ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह' १३५ म अंक ०१ अगस्त २०१३ (वर्ष ६ मास ६८ अंक १३५) ऐ अंकमे अछि:- राम विलास साहुक एगारहटा टनका सुरेन्द्र 'शैल' राजीव रंजन मिश्र-गजल१-२ राजदेव मण्डल- डोलनी डाइन- (काव्य कथा) मुन्नाजी-बाल हाइकू कुन्दन कुमार कर्ण-गजल राजदेव मण्डल जीक पाँचटा कविता राम विलास साहुक कविता-के बँचेतौ तोहर जान वसुंधरा-राजदेव मण्डल रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार”-अभिनन्दन इरा मल्लिक-गजल ( श्रृँगार.मल्हार ) राम विलास साहु-गीत-मोह-माया...... जगदीश प्रसाद मण्डलक सबा दर्जन गीत - दीप नारायण'विद्यार्थी'- गजल बिन्देश्वर ठाकुर अनिल मल्लिक-मैथिली गजल बालानां कृते इरा मल्लिक-बाल गजल विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढबा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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भेटत नै किछु ठहरिकँ जिनगीक बाटमे ताकब नै किछु लचरिकँ जिनगीक बाटमे
जीते बा हार हाथ खेलब जँ खेल ई हासिल नै किछु खहरिकँ जिनगीक बाटमे
किछु चक्र थिक दैव केर जे डेग डेग पर बाँचब टा नित रगऱिकँ जिनगीक बाटमे
कानब सदिखन दहो बहो नीक गप्प नै हारब नै हिय हदरिकँ जिनगीक बाटमे
राखब "राजीव" सोझ मोनक विचार टा चमकत चन्ना पसरिकँ जिनगीक बाटमे
2222 121 221 212
राजीव रंजन मिश्र गजल-२ भेटत नै किछु ठहरि क' जिनगीक बाटमे ताकब नै किछु लचरि क' जिनगीक बाटमे जीते बा हारि हाथ खेलब जँ खेल ई हासिल नै किछु खहरि क' जिनगीक बाटमे किछु चक्र थिक दैव केर जे डेग डेग पर बाँचब टा नित रगड़ी क' जिनगीक बाटमे कानब सदिखन दहो बहो नीक गप्प नै हारब नै हिय हदरि क' जिनगीक बाटमे राखब "राजीव" सोझ मोनक विचार टा चमकत चन्ना पसरि क' जिनगीक बाटमे 2222 121 221 212 राजदेव मण्डल डोलनी डाइन- १ (काव्य कथा) चारि-पाँचटा घसबाहिनी छीटा भरने घास छिल-छिल फुस-फुसा कऽ गप करैत नजरि मिलिते हँसै खिल-खिल। एक गोटे घास राखि बजल गाम दिस ताकि- “गै, जल्दी चल ऐठामसँ बात ले हमर मानि आबि रहल छौ गाम दिससँ डोलैत डोलनी डाइन नचैत दुपहरिया रौद बाधमे नै छै एकोटा लोक एहने सुनहटमे होइ छै जंतर-मंतर जाप-जोग एम्हरे आबै छौ चट दऽ उठा ले घास निकल ऐठामसँ पट दऽ नै तँ चलि एतौ पास।” सबहक मुँहपर डर लगल नाचए डाइन-जोगिनक कथा मन जेना बाचए। एकटा घसबाहिन उठल देह तानि हाथमे हँसुआ लेने, बजए लगल फािन-फािन- “केते देवे सेवे भेल छेलै एगो संतान तेकरो छूटि गेलै परसूखन परान लहासकेँ गाड़ने छै धारक कोरपर हमरे बड़का कित्ताक अन्तिम छोरपर आइ उखारतौ ओही लहासकेँ तब भेटतौ एकरा चैन दुपहरियामे आबि रहल छौ तँइ झुलैत ई डोलनी डाइन सभ गोटे नुका रहब धारक कातमे डा नै हँसुआ रखने रहब हाथमे आइ भइखौकीकेँ देखबै सभटा कुकरम दस लोकमे कहबै तब हेतै एकरा लाज-शरम नै छोड़बै एना करेबै पंचसँ जरिमाना।” सबहक भऽ गेलै एक विचार तुरत्ते सभ भऽ गेलै तैयार। डोलनी डाइन- २ (काव्य कथा) घसबाहिनी सभ कऽ देलकै अनघोल सुनै सभ अचरज भरल बोल। “जेकरा नै छै बिसवास उ कऽ लिअ जाँच अपनेसँ देखि लिअ ई गप छै साँच डोलनी डाइन करै छै नँगटे नाच चढ़ि कऽ हाँकै जीते गाछ लहासक साथ धारक कात।” डर नाचै सबहक माथपर मुड़ी डोलाबै एक-दोसराक बातपर गामक फरेबी और उचक्का करए लगल सभ घोल-फचक्का औरतिया सबहक अलगे ताल आँखि नचाबैत बनल वाचाल। “अनकर जा बच्चाकेँ खाइत नै होइ छै डर अपना-अपना धिया-पुताकेँ सबेरे घर कर।” गामक पंच आब की करतै बढ़ि गेलै बात तँ बजै पड़तै। “हौ, देखबा-सुनबामे छेलै बड़ नीक तरे-तर की छै तेकर कोन ठीक एना छोड़ि देलासँ समाज भऽ जेतै उदंड एकरा भेटबाक चाही ओहने कठोर डंड जइसँ टूटि जाइ एकर घमंड थर-थरा जाए सभ देखि कऽ डंड।” सौंसे गाम भऽ गेलै बिढ़नी बान खबरि पसरि गेलै काने-कान पंचैती बैसतै डिहबारक थान साँझेमे देखि लिहक पंचक तान। डोलनी डाइन- ३ (काव्य कथा) दू परानी मिलि केते करतै काम जखनि करमे भेलै बाम सासु-ससुरकेँ पहिने लेलकै छीनि तब भेलै भीन दियाद बनि गेलै दुसमन झगड़ा लेल करै फन-फन छीनि-झपट शुरू केलक की अपन की आन समैक फेरी लगिते सभ भऽ गेलै बेइमान ऊपरसँ पति भऽ गेलै बेमार के करतै घर-बाहरक कारबार करैत-करैत डोलनी परेशान अदहा बँचल छै माथा अदहा तनमे जान असगरोमे गप करै सोर पाड़ने बने अकान लोक कहै- गुणघिच्चू डाइनक इएह सभ छी पहिचान। डोलनी डाइन- ४ (काव्य कथा) नै छेलै एक्कोरत्ती बिसवास पाँच बरिसपर पूरा भेलै आस जनमलै एकटा पूत लगै छेलै जेना मुरुत किन्तु बात भेलै अजगुत सुतलेमे छूटि गेलै ओकर परान डोलनी फेर भऽ गेलै निसंतान लोक कहै- “हमर गप ले मानि बेटा दऽ कऽ सिखलकै डाइन।” बपराहड़ि काटैत डोलनीकेँ बन्न केलक घरमे पाँच गोटे लहास उठौलक कान्हपर धड़फड़मे। चिचिआइत बजल डोलनी घरसँ कलेजा फाटल जाइ छेलै तरसँ- “हौ बाप लेने जाइ छहक हमर घन एक्कोबेर मुँह देखब भरि मन काजक पाछू रहलौं बेहाल तब ने भेल हमर एहेन हाल कहियो भरि नैन देखियौ ने भेल। आब तँ सुगना उड़ियो गेल।” कियो ने बुझलकै दिलक दरद गाड़ैले चलि पड़ल सभटा मरद फाड़ि कऽ देखल जा सकैछ खीरा मुदा के जानतै परसौतीक पीड़ा कियो नै केलक ओकर कहल टुटल खिड़कीसँ ओ देखैत रहल सभ मिलि लऽ गेलै लहासकेँ धारक कातमे ओकर पति मनधत्ता रहै संग साथमे। डोलनी डाइन- ५ (काव्य कथा) उ साँझ केतेक कारी बुझाइ छेलै सबहक मन भारी बुझाइ छेलै बााध-बोनसँ लोक सबेरे गेल छेलै भागि पंनचैतीमे बैस गेल छल दोग-दोगसँ आबि। तखनि घटि गेलै फेर एगो घटना मरि गेलै फनकाक बेटा नाम रहै मटना छौड़ा छेलै पहिनौंसँ कसरि दबाइओक नै पड़ै छेलै असरि नै छेलै बेमारी गप छेलै आन डागदर बुत्ते कतएसँ बँचितै परान आबिते फनका फनकए लगल- “हौ बाप हमहीं छी अभागल मनधतो छै ओकरे साथ कहलौं ई बात तामसे बजल भऽ कऽ कात- ‘बात बाजी सोचि नै तँ मुँह लेबौ नोचि।’ डोलनी आबै छेलै हरदम अँगना-घर हमरा बेटाकेँ खा गेलै बनि चरफर कहि दियौ हमरा बेटाक घुमा देतै परान नै तँ लाठीसँ पीट कऽ खैंचि लेबै जान हमरो नाम छी फनका नै छी कियो आन जे कहब से कऽ देबै स्थानमे दान नै तँ संग दिअ ओकरा मारि देबै जीतै आगिमे जारि देबै।” दोसर-तेसरकेँ नीक लगल चारिम फट्ट दऽ बजल- “एना अनचित केना होइ छै करल सबहक अँगनामे छै बेदरा भरल केकर लेतै जान तेकर कोन ठेकान।” सुनि-सुनि सबहक बातपर तामस चढ़ि गेलै पंचक माथपर “कहाँ छौ मनधता ऐठाम बजा आइ देबै ओकरा कठोर सजा किअए कुड़िएतै जौं नै रहतै फोंसरी नै रहतै बाँस नै बजतै बौसरी।” अन्हरिया भरल चारूकात सुनिते पंचक बात थर-थरा गेलै गात पाछू ठाढ़ छेलै मनधता ओहीठामसँ भऽ गेलै निपत्ता। डोलनी डाइन- ६ (काव्य कथा) दौगते अँगना आएल मनधता थर-थर काँपैत पोर-पोर लगमे सोर पाड़लक डोलनीकेँ मन छेलै भेल अघोर। “पहिने तँ सभ कहै छेलौ तोहर बड़-बढ़िया छौ बानि की केलही टोलक लोक संग जे सभ कहै छौ ई छै डाइन साँचे उखाड़ने रही बेटाक लहास नँगटे नचैत रही ओकरा पास ठीके डाइन सिखौलकौ तँ देलही बेटाक जान मटनाक तोहीं खैंच लेलही परान? नुकाएल छीही घरमे मुइन कऽ कान पंच सभ कऽ रहल छौ घमासान मटनाक बाप लऽ लेतौ परान आइ जिते झड़का देतौ गरम तेलमे कड़का देतौ।” गप सुनि डोलनी भेल अधीर बजए लगल, मन केलक थिर। “हे, हमर बात सुनू धियानसँ आइ तँ जेबै करबै जानसँ बात लिअ मानि हम नै छी डाइन घसबहिनी सभ उड़ौलक अफवाह बौआकेँ देखबाक मनमे रहै चाह बन्न घरमे कटैत रहि गेलौं काह कियो ने केलक परवाह छेलै ई बड़का सेहन्ता साइत पूरा नै करितौं तँ घुन जकाँ खाइत बित जाइत जिनगी छूटि जाइत परान आन तँ होइ छै आन नै देखितौं मुँह अप्पन सन्तान। साड़ी खोलि कऽ राखि देने रही कात किछु लगि जाएत तँ भऽ जाएत बेबात उखाड़लौं बौआक हलास कियो ने रहए आसपास तेल-काजर लगा देखलौं भरि नैन भेटल मनमे पूरा चैन फेर मनकेँ साधि गाड़ि देलौं ओही खाधि जखनि अहाँसँ टुटत आस हम भऽ जाएब जिनगीसँ निरास गै माए, आब जीबै कोन आस अहूँकेँ नै हमरापर बिसवास!” बजल मनधता बहबैत नोर- “हमरो बात सुनि ले थोर कहाँ छौ मोटरी-चोटरी कहाँ छौ गहनाक पोटरी थम लाठी लिअ दे पानियोँ एकघोंट पिअ दे गिरेतौ पाग गै भाग-भाग आबि रहल छौ फोंफियाइत नाग।” डोलनी बजल- “हमरो होइए पूरा शक दुआरि दिस लगौने हएत टक पछुआर दिस भागब नीक हमरा बुझाइए यएह ठीक।” दुनू परानी साथे-साथे भागल जाइत अन्हरिया माथे दुखित भेल छै मन डरे थर-थरा रहल तन बाटक नै कोनो ठेकान मुट्ठीमे लेने छै जान पाछूसँ अबैत हिंसक लोक भागि रहल अछि दोगे-दोग। डोलनी डाइन- ७ (काव्य कथा) टपैत बाध-बोन, ऊँच गहींर गड़ल काँट-कुश होइ छै पीड़ भागले जाए रहल बनल बहीर पाछू नै ताकै मन भेल अधीर टाँग कटल आ ठेहुन फूटल अपन गाम घर सेहो छूटल बनि गेल अछि अभागल अन्हारे संग जाए रहल भागल। “के छी ठाढ़ रह ओहीठाम आगू बढ़मए तँ कियो ने देतौ काम।” दुनू चमकि गेल पएर ठमकि गेल। “आब की करब लड़ब वा मरब ई केकर छी अवाज केनएसँ आबि रहल छै गाज चोर-डाकू छै आगूसँ घेरने आबि रहल आगाँसँ रेड़ने आब नै कोनो बँचलौं बाट आगूमे लगि गेलौ बड़का टाट इज्जत, जान दुनू चलि जेतौ ऐठाम आब कियो ने बँचेतौ तोरे खातीर आइ हमरो जेतौ परान तोहर चलि जेतौ इज्जत-मान।” डोलनीक हाथक हँसुआ चमकल हँसुए जकाँ आँखिओ दमकल “अहाँक देहमे कियो भिर तँ लौ देखि ओकर नै बँचए देबै एक्कोरत्ती रेख। यएह छी पुरुखक समाज केना कऽ बँचतै स्त्रीक लाज ऐ पंच-समाजसँ होइ छै बड़को-समाज एक दिन खुलि जेतै सभटा राज।” दुनू अछि पूरा तैयार मारि देबौ आकि मार नै तर्क वितर्क दुनू भेल सतर्क हवाकेँ गिन रहल अछि समैकेँ चीन्ह रहल अछि भारी भऽ गेल संगी-साथ लाठी कसि पकड़लक हाथ। देखलक मनधता आइ चललै असली पता बाघिन गरजि रहल अछि नव कथा सिरजि रहल अछि खुगल आँखि आ खुगल कान दुनूक अलग-अलग पहचान हरहरा रहल हवा कान ऊपर उगि रहल अछि चान। मुन्नाजी बाल हाइकू (हाइकूमे बाल रचनाक प्रायः पहिल प्रस्तुति) १ पानिमे माछ छप-छप करैए हमरे जकाँ २ छोड़ि खेलौना बन्नुक पकड़लौं ताकू भविष्य ३ निश्छल मोन कँटएल जाइछ बाँचत कोना ४ हथिनी रानी शेरक शासनमे कहू राजाकेँ ५ सोरहा भेलै नेना छै होशगर पैघे बताह ६ चोर सिपाही खेल बिसराएल विडियो गेम ७ राजा आ रानी मोन बहटारए ज्ञान नै दैए ८ चलैए रेल छुक-छुक करैत पटरीपर ९ फुलवाड़ीमे दुखी राजकुमारी राजा बैंसैए १० राग रागिनी संस्कृत केर श्लोक मोनमे राखू ११ शीतल पाटी आब चैन नै दैए नेना सभकेँ १२ लाल चटनी चाटि-चाटि कनैए मोन बुझाउ कुन्दन कुमार कर्ण गजल
२१२ ११२१२ १२२२
दर्द हियक अहांसँ कहब हम कोना चोट नेहसँ भरल सहब हम कोना
छोडि असगर जखन दूर रहबै प्रिय भावमें बिन मिलन बहब हम कोना
ठोरपर चमकैत नव हँसिक मोती दूर रहिक अहांसँ गहब हम कोना
संग जे नहि देबए अहाँ हमरा आगु जीवनमें बरहब हम कोना
कहि रहल अछि गजलमें हियसँ 'कुन्दन' बिन अहाँ प्रिय आब रहब हम कोना
© कुन्दन कुमार कर्ण र्इ हम आठ बरिस पहिने लिखने छलौं । विशेष कs कs जे केयो अपन देश छोडि विदेश गेल छथि हुनका सभहँक लेल परसि रहल छी... -------------------------------------- अंगनामें कुचरल कौआ जागि उठल हमर बौवा हावासँ आयल कोनो सनेश यौ पियाकें यादमें भेलौं हम विभोर रहि-रहि नैनसँ टपकै नोर
बितगेल होली दीवाली मोन रहैत अछि सदिखन खाली एक पल सौ साल लगैछै सूखि रहल अछि ठोरक लाली किया छोडि चलिगेलौं विदेश यौ कहिया आयत खुशीक भोर रहि-रहि नैनसँ टपकै नोर
साँझ भोर बाट तकैछी भितरे-भितर हम मरैछी दर्द नै बुझबै अहाँ हमर महिनामें एकबेर फोन करैछी आयब कहिया अहां घूरि घर यौ थर-थर करैछै हमर ठोर रहि-रहि नैनसँ टपकै नोर
© कुन्दन कुमार कर्ण गजल @ कुन्दन कुमार कर्ण
जीनगी एक वरदान छी र्इश्वरक देलहा दान छी
सोच राखू नम्हर मोनमें जीनगी सुनर सम्मान छी
हटिक नै, डटिक जियबै जखन जीनगी तखन गूमान छी
खेल बूझब जखन एकरा जीनगी तखन आसान छी
कर्म पथपर चलू नित समय कर्म मानवक पहिचान छी
बाट बाटपर बूझी चलू जीनगी एकटा ज्ञान छी
कथन 'कुन्दन' कहैछै अपन जीनगी दू दिनक चान छी
२१२-२१२-२१२ बहरे-मुतदारिक राजदेव मण्डल जीक पाँचटा कविता- खसैत बून खसैत बून-बून गाबै गुन-गुन चिड़ै चुन-चुन झिंगुर झुन-झुन बरसैत मगन घन देखैत मन नयन नाचैत सुमन मन तृषित भीजैत तन सूखल कण-कण अमृतसँ मिलन। चलैत रहत आखेट नै टुटत जिनगीक गेँठ आबि गेल जेठ दुख गेल मेट सभ किछु समेटि आब हएत भेँट। मोँछक लड़ाइ छोटका मोँछ मोटका मोँछ सोझका मोँछ टेढ़का मोँछ पकल मोँछ अधपकल मोँछ बघबा मोँछ बिलरबा मोँछ कारी-कारी ऐंठल मोँछ तितली सन बैसल मोँछ झबरा मोँछ लबरा मोँछ पुरनका मोँछ लबका मोँछ भड़कल मोँछ फड़कल मोँछ मोँछक शान गामक गुमान तोड़ै तान फाटै कान जेतेक रंगक मोँछ तेतेक रंगक झगड़ा झगड़ा ताकै घूमि-घूमि रगड़ा मोँछ गाबए बेवहारक गान अपने जिनगी अपने जुबान “हम नै लड़ब लड़त के आन हमरेपर अछि गामक शान हमहीं बँचाएब सबहक जान सबहक दोकान सबहक माकन सबहक आन सबहक गियान छूटत जखनि हमर बान कियो ने करत कल्यान हमरा सोझहा आनक बड़ाइ तँ चलिते रहत मोँछक लड़ाइ।” मोँछ-सँ-मोँछ लड़ए कियो जीतै कियो मरै केते घर जरए तब केते तरए। “की यौ भाय करिते रहबै मोँछक लड़ाइ सभ किछु भऽ गेल नाश किछु ने रहि गेल पास लटपटा गेलै सभ लगे-पास केकरो ने बढ़बाक आस ओझरा कऽ छी पड़ल अदहा छी मरल आब तँ मोँछो अछि झड़ल आगू बढ़बाक नै अछि उपाए की यौ भाय, करिते रहब मोँछक लड़ाइ आबो ने करब कोनो उपाए?” दूटा धारा अपनो ने पाबि रहल छी पार अंतरंग नदीमे दूटा धार बिनु एकाकार केना करब पार केना कऽ पकड़ब असल आधार केतेक पैघ अछि अवरोध किअए ने भऽ रहल अछि बोध केना कऽ धारा हएत तेज बाधाक ने बँचत कोनो रेख अपन दोख अनका माथपर राखि टकटक चारूभर रहल छी ताकि भेटि ने रहल अछि कोनो उपाइ जिनगीओ ने कहीं अकारथ जाइ झूठे धेने छी अनकार आस अनकर आस रही उपास अप्पन आस तब बिसवास करए पड़त अपने प्रयास। चोरि बेइमानीसँ नाता जोड़ि भरिगर अवरोधकेँ तोड़ि असली मनुखक लक्षण छोड़ि हमहूँ केलौं एकबेर चोरि देखलक हमरा लग धन सबहक बदलि गेल मन शुरू भेल मालक कमाल बदलि गेल सभटा चाल किछुक आँखिमे देखै छी रिश मनमे उठए लगैए टीस मूनि लइ छी चटदनि कान तोड़ए लगै छी अपन तान बढ़ि गेल आब हमरो शान लोक कहए लगल महान अंतरसँ जखनि उठए अवाज खुगए लगैए सभटा राज आँखिक भीज जाइत अछि कोर भीतर शोर चोर-चोर। परिस्थिति केतेक अबैत जाइत लोक सबहक मुँहपर नचैत शोग पिताक अंतिम दर्शन लेल चलि रहल समाजिक खेल केतेको मुँहपर असली दु:ख केतोकोकेँ छुच्छे बजबाक भूख। “लेधुरिया छै धिया-पुता अपना देहमे नै छै बुत्ता पड़ल छेलै बेमार खसौने रहै छै घाड़ समए काटब भऽ जेतै पहाड़ केना कऽ लगतै पार केहेन भऽ गेलै अधला स्थिति घेरि लेलकै चारूभरसँ परिस्थिति।” आ हम छी ठाढ़ परिस्थितिसँ भऽ कात जेतए ने कोइ छूबि सकए आ ने रहए साथ नै छी एकोरती खिन्न हम छी परिस्थितिसँ भिन्न ने जागल छी आ ने सूतल छी सपनामे छी लीन। राम विलास साहुक कविता- के बँचेतौ तोहर जान चिल्का कनैए दूध पीबैले देखि दुखित माए कनैत बाजलि- “सुक्खल देह हड्डीए देखाए लहूक कतरा दु:खे लेल अछि स्तनसँ दूधक फेनगीओ ने चलैए जे तोरा चटा जीएबो लहू पीब पेट भरतो तँ पीब ले सभटा हमरा देहसँ।” चिल्का नोर बहबैत लगले सूरमे कनैत रहल अस्सी बर्खक बुढ़िया दादी ठेंगासँ ठेंगहति लग आबि पोतासँ बाजली- “अपना ने तँ गाए-महिंसक दूध अछि जे पानि फेंटि पीआ दैतिओ जीवितँए तँ हमरो कमा खिऐबितँए एक हाथ सेवा सभ दिन करितँए सबहक असिरवाद पबितँए भगवानो तँ बेमूख बनल छौ माए तोहर रोगही-टेटही छौ।” मुदा, चिल्का फकसीहारि कटैत रहल माए ममता भावपूर्ण पुन: बाजलि- “आन दूध बौआ नयनसँ नै देखलौं ने जीसँ कहियो सुआद लेलौं के देतौ दूध जान बँचबैले नै बँचल छै धरतीपर इंसान कथी पीआ कऽ तोरा जीएबो से नइए कोनो इंजाम माए-बेटा आ बुढ़िया दादी छी तीनू तीन जान तीनू मरि संगे जाएब श्मशान एहेन स्वार्थी दुनियाँकेँ की देखब जैठाम गरीव जीबै छै कुकुर समान।” उन्टा साँस छोड़ैत चिल्का जेना किछु बाजि रहल अछि भूखक आगिमे छूटि रहल प्राण नै कोइ अछि दयावान ऐठाम चहुदिश देखै छी बदलल इंसान रावण-कंशसँ पैघ शैतान। वसुंधरा राजदेव मण्डल अकाल परसाल तँ बचलौं बाल-बाल ऐबेर धऽ लेलक असुर अकाल खाली पेट नै फुटतै गाल सबहक भेल अछि हाल-बेहाल। हर-हर पुरबा बहि रहल अछि कानि-कानि काका कहि रहल अछि- झर-झर आगि बरिस रहल अछि धानक बीआ झड़कि रहल अछि। पियाससँ धरती फाटि रहल अछि मवेशी दूबिकेँ चाटि रहल अछि कतेको माससँ नै खसल एको बून पानि की भेलै केना भेलै से नै जानि अपनहि उजारलहक अपन सुख-चैन गाछ कटौलहक फानि-फानि। जलक महत बुझए पड़त नै तँ ई दुख सहए पड़त काल चढ़ए तँ बिगड़ए बानि घुन सँगे सतुआ देलहक सानि चारूभर पसरल घुसखोरबा पापी खसल पड़ल अछि पूरा चापी टक-टक तकैत अछि अफारे खेत पानि बिनु उड़ैत अछि सूखल रेत पछिला करजासँ हाल-बेहाल ऐबेर बिका जाएत देहक खाल नै रोपल जाएत एको कट्ठा धान केना कऽ बचत सालभरि प्राण ऊपर अछि धूरा भरल आसमान नीचा अछि परिवारक मान-सम्मान लोक कहैत अछि- धीरज धरह सरकार देतह हम कहैत छी- तेजगर लोक सभटा खेतह रहब छूच्छे केर छूच्छे आमजनकेँ कतौ ने कियो पूछए बाहर कतए जाएब यौ भाय बेंगू परदेशमे धऽ लेत डेंगू ने खेबाक नीक आ ने सुतबाक ठीक जेबीसँ पाइ लेत उचक्का झपटि-झींंक कियो लेत बेचि कियो लेत कीनि ठामहि रहि जाएत कपार परक ऋृण कतए बेचब कतएसँ आनब पाइ नै रहत तँ कथी लऽ कऽ फानब। आब अछि आशा अगिला जेठ यौ अन्नदाता घटा दियौ अन्नक रेट सभ काटि रहल एक-दोसरकेँ घेंट केना कऽ भरतै सबहक पेट। मनमे छल चाह धियाकेँ करब बिअाह धऽ लेलक अकालक ग्राह आब केना कऽ करब निरवाह केना कऽ पढ़तै धिया-पुता फाटल वस्त्र आ टुटल जूत्ता देहमे नै बचल आब तागत-बुत्ता दुआरिपर कनैत अछि भूखल कुत्ता। सभमे परिवर्त्तन सभमे उत्थान ठामहिपर अछि हमर गहुम-धान धन्य हे ज्ञान धन्य विज्ञान हमरो दिस दियौ एकबेर धियान वएह खेत-पथार, वएह खरिहान घरो छै टुटले कतए देखबै मकान कतए बेचबै कतए रखबै धान नै छै बजार नै छै गोदाम वएह खाद-बीआ ओहिना पानिक दाम वएह हड़-बड़द ओहिना बथान। यौ सरकार करू जलक प्रबन्ध फेर उठतै धरासँ धानक गन्ध दमकल, नलकूपक करू उपाए चन्द धार-नदीपर करू तटबन्ध। हम छी ऐ अंचलक किसान देशक बढ़ेबाक अछि मान-सम्मान बचेबाक अछि सबहक प्राण भूखसँ दिएबाक अछि त्राण हम करब संघर्ष नै छी बेजान फेरसँ गाएब कजरी गान। घरक आँखि- रहै छलौं केतबो व्यस्त देखबाक अभ्यस्त ठमकि जाइत छल पएर ठीक ओही स्थलपर सम्हारि एकबेर झाँकि घरक आँखि मध्य ओ मोहक रूप ठाढ़ भेल गुप-चुप चित्र आँखिमे चमकि उठैत छल मनक कण-कण गमकि उठैत छल किछु दिनसँ भेल िनपत्ता बिनु देने अता-पत्ता तैयो आदतिसँ लचार भऽ ठाढ़ भऽ गेलौं शून्यमे ओहिना जहिना पहिने छल तहिना ओ नै अछि ई छी मनक खेल ठमकि ठाढ़ भेल तकै छी ई हमरा की भेल की हमरा आँखिमे हुनक बास भऽ गेल आकि हमर आँखि ओ रूप मिलि एकेटा अकास भऽ गेल। अभ्यास नै ऐपार नै ओइपार खसल छी मँझधार पानि अछि अगम-अथाह मनमे निकलबाक चाह डुमैत भसिआइत सम्हारि रहल छी उनटा धाराकेँ झमारि रहल छी छूटि जाएत घर-पलिबार टूटि रहल अछि मोह केर तार जरूरी छलै धीरजसँ सीखब बूझि समझि मनमे लिखब कछेरमे केने रहितौं हेलबाक अभ्यास एना नै टुटैत हमर आस पछताबासँ नीक सेाचब आगू की हएत ठीक। महफा आ अरथी कारी आ उज्जर वस्त्र अछि पसरल नापैत-जोखैत जा रहल छी ससरल पैघ भेल जा रहल अछि दूरी धेने कड़ी आ गोंतने मुड़ी ऊँच-गहींर आ समतल नव-नव दृश्य बनए पल-पल काठ-कठोर बनल हरपल छन मात्र होइत अछि चंचल टपैत देस-कोस बनैत दुसमन-दोस दुखमे होश सुखमे बेहोश काल जीत रहल अछि उमेर बीत रहल अछि तैयो जोड़ैत घटी-बढ़ती आगू शेष ऊसर-परती कतबो नापब नै होएत नापल धरती महफा शुरू केलक अन्त करत अरथी। काटैत बीआ छुटैत निसाँस जेना निकलए जान ऊपर ताकए खाली आसमान नीचा डहि रहल पोसल बीआ देखि-देखि फाटै छै हीया हँसुआसँ काटि रहल फसल केर सीना देह भीजल अछि घाम-पसीना करए पड़त आगूक आस अपनहि काटैत लगाओल चास थरथराइत हाथ जानैत अछि बीआ रहि-रहि केना कानैत अछि हँसुआ कहै आ सुनै कान फुलकी फुला गेल बहि गेल निशान आब कि रोपबह हे किसान जेतबे बोझ बीआ ततबे धान। कानैत हँसी घटि गेल बीचक दूरी गप्पसँ बेसी डोलैत मुड़ी किछु नै जानै छी तैयो अपन मानै छी एककेँ सुख दोसराक सुख दूनू मिलि भऽ जाइत अछि दुख एक गोटेक आँखिक नोर दोसरकेँ दुखक नै ओर भीज रहल अछि अन्तरक पोरे-पोर ई नै रूकत कतबो लगाएब जोर संचय कएल एक-एकटा कण कतेक भरिगर भेल छल तन निकलि गेलासँ आब केहेन हल्लुक लगैत अछि मन माए एकदिन कहने रहए साइत सभटा सहने रहए बाटसँ भऽ कऽ कात वएह भोगल बात कहैत नीक अधला फाटि कलेजा निकलै दाह दू बून सूखल हँसी नोर जल अथाह कहलौं-सुनलौं भऽ गेल गप्प एहेनठाम की करिते रहब तप हे, रहै छी कतए कहाँ गप्प कतौ नै बजबै अहाँ बिसरि थाल-कादोमे धँसल कानैत-कानैत खिखिया कऽ हँसल लवका शक्ति जागि गेल हँसलासँ दुख भागि गेल। कनहेपर भाेलबा हड़बिर्ड़ो मचल अछि मेलामे धिया-पुता हरा गेल ठेमल-ठेलामे दूनू पच्छ अछि पूरा तगड़ा शुरू भऽ गेलै मेलेपर झगड़ा कोइ एँठ-कुठपर खसल चिचियाइत कोइ भीड़मे फँसल मँुहपर डर नाचि रहल अछि सभ अपने दुख बाँचि रहल अछि के कोनए भऽ गेल निपत्ता केकरो नै चलि रहल पत्ता “हे रौ सुन-ढोलबा हरा गेल भोलबा गाँजा पीबैत छन छलै सँगे की कहबो, छौड़ा छै अधनंगे तकैत-तकैत करए लगल दरद कानि-कानि ओ करैत हेतै गरद।” गाँजाक चिलम जेबीमे रखलक आँखि उनटबैत ढोलबा कहलक- “छौड़ा छह पाछू कान्हपर चढ़ल तूँ जाइ छह आगू बढ़ल निशाँमे अहिना हरेबह काका चिनाय कन्हेपर भोलबा आ भोलबे नै।” “बुधि हरा गेल हमर साइत कन्हेपर भोलबा ओकरे ले औनाइत कन्हेपर छौड़ा बैसल बिसरि गेलौं डर छल पैसल।” बजल बुढ़बा- छौड़ाकेँ दैत चमेटा- “तूँ बेटा छेँ की टेटा हमर मन भऽ गेल अधीर कान्हपर बैसल छेँ भऽ कऽ बहीर।” थप्पर लगिते उपजल आनि छौड़ा बजल कानि-कानि- “आँखि रहितो किछु नै सुझै छह अपनाकेँ बड़ काबिल बुझै छह।” कुहेस कतौ नै किछु बचल अछि शेष चारूभर पसरल कुहेस कठुआ गेल देह भीजल अछि केश अधभिज्जू सन भेल सभटा भेष घुरिया रहल छी ठामहि-ठाम कियो नै देत अछि समैपर काम टुटल जा रहल सभ आस ऊपरसँ लगि गेल दिशाँस कुहेस और भऽ गेल सघन इजोत लगैत अछि टीका सन। खेत-खरिहान, घर, जंगल-झार सभटाकेँ गिंर गेल अन्हार उनटि गेल अछि जेना माथ छूटि गेल सभ संग-साथ।
नै भेटैत अछि बाट नै अपन घाट लगे-लग औनाइत मन भेल उचाट सभ गोटे धऽ लेने छी खाट देखा दिअ जाएब कोन बाट। कहिया फटत ई कुहेस भेटत अपन घर परिवेश हे सुरूज किरिणकेँ जगाउ आबो तँ ऐ कुहेसकेँ भगाउ। जानवरक बोली सुनहट बाट अन्हार भरल अछि किछो गोंगिया रहल देह थरथराइत मन डरल भूत जकाँ के अछि अड़ल सुनमसान अछि चारूभर ने लोग आ ने अछि घर जानवर ठाढ़ अछि आरि ऊपर बाजि रहल अछि भऽ चरफर- “हे यौ, जल्दी लग आउ बोली सूनि नै घबराउ कहब आब रहस्यक गप बोलीक लेल बड्ड केलौं तप अहाँ देलौं अपन बोली हमर पूरा भेल आसा नै घबराउ हम देब आब अपन भेस-भाषा।” जानवरक मुँहसँ मनुक्खक बोली सूनि रहल छी अचरजमे डुमल अपने माथ घूनि रहल छी। नै सुनब तँए कान मुनि रहल छी विकासक क्रमकेँ गुनि रहल छी। कविता- उपयोग हे यौ श्रीमान्, अहाँ छी अदभुत लोग अहीं सँगे पौलौं हमहूँ सुख-भोग भरल-पूरल रहल हमरो घोघ भागल रहल दुखिया सोग देखलौं एहेन-एहेन दोग जे हमहूँ भऽ गेलौं बड़का लोग जतए तक पहुँचलौं ठीके नै छलौं ओइ जोग किन्तु आइयो हम वएह छी कहाँ भेलौं निरोग जे छल अपन तेकरो लग बनि गेलौं आब कुलोग। काज पड़ल तँ ला ताकि कऽ नुकाएल छौ कोन दोग भऽ गेल काज तँ हटा तुरत इहए छिऔ संक्रामक रोग। आइ जनलौं कारण की छलै असली रोग अहाँ करैत रहलौं हरपल हमर उपयोग। (ई कविता “उपयाेग” श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ समर्पित, राजदेव मण्डल...) द्वन्द अधरतिया भऽ गेल छै साइत अखने पहुँचलौं बौआइत सुनहट बाड़ीमे कोयलीक तान श्वेत शिलापर बैसल अछि चान आधा मुखपर केश-पाश आधापर अछि नोर, निराश तैयो आस-पास छिटकि रहल प्रकाश बिआहक बन्धन तोड़ि-ताड़ि घर-पलिवारकेँ छोड़ि-छाड़ि आएल अपने इच्छा कऽ रहल हमर प्रतीक्षा चिर प्रतिक्षित पियासल मन कछ-मछा रहल तन छन-छन केना कऽ राखब मनकेँ सम्हारि अन्तरमे उठल आन्ही-बिहाड़ि। बढ़ाएब हाथ अहाँ दिस लोककेँ उठतै रिश खुशीसँ भरत हमर मन दुसमन सभ करत सन-सन आपस घींच लेब हाथ तँ समाज रहत साथ अपने मनसँ हएत लड़ाइ लोक करैत रहत बड़ाइ। बाँहि पसारि बढ़ेलौं हाथ तरेतर घुमि रहल अछि माथ विमूढ भऽ अड़ल छी द्वन्दमे पड़ल छी। छीपपर दीप नमगर बाँसक छीप पर नाचैत दीप अपने देहकेँ जारि-जारि तैयो टेमीकेँ सम्हारि अन्हारकेँ ललकारि हवासँ करैत मारि एक्के धूनमे चलि रहल समताक लेल गलि रहल जेतबे क्षमता छै तेतबे दोग-दागमे फैलि रहल बटोहीकेँ देखबैत बाट हरा ने जाइ कहीं कुबाट। देत प्रकाश सभकेँ लड़ैत अन्हारसँ भरि राति किन्नौं नै देखतै केकरो रंग, रूप आ जाति। इमानदारी इमानदारी बिकैत छै बेनाम लाख, करोड़ आ टका-छेदाम सभ रंग दाम सभ रंग नाम जेहने इमानदारी तेहने दाम देहाती दाम शहरी नाम जेहने टका तेहने काम इमान कहै सुनू हमर बोल हमर के लगा सकैत अछि मोल टूटि रहल अछि पुरना खोल सहजहिं फूटत नवका बोल। बेइमानी कठहँसी हँसैत अछि ऊँच आसनपर वएह बसैत अछि ओकरे भेटै आदर सम्मान इमानदारी पाबैत अपमान हमहँू नै बचल छी पूरा लगल अछि बेमानीक धूरा खोजलौं ऐ पार-सँ-ओइ पार नै भेटल पूरा इमानदार बजलौं अहाँ बारम्बार कहू के अछि इमानदार? बीआ बीआ नै अछि खाली बीआ माटि, पानि, हवा प्रकाश सँ मिलतै आस छूबि देत अकास आँखि देख रहल अछि साँच बीआ मध्य आँकुरक नाच कालकेँ कऽ रहल जाँच अन्तरमे बैसल गाछ एक-सँ-अनेक पसरल छेकने जाइत आगाँ ससरल दैत अछि प्राण वायु बढ़ैत अछि सबहक आयु। किछु अछि बेसी किछु अछि कम अहीमे मिलल अछि सत-रज-तम। एकरा अन्तरमे शक्ति अपार जाएत एक दिन धरतीक पार बीजक प्रस्फोटन अछि सार हरक्षण बनैत नव अाकार। बलात् घटना भेलै राति अखने हेतै साइत चौबटियापर पंचायत दोषीपर खसतै जूता-लाति ऊपसँ हेतै जुरमाना लोक मारबे करतै ताना बात बढ़तै तँ जेतै थाना केहेन भऽ गेलै जमाना असगर केना कऽ निकलत लोक राक्षस बैसल दोगे-दोग जेकरा संगे भेलै बलात् कानि रहल अछि भऽ कऽ कात- “एकबेर असगरमे नोचलक गात-गात सबहक सोझा कहए पड़तै वएह बात केना की सभ भेलै हमरा साथ लाज भरल बात केहेन अघात फेर वएह पीड़ा सहए पड़तै खोलि-खोलि कहए पड़तै आँखि ने देखै भरल नोर यौ आब कहिया हेतै भोर?” झूठक गियान हमहीं देने रही झूठक गियान बालपनमे धऽ लेलक कान हमरे देल अछि ई सीख कखनो झूठ होइ छै ठीक झूठ बाजि बचा लिअ जान बढ़ा लिअ मान-सम्मान घटि गेलै सत्यक मान झूठकेँ धऽ लेलक कान करए लगलै झूठक बेपार बदलि गेलै काज बेवहार धऽ लेलकै ओही दिन लीख आब केना कहबे ई नै नीक झूठक गबैत यशोगान भऽ गेलै आब ओ जुआन हाथमे लेने तीर कमान खींच लेत आब हमरे जान ओ नै छी कियो आन सोझा ठाढ़ अपने संतान। जेहने अहाँ तेहने हम संगे-संग घुमलौं देश-कोस कतेक विचारि लगेलौं दोस दुनू गोटेमे भरल परेमक जोश खुशी रहत पल छल पूरा भरोस सभ किछु छल एक्के समान दूटा देह एकेटा जान दोस बनबैत कात एतेक विचार दुसमन बनबैत बखत भेलौं लचार नै सोचने छलौं अपना मन जे बनए पड़त आब दुसमन सन विचार कऽ बनाबितौं दुसमन नै जरैत आइ तन-मन दुसमनसँ कहाँ रहलौं कम जेहने ओ तेहने हम केकरोसँ कहाँ कियो कम। चिर प्रतीक्षा नीपलौं-पोतलौं घर-दुआर कतेक बेर केलौं झार-बहार अपनो केलौं सोलहो िसंगार कऽ रहल छी इंतजार उताहुल भेल मन पिआसल अछि तन बितल जाइत क्षण कखन हएत मिलन मनमे फुलाइत सुमन नमरले जाइत प्रतीक्षाक क्षण असोथकित भऽ गेल नयन शंिकत छी बिफल हएत जतन निन्नसँ बन्न भेल आँखिक कोर दुखाइत देहक पोरे-पोर मन घेराएल सपनाक शोर अहाँक झलक बुझाएल थोड़बे-थोड़ चौंकि उठलौं निन्न छल घोर नै भेल छल भिनसर-भोर पएरक चेन्हसँ हम मानि रहल छी अहाँ अाएल छलौं से जानि रहल छी पुन: एकबेर देहकेँ तानि रहल छी बाधाक निन्नकेँ तोड़ि-ताड़ि बौआइत सपनाकेँ डाहि-जारि खोलि अपन सभ घर-दुआरि चिर-प्रतीक्षा तन-मन सम्हारि। हाथ- हाथ िसर्फ नै अछि हाथ अन्हारमे जनमि गेल एेमे नाक, कान, आँखि, दाँत इजोतेटा मे नै अन्हारोमे रहैत अछि साथ सूँघैत अछि सभ कात जानैत टेब-टेब सभ बात हाथकेँ नै देखैत हाथ देखैत अछि हाथक करामात कतए सँ कते धरि पहुँचल हाथ हाथसँ मिलैत हाथ सिरजनक साथ भऽ जाइत अछि विध्वंसक बात हाथ तँ अछि हमरे साथ फेर किएक हेतै अधला बात। ठक हम छी ठक नै कोनो शक झूठ गप भख साँचक नै परख शुरूमे ठकलौं घर-परिवार आगाँ ठकैत दुनियाँ-संसार टका-पैसा हजारक-हजार लगा देलौं सम्पतिक अमार ठकैक आदतिसँ नचार कतेको कनैत जार-बेजार आइ छूटल पूरा भक जखनि हमर लगल ठक एहेन जीत पार भऽ गेल जिनगी बूझू बेमार भऽ गेल सभकेँ एहिना उठैत हेतै दरद आइ हमहूँ करैत छी गरद साँच कतए सँ आब हम पाएब ठकबे करब वा ठका जाएब सोचब कोनो एहेन उपाए ऐ जालसँ केना बचल जाए। शिशुक स्वर बन्न परसौति घर चिचिआइत शिशुक स्वर निकलैत सुगन्ध मन्द–मन्द शान्तिमे स्पन्द मधुर आवाज सजौने साज कनैत बारम्बार खोलत अनन्त संभावनाक दुआर बनत नित-नूतन सिरजनहार ऐ हेतु होए एहेन आधार बढ़ै बुधि, विवेक, विचार तत्काल चाही सुरक्षाक ढाल देखू पाछू नचै छै काल लेने छै वएह पुरना जाल क्रन्दन स्वर पुछै सवाल “की हरण कऽ सकब अहाँ हमर दुख देख रहल छी घातीक रूख ताकि सकब अहाँ चिन्हल मुख हएत कोनो मनुखे सन मनुख?” बोलती बन्न अभिभावककेँ सीख कानकेँ सुनाइत हवामे चारू-भर गुनगुनाइत “सम्हारि कऽ चलिहेँ अपन चाल नै तँ बाटेमे धऽ लेतौ काल।” देश-दुनियाँ आगू बढ़ल हम रहब ओझरा कऽ पड़ल तैयो पैसल रहैत छल डर काँपैत रहैत छलौं थर-थर सुरक्षाक एतेक अछि समान तँए ने देलिऐ गपपर धियान आइ जाएत बे-वजह जान राह भेल अछि सुन्न-मसान आगू ठाढ़ भेल जमदूत समान कर्कश स्वर सुनि ठाढ़ भेल कान “मुँहसँ जे निकलतौ अावाज कियो ने देतौ अखन काज।” हमर की गलती किअए भेल नाराज “आइ गिरत हमरेपर गाज नजरि उठा देखलौं जी उड़ल सन्न हमर भऽ गेल बोलती बन्न।” दिलक आवाज अन्तरमे रहैत अछि अमृत बाहर बीख भरल अनघोल प्रेमक नै कोनो मोल भीतर शान्तिक खजाना अनमोल दिलक बोलकेँ जारि-मारि बजै छी हम दोसर बोल शब्द दैत अछि दिलकेँ धोखा खोजैत अछि बारम्बार मौका कखनो शब्द दिलपर होइत अछि नाराज कखनो दिलक बात कहैत शब्दकेँ होइत लाज शब्द होइत जे दिलक आवाज सभठाम होइत सत्यक राज अन्तरमे बहुत सजबए पड़त साज तखैन बनत शब्द दिलक आवाज। नेंगरा मजदूर किएक फटकारै छी यौ दरबान हम नै छी कियो आन नै करू एना परेशान नै छी भिखमंगा, चाेर, बेइमान बरख भरि पहिले हमरो रहै अहीं सन शान हमहीं बनौने रही ई सतमहला मकान कतेक लगा कऽ लगन काज केने रही भऽ कऽ मगन अपन दुख किछु कहल ने जाइ ऊपरसँ खसल रही दुनू भाँइ टाँग कटा कऽ हमर बचल जान सहोदराकेँ उड़ि गेल प्राण नै छी दुखित केलौं िनरमान एहेन काजमे होइतै छै बलिदान हमर तँ कर्तव्य अछि काजसँ लड़ब किछु भऽ जेतै काज तैयो करब देखबाक लीलसा छल एकबेर आँखि जुरा जाएत रहब कनेक देर। “भागि जो ऐठामसँ रे बकलेल ई जगह अछि विशिष्ट लोकक लेल मालिक एतौ तँ देख लेबही खेल तुरन्तेमे चलि जेबही जेल।” आँखि लगै छै केहेन क्रूर जेना देहमे कऽ देतै भूर चोटहिं घूमि गेल नेंगरा मजदूर अछि चुप्पे आवाज निकलै दूर-दूर। मनक दुआर अन्हार घरमे बैसल लोग कऽ रहल अछि जेना कोनो नै देखि रहल एक देासराक मुख कतए सँ भेटत दरशनक सुख औना रहल सभ ठामहिं-ठाम बिनु मकसद जिनगी बेकाम अन्हार करै अन्हारसँ बात अन्हारेसँ झँपने रहू सबहक गात अनठेकानी हथोड़िया मारैत हाथ नै जानि के करतै केकरापर आघात शंकामे डूमल सभ काते-कात डर नाचि रहल अछि माथे-माथ कतबो करब छूच्छे जाप अन्हार घरमे साँपे-साँप खोलए पड़त िखड़की-दुआर अन्तर मनक सभ केबाड़ अन्हार भऽ जाएत तार-तार पहुँचत प्रकाश आर-पार एक देासरसँ जान-पहचान बढ़त आपसी मान-सम्माण। छाँहक रूप हम छी अभागल जा रहल छी भागल निन्नमे डूमल या जागल हरपल पाछाँ लागल केहेन ई छाँह बिनु परबाह लगैत अछि अथाह अशोथकित भऽ गेलौं भगैत-भागैत घूमि-घूमि पाछू तकैत-तकैत मुँहसँ निकलैत अछि आह केहेन अछि जिदियाह जखैन तक अछि ई काया सँगे लगल रहत ई छाया बेसी भागब तँ थकित हएत तन ओझराएल रहत हरक्षण मन अड़ि कऽ परखब हम ओकर रूप चाहे चढ़ि ऊपर चाहे खसि कूप रूप हो कुरूप वा हो अनूप ओकरे सँगे देखब हम अपन सरूप। बाबा केर लाठी ठरल हवामे टौआ रहल छी टोले-टोले बौआ रहल छी बाबाक देल घण्टी गलामे टाँगने छी गामक मुँहपुरखी हम नै कोनो माँगने छी घण्टी टनटनाइते भूकए कुकुर लुच्चा छौड़ा सभ तकए भुकुर-भुकुर हुनके देल छलै तेल पिआओल लाठी दूध-भात खेबाक लेल फूलही बाटी छुच्छे बाटी भटकि रहल अछि सूखले भात अटँकि रहल अछि लाठी हाथमे देखते लोक करए सन-सन इशारा करैत बजैत अछि मने-मन “देखियौ देह हाथ सूत सन लगै छै हाथमे बन्दूक सन।” मित्र कहैत अछि- “नै करू फर-फर तामसे किअए कँपै छी थर-थर छै सभकेँ समानताक अधिकार लड़बै तँ उजरि जाएत घर-दुआर नै चलत आब पुरना लाट ओ भऽ गेल कुबाट एकर अछि एकटा काट चलए पड़त आब नवका बाट।” गीतक पूर्व संगीत नै भेल दरस तँ केना हएत परस कहाँ जनलौं अहाँक प्रीत पूर्वमे नै सुनलौं पद ध्वनि संगीत हे यौ मीत दूरसँ सुनलौं गीत बुझलौं गीतक पूर्व बजै छै संगीत अहिना होइत हेतै नित आब तँ अवधि गेल बित कहाँ भेल हमर जीत पहिने जँ जानितौं एना नै कानितौं आदरसँ अरिआइत अानितौं छतीसो व्यंजन छानितौं कतए चलि गेलौं भऽ कऽ अनेर नै पाबि रहल छी अहाँक टेर जेना टूटि गेल पुरना घेर फेर जनम भेल एकबेर। दगध सुर कलीकेँ स्वर सुनि पिक भेल पागल अन्तरमे किछु जागल लेलक कान मुनि मनमे गप्पकेँ गुनि कली बजैत अछि अपनहि धुनि- “मधुमासक आगमन भेल अहाँ फँसि गेलौं कोन खेल हृदय केना बिसरि गेल के बनौलक एहेन जेल जतए चलैत अछि फरेबी खेल हमरा बना देलौं बकलेल आकि अहाँ बनि गेलौं सन्त वियोगक दाहसँ दग्ध छी कन्त साँचे अनन्त अछि वसन्त किन्तु हमर नै देखब अन्त।” इजोतक वस्त्र घर-दुआरिकेँ नीप हाथमे लेने जरैत दीप अन्हारसँ लड़बाक इच्छा कऽ रहल समैक प्रतीक्षा हवाक झाेंका कऽ रहल खेल दीया अपनाकेँ बचेबाक लेल आँचर तर ढुकि गेल जेना इजोत वस्त्र बनि गेल आँखिकेँ असंख्य दीप सुझाएल जे छल मुझाएल बाट अछि असीम, अपार अड़ल चारूभर अन्हार एक दीप अछि ज्वलित तँ करत अनेकोकेँ प्रज्वलित नेसि रहल धेने इहए आस ठामहि-ठाम खेलत उजास। मनुखदेवा सभ मनहि-मन पूजि रहल अछि एक-दोसराक गप्प बूझि रहल अछि मनक केना बूझत सभ बात कहए चहैत अछि छूबि कऽ गात पकड़लक पएर भऽ कऽ कात हमरो दुख सुनि लिअ तात जखैने देवक देहमे भिरल ठामहि ओ ओंघरा कऽ गिरल जेकरा कहै छलौं महान से अपनहि अछि बेजान आब के देत सुन्नर काया सम्पति, यश, सम्मान खूजि गेल सभटा राज तैयो भीतरसँ निकलए आवाज- “छलै जे पावन बना देलिऐ अपावन भऽ गेलै निष्प्राण छुबलासँ घटि गेलै मान पहिने बनल छल देवा आब भेल मनुखदेवा देह चढ़ि करत सेवा भेट सभकेँ मनक मेवा नै डेराउ सभ किछो देत मानत नै पूजा अखनो लेत।” अप्पन हारि गाम-घरसँ मंत्री दरबार कियो नै पाबि सकैत छल पार के बजत सोझा फोड़ि देतिऐ कपार डरे कनैत कते जार-बेजार जीतने छलौं सकल समाज उठिते आवाज गिरबै छलौं गाज बड़का-बड़का केलौं काज बजितो होइत अछि लाज सभ दुसमनकेँ मारि देलौं कतेकेँ माटि तर गाड़ि देलौं घर-परिवारकेँ तारि देलौं तैयो अपनासँ हारि गेलौं। अपन उजाड़ि काटए बपहारि के बजैत अछि अप्पन हारि? स्वरक चेन्ह स्वर आबि रहल आकाशक कोनो छोरसँ दरद उठि रहल देहक पोरे-पोरसँ अहाँक सोर पाड़ब हम सुनि रहल छी असंख्यमे सँ अहाँक स्वर चुनि रहल छी टपब खेत-खरिहान देश-कोस मनमे अछि मिलन केर जोश बियावान झाड़-पहाड़ नदी-नालाकेँ करैत पार पहुँचब एक दिन अहाँक पास लगौने छी मनमे आस स्वरक चेन्ह अछि ठामे-ठाम नै बिसरब आब अहाँक गाम किएक भऽ रहल छी अधीर मनमे उठैए रहि-रहि पीर हएत शुभ मिलन रहू थीर बरसत एक दिन शान्तिक नीर। सुखक भाय तोड़ि रहल छी फूल गड़ि गेल हाथमे शूल भऽ रहल केहेन स्पर्शक सुख हाथमे गड़ल काँटक दुख नै छोड़ि सकैत छी आ ने तोड़ि सकैत छी चलैत जिनगीकेँ नै मोड़ि सकैत छी विचारक क्रमकेँ जोड़ि सकैत छी फड़तै अलग-अलग फल किन्तु एकेटा उद्गम स्थल सुख आ दुख दुनू छी भाय रहत सँगे नै छै उपाय। हएत अगारी सभ खेलै छलै अपन-अपन खेल नै छलै केकरो आपसी मेल सभ चलैत छल अपन-अपन चाल अपने समांगपर फूटै छलै गाल लोकक सिखऔलपर तोड़ैत छल गाल सबहक भेल छलै हाल-बेहाल कतेक प्रयास कतेक नोकसान तब देलक हमरा गप्पपर धियान बनल एकता कतेक छान-बान्ह बालुक बान्ह कोन ठेकान खुश भऽ सभ ठोकए लगल ताल चुप्प नेता भऽ गेल वाचाल ओझरा कऽ फँसल ओ लोभक जाल ठाढ़ भऽ गेल कठिन सवाल फेर बनलौं एकबेर बकलेल जखैन नेते स्वार्थी भऽ गेल पुन: ताकबै खेल रहतै जारी जे नै भेलै से हेतै अगारी। रूचिगर केहेन चीज अहाँक लगत नीक हमरा भेटत ओहीसँ सीख दौगैत रहैत अछि तन अन्वेषण करैत मन विचरण करैत धरासँ गगन पैघ पहाड़ आ कण-कण कतेक बहैत अछि नोर राति-दिन आ साँझ-भोर डुमैत रहै छी अपने भूख तब देखबै छी अहाँक दुख कल्पनामे देखैत छी भऽ कऽ मूक परोसैत छी अहाँ लग सुख तैयो भऽ जाइत अछि चूक कहाँ बदलैत अछि अहाँक रूख आब देखेबाक अछि मृत्यु-चित्र ओ हएत केहेन विचित्र ऐ देहकेँ छोड़ए पड़त यौ मित्र तब बना सकब ओ चित्र घेरने अछि मोहक कड़ी बितल जाइत घड़ी-पर-घड़ी अहीं छी असल प्रहरी तोड़ू कड़ी तोड़ू कड़ी। बजैत एकान्त बजैत अछि सुन-मसान कियो ने दैत अछि कान गबैत रहैत अछि अनवरत गान जुग-जुगसँ संचित ज्ञान चारू भर स्वरक घमासान सुनहट ठाढ़ अपनहि शान हरक्षण दैत अनुपम दान बिनु शब्दक बजैत ज्ञान स्वर सुनैत छी किन्तु अछि चुप केहेन हएत स्वरूप वाणी अछि एतेक मधुर तँ रूप हेतै केहेन अनूप बैसल छी एकान्तक कोड़मे भऽ रहल सर्जना मनक पोर-पोरमे यादि अबैत अछि करम टूटि रहल बहुतो भरम सुनि रहल अछि हमर कान शान्तिक गुन-गुन गान बरिस रहल सुन-मसान कऽ रहल छी पावन स्नान। लटकल छी दुनू हाथ अछि कड़ीसँ बान्हल ओहीपर हम अँटकल छी पएरक नीचाँ उधिअाइत समुंदर आसमानमे लटकल छी छड़पटेलासँ हाड़-पांजर दुखाइत अछि बेसी चिचिएलासँ कंठ सुखाइत अछि कहुना कऽ जीब रहल छी जिनगीक जहर पीब रहल छी नीचाँ गीरब तँ डूमि मरब तँए की हम लटकले रहब आब नै मानब जेकरा नै देखने छी तेकरो जानब बन्हन तोड़ि नीचाँ फानब नै डरबै कठिन कारासँ लड़बै वेगयुक्त धारासँ करबे करब पार उधिआइत तेज धार देख रहल छी समुद्रक कछेर तोड़ए पड़त आब कड़ीक घेर जेकरा करबाक चाही सवेर तेकरे केलौं अबेर। बटमारिक गीत किएक कऽ रहल छी एना ठेमम-ठेल यौ हम नै छी बकलेल यौ। जहूक लेल हम छी जोग तहूसँ भेल छी अभोग किअए ने भेट रहल अछि जगह हमरो लेल यौ हम नै......। हमरो मन छल गबितौं गान घटले जाइत अछि मान-समान कष्टमे रहत जँ मन-प्राण कतएसँ गाएब सुख केर गान दुखसँ नाता अछि आब हमर जुड़ि गेल यौ हम नै......। हमरा लेल जगह नै खाली व्यंग्यसँ बजबैत अछि सभ ताली असली-नकली करिते-करिते हमहीं बनि गेलौं पूरा जाली हमरा सँगे चलि रहल ई कोन उनटा खेल यौ हम नै......। अहाँ कहै छी- “धरू आस करू बारम्बार प्रयास एक दिन करै पड़तै अहूँसँ ओहिना मेल यौ नै रहब अहाँ बकलेल यौ।” हम नै......। गन्तव्यक भरम मन भऽ गेल पुलकित गाबए लगलौं गीत मिलि गेल मंजिल भऽ गेल हमर जीत जेकरा बुझलौं मंजिल ओ कहलक- “अहाँकेँ नै अछि अकिल लटकल छी अधरममे फँसल छी भरममे जेकरा ताकैले एते प्रयास से धेने अछि अहींक आस किएक बखतकेँ करै छी नाश ओ तँ अछि अहींक पास।” दरदक भोर अखन तँ भेलै दर्दक भोर साँझमे देखबै अन्तिम छोर चिचिआइत मन करै शोर कानब तँ सुखि जाएत नोर तानब तँ छूटि जाएत जोड़ डरे धेने छी केकर गोड़ थाह नै भेटए थोड़बो-थोड़ ताकब दरदक अन्तिम कोर छोड़ि देत ओ हमर पछोड़। केहेन मांग असली मांग बजल अर्द्धांग “जिनगी भरि बनले रहब बताह काटिते रहब हम कठ आ काह पलिवारक नै अछि परबाह डूमि जाएत आब घरक नाह जरि गेल सभ मनक चाह केना कऽ चलब काँट भरल राह।” करै छी जौं गप्पपर विचार मन बहैत अछि तेज धार तँए, पटियापर पटुआ गेलौं लाजे कठुआ गेलौं केना करब एकरा सम्हार पाबि नै रहल कोनो पार रखबाक छै सबहक मान करए पड़त एकर निदान। पसरैत प्रशाखा जर्जर बूढ़ अनचिन्हारक गाछ हवा नचा रहल छै नाच लटकल असंख्य डारि-पात चारूभर आ काते-कात सहने हएत कतेक अधात केतेक छूटल केतेक साथ करैत एक दोसरसँ बात परेमसँ भेल स्नात। हमर चलैत अन्तिम साँस स्वजन-परिजन आस-पास एकेटासँ बढ़ि केतेक रास सँगे चलैत सिरजन विनाश झूठ-साँच मध्य नचैत नाच हम बनल छी अनचिन्हक गाछ। खसैत बुन्द खसैत बून-बून गाबै गुन-गुन चिड़ै चुन-चुन झिंगुर झुन-झुन बरसैत मगन घन देखैत मन नयन नाचैत सुमन मन तृषित भीजैत तन सूखल कण-कण अमृतसँ मिलन। चलैत रहत आखेट नै टुटत जिनगीक गेँठ आबि गेल जेठ दुख गेल मेट सभ किछु समेटि आब हएत भेँट। उलहन “सभ तँ रहै छै अहींक लग-पास हम तँ अबै छी चासे-मास पड़ि गेल विपति भेलौं निराश अकालक कारणे डहि गेल चास दिन अदहा पेट राति उपास मनमे छेलए जे पूरा हएत आस भौजीक ताना सुनि आँखि भरल नोर बेथासँ भरल मनक पोर-पोर एक मुट्ठी देलासँ की भऽ जाएत थोर आँखिसँ बहि रहल अछि दहो-बहो नोर हमर नोर नै बनि जाए अँगोर यौ भैया, एकदिन हमरो हेतै भोर चुप्पी साधने खसौने छी धाड़ ऐ सम्पतिपर छै हमरो अधिकार आगूमे ठाढ़ बालपनक पियार नाता तोड़ि केना करब तकरार कनैत जा रहल छी जार-जार माए रहैत तँ करैत दुलार अपने चास-बासपर करए पड़त आस बाबाक बखारी आ धीयाक उपास।” आपसी “जिनगी भरि दैत रहलौं फूल आपस भेटि रहल अछि शूल मन भऽ गेल बियाकुल किअए भेटल ई डण्ड कहाँ केलौं कोनो भूल देहलो चीज नै देब हम देने रही फूल काँ केना लेब?” “हमरा लग वएह अछि तँ दोसर की देब जबरदस्तीओ करब तँ आरो की लेब।” “खुगि रहल अछि मनक राज सुआरथसँ भरल छल हमर काज।” रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार” अभिनन्दन ऐ आवाज सुननिहार सभ गोटा सुभ सिनेह, प्यार आ नमस्कार। प्रफुल्लित छी हम बरियारती समा रहल नै हृदए फूल। चीर स्मरणीय स्वागत पाबि कऽ रहल याद नै राहक शूल। जगमग करैत जनकपुर नगरी श्रद्धामय नर-नारी कूल। की वर्णी ऐठामक शोभा बुझा रहल सभ मंगलक मूल। मंगलमय ऐ शुभ धड़ीमे वर-वधु केलनि कबुल सुख-दु:ख दुनू बाँटि बरबरि रोपब नव बगिया केर मूल। चीर जीवी होउ दुल्हा-दुल्हीन रहत आवाद नव श्रृजित भवन। दऽ रहलौं आशिष हम जगवासी गम नै देत कोनो झोंका पवन। इरा मल्लिक गजल ( श्रृँगार.मल्हार ) ----------000----------
बरखा बरसै छै दिन राति अहाँके इयाद सताबै ओहिपर कारि अन्हरिया राति अहाँ बिन चैन न आबै। अहाँ----
घिरलै कारी घटा घनघोर वन मेँ नाचै मोरनी मोर एसगर सून्न भवन छै मोर बिजुरिया देखि डराबै। अहाँ----
बरसैत कजरा के धार हमरा इहो दैत उपराग प्रीतम द्वारजोहै छी बाट अहाँके मोरा हिय हहराबै। अहाँ -----
पिया अहाँ बसु दूरदेश मेघ सँ भेजू अपन सँदेश करोट फेरैत कटै छै मोरा रतिया नैना नीर बहाबै। अहाँ-----
बून्ने मोती सजल सब पात देखि सिहरै छै मोरा गात भिजै कजरा गजरा बिंदिया कोयलियो के बोली सताबै। अहाँ----
विलमनै करियौमहाराज अबियौ छोड़ि काम आ काज हमर कँगना पायल के झँकार रहि-रहि अहीँके बजाबै। अहाँ---
वर्ण -21 राम विलास साहु गीत मोह-माया...... सगरो माया पसरल-ए मायाक बजार सजल-ए ठगिनियाँ माया-जाल पसारि सभकेँ बान्हि फँसा रहल-ए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैसि सभकेँ ठकि-ठकि खाए रहल-ए सभकेँ......। सभ सज्जन दुर्जन ने कोइ साधु-संत महंथ कहबैए सज्जन साधु-संत महंथ लोभ फँसि घुरिआए रहल-ए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैसि सभकेँ ठकि-ठकि खाए रहल-ए सभकेँ......। लोभी सभ निरलोभी नै कोइ इमान बेचि इंसान कहबैए कुकर्मकेँ धरम-करम बुझैए मोह-मायामे सभ घेराएल-ए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैसि सभकेँ ठकि-ठकि खाए रहल-ए सभकेँ......। ई जगत केना कऽ चलतै के नेकी इंसान कहेतै केना सभकेँ भेटतै त्राण माया देखि कवि बहबैए नोर ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खाए रहल-ए सभकेँ......। जगदीश प्रसाद मण्डलक सबा दर्जन गीत- केकरो फूल...... केकरो फूल मोँछ बनै छै तँ केकरो फूलहरि जाइ छै। फुलैक फूल फुलिया-फलिया हस-हँसि दुनू दिस बढ़ै छै। हस-हँसि दुनू दिस बढ़ै छै। केकरो......। फड़ैक सरूप पकैड़-पकैड़ मोँछ फूल सजबैत कहै छै। सीख-लीख सिरखार गढ़ि-गढ़ि फल-फलाफल सरूप धड़ै छै। फल-फलाफल सरूप धड़ै छै। केकरो......। तेतबे नइ यौ भाय साहैब, केकरो फूल अलोपित भऽ भऽ सत-सत हाथी ताकि थकै छै। फूल गजनती गज-गज गजुआ बाट-बटोही हारि थकै छै। बाट-बटोही हारि थकै छै। केकरो......। जेकर दूध छाल छलही बनि आनि जम जजमान गढ़ै छै। बाल-बोध मुँह अमृत बनि अरोग जीत जिनगी पबै छै। अरोग जीत जिनगी पबै छै। केकरो......। काज पसरि...... काज पसरि अबिते अंगना लप-लप लछमी आबए लगै छै। लछ-लछ लछमी कुदैक-कुदैक शर सिर कमल सजबए लगै छै। शर सिर कमल सजबए लगै छै। लप-लप......। सजि-सजि सजिते सिर श्रृंगार बाणी वीणा आबए लगै छै। बाणी तनि भरैन-पुरैन काशी कमल खिलबए लगै छै। काशी कमल खिलबए लगै छै। लप-लप......। कूदि-कूदि काज कर करिआ वृक्ष सरूप सजबए लगै छै। अशोभ शोभ अलिसाइत अलि प्रसून रस रसबए लगै छै। प्रसून रस रसबए लगै छै। लप-लप......। सरसिज कमल सरि-सेरिआ सागर कमल गढ़ए लगै छै। सगर पहाड़ पार पे-पेबि गर गल जोड़ि मिलए लगै छै। गर गल जोड़ि मिलए लगै छै। लप-लप......। धार बीच...... बलधकेल धकिया-धकिया धार बीच उगै-डुमै छै। सुभर जिनगीक कश्य कथे की पतरखेप खेपैत खपै छै। पतरखेप खपैत खपै छै। धार बीच......। करिते उग-डूम धार मध पगे-पग पएर पिछड़ै छै। पात-निपात पतड़-पतड़ा पतरखेब खेबैत रहै छै। पतरखेब खेबैत रहै छै। धार बीच......। पगेपन पन-पन पंतिया पंतिया पतिया पन चढ़ै छै। बलपन खेलपन कुदि कुदैक पतरखेल खेलैत कहै छै। पतरखेल खेलैत कहै छै। जएह जिनगी सएह किरदानी सभ दिन सभ बाजि कहै छै। धरम-अधरम कुधरम बूध-रम पतरहाँसि हँस-हँसैत कहै छै। पतरहँसि हँस-हँसैत कहै छै। धार बीच......। फेरो हम...... मरि-मरि कऽ मरै छी फेरो हम फड़-फड़ जीबै छी। फेरो हम फड़-फड़ जीबै छी। झूठ-फुस एक्कोटा नै मुँह फोड़ि-फोड़ि कहै छी कखनो ठोर बर-बरी बना दालि सिर चढ़ि-चढ़ि कहै छी दालि सिर चाढ़ि-चाढ़ि कहै छी। फेरो हम......। कखनो रम रमनाक बीच महाभारत रचि-रचि कहै छै। दुनूक श्रृगी-श्रृंग चढ़-चढ़ि दोहरा-दोहरा कहै छी फेरो हम जीबै छी मरि-मरि कऽ मरै छी फेरो हम......। रस-रसा रसाएल जेना रब-रब रभसि कहै छी। रभसी रभसि रम-रमा मरा राम मरा कहै छै। फेरो हम जीबै छी फेरो हम......। रंग जिनगी...... रंगिते काजक रंगसँ रंग जिनगी बदलए लगै छै। धड़-धरती छोड़़िते जेना नवरंग जिनगी धड़ए लगै छै। नवरंग जिनगी धड़ए लगै छै। रंग जिनगी......। रूप अरूप सरूप गढ़ि-गढ़ि रंग रंगि रभसए लगै छै। मुँह-कान जेहेन-जेहेन नाओं अपन सिरजए लगै छै। नाओ अपन......। अपना-अपनी गमक-महक संग रूप सिरजए लगै छै। गमक गंन्हि महक-महकि धरती-अकास पसरए लगै छै। धरती-अकास पसरए लगै छै। रंग जिनगी......। पता-पती पसरि-पसरि जिनगीक राग भरमए लगै छै। अपन-अपन जिनगीक किरदानी शूर गलगल गबए लगै छै। शूर गलगल गबए लगै छै। रंग जिनगी......। चोरकट चालि...... चोरकट चालि पकड़ि-पकड़ि चोरकट चालि चलैत रहै छी बाल देखि बोली बिलहि चोरकट समाज गढ़ैत रहै छी। चोरकट समाज गढ़ैत रहै छी। चोरकट चालि......। एकी-दूकी गंजक-गंज चिरक समाज बनबैत रहै छी। साज सजि सजनी सन्हिया चढ़ि-चढ़ि सिर सजैत रहै छी चढ़ि-चढ़ि सिर सजैत रहै छी चोरकट चालि......। अड़कि-मड़कि धड़कि जन-जन सरकि-हरकि धरैत रहै छी मुसर मूस मुसिया-मुसिया कट-कट, कटि-कटि कहैत रहै छी। कट-कट, कटि-कटि कहैत रहै छी। चोरकट......। कटनी काटि कात कतिया आँटी-अगो बनैत कहै छी आँटी-बोझक आँट जेना सीली-आगू हँसि-हँसि कहै छी। सीली-आगू हँसि-हँसि कहै छी। चोरकट......। तखनि पार...... डूमा-डुमी खेल खेलि धड़ा-धाम केना टपबै। अन्हार घर साँपे-साँप तखनि पार केना करबै? तखनि पार......। अन्हार डूमि-डूमि डुबैक हँथोरि हाथ केना पेबै? के केमहर दहलि भँसिया बीच अन्हार केना देखबै? बीच अन्हार केना देखबै? सघन-समीर अकास ठेिक नाद-शंख केना चढ़बै? अकान कान कानि-कूहि नाग-फाँस केना कटबै। नाग-फाँस केना कटबै। डँसिते छाती सू-सुरसुरा मौगति हथिया धड़बै। लूल हाथ लुलुआ-लुलुआ हर-हर, हारि-हारि सुनेबै। हर-हर, हारि-हारि सुनेबै। तखनि पार......। छाती चढ़ि...... छाती चढ़ि मुकिया-मुकिया कान पकड़ि पुछै छै। संठी बोझ बना-बना झील-झिलहोरि खेलै छै। मीत यौ, झील-झिलहोरि......। अपने ताले ताल पीटि घैल-छाँछ भरैत कहै छै। नीरा-पानि निरा-निरा छछिया-छाँछ धड़धड़बै छै। मीत यौ, छछिया-छाँछ......। छह-छहा छहलि-छहलि छाँछ-साँच बजैत कहै छै। छाँछी छाँछ सुरकि-सुरकि पक-पकौल माटि कहै छै। मीत यौ, पक-पकौल......। कुम्हारक किरदानी केहेन कचिया-पकिया मिला गढ़ै छै। कचिया घोड़ा रमि रेमंत आउ, टिक, आउ-टिकटिकबै छै। मीत यौ, आउ, टिक......। ससुरामे...... ससुरामे जा कऽ धीया रहिहेँ चीत-चेत कऽ। सूखि-दूखि बीच विचड़ि चलिहेँ देखि-सूनि कऽ। चलिहेँ देखि-सूनि कऽ। रहिहेँ चीत-चेत......। सून सुन्न पेब पकड़ि चिन्तन चीत चेत कऽ सुरता सुरत पेब पकड़ि मरनी-मरम जानि कऽ मरनी-मरम जानि कऽ रहिहेँ चीत-चेत......। माए-बाप सर-समाजक लत-लत्ती लतड़ि कऽ नव घर नव घरनी धड़रि मन-मन बपहर पेब कऽ मन-मन बपहर पेब कऽ रहिहेँ चीत-चेत......। जिनगीक ताक...... जिनगीक ताक ताकैमे भरि जिनगी लगा देलिऐ। तैयो सबेर पाबैमे गम-गम जान गमा देलिऐ। गम-गम जान गमा देलिऐ। रेहे-रेह राह ताकैमे राहे-राह राहजनी देलिऐ। तैयो बात-घाट घटि-घटि घटिया घाट घटैत गेलिऐ। घटिया घाट घटैत गेलिऐ। घटी-कुघटी सिर सजि-सजि नचार-विचार सुनैत गेलिऐ। समरथकेँ दुख नाइ गोसाँइ रतिया राति गबैत गेलिऐ। रतिया राति गबैत गेलिऐ। गोर मुँह..... गोर मुँह मणि मन मुसुका बूध जानि बुधजन कहैत एला बाट-बटोही बटिया पकड़ि बटगमनी स्वर भरैत एला। बटगमनी स्वर......। देखि देखि, सून-सूना खीस खीसिया खसैत एला सुखा डाहि सुखौत सुख दुख दुखिया देखबैत गेला। दुख दुखिया......। रूप पकड़ि सरूप गढ़ि-गढ़ि सरूप रूप संगैत गेला पतिया पात पतिया-पतिया गोंति-गोंति मुँह गोंतैत गेला। गोंति-गोंति......। झोंका-झोंका झुका-झुका झुकिया-झुकिया झुलैत गेला मुँह गोरि मन मणि मुसुका बूध जानि बुधजन कहैत एला। बूध जानि......। अंशी-अंश...... कतरा आम की आम नै? तँए कि ओ आम नै भेलै। रूप-रंग गुण सु-सुआद अंश आम की नै भेलै? अंश आम......। पेब गुण जेना आम गुन-गुना रसिया रस रसाइत गेलै। तहिना अंशी अंश बनि-बनि रसिक जन जगजगाइत गेलै। रसिक जन......। अंश एक कटि बिरिछ जन संग दोसर धड़ैत गेलै। अंश-अंशी संगोर छोड़ि जीव-जगत कहबैत गेलै। जीव-जगत......। अंशी अंश जग जन जगा खेल संसार रचैत गेलै। कियो खेलाड़ी खेल पकड़ि अंशी-अंश मिलैत गेलै। अंशी-अंश......। सूखल पोखरिक...... सूखल पोखरिक जाठि जेना जन-जिनगी सुखाइत गेलै। एलै-गेलै ससैर ससरि माने मन भोथाइत गेलै। माने-मन......। बरखा, रौदी बहि बाढ़ि बले-बल बलुआइत गेलै। जलधर धार धेने कहिया जान मारि मटियाइत गेलै। जान मारि......। दशानन जहिना कहियो धारे-धार धड़धड़ाइत गेलै। धारे-धार जाने जान संग मीलि जल-जलाइत गेलै। संग मीलि......। गमे-गम कमि कैम कमिया कामे कम कमियाइत गेलै। पेट-पेट पटिया-पटिया बाते-बात बलुआइत गेलै। मीत यौ, बाते-बात बलुआइत गेलै। माने मन भोथाइत गेलै। माने मन......। श्रोता कहि...... श्रोता कहि-कहि सुत-सुता सुरता सुरत रूप बनौलक। नैन नीन निनिया-निनिया वाण चालिक बैन धड़ौलक। वाण चालिक......। जेहेन बन चलियो तेहेन वाणि चालि जिनगी पकड़ौलक। पकड़ि चालि चल चलिया आंकर पाथर संग सजौलक। आंकर पाथर......। आंकर अँकुर पथ पथला भूमि निरभूमि भँजियौलक। रौदिया रौद पानि पनिया जड़िया जड़ि-जड़ि जाड़ जड़ौलक। जड़िया जड़ि......। काँच माटि कुंभ जहिना चक चकिया चाक चरहौलक। तरे-ऊपरे मूठ मुठिया पत पता पात पतियौलक। पत पता पात......। जड़ि जंजालक...... जड़ि जंजालक फेड़मे टूटि विचार बदलाइत गेल सुखा-सुखा, अलिसा-अलिसा माड़ मारि मरियाइत गेल। माड़ मारि......। मारिते माड़ी नैन-बैन सुरता सरुप झँपाइत गेल। नीक, कि नीक, अध कि अधला फेड़-कनफेड़ फेड़ाइत गेल। फेड़-कनफेड़......। फड़िते कनफेड़ मन बदलि मँुगबा मारि मड़ाइत गेल। मने-मने मनुआँ पकड़ि लेऊँच होइत लुटाइत गेल। लेऊँच होइत......। फेड़-फेड़ कनफेड़ पेब मरमराइत मन मराइत गेल। नैन विचार कन-कनक मन फीड़ा-फीड़ा फीड़ाइत गेल। फीड़ा-फीड़ा......। गजल - दीप नारायण'विद्यार्थी'
आब कथी राखल अछि पिआर मे लोक फुसिए बौआइए बोखार मे
हमरा तँ खरबो मे नहि भेटल आहाँक मुदा भेटगेल हजार मे
'फुसियांहू साय लेल निन्न कामय कतेक मुर्ख छथि लोक संसार मे
साँच कहब तँ ओल जका लागत तैं किया किछु कहब बेकार मे
एहि दुनियाँ सँ कुन आश'दीपक' चलु चलै छी माय के दरबार मे
वर्ण~~१३ बिन्देश्वर ठाकुर धनुषा/ नेपाल पुन: चमक्तै मिथिला राज [कविता]
जय मैथिल जय मिथिला बासी करु सब मिलिक जयकार बन्द हेतै कुशासन सबके पुन: चमक्तै मिथिला राज ।।
सब ढेलफोरबा नेता तेहने लैय टिकट,कुर्सी, भत्ता पार्टी अते जे नाम याद नै जन्मल जेना गोबरछता ।।
के रावण के अछि कुम्भकरण ककरा बुझी न्यायक भगवान झोरा भरब रणनीति सबके बस रामलीलामे बने राम ।।
हाथीसन दुमुहा दात छै एक देखाबे दोसरस खाए पीठ पछाडी छुरा मारत मुहपर बाजत भाए यौ भाए ।।
आइ पद छै घुमिलेब दि बढका बढका गाडीमे छिनब जखने छुछुनर बनतै छिछ्यैतै बारी-झारीमे ।।
माङ्गल भीख नै भेटतै ककरो सभ जनता ज मिलबै आब बन्द हेतै कुशासन सबके पुन: चमक्तै मिथिला राज ।।
आबु किय नै मिलि बाटिक एहि दानवसभके स्राद्ध करी हक छिनब ज पाप थिक त किय ने एक अपराध करी ।।
गरीबो दुखिया चैनस जियत हेतै गाउ समाज उद्धार बन्द हेतै कुशासन सबके पुन: चमक्तै मिथिला राज ।।
बिन्देश्वर ठाकुर धनुषा/ नेपाल हाल: गजल
अही छी हमर भवानी मैया हम अहाके मानै छी करब सबदिन पूजा पाठ मनस हम इ ठानै छी
उजडल घर बसाबु मा एना किय फटकारै छी रातिभरि निन्द नै आबे सद्खन अहा ल कानै छी
क्षमा करु या सजा दिअ हम त अहिक सन्तान छी अज्ञानी हम पुत्र अहाके बिधान नै किछु जानै छी
चिनी लैताह दूध लैताह कही न माइ गे बाबुके लड्डु आ पेडा हमहु बनेबै तै त चिकस सानै छी
अही जननी दु:ख हरणी करु हमर उद्धार हे शक्तिस्वरुपा जगदम्बे हम अहाके पहचानै छी
सरल बार्णिक बहर मात्रा = १९
बिन्देश्वर ठाकुर धनुषा नेपाल हाल : कतार अनिल मल्लिक मैथिली गजल
जिनगी भरि'क साथ बीचेमे किए छोड़ि देलियै हमर ओ सपना सतरँगी किए तोड़ि देलियै
कहियै केकरासँ सुनतै के सिकाइतो हमर दोख कहाँ कहलौं नया रस्ता किए खोजि लेलियै
रहि रहि आब भीजैत रहै छै जे आँखि हमर ई सागर छै नोरक अहिमे किए बोरि देलियै
पहिल भेंटक फूल सुखि गेल तैयो रखने छी मोनक फूलबारी कहू अहाँ किए नोंचि लेलियै
सहलो ने जाइया केहन जरै छै मोन हमर बिरहक आगि मे जे हमरा किए झोंकि देलियै….!
(आखर-१८) विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते इरा मल्लिक बाल गजल
भरि रस्ता कादो कीचड़ पसरल बाहर कोन्ना जेबै हम कन्हा चढ़ि इसकूल जायलेल बाबू के कोना मनेबै हम।
मुसलाधार बरसै छै बदरा एक्कोपल लेल थमतै नै इसकुल पहुँचै मेँ देरी हेतै निश्तुक्की छै मारि खेबै हम।
गल्ली कुच्ची अँगना डबरापोखैर भरि गेलै खेतक आरि पानिये चानी पीटल छै सबतरि नाव कोना चलेबै हम।
लकड़ी काठी जारैन चुल्हा सब तीतलै बड्ड मोशकिल छै सेहोदेखि माथठोकि कहैछै माँजी भातो कोना पकेबै हम।
सँगी साथी सबघर मेँ घुसरल कियो नहिँ बहराबै छै इन्दरराजा ढोल बजाबै ढम्म सँ के नचतै जे गेबै हम। वर्ण- 22 बाल गजल
अछि बड्ड जिद्दी बरसात कहल नै मानै एको बात। कहल-----
घटाटोप बादल आवारा ठुमकि के नाचै चारु कात। कहल-----
कखनोटिप-टिप कखनोझम-झम भिजलै धरती गाछे पात। कहल -----
भैया के भिजलै कापी बस्ता जे नै कराबै मेघ बसात। कहल-----
सब मौसम छै आनी जानी बरसातक फरके बात। कहल------
सँग कजरी झूला साजल इन्द्रधनुष के रँगे सात। कहल------
वर्ण-10 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 42 158 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ‘विदेह'१३५ म अंक ०१ अगस्त २०१३ (वर्ष ६ मास ६८ अंक १३५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA