ISSN 2229-547X VIDEHA ‘विदेह'१४९ म अंक ०१ मार्च २०१४ (वर्ष ७ मास ७५ अंक १४९) ऐ अंकमे अछि:- (लघुकथा संग्रह) प्रस्तुत कथा पुष्पमाल ओइ कथा प्रेमीकेँ समरपित जे कथ्य–कथन कथाक मर्मकेँ पकड़ि कथापान करै छथि। अघटमे खसल ओइ फूल सदृश्य कथाकेँ कथे-प्रेमी ने कोमल पंखुर पकड़ि जल गंगामे स्नान करा पवित्र पग पहिरा देवसिर चढ़ै सदृश्य बनबैत। ओइ मर्मभेदी शिकारीकेँ तहेदिल समरपित। कथाक सत्तरि पाइक मोल 00 चोरूक्का झगड़ा 00 अपसोच 00 पतझाड़ 00 झीसीक मजा 00 मति-गति 00 रिजल्ट 00 अपन सन मुँह 00 सुमति 00 फेर पुछबनि 00 माघक घूर 00 खर्च 00 अखरा-दोखरा 00 पेटगनाह 00 बड़की माता 00 धरती-अकास 00 बकठाँइ 00 पाइक मोल हथिया नै बरसने बाड़ी-झाड़ीक काज अगते शुरू भऽ गेल। काल्हि कोजगरा छी। ओना समए रौदियाह जकाँ भऽ गेल अछि। मुदा समैओक (मासोक) तँ अपन गुण-धर्म होइ छै। चटाएल ओस रहितो जमीनमे ठंढ़ तँ पसरिए गेल अछि। भोरुका सुरूजक जे सोहनगरता एबा चाही से तँ आबिए गेल अछि। बाध-बोनमे भलहिं रौदी बूझि पड़ैए, मरहन्ने-मरहन्ना देखि पड़ैए मुदा बोन-झाड़क रूप तँ ओते नहियेँ बिगड़ल अछि। तहूमे जाड़क उसरन थोड़े छी जे पालाक पल्ला पड़ि ठिठुरल रहत, वरसातक ने उनाड़ी छी! सरलो भुन्ना तँ रहुक दुना! लत्तीओ-फत्ती आकि झाड़ो-झूड़ जे अगते अर्थात् वरसातसँ पहिने पुरना वस्त्र बदलि नव वस्त्रक संग नव कलशक नव मुड़ीमे नव फूलक संग नव फलोक जोरन तँ जोरनाइए गेल अछि। नव सुरूजक संग रविकान्त नव दिनक नव काज दिस नजरि उठौलनि तँ देखि पड़लनि जे दारीमक बाड़ी जाएब जरूरी अछि। केते रंगक कीड़ी-मकौड़ी, उपद्रव शुरू कऽ देने हएत। बिना किम्हरो तकने ओ दारीमक बाड़ी विदा भेला। बाड़ीक मुहाँनीबला गाछपर नजरि पड़िते दीपकक चिट्ठी मन पड़लनि। मन पड़लनि दुर्गापूजाक छुट्टीमे आएल सिनेहकान्त। कलशथापने दिन चिट्ठी देने छल। जइमे लिखल छेलै जे ‘बीसम दिन परीछाक फारम भराएत, कौलेजक पछिलो बाँकी जे अछि सेहो लागत।’ नाओं लिखौला पछाति एको-पाइ देनौं ने छेलिऐ। दारीमक बाड़ीसँ चोटे घूमि रविकान्त दरबज्जाक चारक ओलतीक बत्तीमे खोंसल चिट्ठी निकालि दोहरा कऽ पढ़लनि। परीछाक फारम भराएत तइले पाइक ओरियान करब छेलनि। ईहो लिखल छेलनि जे दीपक अपने गाम आबि मात्रिकक कोजगरो पूरि लेत आ तेसर दिन आपसो भऽ जाएत। ओना केते पाइक ओरियान करब अछि से स्पष्ट नहियेँ अछि मुदा बेटाक पढ़ाइक अंतिम घड़ीमे किछु बजलो तँ नहियेँ जा सकैए। तहूमे कौलेजक आखिरी परीछा छिऐ। अंतिम परीछा मनमे अबिते रविकान्तकेँ खुशी उपकलनि। बेटाक स्नातक भेने परिवारक अगिला सीढ़ीक एकटा पजेबा जोड़ाएत। एक पजेबा जोड़ेने एक सीढ़ीक रूप बनि जाइए। तेतबे किए, ई की नै भेल जे साधारण पढ़ल-लिखल बाप, बेटाकेँ स्नातक बना दुनियाँक बीच ठाढ़ सेहो करत। स्नातक तँ स्नातक होइए। जेकरा राज-काज चलबैक बुधि भऽ जाइ छै। ख्ाैर जे होउ, जेहेन मन पकड़ि मेहनति करत तेहेन बनत। अपन जे कर्मक संकल्प दुनियाँक संग छल से तँ अबस्से पूर्ति हएत। जिनगीमे सभकेँ अपन-अपन दायित्व होइ छै, तेकरा जे जेहेन संकल्पक संग पूर्ति करैए से तेहेन बनि ठाढ़ होइए। कोजगरा दिनक सुरूज उठि कऽ एक बाँस ऊपर भेला, करीब आठ बजैत। दीपक रेलबे स्टेशनसँ गामपर पहुँचल। जहिना दीपकक मनमे तेल-बातीक जोगाड़क विचार मर्ड़ाइत तहिना रविकान्तोक मनमे ओही तेल-बातीक चिड़ै चकभौर लैत रहत। दीपककेँ देखिते रविकान्त बजला- “बाउ, तोरे बात मनमे घुरि-फीरि रहल अछि बहुत दिन जीबह।” ओना पिताक असिरवादसँ दीपकक मनमे मिसिओ भरि हलचल नै उठल, कारणो स्पष्टे अछि। शब्दवाण अकास मार्गसँ छोड़ल जा सकैए मुदा कर्मवाण तँ धरतीए पकड़ि चलत। पएर छूबि प्रणाम करब तँ बिना स्पर्श भेने नहियेँ भऽ सकत। ओना दुनू हाथ जोड़ि शब्दवाणो चलैत अछि मुदा ओ अपना सीमामे। पिता-पुत्रक बीचक जे सीमा होइ छै ओ बिना स्पर्श भेने जँ हएत तँ हाथक आँगुरक अधिकारक हनन हएत। आँगुरोक अपन कर्मभूमि छै जे रणभूमिसँ रंगभूमि धरि पहुँचबैत अछि। लग अबिते दीपक पिता-रविकान्तकेँ गोड़ लागि, बाजल- “बाबू, काल्हि चलि जाएब। पाँचे दिन फारम भरैक बाँकी अछि संगे...?” पीठपर हाथ दैत रविकान्त बजला- “एना किए अदहे मुहेँ बजलह। जे खगता तोरा हेतह, ओकर पूर्ति जहाँ धरि सम्भव हएत से करनाइ अपन संकल्पक अंग बुझै छी। मुदा हम तँ पीठेपर ने रहबह, असल काज तँ तोरे हाथ रहतह। तइले जे सम्भव हएत तइमे पाछू नै हएब, तेतबे आश ने हमर करबह। अच्छा ई कहऽ जे केना-केना कार्यक्रम बना आएल छह?” दीपक- “मामाकेँ तँ अपन परिवारमे काज नहियेँ छी, वएह हकार देलनि, तँए हुनका रातिमे पूरि काल्हि भोरे गाम चलि आएब, भरि दिन गाममे रहब, परसुका गाड़ी पकड़ि लेब। तीनिए मास परीछाक अछि, अखनि एम्हर-ओम्हरमे समए गामाएब नीक नै हएत?” दीपकक बात सुनि रविकान्त बजला- “भने एक दिन पहिने आबि गेलह। किछु पाइ तँ अपना हाथमे अछि मुदा तोरा केते चाही, से तँ खोलि कऽ कहबह, तखने ने आरो ओरियान करब।” पिताक प्रश्न सुनि दीपक ठमकि गेल। ठमकैक कारण भेल जे फारम भरैक हिसाब तँ बूझल अछि मुदा किछु नव पोथी कीनैक ने ठेकान अछि आ ने सबहक दामे बूझल अछि। अखनि धरि तँ एके सेट किताबसँ काज चलेलौं, मुदा परीछा तँ परीछा होइ छै। तइले सीमित दायरासँ बाहर हुअए पड़ै छै। मुदा लगले मनमे संतोख उठि गेलै, बाजल- “तीन मास परीछामे शेष अछि कोर्सक जे एक लेखकक पोथी अछि ओ तँ अछिए तइसँ बेसी पढ़ले केते जा सकैए, सेहो किछु कीनब।” नव पोथीक नाओं सुनि रविकान्तक मनमे उठलनि, केहेन हएत जे भोजक बेर कुमहर रोपल जाएत। मुदा धड़फड़मे किछु बाजबो उचित नै हएत। जे काज जे करैए वएह ने ओकर भूतसँ भविस धरि गौर करत। दोसर तँ अनाड़ीए भेल। अनाड़ीओ तँ एके रंगक नहियेँ होइत। कियो बूझल-गमल अनाड़ी तँ कियो बिनु बूझल-गमल हेबे करैत। ओना अपनो साक्षर छी मुदा स्नातक धरि तँ नै जनै छी। तँए बूझल-गमल नै बिनु बूझल-गमल भेलौं। ओह! अनेरे मनकेँ औनाबै छी। दीपक कियो आन छी, किए ने सभ बात पुछिऐ कऽ बूझि ली। बजला- “बौआ, हम तँ अपनो केलौं आ अनको देखैत एलिऐ जे पढ़ाइ शुरू होइए समैमे सभ किताप-काँपी कीनि लइ छेलौं आ भरि साल पढ़ि कऽ परीछा दइ छेलौं, तँू किए...?” पिताक पश्न सुनि दीपककेँ दुख नै भेल एक विचार मनमे उठल। विचार ई जे काेर्समे किछु पोथी शासन पद्धतिक अनुसार चलैत आ किछु अलग। विषय एक रहितो भिन्न-भिन्न लेखकक विचारधारामे किछु दूरी रहने विषयक पोथीमे सेहो किछु दूरी बनि जाइ छै, तैसंग शिक्षको बीच किछु-ने-किछु रूपमे पढ़ेबा समए अपन विचार प्रस्फुटित होइते रहै छै, मुदा पढ़निहार तँ कोरा कागत रहैए जइसँ मन-मस्तिष्कमे किछु-ने-किछु भिन्नता आबिऐ जाइत अछि, तहूमे विचारक भिन्नता काँपी जाँच करबा समए सेहो मुड़ीआरी दइते रहैए जइसँ किछु प्रभाव पड़िते छै, तँए आनो-आन लेखकक पोथी परीछा लेल जरूरी भऽ जाइए। विद्यार्थी तँ निष्पक्ष ढंग यएह ने कऽ सकैए जे फुटा-फुटा विचारक व्याख्या करत। तइले आनो-आन पोथी पढ़ब अछिए तखनि ने परीछाक तैयारी भेल। किए ने पितोजीकेँ अपन विचार सुना दियनि। बाजल- “बाबूजी, किछु आनो-आन लेखकक पोथी परीछामे देखब जरूरी बूझि पड़ैए, पोथी तँ अनेको लेखकक अनेको छै मुदा जे चलनिमे अछि तेकरा देखि लेब तँ जरूरीए अछि किने, तँए किछु नव पोथी कीनब अछि।” दीपकक बात रविकान्त बूझि गेला। मुदा कम पाइबलाकेँ अधिक पाइक खर्चबला काज गरूगर भाइए जाइ छै, जे रविकान्तोकेँ भेलनि। मुदा विचारोक तँ अपन समुद्र छै जइमे रंग-रंगक हिलकोर उठिते रहै छै। मनमे दोसर विचार उठि गेलनि। उठि गेलनि ई जे जखनि ओकरे इमान बुझतै जे भाँग पढ़ै छी आकि बथुआ। अपन काज एतबे भेल जे जे खर्च कहत से देबै। कियो व्यायाम आकि मनोरंजनक विन्यासकेँ जीविके बूझि लेत तेकर हम की करबै। समगम होइत रविकान्त बजला- “बौआ, फुटा-फुटा कऽ सभ काजक खर्च बुझा दैह, तइ हिसाबसँ पाइक ओरियान कऽ देबह। ई नै जे झाँपल-तोपल तहूँ बाजह आ हमहूँ दिअ। तइसँ काजमे बेवधान हेतह। घटी-बढ़ी भऽ जेतह। आगूसँ जे काज करबह ओ बढ़ि जेतह आ पछिला छूटि जेतह। जइसँ काजमे खाँच औतह। काजेक खाँच जिनगीकेँ खँचाह बनबैए।” पिताक प्रश्न सुनि दीपक असमनजसमे पड़ि गेल जे नापल-जोखल काज अछि ओकरा तँ स्पष्ट बाजि सकै छी मुदा बिनु नपलो-जोखल काज तँ अछिए। तखनि? तखनि की, दू श्रेणीक काज बना बाजल- “कौलेजमे तीन हजार लगत, महिनाक खर्चा बुझले अछि तखनि नव पोथी लेल अन्दाजेसँ काज चला लेब।” दीपकक बात रविकान्तकेँ जँचलनि। बजला- “छह-सात हजारसँ काज चलि जेबा चाही?” उत्साहित होइत दीपक बाजल- “जँ कनी-मनी घटबे करत तँ मोबाइलसँ कहि देब अहूँ ए.टी.एम.मे पठा देब।” सोझ-साझ रस्ता देखि रविकान्तक मनमे काजक अँटकार तँ भऽ गेलनि मुदा हाथमे केते अछि आ केते ओरियान करए पड़त से अँटकार लगबैक विचार उठलनि। मने-मन रविकान्त खर्चक अँटकार लगबिते रहथि आकि पत्नी-चन्द्रावती आबि झटकि बजली- “रस्ता-पेराक थाकल-ठहियाएल बच्चा आएल अछि पहिने किछु मुँहमे कहाँसँ दैत तँ अपन रमा-कठोला सुनबए लगलिऐ। बातो केतौ पड़ाएल जाइ छेलै जे पहिने सएह पसारि देलिऐ।” चन्द्रावतीक विचारक मोड़ कनी आगूए रहनि तैबीच दीपक निहुरि कऽ पएर छूबि गोड़ लगलकनि। पछिला बातकेँ ब्रेकलेल साइकिल जकाँ एकाएक रोकि, असिरवादक प्रमुखता बुझैत बजली- “अखनि हाथी सन दुनू परानी जीविते छी।” माएक बात जहिना दीपककेँ उत्साह भरलक तहिना रविकान्तक उत्साहकेँ दबलक। दबलक ई जे जइ काजसँ दीपक आशा बान्हि आएल अछि ओकरा आगू केना जीवित राखल जाए ओ बिना बुझने केना हएत? बूझल रहत तखनि ने अखनेसँ लागि ओकरा पुरबैक परियास करब आकि गुमे-गुम रहि, जेबा काल बाजत जे एते पाइक काज अछि। कोनो कि अपना हाथमे कागतक रूपैआ छपैक मशीन अछि जे बटम दाबि देबै आ हरहरा कऽ खसत। अपना हाथक तँ ओहन मशीन अछि जे काज रूपमे जनम लऽ समैक संग चलैत समयानुसार दैत। मुदा ई तँ भेल बुझनिहार लेल, कम बुझिनिहार आकि नै बुझनिहार लेल तँ दोसर उपए अछि। बेटा सोझहामे जँ ओ बजली तँ उचिते बजली, अपन अधिकारक प्रयोग केली। अपन अधिकार ई जे जन्मेसँ बच्चाक खेबा-पीबाक माने पेट-भरैक भार हुनके ऊपर छेलनि, जइसँ भूख अबै-जाइक बाट बुझै छथिन। ठीके कहलनि जे मुजफ्फरपुरसँ अबैमे चारि-पाँच घंटाक समए लगले हेतै, तहूमे चुल्हिक ओरियानक आदति लगले छन्हि। आदति ई जे भानसक बेर उनहल जाइए घरमे नून नै अछि आ अहाँ अपना तालमे बेताल छी। खैर जे होउ, मुदा ई बात दाबिओ कऽ राखब परिवार लेल नीक नहियेँ भेल। बजला- “दीपक केतए आएल, किए आएल से जँ अबिते नै पूछि लेतिऐ, तखनि समैपर ओकर ओरियान केना होएत?” पतिक बात सुनि चन्द्रावती ठमकली। मन पड़लनि पावनिक उपास। दीपककेँ खाइमे कनी अबेर भेल हेतै, मुदा अपनो तँ पावनिक व्रत भरि-भरि दिन सहि कऽ करिते छी। कहाँ पराण छूटि जाइए। तहूमे की दीपकक रस्ता-बाटक दोकान-दौरी आकि इनार-कल बन्न भऽ गेल छेलै। रस्ता-बाटमे तँ लोककेँ अपने आशापर ने चलए पड़ै छै। कियो जे केतौ जाइए तैठाम जँ संगबे रहल तँ तेकर आशा भेल जँ सेहो नै रहल तँ अपने आशा करि कऽ ने चलए पड़ै छै। एना मुँह झारि बेटा आगू बाजब नीक नै भेल। चन्द्रावतीक मनक ग्लानि रविकान्त बूझि गेला। बूझि एना गेला जे मुँहक ठोर सिकुड़ए लगलनि। मुदा बेटा सोझहामे किछु अनर्गल बाजबो उचित नै बूझि, बात बदलैत बजला- “पाँच हजार रूपैआ जे रखैले देने रहौं, से तँ हेबे करत किने? बच्चाकेँ हजार-पान सए आगर करि कऽ नै देबै तँ आनठाम केकर मुँह ताकत?” रूपैआक हिसाब सुनि चन्द्रावती सकपकेली। अखनि धरि जे खर्च पतिकेँ कहै छेलखिन, रविकान्त घरक खर्च बूझि टोक-चाल नै करै छेलखिन मुदा आइ! बेटाक पढ़ैक ओरियान करब अछि, जहिना पाइ-पाइक खर्च हएत तहिना ने पाइ-पाइक ओरियानो करब अछि। बजली- “एक हजार तँ खर्च भऽ गेल?” पत्नीक खर्च सुनि रविकान्त ठमकि गेला। मनमे उठलनि जे जहिये मातृनवमी-पितृपक्ष (आसीनक पहिल पख) चढ़ल तही दिन बजारसँ महिनो दिनक सभ खर्चक ओरियान कइए देने छेलियनि, तखनि खर्च केतए कऽ लेलनि। पचास रूपैआ फुटा कऽ दसमी मेला देखैले देनौं रहियनि। तखनि? बजला- “कथीमे खर्च भऽ गेल?” उत्साहित होइत चन्द्रावती बजली- “दुर्गा-पूजाक नवमीए दिनक मेलामे एक हजार उठि गेल।” पत्नीक बात सुनि रविकान्त बजला- “अखनि छठि पावनिकेँ बीसो दिनसँ ऊपरे अछि तखनि एते अगुरवार किए कीनि लेलौं? अच्छा ई कहू जे की सभ कीनलौं?” चन्द्रावती- “चारिटा कोनियाँ, सूप, डगरी, छिट्टा, कूर, हाथी इत्यादि ने कीनि लेलौं।” मने-मन रविकान्त हिसाव जोड़ि अँटकारि लेलनि, मुदा अनेको प्रश्न एक संग उठि गेलनि। सोझहामे बेटा-दीपककेँ देखि बाजब उचित बुझलनि। बजला- “एक तँ कोनियाँक काज सूपेसँ होइ छै तहूमे एकटाकेँ मानलो जा सकैए, ऐ जुगमे माटिक हाथीक कोन काज छै आ आब केतए घैलक काज चलैए जे अनेरे पाइकेँ पानिमे फेकि देलिऐ?” पानिमे फेकब सुनि चन्द्रावती उमकि बजली- “पुरुख-पात्र अहिना पावनिक वस्तुकेँ दुसै छै!” पत्नीक बात सुनि बेसी तामस करब उचित नै बूझि रविकान्त मने-मन विचारए लगला जे काजो तेहेन अछि जे छोड़ब बेबकूफी हएत मुदा जँ अहिना मौका पाबि होइत रहल तखनि जिनगीक गाड़ी केना ससरत? लगले दोसर प्रश्न मनकेँ घेरि कऽ पकड़ि लेलकनि। घेरि कऽ ई पकड़लकनि जे एक परिवार एक पुरुख-नारीक बीच ठाढ़ अछि तैबीच दू रंगक विचार किए चलि रहल अछि। मुदा जे धारा चलि रहल अछि ओहो तँ बरखा पानिक धारा नै, स्थायी धारक धारा जकाँ अछि! मन ठमकि गेलनि। तीनू गोटे दीपक, चन्द्रावती आ रविकान्त तीनू तीन दिस तकैत, मुदा मुँहक बोल सबहक हराएल। रविकान्तक मन औनाइत जे, जे काज सालतनी छी अदौसँ होइत आएल अछि ओ काज जिनगीक गाड़ीकेँ रोकि देत, ई केहेन भेल? जिनगी चलबैक काज जिनगीए रोकि देत तखनि आगू मुहेँ गाड़ी ससरत केना? लगले आगूमे ठाढ़ दीपकपर नजरि पहुँचिते मनमे उठलनि, काल्हिए भरि समए अछि तैबीच दोसर काजमे समए गमाएब उचित नै। जिनगीक बहुत पैघ काजक परीछा छी। काल्हि दिन बेटाक मुहेँ सुनब केते ग्लानिक बात हएत जे कहत पढ़ैक खर्च पिताजी नै जुमा सकला तँए आगू बढ़ैमे बाधा भेल। ओना जेकर पिता समैसँ पहिने मरि जाइ छथिन, ओ केना पढ़ि पौत। मुदा सेहो तँ नहियेँ अछि। जिबठ बान्हि पढ़निहार तँ पढ़िए लैत अछि। खैर जे होउ, जैठाम एहेन परिस्थिति बनैए तैठामक प्रश्न ई भेल। ऐठाम तँ से नै अछि। अपन मनक अभिलाषा अछि जे बेटाकेँ स्नातक बना दुनियाँक बीच ठाढ़ करी। सघन बोनमे हराएल जकाँ माइक मुँह देखि दीपक बाजल- “बाबूजी, आइ जेते खर्चक पावनि भऽ गेल अछि, ओहेन खर्चक पावनि पूर्वज केना बनौलनि जे परिवार-लोक तंग होइत रहैए।” दीपकक प्रश्नक गंभीरता रविकान्तक मनकेँ ओहिना घकेलि देलकनि जहिना कियो घारक महारपर सँ बहैत बीच धारमे कूदि हेलि कऽ ऊपर आबए चाहैए। मुदा अपन गुरुतर भार देखि रविकान्त बजला- “बौआ, तोहर प्रश्न ओहेन छह जेहेन मनुख आ मनुखक छापल कागतक चित्र हुअ। अदौसँ रहल जे आजुक श्रमक फल आजुक जिनगीक समए छी। तँए किछु बँचा कऽ काल्हि लेल राखब अनुचित भेल, एहेनठाम पावनि-तिहार केना हएत? मुदा...।” विस्मित होइत पिताकेँ देखि दीपक बाजल- “मुदा की?” एक दिस काज दोसर दिस अराम कुर्सीक बीच जहिना कियो ठकुआ जाइत तहिना रविकान्त ठकुआ गेला। बेटाक जिज्ञासा भरल प्रश्न स्वाती नक्षत्रक अमृत बून जकाँ भऽ गेलनि, जइसँ एक दिस मोती बनैत तँ दोसर दिस बिष सेहो बनैत अछि। ओना केकरो प्रश्नक उत्तर पाबि जे संतोख होइ छै ओ वएह उत्तर लदलासँ कम होइ छै, तँए दीपककेँ बुझा देब रविकान्त जरूरी बुझथि तँ दोसर दिस जिनगीक एक सीढ़ी टपैक काज देखथि। दुनूमे सँ कोनो छोड़बैबला नै। कारण, जँ समैपर पाइक ओरियान नै हएत, फारम नै भराएत तँ परीछा केना देत? तहूमे अपना हाथमे पाइ कम अछि कोनो ब्यौंत करए पड़त। अनका हाथक काजक ठेकाने केते। मुदा दीपको तँ परीछामे बैसैबला विद्यार्थी छी, अखनि जेते ओकरा बरावरीकेँ भरल जेतै, तेते ने परीछामे असान हेतै। ताल-मेल बैसबैत रविकान्त बजला- “बौआ, किसानी जिनगीमे किसानसँ लऽ कऽ काज केनिहार धरि अगहनमे धान घर अनैए। चाहे खेतक उपजा होइ आकि बोइन आकि आरो-आरो उपए, जेना-जेना अगहन पछाति समए आगू बढ़ैए तेना-तेना खर्च होइत जाइ छै। घटबी होइ छै। भदबारिमे जे भदइ-धान आकि मरूआ होइ छै ओकरा पावनि-तिहारमे अशुद्ध मानल जाइ छै! दोसर दिस आसीनक पनरह दिन खएन-पीअनि होइ छै आ अगिला पनरह दिन दुर्गापूजासँ कोजगरा धरि होइ छै। तहिना कोजगरा प्रात जे कातिक चढ़ैए, ओकरा धर्ममास मानि अनेको तीर्थ-व्रत आ पावनि-तिहार होइ छै। एहेन स्थितिमे की कएल जाए। मुदा अखनि बेसी कहैक समए नै अछि। केकरो हाथे बच्छा बेचि पहिने तोहर काज आगू बढ़ा देबह पछाति कहियो निचेनसँ आगूक बात कहबह।” पतिक बात सुनिते चन्द्रावतीकेँ जेना कोजगराक पुनोचान आ दीपककेँ दिवालीक ज्योति जगि गेलनि। २२ दिसम्बर २०१३ चोरूक्का झगड़ा आने दिन जकाँ भिनसुरका चाह पीऐले शिवशंकर, किसुनदेव, सिंहेश्वर, राधाकान्त आ मनोहर एक्केबेर चाहक दोकानपर पहुँचला। पाँचोक जेहने मिलान चाह दोकानक तेहने मिलान बात-विचारक आ तेहने जिनगीक काजोक। ओना पाँचो पाँच टोलक, पाँच जातिक मुदा चाहक दोकानक एक्के निअम बनौने जे अपने-अपने चाहक खरचे अपनो पीब आ समाजोकेँ पिआएब। भोज हेतै। हिसाबो सोझराएले, पाँचो गोटे छह-छह दिनक भोजक खर्चाक हिस्सा तीस गिलास चाहक दाम एक्केठाम जमा करैत रहथि। जइसँ तीसो गिलासक दाममे अपनो तीसो दिन पीबैत आ चारू संगीओकेँ पीअबैत। ऐ बीचमे एकटा शंका नै करब जे के कहिया पीऔलनि। बही-खताबला दोकानदार पाहि लगा कऽ नाम बजैत जे आइ फल्लाँक भोज छियनि। ओना चाहक दोकान बजारक नै गामक चौक परहक। बजारक दोकानमे सिरिफ कारोबारक गप-सप्प चलैत मुदा गामक चौक अन्तर्राष्ट्रीय होइत। जैठाम सएओ रंगक गप चलैत। केतो चीलमक चौखड़ी तँ केतौ ताड़ी-दारूक, केतो खेती-पथारीक तँ केतो शास्त्र-पुराणक। केतो पार्लियामेंट तँ केतो युनिवरसिटीक। तीन दिनसँ गुलेतिया दुनू परानी सौंसे गाम केता बेर भौड़ी दऽ देलक। भौड़ीक दइक कारण रहै जे शुरूहेक जेठुआ लगनमे गुलेतिया कबुतरीकेँ मेलासँ पटिया कऽ बिआह कऽ लेलक। कुमारि कन्या कबुतरी नै बूझि सकली जे दोती बर गुलेती अछि। मुदा जखनि कबुतरी सासुर आएल तँ सासुक जगह सौतीनक गारजनीमे फँसि गेल। जहिना पड़बा नव-पुरान खोप नै चीन्हि चहरेमे लोभा जाइए तहिना। सौतीनक गारजनी कबुतरीकेँ पसिन ऐ दुआरे नै होइ जे जखनि एके घरबलाक दुनू घरवाली छिऐ तखनि ओकर हुकुम किए मानबै। जहिना ओकर घर छिऐ तहिना ने हमरो छी आ जँ अपन नीक दुआरे हमरासँ काज करा लिअए तखनि अपना की रहत। गुलेतिया अपने पस्त रहए। होइ जे कहुना साँपो मरि जाए आ लाठीओ ने टुटए। झगड़ो फड़िछा जाए आ दुनू घरवालीसँ मिलानो रहि जाए। मने-मन सोचए जे बाप-माएक बिआह केलहा पहिलुका घरवाली छी, जँ कोनो तरहक दुख हेतै आ वेचारी कलपत तँ पड़ि जाएत। हो-न-हो हाथे-पएर लुल्ह भऽ जाए तखनि की धोइ-धोइ चाटब। तँए बिआही घरवालीक डर होइ मुदा दोसरसँ ऐ दुआरे डराइत रहए जे, घटकैतीकाल घरवाली लग बाजि गेल रहए जे बिआह-तिआह नै भेल अछि। रस्ते-रस्ते कबुतरीओ भाँज लगा नेने रहए जे अँगनामे एकटा स्त्रीगण छै। मुदा ई भाँज नै पाबि सकल जे सासु हएत आकि सौतीन। गामक लोक दुनूक बातो सुनि लिअए आ अनठाइओ दिअए। अनठबैक कारण रहै जे सभ बुझैत जे सँए-बहुक झगड़ा किए होइ छै। ओना गुलेतिओ आ कबुतरीओमे सँ कियो पाछू हटैले तैयारो नै। मरदे जकाँ गुलेतिओ लोक लग बाजे आ महिले जकाँ कबुतरीओ। तीन दिन गामक भौड़ी केला पछाति चाहक दोकानपर गुलेतिया पहुँचल। गुलेतियाकेँ देखिते चाहबला बाजल- “अखनि गाममे केकरो चलती छै तँ ओ गुलेती भायकेँ अछि।” बेन्चपर बैसल शिवशंकर टोनलक- “की चलती गुलेती भायकेँ छन्हि हौ?” मुँह-बनबैत दोकानदार बाजल- “अरे बा, चलती! तेहेन गुलेती भाय छथि जे महाभारतक तीरो छोड़ै छथि आ मेना-पौड़की मारैबला गुल्लीओ।” चाहक दोकानपर बैसल सभ दोकानदारक बात अकानैत मुदा अर्थे ने किनको भेटनि। कियो किछु तँ कियो किछु। तही बीच कबुतरी पहुँचल। गुलेतियाक बिना रोच रखने बाजलि- “ऐ मरदाबाकेँ पुछियौ जे अपनाकेँ कुमार कहि किए बिआहि अनलक।” सभ चुप। चुपो केना नै रहता। जखने मुद्दे-मुदालह सोझहामे सवाल-जवाब करत तँ पनचैतीओ अपने कऽ लेत तइले पंचक कोन काज छै। पत्नीक प्रश्नक उत्तर दैत गुलेतिया बाजल- “ई झूठ केना भेल। जैठाम तीस-तीस, चालीस-चालीसटा लोक बिआह करैए तैठाम तँ हम दुइएटा केलौं, तइले एकरा लगै किए छै। काेनो कि हमहींटा अपनाकेँ कुमार कहलिऐ आकि सभ कहने हेतै?” २४ दिसम्बर २०१३ अपसोच जिनगीक अंतिम सीढ़ीपर पहुँचला पछाति जखनि पाछू उनटि तकै छी तँ रंग-बिरंगक काजक संग अपनाकेँ देखै छी। नीको आ खूब नीको आ अधलो आ खूब अधलो। तखनि कहब जे हँसितो ओतबे हएब जेते कानैत हएब। मुदा अपन पनचैती जँ अपने नै करब तँ दुनियाँमे केकरा एते फुरसति छै जे एहेन घोर-मट्ठा पानिकेँ बेराैत। पनचैती केलौं, मन माफित पंचैती केलौं, पछिला सभ सम-गम भऽ बराबरीपर मानि लेलौं। तँए मिसिओ भरि सोग-पीड़ा पछिला नै अछि। मुदा कनीए खोंच रहि गेल तैपर विचार करै छी। कहब जे जखनि सभ काइए लेलौं तखनि खोंच कनी किए रहि गेल। जहिना किछु फलक खोंइचा फले संग जीवन-मरण बितबैए, मुदा किछु फल तँ ओहनो अछिए जेकरा छीलि कऽ आकि सोहि कऽ कात करि देल जाइ छै। हमर से नै अछि, जहिना देहमे नमहर घा रहने कियो ओकर इलाज करत आकि कड़ची-तड़तीक खोंचक दबाइ करत। या तँ बड़के घाक दबाइसँ छूटि जाएत आ अपने किछु दिन पहुनाइ कऽ चलि जाएत। खोंच ई अछि जे नीको केलहा अधला भऽ गेल। खाली जँ अपनेटा नीक बुझितौं आ दुनियाँक लोक अधला बुझितए तैयो अपन गलती मानि लेतौं, सेहो नै भेल। अपनोसँ बेसी दोसर-तेसर नीक बुझितए। सचमुच जिनगीमे सएओसँ ऊपर लड़का-लड़िकिक वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित केलौं। नीक बूझि केलौं, अखनो बुझै छी मुदा तखनि भाेरे-भोर दुलारपुरवाली किए गड़ियौलनि? ई तँ गुण अछि जे लोक सोझहोमे अधला करैत रहैए, देखैत रहै छी, मुदा जँ धिया-पुता जानि नै बजै छी तँ ऊहो सभ बुढ़हाएल शरीर देखि बिनुदेखिनिहारे बुझैए। ओना तइसँ अपनो फेदे-फेदा अछि। अनेरे मौगियाही गपो आ काजोसँ हटल रहै छी। दुलारपुरवालीक गड़ियबैक कारण की? दुलारपुरवालीक पिता संगे नोकरी करै छला। वेचारा सात्विक लोक। भलमनसाहतक चलैत दू-चारि दिनक दरमाहा बीडीओसँ कटबा लइ छला। हुनका सन पच्चीस-तीस गोटे जे पाँच दिनक दरमाहा कटबाइओ कऽ अपना भलमनसाहतकेँ नै छोड़लनि। कहियो बीडीओ साहैब लग अपन सफाइ नै देलखिन। एक मदक खर्च बीडीओ साहैबकेँ चलै छेलनि। बगए-वाणि, बोली-चाली दुलारपुरवला-महेन्द्रबाबूक एहेन जे कियो अपन उपस्थिति हुनका डायरीमे नोट करबए चाहैत। उपकरि कऽ कहलियनि- “भाय साहैब, अहाँ बेटीक बिआह ओहिना (बिनु लेन-देलक) करा देब।” अपन उपकार स्वीकारैत महेन्द्रबाबू कहला- “जखनि मनुख बनि धरतीपर जनम लेलौं तखनि जँ किछु सेवा नै केलौं तँ जिनगीए की!” एक तँ अहुना समाजमे कथा-कुटुमैती जोड़ैमे नीक लगैए आ कन्यादानसँ जुड़ल मुख्य प्रक्रिया जँ करै छी तँ की कन्यादानक सुफलक भागी हम नै भेलौं। जरूर भेलौं। मुदा फेर गाड़ि किए? सेहो तँ अपने विचारए पड़त। भेल ई जे गामेक एकटा छौड़ाकेँ बाप-माए मरि गेलै। मैट्रीक पास कऽ नेने रहए। अखुनका हवा तँ उठल नै छेलै जे पहिने नोकरी पाछू बिआह। बिआहो पछाति केते गोटे पढ़बो केलनि आ नोकरीओ केलनि। ओइ छौड़ाकेँ बिआह करा कहलिऐ- “सभ दिल्ली नौकरी करए जाइए, तहूँ चलि जो। कमेबही तखनि ने परिवार बनतौ।” बात मानि गेल चलि गेल दिल्ली। बंगलोर, चेन्नैइ तँ छी नै जे अनट्रेंड भनसिया हएत। एकटा कोठीमे भनसियाक काज धेलक। साले भरिमे फुलि कऽ माैकना हाथी जकाँ भऽ गेल। घरोवाली लेल रेडियो, कैमरा, रंग-रंगक गहना, साड़ी नेने आएल। आबि कऽ कहबो केलक। ले बलैया अपन घरवाली घर एलै आ अपने सीराआगूक भनसिया दिल्लीमे बनि गेल। गामे आएब छोड़ि देलक। जहिना कोनो कुत्ताकेँ भगबै दुआरे लोक कारा बन्न कऽ दइ दै तहिना दुलारपुरवालीकेँ खरचो-पानि बन्न कऽ देलक! से की कोनो अपना विचारे केलक आकि साहैबक विचारे। वेचारी दुलारपुरवालीक पिता जीवित नै छन्हि जे आबि उपराग देता। मुदा हमहूँ तँ दोखी भेबे केलिऐ जे एकटा नीक परिवारक कन्याकेँ गुँह-खत्तामे बोड़ि देलिऐ। २६ दिसम्बर २०१३ पतझाड़ पलंगपर पड़ल राघोबाबाकेँ आँखि मुनाइते ताड़क छोटका पंखा हाथसँ निच्चाँ खसलनि। पंखा खसिते पसेनाक टघारसँ कोढ़ियाएल नीन अकचका कऽ टुटि गेलनि। बन्ने आँखिए दहिना हाथसँ सिरमाक बगलमे पंखा हँथोड़ए लगला मुदा निच्चाँ खसल पंखा नै अभरलनि। आँखि खोलि सिरमापर सिर सेरिया पजराक मसलनक बीच देह सेरियबैत मुड़ी उठा निच्चाँ देखैक कोशिश केलनि। चीनीपट्टा सन पेट, फीलपाँव पएर, सड़ल साँप जकाँ दुनू बाँहिक गड़ लगबिते बजला- “की समए छल, की भऽ गेल आ की हएत तेकर कोनो ठेकान नै।” मड़ियाएल पतिक बात सुनि, बगलक चौकीपर पड़ल सुमित्रा बिअनि हौंकैत बजली- “सभ कर्मक फल छी। जेहने पीसब तेहने ने उठाएब।” कहि हाँइ-हाँइ बिअनि हौंकए लगली। चारि-पाँच हाथ हटल चौकी तँए राघोबाबाकेँ हवा नै लगनि। मुदा पत्नीक बोल जेना ओल सन कबकबा कऽ लगि गेल होन्हि, तहिना मनमे भेलनि। हारल नटुआ जहिना अपन कलाकेँ हारैत देखि जिनगीक हार कबूल करए लगैत अछि तहिना झड़ैत जिनगी देखि राघोबाबा सेहो हारि मानैक क्रममे क्रमिक गतिये क्रमे-क्रम झड़ि रहल छला। जीवित दुनियाँक प्रेमी पति-पत्नी छी। ओना विगत दस बर्खसँ सुमित्रा पतिकेँ झुठक्कर मानि रहल छेली, मुदा पति-पत्नीक बीचक सम्बन्ध सूत्र जँ ओहन हुअए जे पतिक हाथमे पत्नीक छोर पकड़ा देल जाए आ पत्नीकेँ बिना छोरक जिनगी बना देल जाए तँ की ओ पत्नी पतिक बराबरी कऽ सकत? नीच कर्म केनिहार पुरुखकेँ ऊपर रखि सकत? मुदा...? एहेन स्थितिमे सुमित्रा, तँए मुँह झाड़ि तँ नै बाजि पबै छेली तैयो उचित बूझि लग्गी लगा तँ कहबे करै छेलखिन। पत्नीक बात सुनि पलंगक निच्चाँ खसल पंखा उठा राघोबाबा हाँइ-हाँइ मुँहपर पंखा हौंकए लगला। पसीनासँ भीजल देह हवाक सिहकी पबिते मन सिहकि कलशलनि। जिज्ञासा करैत बजला- “से की? से की?” पतिक जिज्ञासु प्रश्न सुनिते सुमित्राक मनमे उठलनि की जिनगी छल आ आइ की भऽ गेल। जहिना पुरान देह अपन भेलनि तहिना ने हमरो भेल। तखनि तँ हल्लुक-फल्लुक देह अछि, आसकति नै लगैए, मुदा जे जीता जिनगी अपनो फुहराम भऽ उठि-बैस नै सकैए तँ के केकरा देखत। बेटा-पुतोहु सहजे सात सागर दूर चलि गेल, ओकर कोन आश, तखनि? मुदा उपाइए की? नीक आकि अधला पति तँ यएह छथि, हिनके आशा ने करए पड़त। ओना तीत-मीठ बात सभ दिनसँ होइत आएल, होइत रहत। लगले मन पाछू घुसैक गेलनि। दस बरख पहिने की रोब छेलनि, की बुझै छेलियनि आ आइ की छन्हि आ की बूझि रहल छियनि। ऐ दस बर्खक बीच, जहिना गाछक पात एका-एकी झड़ए लगैत अछि तहिना राघोबाबा हारैत निच्चाँ उतरि रहल छला। सुमित्रा जीतैत ऊपर चढ़ि रहल छेली। दुनियाँक बीच नै पति-पत्नीक बीच। बजली- “किछु ने, बुढ़िया फूसि।” पत्नीक झँसाएल बात सुनि राघोबाबाक मन झड़झड़ा कऽ उड़ि गेलनि। उड़ि कऽ स्मृतिक ओइ दुनियाँमे पहुँच गेलनि जेतए गुलावक फूल सन ललिचगर आ कोइलीक वसन्ती मदमस्त भरल बोल सन बोली सुमित्रामे पबै छला, तेतए आइ कौआक बोल आ काँटक गाछ गुलाव देखि रहल छथि। देखि रहल छथि बिनु पतवारिक जिनगीक नाह, जे पतवारि छोड़ि धारमे भँसि रहल अछि। जिनगीक जालमे अपनाकेँ ओझराइत जालक एक-एक सूत देखए लगला। केना छोट कोठली बनल चारूकात गीरहसँ गीरहाएल अछि। खिंचाइत जाल जकाँ राघोबाबाक मन खिंचा कऽ दस बरख पाछू खिंचा गेलनि। चाइनिक पसीना आँगुरसँ काछि निच्चाँ फेकिते रहथि आकि मन ऊपर तकलकनि। यएह घर छी जइमे पाल पंखा चलैत रहै छल, छतमे इजोतक झालड़िक बीच दुनू बेकती सौनक हरिअर साड़ीक बीच लटपटाइत टहलै छेलौं, टहलै छेलौं ओइ विरूदावली वनमे जैठाम मन्द-मन्द हवा अपन मस्तीमे नचैत, पुरस्कार देल नर्तकी जकाँ देहमे लटपटा गुदगुदबै छल, केतए गेल! लोक कहैत धन देने धन बढ़बे करै छै, मुदा से कहाँ भेल, उनटि केना गेल! जिनगीक घटल घटना आन नै बुझलक तँ नै बुझलक, कोन जरूरी छै अनका बूझब, अपनासँ उगारे नै तँ अनका की देखैत, मुदा अपन तँ अपन छल, से के बूझत, मुदा अपनो कहाँ बुझलौं। मन एकमात्र बेटापर पड़लनि। ओकर कोन आशा, मुदा ओकरो गलती कहाँ देखै छिऐ, बढ़ैत समए, बढ़ैत परिवार आ बढ़ैत पीढ़ीक तँ उचिते हक बनै छै किने जे पछिलासँ बेसी सुख-भोगक जिनगी जीबए। जैठाम अपने नोकर-चाकर, जन-बोनिहारक संग रीनियाँ सँ घेरल रहै छेलौं तैठाम जँ ओ (बेटा) अपन सम्पति उठा विदेश जा कारखाना बैसा नोकर-चाकरक बीचक जिनगी बना लेलक तँ उचिते केलक किने। आगू घुसकैत मनमे महाजनी एलनि। बोरा लऽ लऽ लोकक ढबाहि लगल रहै छल, बखारीसँ धान निकालि नोकर तौल कहै छल आ अपने ब्रह्मा जकाँ लिखै छेलौं। चाहे तीन सेरकेँ तीन पसेरी लिखौं आकि तीन पसेरीकेँ तीन मन। मुदा ईहो तँ भऽ सकै छल जे तीन मनकेँ तीन पसेरी आ तीन पसेरीकेँ तीन सेर लिख सकै छेलौं से कहाँ लिखाइत छल। केना लिखाइत? अपन ब्रह्मा अपने छेलौं किने, जँ शराबी, जुआरी अनका बहु-बेटीकेँ नै गरिया अपनाकेँ गरियौत तँ ओकर बदचलनि केते दिन चलतै। यएह गाम छी, तीन मनक उपजा साढ़े चारि मन दइ छल। तैपर खेतक उपजाक संग बुधियारीक माने लेन-देनक बेइमानीबला आमदनी सेहो छल। केतबो नोकर-चाकर जन-बोनिहारकेँ दइ छेलिऐ तैयो कहाँ घटै छल, सभ िकछु चमकै छल। अपना परिवारमे कहिया माछ-मासु तहूमे मिथिलांचलक ललमुहाँ रोहू आ खस्सीक कलेजी आकि दूधे-दही-छालहीक अभाव रहल। भोलो बाबाकेँ दूध-परसाएल गौरिया केरा, मुनक्का-किशमिस, मिसरी तँ चढ़बिते रहलियनि, तखनि किए आइ सभ बेपाट भऽ गेला। की सुरूजे भगवान गाछमे टुसिया हरिअर-हरिअर डारि-पात, फड़-फुलक संग देबो करै छथिन आ समए आनि सभटाकेँ झाड़ियो दइ छथिन। कंठमे सुखौनक आभास भेलनि। पानिक तृष्णा भेलनि। तेहेन जनमारा रौद अछि जे घैलो-बाल्टीनक पानि इन्होरा गेल हएत, जरल लेल ठंढ़-शीतल चाही, जँ जरलपर जरल पड़त तँ आरो जड़ा कऽ जड़िया जाएत। मुदा...? अपने केना लगक बाल्टीन छोड़ि कलपर आनए जाएब। से नै तँ पत्नीकेँ कहियनि जे पियास लागल अछि। मुदा लगले मनमे एलनि जे जँ कहीं, जेना चाह पीबै काल गिलास नेने आबए कहै छथि तहिना कहि दथि जे बाल्टीनमे अछि, लऽ कऽ पीब लिअ, तखनि? पलंगपर बैसल राघोबाबा ने पानि पीबए उठि रहला अछि आ ने पत्नीकेँ कहि रहल छथि मुदा नजरि पत्नीएक चौकीपर नाचि रहल छन्हि। दुनियाँक बोनसँ हाथ पकड़ि सिरजनक दुनियाँ बसबैक वचन देने छियनि, रोग-वियाधिक बीच सहयोगीक संग पुरैक वादा केने छियनि जेकर बदला ऊहो अपन दिन-रातिक जिनगी समरपित केने छथि, तैठाम जहिना अपन तहिना ने हुनको भूख-पियासक संग मन-मनोरथ सेहो छन्हि। से केते धरि पुरा रहलियनि अछि? फेर मन ठमकलनि। ठमकलनि ई जे पुरुख हुअए आकि नारी, दुनू शक्ति सम्पन्न होइते अछि तँए ओंगठबो नीक नै। ओंगठलो नै जा सकैए मुदा रोग-वियाधि, भूख-पियास तँ शक्तिकेँ हिला-हिला दोसराक सहयोगक अपेछा कराइए दइ छै। तहीले ने संगीक प्रयोजन होइ छै। अखनि तँ कियो आन नै अछि, अपने दुनू बेकती छी, दुनियाँक संग लोककेँ छल-प्रपंच करए पड़ै छै, दुनियेँ छल-प्रपंचीक छी। अपना लेल तँ वएह ने नीक जे जेहेन बेवहार करत, सम्बन्ध बनौत तेकरा संग तेहने बेवहार करी। जँ से नै करब तँ दुनियाँक केतौ आदि-अंत छै जे जड़ि पकड़ि ठाढ़ हएब। एहनो लोक तँ छथिए जे सत्यकेँ संकल्प तीर बना नदीमे तैर रहला अछि आ शब्द–वाण छोड़ैत रहला अछि, मुदा तँए कि झूठ छी जे एहनो लोक तँ अछिए जे बजैकाल वेलगाम घोड़ा जकाँ सत्य-फूसिकेँ एके बूझि दूधपनियाँ पीबैए। ओह! अनेरे मनकेँ बौअबै छी, अपन बात अपना लूरिए-बुधिए नै बूझि केने लोक पौल जाइए। तहिना तँ अपनो भेल! मन ठमकलनि। दस बरख पूर्व यएह पत्नी छेली जिनका अपराजित कली सन आँखि नजरि मिलिते अश्रुकणसँ उपोउप भऽ जाइ छल आ यएह आइ कारकौआ सन बूझि पड़ि रहल छथि, आखिर एना किए भेल? लोक बजैए ओल्ड बेटल ओल्ड वाइन आ ओल्ड वाइफ उत्तम होइए अर्थात् पुरान पान तहिना पुरान शराब अपन सहयोगीक संग घुलैत-मिलैत एक रस भऽ जाइत तहिना विचारवान पत्नी सृजनसँ पतिपालक भार उठा चलैत, से कहाँ भेल? की ई झूठ जे प्रेमी पाबि प्रेम प्रेमास्पदक सीमा पकड़ि कदमक गाछमे राधा-कृष्ण जकाँ यमुना किनहरिक गाछक डारिमे झूला झूलि बरहमासा गबैत। मुदा एहेन प्रेम भऽ कहाँ पएल जे होइत! अपन दस बरख पहुलका जिनगी केहेन रहल जे होइत। की परिवार छल, केते सेवा करै छेलियनि। घरक भार भनसिया, पनिभरनी संग जिनगीक कोनो काज बाँकी नै छल जइमे सहयोगी नै छेलनि। मुदा आइ? आइ तँ ओहिना ने ठूठ गाछ जकाँ भऽ गेल छथि जइमे एकोटा पात नै। सभटा झड़ि गेल। पातक-संगबे छुटने मुड़ीक टुस्साक संग ठौहरीओ सूखि खसि पड़लनि। जे सजल सजाएल गाछ नै सूखल-टटाएल ठूठ गाछ भऽ गेल छन्हि। इजोतमे भलहिं लोक भूत-प्रेत नै देखह मुदा अन्हरिया राति हुअए आकि झलफलाएल इजोरिया, ठूठ गाछ भूत जकाँ तँ देखिये पड़ैत। मन घुमलनि, जँ ओ -पत्नी- ठूठ गाछ जकाँ भऽ गेली तँ अपने की रहल। रहल खाली एक क्वीन्टल सताइस किलोक देह। देहपर नजरि पड़िते मनमे खुशी उपकलनि। साठि-सत्तरि किलोबला देह जखनि क्वीनटलिया बोरा पीठ आकि माथपर उठा लइए, तैठाम ओइसँ दोबर उठबैक तागत तँ अपनो देहमे अछिए। हूबा जगिते राघोबाबा उठि कऽ झाँपल बाल्टीन उघारि लोटामे पानि ढारि गिलाससँ पीबए लगला। एक गिलास पीविते कौआ जकाँ मन कड़कड़ेलनि। जहिना भरि दिन चरौड़ कएल कौआ साँझमे एकठाम भेला पछाति निअम बनबैत जे, देख्णा , अर स, काल्हिसँ कियो ने अधला वृत्ति करिहेँ आ ने अधला बौस खइहेँ। जेहेन खेमे तेहेन बुधि हेतौ। नीक बात रहने एकमुहरी सभ मानि लैत। मुदा अधरतियाक अधपेटिया विचारो ने अधविचरिया होइत। सौंझुका निअम बदलि संशोधित निअम बनबैत जे अदहा नीक करिहेँ आ अदहा अधलो खइहेँ। मुदा वएह कौआ भोरमे ओहू निअमकेँ बदलि निअम बनबैत जे खाइ जोकर जे भेटौ से खहिहेँ आ जे मन मानो से करिहेँ। तहिना एक गिलास पानि पीला पछाति राघोबाबाकेँ सेहो विवेक आगू बढ़ि मनकेँ कहलकनि। सुनिते निर्णए केलनि जे जखनि गरम चाहो लोक सुआदि-सुआदि पीविते अछि तखनि तँ हमहीं एकरत्ती ठाढ़ मारल पानि पीलौं तँ कोन अधला भेल। निआसल मनकेँ पानि चाही आकि शीतल-ठंढ़ा जल। मनमे विचार अबिते दोसर देवदूत अपन तरकशसँ तीर निकालि छोड़लक, बैसाख जेठमे जँ ठरल पानिमे सुआद होइ छै तँ पूस मासमे गरमे ने नीक होइ छै। किए कियो इन्होर पीबैए। तर्कक मजगूती देखि राघोबाबाक मन मानि गेलनि जे ई सभ सभटा मन भड़छब छी जँ से नै छी तँ एक चीज सभकेँ एके रंग नीक किए ने लगै छै। तर्कक बोनमे राघोबाबाक नजरि पत्नीपर गेलनि। पोचाड़ा दैत बजला- “बड़ पियास लगल छेलए?” पतिक पियास सुनि सुमित्रा बजली- “तँ बजलौं किए ने?” एकबटुआ देखि राघोबाबा बजला- “कहुना भेलौं तँ अहूँ बूढ़े भेलौं किने। किए अनेरे अहाँकेँ हरान करितौं। अपन काज अपने करी, सएह ने केलौं।” अपन काज अपने करी सुनि सुमित्राक विचारमे धक्का लगलनि। धक्का ई लगलनि जे जँ अपन काज अपने करी तँ कियो केकरो भार बनत किए? मुदा उमेर पाबि शरीरोक तँ रूप बदलिते छै, तैठाम दोसराक जरूरति तँ हेबे करत। मुदा...? मुदा ई जे नोकर-चाकरपर जीनिहारक जँ अपनो बेटा-पुतोहु दूर चलि जाए तँ तखनि बुढ़ाड़ीमे की हएत। नजरि बेटापर गेलनि। आइ जँ अपन बेटा-पुतोहु लगमे रहैत तँ की अहिना जिनगीक रूप रहैत। ऐ अवस्थामे चुल्हिफुक्की केहेन भेल! जेते सम्पति बेचि गामसँ चलि गेल तेते सम्पतिसँ की गाममे पेट नै भरितै। तखनि? तखनि तँ यएह ने जे छी तहीमे जीवैक अछि। बजली- “पैछला सभ किछु बिसरि जाउ, नीक भेल आकि अधला, जे भेल से भेल। आब केना जीव, तइ दिस ताकू।” पचास बरख पूर्व राघोबाबाक बिआह सुमित्रा संग भेलनि। राघोबाबाक पिता गामक जेठरैयत। बीस बीघा जमीन। किसानी जिनगीक जे स्तर होइ छै तइ स्तरक जिनगी। बाहरसँ कम सम्पर्को आ समाजमे पैंच-पालट तँ करथि मुदा महाजनी नै रहनि। पाहीपट्टीक गाम। जइ जमीन्दारक गाम तिनका संग देवानन्द कुटुमैती केलनि। ओना किछु गोटेक ईहो कहब अछि जे समतुल्य सम्बन्ध अधिक नीक होइ छै मुदा विधातोक किरदानी तँ किरदानीए छियनि। ने दूटा मनुखकेँ एकरंग मुँह-कान बनबै छथिन आ ने कलमक दूटा नोक एकरंग करै छथिन। जेते लोक तेते मुँह आ जेते लिखिनिहार तेते रंंग लिखाबटि। खैर जे होउ, जहिना देवानन्दकेँ राघवक सम्बन्ध जोड़ब नीक लगलनि तहिना ठाकुरो प्रसादकेँ सोहनगर बूझि पड़लनि। जमीन्दार घराइनमे बाधा ई उपस्थित भेल रहनि जे दियादीक सम्बन्ध रहनि। दोसर विकल्पो नै बूझि पड़लनि। कारण कुटुमैती तँ जातिएमे हएत, तखनि तँ गोरगर-कन्हगर देखि कऽ करी, से जँचलनि। देवानन्दो दुनू परानीक मन खुशीसँ भरि गेलनि। के ने ऊपर उठए चाहैए, दुनू परानी देवानन्द विचारि लेलनि जे जँ एको पाइ दहेज नहियोँ भेटत तैयो कुटुमैती कइए लेब। भने बेटाकेँ नै बेचने रहब, मुँहदानो दइले तँ रहत। जखनि ठाकुर प्रसादक सिपाही देवानन्द बेटाक बिआहक गप-सप्प उठौलनि तखनि देवानन्दो पत्नीक विचारक आशा छोड़ि ‘हँ’ बजला। ओना विचार भेले रहनि। सिपाही तँ सिपाही छल ठाकुर प्रसाद लग बाजल जे कुटुमैती करै जोकर अछि। कुटुमैती करै जोकर सुनि ठाकुर प्रसादक पत्नी सुनीता पुछलखिन- “से केना बुझलहक?” जहिना इन्टरभ्यूक समए विद्यार्थी निर्भीक भऽ कोनो प्रश्नक उत्तर करैत तहिना सिपाही बाजल- “पुरुखाह लोक देवानन्द छथि।” पुरुखाह सुनि सुनीताक मनमे खुट-खुटी उठलनि। खुट-खुटी ई जे जखनि परिवारमे पुरुख आ महिला काजक बीच सीमांकन अछि तखनि एहेन बात सिपाही किए कहलक। पुछलखिन- “से की?” अपन बढ़ैत मान देखि सिपाही तिलिया-फुलिया लगबैत बाजल- “एक तँ जाइते देरी बिना किछु पुछने दरबज्जापर बैसा अपने आँगन जा लोटामे पानि अनलनि। पएर धोनौं ने रही आकि चाह-जलखै पहुँच गेल।” सुनीताक नजरि बेटी बिआहपर रहनि तँए सिपाहीक बातसँ कानमे झड़ पड़ए लगलनि। बजली- “ई सभ छोड़ह, काजक गप करह?” काजक गप सुनि सिपाही पट बदलि दोसर दिस मुँह बनौलक। बाजल- “जखने कुटुमैतीक गप-सप्प उठेलौं आकि धाँइ दऽ बजला जे निसचित जूड़बन्धन हेबे करत। जाति-पाँजि कोनो छीपल अछि। एक्कैस पुरुखाक इतिहास अछि। कहियो कियो इज्जति गमा कऽ पाँजि नै बनौलनि। परिवारक काज छी किनकोसँ किछु विचारैक प्रश्ने नै अछि।” सिपाहीकेँ भँसैत देखि पुन: सुनीता दोहरौलनि- “सुमित्राकेँ कोनो दुख-तकलीफ तँ ने हएत। लड़का केहेन अछि?” “मलिकाइन, सएह ने कहै छेलौं, सम्बन्धक प्रश्न अछि, सविस्तर बात बूझब जरूरी अछि किने।” ठाकुर प्रसाद आ देवानन्दक बीच कुटुमैती भऽ गेल। कुटुमैती भेला पछाति दान-दहेजक ठेकान नै रहलनि। मुदा दूटा प्रमुख रहनि। पहिल गामक सरकारी जमीन आ दोसर, महाजनीबला बोही सुमझा देलकनि। जहिना लछमीक अगवाण भेने छप्पर फाँड़ि धन-बरखा होइत तहिना देवानन्दोकेँ भेलनि। बढ़ैत कारोबार देखि, जन-बोनिहारक अतिरिक्त तीनटा नोकरो रखलनि। दोसर दिस सुमित्रा लेल तीनटा नोकरनी सेहो नैहरेसँ आएल छेलनि। दुनू परानी देवानन्दो मरि गेला आ ठाकुरो प्रसाद दुनू बेकती। रहि गेला राघव आ सुमित्रा। ओना तीनटा बेटीओ-जमाए आ बेटो-पुतोहु छथिन। जिनगीक चारिम पड़ावपर पहुँचिते राघोबाबाकेँ चारू दिससँ धक्का लगलनि। धक्का लगिते अपन देह देखलनि। जेना जुग बदलै छै तहिना राघोबाबाकेँ साठि बर्खक अवस्थामे भेलनि। तीन-चारि सालक रौदी महाजनी खा गेलनि। करताइत दुआरे खेती टुटि गेलनि, तैपर महाजनी आ जमीनक विवाद सेहो समाजमे पसरि गेल। राघोबाबा डेगे-डेग पाछू मुहेँ ससरए लगला। ससरैत-ससरैत आइ पचहतरि बर्खक अवस्थामे पहुँच गेल छथि। जहिना गाछक फुनगीक डारिपर चिड़ै-चुनमुनी बैस अपन जिनगीओक गप करैए आ नचैत-गबैत-हँसैत-हटैत-सटैत सभ मस्त रहैए, तहिना तँ मनुखोकेँ हेबा चाही से कहाँ होइए। मन ठमकलनि। किछु काल पछाति ठकुआएल मन कुड़कुड़ेलनि। कुड़कुड़ेला- “जहियासँ दुनू गोटे एकठाम भेलौं, तहियासँ अहाँ कोन नजरिये देखलौं?” पतिक आक्षेप सुनि सुमित्रा डहकली- “निरलज जकाँ बजैमे लाजो ने होइए?” पत्नीक इशारा राघोबाबा नै बूझि सकला। धड़फड़ा कऽ बजला- “हमर लाज अहाँक लाज नै, तखनि एना किए बजै छी।” जहिना बोन-झाड़मे माए-बाप अपन बच्चाकेँ केतौ ठाढ़ कऽ अपने गाछक अढ़मे नुका रहैए आ औनाइत बच्चाकेँ देखि कखनो थोपड़ी बजा तँ कखनो बौआ-बौआ कहि बोल-भरोस दइए, तहिना सुमित्रा बजली- “गुड़क मारि धोकड़ेसँ लोक बुझैए, हाथी जकाँ जे अखनो लगै छी, से केकरा केने?” दबैत मन राघोबाबाक आरो दबा गेलनि। दबाइत मनमे एलनि हाथी जकाँ तँ ठीके खुआ-पीआ कऽ बना देलनि मुदा ई किए ने बुझलनि जे एहनो दिन देखए पड़त। प्रकृतिकेँ अजीव खेल छै, जँ गरमी मासमे ठंढ़ा पानिक मान बढ़ि जाइ छै तँ जाड़मे इनहोरक। तहिना पतझड़ मास होइतो सभ गाछमे एकेबेर थोड़े पतझड़ो होइ छै, कोनो पालाक पल्ला पड़ि झड़ि जाइए तँ कोनो रौदक तीक्ष्ण गरमीसँ, तँ कोनो बरसातक रोग-वियाधिसँ। रोग वियाधि अबिते मन अपना दिस बढ़लनि। अपन जिनगी..., गाछे-बिरिछ जकाँ मनुखोक पतझड़ होइ छै, जे भेल? नै, रोग-वियाधिक फल छी। गाछो-बिरिछमे तँ मौसमक अतिरिक्त रोगो-वियाधिसँ पतझाड़ होइते अछि। भरिसक सएह भेल? बजला- “रोग-वियाधि काबू केने अछि, नै तँ अपन पेट जखनि कुतो-बिलाइ, चिड़ैओ-चुनमुनी पालि लइए तखनि हम तँ मनुख छी। मुइला पछाति देखए एबै।” सामंजस करैत सुमित्रा बजली- “की नवे-नौताड़ि पति-पत्नी भेली आ बूढ़-बूढ़ानुस नै हेती। जेकरा पति मानै सएह सोहागिन।” पत्नीक प्रेम भरल बात सुनि राघोबाबा घरसँ बाहर सुरूज दिस देखलनि। बेर टगि गेल छल। साँझो लगिचा गेल छल। पुन: बाहरसँ घर आबि बजला- “बेर टगि गेल, चलू रौतुका ओरियान करए।” पतिक बात सुनि सुमित्रा बजली किछु ने, सिहकि कऽ मन कलशि मूड़-मुड़िया गेलनि। जेना जीवनक नव शक्ति सिरजित भऽ गेल होन्हि। सिरजिते ने जीत शक्ति छी असिरजितेक हरल-हारल-मारल भेल। ३१ दिसम्बर २०१३ झीसीक मजा जेठ मास। मलमासक चलैत जूनक अंतिम समए काल्हिसँ कोटो-कचहरी बन्न हएत जे अदहा जुलाइमे खूजत। हाइओ कोट पटनासँ राँची घुसैक जाएत। बीस बरख पुरान जिनगी पैछिला जिनगीक अंतिम केसक फैसला हएत। सेहो जँ फास्ट ट्रेक कोर्ट नै खुजैत तँ दस-बीस बरख आरो चलैत। ओना केसक चिन्ता तँ सोभाविक छै, मुदा जहिना पैजामा सिऔनिहार निकासक जोगार बना लैत तहिना केसो लड़निहार तँ बनाइए लैत अछि, से छेलैहे। बना ई लैत अछि जे जखनि निचला कोर्टमे बीस-पच्चीस बरख लगैत अछि तखनि ऊपरकामे तइसँ बेसी लगबे करत, तहूमे तीन-तीनटा ऊपर अछि। तँए ईहो तँ कम खुशीक बात नहियेँ भेल जे सरकारी रेकर्डमे मृत्यु घोषित हएब। तइले जहल किए लग आबए देब। मॉरनिंग कोर्ट रहने चारि बजे भोरे साइकिलसँ मधुबनी विदा भेलौं। ओना विदाहे होइ काल मन छह-पाँच करए लगल जे साइकिलसँ जाइ आ ओतए सजा भऽ जाए तखनि साइकिल तँ लुटाइए जाएत। अपना संग लगल वेचारीकेँ किए जहल जाए देब, एकर कोन कसूर छै, फेर हुअए जे जँ सजे भऽ जाएत, तैयो तँ जमानत हेबे करत, फेर घूमि कऽ एबे करब। हँ-निहस करैत साइकिलसँ विदा भेलौं। भोरूका समए, कनी-कनी पूर्वाक सिहकी रहबे करै, किरिण फुटैत-फुटैत मधुबनी पहुँच गेलौं। ओना राँटीक पुबरिये घार लग फ्रेस भऽ गेल रही। राँटी चौकपर पहुँचिते चाह-पान केलौं। भरि दिनक उमसमे तीन बजैत-बजैत वेदम भऽ गेलौं। एहेन वेदम भऽ गेल रही जे निर्णऐ नै कऽ पाबी जे जहल कष्टकर होइ छै आकि कोर्ट। चारि बजे जजमेंट भेल। केस खारिज भेल। ओकील मुंसीकेँ भोज-भात करैत सूर्यास्त भऽ गेल। अन्हरिया पख गाम जाइमे दू घंटा लगत, एक तँ अन्हार दोसर गर्मी-उमस, तैपर साइकिल चलाएब। मुदा कएले की जाएत। जमातक बीच रही, प्रजातंत्र शासन छिऐहे। सूर्यास्त पछाति विदा भेलौं। भगवतीपुर तक एक्के झोंकमे आबि गेलौं, मुदा पसीनासँ बूझि पड़ए जे देहक वस्त्र मोटा कऽ भारी भऽ गेल अछि। चाह पीब विदा भेलौं आकि विजलोका लौकलै। टुकड़ी-टुकड़ी मेघ छिलिआए लगलै। पछबाक सिहकी चललै, कनीए पछाति झीसी झहरए लगलै। तरेगन चोरा-नुक्की खेलए लगल। मेंहथ छहर लग आबि साइकिल चलबसँ हिया हारि गेल। भिनसुरका देखल घारक कतवाहिक बालु आ खेतसँ निच्चाँ बनल रस्तामे महिसिक खुरक धसान। दिनोकेँ होशियार एते होशियारी करिते छथि जे भरि कमला पेट साइकिल गुड़कबैत पएरे टपै छथि। रातिक नअ बजैत। दू घंटाक रस्ता गामक। देहक गंजी-कुरता निकालि, ठेहुनसँ ऊपर धोती खोंसि पएरे विदा भेलौं। पछबाक लहकीक संग मेघक झकास, कमलाधार लग अबैत-अबैत सुधि-बुधि हरा गेल। ठेहुनसँ निच्चाँ कमला पानि, बीच धारमे पैसि जिनगीकेँ हियाबए लगलौं, अंतिम केसक मुकदमाक खुशी, साँप जकाँ छछाड़ी कटैत धारक धारा, बर्खाक बदला झाकस, झाँट-विहारिक जगह हवाक लहकी पएरक पथिककेँ दू कोस आरो जाए पड़त। एगारह बजे पहुँचिते पत्नी हलसि दौगल आबि, जेना जहलसँ पड़ा कऽ आएल होइ तहिना दरबज्जा-आँगनक बीच दुहारिपर मोथीक बिछानि बिछबैत बजली- “पहिने ठंढ़ा लिअ। तखनि खाएब-पीब। अपना हाथक राति छी, सुतैएमे कनी देरी हएत ने।” अपन मस्तीमे मस्त रही। सटले उतारा देलियनि- “अहाँ अपन ओरियानमे जाउ, अखनि झीसीक मजा उठबए दिअ।” १ जनवरी २०१४ मति-गति रूपलालकेँ देखिते राधारमण बाजल- “रूप भाय, गाममे नै छेलौं की, बहुत दिनक बाद नजरि पड़लौं हेन?” राधारमणक प्रश्नक उत्तर रूपलालकेँ जेना ठोरेपर रहै, बाजल- “गामेमे छी। केतए जाएब। हमरा ले तँ गामे सभ किछ छी, स्वर्ग-नर्कसँ लऽ कऽ हाट-कसबा धरि।” रूपलाल आ राधारमण एक उमेरिया, संगे दुनू गोटे कौलेज तक पढ़ने। केते दिनपर दुनूकेँ भेँट भेल से तँ निसचित दिनक ठेकान नै छल मुदा मौसममे परिवर्तन जरूर आबि गेल छल। ई बात राधारमणकेँ बूझल जे रूपलालक छोट भाए मोतीलाल पनरह-बीस बर्खसँ एम.ए. करि कऽ महानगर कोलकातामे नोकरी करैए। आगू भऽ कऽ परिवारक बात पुछब अनुचित बूझि राधारमण बाजल छल। ओना पेटमे रहै जे जहिना अपनो गामक आ आनो गामक पढौल-लिखौल छोट भाए, केना पिता तुल्य जेठ भाइक संग बेवहार करै छथि। मुदा आगू भऽ कऽ एहेन प्रश्न अनुचितो होइ छै। जे भाए पिताक परिवार बिसरि जाइए तेकरा लेल तँ उचितो भऽ सकैए मुदा जे से नै मानि चलैए तैठाम तँ अनुचित हेबे करत। अनुचित ई जे केकरो भैयारीक बीच केहेन बेवहारिक सम्बन्ध छै, परिवारक भीतर किछु एहनो काज होइ छै जे गोपनीय रखल जाइ छै। ओहेन काज जे परिवारकेँ समाजसँ जोड़ैए ओ, आ जे परिवार जोड़ैक काज छी, दुनूमे अन्तर होइ छै। जँ सम्बन्धसँ हटि कऽ किछु प्रश्न धोखासँ एहेन उठि जाए, जइसँ बेवघात पैदा लइ तेहनो तँ भऽ सकैए। मुदा गपोक तँ कड़ी होइ छै, जइ कड़ीक बीच सभ बात जुड़ि सकैए, मुदा कड़ीक बीचक बातकेँ जँ पहिने रखल जाए तखनि तँ एहेन बेवघातक स्थिति बनियेँ जाइए। राधारमणक पेटक प्रश्न पेटेमे रहि गेल, मुदा बात तँ अँकुर गेल छल, कोनो-ने-कोनो गरे बाहर निकलबे करत। किए नै निकलतै, केकरो आँखि नै ने सीअल छै जे भैयारीक जिनगीमे आर्थिक विषमता एते दूरी बना देलक अछि जे एक भाँइक धिया-पुताकेँ उच्च कोटिक विद्यालय भेटै छै जइमे ने निअमित पढ़ाइ छै आ ने पढ़ैक दोसर बेवस्था पुस्तकालय, वाचनालय, डिबेट इत्यादि छै, जइसँ ओकरा साधारणो स्तरक बोध होइ, यएह छी भैयारीक सम्बन्ध। पाशा बदलैत राधारमण बाजल- “दुनू भाँइक परिवार आनन्दसँ छी किने?” राधारमणक गोटी सुतरल। रूपलाल उत्तर देलक- “हँ, बड़-बढ़ियाँ छी, मोतीओलाल गामेमे अछि, चलू कलकतिया विस्कुटो खाएब आ चाहो पीब।” ओना राधारमणकेँ केतेको काज सिरपर सवारी कसने रहै मुदा नवलोकसँ भेँट करब जरूरी बूझि सभ काजकेँ ठेलैत बाजल- “ओना एकटा काजे बौआइ छी मुदा चलू। पछाति बूझल जेतै।” दुनू गोटे संगे विदा भेल। दरबज्जाक ओसारक चौकीपर बिछाएल मोथीक बिछानपर बैसल मोतीलाल अपनो तीनू बेटा-बेटी, बहिनक सेहो दुनू आ भायक चारू बेटा-बेटीकेँ एकठाम बैसा, बीचमे बैसल। रूपलालक छोटका बेटाकेँ मोतीलाल पुछलक- “बौआ, की नाओं छियौ?” मोतीलालक प्रश्न सुनि दजबाक मन बौआ गेलै। मनमे उठि गेलै परिवारक सभ। बाप बौआ कहै तँ माए नूनू, दीदी धींगरा कहै तँ जेठ भाय घुसका। पित्ती टून कहै आ पितियाइन टूनटून। सबहक अपन-अपन नाओं रखैक पाछू अपन-अपन कारणो। पिता ऐ दुआरे कहैत जे हम बौआ कहबै तखनि ने बौआसँ बाउ सीखत। तहिना माएकेँ लोभ जे नूनू कहबै तखने ने नानी सीखत, जे जड़िए पकड़ि लेत। मुदा दीदीक आधार जे बच्चेसँ बेसी खुएलहा-पीएलहा देह, डेढ़ बर्खक पछाति उठि कऽ ठाढ़ भेल। तहिना जेठ भाय नअ महिनामे डेग नै बढ़बैत देखि घुसका नाओं रखि देलक। घुघड़ूबला डोराडोरि नेने आएल रहै, तँए टून नाओं रखने। पितियाइनो तहिना हेँठा-हेँठीक मालामे छोटकी टुनटुना लगौल अनने रहथिन तँए टून-टून नाओं रखने। पित्तीक प्रश्न सुनि। जहिना खले-खल काजक हिसाबसँ रूपैआक खल लगा लोक रखैए आ काज अबिते निकालैए तहिना टून बाजल- “टून।” जेठ भायकेँ देखबैत मोतीलाल बाजल- “ई के हएत?” “बड़का भैया।” बहिनक छोटकी बेटीकेँ देखबैत पुछलक- “ई के हएत?” “बहिन।” “हम के हएब?” “कलकतिया काका।” मोतीलालक रग-रगमे गाम समाज समाएल मुदा जहिना कोनो बोनक फल अपन प्रेमी जीव-जन्तुक बासभूमि बनैत आ नै रहने ओकरा प्रेमीकेँ भगेबो करैत तहिना मोतीलालक जिनगीमे भेल छल। शिक्षक पिताक समझ रहनि जे शिक्षा तँ शिक्षा छी चरम लक्ष्य होइते हेतै, अपने एकरा बूझि केना पएब, एक ढंगक शिक्षा पाबि शिक्षक बनलौं आ वएह विषयक शिक्षक बनलौं, दोसरकेँ बूझि नै पेलिऐ। जखनि बूझि नै पेलौं तखनि दुसब अनुचित तँए शिक्षा शिक्षार्थीक विचारसँ हुअए। मुदा सेवा निवृत्ति भेला पछाति महसूस केलनि जे किछु कमी जरूर भेल। सेहो तखनि भेलनि जखनि दुनू भाँइ रूपलाल-मोतीलालक जिनगी शुरू भेल। जेना रूपलाल अपना संग परिवार आ समाजकेँ जोड़ि मस्तीमे चलि रहल अछि तेना मोतीलालकेँ नै भऽ पाबि रहल छै। पिताक विचारक लाभ मोतीलाल उठौने रहए। नीक विद्यार्थी रहने नीक-नीक विचार हाइए स्कूलसँ उठए लगलै। डाक्टर बनब, इंजीनियर बनब, एम.बी.ए. करब इत्यादि। मुदा सुतरबो केलै। एम.बी.ए. केलक। डिग्री लेला पछाति जखनि उनटि पाछू तकलक तँ बूझि पड़लै जे गाम छूटि जाएत! हमरा जोकर काज कहाँ छै! गामक जे बात बुझए चाहै छेलौं से आब केना हएत!! किए लोक मातृभूमि-मातृभूमि अनेरे रट लगौने अछि। मुदा दोसर उपैयो तँ नै अछि। तखनि? तखनि तँ यएह ने जे जइ भूमिक साहित्य सृजन चाहै छी ओ अन्तौ रहने कएल जा सकैए, मुदा नोकरीक किछु दिन पछाति ई बात बुझलक जे जेते दिन गाममे रहि गाम देखलौं ओहने चित्र ने मनमे औत। मुदा जइ गाममे धार नै बहैत छल तइ गाममे धार आबि गामक भूगोल बदलि देलक, जइसँ उपजाबारीसँ लऽ कऽ जिनगीक क्रिया-कलापकेँ तहस-नहस कऽ देलक तेकरा जँ बीस बरख पहुलका चित्र आगूमे देबै तँ की नवका तूरक लोक आन्हर नै कहत! आन भूमि दर्शन तँ ओतुक्का अनकूल छै। जँ जीविते अन्हरा जाएब तखनि देखलौं की आ देखेलौं कथी! अपनाकेँ बलि चढ़ैत देखि मोतीलाल जिनगीमे किछु संशोधन केलक। संशोधन ई जे मास दिनक छुट्टीमे गाम आएब छोड़ि खुदरा-खुदरी छुट्टी बना मोसमे-मौसम आबए लगल। अपन सारोक डेरा लगेमे जइसँ सुविधो रहै। पाँच दिनक छुट्टी दुर्गापूजामे सपरिवार गाम आबए लगल बाँकी असगरे मोतीलाल तीन दिन-चारि दिन लेल आबए लगल। मुदा से ऐबेर नै भेल। बंगालक पिकनिक छोड़ि गामेमे सालक पहिल दिन सपरिवार मनाबैक विचारसँ आबि गेल। पाँच तारीखकेँ चलि जाएत। ओना मनमे द्वन्द्व कोलकतेसँ उठि गेल रहै, मुदा गाम अबैत-अबैत आरो बढ़ि गेलै। बढ़ि ई गेलै जे एक दिस लोक देशी-विदेशी संस्कृतिक ढोल पीटैए तँ दोसर दिस नगेड़ा बजा स्वागतमे आनियोँ रहल अछि, ई केना हएत! घाओक दबाइओ खेबै आ कदीमो खेबै तखनि तँ खलीफाक भीड़ानमे किछु बेसी समए लगबे करत। विचित्र स्थितिमे मोतीलाल बच्चा सबहक बीच अपन माथक बोझ उतारि रहल छल। एकटा नमहर समैक इतिहास रहल अछि केतौसँ मुड़ी आ केतौसँ नांगरि जोड़ि नै हेतै। कालखण्डक अनुरूप समाजिक ढाँचा बनैत रहल अछि। जँ से नै तँ जनकक इतिहासकेँ केना आधुनिक बना देल गेल अछि। रस्तेपर रूपलाल आ राधारमणकेँ अबैत देखि मोतीलाल उठि कऽ आगू बढ़ि बाजल- “प्रणाम, भाय साहैब?” मोतीलालक प्रणामक उत्तर दैत राधारमण बाजल- “मोतीलाल, तोरे नाओं सुनि कलकतिया बिस्कुट खाइले एलौं हेन।” बाँहि पकड़ि मोतीलाल राधारमणकेँ बैसबैत भातीजकेँ कहलक- “बौआ, जाबे चाह बनतह ताबे जलखै लाबह।” बहरवैया भाए-भावाेकेँ अबिते रूपलाल अपनो बहरवैया भऽ गेल। चुपचाप चौकीपर बैस देखए लगल। राधारमण बाजल- “केते दिन गाममे रहबह?” राधारमणक प्रश्न सुनिते मोतीलाल बाजल- “तीन दिन भाइए गेल परसू चलि जाएब। फेनो अगिला महिना फगुआमे आएब।” फगुआ सुनि राधारमण ठमकि गेल। ठमकि ई गेल जे एक दिस अंग्रेजीया नववर्ष, दोसर दिस अनेको अपन नववर्ष, केतौ चैती तँ केतौ बैशाखी, केतौ सौनी तँ केतौ दिवालीक। मुदा प्रश्न तँ उठबे करत जे सात समुद्र पारक मनबै छी, अपन देशी किए छुटि जाइए? प्रश्न तँ सामंजसक अछि जे एकरा केना सामंजस कएल जाए। अपन सनातनी संस्कृति प्रेममय अछि। जेकर फल छिऐ कण-कणमे ब्रह्मस्वरूप दर्शनक रूप तैंतीस करोड़ देवी-देवता, तेकर कोन नजरिए समावेश हएत। विचारकेँ आगू बढ़बैत राधारमण बाजल- “पढ़ाइ-लिखाइक काज केहेन चलै छह?” मोतीलाल- “गाम आ महानगरमे बहुत अन्तर भऽ गेल अछि। गाम जेते आगू घुसकल तइसँ पाछूओ कम नै घुसकल। तेकर कारण भेल अछि नैतिकताक ह्रास। सए-सैकड़ा रूपैआक मोल मनुखक जिनगीक बनि गेल अछि। भाए-भैयारीक सम्बन्धमे चलनिए बनि गेल अछि जे जखने जनमल तखने भीन! यएह छी रामायणिक चारू भाँइक पारिवारिक सम्बन्ध। गाम-गाम रामायणसँ अकास गूँजि रहल अछि, दोसर दिस पारिवारिक सम्बन्ध नष्ट भऽ रहल अछि तैठाम समाज आ सामाजिक सरोकार केहेन हएत, से तँ सोझहे अछि।” ओना राधारमणक प्लेटक रसगुल्ला सठबो ने कएल छल मुदा मनमे एहेन सुआद जरूर आबि गेल छेलै जे जे प्रश्न मोतीलाल उठौलक ओ केकर प्रश्न भेल। हजार हाथ मंगनिहारकेँ एक हाथ केते दऽ सकैए। मुदा लाजिमी बात ईहो अछिए जे मातृभमिक सेवामे अपन कथी योगदान अछि। देश-विदेशक बीच अनेको भाषा-भाषी क्षेत्रमे रहि एतबो नै कऽ सकै छी जे ओइ भाषाक साहित्यकेँ मैथिलीमे आनि सकी। अपन पहिचान अपन राशन कार्डपर मैथिली भाषी दर्ज करा सकी। खैर जे होउ, कोउ काहू मगन, कोइ काहू मगन। मोतीलालक गंभीर प्रश्नक उत्तर राधारमण नै दऽ बाजल- “छेनाक छी किने?” जहिना पानिक डूमडूमी खेलमे हरदा बजा चोर बनौल जाइ छै तहिना मोतीलालक मनमे भेल। मुदा शब्दवाण कलेजाकेँ बेध देने छेलै। बेधने ई छेलै जे किछु प्रश्नक विचार करब, मुदा पाहीपट्टी बूझि राधारमण प्रश्नकेँ टारि देलक। अपन मजबूरी देखबैत मोतीलाल बाजल- “भाय साहैब, अपन बेथा जे नहियोँ कहब तँ बुझबै केना। किछु पढ़ै-लिखैक इच्छा मनमे अछिए, मुदा जइ धरतीपर बास करै छी ओकर रूप रंग अपन गाम जकाँ नै अछि, जेहेन जरूरति छै तेहेन देखि नै पबै छी, एहेन इसथीतमे फँसि गेल छी। की करब से बाटे ने देखि पबै छी।” मोतीलालक प्रश्न फेनो राधारमणकेँ घुरियाएल बूझि पड़ल। अपन इच्छा जे एक गामक परिवारकेँ शहरक परिवार संग केना सामंजस बनौल राखल गेल अछि। केकरो कहैसँ पहिने अपन बिसवास अपनापर रखए पड़ै छै, जँ से नै हएत तँ शब्दजालमे ओझरेबे करत। बाजल- “परिवारक की सभ भार अहाँ ऊपर अछि आ की सभ भाय साहैबकेँ देने छियनि?” राधारमणक बात मोतीलालकेँ लागल नै, एक विचारधाराक धार बहैत बूझि पड़ल। बाजल- “नोकरीक दरमहे केते होइ छै तखनि तँ गामक हिसाबे बेसी होइते छै, तइमे अदहा-अदही कऽ लइ छी। अपनो आगू मुहेँ ससरैक अछि आ परिवारोकेँ ससारैक अछि। कहियो किछु ने मंगै छथि, अपन ढंग चलैक छन्हि, तइसँ परिवारक भारो ने बूझि पड़ै छन्हि मुदा तैयो बाल-बच्चाक पढ़ब, बर-बेमारी आ लत्ता-कपड़ाक भार उतारिये देने छियनि।” राधारमण- “एतबे किए उतारने छियनि, कहुना तँ श्रेष्ठ भेला किने?” राधारमणक बात सुनि मोतीलाल मुस्की दैत बाजल- “भाय साहैबकेँ घुमै-फीड़ैले मोटर साइकिल लइले कहै छियनि से मानिए ने रहला अछि। अहाँ संगतुरिया छियनि कहियनु।” चौकीपर बैसल रूपलाल दुनू गोटेक बात सुनि बाजल- “अहाँ सबहक विचार अछि जे मोटर साइकिल कीनि ली। मुदा आब हम ओइ जोकर रहलौं जे ड्राइवरी करब। जइ गाममे रहै छी तइ सभ तरहक जरूरति तँ गामेमे पूर्ति भऽ जाइए तखनि अनेरे सवारी लऽ कऽ की करब।” रूपलालक विचारकेँ राधारमण टारैत बाजल- “गाड़ी-सवारी रहलासँ अपनो सुविधा हएत आ अनको बेर-बेगरतामे काज औत। अच्छा सवारीक बात छोड़ू, रहै जोकर घर अछिए, तखनि तँ कोनो मलिनता भैयारीक बीच नहियेँ हएत।” रूपलाल- “मलिनता किए रहत। भैयारी होइ आकि दियादी आकि सामाजिक, सबहक बीच सीमा अछि अपन सीमाक बीच अपन जिनगी अछि तखनि किए कोनो मलिनता औत। बेजान गाड़ी-सवारी सड़कपर चलिते छै मुदा कहाँ केतौ बलउमकी ढाही लइए। केतौ जँ एक दोसरसँ टकराइतो अछि तँ ड्राइवरक गलतीसँ टकराइए।” चौकीपर सँ उठैत राधारमण बाजल- “बाउ मोती, बड़ बेर भऽ गेल। जाइ छी। जखनि गाम अबै छह तखनि एको-आध घंटा लेल भेँट होइत रहिहऽ।” मोतीलाल- “मनमे तँ अपनो रहैए, मुदा जिनगी ने दूदिसिया बनि गेल अछि, किछु जे गपो-सप्प करब, से की करब। तखनि तँ लोकक जिनगीए केतेटा होइ छै। कहुना-ने-कहुना कटिये जाइ छै।” राधारमण- “एना नै बाजह। सदिकाल मनमे रखि मनुख-परिवार-समाज, देश-दुनियाँक बीच अपनाकेँ ठाढ़ करैक परियास करह।” ०७ जनवरी २०१४ रिजल्ट पहिल जनवरीकेँ रवि दिन रहने दोसर दिन स्कूलो खुजत आ बड़ा दिनक छुट्टीसँ पहिने भेल परीछाक रिजल्टो निकलत। ओना शिक्षक अभिभावक आ विद्यार्थीक बीच नव बर्खक उपहारक समए रहने खुशीक वातावरण पसरले अछि। केना नै पसरौ! दुर्गापूजा अबैसँ पहिने जे खुशी मनमे उमकैत ओ तँ सप्तमी पूजा धरि रहबे करैत। ठाँउ करब, फूल-पातसँ पूजा करब, काँच माटिक दियारीसँ साँझ देब, स्तुति करब, मुदा आँखि (डिम्हा) पड़ला पछाति जे उत्सवक मेला शुरू होइए तेकर पछातिए ने खगल-भरल हाथक वोध होइए। गामेक हाइ स्कूलक नअम कक्षामे गोबर गणेश सेहो पढ़ैत। ओकरो रिजल्ट निकलत। जहिना आन-आन विद्यार्थीमे खुशी तहिना ओकरो। एक तँ परीछा देला पछाति बड़ा दिनक छुट्टीक उछाही तैपर आगू बढ़ैक अवसरि किए ने रहतै। ओना छुट्टीक उछाही सभ छुट्टीमे होइ छै मुदा से बड़ा दिनक छुट्टीमे नहियेँ रहै, मुदा किछुओ तँ जरूर रहए। सालमे केतेको छुट्टी विद्यालयमे होइए, जइमे किछु स्थाइओ आ अस्थाइओ। ओना बाबन-तिरपनटा रवि अपन अठबारे हिस्सा लइये लेने अछि, मुदा तँए आन-आनक कोनो सीमा-सरहद नै छै? छइहे। किछु पावनि-तिहारक नामे अछि, किछु मौसमक नामे अछि तँ किछु समैक नामे। खैर जे होउ, मुदा जहिना घटनकेँ बढ़न कहल जाइ छै तहिना छोट दिनकेँ पैघ दिन अर्थात् बड़ा दिन कहि अराम करैक अवसरि देल जाइए! केतबो धड़फड़ केलक गोबर गणेश तैयो साढ़े दस बजिये गेलै। एक तँ इस्कूलो जेबामे किछु बिलम भाइए गेल रहै मुदा रिजल्टक खुशीक हकार बँटबे ने केने रहए। तँए विद्यालय जाइसँ पहिने हकार सेहो बँटैक छइहे। विदा होइसँ पहिने बाबा लग जा बाजल- “बाबा, आइ रिजल्ट निकलत।” पोताक खुशीक हकार पाबि श्यामचरणक मनमे खुशी उपकलनि मुदा बजला किछु ने। केना खुशनामाक असीरवाद देथिन? ओ बरहबट्टू थोड़े छथि जे दीक्षा पहिने आ शिक्षा पछाति देथिन। गोबरो गणेशकेँ विद्यालयक फलक आशा तँए बाबाक असीरवादक प्रतिक्षा छोड़ि विदा भऽ गेल। माथक सुरूज पछिम लटकि गेल, अखनि धरि गोबर गणेश किए ने आएल। पढ़ौनी दिन थोड़े छिऐ जे बेसी समए लागत, रिजल्टक दिन छी। जे पास करत हँसैत घूमत आ जे फेल करत ओ अपनो कानत आ परिवारोकेँ कनौत। समटल मन बाबाक आरो समटा गेलनि। जेबेकाल पोता कहि गेल रिजल्ट निकलत। चौकीपर सँ उठि रस्तापर जा विद्यालय दिस हिया कऽ तकलनि। जेत्ते दूर नजरि गेलनि तैबीच केतौ पोताकेँ अबैत नै देखलनि। घूमि कऽ दरबज्जापर आबि विचारए लगला। केना फल पौल पोताक आगवानी छोड़ि अपने दोसर काजमे लागब। औझुके अगवानी ने वागवानी बनौत। अपना आँखिए पोताकेँ देखब आ अपना काने ओकर फलोकेँ सुनब छोड़ि कऽ जाएब नीक नै। बैसिते मनमे नीकक आशा नाचए लगलनि। जहिना गाम-घरक बीच नव-नव अविष्कार सुनि लोकक मन नचबो करैत आ गीतो गबैत जे आब की जनक जीक तीन बितीया हरक काज हएत, बड़का-बड़का हरजोता सभ आबि रहल अछि। एके दिनमे साठि बर्खक जिनगीकेँ तीस बरख बना देत। दू दिन तँ सौंसे जिनगीक भेल। गोबर गणेशपर नजरि पड़िते मनमे जेना शुभे-शुभक सपना उठए लगलनि। बिसरि गेला चारि सालसँ फेल होइत आएल गोबर गणेशकेँ। मुदा बिसरैक पाछू काजक फलो होइ छै। कियो काजक फल गनि फल बुझैए आ कियो फलेकेँ फल बुझैए। श्यामचरणक मनकेँ गोबर गणेशक काज अधला विचारक बाटपर ठाढ़ भऽ आगू अबै ने दनि, जइसँ बाबाक मनमे सौनक हरिअरीए बूझि पड़नि। आेना पछिला सालक हरिअरी बाढ़िमे तेना कऽ धुआएल जे लोक सौन-भादो बिसरि जुलाइ-अगस्त बुझए लगल, सेहो मनमे रहबे करनि। मुदा लगले मन बिनबिनेलनि। बिनबिनाइते चौकीपर सँ उठि रस्तापर पहुँच स्कूलक बाट हिया कऽ तकलनि। पोताकेँ केतौ नै देखि मन ठमकि गेलनि। मुदा लगले उठलनि जे किछु दूर आगू बढ़ि देखिऐ, जँ कहीं संगी-साथी संग रिजल्टक खुशीमे बौड़ा गेल हुअए। मनो गवाही देलकनि। सएह भेल, भरिसक केतौ बौड़ा गेल अछि। जँ से नै रहितै तँ कोन बेटा-बेटी लाखो बेर सप्पत खा कऽ नै बाजल हएत जे माए-बापक सेवा हमर धर्मे नै कर्तव्यो छी। एकटा झूठ बजने लोक कोट-कचहरीक खूनी केससँ बँचि जाइए आ जैठाम हजारो-लाखोक बात छै। मुदा बेसी काल मन ऐठाम नै अँटकलनि। आगू बढ़िते मन पड़लनि यएह जखनि गोबरधन गिरिधारी गोबरधन पहाड़ उठा इन्द्रक धारकेँ रोकि देलक तखनि हमर गोबर गणेश ने किए करत। मनमे उठिते जेना सौनक कजरारीक छटा छट-छटा गेलनि। डेगे-डेग किछु डेग जखनि आगू बढ़ि नजरि उठौलनि तखनि बूझि पड़लनि जे पोता आबि रहल अछि। नजरि पड़िते बाबा हाँइ-हाँइ पाछू घूमि, आपसी घर दिस विदा भेला। अपन सिंहदुआरिमे पोताक अगवानी करनाइक खुशी मनकेँ भरि देलकनि। मुदा जहिना प्रतिक्षाक घड़ी असथिरसँ नै चलि उकड़ू चालि चलए लगैए। श्यामचरणोक मनमे तहिना उठलनि। चारि बर्खसँ गोबर गणेश फेल करैत आएल अछि मुदा अपन मन कहै छै जेना जिनगीमे एकोबेर ने फेल केलौं हेन। जँ से रहितै तँ कोढ़िया बरद जकाँ पालो देखिते कान झाँकि दइत। सेहो तँ नहियेँ बूझि पड़ैए। मुदा से भेल केना अछि ई तँ ओकरेसँ भाँज लगत। कियो रचनाकार मरि कऽ नै मृत्युक चर्च करै छथि, मृत्युपराए जिनगी देखि मृत्युक चरचा करै छथि। फेर कनगुरिया आँगुरपर हिसाब जोड़ए लगला। टटका पढ़लाहा ने टटका प्रश्नक उत्तर टटके लिखि देत मुदा से तँ गोबर गणेशमे नै अछि। रिआएल-खिआएल पाइ थोड़े कारोबारमे औत। जँ कनियोँ-कनियोँ बिसरैत गेल हएत तैयो एक सालक पढ़ाइ तीन सालमे बिसरिए गेल हएत। जँ बेसियाएल होइतै तँ चारि गुणा बेसीआ जाइत। तखनि तँ दोसरे सालमे बेसी पबिते पास केने रहैत, सेहो तँ नहियेँ भेल अछि। मन घोड़मट्ठा हुअ लगलनि। गोबर गणेश अबिते श्यामचरणकेँ गोड़ लागि बाजल- “बाबा, रिजल्ट निकलल।” गोबर गणेशक बात सुनि श्यामचरणक मनमे उठलनि, की निकलल। पास केलक आकि फेल केलक से कहाँ बूझि पेलिऐ। नजरि उठा हिया कऽ गोबर गणेशक मुँहपर देलनि। मुँहक रूखि मलिन नै। मुदा केना कऽ पुछबै जे बौआ पास केलेँ आकि फेल। पास-फेल तँ लोक जिनगीक क्रियामे करैए। जे बच्चेसँ प्रवाहित हुअ लगै छै आ हंसवाहिनी मतियो चलए लगै छै। आँखिपर आँखि चढ़ल देखि गोबर गणेश बूझि गेल जे बाबाक मनमे किछु प्रश्न छन्हि। हलसैत बाजल- “अहूबेर नमेमे रहब।” पोताक बात सुनि श्यामचरणक मनमे उठलनि, चारि सालसँ फेल करैत आएल अछि मुदा मनमे मिसिओ भरि गम नै छै! सियाहीक कोनो रेख नै देखि पबै छी। असमंजसमे बाबाकेँ पड़ल देखि गोबर गणेश बूझि गेल जे भरिसक बाबा बिसरि गेला। सएह मन पाड़ैले कहि रहला अछि। किछु ठेकना कऽ मन पाड़ि बाजल- “पहिले साल जे फेल केने रही से बिसरि गेलिऐ जे किए केने रही?” पोताक प्रश्न सुनि श्यामचरण असमंजसमे पड़ि गेला जे केना हँ कहबै आ केना नै कहबै। हँ जँ कहबै तखनि जँ कहीं आगूक बात पूछि दिअए आ जँ नै कहबै तँ बुझलो बात नै बूझब कहि झुट्ठा भऽ जाएब। चुपे रहला। परिवार की कोनो कोट-कचहरी छिऐ जे बाता-बाती हएत, परिवार तँ परिवार छिऐ। जहिना बाबाकेँ बिनु पुछनौं किछु कहैक अधिकार पोतापर होइत तहिना ने पोतोकेँ बाबापर। अपने फुड़ने गोबर गणेश बाजल- “पहिल साल जे शिक्षक पढ़ौने रहथि, हुनकर बदलीओ भऽ गेलनि आ विषयो बदलि गेल।” पढ़ौनी आ पढ़ौनिहार सुनि किछु पुछैक मन श्यामचरणकेँ भेलनि, मुदा अपने फुड़ने गोबर गणेश फेर बाजल- “पहिल साल जे शिक्षक जे विषय पढ़ौलनि ओ जेना तर पड़ि गेल।” गोबर गणेशक बात सुनि श्यामचरण ओझरा गेला। डोराक पोलिया जकाँ ओर-छोर नै बूझि पाबि जेना बिच्चेमे ओझरी लगि गेलनि। ओझरी लगिते एकटा ओर देखथि तँ दोसर हरा जान्हि आ बीहयबैत जखनि दोसर भेटनि तँ भेटलाहा हरा जान्हि। टीकमे लागल चिड़चिड़ी जकाँ भऽ गेलनि। एक तँ आँखिक पछुऐतमे टीक रहने सोझहा-सोझही नै देखि पबैत दोसर दुनू हाथक आँगुर ओझरी छोड़ाइए ने पबैत। मनमे उठलनि, गोबर गणेश कियो आन छी जे कोनो बात पुछैमे संकोच हएत। पुछलखिन- “बौआ, नै बूझि पेलौं जे केना पढ़ौनीओ आ पढ़ौनिहारो बदलि गेल। जँ पहिल साल बदलिये गेल तैयो दोसर-तेसर-चारिम साल तँ बँचल...?” बाबाक प्रश्न सुनि, साँपक बीख झाड़निहार मनतरिया जकाँ गोबर गणेश धुरझाड़ बाजल- “जहिना पहिल साल बदलल तहिना दोसरो साल बदलल।” दोसर साल सुनिते बिच्चेमे श्यामचरण टोकि देलखिन- “एना नै बाजह जे जहिना पहिल बदलल तहिना दोसरो-तेसरो-चारिमो साल बदलल। फुटा-फुटा कहऽ जे पहिल साल की बदललह आ दोसर-तेसर-चारिम की?” बाबाक प्रश्न सुनि, जहिना कियो इन्टरभ्यू देमए जाइकाल रस्ताक पढ़ल-बूझल बात सुनि प्रश्नक पुछड़ी पकड़ि धड़-धड़ा कऽ उत्तर दिअ लगैए तहिना गोबर गणेश बाजल- “पहिलुक साल पढ़लौं जे केना कियो गाछपर चढ़ि आम तोड़ैए आ केना माटिक पहियाक गाड़ी बना माटि उघैए।” ओना श्यामचरणकेँ पोताक उत्तर सुनल बूझि पड़लनि, मुदा किछु बेसी दिनक सुनल बूझि बेसी बिसराइए गेल रहनि। किछु अपनो मनपर भार दथि आ किछु खोधि-खाधि गोबरो गणेशक मुँहसँ सुनए चाहथि। गोबर गणेश बूझि गेल जे बाबाकेँ रस भेटि रहल छन्हि। मनमे उठलै जे परिवारमे बूढ़-बच्चाक बीच सम्बन्ध बनत तँ बीचला अनेरे सोझराएल रहत। एक दिस टीकासनक बाबा तँ दोसर दिस गंगा पार करैक नाव पोता। मुस्की दैत गोबर गणेश बाजल- “दलानक खुट्टीपर जे ललका कपड़ामे रामायण बान्हि कऽ रखने छी ओ पुरना गेल। पहिल बर्खक कोर्समे रहए।” गोबर गणेशक अजगुत जवाब सुनि श्यामचरणक मनमे भेलनि जे बुधिए ने घुसुकि गेलैए। मुदा लगले फेर भेलनि जे केमहर घूसकल से केना बूझब। एहेन प्रश्न पुछबो केना करबै। जँ कहीं आगू मुहेँ घुसुकि गेल हेतै तखनि अगियाएल बात बाजत। जँ कहीं अगवानीक चालि धेलक तँ अनेरे अनसोहाँत लागत। से नै तँ चुचिकारी दऽ अपने मुँहसँ बजाएब नीक हएत। पुछलखिन- “बौआ, तँू झब-झब बाजि जाइ छह, कनी असथिरसँ बाजह। आब कि अपन ओ आँखि-कान रहल जे श्रवणकुमारक पानिक अवाज सुनि तीर चलाएब।” बाबाक प्रश्न सुनि गोबर गणेशक मन मघैया खेतक खेसारी, सेरसो जकाँ गद-गदा गेल। बाजल- “बाबा, रस्ता-पेरा एहेन सवाल-जवाबक जगह नै छी। कखनो कुत्ता-बिलाइ धियान तोड़त तँ कखनो बान्हपर खेलाइत धिया-पुता। ओकरा मनाहिओं तँ नै करबै। जेकरा तीनिए बीतक घर-घराड़ी छै ओकर धिया-पुता रस्ता-बाटपर नै खेलतै तँ खेलत केतए। से नै तँ चलू दरबज्जापर, असथिरसँ कहब।” पोताक बात सुनि श्यामचरण बजला- “जेतए बसी वएह सुन्दर देश भेल। जे पैतपाल करए वएह राजा भेल। ईहो जगह कि अधला अछि, दुआरे-दरबज्जाक ने मुहथरि छी। अपन घर-दुआर छी, अकासमे चिड़ै-चुनमुनी उड़बे करत, कुत्ता-बिलाइ, माल-जाल चलबे-एबे-जेबे करत तइसँ कि गप-सप्पमे बाधा पड़त।” बाबाक विचार गोबर गणेशकेँ नीक लगलै। मनमे एलै गाए-गोरूक मिलान ठेहुनो पानि दुहान। बाजल- “बाबा, रखलाहा पोथीमे कथी राखल अछि से बिसरि गेलिऐ।” पोताक बात सुनि कनी पाछू घुसकैत श्यामचरण बजला- “सोलहन्नी केना बिसरि जाएब, मुदा किछु झल जकाँ तँ भइये गेल अछि।” ‘झल’ सुनि झलझलाइत गोबर गणेश बाजए लगल- “चारू जुगक चर्चा अछि।” ‘चारू जुग’ सुनि श्यामचरणक मन सकपकेलनि। सकपकाइते बजला- “बौआ, चारि जुगक चर्चा ने पोथी-पुराणमे अछि, जुग तँ केतेको आएल-गेल आ अबैत-जाइत रहत। जुगोक कि ठेकान अछि, जखनि दूटा चिन्हारकेँ भेँट होइ छै तखनो कहै छै जुगो पछाति भेँट भेलौं। आब तोहीं कहऽ जे एक जुगकेँ के कहए जे केते भऽ जाइए!” बाबाक विचार गोबर गणेशकेँ जँचल। बाजल किछु ने मुदा डोरीमे बान्हल कोनो वस्तु जकाँ मुड़ी डोलबए लगल। बाबा बूझि गेला जे भरिसक आरो बात सुनए चाहैए। बजला- “जहिना चिन्हारक बात कहलियऽ तहिना बारह बर्खकेँ सेहो जुग कहल जाइ छै।” बाबाक विचारकेँ उड़ैत देखि गोबर गणेश बाजल- “बाबा, कोन जुग-जमानाक बात उठा देलिऐ। आब ने ओ जुग रहल आ ने जमाना। अखनुक जे जुग अछि तहीसँ ने अपना सबहक जिनगी चलत। अनेरे मगजमारी केने मनो छिड़िआएत।” जे बूझि गोबर गणेश बाजल हुअए मुदा श्यामचरणकेँ भेलनि जे भरिसक जे कहलिऐ ओ हृदैकेँ बेधलकै हेन। नीक हएत जे आरो किछु कहि विचारक रस्ता बदलब। बजला- “बौआ, जखनि एते बाजिये गेलौं तखनि कनीए आरो रहल अछि, ओकराे सठाइए लेब नीक हएत। चारि जुग जे भेल सतयुग, त्रेता, द्वापर आ कलयुग से कि कोनो एक्केरंग भेल। जेकरा जेते फबलै से तेते दफानि लेलक।” गोबर गणेश दफानैक माने नै बुझलक। बाजल- “की दफानि लेलक?” पोताक जिज्ञासा सुनि श्यामचरण बजला- “देखहक जँ चारू जुगमे समैक बँटबारा भेल तँ एक रंगक ने होइत, से कहाँ अछि। चारू चारि रंग अछि। खैर जे होउ मुदा एकटा आरो बात कहि दइ छिअ। सतयुगक हरिश्चन्द्र बड़ दानी छला। राजा छला, मुदा दान देबाकाल बिसरि गेला जे हम राजा छी, राजक भार ऊपरमे अछि, अपना फुड़ने जँ एक्के गोटेकेँ सभटा दऽ देबै तँ करोड़क-करोड़ लोकले कथी रहतै।” दिन भरिक जुड़ाएल मन गोबर गणेशक, पेटक बात उफनि-उफनि बहराए चाहै, मुदा बाबाक विरामक पाछुए ने किछु बाजत। रोकलो तँ नै जा सकैए। मनमे उठलै, जहिना कोनो फुलक गाछ आकि कोनो लत्ती गिरहे-गिरह मुड़ीओ-फुलो आ बतीओ दइए तहिना जखने बजता आकि बिच्चेमे टोकि मुड़ियारी देबनि। अनेरे अक्छा कऽ चुप भऽ जेता। बाजल- “बाबा, अहाँ चारि जुगक चर्चा करै छिऐ, मास्टर साहैब कहलनि जे पाँचम जुग छी। एकटा केतए हेरा गेल।” हेराएल सुनि श्यामचरण ठमकला। ठमकिते गोबर गणेश बूझि गेल जे भरिसक बजैले किछु कहै छथि। सुनैक प्रतिझु जकाँ मुँह लगै छन्हि। बाजल- “बाबा, जहिना अदौमे आमक फड़ खाइ छल तहिना अखनो खाइ छी। नीक भोज्य पदार्थ छिऐहे। मुदा प्रश्न तँ एकटा उठबे करत किने जे नमहर गाछक फल छी, जँ अपने टुटि कऽ खसैक बात सोचबै तँ छोटका-बड़बड़िया भलहिं खसलोपर दरहे रहैए मुदा नमहर, कोमल केना रहत। तखनि ओकरा केना उपयोग कएल जाएत।” गोबर गणेशक बात श्यामचरणकेँ जँचलनि। बजला- “एकर उपए तँ यएह ने हएत जे जँ छोट गाछ रहत तँ निच्चोसँ ठाढ़ भऽ हाथसँ तोड़ि लेब, मुदा नमहरमे तँ लग्गी-बत्तीसँ तोड़ल जाएत या गोला-ढेपासँ तोड़ल जाएत। मुदा ई तँ तर्क भेल। आजुक समैमे भलहिं गमलोमे आम फड़ए, मुदा नमहर गाछक फल छी, एकरो तँ नकारल नहियेँ जा सकैए। जल्दी-जल्दी अपन बात कहऽ। चाहो पीबैक मन होइए।” चाहक नाओं सुनिते जेना गोबर गणेशक पशे बदलि गेल। बाजल- “बाबा, गप-सप्प केतौ पड़ाएल जाइ छै, ओ तँ सदिकाल उड़िते रहैए आ उड़िते रहत। मुदा ओकरा (बातकेँ) जखनि विचार बना विचारि कऽ नै विचरण करबै तखनि धारक मुँह केना बनतै। अखनि एतबे रहए दियौ। रिजल्टक दिन छी, अहाँ अँटका लेलौं। दादी-माए सभ अँगनामे टाटक भुरकी दने तकैए। भने चाहो बनबा लेब आ कुशलो-छेम सुना देबै।” गोबर गणेशक विचार श्यामचरणकेँ जँचलनि। मनमे उठलनि जे भरिसक हमहूँ सभ (पुरुष पात्र) अतिक्रमण करै छी। से नै तँ दुनू गोटेक (पति-पत्नी) दिशा दू किए भऽ जाइए। परिवारक भीतर जँ वैचारिक समरूपता रहत तँ मतभेद किए हएत। सभ तँ बालो-बच्चा आ परिवारोकेँ नीक्के चाहै छिऐ। आँगन पहुँच दादीकेँ गोड़ लागि गोबर गणेश पाशा बदलैत बाजल- “दादी, पास केलिऐ। तेते ने बैटरीबला पंखा, बत्ती, छोटका बड़का कम्प्यूटर, आरो कि कहाँ आबि गेल अछि जे घरे बैसल इंजीनियर-डाक्टर बनि जेबौ।” पोताक विचार सुनि दादी एते अह्लादित भऽ गेली जे लाख सम्हारला पछातिओ मुँहसँ खसिये पड़लनि- “रौ गोबरा, सभ दिन तूँ गोबरे रहमेँ।” दादीक बात गोबर गणेश नै बूझि पौलक। अपनापर सुनैक शंका भेलै। सुनैक शंका ई जे गोबराएल कहलक आकि गोबर गणेश। सभ तँ गोबर गणेश कहैए। भऽ सकै छै बिनु दाँतक बूढ़ मुँह किछु बजाइए गेल होइ। केहेन-केहेन बीखधरक तँ बीख बिनु दाँते निकलिते ने छै, दादी तँ सहजे बूढ़ दादीए भेली। बाजल किछु ने चाहक गिलास नेने बाबा लग पहुँचल। हाथमे चाहक गिलास पकड़बैत बाजल- “बाबा, अहाँ खुशी भेलौं किने?” “बौआ, जँ तूँ खुशी तँ हमहूँ खुशी।” १६ जनवरी २०१४ अपन सन मुँह रेलबे स्टेशनक प्रतीक्षालयक कुरसीपर बैसल विष्णुमोहनक मनसँ अनायास खसलै- “जहिना अपन सन मुँह लऽ कऽ आएल छेलौं तहिना अपने सन नेने जाइ छी।” मनसँ खसिते विचारक रस्ता बुधि पकड़लक। रस्ता पकड़िते मुँहसँ खसलै- “कोन मुहेँ आएल छेलौं आ कोन मुहेँ जाइ छी। हे स्टेशनक विश्रामालय अंतिम प्रणाम!” परोपट्टामे बड़ी लाइनक गाड़ी आ बिहारकेँ महानगरसँ जुड़ैक बाटक चर्च सुनिते लोक, सूतल गाए जकाँ कान पटपटौलक। एन.एच.५७क दूरबीनक काज शुरू होइते अन्नक संग कुअन्नो सौनक मेघ जकाँ सिसकए लगल। दूरबीनसँ देखिनिहार इंजीनियर सभसँ गामक लोक सभकेँ भेँट भेलै। जहिना साँपक मुँह साँप चटैए तहिना लोक पुछब शुरू केलक। गामक लोको तँ बुधिक बखारीए छी, मरूआक छी आकि तीसीक, धानक छी आकि चाउरक से बुझैक काजे कोन छै। सरकारी छी सरकार बनबैए। कमीशनक कारोबार हेबे करतै। जहिना सीढ़ीनुमा ढाल अछि तहिना कमीशनो चढ़बे करत। मुदा से बिनु चाह-पान खुऔने थोड़े हएत। भाइ! मिथिला छिऐ, हमरा गाम अहाँ काज करए एलौं आ कुशलो-छेम नै पुछी, चाहो-पान नै कराबी तखनि हमरा सबहक सेखीए की रहत। बहरवैया इंजीनियर मिथिलाकेँ पवित्र भूमि बुझबे करैए। भाषा नै बुझैए तँ नै बूझह मुदा पवित्र बूझि पावन तँ करबे करत। सोझ मतिये बजबो करैत- “विदेशी पूजीक सहयोगसँ बनि रहल अछि, पाइक कमी नै छै, इलाका धुधुआ जाएत।” नक्शा बनला पछाति जखनि जमीनक प्रश्न उठल तँ हजारो बर्खक मुइलहा जमीन सबहक मुँहमे स्वाती नक्षत्रक अमृत खसल। सए-सैकड़ा रूपैआक कट्ठा जमीन हजार-लाखमे कूदल। गाम-गाम चाह-पानक दोकान चौकक निर्माण केलक। सड़कक बीच जे जमीन पड़ल ओकर हस्तान्तरण शुरू भेल। भेल दुनू, किछु गोटेक जमीन लूटा गेल तँ किछु गोटे लूटबो केलक। लूटलक ई जे ताल-मेल बैसा टटघरकेँ कोठा मकानक दाम लेलक। खाली जमीनक दामेक लाभ भेल से नै, गाम-गामक रस्ता-बाटक सम्पर्क बनल। मुदा गाम-गामसँ पड़ाएल लोक दुआरे पाइक जेहेन मोल हेबा चाही से नै भेल। संगे जइ गतिये हेबा चाही सेहो नै भऽ रहल अछि। पाँच कट्ठा घराड़ीक जमीनक अढ़ाइ कट्ठा इन्द्रमोहन आ विष्णुमोहनक सेहो पड़ल। ओना सड़कक कातक जमीनक मोल तखने उचित होइत जखनि सड़क बरोबरि आ किछु ऊपर उठा ओकरा कारोबारमे आनल जाए, नै तँ सिरकट भऽ ओहेन बनि जाइए जइमे सड़कक कूड़ा-कड़कटसँ लऽ कऽ बर्खाक पानि धरि बसए लगैए। इन्द्रमोहनोक जमीनक हाल सएह हएत। इन्द्रमोहन आ विष्णुमोहन सहोदर भाए। पिताक नाओं कृष्णमोहन। कृष्णमोहन गामक बगले गामक लोअर प्राइमरी स्कूलक शिक्षक छला। ओना लोअर प्राइमरी स्कूलोक शिक्षकक एक सीमांकन भाइए गेल जे मैट्रिक पास शिक्षक हेता। मैट्रिकक सर्टिफिकेट तँ कृष्णमोहनकेँ नै रहनि मुदा निच्चाँसँ ऊपर श्रेणी धरि स्कूलक पढ़बैक लूरि तँ रहबे करनि। लूरिक दोसरो कारण रहनि। कारण ई रहनि जे ओना स्कूलक शिक्षा नै भेटल रहनि मुदा नाना अपना लग रखि पढ़ै-लिखैक एहेन लूरि बना देने रहनि जे धुड़झार सभ किलासमे पढ़बै छला। जइसँ विद्यार्थीओ आ अभिभावकोमे मान-समान रहबे करनि, जेकर जीवंत प्रमाण छल जे सिरिफ पढ़ौले विद्यार्थी नै आनो-आन प्रणाम करिते छेलनि। सुबुधिए ने प्रणम्य होइत से तँ अपन काजक ओकाइत धरि रहबे करनि। नोकरीक शुरूमे सरकारी दरमाहा कृष्णमोहनकेँ नै रहनि हुनकेटा नै रहनि से बात नै आनो शिक्षककेँ नै रहनि। मुदा तँए पढ़निहार बेइमान रहए से नै। अरबा चाउर शनिचरा आ एकटा दूटा पाइ तँ अठबारे शनिए-शनि दैते रहनि। ओना किछु विद्यार्थीकेँ शनिचरा माफ रहए। तैठाम कृष्णमोहन सबुर करथि जे जेहने दान तेहने ने पुन। माफक कारण आर्थिक स्थिति छेलै। ओना ओहन विद्यार्थीक संख्या कम रहए। दस बीघा खेतबला कृष्णमोहन सोलहन्नी पठने-पाठनक बीचक जिनगी धारण कऽ लेलनि तइसँ खेतीक आमदनी सेहो कमि गेलनि। ओना खेत बँटाइ लगौने रहथि मुदा उपजा दूधक-डारही जकाँ रहनि। कारणो छल, एक तँ समैपर खेती नै भऽ पबै, दोसर खेतीक खोराक तँ पानि छिऐ से नै रहनि, तैसंग कोनो साल बीड़ारेमे विहनि रौदी भेने जरि जाइत तँ कोनो साल बेसी बरखा-बाढ़ि एने गलि जाइ। जरन-गलन खेतीक प्रमुख बिमारी भाइए गेल रहै। ओना कृष्णमोहनक किछु बँटेदार खेतीमे पूजी लगा उद्योग बनबए चाहै छल मुदा खेतीक पूजी दू दिशिया होइत। एक दिस खेतकेँ चौरस करब, पानिक ओरियान करब, जीव-जन्तुक उपद्रवक बचाव करब, तँ दोसर दिस होइत नीक बीआ, खाद, दबाइ कीनि उपजा बढ़ाएब। मुदा तइमे कृष्मोहन पाछू हटि जाथि। हटैक कारण रहनि जे पानि लेल बोरिंग-दमकल जे कारखानाक समान छी, तइमे मनमाना दाम रहने अधिक पूजीक जरूरति पड़ैत, तहिना खेतो चौरस आकि छहरदेवालीसँ घेरब आकि कँटहा तारसँ बेरहब सेहो तहिना। आब ओ समए रहल नै जे टल्ला-छिट्टासँ लोक खेत सेरिऔत, गामक लोक भागि कऽ शहर-बजार पकड़ि लेलक तखनि केना सेरिऔल जाएत। टेकटर सभ बढ़ियाँ काज करै छै मुदा ओकर तँ खर्चो बेसी छैहे। ओना कृष्णमोहनकेँ एते जमीन छेलनि जे किछु जमीन बेचि जँ पानिक प्रबन्ध करए चाहितथि तँ कऽ सकै छला मुदा बाप-दादाक देल जमीन केना बेचि सकै छला! प्रतिष्ठाक प्रश्न तँ रहबे करनि। भूमिए ने भूमा आ भूषण दुनू छी। बँटेदार अपन पूजी अहू दुआरे नै बेसीयबऽ चाहैत जे उपजाक बँटबारा उचित नै छै। खेतीमे उपजाक अदहासँ बेसी बँटेदारकेँ लगते लगबए पड़ैए, तैठाम जँ अदहा बँटाइ भेटत तँ घाटा हेबे करत। आब कि कोनो सतयुग छी जे लोक अपन पूजी गमा दोसराक उपकार करत। आब तँ ओ जुग आबि गेल अछि जे लोक दानो-पुन अपने धिया-पुता धरि करैए। जँ से नै तँ महारथीक बेटे किए महारथी बनला, दोसर किए ने बनि सकला, जखनि कि ओ सभ दानीए नै महादानी छला। कृष्णमोहनक पहिल सन्तान इन्द्रमोहन। इन्द्रमोहनक जन्मक समए हुनकर मातो-पिता जीविते रहथिन। परिवारमे इन्द्रमोहनकेँ पबिते बाबा-दादी हृदए फाड़ि असिरवाद देने रहथिन जे कुलमन्त बनि जिनगी जीविहऽ। समए बीतल हराइत-ढराइत कृष्णमोहनोकेँ स्कूल भेटलनि। शनिचराक आशा रहबे करनि तैपर पैंतालीस रूपैआ दरमहो भेटए लगलनि। मनक आशा पुरबै दुआरे इन्द्रमोहनकेँ इमानदारीक संग पढ़ौलनि। अपन कोठीक जे धान-चाउर रहनि ओ खोलि कऽ दऽ देलखिन। मुदा इन्द्रमोहनकेँ डिग्री-डिप्लोमा नै भेटि सकलै। अछैते बुधिए इन्द्रमोहनकेँ अपना बरबरि काज नै देखि कृष्णमोहन चिन्तित रहबे करथि मुदा उपैये की। सरकारमे जे अछि ओकर तँ अपने लगुआ-भगुआ सड़कपर बौआइ छै, अनका कथी देखत। मुदा एते उपए तँ कृष्णमोहन कइये देलखिन जे खेत बँटाइए रहए दहक, अपनो दरमाहा भेटिते अछि, पेन्शनोक गप-सप्प चलिये रहल अछि जाबे जीब ताबे तोरा तकलीफ नै हुअ देबह। जइसँ इन्द्रमोहनकेँ अपना सिरे काज किछु ने। मुदा शिक्षकक बेटा रहने परिवार तँ प्रतिष्ठित भाइए गेल छेलनि। केना ने होइत, जँ सरस्वतीक बास भूमि स्वर्ग भूमि नै बनै तँ केकर बनै। अपनो दरबज्जापर लोकक आवाजाही आ अनको ऐठाम आएब-जाएब इन्द्रमोहनक रहबे कएल। पढ़ल-लिखल रहने गामक लोक इन्द्रमोहनकेँ काजक भार दिअ लगलनि। खेती-पथारीक समए आ ओकरा करैक लूरि तँ लोक पुछए लगलनि। समाजमे झूठो केना बाजल जाए तखनि तँ महिना-तीर्थ बुझैले किछु जरूरति पड़बे करत। तैसंग खेती करैक तरीका सेहो बुझए पड़त, जँ से नै बूझब तँ लोक अनेरे कहत जे मास्टरक बेटा तास्टर भऽ गेल। तइले जँ सोलहन्नी नै तँ चौअन्नीओ सत् नै रहत तँ सोलहन्नी झूठो आँखिक सोझहामे केना देखल जाएत। ओना पोथीओ-पत्रा प्रमाणिक अछि मुदा तेतबेसँ काज चलैबला नहियेँ अछि। जेना वायुमण्डलक रूप रेखा बदलने मौसमक रूप-रेखा बदलि जाइत तेना तँ पोथी-पत्राक तानी-भरनी नै बदलैत, तँए किछु आरो पढ़ैक जरूरति अछि। इन्द्रमोहनकेँ मनमे उठिते बुधि बिचरलै, बिचरिते भूगोल-इतिहास दिस बढ़ल। मुदा प्रश्न फँसि गेलै दुनूक साल-मासक हिसाबमे मलमास। तीन सालपर होइए। जेकर कोनो मोजरे ने छै, जखनि पूजा-पाठ, पावनि-तिहार हेबे ने करत तखनि खेती-पथारी केना कएल जाएत। मुदा विचारलो केकरासँ जाए। भूमि छेदन अधला भेल। मुदा भूमि तँ देहो होइए, मनो होइए। समाजक निरमौत समाज होइए। तइमे समाज तेहेन चालनि जकाँ भऽ गेल अछि जइसँ परदा बनब कठिन अछि। घोर-मट्ठा भेल मनमे इन्द्रमोहनकेँ उठल जे अनेरे दूध-दही फुटाएब आकि घोर-मट्ठा, तइसँ नीक जे दूधे उठा कऽ पीब जाइ। सबहक मद्दी भऽ जेतै। विचारमे मनो मानि निर्णए कऽ लेलकै जे जेते बूझल अछि ओ बुझलाहा भेल बाँकी बिनु बूझल भेल, दुनू बात लोककेँ कहबै। जे मन फुड़तै से मानि करत। मुदा लगले मनमे दोसर धक्का लगलनि। ओ ई जे बुझबो तँ एक रंग नै होइए। कोनो दोसराक मुँहक सुनल होइए तँ कोनो किताबक पढ़ल तँ कोनो अपना हाथे कएल रहैए तखनि तीनूमे केकरा की कहबै। हरि अनंत हरि कथा अनन्ता’ कहि राम-राम कऽ जिनगीकेँ रामरो बना सामाजिक लोक इन्द्रमोहन बनि गेल। नोकरीक अंतिम दस बर्खक बीच पिता-कृष्णमोहनक जिनगीमे उछाल एलनि। पाँच सन्तानक बीच परिवारमे तीनू बेटीओ आ जेठ बेटा-इन्द्रमोहनकेँ बिआह-दुरागमन कऽ निचेन भऽ गेल छला। गामसँ थोड़े हटि दोसर गाममे हाइस्कूल बनने विष्णुमोहन मैट्रिक पास कऽ नेने छल। एका-एक पैंतालीस रूपैआक काजक मूल्यो हजारमे बदलि गेलनि। बेटाक मनमाना शिक्षा लेल हृदए खोलि देलखिन। एते जरूर केलनि कृष्णमोहन जे इन्द्रमोहनसँ सेहो पूछि लेलखिन। सोझमतिया इन्द्रमोहनकेँ प्रश्नक उत्तर दइमे मिनटो नै लगलै। मन कहलकै- “अनकर दालि-चाउर अनकर घी हमरा परसैमे की। जेठ भायक मान-मर्यादा तँ अपने बनबए पड़त। से तँ अनके सिरे भेटि रहल अछि। एते हल्लुक माटि तँ बिलाइओ खुनि सकैए, मनुख तँ सहजे मनुख छी जे पाताल खुनि जौमठि गाड़ि सीमांकन कऽ लइए।” जहिना पिताक उल्लासक प्रेरणा आ सहयोग तहिना भाइक पाबि विष्णुमोहन एम.बी.ए. केलक। एम.बी.ए. केला पछाति बैंकक मैनेजरक ग्रेजुएट कन्या संग बिआह भेल। आमजन जकाँ बन्हाएल जनक जिनगी नै होइत। चारित्रिक प्रमाणपत्रक रूपो-रेखा बदलि जाइ छै, जेना बैंक-कारखानाक बीच चरित्र निर्माण भेने परिवारमे नोकरीक आगमन भाइए जाइत अछि। नोकरीक आश्वासनपर विष्णुमोहनक बिआह कृष्णमोहन करा देलखिन। बिआहक किछुए दिन पछाति विष्णुमोहनकेँ भोपालक बैंकमे नोकरी भऽ गेल। नीक दरमाहा नीक सुविधा। मुदा सुविधो तँ सुविधा चाहैए। जहियेसँ कृष्णमोहन सेवा निवृत भेला तहिये हराएल-भोथियाएल बिमारी सभ आबि दाबए लगल रहनि। जेते दरमाहा रहनि ओ टुटि कऽ अदहा भऽ गेल रहनि। इन्द्रमोहनक बेटो-बेटी पढ़ै-लिखै, बिआह-दान करै जोकर भेले जाइत रहनि। असगरे दरबज्जापर बैसल कृष्णमोहन पत्नीकेँ सोर पाड़लखिन। पतिक अबाज सुनि राधा लगमे आबि बजली- “की कहलौं?” जेना हारल-मारल-थाकल बटोही कोनो गाछ लग बैस जिनगीक दुनू छोर पकड़िते रगड़ाए लगैए तहिना कृष्णमोहनक स्थिति छन्हि। परिवारक जे मान-प्रतिष्ठा एक लोटा पानिक अछि ओ केना उलटा कऽ उलटा देब। केहेन अतिथि दरबज्जापर औता, पतिपाल कठिन हएत। मुदा जँ नै बाजब तँ पुराएब केतएसँ। अपने बिमारीसँ ग्रसित छी जेते अन्न-पानि नै खाइ छी तइसँ बेसी दबाइ खाइ छी। अखनि धरि जे भार बेटा इन्द्रमोहनक कान्हपर नै आबए दिअ देलिऐ ओ केना सम्हारि पौत! मुदा लगले मनमे उठिते कृष्णमोहन बजला- “दू साल विष्णुमोहनकेँ नोकरी भेना भऽ गेल, ने कहियो गाम आएल आ ने परिवारक नीक-अधला पुछलक। मुदा...?” पतिक थकथकाएल गति देखि राधा बजली- “जाधरि सामर्थ छल ताधरि अपना जकाँ परिवारक केलिऐ, मुदा आब ने ओ सामर्थ रहल आ ने शक्ति, तखनि तँ जे अछि तेकरे कान्हपर ने दिअ पड़त। से जँ नै देबै तखनि अन्हराएल माए-बापक तीर्थाटन केना हएत। तइले तँ श्रवणकुमारक परीछा लिअ पड़त किने?” पत्नीक विचार कृष्णमोहनकेँ जँचलनि। दुनू बेकतीक बीचक बात तँए ने इन्द्रमोहन किछु बाजए चाहै छल आ ने पुतोहु। विष्णुमोहनकेँ पत्रक माध्यमसँ भेँट करए कहलखिन। एबासँ विष्णुमोहन नासकार केलक। बेटाक असहयोग देखि कृष्णमोहनकेँ अपन केलहामे दोख भेटलनि। कहुना घीचि-तीड़ि साल भरिक अगाति-पछाति आठ बर्खक बिच्चे दुनू बेकती मरि गेला। अखनि धरि दुनू भैयारी इन्द्रमोहन-विष्णुमोहनक बीच दू अलग-अलग समाज बनि गेल छल। ओना गामक समाजसँ बाहरक समाजक डारि फुटल मुदा दूरी एते बनि गेल जे समकक्षपर आबि गेल। सासुरक सम्बन्धक संग विभागीय तेते हित-अपेछित विष्णुमोहनकेँ बनि गेल छै जे अपन सालक छुट्टीए हरा जाइ छै। ओना विष्णुमोहनक बिआहमे कृष्णमोहन नगद-नारायण लऽ कऽ बैंकमे जमा नै केने रहथि, मुदा तँए विष्णुमोहनक नामे बेटी-जमाइक नाओंपर जे सासुरक परिवारमे बजट बनि गेल छल ओकर हकदार तँ बनियेँ गेल छल। भोपालमे जइ दिन डेरामे विष्णुमोहन पहुँचल, तीनू कोठरी तँ भरिये गेल रहै। केना नै भरितै, जइ परिवारक बिआहक बजट पचीस लाखमे चलि रहल अछि तइमे जिनगीक उपयोगी वस्तु केना छोड़ल जाएत। अखनि धरि विष्णुमोहनकेँ तेना भऽ कऽ कोनो जिनगी नै समाएल छेलै। नै समाएब भेल, जहिना किसान हुअए आकि वेपारी आकि नोकरिहारा, आर्थिक स्तरक हिसाबसँ जिनगी बना जीवन धारण करैए। अगुआएल-पछुआएल साल भरिसँ लऽ कऽ जिनगी भरिक किछु आवश्यक वस्तुक पूर्ति सासुरसँ भाइए गेल रहै। जहिना ग्रीन रूममे पात्र अपन, सात्विक होउ आकि राजसी आकि तामसी, मेकअप केला पछाति स्टेजक अधिकारी तँ भाइए जाइत अछि। विष्णुमोहनकेँ सएह भेल। एक तँ ओहन परिवारक लड़की संग बिआह भेने जहिना परिवारसँ हराएल विष्णुमोहन तहिना अनुभवी पत्नी। ओना रेखा अखनि धरि माने बिआहसँ पहिने धरि, कौलेजक छात्रा रहली मुदा परिवारक क्रिया-कलाप देखने अपन जिनगीक ऊपरक अनुभव तँ भाइए गेल रहनि। ईहो कोनो हराएल बात थोड़े छी जे बिआहसँ पहिने, बेटा भलहिं पिताक छत्रछायामे रहि नै बूझि पाबए मुदा बेटी तँ सभ जनिते रहैत जे हमरा ऐ घरसँ जेनाइ अछि। आन घरकेँ अपन घर बनाएब अछि। तखनि तँ घर बनबैक केहेन कारीगर अछि निर्भर करैए तैपर। जहिना सभ शक्तिकेँ हाथमे रखि करए चाहैए तहिना रेखो दुनू परिवारमे केलनि। समैओ अनुकूल। समए अनुकूल ई जे ऊपरक परिवारसँ आएल रहने ऊपर चढ़बैमे ढलान रहैत। ढलान ई जे जहिना सभ आगू बढ़बकेँ उचित उदेस बुझैए तहिना रेखो किए ने बुझती। जखनि ऊपर श्रेणीक सुआगत मध्यसँ नै करब तँ सुआगत की भेल? भलहिं अपमान नै कहबै मुदा सुआगतो तँ नहियेँ भेल। परिवारक डोरकेँ रेखा ऐ तरहेँ पतिकेँ खींच धकिया नेने जे विष्णुमोहन दिन-राति बौआए लगल। एक तँ बैंकक नोकरी समैपर आफिस पहुँचब अछि, नहाइ-खाइ, रस्ता-बाटक समए अपन। तैसंग काजक भार एते जे एको मिनट देरी भेने काजक सम्पादनमे कमी औत जे अतिरिक्त समैमे पुरबए पड़त। खैर जे होउ, विष्णुमोहनक साख तँ आफिसमे छैहे। नोकरीक शुरूक सालमे विष्णुमोहन एक-आध बेर गाम एबो कएल मुदा रसे-रसे एक नव समाजक पकड़ आ दोसर गाम-समाजसँ बिछोह हुअ लगलै। भाइए गेलै। बिछोहक अनुकूल परिस्थिति बनि गेल रहै। अनुकूल ई जे, सालमे मात्र पचीस दिनक छुट्टी भेटै, जेकरा छुट्टी नै मानल जाइ छेलै। एक तँ गामक रस्ता, सवारीक असुविधासँ तीन दिनक, दोसर गाड़ी-सवारीक रस्ता भरिगरो आ उकड़ुओ होइते छै। तइमे छोट-छोट बच्चाक चलब आरो भारी होइ छै। दोसर जइ नब समाजमे आगमन भेल छेलै ओइमे दू तरहक एहेन भूमि छेलै जे भरपुर उर्वर छेलै। ओ भूमि छल सासुरक परिवारक सम्बन्धीक संग सम्बन्ध बढ़ब आ दोसर छल बैंकक संगीक संग। दुनूक बीच एहेन उत्सवी माहौल बनल रहैत छल जे पचीस दिनक छुट्टीक पते नै पाबि पबै छल। किछु मेडीकल सेहो चलि जाइ छेलै। जइ सभसँ गाम छुटि गेलै। ओना अपन भार हटबै दुआरे इन्द्रमोहन पत्रक माध्यमसँ जानकारी दैते छल मुदा जहिना काजक अनिच्छाबलाकेँ रंग-बिरंगक बहाना फुड़ैत तहिना बहाना बना विष्णुमोहन खेप जाइत छल। ऐ तरहेँ पनरह बरख बीति गेलै। ओना पनरह बर्खक बीच विष्णुमोहनक डेरामे वस्त्र-जात, इलेक्ट्रोनिक वस्तु, वर्तन-बासन इत्यादि तेते भऽ गेल छेलै जे अपन सातो कोठरीक मकान भरि जकाँ गेल छेलै। अपन मकान, अपन गाड़ी भाइए गेल छेलै। लोकोक आएब-जाएब रहने, मकानक ऊपरमे पहिने समियाना तेकर पछाति ऊपरो मकान बनाएब जरूरी भेलै। कियो जमीनपर बैस जिनगीक रस-रहस्य बुझैत तँ कियो तीन तल्ला-पँच तल्लापर, दुनूक उदेस एक केना! बीचमे एकटा आरो भेल। भेल ई जे गामो आ अगलो-बगलक मिड्ल स्कूलक शिक्षक दस दिन घुमैक विचार मध्य प्रदेशक केलनि। भोपालसँ यात्राक आरम्भक विचार केलनि। गौआँ विष्णुमोहन तँए असुविधा नहियेँ हेतनि। तैसंग ईहो विशेष जिज्ञासा जे तीन दिसम्बर १९८४ इस्वीक महुराएल गैस घटनाक फल-कुफल देखब सेहो छेलनि। दसो गोटेक बैच भोपाल स्टेशन उतरि विष्णुमोहनकेँ फोन केलनि- “हम सभ घुमैक विचारसँ आएल छी।” गौआँक बात सुनि विष्णुमोहन जवाब देलकनि- “अखनि हम भोपालसँ अस्सी किलोमीटर हटि मित्रक ऐठाम छी। बैंकक डायरेक्टरसँ लऽ कऽ सभ छथि। तँए नै किछु कऽ सकब।” ओना दसो शिक्षक मिड्ले स्कूलक रहथि मुदा विचार दस रंगक रहनि। किनको विचारमे झंझ-मंझ भेनौं अपनामे एकमत सेहो भाइए जाइत, मुदा एकाध घंटा घमर्थनमे चलिये जाइ छेलनि। विष्णुमोहनक उत्तरक प्रतिक्रिया भेल? पहिल शिक्षकक विचार- “अस्सी किलो मीटरपर रहए आकि सए किलोमीटरपर, मुदा अँटकैक जोगार तँ कऽ सकै छल, सेहो कहाँ केलक।” दोसर गोटेक कहब- “नोकरिहारा अनका हाथक भऽ जाइए तँए अपना जुतिये चलब कठिन भऽ जाइ छै। अपना सभ अपना भरोसे ने आएल छी, बड़बढ़ियाँ विष्णुमोहन गौआँ छी अपन समाचार कहलिऐ।” अहिना दसो गोटेक विचार दस रंगक आएल। अंतमे तँइ भेल जे अनेरे बक्-बातमे समए गमाएब उचित नै। कियो अपना लेल करैए, सभकेँ अपन-अपन जिनगी छै, अपन-अपन काज छै। सहमति बनिते नहा-धो कऽ स्टेशनसँ निकलि होटलमे खेनाइ खा टेम्पू पकड़ि गैस कारखाना देखए विदा भऽ जाइ गेला। तीन दिसम्बर उन्नैस सए चौरासी इस्वीमे मिथाइल आइसो साइनेट गैसक रिसाव भेल जइमे दू लाख पचास हजार लोक मरल। जहिना ६ अगस्त १९४५ इस्वीकेँ जापानक नागाशाकीमे आ हिरोसिमापर घटना भेल आ तीन पीढ़ी तक लुल्हा-नेंगराक जनम होइत रहल तहिना ने भोपालोमे भेल। साँची-स्तूफ, अन्नपूर्णा देवीक मंदिर, शिप्रा तट (पहाड़ी घाट) हाॅडी खोह, जे तीन सए मीटर गहींर छै, भेड़ाघाटक चौंसठि जोगिनी मंदिर, दुर्गावतीक संग्राहालय, माइक बगिया जे नर्मदा आ सोनभद्रा नदीक उद्गम स्थल छी, खजुराहो घुमैत-घुमैत दसो दिनक छुट्टी बीति गेलनि। स्कूलो खुजैक समए भेने सभ कियो गाम चलि एला। गाम एला पछाति विष्णुमोहनक काज समाजक मंचपर आएल। जेते मुँह तेते विचार। मुदा भेल ई जे जहिना राज मिठाइ जिलेबी आ मुरहीक प्रेमी कचड़ी घीउक आकि तेलक लोहियामे पएर रखिते आँगन-अगनेय छूबि प्रणाम करिते शक्ति पाबि ऊपर आबि अपन रूप सजबैए तहिना विष्णुमोहनक बेवहारक प्रतिक्रिया भेल। एहेन नै भेल जे पुरी जकाँ लोहियाक मठौठे पकड़ि छलछला, खेनाइ पूर्ति करैत। एक स्वरसँ समाजक स्वर सुर-सुरा उठल। जे समाजक संग जेहेन बेवहार करत ओकरो संग समाज ओहने बेवहार करतै। जघन्य अपराध जँ समाजक बीच निंदित नै हएत तँ कागजक बीच लिखल कानून-कायदा कथी कऽ सकैए। भेल ई जे विष्णुमोहन समाजसँ अघोषित वहिष्कृत भऽ गेल। जहिना जेठुआ बर्खा भेने माछक अवार चलै छै तहिना एन.एच ५७क बनने गामो-घरमे अवार चलल। जइ सोभावक इन्द्रमोहन छथि ओ लूटेबे करता। मुदा से नै भेल। पाँचो कट्ठाक घराड़ीमे अढ़ाइ कट्ठा पड़ने भैयारी केतौ बाधा नै भेलै। कारबारी इमानदार भेटलनि। एक तँ घराड़ी तैपर घर। निच्चाँ पजेबा ऊपर चदरा घर, कोठा भावक संग घराड़ी भावमे बिकाएल। करीब दू करोड़क सौदामे सबा करोड़ इन्द्रमोहनकेँ हाथ लगलनि। जमीनक सभ काज सम्पन्न भेला पछाति विष्णुमोहनकेँ उड़न्ती जानकारी भेल। भैयारीक हिस्सा, तहूमे मरौसी जमीन। तैसंग इन्द्रमोहनक सबा करोड़ पाँच करोड़ बनि गेल छल। भूख तँ भूख छी, नै तँ बैंके किए दिवालिया भऽ जाइए। जइमे रूपैआक ढेरीए रहै छै। तीन दिनक छुट्टी लऽ विष्णुमोहन ई ठेकना गाम विदा भेल जे पहुँचिते भैयाकेँ कहबनि, बाँटि लेब। नै तँ समाजकेँ बैसा बँटबा लेब। एक तँ ओहिना बैंकक दरमाहा, तैपर कमीशनक संग उपहार पाबि विष्णुमोहनक चसकल मन! तैपर पाँच करोड़ सुनि मनसूबा आरो बढ़ौलकै। जहिना पत्नी विचारक तहिना समाजक लोक, उपकार छोड़ि अपकारक विचार किए देतनि। एतबे किए, बैंकक सहाएब गामक सहाएब नै? ओही गामक बेटा ने भोपालमे बैंकक सहाएब बनल अछि, तोहूँमे ओहेन राजक बासी छी जइमे बैमानी-शैतानी छइहे नै। ई बात विष्णुमोहन बूझि नै पौलक जे झगड़ा भेने गदहो मारि-मरौबलि करा दइए तँए कि गदहाक बीआ उपटि जाएत। जेते समाज तेते रंगक गदहा। जत्ता उठबैसँ ओटोमेटिक मशीन धरि दसटा गदहाकेँ मिला बना देल जाइ छै आ पहाड़ी क्षेत्रमे पाथर लादि घुमबैत रहै छै। तेतबे नै समाजक नारी पकड़ैक थर्मामीटर बनाएब सेहो सीखनहि छल। गाम कि अखनो शहर-बजार भेल अछि जे फटका-फुटकीमे (जुआ) करोड़क सौदा भऽ जाइए। हजार-बजार बेसीसँ बेसी भेल अछि तइमे जँ किछु आगू बढ़ि वेपार बढ़ाएत तँ अनेरे मानो-प्रतिष्ठा बढ़ि जाएत आ कारोबार असानीएसँ चलि जाएत। मनो गवाही दइये देलक। विष्णुमोहन गाम आएल। गामक सीमानपर पएर दइते विष्णुमोहनकेँ अनभुआर जकाँ बूझि पड़लै। मनमे उठलै जइ समए पढ़लौं पिताक देल खर्चमे भैया-इन्द्रमोहन एकोबेर नकारि नै सकारि लेलनि। ओहूमे तँ हुनकर हिस्सा छेलन्हिहेँ। मनमे उठिते जेना कम्प्यूटर हिसाब जोड़ैत तहिना जोड़ा गेलै। फेर मनमे भेलै जे अनेरे मन बौआइए। ओइ दिन सझिया परिवार छल, अखनि हिस्सेदार छियनि। दुनियाँमे अपन हिस्सा के छोड़लक जे छोड़ब, पाँच करोड़ सुनलौं, चारिओ करोड़ तँ सत् हेबे करत। बड़ करता आ सप्पत खा कऽ कहता तैयो तीन करोड़सँ निच्चाँ नहियेँ हएत। मने-मन हिसाबक गरो अँटबैत आ टेम्पूसँ रस्तो तँइ करैत। दरबज्जापर विष्णुमोहनकेँ अबिते इन्द्रमोहनक नजरि पड़ल। ओना विष्णुमोहन अपन अदा अदए करैत पएर छूबि इन्द्रमोहनकेँ प्रणाम केलक मुदा नजरि अँकड़ाएल रहै। जहिना अँकड़ाएल चाउरक आँकड़ होशियारि भनसीआ अदहन लगबैसँ पहिने निकालि लैत तहिना इन्द्रमोहन नजरिसँ निकालि लेलक। मुदा कि ओ बिसरि गेल जे अपन हिस्सा पेट काटि जइ भाएकेँ पढ़ेलक, वएह भाए केते पेट काटि परिवारकेँ देखलक। अपना पाछू बेहाल अछि। ओ बेहाल भेल अछि तइसँ हमरा? तखनि तँ ओकरो घर-घराड़ी छिऐहे, परिवार अछिए। खेला-पीला पछाति विष्णुमोहन इन्द्रमोहनकेँ पुछलक- “भैया, एन.एच.बला पाइ की भेल?” पाइक नाओं सुनिते इन्द्रमाेहनक मन ठमकल। ठमकिते बाजल- “देखिते छहक जे घराड़ीओ घुसुकि गेल। पुरना घराड़ीक आगूएसँ तेना कटि गेल जे घराड़ीक रूपे बिगाड़ि देलक। बान्ह सड़कक काजे एहेन होइए जे केकरो नाक कटैए तँ केकरो बनबैए। खैर जे होउ, जे पाइ भेटल तइमे दोसर घराड़ी कीनि घर बनबैत खर्च भेल।” विष्णुमोहन- “सभ खर्च कऽ देलिऐ, हमर हिस्सा?” इन्द्रमोहन- “तोहर हिस्सा तँ छेबे करह। पाँच कट्ठा घराड़ीमे अढ़ाइ कट्ठा पड़ल, ओते तँ हमरे भेल किने?” “जेते पाइ अहाँकेँ भेल ओते पाइक चीज रहल।” “चीजक उदए-प्रलए अहिना होइ छै, जँ से नै रहल तँ अढ़ाइ कट्ठासँ कम थोड़े भऽ गेल।” विष्णुमोहनक मनसूबामे धक्का लगल। मुदा उत्तरो तँ हल्लुक नहियेँ अछि जे धड़फड़मे किछु भऽ जाएत। बाजल- “भैया, ईहो तँ नीक नहियेँ भेल जे, नीक अहाँक भेल अधला हमर रहि गेल।” बुझबैत इन्द्रमोहन बाजल- “देखहक सरकारी काज छिऐ, सभ काज पछुआएले डेटमे चलै छै। तैठाम जँ सतर्क भऽ काज नै करितौं आ बुड़ि जाइत तँ केकर बुड़ैत।” “हमरो तँ जानकारी दइतौं?” “जहियासँ गाम छोड़लह तहियासँ बुझिओ कऽ की केलह। ओहेन भारी भुमकम भेल जे घरक देबाल राँइ-बाँइ भऽ गेल, तैपर बाढ़ि आबि तेना-झमाड़लक जे सभ परानी मिलि ओसारक चौकीपर बैस यएह विचारि लेलौं जे सभ तूर संगे मरब। कियो जीवैत रहब तखनि ने दुखक दुख हएत, जँ सभ संगे चलि जाएब तखनि के केकरा ले कानत।” पोखरिक माटि, जमीन नै पाबि विष्णुमोहनक क्रोध जगल। बाजल- “अदहा हमर छी हम लइये कऽ रहब!” छोट भाएक बात सुनि इन्द्रमोहन सकदम भऽ गेल। बकार बन्न भऽ गेलै। मनक बेथाकेँ मनेमे मसोरि मोरिया देलक। बिनु किछु बजैत मुड़ी गोंति परिवारक भूत-भविस पढ़ए लगल। पढ़ए लगल ई जे गाम छोड़ि जे बाहर बसि गेल ओकरा की मानल जाए। मुदा मानैसँ पहिने सम्बन्ध तँ देखए पड़त। कियो गामक बेचि बाहर कीनि घर बना अपनो रहैए आ भड़ो लगबैए। कियो गामक उत्पादित पूजी खड़का उत्पादित पूजी ठाढ़ कऽ लइए। कियो बैंकमे सूदिपर लगा दइए। मुदा िवष्णुमोहन तँ से नै केलक। मन ठमकलै, ठमकिते ठमठमाएल। ठमाइते जेना कोनो पौध-गाछ जगह बदलब स्वीकारि लइए तहिना इन्द्रमोहनक मनमे उठल, परिवारसँ समाज चलैए समाजक गति परिवारमे निहित छै तैठाम विष्णुमोहनक की छै, जँ से नै छै तखनि तँ गाम-समाजसँ हराएल-भुतियाएल रहल। हराएल-भुतियाएलक की हेबा चाही। एक तँ ओहुना बारह बर्खक हराएलकेँ कुशपूत बना मटिया देल जाइए, विष्णुमोहनो तँ सहए भेल। अपन सहोदर भाए छी, जरूर छी, मुदा दुनूक जिनगीक सम्बन्ध कहाँ अछि। ने खाइ-पीबैक आ ने रहैक। ने बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइक आ ने बर-बेमारीक संग परिवारक काजक। हमरो बेटा अछि, सिदहा दऽ अस्तुरासँ जनम केश कटा मुड़न करेलौं। ओकरो बेटा छै लाखसँ ऊपरे खर्च केलक। अपन बेटा पनरह बर्खक उमेरमे मैट्रिक पास केलक ओकर दसे बर्खमे कौलेज पहुँच गेल। जेते इन्द्रमोहन पाछू उनटि परिवार दिस तकैत तेते ओझरौठमेमे पड़ल जाइत। अन्तमे यएह विचार उठलै जे पहिने परिवार अलग हएत तखनि ने हिस्सा-बखड़ाक प्रश्न उठत। जाधरि से नै भेल ताधरि तँ परिवार चलल। बाजल- “बौआ, आबेशमे नै आबह। छोट भाए छिअ, बुझा कऽ कहै छिअ। पहिने ई कहऽ जे परिवारकेँ फुट-फुट मानल जाए आकि समलित। जँ समलित मानबह तखनि तँ परिवार चललह, जँ अलग मानबह तँ कहियासँ मानबह से पहिने परिछा लेबह तखनि ने?” इन्द्रमोहनक विचारक कोनो असरि विष्णुमोहनकेँ नै भेल। जहिना कियो आगूमे बैसल रहैए मुदा मन मेलामे घुमैत रहै छै, जोरोसँ बजला पछाति नै सुनि पबैए तहिना विष्णुमोहनक मन करोड़क केलकुलेशन करैत। दर्जनो नवका गाड़ी कीनि रोडपर दौगा देबै। भोपालक समाजमे भलहिं नै मुदा भोपालक परिवहन समाजमे तँ अपन उपस्थिति दर्ज कराइए लेब! वएह ने लतड़ैत-चतड़ैत भोपालक समाज बनत। अवसरिक चुकल मनुखकेँ डारिक चुकल बानरक गति होइ छै। पाछू हटब कायरता हएत। बाजल- “भैया, जइ विचारसँ आएल छेलौं ओइमे अहाँ बाधा उपस्थित करै छी, कियो अपन जिनगीक मालिक होइए।” विष्णुमोहनक विचारकेँ स्वीकारैत इन्द्रमोहन बाजल- “हँ, होइए।” विष्णुमोहन- “तखनि?” “बेकतीक सामुहिक रूप परिवार छी। बेक्तिगत विचार सामुहिक रूपमे बदलि जाइ छै, जइमे सबहक जिनगी देखल जाइ छै।” एक दिशाक बाटमे आगू-पाछूक दिशा बोध असानीसँ होइए मुदा विपरीत दिशामे असंभव भऽ जाइत अछि। वैचारिक रूपमे दुनू विपरीत दिशामे। तँए सहमति हएब कठिन। विष्णुमोहन बाजल- “भैया, सभ दिन आदर करैत एलौं, अखनो कहै छी जे ओहेन परिस्थिति ने बनि जाए जे थाना-पुलिस दरबज्जापर आबए!” विष्णुमोहनक बात सुनि इन्द्रमोहनक मन मुस्कीआएल। बाजल किछु ने। मनमे उठलै नककट्टा दुसै नाकबलाकेँ। आदर करैए आकि समाजमे नाक कटा देलक जे समाजक प्रवुद्ध वर्ग घुमैले गेला आ चोर जकाँ गएब भऽ गेल! सएह आदरक बात करैए। छोट भाएकेँ परिवारक अंग बूझि अपन बाल-बच्चाक हिस्साकेँ जेकरा पाछू गमा देलौं सएह आदरक बात करैए। हराएलो-भुतियाएल जँ अनठीओ दरबज्जापर आबि जाइ छथि तँ एक लोटा पानिक आग्रह करिते छियनि आ परिवारक अंग भेल ओ! मुदा हाथक आँगुरो तँ अपन महत रखिते अछि। नीक हएत जे समाजकेँ मानि बेकतीकेँ समूह दिस बढ़ा दिऐ। बाजल- “बौआ, थाना-पुलिस अबैत-जाइत रहत मुदा गामक खेत-पथार केतौ ने जाएत, जएह गाममे रहत ओकरे हिस्सामे रहतै। वृद्ध-वेवा जकाँ केतए जाएत। नीक हएत जे जहिना समाज हमर छी तहिना तोरो छिअ किने, समाज जे कहता से मानि लेब।” इन्द्रमोहनक विचार विष्णुमोहनकेँ जँचल, जँचिते बाजल- “तीन दिनक छुट्टीमे आएल छी, काल्हि समाजकेँ बैसा पाइ-पाइक हिस्सा बाँटि लेब।” विष्णुमोहनक विचारकेँ इन्द्रमोहन चुपचाप सुनि लेलक। समाज दिस हियासि विष्णुमोहन सोचए लगल। केतेमे सौदा पटत। एहेन तँ नै हुअए जे घानीसँ बहतौनी भारी भऽ जाए। कोनो कि राज-पाटक झगड़ा छी जे दखला-दखली हएत। पूजीक विवाद छी पच्चीस प्रतिशत तक पूजी लगौल जा सकैए। कोट-कचहरीक भाँजमे जाएब बूड़िबकी हएत। अकासमे उड़ैत चिलहोरि जकाँ ऊपरेसँ लूझि लेत। सेहो नीक नै। गाम कि कोनो शहर बजार छी जे घटनाक दाम-दिगर होइ छै। गाम छी खुदरा-खुदरी कारोबारक। सम्हरि कऽ विष्णुमोहन गाम दिस विदा भेल। हाइ स्कूलक संगी सूर्यमोहन छथि। पुरान संगी। महाभारत केतबो पुरान हएत तैयो संग पुरबे करत। सूर्यमोहन विद्यालय जेबाक तैयारीमे जुटल रहथि। नहाइले डोल-लोटा नेने कलपर पहुँचल छला। विष्णुमोहनकेँ देखिते मन भनभना गेलनि। की एहेन मनुखक मुँह देखब नीक हएत? मुदा मुहोँ घुमाएब तँ नीक नहियेँ। जँ कहीं अपने आदति जकाँ बूझि लिअए जे फल्लाँ मुँह चोरा लेलक। आँखि उठा बजला- “विष्णुमोहन!” विष्णुमोहन- “हँ भाय, तोरेसँ काज अछि।” काज सुनि सूर्यमोहन बजला किछु ने मुदा मने-मन विचारए लगला जे कोन काज छै। ने एक गाम-समाजमे रहै छी, ने एक बेवसायसँ जुड़ल छी आ ने एक परिवारक छी, तखनि कोन काज हेतै। तँए पूछि लेब नीक हएत। मुदा जइ काजक तैयारीमे छी, बीचमे जँ दोसर काजक चर्च उठाएब तँ अनेरे अपन काज धकिया कऽ घटिया जाएत। नै बुझने मनमे खुट-खुटी बनि गेने सभ काजकेँ खुटखुटौत। अँटाबेश करैत बजला- “अधखरूआ नहाएल छी, ताबे दरबज्जापर बैसह। दुनू गोरे खेबो करब आ बीचमे गपो कऽ लेब।” सूर्यमोहनक बात सुनि विष्णुमोहनक मनमे ओहेन आशा जगल जेहेन नोनक सेरियत लोक दइए। झूठ-फूस बजैले आ करैले दिन-राति तँ पड़ले रहैए, खाइकाल किए कियो करत। मुदा खाएब तँ गड़बड़ हएत। तैसंग ईहो भेल जे केकरो नहेबा काल लगमे ठाढ़ रहब उचित नै। जखनि काजे आएल छी तखनि काजेक महत ने मानए पड़त। जौं से नै काजक बेर जँ धड़फड़ा जाएब तखनि तँ काजेमे विघनेस हएत। दरबज्जाक ओसारपर रखल कुरसीपर बैस विष्णुमोहन अपन सतरंजक गोटी मने-मन पसारिते छल आकि सूर्यमोहन डोल-लोटा रखि, चारपर धोती पसारि डेढ़ियेपर सँ बजला- “दू गोरे छी, तँए दूटा थारीमे परसने आउ।” सूर्यमोहनक बात पत्नी सुनि कऽ खखसि देलखिन। सूर्यमोहन बूझि गेला जे समाद पहुँच गेल। मुदा बिच्चेमे विष्णुमोहन बाजल- “हम नै खाएब, अखनि खेबाक इच्छा नै अछि।” विष्णुमोहनक नकार सुनि सूर्यमोहन दोहरबैत बजला- “एकेटा थारी आनब।” कहि विष्णुमोहनकेँ पुछलखिन- “कोन काजे आएल छह से पहिने बाजह। जँ छोट-छीन हएत तँ बिच्चेमे कऽ लेब।” जहिना कियो रचनाकार अपन रचनाक सविस्तर भूमिका लिखैत तँ कियो अपन रचित रचनाकेँ भूमिकाक प्रयोजने ने बुझैत तहिना विष्णुमोहन चौहद्दी बन्हैत बाजल- “भाय, अपन सभ तँ एक्के हाइ स्कूल तक पढ़ने छी, हमर दिन घटल तँ आन राजमे कमाइ छी तोहर बढ़लह तँ गामेमे मौजसँ रहै छह।” विष्णुमोहनक बातक अर्थ नीक जकाँ सूर्यमोहन नै बूझि सकला। नि:प्रयोजन बूझि बजला- “अखनि हमहूँ धड़फड़ाएल छी तँए समैक हिसाबसँ बाजह?” विष्णुमोहनक मन अँटकि गेल। तैबीच सूर्यमोहनक मनमे उठलनि, कहिया केतए हाइ स्कूलसँ निकललौं। तैबीच गंगा धारक केते पानि बहि समुद्रमे चलि गेल, ई कथी कहए चाहैए। माथक टेटर देखि नै रहल अछि। गाममे हमरो घर-परिवार अछि एकरो छै, मुदा जखनि भोपाल घुमए गेलौं, ओइठाम तँ ओकरेटा घर छेलै, तैठामक बेवहार बिसरि गेल। तैबीच अदहासँ बेसी भोजन सेहो कऽ लेलनि। परीछाक वारनिंग घंटी जकाँ बजला- “झब दऽ जे कहबाक छह से कहऽ, नै तँ विद्यालयसँ आएब निचेन रहब तखनि कहिहऽ।” कहि लोटा उठा पानि पीब अधढ़कार करैत विष्णुमोहन नजरिपर नजरि देलनि। नजरि पड़िते विष्णुमोहन बाजल- “भाय, भैयारीक पनचैती करेबाक अछि।” पनचैती सुनि सूर्यमोहनक मन ठमकलनि। बात बुझैसँ पहिने बजला- “हम कि कोनो गामक पंच छी। हाइ स्कूलक शिक्षक छी। किए लोक हमर बात सुनत। गामक झगड़ा दन पड़िछबै दुआरे सरपंच छै, ओकर कमिटीक पंच छै।” विष्णुमोहनकेँ बुझैमे देरी नै लगलै जे संगी भऽ कऽ टारि रहल अछि। मन ममोड़ैत बाजल- “भाय, तीनियेँ दिनक छुट्टीमे आएल छी, तइमे दोसर दिन बीतिये रहल अछि, तँए चाहै छी जे जल्दवाजीमे काज निपटा समैपर घूमि जाइ।” विष्णुमोहनक विचारकेँ ठेलैत सूर्यमोहन कहलखिन- “परिवारक बीचक बात छी। एना धड़फड़ेने थोड़े हेतह। खैर हम संगी छिअ तँए एते गछै छिअ जे साँझूपहरक समए देबह। मुदा असगरे नै, गाममे जे बुझनुक लोक छथि हुनको सभकेँ संगोरि लिहऽ।” सूर्यमोहनक विचारकेँ अपन समैसँ विष्णुमोहन मिलबए लगल। गाममे जेते बुझनुक लोक छथि, सबहक संगोर तँ असान नहियेँ अछि। मुदा जँ अपने विचारे चलब तँ सूर्यमोहनो कहीं छिटकि जाएत तखनि तँ आरो पहपैट हएत जइसँ बानरक करहर उखाड़ब भऽ जाएत। उखड़लहो भँसिया जाएत आ बिनु उखड़लोहो पानिक तरक माटिमे सीरबेधू भेल रहत। तैबीच सूर्यमोहन कपड़ा पहीर साइकिल निकालि ओसारक निच्चाँ भऽ बजला- “जहिना तँू बुझैत हेबह जे संगी भऽ कऽ नीक जकाँ कान-बात नै देलक तहिना तँ अपनो कानपर बात लधले अछि। जेकर काजक भार उठौने छिऐ, जँ उचित समैपर ओकरा नै पुड़ेबै, से केहेन हएत। तैयो एते कहै छिअ, सँझुका समए देलियऽ।” कहि साइकिलपर चढ़ि सूर्यमोहन विद्यालय विदा भेला। सूर्यमोहनक बेवहार विष्णुमोहनकेँ जेते नीक लगक चाही तेते नीक नै लागल। मुदा उपैयो तँ दोसर नहियेँ छै। अपना काज बेरमे लोक गदहोपर चढ़ैले तैयार होइते अछि। फेर मनमे उठलै जखनि एते दिनक पुरान संगीक एहेन बेवहार भेल जे संग नै रहल तखनि अनकर केहेन हएत। नीको भऽ सकैए, अधलो भऽ सकैए। ओह! दुनू भाँइक बीच कोनो कि झगड़ा झंझटि अछि जे अनेरे समुद्र उपछब, आपसी बुझारैत छी। एको गोटेसँ काज चलि सकैए। साइकिलपर चढ़िते सूर्यमोहन धड़फड़ा गेला। खुशीसँ मन चढ़ि गेल रहनि। दिलक धड़कन सेहो तेज भऽ गेल रहनि। एहेन लोककेँ एहने बेवहार उचित छी। गामक पूजी उठा-उठा लोक शहर-बजार गढ़ि रहल अछि! गाम जेतै-क-तेतै पड़ल रहि गेल अछि। आब कोन गाम एहेन अछि जेकर बाहरी आमदनी करोड़क नै छै। एक तँ दैवी प्रकोप दोसर मनुखक प्रकोपसँ उजड़ि रहल अछि। तरोटा जाँत जकाँ माटिपर कीलमे गाड़ल अछि, मुदा सभ हितैषीक सोहर गामेक गाबि रहल अछि। गाम दिस विष्णुमोहनकेँ बढ़ैत देखि इन्द्रमोहन सेहो चिलहोरि जकाँ टोह लगबए लगल। पहिल समदिया कहलकनि जे ओ सूर्यमोहन मास्टर साहैब ऐठाम गप-सप्प करै छथि। ओना समदियाक बातपर इन्द्रमोहनकेँ सोलहन्नी बिसवास भेल, मुदा अपन आरो मजगूती दुआरे ओही रस्ते पार सेहो कऽ लेलक, दूरेसँ सूर्यमोहनोक नजरि इन्द्रमोहनोपर पड़ल आ इन्द्रमोहनोक सूर्यमोहनपर, मुदा विष्णुमोहन उतरल नजरि नै पौलक। सूर्यमोहनक सोझहासँ हटिते इन्द्रमोहनक अबाज कानमे मोबाइलिक घंटी जकाँ टनटनए लगल। टनटनए ई लगल जे भोपालसँ घुमला पछाति भरि ढाकी विष्णुमोहनक उपराग सूर्यमोहन सुना चुकल रहनि। जँ दुनू भाँइ दू छेलौं तखनि अनकर उपराग हम किए सुनी। मुदा जँ अपन समाजक परिवार बूझि कहलनि तँ उचित-उपकार दुनू केलनि। परिवारक बीच अधला वृत्तिक प्रवेश जँ अपने नै बूझि पाबी आ दोसर जँ बुझहा दथि तँ ओकरा की कहबै। कहुना तँ पितेतुल्य छी किने। जँ ओहेन जघन्य वृत्ति भऽ जाए जे माफी मंगैक जरूरति भऽ जाए तँ किए ने मांगि ली। भीख मांगब थोड़े छी जे कलंक लागत। भिक्षाटन छी, समैक दोख भेल। सबहक मति सदिकाल एक रंग थोड़ै रहै छै, तहूमे नवकवड़ियाकेँ तँ आरो बेसी होइ छै। सूर्यमोहन ओइठामसँ घुमैकाल विष्णुमोहनक मनमे उठल। भैया संग ने गप-सप्प भेल, मुदा भौजी थोड़े बुझलनि जँ भैया-भौजी लग बाजल हेता, सेहो भाँज लगि जाएत जँ से नै बाजल हेता तँ अपन विचारक अनुकूल बना किए ने दुनू बेकतीमे ओझरी लगा दियनि। तेतबे किए, जँ पक्षमे बाजि जेती तँ हुनके पंच बना लेब। एक तँ परिवारक बात परिवारेमे रहि जाएत दोसर तीनमे जँ दू एक दिस भऽ जाएब तखनि आगूओक दुआरमे धक्का मारि सकै छी। घरपर अबिते भैजी लग बाजल- “भौजी, मनसँ चाह बनाउ, दुनू गोटे एकठाम बैस चाह पीब।” हँ, हूँ बिनु किछु बजने श्याम सुनरि चाह बनबए लगली। दुनू भैयारीक बात मनमे उठलनि। अपनो पतिक चेहरा, धिया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइक संग जिनगी, ओना घर-दुआर आ परिवारक रहन-सहन नै देखने तँए तइ दिस नजरि नै गेलनि। मुदा अंग्रेजीया देह तँ सेझहामे रहबे करनि। मुदा ई सभ तँ कर्मक खेल छी। जेहेन जगह रहै छै तेहने ने कर्मो खेलै छै। चाह बनि गेल। दिअरक आग्रह श्याम-सुनरि कटलनि नै। किए कटती। एकठाम बैसि खाएब-पीब अधले कथी भेल। ई तँ भनसीयाक इमानक परीछा भेल जे जँ जहरे-माहुर मिला देने हेबै तँ अपनो मरब किने। तेतबे किए, केतेको दिअर भौजाइक दूध पीब मातृवत जिनगी सेहो ठाढ़ केने अछि। दोसर चिस्की चाहक लैत विष्णुमोहन बाजल- “भैया, बिगड़ल छथि।” “किए बिगड़ता?” “से अहाँ नै सुनलिऐ?” “भैयारीक बात किए सुनब?” ओना सूर्यमोहन स्कूलसँ आबि साँझ पड़िते इन्द्रमोहन ऐठाम जाइले तैयार भेला मुदा पहिल साँझ अकलबेर होइए तँए दोसर साँझ अबिते पहुँचला। दुनू भाँइ दरबज्जेपर, मुदा बाजा-भुकी किछु ने। जेना मने-मन दुनू गुर-चाउर मुँहमे रखने हुअए। दरबज्जापर पहुँचिते सूर्यमोहन बजला- “हमरा होइ छल जे पछुआ गेलौं, मुदा अगुआएले छी। आरो के सभ औता विष्णुमोहन?” विष्णुमोहन- “दोसर कियो ने औता। अहाँ जखनि आबिए गेलौं तखनि अनेरे अनकर कोन काज अछि।” विष्णुमोहनक बात सुनि सूर्यमोहनक मन ठमकलनि। ठमकलनि ई जे भैयारीक विवाद अदहा गाम होइए। अनेरे एते भारी मोटा अपना माथपर लेब उचित नै। बजला- “देखू, गौआँ छी, तहूमे शिक्षक छी। गामक कोनो जवाबदेह लोक नै छी, तँए भार नै उठाएब मुदा अपन विचार देब। बाजू की कहैक अछि?” विष्णुमोहन- “अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे एन.एच.मे घर-घराड़ी पड़ल जेकर मुआबजा भेटल, तइमे भैया हिस्सा नै देलनि।” विष्णुमोहनक बात सुनि सूर्यमोहन बजला- “ई तँ अहाँक बात भेल। इन्द्रमोहन अहाँ बुझा दिअनु।” इन्द्रमोहन- “पहिने तँ परिवार बुझए पड़त। अखनि धरिक जे परिवार रहल ओकर संचालन तँ हमहीं करैत एलिऐ। जहियासँ विष्णुमोहन गाम छोड़लक तहियासँ एक्को पाइक सहयोग नै केलक। बाढ़ि-रौदी, भुमकमक झमार हमरा लगल। खेतमे मोनि फोड़ि देलक तेकरा खेत बनेलौं, भुमकममे घर चिड़ीचोंत भऽ गेल, तेकरा बन्हलौं, कुटुम-परिवारकेँ जिआ कऽ रखने छी तखनि हिस्सा कथीक आ हिस्सेदारी कथीक?” जलाएल प्रश्न देखि सूर्यमोहन बजला- “हम समाज छी कखनो नै चाहब जे समाजकेँ नोकसान होइ।” सूर्यमोहनक विचार सुनि इन्द्रमोहन बाजल- “एक तँ सबा करोड़ रूपैआ भेटल तइमे घराड़ी कीनि घर बनेलौं। घरो देखते छी जे केतबो परिवार बढ़त तैयो पचास बरख अभाव नै हएत। एते करैमे सभ रूपैआ सठि गेल।” बमकि कऽ विष्णुमोहन बाजल- “अहाँ झूठ बजै छी? पाँच करोड़ रूपैआ भेटल?” सूर्यमोहन- “केना बुझै छी?” “जानकारी भेल।” विष्णुमोहनक बेवहार सूर्यमोहनकेँ नीक नै लगलनि। बजला- “जखनि गाम छोड़ि अनतए चलि गेलह, तखनि गामक सम्पति अनतए जाइ! ई हम कखनो नै कहबह। एक तँ ओहिना रंग-बिरंगक जालक माध्यमसँ गामक सम्पति जाइए रहल अछि, तैपर सोझहा-सोझही भैयारीक जाए, ई कखनो उचित नै भेल। तहूमे जखनि भैयारीक विभाजन नै भेल अछि तखनि लेनी-देनी कथीक। परिवार ठाढ़ भऽ चलैत रहत तखनि ने समाज ठाढ़ हएत।” आशा तोड़ि विष्णुमोहन बाजल- “तखनि हम गामसँ चलि जाइ?” सूर्यमोहन- “से किए कहबह। तँू तँ अपने छोड़ि कऽ चलि गेलह।” तेसर दिन विष्णुमोहन भोपाल विदा भेल। २५ जनवरी २०१४ सुमति तीन माससँ किछु बेसीए दिनपर हरिनाथ भाय भेटला। ओना उमेरमे भरिसक चारि-पाँच मास छोटे हेता मुदा तेहेन लछन-करम छन्हि जे छोटक कोन बात जे जेठोजन सभ भाय कहै छन्हि, तहिना हमहूँ कहै छियनि। नै भेँट होइक कारण ई नै छन्हि जे परिवारक ओझरीमे ओझरा गेल छथि आकि बेमरियाहे भऽ गेल छथि। आन भैयारी जकाँ सेहो नहियेँ छन्हि जे बपौती हिस्सा-बखरा लेल कन्हामे झोरा लटका सरकारी दुआरि धेने रहता। भेल ई छन्हि जे परिवारक दाब कम भेने नव-नव काजो आ विचारो तेना कऽ पकड़ि लेलकनि जे पछिला सभ किछु तरिआ लगलनि अछि, जइसँ घुमबो-फीड़ब कम भऽ गेलनि। कम भेने भेँट-घाँट कमब सोभाविके अछि। दोसर ईहो जे जहिना नव-विचार विचरण लेल समए मंगैए तहिना नव काजो मांगिते अछि। दोहरी मांग भेने रूटिंग बदलबे करत। सएह भेलनि। भेटिते मनमे उठल जे आने जकाँ तँ ओहो भैयारीक बीच छथिए, तँए रामा-कठोला हेबे करतनि। मुदा मुँहक सुरखी से नै कहै छन्हि। आशाक ओसाएल ओसक बून जकाँ टप-टप करै छन्हि। ओना एहनो तँ होइते अछि जे अपन मनक बेथा-कथा अनका लग बजनै की! तँए अनेरे मुहोँ लटकाएब नीक नहियेँ होइए। मुदा से हरिनाथ भायकेँ नै रहनि। जेना रसे-रसे बेसियाएले जाइत रहनि। एहेन स्थितिमे अगुरवार किछु बाजब उचित नै बूझि पुछलियनि- “हरी भाय, बहुत दिनपर भेटलौं अछि। की माया-जालमे बेसी ओझरा गेल छी।” जहिना हल्लुक फूलमे फल्लुक फड़ फड़ैए तहिना ओहो निर्विकार उत्तर देलनि- “घर आँगनमे तेते नवका-नवका अतिथि-अभियागत सभ आबए लगला अछि जे तइसँ छुट्टीए ने होइए जे केतौ टहलबो-बुलबो करब। तँए बेसी दिनपर देखलह।” हरिनाथ भाइक चिक्कारी बात नीक जकाँ नै बूझि पेलौं। मुदा दोहरा कऽ पुछबो केना करितियनि। अखनि तँ भेँटक ऊपरके सीढ़ीपर छी, चाहे ओ भूमिका होइ आकि कुशल-छेम। कोनो गंभीर बात तँ राजसी ठाठ-बाठमे चलैए, आगू-पाछू सर-सिपाही रहै छै। मुदा ईहो तँ मनकेँ हौंरबे करत जे जखनि कुशले-छेम नै बूझि पेलौं तखनि अगिला केना बूझि पाएब। करहर सौरखीक गाछ होइ आकि मखानक गाछ बिनु पात पकड़ने केना ओकर गाछ पकड़ि सकै छी। जँ गाछे नै पकड़ाएत तँ पानिक निच्चाँ कीचक जड़ि केना पकड़ाएत, जँ जड़िए नै पकड़ाएत तखनि बिच्ची उखाड़ि केना सकै छी। जँ बिच्चीए नै उखड़त तँ अनेरे ओइ दिस ताकिए कऽ की लाभ? पोखरि-डाबरमे तँ पड़ले छै। तीन-चारि मासक बीच हरिनाथ भाय भेटला, एते दिनमे सालक मौसमो बदलि जाइए। मुदा गप-सप्पमे तेहेन घुच्ची बनि गेल जे खसैकेँ के कहए जे पएरक कनगुरिया आँगुरक सिर तक छिटका देत। मन मोड़ि कहलियनि- “भाय, बारह मासक सालमे तीनटा मौसम बदलि जाइए मुदा एते दिनक पछातिओ अहाँक मुँहक चुहचुही नै चिहकल अछि।” जेना निर्विकार हरिनाथ भाय रहथि तहिना बजला- “मुँहक चुहचुही किए बदलत, अपन जे दायित्व बुझै छी तइ पाछू लगल छी। जहाँ धरि संभव भऽ सकतै, हेतै। तइले अनेरे चिन्तासँ चीत भऽ चितामे चलि जाइ सेहो केहेन हएत। जँ कोनो काज अछि तँ से केना हएत, ओकर चिन्तन-मनन करैत चिन्तक बनि परिवारमे ठाढ़ हएब, तखने ने िचन्तामुक्त परिवार बनत। से बिना केने थोड़े हएत।” ओना हरिनाथ भाइक विचार सुनि केते बात मनमे उठल मुदा फेर भेल जे भैयारीक सम्बन्ध बुझैक अछि, अनेरे दोसर-तेसर बातमे बौआएब नीक नै। पुछलियनि- “सपरिवार नीके छी किने?” परिवारक नाओं सुनिते जेना हरिनाथ भाय चौंकला। हलसैत बजला- “भने परिवारक कुशल पुछलह, सुन्दरलाल सेहो आएल अछि, गामेपर चलह कलकतिया बिस्कुटो खुएबह, चाहो पीविहऽ आ गपो-सप्प हेतै।” हरिनाथ भाइक बात सुनि मनमे उठल भने कहबो केलनि आ बहुत दिनसँ सुन्दरलालसँ भेँटो ने भेल, दुनू भऽ जाएत। मुदा नमहर नचनियाँक फीस तखने ने नमहर होइ छै जखनि बेस्तता बेसी देखबैए। तहिना हमहूँ बजलौं- “भाय, एकटा काजे दछिनवारि टोल जाइ छी मुदा सुन्दरलाल बहरवैया भेल, परदेशक किछु समाचार सुनब बेसी महत रखैए। अपन काज तँ अपना हाथक छी, जखने समैक गर लागत तखने ससारि लेब।” हरिनाथक घर दिस डेगो बढ़ैत रहए आ गपो-सप्प डेगे-डेग बढ़ए लगल। कहलियनि- “जखनि सुन्दरलाल महानगरक राजधानीमे रहैए तखनि तँ बाल-बच्चा सभकेँ ओतै पढ़बैत हएब?” अगिला बात कहैले पछुआएले रहए आकि बिच्चेमे हरिनाथ भाय टपकि गेला- “संगतुरिया जकाँ तोरा बुझै छी, तखनि किए एना अनाड़ी जकाँ बजै छह।” हरिनाथ भाइक बात सुनि फेर मन ओझरा गेल। केहेन सुन्नर बात कहलियनि तखनि किए तमसा गेला। तमसाइक कोनो अरथे ने लागल। फेर सोचलौं जे दरबज्जापर पहुँचैसँ पहिने खटपटाएब नीक नै। खटपटही गाए जकाँ दुहैसँ पहिने लथारसँ डाबा फोड़ा लेब तखनि दूहब कथीमे। मुस्की दुस्की र ँ त ेसीैत जहिना शुभ-शुभ कियो केतौ पहुँचैए तहिना बजलौं- “भाय, बिस्कुट तँ कलकतिया नीक हएत मुदा चाहमे पौडरबला दूध मनाही कऽ देबै। गैसक शिकाइत रहैए।” जेना हरिनाथ भायकेँ ठोरेपर बरी पकैत होन्हि तहिना जवाब देलनि- “घरवैयाकेँ जुड़त मरूआ रोटी तँ खीर केतएसँ आनत।” गर भेटल। कहलियनि- “कहलौं तँ बेस मुदा ईहो केहेन हएत जे नै पचैए सएह खुआएब।” जहिना बजलौं तहिना ओहो लोइक लेलनि। बजला- “खुएबऽ विस्कुट, चाह तँ पीबैक वस्तु छी। खेला पछाति ने पीअल जाइ छै पीला पछाति खाएल थोड़े जाइ छै।” गपक रस पाबि बजलौं- “खेनाइ-पीनाइ दुनू संगी छी। एकठाम बनि-ठनि भरि दिन केतए बौआइए तेकर खोज-खबरि रहौ आकि नै रहौ मुदा बनै-ठनै बेर तँ दुनू एकठाम होइते अछि।” घर लग एने मनमे भेल जे रस्ताक गपकेँ विराम देब नीक हएत। दू गोटे बीचक, तहूमे लंगोटीआ संगीक बीचक बात छी, जँ कहीं परिवारक दोसराइत सुनि लेत तँ अनेरे अर्थक अनर्थ भऽ जाएत। बजलौं- “सपरिवार सुन्दरलाल एला अछि आकि असगरे?” हरिनाथ- “ऐबेर तँ सपरिवार आएल अछि मुदा बेसी काल असगरे अबैए।” असगर सुनि पुछि देलियनि- “एना किए दू-रंगा गप कहै छी।” दू-रंगा सुनि मनमे कचोट भेलनि। मुदा सोझे मुहेँ नै बाजि बजला- “नोकरीओ कि एक रंगक होइए जे एक चालिए सभ चलत। रघुवीरकेँ देखै छी एजेंसीक नोकरी छै, किम्हरोसँ किम्हरो महिनामे चारि-पाँच खेप चलि अबैए। मुदा सभ कि रघुवीरे छी सेहो बात नै। एहनो तँ होइते अछि जे सालक मास दिनक छुट्टी एकेबेर गाममे बितबैए, तँ कियो टुकड़ी काटि-काटि पान-सात बेर सालमे चलि आबैए। मुदा सुन्दरलालकेँ अपन ढाठी छै। दस दिनक दुर्गा पूजाक छुट्टीमे सभतूर अबैए आ अनदिना असगरे अबैए। मुदा ऐबेर तइ सभसँ अलग भऽ सपरिवार आएल अछि।” पेटमे जहिना भूखल बिलाइ बिलाइत रूपमे कुदैत तहिना पेटमे दू भैयाीक रामा-कठोला सुनैले सेहो कुदैत रहए। मुदा कंठसँ ऊपर हुअ नै दिअ चाहिऐ। अनेरे अनका चार परहक कुमहर गनब। गनबै कुमहर आ जँ कोनो बतिया सड़ि जेतै तँ नाओं लगौत जे फँल्लेँ ओंगरी बतौने रहए। फेर मन हुअए जे जँ कहीं दुनू भाँइक बिच्चेमे सम्बन्धक प्रश्न रखि दिऐ तँ से बेसी नीक हएत। मुदा फेर हुअए जे सबहक कीदैन रूपैआ करए। जँ कहीं पाइ-कौड़ीक चर्च भेल आ विवाद फँसल तँ अनेरे दोखी हएब जे फँल्लेँ आबि कऽ दुनू भाँइमे मारि करा देलक। मारि करत अपना चालिए आ दोखी बनौत हमरा जे फँल्लम्मा घरे फोड़ि देलक! कोनो गरे ने अँटए जे अपन बातक जड़ि पकड़ब। जाबे जड़ि नै पकड़ाएत ताबे सत् केना औत, जाबे सत् नै औत ताबे चेतनकेँ चेतन केना कहबै, ताबे तक तँ ओ बाले-बोल रहत। बाल-बोलक आनन्दे की? क्षणिक! मन तेना मकड़जालमे ओझरा गेल जे हरिनाथ भाइक रस्ताक बातो अदहे-छिदहे सुनि पेलौं। दरबज्जापर पहुँचिते जहिना घोड़ाएल मक्खन आगिपर चढ़ि घी बनए लगैत तहिना भेल। दरबज्जा ओसारक चरिजनियाँ अखड़े चौकीपर सुन्दरलाल सभटा धिया-पुताकेँ माने दुनू भाँइक बेटा-बेटीकेँ गोल-मोल बैसा अपनो बैसल रहए। रूमाल चोर जकाँ गोलका माला बनौने छल। सभसँ छोट भतीजीकेँ पुछैत रहए- “बुच्ची, तोहर नाओं की छियौ?” आँखि उठा चारि बर्खक रानी मने-मन गर लगबए लगल। माए कहैए रानी, पिता कहै छथि सड़लाही, बड़का भैया लछमी, काका अपने कहै छथि त्रिवेणी आ चाची जमुनियाँ सरस्वती। लोकक नाओं तँ एकटा होइ छै तैठाम हमरा ढेरी अछि। तखनि की कहबनि, यएह ने कहबनि त्रिवेणी। बाजल- “त्रिवेणी।” सुन्दरलालकेँ बच्चा सबहक बीच गप-सप्प करैत देखि डेढ़ियेपर कनी डेग छोट कऽ लेलौं। मुदा संयोगो नीक रहए जे सुन्दरलालक पीठ दिससँ अबैत रही। त्रिवेणी सुनि सुन्दरलाल जेठकी बहिनकेँ देखबैत पुछलक- “ई के भेलखुन?” “दीदी।” “हम?” “कलकतिया काका।” सुन्दरलालकेँ बच्चा सबहक बीच देखि मन घीवाह भऽ गेल। आगिपर चढ़ल घीउक सुगंधसँ दरबज्जा सुगंधित पाबि ठाढ़ भऽ गेलौं। मुदा से हीराभाय भंग कऽ देलनि। सुन्दरलालकेँ टाँहि देलखिन- “बौआ, पुरान संगी रस्तापर भेटला, बच्चा सभकेँ छोड़ह पहिने जलखै-चाहक ओरियान करह।” धड़फड़ा कऽ सुन्दरलाल उठि बाँहि पकड़ि कुरसीपर बैसबैत भातीजकेँ कहलक- “बौआ, पहिने जलखै नेने आबह, ताबे चाहो बनते।” कहि दुनू भाँइ चौकीपर बैसला। सेरिया कऽ सभ बैसलो ने रही आकि तीन-चार रंगक बिस्कुट आ दूटा लालमोहन सजल प्लेट हाथमे आबि गेल। तेज काजक रूप देखि मनमे भेल जेना पहिनेसँ प्लेट सजल होइ। तीनू गोटेक हाथमे प्लेट आबि गेल मुदा हाथ तीनूक बाड़ल। ओ दुनू भाँइ बाड़ने जे पहिने, ओ मुँहमे लेता तखनि ने हम सभ लेब। जेना भोजो काजमे पहिने बूढ़-बुढ़ानुस कौर उठबै छथि तेकर पछातिए ने सभ उठबैए। भलहिं धिया-पुता पहिने किए ने खेनाइ शुरू कऽ लइए। अपन अगुआएब नीक बूझि एकटा बिस्कुट तोड़ि मुँहमे लेलौं। ओहो दुनू भाँइ खाए लगला। बेवहार देखि भ्रमित मन सहमि गेल। अपनाकेँ छिपबैत सुन्दरलालकेँ पुछलिऐ- “बौआ, केते दिनपर गाम एलह हेन?” सुन्दरलाल कहलक- “डेढ़ मासपर।” डेढ़ मास सुनि मन आरो भरमि गेल। डेढ़ मासपर कलकत्तासँ आएल, तखनि कमाएल कथी हएत! ओ कमाइ तँ गाड़ीएक भाड़ा-भुड़ीमे चलि गेल हेतै। मुदा पुछबो केना करबै जे भाड़े-भुड़ीमे सभ पाइ चलि जाइत हेतह तखनि परिवार केना चलतह। मुदा विचारकेँ मोड़ैत बजलौं- “डेढ़ मासपर किए एलह, कोनो विषेश काज की?” विशेष काज सुनि सुन्दरलाल पुछलक- “विशेष केकरा कहबै आ साधारण केकरा कहबै?” सुन्दरलालक प्रश्न जेना मनकेँ दाबि देलक, दाबि ई देलक जे विशेष आ साधारण तँ बेकता-बेकती होइए। ओना समाजिक सेहो होइत, मुदा जहिना समाज अपन चालि बदलि कुचालिक बाट पकड़ि लेलक अछि तहिना ने बेकतीक साधारण आ विशेष काजोक चालि बदलि गेल अछि। ओना बेकता-बेकती जिनगीक दशा-दिशानुसार सेहो बदलैत चलै छै। कोनो गरे ने फुड़ए जे सुन्दरलालकेँ सवुरगर जवाब दऽ सकब। मन ठमकल। मुदा लगले भेल जे जखनि पी.जी. क्लासमे विषय धारा पकड़ि चलबे ने करैए, तखनि गाम घरक तँ दलान दलाने भेल। जँ खेती-गिरहस्तीक क्रार्यक्रममे भगवतीक गीत बीचमे नै गाएब तँ की गाएब। ने खेतीकेँ अपन उपजाक ठेकान छै आ ने गिरहतकेँ गिरहस्तीक। तखनि हमरे किए रहत। पाशा बदलैत बजलौं- “बौआ, गाममे नीक लगै छह?” प्रश्न तँ ऐ हिसाबसँ रखलौं जे जहिना बजरूआ लोक सिनेमा कलाकारक सात पुश्त तक जनैए मुदा अपन वंशक तीनिओ पुश्त नै जानि पबैए, मुदा से भेल नै। जेना ठेकनाएले रहै तहिना सुन्दरलाल कहलक- “भैया, जहिना अहाँ भाय साहैबक संगी छियनि तहिना हमरो भेलौं। तँए अहाँ लग कोनो बात बुझैले रखि सकै छी। गाममे किए ने नीक लागल। वन राखए सिंह आ सिंह राखए वन।” खोलि कऽ सुन्दरलाल किछु ने बाजल मुदा तेहेन गड़ूगर प्रश्न रखि देलक, जे किछु फुड़बे ने कएल। मनमे उठल जे जखनि धारो-धुरक कोनो ठेकान नै अछि जे जइ कोसी-कमलाक गीत लोक झालि-मिरदंगपर गबैए भलहिं ढोलक-झालिक जगहे किए ने बदलि गेल होइ। मुदा जइसँ खुशी होइत ऊहो कोसी-कमला गामक-गामकेँ उजाड़बो करैए आ माटिकेँ सेहो उजरबैए! तैठाम मनुख तँ मनुखे भेल। जे मनुखाहो बनैए आ मरखाहो। पाशा बदलि बजलौं- “भाइओ साहैबक धिया-पुताकेँ ओतए लऽ जा नीक स्कूल कौलेजमे पढ़बै छहुन किने?” ले बलैया! सुन्दरलाल चुपे रहल हरी भाय बमकि उठला- “अहिना बुझै छहक। हम कि अपना बेटाकेँ कारखानाक लूरि सीखा कारखानाबलाक बेटा बना देब। जइ दिन अपना पूजी-पगहा हएत तइ दिन अपना मशीनपर लूरि सिखत।” हरी भायक बात सुनि किछु बात मनमे उठल। मनमे ईहो उठल जे अनेरे अनका दरबज्जापर मुँहचुरू होइ छी तइसँ नीक जे हरीए भायकेँ पूछि बक्ता बना अपन नांगरि समेटि लेब नीक हएत। बजलौं- “केना अपन बेटा अनकर भऽ जाएत?” हीरा भाय बजला- “केना भऽ जाएत, से तँू नै बुझै छहक।” अपना दिस प्रश्न अबैत देखि फेर पाशा बदललौं- “बौआ सुन्दरलाल, तोहर बात नै बूझि पेलौं जे केना वन सिंह रखैए आ सिंह केना वन?” गंभीर होइत सुन्दरलाल बाजल- “भैया, किए हम परदेश गेलौं, अहीं कनी बुझा दिअ। स्कूलमे नीक विद्यार्थीक गिनतीमे हमहूँ छेलौं। एम.बी.ए. केलौं। अहाँक गाममे हमर कोन काज रहल। जँ पढ़ि-लिखि काज बदलि करितौं तँ अहीं बजितौं जे पढ़ै फारसी बेचै तेल, देखू भाय करमक खेल। तखनि?” सुन्दरलालक प्रश्न जेना मनकेँ आरो भरिया देलक। मुदा जइ दरबज्जापर बैस जलखै केलौं, चाह पीलौं तैठामसँ मुड़ी गौंति जाइ ओ नीक नै। मुदा मुड़ी उठाएबो असान तँ नहियेँ अछि। मनमे एकटा गर उठल। गर ई उठल जे जइ प्रश्नपर हरी भाय बमकला तही प्रश्नकेँ किए ने सुन्दरलालकेँ दोहरा कऽ पुछि दिऐ। बजलौं- “बौआ हरीभायकेँ कोन बातक कुवाथ भऽ गेल छन्हि जे एना कड़ुआएल छथि?” सुन्दरलाल हूसल। हूसल ई जे अपन पछिला बात दोहरबैत बाजल- “मनमे उठल रहए जे जखनि भैयारीमे, परिवारमे जाबे तक काजक सम्बन्ध नै बनत ताबे तक एक दबाइत रहत दोसर उठैत रहत। यहए सोचि भैयाकेँ कहलियनि जे भातीज-भतीजीकेँ कलकते जाए दियौ, ओतै नीक स्कूल-कौलेजमे पढ़ाएब। मुदा...?” `मुदाक' पछाति सुन्दरलाल रूकि गेल। ओना जिनगीक घटित घटना रहै, भायक सोझहामे पक्ष राखब नीक नै बुझलक, मुदा हरीभाइकेँ जेना पैछलो बात ओहिना तजगरे छेलनि। तहूँमे बजैक क्रम तँ अगिया गेल रहनि। मुदा मनुख तँ भगवानसँ बुधियार होइते अछि। आगि भलहिं पानि नै भऽ सकए आ ने पानि आगि भऽ सकए मुदा मनुख तँ भऽ सकैए। आगि पानिक बनल मनुख, कखनो लहास जकाँ भऽ जाइए तँ कखनो कैलाशक पाथर जकाँ। हरीओ भायकेँ सहए भेलनि। भेलनि ई जे अपन भाएक विचारपर पानि फेड़ैत टटका प्रश्न बनबैत बजला- “तोरेसँ पुछै छिअ जे जे बच्चा बच्चेसँ माए-बाप लगसँ हटि जाइए ओ सकताइत-सकताइत पाकल बाँस जकाँ नै सकता जाएत ओ माए-बापक देल कोन किरिया-करम मन पाड़ि अपन किरिया करमसँ जोड़ि करत।” हरीभाइक प्रश्नक उत्तर उकड़ू छेलनि। उकड़ू काजकेँ सुकड़ू बनाएब धिया-पुताक खेल थोड़े छी। तहूमे केहेन उकड़ूकेँ केहेन सुकड़ू बनौल जाए। एहेन तँ नै ने जे जइ बाँसक टोनसँ ढेंग उनटाबए जाएब आ वएह टुटि जाए तखनि तँ आरो उकड़ू हएत। तइसँ नीक जे दुनू भाँइक बीचक बात छी किए ने ओही गरे उनटा दिऐ। बजलौं- “हरी भाय, बातकेँ कनी पड़िछा कऽ कहियौ। नै बूझि पेलौं जे अहाँ की कहै छिऐ।” जेहने धियानसँ हमर बात हरी भाय सुनने रहथि तेहने अपन जगह ठेकनबैत बजला- “हमहीं दू भाँइ छी। दुनू भाँइक बीच केहेन मेल-मिलान अछि जे सभ देखैए, मुदा मिलान रहलो पछाति हटल केते छी। जँ कलकत्तामे सुन्दरलाल बिमार पड़ए आकि गाममे हमहीं पड़ी, भैयारीक सेवा कथी हएत?” हरीभाइक अकाट बात सुनि किछु फुड़बे ने कएल, खिस्सा सुनिनिहार जँ हूँहकारी नै देत तँ खिस्सकर अपनाकेँ की बूझत। मुदा हूँहकारीओ तँ हूँहकारी छी। केहेन हूँहकारी पड़त ईहो तँ अदना बात नहियेँ अछि। ओना सुन्दरलाल डेढ़ मासपर आएल छल, मुदा बुझलो बातकेँ अनठबैत फेर पाशा बदलि बजलौं- “बौआ, गामक आवाजाही केहेन रखने छह?” अपन भार हटैत देखि हरी भाय ओसारक देवालमे ओंगढि गेला। ओंगठैत देखि मन हल्लुक भेल। जइ नजरिए हरी भायकेँ देखै छियनि तइ नजरि जोगर सुन्दरलाल थोड़े अछि। आँखि उठा सुन्दरलालक आँखिमे गाड़लौं। गाड़िते सुन्दरलाल बाजल- “भैया, नोकरीक शुरूआतीमे दस बरख सोलहन्नी गाम छूटि गेल। छुटैक कारण नोकरी रहए। जहिना सभ जिनगीमे आगू बढ़ए चाहैए तहिना चाहलौं। जइसँ ड्यूटीकेँ मजगूतीसँ पकड़लौं। ने कहियो अनट-बिनट छुट्टी ली आ ने कोनो लापरवाही करी। मुदा बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ आ पत्नीक बर-बिमारी खुदरो-खुदरी एते भइये जाए जे सालक बीस दिनक छुट्टी हरा जाए। छुट्टीओ ने हुअए जे गाम अबितौं। दस बरख पछाति मनमे भेल जे आब बच्चो कनी चेष्टगर भेल आ पत्नीओ कनी निधोख भेली जइसँ दुनू काज असान भेल। असान कि भेल जे अपन काजे ने रहल। मुदा फेरि दोसर बिहंगरा ठाढ़ भऽ गेल?” बिहंगरा सुनि बजलौं- “की बिहंगरा?” मुँह बिजकबैत सुन्दरलाल बाजल- “तेते ने हित-अपेछित भऽ गेल अछि जे नौत-हकार पुरैमे छुट्टी हेरा लगल। हरेबेनै कएल जे केतेठामसँ उपरागो आबए लगल जे अहाँ नै एलौं।” बाजि सुन्दरलाल चुप भऽ गेल। पुछलिऐ- “चुप किए भेलह?” जेना सुन्दरलालक आँखिमे चुमकी एलै। बाजल- “सभ छोड़ि दुर्गापूजामे सपरिवार गाम आबए लगलौं। मुदा जे मनमे छल से अहूसँ नै भेल।” जिज्ञासा जगल पुछलिऐ- “की मनमे छेलह?” सुन्दरलाल- “मनमे आएल जे कम-सँ-कम मासे-मास गाम आबी। मुदा तहूमे बाधा आबए लगल। कहियो पत्नी नैहरक लाटमे नौत पुड़ैए जेती तँ कहियो बच्चा-सबहक पढ़ाइ बाधित हुअए।” “तखनि?” “तखनि यएह केलौं शनि-रबिक उपयोग केलौं, परिवारकेँ छोड़ि गाम आबए लगलौं।” गाम अबैक लाट देखि कहलिऐ- “हरी भायकेँ गाम-गमाइत करैले एकटा गाड़ी कीनि दहुन? एक तँ उमेरगरो भेला आ अपन नामो-निशान रहतह?” बजैकाल तँ बाजि गेलौं मुदा हरी भायकेँ नीक नै लगलनि। बमकि गेला- “बड़ बुधियार भऽ गेलह, टिटही जकाँ हमरा टिकटिकिया कपापरपर चढ़ल अछि जे अनेरे रोडमे हाथ-पएर तोड़ा काहि काटब। हाट-बजारक जे काज अछि ओ जखनि गामेमे भेटि जाइए तखनि अनेरे किए बौआएल घुमब।” सिरचढ़ू सुर्जकेँ होइत देखि उठैक गर अँटबए लगलौं। बहुत बेसी कहा-कही दुनूक भाँइक बीच भलहिं नै भेल होइ, मुदा विचारक दूरी तँ अछिए। तहूमे दरबज्जापर बैस चाह-पानि पीलौं, सामंजस करैत कुरसीपर सँ उठैत बजलौं- “समए तेहेन भऽ गेल अछि जे कँटहा बाँस जकाँ केतबो चिक्कन करबै तैयो उबड़-खाबड़ रहिये जाएत। कोनो कि गीरहेटा खोंचाह रहैए पोरोक बिच्चोमे तहिना रहैए।” बाजल तँ ई सोचि रही जे दुनू भाँइकेँ नीक लगतनि मुदा से भेल नै। सुन्दरलाल चुप रहल, बात मानलक आकि नै से तँ ओ जानए। मुदा चुप देखि अपना भेल जे मानि लेलक। मुदा हरी भाय तड़ंगि बजला- “अनेरे समैकेँ दोख लगा लोक अपन गल्ती छिपबैए। समैए केकरो ने किछु केलकै हेन आ ने करैत। केतौ भाग कहि समैक दोख लगबैए तँ केतौ दिनक दोख। केतौ मौसमक तँ केतौ सालक।” हरी भाइक बात सुनि मन चकड़ा गेल। चकड़ा ई गेल जे, जे बात सभ बजैए से झूठ केना भऽ जाएत। सभ कि झुठेक कारोबार करैए। बजलौं- “हरी भाय, अहाँ जान नै छोड़ब। सोफ जकाँ तेहेन बात लाधि देलिऐ जे बिना लाठी लगौने ठाढ़े ने हएत। अधडरेरेपर सँ लीब जाएत। कहैले तँ बिछानसँ नमहर होइए मुदा अपने भरे ठाढ़ो होइक जोर नै होइ छै। कनी फड़िछा कऽ कहियौ जे समैक दोख किए ने होइए। हरी भाय बूझि गेला। कनीए रूकि बजला- “देखहक, कोनो काज करैसँ पहिने लोक ओकर विचार करैए। विचार केला पछाति एक सीमापर अबिते बुझब मानैए। बुझबकेँ बुझाएब लूरि भेल, कला भेल।” हरी भाइक विचार जेना मनमे गड़ल। काँट जकाँ नै गड़ल जे बिसबिसैतए, छेनाक पानि जकाँ कपड़ामे बान्हल मोटरीक पानिक ठोप जकाँ गड़ल। कहलियनि- “हरी भाय, कनी पछिला बात, समैक दोख जे कहलिऐ तेकरा चिक्कन कऽ दियौ।” चिक्कन सुनि हरी भाइक ठोर जेना मधुएलनि। मुस्की दैत बजला- “जेकरा समए बुझै छहक ओ निरविकार अछि। हाथ-पएर नै रहितो ओ अपना गतिये चलिते अछि, चलिते रहत। मुदा विवेकी मनुख विवेकहीन बनि अपन काजकेँ दोसरपर लादि दइए। खैर, आब नहाइओक बेर भेल जाइए, तहूँ जेबह। तँए कहि दइ छिअ।” हरी भाइक लछन-करमसँ बूझि पड़ल जे अपन अंतिम बात कहए चाहै छथि। हूँहकारी भरलौं- “समैएपर ने नहाएब, खाएब, सूतब नीक होइए।” सुनि जेना हरी भाइक मन फुला गेलनि। जेठ मासक रौदमे जखनि कियो छाती भरि पानिमे पैसि पतालसँ अकास धरिक बीच अपनाकेँ पबैए तहिना हरी भाय अपन बात बजला- “जखनि सुन्दरलाल आगू पढ़ैक विचार केलक, तखनि सुन्दरोलाल आ पितोक एक विचार रहनि। मुदा नै ऐ दुआरे बजलौं जे पिता आगू किछु बाजब आ जँ कहीं सुन्दरलालक मनमे होइतै जे भैये बाधा छथि, तखनि किए बीचमे बाधक बनि कलंक लैतौं। तँए किछु ने बजलौं, मुदा ओतैसँ परिवार हूसल। हूसल सुनि जिज्ञासा बढ़ल। पुछलियनि- “उपए?” बजला- “जे हूसल से तँ हूसि गेल, मुदा आबो सुमति आबौ जे आगू दिन दनदनाइत चलत।” ३० जनवरी २०१४ फेर पुछबनि राकेश आ मुकेश गामेक हाइ स्कूलक वर्ग दसममे पढ़ैत। एक तँ एक उमेरिया तैपर दुनूक मात्रिक एके गाम तँए सम्बन्ध आरो बेसी गाढ़। गाढ़ सम्बन्ध तँ वएह ने भेल जे झगड़ा-मिलान संगे एक रहैए। तेतबे किए तहूसँ बेसी होइए। तीत-मीठ दुनू संगे रहैए। तँए कि सनाबटा कऽ डलना तरकारी जे मसल्ला सभकेँ एकबट कऽ दइ छै, से भऽ जाइ छै? नै! से नै होइ छै। होइ छै ई जे समए आ जगह पाबि वएह तीत होइए आ समए-जगह पाबि वएह मीठ होइए। दस घंटी पढ़ाइक बीच नअम घंटीक पढ़ाइ शुरू भेल। शिक्षक आबि जमीनक सर्वेक विषय पढ़बए लगला। जलिआएल विषय तँए आन शिक्षक जकाँ धुर-झाड़ तँ नै बाजि पबथि मुदा मन पाड़ि-पाड़ि बजने विद्यार्थी सभकेँ अकछाइत बूझि पड़लनि। मन मोड़ैले बजला- “जोरू जमीन जोरकेँ नै तँ केकरो औरकेँ।” लयवद्ध पाँति तँए विद्यार्थी एकाग्र भेल। मुदा अपन विषयक नांगरि पकड़ि पुन: शिक्षक सर्वेक विषय पकड़ि लेलनि। छुट्टीक घंटी बजल। सभ विदा भेल। विद्यालयक आँगनक झुण्ड पतराइते राकेश-मुकेश एकठाम भेल। झुण्डक हल्लो कमल। गप-सप्प करैक मौसम पाबि राकेश बाजल- “जोरू जमीन जोरकेँ, नै तँ केकरो औरकेँ।” बजैक कारण राकेशक मनमे रहै जे मास्टर साहैबक पढ़ौल ओहिना मन अछि। उनटबैत मुकेश बाजल- “छुच्छे पाँति बजने हेतौ, कह तँ ओकर माने की भेल?” मुकेशक चाइलेंजकेँ राकेश केना नै स्वीकारैत। बाजल- “घरवाली आ खेत-पथार तागतिक छिऐ जे हर्ही-सुर्ही नै सम्हारि पौत।” गपक क्रमक नांगरि पकड़ि मुकेश बाजल- “जहिना सुरेबगरहा लेल सुरेबगरही घरवाली होइ छै तहिना नेंगरा लेल नेंगरीओ होइ छै, तखनि केना बुझलेँ।” दुनूक बीच प्रश्नपर रग्गड़ नै होइत, नीक-बेजाएक सीमापर हरदा-हरदी कहि मानि लैत। राकेश मानैत बाजल- “तूँ की बुझहै छीही, बाज।” राकेशक बात सुनि मुकेशक मनमे खुशी उपकल। खुशीओ केना नै उपकैत, केतौ बिनु पुछनौं ढाकीक-ढाकी बात छिड़िआइत रहैए आ केतौ सुनिनिहार स्वयं जिज्ञासु होइए। बाजल- “खेत-पथारक संग जेकर जोर भेल अछि ओकरे ने ओ भेल आकि दोसराक?” ओना अखनि धरि राकेश-मुकेश अपना मतभेदकेँ अपन विवेके फरिछा लैत छल मुदा से नै भेल। रक्का-टोकी शुरू भेल, रंग-बिरंगक शब्दवाण चलए लगल। विद्यालयसँ घर लग दुनू पहुँच गेल मुदा फरिछाएल नै। अंतमे दुनू सहमत भेल जे काल्हि ओही मास्टर साहैबकेँ फेर पुछबनि। ३१ जनवरी २०१४ माघक घूर नरक निवारण पावनि अन्हरिया चतुरदसीक दिन, सतैहिया शीतलहरी अपन कड़कड़ाएल मस्त जुआनी पाबि पछिया हवाक संग विहुँसैत गतिये गुनगुनाइत बहि रहल छल। ओना दुनू मीलि दिन-राति बहैत मुदा भोरहरबामे आबि आरो विकराल रूप पकड़ि लैत। विकरालक पाछू तेज हवा बहब नै मौसमक अपन सकल-सरूप अछि। दिनमे कनी-मनी तँ सुरूजक असरि पाबि कमबो करैत मुदा रातिक चारिम पहर अबैत-अबैत ऊहो असरि हारि-थाकि, जहिना धारक किनछरिक मरियाएल पानि कतवाहि पकडि चलैत तहिना कतवाहि पकड़ि नेने अछि। पाँच थान मालबला रघवा कक्काक सिरसिराएल मन सीरको तरमे सिरसि कऽ तरसि रहल छन्हि। कनारथपर असुआएल बैसल नजरि नोर सिरजि रहल छन्हि। सिरजि रहल छन्हि अपन जिनगीक बेथा-कथा। तेहेन बीखाह समए भऽ गेल अछि जे जहिना माटिक पँखाएल दिवारकेँ कुदि-कुदि बेंग मुँहसँ पकड़ि सुगबुगाइओ ने दैत तहिना अन्हार इजोत बीछि-बीछि बिछौन केने जा रहल अछि। देह परहक सीरक उतारि रघवा काका जिनगीक समर भूमि लेल मन बनबए लगला। जँ लड़ि मरब तैयो दुखेक निवारण जँ जीवित रहब तैयो सएह। आखिर पाँचो थानक पोसिनिहारो तँ छीहे। ओकरा मुँहमे कोनो बाेल छै जे अपन बेथाक कथा कहत। ओना कहियो काल खेबा-पीबा लेल आकि अनठिया जीव-जन्तु देखि आकि दुहै-गाड़ै काल मुँह खोलैए मुदा मनुख जकाँ तँ नै कहि सकैए। नहियोँ कहत तैयो तँ एते बुझबे करै छी जे अखनि जे दुरकाल समए अछि तइमे की सभ शक्तिशाली अछि। जाधरि हथियार नै पकड़ाइ छै ताधरि शक्तिहीनो शक्तिशाली होइते अछि। सुकाल पाबि भलहिं वएह शक्तिहीन शक्तिशाली किए ने बनि जाए मुदा कुकाल तँ कुकाल छिऐ जेकरा मुँहमे अवाज भलहिं होउ, मुदा जेकरा बोल नै छै ओ अपन बेथाक कथा कहिये केकरा सकैए। देह लगा मारब छोड़ि उपैये दोसर की छै। मुदा जानसँ जाए आकि सोग-रोगसँ पकड़ाए, अपन जिनगीक संग हमरो जिनगी तँ तोड़बे करत। टुटैत जिनगी देखि मन थकथकेलनि। थकथकाएल मन बुदबुदेलनि। जिनगी टुटि कऽ फेरि ओहिना खसि पड़त जहिना दस बरख पहिने छल। जे दस बर्खक बीच ज्ञान-कर्मक संग कठिन श्रम केला पछाति भेटल, ओ छीना रहल अछि, छीना जाएत। मुदा बँचाइओ तँ नहियेँ सकै छी। टुटैत मनकेँ हुथैत विचार कहलकनि- “की यएह सोचि एते समैओ आ श्रमो गमेलौं जे छनेमे छनाक भऽ जाए? जखनि जिनगीए टुटि कऽ खसि पड़त तखनि कोन जिनगी लऽ कऽ ठाढ़ रहब!” अनायास उत्साह जगलनि। जहिना सूतल लोककेँ साँस भलहिं चलैत रहौ मुदा रहै तँ निष्प्राणे अछि। तँए कि ओकरा मरलो तँ नहियेँ मानल जाएत। अहुना तँ लोकक नीन टुटबो करैए, तोड़लो जाइ छै आ तोड़ाएलो जाइ छै। उठल उत्साह धकललकनि। देह परहक सीरक ओछाइनपर उनटा दुनू कानकेँ तौनीक मुरेठा बान्हि चद्दरि ओढ़लनि। दुनू डेनो आ दुनू पएरो बैसले-बैसल झाड़ि कऽ सोझ केलनि। सोझ होइते हल्लुकपर पहुँचिते उत्साह सकसकेलनि। विचार जगलनि, जगिते विचार मन फुड़फुड़ेलनि। बारहो मासक बारहो रूप अछि जे अरूप-सरूप दुनू अछि। ओहिक बीच ने जिनगीओ अछि। ओही जिनगीक जनक ने मनुख छी। तखनि लगले हारि मानि लेब पीठ देखाएब भेल। नै पीठ देखाएब तँ जिनगीक हारि भेल। केना लगले सेहो मानि लेब। जँ लगले मानि लेब तँ केकरा लेल मानि लेब, रहबे के करत जे तेकरा लेल मानि लेब। उठि कऽ रघवा काका ओछानइनपर ठाढ़ भेला। केबाड़ खोलि रघवा काका बाहर तकलनि तँ अन्हार छोड़ि किछु ने देखथि। घर अन्हार, बाहर अन्हार तखनि केना डेग आगू बढ़त। चोरबत्तीक स्वीच दबलनि तँ पसरल अन्हारमे छुहिया इजोत किछु दूर धरि भेलनि। देखिते बिसवास जगलनि जे चाेरबत्तीक इजोतक बले आगू बढ़ल जा सकैए। जहिना बाट-बटोही आकि राह-राही गाम घर छोड़ि कोनो गामक रस्ता–बाट पकड़ि आकि कोनो धार-गाछी-बिरछी बाध-बोनसँ हटि अपन पेटे चलि गंगामे मिलैए तहिना एक-दोसर गामक सीमान टपि राही-बटोही अपन गण्तव्य दिस बढ़ैए ओहिना रघवा काका माथ-कानमे मुरेठा बान्हि, चद्दरि ओढ़ि दहिना हाथमे चोरबत्ती नेने ओसारसँ निच्चाँ होइत नजरि खिरौलनि। जहिना अल्हुआ-सुथनीसँ लऽ कऽ साग-पात, भात-रोटी होइत, खीर-पुरी धरि भोज्य होइत तहिना तँ घूरोक अछि। बैशाख जेठक घूर थोड़े छी जे बिनु बीखक माछी-मच्छर भगबैले हएत। ओ तँ घासो-पातसँ लगौल जा सकैए। लगौले किए जा सकैए ओइसँ बेसी जरूरते की छै। जहिना तपाएल समए रहै छै तहिना अगियाएल हवो चलै छै, तेहनामे वएह ने नीक भेल जे जँ आगि हवामे उड़बो कएल तँ उड़िते-उड़िते हवेमे मिझाइओ जाएत। तखनि? तखनि तँ बरसातो नहियेँ छी जे खढ़ो-पात आ जरनो-काठी बरसातक भीजान भीजल रहने धुकुड़-धुकुड़ धुआँ होइत रहत आ ने कखनो घूरक आगि लहसत आ नहियेँ मिझाएत। ओना माछी-मच्छरक बंशो बढ़ि गेल रहै छै आ सौनक नाग-पंचमी पाबि बीखाहो भऽ गेल रहै छै। ओकरा भगबैले तँ कड़ुआएले धुआँ उपयुक्तो होइ छै आ अनुकूलो छै। फेरि रघवा कक्काक मन पाछूसँ ससरैत लगमे पहुँचलनि। पहुँचिते देखलनि जे ई तँ माघ छी। तहूमे अधडरेरक छी। जहिना राति कड़ुआएल अछि तहिना शीतक रूप बदलि पल्ला पकड़ि नेने अछि। एहेन पल्ला पकड़ि नेने अछि जे भीतरसँ बाहर धरिक जलावन सिमसि गेल अछि। बरसातक जरना तँ अधसुखू रहैए। हल्लुक-फल्लुक भलहिं सामान किए ने भीज गेल होइ मुदा एहनो तँ रहिते अछि जे ऊपसँ भलहिं भीजल हुअए मुदा भीतरसँ सूखल रहबे करैए। भीतर-बाहरक जोड़ बीचलाकेँ धकिएबे करै छै। मुदा माघक तँ ओहेन होइए जे हवेमे धोरा भीतर-बाहर एकबट्ट कऽ दइए। भीतर-बाहर तँ ओकरा एकबट्ट करैए जे झाँपल घरसँ बाहर रहैए, जे घरमे झाँपल रहैए ओ किए सिमसत। मनक उत्साह कलशलनि। गठूलाक गोरहा-चिपड़ी तँ सूखल हेबे करत तहूमे ओ कि कोनो गाछक चेरा छी जे पल्लाक डरे तरे-तर सिमसि जाएत। बरद-गाएक गोबरक गोइठा-गोरहा छी जे ओस-पल्लाक के कहए जे पानिक झीसीओ-झकासकेँ थोड़े गुदानैए। ओकरो अपन रस छै। मन पड़लनि बैशाख-जेठमे गोरहा-गाेइठा कएल घर। बाँसक मचान बना सैंति-सैंति रखने रही, तीन मास बरसातमे सठल तेसर मास जारक गुजरि रहल अछि। तेसरोक अदहा बीतिए गेल, हो-ने-हो कहीं ऊहो ने सठि गेल हुअए। तीन मास बरसात रहितो अदहासँ कमे खरचा भेल हएत, मुदा जारक तँ तीनू मासमे बेसी होइते अछि। मन ठमकलनि। मुदा लगले मन कमला गेलनि। अगिले सपता तँ वसन्तक आगमन भऽ रहल अछि। जँ लगिचाइओ गेल हएत तैयो पाँच-दस दिन बेसी थोड़े भेल। तहूमे जे शीतलहरी लधने अछि ओकरो कि सीमा-नांगरि छै। आगू बढ़ि गठूला दिस विदा भेला। डेग उठिते मनमे उठलनि, उठिते मन कहलकनि- “पत्नीक जोगौल घर छी, पुछि लेब नीक हएत। ओ थोड़े कहती जे हमर छी हम नै छुबए देब। जखनि ओही गाए-बच्चाक जीवैक ओरियान कऽ रहल छी, तखनि किए रोकती तहूमे कि ओ नै बुझै छथि जे ओही लक्ष्मीक देलहासँ घर भरि सुख करै छी।” मनमे अबिते रघवा काका पत्नीकेँ पुछब खगता नै बूझि गठूला पहुँचला। घरक मुँहथरिपर धनउसनियाँ टीन राखल। चोरबत्तीक इजोतमे तेना टीन चमकल जे रघवा कक्काक आँखि चोन्हिआ गेलनि। पएरक ठेँस टीनमे लगि गेलनि। तेते जोरक अवाज भेल जे सुगिया काकीक नीन टुटि गेलनि। नीन टुटिते ओछाइनसँ उठि सुगिया काकी गठूला दिस बढ़ली। केना ने बढ़ितथि, बैशाख-जेठमे भलहिं कम्मल-चद्दरि बैसकी बनि जाए, गोरहा-गोइठा बाध-बोनमे छिड़ियाएल रहए मुदा माघक तँ गिरथानि वएह ने छी। ओसारसँ निच्चाँ उतरिते चोरबत्तीक इजोत गठूलामे देखलनि। बूझि गेली जे कियो जारनि लइले आएल अछि। भरिसक जाड़ बरदास नै भेलै तँए घूर करत। मुदा चुपचाप आगू बढ़ब उचित नै बूझि बजली- “गठूलामे के छी?” पत्नीक अवाज सुनि रघवा काका ओहिना सहमि गेला जहिना कियो पति पत्नीक पौती-सखारीमे हाथ दैत सहमैत अछि। ओना सुगिया काकीक बोलमे चोरक ध्वनि नै छेलनि मुदा मनमे जरूर रहनि जे एते राति कऽ घरमे किए औत। मुदा लगले मन गवाही देलकनि जे एक तँ एते राति दोसर एहेन दुरकाल तहूमे गठूला घर, अन्न-पानिक असवावक घर नै, बिनु बुझने-परखने केकरो चोर कहब उचित नै। तँए सोझे बजली जे के छी। एहनो तँ भऽ सकैए जे केकरो जाड़ नै बरदास भेल होइ, आगिक दुआरे जारनि लइले आएल हुअए। मुदा लगले मनमे आबि गेलनि जे अनका घरमे बिना पुछने कियो किए औत। बड़ जाड़ भेलै तँ मांगि लैत। फेरि मनमे उठि गेलनि जे एहनो तँ भऽ सकैए जे कियो दुनियाँकेँ झूठ बूझि नीक-अधलाक विचारे ने करैत हुअए। पत्नीक अवाज सुनि रघवा काका बजला- “हम छी।” रघवा काका तेते दाबि कऽ बजला जे नीक जकाँ सुगिया काकी सुनबो ने केलनि। तँए कि ओ सोलहन्नी नै सुनलनि, सेहो बात नै। शब्द आ शब्दक भाव नै बुझलनि मुदा अवाज तँ कानमे पड़िये गेलनि। जहिना गंभीर शास्त्रीय संगीतक भाव कियो बुझैत वा नै बुझैत मुदा अवाजक कम्पन्न तँ कम्पित काइए दइ छै। जँ से नै तँ ओहन ध्वनिपर जंगलसँ मोर आबि आकि बोनसँ हरिण आबि नाचए किए लगैए। मने-मन सुगिया काकी विचारबो करथि आ गठूला दिस बढ़लो जाथि। मिरमिरा कऽ रघवा काकाकेँ बजैक कारण रहनि, पत्नीक झगड़ाउ प्रवृति। नान्हि-नान्हिटा काजक बात लेल सुगिया काकी ऐ रूपे रक्का-टोकी करए लगै छथिन जइसँ नोकसाने-नोकसान होइ छन्हि। ओना जहिना निआसमे आशाक जनम, अन्हारमे इजोतक जनम होइत तहिना रक्का-टोकीसँ छोट-छोट गल्ती सहटि कऽ सहीट बनि जिनगीकेँ चिक्कन बना दैत मुदा से रघवा काकाकेँ नै रहनि। माल-जालक जराएल मन तेना कऽ मनकेँ जरबैत रहनि जे क्षण-क्षण छनकैत रहनि। दोहरा कऽ सुगिया काकी बजली- “गठूला घर छी, साँप-कीड़ा रहैए तखनि एती राति कऽ किए एलौं। के छी?” सुगिया काकीक बोलक मिठास रघवा कक्काक आत्माकेँ हौंड़ि देलकनि। देखल देह चिन्हल चेहराक चुनचुनाएल स्वर, बजला- “अपने छी।” “एती राति कऽ एहेन जगहपर किए एलौं, एक तँ जाड़सँ ठिठुरल बोन-झाड़, बिलक कीड़ी-फतिंगी आबि कऽ राति विश्राम करैत हएत तैपर ओकरा देहपर हाथ कि पएर पड़त तँ ओ थोड़े अहाँक दुख बूझत आकि लपकि कऽ अपन बीखसँ बिखा देत।” “हँ, से तँ अपनो बुझै छी, तहीले ने हाथमे इजोत रखने छी। हाथ-पएरमे इजोत रहनै ने लोक पएरे-पएरे दुनियोँ टहलि लइए आ हाथसँ करबो करैए।” बजैत-बजैत रघवा काका बाजि तँ गेला मुदा लगले मनमे उठि गेलनि जे अनेरे काज विलमबै छी। जँ गपे करक हएत तँ माले-घरक घूर पजारि बैस गप-सप्प करब। मालो-जालक आत्मा बुझतै जे जहिना जाड़ हमरा होइए तहिना तँ पोसिनिहारोकेँ होइ छै। एहेन पोसिनिहारक प्रेमसँ जीवि। बजला- “बड़ दुरकाल भऽ गेल अछि, थोड़े गोरहा-चिपड़ी लऽ लिअ आ मालक घरमे घूर कऽ दियौ।” पतिक बात सुनि सुगिया काकी किछु ने बजली। मन मानि गेलनि जे किछु छथि तँ छथि मुदा गृहस्वामी तँ यएह छथि। हिनके ऊपर ने खेत-पथारसँ लऽ कऽ माल-जाल आ मनुख धरिक रक्छाक भार कन्हापर छन्हि। लग आबि बजली- “उसरै बेर तेहेन ई शीतलहरी लाधि देलक जे जेहो जरना-काठीक ओरियान कऽ रखने छेलौं सेहो निंघठि गेल, तैपर तेहेन लधान लाधि देलक जे कोनो ठेकान अछि जे केते दिन लधने रहत?” सुगिया काकीक जनगर बात सुनि रघवा काका गुम भऽ गेला, मुदा लगले मनमे फुड़लनि- “कौल्हुका चिन्ता आइ किए करै छी, काल्हिले काल्हि छै। कोनो ठेकान अछि जे एहने समए कौल्हुको हएत।” दूटा गोरहा आ चारि-पाँचटा चिपड़ी उठा, मटिया तेलक डिबिया आ सलाइ आनि आगू-आगू सुगिया काकी आ पाछू-पाछू रघवा काका आबि मालक घरमे घूर केलनि। सूखल गोइठा, तइमे ढाड़ल मटिया तेल सलाइक लपकी पकड़िते लपकि लेलक। घूर धधकि गेल। ०६ फरवरी २०१४ खर्च ओना समैया काका भोरेसँ ठोह फाड़ि-फाड़ि कनै छला मुदा हम बुझलौं नअ बजेमे। सेहो ओना नै बुझलौं, रबि रहने गामक अपनो टोलवैया आ आनो-आनो टोलवैया सभकेँ, जेरक-जेर काकाकेँ देखए जाइत-अबैत देखि जखनि पुछलिऐ तखनि भाँज लागल। पहिने भेल जे माघक तेसर मकड़ छी लोक हरड़ी मेला जाइत हएत मुदा लगले घूमि किए रहल अछि। भाँज लगिते मनमे उठल जे काम-धाम तँ जिनगी भरि चलिते रहत मुदा जँ कहीं बिच्चेमे कक्काक प्राण छुटि जेतनि तखनि तँ भेँटो ने हेता। मात्र चेतनशून्य देहसँ भेँट हएत। ओना देहोक महत तँ अछिये, जँ से नै अछि तँ जिनगी भरि एकरे पाछू किए लगल रहै छी। टोहियबैत-बीहियबैत विदा भेलौं। रस्तामे जेते लोकसँ पुछिऐ तेते रंगक बात सुनिऐ। पहिल गोटेसँ पुछलिऐ तँ बाजल- “अपने करमे ने कियो हँसैत मरैए तँ कियो बपहारि काटि मरैए।” एक तँ ओहिना रंग-बिरंगक मनक विचारमे ओझराएल रही तैपर कर्मक फल हँसब भेल आकि कानब, भाँजे ने बुझलौं। मन भेल जे फेर पुछिऐ मुदा फेर भेल जे जँ कहीं कहि दिअए जे समैक फल पाबि कयो हँसैए तँ कियो कनैए। तखनि तँ एकहरी घुरछी दोहरा जाएत। जखने दोहराएत तखने आरो सक्कत हएत तइसँ नीक जे दोसर-तेसरकेँ पुछबे ने करिऐ। जखनि भेँट करए जाइए रहल छी तखनि पहुँचला पछाति जे पुछैक आकि बुझैक हएत से मुखाैत्रीए भऽ जाएत। जहिना छिड़ियाएल-बीतियाएल पानि आकि गनहाएल-मनहाएल वायु मुखात्र होइते अपन गति पकड़ि लइए तहिना ने भवैत भव मुखात्र होइत भवसागरमे समा समाधि लैत अछि। नजरि पड़िते देखलियनि जे समैया काका घौना पसारि कऽ कानियोँ रहला अछि आ घुन-घुना कऽ अपन जिनगीक गीतो गाबि रहला अछि। एक तँ ओहिना ओझराएल मन तैपर आरो ओझरी लगि गेल। चलचलौ देखि दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम करैत पुछलियनि- “काका, मन केहेन लगैए?” ले बलैया! जिज्ञासा करए जिज्ञासु बनि गेल छेलौं मुदा ओ तँ जेना बिहाड़िमे उधिया गेल होथि तहिना बजला- “जेते धएल-धड़ल छल सभ सठि गेल, मुदा मनक ताप नै मेटाएल, जे घड़ी जे पहर छी, छी। भने भेँट-घाँट भऽ गेल।” समैया काका जेना कालचक्रक पूजापर बैसल होथि तहिना बाजए लगला। भुजंग प्रयात जकाँ सुनैत रहलौं, सुनैत रहलौं।। ०७ फरवरी २०१४ अखरा-दोखरा देवघरसँ अबैत रही, जसीडीहक मुसाफिर खानामे एक गोटे भेटला। भेटला कि सिमटीक जे कुरसी बनल छल ओइपर पहिनेसँ असगरे बैसल रही, ऊहो आबि कऽ बैसला। कनीकाल तँ ऊहो चुपे रहला आ हमहूँ चुपे रहलौं मुदा जखनि चुनौटी निकालि तमाकुल चुनबैक सुर-सार केलौं आकि बजला- “एक जुम बढ़ा देबै।” पहिल दिनक भेँट, केना कऽ पुछितियनि जे छोट जुम खाइ छी आकि नमहर। अपने अनुमान करए लगलौं जे मुँहक एकोटा दाँत नै टुटल देखै छियनि तइसँ भरिसक छोटे जुम खाइत हेता। सएह करैक मन भेल, मुदा खुएला पछाति जँ अजश भेल तखनि खुएलहा फले की हएत! तँए अहगरसँ तँ नै मुदा मझोलका घानी लगा देलिऐ। तरहत्थीपर औंठा चलए लगल। धिया-पुताक खेल जहानि एतएसँ चलिहेँ बुढ़िया, धोकड़ी समैइहेँ बुढ़िया...। बाँहिपर ओंगरी चलए लगल। घंटा भरि गाड़ी पछुआएल। भरिपोख दुनू गोटेक बीच गपो-सप्प भेल आ दूबेर चाहो-पान चलल। गाड़ीक एके कोठलीमे बैस कऽ भरि रस्ता गप-सप्प करैत एलौं। दरभंगा अबैक रहए। हायाघाटमे जखनि ओ उतरए लगला तँ कहलनि- “फेर कहिया भेँट-घाँट हएब आकि नै हएब।” हमहूँ टोकारा देलियनि- “ऐ देहक कोनो ठेकान अछि, अखने डिब्बासँ खसि पड़ब, प्राण तियागि देब।” हठ करि कऽ अपना संग उतारि लेलनि। दू दिन पहुनाइ चलल। दू दिन पछाति जखनि गाम एलौं तँ बेटा पुछलक- “दू दिन केतए हराएल छेलौं?” जेना-जेना भेल, सभ बात सुना देलिऐ। सुनि कऽ बाजल- “एना जे अखरा-दोखरा-तेखरा दोस्ती हुअए लगल तँ दुनियेँ अछन भऽ जाएत।” जहिना गबैया, खिस्सकर शुरू कम स्वरमे करैए तहिना बेटो मुँह दाबि कऽ बाजल छल। दोखरा-तेखरा तँ नीक जकाँ सुनलौं मुदा अखरा कहलक आकि सखरा से नीक जकाँ सुनबे ने केलौं। मनमे उठल दोखरा बालु तँ पानिओ बनबैए आ हवो मुदा तेखरा तँ पाथरेटा बनबैए। ओ चाहे कोइला कहबए आकि पाथर मुदा दुनूक (बालु-सिमटी) प्रेम केते प्रगाढ़ होइए जे जुग-जुगान्तर के कहए जे जन्म-जन्मान्तर धरि ओहिना ठाढ़ रहैए जहिना शुरूमे ठाढ़ होइए। ओना बेसी थकान नै रहए हायेघाटसँ आएल रही, मुदा पाछू पुछड़ी जोड़ि बजलौं- “बौआ, थाकनिसँ देह भरियाएल अछि, पहिने नहा-खा कऽ किछु समए अराम करब तखनि मन खनहन हएत। पछाति सविस्तर बात करबह।” थकान सुनि बेटा अपन जवाबदेही बूझि गुमे रहि गेल। १० फरवरी २०१४ पेटगनाह कौल्हुका भोजक अजशसँ सौंसे गामेक लोककेँ चोट लगल मुदा सभसँ बेसी लगलनि कुसुमी काकीकेँ। बेसी चोट लगैक कारण भेल जे भोजक अगुआ नेतेजी काका छेलखिन। घरवैया तँ अपन माइयक सराध लेल खर्चक जे मन बनौने छल ओ पाइ-चुक्ती केलक। किए ओकर मन कहतै जे दुआरपर सँ पंच अकची-दोकची बजैत गेला। मन तँ यएह ने कहतै जे समाज जेतेक खर्च मंगलनि से तँ दइए देलियनि तखनि काजक भार समाजक ऊपर गेल। जँ कियो नै बुझत बलधकेल अगुऔत तँ अगुआबऽ, अपन मुँह दुइर करता। देखै छी जे केतौ वारीक समाने चाेरा कऽ अपना ऐठाम साहि दइए तँ केतौ देखै छी भनसीए अपन कनारि चुका तीमन-तरकारीमे नोनेक गड़बड़ी कऽ दइए। केतौ देखै छी बजारसँ सड़ल-पाकल समान कीनि दुइर करैए। तइसँ घरवैयाकेँ की? जानए जौ आ जानए जत्ता। सातु सने घून किए पिसाएत? बलजोरी जँ कियो पीसिनिहारि बिना उलौने-फटकने घुनाएल अन्न पीसत तँ दोख केकर हेतै। बलधकेलकेँ कोनो जवाब होइ छै, जेकरा जे फुड़ै छै से बजबो करैए आ करबो करैए। कियो जँ अजशक दोख घरवैयाक माथपर देत से थोड़े मानत, अपनो मन ने गवाही दइते हेतै। काकीक मन ठमकलनि, ठमकलनि कि मानि गेलनि जे भोजैत निर्दोख अछि। जहिना कोनो न्यायालयक न्यायाधीश दूध-पानि बेड़ा अपन पदक संग अपन गरिमा बढ़ा आत्म–परमात्ममे जोड़ि लैत अछि तहिना कुसुमी काकी भोजैतकेँ घिनमा-घीन भेला पछातिओ पनिपत बना कमल फूल जकाँ फुला देलनि। मुदा मन असथिर नै रहलनि, आगू बढ़ि गेलनि। कुसुमी काकीक नजरि समाज दिस गेलनि। समाजक एहेन दुरगति भेल जे अनगौआँ पंच सभ जे यत्र-कुत्र बाजल से तँ बजबे कएल मुदा ई जे बाजल जे एहेन रही तँ पूजापर बैसबे ने करी। गामक रखलक की! कोनो कि जइ गामक पंच रहए तही गामक लोकटा बाजत आकि साँझ-भोरक तरेगन जकाँ एकटा नढ़िया टाँहि देत आकि गामसँ आन गाम धरिक नढ़िया हुआँ-हुआँ करए लगत। आनो-आन गामक लोक बाजत। लोको तँ लोके छी किने, मान न मान हम तोहर मेहमान। जहिना बजै छी तहिना लील समाज अपन समाजक फरिच्छ रूप सोझमे देखब से नीक? आकि बजै छी काग जकाँ आ करै छी कौआ जकाँ से नीक। दुनूकेँ नांगड़ि जोड़ि काग-भुसुंडी मानब, अपन-अपन मन मानब भेल। समाजे गाम भेल आ गामे ने समाज, मुदा गाम तँ ब्रह्म स्वरूप निरविकार नीरब अछि ओकर कोन दोख। मनुखे ने समाज बना सूनसँ शून्य धरि फड़ैत-फुलाइत अछि। मुदा समाजो टुकड़ी-टुकड़ीमे तेना कटि-खोंटि गेल अछि जे नीक-अधलाक विचार जटिलसँ जटिलतर बनि गेल अछि। कुसुमी काकीक मन ठमकि गेलनि। मुदा सुदर्शन चक्र जकाँ मन तेना नचैत रहनि जे कोनो दिशा नीक जकाँ बुझिए ने पबै छेली। तखने नेताजी काका आँगन पहुँचला। जेना साँढ़-पारा अपन कनारि असुलैत तहिना कुसुमी काकी बघुआइत बजली- “केते दिन मनाही केलौं जे एहेन काजमे नै पड़ू, आब ने ओ राजा भोज छथि आ ने हुनकर दरवार छन्हि।” जहिना टुटल घरमे अकासक बून सोझे लगैत तहिना कुसुमी काकीक बोल नेताजी कक्काक हृदैकेँ बेधि देलकनि। छटपटाइत मन अवाक भऽ गेलनि। नजरि काकीक आँखिमे नाचए लगलनि। बजला किछु ने। दोहरबैत कुसुमी काकी बजली- “जखनि अहाँ देख नेने छी जे अही समाजमे केते भोज-काज भेल अछि जइमे केतेकोकेँ जशो भेलनि आ अजशो। मुदा जश-अजशक भागी के?” जश अजश सुनि नेताजी काका गोबर संुघौल मुसरी जकाँ मुँह खोललनि। बजला- “अपनो नै अखनि धरि बूझि पेलौं अछि जे हिसाबमे गलती केतए भेल, जे एना भेल!” हिसाब सुनि कुसुमी काकी बजली- “कागत परहक हिसाब काजमे नै काज करै छै, केतौ वारीक समाने अपना घर साहि दइए तँ केतौ भनसीए अपन कनारि असुलि नोनगरे-अनोन बना दइए, तँ केतौ खेनिहारे कोनो वस्तुक नांगरि पकड़ि चपैत-चपैत चापि दइए।” पत्नीक विचार सुनि नेताजी कक्काक मन मानि गेलनि जे भरिसक सएह भेल हएत। बजला- “ठीके कहै छी।” “ठीके की कहब। अहाँ अपने पेटगनाह छी, तेकरे फल भेल।”। १४ फरवरी २०१४ बड़की माता “अनसोहाँत भऽ गेल! एहेन कहियो ने देखने छेलिऐ!” -ओछाइनपर पड़ल, अपन कुहरब छोड़ि अठासी बर्खक मंगली दादी बजली। जहिना बाट चलैत बटोही हारि-मारि थकान पीड़ासँ पीड़ाएल बजैत तहिना मंगली दादी सेहो बजली। दोसराइत लगमे नै तँए कियो नै सुनि पौलक। जहिना अकासमे मेघक टुकड़ी उड़ि-उड़ि सुर्जक प्रभाकेँ झँपैत तहिना सोगाएल सोग दादीक बोलतीकेँ झाँपि देलकनि। जइसँ बोलती तँ बन्न भेलनि मुदा विचार भीतरे-भीतर सुरकुनियाँ मारि बिचड़ए लगलनि। जुग बदलि गेल वृन्दावनक गोपी एक सेकेण्डक सतरह सौमा भागकेँ जुग मानि कृष्णसँ अलग नै हुअ चाहैत, मुदा से थोड़े अछि। अनेरे कियो बजैए जे कलयुग अखनि ढेरबे भेल अछि, समरथाइओ पछुआएले छै आ औरुदो बहुत बाँकी छै। केता हजार बरख आरो रहत। मनमे बिचरिते रहनि आकि दुबटिया लग पहुँच गेली। पहुँचिते विचार उचड़लनि, ऐ बीच तँ मनुखक केता पीढ़ी गुजरि जाएत! मनुखक जिनगीए केतेटा होइ छै! तहूमे चारि टुकड़ी अछि। जँ सए बर्खक मानब तँ पचीस-पचीस बर्खक टुकड़ी भेल, नै जँ अस्सी मानब तँ बीस बर्खक भेल आ जँ सरकारी मानब तँ साठि बर्खक पनरह बरख भेल। तइ हिसाबसँ कलयुगक किए ने बेसी औरुदा पछुआएले छै। तैबीच पोता मनोज आबि अँगनामे बाजल- “दछिनवरिया टोलमे बड़की माता एलखिन, तँए ओइ टोल दिस नै जाएब।” आँगनमे दोसराइत नै, ओछाइनपर पड़ल मंगली दादी जोरसँ पोताकेँ सोर पाड़ि पुछलखिन- “बौआ की भेल दछिनवारि टोलमे?” दादीक प्रश्न मनोजक मनकेँ जेना धक्का मारलक। धक्का मारलक ई जे दादी पुछलनि। लगमे आबि मनोज बाजल- “दादी, दछिनवारि टोलमे बड़की माता एलखिन, लोक सभ बजैए जे ओइ टोल नै जइहेँ।” एक तँ झुनाएल पाकल टूर खसैत दादीक स्मरण शक्ति, तैपर बड़की माता सुनि असल अर्थ नै बूझि सकली। बुझबो केना करितथि माएसँ दादी ने बनि गेल छेली। पोताक बातकेँ सुनि मनमे रखि लेली जे बेटा औत आकि पुतोहु तँ पुछि लेब। बालवोध क्याँने गेल जे बड़की माता केकरा कहै छै। देवीओ होइए आ दानवीओ होइए। जीवनदानीओ होइए आ लेनिहारिनीओ होइए। भेल ई जे रोदियाएल सौन भऽ गेल। खाली सौने नै, रौदियाएल अखाढ़ो ने बरिसल। फागुन-चैतक मधुआएल रौद बढ़ैत-बढ़ैत अग्नि स्वरूपा बनि पृथ्वीकेँ गरसि लेलक। अग्नि स्वरूपा बनबो केना ने करैत? पानिक छुतिये ने समापत भऽ गेल। अपन सहयोगीक भरपूर सहयोग भेटबे केलै। रस्ता–बाटक बैसल माटि गर्दा-धुरा बनि धुरिया पकड़ि अकासक रसकेँ चुिस लेलक, गाछ-बिरिछ अपन हरितमा तियागि पीड़ासँ पीड़ा धरतीपर झड़ि गेल। पोखरि-इनार, धार-धूर माटिक खाधि बनि गेल। सुरूजक प्रखर प्रभाकेँ धरती-अकास बीचक सेना नै रोकि हारि मानि कतबाहि धऽ लेलक, एहेन स्थितिमे कालचक्रक पूजा केहेन हएत? गामे-गाम रंग-बिरंगक तपाएल तप रोग-वियाधिक संग छोटकी मातासँ सैझली, मैझली बड़की माता पसरि गेल! एक तँ ओहिना समैक गरुआएल गरमी तैपर देहक तपित तापसँ तपीआ जिनगीक कठिन परीछामे गामक-गाम लोक फँसि गेल। शुरूमे जखनि दछिनवारि टोलमे चेचकक आगमन भेल आकि एके-दुइए काने-मुँह सौंसे गाम समाचार पहुँच गेल। मैयाक आगमन होइते ओझहा-धामिक संग झालि-मिरदंग उठि कऽ ठाढ़ भेल। रंग-रंगक प्रहार टोलपर हुअ लगल। ओ सभ तीन सालसँ गहवर खसा अनठौने अछि। तेकरे फल भेट रहल छै। तेतबे नै आनो गामोक आ आन टोलोक आएब-जाएब घटैत-घटैत घटिया गेल। एक्कैसो घरक टोलकेँ जेना गामो आ आनो गाम जरै-मरैले छोड़ि देलक। छोटकी माता अपन रूप बढ़बैत गेल। जहिना शरीरमे बढ़ल तहिना मौसमो बढ़ैत संग-संग चलए लगल। एक्कैसो परिवार रोगसँ आक्रान्त भऽ गेल। आेना दछिनवरिये टोलटा नै गामक आनो टोल आ आनो-आनो गाममे वियाधि पसरि गेल। ओछाइनपर पड़ल मंगली दादीक मन फड़फड़ेलनि। मैयाक आगमन तँ चैत-बैशाख आकि आसीन-कातिकमे होइ छेलै, जखनि रीत-बेवहार बदलै छै। अखनि तँ सौन छी तखनि किए भेल? अखनि तँ बाध-बोन हरिआएल रहैत, पोखरि-झाँखरिसँ लऽ कऽ चर-चाँचड़ जलजलाएल रहैत, से किए ने अछि? मासक ठेकान तँ दादीकेँ मन पड़लनि मुदा मौसमक ठेकाने ने रहलनि। ठेकानो केना रहितनि, घरहटिया घरहटक समैक लछन-करम ठेकना नक्षत्र मन रखैए, किसान किसानी आ बेपारी बेपारक, से तँ आब दादीमे नै रहलनि। तँए मन नै बूझि पेलकनि। मुदा सुनाएल मन सपनए लगलनि। सपनाइते खापड़िक मकैक लाबा जकाँ चनकि धरतीपर खसलनि। खसिते चनचनेली- “कहाँ दन साते-आठेटा मखानक फोंका जकाँ देवसुनराकेँ तेहेन निकलि गेल अछि जे तनो-भगन-वेनग्न भऽ गेल अछि। बापो-माए डरे लगमे नै जाइ छै। जेबो केना करतै। जखनि एक्के घरक सातटा स्त्रीगण सात सीढ़ीमे तेना बँटा जाइए जे मनुखक शक्ले-सुरति बदलि जाइ छै, तहिना ने बरो-बेमारीक अछि। साधारण पेटझड़ीबला जँ रद-दसबला टोल जाएत तँ जानियेँ कऽ ने ढोढ़ीया बीखकेँ गहुमनेक बनौत...।” एक्कैसो घरक टोलमे ने एकोटा परिवार नागा रहल आ ने एक्कोटा मनुख। जहिना दुनियाँक सभ परुखकेँ नारीक संग कऽ देल जाइ छै, तहिना। टोलक सभ चेचक वियाधिसँ व्यग्र भऽ गेल। के केकरा देखत। सबहक मन कहै, जान रहत तखने ने जहान। जँ जाबे से नै रहत तँ जहाने की। सभ िदन सभ काल दुनियाँक उदए-परले तँ होइते छै, तँए कि सभले एक्के होइ छै। दुनूक फेँट-फाँटमे जे जेहेन बीछिनिहार रहल ओ ओहेन कऽ बीछि लइए। अनायास स्मृति जगलनि। जगिते मन पड़लनि अपना देहमे भेल चालीस बरख पहिनुका चेचक। मझिली मैया मन पड़िते देह ओहिना सिहरि गेलनि जेना बर्खाक बून पड़िते अकासमे उड़ैत चिड़ैकेँ होइत। एक तँ उमेरक जर्जर अंग तैपर चालीस बर्खक स्मृति तेना कऽ मंगली दादीकेँ गरसि लेलकनि जे गराँसक चोटसँ जहिना अंग भऽ जाइत तहिना भऽ गेली। बेथाएल तन-मन तेना अकड़ि दबलकनि जे मुँह भरभरेलनि- “हे भगवान! अनेरे कोन नरकमे रखने छी, कहिया धरि राखब।” मुदा लगले मन बदलि गेलनि। बदलि ई गेलनि जे जाबे आँखि तकै छी ताबे अहिना ने होइतो रहत आ देखबो-भोगबो करैत रहब। तइसँ नीक जे लऽ चलू जिनगीक ओइपार जैठाम ई सभ नै देखब। ओसारक दछिनवारि भागमे मंगली दादीक ओछाइन, तहीबीच बेटा बुधियार आँगन पहुँचल। माइक सभ बात तँ बुधियार नै सुनि सकल मुदा अंतिम बात, ‘लऽ चलू...।’ सुनलक। सुनिते बुधियारक मनमे उठल, माए की बाजि रहल अछि! झब दनि लऽ चलू केतए लऽ चलू? मन मुड़ियाएल। मुड़ियाइते भेल जे भरिसक रोग-पीड़ासँ रोगाएल-पीड़ाएल मन तड़पि रहल छै। फेर भेलै जे अनेरे मनकेँ औनाबै छी। माइओ कियो आन थोड़े छी जे पुछैमे संकोच हएत। बाजल- “माए, की भेलौ, एना किए बजै छेँ?” बुधियारक बोल सुनि मंगली दादीक हूबा जगलनि हूबगर होइत बजली- “सुनै छी जे गाममे मैयाक आगमन भेल अछि?” माइक बात सुनि बुधियार तारतम करए लगल जे माए लग झूठ केना बाजब? तहूमे जखनि कहियो ने बजलौं, मुदा प्रश्नक जबावो केना देब। जहिना दछिनवारि टोलक रस्ता छोड़ि देलौं, तहिना तँ उतरवारिओ टोलक। फेर तखनि केना हँ कि नै कहबै। जहिना चिड़ै लोलसँ बोल मिलबैत तहिना बुधियार माइयक बोलसँ बोल मिलबैत बाजल- “हँ, माए ठीके भेल अछि।” बेटाक बोल सुनि मंगली दादीकेँ सुआस पड़लनि। दोहरबैत बजली- “आनो-गाममे भेल अछि आकि अपने गामटा मे?” दादीक मन बढ़ैत देखि मनमे भेल जे अखनि धरि सुनलेहे बाजि बजलौं, आन गामक जँ बाजब आ अढ़ा दिअए जे अपनो कुटुम-परिवार तँ ओइ गाममे अइछे, कनी जिगेसा कऽ आबह तखनि तँ भारी पहपटि हएत। रस्ता–पेरा केतए फँसि जाएब तेकर ठीक अछि। बाजल- “माए, कनी नीक जकाँ भँजियबै छी तखनि नीक जकाँ कहबौ। सुनै छी जे कहाँदन ओझहा-धाइम भाउ खेलाएल तँ कहलकै, गामक सीमान बान्हि देलियऽ, तखनि तँ जानक बदला जान दिअ पड़तह।” मंगली दादी पुछलखिन- “वैद की कहलकै?” ओझहा-वैदक नाओं सुनि बुधियारक मन मानि गेल जे बिना झूठ बजने काज नै चलत। मुदा जहिना बालवोध तहिना थाकल-ठेहियाएल बूढ़-बुढ़ानुसकेँ बौसब बड़ भारी नहियेँ अछि। बाजल- “अनेरे कोन फेड़मे पड़ै छेँ। राम-राम कर सभ नीक भऽ जेतै।” ‘राम-राम’ सुनि मंगली दादी तारतम करए लगली जे ‘राम-राम’ की कहलक। मरैकाल राम-रामकेँ सत् लोक मानैए। अधला काज केला पछाति राम-राम कहि दुतकारि दइ छै। शुभ काजक बेर जँ राम-नाम सत् छी बाजब तँ कपर फोड़ौबलि करा लेब, तखनि बुधियार की बाजल। माइओ रगड़ी बजली- “बौआ, ओझहो-गुणी नै देखलक-सुनलक हेन?” माइक रगड़गड़ बात सुनि बुधियार रगड़ाइत बाजल- “नेति-नेति कहि कातेसँ छुअब छोड़ि सतदिना रोग कहि जीबै-मरैले छोड़ि देलक।” १८ फरवरी २०१४ धरती-अकास सुधीराक बिआहक गप-सप्प उठल। तीन दिन पहिने तक बी.ए.क रिजल्ट निकलल छेलै। राजनीतिशास्त्र आनर्स पाबि सुधीराक मन मानि गेल छल जे राज-काज बुझै-चलबैक लूरिक प्रमाणपत्र युनिवर्सिटी दऽ देलक। सुधीराक पिता प्रोफेसर साहैब संगी-बीच बैस चाहो-पान करैत रहथि आ ठहाका-पर-ठहाका सेहो दैत रहथिन। ठहाकाक कारण भेल जे अपन टारगेटक भीतरे बेटीक बिआहक गर लगि गेलनि। बरो राजनीतिशास्त्रेक प्रोफेसर छथिन। साल भरि पहिने नोकरी भेलनि। बर-कन्या जँ एक विषयक जानकार हुअए तँ ओ जिनगीक लेल सोनाक सुगंधे भेल। संगी सभकेँ बजबैक कारण प्रोफेसर साहैब सबहक बीच सुधीराक बिआहक चर्च उठा, बेटीक विचार जानए चाहलनि। गद-गदाएल मने प्रोफेसर साहैब सुधीरा दिस देखैत संगीक बीच बजला- “बेटीक बिआह पसिनगर घरमे हएत।” संगी सभ जेना बाँसक एकटा चोंगरामे अनेको गोटे पकड़ि सह दइए तहिना मने-मन सभ देलकनि। मुदा सुधीरा राजनीतिशास्त्रक छात्रा छी, अपना लगसँ लऽ कऽ दुनियाँ धरिक राज-काजक प्रक्रिया जनैए। बाजल- “बाबूजी, केहेन परिवारमे पठबए चाहै छी?” पिता चुपे रहला। दोसर जे संगी रहथिन ओ बजला- “बाउ, संयुक्त परिवार, खानदानी परिवार, तहूमे सातो भाँइक भैयारीमे सभसँ छोट भाएक संग।” सुधीरा- “जहिना सात तल अकास ऊपर अछि तहिना सात तल पतालो। भैयारीक सातम तलकेँ ऊपर-निच्चाँ तजबीज केलिऐ?” १९ फरवरी २०१४ बकठाँइ ओछाइन छोड़िते दुनू परानी लाल भायकेँ बकठाँइ शुरू भऽ गेलनि। बरहमसिया बकठाँइ तँए शुभ-अशुभक मद्दी नै। मद्दी तँ ओतए होइए जेतए निअमित किरिया-कलाप चलैत। ओना दोसरो कारण छेलनि, से छेलनि पति-पत्नीक बीच जिनगीक सम्बन्ध। तँए कहियो एहनो भाइए जाइ छन्हि जे सुतलीओ रातिमे आ कहियो अकलबेरोमे तेहेन परोड़क मुड़ी जकाँ सरेड़ निकलै छन्हि जे अड़ोसीओ-पड़ोसीओ आ दिआदोवाद गामसँ फाजिल कहि अपन मुँह बरजि लइ छथि। ओना से ओहिना नै कियो बरजलनि, किछु दिन पहिने जोतखी भायसँ निसभरि रातिमे तेहेन बजरान बजरलनि जे सौंसे गामक लोक जमा भऽ गेलनि। मुदा गौआँकेँ चाबस्सी दी जे जोतखीए भायकेँ दोखी बना मुँह बन्न करैले कहि, छोड़ि देलकनि। बात कोनो कि किछु रहै, एतबे रहै जे किछु एहनो काज होइए जेकर बरजित अकलबेरामे कएल जाए। तँए छुट्टा साँढ़ जकाँ दुनू परानी लाल भायकेँ गौआँ बूझि, एक घर डाइनो बरजै छै कहि बिनु नीनक पकड़ल ओछाइनपर कर घूमि-घूमि कछमछ करितो, कानमे झड़ पड़ैबितो अड़ोसीया-पड़ोसीया ने लगमे पहुँचैक साहस करैत आ ने सुतले-सूतल कियो मनाही करैबला। तेकर कारण ई नै रहै जे लाल भायसँ आन कम तागतिबला छथि आकि दउगर-पेंचगर कम छथि। मुदा कारण जहिना धानक झड़ केतौ धाने झड़ भऽ जाइए आ केतौ झड़ाह बनि झड़ बनैए। माने ई जे एक धानक खेतीक बीच जँ दोसर धान आबि गेल तँ ओ धानो भेल आ झड़ो भेल। धान भेल जे जँ एकरंगाह दोसरमे चलि गेलौं, मुदा फुटै-पकैक, नमती-मोटाइ आ गुद्दाक रंग जँ एक होउ, तँ किए ने धान भेल। मुदा तुलसीफुल आकि कनकजीर धानक खेतमे जँ उलाँक धान मिझड़ा जाए तखनि की कहबै? एकटा धान दोसरसँ दस बड़ नमहरो आ दस बड़ मोटो होइए। खाइकाल तँ पारखी ओकरा पकड़ि घरनीकेँ दसटा सोहर सुनबैक अधिकारी तँ बनियेँ जेता किने। बनबाको चाहिए। जैठाम एक-एक दाना पकड़ैक बात अछि तैठाम जँ पँचमुखी रूद्राक्षमे गो-मुखी नुकबए चाहबै तँ की छोड़बो उचित? खैर जे होउ...। बरहमसिया बकठाँइ तँए दुनू परानी ओहेन अभ्यस्त जे घंटो भरि एके आसन एके टाँगे धेने रहै छथि। ओना लाल भाय आ लाल भौजीक विचारक दूरी नमहर छन्हि मुदा बिना दूरी पार केने सीमोपर नहियेँ पहुँचल जा सकैए। तहूमे मनुख सामाजिक प्राणी छी, जँ दूटा मनुखकेँ एकठाम रहैक सूत्र नै बनल रहत तँ सदिकाल भैंसा-भैंसी होइते रहत। विवाह सूत्र तँ दुनू परानी लाल भायकेँ बान्हिए देने छन्हि। दुनू परानी लाल भाइक आझुका बकठाँइ छेलनि लाल भायक ओ विचार जेकरा ओ सिद्धान्तसँ जोड़ल छन्हि। तैबीच भौजीक सुमति जगलनि आ बेडटी केर ओरियानमे लगि गेली मुदा लाल भाय ओछाइनेपर पड़ल रहला। जेना अस्सी मन पानि विचारपर पड़ि गेल होन्हि तहिना। जहिना बच्चाक शुरूक शिक्षा जिनगीक संग अधिक दूर तक संग पुड़ैए तहिना लाल भायक विचार सेहो संगे चलि रहल छन्हि। सिद्धान्तक बीच फँसल रहनि लाल भायक विचार! चाह पीबैसँ पहिने लाल भायक मन तुरूछि गेलनि। तुरूछैक कारण छेलनि जे अखनि धरिक जे जिनगी रहलनि ओ ई रहलनि जे जँ घर-बाहर एकरंगाह काज हुअए तँ पहिने बाहरक कऽ ली, पछाति घरक। तहिना दोसर विचार रहनि जे जँ अपनो काज रहए ओहने काजक भार जँ दोसराइतोक होइ तँ पहिने दोसराइतक करब नीक। मुदा.., तइ विचारमे फँसल। मनमे रंग-रंगक बात गाड़ीक पहिया जकाँ चलैत रहनि। पनिपत जहिना बीज रूपमे एक दिस पाँकमे गड़ल रहैए तँ दोसर दिस कमल सदृश आँखि सेहो बनौने रहैए तहिना लाल भायक विचार ऊपर-निच्चाँ होइत रहनि। बच्चेमे एक गुरु नै अनेक गुरु माए-बापसँ लऽ कऽ साहित्य धरिक गुरुक उपदेश कानमे पड़ैत रहल जे ‘सत् बाजी, केकरो अनुचित नै करिऐ, सत्-धर्मक पालन करी! मुदा देखि की रहल छी। मन बमछि गेलनि, बुदबुदेला- “कियो अपन कर्ता-धर्ता छी, सिद्धान्तक संग कोनो समझौता नै।” शिवलिंग जकाँ विचारक बीच खूट्टा गाड़ि देलनि। ओछाइनपर पड़ल लाल भाय जिनगीक परीछाक बीच फँसल छला। चाहमे कनी चीनी बढ़बैत लाल भौजी गद्-गद् जे दुनियाँक के एहेन पुरुख अछि जे अपन स्वेच्छासँ जिनगी बना लेत? तैठाम तँ अजमौल पुरुख छथिए। लगले पाछू घुसुकिये जेता। धुआइत चाहक कप दहिना हाथसँ उठबैत लाल भौजी बजली- “किए, महिंस मोड़ जकाँ ओछाइन पकड़ने छी, उठब चाह पीब आकि पड़ले रहब।” लाल भौजीक बात लाल भायकेँ जँचलनि। फुड़फुड़ा कऽ उठि जेबीक पाइ सेरियबए लगला। चाह लाल भौजीक हाथेमे। पाइ सेरियबैत देखि भौजी टीपली- “भोरे लोक राम-नाम करैए, अहाँ पाइए सेरियबै छी।” लाल भौजीक मनोवृति भैया नीक जकाँ परेखने। परेखने ई छथि जे अनकर काजक किछु होउ, अपन कुरथी बलुआ जाए। तैपर दूधबलाक काजक समैपर सेहो नजरि रहनि। दूधबला बेटी बिआहक सरंजाम कीनए भोरे बजार जाएत। लाल भायक हाथमे पाइ नै रहनि, तँए घुमबैत कहने रहथिन- “नअ-दस बजे राति तक पाइ औत, काजक घरमे अनेरे नै बैसह, बजार जाइसँ पहिने तोरा पाइ पहुँचा देबह।” छअ बजेक समए देने रहथिन। अँखिमुना बिसवासू दूधबला, तँए पाइक िचन्ता मनसँ हटा नेने रहए। जहिना भक्तक भगवानपर सँ हटि भगवान बनि जाइए, तहिना। चाह पीब लाल भाय सोझे दूधबला ओइठाम विदा भेला। विदा होइते लाल भौजी टोकि देलखिन- “केतए जाइ छी?” “दूधबलाकेँ पाइ दइले।” “भोरे-भोर अहूँकेँ किछु फुड़ल नै जे अनेरे विदा भेलौं?” “की अनेरे?” “जेकरा खगता रहै छै, ओ अनेरे दौगल अबैए।” “हमहूँ खगता बुझलिऐ तँए ने दौगल जाइ छी।” पतिक सकताएल विचार सुनि लाल भौजी ठमकि गेली। बजली किछु ने। मुदा नजरिक लाली कतियाए लगलनि। जहिना बाघक आगू पड़ने दुनूकेँ ज्वर लगि जाइ छै तहिना लालो भाय आ लाल भौजीओकेँ हुअ लगलनि। मुदा दुनूक ज्वरक दू कारण छेलनि। केकरो रदु-बसातसँ एला पछाति नहेलासँ अबैत तँ केकरो नहेला पछाति रदु-बसातमे गेला पछाति अबैत। लाल भाय अपन विचारक पाछू अपन मानक संग परिवारक सम्मानक रक्छाक बातमे डूमि कलियाएल जाइत रहथि तँ लाल भौजी अपन मान-सम्मानमे। २४ फरवरी २०१४ विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 100 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका‘विदेह'१४९ म अंक ०१ मार्च २०१४ (वर्ष ७ मास ७५ अंक १४९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA