ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १४२ म अंक १५ नवम्बर २०१३ (वर्ष ६ मास ७१ अंक १४२) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.ज्योति- एक युग : टच वुड भाग ६ २.जगदानन्द झा ‘मनु’- विहनि कथा- सेल्समेन २.२.१.परमेश्वर कापड़ि- लक्ष्मी आ गोधन २.राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’- चिन्तन- मैथिलीक भविष्यक प्रसंग ३.कुमार अभिनन्दन- दुर्गास्तुतिक लोकपरम्परा ः झिझिया ४.नवेंदु कुमार झा-टाकाक आभाव मे ठप्प अछि कोसी महासेतूक काज सहरसा-फारबिसगंज अमान परिवर्तनक काज मद २.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- १. प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल २.अरविन्दजीक आजाद गजल २.ओम प्रकाश-गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.४.१.अमित मिश्र- गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.चंदन कुमार झा- बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- गजल समीक्षा २.६.गजेन्द्र ठाकुर ( संपादकीय सहित ४टा आलेख ) गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.७.मुन्नाजी- गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.८.१.धीरेन्द्र प्रेमर्षि गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.आशीष अनचिन्हार- गजल समीक्षा (पेटारसँ) ३. पद्य ३.१.कामिनी कामायनी- संग दिअ सदिखन अहिना ३.२.दुखन प्रसाद यादव-छीनाझपटी ३.३.सुबोध कुमार ठाकुर- केकरा सँ कहबै ३.४.ओम प्रकाश- गजल १-२ ३.५.गंगेश गुंजन- नेता जी बकवास करै छथि ३.६.राजदेव मण्डल ३.७.सन्दीप कुमार साफी ३.८.भालचन्द्र झा-आजुक बेटी ४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) 5.बालानां कृते-अमित मिश्र- हाथी गेलै भोज खाए 6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली] 7.डॉ. अमर जी झा- भर्तृहरेः भाषाशास्त्राीय योगदानम् / VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
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ऐ विशेषांककेँ पढ़ैत काल दूटा गप्प मोन राखू---
१) पहिल जे ऐ विशेषांकमे बहुत रास एहनो आलेख सभ अछि जे की विदेहक आन-आन अंक ओ अनचिन्हार आखरपर प्रकाशित भ' चुकल अछि। मुदा हम एकरा ऐठाँ मात्र ऐ उद्येश्यसँ देलहु जे पाठक लग एकै संगे एहन सूचना भेटै जे की गजलक समान्य गप्प बुझबा लेल आन ठाम नै बौआए पड़ै। जँ मात्र नवे आलेख हम दितिऐ तँ बहुत संभव जे बहुत रास जानकारी ऐ विशेषांक नै आबि सकैत। मुदा आब हमर ई विश्वास अछि जे गजलपरहँक प्रायः-प्रायः सभ जानकारी एक संगे पाठककेँ भेटतन्हि ऐ प्रयासमे हमरा लोकनि कते सफल छी से मात्र पाठक कहि सकै छथि। २) ऐ विशेषांककेँ पढ़ैत काल बहुत बेर पाठककेँ ई लगतन्हि जे बहुत रास तथ्य दोहराओल गेल छै। पाठककेँ ईहो लगतन्हि जे सभ आलोचक मात्र एकै पक्ष वा तथ्यकेँ बारेमे घोंघाउज कए रहल छथि। ऐ संदर्भमे हमर अनुभव अछि जे ई मात्र ऐ दुआरे भ' रहल छै कारण गजल विषयपर पहिल बेर एते मात्रामे आलोचना-समीक्षा-समालोचना एकै ठाम प्रस्तुत कएल गेल छै तँ ऐ तरहँक दोहराव संभव। विदेहक ऐ "गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा" विशेषांकक बाटसँ टहलैत कालमे अहाँक नजरि बहुत रास दुर्गंधयुक्त वस्तुक खुलल पोल देखबामे भेटत। कतौ गुंटबंदीक पोल खुजैत भेटत तँ कतौ इतिहासमे पहिल बनबाक सौखकेँ देखार करैत लेख भेटत। ऐ प्रश्नक उत्तर भेटत जे किएक गजलक परिदृष्यसँ बाबा बैद्यनाथ गाएब रहला। किएक बिना व्याकरणक गजल रहितों ऐ क्षेत्रमे लोक कम्मे आएल। जखन की जै विधाक नियम टूटल हो तैमे बेसी लोक अबै छै ( जेना कविता ) मुदा ई गजलक संग किएक नै भेल... एहूपर विचार भेटत। विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। २. गद्य २.१.१.ज्योति- एक युग : टच वुड भाग ६ २.जगदानन्द झा ‘मनु’- विहनि कथा- सेल्समेन २.२.१.परमेश्वर कापड़ि- लक्ष्मी आ गोधन २.राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’- चिन्तन- मैथिलीक भविष्यक प्रसंग ३.कुमार अभिनन्दन- दुर्गास्तुतिक लोकपरम्परा ः झिझिया ४.नवेंदु कुमार झा-टाकाक आभाव मे ठप्प अछि कोसी महासेतूक काज सहरसा-फारबिसगंज अमान परिवर्तनक काज मद २.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- १. प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल २.अरविन्दजीक आजाद गजल २.ओम प्रकाश-गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.४.१.अमित मिश्र- गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.चंदन कुमार झा- बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’- गजल समीक्षा २.६.गजेन्द्र ठाकुर ( संपादकीय सहित ४टा आलेख ) गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.७.मुन्नाजी- गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.८.१.धीरेन्द्र प्रेमर्षि गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.आशीष अनचिन्हार- गजल समीक्षा (पेटारसँ) १.ज्योति- एक युग : टच वुड भाग ६ २.जगदानन्द झा ‘मनु’- विहनि कथा- सेल्समेन १ ज्योति एक युग : टच वुड भाग – ६ मधुश्रावणी समाप्त भेल तखन हमर मॉं के हाथक बनल भोजनक सिलसिला शुरू भेल।पति देव कहला जे अहॉं तऽ कहनेहे नहिं रहि जे अहॉंके मॉं अतेक नीक खाना बनाबैत छथि।हुनका सबसऽ नीक हमर मॉं के हाथक बनाओल माछ लगलैन । हम सब बचपन के बात करैत रही । हमरा द कहल गेल जे हमर मॉं हमर माथा पर ठीक बीचो बीच एकटा चोटी कऽ दैत छलैथ तऽ हमर मुँह खरबूजा के ऊपर खजूरक गाछ सनक लागैत छल आ हमर बहिन के दू चोटी बकरी के बच्चा सनक। हमरा अखन तक मोन अछि जे जखन हम अपन चोटी सामान्य पैघ लोक जकॉं पाछॉंमे केलहुँ तऽ हमरा कतेक खुशी भेल रहै। हमर पति के बहुत हँसी लगलैन ई बुझिकऽ जे हम बच्चा मे एकटा गति बहुत गाबै छलर्हुँ ”भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है ।” घरमे एकटा जन्मदिवसके पार्टी छल से मनाक फेर हमसब मुम्बई लौटि रहल छलहुँ। पतिदेव आबै कालमे हमर पिताश्री सऽ पुछलखिन जे अहॉं ठीके चाहै छियैन जे ई नौकरी करैथ। तऽ हमर पिताजी कहलखिन जे प््रोफेशनल कोर्स कियैक कऽ रहल छथि नौकरिये करैलेल ने। फेर ट्रेनमे हम दुनु विदा भेलहुँ मुम्बई दिस। रस्ता भरि बात करैत रहलहुँ जेना लागल बहुत दिनक बाद बात भेल छल। फेर बियाहक बात मोन पारैत रही जे हमर पति पुछने रहैथ जे हमर सपना की अछि तऽ हम कहलियैन जे भारत आ पाकिस्तान ह्यआधुनिक बंगलादेश सहितहृ एक भऽ जाय।ओ हँसय लगला जे हम इतिहास. भूगोल अथवा राजनीतिशास्त्र नहि पढ़ा रहल छी।आहि लंदन में सबके संगे रहैत देखैत छियै तऽ लागैत अछि जे सपना पूरा भऽ गेल। हमर पति देव हमर हाथ देखि रहल छलैथ ट्रेनमे। हमर मेंहदी के रंग उतरि गेल छल।ओ कहला अहॉंके अति शीघ्र एकटा पुत्री के प््रााप्ति होयत।हमर मुंह बनि गेल त ओ कहला अहॉं ठीके खरबूजा सनक लागैत हेबै बच्चा मे।फेर कहला नौकरी के योग अछि।हम तुरन्त आह्लादित भऽ गेलहुँ। हमरा ट्रेनमे भूख बहुत लागैत अछि से हम रस्ता भरि किर्छु किछु खाइत पिबैत गेलहुँ मुदा हमर पति के त मानू निर्जला व्रत छलैन। 22 घण्टा के ट्रेनक सफर फेर 2 घण्टा लागल टैक्सी स घर पहुँचय मे तखन पति कहला आब खाना पकाऊ। हम बुझबे नहिं केलियै जे हम हँसु की कानू। नइहरमे मॉं भौजी आ बहिन के प््राशंसा सुर्निसुनि परेशान छलहुँ। आब हमरा महत्व भेटो रहल छलय त हम बहुत थाकल रही।तैयो पतिदेव के आज्ञा सऽ भोजन बनेलहुँ आ करीब 3 बाजि गेल सुतय जायमे। अगिला दू दिन सुटकेश खाली करई मे गेल। फेर जल्दिये अपन बायोडाटा बनाक नौकरी के ताक मे लागि गेलहुँ। इंटरव्यू देबैलेल पतिके संर्गेसंगे दू चारि ठाम भटकलहुँ तखन नौकरी लागल। आनदिन हम पतिदेवके बेडटी दई छलियैन जाहिलेल सास बड खिसिया गेल छली एकदिन जे खाली पेटे चाय नहिं दियौन तखन हम पानि संगे देबऽ लगलियैन।मुदा हमर नौकरी के पहिल दिन पतिदेव हमरा सऽ पहिने उठिगेला आ कहला जे उठु आई सऽ अहॉंके मुम्बई के जिनगी शुरू भऽ गेल। हम कूदि कऽ भगलहुँ ओछाउन सऽ चाय बनाबैलेल। फेर तैयार भऽ विदा भेलहुँ आफिस दिस।मुम्बई मे सफर करैके स्वर्णिम दिन छल ओ हमर जखन हमसब भार्गिभागि कऽ तैयार होयत छलहुँ। बहुत सहायक छल जे ओतबे टा घरमे बाथरूम आ टॉयलेट अलर्गअलग छल। कारण हमर पतिदेव के कम सऽ कम आधा घण्टा लागैत छलैन टॉयलेटमे। हुन्का नास्ता कराबैमे बहुत पॉंछा लागल रह पड़ै छल। आ कहियो अन्ठा दियौ तऽ घर सऽ फोन आबि जायत छल। अहिमे के नइहर के सासुर कहनाइ मुश्किल ।बड्ड दुखी करै वला व्यवहार छल ई। हम अपन लेल टिफिन सेहो पैक क ल जायत छलहुँ ।सॉंझमे लौटैकाल के नास्ता सेहो पैक रहैत छल।आ पतिदेव सऽ पुछै छलियैन तऽ कहैत छलैथ आहि ऑफिस मे पिज्जा पार्टी अछि तऽ आहि किछु आर। हुन्कर अहि बात सबहक असर छल जे हमरा बाहर के खेनाई के जिद्द लागि गेल छल ।सप्ताहान्त मे हुन्का संगे कुनो भोजनालय मे जरूर जाय छलहुँ आ बेसीतर हमर पसन्दीदा होयत छल पाव भाजी। कोजगरा मे पतिदेव असगर गेला घर आ हम नौकरी मे व्यस्त।अपन पहिल दरमाहा सऽ हम पतिके दिवाली के कपड़ा कीन कऽ देलियैन । अहिना किछु किछु लागल रहल।कोनो सप्ताहान्त में पर्दा बदलल गेल कोनो मे टीवी के कवर। फेर बुझबो नहिं केलियै जे कोना समय बीत गेल आ हमर सबहक पहिल वर्षगांठ आबि गेल। २ जगदानन्द झा ‘मनु’ ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी विहनि कथा सेल्समेन गामक दलानपर नून तेलक दुकान चलेनाहर, साहजी अपन मुस्काइत मुँह आ शांत स्वभावकेँ कारण गाम भरिमे सभक सिनेहगर बनल मुदा किछु गोटे हुनकर एहि स्वभाबकेँ कारणे हुनका हँसीक पात्र बनोने। आइ साहजी अपने किछु काजसँ बाध दिस गेल। दुकानपर हुनकर १४ बर्खक बेटा समान दैत-लैत। एकटा बिस्कुट चकलेटक सेल्समेन साइकिल ठार करैत साहजीक बेटासँ, “की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।” साहजीक बेटा सेल्समेनक मुँह दिस कनी काल देखला बाद, “किएक, की बात ?” “बात की समान देबैकेँ अछि, पुरनका पाइ लेबैक अछि।” “किछु नहि लेबैकेँ अछि (भीतरसँ समान सभ उठा कए दैत) ई अपन पहिलका समान सभ नेने जाऊ।” “किएक ! पहिलका तँ रखने रहु।” “नहि अहाँसँ किछु नहि चाही आ हाँ आगूसँ कहियो हमर दुकानपर नहि आएब।” सेल्समेन मुँह बोनेए बकर-बकर ओइ नेना दिस देखैत अपन पुरनका समान सभ समटैमे लागल। ताबतमे साहजी सेहो आबि गेलाह। सहजी सेल्समेनसँ, “कि यौ मालिक एना सभटा समान किएक समटने जाइ छी।” “हम कहाँ समटने जाइ छी अहाँक नेनकीरबा सभटा समान उठा कए दैत कहलथि एहिठाम कहियो नहि आएब।” “किएक अहाँ की कहि देलिऐ ?” “हम तँ किछु नहि कहलिएन्हि।” “नहि किछु तँ कहने हेबे।” “हाँ अबैत माँतर पूछने रहिएन्हि, की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।” साहजी हँसैत, “हा हा हा, हमरा संगे जे हँसी ठठ्ठा करै छी से ठीक मुदा केकरो सामने ओकर बापकेँ पागल कहबै तँ ओ कोना सहत, जेकरा की ओ अपन भगवान बुझै छै। एखन भोरे भोर दिमाग शांत रहै तेँ चूपेचाप समानेटा आपस कए कऽ रहि गेल नहि तँ एहन तरहक गप्पपर बेटखारा उठा कए मारि दैतेए।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.परमेश्वर कापड़ि- लक्ष्मी आ गोधन २.राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’- चिन्तन- मैथिलीक भविष्यक प्रसंग ३.कुमार अभिनन्दन- दुर्गास्तुतिक लोकपरम्परा ः झिझिया ४.नवेंदु कुमार झा-टाकाक आभाव मे ठप्प अछि कोसी महासेतूक काज सहरसा-फारबिसगंज अमान परिवर्तनक काज मद १ परमेश्वर कापड़ि लक्ष्मी आ गोधन दिन बेराग आ पतरा पूजा मिथिलाक दैनन्दिजनीमे अछि आ बड़–बड़ पावनि तिहार एहि लोकके संस्कार आ संस्कृतिमे रहल अछि । अन–धन लक्ष्मीक सङे अखण्ड सुखानन्द प्रदान करएबला सुखराति÷दियाबाती पावनिपर लोकक समर्पित आस्था आ अटूट निष्ठा अछि । एकर अपन खास विधि–विधान आ पूजा–पद्यति आ आस्था विश्वास अछि, मूल्य–मान्यता अछि । ई पुनित प्रकाश पावनि धार्मिक सांस्कृतिक रागरंगस’ महिमा मण्डित अछि आ लोकतत्व, लोकदर्शन आ लोक पूजा–पद्यति एकर केन्द्रमे विराजित अछि । मिथिलाक एहि सांस्कृतिक पर्वपर वैदिक आ तान्त्रिक पद्यतिक व्यापक प्रभाव सेहो सेहो अछि । अरिपन लोकचित्र सबहकसङे एहिमे प्रयुक्त हुक्कालोली आ सुपबजना लोकमन्त्रक अपन खास दर्शन आ मूल्यमान्यता अछि— — हुकालोली दियावाती । दियावाती हुक्कालोली । — सुख सुखराति दियावाती । हुकालोली दियावाती । — घरक अलक्ष्मी÷दरिद्रा बाहर जाउ ! बाहरके लक्ष्मी घर आउ ! जहिना मिथिलाक संस्कृति सनातन अछि, महान अछि, लोक महिमा मण्डित अछि तहिना एकर पूजा–अर्चाक रीति–नीति, मूल्यमान्यता अपूर्व आ लोकायित अछि । पावनि–तिहार आ पूजा–उत्सव लोकक जीवनमे अभ्यन्तरि उर्जा आन्दक संङहि सांस्कृतिक रागरंग सेहो भरिपोक प्रदान करैछ । तएँ सब घर, सब लोकक जीवनके जगमगएने गमगम महमह हरख आनन्द प्रदान करबाक हिसाबस’ एकरा परम्परागत ढंगस’ अटूट क्रमक रुपमे मनबैत आएल अछि । लोक परम्परा आ पद्यति अदने–पदने, छाहीए–फुंहिए बात ला, ओहिना नै बनैछ, एकाधे दिनमे सेहो नै बनैछ । अपनासबके जीवन–धर्म आ लोक परम्परा जे अछि से परम तत्व, पुनित दर्शन, सम्पूज्य आस्था आ अटूट लोकविश्वासस’ सम्पोसित अछि । सब जनैछ जे अपनासबके सुखरातिमे बहुत उद्यम, अनेको जतन आ तप पूजनस’ लोक लक्ष्मीके जहिना घर करैए, तहिना अलक्ष्मी÷दरिद्राके बाहर करैए । एहि घर बाहरके कर्म–धर्ममे जतए लक्ष्मी घर आनल जाइछ आ अलक्ष्मी जे बहराएल जाइछ, सेहो देवी, धी–बेटी जकाँ । दुखाक’ नै सोहरदे मने, नेमे निष्ठे । लक्ष्मीपूजा दिन सकले सुमंगली बुढ़िया पुरैनिया अन्हरौखेमे, सुप बजाक’, मन्त्रौआ विदा गीत गाबिक’— घरके दरिद्रा÷अलक्ष्मी बाहर जाउ ! बाहरके लक्ष्मी घर आउ !! हे लक्ष्मीमाइ सुख–पुन लहदह करु ।हरख–आनन्दके बाढ़ि बरकैत दिअ’ । अहाँ उद्यमके, व्यपारके, सुकर्मके, सुधर्मके बोइन प्राप्तिके रुपमे बिराजू ! सुख–दुख, जीवन–मृत्यु, दुख–दारिद्र, नीक–बेजाय सब कर्म–धर्मक भोग–पारस अछि । संध्या, छाया, मृत्युदेव आदिदेव दिनकर दीनानाथक अपन घर–परिवारक छथिन । तैं सबटा बातके गहि अबधारि ई लोक दरिद्रोके दुरदुराए, गरिआए नै, नीके नाहित बेटी बहिन माफिक विदा करैत छथि, गोधन दिन । आ ई विदाइके मिथिला परम्परा आ पद्यति अलबत्ते अछि । गोधन, गोवरधन पूजा दिनमे, मालक घरमे, अलक्ष्मीके मुरुत गोबरस’ बनाओल जाइछ । ओकरा कुफुल चढ़ाआmे जाइछ । कुअन्नक पौती–पेटारी, सङ सांठके रुपमे बनाओल जाइछ । ओहो पौती पेटारी गोबरेके रहैछ । जेहने देवता तेहने पूजा । तेहने वर विदाइ । पूजा भाव अहू दुआरे जे के हिनका दुखाक’ अरारि मोल लिअए । ओना कहूँ घर घूरि आएल त’ सब सुख–शान्ति लाहेब ! गोधन, गोवद्र्घन बनब’, मनब’के पाछू एकटा आओर खिस्सा कहल सुनल जाइछ । धरतीए माइ जिका गौ सेहो मते छथिन । हिनकास’ ऐ लोकके, देवताके बड–बड उपकार । एहिना एक दिन लक्ष्मी महारानी गौमातास’ प्रसन्न भ’क’, उनटे निहोरे विनती कए कहलथिन्ह जे अहाँ अपना पवित्र तनमे हमारे बास दिअ’ ! सब देवताके अहाँमे भल बास अइ । ऐ बातस’ खुसी हुअके बदलामे गौमाता आतंक, भयस’ सिहरि गेलथि आ हरकले दगधले बजलीह— नै–नै, एहन किन्नौ नै भ’ सकैए । हम हरगिज नै ई बात मानि सकैछी । अहाँके पाब’ला लोक कोन–कोन पाप, छलछुधरम नै करैए ? हमरामे जखैनते अहाँक बास होएत त’ सब हमरा छिनाझपटी करत । हमर सबटा सुखचैन हरन भछन क’ देत । घात कुघातमे, नाहकमे हमरा काटि मारि देत, से हटले । एमहर लगारी लक्ष्मी लघोबलाए हठपिठ क’ देलखिन— हम नै मानब । जाबे अहाँ हमरा अपना तनमे बास नै देब, हम ठोस ठौर ठेकान नै पाएब, अहाँके कल नै पड़’ देब । ओमहर अदकल छिलमिलाए गौ तिलोभरि तलविचल नै ओथि आ नै हुनक र’ मानथि— ई भइए नै सकैए । अहाँके अनरगल उपरचौढ़ बात हम मानिए नै सकैछी । भने अहाँ अपन अन्नमे विराजै छी । नीके नाहित बोइनमे बरकैत बनू । द्रव्यमे साक्षात् रहू । धरि एना बयबन्ही नै करु । हमरा निछुन उगरासे रह’ दिअ’ । बड़ महजरो, धरम धकेलके बाद, गौए हारि मानि लेलनि— आब अहाँ जखैन एतेक धरखन करैछी त’ जाउ, अहाँ हमर गोबर गौंतमे बिराजुग’ ! सेहे भेलै । ओकरे चलते आइ चरणमृतमे, औषधिमे, खेतक खाद्यमे, पवित्र ठाँव आ निपिया–पोर्तयामे बड उपयोगी आ महत्वपूर्ण मानल जाइछ । गोधन पूजा अहू बाते, एकरो दुखारे ने ! कृष्ण काव्यमे गोवद्र्घनक अलग महत्व आ वर्णसब छै, तेकर खेरहा एखन एत्त’ नै करी । कथिला त’— हरि अनन्त हरि कथा अनन्ताक चौपट चपेटमे एत’ नहि पड़बाक अछि । २ राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’ चिन्तन
मैथिलीक भविष्यक प्रसंग
‘मिथिला आवाज’ दैनिक अखबार रंगीन आठ पृष्टमे दरभंगा सँ बहार होइत अछि । दरभंगा अथवा विहार आन मैथिल बहुल क्षेत्र किंवा ६ करोडक भाषा भाषी ओत्त ओकर की अबिगत होइत छैक पत्ता नहि , जनकपुरमे नियमित दू गोट ग्राहक छोडि आन केओ छुव नहि चाहैत अछि । करोडो टकाक लगानीमे सी एम झा दैनिक अखबार निकाललनि । एहि आशमे जे मिथिला राज्यक बढैत मांग आ मैथिली, मिथिलाक रट लगौनिहार बिच जँ एकटा ब्रोडसिटक अखबार देबैक त ओ चलत , निक ग्राहक पाओत , विज्ञापन पाओत । से सभ आशापर तुषारापात भऽ गेल छन्हि , ने अखबार चलि रहल छन्हि आ ने विज्ञापन भेटि रहल छन्हि । अवस्था ई छैक जेँ ‘तीन तिरहुतिया तेरह पाक’क कहबी चरितार्थ करैत एतबे दिनमे कतेको पुरान स्टाफ परिवर्तन भऽ गेल छैक आ लगैया अखबार कतौ, कोनो विचारधारा, गिरोह अथवा मैथिली भाषाक संग जे पूर्वो सँ जूडैत कारणक चलिते अस्तव्यस्त भऽ रहल अछि । अखबारक शुरुक सम्वाददाता लोकनि परिचय पत्र पावि नहि सकला अछि , पारिश्रमिक आ कदरक गप्पे करब बेकार । कहबाक जरुरति नहि ई अखबारक अवस्थाक कारणे भेल हएत आ एहिमे समस्त समस्त मैथिल दोषी छी । मिथिला राज्य तँ चाही छल मसदा एकटा रंगीन मैथिली अखबारक हेतु दैनिक दू टका खर्च नहि करब । बीसटा मिन मेष निकालि हिन्दी अखबार सँ सटब । एहि तरहक दूरीकेँ जा धरि नहि मेटाओल जाएत ता धरि मैथिली आ मिथिलाक भविष्यक प्रति संसय तऽ बनले रहत । एक दिश अंगिका (पूर्वी तराई दिस) , मगही, बज्जिका भाषाक मारि सुनियोजित ढंग सँ आगा बढि रहल अछि तँ दोसर दिश एहि भाषाकेँ मान्यता देल समूहक लोक जँ मैथिलीमे अछि, आबय चाहैत अछि तँ ओकरा प्रति दुर्भावना, अवमानना , गुटबन्दीद्वारा कात करबाक , उत्तेजित करबाक काज ओहने वर्ग सँ भऽ रहल अछि । जकरा चलिते एहि भाषा सभक उदय भेल अछि आ से जोड पकडने जा रहल अछि । मुठि भरि साहित्यिक संघ, संस्थासभस होइक आकि तेहन गनल चुनल साहित्य क्षेत्रमे लागल लोक, अनेरे ककरो विरुद्धमे आमील पिने बदहवास भेल गोल निर्माण किंवा दुरभिकेँ संरचना करैत अवन उर्जा खर्च करैत देखि पडैत अछि तँ भितर सँ दुःख होइत अछि , एहि दुआरे नहि जे ओ संरचना कोनो व्यक्ति विशेषकेँ कमजोर करबाक हेतु कएल जा रहल होइछ , एहि दुआरे जे व्यथृमे ओ अपन सामथ्र्य आ प्रतिभाकेँ अनका रोकबामे अनेरे खर्च कऽ रहल होइछ । काज तँ बढिते छैक , कहाँ कोनो प्रतिवाद किंवा अवरोध अबैत छैक । तखन ककरो निचां देखएबाक आत्मरतिमे लागल लोक दू टकाक ‘मिथिला आवाज’ बीस टकाक ‘मिथिला दर्शन’ , किंवा स्थानीय मैथिली अखबार सभ कीनि कऽ मैथिली क्षेत्रमे लाग सभक हौसला बुलन्द करितथि तँ कतेक नीक होइतैक । मैथिलीपर जाहि तरहे चौतर्फी हमला भऽ रहल छैक , एहिमे ककरो कात लगा कऽ नहि, जोडि कऽ आगा बढय पडत । टिटही जकाँ सौंस आकास अपने टांगपर उडौने रहबाक भ्रमके पोसब सर्वथा पीडादायी परिणती दिश लऽ जा सकैछ , मैथिली भाषा एतेक समृद्ध आ प्रभावी रहितो पछुअएबा सँ नहि रोक जा सकैछ । मैथिली साहित्यक बारेमे गलत सूचना प्रवाह भऽ रहलैक अछि , जकरा रोकबाक अभियान चाही । नेपाली भाषीकेँ कानमे मैथिली साहित्यक गलत चित्र उझलल जाइछ । काठमाण्डूक कएकटा कार्यक्रममे कितु नेपाली भाषी अथवा किछु धुर्त मैथिलीसभ सेहो इतिहास एवं यथार्थकेँ तोडि मडोरि कऽ प्रस्तुत करैत देखल गेलाह अछि । इन्टरनेटमे राखल एक अंग्रेजी लेखमे नेपालक कथापर टिप्पणी छपल अछि , जाहिमे दू तीनटा कथाकारक चर्च मात्र छैक , एक गोट पाण्डे थरक लोक छथि, ओहो एहने दुष्टतापूर्ण तथ्य लऽ कऽ बौआ रहल छथि । एहि सँ मैथिली लेखनमे लागल लोककेँ निराशा होइत छैक । क्षोभ होइत छैक । सतर्कता जरुरी छैक –हमसभ ओकरा सभकेँ तथ्य परक सूचना दिऐक । एखन विश्वविद्यालयमे निपाली विषयमे एमए, पीएचडी, करैत विद्यार्थी सभकेँ मैथिली साहित्यक विभिन्न विधापर काज करबाक अवसर देल जा रहल छैक , ओसभ सम्पर्कमे अबैत छथि , बुझि पडैए, कतेक गलत सूचना देल गेल छन्हि वा ओ प्राप्त कएने छथि । मैथिली विद्यापति , सलशेस ,दीनाभद्री हो अथवा नौका बनिजारा, दुलरा दयाल, कोनो साहित्यकेँ समृद्ध आ विकसित प्रमाणित करबाक हेतु प्रयाप्त अछि । मुदा तकरा लेल समन्वय, समर्पण आ उदारभावक जरुरति अछि । मात्र एक दोसराक काटक फिराकमे रहब तँ भविष्यमे ककरा कटैत रहब , अपने कटाइत चलि जाएब । खतरा साफ अछि –अंगिका, मगही , किछु मात्रामे बज्जिका सेहो । एखने सविचानी राखू । राज्यक परिकल्पना कएनिहारकेँ हृदय आ सोच दूनु पैघ हएबाक चाही । मैथिल तँ एकटा राज्यक हकदार अछिए ने !
३ कुमार अभिनन्दन दुर्गास्तुतिक लोकपरम्परा ः झिझिया
पृष्ठभूमि एहि परिवर्तनशील दुनियाँमे. सभ किछु बदलि रहलैक अछि । लोक आनक सभ्यताक नकलकऽ अपनाकेँ धन्य बूझऽ लागल अछि । एहि विकट परिस्थितिमे एखनो गाम–घरक हमरा सभक अपन मौलिक संस्कृति ओहिना अविच्छिन्न रूपमे देखबामे अबैत अछि । विभिन्न लोककथा, लोकगाथा, लोकगीत सदृशे लोकनाट्य आ लोकनृत्य सेहो ग्रामीण ललनाक संरक्षणमे जीवित अछि– प्रस्फुटित अछि । एहि जीवित परम्परामे एकटा सशक्त अध्याय अछि लोकनृत्य– झिझियाक । झिझिया मिथिलाक अधिकांश क्षेत्रमे बड़ उल्लसक संग विजयादशमीक शुभ उपलक्ष्यमे कलश–स्थापनासँ लऽ दशमी धरि मनाओल जाइछ । झिझिया पाँचसँ लऽ बीस धरि युवती सभक (अधवयसुओ रहैछ !) एकटा टोली होइछ, जाहिमे कोनो दू वा बेसियो गोटेक माथपर कलश राखल रहैछ जाहिमे अलगनित भूर कयल गेल रहैत छै । कलशक मँुहपर राखल ढ़कनामे गोइठाक आगि रहैछ जाहिमे कनेक–कनेक कालक बाद मटिया तेल राखल जाइत छैक जकर प्रकाश बेस ऊँच धरि लहरा उठैछ । ओहि छौंड़ी सभमहक किछु गोटे माथपर कलश राखि गाओल जाइत गीतक तालपर अपन हाथसँ थपड़ी पाड़ि एकटा विशेष ढ़ंगसँ नाचल करैछ। एहि तरहेँ विभिन्न सम्पन्न लोक सभक दरबज्जापर नाचिकऽ झिझियाक पूर्णाहुतिक लेल अन्न–पाइ मांगल करैछ । एहि माङल पाइक अनुसार अन्तिम दिन अर्थात् दशमी दिन बड़ धुमधामक संग भोज–भात ओ प्रसाद वितरण होइछ । आ विभिन्न तरहक नाच–गानक संग झिझिआक विसर्जन होइछ । गाममे एहि तरहक कैक गोट टोली होइत छैक । सभ एक दोसरासँ नीक होयबाक लेल प्रयत्नशील रहल करैत अछि । झिझिआक कलशमे असंख्य भूर जे बनाओल रहैछ तकरा नाचऽवाली सदैव ड़ोलबैत रहैत छैक, जाहिसँ केओ ओहि भूरकेँ गनि ने लेअय । कहल जाइछ जे केओ ओकरा गनि लैत छैक तँ नचनिहारक मृत्यु भऽ जाइछ । तेँ जँ स्थिर रहबो करैत अछि तँ नचनिहार कलशाकेँ अनेरे घुमबैत रहैत छैक । भिझिया कहियासँ प्रारम्भ भेल तकर ठोस प्रमाण नहि भेटल अछि । ओना ई परम्परा तान्त्रिक विधिसँ पूर्ण होयबाक कारणेँ अन्दाज ई लगाओल जा सकैछ जे मिथिलामे जखन तन्त्र–मन्त्रक नीक प्रभाव छल होयतैक तखने ई प्रारम्भ कयल गेल हायतैक । एकर प्रारम्भ आठम् शताब्दीक पहिनेसँ भेल होइत से अनुमान कयल जा सकैछ ।
झिझियाक परम्परा एकर प्राचीन रूप आ एखनुका रूपमे कोनो खास अन्तर नहि भेल बुझाइछ । पहिने तान्त्रिक विधिक ज्ञाता माली आ मालिन भेल करैछत छल तेँ देवी–देवताक पूजा–अर्चा एहि वर्गसँ सम्पन्न होइक । आइयो धरि देवी–देवताक लेल आवश्यक पूmलमाला तथा विभिन्न उपादान मालिएक द्वारा प्राप्त कयल जाइछ । तेँ झिझिया, जे पूर्ण रूपसँ देवीक आराधना थिक, माली द्वारा संरक्षण पौलक । मालिनी सभक द्वारा भगवती दुर्गाक अराधना स्वरूप प्रस्थापित झिझिआ नृत्य क्रमशः आइ समाजक अन्यान्य वर्गमे सेहो प्रचलित तथा संरक्षित होबऽ लागल अछि । तान्त्रिक ‘कल्ट’ सँ प्रभावित ई झिझियाक बनावटि सेहो एकटा विशेष अर्थ रखैछ । कलशक ऊपर राखल ढ़कना आत्माक प्रतीक थिक आ ओतहिसँ निकलैत ज्वाला, आत्मासँ ज्योति निकलबाक बोध करबैछ । संगे ई झिझिया ड़ाइन, जोगिनकेँ प्रभावहीन बनयवा ले’ बनाओल गेलाक कारणेँ आत्मासँ निःसरित प्रकाशक इजोतमे ड़ाइन–जोगिन रूपी अन्हार किछु नहि बिगाड़ि सकत तकर ज्ञान सेहो करबैछ । ई काज पूर्ण रूपसँ हमरा सभक उपनिषद्सँ प्रभावित अछि– “तमसोमा ज्योतिर्गमय” अर्थात भगवतीसँ अराधना कऽ ई झिझिया टोली “अन्धकारसँ प्रकाशमे लऽ जाउ” क भावना व्यक्त करैत अछि । आ साँच कही त’ यैह एहि लोकनृत्यक मूल उद्देश्य थिक । झिझियाक संरक्षण मिथिला क्षेत्रमे मोरङ, सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही तथा बिहारक उत्तराखण्ड़क किछु भाग पद्या, बेनीपट्टी, मधुबनी आदि क्षेत्रमे देखल जाइत अछि । किछु साल बीचमे ई किछु गुम जकाँ भऽ गेल छल, मुदा फेर एम्हर आबि जोर शोरसँ प्रारम्भ भेल अछि । एकर प्रदर्शनसँ पूर्व स्वच्छ घैला आनि ओहिमे असंख्य छेद कऽ तैयार कयल जाइछ आ ओकरा धामीसँ बन्हा देल जाइछ । धामी अपन मन्त्रसँ झिझियाकेँ बन्हैक– “सभ्य गुरुक बन्दे पाँउ । बजर, बजर, बजर केबाड़ी बजर बान्हों दशो दुआरी । मटिआ बान्हो । मसान बान्हो, टोना बान्हो, टामर बान्हे...।” मंत्रयलाक बाद झिझिया टोली सभ ब्रह्मस्थान लग जा सर्वप्रथम अराधना करैछ । आ तखन ओहि ठामसँ विभिन्न गोटेक ओतऽ जाइछ । आब मंत्रयबाक क्रिया नहि कएल जाइछ ।
झिझियाक गीतमे सामाजिक चेतना झिझिया टोलीसँ गाओल गीत मुख्य दू प्रकारक होइछ । एकटा’ भगवती सम्बन्धी आ दोसर ड़ाइन सम्बन्धी । ओना झिझियाक मुख्य लक्ष्य ड़ाइनकेँ गारि देब होइछ तेँ बेसी ओही तरहक गीत गाओल जाइत अछि । झिझिआक गीत सभ विभिन्न ढ़ंगसँ गाओल जाइछ, मुदा लय आ छन्द वैह होइछ– शब्दमे मात्र फरक रहैछ । देवीक अराधना क्रममे हुनक कामरूप (कामख्या–असाम) देश जयबाक वर्णन बड़ सजीव होइत अछि । प्रचलित गीत– “कोन बने बोले मैयागे, कारी कोइलियागे– ।” मे देवीक विदाइक बड़ रोचक वर्णन भेटैछ । ओ साड़ी पहिरैत छथि । जूड़ा बन्हबैत छथि । आँखिमे काजर लगबैत छथि... । आ अपन गन्तव्य दिस विदा होइबा ले’ तैयार भऽ जाइत छथि– “केकरा अगनमा मैयागे जुरबा बन्हौले गे, केकरा अगनमा मैयागे कजरा पेन्हलेगे– ।” जिज्ञासाक शान्ति गीतमे भेटैछ “बा” आ ‘भैया’ गामक प्रमुख देवता ब्रह्मा आ भैरवक लेल प्रयोग भेल अछि । अपन कन्या वा बहिनकेँ बिदा करब एकटा सांस्कृतिक परंपराक अनुरूप आइ भगवती विदा भऽ रहलीह अछि ‘कमरूआ (कामरूप–कामख्या) देशकए...। सभ तैयार । ड़ोली भव्य रूपसँ सजाओल छनि । लील ड़ोली छनि । लाल ओहार लागल अछि । विभिन्न कलात्मक ढ़ंगसँ सजाओल ड़ोलीकेँ बत्तीस गोट कहार उठबैछ– आ भगवतीकेँ अश्रुपुरित नेत्रसँ विदा करैत छथि ब्रह्मबाबा...।’ लील रंग ड़ोलिया, सबुजेरंग ओहरिया, मैयागे भीड़ि गेलाह बतिसो कहार, कमरूआ देश मैया कब जइहेँ गे । दोसर तरहक गीतमे डाइनकेँ गारि पढ़ल गेल छैक । एहिमे सभ गीतगाइनि सभ गाइनकेँ खूब जोशमे आबि गारि पढ़ल करैत छैक । एहिमे विभिन्न किसिमक गारि होइत छैक । जे आवश्यकतानुसार गीतगाइनि सभ द्वारा थपघट कयल जाइत रहैत छैक । देखल जाय तँ ई स्पष्ट भेल जे गारि सभमे ड़ाइनक व्यवहारक पूर्ण चित्रण ओहिमे कयल गेल रहैछ । एकटा आमधारण छैक जे ड़ाइनसभ दशमीक बीचमे गामसँ बाहर जा ओहिना नङटे नाचल करैछ । एहि नाचक क्रममे ओ अपने द्वारा मारल कोनो बच्चाकेँ जियाकऽ आगाँमे राखि लैछ–ईहो कथन छैक । एहि कथनक सजीव–चित्रण एहि गीतमे भेटैछ– “बरहमेक पछुआरीये ड़ैनियाँ, मत करिहेँ सिंगार ।” वामे लेल आरती, दहिने तरुआरि गे, नचैत–नचैत गेलै ड़ैनियाँ, सीमा ओइपारगे, संगे–संगे गेलै ड़ैनियाँ, राजकोतबाल गे, देख लेलकौ आगे गैनियाँ, नङटे–उघार गे ।” एहिसँ अतिरिक्त गाबऽवाला विभिन्न तरहक गीतसभ ड़ाइनक कयल गेल क्रियाकलापक चित्र उपस्थित करैछ । एहिसँ ओकरा सभक कृत्य स्पष्ट भऽ जाइछ । “कोठाके उपरी ड़ैनियाँ खीड़की लगैने ना, खीड़की ओत्त ड़ैनियाँ गुणवा चलैले ना । आगे किछु होएतो ड़ैनियाँ, गदहापर चढ़ेबौ’ गदहा चढ़ाए ड़ैनियाँ नमुआँ हसैबौना–” साधारणतया ड़ाइनक कृत्यसँ लोककेँ जानकारी होइत छलैक तँ ओकरा गदहापर बैसा गाम भरिमे घुमाओल जाइत छलैक सैह वस्तु ऊपरो कहल गेल अछि । से ओहि गीत सभमे एतुक्का सांस्कृतिक परम्पराक स्पष्ट चित्र देखबामे अबैछ जकर प्रतिपालन एखन धरि भऽ रहल अछि । ड़ाइन समाजमे कोना तिरस्कृत कयल जाइछ तकरो वर्णन गीत सभमे प्राप्त भऽ जाइत अछि । “ड़ैनियाँक बेटा मरल पड़ल है, अन्हार घर झिझिड़ी (झिझिया), कोई नै बाँस कटबैया हे, अन्हार राति झिझिड़ी–’ । एहि तरहेँ बहुत रास गीत अछि जाहिमे ड़ाइनकेँ समाजक शत्रु तथा विनाशक कहल गेल अछि आ तकर भत्र्सना कयल गेल अछि । झिझियाक विसर्जन समारोहक लेल किछु मङ्गबाक परंपरा छैक । एहि क्रममे विभिन्न गोटेक ओहि ठाम जा कटाक्षपूर्ण गीत गाओल जाइछ । उद्देश्य होइछ घर–धनीसँ किछु नगद वा अन्न प्राप्त करब । “जाबे भैया सुनलनि झिझियाके अबैया, ताबे भैया ठोकलनि केबार–’ । आ, लोक किछु ने किछु देबे करैत छैक । कलशक ऊपर राखल ढ़कनामे आगि प्रज्वलित करबा लेल मटिया तेल देबाक सेहो अनुरोध कयल जाइछ–सोहो गीतमे । जाहि ठाम जतेक तेल भेटैछ–जतेक देखरगर लहास चमकैछ–ओतय ओ सभ ओतेक मोनसँ गबैछ तथा नचैछ । तेल माँगक क्रममे– “एक ड़िबिया तेल ला झिझिया रुसल जाइ छै–’ दूमहिला के कोन सिंगार– ।” एहिमे घरक बनौटपर निर्भर करैछ जे ओ ककर कोन सिंगार कहओ ।
संरक्षण आ सम्बद्र्धन जरुरी एहि तरहे देखैत छी, परिपाटीक–रूपसँ झिझिया एखन धरि हमरा सभकेँ अपन अतीतक सांस्कृतिक उपलब्धि दिस मोड़ि अनैत अछि । एकरा आर बेसी नीक जकाँ परिमार्जित करबा ले’ पुरुष–वर्गक भूमिकाक आवश्यकता छै । मुदा, से भेटै नहि छै । तकर संरक्षण जरुरी...। सांस्कृतिक परम्परे तँ आब अपन रहि गेलैक अछि–खालिस अप्पन...। एहन अवस्थामे समाजसं रसे–रसे विलुप्त होइत जाइत झिझियाकें संरक्षण–संबद्र्धन जरुरी अछि । पहिने जत्त प्रत्येक गाममे समाजक विभिन्न वर्गक महिलाद्वारा परम्परागत गीतद्वारा झिझियाक प्रदर्शन होइत छल से आब ई शहरमे आ हाट–बजारमे सिमित भेल जा रहल अछि । एकरा मनोरंजन संग आयक माध्यम बनाओल जा रहल छैक । ने झिझियामे मौलिकता आने ओ श्रद्धा आ विश्वास । वास्तवमे बालबच्चाकें ड़ाइन जोगिनसं बचएबाक लेल भगवती दुर्गाक अराधना आ तेहन ड़ाइन–जोगिनकें गरिपढ़ि सचेत करबाक परम्परागत लोक व्यवहारक रूपें समाजमे स्थापित झिझिया अपन स्वरूपसं मात्रे नहि विचार आ चिंतन सं सेहो विस्थापित भेल जा रहल अछि । एकरा फेरसं समाजमे लौटाब’ पड़त– मौलिक रूपमे । तकरा लेल प्रयास हएबाक चाही । नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, संस्कृति विभाग गत वर्ष एकटा झिझिया महोत्सव कऽ एकर संरक्षण–संबद्र्धनक हेतु प्रयास सुरू कऽ चुकल अछि । मुदा ई त प्रारंभ छलै । एकरा आगां बढ़एबाक चाहीँ । उचित प्रोत्साहन दऽ एहि नृत्यकें पुनःस्थापित कऽ मिथिला क्षेत्रक विशिष्ट नृत्यक रूपमे राष्ट्रिय–अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमे देखाओल जा सकैछ । सदस्य, नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान
४ नवेंदु कुमार झा टाकाक आभाव मे ठप्प अछि कोसी महासेतूक काज सहरसा-फारबिसगंज अमान परिवर्तनक काज मद
मिथिलांचल आ कोसी के एक करबाक हत्ववला सरायगढ़ निर्मली रेल परियोजना टाकाक अभाव मे बंद अछि। 324 करोड़ टाकाक वर्ष परियोजना समुचित टाकाक अभाव मे लअकि गेल अछि। एहि रेल महासेतुक निर्माण पूरा भऽ गेल अछि मुदा सेतूक दुनू किनारा पर छोट-छोट पुल-पुलिया, रेलक पटरी आ मिट्टीकरवाक काज रेलवे द्वारा आवश्यक टाका आवंटित नहि करबाक कारण ठप्प अछि। सरायगढ़-निर्मली रेल लाइनक काज बाध्ति भेला सॅ मिथिलांचलक जनताक उम्मीद पर ग्रहण लगि गेल अछि। मिथिलांचलक जनताक उम्मीद पर ग्रहण लगि गेल अछि। पड़ोसी देश नेपालक सीमा सॅ सटल रहबाक कारण एहि रेलखंडक विशेष महत्व अछि। एहि मेगा रेल परियोजनाक शिलान्यास 6 जून 2003 के तत्कालिक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कयने छलाह। अटल सरकारक कार्यकाल पूरा भेलाक बाद एहि परियोजनाक काजक गति कम भऽ गेल छल। बाद मे वर्ष 2005 मे तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद वर्ष 2005 मे सरायगढ़ मे भूमि पूजनक काज प्रारंभ कयलनि आ एकरा जल्दीए पूरा होयबाक घोषणा कयलनि। मुदा टाकाक आभाव मे ई मात्र घोषणा साबित भेल। नव रेल बजट मे एहि परियोजनाक लेल फराक सॅ टाका आवंटित नहि भ्ेला सॅ स्थिति आओर चिंताजनक भऽ गेल अछि। एहि रेल परियोजनाक काज प्रारंभ भेला सॅ आशा जगल छल जे 79 वर्षक बाद कोसी क्षेत्रक शेष मिथिलांचल सॅ सीधा सम्पर्क भऽ जायत आ सुपौल, अररिया, सहरसा, मधेपुरा आ पूर्णिया आदि जिलाक लोकक दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर आ समस्तीपुर आदि जिला सॅ बेटी-रोटीक संबंध स्थापित भऽ सकत। एहि परियोजनाक निर्माण मे लागल कुमार कंस्ट्रक्शन आ घनश्याम लाल प्राइवेट लिमिटेड रेलवे के कार्य स्थगन प्रस्ताव पठा देला सॅ स्थिति विकट भऽ गेल अछि ओतहि निर्माण कम्पनी जीटी इन्फ्रा प्राइवेट लिमिटेड के गोटेक 90 करोड़ टाकाक काज निविदिाक माध्यम सॅ भेटल छल मुदा टाकाक समुचित भुगतान नहि भेलाक कारण एहि कम्पनीक काज सेहो प्रायः बंद अछि। कम्पनी सूत्रक अनुसार कोसी रेल महासेतू बनिकऽ तैयार अछि। वर्तमान वार्षिक योजना मे एहि परियोजनाक लेल मात्र तीन करोड़ टाका आवंटित कमल गेल छल जे एहि वर्ष अप्रील मास मे समाप्त भऽ गेल। टाकाक आभाव मे काज बाधित अछि। रेलवेक अधिकारी सभक संग एहि विषय मे भेल बैसार मे सेहो कोनो परिणाम नहि निकलल अछि। दोसर दिस, मिथिलांचलक एकटा आओर महत्वपूर्ण रेल लाइनक अमान परिवर्तनक गति मंद पड़ल अछि। रेल मंत्रालय द्वारा वर्ष 1996 मे सहरसा-फारबिसगंज छोटी रेल लाइन के बड़ी लाइन मे अमान परिवर्तनक स्वीकृति देने छल। मुदा एखनो एहि क्षेत्रक जनता अंग्रेजरक जमानाक छोटी रेल लाइन पर यात्रा करऽ पर विवश छथि। पछिला वर्ष 20 जनवरी 2012 के अमान परिवर्तनक लेल राघोपुर सॅ फारबिसगंजक मध्य मेगा ब्लॉक कयल गेल छल। एहि काजक लेल 356 करोड़ टाकाका आवंटित भेलाक बादो ई काज एखन धरि पूरा नहि भऽ सकल अछि एहि तरहें उŸार बिहार के राजधानी पटना सॅ जोड़बाक लेल गंगा नदी पर प्रस्तावित दीघा-परमानंदपुर रेल सह सड़क पूलक काज मंद गति से चलि रहल अछि। हालांकि रेलवे द्वारा एक बेर फेर वर्ष 2015 धरि एकरा पूरा करबाक घोषणा कयल गेल अछि। हालांकि एहि रेलखंड पर नव बनल पाटलिपुत्र स्टेशन सॅ रेलक आबाजाही प्रारंभ होयबाक घोषणाक कयल गेल अछि। 6 सितम्बर के एहि स्टेशन सॅ रेल राज्य मंत्री अधीर रंजन चौधरी पटना यशवंतपुर ट्रेन के हरियर झंडी देखा विदा कऽ एहि रेल खंड पर आंशिक रूप सॅ आवाजाही आरंभ करताह। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- १. प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल २.अरविन्दजीक आजाद गजल २.ओम प्रकाश-गजल समीक्षा (पेटारसँ) १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- १. प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल २.अरविन्दजीक आजाद गजल १ प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल ‘थोडे आगि थोडे पानि’2008 मे प्रकाशित प्रसिद्ध गीतकार भाइ सियाराम झा ‘सरस’क 80 टा गजल संकलन थीक।सरसजी गजलक पोथीक भूमिकामे कविता,कथा,निबन्ध आदि विधामे आबि रहल रचना सभक स्तरपर सवाल उठौलनि अछि। लेखक,कवि,नाटककार कें की की पढबाक चाही,से सलाह देल गेल अछि.लेखक लोकनिमे प्रतिबद्धताक अभाव पर आक्रोश व्यक्त कएल गेल अछि। अपन समाज,अपन भाषाक प्रति अपन लेखकीय प्रतिबद्धताक वर्णन सरसजी जाहि तरहें केलनि अछि से बेर-बेर पढबाक आ मोनहि मोन हुनक चरण स्पर्श करबाक लेल बाध्य क’ देत। मुदा जँ अहाँ ताकब जे गजलकारकें की की पढबाक अथवा कथीक अभ्यास करबाक चाही से एहिमे नहि भेटत। गजलकार स्वयं गजलक सम्बन्धमे की-की पढने छथि तकर उल्लेख नहि कएल गेल अछि। गजलक व्याकरणक कतहु चर्च नहि अछि.गजलकारकें मोन पडैत छनि दक्षिण अफ्रीकाक कवि मोलाइशक क्रान्तिगीत आ फिलीस्तीनी कविक कविता,कोनो शायरक कोनो महत्वपूर्ण शेरक उल्लेख नहि केलनि अछि। एहिसँ गजल लेखनक लेल आवश्यक प्रतिबद्धताक आभास नहि होइत अछि। पोथीक 80 टा गजलमे 62 टा गजलमे रदीफ आ काफियाक प्रयोग कएल गेल अछि जाहिमे 5 टा गजलमे रदीफ अथवा काफिया अथवा दूनूक निर्वाह सभ शेरमे नहि भ’ सकल अछि।16 टा गजलमे काफिया अछि, रदीफ नहि। 2टामे रदीफ अछि,काफिया नहि। अहूमे एकटामे सभ शेरमे रदीफक निर्वाह नहि भ’ सकल अछि। कोनो गजल एहन नहि अछि जकर सभ शेरमे वर्ण अथवा मात्राक एकरूपता हो।तें बहरमे त्रुटि साफ दृष्टिगोचर होइत अछि। एहि दिस गजलकारक ध्यान किएक नहि गेलनि से नहि जानि। सरसजीसँ लोककें बहुत अपेक्षा रहैत छैक, मुदा एहि सम्बन्धमे हुनक कोनहु स्पष्टीकरण सेहो कतहु नहि अछि। आशा अछि गजलकारक अगिला गजल-संग्रहमे आवश्यक औपचारिकताक निर्वाह होयत। ई पढि क’ नीक लगैत अछि जे ‘.....धीरू भाइ तं एते धरि कहने रहथि जे खैयाम कें मैथिलीमे सुनबाक हो तं सरस कें सूनल जा सकैछ...’ तें सरसजीसँ अपेक्षा आर बढि जाइत अछि। सरसजी कहैत छथि,‘एहि संकलनक गजल सभ तं सहजहिं अपन लोकवेदक,माटि-पानिक,भाशा-साहित्यक आ संस्कार-संस्कृतिक प्रतिबिम्ब तं थिके,संगहि अनेक ठाम अनेक तरहें तकरा नब सं परिभाषित आ व्याख्यायित सेहो करैछ । नब-नब संस्कारक स्थापना सेहो करैछ ।.......’ सरसजीक उक्तिकें तकैत विभिन्न गजलक एहि शेर सभ पर विचार करू-
जै पाइने पैनछूआ कैरतै ने लोक, छीः छीः छीः सेहो पाइन घटर-घटर घटघटा रहल,ई मैथिल छौ
जौं-जौं अहंक खसैए पिपनी,धप-धप तेना खसै छी हम रसे-रसे उठबी तं सरिपहुं, होइए देव-उठान हमर
थप्पा समधिन देल समधि केर अंगा मे उजरो मोंछ पिजाएल,फागुनक दिन आयल
अइ समुद्रक किन्हेरमे बड चक्रवातक जोर रहलै बालु पर तैयो अपन हम नाम तकने जा रहल छी
बिज्झो कराओल बैसले रहि गेल नोथारी गलियाक’ कियो खाइत आ उगलि रहल छलै
हम मरब,बेटा लडत,बेटा मरत-पोता लडत कटब-काटब,जे बुझी-सदभावना-दुर्भावना
हवा-पानिक बिना एमहर भेलैए दूभि सब पीयर ओम्हर बोडामे कसि-कसि,स्विस खातामे ढुकाबै छै
व्याकरण पक्षकें जँ उपेक्षित क’ देल जाए तँ कएटा गजलमे किछु शेर महत्वपूर्ण अछि जे पाठकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि किछु शेर जे पढबामे नीक नहि लगैत अछि, भ’ सकैए जे हुनका स्वरमे सुनबामे नीक लागय. मैथिली गजलक भण्डारकें भरबामे सरसजीक योगदानकें महत्वपूर्ण मानैत हम गीतकार सरसजीक प्रशंसक, मैथिलीक सुधी पाठक आ नव-पुरान गजलकार सभसँ अनुरोध करबनि जे कम-सँ-कम तीन बेर अवश्य पढि जाथि सरसजीक ‘थोडे आगि थोडे पानि’। नीक लगतनि।
२ अरविन्दजीक आजाद गजल
मैथिलीयोमे गजल पर खूब काज भेल अछि आ एखनो भ’ रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर गजलक व्याकरण विस्तार सँ प्रस्तुत केलनि आ अपनो बहुत गजल लिखलनि. आशीष अनचिन्हार मैथिली गजल ले’ स्वतंत्र साइट बनाक’ व्याकरण कें स्थापित करबामे अपनो योगदान करैत अपनो बहुत गजल लिखलनि आ आओर बहुत गोटे सँ गजल लिखबौलनि आ से काज एखनो क’ रहल छथि हिनका दूनू गोटेक अतिरिक्त आर बहुत गोटे मैथिली गजलकें समृद्ध करबामे योगदान क’ रहल छथि।ई प्रसन्नताक बात थिक। हमरा जनैत गजलकारक मुख्य तीनटा वर्ग अछि। एक वर्ग ओ अछि जाहिमे रचनाकार पहिने गजलक व्याकरण पढलनि आ तकरा बाद ओही अनुसारे गजल लिख’ लगलाह. दोसर वर्गमे ओ गजलकार सभ छथि जे पहिने गजल लिख’ लगलाह , बादमे गजलक व्याकरण दिस घ्यान गेलनि आ ओहि अनुसारे लिखबाक प्रयास कर’ लगलाह. तेसर वर्गमे ओ लोकनि छथि जे गजल सूनि क’, पढि क’ लीख’ लगलाह आ लीखैत चल गेलाह, पाछां उनटि क’ नहि तकलनि.ओ मात्रा अथवा वर्ण गनि क’ षेर लिखबाक-कहबाक चक्करमे नहि पडि अपन बातकें केंन्द्रमे राखि धडाधड लिखैत चल गेलाह आ लिखैत जा रहल छथि। ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’ मात्र 24 दिनमे लीखल गेल 66टा गजलक संग्रह थीक जाहिमे गजलकार अरविन्द ठाकुरजीक कथन पर ध्यान देल जाए: ‘हम जे कहय चाहैत छी से महत्वपूर्ण छैक,ताहि लेल व्याकरण टूटय कि विधा विशेषक मापदंड,तकर हमरा परवाहि नहि अछि। ओकरा भल चाही त’हमर सहायक हुअए,बाधा ठाढ नहि करए ।’ गजलकारक एहि कथनकें ध्यानमे राखि जँ हिनक गजल पढब त नीक लागत। 66 टा गजलमे 10टा गजल एहेन अछि जाहिमे रदीफ अछि,काफिया नहि. 16 टा एहेन अछि जाहिमे काफिया अछि,रदीफ नहि. 40 टा गजलमे रदीफ आ काफिया दूनू अछि. किछुए गजल एहेन हएत जाहिमे बहरसँ सम्बन्धित दोष नहि हो.मुदा,बहुत रास शेर सभमे जे बात कहल गेल अछि से व्याकरणक त्रुटिकें झांपन देबामे बहुत समर्थ लगैत अछि.सभ गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक नामक प्रयोगक प्राचीन परंपराक निर्वाह नीक जकाँ कएल गेल अछि जे बहुत गजलकार नहि क’ पबैत छथि. गजलकारक समक्ष सामाजिक,राजनीतिक आ सांस्कृतिक चेतनाक अवमूल्यनक विषाल क्षेत्रक अनुभवक संपदा छनि जे जहां-तहां विभिन्न गजलक विभिन्न शेर सभमे प्रगट भेल छनि।एकर बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि निम्नलिखित किछु शेर: दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोस करत नै जखन गाममे मालक बथान रहत
एहि समाजक रूढि भेल अछि घोडनक ओछाओन सन प्रेममे भीजल बतहबा ताहिपर ओंघरा रहल अछि
गाममे डिबिया जरल अछि रातिसं लडबाक लेल मेट्रोपॉलिटन टाउनमे अछि राति दुपहरिया बनल
पात बिछैबाक बेर लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठेबाक बेर
रातिक जे एकबाल बढल दुर्लभ सगर इजोरिया भेल
संसद केर फोटोमे किछुओ नहि हेर-फेर सांपनाथ, नागनाथ,इएह दुनू बेर-बेर
कार खोजै छै एम्हर फूटपाथ पर सूतल षिकार यम अबै छथि एहि नगर विभिन्न वाहन पर सवार
संसदमे घुसिआयल जे सात जनम लेल केलक जोगार
गजलकारक भयंकर आत्मविष्वास एहि षेर सभमे देखू:
धन्य ‘अरबिन’तों एलह गजलक जगतमे फेर केओ ‘खुसरो’की तोहर बाद हेताह
नै पाठक के चिन्ता अरबिन नीक गजल के पढबे करतै
एहने आर बहुत रास नीक-नीक शेर वला गजल पढबाक लेल देखू श्री अरविन्द ठाकुरक रचल आ ‘नवारंभ’ द्वारा 2011 मे प्रकाशित आ बहुत सुंदर कागतपर ‘प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स’, नई दिल्ली द्वारा बहुत सुंदर मुद्रित गजल संग्रह ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’। अन्तमे हम गजलकारक उक्तिक उल्लेख कर’ चाहब: ‘.......हाथक जेना सभ बान्ह टूटि गेल । एहन धारा-प्रवाह जे गजलक मिसरा,शेर,रदीफ,काफिया,बहर,गिरह सभकें सम्हारब कठिन....’ भरिसक, इएह कारण थीक जे गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा हिनक गजल सभकें आजाद गजल कहल गेल अछि। हम एहि विचारसँ सहमत छी। २ ओम प्रकाश गजल समीक्षा (पेटारसँ)
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बहुरूपिया रचनामे
गजलमे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिलीमे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थितिमे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेशमे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथीकेँ आद्योपान्त पढलहुँ।
सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजीकेँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि।
पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छन्हि।
गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधारपर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि।
भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत।
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घोघ उठबैत गजल
मैथिली गजलक पहिलुक प्रकाशित पोथी "उठा रहल घोघ तिमिर" पढबाक सौभाग्य भेंटल। ऐ गजल संग्रहक गजलकार श्री विभूति आनन्द छथि। एहि पोथी मे कुल चौंतीस गोट गजल अछि। पूरा पोथी केँ एकहि बैसार मे पढि गेलहुँ आ बेर-बेर पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री विभूति आनन्दजी केँ मैथिली गजलक पहिलुक संग्रह प्रकाशित करबा लेल धन्यवाद दैत छियैन्हि। एहि पोथीक भूमिका मे गजलकार कहै छथि जे "मैथिलीक गजल सोझे-सोझ हिन्दी सँ प्रभावित अछि मुदा हिन्दी जकाँ जमल नञि अछि एखनो धरि।" आगू हुनकर कहनाई छैन्हि- "पारम्परिक व्याकरण सम्बन्धित अगणित त्रुटि सभ ठाम लक्षित होएत। ओना हम दुस्साहसपूर्वक साहस करैत रहलहुँ अछि जे कथ्य-सामंजस्य लए व्याकरण दिस सँ यदि मूँहो घूमा लेल जाए तँ कोनो हर्ज नञि। किए तँ हम मानैत छी जे ई पाठ्यक्रमक वस्तु नञि अछि। विद्यार्थी मूर्ख नञि बनत। तैं की ------------------------ व्याकरण सँ भयभीत भऽ नञि लिखल जाए।" गजलकारक पहिलुक कथनक सम्बन्ध मे हमर निवेदन अछि जे गजलक परम्परा अरबी-फारसी सँ शुरू भेल अछि आ ओतहि सँ आन भारतीय भाषा मे पसरल अछि। हिन्दी-उर्दू मे गजल कहबाक परम्परा मैथिली सँ पहिने शुरू भेल, तैं बहुसंख्य लोक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि जे मैथिलीक गजल हिन्दी गजलक नकल छी वा ओइ सँ प्रभावित भेल अछि। गजलकार सेहो एहि मिथ्या धारणा सँ प्रभावित छथि। आब गजलक व्याकरण थोड-बहुत समन्जनक संग सब भाषा मे तँ एक्के रहत। ऐ स्थिति केँ हमरा हिसाबेँ "प्रभावित भेनाई" कहबाक कोनो औचित्य नै अछि। गजलकारक दोसर कथन देखि हम निराश भेल छी। पता नै किया एखन धरि जे दुनू गजल संग्रह (सबसँ पहिलुक आ सबसँ अंतिम प्रकाशित) पढलहुँ, एहि दुनू मे गजलकार कथ्य-सामंजस्यक आगू व्याकरण केँ कोनो मोजर नै देबऽ चाहैत छथि। एकटा गप मोन रखबाक चाही जे साहित्यक निर्माण वैयाकरणिक अनुशासनक बादे सफल भेल अछि। इ फराक गप अछि जे समय-काल आ स्थानक हिसाबेँ सर्वमान्य परिवर्तन व्याकरण मे होइत रहल छैक। बिना वैयाकरणिक अनुशासनक भाषा पढबा, लिखबा आ बाजबा जोग रहत? जिनका मे साहित्य निर्माणक माद्दा छैन्हि, हुनका मे व्याकरण केँ पालनक साहस अबस्स हेबाक चाही। आब हम एहि संग्रहक गजलक सम्बन्ध मे किछु गप कहऽ चाहब। इ गजल संग्रह ओहि समय मे लिखल गेल अछि जखन मैथिली गजलक व्याकरण आ बहरक सम्बन्ध मे बहुत बेसी जनतब सार्वजनिक नै छल। हम एकरा एना कहऽ चाहब जे इ गजल संग्रह "अनचिन्हार आखर" जुग सँ पूर्वक गजल अछि जखन बहर, रदीफ आ काफियाक नियमक पालनक विषय मे बहुत रास गप सर्वजन सुलभ नै छल। एहि हिसाबेँ जँ ऐ संग्रहक गजल सभ मे बहरक दोख छैक तँ इ स्वभाविक बुझाईत अछि। एहि संग्रहक कोनो टा गजल कोनो बहर मे नै अछि। तैं ऐ संग्रहक वैध गजल (जाहि मे काफियाक नियमक पालन भेल हुए) सभ केँ "आजाद-गजल"क श्रेणी मे राखल जा सकैए। आब गजलक काफिया आ रदीफक सम्बन्ध मे किछु गप। एहि संग्रहक बहुत रास गजल मे काफिया आ रदीफक नियमक पालन भेल अछि। मुदा कएक गजल मे रदीफ आ काफियाक गलती अछि। जेना पृष्ठ चौदह पर मतला देखला पर बुझाईत अछि जे "इ मौसम" रदीफ अछि आ "लागैए" आओर "उलाबैए" काफियायुक्त शब्द अछि। मुदा दोसर शेर आ आगूक आन शेर मे एकर पालन नै भेल अछि आओर शेर सभ बिना रदीफक "अ" काफियायुक्त अछि। पृष्ठ पन्द्रह पर सेहो यैह दोख अछि, जाहि मे मतला मे रदीफ "कहाँ रहल"क प्रयोग अछि आ आन शेर सभ बिना रदीफक "अल" काफियायुक्त अछि। एहने दोख पृष्ठ सोलह मे देखल जा सकैत अछि, जतय मतला मे "करै छह" रदीफ मानल जयबाक चाही। ओना ऐ गजलक आन शेर सभ मे दू टा काफियाक सुन्नर प्रयोग अछि, जे नीक लागैए। हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि।
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समीक्षा
विदेह ई-पत्रिकाक १ अप्रैल २०१२ केर नब अंक मे प्रकाशित श्री प्रेमचन्द्र पंकजजीक दू टा गजल पढलौं। एहि दूनू गजल केँ हम गजलक व्याकरणक आधार पर देखबाक प्रयास कएलौं। हम दूनू गजल पर आ प्रत्येक पाँति पर अपन विचार राखि रहल छी। गजल १ हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब
चाङुर अपन पसारि रहल अछि माथापर सम्बन्धक बाज कोन विधि बाँचत प्रीत कहब, नहि गजल कहब
कतबो माँटि सुँघाएब तैओ नहि मानब हम अप्पन हारि चारु नाल पछाड़ि अपन हम जीत करब नहि गजल कहब
गगनक मुँहकेँ चूमए कतबो ठाढ़ अहाँ केर शीसमहल बस कखनहुँ बालुक भीत करब नहि गजल कहब
हाथ पसारब रहत पसरले, मुँहे टेढ़ करब तँ की कनि दूसि मुँह विपरीत चलब, नहि गजल कहब
पहिल गजलक मतला पढला पर बुझाइए जे रदीफ "कहब, नहि गजल कहब" अछि आ काफिया मे "ईत" प्रयोग भेल अछि। दोसर शेर मे यैह रदीफ आ काफिया लेल गेल अछि। मुदा तेसर आ चारिम शेर मे आबि कऽ रदीफक "कहब"क बदला मे "करब" उपयोग कएल गेल अछि। पाँचम शेर मे एकरा बदलि कऽ "चलब" कऽ देल गेल अछि। ऐ सँ इ बुझा लगैए जे रदीफ "नहि गजल कहब" अछि आ दू टा काफिया "ईत" युक्त शब्द आ "अब" युक्त शब्द अछि। जँ गजलकार यैह रदीफ आ काफिया मानि कऽ चलल छथि तँ हुनका प्रत्येक शेर मे एकरे प्रयोग करबाक चाही। तखन रदीफ आ काफियाक दोख नै रहितै। रदीफक नियमक मोताबिक प्रत्येक गजलक एकेटा रदीफ होइत अछि आ एकर पालन ओहि गजलक प्रत्येक शेर मे होयबाक चाही। तहिना काफियाक नियमक मोताबिक प्रत्येक शेर मे काफिया एके हेबाक चाही। आब कनी बहर पर चर्च करी। ई गजल सरल वार्णिक बहर वा वार्णिक बहर पर नै लिखल गेल अछि। अरबी बहर मे अछि की नै ई जनबा लेल हम सब एक एक टा पाँतिक विश्लेषण करी। जँ ह्रस्व केँ १ आ दीर्घ केँ २ मानी तँ पहिल शेर मे देखल जाओः- हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब ११ २१ १२ २१ २१ १११ ११ १११ १११ आब दोसर पाँति बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब १२ १११ २१ ११ २१ १११ ११ १११ १११ ऊपर दूनू पाँति मे देखि सकै छी जे ह्रस्वक नीचा ह्रस्व आ दीर्घक नीचा दीर्घ नै आएल अछि आ तैं इ शेर कोनो बहर मे नै अछि। जखन मतले कोन बहर मे नै अछि, तखन आन शेर सब पर विचार करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि। निष्कर्ष यैह जे गजल कोनो बहर मे नै अछि। आन शेरक विश्लेषण पाठक अपने ऐ आधार पर कऽ सकैत छथि।
आब दोसर गजल देखल जाओः- गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब
साँढ़ छैक छुट्टा आ पाड़ा मरखाह कतैक बाँचल फसिलकेर सुरजाक रखबारि लिखब
थानामे नाङट भेलि रमियाक हाकरोस- सुननिहार केओ नहि तकरे पुछारि लिखब
बारल खेलौनासँ, पोथीसँ दूर कएल जिनगीक बोझ उघैत नेनाक भोकारि लिखब
नाचि रहल लोक आइ असली नचनिञा सभ नचा रहल परदासँ केओ परतारि लिखब
फाटल अकास छै सीअत के-कते कोना लिखब जे “पंकज” बेर-बेर विचारि लिखब एहि गजल मे काफिया "आरि" युक्त अछि आ रदीफ "लिखब" अछि। ऐ हिसाबेँ रदीफ आ काफिया ठीक अछि। सरल वार्णिक बाहर वा वार्णिक बहर वा अरबी बहर मे इहो गजल नै अछि। ह्रस्व केँ १ आ दीर्घ केँ २ मानि कऽ मतला केँ देखल जाओः- गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब ११११ १२२ ११ २११ ११ १२१ १११ बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब २१ ११ १११२१ २१ ११२१ १११ इहो गजलक मतला मे ह्रस्वक नीचा ह्रस्व आ दीर्घक नीचा दीर्घ नै आएल अछि आ इ कोनो बहर मे नै अछि। इहो गजल मे जखन मतले बहर मे नै अछि तखन आन शेर सब पर विचार करबाक कोनो प्रयोजन नै अछि। एहि आधार पर इ निष्कर्ष निकलैए जे इहो गजल कोनो बहर मे नै अछि। एहि तरहेँ देखल जा सकैए जे दूनू गजलक बहर दुरूस्त नै छै। ऐठाँ ई बता दी की संयुक्ताक्षर सँ पूर्वक वर्ण दीर्घ मानल जाइए आ अनुस्वार बला वर्ण सेहो दीर्घ मानल जाइए। गजलक विषयवस्तु नीक अछि। दोसर गजल "आजाद गजलक"क श्रेणी मे अछि आ पहिलुक गजल काफिया दोखक कारण गजल नै अछि। सादर।
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मैथिली बाल गजलक अवधारणा
जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिली गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि। आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः-
कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी
ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत। मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत।
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भोथ हथियार
श्री सुरेन्द्र नाथक कहल मैथिली गजलक संग्रह अछि "गजल हमर हथियार थिक"। ऐ पोथी मे हुनकर अडसठि टा गजल प्रकाशित भेल अछि। ई संग्रह २००८ मे आएल अछि जकर आमुख श्री अजीत आजाद जी लिखने छथि। ऐ पोथी केँ आदि सँ अन्त धरि पढबाक बाद हमर यैह अभिमत अछि जे गजलक व्याकरणक दृष्टिसँ ऐ संग्रह मे अनेको कमी अछि, जाहि सँ बचल जा सकैत छल।
पृष्ठ संख्या १३, ६७ आ ७० परहक गजल मे चारिये टा शेर छै, जखन की कोनो गजल मे कम सँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही। संग्रहक कोनो गजल बहर मे नै अछि। हमर ई स्पष्ट मनतब अछि जे गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे बहरक उल्लेख करबाक चाही आ जँ आजाद गजल कहने छथि तँ इहो स्पष्ट रूपेँ लिखबाक चाही।
ऐ पोथी मे काफियाक गलती भरमार अछि। कतौ कतौ तँ ई बूझना जाइ छै जे गजलकार बिना काफिया आ रदीफक मतलब बूझने गजल कहबा लेल बैस गेल छथि। एकर उदाहरण पृष्ठ १५ परहक गजल पढबा पर भेंट जाइ छै। ई तँ हम एकटा उदाहरण कहि रहल छी। आरो गजल ऐ दोख सँ प्रभावित छै, जतय काफियाक नियमक धज्जी उडा देल गेल अछि। जेना पृष्ठ १८, १९, २०, २१, २७, २९, ३१, ३४, ३५, ३६, ३९, ४०, ४१, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ५२, ५३, ५६, ५७, ५८, ६६, ६७, ६८,७०, ७१, ७२, ७४, ७५,७७, ७९ आदिमे काफिया तकलासँ नै भेंटैत अछि आ ऐ खोजमे मोन अकच्छ भऽ जाइत छै। ओना आनो पृष्ठ काफिया दोखसँ ग्रसित अछि, मुदा ई उदाहरण हम ओइ पृष्ठ सभक देने छी, जतय काफियाक झलकियो तक नै भेंटै छै। मैथिली गजल आइ जाहि सोपान पर चढि चुकल अछि, ओइ हिसाबेँ ऐ तरहक रचना गजलक नामसँ स्वीकृत होइ बला नै अछि। कियाक तँ बिना दुरूस्त काफियाक गजल नै भऽ सकैत अछि। ई संग्रह "अनचिन्हार आखर" युगक शुरूआत भेलाक बाद लिखल गेल अछि, तैँ हमरा ई आस छल जे गजलकार कमसँ कम काफिया आ रदीफक नियमक पालन ठीकसँ केने हेताह, कियाक तँ "अनचिन्हार आखर" जुग मे आब गजलक व्याकरणक सभ नियम चिन्हार भऽ चुकल अछि। मुदा गजलकार काफिया आ रदीफक नियम पालन करबामे पूरा असफल रहलथि। ओना ऐ संग्रहक काफिया दोखकेँ पोथीक आमुख लेखक श्री अजीत आजाद पोथीक आमुखमे दाबल आवाजमे स्वीकार करैत कहै छथि जे कतेको ठाम काफिया "गडबडायल सन" बुझना जाइत अछि। ओना ई अलग गप थिक जे काफिया "गडबडायल सन" नै अपितु पूरा पूरी गडबडायल अछि। फेर श्री आजाद ऐ गलतीकेँ झाँपबा लेल इहो कहैत छथि जे "रचनाकारकेँ अपन सीमासँ बाहर आबि शब्द-व्यापार करबाक चाही"। मुदा गजलक अपन व्याकरण छै, जकर पालन केने बिना रचना गजल नै भऽ कऽ पद्य मात्र रहि जाइत छै। गजल आ कविताक बीचक अंतर जे अंतर छै, से ऐ तरहक तर्कसँ समाप्त नै भऽ जाइ छै। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक अनुपालन नै हेबाक कारणेँ श्री सुरेन्द्र नाथक ई संग्रह गजल संग्रह नै भऽ कऽ एकटा पद्यक संग्रह भऽ कऽ रहि गेल अछि।
संवेदनाक स्तर पर किछु रचना नीक अछि आ जँ गजलकार गजलक व्याकरण पर धेआन देने रहतथिन्ह, तँ नीक गजल लिखि सकैत छलाह। गजलकारक ई पहिलुक मैथिली गजल संग्रह बहुत आस तँ नै जगबैत अछि, मुदा हुनकर संवेदनात्मक प्रतिभा देखैत हम ई आस जरूर करै छी जे ओ गजलक व्याकरणक पालन करैत आगू नीक गजल कहताह आ "गजल हमर हथियार थिक" केँ चरितार्थ करताह। गजल तँ हथियार होइते अछि, मुदा बिनु काफिया, रदीफ आ बहरक नियमक पालन केने रचना गजल नै होइत अछि आ भोथ हथियार भऽ जाइत अछि। पद्यक हथियार पर काफिया आ बहरक सान चढल हुनकर नब गजल-हथियारक प्रतीक्षा रहत।
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गजलक लेल
श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि। ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक (पृष्ठ संख्या ४५) मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी- हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल। संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही। अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.अमित मिश्र- गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.चंदन कुमार झा- बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा १ अमित मिश्र गजल समीक्षा (पेटारसँ) १
कतिआएल आखर
बात चारि बर्ष पहिलुक अछि हमरा संगे एकटा संगी हमरे रूम मे रहैत छल । पढ़ैमे कने कमजोर छलै मुदा कंपटीसनमे हमरासँ 2-3 घंटा बेसीए राति कऽ जागै छल आ एकर फलस्वरूप 10 टा मे 4 टा सबाल जरूर हल कऽ लै छलै ।ओना तऽ हमरासँ बेशी बात नै करैत छल मुदा भोर होइते बाँकी बचल सबालक लेल हमरा लऽग जरूर आबि जाइत छल आ एखन ओ मित्र बी .टेक कऽ रहल अछि ।इ घटना चारि सालक बाद मोन पड़ल मुन्ना जीक एकटा शेर पढ़िकऽ
डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही
पिछला डेढ़ महिनासँ मुन्नाजीक गजल संग्रह "माँझ आँगनमे कतिआएल छी " थोड़े-थोड़े पढ़ै छलौँह मुदा काल्हि भरि राति एकर गहन अध्ययन केलौँ ।कुल 50 टा गजल आ 10 टा रूबाइ के संग्रह अछि "माँझ आँगन मे कतिआएल छी" ।पोथीक नाम पढ़ि मोनमे किदन-कहाँदन बात सब उठऽ लागल ।कतिआएल उहो माँझ आँगनमे बिचित्र सन लागल मुदा पढ़लाक बाद हमरा लागैत अछि जे शाइर एहि समाजके आँगन आ एहि समाज रुपि आँगनक माँझ मे अपन बैसार बनेने छथि ।इ भऽ सकैए जे समाजक किछु भागसँ इ कतिआएल हेताह मुदा पूरा समाजसँ किन्नौह कतिआएल नै लागै छथि । हमर इ कथनक सत्यता एहि संग्रह के पढ़लाक बाद बुझा जाएत । इ तऽ प्रेमो केलनि तऽ समाजके ध्यान मे राकि तेँए तँ कहै छथि
सब उमरि वर्ग के प्रेम चाही मरितो दम धरि कुशल छेम चाही आशा आ निराशाके फरिछाबैत कहलनि
निराशा संग आशापर टिकल छै दुनियाँ जँ देखलँहुँ भगजोगनी तँ दिबाली बुझू
बिहारक ताकत आ कमजोरी के समेटने इ शेर
बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी मालिक लगै बिहारी जकाँ एहन-एहन कतेको दमदार शेर सबसँ सजल इ गजल संग्रह अपना-आप मे अलग पहचान बनबैत अछि ।
पहिले गजल के देखलापर एकटा बात हमरा खटकल जे छल मात्र चारि टा शेर । गजलमे कमसँ-कम पाँच टा शेर रहबाक चाही मुदा एहि संग्रहक गजल संख्याँ 1,2,7,10,11,19,22,23,24,25,27,28,32,34,35,37,39,42,43,44,47,48 मे मात्र चारिए टा शेर अछि जे की गलत अछि ।ओना शाइर आमुखक अंतीममे इ गलती स्वीकार करै छथि आ एकर जिम्मेदार अपना के मानैत भविष्यमे एकर सुधारक वादा करैत छथि मुदा हुनक शब्दक पकड़ आ भावक अध्ययन केला के बाद हमरा लागैत अछि जे शाइरक लेल उपरोक्त गजलमे एक-एक टा शेर बढ़ेनाइ कोनो भारी बात नै छलै तेँए हम एकरा आलस मानै छी ।
आब चलु काफियापर । एहि संग्रहक किछु गजलमे एकै काफियाक प्रयोग भेल अछि जेना 26म गजल मे तीन ठाम काफिया "चाहैए" अछि ।29मे पाँच ठाम "एखनो" 31मे पाँच ठाम "उघारू" 46म मे पाँच ठाम"केकरो-केकरो" अछि ।किछु और गजलमे इ बात अछि ।ओना काफियाक दोहरेलासँ गजल गलत नै होइ छै । तेसर गजलमे मतला नै अछि किएक तँ इ गजलक पहिल शेर अछि फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन पहुँचल पहिने ओतहि अभागल
बचल चारिटा शेरमे "अभागल" के काफिया मानि क्रमश: "राँगल ,भाँजल , माँजल आ साधल लिखल अछि ।4म गजलक मतलामे "करैए" आ राखैए" "ऐए" तुकान्त संग अछि मुदा पाँचम शेर मे काफिया "होइए" अछि । छठम गजलक अंतीम शेरमे"कहाइ" के बदला गलत काफिया "कहाइत" लिखा गेल । 32म गजलक मतला अछि हमरा तँ सुख भेटैए गजलक गाँतीमे ओहिना जेना जाड़ मे गर्मी भेटैए गाँतीमे
एहिठाम "गाँतीमे" रदीफ भेल आ काफियाक अता-पता- नै अछि ।ओना आन शेरमे काफिया "आतीमे" तुकान्त संग अछि ।
41म गजलक मतलामे काफिया "झमका आ चमका " तुकान्त "मका" संग अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "उठा" अछि । 44म गजल मे काफियाक तुकान्त "एल" अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "रखैल" "ऐल" तुकान्त अछि । 17म गजलमे अंग्रेजी शब्दक काफिया "गेम" आ "ब्लेम" लिखल अछि ।
एहि संग्रहक सबटा गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि ।ओना तँ इ बहर गजलक सबसँ हल्लुक बहर अछि मुदा शाइर इहो बहरमे बहुते बेर धोखा खाइत छथि । हमरा जानैत 26टा गजल गजलक कोनो शेरमे एक-दू टा वर्ण बढ़ा देलनि तँ कोनो मे घटा देलनि ।जेना दोसर गजलक अंतीम शेरमे 15 के बदले 16 वर्ण अछि ।7म गजलक तेसर शेरमे 18 के बदले 19 वर्ण अछि । 9म मे दोसर शेरमे 11 के बदले 10 वर्ण अछि । 11म गजलक अंतीम शेरक अंतीम पाँतिमे 18 के बदले 17 वर्ण अछि ।एहन गजती गजल संख्याँ 12,14,15,18,19,20,22,24,26,28,29,30,31,32,34,35,38,42,43,46,47आ 48 मे सोहो भेल अछि ।
ओना जँ भावक बात करी तँ एहि गजल संग्रहके ऊँचाइ पर पहुँचा देने अछि एकर भाव । सबटा गजल हृदय के छू लैत अछि आ सोचबाक लेल मजबूर करैत अछि तेँए इ आन संग्रह सबसँ बिल्कुल अलग अछि आ एकर आखर आन संग्रहक आखरसँ कतिआएल अछि । भावक कारणे इ संग्रहक "कतिआएल आखर" पढ़बाक योग्य अछि ।हमर सलाह अछि जे एकबेर एकरा अजमा कऽ जरूर देखू । बेस तँ अहूँ सब पढ़ू आ हम जाइ छी दोसर गजलक खोजमे . . .
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गजल आ गीत मे अंतर की छै?
गजल आ गीत मे अंतर की छै? मात्र एक अक्षर के । गीत आ गजल दूनू गाओल जाइ छै । जँ ध्वनीक तुक {राइम्स } सभ पाँति मे मिलैत रहत त' गीत वा गजल दूनू सुनै मेँ बेशी नीक लागै छै । मुदा गीत मे राइम्स नहियो हेतै त' चलतै मुदा गजल मेँ प्राय: पाँति संख्याँ 1 ,2,आ तकरा वाद 4 ,6 , 8 , 10 . . . मे हेवाक चाही । गीत मे कतेको पाँति के बाद फेर सँ मुखरा दोहराओल जाइ छै मुदा गजल मे प्राय: तुकान्त वाला पाँति बाद कहल जाइ छै । गजल कम सँ कम 10 टा पाँतिक होइ छै जकरा 2-2 पाँति के रूप मे बाँटि क शेर कहल जाइ छै । । जहिना गीतक शास्त्र व्याकरण होइ छै{सा रे ग . . .} तहिना गजलक व्याकरण होइ छै । जहिना शास्त्रीय गायण मे राग होइ छै तहिना गजल मे बहर होइ छै । जहिना गीत कोनो ने कोनो ताल . राग . मे होइ छै तहिना गजल कोनो ने कोनो बहर मे होइ छै । । आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की?
नवका गायक त' गीतक टाँग -हाथ तोड़ि क' गाबै छथि । दू तीन टा शब्द के एकै साथ जोड़ि क' गाबैत छथि बूझू जे फेविकाँल सँ साटि देने होइ । जहिना गीत मे कोनो तरहक चिन्हक {कोमा ,फूल स्टाँप , आदि} के मोजरे नै दै छथि । ओहिना गजल मे कोना पाँति मे कोनो चिन्ह{. , ? आदि} नै देल जाइ छै ।मात्र अपन नामक आगू पिछू {" "} चिन्ह लगा सकै छी । आब एना किए कैएल जाइ छै से नै पूछू ? अपने सोचू ने गीते जकाँ गजलो के त' गाओल जाइ छै । आ आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की?
हमर एकटा मित्र गजलक बारेमे पुछलनि तँ कहलिअन्हि----
गजलक मे आबै वला किछु शब्द के देखू ।
1} शेर- शेर दू पाँतिक होइत अछि आ अपना आप मे सदिखन पूर्ण भाव दै अछि आ आन पाँति सँ स्वतंत्र रहैत अछि ।
2} गजल- कम सँ कम पाँच टा शेरके जँ किछु तुकान्तक सँग एक ठाम राखल जाए त' ओ गजल बनै छै । एकटा गजल मे एकै रंग तुकान्त हेवाक चाही ।
3} रदीफ- गजल पहिल शेर के अंतीम सँ देखू जँ कोनो एहन शब्द जे शेरक दूनु पाँति मे काँमन होइ त' ओकरा गजलक रदीफ कहबै ।
आइ चलू संगे प्रेम गीत गेबै प्रिय एकटा प्रेमक महल बनेबै प्रिय
एहि शेर मे "प्रिय "दुनू पाँति मे अछि तेँए एकर रदीफ भेल" प्रिय" । आब गजलक सब शेरक दोसर पाँति मे इ रदीफ रहबाक चाही इ अनिवार्य अछि ।
4} काफिया - काफिया मने मोटा मोटी तुकान्त{राइम्स} बूझू । जँ बाजै मे एकै रंग ध्वनी बूझना जाइ यै त' ओ भेल काफिया । काफियाक तुक ओहि शब्दक अंतीम सँ पता लागै छै । जे तुकान्त गजलक पहिल पाँति मे अछि सेह आन सब पाँति मे हेवाक चाही । मतलब जे गजलक पहिल शेरक दुनू पाँति मे आ आन शेरक दोसर पाँति मेँ ।
काफिया- जेना - जेबै . खेबै . नहेबै { ऐ मे "एबै" तुकान्त भेल गमला . राधा . चेरा . केरा {एहि मे तुकान्त "आ" भेल}
हेतै , खेबै . झेलै {ऐ मे तुकान्त"ऐ" भेल}
रोटी , हाथी . रेती{ऐ मे "ई" भेल}
झोरी . बोरी {ऐ मे"ओरी" भेल} एनाहिते और सब मे काफिया {तुकान्त }बनत ।
गजल पहिल शेर मे रदीफ आ काफिया क्रमश: पाँतिक अंतीम सँ अनिवार्य रूप सँ हेबाक चाही । आ आन शेरक दोस पाँति मे सेहो रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतीम सँ हेएत ।
5} मतला- गजल पहिल शेर जेकर दूनू पाँति मे रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतीम सँ होइ एकरा मतला कहल जेतै ।
चाँद देखलौ त' सितारा की देखब अन्हारक रूप दोबारा की देखब
प्रेमक सागर मे बड नीक लागै डुब' चाहै छी त' किनारा की देखब
एहि मे पहिल शेरक दुनू पाँति मे काँमन "की देखब" अछि तेँए इ एहि गजलक रदीफ भेल आ रदीफक पहिले देखू , दूनू पाँति मे "सितारा "आ "दोबारा " छै एकर तुकान्त भेल "आरा" तेँए इ भेल काफिया । आब दोसर शेरक दोसर पाँति मे देखू । रदीफ "की देखब" आ तुकान्त "आरा " के संग शब्द "किनारा " अछि । । आब एहि गजलक सब शेरक दोसर पाँति मे अंत सँ रदीफ "की देखब " आ काफिया "आरा" तुकान्तक संग हेबाक चाही ।
तुकान्तक पाता शब्दक अंत सँ चलै छै ।
6} मकता-- गजल अंतीम शेर जै मे शाइर अपन नामक प्रयोग करै छथि ओहि गजलक मकता कहल जाइ छै ।
मेघक डरे चान नै बहरायल नै औता "अमित" नजारा की देखब
इ भेल मकता । शाइर अपन सब शेर मे अपन एकै टा नामक प्रयोग करैथ । जेना हम पहिल गजल सँ"अमित" लिखै छी त' आब कतौ "मिश्र " नै लिख सकै छी ।
वेश त' एते देखू आ लिखू । और कनेटा बात छुटल अछि जे अहाँ सब जानैत छी । वर्ण वला बात । त ' आब लिखू किछ नीक गजल
किछु दिन पूर्व हमरे सन एकटा बिन पढ़ल लिखल गीतकार सँ भेट भेल ।हमरे जकाँ हुनको रचना लोकक माँथ पर द निकैल जाइ छलै । खैर ओ हमरा बतेलनि जे गीत लिखैत बेर जँ वर्ण गानि क लिखब त' गाबै मे सुविधा हेतै । आ ओ वर्ण गानब सिखेलनि । तै पर हम कहलयनि जे एना वर्ण गानि क' हम सब "गजल "लिखै छी आ तेकर नाम दै छी "सरल वार्णिक बहर"
आ एकर वर्ण एना गानल जाइत अछि । हिन्दी वर्णमाला के जतेक वर्ण अछि{अ .आ सँ ल' क' य , र . . . धरि} के एकटा वर्ण मानै छी । जतेक हलन्त रहै अछि तकरा मोजर नै दै छी अर्थात शुन्य{0} मानै छी । संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षर के एक {1} मानै छी । जेना की " भक्त" एहि मे 2 टा वर्ण भेल । एकटा "भ"आ एकटा "क्त" ।
एकर बाद एकटा शेर कहलौँ ।
भाग्य मे जे लिखल अछि तेँ विरह मे मरै छी आशा केने छी कहियो त' मान नोरक धरबै
एहि शेरक दुनू पाँति मे 17 वर्ण अछि । एहि बहर मे जँ गजल लिखब त' सब पाँति मे पहिल पाँति एते वर्ण हेबाक चाही ।
ओ गीतकार कहलनि जे अहाँके वर्ण गान' आबै यै तेँए अहाँ नीक गीतकार बनब आ हमहूँ आब गजल लिखब । । गीत आ गजल मे एते समानता अछि त' आब कहू गीत आ गजल मे अंतर की ? २ चंदन कुमार झा बहुत किछु बुझबैए : कियो बूझि नहि सकल हमरा एकैसम शताब्दीक पहिल दशककेँ, मैथिली गजलक इतिहासमे, जँ नवजागरण काल कहल जाए तऽ कोनो अतिशयोक्ति नहि होयत । एहि दशकमे मैथिली गजल अपन नवस्वरूप ओ नवीन छटा'क संग साहित्य-प्रेमी लोकनिक सोझाँ उपस्थित भेल अछि । एहि समयावधिमे मैथिली गजलकेँ अपन फराक गजलशास्त्र भेटलैक जे खाली गजले नहि अपितु रुबाइ, कता, नात आदिक रचना हेतु सेहो व्याकरणिक पृष्ठभूमि तैयार केलक । ई गजलशास्त्र मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे सहायक सिद्ध भऽ रहल अछि । मैथिली गजल-लोक'क परिधिकेँ विस्तृत ओ सुदृढ़ बना रहल अछि । एहिसँ गजल कहबाक (लिखबाक) व्याकरण सम्मत मानक तैयार भेल अछि जाहिसँ सचेष्ट लोक, गजल कहबाक शैली ओ शिल्पक ज्ञान सहजतापूर्वक अर्जित कऽ सकैत छथि । एहि सूचनाक्रांतिक युगमे “इंटरनेट” मैथिली गजल ओ गजलशास्त्रकेँ मैथिली-साहित्यप्रेमी धरि पहुँचेबामे महत्वपूर्ण माध्यम साबित भऽ रहल अछि । संगहि एकर विभिन्न पक्षपर चर्चा-परिचर्चाक अत्यंत सुभितगर मंच उपलब्ध करा रहल अछि । "अनचिन्हार आखर" नाम्ना ब्लाग मैथिली गजलक विकास ओ विस्तारक हेतु पूर्णतः समर्पित अछि । नेपालमे सेहो मैथिली गजलक एहि नवस्वरूप केर विकासक हेतु किछु एहने सन प्रयास भऽ रहल अछि । कुल मिलाकऽ कही जे पछिला दसेक बरखसँ किछु सजग नवतुरिया मैथिल साहित्यकार लोकनि, गजल प्रेमी लोकनि , मैथिली गजल'क भाषायी ओ शिल्पगत विकासक मादेँ अभियान चलौने छथि । ई अभियान एकटा ऐतिहासिक प्रयास थिक । वर्तमान समयमे मैथिलीक नवतूरक साहित्यकार लोकनि मैथिली गजलक सर्वांगीण विकास हेतु प्रतिबद्ध छथि । एकदिस जतय ई सभ नव-नव गजलकार लोकनिकेँ प्रशिक्षित-प्रतिष्ठित करबामे लागल भेटैत छथि ततहि दोसर दिस पूर्ववर्ती गजलकार सभक रचना संसारक जोत-कोड़क तकतान सेहो हिनका सभकेँ रहैत छनि । पूर्वक एहि रचना सभसँ उपयोगी-अनुपयोगी तत्वकेँ बेरा रहल छथि । प्रतिफलस्वरूप मैथिली गजलक विभिन्न ऐतिहासिक पक्षसँ मैथिली साहित्यप्रेमी लोकनि अवगत भऽ रहल छथि आ नवतुरिया साहित्यकार वर्गकेँ एहिसँ भविष्यक दिशा-निर्देश सेहो भेटिए जाइत छनि । तखन एहि नवतुरिया अभियानी लोकनिकेँ अपन पूर्ववर्तीक कृतिक ( गजल / गजलेसन किछु ) समीक्षा करैत काल एतबा अवश्य ध्यान राखय पड़तनि जे हुनकर सभक व्यक्तित्वक मादेँ कोनो तरहक कठोर कि अपमानजनक शब्दावलीक प्रयोगसँ बाँचथि । कोनो तरहक पूर्वाग्रहसँ बाँचथि । संगहि हिनकर सभक रचनामे जे-जतबा सकारात्मक पक्ष अछि तकर बेसी चर्चा-परिचर्चा करथि । एहिसँ एकटा सकारात्मक वातावरण बनत । गजल आर लोकप्रिय होयत । गजलकार आर बेसी सम्मानित हेताह । गजलक परंपरा आर सुदृढ़ हेतैक । एतय एहि पूर्ववर्ती साहित्यकार वा एहि पिढ़ीक साहित्य प्रेमी लोकनिकेँ सेहो कनेक उदारता देखबय पड़तनि । कदाचित जँ कोनो कटुवचन ई नवतूर अपन पूर्ववर्ती'क प्रतिएँ कहैत अछि तऽ तकर पाछाँ सेहो गजलक विकासक प्रति हिनकर सभक मोनक निष्ठेक प्रबलता रहैत अछि । अतः सकारात्मक वातावरणक निर्माण हेतु सभ पक्षकेँ संयमित हेबय पड़तनि । लक्ष्य साधब तखने संभव होयत । बीसम शताब्दीक प्रारंभहिमे पं.जीवन झा अपन “सुन्दर संयोग” (“रचना”मे छपल डॉ. रामदेवझा'क आलेख "मैथिलीमे गजल"क अनुसार १९०४ ई. मे) नाटकमे मैथिली गजल'क इतिहासक श्रीगणेश कएलनि । तदुत्तर मुंशी रघुनंदन दास,यदुनाथझा 'यदुवर', कविवर सीताराम झा, कविचूडामणि “मधुप” , आदि एहि परंपराकेँ आगाँ बढौलनि । एहि प्रारंभिक गजल सभमे जे सभसँ विशिष्ट तत्व अछि से थिक जे प्रायः अधिकांश आरंभिक गजल बहर, काफिया आ रदीफ संबंधी नियमक अनुपालनमे अरबी बहर (छंद) –विधानक अत्यंत लगीच बुझना जाइत अछि । खासकऽ हिनकर सभक गजल केर प्रत्यके चरणमे (शेरमे) अनुप्रास-योजना (काफिया आ रदीफ) केर विलक्षण प्रयोग भेटैत अछि ।उदाहरणस्वरूप १९३२मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ प्रकाशित "मैथिली-संदेश"मे मधुप जीक गजल देखल जा सकैए :- मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी हम कालिदास विद्या-पति-नामछाड़ि मुँहमे बाड़ीक तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी देशीक गेल ठेसी की पाँकमे पड़ै छी? औ यत्र-तत्र देखू अछि पत्र सैकड़ो टा अछि पत्र मैथिलीमे एको न तैं डरै छी (2212-122-2212-122) कहबाक प्रयोजन नहि जे मैथिली गजल अपन बाल्यकालमे बेस सुरेबगर ओ आकर्षक छल । तकर एकटा इहो कारण भऽ सकैत अछि जे मैथिली गजलक जखन बाल्यावस्था छलैक तखन मिथिलामे फारसी एकटा महत्पूर्ण ओ रोजगारपरक भाषा छल आ संभवतः तकरे प्रभावसँ मैथिलीमे गजलक उत्पति भेल । फारसी कचहरीक दस्ताबेजक भाषा, हिसाब-किताबक भाषाक रूपमे प्रचलित छल । महाकवि लालदास आ उपन्यासकार जीवछ मिश्र फारसी'क शिक्षा ग्रहण कएने रहथि । एहिना मिथिलाक एकटा नमहर वर्ग फारसी पढ़ैत-लिखैत होयत ताहिमे कोनो दू-मत नहि हेबाक चाही । तखन पं. जीवन झा कि कविवर सीताराम झा वा मधुप जी आ'कि आन-आन विद्वान लोकनि जे गजल लिखबाक प्रयोग केलनि, फारसीसँ विधिवत शिक्षित छलाह वा नहि से नहि जानि मुदा, जँ नहियो शिक्षित हेताह तैयो विद्वानक बिच रहैत-रहैत एहि भाषा'क शिल्प ओ विधानसँ परिचित भेल हेताह, तकर प्रयोग अपन-अपन गजलमे कएने हेताह, तकरा अस्वभाविको नहि मानल जा सकैछ । एहि संबंधमे प्रायः जुन १९८४ ई.मे "रचना"मे छपल डॉ.रामदेवझा अपन आलेख "मैथिलीमे गजल"मे लिखैत छथि- " गजलक मार्मिकता ओ लयात्मकता कवि हृदयकेँ सहजे आकृष्ट करैत अछि । मैथिलीयो कवि लोकनि गजल दिश आकृष्ट भेलाह......अठारहम ओ उनैसम शताब्दीमे गजलक रचना ओ गानक केन्द्र लखनउ,बनारस, इलाहाबाद, दिल्ली, इत्यादि बनि गेल छल । उनैसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध ओ बीसम शताब्दीक प्रारम्भिक चरणमे पारसी थियेटरक जे प्रवाह चलल, ओही संग गजल सेहो सामान्य लोककेँ श्रुतिगोचर भेल । एहन मैथिली कवि जे कोनहु रूपमे फारसी उर्दूसँ संपृक्त छलाह अथवा उपर्युक्त परिगणित केन्द्रमे प्रवासमे रहबाक अवसर प्राप्त एलनि, से सब मैथिलीमे गजल-रचनाक प्रयोग करबाक चेष्टा कयलनि ।" किंतु, मैथिली गजलक बाल्यकाल केर शब्द, शिल्प ओ स्वरूप'क मर्यादासँ बान्हल सुसंस्कारी स्वभाव एकर किशोरावस्था अबैत-अबैत जेना अल्हड़पनमे बदलि गेल । जतय एकर भाषायी ओ व्याकरणक स्वरुपक निर्धारण हेबाक चाही छलैक ततय घोषित भेल जे मैथिलीमे गजल कहब (लिखब) संभवे नहि । वैकल्पिक रूपेँ गीतल कहि एकटा नव काव्य संरचना प्रतिपादित कएल गेल । दुर्भाग्यवश एहि घोषणा'क समर्थनमे सेहो मैथिली साहित्यकार लोकनिक पाँत ठाढ़ भेल । तखन एहि मान्यताक विरुद्ध सेहो किछु प्रगतिशील साहित्यकार लोकनि ठाढ़ भेलाह । मुदा, इहो लोकनि अरबी बहर-विधान आ मैथिलीक पारंपरिक छंदशास्त्रक अनुशीलन कए एहि दुनूक मध्य कोनो तरहक सामंजस्य स्थापित नहि कए सकलाह । फलतः मैथिली गजल व्याकरणहीन रहल आ हिनकर सभक गजल काफिया मिलानी धरि सीमित भऽ गेल । एहि संबंधमे उक्त आलेखमे डॉ. रामदेव झाक उक्ति देखू- "हालक विगत किछु वर्षमे गजल-रचनाक प्रवृतिक पुनर्जन्म भेल अछि आ से एकटा प्रवाह अथवा फैसनक रूपमे परिवर्तित भऽ गेल अछि । एहि क्षेत्रमे किछु प्रौढ़ ओ विशेषतः युवा पीढ़ीक कवि गजल रचना करैत जा रहल छथि.........हिनका लोकनि गजलमेसँ किछुमे अवश्ये गजलत्व अछि । परन्तु अधिकांशकेँ गजल-शैलीमे रचित गीत-मात्र कहल जाय तँ अनुपयुक्त नहि होयत । " उत्तम भावाभिव्यक्तिक अछैतो ई गजल सभ वर्तमान गजलशास्त्रक आधारपर निंघेस साबित होइत अछि आ एहीठामसँ मैथिली गजलक दू पिढ़ी'क बीच वैमनस्यता सेहो उपजैत अछि । ओना एहिमे किछु गजलकार एहनो छथि जे स्वयं स्वीकार करैत छथि जे उचित छंदशास्त्रक अभावमे हुनकर सभक रचनामे एहन त्रुटि रहि गेल । मुदा, किछु एहनो व्यक्ति छथि जे एखनो जिद्द अरोपने छथि आ गजलक नव-विधानकेँ स्वीकार करबा लेल तैयार नहि छथि । एहिठाम एहि पिढ़ी'क गजलकार'क कृतित्वक आलोचनाक मादेँ नवतूरक समालोचककेँ इहो ध्यान रखबाक चाही जे एहि समयमे मैथिलीमे गजल संबंधित व्याकरण उपलब्ध नहि छल । संभव जे किछु साहित्यकार वर्ग जीवन झा, सीताराम झा आदिक गजलकेँ प्रेरक स्रोततऽ मानैत रहलाह मुदा, अरबी बहरक प्रयोगसँ मात्र एहि हेतु परहेज कएने रहलाह जे ओ सिद्धांत आन भाषासँ आयातित होयत । कारण जे कोनो होउ मुदा परिणाम एतबे अछि जे उत्कृष्ट विषय-वस्तुक अछैतो मैथिली गजल विश्वक आन-आन भाषा'क गजलक समकक्षी नहि बनि सकल । एक सय बरखक इतिहासक अछैतो मैथिली'क अंगनामे अपरिचिते जकाँ जिबैत रहल । तखन एहि पूर्ववर्ती (गजलक पक्षधर) सभक एतबा योगदान त' नहि नकारल जा सकैत अछि जे ई सभ मैथिली-गजलकेँ जियौने रहलाह । मैथिलीमे गजलक संभावना बचल रहल । एक सय बरखक इतिहासक बलपर मैथिलीमे गजल कहबाक इएह बाँचल संभावना आ "अनचिन्हार युग"क अभियानी प्रयासक एकटा सुंदर प्रतिफल थिक ओमप्रकाश जीक पहिल गजल-संग्रह-"कियो बूझि नहि सकल हमरा" । एहि शताब्दी'क आरंभहिसँ गजलक विकासक मादेँ जे विरार लगाओल गेल, ई पोथी तकरे उपजा थिक । नेनपनहिसँ साहित्यक प्रति रूचि रखनिहार गजलकार ओमप्रकाशजी एहि पोथीक भूमिकामे स्वयं गछैत छथि जे मैथिली गजल'क विकासे हिनक साहित्य-कर्मक प्राथमिकता छनि । हिनक साहित्य-साधनाक मूल साध्य गजले थिकनि । गजलक प्रति हिनकर इएह लगावक परिणाम थिक जे ई अपन एहि संग्रहक माध्यमे मैथिली गजलकेँ उच्चतर स्थानधरि पहुँचेबाक हेतु प्रयासरत बुझना जाइत छथि । हिनकर एहि संग्रहमे एक्कहि संग अनेक विषय-वस्तु यथा-सिनेह,संवेदना,श्रृंगार-सौंदर्य,सामाजिक सरोकार, चिंतन, संघर्षक स्वर, आदि समेटल गेल अछि । देश, काल ओ परिवेशजन्य स्थिती-परिस्थितिक सहज अटावेश एहि संग्रहक हरेक मिसरा (पाँति ), हरेक शेर (चरण) मे भेटैत अछि । परिवर्तन सांसारिक नियम थिक । समयक परिवर्तनशील स्वभावकेँ जे नहि पकड़ि पबैत अछि सएह समयक संग नहि चलि पबैत अछि । पछड़ि जाइत अछि । आम जनमानस भलेँ समय एहि गतिकेँ नहि पढ़ि पबैत हो मुदा एकटा संवेदनशील हृदय, एकटा सूक्ष्मदृष्टि, एकटा साकांक्ष मानव, एकटा मसिजीवीसँ ई परिवर्तन-धर्मिता छपित नहि रहि सकैत अछि । एकटा साहित्यकारक सोझाँ ओकर असली रूप देखार भइए जाइत छैक । ओमप्रकाश जीक कलम समयक चरित्रकेँ उघार करबामे सक्षम छनि । वर्तमान समयक चालिकेँ अकानति ओ कहैत छथि जे ई युग मात्र संघर्षक युग नहि थिक बल्कि ई युग संघर्षक बलपर अधिकार प्राप्तिक युग थिक । हुनकर मानब छनि जे आब लोक-चेतना बढ़ि रहल अछि तेँ व्यवस्थाकेँ सेहो सचेत रहय पड़तैक । ई युग जनता'क थिक । आब जनते जनार्दन अछि । लोककेँ आब खैरात नहि चाही । ओकरा अपन कर्मक प्रतिफल चाही । प्रतिफलो एहन जाहिमे ओकर स्वाभिमान, ओकर सम्मान नुकाएल होइ । ओकरा बोनिमे आत्मीयतासँ भरल उपहार चाही । ओमप्रकाश जी एही युगीन जनभावनाकेँ स्वर दैत कहैत छथि- भीख नहि हमरा अपन अधिकार चाही हमर कर्मसँ जे बनै उपहार चाही कान खोलिकऽ राखने रहऽ पड़त हरदम सुनि सकै जे सभक से सरकार चाही व्यवस्था लग बल होइत छैक । मुदा ओकरा ई बल जनते-जनार्दनसँ भेटैत छैक । व्यवस्था कतबो बलगर होउ मुदा जनबलसँ बलिष्ठ नहि भऽ सकैत अछि । कोनो सरकारी मिसाइलमे एतबा ताकति नहि होइत छैक जे भूखक ज्वालाक सामना कऽ सकत तेँ शाइर ओमप्रकाश एहि बदलल युगमे व्यवस्थाकेँ चेतबैत छथि - धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक लोकतंत्रमे लोकेक बलक प्रताप थिक जे कियो राजभवन पहुँचि जाइत अछि तऽ कियो सड़कपर बौआइत रहैत अछि । सत्ता-परिवर्तन एही "लोक"क हाथमे रहैत छैक । व्यवस्था परिवर्तन एहि "लोक"क हथियार थिक । तेँ अबोध लोककेँ भने किछु काल राजभवन'क परिधिसँ बाहर राखल जा सकैत अछि मुदा, जखन इएह लोक जागि जाइत अछि तखन स्थिती बदलि जाइत छैक । लोकक तागतिकेँ बिसरबाक नहि थिक । ओमप्रकाश एहिमादेँ राजभवनमे बैसल अकर्मण्य सभकेँ स्मरण करबैत छथि- लोकक बलेँ राजभवन इ गेलौ बिसरि खाली करू आबैए खिहारल लोक व्यवस्थाक अकर्मण्यताक चलतेँ सगरो अराजकता व्याप्त अछि । भौतिकताक आगाँ नैतिकता नतमस्तक भेल अछि । भ्रष्टाचार, महगी, बेरोजगारीक समस्यासँ बेहाल जनताक लेल मृत्यु सभसँ सुलभ उपाय बनि गेल अछि आ जीवन कठिन । विपन्नताक मारल, हकन्न कनैत, श्रमजीवी'क पसेनाक मोल आब दालि-रोटीक दामसँ कमि गेलैए । आम जन-जीवनक एहि मनोभावकेँ अपन दू गोट मिसरामे स्वर दैत छथि ओमप्रकाश जी- जीनाइ भेलै महँग एतय मरब सस्त छै महँगीक चाँगुर गड़ल जेबी सभक पस्त छै महगीक मारिसँ पाबनि-तिहारक, उत्सव-उल्लासक, हँसी-हहारो, निपत्ता भऽ गेल अछि । कोनो सामाजिक, आर्थिक कि राजनीतिक समस्यासँ किछु खास जाति-वर्गेक लोक प्रभावित नहि होइत अछि बल्कि एकर मारि समाजक, सभ वर्गक लोकपर परैत छैक । एहनामे जाति-पाति, गोत्र-मूल, अगड़ा-पिछड़ाक जोर-घटाओ, पंचग्रासक ओरियान केर गणितसँ गतानल मनुक्ख लेल कोन काजक, कोन महत्वक ? ओकर त’ कोनो धर्मगुरू कि महाज्ञानी लोकनिक ज्ञानसँ सेहो पेट नहिए भरतैक । तेँ ओमप्रकाश जी कहैत छथि- भूखल पेटक गणितमे ओझरायल लेल ज्ञान की गरीबक सभदिन एक्के मोहर्रम की रमजान की गरीबी'क बात करयबला, अपनाकेँ गरीब-गुरबाक शुभचिंतक कहयबला जखन सत्ता-सिंहासन धरि पहुँचि जाइत छथि तऽ हुनकर अभिष्ट गरीबी उन्मूलन कि गरीबक कल्याण नहि रहि जाइत छनि । जनताकेँ जनार्दन कहि सत्ताधरि पहुँचिते स्वयं जनार्दन बनि जाइत छथि आ जनकल्याण माने अपन आ सर-कुटुम्बक कल्याण बूझैत छथि । जनताक कोष लुटबामे लागि जाइत छथि । व्यवस्थाक गत्र-गत्रमे भ्रष्टाचारी घून पैसल भेटैए । भ्रष्टाचारक नित नव-नव रेकार्ड बनैए आ जनता बाध्य भऽ कहैए- कर जोड़ै छी सरकार आब रहऽ दिऔ कते करब भ्रष्टाचार आब रहऽ दिऔ भूखक ज्वाला, अभावक तापक प्रताप थिक जे शोषित समाज अभिजात्यक मोकाबिला ठाढ़ भऽ जाइत अछि । कहबीयो छैक-मरता, क्या नहि करता ? समाजक दू वर्गक मध्य जे दूरी बनि गेल छैक तकरे परिणाम थिक वर्ग-संघर्ष । भूख आ अर्थाभाव जनित एहि समस्या दिस इशारा करैत अछि ओमप्रकाश जीक ई दू टा मिसरा- मिझबै लेल पेटक आगि देखू पजरि रहल छै आदमी जीबाक आस धेने सदिखन कोना मरि रहल छै आदमी जाहि भूमिपर सिया सन धिया भेलीह आइ ताहि भूमिपर दहेज रूपी दानव "मैथिली"क प्राण हरण कए रहल अछि । मैथिली मूकदर्शक बनल छथि । जनक कानि रहल छथि । हुनका चिंता पैसल छनि जे हुनकर बेटीक विवाह कोना हेतनि- बिना दाम नै वर केर बाप हिलैत अछि धरमे गरीबक सदिखन अतिचार रहैत छैक मात्र भूख, बेरोजगारी, महगी कि भ्रष्टाचारे जीवनक बाटपर समस्या नहि अछि बल्कि एकरा अलावे कतेको कूरीति सेहो अछि जे लोककेँ विकास-पथपर बढ़बामे बाधक बनल अछि । हम सभ जाहि भू-भागक छी ताहि मिथिलाक गौरवशाली अतीत रहल अछि । एहि धरतीपर सामाजिक सद्भाव आ नारीक सम्मानकेँ सभदिन प्राथमिकता देल गेल । मुदा,वर्तमान समयमे हम सभ जाति-पातिमे अपनाकेँ बँटने खण्ड-खण्ड भेल छी । आपसी प्रतिस्पर्धामे अपने समांगसँ ईर्ष्या होइत अछि । अपनहि भाइ-बन्धुक अनिष्ट सोचयमे श्रम-संसाधन उत्सर्ग करय लगैत छी आ परिणाम भेल अछि जे हम सभ असक्त भेल दहो-दिस छिछिया रहल छी । जनक नगरीक बाग उजरि गेल अछि । ओमप्रकाशजीकेँ सेहो ई बात अज्ञात नहि छनि तेँ ओ कहैत छथि- हक बढ़ै केर छै सबहक इ नै छीनू बढ़त सभ गाछ तखने बाग निखरै छै लोक अपन-आनक द्वंदमे फँसल अछि । ओ आधुनिकताक नामपर पसरल भौतिकताक चकचौन्हमे लोक तेनाने आन्हर भऽ गेल अछि जे आब मोनक मर्मकेँ बूझबाक सामर्थ्य ओकर दृष्टिमे नहि बाँचल छैक । ओकरा मात्र बाहरी रंग-रोगन धरि सूझैत छथि । मानवीय मूल्यक ह्रास ओ संबंधक जड़ताक टीस गजलकार ओमप्रकाश जीक करेजासँ सेहो बहराइए जाइत छनि - कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा मुदा, एतेक दुख-दरिद्रा, संकट, समस्या आ संघर्षक अछैतो ओमप्रकाश जी जिनगीक डेन नहि छोड़ैत छथि । बल्कि निरंतर लक्ष्य दिस बढ़ैत रहबाक, सकारात्मक सोच रखबाक आह्वान करैत छथि- जिनगीक गीत अहाँ सदिखन गाबैत रहू एहिना ई राग अहाँ अपन सुनाबैत रहू जीवनमे जिवंतता आ मानवताक डेन धऽ चलैत काल गजलकार गजलक शास्वत मर्म माने प्रेमक तन्नुक तागकेँ सेहो पकड़ने छथि । करेजक इएह प्रेमक भावसँ श्रृंगार छिटकैत अछि जे हिनकर एकटा सूच्चा गजलकार हेबाक परिचिति गढ़ैत अछि - चमकल मुँह अहाँक इजोर भऽ गेलै अधरतिएमे लागल जेना भोर भऽ गेलै ओमप्रकाश जी एहि पोथीक भूमिकामे लिखने छथि जे हिनकर पिता समाजवादी विचारधाराक समर्थक छलखिन तऽ माता उदारवादी सोच रखनिहारि । हिनकर एहि संग्रहक रचना सभमे एहि दुनू विचारधाराक सम्मिश्रण भेटैत अछि जे स्वाभाविके अछि । संगहि सामाजिक सरोकारसँ संबंधित हिनकर अपन चिंता-चिंतन सेहो भेटैत अछि । गजलकार ठिक्के कहैत छथि जे संवेदनहीन हृदयसँ गजल नहि बहरा सकैत अछि । हमतऽ कनि बढ़िकऽ कहब जे संवेदनहीन हृदयसँ साहित्ये नहि बहरा सकैत अछि । संवेदनहीन हृदयकेँ साहित्य बुझबाक क्षमतो नहि रहैत छैक तेँ ओ गजल सेहो नहि बुझि सकैत अछि । प्रायः एहने सन किछु भाव गजलकारक मोनमे सेहो रहल हेतनि आ तेँ ई अपन एहि पोथीकेँ नाओं देलनि-“कियो बूझि नहि सकल हमरा " । मुदा, एकटा संवेदनशील करेजा राखयबलाक हेतु एहि पोथीमे बुझबाक हेतु बहुत रास सामग्री अछि । गजलक विशेषताक मादेँ ओमप्रकाश जीक इहो कहब उचिते छनि जे -व्याकरण ओ मानवीय संवेदना दुनू एकर दू गोट पहिया थिक । तेँ गजलक रचना काल नहि एकर व्याकरण पक्षकेँ नकारल जा सकैत अछि आ नहिए एकर भाव पक्षकेँ । गजलक परिप्रेक्ष्यमे व्याकरणक जे महत्ता ओमप्रकाश जी बुझैत छथि तकर छाप हिनक एहि संग्रहमे सेहो भेटैत अछि । एहि संग्रहमे संकलित कुल सतासी गोट गजलमे चौबीस टा गजल अरबी बहर आधारित अछि एवं शेष तिरसठि टा गजल सरल वार्णिक बहरक अनुसार लिखल गेल अछि । एकर अलावे आठ टा रूबाइ आ दू टा कता संग्रहित अछि । हरेक गजलक निच्चामे तकर बहरक विवरण सेहो देल गेल अछि जाहिसँ पाठककेँ बहरक संरचनाक भाँज सहजहिँ लागि जेतनि । परोक्ष रूपेँ बहरक ई नामोल्लेख ओहि गजलकार सभकेँ एना देखा रहल अछि जिनकर सभक मान्यता छलनि जे मैथिलीमे गजल भइए नहि सकैत अछि, संगहि एहि बातकेँ स्थापित कए रहल अछि जे मैथिलीमे गजल आ सेहो अरबी बहर-विधान आधारित गजल बड़े शानसँ कहल जा सकैत अछि । एहिठाम डॉ. रामदेवझा'क पूर्वोल्लेखित आलेख'क अंतिम अंश जाहिमे ओ कहैत छथि- " जहिना समदाउनिक रचना हिन्दी-उर्दूमे असाध्य वा कष्ट साध्य अछि तहिना मैथिलीयोमे गजल-रचनाक स्थिती मानल जा सकैछ । मुदा एकरा 'इत्यलम्' नहि मानल जा सकैछ । कोनो प्रतिभाशाली कवि मैथिलीमे उपर्युक्त मान्यताकेँ अन्यथा सिद्ध कए सकैत अछि ।" केँ ओमप्रकाश जी शत-प्रतिशत प्रमाणित करैत छथि आ अपन प्रतिभासँ सिद्ध कएलनि अछि जे मैथिलीयोमे उर्दू-फारसीए जकाँ गजल कहल (लिखल) जा सकैत अछि । चूँकि एहि पोथीक सदेह रूप एखनो उपलब्ध नहि भऽ सकल अछि तेँ एकर व्याकरण पक्षक गहन अध्ययन नहि कए सकलहुँ । तखन अपेक्षा करैत छी जे कियो ने कियो गोटे, गजलक व्याकरण गूढ़ जानकार लोकनि, एकर व्याकरण पक्षपर सेहो विस्तृत चर्चा करबे करताह । ओना ओमप्रकाश जीक गजल ओ गलक व्याकरणक अनुसरण करबाक जे अनुराग छनि ताहिसँ जँ कदाचित एहिमे कोनो त्रुटि हेबो करत तऽ से नगण्यप्राये, तेहन विसबास अछि । अपन सिमित ज्ञानक आधारपर एहि पोथीक व्याकरणक पक्षपर जे विहंगम दृष्टिपात कए सकलहुँ ताहि आधारपर हमरा कोनो त्रुटि नहि देखायल अछि । तखन कतहु-कतहु बहरक आखर कि मात्रा पुरेबाक दृष्टिकोणसँ मिसरा सभमे जे वर्ण कि मात्राक जोड़-तोड़ कएल गेल अछि ताहिसँ भावक प्रवाह खण्डित होइत बुझना गेल । संगहि कतेको ठाम वर्तनीक अशुद्धता सेहो एहि पोथीमे एखन देखल जा सकैत अछि । मुदा, इहो संभव जे जखन एकर सदेह रूप हमरा सभक हाथमे आओत तखन एहन बहुत रासेक त्रुटि नहि रहत । पोथीक स्वरूप आ दामक संबंधमे एखन उचित-अनुचित किछुओ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा, एतबा तऽ अबश्य लगैत अछि जे एहि पोथीकेँ पाठकक सिनेह भेटतैक । संगहि निकट भविष्यमे ओमप्रकाश जीक गजल मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा ओ दृष्टि देत । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’- ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी गजल समीक्षा 1
गजलक लहास
हमरा पढ़क सौभाग्य भेटल कलानंद भट्ट कृत गजल संग्रह “कान्हपर लहास हमर” जे की १९८३मे प्रकाशित भेल अछि। एहि गजल संग्रहमे कलानंद भट्ट जीक गजल प्रति सम्बोधन ‘गजलक मादे’क अलाबा कुल ४८टा गजल वा गजल सन किछु अछि। भट्टजी अप्पन संबोधन ‘गजलक मादे’मे तँ विभक्ति सटा कए लिखने छथि मुदा बाद बांकी गजल सभमे विभक्ति शब्दसँ हटा कए लिखल अछि। ई संकेत अछि हुनक वा हुनक समकालीन मैथिली लेखकक द्वारा गद्य आ पद्यमे मैथिली प्रति कएल गेल अन्तर। एहि संग्रहक मादे, गजलक व्याकरण पक्षपर अबैत छी। एक गोट गजल लेल सभसँ आवश्यक अछि काफिया आ रदीफक पालन मुदा एहि संग्रहक किछु गिनतीक गजल बाय लक छोरि कए बाद बांकी गजलमे काफिया आ रदीफक दोख अछि। जेना एहि संग्रहक पहिले गजलक मतला देखू – “घर घरेक आगि सँ अछि जरल जा रहल भाइ सँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल ” आब एहि मतलाक हिसाबे काफिया भेल ‘रल’, मुदा एहि गजलकेँ आँगाक शेर सबहक काफिया अछि – ‘बनल’, ‘बनल’, ‘चलल’, ‘कयल’। गजल तीन केर मतला देखू – “कहू की कथा कहुना जीबि रहल छी फाटल गुदरी अपन हम सीबि रहल छी” आब एहि मतलाक काफिया भेल ‘ीबि’, मुदा गजलक आन-आन शेरक काफिया अछि, ‘लीबि’,’पीबि’, ‘खीचि’, ‘पीति’। एहिठाम ‘लीबि’ आ ‘पीबि’ तँ ठीक मुदा ‘खीचि’ आ ‘पीति’ ? गजल ६ केर मतला – “बाट बाधित पहाड़े छै पाटल जखन सीयत दरजी के आकासे फाटल जखन” एहिठाम काफिया भेल ‘ाटल’ जेना की काटल, चाटल, साटल, मुदा एहि गजलक आन आन काफिया अछि ‘साटल’, ‘फाटल’, ‘जागल’, ‘लागल’। एहिठाम ‘साटल’ तँ ठीक अछि, ‘फाटल’ ठीक मुदा एकर पुनः प्रयोग आ ‘जागल’ आ ‘लागल’ ? गजल संख्या १२ केर मतला – “अहाँ जीबिते मनुक्ख केँ जरा रहल छी घेरि गामे केँ स्वाहा करा रहल छी” मतलाक काफिया भेल ‘रा’ मुदा एहि गजलक आगाँक शेरक काफिया प्रयोगमे अछि, ‘दनदना’,’खड़ा’, ’चला’, ‘बना’, ‘रचा’, ऐ गजल तेसर शेरक काफिया ’खड़ा’ ठीक अछि बांकी सभ गल्ती। एहि तरहे १८,१९,२०,२१,२२,३३,४८म गजलक काफिया ठीक नहि अछि। अंतिम गजलक मतला आओर देखू – “शहर केर सागर मे आइ गाम डूमि रहल कामांध कामिनी केँ पकड़ि जेना चूमि रहल” आब उपरकेँ मतलामे काफिया भेल ‘ूमी’ (दीर्घ ऊ कार आ मी) मुदा एहि गजलक आन शेरक काफिया राखल गेल अछि, ‘घूमि’, ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, आब घूमि ठीक बाद बांकी ‘चूसि’, ‘रेड़ि’, ‘बूकि’, कोन मादे ठीक भऽ सकैत अछि। उपरका उदाहरन सभसँ एक डेग आगू बैढ़ बहुत रास गजल तँ एहनो अछि जाहिठाम काफिया केर कोनो स्थाने नहि राखल गेल अछि। आउ देखी किछु एहनो गजल- गजल संख्या सातक मतला अछि – “मरि मरि क’ जे जीबय से आदमी चाही राखय बिहाड़ि हाथ मे से आदमी चाही” आब एहि मतलामे देखी तँ दुनू पाँतिमे कोमन अछि ‘से आदमी चाही’ अर्थात ई भेल रदीफ। आब रदीफसँ पहिने एहि शेरक दुनू पाँतिमे कोनो काफिया अछि ? नहि ने। एहि तरहे एहि गजलक सभ शेर बिना काफियाक अछि। एहिठाम गजलकार जानि अनजानि नहि जानि किएक ने धियान देलन्हि, मतलाक निच्चाक पाँतिकेँ कनिक बदैल कए काफिया ठीक कएल जा सकैत छल, देखू – मरि मरि क’ जे जीबय से आदमी चाही बिहाड़ि हाथमे राखय से आदमी चाही एहिठाम एकटा गप्प धियान देबए बला अछि जे गजल शास्त्र अनुसार बिना रदीफक गजल तँ कहल जा सकैए परन्च बिन काफियाक गजल, जेना बिन कनियाँ ब्याहक कल्पना। एहि तरहे, एहि संग्रहमे बहुत रास गजल बिन काफियाकेँ कहल गेल अछि जेना गजल संख्या ११,२३,३०,३८,३९,४१,४४,आ ४६। एक बेर फेरसँ गजल संख्या ४६ केर मतला देखी – “ठेंगा जकाँ ठाढ़ भेल नागे देखैत छी हम बाट-घाट सभठाम नागे देखैत छी” आब एहि मतलाक दुनू पाँतिमे कोमन अछि ‘नागे देखैत छी’ जे की रदीफ भेल आ रदीफसँ पहिने काफिया नदारत। कतौ कतौ बाय लक काफिया ठीको अछि तँ काफियामे एक्के शव्दक प्रयोग बेर-बेर अछि। जेना गजल संख्या २९ क मतला देखी तँ- “जनम व्यर्थ बेटीकेँ देलौं विधाता कर्म अपकर्म हम कोन केलौं विधाता” ऐ शेरमे रदीफ भेल ‘विधाता’ आ काफिया भेल ‘ेलौं’। आब एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया अछि, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’, ‘सिरजेलौं’, ‘बनेलौं’, ‘चढ़ेलौं’। मतलाक शेरक हिसाबे काफिया दुरुस्त अछि मुदा ‘बनेलौं’ आ ‘चढ़ेलौं’ शव्दक आवृति काफियामे एकसँ बेसी बेर अछि। एहि तरहे गजल संख्या १५ आ ४५ मे सेहो काफियामे एक शव्दक आवृति एक बेरसँ बेसी बेर भेल अछि। बहुत रास गजलमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू असमंजसकेँ अबस्थामे अछि अथबा कहू तँ दुनूकेँ दुनू गल्ती अछि। जेना गजल संख्या ३५केँ मतला देखी – “बानरक हेँज जकाँ बौख रहल लोग रंगल सियार जकाँ लौक रहल लोक” एहि मतलामे देखी तँ रदीफ भेल ‘रहल लोक’ आ काफिया ‘ौऽ‘, मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया आ रदीफ दुनू संगे अछि, ‘दौड़ रहल लोक’, ‘सिरमौर बनल लोक’, ‘पछोड़ पड़ल लोक’, ‘सिलौट रहत लोक’। एहि शेर सभमे, ‘दौड़ रहल लोक’मे मतलानुसार काफिया आ रदीफ दुनू दुरुस्त अछि मुदा तेसर आ पाँचम शेरमे रदीफ गल्ती अछि आ चारिम शेरमे तँ काफिया आ रदीफ दुनू गरबड़ागेल अछि। कहि तँ एहि गजलकेँ पाँचो शेरधरि गजलकार ई नहि निर्धारित कए सकल छथि जे कोन काफिया अछि आ कोन रदीफ, एहि असमंजसमे खिच्चैर बनि सम्पूर्ण गजल लहास बनि गेल अछि। बिल्कुल एहने तरहक बीमारीसँ ग्रस्त गजल ४३ सेहो अछि। एहिठाम हम कही तँ गजलकारकेँ सामर्थपर नहि हुनक गजल व्याकरण प्रति अज्ञानताकेँ दोखी मानि सकैत छी। किएक तँ सामर्थक गप्प करी तँ एहि संग्रहक १७ म गजलमे दोहरा काफियाक सफल पालन कएल गेल अछि एकरा हुनक सामर्थ अथवा बाय लक कहि सकैत छी। जिनका काफिया आ रदीफ केर ज्ञान हेतनि ओ अतेक बेसी गल्तीक गुंजाइस नहि छोरता। एहि सन्दर्भमे २४ सम गजलक मतला देखू – “सरिपहुँ अहाँ भैया कमाल करै छी अछि भ्रष्ट आचरण मुदा गाल करै छी” अर्थक मादे कहू तँ एहि शेरक दोसर पाँतिमे “करै”केँ जगह ‘बजै’ हेबा चाही मुदा गजलकार “करै छी”केँ रदीफ मानि “ाल”केँ काफिया बनोलनि। एहि तरहे मतलाक काफिया आ रदीफ ठीक अछि मुदा गजलक आन-आन शेरक काफिया आ रदीफ संगे अछि, “ताल करै छी”, “नेहाल करै छी”, “जाल करै छी”, एतए धरि सभ ठीक मुदा अंतिम शेरमे अछि “टाल रखै छी” रदीफ ‘करै छी’केँ जगह रखै छी अर्थात रदीफ गल्ती एकरे कहै छैक सौँसे खीरा खाए कऽ पेनी तीत। आब आबी काफिया आ रदीफकेँ बाद गजल व्याकरण केर महत्वपूर्ण पक्ष बहरपर, तँ ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे संग्रहक पूरा पूरी गजल बेबहर अछि। सरल वार्णिक बहरक साइद ओहि समयमे जनमे नहि भेल छल आ नहि एहि रूपमे संग्रहक कोनो गजल उतरि रहल अछि। वर्णवृत सेहो कोनो गजलमे नहि अछि, कतौ कोनो गजलक एक आधटा शेरमे वर्णवृत्त अबितो अछि तँ गजलक बांकी शेरमे नहि अछि। एकटा उदाहरन देखू संग्रहक १४हम गजलमे गजलकार वर्णवृत करैक प्रयासमे छथि – गजलक मतला अछि – “भेल ई की कहाँ सँ लहरि गेल अछि २१२ -२१२ - ११२ - २१२ प्रश्नवाचक धरा पर पसरि गेल अछि” २१२ – २१२ - २१२ - २१२ एहि मतलामे २१२-२१२-२१२-२१२केँ वर्णवृत बनैत-बनैत बिगैर गेल अछि। एहिठाम या तँ गजलकार वर्णवृतसँ अज्ञात छथि अथवा चानबिंदुकेँ दीर्घ मानै छथि। गजलक आगू केर तीनटा शेरमे २१२x४केँ सटीक वर्णवृतक प्रयोग अछि। गजलक दोसर शेर देखू – “आदमी आदमी केर बैरी बनल २१२ – २१२ – २१२ -२१२ कोन नभसँ घृणा ई उतरि गेल अछि” २१२ – २१२ – २१२ - २१२ मुदा गजलक पाँचम शेरमे अबैत अबैत वर्णवृत टूटि गेल अछि। पाँचम शेर – “उर काँपैछ धरतीक भालरि जकाँ २२२- १२ -२१२ -२१२ युग आदम कोना फेर पलटि गेल अछि” २२२-२२२- १ १२- २१२ जँ कनिक धियान देने रहितथि तँ एतेक लअग एला बाद वर्णवृत पूरा ने होबाक कोनो कारण नहि। कहब ई जे इहो गजल बेबहर भेल। कतौ कतौ बुझाइत अछि जेना भट्टजी समकालीन हिंदी गजलकार सभसँ प्रेरणा लऽ कऽ मात्रिक छंदक प्रयोगक फिराकमे छथि। हलाँकी मात्रिक छंद गजलक हिस्सा नहि अछि तथापि एहि संग्रहक गजल एहनो सिस्टममे पूर्ण फिट नहि भए रहल अछि। पहिले गजलक मतला देखू – “घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल २१२१ -२११२-१२२१२ भाइ सँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल” २११२-२२२१-२२१२ वर्णवृत तँ नहिए अछि मुदा मतलाक दुनू पाँतिमे २०-२० टा मात्रा अछि। ऐ तरहे गजलक तेसर चारिम आ पाँचम शेरमे २०-२० टा मात्रा अछि मुदा दोसर शेरक मात्रा गनियो कए कम बेसी अछि। गजलक दोसर शेर – “कोन आयल जमाना जुआरी एतय (२१ मात्रा) भवना अविवेकी बनल जा रहल” (१९ मात्रा) एहिना सम्पूर्ण संग्रहमे नहि कोनो गजल मात्रिक गणनामे पूर्ण अछि आ नहि वर्णवृतमे। मने ई संग्रह पूरा-पूरी बेबहर गजल संग्रह अछि। काफिया आ रदीफक अशुध्यताक कारणे एहि तरह केर रचनाक संग्रहकेँ अजादो गजल केर श्रेणीमे रखनाइ उचित नहि। गजल व्याकरणक एकटा आओर महत्वपूर्ण हिस्सा अछि मकता, अर्थात गजलक अंतिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम अथवा उपनामक देने होथि। एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकताक प्रयोग नहि अछि। आब आबी भाषा पक्षपर। गजलक भाषा एहन होबा चाही जे सुनिते माँतर मुँहसँ निकलै वाह ! वाह ! आ ई की सुनलहुँ आइ आ बुझै लेल दू दिन बादो शव्दकोश ताकैत रहू। एहि पोथीमे एकर सदत अभाब अछि। बहुत उपरकेँ भाषा, माटि थालमे ओँघरे वलाकेँ लेल जेना सुन्दर चौपाइ जकाँ नीक तँ बड्ड छै मुदा किछु बुझलौं नहि। किछु कठीन शव्द, ऐ संग्रहक पहिले गजलक एकटा शेर – “क्षुब्ध धरती गगन नयन मूनल अपन अछि वसाती बलाती बनल जा रहल” आब ऐ शेरक की अर्थ बूझल जेए ? आ जँ बुझबो करब तँ कतेक काल बाद आ ओहो के ? एकटा आओर शेर ३७ सम गजलसँ – “घर छोट-छोट भीत चूना सँ ढेउरल चित्र ओहि पर राधा कृष्णक ललाम” चूना, चित्र हिंदीक बेसाहल शव्द ओहूपर अर्थ की? ई ललाम की ? के बुझत ? कठीन भारी भरकम शव्दकेँ अलाबो एहि संग्रहक भाषा मैथिली अवश्य अछि मुदा एहने एहने पोधी पढ़ला बाद हिंदीक दलाल सभ कहैत छै जे मैथिली हिंदीक अंग अछि अथवा हिंदीक उपभाषा अछि। ऐ संग्रहक बहुत कम एहेन गजल अछि जाहिमे हिंदी शव्दक प्रयोग नहि हुए। देखी किछु हिन्दीक शव्द – गजल १ मे – चमन गजल 2 मे – श्रम, विवशता कनीक आगू आबि गजल १० मे – विकृति, रक्त गजल ११ मे – आदेश, वैशाखी, आतंकित गजल १२ मे – विकट, मनुष्यता, क्रूरता गजल १४ मे – कहाँ, प्रश्नवाचक, धरा, संशकित, आभास गजल १६ मे – निष्क्रिय, शिथिल, सदृश्य, विस्मय गजल १८ मे – अम्बर, मुरझायल गजल १९ मे – कहर, अग्रसर कनी आओर आगू बढ़ी, गजल ३८ मे – घटा, उषम, विषम, जल बांकीओ गजलमे एनाहिते हिंदी शव्दक भरमार अछि। कतौ-कतौ तँ एकछाहा हिंदीए अछि। १५हम गजलकेँ ई दुनू शेर देखू – “घरमे फूटल क्रिया गर्म सीमांत अछि भावना संकुचित विषमयकारी ने भेल
मंत्र मधुमय कहाँ ओ विश्व वन्धुत्व केर कोन उतरल ई युग दुराचारी ने भेल” उपरकेँ दुनू शेरमे कतेक शव्द मैथिलीक अछि ? ३९ म गजल केर ई शेर देखू – “उर बसा द्वेष इर्ष्या घृणा केर लहरि रक्त तर्पण करैछ ने कोनो जानवर” जँ ई मैथिली तँ हिंदी की ? आब आबी भाव पक्षपर, तँ एहि संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष जबरदस्त अछि। समाजक कोनो एहन कोण नहि जाहिपर शाइर ऐ संग्रहमे वर्णन नहि केने होथि। चापलूसीसँ शुरू कए आम लोकक जीवनक विषमता, भ्रस्टाचार, महगाइ, अपहरण, लूटि-पाट, राजनीति सभ विषयपर अपन कलम चलबैत एक एक भावकेँ उजागर करैमे सफल छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ( संपादकीय सहित ४टा आलेख ) गजल समीक्षा (पेटारसँ) १
“माँझ आंगनमे कतिआएल छी” मुन्नाजीक रुबाइ आ गजल संग्रहक नाम अछि। कतिआएल आ सेहो माँझ आंगनमे! की कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि ई आकि गजलक स्वभाव अछि ई? नहिये ई कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि नहिये ई गजलक स्वभाव अछि, ई एकटा यथार्थ अछि। मुन्नाजी सन कतेको लोक कतिआएल छथि, प्रतिभा अछैत हेराएल छथि। मुदा गजलकार सभटा दोख अपनेपर लऽ लै छथि।
आब तँ माँझ आँगनमे कतिआएल छी अपने चालिसँ आब बेरा गेलहुँ हम आ सएह कारण अछि जे ओ नोरक सुख भोगऽ लागै छथि। नोर तँ खसैए मुदा मजा सन लगैए केहन नीक प्रेमक दुख लेलहुँ हम
बड़का खाधिमे खसै छथि आ तहू लेल अपनेकेँ दोखी मानै छथि: छोटको ठेससँ नै सबक लेलहुँ हम तँए बड़का खाधिमे खसि गेलहुँ हम
तँ की गजलकार प्रेमक महत्व बिसरि गेल छथि, नै प्रेम तँ सभकेँ चाही। सभ उमेर वर्गकेँ प्रेम चाही मरितो धरि कुशल-छेम चाही
आ हिनका जँ कोस दू-कोस मात्र चलबाक रहितन्हि तखन ने, हिनका तँ बहुत आगाँ बढ़बाक छन्हि तेँ प्रेम चाही। डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही
आ से सभ ठाम। एकटा हमर संगी छल, एकटा परीक्षामे टॉप केलक तँ बाजल- नै कम्पीट करै छी तँ नै करै छी, आ करै छी तँ टॉप करै छी। ओ गजलकार नै छल जँ रहिते तँ अहिना लिखितए: बदरी लादल रहै कोनो बात नै जदि बरसी तँ बरिसात बनि कऽ
आ नजरि-नजरिक फेर आ हाफ ग्लास फुल ई दुनूटा अवधारणा ऐ रूपमे ओ राखै छथि: नजरि उठा कऽ देखबै तँ खाली बुझाएत ई दुनियाँ नजरि गरा कऽ देखबै तँ सभ देखाएत ई दुनियाँ
समालोचना आ विरोध दुनूकेँ गजलकार नीक मानै छथि। पक्षधरसँ राखू अपनाकेँ बचा कऽ विपक्षीक सभ बातकेँ नै तीत बुझू
महगाइसँ लोक बेकल अछि मुदा तकरा लेल झुमैत मचानक बिम्ब देखू: महगाइसँ खूने नै हड्डियो सुखाइए आब झुलैत मचान सन लगैए लोक
आ ई उलटबासी देखू, बिम्ब नव, भावना शाश्वत: हम तँ घूर जड़ेलौ गर्मी मासमे मिझाएल आगिसँ पसाही कहियो
ई कोन गोष्ठी छी जे अछि कोन पत्रिकाक प्रायोजित चिट्ठी छपबाक राजनीति सन, ई रुबाइ देखू: मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ उठि दर्शक भागल मारामरीसँ प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन कर्ता देखार भेला जतियारीसँ
मुदा बाढ़िक विषय जँ मैथिली गजलक अंग नै बनए तँ बुझू जे गजलकार समाजसँ कतिआएल छथि। मुदा से नै अछि। धार एखन धरि तँ उफानपर अछि लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछि
आब पड़ाइन घटल अछि, मिथिलासँ पड़ाइन। बाहरी लोक बिहारीकेँ मजदूर आ श्रमिकक पर्यायवाची मानि लेने छथि। तहूपर गजलकारक कलम चलल अछि। बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ
मुन्नाजीक गजल आ रुबाइ स्वच्छन्द रूपसँ बमकोला जेकाँ बहल अछि। शेरक स्वभाव होइ छै जे जँ ओकरा नेकासँ कहल जाए तँ आह-बाह लोक करिते अछि। मैथिलीमे गजल-रुबाइ जइ तरहेँ प्रसारित भऽ रहल अछि से देखि कऽ यएह लागि रहल अछि जे जतेक ई विधा अपनाकेँ पसारि रहल अछि तइसँ बेशी मैथिली लाभान्वित भऽ पसरि रहल अछि। --गजेन्द्र ठाकुर १९ मइ २०१२
2 मैथिली गजल शास्त्र- भाग-१
गजलक उत्पत्ति अरबी साहित्यसँ मानल जा सकैत अछि मुदा ओतए ई अरकान माने कोनो उत्तेजक घटनाक वर्णन विशेषक रूपमे छल। मुदा गजल जे एहि अरकान सभक समुच्चय अछि से फारसीक छी। फेर ओतएसँ गजल उर्दू-हिन्दी आ आब मैथिलीमे आएल अछि। मायानन्द मिश्र मैथिली गजलकेँ गीतल कहलन्हि, मुदा हम एतए ओकरा गजले कहब आ अरबी फारसीक छन्द-शास्त्रक किछु शब्दावलीक प्रयोग करब। से मैथिली गजल शास्त्रक शब्दावली भेल अरूज । बहर: उन्नैस टा अरबी बहर होइत अछि। एतेक बहर मोन रखबाक आवश्यकता नहि। किएक तँ बहर माने थाट, राग-रागिनी। एहि उन्नैसटा अरबी बहरक बदला मैथिली लेल नीचाँमे भारतीय संगीत (स्रोत स्व. श्री रामाश्रय झा रामरंग) दऽ रहल छी। आ किएक तँ देवनागरी आ मिथिलाक्षरमे जे बाजल जाइत अछि सएह लिखल जाइत अछि (ह्रस्व इ सेहो मैथिलीमे अपवाद नहि अछि) से ह्रस्व आ दीर्घ स्वरकेँ गनबाक विधि मैथिलीमे भिन्न अछि, सेहो एतए देल जाएत। जाहि बहरमे शेरमे आठ (माने शेरक दुनू मिसरामे चारि-चारि) अरकान हुअए से भेल मसम्मन आ जाहि बहरमे शेरमे छह (माने शेरक दुनू मिसरामे तीन-तीन) अरकान हुअए से भेल मुसद्द्स । एतए मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखबाक वैज्ञानिक आधार फेर सिद्ध होइत अछि कारण गजलमे जे विभक्ति हटाइयो कऽ लिखब तैयो अरकान गनबा काल तेना कऽ गानए पड़त जेना विभक्ति सटल हुअए, विभक्ति लेल अलगसँ गणना नहि भेटत। जाहि बहरमे एक्केटा रुक्न हुअए से भेल मफरिद बहर आ जाहिमे एकटा सँ बेशी रुक्न हुअए (रुक्नक बहुवचन अराकान) से भेल मुरक्कब बहर। दूटा अराकान पुनः आबए तँ ओकरा बहरे-शिकस्ता कहल जाएत। मिसरा आ शेर: मैथिली गजलमे दू पाँतीक दोहा जे कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत अछि तकरा मिसरा वा शेर कहै छी। दुनू पाँती एकट्ठे भेल शेर आ ओहि दुनू पाँतीकेँ असगरे मिसरा कहब। मतलाक दुनू मिसरामे एकरंग काफिया माने तुकबन्दी होएत। ऊला आ सानी: शेरक पहिल मिसरा ऊला आ दोसर मिसरा सानी भेल। दू मिसरासँ मतला आ दू पाँतीसँ दोहा बनल। अरकान (रुक्न) आ जिहाफ: आठ टा अरकान (एकवचन रुक्न) सँ उन्नैस टा बहर बहराइत अछि। से अरकान मूल राग अछि आ बहर भेल वर्णनात्मक राग। अरकानक छारन भेल जिहाफ । जेना वरेण्यम् सँ वरेणियम्। तकतीअ: दू पाँतीक कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत दोहा जे मिसरा वा शेर अछि आ कएक टा मिसरा वा शेर मिलि कऽ गजल बनैत अछि, तकर शल्य चिकित्सा लेल तकतीअ अछि। से मिसरा कोन राग-रागिनीमे अछि तकर तकतीअसँ बहर ज्ञात होइत अछि ।
मतला (आरम्भ) आ मकता (अन्त): गजलमे पहिल शेर मतला आ आखिरी शेर मकता भेल। मतलाक दुनू मिसरामे तुक एकरंग मुदा मकतामे कवि अपन नाम दै छथि। मकताक कखनो काल लोप रहत, एकरा सन्दर्भसँ बुझब थिक मुदा मतलाक रहब अनिवार्य।
काफिया आ रदीफ: तुकान्त काफिया आ ओकर बाद वा कफियायुक्त शब्दक पहिनेक शब्द/ शब्द समूहकेँ रदीफ कहैत छिऐ। काफिया युक्त शब्द बदलत मुदा रदीफ नञि बदलत। काफिया वर्ण वा मात्राक होइ छै आ रदीफ शब्द वा शब्द समूहक। दूटा काफियाबला शेर जू काफिया कहल जाइत अछि। एक दीर्घक बदला दूटा ह्रस्व सेहो देल जा सकैए। जेना काफिया वर्ण आ मात्राक संग शब्दकेँ सेहो प्रयुक्त करैत अछि तेहिना रदीफ एकर विपरीत शब्द आ शब्दक समूहमे सन्निहित वर्ण आ मात्राकेँ सेहो प्रयुक्त करिते अछि। ऐ तरहेँ पहिल पाँतीमे जँ शब्द समूह रदीफ अछि तँ तँ दोसर पाँतीमे ओकर कोनो एक शब्द दोसर शब्दक अंग भऽ सकैए आ ओइ काफिया युक्त शब्दमे रदीफक उपस्थिति रहि सकैए।
दूटा काफियाक बीचमे सेहो रदीफ रहि सकैए, रदीफ ऐ तरहेँ अनुपस्थितसँ लऽ कऽ एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य भऽ सकैत अछि जे अपरिवर्तित रहत। मुदा काफिया युक्त शब्द गजलमे बदलैत रहत। मैथिली व्याकरणक दृष्टिसँ अपरिवर्तित मात्रा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्दकेँ बिना रदीफक गजल कहि सकै छिऐ, कारण ई काफियाक मूल विशेषता छिऐ (अपरिवर्तित मात्रा वा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्द) ..आ जँ शब्द वा शब्दक अपरिवर्तित समूह दृष्टिसँ देखी तँ एतए रदीफ अनुपस्थित अछि ...ओना रदीफ अनुपस्थित सेहो रहि सकैए, शास्त्रीय दृष्टिसँ कोनो दिक्कत नै अछि.. से प्रारम्भमे बिना रदीफक गजलक बदला "एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य" जे अपरिवर्तित रहए, सएह रदीफक रूपमे प्रयुक्त करू। मैथिली गजल शास्त्र : पहिने कमसँ कम ३७ ‘की’ बला कीबोर्ड लिअ। एहिमे १२-१२ टाक तीन भाग करू। १३ आ २५ संख्या बला की सा,आ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम १२ मंद्र सप्तक, बादक १२ मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन १२ तार सप्तक कहबैछ। १ सँ ३६ धरि मार्करसँ लिखि लिय। १ आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ दहिन हाथ चलत।
१२ गोट ‘की’ केर सेटमे ५ टा कारी आ सात टा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि। वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ १२ केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर १२ केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा। दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ अवरोह करू। ई जे सातो स्वरक वर्णन पिछला अंकमे देल गेल छल ओकरासँ आगू आऊ। एहि सातू स्वरमे षडज आ पंचम मने सा आ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ होयबाक गुंजाइस नहि छैक। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर अछि से सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइस अछि एहिमे। सा आ प मात्र शुद्ध होइत अछि। आ आब विकृति भ’ सकैत अछि दू तरहेँ शुद्धसँ ऊपर स्वर जायत किंवा नीँचा। जदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ नीचाँ रहत तँ कोमल कहायत। म कँ छोड़ि कय सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग,ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ शुद्ध। ’म’ केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह ग दैत अछि शांति म सँ होइत अछि भय ध सँ दुःख आ नि सँ आदेश। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि। जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।
शुद्ध आ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑। एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल। एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत। आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। ३७ टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ १२, १२, १२ केर तीन सेट आ, अंतिम ३७म तीव्र सां केर हेतु। सप्तक मे सातटा शुद्ध आ पाँचटा विकृत मिला कय १२ टा भेल! वाम कातसँ १२ टा उजरा आ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला १२ टा की मध्य सप्तक आ, २५ सँ ३६ धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।
आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक। मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा- स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं अवरोह- तारसँ मध्य आ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।
वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी। गायन काल सेहो सभ राग-रागिनीक हेतु निश्चित रहैत अछि। १२ बजे दिनसँ १२ बजे राति धरि पूर्वांग आ १२ बजे रातिसँ १२ बजे दिन धरि उत्तरांग राग गाओल-बजाओल जाइत अछि। पूर्वांग रागक वादी स्वर मे कोनो एक टा (सा, रे, ग, म, प ) होइत अछि। उत्तरांगक वादी स्वरमे (म,प,ध,नि,सा)मे सँ कोनो एक टा होइत अछि। सूर्योदय आ सूर्यास्तक समयमे गाओल ज्आय बला रागकेँ संधि प्रकाश राग कहल जाइत अछि। रागक जाति रागक आरोह आ अवरोहमे प्रयुक्त्त स्वरक संख्याक आधार पर रागक जातिक निर्धारण होइत अछि। एकर प्रधान जाति तीन टा अछि। १. संपूर्ण (७) २.षाड़व(६) ३.औड़व(५) आ एहिमे सामान्य स्वर संख्या क्रमशः ७,६,५ रहैत अछि। आब एहि आधार पर तीनूकेँ फेँटू। संपूर्ण-औरव की भेल? हँ पहिल रहत आरोही आ दोसर रहत अवरोही। कहू आब। (७,५) एहिमे सात आरोही स्वर संख्या आ ५ अवरोही स्वर संख्या अछि। संपूर्णक सामान्य स्वर संख्या ऊपर लिखल अछि(७) आ औड़वक (५) । तखन संपूर्ण-औड़व भेल(७,५)। अहिना ९ तरहक राग जाति होयत। १.संपूर्ण-संपूर्ण(७,७) २.संपूर्ण-षाड़व(७,६) ३.संपूर्ण-औड़व(७,५) ४. षाड़व-संपूर्ण- (६,७) ५. षाड़व- षाड़व - (६,६) ६. षाड़व -औड़व (६,५) ७.औड़व-संपूर्ण(५,७) ८.औड़व- षाड़व(५,६) ९. औड़व- औड़व(५,५)
थाट: थाट- एकटा सप्तकमे सात शुद्ध, चारिटा कोमल आ एकटा तीव्र स्वर (१२ स्वर) होइत अछि। एहिमे सात स्वरक ओ’ समुदाय, जेकरासँ कोनो रागक उत्पत्ति होइत अछि, तकरा थाट वा मेल कहल जाइत अछि। थाट रागक जनक अछि, थाटमे सात स्वर होइत छैक(संपूर्ण जाति)। थाटमे मात्र आरोही स्वर होइत अछि। थाटमे एकहि स्वरक शुद्ध आ विकृत स्वर संग-संग नहि रहैत अछि। विभिन्न रागक नाम पर थाट सभक नाम राखल गेल अछि। थाटक सातो टा स्वर क्रमानुसार होइत अछि आ एहिमे गेयता नहि होइत छैक। थाटक १० टा अछि। १.आसावरी-सा रे ग॒ म प ध॒ नि॒ २.कल्याण-सा रे ग म॑ प ध नि ३.काफी-सा रे ग॒ म प ध नि॒ ४.खमाज-सा रे ग म प ध नि॒ ५.पूर्वी-सा रे॒ ग म॑ प ध॒ नि ६.बिलावल-सा रे ग म प ध नि ७.भैरव-सा रे॒ ग म प ध॒ नि ८.भैरवी-सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ ९.मारवा-सा रे॒ ग म॑ प ध नि १०.तोड़ी-सा रे॒ ग॒ म॑ प ध॒ नि
वर्ण: वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइत छैक। एकर चारिटा प्रकार छैक। १.स्थायी-जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि।ओकर अवृत्ति होइत अछि। २.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि। ३.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि। ४.संचारी-जाहिमे ऊपरका तीनू रूप लयमे होय।
लक्षण गीत: रचना जाहिमे बादी, सम्बादी,जाति आ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भ’ जाय।
स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि। अन्तरा: जकरा एकहि बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि। अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक नियमबद्ध गायन/वादन भेल अलंकार। आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/वादन भेल आलाप। तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/वादन भेल तान। तानक गति द्रुत होइत अछि आऽ ई दोबर गतिसँ गायन/वादन कएल जाइत अछि।
आब आउ ताल पर। संगीतक गतिक अनूरूपेँ ई झपताल- १० मात्रा, त्रिताल- १६ मात्रा, एक ताल- १२ मात्रा, कह्रवा- ८ मात्रा दादरा- ६ मात्रा होइत अछि। गीत, वाद्य आऽ नृत्यक लेल आवश्यक समय भेल काल आऽ जाहि निश्चित गतिक ई अनुसरण करैत अछि, से भेल लय।जखन लय त्वरित अछि तँ भेल द्रुत, जखन आस्ते-आस्ते अछि, तँ भेल विलम्बित आऽ नञि आस्ते अछि आऽ नञि द्रुत तँ भेल मध्य लय। मात्रा ताल केर युनिट अछि आऽ एहिसँ लय केर नापल जाइत अछि। तालमे मात्रा संयुक्त रूपसँ उपस्थित रहला उत्तर ओकरा विभाग कहल जाइत अछि- जेना दादरामे तीन मात्रा संयुक्त्त रहला उत्तर २ विभाग। तालक विभागक नियमबद्ध विन्यास अछि छन्द।आऽ तालक प्रथम विभागक प्रथम मात्रा भेल सम आऽ एकर चेन्ह भेल + वा x आऽ जतय बिना तालीक तालकेँ बुझाओल जाइत अछि से भेल खाली आऽ एकर चेन्ह अछि ०. ओऽ सम्पूर्ण रचना जाहिसँ तालक बोल इंगित होइत अछि, जेना मात्रा, विभाग,ताली, खाली ई सभटा भेल ठेका। चेन्ह- तालीक स्थान पर ताल चेन्ह आऽ संख्या। सम + वा x खाली ० ऽ अवग्रह/बिकारी - एक मात्राक दू टा बोल - एक मात्राक चारिटा बोल एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आऽ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि।
तालक परिचय ताल कहरबा ४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आऽ पहिल मात्रा पर सम। धागि नाति नक धिन।
तीन ताल त्रिताल
१६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आऽ १३ पर ताली आऽ ९ म मात्रा पर खाली रहैत अछि। धा धिं धिं धिं धा धिं धिं धा धा तिं तिं ता ता धिं धिं धा झपताल १० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २,३,२,३ मात्राक होइत अछि। १ मात्रा पर सम, ६ पर खली, ३,८ पर ताली रहैत अछि। धी ना धी धी ना
ती ना धी धी ना
ताल रूपक ७ मात्रा। ३,२,२ मात्राक विभाग। पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि। पहिल मात्रा पर सम आऽ खाली, चारिम आऽ छठम पर ताली होइत अछि। धी धा त्रक धी धी धा त्रक
ह्रस्व-दीर्घ गणना छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक। वेदमे वार्णिक छन्द अछि। वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्यतः तीनटा बिन्दु मोन राखू- १. हलंतयुक्त्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू :- ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+३+१=२० मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू ; पश्चात्=२ मात्रा ; आब तेसर उदाहरण देखू आब=२ मात्रा ; आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मात्रा
छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः। आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व “इ” एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व 'इ' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि।
छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द । वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि । वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू- १. हलंतयुक्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू- ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+१=१७ आब दोसर उदाहरण देखू
पश्चात्=२ आब तेसर उदाहरण देखू आब=२ आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मुख्य वैदिक छन्द सात अछि- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी। ए = अ + इ ओ = अ + उ ऐ = अ/आ + ए औ = अ/आ + ओ
छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।
१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -। ३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। ४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। ५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)। १. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि।
१. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण क’ उत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,३, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ। उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल। हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद
ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल। ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९ सात टा स्वर सा,रे,ग,म,प,ध,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- १. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। २. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि। ३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि। ४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे ‘यति’। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि। मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि। १. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर। २. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद। ३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद। ४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद। ५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि। ६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद। ७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ। यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि। (अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः। (आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि। ए= अ + इ ओ= अ + उ ऐ= अ/आ + ए औ= अ/आ + ओ अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि। यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)। ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि। देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तरभारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणमे (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, श, स, ह केर वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ केर हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्हारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) केर प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ केर बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार केर बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि। जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि। वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि। पहिने स्वरक वर्णन दैत छी- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर। स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजयमे एक मात्राक समय लागय से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत।
मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह। दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि। अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कए १२ वर्ण भेल। लृ केर ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३) तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर।
एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि। नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित। स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ। दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तट पर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ ’दात्त’ आद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलो पर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह। स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्रस्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि। आब व्यञ्जन पर आऊ। व्यञ्जन ४२ टा अछि। क् ख् ग् घ् ङ् च् छ् ज् झ् ञ् ट् ठ् ड् ढ् ण् त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् श् ष् स् ह् य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो। एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग। ई दुनूटा स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि। विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् केर विकार थीक। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व। अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि। उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि। कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति) पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल। यम सेहो अयोगवाह होइत अछि। अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय केर उच्चारण कण्ठमे होइत अछि। इ ई चवर्ग य श केर उच्चारण तालुमे होइत अछि। ऋ ॠ टवर्ग र ष केर उच्चारण मूर्धामे होइत अछि। लृ तवर्ग ल स केर उच्चारण दाँतसँ होइत अछि। उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय केर उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि। व केर उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठ केर सहायतासँ होइत अछि। ए ऐ केर उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि। ओ औ केर उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि। य र ल व अन्य व्यञ्जन जेकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि। क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कए छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल। सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि। अनुस्वार आ यम केर उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् केर उच्चारण नहि होयबाक चाही। जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भए पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्। श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल “अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल “घोषवान्”। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि “अल्पप्राण” आ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल “महाप्राण”। कचटतप केर पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप केर पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
तँ आब लीखू मैथिली गजल। कविता, अकविता, गद्य-कविता, पद्य सभ लेल तर्क उपलब्ध अछि। से मैथिली गजल सेहो अनिवार्य रूपमे बहर(छन्द)मे सरल-वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दमे कहल जएबाक चाही। जेना सोरठा, चौपाइ छै तहिना गजल छै..उर्दूमे ऐ तरहक प्रयास भेलै..आजाद गजलक नामसँ..), कहबाक आवश्यकता नै जे ओ पूर्ण रूपेँ फ्लॉप भऽ गेलै..५३९ ई.सँ अरबीमे बहर युक्त गजल आइ धरि लिखल जा रहल छै, फारसी आ उर्दूमे सेहो बिना बहरक गजल नै होइ छै..गजलमे भगवान धरिक मजाक उड़ाओल जाइत छै, ओइ अर्थमे ओ उदार छै मुदा बहरक मामिलामे ओ बड्ड कट्टर छै, आ ई कट्टरता ने अरबीमे गजलकेँखम केलकै आ ने उर्दूफारसीमे, मात्रा मिलान आ सहज प्रवाह गजलमे एकटा रीतियेँ होइ छै, आ से ओकर विशेषता छिऐ, नै तँ फेर ई नज्म भऽ जेतै..
3 मैथिली गजलशास्त्र-१३
"हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा “रमणक” ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जाहिमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ...कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीवला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?” (सियाराम झा “सरस”, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला) वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- “छन्दशास्त्रक नियमपर आधारित होयबाक उपरान्तो एहिमे गजलकारकेँ गणना-नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहैत छैक।” (!) गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छैक आ ने वार्णिक गणनामे। देवशंकर नवीन लिखै छथि –“...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करए लगलाह..”। लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे “ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक” कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि। हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बहुतरास अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। मैथिलीक आरम्भिक हाइकूमे सेहो ५/७/५ सिलेबलक अनुकरण करैत ज्योति चौधरी अपन कविता संग्रह “अर्चिस्” मे बेसी वर्णक प्रयोग केलन्हि। तेँ हम सलाह देलहुँ जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल गेल, से आब ज्योतिजी सेहो लऽ रहल छथि, हम सेहो लऽ रहल छी आ मिहिर झा, इरा मल्लिक, उमेश मंडल, रामविलास साहु, सुनील कुमार झा सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतए सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वर्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छ्न्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा (वा वार्णिकमे वर्ण)२० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर (छन्द) मे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही। गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन रोशन झा, प्रवीण चौधरी प्रतीक, आशीष अनचिन्हार, सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि किए नै कऽ सकै छी? मायानन्द मिश्र “गीतल” कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद मुन्ना जी आ आशीष अनचिन्हार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी। लोकवेद आ लालकिला: आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि। कलानन्द भट्ट भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल। तारानन्द वियोगी दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व।(एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतए क्रमभंग भऽ गेल।
देवशंकर नवीन अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।
नरेन्द्र निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ बासन ली ठोकि बजाकेँ सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल। डॉ महेन्द्र चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि। रमेश जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए हमर छाती मे गजलक लहास बरैए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिक मे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए। ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए।
एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक “गजल हमर हथियार थिक” , सियाराम झा “सरस”क “थोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक “नागफेनी” आ तारानन्द वियोगीक “अपन युद्धक साक्ष्य”मेसँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ सहित्यक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि जे अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। जँ ई सभ गजल नै छी तँ पद्य तँ छी आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “लेखनी एक रंग अनेक” देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै, मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए। एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर “लेखनी एक रंग अनेक”) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नाजी गजल समीक्षा (पेटारसँ) १
बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा
घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग, नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए। पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि " जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए।
अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रिती ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि----------------- १) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल। २) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल। ३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल। ४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल। संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.धीरेन्द्र प्रेमर्षि गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.आशीष अनचिन्हार- गजल समीक्षा (पेटारसँ) १ धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१ टा आलेख ) गजल समीक्षा (पेटारसँ) प्रेमर्षि जीक ई आलेख विदेहक अंक २१मे छल तकरा बाद अनचिन्हार आखरपर सेहो देल गेल। वर्तमान समयमे ई आलेख पढ़एसँ पहिने प्रेमर्षि जीक ई विचार देखू जे अनचिन्हार आखरपर देबा लेल माँगल गेल सहमति केर बाद आएल छल— “आशिषजी, ओ कोनो गम्भीर आलेख नइ छै। हमरा जनैत ओ आलेख हम तहिया लिखने रही जहिया गजलपर बेसी काज नइ होइत छलै। एखनुक सन्दर्भमे ओ आलेख बहुत हल्लुक भऽ सकै छै। आ वर्तमानमे कने मेहनति कऽकऽ लिखबाक अवस्थामे सेहो हम नइ छी- समयाभावक कारणेँ। तेँ हम नइ राखू से तँ नइ कहब, मुदा कमसँ कम हमर ई स्वीकार्यता उल्लेख कऽकऽ राखि देबै तँ भऽ सकैछ जे छपलाक बादहु हम दोषक भागी कने कम बनी। धन्यवाद”
१ मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना
रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइत छैक। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगैत छैक जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरबदिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिलाधरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलैक तँ किछु समय दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलैक। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हियाकऽ देखलक तखन बुझबामे अएलैक-आहि रे बा, हमरासभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगैत छैक जेना रङ्गबिरङ्गी फूलकेँ सैँतिकऽ सजाओल सेजौट हो। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम एहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइधरि पहुँचबैत अछि। एहिमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जाहि भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइत छैक, ओहि भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नहि सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लालीगुराँसक फूलजकाँ ओ ताकत विद्यमान छैक जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकऽ समाप्त कऽ दैत छैक। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीतेजकाँ सुरेबगर लगैक, एहिमे गीतसन नरमाहटि नहि होइत छैक। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइत छैक। ई कट्टर इस्लामीसभक सङ्गतिमे बेसी रहल अछि, तेँ एकर स्वभावमे “जब कुछ न चलेगी तो ये तलवार चलेगा” सन तेज तेवरबेसी देखबामे अबैत छैक। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइत छैक। गजल कहितहिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छैक, एहि बातसँ हम कतहु असहमत नहि छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरिजकाँ सीधे बेध दैत छैक लक्ष्यकेँ। लाइलपटमे बेसी नहि रहैत छैक गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपणपर्यन्त तरुआरिजकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूलजकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधाजकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हो, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नहि देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकैत छैक जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छैक। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टासभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारबजकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँतिसभ पत्रपत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइत छैक। कतेकोगोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओलोकनि दू-दू पाँतिवला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बूझैत छथि। हमरा जनैत ओलोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखिकऽ ओहिमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दैत छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एकबेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचनाप्रति कोनो तरहक द्विविधा नहि रहि जएतैक। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ विना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम एहि तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहैत छैक। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलहुपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमेअनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीवला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलैत छैक। ई तँ भेल गजलक मुह-कानक संरचनासम्बन्धी बात। मुदा खालि मुहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोङिआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोटजकाँ गजलक शब्दसभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउरजकाँ ई चलैत चलि जाइत छैक। हऽरक पहिल सिराउर जाहि तरहेँ धरतीक छाती चीरिकऽ ओहिमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करैत छैक, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषयवस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽकऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त्र करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनहुमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकारदिस बढ़एबाक लेल पड़ऽ वला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिलसभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगैत छथि। सम्भवतः तेँ आरसीप्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितहु गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्तिसभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरिकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआसभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमेकलम चलौनिहारसभमध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजितकुमार आजाद, अशोक दत्त आदिसमेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्चद्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। एहि अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। एही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दूगोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकीद्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेशद्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनहु गजल सङ्कलन बहराएल होएत, मुदा तकर जानकारी एहि लेखककेँ नहि छैक। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछाकऽ कहैत पाओल गेल अछि। एहिमे सरससहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीनद्वारा प्रस्तुत गजलसम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्थाधरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़िरहल अछि, बढ़िएरहल अछि।
२ आशीष अनचिन्हार (१० टा आलेख ) गजल समीक्षा (पेटारसँ) आशीष अनचिन्हार (१० टा आलेख ) १
पहरा-अधपहरा
आइ हम पढ़लहुँ बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " जे की 1989मे प्रकाशित भेल आ ऐमे कुल मिला तीस टा गजल अछि। धेआन देबै विभक्ति शब्दमे सटल अछि आ ई गजलकारे द्वारा कएल गेल अछि आ हमरा लोकनि सेहो ऐ परम्पराक अनुयायी छी। तीसटा गजलकेँ छोड़ि ऐ संग्रहमे आरसी प्रसाद सिंह, गोपाल जी झा गोपेश, सोमदेव, मार्कण्डेय प्रवासी, जीवकान्त, रमानंद झा रमण, छात्रानंद सिंह झा ओ विभूति आनंद जीक संक्षिप्त टिप्पणी सेहो अछि। ई गजल संग्रह मात्र 32 पन्नाक अछि। आश्चर्य ऐ गप्पक जे 1989मे प्रकाशित भेलाक बाबजूदो ओहि समयक आन गजलकार ( जे की एखनो जीवित आ रचनारत छथि ) ऐ गजल संग्रह कोनो चर्चा नै केने छथि। जँ गौरसँ अहाँ 1989-2008 बला कालखण्ड देखब तँ बहुत कम्मे ठाम हिनक वा हिनकर पोथीक चर्च भेटत आ ओहूमे अधिकांश चर्च अ-गजलकार ( मुदा अपना विधामे प्रतिष्ठित ) रचनाकार द्वारा भेल अछि। की कारण छै जे एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करए चाहैत अछि। खराप वा नीक बादक विषय भेल मुदा चर्चा तँ हेबाक चाही। हमर गजल एहन, हमर गजल ओहन ऐ तरहँक चर्चा बहुत भेटत मुदा एकटा गजलकार दोसर गजलकारक चर्चा नै करत। आखिर किए ? वा एना कहू जे गजलकारक चर्चा के करत कथाकार की नाटककार आ की आन। जँ ई सभ करबो करता तँ ओहन समयमे जखन की गजल पूर्णरूपेण विकसित भ' क' देखार भ' जाएत तखन। मुदा प्रारम्भिक कालमे तँ स्वयं एक गजलकारकेँ दोसर गजलकारक चर्चा कर' पड़तन्हि, आलोचना आ समीक्षा कर' पड़तन्हि तखने आनो आलोचक सभ गजलपर लिखबाक प्रयास करता। जँ प्रारम्भिके कालमे अहाँ सोचि लेबै मात्र हमरे गजल चर्चा योग्य दोसरक नै तखन अहाँ गजल लीखू की आन कोनो विधा ओकर विकास नै हएत। मात्र पुरने गजलकार सभमे एहन बेमारी छै से नै नव गजलकार सभ सेहो ऐ बेमारीकेँ पोसने छथि। नवमे देखी तँ चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदिमे आलोचना-समालोचना-समीक्षा लिखबाक प्रतिभा छनि मुदा ओकरा उपयोग नै करै छथि। आब हमरा लग ई प्रश्न अछि जे जँ ई सभ केकरो चर्च नै करथिन्ह तँ हिनका लोकनिक चर्च के करत। आब ई सभ जरूर कहता जे हम सभ स्वानतः सुखाय रचना करै छी तँए हमर समीक्षाक कोनो जरूरति नै मुदा हमरो बूझल अछि, हुनको बूझल छन्हि आ सभकेँ बूझल छै जे साहित्यकार केखनो स्वानतः सुखाय रचना नै करै छै। केकरो ने केकरो लेल ओ रचना जरूर रचै छै.................खास क' एहन समयमे जखन की हरेक रचनाकार अपना आपकेँ प्रगतिशील आ जनवादी घोषित करै अछि। हमरा बुझने कथित स्वानतः सुखाय बला रचना जनवादी आ प्रगतिशील भैए नै सकैए। कारण प्रगतिशील आ जनवादी रचना जनता लेल लिखल जाइ छै स्वानतः सुखाय लेल नै। हमरा बुझने आने विधाकार जकाँ प्रारम्भिक दौरमे गजलकारकेँ गजलक दिशा बनाब' पडतै। हँ बादमे बहुत सम्भव जे आनो विधाकार सभ गजल आलोचनापर हाथ चलाबथि मुदा शुरू तँ गजलकारेकेँ कर' पड़तै। सभ नव-पुरान गजलकारकेँ ऐ दिशामे सोचबाक चाही। हरेक पोथीमे नीक वा खराप रहै छै मुदा जँ चर्चे नै करबै तँ ओ सोंझा कोना आएत। हमरा जनैत एक गजलकार द्वारा दोसर गजलकारक आलोचना नै करबाक परंपरा जे सियाराम झा सरस जी द्वारा शुरू कएल गेल तकरा चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, अमित मिश्र आदि नीक जकाँ बढ़ा रहल छथि। आ अंततः ई भविष्य लेल खतरनाक साबित हएत। मुदा ओमप्रकाश जी हमर कथनक अपवाद छथि। ओ जतबा मनोयोगसँ अपन गजल लीखै छथि ततबा मनोयोगसँ ओ दोसरक गजल पढ़ि ओकर आलोचना समीक्षा करै छथि। हमरा जनैत ओमप्रकाश जी मैथिली गजलक पहिल आलोचक-समालोचक-समीक्षक छथि ( बहरयुक्त कालखण्ड बला )। चंदन झा, राजीव रंजन मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री,जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आदि ओमप्रकाश जीसँ प्रेरणा ल' क' कमसँ कम बर्खमे एकटा गजल पोथीक आलोचना लिखथि तँ मैथिली गजल नीक दिशामे आबि जाएत। नव गजलकारकेँ बहुत बेसी दायित्व लेब' पड़तन्हि तखने गजलक दिशा सही हेतै। आ जँ गजलक दिशा सही भेलै तँ बूझू जे गजलकारक दिशा सेहो सही भ' गेलै। ओना हम ई जरूर कह' चाहब जे हरा लोकनि ऐ बहसमे समय नै बरबाद करी जे के आलोचना केलाह आ के नै केला। जे भेलै से भेलै मुदा आबसँ शुरू भ' जेबाक चाही। आब हमरा लोकनि आबी बाबा बैद्यनाथ जीक कृतिपर। कृति थिक गजल आ तँए हम एकरा तीन भागमे बाँटब-- १) व्याकरण पक्ष २) भाषा पक्ष, आ ३) भाव पक्ष तँ पहिले देखी व्याकरण पक्ष। ऐ संग्रहक कोनो गजलमे वर्णवृत नै अछि। मने पूरा-पूरी ई संग्रह बेबहर गजल संग्रह थिक। किछु उदहारण देखू। पहिने ऐ संग्रहक पहिल गजलक मतला आ तकर बाद ओकर दोसर शेर देखू---- एक बेर फेरु नजरि शरण हम आयल छी २१२-१२२-१२-१२२२२२ वा २१२-१२-२२१२-१२२२२२ सौंसे संसारसँ हम सदति सताएल छी २२२२२२-१२-१२२२ वा २२२२११-२२१-१२२२
ई छल मतला आ एकर दूनू तरहें होमए बला मात्रा क्रम अहाँ सभहँक सामनेमे अछि। कहबाक मतलब जे मतलामे वर्णवृत नै अछि। आब कने एही गजलक दोसर शेर देखी--- सभ दिन हम मोह निशामे सूतल रहलौं २२२११-२२२२२२२ व्यर्थ-जंजालमे हम जन्म गमायल छी २१२२-१२२२-११२२२ वा २१-२२१२२१२-१२२२ तँ हरा लोकनि ई देखि रहल छी जे गजलमे वर्णवृत नै अछि मने गजल बहर युक्त नै अछि। आ ई हालति प्रायः तीसो गजलमे अछि। कोनो गजलक कोनो शेरक दुन्नू पाँतिमे तँ वर्णवृत आबि जाइए मुदा ओकर आगू-पाछू बलामे नै। जेना एकटा उदाहरण देखू। ई उनतीसम गजलक मतला थिक-- भोर भागल जेना दूपहर देखि कs २१२२-२२२-१२२-११ गाम गामो ने रहलै शहर देखि कs २१२२-२२२-१२२-११ तँ हमरा लोकनि ई देखलहुँ जे ऐ मतलामे तँ वर्णवृत अछि। मुदा एही गजलक आगूक शेर देखू--- आयत गरमी जखन नहि पानियें पड़त २२२२-१२२२-१२-१२ हेतै खेती ने छुच्छे नहर देखि कs २२२२२२२-१२२-१२ आब अहाँ सभ अपने बूझि सकै छिऐ जे गड़बड़ी कत' छै। संग्रहक तीसो गजलमे ई बेमारी छै। किछु लोक कहि सकै छथि जे भ' सकैए जे शाइर ओहि समयमे हिन्दी गजलमे प्रचलित मात्रिक छन्दमे लिखने हेता। तँ हमर कहब जे मात्रिक छन्द गजलक छन्द होइते नै छै आ दोसर गप्प जे ओ उदाहरणमे देल शेरक मात्राकेँ जोड़ि ईहो देखि लेथु जे मात्रिक छै की नै। व्याकरणमे मात्र बहरे ( वर्णवृते ) नै होइ छै काफिया आ रदीफ सेहो होइत छै। ऐ संग्रहक रदीफ ठीक अछि ( कारण रदीफ अपरिवर्तित होइ छै तँए --) । ऐ संग्रहक अधिकांश काफिया ठीक अछि मात्र किछुए काफिया गलत अछि। आ हमरा बुझैत ओइ समय ( १९८९क ) केर हिसाबसँ ई बहुत बड़का उपल्बधि अछि। जखन की आइ २०१३मे एहन स्थिति अछि जे गजलपर एतेक चर्चाक बादों महान गजलकार सभ काफिया एहन सरल वस्तुमे गलती करै छथि। हमरा हिसाबें बाबा बैद्यनाथ जी ऐ लेल बधाइ केर पात्र छथि। आब देखी किछु गलत काफियाक सूची जे ऐ संग्रहमे अछि--- दोसर गजलक मतला--- झगड़ा कियै बझल छै गामक सिमानपर पहरा कोना लगयबै लोकक इमानपर ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें काफिया भेल--- " इ " स्वरक संग "मानपर"। मुदा एकर बाद आन-आन शेर सभमे क्रमशः " गुमानपर ", " जानपर", "पुरानपर " ," दलानपर " , " कुरानपर ", " नादान पर", " तूफानपर" आ "कृपाणपर" अछि। (जँ ऐ गजलमे पर विभक्ति नै रहतै तँ काफिया ऐ मतलामे काफिया शास्त्रक हिसाबें काफिया होइतै--- " इ " स्वरक संग "मान" संगे-संग जँ मतलामे "सिमानपर" केर बाद जँ " जानपर" आबि जइतै तखन ऐ गजलक सभ काफिया एकदम्म सही भ' जइतै। आब हमरा विश्वास अछि जे गजलक जानकारक संग पाठक सभ सेहो बुझि गेल हेता जे गड़बड़ी कत' छै )| ठीक इएह गड़बड़ी ऐ संग्रहक गजल संख्या 16,13,19 आ 27मे सेहो अछि। तहिना गजल संख्या दसकेँ देखू। ई गजल बिना रदीफक अछि ( बिना रदीफकेँ तँ गजल भ' सकैए मुदा बिना काफियाक नै )---
पहिल शेर अछि-- क्यो एकरा दयौक नहि टोक ई अछि बहिरा ओ अछि बौक आन शेरक काफिया अछि--झोंक, थोक, नोक, आलोक आदि। काफिया शास्त्रक हिसाबें टोक केर काफिया, थोक, नोक, आलोक , आदि। मुदा ऐ शेरमे टोक केर काफिया अछि बौक जे की गलत अछि। आब आबी कने ऐ संग्रहक भाषा पक्षपर। भाषा तँ ऐ संग्रहक मैथिली थिक मुदा गजल संख्या ६मे काफिया बैसाब' के चक्करमे एहनो काफिया ल' लेलथि जे की हिन्दीक क्रिया अछि आ मैथिलीमे मान्य नै अछि। गजल संख्या ६ केर मतला देखू---
बन्धुवर कोन बाट दुनियाँ जा रहल छै सत्य कानय झूठ कीर्तन गा रहल छै ऐ गजलक आन शेरक काफिया सभ अछि-- पा, खा, छा, बा ( मूँह बा ), आ .... आब ई देखू जे एतेक हिन्दी क्रियामेसँ मात्र टूइएटा क्रिया मैथिलीमे मान्य छै-- जा एवं खा। बाद बाँकी एखन धरि मान्य नै छै। हमरा हिसाबें अग्राह्य हिन्दी क्रियाकेँ प्रयोग करब भाषाकेँ दूषित करबाक चेष्टा अछि। तथाकथित प्रगतिशील गजलकार नरेन्द्र एही प्रकारक भाषाक प्रयोग करै छथि आ ऐ लेल हम ने बाबा बैद्यनाथ जीक समर्थन करै छी आ ने नरेन्द्र जीक। हँ, एतबा कहबामे हमरा कोनो संकोच नै जे नरेन्द्र जी अपन १००मेसँ ९५टा गजलमे एहन भाषा प्रयोग करै छथि तँ बाबा बैद्यनाथ १००मेसँ १टामे। ओना ऐ ठाम ई जानब रोचक हएत जे एहन काफियाक प्रयोग करब अनुचित नै छै बशर्ते की भाषा बदलि जेबाक चाही। जँ नरेन्द्र जी वा बाबा बैद्यनाथ जी ऐ काफिया सभहँक प्रयोग अपन गामक वा पड़ोसी गामक मैथिलीक जोलहा रूपमे गजल लीखि करथि तँ ई काफिया सभ बिल्कुल सही होइत। हम बाबा बैद्यनाथ जीक उपरमे लेल गेल गजल संख्या ६क मतलाकेँ ऐ रूपमे देखा रहल छी--- भाइ केन्ने दुनियाँ जा रहलइय' साँच कानै झुट्ठा गा रहलइय' ( आन शेर पाठकक कल्पनापर छोड़ल जाइए) आब अहाँ अपने अनुभव क' सकै छिऐ जे काफिया तँ वएह हिन्दीक छै मुदा फिट एवं प्रवाहपूर्ण भ' गेल छै। शाइरकेँ मात्र बस एतबा देखबाक छै। नै तँ भाषाकेँ दूषित होइत देरी नै लागत। जँ ऐ काफिया सभहँक प्रयोग मैथिली क जोलहा रूपमे वा चंपारण, मुज्जफरपुर, सीतामढ़ी, बेगूसराय, वैशाली एँ झारखंड बाल मिथिला क्षेत्रक भाषाक संग करबै तँ गजलक कल्याण सेहो हेतै आ मैथिलीक सेहो। भाषाक सम्बन्धमे एकटा आर गप्प ऐ संग्रहक अधिकांश गजलमे मैथिलीक चलंत रूप ( मने गाम-घरमे बाज' बला रूप ) प्रयोग भेल अछि जे की मैथिली गजल लेल शुभ अछि। हँ, एतेक अपेक्षा हम बाबा बैद्यनाथ जीसँ जरूर केने छलहुँ जे ओ पूर्णियाक छथि तँ हुनक रचनामे पूर्णियामे बाजल जाइत मैथिलीक स्वरूप रहत । जँ ऐ अधारपर देखी ई संग्रह कने हमरा निराश केलक ( ई हमर व्यतिगत आलोचना अछि, गजलक व्याकरणसँ फराक देखल जाए एकरा )। जेना की उपरे इंगित क' चुकल छी जे गजलकार स्वयं शब्दमे विभक्ति सटेबाक पक्षमे छथि आ हमरा हिसाबें ई मैथिलीक लेल नीक। आ अन्तमे आउ ऐ संग्रहक भाव पक्षपर। मैथिली साहित्यमे " भाव " सभसँ सस्ता छै। जकरा देखू से भाव केर नाङरि पकड़ि साहित्यिक वैतरणी पार करै छथि। तँए ऐ संग्रहक सभ गजलक भाव पक्ष उन्नत अछि। आ ऐ पक्षपर हमर कोनो कथन नै रहत। कारण जखन सभ पक्ष हमहीं कहि देब तखन तँ पाठकक रूचि खत्म भ' जेबाक डर रहत तँए पाठक संग आन सभ गोटासँ अनुरोध जे बाबा बैद्यनाथ कृत " पहरा इमानपर " नामक गजल संग्रह पठथि आ अपन-अपन विचार देथि। जिनका ई पोथी कोनो कारणवश नै उपल्बध भ' रहल छनि से ऐ लिंकपर जा क' एकर पी.डी.एफ फाइल डाउनलोड क' एकरा पठथि https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Pahra_Iman_Par.pdf?attachauth=ANoY7cqrLAai8QAw-5s2DKPbDbL7tkHkNm21JzW7JHpvcnMWa4eUTBj1upJeipTdGs5Ktg9FNASU7n1e23fURUkX_RGJ71_vvSGXUY_jCYzAoJL4WNpIi5YRY-krxar5gRQH8bbqGR7PJznA3E4jjZ3p_n8mZob_0_evLolQsqCFMQFI0tK9CAQplBo3fiCIwMurjrvuSmUoaMS3fj98oxyqnZnnb65L3iOIQwe3rykiAnOw3nyPYQA%3D&attredirects=0 । ई डाउनलोड बिल्कुल फ्री अछि मने साहित्यमे प्रयोग होमए बला " भाव "सँ बहुत बेसी सस्ता। कने रुकू, जे गोटा भाव लेल तरसैत हेता तिनका लेल मात्र किछु शेर हम देखाबए चाहब ( उनतीसम गजलक आठम शेर ) राति-दिन बउआ खाली कमेन्ट्री सुनए कियैक पढ़तै क्रिकेटक लहर देखि कs ऐ शेरकेँ पढ़ू आ तखनुक संग एखुनका समयकेँ देखू। कोनो फर्क नै भेलैए। पहिने रेडियोमे बैट्री नै देल जाइ छलै क्रिकेटक समयमे आब केबल लाइन कटबा देल जाइ छै। पढ़ाइपर क्रिकेटक की असर छै से एकै शेरमे देखा गेल छथि शाइर। पढ़ाइए किए ई क्रिकेट तँ आन छोट-छोट खेलकेँ सेहो नाश क' देलक। शाइर ऐ शेरक माध्यमे सेहो धेआन दिअबैत छथि। एही प्रकारक ज्वलंत मुद्दा सभकेँ बाबा बैद्यनाथ अपन गजलमे लेने छथि जे की आन शाइरक गजलमे दुलर्भ अछि। भाव केर ऐ चर्चामे ११म गजलक अंतिम शेर कहने बिना पूरा नै हएत--- कहियो जँ मोन पड़य अप्पन अतीत जीवन बस आँखि मूनि दूनू कनियें लजा लिय ऐ शेरकेँ पढ़ू आ एकर मतलब निकालू। झटहा फेकेलै कहीं आ लगलै कहीं। इएह भेलै गजलत्व जकरा बारेमे कहल जाइ छै जे गजलक शेर सीधा करेजमे लगै छै। जँ एकैसम गजलकेँ देखी तँ निश्चित रूपसँ ई बाल गजल अछि ( बाल गजल रहितों व्यस्क लेल ओतेबे प्रासंगिक अछि ) आ ओजपूर्ण सेहो अछि-
छोड़ू अपन कपटकेँ आ उदार बनू भैया गाँधी सुभाष नेहरुक अवतार बनू भैया अइ संग्रहमे श्रृंगार रसक गजल सेहो अछि जे की पाठकक लेल छोड़ल जाइए। तँ आसा अछि जे आब अहाँ सभ जरूर एकरा पढ़बै।
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प्रिंट पत्रिकाक संपादक आ गजलकारसँ अपील
पहिने गजलकार सभसँ----
कोनो पत्रिकाकेँ अपन गजल पठएबासँ पहिने ई देखू जे अहाँक गजल कोन बहरमे अछि। आ से देखि लेलापर तकर नाम लीखू आ संगे-संग ओहि बहरक मात्रा क्रम लिखबे टा करु। कारण अलग-अलग पत्रिकाक अलग-अलग वर्तनी आ ओहि हिसाबें प्रकाशित केने अहाँक गजलक बहर टूटि जाएत। एकरा हम एकटा उदाहरणसँ देखाएब। मानू जे अहाँ कोनो बहरक हिसाबसँ " कए " शब्दक प्रयोग केलहुँ जकर मात्रा क्रम छै UI "ह्रस्व-दीर्घ" मुदा कतेको पत्रिका एकरा " कय" बना देताह जकर मात्रा क्रम छै UU "ह्रस्व-ह्रस्व" वा I "दीर्घ" ( दूटा लघु मिला एकटा दीर्घ )। तँ कतेको पत्रिका एकरा खाली " क' " वा " क " लीखि देताह जकर मात्रा क्रम छै U "ह्रस्व"। आब अहाँ अपने बुझि सकैत छी जे वर्तनी बदलने मत्रा क्रम टूटि जाएत। मने बहर टूटि जाएत आ गजल बेबहर भए जाएत। ऐठाम हम खाली एकटा शब्दक उदाहरण देलहुँ अछि मुदा अनेको शब्दपर ई लागू हएत। तँए गजलक संगे-संग बहरक नाम आ ओकर मात्रा क्रम जरूर लीखी। संगहि-संग गजल वा शेरो-शाइरीक अन्य विधा कोनो पत्रिकाकेँ पठबैत काल संपादक जीसँ ई आग्रह करू जे जँ हुनका अपन वर्तनीक हिसाबें गजल नै बुझान्हि तँ गजल नै छापथि। कारण जखन बहर टूटिए जेतै तँ ओ गजल बेकार।छपियो जाएत तँ कोनो कर्मक नै। जँ गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि तैओ ई समस्या आएत। उदाहरण लेल मानू जे अहाँ " नहि " शब्दकेँ प्रयोग करैत एकटा गजल सरल वार्णिक बहरमे लीखि संपादक जीकेँ देलिअन्हि मुदा ओ संपादक जी अपन वर्तनीक हिसाबें ओकरा " नै " लीखि देलखिन्हि। मतलब जे सरल वार्णिक बहर सेहो टूटि गेल। तँए गजलकार सभसँ विशेष आग्रह जे ओ प्रिंट पत्रिकाक संपादककेँ अनिवार्य रूपें लिखथि जे जाहि स्वरूपमे गजल छै ताही स्वरुपमे गजल प्रकाशित हेबाक चाही नै तँ प्रकाशित नै करु।
आब प्रिंट पत्रिकाक संपादक सभसँ-------
जँ संपादक महोदयमे कनियों बुझबाक शक्ति हेतन्हि तँ उपरका विवरणसँ हुनका गजलक संबंधमे व्यवहारिक समस्या बुझा जेतन्हि। तँए संपादक जी लेल हम विशेष नै लिखब।बस हमहूँ एतबे आग्रह करबन्हि जे अपन वर्तनीक पक्ष लए ओ गजलक संग बलात्कार नै करथि। जँ हुनका अपन वर्तनीकेँ रखबाक छन्हि तँ ओ गजलकेँ नै छापथि। या एकटा उपाय इहो भए सकैत छै जे ओ गजलकेँ छापथि आ संगे-संग ई नोट दए देथि जे " ई वर्तनी गजलकार विशेषक वर्तनी थिक, पत्रिकाक नहि"। अंतिकाक संपादक अनलकान्त जी अपन पत्रिकामे एहन नोट छापि लेखक विशेष आ अपन पत्रिका दूनूक वर्तनीक रक्षा केने छथि। एकटा आर गप्प कविता जकाँ पाँतिकेँ सटा कए छापब गजल परंपराक विरुद्ध अछि। सङ्गे-सङ्ग एक पन्नाक दू भाग वा दू पन्नाक दू भागमे गजलकेँ छापब सेहो गजल परंपराक विरुद्द अछि। एकटा गजल दए रहल छी राजीव रञ्जन मिश्र जीक जाहिसँ ई पता लागत जे एकटा गजलक विभिन्न शेरक बीचमे कतेक जगह रहबाक चाही---------
गजल
कखनो किछु बात बुझल करू मोनक धरकन दिन राति बनल करू मोनक
ई जे सिसकल त' लता पता सुनलक आहाँ फरियाद सुनल करू मोनक
छोहक मारल त' घड़ी घड़ी तड़पल मरहम बनि घाव भरल करू मोनक
कहबो ककरो जँ करब त' के बूझत संगे बस मीत रहल करू मोनक
गाबी राजीव सदति गजल नेहक ततबा धरि चाह सुफल करू मोनक
2222 112 1222
शीर्षक द' क' गजल छापब बेकार कारण गजलक शीर्षक नै होइ छै। चूँकि एकटा गजलमे जतेक शेर होइ छै ओतेक विषय रहैत छै गजलमे तँए शीर्षक देबाक परंपरा नै छै। हम अपन एकटा गजल दए रहल छी जाहिसँ ई स्पष्ट हएत जे ऐ तरीकासँ गजल नै प्रकाशित हेबाक चाही-------
गजल ओकर हाथसँ छूल अछि देह सदिखन गम गम फूल अछि देह प्रेमक उच्चासन मिलन छैक दू टा घाटक पूल अछि देह कोना चलि सकतै गुजर आब देहक तँ प्रतिकूल अछि देह गेन्दा सिंगरहार छै मोन चम्पा ओ अड़हूल अछि देह ऐठाँ अनचिन्हार चिन्हार सभ देहक समतूल अछि देह मात्रा क्रम-222-2212-21 हरेक पाँतिमे
ऐ तरीकासँ छापब गलत थिक। एहन रूपसँ गजल प्रकाशित करब परम्परा विरुद्ध अछि।गजलमे सदिखन दूटा शेरक बीचमे जगह हेबाक चाही। ओना हिन्दीमे सेहो कविता जकाँ पाँति सटा क' गजल प्रकाशित कएल जाइत छै मुदा एकर मतलब नै जे दोसर इनारमे खसत तँ हमहूँ सभ खसि पड़ब।
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अज्ञानी संपादकक फेरमे मरैत गजल
किछु मास पहिने हम प्रिंट पत्रिकाक संपादक आ गजलकार सभसँ एकटा अपील केने रही। ई अपील मैथिलीक वर्तनी आ आ बहरक संबंधमे छल। ऐ अपीलक डिस्कशनमे गुंजन श्री नामक व्यक्ति कहलाह जे ठीके कहै छी, एना कए क' बहुत संपादक गजलक प्राण घीचि लै छथि। ताहि पर हम कहलिऐ जे " विदेह"क संपादककेँ छोड़ि किनको बहरक ज्ञान नै छन्हि । ताहि पर कुंदनक कुमार मल्लिक नामक एकटा पाठक कहलाह जे बुझायत अछि जे …”” .”....Ashish Anchinhar जी सभ मैथिली पत्रिकाक सम्पादक लोकनिक ज्ञान केँ परीक्षा लय चुकल छथि. मैथिली गजल मे अपनेक योगदान अतुलनीय आ मीलक पाथर जेकां अछि. जहिया कहियो वा जतय कतओ मैथिली गजलक चर्चा हेतय ओतय अपनेक नाम निसंदेह सभ सँ पहिने आ आदरक संग लेल जायत। मुदा एना निन्दा केनाय कतेक उचित? आलोचन करी संगे संग निन्दा स' सेहो बची.मुदा फेर वैह गप कहब जे गजलक बारे मे हमरा ओतबे बुझल अछि जतेक कोनो गजल के बुझल हेतैक. किछु बेसी कहा गेल हुयै त' एहि टिप्पणी केँ मिटा देबैक” .” तकरा बाद हम कुंदन जीकेँ संबोधित करैत लिखलहुँ जे..." हमर नाम लेल जाए की नै लेल जाए से विषय नै छै। बहस एहि बातकेँ छै जे गजलक आ मैथिली वर्तनीक व्यवहारिक समस्याक फरिछौट। से उपर पढ़ि कए बुझा गेल हएत अहाँकेँ। जहाँ धरि निन्दाकेँ गप्प छै। ओ आदमी उपर निर्भर छै। हम गजलक निखरल आ स्थिर स्वरूप चाहै छी आ ओहि लेल हमरा जँ किनको प्रसंशा वा खिद्दांसो करए पड़त तँ हम करबै।.” ... आ तकरा बाद कुंदन जी लिखला जे...... " हमर टिप्पणी अहाँक आलेखक लेल नञि अपितु अपनेक टिप्पणीक संदर्भ मे छल।" ताहि पर हम फेरो लिखलहुँ जे...." हमहूँ ओही संदर्भमे कहलहुँ अछि आ फेर कहब जे...जहाँ धरि निन्दाकेँ गप्प छै। ओ आदमी उपर निर्भर छै। हम गजलक निखरल आ स्थिर स्वरूप चाहै छी आ ओहि लेल हमरा जँ किनको प्रसंशा वा खिद्दांसो करए पड़त तँ हम करबै।” .......आ फेर हम कुंदन जीकेँ संबोधित करैत लिकलहुँ जे....--" आ जे सही गप्प छै तकरा कहबामे हर्जे की। जँ अहाँकेँ कोनो एहन संपादकक नाम बुझल हो जे विदेहक नै होथि आ ओ बहर बुझैत होथि तनिकर नाम प्रमाण सहित देल जाए।:” ताहि पर कुंदन जी लिखला जे.........." एहि बात के निर्णय करय बला हम के जे कोन सम्पादक के कतेक ज्ञान छन्हि जखन हम पहिने स्पष्ट कय देने छी जे एहि विषय मे हमरा कोनो ज्ञान नञि. हमरा जे बुझायल से कहलहुँ।"...... आब कने आबी पात्र सभ पर। गुंजन श्री कमलमोहन चुन्नू जीक बालक छथि आ एखन कमल मोहन चुन्नू... पटनासँ प्रकाशित " घर-बाहर" नाम पत्रिकाक संपादक मंडलमे छथि आ पत्रिकाक लेल सामग्री पर हिनके निर्णय मान्य होइत अछि। आ कुंदन जी पाठक मात्र छथि।
आब आबी कने " घर-बाहर"क नव अंक पर मने अप्रैल-जून 2012 बला अंक पर। ऐ अंकमे जे संपादक महदोय अपन जे कृत्य देखला से वर्णन करबा योग्य नै। सभसँ पहिने तँ देखू जे सुरेन्द्रनाथ आ अरविन्द ठाकुर जीक बिना बहर बला 6-6टा गजल प्रकाशित केला। ई बारहो गजल ईर घाट-बीर घाट बला बानगी अछि। सुरेन्द्र नाथ जीक गजलमे एखनो काफिया गड़बाड़ाएल अछि तँ अरविन्द जी बहरक नाम पर कुहरि रहल छथि। एही अंकमे योगानंद हीरा जीक " गीत " शीर्षकसँ दूटा रचना छपल अछि। ई आश्चर्य बला बात छै जे योगानंद हीरा जीक ई दूनू रचना गजल छै मुदा संपादक ओकरा गीत कहि रहल छथिन्ह। ई कोन प्रकारक संपादकीय दायित्व छै। हमरा बुझने घर-बाहरक संपादक अज्ञानी तँ छथिहे संगे-संग हीन भावनासँ सेहो भरल छथि। कारण योगानंद हीरा जीक ई उपरोक्त गजल पूरा-पूरा अरबी बहरक पालन करैत अछि। संगे संग संपादक अपन मूर्खताकेँ चलते दोसर गजलक मएकटा पाँति गाएब क' देने छथिन्ह। आ हमरा बुझने संपादक ई काज जानि-बूझि क' केने छथि। कारण हुनका ई बरदास्त नै छन्हि जे केओ बहर युक्त गजल लिखए। ई दूनू गजलक स्कैन दए रहल छी आ देखू जे संपादक कोना बदमाशी केने छथि। पहिल गजलक मतलाक पहिल पाँत अछि----
" किसलय पर घूमै अछि भमरा" देखू जे ऐमे आठ टा दीर्घकेर प्रयोग अछि आ ई शेरक हरेक पाँतिमे निमाहल गेल छै।
आब जखन अहाँ दोसर गजल पार आएब तँ माथ घुमि जाएत। संपादक महोदय एहीठाम बदमाशी केने छथिन्ह। कने गौरसँ स्कैन देखू----पता लागत जे " छी हुलसल" रदीफ छै आ " मोर", भोर, "कोर" आदि काफिया छै। संपादक महोदय ऐ गजलक एकटा पाँति छोड़ि देने छथिन्ह। जाहि कारण ई 11पाँतिक गजल बनि गेल अछि आ किछु नै पता लागि रहल छै। जँ संपादक महोदयकेँ गजलक संबंधमे ज्ञान रहितन्हि तँ एहन प्रकारक गलतीसँ बाँचल जा सकै छल। जँ अंतसँ ऐ गजलकेँ देखी तँ एकर बहर एना छै-दीर्घ-हर्स्व-दीर्घ-दीर्घ+दीर्घ-हर्स्व-दीर्घ-दीर्घ+दीर्घ आ हरेक पाँतिमे ई क्रम पालन कएल गेल छै। आ हमरा बुझने संपादक ऐ तरहँक अज्ञानतासँ मैथिली गजलक भविष्य गर्तमे जा रहल छै। आखिर जिनका मेहनति नै करबाक छन्हि से गजल लिखबाक लौल किएक करै छथि। साहित्य केर बहुत रास विधा छै मेहनति नै करए बला सभ दोसरे विधामे हाथ अजमाबथि तँ नीक।
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मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक भूमिका
तँ कने आब देखी व्याकरणहीन गजलक परम्पराकेँ। चूँकि मैथिली विश्वक एकमात्र भाषा अछि जे की हिन्दीक नकल करैए। जँ हिन्दी मैथिली रचनाकार सभकेँ दिन रहितो राति कहतै तँ मैथिली रचनाकार सेहो दिनक बदला राति केहतै कारण मैथिलीक रचनाकार विशुद्ध रूपें मानसिक गुलाम छथि हिन्दीक। प. जीवन झा, आनन्द झा न्यायाचार्य, कविवर सीताराम झा, मधुप जी जाहि मैथिली गजल के नीक जकाँ विस्तृत केलथि तकरा मात्र हिन्दी नकलक कारणे ७०के दशकमे स्व. मायानन्द मिश्र जी अप्रत्यक्ष रूपसँ कहि देला जे मैथिलीमे गजल लिखब सम्भव नै। ठीक ओहिसँ एक-दू बर्ख पहिने हिन्दीमे नीरज द्वारा ई कथन देल गेल छल जे हिन्दीमे गजल सम्भव नै अछि। नीरज जी हिन्दीमे गजलक नाम गीतिका देलखिन्ह आ गीतिका केर तर्जपर मैथिलीमे गीतल नाम भेल। ऐठाम हम कह' चाहब जे भ' सकैए हिन्दीमे नीरज जीसँ पहिने गजल नै छल हेतै तँए ओ एहन कथन प्रस्तुत केने हेता मुदा मैथिलीमे तँ १९०५सँ गजल लिखल जाइ छल आ ओहो पूर्ण रूपेण व्याकरण सम्मत। तखन मायानन्द जीक ऐ कथन केर मतलब की ? आर किछु चर्च करबासँ पहिने मायानंद जीक पोथी " अवान्तर" भूमिकाक किछु अंश पढ़ू (ई पोथी १९८८मे मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा द्वारा प्रकाशित भेल)। पृष्ठ ६ पर मायानंदजी लिखै छथि --" अवान्तरक आरम्भ अछि गीतलसँ। 'गीतं लातीति गीतलम्' अर्थात गीत केँ आन' बला भेल गीतल। किन्तु गीतल परम्परागत गीत नहि थिक, एहिमे एकटा सुर गजल केर सेहो लगैत अछि। गीतल गजल केर सब बंधन ( सर्त ) केँ स्वीकार नहि करैत अछि। कइयो नहि सकैत अछि। भाषाक अपन-अपन विशेषता होइत अछि जे ओकर संस्कृतिक अनुरूपें निर्मित होइत अछि। हमर उद्येश्य अछि मिश्रणसँ एकटा नवीन प्रयोग। तैं गीतल ने गीते थिक, ने गजले थिक, गीतो थिक आ गजलो थिक। किन्तु गीतितत्वक प्रधानता अभीष्ट, तैं गीतल।" उपरका उद्घोषणामे अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे कतेक दोखाह स्थापना अछि। प्रयोग हएब नीक गप्प मुदा अपन कमजोरीकेँ भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उचित नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का अपराध छनि। जँ ओ अपन कमजोरीकेँ आँकैत गीतल केर आरम्भ करतथि तँ कोनो बेजाए गप्प नै मुदा हुनका अपन कमजोरी नै मैथिलीक कमजोरी सुझा गेलन्हि। एकरे कहै छै आँखि रहैत आन्हर। ई मोन राखब बेसी जरूरी जे २०११मे प्रकाशित कथित गजल संग्रह " बहुरुपिया प्रदेश मे " जे की अरविन्द ठाकुर द्वारा लिखित अछि ताहूमे ठीक इएह गप्पकेँ दोहराओल गेलैए।
मायानंद जी अपन कमजोरीकेँ झाँपैत जै गीतल केर आरम्भ केला तै पाँछा हमरा बुझने तीन टा कारण भ' सकैए--- १) स्व.मायानन्द मिश्र जी हिन्दीक अन्ध भक्त छलाह। २) स्व. मायानन्द जी मैथिली गजलक सम्बन्धमे अज्ञानी छलाह। ३) स्व. मायानन्द चतुराइसँ अपना-आप के मैथिली गजलमे स्थापित करबाक योजना बनेलाह। कह' बला कहै छै आ प्रभाव छोड़ै छै। कथनक विरोध भेनाइ शुरू भेल ऐ आ विरोधक सङ्ग शुरू भेल बड़का मजाक। मजाक ई जे विरोध कर' बला सभ सेहो व्याकरणहीन गजल लिखै छलाह वा एखनो लिखै छथि। ओहि समयक बिना व्याकरणमे गजल लिख' बला सभ ( मुदा अपना-आपकेँ गजलकार मान' बला सभ ) दू भागमे बँटि गेल। गीतल भागमे, मायानन्द, तारानन्द झा तरुण, विलट पासवान विहंगम, आदि एला वा छथि (ऐ सूचीमे आर नाम सभ छथि मुदा अगुआ इएह सभ छलाह छथि) तँ कथित गजल बला भागमे सियाराम झा सरस, रमेश, तारानन्द वियोगी, विभूति आनन्द, कलानन्द भट्ट, डा. महेन्द्र, सोमदेव, राम भरोस कापड़ि भ्रमर, देवशंकर नवीन, राम चैतन्य धीरज, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, अरविन्द टाकुर आदि-आदि सभ रहला वा छथि ।ऐ सूचीमे आर नाम सभ छथि मुदा अगुआ इएह सभ छलाह छथि। मुदा ऐठाँ हम ई स्पष्ट कर' चाहब जे नाम भने जे होइ मायानन्द जी बला गुट वा सरस जी बला गुट दूनू गुटमेसँ कोनो गोटा गजल नै लिखै छलाह कारण ओ व्याकरण हीन छल। आ व्याकरण हीन कथित गजलकेँ गजल नै गीतले टा कहल जा सकैए। सरस जी मायानन्द जीक सभसँ बेसी विरोध केलखिन्ह हुनकर कथनक कारणे मुदा सरस जी स्वंय व्याकरणहीन गजल लिखला आ लिखै छथि तखन मात्र कथनीपर केकरो विरोध करबाक की मतलब जखन की करनी दूनू गोटाक एकै छन्हि। सरस जीक सङ्ग बहुत कथित गजलकार सभ होहकारी दैत एलाह मुदा ओहो सभ व्याकरणहीन गजल लिखला आ लिखैत छथि। आब हमर प्रश्न जे जखन व्याकरण छैहे नै तखन गीतल आ ओइ कथित गजलमे अन्तर की ? हमरा बुझने कोनो अन्तर नै । हम मायानन्द जी गीतल आ सरस जीक कथित गजल दूनूकेँ एकै समान मानै छी। ऐ ठाम ई बेसी मोन राखब जरूरी जे सरस गुट केर महानायक धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी गीत आ गजलकेँ सहोदर भाए माननै छथि। तखन सरस जीक नजरिमे मायानंद जी अपराधी भेला आ धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी महानायक। हमरा जनैत ई सरस जीक पक्षपात थिक आ ऐ पक्षपात केर विरोध हेबाक चाही। सियाराम झा सरस जीक संपादनमे बर्ख 1990मे " लालकिला आ लोकवेद " नामक एकटा साझी गजल संग्रह आएल। एहि संग्रहमे गजलसँ पहिने तीनटा भाष्यकारक आमुख अछि। पहिल आमुख संपादक जीकेँ छन्हि आ ओ तकर शुरुआत एना करै छथि----" समालोचना आ साहित्यिक इतिहास लेखनक क्षेत्रमे तकरे कलम भँजबाक चाही जकरा ओहि साहित्यिक प्रत्येक सुक्ष्तम स्पंदनक अनुभूति होइ......."। अर्थात सरसजीकेँ हिसाबें कोनो साहित्यिक विधाक आलोचना, समीक्षा, वा ओकर इतिहास लेखन वएह कए सकैए जे की ओहि विधामे रचनारत छथि। जँ हम एकर व्याख्या करी तँ ई नतीजा निकलैए जे गजल विधाक आलोचना वा समीक्षा वा ओकर इतिहास वएह लीखि सकै छथि जे की गजलकार होथि। मुदा हमरा आश्चर्य लगैए जे ने 1990सँ पहिले सरस जी ई काज केलाह आ ने 1990सँ 2008 धरि ई काज कए सकलाह। 2008केँ एहि दुआरे हम मानक बर्ख लेलहुँ जे कारण 2008मे हिनकर मने सरस जीक एखन धरिक अंतिम कथित गजल संग्रह "थोड़े आगि-थोड़े पानि" एलन्हि मुदा ओहूमे ओ एहन काज नै कए सकलाह। आ बर्ख 2008मे गजल विधा पर केन्द्रित ब्लाग " अनचिन्हार आखर " आएल जाहिमे गजलक व्याकरण आ आलोचना पर पर्याप्त काज भेल। आ गजल विधाकेँ सरस आ हुनक टीमसँ छुटकारा प्राप्त भेल। आ जे काज 100 साल मे नहि भेल से मात्र एक साल पाँच मासमे गजेन्द्र ठाकुर कए देखेलाह आ मैथिली गजलकेँ पहिल गजल शास्त्र देलाह।ई हमरा हिसाबें कोनो गजलकारक सीमा भए सकैत छलै मुदा सरस जीक दोहरा चरित्र ओही आमुख के तेसर आ चारिम पृष्ठमे भए जाइत अछि जतए सरस जी लिखै छथि-------" मैथिली साहित्यमे तँ बंगला जकाँ गीति-साहित्यिक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि। गजल अही परंपराक नव्यतम विकास थिक, कोनो प्रतिब्द्ध आलोचककेँ से बुझ' पड़तैक। हँ ई एकटा दीगर आ महत्वपूर्ण बात भए सकैछ जे मैथिलीक समकालीन आलोचकक पास एहि नव्यतम विधाक आलोचना हेतु कोनो मापदंडिके नहि छन्हि। नहि छन्हि तँ तकर जोगार करथु.........."आब ई देखल जाए जे एकै आलेखमे कोना दोहरापन देखा रहल छथि। आलेखक शुरुआतमे हुनक भावना छन्हि जे " जे आदमी गजल नै लीखै छथि से एकर समीक्षा वा इतिहास लेखन लेल अयोग्य छथि मुदा फेर ओही आलेखमे ओहन आलोचकसँ गजल लेल मापदंड चाहै छथि जे कहियो गजल नहि लिखला।भए सकैए जे सरस जी ई आरोप सरस जी अपन पूर्ववर्ती विवादास्पद गजलकार मायानंद मिश्र पर लगबथि होथि। जे की सरस जीक हरेक आलेखसँ स्पष्ट होइत अछि। मुदा ऐठाम हमरा सरस जीसँ एकटा प्रश्न जे जँ कोनो कारणवश माया जी ओ काज नै कए सकलाह वा जँ मायानंद जी ई कहिए देलखिन्ह मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ओकरा गलत करबा लेल ओ अपने ( सरस जी ) की केलखिन्ह। 2008धरि मैथिलीमे १०-१२टा कथित गजल संग्रह आबि चुकल छल। मुदा अपने सरस जी कहाँ एकौटा कथित गजल संग्रह समीक्षा वा आलोचना केलखिन्ह। गजलक व्याकरण वा इतिहास लेखन तँ बहुत दूरक बात भए गेल। ऐ आलेखसँ दोसर बात इहो स्पष्ट अछि जे सरस जी कोनो समकालीन आलोचककेँ गजलक समीक्षा लेल मापदंड देबा लेल तैयार नै छथि। जँ कदाचित् कनेकबो सरस जी आलोचक सभकेँ मापदंड दितथिन्ह तँ संभवतः २००८ धरि गजल क्षेत्रमे एहन अकाल नै रहितै। आब हम आबी विदेहक अंक 96 पर जाहिमे श्री मुन्ना जी द्वारा गजल पर परिचर्चा करबाओल गेल छल। आन-आन प्रतिभागीक संग-संग प्रेमचंद पंकज नामक एकटा प्रतिभागी सेहो छथि। पंकज जी अपन आलेखमे आन बात संग इहो लिखैत छथि-----“ कतिपय व्यक्ति एकटा राग अलापि रहल छथि जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ परम्परा रहितहु एकरा मान्यता नै भेटि रहल छैक। एहन बात प्रायः एहि कारणे उठैत अछि जे मैथिली गजलकेँ कोनो मान्य समीक्षक-समालोचक एखन धरि अछूत मानिक' एम्हर ताकब सेहो अपन मर्यादाक प्रतिकूल बूझैत छथि। एहि सम्बन्धमे हमर व्यतिगत विचार ई अछि, जे एकरा ओहने समालोचक-समीक्षक अछूत बुझैत छथि जिनकामे गजलक सूक्ष्मताकेँ बुझबाक अवगतिक सर्वथा अभाव छनि। गजलक संरचना, मिजाज आदिकेँ बुझबाक लेल हुनका लोकनिकेँ स्वयं प्रयास कर' पड़तनि, कोनो गजलकार बैसि क' भट्ठा नहि धरओतनि। हँ, एतबा निश्चय जे गजल धुड़झाड़ लिखल जा रहल अछि आ पसरि रहल अछि आ अपन सामर्थयक बल पर समीक्षक-समालोचकलोकनिकेँ अपना दिस आकर्षित कइए क' छोड़त------ “ अर्थात प्रेमचंद जी सरसे जी जकाँ भट्ठा नै धरेबाक पक्षमे छथि। सरस जी १९९०मे कहै छथि मुदा पंकज जी २०११केर अंतमे मतलब २२साल बाद। मतलब बर्ख बदलैत गेलै मुदा मानसिकता नै बदललै।ओना ऐठाम हम ई जरुर कहए चाहब जे भट्ठा धराबए लेल जे ज्ञान आ इच्छा शक्ति होइ छै से बजारमे नै बिकाइत छै। मुदा आब ऐठाम हम ई जरूर कहए चाहब जे मायानंद मिश्रजीक बयान आ अज्ञानतासँ मैथिली गजलकेँ जतेक अहित भेलै ताहिसँ बेसी अहित सरस जी वा पंकज जी सन अभट्ठाकारी लोकनिसँ भेलै। लिखित रूपकेँ छोड़ि मैथिलीमे गयबाक लेल सेहो गायक सभ गजलक नामपर अत्याचार केलाह। किछु लीखि देबै आ गलामे सुर रहत तँ ओकरा गाबि सकै छी तँए की ओकरा गजल मानल जेतै ? गायनक ऐ धुऱखेलमे बहुत रास गायक छलाह वा छथि जेना चंद्रमणि झा, रामसेवक ठाकुर, कुञ्ज बिहारी मिश्र आदि-आदि। जेना लिख' बला सभ मैथिली गजलकेँ भट्ठा बैसेलक तेनाहिते गायक सभ सेहो। गायक सभ गजलमे मात्रा क्रम सप्तक ( सा,रे,गा,मा,पा,धा,नि,सा ) केर हिसाबसँ बैसाबए लागै छथि जे की अवैज्ञानिक तँ अछिए सङ्गे-सङ्ग अनर्थकारी सेहो अछि। काव्यमे रागक हिसाबसँ छन्द नै बनै छै। तँए कोनो एकटा छन्दमे बनल रचनाकेँ बहुतों गायक बहुतों रागमे गाबै छथि गाबि सकै छथि। राग-रागिनीक मात्राक्रम सङ्गीत लेल छै साहित्य लेल नै। तेनाहिते छन्दक मात्राक्रम काव्य लेल छै सङ्गीत लेल नै। सुधांशु शेखर चौधरी आ बाबा बैद्यनाथ जी गजलमे किछु तत्व तँ अछि। खास क' बाबा बैद्यनाथ जीक गजलमे सभ तत्व अछि मुदा वर्णवृत नै अछि। आ तँए हिनको लोकनिकेँ हम कथित गजलकारक श्रणीमे रखैत छी मुदा हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे ई दूनू बाद-बाँकी कथित गजलकार सभसँ बेसी बोधगर छथि। आब हम पाठकक उपर छोड़ै छी जे ओ अपने निर्णय लेथु जे मैथिली गजलक ऐ पोखरिमे के कते योगदान देला। आब ऐठाम एकटा प्रश्न ठाढ़ होइत अछि जे एना अनधुन हिनका सभकेँ (माया गुट एवं सरस गुट) खारिज किएक कएल जा रहल अछि ? जँ हिनकर सभहँक रचना गजल नै अछि तँ की अछि? एना खारिज करब कतेक उचित? हिनका सभमे प्रतिभा छनि की नै ? आदि...................................निश्चित रूपसँ हमरो नै नीक लागि रहल अछि हिनका सभकेँ खारिज करैत मुदा हिनकर सभहँक शैलिए तेहन छनि जे खारिज करहे पड़त। हमहीं मात्र गजलकार छी आ हमरे गजल मात्र गजल थिक ई शैली हिनकर सभहँक पहिचान अछि जखन की लोक आब बुझि रहल अछि जे हिनकर सभहँक गजल गजल नै छल आ ने अछि। ई लोकनि ने अपने गजलपर काज केलाह आ ने दोसरकेँ कर' देलखिन्ह। आ जकर परिणाम गजल भोगि रहल अछि। खास क' अहाँ सरस जीक गजल पोथीक भूमिका पढ़ू ने गजलपर चर्चा भेटत आ ने गजलक व्याकरणपर मुदा ओइमे ई चर्चा जरूर भेटत जे सभकेँ साहित्य अकादेमी भेटि गेलै हमरा किएक नै भेटि रहल अछि। सरस जीक गजले नै हरेक पोथीक भूमिका ओ लेखमे ई भेटत। तारानंद वियोगी, देवशंकर नवीन, गंगेश गुंजन, रमेश, आ ओइ समयक कथित गजलकार सभ एना एला जेना ओ गजलपर उपकार क' रहल होथिन्ह। आ ऐ हेंजमे योगानंद हीरा, विजयनाथ झा सभ दबि क' रहि गेला। हिनका सभमे प्रतिभा छनि कारण बिना प्रतिभा रहने केओ साहित्य दिस आबिए नै सकैए ( बादमे अध्ययनक जरूरति पड़ै छै ) तँए हम ई मानि रहल छी जे ई सभ प्रतिभाशाली छलाह। हँ, इहो मानि रहल छी जे केओ खुरपीक आगूसँ दूभि छीलैए आ ई कथित गजलकार सभ खुरपीक मूठसँ दूभि छिलबाक प्रयास केला। एकर परिणाम ई भेल जे हिनका सभकेँ मेहनति तँ कर' पड़लनि, पसेना सेहो बहलनि मुदा दूभि छीलि क' ई सभ गजल रूपी गाएकेँ भोजन नै द' सकलाह। आब ऐ प्रश्नपर आबी जे हिनक सभहँक रचना गजल नै अछि तँ की अछि? निश्चित रूपसँ हिनकर सभहँक रचनामे सरसता, पद-लालित्य ओ गेयता अछि मुदा व्याकरण नै अछि। तँए हम हिनकर सभहँक कथित गजलकेँ हम पद्यक रूपमे मानै छी। आब पद्यमे केहन पद्य से तँ आन आलोचक सभ फड़िछा क' कहता मुदा जहाँ धरि हमर अपन विचार अछि तँ ई सभ नीक पद्य अछि आ आन पद्ये जकाँ साहित्यमे समादृत अछि।
ऐ ठाम ई गप्प सार्वजनिक करब अनिवार्य अछि जे अनन्त बिहारी लाल दास " इन्दु " जीक जे टूटा गजल संग्रह छनि ( सरसजी द्वारा देल गेल सूचना ) तैमेसँ हम एकौटा पोथी नै पढ़ि सकलहुँ अछि। तँए इन्दुजीक गजलपर हम कोनो टिप्पणी नै करब। हँ एतेक हम जरूर कहब जे कर्णामृतक किछु अंकमे हमरा हुनक गजल पढ़बाक अवसर भेटल मुदा तैमे बहरक अभाव अछि। बहुत रास गजलकार लेल ई टिप्पणी हम सुरक्षित राखए चाहब। संगे-संग हम ईहो कह' चाहब जे ई एकेडमिक शोध नै थिक तँए बहुत रास गजलकारक पोथी भेटबामे हमरा दिक्कत भेल तथापि हमरा लग १००मेसँ ९९टा मैथिली गजल संग्रह वा मैथिली गजलपरहँक लेख सभ अछि।
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लघु-गुरू निर्णय ( दूनू भाग एक ठाम )
(हमर ऐ लेखमे मात्र पं. गोविन्द झा जीक चर्च अछि तकरा अन्यथा नै लेल जाए से हमर आग्रह। पं. गोविन्द झा जीकेँ हम मैथिली व्याकरणक धूरी मानैत ई लिखल अछि। निश्चित रुपें पं. जी अपन अग्रजसँ नियम ग्रहण केने छथि आ अपन अनुज सभकेँ बेसी प्रभावित केने छथि तँए हम मात्र पं. जीक उपर ई लेख केन्द्रित केलहुँ जाहिसँ हुनक अग्रज आ हुनक अनुज सभ ऐ लेखक माँझमे आबि सकथि।)
तँ आउ कने चली मात्रा केना गानल जाइत छै ताहिपर। मात्रा गनबाक लेल मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिन्दु लघु। चन्द्रबिन्दु जँ लघु अक्षरपर रहतै तँ लघु मानल जेतै आ जँ दीर्घ अक्षरपर रहतै तँ दीर्घ मानल जाएत। संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । सङ्गे-सङ्ग मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ सेहो हएत। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि। तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। मुदा "मृत" शब्दमे "मृ" संयुक्ताक्षर नै अछि। विसर्ग युक्त लघु वर्ण सेहो दीर्घ होइत अछि। हलन्तसँ पहिने बाल लघु दीर्घ होइत अछि आ हलन्तक मात्रा सुन्ना होइत अछि।
गजलमे दूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ सेहो मानल जाइत छै। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि।
जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। मुदा ऐठाम एकटा गप्प मोन राखू जे किछु शब्दमे धेआन सेहो राखए पड़त जेना एकटा शब्द " कमल " लिअ। आब जँ अहाँ एकर उच्चारण क-मल ( मने लघु-दीर्घ) करबै ताहिसँ एकटा फूलक अर्थ निकलत मुदा जखन अहाँ एही शब्दकेँ कम-ल ( मने दीर्घ-लघु) करबै तखन एकर अर्थ घटनाइमे हेतै जेना - पानि कम'ल की नै इत्यादि। तँए हमर आग्रह जे पहिने कोनो शब्दकेँ उच्चारणक हिसाबेँ अर्थ देखू जाहिसँ उच्चारण अनर्थ नै हुअए। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। ऐठाम ईहो कही जे लघु लेल ह्रस्व शब्दक प्रयोग सेहो कएल जाइत छै तेनाहिते दीर्घ लेल गुरू शब्द छै। ऐठाम हम एकटा गप्प स्पष्ट कर' चाहब। संस्कृतक वार्णिक गणमे टूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक परम्परा नै अछि। संगे-संग वार्णिक छन्दमे जतेक गण छै ततेक अक्षर भेनाइ अनिवार्य। एकटा उदाहरण लिअ-- मानू जे १२२-१२२-१२२-१२२ सँ बनल श्लोकक हरेक पाँतिमे मात्रा क्रम इएह रहतै संगे-संग हरेक पाँतिमे १२टा अक्षर रहतै। कम वा बेसी अक्षर मान्य नै छै। मुदा आधुनिक भारतीय भाषामे ई कठिन सन बुझाएल तँए दूटा लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट भेटल।
ई तँ छल सूत्र रूपमे। कने एकरा फरिछा कए देखी------
1) पं. गोविन्द झा अपन पोथी " मैथिली छंद शास्त्र" ( मिथिला पुस्तक केन्द्र दरभंगासँ प्रकाशित, द्वितीय संस्करण १९८७)मे पृष्ठ १३ मे लिखैत छथि जे " सँ, जँ, तँ, हँ आदि गुरू अछि" मने चंद्रबिंदुकेँ पं. गोविन्द झा जी दीर्घ मनने छथि (प. दीनबन्धु झा रचित मिथिला भाषा विद्योतनमे एहने लिखल अछि।) मुदा फेर पं. गोविन्द झा जी शेखर प्रकाशनसँ २००६मे प्रकाशित अपन पोथी " मैथिली परिचायिका" केर पृष्ठ २०पर लिखै छथि जे " अनुस्वार भारी होइत अछि आ चंद्रबिंदु भारहीन" मने ऐ पोथीमे पं. जी चंद्रबिंदुकेँ लघु मनने छथि आ एहने सन विचार ओ मैथिली अकादेमीसँ २००७मे प्रकाशित अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ट ३५पर देने छथि। आब हमरा एहन पाठक लेल ई बड़का प्रश्न अछि जे चंद्रबिंदुकेँ लघु मानल जाए की दीर्घ, कारण एकै पं. गोविन्द झा जी अपन भिन्न-भिन्न पोथीमे भिन्न विचार देने छथि आ ई प्रचारित करबाक उपक्रम करै छथि जे जाहि पोथीमे हम जे लीखि देलहुँ से सही अछि। जँ पं. गोविन्द झा जी बाद बला पोथीमे लीखि देने रहितथिन्ह जे " मैथिली छंद शास्त्रमे चंद्रबिंदु केर सम्बन्धमे हम जे लिखने छी से गलत थिक आब आब हम ऐ पोथीमे एकरा सुधारि रहल छी" तखन हमरा जनैत भ्रम नै पसरितै आ ऐसँ हुनक महानता सेहो सिद्ध होइत। मुदा से नै भेल। कोनो भाषाक वैयाकरणक उपर ओहि भाषाक हरेक लोककेँ विश्वास होइत छै। मैथिल सेहो पं. जीपर विश्वास करैत छथि ( हमरा सहित) आ तँए बहुत मैथिल लोकनि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि बैसल छथि। एकर सभसँ बड़का उदाहरण श्री रमण झा सन अलंकार शास्त्री अपन पोथी " भिन्न-अभिन्न"क पृष्ठ ६७-७३ मे देने छथि जतए श्री रमण जी पं. गोविन्द झा जीक संदर्भ दैत चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। अस्तु ई गप्प फरिछाएल अछि जे चंद्रबिंदु लघु होइत अछि आ अनुस्वार दीर्घ। एही क्रममे एकटा आर गप्प भए सकैए जे पं. गोविन्द झा जी कविवर सीताराम झा जीक कविताकेँ देखि चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने होथि तँ से गप्प फराक, कारण कविवर सीताराम जी अपन अधिकांश कवितामे चंद्रबिंदु युक्त लघु शब्दकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखए पड़त जे छंदमे जरूरति पड़लापर ( मात्र आवश्यक स्थितिमे) लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण कएल जाइत रहलै। तँए जँ कविवर सीता राम जी जँ आवश्यकता पड़लापर जँ चंद्रबिंदु युक्त लघुकेँ दीर्घ जकाँ प्रयोग केने छथि ताहिसँ ओ नियम नै बनि जेतै वस्तुतः नियम तँ इएह छै जे चंद्रबिंदु लघु अछि। एकटा गप्प आर संस्कृतमे लघुकेँ दीर्घक बराबर वा तेनाहिते दीर्घकेँ लघु बराबर उच्चारण मात्र पाँतिक अन्तमे मान्य छै। शब्दक अन्तमे दीर्घकेँ लघु मानबाक मैथिलीमे परम्परा प्राकृत एवं अप्रभंश भाषासँ भेल अछि। 2) मैथिली छन्द शास्त्रक पृष्ठ १४पर पं. गोविन्द झा जी लिखै छथि जे ----" न्ह आ म्ह संयुक्ताक्षरसँ पूर्व लघु वर्ण गुरू नै होइत अछि, कन्हाइ, कुम्हार, एहिठाम क ओ कु गुरू नहि थिक।" मुदा जँ अहाँ मैथिली उच्चारणकेँ अकानब तँ साफ-साफ सुनबामे कन् + हाइ ध्वनि आएत तेनाहिते कुम् + हार ध्वनि सुनबामे आएत। मैथिलीमे क + न्हाइ वा कु + म्हार ध्वनि कदाचिते भेटत आ जेना की गजल उच्चारणपर आधारित अछि तँए गजलमे कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत आ कुम्हार सेहो दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। ओना गजलेमे किएक हरेक छन्द, हरेक पद्य उच्चारणपर अछि तँए हरेक छंदमे कुम्हार दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। आब कने आर विस्तारसँ चली। उर्दू भाषामे न्ह, म्ह आ ल्ह सँ पहिनुक अक्षर दीर्घ नै होइत छै मने जे जाहि सङ्गे ल्ह, म्ह वा न्ह रहैत अछि तकरे उपर ओ प्रभाव दै छै जेना " तुम्हारा " ऐ शब्दक उच्चारण उर्दूमे "तु + म्हारा" होइत छै तँए उर्दूमे " तुम्हारा लेल लघु + दीर्घ + दीर्घ प्रयोग होइत छै। ओना ऐठाम ई कहब बेजाए नै जे उर्दूमे न्ह, म्ह, ल्ह केर ध्वनि संस्कृतसँ आएल मुदा उर्दूक सचेष्ट विद्वान सभ उच्चारण अपने हिसाबसँ रखलथि। उर्दूक ई उच्चारण हिन्दीमे आएल ( बजबा कालमे उर्दू आ हिन्दी एक समान होइत अछि)। मुदा जँ मैथिली उच्चारणकेँ देखबै तँ साफे-साफ अंतर बुझना जाएत। आ एही अन्तरक कारणें मैथिल हरेक आन राज्यमे जल्दिये पहिचानमे आबि जाइत छथि। मैथिलीमे आने संयुक्ताक्षर जकाँ म्ह,न्ह आ ल्ह केर प्रभाव होइत छै तँए कुम्हार आ कन्हाइ लेल दीर्घ + दीर्घ + लघु हएत। संस्कृतमे सेहो “ म्ह, ल्ह आ न्ह “सँ पहिने केर लघु दीर्घ मानल जाइत छै। आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ | आब ऐ श्लोकक दोसर पाँतिक ब्रम्ह शब्दपर धेआन देबै सभ बुझबामे आबि जाएत। 3) पं. गोविन्द झा जी मैथिली छंद शास्त्रक पृष्ठ १३मे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ हएत की लघु तकर व्यवस्था देखेने छथि। हुनका मतें जँ एकैटा शब्दमे संयुक्ताक्षर हो तखने टा संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ईहो कहने छथि जे प्रचलित समासमे जँ अलगो-अलग अक्षर छै तखन संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। सङ्गे-सङ्ग ओ एकर सभहँक अपवाद सेहो देने छथि। लगभग इएह नियम मैथिलीक सभ लेखक अपनेने छथि। सङ्गे हम ईहो कहि दी जे हिन्दीयोमे एहने सन नियम छै ( आन आधुनिक भारतीय भाषामे की छै से हमरा नै पता) मुदा ई नियम लौकिक संस्कृतमे नै छै। संस्कृतमे चाहे एकै शब्दमे संयुक्ताक्षर हो की अलग-अलग शब्दमे दूनू स्थितिमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ हएत। संस्कृत पद्यक किछु उदाहरण देखू------पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्
न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्
न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम्
अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ --------| दोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ--------- । जँ अहाँ नीकसँ पढ़बै तँ पता लागत जे संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर जे अलग शब्दमे छै ओहो दीर्घ भए रहल छै। आब शंकराचार्योसँ पहिनुक रचना देखी। तँ पढ़ू रावण रचित ई शिवतांडव स्त्रोतम्। एहूमे संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक अक्षर दीर्घ भेल अछि चाहे ओ एक शब्दमे अछि वा अलग शब्दमे। लघु-दीर्घक-लघु-दीर्घ-----ऐ रूपकेँ पालन 14 श्लोक धरि पालन कएल गेल अछि। जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- -विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ 3 ॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ 5 ॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- -निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥ 6 ॥
करालफालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- -प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥ 7 ॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः । निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ 8 ॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- -विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् । स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ 9 ॥
अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ 10 ॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- -द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालफालहव्यवाट् । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ 11 ॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- -गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ 12 ॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् । विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ 15 ॥
ऐ के अलावे पूरा संस्कृत पद्ये एकर उदाहरण अछि। मुदा से देब ने हमरा अभीष्ट अछि आ ने उचित। मैथिलीमे ई नियम नै छै तकर कारण प्राकृत-अप्रभंश भाषाक प्रभाव छै। मैथिली सहित आन-आन आधुनिक उत्तर भारतीय भाषामे ई सेहो ई नियम नै मानल जाइत छै प्राकृत-अपभ्रंशक प्रभावें। आब ई देखू जे ई प्राकृत-अपभ्रंश कोन भाषा थिक। प्राकृतक सम्बन्धमे नाट्य शास्त्रक प्रणेता भरत मुनि कहै छथि जे------ एतदेव विपर्यस्तं संस्कार गुण वर्जितम् विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नाना वस्थान्तरात्मकम्। मने जे मूल शब्दक अक्षरकेँ आगू-पाछू कए वा सरलीकृत कए बाजब प्राकृत पाठ कहाइए। ऐठाम मूल शब्द मने संस्कृतक शब्द भेल, मुदा मूल शब्द कोनो भाषाक भए सकैए। तेनाहिते आचार्य भर्तृहरि जी प्राकृतक सम्बन्धमे कहै छथि जे -------- दैवीवाक् व्यवकीर्णेयम शकतैरभि धातृभिः मने जे दैवीवाक् ( संस्कृत ) अशक्त लोकक मूँहमे आबि भिन्न-भिन्न रूपमे आबि जाइ छै। मुदा महाभाष्यकार पतञ्जलि प्राकृतकेँ अपशब्दक रूपमे देखैत छथि आ हुनका मतें ऐ तरहक अपशब्दक प्रयोग चाहे ओ बाजल जाइ की सूनल जाइ दूनू रूपमे अधर्म थिक। प्रायः-प्रायः हरेक भाषाविज्ञानी प्राकृतक बाद बला रूपकेँ अपभ्रंशक नाम देने छथिन्ह। लगभग नवम आ दशम शताब्दी धरि प्राकृतक प्रयोग खत्म भए गेल छल आ अपभ्रंशक प्रयोग शुरू भए गेल छल। मुदा ऐ ठाम मोन राखू जे अधिकांश भाषाविज्ञानी अप्रभंशकेँ प्राकृतसँ अलग मनने छथि मुदा दूनूक प्रकृति एक समान हेबाक कारणें " प्राकृत-अपभ्रंश " नाम बेसी चलै छै। प्राकृतमे शब्दक निर्माण मुख्यतः लोक रूचिपर निर्धारित छै ने की व्याकरणपर। एकटा उदाहरण देखू-----चन्द्र शब्दसँ चन्दा प्राकृत शब्द भेल मुदा इन्द्र शब्दसँ इन्दा शब्द नै बनल ब्लकि इन्दर शब्द बनल। तेनाहिते वधू शब्दसँ बहु बनि तँ गेल मुदा साधु शब्दसँ साहु नै बनल। साहु अलग शब्द अछि। आ लगभग एहने हालति अपभ्रंशक अछि। ई बात जननाइ महत्वपूर्ण अछि जे जेनाहिते प्राकृत लेल मूल शब्द संस्कृत छै तेनाहिते अपभ्रंश लेल मूल शब्द प्राकृत छै। आ बादमे एही अपभ्रंशसँ मैथिली आ आन आधुनिक भारतीय भाषा सभहँक जन्म भेल। ओना प्राकृतक बहुत रूप छै। तेनाहिते अपभ्रंशक सेहो अनेको रूप छै। मैथिलीमे अपभ्रंशकेँ अपभ्रष्ट वा अवहट्ट सेहो कहल जाइत छै। मुदा ई प्राकृत रूप हरेक समयमे होइत रहलैए। वेदक नाराशंसी एकर उदाहरण अछि | आ ऋगवेदमे ओहि समयक सामानान्तर भाषाक बहुत रास शब्द भेटत। तेनाहिते अशोक वाटिकामे हनुमान जीक ई चिन्ता जे हम सीता जीसँ देवभाषामे गप्प करी की मानुषी भाषामे सेहो ऐ गप्पक प्रमाण अछि जे ओहू समयमे संस्कृतक समानान्तर भाषा छलै आब ओकर नाम मानुषी होइ की वा अन्य कोनो। महत्वपूर्ण तँ ई छै जे वेदसँ लए कए एखन धरि संस्कृतक समानान्तर धारा बहैत रहल आब भले ही ओकर नाम जे रहल होइ। संस्कृत शब्द जखन प्राकृत रूपमे आबए लगलै तखन संयुक्ताक्षर शब्दपर बहुत बेसी प्रभाव पड़लै। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे प्राकृत बाजए बला सभ संयुक्ताक्षर शब्दकेँ अपन लक्ष्य बनेने छल ताहूमे एहन संयुक्ताक्षर बला शब्द जे शब्दक शुरूआतमे छल। एकर कारण छलै जे संयुक्ताक्षर बला शब्दकेँ बजबामे बहुत सावधानी आ शिक्षा चाही छल। संस्कृतक संयुक्ताक्षर बला शब्द प्राकृतमे दू रूपमे तोड़ल गेल--- १) जै संस्कृतक शब्दक शुरुआत संयुक्ताक्षरसँ भेल छै तकरा प्राकृतमे पूरा-पूरी लोप कए देल गेलै। केखनो-केखनो शुरूआतक संयुक्ताक्षरकेँ बादमे आनि देल गेलै जेना----- “ग्रह” संस्कृत छै मुदा एकर प्राकृत “गिरहो” छै। तेनाहिते स्कन्द लेल खन्दो, क्षमा लेल खमा वा छमा, स्तम्भ लेल खम्भ, स्खलितं लेल खलिअं, क्लेश लेल किलेसो इत्यादि। २) जँ शब्दक शुरुआत छोड़ि कतौ संयुक्ताक्षर छै तँ केखनो ओकर लोप भए गेल छै वा नव रूपमे संयुक्ताक्षर छै जेना ---- चतुर्थी लेल चउत्थी, चैत्र लेल चइत्ता, चन्द्रिमा लेल चन्दिमा, क्षेत्रम् लेल छेतम् आदि-आदि। कुल मिला कए प्राकृत-अपभ्रंशमे एहन स्थिति बनल जे दूनू भाषामे सँ कोनो भाषामे एहन शब्द नै छलै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षर शब्दसँ होइत हो। एतेक विवेचनाक बाद हम अपन मूल उद्येश्य दिस चली। हमर मूल उद्येश्य छल जे मैथिलीमे संस्कृते जकाँ अलग-अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ किएक नै होइए। आब जँ गौरसँ उपरका विवरण पढ़ने हएब आ जँ आर प्राकृत-अपभ्रंशक पोथी सभ पढ़ब तँ पता लागत जे प्राकृत-अप्रभंशमे तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत शब्द छैके नै। आ मैथिलीयो अपभ्रंशसँ निकलल अछि आ प्रारंभिक मैथिलीमे संयुक्ताक्षरसँ शुरूआत होइत कोनो शब्द नै अछि। आ तँए मैथिलीमे संस्कृतक ई नियम नै आएल। आ अहाँ अपने सोचियौ ने जे जै भाषामे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्द छैके नै से एहन तरहँक नियम किएक राखत। मुदा जँ नवीन मैथिली भाषाक किछु प्रतिष्ठित लेखकक रचनाकेँ देखी तँ ओ मात्र क्रियापदकेँ छोड़ि सभ संस्कृतक शब्द ( तत्सम शब्द )केँ प्रयोग केने छथि। आन-आन कम प्रतिष्ठित लेखक अपन रचनामे तत्सम शब्दकेँ फिल्मी मसल्ला मानि जोरगर प्रयोग करै छथि। एतबा नै पं. गोविन्द झा जी अपन पोथी "मैथिली परिशीलन"क पृष्ठ २९-३० पर गौरव पूर्वक नवीन भारतीय भाषा ( जै मे मैथिली सेहो अछि )केँ तत्सम निष्ठ हेबाक बहुत रास फायदा गनौने छथि। आब हमरा सन जिज्ञासु लग ई प्रश्न अपने-आप आबि जाइए जे जँ संस्कृतक शब्द लेलासँ बहुत रास फायदा भेलै ( वा भए सकैत छै ) तखन तँ संस्कृतक सम्बन्धित नियम लेलासँ सेहो फायदा भेल रहितै ( वा भए सकैत छै )। ओनाहुतो मैथिलीमे वा अन्य कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक पद्यमे संस्कृत शब्दक प्रयोग होइ छै तखन ओ नियम स्वतः पालन भए जाइत छै। अहाँ अपने मैथिली महँक एहन कोनो पद्य गाउ जाहिमे संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत कोनो संस्कृत शब्द हो स्वतः अहाँकेँ बुझा जाएत जे अलग शब्द रहितों संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला अक्षर दीर्घ होमए लगैत छै। ऐठाँ फेर मोन राखू जे प्राकृत-अपभ्रंश भाषामे एहन शब्द छलैहे नै जकर शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ होइ तँए ओहि भाषामे ई नियम नै पालित भेल। आब एतेक विवेचनक बाद अहाँ सभकेँ मामिला बुझबामे आएल हएत। तँए हमर आग्रह जे जँ ऐ नियमसँ बचबाक हो तँ संयुक्ताक्षरसँ शुरू होइत शब्दक तद्भव रूप प्रयोग करू जेना " प्रकाश " लेल परकाश, " प्रयोग " लेल परियोग इत्यादि। हमर कहबाक मतलब जे जेना पुरना कालमे प्राकृत संयुक्ताक्षरकेँ हटा देलकै वा आधुनिक कालमे बंगला भाषामे संयुक्ताक्षर हटि गेलै तेनाहिते मैथिलीमेसँ संयुक्ताक्षर सेहो हटा दिऔ। आ जँ अहाँ संस्कृते शब्द लेब तखन पूरा नियम सहित लिअ। आब अहाँ जँ सकांक्ष पाठक हएब तँ हमरासँ पूछब जे जँ केओ संस्कृत छोड़ि आन भाषाक शब्द लेत तखन की ओहि भाषाक नियमक पालन करत ? ऐ लेल हमर उत्तर रहत जे नै। कारण संस्कृत हमर मूल भाषा थिक तँए ओकरा दिस ताकब हमर मजबूरी नै बल्कि कर्तव्य सेहो अछि। मुदा ओकरा छोड़ि जँ आन भाषाक शब्द लै छै तखन ओकरा मैथिलीक नियम हिसाबें प्रयोग करू। जेना की अरबी-फारसी-उर्दू भाषामे " ग़ज़ल " लिखल जाइत छै मने ग आ ज केर निच्चा नुक्ता लगाएल जाइत छै मुदा मैथिलीमे नुक्ता नै छै तँए मैथिलीमे " गजल " लीखू। नुक्ता लगा कए लिखब बेकार । कोनो संस्कृतक शब्दकेँ वा अन्यदेशीय शब्दकेँ मैथिलीकरण कोना करी आ कोना नव शब्द बनाबी तकर विवेचना आगू हएत। ई छल हमर पहिल तर्क। आब कने दोसर तर्क दिस चली--- संस्कृत पद्यमे एकटा पाँतिकेँ इकाइ मानल जाइत छै। आ जँ हम शब्दकेँ भिन्न-भिन्न करै छिऐ मने अलग-अलग शब्दक संयुक्ताक्षरसँ भेल दीर्घ नै मानै छिऐ तँ एकर मतलब जे हम पाँतिकेँ नै बल्कि शब्दकेँ इकाइ मानि रहल छिऐ आ हमरा जनैत पद्यमे शब्दकेँ इकाइ मानब उचित नै। पद्यमे इकाइ सदिखन पाँति होइ छै। एकटा विडंबना देखू जे मैथिलीक सभ व्याकरण शास्त्री आ कवि लोकनि शब्दकेँ इकाइ तँ मानै छथि मुदा जखन जगण-मगण केर गिनती करै छथि तखन पाँतिकेँ इकाइ मानि लै छथि। एकटा उदाहरण लिअ जे की वसन्त तिलका छन्दक अछि। ऐ छन्दक व्यवस्था एना अछि---- तगण+ मगण+जगण +जगण + गा + गा मने की ----दीर्घ-दर्घ-लघु +दीर्घ-लघु-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +लघु-दीर्घ-लघु +दीर्घ+ दीर्घ आब एकर पद्य उदाहरण देखू---- " ई ने अहाँक सन वीरक काज थीकs" ( कविवर सीताराम झा, मैथिली छन्द शास्त्र, पृष्ठ-४५)। ऐ एकटा पाँतिमे देखू जे " ई " आ "ने " दूटा अलग-अलग शब्द अछि सङ्गे-सङ्ग तेसर शब्द " अहाँक" केर पहिल अक्षर " अ " लए कए मात्र एकटा " तगण "बनल अछि। आब हमर कहब अछि जे जँ अहाँ पद्यमे शब्देकेँ इकाइ मानै छिऐ तखन दू-तीनटा अलग-अलग शब्दकेँ सानि एकटा जगण-मगण किएक बनबै छी। जँ केओ शब्देकेँ इकाइ मानै छथि तकर मतलब ई भेल जे ओ अपन पद्यमे एहन शब्दकेँ प्रयोग करथि जे हरेक जगण-मगण मने कोनो दशाक्षरी खण्ड लेल समान रूपसँ रहए। तँए हमर मानब जे संस्कृतक पद्ये जकाँ जँ अलग-अलग शब्द होइ तैयो संयुक्ताक्षरसँ पहिनुक बला अक्षर दीर्घ हएत। ऐठाँ ई मोन राखू जे एकटा पाँति खत्म भेलै तँ ओ इकाइ खत्म भेलै। आब जँ दोसर पाँतिक शुरूआत संयुक्ताक्षरसँ भए रहल छै तकर प्रभाव पहिल पाँतिक अन्तिम शब्दक अन्तिम अक्षरपर नै पड़त।
पं. गोविन्द झा जी अपन पोथी " मैथिली छन्द शास्त्र "क पृष्ठ १४पर लिखै छथि जे ---- ए,ऐ,ओ,औ कतहु लघु होइत अछि आ कतहु दीर्घ आ तकर बाद ओ समान्य नियम देखेने छथि। मुदा उदाहरणमे देल गेल जे-जे शब्द सभ लेने छथि से प्रयाः-प्रायः आइसँ १५० बर्ख पहिनुक अछि सेहो सोति नामक ब्राम्हणमे बाजल जाइत छल ओहो मात्र पुरूष वर्गमे। हमर कहबाक मतलब जे स्त्री ( चाहे कोनो जातिक किएक ने हो ) एवं गैर-ब्राम्हण ओहि शब्दावलीक अभ्यस्त नै छल आ ने अछि। तँए हम ओइ नियम सभहँक विवेचन नै करब सोंझ स्वरे कहब जे ए,ऐ,ओ,औ जतए रहए ततए दीर्घ रहत। हँ, दूटा गप्प धेआन राखू पहिल जे बहुत काल ए,ऐ,ओ,औ आदिक उच्चारण कोमल भ' जाइत छै मुदा कोमल उच्चारणक कारणें ओ लघु नै मानल जाएत। आ दोसर गप्प जे प्राकृत-कालमे संस्कृतक विरोध स्वरूप लोक सभ अपना सुविधाक हिसाबसँ ए,ऐ,ओ,औ आदिकेँ कतौ लघु आ कतौ दीर्घ मानि लेला। शुरुआती प्राकृत कालमे उच्चारण मुख-सुखपर आधारित अछि मने एहन उच्चारण जकरा बाजएमे बेसी कठनाइ नै हो। मुदा जखन इएह प्राकृत संस्कारयुक्त बनि गेल तखन संस्कृते जकाँ एकरो विरोध भेलै आ अप्रभंश भाषा आएल। मुदा आइकेँ जुगमे जखन की मैथिली संस्कारयु्क्त बनि गेल अछि तखन प्राकृत-अप्रभंश नियमक कोन काज ( आब अहाँ सभ ई डर नै देखाएब जे संस्कारयुक्त भेलासँ मैथिली मरि जाएत। जँ एतबे डर अछि तखन मैथिलीकेँ १००० बर्ख पाछू ल' जाउ आ तखन प्राकृत-अप्रभंश नियम लिअ। वस्तुतः भाषाकेँ मरब आ जन्मब प्रकिया मनुक्खे जकाँ छै जे की रोकल नै जा सकैए। हँ, किछु स्थान राखल जा सकैए जैसँ मूल भाषाक विशेषता नव भाषामे रहि जाए ) तँए हमर ई स्पष्ट रूपें मानब अछि जे ए,ऐ,ओ, औ आदि जतए रहै ओकरा दीर्घ मानू ( ओना छन्दमे केखनो काल अपवाद स्वरूप काज चलेबा लेल ए,ऐ,ओ, औ आदिकेँ लघु मानल जाएत रहलैए मुदा ई छूट जकाँ भेल नियम जकाँ नै ) | पं. जी एही पोथीक पन्ना १४हेपर एकटा नियम देलाह जे --- तद्भव शब्दमे अन्तसँ तेसर ओ चारिम स्थानपर पड़निहार ए,ऐ,ओ,औ सभ लघु थिक जेना --- तेल ( २१)------- तेलाह ( १२१) फैल ( २१)----फैलगर ( ११११) मुदा पं. जी ई नै स्पष्ट केलाह जे अन्तसँ तेसर ओ चारिम स्थानपर पड़निहार ए,ऐ,ओ,औ सभ लघु किएक होइत अछि। आब आउ चली प. गोविन्द झा जी द्वारा लिखित आ १९८७मे प्रकाशित पोथी " मैथिली उद्गम ओ विकास " ( पहिल संस्करण १९६८मे मैथिली प्रकाशन समीतिसँ आ दोसर परिवर्धित संस्करण मैथिली अकादेमीसँ)क १९एम पन्नापर---- " ११ (१) वैदिक कालहिसँ ई नियम चल अबैत अछि जे एके पदमे एके स्वर उदात रहए, आन सभ अनुदात भए जाए। ई नियम शेष निघात कहबैत अछि। एहि प्राचीन नियमक परिणामस्वरूप मैथिलीमे एक बड़े महत्वपूर्ण नियम ई अछि जे अन्तसँ प्रथम ओ द्वितीय स्थानकेँ छोड़ि शेष जतेक ध्वनि अछि से लघु भए जाइत अछि। एहि नियमकेँ पण्डित ग्रिअर्सन साहेब Rule of short antepenultimate कहल अछि।मैथिलीमे एहि नियमक अनुसारें एक शब्दमे अधिकसँ अधिक दुइ गुरू रहि सकैत अछि, आ सेहो अन्तसँ प्रथम वा द्वितीय स्थानमे ,ताहिसँ पूर्व सकल स्वर नियमतः लघु रहत, तथा प्रत्यादि जोड़लासँ जखनहि कोनो गुरू ध्वनि तृतीय वा ताहिसँ पूर्व पड़ि जाएत तखनहि ओ लघु भए जाएत। एकर उदाहरण ग्रंथमे वारंवार भेटत, एतए दुइ-चारि उदाहरण देखबैत छी--- पानि,पनिगर,काँट,कटाँह, बात, बताह, बतहा, बतहबा। टि० एहि नियमकेँ कने आर परिष्कृत करब आवश्यक। ग्रिअर्सन साहेबक कथानुसार यदि तृतीय वर्ण नियमतः लघु होइत अछि तँ " पाओल ", " आबए " इत्यादिमे "आ "लघु किएक नहि भेल? एकर समाधान ग्रिअर्सन साहेब ई देल अछि जे अन्तिम लघु स्वर वा लघुत्तम स्वरक लेखा नहि होइत अछि। परन्तु छन्दमे शतशः उदाहरणसँ आ उच्चारण-पर्यवेक्षणसँ ई स्पष्ट अछि जे अन्तिम लघुत्तम स्वरो एक वर्ण एक syliable गनल जाइत छल। तें उक्त नियमक स्वरूपएहन राखब समुचितः मैथिलीमे गुरू ध्वनि अन्तसँ चारि मात्राक भित्तरे रहि सकैत अछि, ताहिसँ पूर्व नहि। फलतः मैथिली शब्दक अवसान २२,११२,२११,१२१ एही चारि प्रकारक भए सकैत अछि ओ ताहिसँ पूर्व सकल ध्वनि बिनु अपवादेँ लघु रहत यथा-स० आकाश, मै० अकास इत्यादि।“ फेर पं. जी १९९२मे प्रकाशित पोथी " उच्चतर मैथिली व्याकरण " द्वितीय संस्करणक पृष्ठ १९पर, २००६मे प्रकाशित पोथी " मैथिली परिचायिका " केर पृष्ठ ११पर आ २००७मे प्रकाशित पोथी " मैथिली परिशीलन " केर पृष्ठ ५६-५७पर इएह गप्प एकसामान रूपसँ कहने-लिखने छथि। तँ पं. जीक करीब पाँचटा पोथीमे ऐ विषय-वस्तुकेँ पढ़लाक पछाति हम अपन किछु विचार राखए चाहब--- वैदिक कालमे छन्द निर्माण लेल लघु-गुरू प्रकिया नै छल। मात्र अक्षरकेँ गानि क' छन्द बनै छल जकरा गेबा लेल उदात, अनुदात एवं स्वरित रूपक सहायता लेल जाइत छलै। उदात मने कोनो अक्षरक स्वरकेँ उठा क' गाएब, अनुदात मने कोनो अक्षरक स्वरकेँ निच्चा खसा क' गाएब तथा स्वरित मने कोनो अक्षरक स्वरकेँ तुरंत उपर उठा क' तुरंत निच्चा खसा क' गाएब। वैदिक साहित्यमे जे अक्षर लघु अछि तकर उच्चारण उदात भ' सकैए तेनाहिते जे अक्षर दीर्घ अछि तकर उच्चारण अनुदात भ' सकै छल। सोंझ रूपसँ कही तँ उदात,अनुदात-स्वरित कोनो अक्षरक मात्रापर निर्भर नै छल। २) वैदिक साहित्य केर बाद लौकिक संस्कृतसँ ल' क' प्राकृत-अप्रभंश भाषा रूपमे मैथिली साहित्यमे वैदिक छन्द नै रहल मने या तँ लौकिक संस्कृतक वर्णवृत रहल या मात्रिक छन्द। ३) पं. जी लघु-गुरू नियम आ उदात-अनुदात-स्वरित प्रकियाकेँ एकै मानि लेने छथि। ४) पं. जीक हिसाबें ग्रिअर्सन साहेब द्वारा देल गेल Rule of short antepenultimate बेसी ठीक नै अछि तँए पं. जी ओहिमे संशोधन केलाह। आब हमर प्रश्न ई अछि जे जँ उपरका नियम मैथिली लेल अनिवार्य अछि तखन ओहिमे संशोधन किएक ? संशोधित होमए बला नियम अनिवार्य भैए ने सकैए। ५) पं. जीक पोथी सभ पढ़ि हमरा बहुत बेर ई अनुभव होइए जे पं. जी व्याकरण शास्त्र, छन्द शास्त्र आ ध्वनि विज्ञान तीनूक नियम एकैमे सानि देने छथिन्ह। हरेक भाषामे लघुतर आ अति-लघुतर ध्वनि होइ छै मुदा ओकर विवेचन व्याकरण आ छन्द शास्त्रमे नै भ' ध्वनि शास्त्रमे होइत छै। जँ लेखककेँ एकै पोथीमे ध्वनि विज्ञान देबाक रहै छै तँ ओकर खण्ड अलग क' देल जाइत छै। ऐ ल' क' पं. जीक पोथीमे बहुत ठाम संदेहात्मक स्थिति बनि जाइत छै। हम उपरमे जे विचार रखलहुँ ताहि अधारपर अपन निष्कर्श द' रहल छी----
ई नियम अनिवार्य नियम नै अछि कारण पं. जी स्वयं ऐ नियमक बहुत रास अपवाद देखेने छथि। कोनो अनिवार्य नियममे जँ एतेक अपवाद हो तँ निश्चित रूपसँ ओकर अनिवार्यतापर प्रश्नचिन्ह लागै छै। ई नियम व्याकरणक ओ छन्दशास्त्रक नै ब्लकि शब्दकोषीय अछि। मने ऐ नियमक सहायतासँ अहाँ संस्कृत वा अन्य भाषाक शब्दकेँ मैथिलीकरण क' सकै छी। मोन पाड़ू प्राकृत भाषा संस्कृतक शब्द सभकेँ (मने शब्दक शुरूसँ पहिल,दोसर वा तेसर दीर्घक उच्चारण गाएब क' देलक। आब आगू ऐ गाएब कएल दीर्घ लेल हम मात्र कोमल शब्दक प्रयोग करब) कोमलीकृत केलक जेना--आकाश केर बदला अकास, आत्मा केर बदला अत्मा आदि। बादमे एही नियमक अधारपर अंग्रेजी शब्दक इएह हाल भेलै जेना ड्राइवर केर बदला डरेबर, स्टेशन केर बदला टीसन, आदि-आदि। मुदा ई नियम ओहने शब्दमे लागल जै शब्दमे विराम लेबाक सुविधा नै छलै। "परिशीलन" ई एकटा शब्द अछि मुदा एकर उच्चारण -- "परि-शी-लन" होइत अछि मने एकै शब्दमे दू ठाम विराम अछि तँए ऐ शब्दकेँ कोमल करबाक जरूरति नै भेल। अरबी-फारसीक हजारों शब्द मूल रूपसँ मैथिलीमे चलि रहल अछि ( मने बिना कोमल केने ) कारण ओ शब्द सभमे विराम छै वा रहल हेतै। जँ अहाँ " मैथिली " शब्दक उच्चारण करबै तँ " मै-थिली " उच्चारित हएत। मुदा विरामक ई सुविधा आकाश, आत्मा, ड्राइवर आदि शब्दमे नै छलै तँए ओकरा कोमल बना प्रयोगमे लेल गेलै। स्वयं पं. जी अपवाद स्वरूप जै शब्दक उदाहरण देने छथि तकरा देखू---बासन--केर उच्चारण बा-सन भेल। मानल--केर उच्चारण मा-नल भेल। अनलहुँ--केर उच्चारण अन-लहुँ भेल। मने एहू शब्द सभमे विराम छै तँए एहू शब्द सभकेँ कोमल करबाक जरूरति नै बुझाएल। जँ ऐ नियमक अधारपर देखी तँ आधुनिक मैथिली भाषाक कतेको शब्दकेँ ठीक करबाक जरूरति बुझाएत। हालेमे दरभंगासँ प्रकाशित मैथिली दैनिक " मिथिला आवाज " ऐ नियमक अधारपर गलत अछि। सही नाम हेतै " मिथिला अवाज " मुदा मैथिलीक जे राहु-शनि-केतु सभ छथि से ऐ नियमक पालन नै क' क' मैथिली भाषाक निजताकेँ तोड़बापर लागल छथि। तँ आब अहाँ सभ बूझि सकै छिऐ जे पं. जी जै नियमकेँ अनिवार्य मानै छथि से मात्र अन्य भाषाक शब्दकेँ मैथिलीकरण करबाक औजार थिक। उच्चारणक आग्रहसँ औजारक जरूरति भैयो सकैत छै आ नहियो भ' सकै छै। ई शब्दकोषीय नियम आजुक कालमे ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतेक की पहिने छल। लेखक सभसँ आग्रह जे ऐ नियमसँ अन्य भाषाक शब्दकेँ मैथिलीकरण करथि आ मैथिलीक निजताकेँ सुरक्षित राखथि।ऐ के विपरीत केखनो काल भाषाक निजता रखबाक लेल शब्दकेँ दीर्घ सेहो कएल जाइत छै जेना उर्दूमे उस्ताद मुदा मैथिलीमे ओस्ताद। वकील केर बदलामे ओकील आदि-आदि। तँ एतेक धरि एलाक पछाति हम कहि सकै छी जे ए,ऐ,ओ,औ आदि जै ठाम रहत दीर्घे रूपमे रहत। अकारण रूपसँ वा अपना मोने लघु मानि लेबासँ नीक जे मैथिली भाषामेसँ लघु-गुरू हटा वैदिक छन्दक फेरसँ प्रचलन कएल जाए। ऐसँ अनावश्यक रूपसँ खर्च होइत उर्जा बच'त आ भाषाक विकास सुनिश्चित हएत।
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मैथिलीमे बाल गजल
की थिक बाल गजलः
किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ"बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य।
जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै।
आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक अंक-111जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास ( खास कए गजलकारे सभ द्वारा ) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै।
की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः
जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ "मुस्लसल गजल " भेल।
बाल गजलक पूर्व भूमिकाः
तारीखक हिसाबें 24/3/2012केँ बाल गजलक उत्पति मानल जाएत ( एहि पाँतिक लेखक द्वारा 24/3/2012केँ दिल्लीमे साहित्य अकादेमी आ मैलोरंग द्वारा आयोजित कथा गोष्ठीमे ऐ बाल गजल नामक विधाक प्रयोग कएल गेल ) मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। 09 Dec. 2011केँ अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए ( बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------
शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी
टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी
बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी
नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी
सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी
ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी
"शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी
..................वर्ण 22................
तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com आ विदेहक फेसबुक वर्सन http://www.facebook.com/groups/videha/पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू--------------
होइत छैक बरखा आ रे बौआ कागतक नाह बना रे बौआ
देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ
तोरे पर सभटा मान-गुमान माएक मान बढ़ा रे बौआ
छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ
नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग देशक लेल माथ कटा रे बौआ
तेनाहिते 4 अक्टूबर 2010केँ अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि-----
बानर पट लैले अछि तैयार बिरनल सभ करू ने उद्धार
गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने दुहै समऐँ जनताक कपार
पुल बनेबाक समचा छैक नै अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार
कोरो बाती उबही देबाक लेल आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार
डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार
ऐरावत अछि देखा - देखा कए सभटा देखैत अछि ओ व्यापार
कविवर सीताराम झा जीक करीब १९४०मे लिखल बाल गजल सेहो छनि। ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि। ऐठाम ई कहब कनो बेजाए नै जे विदेहक अंक बाल गजलक पहिल विशेषांक अछि। विदेहक अंक-111 जे की बाल गजल विशेषांक अछि जाहिमे कुल 16 टा गजलकारक कुल 93टा बाल गजल आएल। संक्षिप्त विवरण एना अछि--------------------
रूबी झा जीक 13टा बाल गजल, इरा मल्लिक जीक 2टा, मुन्ना जीक 3टा, प्रशांत मैथिल जीक 1टा, पंकज चौधरी ( नवल श्री) जीक 8टा, जवाहर लाल काश्यप जीक 1टा, क्रांति कुमार सुदर्शन जीक 1टा, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक 1टा, अमित मिश्रा जीक 30टा, ओमप्रकाश जीक 1टा, शिव कुमार यादव जीक 1टा, चंदन झा जीक 14टा, जगदानंद झा मनु जीक 6टा, राजीव रंजन मिश्रा जीक 4टा, मिहिर झा जीक 4टा, गजेन्द्र ठाकुर जीक 1टा आ ताहि संगे आशीष अनचिन्हारक 2टा बाल गजल आएल। बाल गजलक आलावे 7टा बाल गजल पर आलेख आएल। आलेख कार सँ छथि---- मुन्ना जी, ओमप्रकाश, चंदन झा, जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आ आशीष अनचिन्हार आ मिहिर झा। आ तारीख 15 अक्टूबर 2012 धरि अनचिन्हार आखरपर कुल 133 टा बाल गजल आ 35टा बाल रुबाइ आबि चुकल अछि संगे संग करीब 10टा बाल गजलपर आलेख उपल्बध अछि। एखन धरिक मुख्य बाल-गजलकारमे श्रीमती शांतिलक्ष्मी चौधरी, जगदानंद झा मनु, अमित मिश्रा, चंदन झा, पंकज चौधरी ( नवल श्री) , शिव कुमार यादव, श्रीमती इरा मल्लिक, ओमप्रकाश, मिहिर झा, राजीव रंजन मिश्रा, क्रांति कुमार सुदर्शन, जवाहर लाल कश्यप, श्री मती रूबी झा ( ई सभ गोटें अनचिन्हार आखरक http://anchinharakharkolkata.blogspot.comखोज छथि गजलक मामलेमे ),प्रशांत मैथिल, श्री जगदीश चंद्र ठाकुर " अनिल ", विनीत उत्पल, मुन्ना जी, गजेन्द्र ठाकुर आ हम स्वंय। आब हमरा ई पूर्ण विश्वास अछि जे बाल गजल मैथिलीमे पसरत आ नेना- भुटका केर जीहपर चढ़त।
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भक्ति गजल
जखन विदेह द्वारा बाल गजल विशेषांक निकलल रहए तखन केओ नै सोचने रहए जे एतेक जल्दिए गजलक नव प्रारूप " भक्ति गजल " विकिसित भए जाएत। मुदा से भेल आ ताहि लेल सभसँ बेसी धन्यवादक पात्र छथि ओ लोक सभ जे की गजलक निंदा करैत छथि। कारण जँ ओ सभ नै रहितथि तँ आइ गजले नै रहितै.. बाल आ भक्ति गजलक तँ बाते छोड़ू।
की थिक भक्ति गजल--
जहाँ धरि भक्ति गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे भक्ति केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर भक्ति मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ भक्ति गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे भक्ति गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। मे भक्ति गजल बाल गजले जकाँ छै।
की भक्ति गजल लेल नियम बदलि जेतैः
जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे भक्ति गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना भक्ति गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात भक्ति गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। किछु लोक आपत्ति कए सकै छथि जे गजल तँ दार्शनिक रहिते छै तखन ई भक्ति गजल किएक ? उचित प्रश्न मुदा हम कहब जे दर्शन आ भक्ति दूनूमे बहुत अंतर छै जकर चर्चा विद्वान सभ करिते रहै छथि तँए ई भक्ति गजल दर्शन बलासँ अलग भेल।
तारीखक हिसाबें भक्ति गजलक उत्पति केँ मानल जाएत जनवरी 2012केँ मानल जाएत जाहिमे जगदानंद झा मनु जीक भक्ति गजल आएल। मुदा ओहूसँ पहिने मिहिर झा द्वारा एकटा आएल जे ताहि समयकेँ हिसाबसँ ठीक छल मुदा बढ़ैत ज्ञानक सङ्ग ओहिमे काफिया आदिक दोष बुझना गेल। मुदा भक्ति गजल स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। मैथिलीक प्रारंभिके दौरमे भक्ति गजल शुरुआत भए चुल छल कविवर सीताराम झा आ मधुप जीक गजलसँ सेहो शुद्ध अरबी बहरमे। मने 1928 धरि भक्ति गजल पूर्ण रूपेण स्थापित भए गेल छल मैथिलीमे। तँ एतेक देखलाक पछाति आउ देखी कविवर सीता राम झा आ ओहि समयक किछु भक्ति गजल---तँ आउ देखी 1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत एकटा गजलकेँ जे की वस्तुतः " भक्ति गजल " अछि---
जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी
न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी
दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी
कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी
करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी
एकर बहर अछि-1222-1222-1222-122 मने बहरे हजज
नोट--१) कविक मूल वर्तनीकेँ राखल गेल गेल अछि। विभक्ति सभ अलग-अलग अछि जे की गलत अछि। २) कवि द्वारा चंद्र बिंदु युक्त सेहो दीर्घ मानल गेल अछि जे की गलत अछि। प्रसंग वश ईहो कहब बेजाए नै जे कविवर अपन गजल समेत सभ कवितामे चंद्रबिंदुकेँ दीर्घ मानि लेने छथि। शायद तँए पं गोविन्द झा जी सेहो चंद्र बिंदुकेँ दीर्घ मानै छलाह आ जकर खंडन भए चुकल अछि। ऐकेँ अलावे मधुप जीक भक्ति गजल अछि। विजय नाथ झा जीक भक्ति गजल अछि। कहबाक मतलब जे अनचिन्हार आखरक आगमनसँ पहिनेहे भक्ति गजल छल मुदा ओकर नामाकरण ( पहिल रूपमे जगदानंद झा मनु ) अनचिन्हार आखरक पछाति भेल। वर्तमान समयमे हमरा छोड़ि लगभग सभ गजलकार भक्ति गजल लीखि रहल छथि जेना , जगदानंद झा मनु, चंदन झा, अमित मिश्र, पंकज चौधरी नवल श्री, बिंदेश्वर नेपाली, सुमित मिश्र, श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी, श्रीमती इरा मल्लिक, ओम प्रकाश, बाल मुकुन्द पाठक, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल, मिहिर झा, प्रदीप पुष्प, अनिल मल्लिक, राजीव रंजन मिश्र इत्यादि-इत्यादि।
ऐ विषयमे आर अनुसंधानक जरूरति अछि ऐ छोट आलेख आ हमर छोट बुद्धिमे भक्ति गजल एहन विस्तृत वस्तु ओतेक नै आएल जतेक एबाक चाही। ओना हम फेर विदेहकेँ ऐ विशेषांक लेल धन्यवाद नै देबै कारण हमहूँ विदेह छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत।
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गजलक साक्ष्य
हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्य” तारानंद वियोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्ता लागि सकैत छैक जे मैथिलीमे गजलक आलोचना कहिआसँ शुरू भए गेलैक। ऐ छगुन्ताक कारण मुख्यत: हम दू रूपेँ देखैत छी पहिल तँ ई जे गजल कहिओ मैथिली साहित्यक मुख्यधारामे नै आएल दोसर-मैथिल-जन एखनो गजलक समान्य निअम आ ओकर बनोत्तरीसँ परिचित नै छथि। समान्ये किएक अपने-आपकेँ गजल बुझनिहारक सेहो हाल एहने छन्हि। बेसी दूर नै जाए पड़त। “घर-बाहर” जुलाइ-सितम्बर 2008ई.मे प्रकाशित अजित आजादक लेल “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथिली गजलपर चर्च” पढ़ि लिअ मामिला बुझबामे आबि जाएत। जँ विष्यान्तर नै बुझाए तँ थोड़ेक देरले तारानंद वियोगीक पोथीसँ हटि अजाद जीक लेखक चर्च करी। ऐ लेखक पहिले पाँति थिक- मैथिलीमे गजल लिखबाक सुदीर्घ परम्परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुदीर्घ तकर कोनो ठेकाना अजादजी नै देने छथिन्ह। फेर एही लेखक दोसर पैरामे अजित जी दूमरजामे फँसल छथि। ओ मैथिल द्वारा समान्य गप-सप्पमे गजलक पाँति नै जोड़बाक प्रथम कारण मानैत छथि। जे मैथिलीमे शेर एकदम्मे नै लिखल गेल। आब पाठकगण कने धेआन देल जाए। लेखक पहिल पाँति तँ अपनेकेँ धेआन हेबोटा करत जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ....।” सभसँ पहिल गप्प जे गजल किछु शेरक संग्रह होइत छैक आ दोसर गप्प ई जे जँ अजाद जीक मोताबिक शेर लिखले नै गेलैक तँ फेर कोन प्रकारक सुदीर्घ परंपराकेँ मोन पाड़ि रहल छथि अजादजी। ऐठाम गलती अजाद जीक नै मैथिलीक ओहि गजलकार सभक छन्हि जे गजल तँ लिखैत छथि मुदा पाठककेँ ओकर परिचए, गठन, निअम आदि देबासँ परहेज करैत छथि। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लिखल नै जाइत छैक। मुदा मैथिलीक धुरंधर सभ गजल लिखैत छथि। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइत छैक लिखल नै। पाठकगण गजलक ई निअम भेल। आब फेरो अजित जीक लेखकेँ आगू पठू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कए लिअ। अजित जी अपन संपूर्ण लेखमे जै शेर सभ मक्ता कहलखिन्ह अछि वस्तुत: ओ मक्ता छैके नै। पाठकगण मोन राखू, मक्ता गजलक ओहि अंतिम शेरकेँ कहल जाइत छैक जैमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्चारण थिक।) अपन नाम वा उपनामक प्रयोग करैत छथि। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाम वा उपनामक समान प्रयोग होएबाक चाही ई नै जे एकरा गजलक मक्ता तारानंदसँ होअए आ दोसर गजलक मक्ता वियोगीक नामसँ नामसँ।) मुदा आश्चर्य रूपेण अजादजी जै शेर सभकेँ मक्ता कहलखिन्ह अछि ओइमे कोनो शाइरक नाम- उपनाम नै भेटत। ओना अजितजी हिन्दीक सुप्रसिद्ध शाइर छथि तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि। हँ तँ ऐ लेखक संक्षिप्त अवलोकनक पछाति फेरसँ वियोगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्पष्टीकरणसँ, हमर नै वियोगी जीक। सभसँ पहिने ई जे अन्य मैथिली शाइर जकाँ वियोगीओ जी मानैत छथि जे गजल लिखल जाइत छैक। दोसर गप्प जे वियोगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी विचारसँ लगैत अछि जे भनहि वियोगीजी उर्दू सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ किन्नहुँ नै लिखैत हेताह,कारण, पाठकगण धेआन देल जाए। अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्त्र एकमतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठिन शब्दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्त भाषाक निअम जकाँ मैथिलीओ मे निअम छैक। तँए महाकवि विद्यापति अपन कोनहुँ गीतमे कृष्ण, विष्णु आदिक प्रयोग नै केने छथि। मुदा वियोगी जी अपन पोथीक नाम रखने छथि “अपन युद्धक साक्ष्य”। जनसमान्य युद्ध तँ कहुना बुझि जेतैक मुदा साक्ष्य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वियोगीजी अपनाकेँ अनअभिजात शब्दक प्रयोग मानैत छथि। आब हमरा लोकनि ऐ पोथीमे प्रस्तुत चालीसो गजलक चर्च करी। पहिले भाषाकेँ देखी। ओना वियोगीजी भाषा संबंधी गलती जानि बूझि कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छैक जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभब नै। एकर किछु उदाहरण प्रस्तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँतिमे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहिल पाँतिमे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति धधराक बदला ज्वलन। अही गजलक अंतिम शेरमे प्रयुक्त तन्वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबिऔ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि केर बदला दृष्टि, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्यक जगह विपरीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबिधाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदिली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंतिम शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरिआक बदला ज्योतसना। चौतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़-इत्यादि। ओना ऐ उदाहरणक अतिरिक्त हरेक गजलमे हिन्दी, उर्दू, संस्कृत आदि भाषाक तत्सम बहुल शब्दक ततेक ने प्रयोग भेल छैक जे गजलक मूल स्वर, भाव-भंगिमा, रसकेँ भरिगर बना देने छैक। तैपर वियोगीजी गर्व पूर्वक घोषणा केने छथि जे ओ ओइ परिवारक नै छथि जिनका संस्कारमे अभिजात शब्द भेटल हो। बिडंबना छोड़ि एकरा किछु नै कहल जा सकैए। जँ चालीसो गजलक भाषाकेँ धेआनसँ देखल जाए तँ हमरा हिसाबें वियोगीजी ऐ गजल सबहक मैथिली अनुवाद कए देथिन्ह तँ बेसी नीक हेतैक। भाषासँ उतरि आब गजलक विचारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त-तेसर गजलक अंतिम शेरसँ मामिला बुझबामे आबि जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे- लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँतिमे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्य कहब जे ई कोनो राजनीतिक विचार नै छैक जकर स्पष्टीकरण दए-वियोगीजी अपन पतिआ छोड़ा लेताह। ई विशुद्ध रूपे समाजिक विचार छैक आ ऐ विचारसँ समाजपर की नकारात्मक प्रभाव पड़लैक वा पड़तैक तकर अध्ययन अवश्य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारत्मक विचार ऐ संग्रहमे कम्मे अछि। संग्रहक किछु सकारात्मक विचार प्रस्तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। निश्चित रूपसँ वियाेगीजी एकरा परिर्वतनीय विचार रखलाह अछि ई कहि जे- देस हमर जागत अच्रक एना चलि ने सकत हारि लिखब झण्डा के आदमीक जीत लिखब। पाठकगण आजुक समएमे झण्डाक विपरीत गेनाइ सहज गप्प नै। तहिना चारिम गजलक तेसर शेरक पहिल पाँति- राम राज्यक स्थापना लेल भरत-लक्ष्मण झगड़ि रहला। कतेक सटीक व्यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबैक। ओतै आजुक भ्रमोत्पादक सरकारपर तै दिनमे लिखल अड़तीसम गजलक मतलाक पहिल पाँति देखू- राजनीति भटकल तँ डूबल मझधार जकाँ। विचार संबंधी प्रस्तुत उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे सकारात्मक विचार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि हेबैक अपने जे एकैटा सड़ल माछ.....। अस्तु आब ऐ गजल संग्रहक व्याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्पष्ट करब आवश्यक जे मैथिली गजल अखनो फरिच्छ भए कए नै आएल अछि जैसँ हम बहर (छंद) आदिपर विचार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफियाक प्रयोगपर विचार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्द अथवा शब्द समूहकेँ कहल जाइ छैक जे गजलक मतलाक (गजलक पहिल शेरकेँ मतला कहल जाइत छैक।) दुनू पाँतिमे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंतिम पाँतिमे सेहो समान यपे रहए। तहिना काफिया ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाइत जे रदीफसँ तुरंत पहिने आबैत हो जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्द लिअ, पहिल भेल अनचिन्हार ओ दोसरमे अन्हार। आब मानि लिअ जे ई दुनू शब्द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्दक तुकान्त “र” छैक। तँ एकर मतलब जे “र” भेल काफिया (काफिया मतलब तुकान्त बूझू) तेनाहिते मात्राक काफिया सेहो होइतैक जेनाकि- राधा आ बाधा दुनू शब्द आ'क मात्रासँ खत्म होइत अछि तँए ऐमे आ'क मात्रा काफिया अछि। “एहि” आ “रहि” दुनूमे इ'क मात्राक काफिया अछि। अन्य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्याकरण पक्षपर- ऐ संग्रहक किछु गजलमे काफियाक गलत प्रयोग भेल छैक- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफिया अछि “न” (भगवान आ सन्तान)। मुदा वियोगीजी आगू देासर शेरमे काफिया “म” (गुमनाम) केँ लेलखिन्ह अछि जे सर्वथा अनुचित। तेनाहिते सताइसम गजलक उपरोक्त “म” काफिया बदलामे “न” काफियाक प्रयोग। कुल मिला कए ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहैत छथि। हँ एतेक स्वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समएमे आएल जै समएमे गजलक मात्रा कम्मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्मे जकाँ छल।
9 सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त
"सूर्यास्तसँ पहिने" ई नाम छन्हि राजेन्द्र विमल जीक गजल संग्रहक। ऐ संग्रहक भूमिका केर अंतिम भागमे विमल जी लिखै छथि जे ई मैथिलीक पहिल संग्रह अछि जाहिमे 100 ( एक सए ) गजल प्रस्तुत कएल गेल अछि। मुदा हमरा जनैत 1985मे प्रकाशित गजल संग्रह " लेखनी एक रंग अनेक " जे की रवीन्द्र नाथ ठाकुरकेँ छन्हि ताहिमे कुल 109टा गजल देल गेल छै आ संगे-संग कता सेहो छै। तखन विमल जीक ऐ पहिल सन घोषणाकेँ की मतलब ? ई भए सकैए जे विमल जी एकरा नेपालीय मैथिलीकेँ संदर्भमे लिखने होथि मुदा तखन तँ आर गड़बड़ ............ कारण विमल जीक ऐ संग्रहमे कुल 4 ( चारि) टा गजल एहन अछि जे की दोहराएक गेल छै। मतलब जे जँ शुद्ध रूपसँ देखी तँ ऐ संग्रहमे कुल ९६टा गजल अछि। हमरा विमल जी एहन लोकसँ ई उम्मेद नै छल जे ओ " पहिल "केँ फेरमे पड़ि एहन काज करताह। इतिहासकेँ अपना फायदा लेल गलत करताह। आब नेपालक सुधि समीक्षक सभ कहताह जे की बात छै। हमर ई टिप्पणी मात्र इतिहास शुद्धता लेल छै। गजल संख्या 19 आ 20 एकै गजल अछि। 29 आ 30 एकै गजल अछि। 31 आ 33 एकै गजल अछि। तेनाहिते 56 आ 61 एकै गजल अछि।... जँ गंभीरता पूर्वक पढ़ल जाए तँ राजेन्द्र विमल जीक कथित गजल संग्रह " सूर्यास्तसँ पहिने " मे बहुत रास एहन रचना भेटत जे की मात्र गीत अछि गजल नै। पता नहि चलि रहल अछि जे गीतकेँ गजल संग्रहमे कोन काज छै।....................... राजेन्द्र विमल जीक कथित गजल संग्रहमे बहुत रास गीत सभ सेहो अछि। तँ देखल जाए कोन-कोन गीत अछि---पृष्ठ संख्या--1,2,3,14,19,20,23,27,34,42,आ 47क दोसर कथित गजल गीत अछि। तेनाहिते पृष्ठ संख्या--4,7,8,9,10,11,16,18,29,31,32,36,39 पर कथित रचना बिना बहरक गजल भए सकैत छल मुदा लेखक ओकरा कविता बला ढ़ाँचामे देने छथि। आन कथित गजल सभ गजलक ढ़ाँचामे अछि तँए हम ई मानबा लेल बाध्य भए जाइत छी जे कविताक ढ़ाँचा बला सभ कविता अछि। कारण विमल जीकेँ कविताक ढ़ाँचा आ गजलक ढ़ाँचामे नीक जकाँ अंतर बूझल छन्हि। आ एकर प्रमाण ओ अपन कथित संग्रहमे सेहो देने छथि।
चूँकि ऐ आलोचनाक प्रारम्भिक भाग २०१२क मध्यमे फेसबुकपर देने रही आ तइ क्रममे एहमर एही आलोचनापर किछु टिप्पणी आएल। ऐ टिप्पणीमे प्रेमर्षि जी एकरा प्रेसक गड़बड़ी कहलन्हि। चलू ओतए धरि ई बात मानल जा सकै छै......................मुदा गीत आ कविताकेँ गजल कहि पाठककेँ बेकूफ बनेबाक आ रेकार्ड बनेबाक सेहन्ता किनका रहल हेतन्हि। आचार्य राजेन्द्र विमल जीकेँ वा प्रेस बलाकेँ.......................................... तँए जँ कदाचित संख्या बला गड़बड़ी प्रेससँ भेल छै तैयो गीत आ कविता बला गड़बड़ी तँ विमले जीक छन्हि। दोसर गप्प जे मानि लिअ ई प्रेसक गड़बड़ी छै आ ऐ संग्रहक सभ रचना गजल अछि तैयो संदेहक घेरामे विमल जी छथि मात्र विमल जी नै मैथिली गजल ( कथिते बला ) संबंधी ज्ञान सेहो संदेहक घेरामे अछि कारण जखन १९८५एमे १०९ बला गजल संग्रह प्रकाशित भेलै... तखन विमल जीक घोषणा मात्र पहिल बला बेमारीक लक्षण अछि। तँ आब चलू कने फेसबुक परहँक ओइ बहस दिस जे की ऐ आलोचनापर जे की हमरा आ धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक भेल छल---( हलाँकि ई बहस ऐ ठाम हम ऐ द्वारे दए रहल छी जैसँ पाठक ई बुझथि जे मैथिलीमे आलोचना नै सहबाक जड़ि कते गँहीरमे गेल अछि)------------ o Dhirendra Premarshi अइ बातपर एम्हर बहस भऽ चुकल छै। प्रकाशकक गलतीक कारणे किछु गजलक पुनरावृत्ति भेल छै। मैथिलीमे ई बड भारी समस्या छै जे लेखनमे जतेक ध्यान देल जाइ छै तते प्रकाशनक क्रममे होबऽ वला काजमे नइ। जहाँतक इतिहासक जे बात अछि ताहि सन्दर्भमे शायद अहाँ जनैत हएब जे रवीन्द्रनाथ ठाकुरजीक पोथीमे गजल कत आ शायरी सेहो सम्मिलित छनि। नेपालक सन्दर्भमे पहिल सम्पूर्ण मैथिली गजल सङ्ग्रह अवश्य कहल जा सकैए। ओना मिश्रित संग्रहक रूपमे रामभरोस कापडि आ राजविराजक एक कोनो माझी सेहो गजलक पोथी बाहर कऽ चुकल छथि। about an hour ago • Unlike • 1 o Ashish Anchinhar कता आ शायरी छोड़ि कुल 109टा गजल देने छथिन्ह रवीन्द्रनाथ ठाकुर। प्रकाशक केर गलती भए सकै छै मुदा भूमिका तँ विमले जीक छन्हि।... about an hour ago • Like o Ashish Anchinhar शायद अहाँ ईहो जनैत हएबै जे कता, रुबाइ आ अन्य शायरी विधा ( खाली नज्म छोड़ि) गजलक अंतर्गत अबै छै।... about an hour ago • Like o Dhirendra Premarshi आशिषजी, अहाँ ओइ माध्यमसँ काज कऽ रहल छी जकर सम्पूर्ण नाथ, पगहा अहाँक हाथमे रहैए। मुदा छापा माध्यम एहन होइ छै जइमे अहाँक सभ कएल धएल पानि भऽ सकैत अछि जँ प्रेसमे काज कएनिहार किछु गडबड कऽ देलक तँ। भूमिका बाँकी सभ चीज छपि गेलाक बाद नइ भऽ सामान्यतया आरम्भेमे लिखल जाइ छै। विमल सर सएटा गजल आ तदनुरूप भूमिका लीखिकऽ छापऽ लेल देने रहखिन। प्रकाशनमे संलग्न व्यक्तिसभ मेहीँ आँखिएँ नहि देखि सकल हेथिन आ किछु गजलक पुनरावृत्ति भऽ गेल हेतै। अहाँक जानकारीक लेल कहि दी जे ई गलती सभसँ पहिने हमरा विमले सर देखौलनि। आब अहाँक कहब ई जे जखन अइ तरहेँ गलती भऽकऽ आबि गेलै तँ की विमल सर सभ किताबके जरा दितथिन? क्यो व्यक्ति जँ तकनिकी आ शारीरिक रूपेँ सभ कार्य स्वयं करबामे सक्षम नहि अछि तँ एकर मतलब ई नइ होइ छै जे ओकर कोनो एक बातकेँ लऽकऽ ओकरा लुलुआ देल जाए। अहाँक जानकारीक लेल इहो कहि दी जे विमल सरक दू सयसँ बेसी गजल जहिँतहिँ छिडिआएल पडल हेतनि। हँ, जँ अहाँके किछु कहबाके छल तँ ओइ पोथीक भूमिकाक सन्दर्भमे कहि सकैत छलियैक जे बहुत विद्वतापूर्णसन देखल जाइतहुँ पोथीमहक गजलसभसँ तादात्म्य स्थापित नहि कऽ पबैत अछि। 51 minutes ago • Unlike • 1 o Ashish Anchinhar अहाँ एकरा गलत संदर्भमे लए रहल छिऐ। ई मात्र इतिहास शुद्धता लेल छै। व्यतिगत रूपसँ ऐमे हम किछु नै कहि सकैत छी।.. 41 minutes ago • Like • 1 o Dhirendra Premarshi अहाँके पल्लवक गजल अंक भेटल? 37 minutes ago • Unlike • 1 o Dhirendra Premarshi जखन अहाँ 'प्रकाशक केर गलती भए सकै छै मुदा भूमिका तँ विमले जीक छन्हि।' लिखबै तँ ओकर आशय गलते लगै छै। अभियानीसभकेँ बहुतो बातक अन्तर्वस्तुकेँ सेहो बूझैत इतिहासक शुद्धिकरण करैत चलबाक चाही। 37 minutes ago • Unlike • 1 ऐ वार्तालापसँ एकटा गप्प ईहो निकलैए जे प्रेमर्षिजीकेँ गजल परम्पराक कोनो जानकारी नै छन्हि। अरबी-फारसी-उर्दूमे " दीवान " शब्दक प्रयोग कएल जाइत छै जैमे गजल, कता, रुबाइ, नज्म आदि सभ रहै छै। जेना दिवाने गालिब ( मने गालिब केर एहन संग्रह जैमे गजल, कता, रुबाइ, नज्म आदि संग्रहीत छै, तेनाहिते दीवाने मीर, दीवाने नासिख, आदि भेल। हँ, आधुनिक युगमे किछु उर्दूक गजलकार सभहँक एहनो दीवान अछि जैमे खाली गजल छै। मुदा तँए अहाँ ई कहि देबै जे नै खाली पोथीमे गजले रहबाक चाही तँ से कतौसँ उचित नै.......... एकटा गप्प आर प्रेमर्षिजी विमलजीक समर्थनमे एते धरि कहै छथि जे.." क्यो व्यक्ति जँ तकनिकी आ शारीरिक रूपेँ सभ कार्य स्वयं करबामे सक्षम नहि अछि तँ एकर मतलब ई नइ होइ छै जे ओकर कोनो एक बातकेँ लऽकऽ ओकरा लुलुआ देल जाए। " आब ई देखू जे जँ ऐ अधारपर हम विमलजीकेँ जँ लुलुआ (आलोचनाकेँ हम लुलुएनाइ नै बूझै छी ई प्रेमर्षिजीक विचार छन्हि) नै सकै छी तँ फेर मात्र एकटा अधारपर प्रेमर्षिजी रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ इतिहाससँ बाहर किएक क' देलखिन्ह? ऐ प्रश्नक उत्तर हम मात्र भविष्यसँ चाहै छी। ऐ वार्तालापकेँ कात करैत हमरा लोकनि फेर चली विमल जी पोथीपर। विमलजी अपन पोथीमे गजलक परिभाषा, तत्व, बहर आदिक वर्णन केने छथि (मुदा अपूर्ण रूपसँ खास क' बहरक लेल)। ओना ई विवरण अनचिन्हार आखरपर २००९सँ प्रकाशित छै आ विमल जीक ई पोथी २०११मे आएल छन्हि। विमलजी स्वयं इंटरनेट ओ फेसबुकपर छथि। मुदा विमलजी द्वारा देल गेल विवरण पढ़लापर ई प्रश्न अबैत अछि जे पोथीक भित्तर देल गेल गजल सभमे ई बहर, तत्व आदि किएक नै अछि ? एकर बहुत रास कारण भ' सकैए मुदा हमरा बुझने सभसँ प्रमुख कारण छै जे मात्र विद्वता देखब' लेल ई विवरण कतौसँ सायास लेल गेल छै ( मने ईंटा किनको, सीमेन्ट किनको आ घर बनल विधायक जीक)। तँए भूमिकामे देल गेल विवरण आ भित्तरक गजल सभमे दूर-दूर धरि ताल-मेल नै बैसैए। ऐ पाँति धरि अबैत-अबैत अहाँ सभ बूझि गेल हेबै जे ऐ गजल संग्रहमे बहुत झोल-झाल छै। मात्र व्याकरणक दृष्टिएँ नै नैतिक दृष्टिकोणसँ सेहो। ओना जँ भावना आ व्याकरण ठीक रहैत तँ ऐ संग्रहक किछु गजल नीक बनि पड़ैत जेना की ५३म गजल, ८३म गजल आदि। किछु गजल नीक जकाँ नेपालक राजनीतिकेँ घेरने अछि तँ किछु गजल पूरा मैथिली समाजकेँ । भाव आ बिंब तँ प्रायः मैथिलीक हरेक लेखकक नीक रहैत छनि तँ हिनकर किए खराप हेतन्हि। हिनको भाव पक्ष नीक छन्हि।
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मैथिली गजलक वर्तमान अनचिन्हार आखरक जन्मसँ पहिने (इंटरनेट पर) किछु गजलकार, समालोचक सभपर आरोप लगबैत छथि जे ओ गजलकेँ बुझि नै सकलाह। मुदा हमरा बुझने आलोचक सही छथि आ गजलकार गलत। कारण मैथिलीक किछु तथाकथित गजलकार सभ अपने गजलकेँ नै बूझि सकलाह। जकर परिणति अबूझ शेर सबहक रूपमे भेल। आ स्वाभाविक छै जे एहन-एहन गजलकेँ आलोचक नकारबे करतथि। वर्तमान गजल-- अ.आ. (अनचिन्हार आखर) क बाद गजल अबूझ नै रहल। से हम किछु शेरक उदाहरणसँ देब। 1) कोनो राजनीतिक पार्टी हो सभहँक स्थितिकेँ परखैत मिहिर झा कहैत छथि--- छोड़ि दिऔ हाथ देखिऔ केम्हर जाइ छै जेतै तँ ओ उम्हरे सब जेम्हर खाइ छै
कुन्दन कुमार कर्णजी कहै छथि--
नेताक भेषमें सभ कामचोर छैक तामससँ लोक देशक तेँ अघोर छैक
मुदा एकर परिणाम की भेलै सेहो कहै छथि कुन्दन जी-- चुल्हा गरीबके दिन राति छैक बन्द जे छैक भ्रष्ट घर ओकर इजोर छैक
ककरा करत भरोसा आम लोक आब निच्चा अकान उप्पर घूसखोर छैक
आ जखन सभ मसिऔते छै तइकेँ कुन्दन जी एना कहै छथि--
आलोचना करत 'कुन्दन' कतेक आर जे चोर ओकरे मुँह एत जोर छैक
ओमप्रकाश जी राजनीतिकेँ एना देखै छथि--
टाल लागल लहासक खरिहानमे गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए
बहुत मेहीं रूपसँ ओमप्रकाश जी आजुक राजनीति केर वास्तिविकता आ परिणामकेँ एकै शेरमे देखा गेल छथि। खेल भ' रहल छै मुदा सभ अकान बनल अछि आ ओमप्रकाश जी टाहि द' रहल छथि--- निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै
आ टाहिए देब असल गजलकारक धर्म थिक। मुदा जँ टाहिए देबए बला चोर हो त? त एहन परिस्थिति बेसी दिन बरदास्त नै कएल जा सकैए आ तँए ओम प्रकाश जी कहैत छथि---
मान-अपमान दुनू भेटै छै, ई मायाक थीक लीला, अन्याय केँ सदिखन दी मोचाड़ि, यैह थीक जिनगी।
श्रीमती इरा मल्लिक जी अइ स्थितिकेँ एना क' देखै छथि-- बाट जाम होय कि मगज विकास रुकबे करत बेइमान हो नेता ते, देश के नैया डूबबे करत
एही स्थितिपर स्वाती लाल जीक विचार देखू--
समाज केना सहि रहल छै तालिबानी पाएर पसारैत देखलौं निर्दोष सब के खून स ओकरा अपन पियास बुझाबैत देखलौं
आन'क घर के "भगत" शहीद होय देश राग हम गाबैत देखलौं शहीद सब के लास पर चढि क’ ओकरा कुर्सी पाबैत देखलौं
फेर स्वाती जी ऐ स्वरकेँ अकानै छथि--
सीता के गुण गान करै छि केलहुँ हुनके कात किनार चिर हरण देखैत रहलौं बैसल रहलौं भs लाचार
बाट चौबटिया जत्तै देखू आदर्श के छि प्रतिरुप अहां स्त्री जाती सँ धर्म अपेक्षित कर्म करै त होय प्रहार
2) विस्थापित भ' क' जीब कठिन। विस्थापित लोकक दुख जगदानंद झा मनु जीक स्थायी दुख छनि— सोन सनक घर-आँगन, स्वर्ग सन हमर परिवार छोड़ि एलहुँ देस अपन दू-चारि टकाक बेपार पर xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx कोना अहाँकेँ घुरि कहब आबै लेल बड़ दूर गेलहुँ टाका कमाबै लेल
3) एही समाजक एकटा आर पहलू पर उमेश मंडल कहैत छथि--- कियो ककरो नहि देखैए ऐ समाजमे मोने मन झगड़ाइए चलू घुरि चली 4) आधुनिक मीडिआपर क्रूरतम प्रहार करैत मैथिलीक दोसर मुदा सक्षम महिला गजलकार श्रीमती शांतिलक्ष्मी चौधरी कहैत छथि---
पापक पराकाष्ठामे जन्मै श्रीकृष्ण मीडिआ छथि जागल कंसक भेषमे आ एतबहि पर नै रुकैत छथि। आ फेरो कहैत छथि---
सोसल साइट पर करैत छै सेंसर के दाबी रे भाय अभिव्यक्तिक स्वच्छंद साँढ़ मुँह बन्हबै की जाबी रे भाय
5) प्रेम आ प्रेम जनित वेदना गजलक प्रमुख अंग थिक। बिना एकरा गजल झुझुआन लागत। वर्तमान गजलमे इहो भेटत। राजीव रंजन मिश्रजी कहै छथि— चान राति सन सजल मुस्कान हुनक मारुक जान प्राण हति रहल मुस्कान हुनक मारुक
आ इएह प्रेम जँ परिपक्व भऽ जाए तखन त्रिपुरारी कुमार शर्मा जीक शेर जन्मैए--- आँखि मिला कऽ हमरा सँ राह पकड़ लेलि अहाँS कोना कटै अछि दिन आब रचना गवाह अछि हमर मिहिर झा जीकेँ बूझल छन्हि जे ई वेदना किएक छै तँए ओ कहैत छथि--
हमरा अहाँ तोड़लहुँ सपना बुझि कऽ हमरा अहाँ छोडलहुँ अपना बुझि कऽ मुदा एतबो भेलाक बादो मैथिली ओ भाषा थिक जाहिमे विद्यापति सन कवि भेलाह। विद्यापति आशावादक सभसँ बड़का कवि छथि। आ हमर ओम प्रकाश जी एही आशाकेँ पकड़ि कहैत छथि--- झाँपै लेल भसियैल जिनगीक टूटल धरातल, सपनाक नबका टाट भरि दिन बुनैत रहै छी। अमित मिश्रा जी कहै छथि--
तरेगण लाख छै तैयौ नगर अन्हार रहिते छै बरू छै भीड़ दुनियाँमे मनुख एसगर चलिते छै आशा आ संघर्ष एक दोसराक पूरक छै--- तँए कुन्दन कुमार कर्ण कहै छथि--
बुझि संघर्ष जियबै जखन जिनगी शान अभिमान छी दार्शनिकता गजल स्थायी भाव छै--- हम ऐ पक्षकेँ राजीव रंजन मिश्र जीक शेरसँ देखाएब--
ऐ उदास मोनक हाल के बुझत ओलि सभकँ सभ सभतरि सधा रहल
चंदन झा बिल्कुल नव भावमे ऐ दार्शनिकताकेँ अकानै छथि--
नैनक काजर पर मोहित छै सगरो जगत जड़ैत डिबियाकेर मोनक मरम के बुझत ?
जँ अहाँ मैथिल छी ताहूमे साहित्यकार आ जँ बाढ़िक दर्द नै भेल तँ अहाँक मोजर सुन्ना। मुदा गजल ऐ दर्द के नीक जकाव देखर केलक आ राजीव रंजन मिश्रजीक अवाजमे बाजि उठल---
पूजल देवी सरिस मानि लोक धरि कपार कहियो कोशी त' कहियो बलान मारि गेल साम्प्रदायिकता लेल राजीव रंजन मिश्र जीक बयान छनि--
नै राम रहीमक झोक रहय नै वेद कुरानक टोक चलय
जँ गप्प मिथिला आंदोलन हुअए तँ गजल ओहूमे पाछू नै हटल। आगू बढ़ि पंकज चौधरी नवल श्री कहै छथि--
मैथिली भाषा अपन अछि मैथिलक बड़ पैघ तागत
एकता मैथिल जँ राखब सुतल मिथिला फेर जागत Xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx पकडू रेल चलू दिल्ली भरबै जेल चलू दिल्ली
धरना देब करब अनशन मिथिला लेल चलू दिल्ली
क्रांतिक धार "नवल" बहलै लड़बा लेल चलू दिल्ली
कुल मिला मैथिली गजल पूरा-पूरी विकसित भ' गेल अछि आ ई कोनो भावकेँ व्यक्त करबामे समर्थ अछि (ऐ लेखमे मात्र हम गजलक उदाहरण देलहुँ अछि। बाल गजल आ भक्ति गजल बाँकिए अछि।)। जकर बानगी उपरक उदाहरण सभमे देखल जा सकैए। मैथिली गजलक भविष्य पर हमर कोनो टिप्पणी नै रहत कारण हम कोनो ज्योतिषी नै छी। आ अतीतो पर नै कहब कारण ई सभकेँ बूझल छैक। ओना मंजर सुलेमानक आलेखक बाद मैथिली गजल निश्चित रूपे पाछाँ गेल (जीवन झासँ पाछाँ) जे स्वागत योग्य अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.कामिनी कामायनी- संग दिअ सदिखन अहिना ३.२.दुखन प्रसाद यादव-छीनाझपटी ३.३.सुबोध कुमार ठाकुर- केकरा सँ कहबै ३.४.ओम प्रकाश- गजल १-२ ३.५.गंगेश गुंजन- नेता जी बकवास करै छथि ३.६.राजदेव मण्डल ३.७.सन्दीप कुमार साफी ३.८.भालचन्द्र झा-आजुक बेटी कामिनी कामायनी संग दिअ सदिखन अहिना संग दिअ सदिखन अहिना ॥ आहाँ कहैत छी जी लेबै त / बिसरि जायब ओही गड़ैत क्षण के । अगिन ,पहाड़ ,खोह ,खधिया,/ बड़,पीपर ,ताड़ , आ पिच्छड़ी/ चढ़ल जतय स ,पिछड़ि गेलहू फेर / नित दिवसक अपमान भेटल बस / भरि पायल संसार स मन त / पड़ा रहल छल स्वास अगाड़ी/ तड़फ़ैत खसल जल बिन मच्छरी/ जरैत रौद /सुलगैत धरती / खलिए पएर,होश से गुम छल/ करी ने सकल विश्राम कनिकबो / चलबा लेल उध्यत सदिखन / चलईत जिमहर नेने मोसाफ़ीर / कठपुतरी छल ,जानै कक्कर/ मूक, बधिर सन ,बढ़ैत चलै छल / तजि रहल छल ,संग जे तन के / बांधी रहल ओकरा मन बलजोरी / किन्तु एक क्षण एहेनो आयल / लागल डेग बढ़त नहि एको / चट्टान लग खसल पड़ल त / दूर ठाढ़ दरिया मुसकायल / गरा सुखि अवरुद्ध पडल छल / अयलहू अहा सनेस नेने कीछु/ कहलहू अमृत रस अछि पी लू /बिसरि जाऊ पाछा के बाट सब / आगा के क्षण हसी का जीबू/ संग देब हम क्षण क्षण अहा के / तखन हमर हिम्मत छल घूरल/ देव दूत संग सुख सब पाओल / अहिना चलै चलाबू नैया/ गाबी हम झुमरि जी भरि के ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। दुखन प्रसाद यादव छीनाझपटी मारि-काटि बढ़ि रहल दिन-दिन छीनाझपटी जारी बुढ़िया-जुअनकीकेँ की कहूँ बुच्चीओक दिन छै भारी। की कहियौ दाइ मन होइए नै जीबी मरि जाइ कियो ने बँचतै आइ टोल-पड़ोसीया सभ भुताह छै आइ। बरहम देवक कठघारा टुटल दबाइ-उबाइ भेल चाेरी मोहम्मदोक कठघारा टुटल लूटल मशीन-तिजोरी। मोटर साइकिल घरसँ उठै छै शिक्षक पिटाइ खाइए बैंक-तिजोरी माल-खजाना थाना आइ लूटाइए। सरकारोक हाल छै खसता केकरा के देखैए ओसामा बीन लाखो-हजारो बन्दुक छतियबैए। रक्षक-भक्षक आइ लगैए केना कऽ जीबै दइया अन्ना-केजरीवाल की करता सभसँ पैघ रूपैआ। नेता-मंत्री सभ भ्रष्ट छै सभ भऽ गेलै चोरे सुपर बौस तँ सुपर चोर अछि जेकर सभठाॅ सोरे। चौदह-चौबीस नौजवान सभ दिशाहीन भऽ गेल अछि बकरी-पठरू खा खा सभ कोइ साँढ़ भऽ ढेकरैत अछि। शिक्षिकाक अपहरण होइत अछि रेप सरेआम भारी बुच्चिया-बुचनी लूटल जाइत अछि देखत के लचारी। पुलिस-आॅफिसर सभ देखैए छै विडम्बना भारी। सभकेँ अपन लिअए पड़त अपन जिम्मेदारी की कहियौ भाय चन्द्रशेखर लक्ष्मीवाइ बनही आइ। अजादी सबहक जान छै जन्मसिद्ध अधिकार हमर अजादी सबहक जान छै लोकतंत्रक धरोहरि छै तिलकक पैगाम छै। सोनाक चिड़ियाँ छल भारत विदेशोक नजरि गड़ल फूटा-फूटा कऽ हमरा लूटलक गुप्तक बगिया उजड़ल। पाँच सए बरख यवनक शासनसँ सभठाम कोहराम मचल दू सए बरख फिंरगी हमरा लूटि-लूटि बरबाद केलक। सोना-चानी कच्चा मालसँ भरल खजाना खाली छै ओकरा पाटैमे अखनि धरि देखियौ तँ तंगहाली छै। अठारह सए संतावनमे सिपाही विद्रोह भेलै बेरहम अंग्रेज कहूँ की कनेको ऐसँ झुकलै। गाँधीबाबा आन्दोलन सत्याग्रह देशमे जब पजरल शहर-गाम आ चौराहा सभठाम सबहक भृकुटी तनल। भीतर आन्दोलन बाहर नेता जीक फौजक तान छै ‘अंग्रेज भारत छोड़ू’ नेहरूचाचाक पैगाम छै। चन्द्रशेखर, खुद्दीराम बोस, पीर अली शहीद भेलै जालियाबाला बागमे शहीद खूनक नदी बहि गेलै। मजरूल हक जय प्रकाश, लोहिया जीक योगदान छै राजेन्द्र बाबू, मोतीलाल, बाबा साहैबक प्रतिदान छै। पनरह अगस्त उन्नैस सए सैतालीस भारत अजाद भेलै लालकिलासँ नेहरू चाचाक शांतिक संदेश भेलै। जाति-पाति-मजहबसँ उठि कऽ हमरा सभ एकजूट रही फूट-टूटसँ देश बँचा कऽ भारतकेँ मजगूत करी। डाक्टर कलाम, जगदीश चन्द्र, भाभाक तँ बस काम छै बढ़ू खूब आ देश बँचाबू महा शक्तिए हमर मुकाम छै। बिहार अछि सिरमौर धरा केर बिहार अछि सिरमौर धरा केर महिमा एकर महान छै गौतम वर्द्धमान महावीर विदेहक जे धाम छै। लोकतंत्रक जन्मभूमि लिच्छवीकेँ हम सभ मानै छी जनप्रिय सिरमौर कवि विद्यापतिकेँ हम जानै छी। नालन्दा केरि वर्णनमे यात्रीक फहियानक नाम छै गौतम वर्द्धमान महावीर विदेहक जे धाम छै। मण्डन मिश्र भारती जीकेँ देश-विदेशमे चर्चा छै प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू कहू केकर नै अर्चा छै। स्वतंत्रताक आन्दोलनमे बिहारक बड़ जोगदान छै गौतम वर्द्धमान महावीर विदेहक जे धाम छै। अंग्रेजक सिरदर्द वीर कुंमरक नै केतौ जोड़ा अछि योगेन्द्र शुक्ल बटुकेश्वर दत्त माए भारतीक तोड़ा अछि। खुद्दी राम बोस शदीह पीर अली वीर सपूतक गाम छै गौतम वर्द्धमान महावीर विदेहक जे धाम छै। राजकुमार लोकनायक जेपी लालू नितिशक गाम छै अनुग्रक श्रीकृष्ण कर्पूरी बाबू जगजीवन राम छै। अब्दूल बारी मजरूल हक विधान चन्द्रक पैगाम छै गौतम वर्द्धमान महावीर विदेहक जे धाम छै। सच्चिद्दा नन्द चन्दा झा ललित बाबूक बिहार अछि बी.पी.मण्डल सूरज बाबू भोगेन्द्र बाबू प्रयाग अछि। यात्री दिनकर रेणुजीकेँ हम सभ दिनसँ जानै छी हरिमोहन मणिपद्म जगदीश मण्डलकेँ पहचानै छी प्रभाकार डी.पी.यादव जुगनु जकाँ करैत प्रचार छै गौतम वर्द्धमान महावीर विदेहक जे धाम छै। दुखन प्रसाद यादव सम्पर्क- गाम-पोस्ट, धबही, भाया- नरहिया थाना- लोकही, जिला- मधुबनी पिन- ८४७१०८ (बिहार) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुबोध कुमार ठाकुर, चाकरी- सी.ए., हैंठा-बाली (मधुबनी) केकरा सँ कहबै रससँ भरल मन, पानिसँ भरल मेघ भेल कारी रंग, बरसत कहिया, हमरो मनक आस पुरत कहिया? नै प्यासले रहल, आ नै प्यासे मरल, अर्द्ध-फुलाएल रहल मनक बगिया, हमर प्यास मिझाएत कहिया? रंग-बिरंगक सपनासँ अछि सजल नैना, केकरासँ कहबै एतेक बियाना, के पढ़त हमर मनक सेहन्ता भरल पतिया, केकरासँ कहबै एतेक बतिया ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजल १ आइ किछु मोन पडलै फेरसँ किए भाव मोनक ससरलै फेरसँ किए टाल लागल लहासक खरिहानमे गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए आँखि खोलू, किए छी आन्हर बनल नोर देशक झहरलै फेरसँ किए चान शोभा बनै छै गगनक सदति चान नीचा उतरलै फेरसँ किए "ओम" जिनगी अन्हारक जीबै छलै प्राण-बाती पजरलै फेरसँ किए - ओम प्रकाश (दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ) (फाइलातुन-फऊलुन-मुस्तफइलुन) - १ बेर प्रत्येक पाँतिमे २ कहियो तँ हमर घरमे चान एतै नेनाक ठोर बिसरल गान गेतै निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै मानक गुमान धरले रहत एतय नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै सुर ताल मिलत जखने सभक ऐठाँ क्रान्तिक बिगुलसँ गुंजित तान हेतै हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ छोडब किया, कियो की दान देतै - ओम प्रकाश (दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ) (मुस्तफइलुन-मफाईलुन-फऊलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गंगेश गुंजन नेता जी बकवास करै छथि जीहे टा ओ पेटक पाछू यथा जमीनो नाश करै छथि
कहता हरदम काज बहुत छनि किछुओ टा ने खास करै छथि
जेहने नेता तेहने जनता पाँच बर्ख अवकाश करै छथि
भोटजोगाडू राजनीति में सब कर्मक अभ्यास करै छथि
अज्ञानी पब्लिक सुनि रहले नेता जी बकवास करै छथि
लोक ठकयला जाही ठक सँ तकरे फेर विश्वास करै छथि
झरकल जनजीवन अकाल मे नेताजी मधुमास करै छथि
लोकक हृदयक हरियर धरती सपना सँ आकाश करै छथि
नव गुलामीक बेधल गुंजन मुक्तिक फेर प्रयास करै छथि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डल स्वरमे बास एक दिन आएल रही अपने काम सुनने रही अहाँक नाम कल्पित छल जे मनमे रूप दरस भेल छल अधिक अनूप मनमे उठैत रहल आह परबशताक बेड़ीमे कटैत काह जाए पड़ल दूर संग रहल छाह पुन: एलौं, नै छेलौं बेपरबाह केतौ ने चलि रहल पता अहाँ केतए भऽ गेलौं निपत्ता। लोक कहैत अछि- अहाँ उड़ि गेलौं आसमानमे डूमि गेलौं शून्यक महागाणमे खोजि रहल छी बेर-बेर आबि बेचैन छी दरस नै पाबि ताकि रहल छी मेघ बनि अकासमे अहाँ निश्चय हएब अहीठाम आस-पासमे जे स्वर हएत लग-पास ओहीमे हएत अहाँक बास अहाँ नै भेटब किन्तु भेटत अवाज जे खोलि देत अहाँ सभटा राज। डायरीक पन्ना-१ बनेलौं एकटा महल जइमे छुच्छे पैसा गहल। खन-खन पैसाक खनक शान्ति उड़ि गेल सुनिते झनक परेम किअए दुख सहत ओ किएक असगरे रहत दुनू भागि गेल हमर सुतल आँखि जागि गेल मात्र पैसा खन-खना रहल अछि हमरा पाछू गनगना रहल अछि। राति-दिन केने परेशान अकच्छ भऽ गेल हमर कान सुतलोमे सुनैत छी वएह तान जगलोमे िनकलए जान तँए हम भागि रहल छी किन्तु, कहाँ जागि रहल छी? डायरीक पन्ना-२ एकर की होएत जाँच ई तँ पूरा-पूरी छै साँच तँए ने भेल बेपरवाह नै चाही कोनो गवाह। यौ सुनि लिअ राज ऐसँ नै चलत काज केहनो अछि बात अहाँक चाही संग-साथ लगा देत कोनो लाथ किन्तु, नै बनत बात केतबो होएत साँच लगि जाएत नाच जनबाक लेल करबे करत जाँच केतबो चिचियाएब निकलैत रहत आह साँचोक लेल दिअ पड़त गवाह। डायरीक पन्ना-३ हमर इतिहास अछि हमरे पास जइमे देखि सकै छी हम अपन धरती आ अपन अकास अपन सिरजन आ अपन नाश। पूर्वजक कएल काज छीनल आ छिनाएल ताज राखब गिन-गिन बरख, मास आ दिन नीक अधलाह जे केने छी काम से नै अछि दोसरठाम सभटा हमर भूत बनि-बनि दूत अछि हमरे पास हमर इतिहास। डायरीक पन्ना-४ केतेक गोट केलक सुधारैक प्रयास अन्तमे टूटि गेल सबहक आस केते उपाए लगबैत रहल पल-पल सभ भऽ गेल अन्तमे असफल हारि कऽ हमरा छोड़ि देलक ऐ काजसँ मुँह मोड़ि लेलक हुअए लगल चारूभरसँ आघात ठोकरसँ भऽ गेलौं कात बिलटि गेल सभ राज-काज हँसैत अछि आब सकल समाज। आबो जँ नै करब सुधार डूमि जाएत घर-पलिबार सोचैले भेलौं नाचार समए कहैए आब करू विचार सोचै छी जँ ऐ दिस लाजसँ झूकि जाइत अछि शीश नै छै दोसर कोनो आधार स्वयं कऽ सकै छी अपन सुधार। डायरीक पन्ना-५ जेतए केतौ गेलौं कोनो निमित्त होइत रहल हमरे जीत केलौं चढ़ाइ देर-सवेर जीतते रहलौं बेर-बेर हमरा सोझा सभ गेल हारि संबन्धी सभकेँ देलौं तारि सबहक गाड़ल खुट्टाकेँ देलिऐ उखाड़ि हमर धक्का के लेत सम्हारि नामक डंका बजए लगल हमरे बातपर सभ चलए लगल ठमकि गेलौं अपने लग आबि कोनो थाह नै रहल छी पाबि हमरा सामने सभ गले हारि हम गेलौं अपनेसँ हारि। डायरीक पन्ना-६ कुरसीक पौआ पीठमे गड़ल हम छी बेकूफ जकाँ पड़ल कहिया ई पीठपर सँ हटत कहिया ई भार घटत अपन दुख केकरा कहब आब केते कष्ट सहब जानवर सन कुरसीक खुर केने जाइत अछि पीठमे भूर हटा दिअ निसाँस लेब आबो नै खड़ा हुअए देब उठि आब हम ठाढ़ हएब समैकेँ एना नै गमाएब ठाढ़ होइते कुरसी टुटत भऽ सकैए माथो फूटत भीतरसँ उठि रहल रोष हमरा नै देब पाछू दोष आब नै हम सुतले रहब नै एना झुकल रहब। डायरीक पन्ना-७ केतेक खोजलौं श्रेष्ट मीत जे करत हरपल हित पुरान छुटैत रहल नव-नव भेटैत रहल नित। सभ अपने स्वार्थे परेशान गबैत रहैए अपने गान अपनेमे जँ एतेक डुमत केतएसँ रखते प्रीतक मान। किन्तु, आइ भेटल हमर श्रेष्ट मीत जे हमरे भीतर गबै छल गीत। डायरीक पन्ना-८ रहै छल जे संग-साथ करै छेलौं ओकरासँ बात। “चोटाह छै ई राह ई गाछी छै बड़ भुताह।” पूरा डरा गेल छल लोक बाट चढ़िते धऽ लइ छेलै शोग हम छेलौं पूरा निडर लोककेँ भऽ गेल छेलै डर अन्हार होइते काँपै थर-थर सबेरे भागि जाइत छल घर। भऽ गेल छै आइ अबेर अन्हरिया लेने छै रस्ता घेर भरल मेनमे विकार बनि नव-नव अकार आगू शब्द गन-गन राति भेल सन-सन लोककेँ डरबैत छेलौं आइ हमहूँ डरा गेलौं बीच बाटमे भुतही गाछी आइ हमहूँ घेरा गेलौं। डायरीक पन्ना-९ हिल-मिल फेर फुलवाड़ी लगा दियौ यौ रंग-रंग बिरंगक पुष्प सजा दियौ यौ एक-एक गाछक अपन इतिहास छै एक-एक फूलक अपन सुवास छै सुगंधसँ चारूभर गमका दियौ यौ हिल-मिल......। सभमे एक जान छै एक तान छै सभमे एक मान छै सभमे एक गान छै सूखलकेँ जलसँ पटा दियौ यौ हिल-मिल......। सभमे एक उल्लास छै सभमे रस छै आ रसाभास छै मौलाइलकेँ फेरसँ हरिआ दियौ यौ पवन संगे पुष्पकेँ नचा दियौ यौ हिल-मिल......। केतए छी हम सैकड़ा नहि हजारक हजार भरल छै भूतसँ बजार कीनैत-बेचैत मनुखक मासु-हाड़ किछु चिचिआइत किछु खसौने घाड़ किछु अछि शान्त किछु करए तकरार किछु हँसैत आ किछु कनैत जार-जार दाँत-मुँह चमकाबैत तुरंते भऽ जाइत अछि पार। हम नुकाएल छी ओहीठाम जेतए सभ किछुक लगि रहल दाम नोंचि नेने अछि ओ सभ हमरा देहक मासु-हाड़ अंग-अंग छोड़ा कऽ कऽ देने अछि तार-तार नेने हाथमे हाड़ हँसैत अछि बेसम्हार हम देखै सभ किच्छो कानै छी जार-जार। अजगर ससरैत अछि सर-सर हमरे दिस ई अजगर नेने हमरे देहक नाप मुँह बौने अजगर साँप भुखाएल छै तन कामनासँ भरल मन एकरा के रोकि सकत के बीचमे टोकि सकत तीव्र छै गति चढ़ल छै कुमति बँचैले चलए पड़त चाल नै तँ निश्चय धऽ लेत ई काल करए पड़त कोनो उपचार नै तँ हमरा घोंटि मारत ढेकार मुँहसँ नै फुटए बकार बढ़ा लेलौं अपन देहक अकार गिरत हमरा तँ फटतै पेट मुइल बापसँ हेतै भेँट। अकासमे ठाढ़ पंछी अकासमे उड़ैत पंछी अँटकि गेल अछि जेना मतिभ्रम भेलासँ ओ भटकि गेल अछि चला रहल अछि पाँखि एकटक तकैत आँखि जोर लगौने बढ़बाक लेल मंजिलपर चढ़बाक लेल ने आगू बढ़ैत अछि ने पाछू भऽ गेल अछि थीर बन्हा गेल सभ शक्ति लगि गेल केहेन पीर कहि रहल ओकर मति जे हम बढ़ि रहल छी अपने गति। एकटक तकैत आँखि आ मन आकि हमहूँ बनि गेलौं ओकरे सन? बीआ केर पता सोचैत-सोचैत फाटए हीया केतए भेटत ऐ गाछक बीआ। ई अनचिन्ह गाछ हमरा सोझहा करए नाच देखि कऽ मन करए जाँच नै भेटत बीआ तँ नस्ल भऽ जाएत नास टूटि जाएत मनक आस तकैत-तकैत भेल छी निराश बितल जाइत बरख आ मास ओकरे भऽ सकैत अछि पता जेकरासँ छै असली नाता वएह कहि सकैत अछि असली अता-पता। कटैत गाछ हड़हड़ाइत कटि कऽ गिरैत गाछ चिचियाइत बजल जे छल साँच। “हम तँ करैत रहलौं सुकरम कहियो नै केलौं कुकरम करैत रहलौं उपकार जइसँ अहाँक सपना हुअए सकार अहाँ करैत रहलौं उपभोग हम करैत रहलौं फल-फूल आदिसँ सहयोग हम केलौं न्याय अहाँ केलौं अन्याय हम केलौं पोषण अहाँ केलौं शोषण टुटैत कटैत सहैत अतियाचार चुपचाप अहींक लेल तैयार सतत कर्मरत रहलौं हम कहियो नै केलौं घमण्ड तैयो अहाँ सभ मिलजुलि कऽ देलौं हमरा प्राणदण्ड हम केहेन छी उदण्ड दोखी नै छी तैयो दण्ड।” नमन हे बसुन्धरे शत् शत् नमन अहाँक आँगन उपजै सुमन जइसँ उड़ैत सुगन्ध भऽ िनर्बन्ध गमकि रहल दिग-दिगन्त हे बसुन्धरे शत् शत् नमन। अहींक चमनक छी हम कण अहींक कृपासँ बनल अछि तन धीरज, शक्ति दिअ हमरा मन अहींक समरपित अछि ई तन हे बसुन्धरे शत् शत् नमन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सन्दीप कुमार साफी कविता १ बैशाखमे दलानपर आउ यौ यार, खेलाइ छी तास बैस कऽ अखन करब की चलू करै छी टेम पास बेर झुकतै तँ जाएब करैले घास चण्डाल सन रौद लगैए चारि बाजऽ जा रहल अछि लगैए अखन एक बाजल अछि महींस खोलब ओइ बेरमे पोखरि लऽ जाएब नहाबैले सुतलोमे गरमसँ नीक नै लागए खाटोमे उड़ीस करैए कछर-मछरसँ नीन्द नै अबैए पुरबा हवा सेहो पेट फुलाबए घामसँ देखू गंजी भीज गेल कौआ डाढ़िपर लोल बबैए मेना जामुनपर झगड़ा करैए बगड़ा दलानपर ची-चू-ची-चू गीत सुनाबए एहन गरम नै देखलौं कहियो रातिकेँ मच्छड़ दिनकेँ माँछी तंग करैए आउ यौ यार खेलाइ छी तास २ सेवा मन होइए करितौं बेटाक बियाह पुतहु लेल हिक गरल अछि काज करैत काल आब देह थाकि गेल भानस करैक शक्ति नै अछि बेटी भेली, अप्पन सासुर गेली असगर अंगनामे नीक नै लगैए होइत पुतहु तँ एक हाथ सेवा करितए मुदा एगो बातक डर लगैए पुतहुक चर्चा देख टोलमे अही सेवासँ चित्त हराइए पढ़ल-लिखल कनियाँ सभ गेल आदर सत्कार सभ बिसरि गेल आठ बजेमे, सुति कऽ उठए चुल्हा अंगना सभ, अहिना पड़ल-ए के करए ससुर-भैंसुरक परदा रीत-रेवाजक उड़ाबए गरदा एकर देखसी करए, सभ कनियाँ ई नै लागए ननदि, साउसकेँ बढ़ियाँ ऐ पढ़ल लिखलसँ घास-छिलनी नीक मन होइए करितौं बेटाक बिआह पुतहु लेल हिक गरल अछि। ३ वर बिकाय लगनमे वरक रेट नै पुछू यौ बाबू मारा माँछक जेना दाम बढ़ैए कनीको पढ़ल-लिखल रहल तँ बेटाबला अप्पन मोँछ सीटैए लड़कीबलाक खेत बिकाइए देखू जमाना ताल ठोकैए दुल्हाक डिमाण्ड अछि, पाइ सन करीजमा लिखल-पढ़लमे सभसँ तेज पँचमामे पाँच बेर अठमामे आठ बेर दसमामे दस बेर लड़का फेल एहनो लड़का लगनमे बिक गेल वरक रेट नै पुछू यौ बाबू मारा माँछ जेना दाम बढ़ैए। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। भालचन्द्र झा आजुक बेटी कराटेक किलासमे ओ एखने-एखने किछु नब गुर सिखलक अछि साइत। अकास दिस पएर उठा कऽ जखन ओ किक् मारैत छैक, तँ करेज मुँहमे आबि जाइत अछि। जे कहीं अकासमे भूर ने भऽ जाइ। परम्पराकेँ गोदड़ी बना कऽ सनातन धर्मक रक्षा करएबला ई अकास, आब जर्जर भऽ गेल छैक। नब जमानाक कराटेसँ- मजगूत बनल पएरक छोटछिनो अगातसँ, कऽ सकैत अछि ओकर नोकसान। भने जर्जरे… मुदा आइयो ओ तनल अछि कतेको लोकनिक छप्पर बनि कऽ। ऐ आश्रित सभक क्रोधसँ- आबि सकैत छैक बुइकम्प। मौला सकैत अछि हुनका लोकनिक क्रोधसँ, नव अंकुरक डिम्भी। सेकल जा सकैत अछि कतेको राजनैतिक रोटी- महिला सशक्तिकरणक नामपर। बेटा-बेटीक सनातनवाद- हिला सकैत अछि तथाकथित समाजिक अवधारणाकेँ। तैओ- ओकर ऐ तरहक आबेसकेँ देखि कऽ आश्वस्त होइत छी हम, मोनक कुनू कोन्हमे। जे आब ऐ नपुंसक फुफकारसँ, छोटकारा पाबक गुर सीखि लेलक अछि ओ। कराटेक किलासमे… (भालचन्द्र झा, २००८) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. ज्योति झा चौधरी २.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ३. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी) १. ज्योति झा चौधरी २. राजनाथ मिश्र चित्रमय मिथिला स्लाइड शो चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ३. उमेश मण्डल मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती १. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) मोहनदास (मैथिली-देवनागरी) मोहनदास (मैथिली-मिथिलाक्षर) मोहनदास (मैथिली-ब्रेल) २.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद छिन्नमस्ता ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि) भगता बेङक देश-भ्रमण ४.तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद डॉ. शम्भु कुमार सिंह द्वारा पाखलो बालानां कृते अमित मिश्र हाथी गेलै भोज खाए
एक जंगलमे पण्डीत हाथी खाली सदिखन पेटक भाथी एक बेर बकरी केलकै व्रत भोजनमे एलै हाथी मस्त भोजनमे आलूक परौठा खा रहलै चाटि-चाटि औंठा आँटा खतम आलू निंघटल पेट एखन आधो नै भरल घामे-पसीने बकरी कानै खाली पेट तँ भोजन जानै अन्तमे बकरी केलक प्रणाम धन्य प्रभु !आब दियौ विराम हाथी बाजल "हम नै मानबौ" और खेबौ, घरो लऽ जेबौ कानै बकरी, हाथी बजा कऽ खाइ छै हाथी सूँढ़ नचा कऽ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पडला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT TUTOR डॉ. अमर जी झा भर्तृहरेः भाषाशास्त्राीय योगदानम्
संस्कृतवाघ्मये भाषातत्त्वचिन्तनं वैदिकालादेव भवति। ऋग्वेदस्य वाक्सूक्तेऽपि भाषायाः विविध्स्वरुपानां विवेचनमस्ति। अस्मिन क्रमे यास्कस्य निर्वचनम् पाणिनेः प्रकृति-प्रत्ययस्य विश्लेषणम, पतञ्जलेः च भाषातत्वनिदर्शनम् प्रशंसनीयं वर्त्तन्ते। भतृहरिणाः स्वकीयेषु ग्रन्थेषु शब्दतत्वस्य ब्रह्मस्वरूपस्य विवेचनं स्पष्टतया, प्रामाणिकतया, सूक्ष्मतया, वर्णिताः सन्ति। भतृहरिणाः वाक्यपदीये भाषायाः विवेचनक्रमे पञ्चमं शतेऽव शब्दब्रह्म एव परमतत्त्वरूपे स्थापितः। भतृहरिमते शब्दतत्त्वज्ञः अपवर्गमपि प्राप्तुं शक्यते। पाश्चात्यसंदर्भे विंशतितमे शते आध्ुनिकभाषाशास्त्रास्य जनकः सोस्यूरः भाषाशास्त्रास्य स्वतंत्रारूपे सामाजिकसत्ताविषयकमतानां प्रिितपाद्यन्ते। भतृहरिः द्वितीयकाण्डे अखण्डः, निरवयः वाक्यस्पफोटस्य सिद्धान्तस्य प्रतिपादनं कृतमऽस्ति। अस्मिनमतेः वाक्ये पदम्, पदे वर्णाः, वर्णे खण्डानाम् भेद केवलं भाषाशिक्षणार्थं भवति न तु वाक्यार्थबोध्नाय। नॉमचॉम्सकीमहोदयः अपि ‘सिन्टेक्टिक स्ट्रक्चर्स’ ग्रन्थे भाषाशास्त्रास्य मुख्यविवेच्यविषयरूपे ‘वाक्यमेव मनुते’। भर्तृहरिः वाचः चत्वारिरूपाणि परापश्यन्तिमध्यमावैखर्याश्च विश्लेषणं करोति, किन्तु पाश्चात्यविद्वांसः वाचः लांग ;लैंगुएजद्ध पेरॉल ;स्पफीचद्ध इति मध्यमा वैखरी पयर्न्तमेव सन्ति। भर्तृहरिमतेः सर्वेः सामाजिकव्यापाराः भाषाश्रिताः सन्ति अपि च भाषारहिता समाजे कोऽपि प्रत्ययस्यावधरणा न भवितुं शक्यते। सोस्यूरमहोदयः अपि भर्तृहरेः मते आध्ृत्य भाषायाः सामाजिकपक्षाणां महत्त्वं प्रतिपाद्यते। सोस्यूरमहोदयेन प्रतिपादितम् यत् ध्वनिसमूहेन वाक्यविन्यासेन वा अर्थग्रहणं, अर्थनिर्धरणं, शुद्धाशुद्धविचारणञ्च लोकव्यवहारश्रितमेव वर्त्तन्ते। आचार्यभर्तृहरिणा अपि शब्दार्थमध्ये नित्याः सम्बन्धः स्वीकीर्यते। तन्मतानुसारं शब्दार्थसंबंध्ः रूढ़ं वर्त्तते। नित्यसम्बन्ध्ेनेव अर्थबोध्ः भवति अन्यथा तु शब्द केवलं ध्वनिसमूहः एव वर्त्तते। परन्तु आध्ुनिकभाषाशास्त्राविचारकाः रूढं-यादृच्छिक मध्ये ;(Conventional Arbitrary) भेदं स्वीकीर्यते। आचार्य भर्तृहरिमतेः सर्वं ज्ञानं शब्देन भासते। आध्ुनिकभाषाशास्त्रोऽपि संकेतक-संकेतितार्थ रूपे भर्तृहरेः अयं सिद्धान्तः एव आधररूपे वर्त्तते। तन्मतानुसारं शब्दः ध्वन्यात्मकः ;(Acoustic) अर्थश्च प्रत्ययात्मकः वर्त्तते। चॉम्सकीमहोदयः अपि भाषातत्त्वनिरूपणसन्दर्भे अर्थतत्त्वस्य महत्त्वं मनुते। आचार्यः भर्तृहरिः भाषाशिक्षणस्य स्वाभाविकप्रक्रियां निदर्शयति यत् अस्मिन संसारे सर्वे क्रियाकलापाः शब्दाश्रिताः वर्त्तन्ते। अयं संस्कारः बालके पूर्वाहितरूपे विद्यते। यतोहि अस्याभावे बालकः प्रथमतः वक्तुं केन प्रकारेण प्रयत्नं कर्तुं शक्यते यथा- वायोः उर्ध्वमुञ्चनं, करणविन्यासादि। निष्कर्षतः भर्तृहरिकृतवाक्तत्वस्य सूक्ष्मविश्लेषणं अध्ुनाऽपि आधररूपे अनुकरणीयं वर्त्तते।
संदर्भ 1. ऋग्वेद, परोपकारिणी सभा, अजमेर 1990 2. वाक्यपदीय ;वृत्ति एवं पद्धति सहितद्ध, के.ए.एस. अय्यर, पूना, 1966 3.Sanssure, F.D. : Course in General Linguistics 4. सं. कुमार पुष्पेन्द्रः भारतीय आचार्यों का योगदान, नाग प्रकाशन, दिल्ली, 1985 5. अय्यर, के.ए.एस., भर्तृहरि, हि.अ.- रामचन्द्र द्विवेदी, राजस्थान, हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर, प्रथम संस्करण, 1981 1. उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शणोत्येनाम्। उतो त्वस्मै तन्वं विस्रसे, जायेव पत्ये उशती सुवासाः।। ट्ट. 10/71/4 2.अनादिनिध्नं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम्। वा.प. 1.1 3.तस्य प्रवृत्तितत्त्वज्ञस्तद् ब्रह्मामृतमश्नुते।। वा.प 1.123 4.Language has an individual Aspects and Social Aspects; Saussure, F.D., Course in General Linguistics, P. 9. 5.पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च। वाक्यात् पदानामत्यन्तं प्रविवेको न कश्चन्।। वा.प. 1.73 6.सं. कुमार पुष्पेन्द्र, भारतीय आचार्यों का योगदान, पृ. 124 7.क. इतिकर्त्तव्यता लोके सर्वाः शब्दव्यपाश्रयाः। वा.प. 1.113 ख. न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते। वा.प. 1.115 8.सं. कुमार, पुष्पेन्द्र भारतीय आचार्यों का योगदन, पृ. 120 9.नित्याः शब्दार्थसंबंधः तत्राम्नाता महर्षिभिः। 10.विषयत्वामनापन्नैः शब्दैः नार्थः प्रतीयते। न सत्तयैव तेऽर्थानम् अग्रहीता प्रकाशकाः।। वा.प. 1.56 11.न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते। अनुबिद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते।। वा.प. 1.113 12.कुमार, पुष्पेन्द्र, आचार्यों का योगदान, पृ. 127 13.इतिकर्त्तव्यता लोके सर्वा शब्दव्यापाश्रय। या पूर्वाहित संस्कारो बालोऽपि प्रपद्यते।। वा.प. 1.115 आद्य करणविन्यासः प्राणस्योर्ध्वसमीरणम्। स्थानानामभिधतश्च न विना शब्दभावनाम्। VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
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