ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह' १४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१) ऐ अंकमे अछि:- हमर टोल- राजदेव मंडल बाप भेल पित्ती आ अधिकार- बेचन ठाकुर भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली] विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाउ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 4.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 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(मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। हमर टोल राजदेव मंडल आमुख- कल्प, यर्थात, स्वप्नक तल माछक जालमे लोक फँसल माछ पुछैत अछि- की यौ भाय? लोक कहैत- किछु कहल ने जाए। हमरे हाथसँ जाल बनल हमरेपर अछि आब तनल। समस्त मिथिलांचल केँ समरपित... सुधी पाठक वृंद- सम्मुख ठाढ़ छी लऽ कऽ सुमन शत-शत नमन शत-शत नमन। १ (नाओं, स्थान, घटना आदि कल्पनापर आधारित अछि।) पूर्वरूप : (क) अहाँ ऐ वसुंधराक कोनो कोनपर छी। ई हमर आत्मविश्वास कहि रहल अछि। अहाँक नै देखितो हम देखि रहल छी। अहाँक उपस्थितिक ज्योत्सना हमरा चारूभर आभासीन भऽ रहल अछि। आर ओइ ज्योतिसँ हमर रोम-रोम पुलकित भऽ रहल अछि। हमहूँ तँ ओइ नृत्यलीलाक अंश छी। हम बुभुक्षित छी अहाँक सिनेह आ आशीरवादक लेल। हमरा क्षमा नै करब तँ दण्ड दिअ। किन्तु बिसरू नै। यएह कामना अछि। अहाँक स्मरण कऽ किछु रचबाक प्रयत्न कऽ रहल छी। (ख) विशाल सागरक पसरल जलपर धनुकटोली ठाढ़ अछि। की ओ हँसि रहल छै? आकि कानि रहल छै? लगैत अछि जेना रंग-बिरंगक जलमे ओ उगि आएल अछि। चारूभर उड़ैत सुगन्धित धुइयाँ। मुँह आ देहमे लटपटाइत बादल जकाँ कारी आ उज्जर धुइयाँ। आ लगैत छै जे ऊ आकृति रसे-रस बढ़ि रहल हो। गाम-नगर-महानगर सभटा आकृतिक भीतर ढुकल जा रहल हो। नजरिक जे एकटा बिस्तार होइ छै, सेहो जेना ओकरा सोझहामे छोट भेल जा रहल छै। ओकरा निसाँससँ निकलैत हवा, बुझाइ छै जेना बिहाड़ि बहैत हो। बहुत गोटे जेना एक्के बेर जय-जयकार केलक। मथापर जटा, अधपक्कू दाढ़ी-मोछ, लाल कुंडाबोर आँखि हाथमे बड़कीटा शंख नेने एकटा बाबाजी देखाए पड़ैत छै। ओकरा आँखिसँ लहू बहि रहल छै। हवाकेँ कंपित करैत गम्भीर वाणी निकलैत अछि- “दैविक दैहिक भौतिक ताप...।” आकास फाड़ैबला शंखनादसँ आगूक शब्द झपा गेल। संगे बाबा महतोकेँ जय-जयकार हुअ लगल। धनुकटोली शनै: शनै: जलमे समा रहल अछि। ओइ स्थानपर उगैत छै- एकटा छोटका टोल। जेना हमर टोल। छोट-पैघ, नीक-अधलाह घर-दुआरि। हँसैत-कानैत लोक-वेद, धिया-पुता, माल-जाल, चिरइ-चुनमुन्नी, सुखल आ हरियर- गाछ-बिरिछ, पोखरि, इनार गली, सड़क, चौबटिया। की ई सपना छी आकि सत्य...। आकि सत्यक सपना? २ गहवर घर हल्ला कऽ रहल अछि। सघन अन्हार कान ठाढ़ केने सुनि रहल अछि। गिरहतबाकेँ ईंटाबला घरपर बैसल इजोत हनहना कऽ हँसैत अछि। हँसी अन्हारमे छिड़िया जाइत अछि कन्तु अन्हारमे छिड़िआएलो इजोत भकजोगनी जकाँ भुकभुकाइत अछि। हड़हड़ाइत हवा आ ओकरा कान्हपर चढ़ल भगैतक स्वर दड़बड़ मारि रहल अछि- सौंसे टोल। “केतेक दूर रहलह हौ सेवक-राजा फुलबरिया हौ...। एके कोस रहलह हौ सेवक राजा फुलबरिया हौ...। लगि गेल चौदहम केवाड़ हौ...।” ताल काटैत मिरदंग आ झनकैत झाइल। भगैतया सभ गाबैसँ बेसी देह मचकाबैत अछि। जेना देह नाचैत अछि टाँग नै। साज-बाजक तालपर नाचैत देह आ मन। गहवरक पछुआरमे अन्हार खटखटा रहल अछि। ऊ अन्हार नै भूत प्रेतक छाँह छिऐ। नेंगरा बुढ़बा कहैत रहै छै। रौ गहवरक देवी-देवताक डरे सभटा साहन सभ पछुआरमे नाँगटे नाचैत रहैत छै। वएह सभ कखनो काल नढ़ियाकेँ कान पकड़ि केंकिया दैत अछि- भूउउऊ...। ओकरे सुरमे सुर मिला कऽ भूत प्रेत कानए लगैत अछि- कुउउऊ...। तखनि टोलक लोक भलहिं सुटैक जाइ किन्तु कुताकेँ देखि लियौ ताल। जना नाँगरिपर कियो मटिया तेल ढारि देने होइ। गहवरक आगू सौंसे अँगनीमे दीया जरि रहल अछि, गोल-गोल पाँतिमे। अन्हरियाकेँ गरदनियाँ दऽ भगा रहल अछि। तैयो उ थेथर जकाँ दोग-दागमे ठाढ़ रहैए चाहैत अछि। हे एकोटा दीपक टेमी निच्चाँ नै हो। हँ... हँ एहेन बखतमे भकइजोत बड्ड खराब। डाइन आ भूत केनौ सँ लपकि सकै छौ। अपन-अपन सतरकी। घटलासँ पहिने दीपमे तेल ढारैत रह। पता छह तेल केते डहतै। महगाइ तँ अासमानमे भूर कऽ देने छै। ओइ कारणे तँ सभकेँ भकभकाइते छै। यएह तेल जरे केकरो फटै छै एकरो...। झकाश इजोत देखैक छौ तँ देखही शहर जा कऽ। राइतोमे सड़कपर गिरल सुइया ताकि लेबही। भगतकेँ कोनो कम पामर होइ छै। चाहतै तँ ऐ गाछो सभमे इजोत जरए लगतै। अच्छा चुप। बड़का लाल बुझक्कर भऽ गेलेँ। हम नै अहाँ बड़का विदुआन। अहाँ चुप रहू। एम्हर देखू। खेलाबन भगत पूजा ढारि रहल अछि। खीर, लड्डू, पान, सुपारी, तुलसी, गंगाजल सभटा डाली सभमे सजाएल छै। मनक तरजूपर तौल कऽ अछत-फूल रखि रहल अछि। सभटा पूजाकेँ कुड़ि एके रंग एके आकार। भगत जखनि लिहुरि कऽ पूजाकेँ कुड़ि रखैत छै तखनि ओकर पेट बोमिया उठै छै। “गै माए, भगत पेटमे बाघ रखने छै। देखै छीही हुमड़ै छै।” “गै दाइ, देवताे-पितर नै बुझै छौ। तोहर बेटी तँ जुगमे भूर करतौ। अखनि तँ पा-भरिक छौ।” हे मुँह सम्हारि कऽ बाजू। अपन बेटी जेना बड्ड सतबरती। कोन-कोन रसखेल केलक के नै बुझलक। हे लबरी...। हे चुप...। झगड़ा-झाँटी बन्न। पहिले कहलौं औरतिया सभकेँ एक कात आ पुरूष सभकेँ एककात बैठाएल जाए। हँ-हँ सएह कएल जाए। आइ गहवर घरमे पहिलुक डाली जागेसरकेँ लागल अछि। ओकरा स्त्रीकेँ कोखिया गोहारि हेतैक। अोकरा देहपर कखनौ भूत सवार भऽ जाइत अछि आर उ खेलाए लगैत अछि। केना भूत सवार नै हेतै? धर्मडीहीवालीकेँ देहो तँ सवारीकेँ जोग अछि। भरल-पूरल जवानी, श्याम वर्ण, तेलसँ छट-छट करैत देह, खलिआएल आँखि, गोल बाहिंपर कसल अँगिया। कारी भौंरा केश। आँखिकेँ जेना स्वत: खैंच लैत अछि अोकर देह। एकर ठीक उनटा जगेसराक शरीर। जेना जुआनीमे घुन लगल हो। तहिना ओकरा देहकेँ बिमारी अधखिज्जु कऽ देने अछि। कमजोरीक कारणें तामस हरदम नाकेपर चढ़ल रहैत अछि। तैपर सँ बाल-बच्चा नै होइ छै। तामस आर दुगुना। ई सभटा तामस उतारत धर्मडीहीवालीपर। कखनो फनकए लगैत अछि- “सन्तानक मुँह केतए देखिते ई पपिआही। जीनगी भरि तँ कुकरम केने अछि।” धर्मडीहीवालीकेँ भरि देह ई बात छूबि लैत अछि। अपन असल नाओं निरमला जेकरा उ नैहरमे रखि कऽ अाएल अछि। अपना नैहराक बड़ाइ चिबा-चिबा करए लगैत अछि- “हमरा धर्मडीहीकेँ लोक असल धर्म-कर्म करैबला सभ अछि। पपिआहा सभ तँ अहीठाम भरल अछि।” दिन, दुपहर, राति कखनो दुनू बेकैतमे बकटेटी शुरू भऽ जाइत अछि। टोलक बूढ़-सुरकेँ अनसोहाँत लागब स्वभाविके। जगेसराकेँ किछो तँ कहऽ पड़तै- “हे रौ, नै होइ छौ तँ ओझहो-धामिकेँ देखाबहि। कोनो धरानी एकोटा बाल-बच्चा भऽ जेतौ तँ बुझही जे सभ दुख पार। ई भूत-देवी आ तामस-पित सभटा एकरा देहसँ भागि जेतौ।” “सन्तान लेल तँ कोखिया गोहारि करबै पड़तौ।” केतेक दिनसँ जागेसर गोचर विनतीमे लगल अछि। किन्तु भगत पिघलत तब ने। भगतकेँ छुट्टी कहाँ रहै छै। आइ ऐ गाम तँ काल्हि दोसर गाम। नाेते-नत। आखिर पक्का भगत छिऐ रामखेलाबन। दू पीढ़ीसँ ओझहा-धाइमक काज कऽ रहल छै। पहिने ओकरा गहवरमे गछौटी करियौ। साफ-साफ कहियो पूजामे केतेक खरच करबै। पाठीक बलि देबै। गछि लियौ। तब भगत तैयार हएत। केतेक खुशामदे आइ तैयार भेल अछि खेलाबन भगत। ३ गहवरक अँगनीमे जेना ललका इजोत उतरि गेल छै। अन्हारक कोरामे लहुआएल लाल चिल्हका खेला रहल हो, तहिना सन लगैत अछि। धधकैत आहुत, चौमुख जरैत दीप, अड़हुलक लाल फूल, लाल सिनूर, ललका डाली। सबहक मुँह जेना ओही लालीसँ ढौंरल हो। लाल टुह-टुह भेल भगतकेँ आँखि सपनामे डूबि-उगि रहल हो। पहिले कहि देल गेल छेलै। मरद सभ एककात आ औरतिया सभ एककात। बात के सुनतै? ढीठ सभ मरदक झोंझिमे ढुकि कऽ बैसल छै। दोसरो दिस तँ थेथरे सभ अछि। मौगियाह जकाँ दोगमे ढुकि कनफुसकी कऽ रहल छै। पता नै चलै छै औरत आ मरदक। एक तँ इजोत तेजगर नै छै। दोसर साड़ीसँ आधा मुँह झँपने छै। आँखिक भाग देखलासँ केना िचन्हत लोक। दसगरदा जगहपर सभ चलै छै। सभ की चलतै। उतरबरिया कातसँ औरतिया सभकेँ नै बैठबाक चाही। उत्तरसँ देवताक आवाहन होय छै। गियान तँ छौ नै। आबि गेलौ संुघहा धान। सुंधाय मड़रकेँ सभ सुंघहाधान कहै छै। सुंघहाधान छुबिते हाथमे गड़ि जाए छै। टोकैते देरी सुंघाय मड़रकेँ बकटेटी शुरू। फेर कियो सुंघहाघान बाजि नै सकैत अछि। देखि लियौ लाठीक हुड़ाठ। मुँह भाँगि देबै, कियो बजत तँ। मुँहकेँ चुप्प राख। तेरहे बरखक उचितवक्ता छै तइसँ की। ओकरासँ गपमे के जीतत। उचित बात फट्ट दऽ बजल- “गोहारि, गोसांय सभ बन्न। सुंघाय बाबा कहि देलक। कियो मुँहसँ बाजि नै सकैत छी। भगतो वाक केनाक देत। चलै चलू आब िकछु नैै हएत। के बतीसी लाठीसँ झड़ाएत।” भगतकेँ नवसिखुआ चेला फनका रपटैत बजल- “देहपर नै लत्ता-चौधरी बोलत्ता। ऐ गामक मालिक सुंघाय छियो की जे ओकर औडर चलतौ। अखने सुंघबाकेँ कंठ पकड़ि बाहर दिस ठोंठिया देबो। बुझि ले, तोरो कोनो बाप नै बचेतौ।” उचितवक्ताकेँ कपारपर तामस नाचि उठल। सुंघाय मड़र पाछूसँ डाँड़मे लाठी लगौने ठाढ़ छै। बूढ़ देहक भार लाठीपर देने आँखि मूनि देवता-पित्तरकेँ सुमरि रहल अछि। गहवरक सीमामे बकटेटी नै करबाक चाही। हम पपियाहा। हमरा छेमा कऽ दिअ। “एहेन गप कहत।” उचितवक्ता फोंफिया कऽ उठल आ सुंघाय मड़रकेँ पाछूसँ लाठी खैंच लेलक। लाठी चमकाबैत फनकापर हुड़कल। सुंघाय मड़र धाँय दऽ डाँड़ भरे खसल। कुहरैत बाजल- “हौ बाप, मारि देलक। ऐ लुकड़बाकेँ जन्मे भेल छै मरचायसँ। तब ने एकर बात आ बानि मरचाय जकाँ लगै छै। एकर बाप सभ साल लंगी मरचायकेँ खेती करै छेलै। ओहीसँ जोड़ा बरद कीनलकै। ओइसँ की। दारू पी कऽ सिरजल चीज केहेन हेतै।” उचितवक्ताकेँ हाथसँ लाठी छिना गेल छै। महुराइत बजल- “अपना बेटा दिस नै तकै छहक। टूटलो डाँड़पर अनकर आड़ि कोदारिसँ नै छाँटबहक तँ जलखै नै भेटतह। केहेन कुकरमी छहक, खेलि देबै सभटा बात।” “नै गौ बाबू, कल जोड़ै छियौ। हमरा उठा कऽ पहुँचा दे।” “अच्छा चुप रहू। शान्त भऽ जाऊ। देखियो ओने गोहारि शुरू भऽ रहल छै।” पहुलका डाली जागेसरक लगल छै। डाली दौड़ कऽ अपने आगू चलि गेलै। सभटा देवताक किरपा छै। देव किरपा बिनु डोले नै पात। आपसी फुसुर-फुसुर भऽ रहल छै। ओकर पति जागेसर गहवर घर दिस टकटकी लगौने। “एहेन जवानीसँ भरल देह आ तब बाल-बच्चा नै होइ छै।” “जागेसरक बाछी एहेने बनल छै। एेबेर गाभ टेकतै की नै?” “खेलावन भगत एे काजमे माहिर छै। आब देखियो तँ...।” स्त्रीगण दिससँ कनी मन्द स्वर निकलै छै। “भैयाखौकीकेँ लाज-धाक होइ छै की नै। अपने दहकेँ अपने जे करै छै। छिनरिया...।” “अइठाम अबिते सभ देवी-देवा चढ़ि जाइ छै। आ नैहरा जाइते सभटा छूटि जाइ छै।” “सुनै छिऐ जे नैहरासँ एकटा छौड़ा आठे दिनपर भेँट करए अबै छै। पछोड़ धेने रहै छै।” “ई सभ तँ होइते रहै छै। तोरो मन होइ छौ की।” एक दोसरकेँ मुक्का मारैत औरतिया सभ एकसंग हँसैत अछि। “चुप। सभ मुँह बन्न कऽ ले। भगतकेँ भाव आबि गेलै।” “कारणीकेँ एमहर लाबह।” भगतियाक भगैत जोर-शोरसँ शुरू भऽ गेल छै। “जय हौ देव। कनी नीकसँ देखियो। माथ आ पेट दुनूमे दरद छै।” खेलावन भगत देह-हाथकेँ ऐंचैत धर्मडीहीवालीक आगूमे बैसैत अछि। मंतर पढ़ि माथ हाथ दऽ रहल छै। माथपर सँ हाथ ओकरा छातीपर गिरबैत अछि। फेर पेटकेँ हँसोति दइ छै। पेटपर सँ हाथ ससरि पुन: माथपर। धर्मडीहीवाली चौंक उठै छै। ओकर देह सिहरि उठै छै। भगत फेर माथपर हाथ रखैत काजकेँ दोहरौलक। “चटाक।” धर्मडीहीवालीक चमेटा भगतकेँ मुँहपर लगल। संगहि कंठ पकड़ि धकेलि देलक। आशा नै छेलै से भेल। भगत ओंधरा गेल। तामसे थर-थर काँपैत। लोकमे हड़कम्प भऽ गेल। किछु ठाढ़ आ किछु बैसल अछि। स्त्रीगणक आँखि आश्चर्यमे डुमल। “गे माइ गे माइ। आब की हेतै।” “आगि बरिस जेतै। ठनका गिरतै।” उचितवक्ताकेँ नै रहल गेल तँ बजल- “भगतकेँ असल भूतसँ पाला पड़ि गेल छै। सभ गुण-मंतर अखनि भीतर भऽ गेल छै। टाँग केना असमान दिस ठाढ़ केने छै। लगै छै जेना टिटही होइ।” फड़फड़ा कऽ उठैत अछि- भगत। बेंत लऽ कऽ धर्मडीीवालीकेँ पीठपर तड़-तड़ा दैत अछि। “आइ हमसभ भूतकेँ भगा देबै।” धर्मडीहीवाली भागैत अछि। “रे खुनियाँ सभ। रे कोढ़ी फूटतौ रे बेईमनमा। गे माइ गेऽऽऽ।” जगेसरा आगूसँ घेर लैत अछि। एक्के धक्कामे जगेसराकेँ गिरबैत धर्मडीहीवाली पड़ाइत अछि। भगत देहसँ गरदा झाड़ि रहल अछि। जगेसरा हाथ जोड़ि थर-थर काँपि रहल छै। “आब की हेतै यौ भगतजी। कोनो उपए लगाऊ। जे कही अहाँ।” “हेतैक सभ उपए लगतैक। भगतसँ भूत नै जीत सकै छै। कोखिया गोहारि हेतै। तूँ परसू आबि कऽ भेँट कर। हमरे नाओं छिऐ रामखेलावन भगत। पछुआरक अन्हारमे किछु करूण क्रदन सन भेल। भगत छड़पि कऽ गहवरमे ढुकि गेल। हवाक झोंक अाएल। किछु दीप मुझा गेल। लोक सभ पीठपर डरकेँ लादने एका-एकी ससरि रहल अछि। ४ ढेरूबा नै नाचै छै असलमे जागेसरक मन नाचै छै। सुतरी कटा रहल छै- केतौ मोट केतौ पातर। मन थिर रहै तब ने। मनकेँ थिर रखब बड्ड कठिन। ई तँ कियो साधक कऽ सकैत छै। सभ जँ साधक भऽ जेतै तँ देश दुनियाँकेँ कोन गति हेतइ। तँए पहिने मन उड़ै छै तब तन। जागेसरक मन धारक थौकड़ा जकाँ उपला रहल अछि। आइ तँ भुटाइओ वैध जवाब दऽ देलकै- “धर्मडीहीवालीकेँ सन्तान नै हेतौ। विधाता कलम मारि देने छौ। एकर कोखि ऐ जनममे नै भरतौ।” हौ बा आब कोन उपए हेतै हो। पहिने तँ लोक खोंखीबाला कहै छेलै। आब मुँह दाबि कऽ कहै छै- “निरवंशा।” दुआरिपर जगेसरा ढेरूआकेँ गिनगिना रहल अछि। सँगे ओकर माथा घूमि रहल अछि आ माथामे घूमि रहल अछि- धर्मडीहीवाली। किन्तु पछिला फूइसक घर थिर अछि। ठीके कहै छेलै- उचितवक्ता- “हटा ऐ ठाँठ गाएकेँ। कर दोसर बिआह। ला टटका माल। नीक नसल देखि-सुनि कऽ। पुरहिया लऽ आन। चाइरे-पान सालमे छौड़ा-छौड़ीसँ खोभारी भरि जेतौ।” नसल तँ एकरो खराब नहिये छै। नमगर-छरहर काजा, भरल-पूरल सीना। जखनी सिंगार कऽ कए निकलै छै तँ संगी-साथीकेँ कहए पड़ै छै- “जगेसरा भागशाली अछि। अपना तँ कमजोर, करिआएल, बेमरियाह अछि। किन्तु ओकरा मौगीकेँ देखियौ। जँ आगूसँ निकलै छै तँ मन फुरफुरा उठै छै।” भाग्यशाली केतए। भाग्य केतएसँ नीक हएत। सुन्दर तँ अछि मुदा बाँझ। जँ निपूतर रहब तँ पिण्डदान के करत? हमरा बाद सम्पतिकेँ के भोगत? बुढ़ारीमे सहारा के बनत? ओह ऐ औरतियाकेँ भगबहि पड़त। ठीके कहै छेलै- उचितवक्ता। मुदा भगेबै केना? छै तँ ई बड़ जब्बर। ओइदिन खेलावन भगतसँ झाड़फूँक करबैले गेलिऐ। एके झापटमे भगतकेँ दाँत चियाइर कऽ खसा देलकै। महतो बाबाकेँ थानसँ भभूत लाबि देलिऐ। छाउर बुझि कऽ मूतनारमे फेक देलकै। यएह भोंसड़ीकेँ बिसबासे नै छै किछोपर। फल केतएसँ भेटतै? आब एकरा डेँगा-ठेठा कऽ भगबहि पड़तै। मुदा केना कऽ आँखि उनटा कऽ जँ हमरा दिस तकै छै तँ हमरा लघी लगि जाइत अछि। तैयो हम तँ मरद छी, देह तानहि पड़त। हम जँ मौगा बनल रहबै तँ उ बेहया बनि जेतै। संभार तँ हमरहि करए पड़तै। केतेक दिनसँ एकर चालि-चलन देखि रहल छी। नकोरबा बनियाँसँ केतेक सटिया कऽ गप करैत रहै छै। छनमाकेँ अँगनामे ढुकै छै तँ निकलैक मने नै होइ छै जेना। हम भूखल रहि जाइयो कोनो बात नै मुदा ई भोरे निकलि जाएत- टोल चक्कर लगबैले। टोलक चक्कर थोड़बे लगबै छै ई तँ दोसरे चक्करमे लगल रहै छै। केतेक बेर भऽ गेलै। भूखसँ पेट दुखा रहल अछि। हमरा दिस धियान रहै तब ने। धियान तँ आरो केकरोपर रहै छै। धर्मडीहीवाली अँगनासँ निकलि कऽ टोल दिस जा रहल अछि। जागेसराक ढेरूआ रूकि गेलै। “ऐ- केतए जा रहल छी? छुच्छे कूद फान? ऐ अँगनासँ ओइ अँगना? जेना कोनो काजे नै छै। एके लाठीमे टाँग तोड़ि देबौ। अपने घरमे बैठल रहबेँ।” धर्मडीहीवालीकेँ टाँग रूकि गेलै। उनटि कऽ बजल- “देहमे तागद तँ छै नै आ टाँग तोड़ता? देखै नै छी केहेन बिमारी ढुकल छौ, तोरा देहमे। कोढ़ि फुट्टा कहीं कऽ।” झगड़ा बढ़तै। जागेसरकेँ बढ़िया चांस भेँट गेल छै। उ झगड़ाकेँ बढ़ाबए चाहैत अछि। “मुँहसँ गारि निकलतौ तँ थुथुन तोड़ि देबौ।” “गारि नै देबौ तँ असिरवाद देबौ?” “यएह बड़का आएल अछि- असिरवाद देनिहारि। निपूतरी, बाँझिन। गे भौंसरी, एकटा मूसोकेँ जन्मा कऽ देखही। तोरी माइकेँ।” “खबरदार, हमरा माइक नाओं नै ले। पुछलीही नै अपना माएसँ। केतए केतए मुँह मारलकौ तब ने तोरा सन बेटा पैदा केलकौ। बेमरियाहा...।” जागेसर ढेरूआ फेकैत लग चलि गेल अछि। करोधसँ थरथरा रहल अछि। “मुँह बन्न राखबें आकि देबौ चमेटा।” धर्मडीहीवालीकेँ आँखि तामसे ललिया गेलै। उ आरो लग आबि गेलै। देह अड़ि कऽ बाजलि- “ले मार। असल बापक बेटा छी तँ मारि कऽ देखही। बापसँ भेँट करबा देबो।” चटाक, चटाक। मुँहपर थप्पर पड़ल। “तु थप्पर मारलें-हमरा। आइ हम जे न से कऽ देबो। आरो बखतमे टिटही जकाँ पड़ल रहैत छै आ मारै कालमे केतएसँ गरमी चढ़ि जाइ छै।” ओ जगेसरा िदस हुड़कैत अछि। ओ डाँड़क डोरा आ झाँपल अंगमे लटकए चहैत अछि। मुदा जगेसरा तँ लाठी लऽ कऽ तैयार भऽ गेल अछि। “निकल हमरा घरसँ- छिनरिया। कोन-कोन कुकरम कऽ केँ तब हमरा घर अएलें। पता नै। भागबें अइठामसँ आकि चलेबाै डंटा?” “ले मार। आरो मार हमरा। अहिना भागि जेबो तोरा सात पुरखाकेँ घिना देबो। पूरा समाजमे उकैट देबो-सबकुछो।” उ कानि-कािन कऽ फाेंफिया रहल अछि। हाथ चमकाबैत जगेसराक लग सटल जा रहल अछि। “भगा देबही। छातीपर छिपाठी रोपि कऽ रहबो। बहुते बल भऽ गेलो, हाथेमे। थप्पर मारबें।” कहैत जागेसरकेँ धकेलि देलक। आसाकेँ विपरीत जागेसर धड़फड़ा कऽ गिर पड़ल। आगि नेस देलक- जगेसरकाकेँ। तामसे काँपैत ओ लाठी नेने उठल। “तोरी माँ की...। आइ तोहर हड्डी तोड़ि देबो। परान लऽ लेबो।” फटाक-फटाक। धर्मडीहीवालीक पीठ आर जाँघपर लाठी बरिस रहल अछि। “गे माइ गे माइ। मारि देलक रेऽऽऽ। दौड़ रेऽऽऽ। कोढ़िफुट्टा बेदरादा, रे लकवाबला। गे माइ, मरि गेलियौ गेऽऽऽ।” दूरेसँ टोलक लोक चिचिया रहल छै। “रे जगेसरा- रूकि जो। मरि जेतै बेचारी। गलत बात। गाए-भैंस जकाँ पीटै छी।” “एना मारबें तँ कोनो दिन लंका कांड भऽ जेतौ।” “आखिर कोन झगड़ाकेँ निपटारा नै होइ छै।” “ई औरतीओ बड्ड झगड़ालू अछि। छुलही कहीं के, आबो अइठामसँ जेबें की अड़ल छँए।” लोक सभ बीच-बचाव करऽ रहल अछि। धर्मडीहीवाली दस पन्द्रह डेगपर ठाढ़ भऽ गेल अछि। आ ओइठामनसँ गरिया रहल अछि। “हम छुलही? झगड़ाउ? केकरा घरमे सतबरती बैसल छै? हम सभटा जानै छी। सबहक बात सुनै छी। ऐ खुनिया, बेदरदाक कारने। रे अनजनुआँ जनमल, देहमे कोढ़ि फुटतौ रेऽऽ। हाथमे घुन लगतौ।” जागेसर गरजैत अछि- “ऐ बीचमे नै आबै कोइ। ई औरतिया सनैक गेल छै। दुसमन सभ एकरा सिखा-पढ़ा कऽ तुल-तैयार कऽ देने छै।” कातमे ठाढ़ भेल लोक सभकेँ बाजए पड़ैत अछि- “हमरा बुझि पड़ैत अछि मरदे सभ सनकल अछि। दू-चारि दिनपर अहिना पिटाइ प्रोग्राम चलैत रहैत छै।” “पिटाइ नै करब तँ पूजा करू। कपारपर चढ़ा कऽ राखू।” “से कहाँ कहै छी हम। सभ किछुकेँ एगो रस्ता होइ छै ने। आकि किछु बुझे ने सुझे फरमा दिया फाँसी।” “ठीके कहै छै। सबहक औरतिया कोनो बाँझिन छै आकि छुलाहीए छै, ऐँ?” औरतीओ सभ चुप नै रहि सकैत अछि। “हे यौ बउआ मरद भेल सोना। ओकर सभ गलती माफ। औरतीओ भेलै टलहा। ओकर की गिनती छै।” “चुप रहु अहूँ तँ अपना पुतहुकेँ खोरनीसँ खांेचारैते रहै छिऐ। की बजब।” “केकरापर करब सिंगार-पिया मोरा आन्हरे हे...।” धिया-पुता कातमे डेराएल सन मुँह केने ठाढ़ अछि। धर्मडीहीवाली चौबटियापर ठाढ़ भऽ कऽ सात पुरखाकेँ गरिया रहल अछि। जगेसारा लाठी लऽ कऽ रेबाड़ैत अछि। “ठाढ़ रह भोंसरी। आइ चौबटियेपर बेदशा करबौ।” चोटक मोन पड़िते धर्मडीहीवाली भागैत अछि। पाछुसँ बाघ जकाँ गरजैत जागेसर। लोक तमाशा देखि रहल अछि। कनीके दूर दौगलापर जागेसर हकमए लगैत अछि। “जो अपना बापक पास। एमहर जँ घूमि कऽ एबें तँ प्राण लऽ लेबौ।” कानैत-खीजैत धर्मडीहीवाली जा रहल अछि- नैहर दिस। नुआ-बस्तरक कोनो ठेकान नै। जेना सुइध-बुइध हेरा गेल हो। ओ कानैत अछि। किन्तु भीतरसँ बोल फूटि रहल अछि। “हमरा तँ बापसँ मोलाकात करबा देलही रे निवंशा। तोरो छोड़बो नै। अठगामा मैनजन-पंच जमा कऽ देबौ- तोरा दुआरिपर। आठो गामक लाेकसँ थू-थू करबा देबौ।” जागेसर ओहीठाम बैसि कऽ खांेखिया रहल अछि। “खों... खों... खों... आक थू...।” पता नै ओ थूक केकरापर पड़ल। समाजपर, गामपर आकि ओइ स्थानपर, धर्मडीहीवालीपर, आकि अपनहि आपपर। पता नै...। ५ पंचायत! हँ, हँ बुझलौं गामक पंचैती। जातिक सरदार, मैनजन-देमान। करत छान-बान्ह। मुँहपुरूष आ सरपंचक शान। पंच भगवान। धुर, भगवान नहि बेमान। मुँह देखल पंचैती। जेकर लाठी तेकर जोर। निरबलक आँखिमे भरल नोर। कमजोरे लेल सभटा कड़ी। आब गामे-गाम बनि रहल छै-कचहरी। तैयो पंचैती होइते छै। हँ जातिक पंचैती। परजातिक पंचैती। जाति तँ जातिसँ साइंग होइ छै। दस लोकक निर्णए तँ मानहि पड़तै। नै तँ समाजक नँगटाहा सभ नाँगटे नाचत। समाज, कानून, बन्धन, डण्ड जरिमाना। इनसाफक उपए। सभकेँ निसाफ मिलबाक चाही। नै तँ कहियो गाड़ीपर नाह आ कहियो नाहपर गाड़ी। सएह यौ मड़र। कालू मड़रक दुआरिपर पंचैती भऽ रहल छै। जातिक मैनजन। हँ हँ बिच्चेमे बैसल छै। आँखि केना नचै छै- मुँहदुसी जकाँ। धरमडीहीओसँ पंच सभ आएल छै। की बुझाइत छै, जगेसराकेँ, छोड़ि देतै ओहिना। ओइ दिन मारैत-मारैत थकचुन्ना कऽ देने रहै, अपना घरवारीकेँ। घरसँ भगा देलकै। आ पाछूसँ समादो पठा देलकै। जे तोहर बेटी बदचलन छौ। चोरनी छै। बाँझ छै। राखह अपना बेटीकेँ कपारपर। आ रे तोरी कऽ, एहेन डकलीलामी। धर्मडीहीवालीक बाप तीन-चारि महिना धरि टकटकी लगौने इन्तजार केलकै। कोनो कौओ-पंछी सुइध-बुइध लइले नै पहुँचलै। अंतमे ओकर बाप जातिक मैनजनकेँ खबैर देलकै। पूरा टोलक लोक जमा भेल छै। धनुखधारी मड़र, उचितवक्ता, ढोढ़ाइ गुरुजी भुटाइ वैद, फतींगा, बिडिओ साहैब, चंतनजी जेकरा सभ चोतबा कहै छै। आर बहुत गोटे कनी पाछू दाबि कऽ बैसल छै। पाछूसँ बीख उगलि मुँह चोरा लेबामे असान होइ छै। टाटक पाछाँ स्त्रीगण कान पाथने अछि। ओ सभ आँखि नचबैत फुसुर-फुसुर कऽ रहल अछि। कालू मड़रक नजरि ओतऽ तक पहुँच गेल। “आब मौगी सभ पंचैती करत। एस.पी., डी.एस.पी. मंतरी-संतरी सभ बैनते छै। आब कोनो कम पावर छै, ओकरो पास।” दुनू हाथ जोड़ैत आगू बजल- “तब ने ओइ राित जोकरबा दुनू हाथ जोड़ि कऽ नाचमे कहैत रहै- तुम्ही हो माता, तुम्ही पिता हो।” छौड़ा सभ खिखिया कऽ हँसैत अछि। “बुढ़बा बहुत दिन धरि लात तरमे रखि राज केलहक आब सभटा पाछू दऽ कऽ बोकरेतह। धनुखधारी मड़र रपटैत अछि- “चुप, गामक इज्जत झाँपि कऽ रखबाक चाही। दोसरो गामसँ पंच सभ आएल छै। की कहतौ।” ई काल केतएसँ आबि गेलै। की हौ, कथीक धोलफच्चका भऽ रहल छै। हे रौ जा रहल छै तँ जाए दही दोसर जातिक मैनजन किएक रहतै। हँ हँ, जाउ अहाँ। हमरा जातिक मामला छै। जय भगवान। ढोढ़ाइ गुरुजी घूस नेने छै। हँ-हँ, जगेसरासँ पाँच बोरा भुस्सा। विल्कुल फ्री। केतेक दिन फोकटमे चाह पीतै आ खेतै, से तँ अलगे। बजतै नै तँ घूस केना पचतै। ढोढ़ाय गुरुजी बीचमे जोरसँ गरजैत अछि- “जोरू-जमीन जोरकेँ, नै तँ किसी औरकेँ। अपना औरतियाकेँ पाँजमे रखैले जगेसरा चारि-पाँच लाठी खींचे देलकै तँ कोन जुलुम भऽ गेलै। के सभ ताजनकेँ अधिकारी होइ छै से तँ सभ जनिते छिऐ।” धरमडीहीसँ आएल कन्हैया मैनजनक कनहा आँखि जखनि चमकै छै तँ सबहक सिटी-पिटी गुम भऽ जाइ छै। ओ अपन छिड़िआएल मोंछकेँ सिटिया रहल अछि। ढोढ़ाय गुरुजीपर जखनि ओकर ललिआएल नजरि पड़ैत छै तँ तत्काल गुरुजी चुप्पी साधि लैत अछि। पाँच बोरी भुस्सा हवामे उड़ि जाइत छै। आ पेटमे बसात औनाए लगैत छै। उचितवक्तासँ नै रहल गेलै तँ टोन कसि देलकै। “धुर ई ढोढ़बा की बजत। एकरा बहुकेँ तँ दोसर जातिक धरमीलाल पंजाब लऽ कऽ भागि गेल आ अइठाम लबर-लबर करै छै।” “ई उचितवक्ता फेर टें-टें करए लगल चुप रहबें की नै।” “हे, आइ जे पंचैतीमे खचरपन्नी करबें तँ मुँह थकचुन्ना कऽ देबो।” “रौ तोरी कऽ। हमर बाप कहने रहै जे पंचैतीमे उचित बात ढेकैर कऽ बजिहेँ। आ तूँ मुँह थकुच देबही तँ बजबै केना। ऐ सँ नीक। हम अइठामसँ चलि जाए।”ुप्पी िआएल नजरि पड़ैत छे तॅ बेंगाय बाबा आइ गाँजा नै पीने छै। नै तँ लौडिसपीकर जकाँ बजितै। ऊ तँ धरमडीहीवालीकेँ तरफसँ छै। जागेसर दिससँ ढेकैरतै तब ने फ्रीमे गाँजा भेटतै। धुर नै बुझबहक। ओकर नजरि गड़ल छै। जगेसराक डीहबला जमीनपर। साेचै छै कहुना झगड़ा बढ़तै तँ कम दरपर ई दाव सुतरि जाएत। हँ आबि गेलौं खिस्सा कहैबला खिस्सकर। ई तँ खिस्सेपर पंचैती कऽ देतौ। ऊ जमाना गेलै। आब तँ जेकरा पासमे साम-दाम भय-भेद छै आकरे बुत्ते पंचैती हेतै। पंचैती कारणे केते पंच बिलटि जाइत छै। जे दसगोटेमे नै बजल अछि। ठाढ़ भऽ कऽ बजैत काल ओकरा थरथरी छुबि दैत छै। “हँ तँ, आब घोंकले गपकेँ केतेक घोंकैत रही। सभ बात जानले अछि। करू तसफिया।” सुनियौ झटकलाल मड़रकेँ गप। अपन बेटी केकरा संगे भागि गेलै। तकर पत्तो नै लगलै। अच्छा छोड़ू। गप सुनू। “यादि अछि ने मड़र। पुबरिया टोलपर चुनचुन पहुलका स्त्री पहुँच गेलै- थाना। तुरत्तेमे पुलिस पहुँच गेलै- दरबज्जापर। वर आ वरक बापकेँ तेतेक पीठपर डण्टा बरसौलकै जे छर-छर नुआ-बस्त्रे... की कहब आब तँ वैह पहिलुकी स्त्री महरानी बनि कऽ घरमे बैसल छै।” आब तँ औरतकेँ जमाना आबि गेलै। तैयो आकरो किछु दाबि-चापि कऽ तँ राखहि पड़तै। नै तँ ऊ सनकि कऽ किछाे बनि सकै छै। एकर मतलब गाए-भैंस जकाँ आेकरा डेंगा देबै। नै हिसाब-किताबसँ। साँपो मरि जाए आ लाठीओ नै टूटै। अइठाम तँ मारैत-मारैत लाठी टूटि गेलै। अपना घरवालीकेँ नै राखै चाहै छै। जागेसरसँ पुछल जाए। किछु विशेष गप छै। आखिर, किएक नै राखए चाहै छै, अपना स्त्रीकेँ। कारण तँ दरपन जकाँ साफे छै। चारि सालसँ बेसी भऽ गेलै आ एकोटा बच्चा नै जनमा सकलै। यएह गप छै ने हौ जागेसर? हँ-हँ बात तँ यएह छै, असलमे। दोसर बिआह करैले पंचायतसँ औडर भेट जाए। दोसर अपाय तँ छै नै। आखिर खनदान आ सम्पतिक रखबार तँ चाही। गुँर केतौ आ भूर केतौ। ऐ बातक कारणे झगड़ा होइ छेलै। आब बुझलौं तरका गप। ऐमे धर्मडीहीवालीक कोन कसूर? सभ कसूर ओकरे। जखनि खेत खराब छै तँ...। फेर चुप। एक आदमी तँ दस-दसटा बिआह करै छै। यएह, डाँरमे ने डोरा बहु करत जोड़ा। सार सभकेँ खाइले तँ जुमै नै छै। आ राजा जकाँ हजार गो रानी रखत। तूँ गारि देबही। मार सारकेँ। हँ बाजि नै सकै छेँ। आन गामसँ आबि कऽ रंगदारी। पंच छी की डकैत। हड़कंप मचि गेलै। सभ गोटे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। किछु लोक सभकेँ शान्त कऽ रहल अछि। भाय एनामे काज नै चलतौ। पाँचटा पंच एकान्तमे विचार कर। ने तँ महाभारत भऽ जेतौ। देखियौ पंच भगवान, ऐ छौड़ाक किरदानी। सभटा हमर लताम तोड़ि लेलक। लिअ पंचक बेटा चोर। आब करू फैसला। अच्छा चुप रहू। एकर निर्णए दोसर दिन हएत। यएह करै छै केना। जेना छोटका जातिक पंचैती भऽ रहल हुअए। अइसँ नीक तँ ओकरे सभ। इह, हमरा सभसँ बहुत नीचो जाति तँ अछि! तइसँ की। आखिर छी तँ शूद्रे। चुपू हमर छूबल सभ खाइत अछि। हँ हँ छुच्छे ठेसी। एकान्तमे विचारि कऽ पंच सभ आबि गेल। सुनल जाए। की कहै छै। “सुनू, जागेसरसँ गलती भेलै। ओकरा औरतियाकेँ एतेक नै पिटबाक चाही। बाल-बच्चा नै होइ छै तँ ओझा-गुणीसँ देखाबौ। डागदर वैदसँ इलाज कराबौ। तैयो नै हेतैक तँ दोसर बिआह कऽ सकैत अछि। किंतु धरमडीहीवालीकेँ राखहि पड़तै। निर्णए सभकेँ मंजूर अछि?” हँ-हँ, दसक निर्णए, भगवानक निर्णए। मंजूर अछि। सभ मानि लिऔ। ढोढ़ाय गुरुजी सोचै छै भुस्सा मिलत की नै। खेलावन भगत मोंछ पिजा रहल अछि। गाममे भगत तँ हमहींटा छी। धर्मडीहीवालीक बाप कनहा मैनजनकेँ कहने छै। “जँ अहाँ ऐ सम्बन्धकेँ नै टूटए देबै तँ जोड़ा भरि धोती देब।” ओकर बामा आँखि फड़कि रहल छै। उचितवक्ता दौड़ल आएल आ बजल- “हे यौ धर्मडीहकेँ कन्हैया मैनजन! अहाँकेँ चौबटियापर पुलिस खोजि रहल अछि। कोनो मोकदमामे नाओं अछि की?” “आऍं।” मैनजन धोती सम्हारैत पड़ेला। एकाएकी सभ उठऽ लगल। डरक पंजा जेना बढ़ऽ लगल। सबहक अन्तरक दोख जेना ठाढ़ भऽ गेल हुअए। स्वर जेना हवामे अलोपित भऽ गेल हो किंतु पएरक गतिमे तीव्रता आबि गेल छेलै। धोनाह भऽ गेल असमान दिस तकबाक केकरा फुरसति छै। ६ स्वार्थक कारणे दुनू परानीमे झगड़ा भेनाय स्वभाविके अछि। झगड़ाक बाद देह आ मन अलग हेबे करतै। वएह सुआरथ फेर दुनूकेँ मिलन करबौतै। से बात साँचे किन्तु झूठे। जे हुए किन्तु झगड़ाक बाद मिलन एक तरहक नव संचार करैत छै, मोनमे। जेना लगैत रहै छै जे सभ किछो अभिनव भऽ गेल हुअए। दमित लीलसा सभ फन-फनाक ठाढ़ भऽ गेल हो। मनक फुलवाड़ीमे नव नव फूलक आगमन। भनभनाइत भ्रमर। आबि जाइ छै- अभिनव प्रीत! धर्मडीहीवाली आपस आबि गेल छै। जागेसर आब डरे किछो नै बजै छै। एक सए झंझटिसँ एकेटा झंझटि ठीक। ठीके कहै छेलै उचितवक्ता- ‘मौगीसँ जे अराड़ि करबें तँ सभ नेबाबी भीतरी घोंसारि देतौ आ बोलती बन्न भऽ जेतौ। धर्मडीहीवालीपर भनभनियाँ भूत सवार भऽ गेल छै। जखनि-तखनि भनभनाइते रहै छै। कोन ठेकान छै। लोक कनी हटिए कऽ ओकरासँ गप करैत अछि। धर्मडीहीवालीक मोनक बात के बूझत। जखनि ओ असगर होइत अछि तखैने ओकरा अगल-बगलमे सखी, सेहेली, भर-भौजाइ, अड़ोसी-पड़ोसी सभ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। जहिना नैहरामे ठाढ़ होइ छेलै, तहिना। ओकरा सभकेँ कियो नै देखै छेलै। देखतै किए। मोनक आँखिसँ देखै छेलै मात्र धर्मडीहीवाली, आ गप्पो करै छेलै। “गे िनरमला, सन्तान कोन भारी चीज छै। चाहनेसँ कोन चीज नै होइ छै। कनी दिमाग लड़ा सभ कुछो ठीक भऽ जेतौ। देखै छी दिदियाकेँ। ओकरो सासुरमे अहिना झगड़ा होइ छेलै। बेटा जनमैते रानी बनि गेलै।” “है शुरूमे तँ बहुतो हल्ला-फसाद भेलै। बदचलन छै। बेहया छै। किन्तु सभ किछो रसे-रसे दबि गेलै। के केकरा याइद रखै छै, कथी। फुरसैतमे दोसरोक गप मोन पड़ैत छै आ काजक बोझ जँ माथपर रहै तँ अपनो विषयमे बिसरि जाइत अछि।” “ई तँ एहेन दुनियाँ अछि। जे जखनि ढोल पिटैक हएत तखनि केकरो सुगबुगाइतो नै देखबै। आ जँ चुप्पी साधि लेबाक बखत हएत तँ बाघ जकाँ गर्जन करए लगत।” “के कथी बजै छै से बात छोड़ू। अपना विषयमे सोचू। अहाँकेँ बच्चा चाही। ओकरा जन्म दिअ पड़त। डागदर-वैद्य गहवर-भगत चाहे जतएसँ हुअए।” धर्मडीहीवाली हँसैत अछि भनभनाइत...। फेर तमसा जाइत अछि। डरे खोलि कऽ नै बजैत अछि किन्तु पतिकेँ देखिते ओर मान घिरनासँ दुबकि जाइत अछि। कोनो काज मोन लगा कऽ नै करैत अछि। जेना उड़ी-बिड़ी लगले रहैत अछि। आब जागेसरो मनकेँ मारने रहैत अछि- डरे...। फेर ने पर-पंचैती बैसि जाए। आ समाज थू-थू करए लगे। समए पाबि मुँह दाबि कऽ कखनो काल कहि दैत अछि। “ओइ दिन खेलावन भगतसँ झगड़ि गेलिऐ। कहू तँ ओकरासँ फेर देखा दी। नै तँ महतो बाबा लग डाली लगबा दी। विसवास नै होइत अछि तँ डागदर-वैध जैठाम चलब ततहि चलू।” किन्तु धर्मडीहीवालीकेँ दिल-मोन तँ भरबे नै करै छै, ऐ गपसँ जेना। हरदम देहमे आगि लगले रहै छै। सुतैत-बैसैत बेचैन। सोचैत छै- जँ पति चाहैत अछि तँ आइ भगतसँ भेँट करबै। कौआ, मैना, बगरा सभ एकेठाम खेलाइ छेलै। चिल्हौड़क छाँह देखिते सभटा एकेबेर फड़फड़ा कऽ उड़ि गेलै, अासमान दिस...। खुला अकासमे उड़ैत एक खुंडी मेघ। धर्मडीहीवालीक छाती धुकधुका उठल। नै जानि किएक...। ७ सुनमसान बाधमे असगरे पीपरक गाछ। कोनो बटोहीकेँ छाँह दइले ठाढ़ छै। केतेको दिनसँ छै। किन्तु आइ उ गाछ नै छै जे पहिने रहए। ओइसँ की? गामक सीमानक निर्णए तँ गाछे करतै। एकरे धोधहैरमे बैसि कऽ प्रेत बोमियेतै आ डेरबुक लोक एक कोला हटि कऽ चकोना हएत पड़ैतै। बुधियार लोक सात बेर गोर लगि छाँहमे जिरेतै। कौआ जँ छेर दइ तँ तुरत्ते उठि कऽ चलि देतै। असगुन भेलौ भाग...। असगरमे फुनगी दिस तकबाक साहस केनाइ बुड़बक सबहक काज छिऐ। दूबज्जी गाड़ीक सीटी ऐ गाछ लग ठाेकले चलि अबै छै। अजय गाछक छाँहमे ठाढ़ भेल। तीन बरिसक बाद गाछकेँ देखि रहल छै। ऐ बीचमे कहुना कौलेजक पढ़ाइ पूरा केलक। बी.ए. पास केनाइ कोनो मामूली गप छिऐ! छाँहक बात मानि ओ रूखगर जगहपर भिनभिनाइत बैसि गेल। सबचीज ओहिना छै। तैयो बदलि गेलै। बहुत दिन बितला बाद देखलहो चीज अनचिन्हार बुझाइ छै। झटकलाल मड़रकेँ लोक सभ झटकू मड़र कहै छै। कारण-कहैमे सुविधा आ झटकू मड़र कोनो तमसाह बेकतीओ नै छै, जे कोनो डर हेतै। झटकलाल मड़र मनमे बड़का-बड़का लीलसा पोसने छल। चाहे जे करए पड़ए। बेटाकेँ पढ़ेबै। अजय बेसी पढ़त तँ बड़का हाकिम बनत। बापोकेँ नाओं जाति-जवारमे चमकैत रहत। खरचा तँ दिऐ पड़तै। आखिर बड़का हाकिम। जेते तेल देबै ततबे ने गाड़ी दौड़तै। नै छै रूपैआ। की तकै छी? शीशोक गाछ बेच। नै भेलौ तँ बाँस बेच। बेसी पैसा लगतै। कोनो मूतनार-हगनार खेत बेच ले। की यौ मालिक? मालिक खेतक जड़सीमनबला रूपैआ दैत टिटकारी मारने रहए- “बाप बनौरा पुत्त चौतार, तेकर बेटा नेड़हा फौदार। देखिहेँ बादमे बापकेँ सरवेन्ट ने कहौ।” “किछो करतह किन्तु पढ़ावह। पढ़लासँ बुइधगर मनुक्ख तँ बनबे करतह।” अजय सुनैत छल- कात-करोटसँ। किछ गप संगी –साथीओसँ बुझि लैत छल। बीख-अमरीत पिबैत चलैत जिनगी! सभ आस तँ पूरे नै होइ छै। किछ बँचलो रहै छै तँए ने जिनगीक दौड़ा-दौड़ी होइत रहै छै एक दोसरकेँ पछोड़ धेने दौड़ैत रहै छै। फेर नवका आश ठाढ़ भऽ जाइ छै। केते कुद-फान केलक-अजय। किन्तु मोन मोताबिक नौकरी नै भेट सकलै। ओने झटकलालक अभिलाषा! सोचै छै अजय- बाबूजीकेँ केतएसँ पता चलतै जे अइठाम कोन-कोन खेल चलै छै। भ्रष्टाचार आ तिकड़म केहेन नाच नचै छै। केना उनटा छुरीसँ हलाल होइ छै- लोक। हमरा जातिमे तँ कोनो बड़का नेतो नै छै। एक आध जँ छै तँ ओहो झोरउगहा। फेर तरघुसका रूपैआ केतएसँ एतै? ने पैरबी आ ने पैसा तँ सड़कपर टहल लगाउ। नौकरी-चाकरी नै भेल तँ पढ़लौं कथीले? जेना पीपरक धोधरिमे सँ कोइ पुछलक- “केतए जाइ छहक- अजय? गाम? गाममे के पुछतह तोरा? कोन काज करबहक तूँ? गमैया कोन काज हेतह तोरा बुत्ते? हर-कोदारि चला सकै छहक तँू? रौद-बसातमे रोपनी-कटनी कऽ सकै छहक? गामक विद्वानक बीच रहि सकबहक? ऐठाम केकरोसँ कोइ कम नै बुझै छै। लिखनाइ-पढ़नाइ भले नै जनैत छै किन्तु सभ छै- ज्ञानवान विद्वान। सबहक अपन-अपन विचार आ थ्योरी छै। लाठीक सहारासँ चलैबला साँढ़ जकाँ ढेकरैत अछि। जेकरा घरमे एक साँझक खरचा नै छै ओकरो गप करोड़पति जकाँ चलै छै।” अट्टहासक स्वर- “हा-हा-हा-हा, गाममे तूँ नै रहि सकबहक। मिस्टर अजय कुमार, तोरा सभ अजैया कहतह। बी.ए.क डिगरी हवामे उड़ि जेतह-फर-फर। ऐठाम शहरी ज्ञान तँ दूरक गप छै, तोहर कोनो बात कोइ नै सुनतह। ही-ही-ही।” अजय गरजैत बजल- “जरूर सुनतै। तँू चुप रह। हम समाजमे पसरल कुरीतकेँ हटेबाक कोशिश करबै। ऐठामक जड़ता आ जिदकेँ तोड़ए पड़तै। देशक अंग-अंगकेँ साफ आ स्वस्थ्य करए पड़तै। गाम-गाममे सुधार भेलासँ देशक सुधार हेतै। समाज बदलतै। नव समाज बनबए पड़तै। किछ लोककेँ बीड़ा-पान उठबए पड़तै।” अजय हाथ चमकबैत जोर-जोरसँ बाजए लगल। शीला बड़ीकाल पहिनेसँ ओइठाम एकटा झोंइझमे नुकाएल अछि। ओ अजयकेँ हाथ-देह फड़कौने आ चिचिया कऽ असगरेमे बजनाइ देखि रहल अछि। उ डेराएल सन सुरमे अजयकेँ टोकबाक प्रयास केलक। किन्तु अजय नै सुनलकै। ओकरा पक्का विश्वास भऽ गेलै जे गाछ परक प्रेत अजयकेँ गरसि लेलकै। वएह एकरा देहपर चढ़ि कऽ बजि रहल छै। ऐठाम तँ कोइ छेबो नै करए। केकरा कहतै। किछो जल्दी करए पड़तै। आगि-पानिसँ तँ भूतो-प्रेतो डेरा जाइ छै। मनमे विचार करैत अगल-बगल देखलक। लगीचेमे एकटा खत्ता छेलै। खत्ताक कोरपर एकटा फूटल बालटी सेहो राखल छेलै। शीलाकेँ तुरन्त फुरेलै। ओ बालटीमे पानि भरलक आ अजयकेँ माथापर उझैल देलकै। अजय चकोना हएत शीला दिस दौड़ल। “के छी? एना किएक केलौं। ठाढ़ रहूँ।” शीला उनटि कऽ भागलि। जेकरा देहपर भूत चढ़ल छै। से की करत, कोन ठेकान। अजय झपैट कऽ पाछूसँ शीलाकेँ पकड़लक। तैयो शीला छुटबाक प्रयास कऽ रहल छै। जमीन भीजल छेलै पकड़-धकड़मे दुनू खसल। तरमे शीला ऊपरसँ अजय चढ़ल। मुँह देखिते अजय चौंकैत बजल- “शीला, अहाँ छी। एना िकएक केलौं।” “अहाँ असगरेमे अड़-बड़ बजै छेलौं। हमरा तँ बुझाएल जे अहाँपर प्रेत चढ़ि गेल अछि। आब बुझाइत अछि अहाँपर सँ उतरि कऽ हमरापर चढ़ि गेल अछि।” “तेकर मतलब हम प्रेत छी?” “अहाँ भूत-प्रेत नै चोर छी। तब ने हमरा मनक चोरि केलौं आ निपत्ता भऽ गेल छेलौं। आबो देहपर सँ हटू ने।” “नै हटब।” “जल्दी हटू। नै तँ धकेलि देब। देखै छिऐ कोइ आबि रहल छै।” दुनूक मन केतेक बरिस पाछू चलि गेल छेलै से पता नै। जेना पछिला स्वर्गक सरोवर सोझहा आबि गेल छेलै। आ ओइमे दुनू संगे-संग जल-खेल करए लगल छेलै। गाछ परक चिड़ै-चुनमुनी ओइ खेलकेँ देखैत चुन-चुन करैत ओकरा सभक आनन्दमे अपन उपस्थिति दरज कऽ रहल छेलै। विरह आ प्रतीक्षाक कथा चलैत रहल। केतेक देरसँ पता नै। वर्तमान उपस्थिति भेल तँ अजय पुछलक- “अहाँ एमहर केतए आएल छेलौं?” शीलाकेँ हँसी लगि गेल किन्तु ओकरा आँखिमे नोर भरल छेलै। “हमर काका-काकी जहिया झगड़ा करै छेलै तहिया-तहिया अइठाम सुनहटमे आबि जाइ छेलौं आ अहाँक बाट जोहैत रहै छेलौं। केतेक माससँ अहाँक इन्तजारी करैत समए काटै छेलौं। जखनि कोनो चिड़ैओ टा समाद नै दइ छेलै तँ कानैत-कानैत आपस घर घूमि जाइ छेलौं। आइ सगुनियाँ चिड़ैकेँ दरशन भाेरे भेल छेलै। भेँट भऽ गेल।” “हम तँ सोचने रही जे अहाँक बियाहो भऽ गेल हेतै। कोरमे बच्चा खेलाइत हेतै। किन्तु आब बुझाइत अछि जे हमहूँ भाग्यशाली छी। शाइत दुनू गोटे एक दोसर लेल बनल छी।” “धुर, बियाहक बात की करैत छी। हमर पितयौत बहिन लीलीयाक बियाह होइबला छै। की हेतै से नै जानि। जातिक सभटा लोक अरचन रोपै छै।” “अरचन किएक? ऐठाम लोक तँ बियाहकेँ यज्ञ बुझै छै तँए एक-दोसरक सहयोग करै छै।” “हँ से तँ ठीके। किन्तु हमर पलिवार तँ ढाठल छै। बागल छै। हमरा परिवारकेँ जातिसँ अलग कऽ देने छै।” अजय चौंकैत पुछलक- “जातिसँ अलग किएक कऽ देने छै?” मुड़ी झुकौने शीला मन्द स्वरे बजली- “बाबूजी केँ मरलापर काका सराध-गैतक भोज नै केलकै। केतएसँ टका लाबितै। ओइ साल फसिल नीक नै उपजल छेलै। सभ मुँहपुरूषकेँ कहलकै- जे हमरा घरमे कोनो उपए नै छै। रोटीओ नै जुमै छै तँ भोज केतएसँ करब। किन्तु भोजक नाओंपर सभ जाति एक भऽ गेलै। ओ सभ कहलकै- “अकलू मड़र दोसराक भोजमे बड़ फानै छेलै। जे भोज नै करए से दालि बड़ सुरकाए। ओकरा सराधक भोज लगबे करतै। जँ पूरा जातिकेँ भोज नै देतै तँ जातिसँ अलग। आगि-पानि सभ बन्न।” “भोजक एतेक महत्व छै अपना समाजमे।” “की कहब घरमाबाबूपर घर ढुक्का पंचैती हएत रहए। चट दऽ धरमाबाबू भोज गछि लेलकै आ कहलकै- “उ तँ झूठ-मूठ हमरापर आरोप लगबै छै।” भोजक नाओंपर सभ कुकरम माफ भऽ गेलै। अजय अवाक्! शीलाक मुँह दिस ताकि रहल अछि। मोनमे बिहाड़ि सन उठल छै। जेना ओकरा सौंसे देहमे जातिक जाल लटपटा रहल छै। “कोइ आबि रहल छै। अहाँ संगे देखि लेत तँ की हेतै पता नै।” कहैत शीला धड़फड़ा कऽ उठल आ टोल दिस चलि देलक। वएह बाट छिऐ किन्तु लगै छै ऊ नै छिऐ। अजय अपना घर दिस बढ़ि रहल अछि। ओ सपनामे छै आकि यर्थाथमे पता नै। किन्तु गाम दोसर रंगक लगै छै। ओ लवका रंग ओकरा आँखिमे छै आकि...। ८ ‘ठक-ठक-ठक’ गाछ कटि रहल छै। झमटगर आमक गाछ। कटबा रहल छै- झटकलाल मड़र। कुरहैड़क चोटसँ डारि-पात थर-थर काँपि रहल अछि। चिड़ई-चुनमुनी फड़फड़ा कऽ उड़ि रहल छै। जार-जार कानैत जेना कहि रहल छै-गाछ। “हौ, हमरा नै काटह। हमर कोनो दोख नै। हम तँ तोहर सहायक छीयह। मीठ-मीठ फल, पवित्तर हवा, शीतल छाँह दैतै रहए छी। बरखा बूनीमे हमर सहयोग देखिते छी। तैयो हमर जान लऽ रहल छी। आह... हमरा बहैत खूनकेँ कियो नै देखि रहल अछि- हौ...।” जल्लाद जकाँ दू गोटे चला रहल अछि-कुरहैड़। गाँजाक निसाँसँ दुनू आँखि लाल। घामसँ नहाएल। चाहै छै- जलदीसँ जल्दी गाछकेँ गिरा दी। मौतक निन्न सुता दी। किछु दूर हटि कऽ झटकलाल मड़र ठाढ़ अछि। जल्दी गाछ कटबाक आग्रह कऽ रहल छै। जेना गाछ नै कोनो भरिगर बोझ ओकरे कपारपर लाधल छै। झटकलाल मड़रक छोटका बेटा अजय जेना गाछक करूण क्रन्दन सुनि लेलक। ओकरा पाएरमे तेजी आबि गेलै। “बाबूजी! आमक गाछ किएक कटबा रहल छिऐ?” झटकलाल मड़र घूमि कऽ देखलक आ कनी गम्भीर होइत बजल- “ई अपन गाछ नै छी अजय। ऐपर जीबू बाबूक अधिकार छन्हि।” “जीबू बाबूकेँ?” “हँ, हुनके दक्षिणामे देल गेल छै। बरिसोपूर्व ताेहर दादाजी केँ श्राद्ध-कर्ममे आत्माक शांति आ मुक्ति लेल। दान-दक्षिणामे देलाक बादसँ हम सिरिफ रखबारि करै छिऐ।” अजयक व्यंग्यसँ भरल स्वर निकललै- “आ आम पकलापर अहाँ घर पहुँचा दैत छिऐ- वाह..।” “हँ हौ। ब्राह्मण देवता छथि। हमरा ईमानदारीपर गाछ छोड़ने अछि। हुनके सबहक हाथमे तँ मुक्ति छै। ओ जँ हमरापर विश्वास करै छथि तँ हमरो कर्तव्य निमाहए पड़तै किने...।” “अहाँ बताह भऽ गेल छी बाबूजी। हम गाछ नै काटय देब।” “फेर, अहाँ पढ़ि-लिख कऽ की बजै छी। आगिसँ खेल करए चाहै छी। सराप दऽ देत तँ अगिला जनम तक पड़ि जाएत। जिनगीकेँ सफल करैले बहुत बात सहए पड़ै छै।” “गाछ केकरो। रखबारि कोइ आर करए। डरे फल दोसरठाम पहुँच जाए। अहाँ डेराएल छी। आन्हर छी।” झटकलाल मड़र तमसा गेल। “दू अछर अँग्रेजी पढ़ि लेलहक तँ हमरा आन्हर बुझै छहक। पात्रकेँ देल दान छिऐ। तेकरा हम बैमानी कऽ ली। अधरमी कहीं कऽ।” नै सुनने छहक- ‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’ “हँ, हँ बुझलौं। गाछक सेवा अहाँ करै छी। फलक रखबारि अहाँ करै छी। ओ फल खाइत अछि- जीबू झा। ई छिऐ कर्मक फल।” “हमरा फलक चिन्ता नै अछि। असलमे गाछ हमर नै छी। हुनका लकड़ीक जरूरत छन्हि। अपन गाछ कटबा कऽ लऽ जा रहल छथि। दान-दक्षिणामे देल गेल छन्हि तेकरा हम केना रोकि देबनि। एहेन जुलुम हमरा बुत्ते नै हएत।” “बाबूजी, जुलुम तँ अहाँसँ भऽ रहल अछि। जीअत गाछकेँ काटनाइ पाप करम छिऐ। अपराध छी। पर्यावरण दूषित भऽ रहल छै। गाछ-बिरिछक अभावसँ प्रदूषण फैल रहल छै। अहाँ गन्दगी फैलाबैमे मदति कऽ रहल छिऐ।” “हम गन्दगी फैला रहल छिऐ की? अधरमी जकाँ बात तूँ करै छहक। पाप-पुण्यक गियान नै छह तोरा। तोरे सन लोकक संख्या जँ धरतीपर बढ़ि जेतै तँ ई धरती थरथर काँपए लगतै।” अजय अपन केश नोचैत धुनधुना कऽ बजल- “भैंसक आगाँ बीन बजेलासँ की फैदा। किन्तु गाछ तँ नै काटए देबनि।” फानि कऽ आगू गेल आ लपकि कऽ कुरहैड़ पकड़ैत बजल- “रूकि जा। गाछ नै काटि सकै छह।” कनीए दूरपर धर्मानन्द बाबू आ ढोढ़ाइ गुरुजी दू गोटेसँ गप कऽ रहल अछि। झटकलाल मड़र जोरसँ शोर पाड़ैत अछि- “यौ धर्मानन्द बाबू सभ गोटे एम्हर आउ। देखियौ हमर बेटा पागल जकाँ करैए। गाछ नै काटए दइए। कहू जे जीबूबाबूकेँ की जवाब देबनि। कोनो तरहेँ एकरा ऐठामसँ हटाउ।” धर्मानन्द लग आबैत बजल- “जीबूबाबू तँ हमरे दुआरिपर छथि। हमरे टाएर गाड़ीसँ हुनकर लकड़ी जेतै। बहलमानक खोजमे आएल छेलौं। घोंचाय तँ गाड़ी चलबैमे माहिर छै। ओकरे ताकि रहल छी।” फेर फुसफुसाइत स्वरमे आगू बजल- “अहाँ तँ जानिते छिऐ मड़र। टाएरगाड़ी तँ घोंचायकेँ नाओंसँ उठल छेलै। ऑफिसमे ओकरे नाओं दरज छै। ओइ दिन- हम तँ चलाकीसँ आनि लेलौं। संदेह होइत अछि आब। कहीं बुझि जाएत तँ गाड़ी घेर लेत।” झटकलाल मुड़ी झुलबैत कहलकै- “धुर, ओकरा केना मालूम पड़तै। मुरूख-चपाट छै। एम्हर जीबूबाबू अपना सबहक संग छथि। किछो नै हेतै। मुदा पहिले हमरा ऐ झंझटिसँ निकालू। अजयकेँ ऐठामसँ ठेल-ठालि कऽ हटाउ।” ढोंढ़ाय गुरुजीकेँ संगे आरो दू गोटे आबि गेल। झटकलाल मड़रक इशारा पाबि सभ गोटे एक्केबेर अजयकेँ पकड़ि लेलक। घिंचैत-ठेलियबैत ओइठामसँ दूर लऽ जेबाक प्रयास करए लगल। “अइठामसँ चलह। तूँ पढ़ूआ बाबू छहक। तोरा समाजक सभ गप नै बूझल छह। जीबूबाबू साधारण लोक नै छथि। पैघ पैरवीबला बेकती छथि। हमरा सभकेँ केतेक बेर नीक-अधलामे बचौने छथि।” अजय ओइठामसँ घुस कऽ नै चाहैत छै। विरोध कऽ रहल छै। ओकरा सबहक बन्धनमे छटपटा रहल अछि। किन्तु बन्धन ढील पड़ै तब ने। “कहै छी हम। हमरा छोड़ि दिअ। नै तँ बड्ड खराब बात भऽ जाएत। पाछू हमरा दोख नै देब।” झटकलाल मड़र ठेलैत कहलक- “चहल अजय चलह। काज नै रोकहक। सुनह- धरम करैत जँ हुए हािन, तैयो नै छोड़ी धरमक बानि।” अजय जालमे फँसल चिड़ै जकाँ फरफरा रहल अछि। जाल तोड़बाक बारम्बार प्रयास कऽ रहल अछि। असोथकित भेलापर देह थिर भऽ गेल। मुदा बुइध तेजीसँ दौड़ए लगल। घर-दुआरि-गाम-शहर-राज्य-देश आरो आगू दिस...। ९ धर्मडीहीवाली केतेक दिनसँ कोशिशमे लगल अछि किन्तु मौका हाथ नै लगै छै। ओकर विचार छै जे असगरमे सभटा बात खेलावन भगतकेँ साफ-साफ सुनाबी। परन्तु झार-फूँक करबैबलाकेँ कोनो अभाव छै। आ गप हाँकैबला तँ ओकरे लग बैसत। कखनो सुनहट नै। एेसँ पहिने महतो बाबाक स्थानमे डाली लगौने रहए। घोड़ा साफ-साफ कहि देलकै- “हम की करबौ। कोखि मारल छौ।” फेर दवाइ करबैक विचार भेल। नीक डाक्टर गाममे रहै नै छै। शहरक बड़का भारी डाक्टर लग जाएत तँ ओतेक रूपैआ केतएसँ लाबत? संगे के जाएत? रहत केतए अनभुआर जगहपर? तैयो धर्मडीहीवाली निराश नै भेल छै। किछु दिनसँ खेलावन भगतपर ओकर विश्वास जेना बढ़ए लगलै। लचारीमे केतेक बेर विचारी करए पड़ै छै। हौ बाबू विश्वासे गुणे फल। आखिर दस-दस कोसक लोक आबै छै। फलित नै होइ छै तँ ओहिना? मरल-सुखाएल कोखि हरियर भऽ जाइत छै। जश-अपजश विधि हाथ। सोझेमे तँ छै-नररी बुढ़ियाक पुतोहू। ओझा-गुणी, डाक्टर-वैद्य, धाइम सभ नकारि देने रहए। खेलावन भगत दूटा सन्तान होइक वाक दऽ देलकै। समूचा धनुकटोलीकेँ ठकमुड़ी लगि गेलै। जहिया वचन पूरा भेलै। कहए भगता आ पूराबए देवता। ओना तँ ऐंठ खाइ छै आ झूठ बजै छै। सभ कुकरम देखिते छी। नचारकेँ विचार की। दस गोटेक बात तँ मानहि पड़ै छै। चलतीमे तँ माटिओ बिका जाइत छै। धर्मडीहीवालीकेँ तँ सोचि-विचारि कऽ काज करए पड़तै। जागेसर तँ ओइ दिन कहि देलकै- पंच सभ साल भरिक समए देने अछि। अहाँक मन-जेकरासँ इलाज कराबी। ओझा-गुणी, डागडर-वैद्य। हमरा दिससँ कोनो मनाही नै। सिरिफ टाका-पैसा पुरौनाइ हमर काज छी। पाछाँ हमर कोनो दोख नै। खेलावन भगत बेंतमे तेल लगा कऽ सुररि रहल छै। भगतकेँ सभ किछु अलगे टाइपक। बेंत लगै छै- साँप सन। अन्हारमे देखि लेत तँ साँपे बुझेतै। आइ धर्मडीहीवालीकेँ मौका भेटलै। सुनहटमे सभ गप फरिछा कऽ कहि रहल छै। किन्तु भगतक मन जेना केतौ आर टहल-बुलि रहल छै। देह केतौ आ मन केतौ। आँखि जेना निशाँमे डुमल छै। धर्मडीहीवाली सोचैत अछि- एना किए केने अछि- भगतजी। कहीं ओइ दिनका गप मन तँ ने पड़ि गेलै। झाड़ैत काल चमेटा जे लगल रहए। कहीं हमरापर तमसाएल तँ ने अछि। आब जे होए। बखत पड़लासँ...। धर्मडीहीवाली कनी सुरकेँ तेज केलक। अपना दिस धियान खिंचैले तँ उपए लगबए पड़तै। “भगत जी, हमरो दुख हरण कऽ लिअ। आब तँ हम केतौ कऽ नै रहबै। जँ बाल-बच्चा नै हेतै तँ सोतिन तरमे बास करए पड़तै। अहाँ तँ बुझिते छी- नदी तरक चास-आ सौतिन तरक बास।” “सौतिन ने कहै छै। बैरिन तरक बास।” टप्प दऽ बाजल भगत। “हम तँ मूरूख छी भगतजी। अहाँ तँ भगवान छिऐ। परोपट्टामे अहाँक जय-जयकार भऽ रहल अछि। केतेकोकेँ दुख हरण कऽ लेलिऐ। हमरो दुखसँ उबारू। खाली आँचारकेँ भरि दिअ। जँ हमरा संतान नै हेतै तँ हम बेसहारा भऽ जाएब। पएर पकड़ै छी भगत जी। कोनो उपए करू।” निसाँस खिंचैत भगत बजल- “गुरु महराज कहने रहथिन- सुआरथ लगि करे सभ पीरीत।” धर्मडीहीवालीकेँ आँखिसँ भरभरा कऽ नोर खसि पड़ल। भगत जीक दिल पिघलि गेलै। ओकरा हाथकेँ अपना पएरपर सँ हटबैत कहलक- “घबरा नै। सभ कुछो हेतै। जे बाट देखाबै छियौ। ओइपर चलए पड़तौ।” “बँचा लिअ भगतजी। जीअत तँ जीअत, मुइलोमे सौतिन नै बकसै छै। मुइलोपर बिसाइत छै।” “तूँ तँ एक-तरफा सोचै छेँ। पुरूषोकेँ दूटा स्त्री भेलासँ ओहिना कठ होइ छै। तरघुसका तकलीफ होइ छै। तोरा तँ मालूमो नै हेतौ घोंचाय मड़र भायक खिस्सा।” “हमरा केतएसँ मालूम हेतै।” “आब तँ बेचारा दुनियाँसँ चलि गेला। चारि-पाँच साल पहुलका गप छिऐ। सौतिनियाँ डाहक शिकार भऽ गेलै। दुनू स्त्री मिलि कऽ दशा बिगाड़ि देने रहए। देखैत छी आइओ दुनूटा साँढ़ जकाँ ढेकैर कऽ लड़ैत छै।” “की भेल रहै भगतजी?” धर्मडीहीवालीक आँखिमे उत्सुकता भरि गेल छै। खेलावन भगत पलथी मारि कऽ बैसि गेल। दहिना जाँघपर राखल बेंत थरथरा रहल छै। मुँहसँ खिस्साक बखान चलि रहल छै। “घोंचाय मड़र भायक नाओं रहै- चिचाय। एकटा स्त्रीमे संतान नै भेलै। फेर दोसर केलक। ओहोमे संतान नै भेलै। दुनू औरतियामे राति-दिन हड़-हड़, खट-खट होइते रहए। चिचाय झगड़ा छोड़बैमे अपस्याँत। दुनू तरफसँ गाड़ि मारि सुनए पड़ैत। चिचाय लवकीकेँ बेसी मानैत। ओकरो संगे राति बिताबैत। पुरनकी कछ-मछ कऽ राति काटैत। सौतिनिया डाहसँ जरैत पुरनकी सोचलक।” किछु काल रूकि भगत आगू बजय लगल- “हँ, अमवस्याक राति रहए। खट-खट अन्हार। टिपिर-टिपिर बून चुबैत। हाथ-हाथ नै देखि पड़ैत। लबकी जइ घरमे सुतैत रहए ओइ ओसरपर चिचाय दहिना पएर रखलक आकि बामा पएर पुरनकी पकड़ि लेलक। अन्हारक कारने चिचाय देखि नै सकल। ओ डरे ‘आऊँ, आऊॅ’ करए लगल। लबकी दौग कऽ निकलल आ दहिना पएर पकड़ि लेलक। दुनू अपना-अपना दिस खिंचए लगल। अपना-अपना घर दिस लऽ जेबाक प्रयास। खैंच रहल छल। चिचायकेँ बुझि पड़लै जे दू फाँकमे चीर कऽ बँटि लेत। ओ बाप-बाप करैत चिचिया उठल। अड़ोसिया-पड़ोसिया जमा भेल। तखनि ममिलाकेँ शान्त केलक। दूटा स्त्री केलाक फल एहनो होइ छै।” “भगतजी, तैयो मरदक जाति ऊपरे रहै छै। हमर नैया कोन विधि पार लगतै।” “तूँ चिन्ता नै कर। आबए दही उ शुभ घड़ी। उ पवितर राति।” खेलावन भगत बेंत उठा कऽ उपदेश दिअ लगल- “सात दिन पहिलेसँ अरबा-अरवाइन भोजन। दुनू बखत स्नान। मन देह शुद्ध। चौबटियापर पूजा-चक्कर। बाहर बजे रातिमे एकान्त जगहपर आबए पड़तौ। राह-बाटमे कोनो टोका-चाली नै। कियो देखै नै। निशिभाग रातिमे चौबटियापर स्नान-पूजा कबुला सभ करए पड़तौ। समैपर सभटा बात बुझा देबौ। भेँट करैत रहिहेँ। शरणमे आबि गेल छेँ तँ कल्याण भऽ जेतौ।” “धन्य हो भगतजी।” धर्मडीहीवाली उठि कऽ आँगन दिस चलि देलक। ओकर पएर स्थिर नै भऽ रहल छै। जेना निशाँसँ मातल हो तहिना ओकरा मनमे बुझाय छै। पता नै ई निशाँ सफलताक छिऐ वा असफलताक। ओकर पएरक गति तेज भऽ गेलै। तैयो गहबरक गन्ध ओकरा चारूभरसँ घेरने छै...। १० राति जमुन भारी सन लगै छै। खट-खट अन्हार छै। एते लोक केतए जाइ छै हौ? गोपी मड़रक दुआरिपर बहुते टोलबैया जमा छै। ठाढ़ भेलहा सभ गप-सप कऽ रहल छै आ बैसलाहा सभ फुसराहटि। लोकक बीचमे गोपी मड़रक जेठका बेटा मनमा बैसल छै। बैसल नै छै बल्की अदहा सूतल आ अदहा जगल छै। जेना निशाँमे मातल हुअए। ओंघराए कऽ खसैले करैत छै किन्तु ओकर जुआन स्त्री पाछूसँ सम्हारने छै। ओकरा स्त्रीकेँ अपना देहक कोनो सोह-सुरता नै छै। फाटल वस्त्र रहलाक कारणे ओकर छाती कनीए उघाड़ छै। सबहक नजरि पहिने ओइ उघड़ल अंगसँ टकरा जाइ छै। आगूमे दू-तीन हाथ जगह खाली छै। जैठाम जरैत लालटेनक इजोत आ कुदैत-फानैत कीड़ा-फतिंगा। नीमक छोट-छोट ठारि आ पात राखल छै। खेलावन भगत अपना चेला-चपाटीक संगे झाड़-फूकमे लागल अछि। गरजि कऽ मंत्र जाप करैत नीमक ठाढ़िसँ बीखकेँ झाड़ि रहल अछि। “एगारह हाथ काय चल बरहम दोहाय चल सातो पुरा नाग चल हरो-हरो बिसंभरो दोहाय बिसहारा माताक छिअ।” गोपी मड़र अखने भुटाय वैद्यकेँ सोर पाड़ए गेलै। ओकर छोटका बेटा घनमा नीमक ठाढ़ि-डारि आ लगपाँचेक माटि लाबैले गेल छै। लोक आपसी फुसराहटि कऽ रहल अछि। पाछूसँ केकरो जोरगर स्वर आएल- “की भेल छेलै हौ?” “दुनू परानी सूतल छेलै। निन्न टूटलापर चिचिया कऽ कहलकै- हमरा किछु काटि लेलकौ। दौग कऽ आबैह जा।” “हँ, सुनैत छिऐ जे परिवारमे कमाउ पूत वएह टा छै।” “खेतपर सँ थाकल-ठेहिआएल। खेलाक बाद सुति रहलै। खाट, चौकी तँ घरमे नै छै। सिमसल जमीनपर सुतै छेलै। साँप काटि नेने हेतै।” “हँ हौ, घरक दशा नै देखैत छहक। एक दिस कूड़ा-करकटक ढेरी तँ एकदिस जंगल-झाड़। केतौ साफ-सुथरा देखै छहक। एनामे मनुख रहतै।” “भुटाय वैद्य की कहै छै हौ?” “कहै छै- असगुन भऽ गेलौ। सुनै छी ने नढ़िया भूकि रहल छौ। जान लेबा बिमारी छौ एकरा।” ई सुनि मनमाक स्त्री जोर-जोरसँ कानए लगली। “फटृट चुप, कुलछनी। बाप-बाप चिचिया रहल छेँ। सतबरती रहितेँ तँ एना हेबे नै करितौ।” गोपी मड़रकेँ ठोर सुखि गेल छै। आँखिमे नोर नै छै तैयो गमछासँ पोछि रहल अछि। मनमाक स्त्री ठोह पाड़ि कऽ कानि रहल छै। गोपी मड़रक छोटका बेटा घनमाकेँ आब दुख बरदाइशसँ बाहर भऽ रहल छै। ओ चिचिया कऽ कहै छै- “हौ भैयाकेँ कहुना बँचा दहक हौ सर-समाज।” मनमाक हालति निरन्तर बेसी खराब भेल जा रहल छै। आब ऊ घररए लगलै। “नै बँचतै शाइत आब।” लोक लगही लाथे ससरि रहल अछि। िनसाँस छोड़ैत बजै छै- “लगै छै साँप नै कटलकै, काल डसि लेलकै।” “आँखिओ नै तकै छै। साँस केना घुरघुराइ छै।” “बेचारी, भरल जुआनीमे विधवा भऽ जेतै।” “धुर, औरतियाकेँ कोन ठेकाना। तुरत्ते दोसर बियाह कऽ लेतै। बिपैत तँ गोपी मड़रकेँ पड़लै। बेचारेकेँ कमौआ पूत...।” खेलाबन भगतकेँ आँखि लाल भऽ गेलै जोरसँ गरजि कऽ बजै छै- “एहेन कठोर छइ जे सुनि नै रहल अछि। उत्तरसँ रस्ता खाली करै जा। महा डाकिनी मंत्र पढ़ए पड़तै।” “हे, हौ, हटै जा उत्तर भ्ारसँ। बाट खाली करै जा।” लोकमे सुगबुगाहटि होइ छै। एने-ओने हटि जाइ छै। “हे रौ, उत्तरसँ हटि जो। कोन ठेकान छै- देवी औतै की साँप।” मुदा उत्तरसँ हड़बड़ाइत अजय अबैत छै। किछ काल तँ ओकरा जानकारी लेबामे लगि जाइ छै। धनमा कानि-कानि सभटा गप कहै छै। सुनिते ओ तमसा जाइ छै आ चिचिया कऽ कहैत अछि- “किएक सभगोटे मिलि कऽ एकर जान लऽ रहल छहक। बहुत नाटक केलहक। बेचारा अन्तिम घड़ी गनि रहल छै। आबो मंतर-जापकेँ रोकह आ लऽ कऽ अस्पताल चलह।” सभ ओकरे दिस तकए लगल। रामखेलावनक आँखि तामसे ललिया गेलै। ओ फुफकारैत बजल- “आबि गेलौ बकटेट। हमरा डाकनि मंतरकेँ बिच्चेमे तोड़ि कऽ नाश कऽ देलकौ।” अखनि अजय केकरो बात नै मानतै। जान जाइक सबाल छै। “ऐ भगतजी, एकरा जानक गारन्टी लेबै अहाँ? जँ ई मरि जेतै तँ अहाँकेँ गोपी मडरक बेटा आपस करए पड़त। अहाँकेँ अपनापर बिसवास अछि। अहाँ बँचा लेबै।” भीतरे-भीतर खेलाबन भगत डगमगा गेल। किछु तँ बाजए पड़तै। “ऊपरबलाकेँ यएह इच्छा हेतै तँ के रोकि सकैत छै। देवीक कृपासँ केतेकोकेँ ठीक केलिऐ। एकरो ठीक करबै।” “ई तँ मरल जा रहल छै आअोर अहाँ कहिया देवीक कृपासँ ठीक करबै। आ हमर दाबा अछि- जँ ई जीअत अस्पताल पहुँच जाएत तँ ठीक भऽ जेतै। एहेन स्थितिमे कियो केकरो अस्पताल लऽ गेल हेबै तब ने बुझबै।” नकोर बनियाँ बिच्चेमे टपकल- “हँ भाय, जरटोलीमे हमरा बहनोइकेँ साँप कटने रहै। चिरा लगा कऽ ऊपर जौड़ीसँ बान्हि देलकै आ अस्पताल लऽ गेलै। दोसरे दिन ठीक भऽ आपस एलै। अस्पतालक बड़का डागदर भगवानोसँ बढ़ि कऽ छै।” अजय फटकारैत बजल- “मुँह की ताकै छहक। एकरा उठाबह आ चलह अस्पताल। ओझा-गुणीक चक्करमे जान चलि जेतह।” “लाबह खाट। टाँगि कऽ लऽ चलह। ने सड़क छै आ ने गाड़ी।” गोपी पड़रक छोटका बेटा दौग कऽ खाट लऽ अनलक। तामसे फाेंफिया कऽ खेलावन भगत उठल आ झटकि कऽ चलल। औंठा धोतीमे लगलाक कारणे धड़फड़ा गेल। बीचसँ स्वर आएल- “यौ भगतजी, ढेका खूलि गेल। सम्हाररू जल्दी।” खेलावन भगत तामसे थरथराइत बजल- “नासे काल विनासे बुद्धि। देवी माइक कारजमे अड़चन। सभ नास भऽ जेतौ।” ढेका पकड़ने फनकैत जा रहल अछि। सनसनाइत अधरतियाक समए। गामक चारूभर थाल-कादो आ पानिसँ भरल। एकोटा सड़क नै। खटोला उठा कऽ चलब आड़िये-धुरे सम्भव छै। कात-करोटक कटहा झाड़ टाँगमे लगैत छै। एक मील एहने कठिन बाट छै। हिम्मत बान्हि चारि-पाँचटा युवक खाट उठौने जा रहल छै। गोपी मड़रक बेटा खाटपर पड़ल छटपटा रहल छै। समए जेतेक बितैत छै तेतेक रोगीक हालति खराब भेल जा रहल छै। “हौ जल्दी चलह हौ।” “एहेन खराब रस्ता ऊपरसँ कनहापर एतेक भार। केना दौगबै हौ।” सड़कपर पहुँचबामे घंटा भरिक समए लगि जाइ छै। खाटकेँ एककातमे रखि सभ गोटे साँस खींचैत ठाढ़ भेल। गोपी मड़र लग जा अपना बेटाकेँ मुँह उघारि देखैत अछि। आ चिचिया उठैत अछि- “रौ बौआ, रौ मनमा उड़ि गेलौ रौ।” सभ खटोलाक चारूभर घेरि नेने अछि। अजय छूबि कऽ देखैत अछि। “वास्तवमे मरि गेल।” सभ एक दोसराक मुँह ताकि रहल अछि। “मरि गेलै आब की करबहक?” “आपस लऽ चलह। कपारमे यएह छेलह।” गोपी मड़रक छोटका बेटा बपहारि काटि रहल अछि। केतेक गोटे आँखिक नोर गमछासँ पोछि रहल अछि। कालू मड़र कहैत अछि- “ठीके कहै छेलै खेलाबन भगत। घमण्ड देखे लहक। टूटि गेलह ने धमण्ड। सभटा खेला अजय लगेलकै। आब वएह जवाब दौ। गोपी मड़रक बेटा आपस कऽ दौ। बकटेटीक कारणे भगत कहि देलकै- नास भऽ जेतौ।” “हमरा सभ केतए जेबै? की करबै? झाड़-फूकक सिबा रस्ता कोन?” “अस्पताल निकटमे नै छै। सड़क एकोटा नै छै। गाड़ी-घोड़ा नै छै जे चढ़ि कऽ फर्रसँ उड़ि जो।” “हम तँ कहै छेलौं जे रस्तेमे खतम भऽ जेतौ। मुदा हमर बात सुनए तब ने।” अजयक बोल नै फुटि रहल छै। आखिर केकरा की जवाब देतै। अधिक लोक कालू मड़रक समर्थन दऽ रहल छै। ओ सोचि रहल अछि- गामसँ केना अंधविश्वास, जड़ता आ जीद्दकेँ हटाओल जाएत। ज्ञान-विज्ञान बढ़ि कऽ केते आगू चलि गेल। गाम केतेक पाछू अछि। झाड़-फूक करैत-करैत मरि जइतै तँ कोनो गप नै मुदा बँचबैक प्रयासमे मरि गेलै तँ आब देखि लियौ। दू घंटासँ झाड़-फूंक कऽ रहल छेलै। जँ दू घंटा पहिले अस्पताल लऽ गेल रहितै तँ एकर जान बँचि जाइतै। आगू-आगू खटोला जा रहल अछि। आपस गाम दिस। पाछूमे अछि, गोपी पड़र आ ओकर छोटका बेटा। कानैत, धड़फराइत बढ़ैत। करूण क्रन्दण बढले जा रहल अछि। ओही मध्यमे अजय जेना घेरा गेल अछि। ११ “दौग कऽ अबै जा हौऽऽऽ। देखहक हौ लोक सभ। हमरा अँगनामे ढेपा बरिस रहल छै। पछुआर दिससँ केतेक ढेपा फेँक रहल छै। दौगै जा हाे।” “गे माइ गे माइ। कोन उपद्रव शुरू भऽ गेलै गे। कोन देवी-देवता खिसिया गेलै हो देव। हौ समाज बँचाबह हौ।” हल्ला–गुल्ला सुनि बहुते लोक दुआरिपर जमा भऽ गेल छै। देवीपुरवालीक मुँहपर डर नाचि रहल अछि। “की भेल?” -अड़ोसी-पड़ोसी पूछि रहल छै। “जान बँचाबह हौ। पछुआर दिससँ ढेला बरिस रहल अछि, अँगनामे।” “अन्हार रातिमे पछुआरमे केना कऽ देखबै?” “फुलचनमा टाॅर्चक इजोतसँ देखही तँ के छी सरबा।” “हे, गारि नै देबाक चाही। किनसाइत देवी-देवताक ममिला हेतौ तँ धक्कापर चढ़ि जेबे। बुझि लही, एक्के बेरमे जय-सियाराम।” हिम्मतगरहा तीन-चारिटा छौड़ा आगू बढ़ल। चारूभर टाॅर्चक इजोत छिड़िया गेलै। “कहाँ छै कोइ हौ। नुका तँ नै रहलै।” “कोन ठेकान, कहीं भूत-प्रेरक ममिला ने होइ।” “भऽ सकै छै। देवीपुरवाली कोनो कबुला-पाती केने होइ आ पूरा नै केलाक कारणे देवी प्रकोप मचबैत होइ।” “देवीपुरवाली लालटेन नेस रहल छै। अँगनामे तँ ढेपाक ढेर लगल छै। एकर बेटे नै छै।” “धुर, उ तँ चौकपर ताड़ी पीब कऽ मतंग हेतै।” देवीपुरवालीक पुतोहु चमकी ओसारपर बैसल छै। बेचारी डरे थर-थर काँपि रहल छै। देवीपुरवाली िवधवा रहितो मरद जकाँ काज करैत छै। बेटाकेँ जन्मैते पति सदाक लेल संग छोड़ि देलकै। ओइ बेटाक भरोसे पहाड़ सन जीनगी काटि लेलकै। ओकर बेटा ‘नकचट्टा’ आब जुआन भेलै। ओइक संगे आसा जगलै जे एकटा कमौआ पूत भेल आब। किन्तु ओहो पियक्कड़ भऽ गेलै। काम करत तँ करिते रहि जाएत। कहीं ताड़ी पीबैले गेल तँ कखनि आएत पता नै। सासु-पुतोहु मिलि कमा-खटा कऽ कहुना गुजर चला रहल अछि। “कही एकर पुतोहु चमकी डाइन तँ नै छै हो?” “नै-नै, ई बात झूठ छै। एतेक भोली-भाली औरत डाइन केना कऽ भऽ सकै छै।” “हँ, हँ, भोला-भाला चेहरा भीतर दिल बेइमान।” “हँ रौ भाय। तब ने जइ समैमे पहिलुक बेर आएल रहै। लबे-धबे रहै। टोलमे बड़का हो-हल्ला भेल रहै।” “हे रौ, ऊ जइ घरमे ठाढ़ होइ ने ठीक ओकरा कपारक सामने घरक छप्परमे आगि लगि जाए छेलै। उतरबरिया घरमे जाय वएह बात। दक्षिणवरिया घरमे जाय फेर वएह बात। ई तँ चट दऽ लोक मुझा दइ छेलै नै तँ पूरा घर जरि कऽ सुड्डाह भऽ जएतै।” “पसरतै केना कऽ। बान्हल आगि रहै ने। बुझिही, औरतियाकेँ देह नै रहै, आगिक भट्ठी रहै।” “तब तँ नकचट्टाकेँ सलाइ कीनबाक कोनो जरूरते नै।” सभ गोटे एक्केबेर खिसिया कऽ हँसए लगल। उन्मुक्त हास्य। “अरे तोरी कऽ, ई तँ असल अगिनदाइ छियौ रौ।” “फेर ई बिमारी ठीक केना भेलइ?” “वएह खेलावन भगत केतेक दिन तक झाड़ फूंक केलकै। तब अगिनदाइक देहसँ आगि कम भेलै।” “सुनने रही जे ओकरे लग गेलासँ ई खेला शुरू भेल रहै।” “हँ मथदुखी झड़बैले खेलावन भगत लग लऽ कऽ गेल रहै। ओही दिनसँ ई अगिलगौना काण्ड हुअ लगलै।” “तब तँ कुल करामात खेलावने भगतक रहै।” पछुआर दिससँ अजय सोर पाड़लक- “दौग कऽ एने अबै जो। भूत पकड़ा गेलौ।” सभ एक्केबेर दौगल। बैगन गाछक झोंझसँ अलटरबाकेँ निकालैत अजय कहलकै- “एकरा पंचक पास लऽ चल।” “हँ हँ ठीके बात। घोंचाय अपना बेटाकेँ किए नै सम्हारैत छै। राति-विराइत औनाइत रहै छै। रातिचर भूत जकाँ।” “लोककेँ डेरानाइ कोनो नीक गप होइ छै। कहीं आँखिमे ढेपा लगि जाय तँ फूटि जेतै।” “जन्मेले टासँ नै होइ छै, पतिपालो करए पड़ै छै। लऽ चल। पंचसभ निरलय करतै।” डेढ़हथ्थी कान्हपर नेने घोंचाय गरजैत देवीपुरवालीक दुआरिपर पहुँचलै। “हमरा बेटाकेँ पंचक पास लऽ जेनिहार के छी? ई छौड़ा अखने अँगनासँ खा-पी कऽ निकललै। मुतै लेल वाड़ीमे गेल छेलै। ई केना कऽ ढेपा फेकतै? छै कोइ गबाह? देखलकै ढेपा फेकैत? अजैया दू अक्षर शहरसँ पढ़ि कऽ की आएल जे सभ जगह अपने कबिलगीरी। अोकरा अँगनामे कोनो देवी ढेपा फेकै छै आ नाओं लगबै छै, हमरा बेटाकेँ।” घोचायक स्त्री गारि पढ़ैत पाछूसँ अबै छै। “के निपूतरा हमरा बेटाकेँ पकड़ने अछि। कोनो चोरी-डकैती केलकै की। कोइढ़फुट्टा, छोड़ हमरा बेटाकेँ। ने तँ जे ने से कऽ देबै।” झमारि कऽ अपना बेटाकेँ छोड़ौलक। ओकर बाँहि पकड़ि घिचने घर दिस चलि पड़ैत अछि। पाछूसँ फनकैत घोंचाइ जा रहल अछि। “अखनि तँ बेकारक झगड़ा ठाढ़ भऽ जइतै। अजयकेँ कोन दुसमनी छेलै, ओइ छौड़ाक संग।” “दुसमनी ओकरासँ नै छै। असल दुसमनी घोंचायसँ देवीपुरवालीकेँ छै।” उचितवक्ता बीचमे आबि कऽ बाजए लगल- “बेटाक जन्म भेलापर अँगनासँ बहींगा फेकल जाइ छै। जे घरक ऊपरसँ दरबज्जापर गिरबाक चाही। फेर ओही बहींगामे बैरक झाड़ आ जूता लटका कऽ घरक आगू गाड़ल जाइ छै।” “घोंचायक संग की भेल रहै?” “घोंचायक बेटा भेल रहै ने तँ अँगनासँ बहींगा फेकने रहै। ओही समैमे देवीपुरवाली दुआरिपर ठाढ़ रहै। बहींगाक नोक ओकरा टांगमे गड़ि गेलै। पंचैती भेलै तँ घोंचायकेँ डण्ड-जरिमाना लगलै। ओही दिनसँ दुसमनी चलि रहल छै।” “कहीं ढेलफेक्का भूतकेँ घोंचाय भेजैत हेतौ।” “कुछो हौ। खेलाबन भगतकेँ पूजाक खरचा भेट जेतै। तब देवीपुरवालीकेँ कल्याण हेतै।” देवीपुरवालीक बेटा नकचट्टा ताड़ी पीब कऽ दुआरिपर आबि गेल छै। ओ निसाँमे गरजि रहल छै। “हमरा दुआरिपर एतेक लोक किएक जमा भेल छै हौ? बुझै छी, ऐ अौरतियाकेँ। सनकल जा रहल छै। हम घरपर नै रहै छी तँ छौड़ा सभकेँ सोर पाड़ि कऽ रसलीला करैत रहैत अछि। कहाँ छै हमर मोटका समाठ बला लाठी। आइ डाँड़ आ पीठी सरका देबै हम।” अगिनदाय डरसँ कोठी गोड़ा तरमे नुका रहल अछि। पता नै देहपर लाठी केतए-केतए गिरतै। रोइयाँ काँटो-काँट भऽ रहल छै। उचितवक्ता दुआरिपर सँ बिदा होइत बजल- “अजय भाय, चलह ऐठामसँ। नै तँ समाठसँ चूड़ा जकाँ कूटल जेबह।” सभ धड़फड़ा कऽ चलि पड़ैत अछि। अजय देखैत अछि। आसमानसँ चुगला गिरैत अछि। धरती दिस बढ़ैत इजोतक रेखा। चारूभरसँ अन्हार ओकरा दिस दौगल। छनेमे जेना ओकरा पकड़ि घोंटि लेलक। फेर आँखि अन्हारेमे अछि, इजोतक प्रतीक्षा करैत। १३ जनीजाति सभ अँगनामे गाबि रहल अछि। “बाबा केँ अँगना मे लगनहि आएल पोती भेल डुमरी केँ फूल हे ऐ बेर लगनमाँ फिराय दियौ बाबा सिखऽ छिऐ लूरि बेवहार यौ।” अकलू मड़रक बेटीकेँ बिआह हेतै। बरयाती आबि रहल छै। दुआरिकेँ केते चिक्कन-चुनमुन केने छै। लगै छै जेना चनन छिटका देने हो। तेतेक इजोत चमकै छै जे अन्हार तँ जेना निपत्ता भऽ गेलै। दुआरि आ अँगनाकेँ सभ चीज दोसरे रंगक लगै छै। चमाचम। एककातमे भनसिया सभ अहरी चढ़ा देने छै। “पहिने भात नै, तीमन बनतै। पानि ला रे।” “भैया, एक चिलम गाजा हमरा घरबारीसँ मंगा दे तँ हम भरि राति खटबौ।” “चुप, दारू, गाजा पी कऽ भानस करता। नूनक बदलामे चीनी ढारि देबही। तब की हेतै?” किछु लोक भोजन-भात बना रहल अछि तँ किछु लोक बरयातीकेँ सूतए आ बैसए लेल बेवस्था कऽ रहल अछि। धिया-पुता सभ दलानक आगूमे खेल रहल छै। किछु नाँगट-उघार तँ किछुकेँ देहपर बस्तरो अछि। नाकमे नेटा, सुर-सुर करैत। “भैया मुतबै हौ।” “चुप सार, तोरा तुरत्ते मुतबास लगि गेलौ।” “तँ परसादी मँगा दे।” “भगवानक पूजा नै हेतै। एकरा अँगनामे बिआह हेतै।” “हे रे छौड़ा, ऐठाम लगही कऽ देलही।” बुढ़बा लाठी लऽ कऽ फटकारैत बजल- “भाग दुआरपर सँ। निच्चाँ जा कऽ खेल।” अँगनामे गीत गौनिहारि सभ उपरौंझ कऽ रहल अछि। पहिने तँ एकोटा जनीजाति एबे नेे करै छेलै। “जाितसँ अलग। ढाढल बान्हल छै- अकलू मड़र। ओकरा संगे के जाएत बन्धनमे पड़ैले।” अकलू मड़रक स्त्री बड्ड चलाकी जनै छै। टोलक मूलगनि घुघुरबत्तीकेँ पटिया लेलकै। “दाय हे, जेहने हमर बेटी तेहने तोहर बेटी। कोनो तरहेँ पार-घाट लगा दहक। दोसरा गामकसँ लोक सभ आबि रहल छै। अपना गामक इज्जतिक सबाल छै। अपना टोलक गप आन लोक किएक बुझतै। रहबै तँ एकेठाम।” केना कऽ मानतै औरतिया सभ। आखिर सुख-दुखमे एकसाथ रहैत आएल छै। “नदिया किनारे बाबा हौ किनकर बाजा बाजै, किनकासँ माँगे दहेज हौ, नदिया किनारे पाेती तोरे बाजा बाजै हमरासँ माँगे दहेज गे...।” डिम-डिम-डिमिक। ढोलक आ पीपीहीक अवाज। “आरे तोरी कऽ बराती तँ गामक बगलमे पहुँच गेलौं। जल्दी सभ प्रबन्ध कर रौ।” “इह, कोनो लाट साहैबकेँ बरयाती नै आबि रहल छै।” “सुनै छी, जे दू बीघा जमीन छै।” “दू बीघा जमीन छै आ सात भाँइ छै। फेर सातोकेँ दू-दूटाक धिया-पुता। अँगनामे बेदराक ढेरी लगल छै।” “सुनै छी, लड़िका घरक छप्पर बनबैमे तेज छै। लाड़-पुआर बत्तीक छप्पर। तँए खेतीक अलाबे किछ आमदनी भऽ जाइ छै।” “बुझलौं- घरमे फुइस-फाइस बाहरमे धक्का।” अँगनासँ गीतक अवाज- “सोनाक पिंजरा बना दऽ हौ बाबा, ओइमे रहब नुकाय हौ। सोनाक पिंजरा बना देबो गे पोती पिंजरा सहित नेने जाय गे...।” बुढ़बा सभ अपना पगड़ी आ धोतीकेँ ठीकसँ बान्हैत अछि। ढोल-पीपही आ स्पीकर जोर-जोरसँ बाजए लगल। लोकमे हड़बड़ी मचि गेल छै। समाजक लोक दुआरिपर एकट्ठा भऽ रहल छै। “बरयाती आबि गेलै। चलै-चल सुआगतमे। खाना-पीना बादमे हेतै। सुआगतमे तिरोटी नै हेबाक चाही।” “हँ, ठीके गप। दोसरा गामक लोक, अरिजन-परिजन, कुटुम। ओकरा ढाठ बान्हसँ की मतलब।” “हँ हँ, आखिर हमरो धनुकटोलीक किछ शान छै।” “अरे तोरीकेँ, नाचक पाटी लौने अछि।” “हँ, लगही आ झाड़ासँ टोलकेँ महकौतौं।” “ई सार तँ नमरी लोफर छै। धियाने दोसरे तरफ।” उचितवक्ता मुड़ी डोलबैत बजल- “असल गप अहिना भकभका कऽ लगै छै। सावधान, नाच देखैते चिड़ै कोनो छौड़ा संगे उड़ि ने जाऊ।” “चुप्प, शैतान।” डेढ़ियापर जनीजातिक भीड़। वर देखबाक सबहक आँखिमे उत्सुकता। रंग-बिरंगक साड़ी-आँगी पहिरने। फूल सन फुलाएल मुख। चहकैत छौड़ा सभक दल। पैंट-शर्ट, लुँगी-कुरतामे सजल। बूढ़ सभ धोती-कुरता आ माथकेँ गमछासँ मुरेठा बन्हने। “पहिले पएर-हाथ धोइले जलक बेवस्था करह। पूछि लहक सभ बरियाती आबि गेलै।” “दुल्हा नै आएल छै?” “आरे बहींचो, बिना वरक बरियाती आबि गेलै हौ। बिआह केना हेतै?” “कहै छै- गामसँ संगे-संग चललौं। रस्तामे पछुआ गेल। पता नै केतए रहि गेलै।” “छुच्छै धुतहु फूकै छेलै रे। बिना दुल्हेक घर-दुआरि। दुआरिपर आएल किएक? मार सार बरियाती सभकेँ।” “ऐमे बरियातीक कोन दोख?” “हे रौ ला तँ सटका। दोष-गुणकेँ फरिछाबै छथि।” “हे रौ, मनकेँ थिर करै जो। ठहर, एना नै करै जो।” बरियाती सकदम। जेना सबहक छातीमे डर ढुकि गेलै। सभ मुँह लटका लेलक। गप-सप्प बन्न। मने-मन सभ सोचि रहल अछि। कहीं भरि राति वर नै एतै तब की हेतै? एहने स्थितिमे बरियाती सभकेँ छौलका छोड़ेने रहै, ढेलपुरा गाममे। चलाक बरियाती धोतीकेँ डाँड़मे खोंसि रहल अछि। पछुआरक रस्तो भँजिया रहल अछि। रंगमे भंग। तमाकूल-बीड़ी सभ बन्न। अँगनामे गीतनादक बदलामे फुसराहटि शुरू भऽ गेल छै। “लीलाक भाग्ये खराप छै। केतेक मेहनति अकलू मड़र केलकै तब सभ चीजक इतजाम भेलै। दू बरिससँ बेचारेकेँ एड़ी खिआ गेलै तब जा कऽ बिआहक बात तँइ भेलै। आब देखियो...।” “छठी राति विधि लिखे लीलारा की संकट के मेटनहारा।” बात सुनि लीलाक कलेजामे जेना बरछी भोंका गेलै। ओ मुँहमे नुआ ठूसि कऽ कानि रहल अछि। लोकक मनमे शंका औना रहल अछि। कहीं लेन-देनमे कोनो गड़बड़ी तँ नै भेल छेलै। अकलू मड़र छै-बड़ा मक्खीचूस। “तीमन-तरकारी बनेबै की नै?” “धुर, छोड़ि दियौ। की हेतै की नाइ।” उचितवक्ता केना चुप रहतै। “कानल कनियाँ रहिए गेल कानी कटाओल वर घूमिए गेल।” “मार सारकेँ रौ। बड़ लबर-लबर करै छौ। एने अकलू मड़रकेँ पाछूसँ निसाँस छूटि रहल छै। आ एकरा...।” अकलू मड़रकेँ दोस-महिम, कर-कुटुम सम्बन्धी सभ बाध-वोन दिस खोजै लेल निकलि गेल छै। “हल्लो जे करबै से वरक नाओं जानबे नै करै छी।” स्टेजपर ढोलक-हरिमुनियाँ चुप्पे पड़ल अछि। नाच पाटीक लोक सभ चुपचाप बिड़ी पी रहल अछि। “हमरा सभ की करबै यौ? एहो लगन ने उधारे रहि जाए।” “चुप, ओने दोसर नाच भऽ रहल छै। तोहर नाच के देखतौ। बानर जकाँ कूदल घुमै छेँ तखनिसँ।” नाचक लेबरा चट दऽ बजल- “सभ तँ बानरेक सन्तान छी आ बानरे छी। हम छी लड़का बानर।” “हे, मुँहकेँ चुप राख नै तँ..।” “गौ बाबू आदति नै छौ। पेट फूलि जाएत।” अकलू मड़र सोचि रहल अछि- एक तँ जाति आगि-पानि बन्न कऽ देने अछि। जखनि कि हमर कोनो दोष नै छेलए। भैया मरि गेल छला। घरमे कुछो नै रहए। ऊपरसँ अकालक तबाही। केतएसँ करितौं भोज? लोक कहलक खेत बेचि। कहए पड़ल- खेत बेचि लेबै तँ खेती केतए करबै? केतेक जमीने छै हमरा पास। दोसरकेँ दुख देखबाक फुरसति केकरा पास छै? सभकेँ तँ अपने दुख भारी छै। अपने सुआरथमे आन्हर। तैयो टेबैत, हथोरैत कहुना चलि रहल अछि। एक साँझ भोज-भात हेतै आ हमर सभ किछो बिका जेतै। मुदा कहाँ कोइ सुनलक हमर गप। ओही दिन जातिसँ अलग कऽ देलक। केतेक मेहनति केलौं। केकरा-केकरा नै गोड़लग्गी केलौं। कोन-कोन जानवर लग ने माथ लगेलाैं। तब िबआहक गप निश्चित भेल। ओहोमे कोन दुसमनी लगि गेल से पता नै। वर बाटेमे बिला गेल। के की केलक से नै जानि। सभ तँ दुसमने अछि। वर नै आएत तँ हमर बेटी कुमारि रहि जाएत। दोसरठाम बिआहक गप्पो नै होएत। लोक सोचत लड़कीमे कोनो खराबी छै। बाप रे बाप, कोन उपए हेतै। केतौ कऽ ने रहबै- हम। सभटा खरच-बरच बेकार चलि जेतै। फेर दोबारा केतएसँ एतेक टाका-पैसाक बनोबस करबै। अफवाह फैलत- बिआहमे कोन नाटक भऽ गेलै रौ। केकरो सोझहामे केना जाएत। अकलू मड़र अन्हारेमे बैसि कऽ कानि रहल अछि। लोक सभ वरकेँ खोजि-खाजि कऽ आपस आबि रहल अछि। “केतौ नै भेटलै। बड़की सड़क तक केतौ नै छै।” “चारि-पाँचटा छौड़ा बौआ रहल छेलै। लग जा कऽ पुछिते पड़ा गलै। गुँहे-मूते दौगैत अपने गाम दिस आएल।” सभ निसाँस छोड़ैत अछि। वरक काका चिचियाइत अछि- “आबि गेल। आबि गेल- दुल्हा। केतए रहि गेल छेलही, तूँ सभ रौ।” हंस पलटि गेल-समधीक। सबहक आँखिमे उत्सुकता। शान्त पोखरिमे हलचल। लोकक देहमे जेना गति आबि गेलै। नाच-मंडलीक कलाकार फानि कऽ स्टेजपर चढ़ि गेलै। ढोलक-हरमुनियााकेँ जेना परान घूमि गेलै। औरत-सभ खखसि कऽ गला साफ कऽ रहल अछि। तरे-तर। “लीलाक माए जल्दी सभ किछो तैयार करू। चुमबैले। समए नै छै।” “चलू, पहिने लड़िका देखबै।” ग्रामीण सभ जमा भऽ गेल छै। “समधि कहाँ छै?” “समधीकेँ रतौनी भेल छै। कम सुझै छै।” “अहाँक बेटा कहाँ अछि? कानमे तँ लंगोटा बन्हने छै- सुनतै केना।” “हेयौ दुल्हा केतए छै?” बरियाती सभ चारूकात सँ घेरने अछि। बीचमे चारि-पाँचटा छौड़ा ठाढ़ अछि। ओकरा देहपर कछी-जंघिया मात्र अछि। उघारे देह-जाड़सँ सुटकौने। मुँह लटकौने। दुल्हाक काका हाथसँ इशारा करैत छै। “वएह छी वर। जेकरा देहपर ललका जँघियाटा अछि।” उचितवक्ता फेंफिया कऽ बजल- “अरे तोरी कऽ। हौ, ओइ गामक एहने रिवाज छै। नंगा भऽ कऽ अहिना उघारे बिआह होइ छै। नंगटा कहीं के...।” “सभ खचरपन्नी समधीक छी। दहेजबला सभटा टाका-पैसा अपना मौगीक पछुआरे रखि कऽ आएल अछि।” “हँ हौ, बेटाकेँ कछी-जंघिया पहिरा कऽ कुश्ती लड़ैले ठाढ़ केने अछि।” सभ ठिठिआ कऽ हँसल। हा... हा... हा.. ही... ही...। “हे रौ हमरा तँ लगै छौ, भैंस-गाए चरा कऽ बाधसँ ऐठाम चलि एलौं। देखहक तँ कपारमे एको बून तेल छै। बिआह हेतै, कोनो खेल नै हेतै। दसटा ग्रामीत देखतै।” “माथपर मौड़ कहाँ छै हौ?” “चुप रह, मौड़ की देखबहक। घौड़ देखहक। बेटाबलाकेँ संतोष रहै छै हौ। दैत रहक।” समधी तरे-तर तामसे फुलल अछि। बेटाक हालति देखि बजत की। अन्तमे घोंघिया कऽ बजल- “जखनिसँ दुआरिपर पएर रखलौं तखैनेसँ सभ ओल सन बोल बजि रहल अछि। आँत छुबौआ बात। जेना हमर कोनो परतिष्ठे नै। मनुखक बेवहार एहने होइ छै की? सभटा बकटेटिया आ लंठाधिराज जमा भऽ गेल अछि। बेसी तामस चढ़त तँ लड़िकाकेँ लऽ कऽ चलि जाएब। सबहक जेना मगजे उनटल छै।” कालू मड़र बीचमे आबि कऽ सम्हारैत अछि। “सभ बकटेटे जकाँ गप नै करहक। एकरा सबहक संगे की भेलै सेहो तँ बुझबहक।” समधी अपना बेटासँ पुछै छै- “की भेल रहौ बौआ?” दुल्हा ठोह पाड़ि कऽ कानए लगैत अछि। उचितवक्ता ठिठिआ कऽ हँसए लगल। “कनियाँ बिदागरी कालमे कानै छै। ई केहेन वर छै जे सासुर अबिते काल कानि रहल छै मौगी जकाँ।” “पहिने सुनि लहक गप।” “हमरा सभ टाएर-गाड़ीसँ आबि रहल छेलौं। बाधमे सात-आठटा डकैत धेरि लेलक। जेबीसँ सभटा पैसा-कौड़ी छीन लेलक। टाँर्च तँ हाथ मोचाड़ि कऽ पहिने झपटि नेने रहए। दिल्लीसँ कमा कऽ घुमैत काल जे पंेट-शुट कीनने छेलौं सेहो निकालि लेलक। हमरा सभकेँ ठाेंठकरिया दैत गाड़ीपर सँ खसा देलक। आ उ सभ टाएरपर चढ़ि बड़दकेँ हाँकि देलक।” “हम कहै छियौ, निश्चित मूतनमा डाकू हेतौं। आइ-काल्हिमे ऊ जेलसँ छुटल छै।” “आब लिअ, सुनियौ, सरकार केहेन छै। चोर-डकैतकेँ केतेक छूट दऽ देने छै। केतौ आएब-जाएब मोश्किल। सभ अपने कुरसी बँचेबाक लेल परेशान। गरीबक तरफ धियान के देतै?” चोर-चहार निशंक भऽ कऽ साँझ-विहान लुट-पाट करै छै। घूसक टाका-पैसा गनैत-गनैत रक्षा करैबलाकेँ पलखति नै भेटै छै। की करतै, आदति पड़ल छै हौ। “हाय रे, अपने समांग दालि-भात।” “अच्छा आब ऊ बात छोड़ि दहक दुल्हाकेँ कपड़ा-वस्तर पहिराबह।” धड़फड़ीमे दोसराक धोती-कुरता वरकेँ पहिरा देल गेलै। देहक नापसँ कुरता नम्हर छै। लड़िका बाबाजी जकाँ लगै छै। उचितवक्ता ऊपर-निच्चाँ तकैत कहै छै- “हड़बड़ी बिआह कनपट्टी सिनुर।” “टाइम नै छै। विध-बेवहार शुरू करह।” फेरसँ सबहक मुँह हरिआ गेलै। गीत गनगना गेलै। ओने राजा सलहेसक नाच शुरू भऽ गेलै। “अरे तोरी के, देखहक, तालपर डान्सरकेँ नचैत। जेहने रूप तेहने नाच। आइ खूबे जमतै।” अखनिओ मनोरथ मड़र नम्हर केश रखिते अछि। जुआनीमे लोक ओकरा नटुआ कहै छेलै। बिच्चेमे टपकल- “अरे, ई की देखै छी। एक समैमे हमहूँ नामी डान्सर छेलौं। धनिकाहा गाम नाच-पाटीमे गेल रहियौ। तीन दिनक साटा रहै। भोरेसँ बड़का घरक मलिकाइन सभ कहै- चाह हमरा घरपर बनतै तँ कोइ कहै जलखै हमरा घरपर। मन तँ हमर उड़ल फिरै। लेकिन की करबै अपना घरक मोह...।” नाच शरू भऽ गेल छै। राजा सलहेसकेँ रिझबैले सती सेालहो सिंगार कऽ रहल छै। अँगनामे साईत सिनुरदान भऽ रहल छै। झोंकपर गीत कान तक आबि रहल छै। दुल्हा सिनुर लियौ हाथ, पान-सुपारीक साथ, दुलहिन उघारि लियौ माथ, सिनुर लए ले। दुल्हाक सिरपर शोभे मोर, दुलहिन सभदिन पूजत गोड़ दुलहिन उघारि लियौ मांग, सिनुर लए ले। ग्रामीत सभ नाचक रसमे दुबकि गेल अछि। गामक झगड़ा-लड़ाइ आ सिनेह-परेमकेँ अजय देखि रहल अछि। ओ कखनो नाच लग जाइत अछि तँ कखनो कोनचरसँ आँगन दिस हुलकी मारैत अछि। चारूभर छड़पटाएल घुड़ैत अछि। किन्तु शीलाक कोनो सुर-पता नै भेट रहल छै। अजय तकैत-तकैत अपस्यिांत। पछुआरमे केराक बड़का-बड़का गाछ लाेके जकाँ ठाढ़ छै। छोटका-छोटका झड़-झाँखुरमे भगजोगनी भुक-भुकाइते रहै छै। ओइ झाँखुरक अढ़मे माटिक ढिमका छै। वएह तँ बनल अछि, दुनूक परेम मिलन स्थल। ओइठाम दुनू गोटे सभ किछु मोन पाड़ैत अछि आ सभ किछु बिसरैत अछि। जहियासँ जोड़ लगैत गहुमन ओइ जगहपर मारल गेलै तहियासँ ओम्हर जेबाक साहस कमे लोक करै छै। अँगनामे शीलाकेँ कछमच्छी लगल छै। लोकक आँखिसँ बचि कऽ ओइ जगहपर जेबाक कोशिशमे लगल छै। परन्तु काजक अँगना अछि तँए कोइ ने कोइ ओकरा सोर पाड़ि लैत अछि। पछुआरमे अजयकेँ मच्छर काटि रहल छै। चोर जकाँ रगड़ि कऽ मच्छरकेँ मारैत अछि फेर विचारमे हरा जाइत अछि। शीला आइ दुलहिन जकाँ सजल छै। केना ने सजितै? ओकरा बहिनक बिआह भऽ रहल छै। छजन्ता छै। अजय आगूक खत्तामे देखैत अछि। पानिमे चान थरथराइत टहलि रहल अछि। चन्द्रमाँक बगलमे दोसर चानकेँ उगैत देखि चकोरकेँ चकविदोर लगैत अछि। “अन्हारमे चोर जकाँ के बैसल अछि?” “मोन आ दिलकेँ चोरबैबला चोर।” “हँ ठीके मक्खन चोर।” अजय आ शीला सहटि कऽ बैसि गेल अछि। दुनू एक-दोसरसँ अर्थहीन गप कऽ रहल अछि। जइमे अर्थ भरल अछि। दुनू तेना कऽ सटि गेल जे लगैत अछि जेना गहुमन साँपक जोड़ी फेर जोड़ लगल। लोभ फाेंफिया उठल। हाथपर चढ़ि कऽ कामना ससरि रहल अछि। सुगन्धक स्वरूप बदलि गेल अछि। मुखक लाली चारूभर छिड़िया गेल छै। जेकरा ठोर समेटि रहल अछि। कामना आ परेमक डोरि बढ़ले जा रहल अछि। मन्द बसात सँ केराक गाछ हिलैत अछि। सुखदानक संगे पत्तापर सँ पानिक बून भरभरा कऽ गिरैत अछि। अँगनासँ कोहबर गीत आबि रहल अछि। कथी केर मड़बा कथी केरि कोहबर कथी-केरि लागल केबाड़, यौ बिनु बाँसक कोहबर सोने केरि मड़बा, रूपा केरि कोहबर हीरा-मोती लगल छै केबाड़, यौ बिनु बाँसक कोहबर। १४ गामक चौबटिया। असलमे तीनबटियाकेँ सभगोटे चौबटिया नाओं रखि देलकै। दस गोटे जे कहलकै सएह साँच। गाए बाहलै तँ हँ। बड़द बाहलै तँ हँ। की करबै, गामक तँ एहने रूल छै। पीपरक गाछ तर अजय धिया-पुताकेँ पढ़ा रहल छै। ई गप केतेक दिन टोलबैयाकेँ कहलकै मुदा कोइ धियान नै देलकै। केना कऽ धियान देतै, फुरसत हेतै तब ने। खेती-गिरहस्ती आ बीच-बीचमे सराध-बिआह आबि जाइ छै। फेर पावनि-ितहार। संगहि झगड़ा-लड़ाइ तँ सभ दिन होइते रहै छै। एक-दोसराक टाँग पकड़ि कऽ घिचैक तैयारी। दुसमनक काजमे बाधा नै देल हुए तँ सोझहामे हवा जरूर छोडि देत। दुरगन्धे निकलतै। दोसराकेँ बढ़ैत देखि चुप रहब बड़ कठिन। एहेन टोलपर अजय धिया-पुताकेँ पढ़ेबाक कोशिश कऽ रहल छै। लोकक दुआरिपर गप उड़ि रहल छै। “सरकारी नोकरी तँ भेटलै नै। आब चललै, गामकेँ सुधारै वास्ते।” “अपना जेना बड़ सुधरल। दोसरो धिया-पुताकेँ निकम्मा ने बना देलक तँ फेर कथीले।” “बकटेट भऽ गेलै। नै घरकेँ आ ने घाटकेँ। कहै छेलै जे सभगोटे पैखाना कोठली बनाउ। रूपैआ केतएसँ लबतै लोक।” “बकरी-गाए चरेतै तँ दू पाइक उन्नति करतै, धिया-पुता। जँ अजैयाक सभटा गुण सिखतै तँ समाजमे सभसँ लड़ैत रहतै।” किछु लोक सभ जगह अलग तरहक होइ छै। ओकर सबहक सोच भिन्न छेलै। “धिया-पुता उच्चका जकाँ भरि दिन खेलाइते रहै छै। ऐठाम पढ़लासँ फ्रीमे दू अछरक बोध भऽ जेतै। अजैया केहनो छै तइसँ की। काज तँ नीके कऽ रहल छै।” “लोक सभ किछो कहौ हमरा सबहक धिया-पुता पढ़तै।” रसे-रस गाछ तरक स्कूल चलतै की, दौड़ए लगलै। आ ढोढ़ाइ गुरुजी तामसे भेर। दियादक संगे अकलू मड़रक पलिवार ढाठल छै। जाति आगि पानि बन्न कऽ देने छै। ओकर छौड़ा बिच्चेमे बैसि कऽ ककहारा पढ़ि रहल छै। अजय कनीकाल लेल कोनो चलि गेल छेलै। ताबे छौड़ा सभ हड़-हड़ खट-खट शुरू कऽ देलकै। “हे रौ, तूँ तँ ढाठल-बान्हल छी। हमरा सबहक बीचमे किएक एलही।” “ई केकरो दुआरि थोड़बे छै। ऐठाम किए ने एबै।” “नै रहए देबौ ऐठाम। भागि जो, नै तँ बापसँ भेँट करा देबौ।” “बापक नाओं लेबही।” “चटाक-फट्ट” “दुनू तरफसँ थप्पर-मुक्का शुरू भऽ गेलै। पेंट-गंजी फटि गेलै। ठोरसँ खून छड़-छड़ बहए लगलै। छौड़ा कनैत अँगना दिस भगलै।” अजय तेजीसँ पहुँचल। सभकेँ फटकारैत पाँितमे बैसौलक। ओकरा सबहक दिस तकलक। सभटा बनैया धिया-पुता सन लगैत अछि। हजारोक भविस अन्हार दिस जा रहल छै। बचेबाक प्रयासमे अपनो भविस अन्हारमे चलि जेतै। बलिदान तँ करए पड़तै। प्राप्त करबाक लेल किछु हरा जाएब स्वभाविके छै। अकलूक पितियौता भाय रामरती मड़र गरजैत आबि रहल छै। “ई झटकूक बेटा माहटर बनि गेलै। खूनियाँ माहटर। ठीके कहै छेलै, ढोढाइ गुरुजी- हम तँ धान-चाउर लऽ कऽ पढ़बै छेलौं। मुदा अजैया खून लेत।” “की भेल मड़र?” “ई कालू मड़र, सार अपनाकेँ लाइट सहैब समझै छै। अपना धिया-पुताकेँ सनका देलकै। धरहा कुत्ता जकाँ लोककेँ कटने फिड़ै छै। हमरा छौड़ाकेँ अंगा फाड़ि देलक। मारैत-मारैत खून बोकरा देलकै। ई बहींचो मैनजन छी आकि काल। ओकरे धिया-पुताकेँ आइ हम थकुचि देबै।” कालू मड़र ओमहरसँ अबै छेलै। गारि सुनिते गरजैत कहलकै- “ऐ रामरती, मुँह खाली नै कर। मरदक बेटा छेँ तँ हमर कोनो बेदराकेँ हाथ लगा कऽ देखही। ओहीठाम हाथ काटि देबौ।” कुत्ताक झुंड एक दोसरपर भूकए लगलै। धिया-पुता सभ किताब लऽ कऽ पड़ाएल। “भाग रौ खून खतरा हेतौ। दूनूक दियादवाद लाठी-भाला लऽ कऽ निकलि गेल छै। टोलमे हड़कम्प मचि गेलै।” मुँहपुरुख सभ बीच-बचाव कऽ रहल छै। “आपसमे किएक लड़ै छी। सबूर करू। शान्त रहू मड़र। गपकेँ नै बढ़ाउ।” ढोढाइ गुरुजीकेँ दाउ सुतरि गेलै। फेर क, ख, पढ़बैक बदला एक बोड़ा धान लेतै। कुदि कऽ आगाँ अबैत बजल- “सभटा नाटक अजैया कऽ रहल छै। झगड़ाक जड़ि।” दुनू पक्षकेँ लोक सभ ठेल-ठालि कऽ हटा देलकै। असगरे अजय गाछ तर ठाढ़ अछि। गाछसँ स्वर निकलि रहल छै- एकटा बिआसँ हमर जनम भेल। छोट-छीन बीआमे नुकाएल छेलौं। बाहर एलापर हजारो बिआ हमरासँ निकलि रहल अछि। एकसँ अनेक। हमरा छाँहमे केतेक जीव-जन्तु सुखक निसाँस लऽ रहल अछि। तैयो हमरेपर झटहा...। १५ धनुषधारी मड़र टोलबैया सभकेँ जातिक गौरव-गाथा सुना रहल छै। “है यौ, जीबू झा हमरा छोटा जाति बुझैत अछि। हम सभ तँ मगधक धनुष धारण करए बला जाति छी। हमरा सबहक जातिमे की नै अछि। ऐ जातिक केतेको नेता देशकेँ स्वतंत्र केलक। आइओ मंडल नेता अपन अलग पहिचान बनौने अछि। जातिक देवता बाबाक स्थान मगहमे छै। सुनै छी जे महतो बाबा जीवान्तेमे समाधि नेने रहथि। तँए ऐबेरक एलेक्सनमे मंडल सभकेँ सोचबाक चाही जे केकरा जीतौलासँ हमर जाति आगाँ बढ़त।” “मड़र, जनौ आब निकालि लिअ।” “किए यौ, हमर वंशज कोनो छोट अछि।” “धूर अहींक जातिक फुलचनमा एकटा नचनियाँ छौड़ी संगे भागि गेल।” “कहिया यौ?” “दस-पनरह दिन पहिने। बाप तँ दिल्लीमे कमाइ छै। सुनै नै छी- ओकर माए बोमिया रहल छै।” “चुप रह, एक-आध परशंेट सभ जगह अहिना होइ छै। तइसँ की लोक छोट भऽ जाइ छै।” १६ “बाँन्हल जूड़ा खुबीए गेल, नयना नाेर चुबै हे ललना रे दरदेसँ मन भेल बियाकुल किनका जगाएब हे...।” स्त्रीगण गीत गाबि-गाबि धान रोपि रहल अछि। मरद सभ तँ पंजाब दिल्लीमे खटि रहल छै। औरत सभ काज नै करतै तँ खेती-पथारी नै हेतै। औरत सबहक खुशामद करए पड़त आब। गिरहत पाछूसँ कहैत छै- “पाँति सोझसँ लगा। बिराड़केँ पूरा गाड़ि दीहैक। हाथ तेजीसँ चला।” “चुप रह मौगा-गिरहत।” घुनघुनाइत स्वर। औरत सबहक धियान गीतपर छै। ओइ सूरपर हाथो चलि रहल छै। “पूर्वा जे बहै झलमल हे ननदि आब पछिया बहै मधुर हे ननदि भौजाइ मिलि पनिया लँ गेलै जमुनामे उठि गेलै बाढ़ि हे...।” “चुभ्- चुभ...।” कतारमे धानक बिराड़ माटिक सहारासँ ठाढ़ होइत! माटि-पानि-प्रकाश-बीआ-प्रगति- निरन्तर विकास! आड़िपर सँ एक गोटे हल्ला करैत छै- “झटक लाल मड़र स्वर्ग सिधारि गेला। दाह संस्कारमे शामिल हेबाक लेल हकार देल जा रहल अछि।” “करनी देखबै मरनी बेरमे।” “ले सभ काजपर बज्जर गिर पड़लौ। अखने मरबाक टेम छेलै।” “रोपनी टाइममे तँ लोक लहाशोकेँ झाँपि दइ छै- औछाओन तरमे। की करबहक चलह-चहल।” १७ कालू मड़रक दुआरिपर जातिक बैसकी भऽ रहल छै। “भोज तँ लोक अपना मनसँ करै छै। ऐ मे दोसर गोटे की कहतै।” “सुनै छी जे ऐ टोलपर केकरो पुरखा भोज केने रहै। केतेको सभा नोतल रहै। पहाड़ सन भातक गंज। ऐ पारसँ ओइ पार। किछु ने देखा पड़ै। आधा मील तलक लोक पाँतिमे बैसल रहए। जे धिया-पुता हरा गेलै से दू दिनपर भेटलै। रेलबे कातमे भोज भेल रहै। रेलक डरेबर, गार्ड उतरि गेलै। अंग्रेजीमे पुछए लगलै। लाेक पातपर दालि-भात देलकै। खुशी-खुशी खेलकै। ओइ समैमे सम्पति अपार रहै। दिल विशाल रहै। इलाकामे चरचा बहुत दिन तक होइत रहलै- हँ भैया धानुको जातिमे महाभोज चौड़ासी होइ छै। आब तँ फूटहा खा कऽ लोक जीबैत छै। कहाँ राजा भोज...।” “बजहक जागेसर केतेक गोटेेक भोज करबहक?” “हमर हालति तँ बड़ खराप अछि, तैयो हम जातिसँ बहार नै छी।” “हौ एकर बाप तँ लोककेँ खेत-पथार बेचा देलकै। एकरा केना छोड़ि देबै। अजैयाक टेरही अही बेर तोड़ि देबै।” “भोज नै देतै तँ जातिसँ अलग कऽ देबै।” कालू मड़रक धियान जागेसरक पचकट्ठबा खेतपर छै। टक लगौने छै केतेक दिनसँ। धरमानन्द बाबूक धियान जागेसरक चरका बड़दक जोड़ीपर छै। बेचैए पड़तै। जेतै केतए। “हँ, हँ रूपैआ-पैसा भऽ जेतै। बहुत कमा कऽ रखने छै- झटकलल मड़र।” “समाजमे किछु हैसियत देखाबए पड़तै।” “हँ हौ बिना भोज केने स्वर्गक दुआरि केना खुलतै।” “अठगामा लोककेँ नोति दहक। आखिर ओकरे अरजल सभटा खेत छै।” अजय बीचमे आबि बजैत अछि। “दबाइक अभावमे हमर बाप मरैत रहए, तँ केकरा पासमे रूपैआ नै रहै। पैंच, रीन कियो नै देलक। आइ सबहक लग रूपैआ छै। हम बुझै छी राजनैति हम भोज नै करबै।” कहैत, जातिक बैसकीसँ उठि चलि देलक। “हे हे एना नै बजहक।” “आ रे तोरी कऽ सबहक मुँहमे टाटी लगा देलकै। ठीके छै। जहिया जातिक चोटपर चढ़तै तहिया बुझतै।” सब किछुसँ किछु बजैत तामसे गुम्हरैत चलि देलक। १८ खेलावन भगत चौबटियापर चक्कर पूजि रहल छै। एकाश दिस तकलकै। लगलै जेना अधरतिया भऽ गेलै। ओना तँ साँझो-परात लोक एनए नै अबै छै तँ रातिक कोन गप। लोककेँ डर पैसल छै- जे सुनहटमे बाधक चौबटियापर मुँहरगड़ा प्रेत रहै छै। एक दिन उचितवक्ताक कक्का चोटपर चढ़ि गेल रहै। खून बोकरैत-बोकरैत आँखि उनटि गलै। के जानि-बूझि कऽ आगिपर टाँग राखत। “जानि बूझि नर करै ढिठाइ...।” किनकर मैया बाघिन जनमे। केकरा ओतेक हिम्मति छै जे एमहर एतै। खेलावन भगत पूरा निचेन अछि। ओकर आँखि अड़हूल फूल जकाँ लाले-लाल भऽ गेल छै। धोतीकेँ डाँरमे कसने अछि। चाकड़-चौरठ देह, नंग-धड़ंग। आगूमे सजावटिक संग पसरल अछि। अड़हूल फूल, अरबा चाउर सिनूर। एक कातमे मनुक्खक खोपड़ीक कंकाल, दाँत किचने। धधकैत आहूत। पाँतिमे जरैत दीप। धूमन आ घी जोरसँ झाेंकैत अछि। तँ आहूत धधकि उठैत अछि। निशिभाग अन्हरिया रातिमे धरमडीहीवालीक चेहरा चमकि उठैत छै। नमरह-नम्हर खुगल केश। पैघ-पैघ आँखिमे नीनक छाँह। जेना निशाँमे मातल होइ। अधभिज्जू साड़ीसँ देहक किछु भाग झाँपल, किछु भाग उघाड़। बन्न होइत आँखि खेलावनक गर्जनसँ चौंकि उठैत अछि। “जय काली-वन्दी-जोगनी भद्रकाली-कपाली...।” आगूमे जरैत दीप दिस ताकए लगैत अछि। “ओने नै एमहर देख। धधकैत आगि दिस।” खेलावन गरजैत अछि- “जेना कहै छियौ तहिना करैत जो। हमरा औडरकेँ अवहेलना करबै तँ अलटरबाकेँ स्त्री जकाँ सौंसे देह आगि धधकि उठतौ।” धरमडीहीवालीक ठोर सुखा रहल छै। बजतै से सट्ठा नै छै। “नै यौ भगतजी। जहिना कहबै तहिना करबै।” “हँ, करैत जो। तइमे कल्याण छौ। जय काली।” ऊपर दिस तकैत चिचिया उठैत अछि। “गे छुलही गात छोड़ नै तँ जरा कऽ भसम कऽ देबौ।” भगत आँखि गुड़रि धरमडीहीवाली दिस तकैत अछि। “एमहर देखि, हमरा दिस। मुँह किए गाड़ने छेँ। कलशा कऽ जल उठा कऽ पी ले।” “आब हम नै पी सकब। हमरा बुत्ते नै हएत। घंटा भरिसँ तँ पीते छी- घोंटे-घोटे। गलामे जलन भऽ रहल अछि। देहम जेना आगि नेश देने अछि। निन्नसँ आँखि बन्न भऽ रहल अछि। लगै छै जेना आसमानमे उड़ि रहल छी। कहीं बेहोश भऽ जाएब तब।” “चुप छुलाही देखै छी- ब्रह्म पिशाचक देल बेंत। ऐसँ अखने...। मन साधि कऽ। पी ले। इलाज भऽ रहल छौ तँ राति भरि कष्ट हेबै करतौ।” डरे थर-थर कापैत धरमडीहीवाली कलशा उठा कऽ मुँहसँ लगा लेलक। साड़ी छातीपरसँ ससरि गेल। भगत जीक आँखि नाचए लगल। कामनाक चिल्हौड़ सुनहट पाबि गन-गना कऽ उड़ए लगल। स्पर्शक लेल हाथ आतुर भऽ गेल। मन बन्धन मुक्त भऽ बनमे बौआए गेलै। कलशाक बँचल नीरसँ अपन पियास मेटबए लगल। श्राद्ध कर्म एक मास पहिने बीतलै। तहियासँ अजय गपकेँ भँजिया रहल छै किन्तु कुछो पता नै लगि रहल अछि। ओकर भौजाइ कखनो जोगनी जकाँ प्रगट भऽ जाइ छै तँ कखनो भूत जकाँ अँगनासँ निप्पता भऽ जाइ छै। परसू शीलाक गपसँ ओकर माथा ठनकल जखनिसँ धर्मडीहीवाली आ भगतक खिस्सा ओ सुनलक तखनिसँ जेना ओकरा देहमे आगि नेश देलकै। “अरे तोरी के। पूरा टोलकेँ सुधारेबला ठीकेदारक घरेमे भोंकार। लाेक मने-मन कहैत हेतै- अपन घर-पलिबार सम्हरबे नै करै छै आ दोसराकेँ उपदेश देने घुड़ै छै। पर उपदेश कुशल...। अँगना लेल तँ अजय बेकूफ छै। पता नै खेलावन भगत की भरने छै दिमागमे।” साँझेसँ अजय अपना भौजाइक चमक-दमक देखि रहल छै। बिना कारणे टिटही नै लगै छै। अजय ओकरेपर नजरि गड़ौने छेलै। किन्तु छनेमे छनाक। कखनि निपत्ता भऽ गेलै। अजय टाँर्च लेलक आ सभ घरमे इजोत घुमेलक। कहाँ छै केतौ। दुआरिपर ओकर भाय जागेसर खोंखिया रहल अछि। अजय सोझे दौगल- गहवर दिस। हाय रौ तोरी। भगत गहबरसँ पार भऽ गेल छै। केतए हेतै? शीला चौबटिया परक नाओं कहने रहै। घोड़ा जकाँ दौगल अजय। हकमैत चौबटियापर जूमि गेल। आगूमे देखैत अछि। खेलावन भगत धरमडीहीवालीक साड़ी खोलि रहल अछि। एहनो हालतिमे धरमडीहीवाली साड़ीकें भरि मुट्ठीसँ धेने अछि। चीरहरण सफल नै भऽ रहल अछि। अजय लपकि कऽ भगत जीक बेंत उठौलक आ तड़ा-तड़ि खेलावनक पीठपर बरसबए लगल। ऐ अप्रत्याशित आक्रमण लेल भगत तैयार नै छल। ओकर दिमागक काज जेना बन्न भऽ गेल। तैयो पलटि कऽ गरजल- “के छेँ? आइ जरा कऽ तोरा राखए कऽ देबौ। जय माँ काली...।” अगिला शब्द ओकरा मुँहसँ नै निकलि सकल। फटा-फट बेंत ओकरा कपारेपर खसए लगल। छड़-छड़ा कऽ कपारसँ लहू बहए लगलै। माथ पकड़ने पड़ेबाक कोशिश केलक। धधकैत आहूत अजय ओकरा देहपर उझलि देलकै। “हौ बाप हौ। गे माइ गे।” डिरिया उठल। अजय पाछूसँ गरजल- “ठहर सार, आइ सभटा तंत्र-मंत्र तोरा पाछाँसँ भीतर ठूसि दइ छियौ।” “हौ बाप आब मरि जेबइ हौ।” कहैत लंक लऽ कऽ भागल भगत। अजय किछु दूर रेबाड़लक। फेर आपस आबि धरमडीहीवालीकेँ सम्हारि कऽ उठौलक कहुना घिसियाबैत टोल दिस चलि देलक। १९ सौंसे टोल खबरि गनगना रहल छै। केतेक गोटे अधरतियासँ जगले रहि गेल। केतेक गोटे अधरितियासँ जगले रहि गेल। डर केना नै हेतै? सौंसे टोल निशिभाग रातिमे भूत कहरै छेलै। कुहरौआ भूत। डिबिया नेस कऽ लोक समए कटलक। गाममे कोनो बिजली बड़ै छै। डरे अन्हारमे केतेक लोक अँगनेमे लगही केलक। कथाी छी कोन ठेकान। कहीं ऊपरेसँ झपटि लेत तँ जुलुम भऽ जाएत। राति-बिराइत के केकरा देखै छै। सभ दूरेसँ ‘हो-लगऽ-लगऽ’ करत। किछु हिम्मतगर छौड़ा सभ भिनसरबेमे बाहर निकलि गेल। टोह लऽ रहल अछि जे कुहरैक स्वर कोन दिससँ आबि रहल अछि। सबहक अनुमान अछि जे अकलू मड़रक पछुआर चोटाह छै, जैठाम जोड़ लगैत गहुमन मारल गेल, आही झँखुरा दिससँ अबाज अबै छेलै। अखनी अन्हार पूरा फरीच्छ नै भेल छै। ओम्हर जेबामे साँप-कीड़ाक सेहो एकटा डर। तँए सभ गोटे अकलू मड़र घरसँ पूरब तीन बटियापर ठाढ़ अछि। पछुआरक ऊ जमीन शाइत परती अछि। तब ने कोइ नै जोत-कोड़ करैत छै। धुर, हमरा तँ बुझाइत अछि जे केकरो डीह-घराड़ी पहिने छेलै। हे रौ, धरमानन्द बाबू पोखरि दिससँ आबि रहल छै। ओकरेसँ पुछल जाए। हे यौ, अकलू मड़रक पछुआरबला जमीन किएक परती जकाँ पड़ल रहै छै? धरमानन्द बाबूक पएर ठमकल। छौड़ा सभ दिस तकैत बजल- “बूझल नै छह- जोतबैया बिना खेतबा पड़ल परती। दुखन आ शान्ति मड़र दूनू भाँइक घराड़ीबला अछि ऊ जमीन।” “ओ सभ केतए चलि गेलै?” “दुखन मड़र बड्ड झगरौआ रहै। झगड़ाबला जमीन खोजि-खोजि कऽ कीनै छेलै। माने झगड़ा खरीदै छेलै। एकबेर पछबरिया टोलक बरियासँ पल्ला पड़ि गेलै। ओ सात भाँइक भैयारी। धिया-पुता हर-हाकिम। तेहेनकेँ चपाठलकै जे सभ सेर-सम्पति बिका गेलै। शान्ति मड़रसँ झगड़ा करैले कहै। मगर शान्ति मड़र किए जाएत। मोकदमामे आधा खरचा मँगै ओ नै दइ छेलै। दुखन एक दिन ओकरो कान-कपाड़ फोड़ि देलकै। बेचारे शान्ति मड़र अपन हिस्सा किछु बेचलक किछु छोड़ि-छाड़ि कऽ शहर भागि गेल। सुनै छी जे ओकर बेटा सभ बड़का-बड़का हाकिम बनि गेल अछि।” “आ दुखन मड़र केतए गेलै?” “जब रहै धन वित्त नित अबै रे पहुनमा, आब दोस-बोन छोड़लक दुआर।” खेत-पथार बिका गेलै। सेर सम्पति सभ नाश भऽ गेलै। अन्न पानिक अभाव। धिया-पुता बिलटि गेलै। अनटूटू धिया-पुता दबाइ-दारूक अभावमे मरि गेलै। हौ बाप डुबै छी। हौ बौआ हाथ-पएर चलाबह। एने तँ करम भेल रहै बाम। हौ, आब की कहेबह। शान्ति मड़र जखनि मरलै तँ कफनक कपड़ा आ अछियाक लकड़ी सभ चंदा मांगि कऽ पुराओल गेलै। ओइ दिनसँ ओकर डीह-घराड़ी परती बनल छै। वंशक एकमात्र टीका पंजाबमे बसल छै।” “हौ, पछुआरमे कही शान्ति मड़र प्रेत बनि कऽ नै बैसल छै।” “धुर, ई बहुत पहुलका गप अछि। चलू आब फरीच्छ भऽ गेलै। किछु छै आकि सभ निपत्ता भऽ गेलै। देखबो करबै।” डराइत-धकमकाइत सभ पछुआरमे पहुँच गेल अछि। “कहाँ छै केतौ किछो। हवामे बिला गेलै साइत। रौ टाँग बँचा कऽ रखिहेँ। कहीं साँप-ताँप हेतौ।” “रौ, बिचला झँखुड़ा बड्ड हिलै छौ।” “रौ बहिं, हइया रौ करिया प्रेत। मरि कऽ पड़ल छौ।” “भाग रौ जल्दी।” “ठहर, हमरा ठीकसँ देखि लिअ दे।” “नाँगटे छै। धोती तँ कटहा झाड़मे फँसल छै। रहतै नै उघारे।” “हौ बाप ई तँ खेलावन भगत अछि। हौ, दौड़ै जा। देखहक कोन हाल भेल छै। मारैत-मारैत हगा-मूता देने छै।” “पानि ला रे। छींट मुँहपर। पूरा होशमे नै छौ। भुट वैदकेँ सोर पार।” स्त्री-पुरूष ढेर लगल जा रहल छै। औरतिया सभ नाँगट देह देखिते नाक नुआँसँ मुनैत पड़ाइत अछि। “मारह मुँह धाय कऽ। हे रौ मुँहझौंसा सभ, पहिने आकरा बस्तरसँ झाँपि देबही, से नै।” “किए भौजी ऐ सँ पहिने ई चीज नै देखने रही अहाँ?” औरतिया सभ गारि पढ़ैत पाछाँ घुसकल जा रहल अछि। “हौ सौंसे देहकेँ झड़का देने छै। पीठीपर लाठीक चेन्ह छै।” “होशमे आबि गेलै। की भेल भगतजी?” कुहरैत बाजए लगल। “हौ, असल चंडालिन जोगनीसँ युद्ध भऽ गेल छल। ओहने कसगर भूतक सेना छेलै- ओकरा सँगे। कहुना राति भरि लड़ैत-लड़ैत गामकेँ बचेलौं। हमर दशा तँ देखिते छहक। तोरा सभकेँ बँचबै खातिर...।” “आ रौ तोरी के, इएह छेलै कुहरैबला प्रेत। गौआँ-घरूआ तँ उल्टे एकरे मारितै, अन्हरिया रातिमे। लुक्का लऽ कऽ झड़काबैत।” “हे यौ भगत, अइठाम केना पहुँचलौं?” “सभटा भूत, जोगनी, देवीकेँ मारि कऽ भगा देलिऐ। आपस होइत काल बेहोश भऽ कऽ गिर पड़लौं। ऐ टोलक लेल तँ हम अपन जान अरपन कऽ देलिऐ। आब जाने समाज।” “धनि छी अहाँ भगतजी। टोलक लोक अहाँक सँग अछि अहाँ लेल तैयार अछि सभ जी-जानसँ।” “देखहक हौ, धरमडीहीवालीकेँ लोक सभ टाँगने जा रहल छै। अजय पाछाँसँ दौगल जा रहल छै।” “सुनै छी अस्पताल जा रहल छै। पुछलाक बादो किछु नै बजै छै अजय।” “बजतै केतएसँ। गप्पे हेतै ओहने। जे बजलासँ...।” अजयकेँ नाम सुनिते खेलावन भगत टन-टना कऽ ठाढ़ भऽ गेल। पछिम दिस चलि देलक। “हे यौ भगतजी, अहाँ केतए जाइ छी। अहाँक तबीयत बड्ड खराब अछि। चलू गहवर घर पहुँचा दैत छी।” “नै, हम आब नै ठाढ़ रहब। हम जा रहल छी। हमरा बहुत दूर जेबाक अछि। गुरुसँ भेँट करबाक अछि। वएह हमरा जान बँचा सकैत अछि। नै तँ रातिमे की हएत से पता नै।” “हे यौ सुनू भगतजी, कनीकाल मोन मारि सुस्ता लिअ।” “नै-नै आब नै रोकू हमरा। जुलुम भऽ जेतै।” दुलकी मारैत पछिम दिस चलि देलक। टाँगमे जेना पाँखि लगि गेल हुअए। अा तहिना लोगोक मनमे जेना पाँखि लगि गेल हुअए। “रौ, रातिमे सबेरे घरक भीतर बिछौन पकड़ि लीहेँ। साँझे लगही झाड़ि कऽ कऽ लीहेँ।” “चोर-छीनारकेँ खौब सुतरतै।” मरद भऽ कऽ मौगी जकाँ किएक गप करै छी। चल, अपन-अपना डेढ़हथ्थी पिजा। रोइयाँ नै भगन हेतै केकरो।” ईह, बड़-बड़ घोड़ी भाँसल जाए, छोट घोड़ी कहए कहाँ छै पानि। भोरका सुरूज उगि आएल अछि। पत्तापर सँ ओसक बून चाटि रहल अछि। बसातक ठण्ढीसँ देह सिहरि रहल अछि। चिड़ै-चुनमुनी अहारक खोजमे चलि देने अछि। पानिक जीव सभ पोखरिमे हलचल शुरू कऽ देने अछि जेना। गिरहतक स्वरकेँ संगे बड़दक घण्टी बाजि रहल अछि। टोलसँ ऊपर धुइयाँ उड़ि रहल अछि। सूतल प्रकृति जेना शनै: शनै: जागि रहल अछि। किन्तु ऐ टोलबैयाक माथपर शंका आ डरक छाँह पसरल जा रहल अछि। २० कालू मड़रकेँ अँगनासँ दुआरि धरि लोक सभ सह-सह कऽ रहल अछि। किछु लोक गप हाँकि रहल अछि। गीत-नाद भऽ रहल छै। “कालू मड़रकेँ अँगनामे होम होइ छै- जाप होइ छै हाेमक धुइयाँ अकास उड़ि जाइ छै।” अँगनामे औरतिया सभ गीत गाबि रहल अछि। घरमे हवन कुंड जरि रहल छै। होम-जाप भऽ रहल छै। केना नै हेतै। घरपर गिद्ध बैसि गेल रहै। अशुद्ध आ अपवित्तर घरमे केना रहितै। धड़फड़ीमे एकबेर भुटाय वैद्यक घरमे साँप मरबा लेल छोट जाति ढूकि गेल रहै। ओकरो शुद्ध करबए पड़ल रहै। ई तँ साफ-साफ घरपर गिद्ध बैसल रहै। भारी अपावन। मरल गाए-मालक सड़ल मासु खाइबला गिद्ध। पण्डितजी केतेको परकारक लकड़ी मँगोने छै। घी, धुमन, जअ-तिल, मधु सेहो सभ। होमक धुइयाँ जतए-ततए जेतै। सभ शुद्ध भऽ जेतै। होमक बाद टोलबैयाकेँ भोज-भात देल जेतै। देखै छहक ने चूल्हा पजारि देने छै। तीमन-तरकारी कटबा रहल छै। हौ, ई तँ बिना मतलबक खरच भऽ रहल छै ने। आखिर कौआ-पंछीक जखनि डेन दुखा जेतै तँ ओ गाछपर नै तँ चारपर बैसबे करतै। गाछ तँ आब बड़का-बड़का छेबो नै करै। हे रौ, कौआ-पंछी आ गिद्धमे फरक छै ने। सुनने नै छी गिद्ध मारि गिद्ध करे अधारा...। की यौ साहैब। ओना तँ गिद्धोक संख्या घटि गेलै आब। धुर छोड़ह, आदमकद भेलासँ आदमी थोड़े भऽ जाए छै। हँ हँ, तूँ सभ मनुक्ख छहक। और सभ तँ बानरे छै। ओइमे परिवर्त्तन हेबाक चाही। केतएसँ बिच्चेमे भगतिया सभ आबि गेलै हौ? मैयाक डाली उठि गलै शाइत। केकरो सपन देने हेतै। हँ हौ, देखै छहक ने सभसँ आगू। डालीमे माइ सजल छै। तेकरा पाछू भगत बेंतसँ इशारा करैत वाक् दऽ रहल छै। सभसँ पाछूमे भगतिया सभ भगति गाबि रहल छै। ...चकमक-चकमक करैत कहमाँसँ एलै हे मैया...। जेहने झालि बजौनिहार तेहने मिरदंगिया। सुनहक की कहै छै- भगत। सुनु हे दाइ-माइ सकले-समाज। हमरा सपन देलक माइ। जे हम सिलौट-लोढ़ीमे परगट भऽ रहल छिऔ। कोइ मसाला पिस कऽ नै खो। पनरह दिनक बाद सभ अपना देव-पित्तर लग माथ लगाबिहेँ। पूजा-पाठ केलाक बादे मसाला पिस कऽ खा सकैत छहक। दस गामसँ माँगि-चाँगि कऽ पूजा-पाठ कएल जेतै। तब देवी माइ खुश हेती। आब सौंसे टोलसँ चाउर आ रूपैआ माँगि कऽ भगत लग जमा करहक। परसाल हल्ला भेल रहै जे औरतिया सभ अपना-अपना नैहरासँ लबका साड़ी, चूड़ी पहिरि कऽ सासुर एतै। आ सासुरमे घीसँ भरि राति दीप जरौतै। तब ने साड़ी, चूड़ीक दोकानदार सभ मालो-माल भेला। फेर ऐबेर कोनो मसाला कम्पनीबला नाटक केने हेतै। हौ, शिक्षित नै बनबहक। आर्थिक सुधार नै करबहक। तँ ऐ अन्हरजालीसँ बँचबो नै करबहक। चारूभर तँ अन्हरेसँ घेरल छहक। ओ हो देवी-देवताकेँ तँ निरमान लोके ने केलकै। दोख केकर? ई अजय एक नम्बरकेँ बकटेट अछि। जेकर धिया-पुता एकरा लग बैसतै सभ बकटेट भऽ जेतै। हम तँ अपना छौड़केँ ममहर पठा देने छी। देवी-देवता किछो नै बुझै छै। अहंकार देखबै छै। नाश हेबाक पहर छै। एहेन लोककेँ तँ गामसँ भगा देबाक चाही। तोरा सबहक विचार उनटि गेल छह। पढ़बहक-लिखबहक नै तँ अहिना हेतह। नया ढँगसँ खेती-वाड़ी नै करबहक तँ सभ दिन भूखे मरबहक। फँसले रहबहक पुरना जालमे। मरैत-रहअ आ सड़ैत रहअ। मुरुख चपाट। हे रौ पहिले अपना पलिवार आ कुल-खनदानकेँ सुधारि ले। पढ़ा-लिखा ले तब लबरपन्ना करिहेँ। आ बेसी मुरुख-मुरुख कहबेँ तँ अखने...। ईह उचित कहैत घर झगड़ा। हाँ हाँ, चुप रहू मड़र। अस्थिर रहू। की मुँह लगबैत छी। अरे जे जस करै सो तस फल चाखा। हँ हँ ऐठामसँ चलू। नै तँ झगड़ भऽ जाएत। होमक काज भऽ गेलै। चलै चलू भोज खेबाक लेल। लोक सभ बैसि रहल छै। भोज खाइबला पंच सभ पाँति लगा कऽ बैसल छै। केराक पातपर दालि-भात, तीमन-तरकारी परसल जा रहल छै। हौउ, शुरू करू भोजन। रौ तोरी के, घी कहाँ पड़लै हौ, बिसरि गेलहक की? नै यौ, घी तं सभटा होममे जरि गेलै। बँचल रहितै तब ने। सभटा आगिमे डाहि देलहक। ई तँ काबिल लोकक काज अछि। वातावरण केहेन हम-मह करै छै। सुकरातियेमे तँ टीकमे तेल पड़ैत। कहियो-काल भोजे-काजमे जी कऽ घीबक सुआद मन पड़ैत छल। तहूपर बज्जर गिरल। जल-ढार भऽ गेलै। झब-झब खा ले। देखै छी ऊपरमे। गिद्ध फेर चकभौर मारि रहल छै। कहुना केकरो चारपर फेर बैसि जाए। बैसबे करतौ। जतए एहेन अधरमी लोक रहतै आ देव-पितरकेँ निंदा करतै ततए कुछो भऽ सकैत अछि। दालि-भात आ तीमन-तरकारी पाँते-पाँत दौग रहल अछि। हौ पानि चला दहक। बक्-बक् गाड़ा लगैत अछि। आरो तोरी के, भगै जो रौ। फेर कालू मड़रकेँ चारपर गिद्ध बैसि गेलै। देखहक हौ, जुलुम भऽ गेलै। गिद्ध तँ ओंघरा कऽ निचा गिर पड़लै। हौ, गिद्ध मरि गेलै। दौड़ै जा हौ। सभ देखबाक लेल दौगल। भात-दालि टाँगसँ धँगा गेलै। भोज घिना गेलै। अधा खा कऽ किए भागल-लोक सभ। भागत नै तँ गिद्धे जकाँ जान देत। पपियाहा! महा अनिष्ट केलक। तब ने एहेन गप भेलै। बेमरियाह माल हेतै नै तँ साँप कटलासँ मरल मवेशी हेतै। ओहन बिखाहा मासु खेतै तँ गिद्ध मरबे करतै। फेर ई दोसरे बात। आब कोन उपए हेतै हौ देव। हौ समाजक लोक। महा अनरथ भऽ गेलै। सभकेँ ठकमुड़ी लगि गेल छै। गप कटाबलि चलि रहल छै। किछु डेरबुक सभ ससरलो जा रहल अछि। की हेतै की नै। अँइठ-कुँइठ सबहक देहमे लगि गेल छै। धाेइले पहिने। एहेने समैपर लोक अपन-अपन गम्भीर विचार रखि सकैत अछि। आब करहक बड़का होम-जाप आ महाभोज। सभसँ फराक भऽ कऽ कालू मड़र मुँह बाबने ठाढ़ अछि। टक-टक आसमान दिस तकैत। मने-मन बिदबिदा रहल अछि। जेना कोनो मंत्र आसमानमे भेज रहल अछि। आकि कोनो देव-पितरसँ गप कऽ रहल अछि। २१ “ढोढ़ाइ गुरुजीक भाय सिफैतकेँ नोत देबही तँ हमरा सभ भोज नै खेबौ।” “ठीके, ओकरा बध लगल छै। ने पूजा पाठ केलक ने गंगा असलान केलक। तब पाँतमे बैसि कऽ खाएत। हम बरदाश नै कऽ सकै छी, ई गप। जाति आ धरमक गप अछि। एनामे तँ लोक बहैश जाएत।” भोज होइसँ पहिले नोत दइकालमे दसगोटेसँ सलाह-विचार तँ करै पड़ै छै। भोजक सुगन्धसँ लोक चट दऽ जमो भऽ गेल। आपसी विचार करए लगै छै। हौ की भेल रहै? केना वध लगलै।” “हौ हाटसँ साँझमे खरीद कऽ लाबने रहै। रातिमे बान्हले बड़द मरि गेलै।” “हौ, कथीसँ खेती-पथारी करतै। बुझहक जे बजर खसि पड़लै।” “बेमानीक टका-पैसासँ खरीदने हेतै।” “बेचाराकेँ ऐबेर खेती मार भऽ जेतै।” अजय ठाढ़ भऽ कऽ गप सुनैत छल। ओकरा नै रहल गेलै तँ बजल- “ओकरा तँ दुख पड़ले छै। ऊपरसँ अहूँ सभ तँ परान खींचबाक लेल तैयारे छी।” “आब सुनियो अजयक गप। ई ऐ टोलमे कोनो बन्हन नै रहए देतै। सभकेँ बिगारिकेँ छोड़ि देतै। एकोबेर इनसाफक बात नै करै छै।” “इनसाफक गप हम नै करै छी। अहाँ लबकीकेँ बेटीक साथ इनसाफ केलिऐ? ओकर बेटी बीख खा कऽ मरि गेलै। के नै जनै छेलै जे ओकरा पेटमे कनफट्टा बनियाक बच्चा पलि रहल छै। कनफट्टा ओकरा सँगे जोर-जबरदस्ती केने रहै।” “कहाँ गछलकै पंचैतीमे?” “पंचैतीमे केतएसँ गछतै। ओइसँ पहिने कनफट्टा लोभ दऽ देलकै। जे हम तोरा संगे बिआह कऽ लेबौ। तोहर पलिबारक खरचा हम अपना दोकानसँ चलेबौ। ऐ कारणे लबकीक बेटी पंचैतीमे कनफट्टाकेँ बँचा लेलकै। पंचो सभ टाका-पैसा नेने रहै। सभ बातकेँ मटिया देलकै।” “बादमे तँ सभ पंच लग गेल। पएर पकड़ि सभटा गप कहलक। अहाँ सभ कहाँ कऽ सकलौं-इनसाफ। उनटे ओकरा बेहया-बेश्या कहि कऽ दुतकारि देलिऐ। तब ने बेवश भऽ कऽ ओ बीख पीबि लेलकै। ओकर हतियाकेँ पाप केकरापर गेलै? केकरा वध लगलै?” “हौ, हमरा सभ पिंगल पास थोड़े छी। दू आाखर जे पढ़ि लेलक से आसमानेमे भूर करै छै।” “हमरा सभ उनटा बजै छी की अहाँ सभ। सुकरातिक दिन जे सुगरक बच्चाकेँ मरखाहा भैंससँ खून करबा दैत छी, ओइ बच्चाकेँ भैंस रगड़ि-रगड़ि जान लैत रहै छै आ अहाँ सभ ताली मारैत खेंखियाइत रहै छी। भैंसकेँ घुमा-घुमा कऽ लबैत रहै छी। जे कहुना सुगरक बच्चाकेँ मारि दै। एकटा छोट जीवकेँ अपना सोझहामे जानि बूझि हत्या कराबैत काला अहाँ सबहक इनसाफ केतए चलि जाइत अछि। ओइ समैमे सभकेँ वध लगैत अछि की नै? सभकेँ वध लगल अछि। सभ जाउ गंगा-स्नान। अहाँ सभकेँ अन्दरमे वध करबाक प्रवृत्ति अछि।” “हे रौ एकरा ऐठामसँ भगा। नै तँ सभकेँ नाश कऽ देतौ। केकरो बजै नै दैत छै।” “यौ मड़र सबहक नाशसँ नीक जे एकटाकेँ नाश भऽ जाए। बहींचो..। एना कहुँ बजै छै।” “फेर मुँह सम्हारि कऽ गप करू नै तँ ठीक कऽ देब।” “हाँ, हाँ अस्थिर रहू। झगड़ा भऽ जाएत। हे रौ हटा दुनू गोटेकेँ।” किछु गोटे दुनूकेँ ठेलि-ठालि कऽ हटा रहल अछि। २२ चौबटियापर गाछ तर चारि-पाँच युवक गप हाँकि रहल अछि। जइमे सिंहेसरा, अजय, घनमा, उचितवक्ता ठाढ़ अछि आ दूटा छौड़ा कनी हटि कातमे फुसराहटि कऽ रहल अछि। रामरती मड़रकेँ आगू दऽ कऽ जाइत देखि उचितवक्ताकेँ नै रहल गेलै। “बित्त भरिक बितबा, बितौसँ छोट, चलैत अछि बितवा टेरैत मोछ।” रामरती मड़र तमसा कऽ पाछू घुमि देखलक। गारि मुँहमे आबि गेल छेलै। छौड़ा सभकेँ बेसी संख्यामे देखि घुनघुनाइत चलि देलक। “बुढ़बा बड्ड तमसाह छै। घमण्डी नम्बर एक।” “खूटा बले पररू डिरिया रहल छै। ऐ टोल परक जेतेक मुँहपुरुख अछि सभटा जीबू बाबू नै तँ अच्युतानन्दक गुलाम बनल अछि। तब ने झँपले-झाँपल ओकरे सबहक जूति-भाँति अहू टोलमे चलै छै।” “गुलाम तँ सभ बनले रहितै। संयोगसँ पंजाब-दिल्ली कमेबाक रस्ता खूलि गेलै। सभकेँ आगाँ बढ़बाक रस्ता भेटि गेलै। लबका हवा-पानि लगलासँ बुधिक विकास भेलै। नै तँ आइओ बेगारमे गिरहत सभ जौड़ी बँटबाबैत, वाड़ीमे खटाबैत।” “बेगार आइओ छै। खाली ओकर रूप बदलि गेलै। बुधिक विकास की हेतै। आइओ ऐ टोलक स्कूल मालिक टोलपर बनले छै। आ आहीमे बान्हल साँढ़ डिरिया रहल छै। बाँआँ-आँ।” “नै यौ, एकरा विरोधमे एकता हेबाक चाही।” “पहिले पढ़बहक तब ने, एकता करबहक। संघर्ष तँ आगाँक गप छिऐ। जड़िमे स्कूले पार भऽ गेल छै।” “पनरह दिनपर मास्टर साहैब मुँहपुरुखक दलानपर आबि हाजरी बना लैत छै। सभटा मुँहपुरुख मास्टरकेँ दोस-महिम अछि।” “हे यौ, लोक सभ तँ गाए-चरौनाइकेँ नीक बुझै छै। कहै छै पढ़लासँ की हेतै।” “हँ हँ। नम्हर भेलापर चोरि सीखतै।” “मुदा भोजकेँ नीक बुझै छै। तब ने केते पलिवार भोजक कारणे सभ जमीन जथा बेचि देलकै।” “हौ, सुनै छी जे फुलचनमा गबैया एकटा नचनियाँ छौड़ी संगे भागि गेलै केतौ। आरे तोरीकेँ उनटे बात।” “नीक केलक। नटुआ मनोरथकेँ बूढ़मे खाइओपर आफत रहै छै।” “गप तँ भँसिया गेलै। रामरती मड़र किएक खिसिया गेल छेलै?” “हँ, बीत भरिक बीतबा। बुझलहक नै।” “कहबहक तब ने बुझबै।” “एकरा बापक नाम रहै- बिताय मड़र। भुट्टा आदमी आ बड़का-बड़का मोछ।” “जमानाक गप कहै छहक।” “हँ हौ सुनलाहा गप। एकर बाप बिताय मड़र चारि बरसक रहै। ओही समैमे बिआह करैले गेल रहै। रातिमे तेतेक कनलै जे भोरे माएकेँ जाए पड़लै। गामक कातमे जा कऽ बितायकेँ दूध पिऔलकै। मुदा बिआह भेलाक बाद निकललै बिताय। धोती-कुरता पहिरने। मोंछपर हाथ फेरैत। टेढ़िया चालि धेने। पाछाँमे साड़ी पहिरने छोटकी कनियाँ। कनियाँ-पुतरा सन। ओही दिनसँ ई फकरा लोक कहै छै। बीत भरिक बीतबा बितौसँ छोट। आइओ तँए ओकरा बेटाकेँ आँतमे लगि जाइ छै। आकि हेतै आेकरा बेटो बिआहमे सएह भेल।” “की भेल छेलै। बुढ़बा मड़र कहै छेलै।” “बिताय मड़र सोचलक अपना बेटाकेँ बिआहमे गलती नै करबै। धिया-पुतामे बिआह नै करबै। बेटा जुआन भऽ गेलै तँ लड़की ओकरा उमेरक भेटबे नै करै। लड़की जुआन घरमे राखतै तँ सभ कहतै- बुढ़िया बेटीकेँ घरमे कुमारे रखने छै। अन्तमे बिताय मड़र अपना बेटाकेँ कमे उमेरक लड़कीसँ बिआहलक। सभ कहै- बुढ़बा लड़िका केतएसँ उठा आनलकै। कनियाँ नैहर आएल तँ सासुर जेबाक लेल तैयारे नै होइ। बुढ़बाकेँ बेटा झगड़ा करै। केतए कहाँ बिआह कऽ देलक। अन्तमे बिताय अपना भाए संगे समधीक घर पहुँचल। समधी घरसँ अनुपस्थित रहए। समधिन अँगनासँ समाद भेजलकै- अखनी हमर बेटी धिया-पुता छै। सासुर नै जाएत। खिसिया कऽ दुनू भाँइ आपस भेल। गामसँ बाहर भेलापर देखलक- जे ओकर पुतोहु साग तोड़ि रहल अछि। बिताय मड़रक भायकेँ ललकारा देलक- “की देखैत छी लऽ चल ऐठामसँ उठा कऽ। फेर बारहटा बहाना करतौ। गामपर छौड़ा छुरी फनका रहल छै। ललकारा सुनैत ओकर भाए कनियाँकेँ कन्हापर उठा लेलक। कनियोँ बाप-बाप चिचिया उठल। आवाज सुनि चारूभरसँ गौआँ दौगल। केतेक लाठी-फराठी दुनू भाँइक देहपर टुटलै पता नै। फेर पंचैती भेल। कनियाँ सासुर आएल। गर्भवती भेल। किन्तु बच्चा जन्मै काल माएकेँ खा गेल।” “तँ ई खाम सनक औरतिया के छी यौ? सुनै छी जे मंतरसँ गाछ हँकै छै।” “गप हँकै छी कि अकासमे भूर करै छी।” “धुर, ई तँ चुमौनवाली लबकी छी।” “हे रौ, भाग रौ रामरती मड़र फेर अबै छौ।” सभ धड़फड़ा कऽ चलि देलक। कौआ-मैनाक लड़ाइ शुरू भऽ गेल। जेकरा कियो नै देखलक किन्तु गाछ देखलक। आर बहुत किछु देखतो गाछ चुप्पे रहल। २३ धरमानन्द बाबूक दुआरिपर महाभारतक कथा भऽ रहल छै। कथा बाचककेँ हाव-भाव आ टहकार लोकक मनकेँ मोहि लैत छै। संगे भोज-भात सेहो हेतै। “आइ दिन शुभ अछि। तब ने सरकारो शुभ दिनकेँ एलेक्सन करबा रहल छै।” “भोँट खसबए लेल तँ हमरो जाए पड़त। पहिले किछु देर सुनि लैत छी। भोज सबेर होएत तँ खा-पीबि कऽ भोँट गिरबै ले जाएब।” “अखनी तँ मालिक टोलक लोक लाइन लगा कऽ भोँट खसबैत हेतै।” “हँ यौ, भोँट तँ ओही टोलक इसकूलमे गिरतै। ऐ टोलक इसकूल ओही टोलपर बनि गेलै।” “इसकूलकेँ तँ गौशाला बना देने छै। बड़का लोकक धिया-पुता ओइमे पढ़ैत नै छै तँ की हेतै।” धनुक टोलीक लोक धरमानन्द बाबूक दुआरिपर महाभारत कथा सुनि रहल छै। “जुआ खेलैमे द्रोपदीकेँ हारि गेलै। पाण्डव सभ तामसे फनकि रहल छै। किन्तु बेवस छै। झूठक सहारा नै लऽ सकैत अछि। आब चीरहरण हेतै।” अजय दू-तीन संगीकेँ संग नेने सभकेँ कहि रहल छै- “हे यौ, भोँट गिरा लिअ। पाँच बरिसपर एहेन अवसर भेटै छै। अपना नेताकेँ चूनि लिअ।” “के जाएत। एतए अमरीत वाणी बरिस रहल छै। भोँट तँ दू घंटा बादो गिराएल जाएत।” धरमानन्द बाबूकेँ ऐबेर नेता सभ भोँटक लेल रूपैआ घूस नै देने छै। छौड़ा सबहक आगू ताश पसरल छै। मुँहपुरुखक नाटक। “मंडल नेता एलेक्सनमे ठाढ़ छै।” “की जाति की पर-जाति। एलेक्सनक बाद तँ कोनो नेताकेँ दरशनो दुरलभ भऽ जाइ छै।” “कोइ सरकार बनो। कुछो नै होइ छै। की भेलै पचासन बरिससँ।” “हँ हँ, पहिले भोज खेबै तब भोँट गिराबै लेल जेबै। ऐबेर तँ कोनो फायदो नै छै।” तीन बजेमे खा-पी कऽ सभटा धनुक टोलीकेँ लोक भोँट गिरबए लेल पहुँचल। अच्युतानन्द बाबू आँखि उनटा कऽ तकैत अछि। “एतेक लोक केतएसँ आबि गेलै।” अच्युतानन्द बाबूक जेठका बेटा उचितवक्ताकेँ धकियबैत अछि। “रे पाछू हट। तूँ भोँट गिरा नेने छीही।” “हम तँ अखनी एबे केलौं, भोँट गिरा कऽ जाएब।” “भाग, हमरा इसकुलपर सँ।” “केकरो बापक इसकुल नै छिऐ।” “सार, बापक नाम लैत छेँ। भेँट करा देबौ।” “मार चारि चमेटा रौ।” थप्पर-मुक्का चलए लगलै। अच्युतानन्द बाबूक इशारा पाबि पुलिसिया डण्टा बरिसए लगलै। “फटाक... सटाक...।” हड़विर्ड़ो मचि गेलै। लोक बाप-बाप चिचिया उठल। उचितवक्ता मारि खा कऽ बाहर निकलैत बाजल- “ठीके कहै छेलै अजय। कियो बात नै मानलकै। तँए ओते भोज खेलक चेला बनि आ एते मारि खा कऽ महंथ भेल।” दोगा-दोगी सभ भागि रहल अछि। २४ सुरूज डुमल हो वा धरती घूमल हो। मुदा अन्हार तँ पसरल जा रहल छै। अन्हार भेलासँ पहिने शीला घर नै पहुँचतै तँ ओकर काका मारैत-मारैत चमड़ी खैंच लेतै। केना नै मारतै? जवान-जहान लोक अन्हार-धुन्हारमे घरसँ बाहर। अपन माए-बाप नै। ओकरा जन्मसँ पहिले बाप ओकर माएकेँ राँड़-मसोमात बना कऽ उड़ि गेलै। शीला दस सालक भेलै तँ माए अनाथ बना कऽ संसारसँ भागि गेलै। काका-काकीक सहारासँ जिनगी कटि रहल छै। थप्पर-मुक्का चलब कोनो खास नै। लाठीक चोट आ दगनीक दाग पड़लै तब खास गप भेलै। भूख सहाज करै छेलै तँ देह दुबरा गेलै। समैपर खेलक तँ खायपेट्टी नै खेलक तँ भूखले रही कोढ़िनियाँ। सभ दिनेसँ सिनेहक भूखल छेली बेचारी। बचपनेसँ अजय आ शीला गामक गली-कुचीमे खेलने छेलै। डोह-डबरामे नांगटे नहेने छेलै। एकर सभसँ नम्हर कारण दुनूक माए सखी जकाँ रहै छेलै। दुनूक बीच खूब मेल। एक दोसराक कनौनाइ आ हँसौनाइ चलै छेलै। खैर, ई छल बचपनक गप। फेर जुआन भेलापर अजय शहर चलि गेल। आर ओतए अपन पढ़ाइ-लिखाइ पूरा करए लगल। कहियो काल छुट्टीमे गाम अबै छेलै तँ शीलासँ भेँट-मोलाकात भऽ जाइ छेलै। आ सुनहटमे बैसि कऽ दुखक कथा पसारि दइ छेलै। अजय बोल-भारोस दैत-दैत कखनो अपनो कानए लगै छेलै। परन्तु जखनि अजय शहर चलि जाइ छेलै तखनि शीला असगरे दुखक पोखरिमे डुमकी मारए लगै छेलै। उज्जर आ कारी पाँखि फलकौने उड़ैत समए। लोकक उमेर बितैत छै आकि समए। परन्तु बितै तँ छै। कल्पना, यर्थात आकि दुनूक मिश्रण। समए सभकेँ नापैत। दौड़ैत-पड़ाइत आगू बढ़ैत। बेदरा, जुआन फेर बूढ़...। गामक लगीचेमे धरमानन्द बाबूकेँ दसकठबा करजान छै। छठि पावनिमे खौब आमदनी होइ छेलै। दसकट्ठाक केरा पावनिमे रूपैआ उझलि दइ छेलै। ओइसँ सटले डेढ-दू बीघामे काश-पटेरक जंगल। बड़का-बड़का घास-पात। केतएसँ ओते जन-मजूर भेटतै। अदहा काटल आ अदहा लगले रहि जाइ छेलै। एकबेर एकटा चीता बसेरा लऽ नेने रहै। डरे लोक साँझे टाटी-बेनाठी लगा लइ छेलै। ओइ भूतहा जंगल लग अजय ठाढ़ छै। बाधसँ आपस जाइत शीलाकेँ इशारासँ सोर पाड़ैत छै। शीला एने-ओने देखलक आ सट्ट दऽ करजानमे ढुकि गेल। अजय पुछलकै- “नेगरी जकाँ किएक चलै छी।” “पएरमे कनी चोट लगि गेल रहए।” “कथीसँ?” “छोड़ू ने ऊ गप।” “हमरासँ चोरा कऽ कोनो गप मनमे राखए चाहै छी। एकर मतलब हृदैसँ नै चाहै छी हमरा।” “फेर अंट-शंट बाजि रहल छी।” “ई भेलै अंट-शंट। अहाँ हमरा सोझाँमे झूठ बजब। एहेन हमरा विश्वास नै छल।” शीला मुड़ी गोंति लेलक। ओकरा आँखिसँ दू बून नोर खसि पड़लै। बझाएल कंठसँ कहलकै- “हमरा काकाकेँ सुभाव तँ बुझते छी। चारि-पाँच दिन पहिले अहाँसँ गाछीमे भेँट भेल रहए। चुगला सभ चुगली कऽ देलकै। ई खबरि सुनिते काकाकेँ देहमे आगि नेस देलकै। ई तँ लाठी पातर रहै जे टुटि गेलै। नै तँ हमहीं मरि जैतौं। देह हाथमे तँ कम चोट अछि मुदा जाँघक चोट...।” अजय देखि रहल छै शीलाक जाँघ। गोर चमड़ीपर कारी सियाह दाग पड़ल। आँखिमे नोर रहबाक कारणे झलफलाह देखा रहल छै। खोंखीक आवाज सुनि दुनू भीतरी करजान दिस ससरि गेलै। ओनए टोलपर दोसरे नाटक चालू भऽ गेल छेलै। अजयकेँ दुश्मनोक संख्या बहुत छै। जइमे सभसँ आगू छै खेलावन भगत। मुँहपुरखी छिनबाक डर छेलै धरमानन्दकेँ ओहो दुसमन। ढोंढाइ गुरुजीकेँ डर छेलै जे अजय कहीं धिया-पुताकेँ पढ़बए ने लगै। कालू मैनजनकेँ बात नै मानलकै। भोज नै केलकै। तँए केतेको दुसमन। केतेक पराेक्ष आ केतेक प्रत्यक्ष दुसमन। दुसमनक बीचमे खबरि पहुँच गेल छेलै। “अजैया आइ चोटपर चढ़ि गेल छौ।” “अकलू मड़रकेँ सभसँ आगू राख। ओकरा भतीजीक इज्जत खराब कऽ रहल छै ने।” अकलू मड़र तामससँ गरमा गेल छै। “जँ इज्जते नै बँचतै तँ जी कऽ की करबै।” अगिलगौना सभकेँ नीक मौका भेटि गेल छै। “ई सरबा अपनाकेँ शहरी बुझै छै। देहातक इज्जतकेँ ऊ की जनतै। बेरा-बेरी सबहक इज्जत-परतिष्ठा बेरबाद कऽ देतौ।” “हम तँ कहै छियौ। राफ-साफ कऽ दही-एक्केबेर। सीधे गरदनि काटि देबै। ने रहतै बाँस आ ने बजतै बौसली।” सबहक भितरिया बाघ गरजए लगलै। युद्ध करू वा देखू। भितरिया पियास मेटेबाक उपए। भीड़-भाड़मे के केकरा देखै छै। जेकरा जे हथियार हाथ लगलै, उठा लेलकै। लाठी-भाला, तीर-धनुष, गड़ाँस-फरसा जेना बनैया सुगरकेँ मारैत काल होइ छै। सभ एके संगे दौड़लै। “खेलावन भगत खबरि देने छेलै केरा बगानमे दुनू रसलीला कऽ रहल छै।” शीला आ अजय दोसरे संसारमे टहलि-बुलि रहल छेलै। अजय कहि रहल छेलै- “अपन-अपन टोल, अपन-अपन जाति अलगे-अलग। तब ने अपन जूति चलतै। अन्हा गाममे कन्हा राजा। एेठाम ज्ञान-विज्ञान निकलै छै- गहवर घरसँ। कानून निकलै छै-मुँहपुरुखक गपसँ। बहि रहल छै- उनटा बसात। सभसँ छोट उनचास हाथ।” पैघ निसाँस लैत आगू बजल- “करए पड़तै परिवर्त्तन। परिवर्त्तनक लेल कि जे किछो करए पड़ै। जिनगीओकेँ होम करए पड़ै तैयो ससते बुझू।” “हो... हो... हो... लगे...।” “भुक... भुक...।” टाँर्चक रोशनी। कुत्ता कानि रहल अछि। सुनहटकेँ चीरैत अवाज- “घेर ले पूरा बगानकेँ आ काटि कऽ ओहीमे गाड़ि दबै।” “चर-मर, खट-खट, धुम-धुम।” सैकड़ों पदचाप। सुनहटक निसाँस सन। अन्हारमे जेना भूत-प्रेत नाचैत-दौड़ैत...। “बाप रे बाप। सबहक हाथमे हथियार छै। चारूभरसँ घेर रहल छै। जेना अपना सभ जानवर छी।” स्वर थरथरा कऽ निकलैत अछि- “भागू ऐठामसँ। खुनियाँ सभ आबि गेल।” ऊँचगर माटिक ढूहपर देखिते शीला बोमिया कऽ कानए लगैत अछि। “अहाँ भागि जाउ अजय। अहाँक जरूरत छै। हमरा कारणे अहूँक जान चलि जाएत।” “अहाँकेँ छोड़ि हम असगरे भागि जाएब। हमरा एतेक डेरबुक बुझै छी। मरबै तँ संगे आ जीअब तँ संगे। हम कोनो अधलाह करम नै केने छी। हम भगबै नै, संघर्ष करबै। अंतिम साँस तक परिवर्त्तन आ प्रगतिक लेल हमर संघर्ष जारी रहतै। हम लड़बै अपना बाँहक बलसँ। अन्हार निश्चित हटतै।” “काश-पटेरक वन दिस भागू। जल्दी करू। खुनियाँ सभ पाछूमे चलि आएल।” घनघोर अन्हार। काश-पटेर आ घास-पातक जंगल। पाछूमे मनुखक खूनसँ पियास मुझबैबला जानवर। भागैत-पड़ाइत दूटा प्राणी...। “केतौ नै भेटै छै। ऐ काशमे नुकाएल छै।” “रौ ठेकानि कऽ अन्दाजसँ तीर चला। जेतै केतए। आहीमे झड़का कऽ मारि देबै।” “हँ, सूखल काश छै। आगि लगा दहक। ओहीमे डहि कऽ भसम भऽ जेतै।” “आ जँ बहरा दिस भगतै तँ खुंडी-खंुडी काटि देबै। ठीके बात।” डेढ़ दू बीघा काश आ घासक जंगलमे आगि लगा देलकै। धू-धू, चर-चर... चराक। चिड़ै-चुनमुनी, साँप-कीड़ा, केतेको जीव सभ जरि रहल अछि। लहाश आसमान दिस उठि रहल छै। धुइयाँसँ चारूभर भरि गेलै। गदमिसान भऽ रहल छै। अजय आ शीला एम्हरसँ ओम्हर भागि रहल छै। पएर खुटी आ काँटसँ लहू-लहान। देह काश पटेरसँ कटल। सन-सनाइत एकटा तीर अजयक बाँहिमे भोंका गेलै। नोचि कऽ फेकलक अजय। बलबला कऽ खून बहए लगलै। शीला कानैत बजली- “हम नै जीअब आब। हमरा ऐ खूनसँ माँग भरि सकै छी अहाँ?” समए कम छेलै, अजय हँसैत बाजल- “लिअ खूनक सिनूर।” भर भरा कऽ खूनक बून ओकरा माँगपर गिरल। पाछाँसँ साड़ीमे आगि लगि गेल। अजय ओकर साड़ी खोलि कऽ फेंकि देलक। आगू भागल तावत अजयकेँ नुआ-वस्तरमे आगि पकड़ि लेलक। ओहो अपना सभ कपड़ा-बस्तर फाड़ि कऽ फेिक देलक। दुनू वस्त्रहीन। खूनसँ भीजल देह। चारूभरसँ आगिक लपट। बँचबाक कोनो उपए नै। तैयो भागैत-पड़ाइत। एक दोसराक सहारा दैत। झोंझमे एकटा चभच्चा देखाए पड़लै। डबरा सन गहींरगर पानिसँ भरल। चारूभर कुकुआहा उड़ैत। आगिक झड़क। उठैत लपट। धुइयाँसँ आन्हार भेल आँखि। जान बचेबाक लेल दुनू ओइ चभच्चामे ‘छपाक’ कूदि गेल। कनीकाल हलचल फेर एक-दोसराकेँ आँखिमे देखैत दुनू शान्त। ईहो काल गुजरि जेतै निश्चित। धैर्य... पैघ प्रतीक्षा... साक्षी। दुनूक देह, मन आ चित्त अपन-अपन काज कऽ रहल अछि। धर्मडीहीवाली चिचिया कऽ अपन पति जागेसरकेँ कहलकै- “लाज नै होइ छै। सभ गोटे मिलि कऽ सहोदरा भायकेँ झड़का रहल छै आ ई मुड़ी गोंति कऽ बैसल छै। गे माइ गे माइ। आइ हमहीं मरि जेबै आकि सभकेँ मारि देबै।” कहैत चारमे सँ ‘सड़ाक’ हँसुआ खींचलक आ केंकिहारि काटैत केलवनी दिस दौगल अेकरा पाछू जगेसरा लाठी नेने बमकि रहल अछि। पाछू लगल आर स्त्रीगण सभ। चारू भरक गौआँ-घरूआ गगनचुम्मी धधरा देखि दौड़ल आबि रहल छै। अजय आ शीलाक हँसी आसमानक अट्टहासमे सम्मलित भऽ रहल अछि। आगिक बीचमे पानि आ ओइ पानिमे हजारो जीव-जन्तु। ओइ बीचमे शीला आ अजय पूर्ण नग्न एक दोसराकेँ आलिंगनमे कसने ठाढ़ अछि। अन्त नै अनन्त... परिवर्त्तन आ विकास हेतु...। बाप भेल पित्ती आ अधिकार बेचन ठाकुर पहिल अंक दृश्य- एक (स्थान- लखनक घर। दलानपर लखन, लखनक काका मोतीलाल, भाए बौहरू बड़का बेटा मनोज आ छोटका बेटा संतोष उपस्थित छथि। लखन चिन्तित मुद्रामे छथि। सभ कियो चौकीपर बैसि विचार-विमर्श कए रहल छथि। बारह वर्षीय मनोज आ दस बर्षीय संतोष दलानपर माटि-माटि खेल रहल अछि। मोतीलाल- लखन, चिन्ता-फीकीर छोड़ू। की करबै? भगवानकेँ जे मर्जी होइत अछि, ओकरा के बदलि सकैत अछि? अहाँ कनियाँकेँ एतबे दिनका भोग छेलै। आब अहाँक की विचार भऽ रहल अछि? लखन- काका, अपने सभ जे जेना विचार देबै। मोतीलाल- हम सभ की विचार देब? पहिने तँ अहाँक अपन इच्छा। लखन- दूटा छोट-छोट बौआ अछि। ओकर पतिपाल केना हएत? जँ कुल-कनियाँ नीक भेटत तँ दोसर कऽ लइतौं। मोतीलाल- भातीज, अहाँक नीक विचार अछि। ऐ उमेरमे अहाँक िनर्णए हमरो उचित बुझना जाइत अछि। बौहरू- काका, एगो कहबी जे छै ‘सतौत भगवानोकेँ नै भेलै’ से? मोतीलाल- बौआ, तोहर की कहब छह? लखनकेँ बिआह नै करबाक चाही की? बौहरू- हँ, हमर सहए कहब रहए। भैया कनी तियाग कऽ दुनू छौंड़ाकेँ पढ़ा-लिखा कऽ बुधियार बनाबितथि। ओना भैयाकेँ कनियाँ केहेन भेटतनि केहेन नै। मोतीलाल- हमरा विचारसँ लखनक परिस्थिति बिआह करैबला अबस्स अछि। लखन- काका, नजरिमे दऽ देलौं। जदी सुर-पता लगए तँ जोगार लगाएब। मोतीलाल- बेस देखबै। पटाक्षेप। दृश्य- 2 (स्थान- मदनक घर। ओ अपन बिआहल बेटीक बिआहक चिन्तामे लीन छथि। कातमे पत्नी-गीता दलान झाड़ि रहल छथि। मोतीलालक समधिक समधि हरिचन मोतीलालकेँ मदनक ऐठाम कुटुमैतीक सम्बन्धमे लऽ जाए रहल छथि। हरिचन मदनक ग्रामीण छथि। हिनका दुनूक पहुँचैत मातर गीता घोघ तानि अन्दर चलि जाइ छथि। दलानपर तीन-चारिटा कुरसी लगल अछि। मोतीलाल आ हरिचनक प्रवेश।) हरिचन- (कर जोड़ि) नमस्कार मदन भाय। मदन- नमस्कार नमस्कार। मोतीलाल- नमस्कार कुटुम। मदन- नमस्कार नमस्कार। बैसै जाइ जाउ। (दुनू जन बैसला।) संजय, संजय, बेटा संजय, संजय। संजय- (अन्दरसँ) जी पिताजी, हैइए ऐलौं। (संजयक प्रवेश।) (हरिचनकेँ मदन पकड़ि कऽ अंदर लऽ जाइ छथि।) मदन- लड़िकाकेँ बेटा दुगो छै आ अस्था-पाती? हरिचन- गोटेक बीघाक अन्दरे छै। अपना भरि कोनो दिक्कत नै छै। मदन- की करी की नै, किछु नै फुड़ाइए। हरिचन- हमरा सभकेँ लेट होइए। यदि विचार हुअए तँ हुनका लड़िकी देखा दियनु। नै तँ कोनो बात नै। मदन- बेस, अपने दलानपर चलू। हम बुच्चीकेँ नेने आबै छी। (हरिचन दलानपर आबि गेला। किछुए काल बाद मदन सेहो आबि गेला।) मदन- चलू, देखल जेतै। कऽ लेबै। आगू भगवानक मर्जी। हम लड़िकीक बाप छिऐ। तँ हमरा लड़िका देखबाके चाही। मुदा हम सभ दिन अहाँपर बिसवास करैत रहलौं। आइ केना नै करब? हरिचन- हम अहाँक संग कहियो बिसवासघात केलौं? मदन- से तँ कहियो नै। ओना दुनियाँ बिसवासेपर चलै छै। (वीणाक संग मीनाक प्रवेश। मीना सभकेँ पएर छूबि गोर लगैत अछि।) हरिचन- कुरसीपर बैसू बुच्ची। (मीना कुरसीपर बैसैत अछि। वीणा ठाढ़े अछि।) मोतीलाल बाबू, लड़िकीकेँ किछु पूछबो करबनि, तँ पुछियौ। मोतीलाल- की पुछबनि, किछु नै। हरिचन- बुच्ची अहाँ चलि जाउ। (मीना सभकेँ गोर लागि अन्दर गेली।) मदन- हरिचन भाय, लड़िकी अपने सभकेँ पसीन भेली? मोतीलाल- हँ, लड़िकी हमरा लोकनिकेँ पसीन अछि। मदन- तहन अगिला कार्यक्रम की हेतै? हरिचन- जे जेना करीयौ। ओना हम विचार दैतौं जे बिआह मंदिरमे कऽ लैतौं। चीप एण्ड बेस्ट। मदन- कहिया तक? हरिचन- कहिया तक, चट मंगनी पट बिआह। काल्हिए कऽ लिअ। बढ़ियाँ दिन छै। कुटुमैती लगा कऽ नै रखबाक चाही। मदन- भाय, ओरियान कहाँ किच्छो छै? हरिचन- जे भेलै सेहो बढ़ियाँ, जे नै भेलै सेहो बढ़ियाँ। आदर्शेमे आदर्श। मदन- बेस, काल्हुके दिन रहए दियौ। हरिचन- जाउ, जे भऽ सकए, ओरियान करू। हम सभ सेहो जाइ छी। जय रामजी की। मदन- जय रामजी की। (हरिचन आ मोतीलालक प्रस्थान।) होनी जे हेबाक हेतै, सएह ने हेतै। आप इच्छा सर्वनाशी, देव इच्छा परमबल:। पटाक्षेप। दृश्य- 3 (दृश्य- लखनक बरिआतीक तैयारी। बर लखन, मोतीलाल, बौहरू, मनोज आ संतोष मदनक ओइठाम जा रहल छथि। मदन अपन घरक कातमे एकटा शिव मंदिरक प्रांगणमे बिआहक पूर्ण तैयारी केने छथि। सात गोट कुरसी आ एक गोट टेबूल लगल अछि। पंडीजी गणेश महादेवक पूजा कए रहल छथि। मदन, मीना, गीता हरिचन, संजय आ वीणा मंदिरक प्रांगणमे थहाथही कए रहल छथि तथा बरियातीक प्रतीक्षा कए रहल छथि। मीना कनियाँक रूपमे पूर्ण सजल अछि। बरियाती पहुँचला। डोलमे राखल पानिसँ सभ बरियाती हाथ-पएर धोइ कऽ कुरसीपर बैसला आ लखन बरबला कुरसीपर बैसला। बापेक कातमे एक्के कुरसीपर मनोज आ संतोष बैसला। मदन प्रांगणमे आबि जलखैक बेवस्था केलनि। सभ कियो जलखै कऽ रहल छथि।) मनोज- पापा, पापा, नाच कखनि शुरू हेतै? लखन- धूर बूरबक, अखनि किछु नइ बाज। लोक हँसतौ। मनोज- किए हौ, लोक हँसतै तँ हमहूँ हँसबै। कहऽ न नटुआ कखनि औतै? लखन- चुप चुप, नटुआ नै कही। लड़िकी औतै। मनोज- कए गो लड़िकी औतै? आर्केस्ट्रा कखनि शुरू हेतै? लड़िकी संगे हमहूँ नचबै, गेबै आ रूमाल फाड़ि कऽ उड़ेबै। पापा हौ, लड़िकीकेँ कहबै खाली रेकाँडिंगे डांस करैले। अगबे भोजपूरीएपर। लखन- चूप बड़ खच्चर छेँ रौ। आर्केस्ट्रा नै हेतै। डांस नै हेतै। मनोज- तखनि एतए की हेतै हौ पापा? लखन- हमर बिआह हेतै बिआह। संतोष- पापा हौ, तोहर बिआह हेतै आ हमर नै। लखन- हँ हँ, तोरो हेतै। संतोष- कहिया हेतै? लखन- नमहर हेबहीन तहन हेतौ। संतोष- हम नमहर नै छिऐ। एत्तेटा तँ भऽ गेलिऐ। आब बिआह कहिया हेतै? लखन- बीस साल बाद हेतौ। संतोष- बीस साल बाद बुढे भऽ जेबै तँ बिआह कए कऽ की हेतै? हम आइए करब। लखन- आइ तोरा ले लड़िकी कहाँ छै? संतोष- आँइ हौ पापा, तोरा ले लड़िकी छै आ हमरा ले नै छै। केकरोसँ कऽ लेबै। लखन- केकरासँ करबिहीन? संतोष- मौगी सभ औतै न, तँ ओइमे जे सभसँ मोटकी मौगी हेतै, ओकरेसँ करबै। दूधो खूब पीबै नम्हरो हेबै आ मोटेबो करबै। पापा हौ, हमरा लोकनियामे तोरे रहए पड़तह। लखन- बेस रहबौ बौआ। (जगमे पानि आ गिलास लऽ कऽ संजयक प्रवेश। सभ कियो पानि पीलनि आ हाथ-मुँह धोइ अपन-अपन जगहपर बैसला। पंडीजी पूजा पूर्ण आहुतिक पश्चात बर लग बैसि जलखै केला।) गणेश- अहाँ सभ विलंब किए करै छी? बिआहक मुहुर्त्त हुसि रहल अछि। हौ, हौ, जल्दी चलै चलू। कोनो चीजक टेम होइ छै किने? (लड़िकीक संग सरयातीक प्रवेश। सभ कियो मंदिरपर गेला। सतहपर बिछाएल दरीपर बैसला।) गणेश- आउ लड़िका-लड़िकी, हमरा लग बैसू। (लखन आ मीना पंडीजी लग बैसै छथि। पंडीजी दुनूकेँ अपन रामनामबला चद्दरि ओढ़ा दइ छथिन। दुनूकेँ हाथमे अरबा चाउर आआेर कुश दइ छथिन।) गणेश- लड़िका-लड़िकी पढ़ू- मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम् गरूड़ध्वज: मंगलम् पुण्डरीकाक्ष मंगलाय तनोऽहरि:।। लखन, मीना- मंगलम्.....। (पंडीजी तीन बेर ई मंत्र पढ़ा कऽ अपना बगलमे राखल सिनूरक पुड़ियामे सँ एक चुटकी सिनूर लड़िकाक हाथमे देलनि।) गणेश- बिआहक मुहुर्त्त बीति रहल छल। तँए हम एक्केटा मंत्रसँ बिआह करा दइ छी। आब सिनूरदान होइए। लड़िका, लड़िकीक मांगमे सिनूर दियनु। (लखन मीनाक मांगमे सिनूर देलनि।) आब अपने सभ दुर्वाक्षत दियनु। (पंडीजी पैघ सबहक हाथमे दुर्वाच्छत देलखिन।) मंत्र- ऊँ. आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसौ जायतामाराष्ट्रे राजन्य: शूर........ सन्तु पूर्णा सन्तु मनोरथा शत्रुणां बुद्धिनाशोस्तु मित्राणामुदयस्तव। (मंत्रक बाद सभ कियो लड़िका-लड़िकीकेँ दूर्वाक्षत देलखिन।) लाउ, दुनू समधि दक्षिणा-पाती। सस्तेमे अहाँ सभ निमहि गेलौं। (दुनू समधि एकावन-एकावन टका दक्षिणा देलखिन।) इएह यौ, एक्को किलो रहुक दाम नै। खैर जाउ। मदन- पंडीजी लड़िकी-लड़िकीकेँ असिरवाद दियनु। (लड़िका-लड़िकी पंडीजीकेँ पएर छूबि प्रणाम करै छथि। पंडीजी असिरवाद दइ छथिन।) मोतीलाल- पंडीजी, मोनसँ असिरवाद देबै। गणेश- हँ यौ, दक्षिणे गुणे ने असिरवाद भेटत। (सभ कियो जा रहल छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- चारि (स्थान- रामलालक घर। रामलालक दुनू पत्नी लक्ष्मी आ संतोषी घरमे हुनका सेवा कऽ रहल छथि। लक्ष्मी पक्षमे दूगो बेटी-एगो बेटा छन्हि तथा संतोषी पक्षमे एगो बेटी-दूगो बेटा छन्हि। छओ भाए-बहिन एक्के पब्लिक स्कूलमे पढ़ए गेल छथि।) रामलाल- बड़की सभ धिया-पुता नीक जकाँ घरपर पढ़ै-लिखै अछि न? हम तँ भिनसर जाइ छी से रातिएमे अबै छी। पेटक पूजा तँ बड़ पैघ पूजा छै किने? हम नै पढ़लौं से अखनि पछताइ छी। लक्ष्मी- छौड़ाक लक्षण अखनि बड़ नीक देखै छिऐ, अग्रिम जे हुअए। हमरा सभकेँ पढ़ैले कहए नै पढ़ै अछि। रामलाल- छोटकी, अहाँ किछु नै बजै छी। संतोषी- दुनू गोटे एक्के बेर बाजि देब तँ अहाँ की सुनबै आ की बुझबै? रामलाल- कोनो तकलीफ अछि की? संतोषी- जेकरा अहाँ सन घरबला रहतै, तेकरा तकलीफो हेतै आ अहुँसँ होशगर बड़की छथि। स्वामी, एगो गप्प पूछी? रामलाल- एक्के गो किए, हजार गो पूछिते रहू। संतोषी- अहाँ, एहेन चिक्कन घरवालीकेँ रहैत दोसर बिअाह किए केलिऐ? रामलाल- बड़कीसँ बेटा होइमे किछु बिलंब देखलिऐ तँए दोसर केलिऐ। संतोषी- नै यौ, दोसर गप्प भऽ सकै छै। रामलाल- हमरा तँ नै बूझल अछि, अहीं बाजू दोसर की भऽ सकै छै? संतोषी- अहाँकेँ, अहाँकेँ, अहाँकेँ, एगोसँ मोन नै भरल। रामलाल- बस करू, बस करू, अहाँ तँ लाल बुझक्करि छी। अहाँ तँ अंतर्यामी छी। ओना मोनकेँ जेतए दौगेबै, ओतए दौगतै। मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोइ। मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय।। (इसकूल पोशाकमे सोनीक प्रवेश।) सोनी- पापा, पापा, इसकूलक फीस दियौ। रामलाल- माएकेँ कहियौ बुच्ची। सोनी- माए, इसकूलक फीस दहिन। लक्ष्मी- केते फीस लगतौ? सोनी- तों नै बुझै छीही छअ गो विद्यार्थीक छअ सए टाका। लक्ष्मी- छोटकी, जाउ, दऽ दियौ ग। संतोषी- बेस, नेने अबै छी। (संतोषी अन्दर जा कऽ छअ सए टाका आनि सोनीकेँ देलनि आ फेर पति सेवामे भीर गेली।) रामलाल- छोड़ै जाइ जाउ आब। आँगना-घर देखियौ। अहुँ सभकेँ कनी, काज होइ छै। (दुनू पत्नी चलि गेली।) पटाक्षेप। दृश्य- पाँच (स्थान- रामलालक घर। रमाकान्त मुखियाक संग बलदेब वार्ड सदस्यक प्रवेश।) बलदेव- (दलान परसँ) रामलाल, रामलाल भाय। रामलाल- (अन्दरेसँ) हैइए एलौं भाय। दलानपर ताबे बैसु। जलखै कएल भऽ गेल। बलदेव- मुखियोजी एला, कनी जल्दीए एबै। रामलाल- तहन तुरन्त एलौं। (हाथ-मुँह पोछिते प्रवेश। प्रणाम-पाती कऽ अन्दरसँ दूटा कुरसी अनलनि। रमाकान्त आ बलदेब कुरसीपर बैसला। मुदा रामलाल ठाढ़े छथि।) रामलाल- मुखियाजी, आइ केम्हर सुरूज उगलै? आइ रामलाल तरि गेल सरकार। कहियौ सरकार हम केना मन पड़लौं। इनरा आवासबला कोनो गप्प छै की? बलदेव- गप्प तँ इएह छै। मुदा पहिने कुशल-छेम, तहन ने अगिला गप-सप्प। कहू अपन हाल-समाचार। रामलाल- अपने सबहक किरपासँ हमर हाल-समाचार बड्ड बढ़ियाँ अछि। भाय, अपन हाल-चाल कहू। बलदेव- भाय, एकदम दनदनाइ छै। रामलाल- आ मुखियाजी दिसका। रमाकान्त- हमरो हाल-चाल बड़ बढ़ियाँ अछि। वएह एलेक्शन नजदीक छै तँए पंचायतमे घुमनाइ अावश्यक बुझलौं। संगे-संग अहुँक काज रहए। रामलाल- तहन अपने किए एलिऐ, हमहीं चलि अबितौं। रमाकान्त- देखियौ, जनता जनार्दन होइ छै। पहिने जनता तहन हम। जनता मुखियाकेँ बड़ आशासँ चुनै छै। ओइ आशाक पूर्ति केनाइ हमर परम कर्त्तव्य छै। रामलाल- अपने महान छिऐ। अपनेक आगू हम की बजबै? बलदेव- मुखियाजी, कनी ओकरो ऐठाम जाइक छै। हिनकर काज जल्दी कऽ दियनु। रमाकान्त- तहन दऽ दियनु। (बलदेव बेगसँ बीस हजार टाका निकालि रामलालकेँ देलखिन।) रामलाल- (पाँच सए टाका निकालि) मुखियाजी, ई अपने रखि लियौ। रमाकान्त- नै, ई नै भऽ सकैए। ई अपने रखियौ। हमरा पेट ले बहुते फण्ड छै। कहबी छै- ओतबे खाइ जइसँ मोँछमे नै ठेकए। रामलाल- भगवान, एहेन मुखिया सगतर होइतै। बलदेव- रामलाल भाय, जेतए-तेतए सुनै छी अहाँक परिवारक सम्बन्धमे। तँ मन हर्षित भऽ जाइए। एहेन सुन्दर ढंगसँ परिवार चलेनाइ आइ-काल्हि असंभव अछि। रामलाल- सभ भगवानक किरपा छन्हि आ अपन करतब तँ चाहबे करी। रमाकान्त- हमरा लोकनि जाइ छी। जाउ, अहुँ अपन काम-काज देखियौ। (रमाकान्त आ बलदेवक प्रस्थान) रामलाल- धैनवाद बलदेव भाय, धैनवाद मुखियाजी एहिना सभ जनतापर खिआल रखबै। पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- लखनक घर। मीना अपन बेटी रामपरी आ बेटा कृष्णाक संग बैडमिंटन खेल रहल अछि। रामपरी- मम्मी, कसि कऽ मारहीन ने। काॅर्क नै उड़ै छौ। मीना- बेसी कसि कऽ नै लगै छै। कम-सँ-कम बौओ जकाँ बमकाही ने? (मनोजक प्रवेश) मीना- ओएह, एलौ सरधुआ भाँड़ैले। रामपरी- आबए दहीन ने मम्मी। भायजी छथिन। मीना- भायजी छथिन। कप्पार छथिन। काॅर्क फूटि जेतौ तँ आनि कऽ देतौ? रामपरी- मम्मी, भायजी केतएसँ आनि कऽ देतै, तोहीं कह तँ। आकि पापा आनि देथिन। मीना- पापाकेँ हम जे कहबै, से करथुन। तोहर कहल नै करथुन। रामपरी- मम्मी, ई गप्प तोहर नीक नै भेलौ आ पापोकेँ नीक नै भेलनि। मीना- तों पंचैती करैले एलँह की बैडमिंटन खेलैले? खेलबाक छौ तँ खेल नै तँ जो एतएसँ। रामपरी- तोहीं सभ खेल, हम जाइ छी। (खीसिया कऽ रामपरीक प्रस्थान। रामपरीबला बैटसँ मनोज बैडमिंटन खेलए लगैत अछि। मीना बैटेसँ ओकरा मारैले छुटैत अछि। फेर दुनू माय-पूत बैडमिंटन खेलए लगैत अछि।) कृष्णा- मम्मी, तोरा दीदी जकाँ खेलल नै होइ छौ। कनी पापाकेँ कहबीन सीखा दइले से नै। मीना- बौआ, पापा हमरा की सीखेथुन, हमहीं सीखा दइ छिऐ। कृष्णा- तेकर माने तों पापासँ जेठ छीही? मीना- उमरमे भलहिं छोट हएब मुदा अकलमे निश्चिते जेठ। (संतोषक प्रवेश) संतोष- हमहूँ खेलबै कृष्णा। (बैट लऽ कऽ खेलए लगैत अछि। झटसँ मीना संतोषक हाथसँ हाथ मोचारि कऽ बैट लऽ लैत अछि। टुनकीबला आ मुड़ीमचरूआ कहि बैटसँ मारैले दौगैत अछि। संतोष भागि जाइत अछि। ओइपर खीसिया कऽ कृष्णा एक बैट मम्मीकेँ बैसा दैत अछि।) कृष्णा- तों बड़ खच्चर छेँ मम्मी। खेलल-तेलल होइ छौ नहियेँ आ जमबै छेँ। अखनि संतोष भायजी रहितै तँ खूम बैडमिंटन खेलतौं की नै। मीना- संतोषबा तोहर भायजी नै छियौ। जेकर छिऐ से बुझतै। तोरा ओकरासँ कोनो मतलब नै। कृष्णा- किए मम्मी? उहो तँ हमरे पापाक बेटा छिऐ ने? मीना- मुदा तोहर मम्मीक बेटा नै ने छिऐ। कृष्णा- बुझबीहीन तँ किए नै हेतै? नै बुझबीहीन तँ हमहूँ तोहर दुश्मन छियौ। मीना- बकबास नै कर। काल्हि जनमलेँ आ बुढ़बा जकाँ गप्प करै छेँ। सभ बात तों अखनि नै बुझबीहीन। आब काल्हि खेलिहेँ चल। (बैट-काॅर्क लऽ कऽ मीना-कृष्णाक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दोसर अंक दृश्य- एक (स्थान- रामलालक घर। संतोषी बिस्तरपर पड़ल अछि। पाँच भाय-बहिन इसकूल गेल अछि। मुदा सोनी घरेपर अछि सोनीक तबीयत ठीक नै अछि।) संतोषी- सोनी बुच्ची, कनी देह दबा दिअ तँ? सोनी- हमरा अपने माथ दुखाइए। तँए इसकूलो नै गेलौं। अखनि धरि बासिए मुहेँ छी। खैर अहाँ तँ छोटकी माए छी। अहाँक अज्ञाक पालन केनाइ हमर परम कर्त्तव्य छी। संतोषी बुच्ची अहाँ बुधियार छी ने। (सोनी संतोषीक देह दबाए रहल अछि।) साेनी- छोटकी माए, बड़ भुख लगल-ए, कनी खाइले दिअ। संतोषी- हमरा नै हएत। जाउ अपनेसँ लऽ लिअ गऽ। सोनी- एक दिन अहीं कहने छेलिऐ, अपनेसँ खाइले कहियो नै लइले। धिया-पुताकेँ घटि जाइ छै। तँए हम अपनेसँ नै लेब। संतोषी- लिअ वा नै लिअ। हमरा बुते नै हएत देल। अपना देहमे करौआ लगल अछि। सोनी- जाइ छिऐ बड़की माएकेँ कहैले। (सोनी, लक्ष्मीकेँ कहैले अन्दर गेली। एमहर संतोषी और गबदिआ कऽ पड़ि रहली। सोनी आ लक्ष्मीक प्रवेश।) लक्ष्मी- छोटकी, छोटकी, छोटकी। सोनी- अखने जगले छेलै। तुरन्ते देखही। गै माए सूतल लोक ने जगैए, जागल की जगतै। लक्ष्मी- (जोरसँ) छोटकी, छोटकी, छोटकीऽ ऽ ऽ ऽ। (संतोषी फुड़फुड़ा कऽ उठै छथि।) संतोषी- की कहलिऐ दीदी? लक्ष्मी- सोनीकेँ अहाँ किए कहलिऐ, देहमे करौआ लगल अछि? संतोषी- हम से कहाँ कहलिऐ। हम अपना दऽ कहलिऐ जे हमरा देहमे करौआ लगल अछि की। एतबेपर बुच्ची भागि गेली। सोनी- अपन बेटाक माथपर हाथ रखि कऽ कहबै? संतोषी- हम बजबे नै केलिऐ। एतेक आगि किए उठबै छी सोनी। साेनी- आगि तँ अहाँ उठबै छी आ लगबै छी। हमरे माथपर हाथ रखि कऽ बाजू तँ। संतोषी- हँ यै, साँच बात किएक ने बाजब। आउ, लग आउ। लक्ष्मी- बूझि गेलौं अहाँ केते साँच बजै छी। अनकर बेटा-बेटी उपरेमे अबै छै आ अपन बड़ कसेब कऽ छै। िनर्लज्जी नहितन। झूठ बजैत कोनो गत्तरमे लाजो नै होइ छन्हि। संतोषी- िनर्लज्जी तँ अहाँ छी जे बेटीक पक्ष लऽ कऽ फेफिया कऽ उठै छी। लक्ष्मी- िनर्लज्जी िनर्लज्जी करब तँ अखनि झोंटा पकड़ि कऽ पोटा िनकालि देब। संतोषी- कनी देखियौ तँ झोंटा पकड़ि कऽ। (रामलालक प्रवेश) रामलाल- अहाँ सभ कथीले हल्ला-फसाद करै छी? चुपै जाउ। छोटकी, की बात छै? संतोषी- दुनू माइ-धीन हमरा कहैए, झोंटा पकड़ि कऽ पोटा निकालि देब। रामलाल- बड़की, अहाँ से किए कहलिऐ? लक्ष्मी- हँ हँ, हमरा सींग बढ़ि गेलै तँए दुआरे। ओकरे पुछियौ तँ। रामलाल- की बात छै छोटकी? संतोषी- ओकरे सभकेँ पुछियौ। रामलाल- की भेलै बुच्ची? सोनी- हमरा माथा दुखाइ छेलए। इसकूलो नै गेलौं। बासिए मुहेँ रही। छोटकी माएकेँ कहलियनि खाइले दिअ। तँ ओ कहलनि, अपनेसँ लऽ लिअ। देहमे करौआ लगल अछि। ई बात बड़की माएकेँ कहलियनि तँ ओ माएसँ लड़ैले तैयार छथि। रामलाल- हमरा तोरापर बिसवास अछि बुच्ची। तों फूसि नै बाजि सकै छेँ। हम बात बूझि गेलौं। छोटकी, सोलहन्नी अहाँक गलती अछि। बड़कीसँ अहाँ लगती मानू। नै तँ एहेन घरवाली हमरा नै चाही। अपन जोगार देखू। जेहने हमर परिवारक सुबेवस्थाक चर्चा सौंसे गाम होइ छेलए तेहने परिवारक प्रतिष्ठाकेँ माटिमे मिलबए चाहै छी। तुरन्त सोचि कऽ बाजू, की चाहै छी? संतोषी- (किछु सोचि कऽ, बड़कीक पएर पकड़ि) हमरेसँ गलती भेलै। आब गलती कहियो नै हेतै। रामलाल- बड़की, आइ माफ कऽ दियनु। आइ दिनसँ गलती नै करतै। सदिकाल मीलि कऽ रहै जाइ जाउ। “जहाँ सुमति वहाँ सम्पत्ति नाना। जहाँ कुमति वहाँ विपति निधाना।” पटाक्षेप। दृश्य- दू (स्थान- लखनक घर। लखन दलानपर बैसल छथि आ पारिवारिक स्थितिक सम्बन्धमे सोचि रहल छथि।) लखन- की करी नै करी, किछु ने फुड़ाइत अछि। बेटी रामपरी सेहो ताड़ जकाँ बढ़ि रहल अछि। आमदनी कम छै आ परिवारमे खर्चा बड़ छै। (मनोज आ संतोषक प्रवेश।) मनोज- पापा, बहुते छौंड़ा सभ इसकूल जाइ छै पढ़ैले। हमहूँ सभ जाएब। हमरो सभकेँ नाम लिखा दिअ ने सरकारी इसकूलमे। लखन- नाम लिखबैमे पाइ लगतै, किताब-कोपीमे पाइ लगतै, टीशन पढ़ैमे पाइ लगतै। हमरा ओतेक सकरता नै अछि। हमरा बुते नै हेतौ। पहिने पेटक चिन्ता कर। संतोष- पापा, रामपरी आ कृष्णा जे पब्लिक इसकूल जाइ छै से? ओकरा सभकेँ पाइ नै लगै छै? लखन- से मम्मीसँ पुछही गऽ। पाइ कोनो हम दइ छिऐ। संतोष- मम्मीकेँ बजा कऽ एतए आनू। कनी अपनेसँ कहबनि। लखन- जो बजा आन। (संतोष शीघ्र मीनाकेँ बजा कऽ अनैत अछि।) मीना- की कहै छी? लखन- की कहब। मनोज-संतोष कहैए हमहूँ पढ़ब, से की करबै। मीना- कप्पार करबै, अंगोरा करबै, धधकलहा करबै। लखन- एना किए बजै छी? बोलीमे कनियो लसि नै अछि। हरदम निशाँमे चूर रहै छी। मीना- बड़ फटर-फटर बजै छी। मुँह बन्न करू, नै तँ बूझि लिअ। जाउ अहाँ एतएसँ। एकरा सभकेँ हम जवाब दइ छिऐ। (लखनक प्रस्थान) की कहलेँ मनोज? मनोज- मम्मी, हमरो सभकेँ इसकूलमे नाम लिखा दिअ। बहुते छौड़ा सभ इसकूल जाइ छै। मीना- बड़ पढ़ुआ भऽ गेलेँ तो सभ? बिना ढौएक पढ़ाइ होइ छै, की खेनाइ होइ छै? पेट भरै छौ तँए फुड़ाइ छौ। एतएसँ अक्खैन भाग। नै तँ बढ़नी देखै छीहीन। कमा कऽ लाऽ तँ खो वा पढ़। नै तँ घर नै टपि सकै छेँ तों सभ। मनोज- मम्मी, हमरा सभकेँ कमाएल हेतै। जनमे के रखतै? मीना- नै कमाएल हेतौ तँ भीखे मँगिहेँ आ ओम्हरे खइहेँ। संतोष- अपना बेटा-बेटीकेँ पढ़ाबै ले होइए आ हमरा बेरमे की होइए? मीना- भगलेँ सरधुए सभ की? (बढ़नी लऽ कऽ मारैले दौगल। संतोष भागि गेल। मनोज पकड़ा गेल। “पढ़ुआकेँ सार अछि भगलेँ एतएसे” कहि कहि मनोजकेँ मीना बढ़नीसँ झँटलक। अन्तमे हाथसँ छूटि कऽ कनैत-कनैत भागि गेल।) पढ़ैए। फोकटेमे पढ़ाइ होइ छै। (हकमैत-हकमैत) ऊपरेमे अल्हुआ फड़ै छै। पटाक्षेप। दृश्य- तीन (स्थान- आन गामक बाट। मनोज कानि रहल अछि। संतोष-संतोष चिचिया रहल अछि। बटोही सभसँ पूछि रहल अछि। आँखिसँ दहो-बहो नोर जा रहल अछि।) मनोज- हौ बटोही, हमरा संतोषकेँ देखलहक? हरेराम- नै, हम नै देखलियौ। मनोज- (हिचुकि-हिचुकि कऽ कानि) संतोष रौ संतोष। असगरे हम केना रहबै रौ संतोष। तों केतए भागि गेलेँ रौ संतोष। हौ बटोही, एगो छौड़ाकेँ भागैत केतौ देखलहक? अनबर- नै बौआ, नै देखलियौ। के छेलौ तोहर ओ? मनोज- हमरे भाए छेलै। यै काकी, एगो छौड़ाकेँ देखलिऐ केम्हरो भागल जाइत। आरती- हँ बौआ, एगो छौड़ा हमरे पाछू-पाछू अबै छेलए। अखने केम्हर गेल केम्हर नै। केतेटा छेलए? केहेन कपड़ा-लत्ता पहिरने छै? मनोज- नअ-दस बर्खक छै। मलि-ढलि कपड़ा पहिरने छै। आरती- हँ देखलियौ बौआ। देखहीन गऽ अही सभमे केतौ बौआइत हेतौ। तुरन्ते हमरे पाछू-पाछू छेलौ। मनोज- संतोषबा छियँए रौ, संतोषबा छियँए रौ। संतोष- (अन्दरसँ) हँ, हैइए छी भाइजी। आबै छी। मनोज- केतए छेँ रौ? जल्दी आ। संतोष- भूख लगल छल। अही आँगनामे खाइ छेलौं। जल्दीए एलौं। मनोज- जल्दी आ। (संतोषक प्रवेश।) संतोष- भायजी यौ भायजी। मनोज- बौआ रौ बौआ। तोरा फकरैत-फकरैत हमरा ठोंठ सुखा गेलौ। (दुनू गरदनि मिलैत अछि) संतोष, भूख हमरो बड़ लागि गेल छौ। चल, केकरोसँ मांगि कऽ खएब। संतोष- भायजी, ई मलिकाइन बड़ नीक लोक छै। एक्के बेर कहलियनि जे मलिकाइन किच्छो खाइले दिअ, बड़ भूख लगल यऽ तँ कहलनि- आ, खा ले। बेचारी भरि पेट खुएलक। एक बेर अहुँले पूछऽ दिअ मनोज- बौआ, मलिकाइन की सोचथिन जे छौड़ा सभ बड़ लोभी अछि। संतोष- भायजी, बेगरता भेलापर गदहोकेँ नाना कहए पड़ै छै। आ ओ तँ मलिकाइन छथिन। मनोज- बेस, पूछहीन। (संतोष अन्दर जा कऽ) संतोष- मलिकाइन, मलिकाइन। राधा- की कहै छैं? संतोष- कहैत तँ लाज होइए। राधा- कह ने, की कहए चाहै छेँ? संतोष- भायजीओ केँ बड़ भूख लगल छै। परसुए भिनसर मम्मी हमरा दुनू भाँइकेँ बाढ़निसँ झाँटि-झाँटि कऽ घरसँ भगाए देलक। राधा- बाप नै छथुन? संतोष- बाप ओकरे दिस छै। हमरा सभकेँ कहैए पहिने पेटक चिन्ता कर। राधा- माए अपन नै छियौ? संतोष- नै, हमर माए मरि गेलै ने तँ पापा दोसर बिआह केलकै। राधा- भायजीकेँ बजा आनहीन। संतोष- मलिकाइन, दियौ ने, नेने जाइ छिऐ। दूरेपर खा लेतै। राधा- तों चल। हम नेने अबै छिऐ। (संतोष बहराए मनोज लग आएल।) मनोज- की कहलखुन? संतोष- कहलखिन, तों चल। हम नेने अबै छी। (राधाक प्रवेश। लोटामे पानि आ थारीमे खेनाइ लऽ कऽ) राधा- ले बौआ खो। (मनोज बैसि कऽ खा रहल अछि।) बौआ, नवकी माएकेँ धिया-पुता छौ? मनोज- हँ, दूगो छै- एगो बेटा-एगो बेटी। राधा- ओकरा सभकेँ मानै छै की? मनोज- हँ हँ, खूम मानै छै। पढ़ेबो-लिखेबो करै छै। हम कहलिऐ- हमहूँ सभ पढ़ब। तइले हमरा बाढ़नियेँ-बाढ़नियेँ खूम झँटलक आ घरोसँ निकालि देलक। राधा- तों खो बौआ। दुनू भाँइ भीखो मांगि कऽ पढ़िहऽ-लिखिहऽ। आइ-काल्हि बिनु पढ़ने काज नै चलतह। केहेन-केहेन पढ़ुआ तँ घास छिलै छै आ मुरखाहाकेँ के पूछतै? (मनोज खा कऽ थारी धोइ देलक।) आब तों सभ जो बौआ। (दुनू राधाक पएर छूबि प्रणाम करै छै। राधा दुनूकेँ असिरवाद माथपर हाथ रखि कऽ दइ छथिन।) पटाक्षेप। दृश्य- चारि (आन गामक बाट। बाटमे चलैत-चलैत मनोज आ संतोष गप-सप्प करैत अछि। भीख मंगैक योजना बनबैत अछि।) मनोज- हम गेबै तँ तों बजबिहेँ आ तों गबिहेँ तँ हम बजेबौ। संतोष- भायजी, अहाँ की गेबै आ हम की बजेबै? मनोज- दुनू भाँइ अल्ला-रूदल गेबै आ लोटे-छिपली बजेबै। जेना मुसहरीमे होइ छेलै। संतोष- लोटा-छिपली केतएसँ आनबै? मनोज- केकराेसँ मांगि लेबै। संतोष- भायजी, एगो कहियौ तँ। मनोज- कहै छिऐ। आ ऽऽऽऽ, जतरा बनेलिऐ शारदा मैया आजू गै बनाय ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ। भीख मंगैले एलौ, अहीं गाम-घरमे। पढ़ैले कहलिऐ तँ, देलक माए निकालि। बढ़नीसँ झाँटि-झाँटि कऽ सतौत भगौलक। (अल्ला–रूदल सूनि लोक सबहक भीड़ भऽ गेलै।) रामसेवक- (संतोषसँ) बौआ, एगो तोहू कही। संतोष- पाइ देबहक, खाइले देबहक। रामसेवक- हँ देबौ। संतोष- एगो छिपली आ एगो लोटा देबहक बजबैले? फेरो दऽ देबह। रामसेवक- हँ देबौ। आनि दइ छियौ। (अन्दर जा कऽ एगो लोटा आ एगो छिपली आनलक आ संतोषकेँ देलक।) संतोष- भायजी, लिअ छिपली-लोटा आ बजाउ अहाँ। (मनोज छिपली-लोटा बजा रहल अछि।) सुनै जाइ जाउ माता-पिता, भाए-बहिन सभ। आ ऽ ऽ ऽ ऽ, से किए गै सतौत माता, अपन बेटा-बेटीले दुनू भायकेँ भगौलेँ। दुनू भाँइ कोन गलती केलिऐ, नाम लिखबए पापाकेँ कहलिऐ। पापापर ओ शासन केलकै, डरे पापा जुआ पटकलकै। अपन बेटाकेँ इसकूल धरेलकै, हमरा इसकूलक मुँहोँ नै देखौलकै। तैयो बैमनमा दुनू भाँइकेँ, पेटोक जोगार नै केलकै यौऽ ऽ ऽ ऽ। (थोपरीक बौछार भऽ गेलै। मुलकिन बिस्कुट-पाइ सेहो पड़लै। दुनू भाँइ पाइ बिस्कुट समटि कऽ जाए रहल अछि। दर्शकगण सेहो अपन-अपन घर गेल। बाटमे दुनू भाय गप-सप्प करैत अछि।) संतोष- भायजी, कतेक भेलै? मनोज- बहुते भेलै बौआ-पच्चीस गोट टाका भेलै आ पाँच डिब्बा बिस्कुट भेलै। की सभ करबीहीन पाइकेँ? संतोष- चलू ने भायजी होटल। खूम मासु-भात खाएब आ कनी-मनी दारूओ पीब लेब। मनोज- एहेन गप्प फेर कहियो धोखोसँ नै बजिहेँ। कोन परिस्थितिमे लोक पाइ देलकौ, से मोन पारहीन। अबैकालमे मलिकाइन की कहने छेलखुन से मोन छौ? संतोष- नै भायजी बिसरि गेलिऐ। अहीं कहियौ। मनोज- पढ़ै दऽ ऽ ऽ। संतोष- हँ हँ हँ, आब धक्क दऽ मोन पड़ल। दुनू भाँय भीखो मांगि कऽ पढ़िहेँ-लिखिहेँ। आइ-काल्हि बिनु पढ़ने काज नै चलतह। मनोज- तब सएह, हमरा लोकनि केना पाइक गलत काज करब? गुरो खुद्दीसँ काज चलि जेतै। पहिने पढ़ैक जोगार कर बौआ। संतोष- आ रहबै केतए? मनोज- चल ने, केतौ हलुको दाममे ओढ़ना-बिछौना कीनि लेब आ कोनो टीशनपर रहब। ओतए इजोतो रहै छै। ओही इजोतमे रातिमे पढ़बो करब आ गुजर जोग गीत गाबि पाइओ कमाएब। संतोष- भायजी, बड़ चिक्कन विचार अछि। चलू, पहिने कोनो सरकारी इसकूलमे दुनू भाँइ नाओं लिखा लेब। तहन रहैक जोगार करब। सरकारी इसकूलमे पाइ बड़ कम लगतै। केतौ जँ मोनसँ पढ़बै तँ चिक्कन फैदा हेतै। मनोज- बेस, चल बौआ। आइ केतौ नाओं लिखाइए लेब। चल। (मनोज आ संतोषक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- पाँच (स्थान- लखनक घर। लखन आ मीना आपसमे गप-सप्प कऽ रहल अछि। रामपरी आ कृष्णा इसकूल गेल अछि।) मीना- स्वामी, छौड़ा सभ माथा खराब कऽ देने छेलए। भने भागि गेल। कहै छेलए पढ़ब। बड़ पढ़ुआक सार भऽ गेल रहए। अपन दुनू बेटा-बेटीक पढ़ाइ केना होइ छै से हमहीं की अहेँ बुझै छी। लखन- अहाँ कोनो गलती कहबै रानी। मुदा कहियो-कहियो मोन पड़ि जाइए तँ बुकौर लागि जाइए। मीना- एकर माने अहाँक धियान ओकरे सभ दिस अछि हमरा सभ दिस नै। लखन- आहिरेबा, ओकरा सभ दिस रहितए तँ ओकरा सभकेँ तैकतिऐ ने, खोज-खबरि रखितिऐ ने? मीना- नै यौ, अहाँ हमरा सभपर धियान नै दइ छी। (आइसँ हमरा अहाँक कोनो मतलब नै।) (रूसि रहैत अछि।) लखन- अहाँ खातीर हम दुगो बेटा-तियागलौं आ तैयो उनटे मुँह फुलेने छी। मीना- ओइ दुनू चकेठबाक नाओं नै लिअ। नै तँ बात केनादन भऽ जाएत। लखन- संतोषबा मनोजबाक नाओं आब नै लेब। सएह ने और की? मीना- हमरा टोकि नै सकै छी। हमर बेटा-बेटी मेघसँ ढब सन खसलै की। लखन- हे हे, पएर पकड़ै छी, दाढ़ी पकड़ै छी। (छुलकि-छुलकि मीना भागि रहल अछि। लखन आगाँ-पाछाँ करैत खुशामद करैत अछि। मुदा ओ लखनसँ बजा-भुकी बन्न केने अछि।) हे हे, लोक सभ की कहतै? लखना बहुरागी भऽ गेल। लाउ जाँति दइ छी। ऐ बीचमे अहाँ बड़ मेहनतिबला काज केलौं। मीना कृष्णा आ रामपरीक खाितर हम जान दइले तैयार छी। अहाँ सन सुन्नरि दुनियाँमे के छै? हेमा मालीन अहाँक तरबो जकाँ नै छै। लाउ पएर रानी, कनी जाँति दइ छी। हे हे, कान-नाक पकड़ै छी। अहाँक कहल नै काटब। (मीना पएर बढ़ाए देलनि। लखन ओकरा जाँति रहल अछि।) मीना- देखबै, दुनू भाए-बहिन नाम करतै। कोनो सरकारी इसकूलमे पढ़ै छै की। पब्लिक इसकूलमे, पब्लिक इसकूलमे। (रामपरीक प्रवेश) रामपरी- पापा, मम्मीकेँ की भऽ गेलै? लखन- किच्छो नै। थाकि गेल छेलखुन मम्मी। रामपरी- हम जाँति देतिऐ। अहाँ किए हरान भेलौं। लोक बुझतै तँ की कहतै? लखन- की कहतै बुच्ची? कहियो गड़ीपर नाउ तँ कहियो नाउपर गड़ी। बुच्ची, अहाँ अखने इसकूलसँ किए चलि एलिऐ? रामपरी- पापा, कृष्णो चलि आएल। नुकाएल अछि। इसकूलमे हेड सर खूम मारलखिन। परीक्षामे सभ विषयमे लड्डूए नंबर एलै ओकरा। मीना- तहन हेड सर पढ़ेलखिन की? काल्हिसँ तों सभ इसकूल बन्न कर। ऐसँ बढ़ियाँ मुरूखे। रामपरी- हेड सर पढ़ेलखिन नै तँ आन सभ विद्यार्थीक रिजल्ट बढ़ियाँ किए होइ छै। हमहूँ बढ़ियाँ जकाँ पास छी। चलए नै आबए तँ आँगने टेढ़। मीना- कहि देलियौ। काल्हिसँ ओइ इसकूल नै जेबाक छौ। सरकारी इसकूल जइहेँ। ओतइ नाओं लिखा देबौ। रामपरी- बेस जएह कहबीन सएह ने करबै। मुदा। मीना- मुदा, तुदा हम किच्छो नै बुझै छिऐ। जे कहै छियौ से कर। बुझलेँ। पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- रेलबे स्टेशन। मनोजकेँ बामा हाथ कटल छै आ संतोषकेँ दुनू आँखि गायब छै। संतोष मनोजक कनहा पकड़ि प्लेटफाॅर्मपर घूमि रहल छै। तखने अटैची लऽ कऽ राम सेवकक प्रवेश। राम सेवक टकटकी लगा कऽ दुनूकेँ देखि रहल अछि। मुदा चिन्हैत नै अछि।) रामसेवक- बौआ सभ, हमरा चिन्है छीही? संतोष- हँ हौ, किए नै चिन्हबह। चिन्हल लोक केतौ अनचिन्हार होइ छै। बाजबसँ हम बूझि गेलियऽ। तोहीं ने हमरा छिपली-लोटा आनि देने छेलहक आ गानापर पाइओ देने छेलहक। रामसेवक- हँ हँ हँ बौआ। तोरा दुनू भाँइकेँ एना किए भऽ गेलौ? पहिने केहेन बढ़ियाँ छेलेँ। मनोज- दुनू भाँय इसकूलसँ बससँ टूरपर जाइ छेलिऐ। ड्राइबरकेँ आॅभरटेक करैमे संतुलन नै रहलै। बस पलटी मारि देलक। छह-सात गो मरबो केलै। धनि हेड सर जे हमहूँ सभ जीलौं। बेचारा अपना दिससँ खरचा कऽ जी-जान लगा देलखिन। संतोष- दूगो स्पोर्ट डेथ भेलै। दूगो हाॅस्पीटल पहुँचैत-पहुँचैत दम तोड़ि देलकै। तीन गो हॉस्पीटलमे दू दिनका बाद दम तोड़ि देलक। रामसेवक- तों सभ आब ठीक छेँ ने? मनोज- हँ अहाँ सबहक पएरक दुआसँ आब हमरा सभ विकलांगो भऽ कऽ ठीक छी। अहाँ केतए जाइ छिऐ काका? रामसेवक- कनी दिल्ली जाइ छिऐ बौआ। हमर छोटका बौआ दिल्लीएमे पढ़ै छै। ओकर तबीयत खराब छै। सएह अबैले फोन केने रहए। बौआ, हम जाइ छियौ। हमर गाड़ी अबै छै। (दुनू भाँइ पएर छूबि प्रणाम केलक।) राम सेवक असिरवाद दऽ प्रस्थान।) संतोष- भायजी, अहाँकेँ इसकूलक बेर भऽ गेल हएत ने? मनोज- हँ हँ लेटे भऽ रहल अछि। वएह भेँट गेलखिन। गप-सप्पमे टेम लगि गेल। संतोष- जाउ, अहाँ इसकूल। बेसी लेट हएत तँ सर मारता। मनोज- अहाँ ठीकसँ रहब। बेसी एम्हर-ओम्हर नै करब। स्टेशनपर चोर-उचक्का बड़ रहै छै। छिपलीओ-लोटो पार कऽ देत। संतोष- हम लगे-पासमे घुमबै आ जेतए जेबै झोरा लटकेने जेबै आ लटकेने रहबै। जाउ अहाँ, लेट होइए। (मनोज बस्ता लऽ कऽ प्रस्थान) पढ़ै तँ हमहूँ छेलौं। पढ़ैओक मोन होइए। मुदा भगवानक इएह मर्जी छेलनि तँ हम की कऽ सकै छी? पढ़ि सकै छी मुदा। खैर हमरा नै पढ़ल हएत तँ कोनो बात नै। मुदा जेना-तेना भाइजीकेँ अबस्स पढ़ाएब। आगू भगवानक किरपा। (प्लेटफाॅर्मपर एकठाम बैसि कऽ झोरासँ छिपली-लोटा निकालि आ झोरा कनहापर लटका अल्ला-रूदल गेबाक तैयारी केलक।) आ ऽ ऽ ऽ ऽ, जतरा बनेलिऐ बाबू भैया भीख मंगैले आइ। टका-दू टकासँ किनको, किछु नै बिगरतै यौऽऽऽ। करमक फल सभकेँ भेटै छै, भलाइक बदला भलाइ भेटै छै। मुट्ठी बान्हि सभ कियो अबै छै, हाथ पसारि सभकेँ जेनाइ छै। तैयो नै दाइ-माइकेँ दया अबै छै आइऽ ऽ ऽ। (दर्शक-श्रोताक भीड़ पाइ बरसा रहल छै। संतोष मस्तीमे गाबि रहल छै।) कोन कुकर्म केलिऐ हम, बाबू भैया दाइ-माइ। जेकर फल आइ भोगै छी यौऽ ऽ ऽ। सतौत माए घरसँ भगौलकै, बाप पित्ती भऽ घूमि नै तकलकै। दसे-बारहमे दुनूकेँ भगौलकै, भरि पेट खाइले नै देलकै। पढ़ैले बढ़नीसँ झँटलकै, अपनाकेँ खूब पढ़ौलकै। भीख मांगि दुनू पढ़ै छेलौं, बस पलटीमे विकलांग भेलौं आन्हर भऽ नै पढ़ि सकलौं, भायजीकेँ इसकूल पठेलौं अनाथक नाथ अहीं सभ दुखियाकेँ उबारबै यौऽ ऽ ऽ ऽ। (थोपरीक बौछार भेल। पाइक ढेर लागि गेलै। पाइ समटि संतोष अपन जगहपर आबि गेल। सभकेँ प्रणाम कऽ संतोषक प्रस्थान।) पटाक्षेप। तेसर अंक दृश्य- एक (लखनक घर। लखन आँगन बहारि रहल छथि। मीना खटियापर पड़ल-पड़ल हुनका देखि रहल छथि।) मीना- कनी हाथ बैसा कऽ बहारब। खर-पात ओहिना छूटि जाइए। लखन- हमरा जहिना हएत तहिना ने बहारब। मीना- खाली तीन मन भातक गोला खाइमे होइए। होउ, हबर-हबर आँगना बहारू। वर्तनो ओहिना छै। लखन- ताबे अहाँ वर्तनो माँजि लेब से नै। मीना- किए अहाँक देहमे करौआ लगल अछि। हम आइ किच्छो नै करब। आइ हम भरि दिन बैस-सुति कऽ खुशी मनाएब। लखन- कथीक खुशी? मीना- आइ दुनू भाए-बहिनक मैट्रिकक रिजल्ट निकलैबला छै। दुनू बुझैले इसकूल गेल अछि। ओना दुनू बढ़ियाँ नम्बरसँ फस्ट हेब्बे करतै। ई हमर दाबा अछि। लखन- पानिमे मछरी, नअ-नअ कुटिया बखरा। रिजल्ट अपना हाथमे अछि जे दाबा करै छी। मीना- अपन हाथमे नै अछि तइसँ की। हमर बेटा फस्ट डिबिजनसँ पास करबे करत। लखन- खैर अहाँसँ के जीतत? मीना- तहन किए मुँह लगबै छी? जाउ, वर्तन-बासन आनि लिअ। एत्तै माँजि लिअ। खेनाइओक बड़ बेर भऽ गेलैए। (लखन अन्दरसँ वर्तन-बासन आनि माँजि रहल अछि।) लखन- अखनि तक बौआ सभ नै आएल? मीना- जे काज करए गेलै से कए कऽ ने आएत। ओना अबिते हएत। ताबे हम सुतै छी। (कनैत-खिजैत कृष्णा आ रामपरीक प्रवेश।) लखन- किए कनै छह बौआ? किए कनै छी बुच्ची? रामपरी- (हिचकि-हिचकि कऽ) हम एक नंबर ले फाइल भऽ गेलिऐ। लखन- आ बौआ? रामपरी- बौआकेँ तँ और कनीयेँ नंबर छै। हमरोसँ दस नंबर कम छै। लखन- जाउ, दुनू भाए-बहिन, मम्मीकेँ कहियनु। बड़ दाबा करैत छेली। (कनैत-कनैत दुनू मीना लग पहुँचल। मीना फुड़फुड़ा कऽ उठली।) मीना- किए कनै जाइ छेँ तों सभ? कृष्णा- दुनू भाए-बहिन फाइल भऽ गेलियौ। मीना- इसकूलमे कए गो फाइल भेलै? रामपरी- तीन सए विद्यार्थीमे दूगो। उहो हमहीं दुनू भाए-बहिन। मीना- ओ, बूझि गेलिऐ। मस्टरबा कोनो चक्कर-चालि लगौने हएत। रामपरी- नै मम्मी, सरक कोनो चक्कर-चालि नै भऽ सकै छै। हमरे सबहक गलती हेतै। मीना- जखनि तोरे सबहक गलती हेतै तखनि आइ अखनिसँ तों सभ किताब-कोपी छुइ नै सकै छेँ। सोचै छेलौं बेटा-बेटीकेँ इसपी. कलक्टर बनाएब। जो रामपरी किताब कोपी नेने आ। डाहि दइ छिऐ। ओते पाइमे केते जमीन कीनने रहितौं? तोरा सभकेँ पढ़ाबैमे कंगाल भऽ गेलौं। अखनि किताब-कोपी ला, सभटाकेँ डािह दइ छियौ। रामपरी- एगो मौका और दहीन मम्मी। मीना- मौका-तौका हम नै बुझै छिऐ। तोरा सबहक खातिर हम बीकि गेलौं। जो आब तों सभ मुरूखे रह। हमरा नै पढ़ेबाक-लिखेबाक अछि। हमरा सामनेसँ भागै जाइ-जो। (दुनू भाए-बहिन मम्मीक पएर पकड़ि लैत अछि।) रामपरी- मम्मी, एकटा मौका आैर दहीन। कृष्णा- मम्मी, एगो मौका और दहीन। लखन- कहै जाइए तँ एगो मौका और दियौ। असफलते सफलताक जननी अछि। मीना- हमरा नै सीखाउ। हम अपने बड़ सीखने छी। केहेन केहेन गेल्ला तँ मोछबला एल्ला आ मोँछबला गेल्ला तँ निमोच्छा एल्ला। अपन काज करू अहाँ। पएर छोड़ै जाइ जो। मौका हम नै बुझै छिऐ। (कृष्णा आ रामपरी पएर नै छोड़ै छै। मीना जबरदस्ती लगमे राखल ठेंगासँ दुनूकेँ मारि-मारि कऽ भगबै छै।) सभसँ घटिया काज पढ़ेनाइ-लिखेनाइ अछि। एहनो सड़ल काज कियो करए? पटाक्षेप। दृश्य- दू (स्थान- रामलालक घर। लक्ष्मी, संतोषी, सोनी, मोनी, पप्पू, रानी, अमर आ सुमन रामलालक संग प्रसन्न मुद्रामे बैसल छथि दलानपर। सभ एक दोसरकेँ चकलेट खोआ रहल अछि। सोनी-मोनीक रिजल्टक खुशीमे।) रामलाल- हमर सोनी बेटी अपन इसकूलमे स्टूड फस्ट आ मोनी स्टूड सकेण्ड केली। एहेन सुन्दर रिजल्ट पाबि हम अति प्रसन्न छी। आ बड़की अहाँ? लक्ष्मी- रिजल्टक खुशीमे हमरा मोन होइए दारू पीबितौं। मुदा लोक की कहत? रामलाल- छोटकी अहाँ? संतोषी- हमहूँ बहुत प्रसन्न छी। हमरा मोन होइए जे हमहूँ पढ़ितौ आ एहने रिजल्ट अनितौं। बड़ नाम होइतए। रामलाल- ई तँ आब संभव नै अछि। धिया-पुताक सम्बन्धमे अपन विचार दिअ। संतोषी- हमर इएह विचार जे जेतेक संभव हुअए, सभ धिया-पुताकेँ मनसँ पढ़ाउ आ काबिल बनाउ। विद्या सभसँ पैघ धन छी। ई स्थायी सम्पति छी। रामलाल- अहाँक विचार अति उत्तम अछि। हमरा बेसी पढ़ाएल तँ नै हएत मुदा जेतए तक हएत तइमे पएर पाछू नै करब। मरितो दम तक हिम्मत नै हारब। सुनै जाइ-जाउ बौआ-बुच्ची सभ। अहाँ सभ खूम मनसँ पढ़ु। खर्चा जे हेतै से हम जेना-तेना पुराएब। सभ धिया-पुता- जी पापा, हम सभ खूम मनसँ पढ़ब आ बड़का हािकम बनब। पटाक्षेप। दृश्य- तीन (स्थान- रेलबे स्टेशन। संतोष अल्ला-रूदल गाबैक तैयारी कऽ रहल अछि।) संतोष- बारह बजे रातिमे भाइजी आएल रहथि, ओ कहलनि- “बौआ, हम आइ.ए.सए.क परीक्षामे स्टूड फर्स्ट केलौं। आब हम कलक्टर बनब। हम ट्रेनिंगमे जा रहल छी। तों ठीकसँ रहिहऽ। हम जल्दीए आएब।” आ भवानक महिना, अगम-अथाह छै यौऽ ऽ ऽ ऽ। तन मन धनसँ श्रम करू, सफलता भेटबे करत। अहींसँ भीख मांगि भाइजीकेँ पढ़ौलिऐ। अहींक असिरवादसँ, कलक्टर बनेलिऐ। तैयो बाप-पीत्ती भऽ, हुलकीओ नै देलकै यौ ऽ ऽ ऽ। (नीक बेक्तीत्वमे मनोजक प्रवेश।) संतोष गीत गेेेनाइ बन्न कऽ देलक। मनोज सभकेँ दहिने हाथसँ प्रणाम करै छथि। मनोज- बौआ संतोष, नीक छी ने? संतोष- भाइजी एलौं। (पएर छूबि प्रणाम कऽ) हम पूर्ण कुशल छी। अपने नीकेना एलौं ने? मनोज- हँ बौआ, हम बढ़ियाँ जकाँ एलौं ट्रेनिंगो बड़ नीकसँ केलौं। परम आदरणीय, माए-बाप, भाय-बहिन। मनोजक हार्दिक प्रणाम। अपने सबहक असिरवादसँ हम आइ आंध्रप्रदेशक कलक्टर बनि ज्वाइन करए जा रहल छी। एकटा भीखमंगाकें अपनेक टाका-दू टाका तारि देलक। तइले अपने सभकेँ हार्दिक धैनवाद। हमरा कलक्टर बनेबाक मूल श्रेय हमर परम प्रिय अनुज संतोषकेँ जा रहल छन्हि। आइक बाद हमर संतोष अपने सभकेँ सेवा नै कऽ सकता। हिनका अपने संग नेने जा रहल छियनि। हमरा लेल ई की की नै केला। हम हिनकर संग आब केना छोड़ि देबनि। हम आजीवन हिनकर आभारी रहबनि। अंतमे, यएह कहब जे हमरा सबहक गलतीकेँ क्षमा करब। धैनवाद। संतोष- हम अपने सबहक संग घूलि-मिल गेल रही। एतएसँ टसकबाक मोन नै होइए। मुदा भाइजीक आदेशकेँ केना ठोकरा सकै छी? जाइए पड़त। क्षमाप्रार्थी संतोषक दिससँ समस्त दर्शक वृंदकेँ कोटि-कोटि धैनवाद। (मनोजक संग झोरा-झपटी लऽ कऽ संतोषक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- चारिम (स्थान- कलक्टरक आवास। सिपाही वीरभद्र गेटपर ठाढ़ छथि। संतोष डेरापर अछि। मनोज आॅफिस गेल छथि। दीन-हीन अवस्थामे रामलालक प्रवेश।) वीरभद्र- का बात हाउ? रामलाल- सरकार, कनी हाकिमसँ भेँट केनाइ आवश्यक छै। वीरभद्र- हाकिम अभी न हाउ। जा कल अबिहऽ। रामलाल- डेरापर कियो छथिन्ह सरकार? वीरभद्र- हँ, हुनकर भाए। रामलाल- हुनकोसँ भऽ सकै अछि। कथा-कुटमैतीक सम्बन्धमे गप-सप्प छै। वीरभद्र- अच्छा आबह। (रामलाल अन्दर जा कऽ संतोष लग बैसि गप-सप्प शुरू केलनि।) रामलाल- सर प्रणाम, हम ठहरलौं एगो अति िनर्धन बेकती। बड़ आशासँ हम अपने लग पहुँचबाक दुस्साहस केलौं। संतोष- कहू की बात? रामलाल- सर, हमरा तीनटा बेटी अछि। ओइमे पहिल बेटीक बिआह लेल अपने ओइठाम पहुँचलौं हेन। कलक्टर साहैबक हाथ अपना बुच्ची ले मांगए एलौं अछि। सर एगो गरीबोकेँ तारीयौ? संतोष- गरीबक सम्बन्धमे हमरा अपने किछु नै कहियौ श्रीमान्। बायोडाटा आ लड़िकीक फोटो अपने अनने छी? रामलाल- हँ सर, अनने छी। इएह लिअ। (झोरासँ निकालि कऽ सर्टिफिकेट आ फोटो संतोषकेँ देलनि।) संतोष- श्रीमान्, लड़िकी केहेन छथि? रामलाल- अपन मुँहसँ अपन बड़ाइ ठीक नै। ओना अछि। संतोष- हम बायोडाटा कलक्टर साहैबकेँ देखा देबनि। हुनकर जे जेना विचार होन्हि। रामलाल- हम काल्हि फेर आएब सर। सर, हमरा िबन्दुपर सकारात्मक ढंगसँ सोचबाक प्रयास अबस्स करबै। संतोष- ईश्वरक इच्छापर छोड़ि दियनु। रामलाल- धैनवाद सर। जय रामजी की। संतोष- जय रामजी की। (रामलालक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- पाँच (स्थान- कलक्टरक आवास। दुनू भाँइ संतोष आ मनोज बिआहक सम्बन्धमे गप-सप्प कऽ रहल छथि।) मनोज- बौआ, काल्हि आॅफिसमे बैसल रही तँ बिआहक लेल एकटा आॅफर आएल। लड़िकी एस.पी. छै। अहाँक सोच सकारात्मक अछि। तँए अपनेक सलाह हमरा सिरोधार्य हएत। संतोष- अपने श्रेष्ठ छिऐ आ आइ.ए.एस. आॅफिसर सेहो छिऐ। अहाँकेँ हम की सलाह दऽ सकै छी? ओना अहाँक अनुपस्थितिमे काल्हि एगो गरीब पहुँचल छेलथि। हुनक जिज्ञासा आ साहसेकेँ धैनवाद दइ छियनि। बायोडाटा सभ आ फोटो दऽ गेला आ कहलनि जे कलक्टर साहैबकेँ देखा देबनि। हम काल्हि फेर आबै छी। ओ आइए एता। देखियौ हुनकर बायोडाटा आ फोटो। (संतोष मनोजकेँ बायोडाटा आ फोटो देलनि। मनोज गौरसँ देखि रहल छथि।) मनोज- बौआ, अहाँक की विचार? ओना डेकोमेन्ट्स तँ सभ तरहेँ नीक छै। संतोष- यदि डेकोमेन्ट्स अहाँकेँ पूर्ण रूपेन नीक लगैए तँ ई बिआह कएल जा सकैए। गरीब ने गरीबक दु:ख बुझतै भायजी। वानर जानए आदीक स्वाद। मनोज- बौआ, अहीं कहू, की िनर्णए लेल जाए? एक दिस एस.पी. लड़की आ दोसर दिस साधारण बी.ए. पास लड़िकी सेहो गरीब। संतोष- हमरा विचारसँ बी.ए. पास लड़िकी अपनाएल जाए। कारण ओ जिनगी भरि प्रतिष्ठा दैत रहतीह। मनोज- बौआ, अहाँक विचारकेँ हम कहियो काटि नै सकै छी। कारण हमरा लेल अधलाह अहाँ किन्नहु नै सोचि सकै छी। अहाँक जे जेना विचार हएत से हमरा मान्य अछि। हमरा आॅफिसक टाइम भऽ गेल। हम आॅफिस जा रहल छी। (मनोजक प्रस्थान आ रामलालक प्रवेश।) रामलाल- प्रणाम सर। संतोष- प्रणाम-प्रणाम। आउ बैसल जाउ। (संतोष आ रामलाल बैसि कऽ गप-सप्प कऽ रहल छथि।) रामलाल- सर, हम अपन समैपर उपस्थित छी। अपनेक जे आज्ञा? संतोष- अपने श्रेष्ठ छिऐ आ कर्मठ सेहो छिऐ। अपनेक आज्ञाक पालन अबस्स हेतै। अहाँक प्रस्ताव हमरा लोकनिकेँ मान्य अछि। रामलाल- सर, सचमुच अपने महान छिऐ। एहेन सुन्दर विचार आ िनर्णए लेल अपने सभकेँ हमर हार्दिक धैनवाद। तहन की केना अगिला आज्ञा होइ छै सर। संतोष- श्रीमान्, अपने गरीब छिऐ आ भाइजी केँ सेहो समैक बड़ बेसी अभाव रहै छन्हि। तँए काल्हिए काली-मंदिरमे आबि बिअाह कार्यक्रम संपन्न कऽ लिअ। पाइ-कौड़ी जे किछु खरच हेतै दुनू दिसक से हमर। जाउ, अपने सभ काल्हि काली मंदिरक प्रांगणमे एगारह बजे पहुँच जाएब। तखने हमहूँ सभ पहुँच जाएब। बिआह एक बजे हएत। बेसी लाम-काफ नै हेतै। रामलाल- बेस, तँ हम जा रहल छी। जय रामजी की। संतोष- जय रामजी की। (रामलालक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- काली मंदिर। पुजारी हरिनन्दन पूजामे लीन छथि। रामलाल, लक्ष्मी, सोनी, मोनी, पप्पु, संतोषी, रानी, अमर आ सुमनक प्रवेश।) सभ कियो सजल-सजल अछि। तुरन्त मनोज, संतोष, वीरभद्र, स्टेनो अमन, आ नौकर चन्दन बरियातीक रूमे प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्कार-पाती भेल। सभ कियो कुरसीपर बैसला। परिछन भेल। लड़िका-लड़िकी मंदिरक सामने लगल विशेष कुरसी-टेबूलपर बैसलथि। पुजारी पूजा कऽ आबि कुरसीपर बैसला।) हरिनंदन- रामलाल बाबू, जलखैओक जोगार छै की? रामलाल- हँ हँ, अबस्स छै। हरिनंदन- तहन जल्दी चलाउ। फेर बिआह-दान सेहो ने छै। रामलाल- जे आज्ञा होइ पंडीजी। बौआ पप्पु, नश्ता-पानि चलाउ। (पप्पु, अमर आ सुमन नश्ता-पानि चला रहल अछि। नश्ता कऽ सभ कियो अपन-अपन जगहपर बैसलथि।) हरिनंदन- चलू लड़िका-लड़िकी मंदिरमे। (लड़िका-लड़िकी मंदिरमे गेलथि। पंडीजी कंबलपर आ लड़िका-लड़िकी कुशक चटाइपर बैसलथि। दुनूक हाथमे कुश दऽ पंडीजी मंत्र पढ़ा रहल छथि।) पढ़ै जाइ जाउ- ऊँ यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजा पतेर् यत सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रतिमृन्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तुतेज:।। मनोज+सोनी- ऊँ यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजा पतेर् यत सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रतिमृन्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तुतेज:।। हरिनंदन- चलू आब जयमाला हएत। (लड़िका-लड़िकी जयमाला लेल बैसलथि। मोनी आैर रानी जयमाला करौलनि।) हरिनंदन- आब दुर्वाक्षत हएत। पहिने दक्षिणा लाउ। रामलाल- दक्षिणा आगू-पाछू भेटबे करत। किए हर-बराइ छी पंडीजी? हरिनंदन- बिआहे कालमे हमर कनियाँ सप्पत देने छथिन जे पहिने दक्षिणा तब दुर्वाक्षत। अमन- दक्षिणा लिअ, काज आगू बढ़ाउ। हरिनंदन- हँ, ई भेल मरदबला गप। लाउ। (अमन एक सए एक टाका दक्षिणा देलनि।) दर्वाक्षतक बाद अपने सभ मैयाकेँ प्रणाम कऽ जल्दी प्रस्थान करबै। पंडीजी पैघकेँ अक्षत देलनि।) ऊँ आब्रह्न ब्राह्नणो............... मित्राणमुदयस्तव। (पैघ जन लड़िका-लड़िकीकेँ दुर्वाक्ष दऽ सभ कियो मैयाकेँ प्रणाम करै छथि। फेर सभ कियो नमस्कार-पाती कऽ प्रस्थान करै छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- सात (स्थान- लखनक घर। अस्वस्थ अवस्थामे मीना चिन्तामग्न अछि।) मीना- हे भगवान, ऐ सँ बढ़ियाँ हमरा लऽ चलू। दुनियाँमे केकरो कियो नै। कोन बेमारी ऐ देहमे पसि गेल से नै कहि। इलाजो कराएब से आब खेतो-पथार नै रहल सभटा बीकि गेल। आब डीहेटा बँचल अछि। बेटा बेटी नै पढ़लक। दुनू नरहेर जकाँ बौआइए। बेटी जुआन भेल जा रहल अछि। ओकर बिआह-दानक चिन्ता सेहो सता रहल अछि। एगो कमाइबला की करत? सेहो हमरे बेमारीक चक्करमे फँसल रहैत अछि। (लखनक प्रवेश) लखन- रानी, मोन बेसी खराब अछि की? मीना- हँ बड़ बेसी खराब अछि। जीअब की नै से नै, कहि। लखन- यै, सम्पति किए रहै छै? डीह अछि ने। डीह भरना रखि दइ छिऐ। ओइसँ इलाज कराए लिअ। जीअब तहन ने भोगब। मीना- लोक की कहत जे डीहो बहुमे लगा देलक। लखन- हम अप्पन करतब करब। मीना- बेस, अहाँक जे विचार। लखन- जाधरि अहाँक घटमे परान रहत, ताधरि हम अपन प्रतिकार नै छोड़ब। कारण हम अहाँक हाथ पकड़ने छी। आइ उ बेटा सभ रहितए तँ किछु उस्साहसक आशा करितौं। मीना- के बेटा सभ? लखन- मनोज आ संतोष। मीना- ओकर नाम नै लिअ। नै तँ हम अहु दशापर जहर-माहूर खा लेब आ सभकेँ जहल खटाएब। लखन- एहेन बात छै तँ हम ओकरा सबहक नाम नै लेब। सएह ने? मुदा जहर-माहूर खा लेब तँ ओकर स्वादो तँ अहींकेँ भेटत आ नयन सुख केते हएत सेहो कनी सोचि लियौ। अपनाकेँ बड़ बेसी बुझनाइ सेहो बड़ खराब होइ छै। आबो अपन ई बुझनाइपर नियंत्रण राखू। अन्यथा अप्पन बुझू। पटाक्षेप। दृश्य- आठ (स्थान- कलक्टरक आवास। आवासपर मनोज, संतोष, सोनी आ वीरभद्र छथि। वीरभद्र वर्दीमे छथि और तीनू साधारण पोशाकमे छथि।) सोनी- स्वामी, हम अति प्रसन्न छी। मुदा एतए तीनटा चीजक कमी देखा पड़ि रहल अछि। मनोज- बाजू प्रिय, उ तीन गो कोन चीज अछि? सोनी- सासु, ससुर आ ननदि। मनोज- प्रिय, अहाँकेँ कोनो चीजक कमी नै अछि। मुदा एतए नै, अपन गाममे। सोनी- तहन एक्को दिन ले गाम चलल जाए। प्राणप्रिय हुनको सभकेँ दर्शन तँ कऽ लेब। मनोज- मुदा एगो खेद अछि जे कहैमे लाज होइए। सोनी- कहबै नै तँ बुझबै केना? मनोज- इहए जे हमर अप्पन माए स्वर्गवास भऽ गेल छथिन, माए सतौत छथि आ ननदि सेहो ओही पक्षक छथि। सोनी- जे छथि से छथि, मुदा हमरा लेल वएह अप्पन छथि, सभ किछु छथि। संतोष- भौजी, अपनेक विचार तँ उत्तम अछि। मुदा वएह मए हमरा दुनू भाँइकेँ बोनक पत्ता तोड़ौलक ने। हमरा दुनू भाँइकेँ कहियो मनुक्ख नै बुझलक। भीख मांग कऽ खाइले कहलक पढ़ैले कहलिऐ तँ बढ़नीसँ झँटलक। कोन-कोन करम ने केलौं। सोनी- बझै छिऐ बौआ, होनहार वीरवान के होत चिकने पात। जदी कैकेयी अपन भरत ले राजगद्दीनै मांगितथि तँ राक्षस राज नष्ट होइतै? अहाँ सभ एतए पहुँचितिऐ आ हम एतए पहुँचितौं? मनोज- से तँ अहाँ कए लाखक गप्प बजलौं। सोनी- हम की बाजब प्रियतम, हम तँ मुरूख छी। मुदा भगवान जे किछु करै छथिन से नीके करै छथिन। हम अपने सभसँ आग्रह करैत छी जे इर्ष्या-द्वेषकेँ तियागि गाम चलू आ अपन समाजकेँ देखा दियनु बुझाए दियनु जे ईश्वर जे किछु करै छथिन से नीके करै छथिन। संगहि अपन समाजमे एगो पार्टी दियौ। मनोज- बौआ, भौजीक विचार कटैबला नै छन्हि। काल्हिए गाम चलू आ ओतए एगो चिक्कन पार्टी भेनाइ आवश्यक छै। (एम्हर वीरभद्र खैनी चूना कऽ खाइए, ओंघाइए, मोँछ टेरैए, मोँछ फरकबैए।) सोनी- प्रियतम, कनी सिपाही दिस धियान दियौ। (मनोज, सोनी आ संतोष सिपाही दिस धियान देने छथि।) वीरभद्र- (निन्नमे) कए महिनासँ कनियाँ उपासे हएत। सरकार छुट्टीए नै दइए। गामक नीक-निकुत खाइमे बड़ नीक लगैए। जेहन हमर कनियाँ सुन्नरि तेहने ओकर हाथक भोजन। मोन होइए जे सरकारेकेँ छुट्टी दऽ दैतिऐ आ कनियेँकेँ सरकार बना दैतिऐ। दुनू परानी एक्केठाम रहितौं। कनियाँ छोड़ि हम स्वर्गोमे नै रहि सकै छी। मनोज- सिपाही, सिपाही, सिपाही ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ। वीरभद्र- (फुड़फुड़ा कऽ उठि) जी जी जी, जीर-मरीच धनिया मिरचाइ। जगले तँ छी सर। तनी मेहरारूक यादि आ रहल वानी। मनोज- ड्युटी पिरीयडमे एना नै हेबाक चाही। नैतँ छुट्टी भऽ जाएत। वीरभद्र- अब ऐशन ना होइ सर। (फेर वीरभद्र खैनी खा कऽ सुति रहल आ सपनाए रहल अछि।) सर कहलनि छुट्टी भऽ जाएत। मुदा मैडम एक्को बेर आइ तक नै टोकलक। बड़ चिक्कन छी तँ अपने घरमे। हमरा अहाँसँ कोन मतलब अछि। सभटा प्रशासन सभकेँ देखै छिऐ बड़का-बड़का पेट। जेना पेटमे साँढ़-पाराक बच्चा होइ। बाप रौ बा, ओइ पेटमे घूस लेल केते जगह छै? ओना हमरो पेट तँ छोट नै अछि नम्हरे अछि। मुदा हमरा पेटमे तीनिटा बच्चा अछि। उहो बच्चा केकरो आनबला नै अछि अपने कनियाँबला अछि। सर बिअाह केलखिन, पाट्रीओ नै देलखिन। जाबे तक पार्टी नै देतहीन ताबे तक बच्चे नै हेतनि। हमर वचनकेँ ब्रह्मो नै काटि सकैए। मनोज- सिपाही, सिपाही, सिपाही.......। वीरभद्र- (फुड़फुड़ा कऽ उठैत) जी सर, जी सर, जी सर। मनोज- सिपाही, अहाँ किए एना करै छी? नोकरी करब, की छुट्टी लेब? वीरभद्र- सर, छुट्टी तँ नै लेब। मुदा पार्टी तँ लऽ कऽ रहब। पार्टी दऽ देबै। सभ नीन्न पार भऽ जेतै। मनोज- बेस, काल्हि हमरा गाम चलू। ओत्तै धमगिज्जर पार्टी हेतै। वीरभद्र- तहन हम मोँछ-तोँछ पीजा लइ छी। पटाक्षेप। दृश्य- नअ लखनक घर। मीनाकेँ उनटा साँस चलै छन्हि। लखन चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि। हुनका आँखिसँ दहो-बहो नोर जा रहल छन्हि। रामपरी आ कृष्णा हिचुकि-हिचुकि कानि रहल अछि।) लखन- आब की करब? डीहो बीिक गेल। मुदा कारणी चंगा नै भेल। डाक्टर कहलनि जे ई पेसेन्ट बड़का ऑपरेशनक बादे ठीक भऽ सकैत अछि। हम पचास हजार टाका केतएसँ आनब? छुच्छाकेँ के पुच्छा? (मनोज, सोनी, संतोष आ वीरभद्रक प्रवेश। सभ कियो एक-दोसर दिस ताकि रहल छथि। मुदा कियो किनको चिन्है नै छथि।) लखन- अहाँ सभ के छी? मनोज- हम अहींक बेटा मनोज छी। ई संतोष छथि। ई हमर पत्नी छथि। ई हमर सिपाही छथि। लखन- बौआ मनोज, बौआ संतोष। (दुनू बेटाकेँ भरि पाँज कऽ पकड़ि खुशीसँ कानि रहल अछि। एक-दोसरकेँ छौड़ैक मन नै होइ छन्हि। फेर छोड़ि दइ छथि। सभ एक-दोसरकेँ गोर लागै छथि। मुदा मीना, मनोज, संतोष आ सोनीक गोर लागै कालमे पएर छीप लेलनि।) डोरी जरि जाए मुदा ऐठन नै जाए। आबो चेतू। मरनासन अवस्थामे छी। मीना- (कुहरि कऽ) आब हम की चेतब, अहाँ सभ चेतु। लखन- करतबक फल तँ भेटबे करत। मीना- हम तँ नै रहब दुनियाँमे। मुदा अहीं अमर भऽ कऽ रहब। से दुनियाँ देखत ने। अाह! ओह! प्राणो नै छुटैए। मनोज- माताजी केँ की भेलनि, पिताजी? लखन- आइ साल भरिसँ बिमार अछि। पेटमे कोनो गड़बड़ी छै। एकर इलाजमे डीहो तक बीकि गेल। डाक्टर कहलनि जे एकरा बड़का ऑपरेशन हेतै तबे ठीक हएत। ओइमे कमसँ कम पचास हजार खरच हएत। हम आब केतएसँ ओत्ते पाइ आनब। ने राधाकेँ नअ मन घी हेतनि आ ने ओ नचती। बौआ तोरा सभकेँ एना किए भऽ गेलह? मनोज- इसकूलसँ टूरपर जाइ कालमे बस पलटी मारि देलक। ओहीमे दुनू भाँइकेँ एना भऽ गेल। हेड सर जी जान लगा कऽ जिऔलनि। आइ अपनेक किरपासँ कलक्टर छी। लखन- (आश्चर्यसँ) कलक्टर! कलक्टर! साँचे कहै छह? मनोज- हँ हँ। कलक्टर। साँचे कहै छी। अहाँ सप्पत। लखन- यै, बेटा कलक्टर भऽ गेल। आबो कनी नैन जुड़ा लिअ। मीना- (कुहरि कऽ) कलक्टर होइ की मजिस्टर होइ, उ अपने गाँइर सम्हारत। ओइ सँ हमरा की? संतोष- पिताजी, चालि परथित बेमाए। तीनू मुइने जाए। सोनी- बौआ, अखनि ई सभ नै बजियौ। अखनि मधुर वचनक आवश्यकता अछि। प्राणप्रिय एक बेर अपना सभ माताजीकेँ देखतिऐ। मनोज- हमहूँ सएह साेचैत रही जे बड़के हॉस्पीटल चलितौं, ऑपरेशन करा दैतिऐ। मीना- (कुहरि कऽ) हम ऑपरेशन-तपरेशन नै कराएब। आ ने होस्प्ीटल जाएब। संतोष- सुनै छिऐ भौजी हिनकर भाषा। वीरभद्र- बड़ी टेढ़ जनानी बा। बड़ी रार जनानी हऽ। मनोज- अपने सभ शांत रहियौ। माताजी, अपने हाँस्पीटल चलियौ। कोनो चीजक डर नै। डाक्टरकेँ हम अपने कहबै जे बिना ऑपरेशनक ठीक करैले। अहाँ अबस्स ठीक भऽ जाएब। बड़का डाक्टर छै। मीना- डाक्टर बड़का रहै की छोटका रहै। हम आब जी कऽ की करब? मनोज- रामपरी आ कृष्णा जे ओत्ते कनैए, ओकरा की हेतै? मीना- अपना केने की होइ छै? भगवानक जे मर्जी हेतनि सएह हेतै? हम केतौ ने जाएब। हम मरबे करब। सोनी- स्वामी, हमरा लगैए जे ई ओना नै जेती। जबरदस्ती एम्बूलेंसमे बैसाउ। मनोज- हमरो सएह लगि रहल अछि। ओना माताजी बुधियारि छथि। जबरदस्ती नै करए पड़तै। मीना- हम बुधियार रहितौं तँ इएह दशा होइतए हमर। मनोज- सभ कियो मिलि कऽ हिनका उठाउ कोनो तकलीफ ने होन्हि। (सभ कियो मीनाकेँ उठबए चाहै छथि। मुदा ओ नै-नै करै छथि। मुड़ीमचरूआ सरऽधुआ इत्यादि सभ कहि-कहि गारि सेहो दइ छथि। मुदा जबरदस्ती हुनका उठा-पुठा कऽ एम्बूलेंसमे बैसा, हॉस्टपीटल लऽ जाइ छथि। सबहक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- दस (स्थान- हॉस्पीटल। डाक्टर धीरेन्द्र कमपान्डर विजय आ विवेक तथा नर्स अनिता आ मनीषा हॉस्पीटलक काॅमन रूममे बैसि चाह पीबैत गप-सप्प करै छथि।) धीरेन्द्र- विजय, आब मोन होइए जे डाक्टरी पेशासँ सन्यास लऽ ली। दिन-राति कखनो चैन नै। एत्ते केतौ लोक बिमार पड़लैए। विजय- सर, खान-पान आ जलवायु प्रदूषित भऽ गेलैए। स्वाभाविक छै लोक बिमार पड़बे करत। विवेक- सर, लोककेँ बहुत टेंशनो भऽ गेलैए। व्यायाम-योग खतम भऽ रहलैए। तहन लोक स्वस्थ किए रहत? धीरेन्द्र- पाइ बड्ड कमेलौं। एकटा बेटा इंगलैण्डमे डाक्टर अछि आ दोसर अमेरिकामे इंजीनियर। आब भगवानक शरणमे जा शांति चाहै छी। अनिता- सर, परोपकारसँ सेहो शांति भेटै छै। मुफ्त इलाज कएल जाउ, आत्मा संतुष्ट रहत। धीरेन्द्र- नै अनिताजी, ई बात नै छै। मुफ्त इलाससँ वा कम फीससँ डाक्टर हल्लुक भऽ जाइ छै। मनीषा- तहन परोपकार आ इमानदारीकेँ पैघ गुण किए कहल जाइ छै सर? धीरेन्द्र- एक्सट्रा आर्डिनरी प्रतिष्ठा देखबै तँ अोकरा सभकेँ नजर अंदाज किछु करैए पड़त। ओना आइ-काल्हि परोपकार आ इमानदारी कागजे भरि रहि गेल अछि। आइ काल्हि नै उ देवी छै आ ने उ खराह छै। (पेसेंट मीना केर संगे लखन सपरिवारक प्रवेश।) मनोज- (डाक्टरसँ) डाक्टर साएहाएब, एकटा पेसेंट छै। इमरजेन्सीमे भर्ती कएल जाउ। (अपन परिचए पत्र देखबै छथि।) धीरेन्द्र- (परिचए पत्र देखि) विजय, कलक्टर साहैबक पेसेंटकेँ इमरजेन्सीमे देखबै। जल्दी नेने आउ। (दुनू कमपॉण्डर आ दुनू नर्स मीनाकेँ आनलनि। आलासँ हुनका जाँचलनि।) सर, प्रीसकेप्शनो सभ छै अपने लग? मनोज- जी सर। (मनोज धीरेन्द्रकेँ प्रीसकेप्शन देलनि। ओ गौरसँ देखलनि।) धीरेन्द्र- सर, अपनेक पेसेंट ऑपरेशनक अछि। मनोज- जे आवश्यक होइ, से कएल जाउ। धीरेन्द्र- सर, किछु खूनक आवश्यकता हएत। मनोज- बाजारसँ आनि देब। जे पाइ लगतै से हम तैयार छी। धीरेन्द्र- जदी नै उपलब्ध हेतै तहन? मनोज- हम सभ सभ कियो छी। जिनकर खून सेट करतै से तैयार छथि। खूनक जाँच कएल जाउ। धीरेन्द्र- विजय, सबहक खूनक जाँच कऽ लिअ। (विजय सबहक खूनक जाँच करै छथि।) विजय- सर, मनोजक ग्रुप मिलै छन्हि। मनोज- सर, हम तैयार छी। धीरेन्द्र- अनिताजी आ मनीषाजी, पेसेंटकेँ ऑपरेशन थियेटरमे लऽ चलू। संगमे सर सेहो जेथिन। (दुनू नर्स मीनाकेँ थियेटरमे लऽ गेलथि। संगमे मनोज सेहो छथि।) अनीताजी, सरसँ खून लऽ लिअ। पेसेंटकेँ हिनके खून सेट करै छन्हि। (अनिताजी मनोजसँ खून लेलनि।) मीना- हम मरि जाएब तँ मरि जाएब, एकर खून नै लेबै। धीरेन्द्र- मनीषाजी, पेसेंटकेँ एगो निशाँबला सुइया दऽ दियनु। (मनीषाजी मीनाकेँ सुइया देलनि। पेसेंट बेहोश भेली।) सरकेँ बाहर कऽ दियनु मनीषाजी। (मनोजकेँ मनीषा डेन पकड़ि बाहर आनि बैसौलनि। थियेटरमे ऑरेशन भऽ रहल छन्हि। थियेटरमे पेसेंट, डाक्टर आ दुनू नर्स छथि। रमाकान्त आ बलदेवक प्रवेश।) लखन- प्रणाम मुखियाजी। रमाकांत- प्रणाम प्रणाम। लखन- नमस्कार बलदेव भाय। बलदेव- नमस्कार, नमस्कार भाय। (आपसमे सभ कियो प्रणाम-पाती कऽ बैसला।) रमाकान्त- लखनजी, पेसेंटक हाल-चाल कहू। लखन- पेसेंट ऑपरेशन थियेटरमे छथि। डाक्टर कहलनि घबरेबाक काज नै छै। रमाकान्त- लखनजी, गामेपर सुनलौं जे अहाँक बेटा कलक्टर बनलथि। से ठीके बात छिऐ? लखन- (मनोजसँ) बौआ, मुखियाजी केँ प्रणाम करियनु। (मनोज मुखियाजीक पएर छूबि प्रणाम केलनि।) रमाकांत- लखनजी, अहाँक बेटा पाथरपर दुबि जनमा देलक। हिनक तियाग-तपस्या लेल हिनका हार्दिक धैनवाद। (दुनू नर्स ऑपरेशन थियेटरसँ पेसेंटकेँ बाहर निकालि बेडपर सुतौलनि। पेसेंट बेहोश छथि। पीठेपर डाक्टर निकललथि। आपसमे प्रणाम-पाती भेलनि। डाक्टर कॉमन रूममे गेलथि। रामलालक प्रवेश।) रामलाल- मुखियाजी प्रणाम। रमाकांत- प्रणाम प्रणाम। रामलाल- कहू पेसेंटक हाॅल। लखन- अखने ऑपरेशन भऽ कऽ एली। अखनि होशमे नै एली। रामलाल- लखन भाय, सुनलौं अपनेक बेटा कलक्टर भेला आ गामो आएल छथि। लखन- बौआ मनोज, काकाकेँ गोर लगहुन। (मनोज, रामलालकेँ पएर छूबि प्रणाम केलनि। दुनू एक-दोसरकेँ टकटकी लगा कऽ देखि रहल छथि। कियो किनको चिन्है नै छथि। फेर मनोज सोनी लग जाइ छथि।) मनोज- यै, एगो आदमी माता जीक जिज्ञासामे आएल छथि। उ लगै छथि जेना अहींक पिताजी होथि। नै हम चिन्हलियनि आ ने उ चिन्हलथि। कनी चलि कऽ देखियनु तँ। (सोनी आबि कऽ अपन पिताजी केँ चिन्हलथि।) सोनी- पिताजी प्रणाम। (पएर छूबि कऽ) रामलाल- खुश रहू बेटी। अहाँ एतए केतए? सोनी- माता जीक ऑपरेशन छेलनि। रामलाल- (आश्चर्यसँ) माताजी! माताजी!! सोनी- हँ पिताजी, पेसेंट हमरे सासु छथिन। रामलाल- तहन तँ लखन हमर समधि हेथिन। नमस्कार समधि (लखनसँ) लखन- (आश्चर्यसँ) से केना रामलाल भाय? रामलाल- से हमरो नै बूझल छेलए। अखने बुझलौं। अहाँक जे पुतोहु हेती से हमरे बड़की बेटी छथि। लखन- साँचे कहै छी? रामलाल- साँचे नै कहै छी तँ फूसि। ई गप मजाक वा फूसिबला भऽ सकै छै। लखन- तहन तँ नमस्कार समधि। रामलाल- नमस्कार नमस्कार। लखन- कहू बाल-बच्चा आ समधीनक हाल-चाल। रामलाल- बाल-बच्चा सभ आनन्द अछि आ दुनू समधीन बमकि रहल छथि। दुनू एकपर एक छथि। हुनका सबहक आगू हमहीं बड़ बूढ़ छी। मुखियाजी, रामलाल, भायसँ समधि बनि गेला। मनोज हमरे दमाद छथि। रमाकांत- रामलालजी, तहन तँ अपने छक्का मारि लेलिऐ। वएह मनोज आ संतोष लखनक बौरेलहा बेटा रहए। आइ देखियौ भगवानक किरपा। रामलाल- मुखियाजी, भगवान राइकेँ परवत आ परवतकेँ राइ बना सकै छथि। आखिर प्रेरणा तँ हुनके होइ छन्हि आ करतब अप्पन। रमाकान्त- रामलालजी, अपनेक करतबक फल जे दूटा कनियाँ रहैत सुसज्जित परिवारक चर्चा केतए-केतए ने होइए। जखनि कि अहाँ अपन समधिकेँ देखियौ। एगो समदाही, सतौत बेटाकेँ खाक छानए देलकै। (मीनाकेँ होश एलनि।) मीना- कनी पानि पीब। (सोनी पानि आनि कऽ पीअबै छन्हि।) सोनी- माताजी, उठि कऽ बैसल हएत। मीना- कनी सहारा दिअ तँ कोशिश करै छिऐ। (सोनी मीनाकेँ सहारा दऽ उठा कऽ बैसौलनि आ दुनू डेन पकड़ि बैसल छथि।) रामलाल- समधीन, आब ठीक छी ने? अपने हमर समधि केना छिऐ, पड़ोसी छेलिऐ ने? रामलाल- भगवानक किरपा जे अपनेक डेन पकड़निहारि हमरे बेटी छी आ अपनेक मनोज हमर दमाद। मीना- (कर जोड़ि) देखियौ भगवानक महिमा अपरम्पार होइ छै। वएह मनोज आ संतोषकेँ हम कोन-कोन दुर्दशा ने केलिऐ। एतबे नै बढ़नीसँ झाँटि घरसँ निकालि देलिऐ। आइ वएह मनोजक किरपा जे हम अपने सबहक दर्शन कऽ नयन जुड़बै छी। सचमुच हम बड़ पैघ पापी छी आ मनोज, संतोष और सोनी परम महान छथि। ऐ संदर्भमे हम क्षमाप्रार्थी छी, क्षमाप्रार्थी छी, क्षमाप्रार्थी छी। मनोज- धैनवाद माताजी। घर चलै चलू। माता जी आब चंगा भऽ गेली। (सबहक प्रस्थान) ।पटाक्षेप। ।।इति शुभम्।। सूचनाक अधिकार विषयपर आधारित मैथिली नाटक अधिकार बेचन ठाकुर बेचन ठाकुर, गाम चनौरागंज, झंझारपुर, मधुबनी। बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सबहक मोन तँ मोहनहिए छल जे विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू सेहो कऽ देने अछि। जखनि मैलोरंग अपन सर्वेक्षण शुरू केलक जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आँगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलिए रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत- "हम तं चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बलपर सौंसे भारतीय साहित्यमे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करताह? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस सालमे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।" मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह- "सर! किछु कारण अछि। सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि। सभहक अपन अपन मनतव्य छनि। मुदा अँग्रेजीमे एकटा कहाबत अछि। सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट....। जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचै छथि इहए हमरा लेल जीवन दायी अछि।" तारानन्द वियोगी फेर लिखलनि- "मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहिपर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषामे किछु एहन रचना होइ छै जे ‘क्लासिक्स'क कोटिमे अबै छै।। (से मैथिलीओमे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबरमे राखल जाइ छै। एहि लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिअ जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृतिमे आम तौरपर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा ‘खास' तौरपर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृतिमे तं से चलन छैके।" तैपर उमेश मण्डल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखनि सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत। ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छेलनि आ से पुनः सिद्ध भेल जखनि बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलनि। एना किए भेल? जखनि प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुरसीपर पएर लटका कऽ बैसथि आ गप छाँटथि तेकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ 90 प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखनि संजय चौधरी मलंगीएक नाटक करै छथि तँ 90 प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ ल' नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दु जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष, ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। प्रकाशजी उमेश मण्डलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ 2008मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम सुनने रहियनि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर 2-3 मिनटक फोनपर गप अछि आ 2-3 बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर जखनि उमेश मण्डल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियनि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि। वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक समाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करता आ "मेडियोक्रिटी"सँ बाहर बहरेता तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तनि। टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै। मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएटा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" विदेहमे देल जा रहल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करता आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनि पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जेतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जरा कऽ कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सबहक, जे बेसी (95 प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सबहक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही। जखनि हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छेलौं तँ ओतए अभिनय केनिहार सबहक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जेकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, आ जेकरा लेना-देना छै तेकरा अहाँ बारने छी तँ की हएत? जखनि हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छला तँ से आ जखनि ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छला से, दुनूमे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि। संगहि जे लिस्ट गनाैल जाइत अछि, तैमे खतबे जी केतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ 200 लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा कऽ करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जेकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम-2 मे देल जाएत। प्रस्तुत नाटक इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छेलनि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भऽ गेल अछि। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह। अधिकार महान सामाजिक एवं क्रांतिकारी मैथिली लघु नाटक अधिकार बेचन ठाकुर दृश्य- एक (स्थान मुखिया चन्दनक घर। दलानपर चारि-पाँचटा कुरसी लगल छै। मुखियाजीक मुहँलगुआ अमरनाथ आ चन्दन कुरसीपर बैसि गप-सप्प कऽ रहल छथि।) अमरनाथ- मुखियाजी, आइ-काल्हि कोनो मुल्हा फँसलै की नै। चंदन - फँसिते रहै छै की। ओना दू-तीनि दिनसँ बोहनीओ नै भेल अमर भाय। अमरनाथ - मुदा बड़ कसि कऽ धऽ लइ छिऐ अहाँ। चंदन - की करबै, अहीं कहू। हमरा सरकार कोनो तनखा दइ छै? (मंजूरक प्रवेश पूर्ण गरीबी अवस्थामे) मंजूर - मुखियाजी प्रणाम। चंदन - प्रणाम प्रणाम। आउ मंजूर भाय। (मंजूर भुइँयापर बैसि जाइ अछि।) मंजूर भाय, नीच्चाँमे किए बैसलौं? कुरसीपर बैसु ने। मंजूर - हम कुरसीपर बैसैबला लोके नै छिऐ। कुरसीपर हाकिम सभ बैसै छथिन। अमरनाथ भाय, प्रणाम । अमरनाथ- प्रणाम प्रणाम, कहू मंजूर भाय, की हाल चाल? मंजूर- जीऐ छी नै मरै छी, हुक्कुर-हुक्कुर करै छी। अहाँ ऐ फाटल-चिटल लोकपर, कोनो ध्याने नै दइ छी ।। अमरनाथ - कहू धिया-पुताक हाल-चाल, घरवालीक हालचाल? मंजूर - की कहब, धिया-पुता चारि-पाँचटा बेसी भऽ गेलै। तैसँ अक्कछ रहै छी। कहलनि अपरेशन कराऽ लिअ तँ कहलनि अपना सबहक हदीशमे से नै लिखल छै। आ फेर कहलनि हुअ ने दियौ केते हेतै अपन-अपन कमा कऽ खेतै। (चन्दन आ अमरनाथ मुस्काए रहल छथि।) अमरनाथ- मंजूर भाय, कनियाँ थेहगर छ से? मंजूर- की पुछै छी? आब नै सकै छी तैयो बड़ हरान कऽ दइए। आब छोड़ भाय मजाक तजाक। ऐ बुढ़बाकेँ की चटै छी? चन्दन - कह मंजूर केम्हर-केम्हर एला? मंजूर - सरकार, इन्दिरा आवासबला गप हम कहिया कहलौं 2006एमे। केते दिन भऽ गेलै? ताबे केते आदमीकेँ इन्दिरा आवास भेटबो केलै। सरकार हमरोसँ बेसी गरीब कियो छै? टमटम चलबै छेलौं तँ घोड़ीओ खर्च नै निकलै छेलए। सुखा-टटा कऽ घोड़ीओ मरि गेल। करजा-बरजा लऽ कऽ एगो पुरना रिक्शा कीनलौं। सेहो कहियो चलैए कहियो नै। टेम्पू-सवारी रिक्शेबलाक रोजी-रोटी खेलकै। आब हमरोपर धियान दियौ सरकार। बरसातमे एक्को बुन्नी पानि बाहर नै खसै छै। चन्दन - बीस हजार तोरा नाम सँ भेटतह । ओइमे की खरचा-बरचा करबहक? मंजूर - हम तँ कहब, एक्को पाइ नै । मुदा अहीं कहियौ की केना लगतै? चन्दन - अमरनाथ भाय, कनी बूझाए दियौ। अमरनाथ - मंजूर भाय, ओना सभकेँ छ-सात हजार लगै छै, अहाँकेँ पाँच हजार लागतै। मंजूर - बाप रे बा, तहन हमरा की बँचतै? पनरह हजारमे केहेन घर हेतै? अमरनाथ - किछु अपनो दिससँ लगा देबै। मंजूर - खाइले मरै छी,धिया-पुता पन्नी बिछैए रोडपर। ओइमे से एक-दू साए टका खइ-पीऐले दऽ देब, सरकार। किरपा करियौ। चन्दन - पाँच हजार देबै तहने हएत। नै तँ नै हएत। बात जानी साफ। मंजूर - हे हे सरकार, पएर पकड़ै छी। दाढ़ी पकड़ै छी। एगो घर डाइनो बकसै छै। एगो गरीबोकेँ कल्याण करू। नीक हएत सरकार। चन्दन - बेसी नीक हमरा नै पचै छै। ओत्ते लगबे करत। मंजूर - तहन जाइ छी सरकार। जे करियौ। ओना एगो गरीबकेँ तारितिऐ ऽ ऽ ऽ ऽ। (प्रस्थान) चन्दन - हम फेर मुखिया हाएब की नै, के जनै छै? माल बनेबाक बेर अनेक नै अछि। अमरनाथ - से तँ ठीके मुखियाजी। काल्हि के देखलकै? ओना मंजूर वास्तवमे बड़ गरीब अछि। (पटाक्षेप) दृश्य – दू (स्थान मंजूरक सलाहकार विनोदक दलान विनोद कूर्सीपर बैसि पेपर पढ़ि रहल छथि। दीन हीन अवस्थामे मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - नेताजी प्रणाम। विनोद - प्रणाम प्रणाम। कहऽ की हाल चाल? आइ बहुत दिनपर देखलिअ। कह केम्हर-केम्हर एला? मंजूर - की पुछै छी नेताजी। मुखिया बिना घूसे इंदिरा आवास नै देमऽ चाहैए। तहूमे बीस हजारमे कम-सँ-कम पाँच हजार। कहू तँ पनरह हजारमे की की करब? अहूमे आइ चारि-पाँच सालसँ आइ-काल्हि आइ-काल्हि करैए। अखनि केतबो पएर दाढ़ी पकड़लियन तैयो उ नै घमलथि। एक्के बेर कहलथि, पाँच हजार देबै तहने हएत। नै तँ नै हएत। बात जानि साफ। अपने हमरा बुधि दिअजे एकर कोनो निअम कानून छै की नै? विनोद - कानून तँ छै, मुदा दौड़ा-बढ़ी करए पड़तह। तों गरीब आदमी छह। तोरा सँ पार लगतह? मंजूर- – नेताजी, मरता क्या नहीं करता। मरल तँ हम छीहे। अहाँ हमरा रस्ता बता दिअ, देखै छिऐ कानूनमे दम छै की नै। उचितक लेल अहाँ हमरा जे कहब से करैले तैयार छी। विनोद - हम एगो आवेदन लिखि दइ छिअ। मुखिया लग अखनि चलि जा दऽ दिहक आ की कहै छह से फेर कहिहऽ। (विनोद मंजूरकेँ एगो आवेदन लिखि दइ छथि आ मंजूर उ लऽ कऽ मुखिया लग तुरंत जाइ अछि।) (पटाक्षेप) दृश्य- तीन (स्थान - चन्दन मुखियाक दलान। दलानपर चन्दन आ अमरनाथ कुरसीपर बैसि गप-सप्प कऽ रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - मुखिया जी प्रणाम। चन्दन - प्रणाम प्रणाम। मंजूर - अमरनाथ भाय प्रणाम। अमरनाथ - प्रणाम प्रणाम मंजूर भाय। बैसू। मंजूर - की बैसब? बैसलासँ पेट भरतै। मुखिया जी एगो दरखास छै, देखल जाउ। चन्दन - लऽ लिअ अमरनाथ। पढ़ियौ की लिखल छै। (अमरनाथ दरखास लऽ कऽ पढ़ै छथि। मंजूर भूइयांमे बैसि जाइत अछि।) अमरनाथ - सेवामे, श्रीमान् मुखिया महोदय। ग्राम पंचायत राज रामपुर। महाशय, नम्र निवेदन अछि जे हम अति निर्धन बेकती छी। अपन पंचायतमे किनको सँ पहिने हमरा कोनो सुविधा भेटक चाही। ओइमे अपने हमरा पाछू छोड़ि दइ छिऐ। इंदिरा आवास लेल चारि-पाँच साल सँ घूमबै छी। जै गरीबकेँ पाँच हजार टाका नै रहाए ओकरा इंदिरा आवास नै भेटए! ऐ संदर्भमे अपने सँ करबद्ध प्रार्थना अछि जे एगो महागरीबकेँ निःशुल्क इंदिरा आवास प्रदान कऽ कल्याण कएल जाए। संगहि सूचना अधिकारक तहत पंचायत सचिव सँ इंदिरा आवासबला आय-व्यय फाइल उपलब्ध करबैमे सहयोग कएल जाए। धैनवाद। अपनेक बिसवासी- मंजूर चन्दन - जाउ मंजूर, अहाँकेँ जै अधिकारक प्रयोग करबाक अछि करू ग। देखि लेबै। नै, जदी पाँच हजार टाका ओइमे से देबै तँ अखनो भऽ सकैए। मंजूर - नै मुखियाजी, हमरा कानूनेमे जाए दिअ। चन्दन - जाउ ने हम रोकने छी। मंजूर - बेस हम जाइ छी। (मंजूरक प्रस्थान) अमरनरथ - मुखियाजी एकरा बुते एगो अल्हुआ तँ उखड़बे नै करतै आ आएल छला धमकी दइले। केहेन-केहेन गेल्ला तँ मोँछबला एल्ला। चन्दन - हा हा हा ऽ ऽ ऽ ऽ (ठहक्का मारि हँसै छथि।) जाए दियौ अमरनाथ केतए जेतै कानून अपना हाथमे छै। (पटाक्षेप) दृश्य- चारि (स्थान - विनोदक दलान। विनोद ससुराइर जाइक तैयारीमे छथि। तखने मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - नेताजी प्रणाम। विनोद - प्रणाम प्रणाम। कहऽ मंजूर, मुखियाजी भेटलखुन। मंजूर - हँ भेटलथि तँ जरूर। मुदा फेर ओएह गप्प। बिना पाँच हजार घुसे काज नै हएत। अहाँके जै अधिकारक प्रयोग करबाक हुआए से करू। विनोद - आब हुनक, किछु नै कहक। हम तोरा तीनिगो आवेदन लिखि दइ छिअ। एगो बी.डी.आे. केँ दऽ दिहक, एगो एस. डी. ओ. के दऽ दिहक आ एगो डी. एम. केँ दऽ दिहक। डर नै ने हेतह? मंजूर - डर कथीके हेतै नेताजी। कोनो हम चोरी कर जाएव। अहाँ कनी हानि कऽ लिखि दिअ। (विनोद तीनगो आवेदन लिखि दइ छथि।) विनोद - मंजूर, ई तीनु आवेदन लएह। तीनु ऑफिसमे दऽ दिहक। हम आइ ससुराइर जाइ छिअ। एक सप्ताहक बाद एबह। देखहक की होइ छै? मंजूर - हम अखने जाइ छी नेताजी। विनोद - बेस जाह। हमहूँ जाइ छिअ। (पहिने मंजूरक प्रस्थान। तकर बाद विनोदक प्रस्थान।) (पटाक्षेप) दृश्य- पाँच (बी.डी.ओ. कार्यालय। गेटपर एगो सिपाही छथि। बी.डी.ओ. अशोक कार्यालयमे फाइल उनटा रहल छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। सिपाही मानसिंह छथि।) मंजूर - प्रणाम सर। मनसिंह - प्रणाम प्रणाम। का बात हउ? मंजूर - सर, कनी बी. डी. ओ. साहैबकेँ भेँट करबाक छै। मानसिंह - बात का ह, से पहिले बोल न? साहैब जरूरी काममे फँसल बा? मंजूर - सर, हमरो बड़ जरूरी काज छै। इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै। मानसिंह - अच्छा जा। (मंजूर अशोक लग पहुँचलथि।) मंजूर - हाकिम परणाम। अशोक - बाजू की बात अछि? मंजूर - हाकिम इंदिरा आवास बला एगो दरखास छै। अशोक- अखनि उ सभ काज नै होइ छै ब्लॉकमे। उ काज मुखिए करै छै। अपन मुखिए लग जाउ। मंजूर - हाकिम, मुखियासँ अक्कछ भऽ गेलौं तहन ने अपनेक शरणमे एलौं। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहाए गेल। सिरकी तानि सभ परानी कौहुना जीबै छी। अशोक - मुखिया की कहलनि? मंजूर - मुखिया कहलनि जे बीस हजारमे पाँच हजार लेब, तहने हएत, नै तँ नै। अशोक - किछु लऽ दऽ कऽ काम कऽ लैतौं ने? मंजूर - हाकिम, हमरा उ बात एक्को रत्ती पसीन नै पड़ल। एक-दू साए बला गप रहितै तँ सोंचबो करितिऐ। हाकिम, किरपा कऽ ई दरखास लियौ आ एगो गरीबोसँ गरीबपर विचार करियौ। अशोक - बेस लाउ। (मंजूर अशोककेँ दरखास दऽ दइ छथि।) मंजूर - परणाम हाकिम। जाइ छी हम। रिक्शा चलबैले जाएब। (प्रस्थान) अशोक - सेवामे, श्रीमान् प्रखंड विकास पदाधिकारी महोदय, कार्यालय - भगवानपुर महाशय, सूचना अधिकारक तहत हम पुछैले चाहै छी जे इंदिरा आवास पाँच हजार घूसे लऽ किए भेटत, ओना किए नै भेटत? एकर लिखित जवाब दूः दिनक अन्दर चाही। नै तँ आगू बढ़ब। धैनवाद, मंजूर, ग्राम पंचायत राज रामपुर। (अशोक आवेदन पढ़ि कूड़ामे फेंक दइ छथि।) एकर लिखित जवाब दू दिनक अन्दर चाही, नै तँ आगू बढ़ब। जाउ, जेतए बढ़ब, तेतए बढ़ू। सभठाम एक्के रंग भेटत। पटाक्षेप दृश्य- छह (स्थान - अनुमंडल कार्यालय। सुनील एस. डी. ओ. आ बहादुर हुनक सिपाही छथि। सुनील फाइल उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - सर प्रणाम। बहादुर - प्रणाम प्रणाम। केतए हुरार जकाँ हुरकल जाइ छी? रूकू। पहिने एतए पाँच गो टका दिअ, तहन अन्दर जाएब। मंजूर - (जोर सँ) ऐ देहमे करौआ लगल छह की? सरकार सँ तों तनखा नै लइ छहक? बहादुर - अच्छा जा। बेसी बाजह नै (मंजूर सुनील लग पहुँचल।) मंजूर - परणाम हाकिम। सुनील - की बात? मंजूर - इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै। लेल जाउ। सुनील - (आवेदन लऽ कऽ) अहाँ जाउ। मंजूर - जाइ छी हाकिम। एगो गरीबोकेँ कल्यााण करबै। परणाम। (मंजूरक प्रस्थान।) सुनील - सेवामे, श्रीमान् अनुमंडलाधिकारी महोदय, बेनीपुर। महाशय, हम मंजूर ग्राम पंचायत राज रामपुरक स्थाइ निवासी छी। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहा गेने काहि काटि रहल छी। इंदिरा आवास लेल मुखिया चंदन पाँच हजार टाका घूस मांगैए। बी. डी. ओ. साहेब सेहो हमर आवेदन पर कोनो धियान नै देलनि। सूचना अधिकारक तहत हम एकर लिखित जवाब दू दिनक अन्दर चाहै छी। अन्यथा आगू बढ़ब। धूः ई बकवासबला आवेदन छै। के माथा पच्ची करतै ऐमे? (सुनील आवेदनकेँ कुड़ामे फेंक दइ छथि ।) पटाक्षेप। दृश्य- सात (स्थान समाहरणालय। डी. एम. चन्द्रकान्त कार्यालयमे फाइल उनटा रहल छथि। गेटपर सिपाही हंसराज ठाढ़ छथि। तखने मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - परणाम हुजूर। अन्दरा कलक्टर साहैब छथिन? हंसराज - की बात? मंजूर - हुनके सँ काज य। हंसराज - कोन काज से? मंजूर - इंदिरा अवासबला एगो दरखस देबाक छै हाकिमकेँ। हंसराज - लाउ ने पाँच हजार टाका, हमही काज कराऽ दइ छी। हाथो-हाथ काज भऽ जाएत। मंजूर - खाएब, से ओकाइदे नै आ पाँच हजार टाका हम केतएसँ देब? हंसराज - तहन ऑफिसमे नै घुसु। घुरि जाउ। मंजूर - से किए, अहींक ऑफिस छी लगाएल। हंसराज - बेसी फटर-फटर बाजलौंह तँ एक्के झापरमे ठीक भऽ जाएब। कोनो बाप काज नै देत-3 मंजूर - बेसी बाप-बाप केलौं तँ बूझि लिअ। हंसराज - (मंजूरकेँ एक थापर मारि) हरामी कहीं के। आब बाज कोन बाप काज देतौ। मंजूर - (हंसराजकेँ एक थापर मारि) हरामी सभ, चोट्टा सभ गरीबकेँ खा कऽ साँढ़-पारा भऽ गेल। (हंसराज आ मंजूरमे हाथापाई भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि चन्द्रकान्त गेटपर एला।) चंद्रकान्त - अहाँसब हल्ला-फसाद किए करै छी? हंसराज की भेलै? हंसराज - सर, ई हमरा बिना मतलबकेँ गाड़ि दऽ देलक। मंजूर - सर, पहिने यएह हमरा गाड़ि देलक। तहन हम देलिऐ। चंद्रकान्त - धिया-पुता जकाँ गाड़ि-गलाैज, मारि-पीट करै जाइ छी। छिः! छिः! लेक सभ हँसत। बाजू बौआ, की बात अछि? मंजूर - हुजूर एगो इंदिरा आवासबला दरखास छै। चंद्रकान्त - लाउ अन्दर आउ। (मंजूर आ चन्द्रकान्त कार्यालसमे जाइ छथि।) आब बाजू की कष्ट? मंजूर - हजूर हम रिक्शा चालक छी। कमाइ छी तँ खाइ छी। नै तँ उपासे रहै छी। चारि-पाँच साल पहीने बाढ़िमे हमर झोपरी दीहा गोल। इंदिरा आवास लेल मुखियालजीकेँ कहलियनि तँ उ कहलनि जे पाँच हजार टाका घूस देबही तहने हेतौ नै तँ नै हेतौ। पएरो दाढ़ीओ पकड़लियनि जे खाइ पीऐले, एक-दू साए टाका पेटो काटि कऽ देब। हमरापर किरपा कएल जाउ। मुदा टस-सँ-मस नै भेला। हजूर, एगो हमर दरखास स्वीकार कएल जाउ। चंद्रकान्त - बेस लाउ। (मंजूर चंद्रकान्तकेँ दरखास दऽ दइ छथि।) मंजूर - हजूर, हमरा पंचायतमे हमरासँ बेसी गरीब कियो नै हएत। अपने पता कऽ लियौ। एगो गरीब बड़ आशा सँ अपने लग पहुँचल अछि। किरपा अबस्स कएल जाउ हजुर। आब हम जाइ छी हजुर। तीनि दिनसँ भुखले छी। (मंजूरक प्रस्थान) चंद्रकान्त - सेवामे, श्रीमान् समाहता महोदय, परसा महाशस, नम्र निवेदन अछि जे हम मंजूर ग्राम पंचायत राज रामपुरक स्थाइ निवासी छी। हम अति निर्धन रिक्शा चालक छी। चारि-पाँच साल पहिने पहिने हमर झोपड़ी बाढ़िामे दहा गेल। हम सभ परानी सिरकी तानि पशु जीवन जीबै छी। कृपया एगो इंदिरा आवासक अनुमति प्रदान कएल जाउ। अइले हम अपनेक आजीवन कृतज्ञ रहब। ओना मुखिया, बी.डी.ओ. आ एस.डी. ओ.के. आचरणसँ हम पूर्ण आजीज छी। कृपया हमर अनुमति दू दिनक अंदर देबाक कष्ट करी। अन्यथा हम सूचना अधिकारक तहत घूसखोरीक विरूद्ध अवाज अबस्स उठाएब। धैनवाद, (आवेदन पढ़ि चन्द्रकांत कुड़ामे फेक दइ छथि। ई तँ सरासर धमकी भेलै। सूचना अधिकार तँ हमरा मुट्ठीमे छै। हम कोनो आइरी-गाइरी हाकिम छी, डी.एम.छी।) हंसराज- (अन्दर कार्यालय जाक) सर, ई आदमी बड़ खच्चर छला। जहाँ कहलिऐ पाँच हजार घूस देबै तँ हाथो-हाथ काज करा देब। फट सन एक थापर बैसा देलक। तेकरे हाथापाई छेलै । चन्द्रकांत- जाए ने दियौ। ओकरा कोनो ऑफिस गुदानतै। पटाक्षेप। दृश्य- आठ (स्थान- विनोदक दलान। विनोद कुट्टी काटि रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - नेताजी परणाम। विनोद - परणाम परणाम। कह मंजूर, काज भेलह? मंजूर - आइ पनरह दिन भऽ गेल। काजक कोनो अता-पता नै। बेकारे रोजी-रोटी छोड़ि कऽ हरानो भेलौं। विनोद - मंजूर, तों जिला तक पहुँचलहक। तोहर काजक कोनो सुनबाई भेलै। आब बुझहक प्रशासन केहेन भ्रष्ट छै। एकटा करह, छोड़ह माथा-पच्ची। जा कमैहऽ आ खैहऽ। ऐ सबहक चक्करमे नै पड़ह। ऐ रस्तामे बड़ा फेदरत छै। मंजूर - नेताजी, परेशानी झेलैले हम तैयार छी। अहाँ हमरा उपए बताउ। विनोद - हाईकोर्ट छै, सुप्रीम कोर्ट छै। सूचना आयोग छै। मंजूर - नेताजी, हमरा अहाँ जेतए जाइले कहबै ओतए जाइले तैयार छी। विनोद - बेस, एगो दरखास हम लिखि दइ छिअ। तों जगदीशपुर चलि जाह। ओइ गाममे एगो हमर पुरना मित्र छथिन। हुनक नाम श्यामानन्द छियनि। पुछैत-पुछैत चलि जइहऽ। हुनका दरखास दऽ दिहक। बड़ नीक लोक छथिन। गरीबकेँ अपनो दिससँ मदति करै छथिन। मंजूर - बेस अपने लिखि दियौ। (विनोद आवेदन लिखै छथि। मंजूर आवेदन लऽ कऽ प्रस्थान करै छथि।) विनोद - केहेन भ्रष्ट प्रशासन छै जे ओइ बुढ़बाकेँ दौड़बैत-दौड़बैत हरान कऽ देलकै। मुदा बिनु घूस एगो इंदिरा आवास नै भेटलै। (मुँह बिजका लइ छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- नअ (स्थान - नेता श्यामानन्दक दलान। दलानपर बैसि उ पत्रिका उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - परणाम सरकार। श्यामानन्द - परणाम परणाम। नै चिन्हलौं। मंजूर - सरकार हम मंजूर छी। रामपुरसँ बड़ी आशसँ पएरे एलौंहें। श्यामान्नद - बाप रे बा, एत्ते दूरसँ पएरे। धैनवाद अहाँक। मंजूर - सरकार, मजबूरीक मारल छी, बाढ़िक झमारल छी, मुखिया-बी.डी.ओ.-एस.डी.ओ.-कलक्टर सभसँ रिटाइर छी। श्यामानंद - कहू की बात अछि। मंजूर - सरकार, एगो हमर दरखास छै। श्यामानंद - लाउ दरखास। (श्यामानंद आवेदन लऽ पढ़ै छथि।) सेवामे, श्रीमान् सूचना आयुक्त महोदय, पटना। महाशय, निवेदन अछि जे चारि-पाँच साल पूर्व बाढ़िमे हमर झोपड़ी दहा गेल। हम गरीब आदमी छी। रिक्शा चला कऽ कौहुना गुजर करै छी। कमाइ छी तँ खाइ छी नै तँ उपासे रहै छी। आइ पाँच सालसँ सिरकी तानि पशु जकाँ रहै छी। बरसातमे एक्कोटा बुन्नी बाहर नै खसैए। म्ुखियाजीकेँ पएर-दढ़ी पकड़लियनि तँ उ कहलनि पाँच हजार घूस देबै तँ इंदिरा आवास भेट जाएत। नै तँ कोनो उपाए नै। बी. डी. ओ., एस. डी. ओ. आ डी. एम लग दरखास देलौं आ सूचना अधिकारक तहत दू दिनमे जवाब मांगलौं। आइ पनरहम दिन छी। कत्तौ कोनो सुनवाइ नै। ऐ संदर्भमे हमर श्रीमान् सँ करबध प्रार्थना अछि जे स्थितिक पूर्ण जाँच कराबए हमर सूचना अधिकारक औचित्यपर गंभीरतापूर्वक विचार कएल जाए आ एगो उजरल अतिदीनकेँ बसाएल जाए। ऐ पुण्यात्मक कार्यक लेल हम अपनेक आजीवन आभारी रहब। धैनवाद, अपनेक विश्वासी नाम - मंजूर ग्राम - रामपुर प्रखण्ड - भगवानपुर जिला - परसा (बिहार) (श्यामानंद किछु देर सोंचिकऽ) आइ धरि हमरा लग एहेन केस नै आएल छल। ई गंभीर केस अछि। खैर मंजूर अहाँ जाउ। हम पूर्ण प्रयास करब। मंजूर - हमरा आबो पड़तै पटना।? श्यामानंद - अखनि नै। जरूरी पड़तै तँ बजाए लेब। मंजूर - बेस सरकार किरपा अबस्स करबै। श्यामानंद - अहाँ जाउ। एत्ते दूर जेबाको अछि पएरे। मंजूर - परणाम सरकार। श्यामानंद - परणाम परणाम। (मंजूर प्रस्थान करै छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- दस (स्थान - मंजूरक घर। मंजूर घरक आगू रस्तापर माथा-हाथ दऽ बैसल छथि।) मंजूर - अल्ला सबटा विपति हमरे दऽ देलक। घोड़ीओ मरि गेल। सभ दिन रिक्शो नै चलैए। गाम-घरक काजो सभ दिन नै भेटैए। एम्हर धिया-पुता खोखरैए। सिरकीओ चुबैए। की करी की नैं, किछु नै फुड़ाइए। या अल्लाह, या खुदा। (श्यामानंदक नोकर मालिकक प्रवेश।) मालिक - मंजूर अपने छिऐ? मंजूर - जी जी, की कहै छी से? मालिक - हमर नेताजी श्री श्यामानंद बाबू अपनेकेँ काल्हिु पटना बजौलनि। सूचना अधिकारक प्रयोगमे अपनेक बड़ पैघ प्रतिष्ठा भेटऽ जा रहल अछि। मंजूर - परणाम सर, परणाम सर। धैनवाद अहाँकेँ। एहेन शुभ समाचार आइ धरि कियो नै देने रहथि। मालिक - बेस हम जाइ छी। अहाँ जरूर जेबै, बिसरबै नै। (प्रस्थान) मंजूर - (घरवाली नजीमा लग जा कऽ) गै नजीमा काल्हि हम पटना जेबै। आब देखही अल्ला की करै छै? नजीमा - बटखरचा लेल तँ घरमे किच्छो नै छै। कनी मुरही हेतै। मंजूर - सएह दऽ दिहनि। नजीमा - जेबहक केना? ओत्ते दूर पएरे हेतह जाएल। मंजूर - टेनमे मांगैत-चांगैत चलि जेबै गै। नजीमा - कनी ओरिया कऽ जइहऽ। सेहो तँ गाड़ी आइए पकड़बहक तब ने काल्हि पटना पहुँचबहक। मंजूर - ठीक कहै छेँ नजीमा। जो अखने मुरही नेने आ विदे भऽ जाइ। ओना टेन छूटि जाएत तहन। हमरा भीखो मांग पड़तै नजीमा। नजीमा - की करबहक? मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी होइ छै। तोरा अबेरो होइ छह। हैअए मुरही नेने आबै छिअ। (नजीमा एक मुठी मुरही खोंइछामे आनलथि।) हैअए, एतबे छेलै। मंजूर - ला जे छौ से। (नजीमा मंजूरक गमछामे देलक) हम जाइ छियौ। राति-विराति कनी जाइगे कऽ सुतिहेँ। घर बेपरद छौ । नजीमा - बेस, तूँ जा ने अल्लाक नाम लऽ कऽ। मंजूर - या अल्ला, या विस्मिला । पटाक्षेप। दृश्य- एगारह (स्थान - सूचना आयुक्त कार्यालय पटना। ब्रह्मदेव सुचना आयुक्त, नेताजी श्यामानंद आ उप सूचना आयुक्त अनजार कार्यालयमे बैसि कऽ मंजूरक भूमिकापर समीक्षा कऽ रहल छथि।) श्यामानंद - सर, आइ धरि हमरा मंजूर जकाँ केस कहियो आ कत्तौ नहि टकराएल राहाए। एत्ते गरीब एवं मूर्ख रहैत एहेन कठिन स्टेप। अंजार - साहैब, वास्तवमे मंजूर धैनवादक पात्र आछि जेे निच्छछ देहाती आ औंठा छाप रहैत अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति संघर्शषीलताक प्रदर्शन केलनि। ब्रह्मदेव - हम एते पद देखलौं मुदा मंजूर जकाँ अपन हकक प्रति जागरूक एवं कर्मठ बेकती नै भेटल राहाए। जदी उ अखनि एतए रहितए तँ हम हुनका हार्दिक धैनवाद दैतौं। श्यामानंद - आइ पटना आबैले ओकरा समाद पठेने रहिऐ। समाद भेटलै की नै। आएत की नै पता नै । (मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - (श्यामानंदकेँ) परणाम हुजूर। (कर जोड़ि) श्यामानंद - परणाम परणाम। मंजूर - (ब्रह्मदेवकेँ) परणाम हुजूर। ब््राह्ममदेव - परणाम हुजूर। मंजूर - (अंजारकेँ) आदाब हुजूर। अनजार - आदाब आदाब। मंजूर - हुजूर सभ, हमरा आबैमे बड़ देरी भऽ गेल। क्षमा कएल जाउ। हुजूर? टेने लेट छेलै। ब्रह्मदेव - अच्छा चलू कोनो बात नै। बेसी लेट नै भेल। अहींक नाम मंजूर छी ने? मंजूर - जी हुजूर। ब्रह्मदेव - हम सूचना आयुक्त छी। हम अहाँकेँ हार्दिक धैनवाद दइ छ। (वाह! वाह! कहि पीठी ठोकै छथि।) अहाँ जकाँ अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति समरपित नागरिक देशकेँ उद्धार कऽ देत। अपनेकेँ बहुत-बहुत धैनवाद। (हिन्दुस्तान पत्रकार पवन आ दैनिक-जागरणक पत्रकार महेशक प्रवेश। दुनु मंजूरक फोटो खिंचै छथि आ गप-सप्प करै छथि।) पवन - मंजूर, ऐ कार्यालयमे अपनेकेँ की भेटलै? मंजूर - हुजूर। सूचना आयुक्तक साहैब हमरा धनवाद देलकै। महेश - जखनि धैनवाद नै दैतथि तहन? मंजूर - तखनि हमरा हाकिमपर सँ बिसवास हटि जैतए। हम बूझि जइतौं जे बड़को आपिस बकवास अछि बेमतलब अछि। पवन+महेश - धैनवाद मंजूर भाय। पटाक्षेप। दृश्य- बारह (स्थान - आई. बी. एन.-7 चैनलक मनेजर अखिलेशक आवास। उ मिथिला समाद पेपर पढ़ि रहल छथि।) अखिलेश - मंजूर को प्रतिष्ठा। मंजूर ग्राम-पंचायत राज रामपुर, प्रखंड-भगवानपुर, जिला-परसा (परसा) क स्थाई निवासी छथि। ओ अतिदीन रिक्शा-चालक छथि जे पूर्ण मूर्ख छथि। ओ इंदिरा आवासमे घूसखोरीक विरूद्ध अवाज उठेबामे सूचना कार्यालयसँ प्रतिष्ठा प्राप्त केलनि जइसँ सूचना आयुक्त ब्रह्मदेव हार्दिक धैनवाद दैत पीठ ठोकलनि। ब्रह्मदेव कहलनि, ऐहेन कर्मठ नागरिक देशक उद्धार करत। (अखिलेश किछु काल सोचि कऽ पेपर रखि दइ छथि।) मंजूर मूर्ख एवं गरीब रहि कऽ एहेन कठिन कदम उठौलनि देशक महान प्रेरणादायक काज केलनि। उ देशक अस्सल नागरिक छी। हुनका हमरा तरफसँ हार्दिक धैनवाद आ अवार्ड परसु दिल्लीमे भेटतनि। हम हुनका सपरिवार आबै-जाइक भाड़ा पठा दइ छियनि। पटाक्षेप। दृश्य- तेरह (स्थान मंजूरक झोपड़ी। झोपड़ीमे मंजूर, नजीमा, बेटी सलमा, नाजीनी, खुशबू आ बेटा अजहर, जफर एवं अस्फाक उपस्थित छथि मंजूर सपरिवार दिल्ली जेबाक विचार-विमर्श कऽ रहल छथि।) मंजूर - गै नजीमा, अखिलेश अपना सभकेँ दिल्ली आबै-जाइक खर्च पठा देलकौ, से जेबही? नजीमा - कथीले हौ? मंजूर - से हमरो नै बुझल छौ। एक आदमी कहै छेलए जे जाह दिल्ली, अखिलेश बड़का अबार देतह। कहाँदुन पेपरमे निकलल छेलै। नजीमा - चल ने देखियौ तँ ओकरा केहेन छै? हौ हमरा से कुच्छो पूछतै तँ की कहबै? मंजूर - जे फुड़तौ से कहिऐ। उ कोनो नै बुझै हेतै जे मुरूख आ गरीबक भनसिया सधारणीमे केहेन होइ छै। गै नजीमा, लोक सभ हमरा बड़ मजाक करैए जे दिल्ली जा न, रिक्शापर बैसा कऽ अन्नपूर्णाकेँ खूम घुमबिहऽ। नजीमा - हौ, अपना सभकेँ अपने गाम लऽ कऽ नै तँ चलि जेतै? मंजूर - नै गै, से तँ नै बुझाइ छौ। चल ने बुझल जेतै। बड़ बेसी तँ अपना गाम लऽ जेतै। ऐ सँ बेसी की हेतै? ओतै खाएब, पीयब आ मौज मस्तीमे रहबै। बुझै छी ही, अखिलेश केतेक बड़का आदमी छै? नजीमा - हँ हौ, सुनै छिऐ बड़ीटा लोक छै। बिआह-तिआह करैले नै ने कहतै। मंजूर - नै गै, तूँ तँ बूरबक जकाँ गप करै छेँ। सलमा - बाबा, हमहुँ जेबौ तोरा संगे दिल्ली अखिलेशकेँ देखैले। अस्फाक - बाबा, हमहुँ ओकरेसँ बिआह करबै। मंजूर - केकरासँ अस्फाक - अखिलेशक साइर सँ। मंजूर - धूर बुड़बक, लोक हँसतौ। खुशबू - बाबा, सभकेँ दिल्ली लऽ जेबहक आ हम घरपर असगरे रहबै? मंजूर - सभ कियो चलबै बुच्ची राजधानी एस्प्रेससँ। ओइ टेनमे जाड़मे गरम आ गरममे जाड़ लगै छै। गै नजीमा, तू सभ जल्दी तैयार होइ जो। आइ रातिमे पटनासे ओ टेन छै। फेद एत्ते दूर जेबाको छै ने। लेट भऽ रहल छौ। नजीमा - जाइ छिअ तैयार होइले। तोहूँ जा झारा-झपटासँ भऽ आबह। तोरा खुच-खुच झड़े लगैत रहै छह। मंजूर - अच्छा हम ओम्हरसँ अबै छी। तों सभ तैयार रह। पटाक्षेप। दृश्य –चौदह (स्थान - दिल्ली। मंच सजल धजल अछि । दर्शकक भीड़ अछि। अखिलेश आओर अन्नपूर्णा मंचपर उपस्थित छथि। अखिलेशक नौकर किसुन मंचपर घुमि रहल छथि। अखिलेश आ अन्नपूर्णा पेपर पढ़ि रहल छथि।) किसुन - मालिक, ओ सभ एखनि धरि नै पहुँचलथि की कारण भऽ सकै छै? अखिलेश - ट्रेनक टाइम आब भऽ गेलैए। ओ सभ आबिते हएत। (सपरिवार मंजूरक प्रवेश) मंजूर - परणाम हुजूर। (अखिलशकेँ) अखिलेश - परणाम परणाम मंजूर भाय। मंजूर - परणाम मैडम। अन्नपूर्णा - परणाम परणाम। बैसे जाइ जाउ। (सब कियो कुरसीपर बैसै छथि।) अखलेश - मंजूर भाय, सपरिवार नीके ना एलौं न? मंजूर - जी, बड़ नीकेना एलौं। राजधानीमे चढ़ि हम सभ तइर गेलौं। अन्नपूर्णा - मंजूर भाय, ई के छथि? मंजूर - हमरे घरवाली छिऐ नजीमा। अन्नपूर्णा - नजीमा बहिन, नमस्कार। नजीमा – नमसकार बहिन। अन्नपूर्णा - बहीन, उ सभ के छथि? नजीमा - सभ हमरे धिया-पुता छथि। अन्नपूर्णा - बहुते धिया-पुता अछि। ऐपर सुधार करू, बहीन। नजीमा - की करबै, अल्लाक मर्जी। अन्नपूर्णा - सभकेँ नीक जकाँ पढ़ाएब-लिखाएब। अखिलेश - मंजूर भाय, आब अपना सबहक आयोजित कार्यक्रमपर धियान देल जाए। मंजूर - जी हुजूर। अखिलेश - समस्त दर्षक लोकनि, अखिलेशक नव वर्षक हार्दिक शुभकाना आ अभिनन्दन। आइ ऐ देशक अहोभाग्य अछि जे मंजूर जकाँ अपन अधिकार आ कर्त्तव्यकेँ बुझ बला प्रथम नागरिक हमरा सभकेँ प्राप्त भेल जे गरीब-गवार रहैत देशक भ्रष्टाचारीक विरूद्ध बीड़ा उठा कऽ अपन इमानदारी आ कर्मठताक परिचए दैत सफलता समस्त जनताक बीच समरपित केलनि। हम हिनक अहम भूमिकासँ प्रसन्न भऽ कऽ बेस्ट सिटीजन ऑफ द नेशन अवार्डक लेल चुनलौं आओर अखनि शीघ्र हम हिनका अपन अवार्डसँ सम्मानित करबनि। (थोपरीक बौछार भऽ जाइए।) मंजूर भाय अपनेक दर्शक लोकनिकेँ किछु कहियौ। मंजूर - हम दर्शक भाय सभकेँ की कहबैन। हम तँ मुरूख छी। तहन अपनेक आज्ञा भेलै तँ किच्छो कहि दइ छिऐ। हम तँ यएह कहब जे देशमे भ्रष्टाचारीके जनम जनता देलकै आ ओकर पालन-पोषण से हो जनते करै छै। जदी एकजुट भऽ कऽ सख्ती सँ एकर विरोध कएल जाए तँ पक्का कहै छी जे ऐ महामारीसँ देशके मुक्ति भेटतै आ हमर देशक कल्याण हेतै तथा दुनियाँमे एकर नाम हेतै। ऐ से बेसी हमरा किच्छो नै फुड़ाए य। धनवाद। (फेर थोपरीक बौछार भऽ जाइ छै।) अखिलेश - आब अपने सबहक समक्ष हम मंजूर भायकेँ सम्मानित कऽ रहल छियनि। (अखिलेश मंजूरकेँ फुल-माला अरपित केलनि। थोपरीक बौछार भेल। अखिलेश मंजूरकेँ अवार्ड देलनि। थोपरीक फेर बौछार भेल। मंजूर अखिलेशकेँ पएर छूबि प्रणाम कर चाहै छथि। मुदा अखिलेश मंजूरक हाथ पकड़ि लइ छथि।) मंजूर भाय, सचमुच अपने ऐ देशक महान प्रेरक छिऐ। हमरा सँ बड़ पैघ छिऐ। अहाँकेँ हार्दिक प्रणाम। मंजूर - खुश रहू अखिलेश भाय। अहाँकेँ हमर उमेर लगि जाए। (मंजूर अखिलेश सँ गरदनि मिललथि आ नजीमा अन्नपूर्णाकेँ पएर छूबि प्रणाम केलक। थोपरीक बौछार भेल।) पटाक्षेप। दृश्य- पनरह (स्थान - मंजूरक झोपरी। मंजूर अपन भाए रमजानीसँ गप-सप्प कऽ रहल छथि।) रमजानी - भैया, की केना भेलै दिल्लीमे? मंजूर - बौआ, अखिलेश हमरा अबार देलकै आ फुल-माला हमरा पहिरा कऽ नवाजलकै। लोकक बड़ भीड़ छेलै। (चन्दन आ अमरनाथक प्रवेश।) अमरनाथ - मंजूर भाय नमस्कार। मंजूर - नमस्कार, नमस्कार। मुखियाजी, परणाम। चन्दन - परणाम, परणाम। मंजूर - बैसल जाउ, सरकार सभ । (चन्दन आ अमरनाथ पीढ़ीयापर बैसलथि।) अमरनाथ - मंजूर भाय, खर्च-बर्च करू। अहाँकेँ इंदिरा आवासबला बीस हजार टाका आबि गेल आ मुखियाजी सेहो अपना तरफसँ पाँच हजार टाका दइ छथि। मंजूर - अमरनाथ भाय, हमरा हरामक पाइ नै चाही हमरा अपन उचित पाइ बीस हजार चाही अप्पन पाइ मुखियाजी अपने रखथि। अमरनाथ- मंजूर भाय, अहाँकेँ मुखियाजीबला पाँच हजार लेमहि पड़त। उ अहाँकेँ पाँच हजार मदतिमे दइ छथि। मंजूर - एहेन मदति लेबाक मन नै होइए। कारण मुखियाजी समाजक संग बड़ गददेदारी करै छथि। चंदन - इएह लिअ, पच्चीस हजार टाका। मंजूर - लाउ, बड़ जिद्ध करै छी तँ । (चन्दन मंजूरकेँ पच्चीस हजार टाका देलनि।) चन्दन - मंजूर भाय, अहाँ सचमुच महान छी। हमर गलतीकेँ माफ कएल जाए। मंजूर - गलती तखने माफ करब जखनि अपने पब्लिक संग नीक बेवहार करब। चन्दन - आब केकरो संगे गलत बेवहार नै करब। मंजूर - तहन गलती माफ अछि। अमरनाथ - धैनवाद मंजूर भाय। (चन्दन आ अमरनाथक प्रस्थान।) रमजानी - भैया, बड़ चौंसैठ छह मुखियाजी। एहेन घूसखोर नै देखल। मंजूर - तैं ने हमरा सनक गरीब आ मुरूख सँ घट्टी मानलनि। रमजानी - भैया, तोरा एत्ते आगू बढ़ाबामे किनकर यानगदान छै? मंजूर - बौआ, नेताजी विनोदक किरपा छैन। ओ गुदरीक लाल छथिन। गरीब जरूर छथिन मुदा सभ तरहक बुधिमे पारंगत छथिन। गरीबक मसीहा छथि। उचितक लेल जी जान लगा दइ छथिन। (नेताजी विनोदक प्रवेश।) परणाम नेताजी। विनोद - परणाम, परणाम। कह मंजूर कह रमजानी की हाल-चाल छै? रमजानी - अपनेक किरपा सँ बड़ बढ़ियाँ छै। नेताजी, भैयाकेँ खाली अबारेट भेटलै और कहाँ किछु भेटलै। विनोद - कथी भेटतै? रमजानी - किच्छो पाइ-कौड़ी भेटतै तहन ने? विनोद - बौआ, प्रतिष्ठा से बढ़ि कऽ किछु नै छै। ओना पाइओ प्रतिष्ठाक सिंगार छिऐ। सेहो मंजूरकेँ जरूर भेटतै। मंजूर तों धैर्य राखह संतोष राखह। सबटा धीरे-धीरे हेतै। बहुत ठाम तोहर सहयोगक चर्चा भऽ रहल छै। मंजूर - नेताजी, अपने जेना कहबै। हम साएह करबै। नेताजी, अपने अपन अनुभव पब्लिककेँ किछु दैतिऐ तँ बड़ बढ़िया होइतै। विनोद - हम कोन जोकरक छी जे पब्लिककेँ अपन अनुभव देबै। आइ-काल्हि कियो केकरोसँ कम नै छै। तैयो हम दू शब्द कहि दइ छिऐ। अशिक्षे कारण जनता सुयोग्य प्रतिनिधिक चयन नै कऽ पावै अछि, ताड़ीए दारूए पर बीकी जाइ अछि। स्वभाविक छै जे प्रतिनिधि क्षतिपुर्तीमे घूसखोरीक अाश्रय लेत। ओइ घूसखोरीकेँ मेटाबऽ लेल हमरा लोकनिकेँ एकजुट भऽ कऽ शिक्षाकेँ सबसँ आगू बढ़ेनाइ अछि। हमरा नजरिमे सबटा अव्यवस्थाक मूल कारण अशिक्षा छै। अशिक्षा हटतै तहने व्यवस्था सुधरतै आ देशक चहुँमुखि विकास हेतै। अंतमे मंजूरकेँ हार्दिक बधाइ दैत अपन दू शब्द खत्म करै छी। जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!! पटाक्षेप ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 196 162 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ‘विदेह'१४१ म अंक ०१ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA 93