ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह' १३७ म अंक ०१ सितम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ६९ अंक १३७) ऐ अंकमे अछि:- सखारी-पेटारी-(लघु कथा संग्रह)- नन्द विलास राय भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली] विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। सखारी-पेटारी (लघु कथा संग्रह) नन्द विलास राय एकसत्तरि- असल बेटा जजाति पोलिथिन निवास प्रमाणपत्र निपुतराहा महाजन गोबरबीछनी पोषाहारक गहुम सभसँ पैघ पूजा भोँट सोइरी छछारब ननदि-भौजाइ बाबाधाम चौड़चनक दही जाति-पाति विवेकक विवेक वाड़ीक पटुआ डाक्टर बेटा प्रोफेसर बेटा सोच ऐना असल बेटा िनर्मली स्टेशनसँ पच्छिम एकटा गाम छै छजना। छजना मधुबनी जिलाक लौकही थानामे पड़ै छै। बेस झमटगर गाम। पढ़ल-लिखल लोकक गाम। इंजीनियर-डाक्टर आ आनो केतेक सरकारी नौकरी करैत गामक लोक। मास्टरक कमी नै। िनर्मली बाजार लग रहबाक कारण, किछु लोक बिजनैस-बेपार करैत। जेकरा कोनो नौकरी नै, ओ िनर्मली बजारक सेठ-साहुकार ओइठाम नोकरी कऽ अपन गुजर-बसर करैत। किछु लोक िनर्मली बजारमे निजि स्कूल खोलि अपन धंधा करैत। किछु लोक बजारेमे चटिया सभकेँ ट्यूशन पढ़बैत आ ओइसँ जे आमद होइत तइसँ बेगरता शांन्त करैत। छजना गाममे एकगोटे छल जीतन मुखिया। जातिक मलाह, मुदा माछ मारैक कोनो लूड़ि नै। अपन जातिक पेशा छोड़ि िनर्मली टिशनक बगलमे एकटा चाह दोकान चला अपन परिवारक गुजर-बसर करैत। चाह पीबैले रेलबेक कर्मचारी सभ अबैत, चाहो पीबैत आ रंग-बिरंगक गपो करैत। टिशनक बगलमे चाहक दोकान हेबाक कारणे ट्रेन पकड़ैबला मोसाफिर सभ सेहो चाह पीबैत। जीतन नीक चाह बेचैए तँए आनो गहिंकी सभ दोकानपर आबि-आबि चाह पीबैत। जीतनकेँ धीरे-धीरे नीक आमदनी हुअए लागल। बजारमे रहैक कारण आ नीक-नीक लोकक गप सुनि जीतनो बुधियार भऽ गेल। चाहक संग िबस्कुटो राखए लगल। जइसँ आमदनी आरो बढ़ि गेल। जीतन सेन्ट्रल बैंक िनर्मलीमे खाता खोला किछु रूपैआ खातामे जमा करए लगल। िनर्मली टिशनसँ दच्छिन िनर्मली हाइ स्कूल। स्कूलक सटले चाउरक मिलक रमना। बिस-पच्चीस बरख पहिने ओइ रमनापर धान सुखाएल जाइत छल। मुदा एम्हर आबि कऽ मिल बन्न भऽ गेल अछि। तँए आब रमनापर घास-पात जनमि गेल अछि। जीतनकेँ मालूम भेल जे मिलक रमनाबला जमीन बीकि रहल अछि ई गप सुनि जीतन मिलक मनेजर मिश्राजी लग गेल। मिश्राजी कखनो-कखनो जीतन दोकानपर चाह पीबै छल। जीतनकेँ देखैत बाजल- “आबह-आबह जीतन बैसह।” जीतन हाथ जोड़ि मिश्रा जीकेँ प्रणाम करैत एक बगल ठाढ़ भऽ गेल, बैसल नै। मिश्राजी केतबो बैसैले जीतनकेँ कहलखिन मुदा जीतन नै बैस बाजल- “मािलक ठीके छै, हम तुरत्ते चलि जाएब। किछु गप करबाक अछि तँए एलौं।” मिश्राजी लग तीन-चारि गोटे पहिनेसँ बैसल छल। मिश्राजी पुछलखिन- “कोनो खास बात छह की?” जीतन बाजल- “हँ, मािलक। मुदा अखनि अपने लग आरो लोक सभ छथिन तँए हम दोसर घड़ी आएब।” मिश्राजी कहलखिन- “ठीक छै। ठीक छै। तोरा बेसी नै रोकबह, तोहर चाहक दोकान बरदेतह। हम साँझमे बजार जाएब तँ तोरे दोकानपर चाहो पीअब आ गपो बूझि लेब। जा।” जीतन बाजल- “बेस मालिक।” जीतन अपना दोकानपर आबि गेल। साँझखिन मिश्राजी दोकानपर एला। जीतन एकटा स्पेशल चाह बना मिश्राजीक हाथमे देलक। मिश्राजी चाहक चुस्की लैत पुछलखिन- “कहए जीतन, कोन गपे हमरा डेरापर गेल छेलह?” जीतन बाजल- “मािलक, सुनलिऐ हेन जे रमनाबला जमीन बिकरू छै। सएह बुझैले गेल रही।” मिश्राजी कहलखिन- “हँ, जमीन तँ बीकि रहल अछि। अदहासँ बेसी जमीन बिकिओ गेल। केकरा लेल तँू गप करै छह।” जीतन बाजल- “मािलक, एक कट्ठा जमीनक केते रूपैआ देबए पड़त।” मिश्राजी कहलखिन- “तूँ लेबह तँ तोरा एक्के लाखमे दिया देबह। दोसर लेल सबा लाख।” जीतन हाथ जोड़ैत बाजल- “हमहीं लेब मालिक। छजनासँ आबि कऽ दोकान खोलैमे अबेर भऽ जाइए। लगमे रहब तँ सबेरे दोकान खोलब आ देरीसँ बन्न करब तँ आमदनीओ दोबर भऽ जाएत। जँ जमीन भऽ जाएत तँ एकटा खोपड़ी लटका देबै।” मिश्राजी कहलखिन- “ठीक छै। ठीक छै। काल्हि भोरे आठ बजे आबह। जमीनो देखा देबह आ तोरा नामे बुको कऽ देबह। जेतेक रूपैआ हेतह से ताबए जमो कऽ दिअह। बाँकी मास भरिमे पूरा कऽ दिहक। महिना दिन पछाति सेठजी दिल्लीसँ एता। सबहक रजिस्ट्री हेतै तहीमे तोरो हेतह।” जीतन हाथ जोड़ैत बाजल- “ठीक छै मािलक। हम आठ बजे आबि जाएब।” मिश्राजी जखनि चाहक दाम देबए लगला तँ जीतन कहलखिन- “नै मालिक, पाइ राखू।” मिश्राजी कहलखिन- “नै जीतन, अखनि नै। जखनि तोरा जमीन भऽ जेतह तखनि चाहो पीअब आ बिस्कुटो खाएब। अखनि पाइ रखि लैह।” ई कहि मिश्राजी जीतनक गल्लापर एकटा सिक्का रखि बजार दिस बिदा भऽ गेला। अगिला दिन भोरे जीतन मिश्राजीक डेरापर पहुँचल। मिश्राजी रमनेक बगलमे अपन घर बनेने छथि। जीतनकेँ देखते मिश्राजी पहिने जमीन देखौलखिन। जीतनकेँ जमीन पसिन भऽ गेलै। गद्दीपर आबि अपना नामे बुक करा लेलक। बैंकसँ रूपैआ निकालि मिश्राजी लग जमा कऽ आएल। पचासी हजार टाका खातामे छेलै। अस्सी हजार निकालि मिश्राजी लग जमा कऽ आएल। अगिला महिनामे सेठजी दिल्लीसँ आबि सभकेँ जमीन लिखि देलखिन। जीतन अपना जमीनमे माटि भरा एकटा खोपड़ी बना ओइमे रहल लागल। आब ओ सबेरे चारिए बजे दोकान खोलए आ राितक दस बजे बन्न करए। जीतन जे चारि बजे भाेरे दोकान खोलि चाह बनाबए तँ सभसँ पहिने एक कप चाह स्टेशन मास्टर अनील चटर्जीकेँ दऽ अबनि। तेकर पछाति ओ अपनो चाह पीबए आ बेचबो करए। िनर्मली स्टेशनक स्टेशन मास्टर अनील चटर्जी लगधग पचपन-छप्पन बर्खक बेकती। पत्नी शांतिनिकेतनमे प्रोफेसर। एकटा बेटा आसनसोलमे इंजीनियर दोसर बेटा अमेरिकामे इंजीनियर। बेटी कलकत्तामे बैंक मनेजर। तँए अनील चटर्जी असगरे िनर्मलीमे रहि नोकरी करै छथि। चटर्जीक विचार रहनि जे पत्नी नोकरी छोड़ि हमरा संग रहथि। मुदा पत्नीक विचार ओइसँ भिन्न रहनि। हुनकर विचार रहनि जे एम.ए.-पी.एच.डी. केलौं तँ ओकरा बेकार किअए जाए देब। पचास हजार टाका महिना दरमाहा भेटैए। जखनि कि चटर्जी साहैबकेँ पचीसे हजार भेटै छन्हि। तँए चटर्जी साहैब असगरे रहै छथि। एकटा होटलबला दिनक खेनाइ डेरापर पहुँचा दइ छन्हि। रतुका खेनाइ होटलेमे जा कऽ खाए पड़ै छन्हि। जीतन िदनमे चारि बेर हुनका टेबूलपर चाह पहुँचा अबै छन्हि। रवि दिन दस बजे दिनमे जखनि जीतन चाह लऽ कऽ चटर्जी साहैब लग गेल तँ चटर्जी साहैब जीतनकेँ पुछलखिन- “कहअ जीतन की हाल-चाल छै।” जीतन जवाब देलकनि- “सर, सभ ठीक छै।” “आछा जीतन, ई बताबह तोरा केते बाल-बच्चा छह।” “सर, हमरा दूटा बेटा आ एकटा बेटी अछि। जेठकाक नाओं सुकल आ छोटकाक बिकल। सभसँ छोट बेटी अछि जेकर नाओं सुकनी रखने छी। किएक तँ ओ शुक्कर दिन जनमल छेलए।” चटर्जी साहैब तीन बर्खसँ िनर्मलीमे स्टेशन मास्टर छथि। तँए थोड़-बहुत मैथिली बजै छला। चटर्जी साहैब जीतनकेँ फेर पुछलखिन- “आछा, ई बताबह। बाल-बच्चा सभकेँ पढ़बै छहक की नै।” जीतन बाजल- “कहाँ पढ़ाबै छिऐ सर। दुनू बेटा दोकानेपर रहैए। बेटी गाममे रहैए। एकटा बकरी रखने अछि।” चटर्जी साहैब कहलखिन- “नै जीतन, ई नीक बात नै छी। तँू अपना बच्चाकेँ स्कूल नै भेजै छह। पढ़बै-लिखबै नै छहक। ऐसँ हमरा तोरा प्रति बड़ दुख छह। देखह हमर एकटा बेटा अमेरिकामे इंजीनियर अछि। दोसर आसनसोलमे इंजीनियर अछि आ वाइफ शांति निकेतनमे प्रोफेसर आ बेटी बैंक मनेजर अछि। हम असगरे एतए रहै छी। दुख सहै छी। सभ अपन-अपन रूपैआ कमाइए। देखह जीतन, काल्हिसँ तोहूँ अपन बेटी-बेटीकेँ पढ़ेनाइ शुरू करह। नीकसँ पढ़ाबह। इंजीनियर-डाक्टर बनाबह। हमर फादर कलकत्तामे मोटियाक काज करैत रहथि। बुझहकल जीतन? हमरा बातपर धियान दहक। काल्हि एगारह बजे हम तोरा दोकानपर आएब। जँ तोरा दुनू बेटाकेँ चाहक दोकानपर देखबह तँ तोरा हाथक चाह पीअब छोड़ि देब।” जीतन हाथ जोड़ैत बाजल- “सर, काल्हिसँ बच्चा सभकेँ इसकुल पठेबै।” चटर्जी साहैब बजला- “सुनह जीतन, सरकारी स्कूलमे पढ़ाइ नै होइ छै। तूँ अपना बेटा-बेटीकेँ कन्भेन्टमे पढ़ाबह। आ डेरापर ट्यूशन सेहो पढ़ाबह।” जीतन हाथ जोड़ैत बाजल- “ठीक छै सर। ज्ञान भारती इस्कूलमे नाओं लिखा देबै। ओइ इसकुलक हेड मास्टर हमरे गामक गोपाल साहु छी। हमरा दोकानपर सभ दिन साँझमे चाह पीबैले अबै छथिन। आइ साँझमे हुनकासँ गप करब।” चटर्जी साहैब बजला- “आछा जीतन, आब जाह। हमरा गपक खियाल रखिअ।” “जी सर, एकदम खियाल रखब।” कहि जीतन अपना दोकानपर आबि गेल। साँझमे जखनि गोपाल साहु चाह पीबैले दोकानपर एला तँ जीतन हुनकासँ दुनू बेटा आ बेटीक पढ़ाइ लेल गप केलक। “पचास टाका महिनामे तीनू बच्चाकेँ पढ़ा देब।” ई बात गोपाल साहु कहलखिन। जीतन गोपालजीसँ एकटा ट्यूशनियाँ मास्टरक सेहो बेवस्था करए कहलकनि। गोपालजी कहलखिन- “हमहीं पढ़ा देब अहाँ चिन्ता नै करू। महिनामे सए टाका देबए पड़त। पहिने काल्हि दस बजे कन्भेन्टपर आबि तीनूक नाम लिखाउ।” जीतन हाथ जोड़ैत गोपालजीकेँ कलकनि- “बहुत-बहुत धैनवाद।” गोपाल साहु चाह पीब चलि गेला। दोसर दिन जीतन दुनू बेटा आ बेटीकेँ लऽ स्कूलपर पहुँच नाओं लिखा देलक। साँझमे गाम जा पत्नीओकेँ िनर्मलीए आनि लेलक। पूरा परिवारक संग जीतन आब िनर्मलीएमे रहए लगल। एकटा घर रहबै करै एकटा ओरो एकचारी टांगि लेलक। तीनू धिया-पुता सभ दिन स्कूल जाए-अबए लगलै। साँझे-साँझ गोपालजी ट्यूशन पढ़बए जीतनक डेरापर आबए लगलखिन। समए बितैत देरी नै होइ छै। आइ जीतन िनर्मली हाइ स्कूलक बगलमे रमनाबला जमीनपर तीन मंजिला मकान बना लेलक। आब जीतन चाहक दोकान छोड़ि देलक। किएक ने छोड़त दुनू सुकल आ बिकल इंजीनियर भऽ गेल। बेटी-सुकनी िनर्मली कन्याँ उच्च विद्यालयमे शिक्षिका पदपर कार्यरत भेली। जखैनकि जेठका बेटा-सुकल मुम्बइमे इंजीनियर आ छोटका बेटा-बिकल दिल्लीमे इंजीनियर। जीतनक इच्छा नै रहए जे चाहक दोकान छोड़ी मुदा बेटा-बेटीक जिद्दक कारण दोकान छोड़ए पड़लै। बेटीक जिद्द बेसी रहनि किएक तँ िनर्मलीएमे नौकरी करै छथिन। मुदा जीतनक इच्छा रहै जे एही चाहक दोकानसँ हम एते केलौं तँए एकरा बन्न केनाइ ठीक नै हएत। तीनू सन्तानक बिआह-दुरागमन भऽ गेलै। जेठका बेटा सुक्कल मुम्बइमे मकान खरीद ओतइ बसि गेल। छोटका बेटा दिल्लीमे जमीन कीनि आलीसान मकान बनेलक। मुदा जीतनक ऊपर दुखक पहाड़ टूटि पड़ल। पत्नी-जीतनी जीतनकेँ छोड़ि दुनियाँसँ चलि गेली। माएक किरियाक्रममे दुनू भाँइ गाम आएल छल। माएक मरला पछाति सुकनी बापे संग रहल लगली। सुकनीक दुलहा शंकरजी इलाहाबाद बैंक दरभंगामे नोकरी करै छथि। शनिए-शनि रातिमे िनर्मली अबै छथि आ सोमे-सोम भोरे दरभंगा चलि जाइ छथि। सुकनी अपना पिता लग रहि हुनक सेवा-टहल करैत नोकरी करैए। पत्नीक मुइला तीिनए मास पछाति जीतनकेँ लकबा लपकि लेलक। सुकनी पिताकेँ लेने आर.बी.मेमोरियल निजि अस्पतालमे भर्ती करौलक किएक तँ सरकारीमे इलाज बढ़िया जकाँ सभकेँ नै होइ छै। पिताक बिमारीक खबरि दुनू भैयाकेँ सुकनी मोबाइलपर देलक। दुनू भाँइक बेस्तता तंगी आबए तँ नै देलकै मुदा रूपैआ पठा देलकै आ कहलकै जे बढ़ियाँ जकाँ इलाज कराही। सुकनी आ हुनकर दुल्हा शंकरजी छुट्टी लऽ जीतनक देख-रेख करए लगलखिन। एक हप्ता बाद आरबी मेमोरियलक डाक्टर सुकनी आ शंकरजीकेँ कहलखिन- “रोगीकेँ आब घरे लऽ जाउ। ई आब किछुए दिनक मेहमान छथि। घरेपर जेतेक सेवा-टहल हएत करै जेबनि।” डाक्टर साहैबक बात सुनि सुकनी कानए लगल। शंकरजी अस्पतालक बकाया चुक्ता कऽ एकटा गाड़ी आनलनि। ओइ गाड़ीसँ सभ कियो िनर्मली एला। िनर्मली आबि सुकनी भैया सभकेँ सभ समाचार बता देलक। दरभंगासँ एलाक तेसरे दिन भने जीतन दम तोड़ि देलक। सुकनीक कनैत-कनैत आँखि लाल भऽ गेलै। गोपालजी मास्टर साहैबकेँ पता लगलनि तँ जिगेसामे एलखिन। सुकनीकेँ असगरे देखि गोपालजी फोनपर दुनू भाँइकेँ जनतब देलखिन। गोपालजी सुक्कलकेँ मोबाइलपर पुछलखिन- “लहाशकेँ दाहसंस्कार कएल जाए आकि अहाँक एला पछाति कएल जेतै?” सुकल आ बिकल दुनू भाँइ कहलखिन- “नै गुरुदेव, जाबे धरि हम दुनू भाँइ नै आबि ताबे धरि हमरा बाबूजीकेँ बरफमे राखल जाए। हम सभ बाबू जीक दर्शन करब तेकर बाद दाह-संस्कार करब। हम सभ प्लेनसँ पटना आएब आ पटनासँ निजि गाड़ी भाड़ा कऽ िनर्मली आएब।” जीतनक मरलाक तेसर दिन दुनू भाँइ अपन-अपन परिवारक संग बेलेरो गाड़ीसँ िनर्मली पहुँचल। भैया सभकेँ देखि सुकनी कनैत दुनूक पएरपर गिर पड़ल। सुकल-बिकल अपना बापक पएरपर माथ रगड़ैत-रगड़ैत कानि कऽ आँखि लाल कऽ लेलक। गोपाल बाबूकेँ खबरि भेल तँ ओहो एला। गोपाल बाबूकेँ देखिते दुनू भाँइ हुनका पएरपर गिर आरो जोर-जोरसँ कानए लगल। गोपाल बाबू दुनू भाँइकेँ चुप हुअए कहलखिन- “दाह-संस्कारक तैयारी करै जाह।” तुरत्ते लकड़ी-सरर-घी-कपड़ा इत्यादि इंजाम भेल। तीलजुगा नदीक कछेरमे जीतनक दाह-संस्कार कएल गेल। जेठका बेटा सुकल पिताक मुँहमे आगि देलकनि। छोट भाए बिकल भोज-भातक इंजाममे लगि गेल। सुकनी अपन स्कूलसँ छुट्टी लऽ किरियाक्रमक सामग्रीक ओरियान करए लगली। नह-केस दिन कठियारीबला सबहक लेल सुकनी खीरक भोज केलक। श्राद्ध दिन पूरा छजना गामक लोक सभकेँ रसगुल्ला-लालमोहनक भोज िखयाएल गेल। आइ संपीण्डन अछि। प्रात: आठ बजेसँ बारह बजे धरि करम भेल। तेकर बाद पाँचटा ब्राह्मणक भोजन सेहो भेल। आइ िनर्मलीक सेठ-साहुकार आ शिक्षक, नेता आ आनो-आन प्रतिष्ठित बेकती सभ आमंत्रित छथि। बढ़िया जकाँ सभ भोजन केलनि आ दुनू भाँइकेँ जश दइ गेलखिन। जखनि गोपालजी अपना सहयोगीक संग भोजन कऽ कुरसीपर बैसला तखनि दुनू भाँइ सुकल-बिकल गोपालजीक पएर छूबि प्रणाम केलकनि। गोपालजी असीरवाद दैत कहलखिन- “भगवान अहाँ दुनू गोटे जकाँ बेटा सभकेँ देथुन। जे माए-बापक किरिया-करम, भोज-भात, सेवा-टहल अहिना करतनि। अहाँ दुनू भाँइ जीतन जीक असल बेटा सावित भेलौं।” गोपाल मास्टर साहैबक ई गप सुनि सुकल बाजल- “नै गुरुदेव, हम दुनू भाँइ बाबूजीक असल बेटा नै छी। हम सभ बाबूजीक सेवा-टहल कहाँ केलियनि। हमरा सबहक हाथक एक गिलास पानियोँ कहाँ भेटलनि बाबूजीकेँ। असल बेटा तँ हमर बहिन सुकनी आ बहनोइ शंकरजी छथिन। जे बाबूजीकेँ सेवा-सुश्रुसा केलखिन।” बिच्चेमे बिकल बाजल- “हँ सर, भैया ठीके कहै छथिन...।” दुनू भाँइक आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल। जजाति “हे भगवान जे हमर खेसारी चरेलक तेकर पूतक मौगति देखबिहऽ।” ई कहि मैलामवाली बोम फाड़ि कानए लगली। भोरे-भोर ओ कनबो करथि आ गरियेबो करथि। भोरे जखनि मैलामवाली छौर लऽ कऽ खेसारीमे छीटैले खेत गेली तँ समुच्चा खेतक खेसारी चरल देखली। देखिते झमा गेली। खेतेसँ कनैत आ गरियबैत गामपर एली। गामोपर अनधुन खाली बेटे लगा-लगा गरियाबए लगली। मैलामवालीकेँ कनैत आ गरियबैत देखि सौंसे खतबेटोलीक जनिजाति सभ जमा भऽ गेल। ओइमे सँ गामवाली पुछलकनि- “ऐ दाइ, की भेलनि जे एना बताह भेल छथि?” मैलामवाली कनैत बजली- “की कहबह कनियाँ, पाँच कट्ठामे खेसारी छेलए, फूल-बतियासँ लदल रहए, भिनसरबामे नै जानि केकर पूत मरल जे महिंससँ समुच्चा खेतक खेसारी चरा लेलक। जखनि भोरमे छौर छीटैले गेलौं तँ देखलौं।” गामवाली बाजलि- “जूनि कानथु। भगवान ओही चरलाहा खेतमे पुरा कऽ देतनि।” मैलामवाली बाजली- “है कनियाँ, देखबहक ने तँ धैरजता नै रहतह। कुट्टी-कुट्टी कऽ समुच्चा खेतक खेसारी चरा लेलक।” ई कहि मैलामवाली छाती पीटैत फेर गरियाबए लगली। “हे बरहमबाबा, जौं खेसारी चरौनिहारक पूत मरत तँ हम तोरा जोड़ा छागर ढोल बजा कऽ चढ़ेबह।” फूलचन राउतक पत्नी तिलाठवालीकेँ गोबर पाथेले कहए आएल छेली। ओहो मैलामवालीकेँ ढेरियापर जनिजाति सबहक भीड़ देखि ससरि कऽ लग जा सभ गप बुझलनि। ओहो मैलामवालीकेँ ढाढ़स बन्हैत कहलकनि- “आब गरिएला आ कनलासँ कोन लाभ हेतनि। दिनकरबाबापर आशा करथु। वएह सभटा पूर करथिन।” फूलचन राउतकेँ गामक सभ गोटे खलीफा कहै छन्हि। हुनकर देहो खलीफे जकाँ लगै छन्हि। पहलमानीओ करै छथि। गामक अखराहापर नवतुरिया सभकेँ कुश्तीओ सिखबै छथिन। मुदा छथि बड़ मोचण्ड। हुनकर उमेर लगधग तीस बरख हएत। पाँच बीघा खेत छन्हि। जोड़ा बरद आ दूटा महिंस पोसने छथि। महिंस अपनेसँ चरबै छथि। दुहबो-गारबो अपने करै छथि। भोरमे महिंस दूहि एक लोटा काँचे दूध नीत पीबै छथि। भिनसरबामे दुनू महिंस खोलि पोसर चरबै छथि। केकरो मसुरी, केकरो खेसारी तँ केकरो गहुम भिनसरबेमे चरा अबै छथि। जौं कियो देखबो करै छन्हि तँ की मजाल जे हुनका उपराग देथिन। गामक लोक प्राय: हुनकासँ डरैत रहैए। मुदा हुनकर पिताजी बनबारी मड़र बड़ नीक लोक। गामक लोक हुनका मड़र कहि आदर करै छन्हि। बनबारी मड़र अपन बेटाक करतूतसँ बड़ दुखी रहै छथि। हरिदम फूलचनकेँ समझबैत रहै छथिन- “बौआ, बड़ मेहनतिसँ लोक खेती करैए। केकरो जजाति चरेबहक तँ ओ जे कलपत तँ पड़तह। तँए केकरो जजाति नै चराबी। आ ने केकरो कोनो अपराध करहक। गहुमक भुसी आ बाँसक पत्ताक कुट्टी, बरदकेँ खुआबह। महिंसकेँ भुसी आ खेसारीक चुन्नी दहक। अहीमे बर्रकत्ति हेतह।” मुदा फूलचन खलीफाकेँ पिताक बातक कोनो असरि नै। आइओ भिनसरबामे मैलामवालीक खेसारी चरा अनलक। मैलामवालीक घरबला पंचू दिल्लीमे नोकरी करैत। अगहन आ अखार मासमे गाममे रहि खेती-वाड़ी करैए आ आन मासमे दिल्लीएमे काज करैए। किएक तँ पंचूकेँ मात्र एक्के बीघा खेत आ पाँच गोरेक आश्रम। एक बीघा खेतसँ परिवार चलब मोसकिल तँए दिल्लीमे नोकरी सेहो करैत। फूलचन खलीफा जखनि जलखै करैले अँगना एला तँ पत्नी-तिलाठवाली कहलकनि- “हे सुनै छै?” फूलचन बजला- “की कहै छै?” “मैलामवाली बड़ गरियबै छलि। कहै छेलै सभटा खेसारी चरा लेलक गऽ। खाली बेटे लगा-लगा गरियबै छलि। ई ने तँ ओकर खेसारी भिनसरबामे चरा अनलक गऽ?” “बेटा लगा-लगा गरियाबैत छेलै? ठीक छै। गारिसँ हमरा बेटाकेँ किछु ने हएत। गारि देने किछु ने होइ छै। लोक अपना मनकेँ बुझबैए।” “हे, हमरा गाइरिक बड़ डर होइए। हम देखलिऐ मैलामवालीकेँ छाती पीटैत आ कानि-कानि खूम गरियबैत। से हमरा नै नीक लगल। भगवान गौनाक दस बरख पछाति एगो बेटा देलनि। जौं ओकरा किछु भऽ जाएत तँ एतेक धन कि हएत। एकरा बेर-बेर कहै छिऐ जे केकरो जजाति नै चराबौ।” ई गप होइते छल ताबेतमे फूलचन खलीफाक पिता-बनबारी मड़र जलखै करैले आँगना एला। सभ बात बूझि बजला- “बौआ, बहुरिया निके ने कहै छह। हम तोरा बेर-बेर बुझबै छिअह। मुदा तूँ हमर गपक कोनो मानिए ने दइ छहक।” फूलचन बजला- “मैलामवाली बड़ गरियबै छेलै तँ ओकर फल ओ अपने भोगि लेत। ओकरा हम हक्कनी नोर नै कनाए देलिऐ तँ हमर नाम फूलचन नै काँटचन। अहाँ सभ जूनि चिन्ता करू। हमरा बेटाकेँ कुशप कलेप नै लगतै।” फूलचन खलीफा आ तिलाठवालीक दुरागमनक दस बर्खक पछाति एकटा बेटा भेल। जेकर उमेर छह मास अछि। ऐ दस बर्खक बीच दुनू परानी कोन-कोन गहबर आ कोन-कोन डाक्टर लग ने गेल। रातिमे फूलचन मैलामवालीक खेतसँ दू कट्ठाक मसुरी उखाड़ि अनलक आ रातिएमे बरद आ महिंसकेँ खुआ लेलक। जखनि रातिमे मसुरी बाेझ लऽ कऽ आएल तँ हुनकर बाबूजी जगले रहथिन। कहलखिन- “बौआ, एहेन काज किअए करै छह। ई नीक गप नै।” फूलचन बापकेँ डँटैत बजला- “तों चूप रहऽ। मैलामवालीक खेतमे कोनो जजाति नै रहए देबै। नै देखलक जे भोरे-भोरे बेटा लगा-लगा गरियौने रहए।” भोरमे मैलामवाली जखनि दुनू कट्ठाक मसुरी उखारड़ल देखलक तँ ओ फेर गरियौनाइ शुरू केलक। मसुरी उखरनिहारक बेटाकेँ सरापए लगल। बनबारी मड़र सोचलक जे आब कोनो उपए करक चाही। नै तँ फूलचनमाक आदतिमे सुधार नै हएत। फूलचन खलीफा बेरू पहर ताड़ी पीबैले नरहिया गेला तही बीच मड़र तिलाठवालीसँ विचार केलक। बनबारी मड़र तिलाठवालीकेँ कहलक- “रातिमे, अपन कनचनमाबला खेतसँ एक बोझ बदाम उखाड़ि आनब आ बरद-महिंसकेँ खुआ देब। जखनि फूलचनमा भोरमे खेत देखत तखनि ओकरा जजातिक नोकसानक मरम बुझेतै। कहबै नै से धियान रखब।” तिलाठवाली कहलक- “हमहूँ साँझखिन ओछाइन पकड़ि लेब। जखनि खलीफा ताड़ी पीब कऽ नरहियासँ औत तखनि बौआक बेरामक बहन्ना करब। कहबै जे बौआ दुखित भऽ गेल अछि। अही बहन्नासँ खलीफाकेँ बुझाएब।” मड़र बजला- “ठीक विचार केलह हेन।” रातिमे जखनि फूलचन ताड़ी पीब निसाँमे बुत्त भऽ माँछ नेने अँगना आएल तँ तिलाठवालीकेँ हाक देलक। मुदा तिलाठवाली घरसँ नै निकलल आ ने किछु बजबै कएल। तीन-चारि हाक सुनला पछाति तिलाठवाली घरेसँ बाजलि- “की कहै छै। बौआक बड़ मन खराप छै। माइर चिचिआइ छेलै। कखनो मुँह सापुटे ने लइ छै। चारि बेर उन्टीओ भेलै गऽ। दूधो ने धड़ै छेलै। केतेक गोसाँइ-पीतरकेँ कबुला केलिऐ गऽ तखनि जा कऽ अखनि सूलत गऽ। लोकक हहंकाल पड़ि रहल गऽ। एकरा बेर-बेर कहै छिऐ जे केकरो जजाति नै विद्दत करौ, केकरो कोनो अपराध नै करौ मुदा हमर के सुनै छै।” पत्नीक बात सुनि फूलचनक निसाँ फाटि गेल। माँछक झोरा टाटमे टांगि घर गेल आ बेटाकेँ देखलक। तिलाठवाली फेर बाजलि- “बड़ी काल तक कनै छलए। अखने सूतल गऽ ई बाहर जाउ। बिनु हाथ-पएर धोने बच्चा लग आबि गेलै।” फूलचन बजला- “एक किलो भाकूर माँछ अनने छी। माँछकेँ की करब। जौं रातिमे नै तरब तँ मोहकि जाएत।” तिलाठवाली बाजलि- “ताबे ई फाँसूल लऽ कऽ माँछ बनौत। बौआ जखनि नीक जकाँति सूति रहत तखनि हम आबि कऽ भानस करब।” फूलचन अपनेसँ माँछ बनबए लगल। रातिमे खेनाइ अबेरसँ बनल। खाति-पीबैत अधरतिया भऽ गेल। आइ फूलचन भिनसरबामे महिंस पोसर चरबैले नै गेल। किएक तँ अबेर सुतने नीने ने टुटलनि। भोरमे जखनि ओ पोखरि दिस जाइत रहथि तँ अपना खेतमे लगधग दस धूर बदाम उखाड़ल देखलनि। देखिते सौंसे देहमे जेना आगि नेस देलकनि। बताह भेल गामपर आबि अन्ट-सन्ट बजए लगला- “केकरा होसपीटल जाइक मन भेलैए जे हमर बदाम उखाड़ि अनलक। जौं कनिको पता चलि जाएत तँ ओकरा अधमौगति कऽ होसपीटल पठा देब। गाममे आब केकरो बदाम नै रहब देब। सबहक बदाम उखाड़ि-उखाड़ि बरद-महिंसकेँ खुआ देब।” दलानपर घरबलाकेँ बताह भेल देखि तिलाठवाली अँगनासँ डेढ़ियापर आबि घरबलासँ पुछलक- “मर, की भेलै गऽ जे एना बताह भेल छै?” फूलचन बजला- “अपना खेतसँ दू कट्ठा बदाम उखाड़ि कियो लऽ अनलक। हम आब केकरो रवि-राइ नै रहए देब। सभटा उखाड़ि आनि माल-जालकेँ खुआ देब।” तिलाठवाली बाजलि- “एहेन काज फेर जूनि करह। रातिमे केतेक देवता-पितरकेँ कबुला केलौं तब जा कऽ बौआ नीक भेल। हम धरमराज बाबाकेँ कहलिऐ- जौं हमरा बौआक मन नीक भऽ जाएत तँ फेर खलीफा केकरो कोनो अपराध नै करत।” बेटा नामपर फूलचन किछु शान्त भेल। शान्त भेल देखि तिलाठवाली बाजलि- “बदाम उखाड़ि लेलकै तँ की हेतै। भगवान हमरा ओहीमे पूरा कऽ देथिन। अहाँ महिंस दूहू चाह बना दइ छी।” ताबेतमे बुरहा बनबारी मड़र पहुँच पुछलखिन- “बौआ, किअए हल्ला करै छेलहक? हम तोहर हल्ला सुनि िबनु कुर्रा केने पोखरिक घाटपर सँ दौगल एलौं हेन।” फूलचन बजला- “बाउ हौ, रातिमे कियो अपना कंचनमाबला खेतसँ दू कट्ठा बदाम उखाड़ि लेलक। तँए जोर-जोरसँ हल्ला करै छेलिऐ।” “अच्छा, पहिने महिंस दूहऽ अबेर भऽ गेल। चाहो पीअब।” ससुरक गप सुनि तिलाठवाली बिच्चेमे बाजलि- “बाबू, यएह एकरा समझाबथुन। लोकक हहंकाल पड़ै छै। रातिमे बौआक मन खराप भऽ गेल छेलै। केतेक काल देव-धरमकेँ सुमरलौं तब बौआ नीक भेल। गौनाक दस बर्खक पछाति धरमराजबाबा एकटा बेटा देलथि। गामक लोक बझिबा-बझिनियाँ कहै छेलए। आब जे केकरो ई केकरो कोनो अपराध करत तँ हम बौआ लऽ नैहरा चलि जाएब। अपन बरद आ महिंसकेँ आनक जजाति उखाड़ि-उखाड़ि खुआबैत रहत।” बनबारी मड़र फूलचनकेँ कहलखिन- “बौआ, बहुरिया नीके कहै छह। केकरो जजाति नै विद्दत करहक। जजाति लगबैमे बड़ मेहनति लगै छै। देखहक तँ तोहर बदाम उखाड़ि लेने तोरा केहेन समुच्चा देहमे आगि नेसने छह। तहिना तँ आनो गोटेकेँ होइत हएत ने। तोँ केतेक गोटेकेँ खेसारी पोसर खोलि चरबै छह। केतेक गोटेकेँ मसुरी आ बदाम उखाड़ि बरद-महिंसकेँ खुआ दइ छहक। जेहने अपन जजाति तेहने ने अनको। जहिना तोरा आइ कठ होइ छह तहिना ने आनोकेँ होइत हएत।” फूलचनक भक्क खूजि गेल। पिताक पएर छूबि सप्पत खेलक। जे आइ दिनसँ हम ने केकरो जजाति विद्दत करब आ ने कोनो अपराध। पोलिथिन कमलक बेटीक बिआह छल। लड़काबलाक कहब छेलै जे खेनाइमे माँछ-भात हेबाक चाही। हम सभ डलडाबला पुरी आ सागरक दूधक बनल मिठाइ नै खाएब। हमरो कमल बिआहक काड देने छल तँए हमहूँ बरियातीक स्वागत लेल पहुँचल छेलौं। बारह बजे राति बरियाती आएल। बारहअना बरियाती निसाँमे बुत्त रहए। जवान सबहक गप कि कही जे बुढ़बो सभ डीजेक धूनपर नचैत रहथि। हम कमलकेँ कहलिऐ- “हौ कमल, बारहअना बरियाती पीने छह तँए जल्दी-जल्दी विधि-बेवहार ससारने चलह।” कमल कहलक- “से तँ ठीके कहै छिऐ।” हम कहललिऐ- “सभ बरियातीकेँ पंडालमे बैसाबह। आ चाह-नस्ता कराबह। तेकर पछाति विधि-बेवहारक काज शुरू करबिहऽ।” कमल अपन भातिज िवनोदकेँ बजा कहलक- “मैकसँ सभ बरियातीकेँ पंडालमे बैसैक आग्रह करही।” मैकसँ कतेको बेर आग्रहक पछातिओ अदहा बरियाती डीजेक धूनपर नचिते रहल। हारि कऽ जे बरियाती पंडालमे बैसल छल तिनका सभकेँ नास्ता देल गेल। दुल्हाक पिताजीकेँ कहल गेल जे राति बेसी भऽ गेल अछि तँए डीजेकेँ बन्न कऽ चाह-नास्ता करै जाउ। तेकर पछाति विधि-बेवहारक काज हएत। लड़काबला केतेक निहोरा-विनती केलक तखनि जा कऽ डीजे बन्न भेल आ बरियाती सभ चाह-नास्ता लेल पंडालमे बैसल। युवक सभकेँ आश्वासन देल गेल जे चाह-नास्ताक पछाति अहाँ सभ डीजे बाजाक आनन्द लेब। सएह भेल। नवयुवक बरियाती सभ डीजे बाजा चालू करा फेरो नाचए लगल। घरवारी आ बरियातीक बूढ़-बुजुर्ग विधि-बेवहारक काजमे लगि गेल। मड़बा लग बर-कनियाँक तिलक पछाति दुर्वाक्षत भेल। बरकेँ बिआह करैले छोड़ि बरियाती सभ जनवासामे आएल। हम कमलकेँ बजा कहलिऐ- “जल्दी-जल्दी पंडालमे टेबुल सेट कऽ बरियातीकेँ भोजन लेल बैसाबह।” सएह भेल। पंडालमे बरियाती सभ आबि बैसला। डीजे बन्न भेल। बरियाती सभ अपन-अपन ग्रुपमे बैसला। सबहक आगू पलेट आ गिलास देल गेल। माँछ-भातक संग सलादक सेहो बेवस्था छल। जखनि भोजन शुरू भेल तँ कमल हमरोसँ भोजनक आग्रह केलक। हम कहलिऐ- “बरियातीक पछाति हम खेनाइ खाएब।” कमल हमरासँ फेर आग्रह केलनि- “तखनि पंडालमे भोजनक बेवस्था देखियौ। कोनो टेबुलपर कोनो चीजक अभाव नै हेबाक चाही।” हम पंडालमे गेलौं तँ देखै छी जे लगधग अदहा बरियाती पोलिथिनसँ दारू गिलासमे लऽ लऽ पीब रहल छथि। किछु बरियाती अंग्रेजी दारूक बोतल सेहो खोलने छथि। किछुए बरियाती छला जे खाली भोजनेटा कऽ रहल छला। देखि कऽ हम छगुन्तामे पड़ि गेलौं। पोलिथिनमे देशी दारू रहैए जेकर गंध हमरा बरदास नै भेल। हम पंडालसँ बाहर भऽ गेलौं। बरियातीक भोजन पछाति सर-कुटुम आ गौआँ-घरुआकेँ भोजनक लेल बैसौल गेल। ओहूमे देखै छी जे अदहासँ बेसी लोक पोलिथिन आ अंग्रेजी दारू भोजनक संग पीब रहल छथि। हम एकबेर फेर छगुन्तामे पड़ि गेलौं। कमलकेँ कहलिऐ- “हौ कमल, बेसी लोक पीआके भऽ गेल अछि।” ओ बाजल- “यौ नन्द भायजी, पानि उघैबलासँ लऽ कऽ मड़बा सजबैबला आ रसोइआ सभकेँ बूझू घूसमे पोलिथिन देबए पड़ल अछि। बिना दारूक कोनो काजे नै हएत। पिछला साल मैलाममे एकटा भोज छल। हमर पितिया ससूर मरि गेल रहथिन। ओहू भोजमे देखलिऐ जे पानि उघैबलासँ लऽ कऽ रसोइआ तककेँ घरवारी पोलिथिन आनि-आनि दइ छेलखिन। यौ भाय, आब तँ बिनु दारूक कोनो काजे ने ससरैए।” हम कहलिऐ- “हम रूपैआ दऽ देबै मुदा पोलिथिन वा कोनो दारूक बोतल नै देबै। चाहै हमर काज हुअए अथबा नै हुअए।” कमल बाजल- “जखनि बेर पड़त तखनि बुझबै।” कातिक मासक समए। सभ गोटे अपन-अपन वाड़ी-झाड़ीमे तीमन-तरकारी रौपैमे बेस्त। हमरो कट्ठा दुइएक भीठ खेत। ओइ कोलामे सभ साल अल्लू रोपै छी। एमकीओ भीखनासँ हर मोल लऽ खेत जोता तैयार करेलौं। किएक तँ अपना हर-बरद नै। बरद रखबो करब तँ जोतत के। अपना हर जोतैक लूड़ि नै। दिल्ली-पंजाब खुजबाक कारणे हरबाहा भेटब मोसकिल। तँए सभ खेती-गिरहस्तीक काज टेकटरेसँ होइए। टेकटरबलाकेँ अगुरबारे रूपैआ दऽ अबै छी आ ओ समैपर आबि खेत जोति दइए। मुदा अखनि खेत सभमे धानक फसिल लगल अछि। तँए अखनि टेकटरकेँ जाएब मोसकिल। तही दुआरे भीखनासँ हर मोल लऽ अल्लूक खेत तैयार करेलौं। घोघरडीहा बजारसँ साइकिलपर अल्लूक बीआ आ खादो कीनि अनलौं। आब समस्या अछि। जे रोपत के। बीआ आ खाद तँ अपनो गिरा लेब। मुदा कोदारिसँ दन के काटत? अपना जौं काटब तखनि तँ पएरे कटि जाएत। पछिला साल सएह ने भेल रहए। जोशमे आबि अपने विदा भेल रही दन कटैले आ पत्नीकेँ खाद आ बिआ गिरबैले लऽ गेल रही। कोदारिसँ दू दन काटि कऽ अल्लू तँ रोपलौं मुदा तेसर दनमे तेहन ने पएर कटाएल जे लोक सभ टाँगि कऽ गामपर अनलक। दू सएसँ बेसी रूपैआ दबाइमे लगल आ एक पनरहिया चलल-फिरल नै भेल। रातिमे खाइतकाल पत्नी बजली- “अल्लू पचता भऽ रहल अछि। पचता अल्लूमे झुल्सा पकड़त। लत्ती गलि जाएत आ अल्लू किछु ने हएत। केकरो पकड़ि अल्लू रोपा लिअ।” हम कहलिऐ- “से तँ ठीके कहै छिऐ।” भोरे हम भीखना लग गेलौं आ कहलिऐ- “आइ हमर अल्लू रोपि दए।” भीखना बाजल- “हमरा एक्को पलक छुट्टी नै अछि। हमरा तँ हरे जोतैसँ छुट्टी नै रहैए। दू सए टाकामे हर बेचै छी। अखने तँ समए अछि जे किछु कमा लेब। जखनि धान कटि जाएत आ खेत खाली भऽ जाएत तब सभ गोटे टेकटरेसँ हर जोताएत। अखनि तँ टेकटर जाइक बाटे नै छै। तँए लोक वाड़ी-झाड़ी करैले हर मोल लइए।” भीखनाक गप सुनि ओतएसँ हम बितबा लग गेलौं ओकरो अल्लू रोपैक आग्रह केलिऐ। बितबा कहलक- “हम अपने फिरिसान छी। मंगली माए नैहर चलि गेल। ओकरा माएकेँ लकबा मारि देलकै। हमरा माल-जाल सभकेँ देखए पड़ैए आ भानसो अपने करए पड़ैए। किएक तँ बेटी जे मंगली अछि ओ पढ़ैले इसकूल चलि जाइए। बूझू अखनि सभ काज अपने करए पड़ैए।” हम कहलिऐ- “हौ, आब अल्लू पचता भऽ रहल अछि। अपनासँ दन काटले ने हएत।” तब बितबा कहलक- “यौ गिरहत, भीलबा लग चलि जाउ। ओकरा बैसले देखै छिऐ। चारिम दिन पंचाबसँ ऐबे कएल अछि।” भीलबा लग गेलौं। ओ मोबाइलमे गीत सुनै छल। हमरा देखते टोकलक- “गिरहत गोर लगै छी।” हम कहलिऐ- “नीक्के रहऽ। कहिया गाम एलहक?” भीलबा बाजल- “चारिम दिन एलौंहेँ। केम्हर-केम्हर आएल छेलिऐ गिरहत?” हम कहलिऐ- “हौ, हमरा अल्लू रोपेबाक अछि। तँए तोरे लग एलिअहेँ। कनी आइ हमर बेगरता सम्हारि दैह।” तखनि भीलबा कहलक- “हमर तबियत ठीक नै अछि। हमरा सक्क नै हएत।” हम कहलिऐ- “हौ भीलाइ तोरा लग बड़ आशासँ आएल छेलौं। आइएटा हमर काज सम्हारि दैह।” ताबेतमे भीलबाक माए अँगनासँ निकलल। ओ भीलबासँ कहलक- “जो गिरहतकेँ अल्लू रोपि दही गऽ। गिरहतक हमरापर बड़ उपकार छै। बैसाखमे अपन बकरी लालबाबूकेँ खेरही चरि नेने रहै तँ ओ बकरी बान्हि नेने रहए। हमरा पता लगल तँ लालबाबू लग गेल रही मुदा ओ बकरी नै देलक। कहलक, बकरी सरपंच ओइठाम दऽ अबै छी ओतेसँ लऽ जाएब। इहए गिरहत लालबाबूकेँ बुझा अपन बकरी दियौलक। जाही हिनकर काज कऽ दही गऽ।” भीलबा बाजल- “गिरहत, अहाँक अल्लू रोपि देब। मुदा बोइनक ऊपरसँ किछु आरो खरचा करए पड़त।” हम पुछलिऐ- “की खर्च लेबहक? चाह-पान लऽ किछु अलगसँ दऽ देबह।” भीलबा बाजल- “से नै हएत। बोइनक अलाबे एकटा पोलिथिन देबए पड़त।” हमरा कमलक गप मन पड़ि गेल। मुदा की करब। अल्लू पचता भऽ रहल छल। हम सोचमे पड़ि गलौं जौं एकरा पोलिथिन गछि लइ छी तँ अपन सिद्धान्तक विपरीत काज हएत। बिच्चेमे भीलबा टोकलक- “गिरहत, बीस टाका तँ अलगसँ खर्च करए पड़त मुदा अल्लू तँ रोपा जाएत।” हम कहलिऐ- “हौ बाउ, बात बीस टाकाक नै छै। हम दारू पीनाइकेँ नीक नै बुझै छी। हम तोरा मिठाइ खाइले पच्चीस टाका दऽ देबह मुदा पोलिथिन नै देबह।” भीलबाक माए सभ गप सुनैत, ओ बजली- “जो, गिरहतक अल्लू रोपि दहिन गऽ बोइनक अलाबे किछु नै मांगही। ठीके कहै छथुन ई सभ नै पी।” भीलबा हमरा संगे विदा भऽ गेल। निवास प्रमाणपत्र बाल विकास विभागमे किरानी आ चपरासी लेल विज्ञापन निकलल छल। आवेदन पत्रक संग शैक्षणिक योग्यता प्रमाण पत्रक अभिप्रमाणित छायाप्रति आ निवास प्रमाण पत्रक अभिप्रमाणित छायाप्रति देनाइ अनिवार्य छल। आरक्षणक लाभ लेल जाति प्रमाण पत्र देनाइ सेहो अनिवार्य छल। नै तँ आवेदने रद्द। हमरा निवास प्रमाण पत्र नै छल। प्रखण्ड कार्यलय गेलौं। ओतए पता चलल जे कोनो प्रमाण पत्र लेल ऑनलाइन आवेदन कएल जाइ छै। एकटा कठघारामे जा फोटो स्टेट करैबलासँ निवास प्रमाण पत्रक फार्म कीनिलौं। खाली स्थानक पूर्ति कऽ लाइनमे लगि गेलौं। पता चलल तीन बजे धरि आवेदन लेल जेतै। दू बजैत रहए। हमरा आगूमे लगधग चालिस गोटे लाइनमे छल। हमरा पारी अबैसँ पहिने तीन बजि गेल। किरानी, जे आवेदन लइ छला, कहलनि- “टेम ओभर, टेम ओभर। अहाँ सभ काल्हि आउ।” किरानीक बात सुनि साइकिल लग जा ताला खोलि विदा भेलौं। रस्तामे सोचैत रही जे काल्हि दसे बजे आबि लाइनमे लगि जाएब। दोसर दिन नअ बजे घरसँ विदा भेलौं जे घंटा भरि लगत पहुँच जाएब। नरहिया बजारमे साइकिलमे हवा दिया विदा भेलौं। बैशाख मासक समए रहए। साइकिलक पछिला टाएर कमजोर छल। फुलपराससँ आगू बढ़लौं आकि धरामक अवाज भेल। देखलौं तँ साइकिलक पछिला चक्काक टाएर-ट्यूब फाटि गेल छल। स्थिति से छल जे बिनु बदलने गुनजाइश नै। जेबीमे मात्र पचासी टाका रहए। जखनि कि तीन सएक जरूरति छल। साइकिल गुरकौने बेलहा-बथनाहा चौक तक एलौं। एकटा चिन्हारए मिस्त्री लग गेलौं आ कहलियनि अपन दुखरा। मुदा हुनका लग टाएर-ट्यूब नै रहनि। तँ कहलियनि- “हम काल्हि टाएर-ट्यूब लऽ कऽ आएब। ताबए साइकिल राखू।” मिस्त्री बजला- “ठीक छै। काल्हि दसे बजे तक आबि जाएब। नै तँ साइकिलक जवाबदेही हमरा ऊपर नै। किएक तँ भीड़ बढ़ने तनदेही घटि जाइ छै।” हम बेलहा-बथनाहा चौकसँ पएरे घोघरडीहा दिस विदा भेलौं। एगारह बजे प्रखण्ड कार्यलय पहुँच लानिमे लगि गेलौं। हमरासँ आगू करीब पनरह गोटे छल। बुझाएल डेढ़ बजेसँ पहिने कागत जमा भऽ जाएत। आब हमरासँ आगू मात्र दू गोटे छल। मन तनफनाइत रहए जे आब कागत मांगत तब कागत मांगत। अगिला बेकती बजलै- “ले बलैया, जेनरेटरे खराप भऽ गेलै। कखनि ठीक हएत कखनि नै।” “यौ भाय, की भऽ गेलै?” हम पुछलिऐ। ओ बजला- “देखै नै छिऐ जेनरेटर बन्न भऽ गेलैए। बिना बिजलीक कम्प्यूटर केना चलत। बिनु कम्प्यूटर चलने ऑनलाइन केना होएत।” दू-तीन गोटे हमरासँ पाछू ठाढ़ छल। ओ सभ जेनरेटर लग गेल। ऑपरेटर साहैब मशीन खोलि रहल छला। दस मिनट पछाति एक गोटे आबि बाजल- “ऑपरेटरक कहब छै, बिना मिस्त्रीसँ ठीक नै होइबला छै। आइ आवेदन जमा भेनाइ असंभव।” हमहूँ जेनरेटर लग पहुँच ऑपरेटरसँ पुछलियनि- “की यौ बाबू साहैब, कखनि तक मशीन ठीक हेबाक संभावना अछि?” बजला- “आइ तँ कोनो असे ने करू। मिस्त्री जखनि अबए मुदा साँझ तक मशीन ठीक हएत कौल्हका आशा करू।” हम ओतएसँ ट्रेन पकड़ैले स्टेशन दिस चललौं। स्टेशनपर एलौं तँ पता चलल जे पाँच बजे तक ट्रेन आएत। समए करीब तीन बजैत रहए। अखनि दू घंटा गाड़ी अबैमे देरी अछि। सोचलौं किएक ने टेम्पू पकड़ि फुलपरास चलि जाइ आ ओतएसँ दोसर टेम्पू पकड़ि नरहिया चलि जाएब। नरहियासँ पएरे गाम जाइमे अदहा घंटा लगै छै। भाड़ा जोड़लौं तँ पचीस टाकाक खर्च छल। पचीस टाका खर्च केला बादो अदहा घंटा पएरे चलैइए पड़त। ओना ट्रेनसँ गेने परसा हॉल्ट उतरब। टिकटक कोनो दरकारे नै। परसासँ सबा घंटा गाम जाइमे लगत। नजरिपर आएल पैतालीस मिनट बेसी चलए पड़त मुदा पचीस टाकाक बँचत हएत। दस रूपैआक चाहे-पान खा लेब तैयो पनरहक नफ्फा। सएह केलौं। चाह-पान खा मुसाफिर खानाक विरिंचपर आबि बैस गेलौं। एकटा मुसाफिर हिन्दुस्तान पेपर पढ़ै छल। हम हुनकेसँ पेपर मांगि पढ़ए लगलौं। रहि-रहि कऽ मोबाइलमे समए देखी। जखनि साढ़े चारि बजल तब स्टेशन मास्टरसँ गाड़ीक सूर-पता पुछलौं। कहलनि- “दू घंटा लेट अछि। सात बजेसँ पहिने अबैक कोनो चान्स नै।” सुनिते झमा गेलौं। सस्ता महग पड़ि रहल छल। साढ़े सात बजे परसा हॉल्टपर उतरलौं। ट्रेनसँ उतरि गांधी चौक बसुआरी एलौं तँ आगूमे पाँतर छेलै तँए कोनो संगी मिलि जाएत तँ ठीक रहतै। ताकए लगलौं। एक गोटे मिलला। हुनको जेबाक रहनि आगू। दुनू गोटे चाह पीब संगे-संग विदा भेलौं। भपटियाही दुर्गा स्थान तक ओ संग रहला। दुर्गा स्थानमे भजन-कीर्तन होइत रहै ओ ओहीठाम रूकि गेला। हम मोबाइलक रोशनीमे आगू बढ़ैत गेलौं। नअ बजे रातिमे घर पहुँचलौं। घरपर पत्नी आ धिया-पुता चिन्तित रहथि। पत्नीकेँ पूरा दिनक घटना सुना देलियनि। दोसर दिन भोरे पत्नीसँ तीन सए रूपैआ केकरोसँ पैंच मांगि कऽ लाबए कहलियनि जे साइकिलक टाएर-ट्यूब बदलए पड़त। अदहा घंटा पछाति पत्नी आबि कहली- “कियो रूपैआ नै देलक।” “आब केना हएत। साइकिल बेलहा चौकपर पड़ल अछि।” चुप देखि पत्नी बजली- “तीन सए टाकाक गहुमे दोकानमे बेचि लिअ आ चलि जाउ।” पुछलियनि- “कि दर चलै छै।” “खुदरा नअ सारहे नअ रूपैए लइ छै।” “िनरमली-घोघरडीहामे तँ एगारह टके लइ छै?” पत्नीकेँ हमर बात जेना कान धरि नै गेलनि। किछु ने बजली। हमहूँ सोचए लगलौं, साइकिलो खरापे अछि। ओकरे मरम्मति खातिर तँ रूपैआक बेगरता अछि। तखनि बाहर केना आ कथीपर भाड़ी लऽ जाएब...। भक्क खूजल। हम तीस किलो गहुम लऽ दोकान गेलौं। दस टके बेचि तीन सए टाका लऽ घर एलौं। पत्नी खिचड़ी आ अल्लूक सन्ना बनेने छेली। जल्दीए खेनाइ खा ट्रेन पकड़ैले परसा हॉल्ट विदा भेलौं। ट्रेन पकड़ि घोघरडीहा एलौं। साइकिलक टाएर-ट्यूब कीनि बेलहा-बथनाहा चौक दिस विदा भेलौं। लगधग एक बजे चौकपर पहुँचलौं। मिस्त्रीकेँ दोकानपर नै देखने पता केलौं। पानबला कहलक- “साइकिलसँ भोजन करए बथनाहा गेल अछि।” मिस्त्रीकेँ धर बथनहे छै सेहो बुझलिऐ। दू बजे मिस्त्री एला। हमरा देखिते पुछलनि- “कहाँ अछि टाएर-ट्यूब। लाउ पहिने अहींक काज कऽ दइ छी।” पनरह मिनटमे ओ साइकिल ठीक कऽ दऽ देलक। दस टका फिंटिंग चार्ज दऽ हम साइकिल लऽ विदा भेलौं। भरि रस्ता एतबे सोचै रही जे हमर निवास प्रमाण पत्र केना बनत। अखनि धरि आवेदनो जमा नै भेल अछि। सोचलौं काल्हि भोरे जलखै कऽ आठे बजे ब्लौक दिस विदा भऽ जाएब। भिनसर भने चारिटा सोहारी आ अल्लूक भूजीआ लऽ विदा भऽ जाएब। सएह केलौं। दोसर दिन हम नअ बजै ब्लौक पहुँचलौं। ब्लौक ताबए बन्ने छल। सोचलौं जे आइ सभसँ आगाँ रहब। सभसँ पहिने हमरे कागत जमा हएत। खेनाइ खाइबेर गामेमे रहब। जलखै तँ संगमे अइछे। नअसँ-साढ़े-दस बजल। मुदा आॅफिसक गेंटक ताला नै खुगल। हम सोचए लगलौं एते समए भऽ गेलै मुदा अखनि धरि किनको देखै कहाँ छी। आॅफिस किअए ने खुलै छै। अावेदनो करैबला दोसर कियो बेकती नै आएल। कहीं आइ छुट्टी तँ नै छै। रोडक बगलमे चाह-पानक दोकान अछि। ओही दोकानपर जा पुछलौं- “आइ ऑफिस बन्न छै की?” दोकानदार कहलक- “अहाँकेँ नै बूझल अछि। पूर्व मुखमंत्री काल्हिहे मरि गेलै।” फेर हम पुछलिऐ- “काल्हि खुलतै की नै?” ओ हँसैत कहलक- “अहाँकेँ नै बूझल अछि, काल्हि रबि छिऐ।” हमरा अपने-आपपर गलानि हुअए लगल। दोकानदार पुछलक- “कोन काज अछि से। किअए एते फिरिसान छी?” हम जवाब देलिऐ- “यौ भाय, हमरा निवास प्रमाण पत्र बनेबाक अछि। चारि दिनसँ आबि रहल छी। मुदा कागत जमे ने भऽ रहल अछि।” “अहाँ बूड़ि छी।” दोकानदार चट दऽ कहि देलक। हम पुछलिऐ- “से किअए कहै छी?” बाजल- “चारि दिनसँ घुमै छी आ कागत जमा नै भेल। चािर दिनमे कमतीमे चालिस-पचास टाका खर्च कऽ नेने हएब। घरक काज हरजा भेल से कात। बजारमे शर्मा जीक इन्टर नेट सेवापर चलि जइतौं दस टाका दैतिऐ आ अहाँक आवेदन ऑनलाइन जमा भऽ जाइत कथीले लाइनमे ठाढ़ रहए पड़ैत।” अनायासे हमरा मुँहसँ निकलि गेल- “यौ भाय, ई गप तँ हमरा बुझले ने छल।” दोकानदार फेर टोकलक- “कतए घर अछि?” “सखुआ भपटियाही।” “अहूँक नरहिया बजारमे इंटरनेट सेवा हएत। नै तँ िनर्मलीमे तँ हेबे करत आ फुलपरामे सेहो अछि।” हम पुछलिऐ- “यौ भाय आइ ऑनलाइन हएत?” “नै आइ नै हएत आइ बन्न हएत। छुट्टी दिन सभ बन्न रहै छै।” “सोमदिन फुलपरास चलि जाएब। काज भऽ जाएत।” हम पानबलाकेँ धैनवाद दैत गाम दिस विदा भऽ गेलौं। सोम दिन जलखै खा एगारह बजे फुलपरास गेलौं। ओइठाम एकटा दोकानपर जा भाँज लगेलौं आ जगहपर जा कागत आॅनलाइन करबेलौं। आ पुछलिऐ- “प्रमाण पत्र कहिया भेटत?” दोकानदार कहलक- “एक्कैस-बाइस दिन पछाति ब्लौकमे भेट जाएत।” हम पुछलिऐ- “तइसँ पहिने नै हेतै की। हमरा तँ जरूरी अछि। आवेदन करबाक अछि?” ओ कहलक- “हएत तँ मुदा किरानी बाबूकेँ किछु देबए पड़त।” “केते देबए पड़तै?” “एकटा प्रमाण पत्रक पचास टाकासँ बेसी नै लेबाक चाही।” “दू-तीन दिन पछाति ब्लौक चलि जाएब आ पता करब। नै हएत तँ कोनो दलालकेँ पकड़ि लेब।” पुछलिऐ- “के दलाल छी से केना बुझबै?” “यौ भाय, वाड सदससँ लऽ कऽ मुखिया-समिति सभ दलालिऐ करै छै। से नै बुझै छी। एकरा सबहक अलाबे किछु आरो दलाल अछि जे भरि दिन ब्लौक-अनुमण्डल-जिला आ थानामे घुमैत रहै छै।” हम विचारलौं जे वाड सदस तँ हमरे टोलक छी। जाइ छी रातिएमे बात कऽ लेब। रातिमे पहुँचलौं वाड सदस लग। पता चलल अखनि तक ब्लौकसँ नै आएल। हुनक पुत्र कहलनि जे पापा लेटसँ अबै छथिन से नै तँ भिनसरे आउ। भोरे वाड सदससँ भेँट कऽ अपन समस्या सुनेलिऐ। कहलथि- “अहाँ दोसर जगहसँ कागत ऑनलाइन केने छी। तँए काज होइमे कठनाइ अछि। जौं ब्लौकमे ऑनलाइन करेने रहितिऐ। तँ सए-दू-सए टाकामे काज करा दइतौं। ओना हम जाइ छी किरानी बाबूसँ बात करब। काल्हि भेँट करू।” अँगना एलौं तँ पत्नीकेँ सभ बात कहलियनि। ओ कहलनि- “यौ, मुखियाजी तँ अपने जातिक छथिन। भोँटक समैमे कहने रहथि। हमरा जीता दइ जाउ। जौं कोनो काज हएत तँ बिनु पाइएक करा देब आ कऽ देब।” हम कहलियनि- “से तँ ठीके कहने रहथिन।” पत्नी कहली- “एकबेर भेँट करियनु ने। थाहियो तँ लेबे। फेर ने भोँटक समए औत।” हम मुखियाजी सँ भेँट कऽ सभ गप कहलियनि। कहलनि- “अखनि हम बड़ बेस्त छी। मनरेगा तहत पंचायतक खाली जमीन सभपर गाछ-बिरिछ रोपबाक अछि। अखनि एक्को पलक छुट्टी नै अछि। हम आइ काल्हि ब्लौको नै जाइ छी। हलाँकी अहाँक काजो उकड़ू अछि। एना करू, अहाँ प्रमुख साहैबसँ भेँट करियनु। ओ भरि दिन ब्लौकेमे रहै छथिन।” हम कहलियनि- “प्रमुख साहिबाक पति विपीनजी हमर संगीए छथि। विपीने जीकेँ सभ प्रमुख साहैब कहै छन्हि। हुनकर पत्नी प्रमुख साहिबा तँ बैसके-बैसक घोघरडीहा जाइ छथिन। विपीनेजी सभ काज करै छथिन। अहाँ हुनकेसँ भेँट करू काज भऽ जाएत। स्कूलक संगीओ छथि।” “से तँ छीहे।” बाजि ओतएसँ हम विदा भेलौं। अगिला दिन परसा जा विपीनजी ओतए गेलौं, दरबज्जेपर रहथि। देखिते बजला- “आबह भाय, आबह।” एकटा कुरसी देखबैत बैसैक इशारा केलनि। हम कुरसीपर बैस गेलौं। एकटा लड़का दरबज्जापर पढ़ैत रहए। ओकरा दू कप चाह आनैले विपीनजी कहलखिन। कनीए काल पछाति ओ लड़का दू कप चाह नेने एलनि। विपीनजी पुछलनि- “भाय, जलो पीबहक?” हम कहलिऐ- “नै जल नै पीअब।” विपीनजी हमरा तरफ चाहक एकटा कप बढ़ौलनि आ अपने एकटा कप लेलनि। दुनू गोटे चाह पीबए लगलौं। विपीनजी पुछलनि- “केम्हर-केम्हर आगमन भेलह हेन?” “तोरेसँ किछु काज छल तँए एलौं हेन।” “हमरासँ काेन काज कहऽ, हमरासँ जे हएत से करबह। तूँ स्कूलक संगी छह।” हम हुनका सभ गप कहलियनि। बजला- “तोरा काजमे बड़ खुसामद करए पड़त। काजो हएत कि नै सेहो ठीक नै। तहूमे कहै छहक अप्लाइमे तीनिए दिन बाँकी अछि। ऑनलाइन केला एक्केस-बाइस दिनपर प्रमाण पत्र भेटै छै। तोरा तँ से चारिए दिन भेलह हेन। जौं किरानीसँ कहब, बड़ जरूरी अछि तँ ओ पाँच सए-छह सए मांगत। बेसी एँठी-मोचार करत। की कहबह। कहैत लाज होइए। मुदा तूँ संगी छह तँए तोरा कहै छीअ। बिना रूपैआक कोनो काज नै हेतह। हमरो बात कर-किरानी नै मानैए। एना करह एकबेर तूँ अपनेसँ परियास करहक। जौं काज भऽ जेतह तँ बड़ नीक नै तँ हम तँ छीहेँ। जे रूपैआ खर्च हएत हएत। काज तँ करक अछि।” हम सोचलौं किएक ने किरानीसँ भेँट कऽ अपनेसँ कोशिश करी। सएह केलौं। काल्हि पहुँचलौं। पता लगबैत किरानीसँ भेँट कऽ सभ बात कहलियनि। तँ किरानी मुरारीजी बजला- “अखनि तँ सोलह दिन बाँकी अछि।” हम हाथ जोड़ैत हुनकासँ आग्रह केलियनि- “जौं अपनेक कृपा हएत तँ आइओ हमर काज भऽ सकैए। बड़ उपकार मानब। अपने जे कहब, हम तैयार छी।” मुरारीजी बजला- “दू सए टाका जमा करू। तीन बजे पछाति अहाँक निवास प्रमाण पत्र िनर्गत कऽ देब।” हम ऑनलाइनबला रसीद आ एकटा नमरी हुनका हाथमे दैत कहलियनि- “आब माफ कएल जाउ।” ओ कहए लगला- “नै हएत, कमतीमे पचासो टाका और दियौ।” हम एकटा पचसटकही औरो देलियनि। मुड़ी डोलबैत कहलनि- “अखनि जाउ, तीन बजे भेँट करब।” तीन बजे हुनकासँ भेँट केलियनि। ओ हमरा िनवास प्रमाण पत्र देलनि। हम हुनका धैनवाद दैत विदा भेलौं। निपुतराहा “भोरे-भोर निपुतराहाक दर्शन भऽ गेल। आइ अनजलो हएत कि नै से नै जानि।” ई कहि औरहावाली मुँह बिजकाबए लगली। रीता बजली- “गइ माए, तों की बजै छेँ। ई सभ मात्र कहबी छिऐ। ओहो तँ मनुखे छथिन। भगवान बेटा नै देलखिन तँ ओ निपुत्तर भऽ गेल। कोनो बाँझ तँ नै छथिन। दूटा बेटी छन्हिहेँ। एकटा बी.ए. फाइनलमे पढ़ै छन्हि आ दोसर इंटरक परीक्षाक फार्म भरने छथिन। अपनो बी.एस.सी. पास केने छथिन। राजनीति सेहो करै छथिन। हुनकर भाषण बड़ जोरगर होइ छन्हि। सुनै छी ओ साहित्यकारो छथिन। एहेन लोकक दर्शनकेँ अधला बुझै छिही?” औरहावाली कहलखिन- “गइ तूँ की बुझबिही। निपुत्तर मनुखक दर्शन बड़ अधला। पछिला साल हम उजाला ट्रेनिंगमे शामिल होइले घोघरडीहा जाइत रही, ओइ निपुतराहाक दर्शन भऽ गेल। पाँचे मिनट लेल ट्रेन छूटि गेल। सभ दिन तँ ट्रेन लेटे रहै छल मुदा ओइ दिन ठीक साढ़े दस बजै खूगि गेल। हमरा ट्रेनिंगमे जेनाइ जरूरी छल पछाति तोहर पापा मोटर साइकिलसँ घोघरडीहा पहुँचौलनि, जइसँ हुनका अपना स्कूल पहुँचैमे देरी भऽ गेलनि। ओही दिन डी.ओ. साहैब एगारह बजै बनगामा हाइ स्कूलपर आएल रहथि। तोहर पापा साढ़े एगारह बजै स्कूल पहुँचल छेलखुन। अदहा घंटा समए हुनका देरी भऽ गेल रहनि। डी.ओ. साहैब हुनकासँ स्पष्टीकरण मंगलकनि। ओही दिनसँ हम निपुतराहाक दर्शनकेँ खराप बुझै छी।” रीता बजली- “ई सभ संजोगक बात छी। तूँ तँ मास्टरी करै छीही। पढ़ल-लिखल छेँ। तखनो ऐ रूढ़ीवादीकेँ मानै छीही? कह तँ जौं ई बात विमलकाकाकेँ पता चलतनि तँ हुनका केतेक दुख हेतनि? हमरा बिआहमे ओ केते खटल रहथि। सभ बरियातीकेँ भोजन करा सबहक पात विमलेकाका फेंकने रहथिन।” “से तँ तूँ ठीके कहै छेँ। तोरा बिआहमे ओ बड़ खटल रहथिन। मुदा जहिया हमर ट्रेन छूटि गेल आ तोहर पापाकेँ डी.ओ. साहैब झमेलामे दऽ देलखिन तहियासँ ओकर दर्शनकेँ हम बड़ अधला बुझै छिऐ।” ई सभटा बात औरहावाली आ हुनकर बेटी रीताक बीच चलै छल जखनि विमलजी निर्मली जाइत रहथिन आ हुनके देख कऽ औरहावाली मुँह बिजकबैत बाजए लगल रहथिन। औरहावालीक मकान सड़कक कातेमे अछि। मकानमे सड़को दिससँ ओसारा छै। तही ओसारापर दुनू माइधी बैसल छेली। विमलजी बी.एस.सी. पास छथि। हुनकर उमेर लगधग चालिस बर्ख छन्हि। कखनो काल मैथिलीमे कथा-कविता-हैकू-टनका-वाका सेहो लिखै छथि। पाँच बर्ख तक एकटा संस्कृत उच्च विद्यालयमे विज्ञान विषयक पदपर शिक्षणक काज सेहो केला। स्कूल मंजूर नै भेने बेरोजगारे रहि गेला। सामाजिक काजमे रूचि सेहो छन्हि। हिनका दूटा बेटीएटा छन्हि। बड़की बेटी वीणा बी.ए. कऽ रहल छथिन आ छोटकी इंटर। औरहावालीक पति दिनेशजी वनगामा उच्च विद्यालयक प्रधानाध्यापक छथिन। औरहावाली गामेक प्राथमिक स्कूलमे शिक्षिका छथिन। दूटा बेटी आ एकटा बेटा छन्हि। जेठकी बेटी रीना सासुरवास छथिन। छोटकी बेटी रीताक बिआह कनीय अभियंतासँ भेल अछि। इंजीनियर साहैब झारखण्डमे नोकरी करै छथिन। नव-नव नोकरी छन्हि। तँए रीता अखनि नैहरेमे अछि। सभसँ छोट संतान संदीप छन्हि। रीता सोचए लगली, माएक विचार केतेक संकुचित अछि। विमलकाका समाजक सबहक दुख-सुखमे हाथ बटबै छथिन। केकरो बेटीक बिआहमे बिनु बजौने जा अपना सक्क भरि मदति करै छथिन। हमर पापा तँ बिनु सूदि लेने केकरो पाँचो रूपैआ नै दइ छथिन। बड़की बहिन रीना कहियासँ एकटा टेलीविजन लेल किलोल करैए मुदा ओ पाइ रहितो साधारण मांगक पूर्ति नै कऽ पबै छथिन। जखैनकि एक मासक दरमाहा मिला कऽ अस्सी हजारसँ ऊपरे होइ छन्हि। तैपरसँ कमतीमे बीस हजार रूपैआ महिना सूदि-बिआजसँ आमदनी अलग छन्हि। मुदा हमर माए-बाबू एक नम्मरक मखीचूस। विमलकाका हमरा पापासँ नीक लोक छथिन। एहेन नीक लोकक प्रति माएक ई सोच छन्हि! दिनेशजी बेटा संदीप भोपालमे इंजीनियरक पढ़ाइ कऽ रहल अछि। डोनेशनपर नामांकन भेल छै। तीन बेर कम्पीटीशनमे बैसला पछाति सफल नै भऽ सकलै तखनि जा कऽ डोनेशन दऽ पिता नाओं लिखौलकनि। आइ-काल्हि संदीप गामे अछि। माए-बापक दुलरुआ बेटा। विमल जीक मामाकेँ लकबा मारि देलकनि। हुनका इलाज लेल आर.बी.मेमोरियल, लहेरियासरायमे भर्ती करौल गेल। विमलजी सेहो संगे रहथिन। एक सप्ताहक इलाजक पछाति स्वास्थमे सुधार हुअए लगलनि। विमलजी चाह पीबैले आर.बी.मेमोरियरक बाहर एला तँ हुनकर नजरि दिनेशजीपर गेलनि। दिनेशजी एकटा बोलेरो गाड़ीसँ उतरै छला। विमलजी गाड़ी लग पहुँचला तँ गाड़ीमे संदीपकेँ बेहोश देखलखिन। औरहोवाली गाड़ीएमे छेली। विमलजी पुछलखिन- “की भेलैए संदीपकेँ? एकरा माथमे पट्टी किअए बान्हल छै?” औरहावालीक आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलनि। दिनेशजी कहलखिन- “पहिने संदीपकेँ उतारि भीतर लऽ चलू। भर्ती करा इलाज चालू कराउ। हालति बड़ खराप छै।” मोटर साइकिल दुर्घटनामे संदीपकेँ माथा फाटि गेलै। बड़ लहू बहलै हेन। खून सेहो चढ़बए पड़तै। फुलपरास रेफरल अस्पतालमे पट्टी बान्हि डी.एम.सी.एच. रेफर कऽ देलकै। पहिने तँ डी.एम.सी.एचे. अस्पताल लऽ गेल हरथिन दिनेशजी मुदा ओइठाम डाक्टर सबहक हड़तालसँ बन्न रहने गाड़ी घूमा आर.बी.मेमोरियल निजी अस्पताल आनल गेल। विमलजी आ दिनेशजी दुनू गोरे संदीपकेँ उठा अस्पतालक भीतर लऽ गेलखिन। इमरजेंसी वार्डमे भर्ती करौल गेल। डाक्टर साहैब कहलखिन- “रोगीकेँ बड़ खूनक कमी भऽ गेल अछि। जल्दी पहिने खूनक बेवस्था करै जाउ।” संदीपक खूनक जाँच भेल। जइ ग्रुपक खून संदीपक शरीरमे छल ओइ ग्रुपक खून अस्पतालमे उपलब्ध नै छेलै। दिनेशजी आ औरहावाली सेहो दुनू गोटेक खूनक जाँच भेल। दिनेशजी खूनक ग्रुप संदीपक खूनक ग्रुपसँ मिलल। एक बोतल खून निकालि तत्काल संदीपक इलाज शुरू भेल। डाक्टर कहलखिन- “एक बोतल आरो चाही।” दिनेश जीक शरीरसँ अखनि आरो खून नै निकालल जा सकै छल। किएक तँ कमजोर जकाँ बूझा रहल छेलखिन। विमलजी डाक्टरसँ अपन खूनक जाँच करैले कहलखिन। हुनका खूनक ग्रुप संदीपक खूनक ग्रुपसँ मिलि गेल। विमलजी डाक्टरकेँ कहलखिन- “जेते खूनक खगता अछि। हमरा देहसँ निकालि संदीपकेँ चढ़ा दियौ।” तत्काल खगता भरि खून विमल जीक देहसँ निकालि संदीपकेँ चढ़ा इलाज बढ़ौल गेल। जखनि विमल जीक देहसँ खून निकालि संदीपक देहम डाक्टर चढ़बैत रहथिन तखनि विमलजी दिनेश जीकेँ कलखिन- “चलू एक-एक कप चाह पीबी। चाहो पीअब आ गपो करब। भौजीले चाह सोहो नेने आएब। जगहपर आबि गेल छी इलाजो भाइए रहल अछि। भगवानक कृपासँ आब संदीपकेँ किछु नै हएत।” दुनू गोटे चाहक दोकानपर जा दोकानदारसँ विमलजी दूटा चाह दइले कहलखिन। दोकानदार दू कप चाह पकड़ा देलक। दुनू गोटे चाह पीबए लगला। विमलजी पुछलखिन- “आब कहू संदीपक माथ केना फाटल?” दिनेसजी कहलखिन- “अहाँकेँ तँ बुझलै अछि संदीप क्रिकेटक पाछू बताह अछि। आइ झंझारपुरमे क्रिकेटक मैच छल। सबेरे आठ बजे मोटर साइकिलसँ बल्ला लऽ विदा भेल। गाड़ीपर तीन गोटे बैस गेल जखनि फुलपरास लोहिया चौकसँ बढ़ल तँ एकटा कुत्ता मोटर साइकिलसँ टकारा गेल। गाड़ी स्पीडमे रहै नाचि कऽ सकड़पर गिरल। तखने ओकर कपार फाटि गेल। हेलमेट पछिला संगीकेँ देने रहए।” घंटा भरि पछाति संदीप होशमे आएल। आँखि खोललक। डाक्टर कहलखिन- “आब खतराक कोनो डर नै। संदीपक जान बँचि गेल।” औरहावाली भरि पाँजमे विमल जीकेँ लऽ कानए लगली- “बौआ यौ बौआ, आइ अहाँ नै रहितौं तँ हमरा बेटाकेँ की होइत से नै जानि यौ बौआ। हम अहाँक दर्शनकेँ बड़ अधला बुझै छेलौं। हमरा माफ कऽ दिअ यौ बौआ।” विमलजी बजलखिन- “हमरा खून देलासँ संदीप बँचि गेल। हमरा लेल ऐसँ पैघ काज दोसर की भऽ सकैए। भगवान संदीपकेँ जल्दी स्वस्थ करथुन, सएह कामना अछि।” औरहावाली सोचए लगली, एहेन पैघ विचारक लोकक प्रति हमर केतेक खराप सोच छल। रीता ठीके कहै छल...। औरहावालीक आँखिक नोर बन्न नै भऽ अनवरत बहिते रहलै। महाजन “महाजन गोड़ लगै छी।” “निक्के रहअ। कहअ हजारी निक्केना रहै छह किने?” “की निक्के रहब महाजन। अखार आबि गेल मुदा अखनि धरि खुट्टापर बरद नै आएल।” “किअए, पहुलका बरद कि भेलह।” “पहुलका बरद मरि ने गेल। डकहा भऽ गेल रहै। एक हजार टाका श्यामजी डाक्टरकेँ देलियनि। ओहो बड़ मेहनति केलनि मुदा हमर भाग्ये खराप अछि। बरद नै बँचि सकल। श्यामजी अपन मेहताना किछु नै लेलनि खाली दबाइएक दाम लेलनि। बड़ नीक लोक छथिन श्यामजी।” “अच्छा केते दामक बरद लेबह।” लगलेसुरे लालबाबू पुछलखिन। “बरदक दाममे तँ आगि लगल अछि। पचीस हजारसँ कममे जोतै जोकर तँ हेबे ने करत।” हजारी बाजल। लालबाबू फेर पुछलखिन- “अखनि लेबह रूपैआ?” “नै महाजन, एतेक रूपैआ घरमे रखनाइ नै ठीक हएत। फूसक घर छी चोरि भऽ जाएत तँ ऊहो आफदे। काल्हि जखनि लौफा हाट जाए लगब तखनि लेब।” हजारी कहलक। लालबाबू बजलखिन- “ठीक छै जेहेन तोहर विचार।” लालबाबू आ हजारी दुनू गोटेक घर मैनहा गाममे। मुदा टोल अलग-अलग। लालबाबूक घर अमतटोलीमे जखैनकि हजारीक घर खतबेटोलीमे। अलग-अलग टोल भेने सभ घटना सभ नै बूझि सकए। तँए हजारीक बरद डकहा बिमारीसँ मरल ई बात लालबाबूकेँ नै मालूम भऽ सकल। लालबाबूक पूरा नाओं धनीलाल राउत छियनि मुदा सभ कियो हुनका लालबाबू कहै छन्हि। आब तँ महाजन सेहो केते लोक कहै छन्हि। बापक एकलौता बेटा। बुझू, छोट-छीन जमीनदार। पक्काक घर। समूचा घर आ दरबज्जा देबालसँ घेरल आगूमे लोहाक फाटक। सभ कियो हुनका घरकेँ हवेली कहैत अछि। दरबज्जापर पतियानी लगल बखारी छन्हि। पिताक अमलदारीमे सभटा बखारी धानसँ भरल रहै छल। जौं कोनो साल रौदी भऽ जाइ छेलै तँ लोककेँ खेनाइमे दिक्कत नै होइ तइले पोखरि उराहै छला। पोखरिमे काज करैबला बेकती सभकेँ जलखै-कलौक अलाबे पाँच सेर धान बोइन दइ छेलखिन। अखनो गाममे पाँचटा पोखरि लालबाबूकेँ छन्हि। जइमे माँछ पोसल जाइए। हाल धरि हुनका दरबज्जापर हाथी-घोड़ा आ पाँच जोरा बरद छेलनि। मुदा अखनि तँ समए बदलि गेल अछि। आब, घोड़ा तँ दर-देहातमे अछियो मुदा हाथी तँ सरकसेटामे देखै छी। हाथीक जगहपर लालबाबू बोलेरो गाड़ी, घोड़ाक जगहपर बुलेट मोटर साइकिल रखने छथि तहिना बरदक काज टेकटरसँ करै छथिन। अखनो हुनका कमतीमे अस्सी पचासी बीघा खेत हेतनि। सिलिंग एक्ट एलासँ किछु जमीन हुनकर पिता बेटीकेँ लिखि देने रहथिन। जन-मजदूर नै भेटैक कारण किछु जमीन लालोबाबू अपना हाथे बेचि देलखिन। जमीन बेचलासँ जे रूपैआ भेल रहनि ओहीसँ लगानी-भिरानी करै छथि। मात्र पाँच बीघा खेत जे घर लग छन्हि से अपनासँ उपजबै छथि बाँकी सभटा मनखप लगेने छथि। कमतीमे पनरह-सोलह सए मन धान अखनो भऽ जाइ छन्हि। पाँच सए मन धान बखारीमे ढारि बाँकी धान वेपारी हाथे अगहने-पूसमे बेचि दइ छथिन। अखनि हुनकर मुख्य पेशा लगानी-भिरानी भऽ गेल अछि। अपन गाम छोड़ि पास-पड़ोसक दस गाममे हुनकर लहनापाती चलै छन्हि। धान सबाइपर दइ छथिन माने आसीन-कातिकमे एक मन धानक पूस-माघमे सबा मन लइ छथिन आ रूपैआ तीन रूपैए सैकड़ा सूदिपर। आन गोटे तँ पाँच रूपैए सैंकड़ा सूदिपर लगबैए। अनगौआँकेँ जेबर रखि अथवा जमीन भरना लिखा कर्जा दइ छथिन मुदा गौआँकेँ बिनु जमीन लिखौने आ जेबर लेने कर्जा दइ छथिन। जौं कोनो खौदका लचरि जाइए तँ ओकरा सूदि माफ कऽ मात्र मूरि लऽ फारकती कऽ दइ छथिन। तेसर सालक गप छी। जंगलक बापकेँ लकबा लपकि लेलक। जंगल लालबाबूसँ पचीस हजार टाका कर्जा लऽ पिताकेँ दरभंगामे इलाज करौलक मुदा पिता नै बँचि सकलनि। एमकी जंगल दिल्लीसँ आएल आ कर्जाक हिसाब सुनलक तँ ओकरा माथमे चक्कर आबए लगल। साढ़े तीन बरखमे मूरि सूदि लगा दोबर भऽ गेल। ओ कानए लगल। दिल्लीसँ दस हजार टाका महाजने नामे पठेने छल। बीस हजार संग अनने छल। महाजनक पएर पकड़ि कानए लगल। लालबाबू पुछलखिन- “कहऽ जंगल किअए कनै छह?” जंगल बाजल- “महाजन, अहाँक कर्जा नै सदहा सकलिऐ। बीसे हजार टाका छै। दिल्लीमे दुखित पड़ि गेलिऐ। कमाएल नै भेलै। केतएसँ अहाँ कर्जा सदहाएब। जौं अहाँक कर्जा नै चुकता करब तँ समाजमे बेर-बेगरतापर के मदति करत। सभ कहत जंगला बेइमान अछि।” लालबाबू बजलखिन- “सुनह जंगल, कानए जुनि। लाबह कहाँ छह टाका।” जंगल बौगलीसँ टाका निकालि लालबाबूक हाथमे देलक। लालबाबू रूपैआ गनि बजला- “बीस हजार छह। दस हजार पहिने भेजने रहक।” जंगल ठाढ़ भऽ हाथ जोड़ैत बाजल- “हँ महाजन, बीसे हजार अछि।” लालबाबू पुछलखिन- “आब कहऽ की कहै छहक?” जंगल हाथ जोड़ने बाजल- “हम की बाजू महाजन, केना बाजू। अहाँ एक मुस्त पचीस हजार टाका देने रही...। कोन मुहेँ बाजी।” लालबाबू पुछलखिन- “आरो केते दऽ सकै छहक?” जंगल बाजल- “महाजन, एमकी आसीनमे जीड़ी कटैले पंजाब जाएब। ओतएसँ जे कमा कऽ आनब से अहाँक पएरपर दऽ जाएब।” लालबाबू बजलखिन- “ठीक छै। तोरे धरमपर छोड़ि दइ छिअह। जीड़ी कटैसँ जे आमदनी हेतह पहुँचा जाइहऽ। तोरा फारकती दऽ देबह।” जंगल एकबेर फेर हाथ जोड़ैत बाजल- “जी महाजन, जे हएत पहुँचा देब।” लालबाबू कहलखिन- “अच्छा जा।” जंगल चलि गेल। लालबाबू एम.ए. पास छथि। उमेर साठि-पैंसठि हेतनि। जइ समैमे एम.ए.पास केने रहथिन। कतेको कौलेजमे प्रोफेसरक नोकरी भऽ सकै छल मुदा बाबूजी कहने रहनि जे नोकरी नै करह। अपने सम्पतिकेँ लड़ाबह-चराबह। अहीसँ विकास हेतह। लालबाबूकेँ दूटा बेटा आ दूटा बेटी। दुनू बेटी सासुर बसैत। दुनू जमाए इंजीनियर। छोटका बेटा संजीत इंजीनियरक पढ़ाइ पढ़ैत आ जेठका रंजीत बी.ए.पास कऽ गामेमे खेती-पथारी आ लगानीक काज देखैत मुदा अखनो जुति लालेबाबूक छन्हि घरमे। लालबाबूक सार हाइस्कूलक शिक्षक। ओ लालबाबूकेँ कहैत रहै छथिन जे आब हाथ-पएर समटू माने लगानी-भिरानी बला काज बन्न करू। जमाना बदलि गेल अछि। कखनि के बेइमानी कऽ लेत तेकर कोन ठेकान। मुदा लालबाबूपर सारक बातक कोनो असरि नै। अखनो लगधग पनरहसँ बीस लाख टाकाक लगानी छन्हि। दियारी पछाति जंगल पंजाबसँ आएल। भोरे हवेलीपर गेल। लालबाबू दरबज्जेपर छेलखिन। “महाजन गोड़ लगै छी।” जंगल गेँटेपरसँ हाथ जोड़ैत बाजल। लालबाबू बजलखिन- “आबह-आबह जंगल। कहिया एलह पंजाबसँ?” “रातिए एलौं हेन महाजन।” जंगल जवाब देलकनि। “अच्छा बैसह, केहेन रहलह कमाइ-धमाइ?” लालबाबू पुछलखिन। मंगल जवाब देलक- “मिला-जुला कऽ ठीके रहल महाजन।” बाजि जंगल जमीनपर बैस गेल। लालबाबू कहलखिन- “विरिंचपर बैसह ने।” जंगल बाजल- “नै महाजन, हम निच्चेमे ठीक छी।” लालबाबू पुछलखिन- “हमरा दइले केतेक पाइ अनलहक?” “सात हजार टाका महाजन।” “कहाँ छह पाइ लाबह।” जंगल बौगलीसँ टाका निकालि महाजनक हाथमे दैत बाजल- “महाजन, हमरा फारकती दऽ दिअ।” लालबाबू पुछलखिन- “पंजाबसँ एतबे अनलहक?” जंगल बाजल- “नै महाजन, आठ हजार भेल जइमे पाँच सए तँ टिकटेमे चलि गेल आ पाँच सए पावनि ले रखने छी। जँ अपने कहब तँ ऊहो पाँच सए टाका अपनेक पएरपर रखि देब।” लालबाबू बजलखिन- “नै, राखए पावनि ले। साल भरिक पावनि छी। देखहक तँ रंजीत हवेलीमे अछि?” जंगल हवेलीक गेँटपर जा हाक देलक- “रंजीत मािलक, रंजीत मािलक?” रंजीत चाह पीब रहल छल। कप हाथेमे नेने सोझहा आबि बाजल- “कहए जंगल, की बात छिऐ?” जंगल कहलक- “महाजन अपनेकेँ खोज करै छथिन।” “चलह चाह पीने अबै छी।” रंजीतक मुँहसँ बहराएल आ कनीए काल पछाति दरबज्जापर आएल। लालबाबू रंजीतकेँ कहलखिन- “कनी बही निकालह तँ।” रंजीत अलमारी खोलि बही निकाललक। लालबाबू फेरो बजलखिन- “जंगलक नाओंपर सात हजार जमा कऽ दहक आ बही छेकि देहक। वेचाराक बापो मरि गेल। फिरीसान अछि।” बाजि लालबाबू जंगल दिस देखैत कहलखिन- “तूँ जा, पावनि-तिहारक समए छी। केतेक रंगक काज हेतह घरपर।” जंगल हाथ जोड़ैत बाजल- “महाजन, हमरा फारकती देलिऐ ने?” लालबाबू- “हँ हौ, फारकती कऽ देलिअ। सुनलहक नै जे रंजीतकेँ बही छेकैले कहि देलिऐ।” “धनि छी महाजन अपने।” ई कहैत जंगल लालबाबूक पएर छूबि प्रणाम करैत विदा भऽ गेल। “मर ई की केलिऐ बाबूजी। साते हजार लऽ बही छेका देलिऐ। जंगलपर तँ पचपन हजार टाका बनै छै। जइमे तीस हजार पहिने देने रहए आ सात हजार अखनि देलक हेन। अठारह हजार टाका छूटि गेल। एना जे फारकती देबए लगबै तँ सभ अहिना करत।” “रंजीत तूँ तँ बी.ए. पास छह। महाजनक अर्थ बुझै छहक?” “हँ बुझै छिऐ। महा माने बड़ जन माने आदमी। बड़ आदमी।” “एकटा गप कहऽ तँ, गाँधीजी केँ लोक महात्मा किअए कहैत अछि? आ महात्माक की अर्थ होइत अछि?” लालबाबू फेर पुछलखिन। ई सुनि रंजीत चुप्पे रहला। चुप देखि लालबाबू बजला- “हौ, महात्माक अर्थ होइत अछि महान आत्मा। जेकर अत्मा महान अछि वएह महान भेल। आ से छला गाँधीजी। हुनकर अत्मा बड़ महान छेलनि। दोसरक दुख देखि ओ तुरत दुखी भऽ जाइ छला। सभ जीवकेँ समान नजरिसँ देखै छला तँए सभ हुनका महात्मा कहैत अछि। तहिना महाजन, महा यानी महान आ जन माने आदमी। महान आदमी। सोचहक, लोक हमरा महान आदमी कहैत अछि। महान कथी? धनीक छी तँए महान? नै, जेकर दिल महान हुअए। जेकर आत्मा महान हुअए। जेकर मन महान हुअए। जेकर चरित्र महान हुअए। वएह महान आदमी हएत आ महाजन कहौत। बुझलहक?” रंजीत कहलकनि- “हँ बाबूजी बूझि गेलिऐ।” मैनहे खतबे टोलीमे एकगोटे रहए जामुन। जेहने पाकल जामुन कारी होइए तेहने ओकर चेहराक रंग कारी रहए। ओहो लालबाबूसँ महिंस कीनैले तीस हजार टाका नेने रहए। सोचने रहए जे दूध बेचि महाजनक पाइ सठा देब। मुदा भाग साथ नै देलकै। महिंसकेँ साँप काटि लेलकै जइसँ महिंस मरि गेलै। लालबाबूकेँ पता चललनि तँ ओ जिगेसा करए जामुन ओइठाम गेलखिन। जामुन लालबाबूक पएर पकड़ि कानए लगल। लालबाबू कहलखिन- “जुनि कानह, कनलासँ कोनो लाभ नै। भगवानपर भरोस करह वएह पुरा करथिन।” जामुन कनैत बाजल- “महाजन, अहाँक कर्जा कतएसँ सठाएब।” लालबाबू कहलखिन- “तीन बापूत कमाइबला छह। तीन महिना जँ गाम छोड़ि देबहक तँ हमर पाइ सठा देबहक।” “हँ महाजन, सएह करए पड़त। दस कट्ठा रोपनि रहि गेल अछि। रोपनि कऽ तीनू बापूत निकलि जाएब।” जामुन सएह केलक। पाँचे दिन पछाति जामुन तीनू बापूत दिल्ली जा एकटा दालि मीलमे लागि गेल। दियावती पछाति जेठका बेटाकेँ गाम पठेलक। ओकरा कनियाँक पएर भारी छल। जामुनक जेठका बेटा चौठिया डबल मचंड। बाप तँ महाजनक पुरा टाका जोड़ि कऽ बेटा मारफद भेजलक। मुदा चौठिया पुरा पाइ नै देलक। ओ सोचए, महिंस तँ मरि गेल तइ दुआरे महाजनक सूदि किअए देब। मूड़ दऽ दइ छी सएह बहुत। चौठिया लालबाबू ऐठाम जा तीस हजार टाका निकालि कऽ देलकनि। लालबाबू चौठियाकेँ पुछलखिन- “जामुन नै आएल?” चौठिया जवाब देलकनि- “बाउ, माघमे औत। कहलनि हेन बोही छेकि दइले।” लालबाबू फेरो पुछलखिन- “बाबू सूदि किछु ने देबए लेल कहलकह?” चाैठया बाजल- “यौ महाजन, महिंस मरि गेल। मूड़ दऽ दइ छी यएह बहुत। सूदि केतएसँ देब?” रंजीतो लालबाबूक बगलमे बैसल छल। जवान खून। तैसमे आबि गेल। ठाढ़ भऽ चौठियाकेँ कहलक- “तोरा महिंसक हम ठेका लेने रहियौ की? साँप काटि लेलकौ आ मरि गेलौ तँ हमरे पाइ नै देमए। फेरो बेगरता नै पड़तौ की?” चौठिया बाजल- “नै देब तँ की कऽ लेब? गोली मारि देबै की?” लालबाबू बात बढ़ैत देखि बेटाकेँ चुप रहैले कहलखिन आ चौठिया दिस देखैत कहलखिन- “ठीक छै। हम पाइ जमा कऽ दइ छी। जखनि जामुन औत तँ हम गप करब।” चौठिया कहलकनि- “आब किछु नै देब महाजन। बही छेकि दिऔ। बाउसँ कथी गप करब?” लालबाबू कहलखिन- “तोँ जा ने। पाइ तोहर बाबू ने लऽ गेल छल। तँए ओकरेसँ गप करब।” चौठिया भनभनाइत विदा भेल। जामुन चौठियासँ फोन कऽ पुछलक- “महाजनक कर्जा फरिछा देलिहीन?” चौठिया कहलक- “हँ तीस हजार दऽ देलिऐ। मुदा महाजन बोही नै छेकलक।” तैपर जामुन पुछलक- “आ सूदि बास्ते जे पाँच हजार देने रहिऔ, से की केलही?” चौठिया बाजल- “महिंस मरि गेल तँ सूदि किअए देतिऐ। मूड़ दऽ देलिऐ यएह बहुत।” जामुन कहलक- “ई नीक काज नै केलहँ। तोरा बेर-बेगरतामे कियो एक्को पाइ नै देतौ।” चौठिया बाजल- “नै देत तँ हम बूझब।” कहि फोन काटि देलक। एक्के मास पछाति चौठियाक घरवाली बरहावालीकेँ भोरेसँ दर्द शुरू भेल। चौठिया आशा लग गेल। आशा फोन कऽ अस्पतालसँ एम्बुलेंस मंगौलक। चौठिया आशा आ चौठियाक माए बरहावालीकेँ लऽ फुलपरास रेफरल अस्पताल गेल। एक दुपहरिया अस्पतालमे रहल मुदा जन्माशौच नै भेल। एक बजे दिनक बाद डाक्टर कहलखिन- “हिनका डी.एम.सी.एच. लऽ जाए पड़त। भऽ सकैए ऑपरेशन करए पड़नि।” चौठिया पुछलक- “ऑपरेशनमे केते खर्चा औत?” “लगधग पनरहसँ बीस हजार टाका तँ पड़िए जाएत। जँ तेलक पाइ जमा कऽ देबहक तँ एम्बुलेंसेसँ दरिभंगा भेज देबह।” चौठिया बाजल- “अखनि तँ पाँचे सए टाका अछि।” डाक्टर साहैब कहलखिन- “गाम जा कऽ घंटा भरिमे टाकाक ओरियान कऽ आबह। जेतेक देरी हेतह, रोगीक हालति तेते खराप हेतह।” आब तँ चौठियाक माथा चकराएल। सोचए लगल, एतेक टाका के देत। महाजन तँ देत नै। हुनकर सूदि नै देने रहिऐ। रंजीतसँ मुहोँ लगा लेने रही। अच्छा गाम जाइ छी। केते गोटेकेँ दारू पीऔने छी। देखै छिऐ बखतपर के काज आबैए। चौठिया टेम्पु पकड़ि गाम अाएल। गाममे जेते संगी-साथी, हित-बोन छल सभसँ पाइ मंगलक मुदा कियो एक्को टाका चौठियाकेँ नै देलकै जइसँ अोकर दिमागे ने काज करै। हारि कऽ बाबूकेँ दिल्ली फोन केलक। सभ गप कहलक। जामुन फोनपर कहलक- “तूँ महाजनक सूदि नै देलिहीन। तोरा के पाइ देतौ। जँ महाजनकेँ सूदि देने रहितँए तँ जेते टाका हुनकासँ मंगितीहीन ओ दऽ देतहुन। अाब कोन मुहेँ हुनकासँ पाइ मांगब।” चौठियाकेँ अपन गलती महसूस भेल। पिताकेँ कलहक- “बाउ, हमरासँ गलती भेल। हम पंजाब कमा महाजनक पाइ चुक्ता करब। तूँ महाजनसँ बीस हजार टाका बेवस्था करा दैह।” जामुन बाजल- “तूँ महाजन लग जो। हुनकासँ गलती माफ करैले निहोरा करिहनि आ सभ गप कहियनि। हुनकर कलेजा बड़ कोमल छन्हि। हमरा बिसवास अछि जरूर मदति करथुन। अगर नै देतहुन तँ हमरा फोन करिहेँ आ गप करबिहेँ।” चौठिया लालबाबू दरबज्जापर गेल। लालबाबू पेपर पढ़ैत रहथिन। चौठिया एक कात ठाढ़ भऽ गेल बाजल किछु नै। जखनि लालबाबूक नजरि चौठियापर गेलनि तँ पुछलखिन- “कहऽ चौठी केम्हर-केम्हर एलह हेन?” चौठिया धरती दिस आँखि गड़ौने बाजल- “महाजन हमरासँ गलती भऽ गेल छल। माफ कऽ दिअ। हमहूँ अहींक बाल-बच्चा छी।” लालबाबू पुछलखिन- “अच्छा, कहऽ की बात अछि?” चौठिया सभ गप सुना देलक। लालबाबू कहलखिन- “तोरा प्रति तँ हमरा बड़ दुख छह। मुदा तोहर कनियाँक जान खतरामे छह आ दोसर बात जे जामुन नीक लोक अछि। टाका लऽ जा आ नीकसँ इलाज कराबह।” कहैत लालबाबू तिजोरीसँ बीस हजार टाका निकालि चौठियाकेँ देलखिन। चौठिया लालबाबूक पएरपर खसि दुनू हाथे गोर लागि भरल आँखिसँ पहुलका गलती लेल एक बेर फेर गलतीक माफी मांगलक। लालबाबू कहलखिन- “जल्दीसँ फुलपरास जा आ कनियाँकेँ लऽ दरिभंगा जा। अबेर भेलासँ रोगीक हालति खराप भऽ सकैत अछि।” चाठया टेम्पू पकड़ैले सड़क दिस विदा भऽ गेल। गोबरबीछनी सखुआ गामसँ उत्तर विहुल नदी जे पच्छिमसँ पूब दिस बहैए। नदी बरसाती छी मुदा कोसी नहरिक पानि नदीमे गिरौने अछि तँए प्राय: बारहो मास पानि बहैत रहैए। नदीक उत्तर कबरगाहबला परती। परतीसँ सए मीटरक दूरीपर एन.एच.सड़क अछि। परतीसँ उत्तर-पूब एन.एच. सड़कक दुनू कात नवटोली गाम आ उत्तर-पच्छिममे नरहियाक धनजैया टोल अछि। नदीमे पक्का अथवा लोहाक पुल तँ नै अछि मुदा बाँसक चचरीक लचका अछि। जैपर दऽ मनुखसँ लऽ कऽ बकरी-छकरी, साइकिल-मोटरसाइकिल पार होइत अछि। परतीक काते-काते लोक सभ अपन जजाति बँचबैक खातीर आरा देने अछि। आरापर जिलेबी, आम, साहोर, कदम आ गुलरिक गाछ सभ अछि। सालो भरि परतीपर लोक सभ महिंस, बरद, गाए आ बकरी चरबैए। सखुआ दुनू टोलक नवटोली आ धनजैया टोलक माल-जालक अलाबे कखनो काल साननो पट्टीक चरबाहा सभ महिंस परतीपर लऽ अनैए तइले कखनो काल सखुआक चरबाहा आ अनगौआँ चरबाहामे रक्का-टोकी सेहो भऽ जाइत अछि। सखुआक चरबाहा सबहक कहब छै जे परती हमरा गामक सीमामे अछि। तँए ऐपर हमहीं सभटा माल-जाल चराएब। मुदा नवटोली आ धनजैआ टोलक चरबाहा सबहक कहब छै जे परती सरकारी छी तँए ऐपर सबहक अधिकार अछि। सभ कियो माल चरौत। पहिने तँ परतीक रकबा बाइस बीघा छल मुदा अखनि दस-बारह बीघाक लगधग हएत। नदीक दक्षिन पाँच बीघाक धतपत परती छल जे जोत भऽ गेल। उत्तरवरिओ परतीमे सँ लगधग पाँच बीघा सेहो जोत भऽ गेल। बँचलाहा परती जोत भऽ जाइत मुदा कबरगाह भेने नै जोत भऽ सकल। केतेक बेर लोक सभ जोतेक परियास केलक मुदा सफल नै भऽ सकल। सखुआ गाममे तँ मुसलमान नै अछि मुदा नरहियामे अछि। नरहैए गामक मुसलमान सभ ऐ परतीपर कव्वर दइले अबैत रहै छथि। ऐ परतीपर खाली मालेटा नै चरौल जाइए बल्की गुड़ीगुडी, चिका-चिका आ गुल्ली-डंटा इत्यादि खेलाएल जाइत अछि। परतीपर तीनटा गाछ अछि। दूटा गाछ बरक आ एकटा कदमक अछि। चरबाहा सभ अपन-अपन हेँड़ बना ओइ गाछ तर बैसैए। कोनो गाछ तर तास-खेलाइत तँ कोनो गाछ तर लूडो आब तँ गाछ तर चरबाहा सभ मोबाइलपर सिनेमाे देखैत रहैए। किछु चरबाहा आरा परहक गाछ तर सेहो बैसल रहैए। एही परतीपर गोबर बीछि कऽ दुखनी अपन गुजर करैत छेली। दुखनीक पति थोलाइ दू साल पहिने मरि गेल। थोलाइ दिल्लीमे नोकरी करै छल। ओतै बोखार लगलै। डाक्टरसँ देखौलक तँ डाक्टर कहलकनि जे कालाजार भऽ गेल अछि। मुदा पाइक तिरोटमे ठीकसँ इलाज नै भेल। जखनि चलै-फिड़ैमे दिक्कत हुअए लगलै तँ एकटा गाैआँ गाम नेने एलै थोलाइकेँ। गाममे दुखनी कर्जा लऽ ग्रामीण डाक्टरसँ इलाज करौलक मुदा बिमारी ठीक नै भेलै। दिल्लीसँ एला महिने दिन पछाति थोलाइ अपन पत्नी दुखनी आ तीन सालक एकटा बुच्चीकेँ छोड़ि दुनियाँसँ विदा भऽ गेल। दुखनी ऊपर दुखक पहाड़ टूटि खसल। कनैत-कनैत दुखनीक आँखि लाल भऽ फूलि गेलै। टोल-पड़ोसक लोकक अलाबे नहिरासँ भाए-बाप आबि हूबा बन्हैले कहैत पाँच दिन तक रहि दुखकेँ बाँटि संगे नहिरा चलैले कहलकै। मुदा दुखनी नै गेल। एक पनरहिया तँ शोकेमे डुमल रहली। बेटी बुचनीक मुँह देखि फेरसँ काज-राज करए लगली। आब दुखनी परतीपर गोबर बीछि चिपड़ी पाथि िनर्मली बजारमे बेचि अपन गूजर-बसर करए लगली। दुखनीकेँ एकटा बेटीए टा। प्राय: तहू दुआरे दुखनीक माए-पिता दोसर चुमौन करैले कहलक मुदा दुखनी तैयार नै भेल। दुखनीकेँ मात्र दू कट्ठा घराड़ीएटा अछि। माल-जालक नाओंपर एकटा बकरीएटा। घर फूसक ऊहो चुबिते। ओही घरमे भानसो-भात करैत, बकरीओ बन्हैत आ दुनू माय-धी सुतबो करैत। भोरे किछु खेनाइ बना खा-पीब घरमे फट्टक सटा बकरी आ बेटीकेँ लऽ दुखनी परतीपर चलि जाइत छल। परतीपर बकरीओ चरबैए, बेटीओकेँ खेलबैए आ गोबरो बीछि-बीछि जमा करैए। परतीएपर गोबरक चिपड़ी पाथि सुखैले छोड़ि दइए। सूखला पछाति गामपर आनि-आनि राखैए आ तेसरा दिनपर िनर्मली जा बेचबौ करैए। ऐ खेप िनर्मली बजारमे स्कूल जाइत धिया-पुतापर नजरि पड़लै। एक्के रंगक कपड़ा पहिरने बच्चाकेँ स्कूल जाइत देखि दुखनीओकेँ अपन बुचनीपर धियान गेलै। सोचए लगल, हमरा बुते तँ बुचनीकेँ बेसी पढ़ौल नै हएत मुदा चिट्ठीओ-पुर्जी जोकर तँ कहुना कऽ पढ़ेबे करब। हमरा जे दुखनीक बाप दिल्लीसँ चिट्ठी पठबए तँ चुनियाँसँ पढ़ाबी आ चुनियेँसँ लिखेबो करी। अपना तँ पढ़ल छी नै। तँए मनक बात कहियो बुचनीक बापकेँ नै लिखि सकलौं। जेमा चलिए गेल। ई पछिला बात सभ मन पड़ने दुखनीक आँखिसँ फेर दहो-बहो नोर जाए लगल। एम्हर आबि कऽ दुखनीक समए भारी भऽ गेल। किएक तँ आब ओकर चिपड़ी बिकनाइ कम भऽ गेल। कारण लोको सभ आ होटलोबला गैसक उपयोग करए लगल। चाहोबला सभ गैसेपर चाह बना-बना बेचए लगल। पहिने तँ कोइलापर भानस करै छल जइमे चिपड़ीक बेगरता रहबे करै छेलै मुदा से आब नै रहल। दुखनीक गुजर-बसरमे दिक्कत हुअए लगल। दिनक लगधग बारह बजैत। टहटहौआ रौदमे दुखनी आ बुचनी परती कातक आरापर गाछ तर बैसल छल। बकरीओ लगेमे छेलै। तीन छिट्टा गोबर बीछि जामा केने छेली। बैसल-बैसल सोचै छेली, चिपड़ी बीकब तँ कमि गेल हेन मुदा दोसर काजो तँ नै अछि। तखने बुचनी माएकेँ कहलक- “माए गै, भूख लगल अछि।” दुखनी बेटी दिस देखए लगल सहजे-सहजे आँखिसँ नोर बहए लगलै। चुप करैत गामपर विदा भेल। भरि रस्ता एतबे सोचै छेली जे आइ तँ घरमे किछु नै अछि बेटीकेँ कथी खुआएब आ अपने केना रहब। रस्तेमे आँगनवाड़ीक केन्द्र पड़ैत अछि। केन्द्रपर धिया-पुताकेँ थारी लेने पाँतिमे बैसल देखलक। हाँइ-हाँइ लफरल चलि घरपर जा छिपा धोइ बुचनीक हाथमे दऽ केन्द्रपर जाइले दुखनी कहलक। पाछू-पाछू अपनो आएल। सहायिका जखनि खिचड़ी परसए लगली तँ बुचनीपर नजरि गेलनि तँ पुछलखिन- “तूँ तँ पहिने नै आएल छेलेँ? तोरा ले तँ खिचड़ी नै बनल अछि।” सेविका सहायिकाक बात सुनि बजली- “अच्छा, की हेतै। ओकरो थारीमे खिचड़ी दऽ दियौ।” सेविकाक नजरि दुखनीपर गेल तँ दुखनीकेँ लग बजा पुछली- “अहूँ अपनो बेटीकेँ किअए ने केन्द्रपर पठबै छी?” दुखनी कहलकनि- “की कहू दीदी। एकर बाप दू बरख पहिने मरि गेल। तँए एको रती नीक नै लगैए। बेटी लगमे रहैए तँ संतोख होइए।” बिच्चेमे सेविका बजली- “देखू जे मरि गेल ओ तँ दुनियाँसँ चलि गेल। अहाँ अपना बेटीकेँ भविस किअए खराप करै छी। केन्द्रपर औत तँ किछु सिखबो करत आ नीक संस्कारो हेतै। भिनसरमे जलखै आ दुपहरियामे खेनाइ सेहो खाएत। आब तँ सरकार अढ़ाइ सए टाका बच्चाक कपड़ा लेल सेहो दइ छै।” दुखनी बजली- “दीदी, काल्हिसँ हमहूँ अपना बुच्चीकेँ केनदरपर पठाएब।” दुखनी अपन सभ दुखरा सेविकाकेँ सुना देलक। बँचलाहा खिचड़ी दुखनीकेँ सेविका दऽ देलक। दुखनी सभ बासन धोइ-माजि सहायिकाकेँ दऽ अँगना आबि गेली। आब दुखनी अँगने-अँगने वर्तन मािज गुजर करए लगली। दुखनी अछि तँ बड़ गरीब तहूमे मासोमात-बेसहारा मुदा वेचारी अछि इमानदार आ स्वाभिमानी जे कोनो मनुखक सभसँ पैघ गुण होइए। एक दिन दुखनीकेँ बाटपर एकटा मोबाइल भेटल। मोबाइल लऽ दुखनी अँगना अबै छलि। तखने बाटपर बुचकुन दुखनीक खाेंइछामे मोबाइल देखलक। देखिते पुछलकै- “अहाँक खोंइछामे मोबाइल देखै छी! कहिया लेलौं?” दुखनी बाजलि- “ई मोबाइल बाटपर भेटल। जेकर हएत तेकरा दऽ देब।” बुचकुन कहलकै- “देखौं केहेन मोबाइल अछि।” दुखनी देखए देलकै। मोबाइल नबे रहै। कमतीमे तीन हजारसँ ऊपरेक। बुचकुनकेँ लोभ आबि गेलै बाजल- “पाँच सए टाका दइ छी हमरा दऽ दिअ।” “नै यौ बौआ, हम मोबाइल नै देब आ ने बेचब। जेकर हएत तेकरा दऽ देब।” दुखनी बुचकुनक हाथसँ मोबाइल लऽ घरपर विदा भेल। रहि-रहि कऽ मोबाइलमे गीत बजै छल। दुखनीकेँ तँ मोबाइलक कोनो भाँजे ने बूझल रहै तँ ओ रिंग-टोन बाजि-बाजि बन्न भऽ जाए। अँगनामे बुचनी देखलक तखने फेर गीत बाजल। बुचनी हरिअरका बटम दाबि बाजल- “हेलाउ?” ओम्हरसँ अवाज आएल- “के बजै छी?” “हम बुचनी।” “के बुचनी केकर बेटी?” बुचनी बाजलि- “माएक नाओं दुखनी छी। बाबू मरि गेल अछि।” ओम्हरसँ फेर पुछलक- “तोहर बाबूक की नाओं?” “सुअर्गीए थोलाइ?” “ई मोबाइल तूँ केतएसँ अनलीही?” बुचनी कहलकै- “माए देलक।” “तूँ अपना माएकेँ दही। गप करा।” बुचनी माए हाथकेँ मोबाइल दैत बाजलि- “ले गप करही।” दुखनी बेटीए जकाँ मोबाइल कान लग सटा बाजलि- “ई मोबाइल हमरा रस्तापर भेटल। जेकर हएत तेकरा दऽ देब।” ओम्हरसँ अवाज आएल- “मोबाइल हमर छी। हम अबै छी।” कहि मोबाइल बन्न केलक। कनीए काल पछाति मोटर साइकिलसँ दू गोटे दुखनी घरपर पहुँचल। ओइमे एक गोटे मुखियाजी रहथिन। मुखियाजी दुखनीकेँ बजा पुछलखिन- “कहाँ अछि मोबाइल?” दुखनी मोबाइल घरसँ निकालि हाथमे दऽ देलकनि। मोबाइल लऽ मुखियाजी पाँच सए रूपैआ दुखनीकेँ दिअए लगलखिन। मुदा दुखनी रूपैआ नै लेलक। आ बाजलि- “हम रूपैआ कथीक लेब हमरा भेटल रहए अहाँक छी लऽ जाउ।” मुखियाजी दुखनीक बेवहारपर खुश होइत पुछलखिन- “अहाँकेँ सामाजिक सुरक्षा पेंसन भेटैए?” दुखनी जवाब देलक- “हमरा के देत पिलसिन उ तँ धनिकाहा सबहक छी ने। हम तँ मसोमात छी।” मुखियाजी फेर पुछलखिन- “अंत्योदय भेटैए आकि नै?” दुखनी कहलकनि- “लिखा-पढ़ही तँ कऽ कऽ गेल मुदा अखनि तक कहाँ कुच्छो भेटल।” मुखियाजी बजलखिन- “अहाँ चारिटा फोटो घीचा कऽ राखब। हम परसू आबि अहाँक नाओं सामाजिक सुरक्षाबला फार्म भरि पठा देब। अंत्योदयमे सेहो नाओं जोड़ि देब। केते गोटेक मरलासँ जगह खालीए अछि।” तेसर दिन मुखियाजी आबि फार्म भरि दुखनीसँ फोटो आ निशान लऽ विदा होइत कहलखिन- “अगिला माससँ सभ किछु भेटत।” आइ दुखनीक बेटी चाैथामे पढ़ैत अछि। ओकरा सामाजिक सुरक्षा पेंसन भेटैत अछि। इन्दिरा अवास सेहो भेटल जइसँ घरो भऽ गेलै। हलाँकि छत नै ऊपरमे एसवेस्टसे छै। पोषाहारक गहुम चनौरा प्राथमिक विद्यालयक शिक्षा समितिक गठन भेल। रंजन जीक पत्नी रीता देवी सचिव आ अनीलजी अध्यक्ष भेला। मोहनजी सेहो सदस्य चुनल गेला। विद्यालयमे छात्र सबहक पोषाहारक लेल सभ महिना सरकार गहुम दैत छल आ गरीब छात्र सभ लेल पोषाहारक अलाबे एक रूपैआ प्रतिदिनक हिसाबसँ प्रोत्साहन भत्ता सेहो दइ छल। आब तँ स्कूल सभमे मीनूक मुताविक छात्र सभकेँ खेनाइ भेटैए। कहियौ खिचड़ी, कहियौ करही-भात तँ कहियौ अण्डा-भात। जइ समैमे पोषाहारक रूपमे गहुम भेटै छल तइ समए प्रधानाध्यापक आ शिक्षा समितिक अध्यक्ष ब्लौकसँ गहुम उठा अानि छात्र सबहक बीच बँटै छल। प्रोत्साहन भत्ता स्कूलक प्रधानाध्यापक प्रखण्ड शिक्षा कार्यालयसँ अनै छल आ ओहो छात्र सबहक बीच बाँटि दइ छल। मुदा प्रधानाध्यापक सभ छात्र सभकेँ कम गहुम दइ छल। प्राय: दू मासपर पोषाहारक बँटवारा होइ छल। जइमे एक किलो कम गहुम छात्र सभकेँ भेटै छेलै। चनौरा प्राथमिक विद्यालयक प्रधानाध्यापिका सेहो यएह काज करै छल। प्रोत्साहन राशिक बँटवारामे पाँच टाकासँ दस टाका धरि कम कऽ छात्र सबहक बीच बँटैत रहथि। ग्राम पंचायतक चुनाव भेल। मोहनजी चनौरा पंचायतसँ पंचायत समितिक सदस्य चुनल गेला। प्रमुख चुनावमे मोहन जीकेँ सक्रिय भूमिका रहलनि। आ हुनके खेमाक बेकती प्रमुख भेला। आब मोहनजी बेसी काल प्रखण्डे मुख्यालयमे प्रमुख जीक संग रहए लगला। प्रखण्डमे चलैबला सभ योजनाक जानकारी हुनका रसे-रसे हुअए लगलनि। प्राथमिक विद्यालय चनौरामे छात्र सबहक बीच प्रोत्साहन भत्ता आ पोषाहार वितरणमे कटौटी होइते छल। गहुम आ टाका बँटला पछाति जे बँचै छल ओ प्रधानाध्यापिका असगरे हजम कऽ लइ छेली। छअ मास भेल। विद्यालयक शिक्षा समितिक अध्यक्ष देखैत रहला। आठम मासमे जखनि छात्र सभकेँ प्रोत्साहन राशि देल जाइ छल तखनि शिक्षा समितिक अध्यक्ष अनीलजी, सचिवक पति रंजनजी आ समिति सदस्य मोहनजी तीनू गोटे विद्यालयपर गेला। प्रधानाध्यापिकासँ प्रोत्साहन भत्ताक राशिक वितरणक पंजी लऽ लेला। पंजीमे छात्र सबहक नामक आगू सभ विद्यार्थीक हस्ताक्षर छल। मुदा राशि अंकित नै छल। शिक्षा समितिक सदस्य सबहक विचार भेल जे काल्हि ई पंजी लऽ जा कऽ प्रमुख साहैबकेँ देखौल जाए। ओ जे सलाह देथिन से कएल जाएत। प्रधानाध्यापिका विभा देवीक पति शोभाजी गामक दबंग बेकती। हुनका जखनि ई सभ बात पता लगलनि तखनि ओ मोहन जीकेँ बजा धमकी देलकनि। मुदा मोहनजी पर ओइ धमकीक कोनो असरि नै भेल। शोभाजी मोहन जीकेँ कहलकनि- “अहाँ, वितरण पंजी प्रधानाध्यापिकाकेँ आपस कऽ दियौ नै तँ हम अहाँपर केस करब।” मोहनजी कहलखिन- “पंजी तँ अध्यक्ष लग अछि। हम केतएसँ देब। गौआँकेँ बैसाउ हुनका सबहक जे निर्णए हेतनि सएह कएल जाएत। अहाँ हमरा बेक्तीगत रूपे किछु ने कहू। ओना अहाँकेँ जे मन फूड़ए से करू। हम डरेबला नै छी।” जखनि धमकीक कोनो असरि नै भेल तँ शोभाजी पंचायतक मुखिया जीकेँ बजेलखिन। पंचायतक मुखियाजी सेवा निवृत शिक्षक छथि। ओहो अध्यक्ष आ मोहनजी सँ पंजी आपस करैले अाग्रह केलखिन। मुदा पंजी आपस नै भेल। दोसर दिन भोरे स्कूलेपर समुच्चा गामक लोक बैसल। िनर्णए भेल, एतेक दिन प्रधानाध्यापिका जे केली से केली मुदा आब आगूसँ राशि वितरण अथवा गहुमक बँटवारामे कटौती नै करथि। मुखियाजी कहलखिन- “जखनि गहुम आकि प्रोत्साहनक राशिक वितरण हुअए तखनि समितिक सभ सदस्य मौजूद रहथि। हुनके सबहक देख-रेखमे सभ किछु वितरण हुअए।” सभ गोटे मुखिया जीक बातक थोपड़ी बजा समर्थन केलक। मोहनजी नामक लेल शिक्षा समितिक सदस्य रहि गेला। पंचायत समितिक सदस्य भेलाक कारण हुनका ब्लौकेसँ फुरसति नै रहै छेलनि। हुनको दूटा बेटा ओही स्कूलमे पढ़ै छल। दू मासक पछाति स्कूलमे गहुमक वितरण भेल। मोहनजी अपना पत्नीसँ पुछलखिन- “एमकी बौआ सभ स्कूलसँ केते-केते गहुम अनलक?” पत्नी कहलकनि- “पहुलकोसँ किलाे भरि कम्मे अनलक। पहिने दू मासमे पाँच किलो अनैत रहए। ऐ बेर चारिए किलो अनलक।” मोहन जीक माथ ठनकलनि। पता लगलनि जे चोर-चोर मौसेरा भाय। शिक्षा समितिक अध्यक्ष आ सचिवकेँ आब कमीशन भेटए लगलनि। तँए एक किलो गहुम आरो कटौती भऽ गेल। मोहनजी अध्यक्ष लग जा पुछलखिन- “अनील बाबू, एमकी तँ एक किलाे गहुम आरो कटौती भऽ गेल। अहीले एतेक नाटक भेल रहए कि?” अनीलजी कहलखिन- “छोड़ू मोहन भाय, अहूँ ब्लौकमे कोनो योजना जाेतू गऽ। किछु कमाउ-धमाउ। अखनि मौका अछि। अगिला चुनावमे कि हएत कि नै। देखै नै छिऐ, पैघ-सँ-पैघ नेता सभ केतेक नम्हर घोटाला करैए।” मोहनजी अनील जीक बात सुनि अवाक् रहि गेला। बजला किछु नै। किछु फुड़ेबे ने करनि। थोड़े काल पछाति कहलखिन- “ठीक छै, काल्हि हम विद्यालय शिक्षा समितिसँ तियाग पत्र दऽ देब। अहाँ सभकेँ जे मन फूड़त सहए करब।” अगिला दिन मोहनजी शिक्षा समितिसँ तियाग पत्र दऽ देलखिन। मुदा गहुम वितरणपर नजरि राखए लगलखिन। प्राय: दू मासपर गहुमक उठाउ कऽ छात्र-छात्रामे बाँटल जाइ छल। दू मासक एक बेर भेटै छेलै। दिसम्बर आ जनवरीक गहुम तँ बँटा गेल छल। मुदा फरवरी-मार्चक गहुम अप्रीलोमे नै वितरण भेल। मई सेहो बितल। मुदा गहुमक कोनो पता नै। पाँच जूनकेँ स्कूलक प्रधानाध्यापिका आ अध्यक्ष गहुम उठा कऽ आनि सात जूनसँ बँटवारा शुरू केलनि। मोहनजी दरबज्जापर रहथि। तखने किछु लोक हुनका लग आबि कहलकनि- “यौ समितिजी, जनवरी महिना धरिक गहुम भेटल छल। फरवरी, मार्च, अप्रील आ मई ऐ चारू मासक गहुक बाँकीए छल। तइमे दुइए मासक गहुम बाँटल जा रहल अछि। दू मासक गहुम केतए गेल?” मोहनजी कहलखिन- “अच्छा, हम पता लगबै छी।” मोहनजी प्रधानाध्यापिका लग जा पुछलखिन- “दू मासक गहुम की भेल?” प्रधानाध्यापिका कहलकनि- “फरवरी आ मार्चक गहुम लेप्स कऽ गेल। आवंटने नै भेल। अखनि अप्रील-मई मासक गहुम बँटल जा रहल अछि।” मोहन जीक मन नै मानलकनि तँ ओ अध्यक्ष अनीलजी लग जा हुनकोसँ पुछलखिन। मुदा हुनको जवाब सएह। गहुम लेप्स भऽ गेल। मोहन जीक मनमे भेलनि जे सभ कियो मीली भगत कऽ नेने अछि। एकरा सबहक बातपर बिसवास नै करी। विचार केलनि, भरि दिन तँ ब्लौकेमे रहै छी। किएक ने बीइओ आॅफिसमे जा पता लगाबी। अगिला दिन ब्लौक गेला तँ बीइओ आॅफिसमे हाकिमे नै छल। ओइठाम मात्र एकटा शिक्षक छला जे लिखा-पढ़हीक काज सम्हारै छला। पुछलापर ओहो गोले-मटोल जवाब देलकनि। मोहनजी सोचलनि जे अपना बुते नै पता लगत। प्रमुख साहैबकेँ कहए पड़त। ओ तँ दसे मिनटमे पता लगा लेथिन। प्रमुख जीकेँ सभ बात कहलखिन। प्रमुखजी कहलखिन- “एतेक छोट काज लेल अहाँ फिरिसान छी। पाँचे मिनटमे पता लगा दइ छी।” कहैत प्रमुखजी टेबुलपर राखल बेलक बटम टीपलनि। चपरासी आएल। गोदाम मैनेजरक रजिस्टर लऽ बजौने अबैले चपरासीकेँ कलखिन। पाँचे मिनट पछाति चपरासी संग मैनेजर रजिस्टर लऽ कऽ आएल। प्रमुख साहैब मैनेजरसँ चनौरा स्कूलक गहुम उठाबक तारीख पुछलखिन। मैनेजर रजिस्टर देखि बतौलकनि। 31 मईकेँ फरवरी-मार्चक आ 01 जूनकेँ अप्रील-मई मासक गहुम उठाब भेल अछि। उठाब रजिस्टरपर विद्यालय शिक्षा समितिक अध्यक्ष आ प्रधानाध्यापिकाक हस्ताक्षर अछि। आब मोहन जीकेँ बुझैमे कनिको भांगठ नै रहल जे दू मासक गहुम प्रधानाध्यापिका, सचिव आ अध्यक्ष मिलि बेचि लइ गेला। गामपर आबि मोहनजी एक बेर फेर अध्यक्ष अनीलजी लग गेला। पता चललनि। अध्यक्षजी प्रधानाध्यापक ओइठाम गेल अछि। तखनि ओहो प्रधानाध्यापिका ऐठाम एला। ऐठाम देखै छथि जे प्रधानाध्यापिकाक पति शोभाजी, अनीलजी आ रंजनजी सभ गोटे एक्केठाम बैस चाह पीब रहल छथि। मोहन जीकेँ देखिते शोभाजी बजला- “आबह आबह मोहन, कहअ की हाल-चाल छह?” मोहनजी कहलकनि- “ठीके अछि।” बिच्चेमे शोभाजी पत्नीकेँ हाक दैत कहलखिन- “एक कप चाह ओरो नेने आउ।” मोहनजी कहखिन- “हम चाह नै पीब, अखने चौकपर चाह पीलौं हेन।” ताबे विभाजी एक कप चाह आ एक गिलास पानि नेने आबि मोहनजी दिस बढ़ेली। मोहनजी कहलखिन- “बेसी चाह पीलासँ गैस बनि जाइए।” विभाजी कहलखिन- “लीअ ने कथीले हमरा सभपर विगड़ल रहै छी।” मोहनजी चाहक कप पकड़ैत कहलकनि- “अहाँ कोन हमर खेत जोति लेलौं जे हम अहाँपर विगड़ल रहब।” बिच्चेमे रंजनजी पुछलखिन- “आब कहू समितिजी, केम्हर-केम्हर आगमन भेलैए?” चाहक घोंट लैत मोहनजी बजला- “हम पुछैले एलौं हेन जे ठीके दू मासक पोषाहार लेप्स भऽ गेलै?” शोभाजी बिच्चेमे टिपलखिन- “तँ हम सभ फूसि बजै छी? तूँ तँ भरि दिन ब्लौकेमे रहै छह। पता लगा लैह।” अध्यक्ष अनीलजी टोकलकनि- “यौ समितिजी, छोड़ू ने बितलाहा बात। अहूँ कथी-कथीमे लगल रहै छी। किछु कमाएब-धमाएब से नै। यौ अखनि कमाइक मौका भेटल अछि। समैकेँ चिन्हयौ। मौकाक फेदा उठाउ।” बिच्चेमे रंजनजी सेहो अपन बात रखलनि- “देखियौ ने, डीलर सभ छअ-छअ मासपर अंत्योदय योजनाक चाउर-गहुम जनताकेँ दैत अछि। कहाँ कियो किछु बजैए। ओ सभ कमा कऽ बोच भऽ गेल।” मोहनजी तंग होइत बजला- “दुनियाँ-दारीक बात छोड़ू जे विषय लऽ कऽ हम एलौं तैपर चर्चा करू। परसू पंचायत समितिक बैसक छी। हमरा स्कूलक पोषाहार किअए लेप्स भऽ गेल से ओइ बैसकमे अवाज उठाएब। ठीक छै हम जाइ छी।” कहि मोहनजी उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेला। ताबे शोभाजी कहलखिन- “बैसह ने, जलखै खा कऽ जइहअ। किअए एते आगुताएल छह?” मोहनजी कहलकनि- “हमरा आरो काज सभ अछि। जाए दिअ।” कहि मोहनजी विदा भऽ गेला। शोभाजी अनील जीकेँ इशारा केलखिन। अनीलजी ठाढ़ होइत बजला- “रूकू समितिजी, हमहूँ चलब।” “चलब तँ चलू।” मोहनजी कहलखिन। दुनू गोटे संगे विदा भेला। रस्तामे अनीलजी मोहनजीकेँ कलखिन- “यौ समितिजी, गहुम लेप्स नै भेल। हम सभ दू मासक गहुम बेचि लेलौं। अहूँक हिस्सा रखल अछि।” मोहनजी कहलखिन- “हमरा हिस्सा-तिस्सा नै चाही। हमर कोन हिस्सा? गहुम बेचि लेलिऐ तँ रूपैआ तँ हेबे करत। ओइ रूपैआक फेर गहुम कीनि विद्यार्थी सभमे बाँटि दियौ।” अनीलजी कहलखिन- “आब से नै हएत। शोभाबाबू आ रंजनजी से नै करता।” मोहनजी कहलखिन- “तँ ठीक छै। हम गौआँकेँ सभ बात कहबै जे दू मासक गहुम अध्यक्ष, सचिव आ प्रधानाध्यापिका मिलि कऽ बेचि लेलक।” अनीलजी कहलकनि- “ठीक छै अहाँ जाउ, हम चौक होइत भेल अबै छी।” मोहनजी बढ़ि गेला। अनीलजी घूमि कऽ शोभा जीक दरबज्जापर एला। रंजनजी आ शोभाजी बैसले रहथि। शोभाजी पुछलकनि- “की मोहना बात बुझलक आकि नै।” “नै बुझलक। कहलक हम गौआँ सभकेँ कहबै।” रंजनजी बजला- “ठीक छै। कहए दिऔ। हम सभ देख लेब।” शोभाजी बजला- “मोहन पंचायत समितिमे की जीतल ओ केकराे मोजरे ने करैए। अपनाकेँ बड़का नेता बुझैए। ओ की कोनाे योजनामे गरबड़ नै करैए।” अनीलजी कहलखिन- “जौं गौआँकेँ गहुम बेचब पता लगि जाएत तँ बुझू जे आगि लगि जाएत। केकर-केकर मुँह बन्न करब। लोक अपना सभकेँ की-की कहत से नै जानि। समाजमे बड़का बदनामी हएत।” शोभाजी पुछलखिन- “अहाँक की विचार अछि?” अनीलजी कहलखिन- “हम तँ कहब जे गहुम कीनि कऽ बँटबा दियौ।” शोभाजी आ रंजन एक्के संग बात कटैत बजला- “नै से तँ नै हएत। आखिर हमरो सबहक किछु इज्जत अछि। जे खा गेलिऐ से खा गेलिऐ। जौं गहुम कीनि कऽ बाँटब तँ मोहना कहत, खेलहा गहुम बोकरा देलिऐ। अहाँ बेकार डराइ छिऐ। यौ मोहन असगरे अछि। अपना सभ तीन गोटे छी।” अनील जीक मुँहसँ निकललनि- “अखनि ने असगरे अछि आ जखनि गौआँकेँ कहत तँ भरि गामे ने भऽ जाएत।” शोभाजी बजला- “हएत तँ हएत। की कऽ लेत। यएह ने हएत जे किछु टाका बीइओ साहैबकेँ देबए पड़त। हम सभ बूझि लेब। अहाँ चिन्ता जुनि करू।” जखनि गौआँकेँ पता लगल तँ समुच्चा गाममे आगि लगि गेल। चौक-चौराहासँ लऽ कऽ दलान सभपर सेहो मात्र अही गपक चर्चा हुअए लगल। गौआँ सभ आवेदन लिखि सभ गोटे सही छाप करै गेल। अगिला दिन ब्लौक जा एकटा आवेदन प्रमुखजीकेँ आ एकटा बीडीओ साहैबकेँ देलक। आवेदन देखि बीडीओ साहैबक विचार भेलनि जे थानामे एफ.आइ.आर. दर्ज करौल जाए। मुदा प्रमुखजी रोकैत कहलखिन- “दू दिन थम्हू। जौं स्कूलक हेड मास्टर गहुम बाँटि देत तँ ठीक नै तँ सहए करब।” जखनि शोभा जीकेँ पता चललनि जे बीडीओ साहैब एफ.आइ.आर. करैले तैयार भऽ गेल अछि तँ माथ चकराए लगलनि। सोचए लगला, गहुमक पाइ तँ सचिवो आ अध्यक्षो खेलक। मुदा फँसत तँ हेड मास्टर। जौं ओ सभ फँसबो करत तँ की हएत। हमर पत्नीकेँ तँ नोकरीए चलि जाएत। अनीलजी आ रंजन जीकेँ बजा कहलखिन- “बात बढ़ि गेल। एफ.आइ.आर. होइबला अछि।” अनीलजी कहलकनि- “हम तँ पहिने कहने रही जे मोहनक बात मानि लिऔ।” शोभाजी बिच्चेमे बात कटैत बजला- “पछिला बातकेँ छोड़ू आब की करए पड़त से करू। जइसँ जान बँचत।” रंजनजी बजलखिन- “जिला परिषदक सदस्य लोकेशजी हमरा दोसक सार छी। हुनका ब्लौकपर पकड़ छन्हि। हुनकासँ गप कऽ मामिलाक रफा-दफा करबैक आग्रह करबनि। हम आ अनीलजी अखने जाइ छी।” सएह केलक अनीलजी, रंजनजी दुनू गोटे जिला परिषदक सदस्य लोकेश जीसँ भेँट कऽ सभ बात कहलकनि। लोकेश जीकेँ पहिनेसँ सभ बात बूझल छेलनि। कहलखिन- “अहाँ सभ बड़ जुलुम केलौं। धिया-पुताक गहुम बेचि लेलौं। ऐसँ पैघ आरो कोनो गलती होइ छै?” रंजनजी कहलखिन- “आब तँ जे भऽ गेल से भऽ गेल। ई मामिला आगू नै बढ़ए से जोगार कऽ दिऔ।” लोकेशजी- “बात तँ बड़ आगू बढ़ि गेल अछि। ओना हम प्रमुख साहैब, मोहन आ बीडीओ साहैबसँ गप करै छी। अहाँ सभ रूकू।” लोकेशजी प्रमुख जीक कक्षमे गेला। ओतै मोहनोजी बैसल रहथि। लोकेशजी प्रमुख साहैबकेँ कहलखिन- “सर, प्राथमिक विद्यालय चनौराबला मामिलाकेँ आगू नै बढ़ए दिऔ। अहाँ जे कहबै सएह हएत। मोहनो जीक प्रतिष्ठा रहि जेतनि।” प्रमुखजी कहलखिन- “ठीक छै, मोहनजी सँ गप करू।” लोकेशजी मोहनकेँ पुछलखिन- “की यौ मोहनजी, अहाँक की विचार?” मोहनजी कहलखिन- “यौ पार्षदजी, धिया-पुताक पोषाहार ई सभ बेचि लेलक। गहुम बेचलासँ जे रूपैआ भेल से तँ हेबे करत। ओही रूपैआक गहुम कीनि बाँटि देथुन, हमरा तरफसँ सभ गप खतम।” प्रमुखजी कहलखिन- “मोहनजी ठीके कहै छथि। अहाँ स्कूलपर जा गहुम बँटबा दियौ। हम अगिला कोनो कार्रवाइ नै हुअए देबै।” लोकेशजी- “जी सर, हम मोहनजीक विचारसँ सहमत छी। हम सभ पंचायत प्रतिनिधि छी। मोहनजीक प्रतिष्ठा हमरो प्रतिष्ठा छी।” अगिला दिन आठ बजे भिनसरमे चनौरा स्कूलपर समुच्चा गौआँक बैसार भेल। शिक्षा समितिक सदस्य, अध्यक्ष, सचिव आ समितिक सदस्य मोहनजी तथा जिला पार्षद लोकेशजी सेहो छला। बैसारक अध्यक्षता लोकेशेजी केलनि। बड़ घमर्थन भेल। अंतमे अध्यक्ष िनर्णए देलखिन- “चारि मासमे दू मासक गहुम छात्र सभकेँ पहिने भेटल अछि। बँकियौता दू मासक गहुम सात दिनक भीतर प्रधानाध्यापिका विद्यार्थी सबहक बीच बँटती।” प्रधानाध्यापिका विभा देवी ठाढ़ भऽ बजली- “जे भऽ गेल ओकरा अहाँ सभ बिसरि जाउ। अगिला रवि दिन हम बँकियौता दू मासक गहुम सभ विद्यार्थीक बीच बाँटब।” सभसँ पैघ पूजा रेलबेमे भेकेन्सी निकलल छल। मूल आवेदन पत्रक संगे सभ प्रमाण पत्रकेँ राजपत्रित पदाधिकारी दुआरा अभिप्रमाणित छाया प्रति संलग्ण करनाइ अनिवार्य छल। नै तँ आवेदने रद्द भऽ जाएत। हमरा देरीसँ पता लागल। एक सप्ताहक समए अवासीय एवं जाति प्रमाण पत्र बनबैमे लगि गेल। आइ आवेदनक अंतिम दिन छल। मुदा हमर प्रमाणक छाया प्रति अभिप्रमाणित नै भेल छल। हम बड़ चिन्तित छेलौं। भिनसरे आठ बजे घोघरडीहा विदा भेलौं सोचलौं, ओतए तँ केतेको राजपत्रित पदाधिकारी सभ छथि, किनकोसँ करा लेब। आ घोघरडीहे डाकघरसँ स्पीड पोस्ट कऽ देबै। ओहीठाम एकटा डाक्टर छथि नाओं छियनि डाक्टर ओम नारायण कर्ण। सभ गोटे हुनका डाक्टर नारायण बाबू कहै छन्हि। हुनकासँ नीक परिचए अछि। केतेको रोगी सभकेँ हुनकासँ इलाज करौने छी। जइसँ डाक्टर साहैबकेँ नीक आमदनी भेल छन्हि। नै तँ कमतीमे दू हजार टाकासँ बेसी हमरा दुआरा डाक्टर साहैबकेँ आमद भेल हेतनि। हमरा पूरा बिसवास छल जे डाक्टर नारायण बाबू हमर प्रमाण पत्रक छाया प्रतिकेँ अभिप्रमाणित कऽ देता। हम हुनका डेरापर पहुँचलौं ओ टी.वी देखै छेला। हमरा देखिते हुनकर पत्नी हुनका कहलकनि- “रायजी एला हेन।” बरबरि जे रोगी लऽ कऽ हुनका डेरापर जाइत रही तँए डाक्टर साहैबक पत्नीओ हमरा चिन्है छेली। हुनकर क्लिनिक डेरापर छन्हि। डाक्टर साहैब टी.बी देखनाइ छोड़ि हमरा लग आबि बजला- “बहुत दिनपर एलौं हेन। कोनो राेगी अछि की?” हम कहलियनि- “नै सर। आइ रोगी नै अछि। आइ तँ हम अपन प्रमाण पत्रक छाया प्रतिकेँ अभिप्रमाणित करबए एलौं। आइ आवेदनक अंतिम तारीख छी।” डाक्टर साहैब बजला- “हमरा लग तँ मोहर अछि नै। उ तँ अस्पतालेमे रहैए। बिनु मोहरक केना हएत।” हम कहलियनि- “सर, अपने अभिप्रमाणित कऽ देल जाउ। हम अस्पताल जा मोहर लगाबा लेब।” डाक्टर साहैब कहलनि- “अखनि तँ हमरा बोहनियो ने भेल अछि। बिनु बोहनिक काज केने अझुका दिन फोंके चलि जाएत।” हमरा डाक्टर साहैबक ऐ बेवहारपर दुख भेल। मुदा बजलौं किछु नै। ओतएसँ विदा भऽ सड़कपर एलौं। सोचलौं आबि की करी। केतए जाइ। मन पड़ल। प्रखण्डक साहायक अभियंतो ई काज कऽ सकै छथि। हुनकोसँ तँ जान-पहचान अछिए। प्रधानमंत्री सड़क जे बनैत रहए तँ इंजीनियर साहैबकेँ हम चाह-जलपान करौने रहियनि। हुनकर मोटर साइकिल खराप भऽ गेल रहनि। तँ हमहीं गुड़का कऽ अपना दरबज्जापर लऽ गेल रही। ऐसँ इंजीनियर साहैब बड़ खुशी भेल रहथि। कहने छला कहियो कोनो काज हएत तँ हमरा लग आएब। शर्मा जीक मकानमे डेरा अछि। शर्मा जीक मकान तँ देखले अछि। कारण पहिने जे दुर्गा बाबू बीडीओ साहैब रहथिन हुनको डेरा तँ शर्मो जीक मकानमे रहनि। एक-आध बेर बीडीओ साहैबक डेरापर गेले छी। शर्मा जीक मकान दिस विदा भेलौं। इंजीनियर साहैब बाहरेमे बैसल रहथि। टेबुलपर चाह रखल रहनि। अपने पेपर पढ़ैत रहथि। लगमे जा कहलियनि- “परनाम सर।” पेपरपरसँ नजरि हटा हमरा दिस देखैत बजला- “बाजू कोन काज अछि।” हम कहलियन- “अभिप्रमाणित करेबाक अछि।” ओ बजला- “अखनि हमरा लग समए नै अछि। देखै नै छिऐ दाढ़ीओ नै कटेलौं हेन। तखनि स्नान-पूजा करब। जलखै कऽ तुरन्त मधुबनी जाएब। जिलामे एगारह बजैसँ मिटिंग अछि। नअ बाजि रहल अछि।” हम पुन: निवेदन करैत कहलियनि- “सर, आवेदनक तँ आइ अंतिम दिन छिऐ। बड़ कृपा हएत जे ई काज अपने कऽ दैतिऐ।” कहलनि- “बोले न समय नहीं है। दुसरे जगह चले जाइए। अस्पताल है ब्लौक है मबेशी अस्पताल है। कहीं भी अभिप्रमाणित हो सकता है।” हम निराश भऽ ओतएसँ विदा भेलौं। हमरा भेल जे आब हमर आवेदन पत्र रखले रहि जाएत। सोची, आब केतए जाइ। अही गुनधुनमे आगू बढ़लौं तँ एकटा मकानक गेँटपर लिखल आलोक कुमार, प्रखण्ड पशुपालन पदाधिकारी, देखलिऐ। केबाड़ भीतरसँ बन्न रहै। हम केबाड़ ढकढकेलिऐ। एक्के मिनट पछाति एकटा युवक निकलला। हुनकर पूरा शरीर भीजल रहनि। गमछा पहिरने रहथि। पुछलियनि- “साइत अपने...?” बिच्चेमे हमर बात लपकि बजला- “हँ, हम आलोक कुमार। प्रखण्ड पशुपालन पदाधिकारी, घोघरडीहा छी। बाजू?” कहलियनि- “अभिप्रमाणित करबैक छल सर। मुदा अखनि अपने स्नानामे लगल छी फेर पूजा करब तेकर बाद ने हमर काज।” ओसारपर राखल चौकीपर बैसैले कहलनि। हम जा कऽ ओइपर बैसलौं। ओ अपने भीतर गेला। कहलनि जे एतए बैसू अबै छी। पाँच-सात मिनट पछाति आबि पुछलनि- “आब कहू कोन प्रमाण पत्रपर अभिप्रमाणित करेबाक अछि।” हम अपन प्रमाण पत्र सबहक छाया प्रतिक संग मूल प्रति सेहो हुनका आगूमे टेबुलपर रखि देलयनि। देख-सुनि सभ प्रमाण पत्रक छाया प्रतिपर अभिप्रमाणित करैत कहलनि- “अहाँ पूजाक बात करै छेलौं...?” हम चुप्पे रहलौं आकि ओ पुन: बजला- “हम जे अपनेक काज कऽ देलौं हमरा लेल सभसँ पैघ पूजा यएह भेल। हम सेवाकेँ पूजा बुझै छी।” हम डाक्टर साहैबक ई बात सुनि किछु सोचए लगलौं। ताबए सभ कागत पोलिथिन झोरामे लऽ नेने रही। हुनक ई बात हमरा िदमागमे ऐ तरहेँ जगह बना छेकि नेने छल जे किछु बाजि नै पबैत रही। अंतो-अंत बिनु किछु बजने हाथक इशारासँ प्रणाम करैत ओइठामसँ निकलि डाकघर दिस िवदा भऽ गेलौं। भोँट पंचायत चुनावक समए रहए। प्रचार-प्रसार पूरा जोर पकड़ने रहए। सभ उम्मीदवारक आदमी साइकिलपर हौरन बान्हि मैकसँ टोले-टोल प्रचार करै छल। चौक-चौराहापर लॉडस्पीकरक तेतेक ने अवाज होइ जे कान देनाइ मुस्कील। हम तँ बुझू चौकपर गेनाइए छोड़ि देने रही। जखैनकि उम्मीदवार सभ तरफसँ भोटरकेँ चाह-जलखैक अलाबे दारूओ भेटै छेलै। मंगनीमे चाह-जलखै करैबला सभ सबेरेसँ चौक पकड़ि लइ छल। केते गोटे तँ एहनो अछि जे दू-दू तीन-तीन उम्मीवारक चाह-जलखै करै छल। ताड़ीओ आ पोलिथिनो पीबैबला सभ अखनि अंग्रेजी दारू पीबैए। मरद कि जे जनानीओ सभ हेँज बान्हि-बान्हि अँगने-अँगने अपना उम्मीदवारक पक्षमे घूमि-घूमि भोँट मंगैए। उम्मीदवारकेँ तँ अखनि बुझू नीने गाइब। एकटा उम्मीदवार उठै छल तँ दोसर उम्मीदवार आबि दरबज्जापर बैस जाइ छल। सभकेँ चाह-पान तँ करबैए पड़ै छल। पत्नी तँ चाह बनबैत-बनबैत फिरीसान छथि। की करब जँ कियो दरबज्जापर एता तँ कम-सँ-कम एक कप चाहोक आग्रह तँ करबे करबनि। एक दिनक गप छी। दरबज्जापर बैसल रही। लगमे सरपंचक उम्मीदवार झमेली दास सेहो रहथि। दुनू गोटे चाह पीबैत रही। तखने हमर हरवाहा रबिया आएल आ कहलक- “गिरहत, कनी खैनी दियौ।” हम कहलिऐ जे जा पहिने अँगना जा आ गिरहतनीसँ चाह मांगि पीने आबह तखनि तमाकुल खइहअ। दसे मिनट पछाति दरबज्जापर आएल रबिया। झमेली दास ताबए चलि गेल छला। रबिया देखैमे तँ बुड़बके जकाँ लगैए मुदा अछि बड़ चंगला। हम ओकरा चुनौटी दैत कहलिऐ- “लगाबह, हमहूँ खाएब। अच्छा एकटा कहअ जे भोँट केकरा-केकरा देबहक? उम्मीदवार सभ तँ अखनि खूब दारू पीयबैत अछि। तोरा कहियो परि लगलह कि नै?” रबिया बाजल- “यौ गिरहत, अखने तँ समए अछि। ई सभ जखनि जीत जाएत तखनि फेर केकरोसँ गपो करत। तँए जएह हाथ सएह साथ। भोँट तँ जेकरा मन हएत तेकरे देब। मुदा खाएब-पीअब सबहक।” हम कहलिऐ- “ई नीक काज नै छी। अपन इमान अपने बँचबए पड़ै छै। नीक लोककेँ चुनिहअ।” रबिया- “ई की कहै छिऐ गिरहत। नीक केकरा कहै छिऐ। पछिला बेर गोपाल बाबूकेँ सभ मिलि मुखयामे जीतौलिऐ। मुदा आइ देखियौ गोपालबाबूकेँ की-सँ-की भऽ गेला। पहिने तँ एकटा कटहीओ साइकिल नै रहनि। आब किदनि तँ कहै छै हँ बलरो गाड़ी। ओहीपर हरदम चढ़ि-चढ़ि गामसँ हरिदम बाहरे रहैए। मकानो गाममे नै दरिभंगामे जा कऽ बनेलथि हेन।” हम कहलिऐ- “हौ अहिना होइ छै। सभ कियो कमाइए। देखै नै छहक एमेले-एमपीकेँ पाँचे सालमे करोड़पति-अरबपति भऽ जाइत अछि।” रबिया बाजल- “होइते हएत। जखनि मुखिया सभ एते कमाइए जेकरा एक्को पाइ दरमाहा नै छै आ ओकरा सभकेँ तँ दरमहो आ सुनै छिऐ जरकीनो भत्ता भेटै छै।” हम कहलिऐ- “अच्छा, छोड़ह ई गप-सप्प ई कहअ जे वाडपंचमे केकरा भोँट देबहक। ओइमे तँ तोहर दियादे बुधन ठाढ़ छह। आन उम्मीदवारसँ आदमीओ ठीक अछि।” हमर बात कटैत बिच्चेमे रबिया बाजल- “की कहलिऐ गिरहत, नीक आदमी। यौ उ तँ गाममे सभसँ गिरहकट अादमी अछि।” पुछलिऐ- “से केना?” कहलक- “परुकाँ साल हमर बकरी ओकर दसटा कोबीक गाछ खा नेने रहए। तइले ओकर मौगी हमरा बिखनि-बिखनि गारि देने रहए। हमरो ओकर गारिक बड़ चोट लगल अछि। हम अप्पन भोँट ओकरा किन्नहु नै देब।” सोइरी छछारब मिथिलांचलमे एकटा बजार अछि झंझारपुर जे अनुमण्डल सेहो छी। झंझारपुरमे एकटा मध्यम किसान छला। नाओं रहनि टुनटुन। हुनका तीनटा बेटा आ दूटा बेटी। तीनू बेटाक बिआह भऽ गेल छन्हि आ दुनू बेटीओक बिआह भऽ गेल छन्हि। ओना दुरागमन पछाइतो दुनू बेटी बेसी काल नहिरेमे रहै छन्हि। दूटा बेटा पंचायत शिक्षक आ एकटा बेटा रोजगार सेवक छथिन। जेठका जमाए पंचायत सचिव छथिन। पहिने तँ ओ दलपति छला। सरकार दलपति सभकेँ पंचायत सेवक बना देलकनि तहीमे ओ पंचायत सेवक भऽ गेला। एम्हर पंचायत सेवककेँ सरकार पंचायत सचिव बना देलक। बुझू जे ओ सभ तँ आब पंचायतक हाकिम भऽ गेला। हुनका सभकेँ नीक आमदनी छन्हि। किएक तँ हुनका सभकेँ इंदिरा अवास आ आनो-आन योजना सभमे कमीशन भेटै छन्हि। जन्म आ मृत्यु प्रमाण पत्र बनबैमे सेहो रूपैआ लइ छथिन। टुनटुन जीक जेठका जमाएकेँ सासुरमे नीक मानदान होइ छन्हि। किएक ने हेतनि। सासुर जखनि अबै छथिन तँ खरच-बरचपर तूलल रहै छथिन। सासु-सरहोजि लेल फूटा-फूटा मिठाइ, कपड़ा आ धिया-पुता लेल सेहो कपड़ा-लत्ताक संग बिस्कुट, मिठाइ, चकलेट इत्यादि अलग-अलग। टुनटुन जीक छोटका जमाए राकेश जीकेँ पढ़ैमे चन्सगर रहितो अखनि धरि कोनो नोकरी नै भेटल रहनि। ओ मैट्रिकसँ लऽ कऽ एम.ए. धरि प्रथम श्रेणीसँ पास करैत रहला। साले भरि पहिने हुनकर कनियाँ दुरागमन भऽ सासुर आएल रहनि। मुदा कनियाँकेँ बेसी समए नहिरेमे रहए दइ छथिन। नोकरी नै भेने राकेशजी दरभंगाक एकटा निजि विद्यालयमे कार्यरत् छथि। मुदा तैयो सरकारी नोकरी लेल अखनो प्रतियोगिता परीक्षा सभमे बैसैत रहै छथिन। टुनटुन जीकेँ एक्केटा बहिन ओहो मसोमाते। हुनका दूटा बेटा आ दूटा बेटी छन्हि। दुनू बेटा दिल्लीमे नोकरी करै छथिन। जेठकी बेटी रीना मामा-मामी लग रहि पढ़ैए। छोटकी बेटी वीणा माइए संग रहैए। टुनटुन जीक जेठकी बेटी मालतीकेँ कल्याणक जाेगता रहनि। जन्माशौचक समए लगिचाएल रहनि। ओकर भौजाइ सभ सोचए, मलतीकेँ जँ भगवान बेटा दऽ दइतथिन तँ हमरा सभकेँ पहुनासँ सोइरी छछारला पछाति नीक आमदनी होइतए। ओना तँ पहिल बेर छिऐ बेटीओ भेने तँ नीक आमदनी हेबे करत। जेठकी भौजाइ सोचैत, हम जेठ भौजाइ छी तँए सोइरी हम छछारब आ पहुनासँ नीक गहना लेब। छोटकी सोचैत, हम तँ सभसँ छोट छी तँए सोइरी हम नीपब। पाहुन नीक कमाइ छथिन। नीक दान-दछिना भेटबै करत। मझिली भौजाइ सोचैत, हमहीं मालती बुच्चीक बेसी खियाल रखैत एलौं। पाहुनो अबै छथिन तँ ननदि-ननदोसिकेँ सुतैले हमहीं अपन घर छोड़ि दइ छी आ अपने ओसारिपर सासु लग सुतै छी। बौआक बाबूजी दलानपर जा सुतै छथि। तँए मालती हमरे सोइरी छछारैले कहत। जौं दोसर कियो छछारत तँ कहियो अपन घर सुतैले नै देबनि। मालतीकेँ जन्माशौच भेल। बेटी भेलनि। मझिली भौजाइ मालतीक दुल्हाकेँ मोबाइलसँ खबरि देलकनि। छठिहारसँ दू दिन पहिने मालतीक दुल्हा विनोदजी एला। आइ भिनसरे विनोदजी दू हजार टाका जेठका सारक हाथमे दऽ नीकसँ भोज-भातक ओरियान करैले कहलकनि। जलखै खा छोटका सारकेँ संग बजार गेला। बजारसँ मालती संग बेटी, तीनू सरहोजि आ सासु लेल कपड़ा कीनि कऽ लऽ अनला। आइ छठिहार छी। भिनसरेसँ भौजाइ सभ अँगना-घर नीपब शुरू केलनि। आब चर्चा भेल सोइरी के छछारत। जेठकी भौजाइ बजली- “सभसँ जेठ हम छी। पहिल अधिकार हमर अछि। मालतीक पहिल बच्चा छिऐ तँए सोइरी हम छछारब?” छोटकी बजली- “सभसँ छोट हम छी। तँए सोइरी हम छछारब।” तैपर जेठकी भौजाइ फरकि कऽ बजली- “अहाँ सभसँ छोट छी तँ छोटकी ननदि ललिताक सोइरी छछारब। ओकरो पएर तँ भारीए अछि। पाँचे मास पछाति तँ बच्चा जनमत।” छोटकी भौजाइ बिच्चेमे टिपलक- “अहीं ललिता बुच्चीक सोइरी छछारब।” मझिली भौजाइ सभ गप सुनै छेली। हुनको रहल नै गेलनि बजली- “जखनि पहुना अबै छथिन। तँ हुनका सभकेँ सुतैले हम अपन घर दइ छियनि। आ अखनि सोइरी छछारैले घंघौज भऽ रहल अछि।” तैपर जेठकी बजली- “अहाँ सुतैले अपन घर दइ छियनि ने तँ अहीं सोइरी छछारू। अहीं दान-दछिना लिअ गऽ।” तैपर छोटकी बजली- “हम जे मालती बुच्चीक कपड़ा खिचै छी आ पहुनाकेँ नीक-निकुत खेनाइ बना खुआबै छी। तेकर कोनो मानि नै?” मालती माए सभ गप सुनै छेलखिन। ओ सोइरी घरक मोख लग जा बेटीकेँ कहलखिन- “सोइरी छछारैक तीनू दियादनीक बीच घंघौज भऽ रहल अछि। केकरा कहबीहीन?” मालती असमंजसमे पड़ि गेली। सोचए लगली, तीनटा भौाजइ अछि। एक गोटेकेँ कहब तँ दू गोटे रूसत। मुदा छछारत तँ कियो एक्के गोटे। बेटीकेँ चुप देखि माए फेरो बजली- “बाज ने, केकरासँ छछरबेवहीन?” मालती माएकेँ पुछलखिन- “तोहर की विचार छौ?” माएकेँ छोटकी पुतोहु बेसी मानै छथिन। राइते-राति जँतबो करै छथिन। ई सभ मन पड़लनि। माए बजली- “छोटकीकेँ कहीन सोइरी छछारैले।” तैपर मालती बजली- “मझिली भौजी हमरा सभसँ बेसी मानैए। जखनि सेवकजी अबै छथिन तँ अपन घर हमरा सभ लेल छोड़ि अपने दुनू परानी अनतए सुतै छथिन।” माए कहलखिन- “तोरा जेकरासँ मन हाेउ तेकरासँ सोइरी नीपा। हमरा लेल तँ तीनू पुतोहु एक्के रंग।” मालती अपना दुल्हा सेवक जीसँ सेहो विचार लेब जरूरी बुझलनि। ऊहो मझिलीए सरहोजिसँ निपबैले कहलखिन। मझिली भौजाइ सोइरी छछारलक। तइले छोटकी आ जेठकी भौजाइकेँ बड़ दुख भेलनि। मुदा दुनूमे सँ कियो किछु बजली नै। पाँचे मास पछाति टुनटुन जीक छोटकी बेटी ललिताकेँ बेटा जनमल। आइ छठिहार छी। हुनकर दुल्हो नै एलखिन आ ने कियो आने सासुरसँ एलनि। ललिताक माए तीनू पुतोहुसँ बेरा-बेरी पुछलखिन जे सोइरी के नीपब। जेठकी पुतोहु कहलकनि- “मालती बुच्चीकेँ बेटी भेल तँ मझिली सोइरी निपलक। दान-दछिना लेलक। ललिताक दुल्हा तँ पाइबला नै छथिन। ओकरो साेइरी मझिलीए किअए ने छछारत।” मझिली पुतोहुकेँ कहल गेल तँ ओ बजली- “हम तँ मालती बुच्चीक सोइरी छछारनहियेँ रही। आब छोटकी नै तँ जेठकी छछारती। हुनके सबहक पार छियनि।” जखनि छोटकी पुतोहुसँ कहल गेल तँ खौझाइत जवाब देलखिन- “हम किएक छछारौं। जेठका पाहुन अबै छथिन तँ नीक-निकुत बना-बना हम खुअबियनि, कपड़ा-लत्ता हम खींचौं आ आमदनी बेर आएल तँ साेइरी निपलक मझिली। ओकरे कहथुन वएह नीपत।” तीनू दियादनी एक्के बात सोचए। छोटका पाहुन तँ पाइबला छथिन ने। कहुना कऽ दरिभंगामे खानगी स्कूलमे पढ़ा सरकारी नोकरी लेल प्रयास कऽ रहल छथिन। जहिया-कहियो सासुर अबै छथिन तँ दू-चारि डिब्बा साधारनी बिस्कूट लऽ कऽ। मिठाइ तँ कहियो नाओं लेल नै अनने हेता। सासु आ हमरा सभकेँ के देत कपड़ा। ललितो बुच्चीकेँ तँ आफदे रहै छन्हि। तेलो-साबुन ले लल्ला-छुच्छी। साेइरी जे छछारब से कोनो गहना-जेबर देत। ललिताक माए फेर मझिली पुतोहु लग जा कऽ कहलखिन- “जेठकी आ छोटकी दुनू गोरे अहीं नाओं कहैए। मालतीक दुल्हा पाइबला अछि तँए ओकर सोइरी अहाँ नीपलिऐ आ ललिताक के नीपत? मालती दुल्हासँ गहना-जेबर अहाँ लेलिऐ तइले ओहो दुनू दियादनीकेँ पछताबा होइ छै जे हम छछारितौं तँ हमरा होइतए। ललिताक तँ सहजे सभ बुझै छै जे ओ किछु दइबला नै अछि। उ दुनू दियादनी तँ खुलिए कऽ कहि देलक जे जाथुन ओकरे कहिहथिन।” मझिली कहलकनि- “से जे ई कहै छथिन, सेवकजी हमरा गहना देलखिन से ई देखने रहथिन? गहना दइत तँ पहिरतौं आकि नुका कऽ रखने रहितौं। अखनि हमर मोनो भारी लगैए। मथो दुखाइए। भितरे-भीतर बोखार रहैए। सर्दी-कफ भऽ गेल अछि। सुनै नै छथिन उकासीओ होइत रहैए। साेइरी छछारने तँ नहाए पड़त जइसँ आरो बेसी मोन खराप भऽ जाएत। तखनि हमरा धिया-पुताकेँ के करत। हम नै छछारबनि।” सासु कहलखिन- “जेठका पाहुन जौं गहना नै देने हेता तँ रूपैआ-पौसा तँ देनैहीए हेता। कोनो कि हमरा सभकेँ देखा-सुना कऽ देलनि। किछु नै देने हेता से नै मानब। हम सभ गप बुझै छी। अहाँ सभ सोचै छिऐ जे ललिताक दुल्हा तँ सोइरी नीपाइ किछु देत नै तँए अहाँ सभ एना छिरहारा खेलाइ छी। अहाँ सभले कि ललिता सोइरीएमे बैसल रहत आकि निकलबो करत। अहाँ सभ नै नीपै जाएब तँ हम अपनेसँ नीपि देबै। हमर तँ बेटी छी हम थोड़े छोड़ि देबै। जाउ अहाँ सभ सुतू गऽ।” ई कहि माए ललिता लग गेली। माएकेँ देखिते ललिता पुछलकनि- “के निपतौ?” “कियो नै तैयार होइ छौ। तोहर दुल्हा कोनो पाइबला छथुन जे सोइरी नीपाइ गहना-जेबर देबहीन। बुझहै नै छीही छुच्छाकेँ के पुच्छा। हम अपनेसँ नीपब। तूँ चिन्ता नै कर।” ललिता बजली- “माए, तोहर नीपनाइ नीक हेतौ। तीन-तीनटा भौजाइ रहितौ माए सोइरी निपलकै। लोक की कहत?” “एकटा काज कर। दीदीक बेटी रीना अछि ने ओकरे कहीन वएह नीप देत। जौं भगवान हमरो दिन नीक केलक तँ रीनाकेँ कोनो गहना दऽ देब। अखनि तँ हमरे दिन भारी अछि जे नैहर ओगरने छी।” माए बेटीकेँ संतोष दैत कहलखिन- “अच्छा चिन्ता जुनि कर। भगवान जरूर दुख बुझथुहुन। हँ गै हँसलै घर बसै छै।” रीना ललिताक सोइरी नीपलक। भोज-भातक कोनो आरियान नै रहए। भगवानक घरमे देर छै अन्धेर नै छै। ललिताक दुल्हा राकेश जीकेँ केनरा बैंकमे नौकरी भेलनि। आब तँ ऊहो पाइबला लोक भऽ गेला। सासुरमे हुनको मान-दान बढ़ि गेलनि। पहुलका बच्चाक जन्मक तीन बर्ख पछाति ललिताकेँ दोसर बच्चा भेल। एमकी बेटी रहए। बेटी रहितौ तीनू भौजाइ सोइरी छछारैले उपरौंज करै छेलखिन। जेठकी भौजाइ सोचैत, सोइरी हम छछारब। मझिली तँ जेठकी ननदि मालतीक सोइरी छछारि दान-दछिना पाबिए नेने अछि। छोटकी भौजाइ सौचैत ललिता हमर छोटकी ननदि छी आ हम ओकर छोटकी भौजाइ तँए हमर छछारब उचित। मझिली भौजाइ किछु आर सौचैत, हुनकर सोच ई जे जेठकी आ छोटकीमे सोइरी छछारैले रक्का-टोकी हेबे करत, किएक तँ ओकरा दुनू गोटेमे भैंसा-भैंसीक कनारि अछि। जखने दुनू गोटेमे बात-बताबलि हएत तँ कहब। से नै तँ अहाँ दुनू गोटे अस्थिर रहू हम छछारबै। छोटका पाहुन तँ बैंकमे हाकिम भऽ गेला। जेठका पाहुनसँ बेसी दान-दछिना देबे करता। आइ छठिहार छी। राकेशजी अपने तँ नै एला मुदा हुनकर पिताजी एलखिन। जेठका सारक नाउँए पाँच हजार टाका पठा देने छथिन। नीकसँ भोज-भात करैले कहने छथिन आ ललिता जन्मलही बेटी, बेटा, सासु आ तीनू सरहोजि लेल कपड़ा सेहो कीनि कऽ दइले कहने रहथिन। माए ललितासँ पुछलखिन- “सोइरी छछारैले केकरा कहबीहीन। ऐ बेर तँ तीनू भौजाइ मुँह बौने छौ।” ललिताकेँ पछिला सभ गप मने रहनि। कहलखिन- “सोइरी रीना छछारत। ओकर पछिलो दान-दछिना बाँकीए छै। दुनू सोइरीक दान-दछिना अही बेर देबै।” माए कहलखिन- “बड़ नीक विचार। भगवान तोरा सभकेँ नीक करथुन।” ननदि-भौजाइ लौकही बजारसँ उत्तर-पूबक कोणमे एकटा गाम छै पातो। ने बड़ पैघ आ ने बड़ छोट। पातो सप्तरी जिलाक नेपाल अधिराज्यमे पड़ैए। भारत आ नेपालक सीमासँ लगधग तीन किलो मिटर उत्तर। पातो गामक पच्छिम एकटा सड़क अछि जे फत्तेपुर चौकसँ नेपालक मुख्य सड़क राजमार्गमे कठौना लग मिलैत अछि। पातो गाममे एकटा बड़ पैघ समाजवादी लोक भेल छला। हुनकर नाओं हीरा लाल छेलनि। हुनका सभ गोटे नेताजी कहि आदर करै छेलनि। ओना ओ राजनीति सेहो करै छला। हुनका दूटा बेटा आ दूटा बेटी रहनि। जेठका बेटाक नाओं अमित आ छोटकाक नाओं सुमीत। जेठकी बेटीक नाओं लालति आ छोटकीक नाओं आरती रहनि। सभसँ जेठ बेटीए छेली जे ससुरवास छेली। ओइसँ छोट दुनू बेटा आ सभसँ छोट आरती। अमितक बिआह भऽ गेल रहनि। हुनको कनियाँ बसै छेली। एकटा बेटी आ दूटा बेटा छेलनि। जेठ बेटीए रहनि करीब दस बर्खक। आरती भतिजा-भतिजीकेँ बड़ मानै छेली। पढ़ैले जाइत तँ चौकपर सँ बिस्कुट-चकलेट नेने अबैत आ भतिजा-भतिजीकेँ दैत। अमित इण्टर पास कऽ गामेक स्कूलमे शिक्षक छला जखैनकि सुमीत भोपालमे इंजीनियरिंगक पढ़ाइ पढ़ि रहल छला। हीरा लाल समाजवादी विचार धाराक बेकती छला से तँ पहिनहिओ कहने छी। हुनकर कहब छेलनि जे ‘बेटा आ बेटी बरबरि।’ से नै तँ दुनूकेँ बरबरि अधिकार भेटक चाही। मुदा बेटा सबहक विचार ओइसँ भिन्न, खास कऽ अमितक। हुनकर कहब जे बेटीक बिआह भेला पछाति नैहरमे किछु नै। ओ मेहमान जकाँ नैहर आबए आ दस-बीस दिन रहि आपस सासुर चलि जाथि। नैहराक कोनो बात-बेवहारमे कोनो तरहेँ हस्तक्षेप नै करथि। छोट भाए सुमीत सेहो भैयाक बातकेँ समर्थन करैत। मुदा अखनि ओ पढ़ाइ कऽ रहल अछि। तँए घर-परिवारसँ बेसी सरोकार नै रखैत। हुनका समैपर रूपैआ भेट जान्हि मात्र एतबेसँ मतलब। अमितक पत्नी अमीतोसँ एक डेग आगू हुनका ननदि सभ कनेको नै सोहाइ छेलनि। जखनि जेठकी ननदि लालति नैहरा अबै छेली तँ अमितक पत्नी सिरहावाली कनकन करए लगै छेली। सार-सरहोजिक बेवहारसँ लालतिक दुल्हा सासुर एनाइ-गेनाइ छोड़ि देने छेला। हीरा लालक छोटकी बेटी नमामे पढ़ै छेली। आरती अपन पढ़ाइ करैत भौजाइक भानस-भातमे सेहो मदति करै छेली। भतीजा-भतिजीकेँ स्नान करौनाइ कपड़ा पहिरौनाइ, तेल-कुर देनाइ ई सभ काज आरतीए करै छेली। मुदा भौजाइ लेल धनि सन। आरती आ सिरहावालीक बीच जखनि-तखनि रक्का-टोकी भऽ जाइ छल। आरतीक माए बेटीक पक्ष लइ छेली। जखैनकि अमित पत्नीक पक्ष लइ छल। आरतीक माए पति हीरा लालसँ शिकाइत केली- “सिरहावाली आरतीकेँ देखए नै चाहैए। जखनि-तखनि ओकरासँ कहा-सुनी कऽ लैत अछि।” हीरा लाल बेटाकेँ बजा कहलखिन- “कनियाँकेँ समझा दियौ जे आरतीकेँ तंग नै करए। ओकरा किछु कहए नै।” तैपर अमित बाजल- “सभ दोख आरतीक अछि। ओ ऐ सम्पतिकेँ अपन बुझैए। भौजाइकेँ कोनो मोजरे ने दैत अछि। अहाँ आरतीकेँ बुझा दियौ जे ओ ऐठाम किछु दिनक मेहमान मात्र छी। भौजाइसँ मुँह नै लगबए।” अमितक बातसँ हीरालालकेँ बड़ कष्ट भेलनि मुदा ओ बजला किछु नै। हिनकामे एकटा गुण छन्हि जे ओ अपन बातसँ किनको संतुष्ट कऽ दइ छथिन। मुदा कमजोरी ई जे हुनकर दुनू बेटा हुनकासँ सन्टुष्ट नै होइत रहनि। सोम दिनक घटना छी। अमित स्कूलक कातमे चाहक दोकानपर बैस चाह पीब रहल छल। तखने ओकर बेटी गुड़िया आएल आ कहलक- “पापा, मम्मी कनैए।” अमित पुछलक- “किअए?” गुड़िया बाजल- “आरती दीदी मारलकै हेन।” ई बात सुनि अमितकेँ तामसे टीक ठाढ़ भऽ गेल। चाह पीनाइ छोड़ि गाम दिस विदा भेल। गामपर आबि गोहालीमे खोंसल हरबाही पेना लऽ अँगना गेल। आरती घर बहारै छेली। तखने ओही पेनासँ अनधुन मारए लगल। ओंघरा-ओंघरा कऽ मारलक। पीठ आ जाँघ दू दालि कऽ फूटि गेलै। आरतीक माए बदाम ओगरैले बाध गेल छेली। कियो कहलकनि तँ दौगल अँगना एली। बेटीक हालति देखि कानए लगली। आरतीक कपड़ामे लहू लगल रहए। माएकेँ देखिते आरती आरो जोर-जोरसँ कानए लगली। आरतीक दशा देखि माए भरि पाँजमे पकड़ि बेटाकेँ अन्ट–सन्ट कहए लगली। आरतीक कक्का देवनजी डाक्टर बजा इलाज करौलखिन। रातिमे आरती आ ओकर माए किछु नै खेलक। कियो पुछैओले नै एलनि। भिनसरे आरतीक माए फूट्टे खेनाइ बनौलक। केते कहला पछाति आरती दू-चारि कौर खेलक आरतीक माए अपन बेटी संग भीने भानस करए लगली। जे देखि अमित बजए- “ई छौड़ी, हमरा परिवारमे भिनौज करा देलक। कहिया ई छौड़ी ऐ घरसँ जाएत से नै जानि।” आरतीक माए किछु नै बजए। दुनू माए-बेटीकेँ सिरहावालीसँ बजा-भुक्की बन्न भऽ गेल। हीरा लाल गाममे नै छला। पाटीक मीटिंगमे भाग लइले काठमाण्डू गेल छला। ऐ घटनाक पाँचम दिन भिनसरे हीरा लाल गाम एला। जखनि ओ अपना कोठरीमे झोरा रखि कपड़ा बदलैत रहथि तखने आरतीक माए कानए लगली। माएकेँ कनैत देखि आरतीओ कानए लगली। पत्नी आ बेटीक कानब सुनि हीरा लाल अकचका गेला। हुनका किछु फुड़ेबे ने करनि। भेलनि जे जेठकी बेटी नै तँ छोटका बेटाकेँ नै तँ किछु भऽ गेल। साइत तँए दुनू माय-धी एना कनैए। अमितकेँ हाक देलखिन। अमित अपना काठरीमे किछु लिखैत रहए। पिताक हाक सुनि अमित ओतैसँ बाजल- “की कहै छिऐ।” हीरा लाल कहलकनि- “एम्हर आउ तँ।” अमित पिता लग आबि ठाढ़ भेल। देखिते पिता पुछलखिन- “दुनू गोटे एना किअए कनैए। की भेलै?” अमित रूखाएल बाजल- “एकरे सभसँ पुछियौ ने, कि भेलैए।” तैपर माए लग आबि बजली- “हमरा बेटीकेँ मारि कऽ सुताए देने रहए। ओंघरा-आेंघरा मारलक। जाँघ आ पीठ दू दालि कऽ फोरि देलक आ अखनि बजैए एकरे सभकेँ पुछियौ।” ई कहि माए आरतीक पीठ उघारि देखौलकनि। आ पुछलकनि- “जाँघो देखाबी?” हीरा लाल मुँहसँ निकललनि- “नै, हम सभ बूझि गेलिऐ।” लगले सुरे अमितसँ पुछलखिन- “किअए मारलिऐ आरतीकेँ? की केने रहए?” बिच्चेमे आरतीक माए बजली- “हमरा बेटीकेँ अघमौगति कऽ मारलक। हम बदाम ओगरैत रही। सुगिया हमरा कहए गेल। तँ हम दौगल एलौं। अँगनामे बेटीकेँ ओंघराएल देखलौं। ओकर सलवार आ समीज लहूसँ भिजल रहए। देवन बौआ लाल डाक्टरकेँ बजा हमरा बेटीकेँ दबाइ-बिरो करौलक।” तैपर अमित बाजल- “एकर बेटी हमरा बहुकेँ मारलक से बड़ नीक। छोट ननदि भऽ जेठ भौजाइपर हाथ उठौत। जेना हम हिजरा रहिऐ।” बाजि अमित ओतएसँ चलि गेल। हीरा लालकेँ बेटाक बेवहारसँ बड़ पीड़ा भेलनि। मुदा बलजा किछु नै। आरतीसँ पुछलखिन- “की केने रही। किअए अमित मारलकौ?” आरती- “बाबू यौ, हमरा स्कूलमे ओइ दिन सबेरे छुट्टी भऽ गेल रहए। गामपर एलौं तँ माए अँगनामे नै छल। हमरा बड़ भुख लगल रहए। भनसा घर गेलिऐ तँ छुच्छे भात रहए। तीमन-तरकारी किछु ने रहए। भौजी आ गुड़िया ओसारपर बैस खाइत रहए। हम भौजीसँ पुछलिऐ जे तीनम-तरकारी नै छै हम कथी सेने खेबे। तैपर भौजी कहलक, नून-तेल सेने खा लिअ। हम कहलिऐ नून-तेल सेने नै खाएब। तैपर भौजी कहलक, तहन घी-मलीदा केतएसँ एतै। हम कहलिऐ कनी दूध लऽ लइ छी आ ओही सेने खा लेब। तैपर भौजी बाजलि कनीयेँ दूध छै चाहले रहए दियौ। फेर सोचलौं जे कनीयेँ लऽ लेब। ओरिका लऽ कऽ अदहे ओरिका लिअ लगलौं आकि भौजी अँइठे हाथे आबि ओरिका छीनए लगल। तैपर हम भौजीक हाथ झमारि देलिऐ। ओरिका महक सभटा दूध हरा गेल। भौजी हाथ धोइ कऽ ओछाइनपर जा कानए लगल। हम खेबो ने केलौं। बरतन-बासन माजि-धोइ कऽ रखि जखनि भनसा घर बहारै छेलौं आकि भैया आबि ठेंगा लऽ हमरा मारए लगल।” आरतीक बात सभटा सुनि हीरा लाल किछु नै बजला। ओना नहिए जलखै आ नहिए कलौ खेलनि। चुप-चाप अपन दिनचर्यामे लगल रहला। रातिमे हीरा लाल अमितकेँ बजा कहलखिन- “हमरा सभ बात मालूम भेल। ऐ समस्याक निदान केना हएत?” अमित- “आरतीक बिआह भऽ जेतै ओ सासुर चलि जाएत तखनि समस्याक निदान अपने भऽ जाएत। जाबे धरि ई छौड़ी एतए रहत, झंझट रहबे करत।” हीरा लाल- “अखनि आरती एस.एल.सी.ओ ने केलक हेन। उमेरो अखनि सोल्हे बरख भेलै हेन। बिआहो केना करब। जखनि इण्टर पास कऽ जाएत आ उमेरो अठारह बरख पूगि जेतै तखनि बिआह कऽ देबै।” अमित बाजल- “जानी अहाँ। हमरा कोन मतलब।” हीरा लालकेँ तामस उठि गेलनि बजला- “जेठ भाय छिऐ अहाँ। एहेन बात बजैत कनिको लाज नै होइए?” बापक डाँट सुनि अमित तैसमे आबि बाजल- “अँइ, ई छौड़ी हमरा बहुसँ सौतिनियाँ डाह रक्खत। जेठ भौजाइकेँ कनिको मोजर नै देत। एकरा चलते परिवारमे दू ठाम भानस हुअए लगल। अहाँ उल्टे हमरा कहै छी। आरतीकेँ समझा दियौ राजवाली राज लेती दाइ जेती छुच्छे।” हीरा लाल कहलखिन- “ठीक छै। जाबे धरि आरती पातोमे रहत हम सभ भिन्ने भनसा बनाएब।” अमित कहलकनि- “ठीक छै। जे मन फुड़ए से करू।” हीरा लालक परिवारमे दू जगह भानस बनए लगल। सुमीत गरमी छुट्टीमे गाम आएल। कहियो माएक बनौल खेनाइ खा लइ छल तँ कहियो भौजीक बनौल। सुमीत कहब रहै जे अखनि परिवारक विवादसँ हम दूरे रहब। हमरा ऐ सभसँ कोनो लेनी-देनी नै। अमितक सार ललनजी काठमाण्डूमे इंजीनियर छथिन। ओ अपन परिवारक संग काठमाण्डूएमे रहै छथि। दसमीमे गाम एलखिन तँ अमितोकेँ सपरिवार सिरहा अबैले मोबाइलपर कहलकनि। किएक तँ बलि-भोग छल। पंचमीकेँ अमित अपन पत्नी आ धिया-पुताक संग सासुर पहूँचल। ओतए देखलक जे इंजीनियर साहैब अपन माए-बाबू, दुनू छोट भाए आ छोट बहिन लेल काठमाण्डूसँ कपड़ा नेने आएल रहथिन। अमित, अमितक पत्नी आ धिया-पुताकेँ सिरहा बजार लऽ जा कऽ मन-पसन कपड़ा कीनि देलखिन। सार-सरहोजि अमितकेँ बहुत मानै छेलनि। इंजीनियर साहैब अपन छोट भाए-बहिनक बड़ खियाल रखै छेलखिन। अमित सोचए, इंजीनियर साहैब भाए-बहिनकेँ केते मानै छथिन। हम तँ अपना भाएकेँ आइ धरि एक्को पाइ नै देने हएब आ बहिनकेँ तँ...। फेर सोचए, हमरे बेवहारसँ जेठका पाहुन पातो एनाइ-गेनाइ छोड़ि देलनि। इंजीनियर साहैब अमितकेँ कहलखिन- “यौ पाहुन, दुनियाँमे किछु ने छै। सभ गोटे आपसमे मिलि-जूलि कऽ प्रेमसँ रहू यएह पैघ बात भेल। की लऽ कऽ दुनियाँमे एलौं आ की लऽ कऽ जाएब। जेतेक दिन जीबी हँसी-खुशीसँ जीबी।” अमितपर सारक बातक असरि भेल। अमितक पत्नी भौजाइक सुन्नर बात-बेवहार देखि छगुन्तामे पड़ि गेली। किएक ने पड़िती। भौजाइ हुनका भोरे चाह बना पीबैत रहथिन। जाबे धरि ओ नै खाइ छल ताबे भौजाइओ ने खाइ छेलनि। सिरहावाली सोचए, ईहो तँ हमर भौजाइए छी। केतेक मान-दान करैए। मुदा हम तँ ननदि सभकेँ...। एक दिनक गप छी। चुल्हिपर लोहियामे दूध रहए। दूधमे तरहत्थी सन छालही पड़ल रहए। सिरहावाली छालही देखि भौजाइसँ पुछलक- “भौजी, कनी छालही ली?” तैपर भौजी मारड़िवाली बजली- “अँइ यै दैया, की ई हिनकर घर नै छियनि जे हमरासँ पुछै छथिन। ई सभ तँ घरक मेहमान छथिन। हिनका सभकेँ केतए देखबनि। ई सभ जेतबे खेतहीन-पीतहीन ओतबे ने, कोनो घर नेने पातो जेतहीन। सभ धन-बीत तँ हमरे सभले छोड़ने जेतहीन। जे मन होइ छन्हि से खाथु।” ई कहि मारड़िवाली एकटा कटोरीमे सभटा छालही निकालि ननदिक हाथमे दऽ पुछलखिन- “चिन्नीओ लेब।” सिरहावाली- “कनी दऽ दिअ।” सिरहावालीकेँ सासुरक सभटा बात मन पड़ि गेल। जे कनी दूध ननदि लिअए लगल। तँ ओरिका छिनए लगलौं। तइले ननदि हमर हाथ झमारि देलनि। हम कानए लगलौं हमरा कानैत देखि गुड़ियाक पापा आरतीकेँ अधमौगति कऽ मारलक। जेकर कारण आइ परिवारमे दू जगह भानस होइए। छि छि केहेन छी हम। आरतीओ तँ किछुए दिनक मेहमान छी। इण्टरक परीक्षा मार्चमे हएत आ अप्रीलमे बिआह भऽ जाएत। सासुर चलि जाएत। फेर ओकरा केतए देखब। ओ तँ जेतबे खाएत-पीअत ओढ़त-पहिरत ओतबे ने। सभ धन-सम्पति तँ हमरे सभले रहि जाएत। केते उच्छन्नरि दइ छिऐ ननदि सभकेँ। जेठकी ननदि-ननदोसि तँ सासुरे एनाइ छोड़ि देलक। हम पापी छी...। सिरहावालीक आँखिसँ टप-टप नोर खसए लगल। मारड़िवाली चिन्नी लऽ कऽ एली तँ ननदिक आँखिमे नोर देखलनि तँ पुछलखिन- “की भेल दैया, किअए कनै छी। हमरासँ कोनो घटी भऽ गेल की?” सिरहावाली कहलकनि- “नै यै भौजी, अहाँसँ गलती नै भेल। हमरेसँ गलती भऽ गेल अछि। वएह सभ मन पड़ल तँ आँखिमे नोर आबि गेल। आइ हमर आँखि खूजि गेल।” मारड़िवाली बजली- “देखियौ दैया, जेहने अपन माए-बाबू तेहने सासु-ससुर। जेहने अपन भाए-बहिन तेहने दिअर-ननदि। अपन बेवहारसँ सभकेँ खुश राखी ऐसँ नीक बात और किछु नै। अहाँ अनकासँ नीक बेवहार करब तँ लोक अहूँसँ नीक बेवहार करत।” अमितपर सार-सरहोजिक बेवहारक असरि पड़ल। तेनाहिए सिरहोवालीपर भाए-भौजाइक बात-बेवहारसँ बड़ प्रभावित भेली। दुनू परानी विचार कऽ निश्चए केलनि। दसमीक विहान भने अमित अपन परिवारक संग साँझमे पातो पहूँचल। अमित माएकेँ पएर छूबि गोर लगलक। सिरहोवाली सासुकेँ गोर लगलक। सिरहावाली अपन सभ समान घरमे रखि कपड़ा बदलि भनसा घर गेली। आरती आ ओकर माए भनसाक ओरियानमे लगल छेली। माए तरकारी कटै छेली आ आरती मसल्ला पीसै छेली। सिरहावाली आरतीक हाथ पकड़ि उठबैत कहलखिन- “अहाँ मसल्ला पीसब छोड़ि पढ़ू गऽ, परीक्षा लगिचाएल अछि। आइसँ सबहक भानस हमहीं करब। आब दू जगह खेनाइ नै बनत। गतली हमरे छल। अहाँ तँ किछु दिनक मेहमान छी। बिआह पछाति अहाँकेँ केतए देखब।” सिरहावालीक आँखिसँ टप-टप नोर गिरए लगल। भौजाइकेँ कनैत देखि आरतीओ कानए लगली। आरतीक माए दुनू गोटेक आँखिक नोर पोछैत कहलखिन- “पहुलका बातकेँ दुनू गोटे बिसरि जाउ।” तैपर अमित माएकेँ कहलकनि- “माए, हमरासँ बड़का गलती भऽ गेल छल। हमरा माफ कऽ दे।” अमितो कानए लगल। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलै। आरती भैयाकेँ कनैत देखि पएर पकड़ि कानए लगल- “नै भैया, हमरासँ गलती भेल छल। हमरा माफ कऽ दिअ।” बेटा-बेटी आ पुतोहुकेँ कनैत देखि माएओ कानए लगली। कनीकाल पछाति हीरा लाल एलखिन। दुरेपरसँ आरतीकेँ हाक देलखिन। सिरहावाली पुछलखिन- “की कहै छिऐ बाबूजी। आरती बुच्ची पढ़ै छथिन।” हीरा लाल आरतीक माए लग जा बजल- “ई मासु िलअ नीकसँ तीमन करू।” आरतीक माए कहलखिन- “गुड़िया माएकेँ दियौ। वएह सबहक भानस करथिन।” तैपर सिरहावाली कहलखिन- “हँ बाबूजी, आइसँ हमहीं सबहक भानस-भात करब। परिवारमे दूठाम भानस नै हएत।” गप-सप्प सुनि अमितो आबि बजल- “हँ बाबूजी, आब सभ गोटे अपसमे मिलि-जूलि प्रेमसँ रहब। आरतीक परीक्षा लगिचाएल अछि। ओ अपन परीक्षाक तैयारी करत।” “अच्छा, ठीक छै।” बजैत हीरा लालकेँ मनमे भेलनि आइसँ भरि पेट खाएब। बाबाधाम “बोल-बम बोल-बम। बोलबम-बोलबम” ई आवाज कमलीक कानमे पड़ल तँ ओ घास काटब छोड़ि सड़क दिस तकलक। एकटा बसमे पीयर-लाल कपड़ा पहिरिने लोक सभकेँ देखलक। बसक भीतर आ छतपर लोक सभ बैस कऽ बोलबम-बोलबमक नारा लगवैत छल। बस तेजीसँ सड़कपर दौग रहल छल। कमलीक खेत सड़कक कातेमे छल। ओ खेतक आरिपर घास काटि रहल छलि। कमली सोचए लगली- कतेक लोक बाबा धाम जाइत अछि मुदा हमर तँ भागे खराप अछि। कतेक दिनसँ विकलाक बापकेँ कहैत छी मुदा ओ अछि जे धियाने ने दैत अछि। कमली आ लखन दू परानी। एकटा बेटा िवकला। विकला सातमे पढ़ैत। लखनक माए-बापक सत्तर अस्सी बर्खक बूढ़। लखनकेँ पाँच बिघा खेत। एक जोड़ा बड़द आ एकटा महीसो। लखनकेँ कतौ जाइले सोचए पड़ए। किएक तँ सत्तर बर्खक बूढ़ माए आ अस्सी बर्खक अथबल बापकेँ छोड़ि कतए जाएत। तइपर सँ एक जोड़ा बरद आ महीसोकेँ देख-रेख। पाँच बिघा खेतमे लागल फसलक ओगरवाही। असगरे कमलीसँ केना पार लागत। तैं कमलीक बाबाधामबला बातपर लखन धियान नै दैत छल। लखन सोचए कमलीकेँ गामक लाेक संगे बाबा धाम भेज देव तँ भानस के करत? धास के आनत। असगरे हम की सभ करब। बेटा विकला पढ़ते अछि। ओकरा स्कूलसँ छुट्टी होइत अछि तँ ओ टीशन पढ़ै लए चलि जाइत अछि। बिना टीशन पढ़ने केना परीक्षा पास करत। सरकारी स्कूलमे की आब पढ़ाइ होइत अछि। मास्टर सभ बैस कऽ गप लड़बैत रहैत अछि। चटिया सभ कोठरीमे बैस कऽ गप करैए अथवा लड़ाइ-झगड़ा। मास्टर सबहक लेल धनि सन। लखन अपन खेती गृहस्थीक संगे माए-बापकेँ सेवा नीकसँ करैत अछि। माए तँ थोड़े थेहगरो छथिन मुदा बापकेँ उठबो-बैसबोमे दिक्कते छन्हि। हुनका पैखाना-पैशाव लखनेकेँ कराबए पड़ैत अछि। पौरुकाँसाल फागुनमे लखनक पिताजीकेँ लकबा मारि देलकनि। मिश्रा पॉली क्लिनीक दरभंगामे इलाज करेलासँ जान तँ बचि गेलनि मुदा अथबल भऽ गेला। भगवान लखन जकाॅँ बेटा सभकेँ देथुन। ओ तन मन आ धनसँ माए-बापकेँ सेवा करैत अछि। लखनक एकटा संगी अछि। नाम छी सुकन। सुकन लखनसँ बेसी धनीक अछि। दूटा बेटा अछि सुकनकेँ। दुनू बेटा सतमा तक पढ़ि दिल्लीमे नौकरी करैत अछि। मासे-मासे बेटा सबहक भेजलाहा रूपैआ सुकनकेँ भेट जाइत अछि। सुकनोक माए-बाबू जीबिते छथिन। सुकनक माए कम देखैत छथिन। हुनका रातिकेँ सुझबे नै करैत छन्हि। एक दिन सुकनक माए रातिकेँ ओसारपर सँ गिर गेलखिन हुनका पएरमे मोच पड़ि गेलन्हि। लखनकेँ पता चलल तँ ओ सुकनक माएक जिज्ञासा करैले गेल। सुकनक माए लखनकेँ अपने बेटा जकाँ मानै छेलखिन। लखन सुकनक माएसँ पुछलक- “माए केना कऽ ओसारपर सँ गिर गेले।” सुकनक माए बाजलि- “बौआ, आब हमरा सुझै नै अछि। राति कऽ तँ साफे नै देखैत छी। बेचू बाबूक छोटका कनटीरबा दरभंगामे डाकडरी पढ़ैत अछि ओ फगुआमे गाम आएल छल हुनका कहलिऐ तँ ओ हमर दुनू आँखि देखलक आ कहलक जे दुनू आँखिमे मोतियाविन भऽ गेलौहेँ। कहलक जे ऑपरेशन करेलासँ ठीक भऽ जाएत आ नीक जहाति सुझए लगत।” हम सुकनकेँ कहलिऐ तँ ओ कहलक जे अखनि रूपैआ नै अछि। रूपैआ हएत तँ लहान लऽ जा कऽ ऑपरेशन करा अनबै। मुदा फागुनसँ भादो आबि गेल, ऑपरेशन नै करा आनलक। सुनै छिऐ चौड़चनक परात दुनू परानी बाबाधाम जएत। सुकनक बाबूजी सत्तरि बर्खक छथिन। ओ नामी गिरहत छला। तरकारी उपजा कऽ बेचै छला। तरकारी बेचि कऽ पाँच बिगहा खेत कीनला। आब उमेर बेसी भेलासँ काज करै जोकर नै रहला। हुनका चाह पीबाक आदति भऽ गेल छन्हि। भोर आ साँझ चाह हेबाके ताकी। एकटा आदति ओरो छन्हि, खैनी खाइक। सुकन अपनाबाबू जीकेँ चाह आ खैनी नै जुमाबैत अछि। केहैत छन्हि- कैंसर भऽ जेतह। मुदा अपना पान-पराग, सिगरेट, दारू सबहक सेवन करैत अछि। एक दिन लखन सुकनक दलानक पाछाँसँ जाइत छल तँ सुकनक जोर-जोरसँ बाजब सुनि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सुकनक दलानक पाछाँसँ सड़क गुरजै छै। सड़केपर सँ लखन सुनए लगल। सुकन बजै छल- “हरदम चाह-चाह रटैत रहैत छहक। किछु बुझबो करै छहक। चीनी चालीस टके किलो भऽ गेल। चाहपत्ती जे बारह टाकामे भेटै छेलै आब बीस टाकामे भेटै छै। पानिबला दुध पन्द्रह रूपैये गिलास। के जुमत चाहमे। आ तोरा भोर-साँझ चाह हेबाके चाही। हम नै सकब-तोरा चाह जुमबैमे।” बूढ़ा किछु नै बजैत रहथि। लखनकेँ कोनो जरूरी काज रहै तँए ओ आगाँ बढ़ि गेल। सुकन अपना पड़ोसिया ओइठाम माए-बाबूक भोजनक जोगार लगा कऽ चौड़चनक विहाने दुनू परानी बाबाधाम विदा भऽ गेल। सुलतानगंजमे गंगाजल भरि कामौर लऽ बाबाधाम पहुँचल। एकादशी दिन बाबाकेँ जल चढ़ा वासकीनाथ, तारापीठ होइत ओतएसँ कलकत्ता चलि गेल। एमहर एे बीच सुकनक बाबूजी बेमार पड़ि गेलखिन। हुनका बोखार लगि गेलनि। लखनकेँ समाद भेटल जे सुकनक बाबूजी दुखित छथिन। लखन ओइठाम जा डाक्टरकेँ बजा कऽ अपना दिससँ खर्च कऽ बूढ़ाक इलाज करौलक। जाबे धरि सुकन दुनू परानी बाबाधमसँ आपस नै आएल ताबे धरि लखन दिनमे एकबेर सुकनक माए-बाबूक भेँट करबाक लेल निश्चित जाए। दुनू गोटे लेल अपना दिससँ चाह आ खैनीओक जोगार लखन कऽ देने छल। सुकन जितिया पावनिसँ तीन दिन पहिने गाम आएल। सुकनकेँ बाबाधाम आ कलकत्तासँ आपस अएलाक दोसर दिन भिनसरे चौकपर चाहक दोकानपर लखनक भेँट सुकनसँ भऽ गेल। सुकन चाहक दोकानपर बैस कलकत्ताक वर्णन करैत छल। लखन सुकनसँ रास्ता-पेराक समाचार पुछलक। तँ सुकन कहलक- “रौ दोस, बाबाक कृपासँ सभ किछु नीके रहलौ। दुनू परानी कलकत्तो घुमिये लेलियो। तोँ खाली बैंकमे रूपैआ राख ने। तोँ की बुझबेँ धरम-करम। तोरा जँ रूपैआक आमदनी हेतौ तँ तोँ खेत भरना लेमे नै तँ बैंकमे रखमे। हम दुनू परानी दस बर्खसँ कामोर लऽ कऽ बाबाधाम जाइत छी।” सुकनक बात लखनकेँ नै सोहाएल। ओ सोचलक जे अखनि एकरा जवाब देनाइ ठीक नै हएत। बाजल- “रौ दोस, से तँ ठीके कहै छी। हम धरम-करम की बूझब। मुदा हम अपन माए-बापक सेवा तन-मन-धनसँ करै छी। हमरा लेल तँ बाबाधाम हमर माइए-बाबू छथि। हमरा लेल तँ हमर बाबूजी साक्षात् महादेव आ माए पार्वती छथि। हुनके दुनू गोटेकेँ सेवा करब बाबाधाम कामोर लऽ कऽ जाएबसँ बेसी नीक बुझै छी। केकरो अधलाहो नै सोचैत छी आ ने करै छी। तोँ कह जे माइक मोतियाविन्दक ऑपरेशनक लेल तोरा रूपैआ नै छौ। बाबूजीक चाह पियाबैक लेल तोरा रूपैआ नै छौ। मुदा बाबाधाम जेबाक लेल रूपैआ छौ। कलकत्ता घुमैक लेल रूपैआ छौ। दारू पीबैले रूपैआ छौ। माएकेँ सुझै नै छौ। रातिमे ओसारापर सँ खसलखिन तँ पएरमे मोच पड़ि गेलनि। जँ तोँ अपन माइक मोितयाविन्दक ऑपरेशन करा आनने रहितेँ तँ ओ ओसारापर सँ नै खसितथिन। अपने दुनू परानी बाबाधाम गेलेँ मुदा माए-बाबूक भोजनक जोगार पड़ाेसिया ओतए लगा कऽ गेलेँ। तोहर बाबूजी बेमार पड़ि गेलखुन तँ डाक्टर बजा हम इलाज करौलियनि। तोँ बूढ़ माए-बाबूकेँ एकोटा टाका नै देने गेल रहेँ। अपना दुनू परानी बापक अरजलहा सम्पत्ति आ बेटा सभक कमाइसँ एश-मौज करै छेँ। मुदा माए-बाप एक कप चाहक लेल काहि कटै छौ। धूर बूड़ि तोँ की बजमेँ।” लखनक बात सुनि सुकन गुम्म पड़ि गेल। ओकरा कोनो जवाबे नै फुड़ाएल। ओकरा भेल जेना बीच बाजारमे कियो नंगट कऽ देलक। चौड़चनक दही आइसँ चौड़चन पावनि चारि दिन अछि। चारिम दिन तँ पावनि हेबे करत। तँए ओइ दिन दही नै पाैड़ल जाएत। सोमनी जन्मअष्टमीसँ पहिनहि गुरकी हटिया बनगामासँ तीनटा छाँछी आ दूटा मटकुरी किन कऽ अनने छलि। सोचलक जे पहिने कीनलासँ बासन सस्ता हएत मुदा से नै भेल। पाँचटा माटिक बासन पच्चीस टाकामे भेल। अपना तँ ने महिंसे छल आ ने गाइए। सोमनी सोचलक अपना गाए-महिंस नै अछि तँ की हेतै सौंसे गाममे तँ गाइए-महिंस अछि। की हमरा दस गिलास दूध नै हएत। जौं दूओ-दू गिलास कऽ कए पाँच गोटे दूध दऽ देलक तैयो पाँचटा बासनमे दही भऽ जाएत। मरड़ लेल खीर रान्हैले भजैत आेइठामसँ एक्को गिलास दूध लऽ आनव केनाहिओ कऽ पावनि कऽ लेब। सोमनी आ मंगल दू परानी। मंगल दिल्लीमे दालि मिलमे नौकरी करैत। सोमनी गाममे खेती-वाड़ीक काज करति। सोमनी-मंगलक परिवारमे पाँच गोटे छल। सोमनी, मंगल, बेटा राधे आ बेटी फूलिया, गुलबिया। पाँचो परानीक नाओंपर सोमनी पाँचटा बासनमे दही पाैड़ चौठी चाँद महराजकेँ हाथ उठबैत छलि। सोमनीकेँ एक बीघा खेत छल। एकटा बरद रखने छल। गामेमे बितबासँ हरक भाँज लगौने रहए। नूनू बाबूक दस कट्ठा खेतो बटाइ करैत छलि। अपन खेतीक बाद हर बेचिओ लैत छलि। जइसँ किछु रूपैआ सेहो भऽ जाइत छेलै। मंगल तँ दिल्लीएमे कमाइत छल तँए बितबा सोमनीओक खेतमे हर जोति दैत छल। बितबाकेँ अपन डेढ़ बीघा खेत छल आ एक बीघा बटाइ करैत छल। तँइ बितबा सेामनीओक खेत जोति दैत छल। बितबाकेँ हर जोतैक बदलामे सोमनी बितबाकेँ खेत रौपि दैत छलि। दुनू गोटेमे मिलानी खुब रहए। काल्हि चौड़चन छी मुदा आइ साँझ धरि सोमनीकेँ कियो एक्को गिलास दूध नै देलक। जे ओ कोनो बासनमे दैत। ओकर मन घोर-घोर भऽ गेल। ओ बड़ खौझा गेलि। अपना आंगनमे खौंझाइत बजलि- “हमर बेगरता लोककेँ नै हेतै। जँ गाममे रहब तँ आइ ने काल्हि हमरो बेगरता लोककेँ पड़बे करतै। तहिया मन पाड़ि दैबनि।” माएकेँ खौंझाइत देखि बेटा राधे बाजल- “माए गै, चुनचुन बाबा जे मरल रहथिन तँ हुनकर भोजमे देखलिऐ पोडरक दही पाैड़ने। चौकोपर दैखै छीऐ जइ चाहबलाकेँ दूध सधि जाइए तँ पाउडरेकेँ घोड़ि कऽ चाह बनबैत अछि। कह ने तँ चौकपर सँ आधा किलो पोडर आनि दइ छिओ। ओकरा खूब कऽ औंट लिहेँ आ बासन सभमे दही पाैड़ लिहेँ।” बेटाक बात सुनि सोमनी बाजलि- “पोडरबला दूधक दहीसँ पावनि केना हएत।” राधे बाजल- “जँ गाए, महिंसक दूध नै भेटलौ तँ की करबीही। पोडर तँ गाइए महिंसिक दूधकेँ बनैत अछि।” सोमनी गुन-धुन करैत बजली- “ठीक छै। जँ चौठी चाँद महराज अपना गाए-महिंस नै देने छथिन तँ पोडरेक दूधसँ पावनि करब। जो भुटकुनक दोकानसँ आसेर नीमनका पाेडर नेने आ। आ हे दू टाकाक जोरनले दहीओ लए लिहेँ।” राधे चौकपर विदा भेल। ओतएसँ पोडरबला दूध नेने आएल। ओइ दूधकेँ औट दही पौड़लक। आइ चौड़चन छी। भोरे सोमनी राधेकेँ लोटा दऽ कऽ बितबा आेइठाम दूध आनेले पठौलक। बितबा आइ बैसले अछि किएक तँ पावनि छीऐ। राधेकेँ देखिते बाजल- “लोटा रखि दही दूध खीर रन्हैले हम तोरा माएकेँ गछने छेलिओ मुदा अखनि नै हेतौ। साँझमे लऽ जइहेँ।” साँझखन जखनि राधे दूध अनैले गेल। बितबा चाहबला गिलाससँ एक गिलास दूध देलक। दूध देखि सोमनी दुखी भऽ गेलि। सोचलक जे एतबे दूधसँ खीर केना रान्हल जाएत। मुदा कोनो उपाए नै। तँए ओही दूधमे पानि मिला खीर रान्हलक। सोमनी चौठी चाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलक- “हे चौठी चाँद महराज जँ हमरा दरबज्जापर एकटा नीक लगहरि गाए भऽ जाएत तँ अगिला साल एक छाँछी दही आओर देब।” राति नअ बजे दिल्लीसँ मंगलक फोन आएल। घरेक बगलमे एक गोटे मोबाइल रखने अछि। ओकरे मोबाइलपर सोमनीकेँ फोन अाएल। सोमनी फोनपर मंगलसँ गप केलक। कुशल-समाचारक बाद मंगल कहलक- “आइ चौड़चन पावनि छी, अहाँसब भरि मोन खीर, पुरी, दही खेने हएब।” सोमनी उदास होइत बजली- “की भरि मन खएब, दही पौड़ैले कियो एक्को फुच्ची दूध नै देलक। पोडरक दही लए कऽ पावनि केलौं गऽ मरड़क खीर रान्हैले भजैत एक्के फुच्ची दूध देलक। एक फुच्ची दूधसँ केहेन खीर हएत।” मंगल कहलक- “अहाँ मोन जुनि छोट करू, हम फगुआमे गाम अबै छी तँ एकटा नीक लगहरि गाए कीनि कऽ आनि देव। दूध खेबो करब आ बेचबो करब। दूटा पाइ हएत तँ नूनो-तेल चलत। बेटी सभ घास काटि-काटि आनि देत।” सोमनीक मन खुश भऽ गेल। फगुआमे मंगल गाम आएल तँ सोमनीकेँ गाए कीनि देलक। गाए अध किलौआ बार्ली डिब्बासँ छह डिब्बा भोर आ चारि डिब्बा दुपहर लगैत छल। जाबे धरि मंगल गाममे रहल ताबे ओ अपने गाए दुहैत। जखनि मंगल दिल्ली चलि गेल तँ सोमनीए गाए दुहए लगली। भोरका दूध बेचि लइ छेली आ दुपहरका दूध परिवारेमे खाइत। बेटी फुलिया आ गुलबिया घास आनि-आनि कऽ खुअबै। एक दिन फुलिया लगमावालीक खेतक आरिपर कनी घास काटि लेलक। तइले लगमावाली फुलिया आ ओकर माए सोमनीकेँ बिखनि-बिखनि कऽ गरियौलक। सोमनी फुलियाकेँ मारबो केलक आ लगमावालीसँ गलतीओ मानलक। समए बितैत देरी नै लगैत छै। आइ कुसी अमवसिया छी। पाँचम दिन चौड़चन पावनि हएत। काल्हिसँ दही पाैड़ल जाएत। सोमनीक दरबज्जापर एमकी लगहरि गाए चौठीचान महराज देने छथिन। सोमनी सोचलक जे एम्की सभ बासनमे नीक जहाँति दही पाैड़ब। ओकरा पाैरुकाँ सालक सभ गप्प मन रहए जे कियो एक्को िगलास दूध नै देलक तँ पोडरक दही लए कऽ पावनि केलौं। मने-मन विचारलक जे हमहूँ केकरो दूध नै देबै। आइसँ चौड़चनक दही पाैड़ल जाएत। भोरे मुसबा लोटा नेने सोमनी ऐठाम दूध लइ लए आएल। राधे कहलक- “माए गै, पौरुकाँ साल अपना कियो एक्को गिलास दूध नै देने रहौ तँइ केकरो दूध नै दे।” सोमनी सोचलक जँ सिंग्हेसर बाबा लगहरि गाए देने छथि। तँ पावनि नाओंपर सभकेँ किछु ने किछु दूध देबे करब। जत्ते गोटे सोमनी ऐठाम दूध ले आएल सोमनी सभकेँ दूध दऽ विदा केलक। ओकर अपन छओटा बासन लए मात्र दू गिलास दूध बँचल। ओहो काल्हि पावनि छिऐ तँ आइ दुपहरक। सोमनी ओही दू गिलास दूधकेँ छओ वासनमे दही पाैड़लक। आइ चौड़चन छी भोरेसँ लोक सभ लोटा लए लए सोमनी ऐठाम दूध ले पहुँचल। लगमावालीक बेटी दुखनी सेहो अएल। फूलिया सोमनीकेँ कहलक- “माए गै, दुखनीकेँ दूध नै दहीन। ओकर माए कनिए घासले गिरिऔने रहौ।” सोमनी बाजलि- “पावनिले सभकेँ दूध देबै। गारि देलक तँ की भेल एकठाम रहलासँ तँ आहिना लड़ाइ-झगर होइत छै तँ कि ओइ बातकेँ जिनगी भरि मन रखने रहब ओइसँ की हएत। अनेरे टेंसन रहत।” सेामनी भोरका सभटा दूध लोककेँ दऽ देलक। ओइ दूधक केकरोसँ पाइओ नै लेलक। दुपहरका दूध दूहि कऽ एक गिलास दूध भजैत वितबाकेँ आ एक गिलास मालिक नूनू बाबू आेइठाम पठौलक। एक गिलास अपने रखलक। साँझमे जखनि मरड़ लए सोमनी खीर रान्हैले बैसली तखने बेरमावाली आबि गेलि। ओ कहऽ लगली- “यै दाइ, हमरा तँ खीर रान्हैले दूधे ने भेल। जितबा अखुन्का नाओं कहने रहए। मुदा जखनि बेटाकेँ दूधले पठौलिऐ तँ नै देलक। आब कथी लऽ कऽ मरड़क खीर रान्हब?” सोमनी अपनाले जे दूध रखने रहए आेइमेसँ अधा दूध बेरमावालीकेँ देलक। साँझमे सोमनी चौठीचाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहली- “हे चौठीचाँद महराज, हमरा दरबज्जापर अहिना लगहरि गाए देने रहू तँ हम सभकेँ पावनि लए दूध दैत रहब।” जाति-पाति “यौ नूनू भाय, धानक खेतमे तँ नम्हर-नम्हर दरारि फाटि गेल। रोप सभ पिअर भऽ भऽ गेल। जँ छ-सात दिन आरो बरखा नै भेल तँ बुझू जे सभटा कएल-धएल पानिमे चलि जाएत।” चंचल कहलखिन। “जएत नै चलि गेल। आब जे बरखा हेबे करत तैयो कि सोलह आना धान थोड़े हएत। जँ दस दिन बरखा नै भेल तँ बुझू गेल भैंस पानिमे...। हाथो तरक आ लातो तरक समापत।” नूनूजी चंचलकेँ कहलखिन। गप-सप्पकमे चंचल बजला- “हे भाय, कोनो तरहेँ बिहुल नदीकेँ बान्हू नै तँ सभटा रोप जरि जाएत। भयंकर रौदीक लक्षण बुझहा रहल अछि। यौ आइ-काल्हि आेस केते गिरै छै?” तैपर नूनूजी कहलखिन- “यौ भाय, बिहुलकेँ बान्हब आब असान नै रहि गेल। दू लाखसँ बेसीए खर्च हएत। तखनि बान्ह बान्हल जा सकत। एतबे नै, पनिछेकि बेरमे कम-सँ-कम दू सएक हँसेरी चाही जे चेका आ बालुसँ भरल सिमेंटक बोरा उगहत। दू चारि गोटेकेँ लौकही पठा नहरिक पानिकेँ फाटक गिरा बन्न कराबए पड़त तखने हएत।” चंचलजी बजला- “यौ भाय, अपने जँ मनमे ठानि लेबै तँ बान्ह हेबे करत। परुकौं साल अहींक जोरपर बान्ह भेल। जइसँ धानक रोपनि भेल।” नूनूजी अपन बड़ाइ सुनि उत्तर देलखिन- “से तँ हम पाँच बेर ऐ नदीकेँ बन्हने छी। ठीक छै, परसू सखुआ परतीपर भिनसरे आठ बजे लोक सबहक बैसार करै छी। जँ सबहक विचार भऽ जाएत तँ परसूए हाथ लगा देब।” रबि दिन आठ बजे भिनसरे सखुआ परतीपर बैसक भेल। पाँच गामक किसान सभ बैसल। सबहक विचार भेल, आइए बान्हमे हाथ लगा देल जाए। जेते देरी करब ओते रोपकेँ नोकसान हएत। मुदा रूपैआ तसलैमे तँ समए लगत। टेकटर आ जेसीबीबला तँ बिनु अगुरवार पाइए लेने औत नै। सभ गोटे नूनूजी सँ एक लाख टाका अपना दिससँ दऽ बान्हमे हाथ लगा दइले आग्रह करैत कहलकनि- “जखनि रूपैआ तसील भऽ औत तँ अहाँकेँ आपस कऽ देल जाएत।” सएह भेल नूनूजी अपन पाइ लगा काज शुरू करैले तैयार भऽ गेलखिन। काज शुरू भेल। बान्ह बान्हल गेल। सबहक खेतमे पानि गेल। पिअर भेलहा रोप सभ पानि पबिते हरिआ गेल। सभ गोटे नूनूजीकेँ जश देलकनि। आपसमे रूपैआ तसील नूनूजीकेँ आपस कऽ दइ गेल। गामक मालिक दूर्गा जीक बेटा नूनूजी। लगधग पचास बीघा खेतक मालिक। जमानाक ग्रेजुएट। परोपट्टामे लोकप्रिय लोक। केकरो बेटीक बिआहमे नूनूजी बिनु बजौलो पहूँच एते अबस्स पुछै छथिन जे कोनो दिक्कतदारी तँ ने अछि। जँ कियो बिमार पड़ैए तहूमे नूनूजी सलाह दइ छथिन जे नीकसँ इलाज होइक चाही। जँ पाइ-कौड़ीक अभाव रहल तँ मदति सेहो करै छथिन। तेसर सालक गप छी। बिन्दे साहक बेटीक बिआह मदना गामक तेजी साहक बेटासँ ठीक भेल रहए। दू लाख टाका, एकटा पल्सर मोटर साइकिल आ दू भरि सोनपर बात पक्का भेल छल। लड़िका पंचायत शिक्षक छथिन। नौकरी केनिहार लड़िका सबहक भौउ तँ अनेरे बढ़ल रहैए। जखैनकि लड़िका भैयारीमे असगरे आ पाँच बीघा खेतो। तेजी साह एक नम्मरक लोभी। बिन्दे साह साधारण किसान। एकदम भोला-भला बेकती। हुनकर एकटा बेटा कलकत्तामे टेकसी ड्राइभर, दोसर लड़का दिल्लीमे बिस्कुट फैक्ट्रीमे काज करैत। लड़िकाबलासँ गप भेल छेलै जे मोटर साइकिल आ एक भरि सोन दुरागमनमे देब। बिन्दे साह बिआहक सभ ओरियान कऽ नेने रहए। सर-कुटुम सभकेँ नौत-पिहानी पठा देने रहए। लड़िकाबलाकेँ दू लाख टाका सेहो गनि आएल रहए। बिआहक पाँच दिन पहिने भिनसर भने मदनासँ फोन आएल जे गाड़ी आ दू भरि सोनक दाम हमरा काल्हि पठा देब तँ बिआह हएत नै तँ नै हएत। फोनपर कहल गेल, दोसर गामबला हमरा पाँच लाख दइले तैयार अछि। ऐ बातपर बिन्दे साह झमान भऽ गेला। केतेक जोगारसँ तँ दू लाख टाका मदना पठौने रहथि। आइ भरिए दिनमे केतएसँ औत। बिन्दे साहक जाति बनवाली साहु लगानी-भिरानीक काज करैए। हुनके लग जा बिन्दे साह अपन सभ गप कहैत कहलखिन जे एक लाख टाका ताबे सम्हारि दिअ। बनवाली साहु कहलकनि- “टाका तँ जेते लेब हम तेते देब। मुदा बिनु जेबर लेने आकि जमीन लिखेने नै देब। एक लाख देब तँ दू लाखक जेबर रखब। जमीनो लिखाएब तँ दू लाखक आ लिखाइमे जे खरच हएत से अहींकेँ दिअए पड़त।” बिन्दे साहक घरमे जेबर नै छेलनि। जमीन लिखाइमे पचीस हजारसँ ऊपरेक खर्च। गुनधुन करैत घर आपस आबि गेला। मनमे भेलनि जे एक बेर नूनूजी सँ भेँट कऽ सभ बात कहियनि। सएह भेल, नूनूजी ऐठाम जा बिन्दे साह नूनूजीकेँ सभ बात कहलकनि। नूनूजी कहलखिन- “हौ लड़िकाबला तँ नम्हर चुतिया बुझहा रहल छह। हमरा विचारे तँ ओकरा ओइठाम कुटुमैती नै करह। मुदा बिआहक सभ ओरियान भऽ गेल छह। काडो बाँटि देने छहक। कहअ केतेक टाकाक बेगरता छह।” बिन्दे साह बजला- “एक लाख टाका ब्यौंत कऽ दियौ।” नूनूजी मुड़ी डोलबैत बजला- “ओते तँ घरमे नै अछि, बैंकसँ निकालए पड़त। एना करह, टाका लऽ कऽ जेकरा मदना पठेबहक तेकरा हमरा संग लगा दैह। हम फुलपरास इलाहावाद बैंकसँ टाका निकालि ओकरा दऽ देबै।” बिन्दे साह खुशीसँ बजला- “बड़ सुन्नर गप कहलिऐ। आइए मदनाबलाक पाइ चलि जाएत।” सएह भेल। बिन्दे साहक बेटा नूनूजी सँ पाइ लऽ मदनाबलाकेँ दऽ आएल। बड़ धूम-धामसँ बिआह भेल। नूनूजी अपनेसँ मुस्ताइज भऽ बरियाती सभकेँ भोजन करौलनि। दू महिना पछाति बिन्दे साह जमीन बेचि नूनूजीक रूपैआ आपस केलनि। पाँच रूपैए सैंकर सूदि जोड़ि नूनूजीकेँ दिअए लगला तँ कहलकनि- “ई की दइ छहक। हम तोरा सूदि कहि तँ नै देने रहिअ। हमर टाका बैंकमे पड़ल छल। तोरा बेटीक बिअाहमे काज आएल। हमरा लेल ऐसँ पैघ आैर कि हएत।” तैपर बिन्दे साह निहोरा करैत कहलकनि- “कम-सँ-कम बैंकोक सूदि तँ लऽ लिअ।” नूनूजी- “तोहर बेटी हमर बेटी नै छी की?” बिन्दे साह- “अहाँक उपकार जिनगी भरि नै बिसरब।” परुकाँ बैसाखमे रूपा मण्डलक बेटाकेँ साँप काटि लेलक। पूरा गाम हल्ला भऽ गेल। नूनूजी रूपाक घरपर गेलखिन तँ देखलनि जे झार-फूक कऽ चलि रहल छेलै। नूनूजी ई खेला-बेला देखिते रूपाकेँ कहलखिन- “ऐ सभ अन्धबिसवासमे नै पड़ह। जल्दी डाक्टर रामानन्द बाबूक लग िनर्मली लऽ जा।” रूपा मण्डल कहलकनि- “मािलक हाथपर एक्कोटा छुद्दी नै अछि।” तैपर नूनूजी कहलखिन- “केकरा मोटर साइकिलसँ ओतए पहुँचह हम पाछूसँ पाइ नेने अबै छिअ।” रूपा सुनीलक मोटर साइकिलपर बेटाकेँ लऽ रामानन्द बाबू लग पहुँचल। रोगीकेँ देखि डाक्टर कहलकनि- “अबैमे तँ बड़ देरी भऽ गेलह। जल्दी दस हजार जमा करह। इलाज शुरू करब।” रूपा कहलकनि- “डाक्टर साहैब, अहाँ दबाइ चालू कऽ दियौ। नूनूजी पाइ लऽ कऽ जैघड़ी ने पहुँचला।” नूनूजी नाओं सुनि डाक्टर साहैब इलाज चालू कऽ देलखिन। नूनूजी सँ नीक जान-पहिचान छन्हि। दसे मिनट पछाति नूनूजी अपना मोटर साइकिलसँ पहुँचला। बारह घंटा धरि इलाज चलला पछाति रोगी ठीक भेल। डाक्टर साहैब कहलखिन- “आब ठीक छह रोगी। लऽ जा सकै छह।” रूपा दुनू बापूत नूनू जीक पएर पकड़ि कानए लगल। नूनूजी डाक्टर साहैबकेँ पुछलखिन- “अपनेक केते चार्ज भेल?” डाक्टर साहैब बारह हजार कहलखिन। एक हजार छोड़बैत एगाहर हजार देलखिन आ कहलखिन- “रूपा मण्डल बड़ गरीब अछि। एक हजार छोड़ि दियौ।” डाक्टर साहैब मानि गेलखिन। ओतएसँ सभ विदा भेला। छह मास पछाति रूपा मण्डल नूनूजीक रूपैआ आपस केलकनि। नूनूजी हुनकोसँ एक्को पाइ सूदि नै लेलखिन। एमकी माघमे गोलबाक सूगर चनेसर कामतक अल्लू कोड़ि देने रहए। तइले चनेसर गोलबाकेँ दस-पनरह लाठी मारलक। गोलबाकेँ कपार फूटि गेल। गामक किछु लोक गोलबाकेँ सिखा-पढ़ा चनेसरपर मोकदमा करा देलक। चनेसरपर हरिजन एक्ट लगि गेल। आब तँ चनेसरकेँ प्रलय भऽ गेल। पुलीस पकड़ैले रेड करए लगलै। एक राति चनेसर नूनूजी लग आबि कानैत कहलकनि- “सरकार, अहाँक गप गोलबा मानि जाएत। किएक तँ अहीं जमीनमे ओ सभ बसल अछि। हमरा गोलबासँ सोलह करा दिअ। अपने जे कहब से मानब।” नूनूजी कहलखिन- “अच्छा, ठीक छै। हम गोलबाकेँ बजा गप करै छी। तूँ चिन्ता नै करह।” भिनसरे नूनूजी गोलबाकेँ बजा सभ बात बुझहा कऽ कहलखिन- “केस-फौदारीसँ किछु नै भेटतह। तोरा हम चनेसरसँ दबाइक दाम आ केसक खर्च दिया दइ छिअह। दुनू गोटे सोलह कऽ लैह।” गोलबा बाजल- “मालिक, हम सभ अहीं जमीनमे बसल छी। अहाँ जे कहब हम सभ सहए करबै।” नूनूजी चनेसरकेँ बजा दुनू गोटेमे मिलानी करा देलखिन। कोर्ट जा दुनू गोटे सोलह लगा लेलक। केस खारिज भऽ गेल। ग्राम पंचाय चुनावक घोषणा भेल। पंचायत सभमे भिन्न-भिन्न पदक चर्चा-परिचर्चा हुअए लगल। हमरो पंचायत छजनामे मुखिया पदक लेल बेसी चर्चा भेल। हम सभ विचार केलौं जे मुखिया पदक लेल नूनूजी सभसँ योग्य उमीदवार छथि। से नै तँ हम सभ हुनके ठाढ़ करब। आमदीओ पढ़ल-लिखल आ समाजसेवी छथि। हम सभ नूनूजी लग ऐ विषयपर चर्चा केलौं। कहलनि- “देखू, ऐ पंचायतमे हमर जाति दसे घर अछि। अखुनका राजनीति जाति-पाति लऽ कऽ होइए। तहूमे पंचायत चुनावमे तँ आरो बेसी चलै छै जाति-पाति। हमरा माफ करू अहीं सभमे सँ कियो ठाढ़ होउ। हम हर तरहेँ मदति करब।” तैपर हम कहलियनि- “अहाँक आगूमे सभ जाति-पाति फेल भऽ जाएत। हम सभ नै मानब। अहाँकेँ मुखियामे ठाढ़ काइए कऽ रहब।” बड़ उत्साहसँ सभ नूनूजी केँ मुखिया पद लेल नोमिनेशन करौलकनि। नूनू जीक नोमिनेशन पछाति सोभित साह, मोहित कामत आ सुखदेव मण्डल सेहो मुखिया पद लेल नोमिनेशन करौलनि। छजना पंचायतमे मुख रूपसँ तीन जातिक बोलबाला अछि। जइमे तेली, धानुक आ कियौट सभ छथि। शुरू-शुरूमे तँ नूनू जीक पक्षमे नीक हवा रहल। मुदा जौं-जौं समए बितैत गेल तौं-तौं जाति-पातिक हवा बहए लगल। किछु उम्मीदवार सभ वोटरकेँ चाह-जलखैक अलाबे दारूओ पिअबए लगल। ई सभ देखि नूनू बाबू बजला- “अहाँ सभ मिलि कऽ हमरा उम्मीदवार बनेलौं। हम भोटक नाओंपर एक्को पाइ खर्च नै करब। चाहे हम जीती अथवा हारी। हमरा ने जीतक खुशी हएत आ ने हारिक गम।” भोटक दिन अबैत-अबैत जाति-पातिक हवा आरो जोर पकड़ि लेलक। भोटे गिरै दिन लोक सभ बूझि गेल जे नूनूजी चुनाव हारि जेता। किएक तँ खुलेआम भोटर सभ अपना-अपना जातिकेँ भोट दऽ रहल छल। सहए भेल, सोभित साहु एक नम्मरपर, सुखदेव मण्डल दोसर नम्मरपर, मोहित कामत तेसर आ चारिम नम्मरपर नूनूजी रहला। विवेकक विवेक “बौआ, विवेक कखनि िनर्मली पहुँचत?” ई बात हमर बाबूजी हमरासँ पुछलनि। हम कहलियनि- “दस बजे।” बाबूजी फेर पुछलनि- “की विवेक फोन केने रहए?” हम कहलियनि- “हँ बाबूजी, दस मिनट पहिने सकरीसँ फोन केने रहए। ओ िनर्मलीवाली ट्रेनमे बैस गेल रहए। कहलक, दस बजे धरि ट्रेन िनर्मली पहुँचत।” बाबूजी फेर कहलनि- “ठीक छै, जलखै कऽ लैह आ गाड़ी लऽ कऽ िनर्मली चलि जाह।” “सएह करब।” हम कहलियनि। विवेक हमर पिसियौत भाए। आइ ओ मुम्बईसँ हमरा गाम आबि रहल अछि। कम्प्यूटर इंजीनियर छथि। नौकरी ज्वाइन केला छह मास पछाति पहिल बेर विवेक गाम आबि रहल छथि, ओहो मामा गाम। ओ बजल रहथि जे नौकरी भेटला पछाति पहिल छुट्टीमे पहिने मामा गाम आबि मामा-मामी, भैया-भौजीसँ असिरवाद लेब तखनि अपन गाम जा काका-काकी आ गौआँसँ असिरवाद लेब। हम जल्दी-जल्दी जलखै कऽ मोटर साइकिलसँ िनर्मली टीशन विदा भेलौं। नअए बजे टीशनपर पहुँच गेलौं। टेन अबैमे घंटा भरि देरी छल। टीशनसँ बाहरे मोटर साइकिल हेण्डील लाॅक कऽ मोसाफिरखानाक ब्रिन्चपर बैस गेलौं। हमरा पछिला बात सभ मन पड़ि गेल। पढ़ि कऽ अँगना एलौं तँ दादी आ माएकेँ कनैत देखिलिऐ। समुच्चा गामक स्त्रीगण सभ आ पुरुखो अँगनासँ लऽ कऽ दरबज्जा तक भरल छल। हम किछु बुझबे ने करी। माएसँ पुछलिऐ- “किअए कनै छी। की भेलौं हेन?” माए बजली- “तोहर मदना बला पीसा आ दीदी बस दुरघटनामे मरि गेलखुन।” हम पुछलिऐ- “केतए?” माए कनैत कहने बजली- “ओ सभ बससँ बाबाधाम जाइत रहथिन। ने जानि केना सुलतान गंजसँ पहिने बस एकटा खदहामे खसि पड़ल। दस गोटे ओत्तै मरि गेल जइमे तोरो पीसा-दीदी रहथुन।” हम पुछलिऐ- “के कहलकौ?” माए जवाब देलक- “मदनासँ मोबाइलपर फोन आएल छेलै। तोहर बाबू साइकिलसँ मदना गेलखुन हेन।” दादी कनैत बजली- “भगवान किअए हमरा एहेन दुख देलखिन। हम जीविते छी आ हमर बेटी-जमाए दुनियाँसँ उठि गेला। आब के ओकरा धिया-पुताकेँ पालत-पोसत, लिखौत-पढ़ौत, सादी-बिआह करौत। ऐसँ तँ भगवान हमरा बजा लैत ऊपर।” दादीकेँ संतोख बन्हैत तिलाठवाली कहलखिन- “सभ भगवाने पूरा करथिन। जे भगवान एते बड़का दुख देलक वएह पार लगौतहिन।” दादीकेँ कनैत-कनैत दाँती लगि गेल छल। जनिजाति सभ दादीक दाँती छोड़ा पानि पिऔलक। हमर मदनावाली दीदीकेँ एकटा बेटा आ एकटा बेटी। बेटी दसमामे पढ़ैत आ बेटा अठमामे। बेटीक नाओं मीना आ बेटाक विवेक। विवेक हमरासँ पनरहे दिनक छोट। दुनू भाए-बहिन पढ़ैमे बड़ चन्सगर। दुनू अपना-अपना किलासमे फस्ट करैत। गामसँ एक किलो मीटरमे मदनेसर हाइ स्कूल। ओहीमे दुनू भाए-बहिन पढ़ैत। मदनाबला पीसा दू भाँइ। गेना लाल आ नेना लाल। हमर पीसा गेना लाल जेठ आ नेना लाल छोट। दुनू भाँइ सामिले। जेठ भाय गेना लाल खेतीक काज देखैत जखैनकि नेना लाल गामेमे किराना दाेकान करैत। दुनू भाँइमे पाँच बीघाक धतपत खेत। बाबूजी चारिम दिन मदनासँ आपस एला। बाबूजीकेँ देखिते दादी पछाड़ खा खसि पड़ली। टोल-पड़ोसक लोक सभ जमा भऽ गेल। सभ घटनाक बाबत बाबूजीसँ पुछए लगल। स्त्रीगण सभ दादीकेँ समझाबए लगली। दादी कनैत बाबूकेॅ कहलकनि- “जीतू, हमर नाित-नातिन आब केना रहत। के ओकरा सभकेँ पढ़ौत-लिखौत। के ओकर सबहक बिआह-दुरागमन करौत।” बाबूजी कलखिन- “माए तूँ चिन्ता जुनि कर। जेहेन हमर बेटा राधे तेहने हमर भागिन विवेक आ जेहने हमर बेटी सीमा तेहने भगिनी मीना। हम चारू भाए-बहिनकेँ पढ़ा-लिखा बिआह-दुरागमन कराएब। ओना नेना लालो पाहुन नीके लोक छथिन। ओहो आन तरहेँ भतिजा-भतिजीकेँ नै करथिन।” छठम दिन बाबूजी फोरो मदना विदा भेला। तँ दादी कहलखिन- “जीतू हमरा नैत-नातिनकेँ सखुआ नेने अबिहअ।” पीसा-दीदीक क्रिया-क्रम पछाति बाबूजी विवेक आ मीनाकेँ नेने एलखिन। संगमे पीसाक भाए नेना लाल सेहो रहथिन। विवेक मीना आ नेना लालकेँ देखिते दादी फेरो कानए लगली। नेना लाल मीना आ विवेक सेहो कानए लगल। बाबूजी सभकेँ चुप केलखिन। तेसर दिन नेना लाल पीसा मदना विदा भेला हुनकर कहब रहनि जे हम अपने रखि भतिजा-भतिजीकेँ पढ़ाएब-लिखाएब। जखैनकि दादीक जिद्द रहनि जाबे धरि हम जीब नैत-नातीनकेँ अपना लग राखब आ पढ़ाएब-लिखाएब। नेना लाल पीसा बजल छला- “हमरा गौआँ-समाज की कहत। ओ सभ रंग-रंगक कुटीचाैल करत।” अंतमे िनर्णए भेल जे मीना मदनामे रहत आ विवेक मात्रिकमे रहि पढ़त-लिखत। जखनि नेना लाल पीसा साइकिलपर मीना बहिनकेँ बैसा मदना विदा भेला तँ ओ बौम फाड़ि कऽ कानए लगला। हुनका कनैत देिख अँगनामे सभ कानए लगल। मुदा बाबूजी अपनाकेँ सम्हारैत सभकेँ चुप केलनि। नेना लाल पीसा विदा होइ काल दादीकेँ गोड़ लागि कहने रहथिन- “माए, जेहने जीतू अहाँक बेटा तेहेन हमहूँ अहाँक बेटा छी। हमरा असिरवाद दिअ। जे हमरासँ हमरा भतिजा-भतिजीकेँ कोनो आन तरहेँ नै होइ।” विवेक हमरे ऐठाम रहि पढ़ए लगल। हम दुनू गोटे एक्के किलस अठमामे रही। दुनू गोटे संगे-संग नरहिया हाइ स्कूलमे पढ़ैले जाए लगलौं ओ हमरा भाइजी कहैए आ हम ओकरा विवेक बौआ कहै छिऐ। विवेक पढ़ैमे चन्सगर तँ रहबे करए जे मेहनतियो रहए। मैट्रीक परीक्षामे विवेक अस्सी प्रतिशत नम्मर अनने रहए। हमहूँ सकेण्ड डिविजनसँ पास केलौं। विवेक सीएम साइन्स कौलेजमे नाओं लिखौलक आ हम िनर्मलीए कौलेजमे पढ़ए लगलौं। विवेककेँ मैरिट स्कॉलरसीप भेटए लगल। नेना लाल पीसा विवेकक पढ़ाइमे कोनो कोताही नै केलखिन। विवेक हमरा बरबरि चिट्ठी लिखए। ऐ बीच मीना बहिन पार्वती महिला कौलेजसँ आइए फस्ट डिविजनसँ केलक। बाबू आ नेना लाल पीसा मीना दीदीक बिआह एकटा पंचायत शिक्षकसँ तँइ केलनि। लड़कीक प्रतिभा देखि लड़िकाबला बेसी रूपैआक मांग-चांग नै केलनि तथापि नेना लाल पीसा बड़ धूम-धामसँ भतिजीक बिआह संम्पन्न केलनि। हम आ विवेक मीना बहिनक बिआहमे लोकनियाँ गेल रही। मीना दीदीक ननदि हमरा दुनू भाँइकेँ बड़ तंग केने रहए। खेनाइए बेर हमरा सभकेँ ऊपरेसँ रंग दऽ देने रहए। इण्टरक परीक्षामे विवेक बिरासी प्रतिशत अंक अनलक। हमरो इण्टरमे फस्ट डिविजन भेल। बाबूजी आ नेना लाल पीसाक विचार भेलनि जे विवेककेँ इंजीनियरिंगक कम्पीटिशनक तैयारी लेल पटनामे राखल जाए। सएह भेल। विवेक पटनामे रहए लगल। इण्टर केलाक अगिला साल ओ आइ.आइ.टी.क प्रतियोगिता परीक्षामे पास भेल। पछाति रुड़कीमे नाआंे लिखौलक। इंजीनिरिंग कौलेजमे विवेककेँ फेरो मैरिट स्कॉलरसिप भेटल। जइसँ नेना लाल पीसाकेँ भार कमल। ऐ बीच शिक्षक िनयोजन लेल बिहार सरकार विज्ञापन निकालल। हम आ मीना बहिन दुनू गोटे पंचायत शिक्षकक पदपर चयनित भऽ नौकरी करए लगलौं। समए बितैत देरी नै लगै छै। विवेक इंजीनियरिंगक फाइनल परीक्षामे पचासी प्रतिशत अंक अनलक। ओकर केम्स सलेक्शन भेल। मुम्बइक एकटा पैघ कम्पनीमे नौकरी भेटलै। नेना लाल पीसा मिठाइ लऽ कऽ सखुआ एला। बाबूजी समुच्चा गाममे मिठाइ बँटने रहथिन। गाड़ी सीटीक अवाज सुनिते हमर धियान टुटल। गाड़ी टीशनपर पहुँच गेल छल। हम हरबड़ा कऽ उठलौं आ टेनक डिब्बा दिस बढ़लौं। यात्री सभ डिब्बासँ उतरए लगल। हम बौगी सभमे विवेककेँ ताकए लगलौं। तखने एकटा खिड़कीसँ अवाज आएल- “यौ भायजी, यौ नन्द भायजी।” हमरा हुअए लगल ई तँ विवेकक अवाज छी। हम झटकि कऽ ओइ खिड़की लग गेलौं तँ विवेककेँ वर्थपरसँ समान उतारैत देखलौं। हमरा देखिते विवेक बाजल- “भायजी, गोड़ लगै छी।” हम कहलिऐ- “नीके रहह।” सभ यात्रीक उतरला पछाति हम टेनमे चढ़लौं। विवेक हमर पएर छूबि गोड़ लगलक। हम ओकरा भरि पाँज पकड़ि छातीसँ लगा लेलौं। विवेक पुछलक- “मामा-मामी सभ कुशल छथिन ने?” हम कहलिऐ- “हँ, सभ ठीक छथिन।” विवेककेँ एकटा बड़का शुटकेश, एकटा बैग आ एकटा काटून छल। हम बड़का शुटकेश उठेलौं। ओ बाजल- “भायजी, अहाँ छोड़ि दियौ। हम बेगो आ शुटकेशो लऽ लइ छी।” हम कहलिऐ- “शुटकेश तँ भारी बुझाइ छह। ई हमरा लाबह। तूँ बेग लऽ लैह।” ओ कहलक- “नै भायजी, अहाँ हमरासँ पैघ छी। तँए अहाँकेँ हम अपन समान केना उगहए देब। ई छोटका काटून अहाँ हाथमे लऽ लिअ।” हम केतबो परियास केलौं मुदा तैयो ओ बैग आ शुटकेश हमरा नै लिअए देलक। अपनेसँ दुनू समान लऽ मोटर साइकिल तक अनलक। मोटर साइकिलपर समान सभ बान्हि हम दुनू भैयारी किशन होटल आबि जलखै केलौं केताबे चाहलिऐ मुदा जलखैक पाइ हमरा नै दिअए देलक। जलखै पछाति फल आ मिठाइ कीनि हम सभ गामपर एलौं। अपन मामा-मामीकेँ गोड़ लागि विवेक नानीक सारा लग गेल। हाथ-पएर धोइ नानीक सारापर माथ टेकि प्रणाम कऽ अँगना आबि मामाकेँ कहलक- “मामा यौ, अखने खेनाइ खा हम भाय जीक संगे मदना जाएब। ओतए काका-काकीकेँ प्रणाम कऽ माए-बाबूक सारापर माथ टेकि मीना दीदी ओतए मैलाम चलि जाएब। रातिमे मैलामे रहि जाएब। काल्हि भोरे मदना आएब आ फेर साँझ धरि सखुआ। दू दिन सखुआमे रहि फेर आपस मदना चलि जाएब।” मामा कहलखिन- “बड़ नीक विचार छह।” विवेक सभ कोइले कपड़ा नेने आएल अछि। शुटकेश खोलि सभकेँ कपड़ा देलक। हम दुनू भाँइ खेनाइ खा मदना गेलौं। मदनामे विवेक सभकेँ प्रमाण-पाती कऽ माए-बाबूक सारापर माथ टेकि झहरैत आँखिए अँगना आएल। नेना लाल पीसा विवेककेँ भरि पाँजमे पकड़ि छातीसँ लगौलखिन। हुनको आँखिसँ दहो-बहो नाेर जाइत रहनि। विवेक काका-काकी, भाए-बहिन सभ कोइले कपड़ा अनने रहए। सभकेँ कपड़ा देलक। दू लाखक ड्राप काका नामे मुम्बईसँ अनने छल। नेना लाल पीसाकेँ दैत कहलक- “एकरा बैंकमे जमा कऽ लेब। सप्ताह भरिमे खातामे पाइ चलि औत। जे खेत सभ भरना लगल अछि से सभटा छोड़ा लेब। आब जौं अपने हुकुम करी तँ हम सभ मीना दीदीकेँ भेँट केने आबी।” नेना लाल पीसा कहलखिन- “अबस्से जाह। मुदा रातिमे आब ओत्तै रहि जइहअ। मैलाम दूर अछि ओतएसँ रातिमे एनाइ ठीक नै हेतह।” हम सोचए लगलौं, केतेक नीक अछि। विवेकक विवेक...। वाड़ीक पटुआ डाक्टर प्रमोद कलकत्ता मेडिकल कौलेजसँ एम.डी.क डिग्री लऽ गाम एला। गाममे पिताजी आ मित्र सभसँ क्लीनिक खोलैक विचार करए लगला। मित्र सभ लहेरियासरायक विचार देलकनि। मुदा पिताजी कहलकनि- “लहेरियासरायमे तँ एक-पर-एक डाक्टर सभ अछिए जे रोगीक इलाज करैए। किछु डाक्टर सेवा-भावनासँ इलाज करै छथि तँ किछु सोलहैनी पेशा बनेने अछि। रंग-रंगक ढाढ़स करैत कहत जे हम डाक्टर छी आकि अहाँ। जे कहै छी से करू नै तँ...। सोवहाविको छै ओइ विभागक तरी-घटी, नीक-बेजाएक ज्ञान आमकेँ छैइहो नै। तँए सोलहैनी सुतरबो करै छै। से नै तँ गामेमे क्लीनिक खोलह जे सामाजोकेँ लाभ हेतै आ तोरो जिनगीक महत रहतह।” डाक्टर प्रोमदक पिता अनंत प्रसाद समाज सेवी बेकती। सबहक दुख-सुखमे संग रहए बला। केतेको मरीज सभकेँ लहेरियासराय लऽ जा इलाज करा अनने छथिन। तँए हिनका सभ गपक तजुरबा छन्हि। डाक्टरकेँ भगवान बुझै छथिन मुदा डाक्टरो तँ रंग-बिरंगक अछि। सेहो फर्क करैत रहै छथिन। प्रमोदकेँ डाक्टरी पढ़ेबाक उदेस छेलनि जे गाम-देहातमे समैपर इलाजक अभावसँ केते लोक काल-कलवित भऽ जाइए। तँए देहातोमे डाक्टर जरूरी छै। ओ केतोको डाक्टरकेँ आग्रह सेहो केलखिन मुदा कियो तैयार नै भेलनि। मुदा डाक्टर प्रमोद तँ अपन खून छियनि। हुनकापर अनंत प्रसादकेँ तँ पूरा अधिकार छन्हि। ओना डाक्टर प्रमोदोमे पिताक गुण-बेवहार छन्हि। जखनि ओ मेडिकल कौलेजमे एम.डी.क पढ़ाइ कऽ रहल छला तहू समैमे केतेको मरीज सभकेँ मदति केने रहथिन। अनंत प्रसादक कहब रहनि जे बेरमेमे क्लीनिक खोलल जाए। मुदा बेरमामे तँ खून, लगही, पैखाना इत्यादिक जाँचक तँ सुविधा नै अछि तँए सबहक विचार भेल जे प्रमोद िनर्मलीमे क्लीनिक खोलता आ सप्ताहे-सप्ताह बेरमामे समए देथिन। अनंत प्रसाद प्रमोदकेँ कहलखिन- “बौआ, सेवाक भावनासँ मरीजक इलाज करिहअ। भगवान अहीमे बड़्क्कति देथुन। एकर मतलब ईहो नै जे सोलहैनी फोकटेमे इलाज करब। अपन उचित फीस लऽ रोगीक इलाज करिहअ। तहिना उचित दबाइओ आ जाँचो करबिहक।” डाक्टर प्रमोद कहलकनि- “सएह करब बाबूजी।” िनर्मलीमे क्लीनिक खोलला छह मास नै बितल हएत। परोपट्टामे हुनकर नओंक डंका बाजए लगल। रोगी आ रोगीक संबन्धी सभ डाक्टर साहैबकेँ जश दिअए लगलनि। जगदगरसँ जगदगर िबमारी डाक्टर साहैब ठीक केलखिन। सभसँ पैघ बात ई जे गरीब रोगीक इलाज बिनु फिसेक करै छथिन। दबाइओ फाजील नै लिखै छथिन तँए रोगी सबहक भीड़ लगल रहलैए। रवि दिन छह बजिया ट्रेन पकड़ि राेगी देखए बेरमा चलि जाइ छथिन। ओतौ बहुत रोगी सभ रहैत अछि। सभ रोगीक इलाज कऽ रतुका ट्रेनसँ आपस िनर्मली चलि अबै छथिन। बेरमामे बेसी रोगी रहलापर कखनो काल अँटकैओ पड़ै छन्हि। डाक्टर साहैबक पिताक मित्र छथिन मंगनू प्रसाद। ओहो बेरमेक बासी छथिन। अनंत प्रसादक लंगोटिया संगी। डाक्टर साहैब मंगनू प्रसादकेँ बड़ इज्जति करै छथिन। प्राय: सभ रवि मंगनू प्रसाद डाक्टर साहैबसँ भेँट करए क्लीनिकपर आबि जाइ छथिन। डाक्टर साहैब हुनका चाहो-पान करबै छथिन। आइ रवि छी। आब बजे धरि डाक्टर साहैब बेरमा क्लीनिकपर पहुँचता। ई गप सभकेँ बूझल छन्हि। हम चौकपर चाह पीऐत रही। देखै छी जे मंगनू प्रसाद आ हुनकर पुतोहु आ पोता रिक्शापर बैस तमुरिया दिस जा रहल छथि। हम लग जा पुछलियनि- “मंगनू बाबू अपने लोकनि केतए जा रहल छिऐ?” मंगनू प्रसाद कहलनि- “तमुरिया जा रहल छी। ट्रेन पकड़ि लहेरियासराय जाएब। गोपालकेँ मन खराब छै।” तैपर हम कहलियनि- “आइ तँ रवि छी। डाक्टर प्रमोदो एबे करता। हुनकासँ एक बेर देखा दैतिऐ। इलाज तँ ओहो नीक्के करै छथि आ बच्चे विभागक छथिओ।” मंगनू प्रसाद कहलनि- “छोड़ू, हमरा लहेरियेसराय जाए दिअ। हम गाम-घरक फेरमे नै रहए चाहै छी।” ई कहि ओ रिक्शाबलाकेँ इशारा दैत विदा भऽ गेला। आठ बजे डाक्टर प्रमोद क्लीनिकपर पहुँचला। हमरो ब्लड प्रेशर जँचेबाक रहए तँए हमहूँ ओतै रही। हमरा मुँहसँ अनासुरती निकलि गेल- “तमुरिया टीशनपर मंगनू भेटबो केला।” डाक्टर साहैब कहलनि- “नै तँ, से की? केतए गेला हेन मित्ता काका?” हम कहलियनि- “पोताकेँ डाक्टरसँ देखबैले लहेरियासराय गेला हेन। हम कहबो केलियनि अहाँ दऽ जे एबे करता। मुदा कहलनि जे छोड़ू हमरा लहेरियेसराय जाए दिअ।” डाक्टर साहैब बजला- “जाए दियनु।” लहेरियासरायमे मंगनू प्रसाद अपना पोताकेँ डाक्टरसँ देखौलखिन। डाक्टर साहैब तीन सए फीस लेलकनि। दू हजारक जाँच आ छह सएक अल्ट्रसाउण्ड लिखलकनि। जाँच-परतालक पछाति दू हजारक दबाइ लिखलखिन। अदहा दबाइसँ बेसीए दबाइ चललोपर गोपालक पेटक दरद ठीक नै भेल। तखनि हारि-थाकि कऽ डाक्टर प्रमोद लग िनर्मली लऽ जा कहलखिन- “हौ डाक्टर, लहेरियासरायमे चारि हजारसँ बेसीए खर्च भऽ गेल मुदा गोपलाक दरद कनियोँ उन्नैस नै भेल। से कनी देखहक।” डाक्टर साहैब गोपालक सभटा जाँचक पुर्जा देखलखिन। लहेरियासरायक डाक्टर सभटा पटनियाँ दबाइ लिखने रहै। जाँचो अनाप-सनाप करबौने छेलै। से सभ सभ देखि डाक्टर प्रमोद लहेरियासरायक सभटा दबाइ बन्न कऽ मात्र दू सए टाकाक दबाइ लिखलखिन। तीने िदन दबाइ खेला पछाति गोपालक दरद ठीक भऽ गेल। अगिला रवि मंगनू प्रसाद बेरमामे डाक्टर साहैबक क्लीनिकपर जा भेँट कऽ तारतम कहलकनि- “हौ, हम तँ लहेरियासराय जा ठका गेलौं। तोहर लिखलाहा दबाइ तीनिए दिन खेलापर गोपला पेटक दरद सोलहैनी ठीक भऽ गेल।” डाक्टर साहैब मंगनू प्रसादकेँ कहलखिन- “यौ काका, हम तँ वाड़ीक पटुआ छी। जे तीत सभ दिनसँ होइत रहलै हेन।” मंगनू बाबू किछु नै बजला। डाक्टर बेटा रामकुमार चटिया सभकेँ पढ़ा अँगना एला तँ पत्नीकेँ कनैत देखलनि। देखिते ओ अकबका गेला। पुछलखिन- “की भेल?” पत्नी कनिते कहलकनि- “छिटहीसँ बाबूजी फोन केने रहथिन, माएकेँ लकबा मारि देलक। बजबो-भुकबो ने करै छै।” रामकुमार पुछलकनि- “कहिया लकबा मारलक?” पत्नी कहलकनि- “परसू रातिमे। बाबूजी बजै छेलखिन जे बँचत कि नै तेकर कोनो ठीक नै। अपना सभकेँ परसू रातिएसँ फोन लगबै छेलखिन मुदा फोने ने लगलनि।” रामकुमार बाजल- “तखनि तँ आइए छिटही जाए पड़त। माएक उमेरो तँ अस्सीसँ कम नै हेतनि। काेन ठीक कखनि चलि जेती। चलू दस बजिया बस पकड़ि ली। ओना तँ गहुमक दौनी करब जरूरी अछि। रहि-रहि कऽ मेघ अबै छै। जँ बरखा भऽ जाएत तँ बुझू गहुमक खिजानैत भऽ जाएत। थ्रेसरबला शम्भु कल्हुका नाओं कहने रहथि। मुदा अपना नै रहने दौनी केना हएत। शंभुकेँ फोन लगा कहि दइ छियनि जे हम काल्हि नै रहब अन्तए जा रहल छी। ओतएसँ एला पछाति दौन कराएब। अच्छा जे हएत से हएत। माएक जिज्ञासा करब तँ जरूरीए अछि। हुनका सभकेँ के छन्हि। एकटा बेटो छन्हि जे पटनामे डाक्टरी करै छथिन, परिवार लऽ कऽ ओतइ रहै छथिन।” छिटहीवाली बजली- “एकटा काज करू, खेखनाकेँ बजा गहुमक बोझ करिया दियौ आ ऊपरसँ तिरपाल ओझा झाँपि दिऔ। बरखो हएत तँ नोकसान नै हएत। छिटहीसँ कहिया आएब तेकर कोन ठीक।” रामकुमार कहलकनि- “ठीके कहै छिऐ। तिरपाल तँ अछिए कनी मेहनति करए पड़त। दसबजिया बस नै पकड़ि बरहबजिया पकड़ए पड़त। गहुम झाँपल रहने चिन्ता नै रहत।” सएह केलनि। गहुमकेँ सेरिआ झाँपि देल गेल। गौरकेँ पड़ोसियाक जिम्मा लगा, घरमे ताला मारि दुनू परानी बेटाकेँ लऽ छिटही विदा भेला। रामकुमार एकटा छोट किसान। मात्र दू बिघा खेतक मालिक। ओना तँ एम.ए. पास छथि। मुदा बेरोजगार। कतेको बेर सरकारी नौकरी लेल परियासो केलनि मुदा ऐ जुगमे भगवान भेटब असान अछि मुदा सरकारी नौकरी कठिन। की करता, खेतीक अलाबा चटिया सभकेँ टिशन पढ़ा कोनो धरानी अपन गुजर करै छथि। परिवारमे मात्र तीनि गोटे। दू परानी अपना आ एकटा दस बर्खक बेटा कन्हैया। मालो जालक नाआंेपर एकटा मात्र गौर। पत्नीओ मध्यमा परीक्षा पास केने मुदा ऊहो बेरोजगारे। नौकरी हेबो केना करितनि। जखनि बी.ए., एम.ए.बला सभ झख मारैए तखनि मैट्रिक-मध्यमाक कोन गप। छिटहीवालीक पिता रवि कान्त जमानाक मैट्रिक छथि। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी। बेटाक नाआें फूल कुमार आ बेटीक सुमित्रा। रवि कान्त रजिष्ट्री आॅफिसमे मुनसीक काज करै छला। पहिने तँ हुनका पाँच बिघा खेत छेलनि मुदा आब घराड़ीक अलाबे मात्र दस कट्ठा बँचल छन्हि। बेटा फूल कुमार पटना मेडिकल कौलेजमे डाक्टर। नौकरीक अलाबे खानगीओ क्लीनिक खोलने छथि। प्राय: पाँच हजारक आमदनी भरि दिनक छन्हि। मुदा एक नम्मरक मक्खीचूस आ अबेवहारिक। बहिन-बहनोइसँ कोनो सरोकार नै। माए-बाबू फोन-पर-फोन करैत रहै छन्हि मुदा हुनका लेल धैनसन। गाम एबो केना करता। कमतीमे चारि दिन तँ लगतै जे बीस हजारक अामदनीपर पानि फेड़त, कहबीओ छै बाप बड़े ने मैया सभसँ पैघ रूपैआ। झलअन्हारीमे राम कुमार परिवारक संग सासुर पहुँचला। गामक बीचमे सुमित्राक पिताक घर। अँगनामे पच्छिमसँ पूब मुहेँ एकटा ओ दोसर घर पूबसँ पच्छिम मुहेँ। इटाक देबाल आ ऊपरसँ खपड़ा। अँगनाक उत्तर आ दछिनसँ देबाल दऽ घेरल। उत्तरवरिये कातसँ अँगना एबा-जेबाक रस्ता। दछिनवरिया देबालपर एकचारी जइमे भानस-भात होइए। पछवरिया ओसारपर चौकी जइपर सुमित्राक माए सूतल छेली। रवि कान्त बुढ़ीक पाँजरमे बैसल छला। ओसारिक कोरोमे लालटेन टाँगल छल। राम कुमार सुमित्रा आ कन्हैया अँगना पहुँचला। सभ गोटे रवि कान्तक पएर छूबि गोर लगलकनि। सुमित्रा बेटी जमाए आ नातिकेँ देखि रवि कान्तक छाती सूप सनक भऽ गेल। ओ कुरसी आनि जमाएकेँ बैसैले कहलकनि। सुमित्रा माएक पाँजरमे जा बैसली। रवि कान्त चाह बनबैले चुल्हि पजारए लगला। राम कुमार कहलखिन- “बाबूजी, अखनि चाह बनेनाइ छोड़ि देथुन पहिने एतए आबथु।” माएक पाँजरमे बैसल सुमित्रा माएकेँ िहलबैत बजली- “माए, माए। माए गै, माए।” मुदा बुरहीक शरीमे कोनो हरकति नै भेलनि। सुमित्राक आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल। हुनकर बाबूजी कहलखिन- “गै बताहि। आब माए थोड़े बजतौ। दू-चारि दिनक मेहमान छियौ। परसू रातिमे जे खसलौ से खसलै छौ। कखनो-कखनो आँखि चारू दिस तकै छौ। ठोरो पटपटबै छौ मुदा मुँहसँ अवाज नै निकनि पबै छै।” पिताक बात सुनि सुमित्रा बोम फाड़ि कानए लगली। राम कुमार ससुरसँ पुछलखिन- “डाक्टर भैयाकेँ फोन नै केलखिन?” रवि कान्त जवाब देलकनि- “परसूए जखनि अहाँ सासु गिरल तखने फूलबाबूकेँ फोन केलौं तँ ओ कहलक, अखनि बड़ बिजी छी, घंटा भरि पछाति फोन करब। अहाँ सभकेँ लगेलौं तँ सुइच आॅफ कहलक।” रामकुमार कहलखिन- “हँ परसू मोबाइलक बैटरी चार्ज नै रहए। की कहबनि, हमरा गाममे ने बिजलीए छै आ ने जेनरेटरे। नरहिया नै तँ िनर्मली जा मोबाइल चार्ज करबै छी। काल्हि िनर्मली गेल रहिऐ तँ ओतइ चार्ज करौलिऐ। अच्छा तँ, रातिमे डाक्टर साहैबसँ बात भेलनि?” रवि कान्त कहलखिन- “रातिमे फोन लगौलिऐ तँ सुइच ऑफ कहलक। भिनसर भेने जखनि फोन लगेलौं तँ कनियाँ उठबैत कहली जे अखनि एकटा रोगीमे लागल छथि। बारह बजे करीब फोन करए कहली। बारह बजे फोन केलौं तँ फूलबाबूसँ गप भेल। कहलक, कोनो डाक्टर बजा माएकेँ देखा दियनु आ डाक्टर जे कहता से हमरा फोनपर बताएब। जौं पाइ-कौड़ीक अभाव हुअए तँ ताबए इंजाम कऽ काज करब पछाति हम पठा देब। चौकपर सोम आ शुक्र दिन एकटा डाक्टर अबै छथिन। ओना तँ हुनकर क्लीनिक सिमराही बजारमे छन्हि मुदा हाटे-हाट रमण जीक दबाइ दोकानपर रोगी सभकेँ देखै छथिन। काल्हि सोम रहने डाक्टर साहैब लग गेलौं तँ देखलिऐ मारि भीड़। रोगी सभकेँ देखैत-देखैत साँझ पड़ि गेलनि। सिमराहीओ जेबाक रहनि। मुदा रमणजीकेँ कहलियनि तँ डाक्टर साहैबकेँ कहलखिन जे हिनको बेटा डाक्टर छथिन तखनि हमरा ऐठाम एला। आला लगा देखलखिन, ब्लडपेसर सेहो जँचलखिन आ कहला जे बढ़ल छन्हि जइसँ लकबा मारि देलकनि। दबाइ सभ लिखि कहलखिन चलए दियौ। काल्हिसँ आइ धरि दस बोतल पानि चढ़ि गेलनि मुदा कोनो सुधार नै भेलनि। खाली कखनो-कखनो आँखि तकैत रहै छथिन जेना केकरो खोजैत हुअए।” ई कहैत कहैत रवि कान्तकेँ बुकौर लगि गेलनि। आँखिसँ टप-टप नोर झहरए लगलनि। पिताकेँ कनैत देखि सुमित्रा सेहो कानए लगली। रामकुमार फोरो पुछलकनि- “डाक्टर भैयाकेँ फेर फोन केलियनि आकि नै?” रवि कान्त कहलखिन- “रातिएमे फोनपर सभ बात बतौलिऐ। तैपर फूलबाबू कहलक, काल्हि दू बजै सिमराही जा डाक्टर साहैबकेँ सभ बात कहिहक। मुदा अपनासँ फूलबाबू फोन कऽ माएक हालति नै पुछलक। जेते बेर फोन केलौं हमहीं केलौं।” बिच्चेमे सुमित्रा पिताकेँ पुछलखिन- “भौजीओ ने फोन केलक?” रवि कान्त बजला- “गै बताहि, जौं अपन जनमल नै पुछलक तँ आनक कोन बात। तोरा तँ सभ गप बुझले छौ जे केते कठिनसँ ओकरा पढ़ैलौं।” सुमित्रा बजली- “से कोनो हमरा नै देखल अछि। अहाँक कमाइसँ पूरा नै भेल तँ माएक सभटा गहना-जेबर बेचि कऽ दऽ देलियनि। तहूसँ नै भेल तँ जमीनो बेचि दऽ देलियनि। हँ तँ सिमराहीवला डाक्टर लग गेलिऐ तँ ओ की कहलनि?” रवि कान्त बजला- “कहलनि जे लकबा मारने छन्हि। उमेरो अस्सीसँ ऊपरे छन्हि से आब उठब मोसकिल छन्हि। अपना जानि जे सेवा कऽ सकबनि से करियनु।” रातिमे खानपुरवाली सबहक खेनाइ बनौलक। खेनाइ खा रामकुमार आ रवि कान्त सुतैले चलि गेला। सुमित्रा माएक पाँजरमे बैसल छेली। रातिम एगारह बजे बुढ़ीक शरीरमे हरकति भेल। आँखि ताकि बजली- “बौआ नै आएल? डाकडर बौआ हौ डाकडर बौआ?” सुमित्रा टोकलकनि- “माए हम छियौ, सुमित्रा गोर लगै छियौ।” “के, बुच्ची? कखनि एलँह? पाहुनो एलखुन हेन?” “हँ ऊहो आएल छथिन आ कन्हैयौ आएल अछि।” तखने रवि कान्त एलखिन आ राम कुमार सेहो। “गोर लगै छियनि माए।” रामकुमार बुढ़ीक पएर छुबैत कहलखिन। “नीक्के रहथु। जुग-जुग जीबथु। डाकडर बौआ नै आएल। आब ओकर मुँह नै देखबै। पोताक देखैक सिहन्ता नेनहि मरि जाएब।” रामकुमार कहलखिन- “हिनका किछु नै हेतनि। हम भिनसरे डाक्टर भैयाकेँ फोन कऽ गाम बजाएब।” बुढ़ी कहलखिन- “अच्छा!” अच्छा कहिते बुढ़ीकेँ हिचकी उठलनि आ गरदनि सिरमापरसँ गिर पड़ल। सुमित्रा माए-माए कहैत कानए लगली। रामकुमार बुढ़ीक नारी देखैत बजलखिन- “माए चलि गेली!” प्रोफेसर बेटा गाम नाओं मौआहा। जिला सप्तरी। नेपाल अधिराज्य। बेस झमटगर गाम। बारहो वर्णक लोकक बसोबास करैबला गाम। ओइ गाममे एक गोटेक नाआंे रौदी राउत। हुनकर उमेर लगधग अस्सी बरख। पाँच हाथक लम्गर मरद। श्याम वर्ण। मेहनती आ स्वाभिमानी बेकती। हम अपना मामा लेल भोँट मागए मौआहा गेल छेलौं। मामा नेपालक संविधान सभाक सदस्यक लेल ठाढ़ भेल छला। ओही क्रममे हमरा राउतजीसँ भेँट भेल छल। जखनि हम आ हमर दूगो संगी रामबाबू आ गिरिस सभ कोइ राउत जीक दरबज्जापर पहुँचलौं तँ ओ ओतै छला। हमरा सभकेँ बड़खातिर बात केलनि। अपना पोताकेँ बजा जाह पिऔलनि। हम हुनका अपन मामक लेल भोँट मंगलियनि तँ ओ कहला- “जे नीक लोक हएत तिनका हम जरूर भोँ देब।” रातिमे हमरा सभकेँ रूकबाक लेल आग्रह केलनि। हमहूँ सभ सोचलौं, एतएसँ बरिसानि बारह किलो मीटर अछि। ओतए जाइसँ नीक हएत रातिमे एतै रूकि आरो भोँटर सभसँ सम्पर्क करी। हम राउत जीकेँ कहलियनि- “हम सभ अहीं ऐठाम रातिमे रूकब, भोजनो करब आ अरामो करब। ताबे हम सभ भोँटरसँ सम्पर्क करैले गाम घुमै छी।” राउतजी कहलनि- “सबेरे आबि जाएब।” हम सभ आठ बजे रातिमे हुनका ओइठाम पहुँचलौं। ओ हमरे सबहक बाट ताकि रहल छला। हमरा सभकेँ पहुँिचते पोताकेँ हाक दऽ पानि अनैले कहलखिन। हम सभ हाथ मुँह धोलौं। राउतजी अपना पोताकेँ कहलखिन- “हिनका सभकेँ जल्दी भोजन करा दहुन। भूख लगल हेतनि।” किछुए काल पछाति हमरा सभकेँ आँगन लऽ गेला। भीतक देबाल आ ऊपर खपड़ासँ छाड़ल घर छल। अँगना आ ओसारा बड़ चिक्कन-चुनमुन छल। पछवरिया ओसारिपर हमरा सबहक भोजन लेल कम्बलक आसन लगौल छल। हम सभ भोजन केलौं। जाबे धरि हम सभ भोजन केलौं ताबे धरि राउतजी अपने बैसल रहला आ पोताकेँ कहि हमरा सभकेँ परसन-पर-परसन दिया खुअबैत रहला। हम एक बेर हुनकाेसँ भोजनक आग्रह केलियनि तँ कहला जे हम पछाति करब। भोजन पछाति हम सभ दरबज्जापर आबि गेलौं। किछुए काल पछाति राउतोजी भोजन कऽ हमरा सभ लग आबि कऽ बैसला। हम हुनकासँ परिवारक विषयमे चर्चा कलियनि। ओ जे अपना परिवारक विषयमे कहलनि ओइसँ हुनक वेदना बुझहलियनि। ओ कहला- “बौआ, हमर बाबूजी हमरा मात्र दू बीघा खेत दऽ गेल छला। हम दूध बेचि आ तरकारी खेती कऽ आइ दस बीघा जमीन बनेलौं। हमरा तीनटा बेटा आ एकटा बेटी अछि। बेटीक बिअाह भऽ गेल अछि। जमाए मास्टर छथि। एकटा बेटा गिरहस्त आ एकटा प्रोफेसर अछि। छोटका बेटा बी.ए.पास कऽ गामे धनकुट्टा मील चलबैए। प्रोफेसर राजविराजमे मकान बनेने अछि। लोको वेद ओतै रहै छै। एकटा प्रेस सेहो चलबैए। रूपैआक नीक आमदनी छै।” तैपर हम पुछलियनि- “बाबा, प्रोफेसर साहैब तँ भैयारी सभकेँ मदति करिते हेथिन।” तैपर राउतजी कहला- “बौआ, से जुनि पूछू। दुनियाँमे कोइ केकरो नै छिऐ। लोक केते दुख काटि बाल-बच्चाकेँ पढ़बैए। मुदा जखनि बेटा कमाए लगै छै तँ सभटा बिसरि जाइ छै। लोकवेदक अलाबे किछु नजरिएपर ने चढ़ै छै।” पुछलियनि- “से किअए कहै छिऐ, अहाँ?” राउतजी कहला- “जखनि हमर मझिला बेटा दरभंगामे पढ़ैत रहए तखनि जेठका भाय हर जोति ओकरा देलक। जखनि पाइ घटि गेलै तँ एम.ए.क फारम भरै काल जेठकी कनियाँ अपन हौंसली बन्हक लगा पाइ पठेलक। जखनि राजविराजमे प्रोफेसरी भेलै तँ ओ सभ सभटा बिसरि गेल। पछाति एकटा प्रेस खोललक तँ कहलिऐ छोटका भाएकेँ रखि लहक तँ हमर बात नै मानि अपना सारकेँ रखलक। किछु दिनक बाद हमरा जेठकी पुतोहुकेँ पेटमे दरद उठलै। राजविराजमे डाक्टर लग लऽ गेलिऐ। डाक्टर कहलक जे हिनका पेटमे पाथर भऽ गेलनि। जल्दीसँ ऑपरेशन करए पड़त। दरभंगा लऽ जा करा दियौ। बीस हजारक खर्चक अनुमान डाक्टरो कहलनि। हम चाउर-गहुम बेचि कऽ पनरह हजारक इंजाम केलौं आ पाँच हजार टाका प्रोफेसरसँ मंगलिऐ तँ कहलक, हमरा लग एकोटा टाका नै अछि। परिवारमे बड़ खर्च होइए। तैपर हम कहलिऐ, हौ, बड़की कनियाँ तोरा पढ़ाइमे बड़ मदति केने छथुन। अखनि ओ बेराम अछि तँ तूँ कहै छह पाइए नै अछि। केते दुख हेतनि बड़की कनियाँकेँ। मुदा ओ एको रूपैआ नै देलक। अंतमे हमर पत्नी अपन कौटबी बेचि दरभंगा देलक। दरभंगा संगे जाइले प्रोफेसरकेँ कहलिऐ तँ सेहो तैयार नै भेल कहलक, मारि काज अछि। एको मिनटक छुट्टी नै अछि। तखनि हम हमर जेठका बेटा आ पत्नी सभ कोइ दरभंगा जा बड़की कनियाँक ऑपरेशन करेलौं।” तैपर हम पुछलियनि- “अँए यौ, प्रोफेसर साहैब किछु ने मदति केलथि?” राउत जी कहलनि- “एकटा दोसर गप बतबै छी। हमर किछु जमीन नहरिमे चलि गेल रहए। सरकार जमीनक मुआबजा भुगतान केलक। राजविराजेमे रूपैआ भेटल। रातिमे हम रूपैआ प्रोफेसरकेँ रखैले देलिऐ। भिनसर भने गाम अबै काल रूपैआ मंगलिऐ तँ ओ कहलक, हमरा रूपैआ बेगरता अछि। अहाँ लग तँ रखले रहत दू मास पछाति आपस करब। जखनि तीन मास पछाति छोटका बेटाले धनकुट्टा मील आ आटा चक्की बैसबैले रूपैआ मंगलौं तँ कहलक, सभ खेत-पथार तँ ओही भाय सभ लेल छोड़ि देने छिऐ। हम तँ मात्र खरचे जोकर चाउर-गहुम-दालि-लल्लू-पिआजु अनै छी बाँकी सभ किछु तँ ओकरे सभ लेल रहि जाइत अछि। पाँच हजार रूपैए रखि लेलौं तँ कोन बड़का अन्हैर भऽ गेल। बेटीक जे बिआह केलाैं ओहूमे एकोटा छिद्दी नै देलक। ई प्रोफेसर तँ ओहू दुनू भाँइक सम्पति हरपैले चाहैए। एतेक दिनसँ प्रोफेसर अछि। प्रेस से चलबैत अछि जइसँ रूपैआक नीक आमदनी छै। मुदा आइ धरि हमरा आकि माएकेँ एक्को टाका नै देने हएत। बौआ, जे विद्वान से बेइमान।” हमरा राउत जीक बात सुनैत-सुनैत निन्न आबए लगल। कहलियनि- “बाबा, हम सुतै छी। अहूँ सुति रहू।” सोच “बाबूजी आइ.आइ.टी. प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी लेल कोचिंग करब। राजस्थानक कोटामे नाओं लिखाएब। ओतए नीक तैयारी करौल जाइ छै। तइले एक लाख टाका चाही।” अजीत दरभंगासँ अबित पिताकेँ कहलकनि। बेटाक बात सुनि शीतल राय बिगरैत कहलखिन- “हरिदम टाका केतएसँ औत, पाँचमे दिन तँ तोरा पाँच हजार टाका देने रहियौ। ऐतए कि रूपैआक गाछ अछि। जखनि मन भेल झखा लिअ। देखै नै छिही दादाक इलाजमे केते खरच भऽ रहल छौ। ओ किछुए दिनक मेहमान छथिन। अखनि धरि दबाइए बले जीबैत रहला अछि। मुदा आब बेसी दिन नै खेपता।” अजीत बाजल- “सुजीत भाय, कोटामे नाओं लिखौलनि। ओ हमरा कोटेसँ फोन केने छला। कहलनि जे सत्तरि हजार एडमिशनमे लगत आ रहै-खाइक अलगसँ। सुजीत तँ अपना सभसँ गरीबे छथिन। हुनकर पिताकेँ तँ चारिए बीघा खेत छन्हि। धिया-पुताकेँ ट्यूशन पढ़ा काज चलबै छथिन। अपना तँ दस बीघासँ बेसीए खेत हएत। रूपैआ नै अछि तँ पाँच कट्ठा खेते बेचि लिअ।” शीतल राय जोरसँ बजला- “देख, बेसी हमर दिमाग नै चाट। हम खेत नै बेचब। लोक की कहत। कहत ने जे शीतलो खेत बेचि-बेचि खाए लगल। परुकाँ साल गीताक बिआहमे बीघा भरि खेत बिकले रहए। हरिदम जँ खेत बेचब तँ गाम-समाजमे कोन इज्जति रहत।” बाबू जीकेँ अपन गप नै मानैत देखि अजीत माए लग पैरवी लगौलक। माए सभ बात बूझि पति लग जा बड़ खुशामद केलखिन मुदा शीतल राय साफ तैयार नै भेला। शीतल रायकेँ दस बीघा खेत। एकटा बेटा आ एकटा बेटी जेकर बिआह-दुरागमन सभटा भऽ गेल छन्हि। ओ अपना दुल्हा संग राँचीमे रहै छथिन। शीतल रायक पिता तँ जीविते छथिम मुदा माए मरि गेल छथिन। पिता दम्माक पुरान रोगी छथिन। बेटा अजीत पढ़ैमे होशगर छन्हि। मैट्रिको आ आइ.एस.सी.मे नीक नम्मर अनने अछि। मुदा शीतल राय पढ़ाइकेँ बेसी महत नै दइ छथिन। हुनकर सोच छन्हि एकटा बेटा अछि, दस बीघा जमीन अछि। कोन जरूरी छै बेसी पढ़बाक। आब पढ़ाइ छोड़ि खेती-गिरहस्तीक काज देखह। अजीतकेँ रूपैआ नै देलखिन तँए ओ खेनाइ-पीनाइ छोड़ि देलक। तीनिए दिन पछाति शीतल रायक पिता मरि गेलनि। आब भोज-भातक चर्च हुअए लगल। शीतल रायक पिता जोखन मरड़ गामेमे मात्र नै परोपट्टामे नामी बेकतीमे एक छला। जातिक मैनजन सेहो छला। शीतल राय सोचए, बाबूजी मैनजन छला। तँए हुनकर श्राधक भोज खुब नीक आ नम्हर हेबाक चाही। रसगुल्ला-लालमोहनक भोज करब। भोज आ क्रिया-कर्ममे दू लाख टाकासँ बेसी खर्च हएत। मुदा हाथपर तँ नै अछि। से नै तँ दस कट्ठा खेते बेचि लेब। ई काज दोहरा कऽ फेर थोड़े हएत। अपनो नाआंे कऽ लेब। अजीत सभ गप सुनैत रहए मुदा बाजए किछु नै। ओकरा दिमागमे कोटाक अलाबे किछु एबे ने करैत। भोज-भातक इंजामक लेल शीतल राय अपन सार बेचनजी केँ बजौला। बेचनजी हाइ स्कूलमे शिक्षक छथिन। ओ अबिते बहनोइसँ कहलखिन- “जेतबे सकर्ता हुअए तेतबे भोज करू। जमीन बेचि भोज केलासँ कोन लाभ।” तैपर शीतल राय बजला- “यौ मास्टर साहैब, बाबूजी जातिक मैनजन छला। परोपट्टामे हुनकर नाम छन्हि। नीकसँ भोज नै भेने लोक की कहत?” जखनि ई गप-सप्प दुनू सार-बहनोइमे होइ छल तखनि अजीतो ओतै रहए। पिताक बात सुनि अजीत बाजल- “मामा यौ, बाबूजी हमरा कोचिंग करैले एक लाख टाका नै देता मुदा दादाक भोज खेत बेचि कऽ दू लाख टाका खर्च करथिन?” तैपर शीतल राय टोकलखिन- “पहिने हमरा भोज करए दे। तेकर पछाति आर किछु सोचब।” बहनोइक बात सुनि बेचनजी बजला- “अँइ यौ पाहुन, अहाँ कोन मनुख छी। बेटाक इंजीनियरिंगक प्रतियोगिता परीक्षा तैयारी लेल टाका नै देबै आ भोज-भात खुब ऐल-फइलसँ करब? धूर जी! केहेन अहाँक सोच अछि। छोड़ू भोज-भात। पहिने अजीतकेँ रूपैआक इंजाम कऽ दियौ। तेकर पछाति भोज-भातक गप सोचब। बेटा जे इंजीनियर भऽ जाएत तँ बड़ पैघ बात हएत।” शीतल राय सोचए लगला, बेचन बाबू नीके कहै छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 1 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ‘विदेह'१३७ म अंक ०१ सितम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ६९ अंक १३७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA