ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १५८ म अंक १५ जुलाइ २०१४ (वर्ष ७ मास ७९ अंक १५८) गद्य जवाहर लाल कश्यप जगदानन्द झा “मनु” सत्य नारायण झा शिव कुमार झा “टिल्लू” सुरेन्द्र शैल अमित मिश्र डॉ. बचेश्वर झा उमेश मण्डल गजेन्द्र ठाकुर राजदेव मण्डल पद्य नीतीश कर्ण बिनीता झा जगदानन्द झा “मनु” विन्देश्वर ठाकुर आशीष अनचिन्हार बृषेश चन्द्र लाल प्रदीप पुष्प पंकज झा बेचन महतो अब्दुर रज्जाक कुन्दन कुमार कर्ण बिनीत ठाकुर राम कुमार मिश्र सत्य नारायण झा श्याम शेखर झा आर. अनुराधा (मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार) मिहिर झा जवाहर लाल कश्यप स्ट्रेश बस्टर "रागिनी जल्दी चलु 6.13 के ट्रेन भेट जायत तखन समय पर घर पहुँचब आ घरक काज जल्दी भ जायत" सुशीला ऑफिश स निकलैत रागिनी के हाथ ध क बजलीह / "नहि आई हम संगे नहि जायब /" "ओकर फोन आयल छल कि ?"w "हॉ ओकरे फोने आयल छल कहलक जुहु मे भेट करु" रागिनी के मुँह पर लज्जा मिश्रित मुस्कान आबि गेल / ओकर बाद दुनु अलग अलग दिशा मे मुम्बई के भीड के हिस्सा भ गेलीह /मुम्बई के भीड, भागैत भीड, एक दोसर स आगा बढबा के होर लैत भीड, धकियाबैत मुकियाबैत भीड, पता नहि ई होर कहिया खतम होयत / ओहि भीड के अंग बनि सुशीला अन्धेरी स्टेशन पर आबि गेलीह / ट्रेन पहिले आबि गेल छल आ लगभग भरि गेल छल /ओ ओहि मे चढि गेलीह / बैसबाक नहि मुदा सोझ स ठाढ होबाक जगह भेट गेल छल / समय बीति रहल छल आओर् लोक ट्रेन मे चढल जा रहल छल / तिल रखबाक जगह नहि छल मुदा आदमी तैयो सन्हियायल जा रहल छल / मुम्बई के ट्रेन मे भारतक छवि देखल जा सकैत अछि / कोना नाना धर्म, नाना जाति , भिन्न-भिन्न प्रकार के वेश धेने सब एक संग समाहित भेल अछि आ अपस्यॉत भेल जिन्दगी जीबय लेल आ देश चलनिहार के गारि पढबाके लेल विवश भेल छथि / ट्रेन चालु भेल आ सब कियौ भगवानक जयकारा लगेलक / सुशीला रागिनी के लेल सोचय लगलीह हमरा त अप्पन काज स फुरसति नहि होईत अछि, आखिर कोना ओ सब काज करैत हेती /अप्पन आफिसक काज , घर मे दुनू बच्चा के काज , पति के काज तखन बॉयफ्रेंडक नखरा से अलग / पता नहि भारतक पतन आ पाश्चात्यक नकल कतय जा रुकत / * * * "आई पहिले आबि गेलहुँ" सुशीला घर मे घुसैत आँफिस स आयल अप्पन पति के देखि बजलीह / खुशी बड्ड भेलन्हि मुदा भरि दिनक झमारल मुँह पर ओ खुशी नहि आबि सकल आ मोनक ओहि खुशी के राहुल (पति) नहि देख सकलाह / राहुल व्यंग केलथि ,"चलु आई गलती भेल आब हम जल्दी नहि आयब /" "हाँ जल्दी आबि क हम्मर उपकार केलहुँ . . ." सुशीला खिसिया गेलीह "तखन स टी व्ही देख रहल छी / एक कप चाह नहि पिने होयब ? रवि (बेटा) के स्कुल स आनि लाबितहुँ, सेहो नहि केने छी…." राहुल बीच मे खिसिया क बजलाह "एक दिन हम सबेरे आबि जाउ तकर मतलब जे सब काज हमहीं करु /" "नहिं , आबि क टीव्ही देखैत रहु " सुशीला बैग राखैत, जबाब डेल्खिन्ह् / हन हन करैत , घरक दरबज्जा जोर स बन्द करैत, रवि के लावय लेल स्कूल विदा भ गेलीह /भरि रस्ता अप्पन क्रोध के शांत करबाक प्रयास करैत रहली मुदा क्रोध छल जे शांत हेबाक नाम नहि ल रहल छल / पता नहिं पुरुख जाति कहिया स्त्री के अपन सम्तुलय मानत / जतेक काज ऑफ़िश मे ओ करैत अछि ततेक त हमहुँ करैत छी, तखन कथीक घमंड / रवि के स्कूल मे छुट्टी होमय बला छल गार्जियनक लाईन लागल छलै, सुशीला मोने-मोन खिसियाईत पता नहिं ई लाईन स कहिया छुट्टी होयत जतय जाउ ओतय लाईन, बस मे लाईन, ट्रेनक टिकट मे लाईन, रोड पर गाडी के लाईन/तखने छुट्टी के घंटी बाजल / बच्चा सब अप्पन-अप्पन गार्जियन सब लग आबय लागल/ रवि के कुम्हलायल फुल सन सुखायल मुँह के देखिते सुशीलाक क्रोध ममत्व मे बदलि गेल / अप्पन जमाना याद आबय लागल / एकटा स्लेट ल क स्कूल गेनाई ,जतय पढाई कम,मौज-मस्ती ज्यादा /पढाबय के जगह पर कुर्सी पर बैस क सुतय बला मास्टर साहेब पासवान जी /खिस्सा सुना क पढाबय बला चन्द्रकांत बाबु /आब अपना स ज्यादा भाडी बैग /डिसिप्लिन के नाम पर बच्चा के टार्चर करैत सर / अहि चक्कर मे हरा गेल बचपना / सुशीला अहि बात के सोचैत अप्पन घर आबि गेल आ आबिते क्रोध अप्पन चरम पर पहुँच गेल / रवि घर मे नहि छल, घर मे ताला लागल छलै आ घर के दोसर चाभी सुशील के बैग मे रहै / रवि के मोबाईल स्विच आँफ छलै आब एकटा उपाय छल जे पडोसी के घर मे बैस इंतजार कैल जाय आ सुशीला वैह करय लगलीह /ज्यों-ज्यों समय बितैत छल हुनकर क्रोध चरम पर जा रहल छल / ओ आ रवि दोसर के घर मे बैसल परेसान भ गेल मुदा राहुल के कोनो पता नहिं / रातिके 9.35 मे राहुल घर आयल आ अप्पन गलती पर सफाई देनाई सुरु केलक, सुशीला ओकरा बिना सुनने अंदर आबि गेलीह / राहुल -" साँरी हमरा ई अंदाज न......... सुशीला- "चुप भ जाउ हमरा कोनो बात नहि सुनय के अछि /" सुशीला के क्रोध देखि रवि त सहमि गेल मुदा राहुल और खिसिया गेलाह / ओहि राति दुनु प्राणी मे खुब झगरा भेल / राहुल सुशीला पर पहिल दिन हाथ छोडि अप्पन पुरुषत्व सेहो प्रदर्शित केलाह /तीनु प्राणी भुखले सुतलाह / रातिक घटनाक प्रभाव भोर मे सेहो देखल गेल / राहुल बिना खाना खेने चलि गेलाह /सुशीला रवि के खाना खुआ स्कूल भेजि अपने बिना खेने चलि गेलीह / फ़ेर सुरु भेल ट्रेनक वैह भीड / अंधेरी मे ट्रेन स उतरि ऑफिस के लेल बिदा भेलीह तखने रागिनी के फोन आयल कहाँ छी हमहुँ अंधेरी आबि गेल छी / सुशीला ओकर इंतजार करय लगलीह /किछु देर मे खुशी मोन रागिनी आयल आ दुनु आँफिस के लेल बिदा भेल /सुशीला -" कि बात छै आई बहुत खुश छी /" "हम त अहिना खुश रहैत छी" रागिनी के जवाव छल "जिंदगी के एकटा मकसद अछि जे खुश ऱहु /" सुशीला -"एकटा बात पुछु खराप नहि ने मानब ?" पुछु.... "अहाँ जे दोसर लडका स भेंट करय जाईत छी से के अछि ?अहाँक बियाह भ गेल अछि, दू टा बच्चा अछि तखन ओकर की महत्व ? ओ अहाँक के अछि ?" रागिनी के मुँह पर मुस्कान आबि गेल -"ओ हम्मर कियौ नहि अछि आँफिस मे सर स परेशान आ घर मे पति के पुरुषत्व स / बस ओ स्ट्रेश बस्टर छै ,स्ट्रेश बस्टर ......... जगदानन्द झा “मनु” मैथिलीमे एकरूपताक अभाब “कोस-कोसपर बदले पानी, तीन कोसपर बदले वाणी।” ई कथ्य किनकर अछि, हम नहि जानि मुदा अछि जग जाहिर। कोनो एहन सुधी मनुख नहि जे एहि पाँति सँ अनभिक होथि। आ ई कथ्य सोलह आना सत्य अछि। एक गामसँ दोसर गामक इनार पोखरिक पानिमे अन्तर आबि जाइ छैक। ओना आब इनारक जमाना तँ रहल नहि। गामक घरे-घर चापा कऽल चलि गेलै आ शहरक घरे-घर टंकी। टंकीक पानिमे तँ कनिक समानता देखलो जा सकैत अछि मुदा एक आँगनक चापा कऽलक पानिक स्वाद दोसर आँगनक चापा कऽलसँ भिन्न होएत। परञ्च हम एहिठाम पानिक संदर्भमे गप्प नहि कहि कऽ भाषाक पक्षक मादे कहै चाहैत छी। पानि जकाँ भाषाक मिजाद सेहो सगरो तीन चारि कोसपर बदलल देखाइत छैक। ई असमानता मिथिले-मैथिलीमे नहि भऽ कँ कमबेसी सम्पूर्ण भारतीय वा अभारतीय भाषामे देखार भऽ चुकल अछि आ ओ गुण कोनो भाषाक विकास आ ओकर उन्नतिक पक्षक धियान राखि ठीके अछि। पानिक मादे जेना कोनो नदी हेतु ओहिमे बहाब भेनाइ स्वभाविक छैक नहि तँ ओ नदीसँ डबरा भऽ जेतैक। तेनाहिते कोनो भाषाक चहुमुखी विकास लेल ओहिमे निरन्तर बहाब, अर्थात नव-नव शव्दक वृद्धि, आन-आन भाषाक सटीक आ प्रचलित शव्दकेँ स्वीकार केनाइ आवश्यक छैक। आ दुनियाँक ओ कोनो भाषा जे अपना आपके एकटा बहुत पैघ रुपे स्थापित केलक, ओकर विकासक इहे अबधारना वा गुणक कारने संभब भेल अछि। हमरा इआद अछि जखन अंग्रेगीक प्रथम शव्दकोष बनल रहैक तँ ओहिमे मात्र एक हजार शव्दकेँ जगह भेटल रहैक आ आइ..... ? मुदा मैथिलीक संगे, ई गुण किछु बेसीए अछि। किएक तँ मैथिल किछु बेसीए बुद्धिजीवी, शिक्षित आ चलएमान छथि। जतए-जतए गेला अपना भाषाकेँ अपना संगे नेने गेला आ ओतुका भाषाक शव्दकेँ अपना संगे जोड़ने गेला। ओनाहितो अपन मिथिलांचलक प्रतेक दू तीन कोसक बादक भाषामे भिन्नता अछि। पछिमाहा मैथिली पुरबाहा मैथिली, दछिनाहा मैथिली उत्तर भरक मैथिली, कमला कातक मैथिली, कोसी कातक मैथिली। एक्के गाममे बड्डकाक मैथिली, छोटकाक मैथिली। नीक गामक मैथिली तँ बेजए गामक मैथिली। शिक्षित मैथिली तँ अशिक्षित मैथिली। आमिरक मैथिली तँ गरीबक मैथिली। एक्के बेर एतेक बेसी असमानता भऽ गेल अछि जे कतेक ठाम तँ मैथिली नहि कहि कऽ दोसर नामसँ संबोधन भँ रहल अछि। अपन जाहि गुणक कारण दुनियाँक कोनो दोसर भाषा विकासक रस्तापर चलि रहल अछि, ओतए हमर सबहक मैथिली एहि क्रममे पछुआ रहल अछि। एकर की कारण ? तँ उत्तरमे हमरा मैथिलीक एकटा लोकोक्ति इआद आबि रहल अछि। “जे बड्ड होशियार से तीन ठाम गूँह मखे।” एहि लोकोक्तिकेँ कनी फरिछादी; एकटा पढ़ल लिखल विद्वान् गूँह मँखि गेला, आब ओ एहि गप्पक खोजमे लागि गेला जे, जे मखलौं से गूँहे अछि वा किछु आरो। एहि क्रममे ओ पएरक गूँहकेँ अपन हाथक आंगुरसँ छुला बाद नाकसँ सुंघला। लगलनि ने तीन ठाम, पएरमे, हाथक आंगुरमे, अन्तोगत्बा नाकमे। ओतए एकटा दोसर व्यक्ति बेसी खोज बिन नहि पैर कऽ मखला बाद पानिसँ धो लेलक। “अति सर्वत्र वर्जिते,” इहे रोग मैथिली भाषाक विकासमे लागि गेल अछि। जाहि गुणक कारणे हम आगू बढ़ि सकैत छलहुँ, अपन ओहि गुणकेँ कारण ठमैक गेल छी। एहि गुण, अतिसय गुण वा कही तँ अबगुनकेँ हम समान्य लोककेँ लेल जेनाकेँ तेना छोरिदी, विकास क्रममे समयक संगमे मानिली जे ओ अपने ठीक भए जेतैक। मुदा जे अपनाकेँ बुद्धिजीवी कहैत छथि, शिक्षित आ मैथिली विकासक ठेकेदार अपनाकेँ मानैत छथि तिनका सभकेँ तँ कदापि नहि छोरल जए आ हुनके सबहक एकरूपताक अभाबे मैथिलीक गति अबरुद्ध भेल अछि। एकटा समान्य लोक ककरा देखत, पढ़त ? एकगोट बुद्धिजीवीकेँ, साहित्यकारकेँ, पत्र-पत्रिकाकेँ, ऑडियो-विडिओ मिडियाकेँ मुदा एखुनका समयमे मैथिली भाषाक एकरूपतामे कतौ समानता नहि अछि। एहिठाम हम समान्य लोकक गप्प नै कहि रहल छी, पढ़ल-लिखल, मैथिलीमे ऑनर्स, एमए०, पिएचडी करै बलाक गप्प कए रहल छी। जिनक सबहक कतेको मैथिली पोथी छपा कऽ समान्य लोकक हाथमे आबि गेल अछि, मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक सम्पादक आ सम्पादक मण्डलीक गप्प कए रहल छी। कतेको मैथिलीक पुस्तक छापि चुकल प्रकाशकक गप्प कए रहल छी। ऑडियो-विडिओ बेच कऽ अपन कमाइ करै बला चैनल आ म्यूजिक विडिओज कम्पनीक गप्प कए रहल छी। सदति भाषाक एकरुपताक अभाब अछि। कनिक काल लेल किनको अज्ञान मानि कए क्षमा कएल जा सकैत अछि मुदा ओहि खन कि कएल जे जखन कियो गोटा अपनाकेँ मुख्य सम्पादक, सम्पादक, मैथिलीक ऑनर्स, एमए पिएचडीक चश्मा पहिरने, ओहि घोड़ा जकाँ लगैत अछि, जेकरा आँखिपर हरियर पट्टी बान्हल छैक आ ओकरा सगरो दुनियाँमे हरियरे-हरियर नजरि अबैत छैक। ई बिडम्बना मैथिलीए संगे किएक ? जीवन भरि अपन घर-परिवारमे मैथिली नहि बजै बला मैथिलीक ठीकेदार बनि जाइत छैक किएक ? एहिठाम हम विदेह ग्रुपक प्रसंशा करैत छी जे ओ अन्तर्जाल आ प्रिन्ट दुनू रूपे मैथिली भाषाक समृधि आ एकरूपता लेल भागीरथी प्रयासमे लागल छथि। कतेको प्रकाशकक पोथी, कतेको लेखक आ साहित्यकारक कृति, कतेको पत्र-पत्रिका, फलाँ फलाँ मैथिली एकादमीक पोथी आ पत्रिका हमरा लग अछि जाहिमे विभक्ति केर प्रयोग हिन्दीक तर्जपर कएल गेल अछि। कतेक मैथिलीक महान-महान विभूतिसँ हम व्यक्तिगत रुपे संपर्क कए हुनका सभसँ निवेदन केलहुँ जे, मैथिलीमे विभक्तिकेँ सटा कए लिखबा चाही मुदा नहि, ओहे आँखिपर पट्टी बान्हल घोड़ा बला हिसाब। एकटा मुख्य-सम्पादक, सम्पादक, ऑनर्स, एमए, पिएचडी, केनहार अपनाकेँ मैथिलीक ठीकेदार बुझनाहर, दोसर लोकक गप्प कोना मानि लेता। लागल छथि सभकेँ सभ मैथिलीकेँ हिंदी टच देबैमे। जीवन होए वा साहित्य ई गप्प मानै बला छैक जे लोक गल्तीए कए कऽ आगू बढ़ैत छैक। मुदा ओइ लोक आ संस्थाक कि जे गल्तीओ करत, गल्तीकेँ मानबो नहि करत, आ बाजु तँ लड़बो करत, ई तँ ओहे गप्प भेल जकर लाठी तकरे भैंस मुदा एहिठाम गप्प भैंसक नहि छैक, एहिठाम गप्प एकटा प्राचीन, समृद्ध आ श्रेष्ठ भाषाक भविष्य आ एकरूपताक छैक। दुनियाँक सभ समृद्ध भाषामे एना देखल गेलैए जे आम बोलचाल आ साहित्य, शिक्षा वा सार्वजनिक भाषामे भेद पाएल जाइत छैक। आम बोलचाल आ प्रचलनमे बहुत सगरो छूट छैक वा बन्हँन केर आभाव छैक मुदा साहित्य, शिक्षा आ सार्वजानिक मंच हेतु ओहि भाषाक एकटा मानक रूपक प्रयोग कएल जाइत छैक। एहि तरहक अभाब मैथिलीक संगे किएक ? मैथिली साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक मैथिलीक मानक रूपक प्रयोग किएक नहि करैत छथि। कतेको जन्मान्हर(ज्ञान रुपे) तँ सिखैक डरे एक्के बेर कहता, “चलू चलू अहाँ फलाँ-फलाँ ग्रुपसँ जुड़ल छी ई ओकर सबहक चर्च छै।“ यौ महराज ई चर्च अहाँ लगकेँ अनलक ई नहि देखि, ई देखू जे की अनलक। कनिक देखैक अपन नजरि बदलि लिअ तँ अहूँक विकास आ संगे संग भाषाक विकासक सेहो सम्भावना मुदा नहि हमर एकटा आँखि फूटेए तँ फूटेए तोहर दुनू फोरबौ। आ एहि फोरा फोरीमे ई किनको चिंता नहि जे ओहि माए बाबूक कि हाल जिनक करेजाक टुकरा अपन दुनू छी। मैथिलीमे एकरूपताक अभाब, इस्थीति, कारण आ निदानपर चर्चा करी तँ एकटा बेस मोटगर किताब बनि जाएत मुदा मैथिलीक अबरुद्ध विकास हेतु हमरा सभकेँ अपन अपन आँखि नै मुनि एहि चर्चाकेँ आगू बढ़ाबए परत। आ अति शीर्घ मैथिलीक वर्तमान पत्र-पत्रिकाक सम्पादक, प्रकाशक, साहित्यकार, लेखक आर कोनो सार्वजानिक मंचकेँ देखनिहार लोकनि सभकेँ मानक मैथिलीकेँ स्वीकार कए ओकरा आगू आनए परत नहि तँ ओ दिन दूर नहि जहिया हमर सबहक धिया पूरा एकरा इतिहासक पोथीमे पढ़त। जगदानन्द झा ‘मनु’ मो० +91 9212 46 1006 सत्य नारायण झा बेचारा लोक --- पुरा देस शान्त अछि ।युद्धक बाद जेना शान्ति पसरि जाइत छैक तहिना एखन देस मे बुझा रहल छैक ।काल्हि ब्रह्मस्थान दिस जाइत रही त बाट पर मथा हाथ देने यार भेटल ,कहलियैक एना माथ पर हाथ देने की सोचैत छैं ?आब कथीक चिन्ता ? कमल छाप पर भोट देलही ,तू सभ जितबो केलें ।सरकारो बनि गेलौ ।महिस पर सँ सीधे बुलेट टेन पर चढ़बें ।आब त पौ बारह छौक ।कने काल चुप रहल ,फेर बाजल ,रौ तोरा सँ की छिपायब ।कमल छापक हम समर्थन त दैते आयल छियैक मुदा अटल, अडवाणी,जोशी सदृश नेता के ।हम कहियो मोदी ,जेटली आ नितिन एहन नेताक सपनो मे नहि सोचने रहियैक ।कांग्रेसिया सभ तेहन तेहन ने कुकर्म केलकै आ ततेक ने महगाइ बढ़ि गेलै जे एकेटा संकल्प केलौ जे एहि कांग्रेसिया सँ बरू कुकुर बानर के जिता दी ।सैह भेलै ।मुदा ई त कुकरो बानर के टपि गेल ।कहै छें तू जे बुलेट टेन !कहावत छैक पेट मे अन्न नहि आ मुँह मे पान ।सुनै काल्हि महराजी पोखरि मे मछहर रहैक ,हमहूँ दु किलो कए रोहु माछ अनलौ ।घर मे फरमाइस भेटल जे बजार सँ आधा किलो टमाटर ,एक किलो प्याजु आ बढियाँ चाउर एक किलो नेने आबय । कोनो तेहन फरमाइस नहि छल ।बजार गेलौ ,बर मुश्किल मे परि गेलौ ।एक सौ टका छल संग मे ।जखन भाव सुनलियैक त चकरी गुम भए गेल ।100 रु0 किलो टमाटर .60 रु0 प्याजु ,30-40 सँ कम कोनो तरकरी नहि बिकायत रहैक ।आधा किलो टमाचर पचास रु0 मे ,आधा किलो प्याजु तीस मे .आब बाचल 20 रु0 ।गेलौ किराना दूकान मे ,कोनो नीक चाउर 80 रु0 किलो सँ कम नहि ।आब कि करू से फुरेबे नहि करए ।ओना भए के कहलनि, नीक चाउर नेने आएब से नहि भए रहल अछि ।की कहती जे आहाँ केहन मनुख छी ।अन्त मे गेलौ मुन्नी लाल लग ,कहलियैक जे हमरा कोनो उपाय सँ 150 रु0 दैह ।हम दु दिन मे दए देबह ।ओहो जान पहचानक कोनो परबाहि नहि कय ओ कहलक जे पैसा त हम देब मुदा हर दिनक 20 रु0 सुदि देबए परत ।तेना कय समान सभ अनलौ ।बुलेट टेन पर के चढ़तै ,जे टमाटर नहि किन सकै छै से बुलेट टेन पर चढ़तै ।पुरा देस कए नीक नीक बात कहि ठकि लेलकै ।पुरा देस शान्त कोना नहि रहतैक ,अपन हारल आ बहुक मारल कियो कतौ बजै छै ?एहि राज मे धनीक आओर धनीक भए जेतै आ गरीब आओर गरीब ।यार चुप भए गेल ।यार के चुप देखि हमहूँ चुपे मे अपन भलाइ देखलौ । शिव कुमार झा टिल्लू "आब ओ नहि एथुन" ( लघु कथा ) .. बनेश्वर भैयाक दलानक आगाँ थपड़ी पड़ैत बाल-मंडली, महिनामवाली भौजीक मुख सँ गाड़ि सुनबाक लेल हुनका उकसा रहल छल .... "बानो बन-बन देह करय ढनमन अपने लकलक ब'हु चतरिया दुन्नू परानी बक्खो पमरिया ...." अलच्छ , सरधुआ , कपरजरू सन मिथिलामक गारिक बिच नेनाक टोलीक ठहक्का सुनि रघुपति बाबू अनचोके रुकि गेलनि. सभ उकट्ठी नेना -भुटकाक संग मोहित केँ देखि मास्टर साहेब आगि भ' कहलनि, ." ..चल भाय साहेब लग "- तोँहू एहेन छेँ हमरा विश्वास नहि छल. मोहितक बाबूजी आ रघुपति बाबू मे सिनेह गाम मे चर्चित छल , तें मोहित मास्टर साहेब नाओं सँ चर्चित रघुपति बाबूक डरें हुनका सँ क्षमा-याचना क' अपन घ'र दिश विदा भ' गेल आ मास्टर साहेब भगवती थान दिश चलि गेलाह . हुनका दूर जाइते देरी छौंड़ा सभ फेर फेर मोहित केँ बजब' चलि आयल मुदा ओ एहेन काज आब कोना करत ? आन छौंड़ा सभक लेल रघुपति बाबू कोनो विशेष महत्व नहि रखैत छथि , किएक त' ओ उच्च विद्यालयक शिक्षक छथि ." एखन हम सभ पंचमें मे छी जखन नम्मा मे जाएब त' देखल जेतै , एखने सँ रघु मास्टर सँ किए डेरायब " ई कहि जितबा फेर सभ छौंड़ा केँ बानो भैयाक दलानक ओलती लग ल' गेल ,मुदा मोहित नहि आयल किएक त' मास्टर साहेब क प्रति श्रद्धा रखैत अछि. जखन मोहर्रिर साहेब अर्थात मोहितक बाबूजी गाम मे रहैत छथि त' मरसायब कोनो दिन हुनका सँ बिनु भेंट कएने नहि रहैत छथि. सम्पूर्ण गामक आचार-विचार नीक- अधलाह सभ पर टीका -टिप्पणी दुनू गोटेक फुरसति कालक दिनचर्या जकाँ भ' गेल छन्हि . "समय " --- एकटा एहेन भाववाचक संज्ञा थिक जकरा लग परिवर्तनक चाभुक सदिखन ओरिआयल रहैछ . आइ मुहर्रिर साहेबक मुइला चारि दिन भ' गेल अछि. दलान पर श्राद्धकर्मक लेल बैसार लागल .स्वाभाविक छैक इएह एकटा एहेन यज्ञ होइछ जाहि लेल लोक पहिनहि सँ ओरिआओन क' क' नहि रखने रहैछ .तें समाजक जाति- परजातिक लोकक भीड़ लागल अछि .मोहर्रिर साहेब जतेक ब्राह्मण मे प्रिय ततबे आन जातिक लोकक बिच श्रद्धेय किएक त' ओ सभ लोक केँ " समान मनुक्ख " मानि देखइत छलाह. सभ जातिक दाबल लोक बेसी व्यथित छल. "ओ महापुरुख छलथि तें आडम्बर आ भोज -भात पर बेसी जोर नहि देल जाए, प्रेत त' ओ बनैछ जकर जीवन समाज केँ अशांत कएने हुअए, मोहर्रिर साहेब त' सीधे स्वर्ग गेल हेताह .. जीवन भरि अभाव मे रहलनि भ' सकैत अछि एहि लेल पुरुब जन्मक दोख होनि." चौधरी जीक एहि गप्प केँ सभ मूक समर्थन देलथि . रघुपति मास्टर साहेब पंडित जी केँ मात्र वैदिक कर्मक चिट्ठा बनयबाक सलाह दैत बजलनि --- " बाँकी भोज-भातक तैयारी मोहित पर छोड़ि देल जाए. हमर आग्रह जे भावना मे नहि बहि क' अपन साध्य केँ देखैत मोहित कोनो निर्णय करथि..हमरा सभ सँ जतेक सहयोगक अपेक्षा हुअनि खुलि क' कहि सकैत छथि . मोहित त' किछु आर सोचि रहल छल .एक बरख पहिने मोहर्रिर साहेब बहुत बीमार छलाह . मोहित सेहो सूचना भेंटैत देरी ड्यूटी सँ गाम आएल रहथि तीन दिन मे मोहर्रिर साहेब कनेक नीक भ' गेल छलाह . ओहि साँझ मे चौकी पर पड़ल छलथि आ डाक्टर साहेब ल'ग मे बैसल छलाह . दुरुक्खाक बाहर सँ रघुपति बाबू.." डाक्टर साहेब ..डाक्टर साहेब हाक लगेलनि. सुनैत देरी डाक्टर साहेब बाहर निकलि गेलाह . मोहित अपन पिता सँ कहलक " बाबूजी , रघुपति बाबू बाहर मे छथि हुनका बजा दिअ' की ? जीर्ण बीमार मोहर्रिरक मुख सँ निकसल - नहि बाउ - "आब ओ नहि एथुन" ओ त' पैघ लोक भ' गेल छथि , बेटा सभ अधिकारी भ' गेल छन्हि , हम गरीब आब हुनक मित्र कोना कहायब . एतवे मे रघुपति बाबू मोहितक तंद्रा भंग करैत कान मे कलथिन्ह " जतेक कैंचाक काज हुअए , अवश्य कहब " मोहित मंद-मुस्की दैत, मात्र! मूक सहमति धरि सीमित रहि गेल. जे बौद्धिक साध्यक आगाँ मित्र केँ बिसरि गेल छथि हुनका पर कोन विश्वाश आ हुनका सँ केहेन आश .? पेटक मारि ( बाल विहनि कथा ) शिव कुमार झा टिल्लू . आगाँ -आगाँ कल्लो भगता पड़ाइत ....त' पाछाँ सँ नेना सभ खेहैत सगुन ब्रह्मक उपासक जकाँ गीतक स्वर मे...... " हाथ पएर मैल भेल " " पेट फूटल घैल भेल " वयसक कोनो सीमा नहि. चारि पांच वरखक इचना पोठी सँ ल' क' दस -पंद्रह वरखक गड़ै -गैंची सदृश नेनाक टोल. बहिनक सासुर गेल छलहुँ . हमहुँ नेना तें सरिपहुँ जिज्ञासा भेल जे एहि हास्यक कारण की ? तुलो कक्का अर्थात तुलानन्द झा गामक मुरूख जमींदार छथि .एकटा विवाहिता बहिन नहिरे मे रहि गेली नाओं -" जहान दाइ" तुलो कक्का बहिन केँ बड्ड मनैत छथि . माय -बापक मृत्युक बाद छोट बहिन जहान केँ बेटी मानि कक्का ,पालन -पोषण कयलथि . ततेक मानैत छलाह जे एक दिन जखन इस्कुल मे जहान केँ मास्टर साहेब मारलखिन त' ओहि मास्टर केँ तुलो कक्का हाड़-पाँजर तोड़ि देलथिन .फेर जहान कहियो इस्कुल नहि गेली .बिआहक बाद सासुर मे जहान केँ सासु सँ झगड़ा भ' गेलनि .बालिका वधू जहान दाइ अपन भैया केँ समाद पठौलथि .बहिनक सिनेह मे माहुर भेल तुलानन्द जी सासुर जा क' जहान क सासुक देह पर एक बोझ करची तोड़ि कहलथिन्ह " चल जहानी नैहरें मे रहिहें" आब पति अछैत साध्वी बनल जहानी नैहरें मे छथि आ तुलो कक्का बिनु बिआह कएने जहान केँ अपन बेटी मानि शान सँ जमींदारी चला रहल छथिन्ह . एकादशीक व्रत छलनि, जहानी बिनु ब्राह्मण खुऔने कोना पारण करतीह , तें गामक एकटा दरिद्र ब्राह्मण कलानंद झा अर्थात कल्लो भगता केँ नोत देल गेल . "कतेक सेर दही लगतौ कलबा " ..तुलो कक्का क मुख एक दिन पहिनहि ई सुनि कल्लो भगता उगल' लागल , " तुलो कक्का बेसी नहि चारि सेर दही , सेर भरि चूड़ा आ सेर भरिक गूड़क भेलीक जोगार क' देबै " . आठ सेर दूध पौरल गेल .द्वादशीक सूर्योदयक उपरान्त हाँय -हाँय जहान दाइ पूजा अर्चना क' कल्लो भगता केँ नोतक बिजो पठा देलनि . एक याम बीति गेल .तुलो कक्का स्नान क' क' आँगन मे चौका लगा जहान दाइ केँ भोजनक लेल हाक लगौलनि ." भात भ' गेलै , दालि उधिया रहल छै ..बस कनेक काल आर लागत सरिसबक साग पसाक' छौंकि दैत छी " जहानक गप्प सुनितें तुलो कक्का आगि भ' गेलथि ..दही सभ की भेलै ? 'सभटा कल्लो भगता खा गेल ' जहानक उत्तर पर कोनो प्रत्युत्तर नहि द' तुलो कक्का कहलनि ..." फरुसा ला , आइ भगता केँ बपरहरि छोरा देबै .ओकर पेट फूटल घैल छै त' सार पहिने कहिते मोन भरि दही जमा दितियै. चारि सेर कहलक ..हम आठ सेर पौरलहुँ तखन हमर हिस्सा किए खा गेल ? खोपड़ी मे सूतल कल्लो भगता पर' फरुसा सँ प्रहार नहि भेल , मुदा तुलो कक्काक मुक्का सँ ओकर बाँचल दांत धरि भरकुस्सा भ' गेल. गाम मे कथीक थाना -पुलिस ..मारियो खेलक आ जुर्माना सेहो देलक कल्लो भगता .बरहर जकाँ फूलल घुघना देखि जखन छौंड़ा सभ पुछलकै जे के मारल क' ? कल्लो भगता कहलक मारत के, ई त पेटक मारि छै ? ओहि दिन सँ कल्लो नेनाक झुंझुना भ' गेल. सुरेन्द्र शैल धनुष यज्ञ-सीता स्वयंवर आ जयमाल हमर जिज्ञासा-की सीता स्वयंवरक आयोजन कैल गेल छल? हमरा जनैत नहिं। सीता वियाहक प्रयोजन सँ विभिन्न देशक राजा-महाराजा-राजकुमार आमंत्रित कैल गेल छलाह। सभामध्य पिनाक नामक अति विशाल शिव धनुष हजारों आदमी गाड़ी पर लादि आ खींचि आनि स्थापित कैलक। शिवक ई धनुष जनकक पूर्वज राजा निमिक ज्येष्ठ भ्राता देवरात कैं देवाधिपति इन्द्र सँ भेटल छलनि। सभामध्य अपन ज्येष्ठ भाई एवं सखी सभक संग सीता एलीह।राजाक ज्येष्ठ पुत्र सभामध्य जनकक संकल्पक"जे शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढौताह तिनके संग सीताक वियाह हैत"उदघोषणा कैलनि। जनकक संकल्प संज्ञान मे एला पर रावण सहित अनेकों राजा ओहि शिव धनु पर प्रत्यंचा चढेवाक चेष्टा कैलनि मुदा समर्थ नहिं भेलाह। जनकजी ई देखि अत्यंत चिंतित भय बाजि उठलाह की वसुंधरा वीर विहीन भय गेल वा "लिखा न विधि वैदेही विवाहू"।एहन विकट परिस्थितियो मे जनक निराश तँ छथि मुदा अपन प्रतिज्ञा सँ आबद्ध राजा सीता कै अपना योग्य पतिक वरन करवाक अनुमति नहिं दैत छथिन। सीताक वियाह हुनक पिताक प्रतिज्ञाक मर्यादाक रक्षा पर निर्भर(conditional marriage)छल।जखन सीता अपन पतिक वरन करवाक हेतु स्वतंत्र नहिं छलीह तँ ओहि आयोजनके स्वयंवरक संज्ञा देवाक औचित्य प्रतीत नहिं होइछ। वियाहक निमित्त आयोजित सभ समारोह स्वयंवर नहिं भय सकैछ। िमिथलाक िववाह पद्धित, परम्परा वा िविध वयवहार मे किहयो जयमाल क स्थान निहं छल। आन समाज आ प्रान्तक एिह परम्परा कैं िसनेमा आ दूरदर्शन मे देखि हमरा लोकिन िवनु कोनो मर्म बुझने एिह िविध के स्वीकारे निहं अंगीकार कय लेलहुँ। खासकय ब्राह्मण आ कायस्थ पिरवार जे अपनाकैं बुिद्धजीवी आ ज्ञानवान कहैत छी एकरा मान्यता प्रदान करवा लेल कुतर्क पर उतिर एलहुँ। भगवान राम आ सीताक िवयाह मे जयमाल भेलिन तँ हमरा बेटा वा बेटीक िवयाह मे िकयैक निहं हैत? एिह िनर्णय मे जनीजाित जे भगवान आ सन्तानक प्रित स्वाभािवकरूपें कने वेशी संवेदनशील होइत छिथ, केर प्रभावी भूमिका सँ इंकार निहं कैल जा सकैछ। हमर तेसर िजगयासा -की सीताराम िवयाह मे वरमाल(जयमाल) भेल छल? हमरा जनैत निहं। आऊ कने एिह पर िवचार कैल जाय... जयमाल शब्द स्वयं िचकिर-िचकिर के अपन अर्थ किह रहल अिछ। ओना राजतंत्री व्यवस्था मे राजा जखन युद्ध मे िवजयी भय वापस अवैत छलाह तँ हुनक िंसंहद्वार पर रानीसभ अपन अिरजन-पिरजनक संग राजाक आरती उतािर मधुर खोआय जे माला राजाक गरा मे पिहरवैत छलीह तेकरा जयमाल कहल जाइत छल। एिहमे एकतरफा माल्यार्पण होइत छल। िवयाहक क्रममे जािह मालाक आदान -प्रदान होइत छल तेकरा वरमाल कहल जाइत छल। वर शब्दक अर्थ भेल िवछनाइ।एिहतरहक िवयाहमे लड़का आ लड़की अपना लेल वर/किनयाँ िवछवाक(selection)लेल स्वतंत्र रहिथ। जाितक कोनो बन्धन निहं छल। एकरा प्राचीन युगमे गन्धर्व वियाह आ आधुिनक युगमे प्रेम-िवयाह(love marriage) कहल जाइछ।एिहमे कोनो युवक कोनो युववतीक प्रित आकर्िषत भय अपन प्रेमक अिभव्यिकत आ ओकर स्वीकारोपरान्त सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी,, वृक्ष, देवता, गन्धर्वािद कैं साक्षी रािख एक दोसराक गरा मे माला पिहराय िवयाहक बंधन मे बनिह जाइत छलाह। कन्यादान आ िसन्दूरदान निहं होइत छल। कोनो आन िविध-व्यवहारक आवश्यकता निहं।कथा-पात्र नल दम्यंती आ दुष्यंत-शकुन्तलाक िवयाहक उदाहरण समक्ष अिछ। एिह िविध कैं तत्कालीन समाज द्वारा मान्यता प्राप्त छल। दोसर राजा अपन पुत्रीक वयसक ध्यान रािख स्वयंवरक आयोजन करैत छलाह। आमंत्रण पािव आन आन राजक राजकुमार लोकिन एिह आयोजन मे भाग लैत छलाह। राजकुमारी हाथमे माला नेने सभामध्य घुरैत छलीह। राजकुमार सभक संग आयल मागध-बन्दी-सूत लोकिन अपन-अपन राजकुमारक गुणक वर्णन करैत छलाह। जािह राजकुमारक रूप-गुण सँ राजकुमारी प्रभािवत भय हुनका गरा मे माला पिहरा दैत छलीह से हुनक पित भय जाइत छलाह। एिह तरहक स्वयंवर मे राजा वा राजकुमार भेनाइ एक शर्त छल। स्वयंवर मे राजकुमारी एकतरफा माल्यार्पण करैत छलीह। इहो माल वरमाल कहाइत छल। ओना तँ अपहरणो कय िवयाहक परम्परा छल मुदा एिह तरहक िवयाह मे मालाक आदान-प्रदानक उदाहरण हमरा समक्ष निहं आयल अिछ। महाभारत मे भीष्म अपन छोट भाए िचत्रांगद आ िविचत्रवीर्यक िवयाहक उद्देश्य सँ अम्बा,अमिबका आ अम्बािलकाक अपहरण कय लैत छिथ। रुक्िमन आ सुभद्राक अपहरण एवं पराकाल मे पृथ्वीराज द्वारा संयोिगताक अपहरण होइत अिछ। अस्तु! उपरोक्त िवयाहक कोनो पद्धित सीताराम िवयाहक उदाहरण बनवा योग्य निह अिछ।धनुष भंग भेला परे सीताक िवयाह राम सँ होएब सुिनश्िचत भय गेल।जनकजी अयोध्या संवाद दैत छिथ। दशरथ बिरयाती सािज के अवैत छिथ। भगवान, गुरुजन आ समाजक बीच िविधपूर्वक जनकजी कन्यादान करैत छिथ। तैं वरमाल कैं जयमाल कहब वा सीताराम िवयाह मे जयमाल भेल, ई कतय धिर उिचत से सुधीजनक िचंतन पर छोडैत छी। ओना मैिथली मे एक कहावत छैक"अपना मोनक मौजी आ बहु के कहब भौजी"एकर उत्तर हमरा संग निहं अिछ। िवयाहक एिह आयाितत रीितक संग ओकर सखी बिहनपो सभ एलीह। ढोल, िपपही,िसंघा,रसनचौकी आ मशक बाजा सनक मधुर -कर्णिप्रय साज कैं ठेिल पिहने बैंड पार्टी आ एखन डीजे सनक असह्य कानफाडू साज स्थान ग्हण कय लेलक। ओिहैंपर छौडा-छौडीक संग बुढवा-बुिढयाक अशोभनीय नाच। भाभौ-भैंसुरक िवचार निहं।लाल-िपयर धोतीक स्थान शेरवानी आ टोपी लय लेलक। बीच पंडाल मे तथाकिथत जयमाल घोघट कैं महत्वहीन कय देलक।आब घोडी आ डाँड़ मे तरूआिर बािन्ह के िवयाहक हेत आयलु वरक पिरछन करव बाँकी अिछ।ओना घोडी पै होके सवार चला है दुल्हा यार कमिरया मे बान्धे तलवार त गािवये रहल छी। महेशवानी, स्वयंवर(समर),, डहकन आ जेवनार पर लुंगी डांस भारी पिड रहल अिछ। हा मैिथल!हा िमिथला!! अमित मिश्र बस एकटा गर्लफ्रेन्ड बाप-बेटामे गरमागरम बहस भऽ रहल छलै ।उचक्का, आवारा सन पदवी प्राप्त बेटाक लेल बापक चिन्ता जायज छलै, मुदा बेटा बुझै बला होइ तखन ने ! बाप बुझा-बुझा कऽ कहि रहल छल "बौआ पढ़ि ले ।किछु आखरक ज्ञान भऽ जेतौ तँ नीक जकाँ कमा-खटा लेबें ।" मुदा जानि नै कोन मुहछी मारने छलै जे बेटा पढ़ैक लेल तैयारे नै छलै ।बड बुझेलाक बाद जखन बात नै बनलै तँ बापकेँ तामस चढ़ि गेलै ।बाप तमसाइत बाजल "जँ नै पढ़बे तँ एखने हम घरसँ निकालि देबौ ।जखन रने-वने बौआए पड़तौ, अँतरी कुलबुलेतौ तँ पता चलतौ ।" बेटा ई सब सुनि हँसऽ लागल "हा . . .हा. . .हा . . .एतेक छोट सजा !आइ-काल्हि टाका आ भोजनकेँ के पुछै छै !हमरा एहन दिमाग बला तँ बैसल सोहारी तोड़तै ।बस एकटा गाय सन सुध गर्लफ्रेन्ड आ मीठ बाजबाक कला चाही ।से अछिए ।आइ-काल्हि गरम माँउसक किरायेदार बड भेटै छै बाबू ।चिन्ता जुनि करू ।" बापक अंग-अंग लोथ भऽ गेल छलै । डॉ. बचेश्वर झा, निर्मली (सुपौल) कथा- ''सासुरक साइकिलक कथा-बेथा'' बैशाख मासक साँझ नहु-नहु हवा बहि रहल छेलै। दिन भरिक तपाएल वातावरण संग मन्द पवनक सिहकलासँ सुखद प्रतीत भेल छल। डेरासँ फराक जा मोन बहटारैले चलि देने छेलौं। उष्म ऋृतुक साँझक सौन्दर्यक सन्दर्भ एक कविक स्मरण भऽ आएल। “उषम-विषम अब आयल सजनी गे, सुखद भेल बन वात। ककर ने मोन हरण कर सजनी गे, गृष्मक साँझ-परात।।” वस्तुत: गृष्मक साँझ आ प्रात: काल अति मनोहर होइत। ऐ लऽ कऽ हमहूँ सम्प्रति आनन्दक अवलोकनोपरान्त डेरा घूमि कऽ अाबि गेलौं। तरकारी वाड़ीमे पानि पटौल गेल कि नै से देखि रहल छेलौं। हठात् साइकिलक घंटीक टन-टन सुनबामे आएल। चौंकि कऽ देखल तँ हमर मित्र वएह छला जे विद्यालयसँ महा विद्यालय धरि संग पूरने छला। धड़फराएल दलानक ओलतीमे साइकिल लगा कऽ खाटपर धब्ब दऽ लेटि गेला। हम लग आबि यथोचित अभिवादन केलियनि। मित्र महोदय गुम्म-सुम्म पड़ल रहला। हुनकासँ एहेन अवस्थामे किछु पूछब उचित नै छल। तँए आँगन दिस बढ़लौं। संकेत भेटल जे मिताकेँ चाह दऽ दियनु। गृहिणीक आग्रहकेँ हम हुनका तक पहुँचेबाक प्रयास कएल। आग्रहकेँ ओ दुराग्रह बूझि अनठा देलनि, तथापि हम बलजोरीए चाहक कप हाथमे धड़ा देलियनि। शनै: शनै: चाहक चुस्की लैत गेला। तइ बीच पान सेहो खिल्ली मोड़ल आबि गेलनि। पानक खिल्ली मुँहमे दाबि किछु स्वस्थ भेला तखनि हम कुशल क्षेम पूछबाक साहस कएल। ओ उखरल-उखरल जवाब देथि मुदा हम बिकछा कऽ पुछैत गेलियनि। अन्तमे ओ अपन बेथा-कथा कहए लगला- “की पुछै छी! हमरा केहेन तरहक घटनाक शिकार होमए पड़ल अछि?” उत्सुकता बढ़ि गेल जे कोन एहेन घटनाक शिकार भेला जइ कारण वगए-वानि विकृत केने छथि। सरस लोकसँ एहेन चुप्पी सधने छला। खैर! हमर मुद्रा देखि ओ नि:संकोच भऽ खिस्सा सुनबैत गेला आ हम सुनैत गेलौं। हुनक बिआह वर्ष दिनक भीतरे भेल रहनि। सासुर मनोनुकूल भेल छेलनि। ससुर कलकत्ता महानगरीमे नीक पाइ कमाइत रहथिन। पहिल जमाए यएह भेल छेलखिन तँए हिनक सम्मान सभ तरहेँ होइत रहनि। पत्नी अल्प शिक्षित मुदा रूप गुण सम्पन्ना रहथिन। सासु पूर्ण मनोहरथी तँए ई हमर मित्र विवाहोपरान्त अधिकांश समए सासुरेमे बितबैत रहथि। गोरलग्गीमे सासु सए-पचासक नोट दऽ हिनका मनोबलकेँ बढ़ा देने रहथिन। छात्रावासक जीवन-कालक मित्र आब आशमान छुनिहार भऽ गेल छला। सदिखन सासुरेक प्रशंसा करैत हिनक समए बितैत रहनि। भाग्यक भूत संग छेलनि। बी.ए. पास केला पछाति किरानीगिरीक नौकरी सेहो भऽ गेल रहनि तँए गर्वोक्त्ती होएब सोभाविक रहनि। हमरा तँ ओ झूस बुझथि, किएक तँ हम विद्यार्थी बनले छेलौं। पंचम वर्षक छात्र संगहि निरस सासुर ओ धाेंछ ससुर-सासु तँए हिनक एे तरहक सुसंयोगसँ कखनो काल डाहो उत्पन्न होइत छल। खैर! अपन-अपन भाग्य तँए ऐ तरहक डाही भावनाक परित्याग तत्क्षणे कऽ दैत छेलौं। आइ मित्रक बेथा-कथा ओही मुँहसँ सूनब से आश्चर्य लगैत छल तथापि श्रोता बनि गेलौं। मित्र महोदय कहलनि जे “सासुक आकंक्षा रहनि जे जमाए साइकिलपर चढ़ल घंटी टन-टनबैत जे अबै छै से बड़ नीक लगैत अछि। ओझहा ईहो साइकिलपर चढ़ल घंटी टनटनबैत आबथि, किएक तँ हिनको नव रेले साइकिल ससुर देथिन हम कहि देने छियनि...।” “संयोगवश पाँचम दिन साइकिल पार्सलसँ रेलबे द्वारा आबि गेल। साइकिल रेलबेसँ छोड़ा कऽ आनल आ जान-बेजान चलौनाइ सिखए लगलौं। ऐ तरहेँ शरीरक जे दुर्गति भेल से की कहब? केतेक बेर खसलौं आ चोट जे लागल से तँ देहेमे भीजैत अछि। ठेहुनक घाव अखनो विद्यमान अछि। कहुना चलबए आबि गेल मुदा ब्रेकपर काबू पाएब आ डाँड़क स्थिरता नै आएल छल कि सासुक समाद लऽ छोट सार आबि गेला। ऐ तरहक समाद पाबि सासुरक हेतु साइकिलसँ यात्र कएल। नवका जोश बेछोह पैडिल दैत चललौं। सासुरसँ कोस भरि पहिले एकटा टोल पड़ैत अछि जेकर नाओं बहुअरबा छिऐ...।” हमरा हँसी लागि गेल तथापि मुँह दाबि कऽ हुनक कथा सुनैत आगू पुछलियनि- “हँ तखनि की भेल?” कहए लगला- “टोल परहक रस्ता संकीर्ण रहैक आ बगलमे खूब गहींर पोखरि पड़ैत छल। हम साइकिल बढ़ौने जाइत रही आकि एकटा भीमकाय साँढ़ फूफू करैत बिच्चे बाटपर ठाढ़ छल। हैडिल तिरछा केलौं ताकि निकलि जाएब से ब्रेकक खियाल नै रहल परिणाम ई भेल जे साइकिल समेत भरि छाती पानिमे चल गेलौं। कहुना साइकिल समेत ऊपर एलौं। तीतले वस्त्र पुनश्य आगू बढ़लौं। बादमे ई शंका हुअए जे कियो चिन्हार लोक ने देखि लिअए। गुणक भेल जे झल-अन्हारीमे कियो चिन्ह नै सकल। सासुरक लगीचमे एकटा गाछी छै, जेतए ब्रीफकेशकेँ कैरियरसँ उतारि कपड़ा बदलबाक हेतु सोचल। ब्रीफकेश खोललापर रंगमे भंग पड़ि गेल! किएक तँ पानि भीतर पहुँचि गेल छल। लाल दंत मंजन पानिमे घोरा कऽ क्रीच कएल कपड़ाकेँ रंगि देलक, संगे बिस्कुट पानिक संयोग पाबि कपड़ाक तहमे दही जकां जमि गेल छल। सासुरक सामग्री सभ एकदम धिनाैन भऽ गेल छल जे देखि आन्तरिक बेथा उत्पन्न भऽ गेल। घूमि जाएब सोचल, मुदा घुमिओ ने सकै छेलौं। ई बात हास्यास्पद होइत तँए ककरा कहितिऐक, तँए गुरक मारि धोकरा खाइक स्थिति भऽ गेल। आखिर साहस बटोरि कऽ लथ-पथ कपड़ा नेने साइकिलक हैण्डिल पकड़ने विदा भेलौं। बाटमे िकयो पूछए नै जे एना किएक? चिन्हार लोककेँ तँ सत्यपर परदा दैत कहुना ससुरक दलान तक एलौं। घंटीक शब्द कएल। किछु क्षणक पश्चात छोट सार आ सारि सभ दौगल आएल। सासु खिरकी लगसँ देखि रहल छलीह। हमर हतप्रभ अवस्था देखि पितिया ससुर बाजि उठला- ‘ओझहा भीजल छथि आ रूग्न देखाइत छथि की कारण?’ हुनको संग फूसि बाजि तँ खेपलौं। भीतरे-भीतर कपड़ा बदलबाक व्याकुलता बढ़ल जाइत छल। आँगनमे पत्नीकेँ हमर अएबाक सूचना जखने देलकनि आकि ओ धड़फड़ा कऽ आँगन अबैत छली कि एकाएक ओल्तीक टघारमे पएर पड़ि गेलासँ मोंच पड़ि गेलनि। हुनक चित्कार सूनि सासु, सरहोजि प्रभृति नारी गणक भीड़ लागि गेल। आब हमरापर के धियान देत! सभ हुनके परिचरजामे लागि गेल। हम तीतल वस्त्र पहिरने बधलग्गू जकाँ मूक दर्शक भेल रही। किछु कालक पछाति आंगन जेबाक हेतु अनुमति भेटल। पत्नीक कहरबाक शब्द हृदैकेँ विदीर्ण केने जाइत रहए। सरहोजि आ सारिक ऊपरसँ व्यंगवाणक प्रहार होइत रहए। आखिर कपड़ा बदलि स्वस्थ भऽ बसि गेलौं। जलपानक पश्चात यएह सुनबामे आएल जे कोन कुयात्रासँ चलल छेलौं जे अबिते-अबिते ललीक टाँगमे मोंच पड़ि गेलै। आखिर हमर बेथाक थाह केकरा छेलै जे सुनितए? मोने-मोन पचबैत छेलौं...।” “...रात्रि विश्राम शय्यापर जखनि पड़ल रही तखनि पत्नीक आक्रोशपूर्ण स्वर औरो बेचैन कऽ देलक। आखिर जखनि हम अपन कथा-बेथा कहि सुनौल तँ हुनको अश्रुपात् हुअए लगलनि, ऐ तरहेँ गेरूआक सम्पूर्ण भाग नोरक टघारसँ भीजि गेल आ कखनि नीन्न आएल से नै जानि। प्रात: कालक हुनक पएर फीलपाॅवक बिमारी जकाँ प्रतीत भेल। आखिर देहाती उपचारक संग किछु दबाइ-महलहमक ओरियौन करौल। तत्पश्चात् प्रस्थान करबाक नेआर केलौं। मुदा सरहोजिक प्रबल आग्रहपर रूकि गेलौं। हुनका लोकनिक कठचौल होइत- ‘हँ! दाइक पएरक दर्द तँ अहींक ससारलासँ ठीक हेतनि इत्यादि-इत्यादि।’ आखिर दिनक भोजन काल जेठ सरहोजि कहलनि- ‘ओझहा जेठक पटुआ सागक अलौकिक सुआद होइ छै जँ आमक टिकुला देल हो तँ...। हम बड़ यत्नसँ बनौल अछि। जमाएकेँ सागक तिमन देब निषेध होइत तथापि हमर आग्रह जे कनी ईहो खा लीअ।’ कहलियनि- ‘बेस लाउ।’ खा लेलौं। छोट सरहोजि दही-चीनी देलोपरान्त पाकल केरा सोहि कऽ चारि गोट छिमरि धऽ देलनि। अगत्या ऊहो आग्रह मानि खा लेलौं। हम इसनोफिलियाक पेसेन्ट रहबे करी साइकिल सवारी ई सभ बिमारीक हेतु बनि गेल आ डेरापर अबैत-अबैत दम फूलए लगल। तीन दिन धरि रोगशय्याक सेवन केलौं। सूइया-दवाइक बलपर त्राण तँ भेल, मुदा शरीर अखनो अति कमजोर बुझना जाइत रहए। वेतनमे कटौती हेबाक संभावना अछि तँए अहाँ जँ सहयोग करी तँ मेडिकल सर्टिफिकेट बना दिअ। अहाँकेँ डाक्टर सभसँ हेम-क्षेम नीक अछि। हम कहलियनि- पाँच गोट टाका फीस देबनि तँ किएक ने बना देता। ओ तमकि गेला आ कहए लगला- तखनि अहाँक कोन प्रयोजन फीस देलासँ तँ डाक्टरसँ जे मोन हएत से लिखबा लेब। हमहूँ जीवनमे सीखलौं जे मोनक बात केकरो नै कहबै। जरलपर नोन नै छीटू। एक तँ साइकिलक बेथा आ तैपरसँ अहाँक कठ हँसीपूर्ण बात दुनू हमर हृदैकेँ विदीर्ण करैत अछि। खैर, यात्राक फेर छल आ सासुक सिनेह-संकटक संकेत।” हुनक बात सुनि अन्तमे मुफ्तमे काज करा देबाक आश्वासन देलियनि। पुनश्च ओ अपन सासुरक पोटरी खोलए लगला, मुदा कार्यरत लोक की सुनत तँए संक्षेपणक सलाह दऽ हुनकासँ मुक्त भेलौं। मुदा आइयो सासुरक साइकिलक कथा-बेथा हास्यहास्पद रूपमे चर्चित अछि।¦¦¦ उमेश मण्डल 81म सगर राति दीप जरए-देवघर :: स्व. मायानन्द मिश्र तथा जीवकान्तक स्मृतकेँ समरपित 81म सगर राति दीप जरए केर आयोजन दिनांक 22 मार्च 2014केँ श्री ओम प्रकाश झाक संयोजकत्वमे संध्या 6 बजेसँ देवघरक बम्पास टॉनक बिजली कोठी-3 मे आयोजित भेल। ओयोजनक उद्घाटन दीप प्रज्वलित करि कऽ श्री ओ.पी. मिश्राजी केलनि। मिथिलाक गाम-गामसँ आ भारतक शहर-शहरसँ आएल कथाकार, साहित्यकार, समालोचक तथा साहित्य प्रेमीक कसगर जुटान छल। साँझक पाँचे बजेसँ जुटान हुअ लगल। मिडियाकर्मीक थहाथही शुरू भऽ गेल। शुभारम्भ मंगला चरणसँ श्री एस.के. मिश्राजी केलनि। झारूदारजी अपन सृजित अनुपम गीत “हम नै छी अहाँ योग यौ पाहुन/ अहाँ छी बड़ा महान/ स्वागत स्वीकार करू श्रीमान्/ अहाँ छी गंगा अहाँ छी यमुना/ पग धुलसँ पावण भेल अँगना...।” गाबि उपस्थित साहित्यप्रेमी आ साहित्यकारकेँ स्वागत केलनि। पोथीक लोकार्पण शुरू भेल। गजेन्द्र ठाकुरक संग सम्पादनमे सम्पादित मिथिलाक पंजी प्रबन्ध “जीनाेम मैपिंग भाग- 2” आ “जिनीयोलोजिकल मैपिंग” 950 एडीसँ 2009 एडी धरिक पंजीक लोकार्पण श्री ओम प्रकाश झा, डॉ. योगानन्द झा आ श्री राजीव रंजन मिश्रा जीक हाथे भेल। शिवकुमार झा ‘टिल्लू’जी रचित समालोचनाक पोथी “अंशु” केर लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल आ श्री बेचन ठाकुरजी केलनि। अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोष भाग-2, “मैथिली-अंग्रेजी कम्प्यूटर शब्दकोष” तथा बेचन ठाकुरक “ऊँच-नीच” नाटकक लोकार्पण सेहो भेल। दू शब्दक कड़ीमे प्रवेश केलौं। ओ.पी.मिश्रा, दिलीप दास, ओम प्रकाश झा, दैनिक समाचार पत्र प्रभात खबर केर सम्पादक श्री सशील भारती मैथिलीक दशा दिसापर अपन विचार प्रकट केलनि। ओ कहलनि- “अही तरहक आयोजन मैथिलीक सम्पूर्ण विकासक मार्ग सहज बनौत।” आयोजककेँ धन्यवाद ज्ञापन करैत एक-सँ-एक साहित्यकार अपन मनक खुलता बात मैथिली विकास लेल स्वतंत्रा पूर्वक मंचपर रखलनि। मुख्य अतिथि ओ.पी. मिश्राजी सेहो एकटा सुन्दर गीत गाबि स्वागतक भाव प्रकट केलनि। राजीव रंजनजी स्वलिखित गजल गाबि अपन भाव प्रकट केलनि। सगर राति दीप जरए (सभ अज्ञानीमे ज्ञानक दीप जरौ) कथायात्राक मादे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक विचार बकतनक संग लिखतनमे सेहो विस्तारपूर्वक आएल। दू पिट्ठा कागत हाथे-हाथ बाँटल गेल। जे ऐ लिंकपर उपलब्ध अछि- http://maithili-samalochna.blogspot.in/…/…/blog-post_24.html 34 गोट लघुकथा/विहनि कथाक पाठ भेल। सात पालीमे बाँटि सभ कथाक पाठ करौल गेल। अंतिम पाली छोड़ि छबो पालीमे पठित कथापर तीन गोट समीक्षकक समीक्षा अबैत रहल आ समीक्षाक समीक्षा सेहो होइत रहल। समीक्षाक समीक्षा केनिहार सभ छला राजदेव मण्डल, नन्द विलास राय, भाष्कर झा, उमेश मण्डल, चन्दन झा, डॉ. धनाकर ठाकुर, बिपीन कुमार कर्ण इत्यादि। प्रतिसमीक्षाक क्रममे एक गोट विचारणीय टिप्पणी आएल। ओ छल, युवा समीक्षकक। अपन विचार व्यक्त करैत कहलखिन- “समसामयिक कथाक गहराइकेँ आधुनिक पाठक स्वागत नै करए चाहैए। से ई कथाक दोष भेल। फलस्वरूप पाठकक अभाव अछि।” संचालक गजेन्द्र ठाकुरजी ऐ विचारपर असहमति जँतौलनि। कहलखिन- “ई तँ भाषाक विशेषता छिऐ जे कथानककेँ गहराइ प्रदान करै छै। जेकर अभाव मैथिली साहित्यकेँ पाठक विहिन केने रहल।” ऐ तथ्यकेँ सत्यापित करैत ठाकुरजी आइसलैण्डक भाषाक जिकिर केलनि। दू सत्रक पछाति भोजनावकाश भेल। मिथिलाक खान-पानक आधुनिक रूप अकतियार केने छला आयोजक। करीब 125 गोटे एक पाँतिमे बैस भोजन केलनि। ऐ तरहक समायोजनसँ हुनका मुँहक रोहानी फुलाएल गुलाबक फूल सन देखबामे आएल। बारीक सभ फुदैक-फुदैक अपन-अपन जिम्माकेँ जीतैत खेलाड़ी जकाँ निर्वहन करैत देखल गेला। भोजनक घंटा भरि पछाति पुन: अगिला सत्रक यात्रा शुरू भेल। पठित कथापर समीक्षा हेतु विशेष सुिवधा प्रदान कएल गेल छल। ओइ ई जे जँ समीक्षक पठित कथाकेँ कोनो कारणे धियानसँ नै सुनि पबथि तँ हुनका लेल कथाक पाण्डुलिपि उपलब्ध करौल जाइ छल। संचालकक कहब रहनि जे मैथिली साहित्यमे समीक्षाक स्थिति उमदा नै अछि। ऐपर श्री अरविन्द ठाकुर असहमति व्यक्त केलनि। ओ कहलनि- “सगर राितक अलिखित निअम रहल अछि जे समीक्षापर समीक्षासँ गोष्ठीमे विवाद बढ़ि सकैए तँए एहेन कार्यसँ बँचक चाही।” सम्पूर्ण कार्यक्रमक लाइव प्रसारण कएल गेल। सगर रातिक इतिहासक पन्नामे ई एक गोट अनुपम कार्य सिद्ध हएत। सम्पूर्ण कार्यक्रमक विडिओ यू-ट्यूबपर उपलब्ध करौल जाएत तेकरो बेवस्था आयोजक केने छला। मैथिली साहित्यकेँ पूर्णत: इलेक्ट्रॉनिक स्पोर्ट भेटौ ऐ हेतु आयोजक प्रतिवद्ध छला। अगिला गोष्ठी हेतु दू गोट प्रस्ताव आएल। बहुसंख्यक साहित्यकारक विचारकेँ आगू बढ़बैत अध्यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्डल भावी संयोजककेँ दीप आ उपस्थिति पुस्तिका हश्तगत करौलनि। 31 मई 2014केँ मधुबनी जिलाक मेंहथ गाममे 82म कथा गोष्ठी हेतु भावी संयोजक श्री गजेन्द्र ठाकुर समगर्दा हकार दऽ सभकेँ आमंत्रित करैत कहलखिन- बालकथापर केन्द्रित अगिला गोष्ठी आयोजित हएत।” अंतमे संयोजक श्री ओम प्रकाश झा आयोजक धन्यवाद ज्ञापन करैत कहलनि- “81m Sagar Raati Deep Jaray katha Gosthi 22 March 2014 saanjh sa shuru bha ka 23 March 2014 ke bhor me safalta poorvak Deoghar me sampann bha gel. Ehi beruka katha gosthi ke swargiy Mayanand babu aa swargiy Jeevkant ke samarpit kayal gel. Gosthik adhyakshta sri Jagdish Pd Mandal kayalanhi aa sanchalak chhalaah Sri Gajendra Thakur. Mukhy atithi Sri O. P. Mishra chhalaah. Kul 29 got kathaakaarak dwara 35 got katha paaTh kayal gel. Samalochna seho badd neek rahal. Kul milaa ka kathaa goshthi ekTa neek workshop saabit bhel. Katha goshthi me aaynihaar sab kathakaar lokani ke hum hriday sa aabhari chhi. Sangahi ahaa sab shubhkaamna denihaar mitra sabhak seho aabhari chhi. Kichhu gote anupasthitik khed prakaT karait shubhkaamna prakaT kelanhi, hunko sabhak aabhari chhi. Je jaani boojhi ka nai aylaah tinko aabhari chhi kiyak ta hunkar vyavhaar humra bheetar Maa Maithilik prati pratibaddhtaa aar badhaa delanhi.” 81म सगर राति दीप जरए- देवघरमे सुसम्पन्न भेल 82म कथा गोष्ठी मेंहथमे होएत मायानन्द मिश्र जीवकान्त स्मृति-सगर राति दीप जरए केर 81म कथा गोष्ठी– देवघर (झारखण्ड) संयोजक- ओम प्रकाश झा उद्घाटन सत्र- दीप प्रज्वलन- श्री ओ.पी. मिश्रा एवं समस्त कथाकार संचालन- ओम प्रकाश झा लोकार्पण सत्र- अध्यक्ष- जगदीश प्रसाद मण्डल मुख्य अतिथि- श्री ओ.पी. झा आ श्री गजेन्द्र ठाकुर संचालक- उमेश मण्डल दू शब्द- 1. ओ.पी. झा, अवकाश प्राप्त अभियंता- झारखण्ड सरकार 2. सुशील भारती, संपादक, प्रभात खबर हिन्दी दैनिक। 3. दिलीप दास 4. ओम प्रकाश झा 5. मिथिलेश कुमार 6. जगदीश प्रसाद मण्डल कथा सत्र- अध्यक्ष- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, वरिष्ठ साहित्यकार मंच संचालक- श्री गजेन्द्र ठाकुर, संपादक, ‘विदेह’ इण्टरनेशनल ई-जनरल पहिल सत्रमे पठित कथा एवं कथाकार- असली हीरा- श्री दुर्गानन्द मण्डल (निर्मली) रिक्शाक भाड़ा आ बुधिए बताह- श्रभ् फागुलाल साहु (सखुआ) बुढ़िया मैया- ओम प्रकाश झा (भागलपुर) केते बेर- उमेश मण्डल (निर्मली) समीक्षक- योगानन्द झा राजदेव मण्डल अरविन्द ठाकुर प्रमोद कुमार झा समीक्षाक समीक्षक नन्द विलास राय चन्दन झा धनाकर ठाकुर दोसर सत्र- सभसँ बड़का भी.आई.पी. गेष्ट- श्री नन्द विलास राय (भपटियाही) डरक डंका- श्री राजदेव मण्डल (मुसहरनियाँ) ई छी हमर मजबूरी आ इमानदारीक पाठ- श्री राम विलास साहु (लक्ष्मिनियाँ) अप्पन माए-बाप- श्री ललन कुमार कामत (ललमनियाँ) तेसर सत्र- छिन्ना-झपटी- श्री शिव कुमार मिश्र (बेरमा) बड़का मोछ- श्री कपिलेश्वर राउत (बेरमा) उतेढ़क श्राद्ध- श्री शम्भू सौरभ (बैका) जातिक भोज- श्री उमेश पासवान (औरहा) चारिम सत्र- गुरुदक्षिणा- डाॅ. योगानन्द झा (कबिलपुर) अपराध- श्री पंकज सत्यम् (मधुबनी लगक) ककर चरवाही आ चुनावधर्मी लोक- डॉ. उमेश नारायण कर्ण कबाउछ- डॉ. धनाकर ठाकुर पाँचम सत्र- आन्हर- श्री अखिलेश कुमार मण्डल (बेरमा) सरकारीए नौकरी किएक- बिपीन कुमार कर्ण (रेवाड़ी) बनमानुष आ मनुष- डाॅ. शिवकुमार प्रसाद (सिमरा) वृधापेंसन आ मजबुरी- श्री शारदानन्द सिंह पानि- श्री बेचन ठाकुर छअम सत्र- सत्ता-चरित- श्री अरविन्द ठाकुर (सुपौल) बापक प्राण- श्री भाष्करानन्द झा भाष्कर (कोलकाता) संबोधन- श्री चन्दन कुमार झा (कोलकाता) ठीका- श्री आमोद कुमार झा चौठिया- श्री अच्छेलाल शास्त्री (सोनवर्षा) सातम सत्र- तखन, जखन- श्री गजेन्द्र ठाकुर (दिल्ली) चैन-बेचैन- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (बेरमा) ऐ तरहेँ देवघरक गोष्ठीमे कुल कथाकारक संख्या 29 छल। 34 गोट कथाक पाठ भेल। गजेन्द्र ठाकुर बाल विहनि आ लघु कथा पर केन्द्रित "कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा" -८२म सगर राति दीप जरय- गोष्ठीमे पठित
रेस भोरेमे मास्टर साहेब कहि देलखिन्ह जे सर्वसीमा जा कऽ दौगैमे, हिसाब बनबैमे, फांगैमे, नेङरा रेसमे जीतत ओकरा ओतऽ पुरस्कार जे भेटतै से तँ भेटबे करतै, सङमे स्कूल दिससँ सर्टिफिकेट सेहो भेटतै। शोभित दौगैमे बड्ड तेजगर। सङी सभ ओकरा लुक्खी कहै छलै। छाती तानि कऽ दौगै छलै। जेना धनुष गोल होइ छै तहिना ओकर छाती घुमि जाइ छलै। मास्टर साहेब कहैत-कहैत मरि गेलखिन्ह जे दौगै कालमे छाती टेढ़ किए करै छेँ। मुदा ओ बुझबे नै करै जे केना छाती टेढ़ भऽ जाइ छै। अपने मोने भऽ जाइ छै। ओ तँ खाली दौगै छै, केना छाती मुड़ि जाइ छै से ओकरा पते नै चलै छै। ओना स्कूलमे दौगैमे ओ फर्स्ट करै छलै। मुदा मास्टर साहेब कहलखिन्ह- गामक स्कूलक रेस आ सर्वसीमाक रेसमे अन्तर छै। ओतऽ भरि जिलासँ लोक सभ एतै। ओतऽ दौगबाक टेकनिकमे परिवर्तन करऽ पड़त। ओतऽ सभ तैयारी संग अबै जाएत, ओतऽ सेकेण्डक अन्तरसँ जीत-हारिक निर्णय हएत। शोभित भोरे उठि कऽ तैयारी करऽ लागल। पोखरि दिस जाए तँ दौगैते। स्कूल जाए तँ दौगैत, माए दोकान पठबै तँ ओतौ जाइ छल दौगिते। सभ लुक्खी कहै छलै, केहेन तेजगर छै हौ, लुक्खी सन दौगै छै। ओ सभसँ पुछै- की हम दौगै काल धनुष सन तनि जाइ छिऐ। उत्तर भेटै छलै- हँ हौ। एतेक तेज तँए ने दौगल होइ छह। ई सुनिते शोभितक मोन छोट भऽ जाइ छलै। मास्टर साहेब ओकरा कहलखिन्ह- पाछू मुँहे जे शरीर उनार होइ छौ से आगाँ मुँहे उनार करऽ तखन जा कऽ चालि सोझ हेतौ। आब शोभित सदिखन आगाँ झुकि कऽ चलऽ आ दौगऽ लागल। कखनो पएरमे ठेस लागि जाइ छलै तँ कखनो मुँहे भरे खसि पड़ै छल। जेना-तेना आगाँ मुँहे झुकि कऽ दौगनाइ ओ शुरू केलक। मुदा स्कूलक प्रैक्टिस रेस भेलै।जइ ठाम सभ बेर शोभित फर्स्ट करै छल ओतऽ ऐबेर ओ तेसर स्थानपर आएल। मुदा मास्टर साहेब ओकरा प्रोत्साहित करैत रहला। कहैत रहलखिन्ह जे शोभित, आब तोहर टेकनिक ठीक भेलौ, नव टेकनिकमे गति शुरूमे कने घटि जाइ छै, मुदा फेर जखन गति बढ़नाइ शुरू हेतौ तँ पहिनेसँ बड्ड बेशी गति भऽ जेतौ। पुरनका टेकनिकमे अधिकतम गति तूँ पाबि लेने छेँ, मुदा से जिला स्तर लेल पर्याप्त नै छौ। मुदा नव टेकनिकमे अधिकतम गति तोरा जिला स्तरपर सभसँ बेशी गति देतौ। शोभितक संगी सभ किचकिचाबै। ई नवका टेकनिक तँ तोरा स्कूलोक रेसमे पाछाँ कऽ देलकौ। आब आशमे जिबैत रह जे आब गति बढ़त तब बढ़त। मुदा शोभितकेँ अपन मास्टर साहेबपर विश्वास रहै। पहिने तँ ऐ नव टेकनिकमे चललो नै होइ छल। मुँहे भरे खसि पड़ै छलौं। आब दौगऽ लागल छी। स्कूलमे तेसर स्थान आएल। माने प्रगति अछि। देखै छी आगाँ की होइए। शोभित अभ्यास करैत रहल। नव टेकनिकमे ओकरा आब बेशी आराम लागै छलै। पहिने लुक्खी सन दौगैमे जतेक घाम बहराइ छलै, ओइसँ बेशी आसानीसँ आब ओ दौगै छल। लागै छलै जे पएरमे स्प्रिंग लागि गेल होइ। असगरे दौगैमे ओकरा अन्दाज नै होइ छलै जे ओ कतेक गतिसँ दौगि रहल अछि। मुदा अभ्यास ओकरा आब भीर नै लागै छलै। मास्टर साहेब स्कूलमे प्रैक्टिस मैच करेलन्हि। शोभित पछिला बेरक हारिक बाद आशंकित छल। से ओ कोनो तरहक ढिलाइ नै देलक। जावत दोसर छौड़ा सभ अदहे मैदान दौगल छल शोभित पूरा मैदान पार कऽ गेल। मास्टर साहेब प्रसन्न रहथि। हँ शोभित, आब तूँ जिला स्तरक रेस लेल तैयार छेँ। शोभितक संगी सभक मुँह बन्न भऽ गेलै। आब शोभित मास्टर साहेबक संग सर्वसीमाक अन्तिम रेसक लेल तैयारी शुरू कऽ देलक। राजदेव मण्डल, गाम- मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा (निर्मली), जिला- मधुबनी। बाल विहनि आ लघु कथा पर केन्द्रित "कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा" -८२म सगर राति दीप जरय- गोष्ठीमे पठित
रूसल बौआ दुर्गापूजाक मेला शुरू भऽ गेल छै। अष्टमी बीत गेलै, आबो नै हेतै मेला। मेलामे तँ होइते छै, खुशी, उत्साह, मनोरथ, मिलन। घर-घर बनि रहल छै मेवा-मिष्टान, तरुआ-भुजुआ आर कते चीज-बोस। रंग-बिरंगक नुआ-बस्तर पहिरने धीया-पुताक मुँहपर खुशी नाचि रहल अछि। सभ मेला देखबाक लेल तैयार भऽ रहल अछि। फेकन हड़बड़ाइत अंगना आएल आ पत्नीसँ पुछलक- “बेचू बौआ कहाँ अछि? खेलक आकि भुखले अछि?” पत्नीक मोनमे तामस औनाइते छलै। एकबेर तामससँ भरल आँखिए ताकलक आ बजल किछो नै। ओकरा दिश बिनु देखनहि फेकन फेर बजल- “एकोटा रुपैया तँ घरमे छलै नै। सोचलौं- छौड़ा मेला देखैले जाए लगितै तँ मांगबे करतै। एक गोड़ेसँ हथपैंच लेलौं। आ बौआकेँ देखबे नै करै छी। कते गेल अछि?” “जेतै कते, कानै छलै। दुआरिपर रुसल बैसल छै।” “की भेलै से?” “हेतै की, लवका पेण्ट-शर्ट लेतै।“ “ओह, अखनी तँ पैसाक बड्ड अभाव छै। ओकरा समझा-बुझा दैतिऐ से नै।“ “अहाँक धीया-पुताकेँ के समझाइत। कहै छलै जे अमितकेँ लवका पेण्ट-शर्ट ओकर बाबू आनि देलकै। ओ भोरेसँ देखा-देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबैत अछि। औंठा देखा कऽ इहू-इहू कहैत अछि।“ “अहाँकेँ कहबाक चाही ने जे अमितक बाप धीरेन्द्र बाबू बड़का लोक छथि। पलिबारमे सरकारी नौकरीयो छै। जमीनो हमरासँ बहुत बेशी छै। हुनकर बराबड़ि हम केना करबै?” “से गप्प हम कहलिऐ। रौ बौआ, अमित बड़का लोक छिऐ। उनटे तमसाकेँ बजल- अमितवा कद-काठीमे हमरासँ छोट अछि। परीक्षामे हमरासँ कम नम्बर लाबैत अछि। खेलो-कूदमे हमरासँ हारले रहैत अछि। ऊ हमरासँ नम्हर केना भेलै।– आब अहीं कहू जे केना बुझेबै? की कहबै?” बझल कंठे फेकन बजल- “आ हमहीं की करबै? एक साल रौदी तँ एक साल दाही। जी-जान लगा कऽ काज करै छी, तइयो उपजा ओतने होइत अछि। देह रोगाएल रहैत अछि। बाहरो कमेबाक लेल केना जाएब। हमरा सन छोट गिरहतकेँ देखनिहार कियो नै। अहाँ तँ देखबे करै छी। घरक खर्चा नै जुमैत अछि, तइयो धीया-पुताकेँ पढ़बै छी।” पत्नीक सुरमे तामस भरल छल- “हमर सऽख-सेहन्ता तँ डहि-जरि गेल। आब धीयो-पुतोक वएह गति भऽ रहल अछि। अहाँ कोनो करमक लोक नै छी। अहाँ बुत्ते नै किछो भेल आ नै हएत।” अहाँ कोनो करमक लोक नै छी, ई वाक्य जेना फेकनक कलेजामे बरछी बनि गड़ि गेलै। तन-मनसँ समर्पित भावे काज केनिहारकेँ जँ फलक रूपमे दुत्कार भेटै तँ एकर प्रतिकार की? फेकनक मोन औना रहल छै। बेवश, लचार। ओकरा आँखिसँ भरभरा कऽ लोर खसि पड़लै। आसमे जेना आगि लागि गेल होइ। ओकर बेचू बेटा अढ़मे ठाढ़ भऽ कऽ सब किछो सुनै छलै। बापकेँ कानैत देखि नै रहल गेलै तँ लगमे जा कऽ बाजल- “बाबू अहाँ नै कानू। कोनो कि अंगे-पेण्टसँ लोक मेला देखै छै। ऊ लवका पेण्ट-शर्ट देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबै छै। हम परीक्षामे ओकरासँ बेसी नम्बर लाबि कऽ ओकरा बुड़बक बनेबै।” सपना सन….। क्षण भरिक लेल जेना नम्हर-छोट, ऊँच-नीच एके रंग बुझेलै। फेकन बेटाकेँ भरि पाँज पकड़ि लेलक। बाप-बेटा मिलैत देखि पत्नी मुस्की मारलक जे बाप-बेटा दुनूक लेल प्रश्न बनि ठाढ़ भऽ गेल। नीतीश कर्ण प्रेमक बुन्नी उमरि- उमरि, आई हमरा पर बरसल हमर करेज के परती बारी में, प्रेमक गाछ आई उपजल की जाने औ कौन मौसम छल, की जाने औ कौन नक्षत्र हमर मनक अन्हार कोठरी में, भेल कोना इज़ोर सर्वत्र आई धरि नई सोचलउं सपनों में, हमरो पर ई बरखा बरखत मिलते देरी नैन नैन स’, हमरो पर ई बिजुरि करकत नैन झुकेने ओ बैसल छल, मिलते नैन की जादू केलक किछु कहितहुं किछु बाजि नई सकलहुं, की जाने कोन मन्त्र ओ पढ़लक जानि प्रेमक मौसम छल ओ, किछु हमहुं अंदाज लगेलउं कोना भिजलउं से बुझि नई सकलउं, तै बरसातक लाथ लगेलउं © नीतीश कर्ण कोना सुनाबु हाल बिरह के नोर आँखि में आबईये करेज मे एकटा हुक उठल आ प्राण ठोर तक आबईये जानि कोन अपराध केलहु हम, जेकर सजा देलहु आहां हमरा जिनगी हमर ओई फूल जाकाँ भेल, जेकर रस चुसलक कोनो भंवरा निश्चहि घोर अपराध हमर छल, जे हम नेह लगेलहुँ आब अहु सs बइढ कs सजा देब कि, जिबैत जान लs लेलहुँ आबि गेल फेर आमक महिना, जखने गाछी में महुआ गमकल हरियर भेल बेमाय करेजक, सुनबा सs कोयली के कु-कल नैन बिछेने आइयो बाट पर, पैरा अहिं के तकैत छी मन पता नै कतs लटकल अछि, नै सुतई छी नै जागई छी ओहि अतीत मे तकबा के, हम अखनेहु इच्छा रखने छी मुदा देह हमर सिहरी उठइये, जखन गप्प आहा के करैत छी किछु बुईझ नै आबि पडेयै एहन कोन जुलुम हम केलहुँ सभहे किछु गेल हराए, किया हम प्रीत लगेलहुँ © नीतीश कर्ण बिनीता झा **जिनगी** जिनगीकेँ खेलक अलगे मिठास कखनो देत आस आ कखनो निराश जे क्यो बुझि गेल ई छोट छिन बात जिनगी नै करतै तकरा हदास बात धेने नै भेटत ककरो किछू बेस बढ़ने निकहो टा हैत नाश आगा पाछा के बारे मे की सोचै छि कर्म करू आर राखु अपना पर विश्वास दुःख सुख संगी ऐ जीवनक करनीकेँ राखू अपन टा ख़ास *बिनीता झा किछु पाँति राधाकृष्ण सरकार लेल: रथ चढि ऐला सरकार, भक्त जन गाबै झूमै सजल सभक घर द्वार भक्त जन गाबै झूमै श्वेत,ललित,हरित,पीयर श्रृंगार भक्त जन गाबै झूमै सुन्नर सजल भोजनिक थार भक्त जन गाबै झूमै करैथ आदर आ सत्कार भक्त जन गाबै झूमै रथ जतराकेँ त्यौहार भक्त जन गाबै झूमै राधाकृष्ण सभक पालनहार भक्त जन गाबै झूमै बिनीता झा जगदानन्द झा “मनु” गजल एहि ठाम साट हेराए गेलै रामा फेर आइ बलम बौराए गेलै रामा चढ़ल साइठक जबानी केहन बुढ़बापर चुलहाक नार चोराए गेलै रामा गाममे बसल घरे घर छै कंठी धारी साँझ परल माँछ झोराए गेलै रामा देख ढंग पुतक करनी आजुक आँगनमे बाप केर आँखि नोराए गेलै रामा ‘मनु’ समाजमे सगर मोदी जीकेँ अबिते माल संग चोर पकराए गेलै रामा (मात्रा क्रम : २१२१२१-२२२२-२२२) जगदानन्द झा ‘मनु’ विन्देश्वर ठाकुर ने देखलौ अै मुखरा इजोर सजना मन होइय हमर झकझोर सजना चलै कोनो काज तकैछी मेहनतमे बड शक्ति होइछै अहाक कोनो बातके जबाब नै मुसिक देखाओल दातके जबाब नै अहा अतेs छोट बातपर अतेs बेसी आशु बहाएब हम सोचने नै छलौ ! अहा किये कनलौ ? हमरा कहु ने कि अहाक नैनस खसल नोर अहाक मात्र अछि ? एहिपर हमर कोनो हक नै ? एकटा गप सुनि लिअ, ओ आशु अहाक लेल केवल पानि मात्र टा भs सकैय मुदा हमरा लेल त ओ कोनो मोतिके दानास कम नै अछि अहाके हिर्दयमे लागल टिस हमरा लेल कोनो पैघ सदमासs कम नै अछि ललकार [कविता] घरमे चाउर नै फुटानी करैछे नठा बरदस जोतानी करैछे गाउमे घर ने चौरीमे खेत बिच्चे सडकपs खर्ह्यानी करैछे । तोरा बापके के नै चिन्हैछौ तिनकौरिया बजारपर कोबी बेचैछौ तेकरे बेटा जोल्हा छौडा आइ हमरासँग दिलग्गी करैछे । कि छौ तोहर अपन शान कि बनौने छे पहिचान देखि करैछौ दूर छिया सब किय एना तो आगि मुतैछे । सुन रौ बौवा आबो किछु सिख एना नै तो बनै ढीठ बियाह नै करतौ कोनो छौडी बरद सन जे भेस रखैछे । घसनठहा नै बनै आब फुर्तीस किछु करै काज बाप कतेs दिन गुज्जर चलेतौ किय ने हमर बात बुझैछे । जीवन तोहर निक भs जेतौ चलै कोनो काज तकैछी मेहनतमे बड शक्ति होइछै किय अनेरे नेप ढारैछे । बिन्देश्वर ठाकुर धनुषा/ नेपाल हाल : कतार स्वार्थी नेता स्वार्थी सेबक सब देखाबे फुसिक शान एहन बिडम्बना सबठा पसरल कहु कोना बनत सबिधान लोगस लोग परेशान छै एत बती के बाते नै करी सत्ता लिप्सा पत्ता चट्टास कोना हेतै नव देश निर्माण आशीष अनचिन्हार गजल हाथमे वेद रहै जीहमे छेद रहै घेंटमे घेंट फँसल मोनमे भेद रहै ठोर बस हँसि रहल मोन निर्वेद रहै खून सभ चूसि रहत से तँ उम्मेद रहै साँप सभ एक समान मात्र विष भेद रहै सभ पाँतिमे 212+2112 मात्राक्रम अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतमे अतिरिक्त लघु लेबाक छूट लेल गेल अछि बाल गजल जाइंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे नाचिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे खोलिंग द बरतन लेइंग द चिन्नी खाइंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे मारिंग द लाठी फोरिंग द माथा भागिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे हगनी मुतनी आ छेछरिया कटनी पादिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे बात घरैया सभ हो की छौंड़ीकेँ बाजिंग द गाछीमे चुप्पे चुप्पे सभ पाँतिमे 22222+22222 मात्राक्रम अछि अधिकांश पाँतिमे दूटा अलग-अलग लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। भक्ति गजल कत' के कनियाँ कोने महफा हो राम कत' के समधी कोने दुल्हा हो राम देहक कनियाँ कर्मक महफा हो राम सत समधी दुल्हा परमात्मा हो राम किनकर हाथें सोहागिन बनलहुँ हम तँ कोने सेनुरबा छै सोभा हो राम हम जम हाथें सोहागिन भेलहुँ आइ नोरक सेनुरबा छै शोभा हो राम सभकेँ भेटै कर्मक फल अपने मोने गाबै निरगुण अनचिन्हरबा हो राम सभ पाँतिमे 222+222+222+21मात्राक्रम अछि। भक्ति गजल से एलै केहन दिनमा ए राम की फुटलै माटिक बसना ए राम नै रहलै कोनो काजक धन बीत किनलहुँ जे दिल्ली पटना ए राम धधरामे सोना सन पोसल देह जरि जरि भेलै से मटिया ए राम छुटलै बेटा बेटी दुनियाँ संग भेलै जखने पचकठिया ए राम ईहो निरगुण जे गाबै तकरा तँ भेटै ओ अनचिन्हरबा ए राम सभ पाँतिमे 222-222-2221 मात्राक्रम अछि कविता ? डारि + पात= की हेतै लोक – लोक= की हेतै जानवर x मनुख=की हेतै सुख / दुख=की हेतै हँसी < हँसी=की हेतै नोर > आँखि=की हेतै गजल दुनियाँ अन्हार तोरा बिनु सभटा बेकार तोरा बिनु हेड़ा गेलै हँसी हम्मर छै नोरक धार तोरा बिनु आँचर काजर पिआसल छै नै छै उद्धार तोरा बिनु तोहर छोड़ल इयादे टा करतै उपकार तोरा बिनु चीन्हल जानल मुदा तैयो छी अनचिन्हार तोरा बिनु सभ पाँतिमे 2222-1222 मात्राक्रम अछि गजल चिक्कन चुनमुन पात छलै सुंदर सन अहिबात छलै कनिते बीतल सभहँक साँझ केहन खुनिया प्रात छलै मिड डे मीलक झगड़ा सन फेकल फाकल भात छलै सुग्गा मैना पंच बनल बगड़ा बगड़ी कात छलै दिल्ली पटना आ पंजाब छूटल बोनि बुतात छलै दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। दोसर आ पाचँम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूट अछि। गजल गेलहुँ हम हुनका लग एलथि ओ हमरा लग चोट छलै पैघ मुदा बजबै हम ककरा लग रंगक धुरखेलामे करिया छै उजरा लग हुनकर देह हमर देह धधरा छै धधरा लग बनि गेलै जोग हमर अपने छथि पतरा लग सभ पाँतिमे 22+22+22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग शब्दक लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूट अछि। गजल दिनगर मुदा तैयो तँ अन्हार बड़ ऐ ठाम छै उल्लूक जैकार बड़ जै देशमे खाली बलत्कार छै तै देशमे धर्मक चमत्कार बड़ ई साँइ छै ई राम छै ई खुदा ऐ लेल उठि गेलैक हथियार बड़ छै लक्ष्य बौआएल आ बेकहल देखू मुदा हुनकर तँ सिंगार बड़ आँगन उदासल छै पिआसल दुआरि चुपचाप ताकै हमरा ई चार बड़ सभ पाँतिमे 2212-2212-212 मात्राक्रम अछि चारिम आ पाँचम शेरमे एकटा-एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि बाल गजल इस्कूल बंद हतै बाह रे बाह मास्टर उदास भेलै बाह रे बाह माए हमर पसारै खूब मुस्की बस्ता हमर छिनेतै बाह रे बाह किरकेट खेलबै हम खेतमे आब डबरामे गेंद जेतै बाह रे बाह फूटल मुदा ई निगर बोइयामेसँ खटगर अचार खेबै बाह रे बाह बाबा डरा कऽ हमरा नै घुमेता तँ हमहीं घुमा कऽ एबै बाह रे बाह सभ पाँतिमे 2212+ 1222+1221 मात्राक्रम अछि। दोसर, तेसर आ चारिम शेरमे दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल सगरो सुनलहुँ ठोरे ठोर हो रामा एलै महँगी भोरे भोर हो रामा सरकारक संगे हमरा लगैए जे भगवानो छै चोरे चोर हो रामा हँसि रहलै बइमानक संग दल बदलू भलै जनता नोरे नोर हो रामा चुनि चुनि खेलक माउस आब जनता लेल बचलै खाली झोरे झोर हो रामा अठपहरा छै मजदूरक मुदा तैयो हमरे टूटै पोरे पोर हो रामा सभ पाँतिमे 222+2222+1222 मात्राक्रम अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त अछि। गजल कागजपर विकास लिखल छै बस औंठा निशान बचल छै एबे करतै कहियो ने कहियो आसेपर अकास टिकल छै हेतै बाँट फाँट आ बखरा भैयारी तँ खूब जुटल छै भुज्जा सन बनल छै ई सपना फूटल खा कऽ काँच छुटल छै ओ जे खून छै से तँ ऐठाँ नोरे सन निकलि कऽ खसल छै सभ पाँतिमे 2221+21122 मात्रकाक्रम अछि। दोसर, तेसर, चारिम आ पाँचम शेरमे शब्दक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। बृषेश चन्द्र लाल बालगीत फुर्र-फुर्र बगड़ा, उड़ि-उड़ि बैसए; कीरा-फटिंगा, बिछ-बिछ खाए । घिर्र-घिर्र घुमि, चहुँओर देखिकए; सुर्र- फुर्र, खोंता चलि जाए । चीं-चीं लोल, चिआरने भुटका: बगड़ा उगलि, खुअओने जाए । याहले-वाहले, मोटाएल भुटका: जोड़ी बना, फुर्र भ’ जाए ।। फेर वएह दिन, जिनगी ओहिना; फुर्र-फुर्र, भरि अकाश रमाए । फुर्र-फुर्र बगड़ा, उड़ि-उड़ि बैसए; कीरा-फटिंगा, बिछ-बिछ खाए ।। प्रदीप पुष्प तूँ .. तूँ त' बिसरि गेल हेबें, मुदा बिसरल नइ हैत हमरा तोहर पछुआरक बाट, धातरिक गाछ आ आमक नबगछुली, बसबिट्टीक अन्हार, मधुमाछीक खोंता, ओलती लग गाड़ल ढेकी, आ बन्हन देल झाँझनिक टाट.. .. इ सब नइ बिसरल हैत हमरा। तूँ.. हँ हँ तूँ.. तूँ बदलि गेल हेबें.. मुदा बददल नइ हैत भादोक राति, जेठक दुपहरिया, अषाढक ओस आ कतकी बोखार, नवान्नक चूड़ा आ दही अँचार, ओढनीमे मूरही आ घुट्ठीमे जाड़, ठीके, ई सभ नइ बदलल! तूँ.. सुनने तोरे कहै छियौ, तूँ, तूँही नुका लेने हेबें अपनाकें, मुदा नुकायल नइ आइयो .. तोहर हमर नाओं. तोहर हाथक डाँरि, ओइमे हमर मूँह, तोहर आँखि आ गामक कान, बैसल पंच आ भरल दलान, तैयो मेलामे भेटब नुकाक', चोराक' खुआयब मिट्टा पान, पँचटकिया झुमका लेल घूमब दोकाने दोकान, अपस्याँत सन हम आ तोहर दूधिया गाल पर मुसकी ललाम, सत्ते, ई आइयो नइ नुकायल हेतौ। -प्रदीप पुष्प कठपुतरीकें नाच ई जीवन बिधना जे रचि देल रे। समय नचाबैए दिन राति सबकें के जानए की खेल रे। 1.क्षण संतुष्टा क्षणहिमे रूष्टा मतिकें गति अद्भूत रे। कखनो कनाबए कखनो हँसाबए खनहि बिलग खन मेल रे। कठपुतरी.. 2.जतबा घड़ी लेल जोत जेकर होउ ततबे घड़ी लेल दीप रे। बहैए बसाती बुझि जाइ बाती कतबो भरल होऊ तेल रे। कठपुतरी.. 3.यश-अपयशकें भय नइ जेकरा तकर जीवन की मोल रे। वीर प्रबल होउ,शास्त्र रटल होऊ तैयो बनल बकलेल रे। कठपुतरी.. गीत/संगीत-प्रदीप पुष्प(c) फिल्म -जय श्यामा माइसँ पंकज झा हम बुरबकहा बात की बुझब, एक स एक पढुवा आहि ठाम, ककरो कियो मोजर नई करइ, बदैल रहल अइछ मिथिला धाम। हम अधलाहा कान थोपी कS, सुनी रहल छी भजन अजान, मुदा मोजर बस ओकरे छई जे, गप सँ हरी लेत दोषरक प्राण। नई बाजू यो गोरका कक्का, बाप पित्ती के नई कोनो मान, किछु कहबई तँ झट स थुकि देत, देहे पर ओ खा का पान। धीया-पुता की बरका-जेठका, एकहि ढठा एकहि शान, खखइश दियउ त प्राण अवग्रह, क देत सबटा बजा समांग। की ई ओ मिथिला छई जक्कर, करइ छलौ हम सब गुमान, बरको भइया के देखिते सब, परा जाइत छल छोइर दलान। "पंकज" बेचन महतो खुशीके नोर सुबह समुन्दर किनारक शेर आँइख करहल छल ओमहरसँ असमानि रङगक क्षितिजसं आइल समुन्दरी छालस खुसीकेबुलबुल। सबमाला बनारहल छेलै चाँद सर्यसं ज्योतिलाइब मनि जराअ रहल छेल समुन्दरक आँखक नोर सीपसं निकलल मोती ओखरा अपने छल किनारमे समतल आकृति ईटाजका ओइमे पथर और झारसबहक बिचमे एगटा सबस बडका उचपथरपर हिऊ जका लेउ दाँतजेहन चम्कैत माथके समानक माला अर्पन करहल छेलै हमेशा मालामेके छतिस फूलबाईरक फूल शोभा अपारसं हर्षित होईत मुस्कुराइत मुस्कि मारैत छेलै अपन अमरपुत्र आदिकबि भानुभक्तके जन्मदिनक सम्मान कार्यक्रम देखलेल उमरल भिरके हृदयसं आसिर्बाद दैत आसमानक चांदिके टुक्राबादलसं पाइनक फोहरा शीतक बुंद बैन गिरहल दुईभक पातपर टिलपिल टिलपिल करहल छल सुर्यकिरणके दिलमे समायलेल परतिक्षा करहल छल बर्षसं प्रदेश गेल प्रितमक इनतजारमे बाटजोहैत बैसल प्रियसी जका बिदेशमे समपतिये कमा जम्मा क क कि करब ई अपनकहियो नै होयत यै ठामक एक सूचना , निर्णय, आ घोषना जीवनभैरक परिश्रमके सोहा कदेत अपन माईट अपने होइछै बाचौकेलेल अन्तमे अपने देशक माईट चाहि साहाराके लेल अपने बैसाखि कामदैय । बेचन महतो धनुषा हथमुण्डा ४ (आउ हमसब एक हउ) कबिता आऊ सबगोटे मिलु सबकुछ अपने आप ठिक भजेतै छोट बर सबकामकरि मिलक सब निक भजेतै । जेना हमसब मिलैछि गल्फमे कतेक आन्नद कतेक ठिक लगैहै मिलु सबगोटे अपने आप समस्या सब फिट भजेतै । दुनियामे अपनासबके मिलन देख अच्मभित भजेतै हमरा आहाके लालसा बौवा बुच्ची सबहक शिषभजेतै । सब अपनलोक अपन मित भजेतै शान्तिके सोहार्दयसं देखते दुस्मनक सबकाँटा बिष भजेतै भैयाके भौजीसंगे प्रित भजेतै । अपन अपन चाइल होइछै अ - अपने गानामे फरक होइछै खुसीके श्रोत हृदयके तानामे एकै देशमे अच्छ घृणाप्रेमकेएकैसिमानामे । यी सब चीज नुका जाय यैठाम यी हमर अपनके बहानामे अपने लोक लान्छना लगबैबला प्रशंसाके कितो वायह अच्छि । चिनजाइनक दुख दैहै सुख बाटहुला वायह तयार अच्छि मनके यबय्था कियाक येहन प्रेम आ घृणा जग्बै बाला । फेरु सबके मनके राजा बैनक राजकरैला मनमे जगह वायह मङैय आऊ सबगोटे मिलु सब ठिक भजेतै भैयासंगे भौजीके प्रित भजेतै । बेचन महतो धनुषा हथमुण्डा ४ सपनाके बिज ( कबिता ) श्रावन महिनाके कारी कारी बादलके चारोतर्फ चाँदीसं मेरहल छल बेर बेर बिजली चमैक चमैक आकासक क्यमरासं हमर परिचय संसारके देखाबलेल ल रहल फोटो ल कर्कस अवाजसं सचेत करैत थरकबैक त टन्का ठन्कैत छल । हम डरस एक दुसरके बाहुपासमे लुटु पुट भरहल छलि युगल जोरी सपनाके बीज जन्मे लेल तयार छल झरिके संगे संगे गिररछल पाइनक बुँदसंगे सपनाके बीज उर्बक माइटमे । अपन पहचान हराक केना अपने आप बिलिन भ क अंर्कुन भय गाछमे परिवर्तन भजाइछै मगरयोइमे कतस केना हरियर पता निलैहै गाछमे बदलस पहिने बिज अपने लिलामीके जुवा खेल खेलने रहैहै । गाछमे बदैलतेमात्र ओइमे जादु होबलगैछै स्वतंत्रखोजबला डाइरसब स्वतन्त्र खोजैत कतस अबै है उ सुन्दर कोढी, फूल,वोइमे सुगंध आ रङ कहाँस अबैछैओइमे खोंताबनबैबला चिरैसब कतस । अबैछै भुन भुन करैबाला भम्रा,पुतलीसब कतस बस हमर सपनासब हु बहु बिजके जेहन छै ओकरा रोपपरैछै धर्तीपर बढाउनाइ फूलनाइ फलौनाइ धर्तीके कामछैय ओईके लेल अपने आपके अपनेस अपनेसंगे बाजी राखपरतै जीवनमे कियाक कि एक सपनाके लिलामिस दोस्र सपनाके जन्म दैछै वो फूलैछै, सकार होइछै सुभाष फैलैछै आ सब लोकके कल्याण होइछै । बेचन महतो हथमुण्डा ४ अब्दुर रज्जाक चिकन चुनमुन मिथिला चिकन चुनमुन अङ्ने घर नै आश परोश से हो चम्काउ । निरोगिता सङे पाहुन के देख्ता अपन श्भेयता संस्कृतिक चम्काउ सरस्फाइ बहुत स रोग के किनअरा कैने छोइर चले शोस्थ रहे हर प्रानी अए ठाम खुशी जिवन शुख चैन रहे रस्ते पैरे दिशा पिसाब नै जे अप्ने रोग क जैर हुए उचित स्थान प सौच किया नै जे अपना दु;खक नै जैर हुए । के सब अए मे अगा औता इन्तजारक भर मे पछा छिक काइलक काज आइ भारी नै बने बिहानक लेल मिथिला अगा छिक । अब्दुर रज्जाक (कर्म्भुमी नगरि समुन्दर ओइपार कतार स्) मौनतामे किछ बात छिक [कविता] हनहन गनगन हनहन गनगन जेना आइ कोनो ढहल पहाड छिक बरतनसभ अछि सोर मचौने लगैय घुरमैत चुल्ही लs किछ बात छिक ।। धीयापूता अछि आइ दिविद्धामे फसल पुछु त पुछु कोना दम साधल किछु बात छिक बरतनसब पिटै आइ कपार अपन ऊ मुदा नै भन्सास जुरल किछु बात छिक ।। आइग कतौ पसाही कतौ कतौ लागल बिहारि काल छिक मुदा आइ घरणी धs फन फन नाचे किछु मुन्साके कहबाक बात छिक ।। जेना पुवारक आइगमे दम नै कोनो पल भरलाs किछ एहने बात छिक कहाबत अछि कि रुसनी-फुलनी बस किछ पहरलाs एक बात छिक ।। लाख करबट फेर रहल छथि निन्द नै आबे दुनु तरफ किछु बात छिक के बज्ताह पहिनेबेर इन्तजार थिक मौन सबहक बिछानक राज थिक ।। अब्दुल राजाक हरिपूर-४ ,धनुषा /नेपाल हाल : कतार सपुत अहि माटी के बहुत शपुत अहि माटी के खरा अछी कैने कान् मिथिलाक आनन्द शुखशान्ती मे नै लग्तै लगम । कर्मशिल उपर धाक धमक्की स नै चलत उ काम् गेल जामाना लौट्त नै उ उर्दी आ फरमान । लुट पाट आ छिन्ना झप्टी करु आब बिराम् धपक्ड अछी शुरु आब मिथिला के सैतान । पाइह लगाक खोइज रह्ल अछी जे सब छैथ बद्नाम् चालाकी चाप्लुशी स आब नै चलत कोनो काम । टोपी चन्द्न मे धोखा धरी स जनता अछी हैरान् राज नेतिक खोल मे गुन्डा सब नेता बहुत महान । पाप डेराइत छ्त प चैढ जब शत्यके परे अजान ढेरह्बा पोठिया गुबदी हाने जब स इब्लिश पर लगाम । मुह दाबल मे घुटैक रह्ल छल जुल्म स अपन परान् न्याइ के डगहर देखु ऐख्नो उच्च करु मिथिला आब शान । हमरा स नै सही मुदा अहि स उठे जनता मे फरमान् देर सही दुरुश्त हुए उ मिथिला के उच्च शम्मान । अब्दुर रज्जाक (धनुषा हरिपुर्४) हाल कतार जेना नै तारा नै जमिन प कबर नै आश्मान प पाश नै अछी उ ह्म्रा दिल लट्कल ओइ जान प् अनहरिया मे चांद नै मुदा इजोरिया अछी चान प् ऐक डेग चैइल की देखलौ पहुच्लौ अस्मान प् दिल ल लेली अगर अहा किछ बाकी नै परान प् चढ्बाक हिमम्त नै पहार प रहे फेक देली आस्मान प् भोर होइतो नै रहैय राइत परल रहैय जान प शमेएक गिरह्न कसाइल अछी जिनगी के नाम प अबदुर रज्जाक ( हाल कतार्) दीन धर्म के अप्बेखिया क् क् किछ मुल्ला आ पन्डित अपन फाईदा प् समाज के रोज करै अछी दन्डित कुर्ता टोपी चनन कमन्डल के बल प् अबसर ताके शुनगाक भुमहुर समाजमे कहियो अपने नै पाके दान दक्षिना आ चन्दा के धनदा स चमकल एकर बेपार बिन हिसाब के बिजनिश अछी एे खोलु त् पिटे कपार निक मार्ग बताबैत अपने अनैतीक प् चलता दोशर के बद्खोइ क् क् नित्य आइग उगल्ता लपप्न छप्पन शाधारन नै लाख करोडक फेरी शधभाब परेम क् अर्धशिक्षा स काटे एकर डोरी अब्दुर रज्जाक (उमाप्रेमपुर ४ धनुषा ) जाइत पाइत आ छुवा छुत के जब जब रहत भेद अप्ने श अपना के बिच रह्तै अनेक अनेक भेद कुन्ठा भेद श मनक दोश मए घिर्नित एक्टा छाया मानब परेम के हरपल रोके बियक्ती बिच क् माया बिचारक उचतता सन शिरही प् जे सब चाढैत गेल मनुश मनुश बिच लागल कुहेशा बुधिम्त्त श मिटबैत गेल शिक्षा शफाइ निक संगत श हटे मानब बिचक दुरी भेद भाव छुवा छुत अछी अज्ञानी मनुशक मजबुरी अब्दुर रज्जाक (हाल कतार )धनुशा हरिपुर ४ अपना गामक याद अप्ने गामक शिमान प् नै देख्लौ अप्न पह्चान जै बाट प् वर्शौ चल्लौ बाट ओहे बनल बिरान राडी झमरल कुसो जनम्ल जनम्ल दुइभ मखान अपन गामक फुलबारी सेहो लागे अाब झप्टान छुटल गाम समाज अछी बनल जेना अान बिरान एमहर अोमहर जेमहर देखी लागे सब सुन्सान शहरके रमझम मे नै झुइम पैइलो छुटल जब श गाम हिर्दयए मे रख्लौ सजाक एक्रा अपना प्रेमी समान हम किसानक बेटा खेती हमर बनल छ्ल ओ जान किसानक कांध प् दुनियाँ के भारि उहो छल एक सान माटी श जुडल जिनगी अपन अहिमे छ्ल ओ प्रान नै बिरशी ओ माटी अपन जै मिले सब के मान जै माटी के मेहनत स सिच्लौ बनैलौ सोन समान ओही माटी के सान प् जिबित मनुवा सबह्क अर्मान हे माटी याद नै छुटल जब स छुटल अपन गाम आबो लौटु हे प्रेमी गामक सुन्सान बनल अछी गाम परा पूर्व श उत्तम खेती मध्एम अछी बेपार किसानक धरती ऐखनो जगमे सबके करे उधार बन्धन माटी प्रेमी समान अछी करी आबहु बिचार नै बिर्शु कसम माटी के परकट करु आभार सत्ये प् अश्त्ये के झन्डा उठाक जे सब कैलक सोर अही माटी मे मिट्क रहिगेल बलबानक सब के जोर महापुरुश सब गर्ब श अपना माटी के करे उधार कर्ज नै चुकल अपना माटी के जे कैलक अत्याचार अब्दुर रज्जाक (धनुशा हरिपुर ४ )हाल कतार शभा मी हल्ला गुल्ला मचल ( पांच करोड क् फन्दा ) सभा शद कर्ता देश बिकास पांच करोडक चेक के बल प् चार साल प् अाब की कर्ता उशास । मन्त्री लोकैन सजग रहु जनताक कि अछी आश ? भाग बन्डा प् लगाम लगाक मरे नै जनताक आश संबिधान के ओझरी नै सोझिया क् बात किया है खाश बिकासक नाम प् पांच करोड्क नै करु उपहाश . गणतन्त्र क् के गन्ध श बिगरल परजातन्र्क ढंग पार्टी श बश पार्टी खुश अछी जनता के कैने तङ बिलम्ब नै अछी की शरम करु जनता के दिऔ सँग घुरा फिराक नै पेरु गूड्डी के धागा जनता क् सँग गाडी भात्ता शतता मए एना सब दिन नै मानु रहत मोशिवत मऐ डुबल जनता नै अहा सङे रहत मङ्गी घुश खोरी आ बेरोजगारी सब जनता के फन्दा राजये सत्ता के मोह्मे छोरु गरबरी यहन धन्दा अब्दुर रज्जाक ( हाल कतार ) कुन्दन कुमार कर्ण हजल एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा मारलनि ठुनका कहब हम ककरा ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा युद्ध चललै कारगिल सन खतरा मारि लागल बेलनाकेँ एहन फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा बाघ छी हम एखनो बाहरमे की कहू ? घरमे बनल छी मकरा एसगर कुन्दन सकत कोना यौ ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा मात्राक्रम: 2122-2122-22 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल प्रिय चलू संग एकातमे डुबि रहब नेहगर बातमे अनसहज नै बुझू लग हमर आउ बैसू हमर कातमे अछि बरसि जे रहल मेघ झुमि भीज जायब ग' बरिसातमे गुन गुना लिअ गजल आइ जुनि संग मिलि केर सुर सातमे फेर एहन मिलत नै समय लिअ मजा प्रेमकेँ मातमे बहरे - मुतदारिक @ कुन्दन कुमार कर्ण गजल जिनगी एक टा खेल छी सुख दुख केर ई मेल छी कहियो जे सुलझि नै सकत तेहन ई अगम झेल छी संयमतासँ जे नै रहत तकरा लेल ई जेल छी रूकत नै निरन्तर चलत ई अविराम सन रेल छी होइत अछि जखन दुख तखन दैवक बुझि चलू ठेल छी बहरे-मुक्तजिब © कुन्दन कुमार कर्ण बिनीत ठाकुर जे बुझे अपनाकेँ वलशाली देश । काज किछु एमकी करे विशेष । जलवायु परिवर्तण पर राखे ध्यान । पृथ्वीकेँ कम करे तापमाण । राम कुमार मिश्र धनवानक धूनल तूर छी चिनवारक नीपल नूर छी अजवारल कष्टक नोर पी सभहक सूखक मजदूर छी ©राम कुमार मिश्र रमौली, बहेड़ा, दरिभंगा रोटीक जोगार मऽ सांझ परि गेलै नेन्नाक कननाइ सऽ भूख मरि गेलै बचतैक कोनाक इ जान हम्मर यौ छातीक जबकल सभ दूध जरि गेलै ©राम कुमार मिश्र गजल जौं बूझी तऽ जहरी जर्दा जड़ा रहल अछि लोकक जिनगी सिगरेट चीलम गांजा गला रहल अछि लोकक जिनगी चौक-चौबट्टी दारु केर भट्टी बनल बिनाशक बीखशाला चिखना कटिया तारी में लुटा रहल अछि लोकक जिनगी रंग-बिरही पुरिया पाकिट धऽ नवतुरियाक रंग देखू चिबा-चिबा बिख गुटका चिबा रहल अछि लोकक जिनगी नोतल केंसर आबि रहल छै फोंक करै लेल जिनगी कऽ धन-संम्पति लुटा लुटा कना रहल अछि लोकक जिनगी नशाखोरक जिनगी देखियौ भरल जुआनी बूढ बनल दांत टूटि आ डांड़ लीबि लिबा रहल अछि लोकक जिनगी फेर न भेटत जिनगी बाबू जौं एकरा बरबाद करब तोरियौ नशाक जाल जे फंसा रहल अछि लोकक जिनगी लय संकल्प करू दृढ़ निश्चय फेकी सभटा दुर्गुन ‘रामऽ देखू सोचू बूझू कोनाकऽ हरा रहल अछि लोकक जिनगी (सरल वार्णिक बहर) वर्ण – २२ © राम कुमार मिश्र गजल मूड हमर किछु गरबर अछि बोल हुनक बड करगर अछि सूनि हुनक बोली बुझलौ बाप बऽरक बड धरगर अछि दाँत टुटल मूँहक सभटा पाइ बेर धरि दतगर अछि रीति कोन बेटा बेचब गप्प हमर धरि खरगर अछि ‘राम’ कतय बेटी ब्याहब गाम-गाम में अजगर अछि सभ पाँतिमे मात्राक्रम – 2121+2222 © राम कुमार मिश्र गाम: रमौली, बहेड़ा, दरिभंगा सत्य नारायण झा मोनक बात----- मोनक उद्वेग मोने मे समा जाइत अछि , लिखबाक मोन अछि मुदा मोने मे लिखा जाइत अछि , कतेक मोन अछि मुदा मोन मोने मे उधिया जाइत अछि, जिनगीक सुखद पल जिनगिये मे हेरा जाइत अछि | की सोचैत छलौ , से करैत छलौ मुदा भेटल की हाथ, सांसारिक खेल मे सभ छोरि देलक हमर साथ , हम असगर कुहरैत छी ,बेदम छी, मरैत छी , असहाय भेल लोकक मुँह तकैत छी | जेकरा लेल असीम प्यार छल ,असीम स्नेह छल , ओकर मुरझायल चेहरा देखि नहि पबैत छी , मोनक बात मोने मे सहेजि क’ राखि लेत छी | कियो केकरो दुःख नहि बुझैत छैक सभ अपन स्वार्थ मे लिप्त रहैत छैक , आन मर’ जर’ भ’ जाथु राख , नीक लोक लेल कियैक बनत ओ ख़ाक | कतेक निरीह ,निर्वल ,वेपर्द भ’गेल छी, फाटल करेज, बीमार भ’ गेल छी , मोन मे उठल तरंग मोने मे रखैत छी वीरान जिनगीक संग श्मशान मे रहैत छी , मुर्दा क’ जरैत बर् ध्यान सं देखैत छी मोनक बात मोने मे बर समेट क’ रखैत छी | Top of Form श्याम शेखर झा साजन लागय नै नीक मनभावन सावन सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . तेज पवनसं, हमरा तँनसं , ससरी ससरीक उरि उरि आन्चरि जाइय . ठन्का ठनकय, बिजुरी चमकय , देखि घटा घनघोर, मन घबराइय . साजन लागय नै नीक मधुमासक पावन सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . बर्सैत देखिक , गर्जैत सुनिकय , नोर आँखीसं अविरल बहल जाइय . टर टर बेङ्ग, खेलाए रेङ्ग, दृश्य मनोहर देखि मन अकुलाईय . बुन्द बुन्द मे चित्र अहँ के ई सावन . साजन लागय नै नीक मनभावन सावन . सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . भेल व्यथा कि ? रुसल प्रिया कि ? पुछे सखी सब ,उत्तर किछु नै फुराइय . कुररिक काग, टरिइय राग , जोहि क बाट , थकित ई नैंन नै जुराइय . कष्ट विषम सरि भेल मनभावन सावन . साजन लागय नै नीक मनभावन सावन . सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . मन अधीरसं, दग्ध शरीरसं , काँपे थरथर धर दुख आब नै सहाईय . कतय गेल चईन, कटय नै रेइनी, इजोरिया राति, चानि ई सुख नै बुझाइय . झहरय आँखीसं नोर बनिकय ई सावन . सजनी अहँ बिनु सून मनभावन सावन . साजन लागय नै नीक मनभावन सावन . आर.अनुराधा जीक मूल हिंदी कविता " मुट्ठी में रेत " केर मैथिली अनुवाद मुट्ठी महँक बालु बालु बड़ तेजीसँ खसि रहल छै मुट्ठी महँक मुट्ठी कसि कऽ जँ पकड़बै तँ कने-मने सटल तँ रहतै पसेनाक कारणें खाली मुट्ठीसँ तँ लाख नीक ई किछु बालु भरल बला मुट्ठी (अनुवादक आशीष अनचिन्हार) मिहिर झा टोपी पहिर मियाँ बनलहु तिलक लगाय पंडित दिल कहियो मिलल नहि देश के केलों खंडित भाषा बासा रहन बसन अलग रंग छे फूलक सबके सानि भटरन्ग केलहु सन्गहि भेलहुँ दन्डित विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 5 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १५८ म अंक १५ जुलाइ २०१४ (वर्ष ७ मास ७९ अंक १५८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA