ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६३ म अंक ०१ अक्टूबर २०१४ (वर्ष ७ मास ८२ अंक १६३) कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा (बाल साहित्य) दिनांक ३१ मई २०१४ केँ मेंहथ गाममे ८२म सगर राति दीप जरए गोष्ठीमे पढ़ल कथाक संकलन श्रुति प्रकाशन दिल्ली एे पोथिक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति एवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। ISBN : ............ सर्वाधिकार © श्रुति प्रकाशन मूल्य : भा. रू. २००/- पहिल संस्करण : २०१४ श्रुति प्रकाशन रजिस्टर्ड आॅफिस : ८/२१, भूतल,न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- ११०००८. दूरभाष-(०११)२५८८९६५६-५८फैक्स- (०११) २५८८९६५७ Website : http://www.shruti-publication.com e-mail : shruti.publication@shruti-publication.com मुद्रक : अजय आर्टस्, दरिया गंज, नई दिल्ली-११०००२ अक्षर-संयोजक : उमेश मण्डल, निर्मली, सुपौल-८४७४५२ Distributor : Pallavi Distributors Ward no 06 Nirmali (Supaul) Pin code no- 847452 Mobile No- 9572450405, 9931654742, 8539043668 Katha Bodh Sidh Menthpa : Collection of Shotr and Seed Maithili Stories on 82nd Sagar Rait Deep Jaray कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा ८२म सगर राति दीप जरए- स्थान- गजेन्द्र ठाकुरक निज अवास प्रांगण गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। तिथि- ३१ मई २०१४ (शनि दिन) साँझ ६ बजेसँ भिनसर ६ बजे धरि। उद्घाटन- जगदीश प्रसाद मण्डल, कमलकान्त झा, राजदेव मण्डल, शिव कुमार मिश्र तथा शिव कुमार प्रसाद। स्वागत- काशीकान्त झा ‘किरण’ अध्यक्ष- अरविन्द कुमार ठाकुर मंच संचालक- उमेश मण्डल संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर कथाक सत्तरि पलभरि 00 रिजल्ट 00 अजोह 00 मदन-अमर 00 रूसल बौआ 00 खजाना 00 दुष्टपना 00 अदिया 00 बुधि 00 बाल-बोध 00 स्कूलक फीस 00 माइक डाँट 00 ललियाएल मुँह 00 अधला 00 सरकारीए नौकरी किए? 00 हरिया इन्सपेक्टर 00 सासुरक साइकिलक कथा-बेथा 00 दूध 00 एकन्त 00 जगदीश प्रसाद मण्डल जनम : ५ जुलाइ १९४७ ई.मे, पिताक नाओं : स्व. दल्लू मण्डल। माताक नाओं : स्व. मकोबती देवी। पत्नी : श्रीमती रामसखी देवी। मातृक : मनसारा, भाया- घनश्यामपुर, जिला- दरभंगा। मूलगाम : बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बिहार) पिन- ८४७४१० मोबाइल : ०९९३१६५४७४२, ०९५७०९३८६११, ०९९३१७०६५३१ ई-पत्र : jpmandal.berma@gmail.com शिक्षा : एम.ए. द्वय (हिन्दी आ राजनीति शास्त्र), जीविकोपार्जन : कृषि सम्मान : गामक जिनगी लघुकथा संग्रह लेल पहिल “विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार” २०११क मूल पुरस्कार आ मैथिलीक पहिल “टैगाेर साहित्य सम्मान” २०११; तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान- २०१२; एवं बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह ‘‘तरेगन’’ लेल पहिल “बाल साहित्य विदेह सम्मान” २०१२ प्राप्त। साहित्यिक कृति : उपन्यास : (१) मौलाइल गाछक फूल, (२) उत्थान-पतन, (३) जिनगीक जीत, (४) जीवन-मरण, (५) जीवन संघर्ष, (६) नै धाड़ैए, (७) बड़की बहिन प्रकाशित। (८) सधबा-विधवा (९) भादवक आठ अन्हार अप्रकाशित। नाटक : (१०) मिथिलाक बेटी, (११) कम्प्रोमाइज, (१२) झमेलिया बिआह, (१३) रत्नाकर डकैत, (१४) स्वयंवर प्रकाशित। लघु कथा संग्रह : (१५) गामक जिनगी, (१६) अर्द्धांगिनी, (१७) सतभैंया पोखरि, (१८) उलबा चाउर, (१९) भकमोड़ प्रकाशित। तथा (२०) पतझार, (२१) अप्पन-बीरान, (२२) बाल गोपाल, (२३) रटनी खढ़, (२४) लजबिजी, शिघ्र प्रकाश्य। विहनि कथा संग्रह : (२५) बजन्ता–बुझन्ता, (२६) तरेगन प्रकाशित। एकांकी संग्रह : (२७) सतमाए, (२८) कल्याणी, (२९) समझौता, (३०) तामक तमघैल (३१) बीरांगना केर संग्रह “पंचवटी” नाओंसँ प्रकाशित। दीर्घ कथा संग्रह : (३२) शंभुदास प्रकाशित। कविता संग्रह : (३३) इंद्रधनुषी अकास, (३४) राति-दिन प्रकाशित। (३५) सतबेध अप्रकाशित। गीत संग्रह : (३६) गीतांजलि, (३७) तीन जेठ एगारहम माघ, (३८) सरिता, (३९) सुखाएल पोखरिक जाइठ प्रकाशित। पलभरि तिरसैठिम बरख गमौला पछाति शिवजी बाबूक मन गरानिसँ गड़ि रहल छन्हि। जिनगीक सङ दुनियोँ अन्हार जकाँ लगि रहल छन्हि। केकरा कहथिन आ कहलो पछाति के बिसवास करतनि जे उवाह-उवाहमे जिनगीक तिरसैठ बरख बोहि गेल। समाजक केते लोक ऐ बातकेँ बूझि रहल छथि जे जइ आशामे अखनि धरि आस लगौने छेलौं ओ सोलहन्नी निआस बनि निकलि गेल! ओना बेसी लोक तँ यएह ने बूझि रहल छथि जे कौलेजक प्रोफेसर छथि, नीक दरमाहाक नोकरी करै छथि, आ नोकरी छुटलो पछाति तेते पेन्शन भेटतनि जे जिनगीमे कहियो कोनो अभाव नै हेतनि, मुदा भेल की? असकरे अपन कोठरीमे बैस पोथीक अलमारीपर आँखि गरौने मने-मन अपन हूसल जिनगीपर नजरि दौगा रहल छथि। जेते नजरि दौग रहल छन्हि तेते मन विषादसँ बिसबिसा रहल छन्हि। बिसबिसेबो केना नै करतनि, नीक नोकरी नीक दरमाहा केतए गेल? सौनक घट जकाँ दुनू आँखि नोरसँ बोझिल भऽ जिनगीक बितल दिन देखि रहल छन्हि। अनायास बकार फुटलनि- “धारक पानि जहिना धारे-धार बहैत समुद्रमे समा जाइए, तहिना ने अपनो जिनगीक धारक भेल!” असकर कोठरीमे रहने िकयो दोसर तँ नै सुनि पौलक मुदा अपन मनक सोग जे मुँह होइत निकलल, ओ दुनू कान तँ सुनबे केलकनि। फेर मन घुमलनि। भने कियो आन नै सुनलक। जँ सुनबो करैत तँ लाभे कथी होइतै। यएह ने जे जहिना अपन जिनगी फुर्र-फाँइमे गेल तहिना ओकरो जैतै। तैतालिस बरख पहिने शिवजी सी.एम. कौलेजसँ एम.ए. पास केलनि। औनर्सोमे नीक अंक आ एम.ए.मे सेहो नीक अंक भेटल छेलनि। शुरूहेसँ माने हाइए स्कूलसँ मनमे बैस गेल छेलनि जे एम.ए. केला पछाति प्रोफेसर बनब। परिवारक स्तर- शिक्षा सङ अर्थ- केँ उठाएब। मुदा भेल की? गामक सम्पन्न परिवारमे शिवजीक जनम भेल। पिता- राधा गोविन्द- नीक खेतिहर, पनरह बीघा खेतो छेलनि। पढ़ल-लिखल तँ बेसी नहियेँ छला मुदा खेतीक सभ लूरिसँ सम्पन्न छलाहे। समटल परिवार तँए बेटाक विचारक विपरीत विचार कहियो बेटाक सोझ नै रखलनि। मनक धरणो छेलनि जे बच्चाकेँ माने बेटा-बेटीकेँ जेते स्वतंत्र रूपे जिनगी ठाढ़ करैक समए देल जाएत ओ ओते नीक बनत। तहूमे कहियो बेटाकेँ ने स्कूल-कौलेजमे फेल होइत देखलनि आ ने कहियो ताड़ी-दारू पीबैत देखलनि आकि सुनलनि। जइसँ मनमे आरो बेसी बिसवास बनले रहलनि। एम.ए. केलाक साले भरि पछाति गामक बगले गाम सोनपुरमे कौलेज खुजल। कौलेज बनौलनि सोनपुरक एकटा सुभ्यस्त परिवारक विष्णुदेव। तीन भाँइक भैयारीमे विष्णुदेव सभसँ जेठ छथि। अस्सी बीघा जमीन छन्हि। दोसर भाए छेलखिन, जे नि:सन्ताने मरि गेला। तेसर भाए कृष्णदेव छन्हि। मुदा दोसर भाएक नि:सन्तान विधवा सेहो जीविते छथिन। हुनके मन बुझबैले रामदेवक नाओंसँ कौलेज बनौलनि। कौलेजक शुरूक समैमे, बिनु दरमेहेक बाहरक प्रोफेसर केना रहि सकितथि तँए गामोक आ अगल-बगलक गामक सेहो शिक्षक सबहक बहाली भेल। अगिला आशापर सभ- चपरासी, किरानीक सङ प्रोफेसर- ऑफिसक काजसँ पढ़ै-लिखै धरिक काज सम्हारए लगला। ओना गाम-घरमे कम पढ़ैबला तँए विद्यार्थीक संख्या ओते नै जइसँ कौलेजक काज नीक जकाँ चलैत। नीक जकाँक अर्थ ई जे प्राइवेटो कौलेज नीक विद्यार्थी- संख्याक हिसाबसँ- रहने नीक जकाँ चलिते अछि मुदा से ऐ कौलेजक नै। कम विद्यार्थी रहने, आमदनी कम, जइसँ दरमाहोक तँ काटौती भेल मुदा आॅफिसक काज चलैत रहल। बीस बर्खक पछाति कौलेजक भाग जगल। भाग ई जगल जे विद्यार्थीक संख्या बढ़ने आ नीक रिजल्ट भेने सरकारी हेबाक संभावना बढ़ल। जइसँ चपरासी, किरानीक सङ शिक्षकोक बीच सुखद भविसक आशा जगल। मुदा तइसँ पहिने तिकरम शुरू भेल। सचीवक परिवार आ जाति-कुटुमक तँ कौलेजमे रहल मुदा शिवजीक सङ तीन गोटेकेँ हटा देल गेलनि। कौजेलसँ हटला पछाति शिवजी अनुभवी शिक्षकक रूपमे रहितो नोकरीसँ विमुक्त रहला। मुदा साले भरि पछाति दोसर कौलेज शिवजीक घरसँ पाँच कोस हटि खुजल, ओ खुजल जन-सहयोगसँ। मुदा कौलेजक अदीनता रहल जे संचालन समितिक सदस्यक बीच वैचारिक भेद- मन-भेद- सभ दिन चलिते रहल, जइसँ कौलेजक बेवस्था आगू नै ससरि पाछूए हड़कैत रहल। मुदा तैयो ठाढ़ तँ रहबे कएल। ओही कौलेजमे समए बितबैत शिवजीक तिरसैठिम बरख बीत गेलनि। सोनपुर कौलेजमे जखनि तीन साल शिवजीकेँ भेलनि तखनि पिता मरि गेलखिन। परिवारमे दोसर करताइत नै, मुदा तैयो शिवजी जन-बोनिहारक हाथे खेती सम्हारैत रहला। ओना पिता- राधा गोविन्द- अपने हाथे तेते काज करै छला जे ओते काज करबैमे तीनटा जन लगैत। मतलब ई जे तीन जनक काज असकरे राधा गोविन्द करै छला। राधा गोविन्दकेँ मुइने परिवारक काजो घटल, मुदा तैयो परिवार तँ चलिते रहल। शिवजीकेँ तीन सन्तान, दूटा बेटा एकटा बेटी। तीनू छँटगर भऽ गेल। जेठ बेटा- कुशेसर- खेलौड़िया बेसी, तँए हाइ स्कूलक पढ़ाइसँ आगू नै बढ़ि सकल। नै बढ़ैक पाछू पितोक ओते तनदेही नै रहलनि जेतेसँ बेटा-बेटी सुधरैए। सोलह बर्खक अवस्थामे कुशेसर दिल्ली चलि गेल। गरो नीक बैसिलै, एकटा फैक्ट्रीक आॅफिसमे नोकरी भेट गेलै। दरमाहासँ बेसी बाइली हुअ लगलै। जे अपन खर्च चलबैत बैंकमे निअमित रखबो करैत आ पाँच हजार रूपैआ शिवजीओकेँ माने पितोकेँ मासे-मास पठबैत रहल। बहिनक बिआह सेहो नीक जकाँ केलक। छोटका भाएकेँ बंगलोर पठा डाक्टरी पढ़बैए। समए आगू बढ़ल। शिवजी जिनगीक अंतिम अवस्थामे पहुँच गेला। परिवारक सङ कुशेसर परसू गाम आएल। चारू धिया-पुता प्राइवेट कोचिंगमे पढ़ै छै। कोठरीमे दुनू परानी शिवजी बैसल अपनो जिनगीकेँ आ बेटो- कुशेसरो-क जिनगीकेँ भजारि रहल छथि। अपन पढ़ल-लिखल जिनगी देखि शिवजी बजला- “ओना ईश्वरक दयासँ परिवारक पछिलो आ अगिलो गति नीक अछि मुदा...?” ‘मुदा’पर शिवजीकेँ रूकिते पत्नी टोकि देलखिन- “मुदा की?” ओना अखनि धरि पत्नीओ नीक जकाँ शिवजीक जिनगीकेँ नै जनैत, मुदा शिवजी तँ स्वयं कर्ता-धर्ता छथिए। संयोग नीक रहल जे पत्नीकेँ उत्तर दइसँ पहिने पोता- कुशेसरक जेठ बेटा- जे हाइ स्कूलमे पढ़ैए, कोठरी पहुँच गेल। पोताक रूप-रङ देखि शिवजी सहमि गेला। सहमि ई गेला जे अपना आगू कुशेसर केते पढ़ने अछि। मुदा कमेबा आ जिनगी जीबाक जे लूरि ओकरा छै ओ अपना कहाँ भेल! खाली-खाली जिनगी खलियाइत सोलहन्नी खलिआ गेल! कोन मुहेँ केतौ बाजब जे जिनगीक ई लीला अपन छी! कोठरी अबिते पोता- नन्दन- पुछलकनि- “दादाजी, अपन जिनगीक अनुभवक किछु बात हमरो सुना दिअ।” पोताक प्रश्न सुनि शिवजी ठकुआ गेला। ठकुआ ई गेला जे सत्-सत् कहि देबै तँ हो-ने-हो ओकरो मन पढ़ै दिससँ हटकि जाइ, ओना कोन रूपे दिल्लीमे रहैए, हमरा बातक केते असरि हेतै, ई परिखब तँ कठिन अछि। मुदा झाँपि-तोपि अपन कहि देने तँ उत्तर भाइए जेतै। मुदा अधखिजू कहने थोड़े नीक नहाँति बूझि पौत। सभ रोग-वियाधि, सोग-संतापकेँ मनमे तहियबैत शिवजी कहलखिन- “बाउ, समए सभसँ बलवान होइ छै, श्रमवाने ओकरा पकड़ि सङे चलि सकैए, तँए...?” ‘तँए’ सुनि नन्दन पुन: पुछलकनि- “की बलवान?” पोताक दोहरबैत प्रश्न सुनि शिवजी बजला- “बाउ, जे मनुख पल-पल जिनगीक महत बूझि पग-पग बढ़ैत ओकर जिनगी आ पल-पलकेँ पलपलाएल रस पीब बढ़ैत तेकर जिनगीमे अकास-पतालक अंतर होइ छै। किएक तँ नीको आ अधलोमे पलपली होइते छै।” नन्दन- “अकास-पतालक ई अन्तर मेटाएत केना?” शिवजी- “प्रकृतिकेँ अनेको रूप छै मुदा अखनि दुइए रूप देखहक। धरती-अकास तँ देखै छहक, पताल नुकाएल अछि। मुदा मनुखोक प्रकृति होइ छै, जे मनराजमे बास करै छै। वएह रूपान्तरण एक रूपता आनि एकबट करैत बाट पकड़ैए।” बाबा- शिवजी-क विचार सुनि नन्दनो आ पत्नीओ उठि कऽ ठाढ़ भेल। दुनूकेँ ठाढ़ होइत देखि नमहर साँस छोड़ैत शिवजी अपन मनकेँ बुझबैत घुनघुनेला- “दिनक हेराएल जँ साँझमे घूमि आबए तँ ओ हेराएब नै भेल। मुदा जे हेराएल से हेराएल जे बाँकी अछि ओकरा पलो भरि हाथसँ छोड़ब जिनगीकेँ धोखाड़ब हएत।” २४ मई २०१४ रिजल्ट पहिल जनवरीकेँ रवि दिन रहने दोसर दिन स्कूलो खुजत आ बड़ा दिनक छुट्टीसँ पहिने भेल परीछाक रिजल्टो निकलत। ओना शिक्षक अभिभावक आ विद्यार्थीक बीच नव बर्खक उपहारक समए रहने खुशीक वातावरण पसरले अछि। केना नै पसरौ! दुर्गापूजा अबैसँ पहिने जे खुशी मनमे उमकैत ओ तँ सप्तमी पूजा धरि रहबे करैत। ठाँउ करब, फूल-पातसँ पूजा करब, काँच माटिक दियारीसँ साँझ देब, स्तुति करब, मुदा आँखि (डिम्हा) पड़ला पछाति जे उत्सवक मेला शुरू होइए तेकर पछातिए ने खगल-भरल हाथक वोध होइए। गामेक हाइ स्कूलक नअम कक्षामे गोबर गणेश सेहो पढ़ैत। ओकरो रिजल्ट निकलत। जहिना आन-आन विद्यार्थीमे खुशी तहिना ओकरो। एक तँ परीछा देला पछाति बड़ा दिनक छुट्टीक उछाही तैपर आगू बढ़ैक अवसरि किए ने रहतै। ओना छुट्टीक उछाही सभ छुट्टीमे होइ छै मुदा से बड़ा दिनक छुट्टीमे नहियेँ रहै, मुदा किछुओ तँ जरूर रहए। सालमे केतेको छुट्टी विद्यालयमे होइए, जइमे किछु स्थाइओ आ अस्थाइओ। ओना बाबन-तिरपनटा रवि अपन अठबारे हिस्सा लइये लेने अछि, मुदा तँए आन-आनक कोनो सीमा-सरहद नै छै? छइहे। किछु पावनि-तिहारक नामे अछि, किछु मौसमक नामे अछि तँ किछु समैक नामे। खैर जे होउ, मुदा जहिना घटनकेँ बढ़न कहल जाइ छै तहिना छोट दिनकेँ पैघ दिन अर्थात् बड़ा दिन कहि अराम करैक अवसरि देल जाइए! केतबो धड़फड़ केलक गोबर गणेश तैयो साढ़े दस बजिये गेलै। एक तँ इस्कूलो जेबामे किछु बिलम भाइए गेल रहै मुदा रिजल्टक खुशीक हकार बँटबे ने केने रहए। तँए विद्यालय जाइसँ पहिने हकार सेहो बँटैक छइहे। विदा होइसँ पहिने बाबा लग जा बाजल- “बाबा, आइ रिजल्ट निकलत।” पोताक खुशीक हकार पाबि श्यामचरणक मनमे खुशी उपकलनि मुदा बजला किछु ने। केना खुशनामाक असीरवाद देथिन? ओ बरहबट्टू थोड़े छथि जे दीक्षा पहिने आ शिक्षा पछाति देथिन। गोबरो गणेशकेँ विद्यालयक फलक आशा तँए बाबाक असीरवादक प्रतिक्षा छोड़ि विदा भऽ गेल। माथक सुरूज पछिम लटकि गेल, अखनि धरि गोबर गणेश किए ने आएल। पढ़ौनी दिन थोड़े छिऐ जे बेसी समए लागत, रिजल्टक दिन छी। जे पास करत हँसैत घूमत आ जे फेल करत ओ अपनो कानत आ परिवारोकेँ कनौत। समटल मन बाबाक आरो समटा गेलनि। जेबेकाल पोता कहि गेल रिजल्ट निकलत। चौकीपर सँ उठि रस्तापर जा विद्यालय दिस हिया कऽ तकलनि। जेत्ते दूर नजरि गेलनि तैबीच केतौ पोताकेँ अबैत नै देखलनि। घूमि कऽ दरबज्जापर आबि विचारए लगला। केना फल पौल पोताक अगवानी छोड़ि अपने दोसर काजमे लागब। औझुके अगवानी ने वागवानी बनौत। अपना आँखिए पोताकेँ देखब आ अपना काने ओकर फलोकेँ सुनब छोड़ि कऽ जाएब नीक नै। बैसिते मनमे नीकक आशा नाचए लगलनि। जहिना गाम-घरक बीच नव-नव अविष्कार सुनि लोकक मन नचबो करैत आ गीतो गबैत जे आब की जनक जीक तीन बितीया हरक काज हएत, बड़का-बड़का हरजोता सभ आबि रहल अछि। एके दिनमे साठि बर्खक जिनगीकेँ तीस बरख बना देत। दू दिन तँ सौंसे जिनगीक भेल। गोबर गणेशपर नजरि पड़िते मनमे जेना शुभे-शुभक सपना उठए लगलनि। बिसरि गेला चारि सालसँ फेल होइत आएल गोबर गणेशकेँ। मुदा बिसरैक पाछू काजक फलो होइ छै। कियो काजक फल गनि फल बुझैए आ कियो फलेकेँ फल बुझैए। श्यामचरणक मनकेँ गोबर गणेशक काज अधला विचारक बाटपर ठाढ़ भऽ आगू अबै ने दनि, जइसँ बाबाक मनमे सौनक हरिअरीए बूझि पड़नि। आेना पछिला सालक हरिअरी बाढ़िमे तेना कऽ धुआएल जे लोक सौन-भादो बिसरि जुलाइ-अगस्त बुझए लगल, सेहो मनमे रहबे करनि। मुदा लगले मन बिनबिनेलनि। बिनबिनाइते चौकीपर सँ उठि रस्तापर पहुँच स्कूलक बाट हिया कऽ तकलनि। पोताकेँ केतौ नै देखि मन ठमकि गेलनि। मुदा लगले उठलनि जे किछु दूर आगू बढ़ि देखिऐ, जँ कहीं सङी-साथी सङ रिजल्टक खुशीमे बौड़ा गेल हुअए। मनो गवाही देलकनि। सएह भेल, भरिसक केतौ बौड़ा गेल अछि। जँ से नै रहितै तँ कोन बेटा-बेटी लाखो बेर सप्पत खा कऽ नै बाजल हएत जे माए-बापक सेवा हमर धर्मे नै कर्तव्यो छी। एकटा झूठ बजने लोक कोट-कचहरीक खूनी केससँ बँचि जाइए आ जैठाम हजारो-लाखोक बात छै। मुदा बेसी काल मन ऐठाम नै अँटकलनि। आगू बढ़िते मन पड़लनि यएह जखनि गोबरधन गिरिधारी गोबरधन पहाड़ उठा इन्द्रक धारकेँ रोकि देलक तखनि हमर गोबर गणेश ने किए करत। मनमे उठिते जेना सौनक कजरारीक छटा छट-छटा गेलनि। डेगे-डेग किछु डेग जखनि आगू बढ़ि नजरि उठौलनि तखनि बूझि पड़लनि जे पोता आबि रहल अछि। नजरि पड़िते बाबा हाँइ-हाँइ पाछू घूमि, आपसी घर दिस विदा भेला। अपन सिंहदुआरिमे पोताक अगवानी करनाइक खुशी मनकेँ भरि देलकनि। मुदा जहिना प्रतिक्षाक घड़ी असथिरसँ नै चलि उकड़ू चालि चलए लगैए। श्यामचरणोक मनमे तहिना उठलनि। चारि बर्खसँ गोबर गणेश फेल करैत आएल अछि मुदा अपन मन कहै छै जेना जिनगीमे एकोबेर ने फेल केलौं हेन। जँ से रहितै तँ कोढ़िया बरद जकाँ पालो देखिते कान झाँकि दइत। सेहो तँ नहियेँ बूझि पड़ैए। मुदा से भेल केना अछि ई तँ ओकरेसँ भाँज लगत। कियो रचनाकार मरि कऽ नै मृत्युक चर्च करै छथि, मृत्युपराए जिनगी देखि मृत्युक चरचा करै छथि। फेर कनगुरिया आँगुरपर हिसाब जोड़ए लगला। टटका पढ़लाहा ने टटका प्रश्नक उत्तर टटके लिखि देत मुदा से तँ गोबर गणेशमे नै अछि। रिआएल-खिआएल पाइ थोड़े कारोबारमे औत। जँ कनियोँ-कनियोँ बिसरैत गेल हएत तैयो एक सालक पढ़ाइ तीन सालमे बिसरिए गेल हएत। जँ बेसियाएल होइतै तँ चारि गुणा बेसीआ जाइत। तखनि तँ दोसरे सालमे बेसी पबिते पास केने रहैत, सेहो तँ नहियेँ भेल अछि। मन घोड़मट्ठा हुअ लगलनि। गोबर गणेश अबिते श्यामचरणकेँ गोड़ लागि बाजल- “बाबा, रिजल्ट निकलल।” गोबर गणेशक बात सुनि श्यामचरणक मनमे उठलनि, की निकलल। पास केलक आकि फेल केलक से कहाँ बूझि पेलिऐ। नजरि उठा हिया कऽ गोबर गणेशक मुँहपर देलनि। मुँहक रूखि मलिन नै। मुदा केना कऽ पुछबै जे बौआ पास केलेँ आकि फेल। पास-फेल तँ लोक जिनगीक क्रियामे करैए। जे बच्चेसँ प्रवाहित हुअ लगै छै आ हंसवाहिनी मतियो चलए लगै छै। आँखिपर आँखि चढ़ल देखि गोबर गणेश बूझि गेल जे बाबाक मनमे किछु प्रश्न छन्हि। हलसैत बाजल- “अहूबेर नमेमे रहब।” पोताक बात सुनि श्यामचरणक मनमे उठलनि, चारि सालसँ फेल करैत आएल अछि मुदा मनमे मिसिओ भरि गम नै छै! सियाहीक कोनो रेख नै देखि पबै छी। असमंजसमे बाबाकेँ पड़ल देखि गोबर गणेश बूझि गेल जे भरिसक बाबा बिसरि गेला। सएह मन पाड़ैले कहि रहला अछि। किछु ठेकना कऽ मन पाड़ि बाजल- “पहिले साल जे फेल केने रही से बिसरि गेलिऐ जे किए केने रही?” पोताक प्रश्न सुनि श्यामचरण असमंजसमे पड़ि गेला जे केना हँ कहबै आ केना नै कहबै। हँ जँ कहबै तखनि जँ कहीं आगूक बात पूछि दिअए आ जँ नै कहबै तँ बुझलो बात नै बूझब कहि झुट्ठा भऽ जाएब। चुपे रहला। परिवार की कोनो कोट-कचहरी छिऐ जे बाता-बाती हएत, परिवार तँ परिवार छिऐ। जहिना बाबाकेँ बिनु पुछनौं किछु कहैक अधिकार पोतापर होइत तहिना ने पोतोकेँ बाबापर। अपने फुड़ने गोबर गणेश बाजल- “पहिल साल जे शिक्षक पढ़ौने रहथि, हुनकर बदलीओ भऽ गेलनि आ विषयो बदलि गेल।” पढ़ौनी आ पढ़ौनिहार सुनि किछु पुछैक मन श्यामचरणकेँ भेलनि, मुदा अपने फुड़ने गोबर गणेश फेर बाजल- “पहिल साल जे शिक्षक जे विषय पढ़ौलनि ओ जेना तर पड़ि गेल।” गोबर गणेशक बात सुनि श्यामचरण ओझरा गेला। डोराक पोलिया जकाँ ओर-छोर नै बूझि पाबि जेना बिच्चेमे ओझरी लगि गेलनि। ओझरी लगिते एकटा ओर देखथि तँ दोसर हरा जान्हि आ बीहयबैत जखनि दोसर भेटनि तँ भेटलाहा हरा जान्हि। टीकमे लागल चिड़चिड़ी जकाँ भऽ गेलनि। एक तँ आँखिक पछुऐतमे टीक रहने सोझहा-सोझही नै देखि पबैत दोसर दुनू हाथक आँगुर ओझरी छोड़ाइए ने पबैत। मनमे उठलनि, गोबर गणेश कियो आन छी जे कोनो बात पुछैमे संकोच हएत। पुछलखिन- “बौआ, नै बूझि पेलौं जे केना पढ़ौनीओ आ पढ़ौनिहारो बदलि गेल। जँ पहिल साल बदलिये गेल तैयो दोसर-तेसर-चारिम साल तँ बँचल...?” बाबाक प्रश्न सुनि, साँपक बीख झाड़निहार मनतरिया जकाँ गोबर गणेश धुरझाड़ बाजल- “जहिना पहिल साल बदलल तहिना दोसरो साल बदलल।” दोसर साल सुनिते बिच्चेमे श्यामचरण टोकि देलखिन- “एना नै बाजह जे जहिना पहिल बदलल तहिना दोसरो-तेसरो-चारिमो साल बदलल। फुटा-फुटा कहऽ जे पहिल साल की बदललह आ दोसर-तेसर-चारिम की?” बाबाक प्रश्न सुनि, जहिना कियो इन्टरभ्यू देमए जाइकाल रस्ताक पढ़ल-बूझल बात सुनि प्रश्नक पुछड़ी पकड़ि धड़-धड़ा कऽ उत्तर दिअ लगैए तहिना गोबर गणेश बाजल- “पहिलुक साल पढ़लौं जे केना कियो गाछपर चढ़ि आम तोड़ैए आ केना माटिक पहियाक गाड़ी बना माटि उघैए।” ओना श्यामचरणकेँ पोताक उत्तर सुनल बूझि पड़लनि, मुदा किछु बेसी दिनक सुनल बूझि बेसी बिसराइए गेल रहनि। किछु अपनो मनपर भार दथि आ किछु खोधि-खाधि गोबरो गणेशक मुहसँ सुनए चाहथि। गोबर गणेश बूझि गेल जे बाबाकेँ रस भेटि रहल छन्हि। मनमे उठलै जे परिवारमे बूढ़-बच्चाक बीच सम्बन्ध बनत तँ बीचला अनेरे सोझराएल रहत। एक दिस टीकासनक बाबा तँ दोसर दिस गंगा पार करैक नाव पोता। मुस्की दैत गोबर गणेश बाजल- “दलानक खुट्टीपर जे ललका कपड़ामे रामायण बान्हि कऽ रखने छी ओ पुरना गेल। पहिल बर्खक कोर्समे रहए।” गोबर गणेशक अजगुत जवाब सुनि श्यामचरणक मनमे भेलनि जे बुधिए ने घुसुकि गेलैए। मुदा लगले फेर भेलनि जे केमहर घूसकल से केना बूझब। एहेन प्रश्न पुछबो केना करबै। जँ कहीं आगू मुहेँ घुसुकि गेल हेतै तखनि अगियाएल बात बाजत। जँ कहीं अगवानीक चालि धेलक तँ अनेरे अनसोहाँत लागत। से नै तँ चुचिकारी दऽ अपने मुहसँ बजाएब नीक हएत। पुछलखिन- “बौआ, तँू झब-झब बाजि जाइ छह, कनी असथिरसँ बाजह। आब कि अपन ओ आँखि-कान रहल जे श्रवणकुमारक पानिक अवाज सुनि तीर चलाएब।” बाबाक प्रश्न सुनि गोबर गणेशक मन मघैया खेतक खेसारी, सेरसो जकाँ गद-गदा गेल। बाजल- “बाबा, रस्ता-पेरा एहेन सवाल-जवाबक जगह नै छी। कखनो कुत्ता-बिलाइ धियान तोड़त तँ कखनो बान्हपर खेलाइत धिया-पुता। ओकरा मनाहिओं तँ नै करबै। जेकरा तीनिए बीतक घर-घराड़ी छै ओकर धिया-पुता रस्ता-बाटपर नै खेलतै तँ खेलत केतए। से नै तँ चलू दरबज्जापर, असथिरसँ कहब।” पोताक बात सुनि श्यामचरण बजला- “जेतए बसी वएह सुन्दर देश भेल। जे पैतपाल करए वएह राजा भेल। ईहो जगह कि अधला अछि, दुआरे-दरबज्जाक ने मुहथरि छी। अपन घर-दुआर छी, अकासमे चिड़ै-चुनमुनी उड़बे करत, कुत्ता-बिलाइ, माल-जाल चलबे-एबे-जेबे करत तइसँ कि गप-सप्पमे बाधा पड़त।” बाबाक विचार गोबर गणेशकेँ नीक लगलै। मनमे एलै गाए-गोरूक मिलान ठेहुनो पानि दुहान। बाजल- “बाबा, रखलाहा पोथीमे कथी राखल अछि से बिसरि गेलिऐ।” पोताक बात सुनि कनी पाछू घुसकैत श्यामचरण बजला- “सोलहन्नी केना बिसरि जाएब, मुदा किछु झल जकाँ तँ भइये गेल अछि।” ‘झल’ सुनि झलझलाइत गोबर गणेश बाजए लगल- “चारू जुगक चर्चा अछि।” ‘चारू जुग’ सुनि श्यामचरणक मन सकपकेलनि। सकपकाइते बजला- “बौआ, चारि जुगक चर्चा ने पोथी-पुराणमे अछि, जुग तँ केतेको आएल-गेल आ अबैत-जाइत रहत। जुगोक कि ठेकान अछि, जखनि दूटा चिन्हारकेँ भेँट होइ छै तखनो कहै छै जुगो पछाति भेँट भेलौं। आब तोहीं कहऽ जे एक जुगकेँ के कहए जे केते भऽ जाइए!” बाबाक विचार गोबर गणेशकेँ जँचल। बाजल किछु ने मुदा डोरीमे बान्हल कोनो वस्तु जकाँ मुड़ी डोलबए लगल। बाबा बूझि गेला जे भरिसक आरो बात सुनए चाहैए। बजला- “जहिना चिन्हारक बात कहलियऽ तहिना बारह बर्खकेँ सेहो जुग कहल जाइ छै।” बाबाक विचारकेँ उड़ैत देखि गोबर गणेश बाजल- “बाबा, कोन जुग-जमानाक बात उठा देलिऐ। आब ने ओ जुग रहल आ ने जमाना। अखनुक जे जुग अछि तहीसँ ने अपना सबहक जिनगी चलत। अनेरे मगजमारी केने मनो छिड़िआएत।” जे बूझि गोबर गणेश बाजल हुअए मुदा श्यामचरणकेँ भेलनि जे भरिसक जे कहलिऐ ओ हृदैकेँ बेधलकै हेन। नीक हएत जे आरो किछु कहि विचारक रस्ता बदलब। बजला- “बौआ, जखनि एते बाजिये गेलौं तखनि कनीए आरो रहल अछि, ओकराे सठाइए लेब नीक हएत। चारि जुग जे भेल सतयुग, त्रेता, द्वापर आ कलयुग से कि कोनो एक्के रङ भेल। जेकरा जेते फबलै से तेते दफानि लेलक।” गोबर गणेश दफानैक माने नै बुझलक। बाजल- “की दफानि लेलक?” पोताक जिज्ञासा सुनि श्यामचरण बजला- “देखहक जँ चारू जुगमे समैक बँटबारा भेल तँ एक रङक ने होइत, से कहाँ अछि। चारू चारि रङ अछि। खैर जे होउ मुदा एकटा आरो बात कहि दइ छिअ। सतयुगक हरिश्चन्द्र बड़ दानी छला। राजा छला, मुदा दान देबाकाल बिसरि गेला जे हम राजा छी, राजक भार ऊपरमे अछि, अपना फुड़ने जँ एक्के गोटेकेँ सभटा दऽ देबै तँ करोड़क-करोड़ लोकले कथी रहतै।” दिन भरिक जुड़ाएल मन गोबर गणेशक, पेटक बात उफनि-उफनि बहराए चाहै, मुदा बाबाक विरामक पाछुए ने किछु बाजत। रोकलो तँ नै जा सकैए। मनमे उठलै, जहिना कोनो फुलक गाछ आकि कोनो लत्ती गिरहे-गिरह मुड़ीओ-फुलो आ बतीओ दइए तहिना जखने बजता आकि बिच्चेमे टोकि मुड़ियारी देबनि। अनेरे अक्छा कऽ चुप भऽ जेता। बाजल- “बाबा, अहाँ चारि जुगक चर्चा करै छिऐ, मास्टर साहैब कहलनि जे पाँचम जुग छी। एकटा केतए हेरा गेल।” हेराएल सुनि श्यामचरण ठमकला। ठमकिते गोबर गणेश बूझि गेल जे भरिसक बजैले किछु कहै छथि। सुनैक प्रतिझु जकाँ मुँह लगै छन्हि। बाजल- “बाबा, जहिना अदौमे आमक फड़ खाइ छल तहिना अखनो खाइ छी। नीक भोज्य पदार्थ छिऐहे। मुदा प्रश्न तँ एकटा उठबे करत किने जे नमहर गाछक फल छी, जँ अपने टूटि कऽ खसैक बात सोचबै तँ छोटका-बड़बड़िया भलहिं खसलोपर दरहे रहैए मुदा नमहर, कोमल केना रहत। तखनि ओकरा केना उपयोग कएल जाएत।” गोबर गणेशक बात श्यामचरणकेँ जँचलनि। बजला- “एकर उपए तँ यएह ने हएत जे जँ छोट गाछ रहत तँ निच्चोसँ ठाढ़ भऽ हाथसँ तोड़ि लेब, मुदा नमहरमे तँ लग्गी-बत्तीसँ तोड़ल जाएत या गोला-ढेपासँ तोड़ल जाएत। मुदा ई तँ तर्क भेल। आजुक समैमे भलहिं गमलोमे आम फड़ए, मुदा नमहर गाछक फल छी, एकरो तँ नकारल नहियेँ जा सकैए। जल्दी-जल्दी अपन बात कहऽ। चाहो पीबैक मन होइए।” चाहक नाओं सुनिते जेना गोबर गणेशक पशे बदलि गेल। बाजल- “बाबा, गप-सप्प केतौ पड़ाएल जाइ छै, ओ तँ सदिकाल उड़िते रहैए आ उड़िते रहत। मुदा ओकरा (बातकेँ) जखनि विचार बना विचारि कऽ नै विचरण करबै तखनि धारक मुँह केना बनतै। अखनि एतबे रहए दियौ। रिजल्टक दिन छी, अहाँ अँटका लेलौं। दादी-माए सभ अङनामे टाटक भुरकी दने तकैए। भने चाहो बनबा लेब आ कुशलो-छेम सुना देबै।” गोबर गणेशक विचार श्यामचरणकेँ जँचलनि। मनमे उठलनि जे भरिसक हमहूँ सभ (पुरुष पात्र) अतिक्रमण करै छी। से नै तँ दुनू गोटेक (पति-पत्नी) दिशा दू किए भऽ जाइए। परिवारक भीतर जँ वैचारिक समरूपता रहत तँ मतभेद किए हएत। सभ तँ बालो-बच्चा आ परिवारोकेँ नीक्के चाहै छिऐ। अाङगन पहुँच दादीकेँ गोड़ लागि गोबर गणेश पाशा बदलैत बाजल- “दादी, पास केलिऐ। तेते ने बैटरीबला पंखा, बत्ती, छोटका बड़का कम्प्यूटर, आरो कि कहाँ आबि गेल अछि जे घरे बैसल इंजीनियर-डाक्टर बनि जेबौ।” पोताक विचार सुनि दादी एते अह्लादित भऽ गेली जे लाख सम्हारला पछातिओ मुहसँ खसिये पड़लनि- “रौ गोबरा, सभ दिन तूँ गोबरे रहमेँ।” दादीक बात गोबर गणेश नै बूझि पौलक। अपनापर सुनैक शंका भेलै। सुनैक शंका ई जे गोबराएल कहलक आकि गोबर गणेश। सभ तँ गोबर गणेश कहैए। भऽ सकै छै बिनु दाँतक बूढ़ मुँह किछु बजाइए गेल होइ। केहेन-केहेन बीखधरक तँ बीख बिनु दाँते निकलिते ने छै, दादी तँ सहजे बूढ़ दादीए भेली। बाजल किछु ने चाहक गिलास नेने बाबा लग पहुँचल। हाथमे चाहक गिलास पकड़बैत बाजल- “बाबा, अहाँ खुशी भेलौं किने?” “बौआ, जँ तूँ खुशी तँ हमहूँ खुशी।” १६ जनवरी २०१४ उमेश पासवान जनम- १० अक्टूबर १९८४ई.मे। पिताक नाअों- स्व. खखन पासवान, माता- श्रीमती अमेरिका देवी। गाम- औरहा, पंचायत उत्तरी बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, बिहार। प्रकाशित कृति- वर्णित रस (पद्य संग्रह) श्रुति प्रकाशनसँ। अप्रकाशित कृति- हेराएल पन्ना काव्य संग्रह। अजोह स्कूलक पढ़ाइ, खेल-कूद, दस मिनट छुट्टी लेल बिनु किछु बजने सर जीक आगू दुनू हाथक दसो आँगूर देखानाइ, बड़की पोखरिक महारपर जा गप-सप्प लड़ेनाइ, सवक नै बनल रहने बैजू कान्त सर तथा रायजी सरक घंट्टी छोड़नाइ इत्यादि मन पड़ैए। मुदा तइ दिनमे किछु आर छल। किछु एहनो प्रसग अछि जेकरा तइ दिनमे ठीकसँ नै बुझै छेलौं जे आइ बूझि रहल छी। किछु ओहनो प्रसंग रहल जइमे अपने दोखी नै रही मुदा दोखीक सजा पबैत रही। अधलाकेँ अधला नै बूझि नीक्के बुझैत रही। वास्तवमे ओ नीक नै छल, खराप छल, जे आइ बुझै छी। खैर! नीक-खरापक पनचैती नै करेबाक अछि। सुनेबाक अछि अपन बचपनक खिस्सा। तीसरा-चौथामे पढ़ैत रही। पाठकजी, यादवजी, रायजी, मोलबी साहैब आ बैजू कान्त सर छला हमरा सबहक शिक्षक। रमण, वीर कुमार, मनोज, मुरारी आ हम रही एक-दोसराक पार्टनर। पाठक सर पढ़बैत रहथिन जोड़-घटाउ, रायजी एबीसीडी, यादवजी लिखना चेक करै छेलखिन आ जे समए बँचल तइमे यादि केलहा कविता सुनै छला। मोलबी साहैब समाज विज्ञान पढ़बैत रहथिन। सभसँ आफत छल हमरा सभ लेल संस्कृत। बैजू कान्त सर पढ़बथिन संस्कृत। पाँच-सात दिनपर अबैत रहथिन स्कूल। बेसी काल कार्यालयी कार्यमे लगल रहैत रहथिन। तँए ई समस्या सभ दिनक नै कहियो कालक छल। सभसँ नीक सरजी रहथिन मोलबी साहैब। किएक तँ ओ मारै नै छेलखिन कोनो विद्यार्थीकेँ। मारैमे नामी रहथिन बैजू कान्त सर। हम सभ डरसँ हुनकर किलास छोड़ैक गड़ लगबैत रहै छेलौं। हुनकर घंटी अबैसँ पहिने दस मिनटक छुट्टी लऽ निकलि जाइत रही। किएक तँ ओ अपने जल्दी छुट्टी नै दैत रहथिन। कए दिन तँ पोखरि महारपर सँ पजन्त टँगबा अनै छेलखिन विद्यार्थीकेँ। आ लग्गे छौंकी! मुदा कए दिन असानीसँ बँचिओ जाइत छल। खास कऽ ओइ दिन जइ दिन बैजू कान्त सर उपस्थिति होइत रहथिन आ हाथमे कागतक झोरा रहै छेलनि। झोरे देखि हम सभ बूिझ जाइत रही जे आइ ठीक रहत। किएक तँ हिसाब-बाड़ी चलतै ऑफिसमे। सभ कियो आॅफिसमे बैस हिसाब-वाड़ी करता, हम सभ मुक्त रहब। खुश भऽ जाइत रही। मुदा भऽ जाए किछु आैर। खुशी कहीं दबाएल रहै छै। किलासमे हल्ला हुअ लगै। आकि यादवजी आबि तरतरबऽ लगैत रहथिन। यादव जीक तइ घड़ीक तामस दोसर रहैत रहनि। ओ ई जे लेखा-जोखा करैत घड़ी हिनकर इच्छा रहैत रहनि जे हमहूँ ऑफिसेमे रही मुदा हल्ला जे हुअ लगै छल आकि सभ कियो यादवेजी सरकेँ किलास पठा दन्हि। ओ आबि सभटा बिख हमरे सभपर उतारि लइ छला। हलाँकि हम चारू मित्र ऐ सभ समस्याकेँ रसे-रसे बूझि गेल रही। आ ऐ सभसँ बँचैले दस मिनट छुट्टी लऽ पोखरि दिस चल जाइत रही। छुट्टीओ अरामसँ मिल जाइत रहए। कहियो काल बैजू कान्त सर बड़ तमसाएल अबैत रहथिन। हाथमे झोरा नै रहने हम सभ बुझिओ जाइत रही जे आइ तमसाएल हेता। आइ मारि लगले अछि। बैजू कान्त सर छुट्टीओ जल्दी नै दइ छथिन। संस्कृत विषयमे आफदे-आफद। सभटा यादे करए पड़ैत छल। हमरा सबहक हिसाबे बैजू कान्त सरमे एकटा गुण रहनि। ओ ई जे नेबोक शर्बत बड़ पसिन रहनि। नेबो औत केतएसँ। जहिना पियास लगलापर हमरा सभकेँ पानि पीआबए इशारामे कहथिन आ हम सभ पानि आनि पीअबैत रहियनि तहिना मनक गप बूझि नेबोओक जोगाड़ हम सभ लगा आनी। मुदा तइमे दिन-तारीखक मेल नै खाइत रहए। तैयो खुश भऽ जाथिन। एक दिन नेबोक चर्च करैत किलासमे पुछलखिन- “केकरा नेबो फड़ल छौ?” रौदाएल आएल रहथिन। हाथमे झोरा नै देखने रहियनि। आठम दिनन देलहा सवक यादो नै भेल छल। हम आ हमर मित्र मुरारी एक्केबेर हाथ उठबैत बजलौं- “हमरा। हमरा।” मुदा एकटा आफत भेल दुनू गोरेकेँ कहीं नै जाए देलनि तखनि तँ फँसलौं। हम कहलियनि- “सर, नेबो आनए हम जाएब।” यएह डर मुरारीकेँ सेहो रहै, प्रतिवाद करैत ऊहो बाजल- “नै सर, हम जाएब, हमरा गाछमे कागजीबला नेबो छै।” हम ठाढ़े रहलौं। मुरारी हमरा दिस ताकए लगल। केना-ने-केना सरजी दुनू आदमीकेँ कहि देलनि- “अच्छा जो दुनू गोरे, जल्दी अबिहेँ।” दुनू गोटे विदा भेलौं। स्कूलक हाता धरि तँ संचमंच भऽ टपलौं, जे काजे जा रहल छी। मुदा हातासँ टपिते इठलाइत बढ़ए लगलौं। दुनू गोटे एक्के समस्यासँ घेरल रही। सवक नै बनल रहए। ई बात तँ तखने स्पष्ट भऽ गेल छल। जइसँ कोनो धरानी त्राण पेने रही। मुदा आब एकटा दोसर समस्या ठाढ़ भेल। नेबो गाछमे अखनि सभटा थुल्लीए छै। ई नै बुझैत रही जे हमरो गाछमे अजोहे हेतै। आब तँ भेल आफत! आब की करब। मन औनाए लगल। समए सेहो बित रहल छै। कहने छेलखिन जल्दी अबिहेँ। देरी हएत तँ वीरकुमरा ने कहीं सवक दुआरे दुनूटा निकलल से सरजीकेँ कहि दन्हि। सेहो मनमे आबए लगल। अन्तमे विचार केलौं। पाँच-सातटा अजोहे नेबो तोड़ि कऽ लऽ जा सरजीकेँ नै देखए देबनि आ शर्बत बना गिलास पकड़ा देबनि। सएह करए विदा भेलौं। नेबो तोड़ि लऽ जाइत रही तँ राजे काका देखि लेलनि। हमरा तँ नै किछु कहलनि मुदा मुरारीकेँ कहलखिन- “आइ आबए दहुन मनेजर साहैबकेँ। नेबो सुररनाइ की छिऐ से पता चलतौ।” मुरारीक बाबूकेँ सभ मनेजर साहैब कहै छन्हि। बड़ तमसाह छथिन। मुरारी डरि गेल। डर हमरो भऽ गेल। दुनू गोरे ठमकि गेलौं। हमरा सभकेँ ठमकल देखि राजे काका पुन: पुछलनि- “केतए लऽ जाइ छेँ ई थुल्ली नेबो?” अपन दोख छोड़बैत दुनू गोटे एक्केबेर बजलौं- “सरजी, कहने छथिन। हुनकर मन खराप छन्हि। शर्बत बनतै।” राजे काका मुड़ी डोलबैत किछु ने बजला। हम सभ बढ़ि गेलौं। दुनू पार्टनरकेँ बुझाएल जे पार लगि गेल। स्कूलपर पहुँचिते देखलौं बैजू कान्त सर ओङहा रहल छथि। फबल। हाँइ-हाँइ कऽ शर्बत बना सरजीकेँ उठबैत गिलास हाथमे देलियनि। पीब तँ गेला मुदा केना-ने-केना बूझि गेलखिन जे नेबो रसाएल नै छेलै। मुदा किछु हाँट-दबाड़ नै केलनि। घंटी बदलि गेल छल। समस्या टड़ि गेल। दुनू पार्टनर खुशी भऽ गेल रही। मुदा ई खुशी दुखमे बदलि गेल। डर तँ रहबे करए जे राजे काका ने कहीं बाबूजीकेँ कहि दन्हि। सएह भेल। बेरू पहर, करीब साढ़े पाँच बजेमे मनेजर साहैबक सङ मुरारीकेँ अबैत देखि हम सर्द भऽ गेलौं। दलानपर एला। ताबत हम अङना चलि गेलौं। टाटक अढ़मे ठाढ़ भऽ डरे थरथराइत रही। आब की हएत की नै। बाबूजी दलानेपर बैसल छला। वाड़ीसँ काज करि कऽ तुरन्ते आएले रहथि। मनेजर साहैबकेँ देखिते हमरा सोर पाड़लनि- “रमेश?” हमर तँ बुझू समुच्चा देह सर्द भऽ गेल रहए। किछु ने प्रतिउत्तर पाबि पुन: सोर पाड़ैत बजला- “एक लोटा पानि नेने आ आ माएकेँ कहुन दू गिलास चाह बनबए।” ई बात सुनि थोड़ेक जान-मे-जान आएल। लोटामे पानि लऽ दलानपर पहुँचलौं। लगले आबि माएकेँ चाह बनबए कहलियनि। चाहपत्ती घरमे नै रहने दोकानसँ आनए गेलौं। चाह बनल। दुनू गिलास चाह छिपलीमे लऽ माए हाथमे पकड़ा देलनि। छिपली लऽ कऽ दलानपर पहुँचलौं। मुरारीक चेहराक उदासी देखि बूझि पड़ल समस्या अछिए। दू-चारि घोंट चाह पीला पछाति। मनेजर काका हमरा पुछलनि- “रमेश, सरजी कहने रहथुन नेबो तोड़ि अनैले आकि तूँ सभ अपने मोने तोड़ने छेलँह?” अपन जान बँचबैत सहीए बात बजलौं- “सरजीए कहने छेलखिन, हुनकर मन खराप छेलनि।” ताबए बाबूजी पूछि देलनि- “पुछलुहुन नै जे अखनि नेबो तोड़ेबला हेतै।” ई गप सुनि मुरारी हमरा मुँह दिस तकलक। हम चुपे रहलौं। मनेजर साहैब बिच्चेमे दुनू गोटेकेँ कहलनि- “जाइ जो, नीकसँ पढ़ै जइहेँ।” मुरारी आ हम दुनू गोटे ओतएसँ ससरलौं। ओ दुनू गोटे अपनामे गप करैत रहला। हमरा दुनू पार्टनरक मन खुशी भऽ गेल, विचारि लेलौं आब थुल्ली नेबो कहियो नै तोड़ब। नन्द विलास राय जनम- २ जनवरी १९५७ ई.मे। पिताक नाओं- स्व. बच्चा राय, माता- स्व. दुर्गा देवी आ श्रीमती परमेश्वरी देवी। गाम+पोस्ट- भपटियाही, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मोबाइल नम्बर- ९९३१९०९६७१ जीविकोपार्जन- कृषि। शैक्षणिक योग्यता- बी.एस-सी। प्रशैक्षणिक योग्यता- आइ.टी.आइ (टर्नर) प्रकाशित कृति- सखारी-पेटारी लघु कथा संग्रह श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अप्रकाशित कृति- (१) मरजादक भोज लघु कथा संग्रह, (२) छठिक डाला कविता संग्रह, (३) बहिनपा एकांकी संचयन। मदन-अमर रमणजी इलाहावाद विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर छथि। हुनका एक बेटा आ एकटा बेटी छन्हि। बेटाक नाओं मदन आ बेटीक मीरा रखने छथि। मीरा आ मदन इलहेवादक एकटा कॉनवेन्टमे पढ़ैए। मदन स्टैन्डर्ड पाँच आ मीरा स्टैन्डर्ड चारिमे पढ़ैए। रमणजीक सासुर मिथिलांचलक कोयलख गाममे अछि। रमणजीक ससुर महराज रमणजी सँ गर्मी छुट्टीमे आम खाइले कोयलख आबए आग्रह केलखिन। रमणजी सपरिवार कोयलख एला। नानी गाममे मीरा आ मदन दुइए-चारि दिनमे गामक धिया-पुता सङ तेना ने मिलि गेल जेना पानिमे चीनी मिलैए। मदन नानी गामक धिया-पुता सङे कबड्डी आ हाथी-चुक्का खेल खेलाइत रहए। मदन तँ इलाहावादमे बैडमिन्टन आ क्रिकेट देखैत रहए। कखनो-काल क्रिकेट खेलबो करए। ओकरा लेल कबड्डी आ हाथी-चुक्का खेल नव छेलै, मुदा ओकरा नीक लगैत रहै। नानी गाममे मदनकेँ अमर नामक एकटा बालकसँ दोस्ती भऽ गेल। एक दिन अमर मदनकेँ अपना अङना लऽ गेल। अमरक घर फूसक रहए। ओकर बाबूजी दिल्लीमे दालि मीलमे काज करै छथिन। अमरक माए एकटा गाए पोसने छथिन। आइ-काल्हि गाए लगबो करै छन्हि। खेत-पथारक नाओंपर अमरकेँ बाधमे दस कट्ठा खेत, दू कट्ठा गाछी आ दू कट्ठा घराड़ी। अङनामे दूटा घर। अमरक माए नीकहा-नीकहा आम मदनकेँ खइले देलखिन। मदन अमरकेँ माएसँ बड्ड प्रभावित भेल रहए। मदनक नानाकेँ पक्काक घर। चारू भागसँ पोखरा-पाटन। ऊपरोमे चारि कोठरी। गामक लोक मदनक नानाक घरकेँ हवेली कहैत अछि। मदनक नाना गोकूलबाबू पुरान जमीन्दारक बेटा, तइमे रिटारयर डिप्टी कलक्टर। गामक गरीब-गुरबा हुनका हािकम मालिक कहैत छेलनि। एक दिन मदन अपना सङ अमरकेँ अपना नानीक घर लऽ जाइत छल। मैल-कुचैल कपड़ामे अमर। ऐसँ पहिने ओ कहियो हवेली नै गेल रहए। ओ धखाइते-धखाइत मदनक सङे हवेलीक सीढ़ीपर चढ़ल। आगू बढ़ल। देखिते मदनक नानी मदनकेँ पुछलखिन- “ई छौड़ा के छी। तोँ एकरा भीतर किए अनै छेँ?” तैपर मदन बाजल- “नानी ई अमर छी। हम एकरा सङे खेलाइ छी। एकरासँ हमरा दोस्ती भऽ गेल अछि।” मदनक बात सुनि नानी मदनकेँ डँटैत कहलखिन- “समूचा कोयलखमे तोरा यएह छौड़ा दोस्ती करैले भेटलौ। छोट लोकसँ दोस्ती करै छेँ!” तैपर मदन बाजल- “नानी ई छोट कहाँ अछि। ई तँ हमरे अतेटा अछि।” “तोँ नै बुझलेँ। ई सभ छोट जाति छी। एकरा सभकेँ हम सभ अपना हवेलीक भीतर नै आबए दइ छिऐ।” अमर दिस देखैत नानी फेर बजली- “रे छौड़ा, केकर बेटा छीही?” अमर बाजल- “भोला चौपालक।” “कह तँ खतबे जातिक छौड़ाकेँ हवेलीक भीतर अनै छेँ। हवेलीओ छुआ जाइत। रे छौड़ा भोलबा बेटा, जो भाग एतएसँ।” अमर ओतएसँ चलि देलक। मदन किछु बूझि नै पौलक। बकर-बकर नानीक मुँह दिस तकैत रहल। नानी ओकर हाथ पकड़ि हवेलीक भीतर लऽ गेली। अमर अपना अाङन जा माएकेँ सभ गप कहलक। माए पुछलखिन- “तूँ हवेली गेलही किए?” तैपर अमर बाजल- “माए, हमरा तँ मदन लऽ जाइत रहए। हम कहियो कहाँ हवेली दिस जाइ छी।” माए- “बाउ रौ, उ सभ पैघ लोक छथिन। हम पनरह बर्खसँ कोयलखमे छी मुदा आइ धरि हवेलीक भीतर नै गेलौं। कहियो काल खेरही तोड़ए हाकिम मालिकक खेतमे जाइ छी तँ हेवलीक ओसारक निच्चेसँ खेरही राखि आ बोइन लऽ घूमि जाइ छी।” अमर माएक बात नै बूझि सकल। पुछलक- “पैघ लोक केकरा कहै छै?” माए जवाब देलखिन- “पैघ लोक माने बड़का आदमी। धनीक आदमी। पढ़ल-लिखल हाकिम-हुकूम।” अमर- “हमहूँ पैघ लोक बनब।” माए- “पढ़बीही तब ने पैघ लोक बनमेँ। देखै छीही ने जीतनीक मामा पढ़ि-लिख कऽ हाकिम बनलखिन। ओ अबै छथिन तँ हाकिमो मालिक हुनका चाह-पान करबै छथिन। तहूँ मनसँ पढ़-लिख आ हाकिम बन।” माएक बात सुनि अमर बाजल- “तूँ तँ हमरा किताबो-काैपी ने आनि दइ छीही। टीशनो ने धरा दइ छीही। कहैत रहै छीही गाए चरा आन।” तैपर माए बजली- “तूँ मोनसँ पढ़। तोरा किताप-कौपी सभ आनि देबौ। गाइओ चरबए नै कहबो। टीशनो धरा देबौ।” अमर बाजल- “हम मोनसँ पढ़ब आ हाकिम बनब।” अमर पढ़ए लगल। ओ अपना किलासमे फस्ट करए। मैट्रिक आ इण्टरमे अपना जिलामे पहिल स्थान लौलक। चटिया सभकेँ टीशन पढ़ा कऽ बी.ए. आनर्स फस्ट क्लाससँ पास भेल। जीतनीक मामा हरियरीबला बीडीओ साहैबसँ भेँट केलक। ओ कहलखिन- “कोनो भी कम्पीटीशनक तैयारी लेल पटनामे बैसए परतह। तइले ढौआ चाही।” ई सभ गप्प अमर अपना माए-बाबूसँ कहलक। अमरक बाबू दस कट्ठा जमीनमे सँ पाँच कट्ठा जमीन बेच देलक। अमर पटनामे रहि बी.पी.एस.सी.क तैयारी करए लगल। गाममे कुट्टी-चालि चलए लगलै। जे जमीन बेच कऽ सभटा बेरबाद करैए फल्लमा। मुदा तेकर परवाह नै केलक अमरक पिता। पहिले खेपमे अमर सफल भऽ गेल, बी.डी.ओ.क पदपर चयन भऽ गेलै। प्रशिक्षणक बाद अमरक पदस्थापना निर्मली अनुमण्डलमे भेल। योगदानक दोसरे दिन हुनका चैम्बरमे हुनकर सहायक संचिका लऽ कऽ आएल। बी.डी.ओ. साहैबकेँ ओ चेहरा जानल-पहचानल लगलनि। ओ गौर करि कऽ सहायक दिस ताकए लगलखिन। आ दिमागपर जोर देलखिन जे हिनका तँ केतौ देखने छियनि। मुदा केतए से मोने ने पड़नि। सहायकसँ पुछलखिन- “अहाँक नाओं की छी?” सहायक जवाब देलखिन- “मदन कुमार ठाकुर।” मदन नाओं सुनिते बी.डी.ओ साहैबकेँ बचपनक सभ घटा मोन पड़ि गेलनि। हुनका भेलनि शाइत ओ वएह मदन छी जे हमरा हवेली लऽ जाइत छल, मुदा ओकर नानी हमरा डपैट कऽ भगा देने रहए। मुदा शंका समाधान दुआरे पुछलखिन- “अहाँक मामा गाम केतए अछि?” सहायक जवाब देलखिन- “जी, हमर मामा गाम कोयलख भेल। आ नाना स्व. गोकूल प्रसाद ठाकुर।” आब तँ बी.डी.ओ साहैबकेँ कोनो शंके ने रहलनि। ओ सभ संचिका पढ़ि कऽ ओइपर दसखत करैत कहलखिन- “साँझमे हमरा डेरापर आएब।” तैपर सहायक मदन पुछलकनि- “सर, कोनो खास गप्प छै की?” बी.डी.ओ. साहैब कहलखिन- “अहाँ आएब तँ ओतए आम आ खास मालूम भऽ जाएत।” सहायककेँ छातीक धड़कन बढ़ि गेलनि। ओ सोचए लगला की बात छिऐ। किएक साहैब डेरापर बजौलनि। कियो चुगली तँ ने कऽ देलक। साँझमे मदन बी.डी.ओ साहैबक डेरापर पहुँचला। बी.डी.ओ. साहैब हुनका बड़ प्रेमसँ भीतर लऽ गेलखिन। एकटा कुरसीपर अपना बैसला आ दोसरपर इशारा करैत मदनकेँ बैसैले कहलखिन। दुनू गोटे कुरसीपर बैसला। बी.डी.ओ. साहैब पत्नीकेँ सोर पाड़ैत कहलखिन- “चाह-जलखैक ओरियान करू। मदन एला।” मदनकेँ किछु बुझेबे ने करए। ओ बाजल- “सर, कथी लऽ बजेलौं। की आदेश छै।” तैपर बी.डी.ओ. साहैब कहलखिन- “सर नै अमर बाजू अमर। हम वएह अमर छी जेकरा सङे अहाँ मामा गाममे कबड्डी, हाथी चुक्का खेलैत रही। एक दिन अहाँ अपना नीनीक हवेली लऽ जाइत रही तँ अहाँक नानी अहाँपर बिगड़ैत हमरो डँटने रहथि। की अहाँकेँ ओ घटना मोन अछि?” मदनकेँ ममहरक सभ गप मोन पड़ि गेल। ओ ठाढ़ भऽ कऽ हाथ जोड़ैत बाजल- “सर, हमरा माफ कऽ दिअ। हम बड्ड लज्जित छी।” तैपर बी.डी.ओ. साहैब कहलखिन- “फेर सर! अमर बाजू। अमर।” कहि बी.डी.ओ. साहैब ठाढ़ होइत पुन: बजला- “आउ मदन, गला मिलू।” कहि दुनू बाँहि फैला देलखिन। मदन झिझकैत अमरसँ गला मिलल। मदनक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलै। राजदेव मण्डल जन्म : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्व. सोनेलाल मण्डल उर्फ सोनाइ मण्डल। माता : स्व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्त मण्डल, कृष्णकान्त मण्डल, विप्रकान्त मण्डल। पुत्री : रश्मि कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा, भाया- िनर्मली, जिला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शिक्षा : एम.ए. द्वय (मैथिली, हिन्दी, एल.एल.बी) ई पत्र : rajdeokavi@gmail.com सम्मान : अम्बरा कविता संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान-२०१३ प्राप्त। प्रकाशित कृति : (१) अम्बरा- कविता संग्रह (२०१०), (२) बसुंधरा कविता संग्रह (२०१३), (३) हमर टोल- उपन्यास (२०१३) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अप्रकाशित कृति- चाक (उपन्यास), जाल (पटकथा), त्रिवेणीक रंग (लघु/विहनि कथा संग्रह)। रूसल बौआ दुर्गापूजाक मेला शुरू भऽ गेल छै। अष्टमी बीत गेलै, आबो नै हेतै मेला। मेलामे तँ होइते छै, खुशी, उत्साह, मनोरथ, मिलन। घर-घर बनि रहल छै मेवा-मिष्टान, तरुआ-भुजुआ आर केते चीज-बोस। रंग-बिरंगक नुआ-बस्तर पहिरने धिया-पुताक मुँहपर खुशी नाचि रहल अछि। सभ मेला देखबाक लेल तैयार भऽ रहल अछि। फेकन हड़बड़ाइत अङना आएल आ पत्नीसँ पुछलक- “बेचू बौआ कहाँ अछि? खेलक आकि भुखले अछि?” पत्नीक मोनमे तामस औनाइते छेलै। एकबेर तामससँ भरल आँखिए ताकलक आ बजल किछो नै। ओकरा दिश बिनु देखने फेकन फेर बजल- “एकोटा रुपैया तँ घरमे छेलै नै। सोचलौं- छौड़ा मेला देखैले जाए लगितै तँ मांगबे करतै। एक गोड़ेसँ हथपैंच लेलौं। आ बौआकेँ देखबे नै करै छी। केतए गेल अछि?” “जेतै केतए, कानै छेलै। दुआरिपर रुसल बैसल छै।” “की भेलै से?” “हेतै की, लवका पेण्ट-शर्ट लेतै।” “ओह, अखनी तँ पैसाक बड्ड अभाव छै। ओकरा समझा-बुझा दैतिऐ से नै।” “अहाँक धिया-पुताकेँ के समझाइत। कहै छेलै जे अमितकेँ लवका पेण्ट-शर्ट ओकर बाबू आनि देलकै। ओ भोरेसँ देखा-देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबैत अछि। औंठा देखा कऽ इहू-इहू कहैत अछि।” “अहाँकेँ कहबाक चाही ने जे अमितक बाप धीरेन्द्र बाबू बड़का लोक छथि। पलिबारमे सरकारी नौकरीयो छै। जमीनो हमरासँ बहुत बेशी छै। हुनकर बराबड़ि हम केना करबै?” “से गप्प हम कहलिऐ। रौ बौआ, अमित बड़का लोक छिऐ। उनटे तमसाकेँ बजल- “अमितवा कद-काठीमे हमरासँ छोट अछि। परीक्षामे हमरासँ कम नम्बर लाबैत अछि। खेलो-कूदमे हमरासँ हारले रहैत अछि। ऊ हमरासँ नम्हर केना भेलै।– आब अहीं कहू जे केना बुझेबै? की कहबै?” बझल कंठे फेकन बजल- “आ हमहीं की करबै? एक साल रौदी तँ एक साल दाही। जी-जान लगा कऽ काज करै छी, तैयो उपजा ओतने होइत अछि। देह रोगाएल रहैत अछि। बाहरो कमेबाक लेल केना जाएब। हमरा सन छोट गिरहतकेँ देखनिहार कियो नै। अहाँ तँ देखबे करै छी। घरक खर्चा नै जुमैत अछि, तैयो धिया-पुताकेँ पढ़बै छी।” पत्नीक सुरमे तामस भरल छल- “हमर सऽख-सेहन्ता तँ डहि-जरि गेल। आब धीयो-पुतोक वएह गति भऽ रहल अछि। अहाँ कोनो करमक लोक नै छी। अहाँ बुत्ते नै किछो भेल आ नै हएत।” अहाँ कोनो करमक लोक नै छी, ई वाक्य जेना फेकनक कलेजामे बरछी बनि गड़ि गेलै। तन-मनसँ समर्पित भावे काज केनिहारकेँ जँ फलक रूपमे दुत्कार भेटै तँ एकर प्रतिकार की? फेकनक मोन औना रहल छै। बेवश, लचार। ओकरा आँखिसँ भरभरा कऽ लोर खसि पड़लै। आसमे जेना आगि लागि गेल होइ। ओकर बेचू बेटा अढ़मे ठाढ़ भऽ कऽ सभ किछो सुनै छेलै। बापकेँ कानैत देखि नै रहल गेलै तँ लगमे जा कऽ बाजल- “बाबू अहाँ नै कानू। कोनो कि अंगे-पेण्टसँ लोक मेला देखै छै। ऊ लवका पेण्ट-शर्ट देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबै छै। हम परीक्षामे ओकरासँ बेसी नम्बर लाबि कऽ ओकरा बुड़बक बनेबै।” सपना सन….। क्षण भरिक लेल जेना नम्हर-छोट, ऊँच-नीच एके रंग बुझेलै। फेकन बेटाकेँ भरि पाँज पकड़ि लेलक। बाप-बेटा मिलैत देखि पत्नी मुस्की मारलक जे बाप-बेटा दुनूक लेल प्रश्न बनि ठाढ़ भऽ गेल। डा. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ जनम- अक्टूबर १९४८ई.मे। पिताक नाओं- स्व. सहदेव पाठक, माता स्व. माया देवी। गाम- लौफा, जिला- मधुबनी जिला (बिहार) छिटफुट रूपमे किछु कथा, कविता, यात्रा वृतांत आ विज्ञान लेख मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। प्रकाशित कृति- “विज्ञानक बतकही” (विज्ञान लेख संग्रह), आ “किछु तीत मधुर” (विदेश प्रवासक अनुभव पर आधारित यात्रा कथा।) खजाना गामक धिया-पुतामे हल्ला छेलै जे चैतू बाबूक अमेरिकन पोता एलखिन्ह अछि। अमेरिकन पोताकेँ आङनमे सभ गोटे पैडी कहि कऽ बजबै छेलै। सुनबामे एलै जे पैडी अपना पापा मम्मीसँ अंगरेजीएमे गप करै छेलै मुदा दादा दादीसँ कनी-मनी मैथिली बाजि लइ छेलै। पैडी जखनि पाँच बरखक छल तखने ओकर पापा मम्मी अमेरिका चल गेल छेलै। दुनू कम्प्यूटर इंजीनियर। अमेरिका जेबासँ पहिने ओ दुनू बंगलोरमे नोकरी करै छेलथि। तखनि पैडी दू तीन बेर गाम आएल छल। अमेरिका गेला बाद पहिल बेर चारि सालपर पैडी गाम आएल। पैडी माने प्रद्युम्न। पैडी नाओं तँ अमेरिकामे पड़लै। बच्चामे जखनि प्रद्युम्न गाम आबए तँ बंटी आ सोनूक सङ खेला धुपा लइ छल। सोनू ओकर नाओं राखि देलकै पद्दू। बजबैमे हल्लुक नाओं छेलै। ई नाओं सुनि कऽ प्रद्युम्नकेँ अपना तँ किछु नीक बेजाए बुझैमे नै आएल छेलै मुदा बंटी खूब हँसल छेलै। बंटीक हँसलापर ओ किछु आश्चर्यसँ पुछने छेलै जे कोन बातपर ओ सभ हँसलक मुदा ओ सभ अनठा देने छेलै। ऐ बीच पैडी बहुत बदलि गेल छल। ओ हरदम अपन कम्प्यूटरमे व्यस्त रहै छल। सोनू आ बंटीकेँ बहुत इच्छा छेलै ओकरा सङ खेलेबाक आ अमेरिकाक बारेमे किछु बुझबा सुझबाक, मुदा चैतू बाबूक दलानपर जा कऽ घूरि आबए, पैडीकेँ अंग्रेजीमे बजाओत कोना से बुझले नै छेलै। ओकरा सभकेँ ईहो नै बूझल छेलै जे पैडीकेँ चारि साल पुरान सङी आ ओकरा सबहक गप मोनो हेतैक की नै। आ फेर ओ एतुका गमारू बच्चा सबहक सङ मेल-जोल करब ठीक बूझत की नै। ओना साफ सुथरा तँ दुनू गोटे छल आ कपड़ो लत्ता ठीके ठाक छेलै मुदा एकटा अमेरिकन लग जेबामे धाख होइते छेलै। अही गुनधुनमे जखनि सोनू आ बंटी दलानक चक्कर लगबै छल तखनि एक बेर चैतू बाबू बजा लेलखिन्ह। दुनू डेराइते लग गेल। चैतू बाबूक पुछलापर अपन अभिप्राय कहलकन्हि जे ओकरा पैडीसँ अमेरिकाक बारेमे किछु गप करबाक छेलै। ई बात चैतू बाबूकेँ नीक लगलन्हि कारण ई गौरवक बात छेलै जे हुनकर पौत्र अमेरिकासँ एलखिन्ह आ आन बच्चा सभ ओकरासँ किछु सीखए चाहै छल। ओ पैडीकेँ बजाए सोनू आ बंटीसँ परिचय करा देलखिन्ह। तखनि पैडीकेँ अपनहि पुरान बात सभ मोन पड़ए लगलै आ ओइ दुनू गमारू बच्चाकेँ अपन मित्र स्वीकार करबामे कोनो हर्ज नै बुझेलै। दलानेपर पैडी बैस गेल दुनूक सङ। कम्प्यूटर तँ सङमे छेलैहे। ओतुका स्कूलक बारेमे ओ बंटी आ सोनूकेँ बता रहल छल। कम्प्यूटरमे स्टोर कएल स्कूलक फोटो, क्लास रूमक फोटो, लाइब्रेरीक फोटो आदि देखा सेहो रहल छल। सोनू आ बंटी धियानमग्न भऽ कऽ सुनि रहल छल, लगै छेलै एक एकटा शब्द पीब जेबाक चेष्टा कऽ रहल हो। ओकरा दुनूक लेल ई सपनाक दुनियाँसँ कनियोँ कम नै छेलै। एतबेमे चैतू बाबू टॉर्चक दूटा खराप बैटरी लेने एलखिन्ह आ जुमा कऽ दलानक बाहर फेक देलखिन्ह। मुदा ओ खसलै हत्ताक भीतरे आ पैडीक नजरि ओइपर चल गेलै। ओ आश्चर्यसँ जेना चिचिया उठल “दादाजी, बैटरी एना किएक फेकि देलिऐक?” चैतू बाबू हरान जे ई बच्चा टोकलक कोन कारणें। सोनू आ बंटी सेहो हरान। बैटरी फेकब ओकरा सबहक लेल कोनो अजगुत बात नै छेलै। बंटी पैडीकेँ बुझबए लागल- “गाम घरमे लोक खराप बैटरी तँ अहिना यत्र कुत्र फेकि दइ छै। ओतबे नै आब तँ लोक खराप मोबाइलो अहिना कतहु फेकि दइ छै। यदि चौक दिस चलब तँ हम फेकलाहा मोबाइल देखा देब”। आब पैडीक आश्चर्यक ठेकाने नै। ओ सोचए कोना अमेरिकामे ओकरा सभकेँ बैटरी, मोबाइल फोन अथवा अन्य कोनो इलेक्ट्रॉनिक कचराकेँ फेकबाक तरीका बुझाैल जाइ छेलै आ कतए ई लोक सभ जिनका लेल एहेन वस्तु फेकबाक कोनो ठेकाने नै। दादाजीकेँ तँ ओ नै किछु कहलक मुदा सोनू आ बंटीकेँ बुझबए लागल अपना स्कूलमे कराैैल गेल “सेलफोन रीसाइक्लिंग अभियान” के बारेमे। ऐ प्रोग्राममे बच्चा सभ घरे घरे जा कऽ खराप मोबाइल फोन, आइपॉड आदि माँगि कऽ स्कूलमे जमा केने छल। ओइमे करीब एक तिहाइ तँ टीचर सबहक सहयोगसँ मामूली मरम्मति केलापर काज करए लागल छेलै आ बाकीकेँ एकटा कम्पनीकेँ बेचि देल गेल छेलै। ऐ अभियानमे स्कूलकेँ करीब दू हजार डॉलरक आय भेल छेलै। पैडीक कम्प्यूटरमे एहू अभियानक फोटो छेलै जे ओ सोनू आ बंटीकेँ देखा देलकै। सोनू आ बंटी तँ किछु बुझिए नै रहल छल जे खराप मोबाइल कियो किएक किनतैक आ ओकर की करतैक। पैडीक कम्प्यूटरमे इंटरनेट तँ छेलैहे, ओ “स्टोरी ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स” आ “ईक्को वर्ल्ड” नामक दूटा विडियो दुनूकेँ देखा देलकै। एमहर चैतू बाबू सेहो कनी चिन्तित भेला। गाम घरमे खराप बैटरी तँ अहिना लोक फेकि दइ छेलै। ई काज एना नै करबाक चाही तेकर धियान केकरो ने छेलै। ने हुनका बूझल छलन्हि आ ने ओ अपना बेटा बेटीकेँ कहियो बुझेलखिन्ह। आ अमेरिकामे रहि कऽ हिनकर पोता तँ सत्तेमे ज्ञानी भऽ गेलन्हि। ओ आङन जा कऽ अपन बेटा मनोजकेँ बैटरी फेकबाक आ पैडीक प्रतिकार करबाक बात सुना देलखिन्ह। मनोज हुनका बुझेलकन्हि जे पैडी ठीके कहै छल। आब तँ बंगलोर पर्यन्तमे ऐ तरहक निअम लागू भऽ गेलैक अछि। विभिन्न प्रकारक कचरा लोककेँ घरेमे छाँटि कऽ दू अथवा तीन तरहक पैकेटमे राखि देबए पड़ै छै। भनसा घरक कचरा अलग, कागज प्लास्टिक अलग, इलेक्ट्रॉनिक कचरा अलग। से नै केलापर कचरा उठेनिहार अहाँक घरक कचरा लेबे नै करत। सभ कॉलोनीमे ऐ तरहक व्यवस्था लागू भऽ गेलै अछि, विभिन्न प्रकारक कचराक लेल पैकेट बना कऽ घरे घरे पठा देल गेलै अछि। तेकर बाद सभकेँ चाँकि जगलै। पैडी जतए सोनू आ बंटीकेँ इलेक्ट्रॉनिक कचराक महत बुझा रहल छल ओतए दादा दादी सेहो आबि कऽ बैस गेलखिन्ह। पैडी लजा गेल आ अपन बात बन्द कऽ देलक। तैपर चैतू बाबू ओकरा प्रोत्साहित करैत कहलखिन्ह जे आइ पहिल बेर हुनका ज्ञान भेलन्हि आ सभटा बात सुनबा लेल बैसला अछि। तखनि पैडीकेँ कनी धाख छुटलै। ओ सभकेँ बुझबए लागल। बैटरी आ इलेक्ट्रॉनिक कचरामे लेड, कैडमियम, मरकरी आदि हानिकारक तत्व रहै छै। यत्र कुत्र फेकि देलापर ओ तत्व सभ माटिमे आ जलक स्रोतमे मिलि जाइ छै। ओतएसँ फेर माटिमे उपजल अनाज अथवा तरकारी आदिमे पहुँच जाइ छै आ फेर भोजन द्वारा लोकक शरीरमे। इलेक्ट्रॉनिक कचरामे आनो एहेन विषाक्त पदार्थ सभ रहै छै जे पर्यावरणक लेल हानिकारक छैक। ई तँ भेल एकटा बात। दोसर आ बेसी महतपूर्ण बात अछि इलेक्ट्रॉनिक कचरामे बहुमूल्य धातुक उपस्थिति। कोनो इलेक्ट्रॉनिक सामान, जेना मोबाइल फोन, आइपॉड, कम्प्यूटर, टीवी, सीडी प्लेयर आदिमे पर्याप्त मात्रामे सोना, चानी आ ताम रहै छै जेकरा उचित प्रक्रिया द्वारा फेर प्राप्त कएल जा सकै छै। एहेन बहुत रास कम्पनी आब काज करए लगलैक अछि जे लोकसँ इलेक्ट्रॉनिक कचरा कीन लैत अछि आ ओकरा रसायनिक विधि द्वारा परिस्कृत करि कऽ ओकर सोना, चानी आ ताम बहार कऽ लैत अछि। पैडी इंटरनेटसँ ताकि कऽ दिल्ली, पूना आ बंगलोरमे काज करैत एहेन कम्पनीक नामो हुनका सभकेँ बता देलक। पैडीक दादा, दादी आ सोनू, बंटीक आश्चर्यक ठेकाने नै। विश्वासे नै भऽ रहल छेलै मोबाइल फोनमे सोना चानी भरल रहै छै। बंटी तखने दौग गेल आ रस्ता कातमे फेकल मोबाइल उठा अनलक। पैडीकेँ कहलकै कनी देखा दइले। पैडी अपन बैग उठा अनलक आ ओइमे सँ छोटका स्क्रू ड्राइवर निकालि मोबाइल फोनक अंग प्रत्यंग खोलि देलक। एतेक होशियारीसँ ई काज केलक जे दादा दादीकेँ तँ छगुन्ता लागि गेलन्हि। हुनका विश्वासे नै भऽ रहल छलन्हि जे हुनकर पोता एतेक बुधियार आ होशियार भऽ गेलन्हि। सोनू आ बंटीक सामने छेलै मोबाइल फोनक पार्ट पुरजाक टुकड़ी सभ छिड़िआएल जाइमे केतेको ठाम सोना ओहिना चमकै छेलै। पैडी सभकेँ सुनेलक जे ई सोना देखबामे बहुत थोड़ लगै छै मुदा ओ इंटरनेटमे एक ठाम पढ़लक जे एक लाख एहेन मोबाइल फोनमे छैक करीब अढ़ाइ किलो सोना, 25 किलो चानी आ 900 किलो ताम। सोनू आ बंटीक आँखि जेना पसरले रहि गेलै। एतेक पैघ खजाना! आ तेकरा अबूझ लोक बाट घाट खेत पथारमे फेकि दैत अछि। लगै छेलै जेना अलीबाबाकेँ चोर सबहक खजानाक कुंजी भेटलै तहिना बंटी आ सोनूकेँ पैडीक सङ गप केलापर ई नव खजाना भेटलै। सोनूक मोन ललचा गेलै। ओ पुछलक- “पैडी, तोरा एतेक बात बूझल छौ। यदि हम सभ अपनहिं मोबाइल कि आनो कोनो इलेक्ट्रॉनिक कचरासँ सोना चानी बहार कऽ सकी तँ फेर एकरा अनका बेचबाक काजे नै। आमदनी सेहो नीक होएत”। पैडी किछु सोचि कऽ जवाब देलकै- “बेसी विस्तार तँ हमरा नै बूझल अछि, मुदा टीचर सभ बजै छलखिन्ह जे ई काज सभ नै कऽ सकैत अछि कारण ऐमे पर्यावरणपर प्रभाव पड़ै छै। अमेरिकमे इ-स्टेवार्ड नामक संस्था सभ ई काज करै छै।”। ई विचार चैतू बाबूकेँ नीक लगलन्हि। ओ सोनूकेँ कहलखिन्ह जे इ-स्टेवार्डक काज करबाक तरीका ओ सीखता आ बैंकसँ लोन लऽ कऽ एकर कारखाना गामेमे लगेता। ई विचार सभकेँ नीक लगलै। पैडीक खिस्सा सुनि कऽ बंटी आ सोनूकेँ सेहो ज्ञान भऽ गेलै। ओ दुनू तखने निर्णए लेलक जे ऐ बातक प्रचार अपना स्कूलमे तँ करबे करत आ गाममे सेहो सभकेँ बुझेतैक। चैतू बाबू ऐ काजमे ओ दुनू बच्चाक सहयोग करबा लेल तैयार भऽ गेलखिन्ह। आब गाममे इलेक्ट्रॉनिक कचराक संग्रह कएल जाएत। जाबत कारखाना नै लगलैक अछि ताबत ई सामान दिल्ली पूना बंगलोरक कोनो कम्पनीकेँ बेचल जाएत। जे टाका भेटतैक से गामक बाल कल्याण कोषमे जमा कऽ देल जेतैक। पैडी एके सप्ताह गाममे रहल मुदा अपना बुद्धिसँ गामकेँ बदलि देलक आ लोककेँ भेटि गेलै एकटा खजाना। लक्ष्मी दास जनम- लगभग ५० बरख पूर्ब। पिताक नाओं- स्व. फन्न दास, माता- रेशमा देवी। गाम-बेरमा, पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी। जीविकोपार्जन- कृषि। दुष्टपना एते उमेर बितलो पछाति दुश्मनीसँ आगू नै बुझै छेलिऐ जे ऐबेर बुझलिऐ। बुझलिऐ ई जे दुश्मनीसँ आगू दुष्टपना होइ छै। पौन दर्जन धिया-पुता रहितो, कम आँट-पेटक किसान रहितो, गामेमे रहै छी तँए, मिथिवासी कियो अछि तँ हमहूँ छी। मिथिवासी होइक नाते अपनापर गर्व अछि। तीन कट्ठा बैशाखा सजमनिक खेती केने छेलौं, शुरूक तीन हाटमे सोलह सए रूपैआक बिकाएल छल। ओना आइ धरिक जिनगीमे सभसँ नीक सम्हरल खेती छल। बीस बर्खसँ ऊपरेसँ तरकारी खेती करै छी। गामक किछु नवतुरिया सौंसे खेतक लत्तीओ काटि देलक आ फड़ सभकेँ जेना देवालयमे कुमहरक बलि पड़ै छै तहिना सौंसे खेतक फड़केँ हँसुआसँ काटि-काटि ओंघरा देने छल। आने दिन जकाँ भोरे जखनि खेत पहुँचलौं तँ जजातिक दशा देखि ठढ़भस लगि गेल। ने आगू डेग उठए आ ने पाछू, बोल हेरा गेल वकार बन्न भऽ गेल। मुदा सौनक बून जकाँ आँखिसँ नोर ठोपे-ठोप खसैत रहए। दुनू हाथे छातीकेँ दाबि करेजकेँ थीर करैत सौंसे खेत घुमलौं। देखला पछाति मन मानि गेल जे दुष्ट सभ बाल-बच्चाक मुँहमे जाबी लगौलक। आने-आन जकाँ हमरो श्रमबल चोरि कऽ नष्ट केलक। मोबाइलसँ जेठका बेटा- जे शिक्षक अछि,केँ फोन करैत कहलिऐ- “बौआ, सजमनिक खेती चलि गेलह!” ओकर माए सेहो सुनैत। सभ बात तँ वेचारी नै सुनि पेली मुदा ‘सजमनि’ जरूर सुनलनि। धड़फड़ाइते साइकिल पकड़ि बेटा विदा भेल। बेटाक धड़फड़ी देखि चौथाइ दर्जन धिया-पुता सङ पत्नीओ पएरे विदा भेली। खेत देखि बेटा पुछलक- “बाबू, केकरोसँ दुसमनी नै अछि। तखनि एना किए केलक?” हमरा लग कोनो जवाब नै छल जे बेटाकेँ दैतिऐ, चुपे रहलौं। तही बीच पत्नीओ खेत पहुँच गेली, देखिते छाती पीट-पीट घैना करए लगली- “हौ डकूबा भगवान, सभ कुछ रातिमे हेर लेलह!” बोल-भरोस दैत परिवारक सभकेँ कहलिऐ- “अपन हाथ-पएरक आशा रखै जाह। चोर चोरे रहतै, साउध साउधे रहतै। जँ लौका चोरौने साधुओ चोर भऽ जइतै तँ साधुक बीआ उपटि गेल रहितै।” गाममे चौक अछि। दस रंगक दोकानो छै, जइसँ दसटा दस रंगक लोको रहिते अछि। चौकपर अबैसँ पहिने अगुरबारे समाचार पहुँच गेल। किछु गोटे खेतो जा-जा देखलक। मुदा चौकक मुँह चौबगली बूझि पड़ल। थाहे ने लागल जे चौकक असल मुँह केमहर छै। कियो बजैत- “सजमनि तोड़ि लैत तँ तोड़ि लैत, लत्ती किए कटलकै?” कियो बजैत- “फड़ कटलकै तँ कटलकै, कुमहर जकाँ टुकड़ी-टुकड़ी किए केलकै?” सुनि-सुनि छगुन्ता लागए जे जे चोरिक सङ गरदनिकट्टी सेहो केलक। ओ सोलहन्नी चोर नै भेल। फेर दोसर दिससँ हवा झोंकलक- “दुसमनीसँ केने हएत।” मुदा टटका दुश्मनी केकरो सङ नै भेल अछि। तखनि एहेन किए केलक। की सतयुगे त्रेतामे दुष्टो फड़ै छेलै आ दुष्टपनो होइ छेलै। आ कलयुगमे ओकर बीए सूखि गेलै। मुदा भाँजपर चोर चढ़बे ने कएल नै तँ आचार संहिताक शक्ति देखै दैतिऐ। डा. शिव कुमार प्रसाद जनम- १२ नवम्वर १९५६ई.मे। पिताक नाओं- स्व. निर्धन प्रसाद, माता- स्व. यमुना देवी। गाम- सिमरा, पोस्ट– सिमरा, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, बिहार। अदिया एकटा गाममे छोट-छिन परिवार छल। ओइ परिवारमे एकटा नेनाक जनम भेल। माए-बापक आँखिक तरेगन। शरीरसँ लक-लक। ओकर सौंसे देहक हाड़ गनल जा सकैत छल। मुदा आँखिमे तेज दप-दप करैत रहै। धीरे-धीरे ओ पैघ भेल। नेनाक माथमे केतेक बात सन्हियाएल छल तेकर हिसाब करब असान नै छल। नेनाक माए-बाप कुटौन-पिसौन आ मजूरी कऽ कहुना गुजर करैत छल। अपन एक मात्र नेना लेल दुनू परानी दिन-राति सौचैत रहैत छल। आब नेना विद्यालय जेबाक योग भऽ गेल। माए-बाप ओकरा पढ़बैले गुन-धुनमे लागल छल। संयोगसँ गामेमे एकटा चिमनी-भट्ठा खुगलै। नेनाक बाप गामक आन मजूरक सङ भट्ठापर गेल। भट्ठाक मुंशी ईटा बनबैले मजूर सभकेँ नाओं लिखैत छल आ किछु-किछु टका दऽ एकटा आदमीक सङ जमीन देखबैले भेजने जाइत छल। नेनाक बाप मुंशीसँ पुछलकै- “हमरा लेल कोनो काज नै छै मालिक?” मुंशी पुछलकै- “तों की करबह। ईटा पाथल नै तेतह।” ओ बाजल- “नै मालिक हम तँ मजूरी करै छेलौं। मजूरीबला कोनो काज...।” मुंशी बाजल- “माथपर ईटा ऊघल हेतह?” “हँ मालिक, ई तँ भऽ जेतै।” मुंशी बाजल- “ठीक छह, तों काल्हि आबह। मालिक सेहो काल्हि एतहिन। अखनि चिमनी बनतै। भट्ठा बनतै। मजदूरक जरूरी तँ छइहे।” नेनाक भागसँ ओकर बापकेँ भट्ठापर मालिक महिनवारीपर रखि लेलखिन। अपन ओकातिसँ ओइ नेनाकेँ माए-बाप एकटा छोट-छिन विद्यालयमे नाओं लिखबा देलकै। टीनबला रिक्शापर बैस नेना विद्यालय जाए लगल। गाम-घरक आनो-आनो घरक बच्चा ओही स्कूलमे पढ़ैत छेलै। सभसँ कातमे दुबकल ओइ बच्चाकेँ देखि कऽ कोइ सोचिओ नै सकैत छल कि ओइ बकुटा भरिक बच्चामे खाली बुधिएटा भरल छै। विद्यालयमे एक बरख पुड़ैत-पुड़ैत ओ नेना देखार होमए लगल। माए-बाप, दादा-दादीक सङे-सङ सर-समाजक जेतेक लोक छल, ओइ बच्चाक बात सुनि-सुनि ओकर मुहोँ तकैत रहि जाइत छल। केकरो-केकरो तँ बिसवासे ने होइ जे अखनि ओ जे बाजल से ओकरे मुहसँ बात निकललै वा कोनो आन मुहसँ। आब जखनि ओइ नेनाकेँ विद्यालयमे नाओं लिखा गेलैक तँ कोनो नामो तँ हेबक चाही। ओकर नाओं राखल गेल आदित्य। मुदा ओ कोनो बड़का बापक बेटा थोड़े छेलै। गामसँ विद्यालय धरि ओ भऽ गेल ‘अदिया’। अदिया माने आदी वा आरम्भ। अपने सभ जे अनुमान करी। हमरा तँ लगैत छल जेना ओ सच्चोमे आदी होमए। ऊपरसँ सुखल-पुखल भीतरसँ रसगर। मुदा रस केतए तँ आदीए सन कठगर रेसादार गीरहक समग्र भागमे सन्हियाएल। आब सुनू ओकर आगूक खिस्सा। विद्यालयक सभ गुरुजीकेँ ओकरापर सए प्रतिशत बिसवास। कोनो विषयक गुरुजीकेँ सेहन्ते लागल रहलनि जे ओकरा कहियो दबारितथि। बेंचपर ठाढ़ करब तँ बहुत दूरक बात छल। सभटा बड़-बढ़ियाँ। परीक्षा होइत गेल। मासिक, त्रेमासिक, छमाही आदि। आब वार्षिक परीक्षा हएत। अदिया चिंतामे फँसल। “गुरुजी, हमरा सभ परीक्षामे कम नम्बर किएक अबैत अछि।” ई बात अपन गुरुजी सभसँ ओ पुछैत रहल मुदा कोनो गुरुजी ओकरा सही उत्तर नै दइ छेलखिन। अदिया मन मारि कऽ माए लग आबि पुछलकै- “माए गइ, हम फस्ट नै कऽ सकै छी की?” माए बुझबैत कहलखिन- “बाउ, खूम मन लगा कऽ पढ़ू। फस्ट करि कऽ की हेतै अगर ज्ञाने ने हएत।” अदिया कहैत छल- “माए गइ, हमरा वर्गमे जे फस्ट करैत अछि अेकरा तँ हमरो एतेक नै अबै छै। सर सभ तँ सब दिन ओकरा बेंचेपर ठाढ़ केने रहै छन्हि। फेर नम्बर केना पबैत अछि?” विद्यालयमे वार्षिक परीक्षा भेल। अदिया वर्गमे फस्ट नै केलक। ओ तेसर स्थानपर आएल। फेर वएह सरलहबा फस्ट कऽ गेलैक। अदिया जखनि परीक्षाक रिजल्ट सुनलक तँ हँसए लगल। ओकरा सङे आनो साथी हँसैत रहल। ओ जखनि गामपर आएल तँ माएसँ कहलक- “माए गे, अहूबेर वएह सरलहबा छौड़ा फस्ट कए गेल। जाए दही, मास्टर सभकेँ लाजो ने होइ छै। ओकरा केना फस्ट करा दइ छै। हमरसँ तँ ओकरा अदहो विषय नै बूझल छै।” गुरुजीक खिधांस सुनि माए दुखी भऽ गेली। ओ अदियाकेँ बुझबैत कहलखिन- “बाउ, मास्टरक विषयमे एहेन बात नै बाजी। मास्टरसँ ऊपर संसारमे कियो नै होइ छै। हुनक आदर करी। तखने अहाँकेँ विद्या औत।” अदियाकेँ अपन गल्तीक भान तुरंत भेलै। बाजल- “हँ गइ माए, हमरासँ गल्त्ी भऽ गेल। हम काल्हि सभ सरसँ माफी मंगबनि।” अदिया बढ़ैत गेल। आब पैघ सेहो भऽ रहल अछि। टिनही रिक्शासँ साइकिलपर सवार भऽ विद्यालय जाइत अछि। वर्गमे तेसर-चारिम स्थान अनितौं ओ खुश अछि। एकटा गुरुजी अदियाकेँ एकान्तमे बजा कऽ बता कहलखिन- “बाउ, अहाँ विद्यालयक रिजल्टकेँ चिंता जुनि करू। बोर्डक परीक्षामे अहीं फस्ट करब। ऐ बातक गिरह बान्हि लिअ।” दशमी परीक्षाक तैयारीमे सभ विद्यार्थी लागल अछि। अदिया सेहो यथासाध्य अपने अथवा सङी-साथीक मददिसँ तैयारीमे लागल अछि। अदियाकेँ दिन-रातिक होश नै। बोर्डक परीक्षा जिला मुख्यालयमे छै। अदिया एगो सङी सङे एकटा डेरा ठीक केलक। माएक जी हराएल छै। बाप साइकिलसँ पहुँचा गेल। अदिया बापकेँ प्रणाम कऽ असिरवाद लेलक आ बाबू गामपर घूमि एला। अदियाक परीक्षा शुरू भेल। अदिया सभ दिन परीक्षा दऽ खुशी-खुशी डेरापर अबैत छल। आइ परीक्षाक अन्तिम दिन अछि। अदिया परीक्षा दऽ अपन गर्वसँ निकलल। विद्यालयक ओसारिपर वर्गमे प्रथम स्थान आनए बला लड़का ठाढ़ छल। ओ अदियाक हाथ पकड़ि परीक्षा केन्द्रक गेटसँ बाहर भेल। गेटसँ बहराइते ओकर आँखि डबडबा गेलै। अदिया ओकरासँ पुछलकै- “परीक्षा खराब भऽ गेलौ की?” ओ विद्यार्थी बाजल- “हमर परीक्षा तँ ओही दिन खराप भऽ गेल जइ दिन हम विद्यालयक परीक्षामे फस्ट केलौं। ऐ परीक्षामे अहाँ प्रथम आएब। हम अखने अहाँकेँ वधाई दइ छी। ऐ जिनगीमे ने हम अहाँक बरबरि छेलौं ने आब भऽ सकब।” आदित्य किछु कहितै तइसँ पहिने ओ विद्यार्थी दाबि फफकैत विद्यार्थीक भीड़मे सन्हिया गेल। दुर्गा नन्द मण्डल जनम- २ जनवरी १९६५ ई.मे। गाम- गोधनपुर, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार)। पिताक नाओं- श्री रामदेव मण्डल, माता- श्रीमती भालसरी देवी। शीघ्र प्रकाश्य- कथा कुसुम (लघु/विहनि कथा संग्रह) बुधि- गामक बूढ़, पीपरावाली काकी, माथक केस सोन सन उज्जर धप-धप। आँखि भुमकमक दराड़ि जकाँ धँसल। बत्तीसीसँ हाँसील गोल। गिनती लेल दूगो दाँत देखार छल। मुदा चेतना पूर्णरूपेण। पेशाब-पैखानक ज्ञान पुरा-पुरी छन्हि। लाठी हाथे तिकोण भऽ चलै छथि। मुदा गप एक्कोटा ने लटपटाइ छन्हि। गाम-घरक आ टोला-पड़ोसाक लोक सभ पीपरावाली काकीकेँ नीक खिस्सकरि, गीतगायन आ विधकरीक रूपमे जनै छन्हि। मिथिलाक माटि-पानिसँ जूड़ल सभ विध-बेवहारसँ लऽ कऽ टोना-टापर आ अरिपन-पीढ़ी आदि देबमे सिद्धस्त मानल जाइ छथि। पैरुख घटने पीपरावाली काकी माय-सँ-दाय भऽ गेली। आनो-आनो समैमे धिया-पुता सभ पीपरावाली काकी लग खिस्सा सुनैले घूर लगौने रहैए। गरमी-गुमारमे तँ अरबधि कऽ। एक दिनक गप छी। काकी अपना जौत-भुटबा जे वर्ग आठमे गामेक स्कूलमे पढ़ैए काकीकेँ खिस्सा सुनबैले जिद्द पकड़ि लेलक- “काकी गइ, एकटा नीक खिस्सा सुना। काल्हि जे स्कूल जेबै तँ मास्सैब सुनतै। काल्हि शनि छिऐ। मास्सैब कहने छथिन जे भुटबा काल्हि एकटा खिस्सा सुनबए पड़तौ। से काकी एकटा खिस्सा कही ने।” काकी कहलखिन- “केहेन खिस्सा सुनमेँ से तँ कह।” भुटबा बाजल- “काकी, नीक खिस्सा कही बुधि-ज्ञानबला जे स्कूलमे सुनाबए पड़तै। कोनो राजा-महराजाबला नै तँ सोनपड़ीबला कही।” काकी शुरू केलनि खिस्सा- “एक नगरमे एकटा राजा रहै छला। राजाक राजमे कथुक कमी नै। सगतरि सुख-शांति बनल रहै छेलए। राज भरिमे ने केकरोसँ कोनो दुश्मनी आ ने बाड़ि। सभ एक-दोसराक सहयोगी। केकरो कोनो चीजक दुख-तकलीफ नै। सौंसे राजमे अमन-चैन छल...।” काकी कनी रूकैत आगू कहए लगलखिन- “एक दिनक गप छी। राजाक छोटकी बेटी असलान करैले राज-महलसँ बाहर ढयोढ़ीमे खुनाएल पोखरि जेकर चारूकात फुलवाड़ी छल तइमे अपन नौरी-खबासीनीक सङ गेल। असलान करैकाल अपन सभ कपड़ा उतारि निच्चाँ जमीनपर रखलक आ गरदनिक हिराक हार एकटा फूलक डारिपर लटका देलक। राजाक बेटी असलान-धियान कऽ कपड़ा पहिरि नौरी-खबासीनीक सङ राज दरबारमे चलि गेल। मुदा गरदनिक हीराक हार बिसरि गेल। ओ हार ओही फूलक डारिपर लटकल रहि गेल। दिन बीति गेलै। लूकझूक साँझक बेरमे घोड़सारक नोकरक नजरि ओइ हारपर पड़ल। किएक तँ दिन भरिक काज-उदमक बाद ओ नौकर हाथ-पएर घोइले ओही पोखरिमे गेल। नोकरबा ओ हार लऽ नुका कऽ रखि लेलक। परात भने ओकर खोज-खबरि शुरू भेल। मुदा कियो गछबे ने करै जे हम लेलौं। राज भरिमे ढोलहो पड़ल। मुदा कोनो लाभ नै। राजक बेटी ओइ हार लेल सोगा गेल। दिन एक बितल, दोसर बितल। मुदा कोनो थाह-पता नै। एमहर राजाक बेटी सोगाएल बिछौन पकड़ने। राजा मंत्रीकेँ बजौलनि। सभा लागल। दबारक सभ सभासद् एकठाम बैसला। राजाकेँ किछु ने फुड़नि। अंतमे मंत्रीजी बुधि बतबैत कहलखिन जे राजा साहैब चिन्ता जुनि करू। राजकुमारीक हार चौबीस घंटाक पेसतर भेट जाएत। काल्हि पुन: दरबारक सभ कर्मचारीक सङ प्रजाकेँ सेहो बजौल जाए। सएह भेल। राजाक आदेशानुसार राज दरबारक सभ कर्मचारी आ प्रजागण उपस्थित भेल। राजा फेर एकबेर सभकेँ पुछलखिन। मुदा हारक चोरिक विषएमे कियो ने बाजल...।” भुटबा बिच्चेमे पुछलक- “तब की भेलै?” काकी आगू कहए लगलखिन- “पश्चात मंत्रीजी बजला जे ठीक छै कोनो बात नै राजा साहैब। से नै तँ उपस्थित कर्मचारी-दरबारीक सङ प्रजागण अपने सभ ऐ ढेरीमे सँ एक-हकटा लाठी लिअ। आ धियान राखब जे जे कियो राजकुमारीक हार लेलिऐ बा चोरौलिऐ तेकर लाठी रातिमे एकहाथ नमहर भऽ जाएत। सभ कियो एक-हकटा लाठी लेलक। घोड़सारक नोकर सेहो एकटा लेलक। हार तँ ओ घोड़सारक नोकरबे लेने रहए। से नै तँ ओकरा भेलै जे हम तँ काल्हि चोरीमे पकड़ाइए जाएब। तइ खातीर ओ अपन लाठीकेँ ऊपरसँ एक हाथ नापि कऽ काटि देलक। परात भेने पुन: दरबार लगल। सभ अपन-अपन लाठी लऽ दरबारमे पहुँचल। सबहक लाठी भजारल गेल। घोड़सारक नोकरक लाठी आन सभ लाठीसँ एक हाथ छोट छल। ऐ तरहेँ ओकर चाेरि पकड़ा गेलै। राजा ओकरा आर्थिक जुरबानाक सङ छह मासक जहलक सजा दऽ देलखिन। एे तरहेँ राजकुमारीक हार भेट गेलै। राजा आ प्रजा सभ खुश। राजा खुश भऽ कऽ मंत्रीकेँ इनाम देलखिन। राजाक सङ रानी आ राजकुमारी खुश। सङे सभ सभासद् सेहो। से बुझिलीही रौ भुटबा जे कोन तरहेँ मंत्री चोरकेँ पकड़लक? एकरे कहै छै बुधि!” भुटबा छल चूप। किएक तँ ओ खिस्सा सुनैत-सुनैत ओङहा गेल छल। राम विलास साहु जनम- ०१ जनवरी १९५७ई.मे। पिताक नाओं- स्व. नशीवलाल साहु, माता- मसोमात कैली देवी। गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) पिन नं.- ८४७१०८, मोबाइल- ९९५५८०२५२२ प्रकाशित कृति- रथक चक्का उलटि चलै बाट (पद्य संग्रह) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। बाल-बोध दुखीलालकेँ दुखक पहाड़ माथसँ कहियो निच्चाँ नै भेल। बूढ़ माए-बापक सेवा टहल, तैपर सँ दूटा भलढ़ेरबा बेटी, छोट-छोट दूटा बेटा, पत्नी आ अपने कुल आठ बेक्तीक परिवार। पत्नी- फुलिया- परिवारक काजमे पिसाइत छेली। सासु-ससुरक टहल-टिकोरा आ सेवासँ पलखतिए नै। ऊपरसँ एकटा पोसिया गाए, एकटा भजैतिया बरद। मुदा दुनू बेटी चठेलगरि आ हुनरगरि छन्हि। घरक कमौआ दुखीलाल असकरे दिन-राति फिरिशान रहैए। घरक खर्चा पुग्बे ने करैए जे पलखति मारत। खेतीओ-पथारी कम्मे भेने जने-बुत्तापर घरक खर्चा चलैत अछि। जखनि खेनाइओ-पीनाइओमे ढनसने तखनि बेटा-बेटी पढ़त केना? बर्खक पेसतरे दुखीक माए लकबा रोगसँ मरि गेली। पछाति बूढ़ बाप सेहो रोगसँ रोगा-सोगा दम तोड़ि देलकनि। श्राध-कर्म आ भोज-भात कर्जे हाथे भेल। दुखीलालकेँ एक-सबा कट्ठा डीह, तीन कट्ठा चौमास आ छह-सात कट्ठा तीन-फसिला खेत छन्हि। जइसँ छह मास परिवारक गुजर चलै छन्हि। जन-मजदूरी कऽ शेष छह मास बितबैत अछि। मुदा अखनि तँ चौमास आ तीन-फसिला खेत दस हजारमे डेढ़ा सूदिपर भरना लगि गेल अछि। तैपर सँ दूटा बेटीक बिआहक अलगे। दुनू बेटा अखनि बाल-बोध! समस्या-पर-समस्या लदल जा रहल अछि। जँ चारि-पाँच साल खेत-भरना रूपैआक सूदि नै भरब तँ खेतो सूदिए तरे चलि जाएत। गाए बिकल चरबाहियेमे कहबी सन हएत। एक दिन दुखीलाल बैसारीए छल। किछु सोचैत छल आकि मनमे उपकलै खेतक भरना। जइ खेतसँ हमर बाप-दादा परिवार चलबै छला वएह खेत हमरो जीविका अछि। मुदा आब बूझि पड़ैए ओ खेत बिलटि जाएत। ऐ क्रममे सोचैत दुखीलाल टहलि मालिक प्रभूनाथ जीक दरबज्जापर पहुँचल। प्रभूनाथजी दुखीकेँ देखिते कहलखिन- “आबह दुखी, एमकी बहू दिनपर भेँट करए एलह।” दुखीलाल- “मालिक, अहाँसँ कथी छुपल अछि। एतेक दिनसँ माए-बापक कहुना रीन उतारलौं मुदा अपनेक रीन केना चुकाएब से फुड़ेबे ने करैए।” प्रभूनाथजी- “केना चुकेबऽ से तँ तोहर काज छिअ। तइले हम किए मगजमारी करब। साले-साले हमरा रूपैआक डौरहा सूदि बढ़ैत जेतह। पाँच सालक कराड़ी छह, नै चुकेबहक तँ खेत छोड़ह पड़तऽ।” दुखीलाल- “मािलक, एना नै ने बाजू। खेतक नाओं सुनि हमर करेजा फाटि जाइए। ई खेत हमर खनदानक पूजी आ इज्जति छी। अपना जीबैत हम केना बिलटए देब।” प्रभूनाथजी- “से तँ तूँ ठीके कहै छह। रूपैआक सूदि जोड़ि चुकता कऽ दहक आ अपन खेत छोड़ा लैह।” दुखीलाल- “मालिक, अहींक दरबारमे जन-मजुरी कऽ जीब लेब। रहल अहाँक रूपैआक सूदि, तइ एबजमे हम अपन दुनू बेटाकेँ अहीं ऐठाम नोकरी राखि दइ छी। बँचलोहो बासि-बेरहट खा जीब लेत आ अहूँक काज चलत। जाधरि अहाँक रूपैआक सूद-मूर नै सधत ताधरि अहींक दरबारमे नोकर बनि खटि देत। रूपैओक चुकता भऽ जाएत आ हमरो खेत छुटि जाएत।” प्रभूनाथजी- “कहलह तँ बड़ नीक। युक्तिओ तोहर नीमन छह मुदा...।” दुखीलाल- “मािलक ‘मुदा’ किए कहलौं?” प्रभूनाथजी- “मुदा ऐ दुआरे बजलौं कि तोहर बेटा दुनूकेँ तँ देखने नै छी। अबोध अछि आकि बाल-बोध ” दुखीलाल- “बल-बोध अछि। ठेकनगरि, एकबेर सेरिया कऽ बता देबै तँ दोसर बेर अढ़बए नै पड़त। देखिते-देखिते फुर्र-फुर्र काज कऽ देत। एक्को मिसिया असकतिया नै अछि।” प्रभूनाथजी- “बेस काल्हिए दुनूकेँ बजौने आबह। नैनसँ देखियो लेब आ काज करै जोकर अछि कि नै सेहो ठेकानि लेब।” दुखीलाल- “बेस मालिक, जाइ छी काल्हिए दुनूकेँ सङे नेने अबै छी।” दुखीलाल अपन कर्तव्यकेँ हीन बूझि चिन्तामे डूमि गेल। हम केहेन बाप छी जे बाल-बोध बेटाकेँ भोजन-बस्त्र-शिक्षा इत्यादि पूर नै कऽ अपने बेगरते नोकरी लगबै छी। बेटा-बेटी राजाक हुअए आकि गरीबक सभकेँ अपन सन्तान दुलरूआ होइ छै। जखनि नमहर-बुधिगर-ठकनगर हएत तँ की कहत! हमर बाप केहेन निष्ठुर छथि जे हमरा सङे एहेन अन्याय केलनि। मुदा हमरा लग रस्ते कोन अछि। दोसर कोन उपए लगा सकब। मोनक बात मोनमे रखैत हृदैकेँ सक्कत कऽ बिहाने भने पनिपिआइ करा सङे नेने प्रभूनाथ जीक दरबार पहुँचल। दुनू बाल-बोध भाए गांगी-जमुनी, देखैओमे बड़ नुनुआगर, उमेरो आठ-दस बर्खक। प्रभूनाथ जीकेँ मनमे भेलनि बड़ नीमन टहलू हएत। मुदा अनठबैत बजला- “दुखी दुनू बौआ तँ अखनि लेधुरिए अछि। हमरा ऐठाम कोन काज करत। ऐठाम तँ भीड़गर काज अछि।” दुखीलाल बूझि गेल जे मालिक हमरा टाड़ि रहल अछि। बाजल- “मालिक, छोट देखि झुझुआउ नै। घरक छोट-छोट सभ काज करत। गाए-बरदक कुट्टी-सानी, दरबज्जा, माल-जालक बथान आ गोहाल घरक झार-बहार करत। गोबर-करसी ढुल-ढालकेँ हटाएत। अहूँकेँ कियो टहल-टिकोरा करैबला नै अछि सेहो अपन समझि करत। अहूँ अपने पोता सन बेवहार करबै। घरे ने बदलि जेतै मुदा रहतै तँ गामेमे। अहाँ लग रहत तँ हम निफिकिर रहब। ओना हमहूँ तँ अबिते-जाइते रहब।” प्रभूनाथजी- “दुखी, तँू ने गाम-घरक बात करै छह। लोक तँ शहर जाइले गाम गमौने अछि।” दुखीलाल- “मालिक की कहब, लोक तँ चिड़ै भऽ गेल अछि। जेतै पेट भरै छै ओतै खोंता बना रहैत अछि।” प्रभूनाथजी- “से ठीके। हमरे बेटाकेँ नै देखै छहक। गाम-समाज छोड़ि हैदराबादमे रहैए। पावनि-तिहार तँ हम जाबै जीबै छी ताबे कहुना कऽ दइ छिऐ, नै तँ घरक देवताकेँ एक चुरुक पानिओ के देत।” दुखीलाल- “मािलक, छोड़ू दुनियाँ-दारीक गप-सप्प। हमरो काजपर जाइक अछि। और गप-सप्प दोसरो दिन हेतै। दुनू बाल-बोधकेँ सम्हारू।” प्रभूनाथजी- “दुखी, कनी आर बैसह। ई दुनू बौआ अनचिन्हार अछि। कनी बतिया लइ छी। नाओं बूझल रहत तँ समैपर समझा-बुझा देबै। नै तँ पोसो नै मानत। तँू तँ बुझबे करै छहक जे हमरासँ दुनू बौआकेँ खटपट तँ नै हएत मुदा हमर बुढ़ियाक सोभाव आ बेवहारकेँ तँ तूँ नीकसँ जनै छह, ओ मक्कै लाबा जकाँ दिन भरि फटफटाइते रहै छथि। तेहेन झनकाहि अछि जे केकरोसँ पटरीए ने खाइ छै। दिन-भरि पूजे-पाठमे लगल रहैए, दिनक भोजन राति आ रतुका भोरमे पाड़न करैए। जँ कियो लागिओ-भीड़ीओ देतै तँ कहत जे हमर सभ किछु छुबा गेल। एकबेर के कहए जे तीन-तीन बेर नहाएत आ गंगाजलसँ शुद्ध करत। बेटो-पुतोहु आ पोता-पोती जखनि अबैए तँ देखिते बनरनी जकाँ लड़िते रहैए। तखनि हमर जिनगी केहेन अछि से बिनु कहने बूझि गेल हेबह।” दुखीलाल- “मालिक, ई तँ घरक बात छी। ओइमे हम किए दखल देब। मनुखो कोनो एक्के रंगक होइए। लोक अपन सुख-दुखक सृजन अपने करैए। अपजश दोसरकेँ लगबैए।” बात समटैत दुखी दुनू बाल-बोधक दिस इशारा केलक। प्रभूनाथजी पुछलखिन- “बौआ, नाओं की छिअ?” दुनू भाँइ एक्के स्वरमे अपन-अपन नाओं बाजल- “बुधन-बेचन।” प्रभूनाथ- “मुँह सूखल छह। किछु खेबह?” दुनू भाँइ बाजल- “नै, पनिपिआइ कऽ लेने छी।” प्रभूनाथजी- “तोहर बापक कहब अछि जे दुनू भाँइ अहीठाम काज करत से करबहक ने?” बुधन- “हँ।” प्रभूनाथजी- “अपन काज कहुना सभ करैए मुदा बीरानक काज कियो करैए आ कियो नै करए चाहैए।” बुधन- “हम अपन आ बीरानमे नै बुझै छी। काज करब।” दुखीलाल बूझि गेल जे बात बढ़ि जाएत। बातकेँ सम्हारैत बाजल- “मालिक गरीबक बेटाकेँ कथी परीक्षा लइ छिऐ। जे कहबै से करत।अबेर भऽ गेल काजपर जाइ छी।” प्रभूनाथजी- “कनी दरमाहा फरिआ लैह जे पछाति कोनो मुहाँ-ठुठी ने हुअए।” दुखीलाल- “मालिक, दरमाहा की हेतै। अहाँसँ रूपैआ दस हजार नेने छी। सालमे पनरह हजार हएत। पँच-पँच सए रूपैआ महिनाक हिसाबसँ दुनू भाँइक एक हजार भेल। पनरह महिनामे अहाँक रूपैआ फरिया जाएत, नै मानब तँ एक मास बेसीए खटि देत। हमरो खेत छूटि जाएत। ने अहाँकेँ दिअ पड़त आ ने हमरा। दुनू भाँइ अहींक दरबारमे खाएत-पीअत काज अहाँक अनुकूल करत।” प्रभूनाथजी- “ठीक छै मानि लेलिअ। तँू तँ हमरोसँ तेज निकललह। हम तँ बाल-बोधक फेरमे अबोध बनि गेलौं।” ललन कुमार कामत जनम- १० मार्च १९८४, पिताक नाओं- स्व. रामचन्द्र कामत, माता- स्व. तारा देवी। गाम- ललमनियाँ, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल। स्कूलक फीस मानस तीन सालक छल तहिये माएक देहावसान भऽ गेलनि। पिताजी गामक मुखिया छथिन। समाजक कहलापर दोसर बिआह केलनि। लबकी कनियाँ थोड़-बहुत पढ़ल-लिखल, सोभावशील, विचारू आ सुन्दर भेलनि। तीन सालमे मुखिया जीकेँ दूटा सन्तान और भेलनि। चन्दन आ नन्दन। नन्दनक जन्मक छह मासक पछाति मुखियाजी स्वयं भगवानक प्रिय भऽ गेला। एकबेर फेर परिवारसँ लऽ कऽ गाम भरिमे शोकक लहरि पसरि गेल। मुदा मुखियानि शोकक सागरसँ बाहर आबि तीनू बच्चाकेँ लालन-पालनक लेल फेरसँ अपन दिन-दुनियाँमे लीन भऽ गेली। अपना सुइध-बुइधसँ बच्चा सबहक बरबरि लार-प्यारसँ पोसैमे कोनो कसरि नै छोड़ै छथिन। मानस आब दस सालक भऽ गेल। प्राइवेट स्कूलक चारिम कक्षामे पढ़ैए। महिनाक पाँच तारीख तक सभ बच्चा अपन-अपन फीस जमा करैए। लेट-सेट छह तारीख धरि विलम शुल्कक सङ जमा करब आवश्यक अछि। नै देने नाओं काटि देल जाइ छै। मानस प्रत्येक महिना अतिरिक्त शुल्कक सङ जमा करैत छल। मुदा ऐ मास सेहो नै भेलै। पीठपर पोथीक बैग टाँगि, अनजान चालिमे डेल उठबैत, एमहर-ओम्हर तकैत स्कूल दिस विदा भेल। घरसँ लगभग एक किलो मीटर भरि पूब स्कूल छै। बाटेमे मानसक मन फीपर गेलै। आइ तँ छह तारीख छी। मुदा फीस तँ अछि नै। सरजी की कहता की नै। असमंजसमे पड़ल मानस स्कूलक हाता धरि पहुँच गेल। हातासँ आगू नै बढ़ि बाहरेमे ठाढ़ रहल। किछु काल पछाति आपस घूमि गेल। अगल-बगलमे डबरा-डुबरीमे पहिल मानसुनक बर्खासँ पानिक जमाव सभकेँ देखैत, बेंगक टरटरेनाइ आदिकेँ देखैत-सुनैत लीन भऽ गेल। ओमहर स्कूलमे सरजी हाजली मिलौला पछाति मानसक अनुपस्थितिपर बजला- “मानस आइ नै एलौं?” एकटा बालक कहलकनि- “आएल तँ छल मानस, साइत बाहरमे हएत।” सरजी- “आइ फेर फीस नै अनने होएत।” फेर वएह बालक बाजल- “सरजी, अहाँ कहब तँ हम मानसकेँ बजा आनब।” सरजीक धियान मुद्रापर गेल। बजला- “जो, आ कहि दिहनि जे आइ जँ फीस नै लऽ कऽ आएत तँ दोबर फीस लगतै।” बालकक नाओं सौरभ अछि। सौरभ स्थानीय बेपारीक बेटा छी। सौरभ केर घर स्कूलक बगलेमे छै। मानससँ मित्रता छै। मानस केर प्रति सहायताक भाव सेहो रहै छै। सौरभ विदा भेल मानसकेँ तकैले। बाहर जा एमहर-ओम्हर नजरि दौड़ौलक। मानसपर केतौ नजरि नै पड़लै। कनी और आगू बढ़ल। देखलक एकटा गाछक छाँहमे ठाढ़ किछु देखि रहल अछि। देखिते चिकरि कऽ सोर पाड़लक- “मानस, की करै छी। एमहर आ।” मानस अवाज सुनि-ताकि लग आबि बाजल- “आइ हम स्कूल नै जेबौ। सरजीकेँ नै कहिहनि जे मानस गाछ तर अछि।” सौरभ- “जौं तूँ स्कूल नै जेमेँ तँ एतए की करै छीही। घरेपर रहितेँ।” मानस- “तूँ नै बुझै छीही। घरपर जँ रहब तँ माइक सैकड़ो प्रश्नक उत्तर दिअ पड़त। घरमे पाइ-कौड़ी नै छै। माए कहलक जे दू-चारि दिनमे पाइ देबौ।” सौरभ स्कूलक निअमसँ अवगत अछि। जौं छह तारीख तक फीस जमा नै हेतै तँ स्कूलसँ निकालि देल जाइ छै। ई सभ सोचि मानसकेँ कहलकै- “स्कूलक निअम नै बूझल छौ जे केते कड़ा छै। माएकेँ नै कहने छीही?” मानस किछु बाजल नै, आ ने किछु फुरेलै। चुप रहल। सौरभ घूमि कऽ स्कूल चलि गेल। फागुलाल साहु जनम- १ फरवरी १९५३ ई.मे। गाम- सखुआ, पोस्ट- भपटियाही, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, बिहार। पिताक नाओं- स्व. रामजी साहु, माता- स्व. चुनचुन देवी। माइक डाँट बात बचपनक छी। हमर माए सदिखन हमरा नजरि चढ़ौने रहै छेली। पढ़ाइ खातिर सदिखन समझबैत रहै छेली, स्कूलक समैमे खिया-पिया कऽ सहियारैत-पुचकारैत विद्यालय पठबैत छेली। मुदा हम तँ बेसी दिन अदहे बाटमे सङतुरियाक सङ खेलैत रहि जाइत रही। जखनि विद्यालयक छुट्टीक समए होइ छल तखनि झटदनि घर आपस आबि जाइ छेलौं। हमर माए नीक-निकुत खाइले दऽ दइ छेली। मुदा हम तँ विद्यालयक चौकैठो तक ने जाइ छेलौं। तँए, मन तँ गुदगुदाइत रहै छल। माए जखनि आन छात्र सभसँ पुछै छेलखिन हमर हाल-चाल तँ सभटा पोल खुलि जाइ छल। नै पढ़बा खातिर बहुतो टाँट-फटकार करैत लुलुआबैत छेली। हम मुँह लटकौने चुप्पी साधने सज्जनक स्वरूप बनौने लिबिर-लिबिर तकैत माइक ममता जगबैत अप्पन दोख छुपबैत सफाइ वचन बजैत रहै छेलौं। तेतबे नै! पीटाइओ तँ खाइए पड़ै छल। पिताजीक सेहो आ गुरुजीक तँ अलगे। मुदा हमरा तँ माइक डाँट बड़ अधला जकाँ लगै छल। हमरा ऐ बातक भान थोड़े छल जे माए पढ़ाइक महत जनै छथिन तँए डँटै छथिन। जेना-तेना मैट्रिक धरि तँ आबि गेलौं मुदा पढ़ाइमे हम केहेन छेलौं से तँ बुझिए गेल हएब। पिताजी सेहो हमर पढ़ाइ-लिखाइ खातिर चिन्तिते रहै छला। पिताजी सदिखन चिन्तामे डुमल रहै छला। एक दिन दिलक दौड़ा पड़ि गेलासँ स्वर्गधाम चलि बसला। आब हमरा विद्यालय जेबाक सङ घर परहक पढ़ाइ सेहो बन्न भऽ गेल। चूकि घरोक काज-भार हमरेपर पड़ि गेल। बोर्ड परीक्षामे सेहो फेल भऽ गेलौं। मैट्रिक परीक्षामे फेल भेने लागल कि सम्पूर्ण जीवन दुखे-दुखमे बितल। सङी-साथीक सेझहा लज्जित सेहो रहए पड़त, ई सोचैत मन पड़ल माइक डाँट-फटकार। जखनि ओ हमरा पढ़ाइ खातिर डँटै छेली तखनि हमर अन्तर आत्मासँ अवाज आएल- “अखनि बेर नै भेल अछि, समए बँचल अछि शेष।” आब हमरा पढ़ाइक जुनुन सवार भऽ गेल। हम पुन: मैट्रिकक फार्म दुबारा भरैत पढ़ाइ शुरू केलौं। मैट्रिक परीक्षामे प्रथम स्थान केलौं। प्रथम स्थान पाबि आगूक पढ़ाइ जारी रखलौं। माइक कृपा भेल, सङे असिरवाद भेटए लगल। आजूक दिन सरकारी सेवामे पदाधिकारीक पदपर रहि सेवा दऽ रहल छी। माइक डाँट, असिरवादमे बदलि गेल। हमर कामयावीक सभटा श्रेय माइक छी। सङे हमरा ई अनुभव भेल जे माता-पिताक डाँट-फटकार बेजा नै होइत अछि। किएक तँ माइक डाँटमे बच्चाक भलाइक कामना नुकाएल रहैत अछि। अखिलेश मण्डल जनम- ३० दिसम्बर १९९३़, गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, बिहार। पिताक नाओं- श्री सुरेश मण्डल, माता- श्रीमती- प्रेमकला देवी। ललियाएल मुँह डमहाएल गुलाब खास आम जकाँ राम सरूपक ललियाएल मुँह देखि सुशीलक मनमे भेल जे किछु पौलक अछि। ओना पबै-पबैक अपन-अपन खुशी होइ छै, मुदा मुँहक जेहेन लाली देखै छिऐ ओइसँ किछु खास पबैक बूझि पड़लै। राम सरूप स्कूलक सङी छिऐ, हाइ स्कूलमे दुनू गोटे एके किलास दसमामे पढ़ितो अछि। पुछलकै- “सरूप भाय, कथी पेलौं हेन मन बड़ ललियाएल बूझि पड़ैए, ओइमे हमरा सबहक हिस्सा नै हेतै?” ‘हिस्सा‘ सुनि राम सरूप ठमकि गेल। मुदा ओहेन ठमकान नै ठमकल जे पाछू ससरैत। रोग उतरिते जहिना कोनो रोगीक मुँहक रोहानी घूमि जाइ छै, तहिना राम सरूपोक घूमल। मनमे जेना लबालब उल्लास भरल होइ तहिना भरल बूझि पड़लै। दोहरबैत सुशील बाजल- “सरूप भाय, की बात छिऐ जे करियाएल मुँह एना ललिआ गेल अछि?” ‘करियाएल मुँह’ सुनि राम सरूप अपन पहुलका विवशता देखबैत बाजल- “सुशील भाय, समए करोट फेड़लक। अहाँकेँ देखिते मन लजा जाइ छल जे की कहि पच्चीस रूपैआ पैंच नेने रही आ अखनि तक नै दऽ सकलौं!” राम सरूपक बेवसाएल बात सुनि मन सहमि गेलै। सहमि ई गेलै जे अनेरे वेचाराकेँ एहेन बात कहलिऐ। पचीस रूपैआक जे मोल एकरा लेल छै से हमरा लेल थोड़े अछि। अपने ऊपर गरानि हुअ लगलै। मुदा जे बात मुहसँ निकलि गेल ओ दोहरा कऽ आपसो तँ नहियेँ आबि सकैए। अपनाकेँ सम्हारैक कोशिश करैत सुशील बाजल- “राम सरूप भाय, अहाँपर हम व्यंग्य–वाण नै चलेने छेलौं, जँ अहाँ से बुझैत होइ तँ गलती भेल माफी मंगै छी।” ‘माफी’ सुनि जेना राम सरूपोक विचार थकथकाएल। बाजल- “सुशील भाय, समए घूमल। दिन बदलल।” राम सरूपक अधकट्टी पाँति सुनि जइ ढंगे बुझक चाही से नै बूझि, सुशील पुछलक- “की समए घूमल आ दिन बदलल?” राम सरूपक करियाएल मुँह जेना पाकल डोमा बम्बै आम जकाँ भीतरेसँ ललिआ गेल होइ तहिना बाजल- “सुशील भाय, मामा गाममे एक कट्ठा खेत हमरो भेल। पितियौत मामा कहलनि, बौआ एक कट्ठा खेतसँ गुजर नै चलतह से हमरा दऽ दैह। बदलामे तोरा पाँच एच.पी.क इंजन कीन दइ छिअ। तत्-खनात पटौनीक काज करिहऽ, जेना-जेना कमाइ होइत जेतह, तेना-तेना काजक जोड़-जाड़ करैत आगू बढ़िहऽ।” राम सरूपक मन विराम नै लिअ चाहै छल, जेना किछु आरो बजला पछाति लइतै, मुदा सुशीलेक मन सुनि औगता गेलै। बाजल- “तखनि तँ जिनगीक रंगे बदलि जाएत।” असिया आस लगबैत राम सरूप बाजल- “पहिल दिन, दुइए घंटा आइ चलेलौं। दमकलक हिसाब अखनि तँ नै बुझै छिऐ। ओ इंजीनेबला आकि इन्जीनियरे बुझैत हेता। जे नव मशीनक पहिल साल दोसर साल आ तेसर साल केहेन होइ छै। मुदा एते आशा तँ भाइए गेल अछि जे जँ दू घंटा सभ दिन चलाएब तँ गुजरो कऽ लेब आ पढ़िओ लेब। सोलहो आना आशा भऽ गेल अछि जे जँ अपनो भरोसे जीबए चाहब तँ जीबो लेब आ पढ़िओ-लिखि लेब।” कपिलेश्वर राउत जनम- ३० मार्च १९५२ ई.मे। पिताक नाओं- स्व. राम स्वरूप राउत, माता- स्व. ज्ञानी देवी। गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, बिहार। जीविकोपार्जन- कृषि। साहित्यिक कृति- उलहन (विहनि/लघु कथा संग्रह) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अधला सुलोचना दादी जेहने कमासुत तेहने खिसक्करि, खिसक्करे नै गीतो गबैमे सेहो माहिर रस्ते-पेरे आकि पोखरिक घाटपर बिना कोनो समैमे जहाँ कि महिला जमा भेली आ दादी जँ छथि तँ कोनो ने कोनो खिस्सा हेबेटा करत। छठि पावनिमे तँ घाटपर छठि मैयाक खिस्सा सुनैले भीड़ लािग जाइत। सुलोचना दादीक उमेर पच्चपन-साइठ बर्खक। दूटा लड़का एकटा लड़की छेलनि लड़की सासुर बसैत रहनि। बेटा सभकेँ सेहो धिया-पुता भऽ गेल छेलनि पोता-पोतीसँ घर भड़ल-पुरल। परिवारमे ततेक मिलान बाँसक ओइद जकाँ आ गाछक डाइर पात जकाँ जे एक दोसरसँ जोड़ल। बिआह उपनायन वा कोनो मांगलिक काजमे बिना सुलोचना दादीक गीते नै पुड़ा होइए। गामक बूढ़-जवान धिया-पुता बेटी पुतोहु सभ दादी कहि कऽ संबोधित करैत। परिवार किसानी जीवन जीबैत। एक दिन साँझक समए छल सुलोचना दादी गाए-बरदक गोबर करसी उठा, थरि खड़ैर माल-जालकेँ कुट्टी-सानी लगा, घूर कऽ, पैर हाथ धो बीच अाङनमे मोथीक पटिया बिछा पड़ल छेली। पुतोहु सभ रौतुका भानसक जोगाड़मे छेली तखने धिया-पुता सभ (नैत-पोता-पोती) खेल धुप कऽ कऽ आएल छल। सभ तूर दादी लग बैस गेल आ कहए लागल दादी एकटा खिस्सा कहि ने। दादी बजली- “ई देह जरूआ जनिपिट्टा बोंगमरौना सभ कखनो चैनसँ अराम नै करए देत।” जहिना माइक थप्परमे प्रेम होइ छै तहिना धिया-पुता हँसि कऽ गप्पेकेँ उड़ा देलक। दादी फेर बजली- “पढ़बीही लिखबिही से नै जे खिस्सा-पिहानी सुनबीही। पढ़-लिख गऽ। छुट्टी दिन खिस्सा कहबौ।” एक सुड़े धिया-पुता बाजल- “नै दादी, आइ रबि दिन छिऐ छुट्टीओ छै। तँए खिस्सा कहै पड़तौ, कहि ने।” “रौ रविन्दर, बिरेन्दर आइ थाकल-ठेहियाल छियौ देह-हाथ दुखाइत अछि, पड़ल रहए दे।” एतेक बात सुनिते धिया-पुता सौंसे देह लुधकि गेल आ जाँतए-पीचए लगल। दादीसँ पुछलक- “दादी बुढ़मे किए गोबर-करसी आकि काज उदम करै छँह। बैस कऽ खेमे से नै। बाबू-कक्का, माए-काकी तँ कमाइते छौ?” दादी बजली- “रौ बौआ, जँ कियो कमाइ-खटाइबला नै रहए, अथबल भऽ जाए तइसँ नीक मरनाइए। तँए जाबत जीबै छी ताबत जे पैरूख अछि ततेक काज करैत रहै छी। जइसँ देहक खुन चलैत रहत। तँए तंदरूस्त रहै छी आ मनो खुशी रहैत अछि। तेकरा तूँ अधला बुझै छिही?” कनीकालक बाद पोता-पोती कहलकनि- “आब तँ ठीक छँह ने। कही ने खिस्सा?” पुतोहु सभ फूट्टे हँसैत छेली। सुलोचना दादी पुछलखिन- “कोन खिस्सा सुनबिहिन?” जेटका पोता रविन्दर बाजल- “दादी कोनो खिस्सा कही नीकहा।” दादी बजली- “बौआ, पहिने लोक बाजए जे उत्तम खेती मध्यम बैनि निषिध चाकरी भीख निदान। मुदा आब एकर उनटा बुझैत अछि। उत्तम भीख मध्यम चाकरी निषिध बैनि खेती निदान। सुविधा भोगी लोक भऽ गेल अछि। कामसँ देह चोरबैत अछि तँए देखबहक जे सभ एक दोसराक खिधाँसे करैत रहैत अछि। तँए नीक बेजए फुटेनाइ कठिन अछि। रौ रवीन्दर, अखुनका जुग वैज्ञानिक जुग छै अधलासँ अधला वस्तुक शोध करि कऽ उपयोगी बना दइ छै। तँ सुन एकटा पुरना खिस्सा कहै छियौ अकबर-वीरबलक।” “...अकबर-वीरबलसँ कहलक सभसँ अधला कोन बस्तु छै। खोइज कऽ कहू। वीरबल खोजैले बिदा भेल खोजमे देखलक जेकरा हम खराब बुझै छी सएह वस्तु केकरो लेल नीक छै। कोनो वस्तु वीरबलकेँ खराब भेटबे नै करैत। हारि-थाकि कऽ देहातक एकटा चाहक दोकानपर बैस गेल आ विचार-विमर्श करए लगल। कच्ची रस्ता छल देखलक रस्ता पैखानासँ घिनौल अछि जे कियो ओइ रस्ता धऽ कऽ चलैत सभ नाक मुँहपर गमछा दबने झटैक कऽ चलैत। वीरबल सोचलक ऐसँ अधला कोनो वस्तु नै अछि। सभ घृणे करैत अछि। वीरबल एकटा कुटक डिब्बा लऽ पैखाना उठबैले पहुँचल...।” “...पैखाना हँसिकेँ बाजल- “हौ बुड़ी, सभसँ अधला हमहीं बुझेलियह? हम कि सभ खा कऽ सिठ्ठी बनल छी से बुझैत छहक? हे सुनह भात-दालिसँ लऽ कऽ रसगुल्ला-लालमोहन, कलाकंद, किसमिस, छहोड़ा, सेब, संतरा, साग-पात तकसँ बनल सिठ्ठी छी। तेकरा तूँ अधला बुझै छहक? हमरे से खाद बनैए, हमरेसँ बिजली बनैए। केकरो लेल हम सभसँ नीक भोजन छिऐ।” तखने सुगरक हेँज अबैत रहए। इशारा करैत वीरबलकेँ कहलक- “हे दैखैत रहक हम केतेक नीक छी।” जहिना दुरेसँ माछकेँ देखि बौगुला झपटै छै तहिना सुगर एक दोसराकेँ पछारैत पैखानापर टुटि पड़ल। वीरबलकेँ आत्म ज्ञान भेलै। दरबारमे जाऽ अकबरसँ कहलक- “हजुर, सभ से अधला हम आ अहाँ छी। दुनियाँमे कोनो वस्तु अधला नै अछि। कोनो वस्तुकेँ आँले आँखि चाही, ज्ञान चाही, हमरा अहाँक मनक सोच जे हिनतासँ ग्रसित अछि तँए कोनो वस्तु खराब आ नीक बुझै छिऐ।” “...वीरबल सोचए लागल।” दादी धिया-पुतासँ पुछलखिन- “केहेन लगलौ खिस्सा? धिया-पुता बाजल- “बड़ नीक, बड़ नीक।” दादी कहखिन- “सुनू, खुब पढ़ू-लिखू ज्ञानवान बनू। कोनो वस्तुकेँ अधला नै बुझू, किचरेमे कमल फुलाइ छै, गुलाबक फूलक गाछमे सौंसे देह काँटे रहै छै रक्षा लेल। खोजू खोइज कऽ दुनियाँमे महान बनू। महकारी फड़ जकाँ ऊपरसँ नीक भीतर कोनो काजक नै। तेहेन नै बनू बाहर-भीतर एक रंग रहक चाही ठीक छै ने?” धिया-पुता बाजल- “ठीक छै। दादी, ठीक छै।” समए साल बितैत गेल। दादी अस्सीकेँ पार केलनि एक दिन खाइकाल गाड़ा लगलनि आ स्वर्गबास सिधारि गेली। एमहर रविन्दर दादीक खिस्साकेँ गीरह बान्हि लेने छल। बी.ए. पास केला पछाति मनमे ठानि लेलक हम खेतीए-वाड़ी करब सहए केलन। बाप-दादा वा दादीसँ विरासतमे भेटल ज्ञानकेँ वैज्ञानिकक शोध केलहा सोचकेँ धारातलपर उतारए लगल। जइ गोबर-करसीकेँ रविन्दर दादीकेँ कहने छेलनि जे ई काज छोड़ि देही ने। वहए गोबर-करसीकेँ सभसँ उत्तम खाध बूझि जैविक खाध बना खेती करए लगल। आइ रविन्दरक दरबज्जापर कामधेनु गाए जरसी, बरदक बदला ट्रेक्टर, रोटाबेटर, धान रोपैबला मशीन, दौनीक मशीन, कमठानक मशीन, फसल काटैबला मशीन छन्हि। श्रीविधिसँ खेती करै छाथि। मधुबनी जिला भरिमे देखा देलक उन्नत खेती करि कऽ। उपजामे तीन गुणा बढ़ोतरी भेलै। परोपट्टाक लोक सभ रविन्दरक खेतक उपजा देखैले खेतक आड़िपर ठाढ़ भेल, आ ठकमुड़ी लागि जाइ गेलनि। रविन्दरकेँ गेहुम आ धानक उपजामे जिला भरिक सर्वक्षेष्ठ किसानक प्रथम पुरस्कारसँ कलक्टर साहैब सम्मानित केलखिन। सम्मानित कालमे रविन्दरकेँ आँखि सँ नोर ढब-ढबा गेलै। आ मनमे सोचलनि जँ आइ दादी जीवैत रहितथि तँ ई पुरस्कार हम दादीएकेँ चरणमे समर्पित करिताैं। जइ खेतीकेँ लोक अधला बूझि पंजाब, भदोही, हरियाना भागै छल, खेतीकेँ घाटाक सौदा बुझै छल से आब रविन्द्रक खेतीकेँ देखि नफ्फाक सौदा बुझए लगल। नीक-खरापक प्रति विचार बदलि गेलै। बिसवास बढ़ि गेलै। बिपिन कुमार कर्ण ‘करण’ पिता- स्व. राम कृष्ण लाल कर्ण, माता- फुलदाय देवी, पत्नी- मीनू कुमारी, ग्राम- रेवाड़ी, पोस्ट- चौड़ामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, मोबाइल- ९९३१५९५३९०, शिक्षा- एम.ए; मैथिली जीविकोपार्जन- एल.आई.सी. अभिकर्ता सरकारीए नौकरी किए? गामक मानल झगरौआ चौबटिया, केतेक रास इतिहास ऐ चौबटियासँ जुड़ल अछि, सौंसे गामक लोक नीक-बेजए अपन-अपन भरास ऐ चौबटियेपर आबि निकालैत अछि। ओना गाममे आरो बहुत रास चौराहा सभ अछि, मुदा ऐठाम आबि अपन शान बघारब गामक लोककेँ बड्ड रास अबै छन्हि। गामक सभटा झगड़ा-झंझटि, पंचैती, गप-सर्ड़का, खास कऽ संझुका पहर पीला पछाति अपन लठैती देखाएब ऐ चौबटियाक सोभाव बनि गेल अछि। खैर! संयोगसँ हमरो घर ऐ चौबटियाक नाकेपर अछि। नहियोँ चाहैत अङनासँ निकलिते पहिने चौबटियेक दर्शन होइत अछि। कनी अबेरेसँ सुति कऽ उठल रही। भिनसुरका क्रियासँ निपटि अङनासँ बहरैलौं आकि सुन्दर काकापर नजरि पड़ल। काका पड़ोसीए छथि। सभ दिन परदेशे खटलथि। केतेक दिनक बाद कक्काक दर्शन भेल। कहलियनि- “गोड़ लगै छी सुन्दरकाका।” “खूब नीक रहू बाबू, नीके ना छी ने सभ कियो?” कहलियनि- “हँ, प्रभूक दया छन्हि, सभ कियो नीके छी। मुदा अपने तँ ऐबेर बड़ दिनपर एलौं हेँ काका? काकी सेहो एलखिन हेन?” “हँ यौ, सभ कियो एलौं अछि। बड़ दिन भऽ गेल छल गाम एला। होली पावनि छले, तँ सोचलौं जे गाम भऽ आबी।” हम कहलियनि- “तहन तँ बड़ नीक समैपर एलौंहेँ काका, भोज सेहो परि लागि जाएत।” “कथीक भोज यौ, हमरा तँ गामक भोज कहियो खेलौं से मनो ने अछि। जहियासँ मद्रास पकड़लौं आ ट्रान्सपोर्टक नोकरी धेलौं तहियासँ बुझू सभटा बिसरिए गेलौं। अच्छा छोड़ू ई सभ बात। ई कहू जे भोज छी केतए?” “नै बुझलिऐ काका, इन्दू भाइक परसू बिआह छियनि। काल्हि कुमरनक भोज हएत टोलमे आ परसू बरियाती जाएत। अहीठाम लगेमे इमादपट्टी।” “ई इन्दू किनकर लड़का छिऐ। नबल भाइक छियनि की?” “हँ। नवल कक्काक चारिम लड़का छथिन। हमरासँ तीन सालक जेठे हेता। आब तँ हमरो तैंतीसम चलिए रहल अछि किने।” चनौरागंज एन.एच.क उत्तरमे बसल ई छोट-छिन गामक ऐ चर्चित चौबटियापर एकटा ने एकटा लोक अबिते-जाइत रहैए। चौबटियाक दछिनवरिया बाटसँ जेना मुसना सुनिते आएल आ बिच्चेमे टपकि गेल- “गोड़ लगै छी बाबा।” सुन्दर काका दिस लपकैत पुन:- “नै बुझलिऐ, कएथक बिआह तँ अदहा उमेर बितला पछाितए ने होइ छै। देखियौ इन्दू भाइकेँ, की चालिस बरखसँ कम होइत हेतनि। हमरासँ दू बर्खक जेठे हेता। ताबत हमर धियो-पुतो जमान भऽ गेल।” सुन्दर काका गौरसँ चिन्हैत कहलखिन- “अँए रौ, एना लम्पट जकाँ किए बजै छेँ। महन्थु दुसाध तँ बड़ भलमानुस छेलौ। सभ कएथक की तीस बर्खक बादे बिआह होइ छै। हमरा तँ बाबू मैट्रिकमे पढ़िते रही तहिए कथा ठीक कऽ लेलनि आ परीक्षाक बाद बिआहो भऽ गेल।” मुसना बाजल- “नै बुझलिऐ बाबा, आखिर बिआहो तँ उमेरेपर ने नीक होइ छै।” “हँ-हँ ठीके कहलिऐ मुसन भाय, जहियासँ अहाँ वार्डमेम्बर बनलिऐ हेन तहियासँ खूब उपदेश दइ छिऐ अपने।” “हमर गप की नै नीक लागल प्रवीण भाय? लिअ माफ करब। जाइ छी, आइ इन्दिरा अवासबला किछु पेमेन्ट सभ अछि।” कहि मुसना पछिम दिशामे चलि दैत अछि। “अच्छा तँ अपन कहू प्रवीण, काज-धंधा केहेन चलैए?” सुन्दरकाका गपकेँ नव मोड़ देलनि। “नीके चलैए काका। इमानदारीसँ जे कमाइ छी तइमे नून-रोटी नीके जकाँ खाइ छी। दिल्ली-बम्बई जा नोकरी करब तँ हमरा कहियो नीक नै लगल। हँ एलआइसीक काजसँ एक-आध महिना लेल मद्रास जाइ छी तँ बुझू जे मन औना जाइत अछि। जनिते छी काका जे अहू लाइनमे भेड़िया-धसाँन छै। पेटक खातिर बाहर जए पड़ैत अछि, मुदा सच्च कही काका गाम तँ गाम छी, बुझू स्वर्ग छी। शहरक धुआँ-धुकुरमे दम घूटि कऽ रहि जाइत अछि।” “हँ से तँ सखे लोक बाहर जाइए, अपना ऐठाम रोजगारक अभाव अछि। बेरोजगारीक समस्या दिन-व-दिन बढ़ले जा रहल अछि।” “ई आब पुरान गप भेल सुन्दरकाका। कृषि कार्यक अलादो बहुत रास रोजगारक संभावना जगेलक अछि सरकार, आब ऐ सुचना क्रान्तिक जुगमे बहुतो क्षेत्रमे रोजगारक सृजन सभ भऽ रहल अछि, हँ पहिने ई समस्या सभ जरूर छल। कहियो बाढ़ि तँ कहियो सुखार, सुतरल तँ भरि कोठी धान नै तँ ठन-ठन गोपाल।” काका पलटी मारलनि। आखिर हुनको तँ सुख-दुखक बहुत रास अनुभव छन्हि। बजला- “रोजगारक संभावना तँ सभ दिनसँ अछि गामो-घरमे, जरूरति अछि सृजन करबाक। अपना ऐठामक माटि-पानिमे सुस्ती अछि। आन-आन शहर जा कऽ लोक खून-पसीना एक कऽ दैत अछि मुदा अपना घरमे अलिसाएल पड़ल रहैत अछि। कहबीओ छै, ‘भुखले रहब तँ सुतले रहब आ सुति कऽ उठब तँ अँइठ कऽ चलब।’ खैर छोड़ू हम आनकेँ की कहबै, हम तँ अपने देशक छोड़पर जा कऽ गुजर-बसर करै छी।” दुनू गोटे गप-सप्प करिते रही आकि ताबत चन्द्रकान्त भैया सेहो आबि गेला। चौबटिया तँ ओना मुख्य रूपसँ कएथटोलीक नाकेपर अछि, मुदा पासमान टोलक धमगीजरीए सभ दिन हाबी रहल की मजाल जे कोनो कएथ भाय किछु बजता। गारि-गलौज सुनैत रहै छथि आ नीके ना पचबैत रहै छथि। चन्द्रकान्त भैया बजला- “की यौ काका जेना बुझाइए जे भोजक चर्चा भऽ रहल अछि।” हम कहलियनि- “हँ भैया, काकाकेँ बहुत दिनपर भोज परि लगतनि तँ किए ने सुआदक चर्च पहिनेसँ करी।” चन्द्रकान्तजी बड़ सुलझल एम.ए.पास बुधिजीवि बेकती छथि। सौंसे गाममे हुनकेटा मे ईष्या आ भेदभावक कोनो चैन्ह नै छन्हि, बजला- “किएक ने टोलमे भोज हुअए आ चर्च नै हुअए तँ फेर भोजक मजे की।” सुन्दर काका कोनो गंभीर सोचसँ फराक भऽ बजला- “मुदा चन्द्रकान्त, इन्दूजी एतेक उमेरपर बिआह किए केलनि?” “नै बुझलिऐ काका, अपना सबहक ऐठाम जाबत लड़िका पएरपर नै ठाढ़ भऽ जाइए ताबत बिआह केना करत। इन्दू सेहो अखनि धरि नीक सरकारी नोकरीक खोजमे पढ़िते रहि गेला। अदहा उमेर बीति गेलनि तखनि जा कऽ एकटा किरानीक नोकरी भेलनि।” “अँए हौ चन्द्रकान्त, तँए की जँ सरकारी नोकरी नै हुअए तँ लोक बिआह नै करत।” “करत किएक नै काका। मुदा जौं सरकारी नोकरी नै होइत तँ इन्दूकेँ दस लाख टाका केना भेटितनि दहेजमे। ई तँ भाग मनाउ जे एतेक मेहनति आ तपस्याक बादो बेचारा किरानीए भेला। जँ कोनो ओफिसर होइतथि तँ तीस लाखसँ कम दहेज मांग नै करितथि। खैर चलू, जे होइ छै से हुअ दिऔ। माइओ-बाप तँ हुनके ने अन्न आ दबाइ बिना तड़ैप-तड़ैप कऽ मरलनि।” “अपना सबहक ऐठाम एकटा बड़ पैघ ओझरी अछि काका, नइ कि ई अपन जातिमे बल्की सौंसे बिहारक ई समस्या छिऐ। ऐ राज्यक, खास कऽ मिथिलाक सभ कियो सरकारीए नोकरी किए चाहैए। आखिर सरकारे केतेक लोककेँ नोकरी देत। मनुखक संख्या तँ मच्छरे जकाँ बढ़ल जा रहल अछि- अकासे फाटि जाएत तँ दरजीक बापक दिन छी जे सीब लेत। सरकारो अपन संसाधने मोताबिक ने नोकरी देत। मुदा बिहारक लोक तँ सरकारी नोकरीकेँ अपन प्रतिष्ठे बना लैत अछि, तँए कि अपन रोजगार करएबलाकेँ समाजमे कम प्रतिष्ठा छै।” हम कहलियनि तैपर काका बजला- “ठीके कहलिऐ अहाँ। दोसर प्रदेशमे जा कऽ देखियौ सरकारी नोकरीक पाछू कहाँ एतेक लोक भागैए, जेकरा जेतेक ज्ञान आ कुब्बत छै तइ अनुकूल लोक अपन जीवन-यापन करैए। तँए कि कोनो राज्य बिहारसँ पाछू अछि?” धाँइदनि चन्द्रकान्त भैया बजला- “से तँ जुनि पूछू काका, एकटा शिक्षामित्रबला मास्टरी लेल तीन-तीन लाख घूस दऽ कऽ मास्टर बनल अछि। तँए कि ओ तीन लाखसँ बेपार करि अपन जीवन नै चला सकै छल?” हम कहलियनि- “की करबै भैया, लोकक नैतिक पतन भऽ गेल अछि। अराम आ मंगनीक जीवन सभ जीबए चाहैए। कोनो तरहेँ एकबेर सरकारी नोकरी भऽ गेल तँ मानू गंगा नहा लेलौं, दरमाहा बँचले रहत आ काते-कातक आमदनीसँ गुजारा चलि जाएत। एहने मानसिकताबला लोकक भरमार भऽ गेल अछि। जिनगीक दू तिहाइ उमेर तँ सरकारीए नोकरीक आशमे बिता लैत अछि। पछाति हारि-थाकि कऽ दिल्ली-कलकत्ताक रूखि लैत अछि। केहेन दुरभाग अछि ऐठामक लोकक।” सुन्दर काका विचलित होइत बजला- “सएह देखियौ, देश-दुनियाँ चान-तारापर पहुँच गेल मुदा बिहारक लोक आइओ पूर्ण निठल्ला भऽ सरकारीए नोकरीक आशमे जीवन बिता दैत अछि। आखिर विकासक मार्ग केना सुदृढ़ हएत। तँए कि संसारमे रोजगारक कमी अछि। हजारो सार्वजीनिक क्षेत्रमे लाखो-कड़ोरो रोजगारक अवसरि बाट जोहि रहल अछि। पैसो नीक आ प्रतिष्ठो नीक, मुदा थप्पा लेल जे आतूर छथि तेकर पूर्ति केना हएत।” काकाकेँ चिन्तनक सागरमे उगैत-डुमैत देखि कहलियनि- “चिन्ता जुनि करू काका, परिवर्तन जरूर हएत। जे संसारक निअम अछि। आशक वंधन जुिन तोड़ू, हमरे देखू पढ़बामे बड़ तेज तँ नै मुदा भुसकोलो तँ नहियेँ रही। स्कूलसँ लऽ कौलेज धरि सभ दिन फस्टे केलौं, मुदा सरकारी नोकरी तँ नै भेल। जँ हमहूँ इन्दूए भाय जकाँ माए-बापक घोर गरीबीक दशाकेँ अनठाबैत बीस बरख धरि सरकारीए नोकरीक तैयारी करितौं तँ की नोकरी नै होइत। मुदा ताबत माए-बाप पुत्रक कमाइक आशमे दम तोड़ि दैत।” बिच्चेमे चन्द्रकान्त बलजा- “तँए कि इन्दू सन-सन नोकरियासँ प्रवीणक मान-सम्मान समाजमे कम अछि। इन्दूकेँ तँ नीकसँ समाजमे कियो चिन्हतो नै छन्हि। समाजक सुख-दुखमे तँ पहिने हमहीं-अहाँ पहुँचब किने। आखिर एहेन सरकारी नोकरीसँ समाजक कोन भलाइ हएत।” काकाकेँ माथपर संतोखक रेखा उभरि एलनि। माथक पसीना पोछैत बजला- “आखिर, सरकारीए नोकरी किए?” बेचन ठाकुर विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक। जनम- ५ नवम्वर १९७०ई.मे, गाम- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, बिहार। पिताक नाओं- स्व. राम सुन्दर ठाकुर, माता- स्व. कलावती देवी। साहित्यिक कृति- नाटक- बेटीक अपमान आ छीनरदेवी, बिसवासघात, बाप भेल पित्ती आ अधिकार, ऊँच-नीच प्रकाशित। कौआसँ गेल्ह बुधियार, सिमरियाक पंडा, तेतरि गाछमे आम केना, राखीक लाज, घोघटवाली कनियाँ, सपूत नाटक आ रमेश डिलर, महाविरलाल, किशुन बम, बरहमबाबा, रसून-पिआजु नुक्कर नाटक आ नाटक अप्रकाशित। हरिया इन्सपेक्टर दूटा दोस मोहन आ सोहन मैट्रिकक छात्र। दुनू स्कूलसँ पढ़ि कऽ घर अबैकाल रस्तामे अपन जीवनक उदेसक सम्बन्धमे गप-सप्प करैत छल। मोहन- “दोस, तोहर की उदेस छौ?” सोहन- “हम इंजीनियर पक्का बनबौ। आ तोहर उदेस?” मोहन- “हम बिनु पेनीक लोटा छियौ। हमर कोनो उदेस नै। मुदा एगो कह तँू इंजीनियर केना बनबीही?” “पढ़ि कऽ हेतै तँ हेतै नै तँ मालपर कमाल हेतै।” सोहन जवाब देलक। तैपर मोहन गंभीर साँस लऽ बाजल- “दोस, तोहर बाबू डाक्टर छथुन। हुनकर आमदनी अथाह छन्हि। हुनका लेल पर्वत राय छन्हि। मुदा हमर बाबू गरीब किसान छथि। अगिला पढ़ाइमे बेसी खर्चकेँ देखैत ओ लाल झण्डी देखबै छथि खाली हमरे हिम्मतसँ विशेष पढ़ाइ केना हएत? आजुक समान्य पढ़ाइ कागतक नाव छी। स्कूल कौलेजमे पढ़ाइ कागतेपर बनल सड़क छै। तइसँ हम हरीए इन्सपेक्टर नै बनि सकै छी तँ और की।” डा. बचेश्वर झा जनम- १५ मार्च १९४७ई.मे एम.ए. पी.एच-डी; पूर्ब प्राचार्य, निर्मली महाविद्यालय निर्मली। गाम- निर्मली, जिला- सुपौल। किछु कविता, विहनि कथा लघु कथा आ समीक्षा विदेह सङ विदेह-सदेहमे प्रकाशित। सासुरक साइकिलक कथा-बेथा बैशाख मासक साँझ नहु-नहु हवा बहि रहल छेलै। दिन भरिक तपाएल वातावरण सङ मन्द पवनक सिहकलासँ सुखद प्रतीत भेल छल। डेरासँ फराक जा मोन बहटारैले चलि देने छेलौं। उष्म ऋृतुक साँझक सौन्दर्यक सन्दर्भ एक कविक स्मरण भऽ आएल। “उषम-विषम अब आयल सजनी गे, सुखद भेल बन वात। ककर ने मोन हरण कर सजनी गे, गृष्मक साँझ-परात।।” वस्तुत: गृष्मक साँझ आ प्रात: काल अति मनोहर होइत। ऐ लऽ कऽ हमहूँ सम्प्रति आनन्दक अवलोकनोपरान्त डेरा घूमि कऽ अाबि गेलौं। तरकारी वाड़ीमे पानि पटौल गेल कि नै से देखि रहल छेलौं। हठात् साइकिलक घंटीक टन-टन सुनबामे आएल। चौंकि कऽ देखल तँ हमर मित्र वएह छला जे विद्यालयसँ महा विद्यालय धरि सङ पूरने छला। धड़फराएल दलानक ओलतीमे साइकिल लगा कऽ खाटपर धब्ब दऽ लेटि गेला। हम लग आबि यथोचित अभिवादन केलियनि। मित्र महोदय गुम्म-सुम्म पड़ल रहला। हुनकासँ एहेन अवस्थामे किछु पूछब उचित नै छल। तँए अाङन दिस बढ़लौं। संकेत भेटल जे मिताकेँ चाह दऽ दियनु। गृहिणीक आग्रहकेँ हम हुनका तक पहुँचेबाक प्रयास कएल। आग्रहकेँ ओ दुराग्रह बूझि अनठा देलनि, तथापि हम बलजोरीए चाहक कप हाथमे धड़ा देलियनि। शनै: शनै: चाहक चुस्की लैत गेला। तैबीच पान सेहो खिल्ली मोड़ल आबि गेलनि। पानक खिल्ली मुँहमे दाबि किछु स्वस्थ भेला तखनि हम कुशल क्षेम पूछबाक साहस कएल। ओ उखरल-उखरल जवाब देथि मुदा हम बिकछा कऽ पुछैत गेलियनि। अन्तमे ओ अपन बेथा-कथा कहए लगला- “की पुछै छी! हमरा केहेन तरहक घटनाक शिकार होमए पड़ल अछि?” उत्सुकता बढ़ि गेल जे कोन एहेन घटनाक शिकार भेला जइ कारण वगए-वानि विकृत केने छथि। सरस लोकसँ एहेन चुप्पी सधने छला। खैर! हमर मुद्रा देखि ओ नि:संकोच भऽ खिस्सा सुनबैत गेला आ हम सुनैत गेलौं। हुनक बिआह वर्ष दिनक भीतरे भेल रहनि। सासुर मनोनुकूल भेल छेलनि। ससुर कलकत्ता महानगरीमे नीक पाइ कमाइत रहथिन। पहिल जमाए यएह भेल छेलखिन तँए हिनक सम्मान सभ तरहेँ होइत रहनि। पत्नी अल्प शिक्षित मुदा रूप गुण सम्पन्ना रहथिन। सासु पूर्ण मनोहरथी तँए ई हमर मित्र विवाहोपरान्त अधिकांश समए सासुरेमे बितबैत रहथि। गोरलग्गीमे सासु सए-पचासक नोट दऽ हिनका मनोबलकेँ बढ़ा देने रहथिन। छात्रावासक जीवन-कालक मित्र आब आशमान छुनिहार भऽ गेल छला। सदिखन सासुरेक प्रशंसा करैत हिनक समए बितैत रहनि। भाग्यक भूत सङ छेलनि। बी.ए. पास केला पछाति किरानीगिरीक नौकरी सेहो भऽ गेल रहनि तँए गर्वोक्त्ती होएब सोभाविक रहनि। हमरा तँ ओ झूस बुझथि, किएक तँ हम विद्यार्थी बनले छेलौं। पंचम वर्षक छात्र सङे निरस सासुर ओ धाेंछ ससुर-सासु तँए हिनक एे तरहक सुसंयोगसँ कखनो काल डाहो उत्पन्न होइत छल। खैर! अपन-अपन भाग्य तँए ऐ तरहक डाही भावनाक परित्याग तत्क्षणे कऽ दैत छेलौं। आइ मित्रक बेथा-कथा ओही मुहसँ सूनब से आश्चर्य लगैत छल तथापि श्रोता बनि गेलौं। मित्र महोदय कहलनि जे “सासुक आकंक्षा रहनि जे जमाए साइकिलपर चढ़ल घंटी टन-टनबैत जे अबै छै से बड़ नीक लगैत अछि। ओझहा ईहो साइकिलपर चढ़ल घंटी टनटनबैत आबथि, किएक तँ हिनको नव रेले साइकिल ससुर देथिन हम कहि देने छियनि...।” “संयोगवश पाँचम दिन साइकिल पार्सलसँ रेलबे द्वारा आबि गेल। साइकिल रेलबेसँ छोड़ा कऽ आनल आ जान-बेजान चलौनाइ सिखए लगलौं। ऐ तरहेँ शरीरक जे दुर्गति भेल से की कहब? केतेक बेर खसलौं आ चोट जे लागल से तँ देहेमे भीजैत अछि। ठेहुनक घाव अखनो विद्यमान अछि। कहुना चलबए आबि गेल मुदा ब्रेकपर काबू पाएब आ डाँड़क स्थिरता नै आएल छल कि सासुक समाद लऽ छोट सार आबि गेला। ऐ तरहक समाद पाबि सासुरक हेतु साइकिलसँ यात्र कएल। नवका जोश बेछोह पैडिल दैत चललौं। सासुरसँ कोस भरि पहिले एकटा टोल पड़ैत अछि जेकर नाओं बहुअरबा छिऐ...।” हमरा हँसी लागि गेल तथापि मुँह दाबि कऽ हुनक कथा सुनैत आगू पुछलियनि- “हँ तखनि की भेल?” कहए लगला- “टोल परहक रस्ता संकीर्ण रहैक आ बगलमे खूब गहींर पोखरि पड़ैत छल। हम साइकिल बढ़ौने जाइत रही आकि एकटा भीमकाय साँढ़ फूफू करैत बिच्चे बाटपर ठाढ़ छल। हैडिल तिरछा केलौं ताकि निकलि जाएब से ब्रेकक खियाल नै रहल परिणाम ई भेल जे साइकिल समेत भरि छाती पानिमे चल गेलौं। कहुना साइकिल समेत ऊपर एलौं। तीतले वस्त्र पुनश्य आगू बढ़लौं। बादमे ई शंका हुअए जे कियो चिन्हार लोक ने देखि लिअए। गुणक भेल जे झल-अन्हारीमे कियो चिन्ह नै सकल। सासुरक लगीचमे एकटा गाछी छै, जेतए ब्रीफकेशकेँ कैरियरसँ उतारि कपड़ा बदलबाक हेतु सोचल। ब्रीफकेश खोललापर रंगमे भंग पड़ि गेल! किएक तँ पानि भीतर पहुँच गेल छल। लाल दंत मंजन पानिमे घोरा कऽ क्रीच कएल कपड़ाकेँ रंगि देलक, सङे बिस्कुट पानिक संयोग पाबि कपड़ाक तहमे दही जकाँ जमि गेल छल। सासुरक सामग्री सभ एकदम धिनाैन भऽ गेल छल जे देखि आन्तरिक बेथा उत्पन्न भऽ गेल। घूमि जाएब सोचल, मुदा घुमिओ ने सकै छेलौं। ई बात हास्यास्पद होइत तँए ककरा कहितिऐक, तँए गुरक मारि धोकरा खाइक स्थिति भऽ गेल। आखिर साहस बटोरि कऽ लथ-पथ कपड़ा नेने साइकिलक हैण्डिल पकड़ने विदा भेलौं। बाटमे िकयो पूछए नै जे एना किएक? चिन्हार लोककेँ तँ सत्यपर परदा दैत कहुना ससुरक दलान तक एलौं। घंटीक शब्द कएल। किछु क्षणक पश्चात छोट सार आ सारि सभ दौगल आएल। सासु खिरकी लगसँ देखि रहल छलीह। हमर हतप्रभ अवस्था देखि पितिया ससुर बाजि उठला- ‘ओझहा भीजल छथि आ रूग्न देखाइत छथि की कारण?’ हुनको सङ फूसि बाजि तँ खेपलौं। भीतरे-भीतर कपड़ा बदलबाक व्याकुलता बढ़ल जाइत छल। अाङनमे पत्नीकेँ हमर एबाक सूचना जखने देलकनि आकि ओ धड़फड़ा कऽ अाङन अबैत छली कि एकाएक ओल्तीक टघारमे पएर पड़ि गेलासँ मोंच पड़ि गेलनि। हुनक चित्कार सूनि सासु, सरहोजि प्रभृति नारी गणक भीड़ लागि गेल। आब हमरापर के धियान देत! सभ हुनके परिचरजामे लागि गेल। हम तीतल वस्त्र पहिरने बधलग्गू जकाँ मूक दर्शक भेल रही। किछु कालक पछाति आंगन जेबाक हेतु अनुमति भेटल। पत्नीक कहरबाक शब्द हृदैकेँ विदीर्ण केने जाइत रहए। सरहोजि आ सारिक ऊपरसँ व्यंगवाणक प्रहार होइत रहए। आखिर कपड़ा बदलि स्वस्थ भऽ बसि गेलौं। जलपानक पश्चात यएह सुनबामे आएल जे कोन कुयात्रासँ चलल छेलौं जे अबिते-अबिते ललीक टाँगमे मोंच पड़ि गेलै। आखिर हमर बेथाक थाह केकरा छेलै जे सुनितए? मोने-मोन पचबैत छेलौं...।” “...रात्रि विश्राम शय्यापर जखनि पड़ल रही तखनि पत्नीक आक्रोशपूर्ण स्वर औरो बेचैन कऽ देलक। आखिर जखनि हम अपन कथा-बेथा कहि सुनौल तँ हुनको अश्रुपात् हुअए लगलनि, ऐ तरहेँ गेरूआक सम्पूर्ण भाग नोरक टघारसँ भीजि गेल आ कखनि नीन्न आएल से नै जानि। प्रात: कालक हुनक पएर फीलपाॅवक बिमारी जकाँ प्रतीत भेल। आखिर देहाती उपचारक सङ किछु दबाइ-महलहमक ओरियौन करौल। तत्पश्चात् प्रस्थान करबाक नेआर केलौं। मुदा सरहोजिक प्रबल आग्रहपर रूकि गेलौं। हुनका लोकनिक कठचौल होइत- ‘हँ! दाइक पएरक दर्द तँ अहींक ससारलासँ ठीक हेतनि इत्यादि-इत्यादि।’ आखिर दिनक भोजन काल जेठ सरहोजि कहलनि- ‘ओझहा जेठक पटुआ सागक अलौकिक सुआद होइ छै जँ आमक टिकुला देल हो तँ...। हम बड़ यत्नसँ बनौल अछि। जमाएकेँ सागक तिमन देब निषेध होइत तथापि हमर आग्रह जे कनी ईहो खा लीअ।’ कहलियनि- ‘बेस लाउ।’ खा लेलौं। छोट सरहोजि दही-चीनी देलोपरान्त पाकल केरा सोहि कऽ चारि गोट छिमरि धऽ देलनि। अगत्या ऊहो आग्रह मानि खा लेलौं। हम इसनोफिलियाक पेसेन्ट रहबे करी साइकिल सवारी ई सभ बिमारीक हेतु बनि गेल आ डेरापर अबैत-अबैत दम फूलए लगल। तीन दिन धरि रोगशय्याक सेवन केलौं। सूइया-दवाइक बलपर त्राण तँ भेल, मुदा शरीर अखनो अति कमजोर बुझना जाइत रहए। वेतनमे कटौती हेबाक संभावना अछि तँए अहाँ जँ सहयोग करी तँ मेडिकल सर्टिफिकेट बना दिअ। अहाँकेँ डाक्टर सभसँ हेम-क्षेम नीक अछि। हम कहलियनि- “पाँच गोट टाका फीस देबनि तँ किएक ने बना देता। ओ तमकि गेला आ कहए लगला- तखनि अहाँक कोन प्रयोजन फीस देलासँ तँ डाक्टरसँ जे मोन हएत से लिखबा लेब। हमहूँ जीवनमे सीखलौं जे मोनक बात केकरो नै कहबै। जरलपर नोन नै छीटू। एक तँ साइकिलक बेथा आ तैपरसँ अहाँक कठ हँसीपूर्ण बात दुनू हमर हृदैकेँ विदीर्ण करैत अछि। खैर, यात्राक फेर छल आ सासुक सिनेह-संकटक संकेत।” हुनक बात सुनि अन्तमे मुफ्तमे काज करा देबाक आश्वासन देलियनि। पुनश्च ओ अपन सासुरक पोटरी खोलए लगला, मुदा कार्यरत लोक की सुनत तँए संक्षेपणक सलाह दऽ हुनकासँ मुक्त भेलौं। मुदा आइयो सासुरक साइकिलक कथा-बेथा हास्यहास्पद रूपमे चर्चित अछि। उमेश मण्डल माता-पिता : श्रीमती रामसखी देवी, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। पत्नी : श्रीमती पूनम मण्डल। जन्म तिथि : 31 दिसम्बर 1980 पत्रालय : गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, पिन- 847410, बिहार। सम्प्रति : गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. 06, पिन- 847452, जिला- सुपौल। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), बी.आर.अम्बेदकर बिहार विश्व विद्यालय, मुजफ्फरपुर। प्रकाशित पोथी : निश्तुकी (पद्य संग्रह), मिथिलाक संस्कार गीत, विध-बेवहार गीत आ गीतनाद (मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त मैथिली लोकगीतक पहिल संकलन), मिथिलाक जीव-जन्तु/ वनस्पति और जिनगी’क डिजिटल सचित्र ऑनलाइन संस्करण, मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त लोकगीतक रेकार्डेड ऑनलाइन ऑडियो और वीडियो डिजिटल संकलन। अप्रकाशित कृति- भकइजोत पद्य संग्रह अप्रकाशित। सह सम्पादक : विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका एवं विदेह-सदेह पत्रिका- ISSN 2229-547X VIDEHA (www.videha.co.in) योगदान : विकीपीडियामे मैथिलीक स्थानीयकीकरणमे योगदान, मैथिली भाषाक मानकीकरणमे योगदान। दर्जनो गोष्ठी/संगोष्ठी/परिचर्चा (मैथिली)क आयोजन, दर्जनो पोथी प्रदर्शनी (मैथिली), विभिन्न लेखकक पचाससँ ऊपर मैथिली-पोथीक टंकन (Typeset)। ई-पत्र : umeshberma@gmail.com मोबाइल न. : 8539043668, 9931654742 दूध पपुआ हमर स्कूलसँ गामपर तकक दोस छी। ओना ओ दोसर टोलक छी मुदा स्कूलसँ दमकलक कारोबार एक रहने गंजक सङी सेहो छी। डीजल आनए आ सम्बन्धित आनो-आन काजे गंजपर सङे जाइ-अबै छी। तँए घुमा-फिरा कऽ अदहासँ बेसी समए दुनू गोरे सङे रहै छी। दुनू गोरे झंझारपुर हाइ स्कूलक एके किलासमे पढ़ितो छी, आ गामो परहक काज एकरंगाहे अछि। ओकरो हौन्डा-दमकल छै आ हमरो अछि। तँए दुनू गोरे अदहा-अदही रिन्चसँ सोलहन्नी काज सम्हारि लइ छी। सङे रहने गपो-सप्प बेसी होइए। जइसँ दोस्ती बेसी सक्कत अछि। पाइक लेन-देन सेहो दुनू गोरेक बीच चलिते अछि। एते तँ पढ़ैओमे सुविधा अछिए जे अदहे-अदही दुनू गोरे पोथी कीनने छी आ सभ पोथीक काज अपना जकाँ होइए। तेतबे किए, स्कूलमे जे पढ़ाइ भेल तैपर गंजक रस्तामे चर्च करै छी जइसँ दुनू गोरेक विचार एकरंगाह बनि जाइए। तहूमे मुख्यमंत्री योजनासँ तेहेन मजगूत साइकिल भेटल जे हवाइए जहाज जकाँ उड़बैत चलै छी। पौकेट खर्च दुआरे साइकिलक मरम्मतिक समान सेहो रखने छी, जेते जरूरति बूझि पड़ल, कमा लेलौं। ओना असल काज हमर दू घंटा दमकल चलेनाइ अछि। मनुखक आठ घंटा मशीनक दू घंटाक बरबरि होइ छै। कलम सठि गेल छल तँए आन दिनसँ अदहा घंटा पहिने झंझारपुर विदा भेलौं। पहिने पेन कीनब तखनि ने स्कूलमे काज करब। तइ खियालसँ। हमरा टोहियबैत पपुओ पनरह मिनट पहिने घरपर सँ स्कूल विदा भऽ गेल। दमकल जे चलौने रहए से पाइ सङेमे रहै। रस्तेमे ताड़ी पीब लेलक। एक तँ चढ़ंत बेर तैपर रौद! मुदा गुण छल जे सम्हरि कऽ पीने रहए, तँए कोनो गड़बड़ नहियेँ रहै, मुदा चुल्हियाएल रौदक ताड़ी तँ रहबे करै। पपुआकेँ किलासमे बैसिते तड़िआइन महक पसरल! पकड़ाइत-पकड़ाइत पपुआ पकड़ा गेल। मास्टर साहैब कुरसीपर बैसला। पपुआ टेबुलक बगलमे ठाढ़ भेल। मास्टर साहैब पपुआकेँ पुछलखिन- “पप्पू, ताड़ी पीलह अछि?” मुजरिम जकाँ पप्पू बीचमे ठाढ़, एक दिस शिक्षक दोसर दिस विद्यार्थी। ताड़ीक रमकी पपुआक मनकेँ रमकबैत रहै, तँए अभय जकाँ रहए। जहिना शिक्षक नरम बोलीमे पुछलखिन तहिना पपुओ असथिरसँ बाजल- “सर, ताड़ी नै दूध पीने छी। अहीं ने चारि सए ग्राम दूध प्रतिदिनक हिसावसँ कहने छिऐ। तेतबे पीलौं।” सोझहा-सोझही झूठ सुनि मास्टर साहैब बिगड़लखिन नै। सुधारि कऽ सोचए लगला जे ताड़ी तँ जरूर पीने अछि, तैपर सँ ताड़ीकेँ दूध कहैए! एही गुनधुनमे सरजी रहथि। ताबे बिच्चेमे विद्यार्थी दिससँ एक गोटे बाजल- “मुँह महकै छै?” मुदा विद्यार्थीक झुण्ड एक दिस देखि पपुआक मनमे उठलै, एका-दूकी जवाबसँ काज नै चलत। पचास मुँह झपटि लेत। मुदा तइसँ पहिने जवाब दैत पपुआ बाजल- “बूड़ि कहींकए! फोकड़ाइन नै गमकै छै तँ तड़ियाइन महकै छै!” आँखिक इशारासँ शिक्षक विद्यार्थीकेँ शान्त करैत पप्पूकेँ पुछलखिन- “बौआ पप्पू, दूध केकरा कहै छै?” पपुआक मन हल्लुक रहबे करै, ठोरेपर बरी पकबए लगल- “सर, ताड़ी दोकान सेहो स्कूल छिऐ, ओइ स्कूलमे ताड़क दूध कहल जाइ छै।” ओझरीमे ओझराइसँ बँचैत शिक्षक कहलखिन- “अच्छा, जो पहिने ठीकसँ लघी कऽ आबि असथिरसँ बैस।” संजय कुमार मण्डल जनम- १८ जनवरी १९७४ ई.मे। पिताक नाओं- श्री रामदेव मण्डल, माता- श्रीमती भालसरी देवी। गाम- गोधनपुर, पोस्ट- सुखेत, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, बिहार। जीविकोपार्जन- िचकित्सा प्रतिनिधि। शैक्षनिक योग्यता- बी.एस-सी। मोबाइल नम्बर- ८८६२८६०६०० एकन्त कारी झामड़ि, बेस नमगर, पातरे-पातरे, डेन हाथ, मुदा पेट कोहा सन आ कपार सेहो बड़कीटा हंडी सन, टमाटर सन नाक, डोका सन-सन आँखि छल ओकर। पलिवारक नाओंपर घरवाली एकटा बारह बर्खक बेटा तेतरा आ बेटी अभेलिया। अभेलिया पैघ आ तेतरा छोट छल सम्पति आ घर-घराड़ीक नाओंपर तीन धुरमे बनल एकटा फूसक घर आ कनीटा अँगना जे सभ दिन करची आ खजूरक छाजासँ बनल टाटसँ घेरल रहैत छल जैपर सभ दिन पोरो सागक लत्ती लतरल आ लुब्धल रहैत छल जाइसँ एकन्तकेँ तीमन-तरकारीक अभाव कहियो नै रहैत छल। जहिया रूचि नै चढ़ै छेलै तँ अन्हरी पोखरि जा मछरदानीसँ किन्छरिमे दू-चारि बेर अड़ा लइ छल, माछ तँ एक-आध पाव ुहोइ मुदा घोङही बेस रास भऽ जाइ छेलै। माछ कम भेल तँ हरिअर मिरचाइ आ पीआजु दऽ चटनी बना दू-तीनटा मरूआ रोटी दाबि दैत छल। जौं माछ बेसी भेल तँ तीमन बना लइ छल। आ घोङहीक तीमन तँ तीमन नै तँ सुरका सेहो अपूर्व बनबैत छल। आ नै तँ मलिदा चाउरक भात आ माड़ देल पोड़ोक रसगर साग एकन्त आ गंजपरवालीकेँ जिनगीमे अभावो रहैत प्रेम आ सिनेहक डोरीमे कसिया कऽ बन्हने छल। नगदा पूजीक नाओंपर एकटा बुढ़िया बकरी छल ओकरा, जइसँ जोड़ा छागर सालमे बेचै छल। लूरिक मामलामे एकन्त जरूर धनिक छल। हर-फाड़, चलेनाइ, घर छारनाइ, टाट-फड़क बिननाइसँ लऽ कऽ ढकिया, पथिया, छिट्टा, कोनियाँ इत्यादि बनेनाइ माने गाम घरक सभ लूरि छेलै। जइ कारणसँ ओ कहियो बेरोजगार नै बैसै छल। तँए ओकरा कहियो परदेश जाइक जरूरति नै बुझना गेलै। आ बिना दिक्कते-सिक्कते ओकर जिनगीक गाड़ी सतत चलि रहल छल। तेतरा दिन भरि बकरीक डोरी पकड़ि चरबैत रहै छल। एक दिन तेतरा बकरीकेँ खुट्टीमे ठोकि खेलाए लगल। किछु काल पछाति केम्हरोसँ दूटा कुकुर आएल, बकरीक जे दूटा बच्चा बगलमे कूदि-फानि रहल छल ओकर गरदनि चाभि देलकै। ई देखि बकरीक दोसर बच्चा मेमिऐ लगल। बुढ़िया बकरी भरि दम कुकुरसँ लड़ल, पछिला दुनू टाँगपर ठाढ़ भऽ अगिला दुनू टाँग उठा सींगसँ केतेक बेर कुकुरकेँ ढाही मारलक मुदा कुकुरक आगूमे बकरीकेँ की ओकाति। कुकुरो दूटा छल, एकटा कुकुर बकरीकेँ थनमे हबकि लेलक, बकरी बेदम भऽ गेल। बकरीक मेमिएनाइ सुनि कऽ तेतराक खेलेनाइ भंग भेल, दौगल जा कऽ तेतरा ढेपा-चेपा उठा-उठा कुकुरपर बरसाबऽ लगल। आ धाड़-धाड़ करए लगल। पछाति कुकुर बकरीकेँ छोड़ि पड़ा गेल। कुकुरक आगूमे बकरी बच्चाकेँ की बस चलितै। तेतरा हाँइ-हाँइ कऽ रूसल बकरी बच्चाकेँ उठौलक, झारलक, देखलक तँ एकटा दोसर बच्चाकेँ ठाढ़े ने भेल होइ। ओकरा गरदनिसँ छर-छर लेहु बोहि रहल छेलै। तेतराकेँ किछु फुरेबे ने करए। जे की करी नै करी। थाकि-हारि कऽ तेतरा दुनू बच्चाकेँ काँखमे दाबि बकरीक खुट्टी उखारि, रस्सी पकड़ि घर दिस बिदा भेल। अबिते माएकेँ कहलक- “माए गइ, दुनू बच्चाकेँ चमरटोलीबला करिया कुत्ता हबैक लेलकौ।” तुरंत गंजपरवाली हरदी गिरह पीस कऽ लगेलक आ आगि पजारि बकरी बच्चाकेँ सेदलक। आ छिटटा तरमे झाँपि देलक। ऐ घटनाक असरि एकन्तक मनपर बड़ बेसी पड़लै। सोचै छल जे पूजीक नाओंपर तँ बकरीएटा छल कहीं मरि गेल तँ की करब। अगिला दिन भोरे उठि कऽ तेतरा छिट्टा उघारि बकरीकेँ देखलक, एकटा बच्चा लटपटाएल जकाँ छेलै मुदा दोसरोक स्थिति नीक नै रहै। बकरीक स्थति देखि तेतरा उदास भऽ गेल, दिनमे चिंतासँ खेनाइ नै खेलक। साँझु पहर एकन्त केतौसँ घर छाड़ि कऽ आएल तँ देखलक ओकर दुलरूआ बेटा तेतरा भुखले छल। एकन्त तेतराकेँ मनबैत कहलक- “बौआ, खा न ले। बकरी ठीक भऽ जेतै।” “नै बाबू, हम नै खाएब। हमर बकरी मरि जाएत। दुनू बच्चाकेँ चमरटोलीबला कुत्ता गरदनिमे हबैक लेने छै। आ बकरीकेँ थनमे सेहो। हम नै खाएब। जाबे हमर बकरी ठीक नै भऽ जाएत।” एकन्तकेँ किछु फुड़ेबे ने करैत। बेटाकेँ केना मनाएल जाए। अंतमे एकटा जुक्ति फुड़लै, बाजल- “बौआ, चल तँ अन्हरी पोखरि, माछ मारि कऽ अनैले। माछ भेल तँ बड़ बढ़ियाँ नै तँ घोङही तीमन तँ हेबे करत। चल मछरदानी लऽ कऽ।” माछक नाओंपर तेतरा जेना-तेना तैयार भेल। दुनू बापूत पोखरिक िकन्छरिमे मछरदानी अड़ाबऽ लगल। तीन चारि बेर अड़ेलक तँ लगभग एक सेर घोङही आ अदहा सेर इचना, डेढ़बा आ पोठी, मारा मिला कऽ भेल। दुनू बापूत घर आएल। एकन्त हाक दऽ बाजल- “केतए गेलौ यौ गंजपरवाली, माछ मारि कऽ अनलौं आ घोङही सेहो अछि। अखनि खूब कड़ू-झड़ू कऽ माछक तीमन बनाउ आ काल्हि दिनमे घोङहीक तीमन बना लेब।” गंजपरवाली बड़ी जतनसँ माछ बनेलक। ओकरा सदिखन मन रहै जे बकरी सोगे दिनमे तेतरा खेनाइ नै खेलक तँए बेस अधिक रास कऽ मिरचाइ, रैंची, लहसुन दऽ कऽ माछ रन्हलक। पूरा टोल बुझू जे गमैक उठल। तेतराकेँ हाक दऽ बाजल- “बौआ, रौ तोंहू हाथ-मुँह धो ले, आ बाबूकेँ बजेने आही। हम खेनाइ काढ़ै छी।” हाथ-मुँह धो दुनू-बापूत खाइले बैसल। मुदा तेतराक धियान बकरीए आ पठरूएपर छेलै। तेतरा बाजल- “बाबू हौ, तूँ खा हम कनी बकरी बच्चाकेँ देखने अबै छी।” “धूर बुड़बक खो ने, बकरीकेँ किच्छो नै हेतै।” ताधरि तेतरा उठि कऽ बकरी बच्चाकेँ देखि आएल। दुनू जीवित रहै मुदा स्थिति ठीक नै। स्थिति देखि तेतराक मन खाइक नै भेलै। मुदा बापक डर आ माछक झसगर गंधपर बेचारा खेनाइ शुरू केलक, नीक लगलै, भरि इच्छा खेलक दुनू बापूत। भोजनक गदपर नीन जल्दीए दाबि देलकै तेतरा सुति रहल आ एकन्त खैनी चुना कऽ खेला बाद पड़ि रहल। रातिमे लगभग दू बाजि रहल छल, एकन्तक पेट जेना फूलल जा रहल छेलै। कछ-मछ करै छल मुदा नीन नै होइ छेलै। थोड़ेकाल बाद पेट एकबेर जोरसँ हड़बड़ेलै आ पैखाना करैक इच्छा भेलै। लोटा लऽ कऽ बान्हपर गेल। मुदा बेसी दूर नै जा सकल। चटदनि बान्हऽ कातमे बैस गेल। कसगर झार भेलै। मुदा पेट शान्त नै भेलै। आबि कऽ पड़ि रहल। बुझना जाइ जेना पेटमे किछु गड़ै छेलै। कछ-मछ करै छल थोड़े काल पछाति फेर पैखाना लगलै, विदा भेल, किछु मन हल्लुक भेलै। पानि लऽ हाथ मटिया उठि विदा भेल आकि फेर मन हदमदए लगलै। बैस रहल फेर दूटा उन्टी भेलै देह पसीना-पसीना भऽ गेलै। उठैक साहसे ने होइ। जखनि मन अस्थिर भेलै तखनि विदा भेल, बुझना गेलै जे ठाढ़ नै भेल होएत। कमजोरी बुझना जाइ छेलै। कहुना हिम्मत कऽ डेग बढ़ेलक, मुदा घर तक नै आबि सकल रस्तेपर खसि पड़ल आ अचेत भऽ गेल। भोरे तेतराकेँ नीन खुजलै तँ बापकेँ बगलमे नै देखल, उठि कऽ बकरी बच्चाकेँ देखए गेल तँ दुनू बकरी बच्चा मरल, पड़ल छेलै। तेतराकेँ बुकौर लगि गेलै, हबोढकार भऽ कानए लगल। तेतराक कानब सुनि गंजपरवाली सेहो दौग कऽ आएल, जेना-तेना बेटाकेँ चुप केलक। ताधरि मुनेसर बाहरसँ अवाज देलक- “गंजपरवाली छी यै, तेतरा छेँ रौ, देखही तँ बापकेँ की भऽ गेलौ, बान्हपर ओंघराएल छौ।” ताधरि अगल-बगलक लोक सभ सेहो जमा भऽ गेल। आ एकन्तकेँ उठा-पुठा कऽ घरमे देलक। कियो तेलसँ मालिश तँ कियो नून-पानि-चीनीक घोल बना कऽ पिआबए लगल। जइसँ एकन्तक तबीयतमे थोड़े सुधार भेलै। बकरी बच्चा मरिए गेल छेलै, बुढ़िया बकरी खढ़ खेबे ने करै, दू-तीन-दिन पछाति बुढिओ बकरी टग हानि देलकै। गरीबक पूजी छेलै ई बकरी आ पठरू। सोचै छल दुर्गा पूजामे छागर बेचि कऽ तेतरा आ अभेलियाकेँ कपड़ा कीनि देबै, मुदा सेहो आश टूटि गेलै। एकन्तकेँ आगूक जिनगी अन्हार बुझना जा रहल छेलै। कारण पूजीक नाओंपर बकरी आ छागर मात्र ओकर जमा नगद पूजी छेलै। चिन्ता आ शोकसँ एकन्त आरो अधिक बिमार पड़ि गेल। दस्त रूकबे ने करै। पाइक अभावमे डाक्टर लग जा नै सकैत छल, आ घरेलू उपचारसँ ठीक नै भऽ रहल छेलै। आब ओकरा दस्तसँ सुलबाइ धऽ लेलकै। भरि-भरि दिन लोटे हाथे रहै छल आ बान्हेकातमे बैसल रहै छल। खूने पैखाना होइ छेलै। धीरे-धीरे शरीरमे लौह तत्वक कमी भऽ गेलै। एक दिन पैखानापर बैसल-बैसल अचेत भऽ ओंघरा गेल एक-दू बेर हिचकी उठलै, मन धुमै छेलै, सगरे अन्हारे-अन्हार बूझि पड़ैत रहै। उन्टीक इच्छा होइत रहै, मुदा उन्टी होइ नै छेलै। जोरसँ खौंखी उठलै आ खोंखी करिते-करिते दम टूटि गेलै। तेतरा जेना-तेना उधार पैंच कऽ काजसँ निवृत भेल मुदा बकरी आ बापक सोग तेहने भेलै जे ओहो अन्न-पानि तियागि देने छल। भरि-भरि दुपहरिया बाधमे असकरे बैसल रहै छल आ पता नै किदनि कहाँ बतियाति रहै छल। एक-दू दिन बीतलै, मुदा पेटक आगि केते दिन बरदास होइतै। तेतरा बाधेमे बैसल-बैसल कौंकरहरिबला माटि खाए लगल। धीरे-धीरे ओकरो शरीर गलि गेलै, पाण्डु पकड़ि लेलकै, अन्न खेबाक प्रयासो केलक, मुदा घोंटेबे ने करै। डेढ़-दू मास घिसियौर कटैत ओकरो यएह लीला भेलै। समाप्त भऽ गेल। अभेलियाकेँ बादमे टी.बी पकड़ि लेलकै ओहो दिन राति खोंखी आ खूनक उन्टी करैत रहै छल। इलाज बेतरे मरनासन्न भऽ गेल। जे दिन जइ पहर छै, मरबे करत। गंजपरवाली सेहो लटपटाएले जकाँ। ओहो बिमार रहए लागलि। जेना-तेना लोक सबहक बरतन-बासन कऽ जीवन-यापन करैत अछि। भरि दिन भगवानकेँ कहैत रहैए- “सभकेँ छीनिए लेलह हमरा किए छोड़ि देलह, अभेलियोकेँ उठा लहक हे महादेव, कृपा करह हे भोला दानी ऐ कष्टसँ फूरसत दैह।” गंजपरवाली भरि दिन यएह रटैत रहैए जे हमर अंत कहिया हएत हे बाबा हमर अंत कहिया हएत। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 61 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १६३ म अंक ०१ अक्टूबर २०१४ (वर्ष ७ मास ८२ अंक १६३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA