ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह' १३९ म अंक ०१ अक्टूबर २०१३ (वर्ष ६ मास ७० अंक १३९) ऐ अंकमे अछि:- बड़की बहीन (उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली] विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। बड़की बहीन (उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल १ चारि भाए-बहिनक बीच सुलोचना पहिल रहने बड़की बहिनक नाओंसँ गाम भरिमे जानल जाइ छथि। दू-अढ़ाइ बीघा जमीनबला परिवार। छियासी बर्खक अवस्थामे जिनगीक ढलानक आखिरी सीढ़ीमे पहुँचल सुलोचना भातीजक संग बिलासपुर-मध्य प्रदेश-सँ अपने गाड़ीसँ गाम पहुँचली। गाम पहुँचिते हलचल भऽ गेल, सुलोचना बहिन एली। ओना पछिला पीढ़ीक अनुकरण करैत अगिलो पीढ़ी दीदीक जगह बहिने कहै छन्हि। एक्के-दुइए टोलक धियो-पुतो आ जनि-जातिओ पहुँचए लगली। डेढ़ियापर गाड़ी रोकि रघुनाथ -छोट भाइक जेठ बेटा- उतरि एका-एकी सभकेँ उतारए लगल। दू बर्खक पोताकेँ सुलोचना कोरामे नेने गाड़ीसँ उतरली। रिष्ट-पुष्ट शरीर, चानीक बल्ला दुनू हाथमे, महीन-सादा साड़ी पहिरने। थुल-थुल देह। उतरिते चारूदिस आँखि उठा तकली तँ बूझि पड़लनि जे जेबा कालसँ विपरीत सभ किछु बूझि पड़ैए। जिनगीक आशा तोड़ि घरो-दुआर आ गामोकेँ गोड़ लागि कहने रहियनि जे अंतिम दर्शन केने जाइ छी। कहाँ आशा छल जे गामक मुँह फेर देखब। तैबीच जेठ भौजाइपर नजरि पड़लनि। नजरिसँ नजरि मिलिते दुनूकेँ बघजर लागि गेलनि। मुँहक बोल बन्ने रहलनि तैबीच झुनकुट चेहरा, ठेंगा हाथे बसमतिया दीदी सेहो पहुँचली। जहिना सुलोचना गामक बेटी तहिना बसमतिया दीदी सेहो। एक उमेरिए दुनू गोटे, मुदा सुलोचना बहिन तीन मास जेठ छथि। बसमतिया दीदीकेँ देखिते सुलोचना पुछलखिन- “साले भरिमे एते लटकि गेलैं?” दुनूक जिनगी बच्चेसँ एकठाम बितने बजैमे कोनो कमी रहबे ने करए। निधोक भऽ बसमतिया दीदी बजली- “तूँ ने भाए-भातिजक कमेलहा खा कऽ गेंड़ा बनि गेलँए, हमरा के देत?” निआरले जकाँ सुलोचना बजली- “किए, भगवान तोरा थोड़े बेपाट छथुन जे नै देनिहार छौ?” बसमतिया- “हँ से तँ अछिए, मुदा जएह कमाएत तेहीमे ने देत। अच्छा, कह जे टुटलाहा लग कज्जी ने तँ रहलौं। नीक जकाँ हाड़ जूटि गेलौं किने?” “हँ। आब तँ बाल्टीनो उठबै छी, पोतोकेँ कोरा-काँखमे लऽ कऽ खेलबै छिऐ। अपने गाड़ीओ छी, आब गामेमे रहब।” “ऐ उमेरमे असगरे रहि हेतौ?” “छोट भाए- मुनेसरो रहत किने? काल्हि ऊहो औत। ताबे कहुना अही टुटलाहा घरमे रहि पजेबाक घर बनाैत। हम सभ केते जीबे करब। मुदा जाबे आँखि तकै छी, ताबे तकक ओरियान तँ करए पड़त किने?” चौदह बर्खक अवस्थामे सुलोचनाक बिआह भेलनि। जहिना पिताक साधारण किसान परिवार तेहने परिवारमे बिआहो भेलनि। समाजमे अखनि धरि धन नै कुले-मूलक महत अधिक रहल मुदा लेनो-देन तँ चलिते छल। नीक-मूलक कन्याक मांगो बेसी। ओना अपन-पिताक कुल-मूलसँ दब परिवारमे बिआह भेलनि, मुदा कोनो हिनके टा नै, समाजमे केतेको गोटेकेँ भेल छन्हि आ होइतो अछि। तँए कोनो प्रश्ने नै उठल। मिथिलांचलक ओइ गाममे सुलोचनाक जनम भेल छेलनि जइ गाम होइत एकटा धारो अछि आ पूबसँ कोसीक पानि आ पछिमसँ कमलाक पानि सेहो बरसातक मौसममे बाढ़ि बनि अबिते अछि। ओना कोसी-कमलाक बान्ह नै रहने अबैत-अबैत बाढ़ि पतरा जाइत मुदा बरखो-बुन्नीक तँ कोनो निश्चित ठेकान नहियेँ छै। जइ साल बरखा बेसी भेल तइ साल बाढ़िओ नम्हर-नम्हर आएल आ जइ साल कम बरखा भेल बाढ़िओ छोट अबैत। खेती लेल बरखा छोड़ि दोसर कोनो साधन नै छल। लकड़ीक करीनसँ किछु खेती होइ छल मुदा ओ तँ पोखरिसँ होइ छल जे बैशाख-जेठमे अपने सुखि जाइत। जे पोखरि गहींर रहैत ओइ पोखरिक पानि ऊपर अनैमे तीन-चारि गाड़ करीन लगि जाइत। गहुमक खेती नहियेँक बरबरि होइ छल, कियो-कियो दू-चारि कट्ठा कऽ लइ छला। सेहो बिनु पटौलहा। छह गोटेक परिवार चलबैमे सुलोचनाक पिता-हरिहरकेँ कठिनाइ तँ रहबे करनि मुदा गाममे मात्र हरिहरे एहेन नै बहुतो एहेन छला जे हुनकोसँ भारी जिनगी जीबै छला। एक तँ महिला शिक्षाक चलनि नै दोसर, गाममे साधनोक अभाव। ओना बाहरसँ कम सम्पर्क रहने गाममे शिक्षाक ओते जरूरतो नहियेँ छल। बेवहारिक ज्ञानक जरूरति छल जे सभमे छेलै, अखनो छै। स्कूलक मुँह सुलोचना नै देखली। बिआहक तीन साल पछाति सुलोचनाक दुरागमन भेल, सासुर गेली। बरख-पाँचे-छबेक पछाति सासुरसँ सुलाचनाकेँ भगा देलकनि। भगबैक कारण रहै जे सन्तान नै भेलनि। ओना ने कहियो डाक्टरी जाँच कराैल गेलनि आ ने सन्तान नै हेबाक दोष किनकामे छन्हि, से फड़िछाैल गेल। समाजमे एहेन धड़ल्लेसँ होइत जे कोनो महिलाकेँ कुरुप कहि सासुरसँ ठोंठिया कऽ भगाैल जाइत तँ कोनोकेँ सौतीन तर बसा भगाैल जाइत। इत्यादि-इत्यादि। वैदिक पद्धति एक-पुरुष एक नारीक सम्बन्धकेँ पहिल श्रेणीक विचार समाज मानने अछि, तैठाम रंग-रंगक बाधा बना नारीकेँ अगुआइसँ रोकल गेल। रंग-रंगक सगुन-अपसगुन कहि तँ उढ़री-ढढ़री बना दबाैल गेल। एहेन स्थितिकेँ जँ रोगक जड़ि बिना तकने आ ओइठामसँ वैचारिक बाट बनौने बिना आइ एक्कैसम शताब्दीमे पहुँचल छी। ई बिलकुल सत् छै जे कियो शेर होइ आकि सियार सभकेँ अपन कालखण्डक लेखा-जोखा होइ छै। तँए ओ अगिला-पछिला दोखक भागी भेला, ई बूझब ननमति भेल। हँ, जँ कियो अपना हाथे किछु केलनि तेकर जबावदेह तँ भेबे कएल। सुलोचनाक पिता हरिहर समाजक ओहन बेकती जे आँखिक सोझहामे कियो गाछक आम तोड़ि लैत वा खेतक धान नोचि लैत तँ एतबे चेतावनी दैत बजै छला जे जाइ िछयौ बापकेँ कहए जे ई छौड़ा धान नोचलक आकि आम तोड़लक। बुझियहनि जे जखनि तोरा कनैठी पड़तौ। समाजमे सहयोगक विचार छल। अपन गार्जन अपने बच्चाकेँ सिखबै छल। मुदा एकटा जबरदस गुण परिवारमे छेलनि जे महिनाक चारि-पाँच रवि, चारि-पाँच सोमक सोमवारी संग केतेको पावनिक उपाससँ सालो छोट कऽ नेने छला। सरस्वतीक आगमन परिवारमे भऽ गेल छेलनि। सिरिफ अपने हरिहरेटा नै पढ़ने। कारणो छल समंगर परिवारमे एक समांग गिरहस्तीओ करै छला। तँए शुरुहेसँ पढ़ाइ दिस नै लगाैल गेलनि। काल-क्रमे ओहन-ओहन भैयारी पछुआएल। ई दीगर भेल। ओना किछु समाज एहनो छल जे एहेन-एहेन अवस्था (सुलोचनाक संग जेहेन भेल तेहेन) केँ बाहुबलसँ रोकलक मुदा समाजोक कटनियाँ तँ बड़का मूस कटिते छै। जाति-जातिकेँ बाँटि सभ रोगसँ रोगाएल छी। कियो कम कियो बेसी। मुदा एहेन-एहेन अपराध समाजक मुद्दा नै बनि बनि, जातिय मुद्दा बनि कमजोर पड़ैत गेल। काल-क्रमे जातिओसँ परिवारमे पहुँच गेल। एक जातिकेँ नीच देखाएब वा जातिक भीतरो अगुआएलक निच्चाँ मनोरंजनक साधन बनि गेल अछि। सरस्वतीक आगमनसँ हरिहरक परिवारक विचारमे किछु नवीनता तँ आबिए गेल अछि। सासुरसँ भगाैल सुलोचनाकेँ परिवार सहर्ष अपना लेलनि। अपनबैक कारण भेल जे परिवारक सभ अपने गल्ती मानि लेलनि जे ओहन कुल-मूलमे डेगे नै उठबैक चाही। ओहनसँ मुहोँ लगाएब नीक नै हएत। बापक दुलरूआ बेटा दोसर बिआह कऽ लेलनि। मुदा सुलोचना अपनाकेँ वैधव्य नै बुझलनि। हाथक चुड़ी रखनहि रहली। समए आगू बढ़ल। लक्ष्मी जहिना दरबज्जापर हँसी-खुशीसँ आबि जाइ छथिन तखनि केतबो ताड़ी-दारूक खर्चा हराएले रहैए तहिना ने सरस्वतीओ रगड़ी-झगड़ी छथि। सुलोचना जकाँ नै ने छथि जे मने-मन संकल्पक संग जीबैक बाट पकड़ैत, ओ तँ तेहेन रगड़ी छथि जे एकटा सौितनक कोन गप जे हजारो सौतीनकेँ झोंटिया अपन हिस्सा लाइए कऽ छोड़ैत। पुरुखक कहने भऽ जेतै जे जेठकीक जेठुआ जोश कमा देतै। सरस्वतीक रूप परिवारमे बदलल। संस्कृत पद्धतिक जगह नव-नव पद्धति शुरू भेल। संस्कृतोक पद्धति रहबे कएल। मुदा शिक्षाकेँ बुनियादी पद्धतिसँ उछालि देलक। सुलोचनाक पीठ परहक जेठ भाय जुगेसर मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। गरीबी-बेकारीसँ त्रस्त परिवार। नोकरीक तलासमे कलकत्ता गेला। दू साल रहला। भाषाक दूरी, शहर-गामक दूरी तँ स्पष्टे रहै। दू साल पछाति जुगेसर टीचर्स ट्रेनिंग केलनि। लोअर प्राइमरीक शिक्षक बनला। जुगेसरसँ छोट मुनेसर सेहो मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। साइंस पढ़ैत। जनता कौलेजमे साइंसक पढ़ाइ नै होइत। गर लगबैत खगड़ियाक गर लगौलनि। ओइ ठामक संस्कृत विद्यालयमे विद्यार्थीकेँ भोजन-डेराक बेवस्था सेहो करैए। कोसी कौलेज सेहो छइहे। साइंसक विद्यार्थी, नीक जकाँ बीएस-सी केलनि तैबीच बिआहो अफसरक परिवारमे भऽ गेलनि। चारि भाँइक भैयारी हरिहरक छेलनि, तइमे बँटबारा भऽ गेलनि। दुनू परानी हरिहरो मरि गेलखिन जइसँ दुनू भाँइक परिवार...। साल भरि पछाति मुनेसरक दुरागमन भेल। दुरागमन भेला पछाति साधना सासुर एली। सासुरक रहन-सहन, घर-दुआर देखि मनमे जबरदस धक्का लगलनि। जे स्वाभाविको छेलै। केतए अफसरक परिवार आ केतए एकटा छोट-छीन गामक किसान परिवार। मुदा एहेन खाली साधनेकेँ भेलनि से नै, धनेरोकेँ भेलो छन्हि आ होइतो अछि। ओना साधनाक अपनो (नैहर) परिवार गामेक छेलनि। मुदा नोकरी भेने परिवारकेँ संगे राँचीमे रखै छला। राँचीएमे जमीन कीनि मकानो बना नेने छथि। अफसर-एसडीओ रहने दोसो-महिम आ सरो-सम्बन्धी अगुआएल तँ छन्हिहेँ। ओना परिवारमे तीन भाए-बहिनक बीच साधना सभसँ जेठ (पहिल संतान) रहने दोसर-तेसर लेल अभिभावके सदृश रहथिन। मुदा बेटी तँ बेटी होइत, बिआह-दुरागमनसँ पहिले धरि माए-बापक घरकेँ अपन घर बुझैत। अपना गामसँ श्यामानन्द (साधनाक पिता) सम्बन्ध तोड़िए जकाँ लेलनि। कहैले तँ घर-घराड़ी छन्हिहेँ मुदा रहैक घर नै। साधारण घर छेलनि जे किछु दिन पछाति गिर पड़लनि, दोहरा कऽ बनबैक खगता नहियेँ बुझलनि। दुरागमनसँ पूर्व धरि मुनेसर परिवारक भारक बीच नै पड़ल छला, मुदा पछाति पत्नी एने किछु जबावदेही तँ भइए गेलनि। अपना ओते खेत-पथार नै जे गिरहस्तीसँ जीविकोपार्जन कऽ सकै छला, तैसंग समाजमे पढ़ल-लिखल संग हँसैक जबरदस समस्या तँ जनम लइए नेने छल जे जँ पढ़ल-लिखलकेँ नोकरी नै भेलनि तँ समाजमे पीहकारीक पात्र बनियेँ जाइ छथि। गाम-घरमे प्रचलित अछि ‘पढ़ए फारसी बेचए तेल देखू भाइ करमक खेल’ बिनु खेतबला जँ गिरहस्त बनि गिरहस्ती अपनाए लेत सेहो बात नहियेँ छै। जीविकोपार्जन लेल केहेन गिरहस्ती चाही ओ तँ सबहक लेल संभव नै। खेतक खरीद-बिक्री होइ छै; सम्पति छिऐ। ओना जेठ भाय जुगेसर नोकरी करै छेलखिन। लोअर प्राइमरीक शिक्षक छला, मुदा अखुनका जकाँ ने सरकारी छल आ ने तेहेन वेतन। दुनू भाँइ मिला परिवार नम्हर छेलन्हिहेँ। जहिना सभ पढ़ल-लिखल वेरोजगारकेँ होइ छै तहिना मुनेसरकेँ सेहो होइ छेलनि जे एतए नोकरीक आवेदन करू, ओतए नोकरीक इन्टरभ्यू दिऔकक स्थिति तँ रहबे करनि। ओना समाजमे (ग्रामीण इलाका) गनल-गूथल पढ़ल-लिखलक संख्या मुदा जेतबो छल ओकरो नोकरीक अाशा तँ नहियेँ छेलै। आ ने अखुनका जकाँ सरकारी कार्यालय छेलै। ओना अखनो कम अछि। नम्हर-नम्हर पंचायत छल, चालीस-चालीस, पचास-पचास पंचायतक बीच ब्लौक थाना छेलै। तैसंग सरकारी कामो-काज कम छल जइसँ सरकारी काजमे प्रवेश करब कठिन तँ छेलैहे। ब्लौकमे अफसरक नाओंपर एकटा बीडीओ रहै छला। काजो कम, अन्नक अभाव रहने खैरातक बँटबारा आ कोटाक माध्यमसँ अमेरिकन गहुमक बिक्री। चीनीक कोटा नै बनल छल। एक तँ चीनीक उत्पादन नीक, दोसर खेनिहार कम। तहिना स्कूलो-कौलेजक संस्था सएह, ‘गनल कुटिया नापल झोर’ सदृश छल। जे शिक्षक काज करै छला ओ सेवा-निवृत्त हेता तेकर पछातिए नव चेहराक प्रवेश हेतनि। लोक बैंकक नाओंएँ टा सुनै छल जे ओइमे रूपैआक लेन-देन होइ छै। दुरागमनक किछुए-दिन पछाति साधना नैहर गेली। अखनि धरि पिता-श्यामानन्द बेटी-जमाएक घर-दुआर नै देखने। बीएस-सी लड़का, शरीरसँ स्वस्थ सुनि बेटीक बिआह केलनि। तइ समए बेटीओ (साधना) मैट्रीक पास केनहि रहनि। बिआहो समैसँ भेल छेलनि। नैहर आपसीक पछाति साधना जखनि सासुरक सभ हाल माए-पिताकेँ कहलनि तखनि पिताक मनमे जमाएक नोकरीक प्रश्न उठलनि। मुनेसरकेँ राँचीए बजा लेलनि। जमाएक नोकरीक चर्च संगीओ-साथी आ सरो-सम्बन्धीक बीच गप-सपक क्रममे करए लगला। राँची विश्वविद्यालयक केमेस्ट्रीक हेडक सोझहा सेहो चर्च केलनि। दुनूक बीच घनिष्ठ दोस्ती। डेरो अगले-बगलमे रहनि। हुनकर (हेडक) ससुर हाइ स्कूल पलामूमे बनौने छथि। ओना जंगल-झाड़क इलाका पलामू, मुदा छोट-मोट कसबा जकाँ तँ छेलैहे। हुनका बूझल छेलनि जे स्कूलमे जे साइंस-टीचर छला, ओ छोड़ि कऽ दोसर नोकरी करए चलि गेला जइसँ साइंस टीचरक अभाव छै। ओ फोन कऽ ससुरकेँ पुछलखिन। विद्यालयमे शिक्षकक अभाव रहबे करै, मुनेसरकेँ नोकरी भऽ गेलनि। दिनांक १-१०-१९६७ ई।केँ िनयुक्ति भेलनि। विद्यालयो सरकारी नहियेँ भेल छल, मुदा कोठारी कमीशनक मंजूरी तँ भइए गेल छेलै। एक सए पाँच रूपैआ महिनाक नोकरी मुनेसरकेँ भऽ गेलनि। नोकरीक समए पत्नी कौलेजमे पढ़ैत रहथिन, तँए पिते ऐठाम रहितो छेलखिन। अपने असगरे पलामूमे रहै छला आ छुट्टीमे राँची अबै-जाइ छला। ओना साइंस शिक्षककेँ सभठाम ट्यूशन चलिते अछि जे मौका मुनेसरोकेँ भेटलनि। एक तँ ग्रामीण जिनगीक जीवन स्तर, तइपर अविकसित इलाकाक नोकरी, बचत नीक होइ छेलनि। किछुएँ दिन पछाति राँचीएमे जमीन कीनि अपन घर सेहो बना लेलनि। मकानसँ किछु किरायो आबए लगलनि। अपन पैतृक गाम मुनेसर छोड़िए जकाँ देलनि। कहियो काल बहिन-सुलोचनाकेँ कपड़ो आ रूपैओ पठा दइ छेलखिन मुदा आबा-जाही नहियेँ जकाँ छेलनि। हाइ स्कूलक शिक्षक लेल ट्रेनिंग करब जरूरी छल। ट्रेंड-आ-अनट्रेंड शिक्षकक बीच वेतनोक अंतर छेलै आ बिना ट्रेंड शिक्षककेँ स्थायी हेबामे सेहो बाधा छेलै। मुनेसरक नियुक्तिक दू साल पछाति मारवाड़ी कौलेज दरभंगामे ट्रेनिंगक पढ़ाइ शुरू भेल। दसे मासक कोर्स। डोनेशनपर एडमीशन होइत। जे पढ़ाइक समए (सेशन शुरू भेला बादो छह मास धरि एडमीशन होइते रहल।) चारि मास पछाति मुनेसरो एडमीशन लेलनि। छबे मासमे ट्रेंड भऽ पुन: पलामू ज्वाइन कऽ लेलनि। ओना ओइ समए झारखंड लगा बिहार छल। राज्योक स्थिति दू भागमे विभाजित। उत्तर-बिहार आ दछिन बिहारक स्पष्ट अन्तर अछि। दछिन-बिहार (झारखंड) मे खेती-पथारी कम होइ छै। खेती जोकर माटिओ कम छै। कम क्षेत्र उपजाऊ अछि। पहाड़ी-जंगलक इलाका। ओना खनिज सम्पदा प्रचूर मात्रामे अछि। कोयलासँ लऽ कऽ अबरख धरिक खान अछि। जखनि कि उत्तर बिहार गंगा-ब्रह्मपुत्रक तलहटी मैदान छी। पहाड़-जंगल नहियेँ जकाँ छै। ओना गाछी-बिरछी पर्याप्त अछि मुदा पहाड़ी लकड़ीक नै। खनिज सम्पदा रहने दछिन बिहारमे देशी विदेशी पूजीपति आ सरकारीओ कारोबार पर्याप्त मात्रामे छै। रंग-रंगक खनिज-सम्पदा, तँए विस्तृत रूपमे कारोबार चलैए। देशी-विदेशी पूजीपति आ सार्वजनिक (सरकारी) कारोबार रहने रोजगारो बहुतायत अछि। मुदा जंगली-पहाड़ी इलाका रहने स्थानीय मूलवासीक बीच शिक्षाक प्रचार-प्रसार कम भेल अछि। साधारण-सँ-कुशल श्रमिकक सृजन नहियेँ जकाँ अछि। साधारण मजदूरक रूपमे रहल अछि। मुदा उत्तर बिहार पढ़ै-लिखैमे अगुआएल। जइसँ कुशल श्रमिकोक संख्या बेसी। तँए उत्तर-बिहारक पढ़ल-लिखल लोक दछिन बिहार जा नोकरी करए लगला आ घरो-दुआर बना बसि गेल छथि। अगिलो पीढ़ी लेल जीविकोपार्जनक उपाए बनियेँ गेल छन्हि। उत्तर बिहारक अर्थात् मिथिलांचलक ईहो दुर्भाग्य रहल जे कृषि प्रधान क्षेत्र होइतो पहाड़ी नदी तेतेक अछि जे क्षेत्रकेँ नष्ट कऽ देने अछि। ओना तीन रूपमे धार प्रवाहित होइए। किछु धार एहेन अछि जे मात्र बरसातक मौसममे प्रवाहित होइए आ पछाति सूखि जाइए। प्रवाहित होइत किछु धार एहेन अछि जे असथिरसँ बहैए, काट-छाँट नहियेँ जकाँ करैए। हजारो बर्खसँ एके स्थानपर बहैए। किछु धार एहनो अछि जे काटो-छाँट बेसी करैए आ उपजाऊ माटिकेँ बालुसँ भरि नष्टो करैए। जइसँ गाम-गामक खेतीओ नष्ट होइ छै आ घरो-दुआर नष्ट होइ छै। जीवन-यापनक मूल आवश्यकता उत्पादित पूजी नष्ट भेने पड़ाइन तँ लगले छल आ लगले रहत। ओना मिथिलांचलक माटि-पानि-हवाकेँ अनुकूल रहने उर्वर शक्ति तँ छइहे। जइसँ केतबो लोक गामसँ पड़ा देश-विदेशक कोण-कोणमे बसला मुदा अखनो गाम-घरक आवादी सघन तँ अछिए। गामसँ तीन कोस हटि जुगेसरो नोकरी करै छला आ डेराे बाहरे रखने छला। कारणो छल जे ने अखुनका जकाँ गाड़ी-सवारी छेलै आ ने बान्ह-सड़कक दशा नीक रहै। शहर-बजार छोड़ि ने पीच (पक्की सड़क) गाम दिस बढ़ल छल आ ने बिजली। मुदा तैयो १९४७ इस्वीक अंग्रेज भगा अपन स्वतंत्र देश बनेबाक विचार तँ जन-जनक मनमे छेलन्हिहेँ। गुलामीक शोषणसँ देशक स्थिति बिगड़ि गेल अछि, जइसँ देशक विकास अवरूद्ध भऽ गेल अछि। स्वतंत्र भेला पछाति विकासक रास्ता देश जरूर पकड़लक। मुदा तेते असथिरसँ जे आजादीक साठि-पैंसठि बरख पछातिओ, जनकेक हरसँ खेतीओ होइए आ करीने-ढोसिसँ पटौनी। कृषि-प्रधान देश (जइ देशमे अस्सी प्रतिशतसँ ऊपर आवादी कृषि आधारित अछि) रहितो पाछू पड़ि गेल। किछु पूजीपति सत्ता हथिया शहरे-बजारक विकास धरि देशक अर्थ-बेवस्थाकेँ समेटि लेलक। तैसंग ईहो नै नकारल जा सकैए जे जे मिथिलांचलवासी आन-आन देशक उन्नतिमे अपन शक्ति बेचि सेवा करै छथि ओ मिथिलांचलसँ, अपन मातृभूमिसँ आँखि सेहो मूनि लेलनि। देशक सत्ता किसानक समस्यासँ हटि जाति-धर्मक एहेन वातावरण बना देने अछि जे वास्तविक विकासकेँ अवरूद्ध कऽ देने अछि। मिथिलांचलक पानि-माटि आ मौसममे एहेन अनुकूलता अछि जे साएओ रंगक अन्न, फल, तरकारीक संग साएओ रंगक चिड़ै, पशु लेल अनुकूल अछि। मुदा सभ किछु रहितो कि अछि से सबहक सोझहेमे अछि! ओना अठबारे (शनि-रवि) जुगेसर गाम अबिते छला तैसंग पावनिक छुट्टी आ अनदिनोक छुट्टीमे सेहो अबिते छला। स्थितिओ एहेन नै छेलनि जे साइकिलो कीनि सकितथि। ओना परिवारो तेहेन नम्हर नहियेँ छेलनि। तहूमे अपने अन्तै रहै छला। जैठाम डेरा रखने छला ओइ परिवारक बच्चा सभकेँ पढ़बै छला। बदलामे भोजन आ रहैक बेवस्था छेलनि। ने बाइली ट्यूशन छेलनि आ ने दरमाहा छोड़ि दोसर आमदनी। शनिचरा प्रथा समाप्त भऽ गेल छल। जुगेसरक सासुर मुंगेर जिला। गंगा दियाराक गाम। तीन भाँइक भैयारीमे ससुर जेठ रहथिन। संयोग एहेन भेलनि जे छोट दुनू भाएकेँ बेटो भेलनि, हिनका (जुगेसरक ससुरकेँ) दूटा बेटीएटा। बहुत बेसी जमीनबला परिवार तँ नहियेँ छेलनि मुदा पच्चीस-तीस बीघा तँ छेलन्हिहेँ। भैयारीक सम्पतिक प्रश्न भैयारीमे टकराएल। दुनू छोट भाएक कहब छेलनि सभ दिन अबैत-जाइत रहती। मुदा से जेठ भाय रमानन्दकेँ मान्य नै रहनि। रमानन्दक विचार छेलनि जे हम अपन हिस्सा बेटीएकेँ देबै। भैयारीमे जमीन लऽ कऽ विवाद ठाढ़ भेल। छोट दुनू भाँइ विचार केलनि जे किछु होउ, जमीन तँ गामेमे रहत। ओ तँ ससरि कऽ नै जाएत। तखनि गामक लोक कीनि लेत आ रूपैया उठा कऽ दऽ औथिन। गामे-गाम तँ तीनतसिओ चालिक लोक अपन चािल चलैबिते छै। मुदा किछु होशियारी भेल। दुनू भाँइ साैंसे गामक लोककेँ, खास कऽ तीन तसियाबलाक बैसार केलनि। बैसारमे अपन प्रस्ताव देलखिन जे जखनि भैयाकेँ बेटा नै छन्हि तखनि बुढ़ाड़ीक सेवा भेलनि से भातीजे सभ करतनि, जइसँ कुलो-खनदानक इज्जत बँचल रहत आ सेवो हेतनि। किए अनेरे बुढ़ाड़ीमे ऐ गाम-सँ-ओइ गाम बौएता। समाजोकेँ जँचल। मुदा रमानन्द सेहो अपने मनक लोक। परिवारसँ समाज धरिक किनको बात सुनैले तैयारे नै। अकछि कऽ समाजक सभ दुनू भाँइकेँ कहि देलकनि जे भैयारीक झंझटि अछि समाज ऐमे नै पड़त। मौका पाबि दुनू भाँइ पूछि देलखिन- “जँ कियो चोरनुकबा जमीन लिखा लथि, तखनि?” जेते गोटे बैसल रहथि पंच-परमेश्वरक रूपमे रहथि, अनुकूल विचार देखि अनुकूलतामे भँसि हरे-हरे एक्के शब्दमे बाजि उठला- “जे समाजसँ बाहर हएत, ओ बेटीचोद हएत।” बजैकाल तँ सभ बाजि गेला मुदा पछाति अपनेपर तामस उठए लगलनि जे सस्त चीज हाथसँ निकलि गेल। जहिना आगिक ताउपर लोहियाक जिलेबी-कचड़ी पेनीसँ उठि ऊपर अलगि जाइत तहिना रमानन्दकेँ भेलनि। गंगाकातक गाम जकाँ गामक लोक सोझहे-सोझही रमानन्दकेँ दुतकारए लगलनि। अखनि धरि समाजमे अहाँकेँ लोक कोन नजरिए देखैत रहल आ अहाँ कि करैपर उताहुल छी। मुदा तेकर कोनो असरि रमानन्दकेँ नै भेलनि। १९४० ई।क लगातिमे रमानन्द मैट्रिक पास केने छला। जइ समए हजारो विद्यार्थी स्कूल-कौलेज छोड़ि आजादीक आन्दोलनमे कूदि अपन सर्वस्व तियाग केलनि। ओही समैक उत्पादित मनुख रमानन्द सेहो छथि, अंग्रेजी धुर-झार बजै छला। रेल-तार इत्यादि सरकारी सेवाक केतेको गोटे नोकरी छोड़ि अपन आहुत देलनि। मध्यम किसान परिवारक रमानन्द। पिताक देख-रेखमे परिवार चलैत, तँए घरक छुट्टा आदमी। एतए-ओतए घुमनाइ आ गुलछर्ड़ा छोड़नाइ जिनगीक काज छेलनि। मुदा जहिना शरीरमे रोगक आगमसँ धीरे-धीरे शरीरक शक्ति ग्रसित हुअ लगैत तहिना रमानन्दकेँ परिवारसँ समाज धरिमे हुअ लगलनि। जे भातीज बड़का बाबू कहै छेलनि ओ मुँहपर गारि पढ़ए लगलनि। मनुखोक तँ अजीव स्वभाव होइ छै। घनिष्ठ-सँ-घनिष्ठ मित्र जँ कोनो अधला वृत्तिमे फँसि जाइए तखनि जे स्थिति पैदा लैत सएह रमानन्दोकेँ भेलनि। समाजक लोक ने कियो दरबज्जापर बैसए कहनि आ ने गप-सप करैले तैयार। जहिना खुला जहल होइत तहिना रमानन्दकेँ भेलनि। भैयारीमे विवाद उठने मुकदमाबाजी सेहो उठल। समांगसँ पातर रहने रमानन्द कमजोर पड़ए लगला। सोझहेमे भाए सभ खेतक जजाति, गाछ-बाँस उजाड़ए-काटए लगलनि। दुनू भाँइ अबधारि लेलनि जे जेते मुकदमा करता करथु। थानो आमदनी बुझलक, तँए हिसाब मिला कऽ चलैत। दुनू बेटी-जमाएकेँ बजा अपन सभ दुखरा सुनबैत रमानन्द कहलखिन- “जहिना, हम अपन सभ सम्पति अहाँ सभकेँ दिअ चाहै छी तहिना तँ अहूँ सभकेँ चाही जे ओकरा बँचा कऽ लऽ जाइ।” दुनू बेटी-जमाएक बल जहिना रमानन्दकेँ भेटलनि तहिना ओहू दुनू भाँइकेँ समाजक लोक मुकदमामे संग दिअ लगलनि। धीरे-धीरे रमानन्दक मन टुटए लगलनि। एक तँ साठि बर्खक उमेर टपि गेेल तइपर कोट-कचहरीक दौड़सँ लऽ कऽ बेटी-जमाए ओइठामक दौड़-बरहा तेते बढ़ि गेलनि जे गामसँ बेसी अन्तै गुजरए लगलनि। असगरे पत्नी घरमे सकपंज भेल रहथि आ अपने बौआइत-बौआइत फिरिसान। किछु दिन पछाति पत्नी अस्सक पड़लखिन। ने दियादवाद आ ने गामक कियो एको बेर पुछाड़ि करए आबनि दुनू बेटीओ-जमाए लगमे नै, मधुबनी जिलाक गाममे। ने उचित समैपर डाक्टरी देख-भाल होन्हि आ ने दवाइ-दारू। किछु दिन पछाति मरि गेलखिन। पत्नीक मुइला पछाति रमानन्दक जिनगी आरो जटिल भऽ गेेलनि। गाममे जखनि रहथि तखनि भानसो-भातक ओरियान अपने करए पड़नि। आमदनी सेहो भाए सभ रोकि देलखिन। अन्ना-गाँहिस देखि दुनू जमाएओ हाथ-मुट्ठी सक्कत केलनि। फटो-फनमे रमानन्द पड़ि गेला। जिनगीक कोनो सोझराएल बाट देखबे ने करथि। जिनगीक अंतिम पाँच बरख रमानन्दक एहेन बितलनि जेकरा लोक नरकक बास कहै छै। हारि-थाकि कऽ किछु दिन पछाति अपनो (रमानन्द) मरि गेला। जमाएओ सभ आवाजाहीक संग केसो-मुकदमा देखब छोड़ि देलकनि। अंत-अंत एकतरफा केस भऽ गेल। जुगेसरक गाममे दियादीक दोसर परिवारमे वेमात्रेय भैयारीक बीच विवाद उठल। एक माएकेँ एक बेटा आ दोसरकेँ चारिटा। चारू भैयारी मिलि पाँचम भाएकेँ (वेमात्रेय) उपद्रव कऽ गामसँ भगा देलकनि। किछु दिन तँ ओ (पाँचम भाए) सर-सम्बन्धीसँ लऽ कऽ समाजक बीच चक्कर लगौलनि, मुदा किछु हाथ नै लगलनि। अन्तमे खिसिया कऽ पिताक सम्पतिक (जमीनक) कागत-पत्तर कलक्ट्रीएटसँ निकालि कहि देलखिन जे अपन हिस्सा घराड़ी तक बेचि लेब। बीघाक लगभग हिस्सा पड़ैत रहनि। मुफ्तक माल खाइबला सभ समाजमे रहिते अछि। तीन-चारिटा परिवार खेत लिखबैक विचार कऽ लेलनि। मुदा विवाद तँ बीचमे छेलैहे। लेबालक बीच प्रश्न उठैत जे जमीन-जयदादक विवाद छी, मारिओ हेबे करत आ थाना-फौदारी सेहो हेबे करत। ने मारिक ठेकान अछि आ ने केते दिन झंझटि रहत तेकर ठेकान। तँए दुनूकेँ नजरिमे रखि लेन-देन करब। तहिना जमीनबलाक (पाँचम भाय) बीच प्रश्न उठल जे जँ सस्तमे लिखि देबै, तइसँ लाभ कि हएत? तखनि तँ नीक अछि जे अपने भैयारी सभ खाथि। कम-सँ-कम एक परिवारक तँ छथि। मुदा चालिओ देनिहारक तँ कमी नहियेँ अछि। उनटा-सीधा मंत्रक तेते डाकनि पड़ल जे बैहरा करकरेतक बीख जकाँ निच्चाँ मुहेँ ससरल। अन्तमे फड़ियाएल जे अधिया दाममे खेत लिखबैले (खेत लिखौनिहार) तैयार भेला। बेचिनिहारकेँ (पाँचम भाएकेँ) तेते चारू भाँइ गंजन केने जे तामस कमबे ने करैत। होइत-हबाइत अधिया दाममे जमीनक लेन-देन भऽ गेल। ओही लेबालमे एकटा जुगेसरो। मुदा संयोग नीक रहलनि जे जुगेसर अपने स्कूलक नौकरी दुआरे बाहरे रहथि तही बीचमे गाममे दाेसर लेबालक संग मारि भऽ गेल। जबरदस मारि भेल। दुनू दिस कपार फुटल, बाँहि टुटल। सौंसे गाम सना-सनी पसरि गेल। अनेको भागमे समाज विभाजित भऽ गेल। किछु गोटे खुलि कऽ दुनू गोटेक (दुनू पार्टीकेँ) केसमे गवाही दइले तैयार भऽ गेला। किछु गोटे मारिओमे संग देलकनि। किछु गोटे बेक्तिगत पूजी देखि अपनाकेँ दुनूसँ अलग रखलनि। मुदा समाजोक लत्ती तँ एहेन सकबेधने अछि जे नहियोँ विचार भेने परिस्थितिवश मजबूरीमे ‘हँ’ कहए पड़ै छै। सेहो भेल। तेतबे नै लत्तीक सोर एहेन अछि जे गामेमे लोक सासुर-मातृक सेहो ठाढ़ कऽ लइए। ओही झंझटिमे जुगेसर आठ कट्ठा जमीन कीनैक विचार केलनि। ओना दुनू परानीक विचार जे मुनेसरकेँ ऐ जमीनमे संग नै करब। मुदा परिवारक तँ विधिवत् बँटबारा भेल नै अछि तखनि जेठ भाय छिऐ, छोट भाएक हिस्सा तँ भइए जाएत। तँए कहि देब जरूरी अछि। जँ अदहा खर्च देत तँ ठीके छै नै तँ अपन दोख तँ मेटा लेब। विचारक पाछू पेटमे रहनि जे मुनेसरक आमदनी तेतबे छै जे कहुना कऽ परिवार चलै छै। तखनि रूपैया केतए सँ आनत? तैबीच मनमे ईहो जे गुप-चुप दाम भेल अछि किने, बढ़ा देबै। कहुना (अधिया दाम भेने) चारि कट्ठा तेफैसला (तीन फसिला) खेतक भैलू कम नै भेल। पोस्ट कार्डक माध्यमसँ जुगेसर मुनेसरकेँ जनतब देलखिन। स्कूलक दरमाहा तँ जुगेसरकेँ बूझल, मुदा ट्यूशनक आमदनी तँ नै बूझल। तैसंग पत्नीओ (मुनेसरक) विचार देलखिन जे नैहरमे देल बरतन-बासन जे अछि ओ अनेरे घरमे ढनमनाइत रहैए, ओकरा बेचि कऽ जमीन कीनि लिअ। अखनि धरि दुनू भाँइ -जुगेसर-मुनेसरक- बीच पहिलुके सम्बन्ध जीवित छल। मुनेसर अदहा खर्च दइले तैयार भऽ गेला। जमीनक रजिष्ट्री जुगेसर दुनू भाँइक नाओंसँ करा लेता। अपन कमजोर पाशा देखि जुगेसर दुनू परानी विचार केलनि जे नीक हएत बेटा नाओंसँ जमीन लिखौल जाए। मुनेसरकेँ कोनो पता नै। तइ समए रजिष्ट्रीओ आॅफिसमे अखुनका जकाँ नै छल जे लिखौनिहारोकेँ उपस्थित रहए पड़ैत। कियो केकराे नाओंसँ जमीन लिखा सकैए। तैसंग पान-सात बरख पछाति दस्ताबेज भेटै छै, ताबे बातो पुरनाए जाइत। तहूमे कागतक खोज जखनि हएत तखनि ने जँ नै हएत तँ के बूझत? ने भिनौज भेल अछि आ ने खेती-पथारी बँटल अछि। तखनि तँ गाममे रहै छी जेना-तेना जनक हाथे खेती कऽ लइ छी। बात खुजबे ने करत, तँ मुहाँ-ठुट्ठी आकि हल्ला-फसाद हएत किए। जहिया भीन हएब तहिया बूझल जेतै। अनुकूल विचार बूझि जुगेसर अपना बेटाक नाओंसँ आठो कट्ठा जमीन लिखा लेलनि। जे पछाति दुनू भाँइक बीच विस्फोटक भऽ गेल। किछु साल पछाति रजिष्ट्रीक भेद खूगल। भेद खूगिते दुनू परिवारमे अनोन-विसनोन शुरू भेल। दू तरहक अनोन-विसनोन उठल। एक तरहक भेल जे मुनेसर दुनू बेकतीक बीच आ दोसर तरहक भेल जुगेसरक बीच। जुगेसरक पत्नी पिताक सम्पतिक खेल देखि चुकल छेली जे अछैते हिस्से हिस्सा नै भेल। तँए पतिपर दबाव बनौने जे जे भेल माने बेटा नामे रजिष्ट्री नीक भेल। मुदा जुगेसरकेँ सद्य: भाइक संग बेइमानी आ समाजक बीच दोखी हेबाक डर मनमे नचैत रहनि। मुदा बेटो जुआन भऽ गेल रहनि। अपन खास हिस्सा बूझि ऊहो माइएक पीठपोहू बनल। तहिना दोसर दिस मुनेसर अपन आमदनी देखि सबुर करैत। आमदनीओ नीक बनि गेल रहनि। सरकारीकरण भेने नीक दरमाहा, तैसंग ट्यूशनो फीस बढ़ने अधिक आमदनी, राँचीक मकान भाड़ा सेहो जोर दैत। मुदा साधनाक भूख (सम्पतिक भूख) आरो उग्र भऽ गेलनि। तहूमे अपन बाप-माइक देल बरतन-बासन बिकाएल रहनि। दुनू परानीक बीच खुलि कऽ मतभेद शुरू भऽ गेल। गप-सपक क्रम एना भेलनि। मुनेसर पत्नीकेँ बुझबैत कहलखिन- “देखियौ, राँची सन शहरमे अपन मकान भऽ गेल, गाममे रहैक कोनो प्रश्ने ने अछि। तखनि तँ ओहए (भैया) खेतीओ करै छथि, खेबो करता।” मुनेसरक विचारकेँ कटैत साधना अपन अर्थशास्त्रीय तर्क देलखिन- “जखनि गाममे नै रहब तखनि गामक पूजीकेँ मार पूजी किए बनौने रहब। ओकरा बेचि कऽ बैंकमे जमा कऽ लेब तैयो सूदि औत। नै जँ घरे आरो बना लेब तैयो भाड़ा एबे करत।” पाशा बदलैत मुनेसर तर्क देलखिन- “बाप-पुरखाक जँ घराड़ीए बेचि लेब तखनि कोन मुँह लऽ कऽ जिनगी जीब। कोनो कि पेट जरैए जे बेचब।” होइत-हबाइत ई भेल जे गामक खेत भरना लगा बैंकमे जमा कऽ लेब। मुदा विवाद तँ बीचमे भैयारीक रहबे करनि। किछु दिन पछाति दुनू बेकती (मुनेसर-साधना) गाम आबि अपन डीह-डावरसँ लऽ कऽ बाध धरिक बँटबारा करैक विचार जुगेसरक सोझहामे रखलनि। विवादी जमीन (जे रजिष्ट्री भेल रहए) छोड़ि सभ किछु बँटैले तैयार भऽ गेला। नै मामासँ कनहा मामा नीक। विवादी जमीन छोड़ि बाँकी बाँटि लेलनि। हरिहरक भैयारीमे अढ़ाइ कट्ठा घराड़ी। जे बँटाइत सबा छह धूरपर आबि गेल। जइ समए सुलोचना सासुरसँ नैहर आएल छेली ओ समए देशक आन्दोलनक तूफानी दौड़ छल। सन् १९४२क दमनचक्र प्रारम्भ भऽ गेल छल। परोपट्टाक (झंझारपुर इलाकाक) लोक अंग्रेजी हुकुमतक खिलाफ सड़कपर उतरि गेल छल। गोरा-पलटनक अड्डा झंझारपुर बनल छल। केतेको गाममे आगि लगाैल गेल। केतेको गोटे भूमिगत काज करै छला। केतेको गोटे मारि खा-खा जहलमे बन्न छला। मुदा लाजिमी बात ईहो रहल जे ऐठामक केतेको परिवार गोरा सरकारक संग देलक। रहै-खाइक बेवस्थाक संग-संग सम्पतिक लूट सेहो केलक। ओना गाममे सुलोचना बहिन सन केतेको गोटे छथि जे सासुरसँ भगाैल छथि। अपन माए-बाप, भाए-भाैजाइक संग सेहो रहै छथि आ असगरो बोनि-बुत्ता कऽ जीवन-यापन सेहो करै छथि। किछु गोटेकेँ सन्तानो छन्हि आ किछु गोटेकेँ नहियोँ छन्हि। अदौसँ एक पुरुष एक नारीक सम्बन्धक विधानो आ बेवहारो तँ बनल रहल मुदा परिवारकेँ आगू बढ़ैले किछु कमी तँ छेलैहे। ओ कमी अछि जे मनुखक शरीरक बनाबटि समान नै होइए। बहुलांशमे सन्तानोत्पत्तिक शक्ति समान रहैत आएल अछि तँ तैसंग कमी-बेसी सेहो रहल अछि। केतौ कोनो पुरुखमे शक्तिक कमी तँ केतौ कोनो महिलामे। तहिना केतौ कोनो पुरुखमे बेसी रहल अछि तँ केतौ कोनो महिलामे। शक्तिहीन पुरुख रहने क्षेत्रज सन्तानक चलनि सेहो रहल अछि। मुदा शक्तिहीन नारी भेने तँ परिवारकेँ आगू बढ़ैमे बाधा उपस्थित भाइए जाइए। तैठाम दोसर नारीक सहारा जरूरी भऽ जाइ छै। जँ से नै हएत तँ परिवारक अन्त हएत। अन्ते नै हएत बुढ़ाड़ी आ बिमारीक अवस्था सेहो कष्टकर हएत। मुदा आवश्यक-आवश्यकता तखनि आराम आ विलास दिस बढ़ैए जखनि भोग-विलासक मनोवृत्ति जोर मारैए। जइक चलैत समाज-परिवारमे िवकृतताक रूप पकड़ैए। से भेल। समाजक अगुआएल (खास कऽ आर्थिक रूपे) आ मध्य वर्गीओ परिवारमे एक-सँ-अधिक बिआह करब नीके जकाँ चलनिमे छल। जइसँ एक पुरुख एक नारीक प्रथापर जबरदस चोट पड़ल। मुदा केतबो जबरदस चोट किए ने पड़ल, तैयो सोलहन्नी नष्ट नै भेल। ओना निम्न वर्गमे सेहो बिमारी पैसल मुदा दोसर रूपमे। ओना राजशाही बेवस्थामे ऊपर-सँ-निच्चाँ धरिक किछु परिवार जोड़ाएल छल, तइ परिवारक बीच भोगी-विलासी मनोवृत्तिक परिणाम छल, जखैन कि गरीबमे पेटक दर्द कारण भेल। एहेन पुरुखोक संख्या कम नै जे कामचोर, आलसी, नशाखोर इत्यादिक कारणे पत्नीकेँ नै रखि पबै छल। नै रखैक माने ई जे पत्नीक भरण-पोषण नै कऽ पबै छल। मुदा सेहो सोलहनी नै भेल। एहेन बहुतो महिला छेली जे पुरुखे जकाँ श्रम करै छेली। जिनका मनमे पतिक प्रति असीम श्रद्धा आ मजगूत संकल्प छेलनि। अपन जिनगीक सभ सुख पतिमे अरोपि नेने छेली। एकसँ अधिक बिआह करैक रूप दिनानुदिन बदतर होइत गेल। अनेको रंगक कुत्सित रोगक जनम होइत गेल। पुरुखोक विचार एते घिनौना रूप पकड़ि लेलक जे दर्जनक-दर्जन बिआह करए लगला। तैसंग ईहो भेल जे पुरुखक उमेरोक ठेकान नै रहल। जे उमेर बिआहक नहियोँ छल तहू उमेरमे बिआह करए लगला। जइसँ अपने किछुए दिन पछाति मरि जाइ छला आ जुआनीएसँ महिला वैधव्य रूपमे बदलि जाइ छेली। विधवा जिनगीक बीच एहेन परिस्थिति पैदा लऽ लइ छल जे समाजमे रोग बनि गेल। ओना नारीक प्रति पुरुख सोलहो आना अन्याइए केलनि सेहो नै। लड़का-लड़कीक (पुरुख-नारीक) बीच दुनू तरहेँ रोगक प्रवेश भेल। केतौ बलक प्रयोग भेल तँ केतौ पुरुख-नारीक बीचक आंगिक सम्बन्ध सेहो भेल। प्रश्न उठैत जे अदौक परम्परा (वैदिक परम्परा) पर एते भारी चोट पड़ल आ सभ पुरुख-महिला मुँह देखैत रहि गेला। ऐठाम ईहो बात देखए पड़त जे ने सभ गामक एक रंग चालि-ढालि, खान-पान, बात-विचार अछि आ ने सामाजिक विकासक प्रक्रिया एक रंग अछि। एक रंग नै होइक अनेको कारण अछि। एक तँ समाज छोट-छोट राज्यमे विभाजित छल। जइ तरहक राज्य छल ओइ तरहक रजो छला। ओना मिथिलांचल सेहो केतेको जमीन्दारीक संग राज्योमे विभाजित छल। सभकेँ अपन-अपन शासनक संग सामाजिक बेवस्थाे संचालित करैक अलग-अलग ढर्ड़ा छल। ओना क्षेत्रक हिसाबसँ सेहो अंतर छेलैहे। खान-पानक संग उपारजन करैक सिस्टमोमे अंतर पहिनौं छल अखनो अछि। अखनो एहेन क्षेत्र अछि जैठाम ने बाढ़िक कोनो प्रभाव (धारक काट-छाँट) तेहेन पड़ल जइसँ ओइठामक खेत-पथार आ बास भूमि प्रभावित भेल। मुदा एहनो क्षेत्रक कमी नै जैठाम उपजाऊ भूमि धारो बनि गेल आ बालुओसँ भरि गेल अछि। जे कहियो सुन्दर गाम (बासक हिसाबे) छल ओ उजड़ि गेल। बिनु अन्न-पानिसँ मनुख जीब केना सकैए? ई तँ प्रश्न तहियो छल आ अखनो अछिए। एकटा आरो भेल। ओ ई जे जैठाम पुरुख-नारीक बीच परिवार ठाढ़ भेल ओइठाम पुरुख प्रधान बेवस्था रहने अनेको तरहक अबलट लगा नारीकेँ घरसँ भगाएब। केकरो सन्तानोत्पत्ति शक्ति नै रहने, तँ केकरो चरित्रहीन कहि इत्यादि-इत्यादि, अबलट जोड़ि घरसँ अलग कऽ देल जाइ छल अखनो कऽ देल जाइए। गामक समस्या (भाइक बेवहार) दुनू परानी मुनेसरक सम्बन्धमे खाधि बनैत गेल। दुनू भाँइक भिनौजी सुलोचनाकेँ सेहो बाँटि देलकनि। एते दिन सुलोचना दुनू भाँइक बीच छेली मुदा भीन भेने जुगेसरसँ हटि मुनेसरक संग भेली। जुगेसर मुनेसरक खेती छोड़ि देलकनि। भाइक खेती छोड़ने खेतीक समस्या मुनेसरकेँ उठलनि। कारणो स्पष्टे अछि। अपने दुनू परानी बाहरे रहितो छला आ गामक आवाजाही सेहो नहियेँ जकाँ छेलनि। गाममे नै रहने माले-जाल केना पोसि सकै छला, जइसँ खेती करितथि। ओना बाहरोमे दुनू बेकती मुनेसर एकठाम नहियेँ रहै छला। बाल-बच्चाक संग पत्नी-साधना राँचीमे रहितो छेली आ हाइ-स्कूलमे नोकरीओ करै छेली जखनि कि मुनेसर पलामूमे रहै छला। एक तँ दुनूक दूरी अधिक अछि दोसर जँ स्कूलमे छुट्टीओ होइ छेलनि तैयो ट्यूशन रहिए जाइ छेलनि। तँए राँचीओक आबाजाही कमे-सम रहै छेलनि। जिनगीक दूरी विचारोक दूरी बनौने रहलनि। जैठाम साधनाकेँ अपन परिवारक चिन्ह-पहचिन्हमे कमी छेलनि तैठाम मुनेसर भाएक आगू सम्पति-जमीनकेँ गौण बुझै छला। स्पष्ट रूपे दुनूक बीच मतभेद होइत गेलनि। अपन हक-हिस्सापर साधना अड़ली तँ मुनेसर आगू बढ़ैसँ हिचकिचाइ छला। होइत-हबाइत भेल ई जे दुनू गोटे एक दिन िनर्णए लेल तैयार भेला। दुनूक बीच प्रश्न-उत्तर एना भेलनि। साधना- “जखनि खेत कीनैमे अदहा खर्च भैयाकेँ देलियनि तखनि ओ किए अपना बेटा नामे जमीन लिखा बेइमानी केलनि?” साधनाक मजगूत तर्कसँ मुनेसर सहमि गेला। मुदा अपनाकेँ उदार बनबैत उत्तर देलखिन- “ओ (भैया) जँ बेइमानीए केलनि तइसँ हमर की बिगड़ल?” २ जुगेसर-मुनेसरक बीच मरौसी जमीनक बँटबारा भऽ गेलनि। मुदा हालमे कीनलाहाक नै भेल। दुनू भाँइक बँटबारा सुलोचना बहिनकेँ सेहो बाँटि देलकनि। सुलोचना बहिन मुनेसरक संग भेली। खेत बँटेलासँ खेतीक समस्या उठल। जुगेसर एकटा बरद रखि भजैती हर बना अपन खेती करैत, मुनेसरकेँ खेत तँ भेलनि मुदा खेतीक कोनो समचा नै। अपनो परिवार बाहरे रहैत। खेतक बँटबारा एकटा नम्हर समस्या ठाढ़ कऽ देलकनि। समस्या ई जे मध्यम परिवारमे खेतक बँटबारा दू ढंगसँ होइ छै। पहिल जे खेते-खेते आड़ि नै दऽ खेते-खेत बाँटि लेलौं। तइ बँटैमे गोटे-आधे खेतमे आड़ि पड़ैत नै तँ खेते-खेत बँटा जाइत। दोसर ई जे छोट-खेत रहऽ आकि नम्हर खेते-खेत बँटाएल। ओना दुनू बँटबारा रोगाएले अछि। एक रोगाएल अछि जमीनक उर्वराशक्ति आ जमीनक किसिमसँ। एके गामक एक बाधमे नीच, मध्यम आ ऊँच खेत होइए। नीचरस खेतमे पानि बसने माने अधिक दिन तक पानि रहने एकेटा उपजा भेल। तेकरो कोनो निश्चित बिसवास नै। किए तँ जँ अगते नम्हर बरखा भऽ गेल तँ खेते ने अवाद हएत, दोसर अवाद भेलो पछाति पानिक कोनो ठेकान नै होइ छै जँ अगते डुम्मा बरखा भेल तँ रोपलोहो डूमि गेल। जइमे लगतो डूमि गेल, उपजाक कोनो चरचे नै। मुदा मध्यम खेतमे उपजो (गिनती हिसाबसँ) बेसी आ नीक फसिलो (जेना धानेमे हल्लुक धान, सतरिया-तुलसीफूल) होइत। एहेन ठाम समस्या उठबे करत। तैसंग ऊँच जमीनमे गाछीओ-कलम लगैत आ बरसाती वाड़ी (बरसाती तरकारी) सेहो होइत, जे मध्यम आ नीच खेत लेल संभ्ाव नै। तहिना दोसर तरहक बँटबारामे समस्या उठैत जे एक बीघा खेतक टुकड़ा तीन पीढ़ी जाइत-जाइत बीघासँ कट्ठामे उतरैत धूरमे पहुँच जाइए। जेना पहिल पीढ़ी जँ चारि भाँइक भैयारी रहल तँ बीघा पाँच कट्ठामे बँटाएल, दोसर पीढ़ी जँ चािर भैयारीक रहल तँ एक-कट्ठा पाँच धूरमे बँटाएल आ तेसर जँ दूओ भाँइक भैयारी रहल तँ साढ़े-बारह धूर भेल। खैर जे होउ, मुदा समाज दुनूक संग न्याय केने अछि। दुनू प्रथाक गाम-गाममे चलनिओ अछि आ सभ मानितो अछि। जुगेसर मुनेसर झगड़ि कऽ बँटबारा केलनि खेते-खेत आड़ि देलनि। खेतक नक्शा तेहेन बनि गेलनि जे हरक जोत कोदारिपर चलि आएल। जँ एक दिस नम्हर-नम्हर ट्रेक्टर खेत जोतए आबि रहल अछि तँ दोसर दिस खेत खँताइत-खँताइत तेते छोट भऽ गेल जे ट्रेक्टर अँटबे ने करत तँ जोतत कथी। बेल पकने कौआकेँ कोन लाभ। ओना समाजमे दू रंगक बँटेदारो अछि। एक ओ जे अपन हर-बरद रखि अपने हरबाहि कऽ बँटाइ खेत जोतैए, जेकरा थोड़-थाड़ अपनो रहल आ दोसरो भेल। किए तँ, आजुक ओहन खेती बनि रहल अछि जे एक-फसिला नै बहु-फसिला बनने खेतक जोतो बढ़ै छै। बरहमसीआ खेती सहो भऽ रहल अछि। बरहमसीए खेती कृषिक उन्नतिक चोटीक सीढ़ी भेल। बारहो मास खेती भेने, पर्यावरणविद् सभकेँ अनेरे ऑक्सीजनक साँस भेटतनि। दोसर तरहक बँटेदार ओ भेल जे अपने बोइन करैए आ किछु खेतीओ करैए। मोटा-मोटी ओ सभ कोदारिसँ खेती करैए। दुनू भाँइक बीच बँटबारा भेला पछाति मुनेसरक मनमे रहनि जे खेतक देखभाल बहिन करती आ भैये खेती करता, उपजाक हिस्सा बहिनकेँ देथिन। मनमे रहनि जे बहिन तँ दुनू भाँइक छी जँ ओहू लाथे अपन सहयोग बूझि सोलहो आना उपजा दऽ देथिन तँ हुनको गूजरमे सुविधा हेतनि। मुदा झगड़ाक बीआ पहिने सुलोचना बहिन रोपि लेलनि। रोपि ई लेलनि जे खेत कीनला पछाति मुनेसर दिससँ बाइज गेली जे जखनि दुनू भाँइ अदहा-अदहा खर्च दऽ खेत कीनलक तखनि हिस्सा किए ने हेतै। अपना मुहेँ वेचारी एक भाँइसँ दूर आ दोसरसँ लग चलि एली। जुगेसरोकेँ सरकारी मान्यता (सरकारी स्कूल बनने) भेटने दरमहो बढ़लनि जइसँ घराड़ी कीनि पजेबाक घरो नीक जकाँ बना लेलनि। सुलोचना बहिन सबूर केली जे जखनि सीता महरानी जाबे जनकपुरमे रहली ताबे बेटीए रहली (बेटीक महत परिवारमे कम होइत) आ जखनि राजगद्दी बेर एलनि तखनि बोने गेली आ बोनोमे पति-दिअरसँ बिछुड़ि लंका गेली। तँए कि ओ रावणक राजधानीमे रहली? नै! पुष्पवाटिकामे रहली। तहिना हमहूँ रहब। खेत बँटाइ करैसँ जुगेसर पाछू हटि गेला। तेहेन-तेहेन बँटेदार भेलनि जे समैपर खेतीए ने कऽ पबै छल। जइसँ उपजा बेठेकान भऽ गेल। मुदा सुलोचना बहिन अपन बाप-दादाक डीह धेने रहली। डिफिसिट ग्राण्ट स्कूलकेँ भेटने मुनेसरोक दरमाहामे बढ़ोतरी भेलनि। तैसंग नीक शिक्षक भेने (पढ़बैमे नीक) ट्यूशन सेहो बेसीआ गेलनि। जइसँ आमदनीमे नीक बढ़ोतरी भऽ गेलनि। राँचीमे अपन घरो बना नेने रहथि। गाममे भैयारीक विवाद ठमकल रहल। मुदा दुनू बेकतीक बीचक मुनेसरक दूरी बढ़ैत गेलनि। स्वभावसँ दुनू दू तरहक। एकक स्वभाव अपन कर्ममे एते विश्वस्त भऽ गेल जे मनमे उठैत, कोन सम्पति अछि मास दिनक कमाइ भेल बूझब जे मास दिन नहियेँ कमेलौं। तइसँ ई तँ हएत जे समाजोक नजरिमे जीवित रहब आ परिवारक बीच मलिनतो कमत। भैयारीक जे सम्बन्ध अछि ओ बरकरारे रहत। घराड़ी छोड़ने की होइ छै। हमहूँ तँ गामक के कहए जे आने राजमे घर बनौने छी। मुदा भैयारीओ तँ भैयारीए छी। दू भाँइक बीच दू माए-बापक बेटी सेहो छथि। दुनू भाँइ ऐ रोगसँ ग्रसित। कारणो भेल। कारण भेल जे जुगेसरकेँ सासुरक सम्पतिक लोभ पत्नीक मातहतीमे आ मुनेसर ऐ दुआरे जे एक साधारण किसान परिवारक बेटाक बिआह प्रशासनिक अफसरक बेटीसँ भेल छेलनि। केतबो हाइ-तौबा किएक ने हुअए मुदा एकरा केना नकारि देब जे मिथिलांचलक अधिकांश परिवारमे महिलाक मुँहपुरखी नै अछि। ई दीगर जे की अछि, केते अछि, केहेन अछि, मुदा परिवारक जुइत महिला हाथमे नै अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। ओना मुनेसर चरित्रकेँ बहुत हद तक संयमित रखला। बेटोकेँ नीक स्कूलमे पढौलनि। अपन कमाइसँ एहेन सबूर भेल मन मानि गेलनि जे जिनगी बड़ भारी नै होइ छै। मुदा तैयो गामक सम्पति लेल दुनू बेकतीक बीच मतभेद भुमहुरक आगि जकाँ सुनगिते रहल। जे से, मुदा सुलोचनो बहिनक देख-रेख तँ करबे करैत रहला। जमीनो तँ जाल छी। जुगेसरकेँ पहिल चारि कट्ठा हाथ लगले छन्हि दोसर सासुरक हूसलनि। फेर तेसर दस कट्ठाक जालमे पड़ला। जाल ई जे पाहीपट्टीबला दू भाँइक घराड़ी-वाड़ी मिला दस कट्ठा एकठाम। दुनू