ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह'१२९ म अंक ०१ मई २०१३ (वर्ष ६ मास ६५ अंक १२९) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा- माटीक मुरुत २.२.कैलास दास- लघुकथा- ममता २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-बगवाड़ि २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-बेटी, हम अपराधी छी ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-४ ३.२.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ ३.३.किशन कारीगर- दूधपीबा नेना ३.४.सुमित मिश्र- भक्ति गजल ३.५.जगदानन्द झा ‘मनु’-गजल १-५ ३.६.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.७.राजदेव मण्डल- तीनटा कविता गद्य-पद्य भारती:मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) बालानां कृते-अमित मिश्र- १.राति दिवालीक २.जनमदिनक शुभकामना विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। संपादकीय १ गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा- माटीक मुरुत २.२.कैलास दास- लघुकथा- ममता २.३.जगदीश प्रसाद मण्डल-लघुकथा-बगवाड़ि २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा-बेटी, हम अपराधी छी कामिनी कामायनी लघुकथा- माटीक मुरुत चारहु कात कुहेस् क साम्राज्य ,मोटका ,मोटका ,उज्जर ,धप धप, धूस ओढ़ने गाछ बिरिछ ,सोझा के लतामक गाछ जे घर स दस डेग पर ठिठुरति ठाढ़ छल ,आंखिक दर्शन शक्ति स, बाहरि , , हिमालय के तराई मे बसल अहि छोट सन शहर प,अहिना पहिनहु स ,शरद रानी बिशेख वात्सल्य प्रेम स आविर्भूत रहैत रहल छली,आ एखन त, सद्यः हुनके प्रिय समय आ, साम्राज्य । ओहि प्रलयंकारी शीतलहरी मे घरक भीतर लोक वेदक हाथ पैर सुन्न भेनाय स्वाभाविक छल ,मुदा कोढ़ फाड़ैत करून चित्कार ‘ ‘गै म्या, गै म्या” सुनि कियो नहिं सिरक क’ तर नुकायल रहि सकल छल,धड़ाधड़ि अड़ोसीया पड़ोसिया के दरवज्जा खुलि गेल छले। ओढ़ना ,कंबल ,मोफलर ,सौल मे बांहल ,छेकल लोग हिम मानव बनल टौवाइत टौवाइत एक दोसर स, ओहि अनुत्तरित प्रश्नक समाधान पाबए लेल बेकल ,मुदा केकरो किछू नहि बुझल जे मिसेज ठाकुर के किएक गाड़ी प, उठा पुठा क, अस्पताल ल जायल गेल ,वा के एना हाक्रोश करि रहल छल । गप्प खुजबा मे कनि काल त, अवस्स लागले ,मुदा तखन ककरो बिस्वास ने भ रहल छल मिसेज ठाकुर त, एना सपनों मे नहि करि सकैत छली ,तहन केकरो पेट मे पईस क त’ लोग नहीं देख सकैत अछि । असंख्य सम्बोधन स संबोधित मनुख सन हुनको संग समय भेष बदलि क; डेगा डेगी आगा आगा चलैत ,लुका छिपी खेलाइत पाया कातक ओहि राज्य मे जा क’ नूका रहल छल । एक बीत्त के घोघ तानने, ओ दस बरखक बहुरिया पाँच हाथ क ललका नुआ मे लेपटायल भट भट खसैथ, त बेस लाम चाकर सौसक बज्र बोलक लगाम तुरत हुनक कान मे पड़ेंह “की खुआ क माए बाप पोसलक ,जे दु डेग चललों ने होएयै” । सासुर मे त जेकर जे रिश्ता नाता होए ,तही स,संबोधित करेन्ह,मुदा परोछ मे सबहक लेल भानपुर बाली रहैथ,। अपन जन्म स्थानक नाम जेना अपन पीठ प’खोदबा क, स्त्रीगन सासुर जैत अछि ,आ,जीवनपर्यंत ओकर वएह नेसान बनि जैत छैक । आब नीक सुभाव रहल ,ठोर मुंह नीक रहल,पीत्तमरू रहल त’ ओहि गांमक मान मरजाद बढल,बदियल ,मरखाह ,गुमान वाली भेली त, परात उठि क, किओ ओहि गामक नाम लेबा के सोचिओ नहि सकैत छल । भानपुर बाली के गोतियो सब हुनक अदम्य जीवट आ, संघर्षशील जीवनक चर्च परोछ में करईत कखनों ने कखनों नतमस्त्क त’ भ’ जाएत हेताह ,मुदा प्रत्यक्ष मे लोक ओहि लोक क प्रशंसा केनाय उचित नहीं बुझे छै ,जेकरा स कोनो प्रकारक लाभ नै होय । एक सधल नटी सन दु टा खुट्टा पर बांहल ज़ोर प पएर ,आंखि एकदम ,सीध मे ,माथ पर चारी पाँच टा घैल ,,ह , भानपुर बाली एहीना पएर संभारि क, कतेको बेर अहि खूँट स’ ओहि खूँट आ, ओहि खूँट स, अहि खूँट आबैत जैत रहली ,मुदा तखन त’ हुनक धुआ देखि क दियाद सभक हिय झरकि जाए । पेलवार क नजरि मे ओ अबला कतछलिह ,भरि मुह दांत भ’ गेल छलन्हि,पीत्त देखाय पड़ ‘लागल छल,आ, माथ प, कनी टा टा सींघ सेहो देखाय पड़य लागल छल । मुदा ओ त बाद मे । , क’ ट’ करि क’ जोडि जाड़ि क’ चीठी पटरी लिखबा योग्य साक्षरता ,बेटी के पढ़ालिखा क जज बनेबा के छै की ?फुकते त’ चूल्हिए, बाला जमाना मे ,अतीतक ड्योढ़ि जे आब नब जमाए लेल पायस बनेबाक सेहो सामर्थ नहि रखैत छल,नवम दसम होइत ,सुखी सम्पन्न घर देखि अपन माथ क’ बोझ उतारि देल ,आब सासुर मे जे जेकर भाग्य ,भोगतै जिनगी ओहि भांति । तखन अपन छोट छोट हाथ स ओसारा प’ राखल बड़का सिलौट प’ मोटका लोढ़ी स’ मसल्ला पिसइत ,बड़की दियादिनी स’ नहु नहुं बजैथ “हम सबटा काज करि दैत छिएइन्ह,ई भानस करि लौथ हमारा रानहय नहि आबैत अछि,बाबू बड़ खिसियाय लागैत छथिंह,’ । दियादिनी मुसुकि क’ रही जायथि ,ससुर के गारि बात आंखि क’ सोझा नाचि उठेक “ई भानस मनुक्ख खेबा जोगर छै ,दालि अनोन ,तरकारी मे एक ढ़ाकी नून ,’। सौस आगि प’ओडिका ल क घी ढ़ारैथ “सोइत्क बेटी छथि,सुकुमारि’ । गोर नारि ,पातर छितर ,कलसगर ,नीक आंखि नाक ,भानपुर बाली ,पीअर ,हरियर नुआ के देह मे ऊपर स’नीचा लपेटने निहुरि निहुरि क’ ओते बड़का टा आंगन मे दुनु सांझ झाड़ू बहाड़ू करैत हाफ़य लागैत त’ पनभरनी बिजूरी ल’ग आबि क’ छीन लेन्ह बाढ्नि ‘है लभकी कनिया ,आहाँ किए छूबे हीए बाढ़्नि,हम कथि ले हिये’। त’ घोघ क, नीचा स’ हुनक दाड़िमक बीज सन दांत चमकि जायन्ह।“सिखबाक चाहि नै,तखन नै बुझबे काज कोना होइत छै’। पाबनि तिहार मे जे नब नूआ आबै त पहिने घरक सब स्त्रीगन अपन अपन पसीन्न के चुनि लइथ,आब हुनका हरियर नै नीक लगे ,मुदा उपाय की ,दू नॉर कानि लइथ ,कतेक दिन धरि ओ नूआ ओहिना सन्दुक प’ राखल रहि जाए ,सब हुनक अईठी प’ हसैत रहे कोन कोन नै फकड़ा पढल जाए ,हारि क’ हुनका ओ नूआ पहिरैए पडैक । नहु नहु आब हुनको सौख मौज जागय लागल रहेंह । अपन बड़का बड़का आंखि मे काजरि लगा क’ नीक जका नूआ पहिरै लागल छलिह । भरल दुपहरिया मे ,अपन कोठरिक दरबज्जा सटा , नीचा पटिया ओछा क’ सीकी के बड़का पौती स’ कजरौटी,पोडर अफगान स्नो ,अलता ,टिकुली ,सिंदूरक कीया, किलिपक पत्ता ,ककबा संग बीत्त भरि के एना निकालि क’ पौती के सोझा ठाढ़ करैत । अपन बड़का बड़का केस के जुट्टी स’ निकालि क नारिकेर् क तेल स बड़ी बड़ी काल धरि माथ् क मालिस करैत रहेथ 'फेर ककबा स' थकड़ईत थकड़इत पहिने बाम कात के जुट्टी गुथेथ,ओकर नीचा मे ललका फीता के खूब पैघ बड़का फूल बनाक ,ज़ोर स पीठ प फेक ,दोसर दिस क जुट्टीगुथेथ, फूल बनाबैथ ,फेर दुनु के एक दोसर मे फसा क बीच माथ स कनी नीच क्लिप लगा क खोंपा बनाबथि। गमछा के एक कोन के लोटा के पानि मे भिजा क' सबुंदानी मे राखल साबुन प रगड़ि मुह पोछि आंगुर स स्नो दुनु गाल प लगा बढ़िया स पचा क पोडर लगेला के बाद , टीकुली कपार प साटैथ,आखि मे काजर लगाक ,एना के हाथ मे उठा कनी काल धरि अपना के निहारैथ ,फेर नहीं जानि की सोची क' मुसुकि क ,सब चीज बोस्त ओरिया क मौनी मे ध ,कोठी के ऊपर राखि अपन पलंग प कनी काल पडल पडल घरक़ धरनि तकेत आंखि मुनि लइत छलिह ,की बेरहट लेल आंगन मे धिया पुता के आवाजाही सुरू भ’ जाय छल,फेर रतुका भोजनक ब्योंत ।कहिओ जखन अहि टोल,ओहि टोलक ससुर् बासि बेटी सब नैहर आबैथ त’ बड़का बाबा के हवेली के नब कनिया के देखय एबे करे जायथ,बड़की दादी हुलसि क’ हुनका सभके अपन ओसारा प’ राखल चौकी प,बैसबा स’ पहिने चद्दरी बिछेनाय नहिं बिसरथि । आ’ कनि काल् क गप्प सप्प के बाद पछबरिया घरक केबाड़ लग जा क’ बाजथि ‘दाय सब एलखीन हें कनी बहरैयों घर स’ मुंह देखा दिओ”। छोटकी कनिया केबाड़ लग आबी क; बड़का टा घोघ निकालि ,मुड़ी गोतने अपन दुनू पएर प बैस रहैथ दादी कनि झांकी क’ देख लैथ फेर ,संतुष्ट भाव स ,केबाड़ खोलि आगाँ बढि कहथि “गे फूलो ,तुही देखा दहि नबकी भौजी के मुंह”। अपन विवाहक बाट जोहैत पितियौत ननदि फूलो चट स घोघ उठा क, मुड़ी पकड़ि तीनों दिस घुमा दैक । “कनिया बड़ सुन्नरि , केहेन परोड़क फाँक सन उछलल उछलल आंखि, ठाढ़ नाक ,पनमा ठोर ” । कनिया के सुन्दरताई प अपन विचार परगट करि क जायत काल हुनका सबके दादी आने की भानपुर बाली के सौस् क विलाप करेज मे छूरा सन गड़य लागे “माटी के मुरुत एक टा गढ़ि क ध देलक,’ आ’ तेकरा बाद हुनक विपन्न नैहरक खोईचा छोड़ा क बखानय लगेथ त’ सुननहारों के अनसोहात लगे “जाए दिओ,बाप क धन स की होई छै, नीक लोक त भेट गेल” किओ ने कियो बजिए उठेक । गरमी मे सकाले भानस भात भ’ जाए आ’ घरक स्त्रीगण सब सेहो नीफिकिर भ; कखनों पछबरिया ओसारा प;कखनों पुबरिया बाड़ी बाला दुमुहा हवादार घर मे अपन किसिम किसिमक गप्प क पेटार खोलथि। टोल भरिक बेटी पुतहु सबहक बाजब, भूकब ,व्यवहार ,रूपरंग के अपन अपन तराजू प जोखैत ,कखनों ओकिल त, कखनों जज के मुद्रा मे आबि जायथ। ओहि बइसारी में बुढ़ पुरनिया सौस लेल जगह नै रहे ,एक्छहे जुबती सब ;,बियाहल ,कुमारि, । ओत्त पानिभरनी, कुटिया पिसिया करनिहारि ,मालिन ,धोबिन ,खबासिन तेकरो सभक पैठ छल,मुदा उमरि के मामले मे कोनो दरेग नहीं ,आब हस्सी ठठा लोक अपने तुरीया मे करते न । बाजए के सबके समान अधिकार त नहि छले,मुदा किओ चुप्पों नै रहे ,मुंह दाबि क त पुतौह सब हँसे ,गामक बेटी त, ठिठिएबे करे ज़ोर स । एहने जेठक सुनसान दुपहरिया मे ,जखन एक दिन अपन कोठरिक केबाड़ ओठङ्गा क’ सिंगार पटार करबा लेल पटिया ओछा क’ जुट्टी खोलि कोठी पर स एना ककबा उतारक लेल हाथ बढोलन्हि की पएर दाबी क’ चुप्पे स पईसल छलखींह, उघरल माथ कपार ,छिटकल केस ,भानपुर बाली के जेना ठकबकी लागि गेले ,देहक शोणित बरफ भ दिमागक सबटा गतिबिधी के अवरुद्ध करि देलके , हुनक अहि मनोदशा के फायदा उठबईत टुनटुन भैया झट दनी हुनका बाम हाथ स पजियाबईत दाहिना हाथे हुनक मुंह बन्न करि देलथि। खूब बुझल छलनहि,एखन आँगन मे कियो नहि ,माय अपन भगिनी के बियाह क हकार पुरय लेल अपन नैहर गेल छली,बड़की भौजी अपन छोटकी बहिनक दुरागमनक लेल अपन नैहर गेल छलथि ,तीनों बहिन अपन अपन सासुर ,खबासीन दुनु ,सेहो लगनक समय मे नौत हकार पूरय कत्तों कत्तों आन गाम गेल ,। टुनटुन भैया के मनोरथि प, भानपुर बाली धधकैत अँगोरा फेकलथि ,अचानक ओ सिंहनी बनि हुनक पकड़ि स, छूटि हुनक दाहिना हाथ प’ ततेक ज़ोर स अपन दांत गडौलथि जे हुनक छरपट्टी छुटि गेलन्ह ,एतबा मे ओ केबाड़ खोलि सोझे दलान दिस प्रेत बाधा स ग्रसित मनुख जका पड़ेली,पितिया सौस जनार्दनक माए ,जे अपन दलान स उतरि टेटरा म्या स, बांगक गाछ लग ठाढ़ भ गप्प करैत छली, बड़की काकी के आँगन स दौड़बक आबाज सुनी दुरखा लग आबी चिहुकि उठली “की भेल ये कनिया ,गई म्या , ,”बड़का बड़का केस ओहिना खुजल ,माथ प नुआ ने , आंखि मे भयानक भय ,ज़ोर ज़ोर स, चलैत साँस,मुंह स त’ किछू नहीं बहरेलन्हि,मुदा ओ हुनका भरि पाँज पकड़ि ज़ोर ज़ोर स कानय लागल छलिह । इमहर उमहर कान ठाढ़ केने लोक बेद के देखि क जनारदनक माए हुनका हुनके आँगन मे पछबरिया ओसारा धरि डाढ़ पकड़ि क आनलखिन्ह । कनी काल धरि हुनक माथ प, हाथ राखि नोर पोछि,सप्पत तप्पत दइथ ,सब टा खिस्सा उगलबेलखिन । घर बला पढुया छलथी त, बेसि काल पर्देसिए बनल । फेर त जा धरि सौस नहीं आपस अयली ताबे तक हुनका ओगरि क ओ हुनक ओसारा प सुतैत रहल छली । सौस के कान मे जखन खिस्सा गेलन्हि ,त’ ससुर आ’ भैसुर संग ओहो त्रिया चरित त्रिया चरितक डिडिंबी नाद करैत हुनक हाथक छूल नहिं खेबा क सप्पत संग पेटकुनिया द’ पुतौह के सरापय लागल छलिह ,किएक त ओहि दिन स’ टुनटुन भैया निपता भ गेल छलईथ । उमहर एहने नीफिकिर दुपहरिया मे जुबती सबहक बइसारी मे भानपुर बाली हीरोइन भ गेल छलिह । किओ कहेक“गाल प दांत गड़ा दैतथि नै, जे जिनगी भरि के चेनहासी भ’ जयतइन्ही’। किओ कहे “हम जे रहितिये त तेहन ठाम नै लात मरितिएई जे ज़नानी के नाम धरि बिसरि जैतथि’ ‘एहने चालि प घरबाली छोड़ि देने हेतैन्ह’। तेकरा बाद सब अपन अपन गामक छिनार पुरुखक अनंत खिस्सा बांचैत। आ , दोसर ठामक बैसारी मे,जतए ,थकुचल ,झुरकुट ,खुर्राट सौस सबहक गप्प चले ,टुनटुन बाबुके सुधपनि के;हरेराम कका के माए अपन गरदनि के मोटका हसूली छूबेत ,मिचिया मिचिया क बाजेथ ‘कहिओ हमरा सब दिस नजरि उठा क, नहिं देखलन्ही, तेहेन लजकोटर ओ ,सदिखन माठ झुका क छलेथ’। ‘यै गरिब् क बेटी आनलहु बीयाहि क तखन त एहने सन दिन नै देखौता बिधाता।‘ कानक माकड़ी झूलबईत अनारस बाली बाबी बाजैथ । आ ओहि बइसारी मे जनार्दनक माय सेहो रहेत “हम सब मुरुख छल प्रपंच की बुझबई ,कहबी छै जे घोर कलिजुग आबि गेले,’।टुनटुन बाबू के जननी नॉर पोछि बाजेथ “ओ बतहा के की पता छले जे ओसारा प राखल लोटा उठा क क’ल स पीबा लेल पानि भरनाय ओकरा एतेक महग पड़ते ,देह मे त अहि कुलछनी के आगि नेसने रहे छै’। छले त टूटल जमींदारी ,मुदा एखनों बड़का गिरहस्थ ,,जमीन जायदाद गाछी ,माल जाल संगे दस टा धिया पुत्ता बाला नामी घर ,दू तीन टा पूत त’ ऊच शिक्षा प्राप्त करि बढ़िया नौकरी सेहो करय लागल छलथि। अहि प्रसंगक बाद भानपुर बाली के घरबला कोलेजक एक टा छुट्टी मे जखन गाम एलथी ,त’ फेर ओ आपस अपन कोलेजक मुंह देखे नहीं गेला ,कनिया लग जे दु चारि पाय जोडल छल , पेटी मे आ’ देह पर जे सब आभूषण छल संग ध ,दुनु बेक्ती ओहि घर क मधुर छाहरि स निकलि दुनिया के अथाह महासमुंदर मे दहिया भसीया क अपन बाट ताकय लेल जायत रहल छला । कतेको बेर एहेन देखल गेले जे साधारण सन बाट ,कखनों क तेहन भयौन मोड़ ल लेत छै ,जे एक दिस उंच पहाड़ आ’दोसर दिस लोंमहर्षक खाधि। लोकबेद के कहब छै जे अप्पन बाट मनुक्ख अपने कहाँ बनबे छै ,ओकर बस चलिते त’ ओ चिक्कन चुनमुन गंगाजल स’ धोल रस्ता प,पएर रखिते,मुदा जीबनक रस्ता त’ वैह बनबैत अछि ,जे जीबन बनेबक ,ओकर संचार करबाक ,आ’ ओकर संहार करबाक भार उठौने अछि । तखन सुंदर ,सूचिक्कन बाट सेहो काँट कूस ,पाथर ,पानि स’ भरि दुसाध्य भ’ गेले कोना ,से अदृष्ट जानेथ।भानपुर बाली संग किछू एहेने भेल छले।ओहि जमाना के इंजीनियरीङ्ग्क पढ़ाई डेढ़ बरख पहिनहि छोड़ि घर बाला सड़क प’ बौआ रहल छलथी। कनिया के मोसियौत बहिनक घरबला अहि मुसीबतक घड़ी मे सुग्रीव जका हुनक संग धेने रहल।मास दिन धरिअपन घर क छत हुनको माथ प’ राखि डिस्टिल्ड वाटर के फैक्ट्री में नौकरी के सेहो बेबस्था करा देलकन्हि। भानपुर बाली के की नाम छल हेतैन्ह की पता ,मुदा तत्कालीन रिवाज् क मोताबिक ,पहिलोठ संतान के नाम स म्या के नाम पड़ी जाए ,असेसरक माय ,बीन्नी के माय । धिया पुत्ता के बेर मे सेहो बिधाता जेना बाम बैसि रहल छलथी। मुदा कतेक बरखक बाद एक पर एक तराउपरि चारि टा धिया पुता स भगमान आचरि आ’ घर भरिदेलखिन्ह।आ ओतुक्का लोग हुनका सोना के माँ के नाम स चिन्ह लागल छल। घरबला के त’ बुधिए बाम भ गेल रहेंह । अपन कुल खानदान क’ घमण्डक संग ओहि अधखिज्जु डिग्री के दंश हुनका सनकी सन बना देने छलन्हि। अपना ऊपर केकरो रोब जतेनाय हुनक पीत्त के तुरन्ते एड़ी स’ मगज धरि पहुंचा दैक। कार्य स्थल प’ नित्त दिन झंझट होमए लागल । घर आबि क’ भानपुर बाली प’ तामस झाड़ईथ ‘अहीके चलते हमरा आय ई दिन देखय पड़ि रहल अछि ,बड़ कष्ट छल त’ नदी पोखरि मे भसिया जयतों ,जहर माहुर खा सूती रहितों : तिरिया चरित्र मे फसि क, हम बर्बाद भ गेलों”। की करितथि भानपुर बाली ,बज्र सन बोल सुनैत सुनैत पाथर भ’ गेल छलथी पहिनहि स । बच्चा चारु इसकुल मे पढ़ैत छलेय । तनखा त’ कोनो खरापो नहिं छल । प्रतिदिन भोर मे काज प’ ज़ेबा काल पति कलह मचबैत ‘अहाँ की बुझबै ,अपने त दरिद्रक बेटी छी, स्वाभिमान की होय छैक। आय हम अपन हिसाब करबा क रहबे ,ने बरदास होइत अछि कनहा के बोल”। भानपुर बाली आगा बढ़ी क हुनक माय बनी जायथ ‘हमर गप्प छोड़ू ने ,मुदा अहा केकरो स याचना करय थोड़े जाय छी ,मेहनत करे छी,दुनिया करे छै, आब ई कोनो निषिद्ध चाकरी बाला जमाना त रहले नहिं ,देखियो बच्चा सब के निक इसकुल भेट गेले,सब त अहिं प, आश्रित अछि ने”। एक बेर केकरो मुंह स कत्तों सुनली ,जे सेना मे नीक नौकरी भेटेय छै । एक दिन घरबला के नीक मूड देखि क बजली त हुनक रौद्र रूप आ चिकरनाय सुनि क सब धिया पुत्ता कोठरी के मुंह लग आबि क’ ठाढ़ भ गेले “ हे देखैजाही एकर बुद्धि , तोहरि बाप रहतौ घर मे आ हम जाऊ सेना मे मरय”। मुदा कतेक दिन ,आखिर मे ओ नौकरी स इस्तीफा द देलथि। तखन एहने सन किछू भवितब्य के सोचि विचारि होसियारि भानपुर बाली पाँच कोठरी के अपन मकान पहिनहि बनवा नेने छलथी ,एक टा बाईस कट्ठा के जमीन सेहो कीन लेने छलिह। आब घरबला जखन त्यागपत्र द देलखीन त जे बकाया रुपैया भेटलनही,ओहि स खाली जमीन प, दू टा कोठरी गिलेबा प, ठाढ़ करि क’ जुत्ता के फैक्ट्री खोललन्हि। तीन टा कारीगर रखली । घरक सबटा काज सम्पन्न करि सीधे फैक्ट्री पहुंचथि । कखनों पतिदेव के अनेरे क्रोध देखि ,कारीगर सब के पोल्हा क चाह पानि पिया क’ बुद्धि स’ काज लईथ। किछुए काल मे बिजनेस गति पकड़ि नेने रहेक । दुनु बेटी के कन्यादान करि गंगा नहा नेने छलैथ । मुदा बिपदा के ई कोना सोहेतेंह। ओ अपन चक्र चालि फेर स’ तेज करि देली । किओ कहलकैन सौस बड़ बीमार,किओ नै सेबा करे छेंन । जे पुतौह सब बड़ नाम गाम बाली छलिह ,धिया पुत्ता के पढ़ाबए के लाथे अपन अपन घरबला संगे बाहरि जायत रहली । एक टा बेटा त भागिए गेल छलेंह,मुदा तइयो पाँच टा पुतौह त बसिते छल ,आय बुढ़ारी मे ,बीमारी मे कियो काज क नै ।ई सुनि हुनक मोंन कचोट स भरी गेलन्ही,आखिर ओ हमर स्वामी के माँ बाबू छथि,आ शास्त्र क बिधान अनुसारे हुनको धर्मक माँ पिता , हुनक करतब्य बोध हिय मे उत्पात मचबए लागल । सबटा काज छौड़ि सौस लग आबि गेल रहैथ।ओ रोबदाब बाला धूवा ,मुट्ठी भरि के ठठरी बनल बिछौन स सटल,ससुर सेहो दलान प पड़ल। मास दिन रहि क सब व्यवस्था दुरुस्त केली । जखन हुनक मुंह मे ओ कौर खुवाबथि सौस के आंखि स हर हर नॉर बहे लगै ,अपन दुनु हाथ जोडि ओ जेना हुनका स क्षमा मांगेथ । भानपुर बाली हाथ पकैड़ अपन माथ प राखि लइथ। ओछौने प नदी ,लग्घी होयन्ह , अपने स बिन घिनेने साफ करैथ ,दू टा मटकूड़ि राखीदेलथी,महेशक बेटी के हुनका कोठरी मे सूते के ,आ हुनक सब तरहक धियान राखय लेल गछबा क ओकर बियाह दानक सब टा भार गछि लेलथि। भनसीया सेहो राखि देलथी ‘हम पाय देब आहाँ दुनू प्राणी के सेवा करबै खेबा पीबा मे ,पथ परहेज मे कोनो कोताहि नहिं हेबाक चाहि । कनी डेरो प हमरा देखनाय जरूरी अछि”। आ एक पएरसासुर आ दोसर डेरा प, रखने बरख धरि काटि देने छलिह । माय बाप संग ,गांमक लोग के आत्मा जुड़ा गेलय,आब हुनक कुल सील क डंका पिटाय लागल । किछू बरखक बाद जुत्ता फैक्ट्री बंद भ गेले ,घरबला के चिनिया बीमारी आ, ब्लड प्रेशर दबोचि लेलकन्ही। बेरा बेरी ससुर आ, सौस अपन अपन ठाम जायत रहला । इहों सबहक संग ससुरक संपत्ति मे अपन हिस्सा बटबा लेलथी । मुदा बटाई प, ने लगा क, अपने स’ जन मजूर राखि खेती करबाबए के ठनली। परदेशक जमीन आ मकान बेचि क’गाम स सट्ल शहरि मे जमीन खरीद क’ मकान बना लेलथी जतय दियाद सबहक सेहो चास बास छलेन्ह। मकान क चारु कट छहरि द क सोझा बदक फाटक सेहो ल्गबा लेलथी ,आंच कट्ठा के ओहि चास बास मे आगा पाछा फल फूल के किसिम किसिम क गाछ बिरीछ लगाबा लेलथि ।गाम प बटला के बाद चालीस बीघा जमीन त’ हिस्सा मे पड़बे केलन्हि,आ ओ पोखरा पाटन बड़का हबेली मे छ टा कोठरी सेहो हिस्सा मे भेटलन्हि। अन्न पानि, उपजा बाड़ी बड़ नीक, गाय भइस पोसिया लगा देने छलथी। साल भरि केअन्न ओहि ठाम राखि क बाकी खेते स बेच दैथ। बड़का लग्गा बाला उपजाऊ जमीन ,जिनगी नीक जका कटय लागल । आ ई सबटा काज भानपुर बाली जनानी भईयो क’ अपने करैथ ।आब उमरि सेहो भेलन्हि, आ’बेतहासा रौद बसात सहैत सहैत हुनको देह मे बीमारी पइस गेलन्ही।छोटका बेटा के डाक्टरी मे नाम लिखा गेल छल, माय के सदी खन कहे , “बस कनी दिन रुकि जाऊ ,चारि बरख आउर ,हम नौकरी धेलउ की आहा के रानी जका बैसा क’ राखब ,ई बातरस ,ई दम फुल्ली सबटा दूर करि देब । बड़की पुतौह अपने सन कुलसील बाली आनली।बी एड करि रहल छल । पद्गाई के संगे गृहकार्य मे सेहो दक्ष ,अपन परिस्थिति के बुझए बाली ,पूजा पाठ करय बाली,सौस ससुर् क मान सम्मान देबए बाली । मुदा पहिने कहल जे बिपदा के ने सोहेले बिन हड़ हड़ खट खट के जिनगी ।ओ कोना चाहितेथि जे आस क किरण कोनो ने कोनो दोग स हुनक जिनगी के इजोत स भरि दैक । दुनिया भरि के व्रत । ओहि नरक निवारण चतुरदसी के परात उठली त घरबला के पलंगक नीचा खसल देखि सन्न रहि गेलिह ।बेटा पुतौह के मददि स कहुना करि ओछौन प’ सुथौलथी स्वास चलइ छल। अपने दौड़ गेली पड़ोसिया डाक्टर लग ,ओहो ओहिना भोरका चाहक कप सोझा क टेबुल प राखि झटकारैत संगे चलि अयलैन्ह। नॉरखसेबक काल नहीं छल ,तुरत एंबुलेंस मे लादि हुनका नर्सिंग होम मे भरतीकराओल गेल । पक्षाघात क अटैक छल। शरीरक बाम अलंग सून। अहि बिपत्ति मे दुनु हाथ क मोटका सोनक बाला आ’ कांगुरिया आंगुरक बराबरि मोट गरा के चेन बिका गेलन्ही। मुदा संतोष छल सत्ती माय हुनक जान त बकसि देलखिन। पहिनहु ओ घरे मे रहैत छला,आब ओछौन प ,मुदा आंखिक सोझा त छलेथ ,आस त मन मे रहबे करेन्ह जे आए नै काल्हि,सखरा भगवत्ति के किरपा स उठि क अप्पन पएर प ठाढ़ त अवस्स हेता।आब जे साधू ,संत ,बैद,डाक्टरक अजगुत चमत्कारक खिस्सा लोग सुनबे ओ आस् क डोरी पकड़ने दूर दूर धरि दौगति रहली । कोन जड़ी ,कोन बूटी ,कोन तेल मालिस ,जादू टोना ,की सब नहि अजमबेत रहली ,मुदा हार नहि मानली ,बिसबास जीवित छलेनह। अहि मध्य खबरि भेटलनही जे छोटका बेटा जे अखन पहिले बरख मेडिकल मे छल ,कोनो पहाड़िन स विवाह करि लेलके । दुख की आ कतेक होयतन्हि,किछू दिन भगवती के सोझा रिरियाती रहली ,मुदा मोंन नै मानलकैन्ह त’ बस पकड़ि ओतेक दूर बेटा पुतौहक मुंह देखय औ बरखा बूनि के परबाह नहिं करि क चलि पड़ल छलिह। फोन प गप्प भेल रहेंह ,सपूत बरुन बस स्टेंड प आबि दुनिया के सोझा माय के निहुरि क गोड़ लगलक । होटल मे ल जाक खुआदेलकईन्ह,आ फेर ओहि घूरती बस मे, ओहने मौसम मे रतुका टिकस कटा क चढ़ा देलकेंह । सोचने रहैथ ,केकरो स विवाह करि लेलके त की ,आब त ओ हमर पुतौह भेली न ,त अपन कर्णफूल छोटका डिब्बी मे राखि पर्स मे ओरिया क ध नेने छलथी,कनिया के खाली हाथ कोना देखब । किछू टाका सेहो राखि लेलथी ,नब नब गिरहस्थी छै,ककरा स मांगते । अनहरिया रा ति ,कड़कैत बिजुरी ,बरसैत मेघ मे तितति भीजति ,जखन ओ दरबज्जा खटखटौली,पुतौह के डरे हदास पईसी गेले ,अंदेसा भेलन्हि,खिड़की स झकलि ,माँ के देखि किछू पूछताथ करितथि तेइ स पहिनहि घर मे पएर रखैत बड़की पुतौह के भरि पाँज धरि मोन भरि कनली “केहन भ गेल बरुन ,अपन डेरो नै ल गेल ,आन लोक सन होटल मे खुआ क अहि प्रलय काल मे ,बिन किछू सोचने रातराती बिदा करि देल। कतबों कहलिए कनी कनिया के मुंह देखा दे ,कहलक कोन सुन्नरी छै जे देखबै’। कनी दिनक बाद बरुनक फोन आबए लागले ,जायदाद मे हमर बख़रा द दीय । हम अहि ठाम घर कीनब’। घर मे भूकंप आबी गेले ,चारुकात क धरतिए टा नहि,ऊपर अकास धरि डोलए लगलै। भानपुर बाली के सोझा परसल थारी निरैठे रहए लगलै ,हाथ पएर मे बग्घा लागए लगले,माथ टनके ,अनेरे बड़ बड़ाए लागल छलिह। “कोन कोन दिन देखेता बिधाता ,जायदाद मे हिस्सा के मतलब जे ई घर बेचू ,गामक जमीन आधा करू ,गामक मकान आधा करू । तखन कोना करि क जीबनक भवसागर पार करब । तखन लोकबेद सलाह देलकेंह , बाटल जेते दादा के संपत्ति,बापक अरजल प हुनका अछैत किओ ने अपन जुईत चला सकैत अछि आ येह गप्प बड़का बाबू के सरबेटा जे नामी ओकिल छलथि सेहो कहलखिन ।“अशक्त बीमार बाप के सेवा करबा के फुरसति नहीं छेंन आ, संपति मे बख़रा तुरत चाहि, पढ़ाई लेल जे पाय पठा रहल छी ,सेहो बंद करू एहेन कपूत के’। मौसम अहि बेर केहेन तांडव केने छल। भयंकर ठंड । कम्मल ,सीरक मे भरि दिन लपेट क त ओ बैसयबाली प्राणी नहिं छली , हाथक बुनल मौज़ा पएर मे ,साया के नीच गरम पैजामा ,कार्डिगन, ऊपर स मोटका पशमीना शौल मे अपना के नीक जका बानहि छेक क ब्रम्हबेला के स्नान ,पूजा के बाद स इमहार उमहर लुड़ूखुड़ू मे लाइग जायथ । पुतहुक परीक्षा चलैत छलै। सबके चाह द क ,बाहर आँगन मे बोरसी मे आगि सुनगा क राखि देली,कनी काल मे निधु भ जेतैक त’ घरबला के कोठरी मे राखि,हुनकर मालिस करितथि। ताबैत चाह ल’क बेसकी मे आबि गेलिह ,थर थरी लागए लगलैन्ह त, पर्दा लग रखल हीटर जे कनी खराप छलै ,कतेक दिन स सोचने रहेथ ठीक करबाबक ,मुदा आय कपकपी बरदास नै भेलन्हि त जरा लेलखींह । कनिए काल मे गों गों के आबाज सुनि पुतौह पढ़ाई छोड़ि दौडलनन्हि,ओकरा भेले बाबूजी के कोठरी स स्वर आबि रहल अछि। मुदा ओ त बैसकी स आबेत छ्लै, खिड़की के परदा पकड़ने ओ त नीक जका झरकि चुकल छलिह सबटा कपड़ा सुड्डाह ,बाक बंद ,तुरत हुनक उठा क ,सूती चादरि आ,कम्मल मे लपेटि बड़का अस्पताल ल जायल गेल डाक्टर नीचा मुंह करि नीरास भ मुड़ी हिला देलके, नब्बे प्रतिशत झरकल । तीन दिनक भनक कष्ट क उपरांत आखिरी मे माटि के मुरुत माटि जका भखरि गेल छलिह । इम्हर,मनुक्खक जाति, कियो कियो बिररो उड़ा देलके ,आत्मह्त्या करि लेलथि,बेटा स परेसान छलखिन ,मुदा ओत्त उपस्थित सम्पूर्ण समाज किओ ने पतिएलके ,एहेन जीबट स्त्री त बड़ कम गढ़ैत छथिंह भगबती ।कानेत कानेत पुतौह बजली “हीटर खराप छल ,ओहि मे करेंट आबैत छलै”। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कैलास दास लघुकथा- ममता युग बदलतै समय नहि लगैत अछि । युग सँगहि मनुष्य नहि बदलि सकल तऽ ओकर बीच मजधार मे छोडिकऽ समय आगा निकलि जाइत अछि । एहने भेलन्हि ममता आ ओकर माय बाबु के । समय अनुसार ममताके माय बाबु नहि बदलल आ ममता के समय साथ नहि देलक । कहैत अछि, ‘अभावे झगडाके जडि होइत अछि ।’ जतए अभाव नहि छैक ओतह द्वन्द नहि होइत अछि । फेर तऽ बेटी होए वा बेटा सभ एक समान । २५ वर्ष पहिने जहिया ममता के जनम भेलन्हि चारुगाम सोर भऽ गेल रहैक, ‘गुमस्ता बाबा के पोती भेलन्हि ।’ दू पुस्तासँ ओहि खनदानमे एको गो बेटी नहि भेल रहथि । ओना गुमस्ता बाबा चाउरगामक जमिनदार सेहो छथि । बड धुमधामसँ खुशीयाली मनाओल गेल । ममताक छठिहारक दिन चारुगामा नौतल गेल रहैक । डिविया दशपैसीकेँ नाच सेहो आएल छल । छठिहारक दिन गुमस्ता बाबा नाचएवालाके सोनाके सिकरी दऽ देने रहथि । ममताके बड लार प्यार आ दुलार सँ लालन पालन भेल रहैक । मुदा भविष्य मे की हएतै कोई नहि जनैत अछि । गाममे बेटी बढत लिखत तऽ बिगडि जाएत रहल मनसाय के गुमस्ता बाबा तोडलक । ओ अपन पौती ममता के पढा लिखा कऽ निक डाक्टर बनाबए चाहैत छल । मुदा भेल ओकर उल्टा ? ममता स्वयं नहि बुझि पाबि रहल छल जे एहिमे गल्ती कतए भऽ गेल । ओ अपन खिडकीबाटे लोकके अबैत जाइत देखि रहल छल । एहिसँगहि अपन वर्तमान आ भविष्यकेँ सेहो तौल रहल छल । जहिया ओ विद्यालयमे पढैत छलथि तऽ सभ विद्यार्थी ममतेसँ प्रतिस्पर्धा करैत छल । चंचल तऽ ओ छलैए, पढएमे सेहो बड तेज रहैक । पाँच कक्षा धरि ओकरा कोई नहि प्रथम भेला सँ रोकने छल । मुदा जखन ओ छ कक्षा मे गेल तऽ दोसर विद्यालयसँ आएल राजेश सँ प्रतिस्पर्धा होबए लागल । प्रतिस्पर्धाक क्रममे कहियो काल दुनू गोटे बीच झगडा सेहो भऽ जाइत छल । सात कक्षा धरि जाइत—जाइत राजेश प्रथम स्थान ललौक आ ममता दोसर । राजेश मनिपुरसँ ममताक गाम घारोपुर मे रहल विद्यालयमे पढए अबैत छल । देखएमे राजेश तऽ ओतेक सुन्दर नहि रहथि मुदा पढएमे ओतबे तेज रहथि ओ एके वर्षमे ममताक नम्वर तऽ तोडबे कएलथि, सँगहि विद्यालयक विद्यार्थी आ शिक्षक सभक चहेता सेहो बनि गेल रहथि । ममता राजेश के देखि कऽ मनेमन खुब जरैत छल । किछु दिन धरि तऽ राजेशके टोकबो नहि कएन्हि । ममताक बाहेक राजेशके विद्यालय के सभ छात्रछात्र बजबैत छल आ राजेशो ओकरा सभके पढाईमे कोनो समस्या होइत छल तऽ सल्लाह दैति छल । एहिसँ ममताके आओर बेसी जलन होबए लागल । मुदा एगो इर रहैक ममताके जे राजेश पहिने बजाओत तऽ बजाएब नहि तऽ नहि । जतबे ममताके राजेशके बजाबएके मन करए ततबे पितो लहरए । जेना जेना समय वितैत गेल ममता राजेशके बजाबएके प्रयास करए लागल मुदा कोनो बहना नहि भेटलाक कारण बात नहि बनि पाबि रहल छल । संयोगे कहुँ परीक्षा समाप्त भेलाक बाद विद्यालयक पिकनिक मनाओल गेल । ओना ई पिकनिक विद्यालयकेँ छात्रा सभके मात्र होईत अछि । छात्रासभ खाना बनाकऽ शिक्षक सभके खिएबैत अछि । मुदा राजेश विद्यालयके सभसँ तेज आ आज्ञाकारी भेलाक कारण ओहि पिकनिकमे ओकरो रहिकऽ सहयोग कऽ देवाक लेल छात्रा आ शिक्षक सभक कहने रहथि । ओही क्रममे ममता पियाउज काटि रहल छल आ अपन सहेली सभसँ सेहो बात चित कऽ रहल छल कि हासु उछैटकऽ लागि गेलन्हि आ धरधरकऽ खुन बहए लागल । खुन देखिकऽ ममताक सहेली सभ बाजल ‘गे केना हात कटि गेलहुँ, किछु बानहु ला नहि अछि । किछु देर पानिमे हात राखि लेबे तऽ खुन बन्द भऽ जएतो ।’ कहिते छल कि राजेश अपन जेबसँ रुमाल निकालिकऽ चट दऽ ओकर हात बान्हि देलक आ हातके किछु खानधरि अपने हातमे दबौने रहल । राजेश के ई बानि देखिकऽ ममताके आँखिमे नोर आबि गेल मुदा किछु बाजि नहि सकल । ओहि दिनसँ ममताक सहेली सभ ओकरा खौझाबए सेहो लागल । कखनो काल ममताक सहेली सभक कहैत छलथि,‘ममता घमण्ट सँ भरल अछि मुदा राजेश सभके भले चाहैत अछि । पढहुँ मे तेज आ व्यवहारमे निक ।’ एक दिन ममता विद्यालयके वर्क बनाबएके बिसरि गेलथि । जखन स्कूल आएल तऽ ओकरा स्मरण भेलन्हि हम वर्क बनाबही के विसरि गेली । टेबुल के तेसर बेन्च पर राखल झोलामे सँ ममता काँपी निकालिकऽ झट दऽ होम वर्क बनाबए लागल । किछुओ देरक बाद मास्टर क्लस मे आबि गेल । राजेश होम वर्क काँपी सभ विद्यार्थी सभसँ लेबए लागल । मुदा जखन ओ अपन बेंग खोलए त ओहि मे होम वर्गवाला कापिए नहि छल । ओ सोचए लागल शायद आई घरहि मे तऽ नहि भेल गेलहुँ । किछु खानधरि ठाढ भऽ सोचि रहल छल कि ममता राजेश के कापी देति बाजल ‘साँरी ! हम होम वर्क बनाकऽ नहि आएल छलहुँ तएँ अपनेक कापी सँ सहयोग लेलीए ।’ ‘कोई बात नहि, मुदा कहि देने रहथि तऽ...’ राजेश कहलक ‘आब कहिएके लेल ।’ ममता बाजल । एहिना बातबिचतक क्रमम एसएलसी अबैत अबैत ओ सभ बहुत घनिष्ट मित्र भऽ गेलथि आ फेर जेना अन्य प्रेममे होइत अछि तहिना ओहो सभ विवाहक लेल तयारी शुरु कऽ देलन्हि । ममताक माए बाबुक कहब छल राजेशके माथ पर घडारी बाहेक किछु जमीन नहि अछि फेर एहि गामक जमिन्दारक बेटीसँग कोना विवाह करत । जातिके बात ओतेक नहि छल कारण दुनू स्वजातीय छली । मुदा बाबुक जमिन्दार अहमके परवाह नहि करथि ओ दुनू गोटे भागिकऽ विवाह कऽ लेलथि । राजेशके पढाईमे तेज होबएके फाइदा सेहो भेटल । भलहि ओ एसएलसीए पास छलथि मुदा हुनका एकटा कम्पनीमे जुनियर एकाउन्टेण्ट पदमे नोकरी भेट गेल । अपन घरसँ दूरे किए नहि होइक मुदा नोकरी भेटलाक कारण दुनू गोटेके जीवन बढिया जेकाँ चलए लागल । दुनू गोटे आइए सेहो कऽ लेलन्हि । भगवानके इच्छा किछु आओर छल । राजेश बिमार भऽ गेलथि । ममताके किछु फुराइए नहि रहल छल । आब की कएल जाए ? नैहरि सँ तऽ पुरे सम्बन्धे तोडि लेने छलथि । राजेशके गाम पर माएबाबु जिबैत नहि छल । भैया भौजी ककरा के होइत छैक । ओ बढिया जेकाँ बुझैत छली । तैयो ममता सभसँ पहिने भैया भौजीसँ सहयोगक याचना कएलन्हि । मुदा जेना बहुतो भैयाभौजी सँ होइत छैक तहिना हिनको निराशे भेटलन्हि । ममता दियादनी सल्लाह देलन्हि, ‘अहाँ अपन बाबुसँ कहियो सहयोग करबाक लेल, तिलको नहि लेने छिएन्हि । ’ ममता बुझि गेली भैसुर आ दियादनीसँ सहयोगके बात करब कोनो अर्थ नहि रखलक । ममता माएबाबु लग जाए नहि चाहैत छली मुदा कोनो विकल्प नहि भेटलाक बाद गेली । हुनका लागल छल बहुत दिनक बाद बेटीके देखलाक बाद कहुँ माएबापके मोन डोलि जाइक मुदा से नहि भेल । ओ घरमे बैसहुँ नहि कहलन्हि । बाबु मुसीके कहिकऽ भगा देलन्हि । जे मुंसी काकाके एक बेर हल्ला करैत छलथि तऽ तीन बेर हाजिर हाजिर करैत छलाह से हुनका घरसँ निकालि देलन्हि । ममता राजेशके कोनो हालतमे गमाबए नहि चाहैत छली । ओ अन्तमे राजेश अफिसमे गेली । राजेशक म्यानेजर सहयोग तत्काल नहि कएलक मुदा नोकरी देबएके वचन देलन्हि । राजेशके कहुनाकऽ दवाई आ घरक खर्चा हुनक आगा ठाढ छल । ओ हारिकऽ नोकरी करबाक लेल तैयार भऽ गेलथि । राजेशके घरमे छोडि ओ नोकरी करथि आ फेर घर पहुँचते फेरसँ राजेशके सेवा करए लगथि । म्यानेजरक आँखि हुनके पर घुरि रहल छल । ओ बढिया जेकाँ बुझि रहल छली । मुदा उपाय किछु नहि छलन्हि । एक दिन म्यानेजर किछु काजसँ हुनका रोकि लेलक फेर हुनकासँ गलत व्यवहारक प्रयास करए लागल । हुनका बुझए मे नहि आबि रहल छल आब कि कएल जाए । एकदिस म्यानेजरके बात नहि मानला पर राजेशक जीवन आ घर परिवार आ दोसर दिस एहि जीवनके नाम पर एतेक बडका धोखा । ममता म्यानेजरके आगूमे बहुत कनलथि तैयो कोनो प्रभाव नहि पडल । एक दिन राजेश के हालात बहुत बिगरि गेल । एहिसँ पहिने शहरक बढिया बढिया क्लीनिक सभमे राजेश के उपचार करा चुकल छल । मुदा किछु दिन सुधार रहल तकरबाद फेरसँ ओकर हालात बिगरैत गेल । ममताक किछु नहि फुरा रहल छल । ओकर दिमाग मे एकेटा बात रहैक जे शहरक बढिया बढिया डाक्टर सभसँ राजेशक इलाज नहि भऽ सकल तऽ आब कहाँ इलाज कराओल जाए । कतहुँ जाएबाक लेल पैसा चाही मुदा अखन तऽ पैसा नहि अछि । कोन परीक्षा भगवान लऽ रहल छथि । अब त एके टा भरोसा भगवाने पर । एक बेर सरकारी अस्पतालमे लऽ जाएल जाए । मुदा अस्पताल धरि लऽजा कऽ उपचार कराबी ममतासँग पैसा नहि छल । महिनो पुरा होबएमे पाँच सात दिन बाँकिए छल । राजेश के हालत देखिक ममता विलकुल विचलित होबए लागल । ओकरा किछु नहि फुरा रहल छल की करु की नहि । एहिसँ पहिने एक दिन कम्पनीक मालिक किछु काजसँ ममताके रोकि लेने छल आ ओकरासँग किछु गलत व्यवहारक प्रयास सेहो कएने छल । एहि सँ ममता कम्पनीसँ पैसा माँगए नहि चाहि रहल छल । मुदा कएल की जाए । ममता किछु खान धरि चुपचाप सोचैत रहल । फेरसँ अपन साहस जुटाकऽ कम्पनीमे गेल आ राजेशक स्थितिके बारेमे कहलक । कम्पनीक मालिक मुस्कुराइत बाजल, ‘ममता एखनो अहाँ के किछु नहि बिगरल अछि । सुन्दर मात्र नहि अहाँक अखण्ड रुप अछि । अहाँ एक बेर बाहि फैलाकऽ त देखु । राजेश आब बेसी दिनक मेहमान नहि अछि । फेर अहाँक ई सुन्दरता कोनो कामके नहि रहि जाएत ।’ ‘तब हम की करु मालिक’ ममता बाजल । ‘हमर सल्लाह मानब तऽ अहाँ छोडि दिए राजेश के, अहाँक लेल हम एकटा पक्का घर दऽ देब आ नोकरीमे पद सेहो बढा देब, मुदा हमरा सँग रहए पडत ।’ कम्पनीक मालिक बाजल । ममता बहुत बडका असमन्जसमे पडि गेल की करु, नहि करु सोचैत सोचैत हुनकर माथा मे चक्कर देवए लागल । फेर अपन बिखरल साहसक समेटिकऽ ममता बाजल, ‘मालिक ! राजेश के जिते जी कतबो सम्पति हमरा लेल किछु नहि अछि । हम एकटा वियाह महिला छी । वियाहल महिलाक लेल सभ अस्मिता अपन पुरुष के लेल होइत अछि । हम जहर खा सकैत छी मुदा ई कुर्कम हमरा सँ नहि हएत । हमर तलव दऽ दिए ।’ कहैत ममता अपन तलव लऽकऽ आबि गेल आ राजेश के सरकारी अस्पतालमे भर्ना करा देलक । राजेश के सात दिन धरि अस्पतालमे रखलक । ओकर बाद दू सय के दवाई डाक्टर साहेब लिखकऽ डिसचार्ज कऽ देलक आ कहलक ‘ई कोनो बडा रोग नहि अछि, आतमे मल जमि गेल अछि । चिन्ता करबाक कोनो हात नहि अछि । सभ ठिक भऽ जाएत । हा.. मुदा किछु दिन धरि राजेशक सुसम दुध दिए नहि बिसरब । किछुए दिनमे राजेश ठिक भऽ गेल । ममता सोचए लागल दुःखके जीवन कतेक कठिन होइत अछि । साँचेमे मानव जीवन कतेक स्वार्थी अछि । दोसर मे शहरक बहुत ठाममे राजेशक उपचार नहि भेल मुदा छोटछिन सरकारी अस्पतालमे राजेशक उपचार भेल । ऐकरा हम की बुझी परीक्षा आ पतिपत्नी बीच धर्म सोचैत कानए लागल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल लघुकथा-बगवाड़ि बगवाड़ि अदरा अपन चौदहम दिन बिता काल्हि चलि जाएत। बहुत दिनक पछाति अदराकेँ एहेन जश भेल। जशो केना ने होइत, पहिल दिन अबिते बरिस गेल जइसँ धू-धू जरैत धरतीकेँ असमानी पानि भेटिते मन तिरपित भेलै तँ दोसर दिस पछिला सात सालक पछाति एहेन आम-कटहरसँ भेँट भेलै। तहूमे पछिला सालक छगाएल मन आमक अभावमे रहने आरो बेसी सिनेहासिक्त भऽ गेल। दोसर साँझ जारन-काठी चुल्हि लग ओरिया फुलिया पति-हराननकेँ अदरा नक्षत्रक अंतिम दिन मन पाड़ैत कहली- “काल्हिए भरि अदरा अछि, तँए...?” फुलियाक बात सुनि हरानन ओहिना मनमे औंटए-पौड़ए लगला जहिना नेबोरस, चीनी आ पानिकेँ औंट-आँटि शर्बत बनाैल जाइ छै। बातकेँ औंटैत-पौड़ैत हरानन बजला- “काल्हि जाए कि परसू जाए, आकि नहियेँ अबितए-जाइतए तइसँ अपना की। ने आम-कटहर अछि आ ने खुट्टापर लगहरि गाए-महिंस। तखन अदराकेँ एने आ गेने की?” हराननक बात फुलियाकेँ आन घरक जनिजाति जकाँ छुलकनि नै बल्कि पतिक विचारकेँ गौर केलनि। कहै तँ ठीके छथि मुदा साल भरिक पावनि छी, बाल-बच्चा घरमे केना छोड़ियो देब। एकबेर छुटने तँ जिनगीए भरि छूटि जेतै। बजली- “नै पान तँ पानक डंटिओसँ पावनि नै करब से केहेन हएत?” फुलियाक आग्रह सुनि हरानन सामंजस करैत बजला- “घरमे रहने सभ दिन पावनिए-पावनि होइ छै आ नै रहने पावनियोँ फोंक भऽ ओहिना चलि जाइ छै जहिना आन दिन जाइ छै।” फुलिया- “हँ, से तँ जाइ छै मुदा पावनिक अपन ‘रूपं मधुरम् तिलकं’ मधुरम होइ छै।” फुलियाक बात सुनि मुस्की दैत हरानन बजला- “हँ से तँ होइ छै। मुदा एहनो तँ होइ छै जे सालक सत्ताइस नक्षत्रमे अदरो एकटा छी। जे पनरहो दिन अरबा चाउर, दूध-चीनी, आम-कटहरसँ पूजल जाइए आ दोसर एहनो नक्षत्र तँ होइते अछि जेकरा एको दिन पूजन-पावनि नै होइ छै। तँए कि ओ सालक नक्षत्र नै भेल?” “भेल किअए ने, मुदा सभकेँ लौल रहै छै किने जे आगत-भागत हुअए।” फुलियाक बात ओराएलो ने छेलनि कि बिच्चेमे हरानन टपकला- “लौलो-लौलमे भेद होइ छै। कियो अपन सेवा कएल छागड़ बलि चढ़बैए आ कियो नगद नारायणसँ कीनि चढ़बैए, चढ़बैत तँ दुनू अछि। मुदा अहीं कहू जे दुनू एक्के मोने चढ़बैए?” “जखन घरमे अरबा चाउर नै अछि, दूधक जोगार नै अछि, ओहो जे बगवाड़िमे आम-कटहर होइ छलए सेहो छीना गेल, तखन तँ ठीके...। छुछ मुहेँ शंख बाजत?” “हँ से तँ नै बाजत। मुदा...?” साठि बर्खक हरानन अपन अंतिम हार पछिला साल तखन मानि गेला जखन अपन लगौल-सजौल गाछी-कलमक टुकलोसँ बंिचत भेला। पिता परोछ भेला पछाति हरानन पाँच बीघा चास, तीन कट्ठा बास आ आठ कट्ठा गाछी-कलमक रक्षक छला। ओना चास-वास अरजैमे हराननक कोनो योगदान नै छेलनि मुदा आठ कट्ठा गाछी-कमल लगबैमे तँ छेलनिहेँ। दस-बारह बर्खक जखन हरानन रहए तखने पिता-रूपलाल अपन पुरना गाछी उपटबैक विचार केलनि। उपटबैक कारण रहनि जे एक तँ आम सभ नीक नै अछि दोसर जेहो छलै से पुरान भेने या तँ फड़बे नै करैत या तँ फड़ला पछाति रोगाइए जाइ छलै। रूपलालक मनमे उठलनि जे गाछी-कलम कि लोक अपना नापसँ लगबैए जे हम तीस बर्ख जीब तँए आमो गाछ तीसे बर्ख रहत। तीन-तीन-चरि-चरि पुश्तक गाछी-कलम, पोथी-कलम सभसँ परिवार सुख करैए। से नै तँ दस बारहे बर्खक हरानन अछि तइसँ कि मुदा अपना संगे ओकरो किछु भार देबै। दुनू बापूतक सीमानपर एकटा गाछियो रहत। पुरना गाछीक गाछ हटा रूपलाल पाँच बर्ख जोत-कोर केलनि। अन्न उपजौलनि। गाछी लगबैसँ पहिने हराननकेँ कहलखिन जे बौआ नीकहा आमक आँठि बीछि एकठाम रोपिहअ आ कलम लगबैले सहरगंजा एकठाम। हाथ-हाथ भरिपर रोपि दिहक जे उखाड़ैमे असान हएत। अपन लगौल गाछी-कलम अधिक बिसवासू होइए। समए तेहेन भऽ गेल अछि जे बिसवास अपन चेहरे बदिल लेलक। जे नर्सरी गाछी-कलम, वाड़ी-फुलवाड़ीक बीआ बेचैए ओहो ओहन भऽ गेल अछि जे कहत सागवानक गाछ छिऐ आ भऽ जाइए वौनैया काँट। खैर जे होउ, अपन गाछी अपने लगाएब। सालभरि पछाति आँठीसँ डेढ़-डेढ़, दू-दू हाथक गाछ भऽ गेलै। सरहीकेँ मुसरा काटि, बड़द जकाँ सुरेब बनैले थल्ला उखाड़ए कहलखिन। अपने आगूमे आबि केना खुरपी उनटा-सुनटा चलत तइ ताकमे बैसला। आठे कट्ठा कलम-गाछी लागत तइमे गाछे केत्ते रोपल जाएत। तहूमे नवका बौना किस्म नै, बड़का किस्म छेलै। मेल-पाँच कऽ सरही एक भाग आ कलमी एक भाग लगाएब नीक हएत। सएह केने रहथि। अपन खेती-पथारीक जिनगी हराननक तँए झूठ-फूससँ कम भेँट। एक्कैस बर्खक अवस्थामे हराननकेँ बेटा भेलनि। तीन मास पछाति बच्चाक माथ नम्हर हुअए लगलै। साल भरि जाइत-जाइत असर्द्ध देखैमे लगए लगलै। दुनू परानी हरानन िवचारलनि, कोखिक पहिल सन्तान छी। केना छोड़ि देबै। जमीन-जत्था लोक किअए रखैए। से नै तँ जाबे तक जीबैक आशा रहतै ताबे तक तकतियान करबै। तइले जे होउ। खेत-पथार रहौ आकि चलि जाउ। जौं मनुख बँचत तँ ओहूसँ बेसी अरजि लेत आ जौं मनुक्खे ने रहत तँ खेते-पथार कोन काजक। गणेशजी माथ सन ओइ बच्चाक माथ भऽ गेलै। एनमेन हाथी माथ सदृश। समाजक चलैनानुसार हरानन दुनू दिस बढ़ल। एक दिस गामक डॉक्टरी-इलाज तँ दोसर दिस झाड़-फूक, टोना-टापर। बिमारीक चक्रमे पड़ने दुनू बेक्तीक जीवनचक्रे बदलि गेलै। एक दिस हरानन भरि-भरि दिन झाड़-फूक केनिहारक भाँजमे बौआइत तँ दोसर दिस फुलिया घरेक आइ-पाइमे समए गमबए लगली। एक दिस सओनक बून जकाँ खर्च बरसए लगलनि तँ दोसर दिस खेती-पथारीसँ विमुख भेने आमदनी हराए लगलनि। छह मास बितैत-बितैत तीन बीघा बिका गेलनि। मुदा अखनो आशा ओहने बनल छन्हि जहिना छह मास पहिने छेलनि। जे कियो डॉक्टरसँ लऽ कऽ झाड़-फूक केनिहार धरि देखैत ओ कियो ने कहैत जे रोग नै छूटत। एते बोल-भरोष दैत जे रोग निश्चित भगबे करत। जइ खेतक अन्नसँ हराननक परिवार चलै छेलनि वएह खेत बेचि-बेचि अपनो खाए लगला। ठाकुरक बरिआती जकाँ सभ ठाकुरे-ठाकुर। उचित-अभ्यागतक भाँजमे अपनो दुनू परानी हरानन सएह बनैत चलि गेला। खेत बीक रहल अछि आ रोगो बढ़ि रहल अछि। समुद्रमे भँसैत नाव जकाँ कतए जाएत कोनो ठीक नै। बिनु महारक पानिमे एहिना होइ छै। दस मास पुड़ैत-पुड़ैत बच्चा मरि गेलै। बच्चा तँ मरि गेलै मुदा परिवारोक कोनो तन-भगन नै रहए देलकै। खेतक लूट भऽ गेलै। कियो उचित मूल्य दऽ लेलनि, तँ कियो हथपैंच एकक तीन केलनि। घराड़ी छोड़ि हराननकेँ किछु ने बँचलनि। खाली एतबे जे चास बटाइ करता आ गाछी-कलम ओगरवाहि। बेटो-मृत्यु तँ सबहक एक्के रंग नै होइत। कियो जनमिते मरि जाइए तँ कियो रोग-वियाधिसँ चट-पटा मरैए। मुदा तइ संग ईहो ने होइ छै जे कियो जनमरोगी बनि जीबैए तँ कियो रोगाएले जिनगीक आनन्द लुटैत जीबैए। जहियासँ हरानन बेटाक बेमारीक इलाजक पाछू बढ़ला तहियेसँ दुनू बेक्तीक मन-मोटाउ सेहो बढ़ए लगलनि। मन-मोटाउक कारण रहनि दुनूक दू धारणाक धारा। हराननक मनकेँ पकड़ने जे डॉक्टरी इलाजसँ रोग भागत। मुदा फुलियाक मन झाड़-फूकमे पकड़ाएल। जेकर फलाफल डाॅक्टर आ झाड़-फूक केनिहारकेँ एलापर स्पष्ट देख पड़ैत। जइठाम हरानन डॉक्टरक आइ-पाइ नीक जकाँ करै छला तइठाम फुलिया झड़निहार-फूकनिहरकेँ। काजक दौरमे परिवारोक बीच एहिना होइ छै। कियो काजकेँ काज बूझि करैए आ कियो काजकेँ काज बुझैए। भलहिं कियो काजक आ कियो अकाजक किअए ने बनि जाए। बिलाइक झगड़ामे बानर पंच। जखन मंतरिया अबैत तँ घंटो बैस डॉक्टरी इलाजकेँ अदखोइ-बदखोइ करैत। दुनूक बीचक लट-पट-सट-पट दुनू बेक्ती हराननक विचारपर सेहो पड़िते छेलनि। रोगकेँ कमैत नै देखि दोसर-तेसर साँझमे सभ िदन दुनूक बीच एक आखर होइते छेलनि। एक दिस खेत बोहाइत देखि हरानन झाड़-फूककेँ अनुचित खर्च बूझि झपटथि तँ दोसर दिस फुलिया डॉक्टरी इलाजकेँ। पंच कियो ने। दुनू पार्टी लड़िए कऽ पड़ियेता। जे दसम मासमे िनर्मूल भेल। हरानन बोनिहार बटेदार नै किसान बटेदार बनि नव जीवन धारण केलनि। जिनगी बदलने बहुत किछु बदलैओ पड़ै छै आ बहुत किछु अपनो बदलि जाइ छै। हराननक अपन खड़िहाँन उसरि गेलनि। खेतक उपजा अदहा-अदही सेहो अपना मोने ने लगा सकै छी ने काटि सकै छी आ आमक बगवाड़ि कलमी चारिमे एक आ सरही तीनमे एक भेटतनि। भलहिं कलमीसँ सरहीए किअए ने नम्हरो आ गुदगरो हुअए। वसन्त पंचमीक दिन। सरस्वती पूजाक संग किसान हरो ठाढ़ करता। जोड़ा बड़दक बटेदार किसान रहितो हरानन हर कतए ठाढ़ करता। किसान तँ अपन ओजार -हर-कोदारि-खुरपी-हँसुआ- बड़ही ऐठामसँ सान करा अपना घरमे पूजा करत आकि अपन हाथ आ हाथक ओजार अनका घर? हर ठाढ़ कतए करब, हराननक मनकेँ हौंड़ि देलकनि! सतंजा अन्न सतंजा तीमन-तरकारी जकाँ हरानन बेड़ा नै पाबि रहला जे कि की छी। अपन रंगे बदलि नेने अछि। खेतमे मेहनति ओतबे करब मुदा उपजा अधिया हएत। जइ साल रौदी-दाही हएत तइ साल बटेदारक खर्च जाएत आकि खेतबलाक खेत। मुदा उपाएओ तँ दोसर नहियेँ अछि। फेर मन घुमलनि, किछु खेती जोति-कोरि होइ छै आ किछु ओहुना-छिटुआ- सेहो होइ छै, तइमे की नीक? आगू सीमा घेरल अछि। अधिया। जखन अदहे हएत तखन किअए ने लागतमे कटौती कएल जाए। ओते तँ बँचत हेबे करत किने। मुदा जौं बीए खा जाएब तखन खेती कथीक करब। श्रमक ह्रास मन्थर गतिए नै द्रुत गतिए भेल। जहिना साओनक झटकीमे पानिक नम्हर-नम्हर बुन्नक संगबे हवा भेने आरो दगनियाँ रूप पकड़ि बरिसैए तहिना श्रमक ह्रास भेने रंग-बिरंगक रोग श्रम-शक्तिकेँ धेलक। केतौ श्रमक चोरि तँ केतौ श्रमक बेइमानी, कतौ अनदेखी तँ केतौं बलजोर! तेसर सालक पंचायत चुनाव हराननकेँ आरो धकियौलकनि। जिनगीमे दुनू परानी हराननकेँ छल-प्रपंच, गरीब भेनौं नै छूबि सकलनि। भगवानक लीला बूझि सभ दुख-सुखकेँ दुनू परानी घोंटि गेला। मनो मानि लेलकनि जे जहिना बेटा आएल तहिना गेल। दुनियाँ थोड़े दोखी बनाएत जे बेटाक तकतियान नै केलिऐ। धर्म-कर्म धने ने सुधन कहबैए। की ई हमर सफलता नै जे बेटा लेल अपन सर्वस्व गमा लेलौं। मुदा दोखोक तँ एक नै अनेक कारणो छै। जेकर फलो सोझहे अछि। तीन गोटे पंचायतक मुखिया लेल उम्मीदवार रहथि। तीनूमे के नीक ओ विचारि दुनू परानी हरानन भोट देलखिन। जिनका हाथे गाछी-कलम बेचने रहथि आ अखन हुनके बगवार बनि गाछी ओगरवाहि करै छला। अपन बगवार बूझि हराननकेँ अपन भोटर बुझै छला कुलानन। चुनावक हार हराननक कपारपर हड़हड़ा कऽ खसौलनि। अंगनाक ओसारपर दुनू परानी हरानन अपन दीन-दुनियाँक गप-सप करैत रहथि। साठि बर्खसँ ऊपरेक दुनू बेक्ती। जिनगीक संगी खाली लभे-मैरेजक नै, चलैत-फिड़ैत समाजोक बन्धन तँ छिऐ? एहेन स्थितिमे दू-दिलक दिलराजक बास कतए हएत? ओहुना लोक बुझैए जे ओल्ड बेटल, ओल्ड वाइन आ ओल्ड वाइफ बेसी चसगर होइ छै। दुनू परानी फुलियाक अवस्था चेहराक रूपे-रंग बिगाड़ि देने अछि। फुलियाक मुँहमे तीनटा चहु बाँचल आ हराननकेँ सेहो नै। बिनु दाँतक मुँहसँ अदन्त बच्चा जकाँ गुलावी हँसी हँसैत हरानन फुलियाकेँ कहलखिन- “आब ऐ दुनियाँमे रहैक मन नै होइए। होइए जे जल्दी मरि जैतौं जे अपनो भार हटितए आ दुनियोँक भार घटितै।” जिनगीक तीत-मीठ जे फुलिया आ हराननकेँ पति-पत्नीक रूप बिगाड़ि देने छल ओ ठमकि पुन: जिनगीक धार लग पहुँच गेल। एक तँ उमेरक उपजा दोसर संगी बनि संग-संग चलैक। बजली- “कहलौं तँ बैस बात मुदा एते दिन जे केलौं से केलौं। जहिना अहाँ केलौं तहिना हमहूँ केलौं, मुदा आबो जे ओहिना पहिलुके जकाँ करब से थोड़े मानि लेब?” फुलियाक बात सुनि हरानन ठमकला। ठमकैक कारण भेलनि पछिले जकाँ आब नै जीबए चहै छथि। वैचारिक मेल-मिलानक मन बना जीबए चहै छथि। पुछलखिन- “एना किअए कड़ुआएल बात बजलौं?” पतिक शान्त भाव देखि फुलिया सह पौलनि। भरियबैत बजली- “जखन दुनू बेक्ती संगीए नै अर्द्धांगिनीयोँ छी तखन एहेन बात बिना विचारने किअए बजलौं जे मरि जाएब। अहाँकेँ जीबैक मन नै अछि? अकछि गेलौं तँ मरि जाउ! मुदा हमरा जे मारब से दोखी के हएत?” विधवो नारी तँ अधमौगैते जिनगी जीबै छथि। तहूमे फुलिया-हराननक उमेरक दूरी मात्र साले भरिक। तहूमे साल भरि फुलिया आरो निच्चे। गुम्म भऽ हरानन विचारिते रहथि आकि कुलानन बेधड़क आंगन पहुँच हराननकेँ कहलखिन- “हमरा गाछी भीर काल्हिसँ कियो नै जइहह। देखि लेलिअ जे केहेन हितैषी बगवार छह।” जहिना ध्वनि साधनाक समए बमक अबाज साधनाकेँ भंग करैत तहिना फुलियाक बात बिसरि हरानन कुलाननकेँ उत्तर देलखिन- “बेटा चलि गेल से छातीए लगा मारलौं आ बगवाड़िक जे आमे चलि जाएत तेकर सोच अछि? जे मन फुड़ए से करब।” हारैत-हारैत हरानन जिनगी हारि चुकल छला। मिसिओ भरि कलेज निराेग कहाँ रहि गेल छेलनि जइसँ हूबा कऽ बजितथि जे अही हाथक लगौल गाछी-कलम छी, हिस्सेदारी टूटि गेल मुदा अखनो ओहिना मन अछि जे लोटे-लोटा जड़िमे पानि देने रहिऐ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल लघुकथा-बेटी, हम अपराधी छी बेटी, हम अपराधी छी सही समैसँ सालभरि पहिने मनोहरकेँ सेवा मुक्तिक चिट्ठी ऑफिसमे थम्हा देलकनि। थम्हबैक कारण रहनि काजक गजपटी। काजक गजपटीक कारण रहनि मनक संताप। आॅफिसक सभ मानि लेलकनि जे मनोहरक मन चढ़ि गेलनि तँए समुचित काज करए जोग नै रहला। आॅफिसेक कुरसीपर बैसल रहथि आकि चपरासी आबि हाथमे चिट्ठी थम्हा देलकनि। पहिने तँ नै बूझि सकला जे सेवामुक्त भऽ रहल छी मुदा पढ़ला पछाति केकरोसँ पुछौक जरूरति नै रहलनि। कोनो लेन-देनक कारण नै बतहपनीक कारण स्पष्ट लिखल रहनि। जहिना बर्खा होइकाल अनायास मेघ ढनढ़नाए उठैत तहिना एकाएक मनोहरक मनमे भेलनि। जेकरो कहबै सेहो बताहे बूझि सुनबो ने करत। तखन कहबे किअए करबै। अनेरे मुहोँ दूरि करब। मनोहरक मन जेना बेर-बेर चनकए लगलनि। टुकड़ी-टुकड़ी भेल मनमे उठलनि जे सभटा-कागत-पत्तरकेँ छीट-छाटि दिऐ, टेबुल-कुरसीकेँ उनटा-पुनटा दिऐ आ निकलि जाइ। मुदा मनक लगामकेँ बुधि पाछू खिंचलकनि। बदलैत सोच विचार केलकनि जे एक तँ लिखतन बताह बनाइए देलक तइपर एहेन काज जौं करब तँए थिरोरी-प्रेक्टीकल संग भऽ जाएत, तखन बतहपनीक सजाक हकदार बनैमे कते देरी लागत। कुरसीसँ उठि सोझे घरमुहाँ रस्ता पकड़लनि। डेराक सुधिए ने रहलनि जे भड़ो-किराया फड़िछा लितथि। बेसुधि मनमे बेठेकान सोच उठनि आ पानिक बुलबुला जकाँ फूटि जान्हि। गामक सीमा परक बड़क गाछ देखते भकइजोत जकाँ भेलनि। भकइजोतेमे देखलनि जे इएह गाम अपन छी। मनमे अपन अबिते पएर जवाब देलकनि- “आगू नै बढ़ब। गाममे मुँह देखबैबला नै छी।” मुदा तपाएल मुँह लगले पएरकेँ कहलकै- “ईह बूड़ि रे, मुँह देखबैबला नै छी, ई समाज मुँह देखबैबला नइए। सदिकाल विवेक-विवेकक भांग घोड़ि-घोड़ि इनारेक निशाँएल पानि बना देने अछि आ िनर्लज जकाँ बजैमे लाजे ने होइ छै, सुझबे ने करै छै जे जखन पाइक हाथे शिक्षा विकाइए ओ शिक्षा पाइबलाक हएत आकि बिनु पाइबलाक। जइ समाजमे रोग-वियाधि पाइक हाथे छोड़ौल जाइ छै तइ समाजमे बिनु पाइबलाक गति-मति कि हेतै। रौद-बसात, जाड़, पानि-पाथरक रक्छा केना करत। अदौसँ अबैत नर-नारीक संबन्धक बीच जखन दान-दहेज एहेन बड़का मोनि घारक पेटमे फोड़ि देने अछि, जइ टपानमे कते हाथियो-घोड़ा फँसि जान गामा रहल अछि। तइ मोनिमे अदना-अदनीक अह्लादे केतै कएल जा सकैए। महिंसक आगू वीणक कोन मोल छै।” मोने-मन मनोहर घर दिस बढ़बाक हूबा करथि मुदा पएर उठैले तैयार नै होन्हि। जौं पएर थोड़े तैयारो होन्हि तँ आँखि साफे नै। निच्चाँ ओंघराएल मनोहरक सभ सुधि-बुधि हरा कऽ छिड़िया गेलनि। मोबाइलक जुग रहने समाचार पसरैमे देरिए किअए लागत। गाम-समाजक बच्चा-बच्चा बूझि गेल जे मनोहर बताह भऽ गेला, नोकरीसँ निकालि देलकनि। पेन्शनो आने-आन लूटतनि। पत्नी सुनैनाकेँ पहिने बिसवास नै भेलनि। आइ धरिक जे पति-प्रेम मनोहरसँ भेटल छलनि ओ अनकासँ बहुत बेसी छलनि। मुदा जानकीक काँच बुधि मानि गेल रहै जे पिता पागल भऽ गेला, नोकरीसँ भगा देलकनि। गामे लोकक जेर संगे दुनू मायधी अर्थात् सुनैना आ जानकी, विदा भेली। लोकक बीच रंग-रंगक घौचाल चलैत। कोनो नीको मुदा बेसी अधले। घौचाल सुनि दुनू मायधीक मन विचलित हुअए लगलनि। बेटीक मुँह सुनैना निहारैत आ माएक मुँह जानकी। पोखरि घाटपर जहिना रंग-रंगक चालि रंग-रंगक भुरही-माछ दैत तहिना रंग-रंगक चालिक बात दुनू गोटे सुनैत। कचकूह मन जानकीक तँए बेसी विचलिते होइत गेलै। बताह भऽ बाबू छोड़ि पड़ाए जेता, समाज सहजहि हमरा सन-सनकेँ भगाइए रहल अछि। तखन माएक कि गति हेतै। अधबटिया पछाति सुनैनोक मन मानि गेलनि जे पति पगला गेला। जानकीपर नजरि अँटका मोने-मन सोचए लगली जे बाइस बर्खक कुमारि बेटीक मुँह सिंह दुआरिपर केना देखब। कि दुनियेँ उजड़ि रहल छै आकि उजाड़ि चढ़ा देलक अछि? एको बीत धरती नै बँचल अछि जतए नोरक धार सुखौल जाएत। जहिना दंगलक खलीफा पटका चारू नाल चीज खसैए तहिना मनोहर बड़का गाछक निच्चाँ जिनगीक अखड़ाहापर चारूनाल चीत भेल पड़ल मोने-मन सोचथि, अपन जिनगीक हारिक कारण अपने छी तँए पत्नियोँ आ बेटियो लेल अपराधी छी। मुदा फेर मन कहनि जे अपराध कथी केलौं जे अपराधी भेलौं। भवसागरमे डुमल मनोहरक शरीर चेतनशून्य भेल रहनि। तखने पत्नियोँ आ बेटियो लग पहुँच मुँह निहारए लगलनि। दुनूक मन कहलकनि मुँहक रूखि कहाँ कहै छन्हि जे कोनो रोग छन्हि। रणभूमिक हारिक रोग आ बिमारीक रोग अपन बात अपने चिकड़ि-चिकड़ि कहै छै जे कि छी। मुदा बन्न मुँह देख मनोहरक छातीपर दुनू गोरे अपन-अपन सती हाथ रखलनि। छातीक धुकधुकी समतूले बूझि पड़लनि। मुदा आखिर किछु छथि तँ एकक पिता दोसराक पतिये छथि ने। दुनूकेँ अपना-अपना बिसवासमे शंका भेलनि। शंका होइते एक-दोसराक मुँह दिस तकलनि। आँखि-आँखिक बीच पुल-सड़क बनल। सुनैनाकेँ सान्त्वना दैत जानकी बाजलि- “माए, हृदए तँ ओहिना पवित्र देखै छिअनि।” कदमक गाछक झूला जकाँ दहिना आस मारि सुनैना कहलखिन- “बेटी, पुरुखक छातीपर बहुत भार छै। जेकरा माथपर जारनक बोझ आकि अन्न-पानिक बोझ पड़बे ने कएल ओ ओइ बोझ उठबैबला छातीक धकधकी गनि केना सकैए। से नै तँ छातीए डोला कऽ देखहुन जे मुँहसँ केहेन बकार निकलै छन्हि।” माइक विचार सुनि जानकी आरो जाँच-पड़ताल करब नीक बुझलक। जहिना कलिआएल अड़हूल फुलाइत रहैए आकि कलीक अवस्थामे रहैए तहिना जानकीक मन छातीसँ ससरि हाथ दिस बढ़ल। केना नै बढ़ैत कहुना अछि तँ छातीक ऊपरेसँ ने लटकल अछि। बाजलि- “माए, से नै तँ छातीक धुकधुकीसँ अपनो मन धुकधुकाइते अछि। हाथक नारी पहिने देख लहुन।” नारी तँ नारी छी। एक पुरखियाह। छाती जकाँ दुनू गोटे एक्केबेर थोड़े पकड़ि सकै छथि। मुदा पहिने के देखत, दुनूक बीच ओझरी लगि गेलनि। एक पुरुष हजार रूप। की मनोहर जानकीयो लेल वएह छथि जे सुनैना लेल? मुदा कि मनोहर सुनैनाक छिअनि आ जानकीक नै? तखन? जानकी सुनैनाकेँ कहलक- “माए, छातीक धुकधुकी तँ जोरसँ चलै छै, गनल भऽ जाइए मुदा हाथक नारी आइ धरि कहाँ गनलौंहेँ।” बेटीक बात सुनैनाकेँ सोहनगर लगलनि। ऐठाम कियो आन अछि जे अछियो ओ तमसगीरे अछि, उकटा-चाल करत। बामा हाथसँ तरहत्थी पकड़ि दहिना हाथ सुनैना मनोहरक बाजूपर देलनि। आँगुरसँ नारी पकड़िते कानमे झड़झड़ाए लगलनि- “सुनैना, बहुत आशा जिनगीसँ केने छेलौं। मुदा, टूटि कऽ सभटा छिड़िया गेल। समाजक डर हमरा नै होइए मुदा अहाँ पत्नी छी तँए कहै छी। बताह बना बतहपनीक फड़मान हाथमे धरा देलक। कमेलहो खेलक आ अगिलो कमाइ मारलक। जखने घरसँ निकलब धिया-पुता जानि-जानि देहपर कियो गोला फेकत, कियो काँट फेकत, कियो गोबर मािट फेकत। केकरा कि कहबै, हमरा बातकेँ कियो कान धड़त। आइ दस बर्खसँ जानकीक बिआहक पाछू पड़ल छेलौं, मास दिन पूर्ब जवाब भेटल जे वैवाहिक संबन्ध भंग भऽ गेल।” आरो कान लगमे आनि सुनैना मनोहरक हाथ उठा कानमे सटौलनि। धड़धड़ाइत सुनए लगली। हम ओइ जुगलासँ पुछै छिऐ जे कोन बुधिए जमाए बना एते सेवा करौलक। बाइस बर्खक बेटीक मुँह देखल जाएत। जखनि घरक भार उठबैमे अक्षम भऽ गेलौं अनेरे जीबिए कऽ कि करब। मुदा परिवार? सेहो कहाँ राखि पौलौं। दस बर्खक अवस्थामे बेटी कन्यासँ कनियाँक रूप धारण करए लगैए तइठाम जानकीक चर्च पत्नी दस बर्ख पूर्ब बारह बर्खक अवस्थामे केलनि। अपनो ओइ पाछू पड़लौं। काजोक अगुताहत नहियेँ बूझि पड़ल किएक तँ समयानुसार परिवर्त्तन हेबेक चाही। बीस-बाइस बर्खक बच्चिया समाजक कुमारि बच्चिया छी तँए समाजमे केकराे चहु अलगबैक अधिकार नै छै जे ओकरा अलग बुझए। जौं जमीनो बेचि जानकीक बिआह कइए लइ छी, तँ कि समाज भार उठौत जे एहेन काज आगू नै हएत? विष्मित भेल सुनैनाकेँ देखि जानकी बाजलि- “माए, कनी हमरो बाबूक नारी देखए दे।” जानकीक बोल सुनि सुग्गाक लोल सुनैना निहारए लगली। यएह अवस्था छी, लोक सती बनैए। यएह अवस्था छी, लोक बेश्या बनैए। यएह अवस्था छी, जइमे लोक मातृ-पितृ भक्त बनि भगवत भजन करैए। मुदा जानकी...? पतिक हाथ सुनैना जानकीक हाथमे दैत कान ठाढ़ कऽ मुँह निच्चाँ गोड़ि लेलनि। पिताक कब्ज पकड़िते जानकीक कानमे घनघनाइत आएल- “बेटी जानकी! हम अपराधी छी। हमरासँ अपराध भेल।” “नै बाबूजी नै, सौंसे दुनियाँ भलहिं कहए मुदा अपन जुआन नै निकलि सकैए। चौथारि सीमा धरि आबि अहाँ परिवारक सेवा करैत रहलिऐ। दुनियाँ बौक कहए आकि बताह कहए, कहअ दिऔ। मुदा अपन इमान कखनो धरमसँ विचलित नै हएत। हम मिथिवाला छी, हमरा वाजूमे शक्ति अछि। जहिना अपन कालखंड इमानदारीसँ टपलौं तहिना अगिला खंड हमरो छी। अपना दरबज्जापर बैस भगवत भजन करैत रहब, देहक चिन्ता नै करब। हमहूँ तँ सन्ताने छी किने। बेटा रहैत तँ बहिन बनि भार दैतियनि। मुदा जखन भाए नै अछि तखन तँ हमहीं ने बेटा-बेटी भेलौं। ई प्रश्न हमरो भेल किने? बिआह हएत, सासुर बसब मुदा अहाँकेँ ऐ अवस्थामे छोड़ब कते उचित हएत। नीक-बेजाएक भार के उठौत। अपना जीबैत अपन माए-बापक एहेन गति भऽ जान्हि जे अनसोहाँतो-सँ-अनसोहाँत भऽ जाए, ई दोख केकरा सिर सवार हएत। मुदा समाजो तँ तेहेन अछि जे छातीक कोन बात कोढ़-करेज धरि खोखड़ि-खोखड़ि खाइते आएल आ रहत। हे शिव, एहेन धनुष उठबैक भार जौं अपने नै लेब तँ कि ई समाज उठा सकैए? कि मिथिलांगना अखनो धरि ई नै बूझि सकली जे माए-बाप जनमदाते टा नै छथि जिनगीक हारि-जीतक सूत्रधार सेहो छथि, जौं से नै तँ सासु-पुतोहुकेँ भिखमंगनी बेटी कहि किअए मुड़ी गोतबै छथिन। जरूरत अछि समायानुसार शक्ति उपका संचय करैक। जाबे तक से नै हएत ताबे तक पुरुखक नजरि निच्चाँ केना कऽ पाबि सकै छी। देखए पड़त अपन भूत आ भविष। जाधरि अपन भूत-भविष देख नै लेब, अपन-अपन बीर्तमानक लक्ष्मण रेखा खींच रक्षाक भार स्वयं नै उठा लेब ताधरि ऋृषिका, सती-सध्वी, पतिव्रता आदि-इत्यादि शब्दक साकार जिनगी केना बनि सकत?” जहिना नट-नटीनक नाचमे दर्शक चारू दिस घेरि बैसैत आ बीचमे दुनू अपन जिनगीक राग अलापति तहिना समाजक लोकक बीच मनोहर, सुनैना आ जानकी, जिनगीक राग अलापि घर दिस विदा भेली। आगू-आगू सुनैना-जानकी मनोहरक दुनू हाथ पकड़ने आ पाछू-पाछू धिया-पुतासँ चेतन धरि। घरक मुड़ेरा देखिते मनोहर दुनूक हाथ झमाड़ि बाँहि छोड़ा बमकि बजला- “बिसवासघात..., बिसवास घाती छी...। जमाजमे जेहने मनुख रहत तेहने ने बनत। बिसवास देने छल जे बुढ़ाड़ीमे अहाँ गर्त्तमे खसब। ओ सभ पागल बना देलक।” पुन: झोंकमे- “नै सुनत दुनियाँ नै सुनह मुदा जाबे घटमे प्राण-घटवार रहत ताबे यात्री कहबे करबै। कहिते रहबै।” सातम दसकमे मनोहर जिला-कार्यलयमे किरानीक नोकरी शुरू केलनि। समाजक पहिल विद्यार्थी जे पहिल श्रेणीसँ मैट्रिक पास केलनि। कौलेज लगमे नै रहने आगू पढ़ैक आशा तोड़ि जिनगीक मैदानमे उतरल। मुदा रिजल्टक कागत आँखिक सोझ अबिते मनमे उपकि गेलै जे जहिना प्रथम श्रेणीक फल भेटल तेहने फलक गाछ रोपि ओकर सेवा टहल जिनगी भरि करैत अपनो आ समाजोकेँ नीक फल खुएबनि। एक तँ सरकारी कार्यालयमे काज नै जे पढ़ल-लिखलक अँटाबेस होइत, दोसर स्कूलो-कौलेज कम रहने लोक पढ़ियो नै पबैत छल। संयोग नीक बैसलै जिलाक कृर्षि विभागमे किरानीक नोकरी मनोहरकेँ भऽ गेल। जहिना दशमीमे दुर्गास्थान साँझ दिअए जाइसँ पहिने साँझ-देनिहार अपन-अपन घरक भगवतीक आगू साँझ दऽ लइए तखन ने दसनामा देवालयमे जाइए, तहिना मनोहर नोकरीपर जाइसँ पहिने माता-िपताक असीरवाद लऽ लेब जरूरी बुझलक। खुशी तीनू गोटेक मनमे। मुदा तीनूक तीन रंगक। किअए ने तीन रंगक होइत। हजारो रंगक फूलमे सुगंध होइ छै, सभकेँ अपन-अपन सुगंध सिरजन कऽ पसारैक हक छै। दलानक ओसारपर सतदेव कोदारिमे पच्चर लगबैत रहथि। मनोहरकेँ खुआ आंगनसँ माए असीरवाद देलक। आंगन-दलानक बीच मनोहरक मनमे उठल ओह माएकेँ तँ कहि देलियनि जे नोकरीपर जाइ छी, ओ असीरवादो देलनि जे आब तोंही सभ ने ऐ घरक खुट्टा भेलहक। हम सभ तँ पाकल आम भेलौं। मुदा से नै जौं माइक एक रूप छन्हि, पिताक एक रूप छन्हि तँ तइ बीच एकटा संयुक्तो रूप तँ छन्हिहेँ। तँए दुनू गोटेक ओइ रूपकेँ प्रणाम कऽ असीरवाद लेब। डेढ़िए परसँ बाजल- “माए, कनी एम्हर आ।” शुभ काजमे विलमैक दोख अपनापर माए केना लेती। अँइठे हाथे दरबज्जपर पहुँच बजली- “कि कहलह” पिता-सतदेवकेँ मनोहर गोड़ लागि बाजल- “बाबू, नोकरी करए जाइ छी।” ‘नोकरीपर’ कानमे पड़िते सतदेवक मन खुशिया गेलनि। सुगंधित फूलक फुलवारी आ बिनु सगंधक फुलवारीक हवा जहिना दोरस रहैत तेना नै बूझि पड़लनि। असीरवाद दैत सतदेव मनोहरकेँ कहलनि- “बौआ, डिक्शनरी जकाँ जौं तीनिए टा शब्दक कोष बना लेबह तँ मुइला पछातियो बेर-बेर दर्शन होइते रहबह। भरल-पूरल देख आत्मा जुड़ाइते रहत।” सिनेह सिक्त सतदेवक शब्द सुनि मनोहर सहमि स्वीकारैत पुछलकनि- “ओ तीन शब्द कि छिऐ?” “बौआ, झूठ नै बजिहह। दोसर, केकरोसँ एक्को पाइ डँड़िहक नै। तेसर, दरबज्जापर जे मनुख-शक्लक आबथि हुनका एक लोटा पानिक आग्रह जरूर करिहनु।” पिताक शब्दकेँ गुरु-पित वचन बूझि तत्काल तँ मनोहर गीरह बान्हि राखि लेलक, राखबो जरूरी छेलै। एगारह बजे आॅफिस पहुँचक छेलै। मुदा पिताक वचनकेँ हास्य शब्दकोषमे नै हहासक डरसँ चाइलेंजकोषमे लऽ अंगीकार केलक। दुरगमनियाँ कनियाँ जकाँ मनोहर अपन उपस्थिति दर्ज करा, सभकेँ प्रणाम-पाती करैत, कोहवरमे असकरे कुरसीपर बैस गेल। कोनो काज नै देखि चुनौल तमाकुलक गीरह जकाँ गामक गीरह खोलए लगल तँ भक्क दऽ पिताक असीरवाद मन पड़लै। होइतो अहिना छै जे जखन रॉकैत तैयार भऽ उड़ैक रूप धारण करैए तखन धरती छोड़ैसँ पहिने उनटा जाँच-पड़ताल होइ छै। मनोहरोकेँ जिनगीक पैछला कोनो बात मन नै पड़लै, पहिने पिताक वएह तीनू शब्द मन पड़लै जे तीन प्रश्न बनि जिनगीक आगूमे ठाढ़ भेल। जौं अपन प्रश्नक जवाब दइ जोकर नै छी तँ कोनो लजेबाक बात नै जे अपन कमजोरी केना सुहकारी। जाबे तक कोनो खेतमे नव सिरासँ जोति नव बीज नै देल जाइ छै ताबे नव फलक आशा केना हएत। कुरसीपर बैसल मनोहरक मनमे पिताक असीरवादक तीनू शब्द तीन प्रश्नक गाछ रूपमे ठाढ़ भेल। कुशल माली जहिना सभ फूलक अपन-अपन पतिआनी हियबैत तहिना मनोहरो अपन तीनू शब्दक पाँति हियाबए लगल। मुदा सतरंगा मकान बनौनिहार इंजीनियर जकाँ गुनियाँ-परकालसँ नै गुनि, संकल्प बूझि विचारए लगल। ओना विचारक खण्डन-मण्डन जेते बेसी होइ छै ओकर बीज-स्वरूप दूधक मक्खन जकाँ ओते भेटै छै। मुदा मात्र दू घंटा ऑफिसमे रहैक छै। डेरो-डंटा ठीक नहियेँ भेल छै, तीन घंटा रस्ता काटि गामो जाएब छै। तँए जते खण्डन-मण्डन हेबाक चाही तते तँ नै मुदा तात्विक विचार जरूर केलक। ओना हनुमानजी जकाँ कखनो अकास मार्गपर नजरि पड़ै तँ विहाड़ि जकाँ भऽ जाइ, मुदा लगले महावीर जकाँ बदलि लिअए। ‘झूठ नै बाजब।’ कोन बड़का प्रश्न भेल। नान्हिटा प्रश्न अछि। ने हमरा एक सेलक जीवाणुक इतिहास देखक अछि आ ने सोनाक लंका। चौबीस घंटाक दिन-रातिमे जे समए संग अबैत जाएत आ विवेक कहैत जाएत तेतबे करबाक अछि। मनमे खुशी भेलै। जहिना तीन प्रश्नक उत्तरमे एक प्रश्न हल भेने पास नम्बर चलि अबैत तहिना मनोहरक मनमे पासक आशा जगलै। पास बदलि पासापर दोसर आस मारलक। ‘दोसरकेँ नै डाँड़ब।’ ईहो बड़ भारी प्रश्न कहाँ अछि? अपन खर्चमे कमी-बेसी भेने ने लोक कर्जदार होइए आकि कर्जदाता। जौं सरपट चालि पकड़ि चलब तँ किअए दुनूमे सँ कियो भेँट हएत। मुदा समाजक बीच परिवारकेँ रहबाक छै। सोल्हन्नी सरपट नै देखि मनोहरक मन अँटकल मुदा लगले घोड़ा जकाँ मन हीहीएलै- “खगताकेँ जते तक पचा सकब ओते पचाएब। आ बढ़ता ले समाज अछि।” दू-तहाइ अंकक आशा नहियोँ देख मनोहरक मन मानि गेलै जे कोनो बेसी ओझरी नहियेँ अछि। तेसर प्रश्न ‘दरबज्जपर एक लोटा पानि’ पर नजरि पड़िते मन ठमकि गेलै। अपने घरसँ तीन घंटाक रस्ता दूर रहब, दरबज्जापर बारह बजे दिन आकि बारह बजे राति जौं कियो आबि जाथि तखन अपना बुते कि हएत। अखैन माता-पिता जीबै छथि तँ अपन दुआर-दरबज्जाक मुड़ेरा अकास ठेकेता मुदा परोक्ष भेला पछाति की करबै? जौं अखैन नै विचारि बाट पकड़ि लेब तँ बेर-विपत्ति पड़लापर तँ सहजहि लोकक बुधि हरा जाइ छै, तखन विचारि पाएब। वस्त्रक एक-एक सूत विलगा-विलगा जखन मनोहर देखए लगल तँ बूझि पड़लै जे प्रश्न भारी कहाँ अछि। पीसक हले-हल बनबैक जन्मभूमि मातृभूमि भेल, सेवाभूमि कर्मभूमि भेल। मातृभूमि कर्मभूमि चलए तेतबे विचारैक अछि। नोकरी भेलाक पनरह बर्ख पछाति मनोहरक माता-पिता मरि गेल छेलनि। अखैन धरि मनोहर अठवारे गाम-अबै जाइ छल। गामक तसवीर तँ तेना भऽ नै सुधरल मुदा अपना घरसँ खा-पी कऽ बच्चा बी.ए. तक पढ़ि सकैए। घंटा बितैत-बितैत डाॅक्टर ओइठाम पहुँच सकैए। तखन गाम छोड़ब-तोड़ब नीक नै। जहिना माता-पिताक समए अबै जाइ छेलैं तहिना अगिलो परिवार सेने रहब। यएह सोचि मनोहर अपन परिवारकेँ गामे रखलनि। जोडा बड़दक जोत परिवार सतदेवक छेलनि। ओना जोड़ा बड़दक जोतक अर्थ विकृत भऽ गेल अछि। विकृत ई भऽ गेल अछि जे सए-सए बीघा जमीनबला खुट्टा उसरन कऽ लेलनि! तर्क देता ट्रेक्टर-थ्रेसरक मुदा अपने परदेशसँ अगहने-अगहन गाम पहुँचता। से नै, सतदेव मेहनती गिरहस्त छला। गिरहस्तीकेँ सभ रूप सजौने छला। आदि-आदी धरिक कलमी-सरही आमक गाछी पाँच कट्ठा छन्हिहेँ। दू कट्ठा बँसवाड़ि, एक कट्ठा करजान, पाँच कट्ठा घराड़ीयो छन्हिहेँ। तीमन-तरकारीसँ लऽ कऽ वाड़ी-झाड़ी छन्हिहेँ। पानिक अपन बेवस्था केनहि छथि। जेहने सासुक चालि-चलनि तेहने पुतोहु-सुनैनोक भऽ गेलनि। गिरहस्तियो काज सतदेवकेँ बँटाएले जकाँ रहनि। अढ़ाइ बीघा बाधक खेती अपन रहनि। तीमन-तरकारी, वाड़ी-झाड़ी-फुलवारीक भार पत्नीक रहनि। जे सुनैनाक हृदैक रूप बनि गेलनि। मुदा सासु-ससुरकेँ परोछ भेने घरक सोल्हनी भार सुनैने उठा नेने छेलीह। सुनैनाक अभ्यन्तर कहनि जे ऐ घरक सोल्हन्नी कर्ता-धर्ता अपने छी। तेकरा जौं अपना जकाँ नै राखि बिनु आड़ि-मेड़क घर बना लेब तखन किअए कहै छिऐ जे नारी शोषण होइए। कि एहेन नारी नै छथि जे पुरुखसँ मालिस करबै छथि। मुदा से नै ई भेल गप-सप। जिला कार्यालयमे कि खाली सरकारिये काम-काज होइए आकि जिला भरिक कथा-कुटुमैती, गाए-बड़द महिंसक खरीद-विक्री, राजनीति कूटनीति, छलनीति, दुर्नित सभ कथुक जिला छी। भलहिं कामकाजी लोक काजक धड़फड़ीमे तारिकोपर जेता मुदा पाछूसँ वारंट नेने औता। मुदा तेतबे तँ नै अछि, कचहरी जाइ छी, भरि दिन कतए बैस समए गमाएब। तइसँ नीक किअए ने पूर्बा हवाक गरपर बैस गांजाक गंध पसारि सभ गजेरीकेँ एकठाम समेटब नीक। एक चेहरा अनेक रूप दुनियाँक नव हाल भऽ गेल अछि। के अपराधी आ के अपराध रोकिनिहार। विचित्र स्थिति अछि। जौं दू-तीन-चारिक जोगकेँ खिचड़ी कहब तँ चाउर, दूध, चीनी, मसालाक जोग खीर केना भऽ गेल। जौं से नै चाउर-दालि-अल्लू-पानिक बीच चीनियोँ दऽ दिऐ तखन कि भेल। तँए सोझे नोन-चीनीक बात नै अछि। सिंचाइ विभागक बड़ाबाबू छला जुगल किशोर। आब सेवा िनवृत्ति भऽ गेला। इलाकाक एके जातिक नै अधिकांश जातिक पजिआरीक पेशा सेहो अपनौने। कार्यालय सभमे अहिना होइ छै एक चिन्हारे भेने तीन दिनमे हजार चिन्हरबा भऽ जाइ छै। सरकारिये काजक भाषाक जुगल किशोर। निपुणे नै घटकैतीक भाषाक सेहो पाकल पड़ोर। हुनके भाँजमे मनोहर पड़ि गेला। जखने जानकी एगारहम बर्ख टपि बारहममे पएर रखलक तखने सुनैना मनोहरकेँ जानकीक बिआहक भार सुमझा देलखिन। अखैन धरि मनोहरकेँ कथा-कुटुमैतीक बोध नै। भाँज लगलनि जे जुगल-किशोरक हाथमे छपड़िया पैकार जकाँ सएओ जोड़ा बड़द-गाए रहिते अछि। जिला कार्यालयमे मनोहरकेँ अपन पहिचान छेलनि। जइसँ काजक बोझो कम रहैत छेलनि। एक दिन चारि बजे छुट्टी होइते जुगल किशोरसँ भेँट करैत अपन बात जानकी बिआहक रखलनि। जेना जुगल किशोरकेँ जीएपर राखल रहनि मनोहरकेँ कहलखिन जे कृष्णकान्त बी.ए. पास कऽ नोकरी लेल बौआइए मुदा लेन-देन दुआरे काज नै भऽ पबै छै। से जौं अहाँ अपनेसँ जा कऽ कहियनि तँ ओहिना माने बिनु लेन-देनेक काज भऽ जेतनि आ अहूँकेँ बिआहमे लेन-देनक भार नै पड़त। मनोहरक मन मानि गेलनि जे एक परिवारकेँ ठाढ़ होइक प्रश्न छै से जौं कहलासँ भऽ जेतै तँ उचित-उपकार दुनू भेल। अपनो काज ससरि जाएत। बीचमे एकटा बाधा ठाढ़ भेल, ओ ई जे पहिने नोकरी होइ आकि बिआह। घटकैती भाषमे जुगला किशोर कहलखिन- “मनोहर बाबू, अहूँ सभ दिन कागतेमे ओझड़ाएल रहलौं, एतबो ने बुझै छिऐ जे जइ घर बेटी जाएत तेकरा घरो ने छै। दू-चारि मास कमा कऽ घर बनौत तखन निचेनसँ बिआह हेतै। अखैन एगारहे-बारहे बर्खक बेटी अछि, आब कि कोनो उ जुग-जमाना रहलै, आब तँ बीस-बाइसक चलनि भऽ गेल अछि। नीको अछि।” सोझमतिया मनोहर जुगल किशोरपर सोल्हनी बिसवास कऽ लेलनि। समए बितैत रहल बितैत रहल मनोहर निचेन जे बीस-बाइस बर्खक बीचक काज टरि गेल। स्थायी रूपे जखन कृष्णकान्त बेवस्थित भेल तखन जुगल किशोर अपन बेटीक बिआह कृष्णकान्तसँ पाँच लाख नगद गनि करा लेलनि। कृष्णकान्तो अपन पूर्ब जन्मक कमाइ बुझलक। एक पट्टीमे नोकरी, दोसर पट्टीमे पाँच लाख संग कनियाँ। के हमरा सन भागमन्त हएत। जानकी जखन बाइसम बर्खमे पहुँचल, तखन सुनैना अंतिम वारनिंग मनोहरकेँ देलखिन। तखन मनोहरकेँ चाँकि जगलनि। धर्म-कर्म बूझि मनोहर जुगल किशोरक गाम पहुँचला। तीन साल पहिने जुगल िकशोर सेवा-िनवृत्त भेल रहथि। दरबज्जापर बैसल जुगल किशोरक मन मनोहरकेँ किछु मोट बुझहेलनि। मुदा अपन काज तँ पहाड़ी इलाकामे लोक गदहो चढ़ि कऽ लइए। खैर, हमहूँ कोनो कुटुमैती थोड़े एलौं जे मान-रोख राखब। काजे एलौं काज करब जाएब तइ बीच समैए कखन बँचत जे पहुनाइ करब। बुढ़ाड़ियो बाघिन तँ फेर बाघिन छिऐ किने। मनोहरकेँ देखिते जुगल किशोर चपाड़ा दैत अभिवादन केलकनि- “आउ-आउ मनोहरबाबू, आब तँ भेँटो दुर्लव। केम्हर-केम्हर...।” मनोहर कहलकनि- “जानकी बाइस बर्खक भऽ गेल, सएह काजे आएल छी।” अखैन धरि मनोहरकेँ नै बूझल जे कृष्ण कान्तक बिआह जुगल किशोरेक बेटीसँ भऽ गेलनि। मुदा ई दुनियाँक खेल छी जे दुनियाँमे रहितो लोक दुनियाँकेँ नै जानि पबैत अछि। जुगल किशोरक मनमे भेलनि जे मास दिन पहिने काज भेल आ आइ ई ताना-मारए दरबज्जापर चलि आएल। अपना सीमा कुकुरो बताह। जुगल किशोर सोझे कहलखिन- “ऐठामसँ चलि जाउ, नै तँ पुलिसकेँ बजाएब?” ओना जुगल किशोरक बात मनोहरकेँ तते कठानि नै लगलनि जते लागक चाही। किएक तँ अपन दरबज्जापर उचित-अभ्यागत लेल पुलिस आनी, सएह तँ मिथिलाक दरबज्जा छी। मुदा पुलिस नाओं सुनि मनोहर भरमे-सरमे घरमुहाँ भेला। तही दिनसँ आॅफिसक काजमे उन्टा-फेड़ हुअए लगलनि। जइसँ पागल घोषित कऽ देल गेला। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-४ ३.२.रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ ३.३.किशन कारीगर- दूधपीबा नेना ३.४.सुमित मिश्र- भक्ति गजल ३.५.जगदानन्द झा ‘मनु’-गजल १-५ ३.६.जगदीश प्रसाद मण्डल ३.७.राजदेव मण्डल- तीनटा कविता जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गजल 1 धनसं सुन्दर तन चाही तनसं सुन्दर मन चाही
बाहर-बाहर दुनियां ई भीतर राम भजन चाही
नै चाही मोटर आ बंगला हमरा नीलगगन चाही
हम पावन आ शान्त आत्मा ई धियान सदिखन चाही
मित्र, मोक्ष नै चाही हमरा मरण और जीवन चाही
हानि-लाभ हो दुख-सुख हो बिछुडन आ’मिलन चाही सरल वार्णिक बहर,वर्ण-10
2.
मोटर आ ने महल चाही कविता गीत गजल चाही
ओ रस्तापर कांट छिटैए ओकरा लेल जहल चाही
महिशासुर अछि उत्पाती मां दुरगाक दखल चाही
किए’खाधि आ पर्वत कत्तौ स’भ खेत समतल चाही
घर दफ्तर वा करखाना सभठां लोक कुशल चाही
अहिल्याक संताप हरैले’ नयनमे गंगाजल चाही
भार चंगेरा मैथिलीक हो जागल मिथिलांचल चाही सरल वार्णिक बहर,वर्ण-10
3 सदिखन कोनो बियोंतमे बाझल करैए आदमी आदमीकें कतेक पांतमे बांटल करैए आदमी
आदमीक विवेक देखलहुं सांढ आ महिशा जकां हरियर जजात बाधक धांगल करैए आदमी
आदमी केर रूप देखल बिलाइ आ कुकुर जकां आदमीक डरसं एतय भागल करैए आदमी
आदमी केर देशमे किए आदमी केर टान अछि आदमीक पेट पर किए नाचल करैए आदमी
सोचैत छी हम आदमीक सुविचार कें की भ’ गेलै आदमीकें पाइसं सतत नापल करैए आदमी
आदमी ले’ वैह सरिपहुं आदमी भगवान थिक आदमी केर दुख-दर्द जे बांटल करैए आदमी सरल वार्णिक बहर, वर्ण-19
4 माटि-पानि ले’ देश-कोस ले’ अहांक योगदान की अहां उपस्थित छी दुनियामे तकर प्रमाण की
अहां बान्हि नेने छी पट्टी अपन दूनू आंखि पर आब अहां लेल कोनो राक्षस की आ भगवान की
ओ नंगटे ठाढ भ’ गेल अछि ऐ चौबटिया पर आब ओकरा लेल कोनो सम्मान की अपमान की
अहां जनैत छी लहरि गनि क’ कमाएब पाइ अहां लेल नोकरी की आ नून-तेलक दोकान की
अहां तं बातेसं क’ दै छिऐ सभकें लहूलुहान अहां ले’ कोनो तीर की आ अहां ले’ कोनो कमान की
अहां तं नारद छी घुमैत रहै छी तीनू लोकमे अहांक लेल बाइक की मोटर की वायुयान की
साल भरिसं संगे रहै जाइ छी अहां दूनू गोटे आब अहां सभक लेल परिछन की चुमान की सरल वार्णिक बहर, वर्ण-18 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ झारू- झारू बिनु ने घरक शोभा, ने हमरा बिनु हएत हवन हमरा बिनु ने मंदिर-मस्जिद, और ने देशक संसद भवन। गीत- झारूसँ नै घृणा करू ई तँ अनुचित बात छी मिलै छै जइसँ जगमे शान्ति तेकर हम सुरूआत छी। जइ घर नै छै हम्मर आदर तइ घर घुसतै दुक्खक बादल पएर पसारत रोग बेमारी ओ घर भूतक जमात छी मिलै छै जइ......। की हमरा बिनु तनक शोभा फुटतै कि मोन ऐ बिनु आभा के कहौत हमरा बिनु मानव केकर ई ओकात छी मिलै छै जइ......। के नै लइ छै हम्मर सेवा राजा-रंक-दानव और देवा के गिन सकतै रूप-रंग हमर सौचैबला बात छै जइसँ मिलै छै......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर (आकाशवाणी दिल्ली) दूधपीबा नेना आजुके दिन जनमल “कारीगर” खुशी सँ हम कहू कोना? हर्षित भेल अछि मोन हमर देलहुँ स्नेहबश अहाँ जे शुभकामना। केखनो के हँसी हम केखनो अपने मने कानी मेला घूमै काल माए बाबू संगे करी हम कोनो बहन्ना। आई मोन होइए फेर सँ बनि जाए हम दूधपीबा नेना रूसल छी आई ने मानब हमरा किन दियए ने एकटा झुनझुना। दाई के कोरा मे खूम खेलाई बाबाक कोरा मे हम कानी मामा संगे आबि जो रे बौआ सोर करैथ हमर बुरहिया नानी। ओई कोरा सँ ओई कोरा जाई केखनो क’ कानी केखनो खेलाई फेर झुल्ला गाड़ी पर बैसी क’ अंगने-अंगने घूमलहुँ हम आई। कियो दुलारैथ कियो पुचकारैथ कान पकड़ि के उठाबैत-बैसाबैथ आउ बौआ एम्हर आउ सभ कियो हमरा सोर पारैथ। लुक्का-छिप्पी हम खूम खेलाई तहि दुआरे बड़का बाबू खिसिआइथ कतए हेरा गेल दुलरूआ बौआ टुकुर-टुकुर ताकैथ बुरहिया दाई। आइओ रूसले रहब आ कि हँसब खेलौना पिप गाड़ी, आ कि झुनझुना? जन्मदिन पर पुछलीह हमर माए किछु ने फुराए, की कहत दूधपीबा नेना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुमित मिश्र करियन , समस्तीपुर भक्ति गजल
हम निर्बुद्धि-पापी बैसल कानै छी पुत्र अहीँके जननी क्षमा माँगै छी
तोहर दुआरि बड भीड़ हे मैया कखन देब दर्शन आब हारै छी
अष्टभुजा नवरुप जगदम्बिके दशो दिशा विभूषित अहाँ साजै छी
ममतामयी झट दया-दृष्टि करु नाव भँवरसँ दुःखियाके उबारै छी
अरहुल फूल आ ललका चुनरी असुर विनासिनी जगके तारै छी
"सुमित" बालक जुनि ज्ञान हे दुर्गे चरण बैसिकऽ गीत अहीँके गाबै छी
वर्ण-12 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल १.गजल
घोड़ा जखन कोनो भऽ नाँगड़ जाइ छै कहि ओकरा मालिक झटसँ दै बाइ छै माए बनल फसरी तँ बाबू बोझ छथि नव लोक सभकेँ लेल सभटा पाइ छै
घर सेबने बैसल मरदबा छै किए चिन्हैत सभ कनियाँक नामसँ आइ छै
कानूनकेँ रखने बुझू ताकपर जे बाजार भरिमे ओ कहाइत भाइ छै खाए कए मौसी हजारो मूषरी बनि बैसलै कोना कऽ बड़की दाइ छै
पोसाकमे नेताक जिनगी भरि रहल जीतैत मातर देशकेँ ‘मनु’ खाइ छै
(बहरे रजज, मात्रा क्रम २२१२ तीन तीन बेर)
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२.गजल
आइ सगरो गाममे हाहाकार छै मचल एना ई किए अत्याचार छै
आँखि मुनने बोगला बैसल भगत बनि खून पीबै लेल कोना तैयार छै
देखतै के केकरा आजुक समयमे देशकेँ सिस्टम तँ अपने बेमार छै
देखते मुँह पाइकेँ कोना मुँह मोरलक मांगि नै लेए खगल सभ बेकार छै
भरल भिरमे एखनो धरि एसगर छी केकरो मनपर ‘मनु’क नै अधिकार छै
(बहरे जदीद, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-२२१२)
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३.गजल
अहाँ पिआर करु हमरा हमर बसन्ती पिया अपन बाबूक नहि हम आब रहलहुँ धिया
बहुत जतनसँ सोलह बसन्त सम्हारलहुँ आब नहि सहल जाइए हमर टूटेए हिया
नेह रखने छी नुका कए कोंढ़ तर अहाँ लए रुकि नहि जुलूम करु हमर तरसेए जिया
आब आँकुर फूटल पिआरक अछि चारू दिस अहाँ जे रोपलौं करेजामे हमर प्रेमक बिया
आउ हमरा सम्हाइर लिअ हमर सिनेहिया अहाँकेँ सप्पत दै छी करियौ नै ‘मनु’ एना छिया
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
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४.गजल
खाल रंगेल गीदड़ बड्ड फरि गेलै एहने आइ सभतरि ढंग परि गेलै
घुरि कऽ इसकूल जे नै गेल जिनगीमे नांघिते तीनबटिया सगर तरि गेलै
देखलक भरल पूरल घर जँ कनखी भरि आँखि फटलै दुनू डाहेसँ मरि गेलै
सभ अपन अपनमे बहटरल कोना अछि मनुखकेँ मनुख बास्ते मोन जरि गेलै
बीछतै ‘मनु’ करेजाकेँ दरद कोना जहरकेँ घूंट सगरो पी कऽ भरि गेलै
(बहरे मुशाकिल, मात्रा क्रम २१२२-१२२२-१२२२)
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५.गजल
लुटेए गाम गाबेए कियो लगनी किए लागल इना सभकेँ शहर भगनी
कियो नै सोचलक परदेश ओगरलक भऽ गेलै गामपर माए किए जगनी
उठेलहुँ बोझ हम आनेक भरि जिनगी अपन घरमे रहल सदिखन बसल खगनी
बिसरलहुँ सुधि सगर कोना कऽ हम हुनकर बनेलहुँ अपन जिनका हम घरक दगनी
अपन जननी जनमकेँ भूमि नै बिसरल भरल बाँकी तँ अछि सभठाम ‘मनु’ ठगनी (बहरे हजज, मात्रा क्रम १२२२ तीन तीन बेर सभ पांतिमे) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा अनुपम गीत भगवती गीत- एना किअए बनेलौं हे मइये एना किअए बनेलौं। दुनियाँ रचै-बसैले दुनियाँ अहाँ बनेलौं। भूमा भोग भगा-भगा माइयक कोर छोड़ेलौं। हे मइये......। सूखल रोटी अल्लू सनि सानि दिन-राति किअए खुएलौं बाँकी भगा-भगा कऽ रोग-वियाधि पठेलौं एना किअए......। जामंतो फूल-गाछ सिरजि जामंतो फूल-फल सजेलौं चीन्ह-पहचीन्ह विस बिसरा अगुआ थारी खिंचलौं हे मइये एना किअए......। बानि वहारि नयन दहाड़ि बनवासी बना पठेलौं। कलपि-तड़पि तैयो कहै छी हीआ जोगि जोगेलौं हे मइये एना किअए......। आनक बोझ...... आनक बोझ उठाबै खातिर अपनो बोझ भड़कि गेलै। दबि-दबि, उनरि-उनरि जुन्ने बीच ससड़ैत गेलइ। मीत यौ, अपनो......। पसरल पानि धार तरहत्थी बीतल-अतल बनैत गेलै। सिर ससरि-ससरि सर अपनो पएर पिछड़ैत गेलै। मीत यौ, अपनो......। रहलै ने सुधि-बुधि मिसिओ मोसिआनी बदलैत गेलै। उज्जर कागज-कलम कहि-सुनि आखर कारी अंकड़ैत गेलै। मीत यौ, आखर......। घूरि घूर घुड़लै जखन मारि मेघ मारैत गेलै। कटि कोदारि कोदरकट्टा भऽ भऽ रूप अमावस धड़ैत गेलै। मीत यौ, जुन्ना बनि ससरैत गेलै। मीत यौ, आनक......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डल तीनटा कविता- गन्तव्यक भरम मन भऽ गेल पुलकित गाबए लगलौं गीत मिलि गेल मंजिल भऽ गेल हमर जीत जेकरा बुझलौं मंजिल ओ कहलक- “अहाँकेँ नै अछि अकिल लटकल छी अधरममे फँसल छी भरममे जेकरा ताकैले एते प्रयास से धेने अछि अहींक आस किएक बखतकेँ करै छी नाश ओ तँ अछि अहींक पास।” दरदक भोर अखन तँ भेलै दर्दक भोर साँझमे देखबै अन्तिम छोर चिचिआइत मन करै शोर कानब तँ सुखि जाएत नोर तानब तँ छूटि जाएत जोड़ डरे धेने छी केकर गोड़ थाह नै भेटए थोड़बो-थोड़ ताकब दरदक अन्तिम कोर छोड़ि देत ओ हमर पछोड़। केहेन मांग असली मांग बजल अर्द्धांग “जिनगी भरि बनले रहब बताह काटिते रहब हम कठ आ काह पलिवारक नै अछि परबाह डूमि जाएत आब घरक नाह जरि गेल सभ मनक चाह केना कऽ चलब काँट भरल राह।” करै छी जौं गप्पपर विचार मन बहैत अछि तेज धार तँए, पटियापर पटुआ गेलौं लाजे कठुआ गेलौं केना करब एकरा सम्हार पाबि नै रहल कोनो पार रखबाक छै सबहक मान करए पड़त एकर निदान। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग- हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल) चतुर्थ परिच्छेद ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना किछु दिन अयोध्याक रनिवास मे रहैक बाद ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्रीक संग मालिनी घुरल। मालिनी सं पश्चिम भाग स्थित अप्पन आश्रम कऽ सुव्यवस्थित केलक।1 ओहि आश्रम मे वेदक अध्ययनक व्यवस्था करल गेल, जे कतेक रास आचार्यक देख-रेख मे संचालित छल। एकर बाद ऋष्यश्रृंग शान्ताक संग कौशिकीक कातक कज्जल वन स्थित अप्पन पुण्याश्रम सेहो घुरल। ई वहि पुण्याश्रम छल, जतय सं गणिका हुनका अंगक राजधानी मालिनी लऽ गेल छल। अंतर्मुखी युवक ऋष्यश्रृंगक बिना ई आश्रम सून छल। मन सं वेदक सार्थक पाठ करय बला ऋष्यश्रृंग के आबैत लता हिल-हिलकऽ स्वागताभिवादनक मुद्रा मे आबि गेल। पिता विभाण्डक अप्पन पुत्रक अहि उपलब्धि पर हर्षोत्फुल छल। शान्ता जेहन पुत्रवधू कऽ पाकऽ ओ पुलकित भऽ उठल। अहि पुण्याश्रम मे ऋष्यश्रृंगाश्रमक स्थापना केल गेल, जाहि के पहिलुक कुलपति ऋष्यश्रृंग छल। उत्तर वैदिक काल मे विश्वविद्यालयक स्तरक मान्यता अहि आश्रमके प्राप्त छल। तहियौका आर्य जातिक शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक, भौतिक आ सांग्रामिक उन्नतिक कारण हुनकर शिक्षा प्रणाली छल। रामायण काल में ऋष्यश्रृंगाश्रम बड़ चर्चित छल। महाभारत मे सेहो एकर संक्षिप्त विवरण भेटैत अछि। पंडित रामदीन पांडेय लिखैत अछि जे ऋष्यश्रृंग अप्पन युगक महान आचार्य छल। चिकित्सा शास्त्र मे हुनकर अद्भुत प्रवेश छल। महाभारत युग मे ई आश्रम बड़ रास हरिहर छल। युधिष्ठिर वनवास काल मे लोमश ऋषिक संग अहि आश्रम मे आयल छल। आश्रम मे दस हजार छात्र सभोजन, सवस्त्र आ निशुल्क शिक्षा प्राप्त करैत छल।2 अहि आश्रमक ब्रह्मचारी मे भक्ति, शुद्धता आ पवित्रताक संग धार्मिक वृत्तिक उदात्त आ गरिमामय छल। ओ सभ दैनिक क्रिया, संध्योपासन, व्रतक अनुपालन आ धर्म समन्वित उत्सव से हुनक जीवन मे उन्नति, आत्मविश्वास, आत्मबल आ आत्मिक शक्ति प्रचुर रूप सं भेटैत छल। आचार्य कुल मे अग्नि-परिचर्याक सभ दिन पालन, ब्रह्मचारीक लेल एकटा धार्मिक व्रतक समान छल आ ई आश्रमक अनुशासनक महत्वपूर्ण अंग छल। आचार्य ऋष्यश्रृंगक कुशल कुलपतित्व मे ई आश्रम जम्बूद्वीप में चर्चित भऽ गेल। वेद आ ओकर सभटा अंगक संग चिकित्सा शास्त्रक गहन ज्ञान ब्रह्मचारी छात्र सभके देल जायत छल। समिधा आ मेखला सं अप्पन व्रतक नियम सं पालन करैत ब्रह्मचारी श्रम, तप आ गुरुसभक आशीर्वादक प्रभाव सं अध्ययन मे सफलता प्राप्त करैत छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम मे तप ब्रह्मचर्य जीवनक आवश्यक अंग छल। तप सं हुनका मे आत्मसंयम, आत्मचिंतन, आत्मविश्वास, आत्मविश्लेषण, न्याय प्रवृत्ति, विवेक भावना अ आध्यात्मिक वृत्तिक उदय होयत छल। कुलपति ऋष्यश्रृंग अपने यज्ञ देवताक साकार रूप छल। कहल जायत अछि जे ओ जीवनभरि यज्ञ केलक आ करौलक। ओ एहन कतेक रास यज्ञक संपादन करैलक जकरा लेल मात्र वहि टा सक्षम छल। गृहस्थक लेल ओहि युग मे पांच महायज्ञक विधान छल। ओ यज्ञ छल, व्रह्म यज्ञ, पितृ यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ आ नृयज्ञ।3 पहिलुका विद्वान ऋषिक प्रति श्रद्धा व्यक्त करैत वेद मंत्रक पाठ कऽ अप्पन बौद्धिक उत्कर्ष करब आ याज्ञिक समारोहक अवसर पर स्वाध्यायक व्यवस्था करब ब्रह्मयज्ञक विधानक अंतर्गत छल। पितरक श्राद्ध तर्पण सभ पितृ यज्ञक अंतर्गत संपन्न होयत छल। देवताक लेल अग्निक आहुति आ इंद्र, अग्नि, प्रजापति, सोम, पृथ्वी अदि देवताक नाम अग्नि मे समिधा प्रदान करव देव यज्ञ छल। अनिष्टकारी प्रेतात्माक तुष्टिक लेल भूत यज्ञ आ अतिथि देवताक सत्कार नृयज्ञ छल। वेदक मंत्रद्रष्टा ऋष्यश्रृंग वेदक महत्ता सार्वदेशिक आ सार्वकालिक अछि। सभ्यताक उषाकाल सं वेद समादृत आ अपौरुषेय अछि। अहि देशक प्रज्ञा पर्वत सं निकलल पतित पावनी गंगाक संस्पर्श पात्र सं सभटा विश्व चमत्कृत आ आह्लादित भेल अछि। शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मणक स्पष्ट कथन अछि, 'यावन्तुं ह वै इमा पृथिविं वित्तेन पूर्ण ददत लोकं जयति त्रिभिस्तावनां जयति: भूयांसं च अक्षयं च य एवं विद्वान: अदृश्व: स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्याये अधेयतव्य:।' शतपथ व्राह्मण 11-5-6-11 (अर्थात धनसं परिपूर्ण पृथ्वीक दान करहि सं जतेक फल भेटैत अछि, वेदक अध्ययन से सेहो ओतेक फल भेटैत अछि। ओतबै टा नहि, ओकरो से वढि़ के मनुख अविनाशशाली अक्षय लोक कऽ प्राप्त करैत अछि। ताहि सं वेदक स्वाध्याय करब वड़ आवश्यक आ उपादेय अछि।) पुरान कालक ऋषि वड़ निष्ठावान आ तप:शील मनुख छल। समाधिस्थ अवस्था मे ओ अप्पन परिवेशक अतिक्रमण कऽ मंत्रक दर्शन केलक। ताहि सं ऋषि वेदमंत्रक रुाष्टा नै, द्रष्टा कहल जायत अछि। ऋग्वेदक प्रत्येक मंत्रक द्रष्टा कियो नै कियो ऋषि अछि। हुनकर संख्या लगभग तीन सौ टा अछि। अहि मे किछु ऋषिक नाम अछि4- मधुच्छन्द, शुन:शेष, कण्व, गौतम, अगस्त्य, गुत्समद, विश्वामित्र, ऋषभ, देवश्रव, वामदेव, अत्रि, पृथु, कृष्ण, अपाला, देवल, भृगु, च्यवन, सुमित्र, अग्निपूर्य, वर्हिष, सुदास, श्रष्यश्रृंग, प्रचेता, उध्र्वग्रीवा, अधमर्षण, भारद्वाज, वीतहव्य, गर्ग, वशिष्ठ, मेधातिथि, वत्स, शशकर्ण, नारद, विश्वमना, नाभाग आदि। ई पुरुष सभक अलावा स्त्री सेहो मंत्रद्रष्टा छल। अहि मे लोपमुद्रा, गौरी, जुहू, शची, घोषा, लोमशा, विश्वधारा आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। ई ऋषि सभ अप्पन मंत्रमे मूलत: ईश्वरक दिव्य विभूतिक प्रति अप्पन श्रद्धात्मक उद्गार व्यक्त केने अछि। यजुर्वेदक विभाजन चतुर्वेद मे यजुर्वेदक संबंध यज्ञानुष्ठान से अछि। अहि मे संकलित मंत्रक विषय यज्ञ विधिक संपादन करब अछि आ कोन यज्ञ मे कोन कांडक मंत्रक व्यवहार करबाक चाहि, ओकर विधि यजुर्वेद मे देल गेल अछि। ताहि सं वेद कर्मकांड प्रधान अछि। वर्षक गणना ते कठिन अछि, मुदा ऋष्यश्रृंग सं लगभग पांच पीढ़ी पहिने यजुर्वेदक विभाजन भऽ गेल छल, जे कृष्ण यजुर्वेद आ शुक्ल यजुर्वेदक नाम से जानल जायत अछि। अहि संबंध मे विष्णु पुराणक तृतीय अंशक अध्याय पांच मे एकटा कथा अछि। महर्षि वैशम्पायन यजुर्वेद जेहन वृक्षक सत्ताइस शाखाक रचना केने अछि। ओकरा अप्पन शिष्य के पढ़ौलक। हुनकर परम धार्मिक आ हुनकर सेवा मे तत्पर रहि बला शिष्य याज्ञवल्क्य छल। एकटा काल मे सभटा ऋषि सभ ई नियम बनौअलखिन जे कियो ऋषि महामेरु पर स्थित हमर अप्पन समाज मे शामिल नहि होयत ओकर सात राति के भीतर ब्रह्महत्याक पाप लागत। अहि तरह जाहि काल के ऋषि सभ नियत केने छल,ओकर वैशम्पायन अतिक्रमण कऽ देलक। एक बाद ओ प्रमादवश अप्पन भानजाक हत्या कऽ देलक। एकर बाद ओ अप्पन शिष्य सं बाजल, अहां सभ कोनो तरहक विचार नै कऽ हमरा लेल ब्रह्महत्याक पाप के दूर करहि बला व्रत करू। अहि पर याज्ञवल्क्य बाजल, 'भगवन! ई सभ ब्राह्मण बड़ निस्तेज अछि। हुनक कष्ट दैके कोन जरूरत अछि? हम असगरे अहि व्रत अनुष्ठान करब। अहि सं वैशम्पायन तमसा गेल। ओ बाजलखिन, अहां ई सभ ब्राह्मणक अपमान केने छी। अहां जे किछु हमरा सं पढ़ने छी,ओ छोडि़ दिओ। अहां अहि द्विज श्रेष्ठ के निस्तेज कहैत छी। हमरा अहां जेहन आज्ञा भंगकारी शिष्यक कोनो प्रयोजन नहि अछि। 'लिओ, हम जे किछु अहां से पढ़ने छी, ओकरा घुरा रहल छी'। ई कहि याज्ञवल्क्य रुधिर सं भरल मूर्तिमान यजुर्वेद वमन कऽ हुनका घुरा देलक आ स्वेच्छा सं चलि गेल। याज्ञवल्क्य के वमन करल यजुश्र्रुती के दोसर शिष्य तीतर बनिके ग्रहण कऽ लेलक। ताहि सं ई सभ तैत्तिरीय कहौलक। याज्ञवल्क्य यजुर्वेदक प्राप्तिक इच्छा सं संयम चित्त सं सूर्यनारायणक स्तुति करलक। भगवान सूर्य अश्व रूप मे प्रगट भऽ कऽ अभीष्ट वर मांगहि लेल कहलक। तखन याज्ञवल्क्य हुनका प्रणाम कऽ बाजल, अहां हमरा ओहि यजुश्र्रुतीक उपदेश दिये जे हमर गुरु नहि जानैत अछि। हुनकर एहन कहला पर सूर्य हुनका 'अयातयाम' नामक यजुश्र्रुतीक उपदेश देलक, जकरा हुनकर गुरु वैशम्पायन सेहो नहि जानैैत छल। माध्यन्दिन शाखा याज्ञवल्क्य ओहि वाज श्रुत के अप्पन कण्व आदि पंद्रह शिष्य के प्रदान करलक। ओहि मे मध्यन्दिन महर्षि द्वारा प्राप्त यजुर्वेदक विशेष शाखा के माध्यान्दिन कहल जा लागल। शुक्ल यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक मंत्र के महर्षि कात्यायन महर्षि कश्यप के, महर्षि कश्यप महर्षि विभाण्डक के आ महर्षि विभाण्डक ऋष्यश्रृंग के देलक। ऋष्यश्रृंग अहि मंत्रक प्रखर दृष्ट छल। अहि मंत्रक सं अे राजा रोमपादक एतय वृष्टि यज्ञ केने छल। ऋष्यश्रृंग अहि शाखाक मंत्रद्रष्टाक संग अहि शाखा स्वरूपक ओत-प्रोत ब्रह्मनिष्ठ छल, जाहि सं ओ जतय कत्तौ जायत छल, ते हुनकर पदार्पणक संग ओहि भूमि पर इंद्र देवता वर्षा कऽ दैत छल।5 वाजसेनी पुत्र याज्ञवल्क्य द्वारा नष्ट हय के कारण शुक्ल यजुर्वेदक अहि संहिताक नाम वाजसनेय संहिता पड़ल। अहि प्रकार यजुर्वेदक तैत्तरीय आ वाजसनेय अहि दोनों शाखाक निर्माण भेल। वाजसनेय संहिता मे राष्ट्रक उन्नति आ ओकर सुख-शांतिक लेल बड़ रास भावना सभ अभिव्यक्त केने अछि। 'हे पितृदेवो! नमस्कार! अहांक कृपा से वसंत ऋतु राष्ट्र के सुखी करय'। 'हे पितर नमस्कार! अहांक कृपा से देश मे ग्रीष्म अनुकूल रहय'।6 ऋतु सभके राष्ट्रक अनुकूल बनाबै आ जल प्रबंधन मे विशेषज्ञता प्राप्त करय बला ऋष्यश्रृंग अप्पन समय मे मंत्रक सिद्धता प्राप्त कऽ चुकल छल। बाल्मीकिक काल मे शुक्ल यजुर्वेदक बड़ प्रभाव छल। ऋष्याश्रम मे एकर गहन अध्ययन होयत छल। मुदा ओहि काल तैत्तिरीयक शिक्षालय सेहो कार्यरत छल। अयोध्यामे एहन एकटा शिक्षण संस्थानक उल्लेख वाल्मीकि केने अछि। अयोध्या काण्ड (32-15,16) मे राम लक्ष्मणक आदेश दैत अछि, लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तरीय शाखाक अध्ययन करहि वला व्राह्मण के जे आचार्य आ संपूर्ण वेदक विद्वान अछि, संग ही जाहि मे दान प्राप्तिक योग्यता अछि आ जे माता कौशल्याक प्रति भक्तिभाव राखि प्रतिदिन हुनका लग आवि के हुनकर आशीर्वाद प्रदान करैत अछि, हुनका सवारी, दास, दासी, रेशमी वस्त्र आ जतेक धन सं व्राह्मण संतुष्ट हुयअ, ओतेक धन खजाना से दियाविओ। आश्रम व्यवस्था रामायण कालक विभिन्न ऋष्याश्रमक अध्ययन सं ई ज्ञात होयत अछि जे आश्रम मे गुरुक वाद आचार्य आ कुलपतिक गणना केल जायत छल। कुलपतिक अधीन दूर-दूर ठाम सं आयल सैकड़ों छात्र विद्याध्ययन करैत छल। श्रोत्रियक संज्ञा ओहि अध्यापक वर्ग कऽ देल जाय छल जिनकर तामसिक वृत्तिक परंपरागत वैदिक अध्ययन आ तपस्या सं शमन भऽ चुकल अछि। तापसगण तपोनिरत रहैत आ अपना लग आवहि वला के शिक्षा दैत छल। ओ वनवासी छल अ हुनकर उपदेश अरण्यक मे लिपिवद्ध अछि। उपाध्याय लोक शुल्क लऽ कऽ शास्त्र विशेष वढ़ावैत छल। ललित कलाक अध्यापक शिक्षक छल। तुंवरू अप्सराक गान-शिक्षक छल। एकर अलावा, आश्रम मे परिव्राजक सेहो रहैत छल। ओ निवृत्ति मार्गी होयत छल। ओ अवकाशक काल घूमि-घूमि कऽ निर्वेद आ वैराग्यक जीवनक सर्वोच्य ध्येयक तरहे प्रचार करैत छल।7 दोसर आश्रमक तरहे अहि ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे अध्यापक के कोनो वान्हल आय नहि छल। शिष्य सं नियत शुल्क लै के प्रथाक प्रमाण नै भेटैत अछि। एतय गुरु पुरोहित सेहो होयत छल। अहि सं यज्ञ याज्ञादिकक अवसर पर दान दक्षिणा पर्याप्त भेट जायत छल। एकर अलावा, अतिरिक्त आश्रम के कृषि सं सेहो पर्याप्त आय होयत छल। आश्रमक छात्र मे तपस्वी जना त्याग आ सहिष्णुता अपेक्षित छल। स्नातक वनहि धरि हुनकर नैष्ठिक व्रह्मचर्य व्रतक पालन करव अनिवार्य छल। अहि आश्रम मे ज्ञान-विज्ञानक अजरुा धारा वहैत छल। विद्यार्थी पिता-पुत्रक परंपरा सं वरावर आवैत रहैत छल। अहि आश्रम मे कतेक रास परिवारक कतेक पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कऽ चुकल छल। अहि आश्रम मे मुनि-शिक्षक अप्पन स्त्री (मुनि पत्नय:) आ संतान (मुनि दारका:) संग रहैत छल। प्राचीन भारतक इंद्र खंडक (पूर्वी भाग) दूटा आश्रम मिथिलाक सीरध्वज जनकाश्रम आ अंगक उत्तरवरिया भाग स्थित कज्जल वनक ऋष्यश्रृंग आश्रम तत्वक विवेचन, विश्लेषण, चिंतन, अनुसंधान आ निर्णयक लेल प्रसिद्ध छल। तहियौका भारतक सभ आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षा देल जायत छल। स्वयं राम वशिष्ठाश्रम सं दोसर विषयक संग संग्रामिकता मे स्नातक आ विश्वमित्रक सिद्धाश्रम से स्नातकोत्तरक शिा पायल छल। आश्रम मेे संग्रामिकताक शिक्षा शत्रु (असुर) के संहार शक्ति के चुनौती दैक लेल छात्र के देल जायत छल। जतय-जतय असुरक सैन्य छावनी छल ओतय स्थित आश्रम मे संग्रामिकताक उच्चा शिक्षा दैक व्यवस्था छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम आसुरी गतिविधि सं दूर एकांत प्रदेश मे छल। ताहि सं अहि आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षाक कोनो महत्व नहि छल। यज्ञ ऋष्यश्रृंग अपने वृष्टि यज्ञक अद्वितीय आचार्य छल। अप्पन ससुर अंग नरेश रोमपादक राज्य मे कहियो अकाल नहि पड़य, एकरा लेल ओ शुक्ल यजुर्वेद संहिताक वाजसेनीय मध्यन्दिन शाखा सं कतेक रास ऋषि-मुनिकऽ साक्षी राखि सफल वृष्टि यज्ञ केने छल। वैदिक युग मे यज्ञक सवसे वेसी महत्ता छल। यज्ञ अग्नि संपन्न होयत छल। उत्तर वैदिक काल मे सेहो यज्ञक महत्व कम नहि छल। देवता आ मनुखक वीच संवंध स्थापना मे यज्ञक महत्वपूर्ण स्थान छल। उत्तर वैदिक काल धरि कतेक रास यज्ञ प्रचलित भऽ गेल छल जहि मे अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चतुर्मास्य, आग्रयण, निरूढ़, सौत्रामणी, पिण्डपितृ यज्ञ, सोम यज्ञ, षोडशी, अतिरात्र, पुरुषमेध आ पंचमहायज्ञक अलावा गवामयन, वाजपेय, राजसूय आ अश्वमेध जेहन यज्ञ तहियौका भारतीय समाज मे मान्य छल। यज्ञ आर्यक मिलन स्थल सेहो छल। ऋष्यश्रृंगाश्रम मे यज्ञक संपादनक विशेष पाठ¬क्रम छल। कज्जल वनक पुण्याश्रम वेद ध्वनि सं गुंजायमान छल।8 सभ्यताक समन्वय उत्तर वैदिक कल मे भगवान शिवक महत्ता वड़ वढ़ल छल। ओ युग आर्य आ आर्येतर जाइतक सम्मिलन, सम्मिश्रण आ समन्वयक युग छल। भगवान शिव आर्येतर जाइतक अराध्य देव छल। हुनका दरकिनार कऽ समन्वित आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक गठन असंभव छल। एहन स्थिति मे युगद्रष्टा ऋषि केर भगवान शिव दिस आकृष्ट होयव स्वाभाविक छल। वैदिक रुद्र जे उपहन्तु (ध्वंसक) छल, ओ उत्तर वैदिक काल मे कल्याणकारी शिव वनि गेल। वेद मे रुद्र सं कतेक रास रुद्र के उद्भूत मानल गेल अछि, जे भगवान शिवक व्यापकता कऽ रेखांकित करैत अछि। ताहि सं अहि रुद्र के गणपति, कुम्भकार, कर्मकार, रथकार, वाजीगर आ निषाद जेहन दलित, उपेक्षित आर्येतर जाइतक स्वामीक तरहे स्वीकार करल गेल अछि। अहि तरहे भगवान शिव उपर्युक्त शोषित, दलित, उपेक्षित आ अनार्य जाइतक उपास्य आ आराध्य देव छल।9 तत्कालीन तत्वदर्शी ऋषि अहि आर्येतर जाइत के आर्य सभ्यता संस्कृतिक महासिन्धु मे विलीन कऽ दैक लेल संकल्पित छल। एकरा लेल ओ शिवक सामान्य देवक तरहे नहि मुदा महादेवक रूप मे पूजा करलक। अनार्यक परमपूज्य आराध्य देवता रहैत भगवान शिवक प्रतिष्ठा, महानता आ व्यापकताक कारण ई छल जे ओ अप्पन ऐश्वर्य सं देवता के, शक्ति सं असुर के आ योग सं प्राणि सभके पराभूत केने छल।10 ई निर्विवाद अछि जे भारतीय सभ्यता आ संस्कृतिक गठन मे भगवान शिवक विराट भूमिका अछि। जौं शिव के अहि सं अलग कऽ देल जाय ते अहि सभ्यता, संस्कृति के स्थित हेवाक लेल कोनो आधार नहि भेट सकत। ऋष्यश्रृंग आश्रमक समस्त क्षेत्र मे व्रात्यक निवास छल। अथर्ववेदक (11-2-7) अनुसार देवता सभ महादेव के विभिन्न दिशाक व्रात्यक स्वामी नियुक्त केने छल। संभवत: अहि प्रतीकक स्वरूप भगवान विष्णु एतय व्रह्मशिला पर शिवलिंगक स्थापना केने छल। वराहपुराणक उत्तराद्र्धक एकटा पुरा कथा मे अहि तथ्य कऽ रेखांकित करल गेल अछि। विष्णु द्वारा स्थापित शिवलिंग के ऋष्यश्रृंग फेर सं पुनर्जागृत करलक। एकर उल्लेख शिव पुराणक चतुर्थ रुद्र संहिताक सातम श्लोक मे भेल अछि। एकर अनुसार, कौशिकी कात स्थित शिव धाम मे दधीचिक रणभूमि मे श्रृंगेश्वर, वैद्यनाथेश्वर आ जपेश्वर नामक शिवलिंग प्रसिद्ध अछि। 'श्रृंगेश्वरश्च नाम्नावै वैद्यनाथ स्तथैव च। जप्याश्वरस्तथा ख्यातौ यो दधीचिरण स्थले।' चौवीस हजार श्लोक वाले वायु पुराणक एकटा अंश शिवपुराण अछि। ऋष्यश्रृंग द्वारा पुनर्जागृत केल जाय वला भगवान शिवक ई इष्टलिंग उत्तर वैदिक काल सं आय धरि मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय वा पूजनीय अछि। दूर ठाम धरि फैलल विशाल व्रह्मशिला सं ई इष्टलिंग जुड़ल अछि। एखुनका शिवलिंग सं तीन गुना वेसी मोट ओ दस फीट नीचा व्रह्मशिला धरि अछि। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत अछि। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर उत्कीर्ण अछि। ऋष्यश्रृंग अहि शिवलिंग के पुनर्जागृत कऽ आर्य आ आर्येतर संस्कृति कऽ एकाकार कऽ देने छल। ऋष्यश्रृंग द्वारा एकरा पुनर्जागृत करहि के कारण ई इष्टलिंग श्रृंगेश्वरक (या सिंहेश्वर) नाम सं विख्यात भेल। दक्षिात्य मे तपस्या उत्तर वैदिक काल धरि आर्य संपूर्ण उत्तर भारत मे पसैर चुकल छल। अे कतेक रास समृद्ध जनपदक सेहो स्थापना केलक। उत्तर भारत मे कतेक रास ऋष्यश्रृंग आश्रम स्थापित छल। कनि-कनि असुर दक्षिणापत्य दिस सिमटैत गेल। एतय मुख्यत: हुनकरे शासन छल। तकर वादो आर्य सभ्यता आ संस्कृति के दक्षिणात्य मे पसारैलक उद्देश्य सं कतेक रास ऋष्याश्रम मिशनरीक तरहे काज कऽ रहल छल। अहि ऋष्याश्रम के समय-समय पर निरीक्षण करैक दायित्व भगवान शिव पर छल। ओ अहि ठाम अवाध आवैत-जायत छल। क्याकि ओ असुर सभहक सेहो अराध्य देव छल। राम सवसे पहिलुक आर्य देवता छल जे दक्षिणात्व मे पइर राखलक। ओ एतय कार्यरत आर्य ऋष्याश्रम के असुर सं अभय कयलक। निशिचर हीन करौं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह। उत्तर भारतक ऋषि सेहो दक्षिणात्य जा कऽ तप करैत छल। तपक लेल दक्षिणात्यक ठाम वड़ उपयुक्त चल। ऋष्यश्रृंग सेहो दक्षिणात्यक जे ठाम मे अखण्ड तपस्या केने छल ओ तप:पूत स्थल आय श्रृंगेरी क्षेत्रक नाम से चर्चित अछि। श्रृंगेरी ग्राम, श्रृंगेरी पर्वत आ श्रृंगेरी तालाव आययो ओहि महान तपस्वीक तपस्याक साक्षी अछि। हजार वरखक वाद आद्य शंकराचार्य अप्पन पहिलुक मठ श्रृंगेरी मे स्थापित केने छल आ ओतय सं दिग्विजयक लेल अप्पन अभियान शुरू केने छल। शंकराचार्य ओहि ठाम पर देखलक जे प्रकृति विरोध धर्म प्रेम, सेवा आ दयाक आगू प्राणी कोन तरह अप्पन स्वाभाविक धर्म के विसुरि के कल्याण काज मे निरत भऽ जायत छल। थाकल-मांदल योगी शंकर एकटा वटवृक्षक नीचा वैसल छल। वड़ गर्मी चल। आपसी द्वेष के विसुरि के एकटा नेवला आ सांप खेल रहल छल। ओतय सांप अप्पन आहर एकटा वेंग कपा मुंह सं पकडि़ पइन मे छोडि़ दैत छल। ओ विस्मित भऽ जायत अछि। ई ऋष्यश्रृंगक तपस्या स्थली छल, जकर महत्ता आय धरि दृष्टिगोचर होयत अछि। अे महान ऋष्यश्रृंगक प्रति श्रद्धावनत भऽ कऽ अप्पन शिष्य सं कहै छथिन, जतय व्रह्म मे अप्पन अंतकरण के लगा दै वला ऋष्यश्रृंग आय धरि तपस्या कऽ रहल अछि। आ जतय स्पर्श मात्र सं कल्याण दहि वला तुंगभद्रा सुशोभित होयत अछि, जतय अभ्यागत पुरुषक पूजा सं कल्पवृक्ष के सेहो लजावै वला, समस्त वेद कऽ पढ़य वला, सैकड़ों टा यज्ञ सं प्रसन्न हैय वला शान्तचित्त सज्जन लोक सभ निवास करैत अछि।11 शंकराचार्य अहि तपस्थलीक स्तुति करलक आ ओतय विद्याग्रहण मे समर्थ विद्वान शिष्य के अप्पन मुख्य भाष्यक अध्ययन सेहो करैलक। एतय सं वौद्ध के सेहो शास्त्र से पराजित कऽ सनातन धर्मक पुनस्र्थापनाक लेल दिग्विजयक लेल चलल छल शंकराचार्य। अभियानक पूर्व आचार्य शंकर श्रृंगेरी मे अप्पन पहिलुक मठ निर्माण कऽ वेदांत विद्यापीठक स्थापना कएलक। एत्ते सं सनातन धर्मक प्रचारार्थ मीमांसक व्रह्मचारीक समुदाय सन्यास सम्प्रदाय मे दीा ग्रह करैत छल।12 ऋष्यश्रृंग सेहो अप्पन कालक अद्वितीय मीमांसक छल। ओ ऋषि कुल आश्रम मे कतेक ऋषिक आत्मज आ मानस पुत्र के मीमांसाक अध्ययन करावैत रहल। श्रृंगवेरपुर वृतान्त ऋष्यश्रृंग अप्पन प्रताप सं उत्तर पश्चिम गंगाक वाम कात पर सेहो तपस्या करले छल। ई ठाम निषाद शासकक अधीन छल। आजुक काल मे ई ठाम इलाहावाद-उन्नाव राजमार्ग पर स्थित अछि। एतय गंगा कात पर एकटा वड़ पैग टील अछि जकर लगभग आधा हिस्सा गंगा मे कटि चुकल अछि। यहि ठाम अछि ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि श्रृंगवेरपुर। एतय मंदिर मे ऋष्यश्रृंग आ मां शान्ताक भव्य मूर्ति स्थापित अछि। रामायण मे श्रृंगवेरपुरक वड़ महत्व अछि। अप्पन वनवासक काल श्रीराम अप्पन अनुज आ स्त्रीक संग एतय नाव सं गंगा पार केने छल। पुरवासी सभक संग भरत जखन राम मे मिलैक लेल चित्रकूट गेल छल, तखन ओ श्रृंगवेरपुर आयल छल। कालिदासक रघुवंश आ भवभूतिक उत्तर रामचरित मे अहि पुण्य स्थलक गौरवपूर्ण उल्लेख अछि। तुलसीदास एकर सिंगरौरक प्राचीन नाम सं उल्लेख केने अछि- 'केवट कीन्ह वहुत सेवकाई सो जामिनी सिंगरौर गंवाई।' ई ठाम ऋष्यश्रृंगक तपस्या भूमि अछि। ऋष्यश्रृंग मंदिर सं आध किमी दूर गंगा मे विभाण्डक कुण्डक नाम सं घाट सेहोवनल अछि। श्रृंगवेरपुर निवासी राजा रामदत्त सिंह (18वीं सदी) आध्यात्म-रामायणक टीक मे एतय ऋष्यश्रृंग आश्रम हेवाक संग अहि महर्षिक जीवनक अन्यान्य वृतान्त के अहि ठाम सं जोड़वाक यत्न केने अछि। हमर विचार सं अप्पन जन्मभूमिक प्रति मोह हेवाक कारण राजा एहन केने होयत। श्रृंगवेरपुर के ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि मानवाक एतिहासिक भूल अछि क्याकि महाभारत मे स्पष्ट लिखल अछि- 'एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ विश्वामित्राश्रमौ रम्य एश चात्र प्रकाशते। आश्रमश्चैव पुण्याख्य: काश्यपस्य महात्मन:। ऋष्यश्रृंग सुतौ तस्य तपस्वी संयतेन्द्रिय:।' कौशिकीक कात पर जतय विश्वामित्रक आश्रम छल, ओतय पुण्याश्रम मे महर्षि काश्यपक जितेन्द्रिय वंशज ऋष्यश्रृंगक आश्रम छल। एक ऋषिक अप्पन मुख्य आश्रमक अलावा कतेक ठाम हुनकर उपआश्रम होयत छल। पुण्याश्रम मे द्वादश वर्षीय यज्ञ ऋष्यश्रृंगक मुख्य आश्रम कौशिकीक कात पर पुण्याश्रम मे छल। ओ जतय-जतय तप करलक ओतय उपाश्रम वनौलक। ओ अप्पन जीवन मे कठिन तप आ योग साधनाक संग यज्ञ के मोक्ष प्राप्तिक साधना वनैलक। ओ समस्त भारतक पवित्र स्थलक सेहो भ्रमण केलक। ओ कतेक रास कठिनतम यज्ञ केलक, जाहि मे द्वादश वर्षीय यज्ञ सेहो छल। अहि यज्ञक वड़ पैग मार्मिक वर्णन भवभूति अप्पन उत्तर रामचरितक प्रथमांक मे केने अछि। अयोध्या मे सभ दिन कोनो नै कोने उत्सव हैत छल। अहि वीच एकटा विदेशी अयोध्या आवैत छल आ राजधानी मे उत्सव नै हैत देखि के एकर कारण जानैल चाहैत अछि। नट एकर उत्तर दैत अछि जे उत्सव नै हैक कारण अछि जे रामक माता महर्षि वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग अप्पन दामाद ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे यज्ञ देखहि लेल गेल छथिन। 'वशिष्ठाधिष्ठिता देव्यो गता रामस्य मातर:। अरुन्धती पुरस्कृष्य यज्ञे जामातुराश्रमम्।' ई सुनि के ओ विदेशीक प्रश्नाकुलता आरो वढि़ जायत अछि। ओ पूछि दैत अछि जे ई जमाता के अछि? नट उत्तर दैत अछि जे राजा दशरथक पुत्री शान्ताक पति अछि ऋष्यश्रृंग, हुनके कते हैवला यज्ञ मे भाग लैक लेल रामक माता सव गेल छथिन। 'विभाण्डक सुतास्ताम ऋष्यश्रृंग उपयेमे तेन च साम्प्रतं द्वादश वार्षिक सत्र माख्यं। तदपुरोधात कठोर गर्भापति वधूं जानकी विमुप्य गुरुजनस्तत्र: गत:।' ई स्पष्ट अछि जे रामक माता ऋष्यश्रृंग के अप्पन जमाता मानैत अछि। यहि कारण अछि जे गर्भवत सीता के छोडि़ के अप्पन पुत्री शान्ता आ जमाता ऋष्यश्रृंगक प्रति अकूत स्नेहक कारण माता ऋष्यश्रृंगक अश्रम मे पधारैत अछि। मुनि अष्टावक्र सेहो यज्ञ मे उपस्थित छल। ओ अहि महान यज्ञक समाचार लऽ कऽ पहिने अयोध्या घुरैत अछि। राम शान्ता के अप्पन पैग वहीन आ ऋष्यश्रृंग के अप्पन पैग वहनोई जेहन सम्मान दैत यज्ञ कऽ लऽ कऽ पूछैत अछि 'निर्विघ्न: सोमपीथी आवुंते मे भगवान ऋष्यश्रृंग आर्या च शान्ता।।' राम ऋष्यश्रृंग के आवुंत (वहनोई) आ भगवान (पैग) आ शान्ता के पैग वहीन (आर्या) जेहन सम्मान दैत अछि। सीता सेहो कुशल पूछैत अछि, अवि कुशलं स जमातु अस्स। एतवे टा नै सीता के ईहो जिज्ञासा अछि जे ऋष्यश्रृंग के हुनकर याद आवैत अछि की नै? अहमेव सुमरेति? अष्टावक्र एकर उत्तर त्वरित दैत अछि अथ किम्? (आैर क्या?) मुुनि अष्टावक्र सीताक लेल हुनकर ननद शान्ता के ई प्यार भरल संदेश सेहो राम के दैत अछि जे सीताक गर्भावस्थाक काल जहि वस्तुक इच्छा हुए, ओ हुनका उपलव्ध कराओल जाय। गर्भ दोधेअस्या भवति सोऽवस्यम चिरात सम्पादयित्व। एकर संगे अष्टावक्र सं संदेश भेजकऽ ऋष्यश्रृंग सलहज के यज्ञ मे नहि वजावैक कारण वुझावैक संग संवोधोचित परिहास सेहो कऽ लैत अछि वत्से! कठोर गर्भेति नानितासि। वत्सोऽपि रामभद्रस द्विनोदार्थमेव स्थापित:। तत्पुत्र पूर्णोत्संगामायुष्यति दक्ष्याम्। अर्थात वत्से! (वच्ची) गर्भवती हेवाक कारण अहां एतय नहि आवि सकलहुं आ वत्स राम ते अहांक मनोरंजनक लेल अयोध्यामे अछियै। हम ते अहां के पुत्र सं भरल गोदवाली देखव। ऋष्यश्रृंग द्वारा राम के वत्स आ सीता के वत्से कहिके पुरारव सं स्पष्ट अछि जे दूनूक प्रति ऋष्यश्रृंगक छोट साढ़ आ सलहजक प्रेम छल।13 ई द्वादश वर्षीय महायज्ञ कौशिकी तट स्थित ऋष्यश्रृंगक मूल आश्रम मे भेल छल। किछु विद्वान एकरा रेवा नदी (नर्मदा) आ समुद्रक संगम स्थल पर हय के गप करैत अछि।14 जे संदिग्ध अछि। ओहि साधन विहीन युग मे अप्पन मूल आश्रम सं हजार मील दूर एतेक वृहद दीर्घकालीन कठिन यज्ञक संपादन करव उपयुक्त नहि जानि पड़ैत अछि। ओहि ठाम पर अहि यज्ञक कोनो चिह्न सेहो नहि अछि। कोनो ठोस वहिर्साक्ष्य सेहो नहि अछि जे सिद्ध कृ सकय जे यज्ञ अमुक ठाम पर भेल छल। मुदा ऋष्यश्रृंगक कौशिकी तट स्थित मूल आश्रम अहि महान यज्ञक साक्षी अछि। आश्रमक लग कोशीक कात मे सतोखर गाम वसल अछि। एतय हजारों वरख पुरान सात विशाल यज्ञ कुण्ड तालावक रूप में एखनो अछि। दू टा कुंड ते कोशी के पेट मे चलि गेल मुदा पांच टा एखनो अछि। किछु दशक पहिने अहि कुंडक जीर्णोद्धार करय लेल खोदल गेल ते ओहि मे राखक वड़ मोट-मोट परत निकलल छल। परत एतेक मोट छल जे ओ कोनो एक दिन या एक माहक यज्ञक राख नहि भऽ सकैत अछि। ई निश्चित रूप सं वरख भरि चलल यज्ञक राख होयत। सात कुंड एक संग रहवाक कारण एकरा सप्त पुष्कर कहल जायत छल। कुंड पुष्करेक रूप छल। वहि सप्त पुष्कर आव सतोखर वनि गेल अछि। ऋष्यश्रृंग जेहन महान वैज्ञानिक द्वारा संपादित अहि तरहक यज्ञ कतेक अर्थ मे महत्वपूर्ण अछि। ई आैषधिक अनुसंधान, शोध आ परीक्षण सेहो अप्पन यज्ञशाला मे करैत छल। आयुर्वेदिक गुण सं युक्त समिधाक चयन आ प्रयोग, वनस्पतिक गुण-दोष विवेचन आ हुनकर व्यवहारक गवेषणात्मक अध्ययनक लेल अहि ठामक अतिरिक्त आैरो ठाम ओ एहि तरहक महान यज्ञ करने होयत ते ऋष्यश्रृंग जेहन महान याज्ञिकक लेल असंभव नै। मुदा सभी कोण सं परीक्षणक पश्चात ई निर्विवाद अछि जे ओ ऋष्यश्रृंग आश्रम (वर्तमान सिंहेश्वर) मे द्वादश वर्षीय यज्ञ केने छल, जाहि मे आर्यावर्तक सभ ऋषि-मुनि भाग लेने छल। संगेसंग अयोध्या सं रामक माता, वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग यज्ञ मे भाग लैक लेल आयल छल। वारह वरख तक अनवरत ई क्षेत्र वेदमंत्रक समूह गान सं गूंजैत रहल छल। महानदीक प्रगट हेवाक प्राकृतिक जल रुाोत के सुव्यवस्थित कऽ ओहि सं सिचार्ईक व्यवस्था करहि मे ऋष्यश्रृंग सिद्धहस्त छल। एखुनका छत्तीसगढ़क सिहोवा मे महानदीक उद्गम अछि। ऋष्यश्रृंग सं पहिने अहि नदीक अस्तित्व नहि छल। विशाल पत्थर सं झांपल उद्गम के भगीरथक प्रयास सं ई ऋषि नदी मे अवतरित केने छल। परीक्षण सं हुनका ज्ञात भेल जे सिहोवाक शिला मे अगाध जल रुाोत अछि। जौ जल रुाोतक निकासी आ वहाव सुव्यवस्थित कऽ देल जाय, ते ई एकटा वड़ पैग नदीक रूप लऽ सकैत अछि। ऋष्यश्रृंग एहने करलक। ओ लोककल्याण, लोक रंजन आ लोक मंगलक लेल जनसहयोग सं अहि दुष्कर काजक संपादन करलक। अहि प्रकार महानदी प्रकट भेल। किंवदंति ते ई अछि जे हुनकर कमंडल मे पुत्रेष्ठि यज्ञक वचल मंत्रसिक्त जल छल। ओहि से ऋष्यश्रृंग महानदीके प्रगट केलक।15 कथा जे भी हिए, सिहोवा एखुनका रायपुर जिला मे अचि। ई दण्डकारण्य क्षेत्रक प्रमुख स्थान अछि। सिहोवा पर्वत शिखर पर ऋष्यश्रृंगक मंदिर अछि आ माता शान्ताक नाम पर एकटा गुफा सेहो अछि। प्राकृतिक वातावरण सं संपन्न ई एकटा दर्शनीय स्थल अछि। महानदीक उद्गमक रमणीयता ते अकथनीय अछि। मध्य प्रदेश मे चांदा (चन्दनपुर) मे सांदक या भाण्डक आश्रम अछि जे विभाण्डकक विगड़ल रूप अछि। सोयतकलां (शाजापुर) मे ऋष्यश्रृंगक मंदिर सेहो अछि। वेहट (जिला ग्वालियर) ऋष्यश्रृंग गुफा मे हुनकर मूर्ति स्थापित अछि। उज्जैन मे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि, जतय वर्षाक लेल हुनकर मूर्ति वनाके अनुष्ठान केल जायत अछि। वंश विस्तार ऋष्यश्रृंगक वंश विस्तार सेहो भेल अछि। हुनकर पुत्र सारंग ऋषि छल। ओ वड़ तपोनिष्ठ छल। ओ वेदक गहन अध्ययन केने छल। हुनकर चारि टा पुत्र भेल। चारो पुत्र उग्र, वाम, भीम आ वामदेव आजन्म व्रह्मचर्य व्रत धारण कऽ योग साधनारत भऽ कऽ व्रह्म मे लीन भऽ गेल। शेष चारि पुत्र वत्स, धौम्यदेव, वेददृग आ वेदवाहु व्रह्मचर्य पूर्वक गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कयलक। हुनकर वंशज शिखवाल (श्रृंगीवाल) व्राह्म अछि, जे संपूर्ण देश मे पसरल अछि। ओ समृद्ध, विद्यानुरागी आ उत्कृष्ट समाजसेवी अछि। वेदवेत्ता सारंगक पुत्र वत्सक वंश मे मीमांस शास्त्रक रचयिता जैमिनी भेल। ओना ऋष्यश्रृंग वैदिक कर्मकाण्ड आ याज्ञकर्म मे विशेष दक्ष छल। मुदा अहि ऋषिराजक पश्चात व्राह्मण ग्रंथ आ उपनिषदक रचनाकाल मे ऋषि सभ द्वारा जीव व्रह्म संवंधी विशेष चिंतन मनन अन्वेषण करैत रहय सं वैदिक यज्ञादि परंपरा मे विकृति आ विभिन्नता आवि गेल। तखन महर्षि जैमिनी यज्ञ मे पूर्ववत एकरूपता आनय के उद्देश्य सं वेदक प्रमाणक मुताविक, यज्ञक निरूपण आ प्रतिपादन करैत यज्ञादि कर्मक सार्थक विवेचन करलक। अप्पन कामनाक पूर्तिक लेल विधिवत यज्ञ करव जैमिनीक अनुसार धर्म अछि। ताहि सं ओ मीमांसाक दर्शन आरंभ अथातो धर्म जिज्ञासा सूत्र सं केने अछि। ओना तै वैदिक कर्मकाण्डक विधान मे तहियौका विरोधक निवारण आ वैदिक उक्तिक अर्थक समुचित निरूपण दिस श्रुतिकाल मे ऋषि सभहक ध्यान गेल छल जकर प्रमाण वैदिक संहिता मे प्रयुक्त मीमांस आदि संज्ञा पद सं भेटैत अछि। ई दर्शन कर्म पर विशेष वल दैत अछि आ वेदक अपौरुषेय आ नित्य मानैत अछि। एकर साहित्य संपत्ति सेहो विशाल अछि। पांचम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम रामायणकालक शिखर पुरुख छल ऋष्यश्रृंग। हुनकर आश्रम विद्याक स्थायी केंद्र छल। एकर अलावा पूरे देश सेहो आश्रम सं भरल-पुरल छल। ओहि मे ज्ञान-विज्ञानक अजस्त्र मंदाकिनी प्रवाहित छल। रामायण काल आसुरी शक्ति पर आर्यक विजयक जुग छल। ई विजय अस्त्र-शस्त्र सं संभव नै छल। अहि काल मे आर्यावर्त छोट-छोट राज्य मे वंटल छल। सव राज्य स्वतंत्र छल आ सभहक अप्पन पृथक सेना छल। महर्षि वनहि सं पहिने विश्वामित्र लग सेहो चतुरंगिणी सेना छल। सेना मे हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सभ चल। चित्रकूट यात्राक काल भारतक अक्षौहिणी सेना मे नौ हजार हाथी, साठ हजार रथ, दोसर-दोसर आयुधधारी असंख्य धनुर्धर आ एक लाख अश्वारोही सैनिक छल। अहि तरहे रामायणकाल शस्त्र परिचालनक युग छल। अहि कारण देश मे पसरल प्राय: सभटा आश्रम मे सैन्य शिक्षा, आयुध परिचालन, शोध आ निर्मणक शिक्षा अनिवार्य छल। सिद्धाश्रम, भारद्वाजाश्रम, अगस्त्याश्रम, सुतीक्षण आश्रम, वाल्मीकि आश्रम, वशिष्ठ आश्रम आदि मे संग्रामिकताक शिक्षाक भरपूर प्रवंध छल। आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक समूल नष्ट करहिक लेल रावण मलद, करुष आ जनस्थान मे अप्पन विशाल सैन्य छावनी वनैने छल। अहि स्थान मे आर्य ऋषि-महर्षिक वड़ पैग-पैग आश्रम छल जतय रहि के विद्यार्थी सव तरहक शिक्षा आ व्यावहारिक ज्ञान ग्रहण करैत छल। विश्वामित्रक सिद्धाश्रम आ अगस्त्याश्रम मे जखैन कहियो अध्ययन, चिंतन-मनन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रिया होयत छल, तखैन आसुरी छावनी मे तैनात सेना विघ्न उपस्थित करैत छल। ई राक्षस वलवान आ युद्ध कला मे निपुण छल। स्वयं विश्वामित्र एकरा दशरथक आगू स्वीकार केने छल- मारीचश्च सुवाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ रामायण वालकांड 20/5 एहन वलवान राक्षसक संहारक लेल सिद्धाश्रम मे गहन शोध कऽ निर्माण करल गेल दूटा विद्या उल्लेखनीय अछि। ई दूटा विद्या सभ तरहक ज्ञानक जननी छल। वला आ अतिवला, एकर प्रभाव सं भूख-प्यासक कष्ट नहि होयत छल। राम पहिने आचमन करि के अपना के पवित्र केलक आ फेर महर्षि विश्वामित्र सं अहि दूनू विद्या के ग्रहण करलक। अहि प्रकार कतेक रास रहस्यमई विद्या सेहो आश्रम मे सृजित केल जायत छल। आश्रमक वायुमंडल वैदिक मंत्रक घोष सं गुंजायमान रहैत छल। ई वैदिक मंत्रक पूर्ण फल प्राप्त करहि के लेल एकरा शास्त्रानुसार यथा स्वर पढ़हि के विधान छल। अर्जित ज्ञात कतो शिथिल या विस्मृत न भऽ जाय, एकरा लेल प्राचीन शिक्षाविद दैनिक स्वाध्याय आ अभ्यास प्रणाली निकाललक। स्वाध्याय के अपने मे स्वयं शिक्षण विधि करव वेसी उपयुक्त अछि। मुनि कुमार ऋष्यश्रृंग छात्र जीवन मे पितृ सेवा आ स्वाध्याय मे एत्ते निमग्न रहैत छल जे हुनक मे काम चेतनाक उदय नहि भेल। स्नातक मे सामाजिक कत्र्तव्यक पालन करावैक लेल तत्कालीन शिक्षाविद ऋणानि त्रीणि केर सिद्धांतक प्रतिपादन केलक, जकर समाज मे महत्वपूर्ण ठाम अछि। एकर मुताविक, संसार मे जन्म लय वला सभ लोक पर देव ऋण, ऋषि ऋण आ पितृ ऋणक भार आवि जायत अछि। यज्ञक अनुष्ठान, शास्त्रक स्वाध्याय आ संतानोत्पादन सं मनुख अहि सभ ऋण सं मुक्त भऽ सकैत अछि। स्नातक सभ मे पवित्र सामाजिक उत्तरदायित्वक भावना उत्पन्न करहि के लेल ई सिद्धांत वड़ उपादेय छल। ऋष्यश्रृंगक काल मे दोसर जे महत्वपूर्ण आश्रम आर्यायर्त मे संचालित छल, ओकर संक्षिप्त परिचय एना अछि- सिद्धाश्रम मलद प्रदेश मे आधुनिक वक्सर लग विश्वामित्रक ई चर्चित आश्रम छल। एकरा महाश्रम सेहो कहल जायत अछि। एतय छात्र सभके अलग-अलग तरहक अस्त्र-शस्त्रक शिक्षा देल जायत छल। एतय नव-नव अस्त्र-शस्त्रक अविष्कार आ ओकर परीक्षण सेहो करल जायत छल। आर्य सभ्यता-संस्कृतिक ई पूर्वी केंद्र छल। रावण जेहन महाप्रतापी सम्राट सेहो अहि महाश्रम सं सदिक्खन डरल रहैत छल। यहि कारण छल जे ओ एकटा सैनिक छावनी एतय वनैले छल जे मारीच, सुवाहु, ताड़का जेहन महाभट सं संचालित होयत छल। करुष मलदक स्त्री सेहो वड़ वहादुर आ साहसी होयत छल। विश्वामित्र भगवान राम के एतय सैनिक शिक्षा देने छल। संगेसंग ओ कतेक रास नव आ परंपरागत पचपन दुर्लभ अस्त्र देलक आ हुनकर प्रयोग करहि के विधि वतौलक।1 कोशी तट पर सेहो हुनकर तपस्या स्थल छल। एतय ओ एतेक कठिन तपस्या केने छल, जाहि सं सृष्टिक मूल चक्र धरि हिल उठल छल। ओ कोशी तट पर पइन माइट आ वातावरणक अनुसार चीना, मडुआ, खेरही जेहन अनाज आ भैंस जेहन पशुक विकास करलक। ओ अप्पन कालक प्रख्यात कृषि आ पशु वैज्ञानिक सेहो छल। उत्तर वैदिक काल मे आर्यक वीच ई विवाद भऽ गेल जे विजित दस्यु कऽ की करल जाय? जौ ओकर वध करल जाय ते आर्यक सेवा चाकरी के करत? जौं ओकर जीवित राखल जाय ते समाज मे ओकर की पद होयत आ दासी-पुत्रक कुटुम्व मे कोन स्थान होयत? ई विवाद युद्धक रूप लऽ लेलक। शास्त्रक अनुसार, वशिष्ठ आ विश्वामित्र मे अहि समस्याक लऽ कऽ विरोधभाव वढि़ गेल। वशिष्ठ रक्त शुद्धिक पक्षधर छल आ विश्वामित्र दस्यु सभ के आर्य वनावैल चाहैत छल। विश्वामित्रक अनुसार, आर्यत्व जन्म सं नै गायत्र मंत्रक जप सं शुद्ध भऽ कऽ सत्य आ ऋत सं प्रेरित भऽ कऽ यज्ञोपवीत धारण करहि सं ओकर शुद्धि होयत अछि। कोनो मनुख अहि प्रकार सं नया जन्म ग्रहण कऽ सकैत अछि। द्विज वनि के आर्य भऽ जायत अछि। तहियौका समाज मे ई उदारवादी रीति वहि सिखैने अछि। अहि तरहे तहियौक भारतीय समाज संरचना मे विश्वामित्रक वड़ पैग योगदान अछि। ई हुनकर कौशिकी तटक चिंतन-साधनक प्रतिफल अछि।2 राजा जनकक आश्रम महर्षि याज्ञवल्क्य अहि आश्रमक आचार्य छल। ई मिथिलाक विद्वान नरेश सीरध्वज जनकक देख-रेख मे संचालित होयत छल। एतय जागतिक रहस्य, जीवनक विभिन्न जटिल गुत्थी, जीवन-मरणक समस्याक समाधान आ ज्ञान-विज्ञानक तत्व के सार्थक अन्वेषण करल जायत छल।3 अहि आश्रमक नाम एतेक पसैर गेल छल जे मिथिलाक अमराई के संचालित गौतम आश्रम फीका छल। भारद्वाज आश्रम ई आश्रम प्रयाग मे छल। एकरा विश्वविद्यालयक मान्यता प्राप्त छल। ई सर्वशक्ति आ साधन संपन्न आश्रम छल। श्रीराम के मना कऽ भरत सदलवल फेर सं अयोध्या लऽ जाय के लेल चित्रकूटक वाट मे प्रयागक भारद्वाज आश्रम मे एक रात्रि निवास केने छल। वाल्मीकीय रामायणक अयोध्याकण्डक अध्याय 89-90 मे एकर वर्णन अछि। ई स्वागत वृतांत सं पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक साधन संपन्न छल। भारद्वाज विश्वकर्मा, इंद्र, यम, वरुण, कुवेर, पृथ्वी, आकाश, नदी, देव, गंधर्व, अप्सरा, चित्ररथ वन (जेकर गाछ अलंकार सं लदल अछि), उत्तम अन्न, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आ चोष्यक प्रचुर मात्रा मे व्यवस्था करैत भगवान सोम आदि देवताक आह्वान कयलक आ देवता सभ हुनकर आदेशानुसार भरत केर स्वागतक सभ व्यवस्था कयलक। एतवे टा नै, हुनकर योगवल सं मलय अ दर्दुर नामक पर्वतक सुगंध युक्त शीतल हवा सभ लोकक थकान ह लेलक। आमंत्रित नदी मे मैरेय भरि गेल। सैनिक छक कए एकर रस पान केलक। पांच योजन धरि समतल धरती पर नीलम आ वैदुर्य मणिक समान कतेक तरहक कोमल घास उगि गेल। आश्रम मे वेल, कैथ, कटहल, आंवला, विजौरा आ आमक घना वृक्ष छल। चारि-चारि कोठली सं युक्त असंख्य चवूतरा छल। हाथी, घोड़ाक राखहिके लेल अलग शाला छल। राजपरिवारक लेल सुनर द्वार युक्त दिव्य भवन छल। एतय सव तरहक दिव्य रस, दिव्य भोजन आ दिव्य वस्त्र छल। भरतक लेल कतेक प्रकारक रत्न सं सज्जित महल छल। अतिथिक स्वागत लेल हजार दिव्यांगनाएं छल। एतय अप्सराक नृत्य आ गीत चलि रहल छल। सभ लोक भरपेट मन जोगर भोजन केलक आ छककय मैरेय केर पान केलक। अप्सराक संयोग पावि के भरतक सैनिक हम अयोध्या नहि घुरव, अहि दण्डकारण्य मे रहव, जेहन परस्पर गप करि रहल छल। मृग, मोर अ मुर्गाक मांसक संग मदिरापान कऽ सैनिक झूमि रहल छल। आजवाइन मिलाकऽ वनाओल गेल, वराही कंद सं तैयार करल गेल आ आम आदि फल के गरम करल रस मे पकाओल गेल उत्तमोत्तम व्यंजनक संग्रह, सुगंधमय रसवला दाल आ श्वेत रंगक भात सं भरल सहस्त्र स्वर्ण आदि केर पात्र ओतय सभ दिस राखल छल, जेकरा फूलक ध्वजा सं सजाओल गेल छल। भरतक संग आयल सभ लोक हुनका आश्चर्यचकित भऽ के देखलक। आश्रम मे सहस्त्र सोना के अन्न पात्र, लाख व्यंजन पात्र आ एक अरव थाली संग्रहित छल। सात-आठ तरुणी स्त्री मिलकऽ एक-एक पुरुख के नदीक मनोहर तट पर उवटन लग के नहावैत छल। पैग-पैग आंखि वाली रमणी अतिथि सभ के पैर दवावैक लेल आयल छल। ओ हुनकर भीजल अंग के सूखल वस्त्र सं पोछि के वस्त्र धारण कराकऽ हुनक स्वादिष्ट पेय पियावैत छल। महर्षि भारद्वाज द्वारा सेना सहित भरत के करल गेल ई अनिर्वचनीय आतिथ्य सत्कार अद्भुत आ स्वप्नक समान छल। अहि वृतांत सं ई पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक समृद्ध आ साधन संपन्न छल। सैनिक शिक्षाक उद्देश्य सं ई आश्रम वनल छल, एहन प्रतीत होयत अछि।4 अगस्त्याश्रम नासिक सं 36 किलोमीटर दक्षिण पूर्व वर्तमान अगस्तिपुर मे ई आश्रम छल। एकर कुलपति महर्षि अगस्त्य छल। ई सैनिक शिक्षा, आयुध-अनुसंधान आ व्रह्म विद्याक केंद्र छल। ई क्षेत्र जनस्थान कहल जायत अछि। महर्षि अगस्तक आश्रम ते ओहि युग मे भय आ आदरक सम्मानित छल। अहि आश्रम मे एतेक विध्वंसक शस्त्र-अस्त्र तैयार होयत छल जहि सं राक्षसराज रावणक ह्मदय मे सदिक्खन आतंक वनल रहैत छल। रावण अहि डर सं ओतय अप्पन पैग सैनिक छावन कायम कऽ देने छल। राम रावणक वध पैतामह नामक अस्त्र सं केने छल। महर्षि अगस्त्य अप्पन आश्रम मे रावण-वधक लेल एकर अविष्कार केने छल। भगवान राम के ओ अहि उद्देश्य सं हुनका भेंट केने छल। पैतामह अस्त्र मे पहाड़ के वेधय के शक्ति छल।5 एकर अतिरिक्त अगस्त्य राम के हीरा आ सुवर्ण जड़ल दिव्य धनुष, सूर्यक समान देदीप्यमान अमोघ वाण, तीक्ष्ण आ प्रज्जवलित अग्निक समान वाण सं सदिक्खन भरल रहि वला अक्षय तरकस आ सोनाक म्यान आ सोनाक मूठ वला तलवार भेंट दऽ कऽ राक्षस केर संहारक लेल आह्वान केने छल।6 अगस्त्य आश्रम मे ज्ञानक विभिन्न विभाग छल। व्रह्म थान, अग्नि थान, विष्णु थान, महेंद्र थान, विवस्वान थान, वायु थान, वारुण थान प्रभृति। व्रह्म थान मे वेदक अध्ययन होयत छल। अग्नि थाम मे साम गान होयत छल। एतय मंत्रोच्चारणक संग समिधा आहूत होयत छल। विष्णु थान मे राजनीति, अर्थाशास्त्र, पशुपालन, आक्रमणकारी आ रक्षणशील आयुधक ज्ञान प्रदान करल जायत छल। विवस्थान थान मे ज्योतिषक पढ़ाय होयत छल। चिकित्सा विज्ञान सेहो एतय पढ़ौओल जायत छल। गरुड़ थान मे यातायात, यान आदि के ज्ञान उपलव्ध होयत छल। कार्तिकेय थान मे व्रह्मचारी गुल्म,पत्ति, वाहिनी आदिक संचालनक शिक्षा प्राप्त करैत छल। कौवेर थान मे जल संतरण, पोत संचालन आदि केर शिक्षा देल जायत छल।7 महर्षि अत्रि आश्रम ई आश्रम चित्रकूटक दक्षिण मे संचालित छल। ई तहियौका आर्य सभ्यताक मुख्य केंद्र छल। हस्तशिल्प कला मे ई अग्रणी छल। वनवास काल मे महर्षि अत्रिक स्त्री अनुसूइया सीताजी के एहन दिव्य वस्त्र आ आभूषण पहिनेने छल जे नित्य नवीन, निर्मल आ सुहावना वनल रहैत छल। संगेसंग ओ सीताजी के पतिव्रत धर्मक सेहो शिक्षा देने छल।8 वाल्मीकि आश्रमक संवंध मे इतिहासकार मे मत अलग-अलग अचि। ई तमसाक तट पर स्थित छल। ई विश्वविद्यालय अप्पन काल मे शिक्षाक महान केंद्र छल। महाकवि भवभूतिक अनुसार, एतय छात्रा सभ सेहो अध्ययन करैत छल। एतय अलग-अलग शास्त्रक संग शस्त्र/अस्त्रक सेहो शिक्षा देल जायत छल। एकर प्रमाण स्वयं रामक पुत्र लव-कुश छल। वशिष्ठ आश्रम अयोध्या मे स्थित छल, जतय भगवान राम शिक्षा पाओल। गुरु गृह गये पढ़न रघुराई, अल्पकल विद्या सव पाई। रामचरितमानस, वालकाण्ड महर्षि वशिष्ठक दोसर आश्रम हिमालयक तलहटी मे सेहो छल, जकर वर्णन रघुवंश नामक महाकाव्य मे कालिदास केने अछि। अहि आश्रम मे छात्र संघ सेहो छल, जकर वाल्मीकि मेखलीना महासंघा कहि के उल्लेख केने अछि। अहि संघक राजसभा मे सेहो प्रभाव छल। नैमिषारण्य मे महर्षि शौनक के सेहो चर्चित आश्रम छल। एतौका अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सभ वड़ प्रसिद्ध छल। अहि मे धार्मिक, राजनीतिक आ वैज्ञानिक विचार पर संवाद होयत छल।9 एकर अलावा, महर्षि सुतीक्ष्ण, महर्षि शरभंग, महर्षि मतंग आ महर्षि जावालिक आश्रम शिक्षाक प्रमुख केंद्र छल। ------------- षष्ठ परिच्छेद श्रष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) विहार राज्यक जिला मुख्यालय मधेपुराक रेलवे स्टेशन दौरम मधेपुरा कहलावैत अछि। एतय सं आठ किलोमीटर उत्तर ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर आव सिंघेश्वर या सिंहेश्वर थानक नाम सं प्रसिद्ध अछि। लगभग दू सौ वरख पहिने हरिचरण चौधरी नामक एकटा लकड़ीक व्यवसायी कोशीक जलमार्ग सं नेपाल सं लकड़ी आनि के व्यवसाय करैत छल। एक वेर हुनका व्यवसाय मे वेसी लाभ भेल। ओ शिवभक्त व्यवसायी श्रृंगेश्वर नाथ (सिंहेश्वर नाथ) केर एकटा भव्य मंदिर वनैलक। जखन भागलपुर केर जिला आ सत्र न्यायाधीश केर एतय क्षेत्रीय सनातन धर्मी वनाम पंडागण (जय नारायण ठाकुर आ 13 अन्य) वाद संख्या 3/1937 चलि रहल छल, ओहि सिलसिला मे हरिचरण चौधरी के पैंसठ वर्षीय प्रपौत्र दरवारी चौधरी अप्पन गवाही मे वाजल छल जे वर्तमान मंदिरक पूव भरि दीवाल पर स्वयं हरिचरण चौधरी, पश्चिम भरि दीवाल पर लालजी चौधरी आ उत्तर भरि दीवाल पर शिवू चौधरी के चित्र अंकित अछि। अहि तथ्यक पुष्टि ओ अप्पन साक्ष्य मे केने छल। ताहि सं कतिपय स्थानीय वुद्धिजीवी द्वारा मंदिर मे उत्कीर्ण अहि चित्र के वुद्ध आ दोसर वौद्ध भिक्षु केर मानव सरासर भूल अछि। ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि आ कर्मभूमि हेवाक कारण अहि क्षेत्रक प्राचीन महत्व अछि। एतय के कण-कण मे ऋष्यश्रृंग एखनो रमैत अछि। एतय के माटि अहि ऋषिराजक यज्ञाग्निक वुझल भस्म अछि। ताहि सं नदी सं आच्छादित ई क्षेत्र वड़ उर्वर अछि। एकर प्राचीनता के वुझैक लेल सवसं पहिने श्रृंगेश्वर नाथ (स्ंिाहेश्वर) केर नदी सभ (कोशी आ ओकर दोसर सभ धार) केर अध्ययन करव आवश्यक अछि। कोशीक कतेक रास छाड़न धार सूखि गेल अछि आ ओकर धार आव निस्तेज भऽ गेल अछि। मुदा भारत सरकारक कोशी नियंत्रण योजना सं पहिने चीन के ह्वांगहो नदी सं वढि़ के अप्पन विनाशकारी वाढ़ कोशी जग जाहिर छल। देखू जे भोलानाथक नगरी आ ऋष्यश्रृंगक तपस्थली मे कोशी आ ओकर छाड़न धारक स्थिति की छल? कोशी धार भगवान शिव के वड़ प्रिय अछि। महाकवि कालिदासक अनुसार, कोशीक तट पर साक्षात शंकर वसैत अछि। ताहि सं कोशी शंकरक तरहे तांडव करैत अछि। महाभारत मे कौशिकी तीर्थक वृहत चर्चा अछि2, जे अहि देशक सांस्कृतिक भूगोल केर रेखांकित करैत अछि। एकरा जानैक लेल सिंहेश्वर मे प्रवाहित कोशीक विभिन्न धारक जानकारी आवश्यक अछि।3 मुख्य कोशी नदी भीमनगर सं दक्षिण चलिके शिवनगर गामक निकट दू भाग मे वंटि जायत अछि। ओतय पूव भरि वला धार से वैवाह (धसान) आ चिलौनी नामक धार वनैत अछि आ पश्चिम भरि वला धार सं परवाने, तिलावै, वड़हरी आ सोनेह नामक धार अपन स्वरूप ग्रहण करैत अचि। तिलावै नदी एखन सुपौल जिलाक थुमहा, वसहा, तुलापट्टी, रामनगर, रामपुर आदि गाम के स्पर्श करैत सिंहेश्वर स्थानक चर्चित गाम वभनी भेलवा आवैत अछि। ई गाम रामपुरक अग्निकोण मे आ तिलावै के पाश्र्व भाग मे अछि। कहल जायत अछि जे कहियो ई गाम भववावा थानक नाम सं प्रचलित छल। मुगल सम्राट शाहजहांक काल मे भववावा एकटा समाज सेवी छल, जिनकर जन्म अहि ठाम पर भेल छल। 350 ईपू अहि गाम मे हुनकर स्मारक छल। तिलावै वभनी भेलवा गाम सं कनि नैऋत्य कोण मे झुकि के सिंहेश्वर थानक मार्र्ग मे स्थित गम्हरिया नामक गाम आवैत अछि। अहि गाम मे सोनाय महाराज नामक एकटा धार्मिक आ समाज सेवी लोकदेवक स्मारक अछि, जिनका प्रणाम करि के तिलावै सं आगू वढि़ जायत अछि। सोनेह एकटा छोट धार अछि जे सिंहेश्वर थानक नैऋत्य कोण स्थित दलदली चौर सं प्रवाहित होयत अछि। ई परवाने धारक एकटा टूटल धार अछि। ई अप्पन उद्गम सं दक्षिण दिस चलि के लंवा दूर तय करि के वंशीरौता गाम मे तिलावै धार मे प्रवेश करि जायत अछि। परवाने धार रूपौली सं दक्षिण चलि के सिंहेश्वरक चर्चित गाम रामपट्टी मे प्रवेश करैत अछि, जतय धसान आ वरहरीक धार अहि मे मिलिकए एकर जलभंडारक वृद्धि करैत अछि। परवाने आ धसानक ई संगम सिंहेश्वर आ गौरीपुर सं कनि दूर ठाम अछि। धसानक अलग अस्तित्व अछि मुदा वरहरी परवानेक एकटा उपधार अछि, जे आव मृत भऽ गेल अछि। एक चौर सं चलि के वरहरीक धारा परवानेक समानांतर दक्षिण भरि चलैत अछि आ अप्पने वाम भाग सं डंडारी, चम्पानगर, वैरवन्ना आदि गामक स्पर्श करैत अछि। परवाने धार रामपट्टी सं चलिके सिंहेश्वर थान आवैत अछि, जतय ओ भगवान शंकरक चरण स्पर्श करैत अछि। कोशीक चिलौनी धार लालपुर सं दक्षिण चलिके दाहिना पाश्र्व मे सरोपट्टी गाम के स्पर्श करैत अछि। लालपुर गाम के लगभग दू सौ वरख पहिने भानुदास नामक कुशाग्र वंशीय राजभर सरदार वसैने छल। अहि गामक लग गौरीपुर अछि। सिंहेश्वर नाथ मंदिर लग चिलौनी दू भाग मे वंटिके समानांतर मधेपुरा आवैत अछि। गौरीपुर सं दक्षिण पूर्वी धारक कात रामपुर नामक गाम अछि, जतय दू सौ वरख पुरान एकटा व्रह्मस्थान अछि। चम्पारण्य तीर्थ महाभारत मे वर्णित कौशिकी तीर्थ मे एकटा तीर्थ अछि चम्पारण्य। ई क्षेत्र तत्कालीन अंग नरेशक अधीन छल। महाभारत सं पूव अंग देशक राजधानी मालिनी छल। वाद मे राजा रोमपादक प्रपौत्र चम्पा नामक एकटा राजाक नाम पर चम्पा या चम्पावती कऽ देल गेल।4 महाभारत काल मे ई चम्पा नगरी चम्पकक वाग सं परिवृत छल।5 ताहि सं अहि चम्पारण्य सं चम्पा राज्यक अरण्य भाग वुझवाक चाहि। एकरा एखुनका चम्पारण जिला वुझवाक भौगोलिक भूल अछि। छठम शताव्दीक रचना शक्ति संगम तंत्रक अनुसार विदेह भूमिक सीमा अहि तरहे देल गेल अछि, 'गण्डक तीरमारम्य चम्पारण्यान्तक शिवे विदेह भू समाख्याता तैरमुक्त भिवं सुत।' शक्ति संगम तंत्र 7/27 विदेह भूमि पश्चिम मे गण्डकी तीर आ पूव मे चम्पारण्य धरि पसरल अछि। विदेह भूमि मिथिलाक पूव ई क्षेत्र चम्पारण्य अछि। वर्तमान चम्पारण जिला मिथिलाक पश्चिम मे स्थित अछि। महाभारतकार जे चम्पारण्य तीर्थक वर्णक केने अछि, ओ तीर्थ वड़ पुण्य प्रदान करय वला अछि। महाभारतक अनुसार, ओतय एक रात्रि रहय सं सहरुा गाय केर दानक फल भेटैत अछि।6 ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि कौशिकी तीर्थ मे वीराश्रम आ कुमारतीर्थ सेहो अछि, जे चम्पकारण्य तीर्थक उत्तर भरि के सीमा आ पूव सीमा पर स्थित क्रमश: वीरपुर आ कुमारखंड के रेखांकित करैत अछि। ई चम्पकारण्य तीर्थ सिंहेश्वर थान निर्दिष्ट होयत अछि। ई समस्त क्षेत्र चम्पा नरेशक अरण्य भाग छल। एतौका वेसी गाम मे चम्पा देवीक पूजा होयत अछि। शंकरपुर मे वरहगाडि़याक जमींदार वावू एकदेश्वर सिंह चम्पा देवीक मंदिर वनाय के ओतय चम्पाक मूर्ति स्थापित केलक, जतय प्रत्येक वर्ष मेला लागैत अछि। अन्य देवी-देवताक अलावा वांतर जाइतक मान्य कुल देव चम्पावती सेहो अछि।8 वांतरक अलाा दोसर कतेक रास जाइत चम्पादेवीक भगैत गावैत अछि। ताहि सं सिंहेश्वर थानक चम्पारण्य तीर्थ नै मानव एकटा एतिहासिक भूल अछि। परवाने नदी सिंहेश्वर सं दक्षिण दिस चलि के जोतनार गाम के स्पर्श करैत अछि। कौशिकी तीर्थ मे एकटा ज्योतिस्मर तीर्थ सेहो अछि, जतय ह्मद मे नहावय सं वड़ पुण्य भेटैत अछि। ई जोतनार गाम महाभारत कालीन ज्योतिस्मर तीर्थ अछि।9 तहयौका भौगोलिक साक्ष्यक आधार पर समूचा क्षेत्र चम्पा राजाक वनभाग छल। चम्पावतीक वनदेवी सेहो कहल गेल अछि।10 जो एकटरा पौराणिक मान्यता अछि। महाभारतक अनुसार ऋषि आ राजाक एकटा दल प्रभास तीर्थ सं यात्रा शुरू कऽ कौशिकी तीर्थ सेहो गेल छल। अहि दल मे भृगु, वशिष्ठ, गालव, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, यजदग्नि, अष्टक, भारद्वाज, अम्वरीष आ वालखिल्य ऋषि छल आ राजा मे शिवि, दिलीप, नहुष, अम्वरीष आदि छल।11 अहि यात्रा वृतांत अहि क्षेत्रक पौराणिकता आ दर्शनीयता के रेखांकित करैत अछि। पौराणिक सिंहेश्वर थान सिंहेश्वर स्थान भगवान शंकरक पावन तपस्थली अछि। षोड महाजनपद मे शीर्षस्थ जनपद अंग देशक ई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल अछि। अंग देशक निर्माण मे सेहो भगवान शिवक उल्लेखनीय योगदान अछि। दक्षिण मे मन्दराचल पर्वत आ उत्तर मे मूजवान पर्वत धरि पसरल विशाल वन्य प्रदेश श्लेषात्मक वन छल, जतय कन्दर्प दहनक पश्चात भगवान शिव समाधिस्थ भेल छल। कोशी के कतेक धार वन मे वहैत छल। वाराह पुराणक उत्तरार्धक एकटा पुरा कथाक अनुसार, ओहि वन मे भगवान शिव के खोजैत देवराज इंद्रक संग विष्णु आ व्रह्मा पहुंुचल। भगवान शिव एकटा सुनर हरिणक रूप मे विचरण करैत छल। तीनों अंतयार्मी देवता अहि हरिण के देखहि के वुझि गेल जे ई भगवान शंकर अछि आ ओ हरिण के पकड़हि मे सफल भऽ गेल। इंद्र हरिणक सींगक अग्र भाग, व्रह्मा मध्य भाग आ विष्णु निम्न भाग पकड़लक। एकाएक सींग तीन भाग मे टूटिके विभाजित भऽ गेल। तीनो देवताक हाथ मे सींगक एक-एकटे भाग रहल आ हरिण लुप्त भऽ गेल। तखनै आकाशवाणी भेल कि आव शिव नहि भेटत। देवता सभ अप्पन-अप्पन हाथ मे आयल सिंहक भाग के पावि के संतोष कऽ लेलक। कहल जायत अछि जे विष्णु लोक कल्याणार्थ अप्पन भागक सींग के जहि ठाम पर स्थापित करलक, ओ वर्तमान सिंहेश्वर (श्रृंगेश्वर) अछि। अहि तरहे एकर सिंहेश्वर नाथ नाम सार्थक भेल। वाराह पुराणक अहि पुरा कथाक अनुसार तीनों देवता कोशीक तीर पर भगवान शिव से भेंट करय लेल पहुंचल छल। अहि तथ्य के कालिदास कृत कुमारसंभव मे स्पष्ट करल गेल अछि। ओकर अनुसार, कोशी के प्रपात लग भगवान शिवक निवास अछि आ देवता सं ओतय भेंट करयक स्थान निर्दिष्ट करल गेल अछि।12 अत: कोशीक तीर पर इंद्र, विष्णु आैर व्रह्मा का शंकर सं भेट करव पूर्व निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम दिस हुनकर आगमनक सूचक अछि। मुदा वाराह पुराणक अंतिम अध्यायक कथा जे प्रमाणक रूप मे प्रचलित अछि, ओ स्पष्ट नै अछि जे मृग रूप महादेवक श्रृंग मूल पावैक भगवान विष्णु ओकरा एतय स्थापित केने छल। ताहि सं अहि विषय पर प्रवुद्ध पाठक अपने सं विमर्श, विश्लेषण आ विवेचन करय, यहि उचित अछि। मिथिला तत्व विमर्श, पृष्ठ 80 मे विद्वान लेखक महामहोपाध्याय परमेश्वर झाक सेहो यै मत अछि। चौवीस हजार श्लोक वला वाराह पुराण एकटा सतोगुण पुराण अछि, जहि मे विष्णुक वराह अवतार वर्णित अछि। महाभारत आ पद्मपुराण ओहि वड़ क्षेत्रक उल्लेख तऽ नै अछि, मुदा अहि क्षेत्रक स्थान निर्देशक लेल अप्पन जानकारी केर वेस स्पष्ट करैत अछि। ओहि मे अतीतकालीन पुरा कथा अछि, जे जागतिक रहस्य केर उद्घाटन करैत अछि। एहन पुराणक निर्मल जल मे प्रक्षेपक शैवाल जाल सेहो कम नै अछि। प्रक्षेप मे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर-क्षीर विवेचन निष्पक्ष-प्रवुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। परवर्ती साक्ष्य कहल जायत अछि जे सिंहेश्वरक जंगल मे पर्याप्त गोचर भूमि छल। एतय दूर-दूर ठामक गोपाल अप्पन गाय कऽ चरावैक लेल आवैत छल। एहन मान्यता अछि जे एकटा विशेष ठाम पर कुंआरी गाय आवैत छल आ ओकर थन सं दूध टपकैत लागैत छल। ई सिलसिला अनवरत चलैत रहल। एक दिन गोपालक दूध टपकैत दृश्य अप्पन आंखि सं देखलक। ओकर वाद कतेक दिन धरि ओ ई देखैत रहल। ओहि निर्दिष्ट ठाम पर ओहि गाय के आविके आ ओकर थन सं दूध टपका केर ओहि ठाम के सिंचित करव एकटा कौतूहल छल। ओहि गोपालक जिज्ञासावश ओतय सं माटि हटाकऽ देखलक ते ओ विस्मित भऽ गेल। एकटा शिवलिंग माटिक नीचा झांपल छल, जतय गायक धन सं दूध टपकैत छल। ओ गोपालक सेहो नियमित अहि शिवलिंगक पूजा करय लागल। दोसर सव गोपालक सेहो ओतय भक्ति अर्चना करय लागल। वाद मे कोनो भक्त ओतय छोट-सन मंदिर वनैलक। कहल जायत अछि जे यहि ठाम ओ पूर्वकालक गोचारण स्थल अछि आ सिंहेश्वर मंदिरक शिवलिंग वहि अछि जेकरा कोनो अनाम गोपालक माटि सं हटा के दर्शन-पूजन केने छल। सिंहेश्वरक थानक अलावा देवघर आदि मंदिरक शिवलिंगक कथा किछु एहिने तरहे अछि। जे भी हुए सभ शिवलिंगक स्थापना आ ओकरा खोज निकलैक श्रेय गोपाल केर जायत अछि। मुदा एकर प्रत्यक्ष लाभ दोसर समुदायक लोक के भेटैत अछि। शिवलिंगक तीन रूप अछि, भावलिंग, प्राणलिंग आ इष्टलिंग। भाव कलाविहीन, सद्रूप काल आ दिक् सं अपरिच्छिन्न आ परस्पर अछि। एकर साक्षात श्रद्धा सं होयत अछि। प्राण लिंग कलाहीन आ कला युक्त दूनू अछि। वुद्धि सं एकर साक्षात संभव अछि। इष्ट लिंग कला युक्त होयत अछि ताहि सं नेत्र सं एकर दर्शन संभव अछि। अहि तीनो के क्रमश: सत, चित आ आनंद कहल गेल अछि। परम तत्व भाव लिंग अछि, सूक्ष्म प्राण लिंग अछि आ स्थूल इष्ट लिंग अछि। सिंहेवर थान मे स्थापित शिवलिंग इष्ट लिंग अछि, जे मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय आ पूजनीय अछि। कहल जायत अछि जे लगभग एक सौ वरख पहिने सिंहेश्वर मंदिर मे स्थापित शिवलिंगक सव तरफ जलढ़रीक निमित संगमरमर वैसावैक लेल खोदल गेल छल। मजदूर सभ करीव आठ फीट नीचा खोदलक। ओ किछु अद्भुत दृश्य देखलक। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत छल। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर मुद्रित छल। वाह्य रूप सं तीन गुना मोटा आकार नीचा पसरल छल। एकर विशालता देखहि के ओ चकित रहि गेल। किछु मजदूर ते अप्पन संतुलन सेहो विसुरि गेल। एहन स्थिति मे खुदाईक काज स्थगित कऽ देल गेल। एकर सत्यापन किछु अभियंता केने अछि। ओ शिवलिंग सं अलग खुदाई केलक ते आठ-दस फीटक गहराई मे एकटा विशाल चट्टान देखलक जाहि सं शिवलिंग जुड़ल छल। एकटा विशाल चट्टानक कारण कोशीक उफनावैत धार अहि मंदिर के क्षति नहि पहुंचा सकल। अहि मंदिरक पौराणिकताक देखैत आय धरि एकर जाहिना के ताहिना वनरल रहैक श्रेय अहि चट्टानी आधारशिला के देल जा सकैत अछि। किरातक भूमि अहि मे कोनो मत भिन्नता नहि अछि जे प्राचीन काल मे एतय घनघोर जंगल आ नदीक संग पहाड़ सेहो छल जे कतिपय भौगोलिक कारण सं धरतीक संग धंसि गेल। एहने ठाम भगवान शिवक लेल उपयुक्त छल क्याकि उपनिषदकरक मुताविक भगवान शिव निर्जन जंगल आ पहाड़ मे निवास करैत छल।14 जंगल, गिरिगह्वर मे रहै वला किरात जेहन निवासी मे हुनकर लोकप्रियता वढ़ैत गेल। कालांतर मे ओ जगत्पति आ देवताक द्रष्टा मानल जा लागल आ ओ आर्य आ अनार्य दूनूक द्वारा पूजित हुए लागल। प्राचीन काल मे जहि कियो विदेशी जाइत भारत पर आक्रमण कऽ अप्पन विस्तार केलक आ अप्पन राज्य स्थापित केलक हुनकर वर्णन महाभारत, पातंजलिक महाभाष्य, मनुस्मृति आ अन्यान्य स्मृति ग्रंथ मे अछि। महाभारतक अनुसार, यवन, शक, पह्लव, किरात, चीन आदि जाइतक प्रवेश भारत मे भऽ चुकल छल।15 मनुक मुताविक, पौण्ड्रक, द्रविड़, कम्वोज, किरात, दरद, चीन, खश, यवन, शक, पारद आ पह्लव विदेशी जाइत छल।16 अहि विदेशी जाइत आर्य सभ्यता अा संस्कृति पर प्रभाव डालैत भारतीय धर्म आ संस्कृति मे अपना केर आत्मसात कऽ देलक। कलांतर मे ओ विदेशी नहि रहि गेल। हुनकर पूर्ण रूप सं भारतीयकरण भऽ गेल। एहने विदेशी जाइतक एकटा जइत किरात छल, जकरा प्राचीन वर्ण व्यवस्था मे मनु शुद्रक रूप मे मान्यता देलक। तहियौका हिन्दू समाज जहि समुदायक तिरस्कर केलक, ओ भगवान शिवक शरण मे गेल। क्याकि अमरकोश मे किरात के म्लेच्छक एकटा भेद मानल गेल अछि।17 कुमार संभव (8.29) केर मुताविक, ई जाइत हिमालयक परवर्ती प्रदेश मे रहैत छल। भगवान शिव हिमालयक कैलास शिखर पर रहैत छल ताहि सं ई जाइत के भगवान शिव के तादात्मक कथा जुड़ल अछि। वायु पुराण (47.48) आ व्रह्मांड पुराण मे हुनकर धारक कात मे रहय वला जाइतक तरहे उल्लेख करल गेल अछि। संगेसंग विष्णु पुराण (2.3.8) मे एकर निवास स्थान पूर्वी भारत मानल गेल अछि। भले ही भारतीय पुरा साहित्य मे अहि जाइत के विदेशी आ अनार्य मानल गेल अछि, मुदा एकर मूल पुरुष आर्य छल। एकर प्रमाण हरिवंश पुराणक महाराज सगरक चरित-वृतांत मे स्पष्ट अछि जे राज्य मे लोग सं विजयी क्षत्रिय देशांतर गेल छल, मुदा ओ अप्पन व्राह्मण पुरोहित के नहि पावि के अप्पन मूल आर्य धर्म सं भ्रष्ट भेल गेल जाहि सं कतेक रास जाइत व्राह्मणक वर्चस्व के स्वीकार नै भेल ताहि सं म्लेच्छ कोटि मे दऽ देल गेल। भागवत पुराणक स्कन्द 9 के 23म अध्याय मे उल्लिखित अछि जे महाराज ययातिक पुत्र द्रुह्यक संतान उत्तर दिश जाइके म्लेच्छक राजा भऽ गेल। अहि तरहे गतायातक प्रक्रिया चंद्रगुप्तक काल धरि भेल गेल। एकर अलावा, अहि देशक लोग तहियौका सैन्य-वल मे नियुक्त भऽ कऽ म्लेच्छक देश मे जा के म्लेच्छ वनि गेल। मुद्राराक्षस नाटकक पंचम अंक मे एकर उल्लेख अछि। अहि देश मे वर्जन (जाइत-च्युत) कऽ प्रथा वड़ पुरान अचि। जौं केकरो सं ज्ञात आ अज्ञात, छोट या वड़ अपराध भेल अछि ते धर्मक ठेकेदार हुनक जाइत सं वहिष्कार कऽ देत छल आ ओकर एत्ता वेसी तिरस्कार करैत छल जे ओकर लाख अनुनय-विनय करहि के वादो ओकर जाइत मे नहि घुरावैत छल। नतीजा ई हैत छल जे हुनकर दोसर उदार समुदाय मे शामिल भऽ मूल सनातन धर्म सं विस्थापित भऽ तथाकथित म्लेच्छ मे शामिल हेवाक कारण हुनकर संख्या वढ़ैत गेल। हुनका फेर सं सनातन धर्म मे आनय केर प्रयास नहि भेल। हालांकि याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकार एहन तरहक अपराधक प्रायश्चितक व्यवस्था देने अछि मुदा ई स्मृति मे सिमटल रहि गेल। जेकर हाथ मे न्याय आ धर्मक व्यवस्था छल हुनकर हठधर्मिता आ सदा सर्वथा समाज मे वर्चस्व स्थापित राखवाक प्रवृति अहि समाज कऽ क्षीणकाय कऽ देलक।19 किरात आदि जाइत केर अहि धरती पर वहुलांश अहि रहस्य के रेखांकित करैत अछि। महाभारत काल मे अहि क्षेत्र पर किरातक वाहुल्य छल। गंगा सं उत्तर आ महानन्दा सं पूरव नेपाल धरि ई जाइत पसरल छल। अहि क्षेत्र मे हुनकर सशक्त संस्कृति फलफूल रहल छल। राजा विराटक दोसर स्त्री सभ मे एकटा किरात कन्या सेहो छल, जे मोरंग वा नेपालक तराई मे रहि वाली छल। किरात एक शक्तिशाली जाइत छल। तहियौका किरातार्जुन कीर्ति जेहन परवर्ती साहित्य मे एकर चर्चा आयल अछि।20 अहि क्षेत्र मे अन्यान्य जाइतक संग किरता के सेहो वड़ संघर्ष करय पड़ल।21 महाभारत मे अर्जुन पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि हिमालय जाइत अछि। ओतय भगवान शिव अप्पन प्रिय भक्त किरातक वेश मे भेटैत अछि। शिव के नहि चिन्ह सकय के कारण अर्जुन ओहि किरात वेश शिव सं युद्ध करैत अछि, मुदा हुनका सं परास्त भऽ जायत अछि। फेर शिवक वास्तविकता के वुझि अ अहि अवढरदानी के प्रसन्न करहि के लेल अर्जुन माटिक वेदी वनाके हुनकर अराधना करैत अछि आ वेदी पर पुष्प अर्पण करैत अछि। ओ ई देखहि के आश्चर्यचकित रहि जाइत अछि जे जे फूल शिवक लेल ओ मृत्तिका वेदी पर चढ़ावैत अछि ओ ओहि किरात पर आवि जायत अछि। आव अर्जुन किरात वेश शिव के चिन्है मे विलम्व नै होयत अछि।22 विक्रमोर्वशीयम (1.11) मे कालिदास सेहो लिखने अछि जे पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि के लेल अर्जुन कठिन तपस्या केने छल। भारत मे जखैन शिशुनाग वंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, शुंग वंश, आंध्र वंश आदि केर राज्य छल। ओकर समानांतर नेपाल मे लगभग सात सौ वरख धरि किरातक राज्य छल। अशोकक धर्म चक्र विजय काल मे नेपाल मे किरात राज्य स्थ्यांकु छल। वौद्ध धर्मक अनुश्रुति मे सम्राट अशोक अप्पन कन्या चारुमति आ जामाता देवपालक संग नेपाल जाकऽ किरात शासकक सहायता सं कतेक रास विहार आ वौद्ध स्तूप वनैने छल।23 किरात दवंग आ स्वतंत्र विचार वला जाइत छल। सातम शतावद् मे व्राह्मणवादी व्यवस्था आ कर्मकाण्ड के सर्वथा नकारैक कारण एतौका किरातक नव नामांकरण वांतर करल गेल जकर अर्थ अछि कुपथ्य आ त्याज्य। तहियौका समाज व्यवस्थाकार एकरा संगठित हिन्दू समाजक लेल कुपथ्य मानलक। जहि जाइतक सभ्यता संस्कृति महाभारत सं लऽ कऽ गुप्त-स्वर्ण-युग धरि अप्पन यशोज्जवल गाथा कहय मे सक्षम हुए, जाहि जाइत हजार वरख धरि राज्य सत्ताक संचालन केने हुए, ओ म्लेच्छा आ शुद्रे टा नै, समाजक लेल कुपथ्य सेहो भऽ गेल। व्यस्थाकार वर्ण व्यवस्थाक वंधन एतेक मजवूत कऽ देलक आ शासक के सदण्ड एकर कार्यान्वयनक दायित्व सौंपलक जाहि सं सामाजिक कलस्विनीक प्रवाह स्थिर भऽ गेल। ई सच अछि जे मनु द्वारा संचालित वर्ण व्यवस्था मे ऊंच-नीचक भावना आ भेद-भावक दृष्टि छल, जे परवर्ती हिंदू समाज के जर्जरित करय के कारण वनि गेल। भगवान वुद्ध अहि व्यवस्था पर एतेक वेसी प्रहार करलक जे मरणासन्न अवस्था मे आनि के छोडि़ देलक। मुद शुंगक काल मे ई फेर जीवित भऽ गेल। अलवरुनी ग्यारहम शताव्दी मे भेल छल। हुनकर कथन अछि, प्राचीन काल मे कर्म परायण राजा जनता के कतेक रास श्रेणी आ कर्म मे विभक्त करहि मे जोड़ दैत छल। संगेसंग हुनक एक-दोसरा सं भेंट आ क्रम तोड़ैक सं रोकहि के यत्न करैत छल। ताहि सं ओ भिन्न-भिन्न श्रेणीक लेक के एक-दोसरा सं संवंध राखहि सं रोकि देलक आ प्रत्येक श्रेणीक लोग के विशेष प्रकारक काज आ शिल्प सौंप देलक। ओ कोनो लोक के अप्पन वर्गक अतिक्रमण करहि के लेल अनुज्ञा नै दैत छल। जे अप्पन श्रेणी सं संतुष्ट नहि छल, हुनका दंड देल जायत छल।24 एहने समाजक संवेदनशीलता मारल गेल आ एक-दोसरा सं नै मिलय आ पारस्परिक संपर्कक अभाव मे हुनकर गतिशीलत अवरुद्ध भेल। व्राह्मण सेहो व्यवस्थाक नाम पर अप्पन अधिकार के खुलि के दुरुपयोग केलक। विराट भारतीय समाज मे रहि के कतेक रास जाइत अहि सं विमुख भऽ कऽ अप्पन दायरा मे सिमटल चलि गेल। जे कहियो गतिशील जाइतक रूप मे चर्चित छल, ओ अंतर्मुखी वनैत गेल। ग्यारहम सदी मे निशिहरदेव किरात वंशी राजा भेल जिनकर राजधानी निशिहरपुर छल ई वर्तमान शंकरपुर अंचल अछि। हुनकर भवन आ दुर्गक अवशेष एकटा टीलाक रूप मे अवस्थित अछि आ जाहि पर एकटा मंदिर निर्मित अछि। मंदिर परिसर मे राखल गेल राजभवनक स्मृति चिह्न, नक्काशीदार प्रस्तर खण्ड, प्रस्तरक चौखट आदि पालयुगक प्रतीत होयत अछि। संभवत: ई किरातक अंतिम राजा छल। हुनकर अराध्य उगरी महाराज नामक एकटा सिद्ध पुरुष छल जे गुडि़या (त्रिवेणीगंज निवासी) कमार जाइत छल। हुनका लोक देव खेदन महाराज सं वैर छल। टेंगराहा चौर मे ओ मायाक वाघिन के भेजि के खेदन महाराजक वध करैने छल, जे खेदन महाराज के भगैत गीत सं ज्ञात होयत अछि। कर्नाट क्षेत्रीय नान्यदेव 1097 ई. मे अहि क्षेत्र पर अप्पन अधिकार जमा केर सत्तासीन भऽ चुकल छल। आहि काल सिंहेश्वर मे किरात आ कुषाण वंशक छोत्त-छोट राज्य छल जे वाद धरि कर्नाटक करद वनल रहल। कुषाण वंशी राजभर कुषाण चाइत चीनक गोवी प्रांत मे रहय वला यू-ची जाइतक एकटा शाखा छल। यू-ची जाइतक पांचटा शाखा छल, हिऊमी, चाउयांग-मी, ही-तुम, ताउ-मी आ कोई-चाउआंग। कोई-चाउआंग के कुषाण कहल जायत अछि। गोवी प्रांत मे हुं-ग-नू जाइत यू-चि जाइत पर आक्रमण कऽ हुनका सभ के गोवी प्रांत से निकालि कऽ वाहर कऽ देलक। ई सभ लोक भागि के सरदरिया आयल। मुदा ओतय सं सेहो हुनका सभ के भागय पड़ल। सरदरियाक यु-सुन नामक एकटा जाइत हूणक सहायता सं हुनका सभ पर आक्रमण कऽ देलक आ ओतय सं सेहो विस्थापित कऽ देलक। लगभग 140 ईपू ई सभ वैक्ट्रिया आयल। ओहि काल वैक्ट्रिया मे शकक शासन छल। एहि पर रहैत कुषाण अप्पन शेष चारि शाखा पर विजय प्राप्त कऽ वेसी शक्ति संपन्न भऽ गेल। ओकर प्रथम राजा कुजूल कैडफिसेस छल, जे शक्तिशाली आ महत्वाकांक्षी छल। ओ पह्लव शासक के परास्त कऽ गन्धार आ सीमाप्रांत केर अप्पन अधीन कऽ लेलक। ओ वाद मे वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ अस्सी वरख धरि युद्ध मे संलग्न छल। ओ कुषाण वंशक नीव के आओर मजवूत करलक। एकर वाद ओकर पुत्र विमकैडफिसेस सत्तासीन भेल। ओ अप्पन योग्य पिताक योग्य पुत्र सावित भेल। भारत विजयक सेहरा हुनके सिर वान्हल गेल। हुनकर मृत्युक वाद हुनकर पुत्र कनिष्क प्रथम आ ओकर वाद कनिष्क द्वितीय कुषाण वंशक शासक भेल। कनिष्क अप्पन राजधानी सीमा प्रांतक पुरुषपुर मे वनौअलक। ओ अप्पन प्रभुत्व पुरुषपुर से पाटलीपुत्र धरि स्थापित केलक। मान्यताक अनुसार, कनिष्क कठोर संघर्षक वाद पाटलीपुत्र के पराजित केलक आ वौद्ध विद्वान अश्वघोष के जमानतक रूप अपना संगे लऽ गेल। अश्वघोषक संपर्क मे आवि के ओ सेहो वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ पहिलुक शैव धर्मावलम्वी छल।25 संभावत: अश्वघोष जेहन वौद्ध विद्वान अप्पन अधिकार मे लहि के लेल ओ मगध पर चढ़ाय केलक। ओ पूर्वी भारत पर अप्पन अधिकार जमा के शांति स्थापित केलक। तिरहुत प्रमंडल मे कनिष्कक छिद्रांकित ताम्र-मुद्रा प्राप्त भेल अछि अहि क्षेत्र मे सेहो नवीन प्रशासनिक इकाईक रूप मे विभक्त कतेक रास राज प्रतिनिधिगण कुषाण शासक अधन क्षेत्र विशेषक सत्ताक संचालन करैत छल। कुषाणक पतन आ गुप्त साम्राज्यक उदय आ मध्यवर्ती युग मे दूटा प्रमुख राज्य सत्ता अस्तित्व मे आयल। पहिलुक नाग वंश आ द्वितीय वाकाटक वंश। अहि दूनू के अतिरिक्त भार शिव वंश कुषा साम्राज्यक भग्नावशेष पर सत्तासीन भेल, जकर प्रभुत्व अहि पूर्वी क्षेत्र मे वेसी छल। हिन्दू पालिटी (भाग-2 कलकत्ता, 1924) मे डॉ. काशी प्रसाद जायसवालक अभिमत अछि कि ई भार शिव नागा, अपने कंधे पर भगवान शिव के भार को ढोते थे। ई वहि जाइत अछि जे कुषाण वंशक पतनक वाद सेहो लगभग दू सौ वरख धरि अहि क्षेत्र मे सत्तासीन छल। कोशी आ दरभंगा प्रमंडल मे वहि लोक 15म शताव्दी धरि कतो-कतो शासक रूप मे अवस्थित छल। एहन मान्यता अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक संग विहारक कुषाण वहुलांश मे प्रवेश केलक। ई उत्तर आ दक्षिण विहार दूनू दिस पसैर गेल। ई वहादुर आ कष्ट सहिष्णु छल। जा धरि राज्य सत्ता पर हिनकर अधिकार रहल ता धरि ई क्षत्रपक रूप मे सम्मलित होयत रहल। सिंहेश्वर थान मे ई वड़ संख्या मे छल। ओ शैवमत अपनैलक आ कालांतर मे शिवक भार ढोयै के कारण ई भार शिव नागा सेहो कहावय लागल। वड़ वाद शिवनागा शव्द गौण भऽ गेल आ ओ मात्र भार या राजभरक नाम पर चर्चित भऽ गेल। डॉ. के.पी. जायसवालक अनुसार उत्तर विहारक अधिकंश ठाम पर गुप्त युगक उदय सं पूर्व भार शिव नागा द्वारा राच्य करहि के संकेत अछि।26 सिंहेश्वर के रायभीर, वसंतपुर आदि गाम मे भर जाइतक निवास अछि। रायभीर सं ओ अप्पन राज्यक संचालन करैत छल। ओतय हुनकर दुर्ग सेहो छल जे कोशीक भीषण वाढ़ धो-पोंछकऽ खत्म कऽ देलक। एखुनका सिंहेश्वर मंदिर कुषाण वंशीय भर जाइतक छल। दीर्घकाल धरि अहि मंदिरक व्यवस्था करैत आ ओकर भाग खायत छल। पिछला सर्वे मे भानुदास नामक एकटा व्यक्तिक नाम खतियान मे दर्ज अछि, जे सिंहेश्वर थान मंदिरक भूमिक स्वामीत्व दीर्घकल धरि छल। भानुदास मंदिर मे सेवक आ अन्यान्य कार्यकर्ता सभहक नियुक्ति करैत छल आ मंदिरक आय प्राप्त करैत छल। अहि व्यवस्था मे किछु विकृति आवि गेल। भानुदास कुषाण वंशी राजभर जाइतक छल। अव राजभर (या भर) मंदिरक अधिकारी वनि गेल आ प्रत्यक्ष रूप सं दान-दक्षिणा आ चढ़ौआक राशि स्वयं ग्रहण करय लागल। अहि जाइत केर दान-दक्षिणा आ चढ़ौआ ग्रहण करहिक नै ते कोनो धार्मिक आधार छल आ न अधिकार। क्षेत्रीय लोक सभ एकर विरोध केलक आ संघर्ष छेड़ देलक। आखिर दीर्घकाल सं मंदिर मे स्थापित अप्पन स्वामीत्वक जनाक्रोशक कारण राजभर छोडि़ देलक। वाद मे परसरम निवासी वावू हरदत्त सिंह मंदिर पर स्वामीत्व ग्रहण केलक। मुदा हुनको भागय पड़ल। मंदिर परिसर मे रहय वला सन्यासीक दवंगताक आगू हुनको किछु नहि चलल। कहल जायत अछि जे वावू हरदत्त सिंह सं कतेक वेर सन्यासीक घोर संघर्ष भेल। मुदा अहि सन्यासीक प्रवलताक आगू ओ सेहो अप्पन हथियार डालि देलक। अहि सन्यासी मे रघुवरदास आ स्वामी वीर भारती वड़ चर्चित भेल। रघुवरदास मंदिर परिसर मे रामजानकी मंदिरक निर्माण करैले छल। ऊपर उल्लेख करल जा चुकल अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक पश्चात कुषाण वहुलांश मे विहार मे प्रवेश करलक। ओ उत्तर विहारक संग दक्षिण दिस सेहो गेल। रांची जिलाक वेल्दाग आ कर्रा मे क्रमश: कुषाण राजा जुविष्कक एक स्वर्ण मुद्र आ कनिष्कक ताम्र मुद्रा भेटल अछि।27 जे दक्षिण विहार मे कुषाणक शासनक पुष्टि करैत अछि। राजा सीत आ वसंत कुषाण वंशीय छल। राजा सीतक गढ़ कोडरमा मे अछि। ओ टिकैत राजा छल। छोटा नागपुर मे कहावत अछि, घटले घटवाल वढ़ले टिकैत। यानी धन घट जाने से घटवाल आ धन वढि़ जाय सं ओ टिकैत भऽ जायत छै। छोटा नागपुर मे वड़ संख्या मे घटवाल वसैत अछि। ओ अपना के क्षत्रीय कहैत अछि। मुदा विहार सरकार हुनकर उत्तर विहार के राजभर य भर के तरहे हुनका सेहो पिछड़ी जाइतक सूची मे दर्ज कऽ देने अछि। घटवलक नाक-नक्श आ शारीरिक संरचना भर जइत से मिलैत-जुलैत अछि। दूनू के परंपरा आ धार्मिक कृत्य सेहो समान अछि। दूनू शिवक उपासक अछि। अहि सं ई मानय मे कोनो संकोच नहि अछि जे घटवाल सेहो कुषाण वंशीय अछि। छोटा नागपुरक प्राकृतिक परिवेश हुनका आओर वेसी श्यामवर्ण वना देने अछि जखैनकि हिमालयक पाश्र्वभूमि मे निवास करैक कारण भर या राजभर हुनका सं वेसी साफ अछि। घटवाल सेहो टिकैतक रूप मे कतेको रास राजवंश स्थापित केने अछि। एखनो अहि राजवंशक लोक क्षत्रीय सं अप्पन संवंध जोड़ैत अछि। राजा सीत केर छोट भाय राजा वसंतक गढ़क भग्नावशेष सिंहेश्वरक वसंतपुर गाम मे अछि। छोटानागपुरक घटवल सिंह या राय पदवी धारण करैत अछि। उत्तर विहार के भर या राजभरक उपाधि सेहो राय अछि। रायभीर अहि उपाधि केर द्योतक अछि आ राय उपाधि राजवंशी हेवाक प्रमाण अछि। राय का अर्थ होयत अछि राजा। वसंतपुरक वड़ भूभाग मे राजा वसंतक गढ़क अवशेष पसरल अछि, जाहि मे ओकर गौरवशाली अतीतक कथा जुड़ल अछि। कालांतर मे सिंहेश्वर सं तीन कुषाण वंशीय राजकुमार श्रीदेव, विजलदेव आ कांपदेव क्रमश; श्रीनगर (मधेपुरा), विजलपुर (पंचगछिया) आ कांप (सोनवर्षा) मे अलग-अलग अप्पन राजधानी वनैलक।28 श्रीनगर मे राजा श्रीदेव निर्मित विशाल गढक अवशेष अछि। अहि गाम मे एहन दूटा अवशेष अछि। दूनू पर मंदिर अछि जतय भगवान शिव स्थापित अछि। मुख्य अवशेषक ऊंचाई 12 सं 15 फीट धरि अछि। अहि अवशेषक उत्तर भागक मंदिर परिसर मे सैकड़ों प्रस्तर खंड पड़ल अछि जाहि पर कोनो अनाम मूर्तिकार वड़ कुशलत, निष्ठा आ शालीनता सं दुर्लभ नक्काशी केने अछि। अवशेष के एकटा प्रस्तर स्तंभ (शिलालेख) पर मकरध्वज जोगी 100 अंकित अछि। अहि पर गहन गवेषण आ पुरातात्विक सर्वेक्षणक आवश्यकता अछि। मधुवनी जिलाक अन्धराठाड़ गाम मे गंगासागर पोखरि पर स्थित मंदिरक एकटा प्रस्तर स्तंभ कर सेहो मकरध्वज जोगी 700 अंकित अछि। अहि मिथिला तत्व विमर्श मे कोनो वौद्ध भिक्षु सं संवंधित मानल जायत अछि।29 भऽ सकैत अछि जे मकरध्वज योगी नाथ पंथी आ सहजयान सम्प्रदायक कोनो योगी हुए। निषादक धरती अन्यान्य उपेक्षित समुदाय मे निषाद जाइत सेहो छल, जाहि पर भगवान शिवक विशेष कृपा छल। अथर्ववेद (6.39.3) मे भगवान रुद्र आदिम जाइतक संग निषादक स्वामीक रूप मे स्वीकार करल गेल छल। चर्म धारण करहि के कारण शिव के कृतिवासन कहल गेल अछि। संभवत: निषाद सं संवंध हेवाक कारण शिव के चर्म परिधान धारण करय वला मानल गेल अछि। तहियौका समाज मे चतुर्वणक अतिरिक्त अनुलोम प्रतिलोम जेहन अंतर्जातीय विवाहक कारण कतेक रास जाइत आ ओकरा सं कतेक रास उपजाइतक विकास भऽ चुकल छल। वोधायन एहने वर्णसंकर जाइत के व्रात्यक संज्ञा देने अछि।30 अहि सूत्र मे वोधायन निषाद जाइत चर्चा केने अछि, जेकरा मुताविक व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं निषादक उत्पति भेल अछि।31 मुदा गौतम धर्म सूत्र (4.14) केर अनुसार निषाद व्राह्मण पिता आ क्षत्रिय माता से भेल अछि, जे उत्तम संकरताक परिचायक अछि। विष्णु पुराण मे ते एकर उद्भवक एकटा अद्भुत कथ कहल गेल अछि, जकर मुताविक ऋषि सभ पुत्रहीन मृत राजा वेनक जांघ केर पुत्रक लेल यत्नपूर्वक मंथन करलक। ओकर जांघ के मथय सं एकटा पुरुख उत्पन्न भेल, जे जलल ठूंठक समान कारि, वड़ नाट आ छोट मुह वला छल। ओ अति चतुर भऽ कऽ ओहि सभ व्राह्मण सं वाजल, हम की करी? व्राह्म कहलक, निषीद (वैठ)। ताहि सं ई निषाद कहलायल। ओहि सं उत्पन्न लोग विन्ध्याचल निवासी पापपरायरण निषाद गण भेल।32 अहि कथा लेखनक पांछा पुराणकारक मंशा जे रहल हुए मुदा रामायण मे निषादराज गुहक वृतांत अछि जे सानुज आ सपत्नीक भगवान राम के नदी पार करैने छल। हुनकर भक्तिक प्रशंसा वाल्मीकि आ तुलसीदास सेहो केने अछि। महाभारतक अनुसार, निषाद व्राह्मण पिता आ शूद्र माताक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि।33 मनु निषाद के मत्स्य धातो निषादानां कहने अछि जे मछली मारय वला जाइत छल।34 मनुक मुताविक, निषाद नाव खेवैत अछि आ हुनकर निम्न जाइत मे गणना करल गेल अछि। जंगल, पहाड़ मे ई आखेटक रूप मे जानल जायत अछि। आखेट कर्मक कारण ई व्याध सेहो कहल जायत अछि। मिथुन-रत क्रौंच के एकटा निषाद द्वारा वध किए जाय सं दयाद्र्र भऽ कऽ महर्षि वाल्मीकि के एत्ते पैग शोक भेल आ वहि श्लोकक रूप मे परिणत भऽ गेल। निषादक कतेक रास उपजाइत वनल, एहन स्मृति मे उल्लेख अछि। तहियौक पुक्कस जाइत निषाद पुरुख आ शूद्र स्त्रीक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि।35 अहि जाइतक काज विल मे रहय वला जीव के मारव छल। व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं उत्पन्न पारशव जाइत के सेहो निषाद कहल जायत अछ।36 ओहि तरहे शूद्र पुरुष आ निषाद स्त्री से कुक्कुटक जाइतक उद्भव भेल।37 निषाद जाइतक पुरुख आ आयोगव जाइतक स्त्री सं जे संतान होयत अछि ओ मार्गव कहलायल जाइत अछि जे आर्यावर्त मे कैवर्त सेहो कहल जायत अछि। हुनकर कर्म नाव चलावैक छल। 'निषादं मार्गवं सूते दासं नौकर्म जीविनम् कैवर्त मिमियं प्राहुरार्यावर्त निवासिन:।1' तैत्तिरीय संहिता (10.34) निषाद पुरुष आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न प्राचीन काल मे चमड़ाक काज करहि वला कारावर जाइत उल्लेख अछि।38 निषाद स्त्री अ वैदेह पुरुख सं उद्भूत आंध्र जाइतक सेहो उल्लेख वायु पुराण (10.36) आ मत्स्य पुराण(50.76) मे अछि। मनु अप्पन स्मृति (10.37) मे निषाद पुरुख आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न अहिण्डक जाइतक चर्चा केने अछि, जे कारागारक देखभाल करैत छल। एहन कतेक रास निषाद प्रसूत जाइतक आपस मे मिश्रण भऽ जेवाक कारण समान कर्मा शक्तिशाली जाइतक विलयन भऽ गेल। उपयुक्त उपजाइत आव ते खोजै सं नहि भेटैत अछि। एहन कतेक रास उपजाइत समान व्यवसाय परक निषाद, धीवर, मल्लाह, कैवर्त आदि जाइत मे विलन भऽ गेल। ओहि छोट-छोट उपजाइतक अप्पन अस्तित्व रक्षाक लेल एहन भऽ जायव स्वभाविक छल। वैश्य पुरुष आ क्षत्रीय स्त्री सं उत्पन्न संतान कर्मा जाइत धीवर कहैलक।39 कौरव आ पांडवक दादा शान्तनु धीवर(मछुआरा) जरूथक पुत्री योजनगन्धा (सत्यवती) सं व्याह केने छल। अहि विवाहक पूर्व योजनगन्धा महर्षि वशिष्ठक पौत्र पराशरक संयोग सं कृष्ण द्वैपायन के जन्म देने छल, जे अप्पन कालक महाना आचार्य भेल आ महर्षि वेदव्यासक नाम सं विख्यात भेल। आदिकवि वाल्मीकि के किछु लोग व्याध (निषाद) मानैत अछि। मुदा दूनू व्राह्मण छल। रामायण आ महाभारत एकर साक्ष्य अछि। रामायण मे वाल्मीकि दू ठाम पर अप्पन परिचय स्वयं दैत अछि। राम द्वारा संपादित अश्वमेघ यज्ञक काल वाल्मीकि अहि यज्ञ मे सीता कऽ लऽ कऽ आवैत अछि आ राम के अप्पन परिचय दैत अछि प्रचेतसोअहं दशमपुत्रौ (उत्तरकांड 96/19) अर्थात हम प्रचेताक दसवां पुत्र छी। एक दोसर ठाम वाल्मीकि परोक्ष रूप सं अप्पन रामायण में अप्पन परिचय देने अछि। इति संदिश्य वहुशो मुनि प्राचेतसस्तदा वाल्मीकि परमोदारस्तष्णी मासीन्महा (उत्तरकांड 93/17) अर्थात अहि तरहे महायशस्वी प्रचेताक पुत्र वाल्मीकि दूनू शिष्यक शिक्षा दऽ कऽ चुप भऽ गेल छल। प्रचेता व्रह्मक पुत्र छल। मनुस्मृति (1.34.35) केर अनुसार व्रह्मा प्रजाक सृजनक कामना सं घोर तप द्वारा शुरू मे प्रजाक पति दस महर्षि के उत्पन्न केलक। ओ महर्षि मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु आ नारद अछि। वाल्मीकि अहि दस महर्षि मे एकटा प्रचेताक पुत्र छल। ताहि सं हुनकर व्राह्मण हेवाक मे कोनो संदेहक गुंजाइश नहि अछि। आध्यात्म रामायण (अयोध्या काण्ड, सर्ग6, श्लोक 65, 66) मे राम आ वाल्मीकिक वन मे मिलय केर प्रसंग अछि। वाल्मीकि राम के अप्पन विषय मे वतावय अछि, हम जन्म से द्विज छलहुं मुदा हमर आचरण शूद्र जेना छल। शूद्र स्त्री सं हमरा अजितेन्द्रिय द्वारा कतेक रास पुत्र उत्पन्न भेल। चोरक संग रहैक कारण हम सेहो चोर भऽ गेलहुं। स्कन्द पुराण मे सेहो उल्लेख अछि जे ओ व्राह्मण छल आ हुनकर नाम अग्नि शर्मा छल। मुदा शिकार (व्याघ्र कर्म) आ दस्युकर्म मे ओ लिप्त छल। वाद मे सप्तर्षिक कृपा सं ओ महर्षि वाल्मीकि वनि गेल छल। 40 ओहि तरहे वेदव्यास सेहो व्राह्मण छल नै कि शूद्र। महाभारतक आदि पर्व मे हुनकर जन्मक कथा अछि। ओ महर्षि पराशरक पुत्र छल। हुनकर मां सत्यवती एकटा अप्सराक कन्या छल। राजा उपरिचर अहि कन्याक पालन-पोषणक भार मल्लाहक मुखिया जरूथ केर सौंपने छल। ओ नाव चलावैक लेल तट पर जायत छलि जतय हुनकर मिलन ऋषि पराशर सं भेल। संपूर्ण कथ महाभारत (आदिपर्व 63.70-86) मे अंकित अछि। पराशर महर्षि वशिष्ठक पौत्र छल। सत्यवती सं जन्म लऽ कऽ कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) गुण, जाइत आ वर्णक दृष्टि सं महर्षि पराशरक वंश मे आवैत अछि। पराशरक पुत्र भला कोन आधार पर शूद्र कहल जायत अछि? समान व्यवसाय परक जाइत मे कतेक उपजाइतक तिरोहित भऽ जायके पश्चात निषादक वाइस उपजाइत एखनो अस्तित्व मे अछि। ई उपजाइत अछि, कोवट, कैवर्त, चौरा, तीवर, धीवर, वेलदार, विन्द, मल्लाह, सुरहिया, वनपर, गोढ़ी, खुलवट, कौल, जेठौत, परवतिया, चौदहा, राजवंशी, लहेरिया, महिषी, मुरियारी, केवट आ धोवी। निषादक अहि उपजाइत मे कैवर्त आ गोढ़ी सिंहेश्वरक कमरगामा, दुलार, तरहा, चम्पानगर, डंडारी, वभनी, गम्हरिया, टोका जीवछपुर, जलवार, महुली आदि गाम मे वहुलांश मे रहैत अछि। ई संपन्न कृषक अछि आ राजनीति मे हिनकर वर्चस्व अछि। ई एखनो भगवान शिवक उपासक अछि। मूर्ति स्थापना प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा केर कौशिकी मे नव जल उतरैत अछि। जलधारा तीव्र गति सं आगू वढ़ैत अछि। प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा के इतिहास क्षण भरि एतय रूकि के पद्म पलाश अर्पित कऽ जायत अछि। लागैत अछि, शून्य मे वेद ध्वनी गूंजि रहल अछि। नै जानय कहिया सं श्रृंगेश्वरक कौशिकीक जल पीयर भऽ गेल। तहिया सं कोशी पाण्ड, पडुआ या परवान धार वनि गेल। श्रृंगेश्वर थान मे ऋष्यश्रृंग एखनो जीवित अछि। श्रीमद्भागवत सुनावैत शुकदेवजी कहैत अछि 'गालवो दीप्तिमान रामो द्रोण पुत्र: कृपस्तथा। ऋष्यश्रृंग पितास्माकं भगवान वादरायण:।। इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगत:। इदानि मासते राजव स्वे स्वे आश्रम मण्डले।।' (गालव, दीप्तिमान, राम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग, महर्षि वेदव्यास ई सातों ऋषि आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि पद पर आरूढ़ होयत) अहि श्लोक सं ई सिद्ध भऽ गेल अछि जे ऋष्यश्रृंग आव आवय वला आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि मेे से एकटा पद अवश्य ग्रह कऽ अहि कौशिकी अंचल के फेर सं महिम मंडित करत। ऋष्यश्रृंगक मूर्तिक स्थापना ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि सिंहेश्वर थान मे अहि ऋषिराजक भव्य प्रतिमाक अभाव खटकैत छल। ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारविसगंज (अररिया) निवासी गोलोकवासी मोहनलाल जी पाण्डेयक आत्मज श्री गोपाल पंडित (सिखवाल व्राह्मण) कुचामण सिटी जिला नागौर (राजस्थान) निवासी द्वारा संगमरमर निर्मित ऋष्यश्रृंगक भव्य प्रतिमा अप्पन माता श्रीमति पार्वती देवीक आदेशानुसार मंदिर परिसर मे स्थापित करैलक। अहि प्रतिमाक प्राण-प्रतिष्ठा-अनुष्ठान वैदिक मंत्रोच्चारणक संग दिनांक 20 जून, 2002 (गंगा दशहरा) के संपन्न भेल। मंदिरक विकास मे ई एकटा नव अध्याया जुडि़ गेल। सिहेश्वर मेला एतय प्रत्येक वरख फाल्गुन शिवरात्रि मे वड़ मेला लागैत अछि। जखैन कोशीक विभीषिकाक कारण अहि क्षेत्र मे यातायातक घोर असुविधा छल, पूर्णिमा आ भागलपुर सं एकर संवंध टूटि जायत करैत छल तखैन अहि ऐतिहासिक मेलाक वड़ उपयोगिता छल। वैलगाड़ी पर सवार भऽ कऽ दूर-दराजक लोग अप्पन रसद-पइनक संग अहि मेला मे आवैत छल, अप्पन शिविर लगावैत छल, मेलाक आनंद लैत छल आ साल भरिक लेल अप्पन घरेलू उपयोगक वस्तु कीनैत छल। एतवेटा नै, पहिने ई मान्यता प्रचलित छल जे वावा (भगवान शिव) केर विवाह भऽ जाय केर वाद लोक अप्पन वाल-वच्चा सभहक विवाह तय करैत छल। एतदर्थ फाल्गुन महाशिवरात्रि के कन्य आ वरक देखा-देखी आ संवंध तय भऽ गेलाक संग व्याहक लेल उपयोगी समानक खरीद-फरोख्त सेहो अहि मेला मे होयत छल आ दहेज मे दैक लेल मवेशी सेहो मेला मे कीनन जायत छल। अप्पन दूरक कुटुम्व से भेंट-मुलाकात सेहो अहि मेलाक विशिष्ट ठाम छल। तहैयौका काल मे अहि मेलाक आर्थिक टा नै सांस्कृतिक महत्व सेहो वड़ छल। कोशीक वाढ़, मलेरिया आ दोसर प्राकृतिक आपदा सं जूझैत लोकक लेल ई एकट उल्लेखनीय विश्राम स्थल छल, जतय आवि के किछु दिनक लेल लोक अप्पन कष्ट कं विसुरि जायत छल, आगूक योजना वनावैत छल, आ अप्पन जिजीविषा के तरंगित कऽ जय भोलानाथ, जीयव के फेर आयव, जेहन प्रार्थना कऽ घुरैत छल। ई मेला सदी सं उल्लास आ आनंदक संगम रहल अछि। वावा भोलेनाथक पूजा-अर्चनाक वाद माटि खोदि केर वनायल चूल्हा पर अपने सं भोजन वनायव, दिन भरि मेल घूमव, टिकुली-सिनूर सं लऽ कऽ दोसर घरेलू सामान कीनव आ रात मे पन्ना लाल थियेटर कंपनीक नौटंकी देखव मेला दर्शनार्थी सभहक दिनचर्या छल। ई थियेटर कंपनी उत्तरप्रदेश सं प्राय: सभ वरख आवैत छल। एकर संस्थापक पन्ना लाल अपने एकटा कुशल कलाकार छल। लैला मजनूं, शीरी फरहाद, सुलताना डाकू, भक्त पूरन मल, माया मछन्दर, अमर सिंह राठौर आदि हुनकर श्रेष्ठ आ चर्चित नाटक छल जकर अहि मेला मे सफल मंचन होयत छल। नगारेक आवाज पर वहरेतवील मे सभ कलाकार अप्पन भूमिका के गावि के प्रस्तुत करैत छल। मंत्रमुग्ध दर्शक पात्र सं अप्पन साधारणीकृत कऽ अपूर्व आनंद, प्रेम, करुणा, राग-विराग, आक्रोश आदि भावक अनुभव करैत छल। अहि थियेटरक ई एकटा विशिष्ट गुण छल। गलढर सं चौठारी धरि चारि दिन धर मधेपुरा कचहरीक हाकिम-हुक्काम अहि मेलाक कैम्प करैत छल। सीरिज इंस्टीट्यूशनक चुनल गेल स्काउट कैलाश पति मंडल शिक्षक नेतृत्व मे मेला आ मंदिर परिसरक विधि व्यवस्थाक संचालन करैत छल। अनुमंडल मुख्यालय सं आरक्षी वल आ चौकीदारक ड¬ूटी सेहो मेला मे रहैत छल। कतेक वरख मेलाक अंत मे हैजा आ आगलग्गी सं जान आ सामान के क्षति सेहो भेल अछि। सभ रविवार आ वुधवार के हाट मे विक्र-वट्टाक अलावा अहि मेला मे भरपूर कमाई कऽ एतौका दुकानदार भगवान शिवक प्रसाद वुझि वरख वाद अगुलका मेलाक प्रतीक्षा करैत छल। मुदा, धीरे-धीरे समय वदलि गेल। यातायातक सुविधा सं लोकक पारस्परिक दूरी कम भऽ गेल। अहि क्षेत्रक कतेक गाम शहर वनि गेल जतय घरेलू उपयोगक सामान वहुलांश मे भेटय लागल। पहिने भगवान शिवक दरवार मे जतेक यज्ञ मुण्डन आ मनौतीक लेल ओयत छल आव वुद्धिवादक विस्तारक कारण ओहि मे गुणात्मक कमी आवि गेल। आव एतवै टा जरूर भेल अछि जे सभ साल हजार व्याह अहि मंदिर परिसर भे हुए लागल। सिनेम थियेटरक महत्व के किछु कम कऽ देने अछि, मुदा थियेटरक रंगीनी दिन-प्रतिदिन वढ़ैत गेल। पन्ना लालक मर्यादित थियेटर आव नै अछि। हुनकर स्थान रौता कम्पनी, शोभा थियेटर आदि लऽ लेने अछि। आव मर्यादित मनोरंजनक स्थान अश्लीलता ग्रहण कऽ लेने अछि। यै कारण अछि जे प्रशासन के विधि व्यवस्था आव आओर कड़ा करय पड़ैत अछि आ समय-समय पर असामाजिक तत्व सं मुकावला सेहो। अहि मेला मे सर्कस आ मौतक कुआं सेहो दर्शक के वड़ आकर्षित करैत अछि। सरकार द्वारा कृषि, उद्योग आ अन्यान्य नव-नव उपकरणक प्रदर्शनीक संग जनसंपर्क विभाग, खादी ग्रामोद्योग आदिक स्टाल मे दर्शकक भीड़ रहैत अछि। जीप, ट्रैक्टरक वाहुल्यक कारण आव हाथीक उपयोगिता कम भऽ गेल अछि मुदा मवेशी मे घोड़ा, बैल,भैंस आ वकरी सभहक खरीद-विक्री होवत अछि। सरकारी स्तर पर ई मेला पंद्रह दिन धरि, मुदा ओना एक माह धरि चलैत अछि। (क्रमश:) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते अमित मिश्र- १.राति दिवालीक २.जनमदिनक शुभकामना १ राति दिवालीक
कारी-कारी राति डेराओन मुदा चमकि गेल दीप हजार मच्छर झड़काबैत हुक्का-पाती स्वाहा भेल कुरीतक संसार
पाड़ल अरिपन माँझ आँगन राँगल देबाल, चौकठि, केबार पुरना झगड़ापर पड़ल गर्दा भेलै नव जीवनक संचार
मधुर-मिठाइ, पूजा पाठमे लागल सभक घर-परिवार संग चुन्नू-मुन्नू, मुन्ना-टुन्ना लगा देलक फटक्काक पथार
राति दिवालीक सब दिन आबै सब दिन सजै मस्तीक बजार सब दिन आबथि लक्ष्मी मैया सब दिन राखब खोलि केबार
२.
जनमदिनक शुभकामना
जनमदिन जे रामक एलै बनलै अगबे मधुर-मिष्ठान पात-पात हँसि-हँसि कऽ झूमै नाचै मोर, छेड़ै कोइली तान
कनियाँ-मनियाँ लड्डू बाँटथि ठुमकि-ठुमकि कऽ चलथि भगवान जखने रामके मधुर मुस्की छूटल काँपल रावण देलक पतनुकान
मातृ-पितृ भक्त, मर्यादा पुरूषोतम बाल-गोपल बनब ओहने महान सब साल आबि मेटाबू सघन तम जनमदिनक शुभकामना अछि भगवान ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढ़इन बढ़न्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 134 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह'१२९ म अंक ०१ मई २०१३ (वर्ष ६ मास ६५ अंक १२९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA