ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १५२ म अंक १५ अप्रैल २०१४ (वर्ष ७ मास ७६ अंक १५२) ऐ अंकमे अछि:- I.शिव कुमार झा टिल्लू दुःखक दुपहरिया :संसारी संवेदनाक तीख अनुभूति देवीजी : बालमनोविज्ञानक सहज स्पर्शन सहज प्रवृतिक गुणात्मक प्रयोगधर्मिता : गुम्म भेल ठाढ़ छी पेटक मारि ( बाल विहनि कथा ) "घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : मैथिल संस्कृतिक द्विरागमन " " मैथिली बाल साहित्य उद्भव ओ विकास " "हाइकू / शेनर्यू " टनका ११ टा कविता II. पम्मी प्रिया झा -" रौ ललटुनमा " III. पल्लवी मण्डल- अनुभव 1 दुःखक दुपहरिया :संसारी संवेदनाक तीख अनुभूति समालोचक : शिव कुमार झा टिल्लू
दुःखक दुपहरिया मैथिली साहित्यक सिद्धहस्त साहित्यकार श्री गंगेश गुंजन जीक सन १९९९ मे प्रकाशित काव्यकृति छन्हि .कोनो कविक काव्य- संवेदना पर ताधरि सार्थक दृष्टिकोण स्थापित करब कोनो टिप्पणीकार लेल संभव नहि जाधरि कवि स्वयं अपन काव्य मे उपस्थित नहि भ' जाए.एहि ठाम कवि अपन दृष्टिकोणक संग आएल छथि तें काव्य- भावक उद्बोधन मे बेसी खगता आ भाँगठ नहि.
गुंजन जीक अनुसारें एहि रचनाक मूल अनुभव -संसार बनल अछि-जीवन प्रचंड रौदकेर दुःख भरल दुपहरिया ,तकर सघन तीख भरल अनुभूति , भरि संसारी संवेदना , माटि-पानि-बरसात मे अथक मनुष्योचित आस्था आ अंततः एकर आशावादि परिणति अपन विश्वासक निष्कम्प रचना-दृष्टि -भागी जे जीवन-विमुख होयबा सँ बचबैत अछि .तें एकर नाम - दुःखक दुपहरिया.
एहि परिपेक्ष्य मे कवि " गीत-ग़ज़ल सन संकलन " मानि एकरा लिखने छथि. ओना त' गुंजनजी साहित्यक आन विधा -उपन्यास , नाटक ,कथा आदि लेखन मे सेहो पारंगत आ प्रवीण छथि , उचितवक्ता " कथा-संग्रह लेल " साहित्य-अकादेमी" पुरस्कार सँ सम्मानित भेल छथि , मुदा जौं -"आपकता" कोनो साहित्यकारक गवेषणाक मूलांकुर मानल जाय त' निस्संदेह गुंजनजी " उन्मुक्त छन्दक उत्कृष्ट " कवि " छथि.
आकाशवाणीक प्रधिकारी संवर्गक एहि कवि केँ स्वर-भंगिमाक भान छन्हि , तें ने अपन गलती केँ " अश्वस्थामा हतो नरो वा कुंजरो" जकाँ स्वीकार क' सहजहि पाठक केँ दिग्भ्रमित क' दैत छथि . " गीत-ग़ज़ल सन संकलन " कविक एहि तरहक उद्बोधनक पाछाँ इएह सोचल जा सकैछ जे जौं ग़ज़लक विरमित व्याकरण केँ पाठक पकड़ि लेत त' तैयो कविक आलोचना संभव नहि किएक त 'पहिनहि कहने छथि जे " ग़ज़ल सन अछि" अर्थात ओ जनैत छथि जे ग़ज़लक मानदंड मे एहि कृतिक कथाकथित ग़ज़ल कदापि नहि उतरत .ओना एहि तरहक गलती मैथिली साहित्यक बहुत रास कवि कयने छथि मुदा ओ सभ ग़ज़लक व्याकरण सँ पूर्णतः अनभिज्ञ छलाह तें ओ सभ स्वयं केँ ग़ज़लकार मानि नेने छथि.भ' सकैत अछि जे ग़ज़लक व्याकरण सँ कवि परिचित पूर्णतः नहि होथि, मुदा एहि रूपेँ गुंजन जी जे चूकि कयने छथि ओकरा अलोपित नहि कयल जा सकैछ , किएक त' एहि विधाक व्याकरण केँ कोनो ने कोनो अर्थ में ओ अवश्य जनैत छथि .
वर्त्तमान ग़ज़ल केँ मैथिली में मानक स्वरुप देबाक लेल क्रान्ति-विज्ञान जकाँ प्रमाणित भ' रहल अनचिन्हार आखर " केँ आधार मानि जौं एहि संकलन मे देल गेल कथाकथित ग़ज़लक, मानकता केँ देखल जाए त' समाविष्ट ग़ज़ल बहर, रदीफ़ , काफ़िया आदिक खगता वा असंतुलन सँ भरल अछि तें एहि ग़ज़ल- सन- काव्य केँ मात्र " आज़ाद -ग़ज़ल " मानि भावक आधार पर मूल्यांकन कयल जाए त' कदाचित मूल्यांकन भ' सकैत अछि .
मार्कण्डेय प्रवासी अपन "सरस्वती -वंदना " शीर्षक काव्य मे वाक-देवी सँ प्रगीत-काव्यक रचनाक शक्ति एहि रूपेँ मँगैत छथि : " भावना दे कल्पना दे शब्द पर अधिकार दे राग लय गति यति नियति दे रसक पैघ पथार दे ....
अर्थात काव्यक गुण-दोख विवेचन मे कृतिकार सँ राग, लय , गति, यति, नियति, सरसता आदिक आश होइत अछि तखने सुर-साध्य भ' सकैछ .कवि स्वयं केँ उन्मुक्त छन्दक कवि कहैत छथि तें गीत मे हिनक भावक विजय स्वाभाविक किएक त' प्रगीत काव्य नहि लिखने छथि , मुदा " ग़ज़ल -सन " जे काव्य छन्हि ओहि मे त' प्रवासीक खींचल लकीर पर जौं ध्यान देल जाए त' ई प्रतीत होइछ जे कवि " अंशतः गेय काव्यक लोच " केँ स्पर्श त' क' लैत छथि , मुदा कतहु- कतहु भाव केँ बचयबा मे रागक क्षय भ' जाइछ त' कतहु गतिक प्रवाह मंद बुझाइछ .
गंधहीन फूलक मधुमास कविता मधुमय मास मे एकांत परल कविक मनोदशाक भाव पूर्ण चित्रण अछि .एहि ठाम आत्माक स्वर स्पष्ट निकसित भ' रहल . एहि लोक सँ अलोपित अपन सभ सँ पियरगरक वियोग मे कवि आकुल भ' रहल छथि. एकरा प्रिये देशान्तर त' नहि कहल जाए किएक त' ओहि मे अपन स्नेेहीक पुनि घुरि अयबाक आस होइत अछि. एहि ठाम कवि केँ जीवन पर्यन्त पियासले रहि जयबाक भान छन्हि ..किएक त' इहलौकिक सिनेह आब परलौकिक भ' गेल छन्हि
किछु बूझल छल अहूँक मन मे किछु स्वादल छल सिनेहक धार दुनू गोटेक सपना दहा रहल अनचिन्हार गामे गामे ..
श्रृंगारिक जीवन सँ एहि जहानक क्षणभंगुरताक द्योतक वैराग्य मे प्रवेश करैत एहि काव्यक नायक अपन जीवनक गति केँ काव्य लक्षणा ओ व्यंजना बना क' जीवनक आदि-अंतक मध्य झाँपल दर्शन सँ मानवीय गुणक दिशा निर्देशन क' रहल छथि , जे चिंतलशील लगैछ.
जीवनक सुख़-दुःखक अनुभूति, नियति आ प्रवृति पर निर्भर करैछ , अर्थात " मोन उदगार त' गाबी गीत " ...खुशीक अर्णव मे तरंगित मोनक कोनो छद्म क्लेश किछु नहि बुझाइछ, ठीक ओहिना जखन मोन अशांत हुअए त' चाम सँ उपटल छोट फुसरी सेहो भोकन्नर जकाँ लगैछ .
" बिन कहल गीत अमूर्त्त" काव्य मे कविक मोनक क्लेश पूर्ण रूपेँ बाहर आबि गेलनि . जीवनक गाड़ीक एकटा पहिया जखन संग छोड़ि दैत अछि त' दोसर पहियाक व्यथा आ वृथा केँ गाड़ीक कोनो आन पुर्जा कम नहि क' सकैछ ." बिन कहल गीत अमूर्त्त " कविताक नायक जीवनक ओहि अवस्था मे प्रवेश क' गेल छथि जाहि ठाम सँ मात्र सिनेहक एक्के गोट रूप देखाइत छन्हि ... सभ यात्रा कयलक काते काते हमरा काँट-कटैया बनि क' घेरने रहल किछु बात बंद रहल हमरा लेखें दरबज्जा आ दलान अपने तं मृतप्राय , देलक ने हुलकी क्यों आन .....
एहि अवस्था मे प्रवेशक ड'र सभ केँ होइत अछि मुदा एहि ठाम औनाइत लोकक व्यथा दिशि ककरो ध्यान नहि .एकांत दर्शन पर केंद्रित जीवन- दशाक ई काव्य युग -धर्मक गीत जकाँ लगैछ . लेभरल अरिपन सन सबहक नजरि शीर्षक काव्य प्रीति मे रीतिक अनुखन काव्य थिक जाहि मे स्मृतिक संग मधुरता केँ जीवनक क्षणिक आयाम सँ झाँपि जीवाक प्रयास कयल गेल अछि .जखन हिया मे मक़बरा निविष्ट भ' गेल हुअए त' एहि तरहक जीवन अनुकरणीय कोनो अर्थ मे नहि ... एहि काव्यक शाश्वत दृष्टिकोण मे प्रवृति भाँगठ उत्पन्न क' रहल अछि .मुदा कवि त' दुःखक गीत -अगीत कहि लिखने छथि तें हुनक संस्मरण मात्र मानि एहि तरहक किछु काव्य केँ आत्मसात करबाक चाही.
सागर - पथ, आ असकर चुनमुन्नी सन समय नीक अभ्व्यंजना भरल पद्य अछि ..
हिन्दीक चर्चित कवि अज्ञेय अपन कविता " प्राण तुम्हारी पदरज फूली "शीर्षक काव्य मे कहैत छथि .. वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी , गीत शब्द का कब अभिलाषी ? अंतर मे पराग सी छाई है स्मृतियों की आशा धूली प्राण तुम्हारी पदरज फूली ! मैथिली साहित्य मे एहि तरहक भव्य-अभव्य रीति काव्यक जे खगता बुझना जाइत अछि , ओकर खगता केँ " एकटा पारिजात अहाँक नाम " सन काव्य बिनु प्रगीतात्मकता बोरल प्रांजल रूपेँ अंशतः त' अवश्य पूर्ण करैत अछि .... अहाँ प्रेम- आँखिक अमर भाषा हम कंठ मोकल सन अभिलाषा अन्हरिया डोरा सँ प्राण हमर गाँथल अछि ..
दुनूक शब्द विन्यास विलग मुदा भावक समंजन एकरसता भरल अछि
गुंजन जीक काव्य साधनाक अहिवात मे किछुए मुदा कोमल अर्चिस सँ भरल " मुक्तकः " सेहो छन्हि ...सभ किछु छोड़ि अलोपित सिनेहक पाँछा कवि भाग' त' चाहैत छथि मुदा एकर भान सेहो छन्हि जे लोक आब हुनका " बहकल" कहतनि, माने गद्य गीत सँ जखन मुक्तक मे प्रवेश करैत छथि तखन कवि केँ जीवनक वास्तविकताक भान होइत छन्हि.... अहुँक जीवन हमरे जकाँ पहाड़ रहत हमर ई मन सेहो राति -दिन अन्हार रहत जे क्यों सुनत कहियो ककरो सँ ई खिस्सा दुनू गोटे केँ से एक रंग बताह कहत .....
एहि प्रकारेँ कवि आब औनायत घर सँ बाहर भ' ग़ज़लक दुनिया मे प्रवेश करैत छथि .जाहि मे अनिवार्य अनुशासन सँ उन्मुक्त भ' " ग़ज़ल सन गीत" लिखल गेल जाहि गीत सभमे भावक खगता नहि.. सुनू अहुँ ई हमर मनक उदगार सुनू अही मे लोक वेद सौंसे संसार बुझू .. रुसल कमला केर धार पिलखवार जतय एतक लोक सबहक जिनगी कहार बुझू ..
जौं भावक आधार पर मूल्यांकन कयल जाए त' कुशल कवित्वक परिचय मुदा भासल सुर मे आबद्ध रहला सौं ई सभ सेहो गीत नहि "गीत जकाँ " मात्र मानल जाए .हमरा मतेँ प्रवीण कवित्वक धनी गुंजन जी जौं " अतुकांत काव्य संग्रह " बना क' अपन दुःखक दुपहरिया मे मैथिलक कान्ह तकतथि त' आर नीक काव्य संकलन बनितय किएक त ' कवि प्रखर काव्य प्रतिभा सँ भरल छथि , मुदा प्रवाहक आशुत्व नहि छन्हि तें सुर-समंजन कांचे लगैछ अतुकांत काव्य " आज़ाद ' होइत अछि ओहि रूपेँ अवश्य आर उत्कृष्ट होइतनि,आ भावक आलोक-पुंज बेसी उपटि क' सोझाँ अबतनि,ओना अधिकाँश ग़ज़ल सन पद्य भाव सँ परिपूर्ण अछि ,
एकटा पद्यक अंतिम छंद विचारमूलनक पराकाष्ठा केँ पूर्णतः स्पर्श क' लैत अछि .. प्रत्याशा मे पजरल मोनक परिताप बंधु अर्पित अन्हरिया केँ कथा राफ़-साफ़ बधु जीवन-खेला मे बेश गुंजनक निसाफ बंधु .
काव्यक शास्त्रीय व्याख्याक आधार पर एहि ग़ज़ल सबहक विषय मे त्रुटि त' संभव मुदा जौं मात्र प्रगीत-काव्यक आधार पर देखल जाए तँ' किछु पद्यक भाव अनमोल रूपेँ रीतिक व्याख्या करैछ आ परिणामस्वरूप संसारक यथार्थ चित्रण सोझाँ में अबैछ. हम बुझै छी झूठ दुनियाक वचन सँ बहला रहल छथि नेह सँ समझा बुझा क' जे अपन घर जा रहल छथि .
ग़ज़लक बाद देशकालक दशाक गद्य गीत सेहो एहि काव्य में देल गेल अछि तें जौं एकरा मात्र कविक अपन व्यक्तिगत दुःखक दुपहरिया बूझल जायत त' एहि संकलनक संग न्याय नहि .कवि अपन दुःखक अभ्यान्तर मे देश कालक दैनन्दिनी सँ ल' क' चिरकालिक व्याधि सँ क्षुब्ध छथि .. चढ़ैत आकाश पर अन्न सबहक दाम सभटा दोकान अनचिन्हार लगै - ए ताकू मटिया तं ढन -ढन बजे-ए टीन तें आब बेसी घर अन्हार लगै-ए
आदर्शवादक पाठ सभ ठाम भेंटैत अछि मुदा स्वयं मे उतारब संभव नै तें कवि कथाकथित आदर्शवादक नाओं सुनितें बिदकि जाइत छथि आदर्शक बाना छोड़ू , मात्र शब्द धरि ल' ओढू मन पसिन्न सुविधा लोढ़ू विद्यापतिक नोर, राजनीति केर दाव् मे मारू धोबिया पाट सन देशकालक दशाक चित्रण सँ ल' क' विष- बंधन , चेतना गीत , मन कथा सन युगांतकारी नवचेतनावादी काव्य सँ संकलन पाटल अछि सभ सँ प्रतिवादक स्वर भरल पद्य अंत मे भेंटैछ : अरहूल फूलक गीत ..
आब ससरफानी किछु हटलए अन्हरियाक आब रक्त टुह-टुह रंग , आर कनी गाढ़ भेल हमरा दरबज्जा पर लाल सुरूज ठाढ़ भेल
निष्कर्षतः ई कहल जा सकैछ जे " आत्मिक आपक्ता सँ भरल कविक " ई संग्रह मैथिली साहित्य लेल बेछप्प काव्य संग्रह थिक ..
पोथीक नाओं : दुःखक दुपहरिया रचनाकार : श्री गंगेश गुंजन विधा : काव्य संकलन प्रकाशक : क्रांतिपीठ प्रकाशन , पटना प्रकाशन वर्ष : सन १९९९ मूल्य : ५० टका मात्र 2 देवीजी : बालमनोविज्ञानक सहज स्पर्शन समालोचक : शिव कुमार झा टिल्लू देवीजी वर्तमान मैथिलीक चर्चित साहित्यकार श्रीमती ज्योति झा चौधरी क लिखल निबंधात्मक बाल साहित्य अछि, जे श्रुति प्रकाशनक सानिध्य सँ सन २०१२ मे बहरायल .गहन चिन्तनक संग लिखल एहि प्रयोगवादी पोथीक आलोचना सेहो एकटा चिन्तनक विषय भ' रहल अछि .जौं टी एस. इलियड क आलोचना सिद्धांत केँ मूल्यांकनक आधार मानल जाए त' मैथिली भाषा साहित्य मे " बाल साहित्य " विधा पर तीन गोट नव -प्रयोगवाद भेल अछि आ जकर कृतिकार क्रमशः छथि श्रीमती प्रीति ठाकुर , श्री सियाराम झा सरस आ श्रीमती ज्योति झा चौधरी . आलोचना सिद्धांत इएह कहैछ जे कोनो जीवित वा मृत साहित्यकारक कोनो कृतिक सहज मूल्यांकन तखने भ' सकैत अछि जखन ओहि सँ पूर्व ओहि विधा पर कोनो कृतिकार एहि तरहक प्रयोग कएने होथि.एहि संदर्भ मे ह'म मात्र एतवे कहि सकैत छी सरस जी आ प्रीति जी जे नूतन प्रयोग कएने छथि ओहि सँ उन्मुक्त नवल साध्यक रूपेँ ज्योति जी" देवीजी' क संग मैथिली मे पदार्पण केलीह . हिनक जन्म मिथिला ( बेल्हवार , मधुबनी ) मे भेलनि , छात्रजीवन जमशेदपुर ( प्रवास मे मिथिलाम )आ कर्म क्षेत्र अमेरिका आ इंग्लैंड रहलनि .एहि बहुरंगी दुनियाक इंद्रधनुषी रंग छटा केँ कृतिकार अपन बालमोन सँ जोड़ि एहि नवरूपक वोल्फिया ( जहानक सभ सँ छोट फूल ) ल' क' आएल छथि. कोनो कृतिकार केँ विशेष विधाक सृजन करबा सँ पहिने ओहि रूप मे प्रवेश कर' पड़ैत छैक तखने रचना शाश्वत भ' सकैत अछि .गुरुदेव कवीन्द्र रवीन्द्र एकटा साक्षात्कार मे प्रतिउत्तर देने छथिन्ह जे " गीतांजलि लिखबा सँ पहिने ओ कर्मयोगी अपना केँ प्रीति-भरल-रीतियोगी बना नेने छलाह , परिणाम समक्ष अछि . कहबाक तात्पर्य जे एहि पोथीक रचना सँ पहिने ज्योतिजी की सोचने छलीह ओ त' लिखब सहज नहि मुदा लिखैत काल ओ अवश्य अपन नेनपन मे प्रवेश क' गेल हेतीह आब सुधि पाठकक संग-संग आलोचक जाधरि "अयाचीक -गोविन्द " बनि देवीजीक चिंतन पर ध्यान नहि देथि सहज मूल्यांकन कदापि संभव नहि .बाल साहित्य पर एहि तरहक दृष्टिकोणक अपेक्षा बेरि-बेरि उठयबाक कारण अछि जे मैथिली साहित्य मे सम्बलयुक्त साहित्यकारक दृष्टि सँ ई विधा उदासीन जकाँ रहल . बाल साहित्यक भाव " बाल मनोविज्ञान केँ सहज स्पर्श कर' बला होयबाक चाही , जौं एहि रूप सँ एहि पोथीक मूल्यांकन करी त' ज्योतिजीक परिश्रम वृथा नहि गेलनि . देवीजी एकटा बाल विद्यालयक शिक्षिका छथि एहि विद्यालयक संस्कृति ग्रामीण अछि . एहि तरहक विचार सहज एहि दुआरे किएक त' शहर मे कान्वेंट कल्चर हाबी अछि . एहि विद्यालय मे प्राचार्य पुरुख छथि , आर शिक्षकक बेसी चर्च नहि . देवीजी चंचल बाल नेना सभ केँ विविध ३७ गोट नीति आ सामाजिक अवधारणा सँ भरल शिक्षात्मक उपदेशक रूपेँ पाठ पढ़ा रहल छथि . एहि प्रकारक मनोविज्ञान मे सभ सँ नीक लागल जे कोनो छात्र जखन कोनो उत्पात करैत अछि त' आर अध्यापक दंड देबाक लेल उद्दत मुदा " देवीजी " ओहि तरहक उत्पात सँ एकटा नवल नीतिशाश्त्रक निर्माण करैत छथि आ उत्पाती छात्र अवरोही सँ आरोही बनि जाइछ , अर्थात जे ओकर नकारात्मक क्रियाशीलता सँ सहज रूपेँ एकटा सकारात्मक दृष्टिकोणक जन्म भ' जाइत अछि . आब प्रश्न उठैत अछि जे प्रयोगात्मक रूप सँ की ई संभव छैक ? त' एहि लेल वर्त्तमान समस्तीपुर जिलाक चर्चित " रघुनन्दन उच्च विद्यालय समर्था पोस्ट कल्याणपुर अंचल विभूतिपुर " क भ्रमण कयल जा सकैत अछि, जाहि ठाम एहि देवीजी सदृश प्राचार्य राष्ष्ट्रपति सम्मान प्राप्त शिक्षक स्वर्गीय रामनंदन सिंहक प्रयोगवाद पूर्णतः सफल भेल छलन्हि .भारत सरकारक नव शिक्षा नीति मे सेहो छात्र-छात्रा केँ शारीरिक -मानसिक यातना पर प्रतिबन्ध लगाओल गेल अछि .छात्रक चंचल मोन मे पनकैत "बहेरपन" केँ थाम्हबाक लेल "शिक्षक अभिरुचि मानदंड " मे नीति शिक्षाक माध्यम सँ मानसिक उद्विग्न्ताकेँ रोकबाक क्रियान्वन पर ब'ल देल गेल अछि . नेनाक पहिलुक आ सभ सँ पियरगर गुरु माय होइछ, माय अर्थात नारी . प्राथमिक शिक्षा नीति मे महिला शिक्षिकाक नियुक्ति पर विशेष जोर आ देवीजीक " देवीजी " मे नीतिक क्रियाशीलता मे कतहु ने कतहु संधि अवश्य अछि . जाहि ठाम एहि पोथीक कोनो -कोनो लेख मे अध्यापक छात्र केँ दण्डित क' क' बाल मोन मे अपराधक पुनरावृति रोक' चाहैत छथि ओही ठाम देवीजी उपदेश आ उदाहरण सँ ओहि बहकैत नेनपन मे नव-चेतना जगबैत छथि . एहि तरहक कृत्य मे देवीजीक सफलता देखाक' लेखिका ई प्रमाणित कर' चाहैत छथि जे दंड द' क' नेनपनक अपराध नहि रोकल जा सकैछ . " पिंजराक पंछी "नामक कथा मे उल्लेखित ई शब्द " देवीजी सँ विद्यार्थी डेराइतो छल हुनक सम्मान सेहो करैत छल " बोधगम्य किएक त' बिनु दण्डक डरें सम्मान मे ड'र शिक्षाक शाश्वत रूप थिक, पिंजराक पंछी कोनो विशेष कथा नहि , एकटा छात्र देवीजी केँ पिंजरा मे बन्न सुग्गा देलकनि जे देवीजी बजैत छल.आब अगिला दिन देवीजी किछु अन्नक कण ल' उन्मुक्त गगनक पंछी केँ आमंत्रित करैत छथि .ओहि हँसैत पंछी सँ पिंजराक बन्न पंछीक तुलना करैत छथि ..ओहि छात्र केँ अपराधबोध होइत अछि आ पंछी " आज़ाद"क' देल जाइत छैक . आब एहि कथाक मूल्यांकन मे जौं एहि साहित्य केँ प्रसाहित्यिक सृजन मानि सोचल जाए त' किछु नहि भेंटत . तें विश्लेषक केँ एहि ठाम नेना बनि सोचबाक जरुरति छन्हि वा नेना लग पोथी द' ओकरा सँ मूल्यांकन कराओल जाए , किएक त' देवीजी " सोलह प्रकारक सचार नहि नेनाक " गोलगप्पा " थिक एकर स्वाद वेअह कहत जे नेना हुअए वा नेनपनक सहज आनंद उठौने हुअए, कतिपय परिपक्व भेलाक बादो अपना केँ " प्रवीण नहि मनैत हुअए . अर्थात निश्च्छल बाल मोन पर ज्योतिजीक प्रांजल प्रयास केँ मैथिली मे सफल प्रयोगवाद बूझल जा सकैछ. कोलम्बस दिवस पर देवीजी कोलम्बसक विषय में नेना सभ केँ किछु " अपूर्व ' जानकारी दैत छथि . बिहारक सिलेबस मे सेहो नेनाक कोनो कक्षा मे कोलम्बसक चर्च अछि मुदा देवीजीक पाठ मे कोलंबसक जहाज सभक नाओं , सभ यात्रा वृत्तांत द्वीपक चर्च आ १२ अक्टूबर " केँ अमेरिका मे कोलंबस दिवस मनयबा सन तथ्य मैथिल नेनाक लेल नव विषय उत्सुकता भरल मानल जाए. सभ पाठ मे किछु ने किछु नेनाक लेल ओहि पाठ सँ सम्बंधित नूतन विषय देख'में अबैछ जे अपन समाजक नेना सभक लेल जिज्ञासाक कारण प्रमाणित होयत. सहज अछि आत्मिक साहित्यकार बहुत दिन प्रवास मे रहलीह .ओहू ठाम पढ़ैत रहलीह लिखैत रहलीह . तें एहि तरहक सहजता छन्हि आ ओहि ठामक संस्कृतिक आदान -प्रदान एहि पोथीक मादे नेना मे त'अवश्य होयत. मैथिली साहित्यक बहुत रास प्रबुद्ध जन केँ एखन धरि ई नहि बूझल हेतनि जे आन किछु देश मे " पिता-दिवस " मनाओल जाइत अछि . देवीजी जीवन मे मायक संग-संग " पिताक दायित्व केँ देखइत " अपनहुँ देश मे पिता -दिवस मनयबा पर जोर दैत छथि. एहि कथा मे लेखिका कनेक हुसकि गेल छथि ..किएक त' ई उल्लेख नहि कयल गेल जे पिता दिवस कोन-कोन देश मे कोन दिन मनाओल जाइत अछि. एहि प्रयोगवादी पोथी मे सभ सँ नीक लागल कथाक कथ्यक आधार पर चित्रांकित श्रृंखला .सहज अछि ज्योति जी चर्चित चित्रकार छथि त'एहि तरहक प्रयोग प्रासंगिक छलनि. एवं प्रकारेँ कहल जा सकैछ जे ज्योतिजीक ई बाल साहित्य सहज प्रयोगवादी साहित्य अछि जाहि मे कोनो ठाम कृतिमताक भान नहि होइछ आ मातृभाषा बूझ' आ बाज' बला मैथिल नेनाक लेल कौतुहलक विषय होयत . पोथीक नाओं :देवीजी विधा :निबंधात्मक चित्रांकन युक्त बाल साहित्य प्रकाशक : श्रुति प्रकाशन प्रकाशन बर्ष : सन २०१२ रचनाकार : श्रीमती ज्योति झा चौधरी मूल्य : २०० टका 3 सहज प्रवृतिक गुणात्मक प्रयोगधर्मिता : गुम्म भेल ठाढ़ छी समालोचक : शिव कुमार झा टिल्लू अनुभूति आ अभिव्यक्तिक कवि गोपाल जी झा गोपेश युगधर्म ओ आंचलिकताक रंग कें अनुलोम-विलोम मिश्रण सँ बोरि एकटा झुझुआन परंच आशुत्वक रस सँ डबडब काव्य संकलन सन १९६६ मे प्रस्तुत केलनि" गुम्म भेल ठाढ़ छी " मात्र २३ गोट मुक्तक काव्यक ई संग्रह ठुट्ठा प्रकाशन सँ प्रकाशित अछि. एहि सँ पूर्व गोपेशजीक " सोनदाइक चिट्ठी "बहुत लोकप्रिय भेल छलनि. एहि सँ उत्साहित भ' कवि अपन नव रचना पाठक धरि परसबाक साहस केलनि . अन्तर्मुख मे झाँपल बहिर्मुखी काव्य प्रतिभाक कविक " गुम्म भ' ठाढ़ अछि " - एहि पर चिंतन करब आवश्यक छैक आ इएह दृष्टिकोणक कारणे ई छोट-छीन काव्य अपन प्रासंगिकताक अर्धशतक दिश प्रवेश क' रहल आ एखन त' चिरस्थायी मानल जाए. जाहि ठाम रचनाकारक लेखनी गुम्म भ' जाइछ ओहि ठाम सँ जे शब्द -शब्द उदित होइछ ओकरे साहित्य-पांडित्य लोकनि समालोचना कहने छथि. एहि तथ्यक आधार पर प्रांजल प्रयास मे एहि काव्य मे कोनोविशेष चूकि नहि भेंटल , अर्थात " देखन मे छोटन लगे घाव करे गंभीर " एहि पातर पोथीक काव्य-प्राण कातर नहि .शेषांशक गणना ततेक कम छैक जे आलोचक केँ ओकरा पुनि भाजकक रूप देबा मे सोचय परतनि .एकर सभ सँ पैघ कारण जे कवि उत्थान -पतनक आवर्तनक मध्य झाँपल प्रत्यावर्तन केँ बुझैत छथि. कवि कखनहुँ मौलिकताक दाबी नहि केलक आ ने संख्या -बल मे ओझराक' अनाप सनाप रचना करैत गेल. जतबे लिखलक आत्मा सँ लिखलक आ परिणामक निर्णय स्वयं नहि केलक ओ सभ किछु पाठक पर छोड़ि देने अछि . पहिलुक काव्य " मिथिलाक प्रतिनिधि " सरल छन्दात्मक कविता अछि जाहि मे चर-अचर आ जीव-अजीवक सौंदर्य बोधक संग संस्कृति मे माटिक सुवास सोहनगर लगैछ. "जाहि ठाम पाओल जाइछ डोका सन सुन्नर आँखि फ़रफ़रबए खग मात्र जाहि ठाम सूरतालहि सँ पाँखि.... जाहि ठामक थिक पैघ धरोहरि मिरजइ साठा पाग कोकटिक धोती गाम -गाम मे रुचिगर पटुआ साग जाहि देश मे गाओल जाइछ तिरहुति ओ समदौन जाहि देशमे नव विवाहिता करबथि बहुत मनौन एहि मे सरल पाठकक नजरि मे यथार्थ मुदा आलोचकक दृष्टि मे मिथिलामक गदगदीक परिचर्चा मात्र भेंटत किएक त' जाहि मिथिलाक चर्च कएल जा रहल ओ सम्पूर्णताक परिचायक नहि,विशेष संबल आ आगाँक पाँतिक बोध करबैछ . एहि मे कवि अपन दायित्वक निर्वहन नहि क' सकलथि , कवि परम्परावाद सँ बेसी बाझल लगैछ . पावनि-तिहार , आचार- विचार , विद्या-वैभव आ रहन -सहन मे सम्पूर्णता नहि देखाओल गेल. जौं कोजगराक संग-संग घड़ी पावनि आ वाचस्पति-मण्डनक संग-संग राजा सलहेस सन महामानवक चर्च सेहो कएल गेल रहितए त' एहि पद्य कें मिथिलाक अनुगामी आ उत्कृष्ट " संस्कृति-गान " क संज्ञा सँ विभूषित करब अनुचित नहि होइतए किएक त' यथार्थ कें सेहो अनुखन रूपेण प्रस्तुत कएल गेल ...... .. जाहि देश मे नैहर केर कौओ लगैत अछि नीक होइत छथि नेनहि सँ लुडिगरि जाहि देश केर नारि प्रियगर लगैछ जनमानस कें जिनकर डहकन गारि एहि तरहक श्रव्य सम्बल गाथा क संग संग अपन समाजक विकृति कें सेहो आभा-गान जकाँ प्रस्तुत क' ऊँच-नीचक अनुगामी बोधक दर्शन कविता मे आलोचक लेल किछु विशेष नहि छोरलक कविक इएह सत्य प्रहार काव्य-मंडली मे ओ स्थान नहि लिअ' देलक जकर ई अधिकारी छल. तैयो कोनो परवाहि नहि कवि यथार्थ लिखबे कयलक .. जाहि देश मे अहिपन सुन्नर ओ सीकीक चंगेरी जाहि देश मे बटुकों होइछ बड़का गोट भंगेड़ी "हम आ हमर युग" कविता युगधर्मिताक संग उपादेय कर्मक गाथा थिक जाहि ठाम शील सौंदर्यक कोनो सुमारी नहि, एहि काव्य मे सभ्यता , आस्था , चेतना आ संभावनाक विजय केर आश देखाओल गेल अछि .. हम थिकहुँ घोर बुद्धिवादी आस्था कें तर्कक कसौटी पर कसनिहार.... मुदा एहि तरहक कसौटीक एहि ठाम प्रयोजन आ उपादान स्पष्ट नहि भ' सकल , कवि कें एहि छायावादी दर्शनक प्रयोजनक कारण स्पष्ट करबाक चाही छल. सन १९३१ मे जनमल कवि जखन युवावस्था मे प्रवेश केलक ओहि काल हमर देश स्वतंत्रता मे प्रवेश क' रहल छल. समाज मे व्याप्त भौतिक विषमता सम्यक बौद्धिक कवि कें ग्राह्य नहि भ' सकल आ आगाँ चलि " एक-व्यक्तित्व दुइ चित्र " लिखि देलक .अनुचित रूपेँ धनोपार्जन क' अनर्गल ताम झामक जीवन जीब'बला व्यापारी पकौरीमल झुझुनियां आ आदर्श व्यक्तित्वक लोक सेवक जीक जीवन शैलीक तुलना भलहिं वर्तमानकाल मे सामान्य गप्प मानल जाए परंच ताधरि ई कविता प्रासंगिक रहत जाधरि समाज पर अर्थनीतिक आड़ि मे भ्रष्टाचार भारी रहत. "फ्रीलांसर" पद्य मे भारतीय आध्यात्मक स्वरूपक तुलना जीवन-शैली सँ करैत आस्थाक अनुचित रूप पर कविक वांछित प्रहार एहि पद्यकेँ विचारमूलक बना देलक .. बाबा फ्रीलांसर छथि तें नहि छन्हि मंदिर आ' नियमित रूपेँ सइर भ' कए भोगो नहि लगइत छन्हि ... मात्र मूरति स्थापित क' लेला मात्र सँ पूजा नहि , आस्थाक आडंबर पर नीक प्रहार कएल गेल . सन्तुष्टीकरण मानवीय प्रवृति रहल अछि एहि सँ ऊपर भ' कवि सोचलक तें उचित मोजर नहि भेंटल युगधर्मी कवि " युगधर्म' क बल्तोरि कें गहिया क' उखाड़ि देलक . हास्यक रूप मे विषयक अंतर कतेक द्वैध-जीबि कें कटाह लागल हेतनि , मुदा एहि मे एकटा नकारात्मक तत्व इहो जे गंभीर आ समाजक लेल व्याधि बनल चुनौतीपूर्ण विषय कें व्यंग्यात्मक रूप सँ बोरि क' प्रदर्शित करबा मे एकर विचारमूलन कमजोर पड़ि गेल . एहि मे सत्व आ ताम रसक प्रयोग अपेक्षित छल सभ सँ कठिन होईछ- अपन आ अपन वृतिक आलोचना , ताहू मे जौं ओहि वृतिक उद्देश्य भौतिकवादी नहि हुअए. काव्य सृंजन जनकल्याणकारी उद्येश्यक होऊ आ बरु नहि होऊ ,मुदा! एतेक त' निश्चित अछि जे एहि वृति सँ संधिस्थ मनुक्ख एकरा भौतिक रूपेँ नहि देखैछ ओहु मे मैथिली साहित्यकार कविक स्थिति त' पाठक सँ झाँपल नहि अछि . अपने कवि रहितहुँ कविकाठीक आलोचना गोपेश जी खुलि क' करैत छथि ..एहि आलोचना मे आशा अछि , निराशा अछि ,व्यथा अछि , संत्राश अछि आ कतिपय अनर्गल आत्मप्रशंसा पर प्रहार सेहो अछि ..लेखक सँ कविक तुलना करैत गोपेशजी लेखकक अन्तर्द्वन्द्व आ व्यथा दुनू मे संतुलन रखबाक प्रयास करैत छथि . हिनक अन्तर्मोनक इएह उचित उदगार आन कवि सँ हिनका अलग करैत छन्हि आ एहि ठाम त' निश्चित रूपेँ हिनक काव्य मे तंत्रनाथ झा आ भुवनेश्वर सिंह भुवन श्रेणीक कवित्व झलकैत छन्हि .. हे कविकोकिल आजुक युग मे अहाँ जौं होइतहुँ प्रयोगवादी रचना करितहुँ अपनहि लिखतहुँ अपनहि बुझितहुँ रीन काढ़ि पोथी छपयबितहुँ आलोचक कें देखितहि भगितहुँ.... लेखक सँ तुलनाक बाद कविक तुलना गीतकार, ठीकेदार, इंजीनियर , प्रोफेसर , डॉक्टर वकील आ अफसर सँ कएल गेल जे बड्ड रोचक लागल मुदा नेताक संग तुलना करैत काल कवि आशुत्वक पूर्ण प्रवाह मे उबडुब क' रहल छथि...... मिरजइ दोपटा पाग छाड़ि नेता केर सभटा ड्रेस बनिबतहुँ पीड़ा पानक खिल्ली खइतहुँ सदिखन पटना दिल्ली जइतहुँ सभ विषय पर भाषण करितहुँ बहुतो टा उदघाटन करितहुँ . यथार्थवादी कवि "कल्पना "मे सेहो प्रवेश क' जाएत अछि आ पुनि यथार्थक अनुभूति ओकरा सत्यक दिग्दर्शन करबैछ आ कवि फेर सँ यथार्थ मे" प्रवेश" क' जाइत अछि .कल्पना आ यथार्थ दुनू कविता भव्य विचार आ भावना सँ भरल अछि . कविक आँजुर मे बिजुलिक दिमाग आ यंत्रक जाँत, भारतक माटि सँ सन आशु कविता सेहो छन्हि . सोनदाइक नव चिट्ठी कविता सँ साहित्य केँ की भेटल एहि सँ बेसी महत्वपूर्ण अछि जे " सोनदाइक चिट्ठी" क लोकप्रियता सँ प्रभावित भ' कवि एहि काव्यक रचना केलनि. ओहुना साहित्यक उद्देश्य शाश्वतक संग-संग कखनहुँ-कखनहुँ मनोरंजन सेहो हेबाक चाही मुदा सोनदाइक चिट्ठी मनोरंजनक संग-संग इतिहासक गर्त मे शिक्षाप्रद सेहो अछि जे चीनी आक्रमणक काल मे लिखल गेल छल . उपलब्धि कविता कोनो ख़ास उद्देश्यक पूर्ति नहि करैत अछि , मनुक्खक अस्तित्व , टहाटही इजोरिया मे, शौर्य मे ककरो सँ उनैस नहि , प्रयोगवादी गमछा आदि मात्र पृष्ठ टा केँ बढ़बै लेल काज केलक एहि सभ मे विशेष किछु नहि . "जवान केँ सम्बोधित गृहिणीक दू आखर " भारत-पाकिस्तान युद्धकाल मे लिखल गेल प्रेरणादायी गद्य-गीत अछि . एहि मे एकटा ग्रामीण नारी अपन पति केँ राजधर्मक निर्वाह करबाक अद्भुत उत्साह दैत छथि... तनने रहब बन्नुक बँटाएब नहि ध्यान अमर रहत हमर सोहाग जौं चलिओ जैत अहाँक जान माइओ दै छथि सप्पत तें रखबनि दूधक लाज देश रक्षा सँ बढ़ि क' दुनिओं मे नहि दोसर काज प्रयोगबादी गमछा , हिलकोर बारह बरख बाद सासुर यात्रा, जय जवान जय किसान आदि आकर्षक प्रांजल पद्य अछि . युगबोध युगधर्मी कविक तात्विक दर्शन सँ भरल जीवाक कला थिक जे कर्मधर्मिता केँ काव्यक धरातल पर उतारवाक नूतन प्रयोग मानल जा सकैछ . एहिपद्य संकलनक सभ सँ आतुर होम' बला विषय इएह जे कवि अंत मे गुम्म भ' क' ठाढ़ भ' जाइत छथि. बहिर्मुखी प्रतिभाक धनी कविक ई गुमकी साहित्य केँ हिल्कोरि देलक जे सभ ऋतु मे आशुत्व गुम्म भ' रहल अछि . मैथिली साहित्यक लेल ई चिन्तनयुक्त प्रश्न अपन भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ठाढ़ क' देलक' ..... ठुट्ठा पिपरक झोंझ मे दबकल अछि नीलकंठ कोइलाक सभ्यतामे चारूकात लंठे लंठ . कविक अनुसार सभ्यताक शिला पर इतिहासों घसा क' विलुप्त भ' जाइछ , मुदा गोपेशक ई काव्य चिरकालिक ज्योति प्रदान करत एहि विश्वाशक संग आशु-कवि गोपाल जी झा गोपेश कें शतशः पुष्पांजलि . 4 पेटक मारि ( बाल विहनि कथा ) शिव कुमार झा टिल्लू . आगाँ -आगाँ कल्लो भगता पड़ाइत ....त' पाछाँ सँ नेना सभ खेहैत सगुन ब्रह्मक उपासक जकाँ गीतक स्वर मे...... " हाथ पएर मैल भेल " " पेट फूटल घैल भेल " वयसक कोनो सीमा नहि. चारि पांच वरखक इचना पोठी सँ ल' क' दस -पंद्रह वरखक गड़ै -गैंची सदृश नेनाक टोल. बहिनक सासुर गेल छलहुँ . हमहुँ नेना तें सरिपहुँ जिज्ञासा भेल जे एहि हास्यक कारण की ? तुलो कक्का अर्थात तुलानन्द झा गामक मुरूख जमींदार छथि .एकटा विवाहिता बहिन नहिरे मे रहि गेली नाओं -" जहान दाइ" तुलो कक्का बहिन केँ बड्ड मनैत छथि . माय -बापक मृत्युक बाद छोट बहिन जहान केँ बेटी मानि कक्का ,पालन -पोषण कयलथि . ततेक मानैत छलाह जे एक दिन जखन इस्कुल मे जहान केँ मास्टर साहेब मारलखिन त' ओहि मास्टर केँ तुलो कक्का हाड़-पाँजर तोड़ि देलथिन .फेर जहान कहियो इस्कुल नहि गेली .बिआहक बाद सासुर मे जहान केँ सासु सँ झगड़ा भ' गेलनि .बालिका वधू जहान दाइ अपन भैया केँ समाद पठौलथि .बहिनक सिनेह मे माहुर भेल तुलानन्द जी सासुर जा क' जहान क सासुक देह पर एक बोझ करची तोड़ि कहलनि " चल जहानी नैहरें मे रहिहें" आब पति अछैत साध्वी बनल जहानी नैहरें मे छथि आ तुलो कक्का बिनु बिआह कएने जहान केँ अपन बेटी मानि शान सँ जमींदारी चला रहल छथिन्ह . एकादशीक व्रत छलनि, जहानी बिनु ब्राह्मण खुऔने कोना पारण करतीह , तें गामक एकटा दरिद्र ब्राह्मण कलानंद झा अर्थात कल्लो भगता केँ नोत देल गेल . "कतेक सेर दही लगतौ कलबा " ..तुलो कक्का क मुख एक दिन पहिनहि ई सुनि कल्लो भगता उगल' लागल , " तुलो कक्का बेसी नहि चारि सेर दही , सेर भरि चूड़ा आ सेर भरिक गूड़क भेलीक जोगार क' देबै " . आठ सेर दूध पौरल गेल .द्वादशीक सूर्योदयक उपरान्त हाँय -हाँय जहान दाइ पूजा अर्चना क' कल्लो भगता केँ नोतक बिजो पठा देलनि . एक याम बीति गेल .तुलो कक्का स्नान क' क' आँगन मे चौका लगा जहान दाइ केँ भोजनक लेल हाक लगौलनि ." भात भ' गेलै , दालि उधिया रहल छै ..बस कएक काल आर सरिसबक साग पसाक' छौंकि दैत छी " जहानक गप्प सुनितें तुलो कक्का आगि भ' गेलथि ..दही सभ की भेलै ? 'सभटा कल्लो भगता खा गेल ' जहानक उत्तर पर कोनो प्रत्युत्तर नहि द' तुलो कक्का कहलनि ..." फरुसा ला , आइ भगता केँ बपरहरि छोरा देबै .ओकर पेट फूटल घैल छै त' सार पहिने कहिते मोन भरि दही जमा दितियै. चारि सेर कहलक ..हम आठ सेर पौरलहुँ तखन हमर हिस्सा किए खा गेल ? खोपड़ी मे सूतल कल्लो भगता पर' फरुसा सँ प्रहार नहि भेल , मुदा तुलो कक्काक मुक्का सँ ओकर बाँचल दांत धरि भरकुस्सा भ' गेल. गाम मे कथीक थाना -पुलिस ..मारियो खेलक आ जुर्माना सेहो देलक कल्लो भगता .बरहर जकाँ फूलल घुघना देखि जखन छौंड़ा सभ पुछलकै जे के मारल क' ? कल्लो भगता कहलक मारत के, ई त पेटक मारि छै ? ओहि दिन सँ कल्लो नेनाक झुंझुना भ' गेल. 5 "घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : मैथिल संस्कृतिक द्विरागमन " शिव कुमार झा टिल्लू आर्यमूलक भाषा सहित्य मे नाट्य परम्पराक आरम्भ गीतनाटिका सँ भेल एकर मूल कारण प्रांजल पाठकक मध्य एहि विधाक प्रति आपकता भरल आकर्षण जगायब रहल अछि. शनैः-शनैः नाटकक मौलिक संवाद क स्थान गद्य ल' लेलक .जेना सभ तरहक सचारक बिनु ऊर्जावान चिष्टान्न सेहो अधीर लगैछ , ठीक ओहिना गीतक बिनु दीर्घकालिक दृश्य साहित्यिक रूप घृतक सुवास सँ विमुख भोजन जकाँ अनसोहाँत लाग' लागल . तें बीच मे गीत राखब नाटक क आकर्षण लेल प्रासंगिक आवश्यकता लाग' लागल .कालक्रम मे मैथिली साहित्य सेहो एहि परिवर्तन सँ विमुख नहि रहि सकल .जौं कोनो नाटकक कृतिकार ओहि मे गीत संयोजन नहिक' सकलथि त' दिग्दर्शक अपना तरहेँ एहि प्रकारक प्रयोग कयलक . ओना किछु नाटककार एहेन भेल छथि जनिक लिखल मौलिक नाटक मे किछु गीत समंजन हुनके द्वारा कएल गेल एहि तरहक प्रयोग केँ निरन्तर रखैत एकटा नव नाटक पाठक आ श्रोता-दर्शक लेल प्रस्तुत अछि :- "घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : एहि नाटकक कृतिकार श्री बैकुंठ झा अर्थशास्त्रक शिक्षक छथि. विविध पत्र पत्रिकाक मे प्रकाशित अपन रचनाक सुकवि रास चर्चित नहि रहलाहें , मुदा पहिलुक नाटकक मादे साहित्य मण्डली मे चिन्तनक नाओं अवश्य भ' रहल छथि. गोनू झा कोनो अदना वा नव चरित्र नहि . वाकपटु आ हास्यक कालनृप केँ अपन नाटकक नायक बना क' जनभाषाक मंच पर आनब सहज कार्य नहि .एहि चर्चित व्यक्तित्व केँ सहेजवाक क्रम मे नाटककारक एकटा नव गवेषण सँ पाठक परिचित भ' रहल छथि जे महाकवि विद्यापति आ गोनू झा समकालिक छलाह .एहि मे सत्यता की अछि ओहि सँ बेसी ई ध्यान देब उपयुक्त जे एहि नाटक मे की विशेष भेंटल ? चारि अंक आ प्रत्येक अंक केँ चारि दृश्य मे विभक्त क' नाटकक दर्शन प्रणाली क पूर्णतः पालन कएल गेल किएक त' विडंबना जे एखन धरि बहुत प्रतिभाशाली दृश्य -कृतिकार केँ एकांकी आ नाटकक दृश्य परम्पराक संयोजन-बोध नहि छन्हि. समवेत गीत सँ नाटकक आरम्भ होइत अछि , एहि गीतक छंद आ लय सभ गोट पद मे अनुखन आ नाटकक अनुकूल बजैछ अर्थात वाचक , दिकदर्शक आ द्रष्टा तीनूक लेल उत्सुकता सँ भरल लागल........ मुकुट जकर चमकैत हिमालय , पयर पखारथि गंगा गंडक कोशी बान्हि जकर थीक फहड़ा रहल तिरंगा ... विद्यापति सन कवि कोकिल जे छथि लोकक ठोरे पर गोनू झा सँ सीखि चतुरता , पौलनि ख्याति वीरवर ... रुचिगर भोजन चूड़ा-दही तरुआ मे तिलकोरक पात सांठथि चतुरी नारि भाई हेतु खूब सैंति थारी मे भात ... प्रगीत काव्यक प्रणेता स्वरक संग नाटकक अंक मे प्रवेश करैत छथि. गोनू झा आ काली जीक मध्यक संवाद सँ पहिलुक दृश्यक समापन होईछ. दोसर दृश्य मे गोनू झाक सासुरक शालीन हास्य समागम जाहि मे हुनक सारि " गम्हीरा"क संग विनोदी दृश्य मे सहज आकर्षण लगैछ... गम्हीरा : ओझा जी ! कोन लेरक चर्च करैत छलहुँ अहाँ ! ठाढ़ भय हम सभ सुनैत छलहुँ ! तें त अहाँ केँ बराबर लेर छुबैत अछि ! गोनू झा : ऐ ! लेरक नहि लारक चर्च करैत छलहुँ ! आ' लेर - हमरा त अहुूँ केँ देखि लेर चुबैत अछि ... एहि तरहक संवाद त' मिथिला समाजक सहज वृति चित्र होईछ कोनो नवल प्रयोग देख' मे नहि आएल ओना ई सहजो छैक किएक त' नाटककार आठ सय बरख पूर्व मे प्रवेश क' गेल छथि. गोनू झा आ हुनक सार मंगनूक दृश्य मे दर्शन भरल मिथिलामक तरंग किएक त' सारक अर्थ होइत छैक तत्व आ तत्व विखंडित नहि भ' सकैछ .इएह कारण होईछ जे मैथिल पुरुख अपन सभ सँ प्रिय पात्र केँ "सार" कहल . गोनू झा हास्य सम्राटक संग-संग कर्मठ स्वामी सेहो बन' चाहैत छथि , मुदा हुनक अर्धांगिनी त' एखन कालीदासक ध्रुवस्वामिनी छथि. एहि सिनेही संवाद मे रीति-प्रीतिक विलोमी साक्षात्कार मे नाटककार " कवि" लागि रहल छथि. एहि तरहेँ नाटक मध्य सँ इति धरि परम्परावादी लागल , कोनो नूतन लोच नहि . गोनू झाक पुत्र यशस्पति झा आ हुनकर नेनपनक नाओं " मोनू " आधुनिक धरि अवश्य लगैछ यथार्थ जे होइछ मुदा एहि ठाम नाटककार परम्परा मे ओझरायल लगैत छथि.ओ आधुनिक उपनाम बला नेना क रचना त' कयलनि मुदा सामंतवादी " मालिक " शब्द परम्परा केँ जीवंत रखने छथि. ओना एहि ऐतिहासिक विषय मे बेसी क्रांति संभव सेहो नहि छल , मुदा जौं किछु सधल प्रयोग कएल जेतै छल त' नाटक क संग-संग कृतिकार सेहो आर अपेक्षित होइतथि. विषय -वस्तुक आवरणक केंद्र मे ई देख' मे आएल जे एकटा प्रतिभाशाली कवि ओहिना काज कयलनि जेना एकटा शिल्पी पाथरक मुरूत बनेनाइ छोड़िओहि पाथर सँ वाहन बना देलक जे वैज्ञानिक युगक द्रुतगामी वाहनक सोझाँ स्थिर नहि सकल . निष्कर्षतः बैकुंठ जी लयात्मक आ प्रतिभाशाली साहित्यकार छथि , आवश्यकता छैक त' मात्र अपन आभा केँ अनुकूल आ युगांतकारी विधा मे साँचब .समय सँ बहुत आगाँ साहित्यकार वा किओ जौं जायत त' अनुचित मुदा बहुत पाँछा गेनाइ सेहो मात्र नव बाटक तात्विक दर्शन लेल अनिवार्य होइछ , ओहि पुरने बात मे जौं मनुक्ख ओझरायत रहत त' नव अनुसंधान संभव नहि छैक . विज्ञानक संग संग साहित्य कला लेल सेहो एहि आदर्श पर ध्यान देब अपेक्षित होईछ . ओना नवका पिरही केँ अपन पुरान संस्कार सँ बान्हबाक जे प्रयास कयलनि ओहि मे सफल सेहो भेल छथि तें एहि पर नकारात्मक स्वरुपक दृष्टिपात उचित नहि होयत . एतेक ध्रुवसत्य जे नाटकार पूर्ण तल्लीन आ सोचि-विचारि क' " नाट्य-सृजन" कयलनि , एहि लेल धन्यवादक पात्र छथि.नाटक मंचनक लेल पूर्णतः उपयक्त अछि कतहु दर्शक पर अनेरेक बोझ नहि देल गेल .सामा ,चकेबा , चुगला कजरौटी सँ अलोपित होईत नाटकक मौलिक लवण सँ नवका पिरही अवलोकित भेल ई नीक विषय वस्तु मानल जाए . परंच पूर्णाहूति रूपेँ इहो ध्यान दिअ' परत जे जाहि चान पर सँ लोक घूमि-फिरि आबि जायत अछि ओहि चान केँ चौठक संग-संग सभ दिनक लेल भगवान बूझब चातुर्य नहि बैकुंठ जी सन प्रतिभाशाली केँ परम्परावादी सँ बेसी प्रयोगवादी बनवाक चाहिअनि. कृतिकार सँ इएह आश जे बरु नाटक, काव्य वा कोनो विधा पर लिखथि हिनका सन प्रवीण साहित्यकारक एहि भाषा केँ जरुरति अछि , आवश्यकताक छैक त' समयानुकूल शिल्पक क्रम -व्यति क्रम देखैत शिल्पी बनबाक निर्णय कएल जाए आकर्षण सँ भरल नीक नाटक लिखबाक लेल शेष-अशेष साभार. नाटकक नाओं : घृष्ट शिरोमणि महामहोपाध्याय गोनू झा : नाटककार : श्री बैकुंठ झा प्रकाशक : मिनार पब्लिकेशन पटना प्रकाशन वर्ष : सन २०१२ मूल्य : ६० टका . 6 " मैथिली बाल साहित्य उद्भव ओ विकास " शिव कुमार झा टिल्लू " मैथिली बाल साहित्य उद्भव ओ विकास " शिव कुमार झा टिल्लू "एहि आलेखक पाठ ह'म साहित्य अकादेमीक " बाल साहित्य दशा ओ दिशा विषयक सेमिनार मे जमशेदपुर मे कएने छलहुँ " कोनो भाषा साहित्य ताधरि विकासक लेल बाट जोहैत रहत अर्थात अपूर्र्ण मानल जाएत जाधरि ओहि मे वर्तमान आ भविष्यक लेल कोनो सुनियोजित व्यवस्था नहि हुअए. एहि क्रम मे जीवनक पहिलुक पाठशालाक छात्र-छात्रा अर्थात नेना वर्ग मे मातृभाषाक प्रति चेतना ओहि साहित्यक विकासक लेल अनिवार्य व्यवस्था मानल जा सकैछ. स्वाभाविक छैक, भोर मे उगैत सुरुजक सोझाँ जौं करिया मेघ नहि लागल हुअए त' लोक सहज अनुमान करैत छथि जे दिन साफ़ रहत . तें भोर अर्थात नेना वर्ग मे ओहेन रचनाक प्रति संवेदनशीलता जगाओल जाए जाहि सँ हिनका मे भाषा साहित्यक प्रति मनोवैज्ञानिक चेतना जागय. आब प्रश्न उठैत अछि जे बाल साहित्य ककरा कही .? एहि लेल सभ पहिने निर्धारित करय पड़त जे बाल वर्ग मे किनका राखल जाय .. साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुरक मतेँ बाल वर्गक तीन रूप होइछ... शिशु अर्थात नेना वर्ग : ( ०-५ बर्ख ) बाल वर्ग : ( ०५-१२ बर्ख ) किशोर वर्ग :( १२- १८ बर्ख ) नेना वर्गक लेल सरस लोरी गीत आ चित्रकथा ( ३-५ बर्खक नेना लेल )उपयुक्त मानल जाय. बाल वर्गक लेल मांटिक सोहनगर लघुकथा गीत आदि रचना संग देशकालक क्रान्तिगीत , चुटुक्का हास्यकथा आदि आवश्यक अछि किशोर वर्गक लेल बालपद्य, चुटुक्का , बाल कथा सँ ल' क' विचारमूलक साहित्यक संग संग बाल ग़ज़ल ( बाल ग़ज़ल किछु दिन पूर्वहिं मैथिली साहित्य मे अस्तित्व मे आयल ) अनिवार्य आ प्रासांगिक अछि मैथिली बाल साहित्यक उद्भव एहि जनभाषाक उद्भव कालहिं मे भ' गेल एना मानल जाएत अछि . एहि तरहक मान्यता आ वास्तविकता सेहो जे एहि विधा कें ओहि काल मे फराक रूप नहि देल गेल. एहि भाषा मे बाल साहित्यक पहिलुक छाँह महाकवि विद्यापतिक पदावली आ मनबोधक कृष्ण जन्म मे भेंटैत छैक ओना एहि दुनू काव्य मे नेनाक लेल किछु विशेष नहि मुदा एकर किछु भक्ति पद शिक्षाक आँचर मे पएर पसारय बला किशोर मे जीवनक त्रिपद..नीति , श्रृंगार ओ वैराग्य सम्बन्धी ज्ञानक लेल किछु हद धरि उपयोगी प्रमाणित भेल .कहबाक लेल त' बाल साहित्य पर बहुत रास प्राचीन रचनाकार लिखने छथि मुदा प्रथमतः तत्सम रूपेण बिम्बक विश्लेषण ..तें बाल मोन पर ओहि रचना सभक कोनो प्रभाव नहि .बाल साहित्यक लेल साहित्य रस सँ बोरल बिम्बक कोनो प्रयोजन नहि ..एहि तरहक रचना मे नेना -मोनक श्रृंगार होयबाक चाही..जेना, आम छू अमरौरा छू बाबा गाछीक औरा छू नेनपन बीति गेलै केकरा कान मे कहबै कू.. नीति सम्बन्धी बाल साहित्यक अन्तर्गत सीताराम झा क शिक्षा सुधा , जनसीदन क नीति पदावली , वेदानन्द झा क रत्नबटुआ प्रमुख अछि शिक्षा सम्बन्धी बाल साहित्य मे श्री गोविंदक पाकल आम आ श्री किरण जीक प्रभात कविता प्रमुख अछि .मैथिली साहित्य मे कांची नाथ झा किरण क " वीर प्रसून पहिलुक बाल कथा संग्रह थिक. डॉ ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्म क भारतीक बिलाड़ि ( सन १९७८ ) पहिलुक मैथिली बाल उपन्यास थिक. सुमनजीक बाल पद्य तत्सम मिश्रित होइत छलनि मुदा शिशु मासिक पत्रिकाक ओ संपादक छलाह जाहि मे तंत्रनाथ झाक बानर आ ईशनाथ झा वंदना बाल पद्य छपल छल. ओहि कालक चर्चित कवि मधुपक गीत बाल साहित्य सँ भरल नहि रहितहुँ बालकंठक गीत बनि गेल छल .पत्र पत्रिका मे बटुक आ धीआ -पूता सन पत्र पत्रिका बाल साहित्य कें पणिकबैत रहल जाहि मे सरस कवि ईशनाथ , सुमन , किरण , यात्री , अमर , आरसी आ धीरेन्द्र सन कविक बाल पद्य छपैत छल . मिथिला मिहिरक बाल स्तम्भ मे डॉ श्रीकृष्ण मिश्रक अग्रदूत उल्लेखनीय बाल साहित्य रहल .हरिमोहन झा , राजकमल , सुभाष चन्द्र यादव , मंत्रेश्वर झा आ रामदेव झा सन रचनाकारक किछु कथा बाल साहित्यक तत्व सँ विमुख रहितहुँ बाल वर्गक मध्य प्रिय रहल. आधुनिक कालक रचनाकार मे जीवकांत जीक तीन गोट बाल पद्य संग्रह छन्हि ..गाछ झूल झूल , छाँह सोहाओनि , आ खिखिरक बिअरि . सियाराम झा सरस केर "फूल तितली आ तुलबुल " श्रेष्ठ बाल साहित्यक श्रेणी मे राखल जा सकैछ. गजेन्द्र ठाकुर क विविधा संकलन कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक क सातम खंड बाल मंडली आ किशोर जगत नेना भुटकाक लेल लिखल गेल विविधा थिक जाहि मे साहित्यक समग्र विधा मे बाल आत्मा केँ छूबाक प्रयास कएल गेल अछि. गजेन्द्र ठाकुर रचित बाल नाटक जलोदीप आ बाल कथा संग्रह अक्षरमुष्टिका सेहो बाल साहित्यक अमूल्य निधि थिक. मैथिलीक पहिलुक महिला नाटककार विभारानी जीक नाटक बलचन्दा सेहो बाल मोन केँ प्रेरित करय बाला नाटक मानल जाए . रामदेव झाक दू गोट नीतिपरक बाल उपन्यास अछि ..इजोति रानी आ हँसनी पान वजंता सुपारी . चित्रकथा मे प्रीति ठाकुरक मैथिली चित्रकथा , मिथिलाक लोकदेवता आ गोनू झा आ आन मैथिली चित्र कथा, नीतू कुमारीक मैथिली चित्र कथा लोकप्रिय बाल चित्रात्मक रूप थिक.मुक्तक मैथिली बाल ललित कला मे श्वेता झा चौधरी , ज्योति चौधरी , कैलास कामत , इरा मल्लिक आदि चर्चित छथि. बाल चित्र श्रृंखला मे देवांशु वत्सक " नताशा " लोकप्रिय भेल अछि . युवा साहित्यकार ऋषि वशिष्ठ क कोढ़िया घर स्वाहा , जे हारय से नाक कटाबय , आ झूठपकड़ा मशीन ( तीनू उपन्यास ) आ माँटि परक लोक , सुफाँटि जतरा आ नित नित नूतन होय ( तीनू बाल कथा संग्रह ) एहि विधा केँ नवल ज्योति देलक . युवा गीतकार आ ग़ज़लकार अमित मिश्रक " नव अंशु " सम्पूर्ण रूपेण नेनाक लेल नहि लिखल गेल मुदा एहि महक बहुत रास पद्य बाल मोन केँ छुबैत अछि , हिनक दोसर प्रकाशन हेतु तैयार पद्य संकलन " अंशु बनि पसरि जायब " बाल मोनक युगांतकारी काव्य प्रमाणित होयत. महिला साहित्यकार मे डॉ नीता झाक " बिलाइ मौसी " उल्लेखनीय बाल कथा संग्रह थिक जाहि मे चित्रात्मक लयक संग खांटी मैथिली मे बाल कथा लिखल गेल अछि .दोसर महिला साहित्यकार ज्योति झा चौधरी क देवीजी ( बालकथा संग्रह ) सर्वकालीन बाल साहित्य मे अपन विशेष स्थान राखत. शोधात्मक साहित्य मे बाल विषयक निबंध हेतु साहित्यकार डॉ दमन कुमार झा क नाम सेहो उल्लेखनीय अछि .युवा साहित्यकार जगता नन्द झा मनु क " चोनहाँ ' एकटा बाल लघु उपन्यास अछि. भारतीय भाषा साहित्य मे बाल साहित्य केँ प्रोत्साहन आ विकासक लेल साहित्य अकादेमी " बाल साहित्य पुरस्कार " आरम्भ कयलक . तारानन्द वियोगी क " ई भेंटल त' की भेंटल " कर्नल मायानाथ झा क "जकर नारी चतुर होय " मुरलीधर झाक "पिलपिलहा गाछ " आ धीरेन्द्र कुमार झाक " हमरा बिच विज्ञान " उल्लेखनीय पोथी जे बाल साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ सम्मानित भेल अछि . जगदीश प्रसाद मंडल केर " तरेगन " ज्ञानवर्धक बहुद्देशीय, नीतिपरक कृति मानल जा सकैछ , ओना एकरा नेना लेल त' पूर्णतः त' उपयुक्त नहि मानल जाए मुदा किशोर वर्गक लेल श्रेष्ठ प्रेरक प्रसंग सँ भरल ई पोथी वतर्मान दशकक चर्चित नीतिकला थिक . विदेह शिशु उत्सव बाल साहित्यक समग्र विधाक अमूल्य कृति थिक जाहि मे डॉ रमण झा , डॉ शेफालिका वर्मा , डॉ नरेश कुमार विकल , रमा कान्त राय रमा , सदरे आलम गौहर , जगदीश प्रसाद मंडल , गंगेश गुंजन आ दमन कुमार झा सन स्थापित रचनाकारक संग-संग बालिका-कवयित्री संस्कृति वर्मा क रचना प्रकाशित भेल छन्हि . मैथिली बाल साहित्य मे मुक्तक काव्यक अपन विशेष महत्व अछि . आरसी प्रसाद सिंह रचित अधिकार आ बाजि गेल रणडंक , चन्द्रभानु सिंहक कोइली , इलारानी सिंहक शिशु कलकत्ता , फजलुर रहमान हासमी कृत हे भाय , मनबोधक कृष्ण जन्मक एकगोट प्रसंग शिशु , सीताराम झाक परिचय पुंज , गोपाल जी झा गोपेशक नीतिकाव्य समय रूपी दर्पण मे , मायानन्द मिश्रक नवका पीढ़ीक विद्रोह , विद्यानाथ झा विदित क वन्दना , कालीकान्त झा बूच क नेना गीत, पोताक अट्ठहास , दीनक नेना, गय खुशबू गय नानी , मुन्ना कक्का सासुर चलला, रविन्द्र नाथ ठाकुरक खाट आ अर्र बकरी घास खो , क संग संग कवि मैथिली पुत्रप्रदीप क देवी वन्दना नेना क लेल प्रियगर गीति-काव्य रहल अछि जकरा सर्वकालिक साहित्यिक मान्यता देल जा सकैछ . वर्तमान पिरहीक क्रियाशील कवि आ कवयित्री गण मे राजदेव मंडल क मुनियाँ क चिंता आ कथीक गाछ , गजेन्द्र ठाकुरक वरद करैए दाओंन ने यौ , मिथिलेश कुमार झाक बापक रोपल गाछ सिनुरिया, महाकांत ठाकुरक खगता भगत सिंहक , जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक बाल गीत डॉ अशोक अविचल रचित नेना , आमक गाछ आ लेलही तोरय चलल साग , डॉ शंकर देव झा क धरती आ अकाश बिच संवाद आ कोइली , पंकज कुमार झाक माय गे माय , ज्योति झा चौधरी क बचपन , दलमा आ एकटा भीजल बगरा, जगदीश प्रसाद मंडल क सुनू बौआ यौ सुनू नूनू औ आ पिता पुत्र संवाद , डॉ नरेश कुमार विकल रचित बाल गीत आ सुनू बौआ मोर , रमा कान्त राय रमाक उल्लूक शिकारी , चंद्रशेखर कामतिक भात छै नाम-नाम , शांतिलक्ष्मी चौधरी , राजीव रंजन मिश्र , आशीष अनचिन्हार , जगता नन्द झा मनु , अमित मिश्र , कुंदन कुमार कर्ण आदि वर्तमान पीढ़ीक ग़ज़लकारक बाल ग़ज़ल , शांति लक्ष्मी चौधरी क वरखा रानी आ कुम्हर, डॉ जया वर्माक बेटी , शंभूनाथ झा क न्यूटनक सिद्धांत आ पाकल आम , राजेश मोहन झा गुंजन क साओन कुमार आ चुट्टी, अमित मिश्रक बाल रुबाई , मुन्नी कामतक जरैत इजोत, इरा मल्लिक रचित छम -छम बरखा आ माँ, डॉ शशिधर कुमार विदेह रचित हम फूल बनब हम काँट बनब , अनमोल झाक अपन गाम आ मामाक गाम , नवीन कुमार आशाक हिंगलू भाय यौ टिंगलू भाय , मनोज कुमार मण्डलक खेल , दुर्गा नन्द मण्डलक हम हिन्दुस्तानी छी , चन्दन कुमार झा रचित हमहूँ पढ़बै आब उल्लेखनीय बाल मुक्तक काव्य मानल जा सकैछ. बाल मुक्तक कथा मे अनमोल झाक भंडाफोड़ , शेफालिका वर्माक आनक बड़ाई, सावरमती आश्रम , मूर्ख राजा आ ओकर बेटा , अनिल मल्लिक दादीक गीत , वृखेश चन्द्र लाल रचित गोलबा जगदीश चन्द्र मंडल रचित बुढ़िया दादी , गजेन्द्र ठाकुर रचित तरहरि मे परलोक , दमन कुमार झा रचित हीरा मोती आ काली कांत झा बूच रचित धर्म- शास्त्राचार्य आदि उल्लेखनीय अछि. वर्तमान समय मे सभ्यताक भूमंडलीकरण सँ किछु भाषाक अस्तित्व संकट संकट मे पड़ि गेल अछि. हमरा सभ केँ एहि दिशा मे ध्यान देब' परत .नवका पीढ़ी मे मातृभाषाक प्रति संवेदनशीलता जगाब' लेल बाल साहित्य मे बीजगणितीय वृद्धि आवश्यक अछि हमारा सभक भाषाक संग ई विडम्बना रहल जे प्रत्यक्ष रूपेण बाल साहित्य केँ ओछ विषय मानल जाएत अछि , एहि तरहक मानसिकता राख' बला लोकक लेल संकेतन जे अंगरेजी साहित्य मे सभ सँ जनप्रिय कविता रहल ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार बाल पद्य रहल ओहि तरहेँ मैथिली मे सभ सँ बेसी लोकप्रिय गीत बाल गीते रहल. . आब प्रश्न उठैत अछि जे बाल साहित्यक रचना करैत काल कोन बालकक रूप मष्तिष्क मे केंद्रित कएल जाए ? गामक अशिक्षित परिवारक नेना सँ ल' क' प्रवासी मैथिल नेनाक मध्य तारतम्य स्थापित करबाक लेल सभ तरहक बाल साहित्य प्रासंगिक अछि ..ओना एहि दिशा मे सक्रियता पहिनहि सँ अछि .. "माय गे माय तोँ हमरा बंदूक मंगा दे तलवार मँगा दे की हम त' माँ सिपाही हेबौ .".. देशकालक गीतक संग संग सामाजिक विषमताक गीत सेहो अनिवार्य होईछ. डॉ ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्म बहुत बरख पूर्वहिं नेना मे काटरक प्रति सहज आ सजग लक्ष्मण रखा खींचबाक प्रयास कएने छथि... राम छू रहमान छू गीता आर कुरान छू मोल बिकेबें नहि बजार मे पहिने बौआ कान छू .. एहि प्रकारक पद एहि भ्रम केँ दूर करैत अछि जे बाल साहित्य मे बिम्बक प्रधानता नहि होइछ ..ओना बिम्ब एहेन होयबाक चाही जे सहज हुअए जेना युवा कवि चन्दन कुमार झाक कविताक किछु पाँति ,,,,, झमझम बरसै छै बून्नी छै नाचि रहल गरचून्नी सुनिक बेंगक टिटकारी फँसलीह कबई कुमारी बगुला टकध्यान लगौने बैसल छल आस धरौने बुझू भेलै जबारी ओकरा भरि पोखे पेलकै टेंगरा एक दिश चन्दन गामक नेनाक ध्यान राखि कविता लिखैत छथि त' दोसर दिश शहरी जीवन मे रमल बालक मनोदशा : कंप्यूटर बैसल टेबुलपर सोचि रहल छै जोड़-घटाओ , गुणा-भाग केर माथा-पच्ची झटपटमे कोना सोझराओ .. अमित मिश्र अपन कविता मे नेनपन सं मनुक्खक अलख जगयबाक उद्घोष करैत छथि तूँ मनुख बन डर नै तोरा पछारि सकौ हिया नै तोहर हारि सकौ जीत होउ, ने होउ पतन तूँ मनुख बन, तूँ मनुख बन सामाजिक विषमताक हिल्कोरि दिशि मैथिली बाल साहित्य पहिनहि सँ सजग अछि एकर एकटा रूप कवि काली कांत झा बूच क काव्य " दीनक नेना शीर्षक काव्यमे भेंटैछ कोरा मे तोरा सुताबय छौ बिनिया जल्दी सँ अबहीं रौ नुनूक निनिया तोहर उपास हमरो लजबै छौ देखहीं रौ बौआ ई कौआ बजै छौ सुनही रौ तोरे कुचरि सुनबै छौ ... एहि स्थापित पुरान आ नव चर्चित रचनाकारक संग-संग किछु क्षणिक रचनाकार सेहो भेल छथि जे कहियो-कहियो उगैत छथि मुदा तीव्र इजोतक संग: ठोहि पारि क' चिन्नी कानय हा हमरा कुकुरो नहि मानय खाजा मूंगबा नोर चुआबै लै छै किओ नहि हम्मर नाम पाकल आम पाकल आम खो रौ बौआ पाकल आम ......( शम्भुनाथ झा ) विज्ञानक शिक्षक शम्भुनाथ झा आमक महिमाक संग न्यूटन क गतिक नियम मैथिली गीत जकाँ गबैत छथि... क्रिया प्रतिक्रिया संग-संग आबय अपन प्रभाव विपरीत जमाबय एहि सँ चलय अछि वायुयान ई भेल न्यूटन केर तीजै सिद्धांत . चंद्रशेखर कामति सन आशु गीतकार दुर्गापूजा मे मेला देख' लेल टकाक आश धेने गरीबक नेना सभक साधन विहीन पिताक व्यथा कें गीत बना क' गबैत छथि .. टुन्ना गैंग पसारै यै मुन्ना दांत चियारै यै गुड्डू टिंकू बबलू सब्लू मुइलो मोंछ उखारै यै. आब की कहब भाय हुरपेट्टे लगैए बाजय छी कोना ? एहि प्रकारक बाल साहित्यक मैथिली मे खगता नहि, आवश्यकता अछि जे एकर व्यापक प्रचार प्रसार रचना सँ बेसी मायक भाषाक संग आपकता राखि कएल जाए. निश्चित रूपेँ एहि विधा केँ सोनक समान इजोत भेंटत . महाकवि विद्यापति , अयाची , उगना , गोनू झा , डाक , राजा सलहेस,बहुरा गोढ़िन -नटुआ दलाल सन मैथिलक जनगाथा जनभाषा मे बाल वर्ग केँ अपन माटिक सुगंध प्रदान करत. वर्त्तमान वैज्ञानिक युगक नवल शोध मैथिली मे उपलब्ध हुअए एहि लेल एहि लेल बाल मोन पर मातृभाषाक राज आवश्यक अछि..... 7 "हाइकू / शेनर्यू " शिव कुमार झा टिल्लू आँखिक नोर /सिनेहक संगोर / नहि झंपैछ नदीक धार /वीर मनु कपार /आगाँ देखैछ बाझल ताग/बिनु लयक राग /धैर्य परीक्षा गोंगक मोन /गदराइल बोन/पटु बुझैछ हाथीक दल /मिथिलाक संवल/एकहि रंग भावक नाह /कर्मक पतवारि /धयने रहू कोढ़िया मोन/परातक आशमे/आँखि मुनने हमहीं लेब/पसाही लगाएब/किछु भेटत कोसीक मोनि/चारि हाथक बोनि/ बड़ गहींर हम विदेह/अहाँ सभ सदेह/बड़ अंतर भावक नाह /कर्मक पतवारि/ धएने रहू नीतिक संग/सिनेहक उमंग/चल जीवन अथाह धार/मुदा जीवाक आश/कात लागब आनक आँखि/शोणितसँ भरल/क्षीर लगाऊ अपन मान/निरीहक पराण/रक्षाक लेल दैहिक गुण/किओ नहि छिनय/ कर्मठ बनू चेतनशील / धोखा नहि खाइछ /सुरूज जकाँ काबू मे राखू /मोन बड़ चंचल /क्षणे उड़य प्राण कातर/कथी लेल घमंड / सभ नश्वर सभ सँ पापी / मोनक मैल छैक / निर्मल राखू माँछ बैसय / बेमार भेला पर /चलैत रहू 8 टनका शिव कुमार झा टिल्लू बिहाड़ि काल गाछक नीचा ठाढ़ नहि रहब ठाढ़ि खसि सकैछ चोट लागि जाएत पोखरि कात ककरो संग जाय एकसरि मे पिछरवाक डर टांग टूटि जाएत हाथ बैसाउ गोल मटोल लिखू सभ पढ़त चिरचिरी पारब किओ नहि बूझत मधुर बाजू सभ किओ मानत सकाले उठू देह नीक रहत सभ काज उत्तम मायक गप बाबाक उपदेश सुनबा जोग पैघ लोकक बात प्रेरणा दैत छैक सुनू औ बौआ वाम कात चलब नियम छैक एकरा नहि तोरू माय बाट तकैत गुरुक बात धियान द' सुनब ज्ञान बढ़त नित आगाँ रहब बुद्धि सेहो होयत नहि डेराउ भूत नहि होइछ साहसी बनू मुइल मने अंत तकर कोन डर आसन धरु देह सोझ रहत कबड्डी खेलू खूब भूख लागत भरि पोख खाएब बगुला ध्यान कोनो काजक घड़ी जरूरी छैक काज पूर्ण होइछ अपनहुँ संतोख अगिल कंठ उपहासक पात्र आचारी बनू उचित बात बाजू अधलाह सं दूर रहसबौरा लोेकक काज नहि कालक मान जे किओ करताह काल संग देतनि चऽहक गाछ टूटि जाएत मुदा झुकत नहि जीव कोनो धरनि कालक संग चलू कठकोकांड़ि छोट पोखरि जकाॅँ क्षणेमे मत्त सर्वगुणी अर्णव अथाह मुदा शांत सगरो डर चारूकात राकस डिरियाइछ वनिताक जीवन नरक बनि गेल असमंजस बाटक कांट जकाँ बिछैत चलू वक सन धियान आगाँ बढ़ैत चलू पाकल बाँस चार नहि लहय सोझ बड़ेरी साङ्गः सनगर यएह घरहट अंर्तजालमे ओझरा गेल अछि नेनाक मोन नैतिकताक लोप आचरण बेहाल बेटीक हंता एकटा बेटा लेल उकियाएत पानि बिनु कानब तैयो कचोट नहि चहटगर रसायन भरल नहि चिबाउ देह हएत नाश सभ किछु चौपट सभ बेरंग कहियो अधलाह नहि देखल आँखि बिनु जीवन अंशुक अंत भेल केहेन दंड एकरा दैव कृपा केना कहब कोन कालक डांग विलोचन निर्मूल बौआ कमाल घुघना लाले लाल भोरे कानय दिनमे रंगताल फुलल दुनू गाल इडली डोसा सदिखन खाएत दूध देखि कऽ मुँह विचकाएत बहसल चिलका कमौआ पूत बनि कऽ देखबिहेँ सभसँ आगाँ विज्ञक समूहमे कुलक हेतौ नाओं माँछक झोर रसगर परोर देखिते दैया कानथि बलजोर माँगथि तिलकोर दिन सूतथि राति भोकरथि मुनिया बेटी परम सुकुमारि बैशााखक विहाड़ि तोहर बेटा बूढ़ सूढ़ देखिते गाल बजाबै एहेन बहसल केकरो पूत नै सुनू भजार चलू आम तोड़ए चोरिक आम बड़ सुअदगर रखबारो सूतल कैंचाक मोल कनेक बुझू बाउ लेमनचूस बेसी नै चिबाउ दाँत सड़ि जाएत दू दुनी चारि पेटकेँ अजबारि रखने रहू भानस भऽ रहलै धंगरि कऽ खाएब कारी बकरी टाँग दुनू पकड़ी छानि कऽ दूध पीबि पीबि ढ़करी नहि जेबै सकरी काँच लताम नहि चिबाउ दाइ पेट बहत मारि सेहो लागत दवाइ नै देब पाकल फल विटामिन भरल चिबा कऽ खाउ रोग नै धरत पनिगर रहब पापक घाव अपरूप अर्बुद फाटय नहि बिखक संवाहक करेज जराबय विकासलीला मूल कोरि रहल रीतिक अंत मात्र आगाँक सोच अंतक बाट सेहो कासक फूल शारदीय प्रसून गुलाब रोपू शाश्वत सहचरी डेग-डेग छाँह चल जीवन परंच स्थिर मन दुनूक योग अलि प्रसून जकाँ तारतम्यक आश ड्राम बजौता अझुका नेना सभ ढोल मृदंग नहि नीक लागनि बाह पछबरिआ नेह सँ दूर आजुक धीया पूता हिनक माय बोतल दूध देथि तकरे परिणाम मैथिली छथि मात्र गाम घ'र मे सेहो कनैत भरमि गेली माय धियान दियौ भाय गुणी वनिता पापी पूत सँ नीक तखन भेद करब अनुचित बेटियो केँ बचाउ गाछक पात टूटि घुरैत नहि वाक संयम मनुजक लक्षण सोचि विचारि बाजी पुरैन पात पानि मे उपजैछ गुण विलग संग मुदा अनंग विद्वान जकाँ शांत करैत साँप पिछुआरे काटय कुटिल जकाँ पाछाँ प्रहार नहि ककरो सोझाँ बाजी मोनक दुःख सभ केँ नहि कही लोक हँसैछ परोपकारी लोक कलियुग मे नहि खाधिक बेंग जहान खत्ता बुझै सगरो देखू अहाँ सर्वज्ञ नहि विज्ञ सँ ज्ञान लिअ डाकक बोल अमृत अनमोल कहने छल गुरू करी जानि क' पानि पीबि छानि क' जड़ि कोरब अधलाहक काज एहि सँ बचू कुपात्र कहाएब गड़ाइन हएत वाम करोट पयर पसारि क' बिनु गेरुआ नित सुतू औ बाउ रोग नहि धरत परक नारी अपने माय जकाँ चरित्रवान धोखा नहि खाइछ सगरो यशक भागी धरती अंडा अहाँ सेहो अंडे सँ तखन घृणा सटलो छुआबय वाह पण्डितारय आँखि सँ देखू वेअह बात बाजू आनक सुनि परक उपहास अमानुषिक वृति दंड क्षमा मे क्षमा पैघ होइछ मुदा कखनो अनुशासन लेल दंड सेहो जरूरी पैरक नीचाँ लटकलें त' गेलैं लिखल छल मनुज चेताबय मात्र विधान लेल छल प्रपंच गुण बनि रहल राजनीति मे इएह हथियार गणतन्त्रक लेल इंटरनेट आँखि चिबा रहल एहि मे बाझि गेल आजुक लोक सभ विकसित जहान सुनू औ वैद्य आब मोंछ पिजाऊ डंकल दाना पोटरी भरि लिअ' बेमारीक जोड़ सभ विद्वान एक पर सँ एक छोट पैघक कोनो मर्यादा नहि कत' रहब आब की ल' जायब सभ ठामे रहत गीता कुरान सभ पढ़ैत छथि सिकंदर समान ....................... 9 ११ टा कविता १ "शोक सभा " शिव कुमार झा टिल्लू आँखि मे नोर दांत निपोर नेना मे जिद्द पूर्ण होयबाक उपरान्त सुनल फकरा ---- बुढ़िया मायक मुख सं' मुदा! एकटा अधबयसूक अंतिम यात्राक सभा मे प्रिय सहकर्मी लोक सभ विनु नोरक दाँत निपोरल वाह रॉ! मानवीय मूल्य बेचि लेंले अजातशत्रुक अंतिम सभा मे एहेन धृष्टता .. देव कहियो क्षमा नहि करतौ हमर माय असमय गेली द'र दिआद जाति पजातिक संग " नेंगरा " कुकुर सेहो कानल छल वेदनाक अभिव्यक्तिक लेल शब्द कोनो अनिवार्य नहि परंच!जैविक परम्परा थिक सभ जीव , काग गीदड़ सेहो संगी हुए वा परिजन " अंतिम सभा" अवश्य बजबैछ हमहीं अंतिम सभा ' शोक-सभा बजयलहुँ अपन प्रिय मित्रक अंतिम सभा ..... ई हिम्मतिक गप्प थिक हमरा त' अंतिम सभा ..अंतिम स्नानक .. हिस्सक परि गेल अछि एहेन पाथरक करेज ककर हएत ? सरिपहुं अजातशत्रु सभ सं प्रिय छल !! तीन-तीन अबोध नेनाक बाप एकटा अवलाक पतवारि सहज व्यक्तित्व सबल दृष्टिकोण ककरो अधलाह नहि सोचलक.. बूढ " गुजराती" बॉस सेहो कानल परशुरामक आखर-आखर सम्वेंदना सं भरल झकझोरि देलक एहि भीड़ मे किछु अंटेटल अभागल सेहो छल एक दोसरक पाँजरि मे गुदगुदी लगा क' हँसैत वाह रॉ ! टाटा नगरक लाल किओ सत्य कहने छल एहि स्टील नगरी केँ आत्मसात केनिहार मे आत्मा हारमाउसक नहि " स्टेनलेस होइछ " संतोष एतवे जे तीनू " मैथिल नहि छल " सरिपहुं मैथिल कदापि ? एहेन नहि भ' सकैत अछि अपना में लरत एक दोसरक टांग खींचत मुदा! भाव! आह ! कम सं कम अंतर नहि त' उपरिक मोने अवश्य तीनू कुपात्र केँ बधाई रउ तोरो घर अन्हार हेतौ २ " काल-चक्र " ( शिव कुमार झा " टिल्लू") चोरक गाल तर पान पचीश कर्मठ भाग जनेरक शीश पारि चिरचिरी चेक भजाबै कारी आखर बुझै महीष तकर छाँह तर बुद्धि विशारद फुदकि -फुदकि गठरी पंजिआबै गणक तंत्र नहि "काल-चक्र " ई संत एहि ठाम नोर चुआबै आना -छिद्दी झरल पल्ला सं परम पिचाश प्रतिशत चाही कोंचा सं ढेंका बढ़ि रहलै बहकल लूटा रहल बाहबाही शोणित सुखा अन्न उपजाबय तकरा लेल खुद्दी बड़ भारी अंचल मे जे दलाली करतै ओकरा पात भरल तरकारी ककरा' ककरा' दोख दिऔ औ जकरा चुनलहुँ सेअह गहीर बिनु कानक से संगम सुनतै चिंतनशील आब भेल बहीर बूढ़-पुरान बकलेल कहाबै सहसह कपूत हुरदंग मंचाबै बेसुराह छालही बनि पसरल पंचम सुर केँ नांच नचाबै अर्थनीति केर प्रबल पाश मे स'भ बुझै अपना केँ बीस मर्यादा केँ चोन्ह अबै छन्हि भरल ईमान केँ उठलैन्हि टीस जाति-धर्मक धार मे भसि क' सम्बल सबल समाज बनौलक जकरा जतेक पूंजी केर धाही वैह स्वार्थक लेल सत्य जरौलक आर्य भूमि मे देव बसै छथि कोना एखन धरि बाँचल देश ? जकर चरण रज माँथ लगाबी वैह धेने बहुरुपिया वेश ३ " हमर अपन कविता " ( शिव कुमार झा " टिल्लू") नहि ककरो सं आग्रह नहि कोनो पूर्वाग्रह नहि वाद नहि प्रतिवाद एक मात्र समन्वयवाद एक मिथिला एक जनक एक माय ; कौशल्या बुझू वा कैकेयी सबरी बुझू वा यशोदा जाति त' रहबे करत किएक त' एहि सं होइछ जहानक सृजन मुदा ! नहि ब्राह्मण नहि सोलकन जाति मात्र पुरुष - स्त्री की एहेन मिथिलाक निर्माण संभव नहि अवश्य होयत आशावादी बनू प्रतिवादी नहि समताक आश करू नहि उपहास नहि उंच -नीचक आरि नहि दिऔ ककरो गारि जकरा मे जतेक छल शक्ति सभ कयलक मातृभक्ति आगाँ बढ़ि क' सोचू सभक शोणित पोंछू हमर पुरखा कयलनि गलती बुझू ओ छलाह निस्सर हुनका बुझियौन अस्सर जेना पिसौनक जरती कहि सकैत छियनि परती मुदा मृतात्मा केँ सीनियर सिटीजन केँ नहि दिऔन गारि !!!!! किएक दैत छियनि पुरखा केँ तारि ? अपन बाट त' सोझ राखू अरिया सुधरल पमरिया सुधरल पमरिया मने जाति नहि जाहि बोलीक एक्को धुर जमीन नहि ओ कहरिया वेअह बक्खो सएह पमरिया केहेन अपन भाग्य केहेन दुर्भाग्य ओ फूहड़ बोलीक ललना सभ हमरा सं पहिने साहित्यक महँफा उठा पूरा आर्यावर्त दौरा देलक हमर वैदेही गामे मे' काहि काटि रहल छथि हमर संस्कार अविरल कांता जकाँ ..... आब एक्के मात्र आश पकरने रहू समताक पतवारि जेठक दुपहरिया हुए वा रैन भदवारि इतिहास देखू हमर बाट मधमार्ग एहि ठाम सभक सर्ग नहि कोनो अपवर्ग की औ भाय की बेसी कहि देलहुँ आय ? नहि कहब आत्मा सं जे अहाँ कहब हम ओकरे सुनब जौं नहि सुनि सकब त' त' हारि माँ मैथिली केँ अंतिम प्रणाम करैत उछ्ह्वासक सीरक तानि लेब ई मात्र हमर मोनक बात नहि कोनो विशेष गाछक पात कोनो धारक नहि सविता मात्र " हमर अपन कविता " नहि नीक लागय त' करैत छी अर्धना आब अंतिम प्रार्थना नहि देब गारि नीक नहि लागय त' लिऔ मोन सं उजारि त्रिपथगाक ज'ल सं पखारि बाढनि सं बहारि ...... रचनाकार : शिव कुमार झा " टिल्लू" ग्राम + पोस्ट : करियन जिला : समस्तीपुर ४ "सिनेह " छात्रवृतिक अंतिम खेपक परीक्षा लेल हमर नाओं आयल क्षत्रधारी विद्यालय दलसिंहसराय बड्ड नीक लागल रोसड़ा में जौ सेंटर परितय त' गामक तांगा सं आयब जायब नीक नहि लगितय आब त'.... रोसड़ा सं ट्रेन पकड़ि समस्तीपुर फेर बड़ी लाइनक गाड़ी सं मोन गुदगुदा गेल बेसी नहि खाउ आगाँ नीक मिठाइ खुआ देब बाबूजीक बात सुनितहि थारी उनटा देलहुँ मायक करेज फाटि गेलनि छौंड़ा कें हमरा पर कनेको दरेग़ नहीं सिनेह कोना बूझय जखन बापे नहि कहियो मोजर देलक त' एकर कोन आश साग भातक थारी उनटा क' रसमलाइक आश में रोसड़ा नहि रसबड़ा मुँहक लेर पोछैत विदा भ' गेलहुँ श्याम केबिन में अपन आनन्दक अनुभूति में मायक मोन कें दुखबैत रसमलाई संग कचरी कचरैत आनंद आबि गेल परमानंद वा अभयानंद बाल मोन ..... छमकैत विदा भ' गेलहुँ रोसड़ा घाट टीशन पर ट्रेनक प्रतीक्षा हमहू करैत छी संगहि करैत अछि दू गोट आर नेना "सहोदर" अवरोही क्रमक प्रतीक्षा में हम जायब पश्चिम ओ जायत पूब भुखायल मुँह अपरतीभ हमरा जकाँ रसमलाई नहि खेने छल पोटरी सं तीन गोट टटायल सुक्खल सोहारी बाहर कयलक देखिते छोटकाक आँखि सं झहरय लागल स्वातिक बून क्षणहि में नोर बिला गेल सोहारी टटायल छै नहि खायब बरका गंभीर उमेर बेसी नहि , मुदा ! गरीबक संतति नेनपन सं सोझे वृद्धावस्था में प्रवेश क' जाइछ ताहु पर गप्प सं बुझना गेल पितृछाया सं विमुख छल बरका कें पिताक अभिनय करवाक अछि ...अवश्य करत!!! छोटकाक माँथ हँसोथि बाजल - चल ने गौहाटी काल्हि सं घी मलीदा खुएबौ मुदा एकटा गप्प सेहो सुनि ले कतबो मलगर पूआ खेबें " काल्हि सं मायक हाथक ई टटायल सिनेह नहि भेंटतौ दुनू एक दोसर कें पकड़ि क ' बिलखि रहल अछि ,,,,, छोटका हांय हांय एकटा सोहारी कें मोरि पोटरी में बान्हि लेलक " जाधरि गौहाटी में रहब एहि सोहारी कें जोगा क राखब " एहि में जोहैत रहब मायक "सिनेह" आगाँ में राखल शेष - दुनू सोहारी , दुनू नेनाक अश्रुकण सं मायक सिनेहक स्मरण सं नीर बनि खसल आ भिजा देलक सुखल सोहारी नोर सं कोमल भ' गेल घी दालि तीमनक कोनो काज नहि दुन्नु नेना तिरपित भ' गेल हम स्तब्ध छी !! बाबूजी हमरा दिशि ताकि हँसि रहल छथि हम पढ़ि रहल छी ओ दुनू मुरूख हमर प्रतिभाक कोनो काज नहि हम मायक सिनेह कें तार तार क' देलहुँ ओ दुनू मायक सिनेह कें बोरि बोरि क' काठ बनल सोहारी कें सहज बना देलक ओ मुरूख बाल बंधु हमरा सं बेसी बुद्धिमान हम साधनशील पिताक छी - संतान मुदा मनुज नहि जौं ओ हमरा जकाँ शिक्षित ओ साध्य परिवार में जनम नेने रहितय तं हमरा छात्रवृति .... कथमपि नहीं भेटल रहितए कतेको एहेन दीन- सुत ऋतुक पुष्प जकाँ बिनु पूर्णता नेने मुरझा जाइत अछि ओ दुनू भाय वाह !!!!! कतेक सिनेही ओ चिंतनशील हम सरिपहु लजा गेल छी ! मुदा नमन करैत छियनि ओहि माय कें जनिक कोखि सं एहेन मातृभक्त जन्म लेलक .... हमरा छात्रवृति तं भेंटल ...... कचोट सेहो एखनो धरि विद्वान हएब सहज कठिन होइछ तं मनुक्ख हैब ...... ******************************************** रचनाकार : शिव कुमार झा " टिल्लू" ग्राम पोस्ट करियन जिला समस्तीपुर वर्त्तमान पता : जमशेदपुर ५ "नमन " शिव कुमार झा टिल्लू आमक गाछ फ'ड़ सँ लदल अछि देखिते ठुट्ठ पाकड़ि तान देलक उपहासक तान सुड्डाह क' लेलें अपन स्वाभिमान एकरा नम्रता कोना कहबौ हमरा देखें हम गरीब छी फ'ड़विहीन छी मुदा किओ नहि बूझत जे दुखित छी. ककरो लग नांगड़ि नहि डोलबैत छी.. शान सँ जीबैत छी भूखल रहैत छी मुदा छी धरि स्वाभिमानी !!!!! राणा प्रताप जकाँ आमक गाछ हंसल ... यौ बाउ एतेक नहि अगुताउ किए' करय छी राणा सँ तुलना ओ त' मातृ सिनेही छलाह मायक अस्तित्वक रक्षार्थ दृढ रहथि अहँक ई दृढ़ता नहि व्यर्थ अहंकार थिक जकरा किछु नहि रहैछ ओ एहिना उताहुल रहैछ ह'म नांगड़ि डोलाउन नहि राणा जकाँ मातृभक्त छी अपन ठाढ़ि पात झुका क' वसुंधराक प्रति कृतज्ञता देखबैत छियनि "हे माय अहाँ अपन करेज फाड़ि हमरा जन्म देलहुँ कतेक व्यथा सहने होयब लिअ' आब हम संतति बनि अपनेक आँचर मे अहँक लगायल .. फल द' रहल छी पाकत त' खसा देब मनुक्ख सँ ल' क' गीदड़ चिरैं चुनमुन्नी केँ खुआ देब अहाँ माय छी ... अपन करेज केँ कोरि . वायु , ज'ल , भोजन संचारी छी हमरो त' किछु कर्त्तव्य ? तें हम झुकि क' समर्पण क' रहलहुँ नमन क' रहलहुँ दुष्ट पाकड़ि उद्विग्न भ' गेल जखन एकटा दुष्ट लोक कर्म सँ, विचार सँ रीति सँ व्यवहार सँ पराजित भ' जाइछ तखन ओकरा मे गराइन स्वाभाविक आ लाक्षणिक पाकड़ि सेहो दुष्ट मानवक संग रहल संसर्गे सँ दोख -गुण होइछ करय लागल बिहाड़िक कामना पवन सँ प्रार्थना वातक झकझोरि बहाउ हमरा उजाड़ि.. जड़ि सँ उखाड़ि " ओहि अहंकारी आम पर खसाउ" हम आब मरय चाहैत छी मुदा ! ओकरो जीबय नहि देब.. वाह ! कलियुगी मानव की क' देलें अपना संग संग जीवनदायी गाछ-वृछ केँ सेहो दुष्ट बना देलें वात बहल बसात बहल झांट बरखा संग बिहाड़ि देलक पाकड़ि केँ जड़ि सँ उखाड़ि पाकड़ि खसल मुदा उनटा आम पूब दिश छल पाकड़ि पच्छिम भ'र खसल दुष्टक क्षय भेल नमन क जय भेल **************** ६ "उधेरबुन" शिव कुमार झा टिल्लू * * * * * * * * * * * * * * * * * * जीवाक अनुपम क्षण छल भेंटल आपकता सँ जीबि नहि सकलहुँ आश मे पिआसल रहि गेलहुँ मुदा- मधुर सत्व रस पीबि नहि सकलहुँ सुखल आँखि में आब धार नहि हिआ मे आब वसंत -उदगार नहि सदिखन बालु पर रगरैत रहलहुँ मुदा- चकचक भेल एखनहुँ कटार नहि ठाढ़ निरीह कालक गति देखैत फाटल मोन केँ सीबि नहि सकलहुँ उधेरबुनक अनंत निलय केर कर्मक दुआरि पट बन्न भेटल सभ झट्टा केँ झारि क' देखलहुँ कतहु ने अस्सर अन्न भेटल सभ फुल्ली मे कारी बुनका फ'र फ'र मुरहन्न भेटल नीति सँ पहिने श्रृंगार छोह केँ एहि ठाम कोनो मोल नहि जीवनक गति यति आ नियति मे भौतिकताक किल्लोल नहि सोझ बाट पर चलू पथिक औ कतहु ने कतहु भोर हेतै कर्म एकमात्र शाश्वत होइछ बूझब त' इजोतक जोर हेतै समयक महत्त केँ बूझि लिअ' औ सजल शांतिक तान भेटत ":उधेरबुन" क महँफा मे बैसब त' क्षणे -क्षण विप्लव गान भेटत ************************************* ७ बाबाक कंठी " शिव कुमार झा टिल्लू ........................................ ब्रह्मवेला सँ गदहवेर धरि चलिते रहैत ... जन कल्याणक लेल गामक लोक एहि मे बाबाक स्वार्थ देखैत छल कोनो परवाहि नहि एतेक बुड़िबक थोड़े छी मुझौना बाली कनियाँ कहलनि अपन बहिन सँ बियाह करा देबनि साठि बरख बीति गेल आब बुढ़ारी मे घीढ़ारी नहि रिफाइन ढारी.. संभव छैक.???? बेटा लेल बाघोपुर सँ स्कूल बैग मंगेबाक छलनि ने लोक बुझलक " मनोहर बाबा " काज करैत छथि बियाहक लोभें. गामक लोक केँ एतेक बरिस मे चिन्हब नहि की ? ताहू मे मुजौना बाली हुनकर सासुओ अपन बहिन सँ.. गछने छलीह ! रौ! घ'र मे एकसरि मोन नहि लगैत अछि तें ने लोकक डलबाही करैत छी उपहासक पात्र बनैत छी आब शहरक कुटिचालि गाम धिना रहल .. मुरूख लोक ! सभ बुझैत छी मुदा की करब.???? आदति सँ लाचार जकरा अपन संतान नहि ओ दोसरक नेना केँ बड्ड मानैत अछि ... कलाम साहेब केँ टेलीविज़न मे देखने छलियैक बच्चाक स्कूल मे अपने नेना जकाँ भ' गेल छलाह इएह सिनेहक रूप आ तकरे अपमान परंच ! आइ कहि दैत छियौक आब फेर कंठी पहिर लेब ... हमरा हंसी लागि गेल... बाबाक कंठी भोर मे ग'र साँझ मे लतिमर्दन ई कोनो वैष्णवक कंठी नहि " आब ककरो कोनो काज नहि करब - इएह कंठीक भीष्म-प्रतिज्ञा रूप " पचास बेर उतारैत त' ह'म देखने छलियनि कोनो भौजी अपन नेना केँ पठा क' बाबाक केँ पुनि मना लैत छलीह सरिपहुँ..सहज आ आत्मिक बाबा सेहो बौंसेबाक आग्रह लेल प्रतीक्षा मे रहैत छलाह दुखद !कचोट भरल किएक त' आइ ई कंठी बाबाक संग जरि जायत बाबा एहि लोक सँ जा रहल छथि सभ गमैया स्वार्थ मे कानल मात्र ! नेना -भुटकाक आँखि मे सिनेहक नोर .... इएह नोर बाबा केँ स्वर्गक द्वारि धरि ल' जयबाक लेल वाहनक प्रणोदक बनत ....................................... ८ "रीतिक-मारल " (शिव कुमार झा टिल्लू ) सगरो वैभव - विज्ञान नवल विहान विकासक शान मुदा ! हमर घर मे - शताधिक बरख सँ एक्के तान मात्र प्रीतिक बखान रीतिक गुणगान राजतन्त्रक अंत भेल कतेक युग बीति गेल पिछरल सँ विकासशील फेर विकसितक श्रेणी मे प्रवेश करैत सकल आर्यावर्त मुदा अंग -मगध-मिथिला एतवे नहि प्रवासक नृपि भोजक भूमि सेहो औना रहल अछि नेना मूल साधन लेल चिचिया रहल अछि अधिरथ गाम-घ'र मे भार्या केँ एकसरि छोड़ि र'न बोन बिनु रथक बौआ रहल अछि ..... कंत नहि सदेह संत ! ने त' पूर्ण पलायन आ ने पूर्ण आंचलिक त्रिशंकु जकाँ वाह रे व्यवस्था तें ने सब गबैछ ... मात्र रीतिक मन्त्र ठकाइते रहलाहें कतेको विद्यापति -मधुप प्रगीते टा मे औनाइत रहलाहें अमर-भानु मूक भेल आरसी- यात्री चलि गेल.. विवशताक तान दैत सगरो वाहवाही मुदा ! के रहल सुनैत जे बुझलक ओहो किछु नहि सिखलक क्रांतिक कोनो आश नहि प्रीति पौरुख केँ उपहास भेंटल विश्वाश नहि ..... भिखारी भीक्षा मंगिते विदा भेल जाहि लुत्ती जरयबाक लेल नेपाली नाओं बदलि लेलक वैह लुत्ती आगि बनला पर की गोपाल दिश तकलक ? लेखनी त' समाजक सम-विषम चित्र विवशताक अंश जौं सोझाँ रहत कंश की मारत नहि दंश तें ने प्रेमक बरोबरि केनिहार रेणु आंचलिक मात्र रहि गेल शेषांश आडम्बर बहारल हम सभ रहि गेलहुँ ... रीतिक मारल .. उपहासक जारल तंत्रक पजारल रीतिक अर्थ बेपर्द सिनेह नहि व्यवस्थाक कुयोग संबलक हठयोग सभ करय उपभोग हमरे घर वियोग ? गाम -गाम घबाह भेल बाजब सुड्डाह भेल ... गंगा-कोशी-बलान कमला पुनपुन-फल्गु के कहय विहारक सोतियो तंत्रक लेल अगम अथाह भेल ... .............................. ९" बरखा रानी " शिव कुमार झा टिल्लू जमशेदपुर रवि शीतल शशि तनमन कलकल बीतल उष्णादिक ग्रीष्मक चरखा गदरल बहकल झहरल पावस आबि गेली मधुयामिनी बरखा सूतल वितान हरियर खहखह नव कोमल कोंपर पुनि महमह सुक्खल धरिणी भेली चहचह सोती कछेर चाली सहसह बेंगक स्वर सुनि नेना सूतल विरहिणी जुआरि वासर बहसल खेतक सीता बिच विहनि जुआन जड़-चेतन घुरि शील प्राण मरुओ नव रज सँ भेल उत्तान कर्म ह'र कान्ह ल' चलल किसान ई संभव त' तखने हेतै सुरनृप जखने सम बरसेतै जहिया इन्द्राणी जेती नैहर देवराज निलय कोपक गहवर बुझू ओहि बरख अकाल परत जलमास जीव नीर बिनु मरत जौं रहसत पूर्वा त' अतिवृष्टिक ड'र कोशिकान्हा लोक करय थरथर करेह-गण्डकीक की हाल कहब कागतक रिलीफ मे बहैत रहब करू नमन सिनेही सभ परानी नहि विंहुसथि पुनि वरखा रानी वसंतो त' तखने हरियर पावसी सकाल झहरथि झरझर व्याघ्र-कमलाक हाल जुनि करब बेहाल गुनि- धुनि जल छोड़ब यौ नेपाल ........................................... १० "शैव्याक विलाप " हा हंत आशक एहेन अंत ! तेसर कोखिक पाँचम मास अहीं केँ छल पुत्रक आश हम त' दुइ बेटीक संग छलहुँ पुलकित शिक्षा आ दीक्षा दुनू विलोकित तखन आर संतानक कोन प्रयोजन छल.... ताहू पर जातिक जांच फेर बेटिए होयत ... सुनिते अहाँक करेज मे लागल आंच हमरा तनया-हन्ता बना देलहुँ फेर सँ रोहिताश्वक आश वाह रे हरि जकर कोखि सँ निकसल छलहुँ ओकरे जाति केँ मारि देलहुँ आश्चर्य त' ई जे .. कलंकित माय भेलीह ... .अहाँ केँ शांति भेंटल .. एक बेर पुनि प्रयास अहाँ सफल भेलहुँ बेटा आयल..वंश बाँचल सगरो कलरव मुदा हमर हरिवासल भंग भ' गेल नैहर मे चुट्टियों नहि मारने छलहुँ एतय संतान हन्ता मात्र बेटाक लेल ओहि बेटाक लेल जे जेहल मे परल अछि एकटा अवलाक शीलहरणक पाप मे आब तेसर नारीक शाप सँ की अहाँ बचि सकब...... अहींक आग्रह पर ओहि कुकर्मी सँ भेंट करय जेहल गेलहुँ कुपात्र सँ निपुत्र नीक मुदा! ओकरा क्षोह नहि ओ त' दुइ बेटी परक बेटा थिक ने तोरा किए जन्म देलहुँ .... प्रत्युत्तर ..विस्मित क' देलक कोनो हम कहने छलियौ .... बेटाक माय कहयबाक स'ख छलौ फल त' भोगय परतौ ... ............................. शिव कुमार झा टिल्लू ११ ३ संताप " पांच बरख में जे किछु देलहुँ , गोटे क्षण में ओ सभ लेलहुँ ह'म आसिनक तीरा बनि झरलहुँ, अहाँ चैती मोदक बनि परलहुँ आत्म उत्ताप " संताप " भ' पसरल देल अनर्गल अधोलांछन सं विश्वाशक तुलसी विहुँसि गेली हे भागि पड़एली सिनेहक प्रांगण सं सुखल माँटि में केहेन पाँक ई सबल मनोरथ केहेन फांक ई गुद्दा संग आँठी फुटि गेलै चहचह फ'र उपटल कानन सं सिनेह नहि पसाही छल प्रियतम दुर्गंधक लुत्ती हुरळक गमगम बिनु वात बसातक ताग टुटल ई ओझरायल बाँचल सभ लमसम शेष भादवक प्रसून सेहन्तित कतेक बरिस अहोरात्रि गमेलहुँ एतेक लचलच नेह कतहु की ? भसकल गदरल देह कतहु की ? प्राण सेहो निकस' सं पहिने हिचकी दैछ " छोड़ू माया " कहि-कहि सकल मनोरथ झांझ बनलि हे हिया केँ तप्पत तेल पकयलहुँ टीस उठय अछि किए अनेरे गुमानक कील सं मर्दित कयलहुँ कहियो जे छल आत्म सुवासी तकरा श्मसानक छाउर बनेलहुँ आबहुँ तं संतोख करू हे हम नीरक लेल नहि आहि मचेलहुँ आब प्राण कंठ में क्षण-क्षण विकल सिनेही स्वाती कण-कण सात जनम धरि करब प्रतीक्षा "संताप" फोरि क' जोरब हिअ मन बिदकल बहुरल स्मृतिक संग कोमल तरबा में फ़ार गरयलहुँ ******************************** II " रौ ललटुनमा " पम्मी प्रिया झा ********************* रौ ललटुनमा टका बचौलें चाउर मे फेंटलें मंगरैल , दिव्य सिया सन सुन्नरि धिआ केँ ग'र मे बन्हलें घैल ... बेटा खातिर घ'र दुमहला बेटीक चार प'र उपटल मरुआ नाति नोरक संग खुददी फँकै छौ पोता चिब्बौ छुच्छे तरुआ आर्य भूमिक लक्ष्मी अक्षोप छथि पठार कहू की शैल ..... ? जीवित पानि नहि देलकौ कहियो अंत काल मे आगि लगेतौ अरजल जमीन केँ बेचि बेचि क' सौंसे गाम केँ दही खुएतौ सभ दिन पानि पिलें तौला मे मुइला पर तमघैल ....... रचनाकार : सुश्री पम्मी प्रिया झा द्वारा श्री विजय चन्द्र झा गोलपहाड़ी टाटा नगर III. पल्लवी मण्डल, गाम- बेरमा, जिला- मधुबनी। अनुभव हमर अप्पन जे किछु हमरा देलैन तहिमे सभसँ महत्वपूर्ण अछि हुनक अप्पन अनुभव हमरा नहि लगैत अछि जीवनमे जीवन हेबाक लेल अनुभवसँ बेसी किछु आर महत्व रखैत अछि अनुभव एकटा बितल सत्य छी जे जीवनकेँ जीवन प्रदान करैत अछि! समुच्चा जिनगी बिताकऽ जे अन्तमे प्राप्त भेल वएह तँ छी अनुभव! "ऐ काजकेँ करैमे ई समस्या आएत।" जे अहाँकेँ पहिनहि सचेत करैए ओ भलेँ अछि एकटा रूपेँ फेलियर मुदा तजुर्बाकेँ समटैत कहैत रहैए- "डरि कऽ नहि केलौं हम किछु सोचने छेलौं जे हएत नीक हएत। अन्तमे बुझलौं, सोचलासँ नहि केलासँ काज हएत!!" विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 86 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १५२ म अंक १५ अप्रैल २०१४ (वर्ष ७ मास ७६ अंक १५२) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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