ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १५९ म अंक ०१ अगस्त २०१४ (वर्ष ७ मास ८० अंक १५९) गद्य ललन कुमार कामत दुर्गानन्द मण्डल सत्य नारायण झा लक्ष्मी दास गौरी शंकर साह डॉ. शिव कुमार प्रसाद राजदेव मण्डल डॉ. कीर्तिनाथ झा जगदीश प्रसाद मण्डल पद्य बृषेश चन्द्र लाल अमित मिश्र कुन्दन कुमार कर्ण विन्देश्वर ठाकुर किशन कारीगर आशीष अनचिन्हार जगदानन्द झा “मनु” कंचन कुमारी झा प्रदीप पुष्प सत्य नारायण झा ललन कुमार कामत ''बेटी'' सोमनाथजी म्युनसीपल आँफिसमे पैंतीस बरख नोकरी केला पछाति रिटायर भेला। जीवनमे एक्को पाइ नजायज नै ग्रहन केलनि। सोनमनाथजी हृदैसँ पवित्र, शालिन, विनम्र आ दयाक भाव हिनका मुख-मण्डलसँ हरिदम झलकैत रहैए तँए हिनकर बिशेषता बेक्तीगत संज्ञा (उपनाम) मे बदलि गेलनि आ घरसँ लऽ कऽ आँफिस धरि लोक सभ हिनका सोनाजी कहि बोलबए लगलनि। सोनाजीकेँ तीनटा सन्तान, बड़ दुइटा लड़का, जेठ बबलू तैपर सँ डबलू आ सभसँ छोटकी बेटी उषा छन्हि। उषाक बिआह नीक घरमे, इंजीनियर बड़सँ कऽ सम्पन्न केलखिन। जमाइबाबू मुजफरपुरमे नोकरी करै छथिन ओतै सरकारी अवास भेटल छन्हि, तइमे उषा सङ्गे रहै छथिन। जेठका बेटा बबलूक किरदानीसँ दुनू परानी सोनाजीक मन बेथित छन्हि। बबलू इंजीनियरिंग करैले दिल्ली गेला मुदा हरियानाक एकटा लड़िकीक प्रेममे फँसि अपन जीवनक नैयाकेँ किनार कऽ लेलनि आ ओतै प्रेम-बिआह करि बसि गेला। डबलू नागपुरमे बैंक मनेजर छथिन। हिनकरो बिआह भेला पछाति पत्नी सङ्गे आतै रहै छनिन। सालमे एक-आध बेर कभी-कभार घर अबै छथिन। सोनाजी अपन जीवनसंगिनी ममताक सङ्ग बुढ़ाड़ीक पहिया जेना-तेना खिंचै छथि। बेटा-पुतोहुक सुख हिनका नसीब नै होइ छन्हि मुदा उषा, बेटी रहैतो, बेटा जकाँ देखभाल करैए। सप्ताहमे एकबेर आबि कऽ जरूरे देखि जाइत अछि। उषाक सोभाव पिताजीसँ बिरासतमे प्राप्त भेल छन्हि तँए मधुरो आ एक दोसरसँ अनुकूलो छन्हि। सोनाजीक ई पैंसैठम बरख चलि रहल छन्हि। नोकरीसँ रिटायर भेल रहथि तँ शरीरसँ स्वस्थ छला आ भरोसा छेलनि जे आगुओ नीके रहता, मुदा मनुख तँ मात्र इच्छा करैए, होइ तँ अछि वएह जे ऊपरबलाक मरजी रहै छन्हि। उषाक बिआहक पछाति दुनू बेटा दू जगह अपन-अपन घर बसा लेलकनि। सोनाजी दुनू परानीकेँ चिन्ता-फिकिर घरेड़ देलकनि। जीवन-शक्ति शिथिल भऽ गेलनि। हाथ-पएर धीमा पड़ि गेलनि। आँखिक रोशनी कमि गेलनि। कानोसँ कम सुनाइ दिअ लगलनि। पाचनतंत्र गड़बड़ा गेलनि आ दिल-दिमाग सेहो दुरूस नै रहलनि। मतलब बुढ़ापा हिनकर समस्या बनि गेलनि। बेटा सभ कभी-कभार फोन घुमा हालचाल करैत रहै छन्हि। दोस्त-यारकेँ- दबाइ दोकनदार आ मोहल्लाक डाक्टर- सभकेँ फोन घुमा कहैत रहैए जे माए-बाबूकेँ देखैत रहबै। सोनाजी दुनू गोटेकेँ ई परिपक्व अवस्था अछि जइमे ज्ञान, स्थिरता आ अनुभव छन्हि आ तहिक सहारे दुनू बेकती जीवन रूपी नैयाकेँ आगू खिंच रहल छथि। ओना तँ बुढ़ापा भार नै होइत अछि मुदा जब खाएल-पीअल काया जड़जड़ भऽ जाइए आ परिवारक सदस्यक संग तालमेल नै रहैए तँ परीवारमे अपन उपयोगितापर विराम लगि जाइत अछि। वृद्ध लोकनिकेँ ऐ अवस्थामे सहायता आ सहयोगक जरूरत पड़ितै छै। जे बेटा-पुतोहु अपन वृद्ध माए-बापकेँ सेवा करैए वएह जीवनक उत्तम कर्म करैए। एहेन पूत जे माए-बापकेँ जीबिते छोड़ि दइए आ अपनेमे मगन रहैए ओ ओहने काज करैए जेना धिया-पुता सभ बालुक रेतसँ महल बना लइए आ तैपर गाछक डारि-पात गाड़ि कऽ बगीचा बना लइए आ खुशी मनबैत रहैए मुदा जेकरा ज्ञान अछि ओ अपन जीवनक उत्तम कर्म करैसँ पाछू नै हटैए। आजुक समाजमे बेकती अपन बाल-बच्चा संग परिवारमे रीझल रहैए। माए-बाप, बूढ़-पुरानक मान-मर्यादा, तेकर सेवा सत्कारकेँ साफे बिसरि जाइए। ओहेन मनुख हरिदम पाबैक पाछू बेहाल रहैए मुदा जे हिनका लग प्राप्त वस्तु अछि ओकर उपयोग करनाइ नै जानैए। बूढ़-पुरान अनुभवी होइ छथि तँए हिनका समाजमे विशिष्ट स्थान भेटबाक चाही। जे बेकती वृद्धक सेवा नै करैए, ओ कायर होइए आ कायर लोग काल्पनिक विचारक धनवान आ महा गप्पी होइत अछि। जाबे धरि वृद्धजनक आ जुबकक समाजमे तालमेल आ समानता नै बैसत ताबे धरि समाजिक आ सांस्कृतिक काजमे स्थइरूपसँ बिकास सम्भव नै भऽ सकत। सोनाजी शरीरसँ कमजोर होइत गेला आ बेटा पुतोहुक सहायता आ सहानुभूति घटैत गेलनि। आब हिनका याद आबै छन्हि ओ दिन, जइ दिन बेदरूकिया सभकेँ ठेहुनापर लऽ घौआ-छु मल्ले-छु करैत पढ़ैत रहथि ‘लब घर उठे आ पुरान घर खसे...। खैर जे ऐ हाथसँ करैए ओकरा ओइ हाथसँ भोगए पड़ैए। अहु अवस्थामे सोनाजीकेँ रोज-मर्ड़ाक समान कीनए बास्ते हाट-बजार जाइए पड़ै छन्हि। आइ सोनाजी सुति ऊठि कऽ शौचालय गेलखिन। होनीकेँ किछु भेनाइ रहनि, बाहर निकलितै चक्कर आबि गेलनि आ शौचालयक दरबाजासँ टकरा कऽ खसि पड़ला। ममताकेँ गिरैक अभास भेलनि, भिरकाएल फाटककेँ ठेल देखलखिन सोनाजी ढनमनाएल असहाय अवस्थामे ओङ्गराएल आ कहरि रहल छथि। ममता धबरा गेली आ उठबैक परियास केलखिन, हिला-डोला कऽ पुछै छथिन- “बबलूक पपा! की भेल! केना खसलिऐ! बाजू ने?” मुदा कोनो जवाब नै भेटलनि। सोनाजीकेँ मुहसँ छर-छर लेहू बहै छेलनि। ई देखि ममता हाय-बाप करए लगली, असगरि हिनकासँ उठि नै सकल, दौगल-दौगल दरबज्जापर जा हरेरामकेँ सोर पाड़लक, हरेराम दुनू परानी दौगल आएल, सोनाजीक ई दशा देखि हाँइ-हाँइ कऽ उठा-पुठा कऽ ओसार परहक खाटपर सुतेलकनि। सोनाजीक ई हलात देखि ममताक देह जेना केराक भालरि जकाँ काँपए लगलनि। की करब! आ केना हएत! किछु नै फुड़ै छेलनि। हरेराम हड़बराइत बाजल- “काकी! डागडरकेँ फोन करू!” मुदा फोनक डायरी सोनेजी रखने छेलखिन। ममताकेँ भेटिते ने रहनि। हरेरामक पत्नी मंजू बुझि गेलखिन जे बेगरतापर एहेन छोटसन चीज नै भेटैत छन्हि, डाक्टरकेँ बजबैले दौगल-दौगल गेली। मोहल्लेमे डाक्टर इकबालक घर छन्हि, एलखिन। सोनाजीक मुँहक ऊपरका दूटा दाँत नीचला ठोरमे भोंका गेल रहनि तइसँ मुहसँ लेहूक टघार चलै छेलनि।़ उपचार शुरू भेल, कनीएकाल पछाति सोनाजीकेँ होश एलनि। ममतोकेँ जानमे जान एलनि। डाक्टर इकबाल ढाढ़स दैत कहलखिन- “अखनि कोनो चिन्ता करैक बात नै छै, सोनाजीक ब्लडपेसर आ सूगर बढ़ि गेल छन्हि तइसँ, चक्कर एलनि मुदा समैसँ जाँच आ इलाज हेबाक चाही नै तँ हार्टएटेकक सम्भावना बाढ़ि सकैए।” डाक्टर इकबाल पूर्जी लीखि हरेरामकेँ हाथमे दैत कहलखिन- “ई दबाइ जल्दीए लऽ कऽ आउ, सोनाजीकेँ ठोरमे टाँका लगबए पड़त।” तत्कालीन उपचार भेल। सोनाजीक मन पहिनेसँ नीक भेल। ममताक जीक मन हल्लुक हुअ लगल आ बेटा सभकेँ फोन लगबए लगली। जेठका बेटा बबलुकेँ पहिने फोन लगा घटनाक जानकारी देलखिन मुदा बबलू ऐ बातकेँ गंभीरतासँ नै लैत कहलकनि- “केना खसि गेलौ? बाबूजी दबाइ खाइत रहौ की नै? तों केतए रही? दिन राति टेन्शन दइमे तूँ सब लगल रहै छँह।” ऐ घड़ीमे बेटासँ एहेन तरहक जवाब सुनि ममताक मोह भंग भऽ गेलनि। फेर छोटका बेटा डबलूकेँ फोन लगा स्थितिक जानकारी देलखिन। डबलू पिताक हाल सूनि अस्वासन दैत बाजल- “चिन्ता नै कर। डाक्टर साहेबसँ हम बात करै छी। दीपू दोस्तकेँ घरपर भेजै छियौ डाक्टरसँ देखा कऽ दबाइओ-दारू सभ लाबि देतौ। तूँ कान-खीज नै कर।” ममताकेँ बँचल-खोंचल आस नीरास भऽ गेलनि। खैर हिनका सभसँ ओते आसो नै लगेने छेलखिन। आब बेटी उषाकेँ फोन लगेलनि। आन दिन उषा माए-बाबूकेँ फोन करि हालचाल जनैत रहए मुदा, आइ माइक फोन देखि चौंकली आ उत्सुकता पूर्वक बाजलि- “हँ माय! हम सब नीके छी, मुदा बाबूजी केना छथिन?” ममता जनैत छेली जे साँच बात बतेलासँ उषा बेसी घबरा जाएत तँए बातकेँ छोट करैत बजली- “बाबूजीक तबीयत गड़बड़ा गेलौ आबि कऽ देखि जाही।” मुदा भारी मन आ अवाजक थड़-थड़ाहटिसँ उषा भाँपि गेली जे साइत बाबूजीकेँ तबीयत बेसी खराब भऽ गेल अछि। घबराहटि तँ भेबे केलनि मुदा संयमसँ फोन रखि सोचए लगली जे की करी! फेर उठि कऽ बैग झारि, कपड़ा-लत्ता चोपतए लगली आ तुरंत नैहर अबैक ओरयान करए लगली। उषाकेँ एक सालक बेटी छेलनि तेकरो मँुह-कान पोछि तैयार कऽ एक काँखमे बच्चा आ दोसर हाथमे बैग उठा ओसारपर रखि घर दरबज्जामे ताला लगबए लगली। घरक चाभी बिसवासी पड़ोसीकेँ दैत पति इंजीनियर साहेबकेँ फोन लगेलकनि जे घंटे भरि पहिले ड्यूटीपर नीकलले छेलखिन, इंजीनियर साहैब फोन रीसीभ करैत बजला- “हँ बाजू, की बात अछि?” उषाक मन तँ हड़बड़ाएले रहनि मुदा तैयो सम्हरि कऽ बजली- “हम बाबूजीकेँ देखैले गाम जा रहल छी, माइक फोन आएल जे बाबूजी सिरियस छथिन। अहूँ साँझ धरि बाबूजीकेँ देखैले आबि जाएब।” ई बात सुनि इंजीनियर साहैब चौंकि गेला। पुछलखिन- “अखनि! अचानक! किए गाम विदा भेलौं?” ताबे धरि उषा रिक्सापर बैसि बस स्टैण्ड दिस बिदा भऽ गेल छेली। हड़बड़ाइत बजली- “अखनि ओते गप हम नै करब, बूझि लियनु जे बाबूजीक हालत ठीक नै अछि।” उषाकेँ हड़बड़ाएल अवाजसँ इंजीनियर साहैब बूझि गेला जे आब हिनका कोइ नै रोकि सकैए। भरोस दैत बजला- “जाएब तँ जाउ, मुदा मनके अस्थीर केने जाउ, आ बाजू जे पाइ-कौड़ी किछु संगमे अछि किने?” उषा- “अहाँ पाइक चिन्ता नै करू, हमरा संगमे ओते पाइ अछि जइसँ, हम गाम जा सकै छी।” इंजीनियर साहैब बात टोहियबैत पूछि देलकखिन- “पाइ केतएसँ लाबलौं अहाँ? बजैत रहै छिऐ जे हमरा हाथमे एकोटा छिद्दीओ ने रहैए।” उषा सकपका गेली। सकपकेबो केना ने करितथि? पतिक जेबीसँ बँचल-खूचल पाइ रोजे निकालिते रहै छेली। तैपर सँ ऊपरौसँ किछु ने किछु मांगि जरूरतिक समान कीनैबिते रहै छेली आ सभसँ जरूरी काज माए-बाबूकेँ देखै बास्ते जाए पड़ै तइमे खर्चा-बर्चा तँ होइते रहै। ई बात इंजीनियरो साहैब जनिते रहथि तँए उषा बातकेँ खोलैत बजली- “अहाँक जेबी, जे रोज साफ होइत रहैए, वएह कोशलिया कऽ हम रखने रही, विशेष पाइक ओरीयान अहाँ साँझ धरि केने आउ।” बेटा सभकेँ नै एलासँ ममता दुखी तँ छेली। मुदा ऊषाकेँ एलासँ निरासाक बादल छँटि गेलनि। साँझ होइत-होइत उषाक पति इंजीनियरो साहैब ऑफिससँ छुट्टी लऽ पहुँच गलखिन। विहाने भने एम्बुलेन्ससँ सोनाजीकेँ दरभंगा लऽ गेलनि आ डाक्टर यू.के बिश्वाससँ इलाज चलए लगलनि। तत्काल किछु दबाइ शुरू काएल गेल, ऑक्सिजनक खगता सेहो पड़लनि आ दिनमे तीन बेर एकर परयोग हुअ लगल। विभिन्न तरहक जाँच कराैल गेल। जाँचक किछु रिपोट तीन दिनक पछाति आएल आ किछु रिपोट हप्ता भरिक बाद आएत। जे रिपोर्ट आएल ओइमे बी.पी हाइ, सूगर बढ़ल आ संगे-संग हार्ट अटेकक सम्भावना बताएल गेल। सप्ताह भरि इलाज चलैत रहल, तबीयतमे उतार-चढ़ाव होइत रहल, कखनो नीक जकाँ गप-सप्प करैत रहथि तँ कखनो आँखि पथरा जान्हि, दम फुलए लगनि आ बेहोस भऽ जाथि। कखनो बेसुधि अवस्थामे अपने-आपसँ बड़बड़ए लगथि- “बबलू! कखनि एलँह आ आ बैठ! कनियाँ! घर जा। अहाँ पोती छी हमर? आब! आब! बिस्कूट एकटा हमरो दिए ने! एे डबलू चाह लाबह! माएकेँ कहक चाह देत! ईह छिनरीक साँए! जेते खाएत नै तेते छिड़याएत!” दुनू पजरामे बैसि उषा आ उषाक माए- ममता- बेना होंकि रहल छन्हि। सोनाजीक ई बड़बड़ेनाइ रोकैक बास्ते उषा सोनाजीकेँ छातीपर हाथ रखि हिला-डोला कऽ कहैए- “बाबूजी! बाबूजी! केकरासँ गप करै छिऐ?” सोनाजी चौंकैत बजला- “ऊँह! नै नै गप करै छी। तोहर माए केतए छौ?” सोनाजी किछुकाल ऊपर एकटकी नजरिसँ तकैत रहला। फेरि जेना कोनो आहटि चौंकैए तहिना चौंकैत बजला- “डबलू गाड़ीसँ उतरि गेल जा अगुआ कऽ लाबि लहक! काल्हिए कहै छी तोहर माए किछु बुझिते नै छँह।” सोनाजीक स्मरण शक्ति छीन्न भऽ गेल रहनि। आँखिक रोशनी चलि गेल रहनि। रहि-रहि कऽ बिछाैन होंथड़ए लगै छला। ई बेचैनीक अवस्था देखि उषा आ ममताकेँ जी-मन उड़ैत रहनि। मुदा उषा साहसी, कखनो अपन घबड़ाहटिकेँ दृष्टिगोचर नै हुअ दैत रहनि। मनकेँ थिर करैत उषा बाजलि- “बाबूजी! बाबूजी? एम्हर ताकू ने! हमरा चिन्है छिऐ? हम के छी कहू ते?” सोनाजी आब देखि नै पबथि। मुदा जखनि स्मरण लौटैत रहनि तखनि अवाज परेखि नजरि घुमा-घुमा एम्हर-ओम्हर ताकि देखैक परियास करैत रहथि। कहलखिन- “हँ, चिन्है छी! उषा दाइ छी ने अहाँ? केतए छहक आगु आबह ने।” आइ अस्पतालमे नअ दिन भऽ गेल रहनि। एकटा जाँचक रिपोट आइ आएत। दस बजे डाक्टर बजौने छथिन। उषाक पति आ उषा रिपोटक जानकारीले क्लिनीकपर पहुँचला। कनीए कालक पछाति कम्पाउण्डर अवाज देलकनि- “सोनाजीक गारजियन डाक्टर साहैब से मिलिए।” उषा दुनू परानी वेटिंग हाॅलमे बैसल रहथि, बोलाहटि सुनिते डाक्टरक चेम्बरमे पहुँचला, सोफा-कुरसी लागल रहए, बैसैक संकेतक पछाति दुनू गोटे बैस गेला। डाक्टर दुनू गोटेसँ सोनाजीक संग जे सम्बन्ध छेलनि तेकर परिचए लऽ कहलखिन- “मरीजक हालत गम्भीर अछि, रीकौभरक सम्भावना नै बँचल, जाबै धरि छथि, सेवा सत्कार करैत रहियनु।” डाक्टरक ई बात सुनि, उषा बौक जकाँ भऽ गेल। मुँहपर रूमाल रखि सिसैक-सिसैक कानए लगली। उषाक पति सेहो अवाक् रहि गेला! तैयो जिज्ञासु भऽ डाक्टर साहैबसँ पुछलखिन- “डाक्टर साहैब! केना एना भऽ गेलनि?” डाक्टर कहलखिन- “फेंफड़ा हिनकर बिल्कुल खतम भऽ गेल छन्हि। ब्रेन ट्युमर सेहो बढ़ि गेलनि आ शरीरक आनो-आनो अंग सबहक कार्यक्षमता शिथिल भऽ रहल छन्हि।” विभिन्न तरहक विमारी आ समस्याक विषयमे वार्तालापक पछाति निष्कर्ष यएह भेलनि जे सोनाजीक बिमारी ठीक हेबाक कोनो गुंजाइश नै छन्हि। दुनू बेकती नीराश भऽ चेम्बरसँ बाहर एला, उषा बाहर निकलिते भोकारि पाड़ि-पाड़ि कानए लगली। पति साहस बढ़बैत कहलखिन- “अहाँ जौं एना कनब तँ माएकेँ की हएत? शान्त रहू, मनकेँ बुझाउ! जे हेबक छै से तँ भाइए कऽ रहत। सुझि-बुधिसँ काम लिअ! माएकेँ ऐ बातक जानकारी नै चलक चाही। हुनको सम्हारि कऽ आब अहींकेँ राखए पड़त ने। नै कानू। चूप रहू।” उषो सोचलनि जे अखनि हमरा कानबसँ नोकसान छोड़ि आर किछु नै हएत। कहुना मनकेँ बुझबैत चुप भेली। सोनाजी कमरामे बेडपर पड़ल रहथि, बगलमे ममता पंखा हौंकैत रहनि, तइ बगलमे पजरा लागि उषा बैस गेली आ सोनाजीकेँ मँुह निहारए लगली। बेटा सभ टाल-मटोल करैत पिताक पराण छुटैकाल गाम आएल जखनि सोनाजी केकरो ने चिन्ह सकै छेलनि आ ने केकराे देखिए सकै छला। ललन कुमार कामत सम्पर्क- ललमनियाँ, मरौना, सुपौल। गोल इंग्लिश गार्डेन निर्मली। दुर्गानन्द मण्डल ''छुतहरि'' सिमराक शिवनन्दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहिरन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। विधाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्दरि। मध्यम वर्गीए परिवारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बिआह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरियाती गेल रहथि, सभ कियो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि। बड़-बढ़ियाँ घर-परिवार छल। राजाबाबू बिआहक पछातिओ अध्ययन जाड़ीए रखलनि। नीक-नहाँति पढ़ैले पटनामे नाओं लिखा डेरा रखलनि। छुट्टी भेलापर गामो चलि अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहिल सन्तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्चो तेतबए सुन्दर छल। क्रमश: दुनू बच्चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लिखा देलखिन। बच्चा सभ ओतै रहि पढ़ए-िलखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति खराप हुअ लगलनि। जइसँ ओ दोस्ती-यारीमे पीबए लगला। एक दिनक गप छी, गाम एलाक बाद अधरतियामे जोरसँ हल्ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चिचिया रहल छथि। रातिक मौसम देखि गामक डाक्टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखिन। बिमारी उपकले रहनि। पत्नी विशेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि दुइए मासमे दुखकेँ कन्ट्रोल कऽ लेलनि। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जिद्द कऽ पटना चलि गेला। परिकल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि आ भैया जे पाइ दन्हि आकि नै दन्हि तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बितलै आकि वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली रातिमे राजाबाबू अपना बिछौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चिचियए लगला। निसिभाग राति रहने हो-हल्ला सुनि लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्टी करैत सदा-सदाक लेल शान्त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि गेल। टोल भरिक लोक सभ जागि गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रिस्ता–नाता तोड़ि परमधाम चलि गेल छला। परात भेने बिना बजौने सभ आदमी मिलि बाँस काटि, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि दऽ राजाबाबूक पहिल सन्तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि-जारि सभ कियो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि चलि गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि कुहैक रहल छथि। काल्हि तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रतिमूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहिरि कुहैक रहल छलि। केतए गेलनि भरि हाथ चुड़ी, केतए गेलनि भरि माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि दैत। केना ने बेधि दैत! आखिर वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहियो हुनक पएरो ने देखने रहनि ओ आब मुहोँ देखि रहल अछि। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्हि। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बितबए लगली। सासु-िदयादिनीक गपकेँ छोड़ि अनकर गपपर बेसी धियान दिअ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब किछु लोक हुनका गुरु मन्तर दिअ लगलखिन। आ ओहो नीक जकाँ धियान-बात दिअ लगली। जहिना कहबी छै जे खेत बिगड़ि गेल खढ़ बथुआ सन तिरिया बिगड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि तक ओकर उकासीओ ने कियो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि। बिना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखिया-सरपंचक संग हँसि-हँसि बजै-भुकए लगली। गामक राजनीतिमे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनियाँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्य जिनगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि रंगीन दुनियाँमे चलि आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि हल्का छिटबला साड़ी पहिरए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खिलए लगल। एक दिन मुखियाकेँ कहि-सुनि इन्दिरा अवास स्वीकृति करौलक आ बिच्चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कियो छौड़ा-माड़रि भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दिन जेकरा भाफो नै निकलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बिस्कुटी लोकक चक्कर-चािलमे पड़ि ओ भैंसुरसँ अरारि कऽ अपन हक-हिस्सा लेल लड़ए लगली। लड़ि-झगड़ि सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि जे मन फुड़ै तखनि सएह करए। कियो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कियो किछु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्बै पड़ा गेल। आहि रे बा! परात होइते घोल-फच्चका शुरू भेल ‘कनियाँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि दू दिनक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्बैमे अछि फलल्मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनियाँ गाम घूमि आबथि। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्हर। किछु दिनक बाद जेना-तेना पकड़ि-धकड़ि ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखिमे गर्दा झोंकि कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कियो समझबैक परियास केलनि। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि ओ ओकरा बुझबैत कहलखिन- “सुनू कनियाँ, अखनो किछु ने बिगड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि लिऔ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जातिमे मिला लेत। जाति नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जातिसँ बाड़ि आँगनासँ ई कहैत- “एकरा आँगनमे राखब उचित नै ई कनियाँ कनियाँ नै छुतहरि छी छुतहरि...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल किछु ने बाजि सकलौं, किछु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि नै बूझि पेलौं जे आइ बूझि रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहिआ कऽ पकड़ने अछि। ¦¦¦ सत्यनारायण झा विहनि कथा :---- जनक मालिकक खेत मे हर जोतैत रहय |एक चास क’ नेने रहय |आब समरबाक रहैक |थाकि गेल छल |सुरुज भगवान सेहो माथ पर आबि गेल छलखिन |पहिने जलखइ क’ लैत छी तहन खेत क’ समारि देबैक |गहुँमक चिकसक रोटी ,नून आ मिरचाइ छलैक |जलखै करय लागल | जनक पल भरि लेल अतीत मे चलि गेल |जनक क’ एकटा बेटा भेल रहैक |मालिक बर प्रसन्न भेल रहथिन |छौड़ाक नाम मालिके शंकर रखलखिन |शंकर नमहर भेलैक त’ मालिक ओकरा पढ़ेबाक लेल गामक स्कूल मे नाम लिखा देलखिन |मालिक अपनो पढ़बै छलखिन |शंकर पढ़ैत गेलैक |मालिक ओकरा पढ़बै मे कनेको कोताही नहि केलखिन |बहुत खर्चा केलखिन |अंत मे शंकर कलक्टर भ’ गेलैक |ओ जतेक आगा पढ़ैत गेलैक ,जनक सँ दुर होयत गेलैक |एक दिन जनक सुनलकै जे शंकर कतौ बरके लोकक बेटी सं ब्याह क’ लेलकै | एक दिन मालिक कहलखिन ,जनक ,शंकर त’ कतौ ब्याह क’ लेलकौ आ तोरा नहि बजेलकौ |की करबिहिक बेटा छौक |जाकय आशीर्बाद द’ दहीन |जनक गेल मुदा दरबान अंदर नहि जाय देलकै |शंकर बाप क’ वरंडा पर सं देखलकै मुदा मुँह घुमा लेलकै | हँ, कनेक कालक बाद एकटा चपरासी अयलैक आ कहलकै ,तोरा साहेब बीस हजार टाका देलखुन अछि आ कहलखुन अछि जे एतय आव नहि आबय लेल |जनक बुझि गेलैक जे हमर बेटा आब पैघ लोक भ’ गेल अछि |कियैक त’ बाप क’ नहि चिन्ह्लकै|ओ बिना टाका क’ घूमि गेल |आब त’ १० -१५ बरख भ’ गेलैक |शंकर सं कोनो संपर्क नहि |बाप जिबै छै कि मरि गेलैक सेहो खोज करय नहि एलैक |मालिक सेहो मरि गेलखिन |जनक क’ फेर किछु याद परलैक |हँसी लागि गेलैक |शंकर जखन बच्चा मे पढ़ैत रहैक त’ पत्नी एक बेर कहने रहैक जे शंकर क’ पढाबह नहि ,बिगरि जेतय |मुदा ओकर बात नहि मानलियैक आ आइ एहन दिन देख’ परलैक| एकटा निःश्वास छोड़ि आकाश दिस देखलक आ उठि आधा रोटी दुनू बरद क’ खुआ आ लागनि पकरि हर जोत’ लागल | विहनि कथा अन्हार गुफ़ !हाथ हाथ नहि सुझैत छलैक |विजली कड़कैत छलैक |मेघ घटाटोप बन्हने छलैक \रातिक बारह बजैत रहैक |निशीथ घर सं बाहर भेलाह |घर बंद क’ ओ बिदा भ’ गेलाह |आब डरे कथीक ?जन्म भेलनि त’ माय मरि गेलखिन |कनेक पैघ भेलाह त’ बाप सेहो दुनिया छोरि चलि गेलखिन |कतेक संघर्ष क’ एम० ए० केलनि |तखने हुनका जीबन में निशा अयलखिन |कतेक स्नेह निशा सं भ’ गेलनि |एको पल हुनका बिना नहि रहि होयत छलनि |प्रेमक दुनिया मे ओ बिचरैत रहलाह |मुदा एके बेर जेना बज्रपात भ’ गेलनि |निशाक ब्याह हुनकर पिताजी कतौ ठीक क’ देलखिन |निशा सं भेट बंद भ’ गेलनि |फेर निशा नहि भेटलखिन |निशा लेल बताह जकाँ रहय लगलाह |मोन ब्यग्र रहय लगलनि |निशाक चलते ओ बर्बाद भ’ गेलाह |जीवनक सभ लक्ष्य खतम भ’ गेलनि |आइ० ए० एस० क’ सभ चांस लूज केलनि |की सोचैत छलौ आ की भ’ गेल ?आब एहि दुनिया में जीबि क’ की करब ?निशाक याद बिसरबाक लेल शराब सेहो पीबय लगलाह |मुदा दुःख बढ़ले जानि |एहि सं नीक जीबन लीला समाप्त क’ ली |एहन बिकाल समय मे पहुच गेलाह गंगा सेतु पर | आँखि मूनि सेतु पर सं कुदि परैत छथि मुदा ई की ?कोनों कोमल हाथक स्पर्श कुदबा सं रोकि देलकनि |विजली चमकलै |प्रकाश मे देखैत छथि निशा हुनकर हाथ पकरने ठाढ़ छथिन| लक्ष्मी दास 'गंगाजलक धोल' सहदेव काकाकेँ गामे किछु गोरे सहदेवकाका कहै छन्हि तँ किछु गोरे फटहाकाका सेहो कहै छन्हि। किछु गोरे सहदेव भैया कहै छन्हि तँ किछु गोरे फटहाभैया सेहो कहै छन्हि। मुदा हमर ने किछु कहियो बिगाड़लनि आ ने नीके केलनि तँए हम सहदेव कके कहै छियनि। अहाँ कहब जे लोकक एकहरी नाओं होइ छै हुनकर किए दोहरी छन्हि? दोहरीक कारण अछि जे जे घटिया काज सहदेव काका अपने करै छथि ओही काजले दोसरकेँ रेड़बो करै छथिन आ आँखिक पानियोँ उतारि दइ छथिन। ओना केते गोरे एहनो छथि जे अपनो सहदेव कक्काक केलहा काज लोके लग उगलि दुसबो करै छन्हि आ फटहो कहै छन्हि। मुदा जहिना गर्दखोर अपन गरदा झाड़ि फ्रेश भऽ जाइए तहिना अपन गरदा झाड़ि सहदेवो काका फ्रेश भऽ जाइ छथि। आइ सहदेव काका केकर मुँह देखि ओछाइन छोड़ने छला केकर नै, भोरे-भोर दुनू परानीमे झगड़ा बझि गेलनि। खिसिया कऽ अलोधनी काकी आगूमे थूक फेकि कहलकनि- “अहाँ पुरुख छी आकि पुरुखक झड़ छी?” पत्नीक समुचित उत्तर दऽ सहदेव काका भरि दिनका जतरा दुइर नै करए चाहै छला, मुदा झगड़ा बेर चुपो रहब हारि मानब बूझि बजला- “अहाँ कहने जँ हम पुरुखक झड़ छी तँ अहूँ तँ झड़क झरनियेँ ने भेलौं।” सहदेव कक्काक बात जेना अलोधनी काकीकेँ रब-रबा कऽ छूबि लेलकनि। जहिना कुकुर कटौजमे दाँतसँ पकड़ा-पकड़ी करैत घीचा-तीरी करए लगैए तहिना काकी बजली- “गामक लोक जे फटका कहैए, से कोनो झूठ कहैए। अहाँकेँ ने कोनो काजक ठेकान अछि आ ने कोनो बातक ठेकान अछि।” जेना लंकामे अग्निवाणकेँ रोकल गेल, तहिना सहदेव काका अलोधनी काकीक अगियाएल बोलकेँ रोकेत बजला- “कथी ले अनेरे अपने मुहेँ दोखी बनै छी, एतबो ने बुझै छिऐ जे हमरा फटहा कहैए ओ कि अहाँकेँ फटही नै कहत।” अपन हूसैत वाणकेँ देखि काकी पाशा बदलि बजली- “लोक दुसैए, तेकर लाज नै होइए?” जेना ठोरक बरी पकै छै तहिना काका पकबैत बजला- “जे दुसत से पहिने अपन घरवालीकेँ पुइछ लिअ जे अपने केते गंगाजलक धोल छी।” गौरी शंकर साह छोटकी छोटकी दलानपर कबड्डी-कबड्डी खेलि रहल छेली, छोटकी जइ दिशा रहै छेली ओकर पक्का जीतबाक गारंटी रहै छल, एतेक चुस्त, दुरुस्त आ फुर्ति कोनो लड़कीकेँ नै छल। अखनि धरि चारिटा केँ माइर देने छेली आ जीतैबला छेली, जहिना छोटकी खेलैमे नम्बर एक तहिना पढ़ैमे सेहो एक नम्बर छेली, समैसँ दस मिनट पहिने स्कूल चलि जाइ छेली, स्कूलमे सभसँ आगाँक ब्रेंचपर बैसै छेली, जँ कोनो दिन कियो लड़की ओकरा जगहपर बैसि रहैत तँ बिना उठौने नै मानैत, हुनका माथामे रहनि जे पाछूमे भूसकोल बैसैत अछि आ हम कोनो भूसकोल छी, तखनि पाछूमे किए बैसब, बड़ नीक सोच छेलनि छोटकीक। अपनासँ बड़का-बड़काकेँ समस्यासँ केतेको बेर छोड़ौने रहथि। छोटकीकेँ नीक जकाँ बूझल छेलनि जे सभ आदमीकेँ कपारमे मासु आ हड्डी रहै छै मुदा लोक अपन सोचक कारण डाक्टर बनि जाइ छै आ अपना सोचेक कारण चपरासीओ नै बनि पबै छै, छोटकी तँए हरिदम अपन सोच नीक बनबैले स्कूलक पुस्तकालयसँ महान-महान आदमीक किताब लऽ टिफिनमे पढ़ि आपस कऽ दइ छेली। हुनक बेवहार सेहो बड़ नीक रहनि, जइ कारणेँ स्कूलक सर, मैडम सेहो बड़ मानैत रहथिन। ईहो एकटा ओकरा लेल रामवाणक काज करै छल। जखनि छोटकी कबड्डी-कबड्डी खेलैत रहथि तखने छोटकीक बहिन रूबी स्कूलसँ गामपर एली, रूबीक मन उदास देखि छोटकी सेहो उदास भऽ गेली। छोटकी आ रूबी सहोदर बहिन। दुनूमे बड़ मिलान, एतेक मिलान शाइते आइ धरि कियो एक दोसरमे झगड़ैत देखने हेतै। घरक सभ काज दुनू बहिन मिलि-जुलि कऽ करि लैत छेली। रूबी भोरे-भोरे घर बहारैत तँ छोटकी बरतन माँजि लैत छेली। भारीसँ भारी काज चुटकीमे कऽ लैत छेली। दुनू बहिन, छोटकी आठमामे पढ़ै छल, आ रूबी इण्टरमे छल, छोटकी एतेक चन्सगर छल तँ ओइमे रूबीक सेहो सहयोग छेलै। रूबी छोटकीकेँ सभ सबाल बता दइ छल। की सबाल की अछि आ एकरा केना बनौल जेतै, एतेक नीक जकाँ तँ छोटकीकेँ स्कूलोक सर नै बता दइ छेलनि। छोटकी रूबीकेँ उदास देखि पुछलक- “दीदी, अहाँ उदास किए छी। बड़ फिरिसान लगै छी। की भऽ गेल अहाँकेँ, बाजू। नै बाजब तँ हम बुझबै केना।” रूबीकेँ छोटकीक जिज्ञासा देखल नै गेलै, रूबी बाजल- “आइ फेरो ने जाति, ने अवासीय आ ने आय प्रमाण पत्र भेटल, पता नै की हेतै, जँ काल्हि तक नै भेटत तखनि तँ हम छात्रवृत्ति लेल आवेदन नै कऽ सकै छी। आ नहियेँ हमर बैंकमे खाता खुगि सकत।” छोटकी बिच्चेमे रूबीक बात कटैत बाजलि- “दीपाक बहिन तँ तोरा बाद जाति, अवासीय, आय प्रमाण पत्रक लेल आवेदन जमा केने छेलै, ओकर सबहक तँ बनि गेलै, तखनि अहाँकेँ किए ने बनल दीदी?” रूबी बाजलि- “छोटकी अखनि बड़ छोट छी, दुनियाँदारी तों नै बुझबीही, केना दुनियाँ जलैत अछि। दीपाकेँ समैसँ पहिने ऐ दुआरे भेट गेलै, किएक तँ ओकर भाए जे ई कागज-पत्तर सभ बनबै छै तेकरा दू सए टाका देने छेलै, आ टाकाबलाकेँ तँ पहिने काज होइ छै। कहबी कोनो बेजए नै अछि जे बाप बड़ा ने भैया सबसँ बड़ा रूपैआ।” कहि रूबी चुप भऽ गेल। छोटकी किछु सोचए लगल। आ फेर बाजल- “सरकार तँ कहै छै जे घूस लेनाइ कानूनन अपराध छै, तखनि ई सभ एना किए करै छै, कहबा लेल कहै छै की ई लोक सेवाक अधिकार छै मुदा हमरा लगि रहल अछि जे ई लोभ सेवाक अधिकार छै। टाकाक कारणेँ आदमी किछु कऽ सकैए। मुदा दीदी हमरा एगो बात कहू तँ प्रमाण पत्र बनबैबला सभ केना बूझि जाइ छै जे के टाका देने अछि आ के नै देने अछि?” रूबी बाजलि- “कियो कहैत छेलए जे जखनि कियो आवेदक आवेदन करै छै तँ ओ अपना जेबीमे रखल पुर्जीमे ओकर नाओं आ आेवदन क्रमांक नोट कऽ लइ छै आ सभसँ पहिने ओकरे प्रमाण पत्र बना छै।” छोटकी बाजलि- “आ जे पैसा नै दइ छै तेकर की होइ छै।” रूबी- “तेकर की होइ छै, तेकर आवेदनक कोनो माए-बाप नै होइ छै, केतौ फेकि दइ छै, ओइपर कोनो धियान नै दइ छै आ एमहर आवेदक दौगैत-दौगैत तबाह भऽ जाइ छै तखनो नै कोनो असर पड़ै छै, केतबो लोक कहै छै तेकर कोनो परभाब नै पड़ै छै। आवेदककेँ कुकुर बूझि लैत छै आ बीस दिन दौगबबैत रहै छै जेना हम दस दिनसँ दौग रहल छी।” छोटकीकेँ सुनि बड़ तामस उठलै, छोटकी रूबीकेँ कहलक- “तोहर कागज काल्हि बनि जेतौ, कोनो हालमे चाहे काल्हि सुरूज उगै आकि नै उगै, हवा बहै आकि नै बहै, काल्हि अहाँकेँ कागज हर हालतिमे बनबाक छै चाहै किछु भऽ जाइ।” “से केना हेतै।” रूबी बाजलि। तैपर छोटकी बाजल- “से हम काल्हि कहब, अखनि चलू मुँह-हाथ धोइ कऽ किछु खा लिअ फेर भिनसर ऐपर बात हेतै।” छोटकी ऐ स्टाइलमे कहलक जे रूबीकेँ हँसी आबि गेलै आ छोटकी हँसए लगल। दुनू बहिन अँगना गेल आ एके थारीमे बैस दुनू खए लगल। भिनसर भेल दुनू बहिन प्रखण्डपर पहुँचल। छोटकी रूबीकेँ बाहरे ठाढ़ कऽ अन्दर गेल। फेर पाँच मिनटक पछाति बाहर आएल आ रूबीकेँ कहलक- “दीदी, अहाँ अहीठाम बैसू हम चट्टे अबै छी।” रूबी किछु ने बाजल। ओतइ बैस गेल। अदहा घंटा भेल, तखने एकाएक तीन-चारिटा गाड़ी प्रखण्डक मैदानमे आबि लागि गेल। गाड़ी देखि कऽ सभ कर्मचारी सभकेँ होश उड़ि गेलै, सभ अपन-अपन काजमे दनदुरुस्तीसँ लगि गेल। गाड़ी एस.डी.ओ.क छेलै। एस.डी.ओ. सीधे ओही कार्यालयमे गेला जैठाम जाति, आय, आवासीय कागज सभ बनैत अछि। एस.डी.ओ. घूमि-घूमि कऽ सभटा देखए लगला, जेना किछु हराएल चीज ताकि रहल छथि। ओइठाम जेतेक कर्मचारी छेलै, सबहक होश उड़ल छल। तखने एस.डी.ओ. साहैब पुछलखिन- “रमण के छी?” ओहीठाम ठाढ़ एकटा कर्मचारी बाजल- “हम छी सर।” कर्मचारी हाकिम लग आबि कऽ ठाढ़ भेल, हाकिम ओकर जेबीक तलासी लेलक। ओकरा जेबीसँ दू सए रूपैआ निकलल, हाकिम अपन जेबसँ पुर्जी निकालि, रूपैआक नम्बर अपना पुर्जीपर उतारलक। नम्बरसँ मिलौलक, सभटा नम्बर मिलि गेलै। हाकिम एक झापड़ कर्मचारीकेँ लगौलक। झापड़ कसबर छल, लगिते कर्मचारी निच्चाँमे खसि पड़ल। एस.डी.ओ. बजला- “ई पैसा कहाँ से आया?” कर्मचारी डरसँ बाजल- “सर घरसँ लाए थे।” एस.डी.ओ.केँ तामस उठि गेलनि फेर एक झापड़ कर्मचारीकेँ लगा देलखिन। तखनि कर्मचारी मुँह खोललक आ सभटा खिस्सा कहलक। एस.डी.ओ. तुरंत छोटकीकेँ बजौजलक आ कर्मचारीकेँ कहलखिन- “आइ बारह बजे तक रूबी का प्रमाण पत्र बना कर देना।” कहि एस.डी.ओ. साहैब चलि गेला। एमहर छोटकी तीनो प्रमाण पत्र लेबाक लेल बैसि रहल। तखने एकटा कर्मचारी रूबी कुमारी, रूबी कुमारी कहैत अबाज लगेलक। छोटकी तुरंते रूबीकेँ लऽ ओतए पहुँचल आ रजिष्टरपर शाइन कऽ कागज लऽ विदा भेल। रूबीकेँ किछु नै फुड़ाइ छेलै। हम दस दिनसँ दौगै छेलौं मुदा हमरा नै भेटल आ छोटकी केना एके दिनमे काज सलटिआ लेलक। रूबीकेँ रहल नै गेलै। छोटकीसँ पुछलक- “आँइ गे तों केना एक्के दिनमे कागज बनबा देलँह। तोरा लग कोन एहेन जादूक छड़ी छौ।” रूबीक गप सुनि छोटकीकेँ हँसी लगि गेलै। ओ फरिछा कऽ रूबीकेँ कहए लगलै- “देखू, काल्हि जखनि अहाँ कहलौं जे टाका देलासँ काज भऽ जाइ छै तखनि हम अपना डायरीमे दू सए टाका जाइ समए निकालि लेलिऐ आ जेते कोनो नम्बर छेलै तेकरा एकटा कागजपर उतारि लेलिऐ, जखनि हम अहाँकेँ ठाढ़ कऽ कर्मचारी लग गेलौं तँ हम ओकरा अहाँक आवेदनक क्रमांक देलिऐ आ दू सए टाका सेहो देलिऐ। ओ एको बेर आँइओं ने केलक हम ओकर नाओं सेहो ओकरासँ पुछि लेिलऐ, तेकर बाद हम अहाँकेँ चट्टे अबै छी कहैत सीधे एस.डी.ओ. लग गेलौं आ हुनका सभटा बात कहि देलयनि। हुनका बिसवासे ने भेलनि हमर गपक। किएक तँ हम देखैमे धिया-पुता लगैत लगलियनि। तखनि हम नोटक नम्बर जे नोट केने रहिऐ से पुर्जा देलियनि आ हुनका कहलियनि जे अगर हमर आरोप गलत होइ तँ हमरा जेल अहाँ सेहो पठा सकै छी, हमर गप सुनि हुनका हमरापर पूर्ण बिसवास भऽ गेलनि आ तुरंते उठि कऽ तीन-चारिटा हाकिमकेँ बजा संगमे लऽ प्रखण्ड कार्यालयपर पहुँचला। आ छापा मारलखिन। हमर गप सत् भेलनि बाँत अहाँक आगूऐमे घटल।” रूबी बाजलि- “छोटकी तों एतेक तेज छेँ से हम नै बुझैत रही।” छोटकी बाजलि- “सभटा अहींक असिरवाद अछि दीदी।” दुनू बहिन हँसए लगल। भोरे-भोर सबेर भने पेपरमे आएल छल जे घूसखोर रमणकेँ एस.डी.ओ. द्वारा निलंम्बित कऽ देल गेल। आ स्वतंत्रता दिवसक अवसरिपर म.वि.खड़ौआमे पढ़ैत छोटकीकेँ एस.डी.ओ. द्वारा घूसखोरकेँ पकड़ेबा लेल सम्मानित कएल जाएत। भरि खड़ौआक लोक छोटकीक गुणगान करए लगला।¦¦¦ गौरी शंकर साह गाम+पोस्ट- तुलापत गंज थाना- झंझारपुर जिला- मधुबनी (बिहार) पिन- 847109 डा. शिवकुमार प्रसाद झमकी एकटा गाममे एकटा गरीब परिवार रहै छल। परिवारक मुखियाक रूप-रंग, गुण-सोभाव, दह-दशा गामे सन छेलै। नाओं छेलै खखना। भरि-दिन मर-मजूरीसँ जे बोइन भेटै छेलै, खखना घरवालीकेँ सुमझा दइ छेलै। घरमे अपने तीनटा बेटा-बेटी आ कनियाँ। पाँच जनक परिवार। माए किछुए दिनक पछाति सरग सिधारि गेलै। जावत् माए जीबै छेलै ताबत् हुनका कियो पुछैबला छेलै। काजपर सँ लौटला उत्तर एक लोटा पानि, एकटा सूखल रोटी वा फुटहो दऽ हिया जुड़बै छेलै। माइक मुइने ठीके बेटा टुगर भऽ जाइ छै। घरवाली मुँहक जोर। एतबे नै, विधाता घरवाली चम-चिकनी दऽ देलखिन। नाओं छेलै ‘झमकी’। नाउँए गुण सौंसे टोल झमकेत रहैत छल। बाल-बच्चा फुटलीओ आँखि नै सोहाइत रहै। जाबत् सासु छेलै बाल-बच्चाकेँ थथमारने रहै छल। आब तँ धियो-पुतो छिछिआइत रहै छै। खखना बरद जकाँ खटैत अछि। तिरया चरित्तरकेँ ओकरा किछु पता नै। झमकीकेँ एसनो-पोडर, कनफुल-नकफुल चाही। सेहो नव-नव डिजाइनक। खखना सन भकुआ, भकुआएले रहि गेल। आब सुनू आगूक खिस्सा। खखना काजे अपसियाँत। घरवाली आँचे अपसियाँत। टोलसँ अलग एकटा दोसर जातिक घर छल। ओइ घरक अगल-बगलमे कएटा मालिकक कलम छेलै। जारनि बीछऽ झमकी केतए जेतै? कलमेमे ने! झमकीकेँ संगी-बहिनपाक कोन कमी। सबहक संगे कलमे-कलमे, गाछीए-गाछी जारनि बीछैत छल। केना-ने-केना दोसर जातिक एकटा नवतुरियासँ झमकीकेँ आँखि लड़ि गेलै। धीरे-धीरे ओही कलममे जारन-बिछनी सबहक पंचैती सेहो बैसए लगल। ओ छौंड़ा सेहो गामक भौजाइक नाते कखनो बैसल कखनो ठाढ़हे-ठाढ़ गोष्ठीक हिस्सा बनि गेल। ओइ छौंड़ाकेँ देखिते झमकीक चमकी दुगुन्ना भऽ जाइत छेलै। आब बुझू खिस्सा खतम। झमकी झपटा मारलक। झपटा तेहेन छेलै जे छौंड़ा घरक खुट्टा तोड़ि जे भागल से आइ धरि गाम नै घुरल। धिया-पुता फकरा बनेलक- “झमकी झमैक गेल, छौड़ा लऽ कऽ उड़ि गेल...।” खखना बाल-बच्चाक संग ताकि रहल अछि जे कही फेर...।¦¦¦ राजदेव मण्डल दोख केकर इजोरिया रहै मुदा मेघक कारणे कनी अन्हार सन लगै छेलै। निशिभाग राति। सभ सूतल। किन्तु दिनेश दुनू परानीकेँ निन्ने ने होइत। जेना निन्ने रूसि रहल। नै रहल गेलै तँ पत्नीकेँ कहलकै- “केतेकाल भूखल रहब? उठू खा लिअ।” पत्नी चुप्पे करोट फेड़ि लेलक। पति बाँहि पकड़ि हिलबैत पुछलकै- “की भेल? बजबै तब ने बुझबै।” “बूझि कऽ की करबै? अहाँ बुते किछो ने हएत। अहाँ तँ उनटे...।” “बुझबै तब ने। हमर दोख हेतै तँ हमरे दण्ड देब।” “कोनो बुझने नै छिऐ। दोख अहाँ माएकेँ रहै आ गारि-बात हमरा देलौं। अहाँ हमरा बजा नै सकै छी।” पति- “तँ कहू जे रूसलासँ दिन-गुजर चलतै?” तमसाइत पत्नी बाजलि- “केतबो गल्ती अहाँक माए करै छै, तँ अहाँ एकोबेर बजै छिऐ आ हमरापर डाँग लऽ कऽ हुड़कै छी। कहै छी, हमरा बजाउ नै। हम अहिना भूखले मरि जाएब।” समझाबैत पति बाजल- “अच्छा एकटा खिस्सा सुनि लिअ। फेर नै बजब। सुनियौ। ई कथा चौबीस-पचीस बरख पहुलका छी। एकटा औरतक कथा। सुखक लीलशामे दुखक कथा। ओ बड्ड सुन्दर आ सुशील रहए। तँए शुरूमे पतिक आँखिमे ओकरा लेल परेम भरल रहै। मुदा एक-आधटा एहेन घटना घटले जे ओइ औरतकेँ ससुर आ पति दुनू दुख दिअ लगलै। ससुरकेँ मोनमाफित दहेजो नै भेटल रहै आर बहुतो कारणेँ तमसाएल रहै छेलै। ओइपर सँ ओहने समए आ अवसर सेहो भेट गेल रहै। एहेन समैमे केतबो डाँट-डपट करतै तँ उनटा कऽ जवाबो केना देत। दू बेरसँ पँचमसु चिल्का नोकसान भऽ जाइ छेलै। पाँचम मास चढ़िते दरद करै आ गरभपात भऽ जाइ। तँए ओकरा पतिओकेँ हरिदम नाकेपर तामस रहै। जे सभ सोचने रहए ओ सभ पूरा नै होइत देखि मोन हरिदम बिधुआएले रहै छेलै। देखैत सपना टूटि गेलासँ कठ तँ हेबे करै छै। ...सासु नै रहै। औरतिया केकरा कहितै। आ के ओकर दुख बाँटितै। जेमहरे जाए तेमहरे डाँट-डपट आ ठोकर। कियो अपन नै, सभ आन। काज-उदेममे लगल समए कटबाक परियास करए आ असगरमे बैसि भरि मन कानि मनकेँ हल्लुक करए। समए बितैत रहै छै। बितैत रहल।” अहूबेर ओरतिया तीन महिनासँ गरभवती रहए। कानसँ स्वर टकरा जाइ- “फेर ओहिना हेतै। ऐबेर भगा बेटाकेँ चुमौन करा देबै।” फेर दोसर काने पतिक स्वर सुनै- “कोन-कोन डागदर-बैद आ ओझहा-गुणीसँ देखेलौं। कोनो फेदा नै। हेतै केतएसँ? पपियाही अछि ई।” भातक दुख नै बातक दुख। जेना सान्हि मरै। कलेजामे भूर करै। मोन आ शरीर दुनू संगी। एककेँ दुखित भेने दोसर केना ठीक रहि सकत। औरत बिमार रहए लगल। माए-बापकेँ पता लगलै। समाद गेलै आ एलै। ओ नैहर आबि गेल। जेना बैशखा रौदमे गाछतर। नैहराक छाँह। सभ गप्प सुनि-बूझि माए-बाप उपचारमे लगि गेलै। की-की नै केलक। केतए-केतए ने गेल। अही क्रममे एकटा साधु बाबा उपदेश देलखिन- “एकरा छह महिना वोनबास करबए पड़तौ।” “औरत तँ अहुना बोनवासेमे रहैत अछि। फेर कोन वोनबास?” “घर-अँगनासँ अलग। रहिओ कऽ नै आबि सकैत अछि। अपने हाथसँ बनौल खाएत-पीअत। आर सभ गप्प बुझए पड़तौ।” माए-बापकेँ मोन उड़ल रहै। सन्तानक सुखक लीलशा। वोनबास शुरू भऽ गेल। घर-अँगनासँ अलग। आमक गाछीमे। बास करए लगल। टोलक लगेमे रहै मुदा गप्प तँ केकरोसँ नै कऽ सकैत अछि। इशारासँ काम चलाउ। आन लोक हटले रहै। दिन तँ कटि जाइ मुदा राति पहाड़। कुशक ओछाइनपर गुदरी बिछौना। माटिएपर खाना आ माटिएपर सोना। मूजक डोरासँ डाँड़मे जखम भऽ गेलै। जाड़ा-गरमी-बरखा। अन्हरिया राति। साँप-कीड़ा, बिलाय-कुत्ता नढ़िया-खिखिर। एकान्त बास। भरि दिन तँ जे किछु मुदा रातिमे माएकेँ नै रहल जाइ। बारहो बजे रातिमे आबि बनवासी बेटीकेँ भरि पाँज पकड़ि सुति रहए। निन्न टुटिते ओइठामसँ चलि आबए। जे फेर कोनो दोख ने भऽ जाए। आ आबैबला संतानपर कोनो विपति ने पड़ि जाए। केहनो कठिन समए रहै छै। कटि तँ जेबे करै छै। लोको कोनो कम लगराह होइ छै। वोनबासक समए बीतल। गरभकाल पूरा भेलापर औरतियाकेँ बेटा जनमलै। फेरसँ ओकर सुखक दिन घुरि एलै। सभ दिससँ सिनेहक बरखा हुअ लगलै।” किछुकाल चुप रहला पछाति दिनेश अपना पत्नीकेँ पुछलकै- “आब कहू जे ओइ माएकेँ जँ बेटा गारि-बात देतै तँ ओकर की दशा हेतै?” पत्नी गुम्मी साधने। किछो बलजे ने जाइ। फेर दिनेशे बाजल- “ओ औरत हमर माए छिऐ आ ओ बेटा हमहीं छिऐ।” दुनू परानी चुप। रातिक चिड़ै केतौ-केतौ बजै छेलै। आर सभ किछु निशब्द भेल। दुनू परानीक बीचसँ शब्द हेरा गेल छेलै। किन्तु हाथ-पएरक क्रियासँ गप्प शुरू भऽ गेल छेलै। साँस-प्रश्वाँस गवाही दइ छेलै। मुस्कीकेँ अन्हार झँपने छेलै। आ दुनू परानीक बीच दोख बिला गेल छेलै। ओम प्रकाश झा कुलच्छनी ऐबेर फेरसँ श्रीधरक कनिञाँकेँ बेटीए भेलै, ई समाचार पूरा टोलमे पसरि गेल छल। भोज खेबाक आस रखनिहार सज्जन लोकनिक मँुह बिधुआ गेल। किएक तँ आब भोज नहियेँ हेतै। श्रीधरक बाबू गदाधर पोताक आसमे पछिला तीन बरखसँ की की नै करबौलथि। यज्ञ भेलै, हवन भेलै, दान आ पुन्न तँ पूछू नै। एकबेर बुड़हा आ बुड़ही कामर लऽ कऽ बाबाधामसँ सेहो भऽ एला। मुदा एतेक उपय आ जतनक कोनोे प्रतिफल नै। सबहक मुँह लटकल छल, जेना घरमे कोनो मरनी-हरनी भऽ गेल होइ। गदाधर दलान परहक कोठलीमे चुपचाप बैसल छला आ अपन भाग्य आ विधाताक ऊपर प्रलाप केने जाइत छला। हुनकर कनिञाँ आँगनमे कोनटा धेने उपासपर छेली, जे सभ जतन आ प्रयोजन विफल भऽ गेल। ‘पोताक मुँह देखनाइ भाग्यमे नै लिखल अछि’ ई बाजि-बाजि अपन पुतोहुकेँ कोसै छेली। श्रीधर अपनो मुँह लटकेने दलानसँ आँगन एला आ मुड़ी झुकौने सोइरी घर तक एला आ दरबज्जासँ हुलकी मारलथि। कनिञाँ बिछौनपर चुपचाप निश्चेश्ट पड़ल छेलै आ बड़की बेटी सुनैना जे तीन बर्खक छेलै, ओही चौकीपर बैसि माएसँ नवका बच्चा दियए किछु-सँ-किछु सवाल करै छेलै। कनिञाँ ऐ सोचमे छल जे घरक सभ लोक फेरसँ बेटी होइक कारणेँ हुनके दोख लगाैत। बड़की बच्चियाक जन्मक समए सेहो ओकरा सभसँ यएह सुनऽ पड़ल छेलै। नब बच्चा पूरा दुनियाँ आ दुनियाँक सोचसँ बेखबर भऽ अपन क्रन्दनमे तल्लीन भऽ सभकेँ अपना दिस आकर्शित करै छल। बापकेँ देखैत देरी सुनैना बिछौनपर सँ उतरि कऽ लपकल आ श्रीधरक जांघमे लटपटाइत बाजल- “बाबू, हमरा भूख लगल अछि। कियो हमरा खाइले नै दइए।” श्रीधर ओकरा धकलैत कहलक- “चल कुलच्छनी, के देतौ खाइले। पहिनेसँ तूँ की कम बोझ छेलेँ हमर माथपर जे पाछूसँ एकटा आर बहिन लऽ आनलेँ।” सुनैना ऐ सभ बातसँ अनभिज्ञ छल। ओ हठ करैत कहलक- “बाबू हमरा बिस्कुट आ दालमोट आनि दियऽ बड्ड भूख लगल अछि।” ऐबेर श्रीधर तमसा गेल आ सुनैनाकेँ जोरसँ धकेलि देलक। सुनैना निच्चाँ खसि पड़ल, खसिते कानए लगल आ श्रीधरक मुँह दिस टुकुर-टुकुर ताकए लगल। ओकर माथमे चौकीक कोणसँ चोट लगि गेल छेलै। ओकर माए चौकीपर सँ उठैक कोशिश केलक मुदा नै उठि सकल तँ श्रीधरकेँ कहलक जे ऐमे ऐ बचियाक कोन दोख छै जे अहाँ ओकरापर तमसा गेलिऐ। देखियौ तँ केना हिचकि-हिचकि कऽ कानि रहल छै। कनी ओकरा उठा लियौ ने। ताबत सुनैना अपने उठि गेल आ फेरसँ श्रीधर दिस बढ़ए लगल कानैत आँखिसँ टुकुर-टुकुर तकैत रहए। श्रीधरक आँखि ओकर आँखिसँ टकड़ाएल तँ श्रीधरकेँ ई आभास भेलै जे ओइ निर्दोख आँखिसँ अवाज आबि रहल छेलै जे ‘बाबू हमर कोन गलती। हम तँ अहींक अंश छी, अहींक सन्तान।’ श्रीधर ओइ निर्दोख आँखिक सवालसँ सन्न भऽ गेल। ओकर करेज फाटऽ लगलै। ओ सोझहे सुनैनाकेँ उठौलक आ कोरामे लऽ कऽ चुम्मा लेबए लगल आ ओकर माथ हँसौथऽ लगल। ओ अपने मोने बाजए लगल- “तूँ हमर सन्तान छेँ। तूँ हमर अंश छेँ। तोहर छोटकी बहिन सेहो हमर सन्तान आ हमर अंश अछि। तूँ कुलच्छनी नै हमर कुलक सिंगार छेँ। हमर नाओं तोरेसँ हएत। तूँ नै कान बेटी। चल की खेबही हम तोरा अखने कीनि दैत छियौ।” कहैत श्रीधर सुनैनाकेँ कोरामे लऽ कऽ दोकान दिस विदा भऽ गेल। ओम प्रकाश झा बेटीक बिआह आँगनमे बिआहक गीत चालू छल। दरबज्जापर पाहुनक मेला लागल छल। आइ देवकांतक बेटीक बिआह छै। देवकांत एकटा किसान छथि। हुनकर दू गोट सन्तानमे सुलेखा जेठ छन्हि आ शरत छोट। ओ बेटा-बेटीमे कहियो कोनो अन्तर नै बूझलखिन्ह आ दुनूकेँ समान रूपेँ पढ़ाइ-लिखाइ करबौलखिन्ह। एकर नतीजा सेहो नीक रहल जे सुलेखा नीक संस्थानसँ एम.बी.ए.क डिग्री लऽ कऽ एकटा प्राइभेट कंपनीमे नीक नौकरी प्राप्त केलन्हि। बेटा शरत सेहो इंजीनियरिंगक पढ़ाइ कऽ रहल अछि। बेटीक शिक्षा-दीक्षा पूर्ण भेलापर आ नौकरी भेटलापर देवकांत ओकर बिआहक तैयारी शुरू केलथि। सर-कुटुम आ मित्र-मण्डलीसँ एकटा नीक बर ताकबाक अनुरोध केलथि। पढ़ल-लिखल नौकरिहारा बेटी लेल सुयोग्य वरक खोजमे जहाँ-तहाँ अपने सेहो गेला। मुदा सभठाम बेवस्थाक नाओंपर मुद्राक माँग एते भयावह छल जे ओ मुँह लटकौने गाम आबि जाइ छला। सुलेखाकेँ जखनि ऐ तरहक फिरिशानीक पता चलल तँ ओ अपन माएकेँ कहलक- “बाबूकेँ कहुन जे हम अपन सहकर्मी हेमंतसँ बिआह करऽ चाहै छी।” हेमंत सुलेखा संगे काज करै छथि आ ओकर नीक संगी सेहो छथि। मुदा ऐ प्रस्तावपर देवकांत तैयार नै भऽ तमसाइत बाजला- “हेमंत अपन जातिक बर नै छै आ अनजातिमे अपन बेटी बियाहि कऽ हम समाजसँ भतबड़ी नै कराएब।” देवकांतक ई रूप देखि सुलेखा सहमि गेली आ सकदम भऽ पिताक गप मानबाक सहमति दऽ देली। पुरजोर ताक-हेरक पछाति देवकांतकेँ एकटा वर सुलेखा लेल भेटलन्हि। बरक पिता नंदलाल अपन आई.आई.टी. इंजीनियर, उच्च पदपर सेवारत बेटा शैलेश लेल सुलेखाक प्रस्तावपर मंजूरी देलन्हि। मुदा बिआह रातिक खर्चक माँग सेहो केलन्हि। देवकांत पुछलखिन्ह- “बिआह रातिक खर्च केतेक हेतै।” नंदलाल कहलखिन्ह- “ई अहाँ अपनेसँ विचार कऽ लिअ आ हमर सबहक हैसियत आ लड़काक योग्यता देखैत खर्च बिआहसँ पूर्व हमरा लग पठा दिअ।” देवकांत अपन जमा-पूजी तोड़ि पाँच लाख टाका अपन पुत्र- शरत-क मार्फत बिआहसँ दू दिन पूर्व पठा देलखिन्ह। पाँचे लाख टका देखि नंदलालक पारा चढ़ि गेलन्हि आ ओ शरतक फजहति करैत बजला- “हम पच्चीस लाख आ बीस लाखक कथा छोड़ि अहाँ ओइठाम सम्बन्ध कऽ रहल छी से की ऐ भीखमङ्गीए लेल!” शरत बाजला- “ई अहाँ हमर बाबूसँ कहियनु, हम की कऽ सकै छी।” खैर बिआहक दिन आएल आ नंदलाल वर-बरियाती साजि देवकांतक दरबज्जापर एला। बरियाती दुआरि लगि गेल छल आ नश्ता-पानि इत्र-फुलेलसँ हुनकर सबहक सुआगत होमए लगल छल। नंदलाल अपन होइबला समधि- देवकांत-केँ बजा कऽ कहलखिन्ह- “बिआह रातिक समुच्चा बेवस्था अहाँ नै पठेलौं, मुदा तखनो हम आएल छी किएक तँ हम सभ भलामानुस छी। अहाँ आर पाँच लाख टका अबिलम दिअ तँ वर वेदीपर जाएत।” देवकांत अकाससँ खसला आ नंदलालक निहोरा करैत बाजला- “अखनि पाँच लाख केतएसँ आनब। बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखइमे सभ जमा पूजी पहिनहि खरच भऽ गेल अछि। अहाँ अखनि बिआह हुअ दियौ। हम गछै छी जे शनैः शनैः हम अहाँक पाँच लाख टका आर दऽ देब।” मुदा नंदलालपर ऐ निहोराक कोनो प्रभाव नै पड़लन्हि आ ओ जिद्द ठानि बैसि गेला जे पाइ एखने चाही। कनी कालमे ई बात आँगनधरि पहुँच गेल जे जावत नंदलालकेँ पाँच लाख टका आर नै भेटतै तावत बिआह नै हेतै। सुलेखा अपन बापक दुर्दशा आ समाजक बेवहारसँ बेथित भऽ गेल छेली। हुनकर माए हुनका लग बैसि कऽ कानए लगली जे आब की हेतै। ओ बाजली- “हुनका कहैत रहियनि जे बेटी-बिआह लेल पाइ जमा करू मुदा ओ हमर नै सुनलनि आ सबटा पाइ बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखाइपर खर्च कऽ लेलनि। ई बेइज्जती लऽ कऽ केना जीअब हम, सभटा हुनके किरदानीसँ भऽ रहल अछि।” बापक दुर्दशा आ बेइज्जती सुनि सुलेखाक आँखिमे पानि भरि आएल। कनीकाल तँ ओ माइयक विलाप सुनैत रहलि। फेर ओ ठाढ़ भऽ गेल आ अपन नोर पोछि दलान दिस बढ़ि गेलि। दलानपर पाहुन-परक आ दोस्त-महिमक बीचमे ओकर सहकर्मी हेमंत सेहो बैसल छल। ओ सोझहे हेमंत लग गेलि आ ओकर हाथ पकड़ि पुछलक जे अहाँ अखनि हमरासँ बिआह कऽ सकै छी। हेमंत कहलक किएक नै, ई तँ हमर सौभाग्य हएत जे अहाँ सन पढ़ल लिखल सुन्नरि कनिञाँसँ हमर बिआह हएत। सुलेखा हेमंतकेँ लेने वेदीपर पहुँचली आ पंडितजी केँ कहलखिन्ह जे हमर आ हेमंतक बिआह संपन्न कराैल जाए। ई समाद दलानपर पहुँचल आ सौंसे अनघोल भऽ गेल। नंदलाल आ देवकांत आँगन दिस दौड़ला। देवकांत बेटीकेँ कहलखिन्ह- “ई की कऽ रहल छी अहाँ? हमर पगड़ी किएक खसा रहल छी!” सुलेखा बाजली- “एकटा नीक आ सुलझल वरसँ हमर बिआह भेलासँ अहाँक पगड़ी खसि रहल अछि बाबूजी? आ ई दहेजक राक्षस जे अहाँकेँ नोचि रहल अछि ऐसँ अहाँक सम्मान बढ़ि रहल अछि की? अहाँ पहिने पाँच लाख टका दऽ चुकल छिऐ आ ऊपरसँ आर पाँच लाख? किएक बाबू किएक? हम स्त्री छी, की ई एकर प्रायश्चितमे ई टाका अहाँ दऽ रहल छिऐ? कर्जा लऽ कऽ जँ अहाँ ई टका ऐ दहेज-दानवकेँ दैयौ देबै तँ की ई हमर सुखमय जीवनक गारंटी देता? अहाँ ओइ कर्जाक भारसँ दाबल कुहरैत रहब तँ की हम सुखी रहब? नै बाबू नै हम आब किन्नौं ऐ दहेज-दानवक बेटासँ बिआह नै करब आ हम हेमंतसँ बिआह करब।” हेमंत आगू बढ़ि देवकांतक पएर छूबि बजला- “बाबूजी, अहाँ हमरापर बिसवास करू। सुलेखा ठीक कहै छथि। अहाँ अपन बेटीकेँ पढ़ा लिखा सुयोग्य बनेलौं। तेकर बादो बेटी हेबाक प्रायश्चितमे अपन देह बेचबाक तैयारी किएक केने छी? अहाँ स्वीकृति दियौ तँ हम सभ बिआह करी।” देवकांतक मोनमे समाजक डर छेलनि जे परजातिमे बिआहसँ भतबड़ी भऽ जाइत। मुदा दोसर दिस नंदलाल जकाँ राक्षसक डर सेहो छेलन्हि। कनीकाल विचार केला उपरान्त बजला- “हाँ सुलेखा, अहाँ ठीक कहै छी। विआहक उपरान्त ई दहेज-दानव अहाँसँ की बेवहार करत, एकर कोनो गारंटी नै। आ समाज की कोनो हमरा मदति केलक अहाँकेँ पढ़ेबा-लिखेबामे आकि बेवस्थाक टाका गानैमे। हम समाजसँ किए डरू? हम अहाँकेँ सुयोग्य बनेलौं आ आगू अहाँक जिनगी जाइसँ सुखमय रहए, तेहने काज हेबाक चाही। जाउ हम अहाँकेँ असिरवाद दइ छी। अहाँ हेमंत संगे बिआह करू आ नंदलालजी बरियाती लऽ कऽ अपन गाम जाथु।” बाजा-गाजा फेरसँ बाजए लगल। बेदीपर हेमंत आ सुलेखा बैसल आ मंत्रोच्चार शुरू भऽ गेल। डॉ. कीर्तिनाथ झा शेफाली, फुलपरासवाली आ हम जहिआ ओ लोकनि जीबै छला तहिआ तँ ने एहेन प्रसिद्ध रहथि आ ने किछु सुनबाक पढ़बाक तेना भऽ कऽ साधन रहै। आब सुनै छिऐ एक गोटे ‘मुक्ति’ लिखने छला तँ केकरो पढ़ि कऽ ठकमुड़ी लागि गेलनि आ दोसर गोटे ‘फुलपरासवाली’ लिखलनि तँ कहाँ दन ‘मुक्ती’बला नोटिस नै लेलखिन। माने दूध-भात। जे किछु। आब किताब आ पोथी सेहो खूब छपै छै आ लोक किनितो अछि। मुदा हमरा लोकनि रामायण-महाभारत पढ़ब आकि नव-नव किताब। मुदा ओइ दिन संयोगेसँ टी.भी खूजल छेलै आ दू गोट गोट भऽ सकैए परफेसर छल हेता- बड़ीकाल धरि एक दोसरासँ बहस करैत रहथि माने ‘शेफाली’ नीक केलनि आकि ‘फुलपरासवाली’। धुर, एहन गप-सप्प केतौ एतेक खूजि कऽ होउ। धिया-पुता तँ अबधारि कऽ आरो रस लेत। बीचमे एक गोटे आैर छला जे बीचमे एकबेर टिपलखिन िक तँ, कियो कहने छेलखिन, जे “हिनका लोकनिक खीसा मर्यादाक बाहरक गप थिक।” मुदा नै जानि ओ बुढ़ी लोकनि आइ जीबैत रहितथि तँ की कहितथिन। मोने अछि, मैयाँकेँ पुछने रहियनि, “मैआँ अहाँ कहिआ विधवा भेलिऐ?” तेतबे वयस रहए जे ई नै बुझिऐ जे एहेन गप पुछबाक नै छिऐ। आ जेहने हम तेहने मैयाँक जवाब- “जहिए बिआह भेल तहिए राँड़ भऽ गेलिऐ।” दूरस्थेसँ माए ई गप-सप्प सुनलनि तँ दबाड़ि कऽ भगा देलनि। मुदा हमरा ले धनि सन। हम तँ मैयाँसँ बस किछु गप करैले किछु फुछने रहियनि। देखियनि उज्जर धोती, काटल केश, चुड़ी-सिनुर-ठोप-ठीका किछु ने। तैपर हम आवेशसँ कखनौं आलताक ठोप करबाक लौल करियनि। कहियो चुड़ी पहिरबाक। गरमी मासक दुपहरियामे जखनि मैयाँ अपन टेकुरी लऽ कऽ जनौ कटैले बैसै छेली तँ हम सहटि कऽ लग जाइ। किछु-किछु छोट काज कऽ दियनि। ओहो कखनो मिसरी, कखनो एकटा छोहाड़ा तरहथ्थीपर रखि देथि। नातिन आ मैयाँक अही संग बहिनाक आपक्तामे तँ ओ बुझा कऽ कहने रहथि- “है चुड़ी सिनुर विधवा नै करै छै।” नेना तँ रहबे करी। पुछलियनि- “अहाँ विधवा छिऐ।” ओ कहलनि- “हँ।” हम पुछलियनि- “कहिआसँ?” बस हुनकर जवाब देल छेलनि आकि माँ सुनिते छेली गप-सप्प, दबाड़ि कऽ विदा केलनि। मुदा बिआहो दिन लोक विधवा भऽ सकै छै से पछाति बुझलिऐ। हमरो सरकार तँ हालहिमे गेलाहे मुदा हम? जे किछु सुनिऐ, तइसँ एतबे मोन अछि जे घर डेरा बड़ ऊँच रहनि, आ जाति बड्ड पैघ। किदुन सुनिऐ बाबू कहथिन- “शुद्ध गहुमनक पोआ छला, सरकार।” ठीके छल हेता। मुदा जहिया हुनकर पाला पड़ल रही दाढ़क डाँस बुझबाक वयए नै छल। मुदा आब जखनि बीख भरि देह निजाएल अछि तँ बुझै छिऐ। ओ साँप तँ नै छला मुदा हुनकर बीखक असरिसँ की कहियो उबरि सकलौं। अपना तँ बोध एतबे रहनि जे साबुन आ बर्फीक अन्तर नै बुझथिन। झोंक एलापर कथीमे दाँत काटि देता तेकर कोन ठेकान। कखनो बाटीक दालिकेँ बड़की पोखरि कहथिन आ फोड़नक मरचाइकेँ पोखरिक माँछ। बिआह भेलापर लोककेँ तँ खूब मोन लगै। हम आब बुझै छिऐ, लोक, देखि कऽ माँछी केना गिड़ै छल तहिया। मुदा सोचै छी हम के छी? ‘शेफाली’ कि फुलपरासवाली? एक गोटे उड़हरि कऽ मुक्त भेली। दोसर अपन मोनक सक्कसँ इज्जति बँचौलनि। मुदा इज्जति? रसिआरीवाली काकी जीवन भरि इज्जति बँचौने रहली मुदा मगज तँ फिरिए गेलनि। केतए-केतए ने गोहरिआ बनि कऽ गेली। केतेक ने इलाज करौलनि। किछु भेलनि नै। पछाति जखनि सभ किछु समन भऽ गेलनि तँ लगलनि जे अनकर आगि बाँचए नै देत आ आखिरी आबि कऽ अपनेसँ अगि लगा कऽ मरि गेली। मुदा हम? हमरा सरकारक सरकारीक वंशकेँ जे ऊक देखौलकनि तेकर मरला उत्तर मुखबत्ती लगा कऽ शरीर वलानमे भँसौल गेलै। यएह बलान तँ थिकी। अपने नोत पुरैले गेल रहथि। आ हम एसकरिए रही। मड़रटा मनेजर-हरवाह-कमतिआ-ओगरवाह सभ छला। बड़ जोर बाढ़ि आएल रहै। आ हमरा मथदुखीक राेग धऽ नेने छल। सभ राति पहिने दहिना कात कपारसँ शुरू हुअए। फेर कनपट्टी होइत माथक पाछूसँ गरदनि धरि जाए। गरदनि तर केत्ताबेर गेड़ुआ दहिना-बामा करी। चैन नै हुअए। शंकर बाम-कृष्णधारा- विक्स सभ लगाबी। रसे-रसे हुअए माथ दुखाएब दोसरो दिस ने पसरि जाए। तखनि भरि देहमे खौंत, पसेना। मोन आऊल। छट-पटी लगि जाए। बाबूक लिखौल- “सर्व बाधा प्रशमन....।” केर श्लोक पढ़ि अपने हाथ अपने माथपर ली। मुदा भरि राति पहाड़ भऽ जाइत छल। आ दिनमे जे निन्न हुअए से आँखि नै खुजए। तहिया डाक्टर बुझी कि वैद गोनर मिसरटा छला। नाड़ी देखथि मथाहाथ दथि। एक दिन एकटा जड़ी सेहो लत्तामे बान्हि कऽ देलनि जे गाड़ामे बान्हि लेथु। मुदा कोन भूत छल छूटए नै। एक दिन आजिज भऽ ओहो मथाहाथ देब मना करि देलनि। कहलखिन- “कि तँ नवटोल भगवती स्थानमे भगतासँ भाउ कराबथु।” तहिया कि से सनस्था रहै। जैतौं अपने मोने। दर-देआदक हवेली डौढ़ी सेहो कि लग-लग रहै। एक दिन रातिमे फेर असाद्ध मथदुक्खी धेने छल। कोठलीमे कुहरैत छेलौं। कहबो केकरा कहितिऐ? गोनर झा सेहो जवाब दऽ देने छला। सासु छेली नै। हमरा भेल जेना कियो आस्तेसँ कहलकैए- “बौआसीन!” अकानलिऐ। तँ ठीके जेना कियो हाक दैत हो। रोइआँ भुलकि गेल। हनुमान जीक नाम लेलौं। दमसि कऽ कहलिऐ- “के छी?” - “हम, बौआसीन, लोटना!” - “की छिअनि?” - “बड़ कुहरै छथिन! गोनर मिसरकेँ हाक दिअनि?” - “नै।” - “एना कोना रहथिन। बड़ तरद्दुत् होइए।” - “मरए देथु हमरा।” - “बलानक पानिसँ ओसरा धरि छइहे। मरि जाएब तँ कहिहथिन फेक दइ जेता।” लोटना, लागल जेना गुम्म भऽ गेल छला। मुदा गोंगिआइत बाजल रहथि, से मोने अछि- “डोमा जे भाव खेलाइ छेलै, से हम देखने छिऐ। हमरो तँ मथाहाथ देब सिखौने छल। लाजे कहलियनि नै। टोलपर सभ जनी-जाति तँ हमरेसँ माथा-हाथ दिअबै छै, जखनि डोमा-भैया गाम-गमाइत जाइ छै।” मोन आउल-बाउल छल। प्राण अवग्रह छल। सोचए लगलौं जेकर सोझा पएर नै उघार भेले तेकरा सोझा माथपर सँ नूआ केना उतारब। आ केना मथा हाथ देत। मुदा प्राण अवग्रहमे छल। की करितौं? कहलिऐ- “केकरो कहिहथिन नै।” ‘जानथि भगवान। बौआसिन, एक चुरुक नारिकेरिक तेल देथु। आ हम बाहरक कोठलीक लाथे हमर कोठलीक जे केबाड़ रहै, खोलि देने रहिऐ। मुदा बिछौनसँ उठबाक हूबा नै छल। लगमे नारिकेरक तेलक बोतल राखि देने रहिऐ। डिबिआक इजोतमे हम आँखि मुननहि आँगुरसँ इशारा कऽ देने रहिऐ। हमरा एतबे मोन अछि, लोटना एक चुरुक तेल कपारपर ढारि कऽ मलए लागल छला। फुसुर-फुसुर किछु पढ़ितो छला। तेतबे मोन अछि। ओकर पछाति कखनि निन्न भऽ गेल आ ओ कखनि कोठलीसँ बहार गेला से मोन नै अछि। मुदा एतबा मोन अछि जे ने हमर मथदुक्खी छूटल छल आ ने फेर कहियो गोनर झा हमरा मथाहाथ देबए हमर अँगना पएर देलनि। ईहो सत्ते जे ने ओइ बलानक बाढ़िमे हमर देहे भँसिआएल। आ ने कहियो हमरा लोटनाक मथाहाथ देबाक गुणपर संदेहे भेल। हम की छेलौं? की छी? मोने जनैए। लोटना नि:संतान नै छला तैयो मुखबत्ती लगा कऽ बलानमे भँसौल गेला। सरकार नि:संतान छला मुदा संततिक हाथे वृषोत्सर्ग श्राद्ध भेलनि। मुदा हम? हम ‘शेफाली’ छी, की फुलपरासवाली? जगदीश प्रसाद मण्डल ''रेहना चाची'' दिन लहसैत किशुन भाय लौफा हाटसँ घुमती बेर जखनि दीप पहुँचला तँ बाटपर ठाढ़ रेहना चाचीपर नजरि पड़लनि। कोराक बच्चा-प्रपौत्रकेँ रेहना चाची बाजि-बाजि खेलबैत रहथि। रेहना चाचीक ‘अवाज’ सुनिते किशुन भायकेँ सात-आठ बरख पहिलुका बूझि पड़लनि मुदा सत्तरि बर्खक झूर-झूर भेल शरीर, धँसल आँखि, आमक चोकर जकाँ मुँहक सुरखी देखि शंको भेलनि। ओना सात-आठ बर्खसँ किशुन भाय रेहना चाचीकेँ नै देखने रहथि तँए हँ-नै दुनूमे मन फँसल रहनि। फँसबो उचिते छेलनि। एक दिनमे तँ राज-पाट उनटि जाइए, सात-आठ बरख तँ सहजे सात-आठ बरख भेल। मुदा तैयो मन तरसैत रहनि, तरंगी होइत रहनि जे रेहना चाचीक अवाज छी। लग्गा भरि हटि बाटेपर साइकिल दहिना पएरक भरे ठाढ़ केने, रेहना चाचीपर आँखि गड़ौने मने-मन विचारिते छला आकि अनायास मुँह फुटलनि- “रेहना चाची।” ‘रेहना चाची’ सुनि चाची बच्चापर सँ नजरि उठा चारू दिस खिरौलनि। दछिनवारि भाग साइकिलपर ठाढ़ भेलपर नजरि पड़लनि। चेहरासँ चिन्ह नै सकली। मुदा कानमे किशुनक अवाज ठहकलनि। अवाज ठहकिते बोल फुटलनि- “बौआ, किशुन।” ‘बौआ किशुन’ सुनि किशुन भायकेँ जीहमे जान एलनि। जान अबिते जीहपर राखल तीस बरख पहिलुका रेहना चाचीक रूप-रंग-बोल ठहकलनि। वएह रेहना चाची जिनकर जिनगीक दुनियाँ दछिन भाग लखनौर उत्तर बेरमा पूब कछुबी आ पछिम सुखेत भरि छेलनि। यएह छेलनि हुनकर कर्मभूमि आ दीप छेलनि पतिभूमि। एक तँ अहुना दीप ओहन गाम अछि जइमे छोट घराड़ीक परिवार बेसी अछि। जइसँ बरो-बाट घराड़ीए बनि सुखसँ रहैए। पहिने घराड़ीपर घर तखनि ने जाइ अबैले आकि चलै-फिड़ैले बर-बाटक खगता होइए। बाटक काज तँ एक पेड़ीओ, खुरपेड़ीओ आ धुरपेड़ीओसँ चलि सकैए मुदा घराड़ी बिना ‘घर’ बाँसक धूजा बनि थोड़े फहराएत। घराड़ी भरि जमीनमे बास करैवाली रेहना चाचीक जीविकाक बेवसाय छेलनि, भोरे अपन जबावदेहीक अँगना-घरक काज सम्हारि, पथियामे अपन सौदा-बारी सैंति, चारू दिसक गामक पारक हिसाबसँ निकलि एक अनिया अलता, पैयाही डोरा, पैयाही सुइयाक संग आनो-आन बौस लऽ गामक सीमान टपि आन सीमानमे भरि दिन गमा साँझ पड़ैत फेर अपन सीमानमे पहुँच जाइ छेली। मिथिलाक जे गौरव-गाथा अछि दुआरपर आएल बाट-बटोही, भूखल-दूखल जँ खाइबेर पहुँचैत वा जलखैए बेर पहुँचैत आकि जखनि जे समए रहल, पहिने हुनकर आग्रह करियनि। ओना खाधुरोक अपन राज-पाट छै। जँ से नै छै तँ ओइठामक भोजैतक कोटा हजार रसगुल्ला आ बीस किलो माछक ओरियानक पछाति किए नतहारी ताकब छै। ओहन नतहारी जकाँ तँ नै मुदा हिस्सामे बखरा तँ लोक निमाहिते अछि। काेनो गाम अबैसँ पहिने रेहना चाची बिसरि जाइ छेली जे भरि दिन खाएब की आ रहब केतए। परिवार परिवारक बीच खाली कारेबारक सम्बन्ध नै। घंटा-घंटा बैसि रेहना चाची अपनो जिनगी आ परिवारो-समाजोक जिनगीक खिस्सा-पिहानी सुनैत अपन कारोबार करैत आएल छेली। साइकिलपर सँ उतरि किशुन भाय, स्टेण्डपर साइकिल ठाढ़ करैत बजला- “चाची गोड़ लगै छी?” किशुन भायक गोड़ लागब रेहना चाची सुनबे ने केली जे असीरवाद दितथिन, ले बलैया उनटा कऽ पूछि देलखिन- “बौआ, माए नीके छह किने। जहियासँ गाम छूटल, कारोबार गेल तहियासँ चीन्हो-पहचीन गेल। के केतए जीबैए आ केतए मरि गेल। मरि गेल मनक सभ सखी-बहिनपा।” रेहना चाचीक बात सुनि किशुन भायक माथ चकरेलनि। जहिना एक-जनिया, दू-जनिया, बहु-जनिया ओछाइनो-बिछाइन चकराइत जाइए तहिना बुधिओ-बुधियारी आ चासो-बास तँ चकराइते अछि। तहिना किशुन भायक मन चकरा गेलनि, चकरा ई गेलनि जे गाम छूटल! गाम किए छूटल? गुम-सुम भेल किशुन भाय रेहना चाचीक झूर-झूर भेल चेहरा देखए लगला, जेना खेसारी-बदामक बीड़िया झूर-झूर भेलो पछाति गरदी तरकारीक रूप पकड़ि भोज्य भोग पबैक सुख पबैत अपन जिनगी चैनसँ गमबए चाहैए, तहिना चाचीक मन सेहो पुलकैत रहनि। मुदा बिनु बुझनौं तँ नहिने लोक बुझैत। कोनो बात सूनब आ बूझब, दू भेल। बुझैले बेसी सुनए पड़ै छै, सुनै तँ लोक एकहरफीओ अछि। भाय पुछलखिन- “चाची, गाम केना छूटल?” किशुन भायक प्रश्न सुनि रेहना चाचीकेँ एको मिसिया बिसबिसी नै लगलनि, जेना नीक जिनगी पाबि कियो नीक सिरासँ अपन जिनगीक बाट पबिते खुशी होइए तहिना भगिन जमए पाबि रेहना चाची खुशी छथि। मुदा पेटमे पेटेले झगड़ा उठि गेलनि। झगड़ा ई उठलनि जे बीतल जिनगीमे जे घटल सत बात अछि ओ बाजल जा सकैए की नै? ओना आब ओइ बातक खगतो नहियेँ जकाँ अछि मुदा इतिहास तँ काल-खण्ड विहीन भाइए जाएत? मन बेकाबू भऽ गेलनि! मुदा बिसवास देलकनि। बिसवास ई देलकनि जे अबैया दिन सुखैया तँ अछिए तखनि किए ने अपन जिनगीक बात भाइओ-भातीजकेँ कहि दिऐ। आब कियो जिनगी लूटि लेत। बजली- “बौआ, सात-आठ बर्खसँ गाम सभ छोड़लौं, ओना खटनी छूटने देहो हर-हरा गेल, मुदा मन अखनो कहैए जे जानि कऽ रोगा गेलौं। गामे-गामे तेना ने छीना-झपटी हुअ लगल, जे आन गामक लोकक कारेबारेेटा नै चलैक रस्तो कटि-खोंटि गेल।” एक संग किशुन भायक मनमे रंग-बिरंगक अनेको प्रश्न उठि गेलनि, मुदा जहिना मुड़ी आ टाँग कटल लहासकेँ परखब कठिन भऽ जाइए तहिना चाचीक बात सुनि भेलनि। छीना-झपटी आकि झपटी-झपटा, वएह ने जे जहिना प्रखर वक्ता लोकनि अपन मेहिका चाउरमे मोटका चाउर फेँटि काज ससारि लइ छथि आकि मोटके चाउरमे मेहिका फेँटि दइ छथिन...। मुदा अनेरे मन वौअबै छी। मनकेँ थीर करैत बजला- “चाची, जहिया जे भेल, से भेल, आब नीके छी किने?” किशुन भायक बात सुनि रेहना चाची बिसमित भऽ गेली। ‘बिसमित’ ई भऽ गेली जे यएह देह छी, अपन गाम लगा पाँच गामक लोकसँ हबो-गब करै छेलौं आ खेबो-पीबो करै छेलौं, कमाइओ-खटा लइ छेलौं, से तँ छिनाइए गेल! ओना आब अपन उमेरो ने रहल जे माथपर पथिया लऽ चारि गाम घूमि कारोबार करब। रेहना चाची बजली- “अपन बेटा-पोता अल्ला हेरि लेलनि, मुदा फेर वएह ने देबो केलनि।” रेहना चाचीक उत्तर किशुन भाय नीक जकाँ नै बूझि सकला। तेकर कारण भेलनि जे लगले सुनला जे बेटा-पोता हेरि लेलनि आ लगले सुनला जे प्रपौत्र बच्चा छी आ भगिन-जमएक परिवारमे रहै छी। मनकेँ सोझरबैत किशुन भाय बजला- “चाची, हमरा ओहिना मन अछि, जखनि माइओ आ अहूँ एकेठीन बैसि खेबो करी आ नीक-अधला गपो करी।” किशुन भायक बात सुनि रेहना चाचीक अपन सत्तरि बर्खक जिनगी बिजलोका जकाँ मनमे चमकलनि। करियाएल मेघ, बदरियाएल मौसम, सरदियाएल रातिमे जखनि बिजलोका चमकै छै तखनि ओ अपन इजोतक संग अवाज करैत कहै छै जे हम लाली इजोत छी नै कि पीड़ी। पीड़ी दूर-देशक होइ छै लाली लगक। प्रमाण असतक होइ छै आकि सतक? सत तँ अपने सत भऽ सौंसे फल फड़ जकाँ अछि। रेहना चाचीक आगूमे ठाढ़ किशुन भायक ने ‘अक’ चलनि आ ने ‘बक’। दिन सेहो लुक-झुका गेल। सुरूज तँ डूमि गेल मुदा लाली ओहिना पसरल छल। किशुन भाय बजला- “चाची, अखनि तँ दिन निसचित नै भेल मुदा अखने कहि दइ छी जे अहाँकेँ लिऔन करै छी।” किशुन भायक ‘लिऔन’ सुनि रेहना चाचीक मन ठहकलनि। मन ठहकलनि ई जे आब वएह जुग-जमाना रहल आकि ओइसँ नीको-अधला भेल। नीक-अधलाक बीच रेहना चाची बोझक तर पड़ि गेली। जइसँ बोथिया गेली। बोथिया ई गेली जे की सम्बन्ध छल! कोरा-काँख तर केते दिन किशुन लालकेँ नेने छी, पावनिमे पवनौट खुएलौं आ अपने केतए खेलौं, तेकर कोन हिसाब। जिनगीए ओही भरोसे बीतल किने। आइ ओइ किशुन लालक बेटाक बिआह छी, की आब ओतए पहुँच पाइब सकै छी? केना पाबि सकै छी? जैठाम लोक अधला काज करै छल तैठाम गंगाजलसँ सिक्त कऽ नीक बनौल जाइ छल, आ अखनो बनौल जाइए। मुदा ओहन तँ जगहे खिया गेल। मुदा जैठाम गंगेजल अधला बनि जाएत, तैठाम की उपए। रेहना चाचीक मन ओझरा गेलनि। मुदा सँझुका तारा जकाँ जेना मनमे भुक दनि उगलनि। उगलनि ई जे जँ कहीं काजेक चर्च पाछू पड़ि जाएत आ अनेरूए गप साँझ पड़ा देत तइसँ नीक जे काजक नांगरि पकड़ि धार पार होइ, बजली- “बौआ, ढौओ-कौड़ी लेलहक हेन?” ढौआ-कौड़ीक बात सुनि किशुन भायक मन पुलकलनि। बजला- “चाची, बिआहक अखनि गपे-सप उठल हेन, ओ सभ गप पछुआएले अछि, जखनि बिआहमे एबे करब तखनि सभ गप बुझा देब।” किशुन भायक झाँपल-तोपल बात सुनि रेहनो चाचीक मनमे उठलनि, जेते अल्ला-मियाँ परिवार सभकेँ झाँपन-तोपन दैत रहथिन तेते नीक। भगवान सभकेँ नीक करथुन। बजली- “किशुन बौआ, देखिते छह जे अथबल भेलौं। चलै-फिड़ै जोकर नै रहलौं, मुदा पोताक बिआह देखैक मन तँ होइते अछि, से...।” रेहना चाचीक बात सुनि किशुन भाय गुम भऽ गेला। गुम ई भऽ गेला जे की रेहना चाचीकेँ यज्ञ-काजमे लियनु करा लऽ जा पएब? की समाज एकरा पसिन करत? जे दुरकाल समए बनल जा रहल अछि ओ भरियाएल जरूर अछि। मुदा जात तर पड़ल ओंगरी जँ निकालि नै लेब, तँ जातक काजे केना चलत। कोनो एकेटा ने हएत या तँ पीसिया हएत वा ओंगरी पिसाएत। मुदा भविस...। ¦¦¦ बृषेश चन्द्र लाल एकगोट बालगीत चौरचन चौरचन उगल चान झट दए पूरी दही आन मरड़ भाङि खूब खाएब पूरी सभ भाई सभओ आङन घूरी मीठ पिरुकिआ आ अछि खीर लाबह जल्दी छूटल धीर तोड़ब तरुआ आह तिलकोर भैया जो तोँ नरिअल फोर तैपर देबै मीठगर पान बौआ कुदए देखबति शान ! अमित मिश्र गजल हम बाढ़िक मारल-झमारल छी परजातंत्रक सुखसँ बारल छी जुनि कोड़ब सखि भावना कहियो स्मृतिमे पुरना लाश गाड़ल छी ई जग हारय आबि हमरा लऽग अपने मोनक तर्कसँ हारल छी किछु नै हमरा लऽग किओ बाजय सत्यवादक अवगुणसँ छारल छी हम नै छी कवि ने गजल वक्ता बस शब्दक धधरा पजारल छी गजल कने मीठ कने तीत छी अहाँ हमर अपन मीत छी किओ तोड़ि सकत नै सखा अहाँ आँङुर हम बीत छी हमर ठोर परक भाव बनि गुनगुनाइत नव गीत छी अहाँ रहब जतय, रहब हम अहाँ धाह तँ हम शीत छी अहाँ तजि हमरा जीब नै अहाँ हारि तँ हम जीत छी राम कुमार मिश्र गप्पक मारल चनकल छाती साटब हम कोना अमती कांटक बेधल जिनगी काटब हम कोना सत्तक पथपर चललहुँ फूइस पूजित दुनिया में फूसिक जिनगी थूकल फेरो चाटब हम कोना © राम कुमार मिश्र तोरल गप्प तोरै जिनगी मिठगर गप्प जोरै जिनगी क्रोधक लहरि फोरै जिनगी कामुक मोन कोरै जिनगी © राम कुमार मिश्र गजल खेती अगता आइ बुझलियै करमक झटहा आइ बुझलियै असगर जिनगी मगन रही धरि लोकक खगता आइ बुझलियै अनकर तीमन नीक लगै छल बारिक पटुआ आइ बुझलियै बापक टाका खूब उरेलहुँ अप्पन बटुआ आइ बुझलियै शहरी जिनगी मीठ लगै छल गामक कुटिया आइ बुझलियै सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222 21 122 © राम कुमार मिश्र कुन्दन कुमार कर्ण गजल देह जखने पुरान बनल यौ स्थान तखने दलान बनल यौ आङ घटलै उमेर जँ बढलै देश दुनियाँ विरान बनल यौ सोह सुरता रहल कखनो नै आब नाजुक परान बनल यौ अस्त होइत सुरूज जकाँ बुझि राज सेहो अकान बनल यौ रीत छी याह जीवनकेँ सत सोचि कुन्दन हरान बनल यौ 2122-121-122 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ शोणित केर नोर कना देलक ओ हमरा बिनु रहल कखनो नै कहियो देखू आइ लगसँ भगा देलक ओ सपना जे सजैत रहै जिनगीकेँ सभटा पानिमे कऽ बहा देलक ओ हम बुझलौं गुलाब जँका जकरा नित से हमरे बताह बना देलक ओ भेटल नै इलाज कतौ कुन्दनकेँ एहन पैघ दर्द जगा देलक ओ मात्राक्रम: 2221-21-12222 © कुन्दन कुमार कर्ण बिन्देश्वर ठाकुर पैसा एतऽ कमा रहल छी जिनगी सबटा गमा रहल छी रक्षाबन्धन [कविता] भाई-बहिनक प्रेम भरल छै लिय ने एकरा अर्थ अनेक एक दिनलाS सालमे आबे ते त छै ई पर्व बिशेष । थाल सजल छै लड्डु रखल छै लाल चन्दनस माथ रङ्गल छै हर्श-बिस्मातक बाढि आबिगेल हाथमे स्नेहक डोर बन्हल छै । चारुदिस गुन्जैय गीत भाए-बहिनक रीत आ प्रीत मा अम्बेस करैत प्रार्थना होए भैयाके जीते जीत । नीक पथ रोजु यौ भैया बढतै हमरो आत्मविश्वास रक्षा करब देश,समाजक रखनेछी बस एहे आस । अहा हमर आखिक तारा छी हम बहिन अहाक दुलार शत्रुके चङ्गुलस करब सद्खनि अपन भूमि उद्धार । बाट जोहब हम एहि दिनके रहत जाधरि ठोठमे प्राण रक्षाबन्धन जगमग करतै भैया जियत सालो साल । -- विन्देश्वर ठाकुर -- किशन कारीगर बारूद के ढ़ेड़ी पर बैसल बारूद के ढ़ेड़ी पर बैसल हम अट्टहास क हंसी रहल छी मिसायल हमला स उड़ा देब हम अहाँ के नेस्तनाबूद क देब. हमरा लक एतेक परमाणु शक्ति अछि हम अप्पन शक्ति प्रदर्शन केलौहं हमरा सिमान में उड़ल जहाज के अपनेमन ड्रोन हमला स उड़ा देब त्रादसि मचल, निर्दोष मारल गेल एहि स केकरो की? सभ अपना परमाणु प्रदर्शन में बेहाल मानवताक विनाश करै में लागल छि. हाहाकार मचल, लोक अधमरू भेल कोन दिसि जाउ सगतरि विनाश बारूदी अगिलग्गि में लोक उजड़ी गेल मुदा तइयो हवाई हमला रोकल नहि गेल. संघर्ष विरामक सप्पत खा के फेर किएक? गोला बारूद बरसबै छि अहाँ साम्राज्यवादी पसार दुआरे सगतरि मानवताक विनाश पर, उतारू भेल छि. पहिल आ दोसर विश्वयुद्धक भीषण दुष्परिणाम भोगि चुकल समूचा विश्व आबो मानवताक रक्षा लेल सचेत भ' जाउ कहीं ई तेसर विश्वयुद्धक संकेत, नहि त छि? कोनौहं विवादक फरिछौठ सभ देश मिली शांति समझौता सँ कएल करू गोला बारूद स विनाश टा होएत किएक नहि एक बेर ई गप सोचैत छि. कवि- किशन कारीगर (नोट- कॉपीराइट अधिनियम@ लेखक नामे सर्वाधिकार सुरक्षित). बीर जबान मातृभूमीक रक्षा लेल शहीद भऽ जाइत छथि बीर जबान समहारने छथि ओ देशक सीमान नमन करैत छी हम, अहॉ छी बीर जबान। मरब की जीयब तेकर नहि रहैत छनि हुनका धियान मुदा, देशक रक्षा लेल ओ सदखनि न्योछाबर करैत छथि अपन जान। सैनिक छथि ओ इन्सान देशक दुशमन पर रखैत छथि धियान आतंकवादीक छक्का छोड़ा दैत छैक परमवीर छथि, हिन्दुस्तानक बीर जबान। महान छथि ओ बीर जबान, देशक खातिर जे हॅंसैत-हॅंसैत देलथिहिन अपन बलिदान भारतवासी गर्व करैत अछि अहॉ पर नहि बिसरत कहियो अहॉक त्याग आओर बलिदान। सीमा पार सॅं, केलक आतंकी हमला कऽ देलियै आतंक के मटियामेट अहॉं भऽ गेलहु अपने लहु-लुहान मुदा आतंक सॅं बचेलहु सभहक जान कारगील सॅ कूपवाड़ा तक आतंकवादी सॅं लैत छी अहॉं टक्कर अहॉंक बीरता देखी कऽ अबैत छैक ओकरा चक्कर। बीर जबान यौ बीर जबान समहारने छी अहॉं देशक सीमान कोना कऽ हेतै देशक रक्षा सदखनि अहॉ रहैत छी हरान। कवि:- किशन कारीग़र (कॉपीराइट नियम मोताबिक@ लेखक नामे सर्वाधिकार सुरक्षित). आशीष अनचिन्हार गजल भोरक काग बनि कऽ कुचरल छी हम हुनकर ठोरपर तँ बिहुँसल छी हम ओ छथि ठाढ़ गाछ सन आँगनमे लत्ती फत्ती सन तँ पसरल छी हम ई जे देखलहुँ पिआसक रेघा कनियें रुकि कऽ खूब बरसल छी हम भिन्ने भिन्न मत मतांतर जय हो टूटल हड्डी सन तँ छिटकल छी हम असगर देखि आउ नै हमरा लग अनचिन्हार लेल निहुँछल छी हम सभ पाँतिमे 2221+2122+22मात्राक्रम अछि। दोसर आ चारिम शेरक दोसर पाँतिमे दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। भक्ति गजल वसुदेवक भागसँ एलथि कन्हैया जसुदाकेँ जागसँ एलथि कन्हैया जै ठामक लोके छल राक्षस सनकेँ तै ठाँ बचि नागसँ एलथि कन्हैया गाए गोपी बँसुरी बिरदाबन आ राधाकेँ तागसँ एलथि कन्हैया टूटल आसक डोरी सभहँक तखने कनियें उपरागसँ एलथि कन्हैया वेदक नामे उपनिषदक बाटे आ गीता बैरागसँ एलथि कन्हैया सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ओना मैथिलीमे भक्ति गजल तँ बड़ दिनसँ अछि मुदा नामाकरण जगदानंद झा मनुक कएल छनि। ई भक्ति गजल हुनके लेल। गजल ओम्हर लव जेहाद छलै एम्हर लव संवाद छलै बिहुँसल ठोर हमर तोहर आ पसरल उन्माद छलै गड़िए गेलै अनचोक्कहि काँटे सन तँ इयाद छलै पसरल जे सौंसे दुनियाँ छोट्टे सनक फसाद छलै खुब्बे बढ़लै प्रेम हमर हुनकर नेहक खाद छलै सभ पाँतिमे 22+22+22+2 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल तुलसी चौरा के सीत हम शंकर गौरा के गीत हम भ्रष्टाचारक छै लागि भागि अफसर दौरा के जीत हम माखन मिसरी लेलहुँ अहाँ कुक्कुर कौरा के हीत हम चौपेतल नूआ बियहुती सैंतल मौरा के प्रीत हम ई बंसी छै हमरे मुदा पोठी सौरा के मीत हम सभ पाँतिमे 2222+2212 मात्राक्रम अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि। मौरा = मौर गजल गहूमो नै भेलै धानक पछाति उदासल खेतो खरिहानक पछाति गबैए माए समदाउन उदासी बहुत कानै सेनुरदानक पछाति अकासक कोना कोना टेबि हम पहुँचबै सूरज धरि चानक पछाति बचा रखिहें कनियों अमरित गे बहिना नै देतौ बेटा विषपानक पछाति बिसरि जेबै जकरा तकरा तँ हम इयादो करबै शमसानक पछाति सभ पाँतिमे 1222+2222+12 मात्राक्रम अछि। मतला सहित आन पाँति सभक अंतमे एकटा अतिरिक्त लघु लेबाक छूट लेल गेल अछि जगदानन्द झा “मनु” गजल वेदरदी नै बुझलक हमरो जखन जीबू कोना जीवन झहरल तखन घर घर अछि रावण रामक भेषमे कतए रहती आजुक सीता अखन दुश्मन बनि गेलै भाइक भाइ अछि टाकामे भसिएलै कतए लखन सुखि गेलै ममता मायक कोइखक भदबरिया पोखरि सन भेलै भखन सगरो पसरल ‘मनु’ सहसह दू मुँहा काइट नै लेए के कतए कखन (मात्रा क्रम – २२२-२२२-२२१२) भक्ति गजल नै अहाँ केर बिसरी नाम हे भगवन होइ कखनो अहाँ नै बाम हे भगवन सुख कि भेटे दुखे जीवनक रस्तापर संगमे रहथि सदिखन राम हे भगवन हम बनेलौं सिया मंदिर अपन मनकेँ आब कतए अहाँकेँ ठाम हे भगवन आन नै आश कोनो बचल जीवनकेँ अपन दर्शनकटा दिअ दाम हे भगवन ‘मनु’ अहाँकेँ करैए जोड़ि कल विनती तोड़ि फेरसँ तँ अबियौ खाम हे भगवन (बहरे मुशाकिल, मात्रा कर्म – २१२२-१२२२-१२२२) © जगदानन्द झा ‘मनु’ कंचन कुमारी झा मंजिल जौ दिख परल गगन, होई मंजिल ओहि ठमन, होई रस्ता अनचिनार, होई रस्ता में नई केउ आर| रस्ता में काट बिछल अछि, हर कदम पर हर जगह, ओई मुश्किल पर कदम बढ़उ, उ मुश्किल अहा पर नई चला|| मुश्किल सै टुट क$ टुटई छई सब कैउ, उ मुश्किल के तैईर क$ जुझ के अहि आब अहाक| मुश्किल सै जुझईत अहा गिर परलउ तै कि भेल, अपना पर राखु भरोसा करू पहल फैर सै नया|| मुश्किल के दियैउ बताई अहुउ में उ जान अछि, इ होसला के गिरनाई आब नई आसान अछि| होसला सै मुश्किल आब सहज भजात, गगन भी साफ दैखात और मंजिल भी ऩजर एत|| मन में राखु आब भरोसा आशा के भी दियऔ जगह, होई गगन आहाके कदम में, मंजिल अछि ओहि ठमन|| कंचन कुमारी झा प्रदीप पुष्प युग-युगसँ कैद छी हम तोहर इयादमे, भरिसक हमरा जिनगीमे कोनो 15 अगस्त नहि..। -प्रदीप पुष्प सत्य नारायण झा प्रियतम--- डुबल मझधार मे प्रियतम अहाँक हम वाट जोहै छी परल छै घाट पर नैया संग पतवार नेने छी । रहल अछि मोन मे उलझन कहू केकरा सँ जाकय हम हमर त भाग फुटल अछि हृदय मे डाह नेने छी । आहाँ त प्राण छी प्रियतम मगर हम चैन सँ बैसल हृदय मे स्नेह लपटल अछि मुदा हम नीन्द धेने छी । अहाँक आश मे बैसल मदन कें मारि सहै छी करू कल्याण जल्दी सँ कोना हम दिन बिताबै छी । ब्यथित मोन सहब कतेक अपमान सुनू आब लोक हँसैया हुनकर रुपक जाल कतेक जंजाल लगैया । कतेक सिनेह छल हुनका सँ ,से वैह बुझै छथि हमरा मोनक बात मुदा ओ खुब जनै छथि । भोरे उगलै सूर्य कतेक ओ लाल लगै छै , रातिक उगल चान कतेक परिहास करै छैक । फरल गाछ मे आम कतेक झुकल लगै छै पसरल चतरल डारि कतेक सितल करै छै । मिथ्या ई संसार करै छै मिथ्या रचना माहुर बनल समाज देखत की सुन्दर सपना । एहि संसारक रीति कतेक आब स्याह लगै छै भेटत कतौ ने लोक जेतय कियो सत बजै छै । केलक कतेक उपहास हमर आब,हम की बाजब हुनका आँखिक नोर सदा हम मोनहि राखब । छलय जतेक उल्लास आब से ककरा कहबै हुनका मोनक बात सदा हम मोनहि रखबै । बतहा ई संसार ने किछु आब मोन लगैए आँखिक आगा देखि हमर आब देह जरैए । विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 34 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १५९ म अंक ०१ अगस्त २०१४ (वर्ष ७ मास ८० अंक १५९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA