VIDEHA — Issue 161 / अंक १६१

Publication: VIDEHA · Issue: 161
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६१ म अंक ०१ सितम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८१ अंक १६१) गद्य सत्यनारायण झा जगदीश प्रसाद मण्डल पद्य जगदानन्द झा “मनु” आशीष अनचिन्हार रसिक लाल सदाय महेश झा “डखरामी” शेफालिका वर्मा बिन्देश्वर ठाकुर इरा मल्लिक कुन्दन कुमार कर्ण मिहिर झा मो. अशरफ खान अमित मिश्र पंकज चौधरी “नवलश्री” प्रदीप पुष्प स्व. सीताराम झा सत्यनारायण झा अरण्य देश अरण्य अर्थात वन देसक राजा सिंह एकटा गुफा मे परल अछि । गुफा अन्हार गुफ़ छैक ।एकेटा मुँह छैक ।अंदर बर डेरौन छैक ।हाथ हाथ नहि सुझैत छैक ।बेचारे सिंह के पैघ दुःख परलैक ।हजारों बरख सँ ओकर राज रहैक ।ओकर बाप –पुरखा अरण्य देसक राजा होयत आयल छलैक ।एखनो ओ ओहिना बलशाली अछि मुदा समय कतेक बदलि गेलैक जे ओकरा गुफा मे नुकाय परलैक आ छोटका पशु पक्षी अरण्य मे विचरण कय रहल छैक । आब ई दुःख वर्दास्त नहि होयत छैक ? एकबेर वन देसक सभ जीव बैसार केलक जे आब जमाना कतय सँ कतय पहुच गेलैक आ हमसभ एहि बाघ सिंह कए डरे परायल फिरैत छी ।सभ मिलि जौ आंदोलन करी तए ई मुट्ठी भरि हिंसक जीव हमरा सभ कए किछु नहि बिगारि सकैत अछि ।एकरा सबहक जनसंख्ये कतेक छैक ?बाघ ,सिंह ,चिता ,गैंडा,बनैयासूअर ,हाथी घोड़ा ,गीध ,चिल आदि बहुत कम संख्या मे अछि आ एम्हर विशाल जनसंख्या छैक । सिंह राजा कए घेर लेल जाय आ गद्दी पर सँ हटा देल जाय ।चुनाव मे जे जीते ओकर राज हेतैक ।आंदोलन प्रारम्भ भेल आ सिंह कए हटा देल गेलैक । चुनाव मे सिंह आ बाघ कए जमानत जब्त भ गेलैक । आब सिंहक डर केकरो नहि होयक ।जवरदस्त मतदान भेलैक ।राजाक पार्टीक पैघ हारि भेलैक ।सिंह सोचलक कनेके दिन मे मारि काटि क’ भगा देबैक मुदा से नहि भेलैक । नव मंत्री परिषदक गठन भेलैक । बादुर प्रधान मंत्री बनल आ बेंग राष्ट्रपति । विढ़नी रक्षा मंत्री आ कुकुर वित् मंत्री । मधुमखी गृह मंत्री आ गिदर सुचना –प्रसारण मंत्री । एहिना मंत्री परिषदक गठन भ’ गेलैक ।राज काज चलय लगलैक ।बाघ सिंह जहाँ झपटबाक कोशिश करैक कि एके बेर लाखो विढ़नी ,पचहिया आ मधुमाछी नाक ,मुँह आ कथीदनि मे ——लुधिक जाय आ सभ बाप बाप करैत भागे । बाघ –सिंह ततेक डेरा गेलैक जे केकरो दिस तकबो नहि करैक । बाघ –सिंह प्रधान मंत्री बादुर आओर राष्ट्रपति बेंग क’ चमचागिरी करय लगलैक । एक छत्र राज भ’ गेलैक । बाघ –सिंह ,चिता ,गेंडा,हाथी घोड़ा आदिक सभ सुबिधा हटा देल गेलैक । सिंह –बाघ भोरे उठि बादुर आ बेंग क’ चरण स्पर्श करैत छलैक ।बादुर आ बेंग अपन सुरक्षा मे कमांडो पचाहिया क’ रखने छल । बाघ –सिंह जखने भेट करय अबैक , लाखो कमांडो पचहिया बाघ –सिंहक उपर उड्य लगैत छलैक । निष्कंटक राज भ’ गेल छलैक । कतेको साल तक राज केलाक बाद जखन बरका जानवर –पक्षी सँ निश्चिन्त भ’ गेल तखन आब एकरा सभ क’ अपना मे झगड़ा होमय लगलैक ।कतेक जानवर पक्षी एक दोसर कए अपन ताकत देखबय लगलैक । मुस –छुछुन्दर ,कौआ ,बाज लोमरी ,भालू ,गधा आदि अपन अपन दाबा करय लगलैक । जाहि सँ बादुर आ बेंग कए बुझा गेलैक जे बेसी दिन राज नहि चलत । पुरा मंत्री परिषद सशंकित रहैत छल । सभ अपना अपना तरीका सँ खजाना लूटय लागल । एम्हर गिदर अपने त्रस्त रहैत छल । ओ सोचय ओकरा सँ बेसी शास्त्र के पढ़ने अछि ,ओ त’ कतेको बेर सिंहक महामंत्री रहि चुकल अछि । यैह ने केखनो क’ बाघ –सिंह ओकरो पर आक्रमण क’ दैत छलैक ,तै तए एहि दल मे ज्वाइनिंग देलियैक । मुदा एहिठाम तए ओहू सँ बिकराल स्थिति भए गेल छैक । हमर बेमातरे भाई कुकुर हरदम हर समय गुड़रि कए हमरा तकैत रहैत अछि । ओकरा डरे हम कैबिनेट मे ठीक सँ बाजि नहि पबैत छी । गिदर सभटा बात सिंह लग सूचित करय लगलैक । एम्हर सेहो सभ के सभ मे लड़बय लगलैक । आब अपने मे सभ लड़य लागल । एकदिन राष्ट्रपति बेंग बहुत हीरा जवाहरात लए पताल भागि गेलैक । बादुर खजाना लए राति मे भागि गेलैक । खजाना छोडि आर जे बचलै वित् मंत्री कुकुर चाटि गेलैक । पुरा अरण्य देस मे अराजकता पसरि गेलैक । लूट पाट मचि गेलैक । यैह मौकाक तलास मे हिंसक पशु छल । एके बेर चढाई क’ देलकै आ हजारों कए चिबा कए खा गेलैक । केकरो कियो मददि नहि केलकै । पुनः एक छत्र राज स्थापित भए गेलैक आ छोटका बहुत पशु पक्षी कए देस द्रोही घोषित कए प्रतिदिन हजारों कए मारि देल गेलैक |आब पुनः सिंह निष्कंटक राज क’ रहल अछि । जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक शकल-सूरत) एक तँ ओहिना श्‍यामलाल बाबू पनरह मिनट बिलम भेने धड़फड़ाएल छला तैपर अपन उपस्‍थिति दर्ज करौने बिना किलासमे केना जैतथि। ओना मनमे ईहो होन्‍हि जे अखनि धरिक तँ यएह परम्‍परा अछि जे कोनो शिक्षक विद्यालय पहुँच उपस्‍थिति बोहीमे हस्‍ताक्षर कऽ अपन उपस्‍थिति दर्ज करबैत आबि रहल छथि मुदा उपस्‍थिति केकर? कार्यालयक मुँहपर ठाढ़ श्‍यामलाल बाबूक मनमे ईहो होन्‍हि जे किलासक पनरह मिनट कटिए गेल अदहा समए शेष अछि तँए पहिने किलासेक काज पुरा पछाति उपस्‍थिति बोहीमे नाओं चढ़ा लेब। तलब पढ़बैक लइ छिऐ। मुदा लगले मन उनटि ओतए चलि जान्‍हि जे एक तँ परम्‍परा मानि नेने छी दोसर जँ कियो ऊपरका पदाधिकारी आबि जेता तँ अनुपस्‍थितियो बुझता। बेर-बेर घड़ीपर अाँखि जान्‍हि। घड़ीक सुइया क्षण-पल मिनट आगू ससरल जाइत मुदा श्‍यामलाल बाबू ओइ ओझरीमे फँसि गेला जे पढ़बैक समए निर्धारित अछि आगू दोसर घंटीक पढ़ाइ बढ़त काजमे कटौती भेने फलमे, उत्‍पादनमे कटौती हएत, जइसँ नोकसान चाहे जेकर होइ मुदा नोकसान तँ हेबे करत। देवमन्‍दिरक ऊपरक धुजा जेतएसँ देखि पड़ैत तेतए तक ओइ स्‍थानक महत भेल, तैठाम अखनि तँ सहजे विद्यामन्‍दिरक मुँहपर छी! मनमे अबिते बजा गेलनि- “अपन पढ़बैक समैयक भरपाइ भलहिं अतिरिक्‍त समैसँ व्‍यय करब मुदा हमहूँ तँ ओही वर्गक शिक्षक छिऐ। जहिना कोनो ऑफिसक जवाबदेह अफसर होथि आकि विद्यालयक प्रधानाध्‍यापक, तेकर पछातिए आन कियो कोनो ने कोनो किलासक वर्ग शिक्षक हेबे करै छथि। आबक महगीमे तँ एक-एक गोटे एके वर्गक किए सौंसे विद्यालये-महाविद्यालयक किलासक भार कान्‍हपर लऽ चलै छथि।” ओना बजै काल श्‍यामलाल बाबूकेँ बजा तँ गेलनि मुदा बिनु विचारल बात बजा गेलनि। बात बजाइते कान पकड़ि मन कहलकनि- “अहूँ तँ अही विद्यालयक शिक्षक आ नवम् वर्गक वर्ग शिक्षक छिऐ। ई भेल जवाब-देही, मुदा जवाब-देहीक पाछू जे बेवहारिक पक्ष बाधक अछि, ओकर साधक के बनत? जहिना सरकारक गृहमंत्री तहिना ने परिवारक बीच, परिवार चलौनिहारो।” लगले मन अपन जवाब-देहीक पात पकड़ि मखान वा भेँट-मलकोकाक पनिपत पकड़ि, बीज लग पहुँचलनि। विद्यालयक सहायक शिक्षक तँ हमहूँ छीहे। जे विद्यालयक बीच शिक्षककेँ रहैक बेवस्‍था नै छन्‍हि गाम-घरसँ अबै छथि, पारिवारिक-सामाजिक लोक भेने बाट-घाटमे किछु विलम हेबे करतनि। तैबीच पहिने अपन उपस्‍थिति रजिष्‍टरमे दर्ज कराएब जरूरी भेल आकि नियत समैमे काजपर जाएब भेल? श्‍यामलाल बाबू समस्‍याक जड़ि तँ पकड़ि लेलनि मुदा हौहटि-कलकलि जकाँ समस्‍या विचिया गेलनि। विचियाइते उरकुसी लगल जकाँ मन चुलचुलए लगलनि। एक दिस देखथि जे काजक दुआरे हाथ खाली अछि आ दोसर दिस देखथि जे हाथक दुआरे काज खाली अछि। कियो मासक दरमाहा एक दिन बैसि मासो दिनक उपस्‍थिति दर्ज कऽ मासो दिनक कमाइ पबिते अछि। तैठाम उपस्‍थितिक कोन महत रहल। खैर ई जेकर भेल ओ तेकर भेल, अपन बुझह, अपन जानह। मुदा अपनो तँ किछु एहेन प्रश्न अछिए। आब कहू जे विद्यालय अबै छेलौं बाटमे मोहन भाय बजारक एकटा टटका घटना सुनबैत कहलनि- “श्‍याम भाय, बिसरि जैतौं, तँए अहाँकेँ कहब जरूरी अछि। अहाँ ठेकान करबै, आ फेर साँझमे दरबज्‍जेपर बैसि दुनू भाँइ बतिआ लेब।” जेकर चलैत पनरह मिनट विलम भऽ गेल। फेर मन घूमि कारखाना दिस गेलनि जैठाम मिनट-घड़ी जोड़ि आवाजाहीक हाजिरी होइए। मुदा तँए कि ओहन नै अछि जे कोनोमे आइती आ कोनोमे जाइतीक हाजिरी नै होइए? सेहो तँ अछिए! मुदा हम तँ विद्या मन्‍दिरक पुजेगरी छिऐ। विचार तँ करए पड़त। मुदा विचारो करब तँ असान नहियेँ अछि। हँ से तँ नै अछि मुदा अपनो भरि जँ नै करब तँ कोन मुहेँ धरमराज लग ठाढ़ भऽ स्‍वर्गक फाटक खोलबाएब। मुदा बाटो तँ तेहेन अछि जे भोथिआइए जाइ छी। तखनि? चोटे मन उनटि अपन पिताक चलौल परिवारपर गेलनि। घरसँ बाहर धरिक अपन समए बनौने छला जे भिनसुरका उखराहामे काजक जेते समए बाधित हएत ओकर भरपाइ बेरूका उखराहामे कऽ लेब। मुदा विद्यालय तँ से जगह नै छी दस बजेसँ चारि बजे धरिक छी। जहिना बदाम-केराउक भूजा पथरा आरो बेसी सक्कत भऽ जाइए तहिना श्‍यामलाल बाबूक मन सेहो पथरा गेलनि। पथराइते मनमे फुड़लनि, अपन मुँह तखने ऊपर उठत जखनि नीक फल गाछक डारि पकड़ि उठाएब। जँ से नै उठाएब तँ काटल गाछ वा डारिक अशे केते। मन जेना थीर भेलनि। थीर होइते विचार ई भेलनि जे अखनि बच्‍चा सभकेँ पढ़बैक समए छी, जँ ओकर समए ओहिना जाइ छै तँ दोखी हएब। सोचै-विचारैक सेहो अपन-अपन समए होइ छै। एकटा ओहन होइ छै जे आगूमे काज रहल ओकरा कोन जुतिए-भाँतिए करब, दोसर होइए जे काज आगू औत आकि जे काज बेठेकनाएल रहत, तेकर विचार पहिने करब। ऐठाम दुनू अछि। मुदा एते तँ अछिए जे एकटा नै केने नोकसान हएत दोसर किछु पछातिओ केने नोकसान नै हएत। मन मानि गेलनि जे पहिने पढ़बैले किलास जेबाक अछि। अपन उपस्‍थिति बोहीमे उपस्‍थिति दर्ज केने बिना विद्यार्थी सबहक उपस्‍थिति बोही आॅफिसक टेबुलपर सँ उठा किलस विदा भेला। विदा होइते मनमे उठलनि अखनि जँ कियो ऊपरका पदाधिकारी आबि जाथि तँ अो बोही देखि अनुपसथिते ने बुझता? तखनि हुनका लग केना अपन उपस्‍थ्‍िाति दर्ज कराएब? समैओ सहए भेल अछि जे एक दिस पैघ-पैघ योजना नष्‍ट भेल जा रहल अछि आ दोसर दिस, हरसीकार-दिरघीकार छुटने लोक जुरमाना भरि रहल अछि। बिना पाइ-कौड़ीक कोनो काज नै ससरि रहल अछि। काज करै छी दरमाहा पबै छी, परिवार चलैए। मुदा जँ अखनि सए-सैकड़ाक पेंचमे पड़ि जाएब तँ ओते परिवारेक बाल-बच्‍चापर ने पड़त? आन कियो कहथि आकि नै कहथि आ कहबे कए करता, कोन गर्ज छन्‍हि। मुदा पत्नी थोड़े मानती। ओ तँ दुसैत कहबे करती जे तेहेन कोढ़ि छथि जे जेतबो उचित कमाइ हेतनि सेहो डंडे-जुरमानामे गमबै छथि। ओना डंड-जुरमानाक जगहो बदलि गेल। तइसँ जे जेते जुर्माना भरनिहार से तेते लब्‍धप्रतिष्‍ठ भऽ गेल छथि। जेतबो आॅफिससँ बोही लऽ किलास विदा होइ काल मन खनहन छेलनि सेहो जेना खरहरा गेलनि। खरखराइते बकार फुटलनि- “हाथक कंगना जँ ऐनासँ देखल जाए तँ ओ, आँखिक देखब भेल आकि ऐनाक?” कोठरीक मुँह लग पहुँचिते छात्र सभ ठाढ़ भेल। टेबुल लग अबिते दुनू हाथ उठा सभकेँ बैसबैत श्‍यामलाल बाबू बजला- “बाउ, रस्‍ता-बाटक घुच्‍चीमे घुचिया गेलौं तँए थोड़ समए घुचिया गेल! तइले तोँ सभ दुख नै करिहऽ। दू घंटीक बीच जे समए बँचत तइमे तोरा सबहक हाजिरी बनेबऽ। आइ तँ सोम दिन छिऐ, पहिल घंटी चित्रकले हेतह किने?” एक स्‍वरमे छात्र दिससँ उठल- “हँ।” मुदा पछिला बेंचपर सँ अवाज आएल- “नीके भेल नै तँ औझुका हाजिरी कटिए जइतए।” कुरसीपर नीक जकाँ श्‍यामलाल बाबू बैसलो ने छला कि अगिला बेंचक पहिल छात्र अपन ड्राॅईंग-कॉपी नेने पहुँचल। कमल फूलक चित्र बनेने छल। ओना श्‍यामलाल बाबूक मन चौचंग रहबे करनि। चौचंगक कारण रहनि जे एक दिस समए कम देखथि, दोसर दिस छात्रक संख्‍या बेसी देखथि, तैपर पछिला काज सेहो बेसियाएल देखथि। मुदा मनमे एकटा जुइत फुड़लनि। फुड़लनि ई जे सांगोपांग िनरीक्षण-परीक्षण नै कऽ देखि-देखि कऽ टीक लगा देबै। मुदा लगले भेलनि जे नीक-बेजए दुनूमे टीक लगाएब तँ आरो भयंकर गलती हएत। किछु करैत किछु नै बनैत देखि विचारलनि जे नीक हएत ओहिना एक-एक नजरि देखि आगूक सवक संगमे जोड़ि देब। तखनि एतबे ने हएत जे काज दोबरा जाएत। मुदा उपैए की? अहुना तँ लोक करिते अछि जे काज बेसी रहने देहमे पानि चढ़ा सम्‍हारैक कोशिश करिते अछि। जँ से नै सम्‍हरत तँ अगुएलहा काजकेँ सम्‍हारैत पछुएलहाकेँ खण्‍ड काटि आगू दिस बढ़बैत जाएब, जइसँ एक दिनक बदला दू-तीन दिनमे काज पुरिए जाएत। मनमे सबुर भेलनि। नीक जकाँ श्‍यामलाल बाबू असथिरो ने भेल छला तखने अभिराम अपन ड्राॅईंग-कॉपी आगू बढ़ौलक। हाथमे लैत निहारए लगला। चित्रक बगलमे कमल फूल लिखल। मुदा चित्र देखि मन नाचि उठलनि। नाचि ई उठलनि जे कमलो फूल तँ रंग-रंगक होइए। एकटा ओहन होइए जइमे पंखुरी-दल कम होइए, दोसर एहनो तँ होइते अछि जे कोनो शत कमल तँ कोनो सहस्र कमल सेहो होइत अछि। तैसंग ईहो तँ होइते अछि जे कानो शुभ्र कमल तँ कोनो लाल कमल तँ कोनो नीलो कमल तँ होइते अछि। तेतबे किए! कमला धारो तँ बहिते अछि। पानिक कमल एकरंगा होइए मुदा ऐठाम तँ से नै बेराएल अछि। सोझे कमल फूल लिखि देने अछि। ई तँ फुटौने नै अछि जे जलकमल छी आकि थलकमल छी। दुनू कमल रहितो चालि-प्रकृतिमे अन्‍तर छइहे। अन्‍तर ई छै जे जलकमल जँ एकरंगा होइए चाहे उज्‍जर, लाल नीले किए ने हुअए, मुदा थल कमल तँ तीनरंगाे होइते अछि। ओना तीनिए रंग किए कहबै, बहुरंगो तँ कहले जेतै। बहुरंगा ई जे जखनि भोरमे थलकमल कलीसँ कलियाए लगैए तखनि उज्जर रंग धारण केने रहैए मुदा जेना-जेना सुरूजक किरिण आगू मुहेँ ससरैए तेना-तेना ओकर उज्जरपनोमे लाली आबए लगै छै। बाल किरिण जकाँ बाल रंग अबैत गढ़िआए लगैए। हल्‍लुक लाल, गुलाब लाल अड़हुल लाल आ आल लाल होइत लाल कमल भाइए जाइए। एक तँ अहुना कोनो ओझरीमे पड़ने मनक रस्‍ता ओझरा जाइ छै तैपर तँ आरो श्‍यामलाल बाबूक मन ओझराइते रहलनि। काॅपी देखि किछु बजला नै। बजैक पाछू दाेसर-तेसर सवाल उठैक डर भेलनि। डरो केना ने होइतनि, कम समैमे अधिक काजक तँ सूत्रे बदलि जाइ छै। अभिरामकेँ काॅपी बढ़बैत बजला- “बौआ, चित्रकारी तँ नीक केने छह, मुदा जइ ढंगे केने छह, ओकर बारीकी देखैक अखनि समए नै अछि, तँए एकरा राखह। निचेनमे देखबह।” काॅपी लैत अभिराम अपना जगहपर आबि बैसल। दोसर कॉपी शरबनक, हाथमे लैत श्‍यामलाल बाबू निहारए लगला। अपराजित फूल बगलमे लिखल। फूल देखिते मन नचलनि। नचलनि ई जे अपराजितो तँ केते तरहक होइए। एकमुखी, तीनमुखी, पँचमुखी। तैसंग उजरो होइए आ कारीओ होइते छै। जहिना अभिरामक कॉपी देखि श्‍यामलाल बाबू बाजल छला तहिना शरबनोकेँ कहलखिन- “बौआ, चित्रक तँ नीक चित्रण केने छह मुदा ओते परखैक अखनि समए नै अछि, अखनि राखह दोसर दिन देखबह।” कॉपी लऽ शरबन अपन जगहपर बैसलो ने छल आकि तेसर, गरिधरक काॅपी श्‍यामलाल बाबूक हाथ पड़लनि। विचित्र रूप बनल चित्र। पँजरामे लिखल गामक शकल सूरत। शीर्षक पढ़थि आ देखथि तँ काेनो ताले-मात्रा ने मिलनि। शीर्षककेँ नीक मानि लेलनि मुदा वेदरंग वेदचित्र देखि मनमे उठलनि जे जहिना कोनो गरीब लोक[1] अपन बेटीक नाओं ‘लछमी’ आ बिनु पढ़ल-लिखल लोक अपन बेटीक नाओं ‘सरस्‍वती’ रखि लइए, तहिना अछि। घड़ी दिस नजरि देलनि तँ समए ससरल देखलनि। मुदा जाबे घंटी नै बजल ताबे तक तँ समए अछिए। नजरि खिड़ा देखलनि तँ बूझि पड़लनि जे केतौ ढिमका-ढिमकी अछि तँ केतौ चौरस, केतौ खादि जकाँ अछि तँ केतौ डाँरि खींचल अछि, खेतक आड़ि-धुर छी आकि कोनो धार-धुर? घुड़छीमे मन घुड़िछिआ गेलनि। फेर लगले मनमे भेलनि जे आन गोटे फूल, पात, फल इत्‍यादिक चित्र बनबैए आ ई किए एहेन गामेक शकल-सूरतक चित्र बनौलक! अपनो तँ कहियो एहेन बात बजलो ने छेलौं तखनि किए बनौलक? पुछलखिन- “बौआ, एहेन चित्र बनाएब केना सीखलह?” जेना गिरधरक ठोरेपर रहै तहिना बाजल- “मास्‍सैव, परसू रातिमे बाबा कहलनि।” बाबाक नाओं सुनि श्‍यामलाल बाबू तरतम्‍य करए लगला। तरतम्‍य ई करए लगला जे ने कोनो संगी-साथीक नाओं बाजल आ ने दोसर-तेसर शिक्षकक। बाबाक नाओं कहैए। तैबीच घंटी बजल। हाँइ-हाँइ कऽ रजिष्‍टर खोलि हाजिरी लिअ लगला। साढ़े चारि बजे जखनि विद्यालयसँ श्‍यामलाल बाबू घर दिस विदा भेला तखने मनमे गिरधरक बात एलनि। मनमे अबिते सोचलनि जे जँ पहिने अपना घरपर चलि जाएब तखनि दोसरो-तेसरो एहेन काज उपस्‍थित भऽ जाएत जे फेर ई काज पछुआ जाएत। तइसँ नीक जे पहिने गरिधरेक घरपर पहुँच बूझि लेब नीक हएत। घरक रस्‍ता छोड़ि गिरधरेक संग विदा भेला। गिरधरक बाबा- सुबललाल- दरबज्‍जेपर रहथि। श्‍यामलाल बाबूकेँ देखिते गरिधरकेँ कहलखिन- “बौआ, पहिने आँगन जा माएकेँ चाह बनबए कहुन आ अपने लोटा-गिलास अखारि कलक टटका पानि नेने आबह।” अपन आगत-भागत देखि श्‍यामलाल बाबूक मनमे उठलनि जे धड़फड़ा कऽ पहिने अपन प्रश्ने नै राखब। कुशल क्षेम हेबे करत, ताबे गरिधरो निचेन भेल रहत। ओकरे अगुआ किए ने प्रश्‍न उठाएब। दू गिलास पानि एक गिलास चाह पीला पछाति श्‍यामलाल बाबू गिरधरकेँ कहलखिन- “बौआ, कनी अपन ड्राॅईंग-कॉपी लाबह ते।” अपन ड्राॅईंग-कॉपी गिरधर आनि आगूमे रखि देलकनि। ऊपरका पन्ना उल्‍टा, सुबललालक आगूमे रखैत श्‍यामलाल बजला- “बच्‍चा एहेन चित्र बनौने अछि जे नीक जकाँ अपनो ने बूझि पाबि रहल छी।” पोताकेँ अपन कहल बात सुबललालकेँ मन पड़लनि। कॉपी उठा देखलनि तँ बूझि पड़लनि जे जहिना कहने छेलिऐ तहिना हू-बहू चित्र बनौने अछि! मन खिललनि। खिलिते बिहुसलनि। बिहुसिते बजला- “मास्‍सैव, केहेन बढ़ियाँ तँ चित्र सचित्र बनले अछि तखनि विचित्र की?” एक तँ ओहिना श्‍यामलाल बाबूक मन चित्र देखि चितराएल रहनि तैपर सुबललालक समर्थन देखि आरो चितिर-बितिर भऽ गेलनि। मनमे घमर्थन जगलनि। घमर्थन ई जे सुबललाल साधारण पढ़ल-लिखल गिरहस्‍थ छथि, मुदा अपने तँ से नै छी, एक तँ बी.ए. पास केने छी तैपर दिन चरजो तँ पढ़ले-लिखलक अछि, केना बाजब जे नीक जकाँ नै बुझलौं। अपनाकेँ समगम करैत श्‍यामलाल बजला- “किछु तँ नजरिपर चढ़ि रहल अछि, मुदा किछु चढ़िए ने रहल अछि।” बजैक वेगमे श्‍यामलालक विचार भँसियाइत जहिना कोनो वस्‍तु धारामे भँसि जाइए तहिना आगू बढ़ि गेलनि मुदा लगले बाजबक प्रवाहकेँ मनक छोड़सँ खिंचलनि। छोर खिंचैक कारण भेलनि जे जँ कहीं सुबललाल पूछि दथि जे की सभ नजरिपर चढ़ल आ की सभ नै चढ़ल। तखनि तँ आरो जड़ि-तड़ि मुसरा नेने उखरि जाएब! मनमे अबिते जेना मुँहक सुरखी विधुआ गेलनि। मुदा संयोग नीक रहलनि जे सुबललाल से नै पूछि, बजला- “मास्‍सैव, पहाड़, समुद्र, धरती, पताल, अकास सभ मिलि जे एकटा विराट सूरत बनल अछि, सएह तँ छी।” जहिना पोखरि वा धारक अथाह पानिमे खेलाड़ी उगी-डुमी खेल खेलैए, आ जखनि उगि पकड़ा जाइए आ डुमए लगै छै तखनि डुमैसँ नीक हरदा बाजि अपने चोर बनि जाइए तहिना श्‍यामलालक मनमे भेलनि। मुदा लगले मन कहलकनि अनेरे मनकेँ हारि मनबा रहल छी। ई विचार दोख छी। नान्‍हिटा बात अछि जे सुबललाल हमरासँ जहिना उमेरमे बेसी छथि, तहिना जिनगीओक भिन्न आनन-कानन तँ छन्‍हिए। जेहेन जिनगी रहत तहने ने नन-नन्‍दन बोन-झाड़ हएत। जे सोभाविको अछिए। तहूमे ऐठाम कियो तेसर थोड़े अछि जे अनका देखि संकोचो हएत। बजला- “चाचाजी, हम भलहिं शिक्षक छी, वृत्तिए शिक्षा-दीक्षासँ जुड़ल छी, मुदा कहलो तँ जाइते छै जे जेतए ने रवि, तेतए जाए कवि आ जेतए ने जाए कवि, तेतए जाए अनुभवी। जहिना गिरधारीकेँ कथारूपमे गामक शकल-सूरत बुझा देलिऐ, तहिना एकबेर आरो दोहरा दियौ।” श्‍यामलाल बाबूक जिज्ञासा देखि सुबललालक मनमे उठलनि, जे जिज्ञासा श्‍यामबाबूक छन्‍हि ओकरा मुहोँमुह[2] पुराएब कठिन अछि। दू मुँहक बात आ दू मनक विचार छी। एके जिज्ञासाक भिन्न-भिन्न रूप होइ छै। एक भूख ओहन होइ छै जखनि जठराग्‍नि आत्‍मा जरबए लगै छै, आ दोसर एहनो तँ होइते छै जैठाम खानापुरी होइ छै। मुदा लगले मनमे उपकलनि जे एक-एक रेखा आ रेखासँ रेखाएल शकल-सूरतक चर्च करैत चलब, जेतए बुझैमे नै औतनि तेतए प्रश्न उठौता, जँ से नै उठौता तँ बूझब जे जिज्ञासाक अनुकूल मन मन्‍दिर भऽ रहल छन्‍हि। चित्रकलाक कॉपी दुनू गोटेक बीचमे पसारि आँगुरसँ देखबैत सुबललाल बजला- “ई समुद्र भेल, समाज रूपी समुद्र। अथाह जलराशिक भण्‍डार। अहूमे जुआर उठै छै, जे हवा, पानिकेँ अपना पेटसँ निकालि अकासमे पसारैए, जइसँ बर्खाक संग तूफानो उठै छै। जइसँ पानि, हवासँ धरती भरि जाइ छै।” आगूक बात सुबललालक पेटेमे रहनि आकि बिच्‍चेमे श्‍यामलाल बाबू दोसर रेखापर आँगुर रखैत बजला- “ई?” पहिने सुबललाल रेखाक सूरत देखलनि फेर श्‍यामलालक सूरत मिलौलनि, अपन सूरत मिलबैत बजला- “ई धार भेल। जेकरा जीवनो-धार कहि सकै छिऐ, जे वैदिक धार कहियो कल-कल हँसैत, प्रवाहित होइ छल ओ आब मरण भऽ गेल। तँए पानिक जगह बालु उड़ैए।” ‘पानि-बालु’ सुनि श्‍यामलाल बाबूक मन सुमरि-धुमरि कऽ घुमड़लनि। कॉपीपर सँ नजरि उठा सुबललालक नजरिपर फेकलनि। बिहुसैत मन खिलैत रंगाएल चेहरा देखि बजला- “पानिए सँ बाउल आ बाउलेसँ ने पाइनो होइए।” श्‍यामलाल बाबूक प्रश्न सुनि सुबललालक मन एक डेग आगू बढ़लनि। बढ़िते बजला- “यएह तँ दुनियाँक चकरचालि छी जे एक दिस वएह बालु पानिक सतह बनि ऊपर जल बरसन करैए जइसँ धरतीक कोखि जुड़ाइ छै आ दोसर दिस धरतीकेँ मरू बना मरूआ उपजबैए।” सुबललालक बात सुनि श्‍यामलाल बाबू ठहाका लगा हँसला। जहिना कनितो काल मन बजैए, तहिना ने हँसितो काल बजैए। श्‍यामलाल बाबूक हँसी बाजल- “ई तँ भेल धरती, समुद्र। मुदा दुनूक जे जोड़ अछि से...?” श्‍यामलाल बाबूक बात पकड़ैत सुबललाल बजला- “जहिना अकासमे चन्‍द्रमुखी, सुर्जमुखी फूल फुलाइए तहिना धरतीओमे ज्‍वालामुखीक लावा-फूल सेहो तँ फुलाइते अछि। जेहेन फूल फुलाएत तेहने ने गामक शकल-सूरत बनत।” जहिना पेट भरलापर ढकार बनि हवा निकलैए, श्‍यामलाल बाबूक मन तहिना भरि मन ढकरलनि। बजला किछु ने, सूर्यास्‍तक समए सेहो भऽ गेल। मुदा जहिना अर्द्ध-लघुक अवस्‍था, अर्द्ध-कथाक अवस्‍था आ अर्द्ध-गीतक विरह अवस्‍था होइए तहिना श्‍यामलाल बाबूकेँ सेहो भेलनि। मुदा घरोपर, परिवारोमे तँ आन दिनक अपेक्षा अनदेशा होइते हेतनि। मनमे अबिते बजला- “अबेर भऽ गेल, दोसर दिन फेर गप-सप्‍प हेतै।” अपन मर्यादा निमाहैत सुबललाल बजला- “आब तँ बाट-बटोहीकेँ ठौर पकड़बा बेर भऽ गेल, तखनि जाएब केना?” मुस्‍की दैत श्‍यामलाल बाबू बजला- “केतौ अनतए जाएब जे हराइ-भोथिआइक सम्‍भावना रहत। अपन घर छी, कनी अबेर-सबेर पहुँचब सएह ने।”¦२६०२¦ २० अक्‍टुबर २०१४ [1] खगल लोक [2] उपोउप, लबालब जगदानन्द झा “मनु” काल छोरु गौरवमय गाथा भूतकाल केर  आब जीवू वर्तमानमे जरल जुन्ना जकाँ ऐँठल  देखैएमे खाली  छुबैत मातर जे छाउर बनि जए जितैक लेल मान दान आ प्रतिस्था  पाछू जुनि,  देखू आगूक  ओहो तँ कियो छैक  जे चानकेँ छुलक  तँ हमहीँ कहिया धरि  चानक पूजा करब  ओहो तँ कियो छैक  जे मंगलपर पेएर रखलक  तँ हमहीँ कहिया धरि  मंगलकेँ अमंगल मानि  काज नहि करब  ओहो तँ कियो छैक  जे पाँतिक आगू चलैत छैक  तँ हमहीँ कहिया धरि  झंडा लऽ कऽ पाँतिक पाछू चलब मानलहुँ हमर भूत  बड़ नीक आ उत्तम छल  मुदा वर्तमान किएक एहेन अछि  आबू देखू, बैस कए सोचू  कि सनेस हम अपन भविष्यकेँ देब ? जँ रहलहुँ चूप  हाथपर हाथ धेने  तँ ओकरा लग  कोनो नीक भूतो नहि रहत  आ जाकरा लग  वर्तमान आ भूत दुनू शून्य  ओहि लोकक  ओहि संस्कृतिक  आ ओहि समाजक लुप्त भेनाइ  अवस्यसम्भाविक छैक  आब अहीँ कहू  कि हम सभ  हमर सबहक संस्कृति  हमर समाज, कि लुप्त भए जाएत ?  कि लुप्त भए जाएत ? कि लुप्त भए ....... © जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल एमरीक पूजा जोड़ पकरने छै  गाम गाम मैयाकेँ पसारने छै एक दोसरामे होड़ छैक लागल  सभक बुद्धिकेँ के आबि जकरने छै पाठ माइकसँ छकरैत आँखि मुनि सभ  अपन घरक माएकेँ तँ बिसरने छै एक कोणमे छथि चूप मूर्त मैया  लोक नाच गाजा भाँग दकरने छै 'मनु' किछो बाजल आँखि खोलि कनिको  लोक ओकरेपर गाल छकरने छै (मात्रा क्रम : २१-२१-२२/२१-२१-२२) गजल  करेजामे हमर साजन आबि गेलै मनक सभ तार बटगबनी गाबि गेलै हुनक मुस्कीसँ सगरो दुनियाक सम्पति  करेजा जानि नै कोना पाबि गेलै बलमकेँ दर्द जानि कए मोन कनिको  कतेक दुख अपन चट्टे दाबि गेलै बनेलहुँ अपन जखनसँ संगी बलमकेँ  जिला भरि केर लोकक मुँह बाबि गेलै बसने छलहुँ मन मंदिरमे जिनक छबि  दया भगवानकेँ ‘मनु’ ओ पाबि गेलै (बहरे करीब, मात्रा क्रम : १२२२-१२२२-२१२२)  © जगदानन्द झा ‘मनु’ गजल करेजा धधकैत अधि हमर आबासन मनक भीतर माटिक प्रेम काबासन दियावाती भेल नै चौरचन भेलै  मनोरथ भसि गेल ताड़ीक डाबासन अपन अँगने छोरि एलहुँ सगर हित हम फरल दुश्मन एतए बड्ड झाबासन करेजामे दर्द गामक बसल एना बिलोका बनि ओ तँ चमकैत लाबासन हमर पीया दूर परदेशमे 'मनु' छथि विरहमे हम छी हुनक बनल बाबासन (मात्रा क्रम : १२२२-२१२२-१२२२) जगदानन्द झा 'मनु' आशीष अनचिन्हार निमूह (कविता) पहिने तँ कहलक निमूह धन आ तकर बाद लगा देलक जाबी............. गजल एम्हर नोरक टघार आँगनमे ओम्हर सुखके पथार आँगनमे ई तोहर ई हमर रहत बुझि ले भेलै एहन विचार आँगनमे की लेबै आ कतेक लेबै दाइ देखू पसरल बजार आँगनमे नगदी भेलै जखन कने बेसी दौगल एलै उधार आँगनमे सगरो दुनियाँसँ बचि कऽ एलहुँ हम लागल कसगर लथार आँगनमे सभ पाँतिमे 22+2212+1222 मात्राक्रम अछि गजल बितलै राति भेलै भोर गे बहिना रहि गेलै पियासल ठोर गे बहिना आसक नामपर खेपल अपन जीबन के पोछत हमर दुख नोर गे बहिना रहलहुँ राति भरि उसनैत अपनाकेँ साँचे दुखमे छै बड़ जोर गे बहिना गुड्डी बनि छलहुँ उपरे उपर सदिखन के तोड़लकै नेहक डोर गे बहिना अनचिन्हार देलक किछु निशानी आ दुनियाँ लागै बस अंगोर गे बहिना सभ पाँतिमे 2221+2221+222 मात्राक्रम अछि,  तेसर, चारिम आ मक्तामे १-१टा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। भक्ति गजल जय दुर्गा जय काली जय भगवति जय जय अबियौ हाली हाली जय भगवति जय जय अड़हूलक कोंढ़ी लेने जगता भगता मालिन संगे माली जय भगवति जय जय सोभै लहठी नथिया टीका सेनूर तैपर बड़का बाली जय भगवति जय जय रुनझुन बाजल पायल हुनकर साँझहिमे  पसरल भोरक लाली जय भगवति जय जय खनमे ब्रम्हाणी रुद्राणी खनमे  संहारी कंकाली जय भगवति जय जय सभ पाँतिमे मात्राक्रम अछि तेसर शेरक अंतिम अक्षरकेँ संस्कृत छंद शास्त्रानुसार दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल ब्रम्हसँ बेसी छागर उताहुल हाथसँ बेसी आँचर उताहुल मोन बहकि गेलै कोहबरमे ठोरसँ बेसी आखर उताहुल प्रेम मिलनमे नै छोट नमहर धारसँ बेसी सागर उताहुल घोघ कहैए एना सजू जे दोगसँ बेसी बाहर उताहुल रूप हुनक अनचिन्हारे सनकेँ  आँखिसँ बेसी काजर उताहुल सभपाँतिमे 21+1222+2122 मात्राक्रम अछि। मक्तामे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल बड़का बड़का दाबी छै हम पंडित ओ पापी छै हपसै सभ निकगर भोजन हमरे लागल जाबी छै हम्मर नूआ सस्ता सन हुनकर नूआ दामी छै खुलबे करतै ताला ई हमरा लग ओ चाभी छै अन्हारक संगे डिबिया असगर बैसल बाती छै सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि। गजल नै हेतौ तोहर निबाह गे कनियाँ दुनियाँ छै बड़का कटाह गे कनियाँ जेबीकेँ गर्मी रहै नै दुनियामे नै हो एते गौरबाह गे कनियाँ भेलौ तोरा रोगबस धनौंधीके संबंधो सभ लेभराह गे कनियाँ खाली साढ़े तीन हाथके धरती अनचिन्हारे छौ गबाह गे कनियाँ निरगुण अनचिन्हार गाबि रहलै बड़ छै चलती बेरक उछाह गे कनियाँ सभपाँतिमे 22+2221+2122+2मात्राक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। हजल हमरो कहने जे हम तोरे संग छियौ हुनको कहने जे हम तोरे संग छियौ हुनका दमपर जे केलक किछु से बुझलक सगरो कहने जे हम तोरे संग छियौ देखि रहल छी हुनक बदलब भोरे भोर साँझो कहने जे हम तोरे संग छियौ छथि एहन परतापी जे घर एलनि चोर तकरो कहने जे हम तोरे संग छियौ ठकलक अनका संगे अपनो अत्माकेँ अपनो कहने जे हम तोरे संग छियौ सभ पाँतिमे एगारह टा दीर्घ अछि। तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक अधारपर अछि। बाल गजल दिवाली एलै धम धम धम फटक्का फूटै बम बम बम जरै डिबिया सभहँक आँगन करै दरबज्जा चम चम चम खतम भेलै फुलझरियो से बहन्ना करही कम कम कम किनेबै चकरी जेबी भरि जरेबै खाली हम हम हम सभ पाँतिे 1222-2222 मात्राक्रम अछि गजल जाल झटपट खसैए पानिमे माछ छटपट करैए पानिमे हाथमे हाथ लागै नीक बड़ हाथ लटपट लगैए पानिमे माटिपर जे सिनेगक धार छै तकरे खटपट कहैए पानिमे आम छै काँच पाकल डम्हरस टूटि भटभट खसैए पानिमे बोल जक्कर बिकेलै घाटपर आब पटपट बजैए पानिमे सभपाँतिमे 2122+122+212 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक दोसर पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि। गजल उधारक बेर हमहीं रहबै हिसाबक बेर हमहीं रहबै रहै जजमान कतबो किनको प्रसादक बेर हमहीं रहबै सबूतक ढेरपर नाचत सभ फसादक बेर हमहीं रहबै पिया देतै भने अमरित ओ पियासक बेर हमहीं रहबै कियो बनबे करत सिंदूर पिठारक बेर हमहीं रहबै सभ पाँतिमे 1222+122+22 मात्राक्रम अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत हिसाबें दीर्घ मानल गेल अछि। भक्ति गजल बितलै खरना एलै साँझक बेरा उठलै ढ़ाकी गे माथे सोभै सूपक संगे सुंदर पथिया मौनी गे पबनैतिन सभ चलली घाटक दिस नहुँ नहुँ सम्हर सम्हरि साँझक बेरा झलफल कनकन हहरै सभहँक छाती गे हाथे हाथ सजल अरघक नरियर तैपर राखल दीपो घाटे घाट सजल केरा भुसबा संगे तरकारी गे कोशी साजल हाथी मातल छै तैपर ठकुआ राखल सभ घूमै चारू दिस गीतो गाबथि बहिना काकी गे भेलै भिनसरबा सिहकै पछबा बड़ सोचथि पबनैतिन  नै देलथि दरशनमा राना मैया हम बड़ पापी गे आबो तँ उगह हो आदित भेलै बड़ देर अबेर कुबेर नाम उचारथि अरघी हाथ अरघ लेने सभ साँती गे करिते गोहारि किरिन फुटलै उठलै लाली पुरुबक दिस माँगै पबनैतिन सुख नैहर सासुर बेटा बेटी गे भेलै परना गेलै सभ घाटो लागै सून उदासल घाटक दूभि कहै अबिअह परुकाँ रहतौ खुशहाली गे सभ पाँतिमे 222+222+222+222+222 अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। छठम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु फाजिल लेबाक छूट लेल गेल अछि। बाल गजल गेलै उक्पाती बुढ़िया बाड़ीमे लगले रहलै तेल हुनक लाठीमे हमरा लोकनि फैलसँ कड़ुगर झँसगर बड़ सनगर भक्का खेलहुँ गाछीमे चोरक हल्ला सुनलहुँ सभहँक मूँहे ताला आनि लगा देलहुँ काँपीमे बथुआ खुब्बे नीक लगैए तैयो धेआन हमर बसिया खेसारीमे हमरा हेलब चुभकब नीक लगैए पोखरिमे नालामे की नालीमे सभ पाँतिमे 222+222+222+2 मात्राक्रम अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल करेज बेचै छी राति भरि पिआर देखै छी राति भरि मिटा कऽ चलि गेलै रंग रूप निशान हेरै छी राति भरि इयाद हुनकर बस सोन सन करोट फेरै छी राति भरि बसात पसरल चारू दिसा सुगंध घेरै छी राति भरि सिनेह हुनकर भेटल जते तते उकेरै छी राति भरि सभ पाँतिमे 12-122-2212 मात्रक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूटक तौरपर अछि। श्री रसिक लाल सदाय (अवकाश प्राप्‍त शिक्षक) गाम- परमानन्‍दपुर, पोस्‍ट- नवानी भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) निवासी छथि। हिनक जनम तिथि- ०८/०७/१९५२ अछि। लालदास जयंती समारोह- आइसँ तीनि-चारि दिन पहिने, खड़ौआ-मे आयोजित कवि सम्‍मेलनमे हिनका संग भेँट भेल। आयोजित गोष्‍ठीमे अपन कविताक पाठो केलनि, सभ कियो सराहबो केलकनि मुदा मात्र एक गोट कविताक पाठ करबाक अवसरि देल गेलनि। अनुनय तीनू लेल केने रहथिन, समैक टान दुआरे सम्‍भवत: अवसरि नै भेटलनि, मुदा एतए तीनू प्रकाशित कएल जा रहल अछि- दीनक दुर्दशा जे अति दीन तेकर दुर्दिन, दिनानुदिन ओ धन बल हीन कृष गात कृषक मलीन से करत की सामंत युगमे मन मारि-हारि बैसल विचारि की कऽ सकैछ, नै दऽ सकैत की किछु लऽ सकैत, कड़ पसारि हक मारल अछि सभठाम जेकर मेहनत-मजदूरी चारूठाम जेकर मुँह ताकि बिधुआएल ठाढ़ कियो अछि जे सुधि लेत एकर। स्‍वार्थी अर्थी नेता नायक, अपने पेट कुरियबैत किन्‍तु गरीब मौन भऽ बैसल, किछुओ ने बूझि पबैत सरकारो अछि भोंमा शंख, जे ढोल पीटि परचार करैत मुरखाहा संग पढ़लोहोकेँ, धोखा दऽ चटकारैत हमर बनौल हमरे हक खा कऽ, हमरे ओ परतारैत मंगलापर फटकारैत,आशा दऽ कऽ टारैत भीतरे-भीतरे मारैत अछि, अपन दाउ सुतारैत अछि  की कहबऽ हौ भाय, सभ गहुमन सन फुफकारैत अछि। अनुभव लिखलौं-पढ़लौं किछु बचपनमे आब की लिखू, की पढ़ू की सीखू सुधि बुधि सभ हेराएल करम-जालमे सभ बिसराएल दू-चारि बाल-गोपाल भेल जखनि कर्तव्‍यक भार माथ पड़ल तखनि परि गेलौं हम बड़का उलझनमे लिखलौं-पढ़लौं...। की करू नै करू, मन कछमछ करैए नीन नै नयन मनमे चिन्‍ता रहैए उठि-उठि बैसै छी, टुक-टुक तकै छी मनै छी नै जीबै छी, कहुना दिन कटै छी मुदा तैयो नै शान्‍ति पबै छी एको क्षण पाँच-दस-पनरह-बीस, केना बितल उमर पचीस खेती-पथारी दुनियाँ-दारी, केना भरत पेनकट्टा बखारी जे किछु केलौं वा नै केलौं, बहुत कमेलौं बहुत गमेलौं आब की करब उमर पचपनमे लिखलौं-पढ़लौं...। स्‍कूल गीत चल-चल चल बौआ स्‍कूल पढ़ैले चल-चल चल बुच्‍च्‍ाी स्‍कूल पढ़ैले पढ़ै-लिखैले साक्षर बनैले अ, आ, क ख स, ह सीखैले- चल बौआ गिनती सौ तक गिनबैले, अक्षर-अक्षरकेँ मिलबैले देखि-देखि कऽ नकल करैले चल-चल चल...। पढ़मेँ-लिखमेँ साक्षर बनमेँ, नै पढ़मेँ तँ मुरूख कहेमेँ अखनि नै, पाछू पछतेमेँ, अनपढ़ जीवन गाम हँसेमेँ चल-चल चल...। डाक्‍टर आैर इन्‍जीनियर बन, पढ़मेँ-लिखमेँ जँ सदिखन चल बौआ हाकीम बनैले...। चल-चल चल...। स्‍कूलमे सरजी भरपुर, मैडम दीदी सेहो खूब भोजन किताब मंगनीए भेटै छै, पोशाक पैसा सेहो भेटै छै चल बौआ तूँ गीत गबैले...। चल-चल चल...। महेश झा “डखरामी” ------मनोद्गार------------ ------------------------------ साओन सलिला सिंचित शरीर , रभसय सारंग ,सीप,समीर। पुष्पित पल्लब , पुहुप पलाश , प्रियतम हेरथि,प्रेम प्रकाश। कोकिल कुहिकय कानन कानन , ह्रदय विदीर्ण करय मन आँगन। सौरभ सौम्य ,सुन्दर सुषमा , पुरुष प्रकृतिक प्रदीप्त उपमा। पृथवी पाटल , पीयर पात , मदन मन करय आघात। कोठा चढ़ि चढ़ि कागा कूजय , संभव सुन्दर पहुंक उदय। नयन भरि भरि पाहुन हेरब , बहुरि विदेशक बाट घेरब। साजन सुनैथ सुन्दर सन्देश , तरुणी तजि जुनि जाथि विदेश। ---------क्रोध--------- ------------------------ त्रुटि प्रपन्च प्रदत्त दण्ड , पुरजन मध्य स्वमान खण्ड | मन विक्षोभ धारण दण्ड, आवेस वेग सब खण्ड खण्ड | क्रोध काल दुर्भाव प्रचण्ड , भाषा भ्रष्ट नहि अंडबंड | भाव नियंत्रण नहि शब्द उदंड, क्रोध आवेश चिन्ह अबंड | समन शोक संताप पाखण्ड , मस्तक मानिक मान मार्तंड | ----------------------------- सादर : महेश झा ' डखरामी ' --------छैइठ मैय्या--------- ------------------------------- आरूढ़ अश्व सत श्वेत रथ , प्रदीप्त जगतीक सत पथ | पूजा नैवेद्य पान मखान , धूप दीप आरती गुणगाण । स्वीकारू व्रतीक अर्घ्य जल , हो सबहीक मनोरथ सफल | जयति छैइठ मातु परमेश्वरी, नमामि सूर्येश्वरी विघ्नेश्वरी | --------------------------------- सादर; महेश झा 'डखरामी' --------------------------------- छैठक मंगल कामना ---------- 'नारी' ------------- ------------------------------ भगिनी भार्या पुत्री अरु माता , जाकी महिमा भजहि विधाता | निज ईच्छा तजि सुख बरसाबहि, परम सुभाग 'शक्ति' गृह आबाहि | सन्तति सुख जतन दिन राती , हरसि विलोकहि , शीतल छाती | बाजेऊ साँचे सुरनर मुनि ज्ञानी , भेटहि मान तहाँ बसहि भवानी | बहु विधि आदर विनय गुण बरना , तीनहु लोक सुख सब तुम्हरे चरना | नहि स्वर्ग अरु बैकुण्ठ को आशा , करहु सदा मम उर पुर बासा | --------------------------------- सादर: महेश झा 'डखरामी ' -------------------------------- भगिनी = बहिन, शेफालिका वर्मा दीयाबाती मनेलौं आली , नेसलोँ दीप निसा कारी के कारी  ताराक चुनरि पसरल अकास में  धरा पर दीपक पाती  मुदा  ह्रदय बीच डहि रहल  सभ आकांक्षाक होली आली ! शत कामना शत दीप  काँपि रहल नेने विरह गीत  अन्हार सागर में डूबल निष्पन्द 'रजनी ' चकित भीत  विकल हृदय में जरि रहल करुण  तूफानक राग  मृदुल हंसी अधर पर सिसकल आँखि में  अविरल उच्छ्वास  खिलखिला उठल दीपक पाँति  खिलल जेना अनगिन संझा फूल  कम्पित आलोक बनल अमाक अधरक लाली  नेसलहुँ दीप निसा कारी के कारी---------------------------- दीयाबाती केर अशेष शुभकामना  जतेक दीया धरती पर जरय  ओहि से बेसी ख़ुशी अहाँके भेटय बिन्देश्वर ठाकुर एना मनाएब एहिबेरक दशै कविता बिगत बहुते दिनस  चलिआबिरहल परम्परा  मनबैत आएल सन्स्कार  बर्षा रितुक समाप्ती तथा  सरद रितुक आगमनसङ्ग  ल क आएल अछी नया उल्लास आ  नया उमङ्ग्सभ  नव नव प्रकारक दशै मनाब बला तरिकासभ । किनको लेल फूलसन फैलाईल अछी इ दशै किनको लेल लहरासन लतरल अछी इ दशै घट्स्थापनास ल टिका लगाब धरि किनको लेल चाट्टानसन टकराएल अछी इ दशै घटस्थापना करैत अछि जैती छिटैत अछि धुप आरतिसङ्ग दुर्गाक पूजा करैत अछी  भजन करैत अछी  किर्तन करैत अछि टिका लगाबिक् आशिर्बाद लैत अछि माने एना मनबैत अछी हमर कुटुम्ब सभ  हमर देशमे दशै मुदा हमसब  प्रवासमे मनारहल एहिबेरक दशै अवश्य किछु फरक होएत  अवशे किछु अलग होएत  कखनो परिवारस दूर रहबाक पिडामे  सम्झनास्वरुप मनाएब एहिबेरक दशै त कतौ यादक तरङ्ग्सङ्ग  मनक प्यास मेटाएबाक हेतु  मनाएब एहिबेरक दशै  देशमे दूर्गा माताक पूजा होइत काल  हमसब मोदिरके मालिस क  मनाएब एहि बेरक दशै तहिना घरमे जैती चढबैत काल  हमसब सुख्खा खबस चिबबैत मनाएब  एहिबेरक दशै  अतबे नै  दशमीके अन्तिम दिन  माने टिका लगाब बला दिन  ओ म्हर घरमे  टिका आ जैतिसङ्ग मनाओत  एहिबेरक दशै  एम्हर हमसब  काम क्षेत्रमे अपने निधारसा चुबिरहल पसिनासङ्ग  मनाएब एहिबेरक दशै हमर प्राणप्रिय सुपुत्र प्रिन्स ठाकुर जी  यिनकापर समर्पित ई गजल ....... गजल धिरे-धिरे स्नेह बढाएब हम  करेजस भले सटाएब हम बिनु अहाके जियब नै कखनो  जिनगी अहिपर लुटाएब हम आखिक तारा छी अहा यै बउवा छोडिक कहियो नै जाएब हम अहालाS सदिखनि हसि मरब  कहियो नै नोर बहाएब हम प्रेम अहाके पवित्र अछि प्रिय ताहिस नै गंगा नहाएब हम सरल बार्णिक बहर  आखर:- १२ भेटब दोसर दिवालीमे हम एहि साल नहि आबि सकलौ  मुदा आएब दोसर दिवालीमे  पूजा करब सँगे लक्ष्मीके  प्रसाद चढाएब थालीमे ।। रावन बद्ध क राम अएलाह  तखने भेल दिवालीक शुरुवात  दिप जलाएब आरती करब  खुशी बाटब अछि पैघ बात ।। अपने झुमु सबकेऊ झुम्ताह  खुशी मनाउ परिवारमे  बिसरि सबकिछु मन लगाबु  फटका छोडु दरबारमे ।। असत्यपर सत्यके पताका  तै अछि ई चाड महान् आगामी दिनमे टुटे अहिना  दुस्ट दलके इ अभियान ।। सत् संगत सदमार्ग देखाबथि  मासँग बस एह प्रार्थना करु  गरिबी भागे सम्रिद्धी आबे  बस इहे अर्चना करु ।। अन्त्यमे हम कि कहु अहाके  ध्यान राखब एहिपालीमे  हम एहि साल नहि आबि सकलौ  मुदा आएब दोसर दिवालीमे ।। बिन्देश्वर ठाकुर  धनुषा/ नेपाल  हाल : कतार छठिक शुभकामना छठि पावनि धुमधामसँ  हएत पोखरिपर जाइके  शीर नमा कोटि नमन  करै छी हम छठि माइके ।। सु-स्वास्थ दीर्घायु जीवन  पुरबथि सबके कामना  सम्पूर्ण श्रद्धालु भक्तजनमे  यैह अछि शुभकामना ।। इरा मल्लिक गजल _______ प्रीतके मीठे होय छै बोल सेहो हम जानि गेलौं प्रीतके बोल बड़ा अन्मोल सेहो हम मानि गेलौं | इन्द्रधनुष के सातों रंग सँ प्रीत सजल अछि मनमा करै मोर किलोल सेहो हम जानि गेलौं| प्रीतक नहिं छै भाषा कोनो एकर कोनो नै बोली अनहद बाजै प्रीतक ढोल सेहो हम जानि गेलौं| पोथी पढि बनलौं हम ज्ञानी बहुत अभिमानी प्रीतके ढाई आखर बोल सेहो नहिं जानि पेलौं| प्रीतक रीत विरह के पीड़ा दारुण दुखदायी करेजा सालै छै अनघोल चुप्पे हम कानि लेलौं| तरसि गेल दरस बिन नैना प्रीत निरमोही मौन छै व्याकुल नैना बोल सेहो हम मानि गेलौं| सरल वार्णिक(वर्ण-१८) गजल --------- जिनगी जहिना तहिना कटैत रहलौं सुख दुख के जउँर ( रस्सी ) सँग बटैत रहलौं | कान्ह पर छलै घर जिम्मेदारी क बोझ हँसि हँसिके ओ बोझ सब उघैत ( ढोऐत )रहलौं | दुख एलै हम कहियो निराश नहिं भेलौं सुख के मोती हम पानि सँ छटैत रहलौं | रैन अन्हरिया छलैक तहियो की भेलय सवर्णिम भोर के आस लए खटैत रहलौं | बड़ अजगुत दुनियाँ के चलन की कहू तकै नीको में बेजाय सब सहैत रहलौं | पिघलैत रहल रसेरस दुख के घड़ी मेहनैतिये के मोजर छै जनैत रहलौं | दुनु हाथक भरोस छै मेहनैति के जोर जीवन में सुख के संगीत गबैत रहलौं | सरल वार्णिक- ( वर्ण -१६ ) गजल ------- गमाउ नै गोरी छन मधुराग भरैये हमर हृदय सँ फूल पराग झरैये। देखु लाज सँ गालक गुलाब खिल गेल लोगक नैनाक काँट बेहिसाब गरैये। नैना चितवन अल्हड़पन देखैत छी कोना मुस्की मिसरिया पर जान जरैये। अधर कोमलकली छै रस सँ भरल मन भँवरा बौरायल से जानि परैये। मोन फागुनी बयार बनि मस्त मगन सिनुर लाज सँ मुखरा गुलाल भरैये। रूप चर्चा पसैरि गेल गामहि गाम मेँ कोना चलतै लोग दिने मेँ बाट हेरैये। सरल वार्णिक (आखर-१५) गजल --------- जमाना देलकै दरद बहुत किनका कहबै करेजक भेल कत्तेक टुकड़ी किनका कहबै | किछ बात एहेन जहि सँ हम अनजान छलौं बड़ी भेद भरल बेदर्द लोग किनका कहबै | उप्कार में अप्कार तकै जग के रीत पुरान छै हवन करैत जौं हाथ जरल किनका कहबै | मुँह आगू जैह मीठ बनै पीठ पाछू उपहासी मुखौटा लगेने लोक छै फरेबी किनका कहबै | जे जेतबे नम्हर चोर बात हुनके लम्बा चौड़ा साधु बनल मुँहचोर रक्षक किनका कहबै | सज्जन के नै ठौर कतौ दुनियाँ चोर ठकैत के झूट्ठा बनै पवित्र एतै धर्मात्मा किनका कहबै | सरल वार्णिक( वर्ण- १८) कुन्दन कुमार कर्ण गजल अहाँ गोर हम कारी छी मुदा एक टा प्राणी छी सजत रूप नै हमरा बिनु अहाँ देह हम सारी छी रहब नै अलग कखनो जुनि अहाँ ठोर हम लाली छी चलत साँस नै एको छन अहाँ माँछ हम पानी छी कहू आर की यौ कुन्दन अहाँ फूल हम माली छी मात्राक्रम : 1221-2222 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल मोन एखनो पारै छी अहीँकेँ बाट एखनो ताकै छी अहीँकेँ भावमे बहकि हम संगी सभक लग बात एखनो बाजै छी अहीँकेँ आब नै रहल कोनो हक अहाँपर जानितो गजल गाबै छी अहीँकेँ दीप जे जरा गेलहुँ नेहकेँ से नित इयादमे बारै छी अहीँकेँ प्रेम भेल नै कहियो बूढ कुन्दन साँस साँसमे चाहै छी अहीँकेँ मात्राक्रम : 212-1222-2122 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल हियामे उमंगक अगबे लहर छै बुझा गेल ई त प्रेमक असर छै धरकि अछि रहल धरकन बड्ड जोरसँ रहल आब किछु नै बाँकी कसर छै मजा एहि जादूकेँ खूब अनुपम सजा मीठ सनकेँ जेना जहर छै गजल पर गजल कहलहुँ ओकरापर मुदा बादमे बुझलहुँ बेबहर छै पहिल बेर कुन्दन ई बात जानल किए प्रेम सुच्चा जगमे अमर छै मात्राक्रम : 122-122-22-122 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल एहि हारल आदमीकेँ हालचाल नै पुछू दर्द सुनिते जाइ बढि तेहन सवाल नै पुछू मारि किस्मत गेल कखनो खेल खेलमे लटा घर घरायल नित बिपतिमे कोन काल नै पुछू संग अपनो नै जरूरतिकेँ समय कतहुँ रहल केलकै कोना कखन के आल टाल नै पुछू बाट जिनगीकेँ रहल जे डेग डेगपर दुखद बीत कोना गेल ई पच्चीस साल नै पुछू के मरै छै एत यौ कुन्दन ककर इयादमे लोक लोकक खीच रहलै आब खाल नै पुछू मात्राक्रम: 2122-2122-2121-212 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल हमरासँ प्रिय नै रूसल करू बेगरता मोनक बूझल करू बनि नेहक सुन्नर सन फूल नित मोनक बगियामे फूलल करू जखने देखै छी हमरा कतहुँ तखने हँसि लगमे रूकल करू जीवन संगी हमरे मानि जुनि आत्मामे बैसा पूजल करू काइल की हेतै मालूम नै  एखन कुन्दनमे डूबल करू मात्राक्रम : 2222-22212 © कुन्दन कुमार कर्ण गजल दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना स्वीकारू सभ केओ हमर ई सनेश शुभकामना माए बाबू संगी बहिन भाइ जे कतहुँ रहल अछि चाहे केओ परदेश या दूर देश शुभकामना घरमे लक्ष्मीकेँ आगमन होइ सुखसँ जिनगी सजै प्रेमक सौगातसँ जन समर्पित अशेष शुभकामना वैभवमे नित होइत रहै वृद्धि शान्ति घर-घर रहै मठ मन्दिरमे हम दैत छी दीप लेश शुभकामना पावन अवसरपर आइ कुन्दन हृदयसँ दैत सभकेँ शुभ संध्यामे पूजैत लक्ष्मी गणेश शुभकामना मात्राक्रम:22222-2122-121-2212 © कुन्दन कुमार कर्ण मिहिर झा बहु विध भोजन आगू पसरल मुह पर लागल जुन्ना अछि  जीवन भरि कयल कठिन संयम भेटल तैय्यो सुन्ना अछि मो. अशरफ खान ई प्रेम सँ भरल संसार मे अकेले बौवा रहल छी कभियो खैनी तँ कभियो चुना चबा रहल छी दोसरक मित्रता आ प्रेमक रङ देख कऽ अप्ना नैन सँ टप टप नोर खसा रहल छी । । अमित मिश्र गजल किछु गीत एहन रचि दी मीता इतिहास बनय जे अगिला बेर किछु बात एहन कहि दी जगमे सब याद रखय जे अगिला बेर दिन राति सदिखन जीवन पर्दापर किछु नव-पुरान सन अभिनय होइ नाटक कने एहन खेली सगरो खेल करय जे अगिला बेर नै प्रीत बेसी नै बेसी झगड़ा रह सदति बराबर सब लेल नित कर्म एहन राखी मीता अनुकरण करय जे अगिला बेर छै दोष ककरो आ भेटै ककरो सजाय, ई घटलै युगसँ कहियोक ई गलती मारुक, आतंकी बनबय जे अगिला बेर निज गाम तजि एलहुँ बाहर पर सुख-चैन कतहु नै भेटय "अमित" निज देशमे परदेशी बनि कुहरी, टीस उठय जे अगिला बेर 2212-2222-2221-2122-221 गजल जतेक छल भाव हमरा लग आइ पसारि देने छी अपन करेजासँ जनमल सब परत उघारि देने छी गलत-सही केर झगड़ा सब ठाम पड़ल अधूरे अछि जतेक छल फूसि लफड़ा सब आगि पजारि देने छी खुशीक मैडल सिनेहक ओलम्पिकमे कमे भेटय इएह कारण अपन नस-नस दुखसँ गछारि देने छी हमर लिखल गीत हमरे काटैत रहैत अछि मीता अपनहि घरमे अपन जीवनकेँ दुतकारि देने छी अहाँक नैनक नशा बड बेहोश कऽ राखि देने अछि अहाँ तँ पाथर हियाकेँ पलमे चुचकारि देने छी पंकज चौधरी “नवलश्री कविता : जुनि बिसरू त्याग बिना जे ग्रहण करै छी सभकिछु जे संयोगि रहल छी जुनि बिसरू जे अहूँ ई सभटा ककरो त्यागल भोगि रहल छी आङ्गुर पकड़ि चलल जे संगे कष्टक खत्ता पार लगओलक जुनि बिसरू ओ मीत अपन छल जकरा आब नै टोकि रहल छी अनकर गप पतिएलहुँ सहजहिं रहल भरोस ने भाय-मीतपर जुनि बिसरू अपनहि छातीमे अनकर चक्कू भोंकि रहल छी शहरक च'रमे पेटकुनिया द' बिसरि गेलहुँ जे गामक रस्ता जुनि बिसरू अर्थक तरजू पर माएक ममता जोखि रहल छी गंगा - कमला अकछि पड़ेली उघैत-उघैत पापक सभ-मोटरी जुनि बिसरू ई अछिञ्जल गामक शहरक कादोसँ घोंकि रहल छी भाषा भूमि दुनु अवहेलित निजतरंगमे मातल मैथिल जुनि बिसरू जे बिसरि क' सभ किछु फूसिए सीना ठोकि रहल छी © पंकज चौधरी "नवलश्री" प्रदीप पुष्प पाखड़ि तरक मचान मोन पड़ि गेल, खपड़ा बला दलान मोन पड़ि गेल, तोहर हमर पिरीत भेल अनघोल, पीठक पड़ल निशान मोन पड़ि गेल, (2212 1212 1221) स्व. कविवर सीताराम झाजीक ई गजल जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी एकर बहर अछि-1222-1222-1222-1222 मने बहरे हजज  1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत गजल जे की वस्तुतः " भक्ति गजल " अछि--- विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 2 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १६१ म अंक ०१ सितम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८१ अंक १६१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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