भाँइसँ कीनैक दाम जुगेसर केलनि। दामो तँइ भऽ गेल। एक भाँइ रूपैआ लऽ रजिष्ट्री कऽ देलकनि। दोसर भाँइ टौहकी लगौलक। दोसर लेबाल पहुँचल। भैयारीक एके जमीनक दाम एक भाँइसँ डेढ़िया दोसर भाँइकेँ भेल। दोसर रामकिसुन अदहाकेँ के कहए जे सोलहो आना खेत दफानि लेलक। बल प्रयोगमे जुगेसर कमजोर पड़ला। पाछू हटि कोर्ट पहुँचला। केसा-केसी शुरू भेल मुदा जमीन रहल दफानिहारेक हाथमे। किछु दिन पछाति जुगेसरक बेटा (जे मैट्रिक पास) एकटा पोस्टकार्डमे बिखनि-बिखनि कऽ गारि लिखि रामकिसुनकेँ पठा देलक। पोस्ट आॅफिससँ चिट्ठी भेटिते रामकिसुन लोक सभकेँ चिट्ठी देखबए लगल। झाँपल बात तँए, के लिखलक नै लिखलक से प्रश्न उठल। जेकरा गारिक चिट्ठी भेटल ओ शंका केलक जे दोसर किए लिखत। केकरोसँ झगड़ा नै। तखनि तँ खेत लऽ कऽ झगड़ा जुगेसरसँ अछि ओकरे बेटा लिखलक। जुगेसरक बेटा राधा सेहो गाममे। दुनू गोटेक घरो एकेठाम। तँए सदिकाल एक-दोसरकेँ देखबे करैत। राधाकेँ पकड़ि रामकिसुन खूब मारि मारलक। गाममे जमीन्दारक जमीनपर अगिलग्गी केस भऽ गेल। अट्ठाइस गोटे केसक मुद्दालह भेला। ओही जमीन्दारक जमीनपर जुगेसरकेँ विवाद फँसलनि। थानाक लहकी गाममे रहबे करै। घटना भेबो कएल। जमीन्दारो अपन हाथ ससारलक। जुगेसरकेँ अगुआ गौआँ सभकेँ सेहो फँसौलक। खूब नम्हर मुकदमाबाजी भेल। हाइ कोर्ट तक विवाद पहुँचल। मुदा जमीनपर कब्जा जुगेसरकेँ नहियेँ भेलनि। मुनेसर दुनू परानीक बीच मतभेद कमलनि नै बढ़िते गेलनि। एक दिन पत्नी डपटैत मुनेसरकेँ कहलखिन- “अहाँ बुते खेत कब्जा कएल नै हएत तँ हम जा कऽ करब।” साधनाक उग्र रूप देखि मुनेसर चुप रहला। बजला किछु ने मुदा विवादकेँ आगूमे मर्ड़ाइत देखबे केलनि। तत्कालक गुमकी तँ किछु दिन विवादकेँ रोकलक मुदा रूकि नै सकल। फगुआक दिन। मुनेसर सेहो सभतूर पत्नी-बेटा सहित एकठाम भेला। ओना बेटा आवासीय स्कूल, पत्नी राँची हाइ स्कूल, अपने मुनेसर पलामूमे रहैत तँए चिट्ठीए-पतरीसँ भेँट-घाँट होइत। राँचीक होली, आदिवासी इलाका ढोल-ढालक गनगनी इलाकाकेँ गनगनबैए। मलपूआ खेलहा मुनेसर परिवार, बैसारीक दिन रहबे करै, साधना-मुनेसरक बीच गप-सप्प उठल। दुनू बेटा लगमे। गप-सप्प उठल गामक चारि कट्ठा जमीनक हिस्सा। साधना बजली- “जहिना ओ हमरा नैहरक सम्पतिक भोग नै हुअ देलनि, तहिना हमहूँ नै भोग हुअ देबनि।” पत्नीक प्रहार सुनि मुनेसर तिलमिला गेला। सचमुच वेचारीक नैहरक गहनो आ वर्तनो-जात बोहा गेलै। युधिष्ठिर जकाँ मुनेसर पत्नीक प्रहारो सुनथि आ मने-मन विचारबो करथि जे भैयारीमे एहेन नै हेबा चाही। जेठ भाय पिते तुल्य नै पितृगुरु तुल्य होइ छथि। जँ सहोदर भाएमे एहेन होइ तँ राम-लक्ष्मणक सम्बन्ध केना बनत? सद्य: रावण-विभीषणक भेल। एक तँ फगुआक रमकी तैपर मलपूआक सहयोग रमैक कऽ साधना दोहरबैत बजली- “जँ हमहूँ बापक बेटी हएब तँ सिखा देबनि।” दुनू बेटा चुपचाप। पितोक दुर्दशा आ माएक रूप देखि अनेरे बौआइत। बड़का बाबू (जुगेसर) हमरे सबहक गरदनि कटलनि। बाबू किछु किए ने बजै छथि। मुदा मुनेसरक मन जेठ भायक किरदानीपर, पत्नी रणचण्डी भेल छथि, हमरा रोकने रूकती। परिवारक हिसाबसँ दुनूक (पत्नीओ आ भैयो) दूरी अबस्स रहलनि। खान-पान आचार-विचार समाजक रीति-रिवाज, मुदा हम तँ से नै छी। पिता मन पड़लनि। एके बाप-माइक बेटा दुनू भाँइ छी। आइ जँ नै पढ़ल-लिखल रहितथि तँ बुझितौं जे अज्ञान-सज्ञानक बीचक बात भेल, कोन रूपे निराकरण हुअए ओ सज्ञानक काज भेल। मुदा जैठाम जहिना शिक्षक अपने छी तहिना ऊहो छथि। वृत्तिए दुनू गोटे एके छी तखनि एहेन विचार किए मनमे एलनि। मुदा जेठ भायकेँ केना कहबनि जे भैया अहाँ बेइमानी करै छी। हुनका बेइमान बनने तँ अपने अनेरे बेइमान कहबए लगब। ओ गाममे रहै छथि, समाजक बीच रहिते छथि, दरमाहा बढ़ने सुदिओ-सबाइक कारोबार करिते छथि, मुदा हम तँ से नै छी। एहेन जगहपर की कएल जाए। कोट-कचहरीक आँखि कहियो देखलौं नै। तहूमे छुटनगर नै छी। नोकरी करै छी, गनल छुट्टी अछि। पावनि-तिहारक छुट्टीमे कोटो-कचहरीमे छुट्टीए रहै छै। लगमे नोकरी करैत रहितौं तँ दुनू काज मेल-पाँच करि कऽ सम्हारि लैतौं सेहो नै अछि। चौबीस घंटाक दूरी अछि। एक दिनक काजमे तीन दिन लगत। तहूमे झड़े-झमेल छी, केते समए लगत तेकर कोनो ठीक छै। बेवस्थित जिनगी टूटि जाएत। मात्र चारि कट्ठा ओहन खेत अछि जेकरा अपने हाथे नै करब। सम्पतिकेँ प्रतिष्ठा बनाएब नेनमति हएत। मुदा ईहो (पत्नी) थोड़े मानती। तैबीच फेर साधना टपकि गेलखिन- “समए बनाउ, दुनू गोटे चलू। मरि जाएब संगे, जीवैत रहब संगे।” बेवस भऽ मुनेसर गाम अबैक समए बना लेलनि। स्कूलमे छुट्टीक दरखास दऽ दुनू बेकती गाम चलला। सकरीमे मुनेसर पत्नीकेँ कहलखिन- “हम मधुबनी (बहिन ऐठाम) होइत परसू आएब अहाँ आगू चलू।” सएह भेल। साधना गाम एली आ मुनेसर मधुबनी गेला। गाम अबिते साधना चौहद्दी बन्हलनि। तीन तसिया लोकक कमी नै। चढ़ा-उतरीक विचार दऽ फील्डपर साधनाकेँ उतारि देलकनि। दोसर दिन भोरे, करीब सात बजे साधना जुगेसरक दरबज्जापर पहुँच गेली। जुगेसरो दरबज्जेपर, पत्नी-धिया-पुता आँगनमे। साधनाकेँ देखि जुगेसरकेँ भेलनि जे गाम एली तँए भेँट-घाँट करए एली। आँगन जा सभकेँ भेँट करती। चौकीपर बैसल जुगेसर आँखि खसा लेलनि। साधना दरबज्जाक आगूमे अड़ि कऽ ठाढ़ होइत बजली- “अहींसँ काज अछि?” चौंकैत जुगेसर बजला- “की?” “हमर हिस्सा जे जमीन रखने छी, से बाँटि दिअ।” सुनि जुगेसर बजला- “कोन जमीन? जइ जमीनमे हिस्सा छेलए से तँ बाँटिए देलौं। तखनि?” “जे जमीन कीनने छी, से।” “ओ तँ राधाक नाओंसँ छै, अहाँक हिस्सा केना हएत?” “कीनैमे हमर रूपैआ नै लगल अछि?” दुआर परहक हल्ला अँगनाेमे पहुँचल। अँगनासँ सभ दरबज्जापर पहुँचल। साधनाक प्रश्नक उत्तर सोमनी दिअ लगली- “अहाँक रूपैआ रहैत तँ अहीं नाओंसँ ने रहितए।” साधना- “हम किआँने गेलिऐ जे एहेन गरदनि कट भैया छथि जे गरदनि काटि लेता।” सोमनी- “अहूँ घरवलासँ बेसी गरदनि कट?” “की गरदनि कटने छन्हि।” बाताबातीमे गरमी आबि गेल। चारू गोटे जुगेसर साधनाकेँ मार-मार करैत चारू भागसँ घेरि लेलकनि। साधनाक मन मानि गेलनि जे मारि खेबे करब। तइसँ नीक जे पाछू हटि जाइ। पाछू हटैत बजली- “अखनि हम जाइ छी, बारह बजे आबि कऽ फड़िछेनहि जाएब।” जहिना साधना विदा भेली तहिना जुगेसरो सभतूर ठमकि गेला। घुरती बरियाती जकाँ साधनो बजैत आ जुगेसरो सभ परिवार। दियादी परिवारक जे पुरुष पात्र रहथि ओ तँ मुँह दाबि लेलनि मुदा स्त्रीगण सभकेँ अगहन आबि गेलनि। गाम-गामक खिस्सा–पिहानी साधनोकेँ सुनबए लगली आ सोमनीओकेँ। सभ परानी मिलि जुगेसर विचार केलनि जे दरबज्जापर आबि साधना बेइज्जत केलक। मुदा मनसँ हरा गेल जे जइ साधनाक नैहरक सभ किछु (गहना-वर्तन) हरा रहलिऐ ओ केना सुपते मने मानि जाएत। अपनो दुनू परानी जुगेसरकेँ सासुरक अनुभव रहबे करनि जे उचित ससुरक हिस्सा चलि गेल। कोट-कचहरीमे खर्चो भेल आ भेल किछु नै। तहिना हेतै। बेटो राधा बुफगर, पिता जुगेसरकेँ विचार देलक जे जानेसँ मारि देबइ। जिनगी भरिक शिक्षक बेटाक विचारसँ राजी भऽ गेला। बारह बजे साधना उग्र रूपमे पहुँचली। पहिनेसँ दुनू बापूतक विचार रहबे करनि, अबिते साधनाकेँ पकड़ि लेलनि। हत्याक नीक परियास केलनि मुदा भेल नै। हल्ला करैत साधना थाना जा जुगेसरकेँ एरेष्ट करौलनि। मुदा विवादक किछु ने भेल। मुनेसरकेँ मधुबनीएमे जानकारी भेलनि जे गाममे जबरदस घटना घटि गेल। एहेन परिस्थितिमे सोझहे गाम जाएब नीक नै हएत। मुदा नहियोँ जाएब तँ नीक नहियेँ हएत। असमनजसमे मुनेसर पड़ि गेला। गाममे नव घटना भेल। ओना गामक लोक कोट-कचहरी आ जहलक अभ्यस्त जकाँ भऽ गेल छथि तँए बेसी हल-चल नहियेँ जकाँ भेल। मुदा स्त्रीगणक संग एहेन घटना भेल तँ ई चर्चक विषय बनबे केलै। साधनाक अंगीत अंधरा ब्लौकमे अफसर। मुनेसर मधुबनीसँ गाम नै आबि अंधरा पहुँचला। दुनू गोटे विचार केलनि जे गाम जाएब (मुनेसरकेँ) ओते नीक नै हएत जेते साधनाकेँ एतै बजबा ली। आ ऐठामसँ सोझहे राँची चलि जाएब। सएह भेल। चारिम दिन मुनेसर दुनू परानी राँची रवाना भऽ जाइ गेला। दुनू भाँइक बीच (जुगेसर-मुनेसर) चारि कट्ठा जमीनक झंझटि बढ़ि कऽ झमटगर भऽ गेल। एक संग मुनेसरक मन चारूकातक ओझरीक बीच एते ओझरा गेलनि जे मनपर भार पड़ि गेलनि। देहमे एकाएकी रोग सबहक आगमन हुअ लगलनि। ब्लड-प्रेसर डायबीटीज एते जोर मारि देलकनि जे इलाजमे जाए पड़लनि। चारूकातक भार ई पड़लनि जे एक दिन जेठका बेटा-रघुनाथकेँ बैंकमे नोकरी आ स्कूलकेँ सरकारी भेने जहिना खुशी भेलनि तहिना पत्नीओ आ भाइओक मतभेद मनकेँ मरोड़ि देलकनि। खुल्लम-खुल्ला पत्नीक विराेध सोझहामे आबए लगलनि। चारि गोटेक परिवार (मुनेसर-साधना आ दुनू बेटा) मे दू पार्टी (विचारधाराक पार्टी) बनि गेलनि। रघुनाथ मुनेसरक बेटे नै, पढ़ाएल विद्याथीओ। तैपर बैंकक नोकरी भेने संस्कारोमे बदलाउ चलिए एलै। संस्कारमे बदलाउ ई जे सामंती संस्कार जमीन-जयदादकेँ इज्जत-प्रतिष्ठा बूझि लोक जान गमबैले तैयार भऽ जाइ छै मुदा पूजीवादी सोच बनने जमीन-जयदायकेँ पूजी बूझल जाइ छै। प्रतिष्ठा जिनगीक कर्तव्यसँ जुड़ल अछि जइमे माने जेकरा पूर्ति करैमे धनक सहयोग होइ छै। तँए रघुनाथ चारि कट्ठाकेँ चालीस हजारक पूजी बुझैत, जे दुनू बापूतक पनरहो दिनक कमाइ नै भेल। तइले भावो भऽ माए बड़काबाबूकेँ मुँहपर गरियौलक, ई नीक नै केलक। अपनो बाप-दादाकेँ नजरिमे रखैक चाहै छेलै। से नै रखलक। एहेन पढ़ल-लिखल परिवार तखनि एहेन काज नीक नै केलक। तैसंग अपन पिताक परिवार (अपन खनदानक) सेहो जनैत। दुनू भाँइ बाबू शिक्षक छथि, तइसँ पहिने (पछिला पीढ़ीमे) सेहो दू भाँइ शिक्षके छला। एक गोटे वेदक शिक्षक संस्कृत महाविद्यालयमे दोसर मिड्ल स्कूलमे। खनदानी पढ़ल-लिखल दुनू परिवार (नैहर-सासुर) तैबीच औरत भऽ एहेन कदम नै उठेबाक चाही। मरदा-मरदी हम सभ बुझबै। ओहुना तँ मिथिलामे जेठ भायकेँ जेठौंस सम्पति देबाक चलनिओ तँ अछिए। चारि कट्ठा की भेल? हुनके भातीज भऽ कऽ जेते महीना कमाइ छी तेतबो हुनकर कमाइ नै छन्हि। बेटो सहजे नेते बनि कोट-कचहरी टहलि-टहलि फुकिते छन्हि, ईहो तँ उचित नै जे दुनू भाँइमे एक भाँइ तालेबर बनि जाए आ दोसर भाँइ दरिद्र! तखनि परिवारक गाड़ी कोन मुहेँ चलत। दरिद्रा मुहेँ आकि तालेबरी मुहेँ? बाल मन रघुनाथक (ओहन मन जेहेन पोखरिक वा पहाड़ी धारक पानि स्वच्छ होइत) बालु छानल पानि जकाँ रघुनाथक पिता दिस बेसी झूकि गेल। मुनेसरकेँ पारिवारिक बौधिक संस्कार रहने चारि कट्ठा जमीन लेल भैयारीक बीच मलिनता आबए नै दइक विचार। जइक चलैत पत्नीसँ मतभेद चलिते रहनि। रघुनाथ मुनेसरक पीठपोहू भेल। दोसरो बेटाकेँ नोकरी बैंकेमे भेल। तीनू बापूत एक विचारक तँए मिलान बेसी। मुदा रहैक दूरिओ तँ किनकोसँ किनको कम नै। सए किलो मीटरपर दुनू बेटो आ पत्नीओ अपन-अपन डेरामे रहैत। पुश्तैनी घराड़ीक जे सुगंध होइत से दुनू भाँइमे केकरो नै। जेकरा दू-दूटा घराड़ीपर घर रहतै ओ भाड़ाक घरमे जिनगी वितौत ओकरा लेल घराड़ीक कोन मोल। ओना मुनेसरो नोकरीसँ पहिने धरि गामेक घर-घराड़ीमे रहला तँए बेसी झुकाउ, राँचीमे जे घरो बनेलौं तँ सालमे रहबे केते दिन करै छी। तँए गामक झुकाउ राँचीसँ बेसी। जहिना नादिमे बान्हल गाए दोसर गाएकेँ थुथुनबैत-थुथुनबैत ठोकरबौ लगैए तहिना परिवारमे साधनाकेँ भेल। कोनो परिवारक घटनाक बात परिवारक गार्जन बाले-बच्चा लग राखत, एक तँ छल-प्रपंच विहिन बोध तैपर एके घटनाक दुनूक (माता-पिताक) दू विचार। साधनाक मन मानि गेलनि जे जहिना पति तहिना बेटो विचारसँ बाहर अछि। ओना अधिक दिन (बच्चेसँ) राँचीमे रहने साधनाक आकर्षण राँचीसँ बेसी। तहूमे पतिक कमाइक गार्जनी हाथमे, हाथमे ई जे अपने साधना नव स्कूलक नोकरी, जइमे दरमाहा नै, अगिला आशामे नोकरी करैत। जेहने दरमाहा तेहने ने काजो हएत, तँए काजक कोनो भारे नै। राँचीमे जमीन कीनैक जखनि समए आएल तखनि मुनेसरक खाली रूपैआक सहयोग, जमीनक दाम-दीगर, जगह पसिन इत्यादि सभ काज साधनाक हाथमे। जमीन भाँजपर एला पछाति नम्हर प्रश्न उठल। नम्हर ई जे एकबेर जे भऽ जाइ छै से भऽ जाइ छै। नै जँ आगू जमीन कीनौं चाहब तँ एक तँ महगो हएत, दोसर जमीनो हटि कऽ हएत। तइसँ नीक जे घर किछु दिन पछातिओ बनाएब पहिने जमीने नीक जकाँ लऽ ली। लभगर विचार साधनाकेँ मानैमे देरी किए लगतनि। दस कट्ठा जमीन कीनि लेलनि। कीनला पछाति दस कट्ठामे घर बनाएब धिया-पुताक खेल नै। पत्नीक दबाबमे मुनेसर दिन-राति मेहनति करए लगला। ओना मुनेसरक चरित्रक गुण रहलनि जे ओहन खगल समैमे बोर्ड परीक्षा काँपी जाँचक चार्जमे रहला। पाइक मोटरीक लोभ देल जाइन मुदा कुल-खनदानक टेक पकड़ि अपनाकेँ थीर रखला। दिन-रातिक मेहनति मुनेसरकेँ रोगक घर बना देलकनि। ओना साधना सेहो नीके स्थितिमे रहली। दुनू बेटाक बैंकक आमदनी तँ हाथ अबिते छन्हि। एक दिन एकाएक मुनेसरकेँ पेटमे दर्द उठलनि। डाक्टर ओइठाम पता चललनि जे पेनक्रियासक ऑपरेशन करबए पड़त। तैसंग महिनो बेड-रेष्ट लिअ पड़त। मुदा दरदो तेहेन जे नै करौने जीब नै सकै छी। खैर हैदरावादमे ऑपरेशन भेलनि। खर्च नीक भेने प्रगतिमे किछु बाधा तँ पड़बे केलनि। अपनो उमेर बेसी भऽ गेलनि, रंग-रंगक रोग शरीर पकड़िए नेने छन्हि। दुनू भाँइ-जुगेसर-मुनेसरक विवाद समाजक मंचपर सेहो आएल। जुगेसर जे बेटा मारिमे केस केलनि ओ घटना कर्ताक संग समाजोक लोककेँ भँसा देलनि। केसकेँ ओइ गतिए बढ़ौलनि जे घटनाक परात भने चारि थाना गाममे आबि गेल। हरबिर्ड़ो गाममे भऽ गेल। दौड़ा-दौड़ी खेहारा-खेहारी जमि कऽ भेल। दू गोटे जहलो गेल। लगले बाँकी मुद्दालहक जब्ती-कुर्की भऽ गेल। जेकर प्रतिक्रिया समाजमे जमि कऽ भेल। मुँहपर जुगेसरकेँ गारि पड़ए लगलनि। मुँह गोड़ैत-गोड़ैत एते गोड़ा गेलनि जे मन मानि गेलनि जे जहिना लोक कहै छै अपना गामक गाछी डरौन, आन गामक पाेखरि डरौन तहिना तँ हमरोले गाम डरौन भऽ गेल। दिनक के कहए जे रातिओ-बिराति निधोख गाम अबै छेलौं, मुदा से आब हएत? जेना-जेना मनमे डर मर्ड़ाइत गेलनि तेना-तेना परिवार प्रभावित होइत गेलनि। तैसंग ईहो भेलनि जे पहिने जे विवादित जमीन चारि गोटे मिलि कीनने रहथि ओइ जमीनकेँ दखल करैमे मारि फँसि गेल। बाँकी गोटे मारिओ खेलनि, मारबो केलनि आ केसोमे फँसला। तइमे जुगेसर बँचि गेला। स्कूलेक समैमे मारि भेल। तइमे सेहो फुट-फुटौबलि भऽ गेलनि। ओना जमीन कब्जा भाइए गेलनि। फुट-फुटौबलिक कारण भेल जे जिनका सभपर केस भेल ओ केसक हिस्सा मंगलकनि। जे नै देने फुटौबलि भेल। मुनेसरक ऑपरेशन तँ सफल भेलनि, मुदा छह मास आराम करैले डाक्टर सलाह देलकनि। जीवन-मुत्युक बीच पड़ल मुनेसरक मन छँहोछित भऽ गेलनि। एक दिस अपन अगिला जिनगी हरिअर बूझि पड़नि, अपन कमाइक संग दुनू बेटाक कमाइ देखि तँ दोसर दिस अपन स्थिति देखथि जे अपन सेवा केना हएत। पत्नीओ पत्नीए छथि। अकास उड़ैत चिड़ै जकाँ। कमा कऽ हाथमे दियनु, हुकुम पुरबियनु तँ बड़बढ़ियाँ नै तँ अपनाकेँ कपरजरूआक पत्नी कहि डाकनि देती। एक मनुख होइक नाते लाजिमी विचार भेल। अपन शक्तिकेँ क्षीण बनाएब भेल। सावित्री-सत्यवान सेझहेमे छथि। अपन शेष नोकरी आ पेन्शनक आशा पत्नीकेँ देखथि, तँ बेटाकेँ कमासुत बूझि संतोष होन्हि, मुदा बड़की बहिनक की हएत? वेचारीकेँ अछैते भाइए ने भाए रहलनि, अछैते पतिए ने पति रहलनि, घरपर ओते सम्पति नै, तहूमे जँ बेचैओक अधिकार रहितनि तँ किछु बेसीओ दिनक आशा होइतनि, सेहो नै। समए रौदियाहे अछि। अपने ओछाइन धेने छी, पाइक कोनो आमदनी नै। बेटासँ मांगि केना सकै छी, ओकरो ई बात (बहिनक खर्च) बूझल नै छै तैपर जँ मंगबै आ ओ माएकेँ कहत तँ जेहो किछु दिन जीवैक आशा अछि सेहो चलि जाएत। आइने-अवगरानिसँ लोक जहर-माहूर खाइए। अपन विचारकेँ अपने मनमे दाबि मुनेसर बहिनकेँ बिसरि देलनि। महिना-दू महिना तँ सुलोचना आशा धेने रहली मुदा पेटक आगि तँ ओहन आगि होइ छै जेकरा मिझबैले लोक आचार-विचार कुल-खनदान सभ बिसरि जाइए। सुलोचना ओहन परिवारमे जनम नेने छथि जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि केना सकै छथि। अपन ओहन वाड़ी-झाड़ी खेत नै जे अपनो जोकर सागो उपजा सकै छी। बाधक खेत। बेवस सुलोचना गाममे टुटली मरैआमे बैसि गाबए लगली- “हे भोलादानी कहिया हरब दुख मोर।” चारू दिसक अपन बन्न रस्ता देखि सुलोचना बहिन चारूकात तकली तँ एकटा घर लगमे बूझि पड़लनि। ओ घर अपन दीदी-पीसाक। पीसाक देहान्त भऽ गेल छेलनि मुदा दीदी ओछाइन पकड़ैपर छेलखिन। गामसँ सटले, करीब कोस भरिपर दीदीक घर। बेरू पहरमे सुलोचना बहिन दीदी ऐठामक रस्ता पकड़लनि। सुलोचना बहिनकेँ देखि दीदीक परिवारे नै, टोल-पड़ोसक स्त्रीगण सभ सेहो एलखिन। चुपचाप कान लग कनीए जोरसँ सुलोचना दीदीकेँ कहलखिन- “दीदी, भूख लगल अछि।” सुलोचना बहिनक बात सुनि दीदी बूझि गेलखिन जे रस्तेक भूखल नै भुखले घरसँ आएल अछि। सुलोचनाक सुन्दर चेहरा टुटल फूल जकाँ मलिन भेल देखि दीदी पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियाँ, सुलोचना रस्ताक भूखल हएत, पहिने किछु पानि पीबैले दियौ।” ओहुना गाम-समाजक चलनि अछि जे कियो दरबज्जापर आएल अभ्यागतकेँ पहिने पानिए आगू अबैत अछि। जहिना अपन तहिना मात्रिकक संग मौसी आ दीदीक घर लोक बुझिते नै अछि अछिओ। जैठाम महिनो रहने कियो चर्च नै करैत बहुत दिन भऽ गेल। तहूमे सुलोचना बहिनकेँ बूढ़ दीदी हाथ लगलनि, सुलोचनेटाकेँ किए दीदीओकेँ तँ टहलनीक जरूरति भाइए गेल छन्हि। तैसंग परिवारोक भार कम भेने घरोक लोक खुशीए छथि। सुभ्यस्त परिवार छइहे खेबा-पीबाक समस्ये नै। दस गोटेक खोराकीसँ बेसी मूसे खाइए। सुलोचनाक पिसियौत भाए, हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि। प्रतिष्ठित शिक्षक। जिनगीमे डेरापर कहियो कोनो विद्यार्थीकेँ ट्यूशन फीस नै लनि। लगमे सुलोचना बहिनकेँ रहने नजरि पड़लनि। नैहर परिवारक सभ बात सुलोचना मुहेँ सुनलनि। सासुरक बात किछु बुझलो रहनि आ सुलोचनो मुहेँ सुनलनि। मनमे छगुन्ता भेलनि जे अछैते पतिए वेचारी वैधव्य जिनगी जीब रहली अछि। प्रश्नक जड़ि पकड़ि काज बढ़ौलनि। सुलोचनाक पति दोसर बिआह कऽ नेने रहथि जइमे चारिटा सन्तानो भऽ गेल रहनि। मुदा सभ किछु होइतो समस्याक समाधान भऽ सकै छै। मास्सैब (पिसियौत भाए) गामक दियाद-वादक भाँज सेहो लगौलनि। भाँज लगबैक कारण रहनि जे जँ सासुरसँ समझौता नै हएत तखनि तँ दोसर विकल्पक जरूरति अछिए। ऐठाम (अपना ऐठाम) छह मास बरख दिन रहत सएह ने, जिनगी भरि तँ नै रखल जा सकैए। रंग-बिरंगक गप, गप-सप्प क्रममे उठबे करत। दियादवादक भाँज पौलनि जे स्त्रीगण सभ तेहेन छथि जे सुलोचना बहिनक गोड़ा नै बैसऽ देती। अपन जे छन्हि तहीपर रहि सकै छथि। मास्सैबक परियाससँ सुलोचना बहिन सासुर गेली। दोहरा कऽ साठि बर्खक उमेरक पछाति जहिना जिनगी हारल-थाकल तहिना अपन जिनगी पाँच कौर अन्न आ पाँच हाथ वस्त्रपर अँटका लेलनि। दू बरख सासुरमे रहली। जहिना उमेर बढ़ने विचारोमे बदलाउ अबै छै, से सुलोचनो बहिनकेँ एलनि। मुदा सासुरक जे सिनेह स्त्रीगणकेँ अपन बाल-बच्चाक संग, अपन लगौल वाड़ी-फुलवाड़ी, घर-दुआर बनौला पछाति होइ छै, से नै भेटलनि। केतबो सतौत बेटा-बेटी किए ने रहनि मुदा अपन जकाँ तँ नहियेँ माननि। तहूमे चेष्टगर सभ भऽ गेल, जे सत्-भाए बुझैत। तहिना पतिओ संग रहनि, खैर जे रहनि, मुदा दस बीघाक किसान परिवार भेटने सुलोचना बहिन खुशी तँ भेबे केली। परिवारोक सभ बुझैत जे कियो आन थोड़े एली। सुलोचना बहिनक मन मानि गेलनि जे जिनगी असानीसँ कटि सकैए। मरैकाल जे तिरोटो हएत तँ काटि लेब। काटि कि लेब जे ओ तँ एहेन कष्टे होइ छै जे लोक मरिए जाइए। मुदा से अखनि बहुत दूर अछि। अखनि तँ तेहेन थेहगरि छी जे पचीस-तीस बरख जीबे करब। एक दिनक जिनगी तँ लोककेँ पहाड़ होइ छै। सासुर एला पछाति सुलोचना बहिनकेँ सभसँ खुशी ई भेलनि जे अछैते पतिए जे जिनगी बनि गेल छल ओइमे एकाएक बदलाउ एलनि। ओना वैधव्यक सीमा नै अछि। मुदा थोड़-दिन आकि बेसी-दिन बारहसँ चौदह आना महिलाकेँ ऐ जिनगीसँ गुजरए पड़ै छन्हि। मुदा सबहक जिनगी की एक समान थोड़े होइ छन्हि। समाजो तँ समाजे छी, एक दिस वैधव्यक मुँह देखि केतौ जाएबकेँ अशुभ बुझैए तँ केतौ शुभ बुझैए। विधवाक जिनगीओ तँ तहिना होइ छै। पति विहिन पत्नीक (पुरुष बिनु नारीक) दू रूप समाजक बीच अछि। एक पतिक मृत्यु भेला पछाति दोसर जीवितोमे छोड़ला पछाति। ओना उमेरो आ विकासोक (परिवर्तनोक) हिसाबसँ वैधव्य जीवन अनेको रंगक अछि, मुदा से नै, मोटा-मोटी जिक्र अछि। आजुक नजरिए बीस बरख वा ओइसँ ऊपरक हिसाबमे बिआह हुअ लगल अछि। ओना ई विषमता तँ अखनो अछिए जे सभ परिवारक कन्यादानक एके उम्र नै अछि। पढ़ल-लिखल अगुआएल परिवारमे जैठाम डाक्टर, इंजीनियर वा अन्य प्रकारक डिग्री प्राप्त केला पछाति बिआह होइए तँ ओतै नोकरीकेँ आधार बना नोकरीक पछाति बिआह सेहो होइए। समायानुकूल सेहो अछि। बिआहक साल भरिक एहेन प्रक्रिया बनि गेल अछि जे बेर-बेर आवाजाही आ बेर-बेर काज (बिआहक प्रक्रियाक काज) होइते रहैए। मधुश्रावनी, कोजगरा इत्यादि नजरिपर अछिए। अध्ययनक बीच बेवधान उपस्थिति होइते अछि। जइसँ गनल कुटिया नापल झोड़ जकाँ कोर्सक (पढ़ाइक सिलेबस) तैयारीमे कमी अबिते अछि। तेतबे नै, ई ओहन मोड़ (जिनगीक मोड़) छी जैठाम आबि वैचारिक रूप वौद्धिक रूपमे बदलए लगैत। रंग-रंगक किस्सा-पिहानीक संग जिनगीक ओहन मनोहर रूप दृष्टिगोचर होइत जइसँ किछु-ने-किछु धक्का लगिते छै। एक दिस जिनगीक ओहन मोड़पर जैठाम पहिल सीढ़ीक टपान अछि, जे अगिला पिछड़ाह सीढ़ीमे ठाढ़े-ठाढ़ टपि जाइत आकि पिछड़ि-पिछड़ि खसैत-पड़ैत टपत आकि पिछड़ि कऽ तेना खसत जे उठिए ने हेतै। दोसर तरहक परिवारमे (जइमे हायर एजुकेशन नै छै) बेटा-बेटीक बिआहकेँ पारिवारिक संस्कार मानि निमाहब अनिवार्यक संग समैओपर आ समैसँ पहिनौं करए चाहैए। कारणो छै जे अबैत परम्परामे बिआह चाहे जइ उमेरमे होइ (बच्चासँ सियान धरि) मुदा सन्तान समैएपर होइए। समैपर आकि समैसँ पहिने करब सकारात्मक विचार भेल। एहेन परिवार आकि ऐसँ पछुआएल परिवारमे बाल-बिआहसँ लऽ कऽ पनरह-सोलह बरख धरिक बेटीक बिआह अछिए। बच्चामे बिआह नीक नहियेँ अछि। मुदा नीक किए ने अछि? ई बात सत् जे पानिमे कोनो चीजक (अन्न आकि तरकारी) बीआ देब पानिमे फेकब भेल। मुदा की पानिमे उपजैबला (मखान, सिंगहार) केँ फेकब कहबै? बेटा-बेटीक बिआह माता-पिताक अनिवार्य काजक रूपमे समाजमे अखनो ठाढ़ अछि, जे उचितो अछि। गरीबीक चलैत जइ परिवारक जिनगीक कोनो भरोस नै छै। राजरोग (भारी बिमारी) की गरीब घरमे नै होइ छै, जँ हेतै तँ इलाज करा पौत? तेतबे किए, किसान प्रधान गाममे की गामेक किसानक सभटा खेत गामक छन्हि आकि आनो गामक किसानक (अधिक खेतबला किसान)। खेतीक उचित खर्च केलो पछाति उपजौनिहारक (गौआँक) हिस्सा केते होइ छन्हि? जइमे चाहे माल-जाल पोसब हुअए आकि अन्नक खेती हुअए, उपजाक अदहासँ बेसी लागत लगै छै तैठाम अदहा आकि अदहोसँ कम उपजौनिहारकेँ भेटने कथी लाभ हेतनि? एहेन जइ समाजक स्थिति अछि तइ समाजमे जिनगीक भरोस मात्र सीताराम करब नै तँ आरो की हएत? एहेन परिस्थतिमे जँ माए-बाप अपन पान सालक बेटा-बेटीक भारकेँ उतारि लइ छथि तँ की अधला भेल? ओना विधवा विधानकेँ सामाजिक विधान नै मानल जा सकैए मुदा समाजक बीच बेवहारमे नै अछि, एकरो नकारल नै जा सकैए। किछु खास परिवारक बीचक ओहन समस्या अछिए जेकरा एक्कैसमी सदीमे अंगीकार करब नामर्दगीक अतिरिक्त आरो किछु ने छी, खैर जे छी से छी मुदा सामाजिक समस्या तँ छीहे। बारह-चौदह बर्खक कन्या जँ वैधव्य होइ छथि तँ हुनक जिनगी केहेन होइ ई तँ प्रश्न अछिए। ओ उमेर ओहन उमेर होइ छै जेकरा बसन्ती हवासँ भेँट भेल नै रहै छै। जे विधवा भेला पछाति अबै छै। ओ ओहन उमेर होइ छै, जेकरा दिशा देब असाध होइ छै। एक दिस परिवार-समाजसँ निकालि देल जाइ छै तँ दोसर दिस जिनगीक बसन्तक लहकी लहकै छै तेहना स्थितिमे की हएत? जइ संगी-बहिनपा संग अखनि धरि हँसी-चौल होइ छल ऊहो या तँ विधवाक सोझहामे बाजब बन्न कऽ दैत अछि वा ओइठामसँ हटा देल जाइ छै। की पति हरेने (वैवाहिक वंधनक पति) परिवारो हरा जाइ, समाजक संग जिनगीओ हरा जाइ। मुदा हराइ छै। ओइ दूधमुँह बच्चाक कोन दोख भेल जेकरा लोक मुँहपर कहतै जे फल्लींक मुँह देखि जुआ खेलए गेलौं, घरो-घराड़ी हारि गेलौं! जाधरि समाज समायानुकूल सामाजिक वंधन बना नै चलत, ताधरि समाजक कोनो अस्तित्व नै रहतै। गाछसँ पाकल कटहर खसि जहिना धरतीपर छिड़िया जाइत, आँठी उड़ि केतौ, कोआ उड़ि केतौ, कमरी केतौ आ नेरहा केतौ चलि जाइत, तहिना समाजोक होइ छै। जखनि एहेन स्थिति बनै छै तखने रंग-बिरंगक व्यभिचार समाजमे पनपै छै। समाज तँ समाजे छी, एहनो विधवा तँ छथिए जे सासु-ससुरक पछाति पतिसँ बिछुड़ै छथि। दू-चारि सन्तान भेला पछाति। की ओ अपनाकेँ आन परिवारक पुरुखसँ अपनाकेँ कम मानै छथि, किए मानती। अपन परिवारक खेती-वाड़ीसँ लऽ कऽ बाल-बच्चाकेँ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ सभ करै छथि तखनि ओ पुरुखसँ कम केना भेली। जँ पुरुखसँ कम नै भेली तँ कियो मुँहपर कहि दनु जे फल्लींक मुँह देखि यात्रा केलौं, यत्रे भंगठि गेल। जिनगी जिनगी भरै छै। तँए कि सभ अधले तँ नहियेँ अछि, ओहनो विधवा तँ छथिए जे बेटाकेँ मनोनुकूल सेवा केलनि। नाति-नातिन, पोता-पोतीसँ घर-अँगना अवाद छन्हि। जँ कियो घरसँ बहराएत आ दादीकेँ गोड़ लगि असिरवाद नै लेत तँ की माए-बाप फज्झति नै करतनि। जे घरक गोसाँइकेँ लोक पहिने गोड़ लागि निकलैए। जहिना भिन्न-भिन्न रूपक बीच विधवा जीब रहली अछि तहिना ओहनो तँ छथिए जे पतिकेँ बौड़ गेने वा कोनो तेहेन रोगसँ ग्रसित पतिक बीच सेहो छथि। जिनकर पति बौड़ गेल छन्हि ओ विधवा ताधरि नै मानल जाइ छथि जाधरि निश्चित भाँज नै लागि जाइत। जँ भाँज नै लगि सकत तँ बारह बरख पछाति मृत्यु मानल जाएत। मुदा प्रश्न अछि पुरुख विहिन नारीकेँ जीबैक उपए। एक मनुख होइक नाते समाज हुनका कोन नजरिए देखि रहला अछि। समाजो तँ समाजे छी, मुँह केम्हर छै आ नांगरि केम्हर अछि से भाँजेपर ने चढ़ैए। ताड़ी-दारू पीनिहार पीब कऽ मस्तीमे दोसराक माए-बहिनकेँ गारिए-मारिटा नै, इज्जति-बाबरू सेहो लूटैए मुदा अपन माए-बहिनक बीच आदर्श बनि परिवारमे रहैए। एहेन जे सोचक रूप बनि गेल अछि एकरा केना मेटौल जाएत, मूल बात भेल। मुदा एहेन समस्याक सोर देखि, बाजब वा मेटाएब धिया-पुताक खेल कहाँ छी। के रोगी, के भोगी के जोगी से चिन्हब कठिन अछि! कठिने नै अछि जएह रोगी सएह जोगी बनि निश्चिर बनि भरमि रहल अछि। सुलोचना बहिन, अछैते पतिए (पुरुषे) विधवा नै रहितो विधवाक जिनगी जीब रहली अछि। बारह-तेरह बर्खक अवस्थामे बिआह भेलनि उन्नैस-बीस बर्खक अवस्थामे सासुरसँ भगा देल गेली। ओना समाजमे विकल्प रहितो सबहक लेल नै अछि। समाजक बहुलांशक बीच विकल्प खुजल अछि जे दोसर बिआह करैए। मुदा सुलोचना बहिन ओहन परिवारमे जनम नेने छथि जइ परिवारमे पुरुख लेल तँ कोनो बान्ह नै छै मुदा नारीक (महिला) लेल छै। सासुरसँ सन्तान नै हेबाक अबलट जोड़ि भगा तँ देने छन्हि मुदा जबाव (वैवाहक सम्बन्ध भंग करैक) तँ नै देने छन्हि। जबावो तँ ओतए ने देल जा सकैए जैठाम विकल्प होइ। जैठाम विकल्प नै छै तैठाम जबावो देनाइ असान नहियेँ अछि। लगभग बीस-बाइस बर्खसँ साठि-बासठि बरख सुलोचना बहिन अछैते सासुरे नैहरमे रहली। मुदा नैहर-सासुरक बीच सम्बन्धोक तँ दोहरी रूप अछि। जैठाम सासुरमे दिअर-भैजाइ, सासु-ससुर वा आन-आन सम्बन्ध अछि तैठाम नैहरमे भाए-बहिनक, माए-बापक सम्बन्ध अछि। जइक चलैत सुलोचना समाजक बहिने बनल रहली। आने मिथिलांगना जकाँ सुलोचनो बहिनक अपन मन मानि गेल छेलनि जे हमरा सन्तान नै हएत। ओना सन्तान हएब नै हएब जानब थोड़े कठिन अछिए जे सुलोचना बहिन नै बूझि पेली। तैसंग ईहो भेलनि जे जखनि स्वामी (पति) दोसर बिआह कऽ लेलनि तँ सौतीन तरक बाससँ नीक नैहरेक बास। समाजमे ओहन दीक्षा बँटनिहारक कमी नहियेँ अछि जे अबिसबासू जिनगीकेँ बिसबासू बना साठि बर्खक उमेरमे पाँचम बिआहक दीक्षा दैत दैछना पाबि एक रंगीन दुनियाँ ठाढ़ कऽ दैत अछि। नैहरक बास तँ सुलोचना बहिन मनमे अरोपि लेली मुदा जीबैक जोगार नै कऽ पौली। श्रमक सहारासँ जँ जिनगी ठाढ़ करितथि तँ दोसर जिनगी भेटि जैतनि से नै ताकि पौली। नै तकैक कारण परिवारक बेवहार रहनि। परिवारक एहेन बेवहार जइमे घरक अतिरिक्त उद्यम करैक अधिकार नै। ओ अधिकार सिरिफ पुरुखकेँ छन्हि। ओना परिवारोक दोख मानल जा सकैए। जे परिवार सज्ञानी रहल ओइ परिवारमे एहेन-एहेन समस्या लेल कोनो विचार नै भेल, ओकरा तँ दोख कहले जाएत। अनेको मिथिलांगना मिथिलाक धरतीपर जनम नेने छथि जे अविवाहित वा पति विहिन रहि शिखर छूबि बैसल छथि। देखिते-देखिते सुलोचना बहिन साठि-पैंसठि बरख पार कऽ गेली। नम्हर कद, गौर वर्ण, गोल मुँह सुलोचना बहिनक। मुदा नैहरमे रहि परिवारेक नै, समाजक बहिन बनि गेली। केकरो बेटा-बेटीक बिआह होइ, सुलोचना बहिन पाँच दिन पहिने अदौरी खोंटबे करै छथि, भोज-भातक तरकारी बनेबे (कटबे) करै छथि। बर-बरी छनबे करै छथि। गामक देव स्थानमे मुड़नक गीत, बिआहक गीत इत्यादि-इत्यादि गेबे करै छथि। विद्यालयसँ जुगेसर सेवा-निवृति भऽ गेला। ओना सरकारी विद्यालय भेने जुगेसरक अंतिम दस बरख नीक बनलनि। सरकारी वेतनक संग आरो-आरो सुविधाक आशा तँ बनबे केलनि। ओना सेवा-निवृतिसँ पहिने पुरना घराड़ी (पिताक देल) छोड़ि दोसर ठाम घराड़ी कीनि पजेबाक नीक घर बना नेने छथि। पाँचटा सन्तान छन्हि, दू बेटा तीन बेटी। विद्यालयमे नीक वेतन भेटने बेटीओक बिआह नीके घर केने छथि। मुदा शिक्षाक जे दुर्गुण छै ओइसँ परिवार प्रभावित भाइए गेल छन्हि। दुर्गुण ई छैक जे बच्चेसँ लोक जिनगीले नै, नोकरीले पढ़ैए। जखने प्राइमरी शिक्षासँ आगू विद्यार्थी बढ़ैत अछि तखनेसँ ओकरा मनमे नीक-नोकरी नाचए लगै छै। नीक मेहनति करब नीक रिजल्ट हएत। नीक रिजल्ट हएत नीक नोकरी भेटत। अभिभावकोक धारणा सएह बनि गेल अछि। उर्वर भूमि मिथिलाक अछिए, जइसँ वौधिक रूपमे सेहो उर्वर अछिए। नीक शिक्षा लेल नीक जगह चाही से तँ अछिए ने। तखनि? तखनि यएह ने राज्यसँ आन-राज्य आ नगरसँ महानगर होइत आन-आन देशक रस्ता धड़ू। एहने परिवार जुगेसरोक बनि गेलनि। हाइ स्कूल पार केला पछाति दुनू बेटा गाम छोड़ि परदेशक बाट पकड़ि लेलकनि। परदेशोक आब पहुलका रूप नहियेँ रहल जे देहा-देही कियो नोकरी करै छला, आ परिवार गाममे रखै छला। जइसँ सामाजिक सम्बन्धमे कोनो बेवधान नै छल। मुदा आजुक परिवेशमे घरसँ निकलिते, अपन पत्नी-बच्चा अगुआ चलि जाइ छथि। भाड़ा-भुड़ीक घर (एक तँ ओहुना कम कमेनिहार लेल जहिना भोजनक समस्या छै तहिना रहैओक) एकटा कोठरीक जिनगी केहेन हएत? भानससँ लऽ कऽ सूतब धरि। दुनू बेटाकेँ परदेश गेने, जुगेसरो आने-आन जकाँ बुढ़ाड़ीमे दुनू बेकती गाम धेने छथि। जइ अवस्थामे दोसराक सेवाक जरूरति होइ छै, तइमे सेवा केनिहारे नै। अनेको प्रश्न एक संग ठाढ़ होइए। मुनेसर सेहो सेवा निवृति भऽ गेला। पलामूसँ राँची चल एला। मुदा जहिना नोकरीक अदहा दरमाहा गमौलनि तहिना ट्यूशनक अगहन सेहो। ओना ट्यूशनक अभाव राँचीओमे नहियेँ, तहूमे मुनेसर एक तँ सांइसक शिक्षक छथि दोसर पढ़बैमे इमानदारीए नै विषय बुझबैक अद्भुत गुण सेहो छन्हिहेँ। मुदा सभ किछु रहितो शरीर तेहेन रोगा गेलनि जे जलखै-कलौ दबाइए होइ छन्हि। अपन कीनल राँचीक जमीन, तैपर अपन कमाइक बनौल नीक घर छन्हिहेँ, तँए रहैक सुविधा छन्हिहेँ। मुदा समए जहिना नव-नव जिनगी ठाढ़ करैए तहिना आने-आन जकाँ मुनेसरो तँ छथिए। संतानक नाओंपर मात्र दूटा बेटा छन्हि। दुनू बेटा नीक शिक्षा पाबि, एकटा मध्य प्रदेश-विलासपुर आ दोसर हरियाणामे नोकरी करै छन्हि। नोकरीए की करै छन्हि जे अपन-अपन पत्नीक आ धियो-पुता लऽ लऽ छन्हि। ऐठाम प्रश्न उठैत जे जइ परिवारक एक समांग हरियाणा समाजक बीच रहि, ओतुक्का वातावरणमे पालल-पोसल जाएत, दोसर मध्य प्रदेशक वातावरणमे पालल-पोसल जाएत, तेसर राँची आ चारिम गाममे। तैठाम केना समावेश हएत? तहूसँ विकृत तँ ई होइत जे एके परिवारक दू भैयारीमे एकक कमाइ बेसी आ दोसरकेँ कम भेने परिवारक स्तरो (खान-पान, पढ़ाइ-लिखाइ) मे दूरी बनिते अछि। तेतबे किए? गंभीर रोगसँ ग्रसित एक भाँइ खर्चक (इलाजक खर्च) दुआरे मरि जाइ छथि, जखनि कि दोसर भाँइ बैंकमे रूपैआ रखने रहै छथि। प्रश्न उठैत अछि, की यएह मिथिलांचलक भैयारी आकि परिवार आकि समाजक धरोहर छी जेकरा लऽ लऽ नाचब? मिथिलांचलकेँ ऊपरे-झापड़े देखब भेल। मिथिलांचलक योगदान दुनियाँक दर्शनमे ओ अछि जे श्रेष्ठ मनुखक संग नीक समाजक निर्माणक बाट देखबैए। दुनू बेटा तँ मुनेसरक हटले-हटल छन्हि, जे पत्नीओ डेढ़ सए किलोमिटर हटि नोकरी करै छथिन। ओना मुनेसरोकेँ कोनो तरहक अभाव नहियेँ छन्हि, किएक तँ पेन्शन भेटिते छन्हि, बैंकक सूदि अबिते छन्हि, तैसंग घरो-भाड़ा अबिते छन्हि। मुदा सभ किछु (पाइ-कौड़ी) रहितो बूझि पड़ै छन्हि जे कियो ने अछि। रोगी लेल परिचायिकाक की जरूरति होइ छै ओ आन बूझि केना सकैए। जे अनुभव करैए ओ जिनगीक चुकल बेवस अछि। जेकरा एकटा पएर नै छै, पेटमे जखनि भूख-पियास जोर मारै छै तखनि ओकरा छोड़ि दोसर बूझि के सकैए। ई ओहने भेल जे कियो केकरो एक मुट्ठी खुआ सेवा करैत आ कियो ओकरा जिनगी दऽ एक मुट्ठीक जरूरते नै रहए दैत अछि। अस्सी बरख पार केला पछाति पुरना घराड़ीपर सात हाथ नमती घर बना सुलोचना बहिन रहै छथि। धानक नारसँ छाड़ल। बाँसक कोरो-बत्तीसँ ठाठल, बीचला तीनू खुटा लकड़ीक आ कतका छबो बाँसक ठाढ़ घर, जइमे कड़ची-खरहीक टाटक बीच तख्ताक केवाड़ी शीशोक चौकठि लगल, घरमे बैसि सुलोचना बहिन हिया कऽ तकै छथि तँ सभसँ नीक अपनाकेँ बूझि मने-मन गुनगुनाइ छथि- “साग खोंटि खेबै, मिथिलेमे रहबै।” हिया कऽ अपन परिवार देखै छथि। पिताक चारू भैयारीक भाए अपन-अपन पक्का मकान बना अँगना फुटा अपन-अपन अबै-जाइक रस्ता बना लेलनि, मुदा हम तँ ओहए पुरना रस्ता होइत अखनो जाइ-अबै छी जे पिताक देल चारू भैयारीक सझिया रस्ता छेलनि। ने तहीए बँटबारा भेल आ ने अखने कियो बँटलनि। सबहक सझिया रहितो, (सभ भाँइ बुझै छथि) सोलहन्नी सुख तँ हमरे होइए। तेतबे किए, साले-साल घरक मरम्मति करै छी, पुरनाकेँ नव करै छी। खुटा-खुटी सोझ करै छी। नवका नारसँ छाड़ै छी, टाट-फड़कक पुरना लेबा झाड़ि नवका लेबा लेबै छी, घर-ओसराक मुँह-कान बनबै छी। सीढ़ीकेँ सेरियबै छी। सभ दिन नवके घरमे रहै छी। नव घर खसै पुरान घर खसे से हम किए बुझबै। साल भरिक पछाति ने घर पुरनाइ छै, जखनि बर्खामे छाड़-बन्हन सड़ै छै तखनि ने पुरान होइए। जहिना तीनू भैयारी अपन-अपन अँगनामे कल गरौने अछि तहिना ने मुनेसर अपनो गराइए देने अछि। बाप-दादाक खुनौल इनार छेलनि, सभ कियो पानि पीनाइ छोड़ि देलनि तँ हमहीं किए सड़ल-पाकल पानि पीब। तँए कि हमरा कल जकाँ अनको छन्हि। देखै छी जे भरि ठेहुन की-कहाँ कलपर लगौने रहैए, केना ओहेन कलक पानि पीबैमे पड़पन होइ छै से नै जाइन। दतमनि करि कऽ कले लग फेक देलौं। वर्तन माँजि फेकि देलौं, एकरा की कहबै। अपचिष्ट नै कहबै तँ की कहबै। जँ कमे जगह अछि तँ ओहीमे खाधि खुनि देबै आ तइमे फेकब। जखनि बेसी भऽ जेतै तखनि रौदमे सुखा आगि लगा जरा देबै। से करबे ने करब आ भरि ठेहुना गन्दगी लगौने रहब। मन घुमलनि, तीनू भाँइ पक्का घर-अँगनाक तीनू दिस बनौने अछि तइसँ की हमरा गरफेदा अछि, ने अँगनामे साले-साले टाट लगबए पड़ैए आ ने साँप-छुछुनरिक बील-बाल बनैए। तीनू भाँइक घरेक देवाल ने अँगनाक टाट बनल अछि। रातिओ-बिराति तँ यएह बूझि पड़ैए जे चारू दिससँ जेरक-जेर ओगरबाह बैसल अछि बीचमे चेनसँ भानसो करै छी, खेबो करै छी आ सुतबो करै छी। चारूकात लत्ती बीचमे भगवती जकाँ रहै छी। राति-बिराति जे चोरो-चहार औत तँ कोठाबला ऐठाम जाएत आकि खढ़क घरमे औत। जेना कियो सुलोचना बहिनकेँ ठोंठ पकड़ि आगू मुहेँ ठेलि देलकनि तहिना घुसकि पिताक भैयारीसँ अपन चारू भाए-बहिनपर एली। अपन बात केकरो किए कहबै, जेकरा कहबै तेकरे केलहा छी। हम जमाहिर लाल थोड़े छी जे मेननक विचार एकेबेरमे बूझि जेबै। अपनासँ घुसुकि मन आगू बढ़ि माझिल भाएपर गेलनि। कहू जे सात बेटा रामकेँ एको ने कामकेँ। जेकरा दू-दूटा धाकड़ि सन-सन पुतोहु रहतै से अपनेसँ वर्तन माँजत, भानस करत, केहेन हेतै! आब कि जुगेसरोक ओ उमेर रहलै जे साइकिलसँ झंझारपुर हाटसँ समान कीनि कऽ लौत। जखनि नोकरी (जुगेसरक नोकरीक पहिलुक समए) छेलै, तखनि परिवार चलिते छेलै, धियो-पुतोकेँ पढ़ेबे-लिखेबे केलक, बेटीक बिआह अपनासँ बीसेमे केलक, घरो तेहेन बान्हि लेलक जे तीस-चालीस बरख ताकौ पड़तै। तैपर पीलसीनो तेते भेटै छै जे केतेकेँ दरमहो ने ओते छै। तखनि जे बौऐनी लगल छै से कोइ रोकि देतै। जइ बेटाले बाप ओते करि कऽ रखि देने छै जे तेकरे बेटाकेँ नचने तँ पेट नै भरतै आ जिनगी नै चलतै। हमहीं की करबै? ओकरोसँ बेसी उमेर अछि। अपने मुइने जग मुअए। दुनियाँमे तँ सदतिकाल केतौ भुमकम होइ छै, केतौ झाँट-पानि होइ छै, केतौ समुद्रमे जुआरि अबै छै, केतौ ठनका खसै छै, केतौ हवा-जहाज खसै छै, केतौ रेलगाड़ी उनटै छै तँ केतौ धारक नाहे उनटि जाइ छै, केकरो रोकने रोकेतै। तखनि तँ भेल जे लोक अपन रच्छा करैत दोसरोक करए। भाएक जिनगीमे डुमल सुलोचनाकेँ जेना भक्क खुगलनि। अपनो जुगेसरक चालि-परकित नीक नै छै। जिनगी भरि रग्गरघस करैत रहि गेल। कहू जे अनकर झगड़ा (दियादक जमीनक) किए मोल लेलक जे हमरो आ मुनेसरोसँ मुँह फुल्ला–फुली छै। सासुरमे बेटा नै रहने जमीनक लोभ किए केलक। एतबो किए ने बुझलक जे सासुर उपटि जाएत। तहूमे मुंगेर-घाट लगक सासुर, साले-साल बाबा धाम लोक जाइते अछि। एकोरत्ती मनमे विचार रहलै जे जँ कहीं गौआँ-घरुआ हराइत-भोंथियाइत ओइ गाम पहुँचत, राति-बीच रहए चाहत तँ ओ गौआँ गारि पढ़ि भगा देतै आकि रहए देत। भाइए छी, ओकर काज फुट छै, हमर काज फुट अछि, तैठाम कहबे ने करबै आकि कएलो हएत। ने एको कौड़ी हाथ लगलै आ ने अपेछा रहलै। हमहीं जेठ बहिन छिऐ, हमरा लिए जेहने जुगेसर अछि तेहने ने मुनेसरो अछि। मुदा ओ कहियो बुझलक जे बहिन केहेन गरूमे जीबैए। बड़ लीलसा रहए जे समाज ने समाजसँ ठेलि देलक मुदा भगवान थोड़े बेपाट भऽ गेला। भाइयक बेटीक कन्यादान नै कऽ सकै छेलौं। मुनेसरक आशा अछिओ तँ भगवान ओकरा बेटीए ने देलखिन, जेकरा देलखिन से तेहेन अछि जे बेटा-बेटीक बिआह केलक आ एक कौर खाइओले ने देलक। कहू जे एहेन कि ओकरे बेटा छै जे रामकिसुनकेँ किए गारि लिखि चिट्ठी पठौलकै। खेत-पथारक हक-हिस्साक बात छेलै तँ ओ समाजे आकि कोटे-कचहरीसँ ने फड़िछाइत। तइले एते भारी हंगामा किए भेल। अनेरे समाजक लोककेँ किए जहलो कटौलकै आ घरक चौकैठो-केबाड़ उखड़बौलकै। मुदा हमहीं की कहबै, भगवान अपन सासुर हैर लेलनि तँए ने, नै तँ हमरा कोन मतलब ऐ गाम-समाजसँ रहितए। अपन भरल-पूरल परिवार रहैत, बाल-बच्चा रहैत, मनुखक बोनमे हराएल रहितौं। मुदा लगले सुलोचना बहिनक मन घुमलनि। आँगुरपर हिसाब जोड़ए लगली जे माएसँ कम दिन जीलौं, आकि बेसी दिन। बाबू तँ कहबे करथि जे नब्बे बरख टपि गेलौं मुदा माए तँ से नै बाजल। ओ तँ एतबे कहलक जे रौदी साल दुरागमन भेल रहए। तइ हिसाबसँ तँ भरिसक ऊहो नब्बेक धत्-पत् जीबे कएल। ओहुना बाबू कहला पछाति दू-तीन बरख पाछू मुइला। तहू हिसाबसँ नब्बे भाइए जाइए। मुदा अपन केते भेल, से केना बुझबै। कोनो कि लिखल-पढ़ल छी जे कुण्डली देखब। तहूमे घरक चुबाटमे सभटा पछिला कागज-पतर सड़ि गेल। तखनि? मन दौगबए लगली। मन पड़लनि जुगेसरक जनम। बिआहसँ तीन-चारि बरख पहुलका छी। मुदा दुनू तँ अन्हे-गाहिंस अछि। एकटा उपए अछि, नअ-दस बरख नोकरी छुटना भेल हेतै, साठि बर्खमे नोकरी छुटै छै, तइ हिसाबसँ सत्तरिक धत्-पत् भेल हएत। ओकरा जन्मक समए ढेरबा रही। तखनि तँ अस्सीसँ ऊपर भेल। अस्सी मनमे अबिते हँसी फुटलनि। यएह छी जिनगी। ३ माझिल भाए जुगेसरपर सँ साझिल भाए मुनेसरपर सुलोचना बहिनक नजरि बढ़लनि। दुनू भाँइमे मुनेसरे सहोदर बहिनो बुझैए आ जेतए तक वेचाराकेँ भऽ पबै छै मदतिओ करैए। मुदा ओही वेचाराकेँ की दोख देबै। गाममे रहैत आ लग-पासमे नोकरी करैत तखनि ने से तेते दूरमे अछि जे मदतिए की हएत। तहूमे तेहेन घरवाली भगवान देलखिन जे सदिखन अपने परिवारक पाछू तबाह रहैए। एक तँ दुनू बेकतीक बात, दोसर पढ़ल-लिखल परिवार, केतौ जे किछु बाजत आकि केकरो कहतै सेहो केहेन हएत। खैर जे होउ, एते तँ वएह वेचारा करैए जे एते दिन कहियो काल किछु पठा दइ छेलए जइसँ दीके-कि-सीके कहुना कऽ गुजर करै छेलौं। मुदा आब तँ से नहियेँ अछि। एकेबेर तेते रूपैआ बैंकमे जमा कऽ दइए जे साल-मालमे कोनो दिक्कत नहियेँ रहैए। छोट बहिन जे अछि तेकरा अपने तेहेन परिवार छै जे नैहरो बिसरि गेल। जँ कहियो भेँटो करए चाहै छी सेहो नै होइए। केना कऽ छोट-बहिनक सासुर जाएब। लोक की कहत? जेठ बहिन माए दाखिल होइ छै। घर-आँगन बहारि, चुल्हि-चिनमार नीपि वर्तन-बासन माँजि, जारनि-काठी ओरिया सुलोचना बहिन कलपर पानि आनए गेली। बाल्टीन भरि उठा जखनि विदा भेली आकि बाल्टीन नेनहि चबुतरापर खसि पड़ली। गुण रहलनि जे गरदनिसँ ऊपर चबुतरासँ बाहर रहलनि, नै तँ तेहेन खसान खसलथि जे मरिए जैतथि। ओना माथक भाग बँचलनि मुदा डाँड़सँ निच्चाँ थौआ भाइए गेलनि। एक तँ सिमटीक चबुतरा तैपर भरल बाल्टीन पानि। खसिते एकबेर पितियौत भाइक नाओं लऽ कऽ जोरसँ बजली- “मनोहर, हौ मनोहर, कलपर खसि पड़लौं।” अवाज तीनू भैयारीक आँगन तक पहुँचलनि। मुदा एक अवाज (पहिल अवाज) सुनि जहिना कियो कान ठाढ़ कऽ दोसर अवाज अकानए लगैए तहिना सभ (भैयारी परिवार) दोसर अवाजक आशा-बाट देखए लगला। मुदा दोसर अवाज दइसँ पहिने सुलोचना बहिन अचेत भऽ गेली। डाँड़क जोड़क हड्डी टुटि गेलनि। तैपर भरल बाल्टीनक चोट सेहो लगल रहनि। दोसर अवाज नै उठने (सुलोचना बहिन अवाज) मनोहरकेँ शंका भेलनि जे दोहरा कऽ अवाज किए ने आएल। से नै तँ केतौ अनतुका बात थोड़े छी। अँगनेसँ घरक पछिला खिड़की खोलि देखलनि जे सुलोचना बहिन कलपर चारूनाल चीत खसल अछि। घरेसँ हल्ला करैत निकलला जे सुलोचना बहिन कलपर खसल अछि। मनोहरक अवाज सुनि तीनू भैयारीक आँगनसँ धियो-पुता आ स्त्रीगणो दौड़ कऽ सुलोचना बहिन लग पहुँचली। मरदा-मरदी मनोहरेटा। स्त्रीगणो तँ स्त्रीगणे छी। काजक भीड़-भाड़ तँ नै मुदा विचारक तँ समुद्रे छी। रंग-रंगक विचार चलै लगल। विचारक तीर तेते तेज जे मनोहरक अपन बुधिए हरा गेलनि, विचारे थकथका गेलनि। तँइए ने कऽ पबथि जे बहिन जीवित अछि आकि मुइल। देहो-हाथ ने एकोबेर सुगबुगाइन। जहिना बिना ब्रेकक साइकिल वा गाड़ीक ठेकान नै रहै छै जे केम्हर जाएत तहिना मनोहर भऽ गेला। तहूमे अपन पत्नी कहलकनि- “नाकक साँस देखियौ?” मुदा तैबीचमे पतियौत भाइक पत्नी, भावो बाजि देलखिन- “छातीपर हाथ दऽ कऽ देखथुन।” दुनू गोटेक दुनू विचार सुनि मनोहर अकबका गेला। मुदा भावो विचारक आदर करैत मनोहर छातीपर हाथ देलखिन तँ धक-धकी बूझि पड़लनि। मुदा तैबीच पत्नी गुम्हरैत बजली- “कहलौं जे नाकक सोंसा देखियौ, तँ डाक्टर जकाँ छातीमे आला लगबए लगलौं?” पत्नीक बातकेँ मनोहर नै ठेकानि सकला। किएक तँ काल्हि साँझमे जखनि पत्नी आ भावोक बीच झगड़ा भेल रहनि तखनि गामपर नै रहथि, तँए नै बूझल रहनि। दुनू गोटेमे सँ कियो कहबो ने केने रहनि। नै कहैक कारण रहै जे दुनू गोटे अपने फड़िछबैक विचारि नेने रहथि। छातीक धुकधुकी देखि मनोहर नाक लग हाथ देलखिन तँ बूझि पड़लनि जे साँस रूकि-रूकि चलै छन्हि मुदा अखनि उपाइए कथी अछि? मरदा-मरदीमे असगरे छी, केना उठा कऽ ओसारोपर लऽ जाएब? गाड़ि-गड़ौबलि आ मारि-मरौबलि करैकाल ने भैंसूर-भावोक सम्बन्ध नै रहैए मुदा बेर-बेगरतामे तँ रहिते अछि। असगरे पत्नीएटा छथि जे संग भीड़ि काज करती बाँकी सभ भावोए छथि। देहमे केना भीड़ती। तहूमे अधमड़ू जकाँ छथि। देहो-हाथ लरे-तांगर हेतनि। जँ होशगर रहितथि तँ घुघुओपर उठा लइतौं। एक गोरे तँ दुनू डेने सम्हारैमे रहि जेती। अपने जँ धड़ पकड़ब तँ दुनू टाँगकेँ की हएत। तहूमे जँ टुटल हेतनि तँ आरो टुटि कऽ निच्चे खसि पड़तनि। डाक्टरो ऐठाम केना जाएब। डाक्टर बजबए जाएब तैबीच की हएत, तेकर कोन ठेकान। जहिना बाल-बोध बच्चाक बुधिक पौती बन्न रहैए तहिना मनोहरक बुधिक नीचला खप्पीमे ऊपरा लगि गेलनि। कलपर पड़ल सुलोचना बहिन फक-फक करैत। मनोहरकेँ सुमति एलनि। कलपर सभकेँ छोड़ि अपन कोठरी आबि मोबाइल निकालि चिन्हरबा डाक्टरकेँ फोन केलखिन। पछाति पितियौत भाएकेँ केलखिन। मुदा जहिना फोन केलखिन तहिना एक्के-दुइए सभ पहुँचला। पहुँचिते डाक्टर डाँड़ फुलब देखि बजला- “डाँड़ भरिसक टुटि गेल छन्हि। चाहे डाँड़क जोड़ छिटकि गेल छन्हि। हमर साधसँ बाहरक काज अछि। ओना तत्काल इन्जेक्शन दऽ दइ छियनि मुदा हिनका नीक डाक्टर ऐठाम लऽ जैयनु।” तीनू-चारू भाँइओ आ डाक्टरो मिलि हाथे-पाथे उठा ओसारक बिछानपर सुलोचना बहिनकेँ पाड़ि देलकनि। इन्जेक्शन पड़ला पछाति सुलोचना बहिनकेँ कुहरब शुरू भेलनि। मुदा बोली नै फुटनि। हाथोक इशारा नै देल होन्हि। लगले मनोहर जुगेसरकेँ समाद पठौलखिन। ई सोचि जे किछु छियनि तँ सहोदर बहिन हुनके छियनि। हुनका पीठेपर ने हम सभ रहब। नै किछु करथिन तेकर पछातिओ ने दियाद-बाद आकि सर-समाज। समाज तँ सहजे समुद्र छी, आइ नै अदौसँ होइत आएल अछि जे कियो असाध रोगक शिकार हुअए आकि पढ़ए-लिखए चाहैत हुअए आकि बेटा-बेटीक बिआह करए चाहैत हुअए तँ समाज चंदा (दान) दऽ ओइ काजक सम्पादन करैत आएल अछि। समदियाक समाद सुनिते सोमनी स्वामीकेँ सुसकारी देलखिन- “अखनि किए ने बहिन हेतनि?” पत्नीक बात सुनि जुगेसर फटो-फनमे पड़ि गेला। जिनगीक हारल जुगेसर जे परिवारमे मात्र दुइए परानी रहि गेल छथि। संंगीनक बातकेँ रोकि नै सकला। समदियाकेँ कहलखिन- “दुखमे सुमिरन सभ करे। अखनि किए ने बहिन हएत। बजले तँ रहए जे चारि कट्ठा जमीन बेइमानी कऽ लेलिऐ। तैकालमे मुनेसरा भाए रहै आ अखनि हम भऽ गेलिऐ।” पतिक सह पाबि सोमनी गोटी चलली- “जेहेन जे करत से तेहेन पौत।” दुनू परानी जुगेसरक बात सुनि समदिया आबि मनोहरकेँ कहलखिन। सहोदर भाएक बात सुनि मनोहर चौंकि गेला। सहोदरसँ कनीए हटि पितियौत भेल किने। एकर आगू ने समाज भेल। ओना पितियौत चारि भाँइ अखनो छीहे। सेवे (जेते कएल हएत) भरि ने करबै। भगवान नै ने छी जे प्राण दऽ देबै। मुदा नीक हएत जे मुनेसरोकेँ कहि दिऐ। जुगेसर भैया संगे ने खट-पट छन्हि मुदा सोलहो आना मुनेसर तँ सेवा करिते छन्हि। फोन लगा मुनेसरकेँ मनोहर कहलखिन- “मुनेसर, बड़की बहिन कलपर खसि पड़ली, चोट बहुत छन्हि। अखनो अचेते छथि, से जल्दी आउ?” समाचार सुनिते मुनेसरक मनमे अनेको प्रश्न उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलनि। हँ-हूँ किछु उत्तर नै दऽ सकला। अखनि हम हजारो किलो मीटर हटल छिऐ, जरूरति छै डाक्टर ऐठाम लऽ जाइक, तखनि तँ मनोहरेपर किए ने छोड़ि दिऐ जे जाबे पहुँचब ताबे तक ओ सम्हारत। मुदा हाथ-पर- हाथो दऽ बैसब नीक नहियेँ हएत। समाजमे केकरो जे कहबो करबै से मुहेँ ने अछि। एतेटा जिनगीमे समाजक कोन उपकार केलिऐ। लगले मनोहरकेँ फोनपर कहलखिन। “मनोहर, अबैक तैयारीमे जुटि गेलौं। जेते जल्दी भऽ सकत पहुँच रहल छी। तखनि तँ गाड़ी-सवाड़ीक रस्ता छी, तँए स्पष्ट किछु नै कहल जा सकैए। तैबीच खर्चक दुआरे कोनो काज बाधित नै होइ।” मनोहरपर भार दइते मुनेसरक नम्हर साँस छुटलनि। साँस छुटिते मन भेलनि जे एकबेर फेर मनोहरकेँ कहिऐ जे कनी बड़की बहिनसँ गप करा दैह। मुदा लगले भेलनि जे काजक दौड़मे गपो-सप्प बाधक होइ छै। छुच्छे गप्पो केने तँ कोनो लाभो नहियेँ अछि। छोटकी बहिनकेँ कहलखिन- “बुच्ची, बड़की बहिन कलपर खसि पड़लखुन से जहिना हुअ तहिना जल्दी गाम पहुँचऽ।” मुनेसरक बात सुनि कविता उत्तर देली- “भैया, हमरा छुट्टी कहाँ अछि जे जाएब। कियो घरमे नै अछि। असगरे छी। जखने घर छोड़ि जाएब तखने घर विरहा जाएत।” छोटकी बहिनक बात सुनि मुनेसर सकदम भऽ गेला। हम हटले छी, जेहो सभ लगमे अछि सेहो सभ हटिए रहल अछि। कहू जे ई की भेल। घर विरहा जाएत। घरक चीजे-बौस ने लोक चोरा लेत सभ समांग कमाइते अछि फेर कीनि लेत। मुदा सहोदर बहिन...। मने-मन मुनेसर गामक गर अँटबए लगला। राँची-जयनगर गाड़ी काल्हि नै छी। आइ पकड़ि नै हएत। सोझहे विदा भऽ जाएब सेहो नै हएत। सोझहे तँ लोक ओइठाम ने चलि दइए जैठाम काजक आशा रहै छै। जैठाम काजक आशा नै रहै छै तैठाम तँ तैयारे भऽ कऽ जाए पड़ै छै। बसक जे रूट अछि ऊहो गाड़ीसँ पहिने नै पहुँचा सकैए, तखनि? परसूका गाड़ी निश्चित पकड़ि लेब। नीक हएत जे दुनू बेकती जाइ। महिला रोगी संग महिला नीक। बीचमे काल्हि बैंको काज कऽ लेब। ओना अबैले नै कहबै मुदा दुनू भाँइओ (दुनू बेटा) केँ जानकारी तँ दइए दइक अछि। अबैले तखनि कहब ने नीक हएत जखनि असगर-दुसगर रहैत। परिवारक संग बिना रिजबेशनक चलब तँ कठिन अछि। ईहो तँ नीक नहियेँ हएत जे रस्तेमे समानो (चीज-बौस) चोरि भऽ जाए आकि बच्चे सभकेँ किछु भऽ जाए। नीक हएत जे दुनू भाँइकेँ जनतब दऽ दिऐ। मोबाइल उठा रघुनाथकेँ कहलखिन- “बौआ, दीदी कलपर खसि पड़लखुन, से सुनैमे आएल अछि जे डाँड़े कज्जी भऽ गेलनि।” दीदीक नाओं सुनि रघुनाथक मन चौंकि गेल। बाजल- “बड़का बाबूकेँ ताबे नै कहि देलियनि जे आबि रहल छी। तैबीचक भार अहाँक। आगू भऽ कऽ अहाँ जाउ, पाइ-कौड़ीक चिन्ता नै करब। अखनि आॅफिसमे छी, बेसी बात नै हएत, डेरापर गेला पछाति फोन करब।” रघुनाथक विचार सुनि मुनेसर छोटका बेटा रमाकान्तकेँ मोबाइलपर कहलखिन- “बौआ, बड़की दीदी कलपर खसि पड़लखुन। मनोहर अखने फोनपर कहलक हेन।” बाल-बोध रमाकान्त बाजल- “आर, की सभ भेलनि?” मुनेसर- “एतबे जानकारी भेटल अछि। आरो जानकारी होइए तखनि फेर कहबह।” “बाबू, केकरो कियो परान नै दऽ सकै छै, मुदा परान बँचबैक तँ परियास कइए सकै छै। तइले आगू बढ़ि कऽ जाउ, पछाति जँ हएत तँ हमहूँ आएब। ओना रघुनाथ-भैयासँ आॅफिसक पछाति गप करब। गाम-घरमे इलाजक असुविधा छै तँए जरूरतिकेँ देखैत कहब। ऐठाम तँ इलाजक नीक बेवस्था छइहे।” “अखनि जानकारीए बुझह। जाबे अपना नजरिए नै देखि लेब ताबे किछु कहब नीक नहियेँ हएत। सुनल बात गड़ि-मुड़ाह होइ छै, हल्लुको बात भारी आ भारीओ बातकेँ हल्लुक बना लोक बजैए।” दुनू बेटाक बात मुनेसरकेँ बल भरलकनि। मनमे मजगूती एलनि। परसूका गाड़ी कोनो हालतिमे छोड़क नै अछि। रहली पत्नी, कहब उचित अछि, कहबनि, मुदा नाकर-नुकर तँ करबे करती। खैर, नाकर-नुकर किछु करथि, हमरो निर्णयक दौड़सँ चलए पड़त। जँ नाकर-नुकर करती तँ मुँह फोड़ि कहबनि, माए दाखिल बहिन छी, जँ दुनियाँमे कियो माए-बापक सेवाकेँ नीक बुझैत हेतै तँ हमहूँ बुझै छिऐ। पत्नीक मतलब ई नै जे पथभ्रष्ट करए। नीक हएत जे अखने हुनको (पत्नी) सँ गप-सप्प कइए ली। मोबाइल लगा मुनेसर साधनाकेँ कहलखिन- “परसू गाम जाएब जरूरी अछि, तँए स्कूलमे छुट्टीक आवेदन दऽ काल्हि राँची चलि आउ?” पतिक बात सुनि साधना बजली- “एहेन कोन हलतलबी भऽ गेल जे एकाएक जाइक विचार कऽ लेलिऐ?” सुलोचना बहिनक सभ समाचार सुना मुनेसर बजला- “ओइठाम जा हम नै सेवा करबै तँ दुनियाँमे वेचारीकेँ रहलै के, जे करतै। सुनैमे आएल अछि जे भैयो दुनू परानी खुशीए मनबै छथि जे भने नीक भेल। तैठाम अपन दायित्व नै बुझिऐ, से मन गवाही नै दइए। खैर जे होउ, अखनि एतबे जे काल्हि चलि आउ।” पतिक विचार साधनाकेँ दबाबमे बूझि पड़लनि। ओ अपन दायित्वक विचार नै करैत बजली- “अखनि स्कूलमे छुट्टी नै देत।” मुनेसर- “हमरो जिनगी स्कूलेमे बीतल, किए ने छुट्टी देत, जँ नै देत तँ ओहिना चलि आउ।” साधना- “ओहिना केना चलि आउ।” मुनेसर- “रिजाइन दऽ कऽ। मुदा गाम चलैक अछि?” जहिना दबाबमे साधना बजै छेली तहिना दबाबमे मुनेसर सेहो आबि गेला। दुनूक दू दबाब, एककेँ कर्तव्यक दबाब दोसरकेँ सत्ताक दबाब। दुनू दू दिशामे बहैत जाइत। तुरछि कऽ साधना बजली- “बहिन अहाँक छथि, अहाँ जा कऽ देखियनु। हम अखनि नै जाएब!” साधनाक उत्तर सुनि मुनेसर अमबसियाक अन्हारमे पड़ि गेला। दुनियाँक अन्हेरमे सभ किछु सबहक अन्हरा रहल छै, अन्हरा कि रहल छै जे सभ अपने अन्हराइ पाछू पड़ल अछि। एकक पति आ दोसराक भाए तँ हमहीं छी। ई बात सत् जे जे नगीची बहिनक संग अपन अछि ओ पत्नीक नै छन्हि। मुदा की हुनका (पत्नी) आन बूझल जाए...? जिनगीक संगिनी। संग मिलि जिनगीक दुर्गकेँ टपैक व्रती। मुदा काल्हि एकर विपरीतो तँ भऽ सकै छै। अनेरे मनकेँ बौअबै छी। कियो अपन मन, अपन भाव, अपन विचारक अनुकूल अपन दुनियाँ गढ़ैए आ ओइमे बास करैए। जेते करैक शक्ति अछि, ओते करैक अधिकारी छी। परसू निश्चित गाड़ी पकड़ब चाहे बीचमे जेते विध्न–बाधा उपस्थित किए ने हुअए। राँचीसँ जयनगरक गाड़ी खुजैक समए पौने छह बजे साँझमे छै। तीन बजिते मुनेसर बेर-बेर घड़ी देखथि जे कहीं गाड़ी ने छुटि जाए। पनरह मिनट स्टेशनक रस्ता अछि। चारि बजिते भाड़ा-दारकेँ कहि मुनेसर बैगक संग घरमे ताला लगा निकलि गेला। ओना अखनि पौने दू घंटा समए अछि मुदा मनमे होन्हि जे हो-ने-हो जँ समैक हिसाबसँ जाएब आ बीचमे कोनो बाधा उपस्थित भऽ जाए आ गाड़ी छुटि जाए तखनि तँ सभ विचारल चौपट भऽ जाएत। तइसँ नीक जे जखनि डेरोपर गाड़ीएक प्रतिक्षा कऽ रहल छी तखनि किए ने स्टेशनेपर जा कऽ टिकटो कटा लेब आ प्लेटफार्मेपर बैसब जे गाड़ी पकड़ैक पूरा बिसवास बनल रहत। स्टेशन पहुँच पूछ-ताछ आॅफिस दिस मुनेसर बढ़ला। ओना एकेटा ट्रेन राँची-जयनगरक जे सप्ताहमे तीन दिन चलैत तँए समए तँ अपनो बुझले मुदा मनमे रंग-रंगक विचार उठने अपनोपर शंका होइत जे हो-ने-हो गाड़ीक समए-सारणीमे किछु फेर-बदल बीचमे ने भऽ गेल होइ। ओना दिन-रातिक हिसाबसँ अप्रील अक्टूबरमे समैक बदलाब होइ छै मुदा से आब कोनो ठेकान अछि। कहियो समए बदलि देल जाइ छै। तेकर कारणो अछि जे जाबे दूरगामी ट्रेन कम छल ताबे दिन-रातिक सुविधा बूझल जाइत छल मुदा आब तँ से नहियेँ रहल। दिन-राति दौड़ैबला ट्रेनक बीच केतेको जक्शन आ केतेको साधारण स्टेशन पड़िते अछि, तैबीच समैक की सुविधा हएत। पूछ-ताछमे बुझले बात दोहरा कऽ बूझि मुनेसर प्लेटफार्मक सिमटीक बैसकीपर बैसि गाम दिस नजरि देलनि, ने अन्हारे आ ने इजोते बूझि पड़लनि। झल अन्हार जकाँ सभ किछु देखथि। देखए लगला चारि भाए-बहिनक बीच हमहूँ छी आ सुलोचनो बहिन छथि मुदा अखनि तकक जे जानकारी अछि तइमे की छी। चारि छी आकि दू छी? आइ जँ दुनू परानी भैयो बहिनकेँ बूझि आगू इलाज करबए बढ़ि गेल रहितथि तँ जे परिस्थिति बनि गेल अछि से थोड़े रहैत। कोनो अस्पताल आकि डाक्टरक देख-रेखमे रहितथि, मुदा से...। तत्खनात कियो (समांगो) कर्जो हाथे अखनि धरिक प्रतिकार केने रहितथि तँ जेते चिन्ता अछि से थोड़े रहैत। बिमारीक अंतिम सीमा जँ घेरा पाछू दिस ससरैत रहैत सेहो नहियेँ भेल। बिनु प्रतिकारक रोगेकेँ ने अवसरि भेटल। जे बिससँ बिसम बनैत गेल हएत। मुदा विचार तँ मात्र विचार छी। विचार केना काजक रूप पकड़ि चलत, ई नान्हिटा थोड़े अछि मुदा, खैर जे होउ, अपन नाप-जोख तँ अपने जिनगीक कसौटीपर ने हएत। भावलोक (भवलोक) आकि विचारलोक कर्मेपर ने निर्भर करै छै। जैठाम छी तैठामक कसौटी आ जैठाम नै छी तैठामक कसौटी एके थोड़े हएत। प्लेटफार्मक हजारोक भीड़मे मुनेसर अपनाकेँ असगरे देखथि, के केकरा देखत, सभकेँ अपने भवसागर पार करैक छै। सभकेँ अपन-अपन बाट छै, अपन-अपन घाट छै, अपन-अपन घट छै आ अपन-अपन घटबारि छै। लाखोक भीड़मे प्रेम जहिना केतौ दोसरठाम नै अँटकि प्रेमीक हृदैमे सटि जाइ छै तहिना मुनेसरक हृदए सुलोचना बहिनक हृदैमे सटल। एहनो तँ भऽ सकैए जे पहुँचैसँ पहिने मरि जाए। जँ सएह हएत तँ रोकिओ तँ कियो नहियेँ सकैए। जँ रोकनिहार रहैत तँ रोकलो जा सकै छल सेहो तँ नहियेँ अछि। तखनि यएह ने हएत जे जे समए आ श्रम जिनगीमे लगबितौं से दोसर दिस लागत। प्लेटफार्मपर हल्ला भेल जे गाड़ी नै जाएत। इंजन खराप भऽ गेलै। हल्ला होइते जहपटार यात्री एक दोसरसँ पूछ-ताछ करए लगल। पूछ-ताछ कौैन्टरक आगू पुछिनिहारक भीड़ लगि गेल। सबहक एके प्रश्न जे की भेल किए ने गाड़ी औत। बिनु बूझल जबाव देनिहार बिगड़ि-बिगड़ि एतबे जबाव करैत जे कोनो जानकारी नै अछि। मुदा यात्रीओ तँ यात्रीए छी, सभकेँ अपन-अपन काज छै। केकरो कम जरूरी तँ केकरो बेसी। जेकरा कम जरूरी काज छै ओ तँ धीरे-धीरे अस्थिर भेल मुदा जेकरा कोट-कचहरी आकि डाक्टर-अस्पतालक काज छै, ओ केना अस्थिर हएत। समैपर कचहरी नै पहुँच हाजिरी नै देने वारंट हएत तहिना अस्पतालोक। समैपर जँ मरीज आ मरीजाकेँ दबाइ नै भेटितै तँ मरत। मुदा पनरहे मिनटक पछाति हल्लाक रूप बदलल। प्लेटफार्मक रूप-रंग बदलि बेदरंग हुअ लगल। केतौ चर्च होइत जे गाड़ी नै चलने भारी नोकसान भेल, तँ केतौ चर्च होइत जे तीन दिन काज पछुआ गेल। मुदा गाड़ी चलैक समाचार सेहो एके-दुइए पसरैत-पसरैत सौंसे प्लेटफार्म पहुँच गेल। पनरह मिनटक पछाति ट्रेन स्टेशनमे लगि जाएत। यात्री सभ अपन-अपन छुटल काज पूरबैमे लगि गेल। कियो पानिक बोतल किनए लगल तँ कियो बटखर्चा। तैबीच मुनेसर बेर-बेर घड़ी देखथि जे केते समए बँचल अछि। आब केम्हरो उठि कऽ नै जाएब। रिजबेशन टिकट रहैत तँ जगहक बिसवासो रहैत सेहो ने अछि। जेनरल बोगीमे अगुआ कऽ नै चढ़ब तँ रेड़ामे पड़ि जाएब। जुआन-जहान तँ रेड़ा-रेड़ी बरदासो कऽ सकैए मुदा सेहो ने हएत। ओना खलासी-कुली सभ पहिनेसँ माने पाछूएसँ सीट अजबारने रहैए आ पाइ लऽ लऽ एक्सट्रा सीटा सेहो बेचैए। अंतमे बूझल जेतै। समए तँ समए छी, अधलो काज तेहेन सिरचढ़ भऽ जाइए जे बेवस कऽ दइ छै। गाड़ी अबैक मात्र दस मिनट समए शेष रहल। बेर-बेर मुनेसर मुड़ी उठा-उठा पाछू दिस तकथि जे गाड़ी अबैए आकि नै। तैबीच जेबीमे मोबाइलिक घंटी बाजल। जेबीसँ मोबाइल निकालि मुनेसर नम्बर देखलनि तँ पत्नीक नम्बर रहनि। नम्बर देखि ने रिसिभ करथि आ ने रिजेक्ट। मोबाइलिक घंटी टनटन करैत मुदा मुनेसरक मन पत्नीक सिंहावलोकन करैत। एहेन पत्नीकेँ की बूझल जाए? मुदा गाड़ी अबैक समए अछि, अखनि की कहल जाए। किछु ने। मुदा तरे-तरे मन तड़ियाइत-तड़ियाइत तुरूछि गेलनि। तुरुछिते स्वीच दाबि झंझटि कात केलनि। मुदा लगले दोसर घंटी बाजि उठल। नम्बर देखि जहिना रेती चढ़िते घार पनिया जाइत तहिना मुनेसरक मन अनायासे पनिया गेलनि। मन चहकलनि, रघुनाथक नम्बर छी। रिसिभ करिते रघुनाथ कहलकनि- “बाबू, गाड़ी पकड़ि रहल छी की नै?” बेटाक प्रश्न सुनि मुनेसर पसीज गेला। विचारए लगला जे एकरा की बूझल जाए! की बेटा आदेश दऽ रहल अछि आकि काजपर सिरचढ़ अछि। मुदा समैक कमी विचारकेँ रोकि देलकनि। उत्तर दैत बजला- “बच्चा, स्टेशनपर गाड़ी पकड़ए आएल छी। गाड़ी अबैएपर अछि।” रघुनाथ- “बाबू, अखनि बेसी बात करैक समए अहाँकेँ नै अछि। मुदा हम डेरेपर छी। पोतो अछि आ पुतोहुओ लगेमे अछि।” पोता-पुतोहु सुनि मुनेसरक मन मेमिया उठलनि- “ईहो तँ रघुनाथ बाजि सकै छल जे दुनू बेटो आ पत्नीओ लगेमे छथि। से किए ने बाजि बाजल जे पोतो आ पुतोहुओ अछि। अपन रहितो अपन किए ने कहलक।” पतालक पानि जकाँ जेहने सुन्नर तेहने शीतल मनमे मुनेसर कहलखिन- “बौआ, बेसी गप करैक समए नै अछि। मुदा िधयानमे रखिहऽ।” रघुनाथ- “धियानमे रखब आकि धियानमे छथिए। अहाँ बुलन्दीसँ जाउ। बोकारो, जसीडीह, बरौनी, दरभंगा पहुँच जरूर जानकारी देब। काज करैएबला ने हम-अहाँ भेलिऐ, तइमे जानि कऽ कनीओं तिरोट नै हो। अनजानमे भैयो सकै छै, तँए तेकर चिन्ता नै करब। रखि दियौ मोबाइल।” रखि दियौ सुनि मुनेसरक मनमे समुद्रक बाढ़ि जकाँ हिलकोर मारलकनि। बजला- “बौआ, अखनि पाँच मिनट गाड़ीमे देरी अछि ताबे एकटा गप आरो कऽ लेब।” एकटा गप सुनि रघुनाथक मनमे उठल, भुखाएलकेँ जहिना ई थाह नै रहै छै जे केते खाएब, पियासलकेँ पानिक अंदाज नै रहै छै तहिना भऽ रहल छन्हि। जरूरति छन्हि संगीक। मुदा हम तँ बेटा भेलियनि, पाछू रहि संग दऽ सकै छियनि, बराबरीमे केना देबनि। से दइवाली तँ माइए छथिन, से की केलखिन। मुदा पुछबो केना करबनि जे माइओ संग छथि आकि नै। बाजल- “बाबू, गाम पहुँचिते, से जखनि पहुँची राति होइ आकि दिन, सुलोचना दीदीक सभ किछु बूझि जानकारी देब। हमहूँ ऐठाम डाक्टरक सम्पर्कमे रहब। जेना जे जरूरति हेतनि से तहिना हेतै। जँ गाममे अँटाबेश नै हुअए तँ हुनका लाइए कऽ ऐठाम चलि आएब। जेते काल ऑफिसक काज रहत तेतबे काल ने, तैबीच पुतोहु लगमे रहतनि; बाँकी समैक काज तँ अपनो कऽ सकै छी किने? अखनि निचेन से गाड़ीमे जाउ।” रघुनाथक बात सुनि मुनेसर बजला- “बौआ, अखनि तीन मिनट समए बाँकी अछि, अखनिसँ की करब। कियो दोसराइतो रहैत तँ गपो करितौं, सेहो ने...।” मुनेसरक भरभराइत अवाजमे चनकि कऽ खापड़िक तीसी जकाँ एकटा बात कूदि निच्चाँ खसल। ओ अछि दोसराइत। जखनि कोनो प्रश्नपर रघुनाथ दुनू बेकती माएओ आ पितोसँ गप करैत तँ स्पष्ट आभास भऽ जाइ जे दुनूक विचारक दूरी अछि। मुदा दूरिओ तँ दूरी छी आगूक दूरी आकि पाछूक दूरी। एक रास्ताक दूरीसँ विपरीत दूरी दोबर होइत। मुदा दुनियाँक अजीव खेल अछि। विषुवत रेखासँ जेते दूरी दछिनक रहत ओते दूरी उत्तर भेने मौसम मिलि जाइए। ओना दुनू बेकती बीए, बीएस-सी छी तँए वैचारिक दृष्टिसँ कम-बेसी आँकब उचित नै, तेकर दोसरो कारण अछि जे उमरोक हिसाबसँ एकरंगाहे छथि। तँए ईहो प्रश्न उठब जे हम बेसी दुनियाँ देखलिऐ आकि अहाँ। मुदा एकटा नम्हर प्रश्न तँ अछिए जे एके काजक दू विचारक बाट परिवारमे उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइए। परिवारोक तँ दिशा छै जे आगू मुहेँ बढ़त आकि ठमकल रहत आकि पाछू मुहेँ सरकत। रघुनाथक मन ठमकए लगल। हाथक कोनो आँगुर काटू घा अपने। मुदा विचारो तँ विचार छी। कियो बन्दूकक गोलीओक आगू विचार भंग नै करए चाहैत तँ कियो बुधिक खेल बूझि गेन जकाँ गुड़कबैए। खैर जे होउ, जानए जअ आ जानए जत्ता। मुदा ऐठाम तँ एक परिवारक प्रश्न अछि जइमे बाबू-माए छथि, दू भाँइ दू दियादिनी आ तीनटा बच्चा अछि। बच्चा तँ अखनि दूधमुहाँ अछि तँए जरूरीओ नै अछि। मुदा चारि गोटे तैयो बँचलौं ई चारि विचार जाबे एकठाम नै हएत ताबे समुचित ढंगसँ परिवार चलत केना? जँ परिवारकेँ दू पहिया गाड़ी बूझि विचारब तँ, माइए-बाबू भेला। तइमे दुनू दिशिया, केना परिवार आगू मुहेँ ससरत। तहूमे ढलानपर नै चढ़ाइपर। कोनो काजक सोलहन्नी बिसवास ताबे धरि नै कएल जा सकैए जाबे तक मनक सोच (विचार) वाणी होइत कर्म दिस नै बढ़त। जखने हाथ रहत घाटपर आ मन रहत सीकपर तखने केहेन हएत...। हाथमे रघुनाथोक मोबाइल आ मुनेसरोक मोबाइल सनसनाइत। बोली आशा करैत। मुदा बोल कोनो मुँहमे नै। मुदा विरामक पछाति ने विश्राम हएत, बीचमे केना विश्राम हएत। तैबीच ट्रेनक अवाज धमकल। कानमे धमक लगिते मुनेसर बजला- “बौआ, गाड़ी आबि गेल, जाइ छिअ।” पिताक बात सुनि रघुनाथ, खापड़िक खराएल अन्न जकाँ बाजल- “बाबू, अहाँ आगू बढ़ि जानकारी दिअ, जरूरति देखि विचारब। जुआन-जहान छौड़ा छी, अखनि नै ट्रेनक धक्का-धुक्की बरदास करब तँ कहिया करब। जेहेन स्थिति रहत तइ हिसाबसँ काज करब। कोनो जरूरी अछि जे परिवारकेँ संगे लऽ चली। अपन डेरा अछि, अपना घरमे रहत। काजोक तँ लहरि होइ छै, दू-चारि दिन ने समुद्र जुआरि जकाँ रहैए, मुदा रसे-रसे रसाइए जाइए किने।” बाजि रघुनाथ मोबाइलक स्वीच दाबि आगूमे रखलक। लगमे ठाढ़ पत्नी-सुनीता पुछलखिन- “बाबूजी असगरे गाम जाइ छथिन? एक तँ अपने देहमे सभ रोग रखने छथि, तैपर आॅपरेशन कएल पेट छन्हि?” कहि चुप भऽ गेली। गुम भेल रघुनाथ एक दिस नजरि पितापर दैत तँ दोसर दिस पत्नी-बच्चा आगूमे। सभ तँ अपने भेल तैठाम डेग उठाएब असान नै। मुदा जहिना भुमकम-बाढ़ि जेतेकाल रहैए ओते काल तँ दुनियाँसँ पकड़ि अनबे करैए। भलहिं चलि गेला पछाति जे होउ। पत्नीकेँ हाथक इशारासँ बैसबैत रघुनाथ बाजल- “माएसँ अहीं गप करू, हम सुनब।” सुनीता- “माए, सुनलिऐ हेन जे गाममे दीदीक डाँड़ टुटि गेलनि से बाबूजी गेला हेन?” मुनेसरक आगूक छुटल मुँह पुतोहुक आगू तँ छुटले-छुटले, साधनाक मुँह बजली- “बहिन छियनि तँ जेता नै?” सुनीता- “अपनो तँ बिमरयाहे छथि, तखनि जँ अपनो बिमार पड़ि जाथि, तखनि?” सुनीताक प्रश्न सुनि साधना मोबाइल रखि देलनि। बेर-बेर सुनीता हेलौ-हेलौ करैत रहली मुदा कोनो उत्तर नै। मुनेसर हजारो यात्रीक बीच कोणक सीटपर बैसला। जहिना चौड़ी खेतमे आनो-धान झरे भऽ जाइए तहिना मुनेसरक कानमे लोकक बात जड़ाहे बुझाइत रहनि। मन टाँगल रहनि अपन यात्रापर। चारि भाए-बहिनक बीच जहिना सुलोचना बहिन तहिना ने हमहूँ भेलौं। तहिना ने ऊहो (जुगेसर-कविता) दुनू भाए-बहिन भेलखिन। मुदा चारिमे दुइए किए? फेर अपना दिस मन घुमलनि अपनो तँ सएह छी। जखनि बेर-बेगरतामे पत्नीओ संग नै एली तखनि केकरा कहबै। कियो अपन मनक राजा छी आकि भिखाड़ी। पोथीमे छापल फोटो जकाँ दुनियाँ नै ने अछि। कर्ता बनि सभ जनम नेने अछि, दिन-राति कर्मो करिते अछि। मंशो सबहक एके छै मुदा भऽ की जाइ छै, से केकर के देखत। मुदा अपना संग परिवार आ समाजक जे दायित्व ऊपरमे रहै छै, सेहो तँ अपने केने हेतै। ४ बचकानी मन जेहने रघुनाथक तेहने सुनीताक। बचकानी ऐ मानेमे जे ने रघुनाथ बेकती-परिवारसँ आगूक दुनियाँ देखने आ ने सुनीता। तीस बर्खक रघुनाथ स्कूल-कौलेजसँ बैंक धरि जहिना देखने तहिना सुनीतो स्कूल-कौलेजसँ परिवारे धरि समटाएल। ओना सुनीताक अपन प्रवल इच्छा जे जखनि ग्रेजुएशन केने छी तखनि केतौ नोकरी करब जइ कमाइसँ परिवारक भरण-पोषण हएत। बेक्तीगत तौरपर तँ सामान्य विचार भेल, सभकेँ अपन कर्मपर ठाढ़ भऽ जिनगीक जतरा करक चाहिए। मुदा मनुख तँ मनुख छी जेकरा मनुख पैदा करैक क्षमता छै। तँए स्त्री–पुरुखक सम्मिलित रूप परिवार छी। जइमे पति-पत्नीक दुनूक विचारक समावेश केला पछातिए ने रस्ता धेने टघरत। ओना जँ दुनू बेकतीक तलब एकठाम जोड़ल जाएत तँ एक काज भेने एक रंग नै तँ कमी-बेसी किछु हेबे करत। कारणो अछि दू रंगक काज। जहिया रघुनाथ सुनीताक बीच सम्बन्धक नाओं लेल गेल तहिया दुनूक विचार अपन-अपन। कारणो छल जे ने रघुनाथ नोकरी करै छल आ ने सुनीते। जइसँ विचारमे बान्ह-छेक पड़ैत। जहिना सुनीता टटके कौलेज छोड़ने तहिना रघुनाथो। ओना रघुनाथ दू-तीन साल सुनीतासँ बेसी उमेरक। सुनीता कौलेजसँ मात्र बीए आनर्स केने जखनि कि रघुनाथ बीएस-सी आर्नसक संग एमबीए सेहो केने। जहिना रघुनाथक पिता-मुनेसरक धारणा जे नोकरी दू-चारि साल आगूओ-पाछू होइ छै मुदा बिआहोक तँ अपन समए अछि। अपनो (मुनेसरकेँ) तँ बिआहक पछातिए नोकरी भेल तँए हाथक चूड़ी लेल ऐनाक कोन प्रयोजन। तहिना सुनीताक पिता मदन मोहनोक धारणा। अपनो जिनगीमे तहिना भेल जे प्रशासनिक परीक्षा पास केला पछाति ट्रेनिंग पछुआएले छल। जे नोकरीक पूर्ब अवस्था भेल। मुदा दुनूक अपन-अपन पारिवारिक स्थितिक कारण रहनि। मुनेसरक पारिवारिक स्थिति रहनि जे बिआहक तीन साल-पान साल पछाति दुरागमन होइ छै। तैबीच नोकरीक परियास करब। मुदा मदन मोहनक परिवारक विचार धारा संग बेवहारिक धारा सेहो फुटकौर छेलनि। अखनि धरि मदन मोहन सोलहो आना माता-पिताक आदेशमे छला। जइसँ दू धारणा परिवारमे नै जनम नेने छेलनि जे नोकरी होइते बेटा-पुतोहुकेँ अगुआ नोकरी लेल घर छोड़त। जहिना पतिक अधिकार पत्नीपर आ पत्नीक पतिपर तहिना सासु-ससुरक सेहो ने पुतोहुपर। समैनुकूल खेनाइओ-पीनाइ-भानसो-भात एते असान तँ भाइए गेल जे घंटो भरिक काज नै रहल। दुरागमनसँ पहिने रघुनाथकेँ बैंकमे नोकरी भऽ गेल। सुनीता सासुरेक ताकमे। बिआहक पछाति नैहर-सासुरक बीच संक्रमण होइते छै। मदन मोहन दुनू परानीक स्पष्ट सोच रहनि जे बिआहसँ पहिने धरि सुनीतापर जेते अधिकार छल तइमे कम करए पड़त। जँ अपना सभ नोकरीक पक्षमे छी आ ओइठामक (सासुर) विपक्षमे होथि तखनि एहेन काज औगता कऽ करबो नीक नै। दुरागमनक पछाति रघुनाथकेँ एक संग तीन घर सोझहा पड़ल। पहिल अपन विलासपुरक डेरा, सभ तरहक सुविधा। दोसर, राँचीक डेरा मुदा पिता पलामूमे भाड़ाक घरमे रहै छथि! तेसर पूर्वजक गाम जे समैक धक्कामे से डोलि-डोलि उखड़ि रहल अछि। केना नै उखड़त? बिआहेमे विदागरी आ विदागरीओ केतए तँ जैठाम नोकरी करै छी तैठाम! सासुर तँ पहिने छुटल जे रसे-रसे नैहरो छुटिए जाइत। तैसंग कोजगराक मखान, तिलासंक्रान्तिक जड़ौउ-वस्त्र आ मोसरामनीक हिसाबे केतए। पत्नीक बेवहारसँ परिचित मुनेसर अपन भार हटबैत रघुनाथकेँ दुरागमनसँ पहिने कहि देने रहथिन, बौआ नीक हेतह जे दुरागमनक पछाति विलासेपुर चलि जइहऽ। अगिला छुट्टीमे हमहूँ एबह। विलासपुरक तीन कोठरीक डेरा, अतिरिक्त-अतिरिक्त। बैंकसँ वेतन उठा रघुनाथ डेरा आबि पलंगपर रूपैआ रखि वाथरूम विदा होइत सुनीताकेँ कहलक- “जलखै करैक मन नै अछि, केन्टिंगेमे कऽ लेलौं। मुदा चाह पीब। तँए जाबे बाथरूमसँ निकलै छी ताबे अहूँ चाहक जोगार करू।” जैठाम चाह-चीनीक समस्या रहैत तैठाम ने एहेन आदेश पाबि पत्नी अँगैठी-मड़ौर करै छथि, जैठाम से नै तैठाम तँ काजे उत्तर होइ छै। सएह भेल। रघुनाथ अपन कमाइपर अपन जिनगी ठाढ़ करैक प्रश्न उठबैत बाजल- “अहाँक एलापर ई पहिल दरमाहा छी, हम तँ बाहरसँ कमा हाथमे दऽ देलौं, आब अहाँ कहू जे केना चलाएब?” जिनगीक नक्शा नै बना सुनीता अपन मनक बात उगलि देलनि- “हमहूँ केतौ नोकरी करितौं।” पत्नीक विचार सुनि रघुनाथ गुम भऽ गेल। मुदा ऐठाम तेसर अछि के जे गुमी छजत। ऐठाम तँ प्रश्नक उत्तर दिअ पड़त। एक संग अनेको प्रश्न रघुनाथक मनमे तड़कैत मेघ जकाँ आबि गेल। मरदा-मरदी डेरासँ निकलिते डरए लगै छी जे बैंकक स्टाफ बूझि कियो आक्रमण ने कऽ दिअए तहिना आॅफिस आबि थड़थड़ाइत रहै छी जे फेड़-फाड़ ने भऽ जाए। ई तँ घरक बाहर भेल मुदा डेरोकेँ सुरक्षित नै देखै छी। सभ किछु रहितो डरौन जकाँ लगैत रहैए। तैठाम महिलाकेँ असगरे घरसँ निकलब...? दोसर बात उठल जे परिवारक स्तर बना ने घरक खर्च निर्धारित हएत मुदा ऊहो तँ घरक काजेपर निर्भर करैए। घरक काज यएह ने जे समुचित भोजन, वस्त्र, घर, बाल-बच्चाकेँ पढ़ैसँ लऽ कऽ बिआह-दान आ मौका-मुसीबत (बर-बिमारीसँ लऽ कऽ सामाजिक काज) सम्हारै धरि। अपन मनक दौड़मे रघुनाथ परेशान होइत गुमकी लधने। मुदा तँए कि सुनीताकेँ प्रश्न दोहरबैक मन रहलनि। मन बौआइत माता-पितापर चलि गेलनि। पिताजी जिला- स्तरक प्रशासनिक अफसर रहितो पाँच गोटेक परिवारमे आठ दिनपर सौ ग्राम खस्सीक कलेजी चाहे तीनटा अंडा अनै छला आ सभ मिलि खाइ छेलौं। टुकड़ी-टुकड़ी बना-बना हिस्सा पूरबै छेलौं। बच्चेसँ कहियो झूठ नै बजलौं हेन। कहियो केकरो कोनो चीज नै छुलिऐ। एहने आदति ने अपनो परिवारमे बाल-बच्चाकेँ लगबैक अछि। रघुनाथ बाजल- “अपन की विचार, स्पष्ट करू?” विचार स्पष्ट सुनि सुनीता ठमकली। ठमकैक कारण भेलनि जे जेते पिताजी दरमाहा उठा पाँच गोटेक परिवार नीक जकाँ चलबै छला तेते तँ पतिओ कमाइ छथि, माएओ नोकरी नै करै छली, तखनि नोकरीक की प्रयोजन। परिवारो तँ परिवारे छी। जहिना कोनो देशक किरिया-कलाप छै तहिना ने परिवारोक अछि। जे केला पछातिए पूर्ति हएत। जँ पाइएक पाछू दुनू बेकतीक समए चलि जाएत तखनि बाल-बच्चा आकि परिवार-समाजक बीच सम्बन्ध केना बनत? अपना ऐठामक चिन्तनधारा (अध्यात्मिक सोच) मे माए-बापकेँ सिरिफ जन्मदते नै गुरु सेहो मानल गेल अछि। प्रश्न अछि जे पति-पत्नी मिलि बच्चाकेँ जन्मसँ तीन साल धरि पोसि-पालि कोनो विद्यालयमे दऽ दइ छिऐ, माए-बापसँ कोसो दूर। तैठाम माए-बापक आकर्षण बच्चाक प्रति केते दिन टिकत। तहूमे जे नोकरीक (काजक) रूप बनि गेल अछि ओ घंटाक समए किताबक पन्नेमे नुकाएल जाइए। एक तँ ओहुना सभकेँ अपन जिनगीक बेक्तीगत काज (शौच क्रियासँ सुतै धरि) अछिए तैपर काजक वृहत् भार सेहो पड़िए रहल अछि। समए गमौने आमदनी तँ बढ़िए जाइए। आमदनी अनुरूप जिनगी बनबैक इच्छा तँ मनमे अछिए। प्रश्न चौबीस घंटाक दिन-रातिमे अपन आकि परिवारक फड़ै-फुलैक केते समए बँचैए आ केते दुनियाँक दौड़मे जा रहल अछि। चाहे बेक्तीगत जिनगी हुअए आकि पारिवारिक, समैनुकूल रस्ता तँ बनबैए पड़त, नै तँ धारासँ कटि किनछरि चलि जाएब। बेकतीक निर्माण (मनुख बनैले) लेल बेक्तीगत कर्मक आवश्यकता पड़बे करै छै जँ से नै हएत तँ मानवीय संवेदनापर चोट पड़बे करत। तहिना परिवारो-समाजाेक छइहे। सुनीतासँ स्पष्ट पुछैक कारण रघुनाथक मनमे अपन परिवार (माए-बापक) आबि गेलै। परिवार तँ परिवारक लोककेँ बिसवासमे लइए कऽ चलत। तखने परिवारक असल रूप सोझहा पड़त, जइमे बेकतीक समुचित विकास होइ छै। पत्नीक मनक बात बुझै दुआरे प्रश्न उठौलक। मुदा जइ परिवारमे वौधिक अनुशासन अछि तइ परिवारक सुनीता, तँए प्रश्नपर ठमकि गेली। दुनूक बकार बन्न। ने रघुनाथ आगू बढ़ि किछु बाजि पबैत आ ने सुनीता। मुदा चिड़ै जकाँ बोलक बदला लोलोसँ तँ काज नहियेँ चलत। लाेलो तँ सुग्गा–मोनाक छी। एकटा पाकल तिलकोर-लताम खाइबला दोसर काँचोसँ काँच खाइबला। मुदा यक्ष प्रश्न जेहने रघुनाथक संग तेहने सुनीताक संग सेहो। एक पलंगपर बैसल रहितौ जोगिनी जकाँ सौ जोजनपर दुनूक मन बौआइत। केना नै बौऐतै? आखिर परिवारक नीब गाड़ैक प्रश्न अछि ने। अपन गतिए गाड़ी (ट्रेन) चलि रहल अछि, कोणक सीटपर बैसल मुनेसर बिसरि गेला, बेटाक फोनपर जानकारी देनाइ। ईहो थाह नै रहलनि जे कैकटा टीशन पार केलौं। मनमे सुलोचना बहिनक जिनगी नचैत। आइ जँ आने बहिन जकाँ सुलोचनाे बहिन सासुरमे रहितथि, बेटा-पुतोहु, पोता-पोती रहितनि तँ हमरा रातिकेँ किए चलए पड़ैत। मुदा जँ से नै छन्हि तँ की हमहूँ विरान भऽ जैयनि। एक तँ ओहिना भैया-भौजी लगमे रहितो हटल छथिन। तैसंग छोट बहिनो हटले सन अछि तैठाम के देखत वेचारीकेँ? तीनमे एक हम भेलिऐ, मुदा जँ तीनू कनी-कनी कऽ भार उठा लितथि तँ मोटा तँ हल्लुक भाइए जाइत। भने तँ बेटा कहबे केलक जे केकरो कियो परान नै दइ छै मात्र सेवा धरि करै छै। तइमे जानि कऽ कोनो खोंट नै होइ। बिनु बूझल भाइओ सकैए। नजरि पत्नीपर गेलनि-जिनगीक संगिनीक संकल्प लेनिहारि पत्नी सेहो बिछुड़ले जकाँ छथि, जकाँ की छथि जे जइ काजक नीविते जा रहल छी आ ओ संग नै छथि तँ की भेल? मुदा बेटा तँ पीठपोहू अछिए। बेटापर नजरि पड़िते मुनेसर हाँइ-हाँइ कऽ जेबीसँ मोबाइल निकालि धरेलनि- “बौआ, तेज गतिए जा रहल छी, कोठरीमे तँ इजोत छै मुदा कोठरीक बाहर तेते अन्हार छै जे किछु देखि नै पड़ैए जे केतए आबि गेलौं। स्टेशनक ठेकान नै रहल।” पिताक बात सुनि रघुनाथ बाजल- “कोनो चिन्ता मनमे नै राखू। हमहूँ जगले छी, समए-समैपर जानकारी दैत रहब। अखनि कोनो डाक्टर सभसँ सम्पर्क करब उचित नै बूझि रहल छी, तँए किनकोसँ सम्पर्क नै केलौं हेन।” “ठीक छै, मोबाइल रखि दहक।” मोबाइल रखिते सुनीता बजली- “एक तँ अपनो बाबूजी केतेको रोगसँ रोगाएल छथि तैपर बहिनक ई दशा छन्हि! केना कऽ सम्हारि पौता?” सुनीताक बात सुनि रघुनाथ बाजल- “दोसर उपए?” रघुनाथक प्रश्नक उत्तर सुनीताकेँ नै फुड़लनि। असमनजसमे पड़ल सुनीताकेँ देखि रघुनाथ बाजल- “पिताजी धैनवादक पात्र छथि। जे अपन रोगाएल वृद्ध शरीरमे अखनो सेवा लेल तैयार छथि। जँ थोड़ो-थाड़ सभ कियो संग देबनि तँ की ओ पाछू हटता। किन्नहु नै पाछू हटता। पाछू हटथि वा नै, मुदा जँ पीठपर रहबनि आ काजक महत देखब तँ हुनका हटने की हेतनि। जैठाम तक ओ अगुआ कऽ पहुँचल रहता तैठाम तकक अपनो आ परिवारोक तँ बनले रस्ता भेटत, मात्र ओइ दिशामे आगू बढ़ैक अछि।” रघुनाथक विचार सुनीताक मनकेँ तेना हौंरलकनि जे पाशा बदलि गेलनि। जहिना अखड़ाहापर हारैत खलीफा वा रंगमंचपर पछड़ैत नर्तक, कुश्ती वा मंचक मंचन बदलि दोसर दाओ वा चालि पकड़ि नव दृश्य सृजन करैए तहिना सुनीता पाशा बदलैत बजली- “बाबूजीक जे दशा छन्हि ओ माए किए ने बूझि पौलनि?” जहिना निरुत्तर होइत सुनीता पाशा बदलि लेलनि तहिना सुनीताक प्रश्न रघुनाथकेँ पाशा बदलैले बाध्य केलकनि। मुदा प्रश्न तँ एहेन सघन भऽ गेल जे बिहिया कऽ जड़ि पकड़ब कठिन अछि। बिना जड़ि भेटने केतबो चिक्कन शब्द किए ने प्रयोग होइ मुदा वस्तु–स्थिति तँ हराएले रहत। एक संग अनोको प्रश्न रघुनाथक मनमे उठल। माएक खिधांस जाँघ तरक पत्नीकेँ कहब उचित हएत? जँ नै कहबनि सेहो तँ उचित नहियेँ हएत, एक तँ ओहुना पढ़ल-लिखल बुझनुक पत्नी छथि आन जकाँ जँ चौबन्नीओ-अठन्नी अबूझ रहितथि तँ अँटाबेशो भऽ सकै छल, सेहो नै अछि। दोसर पति-पत्नीक बीच नव सम्बन्ध संगीक रूपमे ठाढ़ भेल। जहिना कोनो छोट गाछक पहिल डारि सुखने-टुटने वा कटने, जिनगी भरिक दाग बना दइ छै, तेना जँ भेल तँ कहियो सीना तानि सकै छी? जखने सीना तानि किछु बाजए लगब आ जँ ओही बातक गोलासँ गोलियौल जाएत तखनि छाती छोड़ि लगत केतए! जखने सीनामे गोला भीड़त तखने दलदला कऽ करेजमे भूर करबे करत! विचित्र स्थितिमे रघुनाथ उलझल। जिनगीमे जखनि आन संकट अबै छै तखनि धर्म ओकरा बँचबैए, मुदा जखनि धर्मेपर संकट औत तखनि के बँचौत? जेना-जेना रघुनाथ प्रश्नक जड़ि तकैत तेना-तेना संकट बढ़ल चलि जाइत। अखनि धरि माएक देख-रेखमे रहलौं, जेकरा नकारब अनुचित हएत मुदा कोन रूपमे रहलौं, ई तँ नकारल नै जा सकैए। विचारक गंभीरता रघुनाथक चेहराकेँ एते मलिन कऽ देलक जे लगले पत्नीक प्रति बिसवास रोपब कठिन तँ भऽ गेल। होइतो छै, पोसल बच्चा कनीओं सेवा पाबि कलशए लगैए मुदा रोगाएल, दूधकट्टू बच्चाकेँ कलशैले जड़िमे मालीकेँ तेलक माली लऽ कऽ बैसला पछातिए आशा जगै छै। मुदा रघुनाथकेँ से नै भेल, भेल ई जे जहिना पाँच बर्खक पछाति भेटल संगी वा परिवार जनकेँ बिछुड़ैक अंतिम दिनक मिलाप पहिल दिनसँ मिला आगू बढ़ैए। मनमे अबिते रघुनाथ बाजल- “भने दुनू परानी अपनो सभ छी आ पितोजी गाड़ीमे असगरे हेता, एक तँ दूरक सफर तहूमे असगर आरो गड़ूगर होइ छै। तँए नीक हएत जे अहीं हुनकासँ गप करू।” ससुरसँ मुहाँ-मुहीं गप करब सुनीताकेँ अनुचित बूझि पड़लनि। अनुचित ई जे ससुर-पुतोहुक बीच पति होइ छथि। भऽ सकैए किछु एहेन बात बजा जाए जे उपयुक्त नै होइ। कारणो अछि। कारण ई अछि जे ऐठाम हम दुनू परानी छी, भरल-पूरल परिवारक बीच छी, मुदा ओ तँ गाड़ीमे असगरे छथि, तहूमे रातिक रस्ता, एक तँ ओहुना बोनो-झाड़मे मूससँ बेसी छुछुनरिए फड़ि गेल अछि, गाड़ी तँ सहजे गाड़ीए छी। जँ कहीं कियो बैगे पार केने होन्हि, जइसँ ने किछु खाइक बँचल होन्हि आ ने बिमारीक गोटी-दबाइ। ओ तँ बिषमो स्थितिमे भऽ सकै छथि। बेटा तँ बेटा भेलखिन। पुरुष-नारीक बीच एकटा ओहनो सम्बन्ध सूत्र अछि जे मरदा-मरदी भावहीन अछि। विचार मनमे अबिते सुनीता बजली- “नीक हएत जे अहीं मोबाइलक सम्पर्क करू हमहूँ सुनब?” सुनीताक बात सुनि रघुनाथक मनमे उठल केकर मन कोन रूपमे कोनो चीज बुझैए ई तँ बजने बूझब। जँ हमहीं दुनू बापूत गप करब तँ अपने ढंगसँ ने करब। काजक दौड़मे जेतए धरि आबि चुकल छी तइसँ आगूएक गप ने करब। तइसँ हिनका की भेटतनि। मुदा प्रश्न तँ अछि परिवारिक विचारक। बाजल- “देखियौ, जहिना कोनो गाछ तँ बीजसँ होइ छै। एक दिस गाछ निकलि अकास दिसन बढ़ै छै आ दोसर दिस सिर निकलि मुसराइत पताल दिसन बढ़ै छै। पतालो दिस ने सिरगर सिर मुसरासँ आरो-आरो सिर सभ निकलै छै। सिरोसँ सिर निकलै छै, तहिना धरतीक ऊपरोक गाछमे डारि सभ निकलै छै। सिरगर डारि गाछेक रूपमे बढ़ैत निकलै छै माटिक तरक मुसरा ऊपर आबि शील बनि गाछक रूपमे बढ़ै छै आ दोसर-तेसर डारि सेहो निकलै छै। तहिना जइ परिवारमे अपना सभ छिऐ ओइ परिवारक पछिला पीढ़ीक सभसँ ऊपर (आगू) हम भेलिऐ। हमरा पछाति (पाछू) एक दिस अहाँ भेलिऐ आ दोसर दिस भाए। अहाँ ऐ मानेमे जे हमरा कान्हीक भेलिऐ। अहाँसँ उमेरो भाएक कम छै। अहाँ पहिने स्कूल धेलिऐ, आगू भऽ दुनियाँक मंचपर एलिऐ, भाए पाछू आएल। तँए देहा-देही सम्बन्ध देखए पड़त। हमरा संग पति-पत्नीक सम्बन्ध अछि भाएक संग दिअर-भौजाइक। तहिना दुनू दियादिनी भेलौं। जहिना छोट दियादिनी बेटी तुल्य होइ छै तहिना ने छोट भाए बेटे जकाँ होइ छै। यएह ने पारिवारिक सम्बन्ध अछि। तँए अखनि पिताजी जइ स्थितिमे हेता तइसँ हटि आन बात पूछब हमराले उचित नै भेल। जँ कहीं काल्हि हमरो जाइक जरूरति भऽ गेल तँ भाए (छोट भाए) ऐठाम अहूँ चलि जाएब। जाबे धरि बहराएल रहब ताबे तक अहूँ रमाकान्त ऐठाम रहब। जखनि-जखनि गप करैक समए भेटत तखनि-तखनि अपनो दुनू दियादिनीक परिवारक आ अपने परिवारक गप-सप्प करब। गप-सप्प की करब जे सभ मिलि विचार करब जे पिताजी केतए धरि हमरा सभकेँ पहुँचा देलनि आ आगू हम सभ केना बढ़ब।” एक संग रघुनाथक मुँहसँ केतेको प्रश्न उठि गेल। मिथिलांगना सुनीता एके धारक अनेको घाट देखि बौअए गेली जे कोन घाट पहिल स्नान कएल जाए। तैबीच मोबाइलक घंटी बाजल। घंटी बजिते रघुनाथ उठौलक। लगले रघुनाथकेँ मोबाइल उठबैत सुनि मुनेसर असीरवाद दैत बजला- “बौआ, जगले छी।” जागल सुनि रघुनाथकेँ किछु जबाव नै भेटि सकल। खखास केलक। खखास सुनि मुनेसर बजला- “बौआ, करीब जसीडीह आबि गेल छी। अखनि धरि गाड़ीमे एको बेर उकासीओ ने भेल हेन। ओना दबाइओ आ पानिओ रखने छी, जखने खाहिंस हएत तखने खा लेब। मुदा किछु छिऐ तँ गाड़ीए छिऐ। भुमकमक समए धरती डोलने देह-हाथ तँ डोलबे करै छै तहिना ने गाड़ीओ छी।” पिताक बात सुनि तोष भरैत रघुनाथ बाजल- “भोर तँ भाइए गेल, फरिच जकाँ सेहो भऽ गेल, ओमहर केहेन बूझि पड़ैए।” एक तँ खिड़की-केबाड़ बन्न तैपर बिजलीक इजोत तँए कोठरीक भीतर तँ दिने जकाँ बूझि पड़ैत मुदा गाड़ीक बाहर धुनि जकाँ रहने अन्हराएले। सर्द हवा अबै दुआरे मुनेसर खिड़की खोलि बाहर नै देखलनि। एक तँ तेज गतिए ट्रेन अछि तैपर जँ अहिना पूरबो-पछियाक गति होइ तखनि तँ जाबे खिड़ीक खोलि देखि बन्न करब ताबे खिड़की मुँहक हवा तँ सर्द कइए देत। बाहर देखब ओते खगतो नहियेँ अछि। अखनि तँ अदहासँ कनीए आगू बढ़लौं हेन, कहुना-कहुना तँ पान-सात घंटाक रस्ता बाँकीए अछि। बजला- “बौआ, दस बजे तक दरभंगा पहुँच जाएब।” दरभंगा सुनि रघुनाथ बाजल- “दरभंगासँ केना जेबइ। सुनै छी सकरीमे गाड़ी नै रूकै छै, तखनि तँ दरभंगे उतरए पड़त किने?” “हँ, से तँ दरभंगे उतरए पड़त। मुदा दोसर उपएओ तँ नहियेँ देखै छी। जँ आगू बढ़ि जाएब तँ मधुबनीमे गाड़ी रूकत। मधुबनीसँ नीक दरभंगे उतरब हएत। एक तँ मधुबनीसँ सवारीक रस्ता नीक नै अछि, तेते जरकीन अछि जे देह-हाथ तोड़ि दइए। तैसंग सवारीओक मेल नीक नहियेँ अछि। मुदा दरभंगासँ से सभ नीक अछि। बड़ी लाइनिक गाड़ी जाइयोनगर जाइए आ बिरौलो जाइए। एक-आध घंटा पछातिओ जँ गाड़ी हएत तँ गाड़ीएसँ सकरी चलि जाएब आ ओइठामसँ निर्मलीक गाड़ी पकड़ि लेब। किछु अछि तँ ट्रेन सभसँ नीक सवारी अछि। दरभंगेमे नहा-धो सेहो लेब। आ किछु खाइओ लेब। जँ से नै हएत तँ दबाइक बेरे हूसि जाएत।” पिताक आशा भरल बात सुनि रघुनाथ मने-मन खुशी भेल। खुशीक कारण ई जे कोनो काज करैले जखनि कियो विदा होइए तखनि काज पहिने कहि दइ छै, जे जेते मनसँ करबह से तेते पेबह। ठढ़िया प्रणाम आ छठिक हाथी, पानिक किनछरिमे बैसल रहि जाइए। मुदा मुनेसरक काजक बीच कर्मठता झलकैत। जैठाम कर्मठता रहत तही ठामने सफलतो रहत। बाजल- “बाबूजी आब हमहूँ ओछाइन छोड़िए दइ छी। फरिचो भाइए गेल। मुदा दरभंगा पहुँचिते फोन करब।” रघुनाथक बात सुनि मुनेसरक देहक थकान जेना मेटा गेलनि। मेटा ऐ दुआरे गेलनि जे मन दरभंगा स्टेशनक बाथरूमे सँ निकलि अपनाकेँ दोकानपर खाइत बूझि पड़लनि। मने-मन गोटीक मिलान करए लगला जे तीनू गोटी एकबेर खेने चौबीस घंटा निचेन भऽ जाएब। ताबे गामो पहुँचिए जाएब। गाम तँ गाम छी, नै कियो सेवा रूपमे औत तँ चारि गोरेकेँ भरि दिनक बोइने दऽ देबै। तँए कि काज छोड़ि देब। बजला- “बौआ, आइ बूझि पड़ैए जे सेवा-निवृति नै भेलौं हेन। भलहिं स्कूलसँ भऽ गेलौं मुदा परिवारो तँ छोट पाठशाला नहियेँ होइए। चारि भाए-बहिनक बीच सुलोचना बहिन सभसँ जेठ छथि जिनका परिवारसँ लऽ कऽ सासुर धरि ठोकरा जिनगीकेँ नीरस बना देलकनि, जिनका सोझहा मृत्युक सिवा किछु शेष नै बँचलनि, तैठाम जँ अपनाकेँ पबै छी तँ ऐसँ बेसी जिनगीमे की करब। जिनगी जँ जिनगी पकड़ि चलत तँ जिनगी छोड़ि आरो भेटबे की करतै। जिनगी भेटल, सभ किछु भेटल।” पिताक अह्लाद सुनि अह्लादित होइत रघुनाथ बाजल- “बाबूजी, मनमे कखनो नै आनब जे खर्च-बर्च दुआरे काज नै कऽ पाबि रहल छी। हमहूँ तैयार भऽ कऽ बैंको आ डाक्टरो सभसँ सम्पर्क बना लइ छी। अहूँ दरभंगा उतरिते जानकारी देब।” “बड़बढ़ियाँ, मोबाइल रखि दहक।” भोरक भैड़ाएल भौंरा जकाँ रघुनाथकेँ देखि सुनीता अवसरिकेँ हाथसँ नै गमा टीप देलनि- “वृन्दावनमे आगि लगल काेइ ने मिझाबै हौ।” सुनीताक प्रभात बेल सुनि रघुनाथ विस्मित भऽ गेल। जहिना चकेबा परिवार-समाजसँ भगौल श्यामा लेल माए-बाप सभकेँ छोड़ि बहिनक पीठपोहू भेला तहिना ने पितोजी भेल छथि। की माएकेँ उचित भेल जे संगी नै भेलखिन। हो-ने-हो जँ कहीं रस्ते–पेरे हुनका किछु भऽ जाइ छन्हि तँ यएह भेल अर्द्धांगिनी, जिनगीक आधा। मुदा पिता लेल जे बनि सकत तइमे पाछू हटब बिसवासघात भेल। हो-ने-हो जँ दीदीक सेवा लेल माएओ बेपाट हेती तँ हुनका किन्नहु नै नीक कहबनि। जइ परिवारमे जनम भेलनि तइ परिवार दिस बेसी झूकल रहै छथि, रहथु। तइसँ परिवारमे कोनो बाधो तँ उपस्थित नहियेँ होइए। मुदा जखनि सोझहा-सोझही दुनू परिवारक बीच जँ कोनो प्रश्न उठैत अछि आ माए सासुरसँ नैहर दिस झुकै छथि तँ अनुचित भेल। दुनूक बीच कोनो तरहक अनोन-बिसनोन आकि मधनोने-मिठनोन नै होउ से नीक बात मुदा जैठाम परिवारक जड़िक प्रश्न रहत तैठाम तँ विचारए पड़त जे केकरा जड़िमे पानि ढारल जाए। दिनक सबा दस बजे गाड़ी दरभंगा स्टेशन पहुँचल। निर्मली-सकरीक गाड़ी जकाँ नै जे जहिना चढ़ैकाल धक्कम-धुक्का आ पाॅकेटमारी होइए तहिना उतरैकाल। ओना मुनेसरक मनमे उठलनि जे गाड़ीएसँ रघुनाथकेँ फोन कऽ दिऐ मुदा फेर मन बदलि प्लेटफार्मेक भेलनि। गाड़ीसँ उतरिते रघुनाथकेँ कहलखिन- “बौआ, दरभंगा पहुँच गेलौं। एके घंटाक तरपटमे बिरौलक गाड़ी अछि तइसँ सकरी चलि जाएब। अखनि बेसी बात नै करब। घंटे भीतर तैयारो होइक अछि।” बैंक आ आॅफिसक काज रोकि रघुनाथ मने-मन पिताक रूप देखए लगल। एक तँ रोगसँ रोगाएल तैपर उमेरक रोग सेहो छन्हिहेँ, मुदा काज केहेन करैक बाट धेने छथि। जितेन्द्रीक इन्द्री जहिना क्रियाशील होइत तहिना मुनेसरक सेहो रहनि। लगले बैग उठा शौचालय गेला। बैग रखि अपन क्रिया-कर्म करैत, कौनटरपर दू-टकही दैत प्लेटफार्मसँ निकलि होटल पहुँचला। अधपेटा खा दबाइ खेलनि। हिसाब दैत, टिकट कटा पुन: प्लेटफार्मपर पहुँच गेला। गाड़ी लगले रहै, जा कऽ बैसला। बसिते साँस छोड़लनि। ओना सकरीसँ दुनू सुविधा अछि। गामो लगे अछि। जे जरूरी बूझि पड़त से पकड़ि लेब। भने दिन-देखार अछिए। घरपर जा वस्तु स्थिति देखैत जेना-जे हएत से करब। गाड़ी खुजैसँ पहिने गामेक राधाचरण सेहो धड़फड़ाएल ओही डिब्बामे पहुँचल। जगहक सिकेस देखि मुनेसर राधाचरणकेँ कहलखिन- “राधाचरण ऐठाम आबह।” अपने मुनेसर कनी घुसुकि राधाचरणकेँ बैसबैत पुछलनि- “सुलोचना बहिनक की स्थिति छन्हि?” राधाचरण- “सात दिनपर दरभंगासँ जा रहल छी। नीक जकाँ नै बूझल अछि। उड़न्ती समाचार सुनलौं।” मुनेसर- “किए सात दिनपर जाइ छह?” राधाचरण- “छोटकी बहिनकेँ पेटक ऑपरेशन भेल हेन।” आगू बात नै बढ़ा मुनेसर बजला- “आॅपरेशन सफल भेल किने?” “हँ हँ, खर्चा तँ बहुत भेल। परसू टाँका कटत। किछु रूपैआ-पैसाक भाँजमे जाइ छी। फेर काल्हि घूमब।” राधाचरणक काजमे मुनेसर अपनो काज देखलनि। काज ई देखलनि जे जखनि बहिनक आॅपरेशन भेल तखनि माएओ आएले हेतनि। तैसंग एकटा-दूटा आरो समांग हेबे करतै। अपने ने अनाड़ी रहब मुदा जखनि राधाचरणो काल्हि घुमबे करत तखनि अपने हिसाबसँ समए (बहिनकेँ दरभंगा लऽ जाइक समए) बना लेब। कम-सँ-कम एते तँ हेबे करत जे समांगे जकाँ राधाचरण गामेपर सँ जा रहल अछि, जँ कहीं समैपर पाइक भाँज नै हेतै तँ कौल्हुका बदला परसूओ घूमि सकैए। किएक तँ काजपर काज ठाढ़ अछि। टाँका परसू कटतै। परसू तक पहुँचबाक समए तँ छइहे। मुदा अपना तँ से नै अछि भऽ सकैए जे आइओ घुमए पड़ए। मने-मन मुनेसर हिसाब बैसबए लगला। गुन-धुन करैत मनमे उपकलनि, आब कि कोनो ओ जमाना रहल जे मास-मास, दू-दू मासपर पोस्ट आॅफिससँ पाइ भेटै छै। आब तँ जेतए जाउ तेतए बक्सा-पेटी संगे रहत। तेहेन ने एटीएम भऽ गेल अछि जे जखने खगता तखने पूर्ति होइए। सामंजस्य करैत मुनेसर बजला- “राधाचरण, अखनि तँ तूँ सगरे अस्पताल घुमैत हेबह?” अपन प्रशंसा सुनि राधाचरणक मनमे खुशी उपकल। खुशी उपकिते बड़बड़ए लगल- “काका, साते दिनमे की सभ ने देखलौं। एकटा नवका दुनियाँ देखलौं।” नव दुनियाँ सुनि मुनेसर बजला- “की नव दुनियाँ देख्ालह? कोनो कि आइए अस्पताल बनल जे नव देखलह।” जहिना चुल्हिपर चढ़ल वर्तनमे निच्चाँसँ आँच लगला पछाति वर्तनक पानि उधिया लगैत तहिना राधाचरणक मन उधियाइत। मुदा पाइक चिन्ता मनकेँ दबैत। मुँहक सुर्खीसँ मुनेसर बूझि गेला जे पाइक मारि वेचाराक मनकेँ मारि रहल छै। गरजू अखनि जेहेन ई अछि तेहने तँ अपनो छी। तँ किए ने अन्हरा-नेंगराक दोस्ती जकाँ हाथ बढ़ाबी। बजला- “केते पाइक खगता छह राधाचरण?” ओना लोकक बीच एहेन धारणा बनि गेल अछि जे दुनियाँ-जहानक सभ बात बाजत मुदा लेन-देनक बात छिपा कऽ रखैए। मुदा खगता एहेन परिस्थिति पैदा करैए जे छिपारोकेँ देखार काइए दइ छै। राधाचरण बाजल- “काका, हम तँ संकोचे मुँह नै खोललौं। किएक तँ एक तँ अहाँ सेने ओहन सम्बन्ध नै अछि, दोसर अहूँ तँ विपतिएमे पड़ल छी।” राधाचरणक बात सुनि मुनेसर गुम भऽ गेला। हमरा परिस्थितिकेँ आँकि बाजि रहल अछि जे अहूँ विपतिएमे छी। बजला- “जखनि जिनगी अछि तखनि किछु-ने-किछु आपति-विपति एबे करत, तइले लोक घबड़ा जाएत तँ काज चलतै। जानियेँ कऽ तँ अन्हार घर साँपे-साँप अछिए। मुदा ओहीमे ने सपहरिया अपन शिकारो खेलाइए।” मुनेसरक बात सुनि राधाचरण थकथका गेल। बाजल- “काका, अखनि धरिक सभ काज सम्हारि नेने छी मौका-मुसीबत दुआरे माइयक हाथमे पान सौ दइयो कऽ आएल छिऐ। सभ किछु मिला डेढ़ हजारक खर्च आगू अछि।” डेरहे हजार सुनि मुनेसर हल्लुके बुझलनि। बजला- “अच्छा पाइक चिन्ता मनसँ हटा लैह।” पाइक चिन्ता हटिते जेना फलकैत फूलसँ भौंरा फुड़फुड़ा कऽ निकलि उड़ैए तहिना राधाचरण बाजल- “काका, कहए लगलौं जे नवका दुनियाँ देखलिऐ, से कहै छी। जहिना असमसान घाटक लीला अछि तहिना अस्पतालक लीला अछि। एक गोरेकेँ कनैत देखलिऐ पुछलिऐ तँ कहलक। खेत बेचि कऽ बेटाक इलाज करबए एलौं, डाक्टर ऐठाम पहुँचबो ने केलौं आकि तइ बिच्चेमे तीनटा बदमास आएल आ रूपैआ छीनि लेलक। मुँह तकैत रहि गेलौं। के हमर बात पतियाएत। लगमे थाना, जेरक-जेर लोक तैठाम एना भेल।” मुनेसरक मन सुलोचना बहिनपर टँगल तँए दोसर बात कानमे झड़ जकाँ बूझि पड़नि। बजला- “अनेरे किए बौआइ छह राधाचरण। ठन्का ठनकै छै तँ कियो अपना माथापर हाथ दइए। ई कहऽ जे टुटल हड्डीक इलाज कोन-कोन डाक्टर करै छथि?” मुनेसरक बात सुनि राधाचरण गुम भऽ मने-मन विचारए लगल। इलाज तँ अस्पतालोमे होइ छै आ प्राइवेटोमे होइ छै। मुदा जहिना अनेर गाएक धरम रखबार होइ छै तहिना अस्पतालोक गति अछि। कियो फीसक दुआरे काजमे बेइमानी करैए तँ कियो दबाइए बेचि लइए। कियो कमीशनक भाँजमे काज बिगाड़ैए तँ कियो खेनाइए बेचि लइए। तइसँ नीक सुविधा प्राइवेटमे छै। मुदा ओ तँ पाइबलाक छी एकक तीन लगै छै। बाजल- “काका, जेहेन पाइ तेहेन इलाज। की कहब।” राधाचरणक बात सुनि मुनेसर तारतम करए लगला जे की नीक। मुदा जहिना बिनु हवोक कोनो आम गाछसँ धब दऽ खसैए तहिना मनमे खसलनि। इलाजो तँ इलाज छी। ई तँ नै जे सए बर्खक बूढ़क पाछू घर-घराड़ी बेचि लगा देब। जँ से लगा देब तँ अगिला पीढ़ीमे जँ ओहने रोग लगि जाए तखनि की कएल जाएत। मुदा अछैते सम्पतिए इलाज नै होइ ईहो तँ नीक नहियेँ हएत। खैर जे होउ, जहाँ धरि संभव हएत तहाँ धरि मनसँ कसेर नै करब। बजला- “राधाचरण, जँ आइए पाइक जोगार भऽ जेतह तँ आइए घूमि जेबह?” उत्सुक होइत राधाचरण बाजल- “आइए किए कहै छी, अखने जँ भऽ जाए तँ अगिला टीशनमे उतरि दोसर गाड़ी पकड़ि लेब। कहुना भेल तँ बिमारीक अवस्था भेल किने। कखनि कि भऽ जेतइ तेकर कोनो ठेकान छै, से तँ रहनहि प्रतिकार हएत।” राधाचरणक विचार सुनि मुनेसरक मनमे उठल, पकड़ाएल संगी छूटि जाएत। से नै तँ गाम पहुँच कम-सँ-कम सुलोचना बहिनकेँ देखि लेब उचित हएत। बजला- “गाम गेलासँ परिवारोक हाल-चाल बूझि लेबह, नीक हेतह ने। कहै छह जे सात दिन गाम छोड़ना भऽ गेल।” राधाचरणक दहलाएल मन आरो दहलि गेल। बाजल- “हँ से नीक हएत। गामक आरो समाचार सभ बूझि लेब। एक लपकन खेतो-सभ देखि लेब।” अपन सुढ़ियाइत काज देखि मुनेसर बजला- “अच्छा, एकटा कहऽ जे गाममे गाड़ी-सवारी समैपर भेट जाएत किने?” “गाड़ी-सवारीक कोन कमी छै। तखनि तँ समए-कुसमए कनी दब कि उनार भाइए जाइ छै। जखनि खगता हएत तखनि गाड़ी भेटत। अहाँकेँ नै ने बूझल अछि, हमरा तँ सभ गाड़ीबला सभसँ िचन्हारए अछि। घरेपर बैसल-बैसल सभ काज भऽ जेतै।” स्टेशनसँ संगे दुनू गोटे गाम पहुँचला। गाम आबि राधाचरण अपना ऐठाम गेल आ मुनेसर अपना ऐठाम एला। आँगन पहुँचिते मुनेसर देखलनि जे ओसारक ओछाइनपर सुलोचना बहिन पड़ल कुहरि रहल छथि। सिरमा लग लोटामे पानि राखल अछि। सौंसे देह झाँपल, खाली मुँहटा उघार छन्हि। दोसराइत कियो ने। मनमे उठलनि जे सम्बन्धो तँ दू रंगक होइए। ओना सम्बन्धक अनेको डारि-पात छै मुदा मोटा-मोटी दू रंगक तँ अछिए। एक ओ भेल जे कुल-खनदान, दियाद-वादक होइए आ दोसर उपकारक होइए। अखुनका समैमे केकरा एते पलखति छै जे अपन काज छोड़ि दोसरकेँ देखत। सभ अपने पाछू बेहाल अछि। ने बाप-माएकेँ बेटा-पुतोहु देखैए आ ने बेटा-पुतोहुकेँ बाप-माए। ओना पढ़ै-लिखै-बिआह-दान धरि बाप-माए बेटाकेँ देखिते अछि भलहिं कमाइ-खटाइ बेरमे छुटि जाए मुदा से नै। जखने बेटा-बेटीक जनम होइए तखने सँ माए अपन सुन्नरता दुरि होइ दुआरे अपन दूध नै पीआ बजरूआ दूध पिअबऽ लगैए। तैसंग कनीए टेल्हुक भेला पछाति आवासीय विद्यालयमे नाओं लिखा भर्ती करा दइए। जइसँ मौके-कुमौके सोझहा-सोझही भेँट-घाँट होइए। जँ अहिना हएत तँ किए केकरो कोइ चिन्हत। मुदा उपकारक सम्बन्ध से नै होइ छै। एक तँ ओहुना लोकक आँखिमे पानि रहिते छै जे फल्लाँ बेरपर पाइसँ आकि समांगसँ ठाढ़ भेल रहए तँए अपन कर्ज चुकाएब उचित अछि। मुनेसरक मन दुनू दिससँ ओझरा गेलनि। गाममे नै रहने समाजक बीच किछु कएल नै अछि। दियादो-वाद तेहेन जे भोज तँ खाइओ लइए मुदा छुतका-केश कटबैमे नाकर-नुकर करिते अछि। सुलोचना बहिन लग मुनेसर बैसि बजला- “बहिन, बहिन, हम मुनेसर। एलौं।” मुनेसरक अवाज सुनि सुलोचना बहिन आँखि खोलि उठए लगली। पेटसँ ऊपरक अंग तँ डोललनि मुदा डाँड़क निच्चाँ सगबगेबो ने केलनि। तहूमे फुलि सेहो गेल रहनि। उठैक प्रक्रिया देखि मुनेसर बजला- “नै उठि हएत, सुतले रहू।” मनमे एलनि जे पहिने पितियौत समांग सभकेँ बजा पुछियनि आकि पहिने बहिनेक बात सुनी। बहिनक बात उचित बूझि बजला- “बहिन, की सभ भेबो कएल, आ होइतो अछि?” बाढ़िक लहरिमे जहिना कोनो चुट्टी वा आन जन्तु नान्हिओटा सहारा पाबि खुशीसँ खुशीया जाइत तहिना सुलोचना बहिन अंतिम सहारा पाबि खुशी भेली। खुशी एते भेली जे मने दहला गेलनि। बजली- “बच्चा मुनेसर, जे भेल से तँ भेबे कएल आ जे होइए से होइते अछि मुदा तँू गाड़ीक झमारल छह पहिने किछु खा लैह। चाहो बना कऽ दैतियऽ से तँ समांगे खसल अछि।” सिनेहासिक्त बहिनक बोल सुनि मुनेसर विस्मित भऽ गेला। मुदा अपनो आगू-पाछूक बाट बन्न देखि ठक-ठका गेला। ठकठकाइत मन हारैत जिनगी देखि, अंतिम साँस गनैत बजला- “बहिन, जेते दिन सोझहा-सोझहीक दर्शन अछि से तँ नीके कि अधले रहबे करत, मुदा अपनो हूबा करू आ जेते पार लगत से करबो करब।” दहलाइत मन सुलोचना बहिनक, मुनेसरक बात नीक जकाँ सुनबो ने केलनि। मुदा गपक विराम देखि बजली- “बच्चा, ने एको बेर दर-दियाद देखए अबैए आ ने एको परानी जुगेसर। बड़ आशा छल जे बेर-विपतिमे छोटकी बहिन-कविता ठाढ़ हएत। मुदा ऊहो एको बेर घूमि कऽ नै तकलक। तखनि तँ दुनियाँमे रहल के जेकर मुँह देखि जीबो करब, तइसँ नीक जे भगवान जगहे दथि।” सुलोचना बहिनक टुटैत दुनियाँक सम्बन्ध देखि मुनेसर बजला- “दुनियाँमे अहिना सभ दिनसँ होइत एलैए, होइत रहतै। तहीले ने लोक नीक कि अधला कऽ लइए। अच्छा पितियौतो सभसँ कनी गप कऽ लइ छी आ अखने डाक्टर ऐठाम लऽ जाएब।” कहि मुनेसर पितियौतक दरबज्जा दिस बढ़ला तँ मरदा-मरदी कियो भेँट नै भेलनि। तही बीच राधाचरण पहुँचल। राधाचरणकेँ देखिते मुनेसर कहलखिन- “राधाचरण, कनी झंझारपुर चलू। अहूँक काज रस्तेमे कऽ देब। झंझारपुरमे बहिनकेँ देखा, जेना जे नीक बूझि पड़त तेना से करब।” मुनेसरक बात सुनि राधाचरण बाजल- “काका, गाड़ीओ बलाकेँ कहि दइ छिऐ जाबे ओ औत ताबे गामपर सँ तैयारो भेल अबै छी।” गाड़ी अबिते राधाचरण जनिजाति सभकेँ चरियबैत कहलकनि- “चारि-पाँच गोरे उठा कऽ चढ़ा दियनु।” मुदा बगलमे ठाढ़ मुनेसरक मनमे रंग-बिरंगक प्रश्न उठि गेलनि। जँ मुँह खोलि किनको संग चलैले कहबनि तँ पुरुखक नाओं लगा बहाना करबे करती। तखनि? बजला- “राधाचरण, परिचरजा करैमे जनिजातिक जरूरति हएत, से...?” मुनेसरक बात सुनिते राधाचरण बाजल- “काका, चिन्ता किए करै छी। अस्पतालमे नर्स सभ रहिते अछि। तइले काज रोकब नीक नै।” जहिना मुनेसर राँचीसँ आएल रहथि तहिना बैग समटले रहनि। तैयार होइक प्रश्ने नै, तैयारे रहथि। हाथे-पाथे तीन-चारि गोटे पकड़ि सुलोचना बहिनकेँ गाड़ीमे चढ़ौलनि। ओना झंझारपुरमे सरकारीओ अस्पताल अछि आ प्राइवेटो इलाज चलिते अछि। सरकारी अस्पतालक कियो माए-बाप अछिए नै। भगवाने भरोसे चलैए। बाटमे मुनेसर राधाचरणकेँ पुछलखिन- “सभसँ नीक डाक्टर के छथि?” नीक डाक्टर सुनि राधाचरण अकबका गेल। नीक-अधलाक विचार तँ ओइठाम होइए जैठाम एके-विभागक अनेको डाक्टर रहैए मुदा जैठाम सभ बिमारीक डाक्टरो फुटा-फुटा नै अछि तैठाम केना नीक-अधला बूझब। तहूमे हड्डी रोगक तँ लऽ दऽ कऽ एके गोटे छथि तैठाम केना नीक-अधला बूझब। तखनि तँ जएह छथि सएह नीक। नै मामासँ कनहे मामा नीक किने। बाजल- “काका, ऐठाम जे राँची जकाँ आकि दरभंगा-पटना जकाँ तकबै तइ तकने काज चलत। ऐठाम तँ टूट-फाटक एके गोटे इलाज करै छथि, दोसर ठाम जइए कऽ की हएत?” राधाचरणक बात सुनि मुनेसर मने-मन विचारलनि तँ दमगर बूझि पड़लनि। दोसर उपाए की अछि। तहूमे कोनो जरूरी अछि जे जँ एको गोटे छथि तँ अधले छथि। नीको भऽ सकै छथि। तखनि तँ एकटा कमी डाक्टरोमे छन्हिहेँ, जे जेहो रोग परेखिमे नै आएल ओहू रोगीकेँ पकड़ि घिसिएबे करै छथि। खैर जे होउ, अपनो तँ सोलहन्नी चौपट्टे नै छी, नीक कि अधला देखबे करब। डाक्टर ऐठाम पहुँचैत-पहुँचैत गोसाँइ डूमि गेल। टहलैले डाक्टर रमेशो चलि गेल छला। मुदा गाड़ी पहुँचिते पत्नी जानकारी देलखिन। डाक्टर रमेश लगले पहुँचला। पहुँचिते सुलोचना बहिनकेँ देखलखिन। देखिते बजला- “मास्सैब, जेते ओजारक जरूरति पड़त तेते नै अछि। नीक हएत जे दरभंगा लऽ जैयनि।” दरभंगा सुनि मुनेसर मने-मन तारतम करए लगला जे एक संग केतेको समस्या अछि। सोझहे होलो-लोलो करैत चलि जाएब आ ओइठाम सम्हारल नै हुअए तखनि की करब। दरभंगा गाम थोड़े छी जे लाजो-पछे लोक मदति करत। अपने असगर छी, तहूमे नीक जकाँ बूझल गमल नै अछि। ई तँ धैनवाद राधाचरणेकेँ दी जे एतबो मदति केलक। मुदा रोगीक जे दशा अछि ऊहो राँची-पटना लऽ जाइबला नै अछि। गाड़ीओ-सवारीक असुविधा अछि। एन-एच बनने पटनाक तँ भाइओ गेल मुदा राँचीक तँ नहियेँ भेल अछि। छोटकी गाड़ीबला एते दूर जाइओसँ हिचकिचेबे करत। जँ पटना जाइले तैयारो हएत तँ जे समस्या (समांगक) दरभंगामे अछि से तँ पटनोमे हेबे करत। काज भरियाइत देखि मुनेसर राधाचरणकेँ पुछलाखिन- “राधाचरण, हमरा की असान हएत?” मुनेसरक प्रश्न सुनि राधाचरण पेसो-पेसमे पड़ि गेल। जहाँ धरि बनि पड़ल, संग देलियनि। अपनो बहिनक आॅपरेशन भेल अछि, तेकरो छोड़ब उचित नै। बिमारी बिमारी छी, कखनि की भऽ जाएत तेकर कोन ठेकान। जँ हम भार लेबनि, तँ पार लगाएब कठिन भऽ जाएत। एक संग केरा-दहीक भार कियो थोड़े उठा सकैए। जखनि उठबे ने करत तखनि चलत केना। एकटा भेल कसताराक दही दोसर भेल बागनरक घौर। ठढ़कानर जकाँ छीपक मुँह केतौ करीनक मुँह केतौ रहत। मुदा तइसँ की! मनुख तँ मनुख छी, नीक बात सभकेँ प्रिय लगै छै। ओना नीकोक अनेक रूप छै, मुदा से नै, काजक नीक नीक भेल। काजकेँ ठेकनबैत राधाचरण बाजल- “काका, ऐ देहक काजे की छै, जगरनाथ, केदारनाथ नीक रहितो दुनू दू दिस अछि। एकटा पूब अछि आ दोसर पछिम। किम्हरो तँ एके दिस जेबै। एकर माने ई नै ने भेल जे दोसर अधला भेल। हमरो तँ अहाँ देखिते छी।” राधाचरणक बात सुनि मुनेसर मने-मन विचारए लगला जे जहिना बहिन हमर तहिना तँ अपनो भेल। तहूँमे दुनियाँक बोनमे अपन सम्बन्ध आ भूमि सेहो अछिए। तखनि जहिना सुलोचना बहिनक भार हमरा ऊपर अछि तहिना तँ राधाचरणोकेँ छै। तहूमे सुलोचना बहिन अस्सी बर्ख पार कऽ गेल छथि जखनि कि राधाचरणक बहिन कुमारिए अछि। जे दुनियाँकेँ किछु ने अखनि धरि देखलक हेन। उचित हएत जे राधाचरणकेँ अपन काज करैले छोड़ि दिऐ। अखनि धरि वेचाराक जान भरियाएले छै तँए भऽ सकैए जे बेबस (दोसराक भाँज) हुअए। से नै तँ पहिने राधाचरणकेँ रूपैआ दऽ देब उचित हएत। जखनि ओकरो काज सुढ़िया जेतै तखनि देखैओक अवसरि भेटत जे आब ओ कि करैए। काज छोड़ि चलि जाइए आकि काज सुढ़िया कऽ जाइए। कहलो गेल छै दुखमे सुमिरन सभ करे। पछिला जेबीसँ पर्श निकालि मुनेसर डेढ़ि हजार रूपैआ दैत राधाचरणकेँ पुछलखिन- “काज सम्हरि जेतह आकि आरो खगता छह?” ओना अखनि धरिक हिसाब राधाचरणक डेरहे हजारक छल मुदा कोट-कचहरी आ अस्पतालक हिसाब अनठिया लेल कनी उकड़ू छेबे करै। आएल लक्ष्मीकेँ हाथसँ छोड़ब नीक नै बूझि राधाचरण बाजल- “काका पान सौ जँ आगरे कऽ दऽ देब सेहो नीके हएत?” राधाचरणक बात सुनि मुनेसरक मनमे उठलनि, खगल लोककेँ अहिना होइ छै। मुदा जखनि पूछि देलिऐ तखनि नहियोँ देब नीक नहियेँ हएत। दू हजार रूपैआ पूरा कऽ दैत मुनेसर बजला- “आब तँ कोनो उलझन नै ने रहतह?” कलियाएल फूल जकाँ मुस्की दैत राधाचरण बाजल- “काका, आब तँ परसू अपन रोगीकेँ घर पहुँचा अहूँ जेतए रहब (राँची आकि पटना) तेतए पहुँच जाएब। रस्तोक भाड़ा भाइए गेल।” राधाचरणक बात सुनि मुनेसरकेँ ग्लानि भेलनि। ग्लानि ई भेलनि जे एकसँ अधिक वस्तु मिलौला पछाति जहिना खिचड़ीओ आ खीरो बनैए मुदा दुनू एक तँ नै भेल। एकमे जहिना नोन-मीठनोन तँ भाइए जाइए। ५ डाक्टर रमेशक बात सुनि मुनेसर मने-मन गर अँटबए लगला जे कोनो धरानी सुलोचना बहिन जे राँची पहुँच जाइ छथि तँ सभसँ नीक हएत। राँचीक गाड़ी काल्हि आठ बजे रातिमे दरभंगासँ अछि। तैबीच भरि दिनक बात रहल। गाड़ीमे बूझल जेतै। बजला- “डाक्टर साहैब, राँची पहुँचै तकक ओरियान अहाँ कऽ दिअ।” मुनसेरक बात सुनि डाक्टर अपन भार कम होइत देखि बजला- “इन्जेक्शन, दबाइ दऽ दइ छियनि काल्हि चारि बजे तक एतै अँटकि जाउ। सभ बेवस्था अछिए। भरि दिनक घर भाड़ा आ दबाइक खर्च लागत। तीन दिन तक एक्के उपे रहती, कोनो बेसी तरद्दुतक जरूरति नै पड़त।” मुनेसर- “बड़बढ़ियाँ। राधाचरण कौल्हुको गाड़ी पकड़ि चलि जाएब।” मुनेसरक बात सुनि राधाचरण बाजल- “हमरा की कहै छी? हम की कहब।” मुनेसर- “डाक्टरो साहैबक विचार सुनियेँ लेलियनि। तखनि तँ कौल्हुका गाड़ी पकड़ै धरि तँू संग दैह।” राधाचरण- “अोहुना काल्हि दरभंगा जाइए कऽ अछि, तैबीच जँ दोसरो काज भऽ जाइए तँ हरजे की। मुदा भरि दिन जे झंझारपुरमे बैसल रहब तइसँ नीक दरभंगे जाएब हएत। किएक तँ अपनो रोगीकेँ देखि लेब आ ईहो काज सम्हारि लेब।” झंझारपुरमे सभ सुविधा देखि मुनेसर बजला- “ओना तोरो विचार कटैबला नहियेँ अछि। मुदा जखनि भरि दिनक घरक भाड़ा ऐठाम लागिए जाएत आ सभ सुविधो अछिए तखनि एना कऽ जेबाक प्रोग्राम बनाबह जे दरभंगामे रहैक जोगार नै करए पड़ए।” दुनू काजकेँ अँटावेश करैत राधाचरण बाजल- “काल्हि बारह बजे तक ऐठाम रहू तेकर पछाति एतएसँ चलि जाएब। हमहूँ अपन रोगी देखि डाक्टर साहैबसँ राय-विचार कऽ लेब आ अहूँकेँ गाड़ीमे बैसा देब।” राधाचरणक बात मुनेसरकेँ जँचलनि। मुड़ी डोलबैत स्वीकार करिते रहथि आकि धक दऽ बेटा-रघुनाथ मन पड़लनि। मन पड़िते मोबाइलसँ रघुनाथकेँ कहलखिन- “रघुनाथ, झंझारपुरमे छी। ऐठाम दरभंगा-पटना आकि राँची जकाँ तँ सुविधा नहियेँ अछि, डाक्टरो साहैब कहलनि जे नीक हएत राँचीए लऽ जैयनु।” मुनेसरक बात सुनि रघुनाथ बाजल- “राँची बीचक भार जँ ओ लऽ लइ छथि तँ नीक हएत जे राँचीए चलि आबी।” मुनेसर- “हँ, से डाक्टरो साहैब कहै छथि जे तीन दिनक बेवस्था कऽ दइ छी। जँ दरभंगा आकि पटना जेबो करब तँ असगरे फ्रीसान भऽ जाएब, तइसँ नीक राँचीए हएत।” रघुनाथ- “जे बेसी नीक हुअए से करू।” प्रात भने दोसर चरिपहिया गाड़ी भाड़ा कऽ बारह बजे तीनू गोटे दरभंगा विदा भेला। दरभंगा पहुँच मुनसेर स्टेशनमे पता लगौलनि जे कोन प्लेटफार्मपर गाड़ी अबै छै। भाँज लगा दूटा कुली पकड़ि प्लेटफार्मपर सुलोचना बहिनकेँ लऽ जा सुता देलनि। राधाचरण बाजल- “काका, चारि-पाँच घंटा अहाँ ओगरि कऽ रहू, तैबीच हम अपनो समांग सभसँ भेँट केने अबै छी।” “बड़बढ़ियाँ।” स्टेशनसँ विदा होइत राधाचरण मने-मन हिसाब बैसबए लगल जे साढ़े-सात बजे जयनगरसँ गाड़ी पहुँचैए। तैबीच एनौं कोनो काज नहियेँ हएत। मुदा अपन जे काज अछि, तहूमे काल्हि टाँका कटिते डेरो तोड़ब। तैबीच जेकर जे हिसाब-बाड़ी छै सेहो सभ फरिया लेब। साढ़े-सात बजे गाड़ी छै साते बजे पहुँच जाएब। सएह केलक। राँचीक गाड़ीमे दुनू भाए-बहिनकेँ बैसा राधाचरण बाजल- “काका, ओना राँचीमे अपन घरे अछि, जानो-पहिचानोक लोक सभ छेबे करथि, असुविधा नहियोँ हएत, मुदा तैयो कहि दइ छी जे जँ जरूरति हुअए तँ कहब।” राधाचरणक बात सुनि मुनेसर विस्मित भऽ गेला। मनमे उठलनि कोन जन्मक उपकार कएल छल जे राधाचरण एते केलक। जे पाइ देलिऐ से नै लेब। अहू वेचाराकेँ पैंच-पालट नै हेतइ आ अपनो मन कहत जे बिमारीमे मदति केलऐ। जिनगी भरि तँ कमेबे केलौं, मुदा एहेन उपकारो तँ नहियेँ केने छेलौं। ओना अखनो समाजमे एहेन फुसि-फटक खर्च सभ अछि जे जँ ओकरा बँचा कऽ (रस्ता बदलि कऽ) खर्च कएल जाए तँ समाजक जे पढ़ैबला अछि आकि बर-बिमारी अछि ओ शत-प्रतिशत समाधान भलहिंं नै होउ, मुदा बहुत हद तक तँ हेबे करत। तेतबे किए, समाजो जे दिशा-विहिन चलि रहल अछि ऊहो सुढ़िया कऽ रस्तापर चलि औत। जाबे समाज आकि बेकती अधला रस्ता छोड़ि नीक रस्ता पकड़ि नै चलत, ताबे कल्याण केना हएत। कल्याणक ढोल केतबो किए ने बजौल जाए मुदा ढोलेसँ काज थोड़े चलत। लगले मन घूमलिन। कोनो जरूरी अछि जे राधाचरणकेँ कोनो उपकार हमरासँ भेले हेतै। एहनो तँ भऽ सकैए जे ओकर अगुरबारे होइ। होइ किए भेबे कएल ने। जँ किछु उपकार कएल रहैत तँ मन नै रहितए? जिनगीमे सभ काज सभकेँ मन रहौ आकि नै रहौ, मुदा उचित-उपकार तँ रहिते छै। बजला- “राधाचरण, तँू भगवान बनि आगूमे ठाढ़ भेलह। जीवनमे कहियो नै बिसरबह। तोहूँ मनमे रखि लैह जे जँ कहियो जरूरति हुअ तँ कहिहऽ। शरीर तँ देखिते छह जे अपनो दबाइएपर चलै छी, एकर माने ई नै ने जे अकाजक भऽ गेल छी।” मुनेसरक बात सुनि राधाचरण बिसरि गेल जे तीन किलो मीटर असगरे जाइओक अछि। बाजल किछु ने। मुनेसरक आँखि-पर-आँखि गाड़ि सोझहे देखैत रहल। गाड़ीक समए होइते सीटी देलकै। सीटी सुनि राधाचरणक भक्क खुजल। गाड़ी ससरलै। राधाचरण प्लेटफार्मपर ठाढ़, मुनेसर राँचीक बाट पकड़लनि। पाछू उनटि मुनेसर आ आगू देखैत राधाचरण, धीरे-धीरे ओझल होइत गेल। राँची पहुँच मुनेसर अपना डेरापर पहुँचला। एक्के दुइए भाड़ादार सभ आबि-आबि सुलोचना बहिनकेँ देखए लगलनि। जेते मुँह तेते जुति-भाँति। ओसारपर सुलोचना बहिनकेँ सुता अपने मुनेसर आगूले सोचए लगला। स्त्रीगण छी तँए स्त्रीगणक जरूरति अछिए। ओना भाड़ादार सभ अछिओ मुदा अपनो तँ परिवार अछिए। हुनका (पत्नीक) मनमे अनोन-बिसनोन रहिते छन्हि मुदा की? परिवारो आ समाजेमे तँ ई गुण अछिए जे समैपर चुनो-तमाकुल लेल झगड़ा होइ छै आ बेर-बेगरतामे सम्हारो होइ छै। दिनक दोख कहि लोक टारि दइ छै। नीक हएत जे इलाजमे जाइसँ पहिने परिवार जनसँ राय-विचार कऽ ली। ओना परिवारमे तीन बापूत आ तीन सासु-पुतोहु अछि, मुदा ऐठाम लगमे तँ पत्नीएटा छथि। सए किलो मीटर कोनो दूर भेल। तैसंग ईहो हएत जे जँ पुतोहुकेँ कहबनि तँ बेटो बरदाएत। तइसँ नीक पत्नीए भेली। मन तँ मानि गेलनि मुदा लगले प्रश्न अँकुर गेलनि जे जँ कहीं पत्नी सहयोग नै करथि, तखनि? मुड़छैत मन तुड़ुछि गेलनि। एक गड़ूकेँ बहत्तरि आशा। पत्नी-साधनाकेँ मोबाइल लगा मुनेसर बजला- “सुलोचना बहिनकेँ एतै लऽ अनलियनि। आनठामक (दरभंगा-पटनाक) असुविधा देखि यएह नीक बूझि पड़ल, तँए अहाँ छुट्टी लऽ कऽ चलि आउ?” मुनेसरक बात सुनिते जेना जीएपर साधनाकेँ रहनि तहिना बजली- “अनलियनि तँ नीक केलौं। अस्पतालमे भर्ती करा दियनु। ओइठाम सभ बेवस्था छइहे, हमर कोन काज अछि। अपने डेरामे रहब, एक बेर-दू बेर देखि-सुनि एबनि।” पत्नीक विचार सुनि मुनेसर सकदम भऽ गेला। आगू बजैक साहस नै भेलनि। मोबाइल रखि विचारए लगला जे की कएल जाए? अस्पतालक जेहेन बेबस्था अछि से केकरा ने बूझल छै। कनी-नीक आकि कनी अधला, सबहक एके गति अछि। तखनि तँ दरभंगामे बेसी रद्दी अछि राँची-पटनामे कनी तहदर अछि। तँए नीक कहबै सेहो नहियेँ। वएह डाक्टरो आकि नर्सो ने अदलि-बदलि ऐठाम-ओठठाम करै छथि। दोष की कोनो जगहक होइ छै, दोष होइ छै लोकक चालिक। जेहेन चालि-चलनिक लोक रहैए तेहने तेकर काजो होइ छै। मुदा सेहो की ओहिना होइ छै, होइ छै बेवस्थाक अनुरूप। बेकती-विशेषक दोख तँ लोक खिसिया कऽ लगा दइ छै, मुदा से थोड़े अछि। निच्चाँ-ऊपर एके-रंग अछि। कनी कम आकि कनी बेसी, मुदा अछि सबतरि। दृढ़ होइत, नै हम सुलोचना बहिनक नीक इलाज करेबनि। मरण-जीअन अपना हाथमे नै अछि, मुदा नीक-अधलाक जोगार तँ अपना हाथमे अछिए। हम जे करब से की सुलोचना बहिन नै देखती, देखबे करती। कखनो-पानि पीबैक मन हेतनि आ कियो दइबला नै रहतनि, तखनि ओ की बुझती जे नीक सेवा होइए। पत्नीक विचार सुनिए लेलौं, बेटोसँ पुछिए लिऐ। मुदा पुतोहुकेँ अबैले नै कहबनि। पत्नी जँ रहितथि तँ उमेरदारो भेली आ ऐठामक सभ किछु बुझलो-सुझल छन्हि। से तँ पुतोहुकेँ नै छन्हि। रघुनाथकेँ मोबाइल लगा कहलखिन- “बौआ, बहिनकेँ राँचीए आनि लेलियनि। ऐठाम सुविधो हएत।” मुनेसरक बात सुनिते रघुनाथ बाजल- “नीक केलौं। पहिने ई भाँज लगा लिअ जे सभसँ नीक बेवस्था कोन ठाम अछि। पाइ भलहिं किछु बेसीओ खर्च हुअए मुदा इलाजमे कमी नै होन्हि।” रघुनाथक बात सुनि मुनेसरक मन भरि गेलनि। बजला- “बौआ, परिवारमे अहिना सभ एक-दोसरपर आश्रित रहैए, जँ से नै रहत तँ कुत्ता-बिलाइ आ मनुखमे अन्तरे की भेल। एक तँ ओहुना बिनु विवेकेक सभ अछि सिबा मनुखक। दोसर मनुखेक योनि ने कर्म योनि छी, बाँकी तँ भोगे योनि छी किने। से जँ मनुखमे नै आएल तँ कर्म-योनि आ भोग-योनिमे दूरीए की रहल।” पिताक बात रघुनाथ कान ठाढ़ कऽ सुनैत रहल, सुनैत रहल। बाजल किछु ने। मुदा लगमे पत्नी-सुनीता जे बजलनि से मुनेसरो सुनला। बाजल छेली- “माए छथिन की नै से पूछि लिअनु?” रघुनाथ- “किए?” सुनीता- “लगमे रहने काज असान हेतनि। एहेन समैमे जनिजातिकेँ रहब जरूरी होइ छै। सेवा-टहलसँ लऽ कऽ पानिक ओरियान धरिक जरूरति तँ होइते छै किने? मरदकेँ तँ क्लिनिकसँ दबाइ दोकान आ दबाइ दोकानसँ डाक्टर लग करैत-करैत समए चलि जाइ छै।” बहाना बनबैत रघुनाथ पिताकेँ कहलखिन- “टाबर कटि रहल अछि। कनीकालमे फेर मोबाइल करै छी।” कहि पत्नी-सुनीताकेँ कहलखिन- “अहाँ जे बात कहै छी, से उचित हएत। केना पुछबनि जे माए छथि की नै।” जइ नजरिए रघुनाथक प्रश्न छल तइ नजरिए उत्तर नै दैत नजरि बदलि सुनीता बजली- “नारीक स्वभावक ठेकान नै अछि। नान्हिटा बात लऽ कऽ लोक मूसक दबाइ खा जिनगी मेटा लइए। जिनगी घिया-पुताक खेल नै ने छी जे हाथेसँ बहारि गरदा-माटिक घर-अँगना बना खेला लेब आ मन उचटत तँ हाँइ-हाँइ कऽ मेटा चलि देब।” रघुनाथ- “हँ से तँ नहियेँ छी, मुदा...।” सुनीता- “मुदा-तुदा किछु ने, मुँह खोलि कऽ बाजू। कहियनु जे एकटा महिलाक जरूरति अछिए, जँ माए नै अबै छथि तँ पुतोहु अबैले तैयार छथि। अहाँ बहिनकेँ इलाजमे लऽ चलियनु, गाड़ी पकड़ि आबि रहल छी। भरि दिन गाड़ीमे लगत, गाड़ी पकड़ि आबि रहल छी।” भरि दिन गाड़ीमे लागत, परसूका नाओं कहि दियनु जे पहुँचब। पत्नीक बात सुनि रघुनाथ थकथका गेल। मुदा धर्म संकट तँ अछिए। पत्नीओक विचार अकाट्य अछि मुदा माइक सम्बन्धमे पितासँ पुछलो नहियेँ हएत। तखनि? तखनि किए ने दुनूकेँ मुहाँ-मुहीं बात होन्हि। ने ससुर आन भेलखिन आ ने पुतोहु। पिते-पुत्रीक सम्बन्ध भेलनि, किए ने दुनूक बिच्चे विचार जानि विनिमय भऽ जाइन। मोबाइल उठा नम्बर मिला रघुनाथ सुनीताक हाथमे देलखिन। सुनीता- “बाबूजी, गोड़ लगै छियनि।” पुतोहुक बोल अकानि मुनेसर असीरवाद तँ दऽ देलखिन मुदा आगू किछु बजैसँ परहेज केलनि। परहेज ऐ दुआरे केलनि जे जे किछु कहैक हएत बेटाकेँ कहबै, हिनका किए कहबनि। ससुरक कोनो आगूक बात नै सुनि सुनीता बजली- “जहिना सुलोचना बहिन हिनकर जेठ बहिन छियनि जे माए दाखिल भेली, तहिना तँ हमरो जेठ दीदीए भेली? पिताक बहिन तुल्य।” मुनसेर- “भेली। जँ झगड़ा-दन भेने बेवहारिक पक्ष टुटिओ जाइ छै तैयो पुश्तैनी पक्ष तँ रहबे करै छै। एकरा हम केना नकारि देब।” सुनीता- “काल्हि गाड़ी पकड़ि आबि रहल छी।” गाड़ी पकड़ि आबि रहल छी, सुनीताक बात सुनि मुनेसर थकथका गेला। पुतोहु औती सासुक किरदानी देखती। हो-ने-हो जँ कहीं पूछि दथि जे माए किए ने छथि, तखनि की जबाव देबनि। मुदा काजक दौड़ तँ ओहन दौड़ होइए जे नीक-अधलाक भण्डाफाेर करिते अछि। मन गरमेलनि। गरमाइते मन बाजि उठलनि- ‘सत्यपर पर्दा देब पाप छी। मनुखक बीच देहा-देहीक सम्बन्ध होइ छै, सभकेँ अपना लेल करैक अधिकार छै। हुनको छन्हि, तँए रोकब नीक नै। ससुरक कोनो बात नै सुनि सुनीता बजली- “एक तँ हिनको बेसी उमेरा भऽ गेलनि तैपर केते रंगक रोगो छन्हिहेँ। एहनो तँ भऽ सकैए जे एके-बेर दुनू गोटेकेँ रोग जोर मारनि। तखनि के केकरा देखथिन?” निरुत्तर होइत मुनेसर उत्साहित भऽ बजला- “कनियाँ, केकरो अधिकारमे दखल देब उचित नै बूझि पड़ैए तँए हम किछु ने कहब, जे मन हुअए से करू। अहाँ स्वतंत्र छी।” कहि मोबाइल रखि देलखिन। मोबाइल रखिते सुनीता रघुनाथकेँ कहली- “काज-उदेममे कोनो काजकेँ झाँपि-तोपि नै राखी। ऐसँ काज बाधित होइ छै। जँ काजे बाधित भऽ जाएत तखनि काज हएत केना।” रघुनाथ- “हँ, से तँ नै हएत?” सह पबैत सुनीता बजली- “कौल्हुका गाड़ीसँ हमरा राँची पहुँचा अहाँ घूमि जाएब। अहाँ नोकरी करै छी तँ छुट्टी कटत, दरमाहा कटत। मुदा ओइठाम पहुँचला पछाति तँ अपन चसमसँ सभ किछु देखबै। नै जरूरति पड़तनि जिगेसा भेल, जरूरति पड़तनि रहि कऽ सेवा करबनि।” पुतोहुक बात मुनेसरक मनकेँ खोड़ि देलकनि। विचारए लगला जे केना कएल जाए। ओना अपन अंगीते (पिसियौत जमाए) डाक्टर छथि। ऊहो जनै छथि मुदा सोझहा-सोझही गप-सप्प नै भेने चेहरासँ ने ओ चिन्है छथि आ ने हम चिन्है छियनि। मुदा लगले मनमे द्वन्द्व ठाढ़ भऽ गेलनि। एक मन कहए लगलनि जे जखनि समांग डाक्टर छथि तखनि नीक काज किए ने हएत। दोसर कहनि जे जखनि पाइएक खेल-तमाशा अछि तखनि परिचए दऽ कऽ अपन प्रतिष्ठा किए गमाएब। प्रतिष्ठो तँ प्रतिष्ठा छी। सासु-ससुर जँ भीखो मांगि खेती आ जँ बेटी-जमाइक दरबज्जापर हाथीए रहतनि तँ केना हाथ पसारती। मुदा सम्पति सम्पति छी जे भोज्य पदार्थ छी मुदा प्रतिष्ठो सएह छी। खैर जे होउ, मुनेसर विचार केलनि जे एक शिक्षकक रूपमे अपन परिचए देबनि। गाम-घरक कोनो चर्च नै करब। मन ठमकलनि, उत्साह जगलनि, काल्हि निश्चित डाक्टर ऐठाम जेबे करब। मुदा जाइसँ पहिने नीक हएत जे अस्पतालोक बेवस्था देखि लिऐ आ प्राइवेटो सभकेँ देखि ली। आँखिक देखलकेँ मनो मानै छै। बिनु देखलमे एहनो भऽ सकैए जे औगताइमे अधले भऽ जाए। पछाति जँ बुझैओमे औत तँ काजे हूसि गेल रहत। दोसर दिन सबेरे आठ बजे मुनेसर टेम्पू पकड़ि अस्पताल पहुँचला। रोगी-वार्ड सभमे जा-जा देखलनि तँ मन मानि गेलनि जे प्राइवेटेमे इलाज कराएब नीक। ओना हड्डीओ रोगक केते डाक्टर छथि, मुदा तइमे नीक के छथि? भाँज लगबैत-लगबैत भाँज लगलनि जे डाक्टर शेखर नीक छथि। मुदा छिया तँ अंगीत। पाइबला सबहक स्वभावो बदलि जाइ छै। केतबो लगक किए ने हुअए, पाँच प्रतिशत छोड़ि कऽ, मने-मन बाजिए देता जे जेते-हराएल-भोथियाएल रहैए, धरमशाला बुझैए। तँए नीक जे जखनि चेहराक चिन्हारए नै अछि तखनि भषो तँ दूरी बनबिते छै। वार्ड सभ देखि-सुनि मुनेसर आॅफिसक आगू पहुँचबे केला आकि डाक्टर शेखर गाड़ीसँ उतरि आॅफिसमे प्रवेश केलनि। संयोग नीक बूझि मुनेसर कनीए अँटकि पाछूसँ अपनो आॅफिस पहुँचला। कुरसीपर बैसैत पुछलखिन- “डाॅक्टर साहब, अस्पताल अच्छा होगा कि प्राइवेट?” डाक्टर शेखर- “अच्छा दोनो है। हमहीं लोग ने दोनो जगह हैं। रही बात देख-रेख की, यहाँ हम स्टाफ को कह सकते हैं, दबाव नहीं दे सकते हैं। लेकिन प्राइवेट कि दूसरी बात है।” दुनू गोटेक बीच गप-सप्प शुरूहे भेल छेलनि आकि मुनेसरक पिसियौत भातीज माने डाक्टर शेखरक सार, आॅफिस पहुँचला। मुनेसरकेँ देखिते गोड़ लागि पुछलकनि- “काका, केम्हर-केम्हर आएल छी?” मुनेसर- “कलपर बहिन खसि पड़ली से डाँड़मे कज्जी भऽ गेल छन्हि सएह एलौं जे नीक अस्पताल हएत आकि प्राइवेट।” डाक्टर शेखरक सार-देवेन्द्रक संग मुनेसरक बीच सम्बन्धकेँ अँकैत डाक्टर शेखर मुँह खोललनि- “अपने पलामूमे कार्यरत छिऐ?” मुनेसर- “छेलिऐ। आब सेवा-निवृत भऽ गेलौं।” जहिना डाक्टर शेखर मुनेसरक सम्बन्धमे बहुत बात जनै छथि तहिना मुनेसर सेहो डाक्टर शेखरक सम्बन्धमे जनिते छथि। मुदा पनरह साल पहिने जे शेखरक बिआह भेलनि तइमे मुनेसरकेँ नै रहनौं चेहराक चिन्ह-पहचिन्ह नै भेल रहनि। जहिना कोनो पोथी पढ़ैक जिज्ञासुकेँ अनायास कोनो समांगक माध्यमसँ एने मनक पोटरी अपने खुजि जाइत तहिना डाक्टर शेखरोकेँ भेल छेलनि। होइक कारण भेलनि जे बिआहक पद्धति मन पड़ि गेलनि। मन पड़ि गेलनि पत्नी-पिताक मात्रिक। नीक कुल-मूल। अपनासँ दोसर भेल। ऐठाम भेल अर्थक कारण। उदार पिता बेटीक सुख-सुविधा (आर्थिक) देखि अपन विचार सुधार केने रहथि। मन पड़लनि सुलोचना दीदीक जिनगी। केना नैहर-सासुरमे ठोकरौल गेल छथि। एहेन जगहपर जँ मानवीय विचार प्रतिपादित नै करब तँ हमरा विचारक कोनो मोल नै। मनमे विचार फुटिते डाक्टर शेखर, देवेन्द्रकेँ कहलखिन- “चाचाजी एला अछि, आ अहाँ बैसल गप-सप्प करै छी।” डाक्टर शेखरक मनमे एलनि जे किए ने घरे सुमझा दियनि। नै तँ अनेरे फज्झतिमे पड़ब। जखने ओ (पत्नी) बुझती जे चाचाजी केँ चिन्हबो ने केलनि तखनि आन काल जे हुअए मुदा खाइक गड़गट भाइए जाएत। तइसँ नीक ने हएत जे अखनि सभ बुझै छथि जे नोकरीक ड्यूटीमे छी। यएह ने हएत जे अपन आॅफिसो सुमझा देबनि, खेता-पीता अराम करता। काज तँ काजक पछातिए हएत किने। तहूमे जाबे चाह-पान करता ताबे एकेटा काज अछि, ओकरा हमहूँ पूरा कऽ अगिला काजक योजना बना लेब। डाक्टर शेखरक इशारा देवेन्द्र बूझि गेल। बूझि गेल ई जे जँ जेठ रहितियनि (पत्नीक जेठ भाय) तखनि जँ कहितथि, तँ विचारो करितौं। मुदा से नै अछि। जे मन फुड़त से करब। खर्चा तँ दिअ पड़तनि। बाजल- “काकाजी, अहाँ ताबे अराम करू। घर नै ने छिऐ, सरकारी अस्पताल छिऐ किने, ऐठाम की खाएब की नै खाएब आ की पीअब से तँ विचारए पड़त किने।” भार उतरैत देखि डाक्टर शेखर बजला- “एकटा ऑपरेशन अछि, ताबे हमहूँ निचेन भऽ जाइ छी। तखनि अगिला काजमे भीड़ जाएब।” अस्पतालक आॅफिसकेँ घर जकाँ देखि मुनेसरक मनमे बिसवास जगलनि जे ठौर परहक काज भेल। जँ पत्नी-साधना लगमे नहियोँ रहती तैयो भतीजी (डाक्टर शेखरक पत्नी) तँ अछिए। बच्चेसँ देखल अछि जे केहेन बचिया अछि। टेबुलपर सँ उठैत शेखर देवेन्द्रकेँ कहलखिन- “डेरोपर चाची जीक जानकारी दऽ दियनु। कहि दियनु जे दू घंटा पछाति आबि रहल छी।” दू घंटा आगत-भागतक पछाति तीनू गोटेक डाक्टर शेखर, मुनेसर आ देवेन्द्रक बीच काजक गप-सप्प उठल। ने डाक्टर शेखर सोझ मुहेँ मुनेसरकेँ किछु कहथिन आ ने मुनेसर डाक्टर शेखरकेँ। दुनूक बीच देवेन्द्र, तँए दुनू गोटे देवेन्द्रेकेँ मानि बजथि। विचार करैत मुनेसर बजला- “जखनि डेरेक विचार भेल तखनि नीक हएत जे पहिने हुनका (बड़की बहिनकेँ) लऽ अबियनि।” डाक्टर शेखर चुप-चाप सुनैत रहथि, देवेन्द्र बाजल- “काकीक संग दीदीओकेँ डेरेपर पहिने पहुँचा लिअ। अखनिसँ डाक्टरो साहैब छुट्टीएमे रहता। अपन क्लिनिक छन्हि तँ बीच-बीचमे देखि औता।” देवेन्द्रक बात सुनि मुनेसर सकपका गेला। सकपका गेला ई जे काकीओ केँ संगे नेने एबनि। मुदा डुमैत मनुखक धैर्य थड़थड़ेबे करै छै, मुदा बिच्चेमे युक्ति फुड़लनि। बजला- “बौआ, एहनो बात लोक बजैए जे काकीओकेँ संगे नेने एबनि। अहिना कुल-खनदानकेँ बुझै छहक।” जमाइक सोझ अपनाकेँ छिपबैत मुनेसर बाजि तँ गेला मुदा मन धिक्कारए लगलनि। ग्लानि अपनापर भेलनि जे पढ़ल-लिखल (पति-पत्नी) परिवारमे जँ एना हुअए तँ आनक की गति हएत। मुदा, जहिना एक झूठ हजारो झूठकेँ हजम कऽ जाइए तहिना एक सतोक तँ गुण छइहे। जमाएकेँ परोछ होइते देवेन्द्रकेँ कहि देबै जे बौआ पत्नीक सहयोग नै अछि। टेम्पू अबिते मुनेसर देवेन्द्रकेँ कहलखिन- “बौआ, तोरासँ लाथ कोन। भानस अपने करै छी। जखनि काज नै रहैए तखनि तँ गैसक बेवस्था अछि, भीड़ नै बूझि पड़ैए मुदा, जेना आइए देखहक जे भानस करब आकि बहिनकेँ डाक्टर ऐठाम लऽ जाएब।” मुनेसरक बात सुनि देवेन्द्र बाजल- “ऊहो घर की आन भेल। कहि देने छिऐ, सभ ओतै भोजन करब।” टेम्पूसँ तीनू गोटे डाक्टर शेखरक डेरापर पहुँचला। डेरापर पहुँचिते यमुनाकेँ नैहर मन पड़ि गेलनि। मन पड़ि गेलनि जे जहिया सुलोचना बहिन अपना ओतए रहथि। केते सामोक गीत आ आनो-आन सिखा देने रहथि। यएह ने सुलोचना दीदी छथि। मुदा बजली किछु ने। डाक्टर शेखर सुलोचना बहिनकेँ डाक्टरी नजरिए देखि विचारलनि। विचारलनि ई जे देहक काज-खोंट छी, हो-ने-हो अपनत्वमे मन पघिल जाए। मुदा डाक्टर होइक नाते बाजिओ तँ नै सकै छी। बात बदलि यमुनाकेँ कहलखिन- “काज गड़ूगर तँ अछिए, मुदा असाध नै अछि। तैयो नीक हएत जे दोसरो सहयोगीकेँ बजा लियनि।” डाक्टर शेखरक भक्की यमुना नै बूझि सकली। मुदा नीक होन्हि से तँ मनमे रहबे करनि। बजली- “एकटा किए जेतेक जरूरति हुअए आकि राँचीक सबहक (हड्डी रोगक डाक्टर) जरूरति हुअए तँ सभकेँ बजा लिअ, मुदा दीदी ऐठामसँ अपना पएरे जाथि से तँ देखबए पड़त।” साढ़े छह बजे साँझमे तीनटा डाक्टर बीच सुलोचना बहिनक आॅपरेशन भेलनि। नीक ऑपरेशन। तेसरा दिन हहाएल-फुहाएल रघुनाथ पहुँचला। डेरा बन्न देखि मोबाइलसँ सम्पर्क केलक। मुदा चीज-बौस तँ रहबे करै। भाड़ादारक डेरामे सभ समान रखि दुनू परानी रघुनाथ शेखरक डेरापर विदा भेल। डाक्टर शेखरक डेराक बाहर ओसारपर राखल कुरसीपर बैसल मुनेसर विचार करैत रहथि जे एक दिस बेटा-पुतोहु, भतीजी-जमाइक बीच छी तँ दोसर दिस अर्द्धांगिनीसँ दूर। यएह छी जिनगी। सड़कपर बेटा-पुतोहुकेँ गाड़ीसँ उतरिते मुनेसर आगू बढ़ला। मुदा बिना गोड़ लगने रघुनाथ केना किछु पुछितनि आकि बिनु असीरवाद देने मुनेसरे किछु बजितथि। मुदा दुनू दिससँ दुनू आगू बढ़ैत गेला। लग अबिते रघुनाथसँ पहिने सुनीता गोड़ लगलकनि। गोड़ लगिते मुनेसर असीरवाद दैत बजला- “कनियाँ, अपने भतीजीक परिवार छी।” सड़कपर गाड़ीक अवाज सुनि यमुना सेहो बहरा गेल छेली। मुदा परिचित अनठिया देखि ठमकि गेली। लग अबिते मुनेसर बजला- “रघुनाथ दुनू बेकती छी। बौआ, यमुना बहिन छथुन।” सौझुका समए। रघुनाथ डाक्टर शेखरसँ पुछलकनि- “डाक्टर साहैब, ऐठाम थोड़े असुविधा अछि। असुविधा ई अछि जे मध्य प्रदेशक विलासपुरमे कार्यरत छी। एक तँ नोकरी तहूमे बैंकक, ऐठामसँ ओइठाम नै लऽ जा सकै छी।” डाक्टर शेखर- “सात दिन एतै रहए दियनु, तहीमे एते भऽ जेतनि जे दोसर डाक्टर ऐठाम नै लऽ जाए पड़त। दबाइ-दारू चलतनि।” सएह भेल। सात दिन पछाति सभ कियो- सुलोचना बहिन, मुनेसर दुनू बेकती रघुनाथ आ बच्चाक संग विलासपुर रबाना भेला। छह मास पछाति विलासपुर सँ सभ कियो गाम एला। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 22 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ‘विदेह'१३९ म अंक ०१ अक्टूबर २०१३ (वर्ष ६ मास ७० अंक १३९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA