ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १५५ म अंक ०१ जून २०१४ (वर्ष ७ मास ७८ अंक १५५) ऐ अंकमे अछि:- तोहर कतेक रंग (विहनि कथा संग्रह) जगदानन्द झा ‘मनु’ क्रम १. बेगरता २. उपकार ३. आठ लाखक कार ४. अनाथ ५. अन्तिम जगह ६. जबाड़ भोज ७. अधिकार ८. कुण्ठित मानवता ९. लहाशसँ भरल ट्रेन १०. एक करोड़क दहेज ११. कुम्भ १२. रहस्य १३. असली स्वर्ग १४. भूख १५. आँखिक पानि १६. की भगवती हमर घर एती ? १७. व्यवस्था १८. समय चक्र १९. जीवन २०. गारेन्टी २१. बाबाक हाथी २२. दू लाख महिना २३. अन्न धन २४. पसंदक काज २५. अप्पन नीन २६. मुर्दा २७. जीवन २८. नेनाक छबि २९. एतेक पैघ परिवार ३०. सबसँ खुशी ३१. पूर्वजक मुक्ति ३२. इन्टरब्यू ३३. भूखेल ३४. चयन ३५. मामा ३६. माँछक महिमा ३७. आँखि मुनि ली ३८. दू नम्बरक पाइ ३९. खुशी ४०. चूमान ४१. सपूत ४२. नजरि मिलबए जोगरक ४३. अभिमान ४४. लचार ४५. सादा कागज ४६. सेल्समेन ४७. गृहस्थ धर्म ४८. केँचूआ ४९. प्रेमक बलि ५०. मार बढ़नि तेसरो बेटीए ५१. ममता ५२. अहिवातक सुख ५३. जगह ५४. जुग जुग जीवए ५५. मसोमात ५६. रोटीक स्वाद ५७. तरेगन ५८. नेनाक सनेस ५९. आस्था ६०. महगाइ ६१. बुढ़ारीक डर ६२. पूजा ६३. न्याय ६४. झिमनी बाली ६५. वारेंट ६६. बतीया ६७. सभसँ प्रिय वस्तु ६८. अहाँक मैथिली बड्ड कमजोर अछि ६९. जादूक छड़ी ७०. अनचिन्हार ७१. प्रेम ७२. सनेस ७३. छबि ७४. मनोरथ ७५. मौहक ७६. मौसी ७७. कनियाँ दाइ ७८. चानबाइ ७९. मुँहझौंसा ८०. अगिला जनम ८१. दू वर्ख बड्ड नम्हर है छैक ८२. मोनमे बसै केर रस्ता ८३. नम्हर झोरा ८४. प्रेम दीवानी ८५. नीक ८६. पिआर ८७. पहिल राति ८८. अन्तिम प्रेम ८९. अबूझ ९०. खापरि धिपा कए ९१. पिआस ९२. पुरुषार्थ ९३. बीमारी ९४. पुरखक सोभाब ९५. वर्तमान ९६. डिबिया ९७. मजबूरी ९८. अपवित्र ९९. आँच १००. क्रोध १०१. हारि १०२. वसिअतनामा १०३. भगवान नहि देखैत हेथिन १०४. भगवानकेँ जे नीक लगनि १०५. सार १०६. तास १०७. भगवान कतए रहैत छथि १०८. अरबाचाउर १०९. बड़का बाबू ११०. भगवान सभक गप्प सुने छथिन १११. गाछो सभ गाम जाइ छैक ११२. पाँचमी पास ११३. मनुखक जीवन ११४. बाबीक पिआर ஜ●▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ समर्पण हमर पूज्यनीय माए, जिनक तियाग आ प्रेरणाक फल जे आइ हम छी। हुनक विशाल वट-बृक्ष सन हृदयक हम एकटा छोट विहनि। हुनक श्रीचरण कमलमे ई विहनि कथा संग्रह सादर समर्पित। ஜ●▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ बेगरता “यौ काका, माए बड़ जोड़ दुखीत छै, अस्पतालमे भर्ती करबअ परतै, कने अहाँ दस हजार रुपैयाक व्यबस्था कए दिअ पाँच छह महिनामे हम दए देब।” “तोरासँ तँ किछु नुकाएल छहे नहि जे हमर हालत आइ काल्हि केहन अछि मुदा हाँ भीड़परक जामुनक गाछ जँ बेच दहक तँ हम मैलाम बलासँ गप्प करी।” “बेचक तँ कोनो हर्ज नहि मुदा काका.... ओ जामुनक गाछ तँ कहूना पच्चीस हजारक हेतै।” “हाँ हाँ किएक नहि पच्चीस की तीसो भेट सकैत छैक मुदा ओहि लेल पाँच छह महिनाक चर्च आ इन्तजार दुनू चाही मुदा तोरा एखने बेगरता छ एतेक जल्दी तँ कियो दसो दऽ दिए तँ बड़ छैक।” “एखन एहिना कतौसँ इन्तजाम कए दिअ, गाछ बेचहे परतै तँ बादमे नीक पाइ भेटलापर बेच लेब।” “से तँ बेस मुदा हमरा एखन कोनो दोसर उपाय कहाँ देखा रहल अछि।” “पाइ तँ आइए काल्हिमे चाही।” “हाँ ! भौजी लग किछु सोना होइन तँ....” “सोना तँ सभटा पहिने बाबूक काजमे बिका गेलै। ठीक छै अहाँ साँझ धरि देखियौ, हमहूँ देखै छीऐ नहि किछु हेतै तँ जामुन गाछ तँ छैहे।” भोरे भोर माए केर अस्पतालमे भर्ती भए गेलनि। चारिटा जोन भीड़ परहुक जामुनक गाछ काटैमे लागल। ओमहर दोसर दिस काका अप्पन बैंकमे पन्द्रह हजार रुपैया जमा करबैत। उपकार रग्घू कनियाँ पीलियासँ ग्रस्त अंतिम अवस्थामे दिल्लीक लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालमे आइ दस दिनसँ भर्ती भेल जीवन आ मृत्युक बिच संघर्ष कए रहल छलथि । पीलियाक अधिकता आ कोनो आन कारणे आँखिमे से इन्फेक्शन भए गेलनि। लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक डाक्टर रग्घूसँ कहलकनि जे कनियाँक आँखि लोकनायक जयप्रकाश अस्पतालक बगलेमे आँखिक अस्पताल गुरुनानक आई हॉस्पिटल छैक ओहिठामसँ जाँच करा कए आनै लेल। रग्घू डाक्टरक बात मानि एहि काजमे लागि गेला। लोकनायक आ गुरुनानक दुनू सरकारी अस्पताल छैक तैं खर्चाक बात नहि मुदा रग्घूकेँ बोनि मजुरी रहैन रोज कमाऊ आ रोज खाऊ आ आइ दस दिनसँ अपन बोनि छोरि कनियाँ संगे एहि ठाम अस्पतालमे छथि। दस दिनसँ नव काज नै। जमा पूंजी खत्म। एखन तत्काल लोकनायकसँ गुरुनानक अस्पताल तक जाइमे पन्द्रह रुपैया जइती आ पन्द्रह रुपैया आबिती, तिस रुपैया चाही। हुनका लग छलनि कुल दस रुपैया। ओहि दस रुपैयामे अपन किछु नास्ता भोजन सेहो, कनियाँकेँ तँ अस्पतालेमे भेट जाइ छलनि। ओइ ठामसँ काज करै लेल कतौ जेबो करता ताकी पाइ होइन तँ कमसँ कम दस रुपैया बस भारा चाहीएनि। ई सभ समस्याकेँ जनैत रग्घूक कनियाँ रग्घूसँ कहलनि, “फोन कए कऽ अप्पन भैयासँ दू सए रुपैया माँगि लिअ, काइल्ह-परसु काज कएला बाद पाइ होएत तँ दए देबैन।” रग्घू अपन कनियाँकेँ कन्हापर उठा लोकनायकसँ गुरुनानक अस्पतालकेँ लेल बिदा भए गेला आ चलैत-चलैत बजला, “अहाँ जुनि चिंता करु, रिक्सासँ नीक सबारी हमर पिठक होएत आ रहल ई मुसीबत तँ ई तँ चारि दिन बाद खत्म भए जाएत मुदा केकरो उपकार सधबैमे पूरा जीवनों कम परत।” आठलाखक कार कलुआही जयनगर राजमार्ग, बरखाक समय, पिचक काते-कात खधिया सभमे पानि भड़ल। दीनानाथजी आ हुनक जिगरी दोस्त रामखेलाबनजी, दुनू गोटा अपन-अपन साईकिलपर उज्जर चमचमाईत धोती-कूर्ता पहिर, पान खाइत, मौसम केर आनन्द लैत बतियाइत चलि जाइत रहथि कि पाछुसँ एकटा नव चमचमाईत बड्डका एसी कार दीनानाथजीकेँ उज्जर धोती-कूर्तापर थाल-कादो पड़बैत दनदनाईत आगू निकलि गेलनि। दुनू दोस्तक साईकिल एका-एक रुकल। रामखेलाबनजी हल्ला करैत कारबलाकेँ गरिएनाइ शुरू केलनि। दीनानाथजी, “रहए दियौ दोस्त किएक अपन मुँह खराप करै छी, एसी कारमे बंद ओ कि सुनत, भागि गेल। ओनाहो ओ आठ लाखक कारपर चलैत अछि, हम आठ सएकेँ साईकिलपर छी तँ पानि-कादोक छीत्ता तँ हमरे परत।” अनाथ अस्सी बरखक सोमनाथजी भरल-पुरल संसार छोरि अपन प्राण विशर्जन कए लेला। सभ मनोकामना पूर्ण तैयो सांसारिक मोह मायासँ बान्हल, सभ कियो हुनक मृत देहकेँ चारू कात घेरने, दुखी, व्याकुल, कनैत बिलखैत। दूटा बेटा, दुनूक पुतौह, पोता-पोती सभ संगे, खाली बड़का बेटा मुंबईमे नोकरी करैत । हुनको तीन चारि दिन पहिले सोमनाथजीक खराप स्वास्थक बाबत फोन भए गेल रहनि आ ओ गाम हेतु बिदा भए गेल छथि। आब कोनो घड़ी आबि सकैत छलथि। सोमनाथजी बड़का बेटाक आगमन। हुनका आबैत देरी सभ समांगक कननारोहटमे बिरधि भए गेलनि। हुनकर छोट भाइ हुनका देखते देरी भरि पाँज कए पकरि कनैत, “भईया --- बाबू छोरि चलि गेला हुँ -हुँ ..... आबकेँ देखत ... ” बड़का छोटकाकेँ करेजसँ लगेने हुनक पीठकेँ सिनेहसँ सहलाबैत, “नै रे तूँ किएक कनै छें, तोरा लेल तँ एखन हम जीबैत छीयौक तोहर सभ कीछु । अनाथ तँ आइ हम भए गेलहुँ, माए चारि बर्ख पहिले चलि गेली आ आइ बाबूओ....” अन्तिम जगह फेकना। माए बाऊ की नाम रखलकै गाममे केकरो नहि बुझल आ किंचीत ओकरा अपनों इआद होए की नहि। ओ एहि उपनामसँ गाम भरिमे जानल जाइत छल। खेतिहर मजदूर मुदा जीवन भरि उर्मील बाबूक छोरि दोसरक खेतपर काज नहि कएलक। हुनके जमीनपर जनमल आ हुनक एवं हुनके परिवारकेँ जीवन भरि सेवा करैत एहि संसारसँ बिदा भए गेल। जेकर जन्म भेलैक ओकर मृत्यु निश्चिन्त छैक एहि सत्यकेँ मोन राखि फेकनाक समांग सभ ओकर अन्तिम क्रियाक तैयारीमे लागि गेल। उर्मिल बाबू नोत पुरै लेल दोसर गाम गेल रहथि। गामक सीमामे पएर राखिते मांतर कएकरोसँ फेकनाक मृत्युक समाचार भेट गेलनि। सुनि दुखी मोने घर दिस डेग झटकारलनि । किछु आँगा एला बाद रस्तेमे हुनका फेकनाक शवयात्राक दर्शन भेलनि। फेकनाक समांग सभ हुनका देख ठमैक गेल। उर्मिल बाबू चटे जा कए फेकनाक झाँपल मुँह उघारि ओकरा मुँह देखला आ नम आँखिसँ फेकनाक बेटासँ पूछलथि, "अग्निदाहक व्यबस्था कतए छैक।" “ ठूठी गाछीमे मालीक।” “दूर बुरि कहिंके, कनीक हमरो आबैक इंतजार तँ करै जैतअ, जीवन भरि हमर जमीनपर काज केलक आ आब मुइला बाद ठूठी गाछी.... । चलअ हमर कsलम चलअ, हमर कsलममे नहि जगहक अभाब अछि आ नहि गाछक ओतए दुनूक व्यबस्था छैक।” ई कहैत उर्मिलबाबू आगू-आगू आ सभ हुनक पाछु-पाछु हुनकर कsलम दीस बिदा भए गेल। जबाड़ भोज एकादशाक भोज, गामक डीलर साबकेँ बाबूक एकादशा। डील-डोलसँ सम्पूर्ण जेबाड़केँ नोतल गेल। दसो गामक लोकसभ कियो काठगाड़ीसँ कियो साईकिलसँ कियो पएरे, साँझक छए' बजेसँ लोकक भीर एनाइ शुरू। नोथारी सभ आबि-आबि कऽ बैसति। बैसअकेँ पूर्ण व्यबस्था। करीब पेंतीस हाथक तँ डीलर साबकेँ दलाने छनि आ आबैबला आगुन्तककेँ धियान राखि दलानक आगाँक बारी-झारीकेँ साफ सुथरा कए कऽ एहेन सामियाना लागल जे ओहिमे पाँच सए लोग एक संगे बैस सकैए। व्यबस्थाक कोनो कमी नहि। भोजनसँ पूर्ब सभ व्यबस्था देखि रमणजी स्वंकेँ रोकि नहि सकला आ अपन लऽगमे बैसल सुबोधजीसँ बजला, “कीयौ दोस्त डीलर तँ कोनो तरहक कमी नहि छोरने छथि, एतेकटा सामियाना, एतेक लोककेँ नोतनाइ.........।” सुबोध, “हाँ।” रमण, “जबाड़ नोतनाइ कोनो मामूली गप्प छैक ओहूमे एतेक डील-डोलसँ, खाजा, मूँगबा, पेन्तोआ, रसगुल्ला आ सुनलहुँ हेँ सभ नोथारीकेँ एक-एकटा लोटा सेहो।” सुबोध, “सुनलहुँ तँ हमहुँ इहे सभ।” रमण, “कि अपने की कहै छीयैक, सभटा कतेक खर्चा डीलरकेँ लागि जेतैन।” सुबोध, “हम कोना कहु, हम तँ एखन धरि जबाड़ नहि खुएलहुँ।” रमण, “छोरु अहाँकेँ तँ सदिखन मुँह फुलले रहैए, ओना हमारा हिसाबे आठ-दस लाख रुपैया तँ लगबे करतनि।” सुबोध, “आठ-दस लाख रुपैया डीलरकेँ लेल कोन भारी ओनाहितो हुनकर बरखोकेँ लौलसा छ्लनि जे कहिया बाबू मरथि आ ओ दिन आबि गेलनि तँ खुश तँ हेबे करता, ख़ुशीमे आठ लाख की आ दस लाख की..... ।” अधिकार महानगरमे, आजुक समयानुसार एकल परिवार। सभ कियो अपना अपनामे लागल। एक भाँइ कतौ तँ दोसर कतौ। बाबू गाममे तँ माए किनको एक भाँइ लग। एहने परिवेश आ मकड़जालमे ओझराएल परिवारक एकटा माए अप्पन बेटासँ, “ई की नी० (नी० माएक पोती) काल्हिसँ अस्पतालमे भर्ती छै आ तू सभ हमरा कहबोसँ गेलअ।” बेटा चुप्प, माए आगू, “बूझलीऐ आबैक फुरसैत केकरो लग नहि छैक, कनी एकटा फ़ोनो तँ करबा चाही।” बेटा, “की कहितीयै ? कोनो तरहक सुख तँ हम अहाँ सबहक जीवनमे कहियो दऽ नहि पएलहुँ, दुख कहि अहाँ सबहक मोनकेँ दुखी करैक हमरा कोन अधिकार अछि।” कुण्ठित मानवता घरमे मुरारीजिक कनियाँ अपन आठ बर्खक बेटा आ पाञ्च बर्खक बेटीकेँ कोनोना सम्हारैमे लागल, मुदा हुनक मोनक भावसँ साफ देखा रहल छल जे हुनकर मोन पुर्णतः मुरारीजीपर लागल छलनि, जे की रातिक दस बजला बादो एखन धरि नोकरीसँ घर नहि एलथि। कोनोना दुनू बच्चाकेँ सुतेलनि समयक सुइया सेहो आगू बरहल। दससँ एगारह बाजल। हुनक मोन रूपी समुद्रमे संकाक हिलकोर मरनाइ स्वभाबिक छल। ‘एना तँ एतेक राति पहिले कहियो नहि भेल रहनि।’ सहास करैत घरसँ बाहर निकैल, अपन भैंसुरक अँगना पहुँचली। हुनका सभकेँ कहला बाद शुरू भेल युद्धस्तरपर मुरारीजिक खोज । मुदा सभ मेहनत खाली, मुरारीजिक कोनो पता नहि। हुनक आड़ामिल जाहिठाम ओ काज करैत छलथिसँ ज्ञात भेल जे हुनक छुट्टी तँ साँझु पहर पाँचे बजए भए गेल रहनि आ ओ अपन साईकिलसँ एहिठामसँ बिदा सेहो भए गेल रहथि । तकैत-तकैत भोरे चारि बजे हुनक लहाश पिपरा घाटक सतघारा बला धूरि पर भेटल। देखते मातर सभक हाथ-पएर सुन्न। कनाहोर मचल। बादमे स्थानीय प्रतक्षदर्शीसँ ज्ञात भेल की ओ एहिठाम साँझकेँ साते बजेसँ परल छथि, किछु गोटे हुनका हाथ-पएर मारैत देखि बजितो रहे जे, “बेसी शराब पी कऽ ड्रामा कए रहल अछि।” मुदा हाय रे कुण्ठित मानवता कियोक हुनक बास्तबीक कारण बुझहक प्रयास नहि कएलक, नहि तँ ओ एखन जिबैत रहितथि। हुनका तँ एपेडेंसीक दर्दक बेग रहैन आ समय पर उपचार नहि हेबाक कारणे ओ चलि बसला। लहाशसँ भरल ट्रेन दिल्लीसँ चलल ट्रेन। सेकेंड क्लास स्लीपर आरक्षित डिब्बा। ठसाठस भीड़सँ भरल डिब्बा सभ। एकटा डिब्बाक एक हिस्सामे; तीन व्यक्तिक सीटपर एक पुरुष हुनक स्त्री आ तीनटा ७ सँ १२ बर्खक बच्चा, अर्थात कुल पाँच गोटे बैसल। ई परिवार दिल्लीएसँ आबि रहल छलथि। हुनकर सभक सामनेक सीटपर सेहो पाँच व्यक्ति बैसल आ करीब-करीब सम्पूर्ण डिब्बाक कही तँ सम्पूर्ण ट्रेनक एहने हाल। नाम मात्रक आरक्षित डिब्बा, हालत जेनरलोसँ बत्तर। अपन लक्ष्यक पाँछा करैत ट्रेन बिहारक सीमामे प्रवेश कएलक। ट्रेन बक्सर स्टेशनपर रुकल। तीनटा, २४-२५ सँ ३० बर्खक बिचक बलिस्ट युवक एके संगे भीड़केँ चिड़ैत जबड़दस्ती डिब्बामे प्रवेश कएलक। ओ तीनू सभकेँ ठेलैत धकलैत आगू बढ़ि ओतए जा कए ठार भेल जतए दिल्लीसँ चढ़ल परिवार बैसल छल। ओ तीनू अपनामे हा-हा-ही-ही ठठ्ठा करैत ओतेकदूरक वातावरणकेँ अभद्र बना देलक। ओतबोपर नहि माइन तीनूकेँ तीनू सिगरेट निकाइल कए ओकर नम्हर-नम्हर कश मारै लागल। तीनूक विषाक्त गप्पेकेँ पचेनाइ मुश्किल भए रहल छल ओहिपर आब सिगरेटक लछेएदार धुवाँक जहर, असहनीय होएत। दिल्लीसँ आबिरहल परिवारक पुरुष विनम्र भए बजलनि, “भाइ साहब, सिगरेट बंद करू, एहिठाम स्त्री धिया-पुता सभ छैक एकर धुवाँ सहनाइ असहनीय भs रहल अछि।” तीनू उदण्डमे सँ एकटा, “अरे वाह ! सिगरेट हमर, पाइ हमर, मुँह हमर तेँ हम सभ किएक नहि पीबू ?” दिल्लीसँ आबिरहल परिवारक पुरुष, “मुदा हमरा सभकेँ असुबिधा भs रहल अछि।” “असुबिधा, बेसी असुबिधा अछि तँ अहीँ सभ दोसर डिब्बामे चलि जाउ।” “हम सभ दोसर डिब्बामे किएक चलि जाउ, हमरा सभ लग रिजर्वेशन अछि, बिना रिजर्वेशनक तँ अहाँ सभ छी ओहूपर अनैतिक काज कए रहल छी। ट्रेनमे बीड़ी सिगरेट पीनाइ अपराध छैक।” “अरे वाह ! अपने तँ उकील साब छी (दुनू हाथ जोरैत ) धन्य छी उकीलसाब, अपराध ! हा हा हा .... अपराध ई कोन अपराध भेलैह, अपराध होएत जखन अहाँक सुन्नर कनियाँकेँ लs कए भागि जाइ।” एतबा कहैत तीनूकेँ तीनू भीतर आगू बढ़क प्रयास कएलक आ एहि प्रयासमे किछु धक्का-मुक्की सेहो भेलै। तीनू आगू बढ़ि मर्यादाक सीमासँ बाहर बढ़ैए बला छल की रेलवे पुलिसक दूटा जवान कन्हापर बन्दूक रखने गस्त लगबैत ओहि डिब्बामे आएल। ओकरा देखते मातर तीनू ओहिठामसँ लंकलागि कए भागि गेल। मुदा ओहि डिब्बाक ठसाठस भरल भीड़मेसँ केकरो सहास नहि भेलै जे मात्र तीन गोट कपाटक मनुखसँ बाजि लड़ि कए एकटा नीक परिवार, जेकरा संगे की करीब १७-१८ घंटा पाछूसँ यात्रा कए रहल छल रक्षा करी। आ ओ सहास हेतैक कोना। कियो जीबित होए तहन ने। सभ के सभ लहाश छल। एहन लहाश जे अखबार पढ़ैत अछि, समाचार सुनैत अछि, यात्रा करैत अछि मुदा कोनो अनैतिक बातक पाँछा आबाज नै उठाबैत अछि। एक करोड़क दहेज संजना आ संजयकेँ ब्याहक तैयारीमे जोर-सोरसँ संजनाक बाबूजी आ हुनक सभ परिबार तन-मन-धनसँ लागल। संजना आ संजय दुनू एक्के संगे मेडिकलमे पढ़ै छल ओहि बिच दुनूमे पिआर भेलै आ आब सभक बिचारसँ ब्याह भए रहल छैक। चूकी संजयकेँ पिताजी अप्पन ऑफिसक काजसँ युएसए गेल रहथि आ एहि ठाम हुनक सभटा काज हुनक छोट भेए अर्थात संजयकेँ कक्का कएलनि। आब काल्हि ब्याह तँ आइ गाम एलथि गाम परहक सभ तैयारी देख ओ प्रशन्न भेला। बाते बातमे हुनका ज्ञात भेलनि जे कन्यागत दिससँ पंद्रह लाख रुपैया दहेज सेहो संजयकेँ कक्का ठीक केने छथि आ कन्यागत देबैक लेल सेहो मानि गेल छथि। मानितथिन किएक नहि उच्च कुल-खनदान, वर डॉक्टर,वरक बाबू बड्डका डॉक्टर, गाममे सए बीघा खेत, बेनीपट्टीमे शहरक बीचो-बिच चारि बीघाक घड़ाड़ी । मुदा संजयक बाबूकेँ ई बातसँ किएक नहि जानि खुशी नहि भेलन्हि । ओ तुरंत ड्रायबरकेँ कहि गाड़ी निकलबा कन्यागत ओहिठाम पहुँचलाह। काल्हि ब्याह आ आइ वरक बाबू उपस्थीत, मोनक संकाकेँ नुकबैत कन्यागत दिससँ कन्याँक बाबू सहीत सभ दासोदास उपस्थीत। पानि, चाह शरबत, नास्ता, पंखा सभ प्रस्तुत कएल गेल । संजयक बाबू ओहि सभकेँ नकारैत दू टूक बात संजनाक बाबूसँ, “समधि कनी हमरा अपनेसँ एकांतमे गप्प करैक अछि।” हुनक संकेत पाबि सभ गोते ओहि ठामसँ हटि गेलाह मुदा सभक मोनमे अंदेसा भरल, कतेको गोटा दलानक कोंटासँ सुनैक चेष्टामे सेहो । सभकेँ गेला बाद संजयक बाबू संजनाक बाबूसँ, “समधि! हम तँ एखने दू घंटा पहिने युएसएसँ एलहुँ क्षमा करब पहिने समाय नहि निकालि पएलहुँ मुदा ई की सुनलहुँ अपने पन्द्रह लाख रुपैया दहेजमे दए रहल छी।” संजनाक बाबू दुनू हाथ जोरने, “हाँ समधि जतेक अपनेक सभक मांग रहनि हम अबस्य पूरा करबनि।” संजयक बाबू, “जखन मांगेक गप्प छैक तँ हमरा एक करोड़ रुपैया चाही।” ई सुनिते संजनाक बाबूक आँखिक आँगा अन्हार भए गेलनि, आ आनो जे सुनलक सेहो दांते आँगुर कटलक। संजनाक बाबू पुर्बबत दुनू हाथ जोड़ने, “एहेन बात नहि कहु समधि पंद्रह लाख जोड़ैमे तँ असमर्थ छलहुँ आ ई एक करोड़ तँ हम अपनों बीका कए नहि आनि सकै छी।” कहैत निचा झुकलनि शाइद संजयक बाबूक पएर छुबैक चेष्टामे मुदा निचा झुकैसँ पहिले संजयक बाबू हुनका उठा अपन करेजासँ लगा, “ई की पाप दए रहल छी, पएर तँ हमरा अपनेक पकरबा चाही जे अपने अपन बेटी दए रहल छी आ रहल पाइ तँ हमरा एक्को रुपैया नहि चाही भगबानक कृपासँ हुनक देल सभ किछु अछि। ई एक करोड़क बात तकरा क्षमा करब ओ छ्नीक ठीठोली छल, जखन माँगने पंद्रह लाख भेटत तँ एक करोड़ किएक नहि जे आगू कोनो काजो नहि करअ परेए। आ की अपनेक बेटी आ हमर पुतहु एक करोड़सँ कमकेँ छथि हा हा हा .... !” एका एक चारू कात नोराएल आँखिसँ ड़बड़बेल खुशीक ठहाका पसरए लागल। कुम्भ दीनानाथ आ हुनक कनियाँक गप्प, “सुनै छीयैक गामक बहुत रास लोग कल्हि कुम्भ असनान लेल जा रहल छैक।” “हुँ।” “चलू ने अप्पनो सभ एहि बेर कुम्भ भए आबी।” “नहि, हम तँ नहि जाएब अहाँकेँ मोन होइए तँ चलि जाउ हम व्यबस्था कए दए छी।” “अहाँ किएक नहि जाएब।” “हमर तँ कुम्भ साक्षात हमर घरेमे छथि, हिनका छोरि कए हम कोना जा सकैत छी।” दिनानाथजी अप्पन ९५-१०० बर्खक माए बाबूक तन-मनसँ सेवामे लागल छथि । रहस्य बाबा-बाबीक ब्याहक चालीसम बर्खगांठ। दुनू गोटे अप्पन सम्पूर्ण परिवारक बिच घेरएल बैसल। चारूकात एकटा खुशीक वातावरण बनल। सभक मुँहपर हँसी, खुशी आ प्रशन्ता झलकि रहल छल। बाबीक पंद्रह बर्खक पोती, बाबीक गरदनिपर पाछूसँ लटकि कए झुलति पुछलक, “बाबी एकटा गप्प पुछू।” बाबी, “ हाँ पूछै।” पोती, “बाबा-बाबी हम अहाँ दुनूकेँ कहियो झगड़ा करति नहि देखलहुँ, एकर की रहस्य छैक।” बाबी लजा कए अपन पोतीकेँ कन्हासँ उतारैत, “चल पगली, एकरा ई की फुरा गेलै।” बाबीक छोटका बेटा, “नहि माए ई तँ हमरो बुझैक अछि, ओनाहितो हमर नव-नव ब्याह भेलए ई मन्त्र तँ चाहबे करी।” बाबी, “चल निर्लज, सभ एक्के रंगक भए गेलै, अपन बाबूसँ पूछै हुनका सभ बुझल छनि।” छोटका बेटा बाबूसँ, “हाँ बाबू अहीँ कहु नऽ अपन सफल विवाहीक जीवनक रहस्य, हमहूँ अहाँ दुनूमे कहियो झगडा नहि देखलहुँ, ई मन्त्र हमरो दिअ नऽ ( अपन कनियाँ दिस देख कऽ) देखू ने निर्मल तँ सदिखन हमरासँ लड़िते रहैत अछि।” बाबा, एकटा नमहर साँस लैत जेना अतीतकेँ देखैक प्रयास कए रहल छलथि। छोटकाक माथ पर सिनेहसँ हाथ रखैत बजला, “एकरा कियो झगडा कहैत छैक? अहाँ दुनूमे जे सिनेह अछि ओहिमे किछु नोक-झोंक भेनाइ सेहो आवश्यक छैक, जेना भोजनमे चटनी, जीवनमे सभ पक्षक अपन-अपन महत्व छैक मुदा हाँ ई मात्र नोक-झोंक तक रहवा चाहि झगड़ा नहि, नहि तँ एहिसँ आगू जीवन नर्क भए जाइत छैक। पति पत्नीक बिचक आपसी सम्बन्ध नीक अछि तँ स्वर्गक कोनो जरुरी नहि आ यदि सम्बन्ध नीक नहि अछि तँ नर्कक कोनो आवश्यकता नहि ओहि अवस्थामे ई जीवने नर्क अछि।” सभ कियो एकदम चूप एकाग्रतासँ हुनक गप्प सुनैत। चुप्पीकेँ तोडैत बाबा आगू बजलाह, “रहल हमर आ तोहर मएकेँ बिचक सम्बन्ध तँ ई बहुत पुरान गप्प छैक, जखन हमर दुनूकेँ ब्याह भेल आ हम दुनू एक दोसरकेँ पहिल बेर देखलहुँ तखने हम तोहर मएसँ वचन लेलहुँ जे जखन हमर मोन तमसए तँ ओ नहि तमसेती आ जखन हुनकर मोन तमसेतनि तखन हम नहि तमसाएब। बस ओ दिन आ आइ धरि हमरा दुनूकेँ बिच नोक-झोंक भेल झगड़ा कहियो नहि।” असली स्वर्ग विज्ञापन, मिडिया टीभी चेनलसँ दूर मिथिलाक पावन धरतीक एकटा गामक पोखरि भिरपर कुटीमे रहनीहार बाबा। गामक नजरिमे ओ पागल मुदा हुनक नजरिमे ई दुनियाँ पागल। एक दिन हुनकर दर्शनक सौभाग्य भेटल। समान्य देखाए बला ओहि बाबाक भीतर हमरा आलोकिक शक्तिक अनुभूति भेल। अपन मोनक जिज्ञासा शांत करैक लेल हम हुनकासँ एकटा प्रश्न पुछलहुँ, “बाबा ई स्वर्ग की छैक?” बाबा मुस्काइत, “ई तोहर जिज्ञासा छऽ की हमर परीक्षा?” “क्षमा करब बाबा, ई अहाँक परीक्षा नहि अछि। जखन तखन सभक मुँहसँ सुनैत छी फल्लाँ काज करब तँ स्वर्ग जाएब फल्लाँ काज करब तँ नर्क जाएब मुदा हम आइ धरि नहि बुझि पेलहुँ जे स्वर्ग की अछि। हमरा विश्वास अछि जे अपनेक उत्तरसँ हमर मोनक जिज्ञासा अवश्य शांत होएत।” बाबा, “स्वर्ग नामक कोनो जगह वा चीज नहि छैक, (किछु काल शांत रहला बाद) ई मात्र अहाँक मोनक सुखद अनुभूति अछि। जाहिखन अहाँ दुख आ सुखकेँ अबस्थासँ उपर भऽ जाइ छी, अर्थात दुखसँ दुखी नहि आ सुखसँ सुखी नहि। जाहिखन अहाँ समुच्चा चर अचर अस्तित्वसँ प्रेम करए लगै छी, काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, घृणा आदि बिकारसँ अपनाकेँ दूर रखैमे समर्थ भए जाइ छी। डर अहाँक भीतरसँ खत्म भऽ जाइए। सदिखन आनन्दक अबस्थामे रहैत छी..... इहे स्वर्ग अछि।” “कि ई सभ सम्भब छैक।” “सम्भब तँ छैक मुदा बड़ कठीन। सभक बूते ई नहि भए सकै छैक। एतेक कठीन छै जे लोककेँ असम्भब जकाँ बुझाइत छै। कियो एहिपर विश्वास करै लेल तैयार नहि अछि आ एकरा जीवनसँ फराक मुइला बादक क्रिया बता देल गेल छैक।” भूख ब्रेकिंग न्यूज। हिंदी सिनेमाक मशहूर अदाकारा ज०ख० फाँसी लगा कए आत्महत्या कए लेली। टीभी देखैत हमर आठ बर्खक भतीजाक नेनपनसँ भरल प्रश्न, “बड़का बाबू ई आत्महत्या की होइ छैक।” “बेटा, आत्महत्या अर्थात अपन जीवनकेँ कोनो ने कोनो बिधिसँ खत्म केनाइ।” “मुदा बड़का बाबू, लोक अपन जीवनकेँ खतमे किएक करै छै ?” “बेटा, जखन कोनो मनुखक भूख एतेक बढ़ी जाइ छैक की ओकरा शांत नहि कएल जा सकै तँ ओकर परिणति अंततः आत्महत्याक रूपमे होइ छैक।” मासूम अबोध नेनाक समक्ष हम ई फिलोसफी दए तँ देलहुँ मुदा एकरा ओ अबोध की बुझत। जखन मशहूर अदाकारा ज०ख० नहि बुझि पएलीह। हमहूँ बुझलहुँ कतए बस बेलूनक हबा जकाँ ई शव्द कतहुँसँ हमर मुँहसँ बहर भऽ गेल। आँखिक पानि “यौ गृहथ बचियाक दुरागमन छैक दू हजार रुपैया पैंच दिअ अगहनक कटनीपर आपस कऽ देब।” “हाँ खगता उत्तर मधुरगर मधुरगर बोल आ काज निकैल गेलापर गृहथ दुश्मन। परसु रमेशराकेँ कहलिऐ कनी दू दिनक बोइनिपर रहि जो, बारी झारी साफ करैक अछि तँ मुँह बना कऽ कहलक, मालिकक ओहिठाम काज कए रहल छी आ एखन मालिक कतए चलि गेला।” “बीतल बर्ख एहि बचियाक ब्याहपर मालिक दस हजार रुपैयाक मदद केने रहथिन, बिना आपसिक। आब अहीँ कहियौ, हुनकर बोइनि छोरि कऽ कतौ दोसरठाम काज कोना करतै, बोइनि तँ कतौ करहेक छै, तँ हुनकर ओहिठाम किएक नहि। एतबो आँखिमे पानि नहि रखबै तँ मुइला बाद उपर बलाकेँ की मुँह देखेबै।” की भगवती हमर घर एती ? मोहंती बाबा। भरि गामक बाबा। भरि गामक लोक हुनका बाबा कहि कए संबोधित करैत छनि जेकर कारण छैक हुनकर बएस । पनचानबे बर्खक मोहंती बाबा अपन कद काठी आ डीलडोलसँ एखनो अपन उम्रकेँ पछुआबैत, लाठी टेक कए गामक दू चक्कर लगा कए आबि जाइ छथि मुदा अपन गाम भगवतीक दर्शन करैक हेतु कहियो नहि जाइ छथि। गाममे बनल विशाल भगवतीक मंदिर, भगवती बड्ड जागरन्त चारू कातक बीस गाममे भगवतीक महिमाक चर्चा छन्हि। गामक नियमकेँ हिसाबे गामक सभ कियो दिनमे एक ने एक बेर भगवती घर भगवतीक दर्शन हेतु अबश्य जाइ जेता। गर्मीक छुट्टीमे बाबाक पोता संजय जे की दिल्लीमे कोनो प्रतिष्ठित काज करै छला, गर्मी बिताबै आ आम खेबाक इक्छासँ गाम एला। ओहो गामक परम्पराक निर्वाह करैत भगवतीक दर्शन कए कऽ एला। एला बाद दलानपर बैसल बाबा संगे गप सप होइत रहलै। गपक बिच संजय बाबासँ पुछलनि, “बाबा अहाँ भगवती घर नहि जाइ छियैक।” बाबा, “नहि।” संजय, “किएक।” बाबा, “हौ बौआ, भगवती घर तँ सभ कियोक जाइत अछि, मुदा भगवती केकरो-केकरो घर जाइ छथिन। हम अपन मन आ स्वभाबकेँ एहेन बनाबैक चेष्टामे छी जे भगवती हमर घर आबैथि।” संजय बाबाक मुँहसँ एहेन दार्शनिक गप सुनि अबाक रहिगेल आ सोचय लागल जे की ओकर मन आ स्वभाब एहेन छैक जे कहियो भगवती ओकर घर एती? आ ओकर अबाक रहैक कारण रहै शाइद नहि। व्यबस्था गामक बाहर, एक कातमे दूटा फूसक घर। एकटा घरक बाहर, एकटा बुढ़ अप्पन कुशल हाथसँ लाल पियर बांसक खपचनीकेँ ढाकी सूपक आकार देबैमे लागल। शहरी बेश भूषामे एकटा पाँच बर्खक नेना कतौसँ दौरल आबि चूप चाप कनी काल धरि निघुरि कए अप्पन ठेंहुनपर हाथ रखने देखैत रहल, ढाकी-सूप कोना कए बनि रहल छैक। अनचोके बाजि उठल, “बाबा अहाँक लग कोल्ड ड्रिंक अछि।” “ई कोल्ड ड्रिंक की है छै।” “अरे बाबा ! लिम्का पेप्सी माजा नहि बुझै छी।” “एहि नामक तँ कोनो धिया पुता हमरा घरमे नहि अछि।” ओ नेना बुढ़क एहि तरहक गप्प सुनि चूप चाप कनी काल धरि हुनकर मुँह दिस देखैत आँगा बाजल, “पानि।” “हाँ पानि तँ अछि मुदा अहाँ हमर हाथक पानि कोना पीब, देखैमे तँ कोनो नीक घरक नेना लगै छी।” “किएक अहाँ हाथक पानि नीक नहि होइए।” “नहि बौआ, अहाँ हमरा एहन छोट लोकक हाथसँ पानि कोना पीब जँ अहाँक माए बाबू बुझि जेता तँ हमरा खातीर अहुँकेँ बात सुनअ परत।” ओ नेना हुनक एहि तरहक गप्प सुनि अबाक किएक तँ जाहि शहरसँ ओ आएल छल ओहिठाम एहि तरहक कोनो व्यबस्था नहि छलै। ताबएतमे ओहि बच्चाक माए बाबू आबि गेला। नेनाक बाबू ओहि बुढ़केँ पाएर छू गोर लगलनि। बुढ़ मुँह उठा कए धियानसँ देखै छथि तँ हुनक बेटा मोहन जे सात बर्ख पहिने गाम छोरि शहर चलि गेल रहे। समय चक्र किशुनक विशाल ड्राइंग रूम। तीन बीएचके फ्लेटमे आलीशान २५० वर्गफूटक हॉल नूमा ड्राइंग रूम ओहिमे ४८ इंचक सोनीक एलसीडी टीवी लागल। डीस टीवी, म्यूजिक प्लेयर, फर्सपर जड़ीदार लाल रंगक विदेशी क़ालीन। दवाल सभपर मनभावन मधुबनी पेंटिंग घरक सोभामे चारि चान लगाबैत। मोट- मोट गद्दाक बनल मखमली सोफा सेट, ओहिपर किशुनक मामा-मामी ओकर वेसबरीसँ बाट जोहैत, जे कखन ओ आएत आ ओकरासँ दूटा गप्प कए अपन समस्याक समाधन करी। हुनक दुनू प्राणीक दू घंटाक प्रतीक्षा बाद किशुन, बोगला सन उज्जर चमचमाइत बरका कारसँ आएल। घरक डोरवेल बजेलक घर खुजल। भीतर प्रवेश कएलक। भीतर पएर धरैत देरी ओकर नजैर अपन मामा- मामीपर परलैक। तुरन्त आगू बढ़ि हुनकर दुनूकेँ पएर छुबि आशीर्वाद लेलक। हाल समाचार पुछैत अपनो एकटा सोफापर बैसैत, “कखन एलीऐ।” मामी, “इहे करीब दू घंटा भएले।” किशुन अपन कनियाँकेँ आवाज़ दैत, “यै, सुनैछीयै ! किछु चाह पानि नास्ता देलियैन्हे की?” मामा, “ओसभ भए गेलै, बस अहाँसँ किछु जरूरी गप्प करैक छल।” किशुन, “हाँ हाँ कहु ने, हमर सोभाग्य जे अपनेक किछु सेबाक अबसर भेटत।” मामा कनखीसँ इसारा कए मामीक दिस देखलाह, आ ओकर बाद मामी, “बौआ ! अहाँ तँ सभटा बुझिते छीयै जे मामाक नोकरीक आइ-काल्हि की दशा छनि। कएखनो छनि तँ कएखनो नहि। रहलो उत्तर ई सात- आठ हजार रुपैया महिनाक नोकरीसँ की है छैक ...... (कनी काल चूप, आगू सोचैत ) अहाँकेँ तँ बुझले अछि, बरुण आइ आइ टीक प्रवेश परीक्षा पास कए लेलक। आब ओकर एडमिशनकेँ आ किताब आदी लेल दू लाख रुपैया चाहीऐ। हिनका अपना लग तँ एको रुपैया नहि छनि, आ अहाँ तँ बुझिते छियै दियाद बाद कएकराकेँ दै छैक। बहुत आशा लए कए अहाँ लग एलहुँहेँ, अहाँ किछु रुपैयाक व्यवस्था कए देबै तँ छौंड़ाक जिनगी बनि जेतै।” सभ चूप्प। पिन ड्राप साइलेन्श। किशुन अपन आँखिसँ चश्मा निकालि दुनू आँखिक कोन कए सभसँ नूका कए पोछ्लक। कियो ओकर आँखिक कोनसँ खसैत नोरकेँ नहि देखने हेतै मुदा ओकर दुनू आँखिक कोनसँ नोरक दू दू टा मोती सरैक कए ओकर रुमालमे हड़ा गेलै। पुनः अपन चश्मा पहिरलक आ अपन आँखिक नोरक पाँछाँ करैत बीस बर्ख पाछू चलि गेल। जखन किशुनक माए बाबू आ मामा मामी एके झोपड़पट्टीक एके गलीमे रहैत छला। एक दिन ! महिनाक अन्त तक ओकर बाबूक हाथ खाली भए जेबाक कारण घरमे अन्नक अभाबे ओ अपन माएकेँ कहलापर एहि मामीसँ जा कहने रहनि दू सेर चौर देबएक लेल। मामी चौर तँ देलखिन मुदा ओहिसँ पहिने ठोर चिब्बैत कहने रहथिन, “की बाप पाइ नहि दए कऽ गेलाह, एहिठाम कोन बखाड़ी लागल छैक।” ओ गप्प किशन आइ धरि नहि बिसरल। आ ओकर आँखिक नोरक कारण इहे गप्प छल। ओहि गप्पक कारणे आइ ओ झोपरपट्टीसँ निकैल एकटा नव दुनियाँमे पएर रखलक। पुनः अपनाकेँ वर्तमानमे आनैत किशन चट्टे अपन कोटक जेबीसँ चैक बुक निकालि, ओहिपर दू लाख रुपैया भरि मामाक दिस बढ़ेलक। मामा चैक लैत, “बौआ अहाँक ई उपकार हम कहियो नहि बिसरब, एखन तँ नहि चारि बर्खक बाद वरुणक नोकरी लगलापर सभसँ पहिने अहींक पाइ आपस करत।” किशन , “की मामा अहुँ लज्जित करै छी ई सभ कएकर छैक, की वरुण हमर भाइ नहि अछि। ई हमरा दिससँ एकटा छोट भेंट अछि। एकर चिंता अहाँ नहि करब।” जीवन “कि सदिखन मुँह लटकोने रहै छी। खुस रहुँ, जीवनकेँ नीकसँ जीबू।” “आब यमराज हमर केबार खटखटा रहल छथि एहि अवस्थामे बेसी जीबे कए की करब।” “तँ मइरे कए की कए लेब, जतेक दिन छी जीवनकेँ जीवन जकाँ जिबू।” गारेन्टी सुजीतजी मोटर साइकिल ड्राइव करैत पाँछा प्रशांत जीकेँ बैसोने। मिशर जीकँ दलानपर रुक्ला। आँगा-आँगा सुजीतजी हुनक पाछू प्रशांतजी, मिशरजी लग जा सुमितजी, “नमस्कार मिशरजी, हम कहने रही ने आयुर्वेदसँ समंधित, माँजीक गठियाक दवाइ । हिनकासँ मिलु ई प्रशांतजी, हमर सीनियर छथि । अपनेक सभ गप्पक उचीत उत्तर देता।” मिशरजी, “नमस्कार- नमस्कार (कुर्सी दिस इशारा कए) बैसल जाउ।” तीनु गोटा कुर्सी ग्रहण कएला, तदुपरांत मिशरजी, “हाँ कहियौ।” प्रशांतजी, “हम एकगोट आयुर्वेदिक कम्पनीसँ जुड़ल छी आ हमरा सभ लग किछु असाध्य रोग जेना मधुमेह, गठिया, बी०पी०, हार्ड प्रोब्लेम आदिक सफल उपचार अछि। सुजीत भाइसँ ज्ञात भेल अपनेक माए गठिया ---।” मिशरजी, प्रशांत जीक गप्प बिच्चेमे रोकैत, “हाँ, से सभ ठीके पहिले कहु गारेन्टी छैक।” प्रशांतजी, “गारेन्टी ! गारेन्टी कोना कहु मुदा ठीक होबाक सए टका विस्वास छैक।” मिशरजी, “हाँ इहे, जखन गारेन्टीए नहि तखन हम अपनेक गप्प कोना मानव।” प्रशांतजी, “सुनू-सुनू, हमर सभक पद्धति सुनला वाद अहाँ अपनो बुझबै आ मानबै जे गठियाक उपचार संभव छैक।” मिशरजी, “कोना मानू, अपने गारेन्टी देबै तहन ने मानब। आइ बिस बरखसँ कोनो डॉक्टर कोनो अस्पतालसँ ठीक नहि भेलै, अहुँ गारेन्टी नहिए लए रहल छी आ अहीँ की दुनियाँक कोनो डॉक्टर गारेन्टी नहि लएत तखन कोना मानू।” प्रशांतजी, “देखू ई गप्प ठीके अछि जे दुनियाँक कोनो डॉक्टर गारेन्टी नहि लेत किएक तँ दुनियाँक कोनो डॉक्टर लग एकर इलाह नहि छैक। गठिया की भेलै ?.... अप्पन ठेहुनक दुनू हड्डीकेँ जोड़क बीचमे एकटा माँसुक टुकड़ा होइ छैक जेकरा कार्टिलेज कहल जाइ छैक आ ओहि कार्टिलेजकेँ ठीक आ तन्दुरुस्त राखैक लेल, हम जे भोजन खाए छी ओहि भोजनसँ एकटा ग्रीस जकाँ चिपचिपा पदार्थ निकलै छैक जेकरा साइनोवियस फ्लूड कहल जाइ छैक। भोजनमे पोष्टिक तत्वक कमी, प्रदुषण, बएसकेँ बेसी भेलासँ, आन आन कतेको कारणे अपन देहमे साइनोवियस फ्लूड बननाइ बन भए जाइ छै। जखने साइनोवियस फ्लूड अर्थात चिपचिपा पदार्थ ग्रीस खत्म भेल तखने दुनू हड्डीक बिचमे दबा पिचा कए मासुक टुकड़ा अर्थात कार्टिलेज कइट जाइ छैक। दुनू हड्डीक बिचमे गएप भए जाइ छैक आ दुनू हड्डीमे हड्डी घसेलासँ असहाय दर्द होइत छैक। कतेक गोटेकेँ तँ चलला उत्तर हड्डीमे हड्डी घसेलासँ आवाज सेहो होइत छै। आब देखियौ एहिठाम डॉक्टर कहैत अछि जे साइनोवियस फ्लूड अर्थात चिपचिपा पधार्थ ग्रीस बननाइ बंद तँ बंद एकर कोनो इलाज नहि, बेसीसँ बेसी जीवन भरि दर्द निवारक गोटी खाए कए दर्दसँ बँचि सकै छी। बेसी दर्द निवारक दवाई खेलासँ हार्ड आ किडनीपर से खराबअसर। आब देखियौ, हमरा सभ लग अछि समुद्री जड़ी बूटीसँ निर्मित -------, आ जिनक शरीरमे एक्को आना साइनोवियस फ्लूड बचल अछि एकर नियमित सेवन कएला बाद हुनक शरीरमे ई साइनोवियस फ्लूड बनेनाइ शुरू करत आ जखने साइनोवियस फ्लूड बननाइ शुरू होएत, मासुक टुकड़ा अर्थात कार्टिलेज पुनः मरम्मत भेनाइ आरम्भ भए जाएत। शरीरमे वर्तमान साइनोवियस फ्लूडकेँ उपस्थित मात्राक हिसाबे ६ महिनासँ एक सबा बर्खक अधिकतम सेवन कएला बाद कोनो व्यक्ति अपन पएरपर चलएटा नहि दौड़ए लगता।” एतेक बड़का गठियापर व्याख्यान सुनि मिशरजी चुप्प, चुप्पी तोरैत, “हूँ ! सभ ठीक मुदा गारेन्टी....” प्रशांतजी, “अच्छा लिअ हम अहाँक माए केर ठीक होबैक गारेन्टी लै छी, अहाँक माए हमर माए। अहाँ एक सबा बरख हमर दवाइ दियौन, ठीक नहि भेलनि तँ पाइ आपिस।” आब तँ मिशरजीक बोल बन, जेबीसँ मोबाईल निकाइल बामे हाथे कएकटा न० लगेला बाद, “यौ सभ ठीक, आब तँ अहाँ गारेन्टीयो लए लेलहुँ मुदा एखन हमर छोटका भाइ फोन नहि उठा रहल अछि बादमे ओकरासँ गप्प कएला बाद हम कहब किएक तँ गप्प एक दू महिनाक नहि छै एक सबा बर्खक छै।” एतवामे दलानक कोन्टासँ मिशरजीकेँ कनियाँक चूड़ीकेँ खनखनाइक आवाज मिशरजी सुनलनि। मिशरजी घुमि कए देखला उत्तर प्रशांतजीसँ, “कनीक अबै छी।” कहैत उठि कनियाँ दिस चलि गेला। मिशर जीसँ हुनक कनियाँ, “हम सभटा सुनलहुँ, ई तँ ठीके अचूक इलाज छै आ अहाँ बुझिते छीऐ जे हमरो माए गठियासँ परेसान छै। अहाँ अपन माए लेल ली की नै हमरा नै बुझल मुदा काल्हि चिन्टू गाम जा रहल छै, ६ महिनाक दवाइ लए कऽ चिन्टू दिया हमरा माए लेल पठा दियौ बांकी ६ महिना बाद फेरो कियो गाम जेबे करतै तखन।” कनियाँक गप्प सुनि मिशरजी आपस आबि कुर्सीपर बैसैत, “ठीक सर, आब अपने एतेक कहैत छी तँ ६ महिनाक दवाइ हमरा दए दिअ।” प्रशांतजी, “ठीक छैक परशु सुजीतजी अहाँकेँ दए जेता।” मिशरजी, “परशु नहि हमरा काल्हि भोरे चाही किएक तँ ई हमर माए लेल नहि हमर सासु लेल छन्हि आ काल्हि भोरे १० बजे हमर सार चिन्टू गाम जा रहल छथि। तेँ तँ एक्के बेर ६ महीनाक दवाइ मंगा रहल छी।” प्रशांतजी, “कोनो बात नै काल्हि भोरे ९ बजे तक मिल जाएत। सुजीत जीकेँ पाइ दए दियौन्ह मुदा हाँ गएरेन्टी नहि भेटत।” मिशरजी, “किएक।” प्रशांतजी, “ई गारेन्टी अहाँक माए लेल छल, किएक तँ अहाँक माए हमर माए दोसर ओ हमर आँखिक सोझाँ छथि हुनका हम देखो सकै छीऐन्हि, ठीक भेली की नहि मुदा अहाँक सासु... ।” मिशर जी, जेबीसँ पाइ निकालि कए दैत, “यौ प्रशांतजी अहुँ की गप्प करै छी अहाँ कहिदेलहुँ हमरा बिस्वाश भऽ गेल ई पाइ राखू मुदा हाँ भोरे ९ बजे धरि दबाइ भेट जेबा चाही नहि तँ अपने बुझिते छियै कनियाँ सार सासु।” प्रशांतजी, “हाँ अवस्य, (उठैत) अच्छा आब आज्ञा दिअ।” दुनू गोटे बिदा भेला। मोटर साईकिलपर बैसला बाद बैसले- बैसल सुजीतजी, “प्रशांत भाइ देखलीएनि, माए लेल गारेन्टी चाही भाइ सभक सहमति चाही आ सासु नामे चट्टे ६ महिनाक पाइ निकैल गेलनि।” बाबाक हाथी दिल्लीक कनाट प्लेशक प्रशिद्ध कॉफी हॉउसक आँगन। लूकझिक साँझ मुदा महानगरीय बिजलीक दूधसन इजोतसँ कॉफी हॉउसक आँगन चमचमाइत। एकटा गोल टेबुलक चारू कात राखल चारिटा कुर्सीमे सँ तीनटापर अ०,ब० आ स० बैसल गप्प करैत संगे कॉफीक चुस्कीक आनन्द सेहो लैत। अ० आ ब०केँ बिचक बात-चितमे गरमाहट आबि गेलै। अ०, “रहए दियौ अहाँक बूते नहि होएत।” ब०, “हाँ ई की कहलीयै हमरा बूते नहि होएत, अहाँ बुझिते कि छियै हमरा बारेमे।” अ०, “हम अहाँक बारेमे बेसी नहि बुझै छी परञ्च ई नै .......!” ब०, “हे आगु जुनि किछु बाजु, अहाँकेँ नहि बुझल जे अहाँक सोंझा के बैसल अछि ? हमर बाबाकेँ नअटा बखाड़ी रहनि, दलानपर सदिखन एकटा हाथी बान्हल रहैत छलनि। हमर परबाबाकेँ चालीस गामक मौजे छलनि। हमर मामा एखनो बिहारक राजदरवारमे तैनात छथि। हम स्वम एहिठाम योगाक क्लास राष्टपतिकेँ दै छीयनि।” अ० आ ब०क गप्प बहुते देरीसँ चुपचाप सुनैत स० अपन कॉफीक घूंट खत्म कएला बाद खाली कपकेँ टेबुलपर रखैत, “यौ हम आब चली, अहाँक दुनूकेँ हाइक्लासक गप्प हमरा नहि पचि रहल अछि, हम तँ बस एतबे बुझै छी जे हमर अहाँक बाबू-बाबा आ स्वयं हमरा सभमे एतेक बूता होइत तँ हम सभ एना दिल्लीमे १५-२० हजारक नोकरी कए कऽ आ भराक मकानमे जीवन बिता कए अपन-अपन जिनगीकेँ नरकमय नहि बनाबितहुँ। ओनाहितो आजुक समयमे हाथी भिखमंगा रखै छैक आ दोसर राजमे पेट ओ पोसैत अछि जेकरा अपन घरमे पेट नहि भरि रहल छैक।” स०केँ एकटुक तित मुदा सत्य गप्प सुनि दुनूक मुँह चूप। स० सेहो ई गप्प बजैत हिलैत डुलैत निसाक सरूरमे ओतएसँ बिदा भए गेल। मुदा ओकर बगलक टेबुलपर बैसल हमरा स०केँ ई गप्प सए टका सत्य लागल। दू लाख महिना माए तामससँ लाल भेल, “मार कपर जडुआ, बी०ए० एहि दुआरे करेलीयहुँ जे पढ़ि लिख कऽ गाममे महिस पोसेँ। देखही ललनमाकेँ मुम्बईमे नोकरी करै छै, भोकना दिल्लीमे नोट छाइप रहल छै, ओ रमेशरा कलकत्तामे डिलर बनि गेलै आ ई एतेक पढ़ि लिख कए कहैत अछि गाममे रहत, रहत तँ रहत ओहिपर महिस पोसत।” “माए सुनू, गाम आब ओ गाम नहि रहलै आ परदेश परदेशे होइ छै, ओहिठाम कतबो कियो रहि जेए अप्पन नहि होइ छै। जाहिखन केकरो अप्पन धरतीपर गुजर नहि होइ छै तखने परदेश जाइए।” “बेस से तँ ठीक मुदा ई महिस ? गामपर रहबअ तँ महिसे पोसबअ?” “माए एहिमे खरापीए की छै आ देखू दिल्ली मुम्बई जाएब किएक पाइ लेल, कतेक तँ पन्द्रह बीस हजारक नोकरी, खाइत पीबैत बचत कतेक चारि पाँच हजार मुदा की चारि पाँच हजारसँ जीवन चलि जेतै।” “तँ की महिससँ जीवन चलि जेतै।” “पढ़ूआ काकाकेँ एकटा महिससँ जीवन चललनि की नहि।” “तँ की हुनके जकाँ भए जेबअ।” “सुनू हमर प्लान, हम पाँचटा नीक नस्लक महिस आ संगे एकटा नोकर राखि कए एहि काजकेँ करब। दूधकेँ कतेक बेगरता आ महगाइ छै से तँ बुझिते छीऐ। आब देखू एकटा नीक नस्लक महिस चालीस लिटर रोजकेँ एवरेज दूध देतै तँ पाँचटा कतेक भेलै ४० गुने ५ = २०० लीटर रोजकेँ। आब पाइ, चालीसो रुपैए लीटर बेचब तँ २००*४०= आठ हजार रुपैया रोजकेँ अर्थात महिनाकेँ दू लाख चालीस हजार, चालीस हजार खरचो भए गेल तँ दू लाख महिनाक आमदनी, गोवर काठी, परा पारी अलग।” “गे माए ई केना भऽ जेतै, दूऽऽऽऽऽऽ लाख रुपैया महिना।” अन्न धन बाबा अप्पन सात बर्खक पोतासँ, “की हौ बौआ, ललन कतए गेलाह।” “बाबूजी तँ पूजा कए रहल छथि।” “ईऽऽहऽ.. खेतोपर जेता की खाली पूजे केने गुजारा भए जेतनि, पूजो पाठ एक सीमे धरि नीक होइ छै। जीवन चलै लेल रुपैया चाही आ रुपैया लेल काज करए परै छै आ घरमे जखन अन्न-धन भरल रहै छै तकर बादे पूजो पाठ नीकसँ होइत छैक।” बाबा एसगर बड़बड़ाइत दलान दिस चलि गेला। पशंदक काज दीनानाथजी आ हुनक कनियाँक बिचक गप्प-सप्प- “सुनै छीऐ, अहाँक दुनू धिया पुता कखनो नहि पढ़ैए, दिन भरि नहि जानि कथी कथीमे लागल रहैए।” “हूँ।” “की हूँ, खाली बसहा बरद जकाँ मूरी दोलबैत रहै छी। अहाँकेँ तँ कोनो चिन्ते नहि, दुनियाँ कतए जा रहल छै कनीक धियो-पुतापर धियान देबै।” “की धियान दियौ, अहाँ दै छीऐ ने भऽ गेलै।” “भऽ की कपार गेलै? दुनूमे सँ कियो हमरा मोजर दैए, बेटा अहाँक सदिखन कम्पुटरमे लागल रहैए तँ बेटीकेँ ड्राइंगेसँ फुरिसत नहि। किताबकेँ तँ केखनो छुबितो नहि जाइ छै।” “हे भागबान ! अहाँ किए एतेक आमील पीने छी, भने दुनू अप्पन-अप्पन पशंदक काजमे तँ लगले रहै छै। आइ जे सचिन तेंदुलकर केर गारजन कहितै पढ़ाइ कर वा लता मंगेशकर केर गारजन कहितै जे पढ़ाइ कर तँ की देशकेँ सचिन तेंदुलकर आ लता मंगेशकर भेटतै? कएखनो नहि, हाँ दूटा कलर्क वा चपरासी जरुर भेटगेल रहितै।” अप्पन नीन आइ कतेक बर्खक बाद हम अप्पन गामक फूसक घरमे आपस एलहुँ। मोन एतेक प्रशन्य कि घरसँ बाहर निकलैक मोने नहि भए रहल छल। घरक अखरा चौकी, दिल्लीक दू बएड रुमकेँ पलंगक एक बीत मोटगर गद्दासँ बेसी सुखदायी लागि रहल छल। आँखि मुनैत माँतर सपनाक इन्द्रधनुषी मेघमे मन विचरण करए लागल। भिनसर नीन तुटल तँ बर्खो बाद बुझलहुँ नीन एकरा कहैत छै। दिल्लीक पन्द्रह हजार रुपैयाक भाराक घर जकाँ ओतुका नीनो भाराक। धन्यवाद हमर कम्पनीक मंदी आ हरताल जे हम अप्पन घरमे अप्पन चौकीपर अप्पन नीनसँ सुतलहुँ। मुर्दा बिहार रोडबेजकेँ बस पटनासँ जयनगर धरि सफर। समस्तीपुरसँ किछु पहिले सामनेसँ एकटा बड़काटा चमचमाइत कारी रंगक कार आबि कए बसक सामने ठार भऽ गेल। ओहि कारमे सँ देशी तमन्चा लेने दू गोट पहलवान निकलि बल प्रयोगसँ बसमे घुसि गेल। बसमे चढ़ला बाद सभक दिस धियानसँ देखैत पाछुक सीटपर बैसल एकटा नौजबानकेँ सभक सोझाँ खीच कए बससँ बाहर निकालि दुनू गोटे ओकरा लात मुक्कासँ पीटअ लागल। बसमे बैसल ६०-६५ गोटेमे सँ कएकरो हिम्मत नहि जे एकबेर इहो पूछेए कि भेलै, एकरा किएक पीटै छै। सभ मूक दर्शक बनल। अंतमे ओ दुनू यमराजक दूत ओकरा मारैत मारैत थाकि गेल तँ एकटा अप्पन तमन्चा तानि ओकर सीनापर दनादन दूटा गोली दाइग देलकै। सभह सामने दिनदहारे। ६०-६५ टा नपुंसक लग दूटा मर्द जीत गेल वा ६०-६५ टा मुर्दापर दूटा जीवन भारी परल। जीवन “हम एहि दुनियाँमे किएक छी ?” “खाए लेल ?” “पीबैक लेल ?” “जीबैक लेल ?” “सेक्स करैक लेल ?” “सन्तान जन्माबै लेल ?” “मरै लेल ?” “धुत्त ! इहे जीवन अछि तँ हमरामे आ जानवरमे अन्तर की ?” नेनाक छवि दिनानाथ बाबूक बहरइया बेटा पुतहु अपन १२ बरखक पोती संगे बहुत बरखक बाद कोनो विशेष अबसरपर गाम एलाह । दलानपर, अपन पारम्परिक पोषाकमे दिनानाथजी आ हुनक बेटा जीन्स पेंट आ टीशर्ट पहीर बैशल। ताबतेमे एकटा बयोवृद्ध, गामक सम्बन्धमे दिनानाथ जीक काकाक आगमन भेलनि । हुनका बैसक उचित स्थान देला बाद दिनानाथ जीक पुत्र हुनक पएर छूबैत, "गोर लगै छी बाबा।" " खूब नीके रहू।" "कतए रहै छी?" "दिल्लीमे " "हमरा तँ अहाँ सभकेँ देखलो कतेको बरख भए गेल।" कनीक काल चूप रहला बाद, "ब्याह भए गेल की ?" ई प्रश्न बाबा हुनक वस्त्र आ कि हुनक नहि बुझाइत बएसकेँ कारण पुछलखिन। अपन चॉकलेटी शरीर आ ड्रेससँ एखनो २५ बरखसँ बेसीक नहि बुझाई छला। "सृष्टी, सृष्टी……" बाबाक प्रश्न सुनिते, कोनो उत्तर देबैक जगह सृष्टी, सृष्टी केर अबाज दिनानाथजी देलनि। अबाज सुनि आँगनसँ हुनक १२ बरखक चंचल पोती 'सृष्टी' दौरते आएल। दिनानाथजी सृष्टीसँ बाबा दिस इसरा कए, "बाबाकेँ गोर लगियौन्ह।" सृष्टी चट्टे झुकि, बाबाकेँ गोर लागि आशीर्वाद लेलनि। दिनानाथजी, बाबासँ, "ई हिनक बेटी भेलखीन।" बाबा, ई सभ गाममे रहथि तहन ने, हमर नजरिमे तँ एखनो ओहे १८-२० बर्ख पहिने देखल नेनाक छवि बसल अछि। केखन समयक संग जबान भेल, ब्याह भेलै, बेटी सेहो एतेकटा भए गेलै। मुदा हमर सबहक आँखिक छवि……।" ई कहैत बाबा मौन भ’ गेला। एतेक पैघ परिवार “कि बाबा हमरा हिसाबे गाममे अहाँ एतेक पैघ परिवार केकरो नहि हेतैक।” “हाँ से तँ ठीके, दुनू प्राणी अपने, चारि-चारिटा बेटा पुतहु, १३ टा पोता-पोती, चारिटा पर-पुतहु, तीनटा नतिन जमेए, ९ टा परपोता परपोती। सभ लगाइत ३९ गोटेक भरल-पुरल परिवार मुदा की लाभ ? सभ प्रदेश जा-जा कए अपन- अपन पेट पोसएमे लागल अछि हम बुढ़बा बुढ़िया एतए गाममे अपने हाथ झरकाबाबै छी।” सबसँ खुशी “बाबा, एहि दुनियाँमे सबसँ खुशी के अछि ?” “एकर जवाब हम की देबअ बहुत पहिने गोस्वामीजी कहि गेल छथि जे व्यक्ति अप्पन मातृभूमिपर रहैत हुए आ जकरा माथपर कोनो कर्जा नहि होइ दुनियाँक सबसँ खुशी आ भाग्यशाली व्यक्ति ओहे अछि।" पूर्वजक मुक्ति आचार्यजी पुराणक कथाक व्यख्यान करैत, “ब्राम्हन भोजन करेलासँ सात पूर्ख धरि मुइल पूर्वजक आत्माकेँ शांति आ जन्म मरणकेँ फेरीसँ मुक्ति भेट जाइ छैक मुदा ब्राम्हन चयनमे किछु सावधानी रखबा चाही। ब्राम्हन ओ जे माँस मदिरासँ दूर होथि। ब्राम्हन ओ जे झूठ, लोभ आ अहंकारसँ बचल होथि, जे भोर साँझ आन ब्राम्हन कर्म नहि तँ कमसँ कम गायत्री जाप अवस्य करैत होथि आ जिनका वास्तबमे भोजनक आवश्कता होइन, भरल पेटकेँ भरलासँ की लाभ।" आचार्य जीक गप्प सुनि हम सोचै लगलहुँ, “कि आजुक समयमे एहन ब्राम्हन भेटनाइ सम्भब आ कदाचित भेटो गेला तँ की हुनका भोजनक आवश्यकता हेतैन ? तँ की हमर पूर्वजक मुक्ति आब नहि होएत ?” इंटरव्यू सिविल असिस्टेंट इंजीनियर पोस्टकेँ लेल इंटरव्यू। लिखित परीक्षामे २४ टा परीक्षार्थी पास कएला बाद आइ अंतिम मौखिक परीक्षा। २४ मे सँ कुल एक गोटाक चयन होएत। एक-एक कए सभ उमीदवार कक्षमे आबैत। कक्षमे तीनटा इंजीनियर संगे सामने मुख्य चयनकर्ता। सभ उमीदवारक सामने मुख्य चयनकर्ताक एकैटा प्रश्न, “कि अपने सिविल डिपार्टमेंटसँ की इक्षा रखैत छी आ एहिकेँ बदलामे अहाँ की की देबैकेँ लेल तैयार छी।” हुनक एहि तरहक प्रश्नकेँ सुनि कए कियो कहैत, “इक्षा की सभटा तँ आब अपनेक हाथमे अछि हाँ देबैक लेल जे अपने कही, चारि लाख .....पाँच लाख।” “ठीक छै अहाँसँ हम कोन्टेक्ट करब, आगू...।” ई कहैत मुख्य चयनकर्ताक हाथ बेलपर जाइन, खरररर खरररर ऽऽऽऽ केँ आबाज, दोसर उम्मीदवारक प्रवेश। हुनको सभक सामने ओहे पुराण प्रश्न। कियो कहैत, “इक्षा की ई पोस्ट हमर भेल, रहल देबैक गप्प तँ जतेक अपने कही हमर बाबूजीक खाली चेक तैयार छनि।” एकटा तँ प्रश्न सुनिते माँतर क्रोधसँ हिलए लगला, “एतेक भारी अन्याय, एहि तरहक कृत्य, एहि गप्पक आबाज हम बहुत आगू धरि उठाएब।” ई बरबराइत ओ कक्षसँ बाहर निकलि गेला । सभसँ अंतमे अंतिम उम्मीदवार, हुनको लग फेरसँ ओहे प्रश्न राखल गेल, “अपने सिविल डिपार्टमेंटसँ की इक्षा रखैत छी आ एहिकेँ बदलामे अहाँ की की देबैकेँ लेल तैयार छी।” “तत्काल तँ हम ई इक्षा रखै छी जे ई जॉब हमरा कन्फोर्म भऽ जए आ देबैकेँ लेल हम अप्पन पूर्ण योग्यता, काजक प्रति निष्ठा, यथा ज्ञान तन-मनसँ मेहनति देबैक लेल तैयार छी ।” अगिला प्रश्न, “शेलरीक कतेक एक्श्पेक्टेशन रखैत छी।” “ई हमर पहिल जॉब अछि तेँ एखन शेलरी नहि, एहिठामसँ हम कतेक बेसी शिखब तकर एक्श्पेक्टेशन रखैत छी।” मुख्य चयनकर्ता ठार होइत, हाथ आँगा करैत, “बधाइ ! अहांक जॉब कन्फोर्म। उम्मीद करै छी हम सभ एहिठाम अपनेक पूर्ण ज्ञानक उपयोग कए सकी आ अपने सेहो एहिठामसँ अपन ज्ञानक नीकसँ अपडेशन कए सकी। एक बेर फेरसँ बधाइ।” भूखेल “छीः ! कतेक भूखेल छलै सभकेँ सभ।” भोजक बाद फेकल पातक ठेरीमे सँ किछु बिछैक चेष्टामे असफल एकटा बुढ़ पागलक बड़बड़ाहट। चयन मेटरनिटी वार्ड। सा० दर्दसँ बफाइर मारैत। छोटका अस्पतालसँ बड़कामे रेफर कए कऽ लाएल गेलथि। अल्ट्रासाउंड रिपोर्टक मुताबीक आठ मासू जौँआ बच्चाक होनिहार तेँपर दुनू बच्चा उल्टा। बड्ड क्रिटिकल केस, पैघ डॉक्टरक एकटा टीम हरान हरान। एक तँ समयसँ पूर्व ओहूपर जौँआ आ सभसँ कठीन जे दुनू बच्चा उल्टा। डॉक्टरक सामने आब ओपरेशनकेँ अलाबा आन कोनो उपाय नहि। जल्दीसँ जल्दी ओपरेशन करैक आवश्यकता, नहि तँ जच्चा बच्चा दुनूक ने तीनुक जानक खतरा भए सकै छल। डॉक्टरक टीम फटाफट ओपरेशनक तैयारीमे जुटि गेल। ओहि टीमक एकटा स्टाफ नर्स फाइल नेने बाहर आबि, “सा०केँ परिवार वला सभ।” सा०क परिवारक सभ आगू अबैत, “हाँ।” “सा०केँ पति।” “जी।” सा० केँ पति दू डेग आगू आबैत। “ई ओपरेशनक कागज अछि। बहुते क्रिटिकल केस छैक। अपनेकेँ बुझले अछि, बच्चा समयसँ डेढ़ महिना पूर्व, जौँआ आ ताहूपर दुनू उल्टा आगू बढ़ैत बढ़ैत दुनू छाती लग आबि गेल छैक। ऐनामे जँ जल्दी ओपरेशन नहि होएत तँ किछु भऽ सकैत छैक।” “जी।” “हमर सभक प्रयास रहत तीनु प्राणकेँ नीकेना बचाएल जाए मुदा केसक क्रिटिकली देखैत माए अथवा दुनू बच्चामे सँ केवल एकटाकेँ हम सभ गारेन्टी लए सकै छी। से अहाँ लिख कए दिअ जे अहाँकेँ पहिले के चाही सा० की दुनू बच्चा ?” “ठीक छै लाउ हम लिख कए साइन कऽ दै छी, हमरा सा० आ दुनू बच्चामे सँ एकटाक चयन करअ परत तँ हम सा०केँ प्राण चाहैत छी ओना हम भगवानसँ प्राथना करैत छी जे तीनु जानक रक्षा करथि।” मामा “कि रौ संजैया, महिस खोलैक बेर नहि भेलैए की ?” “जाइ छी मामा, ओ माथमे कनीक दर्द करै छल तैँ सुति रहल रही।” “हुँ गिरै कालमे माथ नहि दुखेलहुँ आब महिस खोलै कालमे माथ दुखाइए। एतए तँ जेना कोनो कुबेरक खजाना रहै, बाप कलकत्ता ओगरने आ बेटा छह महिनासँ एतए हमर माथमे दर्द केने।” माँछक महिमा साँझक छह बजे पशीनासँ तरबतर सात कोस साईकिल चला कए अ०बाबू अपन बेटीक ओहिठाम पहुँचला। हुनक साईकिल केर घंटीक अबाज सुनि नाना-नाना करैत हुनक सात बर्खक नैत हुनका लग दौरल आएल। अपन पोताक किलोल सुनि अ०बाबूक समधि सेहो आँगनसँ निकैल दलानपर एला। दुनू समधि आमने सामने- “नमस्कार समधि।” “नमस्कार नमस्कार सभ कुशल मंगल ने।” “हाँ हाँ सभ कुशल मंगल।” अपन नैतकेँ झोरा दैत, “लिअ बौआ आँगनमे राखि आबू, माँछ छैक।” “अहुँ समधि ई की सभ करए लगलहुँ।” “एहिमे करब की भेलै, आबै काल नहैरमे मराइत देखलिऐ हिलसगर देख मोन भए गेल, धिया-पुता लेल लए लेलहुँ।” “मुदा समधि अपने तँ बैसनब छी तहन धियापुताक सिनेह खातीर एतेक कष्ट।” “एहिमे कष्टक कोन गप्प, हम नहि खाए छी एकर माने ई नहि ने जे ई खराप छै। हम नहि खाए छी अर्थात तियाग केने छी, जे खाए छथि हुनकर नीक बेजएक धियान तँ रखहे परत। ओनाहितो अपन मिथिलाक माँछक महिमासँ के अनभिक छथि।” आँखि मुनि ली “मालिक, सोमना चोर भए गेलए।” “हौ, की चोरा लेलकए ?” “मालिक ओ हमर की चोरेत, हमरा लग अछिए की।” “तहन कथिक चिन्ता।” “ओकरा हम देखलहुँ अहाँक कलममे पथियाक निच्चामे आम आ उपरसँ घास भरने, आब कहु ओ आम कतएसँ एलै अहीँक कलमसँ नहि चोरेने होएत।” “हौ लेबअ दहक, कि करबहक ओकरा तँ अपने कलम गाछी छै नहि तहन की करत, बाल बच्चा तँ ओकरो छै। एहेन छोट छोट गप्प देख कए आँखि मुनि ली आखीर एहि संसारमे गुजारा तँ सभकेँ करैएकेँ छै ने।” दू नम्बरक पाइ अ०, “एहि बेरक पूजामे तँ एसगर मिशरजी एकाबन हजारक चंदा देलखिन्ह।” ब०, “देबए दियौंह, बहुते दू नम्बरक पाइ जमा कए कऽ रखने छथि।” स०, “यौ भाइ, पाइ कएखनो दू नम्बरक भेलैए आ यदि होइतो छै तँ सभ कियो एकरा कमेए चाहैए मुदा बात ओहे जखन तोरअ नहि हुए तँ अंगूर खट्टा, तेनाहिते जखन अप्पने नहि कमा सकलहुँ तँ सामने वलाक पाइ दू नम्बरक देखाइ दै छैक।” खुशी कलुआही, बुध दिनक हाट। चारुकात भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचैमे व्यस्त तँ कियो कीनैमे मस्त। दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटियामे प्रबेश कएलनि। हाटक मुँहेपर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथमे धनी-पात लेने हल्ला करैत, “एक रुपैयाकेँ दू मुठ्ठी, एक रुपैयाकेँ दू मुठ्ठी।” मुदा सभ कियोक ओकर बातकेँ अनसुना करैत हाटक भीरमे बिलीन भेल जाए। दीनानाथजी सेहो ओकर बातकेँ सुनैत हाटक भीरमे मिल गेलाह। दू घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अप्पन खरीदारी पूरा कएलाक बाद हाटक मुँहपर वापस एला तँ देखैत छथि, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत। दू मिनट मोन भए ओहिठाम ठार भेला। हुनक कनियाँ, “चलूनए धनी-पात तँ अपने बारीमे बड्ड अछि।" दीनानाथजी, “कनीक रुकू।” कहैत आगू धनी-पात बाली बच्चियासँ, “कोना दै छिही? बुच्ची।” बुच्ची, “ बाबू एक रुपैयाकेँ दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैयाकेँ तीन मुठ्ठी लए लिअ।” दीनानाथजी, “सभटा कतेक छौ?” बुच्ची गनैत, “एक,दू,- - सात, आठ - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस, बीस मुठ्ठी बाबूजी।” दीनानाथजी, “सभटा दय दे।” कनियाँ, “हे-हे की करब?” दीनानाथजी कनियाँकेँ इशारासँ चुप करैत, अप्पन कुर्ताक जेबीसँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कए बुच्चीकेँ देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठामसँ बिदा भए गेला । घर अबैत, दलानपर बान्हल जोड़ भरि बरद, हुनक आहटेसँ अप्पन-अप्पन कान उठा कए मानु सलामी देबअ लागल । ओहो आगू आबि कs सिनेहसँ दुनूकेँ माथ होँसथति, अपन झोरीसँ धनी-पात निकालि नाइदमे दए देलखिन्ह । ई देखि कनियाँ, “ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरदकेँ दए देलियै, एतेककेँ घास लैतहुँ तँ बरद भरि दिन खैतेए।” दीनानाथजी, “कोनो बात नहि, ओइ धनी-पात बाली बच्चियाकेँ मुँहपर जे असंतोस, निरासा आ दुखक भाव रहैक ओ अहाँ देखने हेबै आ बिकेला बादक खुशी देखलीयै, ओहि खुशीक मोल कतौ एहि दस रुपैयासँ बेसी हेतैक।” चूमान शम्भू भाइ कोपी लए कऽ सभक नाम गाम लिखैमे लागल आ एक एकटा कुटुम्ब सभ अप्पन अप्पन नाम गाम कहैत हुनका तरफ रुपैया बढ़बैत- “रामचंद्र, गाम सुपौल, एकाबन सए एक रुपैया।” “बद्री, पिलखबार, एगारह सए एक रुपैया।” “नोनू, फूलपरास, एकैस सए एक रुपैया।” “मोहन, बाबूबरही, छह हजार एक सए एक रुपैया।” एनाहिते आन आन सभ। ई सभ देख गर्दनिमे उतरी पहिरने रामलोचनक आँखिसँ नोर बहि रहल छल आ हुनक मोन कहि रहल छल “आह ! जँ एहिमे सँ दूओ चारि गोटा इहे पाइ पन्द्रह दिन पहिने देने रहितथि तँ आइ पाइ अछैतेए भैया नहि मुइल रहितथि।” सपूत नारायण दत्त जीक दुनू किडनी खराप भए गेल। दिल्लीक एम्समे हुनक किडनीक प्रतियारोपन कए कऽ जान बचाओल गेल। आइ ओपरेशनकेँ दू दिन बाद नारायण दत्तजीकेँ होस एलनि। आधा घंटा लेल हुनक समांग सभकेँ अनुमति भेतलनि जे हुनकासँ भेट कए सकैत अछि। एहि अबसरपर हुनक भाए-बहिन, कनियाँ, बेटा-पुतहु, पोता-पोती सभ हुनका घेरने। नारायण दत्तजी एक बेर चारू कात सभकेँ हर्खसँ देखैत लगमे बैसल अपन कनियाँकेँ धीरेसँ, “रुद्ररू नहि आएल? (रुद्ररू हुनक जेष्ठ पुत्र जिनकासँ हुनका कहियो पटरी नहि खेलकनि) एखनो ओकरा फुरसति नहि भेटलै? मरियो जइतौँ तँ आगि देबै लेल अबिते की नहि?” “राम राम ! केहन गप्प करै छी, रुद्ररू दोसर कोठरीमे भर्ती अछि ओकरे एकटा गुरदा देलासँ तँ आइ अहाँ हमर सभक बिचमे छी। अहाँक असली सपूत तँ ओहे अछि।” हुनका मुँहपर हाथ रखैत हुनक कनियाँ बजली। नजरि मिलाबए जोगरक भोरे भोर मोबाइल फोनक घंटी, “ट्रिन ट्रिन.....!” दीनानाथजी फोनक स्क्रीनपर देखलनि, हुनकर छोटकी भाबौक फोन, आमने सामने एक दोसरसँ गप्प नहि होइ छनि मुदा फोनपर जरूरी गप्प आ समादसँ परहेज नहि। “हेलो।” “भाइजी, नास्ता करैक लेल आबि जाऊ।” “नास्ता तँ हम कए लेलहुँ।” “की सब केलहुँ।” “रातिक तरकारी बचल छलै, दूटा रोटी आ चाह बना नेने रही।” “एना किएक भाइजी? हमरासँ कोनो गलती भए गेल की?” “नहि नहि एहन कोनो गप्प नहि।” “तँ नास्ता भोजन लेल, जाबैत धरि दीदी नैहरमे छथिन एहिठाम आबि जएल करी।” “कोनो गप्प नहि अहाँ चिंता नहि करू, वाणी(दीनानाथ जीक बेटी) आब नम्हर भेलै दिन रातिक भोजन ओ बना लै छै। भोरका हमरा किछु-किछु करए परैए किएक तँ ओकरा भोरेक साते बजेक इसकूल छैक। दोसर अहूँकेँ छोट चिलका अछि ओकरामे बड्ड परिपालन है छैक आ हमहूँ अहीँ सभपर कतेक भार दिअ। अहीँक घरमे रहि रहल छी, बिना दाम बिना भारा, अहीँक पाइसँ खा-पी रहल छी, हम पैघ छी तँ कतए हमरा करए चाही आ उल्टे अहीँ सभ कए रहल छी। आब एक्के बेर एतेक उपकार लए कऽ....! नजरी मिलाबए जोगरक तँ रहै दिअ।” अभिमान अपसीयाँत हहाइत फूफीयाइत नम्हर नम्हर डेग दए आबि पुलिस लकअपमे बन्न अपन पतिकेँ देखि, “हे भगवती ! ई केहन दिन देखेलहुँ ? ई कोना भए गेलै ? कोन अपराध कए देलिऐ ?” “किछु नहि, ऑफिससँ आबैत काल रस्तामे दूटा अबारा छौंरा मिल कए एकटा बच्चीयाक लाजसँ खेलैक प्रयास कए रहल छल। बहुतो मना कएला बादो नहि मानल, हाथा पाहि होबै लागल। दुनूकेँ दुनू चक्कू निकालि लेलक। ओहि हाथा पा।।हिमे एकटाक चक्कू दोसराक पेटमे भोका गेलै। ओ तँ भागि गेल पुलिस हमरा पकरि कए एतए बन्न कऽ देलक।” “चाबस ! ओकरा तँ अपनेमे अपने चक्कू भोका गेलै, एकटा अवलाक लाज बचाबैत जँ अहाँक हाथसँ हत्यो भए जाइत तैयो हमरा दुख नहि होइत। हमरा एहि बातक अभिमान अछि की हम अहाँक कनियाँ छी, जिनक मोनमे नारी जातिक प्रति एतेक निष्ठा छनि।” लचार परबाबा परबाबी गाममे अपन परपुतहुकेँ रखने। अपन सेवाक लोभमे अथवा परपोताक कोनो मजबूरी रहल होनि। बाबा बाबीसँ, “दुनू बच्चाक मुड़न तँ जेना तेना कए रहल छियैक, सभकेँ नोतो हकार दए देलिऐ, आब आँगुरपर गाणल चारि दिन रहि गेलए मुदा पता नहि बच्चू(बच्चू,हुनकर पोता) पाइ पठेबो करत की नहि।” बाबी, “धूर जाऊ ! अहुँ केहेन गप्प करै छी। अपन परपोता परपोतीक मुरन कए रहल छी, ई शोभाग्य केकरा भेटै छै। चारि पाँच हजारक खर्चा डरे डराइ छी।” “अहाँ ठीके कहलहुँ, ई शोभाग्य केकरो नहि भेटै छै अपन परपोताक मुड़न ओहो परपोता संगे परपोतीक सेहो। एहि मुड़नक बाद तँ अप्पन दुनूकेँ सोझे स्वर्गमे जगह भेट जाएत, मुदा एहि दुनियाँक भौतिक काज हेतु पाइ चाहबे करी।” “बस ! शुरू भए गेलहुँ पाइ पाइ।” “अहाँ नहि बुझैत छीयैक, चारू बेटामे सँ तँ कियो पठेबे नहि करैए, बचल अपन तीन हजार रुपैया महिनाक पेंशन। ओहिमे सँ की की हेतै, अपन दुनूक भोजन, कपरा-लत्ता, दबाई-दारू, समय समयपर पाबनि-तिहार, गाम-गमाइत सभटा एहिमे आ एखन दू महिनासँ बच्चूक कनियाँ दुनू बच्चाक संगे छथि, ओहि तीन हजारमे की की हेतै। नहि तँ हमरा नहि सअख हैए अप्पन जौआँ परपोता परपोतीक मुड़नमे भरि गामकेँ नोति कए धूमधामसँ करी मुदा अर्थक सामने लचार छी।” ई कहि बाबाक बुढ़ आँखिक कोरसँ दू दू बुन्न नोर तघरि कए बाबीक नजरिसँ बँचैत लाजे हुनकर कुरताक तअरमे नुका गेलनि। सादा कागज जाँत पीसैत दूटा सासु एक दोसरसँ- “यै बहिन हिनकर पुतहु तँ हीरा छनि हीरा। आइ दू बर्खमे किएक एक्को बेर ऊँच बोलो सुनने हेबैन।” “हिनको पुतहु कोनो कम नहि छनि, एतेक काजुल पूरा घरकेँ सम्हारि लेलकनि।” “धूर जाउत ! हिनका तँ सभ अपने जकाँ लगैत छनि।” “हाँ, ओनाहितो जखन एकटा नव कनियाँ अपन माए-बाप, घर-घराड़ी छोरि कए एकटा नव घर आबैत छै तखन ओ एकटा सादा कागज जकाँ होएत छैक, जाहिपर जे रंग लगेबै ओहे रंग लगतै। आगू रंग लगाबै बलाक इक्षा।” सेल्समेन गामक दलानपर नून तेलक दुकान चलेनाहर, साहजी अपन मुस्काइत मुँह आ शांत स्वभावकेँ कारण गाम भरिमे सभक सिनेहगर बनल मुदा किछु गोटे हुनकर एहि स्वभाबकेँ कारणे हुनका हँसीक पात्र बनोने। आइ साहजी अपने किछु काजसँ बाध दिस गेल। दुकानपर हुनकर १४ बर्खक बेटा समान दैत-लैत। एकटा बिस्कुट चकलेटक सेल्समेन साइकिल ठार करैत साहजीक बेटासँ, “की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।” साहजीक बेटा सेल्समेनक मुँह दिस कनी काल देखला बाद, “किएक, की बात ?” “बात की समान देबैकेँ अछि, पुरनका पाइ लेबैक अछि।” “किछु नहि लेबैकेँ अछि (भीतरसँ समान सभ उठा कए दैत) ई अपन पहिलका समान सभ नेने जाऊ।” “किएक ! पहिलका तँ रखने रहु।” “नहि अहाँसँ किछु नहि चाही आ हाँ आगूसँ कहियो हमर दुकानपर नहि आएब।” सेल्समेन मुँह बोनेए बकर-बकर ओइ नेना दिस देखैत अपन पुरनका समान सभ समटैमे लागल। ताबतमे साहजी सेहो आबि गेलाह। सहजी सेल्समेनसँ, “कि यौ मालिक एना सभटा समान किएक समटने जाइ छी।” “हम कहाँ समटने जाइ छी अहाँक नेनकीरबा सभटा समान उठा कए दैत कहलथि एहिठाम कहियो नहि आएब।” “किएक अहाँ की कहि देलिऐ ?” “हम तँ किछु नहि कहलिएन्हि।” “नहि किछु तँ कहने हेबे।” “हाँ अबैत माँतर पूछने रहिएन्हि, की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।” साहजी हँसैत, “हा हा हा, हमरा संगे जे हँसी ठठ्ठा करै छी से ठीक मुदा केकरो सामने ओकर बापकेँ पागल कहबै तँ ओ कोना सहत, जेकरा की ओ अपन भगवान बुझै छै। एखन भोरे भोर दिमाग शांत रहै तेँ चूपेचाप समानेटा आपस कए कऽ रहि गेल नहि तँ एहन तरहक गप्पपर बेटखारा उठा कए मारि दैतेए।” गृहस्थ धर्म “ई की बाबू ? जे कियो मांगै लेल अबै छै सभकेँ अहाँ दस बीस रुपैया दऽ दए छीऐ आब ओ जमाना नहि रहलै, चोर उच्चका सभ एनाहिते मांगैकेँ एकटा धन्धा बना लेलकैए। नव-नव बहाना बना कए मांगै लेल आबि जाइ छै।” “गृहस्थ धर्मक पालन करैत केएकरो खाली हाथ आपस नहि जेए देबा चाही। के जनैए निनानबेटा झूठमे एकटा सत्यो हुए, निनानबेटा झूठ बाजि कए पाइ लए जेए से नीक मुदा एकटा जरूरतमंदकेँ नहि भेटैसे ठीक नहि। बांकी भगवती देखै छथिन।” केँचूआ धानक खेत। भोरका शीतसँ शीश तितल। दीनानाथजी अपन आठ बर्खक बेटा संगे खेतक निरिक्षण करैत, काटै बला भेलै तँ जोन करी आ कटाबी। “बाबू-बाबू देखू कतेकटा साँप।” “कतए ?” “हैएअ धानक शीशपर लटकल।” “हा हा, धुत्त, ई तँ मात्र केँचूआ छै।” “साँप केँचूआ कोना भए गेलै।” “बेटा, साँप केँचूआ नहि भए गेलै, साँप बर्खमे एक बेर अप्पन देहक पूरना खाल निकाइल दै छै जेकरा केँचूआ कहल जाइ छैक।” “बाबू, हम मनुख सभ केँचूआ नहि उतारै छी ?” दीनानाथजी किछु छन चुप्प रहला बाद, “बेटा, साँप तँ बर्खमे एकबेर अप्पन केँचूआ उतारि कए निचैन भऽ जाइए मुदा मनुख तँ झूठ, बैमानी आ लोभक जन्म-जन्मकेँ कतेक केँचूआ अपना देहपर ओढ़ने रहैए तकर कोनो इत्ता नहि मुदा तैयो ओकरा नहि संतोख आ नहि केँचूआ उतारैक मोन होइ छैक।“ प्रेमक बलि प्रवल आ सुमन एक दोसरसँ बहुत प्रेम करैत छल। दुनू संगे- संग बितल पाँच बरखसँ पढि रहल छल आ ओहि समयसँ दुनूक बिचक चिन्हा परिचय कखन अगाध प्रेममे बदैल गेलै से दुनूमे सँ केकरो सुधि नहि रहलै। आब दुनूक प्रेम अपन चरम सीमा पर पहुँच चुकल छैक आ एक दोसरकेँ बिना जीवनक कल्पनो दुनूक लेल असहनीय छैक। दुनूक प्रेम आब दुनूक एकान्तीसँ निकैल कालेज कम्पलेक्समे गमकए लगलै आ तरे-तरे गाम तक सेहो मुदा रुढ़िवादी ताना-बानामे बुनल समाजक व्यवस्थामे दुनूक मिलन आ विवाहक कल्पनो असंभव छलैक। किएक तँ प्रवल ब्राह्मण आ सुमन तेली जातिकेँ छल आ प्रवलक मए बाबू आ समाजकेँ लोग एहि बिजातीय विवाहकेँ पक्षमे कोनो हालतमे तैयार नहि। एहि सभ गप्पक अनुभब प्रवल आ सुमनकेँ सेहो भेलैक मुदा ओहो दुनू अप्पन प्रेमसँ बन्हल वेबस। करए तँ करए की ? समाजक व्यबस्थाक कारणे विवाहक कल्पने मात्रसँ देह सिहैर जाई। दुनूक प्रेम आब ओई सिखर पर पहुँच गेलैक जतएसँ वापसीक कोनो गुंजाइस नहि। माए बाबू सभटा जनितो समाजक डरे गप्प मानैक तैयार नहि। एक दिन दुनू गोटा एहि विषय पर गप्प करैत रहे, प्रवल बाजल -"चलू दुनू गोते दिल्ली,मुम्बई भागि ओहि ठाम विवाह कए लेब नहि कोनो समाज नहि गाम आ नहि मए बाबूक डर।" सुमन, "से तँ ठीक छैक मुदा हम अपन जीवन जीबैक लेल हुनक जीवनसँ कोना खेलव जीनक जीवैक आसा अपना दुनू गोते छी। सोचू हमरा भगला बाद हमर मए बाबूकेँ आ अहाँक भगला बाद अहाँक मए बाबूकेँ समाजमे की प्रतिस्ठा रहि जेतैंह आ ओकर बाद हुनक जीवन केहन हेतैंह आ एहेन कए कs की हम दुनू अपन जीवनकेँ खुश राखि पाएब। प्रेम तँ तियागक नाम छैक। ऐना एकटा अनुचीत डेग उठा कए हम अपन प्रेम कए बदनाम कोना कए सकै छी। रहल मिलन आ विरहकेँ गप्प तँ मिलनकेँ लेल एकैटा जन्म नहि छैक, एहि जन्ममे नहि अगिला जन्ममे अपन मिलन अबस्य होएत।" सुमनकेँ ई गप्प सुनि प्रवल किछु नहि बाजि पएल ओकरा अपन करेजासँ सटा जेना सभ किछु बिसरि जएबाक प्रयास कए रहल अछि। अगिला भोरे-भोरे गामक पोखरि मोहार पर पीपड़ गाछक निच्चा भिड़क करमान लागल। सामने पीपड़ गाछसँ प्रवल आ सुमनकेँ मुइल देह फसड़ी लागल लटकल। दुनूकेँ आँखि बाहर निकलल जेना समाजसँ एखनो किछु प्रश्न कए रहल अछि – “ऐना कहिया तक, प्रेमक बलि लेब ?” मार बाढ़नि तेसरो बेटीए हेमंत बाबूक बेटी रोशनी, अपन नामक अनुरूपे अपन कृतीक पताका चारू कात लहराबति, आईएएसकेँ परीक्षामे भारत वर्षमे प्रथम दसमे अपन स्थान अनलनि। समाचार सुनि हेमंत बाबू दुनू परानीक प्रशन्नताक कोनो ठीकाने नहि। जे सsर सम्बंधी आ समाजक लोक सुनलनि सेहो सभ दौड़-दौड़ आबि हेमंत बाबूकेँ बधाइ दैत। रोशनी बड्डका जेठका सभकेँ प्रणाम करैत आशीर्वाद लैत। फूलो काकी फूल जकाँ हँसैत-बजैत एलि, रोशनी हुनक दुनू पेएर पकरि आशीर्वाद लेलनि । फूलो काकी रोशनीकेँ अपन करेजासँ लगबैत टपाकसँ बजलिह, “हे यौ हेमंत बौआ, अहाँक तेसर ई फेक्लाही बेटी तँ सगरो खनदानकेँ जगमगा देलक।” हुनकर एहि गप्पपर सभ कियो ठहाका मारि कए हँसय लागल। मुदा हेमंत बाबू आइसँ एकैश बर्ख पाछूक इआदमे चलि गेला......। दूटा बेटी भेला बाद कोना ओ बेटाक इक्षामे मंदिरे-मंदिरे देवता पितरकेँ आशीर्वाद लेल भटकैथि मुदा हुनकर सभटा मेहनत आ सपना बिखरि गेलनि जखन हुनक कनियाँक तेसर प्रसब पीड़ाकेँ बाद फूलो काकीक स्वर हुनकर कानमे परलनि, “मार बाढ़नि तेसरो बेटीए .....” एहिसँ आँगा हुनका किछु नहि सुनाई देलकन्हि । जेना की अपार दुखसँ मोनमे कोनो झटका लागल होइन, ओ अपन जगहपर ठारकेँ ठारे रहि गेल रहथि। ममता “यै बड़की काकी गाए बेचथिन ? नवगाम वला पैकार एलैए।” “नै यै कनियाँ एकरा हम कोना बेच देबै, अप्पन बच्चा जकाँ पोसने छी।” “छोरथि मोह-माया, हम पैकरबासँ गप्प कएलौंहेँ ओ बीस हजार दै लेल तैयार छनि।” “बुझलहुँ बीस हजार आइकेँ दुनियाँमे बड़ पैघ छैक मुदा ममताक सेहो कोनो मोल छै आ हमर ममता एहि बीस हजारमे बिकाउ नहि अछि। जाबत अपने जीबै छी रखने छीयै मुइला बाद जे अपने सब करब।” अहिबातक सुख दरभंगा रेलवे स्टेशन। दरभंगासँ दिल्ली जेबाक ट्रेन। द्वितीय श्रेणीक वातानुकूलित डिब्बा। हमर सामनेक सीटपर एकटा बुढ़ जोड़ा। सीटक निच्चाँ आ खाली तेसर सीटपर करीब पाँच-छहटा झोरा मोटरी रखने। शाइद गामसँ दिल्ली अप्पन बेटा-बेटी वा पोता-पोतीसँ भेट करै लेल जा रहल छथि। बुढ़ीक सोनसन उज्जर केशसँ भरल माथपर सेनुरक लाल रेखा चमचमाइत। आँखिपर सुनहरी चौकोर फ्रेमक सुन्नर चश्मा। पढ़ीया नुआक एकटा खुटसँ अप्पन नाक झपने। जेना ने ट्रेन चलब शुरू भेल बुढ़ी अप्पन नाकसँ नुआक खुट हटा सीटक निच्चासँ एकटा झोरा निकाललनि। झोराक चेन खोलि ओहिमे सँ एकटा दू खानाक बड़काटा टिफिन डिब्बा निकाइल कऽ सीटपर रखला बाद झोराकेँ फेरसँ सीटक निच्चा राखि लेलनि। टिफिन डिब्बा खोलि कए ओहिमे सँ तऽरल माँछक एकटा खण्ड निकालि, कांट बिछ्ला बाद अप्पन पतिकेँ देलनि। फेर एककेँ बाद एक दूटा खण्ड अप्पने खएली। खाए कऽ, टिफिन डिब्बा निच्चा झोरामे राखि आँखिसँ चश्मा निकालि खोलमे रखला बाद ओकरो झोरामे राखि फेरसँ पहिने जकाँ नुआक पाइढ़सँ नाक झँपैत अप्पन दुनू पेएर सीटपर मोरि कए जाँत जकाँ गोल होति आँखि मुनि सुइत रहली। ई अहिबातक सुख नहि तँ अओर की थिक। जगह महानगरीय जीवनक अव्यवस्थित आ व्यस्त जीवनमे समयकेँ आगू लचार आजुक जीवन शैली। रामप्रकाशकेँ माए अपन बेटा-पुतहु आ पाञ्च बर्खक पोता कए दर्शन आ किछु दिन हुनक संग बिताबैक लोभमे अपन गामसँ दिल्ली रामप्रकाश लग एलथि। रामप्रकाश एहिठाम सरकारी दू कोठलीक मकानमे रहै छथि। माए कए आगमनक बाद, जगहकेँ दिक्कत कारणे हुनकर ओछैन बालकोनीमे एकटा फोल्डिंग खाटपर लगाएल गेल। रातिमे एसगर निन्दक अभाबे करट बदलैत, माएकेँ मनमे ओहि दिनक सुमरण आबि गेलन्हि, जखन गामक फुशकेँ एक कोठलीक घरमे केना ओ दुनू बियक्ति अपन तीनटा बच्चा संगे गुजारा करैत छलथि, मुदा आइ एहिठाम ओ बच्चा दू कोठलीक घरमे माएक निर्वाहमे असमर्थ बालकोनीमे ओछैन केलक। माएकेँ आँखिसँ नोरक बूंद टपकैत, नै जानि केखन आँखि लाइग गेलन्हि। जुग-जुग जीबए... “एखन ओ कतए अछि, कोना अछि, की करैत अछि, हमरा किछु पता नै, बस एतबेए बुझल अछि जे आइ ओकर जन्म दिन छैक।” पचपन बर्खक, उज्जर सारीमे लपटल बूढ़ बिधबा माएक दिमागक ई गप्प। एककेँ बाद एक खोल हुनक इआदक केथरीसँ निकैल-निकैल कए इन्द्रधनुषी आकाशमे हिलकोर मारि रहल छल। बैसल, हुनक सामने माटिक एकचूल्हीयापर चढ़ल भातक हाँड़ीसँ बरकैकेँ खड़-खड़-खड़केँ अबाज आबि रहल छल। भात जरि कए कोयला भऽ गेल रहति जँ चेराक आँच अपने जरैत- जरैत चूल्हासँ निकैल कए बाहर नहि जरए लगितै। “पन्द्रह बर्ख पहिने कहि गेल दिल्ली जाइ छी, खूब पाइ कमाएब। नीक घर बनाएब। तोरा नीक नीक सारी कीन कऽ आनि देबौ। बाबूक लेल सुन्नर साईकिल कीनब। मुदा ! सभ बिसैर गेल। शुरू-शुरूमे दू-तीन मासपर चिठ्ठीयो आबेए, छह महिना बरखपर किछु पाइयो आबेए मुदा बादमे सभ बन्द। कोनो खोज खबरे नै। ओकर गेलाक छह बरखक बाद ललनमा मुँहे सुनलहुँ जे ओ दिल्ली बाली मेमसँ ब्याह कए लेलक। आर कोनो समाद नाहि। बापोकेँ मुइला आइ पाँच बरख भऽ गेलन्हि, ओइहोमे नहि आएल। ओकरा तँ बापक दिया बुझलो हेतै की नै----। आइ ओकर जन्म दिन छैक, लऽगमे रहैत तँ बड्ड रास आशीर्वाद दैतियैक मुदा दूरे बड्ड अछि। जतए अछि खुश रहेए.... जुग-जुग जीबए... हमर लाल।” मसोमात चारि बरखक बाद, गामक माटि-पानि जेँ देहमे बहि रहल अछि हिलकोर मारलक तँ सभ काज-बाज छोरि नोकरीसँ सात दिनक छुट्टी लय कए गाम बिदा भेलहुँ। जेना-जेना गामक दुरी कम भेल जए तेना-तेना हृदयक बेग आओर गामक माटिक गंध दुनू तेज भेल जए। ट्रेन आ बसक यात्रा क्रमसँ खत्म भेला बाद गामक चौकसँ पएरे गाम हेतु बिदा भेलहुँ जेकर दुरी करीब एक किलोमीटर रहै। ओनाहितो असगर, समानक नामपर कन्हापर एकटा बैग आ दोसर गाम देखक लौलसा, रिक्सा छोरि पएरे चलैक लेल प्रेरित कएलक। अपन टोलमे प्रबेश करिते सभसँ पहिले छोटकी काकी पर नजरि परल। ओना गामक सम्बन्धमे ओ हमर बाबी लगैत छलथि मुदा गाममे सभ कियो हुनका छोटकी काकी कहि सम्बोधित करैत छलनि तइँ हमहुँ हुनका छोटकी काकी कहैत छलियैन। उज्जर पढिया सारी पहीरने आँचरसँ माथ आ एकटा खूटसँ नाक तक मुँह झपने। रस्तासँ आँगन जाइत घरक कोन्टापर ओहो हमरा देखलथि, जा हुनका गोर लागि आशीर्वाद लेलहुँ। “के... बच्चू ?” छोटकी काकीकेँ मुँहसँ खड़खराइत अबाज निकलल। “हाँ काकी।” “कहीया एलअ ?” “एखन आबिए रहल छी काकी।” “एसगरे एलअहेँ।” “हाँ।” “आ दिल्लीमे कनियाँ, धिया-पुता सभ ठीक।” “अहाँक आशीर्वादसँ सभ कुशल-मंगल। एतअ अहाँक की समाचार, नीके छी ने ?” ई प्रश्न सुनिते हुनका आँखिसँ नोर झहरअ लगलनि नोर रोकैक असफल प्रयास करैत, “कि बौआ, एहि मसोमातकेँ की नीक आ की बेजए, बेजए तँ ओहि दिन भय गेलहुँ जहिया अहाँक काका नबाडियेमे छोरि स्वर्ग चलि गेला, आब तँ एहि बुढ़ारीमे कियोक धूओ नहि देखए चाहैए, देखलासँ सभकेँ अमंगल होएत छैक। नहि जानि बिधाता एहि अभागनिकेँ आओर कतेक ओरदा देने छथि। आइ महीनोंकेँ बाद ककरोसँ दूमुँह गप्प केलहुँ आ कियो हमरो द पुछलक .....।” ई कहैत काकी अपन नोरकेँ नुकबैत कोन्टासँ अँगना दीस चलि गेली आ हमहुँ गामक जिनगीक, बिधबा, मसोमात, बुढ़ारी.... सोचैत आगू बढ़ि गेलहुँ। रोटीक स्वाद आइ दस बर्खक बाद कियोक पाहून छोटकी काकीक अँगना एलैंह। पहुनो परख गरीबक घर अँगना किएक एता। छोटकी काकी ओनाहितो गरीब मसोमात एहनठाम कि सेबासत्कार भेटक उम्मीद। पाहुनोकेँ तँ हुनकर बहिनक बेटा। ओकरा ओ बारह बर्ख पहीले देखने रहथि आ आब ओ सत्रह बरखक पाँच हाथक जबान भए गेल अछि। आबिते अपन मौसीकेँ पएर छू कए गोर लगलक। “के? चिन्हलहुँ नहि बौआ ?” “मौसी ! हम लोटन, अहाँक बहीन मालतीक बेटा।” मौसी (छोटकी काकी) दुनू हाथे स्नेहसँ लोटनकेँ माथ पकैर अपन करेजासँ सटा, “चिन्हबौ कोना, मूड़नेमे पाँच बर्खक अवस्थामे जे देखलीयै से देखने देखने, आइ कोना ई गरीब मौसीक इआद आबि गेलौ।” लोटन, “मौसी मधुबनीमे हमर परीक्षाक सेंटर परल छल आइ परीक्षा खत्म भेल तँ मोनमे भेल मौसीक घर सौराठ तँ एहिठामसँ कनिके दूर छैक भेट कए आबी।” मौसी, “जुग- जुग जीबअ नेन्ना, एहि दुखिया मौसीक इआद तँ रहलै। आ मालती केहन ? ओझाजी केहन ?” लोटन, “सब कियो एकदम फस्ट किलास, दनादन, ओ सब आब छोरु पहिले किछ नास्ता कराऊ, मधुबनीसँ सौराठ पएरे अबैत-अबैत बड्ड भूख लागि गेल।” सुनिते मातर मौसीक छातीमे धकसँ उठल, ओ मने-मन सोचए लगलि –“नेन्नाकेँ की खुवाऊ ? घरमे किछो नहि अपने तँ माँगि बेसए कऽ गुजरा कए लै छी एकर नास्ता भोजनक व्यवस्था कतएसँ होएत।” हुनक सोचकेँ बिचेमे तोरैत लोटन फेरसँ बाजल, “मौसी जल्दी बड्ड भूख लागल अछि।” अपनाकेँ सम्हारैत मौसी, “हाँ एखने हम भात, दालि, भुजिया, तरुआ, नीकसँ बना कए नेन्नाकेँ दै छी, अहाँ कनी बैसू।” ई कहैत मौसी भंसा घर दिस बिदा भेली, जहन की हुनका बुझल जे घरमे किछु नहि अछि। मुदा हुनका पाँछा-पाँछा लोटन सेहो आबि, “नहि मौसी एतेक काल हम नहि रुकब पाँच बजे मधुबनीसँ बाबूबरहीक अन्तीम बस छै आ चारि एखने बाजि गेलै।” मौसी अपन घरक हालत देखि लोटनक गप्पक उतर नहि दए सोचय लगलि, “आह ! मजबूरी नेन्नाकेँ रूकैयो लेल नहि कैह सकै छी।” एतबामे लोटन भंसा घरक बर्तन सबकेँ देखि बाजल, “एहि बासन सबमे सँ जे किछ अछि दए दिए।” “हे राम !”- मौसीक मन कनाल, बासनमे किछु रहैक तहन नहि। आगू हुनक मुँह बंद भए गेलन्हि, बकोर लगलेकेँ लगले रहलनि। बड्ड सहाससँ गप्पकेँ समटैत बजली, “नहि बौआ किछु नहि छौ, हम एखने बिना देरी केने बनाबै छी।” लोटन, “नहि नहि मौसी बनाबैकेँ नहि छै, बस छुटि जाएत।” एतबेमे लोटनक नजैर टीनही ढकनासँ झाँपल कोनो समानपर पर। आगू जा ढकना उठा, “हे मौसी ई की ?” मौसी अबाक, की बजति, पहील बेर नेन्ना आएल आ ओकरा खूददीक रोटी खुआउ ओहो राइतेकेँ बनल। रातिमे एकटा खूददीक रोटी बनेने रहथि, आधा खा आधा ढकनीसँ झाँपि राखि देने रहथि। लोटन ओहि रोटीकेँ दाँतसँ काटि कए खाइत आगाँ बाजल, “एतेक नीक रोटी तँ हम कहीयो खेन्हें नहि छलहुँ, मए तँ खाली छाल्ही भात, दूध-भात, दूध-रोटी, खुआ-खुआ कए मोन घोर कऽ दैए। आहा एतेक स्वाद तँ पहील बेर भेट रहल अछि।” मौसी लोटनक गप्प आ ओकर खएक तेजी देख बजली, “रुक-रुक कनी आचारो तँ आनि देबअ दए।” ई कहि मौसी अचार ताकै लेल एम्हर-उम्हर ताकै लगली मुदा अचार कतौ रहै तहन तँ भेटै। लोटन, “रहअ दीयौ, एतेक नीक ई मोटका रोटी रहै अचारकेँ कोन काज। रोटी तँ खतमो भए गेल।” मौसी बकर-बकर ओकर मुँह तकैत रहली । लोटन, “अच्छा आब हम जाइ छी, घर देख लेलीयै फेर मधुबनी एलहुँ तँ अहाँ लग जरुर आएब, मुदा हाँ एहने नीकगर मोटका रोटी बनेने रहब।” ई कहैत मौसीकेँ गोर लागि लोटन गोली जकाँ बाहर आबि गेल मुदा बाहर अबैत-अबैत मौसीक दयनीय हालत देखि ओकर दुनू आँखिसँ नोरक टधार बहए लगलै। तरेगन इजोरिया राति, चन्द्रमाक दूध सन इजोतसँ राइतो दिन जँका बुझाइत। माँझ आँगनमे पटीयापर, अपन बाबीक पाँजरमे सुतलसँ जागि कए तीन बरखक नेना एकटक मेघक तरेगन दिस टकटकी लगोने ताकैत। आँखिक पपनी एकदम स्थीर, उपरकेँ उपर आ निँचाकेँ निँचा, जेना की कोनो हराएल प्रिय वस्तुकेँ ताकि रहल हुए। किछु घड़ीबाद नेनाक बाबीक निन टूटल तँ नेनाकेँ बैसल देख ओहो हरबड़ा कए उठैत, “की बौआ किएक बैसल छ, आ ई मेघमे की देखै छ।” नेना धनसन बाबीक बोल ओकर कान तक तँ जाइ मुदा दिमाग तक नहि जाइ। ओ तरेगन दिस एतेक तन्मयतासँ देखेए जे ध्यान उम्हरे एकाग्र। नेनाक बाबी दुनू हाथसँ नेनाकेँ हिलाबैत, “बौआ की भेल, की देखै छी।” “तरेगन गनैछी।” “किएक।” “काइल्ह सरजू कहलक जे मुइलाबाद लोक तरेगन बनि जाइ छै तैँ हम तरेगन गानि कए देखै छी जे कोन कोन तरेगन बेसी अछि ओहिमे सँ अवस्य एकटा हमर माए हेती।” बाबी, नेनाकेँ दुनू हाथसँ अपन पाँजमे भरैत, “हमर नेना कतेक बुधियार भऽ गेलै, केकरो नजरि नै लगेए। अहाँक माए कोनो आजी गुजी थोरे रहथि जे ओ आजी गुजी तरेगन बनति, ओ देखू ओ—ओ सभसँ बेसी चमचमाइत तरेगन, ओ अहींक माए छथि।" नेनाक सनेस “साँझकेँ छह बाजि गेलहि एखन धरि बौआ नहि आएल। भगवानपुर बालीक सेहो अता पता नहि। जा कए भगवानपुर बालीक अँगना देखै छी कि भेलहि।” ई द्वंद अछि एक गोट माएक मनक जीनक दस बरखक नेना दिनक एगारह बजे अपन काकी भगवानपुर बालीक संगे काली पूजाक मेला देखै लेल गेल छल मुदा साँझ परि गेला बादो एखन धरि नहि आएल छल। नेनाकेँ अपनासँ दूर केखनो छोरैक लेल ओ तैयार नहि मुदा नेनाक मेला देखैक लौलसाकेँ देखि ओकरा नहि रोकि पएलिह। जँ अपने जाइतथि तँ बोनिक हर्जाना आ ओहिपर सँ बेसी खर्चाक डर सेहो, कोनो ना पच्चीस रुपैयाक इन्तजाम कए नेनाकेँ काकी संगे पठा देने रहथि। की भेलै किएक देरी भेलहि एहि उधेरबुनमे रहथि की भगवानपुर बालीक शव्द हुनका कानमे कतौसँ परलनि। देखलनि तँ भगवानपुर बालीक आ हुनक नेनाक संगे संग गामक आओर लोकसभ हँसैत बजैत हाथमे माथपर झोड़ा मोटरी नेने आबैत। माए झटसँ आगू बढ़ि अपन नेना लग जा ओकर दाढ़ी छुबि, “ऐना मुँह किएक सुखएल छौ, किछु खेलएँ पीलएँ नहि? पाइ हएरा गेलौ की ?” मुदा नेना चूपचाप ठार। भगवानपुर बाली, “हे बहिन तोहर ई नेना, नेना नै बूढ़बा छौ।” माए, “किएक की भेलै।” भगवानपुर बाली, “सगरो मेला घूमक बादो किएक एक्को पाइ खर्च करत, नै खिलौना, नै मिठाइ, नै कोनो खाए पीबक चीज, भरि मेला पाइकेँ मुठ्ठीमे दबने चूपचाप सभ वस्तुकेँ देखैत रहेए।” माए, “किएक बौआ, किछु खेलएँ पीलएँ किए नै।” नेना चूपचाप अपन हाथ पाछू केने ठार। माएकेँ चूप भेला बाद अपन हाथकेँ पाछुसँ आगू अनि, हाथमे राखल डिब्बा माएकेँ दैत, “ई” माए डिब्बाकेँ देख कए, “ई चप्पल, केकरा लेल ?” नेना, “तोहर लेल, तुँ खाली पेएरे चलैत छलेँ ने।” माए झट नेनाकेँ अपन करेजसँ लगा सिनेह करैत, “हमर सोन सन नेना, भरि दिन भूखे पियासे अपन सभटा सऽखकेँ मारि कए हमर चिन्ता कएलक, हमरो औरदा लए कऽ जीबए हमर लाल।” आस्था डोकहर राजराजेश्वर गौरी शंकरक प्राचीन आ प्रशिद्ध मंदिर। मंदिरक मुख्यद्वारकेँ आगू एकगोट अस्सी-पच्चासी बरखक वृद्धा, सोन सन उज्जर केश, शरीरक नामपर हड्डीक ढांचा, डाँर झुकि गेल। मुख्यद्वारक आँगाक धरतीकेँ बाहरनिसँ पएर तक झुकि कए बहारैत। ‘अ’ आ ‘ब’ दुनू परम मित्र, एक दोसरक गुण दोषसँ परिचीत, दुनू संगे मंदिरक आँगासँ कतौसँ कतौ जा रहल छलथि। मंदिरक सोंझाँ अबिते देरी ‘अ’ दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम कएलनि। ‘ब’ सेहो तुरंते दुनू हाथ जोड़ि, झुकि कए मोने-मोन स्तुति करैत ओतुका धरतीकेँ छुबि माँथसँ लगा ओहि ठामसँ आगू बिदा भेला। ओतएसँ दस डेग आगू गेलाक बाद ‘ब’, ‘अ’सँ, “हे यौ अहाँ कहियासँ एतेक आस्तिक भऽ गेलहुँ, जे मंदिरक सामने जाइत मातर कल जोड़ि लेलहुँ ओहो हमरासँ पहिले।” आगू आरो चुटकी लैत, “भगवानो देख कए हँसैत हेता जे देखू ई महापातकी आइ आस्तिक भऽ गेल।” ‘अ’ शांतिकेँ तोरैत, “पहिले तँ ई अहाँकेँ के कहि देलक जे हम नास्तिक छी, हमहूँ आस्तिक छी, हमहूँ देवता पितरकेँ मानैत छी परञ्च अहाँक जकाँ पाखण्डी नै छी। अंतर एतवे अछि जे अहाँ मंदिर मंदिर भगवानकेँ तकैत रहै छी, हम हुनका अपन मोनमे तकैत छी आ अपन करेजामे बसेने छी। आ रहल एखनका गप जे हम मंदिरकेँ सामने हाथ जोड़लहुँ, ओ तँ हम सदिखन अपन मोनमे बसेने हुनका हाथ जोड़ैत रहैत छी मुदा एखुनका हाथ जोड़ब हमर भगवानकेँ नहि, भगवानक ओहि भक्तकेँ छल, ओहि बृद्धाकेँ जिनक बएसकेँ कारने डाँर झुकि गेल रहनि मुदा एतेक अवस्थोमे भगवानक प्रति एतेक अपार श्रधा भक्ति, कतेक प्रेमसँ मंदिरक मुख्यद्वार बहारि रहल छली। हम ओहि भक्तक भक्तिकेँ, हुनक भगवानक प्रति आस्थाकेँ, हुनक बएसकेँ नमन केने रही।” महगाइ परदेश दिल्लीमे। नेना अपन माएसँ, “माए सभक बाबा-बाबी ओकर संगे छथि, हमर बाबा-बाबी हमरा सभक संगे किएक नहि छथि ?” माए, “बौआ अहाँक बाबा-बाबी अपन गाममे छथि।” नेना, “तँ हुनका सभकेँ अतए किएक नहि लए अनै छियनि, हमरा मोन होइए हुनका सभ संगे रहि हुनका सभ संगे खेलाइ।” माए, “देखै छियै एतेक महगाइमे अपने गुजारा नहि भए रहल छै हुनका सभकेँ अनबन्हि तँ हुनकर गुजारा कोना होएत।” नेना, “ई महगाइ बड्ड खराप चीज छै ने माए ?” माए, “हाँ बौआ।” नेना, “तखन तँ ई एकदिन अहूँ सभकेँ हमरासँ दूर कए देत ?” बुढ़ारीक डर नेना, “माए बाबीकेँ हमरा सभसंगे भोजन किएक नहि दै छियनि ?” माए, “बौआ बड्ड बुढ़ भेलाक कारणे हुनका अपन कोठलीसँ निकलैमे दिक्कत होइत छनि तैँ दुवारे हुनकर भोजन हुनके कोठरीमे पठा दै छियनि।” नेना, “मुदा बाबी तँ दिन कए बारीयोसँ घुमि कऽ आबि जाइ छथि तखन भोजनक समय एतेक किएक नहि चलल हेतैन।” माए, “एहि गप्प सभपर धियान नहि दियौ, एखन ई सभ अहाँ नहि बुझबै । बुढ़ सभकेँ एनाहिते है छैक।” नेना, “अच्छा तँ अहुँक बुढ़ भेलापर अहाँक भोजन एनाहिते एसगर अहाँक कोठरीमे पठाएल जाएत।” अबोध नेनक गप्पक उत्तर तँ माए नहि दए सकलखिन मुदा अगिला दिनसँ बाबीक भोजन सभक संगे होबए लगलन्हि। पूजा एकटा साठि-बासठि बर्खक दाइ पोखरिसँ लोटामे अछिन्जल भरि जेना ने मोहारसँ बाहर निकलि मन्दिर दिस बढ़ली की तखने एकटा ७-८ बर्खक माति कादोमे सनल नेना आबि दाइ केर नुआ पकरि, “दाइ बड्ड भूख लागल अछि किछु खाए लेल दे ने।” दाइ सिनेहसँ नेनाक माथपर दुलार करैत, “आहा, नेन्नाकेँ भूख लागल अछि चलू एखने दै छी।” ई कहैत दाइ नेनाकेँ मन्दिरक असोरापर लए जा कए अपन झोरासँ चुरा चीनी निकालि आ दुकानसँ १०० ग्राम दही किन ओहि नेनाकेँ सिनेहसँ खुएलनि। खेला बाद तृप्त भए ओ नेना फूड़सँ हँसैत भागि गेल। दाइ फेरसँ पूजा करैक हेतु पोखरिसँ जल भरि मन्दिरमे आबिए रहल छलीह कि एकता दोसर दाइ जे की हुनका ओहि नेनाकेँ कनीक पहिने खुआबैत देखने रहथि, “ई कि बहिन, बटूक खुएला बाद पूजा।” “बटूक ! नहि बहिन, ओ तँ ओनाहिते ओहि नेनाकेँ भूख लागल छलै आ घरसँ हम अपन जलखैकेँ लेल चुरा चीनी अनने रहि से ओहि नेनाकेँ खुआ देलिऐ आब पूजा करै लेल जा रहल छी।” हुनक दुनू केर ई गप्प सुनि आ देख कए मन्दिरक एकटा पण्डा, “माए आब तुँ की पूजा करबअ, तोहर पूजा तँ भए गेलह, तुँ जाहि नेनाकेँ भोजन करेलह ओ कियोक आर नहि स्वम जगदीश्वर नेनाक भेसमे छलथि। तोहर भक्ति आ भगवानक लीला दुनूकेँ शत-शत प्रणाम।” न्याय मुखिया जीक दलानपर भोरे भोरे अन्हरोखे भीर लागल। तीन चारि गोटे एकटा स्त्रीकेँ पकरि कए अनने आ कहैत ई चोरनी अछि। ई चोरनी मुखिया जीक खेतसँ धान काटि कए ल जा रहल छल। सबूतक तौरपर एकटा धानक बोझ सेहो संगे उठा कए अनने। चोरनीकेँ देखैक बास्ते भीर लागल मुदा ओ अधबेसु स्त्री जेकरा की सभ चोरनी कहैत छल अपन नुआंसँ लाजे नीकसँ मुँह झपने। भीरमे सँ एकटा, “राम राम स्त्री भए कए चोरी।” दोसर, “देखै की छी एकरा देहपर दू बाल्टी पानि ढारि कए घोरनक छत्ता झारि दियौ।” तेसर, “ओइ सभसँ किछु नहि होएत, एकर केश काइत मुँह रंगि भरि गाम घुमेएल जए।” चारीम, “सबसँ पहिले मुँह उघाइर, ई तँ देखल जेए की ई अछिकेँ।” सभ एक्के संगे, “हाँ हाँ पहिने मुँह तँ उघारु।” एक गोटा, “चोरी करैत काल लाजे नहि एखन केहन लाजवंती बनल अछि।” ई कहि ओ स्त्रीक दिस बढ़ैक चेष्टामे अछि, ओकर हाथ स्त्रीक मुँहतक पहुंचैऐ बला छल की, “रुकू !” मुखिया जीक रौबदार आवाज आएल। ओहि व्यक्ति केर डेग आ हाथ दुनू ठामे रूकि गेल। सभ चुप्प। वातावरणमे पीनड्रॉप साइलेंश। मुखियाजी आबि, अप्पन कुर्सीपर बैसैत, “कि भए रहल छै, आ अपने बड्ड पुरुषमान बनै छी ? एकटा स्त्रीक लाज, ओकर मुँह देखैक चेष्टा कए रहल छी। छीः डूबि कए मरि जाउ। एकरामे आ अहाँमे भेदे की रहल। ओनाहितो एकर चोरी करैक कोनो कारण हेतै मुदा अहाँ सभ बिना कारणे एकटा मूकस्त्रीक अपमान करैपर उतारू छी।” “मालिक ई चोरनी अहाँक खेतसँ धान काइत कए ल जा रहल छल ...।” मुखियाजी अपन पाँचो आंगुरसँ चूप होबैक संकेत दैत, आगू, “हाँ दाइ, तोरापर लगाएल गेल आरोप सत्य छै की असत्य।” “मालिक ई गप्प सत्य छै।” चोरनीकेँ मुँहसँ एतेक सुनति, सभ एकसंगे, “चोरनी चोरनी चोरनी.... एकरा पुलिसकेँ हबाले कए दिअ।” मुखियाजी जोरसँ, “चूप्प” सभ सकदम आगू, “धान केकर कटलकै, हम्मर की तोहर सभक, मुखिया के हम की दुँ सभ ... तखन एतेक हल्ला किएक। (स्त्रीसँ ) हाँ दाइ, चोरी तँ तुँ अपन स्वीकार केलह, आगू कोनो सफाइ।” स्त्री, “मालिक, घरबला एक बर्ख पहिले शराब पी-पी कए मरि गेल। घरमे चारिटा छोट छोट बच्चा भूखे, अन्नकेँ एकोटा दाना नहि। ओकरा सभक भूखसँ बिलखैत मुँह नहि देखल गेल तैँ एहन सहाश कएलहुँ।” सभ सकदम, मुखियोजी चुप। मुखियाजी एकटा नम्हर हुँकार लैत, “हूँऽऽ ठीक छै। तोहर ई पहिल अपराध क्षमा कएल जाइ छ। रामअवतार, (अपन नोकरकेँ अबाज दैत) एकर बच्चा सबकेँ लेल एक मोन धान बोरामे बान्हि दए दहक। आओर हाँ ! दाइ तुँ, आगूसँ कहियो भविष्यमे एहन काज नहि करियह। एहिठाम तोहर परिचय गुप्त रहै तैँ कारण हम नाम गाम नहि पूछे छिअ मुदा कखनो भविष्यमे जरूरत परअ तँ (अपन जेबीसँ एकटा दस रुपैयाक नोटपर शाइन कए क दैत ) एकरा दखा कए हमरासँ बेरोक टोक मदत लए सकै छ।” ई कहि ओ अपन कुर्सीसँ ठार भए गेला। झिमनी बाली “आलू कोबी झिमनी लेबै यै ?” साठि बासठि बर्खक बुढ़ी कुजरनी माथपर पथिया रखने किलोल करैत। “यै झिमनी बाली, एम्हर आबू।” “एलहुँ बौआ।” “चलू हमर अँगना माए झिमनी लेतै।” अँगना आबि, “आलू कोबी झिमनी लेबै यै कनियाँ।” “हाँ यै, बैसथुन्ह अबै छी।” कुजरनी दाइ, माथसँ पथिया उतारि, माथक बिड़ा पोन तरि राखि बैसला बाद, “की लेबै?” “कनी झिमनी लेबै, की भा दै छथिन।” “अहाँ लिअ ने भा की, बस एहि बुढ़ारीमे कोनोना दुनू साँझक भोजन पार लागि जे।” “से कि दाइ, बेटा पुतहु नहि देखै छथि।” “ओ सभ की देखत, आ जँ देखति तँ एहि बएसमे आइ ई पथिया लऽ कऽ घुमतहुँ ?” वारेंट रातिक आठ बजे, दूटा पुलिस कांस्टेबल आबि घरक गेटकेँ पुलिसीया ठेंगासँ खटखटा कए अबाज दैत, “रजिया बानो।” “जी।” भीतरसँ एकटा २३-२४ बर्खक सुन्नर युवती बाहर आबि। “अहाँ, रजिया बानो।” “नहि, हमर माए रजिया बानो, की बात कहुँ।” “हुनकापर कम्पलेन छनि थाना जाए परतैन्हि।” “किएक।” “ओ ओतए जा कए पत्ता चलत, बड़ा साहबक हुक्म छनि।” “अपने लग वारेंट अछि।” “नहि।” “तहन मुँह उठा कए किएक आबि गेलहुँ, भारतीय दण्ड संहिताक हिसाबे सभसँ पहिने अहाँ लग वारेंट होवा चाही, दोसर कोनो महिलाकेँ साँझकेँ बाद थाना नहि लए जा सकै छी, तेसर यदि अहाँ वारेंट लएयो कऽ दिन देखार अबै छी तँ एकटा महिलाक गिरफदारी एकगोट महिले कांस्टेबल लए सकैत अछि, पुरुष नहि। (दुनू कांस्टेबल काठक उल्लू जकाँ सुनैत, आगू) पुलिस कांस्टेबल होबैक नाते अपनेकेँ एतेक कानून तँ बुझले होएत आ नहि तँ हम एखने १०० न०पर पुलिस कंट्रोल रूममे रिपोर्ट दर्ज कराबै छी, डिपार्टमेंट अपने अहाँ दुनूकेँ कानून बता देत।” बतीया “बतीयासँ लदल झिमनीक लत्ती छल, काइल्ह टिकलागाम बाली अप्पन कनखी आँखिसँ देख कि लेलनि राति भरिमे सभटा बतीया गलि गेल।” “की माए अहुँ कएहेन-कएहेन बातपर विश्वास करैत छी। ककरो तकलासँ बतीया वा लत्ती किएक गलतै। ई एनाहिते बदलैत मोसम, कीड़ा आदिक प्रकोपे बतीया गलि गेल हेतै।” “हाँ, तूँसभ दू अक्षर पढ़ि की लेलह सभटा तूँहीँ सभ बुझै छहक। हम सभ तँ जेना रौदेमे अप्पन केश पका लेलहुँ, आब तूँहीँ सभ सीखेबअ कि नीक आ की बेजए।” सभसँ प्रिय बस्तु दादाजी दिन भरिकेँ थाकल झमारल घरमे अबैत छथि। हुनका बैसति देरी दादीक तेज स्वर गुइज उठै छनि, " आबि गेलहुँ दिन भरि बौवा कए। ई जे दिन भरि छिछियाइत रहै छी से एहि मिथिला मैथिलीसँ की घरक चूल्हो जड़त।" दादाजी शांत गंभीर होइत, "चूल्हा तँ नहि जड़त मुदा हमर सभ्यता संस्कृति हमर माएक भाषा जे हमर सभक हाथसँ छूति रहल अछि एनाहिते छुटैत रहल तँ एक दिन लोप भए जाएत आ एहन अवस्थामे कि जरुड़ी अछि ? घरक चूल्हा जड़ेनाइ की अपन माति पानि सभ्यता आ सरोस्वतीक कंठसँ निकलल मैथिलीक मिझएल आगिकेँ जड़ा कए प्रचंड केनाइ।" दादीजी हुनकर गप्प सुनि चुप्प। ओ शाइद सभ्यता संस्कृति माएक भाषा माति पानि एहेन भारी भारी शव्दक कोनो अर्थ नहि बूझि पएलि मुदा दादाजीक छोड़ैत साँससँ एतेक तँ अबस्य बूझि गेलि जे हुनकासँ हुनक कोनो सभसँ प्रिय बस्तु दूर भए रहल छ्लनि। अहाँक मैथिली बड्ड कमजोर अछि “अहाँक मैथिली बड्ड कमजोर अछि।” “धूरि बुरि कहीँक, हमर मैथिली बड़ कमजोर अछि। कमजोर की तागतवर केहनो अछि तँ, आ जकरा लग किछु छै हे नै। जे जिनगी भरि अंग्रेजी वा हिंदीक घड़ीघंटा बन्हने अपनो घुमैत रहैए आ दोसरोकेँ ओहे सिखाबैत रहैए ओकरासँ तँ नीक। रहल हमर खराप मैथिलीक गप्प तँ जखन मनु एहन लोक मैथिलीक मओ नै जनै वला आइ अ०आ० केँ पाँछा घुमि गजलक सेकड़ा टपि गेल। लोशन कुमार मैथिलक म-थ म-थ करैत आइ मैथिल नाम राखि सभकेँ मैथिली सिखाबैए तखन तँ हमर कमजोरे अछि।” जादूक छड़ी चुनाब प्रचारक सभा। जनसमूहक भीर उमरल। नेताजी अपन दुनू हाथकेँ भँजैत माइकमे चिकैर-चिकैर कए भाषण दैत, “आदरणीय भाइ-बहिन आ समस्त काका काकीकेँ प्रणाम, एहि बेर पुनः अपन धरतीक एहि (अपन छाती दिस इशारा कए) लालकेँ भोट दए कऽ जीता दिअ फेर देखू चमत्कार। कोना नै सभक घरमे दुनू साँझ चूल्हा जरऽत। कोना कियो अस्पताल आ डॉक्टरक अभाबमे मरत। हमर दाबा अछि आबै बला पाँच बर्खमे एहि परोपट्टाक गली गलीमे पक्का पीच होएत। युवाकेँ रोजगार भेटत। बुढ़, बिधवा आर्थिक रूपसँ कमजोर वर्गक लोककेँ राजक तरफसँ पेंशन भेटत। भुखमरीक नामो निशान नहि रहत। बस ! एक बेर अपन एहि सेबककेँ जीता दिअ।” थोपरीक गरगराहटसँ पंडाल हिलए लागल। नेताजी जिन्दाबादक नारासँ एक किलोमीटर दूर धरि हल्ला होबए लागल। भीरमे सँ निकलि एकटा बुढ़ मंचपर आबि, “एहि सभामे उपस्थित सभ गण्यमान आ आदरणीय, नेताजी एकदम ठीक कहैत छथि।” ततबामे नेताजीक चाटुकार सभ, “वाह–वाह, बाबा केर स्वागत करू।” पाछूसँ दू तीनटा कार्यकर्ता आबि बाबाकेँ मालासँ तोपि देलकनि। बाबा अपन गरदैनसँ माला निकालि कए, “नेताजी एकदम ठीक कहैत छथि। एतेक रास असमान्य कार्य हिनकर अलाबा दोसर कियो कैए नहि सकैत अछि। जे काज ६६ बर्खमे नहि भेल ओ मात्र पाँच बर्खमे भए जाएत किएक की ओ जदुक छड़ी मात्र हिनके लग छनि जे एखने एहि सभामे अबैसँ पहिले भेतलन्हिए।” अनचिन्हार “मनुखक बच्चा गिदरक झुण्डमे पोसा कए जेना बिसरि जाइत छै जे ओ गिदर नहि मनुख छैक तेनाहिते हम अप्पन ३९ बर्खक अवस्थामे पाछुक ३० बर्ख दिल्लीमे रहैत-रहैत बिसरि गेलहुँ जे हम दिल्लीकेँ नहि पवित्र मिथिला भूमिक संतान छी। धन्य छथि अनचिन्हार जे हमरा एहिसँ चिन्हार करेलनि।” प्रेम “अहाँ हमरासँ कतेक प्रेम करैत छी ?” “प्रेम तँ बड्ड करै छी, मुदा कतेक से कोना कहु, प्रेमक कोनो पैमाना तँ छैक नहि।” “तैयो... !” “हाँ एतेक जरुर कहब, अहाँ बिनु आब जीब नहि सकैत छी।” सनेस “अहाँ हमरा सनेसमे की देब ?” “हम दऐ की सकै छी ? हमरा लग अछिए की ? मात्र सिनेह अछि, प्रेम अछि अहाँक लेल शुभकामना अछि। पाइ तँ नहि अछि मुदा पिआर दए सकै छी सम्मान दए सकै छी।” “वस ! वस ! हमरा अओर किछु नहि चाही। अहाँक ई पिआर अहाँक सिनेह अहाँक शुभकामना एकर कोनो मोल नहि अछि ई तँ अनमोल अछि। अहाँ भेट गेलहुँ हमरा दुनियाँक सभ खुशी भेट गेल।” छबी ब्याहक पन्द्रह बर्ख बाद सा० हमर पर्स केर तलाशी लैत, “सभ कियो अप्पन अप्पन पर्समे अपन कनियाँक फोटो रखने रहैए मुदा अहाँ.....!” “पर्समे फोटो रखैक बेगरता ओकरा परै छैक जकरा अपन कनियाँक छबी इआद नहि भेल होए, हमरा तँ अहाँक छबी हमर आँखिक रस्ता होइत हमर करेजामे जा बसल अछि। एहनठाम ई कागजक फोटो राखैक की बेगरता।” मनोरथ “हमर मुइला बाद..... जँ हम जंगल वा कोनो प्राकृतिक आपदामे मरी तँ, जंगलक जानवर अथवा चील कौआकेँ छूट जे हमर देहकेँ नोचि नोचि कए खा जए... मुदा प्राथना जे हमर आँखिकेँ छोरि दए। दुख हमर आँखिक नहि, हमर आँखिमे बसल हमर प्रीतमक छबी खराप होबैकेँ अछि। जँ हम सड़क दुर्घटनामे मरी तँ, एहि देहके आगिकेँ समर्पित करैसँ पहिने हमर आँखिकेँ कोनो खगल नेनाकेँ दान कए देल जाए, कारण हम नहि तँ हमर आँखि;.... नम्हर उम्र धरि प्रीतमकेँ ताकैत रहे। आ जँ हम वयोवृद्ध भए कऽ मरी, प्रीतमसँ पहिने तँ प्रीतमक घरक पाछू हमर सारा बने, आ प्रीतमक बाद तँ हमर सारा हमर प्रीतमक सारा संगे बने।” मौहक मौहककेँ बिध होइत। वर कनियाँ खीरक थारीक आगू बैसल। चारू कातसँ कनियाँक सखी सहेली आ गामक स्त्रीगण घेरने। एकटा, “गे दाए ! ओझाजी तँ चुपचाप बैसल छथि।” दोसर, “लगैए रुसल छथि।” तेसर, “हाँ यौ ओझाजी ! किछु चाही-ताही तँ माँगि लिअ।” हा हा हा .... सभ एक्के संगे हँसए लगली। दोसर, “हिनकर ससुर तँ एतेक शुद्धा छथिन जे बिन माँगने किछु नहि भेटै बला।” ओझाजी, “की माँगू, अपन बेटी देला बाद आब हुनका लग बैँचिए की गेलैनि।” मौसी पहिल सखी, “गे दैया ! ई तँ बाँस जकाँ पातर छथि।” दोसर सखी, “यौ ओझाजी ई केहन देह बनोने छी।” तेसर सखी, “लगैए माए दूध नहि पीएलकनि।” चारीम सखी, “हाँ यौ ओझाजी, माए बिशुकि गेल रहथि की।” पाञ्चम सखी, “नै गै हिनकर माए दूध बेचै छलखिन।” सभ एक्के संगे, “हा हा हा ......” नबका ओझाजी, रातिमे व्याह भेलन्हि आ आइ बेरुपहर कनियाँक सखीसभ चारू कातसँ घेर कए हँसी ठिठोली करति। ओझाजी बौक जकाँ सबटा सुनैत। एकटा सखी फेरसँ, “लगैए हिनकर माए बजहो नहि सिखेलखिन।” ओझाजी कनीक मुँह उठा कए, “आब एतेक रास मौसी लग कोना बाजू।” सभ सखी एक्के संगे, “मौसी ! मौसी कोना।” ओझाजी, “अहाँ सभकेँ हमर माएक सभ गप्प बुझल अछि अर्थात हमर माएक संगी सभ छी तेँ एहि हिसाबे अपने सभ भेलहुँ ने हमर मौसी।” कनियाँ दाइ अपन दियादनीमे सभसँ छोट रहला कारणे कनियाँ आ एखन सभक दाइ तेँ दुनू मिल कए कनियाँ दाइ। अपन अवस्थाकेँ अपनासँ पाछू छोरैत एखन साठि बर्खक अवस्थोमे चंचलता आ हाजिर जवाबीमे कोनो अंतर नहि। केशवक पाँचो भाइक उपनैन। आगू आगू पाँचो बरुआ पाछू ढोल पिपही बजैत रमनगर दृश्य। कनियाँ दाइ एहि अबसरपर कतौ अपन व्यस्तताकेँ कारणे देरी भए गेली। हरबराइत दौरैत अँगना पहुँचक चेष्टामे डौढ़ीपर बरुआ केशवसँ आमने सामने टकरा गेली। अपनाकेँ सम्हारैत झटसँ, “बुढ़ीयासँ टकरा कए की भेटतौ कोनो छौंड़ीसँ टकराअ तँ किछु भेटबो करतौ।” हुनक गप्प सुनि सभक मुँहसँ हँसीक ठहाका छुटि गेल। चानबाइ “चानबाइ, माय डार्लिंग, एकटा तोरे लग आबि सगुण भेतैए बाँकी तँ दुनियाँ सभ मतलबकेँ अछि। बाबूकेँ महिने महिने तनखा जँ नहि दियौ तँ निक्कम्मा हरामी। माएलग कनियाँकेँ गरियाबू नहि तँ जोरुक गुलाम । कनियाँकेँ नव नव गहना दियौ आ माएक बुराइ सुनू नहि तँ डरपोक। हम भरि जीवन सभक सुनिते रहू हमर कियोक नहि सुनत। बस, एकटा चानबाइ, एहिठाम कोनो शिकाइत नै, कोनो कमी नै, मात्र हम आ चानबाइ दोसर केकरो गप्प नहि। आइ लव यू चानबाइ, (बोतल हिलाबैत) ई की चानबाइ, नै तुँहूँ रुसि रहलअ, एतेक जल्दी खत्तम।” अपने खसल धम्म, दोसर कात चान मार्काक देशी दारूक खाली बोतल गूरकल। मुँह झौंसा “गै दैया ! एतेक आँखि किएक फूलल छौ ? लगैए राति भरि पहुना सुतए नहि देलकौ।” “छोर, मुँह झौंसा किएक नहि सुतए देत, अपने तँ ओ बिछानपर परैत मातर कुम्भकरन जकाँ सुति रहल आ हम भरि राति कोरो गनैत प्रात केलहुँ।” अगिला जनम “डाँड़ टूटल जाइए भरि राति सूतलहुँ नहि। बड़ हरान करै छी, अगिला जनममे अहाँ हिजड़ा होएब जे कोनो आओर मौगीकेँ एना तंग नहि कए सकब।” “ठीक छै ! अगिला जनम अगिला जनममे देखल जेतै, एहि जनमक आनन्द तँ लए लिअ। आ अगिला जनममे ओहि हिजड़ाक ब्याह जँ अहीँ संगे भए गेलहि तँ।” दू बर्ख बड्ड नम्हर है छैक “सुनलीयै बलचनमाकेँ बेटा भेलैए।” “हाँ, सुनलीयै तँ हमहूँ।” “राम-राम घोर कलियुग आबि गेलहि।” “एहिमे कलियुग आ द्वापरकेँ की गप्प भेलै।” “भेलै नहि, बलचनमा अपने दू बर्खसँ गुजरातमे पेट पोसने अछि आ एहिठाम ओकर कनियाँकेँ बेटा भेलै, ई कलियुग नहि तँ सत्ययुगक गप्प भेलै।” “यौ महराज अहाँ किएक एतेक हिसाब किताब रखै छी। बलचनमाकेँ बेटा भेलै तँ भेलै। ओना ई गप सभ कलियुगक नहि द्वापरे त्रेताक छीयैक। बिसरि गेलियै राजासुधन्वा - मत्स्यगंधा आ व्यास जन्मक कथा। जखन ओहि कालमे पातपर वीर्य राखि पठावल जा सकैत छल तखन तँ आइ फेक्स आ ई-मेलक जमाना छैक आ सत्यक धरातलपर आउ तँ तीन महिनामे बकरीयो मिमिए लगै छै। ओनाहितोँ दू बर्खक समय बड्ड नम्हर है छैक।” मोनमे बसै केर रस्ता “ई केहन भेष बनोने छेँ, भगवान एहन सुन्नर रूप रंग देने छ्थुन एकरा बना-सुना कए राख।” “की दी, केकरा लेल रंग रूप आ केकरा लेल श्रृंगार। सुनने नै छी ‘पिया मोर आन्हर करू श्रृंगार केकरा लेल’ आ हमर पिया तँ आँखि रहितो एको बेर मुँह उठा हमरा दिस देखतो नहि छथि।” “धूर पगली एहिसँ तँ आओर दुरी बढ़तौ। सुन, पुरुखक मोनमे बसै केर दूएटा रस्ता छैक। पेटसँ आ बिछानसँ।” “मने।” “मने की, पेटसँ मने एहन नीक नीकूत बना कए हुनका खुआबहुन जे पशीन होइन। भोजनक प्रशंशा संगे तोहर प्रशंशा आ जखने प्रशंशा तहने हुनक मोनक भितर। आ बिछानसँ मने, बिछानपर जएसँ पहिने एतेक सजि धजि कए जो जे हुनका देखैत मातर हुनक आँखिक रस्ते हुनक करेजामे घुसि जो आ एकबेर ई अबसर भेटलाबाद स्वर्गक भोग करा दिओन तहन देखू कोना नै तुँ हुनक मोनमे आ ओ तोहर चारूकात चक्कर लगाबैत, हाँ हाँ हाँ....।” “धत्त दी अहूँ।” नम्हर झोरा “कि मालिक हमर छौंरा आएल रहै समान नहि देलहक।” “ए रानी तोरा लेल समानकेँ कतए मनाही छै, बस ई चानसन मुँह देखैक लौलसा रहेए आ रानी तोरासँ पाइ तँ मँगैत नहि छियौ तहन अपन सेबासँ बंचित किएक कए देलह।” “राम राम मालिक, केहन गप्प करै छ ओ तँ एखन गुजरातसँ हमर मरदाबा आएल छै ओकरा बाद तँ ई गुलाबो आ तुँ .....। अच्छा मालिक आब हम जाइ छी छौंराकेँ पठा देबै।” “हाँ हाँ रानी किएक नहि, संगमे नम्हर झोरा दऽ दिहै।” प्रेम दीवानी “अरे ! अरे ! रुक ई की भऽ रहल छै ! तूँ सभ एक संगे एतेक रास सामूहिक आत्मदाह !” “हम सभ प्रेम दीवानी, प्रेमकेँ अंतिम छोर पावै लेल जा रहल छी मुदा अहाँ अपस्वार्थी मनुख एहि प्रेमकेँ नहि बुझब अहाँ सभ तँ प्रेमोमे नफा नुकशान तकै छी।” डिबियाक लोऽपर भन्नाइत फतिन्गाक झुण्डमे सँ एकटा धीरेसँ हमर कानमे भनभना कए कहि डिबियाक आँचपर जा जरि गेल। नीक “अहाँसँ भेट कए कऽ हमरा एतेक नीक किएक लगैए।” “किएक तँ अहाँसँ भेट कए कऽ हमरो बड्ड नीक लगैए।” पिआर “जे हमरासँ पिआर करत ओ हमर मोन मे दर्पण जकाँ देख सकैत अछि आ हम ओकर आँखिमे हरा कए अपनाकेँ बिसैर सकैत छी।” पहिल राति रातिकेँ करीब साढ़े इग्यारह बजे, घरक पाछूक बड़ीसँ कुकुरकेँ कानैक स्वर सुनाइ दऽ रहल छलै। “कि एहि अँगनामे कएकरो अकाल मृतु भेल छलै।” कनियाँ अप्पन वरसँ पुछ्लनि, जिनक ब्याह सात दिन पहिने भेल छल। आइ दुरागमन आ कनियाँक ससुरक पहिल राति। केखनो -केखनो आँगनमे कएकरो पएरक चलैक अबाज । दुपहरिया रातिक डराउन चुप्पीमे ओ नव जोड़ा जागैत चुप-चाप परल। कौआक काँव-काँवसँ भोरक पहिल इजोतक आगमन। दिनक पहिले उखराहामे बर, एकटा पहुँचल वैदक दुकानपर। सामने दुकानक साइन बोर्डपर लिखल ‘शर्तिया मरदाना ताकतकेँ लेल संपर्क करू’। अन्तिम प्रेम कनाट प्लेस। कॉफी हॉउसक आँगन कएकरो इंतजारमे टाइम पास करैत कॉफीक चुस्कीक आनन्द लैत। हमर सामनेक खाली कुर्सीपर करीब १५ बर्खक कन्याँ आबि बैसैत, “अहाँकेँ खराप नहि लगे तँ हम बैस रही।” “किएक नहि।” ओ बातूनी कन्याँ एकपर एक सबाल दागैत, “लगैए अहाँ कोनो MLM बिजनेसमे छी।” “हाँ।” “ओ माइ गॉड, MLM हमर फेबरेट विषय अछि। हम बारहवीँमे पढ़ै छी, हमरो इक्षा अछि जे ग्रेजुएशनकेँ संगे MLM बिजनेस कए कऽ टाइम फ्रीडम आ मनी फ्रीडम पाबी।” पता नहि आओर की की बतियाइत ओ बातूनी अंतमे हमरा थेंक्स कहि ओहिठामसँ चलि गेल। ओकर गेलाक बाद हमर भीतरक शैतान जागल, “हमर अंतिम अवस्थामे, हमर अंतिम प्रेमक अंतिम नाइका कोनो एहने १५-१६ बर्खक बातूनी हेबाक चाही।” अबूझ “हमरा संगे सदिखन ऐना किएक होइए, जे मोनमे अछि कहि नहि सकै छी, जे कहैत छी ओ किओ बुझैत नहि अछि आ जे किओक बुझैत अछि ओ हम कहैक नहि चाहैत छी।” खापरि धिपा कए “यै छोटकी कनियाँ, सुनै छीयै ललिताक वर एलखीन्हेँ जाउ हुनकासँ कनीक नीक मुँहें हँसि बाजि लियौन, खुश भए जेता तँ टिकुली सेनुर लेल किछु दएओ कए जेता।” “एहन हँसै बजै बला आ खुश होएबला मरदाबाकेँ हम खापरि धिपा कए चेन नहि फोरि देबैन, अप्पन जमएक बड़ चिंता छनि तँ अपने जा कए किएक नहि खुश कऽ लै छथि।” पिआस “की यौ ललनजी एना टुकुर टुकुर की तकै छी ?” अप्पन गामक मुँहलागल भाउजक मुँहसँ ई सुनि ललन एकदमसँ सकपका गेला, जिनका कि बहुत कालसँ घुरि रहल छल। “नहि किछु नहि।” “धूर जाऊ ! इनार लग पिआसल जाइ छै की पिआसल लग इनार। अहाँ एहन पहिल मरद छी जकरा लग इनार चलि कए एलैए आ एना टुकुर टुकुर तकने कोनो पिआस मिझाइ छैक की ? पिआस मिझाबैक लेल इनारमे कूदए परैक छै।” पुरुषार्थ बांसक करचीपर झिमनीक लत्ती जकाँ एक दोसरसँ लपटेएल, “की हम सभ जे ई कए रहल छी ठीक छैक..... जँ भैयाकेँ बुझहएमे आबि गेलनि तँ ?” “बुझथीन कोना, कहबनि तँ हमहीँ आ जँ अहाँ हमरा एनाहितेँ खुश राखब तँ हम कहबे किएक करबनि। दोसर अहाँक भैयाकेँ जँ एतेक पुरुषार्थ रहितैन तँ आइ एकर नौबते किएक अबितेए।” बीमारी आइ साँझू पहर सा०केँ हुनक भेए संगे गामक लेल बिदा कएला बाद हम सिगरेट खरीदक इक्षासँ अप्पन घर प्रथम तलसँ निच्चाँ उतरलहुँ किएक तँ राति भरि लेल जे सिगरेट बचा कए रखने छलहुँ आजुक राति पर्याप्त नहि होएत। “शराब ! अओर.... नहि, सिगरेटसँ काज चलबअ परत।” हमर शरीर एहिठाम परञ्च मोनक चिड़ै सा०केँ पाछू पाछू। हमर मोन कनिको नहि लागि रहल अछि। राति भरि आँखिमे नीन्न नहि। बर्खाक पट-पटकेँ स्वर कानमे बम जकाँ फाति रहल अछि। दूर सड़कपर चलैत गाड़ीक अबाज ओनाहिते सुनाइ दए रहल अछि। केखनो केखनो मच्छरक संगीत संगे बाहर नालीसँ फतिंगाक गाबैक अबाज, जे शाइद झींगुर हुए अथवा कोनो अओर। कीट फतिंगाक अबाज चिन्हैमे हम बड्ड नीक नहि। भोरे आठ बजे उठै बला आइ पाँचे बजे उठि कए धियापुताकेँ इस्कूल जेए लेल जगाबैए लगलहुँ। धियापुता नित्य क्रियामे लागि गेल आ हम सोचए लगलहुँ, “एसगर एना कतेक दिन, ई तँ बीमारी छी, सा०केँ बिन नहि रहैक बीमारी।” पुरखक सोभाब “जखन अहाँ नैहर गेल रही, अहाँक घरमे रंग बिरंगक नव-नव मौगी सभ अबैत छल सम्हैर कए कियो कोनो दिन अहाँक दूल्हाकेँ उड़ा कए नहि लए जेए।” “हा हा....., अहाँ जुनि चिन्ता करू हम्मर ओहेन नहि छथि।” “अहाँ नहि बुझैछीऐ ! जएकर कनियाँ एहिठाम नहि छैक तकर घरमे भला अनेरेकेँ बिना कोनो सरोकारे मौगीसभ किएक एतै आ कोनो पुरखकेँ कम नहि बुझिऐ। कुकुरक नाँगैर आ पुरखक सोभाब कहियो सोझ नहि भए सकै छैक, जिम्हरे हरियरी देखलक उम्हरे गुरैक गेल।” वर्तमान गरीब बापक बेटी सोनमती। अर्थक अभाबे पच्चीसम बर्खक बएसमे ब्याह भेलनि। वर सेहो गरीबे घरक मुदा जेना तेना गरीबीसँ संघर्स करितो पढ़ल लिखल बुझनूक। ब्याहक चारिमे दिन दुरागमन आ आइ एक महिना बाद पहिल बिदागरीपर सोनमती वर संगे अपन गाम बुढ़ माए बाबू लग आबि रहल छली। हुनक घरसँ किछुए पहिने तीन चारिटा आबारा छौंड़ासभ हुनका दुनूकेँ सुना कए अपनेमे, “देखही देखही सएटा मुसरी खाए कऽ बिलाइ चलल हज करै लेल।” दोसर, “हा हा... कतेकोकेँ देखला बाद ब्याह, सुहागिन, पतिव्रता हा हा हा .....!” सोनमती दुनू गोटे ओकर सभक गप्पकेँ अनसुना करैत आगू बढ़ि गेला। किछु आगू बढ़ला बाद सोनमतीक मौलाएल मुँह देख कए अप्पन कनियाँसँ, “अहाँ किएक चिन्ता करै छी, मुँह उपर कए कऽ कुरुर कएलासँ सुरुजकेँ थोरे परि जाइ छनि।” “अहाँकेँ ओकरा सभक गप्पपर विश्वास अछि।” “कनिको नहि, ओनाहितो ओ सभ बितल गप्प अछि। अहाँक वर्तमान हमर अछि आ वर्तमानमे हमरा एतबे बुझल जे अहाँसँ बेसी प्रेम हमरा कियोक नहि करैत अछि।” डिबिया “गे दाइ अहाँक सभक धिया-पुता कतेक गोड़ होइए ? राति कए डिबिया बाइर कए सुतै जाइ छीयै की ? हमर मरदाबा तँ डिबिया बुता दै छै।” मजबूरी एकटा समाचार – फलाँ नियालयकेँ फलाँ जजक कथन, “एकटा पुरुख आ एकटा स्त्री जँ कोनो कोठरीमे बन्द कए देल जेए तँ हुनक दुनूक बिच मात्र सेक्स चर्चा अथवा सेक्स होएत।” एहि समाचारपर बहुतो रास तथाकथित समाजक ठेकदार सभक विरोध आएल मुदा सत्यकेँ हाजिर नाजिर राखि करेजापर हाथ रखला बाद कियो सत्य कहे, एसगर कोठरीमे की रस्तो चलैत एक दोसर बिपरीत लिंगक मोनमे एहने गप्प नहि अबैत छैक मुदा बाहर समाजक लज्या आ मजबूरी, अन्दर कोठरीमे स्वेक्षा आजादी। विशेष कए पुरखक मोनमे। अपवित्र भगवती मंदिरक प्राँगण। आरती होइत। भीरक अम्बार लागल। घरी घंटा, शंखादीक शुभ ध्वनीसँ चाहुदिस भक्तिमय वातावरण बनल। मंदिरक मुख्य पुजारी अपन दहिना हाथसँ बड़काटा प्रज्वलित पंचदीपसँ आरती करैत आ संगे बामा हाथसँ चम्बर डोलाबैत मधुर स्वरसँ भक्तिमे लीन भए माँ भगवतीक आरतीमे लागल। आरती अपन समाप्तिक दिस बढ़ैत। मुख्य पुजारीजी बिना पाछू देखने अपन जगहसँ आरती करैत चम्बर डोलाबैत, धीरे धीरे पाछू मुँहे मन्दिरकक्षसँ निकलि मंदिर प्राँगनमे भीरक बिच पाछूए मुँहे अबैत। ई हुनक नित्यक काज रहबाक कारणे हुनका पूर्ण अभ्यास रहनि। पाछू मुँहे, पाछू ससरैत ओ भीरक अन्तिम छोरपर पहुँचला। ओहिठाम सभसँ कातमे दू तीनटा मलीन बेसमे २५ सँ ३० बर्खक समबएस स्त्री ठार। शाइद हुनका सभकेँ नहि बुझल जे पुजारीजी एहिदने तुलसीचौरा लग जेता तेँ ओ सभ पुजारी जीकेँ एला बादो अपन जगह ठाढ़े। पुजारीजी अपन दुनू आँखिकेँ गुम्हरि कए गरदैनसँ हतैक इशारा करैत, “हूँ।” ओहिमे सँ एक (पहिल) स्त्री जे मधुरक एकटा डिब्बा भगवतीकेँ चढ़ाबै लेल अनने रहथि, “की हूँ।” दोसर स्त्री, “गै ई कहै छौ ई डिब्बा दही ने मैयाकेँ भोग लगेतै।” पहिल स्त्री मधुरक डिब्बा पुजारीजीकेँ दिस बढ़ोलनि, बढ़बैक कालमे ओ डिब्बा पुजारी जीक धोतीसँ भिर गेलन्हि। पुजारीजी, “हे भगवती! एकरा सभकेँ के आबै देलकै, देह अपवित्र भए गेल। फेरसँ स्नान कए तुलसीजीक आरती करए परत।” तेसर स्त्री जे की चूप एखनतक सभटा गप्प सुनैत छली, “की पुजारी एखन तोहर धोतीमे भिरलासँ तुँ अपवित्र भऽ गेलह, तोरा फेरसँ असनान करेए परतअ आ रातिक अन्हारमे जे हमरा सभक घरे-घर मुँह मारैत रहै छऽ तैँ कालमे तोहर देह अपवित्र नै होइ छऽ।” आँच जिला अस्पताल। डा० श्रीमती देवी सिंह। पेशेंटकेँ शुक्ष्म परिक्षण कएला बाद परिक्षण कक्षसँ बाहर आबि कुर्सीपर बैसैत, सामने अपन कॉलेजक संगी सुधासँ, “ई कि अहाँ तँ कहलहुँ सुटीयाक वर दू वर्ख पहिने मरि गेल छै मुदा ओ तँ तीन महिनाक गर्भसँ अछि।” “से कोना ! हमरा तँ ओ कहलक ब्लडींग बेसी भए रहल छै, तेँ हम ओकरा लए कऽ अहाँ लग आबि गेलहुँ नहि तँ हमरा कोन काज छल एहि पापक मोटरीकेँ लए कऽ एतए आबैकेँ।” “से कोनो नहि, कएखनो-कएखनो कए एना हैत छैक। गर्भ रहला उतरो संजम नहि कएलासँ ब्लडींग बेसी होइत छैक परञ्च पतिकें मुइला बादो ई गर्भ कतएसँ।” “से की पता ई पाप कतएसँ पोइस लेलक मुदा ओकरो कि दोख बएसे की भेलैए मात्र बीस वर्खक बएसमे ओकर घरबला छोरि कए परलोक चलि गेलै। एहिठाम पच्चपन वर्खक पुरुखकेँ ब्याहक अधिकार छै मुदा ओहि समाजक लोक बीस वर्खक विधवाकेँ एहि अधिकारसँ बंचित केने अछि आ जखन आँच पजरतै तँ किछु नहि किछु पकबे करतै ओ चाहे रोटी होइ वा हाथ।” क्रोध अ० अप्पन खेतपर जल्दी जल्दी सभ काज कए कऽ आन दिनसँ दू घंटा पहिने घर दिसा आबि रहल छला किएक तँ आइ हुनक छोट भेए कोलकतासँ वकालतकेँ डिग्री लए गाम अप्पन भैया भौजीसँ आशीर्वाद लेबैक लेल आबि रहल छनि। दौढ़ीपर जाफरीक फट्टक हटा आँगन एला, चारूकात नजरि घुमा कए देखला बादो हुनका अपन कनियाँ नहि देखेलनि। अपन कोठरीक केबार सटल देखलनि। केबार लग गेला बाद घरक भीतरसँ फुसफुसाहट सुनाइ देलकनि। कान लगा कए सुनै लगला, “उह ऽऽऽ ! धीरेसँ बड्ड दर्द भए रहल अछि।” “बस कनीक सहास अओर कए लिअ, तकरा बाद सभ ठीक।” “लगैए आइ अहाँ हमर प्राणे लऽकए रहब।” “प्राण कोना लए लेब, अहाँ तँ हमर देह प्राण सभटा छी, भगवानक बाद दोसर अहीँ तँ छी।” भीतरक ई गप्प सुनि अ० केर हिम्मत जबाब दए गेलनि, अबाजसँ एतबा तँ बुझनाइए गेलनि जे भीतर हुनक कनियाँ आ हुनक छोट भेएक अबाज छी ओ कोलकतासँ आबि चुकल अछि। दुनूक गप्पक अर्थ लगा ओ क्रोधसँ कपैत बिना बिलैयाक सटल केबारपर जोरसँ लात मरलनि। धरामसँ दुनू पट्टा दुनू कात, सामने हुनक कनियाँ पेएर आगू कए कऽ बैसल आ हुनक छोटका भेए अपन भोजीक मोड़ेल एड़ीकेँ करूतेलसँ ससारि कए ठीक करैमे लागल। कनीक काल पहिने अप्पन बेटा जकाँ पोसने छोट दिअरकेँ आगमनक सुनि ख़ुशीक हरबराहटमे हुनकर एंड़ी मोरा गेल रहनि। हारि साँझु पहर फोनक घंटी बाजल, “ट्रिन न न ट्रिन न न न ट्रिन न न न न...।" बिना अप्पन नाम बतोने हम रिसीवर उठेलहुँ। कोनो जवाब नहि। दोसर कातसँ शांत। मुश्किलसँ पन्द्रह मिनट बाद फेर फोनक घंटी बाजल। दोसर दिससँ फेरो कोनो आवाज नहि। शाइद हमर स्वर पशंद नहि हेतै अथवा कएकरो आओरसँ गप्प करैक हेतै। रातिक एगारह बजे फेर फोन आएल, फोन उठेलहुँ, “हेलो।" कनिक कालक चूप्पीकेँ बाद उम्हरसँ, “हम मालकी बजै छी, बहुत दिनक बाद फोन कए रहल छी, ठीक तँ छी ने ? साँझेसँ ट्राइ कए रहल छलहुँ मुदा हिम्मत नहि भए रहल छल। ई कहै लेल एतेक राति कए फोन केलहुँ जे हमर ब्याह भए गेल।" “हमरा बुझल अछि।" “कोना।" “दुबईसँ एला बाद हम अहाँक गाम गेल रही ओहिठाम कएकरोसँ बुझलहुँ जे दू महिना पाहिले अहाँक ब्याह दुरागमन दुनू संगे भऽ गेल मुदा ई की हमर इंतजार नहि कए पएलहुँ।" “हम बेबस रही..... अहाँक बच्चाकेँ पाँच महिनासँ अप्पन पेटमे रखने-रखने, आगू दुनियाँक नजरिसँ बचेनाइ असम्भब छल।" “हम कहि कए तँ गेल रहि जे छह महिनासँ पहिने पहिने आबि जाएब कि हमरापर बिश्वास नहि रहल।" “एहन गप्प नहि छै, हमर तन एहिठाम अछि मुदा मोन एखनो अहीँ लग अछि परञ्च ई समाज, गाम आ परिवारक सामने हम हारि गेलहुँ।" “की अहाँक पतिकेँ ई सभ बुझल छनि।" “हाँ ! अहाँक दऽ नहि मुदा बच्चा दऽ बुझल छनि। ओ देवतुल्य लोक छथि, होइ बला हमर बच्चाकेँ सेहो अप्पन नाम दै लेल तैयार छथि ... (कनिकाल दुनू कातसँ चुप्पीकेँ बाद) हम एखन एहि द्वारे फोन कएलहुँ जे हमरा आब ताकैक वा फोन करैक चेष्टा नहि करब ओहि सभकेँ बितल गप्प जानि बिसरि जाएब...हुँऽऽ हुँऽऽऽ !” कानेक स्वर संगे रिसीवर राखैक खटखटाहट, फोन बंद। वसिअतनामा सु०केँ व्याह दूतीवरसँ भेलन्हि। हुनक बएससँ करीब बीस बर्खक बेसी हुनक वर। हुनक वरकेँ पहिलुक कनियाँसँ एकटा बारह बर्खक बेटा। व्याहक पाँच वर्ख बादो सु०केँ एखन धरि कोनो संतान नहि। अपन माएक आग्रहपर सु० दू दिनक लेल अपन नैहर एली। एहिठाम माएकेँ केशमे तेल दैत – सु० केर छोट भाइ, “दीदीसँ पैघ पतिवरता स्त्री आइकेँ दुनियाँमे कियो नहि होएत।” सु०, “ई एनाहिते कहैत छैक।” छोट भाइ, “नहि गे माए, दीदीकेँ देखलहुँ अपन बुढ़बा वरकेँ एतेक सेवा करैत जतेक आजुक समयमे कियोक नहि करतै। नहबैत-सुनाबैत तीन तीन घंटापर हुनका चाह नास्ता भोजन दैत भरि दिन हुनके सेवामे लागल आ हुनकासँ कनी समय भेटलै तँ हुनक बेटामे लागल अपन देहक तँ एकरा सुधियो नहि रहै छै।” सु०, “एहन कोनो गप्प नहि छै आ नहि हम कोनो पतिवरता छी। ओ तँ, ओ अपन एहन वसिअतनामा बनोने छथि जेकर हिसाबे हुनक एखन मुइलापर हुनक सभटा सम्पतिकेँ मालिक हुनक बेटा होएत। आ जखन हमरा एकगो संतान भए जाएत तखन हुनक सम्पति, हुनक पहिलका बेटा आ हमर संतान दुनूमे बराबर बटा जाएत ताहि दुवारे बुढ़बाकेँ एतेक सेवा कए कऽ जीएने छी जे कहुना कतौसँ एकटा बेटा की बेटी भऽ जे नहि तँ एहेन बुढ़बाकेँ के पूछैए।” भगवान नहि देखैत हेथिन “बाबू, भगवान तँ सभठाम होइत छथिन ने ?” “हाँ बेटा।” “ओ तँ सभ किछु देखैत छथिन ?” “हाँ बेटा हाँ।” “तहन अहाँ जे ई दूधमे पानि मिलाबै छियैक की ओ नहि देखैत हेथिन ?” भगवानकेँ जे नीक लगनि बाबा भोलेनाथक विशाल मन्दिर। मुख्य शिवलिंग आ समस्त शिव परिवारक भव्य आ सुन्दर मूर्ति। साँझक समय एक-एक कए भक्त सब अबैत आ बाबाक स्तुति वन्दना करैत जाएत। एकटा चारि बर्खक नेना आबि बाबा दिस धियानसँ देखैत। ताबएतमे एकटा भक्त आबि बाबाक सोंझाँ श्लोक, “कर्पुर गौरं करुणावतारं....” सुना कए चलि गेला। दोसर भक्त आबि, “नमामी शमसान निर्वा.....” सुनाबए लगला। एनाहिते आन आन भक्त सब सेहो किछु ने किछु मन्त्र श्लोक प्राथनासँ बाबा भोलेनाथकेँ मनाबेएमे लागल। ई सब देख सुनि ओहि नेनाक वाल मोन सोचए लागल, “हम की सुनाबू ? हमरा तँ किछु नहि अबैत अछि ? कोनो बात नहि एलहुँ तँ किछु नहि किछु सुनाएब तँ जरुर। ई सोचैत नेना अप्पन दुनू कल जोरि, आँखि मुनि धियानक मुदरामे पढ़ लागल, “अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ..........” नेनाकेँ ई पढ़ैत देख पुजारी बाबासँ नहि रहल गेलनि। ओ कनीक काल धियानसँ सुनला बाद नेना सँ पूछि बैसला, “बौआ ई अ आ किएक पढ़ि रहल छी ?” “जकरा देखू किछु ने किछु मन्त्र पढ़ि कए जाइए, हमरा तँ आओर किछु अबिते नहि अछि, तेँ अ आ पढ़ि रहल छी। भगवानकेँ जे नीक लगनि एहिमे सँ छाँति लेता।” सार एकटा अबोध नेना अपन मामासँ, “यौ मामा।” “हाँ।” “ई सार केकरा कहैत छै।” “किएक।” “ने कहू तँ।” “की भेलै से।” “भेलै किछु नहि कनीककाल पहिले बाबू, माएसँ कहैत छलखिन्ह, ई सार सभ जखन तखन मुँह उठा कए चलि अबैए।” तास दलानपर तास बजरल, हा हा ही ही होइत। पानपर पान चलैत। तास फेकैत क०जी, “की यौ भाइ सुनलीयैए रमेशरा बेटाक नाम डॉक्टरी कॉलेजमे लिखा गेलै।” “हाँ, किछु बर्ख बाद ओ डॉक्टर बनि हमरा सभक इलाजो करत।” “केहन समय आबि गेलै.... आ एकटा हमरा सभक धिया-पुताक कोनो गैँरे बथान नहि छै।” हुनक दुनूक गप्प सुनैत आ ओहिसँ पहिने अपन माएकेँ कहलापर बाबूकेँ बजबै लेल आएल क०जीक चौदह बर्खक बेटा, “अहाँ सभ भरि दिन तासमे लागल रहू आ अप्पन अप्पन धिया-पुताकेँ कोसैत रहू, देखियौ गऽ रमेशराकेँ एखनो अप्पन खेतमे लागल छथि तँ डॉक्टर केकर बेटा बनतै रमेशराक की अहाँ सभक।” भगवान कतए रहैत छथि एकटा नेना अपन बाबीसँ, “बाबी भगवान कतए रहैत छथि।” “बेटा सभठाम, कोनो एहन जगह नहि जाहिठाम भगवान नहि हुएथ।” “अच्छा।” “हाँ बेटा।” “अहुठाम।” “हाँ बेटा हाँ।” “तहन अहाँ सभ दिन पूजा करैक हेतु मन्दिर किएक जाइ छी।” अरबाचाउर “गे बौआ कनी काकीसँ अरबाचाउर माँगि कए नेने आ।” “नहि, हम नहि जेबौ, हमरा माँगैमे लाज लगैए।” “दैया ने, की करबै देखी कतेक दिनपर मामा एलैए, की कहतै एकरा घरमे अरबोचाउर नहि रहै जे उसनाचाउरक भात खुएलक।” “मामक ई सोचनाइ बढ़ियाँ, की काकीक ई सुननाइ–आइब गेलहुँ ढकनी लए कऽ माँगै लेल।” बड़का बाबू दस बर्खक नेना अक्षत अपन माएसँ, “माए माँछ बनेलहुँ मुदा बड़का बाबूकेँ तँ खाए लेल कहबे नहि केलियन्हि।” माए, “रहअ दहि, तोहर बड़की माएकेँ एनाहिते बड़काटा ब्याम छनि। ओ अपना घरमे पिआउज, लहसुन, माँछ-माँसु नहि बनेता आ हम अपना घरमे बनाबी तँ तोहर बड़का बाबूकेँ खुआबू।” अक्षत, “मुदा माए जँ बड़का बाबू बूझि गेलखिन्ह कि अक्षतक घरमे माँछ बनलै आ हुनका खाए लेल नहि कियो कहलकनि तहन ?” माए टपाकसँ, “तहन की हमरा कोनो केकरो डर नहि लगैए।” अक्षत, “ई गप्प नहि छै माए....(कनिक काल चुप्प, आगू ) जखन हम कमाए लागब तँ सभ दिन माँछ-माँसु बना बड़का बाबूकेँ खुएब...।” भगवान सभक गप्प सुनै छथिन मन्दिर जाएक रस्तामे, एकटा अबोध नेना अप्पन माएसँ, “माए, हमसभ मन्दिर किएक जा रहल छी ?” “बेटा, मन्दिरमे भगवान सभक गप्प सुनि कए ओकरा पूरा करै छथिन।” “भगवान हमरो गप्प सुनथिन ?” “हाँ बेटा।” “हम जे भगवानसँ माँगबनि से हमरा भेट जएत ?” “हाँ बेटा जे अहाँ माँगब अवस्य भेटत।” ततबामे चलति चलति मन्दिरक मुख्यद्वार आबि गेल। द्वारिक सीढ़िपर बहुत रास भिखमंगा भिन्न भिन्न रंग रूपमे भिन्न भिन्न तरिकासँ भीख मांगैमे लागल। भिखमंगाकेँ देखि नेना अप्पन माएसँ, “माए ई भिखमंगा सब तँ दिन भरि एतए मांगैत रहैए मुदा भगवान एकर सभक गप्प किएक नहि सुनै छथिन।” गाछो सभ गाम जाइ छै लगभग ८०-८५ किमीकेँ गतिसँ चलैत ट्रेनकेँ बॉगीमे बैसल एकटा पूर्ण परिवार। ओहिमे सँ एकटा तीन बरखक नेना जेकी शाइद पहिल बेर अपन ज्ञानमे ट्रेनक यात्रा कए रहल छल । खिड़कीसँ बाहर देखते देरी खुशीसँ चहैक बाजल, "पापा यौ पापा, देखियौ गाछो सभ गाम जाइ छै ।" पाँचमी पास नेना, “नै हम इसकूल नहि जाएब।” माए, “किएक।” नेना, “हमरा इसकूल जएक मोन नहि होइए।” माए, “नै बौआ एना नहि कहैत छै, इसकूल जएब तहने ने पढ़ि लिख कए ज्ञान होएत आ ओकरा बादे जीवन नीकसँ चलत।” नेना, “हूँ ! बाबू कहियो इसकूल नहि गेला से तँ हुनक जीवन एतेक नीक चलैत छनि आ हम तँ पाँचमी पास भए गेलहुँ।” मनुखक जीवन “बौआ पैघ भए कऽ अहाँ की बनब ?” “मनुख।” नेनाक एहि उत्तरपर चारूकात ठहाका पसरि गेल। मनुख ! मनुख तँ हम सभ छीहे, मनुख बनक बेगरता की ? मुदा नेनाक आखर ‘मनुख’ हमर हृदयमे तऽर धरि धसि गेल। की आइ काल्हि हम मनुख, मनुख रहि गेलहुँ ? हमर सभक भीतर मनुखताक कोनो अवशेष एखनो बचल अछि ? मनुख की ? खाली मनुखक कोखिसँ जन्म लेने भऽ गेलहुँ ? जन्म लेलहुँ, नम्हर भेलहुँ, ब्याहदान भेल, दू चारिटा बच्चा जनमेलहुँ, ओकर लालन-पालन केलहुँ, बुढ़ भेलहुँ, मरि गेलहुँ, इहो जीवन कोनो मनुखक जीवन भेलै। आइ मरलहुँ काल्हि दुनियाँ तँ दुनियाँ १३ दिन बाद अप्पनो बिसरि गेल। मनुख जीवन तँ ओ भेल जेकर मृत्यु नहि हुए। मृत्यु देहक होइ छैक, कमसँ कम नामक मृत्यु तँ नहि होइ, नाम जीबैत रहै, ओ भेल मनुखक जीवन। बाबीक पिआर बेरुपहरकेँ चारि बाजि रहल छल। ओ दुनू भोरेसँ एहि गप्पपर चर्चा कए रहल छल कि हमर जनम दिनपर हमरा की उपहार देल जेए। नी० कोनो डिपार्टमेंट स्टोरसँ एकटा रिस्ट वाच देख कए आएल छल जेकर दाम अठारह सए रुपैया छल। मुदा ओकरा दुनू लग मात्र बारह सए रुपैया छलै। ओ दुनू हमरा नहि कहलक जे ओ हमरा ओहे रिस्ट वाच देबअ चाहैत अछि। बस हमरा एतबे कहलक जे ओकरा छह सए रुपैया चाही। “किएक।” “ई सरपराईज छैक, बस ई बुझि लिअ जे अहाँक जनमदिनक उपहार आनैक अछि।” “की आनब।” “इहे तँ सरपराईज छै, ओ तँ अहाँ देखे कऽ बुझब।” “अच्छा ! की लेबैक अछि ई छोरु, ई कहुँ अहाँ दुनू अप्पन-अप्पन जनम दिनक की उपहार लेब।” “किछु नहि।” “तहन तँ हमहूँ अहाँ सभसँ किछु नहि लेब, नहि तँ पहिले ई कहू जे अहाँ दुनूकेँ अप्पन-अप्पन जनम दिनपर की लेबैक मोन होइए।” “माए बाबूक संगे बाबीक पिआर।” “मने।” “मने बाबीकेँ गामसँ एहिठाम नेने आबू आओर हमरा सभकेँ किछु नहि चाही।” ************************************************************************** विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2013-14) (१४२१ फसली साल) Marriage Days: Nov.2013- 18, 20, 24, 25, 28, 29 Dec.2013- 1, 4, 6, 8, 12, 13 January 2014- 19, 20, 22, 23, 24, 26, 31. Feb.2014- 3, 5, 6, 9, 10, 17, 19, 24, 26, 27. March 2014- 2, 3, 5, 7, 9. April 2014- 16, 17, 18, 20, 21, 23, 24. May 2014- 1, 2, 8, 9, 11, 12, 18, 19, 21, 25, 26, 28, 29, 30. June 2014- 4, 5, 8, 9, 13, 18, 22, 25. July 2014- 2, 3, 4, 6, 7. Upanayana Days: February 2014- 2, 4, 9, 10. March 2014- 3, 5, 11, 12. April 2014- 4, 9, 10. June 2014- 2, 8, 9. Dviragaman Din: November 2013- 18, 21, 22. December 2013- 4, 6, 8, 9, 12, 13. February 2014- 16, 17, 19, 20. March 2014- 2, 3, 5, 9, 10, 12. April 2014- 16, 17, 18, 20. May 2014- 1, 2, 9, 11, 12. Mundan Din: November 2013- 20, 22. December 2013- 9, 12, 13. January 2014- 16, 17. February 2014- 6, 10, 19, 20. March 2014- 5, 12. April 2014- 16. May 2014- 12, 30. June 2014- 2, 9, 30. FESTIVALS OF MITHILA (2013-14) Mauna Panchami-27 July Madhushravani- 9 August Nag Panchami- 11 August Raksha Bandhan- 21 Aug Krishnastami- 28 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 5 September Hartalika Teej- 8 September ChauthChandra-8 September Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 18 Sep Pitri Paksha begins- 20 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-27 Sep Matri Navami-28 Sep Kalashsthapan- 5 October Belnauti- 10 October Patrika Pravesh- 11 October Mahastami- 12 October Maha Navami - 13 October Vijaya Dashami- 14 October Kojagara- 18 Oct Dhanteras- 1 November Diyabati, shyama pooja-3 November Annakoota/ Govardhana Pooja-4 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 5 November Chhathi -8 November Sama Poojaarambh- 9 November Devotthan Ekadashi- 13 November ravivratarambh- 17 November Navanna parvan- 20 November KartikPoornima- Sama Visarjan- 2 December Vivaha Panchmi- 7 December Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Naraknivaran chaturdashi- 29 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 4 February Achla Saptmi- 6 February Mahashivaratri-27 February Holikadahan-Fagua-16 March Holi- 17 March Saptadora- 17 March Varuni Trayodashi-28 March Jurishital-15 April Ram Navami- 8 April Akshaya Tritiya-2 May Janaki Navami- 8 May Ravi Brat Ant- 11 May Vat Savitri-barasait- 28 May Ganga Dashhara-8 June Harivasar Vrata- 9 July Shree Guru Poornima-12 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१३. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा, राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डा. जया वर्मा आ डा. राजीव कुमार वर्मा। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल आ प्रियंका झा। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-13 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 6 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १५५म अंक ०१ जून २०१४ (वर्ष ७ मास ७८ अंक १५५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA