VIDEHA — Issue 160 / अंक १६०

Publication: VIDEHA · Issue: 160
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६० म अंक १५ अगस्त २०१४ (वर्ष ७ मास ८० अंक १६०) गद्य राजदेव मण्डल शारदानन्द सिंह जे. पी. गुप्ता (मोनूजी) अक्षय कुमार झा ललन कुमार कामत पद्य संजय झा राम कुमार मिश्र आशीष अनचिन्हार शारदानन्द सिंह अरुण चन्द्र राय कुन्दन कुमार कर्ण इरा मल्लिक बिन्देश्वर ठाकुर सुरेन्द्र शैल राजदेव मण्‍डल जाल (पटकथा) दू शब्‍द- मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पटकथाक अभावकेँ देखैत ऐ वि‍षयमे अज्ञ रहि‍तो, एकटा लघु परि‍यास केलौं। सफल भेलौं आकि‍ असफल, निर्णए तँ समाजे करता। -राजदेव मण्‍डल मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, भाया- नि‍र्मली, जि‍ला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शि‍क्षा : एम.ए. द्वय (मैथि‍ली, हि‍न्‍दी, एल.एल.बी) पात्र परि‍चए- जाल (पटकथा) १. वि‍क्रम- नायक २. बरसा- नायि‍का ३. श्‍यामबाबू- बरसाक पि‍ता ४. मनदेव- बरसाक मामा ५. रखि‍या- बरसाक मामी ६. हरि‍या- खलनायक ७. सुइदचन- खलनायकक पि‍ता ८. मुंशी- सुइदचनक मुंशी ९. चनकी- हरि‍याक प्रेमि‍का १०. फुलि‍या- चनकीक माए ११. डोलना- चनकीक पि‍ता १२. भकोलबा- चनकीक भाए १३. वि‍क्रमक माए- नायकक माए १४. रघुआ- वि‍क्रमक संगी १५. टहलू- गामक एक बेकती (दोकनदार, सि‍पाहीक दल, हरि‍याक संगी बदमाश तथा कि‍छु ग्रामीण आ पंचगण।) पहि‍ल दृश्‍य- समए- भोर। स्‍थान- नदीक कि‍नार। नदीक आस-पड़ोसक दृश्‍य उभड़ैत अछि‍। सुरुज उगि‍ रहल अछि‍। कि‍नारपर गाम-घरक लोक, चारूभर पसरल हरि‍अरी, गाए, भैंस, बकरी सभ चरैत। गरदा आ थाल-कादोमे खेलाइत धि‍या-पुता। दूर-दूर धरि‍ देखाइत अछि‍। कट टू। धारमे नाह चलि‍ रहल अछि‍। जैपर चढ़ि‍ कऽ गामक लोक शहर जाइत अछि‍, जरूरी चीज-बौस कीनै आ बेचैले। धारक ऐ पार गाम आ ओइ पार देखा पड़ै अछि‍- कौलेज, स्‍कूल, रेलबे टीसन, चलैत आ ठाढ़ बस। केते गोटे नाहसँ उतरि‍ कऽ गाम दि‍स आबि‍ रहल अछि‍। नदी आ ओइठामक जि‍नगीसँ सम्‍बन्‍धि‍त गीत नवरि‍या गाबि‍ रहल अछि‍। कट टू। दोसर दृश्‍य- समए- भोर। नायक- वि‍क्रम, वि‍क्रमक माए। स्‍थान- वि‍क्रमक घरक बाहरी भाग। (घरक बाहर दुआरि‍पर गाए आ बरद बान्‍हल अछि‍। वि‍क्रमक माए गाए दूहि‍ रहल अछि‍। दूधसँ भरल बाल्‍टीन दुआरि‍क कोनपर रखैत अछि‍। आ बड़बड़ाइत अँगना दि‍स बढ़ैत अछि‍। वि‍क्रमक माए- वि‍क्रम अखनी तक सुतले छै शाइत। की करतै छौड़ा, परेशान रहै छै। पढ़नाइक संगे घरेाक काज करए पड़ै छै। (जोरसँ) हे रौ बौआऽऽऽ वि‍क्रम बेटाऽऽ, उठ जल्‍दी भोर भऽ गेलौ। कट टू। तेसर दृश्‍य- स्‍थान- वि‍क्रमक घरक भीतरी भाग। समए- दि‍न पात्र- वि‍क्रम (वि‍क्रम घरमे सूतल अछि‍। चौकीक बगलमे टेबुलपर पोथी आ काैपीक ढेरी अछि‍। ओइपर एकटा टेबुल घड़ीओ अछि‍। माएक स्‍वर सुनि‍ देहपर सँ चद्दरि‍ हटबैत अछि‍। अँगैठी करैत घड़ीपर नजरि‍ दैत अछि‍। घड़ी दिस देखि‍ते फुड़फुड़ा कऽ उठैत अछि‍।) वि‍क्रम- भोर भऽ गेलै। जुलुमक गप्‍प! आइ घड़ीओ नै बजलै। दूध कखनि‍ शहर पहुँचैबै? (जोरसँ) अबै छि‍यौ माएऽऽऽ। कटू टू। चारम दृश्‍य- स्‍थान- वि‍क्रमक दुआरि‍। समए- दि‍न। पात्र- वि‍क्रमक माए आ वि‍क्रम। वि‍क्रमक माए एकटा बड़का कनस्‍तरमे दूध भरि‍ रहल अछि‍। दूध भरि‍ कऽ आँगन दि‍स तकैत अछि‍। तखने वि‍क्रम शर्टक बटम लगबैत अँगनासँ नि‍कलैत अछि‍। दुआरि‍क कातसँ साइकि‍ल लाबि‍ ओइपर दूधक वर्तन लटकबैत अछि‍। आगू-पाछू देखैत, घंटी टुनटुनबैत आगू बढ़ैत अछि‍।) वि‍क्रमक माए- आइ दूधो कमे भेलौ। (साइकि‍लपर चढ़ि‍ चलि‍ पड़ैत अछि‍। ओकर माए पाछूसँ सोर पाड़ैत अछि‍।) ि‍वक्रमक माए- वि‍क्रमऽऽऽ। तूँ कि‍छो बि‍सरबो केलही? वि‍क्रम- नै...। कहाँ कि‍छो। वि‍क्रमक माए- मन पड़लौं? वि‍क्रम- हँ-हँ। ऊ वेकेन्‍सीबला फार्म पोस्‍ट ऑफि‍समे रजि‍ष्‍ट्री करबाक छै। मन नै परि‍तौ तँ डेटे बि‍त जइतै। (माए लेटर लाबि‍ कऽ दैत अछि‍ आ जेबीमे रखैत वि‍क्रमक साइकि‍ल चलि‍ पड़ैत अछि‍।) वि‍क्रमक माए- भुलक्कड़ भऽ गेलै। (रस्‍ता दि‍स तकि‍ते रहि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। पाँचम दृश्‍य- स्‍थान- गामक एक भाग। समए- दि‍न। पात्र- रघुआ, वि‍क्रम। दुआरि‍क चबुतरापर रघु नहा रहल अछि‍। कपारपर पानि‍ ढरैत काल जोर-जोरसँ ‘राम-राम’क जाप कऽ रहल अछि‍। बगलसँ गुजरैत डगरपर साइकि‍लसँ वि‍क्रम जा रहल अछि‍। रघुआक नजरि‍ ओकरापर पड़ैत अछि‍। रघुआ- यौ दरोगा भाय। कनी सुस्‍ता लि‍अ। बस एक मि‍नि‍ट। हमहूँ अहींक संगे चलबै। तैयारे छी। बस धोतीक ढेका खाेंसए दि‍अ। वि‍क्रम- नै रघु काका। हमरा देरी भऽ गेल अछि‍। रघुआ- रौ भतीजबा। तुरत्तेमे दुनि‍याँ आछन भऽ जेतै। हे रौ ठाढ़ रह। हे हे ढेका खोसए दे। (वि‍क्रम साइकि‍ल आगू बढ़ा लैत अछि‍। पाछूसँ रघुआ डाँड़मे धोती लटपटबैत रहि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। साइकि‍लक दुनू पहि‍या तेज गति‍सँ चलि‍ रहल अछि‍। ओहीपर चढ़ल आ जोर-जोरसँ नि‍साँस खि‍ंचैत वि‍क्रम देखा पड़ैत अछि‍। असगरेमे बड़बड़ाइत अछि‍। वि‍क्रम- बेदरामे चोर-सि‍पाहीक खेल खेलाइत काल-सि‍पाही बेसी हमरे बनए पड़ै छल। तहि‍एसँ सभ हमरा दरोगा कहए लगल। आब कहैत अछि‍ तँ तामस लहरैत अछि‍। करबै की? आब हमरा दरोगा बनैक उपए करए पड़तै। जे होइ ऐ परीछामे पूरा जोर लगबए पड़तै। (पाछू मुहेँ घुमि‍ कऽ तकैत अछि‍। रघुआ धोती सम्‍हारैत दौगल आबि‍ रहल अछि‍।) रघुआ- (हाथ उठा कऽ हल्‍ला करैत) रे भतीजबा, ठाढ़ रह। एतेक दूरसँ दौगल अबै छि‍यौ, आबो तँ चढ़ा कऽ नेने चल। (वि‍क्रम फेंर तेजीसँ साइकि‍ल आगू बढ़ा लैत अछि‍।) कट टू। छअम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक तट्क बाहरी भाग। पात्र- बरसा (नायि‍का) नदीक काते-कात घास-फूसक बीचमे बाट देखा पड़ैत अछि‍। ओइ बाटपर हाथमे पोथी नेने बरसा तेजीसँ आबि‍ रहल अछि‍। कट टू। नदीक कछेरमे नाह ठाढ़ भेल देखा पड़ैत अछि‍। लोक सभ नाहपर चढ़ि‍ रहल अछि‍, कि‍छु गोटे चढ़ेक प्रयासमे अछि‍। कट टू। देखा पड़ैत अछि‍- एक तरफ तेजीसँ साइकि‍लपर चढ़ल वि‍क्रम आबि‍ रहल अछि‍ आ दोसर दि‍ससँ बरसा दौगैत आबि‍ रहल अछि‍। कट टू। (नाह खुगैले तैयार अछि‍। तखैने बरसा पहुँच जाइत अछि‍। कैएक स्‍त्री-पुरुख एके संग कहैत अछि‍।) स्‍त्री-पुरुख- हौ नवरि‍या, कनी रूकि‍ जाहक। स्‍त्री- हाथ बढ़ाउ दाय। खैंच कऽ चढ़ा लइ छी। बरसा- कोनो बात नै हम अपने चढ़ि‍ जाएब। (कहैत नाहपर चढ़ि‍ जाइत अछि‍।) (तखैने वि‍क्रम साइकि‍लक घंटी बजबैत आ हल्‍ला करैत नाह लग पहुँच जाइत अछि‍। साइकि‍लक ब्रेक लगबैत फानि‍ कऽ उतरैत अछि‍।) वि‍क्रम- हे रौ भाय। हमरो चढ़ा ले। आइ अहुना हमरा लेट भऽ गेल छौ। (साइकि‍लकेँ नाहपर लादैत अछि‍। आ चढ़ि‍ जाइत अछि‍। नाह खुगि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। (देखा पड़ैत अछि‍ जे वि‍क्रमकेँ पएरसँ बरसाक पएर चि‍पा रहल अछि‍। बरसा पएर खि‍ंचैक कोशि‍श कऽ रहल अछि‍। ताबे वि‍क्रमक नजरि नि‍च्‍चाँ पड़ैत अछि‍। ओ चट दनि‍ अपन पएर हटा लैत अछि‍।) वि‍क्रम- ओह...। हड़बड़ीमे पएर पड़ि‍ गेल। चि‍पा गेल की? धकम-धुक्कीमे एना भऽ जाइ छै। (बरसा कि‍छो नै बजैत अछि‍।) बरसा- (टाँग दि‍स तकैत) एँह...। (वि‍क्रम ओकरा दि‍स देखैत अछि‍। बरसा नजरि‍ झुका लैत अछि‍। वि‍क्रम टकटकी लगा कऽ ओकरा दि‍स देखते रहि‍ जाइत अछि‍।) (फ्लैश बैक- दुनू सपनामे प्रेम गीत गाबि‍ रहल अछि‍।) (फ्लैश बैक समाप्‍त) (वि‍क्रम बरसाक हाथ पकड़ने ठाढ़ अछि‍।) बरसा- (तामसमे) हाथ छोड़ू। दि‍माग ठीक अछि‍ की नै। वि‍क्रम- गल्‍ती भऽ गेल। हे हम जानि‍ कऽ एना नै केलौं। लेकि‍न अहाँ बड्ड तमसाह छी। (बरसा तामसमे ओकरा दि‍स आँखि‍ गुड़ारि‍ कऽ देखैत अछि‍। लोक सभ हल्‍ला-गुल्‍ल करैत नाहसँ उतरि‍ रहल अछि‍। वि‍क्रम ओकरा क्रोधसँ बँचबाक लेल आसमान दि‍स ताकए लगैत अछि‍।) वि‍क्रम- समए केते सुन्‍दर छै। ई बादलक टुकड़ी सभ केते रेशमे दौगल जा रहल छै। लगै छै केकरोसँ भेँट करबाक लेल हड़बड़ीमे हुअए। कट टू। (नाहसँ सभ उतरि‍ गेल छै। लोक सभ दू-चारि‍ डेग आगू बढ़ि‍ गेल छै। असगरे वि‍क्रम नाहपर अछि‍।) नवरि‍या- हे यौ भाय। आसमानक तारा गि‍नै छी की? यौ अखनि‍ दि‍न छै राति‍ नै। झट दऽ नाहसँ उतरू। अखनि‍ तारा नै भेटत। वि‍क्रम- हँ...। हैया उतरै छी। लोको केते हड़बड़ीमे छै। (चट दऽ साइकि‍ल उतारि‍ आगू बढ़ैत अछि‍।) कट टू। सातम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- छोटका शहर। (मि‍ष्‍टान आ चाहक दोकान) (दोकनदार एकटा बड़का कराहमे दूध ओंट रहल अछि‍। ओकरा बगलमे टेबुल-बेंच लगल अछि‍। ओइपर बैस कऽ दूटा मोंछबला चूड़ा-दही सुड़ैक रहल अछि‍। तखैने वि‍क्रम सायकि‍लक घंटी टुनटुनबैत पहुँचैत अछि‍।) दोकदार- यौ वि‍क्रम भाय। हमरा तँ लगै छेलए जे आइ अहाँक दरशने नै हेतै। हे... हे... सम्‍हारि‍ कऽ। (वि‍क्रमक सायकि‍ल खलि‍या दूधक वर्तनसँ टकरा जाइत अछि‍।) यौ भाय, बसन्‍तीकेँ लगाम नै अछि‍ की? वि‍क्रम- यौ, हमरा बसन्‍तीकेँ नजरि‍ नै लगाउ। (सायकि‍लसँ हड़बड़ा कऽ वि‍क्रम उतरैत अछि‍। दूध नापि‍ कऽ कराहमे दैत अछि‍। मोंछबला तेजीसँ दही सुड़ैक रहल अछि‍।) आइ जँ दूध नै आनि‍तौं तँ चाहक दोकान केना चलैत? जँ दोसरासँ दूध लैतौं तँ हमर रोजगार मारल जाइत। दोकानदार- हँ से तँ ठीके। वि‍क्रम- खेत नै उपजैत अछि‍ तँ ई दूधक रोजगार पैदा केलौं। तहूमे अपने टाँगमे कुड़हैर मारि‍ लेब। (सायकि‍ल आगू बढ़बैत अछि‍।) कट टू। आठम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- पोस्‍ट आँफि‍स। (वि‍क्रम पोस्‍ट आँफि‍सक काउन्‍टरपर लेटर दऽ रहल अछि‍। आँफि‍सक कि‍रानी स्‍प्‍ीडपोस्‍टक मोहर लगा कऽ रसीद वि‍क्रमकेँ हाथमे दैत अछि‍।) कट टू। स्‍थान- पोस्‍ट ऑफि‍सक बाहरी भाग समए- दि‍न (एक दि‍ससँ लेटरवाँक्‍समे लेटर गि‍रा कऽ बरसा नि‍कलैत अछि‍। दोसर दि‍ससँ रसीदकेँ देखैत वि‍क्रम अबैत अछि‍। दुनू एक-दोसरासँ टकरा जाइत अछि‍। बरसाकेँ हाथसँ पुस्‍तक गि‍र पड़ैत अछि‍। वि‍क्रम पुस्‍तक उठेबैले झुकैत अछि‍। ओकरासँ पहि‍ने तमसाइत बरसा पुस्‍तक उठा कऽ चलि‍ जाइत अछि‍। वि‍क्रम- (ऊपर देखैत) हे भगवान एकरासँ रक्षा करू। कट टू। नअम दृश्‍य- समए- राति‍। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (घरमे लालटेनक मद्धि‍म इजोत। वि‍क्रम चद्दरि‍ ओढ़ने बारम्‍बार कर फेरि‍ रहल अछि‍। ओकरा सपनामे बारम्‍बार बरसा चलि‍ अबैत अछि‍। जइ कारणे ओकरा नि‍न्न नै होइत अछि‍। लालटेनक इजोतकेँ कम करैत अछि‍ आ चद्दरि‍ तानि‍ सुतैक परि‍यास करैत अछि‍।) कट टू। (फलैश बैक- बरसा आ वि‍क्रम सपनामे प्रेम-गीत गाबि‍ रहल अछि‍।) (फ्लैश बैक समाप्‍त।) कट टू। (मालक घर दि‍ससँ मवेशी खढ़क टाटमे धक्का मारि‍ रहल अछि‍। स्‍वर सुनि‍ वि‍क्रम चट दनि‍ उठैत अछि‍ आ लालटेनक इजोत बढ़बैत अछि‍। टाटक भूरसँ हुलकी मारैत अछि‍। खुगल बड़द देखा पड़ैत अछि‍। फेर लालटेनक इजोत कम करि‍ दैत अछि‍। अन्‍हार ससरि‍ कऽ लगमे चलि‍ अबैत अछि‍।) कट टू। दसम दृश्‍य- समए- भोर। स्‍थान- नदीक कि‍नार। (दूरमे मंदि‍र आ मस्‍जि‍द देखा पड़ैत अछि‍। मंदि‍रक घंटाक स्‍वर। मुर्गाक अबाज। गाए, बकरी, बड़द हाँकने जाइत लोक सभ। सायकि‍लपर चढ़ल वि‍क्रम जा रहल अछि‍।) कट टू। समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक कि‍नार। (वि‍क्रम नदीक कि‍नारपर बैसल बरसाक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि‍। नाह ऐपार-सँ-ओइपार अबैत अछि‍, जाइत अछि‍। कि‍न्‍तु बरसा नै अबैत अछि‍। मि‍लैले वि‍क्रम छटपटा रहल अछि‍।) डि‍जॉल्‍व। कट टू। एगारहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर। (सुइदचन आ ओकर मुंशी कुरसी-टेबुल लगा कऽ बैसल अछि‍। सुइदचन कि‍छु सोचि‍ रहल अछि‍, ओकरा बगलमे मुंशीजी बही-खाता उनटा-पुनटा रहल अछि‍।) मुंशी- मालि‍क! अहाँ श्‍याम बाबूकेँ कि‍ए नै कहै छि‍ऐ। ओकरापर तेतेक सुइद बढ़ि‍ गेलै जे सभटा खेत लि‍खि‍ देत तैयो नै सधतै। सुइदचन- हमहूँ तँ सहए सोचि‍ रहल छी। मुंशी- गामक धि‍या-पुताकेँ टीसन पढ़बै छै। एनए खेती नै उपजै छै। की हेतै। सुनै छी जे बेटीकेँ पढ़ा रहल छै। आमदनी अठन्नी आ खरचा रूपैआ। सुइदचन- बस नै वएह बेबस हेतै। हम नै तँ हमर बेटा बेबस कऽ देतै। करजा सधबैमे देरी हेतै तब ने खेत-पथार आ गहना-जेवर देइले बेबस हेतै। मुंशी- जँ अगि‍ला सालक फसल नीक हेतै तँ बेचि‍ कऽ चुकता कऽ देत। तब? सुइदचन- समैपर खाद-पानि‍ भेटबे नै करतै तँ उपजा नीक केना कऽ हेतै। हमर जाल केतेक दूर धरि‍ पसरल छै। अहाँ तँ बुझि‍ते छी। बैंको समैपर टका नै देतै। (दुनूकेँ आँखि‍ मि‍लैत अछि‍ आ दुनू हँसए लगैत अछि‍।) कट टू। बारहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक कछेर। (वि‍क्रम ओतए प्रतीक्षा करैत रहैत अछि‍। जेतए बरसासँ मि‍लबाक संभावना रहैत अछि‍। ऐ क्रममे आइ सुनहट बाधमे ठाढ़ अछि‍। तखैने बरसाकेँ चि‍चि‍याइत सुनैत अछि‍। वि‍क्रम दौग कऽ ओतए पहुँचैत अछि‍ तँ देखैए जे तीन-चारि‍टा बदमाश बरसाकेँ घि‍सि‍यबैत नेने जा रहल अछि‍। बरसा ओकरा सभसँ छुटबाक परि‍यास कऽ रहल अछि‍। वि‍क्रम ओइ दृश्‍यकेँ देखि‍ते चि‍चि‍या लगैत अछि‍।) वि‍क्रम- हे रौ, ओकरा छोड़ि‍ देबही की देखबीही। बदमाश- ई केतएसँ आबि‍ गेलौ रौ। मार सारकेँ। (बदमाश आ वि‍क्रमक बीच झगड़ा शुरू भऽ जाइत अछि‍। हल्‍ला-गुल्‍ला सुनि‍ खेतमे काज करैत जन-मजूर सभ हँसुआ आ लाठी लऽ कऽ दौगैत अछि‍। लोकक संख्‍या देखि‍ कऽ बदमाश सभ भागि‍ जाइत अछि‍। वि‍क्रमक संगे बरसा घर दि‍स वि‍दा भऽ जाइत अछि‍।) कट टू। तेहरहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (डेढ़ि‍यापर ठाढ़ भऽ कऽ टहलू हल्‍ला करैत अछि‍।) टहलू- (चकोना होइत) केकरो नै देखै छि‍ऐ। अँगनामे कि‍यो छी कि‍ नै यौ? वि‍क्रमक माए- (अँगनासँ हुलकी दैत) टहलू बौआ छी। अँगना चलि‍ आउ। बहुत दि‍नक बाद देखलौं। टहलू- हँ, हम तँ टहलैते रहै छी। से आइ टहैलते काल बड्ड अजगुत देखलौं। वि‍क्रमक माए- की देखलि‍ऐ? टहलू- देखलौं, अहाँक बेटा गुण्‍डा–बदमाश सभसँ लड़ैत छल। सेहो एकटा लड़की लेल। वि‍क्रमक माए- (आश्चर्यसँ) आँए...! टहलू- झूठ छि‍ऐ की साँच। अपना बेटेसँ पूछि‍ लेबै। हम जाइ छी। (वि‍दा होइत अछि‍।) कट टू। पनरहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (वि‍क्रमक माए अँगना बहारि‍ रहल अछि‍। वि‍क्रम अँगना पहुँचि‍ते माएसँ कहैत अछि‍।) वि‍क्रम- आइ कनी बेसी देरी भऽ गेलौ माए। वि‍क्रमक माए- राह-बाटमे गुण्‍डा-अवारासँ झगड़ा करबीही तँ देरी लगतौ ने। खाइक लेल अन्नक जोगाड़ नै छौ। जि‍नगी केना सुधरतौ तइले सोचबें आकि‍ हीरो बनल घुमै छेँ। वि‍क्रम- हमरो गप्‍प सुनबीही तब ने माए। वि‍क्रमक माए- सुनबै की। उ सभ बड़का खुनि‍याँ छि‍ऐ। ओकरासँ झगड़बें तँ जि‍नगी बेरवाद कऽ देतौ। केते गोटेकेँ मारि‍ कऽ धारमे भँसा देने छै। वि‍क्रम- माए, तोहीं तँ कहने रही जे केकरोपर अति‍याचार होइत रहै तँ चुप नै रहबाक चाही। एकटा लड़कीकेँ संगे उ सभ जबरदस्‍ती करै छेलै तँ हम चुप भऽ कऽ देखैत रहि‍तौं। से तोरा नीक लगि‍तौ? (वि‍क्रमक माए सोचमे डुमि‍‍ जाइत अछि‍।) वि‍क्रमक माए- नीक तँ नै लगि‍तए। मुदा ओ सभ पैसाबला लोक छै। पुलि‍स आ कानून ओकरा मुट्ठीमे छै। ओकरासँ के लड़तै? वि‍क्रम- हम लड़बै माए हम। हम अपने बनबै पुलि‍सबला। सभकेँ सोझ कऽ देबै। रस्‍तापर लबैले चाहे जे करए पड़ए। कट टू। सोलहम दृश्‍य-– समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर। सुइदचन- मुंशीजी, सुनै छी, कि‍रपलबाक बेटा कहै छल जे हम करजा आपस नै करबै। मुंशी- उ कहै छै जे हमरापर बेसी सुइद जोड़ि‍ देने छी। सुइदचन- तेकर मतलब, हमरा बेइमान बनबए चाहै छै। मुंशी- एना करतै तँ देखा-देखी समाजक आनो लोक...। सुइदचन- केकरा समाजमे हि‍म्‍मत छै जे हमरासँ टकरा जाएत। हरि‍याकेँ कहि‍ दि‍यौ ि‍करपलबा बेटाकेँ चारि‍ सटका लगा देतै। ओकर लबरपनी बन्न भऽ जेतै। आ नै सुधरतै तँ राफ-साफ। (हाथसँ इशारा करैत अछि‍।) कट टू। सतरहम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (बरसा चुप्‍पी साधने बैसल अछि‍। श्‍यामबाबू गहींर नजरि‍सँ बेटी दि‍स देखि‍ रहल अछि‍।) श्‍यामबाबू- बरसा, तोरा कि‍छो होइ छौ, आकि‍ कोइ कि‍छु कहलकौ?  (बरसा कि‍छु ने बजैत अछि‍।) श्‍यामबाबू- तोहर माए तँ बचपनेमे मरि‍ गेलौ। केकरा कहबीही। कि‍छु बात छै तँ हमरे कहए पड़तौ। (बरसाक आँखि‍सँ दहो-बहो नोर खसए लगैत अछि‍।) श्‍यामबाबू- की भेलौ तोरा? बजबीही तब ने। (बरसा आँखि‍ पोछैत अछि‍।) बरसा- पढ़ि‍ कऽ अबैकाल बाधमे गुण्‍डा–छौड़ा सभ घेर नेने छल। घि‍सि‍या कऽ नेने जाइत छल। खेतसँ जन सभ आ ओ दौगल, नै तँ...। (फेर कानए लगैत अछि‍।) श्‍यामबाबू- तब तँ केते गोटेक बुझने हेतै। चि‍न्‍हने हेतै। आइ हम ओकरा बापसँ भेँट करा देबै। (तमसा कऽ चलि‍ पड़ैत अछि‍।) बरसा- (पाछूसँ हल्‍ला करैत अछि‍।) बाबूजीऽऽऽ  कट टू। अठारहम दृश्‍य-– समए- दि‍न। स्‍थान- गामक डगर। (श्‍यामबाबू जा रहल अछि‍। आगूसँ अबैत सुइदचन ओकरा टोकै छै।) सुइदचन- यौ श्‍यामबाबू, उदास छी। की बात? कि‍छु भेल की? श्‍यामबाबू- की कहब। आ केना कहब? सुइदचन- हम तँ अहाँक हि‍त छी। हमरा लग नै बाजब तँ फेर...। श्‍यामबाबू- हमर बेटी पढ़ि‍ कऽ अबैत रहए से बाटमे...। (श्‍यामबाबू नजदीक आबि‍ कानमे सुइदचनकेँ सभटा गप कहैत अछि‍।) सुइदचन- ई गप दोसरठाम नै बजब। ऐसँ अहींक इज्‍जत उघार हएत। बुझलौं कि‍ने। श्‍यामबाबू- तब एकर नि‍दान केना हेतै? सुइदचन- धुर। तेकर चि‍न्‍ता नै करू। अइले तँ हमर बेटा हरि‍या काफी छै। फोनसँ सभ गप कहि‍ दइ छि‍ऐ। अहाँ जाउ। (सुइदचन फोनसँ गप करए लगैत अछि‍। श्‍यामबाबू चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। उन्नैसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- नदीक कि‍नार। (घोड़सवार तेजीसँ आबि‍ रहल अछि‍। ओकर फोनक घंटी बजैत अछि‍। एकाएक घोड़ा रोकैक परि‍यास करैत अछि‍। गति‍क कारणे घोड़ा नचैत अँइठ कऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍। फोनपर गप करैत-करैत ओ फ्लैश बैकमे चलि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। दृश्‍य परि‍वर्तन फ्लैश बैक स्‍थान- सड़क समए दि‍न। (श्‍यामबाबू अपना बेटीक संगे शहरसँ आपस आबि‍ रहल अछि‍। बजारसँ कीनल वस्‍तु सभ हाथमे लटकौने अछि‍। आगूमे हरि‍याकेँ देखि‍ ठाढ़ होइत अछि‍। हरि‍यो ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍।) श्‍यामबाबू- की यौ बौआ, अहाँक बाबूजी कुशल छथि‍ ने? हरि‍या- हँ-हँ ठीके छथि‍। (हरि‍याक नजरि‍ बरसापर पड़ैत अछि‍। बरसा नजरि‍ झुका कऽ आगू बढ़ि‍ जाइत अछि‍।) श्‍यामबाबू- अच्‍छा-अच्‍छा, परसू अबै छी तँ भेँट करबनि‍। (कहैत चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। फ्लैश बैक समाप्‍त। दृश्‍य परि‍वर्तन। हरि‍या- चि‍न्‍ह गेलौं, वएह लड़की छी। (हरि‍या फोन जीबीमे रखैत अछि‍। सि‍रकेँ झटकैत अछि‍ आ तेजीसँ घोड़ाकेँ आगू बढ़ा दैत अछि‍।) कट टू। बीसम दृश्‍य- समए- राति‍। स्‍थान- निर्जन। (हरि‍या अपना संगी बदमाश लग पहुँचैत अछि‍। बदमाश सभ आपसमे फुसराहटि‍ करए लगैत अछि‍।) हरि‍या- हे रौ, तूँ सभ आइ कोनो लड़कीकेँ घेरने रही। (सभ चुप्‍पी साधि‍ लैत अछि‍।) बजै छी कि‍ए नै रौ। हमर तामस नै देखने छी। साँच बज नै तँ कान-कपार ढाहि‍ देबौ। बदमाश एक- हजूर, अहाँ तामसकेँ रोकू। अहाँ बि‍नु पुछने ई गलती भऽ गेल। हरि‍या- हँ-हँ बाज ने। की गलती? (बदमाश एक लगमे आबि‍ कानमे सभटा बात कहैत अछि‍।) बदमाश दू- हजूर, आगूक लेल आदेश ि‍दयौ। हरि‍या- ओइ लड़कीक संग दोबारा गलत बेवहार नै हेबाक चाही। ओ लड़की अपने जाति‍क अछि‍। ओकरा बापक संगे हमरा पि‍ताजीक पुरान सम्‍बन्‍ध छै। मुड़ी डोलबैत) हँ एकटा बातक पता लगा जे ओइ लड़कीक संगे लड़का के छेलै। (हरि‍या तेजीसँ प्रस्‍थान करैत अछि‍।) कट टू। एकैसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू अपना दुआरि‍पर बैसल छथि‍। हरि‍या पहुँचैत अछि‍।) श्‍यमाबाबू- आऊ बौआ, कहू महाजनक समाचार? ठीक छथि‍ ने? हरि‍या- हँ-हँ ठीके छथि‍। श्‍यामबाबू- बरसा बेटीऽऽऽ। बरसा- (भीतरसँ बजैत अछि‍।) हँ, बाबूजी। श्‍यामबाबू- चाह नेने अबि‍हेँ। हरि‍या- हमरा बाबूजी भेजने छथि‍। श्‍यामबाबू- हँ-हँ कहू की बात? हरि‍या- वएह, करजाक सम्‍बन्‍धमे। अहाँसँ भेँट करए चाहै छथि‍। श्‍यामबाबू- देखि‍यौ ने, धि‍या-पुता सभकेँ पढ़बै छी। ओहो सभ रूपैआ नै देने अछि‍। सभटा असूल कऽ नेने अबै छी। आ भेँटो हेतै। (श्‍यामबाबू आँगन दि‍स जाइ छथि‍ ताबत बरसा चाह नेने आबि‍ जाइत अछि‍।) हरि‍या- एकटक बरसा दि‍स ताकि‍ रहल अछि‍। बरसा नजरि‍ झुकौने चाह हरि‍या दि‍स बढ़बैत अछि‍। हरि‍या चाहक कप तेना कऽ पकड़ैत अछि‍ जे चाह हरा जाइत अछि‍। तखैने श्‍यामबाबू पुन: आपस आबि‍ जाइ छथि‍। बरसा तमसा कऽ आँगन चलि‍ जाइत अछि‍।) कट टू। बाइसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- निर्जन बाट। (बरसा लोकक नजरि‍सँ नुकाइत जा रहल अछि‍। हरि‍याकेँ नजरि‍ ओकरापर चल जाइत अछि‍। कि‍न्‍तु बरसाकेँ ऐ बातक पता नै चलैत अछि‍। हरि‍या चोरा कऽ ओकरा पाछू-पाछू जा रहल अछि‍।) कट टू। दृश्‍य परि‍वर्तन- समए- साँझ। स्‍थान- बाध। (बरसाकेँ ओतए पहुँचि‍ते वि‍क्रम खेतसँ नि‍कलैत अछि‍।) वि‍क्रम- अहाँ, बहुत काल धरि‍ प्रति‍क्षा करबौलौं। बरसा- की करबै। लोक तँ तकि‍ते रहै छै। कहुना नुकाइत-छि‍पाइत एलौं। वि‍क्रम- ऐठाम रस्‍ता छै। चलू नदीक कछेरपर। नि‍धोख भऽ कऽ गप करब। (दुनू गोटे चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। दृश्‍य परि‍वर्तन- दुनू एक-दोसराक हाथ पकड़ने खुशीक गीत गाबि‍ रहल अछि‍। झोंझमे छि‍पल हरि‍या देखि‍ रहल अछि‍।) कट टू। तइसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- निर्जन। (हरि‍याक मुँहपर घृणाक भाव अछि‍। दारूक बोतल मुँहसँ लगबैत अछि‍। फेर जोरसँ फेक दैत अछि‍।) हरि‍या- (क्रोधमे) सार, हीरोपनी करैत अछि‍। हमरा सोझहामे। हमरा चि‍न्‍हने नै अछि‍। जाति‍क लड़कीक संगे...। आइए तोरा मुइलहा बापसँ भेँट करा देबौ। (बोतलकेँ टाँगसँ ठोकर मारैत अछि‍ आ तेजीसँ घोड़ापर चढ़ि‍ चलि‍ दैत अछि‍।) कट टू। चौबीसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- वि‍क्रमक घर। (वि‍क्रमक माए घर-अँगनाक काज कऽ रहल अछि‍। हरि‍या अपना तीन-चाारि‍ साथीक संगे पहुँचैत अछि‍। घोड़सवार सभकेँ देखि‍ते बुढ़ि‍या भ्‍यभीत भऽ जाइत अछि‍।) हरि‍या- गे बुढ़ि‍याऽऽऽऽ। तोहर बेटा बि‍करमा कहाँ छौ? वि‍क्रमक माए- हौ बाबू। हमरा नै बूझल अछि‍। की भेलै से? हरि‍या- साँपकेँ पोसने छी आ पुछै छी की भेलै। नि‍काल अँगनासँ आइ हड्डी तोड़ि‍ देबौ सारकेँ। वि‍क्रमक माए- यौ बाबू मुँह सम्‍हारि‍ कऽ गप करू हमर बेटा पढ़ै छै। कोनो लुच्‍चा-लोफर नै अछि‍। हरि‍या- लोफर नै छौ तँ छौड़ीक संगे रसलीला कि‍ए केने घुरै छौ। वि‍क्रमक माए- हमरा बेटापर झूठ-मूठक दोख नै लगाउ। नै तँ ठीक नै हएत। हरि‍या- (कोड़ा देखबैत) देखै छीही कोड़ा। हरामजादी पीठ परहक खाल खींच लेबौ। नै तँ बेटाकेँ सम्‍हारि‍ ले। (हरि‍याक एकटा संगी अँगनासँ ताकि‍ कऽ बहार ि‍नकलैत अछि‍।) संगी- अँगनामे नै छै बि‍करमा। हरि‍या- सुनि‍ ले बुढ़ि‍या। बेटा जँ रस्‍तापर नै एतौ तँ काटि‍ कऽ धारमे भँसा देबौ। (घोड़ापर चढ़ि‍ सभ तीव्र गति‍सँ चलि‍ पड़ैत अछि‍।) पचीसम दृश्‍य- स्‍थान- सुइदचनक घर। (हरि‍या शराब पी रहल अछि‍। सुइदचन आ मुंशी जीकेँ अबैत देखि‍ बोतल फेंक कऽ चलि‍ पड़ैए।) सुइदचन- मुंशीजी, हरि‍या कि‍एक तमसाएल छै? गाँजाक बि‍जनीशमे घाटा लगलै की? मुंशी- नै बुझलि‍ऐ मालि‍क। श्‍यामबाबूक बेटी छै ने बरसा। ओकरा अपन हरीबाबू पसि‍न कऽ लेलकै। ओकरेसँ बि‍आह करबाक मन बना लेने छै। सुइदचन- वाह। काबि‍ल अछि‍। असलमे बेटा तँ हमरे छि‍ऐ। पैघ हाथ मारलक। सोचै छेलौं ओकर जमीन करजा तरमे लि‍खेबै। आब तँ दहेजेमे सभटा आबि‍ जेतै। मुंशी- से तँ श्‍यामबाबूकेँ सन्‍तानक नामपर वएह बेटी मात्र छै। कि‍न्‍तु...। सुइदचन- दि‍क्कत की छै जे कि‍न्‍तु लगौने छी? मुंशी- मालि‍क! एकटा पढ़ुआ छौड़ा छै बि‍करमा। सुनै छी जे ओइ लड़कीसँ मेल-जोल छै। देरी करबै तँ हाथसँ सब कुछौ नि‍कलि‍ जाएत। सुइदचन- मुंशीजी। हमरा जालसँ नि‍कलनाइ एते असान छै की। चलू अखने देखै छि‍ऐ। (दुनू चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। छबीसम दृश्‍य- स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। समए- दि‍न। (श्‍यामबाबू, सुइदचन आ मुंशीक संगे बैसल अछि‍।) सुइदचन- अहीं कहू श्‍यामजी, जे ओइ दि‍नसँ अहाँ बेटी दि‍स कोनो गुण्‍डा-बदमाश तकबो करैए? श्‍यामबाबू- से तँ अहीं सबहक छत्र-छायामे ने हमरा सभ सुरक्षि‍त छी। सुइदचन- धि‍यानसँ सुनि‍ लि‍अ। अहां बेटीकेँ हम अपन पुतोहु मानि‍ लेने छी। आ हम बुझि‍ते छी जे अहाँ हमरा गप्‍पकेँ सहर्ष स्‍वीकार करबे करब। श्‍यामबाबू- कनी बेटीसँ...। (सुइदचन चुप रहबाक इशारा करैत अछि‍।) सुइदचन- अहाँ चुप रहू। अहांपर करजो ततँ बहुत भऽ गेल छै। सभटा खेत बि‍का जाएत, तैयो नै सठत। मुंशी- मालि‍क अहाँ कथी बजै छी। आब तँ हि‍नक खेत-पथार बेटीए-जमाएक हेतै। सुइदचन- से तँ हम बुझि‍ते छी। हम तँ ई कहैले एलौं, जे कोइ हमरा पुतोहु दि‍स अधला नजरि‍सँ तकतै तँ हम ओकर आँखि‍ फोड़ि‍ देबै। बुझलौं। चलू मुंशीजी। (सुइदचन, मुंशी चलि‍ पड़ैत अछि‍।) कट टू। सत्ताइसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू बैसल अछि‍। बरसा ठाढ़ अछि‍।) श्‍यामबाबू- (तमसाइत) ओइ टोलक वि‍क्रमक संग एतेक मेल-जोल कि‍एक रखने छी? तोरा पता छौ- लोक सभ केहेन-केहेन अफवाह उड़ा रहल छै। बरसा- (मुड़ी गोंतने) बाबूजी ओ नीक लोक छै। ओइ दि‍न ओकरे कारणे हमर इज्‍जत आ जान बँचल। श्‍यामबाबू- तँू भ्रममे छेँ। सभ सुइदचन बाबूक कृपा छेलै। बरसा- तखनि‍ तँ वएह मारि‍ओ खा कऽ हमरा बँचौलक। समैपर आन लोक सोझहा कहाँ आएल। श्‍यामबाबू- मुँह लगल नै बाज। ऊ लड़ि‍का हमरा जाति‍ओ-बेरादरीक तँ नै छी‍। आ एने तोरा बि‍आहक सभ गप्‍प तँइ-तसफि‍या भऽ गेल छौ। (बरसा तमसा कऽ जा रहल अछि‍।) सुनि‍ ले, आब तँू घर-अँगनासँ बाहर नै नि‍कलि‍ सकै छेँ। (झटकि‍ कऽ वि‍दा भऽ जाइए बरसा।) कट टू। अट्ठाइसम दृश्‍य- स्‍थान- वि‍क्रमक घर। समए- दि‍न। (वि‍क्रमक माए घाड़ खसौने बैसल अछि‍। वि‍क्रम प्रसन्न मुद्रामे पहुँचैत अछि‍।) वि‍क्रम- माए, तँू कथीक चि‍न्‍तामे डुमल छेँ? वि‍क्रमक माए- हमर चि‍न्‍ता बुझै नै छीही। सोचै छी जे तोरा नोकरी भेट जाउ तँ हमरो जि‍नगी सुफल भऽ जाएत। वि‍क्रम- आइसँ तोहर चि‍न्‍ता खतम। (लेटर देखबैत) लेटर भेटि‍ गेल छै। आइ सौझुका गाड़ीसँ हम जा रहल छि‍यौ। सभ कि‍छो सैंति‍ कऽ झोरामे दऽ दही। वि‍क्रमम माए- अँए...। ठीके...। (अचरजक भाव) कट टू। उनतीसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- सड़क। (वि‍क्रम टीसन दि‍स बढ़ल जा रहल अछि‍। वि‍चारमे डुमल अछि‍। आगूमे रघुआकेँ देखि‍ बजैत अछि‍।) वि‍क्रम- (स्‍वत:) बरसाकेँ सभ गप्‍पक जानकारी दऽ देबाक चाही। (रघुआकेँ रोकैत अछि‍) यौ रघुजी, कनी रूकि‍ जाउ। एगो हमर चि‍ट्ठी नेने जाउ। रघुआ- (रूकि‍ कऽ) की यौ दरोगाजी, बनियेँ गलि‍ऐ अहाँ दरोगा। अच्‍छा जाउ, जाउ आ लाउ केकरा देबाक छै चि‍ट्ठी? वि‍क्रम- हे लि‍अ। कोइ बुझहए नै। चुपेचाप बरसाकेँ हाथमे दऽ देबै। रघुआ- अहाँ नि‍चेन रहू। कोइ नै बुझतै। मुदा घूस दि‍अ पड़त। (दुनू हँसैत अछि‍।) कट टू। तीसम दृश्‍य- समए- साँझ। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (आस-पड़ोसक औरति‍या सभ अँगनामे जमा अछि‍। बि‍आहसँ पूर्वक वि‍ध-बेवहार भऽ रहल अछि‍। पुरुख सभ बरि‍यातीक प्रति‍क्षा कऽ रहल अछि‍। रघुआ कोनटा लगसँ बरसाकेँ इशारा करैत अछि‍। बरसाकेँ लगमे पहुँचि‍ते चि‍ट्ठी ओकरा हाथमे पकड़ा दैत अछि‍।) कट टू। एकतीसम दृश्‍य- (वि‍क्रम ट्रेनपर चढ़ैत अछि‍। आ गाड़ी खुगि‍ जाइत अछि‍। चलैत गाड़ीक पाछूमे बरसा दौग रहल अछि‍। बरसाक पाछूसँ एकटा घोड़ सवार रेबाड़ने जा रहल अछि‍।) कट टू। बत्तीसम दृश्‍य- समए- राति‍। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू उदास भऽ बैसल छथि‍। घरक समान सभ अस्‍त-बेस्‍त अछि‍। एकटा घोड़ सवार अबैत अछि‍। श्‍यामबाबू मुड़ी उठा कऽ ओकरा दि‍स तकै छथि‍।) श्‍यामबाबू- हमरा बेटीक कोनो पता लगल? घोड़ सवार- टीशनक चारूभर आ दूर-दूर धरि‍ तकलौं, पता नै, गाड़ीपर चढ़ि‍ गेल आकि‍‍ केनौ नुका रहल, अन्‍हारमे। मुदा ि‍चन्‍ता नै करू। हमर संगी सभ ताकि‍ए रहल अछि‍। जेतै केतए।) (घोड़ सवार चलि‍ दैत अछि‍।) कट टू। तैंतीसम दृश्‍य- समए- भोर। स्‍थान- श्‍यामबाबूक घर। (श्‍यामबाबू स्‍नानक उपरान्‍त सुरूजकेँ नमस्‍कार करै छथि‍।) श्‍यामबाबू- (सुरूज दि‍स तकैत) हे सुरूज महराज! पता नै, दोख हमर अछि‍ आकि‍ हमरा बेटीक। केतए हेतै आ केहेन हालमे हेतै। हम ओकर बाप छि‍ऐ। चि‍न्‍ता तँ हमरे हेतै। समाज तँ हँसि‍ रहल छै। आइ ओकर माए रहि‍तै तँ ई दशा नै होइतै। पता नै, बापकेँ जे करबाक चाही से हम करि‍ रहल छी आकि‍ नै। हे सुरूज महराज, ओकर रक्षा करब। ओह...। (आँखि‍मे नोर भरि‍ जाइ छै।) कट टू। चौंतीसम दृश्‍य- समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर। (सुइदचन आ मुंशीजी बैसल अछि‍।) मुंशीजी- माि‍लक! केतेक दि‍न बीति‍ गेल। मुदा अखनी तक श्‍यामक बेटीक कोनो पता नै लगल। लगै छल- जे छुच्‍छे फैदा हएत लेकि‍न...। सुइदचन- लेकि‍न की लगबै छी। सुइदखोरकेँ कहि‍यो घाटा लगै छै। हमर बेटा कच्‍चा खेलाड़ी नै छै। लड़की केतौ नुकाएल हेतै ओ खोजि‍ कऽ नि‍कालि‍ लेतै। फेर हम जे चाहबै सएह हेतै। कट टू। पैंतीसम दृश्‍य- समए- दि‍न। (हरि‍या अपना कोठलीमे दारू पीब रहल अछि‍। बोतल खाली कऽ झुमैत-झामैत बाहर नि‍कलैत अछि‍। आ घोड़ापर चढ़ि‍ चलि‍ दैत अछि‍।) कट टू। छत्तीसम दृश्‍य- स्‍थान- बाधक निर्जन भाग। समए- दि‍न। (हरि‍या घोड़ापर सँ उतरैत अछि‍। कातक गाछ तरमे ओकर प्रेमि‍का फुलि‍या ठाढ़ अछि‍। दुनूक बीच प्रेमसँ भीजल गप-सप्‍प्‍ होइत अछि‍, दुनूमे प्रेमालाप।) फुलि‍या- एकटा गप्‍प तँ अहाँकेँ नै कहलौं। हरि‍या- कोन गप्‍प? फुलि‍या- हम तँ अहाँ बच्‍चाक माए बनैवाली छी। हरि‍या- धुर, ऐ झंझटकेँ हटाउ। खसा लि‍अ। फुलि‍या- एना कहीं होइ छै। अहाँ बाप बनैबला छी। (पेट दि‍स इशारा करैत) ई अहींक बच्‍चा छी। हरि‍या- एनामे तँ हम केतेक धि‍या-पुताक बाप बनि‍ जेबै, आ केतेक लड़कीक पति‍। फुलि‍या- तेकर मतलब...। हरि‍या- (क्रोधमे) मतलब कि‍छो नै। गर्भपात करबा लि‍अ। खरच हम देबै। फुलि‍या- हम से नै करब। हरि‍या- (क्रोधमे) केतौ कि‍छो बजबेँ वा हमरा लग एबही तँ परान खैंचि‍ लेबौ। तोरा हमरा बीच सभ बात खतम। (घोडापर चढ़ि‍ सक्रोध प्रस्‍थान।) कट टू। सैंतीसम दृश्‍य-–

समए- दि‍न। स्‍थान- फुलि‍याक घर।

(फुलि‍याक माए चनकी अपना धि‍या-पुतका खाएक परैस रहली अछि‍। धि‍या-पुता भात मंगैत अछि‍।) 

चनकी- (करछुल थारीमे पटकैत) ले, थारीओ बरतन खा ले। (तखैने फुलि‍याक बाप डोलना नि‍शाँमे झुमैत पहुँचैत अछि‍।)

डोलना- फुलि‍याक माएऽऽऽ। एको लवनीक दाम लाबह। कंठ सुखा गेल। हे तोरा नीक नै हेतह। एको चुरूक दाम नि‍कालह। (चनकी पैसा राखएबला गुल्‍लककेँ फोड़ैत अछि‍, आ सभटा पैसा तामसे छि‍ड़ि‍या दैत अछि‍।)

चनकी- ले सभटा पैसा ले। नै होइ छौ तँ धि‍यो-पुताकेँ रकत पी ले। (तामसे चनकी धि‍या-पुताकेँ थोपराबए लगैत अछि‍। तखैने फुलि‍या पहुँचैए आ कोनमे बैस कऽ कानए लगैए।)

चनकी- तोरा की भेलौ गइ?

फुलि‍या- माए गइ माए, तोहर इज्‍जत...। (कानए लगैए)

चनकी- हमरा इज्‍जतकेँ की भेलै गइ?

फुलि‍या- सुइदखोरबाक बेेटा इज्‍जत खराप कऽ देलकौ गइ। हमरा पेटमे ओकर...। (कानए लगैत अछि‍।)

चनकी- हमर इज्‍जत खराप करत अनजनुआ जनमल ओकरा तँ हम...।

फुलि‍या- कहने रहै जे बि‍आह करबो, तोरा संगे।

चनकी- ओइ कोंढ़ि‍फुट्टाकेँ बि‍आह करए पड़तै। चल देखै छि‍ऐ केना नै बि‍आह करतै ऊ। नै करतै तँ सौंसे समाजमे ढोल पीट देबै। कारि‍ख-चुन लगा देबै। घि‍ना कऽ रखि‍ देबै- आइ। सभ गोरे चल। कहि‍ दही सभकेँ। (एके संग सभ चलि‍ दैत अछि‍।)

कट टू। अरतीसम दृश्‍य-

समए- दि‍न। स्‍थान- सुइदचनक घर।

(सुइदचन आ मुंशी दलानपर बैसल अछि‍। एक हेंज लोक अबैत अछि‍। ओइमे फुलि‍या ओकर माए-बाप आ ओइ टोलक आनो-आन लोक सभ अछि‍। सभ तामसे गाि‍र-बात दऽ रहल अछि‍, मंुशी पुछै छै।)

मुंशी- की बात छि‍ऐ? अहाँ सभ केकरा गरि‍या रहल छि‍ऐ?

सुइदचन- सार सभ नि‍शाँ पीने अछि‍। बताह भऽ गेल छै सभटा। पता छौ जे केकरा दुआर पर छी।

मुंशीजी- हे रौ भाग जो तोरा सभ। तमसेतौ तँ मालि‍क गोली मारि‍ देतौ। (फुलि‍याक माए चनकी करि‍या खापड़ि‍ नेने आगू अबैत अछि‍।)

चनकी- देखै छी खापड़ि‍। माएक दूध पीने छी तँ सामनेमे चलि‍ आ। आइ चानि‍ ठोकि‍ देबौ।

सुइदचन- रे सोर पार तँ खलीफाकेँ। ला लाठी, चुतर तोड़ि‍ देबै। (लाठी हाथमे लेने आगू बढ़ैत अछि‍। चनकी खापड़ि‍ फेकैत अछि‍। सुइदचनक कपारपर खापड़ि‍ लगैत अछि‍ अछि‍ फूटि‍ जाइत अछि‍। कपार पकड़ि‍ बैस जाइत अछि‍।)

मुंशीजी- मालि‍क जान बँचाउ।

सुइदचन- रे बहींचो, कोनेसँ बजर खसलौ रे।

मुंशी- सुइदबला छी।

चनकी- (गरजैत) घरढुक्काक बाप। असली बजर तँ आब गि‍रतौ। कहाँ छौ बेटा? करा बि‍आह।

सुइदचन- बि‍आह? हमरासँ?

मुंशीजी- मािलक! अहासँ नै। अहाँक बेटासँ बि‍आह करौत। (भीड़मे श्‍यामबाबू ठाढ़ भऽ कऽ सभ कि‍छु देखि‍ सुनि‍ रहल अछि‍।)

सुइदचन- की बात भेलै रौ?  (एक गोटे आगू बढ़ि‍ सभ गप्‍प सुइदचनक कानमे कहैत अछि‍। माथापर चोट मारैत श्‍यामबू प्रस्‍थान करैत अछि‍। कि‍छु लोक हल्‍ला केनि‍हारकेँ शान्‍त कऽ रहल अछि‍।)

कट टू। शारदा नन्‍द सिंह जीक विहनि कथा- की करब से अहीं कहू रामा कहलकै- “ऐ सुनै नइ छै। अँगनामे नै छै की? केतए चलि‍ जाइ छै, से नै जाइन।” देखि‍यौ ने एतबे कालमे कए गोट महाजन दुआरि‍ लागि‍ गेला। अखनि‍ तँ भोरे भेलैए, दि‍न तँ बाँकी छै। आ कि‍छु पटौनीओं बलामे रहि‍ए गेलै। पहि‍लुका महाजन कहि‍ते रहै आकि‍ धरदनि‍ दोसरो महाजन हुनक मँुहक बात ऊपरे लोकि‍ लेल की जे वरू खाद तरेचा जे नेने छेलै ओहूमे अदहा देने रहै आर बाँकी रहि‍ गेलै। कहने छेलखि‍न जे यूरि‍याक बोरा लेबै ने तँ ओहीमे मि‍झर करादेब। से तँ आब फसि‍लो नवको होइतै। आइ बि‍नु नेने कि‍ हम टसकि‍ नै सकै छी। एनामे तँ हमर भट्ठीए जाम भऽ जाएत। एहेन महाजनीसँ बाद अबै छी। कहू एहनो भेलैए। एतै कहल गेलै जे पैंच खि‍आइ ऋृणे बि‍आइ। ई उतारा चौरी भऽ रहल छेलै की। एकटा गाड़ी एम्‍हरे हौरन दैत हुरहुराइत आबि‍ रहले ओहीपर लि‍खल छेलै उतरी बि‍अार ग्रामीण क्षेत्रि‍य बैंक गोड़ा-वौराम दुआरि‍ लागि‍ गेल अछि‍। मुहथरि‍पर अमला सभ ठाढ़ भऽ कऽ पूछि‍ बैसला- “यही रामा का घर है?” जे.पी.गुप्‍ता ऊर्फ मोनूजी। मोनूजी'क ई पहि‍ल कथा छि‍यनि‍- ''बेटी रूपी बोझ'' रातिक दू बजैत रहै, चारू दिश अन्हार छल। सुमित्राक आँखिसँ जेना नीन उड़ि गेल रहनि‍। तखने एकाएक पतिक कराहब सुनि नीन टुटलनि। नीन टुटि‍ते पति- श्याम-सँ पुछलखिन- “की होइए?” श्याम किछु ने बजला। हाथ छूलापर बूझि‍ पड़लनि‍ जे बड़ जोर बोखार छन्हि‍। छोटकी बेटी- गीता-केँ हड़बड़ाइत उठबैत, मुँह पटपटबैत बजली- “हमर तँ कपारे जरल अछि। भगवानो सभटा दुख हमरे देने छथि!” दू कट्ठा जमीनक अलाबे एकटा छोट-छीन फूसिक घर। जइमे सुमित्रा पति आ छोटकी बेटी-गीता-क संग जि‍नगी गुजरि‍ रहल छथि‍। पतिक तबियत सेहो बरबरि‍ खरापे रहै छन्‍हि‍। बेटा नै छन्‍हि‍। भगवतीकेँ केतेक कबुला-पातीक पछाति‍ओ बेटा नै भेलनि। बड़की बेटी गिरजा, जेकर बिआह बि‍नु लेन-देनक भेल छेलनि‍। बि‍नु लेन-देनक बि‍आह ऐ खातिर भेल रहनि‍ जे गिरजा देखै-सुनैमे बड़ सुन्नरि‍‍ संगे गुणशील आ कर्मशील सेहो। मुदा सुमित्राक जमाए आ समधि बड़ लालची। बिआहक साल भरिक‍ पछतिओ कोनो-ने-कोनो बहानासँ गिरजाकेँ पड़तारि‍त करैत रहथि‍न। गिरजाक सासु बिजनेसक नाओंपर बेटाकेँ ससुरारिसँ पाइ अँइठऽ सेहो कहैत रहथिन‍। बेटो एहेन जे महिने-महिने सासु-ससुरकेँ रूपैआक समाद पठबैत। मुदा कोनो असरि‍ नै देखि‍ एक दि‍न गिरजाक सासु समधिन लग स्‍वयं पहुचि‍ कहलखिन- “जमाए तँ शराबी भऽ गेल, किएक तँ कोनाे रोजगार नै छै, भरि दिन एनए-ओनए बौआइत रहैए। अहाँ लाख-सबा-लाख मदति‍ करि दियौ, जइसँ कोनो काज-धंधा शुरू करत। काज-रोजगार भेने अहाँक बेटीओ सुखी रहत।” एते कहैत ओ बड़बड़ाइत ओतएसँ वि‍दा भऽ गेली। मनमे दू कठ्ठा जमीन आ गि‍रजाक नामे बीमाबला पाइ नाचैत रहनि‍। एक दिन थाकि-हारि कऽ गिरजाक सासु-ससुर गिरजाकेँ नैहर भेज देलक। पति सेहो पाछू लगल गि‍रि‍जा संग एला मुदा दुआरिपर रूकि गेला। गिरजा कानि-कानि कऽ अपन सभटा बेथा माएकेँ कहलखि‍न। बेटीक बात सुनि‍ माए द्वन्‍द्वमे पड़ि‍ गेली। बीमाबला पाइसँ गीताक बिआह करब आकि गिरजाक अशान्त जिनगीकेँ बँचाएब! आन कोनो अवलम्‍ब नै। सोचैत-सोचैत चाह-बिस्कुट आ पानि लऽ कऽ दरबज्जापर पहुँचली। जमाइओ हुनकर गोड़ कि लगि‍तनि‍, ओ तँ अपने बेगरते आन्‍हर! गुस्साइले चाह पटकैत बजला- “ई सभ आदर-सत्कारक ढंग रहए दथुन। हमरा लग समए कम अछि। पुरनि‍मा दिन साइकिन दोकान खोलब। हमरा बीमाबला पाइ चाही। ओनाहितो बिना दान-दहेजक हि‍नका बेटी संग बि‍आह कऽ बहुते दिन घरमे बैसा कऽ खुएलि‍यनि‍।” सुमित्रा गिड़गिड़ाइत बजली- “पाहुन, ई तँ घरक पैघ जमाए छथि‍, गीताक बि‍आहक भार जेतेक हमरा सभकेँ अछि तेते हिनको छन्‍हि‍ ने।” कनीकाल जमाए बाबू कि‍छु ने जवाब देलखिल मुदा किछुकालक पछाति गिरजाकेँ बजा कातमे लऽ गेलखि‍न आ कहलखिन- “आब, अहाँ अपन जिनगी एतै काटू। जाधरि पाइ नै मिलत ताधरि अहाँ घुरि कऽ हमरा लग नै आएब।” ई कहि‍ जमाए बाबू तमतमाएल मोटर साइकिलपर बैस आँखिसँ ओझल भऽ गेला। गीता बहनोइक सभटा बात सुनि‍ लेलक। बहनोइक रूखि‍ देखि‍ गीता बहुत दुखी भऽ गेल। मुदा माए-बाबूक लाख पुछलाक पछातिओ दुनू बहिनमे सँ कि‍यो ई बात नै कहनि‍। कारण छल जे ओनाहि‍तो माए-बाबू गरीबीक चलैत दम्‍माक इलाजो ने करा पबथि‍। ऊपरसँ ई सभटा झंझ-मंझ सुनि‍ आरो दुखे बढ़ि‍तनि‍।  एकान्तमे बैस दुनू बहिन अपन फूटल किस्मतपर कनैत रहए। दुनू बहि‍नक मनमे उठैत रहै, दहेजक कारण माए-बापक माथपर बाेझ बनल छी।¦¦¦ जे.पी. गुप्ता ऊर्फ मोनूजी सम्पर्क- निर्मली, सुपौल (बिहार) अक्षय कुमार झा प्रेमक अधिकार अपन माँ आ पिताक हम आज्ञाकारी पुत्र छी, मुदा जहियासँ बिआह भेल, हुनका नजरि‍मे संदिग्ध भऽ गेल छी। हमर सोभाव, आचरण, आ हृदैक भावना पहिने जकाँ स्थिर आ तटस्थ अछि, मुदा हुनका नजरि‍मे अपन कनियाँक गुलाम छी। हमरा बुझने आनो घरमे हमरा सनक आज्ञाकारी बेटा ई मनोवैज्ञानिक दबाबमे अपन जि‍नगी बिता रहल छथि। कनियाँ घर कि एली, जेना नांगरि‍ हमरा लगि गेल। आब ई आरोप सहनाइ कठिन लागैत अछि कि हमरा कियो कनियाँक आदेशपाल कहए। जेना लगैत अछि, बिआहे केनाइ हमर अपराध छल। जहिना एकटा बेटाक अपन माए-बापक प्रति दायित्व अछि तहिना अनकर घरक ओ बेटी जे अपन घर-दुआर छोड़ि कऽ हमरापर आश्रित छथि‍। हुनका प्रति जिम्मेवारीक निर्वहन केनाइ हमर फर्जे नै अपितु धर्म अछि। डरैत-डरैत एकबेर माएकेँ कहलियनि- “माए, रूकमणिक माइक मोन सप्ताह दिनसँ खराप छन्हि भोरे फोन आएल छल कि ओझा दुइए दिनक लेल आबए देथुन बुच्चीकेँ देखला बड़ दिन भऽ गेल।” हमर गप अधुरे अखनि छल, माए झटसँ कहली- “तोरा दुनूक पेट मिलले छौ। कनियाँकेँ नैहरेमे कहुन रहैले। दू आदमीक भोजन कि बनबै छथि, जेना लगैए बड़का उपकारे हमरा सबहक करै छथि।” ई कहैत मुँह चमकबैत आ पटपटबैत अपना कोठलीमे माँ चलि गेली। दू दिनक बाद रूकमणिक तबीयत बेसी बिगड़ि गेलनि। संयोगवश हम दरभंगामे छेलौं। सुलेखा हमर छोट बहि‍न फोन केली, भैया, भौजीक तबीयत खराप छन्हि। साँझ तक घर आबि हुनका अस्पतालमे डाक्टरसँ देखा दबाइ लऽ घर एलौं। डाक्‍टर साहैब दस दिनक बेडरेस्ट पूर्जापर लिखि देलखिन। गामपर आपस एलापर उमेद छल माए पुछती कनियाँक केहेन तबीयत अछि? डाक्‍टर साहैब की कहलनि? मुदा हमर सोचक उन्‍टा माए पुछै लगली- “दबाइमे पाइ केतेक लगलो?” जहाँ हजार टकाक नाओं कहलियनि, आकि‍ तुरन्ते ताना मारए लगली- “छह माससँ बिजली बि‍ल बकाया छै ओ तोरा नै सुझाइ छौ। हमर बातरसक दबाइ अखनि तक अबि‍ते अछि‍। ओ तोरा नजरि‍पर किए रहतौ? अपन नौटंकीबाज कनियाँक बहानापर हजार टका फटसँ बुकि देलहिन। ई सभ हुनकर अराम करैक बहाना छियनि।” एक दिन रातिमे सूतल छेलौं, घड़ी दिस देखलौं, दू बजैत छल, नीन नै होइत छल। सोचैत रही बिआहसँ पहिने माए केतेक हमरा मानै छेली। मुदा आइ एहेन कोन अपराध हमरासँ भेल, जे ठीकसँ बातो ने करै छथि? आँखि डबडबा गेल। बहुत सोचलापर एकटा निष्कर्षपर पहुँचलौं कि जे बेटाकेँ माए जनम दइ छथि, एते कठीनसँ पालै-पोसै छथि। बिआहक बाद प्रेमक एकटा हिस्सेदार कनियाँ भेलासँ माइक अन्तर आत्मामे एकटा नाकारात्मक भावनाक जनम होइ छै। कि‍ जे हमर हिस्साक प्रेम कियो बाँटि तँ नै रहल अछि। ई सोच हमरा जनैत गलत अछि। प्रेम तँ सागर सनक अथाह आ अनंत अछि। जेकरा अनन्त तक बढ़ौने आ बंटनै अपन हाथमे अछि। ईहो सोच हमर अहाँक हेबाक चाही जे अलग-अलग तरहक सम्‍बन्‍धक लेल, अलग-अलग तरहक प्रेमक रंग आ रूप छै। जेकरा उचित रूपमे देनाइ आ लेनाइ हमर अधिकार क्षेत्रमे अछि। ललन कुमार कामत सफरनामा जन्मसँ हम मैथिल जरूर छी मुदा मैथिली भषा-साहि‍त्‍यमे हमर जनम ८०म सगर राति दीप जरय, निर्मली (सुपौल) तिथि ३०.११. २०१३मे भेल, जे श्री उमेश मण्डल जीक संयोजकत्‍वमे आयोजि‍त छल। अहसास भेल, वास्तवमे जे मिथिलाक लोक मैथिली नै बजै छथि‍, ओ ओहने उदासीन प्राणी छथि‍ जेना माए बापसँ रूसल बेटा आकि‍ बेटी होइए। ओइसँ पहिले हमरा भीतरक सृजनात्मक शक्‍ति‍ पनपति‍ तँ रहए मुदा सिंचाइ ऐ गोष्ठीमे भेल। हम अंग्रेजीसँ एम.ए., पी.एच-डी. छी, जे हमरा कार्यक्षेत्रकेँ सुदृढ़ केलक, फलस्वरूप, एकटा साधारण पेन्टरसँ लऽ कऽ अंग्रेजी शि‍क्षकक रूपमे अध्‍यापनक कार्यक सफर तय करैत रहलौं अछि‍। आय हम इंटरमीडिएट आ ग्रेजुएशन स्तरक अंग्रेजी पाठ्यक्रमक अध्यापनक कार्य, अपन निजी कोचिंग संस्थानमे करै छी। मुदा हमरा अपन भाषापर गर्व होइए आ गुमानसँ कहै छी जे हमर मातृभाषा हमरा बेक्तिगत-बेवहारिक जीवनकेँ अत्यधिक प्रभावित केलक आ कऽ रहल अछि‍। हमर आपसी सद्भाव आ प्रेममे चारि-चांद लगि‍ गेल। जे काज हमरासँ असम्भव बुझना जाइत रहए तइ काजक योग्य हम भऽ रहल छी। एकर श्रेय हम श्री उमेश मण्डल जीकेँ (डा. साहैबकेँ) दइ छी। हम केना हुनकर अभिवादन करी? ८०म सगर राति दीप जरय, निर्मली, ८१म देवघर, संयोजक श्री ओम प्रकाश झाजी, तिथि २२. ०३. २०१४, ८२म मेंहथ, संयोजक श्री गजेन्द्र ठाकुरजी, तिथि ३१.०५. २०१४, आ ८३म भपटियाही, संयोजक श्री नन्दविलास रायजी, तिथि ३०. ०८. २०१४., लगातार ऐ सभ गोष्ठीमे उत्सुकता पूर्वक हम भाग लैत रहलौं आ आगूओ लैत रहब जइसँ विद्वान कथाकार लोकनिकेँ बीच हमहूँ अपन नूतन कथाक पाठ करै छी आ करैत रहब। ई वि‍शेष आलेख ८३म सगर राति दीप जरय’पर केन्द्रि‍त अछि। ऐ गोष्ठीक बीजारोपन मेंहथमे आयोजित ८२म गोष्ठीमे श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ हाथसँ नन्द विलास राय जीकेँ हाथमे दीप तथा पंजीक समर्पणसँ शुरूआत भेल रहए जइमे हमहूँ प्रत्यक्ष सहभागी रही। पहिलुक तीनटा गोष्ठीमे भाग लेला पछाति हमर उत्‍सुकता आरो बढ़ि‍ गेल, एतदर्थ हम उत्सुकता पूर्वक भपटि‍याही गोष्‍ठी लेल नारी केन्‍द्रि‍त कथा हेतु कार्यमे जुटि‍ गेलौं। “बेटी” नामक कथा लि‍खि‍ ओइ गोष्‍ठीमे पाठ केलौं। ऐ क्रममे बरबरि‍ हम श्री उमेश मण्‍डलक सम्पर्कमे रहलौं। हिनकासँ सहयोग आ प्रोत्साहन भेटल। कथा आ गोष्ठी केर संदर्भमे अनेक तरहक वार्तालाप होइत रहल। अही क्रममे हमरा हुनकर (डा. साहैबक) मातृभाषाक प्रति समर्पण काफी आकृष्‍ट केलक। जे कएक दिन निर्मली स्थित नीज आवासपर हम विभिन्न तरहक काजसँ जाइत रहै छी, तँ देखै छि‍यनि‍ जे हिनका अनेको तरहक कथा, नाटक, उपन्यास इत्यादि वि‍भि‍न्न तरहक लेखकक साहित्यिक काजमे ओझराएल रहै छथि। एतबे नै, घरसँ लऽ कऽ क्लिनिक धरि‍, जे मि‍लान चौक स्‍थि‍ति‍ सेहो अछि‍- जेतए संध्‍या चारि‍ बजेसँ साढ़े सात बजे धरि‍ बैसै छथि‍- पर मरीजक देख-रेखसँ बँचल समैकेँ साहित्येक कार्यमे समर्पित करैत रहै छथि‍। सँझुका हिनक क्लिनिकपर सभ दि‍न विद्वान लोकनिकेँ सम्मेलन बुझू होइत रहैए जइमे मुख्यरूपसँ रामविलास सरजी, हेमनारायण भाइजी, वकील साहैब- वीरेन्‍द्र यादवजी, राजदेव मण्‍डल तथा राम प्रवेश मण्‍डल आ कहि‍यो-कहि‍यो उमेश पासवान तथा दुर्गा नन्‍द मण्‍डल निअमित रूपे भाग लइ छथि। ऐ बीचसँ हमहूँ केता दि‍न समए नि‍कालि‍ जाए-आबए लगलौं अछि‍। ८३म सगर राति दीप जरय, मैथिली कथा गोष्ठी, एकर इन्तजार वेसब्रीसँ रहए। जेना-जेना समए लगि‍चाइत गेल, हमर धीरज रूपी बान्‍ह ढहल जाइत रहए। दस दिन पहिले मोबाइलपर आ फेसबुकपर निमंत्रणक समाद आएल। संगे विदेह मैथिली लघु कथाक बेवसाइटपर सेहो वि‍ज्ञापन देखि‍ आरो मोन गद्-गद् होइत रहए। उत्सुक्ता जेना भीतरे-भीतर बिस्फोट होइत रहए। एकर चर्चा हम अपन कोचिंगक कि‍लासक अलाबे आनो-आन जगहपर करैत रही। मुदा दिन लगि‍चा गेल आ दू दिन पूर्व, २८ अगस्त, २०१४केँ, करीब साढ़े एगारह बजे, कोचिंगसँ आएले रही, जोरसँ झारा लागल रहए, पेन्ट उतारलौं आ गमछा डाँरमे लटपटा पैखाना घर दौगल गेलौं। मुदा संयोसँ शर्टक जेबीमे मोबाइल रहि गेल रहए। बैसबे केलौं आकि अननोन नम्बरसँ फोन बाजि उठल। हम यथोचि‍त अवस्थामे नै रही, डिसकनेक्ट केलौं। मुदा फेर फोन आएल। पुन डिसकनेक्ट केलौं। कनि‍येँ कालक पछाति बाहर आबि घरमे बैसलौं आकि ओही नम्बरसँ फेर फोन बाजल। रीसिभ करैत हम बाजलौं- “हेल्लो?” ओम्हरसँ- “अहाँ ललनजी छी ने?” कहलि‍यनि‍- “हँ, बाजू अपने के?” “हम नन्द विलास राय बजै छी, भपटियाहीसँ।” “हँ श्रीमान्, नमस्कार, कहल जाए।” “नमस्कार! नमस्कार! कहलौं ललनजी, एकटा बैनर बनबेबाक अछि, केना हेतै?” हम बेहिचक बजलौं- “भऽ जेतै, हम डा. साहेबसँ लिखैक मेटर लऽ कऽ लिखि‍ कऽ नेने आएब। अहाँ ओकर चिन्ता नै करू।” “ठीक छै। तँ राखै छी?” कहलि‍यनि‍- “ठीक छै।” हमरा जीवनमे पेन्टींग एकटा विस्मरणीय समए-अवधि‍ रहल अछि। एकर योगदान बेदरासँ लऽ कऽ अखनि धरि हमर बेक्तित्वकेँ निखारैमे तथा नव जि‍नगी प्रदान करैमे, अहम अछि। आइ हम पेन्टींग काज जरूर छोड़ि देने छी, मुदा ऐ शरीरक एक-एकटा रूइआँ ऐ रंगमे सराबोर भेल अछि। नन्द विलास राय जीक आग्रहसँ हम अति प्रसन्न भेलौं मुदा पश्चाताप सेहो हुअ लगल किए तँ पछिला सात बर्खसँ रंग-ब्रश सोल्हन्नी छोड़ि देने छी। जहियासँ अध्‍यापन काजमे प्रवेश केलौं। दिन भरि चटि‍या सबहक बीच आ बँचल-खुचल समैमे अपन अध्ययन आ आनो काजमे लगल रहै छी। जहियासँ मैथिलीक प्रति आकर्षण बढ़ल, तहि‍येसँ हमरो लेल समैक महत बढ़ि‍ गेल। कहि‍यो-कहि‍यो कोनो पेन्टींग आकि चित्र बनेबाक उत्कण्ठा तीव्र भऽ जाइत अछि‍ मुदा रोशनाइ-ब्रुशक अभावमे, कारण जे ओ कार्य आब हम करीब-करीब छोड़ि‍ए जकाँ देने छी। मुदा अखनो हमर ऐ कार्यक प्रति‍ बहुतो गोटेकेँ इच्‍छा रहै छन्‍हि‍ जे स्‍वयं हमहीं अपना हाथे करि‍ऐ। मुदा किछु नै करि‍ सकै छी, तखनि‍ दर्दसँ जेना छटपटा उठै छी। ई बेचैनी तत्कालीन हुअए, जखने कोनो काजमे लगै छी ई सुरता बिसरि जाइ छी। अफसोस! ओही सुराएल समैपर ओजार भेट जाएत तँ सुन्दरोसँ सुन्दर पेन्टींग बनबितौं! अगिला दिन चौरचन पावनि तेकर बिहाने ३० अगस्त, ८३म गोष्ठी। सबेरे सकाल डा. साहेबक आवासपर जा लिखैक मेटर प्राप्त कऽ बजारसँ दू मीटर कपड़ा कीनलौं। सुभाष चौकक नजदीक हमर पुरान पेन्टींगक दोकान अछि‍ जे अखनि भागिन- वि‍जय- चलबै छथि‍, ओतए गेलौं। पता चलल वि‍जय दू माससँ दोकानपर नै अबैए। फोन लगेलौं मुदा गप नै भेल। तखैने बगलक दोकानदार एला आ पुछलथि‍- “सर, बिजेसँ केहेन काज अछि?” हम कहलि‍यनि‍- “यौ, रंग-ब्रुशक काज छल, वएह लेबाक अछि। किनब तँ मुल्किक पाइ लगत, वि‍जय नै आएत की?” दोकानक चाभी हुनके लग रहनि‍, जेबीसँ निकालि हमरा हाथमे देलनि‍। सभ समान मिलल मुदा किछु रंग बजारसँ कीनए पड़ल। घरपर आबि, जलखै केलौं आ बैनरक कपड़ा देबालपर टाँगि लिखैमे जुटि‍ गेलौं। अभ्यास तँ छूटल रहए। बीच-बीचमे मौका मिललापर कहि‍यो-काल हाथ साफ करैत रही मुदा ऐ तीन बरीखसँ सोल्हन्नी जेना बिसरल जाइत रही। मनमे शंका उठैत रहए कि केहेन लि‍खि‍ पएब, केहेन नै? मुदा अनुभव रहए आ दोसर, गोष्ठीमे शामिल हेबाक उमंग अद्भूत उर्जाक संचार करि‍ते रहए। गर्मी जेना आइ छोड़ि काल्हि नै रहत? हवा सोल्हन्नी रूकि गेल छल। आ एम्हर कलाकारीक सुनामी सेहो उफनाइत रहए। लिखनाइ शुरू केलौं। तीन घंटाक मेहनति‍क पछाति एकटा सुन्दर बैनर लिखि‍ अपन कार्य-भारमे सफल भेलौं। तीन बजि‍ गेल छल, आइए चारि बजे भपटि‍याही गोष्ठीमे भाग लेबए लेल बिदा भेनाइ अछि‍। हड़बड़ाएले नहेलौं आ रहि-रहि कऽ घड़ी दिश तकैत रही जे आब, आब बिदा हएब! तखने डा. साहैबक फोन आएल- “ललनजी, तैयार छिऐ? बिदा भेलिएे कि नै?” कहलि‍यनि‍- “हँ सर! चलैएबला छी।” कहलनि‍- “हएत तँ अहाँ अपन लैप-टाॅप सेहो नेने आएब, कि‍छु काज, गोष्‍ठीए सम्‍बन्‍धी बजड़ि‍ गेल अछि‍।” हमर इन्तजारक घड़ी खतम भऽ गेल छल। कपड़ा पहिरि‍ लैप-टॉपक बैग पीठपर लेलौं आ बाइकसँ बिदा भऽ गेलौं। निर्मली स्थित डा. साहैबक अवासपर आशुतोषो भाइजी पहिनेसँ पहुँचल छला। डा. साहैबकेँ गोष्ठीसँ सम्बन्धित प्रयाप्त मात्रामे सी.डी. कैसेट तैयार करबाक रहनि‍। एकर अलाबे किछु पोथीकेँ सेहो पैकिंग करबाक रहनि‍। हमर इच्छा रहए जे किछु हिनकर संग दऽ सकि‍यनि‍! हम बजारसँ रंगीन कागत लाबि कऽ पोथीक पैकैट बनबैमे जुटि‍ गेलौं। तही बीचमे श्री ओमप्रकाश झा (देवघर-भागलपुर) सँ आगमन भेलनि। ई हमर संयोग छल जे ओम प्रकाश बाबूक अनायास दर्शन आ भेँट भेल। हम अति प्रसन्न भेलौं। हम हाँइ-हाँइ पोथी पैकिंग करैत रही जइमे डा साहैबक दुनू बेटी, पल्‍लवी आ तुलसीक मदति‍ सराहनीय रहल। सभटा काजके निपटबैत साढ़े पाँच बजि गेल। हमसभ अपन-अपन सुविधानुसार भपटियाही बिदा भेलौं। हमरा संगे अक्षय कुमार झा आ जे.पी. गुप्ताजी सेहो रहथि‍। हिनका सभकेँ नेने हम करीब सबा छह बजे भपटियाही मध्य विद्यालय परि‍सर, आयोजन स्थलपर पहुँचलौं। जखनि‍ हम सभ पहुँचलौं तइ समए दुर्गानन्द मण्‍डल जी मैकपर कार्यक्रमक श्री गणेशक उद्घोषण करैत रहथि‍। बर्खाक मोसि‍मक कारणेँ विद्यालय प्रांगणमे पानिक जमाउ छल। सम्‍भवत: तँए एकटा गोलाकार कमरामे कार्यक्रमक आयोजन छल। नमहर हॉल रहि‍तो जगहक कमी बुझना जाइत रहए मुदा बेवस्था ठीक-ठाक छल। हमरा बुझना गेल, जेना कथाकारो लोकनिक संख्या पहिनेसँ ऐ गोष्‍ठीमे बेसी छल। तहूसँ रूम भरल रहए। मुदा गर्मीसँ जेना सबहक मन औल-बौल करैत रहनि‍। दूटा स्टेण्ड फेन गेँट लग छल जे भीषण गर्मीक आगू बौना पड़ैत छल। ऐ गोष्ठीकेँ एकटा आर खास बिशेषता ई रहल जे गाम समाजक विशि‍ष्ट बुजुर्ग लोकक संग जुअन-जहान तथा माएओ-बहिन सभ बढ़ि‍-चढ़ि कऽ भाग लेने रहथि‍।  एे सबहक बीच गोष्ठीक आरम्भ विधिवत् दीप प्रज्वलित कऽ बुजुर्ग साहित्यकार लोकनीक द्वारा करौल गेल। तत्पश्चात् अध्यक्ष मण्‍डलक चयन भेल जइमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री कमलेश झा, डा. बिमल कुमार राय, डा. योगेन्द्र पाठक वियोगी, आ डा. शि‍व कुमार प्रसाद रहथि। संगे संचालन समितिक सदस्यक नाओं उद्घोषित कएल गेल जइमे मुख्य रूपे श्री ओमप्रकाश झाजीक संग श्री दुर्गानन्द मण्डल तथा श्री राजदेव मण्डल रहथि। लोकार्पण सत्र शुरू भेल जइमे विभिन्न तरहक पोथीक लोकार्पण भेल। तत्पश्चात् नूतन विहनि आ लघु कथाक पाठ संग समीक्षक मण्‍डलक द्वारा समीक्षा सेहो शुरू भेल। ई गोष्ठी मुख्य रूपे नारी केन्द्रि‍त रहए, सभ कथाकार लोकनि एकसँ एक नारी विमर्शपर आधारित कथा गढ़ने रहथि‍। शाइत! मोसमक ठीक अनुमान आयोजक महोदयकेँ नै रहनि‍ तँए कार्यक्रमक मध्‍य बि‍जली-पंखाक बिशेष बेवस्थामे नरहिया जाइले आदमी ताकए लगला। आदमी तँ मुलके छल मुदा एकटा मोटर साइकिलो चाही। शाइत अही सबहक गुनधुनमे ललितजी खिड़कीसँ हमरा अवाज देलनि‍। हम बाहर आबि पुछलि‍यनि‍- “की बात?” कहलनि‍- “ललनजी, कनी अहाँ अपना गाड़ीकेँ चाभी दि‍यनु?” हमरा गाड़ीक हेड लाइटक स्वूच खराप रहए, आ राति-वाली बात। हम सोचलौं, किए ने हमहीं जा कऽ ई काज करि‍ दी? हम पुछलि‍यनि‍- “केहन काज अछि बाजू ने हमहीं करि‍ दइ छी।” “कनी हिनका संगे नरहिया जा दूटा सिलिंग पंखा लाबि दियौ।” हमरा संगे एकटा श्रीमान्, लागल जे बहुत होशगर छथि,‍ नरहिया पहुँचलौं। रातिक दस बजैत छल मुदा सुधि-बुधिक परिचए दैत ओ श्रीमान् टेन्ट हाउससँ दूटा पंखा प्राप्त केलनि आ हमसभ कार्यक्रम स्थलपर लऽ कऽ पहुँचलौं। पंखा लगि‍ते गर्मी जेना छू-मंतर भऽ गेल। जइसँ कथाकार सभकेँ ऊर्जा भेटि‍ गेलनि‍। कार्यक्रममे गति पकड़लक। नव-नव कथाकार लोकनि पहुँचल रहथि‍ जइमे हमरा संगे अक्षय कुमार झाजी आ जे.पी.गुप्ताजी सेहो पहुँचल रहथि। आसपासक ग्रामीण लोकनि आ किछु माता-बहिन सेहो श्रोता रूपमे उपस्थित रहथि‍। दोसर सत्रमे हम अपन नवसृजित कथा “बेटी”क पाठ केलौं। अधरति‍यामे भोजनावकाश भेल। भोजनमे गाम घरक खाँटी सुआद भेटल। दस मिनटक विश्रामक पछाति पुन: तेसर सत्रक संग राति भरिक कथा-यात्रा आगू प्रारम्‍भ भेल जे भि‍नसर छह बजे करीब कार्यक्रम शेष भेल। अन्‍तमे संयोजक श्री नन्‍द वि‍लास राय धैनवाद ज्ञानक केलनि‍। अगि‍ला गोष्‍ठी हेतु श्री शि‍व कुमार मि‍श्रजी दीप तथा पंजी लेलनि‍। जे लखनौर प्रखण्‍डक अन्‍तर्गत बेरमा गाममे प्राय: २० दि‍सम्‍बर २०१४केँ करौता। ललन कुमार कामत, निर्मली-ललमनि‍याँ, जि‍ला- सुपौल। संजय झा हे माय तोरा प्रणाम ----------------------- उठ रौ बौआ , उठ रौ बेटा भ' गेलै आब भोर  कतेक करबै आब तू देरी  सूर्यो भेलथि इन्होर जाउ नहाउ आ जल्दी सं आउ जलखै भ' गेल ठंढा  झटपट आहाँ पहिर लिअ  पेंट, जुटा ओ अंगा उठाऊ झोड़ा जाउ पाठशाला  नै त' लागत डंडा मुँहक बोल छै कड़गर ओकर  ह्रदय बहाई छै गंगा बोली बचन के बात नै पुछु - कखनो रसगुल्ला सन मिठगर  कखनो , तितगर नीमक पात सन  एक रति जौं कष्ट जे देखलेत छड़पटाय लागत - बिन पाइनक ओ माछ सन उम्र हमर आब भेल बहुत  भ, गेलहुँ हम जवान  तैयो ओकरा एहने लागय इ अछि एखनो अज्ञान  आब बुझाइया किया बुझैया इ हमरा अज्ञान  ठेंसो जखन हमर पुत्र के लागय  निकलि जाइत अछि प्राण हे माय तोरा प्रणाम !! हे माँ तोरा प्रणाम !! राम कुमार मिश्र गजल सहसह लोकक भीड़ देखल हम  सुच्चा लोकक लेल बेकल हम कटुता क्रोधक उमर बढ़लै टा नेहक देखल लाश जेकल हम माहुर मीझर गप्प गीजै छथि माहुर गप्पक टीस सेकल हम बलगर शोणित पीबि मोटेलै अबला श्राद्धक पात फेकल हम जीयब निकहा दिनक आशामें आशक सिम्मर फ़ूल सेबल हम सभ पाँतिमे मात्राक्रम –2222-21-222 © राम कुमार मिश्र आशीष अनचिन्हार गजल "ग"सँ गंगा "ग"सँ गजल छै  आखर आखर विमल छै "ग"सँ गीता "ग"सँ गजल छै वेदक संगे रचल छै "ग"सँ गाए "ग"सँ गजल छै पाथर पाथर महल छै "ग"सँ गायत्री रटल हम अनका धरिकेँ बुझल छै "ग"सँ गामा संग गाँधी दुष्टक गर्वो टुटल छै सभ पाँतिमे 2222+122 मात्राक्रम अछि। गजल ने बेटा ने पोता ने बेटी बुढ़ौतीमे देखै छी खाली उकटा पैंची बुढ़ौतीमे लोटा लाठी टूटल दरबज्जा चुनौटी आ करिया कुक्कुर संगे छै दोस्ती बुढ़ौतीमे डबरा डुबरी पोखरि झाँखरि खेत गाछी संग चलि गेलै हम्मर सोहक पौती बुढ़ौतीमे घुरि घुरि एना हमरा देखैए समाजक लोक जेना फेरो हेतै घटकैती बुढ़ौतीमे की खेबाके इच्छा अछि से कहि दिऔ झटपट झड़कल सन संतानक अपनैती बुढ़ौतीमे सभ पाँतिमे 222+222+222+1222 मात्राक्रम अछि तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। शारदा नन्‍द सिंह जीक कि‍छु कवि‍ता- ((नमरीक भाउ तेहेन ने दरकल)) नमरीक भाउ तेहेन ने दरकल सीधे-सीध दशटकहीपर अरकल धान-गहुम गोदाम सड़ैए आल्‍लू-पि‍औजक भाउ सुनि‍ थारी-बाटी झुझुआन लगैए श्रोतस्‍वि‍नी भेल प्रदुषि‍त जलपर लागल मोहर वि‍देश तेतेक आराजकता बढ़ल जा रहल अर्णव उफनि‍ डोलि‍ रहले शेष तेहेन वि‍धेयक पास भेलै अलंकारो गेलै श्‍लेष ढारि‍ कि‍रोशीन हि‍न्‍दपर देल माचि‍स लेश जनसाधारण एको ने बाँचत बाँचत जन वि‍शेष खद्दर-खाकी रमनामा रंच मात्र ने मानवताक लेश भारत माता ढनमना रहलि‍ जनशक्‍ति‍पर लागल ठेँस। ((अयोग्‍य शासक)) बि‍नु पढ़ने वि‍द्या जँ होइतै बि‍ना पढ़ने कि‍सान हमरो भारत होइतै साक्षर नै मरि‍तै भूखै कि‍सान छेलै केहेन ई देश जे बाँटै अनुपम अपन संदेश न्‍याय-दर्शन दरसाबए छेलै ने बाँचल कोनो देश गार्गि‍-मैत्रीय सन वि‍दुषी अछैते देह वि‍देह ति‍नक सन्‍तानकेँ अपनोसँ ने पाबै नेह जँए प्रजातंत्र छै मुर्खक तँए चुनै शासक अयोग्‍य एहेन दि‍न सुनबाक ऐतै भारत ललना हबसक होइ उपयोग राज छूपल छै बड़का बदलाक भाव बरकि‍ रहल छोभ कल-छल-छल बारि‍ बहए बान्‍ध बनाबलि‍ डोभ। केतेको क्रान्‍ति‍ उठल भारतमे उद्योग क्रान्‍ति‍सँ रहलै वाज जेतेक वि‍देशी टांग पसारल हम भारतीय छी बनल मोहताज कि‍एक तँ प्राइमरीसँ युनि‍भरसि‍टी तक सभतरि‍ एक्के हाल छै शि‍क्षा मि‍त्र होउ आकि‍ चाँन्‍सलर शारदाक घेँट करै हलाल छै। ((चि‍रकि‍ जाएब)) ई जीवन हमर सुखाएल डारि‍ सन जँ बहै कड़गड़ वसात चि‍रकि‍ जाएब वा‍ की हएब? आकि‍ टूटि‍ जाएब कि‍एक तँ अन्‍त:स्‍त्रोत अछि‍ सुखा रहल स्‍त्रोत पयश्वनीक प्रवाह अवि‍रल बहि‍ रहल छल से ठमकि‍ रहल नै सिंचि‍त द्रुमलता वि‍टप भऽ रहल जड़ि‍ जेकर हरि‍त-पल्‍लवि‍त-पुष्‍पि‍त भऽ सकत फलि‍त जरि‍ रहल जीगर अछि‍ हाल यएह कथा-कवि‍ताक हमर छन्‍द ने अलंकार आ ने हृदैदारक तरू डारि‍ सुखाएल सनि‍ चि‍रकि‍ जाएत ई जीवन हमर अछि‍ जे देश हमर जनतांत्रि‍क जनता जेकर जड़ि‍ केहेन विश्व मानकपर खाँका खींचल केहेन कसगर जन-गन तक अमरलत्ती लतरल-चतरल हर जन-जनपर ताधरि‍ रहे रसगर जँ बहए वसात कड़गड़ चि‍रकि‍ जाएत सुखाएल डारि‍ सन जीवन हमर। ((भूमि‍जा भैया)) हे भूमि‍जे जनमि‍ते एतेक कि‍ए हमरासँ माँख ने कोरा आ ने काँख अबि‍ते एलौं की हम केलौं देखि‍ते कि‍ए हमरा एना बि‍सरलौं की मन अछि‍ से नै जानि‍ छेलौं केहेन सन डुमैत कि‍ए अनलौं हमरा छानि। भल ने केलेँ तूँ गे दैया सभ कहे दुर जो जँए भेलौं भूमि‍जाक भैया तँए ने होइए हमरा एते ऐसँ नीक तँू मारि‍ए दइतेँ एहेन भाएसँ तँ भैटुरे रहि‍तेँ चट आबि‍ झारि‍-पोछि‍ मुँह लेलेँ चुमि‍‍ कहलेँ भैया सभटा सत्ते। की कहबो हम तोरा भैया केने अछि‍ तेतेक मुँहचुरू जेतेक नि‍पट नि‍टटू अखनि‍ कहबैए सुरखुरू जे देखै छै राखल जएह सभटा करै चट अपन सुतारै अगबे गोटी डाँड़ खोंसि‍ जे बँचै छै धऽ लइ छै मुँह फट‍ के भरतै ई पेट अगस्‍ती सुगम मार्ग अपनौने नाम बेचि‍ हमर सगरो छै घि‍नौने सुच्‍चा मैथि‍ल बुझै अपनाकेँ असलीकेँ कि‍यो ने जानै दाँत बत्तीसी बाबि‍ कऽ नै मानै तँ लागए फानए लगबै माने-पर-माने की कहबो हम तोरा भैया केने अछि‍ मुँहचुरू की छेलौं आ की भेलौं तँए कहाबै सुरखुरू। अरुण चन्द्र राय अर्थशास्त्र  ------------------------------- कहल जाइत अछि जे  अर्थशास्त्र  थीक एक टा विज्ञान जाहि सॅ कएल जाइत अछि  उत्पादन, वितरण व  खपत केर प्रबंधन संसाधनक इष्टतम उपयोग लाभक संग  अछि एकर अंतिम उद्देश्य  हटि गेल छथि  आमजन  अर्थशास्त्र के केंद्र स' नबका परिभाषा में मांग आ' आपूर्ति कए बीच  संतुलन बैसेबाक कला सेहो थीक  अर्थशास्त्र  जखन कि नाना प्रकारक  प्रलोभन दय कए  सृजित कएल जा रहल अछि मांग  आ' आपूर्ति भए रहल अछि  बाजारक शर्त पर कुन्दन कुमार कर्ण बाल गजल पढबै लिखबै चलबै नीक बाटसँ आगू बढबै अपने ठोस आंटसँ संस्कृति अप्पन कहियो छोडब नै अलगे रहबै कूसंगत कऽ लाटसँ फुलिते रहबै सदिखन फूल बनि नित डेरेबै नै कोनो चोख कांटसँ हिम्मत जिनगीमे हेतैक नै कम चलबै आगू बाधा केर टाटसँ बच्चा बुझि मानू कमजोर नै यौ चमकेबै मिथिलाकेँ नाम ठाटसँ मात्राक्रम: 2222-2221-22 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल बीतल दिन जखन मोन पडै छै आँखिसँ बस तखन नोर झरै छै छोडब नै कहै संग अहाँकेँ लग नै आउ से आब कहै छै ओकर देलहा चोटसँ छाती एखन धरि हमर दर्द करै छै जिनगीमे लगा गेल पसाही धधरामे हिया कानि जरै छै के बूझत दुखक बात हियाकेँ कुन्दन आब कोना कँ रहै छै मात्राक्रम : 222-1221-122 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल दुख अपने लग राखै छी सुख सभमे हम बाँटै छी सभकेँ बुझि अप्पन सदिखन हँसि-हँसि जिनगी काटै छी पापसँ रहि अलगे बलगे धर्मक गीतल गाबै छी मैथिल छी सज्जन छी हम मिठगर बोली बाजै छी कुन्दन सन गुण अछि हमरा मिथिलाकेँ चमकाबै छी मात्राक्रम : 2222-222 © कुन्दन कुमार कर्ण इरा मल्लिक गजल हुनक नैन झरैत नोर हम देखने छी भरल आँखिक लाल कोर हम देखने छी | नैन चुपचाप रहय बोल किछ नै फुटै हुनकर बिजुकैत ठोर हम देखने छी | उठैत करेजक दरद कहु के बुझतै सालैत अो टीस पोरे पोर हम देखने छी | नेहमहल ओ सजेने छलैथ जतन सँ बिखरै महल खंड थोर हम देखने छी | हुनका के बुझाबै इयैह जिनगी थिकैक कानबै कनैत चहुँ ओर हम देखने छी | (वर्ण - 16) गीत (श्रृन्गार) ---------------------- ओहि राति! ओहि राति ! सपन में अयला सजना ! बिहुँसैत अधर भीजल नयना! ओहि राति! सपन में अयला सजना! नहुँ नहुँ दीप जरय ओहि प्रीतमहल, हम बाती मधुर बनल सजना! ओहि राति ! सपन में अयला सजना! पिपासित छल मन! तन थिरकि रहल ! तकय चानक दिस चकोर नयना ! ओहि राति! सपन में अयला सजना ! वन कानन मन विरहिन पपीहा ! पीउ पुकारि रहल काँपय गगना ! ओहि राति! सपन में अयला सजना ! प्रीतकुँज जखन कुहकल कोयली! आधे राति बिखरि गेल भोर जेना ! साँस उसाँस सुरभित सुरभित ! महुआ मादक बौरायल मना ! ओहि राति ! सपन में अयला सजना ! ओह!! ओहि राति सपन में अयला सजना !! कविता ............ दर्द दर्द में फर्क बहुत अछि हँसी हँसी केर अर्थ अलग अछि | पीर गहनतम शान्त दर्द अछि टीस पीर के मर्म बुझल अछि | पीर सत्य थिक सुख क्षणिक अछि नुका सकब दृग नोर भरल अछि | घोंटि सकब नीलकंठ बनि विष शिवरूप धरब कहु कहाँ सरल अछि | बिन्देश्वर ठाकुर सूर्जक पहिल किरण  प्रात: काल पृथ्वीपर उतरल आ  सन्देश देलक अहाँक प्रेमक  अहाँक स्नेहक देखिते हम  मन्त्रमुग्ध भs गेलौं  कारण ओइ किरणमे  स्वयम् अहाँ प्रतिबिम्बित छलौं । सुरेन्द्र शैल पोसुआ कुकुर

पोसुआ कुकुर खाय मलीदा, अइंठ कूठ अमला के भोग। नेता काढ़य नित्य कसीदा, भूख बनल जनता के रोग॥ पाँच बरख पर गिरगिट बदलय, मौसम के अनुरूपे रंग। झरकल मुँह पर रहि- रहि चढ़वय, पियर-हरियर-उज्जर रंग॥ समर भूमि मे मंच सजल अछि, अभिनेता-योद्धा बहुरंग। क्रीड़ा-कौतुक-दंभ भरल अछि, प्रजातंत्र आनन भटरंग॥ महिसवार बनि चढ़ल मंच  पर, केकरो केतली चाहक हाथ। तीर-तुणीर धयल दसकंधर, सनकल हाथी चढ़ल सवार॥ विपटा-लवड़ा ताल देखावय, गीता और कुरान सिखावय। ठक गाँधी के रूप बनावय, आई शहीदक जाति गनावय॥ नटुआ और बजनियाँ देखल, ठोकैत ताल-ठेहुनियाँ देखल। जोड़ल हाथ-केहुनियाँ देखल॥ निर्लज्जक गुड़कुनियाँ देखल॥ इन्द्र घटावय महगाई अरु देव मंगावय कारी धन। लाख दुखक बस एक दवाई, फेर कहै छी साँच बचन॥ पछिला लूटल कोखि धरा के, ई बेचत पक्का पुनि देश। अपन पिया सँ नयन लड़ा के, घुरि आयत धरि जोगिन भेष॥ विवश बेचारी जनता  निरखल, विना टिकट के वाइस्कोप। शैल मूक कखनो नहिं परखल, काल्हि हैत सुख शांतिक लोप॥ सुरेन्द्र शैल, भदहर(दरभंगा) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 49 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १६० म अंक १५ अगस्त २०१४ (वर्ष ७ मास ८० अंक १६०) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA