VIDEHA — Issue 131 / अंक १३१

Publication: VIDEHA · Issue: 131
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १३१ म अंक ०१ जून २०१३ (वर्ष ६ मास ६६ अंक १३१) ७९म सगर राति दीप जरय- विहनि आ लघु कथाक सगर राति पाठ- दिनांक १५ जून २०१३ क संध्यासँ १६ जून २०१३ क भोर धरि- स्थान- गाम औरहा (जिला मधुबनी) संयोजक- श्री उमेश पासवान। बससँ एनिहार एन.एच. ५७ पर निर्मलीसँ ३ कि.मी. दूर भुतहा चौकपर उतरू आ ओतएसँ वनगामा चौक होइत औरहा गाम ३ कि.मी. छै। ट्रेनसँ एनिहार निर्मली स्टेशनपर उतरू, ओतएसँ भुतहा चौक आ वनगामा चौक होइत औरहा गाम उमेश पासवान जीक दरबज्जापर संध्या ६ बजेसँ आयोजन छै। अहाँक उपस्थिति प्रार्थनीय। संपर्क श्री उमेश पासवान फोन ०९९३१२३५९४४ ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा-घुइर ताकू २.२.बिन्देश्वर ठाकुर-विहनि कथा: टेनामेनी/ दुर्भाग्य/ घुसखोर/ छुआछुत २.३.आशीष अनचिन्हार-विहनि कथा-भविष्य २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-तीन टा लघुकथा-कि‍यो ने/ मुइलो बि‍सेबनि‍ ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-४ ३.२.१.बिनीता झा-वरदान/तम्बाकू दिवस पर २.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-मतिभ्रम३.शेफालिका वर्मा-अहाँक गाम कतऽ अछि?/ पाहन अप्पन प्राण भेल! ३.३.अनिल मल्लिक-गजल ३.४.१.बाल मुकुन्द पाठक- गजल २.सुरेन्द्र शैल- मुदा करबै की?/ बटोही/ नवका महेशवाणी/ चुहाड़ विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। संपादकीय ७९म सगर राति दीप जरय- विहनि आ लघु कथाक सगर राति पाठ- दिनांक १५ जून २०१३ क संध्यासँ १६ जून २०१३ क भोर धरि- स्थान- गाम औरहा (जिला मधुबनी) संयोजक- श्री उमेश पासवान। बससँ एनिहार एन.एच. ५७ पर निर्मलीसँ ३ कि.मी. दूर भुतहा चौकपर उतरू आ ओतएसँ वनगामा चौक होइत औरहा गाम ३ कि.मी. छै। ट्रेनसँ एनिहार निर्मली स्टेशनपर उतरू, ओतएसँ भुतहा चौक आ वनगामा चौक होइत औरहा गाम उमेश पासवान जीक दरबज्जापर संध्या ६ बजेसँ आयोजन छै। अहाँक उपस्थिति प्रार्थनीय। संपर्क श्री उमेश पासवान फोन ०९९३१२३५९४४ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गद्य २.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा-घुइर ताकू २.२.बिन्देश्वर ठाकुर-विहनि कथा: टेनामेनी/ दुर्भाग्य/ घुसखोर/ छुआछुत २.३.आशीष अनचिन्हार-विहनि कथा-भविष्य २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-तीन टा लघुकथा-कि‍यो ने/ मुइलो बि‍सेबनि‍ कामिनी कामायनी लघुकथा- घुइर ताकू छोटकी काकी काल्हि रातिए अपन पियरका नुआ के सोडर मे उसिनलन्हि। परात भेने बुचीदाय स बजलीह  ‘गे खुरलुच्ची ,चलमे गे बच्चा , पोखरि स ई पखारि आनु । जखन नामे खुरलुच्ची पड़ल छल त बूच्ची दाय शांत कोना रहितथि ,सदी खन सब ठाम ज़ेबा लेल बेकल  पाँच छौ बरखक उमरि।   ‘चलू’ ,ओ फट दनी गोटरस खेलेनाय छोड़ि जेबा लेल दुनु टांग  पटकेत उठल । एक हाथ मे पीटना आ दोसर मे अलमुनियम के कारी खटखट ,पिचकल पाचकलछोटकी डेकची  मे उसिनल नूआ । भरि बाट उठैत बैसेत रहली , चलल ने होय छन नीक स  ,  अहि मध्य आह ,उह करैत अपन जुगक खिस्सा,गप्प सप्प बांचैत जा रहल छली। ‘ओ जुग छल,बुझलही बुची,हमर सबहक किओ पैर ने देखने होयत ,चौखटि स बाहरि पएर राखि दी कक्कर मजाल ?सब  दलान  त बूढ़ा सब पकड़ने ,। बुढ़ पुरनिया के कतेक प्रतिष्ठा ,कतेक लेहाज़  । ओ आराम ओ सुख आब कतय,कलिजुगक पाप स आब त ने तेहन धरतिए उपजे छै,माले जालक बरक्कति छै ,लोक सेहो तेहन खविस भ गेले ,खेती छोड़ि नौकरी करय लागल अछि । लाजो धाक नै बचले ,दलान प कोनो बुढ़ नै बचलेथ , घरे घर चुलही तर पुरुख सब घुसनाए सुरू करी देलके । तहिया कनिया बहुरिया दरवज्जा की ,खिड़किओ धरि स बाहरि हुलकी मारब स परहेज करैत छल ,,,,आब त , की पोखेर ,की इनार’कत्त नै पैठ ओकर सबहक । ‘आ ओ जे मसूद पुर बाली छथि,हुनक ससुर बड़ गरीब ,एतेक गरीब जे पनि भरनी धरि नै राखि सकैत छलिह ,,मुदा कुलीन एतेक जे तेसरे पहरि राति उठी क पोखरी,इनार स पानि बाला काज फरिछा लैत छलिह।पुतौहों एहेने सुशील भेटलनहिं   ,,मुदा आब हुनके पुतौह के देखही ,गई म्या,घर बाला कत दन की दन करे छै,,कोट पहिर क बुले छै मौगी”। ,एक बेर जखन ओ गप्प सुरू करी दईथ ,त लगबे ने करे की ,कोनो बच्चा बुतरु लग मे छन्हि की कोनो चेतन । भाय भाय बड़ बड़ेने जाइथ। जौं किओ नहिओं होय सुनए बाला तइयो हुनकर वएह चालि । “ओह गे बच्चा ,गै हाथ पकड़ा गे,,,पएर मे बग्घा लागि गेले ,ओ हो हो ,अ ह ह ह ,,महादेव ई की केलहु ‘। हाथ त हुनक पकडबे पडले ,नूआ बाला बासन सेहो माथ प उठबय पडले “ह चलू आब , एतेक कष्ट होय अछि ,पुतौह ने पखारि देती” । पुतौह के नाम प हुनका एड़ि के गरमी मगज प पहुँच गेलन्ही “मार बाढ़नि छूतहड़िया के  ,   हम्मर नूआ धोत की ओ अप्पन गजेड़ी भंगेड़ि बापक     सारा निपत ,”। पोखरिक घाट प टांग पसारि काकी इतमीनान स बैसेत बजली “ला गे बच्चा ,बासन ला ‘। तसली स नुआ उनटि,ओहि मे पानि भरि लग मे राखि लेलथि आ नुआ प चुरू स पानि  ध ध क पीटना स पीटय लगलिह । “काकी बूढ़ मे ई पीयर नुआ ‘? “गे चुप रह बेटी देलक ; देखै छै जे झुरकुट बूढ़ बसन पट्टी बाली ,केहेन छाप बाला नुआ पहिरति अछि’। “काकी  , मुदा नूआ मे कनिको जान  नहिं, जे दिन नै चरर   बाजि जायत ,दोसर कीन लीअ’।   “ह गे तोरे बाप हमरा कमा क पठा देता’।   ‘मर्र,  हमर बाप  किए पाए पठौता ,अपन जे कोसल रखने छी गाड़ि क’ से कोन दिन लेल’। काकी भयंकर तमसा  गेली “तोरे नाना देने अछि कोसल गाड़ि क राखय लेल ‘। बुच्चिदाय चुप भ गेलिह । ठेहुन धरि वस्त्र उठा क ,घाटक तेसर   चारिम सीढ़ी प ठाढ़ नुआ के एक छोर एक हाथ मे पकडली ,आ शेष के जुमा क पानि मे फेकलनि,नुआ छत्ता जका फुलि गेले ,तहन दुनु हाथ स नहु नहु छोट करैत ,दुनु हाथे गारि क पानि बहरेलथि। “हरे राम ,हरे राम करैत पानि स बाहर भेली । फेर नूआ बाला बासन आ पीटना बूची दाय के थमा देलथी। आधे बाट पहुंचल हेतीह कि लुखिया दौगल आबेत छल  ‘यए दाय ,जल्दी चलियो बड़का गाम बाला पीसा अलखींनह ‘। काकी एक दमे चिहुक उठली  ‘गैई म्या ,जुलुम भेल आब ?की करू की नहीं करू ,पाहून एला हें ,दलाने प बेसल हेताह , कोन बाटे जायब आँगन ,नूओ नीक नै पहिरने छी”। बुच्चीदाय हुनक समस्या के समाधान करैत बजली “हमर बाड़ी दने चलि जायब ‘। आ काकी पछबड़िया बाट स ओकर बाड़ी के इंट देवार कहुना क पकड़ि पकडि अपन आँगन मे पइसल  छलिह। “की काकी पाहून गेला ‘?   “ह गे ,कखने गेलथि । ओ राज काज बाला लोक ,हुनका पलखति छनि सरोजक बर जका  नीफिकिर भ क ससुर क कप्पार प बेसबा के’ ओ त ककरो बरियातीमे आयल छला त एक रत्ती ससुर् क हेम क्षेम लेबय चलि आयल छला ,एक लोटा पानि पिलथि ,चारी टा दछीनी सुपारी आ, दु जोड़ जनेऊ बस ,आ जायत रहला” । ओ ओसारा प अपन नूआ के सरियाबैत बैस रहली  ‘की कहिएईन् बहिन ।ई सौराठ बाली निरासी , हमारा जिबय नहीं देत ,की पाहून ,की पड़क ,ई अठ्ठा बज़्जरि खसा दैत अछि ,देखियो ,,आय फेर भानस बन्न करी मुंह फुलौने अन्हारघर मे पेटकुनिया देने पड़ल अछि, दुनिया भरि के गरिओलक ,फज्जति फज्जति करी देलक  । ओ त पैत रखलथि गोसाई जे ओझा खान पीन नहि केलथि।  हम त हैया हाथ उठा क चिकरि चिकरि क उगलहा स कहैथ छिएईन्ह जे कुमार बेटा रहि जाए ,,ओहि गाम नै विवाह करी ,ई कोन जनमक पाप अछि हमरा कप्पार प  ’। बूची के दाय अचार मे तेल ढारैत मौन भ हुनक गप्प सुनि रहल छली। तखने बड़की काकी सेहो आबि गेली “की भेल ए कनिया ,किएक एना बताहि भेल छी,’’? अहि आहे माहे मे बुच्चिदाय के बड़ मोंन लगेंह । जों ओसारा प गप्प होय त आँगन मे फुसीओ कोनो काजक लाथे ठाढ़ भ जाए ,बड़ आज्ञाकारी बनि पान सुपारी के तश्तरी  सेहो ल आबे । खास करि क दादी सबहक गप्प त खिस्सो पिहानी स रमनगर ,जे विशेख करि क पुतौहे ल क होइत छले , , आ रंग बिरंगक भाव भंगिमा । जे कनिया के ओ बड़ नीक ,बड़ सुनरि बुझे हुनको सबहक पोल खोलल जाए ,चीरहरण होय एहेन गोष्ठी मे । बड़की काकी छोटकी काकी के दुख सुनि तमेक पडलिह ‘ये एतबा मे अगुता गेलोन्हु ,हमर सतलखा बाली सन बज्र खसौनी स त लाख कच्छ नीक अछि ,ओकरा त भगवती रूपो देने छथिंह,आ ई करिलुट्ठी। नहा सुना क भगबती के सीरा नीप ,धूप दीप देखा क कहलिए “कनिया ,काल्हिओ उपासे छल ,आईओ बड़ बेर भेले ,जे देब स द दिय खाय लेल ,बड़ भूख लागि गेल’ कि ननदि स लड़ी क जरैत चुल्ही मे पानि ढारि बजेत अछि ‘अंगोरा खौथ’। चूड़ा फुला क खेलहू कहुना करि क। {हुनका चूड़ा दहि नहिं रुचय छलेंह} कनी दिन लेल एले ह मालती ,ओकरा देखय नहीं चाहे छै। भरि दिन हड़ हड़ खट खट  ,कखनों क़हत हमरा नूआ नहिं किन देत छथि, कतेक बेर अहिना पड़ा क नैहर पहुँच जायत अछि ,महिंदर त नहिं जाय छन कखनों बिदागरी करबा क आनय लेल ,अपने बाप भाय आनि क सासुर मे बैसा दैत छें न । एतेक ईर ,की कहू  कनिया घुड़क मारि धोंकड़िए जनेत अछि , कखनों  काल मों न करैत अछि जे बाध बोन मे पड़ा जाइ ,घर त्यागि दी  ” । “काकी ये ,सबहक पुतौहे किएक खराप होईत छै? सौसे किए नीक रहैत छै”?बइसल बइसल बुचिया अपन मौत् क फरमान जारी करि देलक । “गै , तू हमरा सब के अधलाह कहबे’ ये मठौली बाली ,देखू  अपन ,कबौछ लगा क जनमेने रही की ? हे दाय ,जहि नग्र तू जेबए ,अखने स हक्कन नॉर कनैत हैत”। “तखन त ई हो नगर कानल हेतैक”। आ पूरा बाजियो नहिं सकल की गाल प बड़ी जोर् क थापड़ पड़ले , ‘मरि गेले हे हे” पाछा मुडी क ताकलक,त माँ छलिह घोघ तानने । “ऊँह मोने मों न त खुसी ए भेल हेतेंन सौस सबहक निंदा सुनि देखबै लेल मारैत छथी’कनैत बजेत भागल ओ ओत्त स । “की गे फुलेसरी ,आय तोही फूल ल क एला हें ,कहिया एलही सासुर स  , ,सौस केहन छौ ,माने दाने छौ की ?” लालकाकी मलिनिया स गप्प करय लगलिह ,आ ओ नोरे झोरे कनैत ,सौसक देलहा दुखक बखान करय लागल ,ओहि दुख स पड़ा क त नैहर आबि गेल अछि। “बज़्जर खसो ,’लाल काकी ओकर सौस प  बज्र खसब लागली । बूची दाय फेर उपस्थित “यै लालकाकी ,आब अहि जुग मे लोक बज्जर ने बम खसबे छै। अहु ओकर सौस प बम खसबीओ ,एके बम मे सुरलोक चलि जेते’। लाल काकी हसय लागली “ई छौडी त जुग मे भूर करैत अछि ,एखन की बुझबहक दाय’। कत्तय कोन गाम मे , सत्संग वा भागवत चलि रहल छै ,बड़की काकी के सब खबरि रहैत छलनहि । अपने सब बुढ़िया विदा होइते छलिह,आ हाथ हाथ भरि घोघ तनौने  कनिया बहुरिया सब के सेहो  संग नेने जायथ। “ये काकी {हलाकी ओ सब दादी छलिह ,मुदा धिओ पुत्ता सब हुनका सब के काकिए कहेंह } आहाँ सब त बुढ़ पुरानछी,पुतौह सब त आजुकाल्हिक छथिन्ह ,सिनेमा देखा दियौ ,मेला घूमा दियो ,,ई की अपना संग हिनको सब के बैतरणी पार करय लेल नेने जाय छी ?’ बूची के गप्प सुनि छोटकी काकी अपना सब मे हाथ मुंह चमकबैत नहुं नहुं बजली “ई बुचिया ,बड़ बदियल,की कहियन्हि, काल्हि कहलिए जे हमरा संग कनि पोखरि चलबे ,चलि त गेल मुदा भरि बाट से दिक केलक से बुझु नै, गाडल धन ,कोसल ,निकालु ,नबका नुआ किनु ‘’। बूची के कान मे ई गप्प पडी गेले ,ओकरो शोणित खौल गेले ,मन मे उठले ‘माथ प उठा क हिनकर मईल बासन ,हाथ पकड़ि हिनक हम पोखरि ल गेलहू आ ई हमर निंदा करेत छथी’। ओकरा खबरि छले ,कत्तों ज़ेबा काल हुनका किओ घुईर ताकू कहि दैक त ओ एकरा बड़ पैघ अप शकुन माने छलिह ।हुनक देह स धधरा उठय लागे छल,आ मुंह स लाबा फुटय लगे ।,आ नतीजा ,बजनीहार के बड़का बड़का गारि आ सराप । जतरा सेहो स्थगित करि दैत छलिह । बस बुची दाय चिकरली पाछा स “यै छोटकी काकी ,यै घुईर ताकू ,घुईर ताकू ‘। आब की ,  बिरनी के छत्ता उजड़िचुकल छल। ,छोटकी काकी ओहि माझ बाट प ठाढ़ भ सम्पूर्ण टोलक स्त्रीगनक सोझा  बुचिया के दादीए  के गरियाबे लागल छलिह जे एहेन उकट्ठी पोती हिनका कोन पाप क कारने भेलन्हि।आ अपन माय के हाथे तूर जका धुनाई सोचि क , बुचिया ओत’ स लंक लगा क पड़ायल छल ॥ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर विहनि कथा: टेनामेनी/ दुर्भाग्य/ घुसखोर/ छुआछुत १ टेनामेनी

- मोदिर हम आइ कामपर नै जाएब ,कारण ३ महिनाक तलब बाकिए अछि । - रौ छौड़ा तोँ बेसी बुझै छिही। अतेक आदमी हमरा बातक जबाबे नै देलक आ तो हमरा संगे दिलग्गी करबे? - ई सभ तँ मुर्ख छै । किछु लोग अहाँसँ डरैत अछि जे सुपत कहलापर नोकरीसँ हाथ धोबऽ पड़तै। मुदा अधिकारक लेल डरब नीक नै। - ठिके छै, कनिक तोँ ने जो, तब देख लिहें एकर दुर्दशा । - हम मेहेनती आ इमन्दारे नै, जमानक सेहो पक्का छी। अपन हक लेने बिना हरगिज नै जाएब। -काल्हि भोरे-भोर कम्पनीसँ वार्निंग लेटर एलै। १ दिनक अनुपस्थितिमे ३ दिनक पगार सेहो काटि लेलकै। साथे-साथ महनथाक सभ समान लाधि कऽ लऽ गेलै दोसर ठाम, कम्पनिएक गाड़ीसँ। महन्था आँखिसँ नोर ढारैत रहला मुदा कियो हुनकर पुकार नै सुनलकै आ नै कियो अबाजे उठेलकै।

२ दुर्भाग्य आइ भोरेसँ घरमे रमझम छै । सब केउ निक निक कपड़ा लगौने छै। चारुदिस एन्डकोके गीत गुन्जयमान भऽ रहल छै महेशराक घरमे। रहौक किए नै, हुनकर छोटकी बहिनक विवाह जे छनि। मुदा महेशराक कन्याकेँ एकटा कोनमे बैसि कनैत देख कऽ हुनक सास बजलनि- "कन्या ई की, एखन तँ बरातियो नै आएल, बुच्ची बिदाहो नै भेल आ अहाँ एखनेसँ नेप ढारऽ लगलौं।" मुदा के बुझतै सोनापारीवालीक मन भरल बेदना? एतऽ सभक पति लगे छै आ ओ सभ अपन पतिक साथ प्रसन्न छथि, मुदा हुनकर पति एहन शुभ अवसरपर हुनकासँ अलग कतौ दूर देशमे कोइला कटैत होताह।

३ घुसखोर -सर नमस्ते हमरो पास्पोर्ट बनएबाक अछि । हेतै कि नै ? -हइ, बैस ओम्हर, एखन हम व्यस्त छी, देखै नै छिही? ताबे जो, बजैबौ तँ अबिहे। -हेतै। शेनियासँ पाछू आएलि दु गोटेकेँ पैसा लऽ कऽ तुरन्त पासपोर्ट दैत देखि जखन सी.डी.ओ. केँ कहलक तँ ओ बाजल- "रे बुरि, ई लोक तँ नीक छै आ बुधियार सेहो। तोरो अहिना हाथक हाथ पास्पोर्ट चाही तँ चाह पान खियाबै पड़तौ, नै तँ तारिख ढोइत रह सरकारी वकील जकाँ।

४ छुआछुत -धनमन्ती बौआ गे, जल्दी-जल्दी पानि भरै ने, हमरो भरऽ के अछि। ओतऽ बाबा प्रतीक्षामे हेतौ पानि पिबाक लेल। -हँ हँ दाइ, बस, भऽ गेलै। ले भ’र। बुढ़ियाक पानि भरिते काल मोसाफिरक छोटका बेटा आबि गेलै। बुढ़िया भरल घैलाक पानि फेकैत, "रै छौड़ा, तोरा आँखिमे मराछाउर देने हौ ? देखै नै छिही जे हम पानि भरै छी ? मचरुवा कहि कऽ पानियो छुआ देलक हमर। ओम्हर जो, ताबे बादमे अबिहें।" छौड़ा बकुवा कऽ ठाढ़ बस बुढ़ियाक मुँह तकैत रहि गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार विहनि कथा भविष्य वाह... ई बच्चे सभ तँ भविष्य होइत अछि। वाह....................... अच्छा ई कहू जे अहाँके ए.बी.सी अबैए..? हँ.... वाह उत्तम। अपन देशक चौहद्दी अबैए ? हँ...... वाह.. खूब नीक. बाबा-परबाबाके नाम मोन अछि ? हँ... वाह---वाह की संस्कार अछि। अच्छा ई कहू जे अहाँके की नै अबैए ? जी हमरा बस लाज नै अबैए ---- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल तीन टा लघुकथा-कि‍यो ने/ मुइलो बि‍सेबनि‍ कि‍यो ने डेढ़ मासक शीतलहरि‍ समैक रोहनि‍ए उतारि‍ देलक। पला-पला ओस पाला बनि‍ दि‍न-राति‍ बर्फवारी करैए जइसँ मनुखकेँ के कहए जे मालो-जाल आ गाछो-बि‍रि‍छ जि‍नगीसँ तंग-तंग भऽ काहि‍ कटैसँ मरबे नीक बुझैए। चटपट मरब काहि‍ काटबसँ नीक होइते छै। जहि‍ना माल-जालक रूइयाँ भरि ‍दि‍न भुलकल ठाढ़ रहैए तहि‍ना मनुखोक। मुदा माल-जाल जकाँ सौंसे देहक नै। कारणो अछि‍ जे मनुखकेँ रूइयाँ संग केशो होइ छै, माल-जालकेँ से नै होइ छै। गाछ-बि‍रि‍छक पात अपन रंगेटा नै बदलि,‍ पीअर भऽ भऽ सुखौ लगल आ तुबि‍-तुबि‍ खसौ लगल अछि‍। आने-आन जकाँ पचासी बर्खक सुगि‍योकाकीकेँ मन कहए लगलनि‍ जे छि‍आसीअम अगहन भरि‍सक नहि‍येँ देखब। जेहो जारन-काठी आ अन्न-पानि‍ घरमे छल सेहो सठि‍ गेल, शीतलहरि‍क कोनो ठेकान नै अछि‍, तखन जीब केना? मनमे कोनो बाटे ने भेटनि‍। बाटो केना भेटि‍तनि‍ जौं माटि‍क रस्‍ता बाट होइ आ दि‍न-राति‍ बर्खा होइत रहै, तखन पक्की सड़कक सुख कल्‍पने हएत कि‍ने? मुदा मरि‍तो दम लोक, जीबैक आशा थोड़े तोड़ैए जे सुगि‍याकाकीक पचासी बर्खक पाकल फलक आँठी जकाँ सक्कत नै हेतनि‍। सकताएले आँठीमे ने अॅकुड़ैक शक्‍ति सेहो अबै छै। सुगि‍याकाकीक नजरि‍ गेलनि व्‍यास बाब‍ापर। ओ जे कंठ फाड़ि‍-फाड़ि‍ कहै छथि‍न जे ‘लूटि‍ लाउ, कुटि‍ खाउ, भि‍नसर भने फेर जाउ।’ से समैक ठेकान कि‍अए ने केलखि‍न जे जखनि‍ घरसँ नि‍कलैबला समए बनत तखने ने लोक घरसँ नि‍कलि‍ कि‍छु करत आ जखन घरसँ नि‍कलैबला समैए ने हेतै, तखन केना दोसर दि‍न कि‍छु करए नि‍कलत? मुदा पेट से थोड़े बूझत। देहक जे सुख छै से केना भेटतै? आकि‍ व्‍यासबाबा एयर कंडीशन मकान, भरल-पूरल अन्न-पानि‍क जि‍नगी बूझि‍ बजै छथि‍न। जेते सुगि‍याकाकी मनकेँ मथैत तेते ओझराएले जाइत रहथि‍। जीबैक बाट कि‍ भेटतनि‍ जे आरो मन सोगाएले चलि‍ गेलनि‍। असकर सि‍बा घरमे दोसराइतो तँ नहि‍येँ अछि‍ जे दुनू गोटेक बुधि‍यो आ हाथो-पएर लड़ा-चला कऽ देखि‍ति‍ऐ जे जीब सकै छी कि‍ नै। एहने समैमे ने दोसराइति‍क जरूरति‍ होइ छै। आन समए हेबे कि‍अए करतै? असकरे लोक चाह पीब लइए, खेनाइ खा लइए, सुति‍-पड़ि‍ रहैए तखन दोसराइतक जरूरते कि‍। दि‍न-राति‍मे ऐसँ बेसी चाहबे कि‍ करी। चौबीसो घंटा कटैक धार तँ बनले अछि‍ कि‍अए ने कटत। मुदा से नै उमेरो तँ कि‍छु छी। बुढ़ाड़ी मृत्‍युक कारण छी मुदा जुआनीकेँ केना से कहबै? होइ छै तेकरो हजारो कारण, मुदा कारण कारण तँ भऽ सकै छै। अकारण-कारण केना भऽ सकै छै। हि‍या कऽ दुनि‍याँ दि‍स सुगि‍याकाकी तकलनि‍ तँ बूझि‍ पड़लनि‍ बेसौगरकेँ ठेंगो एकटा टाँगक काज करै छै। तँए एकटा सहयोगीक जरूरति‍ तँ अछि‍ए। मुदा सहयोगी हएत के? बेटी सासुरे बसैए, नैहरो हटले अछि‍, तखन? मुदा जरूरत तँ अछि‍ अौझुका? से तँ लगेक लोकसँ भऽ सकैए। मनमे प्रश्न अबि‍ते काकीक मनमे उत्तर स्‍पष्‍ट भऽ गेलनि‍ जे रीतलालक ऐठाम जा अपन बात कहि‍ऐ जे ओ कि‍ कहैए। अनेरे बाबू जन लेबह हौ, तँ पनरह बापूत अपने छी। तइसँ तँ काज नै चलत, काज तँ अछि‍ अपन बनि‍ अपना जकाँ जि‍नगी पार लगबैक? मुदा तइसँ पहि‍ने वि‍चारि‍ लेब नीक हएत जे जौं भार उठा लेलक तँ बड़ बेस, जौं नै उठौत तखनि‍? तखनि‍ कि‍, तखनि‍ यएह ने जे रीतलाल सन-सन बाबन गाही गाममे पसरल अछि‍। सभ कि‍ कोलि‍ फटुए आकि‍ रस फटुए भऽ जाएत। जेकरा हम अपन बना अपनेबै से कि‍अए ने अपनौत। जौं सेहो नै अपनौत तँ पहि‍ने बुझा कऽ कहबै पछाति‍ बुझेबै। उमेद-नाउमेदक बीच सुगि‍याकाकी रीतलाल ऐठाम विदा भेली। ठंढसँ जहि‍ना देह सि‍रसि‍राइत तहि‍ना देहक फाटल-पुरान वस्‍त्र सि‍मसि‍माएल। सुगि‍याकाकीकेँ देखते रीतलाल अचंभि‍त भऽ गेल जे एहनो समैमे नि‍कलि‍ काकी दरबज्जापर एली। सुगि‍याकाकीकेँ रीतलाल साक्षात् लक्ष्‍मी स्‍वरूप बुझैत। गुणसँ भरल, जेहने कंठक स्‍वर, तेहने नजरि‍क गुण आ तेहने हाथक लूड़ि‍सँ भरल-पूरल सुगि‍याकाकी। जाड़सँ सि‍रसि‍राइत काकीकेँ देखि‍ते रीतलाल अपन देह परहक कम्‍मल सुगि‍याकाकीकेँ ओढ़बैत अगियासी जोड़लक। अगियासीक दुनू कात दुनू गोटेकेँ बैसि‍ते गप-सप्‍प उखड़ैक मनसून बनए लगल। मुदा दुनू अपन-अपन मुँह दबने। मनमे अपन-अपन राग-दोख जे केना पुछबनि‍, काकी केम्‍हर एलौं। दरबज्‍जापर एली तँ चाहक बेर चाह, जलखै बेर जलखै, कलौ बेर कल्‍लौ आ सुतै बरे ओछाइनि‍क ओरि‍यान कऽ देबनि‍। तहि‍ना सुगि‍याकाकीक मनमे उठैत जे घरवारी पहि‍ने कि‍छु हँ-नि‍हस बाजत तखन ने उतारामे अपनो दुखनामा कहबै। गुमा-गुम्‍मी पसरल। मुदा कि‍छु समए गुमा-गुमी भेला पछाति‍ सुगि‍याकाकी गुमगुमबैत गुमगुमा जकाँ बजली- “बौआ, एक तँ तूँ एक वंशक छह, दोसर अंश तोरामे अछि‍, जे सुतलो-सूतल कानसँ सुनैत रहै छी, तँए...।” ‘तँए’ कहि‍ते सुगि‍याकाकीक बोल ब्‍लॉटिंग पेपरमे साेंखल रोसनाइ जकाँ बन्न भऽ गेलनि‍। मुदा कि‍छु प्रश्न तँ उठि‍ए गेल छल, जे तूँ एकवंशक छि‍अह। तइ संग लूड़ि‍-बुधि‍क अंश सेहो अछि‍ए। रीतलाल बाजल- “काकी, तेहेन दुरकाल भऽ गेल अछि‍ जे चि‍ड़ै-चुनमुनीक कोन बात जे नम्‍हरको-नम्‍हरकोक जान बँचब कठि‍न भऽ गेल अछि‍। चीन-पहचीन सेहो मेटाएल जा रहल छै, तखन तँ लोक ताबते धरि‍ ने धीरज राखत जाबत धरि‍ आँखि‍ तकैए। ओना तकि‍तो आँखि‍ देहक दुआरे अथबल भऽ जाइ छै मुदा तैयो तँ भूख लगने टंगटुटा चुट्टी जकाँ नेङराइतो चलि‍ते अछि‍। नेङराइत-नेङराइत जखन बेदम भऽ जाइए आ पेटक आगि‍मे जरए लगैए तखने ने अपनाकेँ हवन चढ़बैए। मनुख तँ सहजे मनुख छी।” रीतलालक बातकेँ सुगि‍याकाकी कि‍छु बेसीए बुझलनि‍। बेसी बुझैक कारण काकीक सोचक धार। होइतो तँ एहि‍ना छै जे एक्के मुँहक बात कि‍यो बेसी बुझैए तँ कि‍यो कम। मुदा तइ संग तेसरो बुझि‍नि‍हार तँ होइते अछि‍ जे समगम बुझैए। समगम माने जेते प्रश्नकर्ताक बात रहल तेतबे सुनि‍नि‍हार बुझलक। सुगि‍याकाकी तँ सहजे सुग्‍गा बोल परखि‍नि‍हारि‍ छथि‍। जहि‍ना कोनो रंगक वस्‍त्रपर दोसर रंग चढ़बैक वि‍धि‍ अलग-अलग अछि‍, अलग-अलग ई जे कि‍यो बेधड़क दोसर रंग घोड़ि‍ वस्‍त्रकेँ डुमा देलक तँ कि‍यो आस्‍ते-आस्‍ते रंग घोड़ि‍ बेर-बेर डुमा-डुमा रंग चढ़बैए...। तहि‍ना काकी मोने-मन सोचए लगली जे बेधड़क अपन वि‍चार रखैसँ पहि‍ने, आस्‍ते-आस्‍ते मनक उद्गार बेक्‍त करब बेसी नीक हएत। वि‍चारि‍ते छेली आकि‍ रीतलालक पत्नी-कबुतरी चाह नेने पहुँचली। काकीक हाथमे चाहक गि‍लास पकड़बैत कबुतरी बाजलि‍- “काकी, तेहेन टि‍कजरौना समए भऽ गेल जे एक तँ दुनि‍याँ जाड़सँ जड़ा गेल अछि‍ तैपर आगि‍यो-छाइकेँ कि‍ ओ तेजी छै जे बैशाख-जेठमे रहै छै। ओइ समैमे जेत्तै जारनसँ रोटी-तरकारी बनैए तेतेसँ अखन चाह बनैए।” कबुतरीक रस-रसाएल बोल सुनि‍ कोइली बोलीमे सुगि‍याकाकी बाझक स्‍वरलहरी छि‍टकबैत बजली- “कनि‍याँ, एहने-एहने समैमे पुरुखक पुरुखपना परि‍वारमे देखल जाइ छै। सभ कि‍छु सुरीत रहने भारीओ काज हल्‍लुके बूझि‍ पड़ै छै, मुदा सभ कि‍छु वि‍परीत रहने जौं अपन-अपन परि‍वार, समाज आ मातृभूमि‍क सेवा जे करैए, वएह ने पुरुखपना भेल। बूढ़ भेलौं, कोनो कि‍ भगवान तँ नहि‍येँ छी जे जे कहब से भइए जाएत। मुदा एते तँ कहबे करबह जे भगवान हमरे सनक नम्‍हर जि‍नगी सभकेँ देथुन जे हँसैत-खेलैत दुनि‍याँ देखैत चलत।” एक संग अनेको प्रश्न काकी बाजि‍ गेली। कि‍छु बात कबुतरी बुझबो केलक आ कि‍छु नहि‍योँ। रीतलालो काकीक सोल्हन्नी बात तँ नै बुझलक मुदा कबुतरीसँ तँ बेसी बुझबे केलक। दोसर बात रीतलालक मनकेँ ईहो ठेललक जे परि‍वारक भीतरक जे प्रश्न अछि‍ ओइमे परि‍वारक सभकेँ वि‍चार रखैक समान अधि‍कार छै मुदा समाजक बीच तँ एक-मतक जरूरति‍ होइ छै। तइले परि‍पक वि‍चारक जरूरति‍ होइते छै। कबुतरीओकेँ गर भेटल, मुँहमे ताला-लगा पति‍ दि‍स आँखि‍ उठौलक। कबुतरीक नजरि‍ पड़ि‍ते रीतलाल बाजल- “काकी, अखने देखि‍यौ जे एक गि‍लास चाह पीलौं। यएह चाह गरम समैमे मन भरि‍ दैत, मुदा अदहोसँ कम शक्‍ति‍ रहि‍ गेल छै, तहि‍ना तँ मनुखोक शक्‍ति‍केँ होइ छै।” रीतलालक प्रश्न सुगि‍याकाकी ठाढ़ काने सुनललनि‍। प्रश्नक एकभग्‍गु उत्तर नै दैत बजली- “रीतलाल, तोंही दुनू परानी अखन ऐठाम छह। परि‍वार तँ दुनू गोरेक छि‍अह। जे संतान छह ओहो सम्‍मि‍लि‍ते छह। तँए परि‍वारमे ओहन विचारक धार बहबैक छह जे जि‍नगीक संग हँसैत-खेलैत-बोहैत‍ चलए। हँसी-खेल दुनि‍याँमे कहाँ छै, ओ छै अपन काजमे। अपन परि‍वार छी आकि‍ परि‍वार अपन, एकरा नीक जकाँ बुझने लोक अपन परि‍चए बूझि‍ पबैए।” काकीक वि‍चार सुनि‍ रीतलाल, पत्नीकेँ कहलक- “काकी कि‍ केतौ पड़ाएल जाइ छथि‍ जे गपे सुनैमे रहि‍ जाएब। जाउ, भानसक जोगार करू। खेला-पीला पछाति‍ नि‍चेनसँ गप-सप्‍प करब।” पति‍क सह पाबि‍ कबुतरी बजलि‍- “एहेन समैमे काकीओ कतए जेती। हम सभ जुआन-जहान छी से तँ एक मोटा वस्‍त्र देहमे सटने छी, काकीक तँ सहजे सुखाएल हड्डी छन्‍हि‍, बेसीए जाड़ होइत हेतनि‍। पहि‍ने चाइटा गोरहा आनि‍ कऽ घूरमे दऽ दइ छिअनि‍ जे लगले टनगर भऽ जेती। अच्‍छा ई कहथु जे कि‍ खाइक मन होइ छन्‍हि‍?” आशा पाबि‍ सुगि‍याकाकी आस दैत आस मारलनि‍- “कनि‍याँ, भने दुनू बेक्‍ती छह, एक तँ भगवान बेसी अज-गज नै देलनि‍, तैयो अपन काजे ओहन रहल जे सभ दि‍न अजे-गजेमे बीतल। मुदा जे कि‍छु अपन अछि‍ सभ समैट लि‍अ। पाँच कट्ठा खेत बढ़ने अहूँक उपजा बढ़ि‍ जाएत आ हमरो दि‍न घुसकैत कटि‍ जाएत।” काकीक बात सुनि‍ रीतलाल बाजल- “काकी, हमरासँ लगो अहाँकेँ बहुत अज-गज अछि‍ पहि‍ने ओ...?” झपटि‍ कऽ काकी बजली- “पहि‍ने पाछू कि‍छु नै, चि‍ड़ैकेँ जतए घोघ भरै छै ततए रहै छै। जे कि‍यो अपन छथि‍ ओ एहेन दुरकाल समए नै देख रहल छथि‍।” “देख कि‍अए ने रहल छथि‍ मुदा सबहक तँ अपने जान भौर भऽ गेल छन्‍हि‍, तखन अनकापर नजरि‍ केना जेतनि‍?” रीतलालक बात सुनि‍ सुगि‍याकाकीकेँ कटु लगलनि‍। कटु लगि‍ते मन रब-रबेलनि‍। कबकबाइत बजली- “बौआ रीतलाल, कहलअ तँ बड़-बढ़ि‍याँ मुदा, मनुख तँ वि‍वेकी होइ छै, ओकरा तँ वि‍वेकसँ डेग उठबए पड़ै छै। जौं से नै उठौत तँ मनुखता केना औतै। खाली दूटा हाथे-पएर रहने तँ नै हेतै। दूटाकेँ के कहए जे चारि‍योटा पएर रहने पशु तँ पशुए भेल कि‍ने। जे हाथी पाँच गोटेकेँ पीठपर लादि‍ चलैए। मुदा ओकराे तँ अपना रहैक ठौर-ठेकान आ खाइ-पीबैक ओरि‍यान करैक लूड़ि‍ नहि‍येँ होइ छै। ई दीगर बात जे बि‍नु दोसराइते बोन-झाड़मे रहि‍ जीवन-जापन कऽ लइए मुदा पालतू तँ तखने कहबैए जखन मनुखक संग जीबैए।” सुगि‍याकाकीक बात रीतलाल नीक जकाँ नै बूझि‍ पौलक। प्रश्न उनटबैत बाजल- “काकी, जखनि‍ मनुख मनुख छी तखनि‍ दोसराइतकेँ बाँहि‍ पकड़ि‍ उठाबए आकि‍ दोसराक बाँहि‍क आशा अपने उठैमे करए?” रीतलालक वि‍चार सुनि‍ सुगि‍याकाकी मुस्‍कि‍याइत बजली- “बौआ, कालक्रमे मनुख धरतीपर आबि‍ आगू मुहेँ चलैत अछि‍। तहीले परि‍वार-समाजक जरूरत होइ छै। जखनि‍ बच्‍चाक जन्‍म होइ छै तखनि‍ जौं ओकरा दोसर रच्‍छा नै करतै तँ कि‍ ओ उठि‍ ठाढ़ भऽ सकैए। नै भऽ सकैए। तहि‍ना बुढ़ाड़ीमे, जखनि‍ शरीरक सभ अंग आस्‍ते-आस्‍ते काज करब छोड़ि‍ दइ छै तखनो तँ दोसराइतक जरूरत होइते छै। जौं एतबो बात लोक नै बूझत तँ कि‍ ओ मनुख कहबैक अधि‍कार रखैए।” सुगि‍याकाकीक बात सुनि‍ रीतलालक मनमे उठल जे अनेरे काकी सन लोककेँ ओझरीमे ओझरबै छि‍अनि‍। अपनो नीक नहि‍येँ होइए। नीक तँ तखनि‍ हएत जखनि कामधेनु सन काकीसँ दूधक आशा राखब। तइले दुधारू भोजन आ रहैक ओरि‍यान करए पड़त। मुदा जइ पटरीपर गप-सप्‍प उतरि‍ गेल अछि‍, तइसँ हटि‍ दोसर लीकपर जाइमे बाधा तँ बीचमे अछि‍ए। अपनाकेँ ओझराएल देखि‍ रीतलाल बाजल- “काकी, अहाँ अपन जि‍नगी आ अपन वि‍चारक मालि‍क अपने छी। जे मन हुअए से करब। अखनि‍ एतबे जे जेते दि‍न अपन बूझि‍ रहए चाहब, तइमे बाधा नै हएत। आगू अपन जानी।” रीतलालक वि‍चार सुनि‍ सुगि‍याकाकीक मन मानि‍ गेलनि‍ जे रहै जोगर स्‍थानपर पहुँच गेलौं। सात भाए-बहि‍नि‍क बीच सुगि‍याकाकी अंति‍म तेसर बहि‍न। श्‍याम वर्ण, चाकर गोल मुँह, चौरस देह, मझोल कदक सुगि‍याकाकी। गाममे बेछप जनाना। ओना समाजक जनानाक बीच एकरूपता बेसी मुदा तइसँ भि‍न्न रहने सुगि‍याकाकी छेलीह। समाजक बहुलांश जनाना खेती-बाड़ीसँ जुड़ल तँए दि‍न-राति‍ ओइ चक्कीकेँ चलबै पाछू बेहाल। बेहालो केना नै रहती? मनुख बनि‍ जखनि‍ ऐ धरतीपर खेल खेलैले एलौं, भि‍नसरमे घर-द्वार बना लेब, दुपहरमे बि‍लमि‍ रौद-बसात जीड़ा लेब आ साँझमे सभकेँ उसारि‍ अपने उसरि‍ जाएब, यएह ने भेल जि‍नगी। से तँ सबहक सोझेमे अछि‍। पति‍आनी लगौने बाबा अपन बेटाकेँ बाबा बना अपने उसरि‍-बि‍सरि‍ जाइ छथि‍। अहि‍ना ने दोसर दि‍ससँ पोता-बेटा बनैत, बाबाक कुट्टी लग पहुँच अपन समाधि‍ लइए। मुदा ऐ बीच जे कुत्‍सि‍त बाधा बि‍चमाइन करैत रहल ओकरा तँ देखए पड़त कि‍ने? समाजमे सुगि‍याकाकी ऐ दुआरे बेछप छेली जे जेहने हाथक लूड़ि‍ बदलल छेलनि‍ तेहने छातीक धड़कनक संग कंठक स्‍वर, जे मुँहक बोल होइत नि‍कलै छेलनि‍। गीत-संगीत प्रेमी सुगि‍याकाकी। भि‍त्ति‍-चि‍त्र वृत्ति‍वाली सुगि‍याकाकी। अदौरी, दनौरी, बि‍औरी इत्‍यादि‍क संग आमक अँचार-मोरब्‍बासँ लऽ कऽ ति‍ल-ति‍सी धरि‍क अँचार बनौनि‍हारि‍। तइ संग सतरंग सागक संग सतरंग तरकारी-भुजि‍या-तड़ुआ बनौनि‍हारि‍ सुगि‍याकाकी। साठि‍ बर्ख पूर्व सुगि‍याकाकी वसन्‍तपुर एली। जइ परि‍वारमे एली ओ परि‍वार बहुत जत्‍था-जमीनबला नै। घराड़ी संग पाँच कट्ठा चास। मुदा जेकरा संग बि‍आह भेलनि, ओ जेहने देखैमे भव्‍य तेहने कंठक सुरील। भजन-कीर्तन, नाच-गानसँ सोमनाथकेँ बच्‍चेसँ सि‍नेह छेलनि‍। जेना पाछूएसँ नेने आएल होथि‍ तहि‍ना। दसे-बारह बर्खसँ जे घर छोड़ि‍ बौड़ाए लगल ओ रंगमंचक धीर कलाकार बनि‍ बौड़ाइते रहल। पुश्‍तैनी तीन पुश्‍त आगूसँ सुगि‍याकाकीक नैहरक परि‍वार गीत-संगीतसँ जुड़ल। सोमनाथो घुमैत-घामैत सालक तीन-तीन-चरि‍-चरि‍ मास रहबो करैत आ सीखबो करैत। कि‍सान परि‍वार रहि‍तो वि‍श्वनाथक -सुगि‍याकाकीक पि‍ता- परि‍वार कृर्षि कार्य-खेती-बाड़ीसँ अलग छेलनि‍। ओना परि‍वारमे बीस बीघा चास आ पाँच बीघा गाछी-कलमक संग नमगर-चौरगर बासो आ पोखरि‍ओ‍-इनार छन्‍हि‍हेँ। कला-मर्मज्ञ वि‍श्वनाथक परि‍वार, सोमनाथक बि‍आह अपन परि‍वारमे करा लेलनि‍। ने सोमनाथक घर-द्वार देखलनि‍ आ ने धन-सम्‍पति‍क हि‍साब-कि‍ताब पढ़लनि‍। वसन्‍तपुर अबि‍ते सुगि‍याकाकी परि‍वारक स्‍थि‍ति‍ देख मर्माहत भेली। मुदा उपाए की। पति‍क कमाइ -अर्थ रूपमे- कि‍छु ने, सालमे पाहुने-परक जकाँ आन-जान। पेटक आगि‍ शान्‍त करै खाति‍र सासु-ससुर दि‍न-राति‍ एकबट्ट केने मुदा कट-मटी तँ रहबे करनि‍। नव कनि‍याँ बनि‍ सुगि‍याकाकी घरमे एली, केना सासु-ससुर कहतनि‍ जे कनि‍याँ बोि‍न-बुत्ता करए संगे चलू। परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा तँ प्रति‍ष्‍ठा छि‍ऐ भलहिं जि‍नगी भरि‍ नै नि‍महे। एको दि‍न आकि‍ एको क्षणक महत तँ जि‍नगीमे छइहे। अपन दि‍न-दुनि‍याँ देखैत सुगि‍याकाकी अपना दि‍स तकलनि‍ तँ भरल-पूरल खजाना देखलनि‍। परती देखि‍ जहि‍ना कि‍सानीक जि‍ज्ञासा जगैत, बजार देखि‍ बेपारक जि‍ज्ञासा जगैत तहि‍ना सुगि‍याकाकीकेँ भेलनि‍। मुदा, सासु-ससुरक ऊपर आगू चढ़ि‍ मँुह केना उठौती, ई तँ प्रश्न रहबे करनि‍। जि‍नगी जीबैत-जीबैत लोको आ पशुओ-पक्षी अभ्‍यस्‍त भेने आनन्‍दि‍त जि‍नगीक सुख-भोग तँ करि‍ते अछि‍। मुदा जँ बरि‍सल पानि‍केँ खेतक आड़ि‍ बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ नै राखब तँ खेतमे पानि‍ केना अड़त। जाबे खेतमे पानि‍ नै अड़त ताबे धान केना रोपब। जँ से नै रोपब तँ बोनि‍हारि‍न-बोनि‍हारक पुतोहुक कलंक केना धुआएत? आ जौं से नै धुआएत तँ जि‍नगीए केहेन भेल? रंग-बि‍रंगक प्रश्न सुगि‍याकाकीक मन बरसैत पानि‍क बुलबुला जकाँ इन्‍द्रधनुषी रंग नेने बनैत आ फुटैत। मनमे वि‍चारलनि‍ जे सभसँ पहि‍ने अपन ढेकी-जत्ताक ओरि‍यान करी। जखनि‍ ढेकी-जाॅत भऽ जाएत तखन समाजक कुटौन-पि‍सौन कऽ अपन स्‍वतंत्र कारोबार अपन घर-आंगनमे करब। कि‍ हमरा चूड़ा-चाउर कुटैक लूड़ि‍ नइए। कि‍ हमरा मेदा-चि‍क्कस पीसैक लूड़ि‍ नइए। तखन तँ भेल जे उक्‍खैर-समाठ, ढेकी-जाॅतक ओरि‍यान करब। केना सासु-ससुरकेँ कहबनि‍ जे अहाँ कर्जा लऽ कऽ हमरा कीनि दि‍अ। मुदा अपना माए-बापकेँ तँ कहि‍ सकै छी। देह-हाथ मारि‍ जे आंगनमे बैसल रहै छी तइसँ नीक जे अपन घर-आंगनमे कि‍अए ने अपन लूड़ि‍क कि‍ताब लि‍खब शुरू करी। आंगनक ओसारपर ओछाएल ओछाइनपर बैस सुगि‍याकाकी अपन दि‍न-राति‍क झख-झखैत मोने-मन सुमारक करए लगली जे केना पौतीमे राखल खीड़ा-करैलाक बीआ समैपर माटि‍मे गाड़ल जाइ छै। समए पाबि‍ जखनि‍ माटि‍ पकड़ि‍ हाल पबि‍ते फुड़फुड़ा कऽ अॅकुर माटि‍क ऊपर आबि‍ अपनाकेँ गाछ कहए लगै छै। बौधि‍क रूपे अगुआएल सुगि‍याकाकीक उत्‍साह जगलनि‍। कि‍अए ने फूल जकाँ गंध सि‍रजि‍ हवाक संग वायुमंडलमे पसरब? मुदा बीचमे बाधा तँ अछि‍ए, ओ अछि‍ जइ परि‍वारमे एलौं ओ परि‍वार अपन छी आकि‍ नै। कहैले तँ सभ कि‍यो छथि‍ मुदा हमरा वि‍चारकेँ कते महत अछि‍ से तँ थाहला पछाति‍ बूझब। मुदा थाहो लेब तँ कठि‍न अछि‍। एकरूपा सासुकेँ तँ सम्‍हारि‍ बाजि‍ सम्‍हारि‍ लेब मुदा ससुर तँ पुरुख छथि‍। पुरुखक करेज बेसी स्‍वार्थी होइए, अपन ि‍वचारकेँ दउ-चप बले रखए चाहैए। मन ठमकलनि‍। ठमैकते सुगि‍याकाकीक मनमे बि‍जलोका जकाँ छि‍टकलनि।‍ मन मानि‍ गेलनि‍ जे सासुकेँ संगी बनौल जा सकैए। जखने सासु समटेती तखने ससुर उसरता, उसरैत-उसरैत अपने उसरागा बनि‍ सोझ भऽ जेता। दोसर दि‍न साँझू पहर सुगि‍याकाकी चुल्हि‍क ओरि‍यान करि‍ते छेली आकि‍ सासु-ससुर अनका खेतसँ खटि‍ कऽ कऽ एली। पुतोहुकेँ काजमे लागल देखि‍ रधि‍या पति‍केँ कहलखि‍न- “बड़ काजुल कनि‍याँ घरमे पएर रखलनि‍ अछि‍।” पत्नीक बोलकेँ नकारब सोहनलाल उचि‍त नै बुझलनि‍, बुझलनि‍ ई जे संगे-संग संगी बनि‍ भरि‍ दि‍न संगे काज केलौं तखनि‍ जेहने वि‍चार अपन अछि‍ तेहने ने हुनको हेतनि‍ लोकक काजो तँ लोकक पहि‍चान छी। तहूमे भरि‍ दि‍नक थाकल-मारल अपनो घरमे अराम नै करब, से केहेन हएत? अष्‍टयाम कीर्तनमे जहि‍ना अगुआ-पछुआ एक्के धूनमे जयकार करैए तहि‍ना सोहनलाल ताल मि‍लबैत बजला- “हम सभ तँ हि‍नका सबहक -बेटा-पुतोहु- नौकरी करै छी। ओना उचि‍तो अछि‍। तेहेन भगवान जन्‍म देलनि‍ जे सोझे हाथे-पएरटा देलनि‍। मुदा ओइमे बेमानी नै केलनि‍। ओ चारू सुरेब अछि‍। जँ चारूमे सँ एकोटा अबाह रहैत तखन के केकरा पुछैत। अहीं हमरा पुछि‍तौं कि‍ हमहीं अहाँकेँ पुछि‍तौं। भीख छोड़ि‍ दोसर कोनो रस्‍ता जीबैक रहि‍तए?” नमगर-चौड़गर पति‍क बात सुनि‍ रधि‍या भाव-वि‍ह्वल भऽ गेली। नि‍शाँएल साहि‍त्‍यकार जकाँ जे गुदरी-चेथरीक आगि‍सँ सोनाक लंका जरबै छथि‍, तहि‍ना सासु-ससुरक बोल सुगि‍याकाकीक कानमे पड़लनि‍। अनुकूल मनसून देखि‍ सुिगयाकाकी दाव सम्‍हारलनि‍। भरल बाल्‍टीन पानि‍ आ लोटा नेने आगूमे पहुँच गेली। पुतोहुक आग्रह देखि‍ रधि‍या जहि‍ना बरफ पानि-हवा बनि‍ अकासमे उड़ि‍ जाइए तहि‍ना रधि‍या उड़ैत बजली- “कनि‍याँक सभटा सीख-लीक खनदानीए छन्‍हि‍।” रधि‍याक संग सोहनलाल आरो उड़ि‍या गेला। उड़ि‍आइत बजला- “जहि‍ना दबो भोज्‍य-वस्‍तु, चमकैत थारीमे परोसलापर अनेरो खेबैयाक मन भरक्षए लगै छै तहि‍ना घरक चि‍ष्‍टे-चार ने घरकेँ घर बनबैए। ई घर कि‍ कोनो हमरे छी आकि‍ आब हि‍नके सबहक भेलनि‍। जेना सम्‍हारथि‍।” ससुरक बोल सुनि‍ सुगि‍याकाकीक मनमे भेलनि‍, जेहने परि‍वारमे भगवान जन्‍म देलनि‍ भरि‍सक सासुरो तेहने भेल। मोने-मन भगवानकेँ गोड़ लागि‍ते जगलनि‍ जे ई दलि‍दता कते दि‍न छहटा हाथ पएरक आगू ठाढ़ रहत। मुदा सासु-ससुरकेँ जे जि‍नगी भरि‍क बात पेटमे छन्‍हि‍ से जाबे सुनि‍ नै लेब ताबे बुढ़ी थोड़े कहती अपन चौथारीक गप-सप्‍प। तइ सुनैले तँ कि‍छु पूजी-समए लगबै पड़त। जहि‍ना बड़का करखन्ना बैसबैले बड़का घर बनबए पड़ै छै तहि‍ना नम्‍हर गप-सप्‍प सुनैले बेसी धैर्यक जरूरत पड़ै छै। जइ बनबैमे कि‍छु बेसीओ समए लागि‍ सकै छै। खेला-पीला पछाति‍ सुगि‍याकाकी मालीमे तेल नेने सासु-ससुर लग पहुँचली। भरि‍ दि‍नक थाकलक दबाइओ छी तेल। सोहनलाल रधि‍याकेँ कहलखि‍न- “काल्हि‍ धनरोपनी समापत भऽ जाएत। गाममे कते गि‍रहत तँ आठ दि‍न पहि‍ने रोपनी उसारलनि‍। ई तँ गुण अछि‍ जे अपना सभ केकरो बान्‍हल जन नै छि‍ऐ ने तँ अपनो सबहक काज आठ दि‍न पहि‍ने समापत भऽ गेल रहि‍तए।” आगूक बात सोहनलालक पेटेमे रहनि‍ आकि‍ सुगि‍याकाकीक हाथमे माली देखलनि‍। माली देखि‍ते घरक माली -मालि‍क, बेटा-पर नजरि‍ गेलनि‍। अपने फुड़ने बाजए लगला- “भगवान तेहेन बेटा देलनि‍ जेकरा ने अपन खाइ-पीबैक ठेकान छै आ ने परि‍वारक ठेकान छै। ओहन मनुख बुते घर चलत। अखन अपने दुनू बेक्‍ती थेहगर छी, कहुना कऽ घीच-तीड़ परि‍वारकेँ ससारने चलै छी।” बेटापर पि‍ताक आक्षेप सुनि‍ते रधि‍याक मनक महथीन बाजलि‍- “बेटा धन छी आकि‍ कोनो बेटी छी जे घर-अंगनाक टाटक अढ़मे नुकाएल रहत। भगवान हमरो सबहक औरुदा ओकरे दौ जे आरो बोनाएल रहए।” ससुरक बात सुनि‍ जहि‍ना सुगि‍याकाकीक मन बि‍स-बि‍सेलनि‍ तहि‍ना सासुक बात सुनि‍ मन तन-तनेबो केलनि‍। मुदा सासु-ससुरक बीचक बातमे नव कनि‍याँकेँ पड़क चाही आकि‍ नै? मन ओझरा गेलनि‍। मुदा नीककेँ नीक आ अधलाकेँ अधला जौं नै कहल जाए तँ के पटकाएत तेकर कोनो ठीक छै। हँसीओ होइ छै हहासो होइ छै। गंभीरो हँसब होइ छै आ फुलहो हँसब होइ छै, मुदा से बूझत के? हँसी तँ हँसी छि‍ऐ। मुँह खोलि‍ बत्तीसी जोरसँ छि‍ड़ि‍या देलि‍ऐ, बड़का हँसब भेल! तारतम्‍य करैत सुगि‍याकाकी सासुक वि‍चारपर, सासु दि‍स घूमि‍, डि‍बि‍याक रोशनीमे मन्‍हुआएल चोकटल फूल जकाँ नै, खि‍लैत कली जकाँ आँखि‍-भौ-नाकक संग मुस्‍कि‍एली। पुतोहुक मधुर मुस्‍कान देखि‍ रधि‍याकेँ, जहि‍ना गोबर खत्तोक पानि‍ धाराक संग पाबि‍ गंगामे पहुँच गंगाजल बनि‍ जाइए तहिना भेलनि‍। सौझुका बेला-बेली जहि‍ना अपन चौंसैठो कलासँ नाचए-गाबए लगैए तहि‍ना रधि‍या पति‍केँ देखबैत बजली- “सोमनाथ अपन गुणक हि‍साबसँ दुनि‍याँक गुणा-भाग जोड़ैए। जोड़ह, आरो जोड़ह। हम सभ माए-बाप भेलि‍ऐ, जीता-जि‍नगी ई नै कानमे आबए जे माए-बाप बेटा-पुतोहुकेँ बान्‍हि‍ कऽ रखने अछि‍।” रधि‍याक बात सुनि‍ सुगि‍याकाकीकेँ जहि‍ना अपन शक्‍ति‍ मुँह जगौलकनि‍ तहि‍ना रधि‍याकेँ सेहो दमपति‍ शक्‍ति‍ जगौलकनि‍। मंदि‍रक आगू दुनू हाथ जोड़ि‍ भक्‍त जहि‍ना अपन अराधना करैत तहि‍ना अखन धरि‍ सुगि‍योकाकी हाथमे माली रखने आराधना करैत रहली। माली देखि‍ रधि‍या सुगि‍याकाकीकेँ कहलखि‍न- “कनि‍याँ, अहाँ बैसू जे सेवा सासुरक छी ओ तँ सासुरेमे ने सीखब। हम अपने अहाँ ससुरकेँ देह-हाथ ससारि‍ दइ छियनि‍। ओना ससुरोक सेवा पुतोहुक कर्तव्‍य छी मुदा स्‍थान-वि‍शेषक अनुकूल। पि‍ताक सेवा आ ससुरक सेवा एक रहि‍तो दू प्रक्रि‍यासँ चलै छै। तहि‍ना जन्‍मदात्ती माए आ पोसि‍नि‍हारि‍ सासु-माएक सेवामे सेहो भेद होइ छै। अहाँक ससुर सन भगवान केकरा ससुर देलखि‍न। भगवान एहने सभकेँ देथुन।” परि‍वारक -तीनू गोटेक- बीच अपन प्रति‍ष्‍ठा पबैत सोहनलालक मन सोहनगर होइत-होइत सोन्‍हाएल दूधक डाबाक मक्‍खनक सुगंध नि‍कालि‍ बाजल- “कनि‍याँ, ऐठाम तीनि‍ए गोरे छी। अहीं तीनू गोरेक ने ई घर छी। ऐ घरक भार तँ तीनि‍ए गोरेक ऊपर अछि‍ कि‍ने। अहूँ खनदानी घरक बेटी छी। दुनू गोरे -सासु-पुतोहु- वि‍चारि‍ जे कहब से मानैत चलब। सएह ने...।” ससुरक वि‍चार सुनि‍ सुगि‍याकाकी शुभ प्रभातकेँ प्रणाम केलनि‍। दोसर दि‍न सबेरे सासु-ससुर बोनि‍ करए घरसँ नि‍कलली। भानस करैसँ पहि‍ने चाह-ताह पीला पछाति‍, सोलह बर्खक नव कनि‍याँ सुगि‍याकाकी घरक चौकठि‍ लग बैस अपन शक्‍ति‍केँ खोजए लगली। हमरा सन परि‍वारमे जौं देह धूनि‍ श्रम नै कएल जाएत तँ परि‍वारक नीवमे मजगुती नै औत। शक्‍ति‍क क्षय श्रम आ भोग दुनूमे होइ छै। यएह छी अकास-पतालक दूरी। जतए जे होउ, आइसँ दि‍न-चर्या बना चलब। भोरहरबामे पाँचटा प्रभाती गाएब आ पहि‍ल-दोसर साँझमे पाँचटा मंगल सेहो गाएब, अपना घरमे गाएब, अपन सासु-ससुरकेँ सुनेबनि‍। सभ अपन घर देवताकें पूजा करैए, हमहूँ करब। तइसँ पहि‍ने अखने चि‍क्कनि‍ माटि‍ घोरि‍ सभ घर-ओसारकेँ ढोरब शुरू कऽ ली। सुखैओमे दू-तीन दि‍न लगबे करत। कहि‍याले आ केकराले भि‍त्ती-चि‍त्रक लूड़ि‍ राखब। जि‍नगीक ठेकान नै अछि‍। बि‍नु बँटने जे संगे जरि‍ जाएत तँ अधरम हएत। सभ घर-ओसारमे रंग-रंगक रूप-चि‍त्र बना लेब। कोहवर, भानस, पढ़ैक, सुतैक रूप बना नै राखब तँ लूड़ि‍यो-बुधि‍ तँ हराइते छै, हराइते जाएत। मुदा ई सभ तँ भेल घर सजबैक। मूल तँ अछि‍ पेट। जखन अपना खेत नै अछि‍ तखन खेती केना करब। ओना नैहरमे जँ खेत छेबे करनि‍ तैयो तँ खेती अपने नहि‍येँ करै छथि‍। ई तँ नि‍श्चि‍त अछि‍ जे जखने घर-ओसारमे चि‍त्र बनबैक लूड़ि‍ अछि‍ तँ काजो-रोजगार अछि‍ए। मुदा जैठाम छी तैठाम कि‍ रेडि‍यो-अखबार छै जे लोक बूझत। लोक तँ बूझत देखि‍ए-परेख कऽ, गाम-समाज बनत बजार। शुभ-अवसरक संग नव-नव घर बनत, नव-नव चि‍त्रसँ घर सजौल जाएत। से नै तँ सभसँ पहि‍ने पेटक मुँह मारैक ओरि‍यान कऽ ली, तखन बूझल जेतै। ने दुनि‍याँ पड़ाएल जाइ छै आ ने अपने पड़ाएल जाइ छी। रहैओक अछि‍ए आ रहब तँ संगो चलै पड़त। परि‍वारमे सुगि‍याकाकीक सासुरक जि‍नगीक पहि‍ल जीत यएह भेलनि‍ जे सबहक -परि‍वारक- वि‍चारसँ घर चलत। सभ मि‍लि‍ काजो-राज सि‍रजन करब आ सभ मि‍लि‍ बाँटि‍ करबो करब। अपन तीनू श्रमकेँ एकठाम होइते शक्‍ति‍क रूप बनल। वएह शक्‍ति‍ पूजी बनि‍ ठाढ़ भेलनि‍। परि‍वारक दि‍न-दशा सुधरए लगलनि‍। जेना-जेना अर्थक स्‍तर सुधरैत गेल तेना-तेना श्रमक रूप बदलैत परि‍वार चलए लगल। कमो अपन पूजी-श्रम-अर्थ जौं अपना मननुकूल उपयोग कएल जाएत तँ कर्कशतामे कमी अबै छै। कर्कशता ओत्तै वि‍कृत रूप पकड़ैत जतए मनकेँ प्रति‍कूल श्रम करए पड़ै छै। समए बीतैत गेल। सासु-ससुर सुगि‍याकाकीक सहयोगी बनि‍ एकधारामे परि‍वारकेँ ठाढ़ केलनि‍। ओना दस बर्ख बीतैत-बीतैत सुगि‍याकाकीक नओं-जश चरि‍कोसीमे पसरि‍ गेल छेलनि मुदा एते-सघन काजक समाजमे, गाम छोड़ि‍ अनतए जेबाक समैए ने भेटनि‍। एक बोनि‍हार परि‍वार समाजक ओइ मानचि‍त्रपर पहुँच गेल जे सुति‍हार परि‍वार कहल जाइ छै। बीस बर्ख पुरैत-पुरैत सुगि‍याकाकीकेँ पाँचटा सन्‍तान भेलनि‍। तीन बेटी दू बेटा। सासु-ससुरकेँ रहने सुगि‍याकाकीक काजमे ओते बाधा नै पड़लनि‍ जेते असगरूआ परि‍वारक चि‍लकौरकेँ होइ छै। मनुख पैदा करब आ मनुख बना ठाढ़ करब, धि‍या-पुताक खेल नै छी। ऐ बातपर सुगि‍याकाकी सदति‍ काल धि‍यान रखै छेली। मुदा धि‍यान रखलो पछाति‍ दुनू बेटा मरि‍ गेलनि‍। मात्र तीनू बेटी बँचलनि‍। समाजक लोक सुगि‍याकाकीकेँ जेहने गीत गौनि‍हारि‍, तेहने चि‍त्रकार आ तेहने पाक पकौनि‍हारि‍ एक स्‍वरसँ मानै छन्‍हि‍। समए बीतैत गेल। सुगि‍याकाकीक पति‍-सोमनाथ उड़ि‍ कऽ बम्‍बई चलि‍ गेल। ओत्तै दोहरा कऽ बि‍आहो कऽ लेलक। साउसो-ससुर मरि‍ गेलनि‍। तीनू बेटीक संग सुगि‍याकाकी वसन्‍तपुरमे बँचि‍ गेली। अपना जनैत सुगि‍याकाकी तीनू बेटीक बि‍आह नीके घर जानि‍ केलनि‍ मुदा समैक विर्ड़ोमे उधि‍या तीनू जमाएओ आ बेटीओ मद्रासे-कर्नाटकमे बसि‍ गेलनि‍। अखनि‍ पचासी बर्खसँ पहि‍ने धरि‍ सुगि‍याकाकी समाजक समुद्र रूपी पेटमे हराएल रहली, मुदा सालक शीतलहरि‍ सुगि‍याकाकीकेँ असहनीय बना देलकनि‍। मुइलो बि‍सेबनि‍ काल्हि‍ भाेरेसँ केत्ताबेर लुटनी भौजी धीरू भैयाकेँ खोज करए एली मुदा भेँट नै भेलखि‍न। ओना लुटनीओ भौजी अपने मनक लोक, खोज करए तँ अबै छेली मुदा परि‍वारक कोनो सदस्‍यकेँ सोझे पूछि‍ दइ छेलखि‍न- “धीरू बौआ आंगनमे छथि‍?” तँ उत्तर भेटै छेलनि‍- “नै।” ‘नै’ सुनि‍ते घूमि‍ कऽ चलि‍ जाइ छेली। दोहरा-तेहरा खड़ि‍यारि‍ कऽ ऐ दुआरे नै पुछै छेलखि‍न जे अपना घरक बात सभ लग बाजब नीक नै। ओना कि‍छु मानेमे निको छेलनि‍। नीक ऐ मानेमे जे झगड़ा-दनक बात जखन लोक बजए लगैए तँ कते रंगक बात बजा जाइ छै तइसँ समैओक बेरबादी आ दोसर झगड़ा सेहो टरल रहैए। मुदा सातम बेर एलहा लुटनी भौजीकेँ सुतरलनि‍। धीरू भैया गंगा नहा कऽ आएले छला कि‍ लुटनी भौजी आबि‍ गेलखि‍न। गाड़ी-सवारीक झमारल धीरू भैया तँए आन गप करैक मन नै होइ छेलनि‍। कि‍एक तँ अपनो घरक तीन दि‍नक समाचार पछुआएले रहनि‍। आनठामसँ एला पछाति‍ कि‍यो पहि‍ने अपन परि‍वारक हाल-चाल ने बुझए चाहैए जे कोन काज अगुआएल, कोन पछुआएल आ कोन ठमकले रहि गेल। मुदा जखन लुटनी भौजी अपन दुखनामा कहए एलखि‍न तखन नहि‍योँ सुनब उचि‍त नै। अपन परि‍वारसँ बेसी महत जौं आन परि‍वारकेँ नै देब तँ सुआरथीएक काज भेल। मुदा अपन काज छोड़ि‍ जौं दोसरेक काज करए लगब तँ कि‍ दोखी नै हएब? केना नै दोखी हएब। सभकेँ अपने अधि‍कारो आ कर्तव्‍यो छै जौं तेकरे छोड़ि‍ देब तँ करब की? खैर जे होउ...। एक तँ धीरू भैया रस्‍ताक झमारल तैपरसँ दोसर झमार दैत लुटनी भौजी कहलकनि‍- “पहि‍ने सभ काज छोड़ि‍ हमर पनचैती कऽ दि‍अ, तखनि‍ आन काज करब?” ओना गंगा स्‍नान केला पछाति‍ धीरू भैयामे कि‍छु संकल्‍पो आ कि‍छु काज करैक नव उहि‍यो आबि‍ गेलनि‍ आ कि‍छु छोड़बो तथा बदलबो केलनि‍। लुटनी भौजीक बात सुनि‍ मनमे उठलनि‍ जे अखन दूर-दराजसँ आएल छी, लगले पनचैती करए बैसब, तहूमे मनो थाकले आ गरमाएलो अछि‍। समैक हि‍साबसँ नीक केना हएत? कोनो पोखरि‍सँ अछींजल भरब तखन ने उचि‍त होइ छै जखन जल असथि‍र रहल, जइसँ ने चहल-पहल रहत आ ने गादि‍-गंधक संभावना रहत। मुदा लुटनी भैजीकेँ टारबो असान नै। एक कालखंड धीरू भैया आ लुटनी भौजी गामक नेतागि‍री कऽ चुकल छला। ओना लुटनी भौजी बि‍नु पेनक लोटे जकाँ छेली मुदा जासुसी लेल तँ ओहने फूटल-फाटल, पचकल-पुचकलक ने जरूरति‍ होइ छै। तइमे लुटनी भौजी सोल्हन्नी उपयुक्‍त छेलखि‍न। ओना, सभ बुझै छला जे लुटनी भौजीक बात आ उनटा गाड़ीक चालि‍, दुनू बरबरि‍ मुदा तैयो गाममे ओहएटा मरदक बेटी छथि‍ जे थनो-पुलि‍सक आगूमे ठाढ़ होइ छथि‍। जेहने रकार-तकार पुलि‍सक बोल तेहने तँ लुटनीओ भौजीक रेकार-तेकार छन्‍हि‍हेँ। गामक लोक जे बुझनि‍ मुदा सरकारी जासूससँ तँ नीक चरि‍त्रक छथि‍ए। केना नै छथि‍, गाम-घरक जासूरी मुखौती चलै छै मुदा सरकारीक तँ लि‍खौती चलैए। मलकारे ने महिंसि‍क घीकेँ गाएक घी आ गाएक घीकेँ महिंसि‍क घी मुखौतीओ बना लइए। आकि‍ कीनि‍नि‍हार बनौत? कीनि‍नि‍हारकेँ जे जरूरति‍ रहलै ओ मांग करैए। मलकारकेँ जेते जल्‍दी घी बि‍काएत ओते पहि‍ने ने काजसँ छुटकारा भेटत। जखन सभ अपने लाभक रोजगार करैए तखन मलकारेकेँ कि‍छु कहब उचि‍त हएत। लि‍खौतीए जासूसीमे ने कोनो कारखानासँ लाखक माल सैकड़ा बनैए आ सैकड़ा-लााख बनैए। भलहिं बीचमे इन्‍कम-टैक्‍सक जे करामात होउ। एहेन जासूसी लुटनी भौजी कहि‍यो ने केलनि‍ आ ने अखनो करै छथि‍। ओना केतबो माहि‍र लुटनी भौजी कि‍एक ने बूझल जाथि‍ मुदा सभ घरक जासूसी करैमे खि‍लैच‍ जाइ छथि‍। जे पुरुख कोट-कचहरीक गप अपन जनानाकेँ कहि‍ दइ छथि‍न। ओइ बुझैमे लुटनी भौजीकेँ बेसी भाङठ नै होइ छन्‍हि‍ मुदा जइ घरक जनानाकेँ अपन घरक बात कतए बाजी, कते बाजी, कतए नै बाजी इत्‍यादि‍क ज्ञान छन्‍हि‍, ओइ घरक भाँज बुझैमे भौजी हारि‍ जाइ छथि‍। जराएल मन भौजीक रहबे करनि‍। कंठ फाड़ि‍ दोहरी अबाजमे प्रश्न दोहरबैत बजली- “हमरा बातपर कान कि‍अए ने दइ छी जे मने-मन गुड़-चाउर फँकै छी।” जहि‍ना आमक डारि‍केँ दोहरी दोम पघि‍लल, घुलल आ कठगर तीनूकेँ झखबए लगैए तहि‍ना धीरू भैयाकेँ लुटनी भौजीक बात सुनि‍ भेलनि‍। मुदा मन तँ पहि‍ने गंगा संकल्‍पकेँ जपैत रहनि‍ जे सासु-पुतोहुक झगड़ाक फरि‍छोटमे नै पड़ब। ई कि‍ कोनो झगड़ा छी। सोल्हन्नी रगड़ा छी। ने तँ वएह बेटी हँसी-खुशीसँ माएक घर लक्ष्‍मी बनि‍ बीस बर्ख बि‍तबै छथि‍ आ सासुर अबि‍ते सासु चुड़ैल बनबए लगै छन्‍हि‍। एकरा रग्गड़ नै कहब तँ की कहब। सोझ बात अछि‍, परि‍वारक कोनो काज करैसँ पहि‍ने सासु पुतोहुसँ पूछि‍ लेथुन जे कनि‍याँ ई काज अहाँ नैहरमे केना करै छेलौं। दुइए रंगक जवाब भेटत, या तँ नै कएल अछि‍ वा केलहा ढंग कहि‍ देब। कारणो अछि‍ जे एक्के मि‍थि‍लांचलक बीच क्षेत्र-क्षेत्रक वि‍न्‍यासो बनबैक आ बाजबोक आ पावनि‍योँ‍-ति‍हारक संग गीतो-नादक रूप लगल-अलग अछि‍। तइले जे सासु भागलपुरक चलनि‍केँ अधला आ मधुबनीकेँ नीक कहथि‍, कते उचि‍त हएत। गाम-गामक बीच ढेरो रंगक खाधि‍ बनल अछि‍। जे खान-पीन, ओढ़ब-पहि‍रब, बाजब-भूकबसँ लऽ कऽ गीत-नाद, वि‍धि‍-बेवहार धरि‍मे पसरल अछि‍, तैठाम...। एक तँ ओहि‍ना धीरू भैयाक मन रस्‍ताक चालि‍सँ असोथकि‍त रहनि‍, तैपर लुटनी भौजी आरो नम्‍हर-नम्‍हर चेका काटि‍-काटि‍ लादैत रहनि‍। धीरू भैयाक मन गवाही दैत कहलकनि‍ जे नीक हएत लुटनीए भौजी कि‍अए ने हमर बेथा बुझथि‍। सभकेँ अपन-अपन बेक्‍ति‍गतो आ समाजि‍को कि‍छु समस्‍या होइ छै। मुदा से लुटनी भौजी मानथि‍ तखन ने, ओ तँ अपने ताले बेताल छथि‍। बेतालो कि‍अए ने रहती। मनमे ओहि‍ना छोटकी पुतोहुक बात नचैत रहनि‍ जे ‘आब‍ हि‍नकर भानस नै करबनि‍। अपन कइए कऽ खथु‍ वा नै खथु हमरा कोनो मतलब नै।’ मुदा से मन मानैले तैयारे ने होन्‍हि‍। सासु-पुतोहु दू पक्ष भेलौं जौं दुनू पक्षक बीच सोझहा-सोझही किछु टक्कर हएत तखन आगूक रस्‍ता कि‍म्‍हर बनत। या तँ एक गोटे पटका खसि‍ पड़ए, या तँ दुनू दि‍ससँ तेहेन देवाल ठाढ़ भऽ जाएत जे रस्‍ते रोका जाएत। तूफानी धाराकेँ सेहो रोकल जा सकैए, ओना‍ धार बनब, पहाड़ ढाहब धि‍या-पुताक खेल नै जे साधन छै ओ बि‍नु अपनौने थोड़े हएत। केतौ बान्‍ह बन्‍हैक जरूरत होइ छै तँ केतौ छोट-छोट नासी-नहर बना पानि‍क वेगकेँ कम करैत रोकल जा सकै छै। तँए नीक हएत जे एक दि‍स भौजीकेँ चाहो-पानक आग्रह करि‍यनि‍ आ दोसर दि‍स पहि‍लुका पुतोहुक चर्च ठाढ़ केने मन ससरबे करतनि‍ तइसँ तम-तमी कमतनि‍ तखने जान बँचत। झगड़ो-झगड़ा सन रहए तखन ने। ओहन झगड़ा जेकरा हजारो ठाम गीरह-गाँठ पड़ल छै तैठाम तँ न्‍यायालय लेल बेसी उचि‍त यएह ने हएत जे दुनू पक्ष अपनेमे मुँहमि‍लानी कऽ न्‍यायमूर्तिसँ हस्‍ताक्षर करबा लि‍अए। जेठकी बेटीकेँ धीरू भैया कहलखि‍न- “बुच्‍ची, कनी भौजीओकेँ चाह पीआ दहुन आ हमरो पि‍याबह। बड़ीकालसँ चाह पीअक मन होइए।” धीरू भैयाक जाल सुतरलनि‍। ओना घुमौआ जाल नहि‍येँ रहनि‍, मुदा तैयो चाह हाथमे लइते लुटनी भौजीक मुँह टुसकि‍एलनि‍। मुँहक टुसकी देख धीरू भैया टि‍पलनि‍- “पहि‍लुका पुतोहुक घरदेखी ओहि‍ना मन अछि‍ भौजी। अहाँ बि‍सरि‍ गेलि‍ऐ?” सह पाबि‍ लुटनी भौजीक मन तेसर पुतोहुकेँ छोड़ि‍ पहि‍लुकाकेँ झोंट लपकलक। बजली- “अपन केलहा काज लोक वएह ने बि‍सरैए आकि‍ बि‍सरए चाहैए जे अधला रहै छै, मुदा नीक केना बि‍सरि‍ जाएत। अहाँ तँ ओइ काजमे अगुए रही, कहू जे कोन धरानी पुतोहुकेँ घर अनने रही।” लुटनी भौजीक दोहरी पंच बनि‍ते धीरू भैया कहलखि‍न- “ओना मुँहपर केकरो बड़ाइ आकि‍ छोटाइ चटुकारी भेल मुदा नीक कि‍ अधला बजलो नै जाए सेहो तँ नीक नहि‍येँ हएत। केतौ अधलाकेँ नीक दबतै तँ केतौ नीककेँ अधला दबतै। एहने बात अखन उठि‍ गेल अछि‍। जे समाङ वा कुटुम घर छोड़ि‍ परदेश जा घर बना लेलनि‍, पैघ बनि‍ गेला। जौं कोनो काज-पीहानीमे भाग लइले नोत-हकार देबनि‍ तखन जौं अबै-जाइक गाड़ी-बस, जहाजक भाड़ा-कि‍राया नै देबनि‍ तँ कि‍ हुनका मान-मर्जापर नै पड़तनि‍। मुदा तइ संग ईहो प्रश्न तँ जोड़ले अछि‍ जे जइ पेटक खाति‍र गामसँ हजारो कोस दूर भगलौं ओइ धरती धारण केनि‍हारकेँ नै परेखि‍ पाबी। खैर जे होउ...।” मुस्‍की दैत धीरू भैया पुन: बजला- “मुदा ओ बात हम कहि‍यो ने अहाँक बि‍सरब।” ‘बि‍सरब’ सुनि‍ लुटनी भौजी अन्‍हरोखमे फुलाइबला फूल जकाँ हलसि‍ कऽ खि‍लैत पुछलखि‍न- “कोन बात कहलि‍ऐ बौआ?” “वएह-वएह! अहाँ बि‍सरि‍ गेलि‍ऐ?” “एँह, कि‍ कहब काजक तेहेन ओझराैठ होइ छै जे कोन बात लोक मोन राखत आ कोन बात नै मन राखत। काजो करैत-करैत कखनो काल मन हरा जाइ छै कि‍ने।” सि‍मसि‍माएल लुटनी भौजीक मन देख धीरू भैयाक मन सेहो थीर भेलनि‍। बजला- “पहि‍ल बेटाक घरदेखीमे जे अहाँ सभकेँ बर-बरी खुऔने रहि‍यनि‍, तही दि‍न ने बेटीबला सभसँ कहबा नेने रहि‍यनि‍ ने ‘एते रंगक बर-बरी हम नै खुआ पाएब।” जहि‍ना हौहैठ कलकैल कुरि‍यबै काल सुआस पड़ै छै तहि‍ना धीरू भैयाक बात सुनि‍ लुटनी भौजीकेँ पड़ए लगलनि‍ बजली- “कोन परगनाक बेटी हमरासँ लूड़ि‍गर अछि‍, सात-परगनाक बर-बरी बनबैक लूड़ि‍ ऐ देहमे गहना जकाँ सजा कऽ रखने छी।” बजैत-बजैत लुटनी भौजी झोंक दैत झोंकली- “अखुनका लोक कहत जे हम बड़ लूड़ि‍गर छी, चलह ते अखनो हमरा सेने भानसमे!” चुटकी लैत धीरू भैया कहलखि‍न- “यएह बात भरि‍सक छोटकीओ पुतोहु बूझि‍ गेली, तँए भानस करब छोड़ि‍ देलनि‍।” जहि‍ना लुटनी भौजीक सनक आगू ससरल रहनि‍ धीरू भैयाक बात सुनि‍ तहि‍ना ढील भऽ गेलनि‍। पुन: पहुलके पुतोहुक चर्च उठबैत बजली- “ओहो पुतोहु कि‍ कोनो अधला छथि‍, मुदा ई दोख तँ छन्‍हि‍हेँ ने जे जइ घरमे थेहगर सासु रहती ओइ घरक जुइत पुतोहुक हाथमे केना जाएत। बेटा बेटी परि‍वारमे होइ छै। आनक बेटी आनक बेटीक संग केहेन बेवहार राखत, ई बात तँ माइए-बाप ने बूझि‍ सकैए आकि‍ कनि‍याँ-मनि‍याँ।” बजैत-बजैत लुटनी भौजीक मन चढ़लनि‍। धीरू भैया कहलखि‍न- “देखू, ओइ पनचैतीमे बेसी दोख अहींक रहए। पुतोहु जकाँ कहि‍यो जेठकी पुतोहुकेँ नै बुझलि‍ऐ।” मन पाड़ैत लुटनी भौजी बजली- “देखि‍औ बौआ, जेते दोखी अहाँ बनबै छी तेते नै छी। कनी-मनी दोख केतौ भऽ गेल होइ से भऽ सकैए मुदा जेते बुझै छी तेते नै छी।” “केना नै रहि‍ऐ। देखै छेलौं जे चि‍चि‍या-चि‍चि‍या पुतोहुकेँ सरापै छेलि‍ऐ आ कहै छी जे केना केलि‍ऐ।” “ऐमे हम की दोखी भेलौं?” “ऐमे अहाँ ई दोखी भेलि‍ऐ जे एक तँ ओहुना बेटी नैहरक मुँह पौतीमे बन्न कऽ लइए, तैपर जे सासु साँढ़-पारा जकाँ ढेकरि‍-ढेकरि‍ टोकारा देथि‍न तँ कि‍ ओ पशु-मुँह कते दि‍न बरदास करत। अहींक जे पुतोहु छथि‍, कि‍अए ने बेटी जकाँ चुचकारि‍ कऽ गप करै छेलौं। जे अनठि‍या माल-जाल जकाँ ढूसि‍ लइ छेलि‍ऐ।” अपन तर्क कमजोर देखि‍ लुटनी भैजी छछलैत बजली- “बौआ, ऐमे दोसर भाँज रहै जे हमहूँ नै बजलौं।” चुम्मक जकाँ जेते धीरू भैया लुटनी भौजीकेँ पकड़ए चाहथि‍ तेते लुटनी भौजी, जहि‍ना लोहामे आन-आन द्रव्‍य मि‍लौलासँ चुम्‍मकीय शक्‍ति‍ कमजोर होइ छै तहि‍ना आन-आन बात जोड़ए लगली। धीरू भैयाक मन गबाही देलकनि‍। बजला- “कथी दोसर भाँज रहए बाजू। अखने कि‍ भेल, आबो तँ बूझब ने?” धीरू भैयाक प्रश्न सुनि‍ लुटनी भौजीक मन धकमकेलनि‍। मनक एक पक्षक कहब रहनि‍ जे घरक कोनो बात छि‍पा कऽ कि‍अए राखब। जखनि‍ समाजक एकटा खुट्टा हमहूँ छि‍ऐ तखनि‍ गराड़केँ कि‍अए चोरा कऽ राखब! मुदा दोसर पक्षक कहब रहनि‍ जे पसीना चुबौल काज लोक लग बजैमे हर्ज नै। पसीनाक धार आनोक-आन देखैए। मुदा बि‍नु पसीना चुबौल काजक आमदनी बजलासँ केहेन हएत? कि‍न्‍तु डारि‍क चुकल बानर जहि‍ना अपनाकेँ मरले बुझैए तहि‍ना मनमे अबि‍ते फरकि‍ कऽ लुटनी भौजी बजली- “अहाँ सभ जे पंचैतीमे जाइ छि‍ऐ तँ झगड़ाकेँ उनटा-पुनटा कऽ नै देखै छि‍ऐ। जखन उनटा-पुनटा कऽ देखबै तखने ने सुपत बात बाजल हएत।” जइ आवेशमे लुटनी भौजी बजली ओइ आवेशकेँ धीरू भैया सूखल पछि‍या हवा जकाँ वि‍र्ड़ो बुझलनि‍। दस-बीस मि‍नटक खेल, भलहिं घर-दुआरक कोन बात जे मोटगर-मोटगर गाछो कि‍अए ने उखाड़ि‍ दि‍अए...। अपनाकेँ समटैत धीरू भैया बजला- “आबो कि‍ भेल, बाजू। अखनि‍ तँ दुइए गोरे छी, कोनो बात झाँपि‍-तोपि‍ नै राखू। जौं पनचैतीमे इशारोसँ आएल हएत आ ओइपर पंचक धि‍यान नै गेल हेतनि‍, तैठाम पंच दोखी। मुदा जैठाम काजक कोनो गपे ने उठै, तैठाम तँ घरबैए दोखी। छातीपर हाथ राखि‍ बाजू।” धीरू भैयाक जि‍ज्ञासा पाबि‍ लुटनी भौजी सहमि‍ गेली। सहमैक कारण भेलनि‍ परि‍वारक अर्थवि‍न्‍दु केना दोसर लग बाजब। अखनि धरि‍ तँ आबि‍ए रहल अछि‍ जे अपन मेन्‍टेन करैले भुखलो पेट बाबरी उनटा मुँहमे पान फुलबैत चलि‍ते अछि‍। जहि‍ना बि‍नु गुनाक रिंच धीरू भैया लगा खोलए चाहै छथि‍ तहि‍ना लुटनी भौजी दालि‍ तँ बाजथि‍ मुदा राहड़ि‍, कि‍ खेसारी, से छि‍पबैमे माहि‍र। बजली- “मन अछि‍ कि‍ने जे अहूँ रस्‍तेपरसँ सुनैत रहि‍ऐ।” “नै मन अछि‍। कनी मन पाड़ि‍ दि‍अ।” सह पाबि‍ लुटनी भौजी छड़पि‍ बजली- “अहीं सन-सन बि‍सराह पंच न्‍यायालयमे अपन गवाही बदलि‍ दइ छै।” छि‍ड़ि‍आएल लुटनी भौजीकेँ देख धीरू भैया कहलखि‍न‍- “सुनू, जे गप करै छी तेकरा पहि‍ने मुड़नसँ सराध धरि‍ वि‍चार कऽ लि‍अ तखन दोसर बात चालब। अच्‍छा, ओइ दि‍नका मन पाड़ि‍ दि‍अ जइ दि‍नक नाआें कहै छी।” जाल सुतरैत देख लुटनी भौजी टुसि‍आइत बजली- “सुनने रहि‍ऐ ने जेठकी पुतोहु बाजल रहए। ई केहेन भेल जे एक शीशी लोहासव भाए दऽ गेलै तेकर उपराग दि‍अए, से एहेन होइ। कहै कि‍ नै जे नैहरसँ दबाइ-दारू नै अबि‍तए तँ कहि‍या ने मरि‍ गेल रहि‍ताैं।” “नै मन पड़ैए। कनी सरि‍आ कऽ मन पाड़ि‍ दि‍अ।” जहि‍ना खि‍स्‍सकरकेँ सुनि‍नि‍हार भेटि‍ते मन खुशी भऽ जाइ छै तहि‍ना पुतोहुक पि‍तमरी ओढ़ि‍ लुटनी भौजी बजली- “अहींकेँ पुछै छी जे एकटा लोहासवक शीशीकेँ केते दाम हेतै। बड़े हेतै तँ एक सए रूपैआ। एक दि‍नक एक गोरेक खेनाइ केते होइ छै। से जोड़ि‍ लि‍अ। तखन मि‍ला कऽ देखि‍औ जे तीस दि‍नक खर्चा जोड़लक तेकर कोनो मोजरे ने आ एक शीशी लोहासव जोड़ि‍नि‍हारक ढोल पीटए, से अहींकेँ बरदास हएत?” धीरू भैया- “बरदास हुअए आकि‍ नै हुअए, मुदा जे परि‍वार तीस दि‍नक खर्च जोड़ैए तइ परि‍वारमे एक शीशी दबाइए कि‍अए बाहरसँ औत। मुदा नैहरक देल वस्‍तुकेँ बेसी आ सासुरकेँ कम कहब केहेन हएत। होइ कि‍अए अछि‍, होइए ऐ दुआरे जे नैहरक सम्‍पति‍क नाओंपर परि‍वारमे चोरि‍ पनपैए। तँए कि‍अए ने सम्‍मिलित परि‍वारक बीच बाहरक सभ वस्‍तु, सहबक आँखि‍क सोझहा आबि‍ जाउ। जखन परि‍वार सबहक छि‍ऐ तँ परि‍वारक वस्‍तुओ ने सबहक भेल?” बोहि‍याइत धीरू भैयाकेँ देख बीचेमे लुटनी भौजी टोकलकनि‍- “एना नै हएत। जखन अहूँ सुनए चाहै छी आ हमहूँ कहैए लेल एलौं तखनि‍ शुकचेनसँ सुनिए लि‍औ।” कहि‍ लुटनी भौजी चौकीपर पल्‍था जमा बैसली। भौजीक नि‍श्चि‍न्‍ती देख धीरू भैया बूझि‍ गेला जे पेटमरूक घरमे दुपहरि‍या सि‍दहा रहने भि‍नसुरका उखड़ाहामे नि‍श्चि‍न्‍ती आबि‍ए जाइ छै। तहि‍ना भरि‍सक भेलनि‍ अछि‍। मुदा हमहूँ तँ आब अपनाकेँ पहि‍लुका जकाँ नहि‍येँ बुझै छी। सबहक झगड़ा हमरे छी से बुझै छेलौं, मुदा गंगा डूम देला पछाति‍ एते तँ भेल जे सभ झगड़ा बूझब अपन छी। झगड़ा तँ झगड़ौआक छि‍ऐ। जखन भौजी आशा लगा कहए एली तँ पनचैती करए नै जाएब, मुदा चलैक रास्‍तामे जतए जे गीरह-गेठी छै तेकरा ताकि‍ नै बेराएब सेहो तँ नीक नहि‍येँ भेल। जहि‍ना माघक सि‍ताएल कुत्ताकेँ छाउरक ढेरीपर बैसल देख उकट्ठी छाउरबला, लोटो भरि‍ पानि‍ ऊपर उझैल दइ छै तहि‍ना धीरू भैया भौजीपर उझलैत बेटीकेँ कहलखि‍न- “बुच्‍ची, बहू दि‍न भऽ गेल लुटनी भौजीक संग बैस खेना, तँए पहि‍ने जलखै लाबह। पछाति‍ कलौऔ खुअबि‍हअ।” धीरू भैयाक आग्रह सुनि‍ते लुटनी भौजीकेँ पछि‍ला एकटा घटना मन पड़लनि‍। घटना मन पड़ि‍ते कनबात बि‍सरि‍ लुटनी भौजीकेँ धीरू भैयाक बात अनसून हुअए लगलनि‍। जेकर फल भेलनि‍ जे वि‍चारमे जबरदास धक्का लगलनि‍। जे पाछू बुझलखि‍न‍। मन पड़लनि‍ ओ घटना जइमे लुटनी भौजी पार्टीक पंच बनि‍ पनचैतीमे गेली। जैठाम बूझि‍ नै पेली जे ई जगह केहेन छै। गाम-गामक चालि‍-ढालि‍ भि‍न्न-भि‍न्न छै। जइसँ गाम-गामक जगहो चोटाह भऽ गेल छै। कोनो गामक बेसी लोकक हाथमे कि‍ताब रहै छै तँ कोनो गामक बेसी लोकक हाथमे चुटपुटि‍यासँ नमहरका हथि‍यार रहै छै। कोनो गामक बेसी लोकक हाथमे खेलक सामग्री रहै छै तँ कोनो गाममे हँसुआ-खुरपी-कोदारि‍, कोनो गामक बेसी लोकक हाथमे रि‍ंच-हथौरी, पेंचकश रहै छै तँ कोनो गाममे एजेंसीक फार्म-जि‍ल्‍द। गपक हलहलीमे लुटनी भौजीकेँ शर्बतमे बीख मि‍ला देने रहनि‍। संयोग नीक रहलनि‍ जे लोकक बीच रहथि‍, उठा-पुठा कऽ डॉक्‍टर लग जा जान बचौलकनि‍। तही दि‍न लुटनी भौजी कान धऽ लेलनि‍ जे जगह देख कि‍छु करक चाही। मुदा लुटनी भौजीक भक्क तखनि‍ खुजलनि‍ जखनि‍ धीरू भैया दोहरा कऽ आग्रह केलकनि‍- “पहि‍ने कि‍छु खाइए लेब तखन गप-सप्‍प हेतै।” ‘खेनाइ’ सुनि‍ लुटनी भौजी चमैक बजली- “खाइ-पीबैक अरसट्ठा छोड़ू। गपेमे कनी तेजी आनि‍ लि‍अ। अखनि‍ खाइ बेरो ने भेल अछि‍। अहुना काज-उदममे कनी-मनी अबेर-सबेर भइए जाइ छै।” अपन जाल सुतरल देखि‍ धीरू भैयाक मन असथि‍र भेलनि‍ जे जहि‍ना गोनू झाक बि‍लाइ दूध देखि‍ भागै तहि‍ना खेनाइक नाओंपर लुटनी भौजीकेँ भगा सकै छी। मन थीर होइते धीरू भैया कहलखि‍न- “अहीं तेजीओक बात कहै छी आ अनठेबो करै छी?” “नै-नै, अनठबै कहाँ छी। एकटा ओझड़ी रहए तखनि‍ ने, तहूमे तेहेन-तेहेन भत्ता सभ धेने अछि‍ जे केकर मुँह केम्‍हर छै आ केकर नाङरि‍ केम्‍हर छै जे बति‍या जकाँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ ने देखए पड़ैए। ई तँ नै जे घेरा-झुमनीक बीआ जकाँ रोपैकाल केकरो मुड़ी अकास दि‍स आ केकरो पताल दि‍सकेँ दऽ दि‍अौ आ जनमै काल जे पछुआए ओकरा भोरेसँ गरि‍आबी।” जहि‍ना कथाकार लोकनि‍केँ सालक कि‍छु मास वि‍षैए खेजैमे राजगीर चलि‍ जाइ छन्‍हि‍ तहि‍ना लुटनी भौजीक कथा हराइत देख धीरू भैयाक हजार नम्‍बर बि‍जली बौल जकाँ भुक्क दऽ मनमे उठलनि‍, जहि‍ना शि‍कारी जालक एकटा सूत पकड़ि‍ सौंसे जाल खोलि‍ लइए, तहि‍ना तँ गपे-गपमे झगड़ोक रग्‍गड़ पकड़ि‍ खोलल जा सकै छै। बजला- “जएह सोझहामे पड़ै तेकरे अन्‍है जकाँ कि‍म्‍हरोसँ मुट्ठीएने आउ। अपने ने देखबै जे अगि‍ला जनममे कोन साँप हएत।” धीरू भैयाक सह पाबि‍ लुटनी भौजी समधि‍-समधि‍न दि‍स छड़पैत बजली- “कहू तँ एहेन बात अहींकेँ बरदास हएत?” बि‍नु मुड़ीक बात सुनि‍ धीरू भैया अकचकेला। कालीए ने अन्‍हरि‍या राति‍ छी। जि‍नकर जि‍ह्वा लपकि‍-लपकि‍ दुष्‍ट नाश करै छन्‍हि‍। मुस्‍की दैत भौजीकेँ टुसकि‍यबैत कहलखि‍न- “एना झाँपि‍-तोपि‍ बजने काज नै चलत। उघारि‍-उघारि‍ बाजू।” सह पाबि‍ सहटैत लुटनी भौजी आँखि‍-कान, मुँह-नाक आ दहि‍ना हाथक पाँचो ओंगरी छि‍ड़ि‍यबैत बजली- “घरक बात छी आनठाम बजैमे लाज होइए मुदा अहाँ तँ जि‍नगी भरि‍क संगी छी, बारह-बजे दि‍न आकि‍ बारह बजे राति‍ संगे लोकक बीच रहलौं, दुनू गोरेक तीत-मीठ दुनू गोरे जनै छी। तँए कहै छी। कहू जे ई केहेन बात सदि‍खन जेठकी कहै छेलए जे हमरा माएक पएर धोनो जकाँ हि‍नकर छीछा-बीछा नै छन्‍हि‍।” लुटनी भौजीक बात सुनि‍ धीरू भैया पुछलखि‍न- “ऐमे अहाँक कोन लखराज-बह्मोत्तर चलि‍ गेल। जे बात पुतोहुकेँ माए-बापक सि‍खौल मन नै रहलनि‍। जौं मन रहि‍तनि‍ तँ वि‍चारि‍ कऽ ने बजि‍तथि‍ जे जखन दुनू समधीनक बीच हम बेटी-पुतोहु दुनू भेलौं, तखन हमरा लि‍ऐ दुनू ने एक्के रंग। एक जि‍नगीक पूर्ब पक्ष आ दोसर उत्तर पक्ष। तइले एते अहीं कि‍अए आमील पीने छी?” मीठगर बात रहि‍तो लुटनी भौजीकेँ अमताइन लगलनि‍। मन गबाही दइले तैयार भेलनि‍ जे कोनो बौस रसगुणसँ खट्टा होइए मुदा जे रसगुणसँ खट्टा नहि‍योँ होइए ओहो बाइस-तेबाइस भेने तँ खटाइए जाइए। जौं से नै होइए तँ दहीक सुआद खट्टा तँ नै छि‍ऐ मुदा चीनीक काज कि‍अए पड़ै छै। पेरासुट जकाँ मजगूती लुटनी भौजीक मुँहकेँ धकेल खोललकनि‍- “अच्‍छा अहीं कहू तँ एके विद्यार्थी कौलेजमे प्रोफेसरसँ पढ़ैए, हाइ स्‍कूलमे उच्‍च शि‍क्षकसँ तइसँ कम मि‍ड्ल स्‍कूल आ सभसँ पहि‍ने अपना परि‍वारक भाए-बापक संग अगुआएल भाए-बहि‍नसँ सेहो पढ़ैए, तइमे के कम श्रेष्‍ठ के श्रेष्‍ठ आ के बेसी श्रेष्‍ट भेल, से पहि‍ने बुझा दि‍अ।” लुटनी भौजीक प्रश्न सुनि‍ धीरू भैया टेढ़ रस्‍तापर जहि‍ना साइकि‍लक मुँह घुमौल जाइ छै तहि‍ना भौजीक मुँह घुमाएब बुझलनि‍। तेहेन नेतागि‍रीबला सबाल पटकए चाहै छथि‍ जे अनेरे दि‍नक-दि‍न मासक-मास खाइबला अछि‍। मुदा आँखि‍-मुँहक चढ़ती देख अपनाकेँ चढ़बैत बजला- “देखू, अखनि‍ धरि‍ नै कहने छेलौं मुदा जखन गप-पर-गप उठैए तखनि‍ कहिए दइ छी।” हराएल बौस भेटैक संभावना देख जहि‍ना जिज्ञासा जगैत तहि‍ना जि‍ज्ञासु लुटनी भौजी बजली- “मनक बात जे चोरा कऽ रखैए ओ चोरे भेल। अखनि‍ धरि‍ अहूँ सएह भेलौं।” लुटनी भौजीक तीनकमियाँ बंशी धीरू भैयाकेँ लगलनि‍ जरूर मुदा जीहमे नै कातक गलफरमे झि‍ट्टा मारने रहनि‍। जे कनीमनी धाउ भेने तँ छुट्टियो जाइ छै। मुदा अमती काँट नि‍कालैले बगूर आकि‍ बेलक काँटक जरूरति‍ पड़ि‍ते अछि‍। पुछलखि‍न- “कते दि‍न अहाँक जेठकी पुतोहु कहलनि‍ जे सासु-सासु जकाँ हुअए तखन ने, बुढ़ि‍या तेहेन लुपकाहि‍ छथि‍ जे भेल भानसपर चुल्हि‍ गरमे रहै छन्‍हि‍, केम्‍हरोसँ एकटा करैला, तँ केम्‍हरोसँ एकटा झुमनी नेने औती आ हाँइ-हाँइ कि‍ दू-तीनटा टुकड़ी तड़ि‍ लेती। तड़ै छथि‍ तइले दुख नै होइए मुदा तेहन अपसोगारथी छथि‍ जे आगूमे बैसल मुँह तकैत रहब, मुदा एक टुकड़ी देती नै।” कोठीक मुँहसँ जहि‍ना धान-चाउर भुभुआ खसैए तहि‍ना लुटनी भौजी भुभुएली- “बौआ, पेटक बात बजै छी। हमरा एक खढ़ इच्‍छा नै हुअए जे जेठकी साँझी रहै। तीनि‍टा बेटा अछि‍ तीनि‍टा पुतोहु हएत। अहीं कहू जे तीन-तीन गोटे जइ घरक भनसि‍ये भऽ जाएत तइ घरमे भानसक जोगार के करत। कनि‍येँ उच्‍छन्नर देने भीन भेल, अपन परि‍वारक भार उठौलक।” “सम्‍मि‍लि‍त परि‍वारक माने ई नै ने जे कि‍छु गोटे कमेलौं बाँकी सभ बैस खेलौं। सम्‍मि‍लि‍त परि‍वारक माने सम्‍मि‍लि‍त जि‍नगी होइ छै। तँए...।” धीरू भैयाक बात सुनि‍ लुटनी भौजी बजली- “अखनि‍ जाए दि‍अ।” ‘अखनि‍ जाए दि‍अ’ बजि‍ते लुटनी भौजीकेँ धुक दऽ मन पड़लनि‍ छोटकी पुतोहु। ओकरे कारनामा कहैले धीरू भैया ऐठाम आएल छी। तखने धीरू भैया चड़ि‍यबैत पुछलकनि‍- “देखू, बेर-बेर एक्के घरक पनचैती केने घर हेहरू भऽ जाइ छै। तँए जेते झगड़ा अछि‍ से सभटा आइए सुनि‍ लेब। बाजू, दोसर पुतोहु कि‍अए परदेश चलि‍ गेल?” पहि‍लुका पुतोहुक खेरहा ओराइते लुटनी भौजी खड़हीसँ नि‍कलि‍ परतीपर डण्‍ड-बैसकी करैत नढ़ि‍या जकाँ बजली- “देखि‍यौ बौआ, मझि‍ली सोहरदे मने गेल। कहि‍यो झगड़ा-झाँटी नै भेल। ओना झगड़ा-झाँटी करए चाहि‍तौं तँ दुनू साँझ होइतए मुदा अपने परहेज करैत रहलौं।” ‘अपन परहेज’ सुनि‍ धीरू भैया दोहरौलकनि‍- “कि‍ परहेज केलौं?” “कि‍ पुछै छी जेते करूतेल सात दि‍नमे खर्चा होइ छेलए तेते एक्के दि‍नमे करै छेली। मुदा घरक बात बूझि‍ केकरा कहि‍ति‍ऐ। लोक कहैत जे पुतोहुकेँ खाइओ ले ने दइ छै।” “अच्‍छा छोड़ू, भरि‍ दि‍न अहाँ पुतोहुकेँ नीक-नि‍कुत खुअबि‍ते रहलौं। परदेश कि‍अए जाए देलि‍ऐ। बेटा कमाइले गेल आकि‍ घर-दुआर बनबैले?” धीरू भैयाक प्रश्न लुटनी भौजीक मनकेँ हौंर देलकनि‍। जहि‍ना छाँछीमे दूध, मक्‍खन आ पानि‍ रेहीक बले संगे नचैत तहि‍ना लुटनी भौजीक मन नचलनि‍। बजली- “बौआ, ओकर बापो शहरे-बजारमे परि‍वार राखि‍ बेटीकेँ पढ़ेबो केलक आ ट्रेंनि‍ङो करा देलकै। ओतए ओ दुनू परानी नोकरी करत, कमाएत। ऐठाम कोन काज करैत, तँए वि‍चारेसँ जाए देलि‍ऐ।” “जहि‍ना दुनू जेठकी-छोटकी बेटा-पुतोहु घर छोड़ि‍ चलि‍ गेल तहि‍ना जौं तेसरो चलि‍ जाए तखन कि‍ करबै?” धीरू भैयाक प्रश्न लुटनी भौजीकेँ मरोड़ि‍ देलकनि‍। चारू दि‍स नजरि‍ दौगए लगलनि‍। मुदा, जवाबक कोनो बाट नै देख पाशा पलटैत बजली- “देखि‍यौ बौआ, गण्‍डा हुअए आकि‍ गाही, दर्जन हुअए आकि‍ सोरे, असल बेटा तँ दुइएटा ने होइ छै। औरो -बीचलका- संग तँ कटा-कटी भइए गेल छै।” ‘कटा-कटी’ सुनि‍ धीरू भैया प्रश्न उठौलनि‍- “कि‍ कटा-कटी भेल छै?” धीरू भैयाक प्रश्न सुनि‍ते लुटनी भौजी मचि‍यापर बैसल मचि‍बाह जकाँ मचमचबैत बजली- “जेना कोइ बि‍लेँतसँ आबि‍ कहै छै जे गामक कि‍छु ने बूझल अछि‍ तहि‍ना अनठा कऽ बजने नै हएत।” लुटनी भौजीकेँ धकि‍यबैत देख धीरू भैया बामा ठेहुनकेँ अरकबैत झमाड़ि‍ बजला- “अच्‍छा बाजू, कि‍ कटा-कटी भेल छै?” धीरू भैयाक आग्रह सुनि‍ लुटनी भौजी अगुआ जकाँ अगराइत बजली- “अहाँकेँ नै बूझल अछि‍ जे जेकरा चारि‍ या पाँचटा बेटा रहै छै, ओइमे बीचला बि‍नु कि‍छु केनौं पाक-साफ रहैए, मुदा से जेठका छोटकाकेँ समाज बनए देत?” लुटनी भोजीक प्रश्न सुनि‍ धीरू भैया बौलकेँ आगु बढ़बैत गोलकीमे सरि‍आ कऽ फेकलनि‍- “अहाँ मने बीचला जेते बेटा भेल ओ बेटा भेने ने कएल?” दुनू हाथसँ गोली-बौलकेँ पकड़ि‍ जहि‍ना गोल होइसँ बँचा लइए तहि‍ना लुटनी भौजी बजली- “बेटा भेबो कएल नहि‍योँ भेल। रीति‍-रेबाजकेँ मानबै तँ नै भेल, अपन बेटत्‍व बुझबै तँ जहि‍ना एकटासँ छोट अछि‍ तँ दोसरसँ नम्‍हरो तँ अछि‍ए कि‍ने।” लुटनी भौजीक बात सुनि‍ दोसर दि‍स मुड़ैत धीरू भैया बजला- “एहनो बेटा -बीचला- तँ होइते छै जे जेठका-छोटकाक सीमा तोड़ि‍ माए-बापक सेवा करैत अपनाकेँ जेठका, मझिला, सझि‍ला, छोटकाक पति‍यानीक बीच ठाढ़ भऽ जाइए।” धीरू भैयाक प्रश्नक उत्तर नै पाबि‍ लुटनी भौजी करोटि‍या मारलनि‍- “देखि‍यौ, जेठका-छोटका नै कोनो बात भेल। जौं से होइत तँ हजारक-हजार बेटाबला सगरकेँ कि‍यो काज नै देलकनि‍। खाइओ बेर भेल जाइए मुदा बात पछुआएले रहि‍ गेल अछि‍।” “अहाँ तँ अपने खापड़ि‍क मकइ जकाँ कुदि‍-कुदि‍ छि‍ड़ि‍येबो करै छी आ तीसी जकाँ चनचनेबो करै छी। बाजब कि‍ फेर बौएबे करब।” टि‍कासनपर बैसल घरछाड़ा जकाँ मठौठक खढ़-बत्ती अजमबैत अजमौनि‍हार जकाँ लुटनी भौजी बजली- “अहीं कहू जे ई केहेन भेल जे ठेँसगरि‍ जकाँ बाजलि रहए‍।” ‘ठेँसगरि’‍ सुनि‍ धीरू भैया टि‍पलनि‍- “खाली टीकमे ककही चलौने बाबरी नै होइ छै। सरि‍आ कऽ बाजू जे झगड़ाक जड़ि‍ कि‍ अछि‍?” “झगड़ाक जड़ि‍ कि‍ रहत? अहाँ नै देखै छि‍ऐ जे घरसँ बलजोरी घि‍च-घि‍च स्‍त्रीगणक संग कि‍ होइ छै, तैठाम कहैए जे कमरा लऽ कऽ बि‍आह-मुड़नमे फोटो ग्राफी करब। तेकरा हम रोकबै नै। लुच्‍चा-लम्‍पटक बरिआती भऽ गेल अछि‍ आकि‍ नीक लोकक अछि‍। ताड़ी-दारू पीब छौड़ा सभ नाच करैए तैठाम इज्‍जत-आवरू लोक अपने नै बचाएत तँ आन गोरे लेतै कि‍ बचौतै।” लुटनी भौजीक बात सुनि‍ धीरू भैया ठमकला। अपनाकेँ नि‍रूत्तर पाबि‍ पुछलखि‍न- “बीचमे तँ बेटो अछि‍ तेकरा पहि‍ने कि‍ कहलि‍ऐ?” बेटाक नाओं सुनि‍ते लुटनी भौजी चौकीपर सँ कूदि‍ नीचा आबि‍ बजली- “ओ तँ हि‍जरा छी हि‍जरा। ने मौगीए ने पुरूखे। बलि‍गोबि‍ना। ओकरे सहसँ तँ पुतोहुओ दूरि‍ भेल अछि‍। ओइ ि‍नर्लज्‍जाकेँ कथी‍ कहबै?” “तखन मुँह कि‍अए तकैत रहै छी, दुनू हाथे झोंटा पकड़ब से नै?” “मन अपनो होइए मुदा फेर सोचै छी कहीं हाथा-वाँही भेल तँ ऐ बुढ़ाड़ीमे मारि‍ खाएब, नै जे झोंटा-झोंठौअलि‍ भेल तँ ओकर तड़गर केश छै गोटे-आधे उखड़तै मुदा अपन तँ पकलाहा गोट-गोट कऽ बीछा जाएत, तेकरो डर होइए कि‍ने? एकबेरक जौं पकलाहा केश रहैत तँ ओते दुख नहि‍येँ होइतए मुदा समरथाइएसँ जे गोटि‍-पङरा शुरू भेल ओ आब सोलहन्नी भेल।” ‘डर’ सुनि‍ धीरू भैया बजला- “बेटा-पुतोहु दुनूकेँ कहि‍ दि‍औ, तुकपर खाइले दि‍अए। ऐसँ बेसी आब कथीक जरूरति‍ अछि‍। इन्‍दि‍रा अवासक घर भइए गेल, तेहेन-तेहेन स्‍वीटर, कम्‍मल, साड़ी पुतोहुओ पठा दइए आ बड़ो-वि‍दाइ तेते होइए जे लत्ता-कपड़ाक जरूरते ने अछि‍। तखन कि‍ चाही? ओना करैए वा नै करैए ई ओकर धर्म काज भेलै। जौं नहि‍योँ करत तँ अहाँकेँ छोड़ि‍ भगती से काज चलतनि‍।” धीरू भैयाक बात सुनि‍ लुटनी भौजीकेँ कि‍छु हराएल बौस जेना भेटलनि। पुछलखि‍न- “नै बुझलौं जे कि‍ कहलि‍ऐ, नै बनतनि‍।” गदगदाइत लुटनी भौजीक चैहरा देख धीरू भैया कहलखि‍न- “जीता जीनगी अहि‍ना होइ छै हेबै करतै। कहुना अहाँ माए भेलि‍ऐ। जीबैसँ मरै धरि‍क भार ओकरा छै। से जाबे नै पुरौत ताबे परतवाएक भागी रहत। तँए अहाँ मुइलोपर बि‍सेबनि‍।” मुइलि‍क असरा देख लुटनी भौजीकेँ अपन ओछाइनि‍क जि‍नगी मनमे उठलनि‍। दबाइओ-दारू तँ करैए पड़तै...। धीरू भैया लुटनी भौजीक झगड़ा समापन केनौं ने रहथि‍ आकि‍ लुटनी भौजीक छोटका बेटा-सोमना आबि‍ रूआब झाड़ैत बाजल- “काका, ऐ बुढ़ि‍याकेँ पुछि‍यौ जे एहेन गप्‍पकरि‍ कि‍अए अछि‍ जे अपनो भूखे टटाइत हएत आ हमरो सभकेँ टटबैए।” सोमनाकेँ सम्‍हारैत धीरू भैया बजला- “पुरना गप-सप्‍प मन पड़ि‍ गेल छेलै तँए देरी भऽ गेल।” आँखि‍क इशारा लुटनी भौजीकेँ दैत सोमनाकेँ कहलखि‍न- “माएकेँ अण्‍डा-तण्‍डा खुअबै छहक कि‍ने?” सोमना- “की खुएबै, बुढ़ि‍या अपने हथकट्टू अछि‍।” अागू-आगू लुटनी भौजी आ पाछू-पाछू सोमना घरमुहाँ भेल। मुदा अमती काँटमे लुटनी भौजीक मन ओझराइते रहनि‍, होन्‍हि‍ जे अखन मुहेँ कान-तोपि‍ दि‍ऐ मुदा फेर सोचथि‍, एक तँ अबेरक सगुन छी जौं तेकरा भङठाइए लेब तँ अझुका दि‍ने ओहि‍ना रीब-रीबेमे चलि‍ जाएत। तँए चुपे रहब नीक। तहि‍ना सोमनाक मनमे अपन तँ कम्मो-सम्म मुदा घरवालीक बात कहैले आन गोटे लग कि‍अए गेल, से तामस रहै। होइ जे लोक जौं नीक कहि‍तए तँ अखने चारि‍ए थापरमे मुँह घूमा घर दि‍स कऽ दैति‍ऐ। मुदा एक तँ ओहि‍ना समाजमे अबाह छी तैपर जँ एहेन काज करब तँ आरो दोखी हएब। तँए चुपे रहब नीक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-४ ३.२.१.बिनीता झा-वरदान/तम्बाकू दिवस पर २.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-मतिभ्रम३.शेफालिका वर्मा-अहाँक गाम कतऽ अछि?/ पाहन अप्पन प्राण भेल! ३.३.अनिल मल्लिक-गजल ३.४.१.बाल मुकुन्द पाठक- गजल २.सुरेन्द्र शैल- मुदा करबै की?/ बटोही/ नवका महेशवाणी/ चुहाड़ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ४ टा गजल चारिटा गजल 1 खिडकी, केबार किछु नै, महल कोना भेलै ने रदीफ आ ने काफिया, गजल कोना भेलै । एसगर छलीह ओ आ छल दैत्य पांच टा नै जानि तमसगीरकें  रहल कोना भेलै  । ठीक छै वृद्धाश्रमे, हम आएब मासे-मासे ई बात अपन बाप कें  कहल कोना  भेलै । ओ खाइ छलि नून, मूर कि  गूड संगे रोटी कहू तं तीस साल धरि सहल कोना भेलै । जल, थल, अंतरिक्ष सभ भेल अपवित्र माफियाक सभठां एना दखल कोना भेलै । सरल वार्णिक बहर, वर्ण-16 2. सुरूज तरेगन चानक दुनिया नीक हमर भगवानक दुनिया । सोचू त आइ करैए की-की अयाचीक सन्तानक दुनिया । बीया थीक महाभारतके ‘निर्भया’क अपमानक दुनिया । जीवनकें उत्सव बनबैत छी नव-नव अनुसन्धानक दुनिया । देखू दारूमे डूबल अछि जप-तप-योग-धियानक दुनिया । रहए निरोग, विलक्षण आ पावन अन्ना केर अभियानक दुनिया । मात्रा16 प्रत्येक पांतीमे 3 जुनि पूछू की करै छी हम नित्य स्वयंसं लड़ै छी हम । काल्हि डरैत छलौं अहांसं आइ स्वयंसं डरै छी हम । हम सत्य कें झूठ बुझै छी झूठ कें सत्य बुझै छी हम । अहां जगै छी, हम सूतै छी अहां सुतै छी, जगै छी हम । लोक कनैए, हम हंसै छी लोक हंसैए, कनै छी हम । लोक बजैए, चुप्प रहै छी एसग’रेमे बजै छी हम । मोन होइछ त कानी-खीझी मोन भेल त नचै छी हम । कन्यादान लगैए मुश्किल वेद-पुराण जनै छी हम । शत्रु, मित्र, देवी आ देवता स’भ स्वयंमे तकै छी हम । सरल वार्णिक बहर, वर्ण-10 4. किछु गाबि लिय’, किछु गबा लिय’ जीवन थिक फगुआ, मना लिय’। ई सड़क बनल छै चलबा ले’ मोटर एहि ठाम सं  हटा लिय’। अछि मोन हमर त मिथिलेमे तनसं कतबो अहां खटा लिय’। हम तमसायब मैथिलीएमे अंगरेजी इ कतबो रटा लिय’। हमरो सहोदरे बुझू यौ भाइ हमरहु करेजसं  सटा  लिय’। नहि चीन्हय अपनो लोक  आब हे प्रभु अपने लग बजा लिय’। लछमी, दुरगा,सरस्वती बुझू हम लाज अहींक  छी,बचा लिय’। सरल वार्णिक बहर,वर्ण-12 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बिनीता झा- वरदान/ तम्बाकू दिवस पर २.शान्ति लक्ष्मी चौधरी- मतिभ्रम ३.शेफालिका वर्मा- अहाँक गाम कतऽ अछि?/ पाहन अप्पन प्राण भेल! १ बिनीता झा वरदान/ तम्बाकू दिवस पर १ वरदान भोर भेल हे सखी उठू लोढी आनी फूल आउ सजाबी माँ जानकीकँ  आउ करि हिनक श्रृंगार आउ शीश झुका पूजा करी  आउ सब मिल मनाबी जानकी जन्मदिवसक त्यौहार  आउ करी हम सब प्रार्थना  आउ नीक आचरणसँ  करियैन हुनक सम्मान जाइत पाँइत कए दूर भावनासँ  उठए ऊँच अहि माटिक संतान विद्याक होइक बास दिमाग मे कलम पर होइक सबकँ दियमान अनपूर्णा रहैथ भंडार मे लक्ष्मी बसैत आंगन द्वार मे बनल रहै खेत खलियान सभक चित होइक ख़ुशी  नै क्यौ होइक उदास दुखी  करनी सभक हुए उत्कृष्ट बोली मिठगर मिश्री सन द्वेष कलेशक भावनासँ  उपर होइत हिनक सभ संतान हे जानकी हम माँगए छी  अपना मिथिला लेल अहाँसँ बस यैह वरदान

२ तम्बाकू दिवस पर

जुनि खाउ गुटका यौ बाबू धिया पुता की सीखत आगू

खैनीसं झटदनि मुँह फेरू तम्बाकूक अहाँ सेवन छोरू

धुआँ संग जौँ नित कैल फूटानी बिगरत अहाँक जिनगीक पिहानी

नेसा कौखन की देलक ककरो किये भरम मे छी सभ सगरो

बनल किएक छी ओकर गुलाम जे बिलटा देत बस ठामहि ठाम २ शान्ति लक्ष्मी चौधरी मतिभ्रम

की अपना मोन मे तोरा छौ ई मतिभ्रम जे तोरा देह मे बसै छौ अस्सल मर्द? त’ सुन सत्य, तोहर गुणतर छौ नामर्दो सँ कम रे पतीत! मतिभ्रमी नराधम जँ तोरा अस्थि मध्य बहैत छौ शुक्राणु/स्पर्म अपने सन संतति केँ जँ द’ सकैत छै तुँ जन्म नहि हौऊ गर्व स एना उत्स दुष्ट पाँच बरिखक गौरी, ’गुड़िया’केँ क’ बलत्कार नहि बुझ अपनाकेँ असल मर्दक अवतार स्त्रीगण आक् थूह क’ देतौ खखार मुँह पर थुकि तोहर एहि मतिभ्रम पर कुकुरो देतौ टाँग उठा मूति पशुओ मे बचल होइत छै किछ अंतर्ज्ञान नीक बेजायक ध्यान तोहर कुकर्म सँ कियै हेतै कोनो मर्दक मूरीक अवनती जुनि बुझ तू मिसीयो अपनाकेँ मर्द जातिक प्रतिनीधी मर्दमेँ होइत छै मर्यादा, संयम आओर शील चिन्हैत छथि ओ की छी विभत्स आ की अस्लील नहिये भ सकैत छै तूँ कोनो रूपेँ नामर्द जकरा छातीमे टहकै छै नीक-बेजायक दर्द प्रकृति केनय होइन्ह कोनो अंगसँ भल्हु हुनका क्षीण मुदा हुनकोमे रहैत उपस्थित पाप-निष्पापक चिन्ह नहिये भ’ सकैत छै तू मर्द-नामर्दक बीचक बिरूप अपन कामाग्निक आगिमे जरल तू बनल एहेन कुरूप तोरा ल’ नारीदेह अछि बस यौन अंगक समुच्च भोगवासनाक सरस बोस्तु छुछ्छ कामेभोगक मतिभ्रम होइत रहै छौ तोरा सदिखन निर्जीव बोस्तु, वनस्पती, प्राणी-जीवन बील, पील, घुच्ची मातृयोनी मे अवशेष छोड़ल खाली सीसी वा फुच्ची भोगेक मतिभ्रम होइत छौ तोरा नेबो-आम-बेलक बाती सर्वत्र तकैत रहैत छै तू स्त्रीयेक थाथी गदही, घोड़ी, भैंस, बकरी, कुत्ती, बिलाय सद्यह जन्म देय वाली अपन माय तोरा लेँ त’ तुच्छ छियौ बहिन बेटीक संबंध जेँ कामाग्निक आगिमे आँखि फुटि भ’ गेलौ अन्ध ओना कवियित्रीगण ईसभ बात कहैत एखनो छथि धखाइ मुदा जँ कंठमे हाथ दय छै तँ सत्य गप्प सुनि ले आइ ३ शेफालिका वर्मा अहाँक गाम कतऽ अछि? अहाँक गाम कतऽ अछि प्रश्न सुनिते अकचका गेलौं हम कनिक काल सोचैत --- हमर गाम ?? वएह ने जइ ठाम अपन घर होइ छै? हँ हँ वएह घर ,वएह गाम ! हमरा तेँ दू टा गाम अछि .. एकटा जतऽ सँ हम आएल छी दोसर हम जतऽ एलौं अछि मुदा, ऐमे हमर कोन अछि हम नै बूझै छी जतऽ सँ हम एलौं ओतऽ सँ सनेस-बारी दऽ हमरा विदा कऽ देल गेल “जाह अपन घर बेटी” जइ ठाम आएल छी ओइठाम सभ सनेस-बारी बिल्हल गेल “कनियाक गामसँ आएल छै” हम की जानऽ गेलौं हमर गाम कोन थीक हमरा नाम पर तँ कत्तौ किछु नै भरल-पुरल घरमे हमर अस्तित्व किछु नै बस “फलना गामवाली” बनि रहि गेलौं जइ ठामसँ आएल छलौं ओइ गामक ठप्पा बनल रहि गेलौं............ पाहन अप्पन प्राण भेल ! झहरि रहल नोर नीरव विधिक अमिट विधान भेल कोन गीत गाबि गेलौं पाहन अप्पन प्राण भेल !

खंड खंड जीवन जिबैत क्षण क्षण तान भेल पात पात हास हम्मर पाहन अप्पन प्राण भेल

मलय पवन वेग सन सिहरैत कंपैत चान भेल चपल मुस्कानक तरीमे पाहन अप्पन प्राण भेल

भग्नतारक सुर साजि व्यथा विगलित गान भेल स्नेह नोरसँ पाटल पाहन अप्पन प्राण भेल… ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अनिल मल्लिक गजल आब नहि छै केओ गुलाम से के ने कहै छै मुदा जतै भेटै छै मौका गर्दैन के ने रेटै छै

मजदूर दिवसके अछि बधाई अपने लोकनिके भूखक आगिमे जरैत नेनपनके के जे देखै छै

सभा भाषण सेमीनार आ सांझमे हेतै पार्टी रस्ता घाट खटैत एहन बच्चाके के जे देखै छै

जाहि हाथ मे चाही कापी किताब आ कलम ठेला ठेलैत परै छै हाथक ठेला के जे देखै छै

जोश भरल बातेटा लिअने हजार के हजार दूनू सांझ नहि जरै छै चूल्हा के जे देखै छै...! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बाल मुकुन्द पाठक- गजल २.सुरेन्द्र शैल- मुदा करबै की?/ बटोही/ नवका महेशवाणी/ चुहाड़ १ बाल मुकुन्द पाठक गजल 

रौद आ बिहाड़िसँ जे लड़ल अछि एहि ठाम ओतबे गाछ पैघ भऽ बचल अछि एहि ठाम

भूखल छैथ राति दिन जाहि लेल गरीब यौ किनको खरिहानमे सड़ल अछि एहि ठाम

एहि टेक्निकल युगमे बी ए केने हाएत की एम ए कऽ गाम गाम पड़ल अछि एहि ठाम

जे विपत्तिमे धैर्य राखि लागल अछि काजमे ओ नभमे चान बनि सजल अछि एहि ठाम

भ्रष्टाचारी शासनमेँ बीकल सरकारी सीट चुप्पी मारि लोक घरे सूतल अछि एहि ठाम

गेल युग श्रवणकेँ माँ बापक कोनो मोले नै बूढ़ पूराण पूतसँ डरल अछि एहि ठाम 

सरल वार्णिक बहर ,आखर 17

२ सुरेन्द्र शैल,भदहर(दरभंगा) मुदा करबै की?/ बटोही/ नवका महेशवाणी/ चुहाड़ १ मुदा करबै की?

चारू कात अन्हार कोनो वाट नहिँ सूझय नैहर-सासुर  कियो हाल नहिँ पूछय अपने पंजाब मे वैसल अछि  हमरा घर मे दरिद्रा पैसल अछि चेफरी साटल नूआ ठाम-ठाम मस्कलआंगी चूड़ीक नाम पर दू टा वन सेहो चनकल नैहरक पायल सेहो वन्हकी लागल तइपर जरलाहा ई चतरल धूआ घर सँ निकलितो कोँढ कँपैत अछि ओहिना कलरा ककाक नरहेर बेटा एम्हर- ओम्हर तकैत भौजी-भौजी करैत अंगना आवि जाइत अछि सरधुआ ठेलने ने ठेलाइत अछि हम सभ बुझैत छी मुदा करवैक की? पैँच- उधार-बोनि मांगय गिरहथक ओतय जाइत छी हुनकर वेटा संटू बाबूक नजरि पड़िते जेना लागय कियो सौँसे देह मे बबूरक काँट गड़ा रहल अछि टहटहाइत गूड़क कातेकात बिढ़नी अपन सूंघ गड़ा रहल अछि पीज भरल घाव पर पिलुआ सहसहा रहल अछि माथ मे किछु हहाइत अछि जी ओकिआय लगैत अछि मुदा करवैक की? आई तँ हद भय गेल बोनि दैत काल  संटू बाबूक हाथ किछु आगू बढ़ि गेल लागल जे विजलीक तार कोनो अंग सटि गेल भेल जे झारु सँ झाटि दी ने तँ दविया सँ काटि दी परिस्थितिक मारलि ठाढ़ि ठकुआयल छी मुदा करवैक की? २ बटोही

सुधि विसरि वटोही निन्न पड़ल, ठहियाय, थाकि अछि भूमि पड़ल। नहिँ जानि कतेको कोस चलल, वैसल तरुतर झट नैन मुनल। रौदा सँ झामर देह मगर, उन्नत ललाट मुख तेज प्रखर। अछि रूप एकर कन्दर्प सनक, लटकल कुन्तल सखि सर्प सनक। अछि नलिन नयन मुख चान सनक, ऋतुराज मुखक मुस्कान सनक। वनराजक ग्रीव, भरल छाती,  कटि पुष्ट, जाँघ दुलकल हाथी। चाकर कन्हा,भुज युग्म सवल, चुम्बक सन खीँचय नेह नवल। छवि वसल वटोही नैन हमर, हरि लेलक वटोही चैन हमर। मन मे हहाय विररो उदंड, तन मे धधाय पावक प्रचंड। धकधक करेज तन काँपि रहल, लाजो नयनक पल झाँपि रहल। उठ जाग वटोही तेज अलस, उमड़ल अषाढ़ घटि गेल उमस। सभ गीत आई मल्हार बनत। वरिसत सिनेह रसधार वहत। ३ नवका महेशवाणी

भोला भुच्च पहाड़ी यौ। नवका युग मे भोला छोड़ू, ई पुरना ढाठी॥भोला॥ बाघम्बर के भोला छोड़ू, जीन्स-पैन्ट पहिरू। सगर वस्त्र भोला स्प्रे करु, हे डमरूधारी॥भोला॥ सहसह सर्प सघन वन छोड़ू, भस्म-रुद्र त्यागू। सोनक चेन गरा मे पहिरू, हे गंगाधारी॥भोला॥ बूढ़ बरद कैलाशहिँ छोड़ू, "क्वालिस" असवारी। जटा कटा जेन्टलमैन बनियौ, टाई -सूटधारी॥भोला॥ भांगक गोला भोला छोड़ू, ह्विस्की हाथ धरू। सुरा माति त्रिशूल के छोड़ू, हे पिस्टलधारी॥भोला॥ एहिले धन के चिन्ता छोड़ू, तिलकक मांग करू। गौरी बाप-दशा जुनि देखू, हे शिव त्रिपुरारी॥भोला॥ भैरव-भूत-गणादि के छोड़ू, हे शिव भयहारी। छौड़ा सभ नंगटे नाचै अछि, अतेकरे संग धरू॥भोला॥ डीजे पर डामरु के फोड़ू, चक्कर-फुलझारी। विना बैँड गौरी ने वियाहव, हे शिव शशिधारी॥भोला॥ तांडव नृत्य मसान मे छोअड़ू, डिस्को-डांस करू। शैल कुमति मिथिला मति मोड़ू, हे विपदाहारी॥भोला॥ ४ चुहाड़

अछि कोनटा मे ठाढ़ चुहाड़, काटि सेन्ह लुटि लेत भराड़। कय वेरि लुटि पुनि गेल पड़ाय, घुरि-घुरि आवय विनु सकुचाय। जखन सिकन्दर वनि के आयल, राजा पुरु के रणहिँ हरायल। गोरी वनि धाओल गुजरात, लूटल कच्छ,भरुच,भुज सात। सोमनाथ मंदिर घुसि गेल, तोड़ि महादेव सभ लुटि लेल। पृथ्वीराजक फोड़लक नैन, नहिँ भेटल एकरा मन चैन। बाबर बनि के आवि समायल, हति हेमू सत्ता हथियायल। पुनि धेलक वनिया केर भेष, टूटल निन्न ने चौँकल देश।  मायक पयर मे जकरल वेरि, जे गिरहथनी से भेलि चेरि। गोरका मालिक, देश गुलाम, पुरखा चाकर ,देथि सलाम। घुरि आयल वनि निगम घराना, लूटि रहल अछि हमर खजाना। ई बहुरुपिया अछि लुटिहारा, परम चंठ बड़का फँसियारा। धन लूटत धर्महुँ सभ लूटत, इज्जति संग धरोहरि लूटत। पान,मखान,मधुर सभ लूटत, अपना धारक भाकुर लूटत।  जे जन गावय एकर गीत, से परचट्टा परम पतीत। उठू यौ बौआ उठू यौ भैया, फेर घुरि आयल कंस कसैया। एकरा मुँह मे ऊक लगाउ, कूर खेत चुगला झड़काउ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2012-13) (१४२० फसली साल) Marriage Days: Nov.2012- 25, 26, 28, 29, 30 Dec.2012- 5,9, 10, 13, 14 January 2013- 16, 17, 18, 23, 24, 31 Feb.2013- 1, 3, 4, 6, 8, 10, 14, 15, 18, 20, 24, 25 April 2013- 21, 22, 24, 26, 29 May 2013- 1,2,3,5,6,9,12,13,17,19,20,22,23,24,26,27,29,30,31 June 2013- 2,3 July 2013- 11, 14, 15 Upanayana Days: January 2013- 16 February 2013- 14, 15, 20, 21 April 2013- 22 May 2013- 20, 21 Dviragaman Din: November 2012- 25, 26, 28, 29 December 2012- 2, 3, 14 February 2013- 14, 15, 18, 20, 21, 22, 27, 28 March 2013- 1 April 2013- 18, 22, 24, 26, 28, 29 May 2013- 12, 13 Mundan Din: November 2012- 26, 30 December 2012- 3 January 2013- 18, 24 February 2013- 1, 14, 15, 20, 28 April 2013- 17 May 2013- 13, 23, 29 June 2013- 13, 19, 26, 27, 28 July 2013- 10, 15 FESTIVALS OF MITHILA (2012-13) Mauna Panchami-08 July Madhushravani- 22 July Nag Panchami- 24 July Raksha Bandhan- 02 Aug Krishnastami- 10 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 17 August Vishwakarma Pooja- 17 September Hartalika Teej- 18 September ChauthChandra-19 September Karma Dharma Ekadashi-26 September Indra Pooja Aarambh- 27 September Anant Caturdashi- 29 Sep Agastyarghadaan- 30 Sep Pitri Paksha begins- 30 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-08 October Matri Navami- 09 October SomvatiAmavasya Vrat- 15 October Kalashsthapan- 16 October Belnauti- 20 October Patrika Pravesh- 21 October Mahastami- 22 October Maha Navami - 23 October Vijaya Dashami- 24 October Kojagara- 29 Oct Dhanteras- 11 November Diyabati, shyama pooja-13 November Annakoota/ Govardhana Pooja-14 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 15 November Chhathi -19 November Devotthan Ekadashi- 24 November ravivratarambh- 25 November Navanna parvan- 25 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 28 November Vivaha Panchmi- 17 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 08 February Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 15 February Achla Saptmi- 17 February Mahashivaratri-10 March Holikadahan-Fagua-26 March Holi- 28 March Varuni Trayodashi-07 April Chaiti  navaratrarambh- 11 April Jurishital-15 April Chaiti Chhathi vrata-16 April Ram Navami- 19 April Ravi Brat Ant- 12 May Akshaya Tritiya-13 May Janaki Navami- 19 May Vat Savitri-barasait- 08 June Ganga Dashhara-18 June Somavati Amavasya Vrata- 08 July Jagannath Rath Yatra- 10 July Hari Sayan Ekadashi- 19 July Aashadhi Guru Poornima-22 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक  http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/   http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 101 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १३१ म अंक ०१ जून २०१३ (वर्ष ६ मास ६६ अंक १३१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA