VIDEHA — Issue 128 / अंक १२८

Publication: VIDEHA · Issue: 128
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ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह'१२८ म अंक १५ अप्रैल २०१३ (वर्ष ६ मास ६४ अंक १२८) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ कला :: सबल समाजक अर्न्‍तद्वन्‍द्वपर सकारात्‍मक प्रहार २.२.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-४ २.३.नवेंदु कुमार झा-बाँटल गेल मैथिली: बरत मिथिला ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-२ ३.२.सुमित मिश्र- भक्ति गजल ३.३.जगदानन्द झा ‘मनु’-गजल ३.४. १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.मनोज कुमार मण्‍डल ३.५.राजदेव मण्‍डल ३.६.अमित मिश्र-प्रमाण बालानां कृते-जगदीश प्रसाद मण्डल- बाल उपन्यास- नै धाड़ैए विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन शास्त्रीयचिन्तनाधुनिकजीवनयोर्मिथः सम्बन्धः।विद्यावचस्पति डा. सदानन्दझाःVIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। संपादकीय १ गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ कला :: सबल समाजक अर्न्‍तद्वन्‍द्वपर सकारात्‍मक प्रहार २.२.ज्योति चौधरी-एक युग: टच वुड -भाग-४ २.३.नवेंदु कुमार झा-बाँटल गेल मैथिली: बरत मिथिला शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ कला :: सबल समाजक अर्न्‍तद्वन्‍द्वपर सकारात्‍मक प्रहार साम्‍यवाद मात्र कोनो राजनैति‍क चेतना नै अति‍क्रमणवादी बेवस्‍थाक वि‍रूद्ध एकटा समाजवादी वि‍चारधारा थि‍क। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक संग ई बड़ पैघ वि‍डम्‍वना रहल जे वचनसँ तँ बहुत रास रचनाकार अपनाकेँ साम्‍यवादी मानैत छथि‍ मुदा जखन कर्मक बेर अबैत छन्‍हि‍ तँ कतौ कोनो सार्थकता नै। इति‍हास साक्षी अछि‍ कोनो भाषा साहि‍त्‍यक वि‍कास ओकर वि‍चारधाराक सम्‍यक सम्‍पोषणपर ि‍नर्भर रहल अछि‍। यूनानी साहि‍त्‍यकार होमरक इलि‍यड आ ओडेसी, कार्ल्‍स मार्क्‍सक दास कैपि‍टलसँ लऽ कऽ मैक्‍सि‍म गोर्की मदर आ माओत्‍से तुंगक आनकन्‍ट्राडि‍क्‍सन सन सारगर्भि‍त वि‍देशी पोथी समन्‍वयवादक स्‍थापनाक लेल क्रांति‍क द्योतक थि‍क। लि‍यो टाल्‍सटाय आ लेनि‍न ऐ दर्शनमे सूरमाक काज केलनि‍। आर्यावर्त्तक इति‍हास सेहो ऐसँ अक्षोप नै। रामचरि‍त मानसमे रामराज्‍यक परि‍कल्‍पना आ सवरीक सि‍नेह समन्‍वयवादक द्योतक थि‍क। मात्र चौपाइक कारणे ई ग्रन्‍थ जनप्रि‍य नै भेल। श्री मद्भागवत गीतामे कृष्‍णक उपदेश नि‍श्चि‍त रूपसँ शांति‍क लेल युद्धक प्रतीक मुदा ऐ क्रांति‍मे सेहो समाजमे समन्‍वयवादक आश लगाओल गेल। “देसि‍ल वयना सभ जन मि‍ट्ठा”क कतेको गुणगान कएल जाए मुदा हमर साहि‍त्‍यक इति‍हास श्रंृगार आ यशोगानसँ आगू नै बढ़ि‍ रहल छल। ऐ उपक्रममे ललि‍त आ धूमकेतु सन आधुनि‍क रचनाकार अवश्‍य समन्‍वयवादक आश लऽ कऽ एलाह। ऐसँ पूर्वक साहि‍त्‍य अपन समाजमे केतबो गुणगानक ध्‍वजकेँ जाज्‍वल्‍यमान करए मुदा आन क्षेत्रक लेल मात्र मधुर भाषा बनि‍ कऽ रहि‍ गेल जाइमे पग-पग पोखरि‍ माछ मखानसँ बेसी आश राखब अनर्गल छल। कर्मवादि‍ताक आधारपर जौं ि‍नर्णए कएल जाए तँ साहि‍त्‍यसँ साम्‍यवादक घृतगंध मात्र कि‍छुए साहि‍त्‍यकारक लेखनीसँ झहरैत भेटत, जइमे प्रमुख छथि‍ जगदीश प्रसाद मण्‍डल, बैद्यनाथ मि‍श्र यात्री, चतुरानन िमश्र, ललि‍त, धूमकेतु, गजेन्‍द्र ठाकुर, सुधांशु शेखर चौधरी, कुमार पवन आ श्रीमती कमला चौधरी। वास्‍तवमे मैथि‍ली उपन्‍यास वि‍धामे साम्‍यवादक संस्‍थापक वैद्यनाथ मि‍श्र यात्री (कृति-‍ पारो) आ चतुरानन मि‍श्र (कृति‍- कला) केँ मानल जा सकैछ। ई मात्र संयोग मानल जाए जे दुनू साहि‍त्‍यकारक कृति‍ एकहि‍ वर्ष सन 1947 ई.मे प्रकाशि‍त भेल। ओही कालमे यात्री परि‍पक्‍व रचनाकार भऽ गेल छलाह, मुदा चतुरानन एकटा काँच क्रांति‍वादी युवक रहथि‍। एकटा मजदूर आन्‍दोलनक नेतृत्‍व केनि‍हार 21 वर्षक नवयुवकक लेखनीसँ नि‍कसल ऐ उपन्‍यास नै समाजक लेल लि‍खल क्रांति‍गीतकेँ पूर्ण वैचारि‍क मान्‍यता कि‍एक नै भेटल ई वि‍चारनीय प्रश्न थि‍क। कलाक अति‍रि‍क्‍त चतुरानन मि‍श्रीजी वि‍कास, संझा माए, जागरण आदि‍ लघु उपन्‍यास लि‍खने छथि‍ मुदा सामान्‍य पाठकक लेल साहि‍त्‍यकार नै मानल जाइत छथि‍। कलाक पहि‍लुक प्रकाशन 1948 ई.मे भेल। मैथि‍ली अकादमी सन् 1948 ई.मे ऐ पोथीकेँ फेरसँ प्रकाशन केलक। हि‍रमोहन झा आ यात्री सन चर्चित लोकनि‍ एकर सारगर्भितासँ हर्षित भेलाह, मुदा पाग प्रधान मि‍थि‍लामे “कला”केँ कहए जे वाहवाहीक मुरेठा सेहो नै भेटल। समालोचक लोकनि‍ केतौ-केतौ मर्यादावश उल्‍लेख तँ करैत छथि‍ मुदा “क्रांति‍वीर” कहबामे संकोच होइत छन्‍हि‍ कि‍एक तँ ई साम्‍यवादी राजनीति‍ज्ञ कालसँ पूर्वहिं लि‍खब छोड़ि‍ देलक। आब प्रश्न उठैत अछि‍ जे चतुराननकेँ साहि‍त्‍यक महि‍मा मंडनक पि‍रही नै देल जाए कि‍एक तँ परि‍पक्‍व भेलाह वाद लि‍खनाइ छोड़ि‍ देलक आ संग-संग दोहरी चरि‍त्र जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ सेहो महत्‍व नै देल जाए कि‍एक तँ ओ परि‍पक्‍व भेलाक बाद लि‍खलक आ लि‍ख रहल अछि‍‍ की ई उचि‍त...? एकटा समन्‍वयवादपर आघात मानल जाए। ई दुनू केकरो यशोगान आ केकरो तगेदासँ नै लि‍खलक। एकर एकर गंभीर परि‍णाम जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ “टैगोर साहि‍त्‍य सम्मान” सन सम्‍मान भेटल मुदा मि‍थि‍लाक कोनो समाचार पत्रसँ ई प्रकाशि‍त नै भेल। मैथि‍ली भाषा मात्रमे ऐ प्रकारक अर्न्‍तद्वन्‍द्व संभव छैक। समन्‍वयवादसँ हमरा सबहक ऑत कि‍एक डोलि‍ जाइत अछि‍? एकर अर्थ स्‍पष्‍ट जे भाषाक प्रचारक आ संरक्षक लोकनि‍मे पारदर्शिताक संग-संग प्रति‍भा सेहो नै छन्‍हि‍ आ आत्‍मग्‍लानि‍ (complexion) सँ ग्रसि‍त छथि‍। मात्र 54 पृष्‍ठक एकटा छोट-छीन जेकरा अति‍वादी समालोचकक दृष्‍टि‍मे झुझुआन सेहो कहल जा सकैछ, औपन्‍यासि‍क कृति “कला” मि‍थि‍लाक नि‍रापद समाजक नारी दोहनक वृत्ति‍ चि‍त्र थि‍क। मैथि‍लीमे रचनाक संख्‍या बल आगालक ताल रचनाकारक स्‍तरक मूलाधार होइछ। “कला” पढ़लाक बाद ई अक्षरश: प्रमाणि‍त भऽ गेल। जइ समाजमे अखनो वि‍धवा बि‍आह अमान्‍य मानल जाइछ। ओइ समाजक एकटा नारीमे चेतना आ सकारात्‍मक परि‍णामक संग उद्देश्‍य प्राप्‍ति‍क आश लगभग 66 वर्ष पूर्व राखब एकटा क्रांति‍वादी वि‍चारधाराक कारण मानल जा सकैछ। महेश बाबू गरीब मुदा ऊँच-नीच बुझनि‍हार व्‍यक्‍ति‍ छथि‍। ओ अपन 10 वर्षक ज्‍येष्‍ठ कन्‍या “कला”क बि‍आह नै करए चाहैत छथि‍, मुदा पारि‍वारि‍क स्‍थि‍ति‍ आ समाजक दशो-दि‍शा महेश बाबूक मुख बन्न कऽ देलकनि‍ 50 बीघा जमीनक मालि‍क बूढ़ वर मनेजर भाइसँ कलाक बि‍आह करए पड़लनि‍। अपराधवोध नीक लोककेँ अवश्‍य होइछ। परि‍स्‍थि‍ति‍वश आर्थिक दृष्‍टि‍सँ नि‍:शक्‍त महेन्‍द्र बाबू बेटीक बि‍आहसँ पूर्वहि‍ अपन कनि‍याँक नाओंसँ समाजक आ परि‍स्‍थि‍ति‍क देल पीड़ाकेँ पति‍या स्‍वरूप लि‍ख नि‍पत्ता भऽ गेलाह। एकटा बूढ़ वरक कनि‍याँ जे क्षणहि‍ं पर्व कॉच कन्‍या छलीह आब वयससँ नै मुदा जीवन शैलीमे परि‍वर्तनसँ व्‍यस्‍थि‍त आ बेसाहु भऽ गेलीह। एक वर्षक दाम्‍पत्‍य जीवन व्‍यतीत केलाक बाद अज्ञात यौवना बालि‍का चि‍त्राक “बूढ़ वर” कवि‍ताक नायि‍का जकाँ वि‍ावा भऽ गेलीह। मुदा “जो रे राक्षस, जो रे पुरुष जाति‍। तोरे मारलि‍ हमरा सभ मरि‍ रहल छी...।” केर उद्घोष नै केलीह। माए-बाप आ समाजक देल अवांक्षि‍त वैधव्‍यकेँ मूक स्‍वीकारोक्‍ति‍ कलाक परि‍पक्‍वताक नै परि‍स्‍थि‍ति‍क ि‍नष्‍कर्ष भऽ गेल। “कला” वैधव्‍यक कष्‍टसँ कानलि‍ तँ रहथि‍ मुदा छोट वयसक कारणे जीवनमे एतेक भारी वि‍पत्ति‍क आगमन केर पूर्ण भान नै भेल छलनि‍। “अज्ञात नव यौवना” (कोनो राजकमलक कथानायि‍का नै मि‍थि‍लाक गुणगान करए बड़ा छद्म ब्राह्मण जाति‍क कन्‍या) वि‍धवा संकटा बनि‍ गेली। क्षणि‍क चुहचुहीसँ भरल कलाकेँ देख सासु कहलखि‍न- “वौआसि‍न केर वि‍धवाक शोभा नै संकटे थि‍क तँए हमर वि‍चार जे कहबा लि‍तहुँ?” फेर गंगा कातमे कलाक मूड़न भेल। ई मि‍थि‍लाक तादात्‍म्‍य, मैथि‍ल ब्राह्मणक शक्‍ति‍केँ की मानल जाए? इहए कारण थि‍क जे सम्‍पूर्ण भारतमे धर्म सुधार आन्‍दोलन भेल, मुदा मि‍थि‍लामे नै। ओना ऐ तरहक प्रवृत्ति‍ आन ठामक ब्राह्मणमे सेहो छन्‍हि‍, मुदा एतेक कट्टरता नै। अवलाक शोणि‍तसँ जाि‍तवादी हथि‍यारकेँ पि‍जा कऽ कहि‍या धरि‍ अपनाकेँ “सवर्ण” कहैत रहत, ई तँ अवर्णोक लेल ग्राह्य नै। जौं एतबे टामे “कला”क ललि‍त कलाक इति‍श्री भऽ गेल रहि‍तए तँ वि‍श्ेष गप्‍प नै छल। अवला ि‍नर्वला कलाकेँ हुनक दि‍अर सुन्‍दर बाबू जे वयसमे कलाक पि‍ताक समान छथि‍ चरि‍त्र हनन कऽ कुलक्षणा पति‍ता आ कलंकि‍ता माताक रूप दऽ देलखि‍न। कला गर्भवती भऽ गेलीह। भरि‍ दि‍नक गारि‍ आ शापसँ कला असहज भऽ सासुकेँ जबाव देलखि‍न- “अपन कोखि‍ केहन भेलनि‍ जे एहन सुपुत्र जे जनमओलनि‍। शौख केहन भेलनि‍ जे पचास वर्षक बूढ़ बेटा ले नअो वर्षक कनि‍याँ तकैत छलीह...।” सुन्‍दर बाबू जेे पहि‍ने कलाक चरि‍त्रहंता खलनायक छलाह आब मर्यादा पुरुषेत्तम बनि‍ माइक आदेशपर कलाकेँ मूर्छित कऽ देलनि‍। जखन वि‍यति‍ अबैछ तँ सगरो दि‍श अन्‍हार जेम्‍हरे जीव जेबाक प्रयत्न करैछ तेम्‍हरे संकट। कला भाग कऽ बनारस चलि‍ गेलीह। एकटा तथाकथि‍त मैथि‍ल भद्रमहि‍ला सोमदाइ कलाकेँ षडयंत्रसँ गयि‍का बना कऽ बेचए चाहैत छलीह। एकटा ब्राह्मणी सहायतासँ कला चरि‍त्र दोहणसँ बचि‍ तँ गेलीह मुदा पीड़ा अग्राहण भऽ गेलनि‍। परि‍णाम भेल आत्‍महत्‍याक प्रयास, मुदा अभागलि‍केँ मरनाइ सेहो कठि‍न होइछ। सात दि‍न अस्‍पतालमे रहलाक बाद जखन कि‍छु सुधार भेलनि‍ तँ डॉ. कलानंदसँ साक्षात्‍कार जीवनमे सुखद अनुभूति‍ लऽ कऽ आएल। युवक डॉ. कलानंद आत्‍महत्‍याकेँ उचि‍त नै मानैत छथि‍। ओ सुधारवादी ब्राह्मण छथि‍। वि‍धवाकेँ बि‍आह कऽ लेबाक चाही....। डॉ. कलानुदक तर्क कलाकेँ असहज लगलनि‍। ऐ समाजमे वि‍धवाक नारकीय स्‍थि‍ति‍सँ उद्वेलि‍त कला “सती प्रथा”केँ उचि‍त मानैत छथि‍। केहेन वि‍कट परि‍स्‍थि‍ति‍ थि‍क जइठामक नारी अवला जीवनक अभि‍शापसँ बेसी चरि‍त्र हननक डरसँ सती हएब उचि‍त बुझैत छथि‍। तथाकथि‍त पुरुषप्रधान सबल वर्गक नारी दि‍न भरि‍ खटैत रहए सभ दैनन्‍दि‍नीमे परि‍वारक सहयोगी मुदा यात्राकालमे अशुभ। आश्चर्य अछि‍ समाजक अग्र आसनपर बैसल धर्म ि‍नर्माता आ बेवस्‍थाक कथाकथि‍त मनुवादी प्रवृति‍ ओ दर्शन। जौं मनुवादकेँ हृदैसँ मानैत छथि‍ तैयो एहेन दृष्‍टि‍कोण हएब उचि‍त नै। मनु तँ एकर समर्थन कथमपि‍ नै कएने हेता। जौं हुनको इहए दृष्‍टि‍कोण छलनि‍ तँ एहेन व्‍यक्‍ति‍क लि‍खल स्‍मृति‍ समाजपर कलंक मानल जाए। ऐ क्रममे सभसँ नीक लागल चतुरानन जीक समन्‍वयवादी वि‍चारधाराक बेबाक वि‍श्लेषण। डॉ. कलानन्‍द अन्‍तरजातीय आ अन्‍तरप्रान्‍तीय ि‍बआहक समर्थक छथि‍ कलानंदक ऐ दृष्‍टि‍कोणकेँ साम्‍यवादी वि‍चारधाराक अनुशीलन हेतु चतुरानन जीक आत्‍म उद्वोधन मानल जाए। उपन्‍यासक ि‍नष्‍कर्ष सकारात्‍मक अछि‍। डॉ. “कलानंद” कलानंदसँ “कलाकान्‍त” अर्थात् कला दाइक पति‍ भऽ गेलाह। दंतहीन मैनेजर भाइ जकाँ नै सुन्‍दबाबूसँ संस्‍कृत शि‍क्षा ग्रहण करैवाली “कला”क सुयोग्‍य पति‍- डाॅ. कलानंद। कलाक जि‍ज्ञासा छलनि‍ जे वि‍धवा ट्रेनि‍ंग कैम्‍प चलैत रहए। ओ पूर्ण भेलनि‍। डॉ. कलानंद आब औषधालय खोलि‍ राजनीति‍मे कूदए चाहैत छथि‍। औषधालयसँ जे आमदनी हेतनि‍ ओइसँ परि‍वारक भरण-पोषण डॉ. साहेबक मूल उद्देश्‍य छन्‍हि‍। रचनाकार राजनीति‍ज्ञक लेल प्रश्न ठाढ़ कऽ देलनि‍ जे राजनीति‍मे रहैबला लोक समाज सेवाकेँ अपन उद्देश्‍य बनाबथु। राज्‍यक धनसँ परि‍वारक पोषण नै ई तँ “ऑनरेरी सर्विस” हेबाक चाही। कला सोलह बर्खक बाद अपन नैहर एलीह मुदा सभ कि‍छु नष्‍ट भऽ गेल छलनि‍। ऐ उपन्‍यासमे महाजनवादी सूदि‍खोरी प्रथाक वि‍रोध सेहो कएल गेल अछि‍। नि‍ष्‍कर्षत: ई उपन्‍यास वि‍न्‍याक दृष्‍टि‍सँ कि‍छु वि‍शेष नै कि‍एक तँ मैथि‍लीमे कथोपकथनसँ बेसी वि‍न्‍यासक महत होइत छैक। चोटगर आ रसगर गप्‍प ऐमे नै छैक तँए ई समालोचक लोकनि‍केँ नै पचलनि‍। जौं चतुरानन जीक ऐ तरहक दृष्‍टि‍कोण जे अखन धरि‍ मात्र कल्‍पना थि‍क, समाज द्वारा अर्न्‍तमनसँ स्‍वीकार कऽ लेल जाए तँ चतुरानन जीक लेखनीक सार्थकता परि‍लक्षि‍त होएत। ऐ मौलि‍क कृति‍क प्रासंगि‍कता समाजमे अखनो अछि‍। जे वर्ग स्‍वयंकेँ मस्‍ति‍ष्‍क कहैत छथि‍ ओइमे अखन धरि‍ सम्‍यक साम्‍यवादी तत्‍वक वि‍कासमे लागल धून अखन धरि‍ व्‍याप्‍त अछि‍। ओना स्‍थि‍ति‍ बदलि‍ रहलै आ बाल-बि‍आह लगभग मि‍थि‍लामे न्‍यून भऽ गेलैक मुदा काटर प्रथा आ वैधव्‍य जीवनक दारूणि‍क बेथाकेँ अखनो सबल समाजमे मान्‍यता छैक। ब्राह्मण शि‍क्षा स्‍पोतक मूलांकुर रहल छथि‍ तँए राजतंत्रीय बेवस्‍थामे पएर पुजेबाक हि‍नका अधि‍कार छलनि‍ मुदा कि‍ ऐ वर्गक वि‍द्धत लोकनि‍ ओइ अधि‍कारक प्रयोग समाजमे समन्‍वयवादी बेवस्‍थाक स्‍थापनाक लेल कऽ सकलनि‍? द्रवि‍ड़ समाजमे तँ बहुत हद धरि‍ जाति‍-पाति‍क दृष्‍टि‍कोणमे कमी आएल मुदा आर्य समूह वि‍शेष कऽ कऽ मि‍थि‍लामे अखन धरि‍ आनक प्रति‍माकेँ प्रोत्‍साहि‍त करब वा सांस्‍कृति‍क एवं सामाजि‍क वि‍कासमे भूमि‍का देबएमे सबल वर्गकेँ अखनो कचोट होइत छन्‍हि‍। जाधरि‍ ऐ मानसि‍कतासँ मुक्‍ति‍ नै भेटत चतुराननजी सन समन्‍वयवादी वि‍चारधारा पुरान रहि‍तो नूतन मानल जाएत। वि‍श्वास अछि‍ जे स्‍वयंकेँ मूल्‍यांकन कएल जाए जे हम सभ कतए जा रहल छी इहए “कला”क कलात्‍मता ओ तादात्‍म्‍यक सार्थक श्रद्धांजलि‍ हएत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ज्योति चौधरी एक युग :  टच वुड (भाग – ४) हुनका बुझेबे नै केलनि जे के हुनकर पत्नी छलखिन। ओना ओ सर हमर बिआहमे सभसँ अमूल्य उपहार, काजक अनुभवक प्रमाण-पत्र देला जे अखन तक हमर संजीवनी अछि। हमर बिआहमे बरियाती देरसँ आएल छल। सभ हमरा लग आबि कऽ बात करए लागै छल जे लड़काक मुँह अखन तक कियो नै देखने छथि। हम इम्हरसँ उम्हर पड़ाइत रही। अन्ततः साँझमे बरियाती आएल तँ सभ हमरा छोड़ि कऽ चलि गेल। बस तीनटा बचिया रहए जे आबि कऽ रिपोर्ट दऽ रहल छल। एकटा आबि कऽ कहलक जे वरक मुँह देखाए नै रहल छनि। फेर कनिक कालमे एकटा बचिया समाद अनलक जे वरक मुँह गोल छनि। हम चुपचाप सुनैत रही आ लागि रहल छल जे आब हम ऐ परिवारसँ अलग भऽ रहल छी। ने हँसी आबि रहल छल ने कानि रहल छलौं। मुदा फोटो खिंचवाबैक बड्ड शौक छल, से विडियो आ कैमरामे बढ़िया मुद्रा दइ लेल पूरा प्रतिबद्ध छलौं। आखिर बिआह दुबारा नहिये करैक छल। संगे ईहो लागै छल जे बिआहक प्रयोजनमे बहुत लोकक शौख शामिल रहैत छै, तैं कतौ हम उच्छ्रंखल अथवा स्वार्थी ने प्रमाणित भऽ जाइ, तकर ध्यान रखने रही। पूरा परिवार संगे छल, से बहुत सौभाग्य छल। सबहक बीच बाबाक आवाजक कमी खलि रहल छल। मुदा हमर दाइजी हमरे जकॉं मजबूत छलथि। शुभ कार्यमे कननाइ हुनका नै मंजूर रहनि। आइ हुनका सहित आरो किछु लोक परिवारमे नै रहि गेल छथि, से बहुत दुखद अछि। करीब एक महीना बाद पतिदेवसँ भेंट भेल छल मुदा पारम्परिक पहिराबामे। हम हँसल जा रहल छलौं आ ओ अपन कुर्ता झारैक नाटक करै छलथि, जेना किछु लागि गेल होइन। चारि दिनक अनूना, लोक सभसँ भेँट, सबहक आशीर्वाद, ऐ सभसँ होइत दस दिन कोना बीतल से नै बुझलौं आ सासुर दिस विदा हुअक समए आबि गेल। एक नवतुरिया भाउजो अपन ननदिकेँ विदा करै काल कानि रहल छली, जिनका लेल हम किछु नीक केलियनि से नै बूझल अछि। पढ़ाइये लिखाइमे समए बीत गेल छल। बादमे हम खूब जाइ नैहर आ कहियनि जे अहॉं कानल रही तैं एलौं तँ ओ कहली जे हुनका अपन विदागरी मोन पड़ि गेल रहनि तैं कानल रहथि। दुरागमनमे हम सासुरक द्वारपर कारमे बैसल रही, अपन पतिक संगे। ताबे एकटा बच्ची अपन संगी सभ संगे एली आ हमर मुँह देखेलखिन सभकेँ। हम खूब टेंशनमे रही तँ ओ बच्ची बजली, अहॉंकेँ सचिन टेण्डुलकर बड़ नीक लागै छलए ने। हम परेशान। लागल जे सभकेँ बुझल भऽ गेलनि जे हम अपन पतिकेँ देखै लेल परेशान रही आकि हमर कोठलीमे सचिन तेण्डुलकरक फोटो लागल रहए। कोन बातसँ जुटल रहै ई बात, से नै बुझलिऐ। फेर परिछन प्रारंभ भेल। पतिदेवकेँ हटा देल गेलनि।  कनिये देरमे लागल जे सचिन तेण्डुलकर मैथिली बाजि रहल छथि.. “ जल्दी करू, कनिया थाकल हेथिन।” हम फेर परेशान। सभ जे मुँहमे गुड़ दऽ रहल छलथि से चिबाबऽ लगलौं तँ सास कानमे कहली ..“ई गुुड़ लोक नै खाइ छै।” बुझल तँ रहए हमरा। परेशानीमे बिसरल रही, से मोन पड़ि गेल। घरमे प्रवेश केलौं। सभ काजकेँ पूरा जोशसँ फटाफट केलौं, चाहे बामा हाथे कोठी खोलबाक रहए, अहिबऽफड़ बॉंटबाक रहए अथवा एके बेरमे माँछ कटबाक। आब मुँह देखाइ शुरू। कियो सिखेनहे नै रहै जे ऑंखि बन्द कऽ लेब। दोसर सभकेँ देखने रहिऐ, से मुँह देखाइ बेरमे हम ऑंखि बन्द केनाइ नै बिसरलौं। फेर सभ निअम खतम भेल। सभ सुतलौं आ नींद खुजल, भोरे-भोर फेर सचिन तेण्डुलकरक मैथिली बजनाइसँ। हम फेर परेशान। ओना पार्टीबला दिन बुझि गेलिऐ जे ई सचिन तेण्डुलकर सनक आवाज किनकर छनि। समए बीतल आ सभ सम्बन्धी सभ अपन-अपन ठिकाना दिस विदा भेला। हमर पतिदेव सेहो अपन काजपर लौटि गेला। आब समए छल हमर रसोइ घरमे प्रवेशक। हमरापर दियादनीकेँ विश्वास नै रहनि, से कहलथि किछु साइड बनाउ। हम कहलियनि- हम गुलाबजामुन आ वेजिटेबल सूप बनाएब। सूपक लेल लम्बा लिस्ट पकड़ेलियनि आ गुलाबजामुन लेल रेडीमेड मिक्स आनऽ कहलियनि। सभ हँसय लगलथि जे एहेन मिठाइ बनाएब। ओना हमर चाशनी बढ़िया बनल रहए से सास खूब खुश छलथि। तकर बाद हमर टेस्ट भेल रोटी बनाबइक। कनिये कालमे छोट-छोट रोटीक ढेर लगा कऽ राखि देलियनि। सभ कहलथि- अपने सनक रोटी बनेलौं। ओना हम सैण्डविच, रोटी, पराठा आ पूरी बनाबइमे पहिनेहेसँ नीक रही।  सूप लेल हमरा ननदि कहली जे भैया खुश भऽ जेता ऐसँ। हमर चेहरा चमकि गेल मुदा तखन हमर दियादनी कहली जे अहॉंक पतिकेँ मसालाबला झोर नीक लागैत छनि। फेर की छल, हम तन्मय भऽ कऽ सीखए लगलौं। इम्हर दियादनी कहि कहि कऽ सिखाबइ छलथि जे ई अहॉंक पतिकेँ नीक लागै छनि आ उम्हर भैंसुर आ सास खखसनाइ नै बिसरइ छलथि। फेर हम तिला-संक्रान्तिमे नैहर गेलौं। ओतएसँ लौटि कऽ सासुर आ सासुरसँ सासु-ससुर संगे मुम्बइ। पतिदेव स्टेशन आएल छलाह लै लेल। घर पहुँचलौं तँ सास कहली, चलू ई अछि अहॉंक घर। हम बहुत आह्लादित रही। घर बहुत नीक रहए मुदा छोट रहए आ हमरा लेल सभसँ आश्चर्यजनक रहए जे फ्लैटमे बालकोनी नै रहए। पतिदेव कहला, अतुक्का घर एहेने होइ छै। फेर घरकेँ अपन हिसाबसँ व्यवस्थित केलौं। सासुमाताक असिस्टेण्ट बनलौं आ हुनकोसँ बहुत किछु सिखलौं। होलीमे पूआ पकवान सिखलौं। पतिदेव बहुत खुश रहथि। भोरे भोर ऑफिस चलि जाइ छलथि आ हम घरक काज कऽ अपन कोठलीमे बन्द रहै छलौं। बीच-बीचमे सासु-ससुरकेँ लुडो-खेलक नोक-झोंक सुनैत रहै छलौं। कतेक शान्तिमय समए छल ओ, जे बीत गेल। अपन बेटाक जन्मदिन मनाकऽ सासु-ससुर लौट गेला। हम फेर असगर रहि गेलौं। पतिदेवकेँ बूझल रहनि जे हमरा असगर नै नीक लागैत अछि, से ओ ऑफिससँ जल्दी आबि जाइत छलथि। बीचमे एक बेर ऑफिसक पिकनिकपर सेहो गेलौं। वएह हमर सबहक हनीमून छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नवेंदु कुमार झा बाँटल गेल मैथिली: बरत मिथिला बिहार मे न्यायक संग विकासक दावा करएबला नीतीश सरकारक टेढ़ नजरि मिथिला आ मैथिलीपर लागि गेल अछि। विकासक पिटा रहल ढोलक संगहि प्रदेशमे विकासक बाट खूजल अछि, मुदा विकासक सीमाकेँ बान्हि देल गेल अछि। ओना तँ विकासक धार पूरा प्रदेशमे बहि रहल अछि मुदा विकासक जे परिभाषा नालंदा जिला आ मगध क्षेत्रमे लागू भऽ रहल अछि ओइसँ शेष बिहार विशेष कऽ मिथिला अवश्य वंचित अछि। कुशासनक मारि सहल बिहारमे सुशासनक जे बाट देखाओल गेल अछि ऐमे मिथिला आ मैथिलीक परिभाषा बदलि गेल। केन्द्रक सरकार हुअए कि प्रदेशक सरकार, दूनू मिथिला आ मैथिलीक उपेक्षा कऽ रहल अछि। केन्द्रीय रेल बजटक संगहि बिहारक आम बजटमे मिथिलाकेँ तकैत रहि जाएब। ज्यों केन्द्र उपेक्षा कऽ रहल अछि तँ ओकर कारण सेहो वाजिब अछि। सत्ता प्राप्तिक लेल वोटक राजनीति होइत अछि। ओना संवैधानिक रूपे देशमे लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था मुदा विशेष लाभ ओइ क्षेत्र अथवा सरकार समर्थक दलकेँ होइत अछि जकर सहारासॅ सरकार बनैत अछि। ऐ फार्मूलामे मिथिला असफल अछि। केन्द्रमे सतारूढ़ दलकेँ मिथिलांचलसँ खरड़ि कऽ बाहर कऽ देल गेल अछि। प्रदेशमे सतारूढ़ गठबंधककेँ अपार समर्थन देब सेहो मिथिलापर भारी पड़ि रहल अछि। निरंकुश भेल सरकार अब मिथिलाक आ मैथिलीक पहचान भिरबऽ पर लागि गेल अछि। जगत जननी माता सीताक भाषा मैथिलीपर तलवार चलि गेल अछि आ जगत जननीक मातृभूमि मिथिलापर संकटक तलवार लटकि रहल अछि। खएर, ई सभ तँ सत्ताक खेल अछि। सत्ता अपन हिसाबसँ रणनीति बना शासनक संचालन करैत अछि। बिहारक वर्तमान नीतीश सरकार जइ रणनीतिपर शासन चला रहल अछि तकर सोझ नोकसान मैथिली केँ भेल अछि आ मिथिलाक नोकसानक बाट धऽ लेने अछि। मिथिलाक जनता अपन मांगक लेल संघर्ष कऽ रहल अछि। ऐ क्रममे फराक प्रदेशक मांग सेहो उठैत रहैत अछि। सरकारकेँ मिथिलाक आवाज नै सुनाइ पड़ि रहल अछि। मिथिलाक लड़ाइकेँ कमजोर करबाक लेल सरकार साजिश कऽ रहल अछि। ई साजिश आब हमरा सभक सोझाँ अबि गेल अछि। जगत जननीक मातृभाषा मैथिलीकेँ बॉटि मैथिलीक हक लेल चलि रहल संघर्षकेँ कमजोर कएल गेल अछि। प्राथमिक स्तरसँ मैथिली भाषामे पढ़ाइ हुअए, ऐ लेल कतेको वर्षसँ संघर्ष चलि रहल अछि। कांग्रेसक शासन कालमे ऐ लेल मैथिली भाषामे पोथी सेहो प्रकाशित कएल गेल छल। मुदा ओ मात्र कागज धरि सीमित रहल, ऐसँ मैथिलीकेँ कोनो लाभ नै भेल तँ नोकसान सेहो नै भेल। नीतीश सरकार प्राथमिक स्तरसँ मातृभाषामे पढ़ाइ प्रारंभ कएलक अछि। ऐमे बिहारक क्षेत्रीय भाषा मैथिली आ भोजपुरीक संग अंगिका आ बज्जिकाकेँ जगह दऽ मैथिली भाषाक बँटवारा कऽ मैथिली भाषाक अस्तित्वपर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ कऽ देलक अछि। मैथिली, भोजपुरी भाषाक पोथीक संगहि अंगिका आ बज्जिका भाषामे सेहो छपलक अछि। मातृभाषा बँटि गेल। मातृभूमिमे बँटबाक साजिश भऽ रहल अछि। मिथिला आ मैथिलीक नामपर राजनीति कऽ रहल राजनेता आ मैथिल विद्वान मौन धारण कएने छथि। सत्तारूढ़ दलक अंग प्रदेशक एकटा नेताक इशारापर मैथिलीक महत्वकेँ कम करबाक लेल अंगिकाकेँ महत्व देल गेल अछि। दोसर दिस अंगिकाकेँ सेहो आगाँ कएल गेल अछि। ई जनतब अछि जे प्रति पाँच कोसपर भाषाक स्वरूप बदलि जाइत अछि। अंगिका आ बज्जिका मैथिली भाषाक बहिन अछि। क्षुद्र राजनीतिक लाभक लेल मैथिली प्रेमक नौटंकी करएबला राजनेता मैथिली भाषाकेँ बाँटि चैनक बासुरी बजा रहल छथि। हमरा सभ एतेक पैघ बेवकूफ छी जे ओइ राजनेताकेँ माथपर बैसबैत छी जे भाषाक विरूद्ध साजिश करैत अछि। अंगिका आ बज्जिका फराक भाषाक रूपमे कोनो एक दिन अस्तित्वमे नै आबि गेल अछि। ऐमे सत्ताक शीर्ष नेतृत्वक हाथ अवश्य रहल हएत। मिथिला आ मैथिलीक पहरूआ कहएबला राजनेता सभकेँ एकर जनतब नै भेल हएत ई मानऽबला गप नै अछि। दरअसल मजगूत सत्ताक आगाँ मिथिलाक वर्तमान राजनेता असहज छथि। स्वतंत्राक ६४ वर्षक बादो मिथिला आ मैथिली पिछड़ल अछि। बावजूद एकर मिथिलावासी अपन हिसाबे जीवनक गति आगाँ बढ़ा रहल छथि। मिथिलाक भूमि शांतिक केन्द्र अछि, ऐठाम उग्रताक कोनो जगह नै अछि। देशमे भाषा आ प्रदेशक लेल कतेको उग्र आंदोलन भेल अछि जइमे किछु सफल सेहो भेल। ई जनैत जे सरकार उग्रताक भाषा बुझैत अछि मिथिलावासी अपन हिसाबे आंदोलन आ राजनीति करैत छथि। संगहि राजनीतिक महत्व सेहो अछि। बिहारक बँटवारा उग्र आंदोलनक परिणाम आ तात्कालिक सत्ताक कुर्सी बचैबाक लेल ओकर महत्वक परिणाम अछि। आंदोलनक मिथिला प्रतीक्षा कऽ रहल अछि। क्षुद्र राजनीतिक लाभक लेल मैथिलीक अस्तित्वपर जे प्रश्न ठाढ़ कएल गेल अछि ओकर मुँह तोड़ उत्तर देबाक लेल हमरा सभकेँ सजग होमए पड़त। मातृभाषाकेँ सरकार बाँटि देलक अछि तँ मातृभूमि मिथिलाक कपारपर संकट अछि। जिलामे पसरल मिथिला अंग, बज्जिकांचल, सीमांचल आ सुरजापुरीक रूपमे बाँटल जा रहल अछि। एक समए छल जखन मिथिला किछु वर्षक लेल प्राकृतिक कारणसँ दू क्षेत्रमे बँटि गेल छल। कोसीपर पुलक अभावमे मिथिला फराक भऽ गेेल छल। केन्द्रमे अटल बिहारी वाजपेयीक नेतृत्वबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार कोसीक महासेतुक जे उपहार देलक ओइसँ मिथिला एक अवश्य भेल मुदा बिहारक राजग सरकार वाजपेयीक ऐ उपहारक हिसाब मैथिलीक आ मिथिलाकेँ बाँटि चुकता करबापर लागल अछि। मिथिलावासी अपन अधिकारक प्रति सजग भऽ जाथि ऐसँ पहिनहि नीतीश सरकार ओकर धरती पकड़ैबाक लेल तैयार अछि। कोनो संस्कृतिकेँ नष्ट करबाक लेल आवश्यक अछि जे पहिने ओकर भाषाकेँ नष्ट कऽ देल जाए। ज्यों भाषा मरि जाएत तँ ओकर भू-भाग मेटाय मे कोनो समय नै लागत, से नीतीश सरकार पूरा मनोयोगसँ कऽ रहल अछि। भारतीय संस्कृतिक रक्षा करबाक दाबा करएबला राजनीतिक दल आ संगठन सेहो नीतीश सरकारक ऐमे डेगसँ डेग मिला कऽ चलि रहल अछि। श्री रामक जन्म भूमिक लेल पूरा देशकेँ अपना माथपर उठबऽ बला दल आ संगठन जगत जननी सीताक मातृभूमि बँटैत देखि रहल छथि। वोटक राजनीतिक भेट चढ़ि गेल अछि जगत जननीक मातृभूमि आ मातृभाषा। आ राष्ट्रवादी सांस्कृतिवादी सभ आँखि पर पट्टी बान्हि निश्चिंत छथि। मैथिली प्रदेशक एकमात्र भाषा अछि जकरा संविधानक अष्टम् अनुसूचीमे स्थान भेटल अछि। ई भाषा सरकारक संरक्षकक अधिकारी अछि। आन प्रदेशमे कामकाजमे क्षेत्रीय भाषाक महत्व अछि। संविधानक अनुसूचिमे स्थान प्राप्त ऐ भाषाकेँ सरकार संरक्षण दऽ देबऽ मे असफल रहल आ एकर महलकेँ कम करबामे कोनो कसरि नै छोड़लक अछि। सरकारक लाभसँ ई भाषा वंचित अछि। कोनो मैथिली पत्र-पत्रिका सरकारक विज्ञापनक लाभ नै उठा सकैत अछि। कि एक तँ सरकारक विज्ञापन नीितमे मैथिली भाषाक कोनो स्थान नै, ज्यों सरकार भाषाकेँ संरक्षण नै दऽ सकैत अछि तँ ओकरा खंडित करबाक सेहो ओकरा कोनो अधिकार नै छै। हमरा जनैत एखनो बहुसंख्यक मैथिली भाषाीकेँ ऐ तथ्यक जनतब नै अछि जे हमर भाषाकेँ बॉटि देल गेल अछि। ऐमे दोष हमर सभक सेहो अछि। हमरा सभ अपन मातृभूमिक संगहि मातृभाषासँ दूर भऽ रहल छी। उच्चस्थल भेलाक बाद मैथिली भाषामे गप नै करब हमरा सभक पिछड़ल हेबाक हीन भावना प्रदर्शित करैत अछि। ज्यों स्वयं सजग नै रहब तँ एकर लाभ दोसर अवश्य उठाओत। दोसर मैथिलीक राजनीति कएनिहारक जे अछि ऐसँ ऐ भाषापर एक खास वर्गक भाषा हेबाक मोहर लागि रहल अछि। हमरा सभमे अपन भाषाक प्रति समर्पणक भावनाक अभाव आबि गेल अछि आ भाषाक माध्यमसँ मात्र सरकारी लाभ आ पुरस्कार लेबऽ मे अपन सभटा विद्वता खर्च कऽ रहल छी। एकर लाभ दिग्भ्रमित क्षेत्रीय विद्यान उठा, राजनेताक लेल राजनीतिक अवसर उपलब्ध करा रहल छथि। मिथिला बरि रहल अछि, मैथिली बँटि गेल, हमरा सभ मौन छी। मिथिला नाम जाप कऽ राजनीति कएनिहार राजनेता, भाषाक विद्वान होएब आ ऐ भाषाक सहारा लऽ जीवन यापन कऽ रहल विद्वत समूहक कानपर ढील धरि नै चलि रहल अछि। स्वार्थक राजनीतिमे जगत जननीक मातृभूमि आ मातृभाषा बिहारक नीतीश सरकारक बलि चढ़ि गेल अछि। शांत पड़ल मिथिलामे अन्हरक कोनो संकेत नै भेटि रहल अछि। सरकारक गौण एजेंडा आब सभक सोझाँ आबि गेल अछि। भाषा बटल, क्षेत्र बटल, गाम बटल, घर बटल। की ऐ बँटवाराकेँ अपन नियति मानि हमरा सभ चुप्प रहब, समए अछि जागू हे मिथिला पुत्र। अहाँक प्रतीक्षा अहाँक मातृभूमि आ मातृभाषा कऽ रहल अछि। ज्यों से नै भेल तँ देश आ प्रदेशक मानचित्रपर हमरा सभ दूरबीन लगा तकैत रहब मिथिला आ मैथिली। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-२ ३.२.सुमित मिश्र- भक्ति गजल ३.३.जगदानन्द झा ‘मनु’-गजल ३.४. १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.मनोज कुमार मण्‍डल ३.५.राजदेव मण्‍डल ३.६.अमित मिश्र-प्रमाण जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गजल १ बिना बियाहे घरमे कनियां    केहेन लगैए कहू त काकी बदलल दुनियां केहेन लगैए वर कनियां दूनूक हाथमे       सेर-तराजू दूनू पक्ष बनल अछि बनियां  केहेन लगैए तारि देलक दूनू कुलकें      पीओ बनिकऽ भौजी ई बेटी लछमिनियां   केहेन लगैए जाहि घरमे क्यो रूसल क्यो भूखल हो ओतऽ झालि ढोलक हरमुनियां केहेन लगैए अहां आब तं दौड़ि सकैछी      यौ बौआ आब अहांकें देब ठेहुनियां    केहेन लगैए उठू मन्थरासं मुक्तिक किछु युक्ति करू शुभक घड़ीमे ई पेटकुनियां केहेन लगैए अहां स्वयं सामर्थ्यवान छी   हे राजन ककरो आगू करब खेखनियां केहेन लगैए २ आखर-आखर सुनिते रहलौं हऽम अहां दिस तकिते रहलौं आइ एतऽ छी काल्हि ओतऽ छी सभदिन सभकें ठकिते रहलौं हंसै-गबैछी हम अनका लग एसगरमे हम कनिते रहलौं सभकिछु अथवा किछु नै चाही सभदिन अहिना रुसिते रहलौं ओ चलबाले बाट बनौलनि हऽम पथिक छी चलिते रहलौं एतऽ अन्हरिया रहलै सभदिन मोम जकां हम गलिते रहलौं कलियुग आर कते दिन रहतै सभदिन सभकें पुछिते रहलौं ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुमित मिश्र करियन , समस्तीपुर भक्ति गजल

हम निर्बुद्धि-पापी बैसल कानै छी पुत्र अहीँके जननी क्षमा माँगै छी

तोहर दुआरि बड भीड़ हे मैया कखन देब दर्शन आब हारै छी

अष्टभुजा नवरुप जगदम्बिके दशो दिशा विभूषित अहाँ साजै छी

ममतामयी झट दया-दृष्टि करु नाव भँवरसँ दुःखियाके उबारै छी

अरहुल फूल आ ललका चुनरी असुर विनासिनी जगके तारै छी

"सुमित" बालक जुनि ज्ञान हे दुर्गे चरण बैसिकऽ गीत अहीँके गाबै छी

वर्ण-12 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल

माँ शारदे वरदान दिअ हमरो हृदयमे ज्ञान दिअ

हरि ली सभक अन्हार हम एहन इजोतक दान दिअ

सुनि दोख हम कखनो अपन दुख नै हुए ओ कान दिअ

गाबी अहीँकेँ  सगर गुण सुर कन्ठ एहन तान दिअ बुझि पुत्र ‘मनु’केँ माँ अपन कनिको हृदयमे स्थान दिअ (बहरे रजज, मात्रा क्रम - २२१२-२२१२) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.मनोज कुमार मण्‍डल १ जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा अनुपम गीत भगवती गीत- एना कि‍अए बनेलौं हे मइये एना कि‍अए बनेलौं। दुनि‍याँ रचै-बसैले दुनि‍याँ अहाँ बनेलौं। भूमा भोग भगा-भगा माइयक कोर छोड़ेलौं। हे मइये......। सूखल रोटी अल्‍लू सनि‍ सानि‍ दि‍न-राति‍ कि‍अए खुएलौं बाँकी भगा-भगा कऽ रोग-वि‍याधि‍ पठेलौं एना कि‍अए......। जामंतो फूल-गाछ सि‍रजि‍ जामंतो फूल-फल सजेलौं चीन्‍ह-पहचीन्‍ह वि‍स बि‍सरा अगुआ थारी खि‍ंचलौं हे मइये एना कि‍अए......। बानि‍ वहारि‍ नयन दहाड़ि‍ बनवासी बना पठेलौं। कलपि‍-तड़पि‍ तैयो कहै छी हीआ जोगि‍ जोगेलौं हे मइये एना कि‍अए......। आनक बोझ...... आनक बोझ उठाबै खाति‍र अपनो बोझ भड़कि‍ गेलै। दबि‍-दबि‍, उनरि‍-उनरि‍ जुन्ने बीच ससड़ैत गेलइ। मीत यौ, अपनो......। पसरल पानि‍ धार तरहत्‍थी बीतल-अतल बनैत गेलै। सि‍र ससरि‍-ससरि‍ सर अपनो पएर पि‍छड़ैत गेलै। मीत यौ, अपनो......। रहलै ने सुधि‍-बुधि‍ मि‍सि‍ओ मोसि‍आनी बदलैत गेलै। उज्जर कागज-कलम कहि‍-सुनि‍ आखर कारी अंकड़ैत गेलै। मीत यौ, आखर......। घूरि‍ घूर घुड़लै जखन मारि‍ मेघ मारैत गेलै। कटि‍ कोदारि‍ कोदरकट्टा भऽ भऽ रूप अमावस धड़ैत गेलै। मीत यौ, जुन्ना बनि‍ ससरैत गेलै। मीत यौ, आनक......। २ मनोज कुमार मण्‍डल पाँचटा बाल कविता- कित -कित तूँ कित-कित खेल एक्के टांगपर रेंग-रेंग चारू कात घूम दोसर रोपने बनमे चोरनी नै तँ रानी बन बुच्ची तोरा टांग छौ दू एक टांगसँ रानी बनै छै दोसर रहने महरानी एहने छै जिनगीक खेल नीत चलत ओ पहुँचत नै अबेर रुकने-झुकतै माथ हरबेर। सुन बाबू  सुन सुन सुन सुन सुन बाबू सुन सीख एहेन गुण बाबाक पगरी आ बाबूक माथ नै करियनु कहिओ सुन्न सुन सुन सुन सुन दैया   सुन हीरा मोती की चमकतै चमकै छै तँ गुण गुणक गहना जे पहिरत से बनत गि‍रथनि‍ सुन सुन सुन धिया-पुता सुन सगतर छि‍ड़ि‍आएल छै गुणक मोती बुधि लगा कऽ जे भऽ सकौ से बीछ‍ सुन सुन सुन मुन्ना आ मुन्नी सुन मनक खेतमे बुधिक बिआ बून फड़तौ ओइमे कएक-ने-कएकटा गुण। लोभ कुत्तिया दिदिक बिआहमे घनेरो कुत्ता बरियाती आएल दोस्त रहनि‍ मूसाजी तिनको ओ संगे नेने एलाह सखी-बहिनपा देखैले एली बिलाइ मौसी सेहो एली मूसाजीकेँ देखते देरी जीसँ खसलन्हि‍ पानि मूसाजी लग सहटि‍ ओ बैसली बजलि एहेन सुन्नर कतए भेटत हमरा वर। बक-बक कर नै बक बक बनिहेँ नै ठक तूँ एहन महक खुजि जाए सबहक भक हेतौ नै तोरापर केकरो शक तूँ बुधिसँ अपनाकेँ ढक बनबे आँखि‍क तारा सबहक चलैत रह बेधरक। इंजन नम्हर-नम्हर लगि रहल छै दुइये पटरीपर चलि रहल छै एक्केटा इंजन केकटा डिब्बा सभकेँ इंजन खींच रहल छै रेलक ई अद्भुत खेल सभकेँ सुन्नर लागि रहल छै पगि भऽ बनि हम इंजन अहिना खींची अप्पन जीवन एहेन हमारा लागि रहल छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल राजदेव मण्‍डल दूटा पद्य लटकल छी दुनू हाथ अछि‍ कड़ीसँ बान्‍हल ओहीपर हम अँटकल छी पएरक नीचाँ उधि‍अाइत समुंदर आसमानमे लटकल छी छड़पटेलासँ हाड़-पांजर दुखाइत अछि‍ बेसी चि‍चि‍एलासँ कंठ सुखाइत अछि‍ कहुना कऽ जीब रहल छी जि‍नगीक जहर पीब रहल छी नीचाँ गीरब तँ डूमि‍ मरब तँए की हम लटकले रहब आब नै मानब जेकरा नै देखने छी तेकरो जानब बन्‍हन तोड़ि‍ नीचाँ फानब नै डरबै कठि‍न कारासँ लड़बै वेगयुक्‍त धारासँ करबे करब पार उधि‍आइत तेज धार देख रहल छी समुद्रक कछेर तोड़ए पड़त आब कड़ीक घेर जेकरा करबाक चाही सवेर तेकरे केलौं अबेर। बटमारि‍क गीत कि‍एक कऽ रहल छी एना ठेमम-ठेल यौ हम नै छी बकलेल यौ। जहूक लेल हम छी जोग तहूसँ भेल छी अभोग कि‍अए ने भेट रहल अछि‍ जगह हमरो लेल यौ हम नै......। हमरो मन छल गबि‍तौं गान घटले जाइत अछि‍ मान-समान कष्‍टमे रहत जँ मन-प्राण कतएसँ गाएब सुख केर गान दुखसँ नाता अछि‍ आब हमर जुड़ि‍ गेल यौ हम नै......। हमरा लेल जगह नै खाली व्‍यंग्‍यसँ बजबैत अछि‍ सभ ताली असली-नकली करि‍ते-करि‍ते हमहीं बनि‍ गेलौं पूरा जाली हमरा सँगे चलि‍ रहल ई कोन उनटा खेल यौ हम नै......। अहाँ कहै छी- “धरू आस करू बारम्‍बार प्रयास एक दि‍न करै पड़तै अहूँसँ ओहि‍ना मेल यौ नै रहब अहाँ बकलेल यौ।” हम नै......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अमित मिश्र प्रमाण

जेठक निर्मोही दुपहरियामे टूटल-भाँगल एकपैरियापर दुनियाँ भरिक विपतिक पहाड़ भरिगर बोझहामे बान्हि उठेने घामसँ भीजल चिर्री-चिर्री भेल कपड़ासँ भारतक गरीबीक प्रमाण दियाबैत खाधिसँ बचैत, झटकैत जाइत दस वर्षक लड़कीकेँ देखि कऽ प्रमाणित भऽ जाइ छै एकटा कथन जे सत्तमे महापापी छै मनुखक पेट ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते जगदीश प्रसाद मण्डल नै धाड़ैए बाल उपन्यासक आगाँक क्रम... ४ परीक्षाक मास दि‍न पहि‍ने प्रोग्राम नि‍कलल। ओना अखवारो सभमे रहै मुदा असल वि‍द्यालयमे जे आएल छल ओकरे बूझि‍ राधामोहन वि‍द्यालय वि‍दा भेल। सुनबामे ईहो एलै जे अंग्रेजीक तँ परीक्षा हएत मुदा पास-फेलक कोनो महत नै रहत। एक तँ परीक्षाक जि‍ज्ञासा दोसर अंग्रेजी उठावक खुशी मनमे रहबे करै। अंग्रेजी उठावक दसो दुआरि‍ भगवतीक आगमनसँ खुजि‍ जाएत, अंग्रेजी सभसँ बेसी समए वि‍द्यार्थीक खा लैत अछि‍। जि‍नगीक दशो दुआरि‍ खुजैक मैट्रि‍कक परीक्षा, जइमे दसो वि‍षयक पढ़ाइयो होइत आ परीक्षो होइत। ओना जइ हि‍साबसँ अंग्रेजी वि‍द्यार्थीक समए खाइए तइ हि‍साबसँ वापसी नहि‍येँ होइ छै मुदा सोलहन्नी नै होइ छै सेहो बात नै। अक्षत कम देवता बेसी रहने बटाइत-बटाइत वेचारी मैथि‍लीकेँ हि‍स्‍से कम भऽ जाइ छन्‍हि‍। मुदा तँए कि‍ वेचारी नि‍राश छथि‍? नै। नि‍राशाक तँ प्रश्ने मनमे नै उठैत छन्‍हि‍। कारणो स्‍पष्‍टे अछि‍। एक तँ गनल कुटि‍या नापल झोड़ जकाँ स्‍कूलो-कओलेज अछि‍ तहूमे कि‍छु-ने-कि‍छु मैथि‍लीकेँ सेहो भेटि‍ये जाइ छन्‍हि‍, मुदा अधि‍कांश मैथि‍ल तँ स्‍कूल-कओलेज देखबे ने करैत अछि‍। आखि‍र, ओहो सन्‍तान तँ माँ मैथि‍लि‍येक छि‍यनि‍। अहुना, जे कुभेलो करै छन्‍हि‍ तेकरो लेल मनमे कुभेला नहि‍येँ छन्‍हि‍, अपन कर्तव्‍यसँ च्‍युत भऽ बेटा-कुबेटा बनि‍ सकैए मुदा अपन कर्तव्‍य पुरौनि‍हारि‍ धरती सन धीरज रखैवाली माए केना कुमाए बनि‍ सकै छथि‍। ओना हाइ-स्‍कूल अबैत-अबैत बच्‍चा ढेरबा भऽ जाइए, तइसँ पहि‍ने वि‍षय रूपी गुरु अपन-अपन शि‍ष्‍य चुनि‍ लेने रहै छथि‍। मुदा जहि‍ना जेठुआ बर्खाक गति‍ तहि‍ना बाल-बोधक। मुदा हाइ-रे-हाइ, कुबेवस्‍थाक चलैत फि‍जि‍क्‍सक एम.ए. रेल-बसक टि‍कट कटनि‍हार बनि‍ जीवन-यापन करै छथि‍। ज्‍योति‍ष पढ़ि‍ पुलि‍सक लठवाहि‍ करै छथि‍ तइठाम जि‍नगीक बि‍सवासे कते। जखन जि‍नगीयेक बि‍सवास नै तखन जि‍नगी जीनि‍हारेक बि‍सवास कते। खैर जे होउ...। प्रोग्रामक उमकी राधामोहनक मनमे उमकले रहए, साढ़े दस बजे स्‍कूल खुजैए, पूर्वाह्नेक काज नीक बूझि‍ वि‍दा भेल। अंति‍म फागुनक समए, मास दि‍नसँ ऊपरेक वसन्‍त भऽ गेल छल। फगुआक उमकीमे जहि‍ना उमकैक वि‍चार मनमे उठै छै तहि‍ना राधामोहनक मनमे सेहो दशो दुआरि‍क दीप जरबैक उमकी रहबे करै। मुदा घरसँ नि‍कलि‍ डेगे-डेग जते आगू बढ़ैत ओते मन पाछू दि‍स ससरए लगलै। मनकेँ पछुआइत देखि‍ उमकि‍यो पाछूए दि‍स मुड़ि‍ गेलै। राधामोहनक मनमे उठलै जि‍नगी आ परीक्षा। आकि‍ जि‍नगीक परीक्षा? शुद्ध पानि‍ ने इनार-पोखरि‍मे असथि‍र रहैए मुदा जखन ओकरा चीनी वा नूनसँ दुषि‍त करबै, भलहि‍ं ओ जीवनोपयोगि‍ये कि‍अए ने हुअए, मुदा दुषि‍त तँ भेबे कएल? राधामोहनक वि‍चारमे दू दल अपन-अपन वि‍चार लऽ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। घंटो-लक्कर-झक्कर भेलो पछाति,‍ नै फड़ि‍आएल जे बुधि‍यो ज्ञान छी आकि‍ ज्ञान अानैक बाट। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍‍ति‍मे राधामोहन ओझरा गेल। जि‍राएल आदमी जहि‍ना पहि‍ल झोंकमे बेसी दूर दौड़ लगा लइए मुदा धीरे-धीरे उत्‍साहमे कमी हुअए लगै छै तहि‍ना राधामोहनक सेहो भेल। उत्‍साह कमि‍ते देहमे थकथकीक आगमन भेलै जेना-जेना थकथकी बढ़ैत गेलै तेना-तेना थकाएल बूझि‍ पड़ए लगलै। आधा रास्‍ता तँ टपि‍ चुकल छल मुदा आधा टपब भारी बूझि‍ पड़लै। गाछीक छाहरि‍ टोहि‍या कोनैला बड़बड़ि‍या गाछ लग पहुँच, बैस गेल। एक तँ ओहुना पुरान पत-झड़ि‍ नव पत-धार बड़बड़ि‍या गाछक सेखी रहबे करै। तइपर कनी सि‍हकी ि‍सहकि‍ते रहै, फागून रहने मजर संग टुकलो रहै। रौद गरमेने दोहरी बोझ राधामोहनक माथपर चढ़ि‍ गेल रहै। मुदा गाछक छाहरि‍ जेना राधामोहनक कोहि‍ फेड़लक। नजरि‍ गाछी दि‍स बढ़लै। बड़बड़ि‍या आमक गाछक सटले पति‍आनीमे फैजली आमक गाछ। बड़बड़ि‍ये गाछक जड़ि‍ लगसँ देखए लगल। दुनू आमेक गाछ छी मुदा, एना कि‍अए अछि‍ जे एकटा कि‍लो भरि‍क आ दोसर कि‍लोमे पचास चढ़ैत। प्रश्नक ठेहसँ राधामोहन ठेहि‍याए लगल। मन घूमि‍ समए दि‍स ससरलै। चौबीस घंटाक भीतर दि‍न-राति‍मे कते अन्‍तर होइ छै। बारह बजे दि‍नमे लोक दुनि‍याँक कोण-कोण देख सकैए आ बारह बजे राति‍ ओछाइनसँ उठि‍ पेशाबो करैले जाइकाल संगीक जरूरत पड़ैै अछि‍। मुदा फागुन मासमे सूर्योदय आ सूर्यास्‍त केना एके रंग मनोरहम बनि‍ जि‍नगीक बाट पकड़ैए। भलहि‍ं एकटा अन्‍हार दि‍स बढ़ैत दोसर इजोत ि‍दस। बड़बड़ि‍या-फैजलीक बीच राधामोहन लटकि‍ गेल। कि‍छु फुड़बे ने करै जे गाछ-बि‍रीछ लोकक देल छि‍ऐ, ई तँ सुच्‍चा भगवानक देल छि‍अनि‍। लोक ओकर सेवा करैए आ गाएक दूध जकाँ अमृत खाइए। मुदा ई तँ अद्भुत अछि‍ जे दुनू आम रहि‍तो एना अकास-पतालक अन्‍तर कि‍अए छै। भगवान तँ केकरो ने अधला करै छथि‍न आ ने अधला सोचै छथि‍न। सोचबो केना करथि‍न अपने शक्‍ति‍सँ ने सोचैकेँ शक्‍ति‍ दइ छथि‍न। तहि‍ना हाथ-पएर थोड़े रखने छथि‍ जे कोनो काज करता। ई तँ जरूर लोकक करतुत छी। तइ बीच बड़बड़ि‍या आ फैजलीक बीच कहा-कही हुअए लगलै। फल देखि‍ फैजली बाजल- “रे बड़बड़ि‍या, हमर कि‍लो तोरा नानासँ नम्‍हरे हएत।” फैजलीक बात सुनि‍ बड़बड़ि‍या गरमाएल नै, अखन धरि‍ अपनो मन मानैत छलै जे फैजलीक आगू हम छि‍हे नै। जहि‍ना बनि‍या दोकानक मंगनी बौस, तहि‍ना छी। मुदा एकटा गुण तँ हमरोमे अछि‍ये जे अनको-आन गाछक आम लेलो पछाति‍ झगड़ा नै हुअए दइ छि‍ऐ। मुदा एकटा फैजली आम, एक छर कुशि‍यार, एक पुड़ा मखान कतेक कपार फोड़ने अछि‍। मनमे खुशी रहने बड़बड़ि‍या बाजल- “धरमागती बाज जे जेहन सोझ-साझ हमर शीलो आ डारि‍यो अछि‍ तेहेन तोहर छौ। केकरो संग कि‍यो जाएत नै। बाज?” फैजलीकेँ चुप होइते बड़बड़ि‍या रेबाड़ि‍ कऽ फेर बाजल- “सुनि‍ ले, हमरे भाए-भाति‍ज, तोरा डारि‍मे सटि‍ अपन मुड़ी कटा हृदए देने छौ, जइपर तूँ ठाढ़ छेँ।” दुनूक झगड़ा देखि राधामोहन अपन काज -स्‍कूल जा प्रोग्राम लि‍खब- बि‍सरि‍ गेल। जि‍रेला पछाति‍ गाछ तरसँ उठि‍ वि‍दा भेल। ख-खाएल मन रस्‍ते बि‍सरि‍ गेल जे कतए जाइ छलौं। थकथकाइत राधामोहन घरमुहेँ भेल। जहि‍ना हराएल-ढेराएल गाए-महि‍ंसक बच्‍चा साँझू पहर डि‍रि‍आइत घर दि‍स अबैत तहि‍ना राधामोहन जतेक घर दि‍सक बाट टपैत ततेक जोर-जोरसँ मनमे हूँहकारि‍ उठै। गाछी आ घरक अाधा बाट टपैत-टपैत राधामोहनक भक खुजल। जेना ओंघाएल, नि‍शाएल, भकुआएल इत्‍यादि‍क भक खुजैत तहि‍ना रस्‍ताक भकमोड़ी लग आबि‍ भक खुजलै। मन पड़लै हाइ रे बा जाइ छलौं परीक्षाक प्रोग्राम लि‍खैले आ आबि‍ कतए गेलौं। ओना चारि‍ बजे तक स्‍कूलक काज चलै छै मुदा ई बारह बजेक रौद अनेरे खाइले जाएब। नै जाएब तँ परीक्षा केना देब? नै परीक्षा देब तँ पास केना करब? दोसर दि‍स मनमे उठै जे पासे कऽ कऽ की करब? जखन आगू पढ़ैक आशे नै अछि‍ तँ मैट्रि‍क पासकेँ मोजरे कते होइ छै जे बेसी फड़त। जेतबे मोजर तेतबे ने फलो। एम.ए-बी.ए तँ ऑफि‍स-कारखानामे दरमानी करैए आ मैट्रि‍ककेँ के पुछै छै। तहूमे जते पढ़लौं तते तँ ज्ञान भाइये गेल अछि‍ तखन अनेरे एकटा कागज (सर्टिफि‍केट) लेल हरान हएब। द्वन्‍द्वमे पड़ल राधामोहनक मनमे उठलै- काजक परीक्षा नै जि‍नगीक परीक्षा असल परीक्षा छी। मुदा जि‍नगी की? जंगलमे जहि‍ना हजारो-लाखो रंगक गाछ-वि‍रीछ रहै छै, जे हजारो रंगक फूल-फड़ दइ छै आ नहि‍योँ दइ छै। तहूमे कि‍छु फूल एहेन होइ छै जे सुगन्‍धि‍तो होइ छै, सुन्नरो होइ छै मुदा फड़क कोनो दरसे ने होइ छै। तहि‍ना कि‍छु फड़ो एहेन होइ छै जे बि‍ना फूलेक फड़ि‍ जाइ छै। कि‍छु फड़ एहनो होइ छै जे फूलसँ पहि‍ने पड़ि‍ये जाइ छै। कि‍छु फड़ एहनो होइ छै जे संगे-संग गाछमे नि‍कलै छै। कि‍छु फूल-सँ-फड़ होइ छै तँ कि‍छु एहनो होइ छै जे फूल केतौ फुलाइ छै आ फड़ि‍ केतौ जाइए। तहि‍ना ने मनुक्‍खोक जि‍नगी अछि‍। जते मनुख तते रंगक फूल-फड़। जहि‍ना बर्खाक उपरान्‍तो आ होइतोखि‍न बून-बून मि‍लि‍ धारा बनबैए। भलहिं एक-दोसरमे मि‍लैत गहींरगर बाट बना गहींर दि‍स वि‍दा होइए। जइसँ चरो-चाँचर, नीचरस खेतो आ पोखरि‍यो-झाँखरि‍ भरबो करैत अछि‍ आ नहि‍योँ भरैत अछि‍। भरबो तँ अजीबे अछि‍। कतेसँ भरब कहब सेहो कठि‍न अछि‍। कि‍एक तँ जौं सोढ़े तीन हाथक मनुखकेँ आधा कि‍लो दि‍न-राति‍ भोजन मानि‍ लेब तँ पँच-पँच सए रसगुल्ला केना पेटमे अँटैए। दस-दस कि‍लो माछ आ दू-दू तौला दही केना पचैए। राधामोहनक मनमे उठलै अनेरे बौआइ छी। काज छोड़ि‍ जखने मन बौआएत तखने बहपनी अाबए लगत। जखने बहपनी आओत तखने धार-सँ-धारा बनए लगत। मुदा धारोक तँ ठेकान नै छै। एक तँ ओहुना धारक धारा जकाँ जि‍नगीक बहान नै अछि‍। कि‍छु एहेन होइए जे जुग-जुगसँ एके स्‍थानपर बोहति‍ आएल अछि‍। तँ कि‍छु एहनो अछि‍ जे दोसरमे मि‍लि‍ अपन अस्‍ति‍त्‍वे मेटा लेलक। ततबे नै, एहनो तँ कोसी-कमला जकाँ अछि‍ये जे सालमे तीन-तड़पान तड़पैए। जते राधामोहन पताल दि‍स वा अकास दि‍स नजरि‍ दौगबैत तते रंगक दुनि‍योँ आ पतालो मनमे अबैत जाइत। अकास दि‍स तकै तँ देखै जे फनि‍गा धरतीसँ उठि‍ कूदि‍-कूदि‍ अकास दि‍स चढ़ए चहैत, घोरन-चुट्टी मरैक पाँखि‍ पहीरि‍ उड़ए लगैत। तहि‍ना पताल दि‍स तकैत तँ एक्के पोखरि‍मे सत-रंगा माछक जीवन-यापन सुख-चैनसँ होइत देखैत। थालक गैंची गैचि‍या-गैचि‍या थालमे बि‍आह-दुरागमन कऽ पत्नीक लगमे राखि‍ जीवनो-यापन करैत आ कुल-खनदानक धुजा गाड़ि‍ बालो-बच्‍चाक उपार्जन करैत। तहि‍ना पानि‍येँमे माटि‍सँ ऊपर रहु-नैन-भाैंकरी अपन-अपन सीमा रेखा खींचि‍-खींचि‍ अपन घरो-दुआरि‍ बनबैत आ परि‍वार संग मि‍लि‍ वंशोकेँ जीवि‍त रखने अछि‍। बाल मन राधामोहनक जेम्‍हर नजरि‍ गौगबैत तेम्‍हर डाभे-कुशमे ओझरा जाए। जहि‍ना चाणक्‍य छथि‍ नै छलाह आ तहि‍याक नालंदा वि‍श्ववि‍द्यालय जे कुश उपटाएब शुरू केलनि‍ ओ कुश अखनो धरि‍ गामे-गाम अछि‍ये, वेचारे असकरे कते गामक उपटौताह। तहूमे एहेन समाजमे जे सदति‍ जमीनदारि‍ये वा जागीरदारि‍ये बनबै पाछू लागल रहैए। एक्के रंगक जागीरदारीक बीच समाज थोड़े अछि‍। साओन-भादोक वायुक गति‍ भलहिं मंथर भऽ जाए मुदा चैती-फुहा, फुहराम हवा तँ केतौ-सँ-केतौ उड़ि‍ते अछि‍। राधामोहनक मन ओही फुहराम हवाक संग उड़ि‍ पुरुषोत्तम लग पहुँच गेल। मुदा अँटकल नै। दरवारमे बैसैसँ पहि‍ने मनमे उठि‍ गेलै जे त्रेता-जुगक जुआन-जहान राम चारू भाँइ भेलाह मुदा समाजक बूढ़-बुढ़ानुसक वि‍चार पि‍ताक वि‍चारक आगू कि‍अए ने मानलनि‍। समाजक जते बूढ़-बुढ़ानुस छेलखि‍न ओ अपनामे वि‍चार कि‍अए ने केलनि‍ जे राम सन परब्रह्म समाजक अंग बनल रहए। नै कि‍ बनलो बि‍गड़ि‍ जाए। तइसँ नीक जे हुनके (रामेक) वृद्ध परपि‍तामह दि‍लीप छथि‍ ति‍नके दरवार जा अपन उचि‍ती-वि‍नती कि‍अए ने करी जे अपना राजमे बासो देबे करता। जना कानमे काेनो दि‍शासँ कोनो तरहक अवाज अनायास प्रवेश कऽ मनकेँ जगा दैत तहि‍ना राधामोहनक मनमे जगल। अपन संकल्‍पक संग अपन जि‍नगी बना जीब। जौं से नै तँ हारि‍ कि‍ भेल? जाधरि‍ मनुष्‍य दोसराश्रि‍त रहत (वैचारि‍क छोड़ि‍) ताधरि‍ पर्यावरणमे कमी हेबे करतै। जि‍नगीक पहि‍ल वि‍चार जखन मनमे उठल तँ कि‍ ओ अधला उठल। जौं नै अधला तँ कि‍अए ने पालन-पोसन करब। जाबे धरि‍ दूध पैदा करैक शक्‍ति‍ मनुष्‍यमे नै आओत ताबे धरि‍ हंसक बास केना भऽ सकै छै। जतए दूध रहत ततए ने हंसोक बास रहत। मुदा दूध-पानि‍ बेरौनि‍हार हंस मनुखक देल पानि‍ बेड़बैत अछि‍ आकि‍ भगवानक देल जे गाए-महिंसक पेटेमे फेँटल रहैत अछि‍ तेकरो बेड़बैत अछि‍? बाल-बोध बच्‍चा जहि‍ना चलै जोगर टाँग होइते पछोर धऽ चलए चाहैत मुदा चालि‍क गति‍ पछुआ दोसर बाट सेहो धड़ा जाइत मुदा बाट तँ बाटे छी। राधामोहनक मन तहि‍ना बाटक आशा बाट पकड़ि‍ बौआए लगल। मन पड़लै अपन पहि‍ल बाट। गाएक पालन-पोसन। मनमे उठि‍ते उठि‍ गेलै परि‍वारमे गाए नै धाड़ैए। तँ धाड़ैत कि‍ अछि‍। धार-साज तखन बनै छै जखन ओइमे मन मधुरस आबि‍ मनकेँ पकड़ै छै। पशुपालनक अंग भेल गाए पोसब। पशुपालन कृर्षिक अंग रहल अछि‍। कि‍सानक देशक वि‍कास बि‍ना कि‍सानी प्रक्रि‍यासँ संभव छै? अपना लि‍ये अपन दुनि‍याँ बना-बना बैसि जीवन-यात्रा भरि‍सक सभसँ नीक होइ छै। जइ बीच नि‍वास करैत अपन तन-मन-धनक एकाग्र करैत अछि‍। राधामोहनक जिज्ञासा आरो बढ़ल। जि‍ज्ञासा बढ़ि‍ते मनमे उठलै लि‍खि‍त-अलि‍खि‍त वि‍चार पकड़ब। केता दि‍न अखबारक पन्नामे पशुपालनक लेख देखै छि‍ऐ, मुदा ओकरा पढ़ै कहाँ छी? कि‍यो पढ़ै छी जे भारत-अमेरि‍कासँ कते रणसँ जीतलक तँ दोसर कोनो पछुएलहा देशसँ कते रणसँ हारल। तँ कि‍यो पढ़ैत पूरा इलाकामे बैंकक कि‍ कारोवार छै। तँ कि‍यो पढ़ैत चोरी-डकैती कते भेल। तँ कि‍यो पढ़ैत रेलक भाड़ा बढ़ि‍ गेल आब लोक गाड़ीमे केना चलत। ई सभ सच्‍चाइ सामने अबि‍ते राधामोहनक मन बौअाए लगलै। अफसोच करैत अखवारसँ रेडि‍योपर आबि‍ गेलै। जे भाषा बुझै छी तइमे सैकड़ो कार्यक्रम प्रति‍दि‍न कृषि‍क अछि‍। अखवार हुसल तँ हुसल आइयेसँ रेडि‍योक कार्यक्रम सुनब। मन आगू बढ़लै। कृषि‍ कओलेज पूसापर गेलै। ओइठाम कि‍सान मेला लगैए जइमे कृषि‍क अधि‍क-सँ-अधि‍क जानकारी भेटै छै। सतसंगे सँ ने संगति‍ सुधरबो करै छै आ बि‍गड़बो करै छै। अनेरे मन बौआबै छी। जखन वि‍श्ववि‍द्यालय अछि‍ये तखन आरो कि‍ चाहबे करी। मन ठमकलै। वि‍श्ववि‍द्यालय लेल उन्नति‍ खेतीक जरूरत अछि‍ तइठाम जौं कओलेज कम रहै तहूमे सीमि‍त पढ़ाइ होइ, ओहू सीमि‍तमे कि‍ताबीये शि‍क्षा धरि‍ समटा जाए, तखन वि‍कास केना हएत? जरूरति‍ अछि‍ कृषि‍ शि‍क्षाकेँ खुला वि‍श्ववि‍द्यालय बना सभ स्‍तरक कि‍सान पैदा करब। जौं से नै तँ कि‍ मन-कर्म-वचन समतुल्‍य भऽ सकै छै? आकि‍ पुरना लोक नवका कम्‍पनीक अंगूरक रस पीब बेसी भँसि‍या कहलनि‍? ओझराएल बाट देख-देख राधामोहनक मन आरो ओझरा गेल। हृदए सुखए लगलै। मन तरसए लगलै। बकार बन्न हुअए लगलै। मुदा कि‍ हमहीं सभ ऐ देशक भवि‍ष्‍य छि‍ऐ। जेकर अपने ठेकान नै छै। कहब असान छै जे नवयुवककेँ भरमबैले कहल जाइ छै मुदा केहेन युवक पैदा भऽ रहल अछि‍? लगले उड़ि‍ हंस बनि‍ जाएब आ लगले मोड़नीक चालि‍ धऽ लेब आ लगले गाछपर बैस उल्‍लू जकाँ मुँह दुसए लगबै। जहि‍ना बेर-वपत्ति‍ पड़लापर संगी संग छोड़ि‍ दइ छै तहि‍ना राधामोहनक मनक सभ संगी संग छोड़ए लगलै। मुदा ओहनेठाम सत संगि‍योँ भेटै छै। जहि‍ना नीन नि‍पत्ता तहि‍ना बुधि‍यो बि‍ला जाइ छै। जइसँ ने देहमे सक रहै छै आ ने अक चलै चलै छै। जौं अके नै चलतै तँ बक केना चलतै। जौं बके नै चलतै तँ बतक जकाँ माटि‍-पानि‍ एके केना बुझतै। अधमड़ू अवस्‍थामे राधामोहन रेडि‍यो खोललक। बि‍हारक पहि‍ल समाचार- “सातम दि‍न पूसा मेला आरम्‍भ हएत।” सुनि‍ते राधामोहनक ठेहि‍आएल मन उबि‍आएल। सातम दि‍न कृषि‍ मेला छी। जरूर जाएब। दूरे कोन अछि‍। पहि‍लका जि‍ले तँ छी। असकरो जा सकै छी नै जौं संगबे भेट गेल तँ आरो नीक। ओना जे मनमे अछि-‍ ‘गाए पोसब’ ओहन मन केकरो कहाँ देखै छि‍ऐ। जखन मने नै तखन काजे की आ संगबे कतए। तँए संगि‍योँक कोन आश। ओना चौक-चौराहापर चर्च कऽ देबै। सवारीक सुवि‍धा भइये गेल अछि‍ तहूमे डेढ़ बजे मेलाक उद्घाटन हएत, भि‍नसुरको बस पकड़ने काज चलिये जाएत। तीन दि‍नक मेला छी तीनू दि‍न रहब। गरमी मास छि‍हे, खाइ-पीबैक दोकान-दौरी हेबे करतै। दृढ़ता अबि‍ते संयोगकेँ नीक बुझलक। संयोग कोनो कि‍ अपने अबै छै आकि‍ काज अनै छै। जौं काजे नै तँ संयोग कथीक। जहि‍ना कोनो अबोध बच्‍चा आमक लालचमे नि‍सभेर अन्‍हरि‍यो राति‍मे माए-बाप लगसँ उठि‍ ठेकल आमक गाछ लग पहुँच जाइत तहि‍ना राधामोहन बस पकड़ि‍ पूसा कृति‍ मेला वि‍दा भेल। मेला तँ मेले छी। मुदा मेला की? आेहए ने जे वि‍देशी खेल-तमाशा, ललि‍चगर वस्‍तु आनि‍ अपन जे पुरना मेला छल ओकरा नष्‍ट कऽ रहल अछि‍। सुधार जरूरी अछि‍ मुदा अपनकेँ सोल्हनी दुसि‍ अनकर अपना लेब कि‍ नेनमति‍ नै भेल? कोनो वस्‍तुक संग परि‍वार जुटल छै, ओकर जीवि‍का छि‍ऐ, ओइ जीवि‍काकेँ तोड़ैसँ पहि‍ने ओहन जीवि‍का अनि‍वार्य होइत जे समैक संग चलि‍ सकए। बि‍नु हाथ-पएरक जोंक-ठेंगी जहि‍ना दोसर गर पकड़ि‍ आगू बढ़ैत अछि‍ तहि‍ना जइठामक कि‍सानी जि‍नगीक हाथ-पएर टुटल अछि‍ तइठाम उपाए केहेन होइ? उद्घाटनक समए जहि‍ना दि‍ल्‍लीसँ गाम धरि‍क लोक तहि‍ना रंग-रंगक रेडि‍यो-अखवारबला दन-दन करैत। मुदा सि‍पाही कम। तहूमे बेसी ओहने जे उद्घाटनक पछाति‍ चलि‍ये गेल। क्षेत्रीयता जौं केतौ अधला होइ छै तँ कतौ नीको छै जरूरति‍ अछि‍ क्षेत्रीय कृषि‍ ज्ञानक। मि‍थि‍लांचलक अन्‍हरो-दि‍ठरा बुझैत अछि‍ जे छहटा ऋृतु होइ छै आ छबो रीतक छह सीमा होइ छै आ सीमापर कि‍छु दि‍न मेला लगै छै। ओइ मेलाकेँ ओहए सजा पाबैत जे ओइ तेसीसँ चलैत। एके अन्न एके फल आ एके तरकारी कि‍छु कमो दि‍नक होइत तँ कि‍छु बेसि‍यो दि‍नक। हमर स्‍थि‍ति‍ कि‍ अछि‍ ओकरा पकड़ब अछि‍। जे आन-आन राज्‍यक स्‍थि‍ति‍सँ भि‍न्न अछि‍। कि‍ताबी दौड़मे देशकेँ जानव असान अछि‍ मुदा भोगोलि‍क दौड़मे कठि‍न अछि‍। भलहिं कठि‍न अछि‍ मुदा जीवन-दाता तँ ओहए छी। छोड़ि‍ केना जीब? उद्घाटन भाषण सुनि‍ राधामोहनक मन शीशा जकाँ चमकि‍ गेल। पाथर गीरल काच जकाँ चनचना कऽ चनकि‍ गेल। दुनि‍याँसँ लऽ कऽ बलुआहा माटि‍ धरि‍क बात सुनलक। दोखरो बालु सोना पैदा करैत अछि‍ से तँ राधामोहन पहि‍ल दि‍न सुनलक। ओना पहि‍नो सुनने रहैए जे बालुसँ तेल भले नि‍कलि‍ जाउ मुदा बातसँ हटि‍ नै सकै छी। मुदा ओकरा कहबि‍ये बुझै छल। नि‍यमि‍त तौरपर ग्रुप-ग्रुपमे बँटि‍ कार्यक्रम शुरू भेल। एक संग अनेको ग्रुप। केतौ अन्नक खेतीक तँ केतौ तरकारीक, केतौ फूलक तँ कतौ फलक। केतौ पशुपालन तँ केतौ मुर्गी पालन। जहि‍ना मेलामे प्रेमि‍काकेँ देख आरो मेलाक चुहचुही (रौनक) बढि‍ जाइत तहि‍ना राधामोहनकेँ सेहो चुहचुही भरल मेला बुझि‍ पड़ल। बीचक जे आधा घंटा समए खाली अछि‍ तइमे खा-पी लेब नीक रहत। चारि‍ घंटाक गोष्‍ठी अछि‍। पशुपालन गोष्‍ठीमे राधामोहन बैसल। तीन शि‍क्षकक बीच गोष्‍ठी संचालि‍त भेल। मुदा राधामोहनकेँ बैसारक गप-सपसँ बूझि‍ पड़ए लगलै जे भरि‍सक अपना इलाकाक असकरे छी। कि‍एक तँ मनुष्‍यक पहि‍ल परि‍चय भषे कहबै छै। बेगूसराय आ बकसरि‍या बेसी बूझि‍ पड़लै। मुदा असकरेमे असकर नै बूझि‍ पड़ै। कहनि‍हार शि‍क्षक छथि‍ये, सुननि‍हार जहि‍ना सभ तहि‍ना हमहूँ रहब। तीनू शि‍क्षक पशुपालनक लेल पशुक देखरेख, बीमारीक इलाज आ नस्‍लक चर्च केलनि‍। चारि‍ घंटाक गोष्‍ठीमे तीन-चौथाइ समए नि‍कलि‍ गेल। शेष समैमे ओ सभ (तीनू शि‍क्षक) समस्‍या सुनैक समए देलखि‍न। एका-एकी समस्‍यापर चर्च हुअए लगल। मुदा अनकर भोज सुननहि‍ ि‍क नअ सलि‍या अँचार छल। राधामोहनक मनमे सेहो प्रश्न उठए लगल। गुलछि‍या जकाँ घौंदे-घौंदा। मुदा बाल मन राधामोहनक थकथका गेल। हि‍न्‍दीमे सवाल जबाव चलैत छल। भाषाक गल्‍ती वस्‍तुक (वि‍षयक) गल्‍ती बना दैत अछि‍। अष्‍टम सूचीमे मैथि‍ली रहि‍तो मि‍थि‍लांचलक कोट-कचहरीसँ लऽ कऽ स्‍कूल-कओलेजमे हि‍न्‍दीये चलैए। अपन धि‍या-पुताकेँ अंग्रेजि‍या बनाएब अगुआएल जि‍नगीक लक्षण बुझल जा रहल अछि‍। जरूरति अछि‍ जगत-जीव-ईश्वरकेँ जानब। राधामोहन अपन मनक बात मनेमे रखि‍ लेलक। संयोग भेल। तीनू शि‍क्षक अंति‍म पाँच मि‍नटमे के कतएसँ आएल छी पुछलखि‍न। क्षेत्र सुनि‍ राधामोहनकेँ हूबा भेल। अपन देश अपन भेष अपन भाषा तँ संगी अछि‍ये। ओ अपन परि‍चय मधुबनी जि‍ला नाओंसँ देलक। पड़ोसी गामक एकटा शि‍क्षक। ओ मैथि‍लीयेमे राधामोहनकेँ पुछलखि‍न- “अहाँक गाम?” गामक नाओं सुनि‍ते ओ कहलखि‍न- “अहाँक पड़ोसी छी तँए तीनू दि‍न अपने डेरापर रहब।” डेराक नाओं सुनि‍ दोसर शि‍क्षक हुनका आँखि‍-पर-आँखि‍ देलकनि‍। आँखि‍येक इशारामे जबाव देलखि‍न- “मि‍थि‍लाक धर्म।” सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम होइसँ पहि‍ने धरि‍क ड्यूटीमे पी.एन. बाबू छलाह। ओना गोष्‍ठीक तीनू शि‍क्षकक डेरा सटले-सटल सेहो छन्‍हि‍हेँ। तीनूक एकठाम डेरा रहने साँझ-भोर एकठाम बैस चाहो पीबै छथि‍ आ अपन-अपन देश-कोसक गपो करै छथि‍। बीचक एक घंटा समए बि‍तबक क्रममे पी.एन. बाबू राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “राधामोहन, अहूँ मेला देखए एलौं, घूमि‍-फि‍र देख लि‍औ आ हमहूँ ड्यूटी समाप्‍त कऽ लेब।” “बड़बढ़ि‍या।” कहि‍ राधामोहन मेला दि‍स बढ़ल आ पी.एन बाबू ऑफि‍स दि‍स। ऑफि‍स पहुँचते अपना ग्रुपक चर्च उठल। गोष्‍ठीक नीक कार्यक्रम भेल। बैगकेँ आॅफि‍समे रखने राधामोहनक देहो हल्‍लुक भेल। आगू बढ़ि‍ते लोक दि‍स ठि‍कि‍या कऽ तकलक तँ बूझि‍ पड़लै जे ओहने लोक बेसी छथि‍ जे बम्‍बैया कलाकार जकाँ जेहने जोकर तेहने हीरो हीरो जकाँ छथि‍। नारद भगवान जकाँ जतए स्‍मरण करब ततए गामक वीणाक संग पहुँचलाहाक बाहुल्‍य। कि‍सान कम खा कऽ मेहनत करैबला। मुदा, ऐठामक जे कृषि‍क प्रति‍ष्‍ठा बनल रहल ओ तँ रग-रग पकड़नहि अछि‍‍, जइसँ कि‍सान परि‍वार आ कि‍सानक ठेकाने अमेरि‍को-इंग्‍लैंडमे दैते छथि‍। तँए समैक भूख अछि‍ जे कि‍सानक परि‍भाषा आधुनि‍क कएल जाए। सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम शुरू भेल। राधामोहनकेँ संग केने पी.एन. बाबू डेरा दि‍स बढ़ैक वि‍चार केलनि‍। ओना वि‍श्ववि‍द्यालये कैम्‍पसमे डेरा। डेराक संग पान-सात कट्ठाक बाड़ि‍यो झाड़ी। पी.एन. बाबूक घर मधुबनी जि‍लाक भगवानपुर गाम, सुरेन्‍द्र बाबूक घर धर्मपुर नवादा जि‍ला आ दीनानाथ बाबूक बक्‍सर जि‍ला। तीनूक तीन भषे क्षेत्र नै भौगौलि‍क क्षेत्र सेहो। एग्रीकल्‍चरसँ जुड़ल तीनू गोटे तँए तीनू क्षेत्रक जानकारी तीनू गोटेकेँ रहबे करनि‍। ओना भाषाक बीच कोनो वि‍वाद नै रहनि‍, कारणो स्‍पष्‍टे अछि‍। गाम-गाम आ घर-घरक लीला अछि‍ जे मैथि‍ली भाषीकेँ मगहि‍ये आ भोजपुरि‍यो क्षेत्रमे कथा-कुटुमैती होइत आबि‍ रहल अछि‍। कोनो घरक पुरुष मैथि‍ल तँ भोजपुरनी घरवाली आ भोजपुरि‍या घरबलाक मगहि‍नी घरवाली। ओना शब्‍दक कर्कशपन मगहीक अपेक्षा मैथि‍ली-भोजपुरीमे कम अछि‍। कम जबावदेही रहने पी.एन. बाबू समैपर ऑफिस‍सँ नि‍कलि‍ डेरा दि‍स बढ़ैक वि‍चार केलनि‍। मुदा सुरेन्‍द्र बाबू जबावदेहीमे आ दीनानाथ बाबू रि‍पोट दइमे पछुआएले रहि‍ गेला। दि‍नक एक गाड़ी वि‍लम भेने दि‍न भरि‍क गाड़ी बि‍लमि‍ते चलत। मुदा तैयो पी.एन. बाबू दुनू गोटेकेँ कहि‍ देलखि‍न- “गौआँ आएल छथि‍। कि‍छु हाल-चालक समाचार तँ आबि‍ये गेल हएत। लेटो-फेट एकठाम बैस चाह पीबे करब।” आगू बढ़ि‍ते जेना पी.एन. बाबू राधामोहनक गौआँ भऽ गेलखि‍न। पुछलखि‍न- “राधामोहन, अहाँ गामक पजरेमे सुखेत अछि‍, ओत्तै हमर सासुर छी।” परोसी गाम सासुर सुनि‍ राधामोहनक मनमे घनि‍ष्‍ठता जगल। एकबद्ध (एकबद्धू) गाम, एक उपजा एक खान-पान। उगैत उगना जकाँ वि‍भोर होइत राधामोहन बाजल- “श्रीमान्, अपने लोकनि‍ तँ सभ तरहेँ पैघ भेलि‍ऐ, अपनहि‍ लोकनि‍क ने बाँहि‍ पकड़ि‍ आगू बढ़बै।” राधामोहनक बात समाप्‍तो ने भेल छल आकि‍ बीचेमे पी.एन. बाबू टपकला- “जहि‍ना अहाँ अखन नव-तुरि‍या छी तहि‍ना जखन हमहूँ रही तही दि‍नसँ जनै छी जे एक-दोसराक बाँहि‍ पकड़ि‍ गरा-जोड़ी कऽ जीवन-यात्रा करब नीक होइ छै। मुदा से नै भऽ पबैत अछि‍। दि‍न-राति‍ देखै छी जे ठक ठकि‍ बाँहि‍ पकड़ि‍ धकेल-धकेल गरगोटि‍या दइए, तइठाम केकरो बाँहि‍ पकड़ि‍ लेब छौड़ा-छौड़ीक खेल नै ने छी।” पी.एन. बाबूक वि‍चारक गंभीरताकेँ राधामोहन नै परेखि‍ सकल मुदा मनमे तँ ओहन खुशी जागि‍ये गेल रहै जे भरि‍ पेट भोजन, राति‍-बीच रहैक जगह देलनि‍ ओ जरूर नीक बोलो देबे करता। साढ़े सात बजे तीनू गोटे पी.एन. बाबू, सुरेन्‍द्र बाबू आ दीनानाथ बाबू एकठाम भेला। डेराक छतेपर बैसार। एक दि‍स सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक पीह-पाह तँ दोसर दि‍स गाम-घरक कुशल-समाचार। चाह चलि‍ते पी.एन. बाबूक पत्नी सुरेखा सेहो चाह पीब बैसारमे शामि‍ल भऽ गेली। ओना जइ दि‍न दीनानाथ बाबूक मुहेँ मि‍रचाइकेँ तीत सुनलनि‍ तइ दि‍नसँ जेना हि‍नका देखि‍ते वएह मन पड़ि‍ जाइ छन्‍हि‍‍ जइसँ अनेरे हँसी नि‍कलि‍ जाइ छन्‍हि‍। चाह पीब दीनानाथ बाबू बजला- “सभसँ कम उपस्‍थि‍ति‍ मि‍थि‍लांचलेक रहल?” स्‍वीकारैत पी.एन. बाबू बजला- “हँ, से तँ छल। अपन तीनू गोटेक क्षेत्र तीन रंगक अछि‍। माटि‍क (क्षेत्रक) असथि‍रता जइ रूपे अहाँ दुनू गोटे क्षेत्रक अछि‍ ओइसँ भि‍न्न मि‍थि‍लांचलक अछि‍। एक तँ माटि‍ नरम अछि‍ तइ बीच तेज धारक कटावक संग जोरगर बर्खाक संग भुमकमो क्षेत्रकेँ नष्‍ट करैत रहल अछि‍।” पी.एन. बाबूक उत्तर पछाति‍, चुपा-चुपी भऽ गेल। अका-अकी, वका-वकी सभ सबहक मुँह देखए लगला। खढ़ि‍या बच्‍चा जकाँ राधामोहन आँखि‍-कान-मुँह ठाढ़ केने, जे सीखैक समए भेटल कि‍छु सीखब। पी.एन. बाबू गुम जे अपन इलाकाक उखाही करब उचि‍त नै तँए चुपे रहब नीक। मुदा दीनानाथ बाबू जेहने काज करैमे चड़फड़ तेहने बजैयौमे फड़कोर। मनमे उठलनि‍ जखन पी.एन. बाबूक गौआँ एलनि‍, ओना हुनका अपनो गाम छोड़ना पच्‍चीस बर्खसँ बेसि‍ये भेल हेतनि‍, तखन वएह ने अपन बात उठौता। तइ बीच हम सभ अपन क्षेत्रक गप करी ई बूड़ि‍पाना हएत। बूड़ि‍पाना ऐ लेल जे तीनू शि‍क्षकक बीच एकटा दूधमुहाँ बच्‍चाक चाराक ओरि‍यान नै कऽ अपने सभ सभ दि‍ना गप जे ऐ स्‍कीममे एते सुतरल। पूर्णिमा दि‍नक नौत दइ छी। नै तँ सासुरक अमराक अँचारक गप करब। नै तहूसँ तँ मि‍रचाइकेँ तीत कहि‍ गृहि‍णीसँ मुँह दुसा लेब। सभ कि‍छु सम्‍हारैत दीनानाथ बाबू बजला- “भाय, गोष्‍ठीमे जे आँखि‍क इशारा केलौं से अपन अनुभवक आधारपर, तँए एकरा अपना ढंगसँ नै लेबै।” पी.एन. बाबू पुछलखि‍न- “कि‍ अपना ढंगसँ?” दीनानाथ बाबू- “हमरो पत्नी ओम्‍हुरके छथि‍। तते पूजा-पाठ आगत-भागत करै छथि‍ जे घरक जुति‍ये सुमझा देलि‍यनि‍। हाटे-बजार दौड़-बरहा तते करैब‍तथि‍ जे कमेलहो कि‍ खा कऽ पचए दि‍तथि‍। तइसँ नीक जते कमाइ छी पॉकेट खर्च काटि‍ कऽ दऽ दइ छि‍यनि‍। तइ बीच कर्जा केलौं तँ अपन जानी, नइ जौं महाजनी केलौं सेहो अपने जानी।” मुस्‍की दैत बीचेमे पी.एन. बाबू टि‍पलनि‍- “तखन तँ सोलहो आना हि‍साब घरसँ बेड़ा नेने छी?” दीनानाथ बाबू- “नै ने बेड़ाएल होइए, हुनका (पत्नी) लाटक जे कि‍यो अबै छथि‍ ओ तँ सासुरेक पट्टी भेला कि‍ने कि‍छु-ने-कि‍छु बजा जाइते अछि‍। जइसँ घुमा-फि‍ड़ा कऽ दोखी भइये जाइ छी। से सभ छोड़ि‍ कऽ” पी.एन. बाबू गंभीरतासँ प्रश्न दोहरौलनि‍। प्रश्नक गंभीरताकेँ देखैत दीनानाथ बाबू बजला- “देखि‍यौ भाय सहाएब, अपनो वि‍चार ओहने जेहने पत्नीक, तँए अभ्‍यागती परि‍वारमे बेसी बढ़ि‍ गेल। मुदा आइक समैमे जे बि‍गड़ाउ आबि‍ गेल अछि‍ ओ तँ सोझा-सोझी सामनेमे ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। नव पीढ़ीक बोलमे कते झूठ फेँटा गेल अछि‍ जे सत बूझब कठि‍न भऽ गेल अछि‍। जेना-जेना अभ्‍यागती बढ़ैत गेल तेना-तेना घरक वस्‍तु बि‍ड़हाइत गेल। तँए इशारा केलौं।” दीनानाथ बाबू उत्तरक पछाति‍ फेर सभ गुमा-गुमी भऽ गेला। सुरेन्‍द्र बाबू ऐ-ताकमे जे अपन प्रवास लगसँ पी.एन. बाबू प्रश्न उठौता भलहि‍ं राधामोहनक जनमसँ पहि‍ने गाम छोड़ि‍ देने होथि‍, मुदा जएह सएह। पी.एन. बाबूक मनमे उठि‍ गेलनि‍ जे सोझा-सोझी तीन क्षेत्रक तीनू गोटे छी तँए हुनका सभकेँ प्रश्न उठेबाक चाहि‍यनि‍ जइमे हम बीचक कड़ीक काज करब। दीनानाथ बाबू गर लगबैत राधामोहनकेँ पुछि‍ देलखि‍न- “भरि‍ मेला रहब कि‍ने?” आग्रह देख राधामोहनक वि‍चारक बान्‍ह टुटि‍ते भुभुआ गेल- “श्रीमानक, सासुर आ हमर गाम एक्केठाम अछि‍। एकबधूए छी। हि‍नकर ससुर सबहक पूबरि‍या बाध हमरा गामक पछबड़ि‍या बाध छी।” ई गप सुनि‍ते बगलमे बैसल सुरेखाक हृदैमे अपन नैहरक दुर्गापूजा देखब मन पड़ि‍ गेलनि‍। केना संगी सबहक हेँजमे चारि‍ये बजे दि‍आरी लऽ कऽ साँझ दइले जाइ छलौं से दोसरि‍-तेसरि‍ साँझमे घुमि‍ कऽ अबै छलौं। सतमी-सँ-दसमी धरि‍ तँ ठेकाने ने रहै छल जे कखन अंगनामे छी आ कखन दूर्गा-स्‍थानमे। मुदा अखन कि‍छु जौं बाजब तँ बाते अबला-दबला भऽ जाएत। से नै तँ नि‍चेनमे जखन गर लगत तखन गप करब। कि‍यो कि‍ आन छी नैहरक भाए-बोन छी। हमरा सबहक ि‍क ओ युग-जमाना छल जे नैहरेसँ यार भँजि‍येने सासुर अबै छलौं। समाजक कि‍यो छी भाए-बोन छी। दीनानाथ बाबू प्रश्न दोहरबैत बजला- “पूबरि‍या या पछबड़ि‍या बाध कथी कहलि‍ऐ।” राधामोहन- “एक रंग खेत रहने माने माटि‍क सतह एक रंग रहने एके रंगक उपजो-बाड़ी होइ छै आ रौदि‍यो-दही। ओही बाधमे पनरह कट्ठा खेत अपनो अछि‍। अपने खेतक बगलमे आन सभ घासोक खेती करै छथि‍, तँए वि‍चार भेल जे पूसा मेला जाइ छी, जहाँ धरि‍ जे हएत बूझि‍-सूझि‍ आगू करब।” उत्तरक आशामे राधामोहन चुप भऽ गेल। मुदा तीनू गोटे -पी.एन. बाबू, सुरेन्‍द्र बाबू आ दीनानाथ बाबू-क बीच प्रश्नक गड़ उनटा-सुनटा पकड़ा गेल। एक दि‍स देशक स्‍थि‍ति‍क चर्च उठल तँ दोसर दि‍स गामक। तेसर दि‍स एक-एक कि‍सान परि‍वारक। प्रश्ने-प्रश्न उत्तरे-उत्तर गँड़ि‍-मुड़ि‍या हुअए लगल। गपे-सपक क्रममे एहेन गँड़ि‍-मुड़ि‍या भऽ गेल जे तीनू गोटे अपने उबानि‍ हुअए लगला। मुँहसँ बोल नि‍कलि‍ते जहाँ नजरि‍ उठबथि आकि‍ अपने हीआ हारि दन्‍हि‍ जे ओ गड़बड़ भऽ गेल। एकाएकी तीनू गोटेक मुँह बि‍धुआ गेलनि‍। बैसारक रसे समाप्‍त भऽ गेल। दोहरा कऽ चाहो पीब उचि‍त नै, हमरे सबहक दुआरे भरि‍सक घरवारि‍नी भानसो करए नै जाइ छथि‍ तहूमे भरि‍ दि‍नक ठाढ़ ड्यूटी केनि‍हार सेहो छथि‍न। तइसँ नीक जे बैसारे तोड़ि‍ देल जाए। मुदा तीनूक बीच कटाऔझ तँ राधामोहनो सुनलक। ओइ वेचाराक मनमे कि‍ उठतै। मुदा बाढ़ि‍क टुटल बाट होइ आकि‍ टाट लगाओल रस्‍ता, टपब‍ तँ कठि‍न अछि‍ये। सुरेन्‍द्र बाबू आ पी.एन. बाबूक अपेक्षा दीनानाथ बाबूक चपचपी कम रहनि‍। मन गवाही दन्‍हि‍ जे कहुना भेला तँ दुनू गोरे सुरेन्‍द्रो बाबू आ पी.एनो. बाबू सीनि‍यरे भेला कि‍ने। गल्‍ती तँ सभसँ होइ छै। हमरोसँ भेल हएत जे अपने प्रश्नक जबावमे अपने ओझरा गेलौं। मुदा कि‍छु बाजवो तँ घापर नुने छीटब हएत कि‍ने। एक तँ ओहि‍ना दुनू गोटेक मन रब-रबाइत हेतनि‍ तइपर कि‍छु बाजि‍ आरो भक-भका दि‍अनि‍ से नीक नै। मुदा बगलमे बैसल मि‍थि‍लांगि‍नी-सुरेखा तीनू गोटेक दशा देख बीचमे गंगाजल छीटब उचि‍त बूझि‍, दि‍अोरक लेहाजसँ गरगोटियबैत दीनानाथकेँ कहलखि‍न- “मेहनति‍ कऽ कऽ पढ़ने छी आकि रूपैआ-पैसा दऽ कऽ?‍” दि‍ओर-भौजक गप-सपक क्रममे दीनानाथ बजला- “पाइ-कौड़ी तँ खर्चा नै केने छी मुदा दहेजक बदला ससुरसँ नीक रि‍जल्‍ट आ नोकरी जरूर लेने छी।” दीनानाथक उत्तर सुनि‍ सुरेखा बजली- “अखन बैसार तोड़ू भरि‍ दि‍न खटलौंहेँ। फेर काल्हि‍ सेहो अझुके जकाँ खटए पड़त तँए सबेर-सकाल ओछाइनपर चलि‍ जाएब नीक रहत।” ‘एक तँ राकश दोसर नोतल’ हरे-हरे कऽ तीनू गोटे मानि‍ गेला। सुरेखा भानस करए बढ़ली। राधामोहन आ पी.एन. बाबू छतपर सँ नि‍च्‍चाँ उतरि‍ कोठरीमे बैस गप-सप करए लगला। राधामोहन- “श्रीमान्, कते दि‍नसँ ऐठाम छि‍ऐ?” राधामोहनक प्रश्न सुनि‍ पी.एन. बाबू वि‍ष्‍मि‍त हुअए लगला। मन पड़लनि‍ नोकरीक पहि‍ल दि‍न, कओलेजक पढ़ाइ, हाइ-स्‍कूलक पढ़ाइ, पालन-पोसन इत्‍यादि‍। सि‍नेमाक रील जकाँ जि‍नगी पाछू मुहेँ ससरलनि‍। ओही जि‍नगीक फल ने अखन धरि‍ भोगि‍ रहल छी। मुदा...? जे गाम-समाज हमरा सन मनुख बना ठाढ़ केलक ओकरा ले हम कि‍ केलि‍ऐ? प्रति‍ष्‍ठि‍त कि‍सान परि‍वारक बेटा रहि‍तो कि‍ ओइ प्रति‍ष्‍ठाक हकदार बनि‍ पौलि‍ऐ। भक खुजलनि‍। मनमे एलनि‍ समस्‍या तँ एहि‍ना सभठाम ओझराएल अछि‍ मुदा गामसँ आएल नवतुरि‍या बच्‍चाकेँ जौं आबो संगतुरि‍या नै बनाएब तँ सेवा-नि‍वृत्ति‍क पछाति‍ कतए जाएब। मनमे अबि‍ते पी.एन. बाबूक मुँहमे मुस्‍की एलनि‍। जेना अनवरत चलैत साँसक जगह जोरसँ साँस लेला पछाति‍ नाभि‍ तक गति‍मान भऽ जाइत तहि‍ना पी.एन. बाबूकेँ सेहो भेलनि‍। बजला- “राधामोहन, सालक पछाति‍ सेवा-नि‍वृत्त भऽ रहल छी, गामेमे रहब। अखनो गाममे एते खेत-पथार अछि‍ जे जौं ओकरा सरि‍या कऽ करी तँ नोकरीसँ बेसी हएत। मुदा कि‍ करि‍तौं? गाम-समाजक कटू-चालि‍ बोल सुनि‍ पढ़ल-लि‍खल नौजवानकेँ गाम छोड़ैक अनेको कारणमे एकटा कारण ईहो अछि‍ जे जौं कि‍यो एग्रीकल्‍चर ग्रेजुएट खेतक गोला फोड़ि‍ तरकारी खेती करथि‍ तँ समाजक लोक कि‍चाड़ि‍ कऽ समाजसँ भगा देतनि‍। कि‍यो कोइर तॅँ कि‍यो कुजरा कहए लगतनि‍। भलहिं ओ बेरोजगारीक सूचीमे नाआें लि‍खा दि‍ल्‍लीमे कुल्‍ली-कवाड़ीक काज कि‍अए ने करथि‍।” पी.एन. बाबूक वि‍चार सुनि‍ राधामोहन मुड़ी डोलबैत कि‍छु मानबो करैत आ कि‍छु नहि‍योँ मानैत। मुदा मुँह बन्न केने रहने पी.एन. बाबू नै परेखि‍ पाैलनि‍ जे मनसँ कते मानलक। तइ बीच पत्नी सुरेखा आबि‍ कहलकनि‍- “अपने सभ ने राति‍केँ रोटी खाइ छी मुदा पर-पाहुनकेँ खुआएब नीक हएत? मन असकताइए तँए अपनो दुनू गोटे भाते खा लेब।” भातक नाओं सुनि‍ पी.एन. बाबूक मनमे खौंझ उठलनि‍ जे एक तँ भरि‍ दि‍न एम्‍हर-ओम्‍हर करैमे देह-हाथ बथा गेल तइपर भात खुआ भरि‍ राति‍ उठ-बैस करौतीह। मुदा तेसर लग बाजबो केहेन हएत। पाशा बदलैत बजला- “अहाँ जे एहेन छी, से सबेरे कि‍अए ने कहलौं जे चाहे माछे लऽ अनि‍तौं कि‍ अण्‍डे।” बीचमे राधामोहन बाजल- “खाइले अनेरे रक्का-टोकी करै छी, जे सभ दि‍न परि‍वारमे चलैए सएह हमहूँ खाएब। अखन जुआन-जहान छी अखन नै सभ चीज पचाएब तँ कहि‍या पचाएब।” सह पाबि‍ अपन गोटी घुसकबैत सुरेखा आगू बढ़ली। गैस-चुल्हि‍क भानस, गप-सप थोराएलो नै छल कि‍ तैयार भऽ गेल। खेनाइ तैयार होइते कोठरीमे लगल गोल मेजपर सभ वस्‍तु राखि‍ पति‍केँ सुरेखा कहलखि‍न- “चलू, पहि‍ने भोजन कऽ लि‍अ।” एके टेबुलपर तीनू गोरे बैस तीनू गोटे खेनाइ खाए लगला। राधामोहनकेँ नव बेवहार बूझि‍ पड़ल। कि‍छु बाजब उचि‍त नै बूझि‍ चुप्‍पे रहल मुदा ओंघराइत मनमे उपकलै जे आरो जे होउ मुदा सोझामे खेने तँ लूँगी मि‍रचाइ आ अँचारक उपद्रव तँ कमि‍ते अछि‍। तइ संग ईहो तँ होइते अछि‍ जे सोझा-सोझी सबहक खाएब नपाइते अछि‍। वएह नाप ने काजो नापत। आकि‍ खाइले दालि‍-भात आ...? प्रात भने आठ बजि‍ते पी.एन. बाबूकेँ कार्यक्रमक तैयारीक लेल वि‍दा होइसँ पहि‍ने मनमे उठलनि‍ जे अखन अनेरे राधामोहनकेँ कि‍अए संग नेने जाएब। बारह बजेसँ कार्यक्रम शुरू हएत। डेरासँ नि‍कलैत राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “राधामोहन, अखन अहाँ नै जाउ। बारह बजेसँ गोष्‍ठी चलत, तइमे शामि‍ल हएब।” परि‍वारक भीतर ने खाढ़ी हि‍साबसँ भाए-बहि‍न, बाप-पि‍त्ती, दादा-दादी, नाना-नानी बँटल अछि‍ मुदा समाज थोड़े परि‍वारक वि‍चारकेँ ऊपर मानत ओ तँ वहए मानत जे समाजक कल्‍याणार्थ होइ। ओ तँ उमेरे हि‍साबसँ ने मानत। केश-दाढ़ी पाकल दादा-बाबाक श्रेणीमे एलौं समरथ-सकरथ रहने बाप-पि‍त्तीक श्रेणीमे एलौं, एक उमरि‍या रहने भाए-बहि‍न, संगी, बहि‍ना, मीत-यार, भजार इत्‍यादि‍क श्रेणी अबैत तइसँ नि‍च्‍चाँ बौआ-दैया अबैत। पचास-पचपन बर्खक सुरेखा आ पनरह-सोलह बर्खक राधामोहन। तहूमे राधामोहनसँ दोवर उमेरक बाल-बच्‍चा सेहो छन्‍हि‍हेँ। ओना राधामोहनकेँ अपने संग जलखै करा पी.एन. बाबू संतुष्‍ट भऽ गेल छलाह जे नहि‍योँ रहने पाहुन भूखल नहि‍येँ रहत। अराम करैक बेवस्‍था छइहेँ जे नीक लगतै से करत। सुरेखाक बात सुनि‍ राधामोहन बाजल- “खेत-पथार केकरो जि‍म्‍मामे नै देने छि‍ऐ?” “देने कि‍अए ने रहब। मुदा एतबो तँ ओही वेचाराकेँ कहि‍ऐ जे कहयो काल जे अबैए तँ गोटे कि‍लो महि‍ंसक घीए नेने आएल, गोटे मटकूर दहि‍ये।” सुरेखाकेँ भँसि‍आइत देखि‍ राधामेाहन बाजल- “अहाँ गामसँ हमर गाम बहुत पछुआ गेल अछि‍।” “की पछुआ गेल अछि‍?” राधामोहन- “हमर गौआँ तँ तेहेन रगड़ाउ-झगड़ाउ भऽ गेल अछि‍ जे सदि‍खन झगड़े-झाँटी करैत रहल आ उपजाक कोन गप जे खेतो-पथार बेच कोट-कचहरीकेँ दैत रहल। मुदा एकटा धरि‍ भेल अछि‍ जे जइ जहलकेँ आन समाजक लोक पाप बुझैए ओइ व्‍याकरणकेँ उनटा, धरम बना देलक। जे एको बेर जहल नै गेल ओ अधरमी ऐ दुआरे बूझल जाइत जे धर्म प्राप्‍त करैक एको सीढ़ी ऊपर नै उठल अछि‍।” राधामोहनक बात सुनि‍ सुरेखाक नजरि‍ राधामोहनकेँ संगतुरि‍या जकाँ नजरए लगलनि‍। सतरह बर्खक अवस्‍थामे बि‍आह भेल रहए, तइसँ पहि‍ने तँ राधामोहने जकाँ ने बाप-माइक बीच हमहूँ छलौं। उमेरोक तँ कि‍छु गुण-धर्म छै। जौं से नै छै तँ कि‍अए मेलामे एक उमेरि‍ये लोक बेसी रहैए। वि‍ष्‍मि‍त होइत बजली- “बौआ, एक दि‍नक घटना ओहि‍ना मन अछि‍।” घटना सुनि राधामोहनक जि‍ज्ञासा जगल। मुँह बाबि‍ बाजल- “से की, से की?” सुरेखा- “तोरा गाममे दुर्गापूजा तहि‍यो होइ छेलह, अखनो होइते छह। झगड़ाउ तोहर गौआँ सभ दि‍नेक। दुर्गापूजाक मेला एतए हुअए कि‍ ओतए हुअए, अहीले झगड़ा भऽ गेल। कोनो गाममे एकोठाम पूजा नै होइ छै मगर तोरा गाममे दूठाम शुरूहेसँ पूजा होइ छै। एकबधू हमर गाम, जहि‍ना पंचायतक गाम सबहक दूरी होइ छै तइसँ लगे हमर गाम अछि‍। एक्कोमि‍सि‍या ने बूझि‍ पड़ए जे दू गाम दोसर छी अपन गाम दोसर। खेतो-पथारमे ऐ गामक लोक ओइ गाम ओइ गामक लोक ऐ गाम काज करि‍ते अछि‍। जबार, सौजनि‍याँ, मैनजनी, इत्‍यादि‍क भोजो-भातक होइते अछि‍।” सुरेखाकेँ भँसि‍आइत देख राधामोहन बाजल- “कि‍दैन‍ घटना कहए लगलि‍ऐ?” जहि‍ना धक दनि‍ आगि‍ फुटैए, हवा-वि‍हाड़ि‍ उठै छै तहि‍ना सुरेखाक मनमे उठल। बजली- “बौआ, भरि‍सक नि‍शा पूजाक दि‍न रहै। नाच-तमाशा शुरू होइते रहै आकि‍ धुक दऽ पछि‍मसँ वि‍हाड़ि‍ उठलै। पानि‍-पाथर सेहो संगे एलै। मेलामे हूड़ भऽ गेल। जह-पटार लोक जेम्‍हर-तेम्‍हर पड़ाएल। अपना गामक तीन गोरे रही। गामे दि‍स पड़ेलौं, मुदा दसो डेग आगू नै बढ़लौं आकि‍ पाथर तड़-तड़ा गेल। भेल जे जान नै बाँचत। कपार फूटि‍ जाएत, तेहेन-तेहेन पाथर रहए। रस्‍ते कातक एक गोरेक मालक घर चलि‍ गेलौं। हवा तेहेन तेज रहै जे घरक चार उधि‍या दइतए। मुदा तीनू गोरे चारक बत्ती पकड़ि‍ लटकि‍ गेलौं। कहुना जान बँचल। कि‍दैन बाजल छेलह जे अहाँक गाम नीक अछि‍?” सुरेखाक प्रश्न सुनि‍ राधामोहन ओहि‍ना अक-बका गेल, जहि‍ना कि‍यो बजि‍ते-बजि‍ते बि‍सरि‍ जाइत। ओना दुनू गोटेक गप-सप जुगो पाछू घुसुकि‍ चलि‍ गेल छल जे एकक भोगल दोसराक खिस्‍सा बनि‍ चलि‍ रहल छल मुदा प्रश्न-उत्तर ओकरा ससारि‍ अनलक। पाछू उनटि‍ते राधामोहनक मनमे सुरेखाक प्रश्न धब दऽ खसल। बाजल- “हँ, हँ, कहै छलौं जे अहाँक गामक कि‍सानी हमरा गामसँ अगुआ गेल अछि‍।” अगुआ-पछुआ सुनि‍ सुरेखा दोहरबैत पुछलखि‍न- “एकठाम दुनू गोटेक गाम अछि‍। एकबधू खेत अछि‍, एक रंग उबजा-बाड़ी तखन कि‍अए एना भेल?” सुरेखाक प्रश्न सुनि‍ राधामोहन अपनाकेँ टटोलए लगल तँ बूझि‍ पड़लै जे प्रश्नक उत्तर ढंगसँ नै दऽ पएब, मुदा आत्‍माराम कहलकै‍ जे नै पान तँ पानक डंटि‍यो आकि‍ गाछोक डंटीसँ काज चलि‍ते अछि‍। तखन जौं उत्तरक लगलो-भीड़ल जबाव भऽ सकत तैयो तँ कि‍छु-ने-कि‍छु तात्वि‍क बात आबि‍यो जाएत। पहि‍ने तत्व तखन ने एकत्‍व आकि‍ समत्‍व। बाजल‍- “दीदी, अगुआएल-पछुआएल तँ खेनाइ-पीनाइ, ओढ़नाइ-पहीरि‍नाइ आकि‍ घरे-दुआर देखने ने बुझै छी।” सुरेखो अपन मनकेँ, गोधूलि‍ बेला जकाँ बहटारि‍ राधामोहनक वि‍चार लग ठाढ़ केलनि‍। जहि‍ना गुरु-शि‍ष्‍य बीच एक-दोसराकेँ उकटा-पैंची होइत तहि‍ना सुरेखा पुछलखि‍न- “जखन दुनू गामक लोक खेति‍ये करै छथि‍, तखन कि‍अए भगवान दू रंग बना देलखि‍न?” सुरेखाक प्रश्न राधामोहनकेँ ओहि‍ना भरि‍आएल बूझि‍ पड़ल जहि‍ना युनि‍वर्सिटी वा बोर्ड परीक्षामे प्रथम स्‍थान पबैबला छात्र सेहो कि‍छु प्रश्नसँ नि‍रुत्तर देख अपनाकेँ अलग कऽ लइए, तँए कि‍ ओकरा भुसकौल कहबै सेहो तँ उचि‍त नहि‍येँ हएत। हलसि‍ कऽ ही खोलि‍ राधामोहन बाजल- “दीदी, आन चीज तँ नजरि‍पर नै चढ़ैए मुदा एकटा चढ़ैए।” नजरि‍पर चढ़ैबला बात सुनि‍ सुरेखाक मन बाजल नजरि‍पर चढ़ैबला बातकेँ जौं नजरि‍ चढ़ा नै चढ़ाएब तँ ओ ढलानपर छि‍छैलिये जाएत। तँए एकत्‍व भऽ सुनए पड़त। बजलीह- “बौआ, हमरा-तोरा बीच कोन लजेबा-धकेबा अछि‍। हम जेठ बहि‍न माइये-दाखि‍ल भेलि‍अ, तूँ भाए-बोन बाप-दाखि‍ल सीमा परक सि‍पाहि‍ये जकाँ जि‍नगीक भेलह। तखन कि‍अए धक-मकाइ छह।” सुरेखाक भाव देख राधामोहन भवलोक पहुँच गेल मुदा अथाह भवसागर देख बाजल- “दीदी, अहाँ गामक बेसी कि‍सान एकाजू छथि‍। खेती करै छथि‍, गाए-महिंस पोसै छथि‍ इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍ मुदा हमरा गामक बेसी जोतदार दू-दि‍सि‍या काज करै छथि‍। अन्नो-पानि‍क खेती करै छथि‍ आ सामाजि‍क बंधनक बीच सेहो करै छथि‍न। बंधने ने समाजकेँ बान्‍हि‍ बेकतोकेँ बन्‍हैत अछि‍। अपना काजक समए समाजक काजमे लगबै छथि‍ तइसँ खेतीक उचि‍त देख-भाल नै कऽ पबैत छथि‍। जइसँ कम आमदनीक जि‍नगी बनि‍ गेल छन्‍हि‍। मुदा अहाँ गामक कि‍सानी बाट मजगूत बनि‍ गेल अछि‍।” राधामोहनक बात सुनि‍ सुरेखाकेँ मामा मन पड़लनि‍। मामा मन पड़ि‍ते मन पड़लनि‍ बाड़ी-झाड़ी आ माइयक संग मामाकेँ भाए-बहि‍नक ओ रूप जे दुनू मि‍लि‍ जि‍नगीक लेल ठाढ़ छथि‍। कि‍ मामा पाहुन नै जे माइयक बाड़ी-तामि‍-कोड़ि‍ तीमन-तरकारीसँ फल-फलहरी धरि‍क गाछ-वि‍रीछ लगा दैत। राधामोहन कि‍यो आन छी, जौं करजानमे केराक घौर पाकल हएत तँ चारि‍ छीमी खुआइयो देबै आ दू हत्‍था गामो नेने जाइले कहबै। दू परानी कते खाएब, पच्‍चीस-पच्‍चीस-तीस-ती हत्‍थाक केरा घौर। जे तीनि‍येँ दि‍नमे दुरि‍यो भऽ जाइए। बाजलि‍- “बौआ, चलह। गाम जकाँ तँ बीघा-बीघे बाड़ी-झाड़ी आकि‍ गाछी-बि‍रछी नहि‍येँ अछि‍ मुदा जतबे अछि‍ से चलि‍ कऽ देखहक जे अपना जोकर दुनि‍याँ बनौने छी की नै।” बाड़ी-झाड़ीक नाओं सुनि‍ राधामोहनक मन आरो चमकल। खोलि‍यापर राखल हँसुआ हाथमे नेने सुरेखा आ पाछू-पाछू राधामोहन डेरासँ नि‍कलि‍ बाड़ी पहुँचल। जहि‍ना मक्कड़मे हर्ड़ी-बि‍देसरक मेला पहुँच यात्री फरि‍क्केसँ हि‍या कऽ देखैए जे कतए कोन तरहक रूप छै तहि‍ना बाड़ीक टाट खुजि‍ते राधामोहन हि‍या कऽ देखलक तँ अजीव दुनि‍याँ बूझि‍ पड़लै। पानि‍क नालीक बगलमे पाँच बीट केरा पाँच रंगक देखलक। गाछेमे एकटा पकलो। बीटक ऊपर जाल लगल। चि‍ड़ैक कोनो डरे नै जे चोरा कऽ खएत। सूखल डपोर कटैत सुरेखा बजलीह- “बौआ, कहुना भेलह तँ तूँ पुरुखे पात्र भेलह कि‍ने ओरि‍या कऽ ओइ घौरकेँ काटह।” पाकल केरा घौर कटैक नाओं सुनि‍ते राधामोहन चपचपा गेल, कहुना तँ पहुनाइमे छीहे ने। उचि‍त-उपकार दुनू। बाजल- “दीदी, हँसुआ दि‍अ, आ अहाँ हटि‍ जाउ, केराक पानि‍ बड़ खराब होइ छै, कपड़ामे एहेन दाग लगा दइ छै जे कपड़ा फटि‍ जाएत मुदा छूटत नै।” राधामोहनक रक-छक वि‍चार सुनि‍ सुरेखा बजली- “तखन फेर लोक ओइ दागकेँ छोड़बै केना छै?” जहि‍ना परीक्षा भवनमे पहि‍लुक प्रश्नकेँ हल्‍लुक बुझि‍ते अगि‍लो बि‍सरि‍ हाँइ-हाँइ परीक्षार्थी लि‍खए लगैत तहि‍ना राधामोहन बाजल- “दीदी, दुनि‍याँमे एहेन कोन दुख अछि‍ जेकर दवाइ नै छै, तखन तँ...।” डोलैत घरमे जहि‍ना घरवारी सोंगर लगा-लगा ठाढ़ रखए चाहैत तहि‍ना सुरेखा अपन जि‍नगी संग राधामोहनकेँ खुट्टा नै सोंगरे बनए चाहली। मुदा राधामोहनक चटपटाइत मुँह देख बजली- “हँ तँ कि‍दैन कहै छेलह?” ठेंगीकेँ ठेंठि‍ये कोदारि‍ भार थम्‍है छै। बड़का मुरूछि‍ जाइ छै। तहि‍ना ने केरो दागक दवाइ अछि‍। बाजल- “दीदी, केहनो दाग कि‍अए ने होय, मुदा दवाइयो संगे छै।” संगे दवाइ सुनि‍ सुरेखा बजली- “से की?” “आन जीवि‍त गाछमे ने दूध आकि‍ लस्‍सा होइ छै, मुदा केरा तँ छी गाछक झड़। तँए एकरा एकरे सूखल डपोर जे छै, ओकरा आगि‍मे जरा कऽ ओही छाउरसँ रगड़लापर दाग छुटै छै।” केराक घौर काटि‍ थम्‍हकेँ सेहो काटि‍-खोंटि‍ कात कऽ देलक। हँसुआमे लागल पानि‍ माटि‍पर रगड़ि‍ साफ केलक। आगू बढ़ि‍ते कट्ठा भरि‍क फलक गाछो आ झाड़ि‍यो देखलक। गमैआ आम-जामुनक गाछ जकाँ तँ एकोटा फलक गाछ नै मुदा कामधेनु जकाँ सालो भरि‍ फल दइबला सभ। आब कहू जे फड़ैक भार जेकरा नहि‍योँ छै तहू गाछ सभमे फड़ लटकल छै। अनेरे मन घुरि‍आएल अछि‍। मुदा नै गाछोमे अनरनेवा पंडि‍त अछि‍ये। फूल भलहिं होउ, फड़ब पाप बुझि‍ते अछि‍। मुदा तँए कि‍ धात्रीम सन सावि‍त्री थोड़े अछि‍ जे बि‍नु सत्‍यवाने फड़बे ने करत। हँ से तँ अछि‍ये भलहिं टाट-फड़क, आड़ि‍-धूर, घाट-बाट दुआरे माटि‍क बाट कि‍अए ने बन होउ, मुदा अकासक बाट तँ खुजल छइहे तँए ने कहै छै जे हे प्रि‍यतम देह भलहिं तीन कोस हटले कि‍अए ने होय मुदा मन तँ दुनू गोटेक संग मि‍लि‍ रचि‍ते-बसि‍ते अछि‍। समुचि‍त भोजनक लेल जहि‍ना आन-आन वस्‍तुक महत अछि‍ तहि‍ना ने फलोक अछि‍। मुदा फलक दुर्दशा जि‍नगीकेँ सुदशा दि‍स बढ़ए देत। जे मि‍थि‍लांचल कुकाठ-सुकाठक संग चानन सन वृक्ष पैदा करैक उर्वर शक्‍ति‍ संयोगने अछि‍ कि‍ ओइ शक्‍ति‍केँ पूजा केने बि‍ना कल्‍याणक असीरवाद भेट जाएत। जौं मुखौटे होइतै तँ काँच माटि‍क एकटा दि‍आरी लेसि‍, हाथ-जोड़ि‍ नि‍होरा केलासँ भेटि‍तै तँ अदौसँ होइत आएल आ मि‍थि‍लांचल नीचे मुहेँ कि‍एक धसैत गेल। सालो भरि‍ चलैबला फल जइठाम छै, तइठाम...? खींरा लत्ती देख राधामोहन बाजल- “दीदी, खीड़ो लत्ती बीचमे देखै छी?” राधामोहनक जि‍ज्ञासाकेँ सुरेखा परेखि‍ गेली। जहि‍ना छोट-बच्‍चाकेँ माए-बाप, भाए-बहि‍न ओंगरीक इशारासँ कौआ-मेना देखा ओकर नाओं सि‍खबैत तहि‍ना सुरेखा राधामोहनकेँ सि‍खबैत बजली- “बौआ, खीड़ो फले छी। फलेक गुण ओकरोमे छै, मुदा अपन पारि‍वारि‍क जि‍नगी तेहेन बना नेने अछि‍ जे तीमन-तरकारी-सँ-फलाहार धरि‍ पुड़बैत अछि‍।” सुरेखाक बाट राधामोहनकेँ छुछुन बूझि‍ पड़लै। छुछुन ई जे माटि‍पर पसरल लत्ती आ लत्तीक फड़, केना फलाहार हेतै। हँ एते तँ देखै छि‍ऐ जे करेला-झुमनी-सजमनि‍ जकाँ फड़ैए, सजमनि‍सँ भलहिं होट हुअए मुदा करैला-झुमनीक तँ संग-तुरि‍या अछि‍ये। तरकारी मानल जा सकैए। तरकारीकेँ केना फल मानि‍ लेब फड़ तँ तरकारि‍यो फड़ैए मुदा लगले मन पलटि‍ महकारी लग पहुँच गेलै। ओकर तरक बीआ जते तीत होइए ओते तँ करैलोक ने होइ छै। कहाँ राजा भोज कहाँ भजुआ तेली। करैलाक गुद्दा-रस भलहिं तीत होउ मुदा ओइसँ पालल-पोसल बीआ कहाँ तीत होइ छै। दुनूमे अकास-पतालक अन्‍तर होइ छै। गोल-गोल, हरि‍अर-हरि‍अर, लाल-लाल फड़क बीच महकारीक बीआ खेबा-काल खेलहोकेँ बोकरा दइए, से केना करैलाक पड़तर करत। ऊँट जकाँ भलहिं देह उबर-खाबर होउ, रसो आ गुद्दो ति‍तौंस कि‍अए ने होउ, गलि‍-पचि‍ अपने कि‍अए ने सड़ि‍ जाए मुदा ओहन बीआ तँ दैते अछि‍ जे संगी-साथी जकाँ मनुष्‍यक भोज्‍य बनि‍ चलैत आबि‍ रहल अछि‍ आ आगूओ चलैत रहत। खेलौना दोकानपर, रंग-रंगक खेलौना देख जौं बच्‍चा गुमकी लाधि‍ दि‍अए तँ कि‍छु कारणक आशंका होइते छै। स्‍वर्ग सदृश बाड़ी-झाड़ी रहि‍तो राधामोहनकेँ अपन वि‍चारक दुनि‍याँमे वि‍चड़ैत देख सुरेखाक मनमे भेलनि‍ जे भरि‍सक रोड़ा-रोड़ीक ठेंस ने लगि‍ गेलै। बाजली- “बौआ, कि‍ करब, जेतबे छुट्टी रहत तेतबे टा ने दुनि‍योँ बसाएब। इच्‍छा केकरा ने होइ छै जे इन्‍द्रासनक आसनपर बैसी, मुदा इच्‍छे भेने थोड़े होइ छै। अही सुखक लोभमे ने एकटा बौना आबि‍ हरि‍श्चन्‍द्रकेँ राज-पाट ठकि‍ लेलकनि‍। अखुनका वि‍यतनाम राज थोड़े छी जे सालक-साल, दशकक-दशक रगड़ैत रहत। कहू जे जइ राजाकेँ एतबो दया नै जे आमजनक राजकेँ अपना स्‍वार्थमे केना लगा देबै।” ओना सुरेखा राधामोहनक मन बहटारए चाहली मुदा जि‍द्दीयाह गाए-बड़द जकाँ गाछक मुड़ीयेपर राधामोनक नजरि अँटकल। राधामोहन बाजल- “दीदी, अहाँ तँ खीड़ाकेँ फल कहै छि‍ऐ, एते तक माेनेमे शंका नै अछि‍ जे फड़ नै होइ छै, मुदा फड़-तँ-फड़ भेल आ आमोक गाछक फड़े भेल भलहिं कोशा धरि‍केँ फड़े कहि‍ऐ। जि‍नगीक नीक फल सभ चाहैए आकि‍ नीक फड़ कदीमोसँ नहमर चाहैए?” जहि‍ना बाल मन वा जुही फूल, परोड़ इत्‍यादि‍ कोनो नव गाछक सरारि‍ सदृश सर-सरा कऽ आगू धरि‍ बढ़ि‍ जाइत तहि‍ना राधामोहनक प्रश्न आगू बढ़ल मुदा ओरि‍या कऽ मुड़ीकेँ मोड़ि‍ सुरेखा बजली- “बौआ, खीड़ाक तरमे तीन फाँक होइ छै, मुदा होइ छै तीनू बराबर। ऊपरका जे आवरण होइ छै ओ ओहन होइ छै जे दि‍ठा-दृश्‍य देखए नै दैत छै। ओकरा हटौला पछाति‍ये देख पड़ै छै। मुदा जौं ओकरा कत्तासँ गोल-गोल काटल जाइ छै तँ कहाँ तीनूमे सँ कि‍यो कहैत जे कम छी।” कहि‍ सुरेखा सोचए लगली जे भरि‍सक राधामोहनक मन उचटि‍ गेल अछि‍। जाबे तक दोसर दि‍स नै तकाएब, ताबे नजरि‍ नै घुमतै। तँए दोसर दि‍स तकाएब नीक हएत। दोहरबैत बजली- “बौआ, मेलो जाइक समए लगि‍चा गेलह। नहाइत-खाइत समए भैये जाएत। हमहूँ जाएब कि‍ने?” दोसर दि‍नक साँझ। शि‍क्षण प्रक्रि‍याक समाप्‍ति‍। काल्हि‍ ि‍वसर्जन छी। भोज-भात आ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम रहत। राधामोहन आ पी.एन. बाबू गाएक घरक थैड़ देखैत रहथि‍। मच्‍छरक धनधनेनाइसँ बूझि‍ पड़लनि‍ जे घूरक जरूरत अछि‍। दुनू गोटे गाइये घरमे रहथि‍ तखने सुरेन्‍द्रो बाबू आ दीनानाथो बाबू संगे पहुँच बजला- “गाएक घरमे अखन कि‍अए छी?” ई गप सुनि‍ पी.एन. बाबूकेँ संकोच नै भेलनि‍। ओना तीनू गोटेक डेरो एकठाम आ बाड़ि‍यो-झाड़ी एकरंगाहे, तँए प्रश्न बेवहारि‍के छल। पी.एन. बाबू बजला- “तीन-चारि‍ दि‍नसँ एते व्‍यस्‍तता बढ़ि‍ गेल जे अपन जि‍नगीये छि‍ड़ि‍या-वि‍ति‍या गेल। बूझि‍ पड़ैए जे तीनि‍येँ-चारि दि‍नक बीच तते मच्‍छर बढ़ि‍ गेल जे अवधात करत। मुदा आइयो तँ आब करैक समए नहि‍येँ अछि‍। काल्‍हि‍ बूझल जेतै।‍” दीनानाथ बाबू- “काल्हि‍यो कि‍ भरि‍ दि‍न छुट्टी हएत, भोज-भात आकि‍ नाच-तमाशा देखि‍नि‍हार-खेनि‍हार ले ने, मुदा वि‍दाइ-समारोह सेहो छी कि‍ने?” “हँ से तँ छी। मुदा ओ तँ भोज-भातक पछाति‍ये ने हएत तइ बीच तँ समए बँचि‍ते अछि‍।” कलपर हएत-पएर धोइ राधामोहनो आ पी.एनो. बाबू लग पहुँचबे केला आकि‍ ओम्‍हरसँ सुरेखा चाहो नेने एली। ठाढ़े सभ कि‍यो चाह पीबए लगला। दीनानाथ बाबू राधामोहनकेँ कहलखि‍न- “कौल्हुका नोत-हकार दइ छी। खेबो करब आ देखबो करब।” दीनानाथ बाबू गप तँ चालि‍ देलनि‍, मुदा भोजैत तँ नै छला। भोजैत सुरेन्‍द्र बाबू मुदा जहि‍ना घाटपर चेल्हबाक चालि‍मे भुन्नो फँसि‍ जाइए, तहि‍ना वगलमे बैसल सुरेन्‍द्र बाबूकेँ भेलनि‍। दीनानाथ बाबू तँ पठौल नै छेलखि‍न जे मद्दी हेतनि‍। अपनो मुँह खोलए पड़तनि‍, भलहिं राधामोहन नै बूझि‍ पबैत मुदा दुनू परानी पी.एन. बाबू तँ छथि‍ये। पुलि‍सक आगू अनेरे पड़ाएब नीक नै होइ छै, खेहारि‍ कऽ पकड़ि‍ खढ़ि‍या मोर मारि‍ पकड़ि‍ये लेत आ जौं पकड़ि‍ लेत तँ सभ ठेही झाड़ि‍ देत। राज-भोज छि‍ऐ, जते खाएत तइसँ बेसी छि‍ड़ि‍आएत। बजला- “राधामोहन सझि‍या नतहारी हेता।” जहि‍ना भोज-काजमे पहि‍ले योजना बनैत पछाति‍ हि‍साब-बाड़ी होइत। मुदा बैसार दुनू दि‍न चलैत। एक तँ बैसारमे नतक बँटवारा तखन नतहारीक चर्च नै। मुदा दोसराक पाहुनकेँ ईहो पूछब उचि‍त नै जे केम्‍हर एलौं। मुदा जहि‍ना परि‍वारक छोट भाएकेँ अनको कोहवरक रस्‍ता खुजले रहै छै तहि‍ना दीनानाथ बाबू। जेठ लग जेहने गल्‍ती तेहने सही। जौं सही अछि‍ तँ मुड़ी झुलौता जौं गल्‍ती अछि‍ तँ सुधारि‍ देता। बजला- “राधामोहन, अहाँ पढ़बो करै छी।” दीनानाथ बाबूक प्रश्नसँ राधामोहन ठमकि‍ गेल। केना कहबनि‍ जे परीक्षाकेँ अखन छोड़ि‍ आगू बढ़ा देलि‍ऐ, आ अखन घरक पाछू। मुदा उत्‍सुक मन बाजल- “पढ़ि‍तो छी, आ परि‍वारक जे दशा अछि‍ ओकरा जौं नै रोकब तँ कते दूर ढरैक कऽ चलि‍ जाएब तेकर कोनो ठीक नै। तँए कि‍छु करैक वि‍चार सेहो अछि‍।” राधामोहनक सह पाबि‍ दोहरबैत दीनानाथ बाबू पुछलखि‍न- “परि‍वार कतेटा अछि‍?” “ओना कहैले तीन गोरे छी मुदा...।” “मुदा की?” “पि‍ता अंति‍म अवस्‍थामे छथि‍, अब-तब करै छथि‍, कखन छथि‍ कखन नै तेकर कोनो ठीक नै।” “कते उमेर हेतनि‍?” “सेहो नीक जकाँ नै बुझै छी। झूड़-झूड़ शरीर भेल छन्‍हि‍। तइसँ तँ अस्‍सीसँ ऊपरेक कहबनि‍, मुदा माइयक जे गति‍शीलता देखै छी तइसँ बूझि‍ पड़ैए जे घरक चीनवारेक खूँटा टुटि‍ गेल। आइ करी कि‍ काल्हि‍, करए तँ हमरे पड़त। सएह सभ मन हौंड़-हाँड़ि‍‍ देने अछि‍। तँए गाए पोसैक वि‍चार करै छी।” आँखि‍क इशारा सुरेन्‍द्र बाबूक देखि‍ते दीनानाथ बाबू चुप भऽ गेला। सुरेन्‍द्र बाबू पुछलखि‍न- “राधामोहन, वि‍चार तँ नीक अछि‍, मुदा कि‍छु प्रश्नक उत्तर बूझब जरूरी अछि‍। भने मेलेमे एलौं। भोज-भात खेनि‍हार सभकेँ खाए-दि‍औ। मुदा, कहब जे जाधरि‍ अपन मन काज करैले ने मानि‍ जाए, ताधरि‍ रहू। जौं जीवनमे एकोटा काजक लोक भेट जाए तँ जरूर ओइ जि‍नगीकेँ सार्थक मानल जेतै।” सुरेन्‍द्र बाबूक मुँह खुजल देख सुरेखो अपन बातकेँ राखब उचि‍त बूझि‍ बाजली- “दीना बाबू, जखन राधामोहनसँ गप भेल तँ कहलक जे हमरा गामसँ अहाँक गाम नीक अछि‍। पच्‍चीस बर्खसँ नैहर गेबो ने केलौंहेँ, अठारह बर्खक अवस्‍थामे छोड़ने रही तँए जाएब तँ तर पड़ि‍ गेल अछि‍। तँए सेहो कनी कखनो दुनू भाए-बहि‍नक बीच कहि‍ देब।” सुरेखाक प्रश्नसँ सुरेन्‍द्र बाबू घबड़ेला नै मुदा दि‍न भरि‍क देहक थकान, तइ बीच काल्हि‍ वि‍दाइ समारोह सेहो छी एहेन ने हुअए जे धड़फड़मे प्रोफेसर साहेबक जैकेट प्रि‍ंसि‍पल सहाएबक डालीमे चलि‍ जान्‍हि‍ आ प्रि‍सि‍पल साहेबक प्रोफेसर सहाएबमे, तँए मन बोझि‍ल, जे केना एहेन सुराग भेट जाएत जे जे जेतै कऽ अछि‍ से से तत्तै चलि‍ जाए। मुदा परि‍वारो तँ परि‍वारे छी। परि‍वारकेँ चैन रखने बि‍ना एको छन चैन भेटब कठि‍न होइ छै। दीना बाबूकेँ सम्‍बोधि‍त करैत सुरेन्‍द्र बाबू बजला- “दीना बाबू, एन करू जे एकेटा उत्तरमे दुनू प्रश्न आबि‍ जाए।” हँूहकारी भरैत दीनानाथ बाबू बजला- “हँ-हँ बढ़ि‍याँ-बढ़ि‍याँ, हनुमानजी जकाँ पहाड़े चलि‍ आओत अपन-अपन सभ ताकि‍ लेब। मुदा भाय-सहाएब एकटा बात पूछब हमरो रहि‍ गेल अछि‍?” सुरेन्‍द्र बाबू- “कथी ओहो राखि‍ये दि‍औ?” दीनानाथ बाबू- “राधामोहन, एकटा बात कहू जे परि‍वारमे बाहरक लोटा दूध अबैए आकि‍ घरक लाेटा बाहर जाइए।” दीनानाथ बाबूक प्रश्न सुनि‍ पी.एन. बाबूकेँ नै रहल गेलनि‍ बजला- “दीनू बाबू कि‍ कहब, बि‍सरि‍ गेलौं रमझि‍मनी-रामझुमनी। भि‍ंडीक माला जपि‍-जपि‍ भाषाक जान बँचबै छी। मुदा क्षेत्रो तँ कि‍छु छी।” एक संग अनेको प्रश्न उठैत देख सुरेन्‍द्र बाबू वि‍चारलनि‍ जे नीक हएत सभ प्रश्नकेँ बहटारि‍ काल्हि‍ लेल राखि‍ ली आ कि‍छु मनोवि‍नोद संग बैसार उसार कऽ ली। चौअन्नि‍याँ मुस्‍की दैत दीनानाथ बाबूकेँ पुछलखि‍न- “अँए हौ दीनू, उद्घाटन बेर कि‍अए हँसऽ लगल रहह?” टटके बात, बि‍सरैयौक तँ नहि‍येँ कहल जा सकैए। मुदा एकटा जबावदेहक प्रश्न छी। कि‍ कहबनि‍। हम सभ कहुना भेलौं तँ घरवारि‍ये भेलौं कि‍ने, कि‍अए ने खोलि‍ कऽ सभ गप करब। मुस्‍कीक जबावमे ठहाका दैत दीनानाथ बाबू बजला- “भाय, लाबा जकाँ छि‍ड़ि‍आएल नै, मुदा छि‍ड़ि‍आइबला बात तँ रहबे करै ने।” दुनू गोटेक बीचक बातमे सुरेखा लाड़नि‍ लाड़लनि‍- “उद्घाटने जखन हँसा गेल, तखन बाँकि‍ये कथी रहल?” सुरेखाक प्रश्नसँ सुरेन्‍द्र बाबू थकमकेला। थकमकाइत देख पी.एन. बाबू सम्‍हारैत बजला- “बात भेल कि‍छु ने आ अनोन-वि‍सनोन हुअए लगल।” अपन भाँज बूझि‍ दीनानाथ बाबू बजला- “भेल ई रहै जे चारि‍ गोटेकेँ चरि‍मुखी दीप लेसि‍ उद्घाटन करक रहै। एकटा मोमवत्ती नै ने जे तीन गोटे डाॅट पकड़ू आ एक गोटे सलाइ लेसि‍ लगाउ। चरिमुखी दीपमे तँ बाॅटल चारू गोटेक। सभकेँ दीप जराएब छन्‍हि‍। पहि‍ल गोटे जखन सलाइ खरड़ि‍ एकटा दीप लेसि‍ देलखि‍न तखन दोसर-तेसरकेँ सलाइ खरड़ैक कोन प्रयोजन। सलाइ काठीकेँ तँ दीपेमे लेसब असान होइतै। से नै केलनि‍, केलनि‍ ई जे तेसर गोटे जे रहथि‍ ओ राशि‍मे राशि‍ नै काटि‍ सलाइ खरड़ए लगला आकि‍ मसल्‍ला उड़ि‍ कऽ कुर्तापर पड़ि‍ गेलनि‍ तेहेन कुर्ता जे ओतबेमे दगा गेलनि‍। सएह हँसी लागल रहए। अहूँ तँ मंचेपर रहि‍ऐ। अहाँ नै देखि‍लि‍ऐ।” दीनानाथ बाबूक बातसँ सुरेन्‍द्र बाबूकेँ दुख नै भेलनि‍। बजला- “तूँ छुट्टा छह, हम बान्‍हल छी, तँए कि‍छु...।” “अच्‍छा जे होउ, कौल्हका-उगरल वस्‍तु-जात हएत ओ भोजो हएत आ राधामेाहनकेँ मेलाक दर्शन सेहो करा देबनि‍। अखन जाए दि‍अ, दू घंटा दुनू कातक चेकिंग बेवस्‍था करैमे लागत। तहूमे तीन-तीन चेकि‍ंगमे चोरकट रस्‍ता रहि‍ये जाइ छै।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय शास्त्रीयचिन्तनाधुनिकजीवनयोर्मिथः सम्बन्धः। विद्यावचस्पति डा. सदानन्दझाः[1] =============================================== कुञ्जिकाशब्दाः- सकारात्मकं चिन्तनम्, राष्ट्रनिर्माणम्, विश्वकल्याणम्, संस्कृतवाङ्मयम्। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- शोधसारः- निखिलेऽस्मिन् विश्वे शक्तेर्महनीयं स्थानं विद्यत एव। सा शक्तिः कायिकी स्याद्वाचिकी स्यादाहोस्विन्मानसिकी स्यात्। कथं शक्ति एतादृक् महनीयं स्थानं भजते? उत्तरम् अस्ति सुस्पष्टमेव। जगति सर्वत्र प्रतिस्पर्द्धा दृश्यते। वस्तुनः न्यूनता उपयोगकर्तॄणां आधिक्यं तु दृश्यत एव। एवमेव कारणं यत्  साम्प्रतं जगति सर्वत्र अशान्तिः विक्षोभः आतङ्कः लुण्ठनं स्तेयं हिंसा अनाचारः दुराचारः अत्याचारश्च प्रवर्तमानः विश्वमानसं विभीषयन्ति, निरागसः बालाः युवानः वृद्धाश्च निहन्यन्ते अबलाऽपह्रियन्ते पथिगृहे यात्रायाञ्च जनाः आत्मानमसुरक्षितमनुभवन्ति। मानवीयः विश्वासः खण्डितः दृश्यते। नैतिकमूल्यानि जीवनादपाकृतानि भवन्ति। धर्ममुपेक्ष्यार्थकामञ्च समाद्रियेते। अस्माकं पुरतः विराजते दृढतरोऽयं प्रश्नः यत् शक्तिः एव समस्यायाः कारणभूता अथवा अस्ति कश्चन प्रच्छन्नः शत्रुः यः अशान्तिं जनयति, विक्षोभमुत्पादयति, आतङ्कं वर्द्धयति, अनाचारदुराचारादीन् प्रस्रयति। यद्यस्ति तर्हि तस्य निरासः कथं भवितुमर्हति येन अस्माकं राष्ट्रस्य निर्मातारः यूवानः विकसितराष्ट्ररूपे भारतस्य स्थितिं नीत्वा विश्वकल्याणमार्गप्रशस्तं करिष्यन्तीत्येव एतस्य शोधपत्रस्य विषयवस्तुरिति। ================================================== नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा। कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा॥ भूमण्डलीकरणस्य इह युगे सर्वत्र प्रतिस्पर्द्धा दरीदृश्यते। सर्वत्र जनाः स्वकीयकार्यसिद्ध्यर्थं सर्वथा यत्नं कुर्वन्ति। न हि सर्वत्र जयश्रीप्राप्तिः स्वाभाविकी। तर्हि मनसि विक्षोभः संजायते। जनाः सर्वथा अन्यान् उपालम्भयन्ति। अवसादग्रस्तो भूत्वा स्वकीयकर्म अपि ते न कुर्वन्ति। ते चिन्तयन्ति यत् किम् अनेन्? किमेतस्य फलम्? फलतः दिनानुदिनं  ते इतोऽपि नैराश्यतां प्राप्नुवन्ति। ते शक्ति रहिताः सन्ति इति न। यतो हि  सहजा शक्तिः तु जीवमात्रस्य कृते भवति तत्रापि मनुष्यानां कृते तु विशेषरूपे भवति। मनुष्ये तु सहजा सहैव उत्पाद्याप्रभृतिशक्तयः अपि भवन्ति। गुरुजनानुकम्पया, अभ्यासवशात् अपि सन्दर्भितकार्ययोग्यता भवितुमर्हति। अस्माकं महनीयग्रन्थेषु नैकानि उदाहरणानि मिलन्ति। यत्र जनाः अभ्यासद्वारा कठिनतमं कार्यं विधाय जीवनसमराङ्गणे जयं प्राप्तवन्तः। तर्हि शक्तिर्नास्ति अवसादादीनां कारणरूपा इति मन्ये। तर्हि किमन्यत्? उच्यते “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” ।  किं नाम् मनः? संकल्पविकल्पात्मकं मनः भवति। अनेन एव  प्रस्तूयते विकल्पाः। तदनु बुद्ध्या निर्धार्यते यत् एतत्  उचितम् एतत् न उचितम् इति। एवमेव सा शक्तिः सकारात्मक अथवा नकारात्मकमार्गेषु कार्यं करोति। यदि जनाः सकारात्मकचिन्तनद्वारा प्रेरितो भूत्वा कार्यं सम्पादयन्ति तर्हि सर्वत्र सुख-शान्तेरवाप्तिर्भवति अपरं चिन्तनं तानवनति मार्गं दर्शयति इति। एतस्मात् कारणात् यजुर्वेदे शिवसङ्कल्पसूक्ते रथरूपकमाध्यमेन ऋषयः जीवनं कथं यापनीयमिति निदर्शयन्ति। यथा प्रशिक्षितः रथचालकः अश्वनियन्त्रणपूर्वकं रथं नयति तथैव उचितानुचितं मार्गं चित्वा सम्यक् रूपेण गन्तव्यस्थानं गन्तव्यम् । अतो अस्माकं सङ्कल्पः[2] शिवमयः नाम कल्याणकरः स्यात्। अत्र सकारात्मकचिन्तनस्य बीजम् अन्तर्निहितं विद्यत एव। यतो हि यदि सकारात्मकं चिन्तनम् एव न स्यात् तर्हि कथं उचितानुचितः विवेकः स्यात्। इत्थं तु स्पष्टं यत् सकारात्मकं चिन्तनम् एव राष्ट्रस्य उन्नतेः आवश्यकम्। किं सकारात्मकचिन्तनेन भवतुमर्हति इति विशदरूपेण यदि विवेचना कुर्यात्तु इतो स्पष्टता समापतिष्यति। हिन्द्याम् एकं कथनम् अस्ति “मन के हारे हार है मन के जीते जीत”। साधु एव उक्तम् अत्र केनचित्।  एतत् सकारात्मकं चिन्तनं कथमागच्छेत् इति विचारणीयम्। एतस्य कृते पृष्ठभूमि रूपे कानिचित्तत्वानि भवन्ति तद्द्रष्टव्यमिति। तत्र आदौ धैर्यस्य अवस्थितिः भवति। जीवने साफल्यार्थं धैर्यस्य भूमिका तु विदितम् एव। उक्तम् अपि नीतिकारैः “दरिद्रता धीरतया विराजते, कुभोजनं चोष्णतया विराजते[3]”।   तदनु आशा समापतति। आशा सर्वथा बलवती भवति। यदि आशा स्यात्तर्हि सहजतया सकारात्मकं चिन्तनं भवति। महाभारते यदा शल्यस्य कृते सेनापतिभारनिमित्तम् अवसरः ददाति दुर्योधनः तदा शल्यः जानाति यत् वयं किं कर्तुं प्रभवामः तथा स आशामंगीकृत्य कथयति- “ गते द्रोणे गते भीष्मे कर्णे च समितिंजये। आशा बलवती राजन् शल्यो जेष्यति पाण्डवान्॥[4]“ सन्तुष्टिः अपि परमावश्यकी। यदि सन्तुष्टिः न स्यात्तर्हि सकारत्मकं चिन्तनं कथमपि नागच्छेत् इति। उक्तम् अपि मनीषिभिः ’ सन्तोष परमं सुखम्।’ अनन्तरमागच्छति प्रेरकतत्वानि अस्माकं परितः यादृग्वातावरणं भवति तथैव चिन्तनमपि जायते। अतो सर्वथा गुरुजनानां परितः एव वासः स्यात् यत्र सर्वथा श्रेयस्करं चिन्तनम् एव जायते। तदनु चिन्तनं लक्ष्यानुरूपं भवति अतो लक्ष्यस्य महती भूमिका भवति सकारात्मकचिन्तनस्य कृते। अर्जुनः यदा शरवेधनपरीक्षायाम् आसीत् तदा स केवलं कल्पितखगस्य नेत्रम् एव पश्यन् आसीत्। यदि स एवं न कृतवान् स्यात् तर्हि तत्र नैराश्यताम् एव आगत्य विच्छृङ्खलत्वस्यानयनं करिष्यतीति निश्चप्रचः। लक्ष्येन सहैव सकारात्मकचिन्तनस्य कृते आवश्यकता विद्यते समुचितादर्शस्य। यत्  कर्तुम् इच्छति जीवने तस्य कृते केचित् नियमाः स्युः अन्यथा विच्छृङ्खलत्वम् आगच्छति। आदर्शेन सह जीवनस्य विविधेषु स्तरेषु साफल्यमपि आवश्यकम्। अन्यथा नैराश्यम् आगच्छति। समग्ररूपेण नीतिनियमानुसारेण यदि कार्यं न सिध्यति तर्हि पुनरावलोकनं स्यात्। उक्तमपि ’ यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः’। अत्र ध्यातव्यम् अस्ति साकल्येन विश्वकल्याणम् एव अभीष्टम् । तत्रैव अङ्गतया जनानाम् अथवा राष्ट्रस्यविकासः इति। एतदर्थं सकारात्मकं चिन्तनेन सहैव ’ऋत्’ इत्यस्यानुगमनं सर्वथा आवश्यकम् । यतो हि ऋत् इत्यस्यावधारणा अतीवमहनीया। एनां विहाय जनानां, राष्ट्राणामुत् विश्वस्य कल्याणं नैव भवितुमर्हति। अत्र ऋत् इति नैतिक नियमानां अनुपालनं न केवलं जनानां कृते आवश्यकम् अपितु तत्तद्देशेषु याः नियामकसंस्थाः विद्यन्ते तासां कृते अपि। अद्यत्वे अस्माकं देशे भ्रष्टाचरणविरोधि आन्दोलनम् प्रचलितम् अस्ति। तत्र मूलतः संस्थासु तत्तन्नियमानामनुपालनं न भवति, कर्मकराः स्वकीयं कार्यं वोढुं नेच्छन्ति इति एव कारणम्। अतो  संस्थानां कृते ऋत् इत्यस्यावधारणायारनुपालनम् अतीव महत्वपूर्णम् इति। यदि उक्त ऋत् इत्यस्यानुपालनं स्यात्तर्हि कुत्र विप्रतिपत्तिः? कुत्र असहिष्णुता? अहमेव श्रेष्ठः इति मन्यमानाः जनाः सर्वत्र असहिष्णुतां जनयन्ति।मूलतया संघर्षस्य इदमेव कारणम्। मदीयः धर्मः श्रेष्ठतरः इति धर्मोन्मादस्य कारणम्। अस्माकं महर्षयः सर्वेषां समाधानपरकं वाक्यं पूर्वमेवोद्घोषितवन्तः सन्ति। “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।“ पुष्पदन्तेन शिवतोषार्थं स्तुतिं रचयन् नूनमेव जनहितार्थं निगदितवान्- रुचीनां वैचित्र्यादृजु कुटिलनानापथजुषाम्, नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव। उक्तम् अत्र तेन उक्तं यत् विविधनदीनां जलम् यथा अब्धिमध्ये निमज्जति तथैव विविधमतानां स्थितिः ज्ञेया इति। निष्कर्षः- विविधतापदग्धाः जनाः सर्वथा स्वश्रेयार्थं यतन्ति। तत्र जीवनसमराङ्गणे सकारात्मकचिन्तनस्य महती अपेक्षा वर्तते। यतो हि अद्यत्वे फ्रस्टेशन नाम नैराश्यं महतीव्याधिरूपे अस्मान् पुरतः विद्यते। यस्याः समाधानं सकारात्मचिन्तनेन् एव सम्भवति। यदा जनाः एकवारं नैराश्यं प्राप्नुवन्ति तदनु तत्रैव बद्धाः भवन्ति। तेषां निवारणे सति एव राष्ट्रस्य समुन्नतिः सम्भवा। यतो हि युवानः देशस्य आधाररूपाः। यदि ते एव नैराश्यं भजन्ते तर्हि राष्ट्रस्य का गतिः?  अस्तु ऋत् प्रभृत्युक्तोपायद्वारा जनाः सर्वथा सकारात्मकं चिन्तनं विधाय आत्मोन्नतिसहैव राष्ट्रोन्नतिपुरस्सरं विश्वकल्याणं कुर्युरित्येव एतस्य पत्रस्याभीष्टम्। यजुर्वेदे राष्ट्रमंगलरूपे  अस्मन्मनीषिभिरपि भणितम्- आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योति व्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानासुः सप्तिः पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्टा सभेयो युवास्य यजमानस्य.....। ॥शम्॥ सन्दर्भाः ·       श्रीमद्भगवदगीता शाङ्करभाष्य, प्रकाशनस्थान-गीताप्रेस गोरखपुर वर्ष-2008 ·       श्रीमद्भगवदगीता (हिन्दी अनुवाद) प्रकाशन स्थान- गीताप्रेस गोरखपुरम वर्ष-2009 ·       Vidyābhūṣaṇa, Rājendranātha. Kālidāsa Granthāvalī. Kolkata: Basumati, (7th Edition). ·       Chakrabarti, Mohit (1997), “Value Education changing Perspectives”, New Delhi, Kanishka Publishers, Distributors ·       Gupta, N.L. (1997), “Educational Ideals and Institutions in Mahabharata”, New Delhi : Mohit Publications. ·       Kondada Ramayya, P. (1997) - “The light of Ramayana”, Hyderabad : Arsha Vijnana Trust. ·       Kulshrestha, S.P. (1969) - “Test and Manual for a test of Democratic Values”, Lucknow: Indian Psychological Corporation. ·       Venkataiah N. (1988) - “Value Education”, New Delhi: A.P.H Publishing Corporation. ·       Google.co.in (google search) [1] व्याकरणविभागाध्यक्षः, ज.ना.ब्र.आ.सं.म.वि.लगमा, दरभंगा, बिहारः| प्राक्तनशिक्षाविद् सदस्यः भारतसर्वकाराधीनः [2] सुसारथिरिवरश्वान्निवयन्मनुष्यान्नीयतेभिः सुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। शिवसंकल्पसूक्तम्, यजुर्वेदे। [3] नीतिग्रन्थादुद्धरितः। [4] महाभारतात्। DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक  http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/   http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 2 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह'१२८ म अंक १५ अप्रैल २०१३ (वर्ष ६ मास ६४ अंक १२८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA