VIDEHA — Issue 133 / अंक १३३

Publication: VIDEHA · Issue: 133
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ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह' १३३ म अंक ०१ जुलाइ २०१३ (वर्ष ६ मास ६७ अंक १३३) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा-कोन डारि पर केकर खोता २.२.’सगर राति‍ दीप जरय’क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’  उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे  सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय  सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे  उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे रिपोर्ट पूनम मण्डल २.३.बिन्देश्वर ठाकुर- ३टा विहनि कथा २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-लघुकथा-चुप्‍पा पाल‍ २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’-५ टा विहनि कथा २.६.अखिलेश कुमार मण्‍डल-पँचवेदी २.७.प्राज्ञ कापड़ि केशवलाल बाखं शिरपा सम्मानसँ सम्मानित रिपोर्ट पूनम मण्डल २.८.उमेश मण्‍डल-लघुकथा-जीवि‍ते नर्क ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-४ ३.२.१.मुन्नी कामत-गीत:- जट-जटिन २.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-नेताजी ३.३.जगदानन्द झा ‘मनु’- के पतियाएत ३.४.मनोज कुमार मण्डल-देशी कौआ ३.५.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.६.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-सुफल काज ३.७.राजदेव मण्‍डल- दू टा कवि‍ता ३.८.सत्य नारायण-लहकैत समाज विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा-कोन डारि पर केकर खोता २.२.’सगर राति‍ दीप जरय’क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’  उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे  सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय  सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे  उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे रिपोर्ट पूनम मण्डल २.३.बिन्देश्वर ठाकुर- ३टा विहनि कथा २.४.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-लघुकथा-चुप्‍पा पाल‍ २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’-५ टा विहनि कथा २.६.अखिलेश कुमार मण्‍डल-पँचवेदी २.७.प्राज्ञ कापड़ि केशवलाल बाखं शिरपा सम्मानसँ सम्मानित रिपोर्ट पूनम मण्डल २.८.उमेश मण्‍डल-लघुकथा-जीवि‍ते नर्क कामिनी कामायनी लघुकथा- कोन डारि पर केकर खोता । “यै बहिन ,कनी थमि जौथ ,तिलकौड क तरुवा तैर रहल छिएन्ह,तखन खइहथि’। बहिन ओसारा प राखल पीढ़ी प बईस गेल छलिह,सोझा परसल थारी राखल छल, दिनक एगारह बाजि रहल छल,कदंबक गाछ के ऊपर स  सुरूज़ महाराज दुनिया भरिक गाम घरक हिसाब किताब लेबा लेल मुस्तैद भेल अपन ताप स चहु दिस के खड़ पात धरि झरका रहल छलथि।  ,आय बटेदार सब स खेत पथारक हाब डीब लईत लईत बड़ बेर भ चुकल छल ,क्षुधा तीव्र भ गेल छलेंह,बजली “आब रहय दिऔ एखन ,राति क बना लेब ,एखन अहू आबि जाऊ खेबा लेल ,अहू के भूख लागल हैत’। मुदा ताबेत त पहिनहि स  धधकल चूल्ही प चढ़ल लोहिया मे कडूक तेल  पड्पड़ाय लगलै त केराव क घाठि मे पात लटपटा क  हब्बर हब्बर लोहिया मे खसा चुकल छलिह। हुनक ई तत्परता आ अनुराग देखि क ,ओ कनी काल लेल हाथ बारि नेने रहथि । कनी विलंब स दुनू गोटे सोझा सोझी बइस क मौन भ अपन भोजन ग्रहण करय लागल छलिह । नबका ड़िजेंन के लोहा लक्कड़ सीमेंट स  बनल घर जे साबिकक खरिहान मे बनल छल,ओ त बहिनक छलेंह,कनिया के बख़रा मे त पुरना खपड़ैल घड़ाडी, मुदा आब कोन,दुहु घर त अपने सन  । ओत्ते टा चास बास मुदा रहनीहरि ,जेना बडका पोखरि मे दु टा पोठी माछ । अन्न पानि कोठी,तोठी मे रखनाय,उसीनिया कुटिया आब पूरने आँगन मे होय :एक्का दुग्गी जे सर कुटुम आबेन त हुनक रहब के बेबस्था नबका घर मे होय । ओहुना मन बहटारय लेल ओ दुनु कखनों अहि घर त कखनों ओई घर मे दिन व राति काटि लईथ । ओना त चोर चहारक हदस लोकके पहिनहु पईसल रहे ,मुदा आब कत्तेकों घर जिनक मुखिया बा कुलदीपक परदेस कमाई करय गेल छलेथ,ओत त बिसेख रुपे रतिजगा भ जाय ।  आ हिनको दुनु के परान सदिखन सिथुवा मे बन्न तड़पइत रहेंह । कहबों करथि ‘धन संपत्ति लुटबा के डर नहिं, सुने छिये जे मौगी सब के हाथ पएर काटि क ,की बुढ़ ,की बच्चा ,सबहक इज्जतों सेहो लुईट लईतछैक’। आ अहि डरे टोलक नबतुरिया धिया पुत्ता सब के  बाड़ी मे फड़ल लताम ,नेबों ,त कखनों केरा, आम ,कटहर ,लीची , बाटि क मोने मों न अपन फौज तैयार केने रहैथ जे बेर कुबेर गद्दह केला प आन कियो आबै वा नहिं आबे अहि मे स किछू नै किछू त अबस्से आयत । आ ओ सब कहबों करेन ‘एक बेर हाक देबै त केहनों नींद मे रहबे ,दौगल चलि आयब‘। ओ दुनु घरक बीचोबीच  कनि पछवाड़ी दिस घसकिक तेसर घर सेहो  टुकुर टुकुर ,माय टुग्गर सन ताकैत ठाढ़ छल,मुदा  तैयों ईर स भरल ओ घर हिनका सब के स्वीकार नहिं केल्केन्ह  ताही लेल उमहरक रस्ता टाट फट्टा लगा क बड़ पहिनहि बन्न करी देल गेल छल । ओहो घर अहि दुनु घर प’ अपन वक्र दृष्टि रखने छल फराके स । जेठ बैसाख क  उसिनति गरमी , कतबों पंखा ,कूलर लागल रहै ,मोटका मोटका पर्दा खिड़की प रहै ,मुदा नबका घर त राकसक मुंह बनि आगि उगलै , ईट के भट्ठी बनल । तखन कनिया के माटिक ओसारा बाला दच्छिनबरिया घर ,आहाहा ,एकदम शीतल ,जेना स्वर्ग , बाड़ी झाड़ी स सीहकेत बसात । त बेसी काल गरमी मे बहिन ओहि ओसारा वाला घर मे नीचा  बिछाओल पटिया प ,भात तीमन जे बना बथि कनिया प्रेम स ,खा क , ओंघडायल रहैत छली । पहाड़ सन दिन काटय लेल लच्छा के लच्छा ओझराल गप्प के पेटार खोलल जाय । आ पुरखा ,सर् कुटुम ,बाध बोन ,अड़ोसीया  पड़ोसिया केकर कहाँ ,सबहक कर्म कुकर्मक कतेको बेर पुनर्मूल्यांकन केल जाए । अहि एतिहासिक गप्प गोष्टी  मे,दुपहरिया मे बेसी  काल टोलक स्त्रीगन सेहो सब जुटथि,आ गामक ज्ञात इतिहास के रूपक आ क्षेपक सहित  ओहि महान घड़ारीके सौजन्य स नवीन दृष्टि स जनैथ। “भूपिंदर कका के पेलवार त बिलाइए गेलै नै । देखियौ ,केहेन उजाड़ लागै छेंह हुनकर डीह । पहिने जखन हम दुरागमन करि आयल रहिए,काकी के भागक चर्च घरे घर ,सात टा पूत ,दु टा छोटका भरिसक कुमार छलेंह,भरि घर पोता पोती ,काकीए के हुकुमति चलय छल घर मे । कनिया देखय त तीन चारिबेर आबैथ, “कनी टा मुंह हमहु देखबै’ तीन बरखक पोथी के जिद ,आ म्या कोहबर मे आबि क हमर घोघ उघारि क देखा दईथ। चुहचुही स भरल ,बड़का नाम गाम बाला कुटुम सब के आवाजाही ,,देखिते देखिते आब केहेन उजाड़ भ गेलै । बदलि त सौसे गामे गेलै ,भइयारी मे बाट बख़रा होइत गेलै ,किओ बाड़ी त,कियो ,गोहाली ,त कियो खरिहान मे चास बास बना लेलके ,मुदा हुनक पेलबार त उपटिए गेलै जेना एतय स”। “से की कहै छथिन्ह,महाबा के डीह देखथुन ,बड़का बड़का पाग बाला बेटा सब ,ओहेन सुंदर घड़ारी तोड़ि क नबका ड़िजेंन के घर त बनबा लेलथि , केहेन इल्टल बिल्टल सन लगे छैक आब,कियो इमहर स खिड़की  नोचलकेन्ह,किओ उमहर स दरवज्जा,बाड़ी के चहरदेवारी ढाहि पजेबा पर्यंत सब उघि ‘ ल गेलय। लोक के लोक कहे छै जे बिन पूत के डीह बिलटि जाए छै ,हुनक त पूत रहिते उजाड़ भ गेलन। खेत पथार त अपन अपन बेचि लेलथि ,मुदा सझिया के मकान , ओहिना संझा बाती धरि लेल मुंह तकेत ,नॉर बहबेत ,के ताकय एलै घुईरक दसो बरख स’। ओत्ते टा के दुपहरिया ,बुढ़ पुरान , की जुवानों सब पुरखा के गप्प ,दुरखा के गप्प ,संपत्ति बटबारा के गप्प ,बुढ़  नब के रास लीला  के गप्प ,ढेर रास गप्प क सिडही प चढ़ैत उतरेत दिवस काटि रहल छली। ओना आब ओहु ठाम टीवी आबि गेल छले,मुदा बेसी काल बिजली कटले रहैक,आ रहबों करे तईओ एहेन गोष्ठी के आनंद बुढ़ पुरान  के लेल भगवती के बरदाने बुझु । पुरान दिन के पागुर करैत हुनका सब के आंखि मे दोसरे चमक उठि जाए । जोजो बाबू के खिस्सा प कनिया त हसेत हसेत बेहाल ‘कोना हुनका लोक सब बकलेल कहेंह  ओ बताह नै घताह छलेथ,आबैथ अपन भाऊज स भेंट करय आ भरि टोल मे आंगने आँगन घुसि क जनी जाति स ठठा करैथ,किओ कहेंह ,कनी एक टा गीत सुनाऊ ,आ ओ ओहि ठाम धुस्स स बेसि जायथ,घेंट हिला हिला क ,आंगुर नचा नचा क नचारी,कजरी ,त झुम्मरी गीत सुरू करि देथ। सुन्नरों केहेन,पाँच हाथ के धूवा,दप दप गोर ,भाल प लाल सिंदूरक ठोप’। कालक प्रवाह के ग्रास बनल कतबों लोक गाम स उपटि क सहर दिस भागौ,गाम मे त लोकबेद रहबे करते न । आब कीछु सहरि क  भीड़ भाड़ स ,समस्या स ,बेरोजगारी स , गराकाट कंपीटीशन स , मशीनी जिनगी स उबि क गाम सेहो आबि रहल छथि । विवाहदान ,मुड़न उपनेंन ,एकादशी के जग ,पूजा हवन ,सब किछ त यथावत चलेत आबि रहल छल,नब लोक उत्साह स जीब रहल छल ,पुरना लोक सब हाफ़ैत,खीझैत,भोथरायल , भसियायाल बुद्धि ,कमजोर ,झलफल,झलफल दृष्टि स देखि रहल छल ,नब जुग के ,आ अपन मनोव्यथा के, कुंठा के ,अचटी ,कुचटी बाजि क निकालि लेत छल । कोनो एक खिस्सा प हुनका सब के हजार खिस्सा मोंन  पड़े । आ पचासों बरख पहिलुका  बटखरा स  आजुकसमाज के तराजू प तौलेत,केहन छुच्छ, केहन हीन,कतेक गर्हित लगेंह ,से हुनके सबहक आत्मा जनेक । ‘देखियो बिरेन के बेटी के ,चतुरथी स पहिनहि बर संग  ,  पदुवा के रिकसा प सिनेमा देखय मधबन्नी जा रहल छल,त बापे बजलखिन “रिकसा स जेमए त फिल्म छूटि जेतो ,चल, हम अपन मोटरसायकिल स छोड़ि दैत छिओ,हमरो कोर्ट ज़ेबा के अछिए’। आ बाजि क  भरि पोख हसली मनोजक माय । “ये बहिन ई कोन अजगुत गप्प कहलखिन , देखलखिन्ह नै चुनुलाल के बेटी के ,बापक विवाह कराओल बर के छोड़ि क अपन मन माफिक मनसा स दोसर विवाह करि लेलकै ,म्या ओकर सेहो आब सीना चाकर करि क बजेत छै “ह त कोन जुलुम केलकै ,पियक्कड़  छले, ओध बाध करि क मारे छले ,त ककरो दरेग ने उठले हमर बेटी लेल आ ओ जौ ओकरा स पिंड छोड़ा क पडायल त ,लोक् क करेज मे किएक धाह उठैत छैक’ । आब कहथुन’। कनिया के पुबरिया ओसारा दिस स आम रास्ता छल,त ओ सब ओहि ओसारा प नहिं बैस क ओहि स सटल कोठरी मे बैसारी करेत छली। कोठरी मे दू टा खिड़की ,एकटा पूब दिस ,एक टा दछिन दिस । दुनु प आधा आधा  पतरकी ,छाप बालानूआ के  परदा लागल,ओकरो मोड़ि क किम्हरों घुस्का दइथ,तखन ओहि बाट स जाए बला लोक सब प नजरि सेहो रखथि,ई मनसा कोन गामक छै ,किनको कुटुम त नहिं छैन,आ जौ कोनो टोलक एहेन लोग  नजरि पड़ि जाथिजिनका स आना माना रहेंह  ,त हुनक जतरा भंगटाबे लेल   कागद ,वा आचरिक खूंट के बाती सन बाटि क ,नाक मे घुसा क जबरदस्ती छीकल जाए ,कत्तेक बेर त अहि अपसकुन स लोक सब आपस घुईर जायथ,। आ अहि स स्त्र्रीगन सब के बड़ प्रसन्नता होय । हुनक सबहक निक जका मोन बहटि जाए । भोरुका तारा के देखि क दुनू गोटे उठि जायथ अपनअपन ओछोन प स ,नहा धो क ,भगवती नीप क ,पूजा पाठ के काज स जाबेत निवृत होथि,ताबेत सुरुज् क चक्का एक बीत ऊपर क्षितिज मे टंगा   सब  ठाम हुलकी मारेत रहेत छल । नबका घरक उपरका मंजिल के ग्रील मे बैसि दुनु गोटे स्टील के गिलास मे चाह पीबैत काल टोल भरि के अवलोकन करैत छली। बहिन त अपन ऊमीर के बड़का हिस्सा सहरे मे काटने छलिह,आब न ग्राम वासिनी भेलिह,मुदा आदति सब दिन स काक बजबा स पहिनहि उठबा के रही गेल छल। तहिया त आध छिध पूजा करि क घिया पूता लेल जलखई ,पनपियाइ बनाब मे जुटि जायथ,ओसब खा पीबी क स्कूल जाय त कनिकाल मे घरबला के ऑफिस ज़ेबा के समय भ जाए ,हुनका गेला के बाद घरक झाड़ू पोछा,बाल्टी भरि कपड़ा धोबैत नीत दिन बारह एक बाजि जाय । कहिओ ओ एक टा नौकर वा काजबाली नहीं रखली ,देहो भगवती के कीरपा स तंदुरुस्त छल,आ हाथो के बड़ सक्कत,जखन दू पाय ककरो दैतथिन नहिं ,तखन कियो हुनका ओत अपन मुंह बांहि क त नहिं काज करितेंह। मुदा वएह बहिन जखन सासु के सोझा गाम आबैथ त अपन पुबरिया घरक पलंग प चित्त पडल रहेत छली ,काजबाली सब काम करबै करैक,हुनका जाँतय पिचय लेल एक नौड़ी फराक स राखल जाय ,जे हुनका नहाबए सोनाबय, नुआ फट्टा सेहो धोबय। सहर ज़ेबा काल कनी कष्ट त मोंन मे अवस्से होएन ,मुदा ओहि सहरक नाम प त ई राजसी ठाठभेटल  छल ,ई सोचि अपन दियादिनी सब प उपेक्षा के दृष्टि फेरैत तांगा प बेसी क गाड़ी पकड़बा के लेल मधबन्नी जाय छलिह । कातिकी  पूर्णिमा के  दिन दोसर गाम के देवी मंदिर प भागवत कथा के भव्य आयोजन छल।जगननाथजी स विद्वान  पंडित सब आयल छलेथ, कतेक दिन पहिनहि स प्रचार भ रहल  छल, लोक के उत्सुकता हिय मे हिलकोर मारय लागले  । कहिया स नियारति नियारति गामक ढेर रास स्त्रीगण,पुरुखक संग ओहो दुनु रिकसा प बैसि क  नहा सुना क भोरे भोर विदा भेल रहथि । संजोग देखियो जे  ओ सब उमहर गेलथि,आ इमहर बहिनक कुटुम आबि गेलखिन, दुनु घरक कुंडी मे लटकल ताला देखि क तेसर घरक दुरखा लग ठाढ़ कुटुम के हुलसि क सुआगत करबा लेल ओ  दरबज्जा स्वतह खुजि गेल रहे । भोजन भात करि क पाहून कनी काल विश्राम करय लगला त हुनक स्त्री घरक और भीतर पइस तेसरा घर स अनुराग बढ़बय लेलअकुलाय लगली । भाई भौज छलखींन ,इमहरे समधियौन मे आयल छलाह ,त बहिनो मोंन पड़ी गेल छलेनह । मुदा भौज के त नीक मौका हाथ लगले,ननदि के अतीतक उद्यान मे भ्रमण करबके । हुनको ओ कहिओ कनिओ मोजर नै देने छलखिन ,ततेक गुमान छलेंह। आ तेसरो घर के आय अपन पीर  उगिलबा के परसर भेटले । आ खिस्सा के दोसरि छोर कुम्हारक चाक प गढ़ेबा लेल उन्मत्त भ  फर फर क बहरायत गेल । तीनो फरीक मे ,बाँट बख़रा त कहिया कत्त नै भ चुकल छल,कहे लेल त आब दुइए फरिक बचला  बड़का आ छोटका,मुदा तेसर संसार स प्रस्थान करबा स पूर्व  अपन स्त्री संग एक टा कंटिरबी सेहो  छोड़ि गेल छलथि। ओहि गुडकुनिया दईत धिया के कपार देखि पित्ती अपना ओत्त ल गेलथि, अपन बेटी त नहिं देलथी भगवती,एकरे पालब पोसब, पढायब लिखायब, कन्यादान करब ,आब माय के कत्तबों मोंन छटपटेलन्हि,सौस सेहो खुट्टा जका ठाढ़ भ गेलथि ‘ओ आहाँ के बेटी के  इंद्रासनक परी बनबय चाहेतछथी,आ आहाँ छुच्छ के विलाप कय रहल छी”। तखन सबहक बिचारे माय धी दुनू सहर चलि गेल छलिह।बरस दिन प माय त आबि गेली ,खिस्सा के पेटार नेने मुदा बेटी के त स्कूल मे नाम लिखा देल गेल रहे । माय के मोंन जखन  बड़ छटपटाय ,त पोस्ट ऑफिस स पोस्टकार्ड मंगबा क जोड़ी जाड़ि क लिखनाय सुरू करैथ त कनैत कनैत कतेक पहर बीत जाय । अबल दुबल प सिथुया चोख ,त मोसिबत के मारल के ,अपन रक्षा करय लेल बेसि काल जिह्वा प दुर्वासा के बास ,कराबइए पडेत  छल । ढोढ़िया साप के रूप सेहो अख़्तियार करय लेल लोकवेद बाध्य करि दैक। पान सन जीबन पहाड़ सन दिन काटे लेल गाम घर मे लोक बेद के अकाल नै रहैत छैक।पहिनुका जुग मे त गप्प सप्प संग भांति भांति के काज धंधा सेहो चलेक,कुमारि बेटी के विवाहक लेल सिकी के मौनी बने ,गेरुआ के खोल प जोड़ा सुग्गा ,गुलाबक फूल काढ़ल जाए ,जनेऊ काटल जाए चरखा काटल जाय ,मुदा ताहिया बाजार घरे घर नहिं घुसल चल ,आ ने चीनक सुंदर सुंदर समान एना लोकके मोहने छल , ‘एँ ,के आंखि फोड़त अप्पन, बाजार मे एक स एक निक चीज भेटे छै’बाला प्रलयंकारी बाढि मे सब किछू भासियाएल जा रहल अछि । आब त विशुद्ध गप्प ,नबका शिक्षा के भूत ,गाम घरक लोक के कोढ़ि बना रहल अछि ,तखन अहिना कतेको खिस्सा के जन्म होईत छैक आ सोईरीए स पांखि लगा ,बंद खिड़की ,दरवज्जा के अछैत खुजल आकास मे उड़य  लागेत छल । ओहि खिस्सा सब मे कनिया के नॉर स सानल  जिनगी के कतेक रास दुख रहे ,से कतेको लोक ले करेज मे बरछी सन गड़ैत रहलै। उपजा बाड़ी त हुनकर ,जिनकर,समांग , खेत खरिहान छल ,हिनका  त मात्र घड़ाड़ि, आ ओहो साबिकक घर ,बड़का विशाल जे रहल होय ,मुदा भदबारि मे जानक आफत ,कखनों इमहर स चूबे,कखनों उमहर स देवाल खसै,आ एकर मरम्मति करबय लेल कनिया के कतेको मास बरस दिन धरि बहिन के चिट्ठी प चिट्ठी पठाबए पड़े तीन चारि बरख मे किओ सहरि स आबै,आ जाबेत ओकरा दुरुस्त करै,ताबेत कोनो और समस्या ठाढ़ भ जाए ।एक बेर त बहिन गाम आबि क सबहक सोझा मे हुनका बड़ फज्झति केलकिन ‘अहा त अहिठाम आराम स बईसल खाय छी,आहाँ की बुझबै सहर मे पैलवार ल क रहे बला के कतेक फिरीशनी स दु चारि होमए पड़े छैक। अहाँ के बेटियो के जिम्मेबारी हमी सब उठेने छी ,तईओ अहाँ चैन स हमरा सब के नहि जीब’ देबय चहेत छी ।हिनकर ब्लडप्रेसर बढिगेल छन्हि। हम त हुनका कोनो काज कहिते नहिं छिएन्ह, गिरे पड़े छै घर त गिरय दियौ ,बारह टा कोठरी छै ,जखन सब खसि पड़ते ,तखन देखल जेतै’।  ओहि बेर स ओ कतबों कष्ट होयन्हि, हुनका चिट्ठी नैई लिखलखींह ,’ ‘बुझल जे हमारा किओ नहिं अछि अहि संसार  मे’। आ चारो कात स घर खसि क भुतहा हवेली सन लागै, सांझे लालटेम जराक’ दरवज्जा प राखि देथ,जे खसल पजेबा स बाट बटोहिया के ठेस ने लागि जाय । खेबा पिबा लेल साल भरि के अन्न हुनके दिस स देल जाए ,आ बाड़ी झाड़ी मे तीमन तरकारी त उपजिए जाए । मुदा कनियो के अपनघरबाला स बेसि कोढ़ बापक देल गहना गुरिया फाड़े ,चंद्रहार ,नथिया ,टीका ,कर्ण फूल ,बाला,अनंत ,डढ़कस,पाजेब , सबटा त बहिन बैंक मे रखबाबय के नाम उतरबा नेने रहथि।बाद मे कखनों ओकर चर्च करैथ, त बहिन के कबौछ सन बोल स सम्पूर्ण देह मे आगि लेस दै “आब गहना ल क की करब ,लग मे राखब त ओहो डकूबा लुइट क ल जायत,भने बैंक मे रखल छैक’। अगहन मे वा माघ मे ,किंसयातओ कोनो जाड़े मास छल ,जखन बहिन सपैलवार सहरि स गाम बेटा सबहक उपनेन् करबा लेल गाम आयल छलिह। तहिया त गाम गामे छल आ टोल सेहो समस्त ऊर्जा स सम्पन्न ,जन धन स सब डीह भरल । एके दुग्गी लोक गाम स बहराएल छल ,मुदा गामक मजगुत डोर ओकरा खीचने रहै। मईया त बरख दिन पहिनहि स अहि शुभ दिन के ओरिओनमे  कोलहुक बरद सन राति दिन बिसरल लागल रहल छली। आँगन मे ओसारा सब प ओछाओल पटिया सब प पतियानी स राखल राहड़ि,ऊडेद केराव ,तीसी ,मड़ुआ ,मकई ,धान , सरिसब,आने की जतेक अन्न उपजा क बटेदार द जाईत छल,मईया ओकरा अपना हिसबे सइतने जा रहल छलिह,दालि दड़रबाक भूसा सहित छोड़ने छलिह ,आ ओकरा फटकबा झटकबा क पैघ छोट कोठी सब मे रखबय छलिह । तखन एक दिन कनिया के मोंन मे अयलंहि,  उपनेंन हेतैक,एतेक लोकवेद ,सर-कुटुम सब औताह,तखन ओ मड़बा प चढ़ि क बरुआ सब के की भीख देतीह,हुनकर हाथ त ठन ठन गोपाल । आ बड़ सोचि विचारि क मरतिया बाली पेटे दस सेर राहड़ी,दस सेर मकई ,पाँच सेर खेरही ,पाँच सेर केराव ,थोड़े गहूम ,थोड़े धान बेचि लेलथी । कीछु पाय हाथ मे आबी गेलन्ह त छौओ बरुआ लेल गामे के सोनरबा स सोनक औंठी गढ़बा लेलथि,ओहो मैना दीदी के नेहोरा पाती करी क । ई सब कारोबार त  ततेक गुप्त भेल रहै, जे घरक कोनो चार प कोनो कार कौआ सेहो नहिं बैसल छल,नहिं कोनो कोन सानि मे नढिया,गीदड़ बा बिलड़िए नुकाएल छल,मुदा तैयों ई गप्प जखन उजिएले,ओही घर मे  बड़का भुईकंप त आबिए गेल  छल । जखन बहिनक स्वामी बाध बोन दिस गेला अपन खेत पथार देखय सुनै,त  कुसियारक चोरि के दाग स मुक्ति पाबय लेल बीसेसर हुनका कान मे हुनके आंगनक करनी फुइकी देलकेंह। आंगन मे पाहुन पड़कक आगमन प्रारम्भ भ चुकल छले,कनिया अपन कोठरी के पट बन्न करि के कनेत रहली। हुनकर छुदरपन,हीनता,आ पापक पोथी नेने बहिनक घरबाला ज़ोर ज़ोर स आँगन मे बाचि रहल छलेथ ‘अही घर मे आब की उत्थान होयत ,जखन घरे मे मूस लागल अछि”।आ दुनु परानी हुनक हाथ के छूल पाईन धरि नहिं पिबाक सप्पथ खेलाह ,जखन कि तहिया सबटा खेत पथार सझिए रहेक। ‘दसरथ के अंगनमा मे शुभे हो शुभे’ बड़ ज़ोर ज़ोर स होमय लागल,मुदा काकी शुभे कोना कहितथ ,। उपनेन् के दिन सब कुटुमक  उपहास पूर्ण नजरि स बचबा के लेल ओ अपन कोठरी स नहिं निकसल छलिह, तीन दिनक भुखल पीयासल, चारीम दिन झलफल साँझ मे ,छौओ बरुआ लेल बनाओल औठी अपन सौसक हाथ मे राखि पट फेर बन्न क लेने रहथी। हिनको जिनगी स मोह कौन बाचल रहैक,बेटी के पार घाट लगबय लेल भगवती छलिह । तखन सुतली राति मे छुच्छ के लाज लिहाज के तिलांजलि दइत निकलि गेली नबकी पोखरि मे भसियाबय लेल ।कनीए दूर प बुढ़बा कोतबाल उधो टोकि देलकेन्ह’ ‘ कतय जाय छी मलकानि?’ ओ की चीन्हने हेतेक ओकर आंखि मे त रतौनी रहे ,मुदा उज्जर नुआ देखि भेलय कोनो दाय काकी हेतिह ,आ जौ  चुड़ैल हेते त तकरो काट छल ओकरा लग । तही लेल कनी उचगर स्वर मे ओ बाजल छल, आ ओहि स्वर प लगे के दालान प सुतल दिनेशक आंखि खुजि गेल छल ,माझ बाट प आबि ओहो ठाढ़ भ गेला ।किओ किछू ने बाजल आ ओ स्वेत वस्त्र धारिणी आगा पोखरि आ गाछी दिस बढ़ैत रहल छली। नब शोणित दिनेश पहिल बेर कोनो भूत वा चुड़ैल के पछोड़ धेलक ,संग मे उधो मन बढेलके । पोखरिक महाड़ प आबि ओ पलटि क ताकली,दोसर पहरि राति  मे आधा चान आकास मे चमेकि रहल छल ,ई त कमतौल बाली काकी छथीन ,दिनेश चौंकल,टोलक झंझट फसाद स पुरुखों सब परिचिते रहैत छलाह। छपाक के स्वर स ओकरा सब मे चेतना आएल,आ हुनक पीठे प दिनेश पानी मे छलांग लगा देने रहैक ।पोड़ीक हुनका बाहर आनल ,ओ त अचेत भेल । पहिल बेर गामक इतिहास मे एहेन खिसा भेल रहैजे निसाराति मे भगवति पानि मे डुबल प्राणी के बचा लेलथ। मुदा किओ इहों बाजल छल‘अक्खज ने मरै ,छुतहर नै फूटे’। बहिन के डरो पहिनहि बेर भेलन। प्राण परबा जेका पुक पुक करय लागल छल ,आय जौं किछ अधलाह भ जयते ,टोलक लोक जिनगी भरि हुनके उपराग दितेन्ह। दालान प बैसल झक झक उज्जर कुरता,सांची धोती आ बंडी पहिरने रोआबी मालिक के एक टा अदृस्ट भय सेहो पईस गेल छल । तहन  निर्बलक पछ मे उठल लोक् क दया माया देखि दुनु बेकती कनिया के हाथ पएरजोड़ी क शांत केने छलथी । बेटी के विवाह मे त एक टा दमड़ी नै देबए पडलेन्ह,मुदा मुईला प आगि त जौते देतन्ही,आ कन्याक  विवाह कतबों आदर्स हॉक, घरबैयाके त बर ताक’ मे ,दौड़ बरहा करेइए पड़े छैक, जेना गीध के धियान मुइल जानबरक मौस प रहे छै तहिना  कोनो कोनो लाथे हुनक बख़रा के जमीन जथा ओ  अपन नाम प लिखबा लेने रहैथ,आ हुनका अहि सब झंझट स मुक्त करि देने छलेथ । कतेको बरख बीतले, बहिनक सबटा बेटा के विवाह दान भेलन्हि ,सब अपन पेलवार  बढाबेत आन आन सहरि मे जे गेला ,से आपस मुड़ि क बहिनक अहंकार के बरक्कैत नहिं होमय देलखिन, कोनो पुतौह हुनका अपन नरेटी प हाथ नैराखय देलकेन  ।घर वाला के रिटायर भेलोपरांत गाम मे अपन नब मकान बना क रहय लागल छलिह,मुदा तखनो हुनक दोसरे धाह छलेंह । कनिया के खसल घर के मरम्मति करबा देल गेल छल ,मुदा ओकर मालिकाना हक  बहिने सब के हाथ मे छल । कतेको बरख बीमार पड़ी क मालिक जखन गोलोकवासी भेला ,बहिन नितांत एसगरुवा ।कनिया के बेटी  बरस दु बरस लेल माय के घुमाबए फिराबय ले ल जायन्ह,सबटा तीर्थ सेहो करबा देलकैन्ह। देखि देखि क हुनक कोढ़ फाड़ेन्ह,आय धरि त ओ दुनिए दारी मे रही गेल छलथी,आब त कोनो बेटो ने हुलकि मारे आबें ,ह कहिओ काल फोन फान करि लेई त सझिले मुदा ओहो आबे ने खाली बजबे तोही आबी जॉ ,जखन अपन कोखिक जनमल आन भ गेल त आन क जनमल के किए गारि सराप दइतथी, कहबीओ छै जे जहन बौह लगतौ कान तखन माय हेतों आन । पोसने त वेह ओहि बेटी के रहथी,मुदा कतेक सिनेह स से हुनक आत्मा जनैत रहेंह। जखन बहिन विह्वल भ क कनैथ,  हिम्मत जूटा क कनिया हुनका लग एनाय सुरू करी देलथी,आ नहुं नहुं बहिनक खेनाय पिनाय के भार हुनका बिन पूछने कनिया अपना माथ प राखि लेलथी । आब त  खूनक रिस्ता सेहो एहेन ने हेतै ,आध आध मिल क एक भ जाय छै ,नदी आ नाव ,आन्हर आ लाठी ,डॉल आ रस्सी ,तहिना बहिन आ कनिया,एक दोसरक जिबाक सहारा बनी गेल छलथी । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ’सगर राति‍ दीप जरय’क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’  उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे  सम्पन्न/ ८० म सगर राति‍ दीप जरय  सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे  उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे रिपोर्ट पूनम मण्डल सगर राति‍ दीप जरय’क 79म आयोजन ‘कथा कोसी’ नामक वैनरक नीचाँ दि‍नांक 15 जून संध्‍या 6.30 बजेसँ शुरू भऽ 16 जूनक भि‍नसर 6 बजे धरि‍ लौकही थाना अन्‍तर्गत औरहा गामक मध्‍य वि‍द्यालयक नव नि‍र्मित भवनमे श्री उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गोष्‍ठी सुसम्‍पन्न भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं श्री रामचन्‍द्र पासवान जीक संयुक्‍त  अध्‍यक्षतामे तथा श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव आ श्री दुर्गागान्‍द मण्‍डलक संयुक्‍त  संचालनमे ऐ कथा गोष्‍ठीक भरि‍ राति‍क यात्रा भेल। गोष्‍ठीक  शुभारम्‍भ श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह एवं श्री रामचन्‍द्र पासवानजी संयुक्‍त रूपे दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ  उद्घाटन केलनि‍। वि‍देह-सदेह-5 वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथा, वि‍देह सदेह-6 वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह-सदेह-7 वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह-सदेह-8 वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह-सदेह-9 वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव तथा वि‍देह-सदेह-10 वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध-समालोचना नामक पोथीक लोकार्पण स्‍थानीय वि‍द्वतजन श्री संजय कुमार सिंह, श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री मि‍थि‍लेश सिंह, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी नारायण यादव तथा श्री वीरेन्‍द्र प्रसाद सिंह द्वारा भेल हाथे भेल। लोकार्पण सत्रक पछाति‍ दू-शब्‍दक एकटा महत्‍वपूर्ण सत्रक सेहो आयोजन भेल जइमे श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री बेचन ठाकुर, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री कमलेश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम वि‍लास साहु, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री रामानन्‍द झा ‘रमण’, श्री शंभु सौरभ, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ शि‍वकुमार प्रसाद,हेम नारायण साहु, श्री अरूणाभ सौरभ तथा श्री उमेश मण्‍डल तथा संयोजक श्री उमेश पासवान द्वारा ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक दीर्घ यात्रा तथा उदेसपर सभागारमे उपस्‍थि‍त दूर-दूरसँ आएल कथाकार, समीक्षक-आलोचक एवं स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमीक मध्‍य मंचसँ अपन-अपन मनतव्‍य  रखलनि‍। जइमे सगर राति‍क 75म आयोजनक पश्चात 76म आयोजन जे श्री देवशंकर नवीन दि‍ल्‍लीमे करेबाक घोषना तँ केने रहथि‍ मुदा से नै करा साहि‍त्‍य  अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कथा गोष्‍ठीकेँ गनि नेने रहथि‍ जहू गि‍नतीकेँ सोझरौल गेल आ तँए ऐ गोष्‍ठीकेँ श्री उमेश पासवान अपन इमानक परि‍चए दैत ७९ म गोष्‍ठीक आयोजन केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ अर्थात् वि‍देह मैथि‍ली साहि‍त्‍य  आन्‍दोलनसँ जूड़ल मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी छी। हम सभ ७७म, ७८ म आयोजनक आयोजन कर्ताकेँ स्‍पष्‍ट रूपे कहैत एलि‍यनि‍ जे मुदा हमरा सबहक बात नहियेँ वि‍भारानी मानलनि‍ आ नहि‍येँ कमलेश झा मानलनि‍। मुदा से हमहूँ नै मानब आ सही-सही गि‍नती करब। आ तही दुआरे ऐ गोष्‍ठीक आयोजन ७९मे आयोजन तँइ भेल, आयोजि‍त भेल। हलाँकि‍ दरभंगासँ आएल कथाकार श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक उकसेला पर रहुआसँ आएल श्री वि‍नय मोहन झा जगदीश, श्री दुखमोचन झा आ दरभंगेसँ आएल श्री अशोक कुमार मेहता हीरेन्‍द्र  झाक संग गोष्‍ठीक आरम्‍भक घंटा भरि‍क पछाति‍ चलि‍ जाइ गेला। जीवि‍ते नर्क (उमेश मण्‍डल), शि‍क्षाक महत (राम वि‍लास साहु), बि‍आहक पहि‍ल गि‍रह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल), बौका डाँड़ (लक्ष्‍मी दास), बंश (कपि‍लेश्वर राउत), टाटीक बाँस (राम देव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’), सगतोरनी (शि‍वकुमार मि‍श्र), पाथर, पि‍यक्कर, जोगार आ अंग्रेज नैना (अमीत मि‍श्र), संत आकि‍ चंठ (बेचन ठाकुर), अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ), नमोनाइटिस (उमेश नारायण कर्ण), द्वादशा (सुभाष चन्‍द्र ‘सि‍नेही’), राँड़ि‍न (रोशन कुमार ‘मैथि‍ल’), पँचवेदी (अखि‍लेश कुमार मण्‍डल), मुइलो बि‍सेबनि (जगदीश प्रसाद मण्‍डल) इत्‍यादि‍ महत्‍वपूर्ण लघु कथा/वि‍हन‍ कथाक पाठ भेल आ सत्रे-सत्र मौखि‍क टि‍प्‍पणी आ समीक्षा भेल। अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ) क समीक्षाक क्रममे श्री रमानन्द झा "रमण" कथावस्तुसँ अपन असहमति देखेलनि आ कहलनि- " नै आब ई गप नै अछि, एकटा गप एतै देखियौ, हम  रमानन्द झा "रमण" श्रोत्रिय उच्च कुलक, आ कतऽ आएल छी! उमेश पासवानक दरबज्जापर!" श्री बेचन ठाकुर  श्री रमानन्द झा "रमण"क नव-ब्राह्मणवादी सोचक  विरोध करैत कहलनि- " लोकक मगजमे अखनो जाति-पाति भरल छै, मैलोरंगक प्रकाश झा तेँ ने कहै छथि जे बेचन ठाकुर भरि दिन तँ केश काटैत रहैए, ई रंगमंच की करत!! श्रीधरमकेँ सेहो ई गप बुझल छन्हि। माने मैथिली साहित्यकार, समीक्षक आ रंगमंचसँ जुड़ल ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्म्णवादी सोचक लोककेँ देखैत  ई कहल जा सकैए। २१म शताब्दीमे श्री रमानन्द झा "रमण"क बयान ई देखबैत अछि जे  कोना ओ उमेश पासवानक दरबज्जापर आबि उपकृत करबाक भावनासँ ग्रसित छथि। ऐ अवसर पर २७ म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी  सेहो आयोजित भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर विहनि कथा १ न्याय

स्कूल जाइत काल एकटा लड़कीकेँ ओहे गामक मुखियाक बेटा अपना हबसक शिकार बना लेलक। ई घटना सुनलाक बाद स्कुलिया छौड़ा सभ ओकरा बड पिटलकै। ऐ घटनासँ हुनकर बाबूजीकेँ अपन पगरी खसबाक भान भेलै आ अपन बेटाक करतूतपर पर्दा देबाक लेल पञ्चायत नै करबाक घोषणा केलक। मुखियाक एहन पक्षपात देखि पूरा समाज मिलि कऽ एक निर्णय केलक जे न्याय आखिर न्याय होइ छै। आ सभक साथ उचित न्याय हएब आवश्यक छै, चाहे ओ राजा हुअए या प्रजा। तेँ पञ्चायत हेबाक चाही तथा दोषीकेँ कर्म अनुसार उचित सजाय भेटबाक चाही । समाजक आगू मुखियाक कोनो बस नै चललै। ओ पञ्चायत करबाक लेल विवश भऽ गेल। दोसर दिन भोरे पञ्चायत बैसल आ उचित न्याय भेल।

२  आत्मग्लानि  काल्हि दिवाली पावनि। सभ गोटे दिवालीक तैयारीमे जुटल। हरीयाक हाथ कटा गेल छै तेँ हुनकर पत्नी आवश्यक समान लेल बजार दिस टहलल। पाछु-पाछु हुनकर बेटा सेहो। हरीयाक परिवार बड गरीब छै। दुकानमे पूजा, आरती आ प्रसादी लेबाक क्षमता नै छनि हुनका सभ लग। मुदा समाजमे नाक बचेबाक हेतु एकटा अगरबत्ती, अबीर, चन्दन आ पाभरि लड्डु खरिदलक मुश्किलसँ। तइपर सँ हुनकर बचबा हुकालोली आ फटका लेल बफाड़ि तोड़ऽ लागल। पैसा तँ नै रहए ओकरा लग से झट्ट द किन देतै। दुकनदारसँ विनती केलक तँ ओ कहलक -" पैछला लक्ष्मीपूजाक पैसा सभ बाकिए छौ आ फेर कतेक खाली उधारिए दैत रहियौ। "दुकनदारक बात सुनि कऽ छपराबाली तँ लजैनी जकाँ लाजसँ घोकैच गेल। ओम्हर दोसर लोक सभकेँ सामाग्री किननाइ आ बाल-बच्चा लेल फटका किननाइ देखि कऽ छपराबालीक आँखिसँ श्रवन नोर बहऽ लगलै आ अपन गरीबीपर बड आत्मग्लानी भेलै। ३ अभिशाप  चौकिएपर सँ काकी कहै छथिन, "बौवा एम्हरे आउ।"  काकीक पिड़ाएल स्वर सुनि रमलोचना चौकी दिस बढ़ल मुदा आङ्गन सुन्न। चारु दिस बस कन्नारोहट। ओ समझि नै पबलथि ऐ परिवेशकेँ। आ काकी सहजेसँ बताबऽ लेल राजी नै होएथिन।। तखन ओ कहलथिन- "काकी, की भेल सत्त-सत्त बताबू, अहाँकेँ हमर सपत भेल।" काकी आँचरसँ अपन नोर पोछैत सम्वेदनशील भऽ बजलनि- "की कहू बौवा, अनर्थ भऽ गेलै। बुच्चीकेँ विवाहक ६ महिना नै भेल छलै मुदा नरपिशाच सभ उनका ऊपर अन्याय कऽ देलकै। दहेजक किछु टका बाँकी रहि गेल छलै, से तइसँ ओकरा मट्टी-तेल धऽ जिन्दे जरा देलकै ओकर सासुर सभ। कतेको बेर ऐ टका लेल तछाड़-मछाड़ भेल रहै मुदा हम सभ जल्दिए ब्यबस्था कऽ दऽ देब, से आश्वासन देलाक बाबजुदो ओ दानव सभ हमरा बेटीक साथ एहन कुकर्म केलक। बजरखसुवा पुलिसकेँ थानामे रिपोर्ट लिखाबऽ गेलौ तँ मचरुवा ओकरो सभकेँ शायद पैसेपर मिला लेलकै। एखन धरि किछु निराकरण नै भेलैए।" काकी बैजते-बैजते बेहोस भऽ गेलीह। रमलोचना काकीकेँ सम्हारैत सोचै छै, समाजक एहन अभिशाप आ कुसंस्कारक बारेमे। जकरा चपेटामे कतेको धिया-बर्सेनी बलिदान होइ छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल लघुकथा- चुप्‍पा पाल गोसाँइ लुक-झुका गेल। ओना छह बजि गेल मुदा सुरूज अपन दिनक यात्राक अंतिम पड़ावपर अँटिक तकिते छला। पतराएल काज रहने नीलकंठ काका सबेरे-सकाल निचेन भऽ गेल छला। जहिना परिवार मोटेलासँ काजो मोटाइ छै आ दुबरेलासँ काजो दुबराइ छै तहिना नीलकंठ कक्काकेँ सेहो भेलनि। ओना परिवारक संस्कार आगू बढ़लनि मुदा काज पूरने काजो पतराइए। होइतो तँ तहिना ने छै जे जनम होइते संस्कारोक जनम होइ छै आ अन्त होइत अन्तो होइ छै। नीलकंठ कक्काकेँ तेहने सन भेलनि। किअए ने हेतनि, सोझहे लग्गीसँ घास खुएलासँ नै ने होइ छै जे आगू ताकब दादा-परदादा देखब आ पाछू ताकब तँ नाति‍-छेड़नाति‍ देखब। बाल-बच्चाक बि‍आह-दान भेने माए-बापक जिनगीक प्रमुख कर्म-धर्मक पूर्ति होइ छै जइसँ बाल-बच्चाक अपन दायित्व पूर्ति करै छथि। बेटा बि‍आहक आइ पनरहम दिन छेलनि। पैघ यज्ञसँ दुनू परानी मुक्ति पाबि‍ जहिना साबुनसँ वस्त्रक मैल साफ कएल जाइए तहिना माए-बापसँ लऽ कऽ बेटा-बेटीक परिवार बना जिनगी मैलकेँ कमर्क साबुनसँ घोइ अपन मनक सफाइ लोक करै छाथि। नीलकंठ कक्काक मनमे उठलनि‍ जे बेटा-बि‍आहक अंतिम हिसाब जोड़ि किअए ने काजक विसर्जन कइए ली। आब कि कोनो ओ जुग-जमाना रहल जे तीन-तीन-चारि-चारि मास गरदनिमे उतरी झुलि‍ते रहल। जे काज महज चारि-पाँच घंटाक छी। मन गबाही देलकनि जे से नै तँ आइ अंतिम हिसाब -बि‍आहक लाभ-हानि‍क- कऽ काजक विसर्जन कइए लेब। जहिना बोनैया हरिणक बच्‍चा पकड़ाइते चारूकात चौकन्ना हुअए लगैत तहिना नीलकंठ कक्काकेँ भेलनि। काजसँ विश्राम होइते देखि सुचिता काकी हाँइ-हाँइ अपन काजक मुड़ी मोड़ि चाहक ओरियानक विचार मनमे अनलनि। किअए नै अनती, ओहन जमाना थोड़े छथि जे पतिक विकलांत देखि ओइसँ बेसी अपने विकलांतता देखबए लगती। केतली-लोटा नेने कल दिस बढ़ली, मनमे उठलनि पहिने अपने हाँइ-हाँइ पएर धोइ लोटा-केतली अखाड़ब आकि लोटे केटली अखाड़ि पानि भरि लेब। मन ततमत करए लगलनि, ओना ऐ उमेरक ई प्रश्न नै भेल, मुदा हर-काजक अपन गति-विधि छै। अपने जिनगीक काज ने दोसराकेँ बाट देखौत। समैसँ पहिने सुचिता काकी चाह बना दहिना हाथे गिलास नेने नीलकंठ काका लग पहुँचली। अखनि‍ धरि नीलकंठ काका मुड़ी निच्चे मुहेँ केने छला। मनमे बेटा बि‍आहक काज घुरि‍याइत रहनि‍। चाहक गिलास जखनि सुचिता काकी निच्चे दबा बढ़ौलकनि तखनि आँखि पड़िते काका नजरि उठौलनि। भकुआएल मुँहक सुरखी देखि नजरि-पर-नजरि गड़ौलनि। मुदा कक्काक मन अपन विचारपर रहनि‍। काकीकेँ बूझि पड़लनि जे भरिसक कोनो दब कएल काज मनकेँ पकड़ने छन्‍हि‍। मुदा जँ चाह पीबैसँ पहिने बाजि बात लाड़ब तँ भऽ सकैए जे चाह पीब छोड़ि अपने बेथासँ बेथित भऽ जाथि, तइसँ नीक जे चुपचाप हाथमे चाहक गिलास पकड़ा, अपनो चाह अंगनासँ आनि एतै पीबो करब आ पुछियो लेबनि। तइ बीच दू-चारि घोंट चाहो घोंटि‍ नेने रहता जइसँ मनोक जुआरि‍‍ कमतनि। ओना उदासो चेहराक केते कारणो अछि। केतौ रौद-बसातक उदासी तँ केतौ कोनो काज नै भेने, केतौ परि‍श्रमक नोकसानक उदासी, केतौ धीया-पुता मुइने उदासी तँ केतौ माए-बाप मुइने। मुदा तँए कि पतिक बेथा पत्नी नै सुनथि। पति-पत्नीक बीच हजारो रूप अछि हजारो रंग अछि तँए कि बजा-भुकी बन्न भऽ जाए। आंगन दिस सुचि‍ता काकी बढ़ली। एक घोंट चाह पीवि‍ते नीलकंठ कक्काक मुँह मुसिकिएलनि। मनमे उचरलनि, कहू जे एहेन काजकेँ कि कहबै काज छेलनि डेढ़ सए जोड़ धोती आ तेकर आरो संगी सभ माने पाँचो टूक कपड़ा संग विदाइ करब। ओना डेढ़ सए बहुत भेल मुदा से नै, अज-गज बला परिवार कक्काक। चारि भाँइक अपन भैयारी, तेकर नैहर-सासुर, नाति-नातिक, पोता-पोतीसँ लऽ कऽ अपन सासुरक सातो संबन्‍धीक, तइ संग बेटाक हाइस्‍कूल-कौलेजक संगीक संग नोकरीक संगी धरि‍। नीलकंठ काका हृदए खोलि काज केलनि। प्रश्न तँ मनमे उठलनि मुदा लगले जवाब भेटलनि जे जग-जापमे खर्च होइते छै। जँ से नै होए तँ धनक काजे कि‍ रहत। पेट तँ सागो आ एक लोटा पानियोँसँ मानियेँ जाइ छै। मन नचि‍ते रहनि आकि‍ सुचिता काकी मुँहमे चाहक गिलास भिरौने आगूमे बैसली। तही बीच नीलकंठ काका अपन हाथक गिलास चौकीपर राखि हाथक पाँचो ओंगरी घुमबैत बजला- “कह ते ई केहेन भेल?” नीलकंठ कक्काक प्रश्न सुनि सुचिता काकी अकचकाइते रहली जे कि केहेन भेल। बाघ भेल कि साँप भेल से केना बुझबै। ओना दुनू परानीक -नीलकंठ काका आ सुचि‍ता काकी- मन बेटा बिआहसँ एते खुश रहनि‍ जे छोट-छीन केते बातो आ काजो मनसँ हटि गेल रहनि मुदा मनोक तँ अपन संसार छै। प्रसंगोक अपन स्थानो आ महत्तो छइहे। दुनू बेकतीक सझिया काज तँए आरो बेसी मन खुशी रहनि। खुशी हएब उचितो छल किएक तँ केतो एहनो होइ छै जे प्रेमरस पीब, मधुर गीत गाबि‍ संतान पैदा होइ छै आ किछुए दिन पछाति सभ किछु उनटि जाइ छै, ओइ बेटासँ तँ नीक काज भेले रहानि। ओना चारि भाए-बहिनक बीच एकेटा बेटा तीनटा बेटीए छेलनि। जे तीनू बेटा-बेटीसँ जेठे छेलनि जेकर बि‍आह-दुरागमन पहिने कऽ नेने छला। तीनू बेटी बि‍आहक दान-दहेज देखि दान-दहेजसँ मने उचटि‍ गेलनि, जइसँ बेटाक प्रति दान-दहेजक विचारे मनमे दबि गेलनि। दोसरो कारण भेलनि, एक-एक बेटीक बि‍आहमे जेते खर्च भेल तइसँ बेसी जँ बेटीबलाकेँ खर्च कराएब ई तँ सोझहा-सोझही अन्याय भेल। मुदा से कहाँ होइ छै, दहेजक दुआरे बेटी बि‍आहकेँ लोक अगर-मगर करैत टपि जाइए मुदा बेटा बेरमे बिनु पढ़लो-लिखलकेँ डाक्टर-इंजीनियर बना देल जाइए। जहिना बड़दहट्टामे फुसि-फासिक तेजी रहै छै तहिना ने बेटो-बेटीक बि‍आहमे...। यज्ञ सन पवित्र स्थलमे जँ फुसि-फासिक तेजी नै रहत तँ ओ यज्ञ शुद्धे केना भेल? खैर जे होइ। जेते तीनू बेटीक बि‍आहमे खर्च भेल ओते आमद एकटामे केना हएत। तइसँ नीक जे मुँहछोहनियेँ नै करब। हथउठाइ जे हेतइ सएह हेतै। पतिक बिपटा बानि -हाथक ओंगरी घुमा बजैत- देखि सुचिता काकीकेँ हँसी लगलनि मुदा हँसबो तँ हँसबे छी। केतौ गुदगुदबैए तँ केतौ भकभकेबो करैए। काज नफगर रहल घट्टो नफे बुझाए छै आ घटगर रहल तँ नफो घट्टे बुझाए छै। पथड़ाएल केराउक भुज्जा जकाँ सुचिता काकीक दाँत तर नीलकंठ कक्काक आक्रोश पड़लनि‍। मुदा आक्रोशो तँ आक्रोशे छी, कथीक आक्रोश। तँए जाबे उधारि-उधारि नै बजता ताबे बूझब केना? मुदा मुँहक हँसी पेटमे गुरकुनियाँ कटिते रहनि। बजली- “तेहेन झाँपि‍-तोपि बजै छी जे ऊपरे-घाँड़े रहि गेलौं तँए कनी बिक्‍छा कऽ बजिऔ। जखनि दुनू गोटेक सझिया जीवन अछि तखनि हम हँसी आ अहाँ कानी ई केहेन हएत?” खिस्सकरकेँ जहिना एक्कोटा खिस्सा सुनिनिहार भेटला पछाति अपन सुधि-बुधि हरा जाए छै तहिना नीलकंठ कक्काकेँ सुचिताक बोल सुनि भेलनि बजला- “परिवारक महान यज्ञ बेटा-बेटीक बि‍आह छी, तेहेन यज्ञ जँ नीक जकाँ सम्पन भऽ जाए तँ खुशीक बात भेल। तइले देहोक धौजनि आ पाइयोक धौजनि तँ हेबे करत। मुदा तइमे उचित-अनुचितक तँ विचार करए पड़त किने?” नीलकंठ कक्काक मनकेँ पकड़ैत चुट्टा सुचिता काकी भिड़ौलनि। हुँहकारी भरैत बजली- “ऐमे के नै करत?” जहिना एक्के भगवान भिन्न-भिन्न स्वरूप भिन्न-भिन्न फूल-पत्ती पाबि खुशी होइछ तहिना नीलकंठ कक्काकेँ सेहो भेलनि। सुचिता काकी नजरि‍-पर-नजिर गड़़ा बजला- “उचित-अनुचित बेड़ाएब असान अछि। जिनगीक संगी रहने कि हएत? ई तँ विचारक संगी भेने ने काज चलत।” नीलकंठ कक्काक बात सुचिता काकीकेँ अकठाइन लगलनि। मनमे उठलनि जे कहू सभ दिन एकठाम रहि सभ किछु करै छी तखनि एना किअए बजै छथि। भरिसक कोनो एहेन उकड़ू सोग ने तँ मनकेँ पकड़ि नेने छन्‍हि‍। आन दिन केहेन बढ़ि‍याँ हबगब करै छेलौं आ आइ कि भऽ गेल छन्‍हि‍। बजली- “कनी नीक जकाँ अपन उदासीक कारण बजिऔ। हम ऊपरे-झापरे रहि गेल छी।” सुचिता काकी जिज्ञासा देखि नीलकंठ काका बजला- “उचित-अनुचित काजक दू छोर भेल। एक छोर उचित भेल आ दोसर अनुचित। मुदा तइसँ थोड़े काज चलत। सुत-सुत मिलि जहिना डोरी बनैए तहिना दुनू अछि। तेकरा बि‍हिया कऽ जँ नै सीमा देब तँ काजे भँसि‍या जाएत। बुझबे ने करबै जे कतए कि‍ भऽ गेलै। पछाति बाजब जे मनमे जे छेलै से भेबे ने कएल। अहीं कहू जे मनेक विचारकेँ ने काज रूप बना केलिऐ तखनि किअए ने भेल?” नीलकंठ कक्काक विचार सुचितो काकीकेँ दमगर बूझि पड़लनि। माथ कुड़ियबैत बजली- “तखनि केना हएत?” सुचिता काकीक पघिलल मन देखि नीलकंठ काका बजला- “बड़ भारी जाल छै। फुलवारीक फूलमे देखबै जे एके नामक अपराजित फूल उजरो होइए लालो होइए आ कारीओ होइए। सोझहे अपराजित आकि आने फूल जे रंग-रंगक होइए, कहलासँ थोड़े बूझि पेबे जे लाल-कारीमे कोन-नीक कोन-अधला भेल?” नीलकंठ कक्काक छिड़ियाएल विचार सुनि सुचिता काकी समटैत बजली- “अच्छा छोड़ू एते छान-पगहाकेँ। एक-एक काजकेँ उठा बेड़बैत चलू जे कि नीक-भेल आकि अधला भेल।” पत्नीक विचार सुनि नीलकंठ काका बजला- “हँ, बड़बढ़ि‍याँ विचार देलौं। मुदा पहिने ई कहि दिअ जे केते काज अढ़ेला पछाति करै छी आ केते अपने फुड़ने करै छी?” पतिक बात सुनि सुचिता काकी अकबका गेली। मने-मने विचारे लगली जे ई कि भेल? एकरा कि काज करब नै कहबै। घर-परिवारक जखनि काज भइए गेल तखनि काज केना ने भेल। भरिसक बुधिये तँ नै घुसुकि गेलनि अछि, नै तँ एहेन बिनु हाथ-पएरक बोल किअए भेलनि? एक्केटा बातमे सेहो मानब उचित नै हएत। जँ मन घुसकल-फुसकल हेतनि तँ दोसरो-तेसरो बात एहेन बजता। ओना लोककेँ बेरो-विपति आ काजो-उदममे मन घुसुकि-फुसुकि जाइ छै। आंशिक रूपमे की ई झूठ जे किछु सरकारीओ कर्मचारी वा शिक्षकोकेँ बेटीक बि‍आह सेहो पतित बनौलकनि। परिस्थितियो रहल जे केते शिक्षक हाइ स्कूल वा कौलेजसँ सेवा-निवृत भऽ गेला मुदा हाथसँ कहियो वेतन नै उठौलनि। मुदा तँए कि‍ परिवारमे खर्च नै छेलनि, एक शिक्षक वा कर्मचारीक खर्च तँ छेलनि‍हेँ। मनकेँ थीर करैत सुचिता काकी विचारलनि जे से नै तँ जे बुझैमे नै आएल से पुछिए किअए ने ली बजली- “कि कहलिऐ अढ़ेलोत्तर आ अपने फुड़ने?” सुचिता काकीक प्रश्न सुनि नीलकंठ कक्काक मनमे उपकलनि, भरि दिनक हराएल जँ साँझो घड़ि घर पहुँच जाए तँ ओ हराएब नै भेल। दिन तँ होइते छै बौआइले तखनि बौआएब हराएब केना भेल। बजला- “जखनि कोनो काज अढ़ेला पछाति जे करैए ओ अपन उहिक नै भेल। जँ ओकरा अढ़ाएल नै जाए तखनि ओ करत कि? अहीं कहू?” नीलकंठ कक्काक विचार सुनि माथक मोटा पटकैत सुचिता काकी बजली- “अहाँ अपनाकेँ एतबे किअए बुझै छिए जे हमरा कोनो काज करैले नै कहब। जँ से नै कहब तँ केना बुझबै जे हमर बात फंल्ली मानैए आकि नै?” पाशा पलटैत नीलकंठ कक्काक बजला- “जड़िसँ छीप धरिक काजक हिसाब-किताब करैमे बड़ समए लगत। से नै तँ एक्केटा काजक हिसाब करू।” एकटा सुनि सुचिता काकीक मन हलचलेलनि। ई तँ सोलहन्नी एक तरफा भेल औगता कऽ बजली- “अहूँक बात रहल आ एकटा हमरो अछि।” “से की?” “सवारी बरियातीक हिसाबसँ होइ छै तइमे एते गाड़ीक कोन प्रयोजन छेलै, जे लऽ गेलौं?” सुचिता काकीक प्रश्न सुनि नीलकंठ काका बजला- “अच्छा, अहीं विचार दिअ जे पहिने कि विचारब?” पतिक शीतल छाहरि पाबि काकी बजली- “पहिने गाड़ीए-सवारीक विचार करू। किअए पच्चीसटा गाड़ी लऽ गेलिऐ, जखनि कि डेरहे सए बरियाती गेलिऐ।” गाड़ीक नाओं सुनि समाजमे जीतक अनुभव नीलकंठ कक्काकेँ भेलनि। अखनि धरि‍ समाजमे कियो बीसटा गाड़ीसँ आगू नै बढ़ल छला तैठाम पाँच गाड़ी बढ़ैक प्रतिष्ठा केकरा भेटल। आह्लादित होइत बजला- “अपन मनोरथ छल जे आगू बढ़ि काज करी। किअए अहाँकेँ कोनो तेकर दुख अछि? प्रतिष्ठा कि फूटा कऽ भेल आकि सम्मि‍लि‍ते भेल।” एक तँ ओहिना सुचिता काकीक मन बेटा बि‍आहक खुशीसँ उधियाइत रहनि‍ तैपर पतिक मनोरथ सुनि आरो उधिया गेलनि। बजली- “अनकासँ तँ नीक काज जरूर भेल। देखै छिऐ जे अल्हुआक बोरा जकाँ मनुख गाड़ीमे ठसमठस बरियाती जाइ-अबैए आ गाड़ीएमे मुँह पेट सभ चलए लगै छै। तइसँ नीक भेल जे जे कियो गेला अरामसँ एला-गेला।” सुचिता काकीक बोल सुनि नीलकंठ कक्काक मुँहसँ हँसी फुटलनि। पतिक हँसी देखि काकीकेँ भेलनि जे भरिसक हमर निशान उचित जगहपर लगलनि‍। अपन बराइ सुनि खुशी हएब मनुखक जन्मजात संस्कार रहल अछि। अपन उचित जगहक निशानसँ पतिक मुँहकेँ लाबा जकाँ हँसाएब सफल पत्नीक प्रमुख लक्षण तँ भेबे कएल। मुदा नीलकंठ कक्काक हँसीक कारण सुचिता काकीक निशान नै बल्कि‍ समाजमे अरामदेह बेसी गाड़ीकेँ बेटाक बि‍आहक बरियातीमे लऽ जाएब छेलनि। जेकरा बेटाकेँ अधिक दान-दहेज बि‍आहमे भेटै छै, समाजमे ओकरे मान भेल कि ने? जँ मान बढ़ल तँ जरूर अंको बढ़ल हेबे करत। पेटक गुदगुदी असथिर होइते सुचिता काकी बजली- “आब, हाँ-हाँ हीं-हीं छोड़ू। भानसोक बेर भेल जाइए। अखनि पुतोहुकेँ चुल्हिक भार थोड़े देबै। जइ बेथे बेथाएल छी से बेथा निकालू। जाबे गुर घाउ जकाँ कोनो बेथाकेँ नीक जकाँ नै निकालि बहा लेब ताबे सड़नि-असाइक डर रहि‍ते छै। तँए आदो-पान्त बाजू?” जहि‍ना कियो संगीतज्ञ उच्च कोटीक मंचपर कलासँ श्रोताकेँ मुग्द कऽ सुता दइए तँ केतौ एकान्त बनमे असकरे कियो अपन गुणसँ निराकार रूप भगवानकेँ सुन भरत जकाँ नन्दी गाम बना राज-काज चलबैए तहि‍ना अपन बेथित वाणकेँ निकालैत नीलकंठ काका बजला- “बि‍आहक आन खरच आ काजपर मन केतौ नै अँटकल अछि, किअए तँ चाउर-दालि खर्च भेल तँ बदलामे लोको, मालो-जाल आ चिड़ैऔ खेलक। गाड़ी-सवारीमे खर्च भेल तँ ईहो उपराग नै भेटल जे किनको डाक्टर ऐठाम जाए पड़लनि। मुदा डेढ़ सए जोड़ धोती मिला पाँचो टूक विदाइमे जे खर्च भेल ओ टारनो मनसँ नै हटैए।” जहिना मरूभुमिमे बालु सिबा चमकैत किछु नै नजरि अबैत तहिना सुचिता काकीकेँ बेटा बि‍आहक सफलता मनमे छेलनिहेँ चमकि चड़चड़ेली- “राँड़ कानए अहिवाती कानए तइ लगल बड़कुम्मरि‍ कानए, सुहरदे मुहेँ किअए ने बजै छी जे आने बरक बाप जकाँ कननी बे‍मारी धेने अछि तँए कनै छी। अपने मने जे केतबो गुर-चाउर चिबबैत कानब तँ कि हमहीं संगी छी, बाँटि थोड़े लेब। खैर जे होउ, देह तँ रोगाएल अहींक अछि, तँए बेमारीक जड़ि तँ अपने बुझैत हेबै। बाजू, खोलि कऽ बाजू, कनि भानसमे देरीए हएत तँ कि हेतै। मनक घाउ जे मेटाएल रहत तँ खाइओ आ सुतैओमे रुचि औत।” सुचिता काकीक विचार सुनि नीलकंठ कक्काक मनमे भेलनि जे भरिसक लोक ठीके कहै छै राजाकेँ किदनि‍ चिन्ता आ रानीकेँ किदनि‍क। मुदा मनक बेथा नीक जकाँ वएह ने बूझि पाबि‍ सकैए जेकर हाथ-पएर नमहर हेतै। घटको सबहक अजीब गति छै। बर-कनियाँक घरदेखीमे लगले सर्टिफिकेट दऽ दइ छथि जे सीता-रामक जोड़ी अछि। विधातो जेना जोड़े लगा पठौलनि। मुदा नै सोलहन्नी तँ अठन्नीओ बेथा तँ भगबे करत। सोलहन्नी तँ तखनि भगै छै जखनि सुनिनिहार बेथा सुनि बेवसथित दंगसँ समाधान करै छथि, मुदा तँए कि अपन बेथा हृदैसँ निकाललोसँ तँ अदहा कमिते अछि। किएक ने कमत? लोक नै सुनत तँ नै सुनह मुदा उगलाहा तँ सुनबे करत। बजला- “विदाइमे केते खर्च भेल से बूझल अछि?” ठोरेपर बरी पकबैत सूचिता काकी बजली- “विदाइ तँ विदाइ भेल, तइमे हमरा बुझैक कि प्रयोजन अछि। ई काज तँ पुरुख पात्रक छी। जे घरसँ निकलि‍ कुटुम-परिवार धरिक चीन-पहचीन रखै छाथि, सेहो अधला कि भेल। जखनि अधले नै भेल तखनि चिन्ते किअए हएत? जखनि चिन्ते नै हएत तखनि मने किअए बेथाएत? मन हल्लुक करू। अनेरे तरे-तरे गुमसड़ै छी।” नीलकंठ कक्काक मन मानि गेलनि जे मुँहछोहनि छोड़ि किछु ने भेटत। मुदा मनक बेथाक कथा जँ बाजियो नै लेब तँ ओकरा संग अन्याय हएत। बजला- “जे बात सुनैमे नै आबए ओ दोहरा कऽ पूछि लेब। मुदा जे बुझैमे नै आबए ओहन नै दोहराएब। शुरूहेसँ कहै छी।” अपन भरि‍याइत आसन देखि सुचिता काकी हाथ-पएर सोझ-साझ करैत बैसली। सोझ-साझक कारण रहनि‍ जे नजरि-नजरिक मिलानी नब्‍बे डिग्रीमे नै शत-प्रतिशत हुअए। बजली- “देखू हम बि‍सराह छी, जँ बीचमे कोनो बि‍सरि जाइ तँ ओकर मदी नै भेल। मुदा अहूँ, काज केतौ आ बात केतौसँ नै करब। जहिना-जहिना काज बढ़ैत गेल तहिना-तहिना बातो बढ़बैत चलब।” सुचिता काकीक विचार नीलकंठ कक्काकेँ दमगर बूझि पड़लनि। दमगरे विचार ने दमगर आशा जगबैए। बजला- “डेढ़ सए गोटेकेँ विदाइ केलियनि‍। ओना किनको ऐ दुआरे नै बेरेलियनि‍ जे एक काजक एके विदाइ उचित बुझलौं। मुदा तँए कि, किनको संग कम-बेसी नहियेँ केलियनि।” पतिक बात सुनि सुचिता काकी टपकली- “किअए, कियो किछु उपराग पठौलनि अछि‍?” “उपराग किअए कियो पठेता। मुदा मन मानि नै रहल अछि। कहिये दइ छी। डेरहो सए विदाइ डेढ़ लाखक छल। एक-एक विदाइक वस्तुमे एक-एक हजार लगल छल। मुदा आब जखनि‍ पाछू उनटि तकै छी तँ बूझि पड़ैए जे दस-सँ-पनरह गोटे धोतीओ चदरियोक उपयोग करता बाँकी कियो घरनीपा बनौता तँ कियौ गाड़ी-पोछना!” पतिक बात सुनिते सुचिता काकी कुदैक बजली- “अपन महिंसकेँ कियो कुरहरि‍ए नाथत तइले अहाँकेँ चिन्ता किअए होइए।” सुचिता काकीक बात सुनिते नीलकंठ कक्काकेँ झड़क उठलनि बजला- “अहीं सन लोक बि‍आहमे काजसँ विधि भारी बनबैए। एकटा कहू जे अपन बि‍आह मन अछि।” “मन किअए ने रहत?” “केते खर्च बाप केने रहथि से बूझल अछि?” “दहेलहा-भसेलहा खनदान बुझै छिऐ जे काजक हिसाब बाप-माएसँ लेब। “एना नै छि‍ड़ि‍आउ सबा लाख रूपैआमे दुनू गोटेक बि‍आह भेल रहए। जाउ कनी चसगरसँ भानस करब। अहिना बेजाए नीक होइत एलैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’- विहनि कथा ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी १.   हारि

साँझु पहर फोनक घंटी बाजल । “ट्रिन न न ट्रिन न न न ट्रिन न न न न... “ बिना अप्पन नाम बतोने रिसीवर उठेलहुँ । कोनो जवाब नहि । दोसर कातसँ शांत । मुश्किलसँ पन्द्रह मिनट बाद फेर फोनक घंटी बाजल । दोसर दिससँ फेरो कोनो आवाज नहि । शाइद हमर स्वर पशंद नहि हेतै अथवा कएकरो आओरसँ गप्प करैक हेतै । रातिक एगारह बजे फेर फोन आएल, फोन उठेलहुँ, “हेलो ।“ कनिक कालक चूप्पीकेँ बाद उम्हरसँ, “हम मालकी बजै छी, बहुत दिनक बाद फोन कए रहल छी, ठीक तँ छी ने ? साँझेसँ ट्राइ कए रहल छलहुँ मुदा हिम्मत नहि भए रहल छल । ई कहै लेल एतेक राति कए फोन केलहुँ जे हमर ब्याह भए गेल ।“ “हमरा बुझल अछि ।“ “कोना ।“ “दुबईसँ एला बाद हम अहाँक गाम गेल रही ओहिठाम कएकरोसँ बुझलहुँ जे दू महिना पाहिले अहाँक ब्याह दुरागमन दुनू संगे भऽ गेल मुदा ई की महर इंतजार नहि कए पएलहुँ ।“ “हम बेबस रही..... अहाँक बच्चाकेँ पाँच महिनासँ अपना पेटमे रखने-रखने, आगू दुनियाँक नजरिसँ बचेनाइ असम्भब छल ।“ “हम कहि कए तँ गेल रहि जे छह महिनासँ पहिले पहिले आबि जाएब कि हमरापर बिश्वास नहि रहल ।“ “एहन गप्प नहि छै, हमर तन एहिठाम अछि मुदा मोन एखनो अहीँ लग अछि परञ्च ई समाज, गाम आ परिवारक सामने हम हारि गेलहुँ ।“ “की अहाँक पतिकेँ ई गप्प सभ बुझल छनि ।“ “ हाँ ! अहाँक दऽ नहि मुदा बच्चा दऽ बुझल छनि । ओ देवतुल्य लोक छथि, होइ बला हमर बच्चाकेँ सेहो अप्पन नाम दै लेल तैयार छथि ... (कनिकाल दुनू कातसँ चुप्पीकेँ बाद)  हम एखन एहि द्वारे फोन कएलहुँ जे हमरा आब ताकैक वा फोन करैक चेष्टा नहि करब ओहि सभकेँ बितल गप्प जानि बिसरि जाएब...हुँऽऽ हुँऽऽऽ !” कानेक स्वर संगे रिसीवर राखैक खटखटाहट, फोन बंद ।

            २. डिबिया

“गे दाइ अहाँक सभक धिया-पुता कतेक गोर होइए ? राति कए डिबिया बाइर कए सुतै जाइ छीयै की ? हमर मरदाबा तँ डिबिया बुता दै छै ।”

            ३.    पिआस

“की यौ ललनजी एना टुकुर टुकुर की तकै छी ?” अप्पन गामक मुँहलागल भाउजक मुँहसँ ई सुनि ललन एकदमसँ सकपका गेला, जिनका कि बहुत कालसँ घुरि रहल छल । “नहि किछु नहि ।“ “धूर जाऊ ! इनार लग पिआसल जाइ छै की पिआसल लग इनार । अहाँ एहन पहिल मरद छी जकरा लग इनार चलि कए एलैए आ एना टुकुर टुकुर तकने कोनो पिआस मिझाइ छैक की ? पिआस मिझाबैक लेल इनारमे कूदए परैक छै ।“

            ४. प्रेम दीवानी “अरे ! अरे ! रुक ई की भऽ रहल छै ! तूँ सभ एक संगे एतेक रास सामूहिक आत्मदाह !” “हम सभ प्रेम दीवानी, प्रेमकेँ अंतिम छोर पावै लेल जा रहल छी मुदा अहाँ अपस्वार्थी मनुख एहि प्रेमकेँ नहि बुझब अहाँ सभ तँ प्रेमोमे नफा नुकशान तकै छी ।“ डिबियाक लोऽपर भन्नाइत फतिन्गाक झुण्डमे सँ एकटा धीरेसँ हमर कानमे भनभना कए कहि डिबियाक आँचपर जा जरि गेल ।

              ५.  खापरि धिपा कए

“यै छोटकी कनियाँ, सुनै छीयै ललिताक वर एलखीन्हेँ जाउ हुनकासँ कनीक नीक मुँहें हँसि बाजि लियौन, खुश भए जेता तँ टिकुली सेनुर लेल किछु दएओ कए जेता ।“ “एहन हँसै बजै बला आ खुश होएबला मरदाबाकेँ हम खापरि धिपा कए चेन नहि फोरि देबैन, अप्पन जमएक बड़ चिंता छनि तँ अपने जा कए किएक नहि खुश कऽ लै छथि ।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अखिलेश कुमार मण्‍डल बेरमा, मधुबनी। वि‍हनि‍ कथा- पँचवेदी जेकरा लेल चोरि‍ करै सएह कहै चोरा, भोरेसँ मनमे बेर-बेर उठए लगल। केतबो ठेल कऽ बहटाबए चाही से बहटबे ने करए। तखनि‍ मन भेल जे जहिना केकरो दुखनामा सुनने दुख कमे छै तहिना जँ समाजोक बातकेँ सुनि आ अपनो बात कहिऐ। उठिे कऽ लालकाका लग गेलौं। देखते पुछलनि‍- “बौआ मन बड़ झूकल देखै छिअह?” कहलियनि- “काका, तेहने रगड़ा मनकेँ रगड़ि‍ रहल अछि जे कि‍ कहौं। तँए झुकौने छी।” लालकाका पुछलनि- “से कि?” कहलियनि- “काका, ओना ऐ बातकेँ समाजक पँचवेदीमे उठाएब, मुदा अहाँ घरक गारजन छी तँए पहिने अहीं बुझा दिअ।” अपन बढ़ैत मान देखि‍ लालकाका बजला- “बेस बात मनमे एलह। तेहेन जुग-जमाना भऽ गेल अछि जे लोक झुठो बातकेँ तेना बढ़ा-चढ़ा कऽ बजैए जे जेना ओकरे राज होइ।” “असथिरसँ बुझा कऽ कहअ” कहलियनि- “काका, अहीं कहू जे ई उचित होइ, जइ समाजक पाग अकासमे टेकने छी तइ समाजक लोककेँ कियो खाधुर तँ कियो भोजनभट्ट कहै?” नीक जकाँ लालकाका नै बुझला। दोहरौलनि- “कनी फरि‍छा कऽ बाजह ने? काकाक आशा पाबि‍ अपनो आशा जगल। कहलियनि- “काका अखूनका जे बि‍आहक बरियाती भऽ गेल अछि तेकरा गामक सभ दुि‍र कऽ देलक हेन, ओकरे देखा-देखी हमहूँ दुि‍र कऽ दिऐ से नीक हएत?” बिनु बात बुझने टोकारा दैत लालकाका कहलनि‍- “से तँ नहियेँ हएत। मुदा बात कि भेलह से ने बाजह?” कहलियनि- “काका, देखते छिऐ जे अखुनका बरियातीमे बेसी गोटे ओहने रहैए जे चूड़ा भूजा तड़ल माछ आ दूटा बोतल घरवारी दिसि‍सँ पबिते छाती उघारि कऽ जश दऽ दइ छै, किछु गोरे सए-दु-सए रसगुल्ला खा पुरा जश दऽ दइ छै, मुदा हम तँ तइसँ भिन्न छी। भोजनक मुख्य अंग गोरस छी। एक तँ ओहुना घरवारी पाँच किलोसँ बेसी दहीक ओरियान नहियेँ करै छथि, तेकरा जँ छुच्‍छ कऽ दइ दि‍ऐ तँ हम खाधुर भेलौं कि समाजक इज्जति‍ रखै छिऐ। तइले लोक एना किअए बजैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्राज्ञ कापड़ि केशवलाल बाखं शिरपा सम्मानसँ सम्मानित रिपोर्ट पूनम मण्डल प्राज्ञ कापड़ि केशवलाल बाखं शिरपा सम्मानसँ सम्मानित नेपाल भाषा परिषद मैथिली भाषाक चर्चित साहित्यकार एवं प्राज्ञ राम भरोस कापडि भ्रमरकेँ केशवलाल बाखं शिरपा सम्मान(पुरस्कार)सँ सम्मानित कएलक अछि । राष्टिूय भाषामेसँ एक मैथिली भाषामे उत्कृष्ट साहित्यिक रचनासभ कऽ मैथिली भाषा साहित्यक श्रीवृद्धिकेँ लेल कएने योगदानक कदर करैत परिषद प्रसिद्ध कथाकार केशवलाल कर्माचार्यक नाममे स्थापित ( केशवलाल बाखं शिरपा ) सम्मानसँ हुनका सम्मानित कएने अछि । ओहि अवसर पर प्राज्ञ कापडिकेँ दश हजार नगद एवं सम्मानपत्र प्रदान कएल गेल छल । कविकेशरी चित्तधर हृदयक १ सय ७म जन्म जयन्तिक अवसरपर नेपाल भाषा परिषदक अध्यक्ष फनिन्द्र रत्न ब्रजाचार्यक सभापतित्वमे मंगल दिन सम्पन्न समारोहमे प्राज्ञ भ्रमर उक्त सम्मानसँ सम्मानित भेल छथि । सम्मान ग्रहण करैत प्राज्ञ भ्रमर मैथिली आ नेपाल भाषाक सम्बन्ध मध्यकालेसँ निरन्तर रहल आ मैथिली भाषा साहित्यक अनेको प्राचिन अभिलेखसभ नेवारी लिपीक विभिन्न संग्रहमे संग्रहित रहल बतौलनि । राज्य पक्षसँ अन्यायमे परल अन्य भाषा संगहि ई दुनू भाषासभ अपन अस्तित्वक रक्षाकेँ लेल निरन्तर संघर्षरत रहल सेहो बतौलनि । विक्रम सम्बत २००७ सालमे स्थापित नेवारी भाषा साहित्यक अग्रणी संस्था नेपाल भाषा परिषदसँ मैथिली भाषाक साहित्यकारकेँ प्रदान कएल गेल ई सम्मान पहिल बेर अछि । ओहि अवसर पर नेपाल सम्बत ११३२क भाषाथुवा पुरस्कार प्रा. प्रेम शान्ति तुलाधर, २५ हजार राशीक चित्तधर सिरपा पुरस्कार गायक भृगुराम श्रेष्ठ, १५ हजार राशीक ठाकुर लाल सिरपा पुरस्कार निवन्धकार सुरेन्द्रमान श्रेष्ठ आ मोतीलाल सिरपा पुरस्कारसँ अन्तराष्ट्रिय भिक्षु संघकेँ सेहो सम्मान कएल गेल छल । ओहि समारोहमे परिषदक उपाध्यक्ष प्रा. शुवर्ण शाक्य, महासचिव नवीन्द्रराज जोशी, परिषदका सदस्य नरेशविर शाक्य सहितक वक्तासभ मातृभाषाक साहित्यमे योगदान देनिहार संघ संस्थाकेँ राज्य वेवास्ता करबाक क्रम गणतन्त्र अएलाकबादो नहि रुकल प्रति चिन्ता व्यक्त कएने छलथि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। उमेश मण्‍डल, ि‍नर्मली, सुपौल। लघुकथा जीवि‍ते नर्क सोन-रूप जहिना आगिक ताउ पाबि गलए लगैए तहिना आत्म ग्लानिसँ गलैत राधामोहन ब्रहमस्थान पहुँचल। तेसरि‍ साँझक समए रहै। पहिल साँझसँ जे गामक माए-बहि‍न सभ आबि-आबि काँच माटिक दिआरी नेसि‍ साँझ दैत आएल छेली ओ दोसरि‍ साँझ टपैत-टपैत पतरा गेल छेली। यएह सोचि राधामोहन तेसर साँझकमे पहुँचल छल जइसँ कियो देखए नै। किछु मानेमे मुहूर्तो नीक छलै। एक तँ एकान्त, दोसर अन्हार आ तेसरि‍ देखिनिहारो-सुनिनिहार नै। ब्रहमस्थानक मुहथरि लग आबि राधामोहन अँटकि गेल। अँटकि कि गेल जे पएर ठमकि गेलै। चारूकात आँखि उठा तकलक तँ अन्हारमे ने बेसी दूर देखलक आ ने अन्हार छोड़ि किछु आन देखेलै। मन मानि गेलै जे ने कियो देखिनिहार अछि आ ने सुनिनिहार। बाहर अन्हारमे स्थानक चारूकात कुकुर सभ अपन-अपन सीमानक चौकसी‍ नीनभेर भऽ करैत रहए। नीनो केना नै अबि‍ते, भिनसुरका दुधक ढार तँ वएह सभ ने पीबो करैए आ पटका-पटकी करैत नेहबो-थकबो करैए। खेतिहर जहिना नीक उपजैत खेतक आड़ियो धकिया खेते बनबए चाहैए आ अधला उपजा भेने नीको खेतकेँ परता-परता परतीए बना दइए जइसँ बाट-बटोही बीचे खेत देने रस्तो बना बीचे-बीच चलए लगैए तहिना राधामोहन अपन कएल काजक ग्लानिसँ धकियाइत-धकि‍याइत देवालय पहुँच गेल। हीयकेँ हारैत आगुमे ठाढ़ केलक। जेना-जेना भीतर प्रवेश करैत गेल तेना-तेना मनो पसि‍झैत गेलै। अंतमे एहेन भेलै जे धुँआ बनि अकास उड़त आकि पाथर बनि पानिक पहाड़ बनत तइ गुनधुनमे पड़ि‍ गेल। दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “हे बरहमबाबा, अपने यमराजकेँ कहियनु जे जीवि‍ते नरक पठा दथि। जहिना अपन मित्र संग तहिना संकल्पोक हत्यारा छी; हत्यारा छी।” कहि राधामोहन महादेव जकाँ ताण्डव नाच-नाचए लगल। राधामोहन आ वि‍समोहन बच्चेसँ लंगोटिया संगी। एक्केठाम दुनूक घरो छै। बाध-बोनसँ लऽ कऽ घर-आंगन धरि संगे रहै छल। महाविद्यालयक अभावमे दुनू गोरे मैट्रीक पास कऽ रहि गेल। आन-आन विषए जे जहिना पढलक से तहिना ससरि‍ गेलै मुदा समाज अध्ययनक टिकाउ विषय, टिकल रहलै। जइसँ दुनू मिलि‍ अपन पहि‍चान आ संक्लपकेँ मजगूत बनबैमे गारि‍-गरौबलिसँ लऽ कऽ मारि मरौबलि धरि करबो केलक आ कएक बेर जहलो गेल आएल अछि‍। जहिना लड़ाइ लड़ि जहल गेनिहार जेल जेनाइकेँ अराम करब बुझैए, सएह अखैन धरि ईहो दुनू गोरे बुझैत आएल छल। एक्के जातिक राधामोहनो आ विसमोहनो मुदा दुनूक बीच दू दि‍यादी। ओना दुनू दियादीक बीच पुस्तैनी झगड़ा चलि अबै छलै मुदा दुनूक दोस्ती तेकरा मेटा जकाँ‍ देने छलै। जे पछाति‍ आबि‍ कऽ खेनाइ-पीनाइ, बर-बरियाती सभ चलए लगलै। ओना, नवका तूरकेँ पछि‍ला बात ने कियो कहनिहार आ ने कियो बुझबो करैत। मुदा जहिना गहींरगर खादिकेँ ऊपरका खर-पात छि‍ल-छालि‍ कऽ भरलापर ऊपरसँ भरल बुझाइए‍, मुदा हाथीकेँ के कहए जे धि‍यो-पुताक पएर चपि‍ जाइ छै तहिना राधामोहन-वि‍समोहनक दियादीक बीचक खादि ऊपरसँ तँ चिक्कन बनि गेल छेलै मुदा भीतरसँ भि‍‍तराएले छल। विसमोहनक पितियौत भाए मनमोहन मुम्‍बइमे बीस बरखसँ नोकरी करैत आएल अछि‍। एक परिवार रहने घराड़ीक बँटवारा भागे भाग भेल छलै, जइमे दुनूक घरो आ बाड़़ीओ-झाड़ी छेलै। ओना दुनू परिवारक घराड़ी रोड पकड़ैए मुदा विसमोहनक घराड़ीक बगलमे तीन-बटिया, जैपर दसटा दोकान-दौरी बैसि चौक जकाँ बनि‍ गेल। चौक भेने बजारक मुँह खुगल। एक्के खेत रहितो एक भाग मुहथरि बनि गेल आ दोसर गोरथारी। जइसँ दुनूक महतमे घटी-बढ़ी भऽ गेलै। मुम्‍बइमे रहने मनमोहनक विचारमे सेहो बदलाउ एलै। जइसँ नोकरी करैसँ नीक अपन धंधा मनमे एलै। स्वाभाविको छेलै, औद्योगि‍क शहर मुम्‍बइ आ तेतए मनमोहन बीस बरख बि‍तेने अछि‍। मुदा अपन जिनगी तँ तेना ओझरा गेल छै जे साठि बरखसँ पहिने छोड़त तँ पेन्शनकेँ के कहए जे आनो-आनो जमा-जुमी डूमि‍ जेतै। तँए मनमोहन अपन विचारकेँ बेटा ऊपर केन्‍द्रि‍त केलक। निर्णए कऽ लेलक जे बेटाकेँ औद्योगि‍क शिक्षा दियाएब। ओना उद्योग तँ रंग-बि‍रंगक दुनियाँमे पसरल अछि मुदा अपन मनोनुकूल उद्योग बेसी नीक हौइ छै। सएह केलक। बेटाक पढ़ाइ छोड़लापर मनमोहन सभतूर गाम-आएल। जइबेर गेल रहए तइबेर एक्कोटा दोकान नै बनल छेलै। अखन प्रधानमंत्री योजनाक सड़क, तीनटा तीनू कोनपर चापाकल आ एक-आध घंटा बैसैक जोगार सेहो बनि गेल जेकरा देखि‍ मुम्‍बइक चौराहा मनमोहनक मनमे नाचि उठलै। मनमे उठि‍ते अनैतिक बाट ताकए लगल। मनमे एक्केटा  मंशा जे विसमोहन हमरा दिस चलि जाए आ हम चौक साइड चलि आबी। तीन कट्ठा चौकक जमीन। लाखकेँ के कहए जे करोड़ोक हएत। करोड़क कारोबार लेल दु-चारि लाख छिटैए पड़ै छै। जाबे से नै हेतै, ताबे चिड़ै-चुनमुनी पछौर केना केना लगल। गाम तँ अखनो वएह गाम छी जे चुड़ा-दहीक संग चीनी मिला तीत-मीठ गिरैत आएल अछि। फील्डपर दस गोटेकेँ कोनो भाँजे अपना दि‍स केनाइ, यएह अखुनका पनचैती छी। ई बात मनमे अबि‍ते मनमोहन गामक खौकार पंचकेँ पटिया घराड़ी उनटबैक योजना मनमोहन बनेलक। सँझुका नढ़ि‍या जहि‍ना‍ पू सुनिते सभ पुपुआए लगैए तहि‍ना एक स्वरमे सभ पंचैति‍या ग्राउण्‍ड बना लेलक जे जखनि‍ कानूनी बँटवारा नै छि‍ऐ तखनि‍ ओ बँटबरे ने भेल। मौखिक बँटबाराक कोनो मानि‍ नै! भलहिं वेद-शास्‍त्रक अधार-बात किअए ने हुअए। पाँच परिवारक दियादी विसमोहनक। असगरे दुनू बापूत विसमोहन गाममे रहैए आ बाँकी सभ दि‍याद मुम्‍बइएमे। ओना दुनू बापूत मनमोहन बुफगरो। राधामोहन सेहो पनचैतीमे आएल। नढ़िया जेरमे अपनो नढ़ि‍या बनि वि‍समोहनक संकल्‍पि‍त मि‍त्र राधामोहन चुपे रहल। अपन स्थिति कमजोर हाेइत देखि वि‍‍समोहनक मन राधामोहनकेँ ओइ नजरीए देखलक जेहेन बलिदान होइत समए छागरक होइ छै। मुदा संकल्पित जिनगी। अपन हँसैत अंत देखैक जिज्ञासा करैत वि‍समोहन राधामोहनकेँ पुछलकै- “आन जे हुअए। मुदा तूँ तँ संकल्पित जिनगीक संगी छि‍अँह, मुँह किअए बन्न रखलँह?” वि‍‍समोहनक मनक बात बुझितो राधामोहन दियादी आड़ि‍ ठाढ़ कऽ ओही आड़ि‍मे अरिया गेल। भगैत-पड़ाइत संकल्पित संगीकेँ देखि‍ वि‍समोहनक मन संकल्पकेँ अगुअबैत धधकि गेल, बाजल- “जइ धरतीपर झूठ-फूसमे लोक अपन बलि चढा रहल अछि तैठाम अपनो जुल्‍म अपने नै रोकि पाबी! ई तँ जिनगीकेँ धाेखा देनाइ भेल। ई बात सत् जे बलिदान कतए होइ...। बमकि कऽ फेरि बाजल- “हम पनचैती नै मानब। ई धरती हमर बलि मंगैए।” चढ़ा-उतरी बजनिहारक बोन गाम। तेना ललकारा भरलक जे दुनू बापूत मनमोहन, दुनू बापूत विसमोहनकेँ मारि लठि‍यौलक। जे आठम दि‍न जाइत-जाइत विसमोहन खतम भऽ गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-गजल १-४ ३.२.१.मुन्नी कामत-गीत:- जट-जटिन २.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-नेताजी ३.३.जगदानन्द झा ‘मनु’- के पतियाएत ३.४.मनोज कुमार मण्डल-देशी कौआ ३.५.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.६.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-सुफल काज ३.७.राजदेव मण्‍डल- दू टा कवि‍ता ३.८.सत्य नारायण-लहकैत समाज जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ४ टा गजल 1 एते बाझल किए रहै छी अपनामे अहां अबै छी बडी-बडी राति क’सपनामे अहां ।

चलि जाउ दिल्लीए कि मुंबई कि बंगलोर रहब एसगर कोना क’ पटनामे अहां ।

होइए साल भरि पर भेंट दूनू गोटेकें जखन कटनीमे छी हम, सतनामे अहां ।

भेट जेता शकुनी, दुर्योधन आ धृतराष्ट्र मिला क’देखबै आब कोनो घटनामे अहां ।

ओकरा किए मारै छिऐ मुक्कासं अहां भाइ जेहने छी तेहने देखब अयनामे अहां ।

गरमीमे जल तं भइए जाइए अमृत चाहे लोटामे राखि पीबू कि बधनामे अहां ।

विवाहकें विवाहक गरिमा करू प्रदान किए फंसल छी कपडा आ गहनामे अहां ।

;सरल वार्णिक बहर, वर्ण-16

2 जंगल आओर पहाड देखलौं जीवनमे गुजगुज राति अन्हार देखलौं जीवनमे ।

मोनक नीलगगनमे छिटकै बिजलोका ममता आ स्नेह- दुलार देखलौं जीवनमे ।

मन आंगनमे चारूधामक दर्शन भेल मूल्यक हाट आ बजार देखलौं जीवनमे ।

नृत्य, गीत,संगीत,चौल और हंसी-ठहक्का नोरक कतेक टघार देखलौं जीवनमे ।

मारि-पीट,दंगा आ फसाद, छीना आ झपटी आदर आओर सत्कार देखलौं जीवनमे ।

देखलौं गंगा बहै छली अपने अन्तरमे पोखरि आ धार- इनार देखलौं जीवनमे ।

सरल वार्णिक बहर, वर्ण-16

3 अपन कहैए, सुनैए हमरा किछुए लोक चिन्हैए हमरा ।

सूप जं हम त चालनि अछि ओ तैयो मूंह दुसैए हमरा ।

जकरे खातिर चोरि केलौं सेहो चोर कहैए हमरा ।

एसगरमे तं पएर छुबैए लेाक ल’ग गरियबैए हमरा । कांट छीटि क’ गेल बाट पर आब हाल पूछैए हमरा ।

चोर चिकडि क’ बाजय जखने तामस तखन उठैए हमरा ।

हम मूससं बाघ बनेलियै उनटो करब अबैए हमरा ।

मात्रा-15 प्रत्येक पांतीमे

4 थिक युद्धक मैदान ई जीवन,कोना बढू हम अपने मित्रक मृत्युक कारण, कोना बनू हम

सोझांमे तं छथि दादा-दादी,कक्का-काकी,भैया-भैाजी सभसं खेत-पथारक खातिर कोना लडू हम

राज-पाट की करब जखन लोके नहि रहतै भीषण नर-संहारक पर्वत कोना चढू हम । भीख मांगि बरू खाएब,लडब नहि भैयारीमे हे मधुसूदन गाण्डीव हाथमे कोना धरू हम

हे केशव, कृपया हमरा दुविधासं मुक्त करू हमर बुद्धि नै काज करय, की कोना करू हम

सरल वार्णिक बहर, वर्ण-18 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मुन्नी कामत-गीत:- जट-जटिन २.शान्तिलक्ष्मी चौधरी-नेताजी १ मुन्नी कामत गीत:- जट-जटिन। जटिन- छोड़ि‍ मिथिला नगरिया बांधि‍ अपन ई पोटरिया तूँ कतए जाइ छँह रे..........! जटबा कतए जाइ छँह रे...........! छोड़ि‍ अपन सजनियाँ ति‍याग कऽ सभ खुशियाँ तूँ कतए जाइ छँह रे जटबा कतए जाइ छँह रे...........! जट-  जाइ छि‍यौ गे जटिन देश-गे-विदेश जटिन देश-गे-विदेश भऽ गेलैए गैर आब अपन प्रदेश! साड़ी अनबौ गे जटिन गहना अनबौ गे.................. साड़ी अनबौ गे जटिन गहना अनबौ गे बौआ-बुच्ची ले सेहो नव अंगा अनबौ गे! जटिन- नै लेबो रे जटबा विदेशक सनेस नै लेबो रे जटबा विदेशक सनेस हमरा तँ चाही जटबा तोेहर संग आ सि‍नेह! जाट-   नै रोक गे जटिन हमर तँू डेग कमेबै नै तँ केना भरब सबहक पेट! बौआ कनतौ गे जटिन बुच्ची ललेतौ गे बौआ कनतौ गे जटिन बुच्‍च्‍ी ललेतौ गे जरतौ जे पेट जटिन कोइ नै सोहेतौ गे। जटिन- घुर-घुर रे जटा सुन-सुन रे जटा जिद्य छोड़ रे जटा कोइ नै ललेतौ रे जटा हरे जटबाऽऽऽऽऽऽऽ रे मेहनति‍ करि‍ नुन रोटी खेबै मुदा संगे मिथि‍लेमे रहबै रे जटा..............! चल-चल रे जटा अपन देश रे जटा अपन खेत रे जटा मरूआ रोटी रे जटा नुन रोटी रे जटा हे रे जटबाऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ तूँ धान रोपीहेँ हम जलखै लऽ कऽ एबौ रे जटा.................! जटा-   सुन-सुन गे जटिन हमर सजनी तूँ जटिन घरक लक्ष्मी तूँ जटिन हमर जि‍नगीक गाड़ी तूँ जटिन हमर ज्ञानक खान तूँ जटिन हे गे जटनी ई ई ई...। तूँ जीतलँह हम हारलौं गे जटिन छोड़ि‍ अपन देश नै केतौ जाएब गे  जटिन रहतै मिथि‍लेमे सदैव अपन बास गे जटि‍न हे गे जटनी ई ई ई...। गै दुनू गोरा मिलि‍ मेहनति‍ करबै तँ जि‍नगी स्वर्ग हेतैय गे जटिन। जटिन-  हमर साजन तूँ जटा तोहर सजनी हम जटा हे रे जटबाऽऽऽ...। दुनू गोरा हँसैत अहिना जि‍नगी काटब रे जटा....................। २ शान्तिलक्ष्मी चौधरी नेताजी बाप रे बाप!... करैत छै कोना फड़फड़ उड़ैत फतींगा जकाँ फोड़ि देतय कखन ककर आँखि खोखरि लेतय कखन ककर मुँह काटि लेतय कखन ककर ससरी मारि देतय तरछेब्बा लटकल तरकुल्ला गाछ चढ़ल पसीबा जकाँ रहो वा भाँड़मे जाओक कुलतूर बंशतरू अपन लबनी भरैक चाही बरू बाजय के छेबता कटाह बपुतगर लाठीक जोर तेँ मोन छन्हि टर्रबताह पंचायत खेलकै, बिलौक खेलकै, बैंको खेलकै थानो संग गिटपिटक तँ छैक सैह हाल जतय धौइधेक जुआइल व्यवस्था फँचैंइरे नै बजेतै फच-फच गाल! ओह, ललकारामे ओज की?... जेना स्वयं होइथ लाल-बाल-पाल, सुभाषचन्द्र बोस कतय की बाजथि तकर छैक कोन होस धनिकायमे शोभय नेहरू सन शुभ्रवस्त्र ठोढ़य पर साजल फुसि-फास संविधान, विधेयक, अध्यादेश, योजना, परियोजना, पंचायतीराज, लोकतंत्र आदिक अस्त्र गिरगिट तँ धरतै शाखेक नै रंग कखनो सुनटा, कखनो उनटे बहै गंग जेहने समय-परिस्थिती तेहने दर्शन खन लोहिया, मार्क्स, लेलीनवादी खनेमे स्वधर्म, संस्कृति, राष्ट्रवादी, दरैप गेलय मोन तँ लिअ कतैक लेब गाँधियेक मंडन कुमारबार बेटाकेँ परिवार द’ गरीबीरेखामे नौवेक स्कोरिंग अपन खेत आ बाड़ी पटबै सातटा बिलौकिया पंपिंगसेट-बोरिंग इंदिरा-आवास, वृधापेंसन, फसल-क्षतिपुर्तिक बँटवारामे पिछुवारक घाम टघरि जाइन्हि एंड़ी जेना चिल्हौरे-गिद्धक सुभागे खसल हो मरी नेताजी छथि ओखन भाजपाक महामंत्री दसे दिन पहिने रहथि जनु लोकजनशक्तिक अधिसंतरी कियो कहैत छलाह एम्हर भेलन्हि भितरिया जद-यूसँ साँठगाँठ ओहिदिन लोलियाबैत काँग्रेसिया-पेनियाँकेँ करैत छलाह बाँस राजद केर मित्रभाई संग छैन्हि सेहो उठक-बैठकी राजनीतिक जोकरलोकनिक संगहि फाटय पानपराग-चुटकी पार्टीधर्म, सिद्धांत, ककरो सरकारसँ कथीक सरोकार ओतहि जयकारा जतय बिलहैय एक्कोठोप पंचमकार मुँह परिछ बाजताह तँ बुझेता, अहा! कतेक ज्ञानीलोक टोकि दिओ मध्यकाल, तँ लागि जाइन्हि क्षणहिमे टोक की करबै, आइकाल्हि रहलै कतेक गोटेक बातेक ठर-ठीक मुदा विसबास दियाबए रहि-रहि छुवत माथक टीक भेटत एहने ठोपधारी हिनू जे फुसि बाजत गटगट मियाँ नमाजी हजारबेर दाढ़ी छुबि खाइत सप्पत नेताजीतँ कहैत छथि अपनाकेँ राजनीतिक चाणक मुदा भरिगामक लोक कहन्हि हिनका लाइत खाइत बानर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी के पतियाएत के पतियाएत ई कएकरा कहु सभक आँखिमे पसि कए कोना रहु सदिखन आँगुर हमरेपर उठल कतेक परीक्षा आबो सहु जतए ततए हमहीँ लूटल गेलहुँ घर बाहर सभतरि हमहीँ ठकेलहुँ हम नारी नहि नरकेँ भोग्या सबदिन हमहीँ जितल गेलहुँ झूठ्ठे घर-घर पूजल जाइ छी मुड़ी मचौरि हम भोगल जाइ छी आबू रावण बनि भाइ हमर रामसँ पाछू छुटल जाइ छी | ***** ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मनोज कुमार मण्डल देशी कौआ मन परि रहल अछि ओ दिन जहिया माएक हम छोट नेना रही माएक आँचर तर खेलैत-धुपैत रही माएक बोल हमर धि‍यान एक रहै छेलए जखने बजै अँगनामे कौआ बुढ़िया दादी बाजि उठै छेली पाहुन एता एना लगि रहल अछि सुनिते मन गद-गद भऽ जाइ छेलए आब तड़ुआ-तरकारी के पुछैए दही-चीनी सेहो भेटत दिन भरिमे कएक बेर पुछिऐ माए आइ कखनि‍ पाहुन औता आब ओइ दिनक यादेटा रहि गेल देशी कौआ मरि-मरि गेल कारकौआ गिरीहबासु भऽ गेल आइक कौआ बाजब ई भऽ गेल अमंगलक  सनेस दऽ गेल कौआ बजि‍ते कनियाँ कहै छथि ढेप लऽ एकरा भगाउ हम पुछलियनि‍ कि‍ कहै छी बिनु भगौने देशी कौआ भागि गेल की कारो कौआकेँ बिदाहे  कऽ देब कौआ देखब सपना कऽ देब। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कुन्दन कुमार कर्ण गजल ------------------------------------- नजरिमे नजरि तऽ मिलाक देखू दीप नेहके तऽ जराक देखू

दिल अखन कली अछि प्रिय अहाँकें ओ कली अहाँ तऽ खिलाक देखू

चेहरा अहाँक चमैक जेतै आँखिमें अहाँ तऽ बसाक देखू

दोहराक भेटत नहि जवानी मोनमें उमंग जगाक देखू

बरसि पडत सावन जीनगीमें हमर लेल रूप सजाक देखू

२१२-१२११२-१२२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल सुफल काज...... सुफल काज जेते जिनगीमे सफल-सुफल कहबए लगै छै। फले-फल वन-वन बनैत बगिया बाग बनए लगै छै। बगिया बाग बनै लगै छै। सुफल काज......। पूस पूसौंट कहि-कहि मसिया फल पेबए लगै छै। अधिया हस्त अधिया अदरि‍ पख मसिया पेबए लगे छै। पख मसिया पेबए लगे छै। सुफल काज......। पखिया पख पखड़ि‍-पखड़ि‍ सतिया सात सतिना लगै छै। अठि‍‍या आठिक आड़ि बनि हपता-सपता बनए लगै छै। हपता-सपता बनए लगै छै। सुफल काज......। काम-धाम कि धाम-काम मन मंदिर मनबए लगै छै। अगलि‍-बगलि‍ लतरि‍ फड़ि अमरलत्ती कहबए लगै छै। अमरलत्ती कहबए लगै छै। छुच्‍छ हाथ मुँहमे जहिना किछ ने दऽ पाबि पबै छै। वेद भेदन भेद ने बूझि कर्मक फल पबैत रहै छै। कर्मक फल पबैत रहै छै। सुफल काज......। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल दू टा कवि‍ता- राजदेव मण्‍डल उलहन “सभ तँ रहै छै अहींक लग-पास हम तँ अबै छी चासे-मास पड़ि‍ गेल वि‍पति‍ भेलौं नि‍राश अकालक कारणे डहि‍ गेल चास दि‍न अदहा पेट राति‍ उपास मनमे छेलए जे पूरा हएत आस भौजीक ताना सुनि‍ आँखि‍ भरल नोर बेथासँ भरल मनक पोर-पोर एक मुट्ठी देलासँ की भऽ जाएत थोर आँखि‍सँ बहि‍ रहल अछि‍ दहो-बहो नोर हमर नोर नै बनि‍ जाए अँगोर यौ भैया, एकदि‍न हमरो हेतै भोर चुप्‍पी साधने खसौने छी धाड़ ऐ सम्‍पति‍पर छै हमरो अधि‍कार आगूमे ठाढ़ बालपनक पि‍यार नाता तोड़ि‍ केना करब तकरार कनैत जा रहल छी जार-जार माए रहैत तँ करैत दुलार अपने चास-बासपर करए पड़त आस बाबाक बखारी आ धीयाक उपास।” आपसी “जि‍नगी भरि‍ दैत रहलौं फूल आपस भेटि‍ रहल अछि‍ शूल मन भऽ गेल बि‍याकुल कि‍अए भेटल ई डण्‍ड कहाँ केलौं कोनो भूल देहलो चीज नै देब हम देने रही फूल काँ केना लेब?” “हमरा लग वएह अछि‍ तँ दोसर की देब जबरदस्‍तीओ करब तँ आरो की लेब।” “खुगि‍ रहल अछि‍ मनक राज सुआरथसँ भरल छल हमर काज।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सत्य नारायण लहकैत समाज -------- केखनो क’ मोन भटकि जाइए  केखनो मोन अटकि जाइए  आ केखनो मोन भरकि जाइए  मुदा की करू ,किछु ने सोहाइत अछि  लोकक विद्रुप चेहरा ओहिना देखाइत अछि  कियो ने भेटैत अछि ,ककरा कहबैक  के सुनत केकरा पलखैत छैक  समाज वदरूप ओझरायल छै  लूटेरा लुटैत छै ,समाज देखैत छै  के बाजत केकर मजाल छै  सभ त’ लुटय मे अपने बेहाल छै  जे टुकुर टुकुर देखैत छै ,ओ त’ लाचार छै  ओ की बजतै ओ त’ बेदम छै  साँस लैत छै बोल निष्पंद छै  कतौ अकाल छै , कतौ दुर्भिक्ष छै  कतौ ठनका ठनकैत छै ,कतौ वज्र खसैत छै  मुदा जे निष्ठुर छै ,शैतान छै  ओकरा ल’ वज्रो आसान छै  ओहन लोक कहियो नहि सुधरत  बैमानी ,शैतानी कहियो नहि बिसरत ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ ,  हटा क’ नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/  कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍  ... समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍। जइ/ जाहि‍/ जै जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि‍/ अहि‍/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि‍/ ऐछ तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍ ओहि‍/ ओइ सीखि‍/ सीख जीवि‍/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहि‍ं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि‍/ नै/ नइ गइ/ गै छनि‍/ छन्‍हि‍ चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि‍ बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍ १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍ १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍ १८३. लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बि‍तौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/ करेलखिन्ह/ करेलखि‍न १८९. करएलन्हि/ करेलनि‍ १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍ २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍ २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि‍/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक  http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/   http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 82 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ‘विदेह' १३३ म अंक ०१ जुलाइ २०१३ (वर्ष ६ मास ६७ अंक १३३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA