ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १५७ म अंक ०१ जुलाइ २०१४ (वर्ष ७ मास ७९ अंक १५७) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-नेपालक नोर मरूभूमिमे/ कलंकित चान २.२.जगदीश प्रसाद मण्डलक- लघुकथा-किरदानी २.३.जितेन्द्र झा- सभासद् साह फरार, सद्भावना कहलक निर्दोष की भेटत जनकपुर बमकाण्ड पीडितके न्याय ? २.४.जितेन्द्र झा -गतिविधि २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’-दूटा विहनि कथा २.६.आशीष अनचिन्हार- मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण (आलोचना) २.७.सत्य नारायण झा- विहनि कथा- स्मृति २.८.मो. असरफ राईन- विहनि कथा- शहरीया घरवाली ३. पद्य ३.१.झा हेमन्त बापी- दानव ३.२.राजदेव मंडल- हेलवार ३.३.सुनील मोहन ठाकुर- अहि बेर देखल फागु ३.४.नन्दिनी पाठक- ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल ३.५.अब्दुर रज्जाक- घोरमठा राजनैतिक ३.६.प्रदीप पुष्प ३.७.मो. असरफ राईन ३.८.किशन कारीगर- गजल सन किछु मैथिलीमे ४. मिथिला कला-संगीत १. ज्योति झा चौधरी ५.बालानां कृते-१. आशीष अनचिन्हार- मुदा किछु तँ करू २.जगदानंद झा मनु- प्रकृति ३.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’-खजाना ६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली] ७.VIDEHA FOR NON RESIDENTS ७.1.Obsessed with native-hood- Sanjeev Kumar Jha विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड साइट VIDEHA MAITHILI BOOKS FREE DOWNLOAD SITE विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमेhttp://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाउ। Join official Videha facebook group. 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Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव ज्योतिरीश्वर पूर्व महाकवि विद्यापति। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाउ। संपादकीय सगर राति दीप जरयक इतिहास- कथाक कथा सगर राति दीप जरयक इतिहास जे रमानन्द झा रमण द्वारा परसल जा रहल अछि, ओइमे एकर प्रारम्भ केना भेलसँ लऽ कऽ अखन धरिक इतिहास मे बहुत रास विसंगति अछि। एकर प्रारम्भ केना भेलसँ लऽ कऽ अखन धरिक इतिहासमे बहुत गोटेक योगदान बढ़ा कऽ, बहुत गोटेक घटा कऽ, बहुत गोटेक परिवर्तित कऽ कऽ प्रस्तुत कएल गेल तँ बहुत गोटे निपत्ता कऽ देल गेला। कहल गेल जे ई स्वायत्त संस्था अछि मुदा चेतना समितिक दिससँ रमण आ अजित आजाद सम्मिलित होइत रहला आ जतऽ कियो माला नै उठेलक ओतऽ ई लोकनि चेतना समिति दिससँ माला उठेलन्हि आ संयोजकमे चेतना समितिक नाम नै आन नाम इतिहास बनबै लेल देल गेल। चेतना समिति (गौरीनाथक सूचनाक अनुसार) जखन गौरीनाथ, अग्निपुष्प आ प्रदीप बिहारी पर लिखित प्रतिबन्ध लगेलक तकरा बाद बिहारी द्वारा लिखित माफी ऐ मैरेज हॅाल ( चेतना समिति) सँ मांगल गेल, फेर हुनका रचना लेल नै, वरन ऐ कृत्य लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल आ ओ सेहो ऐ मैरेज हॅालक प्रतिनिधि भऽ गेला। ई मैरेज हॉल साहित्य अकादेमीसँ मान्यताप्राप्त संस्था अछि! फेर ई तिकड़ी श्याम दरिहरे- प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण- संग मिलि कऽ सगर रातिमे की सभ केलक से रमणक जातिवादी इतिहासमे नै भेटत। की छल ओइ सगर रातिक रजिस्टरमे जकरा रमण कहि रहल छथि जे विभारानी हेरा देलन्हि। की ई रजिस्टर हेरा गेल बा हेरा जाइ देल गेल। मुदा किछु गप जे नै रमणकेँ बुझल छन्हि ने विभा रानीकेँ से अछि जे आरती कुमारी अपन मृत्युसँ २-३ दिन पहिने ओकर फोटो स्टेट उमेश मण्डलकेँ पठा देलखिन्ह। ओ चाहितथि तँ कोने झारे झाकेँ सेहो पठा सकैत रहथि, मुदा हुनका झारेझा सभपर विश्वास नै छलन्हि, किए नै छलन्हि? कहल गेल छै जे शोनित अपन निशान छोड़िते अछि। दरभंगा बला गोष्ठी , जे ३१ मइ २०१४ केँ दरिहरे- रमण- बिहारी द्वारा साहित्य अकादेमी आ ओकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फर्जी मैथिली संस्था सभक संग रमण-दरिहरे-बिहारी सन-सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी तथाकथित साहित्यकार सभ द्वारा प्रायोजित रहत, आ अो एे तरहक (दिल्लीक बाद) दोसर गोष्ठी रहत जकरा रमण-दरिहरे-बिहारी ८३म गोष्ठी सेहो कहता। अोतऽ "राडक़ सुख बलाय" आदि कथाक वाचन हएत। मेहथ बला गोष्ठी मे रमण-दरिहरे-बिहारी सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी प्रतिबन्धित छथि। कहल जाइ छै जे सगर राति दीप जरय नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग सदृश अछि। नव कथाकार कलमाएल जाइ छथि! मुदा सत्य की अछि? की एकर प्रवृत्ति साहित्य अकादेमीसँ भिन्न अछि? की ऐपर कब्जा लेल साहित्ये अकादमी सन छल प्रपंच नै होइ छल! आ ७९म सगर रातिक हीरन्द्र झा आदि द्वारा बहिष्कार आ रमणक ओतै जातिवादी उद्घोष उमेश पासवानक नै, मैथिलीक विरोध छल, कब्जाक राजनीतिक प्रारम्भ ७९म सगर रातिसँ पहिनहियो छल। ७४म सगर राति -हज़ारीबागमे प्रदीप बिहारी माला उठेबाक प्रस्ताव केलन्हि आ से छल मात्र दोसराक प्रस्ताव खसेबा लेल। अपन ग्रुपक क़ब्जा लेल मात्र ई प्रस्ताव छल। ओ अपन प्रस्ताव अपन ग्रुपक पक्षमे आपिस लऽ लेलन्हि। ओ ई नाटक ७५म सगर रातिमे सेहो केलन्हि। तँ की ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधामे हुनकर उपयोग कएल जा रहल छन्हि आकि ओ ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधाक मुख्य कलाकार छथि? हुनकर रचनामे जान नै छन्हि मुदा घृणित राजनीतिमे जान छन्हि। आ साहित्य अकादेमी पुरस्कार एहने गुणपर देल जाइ छै, से चेतना समितिसँ माफी मांगि पएर पकड़ि ओ निर्लज्जतापूर्वक लेलन्हि। से ओ ऐ ब्लैकमेलिंग धंधाक मुख्य कलाकार छथि जकरा बुझल छै जे नीक रचना लिखबापर ध्यान देनाइ मूर्खता छै, ओइसँ प्राइज नै भेटै छै, साहित्य अकादेमी लेल जोड़-तोड़ चाही आ ओइमे ओ मास्टर छथि, मैथिली गेल तेलहण्डामे। आ ऐ परिस्थिति मे नव कथाकारक ट्रेनिंग नै भेलै, जतेक लोक सगर रातिसँ जुड़ला ओइसँ बेसी हतोत्साहित कऽ मैथिली साहित्यसँ दूर कऽ देल गेला, नेट रिजल्ट माइनसमे रहल! बहिष्कारक राजनीतिसँ सुपौल, देवघर आ नरहनक गोष्ठी प्रभावित रहल तँ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत काठमाण्डूक सगर रातिमे कोनो स्थानीय साहित्यकारकेँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि हवा नै लागऽ देलखिन्ह जे एहन कोनो गोष्ठी हुअएबला अछि, मनोज मुक्ति ई सूचित करै छथि। कबिलपुरक गोष्ठीमे सोमदेव आ रमानन्द रेणुकेँ नै बजाएल गेलन्हि। राजनन्दन लालदास कहै छथि जे सएह कारण छल जे आयोजक योगानन्द झा ऐ गोष्ठीक रिपोर्ट “कर्णामृत” लेल नै पठेलन्हि, जखन कि दोसरा द्वारा आयोजित गोष्ठी सभक रिपोर्ट ओ पठबै छलखिन्ह। योगानन्द झापर कबिलपुरक कोन ग्रुपक प्रेसर छल? ओही ग्रुपक जे “विद्यापति टाइम्स” नाम्नाअपने छापू अपने पढ़ू पत्रमे ई न्यूज हुनका माध्यमे छपबेलक- “घरदेखियासँ आगाँ नै बढ़ि सकला बनैत बिगड़ैतक लेखक सुभाष चन्द्र यादव”- मोहन भारद्वाजमैथिली लेखक संघक बनैत बिगड़ैतपर भेल गोष्ठीमे बजला। जखन कि नवेन्दु कुमार झा सूचित देलन्हि जे ओइ गोष्ठीमे बनैत बिगड़ैतपर मात्र अशोक आ तारानन्द वियोगीक आलेख आएल। ओना मोहन भारद्वाज आ योगानन्द झा ओइ गोष्ठीमे उपस्थित रहथि, आ आपसी गपशप-लूज टॉक भेल हेतन्हि जे गोष्ठीक कार्यक्रमक अन्तर्गत नै छल। २०१३ दिसम्बरमे साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेल, योगानन्द झाकेँ कबिलपुर ग्रुप जूरी बनेलकन्हि आ बनैत बिगड़ैतक लेखक सुभाष चन्द्र यादवकेँ ई पुरस्कार कोना देल जइतन्हि! सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत", साहित्य अकादेमी आ ओकर पुरस्कार: साहित्य अकादेमीकेँ सुभाष चन्द्र यादवसँ भतबड़ी छै। मनुक्खक मनुक्खसँ भतबड़ी होइ छै, मुदा जखन कोनो संस्थाक मैथिली विभाग कोनो मनुक्खक खास संकीर्ण वर्गक कब्जामे चलि जाइ छै तखन ओ संस्था सेहो मनुक्खे संग व्यवहार करऽ लगै छै। पछिला बेर नचिकेताक "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क अन्तिम बेर छलै आ ऐ बेर सुभाष चन्द्र यादवक "बनैत-बिगड़ैत"क अन्तिम बेर। ऐ पोथीकेँ आब साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै देल जा सकतै। कारण एकटा संस्थाकेँ एकटा पोथीसँ भतबड़ी भेल छै। मूल परम्परा सुखाएल इनारक बेंग छी जकर मृत्यु आसन्न छै। ने ऐसँ "नो एण्ट्री: मा प्रविश" क आ नहिये "बनैत-बिगड़ैत"क महत्व साहित्यिक रूपसँ कम हेतै। मिथिला राज्यक ढोंगी आडम्बरी नेता सभक लेल ओना ई खुशीक विषय थिक मुदा समानान्तर परम्परा लेल ई एकटा चेतौनी छी। की मिथिला राज्य सेहो समानान्तर परम्परासँ भतबड़ी करतै? की ओकरो स्वरूप साहित्ये अकादेमी सन रहतै? मिथिला राज्यक आडम्बरी सभकेँ ई उत्तर देबऽ पड़तै आ नै तँ ओकरो स्थिति सुखाएल इनारक बेंग सन हेतै!!! मिथिला राज्यक लेल जँ अहाँकेँ क्यो धरणा दैत, सभा करैत देखाथि तँ हुनकासँ ई अवश्य पूछू जे "मिथिला यूनिवर्सिटी" "आकाशवाणी दरभंगा" आ "साहित्य अकादेमी" मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका सभकेँ छै से की असत्य नै छै,आ ऐ लेल मिथिला राज्य आन्दोलन कर्मी घोषणा करथु जे कहियासँ साहित्य अकादेमीक संयोजिका आ मेम्बर सभक घरक सोझाँमे आमरण अनशन करबाक घोषणा कऽ अपन प्रतिबद्धताक प्रमाण उपलब्ध करेता। पटना, दिल्ली आ दरभंगामे प्राथमिक शिक्षामे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभ एकटा पैघ षडयंत्रक हिस्सा भऽ सकै छथि, मैथिलीक सिलेबसमे भऽ रहल अन्यायक प्रति हिनकर सभक चुप्पी सएह सिद्ध करैए। मैथिलीक सिलेबसमे वएह जमीन्दारक जीवनी आ चारिटा परिवारक स्तरहीन ब्राह्मणवादी कथा-कविता-नाटक देल जाइत रहतै, ओइ भूप सभ लेल अनशन केलासँ मैथिलीकेँ भऽ रहल हर्जा आर बढ़बे करतै। मैथिलीक जातिवादी सिलेबसक खिलाफ अनशन मात्रसँ मिथिला राज्यक ब्राह्मणवादी आन्दोलनी सभक कलंक मेटा सकै छन्हि। पटना, दिल्ली आ दरभंगामे प्राथमिक शिक्षामे आ दूरस्थ रूपेँ मैथिलीक पाठन लेल अनशन केनिहार सभक कार्यकलाप जाधरि स्प्ष्ट नै भऽ जाए, ओ सभ मूल धाराक एजेण्ट छथि सएह बुझबाक चाही, आ हुनका सभक प्रति ओही तरहक व्यवहार हेबाक चाही। अशोक अविचल, श्याम दरिहरे, रमण आदि देवघरक आयोजक ओमप्रकाश झापर साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ सगर रातिक मान्यता देबा लेल ब्लैकमेलिंगक कऽ ई शर्त रखलन्हि जे तखने ओ सभ ऐमे सम्मिलित हेता आ नै तँ बहिष्कार करता। मुदा आरती कुमारीक हत्याक बाद ई पहिल मौका छल बलैकमेलर सभकेँ हरदा बजेबाक, आ समीक्षा-प्रतिसमीक्षासँ बढ़ैत ई गोष्ठी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त केलक, बलैकमेलर सभक बहिष्कार ओकरा आर सबल बनेलकै। दरिहरे आयोजककेँ कहलन्हि जे साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ मान्यता सगर रातिक रूपये भेटए, तइ लेल मैथिली लेखक संघ, पटनाक बैसकीमे रमणक कहलासँ ओ ऐलेल फोन केलखिन्ह। अविचल सेहो आयोजककेँ सएह कहलखिन्ह। देवघर गोष्ठी ट्रेनिंग स्कूल सिद्ध भेल, रमण, दरिहरे आ बिहारी अबितथि तँ सिखितथि जे केना रचनामे ओ क्वालिटी आनि सकै छथि, मुदा ओ सभ प्रैकटिकल छथि, बुझल छन्हि प्राइज टा लेल लिखल जाइ छै आ से जोड़-तोड़सँ भेटै छै, क्वालिटीसँ नै, अविचलमे प्रतिभा लेशो मात्र नै छन्हि, हुनका कोनो ट्रेनिंग किछु नै दऽ सकतन्हि, से ओ नै आबि अपन टाइम बचेलथि आ से नीके केलथि। सगर राति दीप जरयमे क्वालिटी आबि जाएत तँ बिहारी-दरिहरे-रमण सन मेडियोकरकेँ के पूछत, से ओ सभ राड़केँ सुख बलायक लेखक (!) क संग दोसर साहित्य अकादेमी गोष्ठी करता जतऽ ब्राह्मण युवा सभकेँ राड़केँ सुख बलाय सन नीक कथा केना लिखल जाए तकर ट्रेनिंग रमण-बिहारी-दरिहरे द्वारा देल जाएत। नीके अछि, मूर्ख सभक प्रवेश सगर रातिमे थम्हत। आ परोक्ष रूपेँ ऐ लेल मैथिली साहित्य रमण-बिहारी-दरिहरेक आभारी रहत। दरिहरे-बिहारी-रमणक बहिष्कारक रणनीति द्वारा सगर रातिपर कब्जाक राजनीति आरती कुमारीक संग भागलपुरमे चलि सकल मुदा वएह राजनीति २ सालक बाद देवघरमे तेनाकेँ फेल भेल जे ओ सभ पहिने सगर रातिसँ पड़ाइन केलन्हि आ फेर निकालि देल गेला। ब्राहम्णवादी भाषाक रूपमे विश्वमे ख्यात ऐ साहित्यमे कोन प्रक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक? सगर राति दीप जरयक ब्राहम्णवादी अनुष्ठानकेँ एकर स्वयंभू पुरोहित सभ द्वारा आरती कुमारीक बलि देल जा चुकल छल। भयक ऐ वातावरणमे ई परिवर्तन केना भेल जे रमण-बिहारी-दरिहरे नै बूझि सकला? मैथिली भाषाक ब्राह्मणवादी चरित्रमे भाषाक संग ख़ूब खेल खेलाएल गेल छै। राड़क मतलब एतऽ छै (ब्राहम्णक नजरिमे) भुमिहार, राजपूत, कायस्थ सहित सभ आन जाति। अपन बच्चाकेँ यौ आ राड़क बुढ़बाकेँ हौ! कहबी मे सेहो बेइमानी, जेना- दस ब्राहम्ण दस पेट, दस राड़ एक पेट! मुदा हमर माँ कहै छथि जे ई कहबी मात्र ब्राहम्णमे छै, आन सभ कहै छथि- दस राड़ दस पेट, दस ब्राह्मण एक पेट। मुदा बिहारी सन मेडियोकर साहित्यकारकेँ ई सभ गप नै बुझल छन्हि- ओ बुझै छथि जे राड़केँ सुख बलाय तँ जगदीश प्रसाद मण्डलपर रमण-बिहारी-दरिहरे लिखबेने छथि। रमण आ दरिहरे तँ ठीक सोचै छथि मुदा बिहारी तँ कायस्थ छथि आ दरिहरे-रमणक परिभाषा अनुसार राड़केँ सुख बलाय जगदीश प्रसाद मण्डलक अतिरिक्त हुनके टा पर नै वरण समस्त मिथिलाक गएर ब्राहम्णकेँ देल गारि अछि। विदेह घरे-घरे घुसि चुकल अछि, से ३१ मइ २०१४ केँ रमण-दरिहरे-बिहारीक "राड़केँ सुख बलाय" कथा गोष्ठीमे शामिल सभ ब्राहम्ण-छद्म कथाकारक लिस्ट हमरा ०१ जून २०१४ क भोरमे पठाउ। आब आउ सगर रातिकेँ खतम करबाक साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा आ ओकरा द्वारा मान्यताप्राप्त फ़र्ज़ी संस्था सभक पर। रमण साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखासँ लाखक लाख असाइनमेण्ट क़ताक सालसँ लऽ रहल छथि, से हुनका ई भार देल गेलन्हि जे सगर रातिपर विदेहक प्रभावकेँ ओ ओहिना ख़त्म करथु जेना आरती कुमारीकेँ ओ बिहारी-दरिहरे संग मिलि कऽ ख़त्म केने रहथि। मुदा हुनकर एस्टीमेट ऐबेर गड़बड़ा गेलन्हि, मैथिली लग आब पाठक छलै, शक्ति छलै, स्तर छलै, से मेडियोकर रमण-बिहारी-दरिहरे नै बुझि सकला। ख़ून रंग आनै छै, चेन्हासी छोड़ै छै .....ख़ून खूनीकेँ ताकि लै छै़़़। मिथिलामे दुर्गापूजामे मोटामोटी चन्दा ओसूलि कऽ पूजा होइ छै। बस रोकि कऽ चन्दा ओसूली सरस्वती पूजा लेल आब शुरू भऽ गेल छै, पहिने नै होइ छलै, कारण ई पर्व व्यक्तिगत निष्ठासँ सम्बन्धित छल। ओ निष्ठा यज्ञोपवीत करबा कऽ मूर्खतापूर्वक मोछैल आ क्लीन शेव (संगे पाग पहिरने!) विद्यापतिक कोनो तत्कालीन वेशभूषाक अध्ययनसँ रहित जातिवादी कलाकार द्वारा बनाओल फोटोपर माल्यार्पणक विद्यापति पर्वमे सेहो नै भेटत। ई विद्यापति पर्व सभ , जातिवादी रंगमंच, साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा, प्रज्ञा संस्थान, साझा प्रकाशन आ सगर राति दीप जरय मैथिलीमे कट्टरता बढ़ेलक आकि घटेलक? विश्वकर्मा पूजा, दुर्गापूजा आदि ई दाबा नै करैए जे ओ सभ मैथिली लेल काज करै छथि। मुदा ई सभ समाजमे मिलि काज केना करी से सिखबैए। एकर विपरीत विद्यापतिकेँ यज्ञोपवीत करबाकऽ जे सांस्कृतिक संस्थापर कब्जाक राजनीति सिखाएल गेल से जातिवादी रंगमंचमे पैसल, कोलकाताक कुर्मी-क्षत्रिय समाज मैथिलीसँ अलग कऽ देल गेल। छिट्टाक छिट्टा पोथी आ सम्मान मैथिल ब्राहम्ण आ कर्ण कायस्थ लेल रिज़र्व भऽ गेल। दोसर जँ हिम्मत केलक तँ बूढ़ा सभ लफुआ युवाकेँ साहित्यकार बना कऽ हुलकाबऽ लगला। "राड़कँ सुख बलाय"क लेखक केँ श्याम दरिहरे, प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण द्वारा हुलकाएब ऐ प्रक्रियाक टटका उदाहरण अछि। मुदा ई प्रक्रिया जे ५० सालसँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद आ कायस्थवादक संजीवनी बूटी छल कोना धराशायी भऽ गेल। मैथिली साहित्यमे एहन की भऽ रहल अछि, कोन ऐतिहासिक क्रिया- प्रतिक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक, आ जे रमण-बिहारी- दरिहरे आ हुनकर सभक आका साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ जातिवादी रंगमंच नै बूझि सकल? सगर राति दीप जरय द्वारा ब्राहम्ण युवामे जे कट्टरता ढुकाओल जा रहल छल से जखन तोड़ल गेल तँ बिहारी- रमण- दरिहरे आ आका सभ बूझि नै सकल जे की भऽ रहल अछि आ अन्ततः ओ सभ अपन पेशेन्स खतम कऽ लेलन्हि। मुदा ऐबेर तँ दुनियेँ उनटल छल। रहुआ संग्रामक कथा गोष्ठीमे रमणजी सहित सभ निर्णय लेलन्हि जे राति भरि कियो नै सुतता, मुदा भोजनसँ पहिने जखन सभ नामी(!!) कथाकारक पाठ कऽ सुति रहला तँ भोरहरबामे जे युवा सभ नामी कथाकार लोकनिक कथा सुनने रहथि, तिनकर नम्बर एलन्हि। आशीष अनचिन्हार जखन कथा पढ़ैले एला तँ संचालक ओंघा रहल छला आ मात्र अध्यक्ष शिवशंकर श्रीनिवास जागल रहथि, नै सुतबाक निर्णय लेनहार रमणजी फोंफ काटि रहल रहथि, जकर विरोधमे अध्यक्षक कहलाक उपरान्तो आशीष अनचिन्हार कथा पाठ करबा सँ मना कऽ देलन्हि, ओ पोस्ट माडर्न कथा बादमे "विदेह लघु कथा" मे प्रिन्टमे छपल। मुदा ब्राह्मणवादी सेंसर प्रक्रिया एतेक जब्बर छै जे ने आयोजक, ने रमण आ ने अध्यक्ष-संचालकक फर्जी सगर रातिक इतिहासमे एकर वर्णन भेटत। अरुचिकर गपकेँ झँापि देबाक ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति एकर कारण अछि। ८१ टा सगर राति भेबो कएल आकि नै, लोक हमरासँ पुछै छथि। पहिने डाकसँ रचना आबै आ से नामी (!!) कथा सभ पढ़ल जाइ छलै, जे युवा सभ सदेह आबथि तिनकर नम्बर एबे नै करन्हि, एबो करन्हि तँ सुतलाहा बेरमे, मुन्नाजी जखन एकर विरोध केलन्हि तँ वएह कहल गेल, गप झाँपू, रजिस्टरमे ओइ नै एनिहार सभक सेहो उपस्थिति दर्ज भेल तेँ। बहुत कथा गोष्ठीमे दसो टा कथाकार नै एला, मुदा उपस्थिति रजिस्टरमे बहुत रास उपस्थित भेटता, किछु एबे नै केला, किछु डाकसँ एला(!!) आ किछु हाजरी बना कऽ निपत्ता भऽ गेला सेहो। जेना युद्धमे ३००० सँ कम मुइने ओकरा युद्ध नै कहल जाइए, तहिना दस टा सँ कम उपस्थितिकेँ सगर राति केना कहल जा सकत? ८१ क संख्या बड्ड कम भऽ जाएत, ८१ बड्ड बेशी होइ छै, एतेमे तँ शान्त क्रान्ति भऽ जइतए, से किए नै भेल तकर कारण ऊपर देल अछि। ऐ समानान्तर आन्दोलनमे हमरा सहयोग चाही बा विरोध, धनाकर ठाकुर आ गंगेश गुंजनक "आइडियोजिकल न्यूट्रेलिटी"क मतलब सेहो एकेटा छै, आ से छै समानान्तर धाराक विरोध। आ इतिहास हमरो मूल्याँकन करत आ हुनको (विरोधी आ न्यूट्रल फिफ्थ कालमनिस्टक) । विदेहक सम्बन्धमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ एकटा फकड़ा मोन पड़ल छलन्हि- "खस्सी-बकरी एक्कहि धोकरी"। राजा सलहेसक गाथामे जतऽ सलहेस राजा रहै छथि चूहड़मल चोर भऽ जाइ छथि आ जतऽ चूहड़मल राजा रहै छथि सलहेस चोर भऽ जाइ छथि। साहित्यक ब्राह्मणवाद जातिक आधारपर समीक्षा करैए, समानान्तर परम्पराक उदारवाद कट्टरता विरोधी अछि। समानान्तर परम्परा मिथिला आ मैथिलीक उदार परम्पराकेँ रेखांकित करैए तँ ब्राह्मणवादी समीक्षाकेँ मिथिलाक कट्टर तत्व प्रभावित करै छै। समानान्तर परम्पराक घोड़ा ब्राह्मणवादी समीक्षामे गधा बनि जाइए, आ ब्राह्मणवादी साहित्यमे तँ गधा छैहे नै, सभ घोड़ाक खोल ओढ़ने छै। आ सएह कारण रहल जे मैथिलीक सुखाएल मुख्य धाराक साहित्य दब अछि। आ सएह कारण रहल जे अतुकान्त कविता हुअए बा तुकान्त, बहरयुक्त गजल हुअए बा आजाद गजल; रोला, दोहा, कुण्डलिया, रुबाइ, कसीदा, नात, हजल, हाइकू, हैबून बा टनका-वाका सभ ठाम समानान्तर परम्परा कतऽ सँ कतऽ बढ़ि गेल; नाटक-उपन्यास-समीक्षा, विहनि-लघु-दीर्घ कथा सभ क्षेत्रमे अद्भुत साहित्य मैथिलीक समानान्तर परम्परामे लिखल गेल मुदा ब्राह्मणवादी सुखाएल मुख्यधारा आ जातिवादी रंगमंच छल-प्रपंच आ सरकारी संस्थापर नियंत्रणक अछैत मरनासन्न अछि। बहुत लोक ऐ तरहक कमेण्ट पछिला ६ सालसँ दऽ रहल छथि जे आब विदेह बदलि गेलै, ओकरा सभ सन भऽ गेलै। विदेहक उद्देश्य ने बदलल छै आ ने बदलतै। कोन व्याख्या ककर तुष्टीकरण छै से स्पष्ट बिनु केने ऐ तरहक कमेण्ट कएल जाइत अछि। हुनकर आशा जँ ई रहैए जे मैथिली साहित्य केँ युवाक उत्साह विदेहक माध्यमसँ नव दिशा प्राप्त करत आ से आब लागि रहल अछि जे से आब व्यक्तिगत कुण्ठाक मंचक रूपमे दुरुपयोगी भऽ गेल अछि तँ ऐ सम्बन्धमे हमर यएह कहब अछि जे सत्यक कियो उपयोग कऽ सकैए आ कियो दुरुपयोग, जे हुनका दुरुपयोग आ व्यक्तिगत कुण्ठाक तुष्टीकरण आब लागि रहल छन्हि से बहुत गोटेकेँ ६ साल पहिनहियेसँ लागि रहल छन्हि, आ तकर व्याख्या हमरा लग यएह अछि जे ओ सभ मात्र विदेहसँ सिम्बोलिक विरोधक आशा करैत रहथि, असली परिवर्तन नै चाहनहारकेँ यएह असली ब्राह्मणवाद बुझेतन्हि, कारण बदलल पात्रसँ ब्राहम्णवादी मानसिकता उद्वेलित भऽ गेल छै, ओ गेल तँ हम अबितौं मुदा ई सभ के आबि गेल? अहाँकेँ बुझबाक चाही जे मैथिली आगाँ एलै, जकरा जतेक प्रतिभा छलै ओ विदेहक माध्यमसँ ततेक सिखलकै आ ततेक आगाँ बढ़लै आ बढ़तै। किछु लोक जँ स्वार्थक लेल विदेहसँ जुड़ला मुदा आनुवंशिक जाति श्रेष्ठता हुनकासँ विदेहक निश्छल प्रयासोक बावजूद नै गेलन्हि, आ जइ विदेहकेँ ओ साहित्य आन्दोलन बुझै छला (हृदयसँ नै) आ विदेहकेँ इमोशनल ब्लैकमेल, धमकी , हमरा आ हमरा परिवारकेँ ईमेल- फोनसँ गारि, छोड़ि कऽ जेबाक धमकी (छोड़ि कऽ जेबाक धमकी देनिहारमे संयोगसँ अखन धरि मात्र ब्राहमणे छथि जिनका लगै छन्हि जे सिमबोलिक प्रोटेस्ट धरि मात्र विदेह सीमित रहितए), जे आब अहँू वएह (!!), बुझलौं प्राइज़ लेल, फलनाकेँ दिआबए चाहै छिऐ, अपने लिअ चाहै छी, व्यक्तिगत राजनीति, विदेहक भला नै हएत, ई सभ ६ सालसँ सुनि- सुनि हमर कान पाकि गेल अछि। रामदेव झा आ अमर पहिनेँ कहैत रहथि, हम अपन कनियाँकेँ पुरस्कार दिआबऽ चाहै छिऐ, अपने लिअ चाहै छी, सभ हँसि देलकन्हि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग निर्वस्त्र अछि, दोसराकेँ की सम्मानित करत तँ आब कहि रहल छथि जे उमेश मण्डल ,राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरकेँ हम पुरस्कार दिआबऽ चाहै छिऐ। मोहन भारद्वाज देवशंकर नवीनक सोझाँ कहै छथि जे गजेन्द्र ठाकुर पागले ने छै जेना लखन झा छलै। दरिहरे सेहो लाल बुझक्कर छथि, हुनका आब बुझबामे आबि गेलन्हि जे हमरा साहित्य अकादमी सँ झगड़ा अछि तेँ, व्यक्तिगत राजनीति तेँ। बिहारी मुन्नाजीकेँ फ़ोन करै छथि आ कहै छथि मात्र जगदीशे मण्डलकेँ किए आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि (!!) ब्राहम्णवादी मानसिकता ई छिऐ, जे जगदीश मण्डल मेरिटसँ नै, बढ़ेलासँ आगाँ बढल छथि जेना मैथिली साहित्यमे पहिने होइ छलै। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि जे विदेह किए जातिवादी रंगमंचक विरोध करैए, किए समानान्तर परम्परा भऽ कऽ मूल परम्पराक गुणवत्ताक समीक्षा करैए, समानान्तर तँ मूलसँ मिलिते नै छै तँ किए हमर सभक नाम लै छी, अलग रहू, यएह छिऐ असल ब्राहम्णवाद- कायस्थवाद। चर्चे नै कर, काने बात नै दे!! आ ईहो संयोगे अछि जे जइ २-४ टा लोककेँ दिक्कत छन्हि से ब्राहम्णवादी प्रवृत्तक छथि, अनका ई दिक्कत किए नै छन्हि। पछिला ६ सालसँ विदेह जहिना छल ओहने रहत, अगिला कमसँ कम ३० साल धरि मैथिली साहित्य आब अहिना चलत। विदेहमे जकरा जे मेरिट छै ओ ओतेक बढ़त, चाहे ओ कोनो जाति, धर्म, क्षेत्रक होथि। विदेह जिनका बदलल लागि रहल छन्हि ओ स्वयंकेँ देखथु जे ओ तँ नै बदलि गेल छथि? सगर राति दीप जरयमे अलिखित संविधानक नामपर बहुत रास खेल भेलै। ई मुख्य रूपेँ कथावाचनक गोष्ठी छिऐ मुदा एतऽ आलोचनात्मक आलेख पढ़बाक सेहो अनुमति छै आ से जँ अहाँक नाम रमण अछि तखने टा, से जखन कबिलपुर गोष्ठीमे मुन्नाजी विहनि कथा पर आलेख पढ़बाक अनुमति मांगलन्हि तँ से अनुमति नै भेटलन्हि, आ एतऽ अलिखित संविधानक सोंगर लेल गेल, आ तकर दूटा कारण, एक तँ मुन्नाजीक नाम रमण नै छियन्हि, दोसर विहनि कथाक कनसेप्ट विदेह द्वारा आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि से तकर विरोध, किए ने ओ कनसेप्ट कतबो वैज्ञानिक होइ। झंझारपुर गोष्ठी मे जे एला तिनकर कथाक पाठ नै भेलन्हि मुदा डाकसँ आएल कथाक पाठ भेल, आ जँ अहाँ अविनाश छी सुमन-अमरकेँ गारि लिखै छी यात्रीक नामपर , तँ अहूँ कथाकार, कवि सभ , नै रहितो , छी, देवघर गोष्ठीक संयोजकत्व सेहो बोनसमे अहाँकेँ भेटत। से घोंघरडीहा गोष्ठीमे जिनका सभकेँ कथा नै पढ़ऽ देल गेलन्हि, ओ सभ युवा एकर विरोध केलन्हि, किछुकेँ कथा पढ़ऽ देल गेलन्हि आ जिनका नै पढ़ऽ देल गेलन्हि से अगिला कथा गोष्ठीसँ एनाइ बन्द कऽ देलन्हि। जे सभ मैथिली फिल्म आ डोक्यूमेण्टरीक नामपर लोकसँ पाइ ठकलन्हि से रमण-दरिहरे-बिहारीक विदेहक विरोधमे संगी छथि, जे युवा प्राइज लेल मैथिलीयोमे लिखलन्हि, जातिवादी सभसँ मिलि साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कार लेलन्हि ओ तँ स्वाभाविक रूपे हुनकर संगी हेता। विदेह उमेश मण्डल आ जगदीश प्रसाद मण्डलक कान्हपर बंदूक राखने अछि, यूज़ कऽ रहल अछि, आ जँ हुनकर सभक रचना नै छपऽ देल जाइत, "तिल बहब ने" छपबासँ पहिने, सकरबाबल जाइत, तखन सभ ठीक छल। ब्राहम्णवादी सभ जकाँ विदेह कोनो काज केलासँ पहिने "तिल बहब ने" क शर्त-क़रार नै करबैए आ सएह कारण अछि , नव ब्राह्मणवादी ई नै बूझि सकला, धू, एहनो क़तौ भेलैए। बिनु जान-पहिचान, भेंट- घाँटक मात्र मैथिलीक नामपर सभ एकत्रित भऽ गेल से हुनका अजगुत लगलन्हि। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि आ ई विचार रामदेव झाक सेहो छन्हि जे जखन विदेह, साहित्य अकादेमीक समानान्तर पुरस्कार शुरू कैए देलक तखन साहित्य अकादेमी लेल शोर किए? माने ओकरा बकसि देल जाए! अशोक अविचल शिवकुमार जीकेँ कहै छथि जे मायानाथ झा, आनन्द कुमार झा ( ऐमे गुणनाथ झा जोड़ि लिअ) आदि जिनका सभक चर्चा विदेह केलक, सभकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलै, तँ हुनका उत्तर भेटल छलन्हि, जँ हुनकर सभक नाममे झा नै मण्डल रहितन्हि तँ की ई संभव छल? आ साहित्य अकादेमी कोनो मनुक्ख नै छिऐ जकरा संग भतबरी कएल जाएत आ ने ककरो पैतृक संपत्ति जकर उपयोग ब्राहम्ण कायस्थक तथाकथित साहित्यकारकेँ ख़ैरात बँटबा लेल आब कएल जा सकत। आ हमरा विषयमे जखन सभकेँ बुझबामे आबि गेलन्हि जे नै रौ, ई अपना सभ सन नै अछि, विदेह अपना सभ सन नै छौ, तँ हुनका सभ केँ आर चिन्ता लागि गेलन्हि! रौ कहीन जे, ईहो सभ हमरे सभ सन, कहीं ई, ई जे अपने प्राइज़ लेब' चाहैए बा दोसराकेँ दिआबऽ चाहैए.... ब्राह्मणवाद मैथिलीकेँ गीरि गेलै, आ सभकेँ बुझल छै जे दूटा सहोदरो एक रंग नै होइए, से पूरा जाति नीक बा अधला हेतै ई कनसेप्ट विदेहक नै छै, ओ तँ ब्राह्मणवादी कनसेप्ट छिऐ। अतुलेश्वर झा छथि ओना तँ ब्राहम्णवाादक विरोधमे रहथि मुदा पाग आ विद्यापतिक हमर लेख क बाद कष्ट भऽ गेलन्हि, हुनकर मानब रहन्हि जे पागेपरसँ मौरओढ़ाएल रहै छै आ मौर जे गएर ब्राह्मणक विवाहमे प्रयुक्त छिऐ से पागे छिऐ। मुदा जखन हुनका हम कहलियन्हि जे मौर कोढ़िलासँ बनै छै आ पूर्णियाँक ब्राह्मणमेबरसातिमे सेहो मौर विवाहिता महिला द्वारा पहिरल जाइ छै, तँ मिथिलाक संस्कृतिसँ अपन अपरिचय सिद्ध भेलाक बादो ओ पागक साहित्यिक आ राजनैतिकसभामे प्रयोगक पक्षमे रहला। आ एहेन बहुत रास लोक छथि, प्रेम चन्द्र पंकज आ अभय दासकेँ कोनो ने कोनो बात लऽ कऽ विदेहसँ घृणा भऽ गेलन्हि, आ ई गप ओ सभ मुन्नाजीकेँ सूचित केलन्हि जे ओ लोकनि विदेह पढ़नाइ आब छोड़ि देलन्हि, प्राय: आब ओ सभ चोरा नुका कऽ विदेह पढ़ै छथि,कारण सभ गतिविधिक जानकारी हुनका सभकेँ रहै छन्हि। सगर रातिमे यात्री दिससँ सुमन-अमर केँ गारि देनहार आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि देनहार, मैथिली साहित्यमे ब्राहम्णवाद बचेबाक लेल विदेहक विरुद्ध दरिहरे- रमण- बिहारीक संग आबि गेल छथि अंतिम लड़ाइ लड़बा लेल। २ रमण, बिहारी आ दरिहरेक कथा गोष्ठीक तिथि ८२ म सगर राति दीप जरयक तिथि ३१ मइ २०१४ घोषित भेलाक बाद भेल। ऐ तीनू लग मौलिकताक सर्वथा अभाव अछि। कोनो नव चीज ई लोकनि सोचि नै सकै छथि, हँ प्रतिक्रियावादी, धुरफंदी चीज करबामे ई लोकनि सभसँ आगाँ छथि। से रमण ७९ म कथा गोष्ठी ओरहामे विदेह साहित्य आन्दोलनक खिलाफ गोलैसी करबाक प्रयास केलन्हि, गोष्ठी प्रारम्भ हेबासँ पहिने सायास अही काज लेल पहुँचला, आ बजैत फिरला जे विदेह साहित्य आन्दोलन-तान्दोलन नै छिऐ, खाली गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डल अपन नाम करऽ चाहै छथि, जे उत्तर भेटलन्हि तकर बाद ओ परदाक पाछाँ चलि गेला, जातिवादी बयान देलन्हि, हीरेन्द्र झाक उसकेलासँ अशोक मेहता सेहो ओइ गोष्ठीक बहिष्कार केलन्हि, इच्छा तँ रमणोक रहन्हि बहिष्कार करबाक मुदा हुनकर गाड़ी ड्राइवर समधियौर लऽ कऽ चलि गेलन्हि, से कारण ओ मुन्नाजीकेँ कहलखिन्ह। शंकरदेव झा बहुत पहिने सूचित केने रहथि जे, जे रमण प्रबोध नारायण सिंहकेँ प्रबोध नारायण सिंह एण्ड कम्पनी कहै छला आ सएह आब नचिकेताक बडीगार्ड बनल छथि। ई अवसरवादिता रमणक चरित्रमे छन्हि से जखन ओ दरिहरे आ बिहारीक संग अपन साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ ओकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फ़र्ज़ी संस्था द्वारा संपोषित कथा गोष्ठीक घोषणा केलन्हि तँ ओ सभ ३१ मइ २०१४ क तिथिये सोचि सकला, तकर दू टा कारण छलै, हुनका सभमे मौलिकताक अभाव जे हिनकर सभक रचनामे सेहो दृष्टिगोचर होइत अछि, दोसर घृणित अवसरवादिता आ जातिवादी सोच। दरिहरे कहै छथि जे सगर राति हुनकर दलान अछि, ओइमे सर्वहाराक प्रवेश हुनका लेल कष्टकर छन्हि, बिहारीक कष्ट अही बात लऽ कऽ छन्हि जे पहिने एक दू टा कम्पटीटर छल तँ अस्तित्व जोड़-तोड़सँ बनबै छला, आब तँ मामिले खत्म, रमण कतेक छल-प्रपंचसँ मोहन भारद्वाजकेँ सगर रातिसँ बाहर केलन्हि, मुदा आब नव समीक्षक सभ आबि गेला। से यात्री दिससँ अमर-सुमनकेँ गारि पढ़ऽ बला आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि पढ़ैबला, ई दुनू ब्राहम्णवादी ग्रुप मैथिली साहित्यक विदेह साहित्य आन्दोलनक विरुद्ध मैथिली साहित्यमे जातिवादितापर ऐ घोर संकटक कालमे एक होथि, ई इच्छा राखैत "रमण- बिहारी- दरिहरे" कथा गोष्ठीक घोषणा केलन्हि,मुदा गजेन्द्र ठाकुर, विदेह आदि हुनका सपनामे डरबै छलन्हि से ओ एकटा चोरि केलन्हि, तिथिक चोरि, से किछु गोटे तँ कम हेतै जे सगर रातिमे ३१ मइ २०१४ केँ "रमण- दरिहरे- बिहारी" द्वारा घृणा कएल जाएबला गजेन्द्र ठाकुरक गाममे ओइ राति नै जा सकता। बड़ा आएल छथि आन्दोलनी, ब्राह्मणवादी घुरछीमे तेनाने फँसेबनि जे रमण- बिहारी- दरिहरेकेँ मोन रखता। हौ बाबू यएह छी असली विलेन, एकरा ख़त्म करू, विदेह आन्दोलन खतम आ मैथिली साहित्यपरसँ ब्राह्मणवादक पकड़ खतम हेबाक ख़तरा खतम, मैथिली जिबियेकेँ की फ़ायदा जँ अपना सभक वर्चस्व रहबे नै करए, अखन यात्री ग्रुप, अमर-सुमन ग्रुप नै करू,सभ ऐ संकटमे मिलि जाउ, बादमे झगड़ा करब, नै तँ गजेन्द्र ठाकुर खोप सहित कबूतराय नम: कऽ देत। मुदा की गजेन्द्र ठाकुरकेँ खतम केने मैथिली साहित्य आन्दोलन खतम भऽ जाएत? की परिवर्तनक धारा जे भयंकर रूपेँ विदेह द्वारा छोड़ि देल गेल छै ओकर अस्तित्व गजेन्द्र ठाकुरसँ अलग नै भऽ गेल छै, गजेन्द्र ठाकुरकेँ खतम केलासँ की ओकरा रोकल जा सकत? साहित्य अकादेमीसँ फ़ोन आएल जे ओकर मैथिली विभागमे जे गड़बड़ी भऽ रहल छै ओइले साहित्य अकादेमी कोना ज़िम्मेवार अछि? किछु गोटेक फ़ोन आएल जे ओ सभ सगर रातिक अतिरिक्त रमण-दरिहरे-बिहारीक साहित्य अकादेमी संपोषित गोष्ठीमे सेहो जाए चाहै छथि कारण ओ पब्लिक फंडसँ आयोजित होइ छै, आ जँ सगर रातिक तिथि हम बदलि दी रमण-दरिहरे-बिहारी नाम्ना तिथि चोर की करता? आरती कुमारी संग कएल टॅार्चरक बाद रमण-बिहारी-दरिहरेक मोन जे बहसल से किए नै बूझि सकल ऐ परिवर्तनकेँ?मेडियोक्रिटी नै जानि कतऽ लऽ जेतनि तीनूकेँ। मिथिला यूनिवर्सिटी आकाशवाणी दरभंगा आ साहित्य अकादेमी मे जे भऽ रहल अछि सएह "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य" मांगैबलाक मिथिला राज्यमे हएत, से जे शंका लोककेँ छै से असत्य नै छै। साहित्य अकादेमी मैथिलीक पतन लेल जे काज केलक अछि आ कऽ रहल अछि तकरा मौन आ मुखर सम्बोधन केनिहारक संख्या आंगुर पर गानल जा सकैत अछि। "सगर राति दीप जरए" समानान्तर परम्पराक बौस्तु रहए तकर प्रयास हेबाक चाही, साहित्य अकादेमी पोषित मुख्यधारा लग ने लेखक छै आ ने पाठक आ ने प्रतिभा। ओकर इतिहास लेखनमे एहेन एहेन लोक आ पोथीक वर्णन भेटत जकर अस्तित्व नै छलै, से मूल धारा अपन इतिहास लेखनमे कोनो गनती करबा लेल स्वतंत्र अछि । राधाकृष्ण चौधरी आ सुभाष चन्द्र यादवक संग कएल छलक विरोध ओइ धारामे नै भेलै, कारण ओ "स्टेटस को" समर्थित लोकक संगठन छिऐ। साहित्य अकादेमीक गोष्ठी मूल धाराक लेल सगर रातिक गोष्ठी भऽ सकैए समानान्तर धाराक लेल नै। मैथिली आ मिथिलासँ प्रेम करैबला अधिसंख्यक समानान्तर परम्परा सम्बन्धी वर्ग "गरिखर" मुख्यधाराक डरे साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै दऽ सकत। मैथिलीक मूल "गरिखर" परम्परा मे २० टा लेखक छै आ पाठक एक्कोटा नै, ई बीस गोटा बीस ग्रुपमे विभक्त अछि, सभ आपसमे कुकुड़-कटाउझ करैत रहैत अछि, मुदा विदेहक विरोधमे एक भऽ जाइत अछि आ साहित्य अकादेमीक पक्षमे भऽ जाइत अछि। "सगर राति दीप जरय" यएह एकटा संस्था छै जतऽ नन्दविलास राय सेहो जा सकै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो। मूल धारा युवा ब्राह्मण साहित्यकार सभमे जातिवादिताक विष घोरि रहल अछि, आ ऐ सँ ओइ युवा सभकेँ अपने नोकसान भऽ रहल छन्हि। जइ लेखकमे प्रतिबद्धताक कमी अछि, जेना अमलेन्दु शेखर पाठक, अरुणाभ झा सौरभ आ दिलीप झा लूटन से ओइ जालमे फँसि गेला। अरुणाभ झा सौरभ आ दिलीप झा लूटन केँ युवा पुरस्कार भेट गेलन्हि। मैथिलीकेँ आब की घाटा हेतै, स्वाहा तँ कइये देने रहै, सुधारक सेहो गुंजाइश नै छै, तेँ ओ सभ कोनो सॉफ्टनेस डिजर्व नै करैए। मुदा ई चमचागिरी समानांतर धाराक युवा (ब्राह्मण वा गएर ब्राह्मण) मे भेटब असम्भव (जँ ब्लैक शीपकेँ छोड़े दी), ई युवा तुर्क मंच सापेक्षीय चरित्रक निर्वाह नै करै छथि। अमलेन्दु शेखर पाठक आ दिलीप कुमार झा लूटन क कविता संग्रह साहित्य अकादेमी प्रकाशित केलक, ई बात फराक जे ओइ समयमे ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मण वर्गमे बहुत युवा रहथि जे बेशी प्रतिभाशाली रहथि मुदा प्रकाशन लेल हिनके दुनूकेँ साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग चुनलक। तथापि ई दुनू गोटे किछु कवितामे आशा जगेलथि, मुदा लेखकीय प्रतिबद्धताक अभावक कारण ओ आशा धूमिल भऽ गेल। जखन जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ गुआहाटीमे मुख्य अतिथि बनाओल गेलन्हि तँ बैजू आदिक विरोध आयोजककेँ सहऽ पड़लन्हि आ ओइ वीडियो रेकॉर्डिंगमे ब्लैकआउटक मादे जखन हम आयोजककेँ पुछलियन्हि तँ ई जानकारी भेटल, आ जखन ब्लैक आउट खतम भेल तँ अमलेन्दु शेखर पाठक निर्लज्जतापूर्वक कहैत सुनल गेला "सपनोमे नै सोचने हेतै.." इत्यादि.." आ बैजू आदि दस गोटे ओइपर निर्लज्जतापूर्वक ठहाका लगेलन्हि, ई वीडियो विदेह वीडियोमे उपलब्ध अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल क स्टेचरक अमलेन्दु शेखरक मेण्टर सभ सेहो नै बनि सकता आ विद्यापति पर्वक मुख्य अतिथि भेनाइ जगदीश जीक नै ओइ विद्यापति पर्वक लेल सम्मान छल। खएर .. मुदा तकर बाद दरभंगाक विद्यापति पर्वपर (बैजूक विद्यापति सेवासंस्थानक विद्यापति पर्व) जखन नन्द विलास राय पहुँचला तँ अमलेन्दु हुनका अपमानित करैत मंचे पर कहलखिन्ह " अमलेन्दु अहाँकेँ पोस्टकार्ड लिखि कऽ बजेने रहथि!!!" आ ऐ गपक चर्चा नन्द विलास राय कमलेश झाक संस्थाक सम्मान समारोहमे केलन्हि जतए भीमनाथ झा आदि सभ उपस्थित रहथि। अखनो अमलेन्दु आकाशवाणी दरभंगाक मैथिली विभाग मे जे जातिवादी स्वरक प्रचार कऽ रहल छथि से लेखकीय प्रतिबद्धताक विरुद्ध अछि। जँ समानान्तर परम्परा साहित्य अकादेमी गोष्ठीकेँ मान्यता नै दऽ रहल अछि तँ ऐ सँ मिथिलापर ई कलंक तँ दूर भेबे कएल जे हम सभ "स्टेटस कोइस्ट" छी, आब अधिसंख्यक वर्ग ओइ कुकृत्यसँ अपनाकेँ दूर राखऽ चाहैए। मैथिली साहित्य आ इतिहास दू खण्डमे बँटि गेल अछि। लोक जेना गांधीजीक विरोध कऽ महान बनऽ चाहैए तहिना विदेहक विरोध कऽ कए सेहो। साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता भेटै ओइ लेल कमलेश झा सन "कम्यूनिस्ट" आ ढेर रास "मैथिल ब्राह्मण मात्र लेल मिथिला राज्य आ मैथिली भाषा" मांगैबला ब्राह्म्णवादी (कम्यूनिस्ट ब्राह्मणवादी सेहो) अपस्यांत छथि। मुदा समानान्तर धाराक इतिहास लेखन मे साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ "सगर राति दीप जरए" केर मान्यता नै देल जा सकत। मूल धाराक इतिहास लेखन मे ओ साहित्य अकादेमीक गोष्ठी लेल संख्यामे "एक" नै "अनेक" संख्याक वृद्धि कऽ सकै छथि| झंझ-मंझ: Arvind Thakur हम आएब ! अवश्य आएब ! 81/82 क चक्करक बादो आएब ! Like · · Share · February 8 at 11:05am Umesh Mandal, रवि भूषण पाठक and 2 others like this. Gajendra Thakur kono 81-82 ka chakkar nai chhai. ee 81 m chhiyai, sahitya akademi goshthi ke sagar raatik manyata nai del jaa sakat. February 8 at 9:54pm · Like · 2 Shyam Darihare EE manyata debak adhikar kon sanstha wa vyakti ke chani. Anere ekta neek andolan ke duri karbak prayas band kayal jaybak chahi. sagar rati deep jaryak madhyame apan rajniti karab nindniy thik. 19 hours ago · Like Gajendra Thakur श्याम दरिहरे जी। सगर राति दीप जरयकेँ साहित्य अकादेमीक बंधक बनेबाक कोनो प्रयास बा ओइ प्रयासक समर्थन क्षम्य नै छै। सगर रातिक माध्यमसँ जे राजनीति कएल जा रहल छल ओकरा ध्वस्त क' देल गेल अछि। सुपौल सगर रातिमे जातिवादी स्वरकेँ रमानन्द झा रमण जी द्वारा देल मौन समर्थनक बाद सगर राति ओरहा मे रमानन्द झा रमण जी द्वारा जे जातिवादी स्वर उठाएल गेल रहै जे ओ श्रोत्रिय रहलाक बादो पासवान ऐठाम जा क' हुनका आ सगर राति पर अहसान केलनि ई सभ गप सगर रातिमे असहनीय अछि। 19 hours ago · Like Shyam Darihare Sagar rati deep jaraya kahiyo kakro badhak wa gulam ne chhalaik aa ne kakaro satta chhaik je ee kay sakat. Maithilik je sthiti chhaik tahi me ehan vivad uthayab ghaatak chhaik. jani bujhi kay kichhu lok ehi aandolan ke hathiyabay aa prachar payba lel apsyant chhathi. sagar raati deep jaray jahina chhaik tahina rahay del jay. Rajniti tuarat band ho. Badhiya likhbak badla rajniti karab nindniy thik. 19 hours ago · Like Gajendra Thakur श्याम दरिहरे जी। चारि गोटे मिलि क' एक दोसराक कथाक बाहबाही करै छला, मात्र एक्के जातिक ई गोष्ठी छलै, क्वालिटीक ओत'अभाव छलै आ ओ राजनीतिक अखारा छल, सर्वहारा वर्ग एकरासँ दूर रहै,नव कथाकार नै जुड़ि रहल छला, किछु गोटे एकरा हथियेने छला, आ सएह सभ आब कब्जा छुटला पर हाक्रोश क' रहल छथि; यएह एकर स्वरूप रहै, एकर स्वरूप ओहिना रह' देल जाइ से अहाँक इच्छा अछि? मैथिली आगाँ बढ़ए आ ओकरा पर लागल जातिवादी कलंक दूर होइ ओइ सँ अहाँक कोनो सरोकार नै। सभ जाति सभ क्षेत्रक लोक मैथिलीसँ आ सगर राति सँ जुड़ि रहल छथि, ओइसँ अहाँकेँ प्रसन्नता नै अछि? आन्दोलन केँ राजनीति आ राजनीतिकेँ आन्दोलन कहिया धरि अहाँ बुझैत रहबै? 19 hours ago · Like Shyam Darihare sagar rati deep jaray ne rajnitik manch chhaik aa ne sarkari rahat kendra. Je neek likhat takar naam hetaik. Neek rachnak prashansa hetaik. Ehi me jativad, sarvhara aadi shabdavalik prayog vaih lok kay sakait achhi jakra rachana karm sa nahi apitu matra rajniti sa matlab hoik. Kharab rachnak yadi keo godhiyanbadak adhar par wah wahi kartaik t se prabudh pathak swikar nahi kartaik. Ehi me jatik kon sawal chhaik. sawal matr rachanak gunvatta chhaik. Anere aamil pibak kono jarurati nahi. Jati aa sarvhara shabd aanika ahan lekhan kary me seho aarakshanvadi rajniti aani rahal chhi. Bhashak ehan seva lel badhai.Yadi kono truti ehi me chhaik t okar samadhan hobak chahi muda mathdukhi chhorabay lel aatmhatya ghor anuchit achhi. Hamra kon chij say sarokar achhi takar chinta me aahan kiyak parait chhi. Rajniti aa andolan me antar bujhbak hamara aahan atek abgati nahi achhi se t aab nahiye achhi. 18 hours ago · Like Gajendra Thakur सगर राति दीप जरय राजनीतिक मंच नै छै, आ नहिये सरकारी राहत केन्द्र; मुदा साहित्य अकादेमी राजनीतिक मंच बनि गेल छै आ मैथिल ब्राह्मणक किछु कट्टर तत्त्व जकर रचनामे कोनो जान नै छै तकरा साहित्य अकादेमी राहत सेहो प्रदान करैए। आ जे ओइ साहित्य अकादेमी आदि सरकारी संस्थासँ बिनु रचनाक श्रेष्ठाक राहत लेबा लेल लालायिय छथि ओ जाति आधार पर सगर रातिकेँ ओकर बंधक बनब' चाहै छथि। सर्वहारा आ जाति शब्दक चर्चा साहित्यमे नै हेबाक चाही ई सुनैत सुनैत हमर कान पाकि गेल अछि। जकर रचनामे जान नै होइ छै, जकरा पाठक नै छै, गोधिया बना क' जे सड़ल पाकल रचनापर प्रशंसा पेबाक आदति धेने अछि, तकरा आन्दोलन राजनीति बुझेतै, जे सुखाएल इनारक बेंग छथि, हुनका मैथिली केँ पाठक भेटने सभसँ बेशी कष्ट छन्हि, कारण गोधियाँ सभपर पाठक हँसि रहल छन्हि। मात्रक एक जातिक (मैथिल ब्राह्मणक किछु कट्टर तथाकथित साहित्यकारक) आरक्षण जाधरि मैथिली लेल छलै (साहित्य अकादेमीमे अखनो धरि छै) तकर पक्षमे आ तकरा हाथे सगर रातिकेँ बेचबापर बिर्त लोक जखन "लेखनमे आरक्षण" क विरोध करै छथि तँ अपन तर्कक घुरछीमे अपने फँसि जाइ छथि, हुनका अपन जातिक सड़ल पाकल साहित्य श्रेष्ठ लगै छन्हि आ तकर विरोधकेँ ओ "मथदुक्खी छोड़ाबए लेल आत्महत्या" कहै छथि, आ जँ सत्य सोझाँ आनल जाए तँ तइपर अपन "आमिल पीबि क'" बजबाकेँ ओ दोसराक आमिल पीब कहै छथि। आ त्रुटि लेल समाधान लेल अहाँ हुनकर पएर पकड़ू, कारण मैथिलीकेँ ओ लोकनि मारि क' सुखाएल इनार रूपी साम्राज्यक मठाधीश बनल छथि, आ भाषाक तइ रूपेँ सेवा केलाक लेल ओ बधाइ सेहो चाहै छथि!! अहाँकेँ कोन चीजक सरोकार अछि से स्पष्ट अछि, आ कोन चीजक अवगति सेहो स्पष्ट अछि। 18 hours ago · Like · 1 Shyam Darihare Shyam Darihare Aahank aakrosh bharal bhasha say bujhait achi je aahan kono vyaktigat karne sahitya akadmik virudh jhanda uthene chhi. Se hamra nahi bujhal chhal aane bujhay chahait chhi. Ham baat matr Sagar rati deep jaryak kay rahal chhi. Aahan bat ke sahitya akadmi dis lay ja rahl chhi. Aahan hamara bich kono prichay seho nahi achhi tain binu janane vyaktigat tippani sa bachbak chahi. Takhan ekta baat kahab je ankar dalaan chhinikay hathiya kay chichiyabay sa badhiya je apana butta sa swayngak ekta nishkalank, aa jati varg vihin dalaanak nirman kay ohi par taal thoki se besi purusharthak baat. Hamra sa kono mathadhish galat thapri pitba let se sattha ehi duniya me kakro nahi chhaik. Ehan kono mathadhish ekhan dhari janam nahi lelkaiak achhi. Aahan ke katahu abharay t suchit karb. kono lobh lalach lel bhashai rajniti karybala lok Darihare lag thadh hobak pahine seho ek say ber sochat kiyak t hamara janayvala keo ehan himmat nahi karat. Aa agar karat t ..... Binu kono parichayak etek baat apne sunaol se dhanyvaad. 17 hours ago · Like Gajendra Thakur अहाँकेँ बुझाइत अछि बा अहाँ सएह बुझ' चाहै छी, आ से अहाँ किए बुझ' चाहै छी से स्पष्ट अछि। अहाँकेँ अपन भाषा आक्रोशित नै बुझाइए, आ दोसराक तर्क किए आक्रोश बुझाइए सेहो स्पष्ट अछि। हम सगर राति दीप जरय क गप क' रहल छी, आ कारण सुनेलौं जे अहाँ बा कियो साहित्य अकादेमीक गोष्ठीकेँ सगर राति कोन कारणसँ बनाब' चाहै छथि, मैथिली केँ पाठक भेटलै, ओ एक जातिक घुरछीसँ बाहर निकललै, ओकर स्तर भारत आ नेपालक आन भाषाक साहित्यक समक्ष एलै, तँ ऐ सँ अहाँकेँ खुशी किए नै अछि? अहाँसँ हमरा व्यक्तिगत परिचय नै अछि आ कएक बिलियनक विश्वमे सभक सभसँ परिचय संभव नै छै तैयो अहाँ व्यक्तिगत टिप्पणी करै छी आ से आरोप दोसरा पर किए लगबै छी, सेहो स्पष्ट छै। सगर राति किछु गोटेक दलान रहै,ई स्वीकारोक्ति अहाँक विषयमे बहुत किछु कहि जाइए, आ अहाँ किए चिचिया रहल छी तकरो विषयमे टिप्पणी करैए। अहाँसँ कोनो मठाधीश थोपरी नै पिटबा रहल अछि,लोभ लालच बला अहाँ सँ सटि नै सकैए, आ जँ से सटत तँ तकरा अहाँ गरदा छोड़ा देबै; मुदा तखन अहाँ ई किए क' रहल छी। एकर कारण ई तँ नै अछि जे ओकर सभक सोच आ आइडियोलोजी अहाँक आइडियोलोजी सँ मेल खाइत अछि, आ जे से अछि तँ अहाँक ई स्वीकारोक्ति दुखद अछि आ ओइ आइडियोलोजीसँ हमर मतभिन्नता आजन्म रहत। · Gangesh Gunjan प्रिय गजेन्द्र जी! 'उचितवक्ता ' के एक बेर फेर बाज' पड़ि गेल । माफी चाही। अहाँक आदर हम अहाँक मिथिलाँचल-हित साधक युगीन संस्थापना कार्यक लेल करैत छी। से अहीं, आ मात्र अहीं टा कएल अछि।अहाँक एहि कृति-लेख कें, चाहियो क' क्यो, कोनो तुच्छ तर्क बा तथाकथित मिथिलाँचल हितैषी-प्रेमी लेख लिखि क' मेटा नहि सकैत छथि। से निर्विवाद । से किनको बुतें अहाँ सँ पैघ काज कैये क' संभव हेतनि। तेँ अहाँ सँ एखनो हमर उमीद नै खत्म भेलय । अपन ताही अग्रज-स्नेहाधिकार सँ आग्रह करैत छी जे एहन सृजन हीन,अनुर्वर विषय ल' क' विवाद अहाँक वास्तविक योगदानक क्षमता-प्रतिभाक बेकार मे क्षय क' रहल अछि।तकर मात्सर्य अछि हमरा।अहाँ मैथिली आ मिथिलाँचलक " श्रेष्ठ आ कालान्तर जीवी " कार्य करबा लेल आएल छी। तेँ। एहि सम्पूर्ण विवाद पर हम शायर मोमिनक एक टा अपन अति प्रिय शे-ए-र कहैत अपन इच्छा व्यक्त करै छी- "मर चुक कि कहीं तू ग़मे हिज्राँ से छूट जाए / कह्ते तो हैं भले की वो लेकिन बुरी तरह।" बेशी लोक उचितो बात केँ नितान्त अरुचिकर वाणी आ तेवर मे करबाक अभ्यासी होइत छथि। हमरा जनैत एही मे मुख्य मुद्दा हेरा जाइ छैक।तेँ फेर वैह -"बात जँचय हमर तं हमरा संतोष । अन्यथा मोन सँ निष्काशित क' देब ।" सस्नेह,
2014-03-14 11:07 GMT+05:30 Gajendra Thakur < 5 hours ago · Like · Gajendra Thakur गंगेश गुंजन जी। गारिक डरे भागलासँ सृजनहीन, प्रतिभाहीन लोकक वर्चस्व फेरसँ काएम भऽ जेतै। डॉ. आरती कुमारी (१९६७-२०१२)क काल्हि रातिमे मृत्यु भऽ गेलन्हि। पति श्री अनिल कुमार रॉय आ पुत्र अनुराग कुमार आ पुत्र उज्जवल प्रकाश केँ छोड़ि ओ चलि गेलीह। हुनकर मृत्युसँ मैथिली साहित्य जगत सन्न अछि। हुनकर एकटा पोथी प्रकाशित अछि "मैथिली मुक्तक काव्यमे नारी"। महिषीमे ७३म सगर राति दीप जरय क माला ओ भागलपुर लेल उठेने रहथि, आ तकरा बाद ओ अस्वस्थ भऽ गेलीह, कोलकातामे ऑपरेशन भेलन्हि। किछु सामन्ती प्रवृत्तिक लोककेँ हुनकर सगर राति दीप जरय क माला उठेनाइ नै अरघलन्हि आ हुनका द्वारा भागलपुरक साहित्यकारसँ माला उठेबासँ पहिने नै पुछबाक, आ "जँ भागलपुर मे सगर राति दीप जरय हएत तँ कियो नै आएत" आदि गप कहि मानसिक वेदना पहुँचा कऽ दीप आ रजिस्टर लऽ लेल गेल, आ सगर राति दीप जरय भागलपुरमे नै भऽ सकल। आ सगर राति दीप जरय पर जे ग्रहण लागल से अखन धरि लागले अछि। हम सभ कहनहियो रहियन्हि जे जँ अहाँ भागलपुरमे सगर राति दीप जरय करय चाहै छी तँ निश्चिन्त भऽ करू, सभ पहुँचत, मुदा ओ कहने रहथि जे ओ सगर राति दीप जरय करय चाहै छथि, मुदा विवादमे नै पड़य चाहै छथि। स्व. आरती कुमारीकेँ कृतघ्न समाज दिससँ श्रद्धांजलि। Shyam Darihare 74wa SAGAR RATI DEEP JARAY-- 10 SEPT 2011. Sthan:- HAZARIBAGH. ( Patna ke taraf sa Hazaribagh me pravesh sa pahile N.H. par Vinoba Vhave University Gate chhaik. University gate sa ek minat baab dahina me ekta barka maidan chhaik waih chhaik HOME GUARDS TRAINING CENTRE. Ohi Gate par sipahi sa puchhari karu o hall dhari pahuncha det. SAB MAITHILI KATHAKAR aa KATHPREMI LOKaNIKE SADAR HAKAR. Like · · Unfollow Post · August 11, 2011 at 3:48am Shefalika Verma and Kislay Krishna like this. Arvind Thakur बढियां खबर ! बधाइ !रोमन लिपि मे लिखबाक अनेक खतरा छै,एकटा एतहु देखाइत अछि -कथाप्रेमी कें कठप्रेमी पढय मे बेसी सुविधा बुझाइ छै|सभ गोटे देवनागरी मे लिखबाक हिस्सक बनाबी त नीक |हम गोष्ठी मे आयब,दरिहरे जी| August 11, 2011 at 7:29am · Like · 2 Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth ahzaribag hit chhaik ? August 13, 2011 at 1:13am via · Unlike · 2 Hirendra Kumar Jha Bhagalpurak arth Hazaribagh kona bhay sakait chaik ? ehi san ta prathak samapti bhay jayat. punarbichar karu. Hirendra August 13, 2011 at 1:15am via · Unlike · 1 Ajit Azad aarti ji goshthi karba me saksham nai chhaith. hunke se puchhla par ee bha rahal chhaik. aarti ji gambhir roop se bimar chhaith aa kolkata me 3 maas se ilaaj kara rahlih achhi. August 13, 2011 at 6:10am · Like Kislay Krishna ee ektaa vikalp rup me sojha aayal achhi.... August 13, 2011 at 8:07am · Like Gajendra Thakur आरती जी २४ सितम्बर केँ गोष्ठी करबा लेल तैयार छथि तकरा बादो हुनका सँ मौका छीन कऽ मात्र दस दिन पहिने गोष्ठीकेँ हजारीबाग लऽ जेबाक की प्रयोजन..? Hirendra Kumar Jha जी सँ हम सहमत छी..आब जखन १० सितम्बर तिथि घोषित भऽ गेल तखन आब ओ पाछाँ हटि जाथि से अलग बात, मुदा की हुनका ई भरोस देल गेलन्हि जे अगिला गोष्ठी वएह करेतीह? हम पहिनहियो कहने रही जे हुनकासँ बिना पुछने कोनो निर्णय नै लेबाक चाही..यदि हजारीबागमे गोष्ठी हुअए तँ सशर्त हुअए जे अगिला गोष्ठी आरती जी करेतीह..ई दवाब जे अहाँक अहठाम २४ सितम्बर केँ कियो नै आएत/ अहाँ भागलपुरमे ककरोसँ नै पुछलिऐ..आदि बना कऽ हुनकासँ जबरदस्ती हँ कहेबाक कोनो मतलब नै..August 17, 2011 at 7:39am · Like Ajit Azad jahiya 10 setamber ke ghoshna bhel...tahi se ek ghanta pahine tak aarti ji lag date final naih rahain. ham fon kayliyai ta o kahlih je AAI RAIT ME HAM AHAN KE KAHAB...KARAN JE EK GOTE HAMRA AARTHIK SAHYOG KARBA LEL CHHAITH...YADI O GACHHI LETAH TA HAM 19 YA 20 SEPTEMBER KE KARAB. ham puchhaliyain 19 ke ya 20 ke? o kahalain EHI DOONU TITHI ME SE JAHIYA SHAIN PARTAIK TAHIYA. ham kahaliyain je ehi doonu tarikh ke shain nai parait chhaik. takhan o garbara gelih. hamhi kahaliyain je 24 ke bha sakait achhi muda durga puja 28 se chhaik...ki ahan 3 september ya 10 september me se kono din kara sakait chhi? o taiyar nai bhelih. ham kahaliyain je takhan ahan 24 ke kareba lel swatantra chhi...aa ham aybo karab muda besi lok nai autah...dosar gap je ekhno tak ahank date final nai achhi ( karan, o takhno ber-ber kahait chhalih je ham ek gote se baat karab takhan date ghoshit karab). ham hunak swasthya aa aarthik sthiti ke dekhait kahaliyain je ahan baad me jahiya thik bha jayab tahiya karab. o kahalain JE HAM SANJH ME AHANKE FINALLY KAHAB. baad me o ohi samay pradip bihari ji ke sabhta baat kahalkhin. pradip ji hunka bujhelkhin je ahan ekra presstige issue nai banau...sabh ahank heet me kaih rahlah achhi. o maini lelkhin aa register hunke patheba lel sahmat bhelkhin. ekar baad pradip bihari ji turat hamra fon kaylain je aarti ji taiyar chhith je agila goshthi hazaribagh me hoiek. pradip ji hunka eeho kahalkhin je ahan ee gap ajit ji ya raman ji ke seho kaih diyoun muda o kahalkhin je ham VIDEHA me kaih dait chhiyaik, sabhke khabar bha jaytaik. ham aai tak videha me hunak kono statement nai parhal. hamra lagait achhi je ehi mamla ke tool nai del jai...o yadi agila goshthi karay chahait chhaith ta o karaith, ehi me kakro kiyaik kono aapatti hetaik. ee goshthi june me hebak rahaik...arthat may me date ghoshit bha jaybak chahi chhal. o june me 10 aa 11 ke saharsa me sahitya acsdemik seminar me aayal chhalih...ham takhno hunaka puchhaliyain je kahiya karbaik goshthi...o july me karbak baat kahlain. tabat tak hunak mon kharab bala baat nai rahaik. julu me kolkata me o kavita path karba lel bimarik avastha me aayal chhlih. takhno ham puchhne rahiyain je kahiya karab goshthi? o kahalain je september tak ta ham kolkate me rahab (under treatment). takar baade karab. August 17, 2011 at 10:55am · Like Ajit Azad ek ber ehi tarhak ghatna aar bhel chhaik. dr dhirendra ji janakpur me karbaik prastav darbhanga goshthi me delkhin muda 4-5 maas tak o nai kara saklah takhan pt. govind jha daman kant jha jik sahyog se patna me karoune rahaith. aarti jik paksha me sabh achhi muda hunak sthiti thik nai chhain...ehi mamila me bhagalpurak lok besi nik se kaih sakait chhaith. -चोर रोशन कुमार झा अखनो नै हटेलक जगदीश प्रसाद मण्डलक ओकरा (चोर रोशन कुमार झा ) द्वारा कएल चोरिक लघुकथा सभ अपन ई-पत्रिका (ब्लॉग)सँ- साहित्यिक जगतमे ऐ सँ घोर क्षोभ अछि- -चोर रोशन कुमार झाक चोरिक सबूत नीचाँ लिंकमे अछि जे ओ अखन धरि अपन ई-पत्रिका (ब्लॉग) सँ डिलीट नै केलक अछि। http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/rikshaavala.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/jivika.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_7993.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_9212.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_4646.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_691.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_88.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_7693.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_4876.html http://mithlakgaamghar.blogspot.in/2012/05/blog-post_31.html ई धूर्त रोशन कुमार झा ई सभ रचना जगदीश प्रसाद मण्डलक "गामक जिनगी" सँ चोरा कऽ अपन ई-पत्रिकामे छपने अछि जेकर लिंक ऊपर देल गेल अछि। गामक जिनकीकेँ मैथिलीक पहिल टैगोर पुरस्कार भेटल छै। पहिनहियो एकर संगी रणजीत चौधरी मुन्नाजीक रचनाक लगातार चोरिमे पकड़ाएल अछि, जे अजित आजादक मिथिलाक अबाज ग्रुपपर अखनो अछि। अजित आजाद मुन्नाजीकेँ कहने रहथिन्ह जे ओ रणजीत चौधरीकेँ बैन करता आ चोरिक रचनाकेँ डिलीट करता, मुदा हुनकर कार्यालसँ से अखन धरि से नै भेल तावत ओही कार्यालयसँ ई नबका चोर रोशन कुमार झा आबि गेल। "राड़केँ सुख बलाय" क लेखक अछि ई रोशन कुमार झा आब रौशन मैथिल!!) ई कथा ओकर मूल ब्राह्मणवादी शुद्ध वर्तनीमे नीचाँ देल जा रहल अछि- राअर के सुख बले पढुआ काका किछु काज स दरभंगा आयल छलाह . जखन सव काज भ गेलैन त बस पकर्बाक लेल बस स्टैंड गेलाह , मुदा गामक बस छुट्टी गेलैन . पधुआ काका हमरा फ़ोन केलैने ? रोशन कतय छ: ? हम आकाशवाणी लग ठाढ़ छि ? हाउ हम तोहर घरे बिसरी गेलिय . तो आबी क हमरा ल जा . जखन हम पढुआ काका क ल के घर पर आय्लाहू त घर पर लाइन छल .चुकी गर्मी काफी छल ताहि कारने पंखा चला हुनका लग बैसी गेलहु आ हुनका अपन कंप्यूटर पर फसबूक के खोली हुनका देखाबय लाग्लाहू ? अचानक ललका पाग केर देखैत देरी हुनक मन गडद-गडद भ गेलैने . ओ कह्लैने जे की " इ थिक मिथिला वासी केर पहचान , आ पाग पहिर्ला स बाढ़ी जाइत अछि मान " हम कहलियैक , काका किछू लोक केर कथन अछि जे की पाग मात्र उपनयन , विवाह में पहिरे वाला एक टा परिधान अछि जे की बाभन आ लाला सब मे पहिरल जाइत अछि ? ओ कह्लैने हौ जे इ गप करैत अछि ओ पागल हेताह ? हम कहलियैक , कका ओ सब पढ़ल लिखल आ पैघ-पैघ साहित्यकार छैथ आ विदेह सनक पत्रिका सेहो निकालैत छैथ ? किछु काल केर उपरान्त पढुआ कका कह्लैने जे की एकटा , दूटा ओही महानुभाव केर नाम त कहक जे सब पाग केर मिथिला केर मान नहीं बुझैत अछि आ मात्र ओकरा जातिगत स जोरी रहल अछि ? हम कहलियैक आशीष अनचिन्हार , उमेश मंडल , पूनम मंडल प्रियंका झा आ विदेह केर सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर . कका कह्लैने हौ अहि मे त कोनो पैघ साहित्य कार लोकनि केर नाम कहा अछि ? कका आजुक समय केर इ सब करता धर्ता छैथ साहित्य जगत के . हौ यदि आजुक साहित्य केर करता एहन छैथ त नहीं जानी की होयत भविष्य मे ? हमरा सब केर समर में हरिमोहन झा , नागार्जुन , दिनकर सब सनक महान रचना कार लोकिन छलाह . से इ सब कोनो हुनका स पैघ छैथ जखन ओ लोकिन पाग पहिर अपना केर गौरवान्वित बुझैत छलाह तखन आजुक नौसिखुआ सब के की औकात ? ओ कह्लैने हौ बाऊ ब्रह्मण एकर विरोध किअक क रहल अछि से नहीं जानी मुदा जिनकर बाप दादा कहियो पहिर्बे नहीं केने हैथ हुनका त अवस्य ने असोहाथ बुझेतैन . ओहुना मिथिलाक गाम घर मे कहल जाइत अछि जे की " राअर केर सुख बले " कथा वाचन- लेखन पाठशाला (बाल कथाक विशेष संदर्भमे) १ मैथिलीमे कथा वाचन, विशेष कऽ नेना भुटका लेल बाल कथा वाचनक परम्परा बड्ड पुरान रहल अछि। लोक गाथाक रातिक राति, दिनक दिन प्रदर्शन, बाल सुलभ मोन लेल ओकर छोट वर्जनक गद्य-पद्य मिश्रित एक आ बेशी राति चलैबला दादी-नानीक कथा, दादी-नानी आ बाबा-बाबूक सुनाएल आन लोककथा एकर विभिन्न रूप अछि जे मिथिलाक बालक-बालिकाक मोन मोहने अछि। ऐसँ विपरीत सप्ता डोरासँ लऽ कऽ मधुश्रावणी आ बिहुलाक कथाक जानकारी मात्र बालिके धरि सीमित अछि, एक्के घरमे रहितो किछुए बालक मौगियाहा संज्ञा भेटबाक डरक संग ऐ कथापाठमे सम्मिलित हेबाक साहस करै छथि। कथाक बीच गीत, कहबी, खेल सेहो होइए। खेल कथाक बालक- बालिका सभ द्वारा वाचन-गायन होइत अछि, आ खेला सेहो चलिते रहैत अछि, कोनो दादी-नानीक प्रवेश नै, कोनो बाबू-बाबा, बेदराक खेलमे घुसि नै सकै छथि। २ कथापाठक एतेक सुन्दर परम्पराक अछैत मैथिली बालकथा किए असफल भऽ गेल, बा अखन धरि असफल अछि। जँ लिली रे केँ छोड़ि दी तँ ई कहैत कनियो संकोच नै जे साहित्य अकादेमी पोषित, से ओ छपाई हुअए बा पुरस्कार, मैथिली बाल कथा साहित्य , बाल साहित्य अछिये नै। आ जँ अहाँमे प्रतिभा नै अछि तँ अनुवाद करू, मुदा प्रायोजित अनुवादक स्तर एहन जे बच्चाक बापक दिन नै छिऐ जे एक्को पैराग्राफ़ पढ़ि लिअए, तते ने मुँह कोचिआबए पड़ै छै। ३ साहित्य अकादेमीसँ २४ भाषासँ संकलित बाल कथा निकालल गेल। मैथिलीयोक कोटा छै आ रामदेव झा दुनू बापुतक बालकथा कोना नै रहत, नाटक संग्रह एतै तँ फट नाटक तैयार, तही तर्जपर। लिली रे क कथा मुदा सुन्नर अछि। मैथिलीक ऐसँ बदनामी होइ छै, दुनियाँ बुझैए जे मैथिलीक कथाकार बाल कथाक माने बुझबे नै करै छथि। ८२ म सगर राति दीप जरय बालकथा केन्द्रित रहत। ओइ संदर्भमे बाल कथा वाचन-लेखन पाठशालाक आरम्भ कएल जा रहल अछि। ४ विदेह शिशु उत्सवमे जगदानन्द झा मनु क चोनहा आएल छलन्हि। बाल मनोविज्ञानपर आधारित ई उपन्यास बाल कथा लिखनहार लेल पाठ्यक्रमक समान अछि, केना कथा आगाँ बढ़ाओल जाए, आ समाप्त कएल जाए, कथा वस्तुक नवीनता एकरा विशिष्ट बनबैए। विदेह शिशु उत्सव ऐ लिंकपर उपलब्ध अछि:- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ ५ से बालकथाक लेखन एना हुअए जे ओ पढ़ै आ सुनै, दुनूमे नीक लागए। ई क्लोजेट नाटक सन हेबाक चाही, जे मंचन लेल नै, असगरे पढ़बाले बा किछु गोटे संग ज़ोर-जोरसँ सुनबा-सुनेबा लेल लिखल जाइए। सरल विचार, सरल शब्दावली आ सरल भाषा श्रेष्ठ बाल कथा लेखनक चाभी अछि। जेना ऋगवेदक जल प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, सरस्वती नदी, अरायुक्त रथक विवरण, ई सभ आरम्भिक बाल कथाक आकृति देखबैत अछि तहिना अवेस्ताक गिलगमेशक कथा सेहो। ऋगवेदोसँ पहिने गाथा, नाराशंसी आदिक मौखिक साहित्य छल आ ओइ लेल ऋगवेदमे गाथापति, गाथिन आदिक प्रयोग अछि। "पंचतंत्र" आ ओकर किछु कथाक पुनर्लेखन "हितोपदेश" सँ बहुत पहिने जातक कथा बाल कथा कहलक आ सेहो चिड़ै चुनमुनीक संग मालजाल आ जानवरक माध्यमसँ, ओना जातकक उद्देश्य बौद्ध धर्मक प्रचार सेहो रहै। अही तरहेँ पंचतंत्र बाल कथा कहैत कहैत स्त्री-शूद्रक प्रति पूर्वाग्रह कथामे पैसेलक, आ तेँ ओकर पुनर्लेखनक आवश्यकता अनुभूत भेल। ऋगवेदक आख्यान संवादकेँ जन्म दै छल, जे पौराणिक कथा ख़त्म कऽ देलक आ तेँ ओइ पौराणिक कथा सभक पुनर्लेखन अखुनका हिसाबे हेबाक चाही। ६ आधुनिक बाल कथा केहुन हुअए? ओइमे आधुनिक विज्ञान द्वारा पसारल नीक तत्वक संग पर्यावरण चेतना सेहो हेबाक चाही। माने कथा बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक हेबाक चाही। बालकथामे मनोरंजन आ ज्ञानक समावेश लेल विज्ञान, समाज विज्ञान परक कथा लिखबाक आवश्यकता अछि। बच्चा अपन धरोहरिकेँ बुझए, तेँ लोक कथा, परीकथा, जादू कथा कहल जा सकैए मुदा ई अंधविश्वास नै बढ़बए तइ तरहेँ ओकर लेखन पुनर्लेखन हेबाक चाही। २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार-नेपालक नोर मरूभूमिमे/ कलंकित चान २.२.जगदीश प्रसाद मण्डलक- लघुकथा-किरदानी २.३.जितेन्द्र झा- सभासद् साह फरार, सद्भावना कहलक निर्दोष की भेटत जनकपुर बमकाण्ड पीडितके न्याय ? २.४.जितेन्द्र झा -गतिविधि २.५.जगदानन्द झा ‘मनु’-दूटा विहनि कथा २.६.आशीष अनचिन्हार- मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण (आलोचना) २.७.सत्य नारायण झा- विहनि कथा- स्मृति २.८.मो. असरफ राईन- विहनि कथा- शहरीया घरवाली आशीष अनचिन्हार- नेपालक नोर मरूभूमिमे/ कलंकित चान १ नेपालक नोर मरूभूमिमे
"नेपालक नोर मरूभूमिमे" जँ ई कोनो पोथीक नाम हो तँ नेपालक किछु राष्ट्रवादी सभ जरूर भड़कि जेता ताहूमे जँ ई पता लागै जे जँ ऐ पोथीक प्रकाशक भारतक छै तखन तँ जरूर आरोप लगेता जे "काठमांडू आब दिल्लीसँ संचालित भ' रहल अछि"। नाना रकमक हाय-तौबा मचि जेतै से हमरा विश्वास अछि। किछु लोक भाला लाठी ल' क' दौड़ता तँ किछु शब्दक माध्यमें एता। ताहूमे जँ ई पता लागै जे लेखक नेपालक छथि तखन बुझू जे हुनकर घरकेँ उजाड़ि देल जाएत आ बैला देल जाएत भारतमे। आ ई सभ काज लेखक वर्ग करत राष्ट्रवादक नामपर।
मुदा ऐ ठाम कने ई सोचबाक छै जे "मरूभूमि" मने की ? हमरा जनैत एहन जगह जत' खाली बालुए-बालु होइ। फेर नोर शब्दपर आउ, सभकेँ बुझल हएत। जँ केकरो नोर मरूभूमिमे खसतै तँ की हेतै ? बस खसिते देरी सुखा जेतै, बिला जेतै आ नोरक नामोनिशान नै बचतै। मने शास्त्रीय भाषामे कही तँ अरण्यरोदन। आ ई अरण्यरोदन की नेपालेकेँ लोक करै छथि? कने काल लेल सोचिऔ जे जँ नेपाल हटा भारत वा पाकिस्तान वा भूटान वा ... अन्य देशक नाम द' देल जाइक तँ की हेतै। बस लोक वा ओकर भाषा बदलि जेतै मुदा रहतै तँ वएह अरण्यरोदन। भारत सहित तमाम विकाशशील ओ अविकसित देशक निम्न मध्यमवर्ग (आर्थिक हिसाबसँ) खाड़ी देशक दिस पलायन करै छथि रोजी-रोटी लेल। ई जतबे नेपाल लेल सत्य छै ततबे भारतक लेल सेहो। प्रवासक वेदना जतबे नेपालक प्रवासीमे छै। ततबे भारतक प्रवासी वा पाकिस्तानक प्रवासीमे। एहनो नै होइ छै जे नेपालक लोकक नोर तुरंते सुखा जाइ छै आ भारतक प्रवासी केर नोर एक घंटा बाद। मरूभूमि आखिर मरूभूमि छै कोनो वेदनासँ ओकरा कोनो सरोकार नै ओ सभहँक नोरकेँ एकसमान समयमे सोखै छै। जँ ऐसँ हटि क' आबी तँ ईहो कहल जा सकैए जे बालु जखन आँखिमे पड़ि जाइत छै तखन दर्दसँ नोर बह' लागै छै मुदा बालु कथिक? प्रवासक ने….
काव्य केखनो बपौती नै होइ छै आ ने धनवादी होइ छै। काव्य वस्तुतः जनवादी होइ छै (काव्य मने पूरा साहित्य)। आब ऐठाम किछु संभ्रांत लोक एता आ प्रवचन देता। मुदा हमरा बस एतबे कहबाक अछि जे फ्रेंच कट दाढ़ी बला ओ कुर्ता पैजामा बलाक जनवादीसँ अलग जनवादी मतलब अछि हमर। हमरा नजरिमे फ्रेंच कट दाढ़ी बला ओ कुर्ता पैजामा बलाक जनवादी सदिखन पूँजीवादक दलाल रहल अछि। मुदा एत' हम जै जनवादी काव्यक परिचय देब तकरा देखि क' ई फ्रेंच कट दाढ़ी बला ओ कुर्ता पैजामा बलाक जनवादी भागत से विश्वास अछि। समान्यतः मैथिलीमे जनवादी मतलब ओहन लोक भेल जे मात्र गरीबक लेल भाषण करैत रहैए (मुदा वास्तविक रूपमे नै) मुदा लेखक ओइ प्रकियासँ आगू बढ़ि जै सरोकारकेँ बात करै छथि से दुर्लभ अछि। तँ लिअ ई पहिल उदाहरण-- मैथिलीमे सभ किछु भेटत मुदा पर्यावरणक चिंता नै भेटत मुदा लेखक एकटा शेरमे पूरा विचार निचोड़ि कहै छथि--
जङ्गल उजड़लासँ रोग सभ बढलै स्वस्थ रहबाक लेल वन होबाक चाही
ऐ तरहँक पाँतिक कतेक खगता छलै मैथिलीमे से पाठक बूझि सकै छथि।
ओना ई पूराक पूरा पोथी प्रवासी लोकक दुख समेटने अछि। मुदा मात्र दुखी भेलासँ तँ काज नै चलै छै। एहन राजनीतिक कारण जकर चलते लोकेँ प्रवासी बन' पड़ै छै तकरा निशाना बनबैत लेखक कहै छथि--
हम बूड़ि छी तैं बिदेशमे आएल छी अहाँ ज्ञानी छी तैं घरमे नुकाएल छी ऐ दू पाँतिमे जे व्यंग छै से हमरा जनैत मैथिली साहित्यमे कहियो एबे नै केलै। ऐ सभकेँ अलावे लेखक मैथिली राज्यक नामपर चलैत धुरखेलसँ सेहो परिचित छथि आ कहै छथि--
मिथिला राज् लेल धरना करै छी बात-बातपर झगड़ा करै छी बेइमाने आ भ्रष्टाचारे करब तँ नाहकमे कियक धरना करै छी
चारि पाँतिमे तथाकथित राज्य नेता सभहँक पोस्टमार्टम भ' गेल अछि। ई पोस्टमार्टम जतबे नेपालक लेल महत्वपूर्ण अछि ततबे भारतक लेल सेहो।
लेखक मात्र राजनेताक सभकेँ नै देखै छथि बल्कि ओकर भित्तरक बात सेहो जानै छथि--
की कहू कते कहू बड़ बड़ लीला छै मोछबला नेता सभकेँ नङ्गौटी ढीला छै
कोनो साहित्यमे साहित्यिक चोरी होइते छै। मैथिलीमे सेहो किछु वर्ष पहिने पंकज पराशर नामक सुखाएल मुख्यधाराक साहित्यिक चोर अछि जे एखनो अपन सरदारक सभहँक कृपासँ ऐ क्षेत्रमे आगू बढ़ि रहल अछि। मुदा लेखक एकरो नै छोड़ने छथि---
भौतिकवादकेँ शिकार भेनिहार सभ सुपनेखा सजा क' सीता बना देलक साहित्यमे फुर्ती देखेनिहार सभ गजल चोरा क कबिता बना लेलक
समान्यतः ई मानल जाइए जे " जै लोकमे जतेक प्रेम रहै छै तै लोकमे मृत्यु भय बहुत कम रहै छै"। प्रस्तुत लेखक अपन रचना सभसँ ऐ तथ्यकेँ पुष्टि केलाह अछि--
दुश्मन कतबो दुवारपर होइतो लाख कोसके बीच होइछै प्रीतम दूर पहाडपर होइतो घर-आङ्ग्नके बीच होइछै
ई छल प्रेमक रूप आब कने मृत्युपर आउ देखू जे लेखक कोना मृत्युकेँ सुंदर मानै छथि भने वास्तविका जे हो--
मार्च महिनाकेँ उतरार्द्धमे आइ हम मृत्युकेँ देखलौं सुनने छलौं /सोचने छलौं मृत्यु अत्यन्त सुन्दर होइ छै सरल होइ छै......
ई लेखकक उत्कट प्रेमक परिणाम अछि जे ओ बेर-बेर मृत्यसँ टकराइ छथि अपना रचना माध्यमें। ईहो एकटा सत्य अछि जे हिंदू धर्मक उपनिषद् सभ अनार्य दर्शनसँ प्रेरित अछि। प्रस्तुत लेखक अपन कविता सभमे उपनिषद्क पुनर्रचना केलाह अछि--
हम मानव छी एक दिन जन्मलौं संसारमे माय/बापक इच्छा सँगे एलौं संसारमे नाना तरहँक क्रियाकलाप कयलौं किए की,................
..........पृथ्वी नाशवान छै नाशवान रहतै सब दिन नै कियो अमर रहलैय आ नै कियो रहतै प्रकृतिक यथार्थ/दुनियाँक सत्यता इएह छै आ इएह रहतै
लेखक एतबेपर नै रूकै छथि आ कहै छथि--
हमर मृत्यु पश्चात हवा ओहने बहतै जेहन छलैय पहिने दुनियाँ ओहने रहतै जेहन रहै पहिने...... ....एतै पुन: कोनो नयाँ आयाम बिसरि जेतै सभ हमर नाम सबकेँ मनसँ हेरा जाएब हम सदा-सदा लेल बिसरा जाएब हम
आब अहाँ सभ लेखकक परिचय लेल उत्सुक हएब। ई लेखक छथि श्री विन्देश्वर ठाकुर आ हिनक पोथी छनि " नेपालक नोर मरूभूमिमे"। श्री ठाकुर गाम:-गा. वि. स. गिद्धा 7 योगियारा, धनुषा नेपालक छथि आ एखन कतारमे रहि रहल छथि आ ई पोथी श्रुति प्रकाशन भारतसँ प्रकाशित अछि। ऐ पोथीक विमोचन अधिकारिक रूपें 82म सगर राति दीप जरए (31 मइ 2014केँ मेंहथ गाम)मे हएत। प्रस्तुत पोथी गजल खंड, शेरो-शाइरी खंड, कथा खंड, विहनि कथा खंड ओ कविता खंडमे बाँटल अछि। ऐ पोथीक सभ गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि जे की नेपालक तथाकथित गजलकार सभ लेल एना केर काज करत। वर्तमान समयक नेपालमे मात्र दू टा नव गजलकार मैथिली गजलक आश छथि पहिल कुंदन कुमार कर्ण आ दोसर प्रस्तुत पोथीक लेखक। प्रस्तुत पोथीक सभ विधा अपन नव रूपमे अछि। भिन्न-भिन्न विषयपर अछि। मुदा हमरा मान'मे ई कोनो दिक्कत नै जे लेखकक सभ रचना प्रवासक दुखमे भीजल अछि जे की स्वाभाविक अछि। प्रस्तुत पोथीक भाषिक संरचना पूर्णतः नेपालक गामक अछि आ लेखक अपन निज अछि। हमरा जनैत ई प्रवृति मैथिलीक लेल शुभ अछि कारण एक सीमा धरि भाषाकेँ मानक हेबाक चाही मुदा तै लेल जरूरी नै छै जे दलित साहित्यकार धोती-धारी बला लेखक सभहँक शब्द लेथि। प्रस्तुत पोथीमे ऐसँ बाँचल गेल अछि। जँ राजनीतिक स्तरपर देखल जाए तँ ई पोथी भारत ओ नेपालक संबंधक परिप्रेक्ष्यमे सेहो देखाएत आ भारत नेपाल साझी लेखक वर्गकेँ तैयार करबामे मदति करत। ओना ऐ पोथीमे व्यक्त राजनीतिक विचारक नेपालक स्थितिकेँजग-जाहिर करैए।तँ स्वागत करू नेपालक ऐ युवा लेखक श्री बिंदेश्वर ठाकुरजीकेँ आ कामना करू जे भविष्यमे हिनक लिखल आ पोथी सभ हमरा सामनेमे आएत। २ कलंकित चान (आलोचना) "जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान" द्वारा बर्ख 2013 (दिस.मे) श्री राम भरोस कापड़ि "भ्रमर"जीक कथितजल संग्रह- "अन्हरियाक चान" प्रकाशित भेल अछि। पोथीक भूमिकामे भ्रमरजी स्वीकार करै छथि जे गजलक व्याकरणपर ओ गजल नै लिखने छथि संगे-संग ओ समीक्षककेँ सेहो हिदायत देने छथिन्ह जे ओ व्याकरणक तराजूपर ऐ गजल सभकेँ नै तौलतथि। एकर मने ई भेल जे भ्रमरजी अपने मानै छथि जे हुनक गजल "अजाद गजल " आ समीक्षक तँ अजाद गजलक समीक्षा करबाक लेल स्वतंत्र छथि। संगे-संग भ्रमरजी भूमिकाक समीक्षा करबाक लेल कोनो प्रतिबंध नै लगेने छथि तँए समीक्षक भूमिकाक समीक्षा करबाक लेल सेहो स्वतंत्र छथि।ओना भ्रमरजी गजलमे व्याकरणक मजूगत स्थितिसँ परिचित छथि आ तँए ओ अपन सीमाकेँ देखार केलाह जे की स्वागत योग्य गप्प अछि। तँ चलू शुरू करी भ्रमरजीक अजाद गजलक समीक्षा आ तकर बाद हिनकर भूमिकापर। अजाद गजलक कान्सेप्ट--- जखन कोनो भाषामे कोनो खास विधाकेँ करीब 500-600 बर्ख भ' जाइत छै तखन ओइमे परिवर्तन जरूरी भ' जाइत छै। उर्दू गजलकेँ (जँ भारतीय फारसी गजलकेँ जोड़ि देखी तँ) करीब 500-600 बर्ख भेल छै तँए 1960-70केँ दशकमे उर्दूमे अजाद गजल आएल। एकर मतलब कहल गेलै जे गजलमे बहर कोनो जरूरी नै हँ काफिया भेनाइ आवश्यक अछि ( बिना रदीफकेँ सेहो गजल होइ छै से देआन राखब जरूरी)। ओनाहुतो बिना काफियाकेँ गजल नै होइत छै से सभ जनै छथि। जँ ऐ अधारपर देखी तँ भ्रमरजी बहुत रास कथित गजल फेल भ' जाइत अछि मने भ्रमरजीक कथित अजाद गजल सेहो अजाद गजल कहबा योग्य नै अछि। किछु उदाहरण देखू-- पोथीक पहिल कथित अजाद गजलक पहिल दू पाँति एना अछि--- ई जनक केर नगरी अपन गाम थिक ई मिथिला बैदेहीक अपन गाम थिक मने काफिया गायब। जँ काफिया गाएब तँ तँ गजल नाम्ना विधे गाएब। खएर एहन-एहन दोष ऐ पोथीक गजल संख्या -4,5,6,9,12,14,20,22,23,24,28,29,32,33,34,35,36,39,41 मे भेटत। ओना आन गजलमे किछु ढ़ग तँ छै जकरा काफिया नै बल्कि तुकांत कहब बेसी समीचीन। ईहो मोन राखब जरूरी जे ऐ पोथीमे कुल 44टा गजल अछि। जँ हम नेपालीय परिसरक हिसाबसँ ऐ पोथीकेँ देखी तँ हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे राजेन्द्र विमल जीक गजलकेँ अजाद गजलक श्रेणीमे तँ राखल जा सकैए मुदा भ्रमरजीक गजल तँ अजादो गजलमे स्थान पेबाक योग्य नै अछि। सोंझ तरहें कही तँ भ्रमरजीक ऐ पोथीमे संकलित सभ रचना आन विधा तँ भ' सकैए मुदा गजल, कथित गजल वा अजाद गजल केखनो नै भ' सकैए। मुदा जत' भ्रमरजी अपन गजल महँक दोष स्वीकार करबाक हिम्मति राखै छथि ओतए विमलजी अपन गलतीकेँ स्वीकार करबासँ हिचकै छथि।ई चारित्रिक अंतर दूनू गोटमे छनि से जिनगी भरि रहतनि तकर कोनो गारंटी हमरा लग नै अछि। तँ आउ आब पोथीक भूमिकापर— चूँकि व्याकरणपर हमरा नै जेबाक अछि तँ देखू भ्रमरजीक किछु बिंदु-- 1) भ्रमरजी अपन भूमिकामे लिखै छथि जे " हमरा एखनो धरि पना नै अछि, हम कतेक गजल लिखने छी। साढ़े चारि दशकक साहित्यिक यात्रामे कतेको गजल लिखाएल हएत...." यौजी सरकार, जखन अहाँकेँ अपने गजलक संख्याक बारेमे नै बूझल अछि तखन घर-आँगन, स'र-समाज, देश-विदेशक आँकड़ाक संबंधमे अहाँकेँ की बूझल हएत। भ्रमरजीक उपरोक्त कथन मात्र दंभ भरबाक लेल अछि। मनुख मात्र सभ चीजक हिसाब-किताब रखैए। भ्रमरजी सेहो रखने हेता मुदा हिनका तँ अपना-आपकेँ सुपरमैन कहेबाक छनि तँ लगा देलखिन अज्ञात संख्याकेँ जोर जे हमरा अपन गजल संख्या तँ पते नै अछि मने एते लिखलहुँ जे....................... मोन पाड़ू आइसँ 30 बर्ख पहिने धरि जड़ल जुन्ना सन ऐंठल दू-चारि बिग्घा खेत बला सभ सेहो कहै छलै जे हमरा तँ अपन खेतो ठीकसँ नै देखल अछि। मिला लिअ भ्रमरजीक विचार। 2) भ्रमर जी फेर ओहीमे लिखै छथि जे " एहि बीच हमरा मोनमे आएल जे गजल जे काव्यविधामे बेछप रूपें रहेत अछि.............." यौजी सरकार की ब्रम्ह बाबा रातिमे अहाँकेँ सपना देला जे उठ बच्चा काव्य गगनमे गजले टा बेछप विधा छै। आ जँ सत्ते सपना आएल तँ पहिने किएक ने आएल। ऐ पोथीमे सभसँ आपत्तिजनक बात ई अछि जे प्रस्तुत पोथीमे "बाल-गजल" तँ संकलित अछि मुदा बाल गजलक संदर्भमे कोनो चर्चा नै बेटैत अछि। ज्ञात हो कि मात्र 2012सँ मैथिली बाल गजल शब्दावली प्रचलित अछि। अनचिन्हार आखर ओ विदेहक संयुक्त प्रयासक प्रतिफलन अछि ई बाल गजल मुदा भ्रमर जी बाल गजलक संबंधमे कोनो चरचा नै केने छथि। जेना चरचा केलासँ छोट भ' जेता तेना। ओनाहुतो हम ऐ प्रसंगकेँ अनचिन्हार आखर ओ विदेहक लोकप्रियतासँ जोड़ि क' देखैत छी। ओना भ्रमरजी प्रस्तुत पोथीक बाल गजलकेँ तेना सेट केने छथि भूमिकाक संदर्भमे जेना बुझाइत हो जे ओ मिथिला-मिहिरेक जमानासँ बाल गजल लिखैत होथि। इतिहासकेँ भ्रमित करैत ई पोथी केक सफल हएत से कहब मोश्किल। हँ एतेक कहब कोनो मोश्किल नै जे ई पोथी मात्र राजेन्द्र विमलजीक प्रतिद्वंदितामे निकलल अछि। आ मात्र ऐ दुआरे जे नेपालमे विमल जीक बाद हमरे नाम हुअए। ओना हमरा ई कहबामे कोनो दिक्कत नै जे विमलजीक पोथी नीक छनि भ्रमरजीक अपेक्षामे। जे पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक इच्छा हो से ऐ लिंकपर आबि क' पढ़ि सकैत छथि-- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Bhramar_Gajal.pdf?attredirects=0&d=1 तकरा बाद भ्रमरजीकेँ साहसकेँ धन्यवाद दिऔन कारण ओ स्वयं ऐ पोथीक पी.डी.एफ उपल्बध करेने छथि।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल किरदानी रामरूप प्रसाद, जे छह मास पहिने लेबर कमिश्नर पदसँ सेवा-निवृत भेल छला, गाम एला। नव लोकक आगमनसँ गाममे चलह-पहल शुरू भेल। जेते मुँह तेते बोल, कियो बौआ भाय तँ कियो बौआ काका तँ कियो लाल बौआ कहि-कहि रामरूप प्रसादकेँ सम्बोधित करैत। धिया-पुताकेँ मतलबे कोन जे, के आएल के गेल। जुआन-जहानसँ लऽ कऽ चेतन-अधवेशू धरि अपन-अपन हाजरी दर्ज करबए पहुँच रहल छला। केना नै पहुँचितथि, गामक पहिल बेकती जे एते नमहर हाकिम छथि। किए बूझत जे हकिमपना चलि गेलनि, खलिये रामरूप छथि। बेठेकानो आमक गाछपर गोला फेकि पाकल आम तोड़ने तँ अनठेकानो ने ठेकाने बनि जाइए, तहिना अपन गामक पूबपीठिया देखि जँ गौआँ रामरूप बाबूकेँ भेँट करए अबै छथि तँ अपन समाजिकताे ने निमाहि लइ छथि। जाबे धरि कमिश्नर साहैब काज करै जोकर छला ताबे धरि गाम दिस तकबे ने केलनि आ जखनि अथबल, श्रमहीन भऽ गेला तखनि गाम मन पड़लनि। गाम कि मन पड़ितनि मन पड़लनि पिताक पुश्तैनी भूमि। पुश्तैनी भूमि तँ हजारो लाखो अछि मुदा से नै, केते खेत आ ओकर केते मूल्य भेल। खैर, किछु हुअए मुदा स्वतंत्र देशक नागरिक होइक नाते एते तँ अधिकार सभकेँ अछिए जे, जे मन फुड़ै, जेना मन फुड़ै तेना अपन सम्पतिक उपयोग करए। चाहे बेल रोपए आकि बगूर। मुदा एहनो की नै होइए जे अनकर गोरहा, चौमासकेँ बाँस-गाछ रोपि अछाह कऽ नष्ट करि देल जाइए? चाह-पर-चाह, पान-पर-पान रामरूप बाबू दिससँ चलि रहल अछि, लोकक आवाजाही अछिए। लोको लाज तँ ओहने ने लाज भेल जेहेन वैदिक लाज होइए। ओना किछु गोटे जे भरि दिन रौद-वसातमे रहैए ओकर दुनियोँ तँ अँगने भरिक अछि, ओकरा आनसँ मतलबे कोन? जेतबे अँगना रहत तेतबे पथार पसारब। मुदा फुसन काका कमिश्नर साहैबसँ भेँट करए एला। फुसन काका गामक ओहेन लोक जिनका अदहा गामक लोक फुसियाह झुट्ठा कहै छन्हि तँ अदहा गामक लोक उचितवक्तो आ ठाँहि-पठाँहि बजनिहार सेहो तँ कहिते छन्हि। ई तँ अद्भुत खेल अछि जे एके गोटे दुनू केना? साल-दू-साल फुसन काका कमिश्नर साहैबसँ जेठे रहथि, मुदा जेठ-छोट उमेरेटासँ नै मानल जाइए दोसरो-तेसरो कारण छै, खैर जे छै। फुसन काका कमिश्नर साहैबक बगलेमे बैस पहिने तँ दोसर-तेसरक बात सुनलनि मुदा चाह पीला, पान खेला पछाति अपनो मुँह खोललनि। बजला- “जुगो पछाति दुनू गोटे एकठाम भेलौं, सभ हरेलहा समए हेरा गेल। किम्हर-किम्हर उदए भेलै?” कानून-कायदाक लोक रामरूप बाबू तँए शास्त्रीय भाषाक बोध नै। मुदा तैयो अपन बात रखैत बजला- “अपन जे पाँचो बीघा चौमास अछि तइमे सागवानक खेती करब।” कमिश्नर साहैबक बात सुनि फुसन कक्काक मन कड़कलनि। कड़कलनि ई जे दसे बीघा नकोर[1] जमीन गाममे अछि, तेहेन चौरियाह[2] गाम अछि जे केकरो घर छै तँ अगवास नै आ अगवास छै तँ गाछी-कलम नै, तैठामक खेतमे सागवानक खेती गाममे हएत! वन विभागकेँ बोनक जंगलेटा सुझै छै मंगल नै सुझै छै। दुनियाँक कोन एहेन उपजा अछि जेकरा मिथिलांचलक भूमि अंगीकार करैक शक्ति नै रखैए, मुदा ई तँ विचारणीय भेल। बर्खाक कटाउ होउ आकि बाढ़िक आकि वायु प्रदूशन, गाछ-बिरिछ तँ जरूरी अछिए। मुदा जैठामक गाछ फलो दइए, लकड़ीओ दइए, नीक आैक्सिजनो दइए तेकरा छोड़ि जे एकमुश्त पनरह बरख सम्पतिकेँ घेरावंदी कऽ लेब! तहूमे जेकर उपयोग अपना जिनगीमे नै!! मुदा बजला किछु ने। हड़ताली कर्मचारी जकाँ मुँहमे ताला झुलौने रहला, तरे-तर हूँहकारी भरैत रहला! चारूकात घुमा-घुमा मुड़ी डोलबैत रहला! मन किम्हरो, शक्ल-सूरत किम्हरो घूमि रहल छन्हि! समाज दिस नजरि पड़िते मन हुमड़लनि। हुमड़लनि ई जे समाजोकेँ की डोराडोरि छै जे डाँड़ सक्कत रहतै? बिनु डोराडोरिक समाज केम्हर कखनि ससरि जाएत तेकर कोनो ठेकान छै। नीक करू आकि अधला, किछु गोटे तँ संग पुरनिहार हेबे करता, जखनि समूह संग पुरनिहार तखनि समाजक जँ विरोधो अछि तँ समर्थनो तँ अछिए। समाजे पाबि ने कियो शक्तिशाली बनैए। भलहिं समाज जेहेन होइ। नमहर भेने नमहर आ छोट भेने छोट। तहिना नीकक बनने नीक आ अधलाक बनने अधला। मुदा लगले फुसन कक्काक मनमे उठलनि, एक तँ ओहिना पाइ-कौड़ीबला लोक रामरूप बाबू छथि, तैपर सरकारक बीच अपन हश्ती! बढ़ा-चढ़ा कऽ बजबे करता, अनेरे दसटा फलतुआ लोक संग देबे करतनि। गपे-सप्पमे विचार भेद भेने गारि-मारि किए औत। किए ने औत? फुसन कक्काक गुमी देखि रामरूप बुझलनि जे भरिसक विचार नीक लगलै। अपन विचारकेँ आरो मजगूती दैत बजला- “एकटा बात बूझल अछि किने?” ‘एकटा बात’ सुनि फुसन काका चौंकला। चौंकैक कारण भेलनि जे गामक बात आकि बाहरक। मन गवाही देलकनि जे बाहरसँ मतलबे की आ गाममे रहै छी हम आ हमरे नै बूझल रहत। अह्लादित अतिथि जकाँ आँखि, भौ, मुँह बिहुसबैत पुछलखिन- “से की?” मुँह बाउल बच्चा जकाँ फुसन काकाकेँ बूझि चहरा दैत रामरूप बाबू कहलखिन- “खाली अपने खेतीक टाक बात नै अछि, गामक जे कियो सागवानक खेती करए चाहता सभकेँ सरकारी अनुदान दिआ देबनि। हमहूँ ओही विभागसँ ने जुड़ल छी।” जहिना तामस उठला पछाति बुधियार, गिलास भरि पानि पीब तामसकेँ दबैत अछि तहिना फुसन काका पानक खिल्ली बदलैत, रिसकेँ कम केलनि। मुदा पेटक वायु डिरियए लगलनि। डिरियए ई लगलनि जे जो रे अन्हरा लोक, अन्हरा गाम आ अन्हराएल अन्हरा...। कहू! जे मिथिलांचलक भूमि ओहन सक्कत-सक्कत गाछ-बिरिछकेँ पेटमे समेटने अछि जेकर तख्तामे बन्दूकक गोली नै छेद सकैए, ओहेन गाछ जे प्रकृतिक रंगक संग ओहन फल दइए जेकर तुलना कोनो आन भूमि नै कऽ सकैए, तैठाम जँ लोकक एहेन धारणा बनि जाए जे पनरह-बीस सालक खेती एक बेर पूजी लगौलासँ भऽ जाएत, बाँकी साल निगरानी भरि, तखनि खेतबलाक हाथमे पनरह-बीस बरख काज की रहल? रामरूप बाबूक विचार सुनि फुसन काका जेना मनक लोकसँ आगू बढ़ि संकल्पित लोक पहुँच गेला। समाजकेँ अपन गाम-समाजक विचार अपना ढंगसँ करए पड़तै। मुदा से ओहिना करतै आकि समाजक नीक-अधलाक विचार करैत करत। कोन गाम एहेन अछि जइमे शिक्षाक मदमे गैर सरकारीसँ लऽ कऽ सरकारी धरि करोड़ोमे नै चलि रहल अछि, मुदा शिक्षाक स्तर की अछि। अकछैत मन फुसन काकाकेँ विचार देलकनि- “कियो कीमती हरिअर-सुखाएल तरकारी बूझि अपना खेतमे सांगरीए लगा लेत तँ लगा लिअ, मुदा अपन की हएत से विचार करैत करह!” उठैत-उठैत फुसन काका बजला- “अखनि रहब किने?” फुसन कक्काक मोनक बात जे होउ, मुदा रामरूप बाबू बजला- “जेना अहाँ सभ रहए देब, तहिना ने रहब?” सभ बातक जवाब टटके नीक नै होइ छै। चुपे-चाप फुसन काका विदा भेला। मुदा मन कहलकनि- “एहेन किरदानी आकि किरदानी केनिहारक बास समाजमे उचित नै!” गामक ओहेन परिवारमे रामरूप प्रसादक जनम भेल छेलनि जेकरा समाजमे सुभ्यस्त मानल जाइ छेलै। पनरह बीघासँ ऊपर जमीन, पिता मेहनती किसान, कहियो परिवार चलबैमे खाँच नै भेलनि। तैसंग समाजमे पैंचो-पालट करिते छला। गाममे स्कूल नै रहने रामरूप ममहरेमे रहि मिड्ल पास केलक। मिड्ल पास केला पछाति होस्टलक खर्च पिता दिअ लगलखिन। आन विद्यार्थी जकाँ रामरूपकेँ कहियो ने भेलनि जे कोर्सक किताव नै अछि आकि फीसक दुआरे परीछे छूटि गेल। मैट्रिक पास केला पछाति पिताकेँ अपन हाथक मेहनति कएल पाइक मोल लालमे देखलनि। एते तँ बात अछिए जे पितोकेँ कहियो हाँट-दबार करैक मौका रामरूपक प्रति नै भेटलनि। कहियो कानमे भनक नै लगलनि जे आन-आन जकाँ ताड़ी-दारू करैए। तैसंग साले-साल पासक फल सुनि मनमे गदगदी चढ़िते गेलनि। काैलेजमे नाओं लिखबैक प्रश्न जखनि रामरूपकेँ उठलनि तखनि पिता स्पष्ट कहि देलखिन- “ऐ धनकेँ जेते चला-बना पुरा सकब तेते तँ पुरेबे करब मुदा जखनि नै पूरत तखनि खेतो-पथार तँ अछिए, मुदा जँ तोहर िवचार आगू बढ़ैक छह तइमे नै रोकबह। अखने तोरा समए छह, पछाति जखनि घर-परिवारमे ओझरेबऽ तखनि एहेन समए थोड़े भेटतऽ से नै तँ अनुकूल समए छह हमर खर्च तोहर पढ़ाइ।” बी.ए. पास केला पछाति देश स्तरक तँ नै मुदा राज स्तरक प्रतियोगिता परीछा रामरूप जरूर पास केलनि। जइसँ समैक अनुकूलता पबैत कमिश्नर भऽ रिटायर केलनि। जाबे तक नोकरी केलनि ताबे तक गाम बिसरि गेल छला मुदा काजसँ पलखति भेने, सेवा निवृति भेने आब गाम मन पड़लनि! मन पड़लनि पिताक चास-बास। ओना समाजो, परिवारो आ पितोक देल जिनगीक साइयो-हजारो धरोहर सम्पति अछि मुदा ऐठाम से नै। पितोकेँ पूर्वजक देल आ अपन अरजल खेते-पथार भरि अछि। समए किछु होउ, मुदा एहनो परिवारक कमी मिथिलाक पेटमे नै अछि, आ ओकरा नकारलो नहियेँ जा सकैए, जे पुर्खाक देल सम्पतिकेँ, खेत-पथारकेँ लाड़ि-चारि अपन जिनगी निमाहैत ओइ सम्पतिकेँ अमानत रखि अगिला पीढ़ीकेँ बिनु कहनौं-सुननौं सुमझबैत आएल अछि। तहिना रामरूपो बाबूकेँ अपन पिताक चास-बासपर नजरि पड़लनि। जेठ मासक सौझुका झकासक पछाति पूर्बाक लहकीमे ओसारपर बैस पटनेसँ गामक आनन्द रामरूप बाबू लइ छला। तही बीच चाहक कप नेने पत्नी-कादम्बरी पहुँचलनि। ओना आँखिक टकटकी रहनि मुदा ज्योति विहीन। पत्नीकेँ नै देखि पौलनि। मुदा कादम्बरी बुझैत जे िकम्हरो मन भँसि गेल छन्हि। कप बढ़बैत बजली- “चाह पीब लिअ, भक टूटि जाएत।” कहि बगलेक कुरसीपर बैस अपनो चाह पीबए लगली। चाहक चुस्की लैत रामरूप बाबू बजला- “गाममे बहुत सम्पति अछि ओकर उपयोग केना करी तैबिच नजरि घूसिए ने रहल अछि।” बहुतो एहेन तँ छथिए जिनका ठोरेपर बरी पकै छन्हि। प्रश्न पूरल आकि नै पूरल, उत्तर पहिने दऽ देता। भलहिं उत्तर नूनगर भेल आकि कड़ू आकि मीठनोन! तेकर चिन्ता नै। तहिना कादम्बरीओ छथि। केना नै रहती? अर्थशास्त्री पिताक बेटीक संग अपनो- कादम्बरी- आनर्सक संग एम.ए. अर्थशास्त्रेसँ केने छथि! बजली- “आइक पूजीमे करोड़ोक सम्पति अछि, बेचि कऽ बैंकमे जमा कऽ लिअ, लाखोमे आमदनी बढ़ि जाएत।” गरूड़ जहिना कागभुसुण्डीक बात धियानसँ सुनैत तहिना रामरूप बाबू पत्नीक बात सुनला। मुँहमे तँ ताला लगौने रहला मुदा भीतरे-भीतर मन हौंड़ए लगलनि। अपन नोकरीक जिनगी मन पड़लनि, जिनगी भरि पाइए हँसोंथलौं, जइसँ पटना सन शहरमे दस कट्ठाक घराड़ीमे तीन मंजिला मकान बनेलौं, पेन्शन भेटैए, बैंकोमे अछिए! तखनि जँ बाप-दादाक देल जमीन बेचि समाजसँ नाक कटाएब, ई हमरा सन लोक लेल केते उचित हएत? बच्चाक महिरम जेना माए-बाप बुझैए तहिना ने खेतो अरजनिहार खेतक बुझै छै। की केकरो दस कट्ठाक चौमास पूर्वज अहीले देलनि जे बेटा, बेचि कऽ बैंकमे रखि लिहऽ जे खूब सुइद हेतह। आकि ओ बारहो मासक कामधेनु बूझि देलनि? मुदा आइक बहरबैयाक जे रूप-रंग कहिऔ आकि नव कृषक संस्कृति पकड़ि लेलक अछि आेइसँ उपजा-वाड़ीक रूप की वएह रहत? ने राधाकेँ नअ मन घी हेतनि आ ने राधा नचती। ने गाछमे डारि हएत आ ने कियो मचकी झूलता। मन हुमड़लनि, पत्नीक पैत्रिक सम्पति नै छियनि- पैत्रिक सम्पतिक माने पारिवारिक विचारधारा- ओ अपन छी ओकर रक्छा के करत? नै! पत्नीक विचार नै सुनबनि। कोनो परिस्थितिमे खेत नै बेचब। विचारक दृढ़ता मुँह फोड़ि निकललनि- “बाप दादाक मान-सम्मानसँ जुड़ल जमीन अछि, ओकर उपयोग केना हएत, ई विचारणीय भेल।” अखनि धरिक जिनगीमे रामरूप बाबू पत्नीक विचारकेँ अङेज नेने छला। सेहो ओहिना नै, हुकुमदारी करैत-करैत एहेन मोड़ बनल जाइमे दुनू बेकती निर्णए केलनि जे दरमाहा पत्नीक हाथ जेतनि आ ओ घर चलौती। जइसँ जेना पुरुखक कलंक उठैए जे फल्लाँ फल्लाँ ठाम, से तँ झूठ भाइए जाएत। अँगने नै तँ राधा नचती केतए? मुदा ऊपरफटकी आमदनी तँ बिनु आड़ि-मेड़क होइए, ओ केना हिसाबमे औत? ओना, अइले घोंघौज दुनूक बीच भेलनि, मुदा ओ परिवारक हिसाबसँ बाहर रहल। मुदा ओकरा केना कामयावी बनाबी यएह ने भेल बुधियारी। जहिना कादम्बरीक मन छेलनि जे पतिक सोलहन्नी कमाइ हाथ आबए, सएह भेबो केलनि। जे निर्णयक पछाति रामरूप बाबू मासे-मासे चेक पत्नीक हाथ दैत रहलखिन। तइसँ एते तँ भेबे केलनि जे मछट्टा जाइक जरूरति नै पड़लनि। नून-सँ-हरदी तकक भार कादम्बरीएपर रहलनि। जइसँ कादम्बरीओ अपनाकेँ बेरोजगार नहियेँ मानैत। ओना कादम्बरी पतिक आदमनीकेँ ओइ थर्मामीटरसँ नपैत जइसँ छह बजे साँझसँ बारह-एक बजे रातिमे थाकल-मारल अबैक कारण की? नोकरीक डियूटी दिनका छन्हि, तखनि? मुदा लगले मन मुड़ि जान्हि। मुड़ि ई जान्हि जे अपनो देह भरिक स्वंत्रताक अधिकार जँ पुरुखकेँ नै भेटए, तँ पुरुखपना केतए औत? मुदा तैयो एते तँ इमानदारी रामरूप रखिते छथि किने जे आमदनीकेँ छिड़िअबै नै छथि, किछु-ने-किछु मोटगर काज तँ सम्हारिए लइ छथि। पटना सन शहरमे दस कट्ठा घराड़ीक बीच तीन मंजिला मकान तँ हुनके कमाइक छियनि आकि कियो दोसर देलकनि। अनेरे झूठ-फूसक गपक नाङरि पकड़ैले बौआएब। ओना दुनू परानीक बीच खौटका बनियेँ गेल। रामरूप बाबूक विचार जैठाम छन्हि तइसँ कादम्बरीक विचार हटल रहबे कएल। जमीनक नीक उपयोग भेने ने सम्पतिक नीक सुख भेटै छै। जँ ओकर उपयोगे ने हएत तँ माटिक धरती माटि छोड़ि सोनाक थोड़े भऽ जाएत। हँ, उपयोग केला पछाति माटिओ सोना बनै छै। तैठाम कादम्बरीक हटल विचार ई जे खेत बेचि बैंकमे रखने निश्चित आमदनीपर पहुँच जाएब तइ हिसाबसँ परिवार चलत। ने हाथ मैल आ ने पएर मैल हएत। धारक महार टुटिते दू तरहक धारा निरमित भाइए जाइए। एक जे मुख्यधारा ओकर जगह बना पेटमे समटैए तँ दोसरो एहेन अछिए जे अपना धारामे आरो धफार पैदा कऽ दाेसर दिस रेड़ैए। ओना अखनि धरि दुनू परानी- पति-पत्नी-क बीच केतेको दिन एहेन प्रश्नपर मतभेद होइत रहलनि। समझौतौ होइत रहलनि, मुदा कादम्बरीक आइक प्रश्न रामरूप बाबूकेँ किछु दोसर दिशामे मोड़ि देलकनि। रंग-बिरंगक प्रश्न मनमे उचड़ए लगलनि। की अपन समाज टूटि गेल? आ की अपन जिनगी टूटि गेल? एकरा की मानल जाए? माए-बापक सेवा इतिहास-शास्त्र पुराणक पन्ना पाछू पड़ि गेल? ऐ उमेरमे केकर आशा...? विचारमे मोड़ एलनि। एक तँ ओहिना दुनियासँ हटल छी तैपर जँ दुनू बेक्तीओ हटि-हटि रहब सेहो नीक नै। विहुँसैत रामरूप बाबू पत्नीकेँ बौसैत बजला- “अनेरे छोट-छीन बातक पाछू बेसी पड़ब नीक नै।” पतिक सह पबिते कादम्बरी छिड़िआइत बजली- “ओही दिनसँ अहाँकेँ जनै छी जइ दिन बात काटि देलौं!” जहिना छिड़ियाइत बातकेँ समेटल जाइत तहिना पत्नीकेँ समटैत रामरूप बाबू बजला- “सभ दिन तँ महल्लाक सभ सेवा निवृति भेल लोक एक घंटा-दू घंटा एकठाम बैसिते छी, तही बीचमे किए ने विचारि लेब। अनेरे किए हम बधुआएब आकि अहीं बधुआएब।” पतिक विचार कादम्बरीकेँ नीक लगलनि। नीकक कारण जे कादम्बरीक लड़-जड़क बाहुल्य, तँए अपन पक्ष मजगूत होइत देखलनि तेतबे नै देखलनि तैसंग ईहो देखलनि जे पति-पत्नी माने पुरुष-नारीक बीच अदौसँ किछु-ने-किछु वैचारिक मन-भेद होइत आबि रहल आ होइत रहत, मुदा फेर केना सम्बन्ध बनल रहल?हारल-थाकल-मारल बटोही जकाँ पतिक बगे-वाणि कादम्बरीकेँ बूझि पड़लनि। जीतल पति-पत्नी तँ ओ ने जे अपन आ अपन परिवारक कोनो समस्या दोसराक बीच नै रखि दुनू मिलि समाधान करैत दौड़ैत जिनगी बितबैत मृत्युक धाराकेँ कूदि कऽ टपि जाएत? मुदा से तँ नै भेल! ओझराइत बाटक बात देखि कादम्बरी बजली- “सभसँ बड़ौ समाज। भने अपन बात विचारैले रखि हुनको सबहक विचार देखबनि, नीको बूझि पड़त आ अधलो, जे नीक हएत ओकरा पकड़ि लेब, जे अधला बूझि पड़त ओकरा छोड़ि देबै। सएह ने? तइले जँ दुनू संगीओ-साथीमे मुँह फुलौने रहब, सेहो नीक नै। दुनियाँक इतिहास गबाही अछि जे विषम परिस्थितिमे पुरुखो आ महिलो एक दाेसराक संग छोड़ने अछि। मुदा एहेन पौराणिक गल्ती अपना जिनगीमे नै उतरए देब। लगभग चालीस बरख पूर्ब जहिना हाथ पकड़ा-पकड़ी केने एलौं, तहिना पकड़ने चलब।” पत्नीक विचार रामरूप बाबूक घोर-मट्ठा भेल मनकेँ जेना फरिछाएल पीबै जोकर पानि बना देलकनि। बजला किछु ने। मुदा आँखि जरूर अँखिआ लेलकनि। अँखिआ ई लेलकनि जे नीक भविस दिस अपनाकेँ बढ़बए चाहि रहली अछि। रामरूप बाबूक आँखि-मे-आँखि मीलिते जेना कादम्बरीकेँ बूझि पड़लनि जे भरिसक पति अगिला काज दिस बढ़ैले कहि रहला अछि। काजे ने बोलीकेँ बिलमबै छै। जँ से नै हएत तँ काजे बिगड़ि जाएत! आ जखने काज बिगड़त आकि अनधुन गरिऔनाइ शुरू करत! तइसँ नीक जे रौतुका भोजनक ओरियानमे किए ने लगि जाइ। पति लगसँ उठि कादम्बरी भनसाघर तँ विदा भऽ गेली मुदा मनक दोसर खरी उचरि गेलनि। उचरि ई गेलनि जे अखनि तक कहियो ओहेन भोजन नै केलौं जेहेन मनुखक हेबा चाही। पढ़ल-लिखल परिवार रहितो कहाँ कहियो ऐपर विचार केलौं! एक भोजन श्रमक पूर्ब होइए दोसर अंतक पछाति, जखनि लोक अराम करए जाइ छथि। गरिष्ठ पाक जेते अरामक अवस्थामे हेतै ओते काजक अवस्थामे थोड़े हेतै? मुदा ईहो केना मानल जाए जे सबहक दिन आकि सबहक राति एके रंग होइ छै। चौकाक बटलोहीक एक डेग पाछूए हटल कादम्बरी ठाढ़, मुदा विचारतंत्र तेते सक्रिय जे सभ अंग शिथिल पड़ि गेलनि। नजरि टकटकी जकाँ बनि गेलनि। दुनू परानीक बीच तीन दिन पछातिक समए बनल जे सभकेँ पूर्ब जानकारी देला पछाति विचारि लेब। तैबीच हुनको सभकेँ समए भेटतनि आ ऐबोक जानकारी रहबे करतनि। अपनो ओइ हिसाबसँ तैयारी करब। दाेसर दिन जेना कादम्बरीकेँ पानि चढ़ि गेलनि। मलेटरी जकाँ समैपर नीन तोड़लनि। केना ने तोड़ितथि? भोरुका बसंती-वयार केकरा नै बजारि छातीपर बैसए चाहैए। मुदा एहनो तँ लोक छथिए जे नीनकेँ तोड़ै छथि। जँ नीन अपने नै टुटए चाहैत तँ ओकरा तोड़लो जाइए। कादम्बरीओ नीनकेँ तोड़लनि। समैपर उठि अपन सभ जवाबदेहीक काज सम्हारि बैसारक बीचक योजना बनबए लगली। चारि बजे सौझुका समए अछि। चौबीसो घंटामे सभसँ नीक समए, नीकक माने विचारक अनुकूल मौसम। भोजनो तँ वएह ने नीक जे मौसमक अनुकूल हुअए। जँ से नै आ चैत-बैशाखमे नवका दालि खाएब तँ पेट हरहरेबे, गरगरेबे, पड़पड़ेबे, झड़झड़ेबे करत! मुदा जँ अपनो भोजनक विचार मनुख नै करत तँ नै करह। कोइ काहू मगन कोइ काहू! अपन करनी अपन धरनी अपन मरनी हेतै आकि अनकर? नीक हएत जे ओहेन भोजनक तैयारी करी जे सभकेँ सुपाच्य होन्हि। कादम्बरीक मन मानि गेलनि जे नीक विचार बुधि देलक। मुदा लगले दोसर जोरसँ धक्का दैत कहलकनि- “सुपाच्च तँ वएह ने जे शरीर पचबए? आकि सुपाच्च बौस? जँ सुपाच्च पदार्थ सुपाच्च तँ केकरो काँच दूध पचै छै आ केकरो नै पचै छै! केकरो गर्म दूध पचै छै आ केकरो नै पचै छै! तखनि?” कादम्बरीक मन फेर दोसर घुरछीमे ओझरा गेलनि। एक तँ अदहे मुट्ठी टीक लोक रखैए, तहूमे जँ दसटा चिड़चिड़ी घोंसिआ जाउ तँ टीक खोलिते-खोलिते नोंचा जाएत आकि एकेबेर जड़िएसँ कटा कातमे भऽ जाएत? तैपर सँ पुछबै जे तोरा अपसियाँत भेने हमरा की? से जेहेन हएत तहिना कादम्बरीक मनमे पनपल। पनपल ई जे जिनका जे सुपाच्य होइ छन्हि, माने सभ दिन खाइ छथि, हुनका लेल वएह पाक नीक हएत। एकमुँहरी विचार होइते फेर मन घुड़ियेलनि। घुड़ियेलनि जे जँ कोनो नीक बौस बनि जाए जे किनको नहियोँ नीक भेने मन घूमि जान्हि तखनि की कहबनि जे अहाँले नै तैयार छी? मन ठमकलनि। ठमकिते नियारली जे बेकता-बेकतीक विचारानुकूल पाकक ओरियान कऽ लेब। पेट तँ जंजाल छीहे ने! जँ से नै तँ हजार रसगुल्ला आ बीस किलोक रेहुक पेट जे बनौता हुनका लेल किए ने जंजाल छी। भोजनक सूची तैयार होइते कादम्बरी खोज-भाँज लगबए निकलबे करती जे किनका लेल की नीक। तहूमे समए लगबे करत। गप्पोकेँ कि नाङरि होइ छै, ओकरा कि लोकक देह जकाँ आँखिक निच्चाँ मुँह आकि दुबगली कान आकि मुँहक निच्चाँ पेट जोड़ैक काज छै आकि कैलाशसँ मानसरोवर आकि मानसरोवरसँ गंगोत्री.., ओकरा तँ सौंसे दुनियाँ देखैक विचार होइ छै। जँ से नै तँ ऐ प्रश्नक उत्तर कथी जे ‘अहाँक दुनियाँ केहेन? तँ अपना सन।’ रामरूप बाबूकेँ खाइ-पीऐक धनियेँ-फिकिर नै। तेकर कारण अछि जे शुरूहेसँ अपन दरमाहा पत्नीकेँ सुमझा पाक-साफ भऽ गेल छला। से नीके छेलनि। नीक ई छेलनि जे पत्नी जेते अपन भाएकेँ प्रेमसँ भोजन करबै छथि तेते पतिक भाइओक संग। तइसँ नीक जे ऐ बरहबर्खा रोगसँ छुट्टीए लऽ लेब नीक। तँए मन खुशी, किए कियो कहता फल्लाँ बाबू भरि पेट खाइओले ने देलनि आकि अमुख वस्तु बनबैक लूरिए ने छेलनि! किएक तँ मनुखेक मुँह छिऐ। बेटा बेरमे राजा छी आ बेटी बेर भीखमंगा! समैसँ पूर्ब कादम्बरी अपन विचार तीन बेर सभकेँ डेरे-डेरे पहुँच सुना चुकल छेली। मुदा रामरूप बाबू चुपे रहला। चुपे ऐ दुआरे रहला जे नव प्रश्न उठत, नव दिशा विचारैक प्रश्न हएत ओ तँ अपन अनुभवक संग समैसँ रस्ता मिलबैत आगू बढ़त। जँ से नै तँ समचीन[3] केना हएत। अोना अपनो मन ओतए ठाढ़ भऽ अगिला जिनगीक बाटक दिशा ताकि रहल छेलनि, जँ से नै तकता तँ आनक जिनगीकेँ जहिना अपने बुझै छथि तहिना ने आनो बुझतनि। सभ अपन मनक मालिक छी। सबहक अपन मन ओतए चढ़ि कुचड़ैए जे, भाय, दुनियाँमे सभसँ बेसी बुधियार, सभसँ बेसी इज्जतदार छियौ, टिटही जकाँ हमरेपर अकास टिकल अछि...। तहिना कि दोसराक मन पाँखि लगा उड़ि नै कुचड़त जे हमहँू छी। तखनि ओइ कुचड़ा-कुचड़ीमे अनघोल हएत की नै? तइसँ नीक ने जे मुँहमे ताला लगा रहब। अनेरे मन बौअबै छी। भाय, जेकर माए-बाप मरत ओकरा जँ नीन पकड़ि लइ वा ओङहए लगए तखनि दाेसराक गति की हेतै। मुइला पछाति होउ आकि जनमला पछाति, ओकर जे अगिला प्रक्रिया छै ओ तँ अपने करए पड़ै छै। चारि बजिते सभ आमंत्रितजन पहुँचला। मुदा बैसैमे फेड़-फाड़ भेल। फेड़-फाड़ ई जे आन दिन जेना अबैत गेला बैसैत गेला से नै भेल। अपन-अपन गर अँटकारि-अँटकारि जोड़ लगि-लगि बैसला। मैनेजर साहैब जे बैंकसँ सेवा निवृति भेल छथि, तिनका आ डाक्टर साहैबकेँ खूब पटै छन्हि, जँ दुनूकेँ समए भेटनि तँ भरि-भरि राति सौन जकाँ विद-विदाइते रहि जेता। मुदा जैठाम सभ दौग कऽ आगाँ बढ़ए चाहैए तैठाम मैनेजर साहैब आकि डाक्टर साहैब छूटि जाथि सेहो तँ नीक नहियेँ। जहिना डाक्टर साहैब मैनेजर साहैब लग बैसला तहिना सेवा निवृति इंजीनियर साहैब डायरेक्टर साहैब लग बैसला। फैक्ट्रीक डायरेक्टर साहैब सेहो सेवा निवृति छथि। दुनूक विचारक विनियम अपन रहनि, तँए बेसी हेम-छेम छन्हि। चाह उसरैत-उसरैत पान चलए लगल, मुदा पानक पछाति जे परसल जाइए ओ अनका मुहेँ परसल जाएत आकि अपना मुहेँ। जेम्हर पान परसा गेल ओम्हरसँ प्रश्न उठल- “की बात छिऐ यौ रामरूप बाबू?” प्रश्न उठौलनि डाक्टर साहैब। ओना डाक्टर साहैब बजैमे फड़कोर छथिए, नजरिए तेहेन छन्हि जे लगले कोनो बातकेँ पकड़ि, सामाजिक-पारिवारिक कोनो समस्याकेँ शरीरक रोगे जकाँ एक्स-रे करा मेडीसीन आकि सर्जरीक दुनू विचार ठाँहि-पठाँहि दऽ दइ छथिन। ओना सभ दिन लोकक बीच रहै छथि, अखनो अपनाकेँ अथबल नै बूझि रहला अछि, भलहिं नव तकनीकक मारिक चोट किए ने जिनगीकेँ धकियबैत होन्हि। खैर, जे छन्हि ओ तँ हुनकर बेक्तीगत छियनि। ओना काने-कान बीआ-बान कादम्बरी काइए चुकल छेली, मुदा अपन जिम्माक आ गरिमाक मेनटेन करब छन्हिहेँ। चौमास जकाँ चौकियाएल विचार रामरूप बाबूक रहबे करनि, बजला- “गाममे पिता जीक अमलदारीमे पनरह बीघा जमीन छल, हुनका जीविते नोकरी भेल। हम नोकरी दिस बढ़ि गेलौं। बाबू खेतीएपर अँटैक गेला। दुनू परिवार दू दिस भऽ गेल। चारि पाँच बर्खक पछाति, आगू-ए-पाछू दुनूक मृत्यु भऽ गेलनि, किरिया-कर्म भेला पछाति जे गाम छोड़लौं, से छोड़नै छी।” रामरूप बाबूक नमहर प्रश्न। दू जिनगीक प्रश्न, एक किसानीक दोसर नोकरिहाराक। तहूमे दुनू लग लगाउ नै, सोलहन्नी नवक शुरूआत। सबहक मन ठमकलनि। अपन जिनगीमे भेल घटना आ बिनु भेल घटनाक दू थर्मामीटर होइ छै। जिनगीक प्रश्न छी, तँए सभ सबहक मुहोँ देखैत आ आगू सुनैक प्रतिक्षो करैत। ओना कादम्बरीक मन प्रश्नक उत्तर दइले चटपटाइत रहनि। कारणो छल दुनू परानीक बीच उठल दू दिशाक बाट। मुदा पनचैतीओ तँ पनचैती छिऐ, ओहिना पनचैती आ पर-पनचैतीक चलनि समाज पकड़लक आकि खूब नीक जकाँ जोति-कोरि, गोला फोड़ि चिक्कन बनबैले पकड़लक। पनचैती आकि पर-पनचैती ओहिना थोड़े उठि कऽ ठाढ़ भेल। ओहिना कोनो चीज सोझहे ठाढ़ होइए आकि ओकरा ठाढ़ रहैक गर बनौला पछाति होइए। तँए पनचैतीओक ठाढ़ होइक अपन गर छै। पहिने पहिल पक्ष अपन विचार रखता, ओइ विचारकेँ पंचवेदीमे वेदसँ नहाएल-धोअल जाएत तेकरा पछाति ने दोसर पक्षक विचार, विचारमे औत? जँ से नै आनब आ पनचैतीकेँ निर्णए तक नै पहुँचऽ देबै तखनि विचारक उलंघनक दोषी के हएत। तहूमे परिवारक दुनू परानीक बीचक छी, पतिक प्रति अपन अशिष्टता सोझहाँ आबि जाएत। तइसँ नीक जे डाक्टर किसुन भायकेँ कहिए देने छियनि तँए हुनके इशारा कऽ दियनि। कादम्बरी सएह केलक। मुदा डाक्टर साहैब अपन विचारमे डुमल रहथि। चारि भाँइक पिताक भैयारीमे विचारक भिन्नता परिवारकेँ मटिया-मेट कऽ चौकिया देलक। तँए कोनो परिवारक प्रश्न छी, बिनु बजने दोखीओ तँ नहियेँ हएब। बेर-बेर कादम्बरीक इशारा डाक्टर साहैब देख-देख अनठबैत रहला। डाक्टरो साहैब छह-पाँचक कमाइ नै केलनि। कियो कम्पनी उपहार देलकनि, तेतबे धरि। तँए सोझ विचार जे, भाय जे नै बुझिऐ तेकरा लगले किए ने मानि लिऔ। जे कोट-कचहरीक केस जकाँ पचास-पचास बरख रगड़ैत रहिऔ। तइसँ केकर नीक हएत। लोको रगड़ाएत सरकारो घँसाएत। चुपा-चुपी देखि इंजीनियर साहैब बजला- “सबसँ पहिने दियाद-वादक भाँज लगबए पड़त, गाममे रहनिहार भलहिं मारि-दंगा कऽ बलजोरीओ कऽ सकैए मुदा जे बाहरसँ गौआँ बीच जेता हुनका तँ नापि-जोखि कऽ जाएब नीक हेतनि। अपन सुपत केते जमीन बँचल छन्हि, ओ बिना बुझने केना किछु करता।” इंजीनियर साहैब अपने गामक भगौआ भेल छला। मुदा से अपने गल्तीसँ। जखनि घर बनबैक झोंक चढ़लनि, तखनि अपन पैत्रिक घराड़ी दियाद-वादक हाथे बेचि लेलनि। ओना देलखिन परिवारेकेँ, इज्जत तँ रखलनि, मुदा जखनि अपन रहैक मिथिलांचलक बास बेचि लेलनि, जेकरा कखनो नीक नै कहल जा सकैए आ जखनि पाइ-कौड़ी जोर मारलकनि तखनि गाम मन पड़लनि। मनसूबा यहए जे बेसीए कऽ कीनि लेब मुदा जिनगी भरिक समीक्षा केला पछाति जे इंजीनियर साहैबक किरदानीक समीक्षा समाज आकि दियान-वाद केलनि तँ ऐठाम आबि अँटैक गेला जे इंजीनियर साहैबसँ केकरा की लाभ भेल? तँ किछु ने! तखनि पढ़ल-लिखल आ बिनु पढ़ल-लिखलमे की अन्तर भेल, मुरुखोसँ मुरुखपने केलनि। एकमुट्ठी भोजन करा कियो भूखलकेँ तृप्त बुझैत मुदा जिनगीक भूखक तृप्तिता बिना जिनगी ठाढ़ भेने नै होइ छै। जीवन बनबैक लूरि इंजीनियर साहैबकेँ, मुदा कहाँ एको परिवार गढ़ि सकला! ई बात दियाद-वादक मन मानि नेने छेलनि। केतबो नाङरि पट-पटा कऽ रहि गेला दियाद-वाद ओइ घराड़ीपर नहियेँ आबए देलकनि। कियो अपने बेथे बेथाएल तँ कियो जमीनकेँ जंजाल बूझि ओकरा भीर जेबो ने करै छथि। चुप-चुपी देखि कादम्बरीक मन भीतरे-भीतर खौंझाइत रहनि जे नीमकहराम सभ भऽ गेल। केहेन कऽ बुझा-सुझा कहबो केलियनि आ खुएबो-पीएबो केलियनि। मुदा कियो पीठपोहू हुअ नै चाहैए। पाशा बदलैत बजली- “एके काज लेल बेर-बेर बैसार करब नीक नै हएत। तँए...?” कादम्बरीक प्रश्नमे पुछड़ी जोड़ि मैनेजर साहैब बजला- “मानि गेलौं जे पनरह बीघा छेलनि, तइमे नै सोलहन्नी तँ अठन्नीओ मानि लिअ। अदहो तँ साढ़े सात बीघा बँचबे कएल हेतनि। मुदा साफे नै बँचलनि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए।” मैनेजर साहैबक मन बैंकक सुइद दिस भगैत जे छबे मासमे जखनि सुइद मुइर भऽ चलए लगै छै, तखनि लाखक पूजी पानिमे दहलाइए। मैनेजर साहैबक बोल इंजीनियर साहैबकेँ नीक नै लगलनि। नीको केना लगितनि, मन गवाही दैत रहनि जे जहिना छोटका-बड़का साइओ पार्ट मिला मशीन गढ़ल जाइए तहिना तँ परिवारो छी। तँए, अपन प्रश्नपर अड़ान दैते बूझि पड़लनि जे साइकिलक भौलटू जकाँ गरदनियेँ लगसँ परिवार कटि गेल अछि। कहू जे केहेन लीला छी जे एक माए-बापक सन्तान, बेटा-बेटी भेने केना सम्पतिक अधिकारी आ नै अधिकारीक अधिकार अछि। तेतबे किए, जँ पाँच या सात भाँइक भैयारी छी तँ जेठौंस बँटैत-बँटैत छोटका सोलहन्नी बँटा जाइए आकि रहबो करै छै। गप-सप्पकेँ टेढ़-टूढ़ होइत देखि रामरूप बाबू बजला- “मानि गेलौं जे पनरह बीघामे साढ़े साते बीघा बँचल, तेकरा केना उपयोग करी, से तँ विचारल जा सकैए।” टूटल दाँतक मुँहमे पान गलगलबैत डायरेक्टर साहैब बजला- “अपन कएल काज कहै छी। अपनो गाममे पाँच बीघा जमीन अछि, मन भेल जे पूजन देल सम्पति छी पछिम लेल छोड़ि दिऐ। तखनि तँ भेल ओइकेँ उपजाउ बना दियै आकि परती बना दियै? उत्पादित राखल जाए आकि परती जकाँ? कोनो कि पावनि-तिहार छी जे अनको आन सम्हारि देतै आ एक-आधटा एकादशीक जरूरति हेतै तँ दैयो देतै। जँ उर्वर-उपजाउ बनल रहत तँ सुगमतासँ आगूक काज बढ़ौल जाएत आ नै जँ परती बना राखल जाएत तँ मुरदा-साड़ा लग बैस कऽ कानब हएत। भाय, संस्कृति आ मातृभूमिक सेवा कथी छिऐ तेकरा ने नीक जकाँ बुझए पड़त। जैठाम कण-कणमे भगवान आ कण-कण शक्ति सम्पन्न अछि तैठाम केना कि कएल जाए, एना जँ धिया-पुताक गर्दाक घर-अँगना बना खेलब, तँ बेर झुकैत उजरि-पुजरि जाए पड़त।” डायरेक्टर साहैबक बातमे डाक्टर साहैबकेँ रस भेटलनि। टिटकारी दैत बजला- “भाय साहैब, अपने तँ टटके खेतपर पहुँचल छी, तँए समयानुकूल विचार अपनै दऽ सकै छिऐ?” डाक्टर साहैबक टिटकारी डायरेक्टर साहैब नै परेखि सकला। अपन पूछ खिखिर जकाँ मोटगर बूझि पड़लनि। अठनियाँ मुस्कान भरैत बजला- “देखू अपन सोलहन्नी विचार नै छी, मुदा जखनि एक महान अर्थशास्त्री कानमे घोरि कऽ पीआ देलनि जे देखिऔ, अपना ऐठामक माने मिथिलांचलक किसानी जिनगी बेठेकान छै। तहूमे बहरबैयाक लेल। गाममे रहनिहार तँ ओ भेला जे धार फुलाइते गाँज-डेली लऽ घारक कात जा हियासऽ लगैत जे अमार केमहरसँ आबि रहल अछि। से तँ बहरबैयाक बुत्तासँ बाहर अछि। तँए नीक हएत जे एकेबेर पूजी लगा बीस सालक खेती करि लिअ।” ओना डायरेक्टर साहैब कुशियारक गुल्ली बना-बना अपन बात राखए चाहै छथि, जे जखने तरो मीठ, ऊपरो मीठ आ मनो मीठ तखनि तँ मिठाइ बनबे करत। बड़ हएत तँ भुसबाक बदला लडडू बनि जाए। नाङरि पकड़ि ऐँठि डाक्टर साहैब बजला- “एहेन नफगर जँ खेती हुअए तँ तेलोसँ चिक्कन। तहूमे अपन इलाका, सत-सत बेर लोक एक-एकटा खेतमे धान रोपैए आ तैयो दहा जाइ छै। मुदा धन-धरतीक धैर्य तेते धीरजवान छै जे आँखि खोलिओ आ आँखि बन्न काइओ कऽ सदिकाल यएह कहैत जे धरती अहीं हमरा अन्न दइ छी, हृदैमे जमा कएल पानि दइ छी, अपन सिनेह-सिक्त कएल पुरबा-पछियाक रूपमे हवा दइ छी, जिनगी लेल की ने दइ छी मुदा सभ किछु दैतो हे धरती छाती हटौने छी।” डाक्टर साहैबकेँ भँसिआइत देखि रामरूप बाबू बातकेँ समटैत बजला- “बड़ सुन्नर प्रश्नक उत्तर आबि रहल अछि, एकबेर खेती करैमे ओकरा लगबैमे, जँ बीस बरख दोहरा कऽ ओइमे पूजी नै लागए आ बीस बर्खक पछाति बीसो सालक उपजासँ बेसीक हिसाब आबि जाए तँ किए ने कएल जा सकैए।” रामरूप बाबूक विचार सुनि डायरेक्टर साहैबकेँ आरो मनसूबा जगलनि। बमछैत बजला- “सेवा-निवृति भऽ गेलौं तँए कि ऐ देहमे दम नै अछि? रामरूप बाबू, अपनेसँ गाम जा देखि-सुनि आउ। सागवान-गाछक खर्च सरकारी अनुदानपर आ लगबैओमे जे खर्च औत सेहो सभ सरकारीए अनुदानपर हएत।” डायरेक्टर साहैबक बमछी देखि डाक्टरो साहैबकेँ मन बमछैत रहनि। मुदा अपन जखनि सीमा अँकथि तँ देखथि जे जहिना बजौल हम छी तहिना तँ डायरेक्टरो साहैब छथि, अनका ऐठाम एहेन किछु नै हेबा चाही जे घरबैयाक प्रतिष्ठापर कोनो कचोट होइ। तँए गुम्म। मुदा तरे-तर डाक्टर साहैबक मन ई बमछनि जे कहू केहेन भोतलोह सन विचार दऽ रहला अछि। बीस बर्खक खेतक काज हाथसँ छीना जाए तँ खेतपर रहनिहार लेल ओ हाथ की करत? तहूमे जे धरती दुनियाँक सभसँ नीक अछि ओ फल-फूल विहिन खेतीमे फँसि जाए! तखनि केहेन रमणगर जनकक फुलवाड़ी हएत? एक तँ जन-जनक फुलवाड़ी तैपर विश्वामित्र सन ऋृषिक आगमनक संग सखी-सहेलीक संग सीता आ लक्ष्मणक संग रामक मुस्कान। जहिना समए उसरनपर आएल तहिना विचारोकेँ उसारिए देब सभ नीक बुझलनि। डाक्टर साहैब बजला- “रामरूप बाबू, गाम जा खेत ठेकना लिअ, डायरेक्टर साहैब खेतीक भार उठाइए लेलनि, तखनि शुभ काजमे अनेरे बिलम करब नीक नै।” बैसार समाप्त भेल। मुदा जहिना नवम् मासक बेथा माइयेटा बुझै छथि तहिना नवम् जिनगीक बेथा रामरूप बाबूक मनमे कचकलनि। बैसारक तेसर दिन, दू दिन बीचक समए ऐमे चलि गेलनि जे की करब, केना करब, के संग देत आकि नै देत। एहनो संगी तँ होइते अछि जे सदिकाल तूम्मे फेड़फाड़ करैए। एहनामे केतए बिसवास कएल जा सकैए? कुरसीपर बैसल रामरूप बाबू असकरे विचारि रहल छला। सरकारी सर्टिफिकेट अछि जे आब अहाँ काज करै जोकर नै छी, तैपर बलउमकी करै छी। कोन जरूरति पूर्वजक सम्पतिक अछि, जे गाममे अछि। गौआँ जोति-कोरि कऽ खाए आकि परती बना कऽ गाए चरबए, गामक सम्पतिक हक तँ ओकरे ने भेल। जिनगीमे दुनियाँ छोड़ि पेट पकड़लौं, तैयो मन बौआइते अछि। मुदा दस गोटेक बीच जुआन हारि गेल छी, जँ पाछू हटब तँ अनेरे वएह सभ मुहेँपर थुकता जे रमरूपबाक कोन ठेकान, कोनो कि मनुख छी, धन जमा केने कथी हेतै, जखनि जुआने नै तखनि ओहेन मनुखक मोजरे केते। मुदा विचार जेना विचार भूमिकेँ खोदि देलकनि। खोदि ई देलकनि जे जखनि दुनू परानी दस गोटेक बीच अपन विचार स्थापित करैले गेलौं, तखनि जे निर्णए भेल ओ दुनू गोटेक ने भेल। कोनो काज लेल आ केतौ जाइ लेल संगी संग गप-सप्प करैत रस्ता कटि जाइए। तही बीच कादम्बरी चाह नेने पहुँचली। पतिक सोगाएल सुरति देखि कादम्बरी व्यंग्यवाण छोड़ली- “मन बड़ खनहन जकाँ बूझि पड़ैए?” कादम्बरीक वाण रामरूप बाबूक छातीमे बेधि देलकनि। बजला- “मन कि खनहन रहत, मुदा खरहर तँ अछिए। वएह सोचि रहल छी, अनेरे बेसी देरी किए करब। काल्हिए-परसूसँ किए ने काजमे हाथ लगा दिऐ।” ‘हाथ लगाएब’ सुनि कादम्बरी सहमली। सहमली ई जे विचार देब आ विचारकेँ हाथक काजसँ मिलबैत चलब तँ भीन बात भेल! तखनि? तखनि तँ यएह ने जे ओ पति छथि जेना संग दइले कहता तेना देबनि। ई बात अछिए जे दुनू परानी बूढ़ भेलौं, मुदा ईहो तँ आशा अछिए किने जे जँ रस्ता-पेरा मन झूकत तँ दोसरक आशासँ ठाढ़ हेबे करब किने। धनक लोभ छी, मुइलो अछियापर सँ उठि कऽ अबि लोक लाठी भाँजैए। छोड़बो नीक नहियेँ हएत। बजली- “हम तँ जीवनसंगिनी भेलौं, कर्ता-धर्ता तँ अहीं भेलौं, तखनि जे जेना सामर्थ्य रहत से तेना भाँज पुड़ैत रहब।” कादम्बरीक आस भरल आसक विपरीत दिशामे रामरूप बाबूकेँ आस लगिते मन बढ़लनि। मन बढ़लनि ओइ दिशामे जैठाम अपनाकेँ समाजक ओहेन लोक जे सभसँ बढ़ल-चढ़ल अपनो बुझै छथि आ समाजो मानै छन्हि, जे दोसराक लेल की केलखिन? कोन मुँह लऽ कऽ समाजक बीच जाएब। मुदा सोझहामे कादम्बरी, तँए बात बदलि बजला- “गामक लोक बड़ टेढ़ होइए, अनेरे कहत जे अहाँ बाबरी कटबै दुआरे केशकट्टा दियाद छोड़लौं आ आइ मरै बेरमे समाजक आगिए संस्कार चाहै छी। तखनि की कहबै?” रामरूप बाबूक विचार कादम्बरी नै परेखि पौली। बजली- “केकरो अनकर सम्पतिपर जाएब जे कियो मुँह दुसत? अपन सम्पति छी। चाहे मन्दिर बनाँउ, आकि असमसान, अपना विचारे कियो करैए। तैठाम गौआँ किए बाजत?” कादम्बरीक बोल जेना रामरूप बाबूक मनमे बलबोल जकाँ बूझि पड़लनि। मुदा बजला किछु ने। जिनगीक रक्छा केना कएल जाए, तेकरा खेल बुझै छथि। हँ एहेन गाम-समाज अखनो अछि जे अतिथि सत्कारक विधि-बेवहार बँचा कऽ रखने अछि। रामरूप बाबू समाजक बेटा नै बनि पेला, ई दोख अखनो केकर कलंक भेल। काल्हुक लेल कोन अंक निर्धारित हएत। मुदा कादम्बरी तँ गामक पुतोहु भेलखिन। जखने गाम पएर देथिन तखने समाजक बाल-अबाल सभ अड़ियाइत कऽ अँगने लऽ जेतनि। ओइ संग अपनो रहैक ठौर-ठेकान बना नै चलब तँ समाजक कोनो ठेकान छै। एकटा मारि-पीटि भेने सौंसे गामक लोक जहिना निपत्ता भऽ जाइए तहिना मारि-पीटि करैकाल सेहो तँ गोलियाइते अछि। निर्णए केलनि जे समाजक नीक-अधला समाजक भेल, अपने केना ओइमे प्रवेश करब, ई अपन काज भेल। बजला- “तीन दिन मािन कऽ चलू। तीन दिन रहैक खेनाइ-पीनाइक फास्ट-फुड ओरियानक संग रहैक घरक जोगार सेहो केने चलब।” “हँ मोटा-मोटी दू गोटेक बोझहा भेल। मुदा आब तँ गामे-गाम सवारीओ जाइते अछि। काल्हिए भोरक प्रोग्राम रखू।”¦¦¦ [1] सभसँ उत्तम किसिमक [2] नीच जमीनक [3] समए चिन्ह ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जितेन्द्र झा - सभासद् साह फरार, सद्भावना कहलक निर्दोष की भेटत जनकपुर बमकाण्ड पीडितके न्याय ? पकराउ पुर्जी कटलाक दू सप्ताह बादो नेपाल प्रहरी जनकपुर बम काण्डक आरोपी सभासद् सञ्जय साहके नहि पकडि सकल अछि । जनकपुर बम काण्डमे संलग्न रहल प्रमाण्ँ भेटलाक बाद प्रहरी सभासद् साहके“ पकडबालेल दू बेर पक्राउ पुर्जी जारी कएलाक बादो पकड़मे असफल रहल अछि । जनकपुरक रामानन्द चौकमे २०६९ साल वैशाख १८ गते मिथिला राज्यक मांग करैत आयोजित धर्नामे विष्फोट करओनिहार प्रमुख योजनाकार सभासद् सञ्जय साह रहल प्रहरी आरोप लगओने अछि । प्रहरीक अनुसार विष्फोटके जिम्मा लेनिहार तराई लिबरेशन फ्रन्टक अर्जुन सिंह नामस“ चिन्हल जायबला मुकेश चौधरी धनुषा प्रहरीके बयान दैत सभासद् सञ्जय साहकेँ निर्देशनमे बम विष्फोट कराओल गेल बतओने अछि । चौधरी सुरुमे साहक संलग्नता विषयमे झुठ बजने छल, जाहिके बाद प्रहरीले पोलोग्राफ टेस्ट कऽ कऽ बयान लेने छल । साहक पूर्व सहयोगी ओम यादवके बयानस“ सेहो साहके संलग्नता पुष्टि भेल धनुषाक प्रहरी उपरीक्षक उत्तमराज सुवेदी कहलनि । धर्नामे बम विष्फोट करओनिहार कोनो आवरणमे हुअए प्रहरी ओकरा नहि छोड़त उपरीक्षक सुवेदीक कहब छन्हि । विष्फोटके बाद प्राप्त अडियो टेपसहितके विषयमे सेहो चौधरी आ यादवस“ पुछलाक बाद साहक संलग्नता पुष्टि भेल उपरीक्षक सुवेदी जनतब देलनि । विष्फोटस“ सम्बन्ध रहल एकटा अडियो टेप सार्वजनिक भेल छल । जाहिमे विष्फोटक योजना बनाओल गेल बातचीतके रेकर्ड छल । अडियो टेप तत्कालीन समयमे क्षणिक तरंग त अनने छल मुदा ओकर छानबिन नहि भेलाक बाद अहिना सेरा गेल । प्रहरीले सो अडियोक आधिकारिकताक विषयमे सेहो मुकेश चौधरीस“ पडताल कएलक अछि । के अछि संजय सञ्जय साह ? धनुषा जिलाक लोहना–७ मूल घर रहल सञ्जय साह जनकपुरमे कोनो समयमे कवाड़ीका ठेकेदार छल । एमाले नेता रामचरित्र साहक राजनीतिक संरक्षण आ धनुषा तत्कालीन एसपी विश्व जबराक प्रोत्साहनस“ साहके दायरा बढैत गेल । ओ जबराक मुखबिरीक काज कऽ प्रहरी प्रशासनस“ लग भऽ गेल छल । कहियो कांग्रेसी त कहियो एमालेक नेताक आशिर्वादस“ ठेकेदारीमे आधिपत्य स्थापित करैत आएल साह मधेश आन्दोलनके बाद अपने राजनीतिमे कुदि गेल । ई पहिल बेर नहि जे प्रहरी साहके खोजि रहल अछि । ओ बेर बेर विवादमे आबि चुकल अछि । धनुषा प्रहरीक रेकर्ड ज“ देखी त बुझाइत अछि जे साहके परिचय ठेकेदारक रुपमे मात्र सिमित नहि रहल । हत्या, अपहरण जेहन कतेको घटनामे बेर बेर साहके संलग्नता रहल निवेदन प्रहरीमे पड़ल मुदा राजनीतिक आ आर्थिक हैसियत दुनू भेलाक कारणे साह कारवाहीक दायरामे नहि आबि सकल । प्रहरी कोना कारवाही करैत, प्रहरीके राशन खुअएबाक ठेका साहके भेट गेलाक बाद साहपर कारवाही करबाक हिम्मति कियो नहि कऽ सकल । सभासद्क हैसियत मात्रे नहि गृहमन्त्रीक रुपमे विजयकुमार गच्छदारक संंरक्षणक कारण सेहो साहपर प्रहरी, प्रशासन कारवाही करबाक हिम्मति नहि जुटा सकल । अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोगस“ लऽकऽ राष्ट्रिय सतर्कता केन्द्रधरि साहपर भ्रष्टाचारक कतेको निवेदन पडल, मुदा ओहि सभपर कोनो कारवाही नहि भऽ सकल अछि । मधेश आन्दोलनक लगले बाद २०६४ सालमे संविधान सभाक पहिल चुनावमे साह उपेन्द्र यादव नेतृत्वक मधेशी जनअधिकार फोरम नेपालस“ धनुषा ४ स“ प्रत्यक्ष चुनाव जितने छल । बादमे फोरम नेपालस“ फुटिकऽ बनल विजयकुमार गच्छदार नेतृत्वक फोरम लोकतान्त्रिकमे साह गेल छल । फोरम लोकतान्त्रिकस“ भौतिक योजना तथा निर्माण राज्यमन्त्री सेहो भेल साहपर पार्टीद्वारा कारवाही भेलाक बाद ओ मधेश क्रान्ति फोरम नेपाल नामक समूहमे सकृय भेल । मुदा गतवर्ष नाटकीय रुपस“ साह फेरो फोरम लोकतान्त्रिकमे प्रवेश कएलनि । एकदिश जनकपुर बम काण्डमे संलग्नतक आरोपमे साहपर छानबिन हुअए से मांग भऽ रहल छल दोसर दिश तत्कालीन गृहमन्त्री आ फोरम लोकतान्त्रिकके अध्यक्ष गच्छदार साहके २०६९ फागुन ९ गते पार्टी प्रवेश करौलनि । मुदा साह ओत्तऽ किछुए महिना टिकि सकल । दोसर संविधानसभा चुनावस“ ठिक पहिने राजेन्द्र महतो नेतृत्वक सद्भावनामे प्रवेश कएलनि । संविधानसभा चुनावमे राजेन्द्र महतो नेतृत्वके सद्भावना पार्टीस“ प्रत्यक्ष निर्वाचनमे जितनिहार एकगोटे साह मात्र अछि । एखन साह सद्भावना पार्टीक वरिष्ठ उपाध्यक्ष अछि ।
साहके पकड़बालेल पुलिस पक्राउ पुर्जी जारी कएने समाचार सार्वजनिक होइते सद्भावना पार्टी साह निर्दोष रहल कहैत बचएबालेल आगु आएल अछि । पार्टी संसदमे आवाज त उठेबे कएलक प्रधानमन्त्रीके ज्ञापन दऽकऽ निष्पक्ष छानबिके मांग सेहो कएलक । चैत ६ गते सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो नेतृत्वके टोली प्रधानमन्त्री सुशील कोइरालाके ज्ञापन पत्र बुझओलक जाहिमे जनकपुर विष्फोटमे साहके कानो संलग्नता नहि रहल दाबी कएल गेल अछि । न्यायिक छानबिन आयोग गठन कऽ घटनामे दोषीपर कारवाही कएल जाय सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो कहलनि । बालुवाटारमे प्रधानमन्त्रीके ज्ञापन देलाक बाद पत्रकारसँ बातचीत करैत महतो कहलनि होरीक बाद सभासद् साहसँ कोनो सम्पर्क नहि भेल अछि ।
साह निर्दोष, न्यायिक छानबि हुअए – लक्ष्मणलाल कर्ण, सभासद् सदभावना पार्टी सभामुख महोदय, एहि सम्मानित सदनक एकगोटे सदस्य सञ्जयकुमार साहकेँ सम्बन्धमे समाचारपत्रसभ जनकपुर बम काण्डकँे अभियुक्त कहिकऽ लिखिरहल अछि । एहि सम्बन्धमे हमसभ खोजबिन कएलहु“, एहिमे सरकारके लापरवाही देखल गेलाक बाद ई संसदके विषयवस्तु बनल, तेँ हम ई विषय संसदमे राखऽ चाहैत छी । २०६९ साल वैशाख १८ गते जनकपुरमे बम विष्फोट भेलाक बाद घटनास्थलसँ जयप्रकाश चौधरी नामक व्यक्तिके पकड़िकऽ स्थानीयवासी पुुलिसके बुझओने छल । पुलिस अनुसन्धान कएलक आ अन्य चारिगोटेके पकड़लक । पुलिस घटनामे संलग्न व्यक्तिउपर धनुषा जिला अदालतमे मुद्दा दायर कएलक । ताहिके बाद जनतान्त्रिकके अध्यक्ष घटनाके जिम्मा लेलक । आ पुलिस हुनको पर अदालतमे मुद्दा चलारहल अछि । सम्मानित सभाके ई हम याद दिआबऽ चाहैत छी जे ताहिकेबाद पुलिस एहि घटनाके कारवाही बन्द कएलक । घटनामे मृतक विमल शरण वैष्णवक बेटा जहन प्रहरी कार्यालयमे जाहेरी देबऽ गेल तहन पुलिस कहने छल घटनामे दोषी सभपर मुद्दा चलि रहल अछि आब किनको पर मुद्दा नहि चलि सकैत अछि । पीडित जाहेरी दर्ताक लेल पुनरावेदन अदालत धनुषामे परमादेशके लेल गेल । ओत्तऽ प्रहरी जवाब दैत कहलक जे ई मुद्दाके विषयमे कारवाही भऽ चुकल अछि तेँ आब जाहेरी नहि लेल जा सकैत अछि । एखन करिब दू वर्षक बाद प्रहरीे ओमप्रकाश यादवके बजाकऽ अनैत अछि आ कहैत अछि जे सञ्जय साहके संलग्नता अछि । जहन कि ओ मुद्दामे ओमप्रकाश यादवके कोनो संलग्नता नहि अछि । संलग्नता नहि रहल व्यक्तिके बयानके आधारपर प्रहरी सभासद् सञ्जय साहपर वारेण्ट जारी कएने अछि ।
सञ्जय साह यदि दोषी छथि त कारवाही नहि हुअए, से नहि कहए चाहैत छी । जहन पुलिस अदालतमे आन कोनो व्यक्ति दोषी नहि अछि से कहने छल तहन दू वर्षक बाद कोनाकऽ नयाँ प्रतिवादी आबि गेल ? प्रहरी ककरो दोषी नहि बनाबए । एहि सम्मानित सभाके एकटा सदस्यपर झुठ मुद्दा लगाओल गेल अछि । एहि तरहेँ जहन दोष लगाओल जाय त कोनो व्यक्ति, सभासद् निर्दोष नहि रहि सकैत अछि । ककरोपर वारेन्ट जारी कएल जा सकैत अछि, मुद्दा चलाओल जा सकैत अछि । तेँ सरकार सञ्जय साह दोषी अछि वा निर्दोष, तकर वास्तविकता पत्ता लगाबए । एहिबास्ते सरकारके तत्काल न्यायायिक छानबिन आयोगके गठन करबाक चाही । एकटा सभासद्के चरित्र हत्या सम्बन्धमे सरकार मौन अछि, कोनो कारवाही नहि कएलक अछि । (चैत ६ गते , २० मार्चकऽ सद्भावनाक सह–अध्यक्षसेहो रहल कर्णद्वारा व्यवस्थापिका संसदमे देल गेल मन्तव्य । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जितेन्द्र झा -गतिविधि
गतिविधि सांस्कृतिक सम्मानसँ मजबुत हएत राष्ट्रियता ः बिमल साहित्यकार डा. राजेन्द्रप्रसाद विमल नेपालमे सभ जाति, भाषा संस्कृति आ सभ्यताक सम्मान भेलाक बादे राष्ट्रियता मजबुत हएत से कहलनि अछि । नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालक सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्रद्वारा राजधानीमे २१ मार्चकऽ आयोजित प्रवचनमाला कार्यक्रममे बजैत ओ सांस्कृतिक एकतापर जोड देलनि । नेपाली संस्कृति, मिथिला गौरव आ राष्ट्रियत विषयमे प्राध्यापक राजेन्द्र विमल प्रवचन देने रहथि । ओ नेपालक सांस्कृतिक विविधताके संरक्षण कएलाक बादमात्रे नेपालक समृद्ध सांस्कृतिक पहिचान बनत से कहलनि । हुनक कार्यपत्रमे मिथिलाक प्राचीन इतिहास, सभ्यता आ संस्कृतिक विशिष्ट पक्षसभके व्याख्या कएल गेल अछि । मिथिला संस्कृति विश्वमे अद्वितीय संस्कृति होइतो नेपालमे ई राष्ट्रिय सम्मान नहि पाबि सकल हुनक कहब छलनि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’- ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी दूटा विहनि कथा १. मनुखक जीवन “बौआ पैघ भए कऽ अहाँ की बनब ?” “मनुख।” नेनाक एहि उत्तरपर चारूकात ठहाका पसरि गेल। मनुख ! मनुख तँ हम सभ छीहे, मनुख बनक बेगरता की ? मुदा नेनाक आखर ‘मनुख’हमर हृदयमे तऽर धरि धसि गेल। की आइ काल्हि हम मनुख, मनुख रहि गेलहुँ ? हमर सभक भीतर मनुखताक कोनो अवशेष एखनो बचल अछि ? मनुख की ? खाली मनुखक कोखिसँ जन्म लेने भऽ गेलहुँ ? जन्म लेलहुँ, नम्हर भेलहुँ, ब्याहदान भेल, दू चारिटा बच्चा जनमेलहुँ, ओकर लालन-पालन केलहुँ, बुढ़ भेलहुँ, मरि गेलहुँ, इहो जीवन कोनो मनुखक जीवन भेलै। आइ मरलहुँ काल्हि दुनियाँ तँ दुनियाँ १३ दिन बाद अप्पनो बिसरि गेल। मनुख जीवन तँ ओ भेल जेकर मृत्यु नहि हुए। मृत्यु देहक होइ छैक, कमसँ कम नामक मृत्यु तँ नहि होइ, नाम जीबैत रहै, ओ भेल मनुखक जीवन। २. बाबीक पिआर बेरुपहरकेँ चारि बाजि रहल छल। ओ दुनू भोरेसँ एहि गप्पपर चर्चा कए रहल छल कि हमर जनम दिनपर हमरा की उपहार देल जेए। नी० कोनो डिपार्टमेंट स्टोरसँ एकटा रिस्ट वाच देख कए आएल छल जेकर दाम अठारह सए रुपैया छल। मुदा ओकरा दुनू लग मात्र बारह सए रुपैया छलै। ओ दुनू हमरा नहि कहलक जे ओ हमरा ओहे रिस्ट वाच देबअ चाहैत अछि। बस हमरा एतबे कहलक जे ओकरा छह सए रुपैया चाही। “किएक।” “ई सरपराईज छैक, बस ई बुझि लिअ जे अहाँक जनमदिनक उपहार आनैक अछि।” “की आनब।” “इहे तँ सरपराईज छै, ओ तँ अहाँ देखे कऽ बुझब।” “अच्छा ! की लेबैक अछि ई छोरु, ई कहुँ अहाँ दुनू अप्पन-अप्पन जनम दिनक की उपहार लेब।” “किछु नहि।” “तहन तँ हमहूँ अहाँ सभसँ किछु नहि लेब, नहि तँ पहिले ई कहू जे अहाँ दुनूकेँ अप्पन-अप्पन जनम दिनपर की लेबैक मोन होइए।” “माए बाबूक संगे बाबीक पिआर।” “मने।” “मने बाबीकेँ गामसँ एहिठाम नेने आबू अओर हमरा सभकेँ किछु नहि चाही।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण (आलोचना) भारतीय भाषा मध्य छंदक अवधारणा संस्कृतसँ आएल अछि। वैदिक संस्कृतमे सरल वार्णिक छंद छल, मने एहन छंद जे की पादमे कतेक वर्ण छैसे गानि बनै छलै जेना गायत्री, अनुष्टुप, जगती आदि। लौकिक संस्कृतक शुरूआतमे वर्णवृतक प्रधानता भेल। मने काव्यक हरेक पाँतिक लघु-गुरू क्रम एक समान होमए लागल। लौकिक संस्कृतक अंतमे मात्रिक छंदक विधान चलल जैमे सभ पाँतिक मात्राक जोड़ एक समान होइत छलै। मुदा ई सभ शास्त्रक परिधिमे छल जे की मात्र शिक्षित लोक बुझैत छला। मुदा एकर ई मतलब नै जे अशिक्षित लोक सभ अपन लिखनाइ छोड़ि देने छला। अशिक्षित समाजक लोक ( चाहे ओ दलित होथि की सवर्ण) अपन रचना लेल उपरक तीनू छंदसँ अलग तालवृत छंदक उपयोग केला। आब ई तालवृत छंद की भेल से कने आगू जा क' हम सभ देखब। ऐ छंदसँ पहिने संगीतक प्रारंभिक जानकारी ली। संगीतमे दू टा तत्व प्रमुख छै पहिल स्वर आ दोसर ताल। स्वर संगीत मुख्यतः आरोह-अवरोहपर अधारित रहै छै। संस्कृतक शिक्षित वर्ग स्वरकेँ प्रमुखता देलक तँ जन समान्य तालकेँ । स्वर निर्धारण लेल नाना प्रकारक छंद बनल जैमे सरल वार्णिक आ वार्णिक दूनू अबैए। तालवृत छंद लेल मात्र ताल बराबर भेनाइ अनिवार्य अछि। मने हरेक पाँतिमे चाहे अक्षर बराबर हो की नै हो, लघु-गुरू हरेक पाँतिक बराबर हो की नै मुदा हरेक पाँतिक ताल बराबर भेनाइ जरूरी अछि। तालवृत छंदमे कोनो शब्दक कोनो वर्णक उच्चारण नहियो भ' सकैए। तालवृत छंदमे विराम आ प्लुत केर महत्व अछि। ऐमे शब्दककेँ विशुद्ध उच्चारण अनिवार्य नै अछि। तालवृतमे दीर्घक उच्चारण लघु भ' सकैए आ लघु केर उच्चारण दीर्घ भ' सकैए। जेना तालवृतक हरेक पाँतिक तालगण समान रहनाइ जरूरी छै तेनाहिते वैदिक छंदक हरेक पाँतिमे समान अक्षर हेबाक चाही तेनहिते वार्णिक छंदक हरेक पाँतिमे मात्राक्रम समान भेनाइ जरूरी छै। मैथिलीक सभ प्राचीन लोकगीत तालवृत छंदपर अधारित अछि। तालवृत छंदमे हरेक पाँतिक लय मिलबाके टा चाही तँए तालवृतमे तुक कहियौ, तुकान्त कहियौ, अन्यानुप्रास कहियौ की काफिया कहियौ एकर भेनाइ अनिवार्य अछि। एही तुकान्त निर्वाहक कारणे तालवृत बहुत बेसी लोकप्रिय भेल आ ई परवर्ती संस्कृत धरिकेँ बदलि देलक। बादमे आदि शंकराचार्य अपन सभ स्त्रोत सभमे तुकान्तक प्रयोग केला। आ जेना-जेना समय बितैत गेल संस्कृत काव्य तुकान्त होइत गेल। व्याकरणमे अंत्यानुप्रास सन अलंकारक जन्म भेल आ जयदेव रचित गीत गोविन्दम् सन काव्यकेँ जे मात्र सुमधुर ललित शैली आ अंत्यानुप्रासक कारणे संस्कृतमे विश्वविख्यात भेल। तालवृत छंदक ईहो एकटा बड़का विशेषता अछि जे ई गायकपर निर्भर अछि मने जँ एकटा गायक कोनो दू टा पाँतिकेँ अष्टमात्रिक तालमे बान्हि गेला तँ दोसर गायक ओकरा सप्तमात्रिक तालमे सेहो बान्हि सकै छथि। तँए लौकिक संस्कृतक अन्तमे आ प्राकृतक जन्मसँ तुकान्त केर काव्यमे बहुत महत्व अछि आ जेना-जेना समय आगू बढ़ल तुकान्त बिनु काव्यक परिकल्पना असंभव भ' गेल। पाठक ओ जनता तुकान्तयुक्त काव्यकेँ बेसी मान देलक कारण तुकान्तयुक्त काव्य कर्णप्रिय होइत अछि। प्राकृतक ई गुण अनायास रूपें अप्रभंशमे आएल आ चूँकि अप्रभंश सँ मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय भाषा बनल अछि तँ एहू सभमे तुकान्त अनिवार्य भेल।गएबा कालमे तालवृत छंद हरेक छंद ( वैदिक, वार्णिक आ मात्रिक छंदपर ) लागू भ'सकैए। ओना वैदिक छंद ओ वर्णवृत लेल स्वर-संगीत अनिवार्य अछि। तथापि कोनो गायक ओकरा तालवृतमे सेहो गाबि सकै छथि। तालवृतकेँ मैथिलीमे भास कहल जाइत छै हमरा ज्ञानक हिसाबसँ। बूढ़-पुरान गितगाइन सभ एखनो कहै छथि जे ऐ गीतक भासे नै चढ़ि रहल अछि, एकर मतलबे भेलै जे उक्त गीतक तालवृत बराबर नै बैसि रहल छै। तालवृत छंदक किछु उदाहरण देखू--- भादब हे सखी रैनि भेयाओन दोसरे अन्हरिया के राति यौ राति दुख सुख संगहि खेपब लेसब दीप अकास यौ ऐ बरहमासाक चारि पाँतिक अध्य्यन केलासँ ई पता चलत जे पहिल पाँतिमे 19 मात्रा ( जँ न्ह बला नियम नै मानी तँ 18)टा मात्रा अछि। दोसर पँतिमे 18 मात्रा, तेसर पाँतिमे 15 आ चारिम पाँतिमे 13टा मात्रा अछि। चूँकि गायनमे न्हसँ पहिने बला स्वतः दीर्घ होमए लगैत अछि तँए हम पहिल पाँतिमे 19 मात्रा मानि रहल छी। आब आउ देखू एकर तालवृत--- भादब हे सखी रैनि भेयाओन दोसरे अन्हरियाx के राति यौ राति दुxxख सुxxख संगहि खेपब लेसब दीxxxप अxxxकास यौ दोसर उदाहरण देखू-- काली के देखलहुँ सपनमा से ठाड़े अँगनमा केओ नीपे अगुआर माँ के केओ नीपे पछुआर माँ के केओ नीपे काली के भवनमा.... पहिल पाँतिमे 16, दोसरमे 11, तेसर आ चारिममे 17-17 एवं पाँचम ओ अंतिम पाँतिमे 19 मात्रा अछि। आब आउ देखू एकर तालवृत--- काली के देखलहुँ सपनमा सेxx ठाड़ेx अँगनमाxx केओ नीपे अगुआर माँ के केओ नीपे पछुआर माँ के केओ नीपे काली के भवनमा... तेसर पाँतिक अगुआर शब्दक आपर विराम अछि तेनाहिते चारिम पाँतिक पछुआर शब्दक आपर विराम अछि। अंतिम पाँतिक केओ शब्दक ओ, नीपे शब्दक पे, एवं काली शब्दक लीपर विराम अछि। फलस्वरूप हरेक पाँति 16 तालमात्रिक रचना बनि गेल अछि। प्रस्तुत ऐ गीत सभहँक गायन सुनबा लेल विदह आडियो केर ऐ लिंकपर जाउ-- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ संगीतमे x चिन्ह ताल लेल प्रयोग कएल जाइत छै। तँ ऐ उदाहरण देखि रहल छी जे चारू पाँतिमे ने तँ मात्रिक छंद छै ने वार्णिक आ ने वैदिक मुदा पाँतिक बीच-बीचमे रेघा क' वा ताल द' क' वा विराम ल' क' सभ पाँतिके पूरा कएल गेल छै। इएह तालवृत कहबै छै। गीत मुख्यतः तालवृतक अनुगामिनी अछि ताहूमे मैथिलीक सभ प्राचीन गीत आ लोकगाथा सभ तालवृत छंदक सुदंर उदाहरण अछि। जँ कोनो-कोनो गीतमे आन छंदक लक्षण अबैए तँ ओकरा मात्र संयोग बुझू। ओना हम पहिने कहि चुकल छी जे सभ छंदोबद्ध रचना गेय होइत अछि। तालवृत छंद आ वैदिक छंदमे मात्र एकैटा अन्तर छै बादबाँकी दूनू एकै अछि आ एही एक अंतरक कारणे एकटा स्वर संचालित भेल तँ दोसर ताल संचालित। आब हम पाठक सभसँ अनुरोध करब जे ओ सभ हिसाबसँ तालवृतक आन-आन उदाहरण ताकथि। तालवृतक प्रसंगमे किछु महत्वपूर्ण जानकरी मोन राखू--- १) तालवृत तालगणपर पड़ैत नियमित बलाघातक आवृति अछि। स्वर संगीतक आरोह-अवरोह ऐमे नै अछि। २) तालवृत वैदिक संस्कृतोसँ प्रचीन अछि। आदिवासी समजाक संगीत अध्ययनसँ एकरा देखि सकै छी। ३) तालवृतमे एक पाँतिमे अनेको तालगण भ' सकैए आ एकटा तालगणमे कतेको वर्ण वा मात्रा भ' सकैए। ४) तालावृतमे मात्रा मने कालमात्रा होइत छै। ५) तालवृतमे कालमात्राक संख्या निश्चित होइत छै। ६) तालगणमे सभ वर्णक वा सभ मात्राक उच्चारण हो से जरूरी नै छै। ७) तालवृतमे शब्दक रूढ़ स्वरूपकेँ बदलल जा सकैए। ८) तालवृत मुख्यतः गायनसँ जुड़ल अछि तँए सरल वार्णिक वा वर्णवृत वा मात्रिक छंदक कोनो रचनाकेँ तालवृतम,े प्रस्तुत क' सकै छी। उदाहरण लेल तुलसीदास जी रचित ई दोहा देखू-० राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर बाहिरहु, जो चाहसि उजियार ई थिक दोहा जे की मात्रिक छंदसँ संचालित अछि। आब एकर तालवृत विश्लेष्ण देखू-- राम नाम मणि दीप धरुxxx , जीह देहरी द्वा xxxxx र तुलसी भीतर बाहिरहुxxx जो चाहसि उजिया xxxxx र आब अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे १४-१४ मात्राक दू पाँति बला छंद कोना ८-८ तालवृत छंदक ४ पाँतिमे बदलि गेलै। इएह छै तालवृत। खाली प्राचीने कालमे ई तालवृत छल से गप्प नै आधुनिक कालक मैथिलीक पहिल जनकवि श्री रामदेव प्रसाद मंडल झारूदार एकटा नव छंदक जन्म द' ओकरा विकसित केलाह जकर नाम थिक " झारू छंद "। ई झारू छंद हमरा जनैत तालवृतपर अधारित अछि। ओना ऐठाम ई जानब उचित जे राजनीतिक पार्टी "आआप" केर चुनाव चिन्हसँ बहुत पहिने ई झारू छंद मैथिलीमे आबि चुकल छल। किछु उदाहरण देखू-- भागि गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाति कर रंगदारी वसुल रहल अछि , मारि मारि कऽ सभकेँ लाति पहिल पाँतिमे 32 मात्रा आ दोसर पाँतिमे 31 मात्रा अछि एकरा तालवृतमे एना देखल जा सकैए-- भागि गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाति कर रंगदारी वसुल रहल अछि , मारि मारि कऽ सभकेँx लाति जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानि गेल अछि ई विज्ञान ऐ झारूक पहिल पाँतिमे ३१ मात्रा अछि ( जँ अलग-अलग संयुक्ताक्षर बला नियम छोड़ल जाए तँ) आ दोसर पाँतिमे ३० मात्रा अछि। तालवृतमे एकर उदाहरण देखू-- जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानिx गेल अछि ई विज्ञान आब तालवृतसँ संचालित भ' दूनू पाँतिमे 31-31 तालमात्रा भ' गेल। आर एकटा उदाहरण लिअ-- हे भूमि क' भाग्य विधाता, जगक अदाता भगवान। कहाँ पता तोरा सिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान। पहिल पाँतिमे 27 आ दोसर पाँतिमे 38 मात्रा। आब एकर तालवृत देखू--- हे भूxxxमि क' भाग्य विधाताxxx, जगक अदाxxता भगवाxxxन। कहाँ पता तोरा सिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान। आब तालवृतसँ संचालित भ' दूनू पाँतिमे 38-38 तालमात्रा भ' गेल। हुनक प्रकाशित पोथी "हमरा बिनु जगत सुन्ना छै " अनेको झारू छंद अछि जकरा पाठक सभ ऐ लिंपर देखि सकै छथि------ https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/RamdeoPrasadMandalJharudar.pdf?attachauth=ANoY7cpwFD3AyNPFZn-bFA8rz2L55cs_LB8frjO_GGszrOG4x9MhScXFXBtCNC2Pid0KCYbBPXm_9UQlKdzNBy3QFA4ldAIrbUHkweRLr0Msi6F0oe2mytUfuZVlcNfK0KsOLD6XEmtfdZ5-zyx8KPfmmG-bIzZdNBmW2flPN5ilfYPfWYID4HvXJ_Bi_3sl0BhQa7tibwQzbRkejjTKerlsO6AWQhd0uupSAr83Ktk2RYBmzMo40yo%3D&attredirects=1 । झारूदार जी मात्र एकटा लेखक नै छथि बल्कि हमरा सभकेँ सिद्ध सरहपासँ ल' क' आधुनिक कालक जे धार बनल अछि तकर दूनू घाटकेँ मिलेबाक लेल पूल सेहो छथि। झारू छंद स्वरूप निर्धारण--- तालवृतक अधिकांश रचना दूँ पाँति, चारि पाँतिक वा छह पाँतिक समूहसँ बनैत अछि। श्री झारूदार जी अपन पोथीमे दू पाँतिक स्वरूप बला रचना उपयोगमे केला अछि। एकर बाहरी संरचना दोहा सनक होइत छै। आब हमरा विश्वास अछि जे सुधी पाठक ओ आलोचक सभ ऐ लेखकेँ देखैत श्री झारूदारजीकेँ नव रूपसँ परिभाषित करबाक प्रयास करता। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सत्य नारायण झा विहनि कथा- स्मृति स्निग्ध चाँदनी ।मधुमय चान।घटाटोप मेघ ।सितल बसात ,मेघ चान कए घेरबाक प्रयास मे मुदा सितल बायु मेघक सभ प्रयास कए निष्फल करैत मुदा अपने चान कए स्पर्श करबाक ताक मे । विद्यापतिक नख –शिखक वर्णनवाली नायिका सामनेक वर्थ पर आत्ममुग्ध मुदा टुकुर- टुकुर तकैत ।चोरनी चितवन सँ मोन कए आन्दोलित करैत ,ओहि चितवनक आक्रमण सँ चित मदान्ध भेल जाइत ।ज्वार भाटा उठैत समुद्रक लहरि जकाँ पुरा देह मे हिलकोर मारैत । मद्रास एक्सप्रेस अपन पुरा रफ्तार सँ वातावरण कए चिरैत ,साँय साँय करैत जा रहल छल ।चान कए देखि मोन मे कतेक तरंग उत्पन होयब स्वभाविक ।खिड़की खोलि बाहरी चाँद दिस तकैत छी मुदा ओहि मे ओ स्निग्धता कतए ?मद्धिम चाँदनी आ मुरझाएल चान ।एकदम फीका ।तावे प्राकृतिक पवनक प्रवेश ,तै आँचर विलोपित आ उनमुक्त मदन हुलकी मारैत ।कटि प्रदेश दिगम्बर ।कर कमल सँ चिकुर कए आवेशित करैत मुदा हिरणी जकाँ चितवन घुमबैत जे बरू केकरो दृष्टिगोचर त ने भेलैक ? मुदा केकरो माने की ? भुवनेश्वर,वाल्टियर ,विजयवारा आ मद्रास सेन्ट्रल स्टेशन, गाड़ी धुकुर धुकुर करैत ठाढ़ भेल ।हमरो नीन्द टुटल ।ने आगु नाथ ने पाछु पाघा,ने ओ नगरी ने ओ ठाँव ।झमान भए खसलौ ।धत् तोरी के ? गाड़ी सँ मुँह विधुओने उतरि गेलौ । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मो. असरफ राईन, सिनुरजोड़ा, धनुषा नेपाल, हाल : कतार विहनि कथा शहरीया घरवाली मोहना जवान भऽ गेल । ओकरा मनमे उत्साह जागल कि आब हमहूँ शादी विवाह कऽ कऽ अपन घर बसाबी। मुदा मोहनाके मनमे सभ दिनसँ रहै कि शहरीया घरवाली करी। ई बात मोहना अपना माएकेँ कहलक कि हम गाँउके लड़की नै बल्कि शहरीया लडकीसँ शादी करऽ चाहै छी आ हम तोरा लेल शहरीया पुतौह लाबऽ चाहै छी। तोहर की विचार छौ? मोहनाकेँ माए बजली- तोरा जे पसन्द छौ हम ओइमे राजी छी। ई बात सुनिकऽ मोहनाकेँ मुँहमे लड्डू फुटऽ लागल । ओ आब लड़की खोजबाक प्रयास करऽ लागल। किछु दिनक बाद जनकपुरक थापाचौकके जोगीबाबूक बेटी बन्दना भेटली। ओकरा टि-सर्ट आ जिन्स लगौने देखि मोहनाकेँ पसन्द आबि गेल। आ ओ शादी करबाक लेल तैयार भऽ गेल । गाँउघरक दू-चारि भला आदमीकेँ बजा अपन शादीक दिन पक्का केलक। विवाहो बड धूमधामसँ भेल। किछु दिनक बाद बन्दना घरमे ककरो नै टेर लागल। नित्य दिन आठ बजे पलङ्गे छोड़ै। सभदिन चाह मोहनेसँ मङ्गबाबै। बन्दना रोज खाना खाइत आ बेग लटकबैत बजार दिस चलि दैत। सभ दिन नव नव सखिकेँ संग रङ्गरलिय मनबथि। गाँउमे ककरोसँ माथो नै झापथि। मोहना कतेक दिन कहबो केलक कि अहाँ गामक पुतौह छी, शरम लेहाज करु। एना जिन्स लगा उदण्ड भऽ चलब तँ लोक की कहते? तखन नाक खुमचबैत कन्या बाजल – अहाँकेँ पता नै अछि जे हम शहरीया लड़की छी? अहाँ कहै छी, हमरा मुँह झापै लेल मुदा हमर तँ दम फुलैत अछि। हम अहाँक इशारापर नै नाचब । शहरीया छी तँ एहने सभ दिन रहब। आब एहन चरित्र देखि मोहना सोचमे पड़ि गेल, की करु की नै? तखन माथ पिटैत अपन साथी सभकेँ सल्लाह देलक कि गाँउके लुल्हे नाङ्गरसँ शादी करी मुदा शहरीया घरवाली नै करी .... ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.झा हेमन्त बापी- दानव ३.२.राजदेव मंडल- हेलवार ३.३.सुनील मोहन ठाकुर- अहि बेर देखल फागु ३.४.नन्दिनी पाठक- ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल ३.५.अब्दुर रज्जाक- घोरमठा राजनैतिक ३.६.प्रदीप पुष्प ३.७.मो. असरफ राईन ३.८.किशन कारीगर- गजल सन किछु मैथिलीमे झा हेमन्त बापी दानव जगदम्बा सॅ उपजल धरती बनल निठुर आ भऽ गेल परती फाईट रहल मिथिला के करेज जनमल एहि ठाम असुर दहेज घरे घर पैस गेल इ दानव हैवान बनल मिथिला केर मानव घरे सॅ धूआँ उड़ा रहल छी बेटी सन पुतोहु के जरा रहल छी नित बहिन बेटी के बलि मंगैया कते के खा गेल मुदा एकर पेट नै भरैया हाम सब एकरा खुआ रहल छी घरे मे राछस पाईल रहल छी अनका स कहै छी एकरा त्यागू अपना बेर मे सभ सॅ आगू पहिर लेलौ निर्लज्जक भेश बेटा के बुझै छी नगदी कैश काईन रहल मिथिला केर धीया ई धरती पर जनमलौ कीया बैन गेलौ घऽरक अभिशाप परल सोइच मे भाई,माँ, बाप एकरा जे सभ बढ़ा रहल छैथ मिथिला के ओ सभ जरा रहल छैथ कैऽह दै छी ई नै आब परायत एक दिन अहुँक घर जरायत दिने दिन ई बढ़ले जाइ ऐ सुरसा जेना मुहँ फारने जाइ ऐ आकार एकर भै गेल अनन्त मिथिला सन्स्कारऽक कऽ देलक अन्त किरिया ऐ एकरा सॅ सब जूझू अनकर वैदेही के अप्पन बूझू सभ गोटे करु एकरा सॅ परहेज भगवती सप्पत नै लेब आ नै देब दहेज "बापी" आबो सब चेत जाउ आउ सब मिल इ दानव के बैलाउ फेर घरे घर अएती माँ सीया धन्य बुझब जे घर अएती धीया ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मंडल हेलवार घुच्ची भरि पानिमे कऽ रहल छी खेलवार कखनो ऐपार कखनो ओइपार बनए चाहै छी असली हेलवार संकटमे करए पड़त धारपार धारक पेट हो अगम-अपार जखनि छुरी फनकै रहि-रहि धारा सनकै देख कऽ डरे मन झनकै ठमकल बटोहीक माथ ठनकै तखनि जँ करब पार तब ने बनब हम असली हेलवार। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। सुनील मोहन ठाकुर अहि बेर देखल फागु ******************** फागु हम देखल अहि बेर घटा में चारू दिस पसरल प्रेम अथाह राग भरल प्रकृति छटा में जन-जन बनि गेल छल बताह नाचै सब मोर-मोरनी बनि पोर-पोर रस प्रेम सँ हर्षायल रोम-रोम हरखित छल सभक जन-जन बनि गेल छल बताह यौ रंग सतरंगी धरती पर देखल घटा में देखल सौतिनियाँ डाह कारी-झामैर मेघ बनल छल जन-जन बनि गेल छल बताह गगन बदलि धरती के रंग देखि ओहो टपकेलक रस बूंद टपाक प्रकृति सुन्दरी मन-मस्त भय-नाचे जन-जन बनि गेल छल बताह ........जय हो ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नन्दिनी पाठक ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल ई कोन हाथ? ई तऽ छाप भऽ गेल जीवन कंग्रेसिया भऽ गेल ! भूखक सड़क अछि ठामहि , गली-गली आ गाम मे भूख मेटाबय से नेता चुन ! हेगे लत्ती सुन,हमर मोनक धुन! बन संगिनी दू टा दे झिंगनी। चल-चल कने, नीक तीमन बनो लेल मचल कने ! नीक नहि लागल दळझिंगनी। मिक्सभेज सरकार पर स्वाद उधार !! इज्जैत सस्ता, महग कोबी बड ! मन सोचि बेकल, कोना कीनब फल , कही होम कर जोरि कने पानि छोड कने ! नीक लागल नहि सुकखल झिंगनी। अनसोहांत ई दळझिंगनी !!! आब कतो से आओत आन झिंगनी ? तागत बढ़ा बात मान झिंगनी। सामाधान अकान झिंगनी ! थाकलहुँ हेरि जल थल झिंगनी चल थालहिं मे हेरी कमल झिंगनी चल थालहिं में हेरी कमल झिंगनी अब्दुर रज्जाक , हरिपुर ४, (उमप्रेम्पुर ४ धनुषा) धनुषा नेपाल, हाल : कतार घोरमठा राजनैतिक घोरमठा राजनैतिक बात बतंगर औटाएल अछि संबिधान सभा बौराइले अछि जब जब सभामे बमकै नेता दाल मे काला रखने अछि ।। चौल मजाक बौराइल राजनैतिक देश मे ई अधकपाइड़ जब रहबे करत छिन्ना झपटा निन्दा करैत बोली के ठोली पर संबिधान रहबे करत ।। कुकुर कटाउस आ उपर्चौर जे पार्टीके हाल रहै हौर भौर कऽ कानुनी रुप सँ जनताके बेहाल रहै दु मास पर सरकार बदलता ऊ सब अपने पिटत कपार कल्ला नै अलगौथिन जनता रह्त अपन सँ लचार ।। हुल्लुक बुलुक्क पुर्ब राजा करथिन धुर्खुन नोची आउर नोची दुआर घुटैक घुटैक कऽ जनता केँ कहथिन बपौटी हिनकर बुड़ल बेकार।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रदीप पुष्प 1 हम भास रखने छी, तों गीत दऽ दिहें। हम करेज द' देबौ, तों प्रीत दऽ दिहें। चतुर्थीक राति खाय पड़य माहूर,तँ की? हम सेनूर जोगौने छी,तों सीथ दऽ दिहें। 2 गजल जहिया अहाँ आन हेबै परिबा बला चान हेबै बनतै हमर प्रीत खखरी अनकर अहाँ धान हेबै जौं आन सेनूर देलक यै हम त'निष्प्राण हेबै हेतै लिखल भोगबै हम एक संग बदनाम हेबै प्रेम त' अमर करबे करत हम 'पुष्प' बलिदान हेबै (2212 2122 सब पाँतिमे) 3 गजल बीतलाहा बाटमे हेरा रहल छी कल्हुका छी चाह हम सेरा रहल छी पेरलक दैबा भ' तेना ने कसैया मेहमे ब'रदे जकाँ पेरा रहल छी देह भेलै आब अनमन टाँट सनठी आगि लागल ऊक सन फेरा रहल छी मीत मुसकी बीच कननी हैत अलगे नोर सुख दुखकेर हम बेरा रहल छी मोन भेलै भोज करितौं गाम भरिकें 'पुष्प' जातिक बान्हमे घेरा रहल छी 2122 2122 2122 सब पाँतिमे 4 यै अहाँ, यै अहाँ, भोर छी, इजोर छी, मोनक चूल्हीमे तलमलाइत पजोर छी, बास छी,चास छी, सोन्हगर हुलास छी, अहाँ माघक कुहेसमे स्नेहिल इनहोर छी, यै अहाँ, सुरूज छी,चान छी, कामनाक वितान छी, मेंहदीक सिंगारमे,यौवनक पथारमे, बियौहतीक मुसकी संग कयल मटकोर छी, यै अहाँ, धार छी,वार छी, खंजर छी,औजार छी, कनडेरिए ताकैत काजरक कोर छी, यै अहाँ, हास छी,परिहास छी, चाननक सुवास छी, निष्ठाक पीरीपर बिराजैत विश्वास छी, बिनु रंगने ठोर अहाँ रक्तिम पलास छी, मोनकें भुतियाबैवला कामनाक हिलकोर छी, यै अहाँ, दिन छी,राति छी, अगता छी,पछाति छी, रूपक पूर्णिमा आ पिरीतक संक्रांति छी, गोल मोल भाव संग सिनेहक डोर छी, यै अहाँ, अक्षत छी,धूप छी, अद्भूत छी,अनूप छी, आत्माक अर्घ्य लेल बेसाहल सूप छी, स्पर्शक तूरसँ बूनल दुरगमनिआ पटोर छी, यै अहाँ, यै अहाँ, चान छी,इजोर छी... 5 गजल दोसरक गीत उगबै अछि चान मीता हमर गजलो गबै भूखक गान मीता आब रूदल ब'नब ने हम ग'छब कहियो जरल पेटसँ उठै ने सुर तान मीता भेल बटुआसँ तगमाकें नीक दोस्ती बिन टका छी सभा मध्ये आन मीता जैह देबै अहाँ हम रखबै हुलसिकेँ गाय बूढो खपै विप्र दान मीता पाँतमे हम अछोपक छी भोज खाइत 'पुष्प'कें नइ फिकर आ ने मान मीता 2122 1222 2122 सब पाँतिमे ६ गजल कियै दू सालमे रधिया सुखा गेलै रहै गेना कथी अमती बना गेलै लगै बापे सनक अनमन मरद ओकर दहेजक पेट सेहन्ता बिला गेलै अजोहेमे कमौआ पूतकें पदबी मुदा नेनपन कौड़ीमे बिका गेलै बचाकें बाप देलक क'लम आ गाछी नशाखोरीसँ ओ सबटा लुटा गेलै ल' जाऊ शिव अपन पुरना धनुष जल्दी सिया लछुमनक संगेमे पड़ा गेलै द' ने सकलै कमीशन घूस मुखियाकें त' लिस्टसँ 'पुष्प'कें नामे छँटा गेलै 1222 तीनबेर सब पाँतिमे बहरे हजज ७ गजल पढल पंडित मुदा रोटीक मारल छी बजै छी सत्य हम थोंथीक हारल छी बुझू कोना सबसँ काते रहै छी हम उचितवक्ता बनै छी तें त टारल छी दियादेकें घरक घटना मुदा धनि सन कटेबै केश कियै हम जँ बारल छी मधुर बनबाक छल भेलौं जँ अधखिज्जू सत्ते नोनगर लाड़ैनेंसँ लाड़ल छी लगै छल नीक नाथूरामकेँ पोथी मुदा गाँधीक साड़ा संग गाड़ल छी किओ ने पूजि रहलै कोन गलती यौ बिना सेनूर अरिपन 'पुष्प' पाड़ल छी 1222 1222 1222 सब पाँतिमे बहरे हजज ८ गजलक गजल दर्दक दबाइमे भावक उपचार भेल प्रेमक पीड़ तें गजल भ' बहार भेल जतै दीर्घ लघु केर गाड़ी रूकल ओतै रूक्णक चौक आ बहरक बजार भेल अंत नीक स'ब नीक नीक इ आदर्श तें मतलाक अंतमे रदीफ संस्कार भेल रूचिगर सुआद होइ शेरक भोजमे छंदक सँचारमे काफिया अँचार भेल पन्नाक भीड़मे के कतय हेरा जायत तें मोन पाड़ैले मकता अवतार भेल अदब आँगनमे नव घ'र ठाढ होऊ गजलक गजल तें 'पुष्प' विचार भेल सरल वार्णिक बहर,15 वर्ण सब पाँतिमे ९ गजल रातिकें सपना बनल छें चान तों नव तालमे लय बनि मिलल छें गान तों नव पूर अंकक छें कि तों अधपूर अंकक दस दशमलवमे लिखल छें मान तों नव मौध मिसरी माँछकें जयबार भेलें सोमरसकें प्रिय तरल छें पान तों नव भैरवी मल्हारकें समवेत गायन मालकोशक गजलमे छें तान तों नव छें पराती आरती आ नामधुन तों गामकें गहबर बनल छें थान तों नव नव उमेरक भार छौ 'पुष्प'क नजरिमे ओसमे कतकी फसिल छें धान तों नव 2122 2122 2122सब पाँति मे बहरे रमल १० गजल हम भास रखने छी तों गीत द' दे हम प्राण द' देबौ आ तों प्रीत द' दे ल' आमिल मिरचाइ आब की हेतै हम मीठ द' देबौ त' तों तीत द' दे गामसँ दूर ब'नत बाधमे घ'र हम टाट बीनब गे तों भीत द' दे बरोबरिकें बाँटब सुख वा दु:ख हम प्रथा द' देबौ आ तों रीत द' दे हैत हमर चालि तोहर हाथसँ हम कौड़ी भाँजि देबौ तों जीत द' दे चतुर्थीक राति खेबै माहूर मुदा हम सेनूर द' देबौ तों सीथ द' दे सरल वार्णिक बहर, तेरह वर्ण ११ गुदगुदौने जे रहियौ, कि नहिं मोन छौ? हम हँसौने जे रहियौ, कि नहिं मोन छौ? सत्ते,सुखक क्षण रहय बेसी दिन याद नहिं.. तें हम कनौने जे रहियौ, कि नहिं मोन छौ? १२ ॥गीत॥ जतय चान हँसैये, मुस्की दथि दिनकर भगवान, ओहि मिथिला कें हम छी बेटा,मैथिल हम्मर नाम, माँ मैथिली प्रणाम, माँ मैथिली प्रणाम 1.ख'र सँ छाड़ल घ'र हमर अछि ,नीपल अँगना दलान, हमरा बाड़ीक साग खाय लेल, अयलाह स्वयं भगवान, मर्यादा पुरुषोत्तोम आबथि, वैदेही केर गाम, ओहि मिथिला केँ.... 2.हम गोसाउनिक करी वंदना, शक्ति केँ गुणगान, विद्यापति कें गीत नचारी, गाबि क' भेलहूं महान, उगना जेकर करय चाकरी ,जे शिव केँ मालिकान, ओहि मिथिला कें.... 3.माँछ मखान आ पान अछि नामी, चूड़ा दही जलपान, कोरा मे दुलराबय सदिखन, कमला कोशी बलान, 'पुष्प'क माला सँ शोभित ,जे तिरहुत स्वर्ग समान, ओहि मिथिला कें हम छी बेटा, मैथिल हम्मर नाम, माँ मैथिली प्रणाम , माँ मैथिली प्रणाम, १३ हम भास रखने छी, तों गीत द' दिहें। हम करेज द' देबौ, तों प्रीत द' दिहें। चतुर्थीक राति खाय पड़य माहूर,त' की? हम सेनूर जोगौने छी,तों सीथ द' दिहें। १४ अभावक भीड़ मे हेरा गेल जिनगी। महगीक कोल्हू मे पेड़ा गेल जिनगी। गरीबीक कुहेस, बैसारीक कनकन्नी सँ मोनक प्याली मे सेरा गेल जिनगी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मो. असरफ राईन, सिनुरजोड़ा, धनुषा नेपाल, हाल : कतार १ पियाकेँ समझना राति बीतल साथ छुटल सपना चकनाचूर भऽ गेल अकेले भेली हम आब पिया हमर परदेसी भेल असगर आङ्गन सुना लगैए बिन अहाँक ठाम ठाम भेल जिन्दगी हमर आनहर नैहरसँ जब एलौं पियाक गाम दिन बितैत पहाड़ लगैए राति कटैत जाड़ लगैए बिन पिया जिन्दगी जिअल आब हमरा जंजाल लगैए २ हमर देश जब हमर आखि निदाइय सुतल अपन देश देखैछी जब हम जगैछी त सुतल अपन देश देखैछी ककरास बर्णन करी अपन बात जब अपने देशमे एक- दोसरमे रुठल देखैछी ।। चारोदिस खुन खराबा देखि मन उबियाइय कतौ नै जखन बिकास देखैछी सब जनता लुटाइत पिटाइत बस नेतासभमे बकबास देखैछी ।। अपन स्वर्ग जेहन देश नर्क बनौने देखैछी जाहिके कोनो मोल नै ओहिके अर्थ लगौने देखैछी पृथ्वीनारायणक बनाओल देश आइ हजार टुक्रा भेल देखैछी ।। नै ककरोस मेल मोहब्बत सबके अपनेमे लडैत देखैछी मन होइय हमहु दुनियाँ छोडिदी जब अपने नेपाली माइके मरैत देखैछी ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर गजल सन किछु मैथिलीमे हे यै बाजू ने किएक? हमरा स’ अहाँ जे रूसल छी। अहाँ छी तामसे अघोर लाजे कठुआएल जेना हम भीजल छी। आई बाजब नहि अहाँ स’ हम किएक नहि हमरा कतबो मनाएब। कि करू हम किछु नहि फुराए गप करै लेल हमर मोन सुगबुगाए। कहने रही अहाँ त‘ जे एक संगे मेला घूमै लेल जाएब। हम बुझबे नहि केलियै जे अहाँ एतेक बहन्ना बनाएब। सख मनोरथ सभटा रहिए गेल किनि देलहुँ ने अहाँ झुमका-कंगना। आबो भरि मुँह बाजि लियअ यै देखू त’ की कहैत अछि हमर नैना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १. ज्योति झा चौधरी विदेह नूतन अंक बालानां कृते बालानां कृते १. आशीष अनचिन्हार- मुदा किछु तँ करू २.जगदानंद झा मनु- प्रकृति ३.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’-खजाना १ आशीष अनचिन्हार मुदा किछु तँ करू ------------------------------ मुदा किछु तँ करू बरू फुटले डाबामे पानि भरू मुदा किछु तँ करू ई मोन थिक रखबाक जे नै थिक केखनो रुकबाक नै शेर तँ सियारेसँ लड़ू मुदा किछु तँ करू बाट पाटल होइक रूइसँ की सूइसँ फूलसँ की शूलसँ सदिखन अपन धुनिमे बढ़ू मुदा किछु तँ करू पाँछा पलटि ताकू मुदा जरूरति भरि थाकि रुकबो करू मुदा जरूरति भरि नै केखनो कोनो फेरमे पड़ू मुदा किछु तँ करू २ जगदानंद झा मनु प्रकृति (बाल कविता) प्रकृति अहाँक कोरामे की-की नुकाएल अछि नै जानि देखी नजरि उठा कए जतए नव-नव रंग-विरंगकेँ पानि नुकाएल अनन्त ब्रम्हान्ड अहाँमे कोटी-कोटी ग्रह नक्षत्र धेने छी हमर मोनकेँ अछि जे हरखैत एहन जीव चौरासी लाख धेने छी श्यामल सुन्नर साँझक रूप रौद्ररूप धारण अधपहरमे कएने नव यौवन केर सभटा सुन्नरता भोरक छविमे अहाँकेँ पएने जाड़ गर्मी बरखा वसन्त चारि अवश्था वरखक अहाँकेँ माए जकाँ हमरा लोड़ी सुनबैत अछि अन्न-धन दैत सभकेँ ई रूप अहाँकेँ ३ योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ खजाना गामक धीया पूता मे हल्ला छलैक जे चैतू बाबूक अमेरिकन पोता एलखिन्ह अछि। अमेरिकन पोता कें आङन मे सब गोटे पैडी कहि कए बजबै छलैक। सुनबा मे एलैक जे पैडी अपना पापा मम्मी सँ अंगरेजिये मे गप करैत छलैक मुदा दादा दादी सँ कने मने मैथिली बाजि लैत छलैक। पैडी जखन पाँच बरखक छल तखने ओकर पापा मम्मी अमेरिका चल गेल छलैक। दूनू कम्प्यूटर इंजीनियर। अमेरिका जेबा सँ पहिने ओ दूनू बंगलोर मे नोकरी करैत छलथि। तखन पैडी दू तीन बेर गाम आएल छल। अमेरिका गेलाक बाद पहिल बेर चारि साल पर पैडी गाम आएल। पैडी माने प्रद्युम्न। पैडी नाम तऽ अमेरिका मे परलैक। बच्चा मे जखन प्रद्युम्न गाम आबए तऽ बंटी आ सोनूक संग खेला धुपा लैत छल। सोनू ओकर नाम राखि देलकै पद्दू। बजबै मे हल्लुक नाम छलैक। ई नाम सुनि कए प्रद्युम्न कें अपना तऽ किछु नीक बेजाए बूझै मे नहि आएल छलै मुदा बंटी खूब हँसल छलैक। बंटीक हँसला पर ओ किछु आश्चर्य सँ पुछने छलैक जे कोन बात पर ओ सब हँसलक मुदा ओ सब अनठा देने छलैक। एहि बीच पैडी बहुत बदलि गेल छल। ओ हरदम अपन कम्प्यूटर मे व्यस्त रहैत छल। सोनू आ बंटी कें बहुत इच्छा छलैक ओकरा संग खेलेबाक आ अमेरिकाक बारे मे किछु बुझबा सुझबाक, मुदा चैतू बाबूक दलान पर जा कए घूरि आबए, पैडी कें अंग्रेजी मे बजाओत कोना से बुझले नहि छलैक। ओकरा सबकें ईहो नहि बूझल छलैक जे पैडी कें चारि साल पुरान संगी आ ओकरा सबहक गप मोनो हेतैक की नहि। आ फेर ओ एतुका गमारू बच्चा सबहक संग मेल जोल करब ठीक बूझत की नहि। ओना साफ सुथरा तऽ दूनू गोटे छल आ कपड़ो लत्ता ठीके ठाक छलैक मुदा एकटा अमेरिकन लग जेबा मे धाख होइते छलैक। एही गुनधुन मे जखन सोनू आ बंटी दलानक चक्कर लगबैत छल तखन एक बेर चैतू बाबू बजा लेलखिन्ह। दूनू डेराइते लग गेल। चैतू बाबूक पुछला पर अपन अभिप्राय कहलकन्हि जे ओकरा पैडी सँ अमेरिकाक बारे मे किछु गप करबाक छलैक। ई बात चैतू बाबू कें नीक लगलन्हि कारण ई गौरवक बात छलैक जे हुनकर पौत्र अमेरिका सँ एलखिन्ह आ आन बच्चा सब ओकरा सँ किछु सीखए चाहैत छल। ओ पैडी कें बजाए सोनू आ बंटी सँ परिचय करा देलखिन्ह। तखन पैडी कें अपनहि पुरान बात सब मोन परए लगलैक आ ओहि दूनू गमारू बच्चा कें अपन मित्र स्वीकार करबा मे कोनो हर्ज नहि बुझेलैक। दलाने पर पैडी बैसि गेल दूनूक संग। कम्प्यूटर तऽ संग मे छलैके। ओतुका स्कूलक बारे मे ओ बंटी आ सोनू कें बता रहल छल। कम्प्यूटर मे स्टोर कएल स्कूलक फोटो, क्लास रूमक फोटो, लाइब्रेरीक फोटो आदि देखा सेहो रहल छल। सोनू आ बंटी ध्यानमग्न भऽ कए सुनि रहल छल, लगैत छलैक एक एक टा शब्द पीबि जेबाक चेष्टा कऽ रहल हो। ओकरा दूनूक लेल ई सपनाक दुनियाँ सँ कनियो कम नहि छलैक। एतबे मे चैतू बाबू टॉर्चक दूटा खराप बैटरी लेने एलखिन्ह आ जुमा कए दलानक बाहर फेक देलखिन्ह। मुदा ओ खसलै हत्ताक भीतरे आ पैडीक नजरि ओहि पर चल गेलैक। ओ आश्चर्य सँ जेना चिचिया उठल “दादाजी, बैटरी एना किएक फेकि देलिऐक ?” चैतू बाबू हरान जे ई बच्चा टोकलक कोन कारणें। सोनू आ बंटी सेहो हरान। बैटरी फेकब ओकरा सबहक लेल कोनो अजगुत बात नहि छलैक। बंटी पैडी कें बुझबए लागल “गाम घर मे लोक खराप बैटरी तऽ एहिना यत्र कुत्र फेकि दैत छैक। ओतबे नहि आब तऽ लोक खराप मोबाइलो एहिना कतहु फेकि दैत छैक। यदि चौक दिश चलब तऽ हम फेकलाहा मोबाइल देखा देब”। आब पैडीक आश्चर्यक ठेकाने नहि। ओ सोचए कोना अमेरिका मे ओकरा सब कें बैटरी, मोबाइल फोन अथवा अन्य कोनो इलेक्ट्रॉनिक कचरा कें फेकबाक तरीका बुझाओल जाइत छलैक आ कतए ई लोक सब जिनका लेल एहेन वस्तु फेकबाक कोनो ठेकाने नहि। दादाजी कें तऽ ओ नहि किछु कहलक मुदा सोनू आ बंटी कें बुझबए लागल अपना स्कूल मे कराओल गेल “सेलफोन रीसाइक्लिंग अभियान” के बारे मे। एहि प्रोग्राम मे बच्चा सब घरे घरे जा कए खराप मोबाइल फोन, आइपॉड आदि माँगि कए स्कूल मे जमा केने छल। ओहि मे करीब एक तिहाइ तऽ टीचर सबहक सहयोग सँ मामूली मरम्मति केला पर काज करए लागल छलैक आ बाकी कें एकटा कम्पनी कें बेचि देल गेल छलैक। एहि अभियान मे स्कूल कें करीब दू हजार डॉलरक आय भेल छलैक। पैडीक कम्प्यूटर मे एहू अभियानक फोटो छलैक जे ओ सोनू आ बंटी कें देखा देलकै। सोनू आ बंटी तऽ किछु बुझिए नहि रहल छल जे खराप मोबाइल कियो किएक किनतैक आ ओकर की करतैक। पैडीक कम्प्यूटर मे इंटरनेट तऽ छलैके, ओ “स्टोरी ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स” आ “ईक्को वर्ल्ड” नामक दूटा विडियो दूनू कें देखा देलकै। एमहर चैतू बाबू सेहो कने चिन्तित भेलाह। गाम घर मे खराप बैटरी तऽ एहिना लोक फेकि दैत छलैक। ई काज एना नहि करबाक चाही तकर ध्यान ककरो ने छलैक। ने हुनका बूझल छलन्हि आ ने ओ अपना बेटा बेटी कें कहियो बुझेलखिन्ह। आ अमेरिका मे रहि कए हिनकर पोता तऽ सत्ते मे ज्ञानी भऽ गेलन्हि। ओ आङन जा कए अपन बेटा मनोज कें बैटरी फेकबाक आ पैडीक प्रतिकार करबाक बात सुना देलखिन्ह। मनोज हुनका बुझेलकन्हि जे पैडी ठीके कहैत छल। आब तऽ बंगलोर पर्यन्त मे एहि तरहक नियम लागू भऽ गेलैक अछि। विभिन्न प्रकारक कचरा लोक कें घरे मे छाँटि कए दू अथवा तीन तरहक पैकेट मे राखि देबए पड़ैत छैक। भनसा घरक कचरा अलग, कागज प्लास्टिक अलग, इलेक्ट्रॉनिक कचरा अलग। से नहि केला पर कचरा उठेनिहार अहाँक घरक कचरा लेबे नहि करत। सब कॉलोनी मे एहि तरहक व्यवस्था लागू भऽ गेलैक अछि, विभिन्न प्रकारक कचराक लेल पैकेट बना कए घरे घरे पठा देल गेलैक अछि। तकर बाद सबकें चाँकि जगलैक। पैडी जतए सोनू आ बंटी कें इलेक्ट्रॉनिक कचराक महत्व बुझा रहल छल ओतए दादा दादी सेहो आबि कए बैसि गेलखिन्ह। पैडी लजा गेल आ अपन बात बन्द कऽ देलक। तै पर चैतू बाबू ओकरा प्रोत्साहित करैत कहलखिन्ह जे आइ पहिल बेर हुनका ज्ञान भेलन्हि आ सबटा बात सुनबा लेल बैसलाह अछि। तखन पैडी कें कने धाख छुटलैक। ओ सब कें बुझबए लागल। बैटरी आ इलेक्ट्रॉनिक कचरा मे लेड, कैडमियम, मरकरी आदि हानिकारक तत्व रहैत छैक। यत्र कुत्र फेकि देला पर ओ तत्व सब माटि मे आ जलक स्रोत मे मिलि जाइत छैक। ओतए सँ फेर माटि मे उपजल अनाज अथवा तरकारी आदि मे पहुँचि जाइत छैक आ फेर भोजन द्वारा लोकक शरीर मे। इलेक्ट्रॉनिक कचरा मे आनो एहेन विषाक्त पदार्थ सब रहैत छैक जे पर्यावरणक लेल हानिकारक छैक। ई तऽ भेल एकटा बात। दोसर आ बेसी महत्वपूर्ण बात अछि इलेक्ट्रॉनिक कचरा मे बहुमूल्य धातुक उपस्थिति। कोनो इलेक्ट्रॉनिक सामान, जेना मोबाइल फोन, आइपॉड, कम्प्यूटर, टीवी, सीडी प्लेयर आदि मे पर्याप्त मात्रा मे सोना, चानी आ ताम रहैत छैक जकरा उचित प्रक्रिया द्वारा फेर प्राप्त कएल जा सकैत छैक। एहेन बहुत रास कम्पनी आब काज करए लगलैक अछि जे लोक सँ इलेक्ट्रॉनिक कचरा कीन लैत अछि आ ओकरा रसायनिक विधि द्वारा परिस्कृत कऽ कए ओकर सोना, चानी आ ताम बहार कऽ लैत अछि। पैडी इंटरनेट सँ ताकि कए दिल्ली, पूना आ बंगलोर मे काज करैत एहेन कम्पनीक नामो हुनका सब कें बता देलक। पैडीक दादा, दादी आ सोनू, बंटीक आश्चर्यक ठेकाने नहि। विश्वासे नहि भऽ रहल छलैक मोबाइल फोन मे सोना चानी भरल रहैत छैक। बंटी तखने दौड़ि गेल आ रस्ता कात मे फेकल मोबाइल उठा अनलक। पैडी कें कहलकै कने देखा दै लेल। पैडी अपन बैग उठा अनलक आ ओहि मे सँ छोटका स्क्रू ड्राइवर निकालि मोबाइल फोनक अंग प्रत्यंग खोलि देलक। एतेक होशियारी सँ ई काज केलक जे दादा दादी कें तऽ छगुन्ता लागि गेलन्हि। हुनका विश्वासे नहि भऽ रहल छलन्हि जे हुनकर पोता एतेक बुधियार आ होशियार भऽ गेलन्हि। सोनू आ बंटीक सामने छलैक मोबाइल फोनक पार्ट पुरजाक टुकड़ी सब छिड़िआएल जाहि मे कतेको ठाम सोना ओहिना चमकैत छलैक। पैडी सबकें सुनेलक जे ई सोना देखबा मे बहुत थोड़ लगैत छैक मुदा ओ इंटरनेट मे एक ठाम पढ़लक जे एक लाख एहेन मोबाइल फोन मे छैक करीब अढ़ाइ किलो सोना, 25 किलो चानी आ 900 किलो ताम। सोनू आ बंटीक आँखि जेना पसरले रहि गेलैक। एतेक पैघ खजाना ! आ तकरा अबूझ लोक बाट घाट खेत पथार मे फेकि दैत अछि। लगैत छलैक जेना अलीबाबा कें चोर सबहक खजानाक कुंजी भेटलैक तहिना बंटी आ सोनू कें पैडीक संग गप केला पर ई नव खजाना भेटलैक। सोनूक मोन ललचा गेलैक। ओ पुछलक “पैडी, तोरा एतेक बात बूझल छौक। यदि हमसब अपनहिं मोबाइल कि आनो कोनो इलेक्ट्रॉनिक कचरा सँ सोना चानी बहार कऽ सकी तऽ फेर एकरा अनका बेचबाक काजे नहि। आमदनी सेहो नीक होएत”। पैडी किछु सोचि कए जबाब देलकै “बेसी विस्तार तऽ हमरा नहि बूझल अछि, मुदा टीचर सब बजैत छलखिन्ह जे ई काज सब नै कऽ सकैत अछि कारण एहि मे पर्यावरण पर प्रभाव पड़ैत छैक। अमेरिक मे इ-स्टेवार्ड नामक संस्था सब ई काज करैत छैक”। ई विचार चैतू बाबू कें नीक लगलन्हि। ओ सोनू कें कहलखिन्ह जे इ-स्टेवार्डक काज करबाक तरीका ओ सीखताह आ बैंक सँ लोन लऽ कए एकर कारखाना गामे मे लगेताह। ई विचार सब कें नीक लगलैक। पैडीक खिस्सा सुनि कए बंटी आ सोनू कें सेहो ज्ञान भऽ गेलैक। ओ दूनू तखने निर्णय लेलक जे एहि बातक प्रचार अपना स्कूल मे तऽ करबे करत आ गाम मे सेहो सब कें बुझेतैक। चैतू बाबू एहि काज मे ओ दूनू बच्चाक सहयोग करबा लेल तैयार भऽ गेलखिन्ह। आब गाम मे इलेक्ट्रॉनिक कचराक संग्रह कएल जाएत। जाबत कारखाना नहि लगलैक अछि ताबत ई सामान दिल्ली पूना बंगलोरक कोनो कम्पनी कें बेचल जाएत। जे टाका भेटतैक से गामक बाल कल्याण कोष मे जमा कऽ देल जेतैक। पैडी एके सप्ताह गाम मे रहल मुदा अपना बुद्धि सँ गाम कें बदलि देलक आ लोक कें भेटि गेलैक एकटा खजाना। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। VIDEHA NON RESIDENT MAITHILS Obsessed with native-hood Sanjeev Kumar Jha Ministry of Finance, Govt. of India I have always been fond of finding people of my mother language in the crowded city of Delhi and also elsewhere in the country where I used to visit. I don’t know why these people, while commuting in the heavily crowded metro train, flying in flight or travelling in rail, get my attention abruptly with all my cares towards them, as if, they have got right to have place in my heart. Then I realised I am really obsessed with the people of my mother language and hailing from my motherland. I really enjoyed meeting with my natives in Delhi in high to higher positions and those who are at the lower stratum. But everywhere I percolated through same entrance, i.e. their inclination towards people of similar mother language. The higher strata, whether they belonged to business profession, an IAS, IPS or other higher All India Services, most of them appeared with appreciating gesture and due respect. But I always took it as their regards and sentiments shown wholly for the civilization, culture and the language to which their ancestors belonged. It is but natural that every human being has got some degrees of sentiments with the persons, things or places with which he or she has cultivated deeper sense of attachments and emotions. My obsession, however, paid me a lot in the form of heartfelt pleasure. But at few occasions, I had to eat my sentiments. In an evening of this summer in Delhi, there was a beautiful presentation of a hindi play “maithil nari – char rang” directed by a renowned hindi author and director, organized by one of my colleague under the banner of a theatre group which has been increasingly active since its foundation in 2006. The play was experimented in a new style in the sense that it involved least requirements of space, costumes, make-ups, light and sound and number of characters. The concept was based on the four stories selected from the works of famous Maithili writer Raj Kamal Chaudhary and in the centre of each of the four stories was pitiable condition of maithil women in the erstwhile societies. The presentation was not a formal show and hence limited audience was invited for the show. As described by the director himself at the end of the show, the play was presented with least required facilities but great impact. The script was well refined, smoothly flowing and without changing effective notes and was performed same gracefully by the master artists. The play was flawlessly presented which marked the success of the new experiment. I had reached the venue with another friend of mine well in advance in the late afternoon. Since it was enough time before the programme could commence, it was a good opportunity to get introduced with guests who were there yet not known to each other. My friend-cum-organizing secretary of the event, introduced me with such a guest who was Director in one of the Central Government set up in apparently in his early forty’s. He belonged to a cadre of all India services and it was really a nice meeting with him and in fact I boasted of having such a young, dynamic and good gestured brother from my own land. Seeing a notebook in my hand, which was giving me look of an official on the job, he asked me as to why I was carrying the notebook during that programme as it was just a cultural and entertainment programme. When I told him that I was there straightway from the residence of a Union Cabinet Minister where I had gone to drop my resume for considering me as one of the personal staff in the office of that Minister, he came a step ahead revealing that one of his batch-mate had just joined there as PS to that Minister and if I was really interested to join that Minister’s office, he would make a call to his batch-mate. But before going ahead for that, he advised me to rethink on it whether I should join there or not. I took his advice in heart. A few days later, I wished to contact that gentleman officer of the all India service. I took his mobile number from my friend who had organized that recent event, and sent a sms text “I am so and so from so and so deptt/so and so ministry, and I want your e-mail ID, if you could give it to me, I could approach you with details”. As an immediate response, I got the sms reply “your number is not reachable, could you talk on my landline number......”. I exchanged another SMS “ I would rather prefer to meet you for five minutes if you could spare time for that in your office”. I was replied to “yes you may come”. As it was not possible for me to leave my office that day for some exigency, I had to postpone the timing and I informed the homeland officer of the same with the request that I would be calling on him the next day between 2 to 3 PM, or any other time convenient to him. I visited the officer at his office the next day at 2.15 PM. Abiding by the protocol, I met his PA to seek convenience of the officer. The officer called me in his chamber and offered me to sit turning towards me after leaving his desktop computer. He started “well, which office are you working with now”. I said “yes it is so and so”. He further inquired from me if I had anything to speak to him. I reminded him that I was trying for a position of personal staff with a minister and that he himself during our introduction at the cultural event which held few days back, had revealed a good link in the office of a union cabinet minister with whom one of his batch-mate had joined as Minister’s PS. In the meantime he asked from me if I would like to have a cup of tea which I had replied ‘yes’. Listening to my explanation, he appeared to have got irritated and annoyed and reacted with much displeasure at his face that he had no time to talk on that issue because he was supposed to go for a meeting. He said he always kept himself away from the political gamut and hence he had no interest in that. All through that, his facial expressions were indicative of his being caught with utter confusion. He said “actually I got confused about you, I thought you may be someone from Department of .....”. The tea had arrived by that time. He engaged himself with disposing files while offering me to start the tea. It was giving me to feel as if I was just killing his time and interest. I finished my tea with speedy shots whilst he remained busy with clearing files. What he made to feel me was that it was out of confusion that he offered me to come and meet him, otherwise he could have ignored it had he understood my identity. I soon came to know that he had no interest in me, or in my business. In his few words, he suggested to try myself in the concerned minister’s office for seeking a place there. But the respect and treatment he shown for me was disgraceful and humiliating. I felt it necessary to explain that I was there before him only for the reason that it was he who had come ahead with offer to help and that his confusion about my identity was a fault of him, as I had sent my full details in my sms to him. I left his office in a great dismay with guilt feeling. I kept on thinking and thinking if a senior officer had such a poor sympathy, attachment and sentiment with his native people, then why it was I to be so tender in dealing with the people whom I took as of ‘mine’? ***** विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Top of Form १.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आ २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम १.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ : ढक उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ = पढ़ाइ, बढब, गढब, मढब, बुढबा, साँढ, गाढ, रीढ, चाँढ, सीढी, पीढी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ अबैत अछि। इएह नियम ड आ डक सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खडयन्त्र), षोडशी (खोडशी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढए (पढय) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पडतौक। अपूर्ण रूप : पढ’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पडतौक। पढऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पडतौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पडि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) १.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढैआ, विआह, वा धीया, अढैया, बियाह।
९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
१३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
१८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोडि क’ , हटा क’ नहि।
१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क ( केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ , तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क”क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड / बडी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ । एकटा , दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ , आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोडैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि २.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही: बोल्ड कएल रूप ग्राह्य: १.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक २. आ’/आऽ आ ३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए ४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल ५. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह ६. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ ७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला / करैवाली ८. बला वला (पुरूष), वाली (स्त्री) ९ . आङ्ल आंग्ल १०. प्रायः प्रायह ११. दुःख दुख १ २. चलि गेल चल गेल/चैल गेल १३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन १४. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह १५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि १६. चलैत/दैत चलति/दैति १७. एखनो अखनो १८. बढ़नि बढइन बढन्हि १९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ २० . ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ २१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ २२. जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर २४. केलन्हि/केलनि/कयलन्हि २५. तखनतँ/ तखन तँ २६. जा रहल/जाय रहल/जाए रहल २७. निकलय/निकलए लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल २८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए २९. की फूरल जे कि फूरल जे ३०. जे जे’/जेऽ ३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) ३२. इहो/ ओहो ३३. हँसए/ हँसय हँसऽ ३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस ३५. सासु-ससुर सास-ससुर ३६. छह/ सात छ/छः/सात ३७. की की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) ३८. जबाब जवाब ३९. करएताह/ करेताह करयताह ४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस ४१ . गेलाह गएलाह/गयलाह ४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर ४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल ४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि जाइत छल ४५. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) ४६. लय/ लए क’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए ४७. ल’/लऽ कय/ कए ४८. एखन / एखने / अखन / अखने ४९. अहींकेँ अहीँकेँ ५०. गहींर गहीँर ५१. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए ५२. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ ५३. तहिना तेहिना ५४. एकर अकर ५५. बहिनउ बहनोइ ५६. बहिन बहिनि ५७. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ ५८. नहि/ नै ५९. करबा / करबाय/ करबाए ६०. तँ/ त ऽ तय/तए ६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ, ६२. गिनतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ ६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत ६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता ६५. देन्हि/ दइन दनि/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि ६६. द’/ दऽ/ दए ६७. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) ६८. तका कए तकाय तकाए ६९. पैरे (on foot) पएरे कएक/ कैक ७०. ताहुमे/ ताहूमे ७१. पुत्रीक ७२. बजा कय/ कए / कऽ ७३. बननाय/बननाइ ७४. कोला ७५. दिनुका दिनका ७६. ततहिसँ ७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि/ गरबेलन्हि/ गरबेलनि ७८. बालु बालू ७९. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) ८०. जे जे’ ८१ . से/ के से’/के’ ८२. एखुनका अखनुका ८३. भुमिहार भूमिहार ८४. सुग्गर / सुगरक/ सूगर ८५. झठहाक झटहाक ८६. छूबि ८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ ८८. पुबारि पुबाइ ८९. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि ९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे ९१. खेलएबाक ९२. खेलेबाक ९३. लगा ९४. होए- हो – होअए ९५. बुझल बूझल ९६. बूझल (संबोधन अर्थमे) ९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह ९८. तातिल ९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ १००. निन्न- निन्द १०१. बिनु बिन १०२. जाए जाइ १०३. जाइ (in different sense)-last word of sentence १०४. छत पर आबि जाइ १०५. ने १०६. खेलाए (play) –खेलाइ १०७. शिकाइत- शिकायत १०८. ढप- ढ़प १०९ . पढ़- पढ ११०. कनिए/ कनिये कनिञे १११. राकस- राकश ११२. होए/ होय होइ ११३. अउरदा- औरदा ११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) ११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि/ बुझयलन्हि (understood himself) ११६. चलि- चल/ चलि गेल ११७. खधाइ- खधाय ११८. मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखिन/ मोन पारलखिन्ह ११९. कैक- कएक- कइएक १२०. लग ल’ग १२१. जरेनाइ १२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/ जरेनाइ १२३. होइत १२४. गरबेलन्हि/ गरबेलनि गरबौलन्हि/ गरबौलनि १२५. चिखैत- (to test)चिखइत १२६. करइयो (willing to do) करैयो १२७. जेकरा- जकरा १२८. तकरा- तेकरा १२९. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे १३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं १३१. हारिक (उच्चारण हाइरक) १३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज १३३. आधे भाग/ आध-भागे १३४. पिचा / पिचाय/पिचाए १३५. नञ/ ने १३६. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय १३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत १३८. कतेक गोटे/ कताक गोटे १३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई १४० . लग ल’ग १४१. खेलाइ (for playing) १४२. छथिन्ह/ छथिन १४३. होइत होइ १४४. क्यो कियो / केओ १४५. केश (hair) १४६. केस (court-case) १४७ . बननाइ/ बननाय/ बननाए १४८. जरेनाइ १४९. कुरसी कुर्सी १५०. चरचा चर्चा १५१. कर्म करम १५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए १५३. एखुनका/ अखुनका १५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ १५५. कएलक/ केलक १५६. गरमी गर्मी १५७ . वरदी वर्दी १५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ १५९. एनाइ-गेनाइ १६०. तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि १६१. नञि / नै १६२. डरो ड’रो १६३. कतहु/ कतौ कहीं १६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर १६५. भरिगर १६६. धोल/धोअल धोएल १६७. गप/गप्प १६८. के के’ १६९. दरबज्जा/ दरबजा १७०. ठाम १७१. धरि तक १७२. घूरि लौटि १७३. थोरबेक १७४. बड्ड १७५. तोँ/ तूँ १७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) १७७. तोँही / तोँहि १७८. करबाइए करबाइये १७९. एकेटा १८०. करितथि /करतथि १८१. पहुँचि/ पहुँच १८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि १८३. लगलन्हि/ लगलनि लागलन्हि १८४. सुनि (उच्चारण सुइन) १८५. अछि (उच्चारण अइछ) १८६. एलथि गेलथि १८७. बितओने/ बितौने/ बितेने १८८. करबओलन्हि/ करबौलनि/ करेलखिन्ह/ करेलखिन १८९. करएलन्हि/ करेलनि १९०. आकि/ कि १९१. पहुँचि/ पहुँच १९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा) १९३. से से’ १९४. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) १९५. फेल फैल १९६. फइल(spacious) फैल १९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि/हेतनि/ हेतन्हि १९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब १९९. फेका फेंका २००. देखाए देखा २०१. देखाबए २०२. सत्तरि सत्तर २०३. साहेब साहब २०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि २०५. हेबाक/ होएबाक २०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ २०७. किछु न किछु/ किछु ने किछु २०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं २०९. एलाक/ अएलाक २१०. अः/ अह २११.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक २१३.सबहक/ सभक २१४.मिलाऽ/ मिला २१५.कऽ/ क २१६.जाऽ/ जा २१७.आऽ/ आ २१८.भऽ /भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) २१९.निअम/ नियम २२० .हेक्टेअर/ हेक्टेयर २२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़ २२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं २२३.कहिं/ कहीं २२४.तँइ/ तैं / तइँ २२५.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि/नै २२६.है/ हए / एलीहेँ/ २२७.छञि/ छै/ छैक /छइ २२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २२९.आ (come)/ आऽ(conjunction) २३०. आ (conjunction)/ आऽ(come) २३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/ होन्हि/ २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५ .शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौं / ज्योँ/ जँ/ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/ २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कोना/ केना/ कन्ना/कना २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलनि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि/ २५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी २६०.पठेलन्हि पठेलनि/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि/ २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत/ २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१ .खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पियेबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह २७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/ २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जअए/ जए (लालति जाए लगलीह।) २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै/ तइ २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढैत (पढै-पढैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि। बुझैत-बुझैत आब बुझलिऐ। हमहूँ बुझै छी। २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट/ भेँट २९१. खन/ खीन/ खुना (भोर खन/ भोर खीन) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८ .वाली/ (बदलैवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता ३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै ( भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच/ कागत ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय DATE-LIST (year- 2014-15) (१४२२ फसली साल) Marriage Days: Nov.2014- 19 20, 23, 24, 26, 27, 28 Dec.2014- 1, 3 , 5, 14 January 2015- 21, 25, 26, 30. Feb.2015- 6, 8, 9, 11, 15, 16, 20, 22, 23, 25, 26, 27. March 2015- 4, 6, 11, 12, 13. April 2015- 16, 19, 22, 23, 27, 29, 30. May 2015- 1, 3, 4, 8, 10, 11, 18, 20, 24, 25, 27, 28, 29, 31. June 2015- 1, 3, 4, 7, 8, 11, 12. Upanayan Days: January 2015- 30. February 2015- 23. March 2015- 1, 29, 30, 31. April 2015- 23, 29, 30. May 2015- 20, 22, 28, 29. FESTIVALS OF MITHILA (2014-15) Mauna Panchami-16 July Madhushravani- 30 July Nag Panchami- 1 August Raksha Bandhan- 10 Aug Krishnastami- 18 August Kushi Amavasya / Somvari Vrat- 25 August Hartalika Teej- 28 August ChauthChandra- 29 August Vishwakarma Pooja- 17 September Anant Caturdashi- 8 Sep Pitri Paksha begins- 9 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-16 Sep Matri Navami-17 September Kalashsthapan- 25 September Belnauti- 30 September Patrika Pravesh- 1 October Mahastami- 2 October Maha Navami - 2 October Vijaya Dashami- 3 October Kojagara- 7 Oct Dhanteras- 21 October Kalipooja/ laxmi pooja/ diyabati- 23 October Annakoota/ Govardhana Pooja- 24 October Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja- 25 October Chhathi kharna- 28 October Chhathi sandhyakalin Arghya- 29 October Sama Poojaarambh- 30 October Devotthan Ekadashi- 3 November Sama visarjan/ kartik poornima- 6 November ravivratarambh- 23 November Navanna parvan- 27 November Vivaha Panchmi- - 27 November Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Naraknivaran chaturdashi- 19 January Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 25 January Achla Saptmi- 26 January Mahashivaratri-17 February Holikadahan-5 March Holi- 6 March Saptadora- 6 March Varuni yog-18 March Ram Navami- 28 March Jurishital-15 April Akshaya Tritiya- 21 April Janaki Navami- 27 April Ravi Brat Ant- 3 May Vat Savitri-barasait- 17 May Ganga Dashhara-28 May Harihasyan Ekadashi- 27 July Guru Poornima-31 Jul VIDEHA ARCHIVE १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक http://sites.google.com/a/videha.com/videha/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-i/ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-archive-part-ii/ २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाउ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ २६.Videha Radio २७. Join official Videha facebook group. २८. विदेह मैथिली नाट्य उत्सव http://maithili-drama.blogspot.com/ २९.समदिया http://esamaad.blogspot.com/ ३०. मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ ३१.अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ ३२. मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ३३. मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ ३४. विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ ३५. मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ ३६. मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ ३७.मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ ३८. सगर राति दीप जरय http://sagarraatideepjaray.blogspot.in/ ३९. सगर राति दीप जरय http://sagarraatideepjaray.wordpress.com महत्त्वपूर्ण सूचना: The Maithili pdf books are AVAILABLE FOR free PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ http://videha123.wordpress.com/about/ विदेह:सदेह:१: २: ३: ४:५:६:७:८:९:१० "विदेह"क प्रिंट संस्करण: विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at publishers's (print-version) site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ ऐमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 113 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १५७ म अंक ०१ जुलाइ २०१४ (वर्ष ७ मास ७९ अंक १५७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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