ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६४ म अंक १५ अक्टूबर २०१४ (वर्ष ७ मास ८२ अंक १६४) दिनांक ३० अगस्तब २०१४ केँ सखुआ-भपटियाही गाममे आयोजित ८३म खेपक ‘सगर राति दीप जरय’ मे पठित कथा सभ मनमनियाँ-उमेश मण्डल मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध सर्वहारा मंच “सगर राति दीप जरय” केर ८३म कथा गोष्ठी फुलपरास अनुमण्डलक सखुआ-भपटियाही गामक उत्क्रमित मध्य विद्यालय परिसरमे दिनांक ३० अगस्तक (२०१४) साँझ छह बजेसँ शूरू भऽ ३१ अगस्तक भिनसर छह बजे धरि आकर्षक अध्यक्ष मण्डल तथा संचालन समिति केर अन्तर्गत चलैत रहल। अध्यक्ष मण्डलमे डा. विमल कुमार राय, डा. योगेन्द्र पाठक ‘वियागी’, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री कमलेश झा, तथा डा. शिवकुमार प्रसाद रहथि, तहिना मंचक संचालन समितिमे श्री ओम प्रकाश झा, श्री राजदेव मण्डल आ श्री दुर्गानन्द मण्डल छला। जहिना जन सहयोगसँ ई गोष्ठी आयोजित छल तहिना भपटियाही, सखुआ, छजना, नरहिया, निर्मली, औरहा, बेरियाही, सुरियाही, रतनसारा, चतरापट्टी, नवटोली, कदमपुरा, पकड़िया, लक्ष्मिनियाँ, गम्हरिया, बेलही इत्यादि गामक तथा टोलक साहित्य प्रेमीक उपस्थिति छल। नव-नव साहित्य प्रेमी सोझाँ एला। पठित कथापर त्वरित समीक्षा/टिप्पणी दऽ केतेक गोटे अपन नव परिचए बनौलनि, देलनि आ सोझा एला। जे सगर राति दीप जरय’क उदेस रहल अछि। उपस्थित साहित्यकार सभ अह्लादित भेला। केते गोटे अपन विचार सेहो मंचेपर व्यक्त केलनि जे अहिना गोष्ठी जँ गाम-घरमे हएत तँ नव-नव लोकक प्रवेश स्वत: साहित्य क्षेत्र होइत रहत, जइसँ समाजक संग साहित्य डेग-मे-डेग मिला कऽ चलत आ चलैत रहत। जइसँ जनजागरण हएत आ मैथिली साहित्यक मध्य एक खास अभावक पूर्ति सेहो हएत। नारी केन्द्रित गोष्ठी भेने नारी विमर्श करैत अनेक कथा आएल। कथा मध्य ढेर रास नारी-समस्यामस्या क त डकँ, केँ चिन्हित कएल गेल। समीक्षक लोकनि अपन-अपन मत दैत भरि रातिक यात्राकेँ सफल बनौलनि। गामक किछु नारीओ गोष्ठीमे एक श्रोता रूपमे उपस्थित छेली। गोष्ठीक आरम्भ सामुहिक रूपेँ विधिवत् दीप प्रज्वलित कऽ स्थानीय डा. विमल कुमार राय, श्री सूरज नारायण राय ‘सुमन’, संग-संग कलकत्तासँ आएल डा. योगेन्द्र पाठक ‘वियाेगी’, भागलपुरसँ आएल श्री ओम प्रकाश झा एवं बेरमासँ आएल श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी द्वारा करौल गेल। छह पालीमे कुल २७ गोट नूतन विहनि/लघु कथाक पाठ भेल। समीक्षा भेल, दर्जन भरि पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे दू गोट पोथी क्रमश: “कारू खिरहरि” आ “संत कारू खिरहरि” अयोधी यादव ‘अमर’क। आ पाँच गोट लघु कथाक पोथीक साॅफ्ट कौपी क्रमश: “अप्पन-बीरान”, “पतझाड़”, “बाल-गोपाल”, “रटनी खढ़” तथा नारी केन्द्रित कथा संग्रह “लजबिजी” जगदीश प्रसाद मण्डलक तहिना दूटा पटकथा पहिल “जाल” आ दोसर “पंचैती” राजदेव मण्डलक, एकटा कविता संग्रह “सूखल मन तरसल आँखि” मुन्नी कामतक आ बेचन ठाकुरक एकटा नाटक “भोँट” लोकार्पित भेल। ८४म सगर राति दीप जरयक आयोजन झंझारपुर अनुमण्डलक बेरमा गाममे शिवकुमार मिश्र जीक संयोजकत्वमे २० दिसम्बर-२०१४केँ होएत। बेरमा गाममे ७१म कथा गोष्ठी दिनांक ०२.१०.२०१०केँ मध्य विद्यालय परिसर-बुढ़िया गाछी-दुर्गा स्थान-मे भेल छल। एतेक दिनमे ई दोसर खेप छी। अक्षय कुमार झा आ जे.पी.गुप्ता अपन-अपन पहिल कथा लिखि गोष्ठीमे उपस्थित तँ भेला मुदा कथाक पाठ नै केलनि जे बात पछाति खूलल। अन्तमे संयोजक नन्द विलास राय स्थानीय साहित्य प्रेमी, जिनका सबहक विशेष सहयोग छल ऐ आयोजनमे, तइ सभ बेक्तीकेँ धैनवाद ज्ञापन केलनि। संग-संग श्री गजेन्द्र ठाकुर दिससँ श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित मैथिलीक आधुनिक पोथी, सभ गोटेकेँ मंचेपर देल गेलनि। विशेष सहयोगी सबहक नाओं ऐ तरहेँ अछि- डा. विमल कुमार राय, श्री धीरेन्द्र कुमार, श्री सूरज नारायण राय, श्री अशोक कुमार राय, श्री सुन्दर लाल साह, मो. रिजवान, श्री सियाराम साह, श्री शम्भू सिंह, श्री यादव, श्री उमाकान्त राय, श्री जगत नारायण राय, श्री ब्रजनन्दन साह, श्री उमेश साह, श्री सुधीर साह, श्री रामकुमार मण्डल, श्री सत्य नारायण सिंह आ श्री लक्ष्मी मण्डल। ब्रेकिंग- अध्यक्ष मण्डल- डा. विमल कुमार राय, डा. योगेन्द्र पाठक ‘वियागी’, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री कमलेश झा, डा. शिवकुमार प्रसाद। संचालन समिति- श्री ओम प्रकाश झा, श्री राजदेव मण्डल, श्री दुर्गानन्द मण्डल। कथा पाठ एवं समीक्षा- पहिल सत्रमे- जगदीश प्रसाद मण्डल- “गावीस मोइस”; शारदानन्द सिंह- “की करब से अहीं कहू”; राजदेव मण्डल- “दोख केकर” तथा लक्ष्मी दास- “गंगाजलक धोल” समीक्षा- योगेन्द्र पाठक ‘िवयोगी’, कमलेश झा, विमल कुमार राय, शिवकुमार प्रसाद, गौड़ी शंकर साह। दोसर सत्रमे- दुर्गानन्द मण्डल- “छुतहरि”; कपिलेश्वर राउत- “बड़का खीरा”, योगेन्द्र पाठक वियागी- “विजय दृश्य-१, विजय दृश्य दू-२”; ललन कुमार कामत- “बेटी” समीक्षा- फागुलाल साहु, राजदेव मण्डल, अयोधी यादव ‘अमर’, कमलेश झा आ शिवकुमार प्रसाद। तेसर सत्र- ओम प्रकाश झा- बेटीक बियाह, शिव कुमार प्रसाद- “झमकी”; राम िवलास साहु- “अविसबास”; हेम नारायण साहु- “बेसी भऽ गेल आब नै” समीक्षा- उमेश मण्डल, शम्भु सौरभ, दुर्गानन्द मण्डल। चारिम सत्र- उमेश मण्डल- “कोटाक चाउर”; फागुलाल साहु- “मर्दानी नारी”; शम्भु सौरभ- “लाजो”; शिव कुमार मिश्र- “बाल विधवा” समीक्षा- कमलेश झा, ओम प्रकाश झा, राजदेव मण्डल, उमेश नारायण कर्ण तथा दुर्गानन्द मण्डल। पाँचिम सत्र- ओम प्रकाश झा- “कुलच्छनी”; गौड़ी शंकर साह- “छोटकी”; उमेश नारायण कर्ण- “यूज एण्ड थ्रो”; अच्छेलाल शास्त्री- “गुलटेनमा”; नन्द विलास राय- “दिव्या” समीक्षा- कमलेश झा, दुर्गानन्द मण्डल, राम कुमार मण्डल, फागुलाल साहु, राजदेव मण्डल। छअम सत्र- राम विलास साहु- “बौआ बाजल”; फागुलाल साहु- “चतुर बालक”; जगदीश प्रसाद मण्डल- “रेहना चाची”; शारदा नन्द सिंह- “फक दऽ निसाँस छूटल”; डाॅ. कीर्ति नाथ झा- (वाचक- उमेश मण्डल) “शेफाली, फुलपरासवाली आ हम” समीक्षा- अयोधी यादव, ओम प्रकाश झा, शम्भू सौरभ, ललन कुमार कामत, शिव कुमार मिश्र। पोथी लोकार्पणकर्ता- डा. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’/श्री कमलेश झा/श्री रामकुमार मण्डल- “कारु खिरहरि” अयोधी यादव ‘अमर’क श्री जगदीश प्रसाद मण्डल/ श्री राजदेव मण्डल/ डा. विमल कुमार राय/ डा. शिवकुमार प्रसाद/ श्री शम्भु सौरभ- “संत कारू खिरहरि” अयोधी यादव ‘अमर’क श्री फागुलाल साहु- “सूखल मन तरसल आँखि” (कविता संग्रह)- मुन्नी कामतक श्री शम्भु सौरभ- “कथा कुसुम” (विहनि/लघु कथा संग्रह) दुर्गानन्द मण्डलक श्री ब्रजनन्दन साह- “भोँट” (नाटक) बेचन ठाकुरक श्री हेम नारायण साहु- “पंचैती” (पटकथा) राजदेव मण्डलक श्री शिव कुमार मिश्र- “जाल” (पटकथा) राजदेव मण्डलक श्री कमलेश झा- “अपन-बिरान” (लघु/विहनि कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक श्री उमेश नारायण कर्ण- “पतझाड़” (लघु/विहनि कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक श्री फागुलाल साहु- “रटनी खढ़” (लघु/विहनि कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक श्री राम कुमार मण्डल- “बाल-गोपाल” (लघु/विहनि कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक श्री ओम प्रकाश झा- “लजबिजी” (लघु/विहनि कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक -उमेश मण्डल २७/०९/२०१४ कथाक सत्तरि रेहना चाची 00 की करब से अहीं कहू 00 दोख केकर 00 गंगाजलक धोल 00 छुतहरि 00 बड़का खीरा 00 विजय दृश्य-१ विजय दृश्य दू-२ 00 बेटी 00 बेटीक बियाह 00 झमकी 00 अविसबास 00 बेसी भऽ गेल आब नै 00 कोटाक चाउर 00 मर्दानी नारी 00 लाजो 00 बाल विधवा 00 कुलच्छनी 00 छोटकी 00 यूज एण्ड थ्रो 00 गुलटेनमा 00 दिव्या 00 बौआ बाजल 00 चतुर बालक 00 गावीस मोइस 00 फक दऽ निसाँस छूटल 00 शेफाली, फुलपरासवाली आ हम 00 बेटी रूपी बोझ 00 प्रेमक अधिकार 00 जगदीश प्रसाद मण्डल :: रेहना चाची दिन लहसैत किशुन भाय लौफा हाटसँ घुमती बेर जखनि दीप पहुँचला तँ बाटपर ठाढ़ रेहना चाचीपर नजरि पड़लनि। कोराक बच्चा-प्रपौत्रकेँ रेहना चाची बाजि-बाजि खेलबैत रहथि। रेहना चाचीक ‘अवाज’ सुनिते किशुन भायकेँ सात-आठ बरख पहिलुका बूझि पड़लनि मुदा सत्तरि बर्खक झूर-झूर भेल शरीर, धँसल आँखि, आमक चोकर जकाँ मुँहक सुरखी देखि शंको भेलनि। ओना सात-आठ बर्खसँ किशुन भाय रेहना चाचीकेँ नै देखने रहथि तँए हँ-नै दुनूमे मन फँसल रहनि। फँसबो उचिते छेलनि। एक दिनमे तँ राज-पाट उनटि जाइए, सात-आठ बरख तँ सहजे सात-आठ बरख भेल। मुदा तैयो मन तरसैत रहनि, तरंगी होइत रहनि जे रेहना चाचीक अवाज छी। लग्गा भरि हटि बाटेपर साइकिल दहिना पएरक भरे ठाढ़ केने, रेहना चाचीपर आँखि गड़ौने मने-मन विचारिते छला आकि अनायास मुँह फुटलनि- “रेहना चाची।” ‘रेहना चाची’ सुनि चाची बच्चापर सँ नजरि उठा चारू दिस खिरौलनि। दछिनवारि भाग साइकिलपर ठाढ़ भेलपर नजरि पड़लनि। चेहरासँ चिन्ह नै सकली। मुदा कानमे किशुनक अवाज ठहकलनि। अवाज ठहकिते बोल फुटलनि- “बौआ, किशुन।” ‘बौआ किशुन’ सुनि किशुन भायकेँ जीहमे जान एलनि। जान अबिते जीहपर राखल तीस बरख पहिलुका रेहना चाचीक रूप-रंग-बोल ठहकलनि। वएह रेहना चाची जिनकर जिनगीक दुनियाँ दछिन भाग लखनौर उत्तर बेरमा पूब कछुबी आ पछिम सुखेत भरि छेलनि। यएह छेलनि हुनकर कर्मभूमि आ दीप छेलनि पतिभूमि। एक तँ अहुना दीप ओहन गाम अछि जइमे छोट घराड़ीक परिवार बेसी अछि। जइसँ बरो-बाट घराड़ीए बनि सुखसँ रहैए। पहिने घराड़ीपर घर तखनि ने जाइ अबैले आकि चलै-फिड़ैले बर-बाटक खगता होइए। बाटक काज तँ एक पेड़ीओ, खुरपेड़ीओ आ धुरपेड़ीओसँ चलि सकैए मुदा घराड़ी बिना ‘घर’ बाँसक धूजा बनि थोड़े फहराएत। घराड़ी भरि जमीनमे बास करैवाली रेहना चाचीक जीविकाक बेवसाय छेलनि, भोरे अपन जबावदेहीक अँगना-घरक काज सम्हारि, पथियामे अपन सौदा-बारी सैंति, चारू दिसक गामक पारक हिसाबसँ निकलि एक अनिया अलता, पैयाही डोरा, पैयाही सुइयाक संग आनो-आन बौस लऽ गामक सीमान टपि आन सीमानमे भरि दिन गमा साँझ पड़ैत फेर अपन सीमानमे पहुँच जाइ छेली। मिथिलाक जे गौरव-गाथा अछि दुआरपर आएल बाट-बटोही, भूखल-दूखल जँ खाइबेर पहुँचैत वा जलखैए बेर पहुँचैत आकि जखनि जे समए रहल, पहिने हुनकर आग्रह करियनि। ओना खाधुरोक अपन राज-पाट छै। जँ से नै छै तँ ओइठामक भोजैतक कोटा हजार रसगुल्ला आ बीस किलो माछक ओरियानक पछाति किए नतहारी ताकब छै। ओहन नतहारी जकाँ तँ नै मुदा हिस्सामे बखरा तँ लोक निमाहिते अछि। काेनो गाम अबैसँ पहिने रेहना चाची बिसरि जाइ छेली जे भरि दिन खाएब की आ रहब केतए। परिवार परिवारक बीच खाली कारेबारक सम्बन्ध नै। घंटा-घंटा बैसि रेहना चाची अपनो जिनगी आ परिवारो-समाजोक जिनगीक खिस्सा-पिहानी सुनैत अपन कारोबार करैत आएल छेली। साइकिलपर सँ उतरि किशुन भाय, स्टेण्डपर साइकिल ठाढ़ करैत बजला- “चाची गोड़ लगै छी?” किशुन भायक गोड़ लागब रेहना चाची सुनबे ने केली जे असीरवाद दितथिन, ले बलैया उनटा कऽ पूछि देलखिन- “बौआ, माए नीके छह किने। जहियासँ गाम छूटल, कारोबार गेल तहियासँ चीन्हो-पहचीन गेल। के केतए जीबैए आ केतए मरि गेल। मरि गेल मनक सभ सखी-बहिनपा।” रेहना चाचीक बात सुनि किशुन भायक माथ चकरेलनि। जहिना एक-जनिया, दू-जनिया, बहु-जनिया ओछाइनो-बिछाइन चकराइत जाइए तहिना बुधिओ-बुधियारी आ चासो-बास तँ चकराइते अछि। तहिना किशुन भायक मन चकरा गेलनि, चकरा ई गेलनि जे गाम छूटल! गाम किए छूटल? गुम-सुम भेल किशुन भाय रेहना चाचीक झूर-झूर भेल चेहरा देखए लगला, जेना खेसारी-बदामक बीड़िया झूर-झूर भेलो पछाति गरदी तरकारीक रूप पकड़ि भोज्य भोग पबैक सुख पबैत अपन जिनगी चैनसँ गमबए चाहैए, तहिना चाचीक मन सेहो पुलकैत रहनि। मुदा बिनु बुझनौं तँ नहिने लोक बुझैत। कोनो बात सूनब आ बूझब, दू भेल। बुझैले बेसी सुनए पड़ै छै, सुनै तँ लोक एकहरफीओ अछि। भाय पुछलखिन- “चाची, गाम केना छूटल?” किशुन भायक प्रश्न सुनि रेहना चाचीकेँ एको मिसिया बिसबिसी नै लगलनि, जेना नीक जिनगी पाबि कियो नीक सिरासँ अपन जिनगीक बाट पबिते खुशी होइए तहिना भगिन जमए पाबि रेहना चाची खुशी छथि। मुदा पेटमे पेटेले झगड़ा उठि गेलनि। झगड़ा ई उठलनि जे बीतल जिनगीमे जे घटल सत बात अछि ओ बाजल जा सकैए की नै? ओना आब ओइ बातक खगतो नहियेँ जकाँ अछि मुदा इतिहास तँ काल-खण्ड विहीन भाइए जाएत? मन बेकाबू भऽ गेलनि! मुदा बिसवास देलकनि। बिसवास ई देलकनि जे अबैया दिन सुखैया तँ अछिए तखनि किए ने अपन जिनगीक बात भाइओ-भातीजकेँ कहि दिऐ। आब कियो जिनगी लूटि लेत। बजली- “बौआ, सात-आठ बर्खसँ गाम सभ छोड़लौं, ओना खटनी छूटने देहो हर-हरा गेल, मुदा मन अखनो कहैए जे जानि कऽ रोगा गेलौं। गामे-गामे तेना ने छीना-झपटी हुअ लगल, जे आन गामक लोकक कारेबारेेटा नै चलैक रस्तो कटि-खोंटि गेल।” एक संग किशुन भायक मनमे रंग-बिरंगक अनेको प्रश्न उठि गेलनि, मुदा जहिना मुड़ी आ टाँग कटल लहासकेँ परखब कठिन भऽ जाइए तहिना चाचीक बात सुनि भेलनि। छीना-झपटी आकि झपटी-झपटा, वएह ने जे जहिना प्रखर वक्ता लोकनि अपन मेहिका चाउरमे मोटका चाउर फेँटि काज ससारि लइ छथि आकि मोटके चाउरमे मेहिका फेँटि दइ छथिन...। मुदा अनेरे मन वौअबै छी। मनकेँ थीर करैत बजला- “चाची, जहिया जे भेल, से भेल, आब नीके छी किने?” किशुन भायक बात सुनि रेहना चाची बिसमित भऽ गेली। ‘बिसमित’ ई भऽ गेली जे यएह देह छी, अपन गाम लगा पाँच गामक लोकसँ हबो-गब करै छेलौं आ खेबो-पीबो करै छेलौं, कमाइओ-खटा लइ छेलौं, से तँ छिनाइए गेल! ओना आब अपन उमेरो ने रहल जे माथपर पथिया लऽ चारि गाम घूमि कारोबार करब। रेहना चाची बजली- “अपन बेटा-पोता अल्ला हेरि लेलनि, मुदा फेर वएह ने देबो केलनि।” रेहना चाचीक उत्तर किशुन भाय नीक जकाँ नै बूझि सकला। तेकर कारण भेलनि जे लगले सुनला जे बेटा-पोता हेरि लेलनि आ लगले सुनला जे प्रपौत्र बच्चा छी आ भगिन-जमएक परिवारमे रहै छी। मनकेँ सोझरबैत किशुन भाय बजला- “चाची, हमरा ओहिना मन अछि, जखनि माइओ आ अहूँ एकेठीन बैसि खेबो करी आ नीक-अधला गपो करी।” किशुन भायक बात सुनि रेहना चाचीक अपन सत्तरि बर्खक जिनगी बिजलोका जकाँ मनमे चमकलनि। करियाएल मेघ, बदरियाएल मौसम, सरदियाएल रातिमे जखनि बिजलोका चमकै छै तखनि ओ अपन इजोतक संग अवाज करैत कहै छै जे हम लाली इजोत छी नै कि पीड़ी। पीड़ी दूर-देशक होइ छै लाली लगक। प्रमाण असतक होइ छै आकि सतक? सत तँ अपने सत भऽ सौंसे फल फड़ जकाँ अछि। रेहना चाचीक आगूमे ठाढ़ किशुन भायक ने ‘अक’ चलनि आ ने ‘बक’। दिन सेहो लुक-झुका गेल। सुरूज तँ डूमि गेल मुदा लाली ओहिना पसरल छल। किशुन भाय बजला- “चाची, अखनि तँ दिन निसचित नै भेल मुदा अखने कहि दइ छी जे अहाँकेँ लिऔन करै छी।” किशुन भायक ‘लिऔन’ सुनि रेहना चाचीक मन ठहकलनि। मन ठहकलनि ई जे आब वएह जुग-जमाना रहल आकि ओइसँ नीको-अधला भेल। नीक-अधलाक बीच रेहना चाची बोझक तर पड़ि गेली। जइसँ बोथिया गेली। बोथिया ई गेली जे की सम्बन्ध छल! कोरा-काँख तर केते दिन किशुन लालकेँ नेने छी, पावनिमे पवनौट खुएलौं आ अपने केतए खेलौं, तेकर कोन हिसाब। जिनगीए ओही भरोसे बीतल किने। आइ ओइ किशुन लालक बेटाक बिआह छी, की आब ओतए पहुँच पाइब सकै छी? केना पाबि सकै छी? जैठाम लोक अधला काज करै छल तैठाम गंगाजलसँ सिक्त कऽ नीक बनौल जाइ छल, आ अखनो बनौल जाइए। मुदा ओहन तँ जगहे खिया गेल। मुदा जैठाम गंगेजल अधला बनि जाएत, तैठाम की उपए। रेहना चाचीक मन ओझरा गेलनि। मुदा सँझुका तारा जकाँ जेना मनमे भुक दनि उगलनि। उगलनि ई जे जँ कहीं काजेक चर्च पाछू पड़ि जाएत आ अनेरूए गप साँझ पड़ा देत तइसँ नीक जे काजक नांगरि पकड़ि धार पार होइ, बजली- “बौआ, ढौओ-कौड़ी लेलहक हेन?” ढौआ-कौड़ीक बात सुनि किशुन भायक मन पुलकलनि। बजला- “चाची, बिआहक अखनि गपे-सप उठल हेन, ओ सभ गप पछुआएले अछि, जखनि बिआहमे एबे करब तखनि सभ गप बुझा देब।” किशुन भायक झाँपल-तोपल बात सुनि रेहनो चाचीक मनमे उठलनि, जेते अल्ला-मियाँ परिवार सभकेँ झाँपन-तोपन दैत रहथिन तेते नीक। भगवान सभकेँ नीक करथुन। बजली- “किशुन बौआ, देखिते छह जे अथबल भेलौं। चलै-फिड़ै जोकर नै रहलौं, मुदा पोताक बिआह देखैक मन तँ होइते अछि, से...।” रेहना चाचीक बात सुनि किशुन भाय गुम भऽ गेला। गुम ई भऽ गेला जे की रेहना चाचीकेँ यज्ञ-काजमे लियनु करा लऽ जा पएब? की समाज एकरा पसिन करत? जे दुरकाल समए बनल जा रहल अछि ओ भरियाएल जरूर अछि। मुदा जात तर पड़ल ओंगरी जँ निकालि नै लेब, तँ जातक काजे केना चलत। कोनो एकेटा ने हएत या तँ पीसिया हएत वा ओंगरी पिसाएत। मुदा भविस...।१,३०७ ९ जुलाई २०१४ शारदा नन्द सिंह :: की करब से अहीं कहू रामा कहलकै- “ऐ सुनै नइ छै। अँगनामे नै छै की? केतए चलि जाइ छै, से नै जाइन।” देखियौ ने एतबे कालमे कए गोट महाजन दुआरि लागि गेला। अखनि तँ भोरे भेलैए, दिन तँ बाँकी छै। आ किछु पटौनीओं बलामे रहिए गेलै। पहिलुका महाजन कहिते रहै आकि धरदनि दोसरो महाजन हुनक मँुहक बात ऊपरे लोकि लेल की जे वरू खाद तरेचा जे नेने छेलै ओहूमे अदहा देने रहै आर बाँकी रहि गेलै। कहने छेलखिन जे यूरियाक बोरा लेबै ने तँ ओहीमे मिझर करादेब। से तँ आब फसिलो नवको होइतै। आइ बिनु नेने कि हम टसकि नै सकै छी। एनामे तँ हमर भट्ठीए जाम भऽ जाएत। एहेन महाजनीसँ बाद अबै छी। कहू एहनो भेलैए। एतै कहल गेलै जे पैंच खिआइ ऋृणे बिआइ। ई उतारा चौरी भऽ रहल छेलै की। एकटा गाड़ी एम्हरे हौरन दैत हुरहुराइत आबि रहले ओहीपर लिखल छेलै उतरी बिअार ग्रामीण क्षेत्रिय बैंक गोड़ा-वौराम दुआरि लागि गेल अछि। मुहथरिपर अमला सभ ठाढ़ भऽ कऽ पूछि बैसला- “यही रामा का घर है?” सभकेँ सभ अकबका गेल। ई तँ एहेन सनक दृश्य गोचर होइ छै कि प्रयाग राजक संगम सुनै छी से सएह बुझू। एमहर गमैआ महाजन आ ओमहर सरकरिया तंत्र बीचमे रामा। दुनू अपन-अपन अोसुलीक तगेदाक संगे धमकी दऽ रहल ओ सुनै छल। ओही कालमे निधरक रामाक घरवाली, जेकरा गामवाली कहै जाइ छै, धरधराएल आबि रहल छेलै। ओकरा ई सभ कोनो पते नै। ई संगम देखि ओ सहमि गेलि आ चाेट्टे पएर घूमि दोसर बाटे काेनो तरहेँ आँगन गेली नेपथ्यसँ बाजलि- “से की बात छिऐ एना आँगनक मुहथरि छेकने सभ ठाढ़ छै? की हमरा दुआरि-दरबज्जा नै? महाजन छिऐ आकि धनचक्कर?” लोकक जेना लक्षणे छै। केहेन जमाना भऽ गेलै। ओ सभ तँ किछु बुझबे ने करै छै। खाद-पानि आ जोताइबला सभकेँ चिन्हते छियन्हि। हुनका सभकेँ तँ उचिते किएक तँ गाम-घरक लोक अहिना होइते छै। दोसर पेन्ट-शर्टबला तँ पढ़ल-लिखल सन बुझना जाइ छथि तँ ऊहो सभ तँ ओहने सनक सरकारीओ लोक अछरकटुआ जेना आकि आरक्षणबला लोक छै की। बुझबामे तँ यएह अबैत अछि। हाकिम-हुकुम आब छथि तँ केतौ बैसि कऽ ऋृणियाकेँ बजबै छै आ ओकरा सुख आ दुख बुझबैक कोशीशो करै छै। तेकर उपरान्त तँ देब-लेब हेबै करतै। खैर जे किछु। तेतबा धरिमे एगो कहावत छै, ‘दालि-भातमे मूसलचन्द’ एकटा गाए पोसियाँ लगौने छेलै। ऊहो ओहीकालमे जूमि गेल तेना ने तुमकि कऽ बाजए लगल- “गाए विआ गेल चलू फरिआ लिअ या तँ अहाँ लिअ की हमरा दिअ?” आब तँ ई दोसरे ममिला खड़ा भऽ गेल। असमंजसमे रामा कहलकै- “ऐ की करब से अहीं कहू?” बैंकबला कहलकै- “रामा बैंक से बैल लिए थे सो अभी तक कुछ नहीं दे पाया है। अब जबदी-कुर्की होगा नोटीश होने जा रहा है अगर एक माह के अन्दर तक ऋृण भूगतान नहीं करने पर...।” ई कहि गाड़ी हूर्र...। से सुनि गामवालीकेँ साँस-मे-साँस एलै। एक मासक बाद ने बूझल जेतै। हँ-हँ सभटा फेर एक्केबेर, विपति तँ एसगर नै ने अबै छै। ओ तँ संगे बहुतो किछु नेनै अबै छै। एकटासँ उवरै छी तँ दोसर जेना दुहारिपर। सभ अपन-अपन ताैक एहनेमे सुतारि ने लइ छै। दोसर जे मौका पाबि चित्त कऽ दिऐ, जे मनुखक सोभाव छिऐ। देखू ने पैसा तहिना ने उड़ि जाइ छै जेना चिल्होर माँछ लऽ कऽ उड़ि जाइ छै। अखनि एनमेन एहने समए बीति रहल छै। एमहर गमैया महाजन आइ तँ अनशन तोड़बे ने करै छै। ई तँ केकर दिनक पड़ि भऽ गेलै। आँखि आन्हर नाम नयन सुख केहेन महाजन, तमासा देखियनु। जीअब बाँचब सदहा देब ऋृण खा कऽ लोक केतौ रहलैए। आइ ने तँ काल्हि सूदो लगा कऽ देब आइ अपने सभ अनशन तोड़ि दिऔ? आब आँखि खुलि गेल जे महाजनीयोँ एगो निष्ठुर चीज होइ छै। एकटा गीत छै जे, ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ से सएह। गामवाली ऐ दुआरे कहै जाइ छै जे ई दुनू गामेक प्राइमरी स्कूलमे पढ़ै छेलै। अखुनका जकाँ नै जे दूध छोड़बे ने करै छै आ चट स्कूलमे भर्ति करा दइ छै। पहिले तँ दस-बारह बर्खक होइत रहै तहन स्कूल ढठियौल जाइत रहै। तही वैचमे ईहो दुनूकेँ आँखि यार भऽ गेल। की लैला-मजनूक कहानी सुनै छी तहिना रामा-अनरियाक प्रेम प्रसफुटित भऽ ऐ रूममे आइ देखि रहल छी। रामा गामक बेटा आ अनरिया ऐ गामक बेटी मुदा टोल दू। उतरवारि टोलमे रामाक घर आ दछिनवारिमे अनरियाक। जाति एक्के गोत्र दू मूल अलगे। बहुत ताड़नक बादो प्रेम प्रगाढ़ होइते गेलै। जे देखिए रहल छी। दामपत्य जीवन बिता रहल छै। सभ दुख सहितो हँसीसँ रहि रहल छेलै। आब घर बसलै तँ किछु उपार्जनो भेनाइ तँ जरूरी छै। प्रेमभाव दिनानुदिन बढ़िते रहलै पढ़नाइओ तँ आगू नै भेल तेहन सन झमेला भऽ गेल जे पढ़ितै की, दोसरे पढ़ौनी पढ़ऽ लगलै। एक दिन अनरिया यानी आब गामवाली नाओंसँ जानल जाइ छै, घरबलाकेँ कहलकै- “आउ आब जे भेलै से तँ भऽ गेलै नै बाहर-भीतर जाएब तँ गामेमे खेती-वारी करू दस सेर आ दस-टाका हाथपर रहत।” से सुनि रामा खुशीसँ उछलए लगल- “हँ-हँ हम खेती करब।” तइले पहिले आइ.आर.डी.पी.मे नाओं लिखबऽ पड़ैत रहै। जेकरा आब गरीबी रेखामे यानी बी.पी.एल. कहै छै। ओहीमे नाओं अपन घोंसियौलक तँ एक जोड़ा बरद बसौली हाटपर बैंक द्वारा प्रदत्त कएल गेल। खेती-वारी श्री गणेश कएल। खेत खूब मन लगा कऽ तैयार करए। भरि-भरि दिन आब तँ खेतेमे रहैए। जोतै-कोरै किसिम-किसिमक बीआ-खाद कीटनाशक दवाइ छीरकल करै। एतेक दिन तँ जीवन हँसीमे उड़ि गेलै। हेकरी हवा भऽ गेलै, तहनसँ मिहनत केनाइ शुरू केलक। साँसो लेल ने होइ। बरद जे बैंकसँ नेने छेलै तँ ओकरेमे लागल रहए पड़ै छेलै। खेतसँ छुटै तँ बरदक सेवा करैत रहए। घरकेँ तँ कायाकल्प भऽ गेल। एकटा दोसरे उत्साह-उमंग आ प्रेम प्रवाह हुअ लगलै। भदै आ धान दुनू केलक। भदै तँ अगता फसिल होइ छै जे उपराहैरक आ धन चर-चाँचरमे बागु केलकै। फसिल सभ तँ जेना उधियाएल जाइ छेलै। खेतपर सँ आबए तँ खुशीसँ फुले ने समाइत छल। गामवाली सेहो वर आतर-चातर जे बरू नै बाहर-भीतर तँ गामे नीक जकाँ रहु जेना अखनि रहि रहल छी। से ईश्वरकेँ जएह सोहाइ छन्हि सएह करै छथिन। ‘ढाक के वही तीन पात’ सभ दिन कष्टमे बीतल। भदैकेँ तँ कएक बेर पटौनीओं केलक। शुरू-शुरूमे भदै तँ लहलहा उठलै जे देखिते बनै। धान अखनि बाँचल छै मन मुग्ध कऽ दइ छै। आशापर पानि फिर गेल एको ने चलल। अकास दिस ताकिते रहि गेलै। कथीले बर्खा होइते, सभटा भदै जरि कऽ खकसियाह भऽ गेलै। भदै तँ जरतीमे चलि गेलै। धान जे कनी-मनी दम धेने रहै तँ आसीन हथिया तेतेक ने बरसलै जे गम्हरा तक दहा गेलै। सभटा तीन तेरह भऽ गेलै। रामा अवाक्। गामवाली बड़ जिबठगरि दुखक संगी धैर्यवान, हँसमुख तँ तेहेन छेलै कि विपतिक पहाड़े खसल रहै तैयो हँसिते रहए। दोसर जेबह नेपाल कपार जाइत संगे, बरदो जे नेने छेलै बैंकसँ से ऐ माटि-पानिमे एडजेस्ट नै कऽ सकलै। एगो बरद हराठेमे रामनाम सत्य भऽ गेल। बँचलाहा किछु दिन सेहो चलि बैसला। जओ जबे गया मटर टघहरिए गिया। अहीं कहू आब की करी? वा की करब से अहीं कहू। गामवाली तँ गाढ़ेक साथी रहबे करै, रामाक ढाढ़स बान्हए लागलि। कहलक- “जाउ तँ ओ जे गाए पोसियाँ लगौने छेलिऐ।” “हँ से की।” रमा बाजल। गामवाली- “गाए फरिछा लेब ओकरे दऽ देबै। आ पैसा लऽ कऽ किछु-किछु महाजनोकेँ दऽ देबै तँ ओकरो सभकेँ भरोस हेतै।” गामसँ पाँच आदमी लऽ चलला गाए फरियाबऽ लेल। वैद्यनाथ, जमाहर, बिलास, पचुआ आ अपने रामा। गाए बलाकेँ ओहीठाम, वैद्यनाथ हाक पाड़लक- “औऊ, घरवारी छह होउ।” ओ सुनिते देरी हबोढ़कार भऽ कानए लगल। आबि गिरहत देखिऔ भगवानक चलितर। देखिए कऽ पाँचो आदमीकेँ आँखिसँ नोर छलछला गेल रहनि। दृश्य हृदए विदारक। की कहब हे भगवान अहँूक लीला अपार अछि। तेहेन ने डाँग अहाँक होइ छै जेकरा लगै छै सएह बुझै छै। आखिर भेलै जे नवजात गाएक बच्चा मरल पड़ल आ दोसर कात गाए अब-तब जइ घड़ी-जइ पहर। ओकरे मुँह सभ लोक घर दिस हिआसऽ लगल। और बाजए लगल- “आप इच्छा सर्वनाशी, देव इच्छा परमबल:।” गामवालीकेँ सभ बोल-भरोस, ओ सभ दऽ प्रस्थान केलक। इतिश्री होइते गामवाली भारतीय नारीक एकटा अंग “Parts of the man” किरदार निभावेमे एको मिसिया कम नै रखने छै। रामासँ कहै छै- “हे, धिरज राखू। जाउ किछु दिन परदेश किछु ढौआ कमा लाउ आ महाजनकेँ दियौ।” कपार तँ आगू-आगू दौड़ैए। एकटा कहबी छै, घरक कोस पचास। से लगले रहि गेल। रामाकेँ तँ ओतै अछि नै, एमहर गामवालीक चिन्ता बढ़ऽ लगल। दिन तेना बितै छल जेना राति आँखिमे कटि जाइ। नव विवाहिता दिन नै होइ राति वरू रहै। तहिना सन भीतरे-भीतरे कुही होइत रहै, जौं-जौं बैंकबलाक मास नजदीक हुअ लगल। उपछल डबराक खत्ता जकाँ देखैमे लगै छल। कि फाँड़ल पोठी माछ जकाँ हुअ लगल जखनि कि अखनि धरि अपसुइया छै। चिन्ताक मारे रामाकेँ निन्न आब टुटलै गामवालीक दशा देखि। की करबै से अहीं कहू। से हम आब गाम नै रहब सभ आशपर तुषारपात भऽ गेल गाए बेचि ऋृणियाँ महाजनकेँ दैतिऐ से नै रहल। “जेतेक खेत अछि सभ बँटाइ लगा देबै। हम तँ चललौं परदेश। अहाँ अपन धैर्यकेँ नै छोड़ब बिनु महाजनी अदा केने घर नै आएब।” राजदेव मण्डल :: दोख केकर इजोरिया रहै मुदा मेघक कारणे कनी अन्हार सन लगै छेलै। निशिभाग राति। सभ सूतल। किन्तु दिनेश दुनू परानीकेँ निन्ने ने होइ। जेना निन्ने रूसि रहल। नै रहल गेलै तँ पत्नीकेँ कहलकै- “केतेकाल भूखल रहब? उठू खा लिअ।” पत्नी चुप्पे करोट फेड़ि लेलक। पति बाँहि पकड़ि हिलबैत पुछलकै- “की भेल? बजबै तब ने बुझबै।” “बूझि कऽ की करबै? अहाँ बुते किछो ने हएत। अहाँ तँ उनटे...।” “बुझबै तब ने। हमर दोख हेतै तँ हमरे दण्ड देब।” “कोनो बुझने नै छिऐ। दोख अहाँ माएकेँ रहै आ गारि-बात हमरा देलौं। अहाँ हमरा बजा नै सकै छी।” पति- “तँ कहू जे रूसलासँ दिन-गुजर चलतै?” तमसाइत पत्नी बाजलि- “केतबो गल्ती अहाँक माए करै छै, तँ अहाँ एकोबेर बजै छिऐ आ हमरापर डाँग लऽ कऽ हुड़कै छी। कहै छी, हमरा बजाउ नै। हम अहिना भूखले मरि जाएब।” समझाबैत पति बाजल- “अच्छा एकटा खिस्सा सुनि लिअ। फेर नै बजब। सुनियौ। ई कथा चौबीस-पचीस बरख पहुलका छी। एकटा औरतक कथा। सुखक लीलशामे दुखक कथा। ओ बड्ड सुन्दर आ सुशील रहए। तँए शुरूमे पतिक आँखिमे ओकरा लेल परेम भरल रहै। मुदा एक-आधटा एहेन घटना घटले जे ओइ औरतकेँ ससुर आ पति दुनू दुख दिअ लगलै। ससुरकेँ मोनमाफित दहेजो नै भेटल रहै आर बहुतो कारणेँ तमसाएल रहै छेलै। ओइपर सँ ओहने समए आ अवसर सेहो भेट गेल रहै। एहेन समैमे केतबो डाँट-डपट करतै तँ उनटा कऽ जवाबो केना देत। दू बेरसँ पँचमसु चिल्का नोकसान भऽ जाइ छेलै। पाँचम मास चढ़िते दरद करै आ गरभपात भऽ जाइ। तँए ओकरा पतिओकेँ हरिदम नाकेपर तामस रहै। जे सभ सोचने रहए ओ सभ पूरा नै होइत देखि मोन हरिदम बिधुआएले रहै छेलै। देखैत सपना टूटि गेलासँ कठ तँ हेबे करै छै। ...सासु नै रहै। औरतिया केकरा कहितै। आ के ओकर दुख बाँटितै। जेमहरे जाए तेमहरे डाँट-डपट आ ठोकर। कियो अपन नै, सभ आन। काज-उदेममे लगल समए कटबाक परियास करए आ असगरमे बैसि भरि मन कानि मनकेँ हल्लुक करए। समए बितैत रहै छै। बितैत रहल।” अहूबेर ओरतिया तीन महिनासँ गरभवती रहए। कानसँ स्वर टकरा जाइ- “फेर ओहिना हेतै। ऐबेर भगा बेटाकेँ चुमौन करा देबै।” फेर दोसर काने पतिक स्वर सुनै- “कोन-कोन डागदर-बैद आ ओझहा-गुणीसँ देखेलौं। कोनो फेदा नै। हेतै केतएसँ? पपियाही अछि ई।” भातक दुख नै बातक दुख। जेना सान्हि मरै। कलेजामे भूर करै। मोन आ शरीर दुनू संगी। एककेँ दुखित भेने दोसर केना ठीक रहि सकत। औरत बिमार रहए लगल। माए-बापकेँ पता लगलै। समाद गेलै आ एलै। ओ नैहर आबि गेल। जेना बैशखा रौदमे गाछतर। नैहराक छाँह। सभ गप्प सुनि-बूझि माए-बाप उपचारमे लगि गेलै। की-की नै केलक। केतए-केतए ने गेल। अही क्रममे एकटा साधु बाबा उपदेश देलखिन- “एकरा छह महिना वोनबास करबए पड़तौ।” “औरत तँ अहुना बोनवासेमे रहैत अछि। फेर कोन वोनबास?” “घर-अँगनासँ अलग। रातिओमे नै आबि सकैत अछि। अपने हाथसँ बनौल खाएत-पीअत। आर सभ गप्प बुझए पड़तौ।” माए-बापकेँ मोन उड़ल रहै। सन्तानक सुखक लीलशा। वोनबास शुरू भऽ गेल। घर-अँगनासँ अलग। आमक गाछीमे। बास करए लगल। टोलक लगेमे रहै मुदा गप्प तँ केकरोसँ नै कऽ सकैत अछि। इशारासँ काम चलाउ। आन लोक हटले रहै। दिन तँ कटि जाइ मुदा राति पहाड़। कुशक ओछाइनपर गुदरी बिछौना। माटिएपर खाना आ माटिएपर सोना। मूजक डोरासँ डाँड़मे जखम भऽ गेलै। जाड़ा-गरमी-बरखा। अन्हरिया राति। साँप-कीड़ा, बिलाय-कुत्ता नढ़िया-खिखिर। एकान्त बास। भरि दिन तँ जे किछु मुदा रातिमे माएकेँ नै रहल जाइ। बारहो बजे रातिमे आबि बनवासी बेटीकेँ भरि पाँज पकड़ि सुति रहए। निन्न टुटिते ओइठामसँ चलि आबए। जे फेर कोनो दोख ने भऽ जाए। आ आबैबला संतानपर कोनो विपति ने पड़ि जाए। केहनो कठिन समए रहै छै। कटि तँ जेबे करै छै। लोको कोनो कम लगराह होइ छै। वोनबासक समए बीतल। गरभकाल पूरा भेलापर औरतियाकेँ बेटा जनमलै। फेरसँ ओकर सुखक दिन घुरि एलै। सभ दिससँ सिनेहक बरखा हुअ लगलै।” किछुकाल चुप रहला पछाति दिनेश अपना पत्नीकेँ पुछलकै- “आब कहू जे ओइ माएकेँ जँ बेटा गारि-बात देतै तँ ओकर की दशा हेतै?” पत्नी गुम्मी साधने। किछो बजले ने जाइ। फेर दिनेशे बाजल- “ओ औरत हमर माए छिऐ आ ओ बेटा हमहीं छिऐ।” दुनू परानी चुप। रातिक चिड़ै केतौ-केतौ बजै छेलै। आर सभ किछु निशब्द भेल। दुनू परानीक बीचसँ शब्द हेरा गेल छेलै। किन्तु हाथ-पएरक क्रियासँ गप्प शुरू भऽ गेल छेलै। साँस-प्रश्वाँस गवाही दइ छेलै। मुस्कीकेँ अन्हार झँपने छेलै। आ दुनू परानीक बीच दोख बिला गेल छेलै। लक्ष्मी दास :: गंगाजलक धोल सहदेव काकाकेँ गामे किछु गोरे सहदेवकाका कहै छन्हि तँ किछु गोरे फटहाकाका सेहो कहै छन्हि। किछु गोरे सहदेव भैया कहै छन्हि तँ किछु गोरे फटहाभैया सेहो कहै छन्हि। मुदा हमर ने किछु कहियो बिगाड़लनि आ ने नीके केलनि तँए हम सहदेव कके कहै छियनि। अहाँ कहब जे लोकक एकहरी नाओं होइ छै हुनकर किए दोहरी छन्हि? दोहरीक कारण अछि जे जे घटिया काज सहदेव काका अपने करै छथि ओही काजले दोसरकेँ रेड़बो करै छथिन आ आँखिक पानियोँ उतारि दइ छथिन। ओना केते गोरे एहनो छथि जे अपनो सहदेव कक्काक केलहा काज लोके लग उगलि दुसबो करै छन्हि आ फटहो कहै छन्हि। मुदा जहिना गर्दखोर अपन गरदा झाड़ि फ्रेश भऽ जाइए तहिना अपन गरदा झाड़ि सहदेवो काका फ्रेश भऽ जाइ छथि। आइ सहदेव काका केकर मुँह देखि ओछाइन छोड़ने छला केकर नै, भोरे-भोर दुनू परानीमे झगड़ा बझि गेलनि। खिसिया कऽ अलोधनी काकी आगूमे थूक फेकि कहलकनि- “अहाँ पुरुख छी आकि पुरुखक झड़ छी?” पत्नीक समुचित उत्तर दऽ सहदेव काका भरि दिनका जतरा दुइर नै करए चाहै छला, मुदा झगड़ा बेर चुपो रहब हारि मानब बूझि बजला- “अहाँ कहने जँ हम पुरुखक झड़ छी तँ अहूँ तँ झड़क झरनियेँ ने भेलौं।” सहदेव कक्काक बात जेना अलोधनी काकीकेँ रब-रबा कऽ छूबि लेलकनि। जहिना कुकुर कटौजमे दाँतसँ पकड़ा-पकड़ी करैत घीचा-तीरी करए लगैए तहिना काकी बजली- “गामक लोक जे फटका कहैए, से कोनो झूठ कहैए। अहाँकेँ ने कोनो काजक ठेकान अछि आ ने कोनो बातक ठेकान अछि।” जेना लंकामे अग्निवाणकेँ रोकल गेल, तहिना सहदेव काका अलोधनी काकीक अगियाएल बोलकेँ रोकेत बजला- “कथी ले अनेरे अपने मुहेँ दोखी बनै छी, एतबो ने बुझै छिऐ जे हमरा फटहा कहैए ओ कि अहाँकेँ फटही नै कहत।” अपन हूसैत वाणकेँ देखि काकी पाशा बदलि बजली- “लोक दुसैए, तेकर लाज नै होइए?” जेना ठोरक बरी पकै छै तहिना काका पकबैत बजला- “जे दुसत से पहिने अपन घरवालीकेँ पुइछ लिअ जे अपने केते गंगाजलक धोल छी।” दुर्गानन्द मण्डल :: छुतहरि सिमराक शिवनन्दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहिरन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। विधाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्दरि। मध्यम वर्गीए परिवारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बिआह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरियाती गेल रहथि, सभ कियो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि। बड़-बढ़ियाँ घर-परिवार छल। राजाबाबू बिआहक पछातिओ अध्ययन जाड़ीए रखलनि। नीक-नहाँति पढ़ैले पटनामे नाओं लिखा डेरा रखलनि। छुट्टी भेलापर गामो चलि अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहिल सन्तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्चो तेतबए सुन्दर छल। क्रमश: दुनू बच्चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लिखा देलखिन। बच्चा सभ ओतै रहि पढ़ए-िलखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति खराप हुअ लगलनि। जइसँ ओ दोस्ती-यारीमे पीबए लगला। एक दिनक गप छी, गाम एलाक बाद अधरतियामे जोरसँ हल्ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चिचिया रहल छथि। रातिक मौसम देखि गामक डाक्टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखिन। बिमारी उपकले रहनि। पत्नी विशेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि दुइए मासमे दुखकेँ कन्ट्रोल कऽ लेलनि। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जिद्द कऽ पटना चलि गेला। परिकल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि आ भैया जे पाइ दन्हि आकि नै दन्हि तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बितलै आकि वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली रातिमे राजाबाबू अपना बिछौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चिचियए लगला। निसिभाग राति रहने हो-हल्ला सुनि लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्टी करैत सदा-सदाक लेल शान्त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि गेल। टोल भरिक लोक सभ जागि गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रिस्ता–नाता तोड़ि परमधाम चलि गेल छला। परात भेने बिना बजौने सभ आदमी मिलि बाँस काटि, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि दऽ राजाबाबूक पहिल सन्तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि-जारि सभ कियो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि चलि गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि कुहैक रहल छथि। काल्हि तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रतिमूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहिरि कुहैक रहल छलि। केतए गेलनि भरि हाथ चुड़ी, केतए गेलनि भरि माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि दैत। केना ने बेधि दैत! आखिर वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहियो हुनक पएरो ने देखने रहनि ओ आब मुहोँ देखि रहल अछि। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्हि। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बितबए लगली। सासु-िदयादिनीक गपकेँ छोड़ि अनकर गपपर बेसी धियान दिअ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब किछु लोक हुनका गुरु मन्तर दिअ लगलखिन। आ ओहो नीक जकाँ धियान-बात दिअ लगली। जहिना कहबी छै जे खेत बिगड़ि गेल खढ़ बथुआ सन तिरिया बिगड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि तक ओकर उकासीओ ने कियो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि। बिना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखिया-सरपंचक संग हँसि-हँसि बजै-भुकए लगली। गामक राजनीतिमे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनियाँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्य जिनगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि रंगीन दुनियाँमे चलि आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि हल्का छिटबला साड़ी पहिरए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खिलए लगल। एक दिन मुखियाकेँ कहि-सुनि इन्दिरा अवास स्वीकृति करौलक आ बिच्चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कियो छौड़ा-माड़रि भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दिन जेकरा भाफो नै निकलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बिस्कुटी लोकक चक्कर-चािलमे पड़ि ओ भैंसुरसँ अरारि कऽ अपन हक-हिस्सा लेल लड़ए लगली। लड़ि-झगड़ि सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि जे मन फुड़ै तखनि सएह करए। कियो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कियो किछु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्बै पड़ा गेल। आहि रे बा! परात होइते घोल-फच्चका शुरू भेल ‘कनियाँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि दू दिनक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्बैमे अछि फलल्मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनियाँ गाम घूमि आबथि। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्हर। किछु दिनक बाद जेना-तेना पकड़ि-धकड़ि ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखिमे गर्दा झोंकि कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कियो समझबैक परियास केलनि। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि ओ ओकरा बुझबैत कहलखिन- “सुनू कनियाँ, अखनो किछु ने बिगड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि लिऔ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जातिमे मिला लेत। जाति नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जातिसँ बाड़ि आँगनासँ ई कहैत- “एकरा आँगनमे राखब उचित नै ई कनियाँ कनियाँ नै छुतहरि छी छुतहरि...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल किछु ने बाजि सकलौं, किछु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि नै बूझि पेलौं जे आइ बूझि रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहिआ कऽ पकड़ने अछि। कपिलेश्वर राउत :: बड़का खीरा कहबी अछि, पुरुखक भाग आ स्त्रीकगणक चरित्र कखनि बदलि जाएत तेकर कोन ठेकान। सएह भेलै जुगुत लालक जिनगीमे। करियाकाकाकेँ तीनटा बेटीपर सँ एकटा बेटा भेलनि। पहिल पुत्र भेने परिवारमे खुशीक माहौल बनि गेल। छठिआरे दिन पमरिया तीन गोटेसँ आबि ढोलकी-कठझालि आ मजिरा लऽ अँगनामे नाचए लगल। केना ने पमरिया अबैत ओहो तँ गामक चमनि आ अड़ोसी-पड़ोसीसँ सूर-पता लगबैत रहैए। से भनक लगित पहुँच गेल। कखनो बधैया गीत तँ कखनो सोहर, कखनो समदौन गाबए लगल। अँगनामे लोकक भीड़ लगि गेलै। करियाकाका कोनो तरहेँ एक सए रूपैआ आ सबा किलो अरबा चाउर निछौरमे दऽ पमरियाकेँ विदा केलनि। कियो पड़ासी टीप देलकनि- “भाय साहैब पत्थरपर दुभि जनमल हेन तँए दसटा साधु-संतकेँ तथा अड़ोसी-पड़ोसीकेँ नोत दऽ भोज-भात खुऔत जइसँ बच्चाकेँ असिरवाद देत तँ बच्चाकेँ नीक हेतै।” करियाकाका बजला- “ठीक छै।” छठियारक रातिमे दसटा साधु-संतकेँ आ दसटा अड़ोसीओकेँ नोत दऽ भंडाराक इंजाम केलनि। छठिआरक विधि-बेवहार भेला बाद दादी-दादी बच्चाक नाओं रखलनि जुगुत लाल। विहान भेने लौअनियाँकेँ साड़ी-साया-ब्लौज आ एक सए टाका दऽ विदा केलनि। करियाकाकाकेँ मात्र एक बीघा खेत। चारि कट्ठा चौमास बँकिए धनहर। कोनो दू-फसिला तँ कोनो एक-फसिला। खेतीक नव-नव तरिका एलाक बादो करियाकाका पुरने ढंगसँ खेती करथि। छह-सात गोटेक परिवार लेल बीघा भरि खेत कम नै भेल। जँ खेती करैक ओजार आ पानिक साधन रहए। वैज्ञानिक तरिकासँ खेती करैक लूरिक अभाव छेलनि करियाकाकाकेँ। तैपर सँ प्रकृतिक प्रकोप सेहो। कोनो साल दाही तँ कोनो साल रौदी अलगे तबाह केने। तथापि परिवारकेँ कोनो तरहेँ खिंचैत चलै छला। गामोक लोक सभ पुरने ढंगसँ खेती करैत रहए। परिवार मात्र सात गोटेक। अपने दुनू प्राणी, पिता रामधन आ माता-सुमित्रा, आ तीनटा धिया-पुता। एकटा बेटी सासुरे बसैत। करियाकक्काक मन छेलनि जे बेटा पढ़ि-लिखि कऽ ज्ञानवान बनए, मुदा अपना सोचलासँ की हएत। जेकरा प्रति हम जे सोचै छी तेकरो मन आ लगन ओहेन तखनि ने। जहिना जेठुआ हाल भेने किसान तँ धानक विहनि खेतमे खसा लैत अछि आ रौदी भेलापर ओहो विहनिकेँ काटए पड़ै छै। सएह हाल करियाकाकाकेँ भेलनि। बेटा जुगुत लालकेँ पढ़ैले स्कूल पठबैत छेलखिन। मुदा जुगुत लाल स्कूल जाइक बदला रस्तेमे कहियो कबड्डी तँ कहियो तास-तास तँ कहियो गोली-गोली खेलए लगैत। अवण्ड जकाँ करैत रहए। चालि-चलनि केहेन तँ केहनो फुनगीपर पाकल आम किए ने होइ जुगुत लालक लेल तोड़नाइ बामा हाथक खेल छल। केकरो वाड़ी-झाड़ीमे लतामक गाछसँ कहुना तोड़ि संगी-साथीकेँ खिआ दैत। कोनो चिड़ै-चुनमुनीक खोंता उजारि अण्डाकेँ छूबि सरा दैत। कियो गाए वा भैंसकेँ पाल खुअबैले विदा हुअए आ जुगुत लाल जे देखैत तँ ओकरे संग लागि इहैत-इहैत करैत घुरए। गैवार-भैंसवारसँ कहबो करैत नीक साँढ़-पारासँ पाल खुआउ जइसँ बाछा हुअए आकि बाछी, पारा हुअए आकि पारी नीक नश्लक हएत, दुधगर माल हएत नै तँ पुष्टगर बाछा वा भैंस हएत। एवं तरहेँ कोनो ने कोनो उपराग, उलहन माए-बापकेँ सभ दिन सुनए पड़ै। तंग भऽ गेल माए-बाप। जुगुत लालक उमेर आब बारह-चौदह बर्खक भऽ गेल छल। जहिना पहिल सीख केकरो माए-बापसँ भेटै छै, दोसर सीख समाजसँ आ तेसर स्कूल आ देश-विदेशसँ भेटै छै, तइमे जेकर बुधि, विवेक, ज्ञान जेहेन रहै छै से अपनाकेँ ओइ रूपमे ढालि लइए। मुदा जुगुत लालले धनिसन। ठेलि-ठुलि कऽ सतमा तक पढ़लक। किएक तँ सरकारो दिससँ मास्टर सभकेँ आदेश भेटल छै जे ‘केकरो फेल नै कएल जाए।’ समए बीतैत गेेल, जखनि जुगुत लाल सोलह-सतरह बर्खक भेल तँ माए-बाप सरस्वती कुमारी नामक लड़कीसँ बिआह करा देलकै। करियाकक्काक मनमे रहनि जे बिआह करा देबै तँ कहीं पत्नी एलासँ सुधरि जाएत। बिआहक बाद जुगुत लाल मोबाइल लऽ हरिदम गीते-नादक पााछू अपसियाँत रहए लगल। माए-बाप सोचथि जे उझट बात आकि एक थप्पर मारि देबै आकि हाँट-दबार करबै तँ कहीं केतौ भाग ने जाए। मन मसोसि कऽ रहि जाए। संयोग भेलै एक दिन रमेश- जुगुत लालक पित्ती- एकटा बिजू आमक गाछक थल्ला काटि रहल छला। जुगुत लाल देखैत छल। देखलक जे बिजू आमक थल्लाकेँ कलकतिया आमक गाछ लग गाड़ि देलकै आ कलकतिया आमक नीचला डारिकेँ चक्कूसँ कनीयेँ छीलि कऽ सरहीकेँ सेहो छीिल दुनूकेँ सटा कऽ बान्हि देलकै। कनी दिनक पछाति मुड़ीकेँ बन्हलाहासँ कनी ऊपर काटि देलकै। आब भऽ गेल सरहीसँ कलमी। जुगुत लालक माथामे जेना चोट पड़लै। जहिना माघक शितलहरीमे कड़गड़ रौद उगिते सभ रौद ताप दौगैत अछि, तहिना जुगुत लालकेँ भेलै। वाड़ीमे चारिटा सजमनिक गाछ तीन-चारि हाथक भेल छेलै कनियेँ हटि कऽ तीन गो खीराक लत्ती छेलै ऊहो दू तीन हाथक भेल छेलै। सजमनि आ खीरा, दुनू लत्तीकेँ सुतरीसँ बान्हि देलकै। जड़िक बगलमे सड़लाहा गोबर दऽ माटि चढ़ा देलकै। पिता तँ पहिनै खेतकेँ एकसलिया गोबर सड़ा कऽ छीटने छला आ खेत तैयार केने छला। कीड़ाक प्रकोप द्वारे पहिने नीक पत्ताकेँ सड़ा, तमाकुलक डाँटकेँ डाहि, गाइयक गोंतक संग मिला कऽ खेतमे छीटने छला। सजमनि आ खीरा दुनूक लत्ती भोगगर भेलै। बरसातक बुढ़ापाक समए छल। पानिक जरूरत कमे पड़लै। जाबे अपन मन कोनो काजक दिस आगू नै बढ़त, ताबे अनका जोरे-जबरदस्तीसँ बुधिक गठरी नै ने खुलै छै। बीस-पचीस दिनक बाद सजमनिक मुड़ीक बन्हलाहाक एक ठुट्ठी ऊपरसँ काटि देलकै आ खीराक मुड़ीकेँ रहऽ देलकै। नीक जकाँ जखनि गाछ लागि गेलै तखनि खीराक जड़ि हटा देलकै। नीक जकाँ जखनि गाछ लागि गेलै आ फूल-बतियाक समए एलै, तखनि गाछक जड़िमे डेढ़ बीत हटा कऽ डी.ए.पी खाद लगभग सए ग्राम सेहो छीटि देलकै आ थोड़ेक पानि देलकै। एक हाथसँ ऊपरे खीरा फड़लै। अड़ोसी-पड़ोसी मचानसँ लटकल खीरा फड़ल देखै तँ बिसवासे ने होइ जे खीरा छिऐ आकि कैता आकि सजमनिक बतीया। मुदा जखनि लग जा कऽ देखै तँ छगुन्ता लगि जाइ। पिताकेँ फुट्टे छाती जुरै जे आब बूझि पड़ैए जुगुत लाल सुधरत। सरकार दिससँ ओही साल मधुबनी स्टेडियममे फल-फूल, तरकारी-फड़कारीक प्रतियोगिता, जिला स्तरपर आयोजन कएल गेल छल। सरकारक उदेस छल हरित क्रान्ति दिस किसानकेँ प्रोत्साहित कऽ देशकेँ आगू बढ़ेबाक। जिला भरिक किसान अपन-अपन जे नीक कदीमा, सजनि, मुरै, ओल, मिरचाइ इत्यादि सभ तरहक तरकारीक मेला लगल छल। सभ कियो अपना-अपना आगूमे जेकर जे सामान छेलै से लऽ कऽ बैसल छल। मुरैए छेलै तँ दू-दू हाथक, सजमनिए छेलै तँ दू-दू हाथक, कदीमे छेलै तँ तीस-तीस-चालिस-चालिस किलोक, ओले तँ पनरहसँ बीस-बीस किलोक। मिरचाइओक गाछ छेलै तँ एक हाथक गाछ आ लुबधी लगल मिरचाय फड़ल, फूले रहै तँ रंग-बिरंगक। रंग-बिरंगक दोकान जकाँ फल, फूल सजौल छल। जुगुत लाल सेहो अपन तीनटा खीराकेँ लटकौने छल, बाँकी पथियामे रखने छल। खीरा देखि-देखि एके-दुइए देखिनिहारक भीड़ लगि गेल। पूसा फार्मक कृषि वैज्ञानिक सभ सेहो छला। ऊहो लोकनि जुगुत लालक खीरा देखलनि। हुनको सभकेँ छगुन्ता लगि गेलनि। जुगुत लालक संग राय-मसबिरा केलनि। स-विस्तार जुगुत लाल खीराक उपजाक बारेमे कहलकनि। अन्तमे पुरस्कारक बेर जिलाधिश महोदय घोषणा केलनि जे खीराक उपजामे प्रथम पुरस्कार जुगुत लालकेँ देल जाइए। अही तरहेँ केकरो अल्लू, तँ केकरो कदीमा, तँ केकरा सजमनिमे, जेकर जेहेन बौस रहै तेहेन पुरस्कारक संग प्रशस्ती-पत्र देल गेलै। पूजाक वैज्ञानिक जुगुत लालकेँ संग लऽ पूसा फार्म लऽ गेलखिन। आ फार्ममे उन्नति खोज विभागमे कोनो पदपर पदस्थापित कऽ देलकनि। शनि-रविकेँ अठबारे जुगुत लाल गाम आबए, फार्ममे नीक-नीक तरकारी आ फल-फूल, धानक बीज इत्यादिकेँ उन्नति किसिमक सभ बनबऽ लागल। आइ वएह जुगुत लाल दस कट्ठा भीठबला जमीन खरीद रंग-बिरंगक कलमी आम गुलाब खास आम्रपाली, सिकूल, सिपिया, गुलाब भोग आदि तैसंग गुल जामुन, बेल, धात्रीम, लताम, अनार, शरीफा इत्यािद रंग-बिरंगक फल सभ लगौने अछि। अपन चारि कट्ठा चौमासमे शोध केलहा कोबी, सजमनि, खीरा, मुरै ओल सबहक खेती करैत अछि। समाजोमे क्रान्ति जगलै, देखौंस केलक तँ समाजक रंगे बदलि गेलै। करियाकेँ जुगुतक खेती देखि छाती तँ जुड़ाइए गेलै जे केतौ-केतौ बजबौ करथिन- “देखू ठहलेलहा जुगुत लालकेँ, की करैत की भऽ गेलै।” लोको कहै- “तँ ठीके, केलासँ की नै होइ छै।” आब तँ जुगुत लाल बाबू जुगुत लाल भऽ गेल। भगवानोक लीला अजीव अछि, तइमे कर्मेक प्रधानता देल गेल अछि। कर्म करबै तँ फल निश्चित भेटत। भाग भरोसे केतेक दिन जीब। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ :: विजय-१ झुमकी हृष्ट-पुष्ट शरीर बाली युवती छलि। लूरिगर आ होशियार, खूब काज करैत। छोट परिवार, घरवाला कुसमाक अतिरिक्त मात्र दूटा बेटा, आठ आ छओ बरखक। दुनू बेकती कमाइत छल आ गुजर बसर करै छल। मुदा ओकरा एकेटा चिन्ता रहैक सभ दिन साँझकेँ घरवाला ताड़ी पीबैक आ घर आबि झुमकीकें अनेरे डेंगा दैत। झुमकी गम खा लइ छलि। एहिना ओ देखने छलि माए आ पितिआइनकेँ सेहो बाबू ओ काकासँ मारि खाति आ सहि लैति। ओकरो सिखाएले गेल छेलै जे घरवाला अपन पौरुष देखबै लेल मौगीकेँ कने मने मारबे पीटबे करतै, से सहि लेबाक चाही। झुमकी जतेक सहैत जाइ छल, कुसमाक डेंगाएब ओतबे बढ़ि जाइ। एक दिन तँ सभ सीमा पार कऽ देलक। ओइ राति झुमकीक देहपर कुसमा अपन हरवाही पेना तोड़िए कए छोड़लक। कारण एतबे जे झुमकी टोकि देलकै एतेक ताड़ी किएक पीबैत अछि ओ। सौंसे पीठपर चेन्ह भऽ गेलै आ केतेक ठामसँ खून सेहो निकलि गेलै। चोट तँ झुमकी अंगेजि लेने छल मुदा पीठ फुटि गेलासँ छनछनाए सेहो लगलै आ दर्द बहुत बेसी बढ़ि गेलै। झुमकीकेँ लगलै आब बर्दास्तसँ बहार भऽ गेल ई। ओ राति भरि सोचैत रहल एना किएक होइ छै। की ओकर शारीरिक ताकति कुसमासँ कम छैक? खोराक एके रंग छैक। काजो ओ बेसिए करैत अछि। कुसमा हरबाहि करैत अछि तँ ओहो जाँत ढेकीसँ लऽ कए जाड़नि तक फाड़िए लैत अछि। धनरोपनी रहौ कि धनकटनी, कोनो पुरुखसँ ओ कम नै रहैत अछि। धानक बोझ रहौक की नारक बोझ, जतेकटा बोझ कुसमा उठबैत अछि ततबेटा तँ ओहो उठबैत अछि। ओकरा जनानी बुझि कोनो छोट बोझ तँ बान्हल नै जाइ छै। खेत पथारसँ घर आँगन तक के कोनो काजमे एहेन ओकरा नै बुझेलै जे ओकर मात्र जनानी भेलासँ किछु न्यून भेल होइक। ओतबे नै, पुरुखकेँ जँ बच्चा बिअए पड़ितै तँ सभ आत्महत्ये कऽ लितए। एक बेर अपना बाँहिकेँ पहलमान जकाँ उठा कए देखलक, ओकरा विश्वास भऽ गेलै जे यदि कुसमाक संग ओकरा कुश्ती लड़ए पड़ै तँ ओकरा पछारि सकत। तखनि फेर एना किएक? किएक पुस्त दर पुस्त मौगी सभ अपन घरवालासँ देह पिटबैत रहल अछि आ अपन बेटी सभकेँ बर्दास्त करए लेल सिखबैत रहल अछि? की पुरुख सभ पेना बजारिए कए अपन पुरुषार्थ देखबैत रहतै? ओकरा एकटा विचार एलै दिमागमे। अगिला दिन कुसमाकेँ नबका पेना बनबए पड़लै हरबाही करै लेल। दिन ओहिना बीतल। साँझखन कुसमा अपन कोटाक ताड़ी पीब कए आँगन आएल आ गेल पेना ताकए जेना ई एकटा रुटीन होइक। पेना ओकरा नै भेटलै। ताबत पाछूसँ झुमकी आबि ओही पेनासँ कुसमाकेँ तरतरबै लागल। कुसमा अवाक। जाबत ओ सम्हरए सम्हरए ताबत झुमकी ओकरा खसा कए ओकरा देहपर चढ़ि गेल छल आ एकदम दुर्गा भवानीबला रौद्र रूपमे कुसमाकेँ कहलक जे आइ रातिसँ नित्य प्रति ओकरा झुमकी ओहिना डेंगेतै जहिना एतेक दिन ओ झुमकीकेँ डेंगबैत रहलै अछि। ई कहि ओकरा देहपरसँ ओ उठि गेल, पेना कात कए रखलक आ गेल अपन भानस भातक काजमे। कुसमाक दिमाग चक्कर काटए लगलै। किछु बुझिएमे नै अबैक जे ई परिवर्तन कोना भेलै। बात एहेन छेलै जे केकरो कहियो नै सकै छल। अपन हारल आ बहुक मारल कियो नै बजैत अछि। ओकरा मोनो नै छैक जे कहिया मारि खेने छल। धिया-पुतामे एक दू चाट माए की बाबू मारने हेथिन्ह सएह टा। जहियासँ ज्ञान भेलै आ मालिक ओतए महींसक चरबाह बनल तहियासँ अखनि तक, जखनि ओ चरबाहसँ हरबाह भऽ गेल, ओकरा कहियो केकरो कथो सुनबाक अवसर नै भेटल छेलै। अपना तुरियाक छौंड़ा सभकेँ देखने छैक चरबाहीमे मालिक सभसँ मारि खाइत आ हरबाहीमे फज्जति सुनैत मुदा ओकर काजसँ ओकर मालिक सभ दिन खुशीए नै रहलखिन्ह, ओकर प्रशंसो करै छेलखिन्ह। अजुका चोट ओकरा सोचबापर बाध्य कऽ देलकै जे ओ झुमकीकेँ किएक मारै छल। झुमकीसँ ओकरा कोनो तेहन शिकाएत नहियेँ छेलै। ओ कोनो अलूरि अबूझ मौगी नहियेँ छल, अपितु होशियार मौगी छल। मुदा पसीखानामे सबहक मुहसँ सुनै ओ जे सभ अपना मौगीकेँ पीटै छै से ओकरो अनेरे लत लागि गेलै। आ झुमकीओ कहाँ कहियो प्रतिवाद केलकै? चोट खाइओ कए ओ अपन काजमे लागल रहै छल से आइ तक ओकरा बुझबेमे नै एलै जे ओ कोनो गलती काज कऽ रहल अछि। ओकरा आश्चर्य लगलै झुमकीक ताकतिपर। कोना ओकरा बजारि कए छातीपर चढ़ि गेलै। ओकरा पहिल बेर भान भेलै जे सत्ते यदि ओकरा झुमकीसँ कुश्ती लड़ए पड़ैक तँ ओ हारियो सकैत अछि। अही गुनधुनमे जखनि झुमकी खाए लेल कहलकै तँ ओ मना नै कऽ सकलै। एकदम आज्ञाकारी बच्चा जकाँ खा लेलक आ गोठुल्लामे जा कए पड़ि रहल। पहिल बेर भरि पोख ताड़ी पीबिओ कए ओकर निन्न निपत्ता भऽ गेल छेलै। सोचिते सोचिते ओ पड़ल छल कि देखलक झुमकी आबि कए ओकर पीठपर तेल मालिस कऽ रहल छैक। कुसमा साहस कऽ कए झुमकीकेँ पुछलक- “सत्ते तों कालि फेर हमरा मारबें।” झुमकीकेँ अपना पुरुखपर दया तँ एलै आ अपना केलहापर कने लज्जित सेहो भेल मुदा अपन दुर्गतिकेँ ध्यान करैत ओ फेर कठोर भऽ गेल। कुसमाकेँ ओ एतबे कहलक- “दूटा शर्त करतै तखनि हम किछु नै करबैक पहिल जे ताड़ी पीनाइ बन्द करतै आ दोसर हमरापर फेर कहियो हाथ नै उठेतै।” कुसमाकेँ मारिक चोट मोन पड़लै। ओ झुमकीक दुनू शर्त मानि लेलक। झुमकी अपना विजयपर हर्षित होइत ओही गोठुल्लाक अन्हारमे कुसमासँ लिपटि गेल। विजय-२ प्रिया अपन परिवारक बहुत विरोध सहैत सोमेशसँ बियाह केलक। दुनू इंजीनियरिंग कौलेजमे सहपाठी छल। प्रियाक मम्मी पापाक कहब छेलन्हि जे सोमेश पढ़बा लिखबामे प्रियासँ सभ दिन कमजोर रहलै अछि आ आगुओक जीवनमे ओ ढीले ढाल रहत। मुदा प्रिया की कोनो चुनि कए आ रिजल्ट देखि कए प्रेम केने छल? प्रेम एना केतौ कएल गेलै अछि? प्रेम तँ भऽ जाइ छै, बस एतबे। अन्तर देखेलै करीब दू सालक बाद जखनि दुनू पहिल प्लेसमेंट छोड़ि दोसर जॉब पकड़लक। प्रियाकेँ भेटलै पचीस लाख के पैकेज आ सोमेशकेँ बीस के। मुदा ऐ अन्तरसँ दुनूक बीच प्रेममे कहियो कोनो खटास नै एलै। अपितु अपना संगी साथी लोकनिक बीच ई जोड़ी आदर्शे मानल जाइत रहल। तेकर किछु दिनक बाद सोमेश एक दिन प्रियाकेँ कहलकै जे हमरा सभकेँ आब बच्चाक प्लानिंग करबाक चाही आ ओइले प्रिया किछु दिनक लेल जॉबसँ ब्रेक लऽ लिअए। प्रियाकेँ पहिल बेर सोमेशक कोनो बात अनसोहाँत लगलकै। ओ बच्चा तँ चाहै छलि मुदा ऐ लेल ओकरे किएक जॉबसँ ब्रेक लेबए पड़तै? ओ सोमेशकेँ पुछलक- “सोमेश, अहाँकेँ नोकरीक पैकेज अछि बीस लाखक, ठीक।” सोमेश सपाट उत्तर देलक- “ठीक।” “आ हमर जॉबक पैकेज अछि पचीस लाखक, ठीक?” फेर सोमेश ओहने उत्तर देलक- “ठीक।” फेर प्रिया ओकरा मोन पारि देलिऐ- “यद्यपि हम दुनू गोटे अलग अलग कम्पनीमे काज करैत छी, अहाँक पोजीशनसँ हमर पोजीशन इंडस्ट्री हिसाबें सीनियर सेहो अछि आ वर्कलोड बेसी सेहो, ठीक।” ऐपर ओ कने लजाइते कहलक- “ठीक मुदा ऐ बातक की माने अखनि?” प्रिया स्पष्ट ओकरा कहलकै- “तँ अहीं किएक ने जॉब छोड़ि दइ छिऐ?” ऐ बातपर ओ हँसय लागल- “लेकिन हमरा जॉब छोड़लासँ बच्चा केना आबि जेतै?” प्रिया ओकरा शान्त भावें बुझा देलक- “बच्चा हम जन्मा देब, ओइले हरेक कम्पनी मैटर्निटी लीव दइते छै। तेकर बाद ओकरा सम्हारैक काज अहाँ करू आ जॉब छोड़ि दियौ। अमेरिकामे आब बहुत पुरुष एना कऽ रहल छैक।” सोमेश एकरा हॅंसीमे टारि देलक। मुदा प्रियाकेँ लगलै जे ओ कोनो अनुचित प्रस्ताव नै देलकै। समय बीतैत गेलै। अगिला साल सोमेशकेँ दश प्रतिशत इन्क्रीमेंट भेटलै, प्रियाक कम्पनीमे ओकरा बीस प्रतिशत भेटलै। सोमेशक पैकेज रहलै बाइस लाखक, प्रिया पहुँचि गेल तीसपर। तेकर छओ मासक भीतरे प्रिया फेर जॉब चेन्ज केलक जतए नबका पैकेज छल चालीस के। नवका पोजीसनमे ओ सीधे वी.पी.केँ रिपोर्ट करै छल। ओ फेर सोमेशकेँ पुछलक- “की विचार केलौं? यदि परिवारमे बच्चा चाहैत छी तँ हमर प्रस्ताव मानि लिअ।” सोमेश किछु उत्तर नै देलकै, ओकर पुरुषबला अहं जागि जाइ छेलै। अखनि तक ओ पूरा बंगलोरमे एहेन नै सुनने छल जे बच्चा पोसैक लेल पतिए जॉबसँ ब्रेक लेलकै आ पत्नी काज करिते रहलै। अमेरिकन सभ सनकी होइत अछि, ओकर नकल करबाक कोन काज? दिन बीतैत गेलै, प्रिया आ सोमेशक पोजीसन आ पैकेजमे अन्तर बढ़िते रहलै। बच्चाक लेल प्रिया अपना दिससँ कोनो हड़बड़ी नै देखा रहल छल। मुदा सोमेशकेँ ई जरूरी बुझाइत छेलै। ओ जखनि प्रियाकेँ ऐ बातक कोनो हिन्ट दैत, ओ अपन प्रस्ताव दोहरा दैत। एक बेर तँ सोमेश सोचए लगल जे प्रिया जिद्दी अछि आ आब ओकरा संग बेसी दिन नै रहि सकत। ई एहेन समस्या छेलै जकरा ओ कोनो कलीग अथवा पुरना संगी साथीक बीच सेहो डिस्कस नै कऽ सकै छल। प्रियासँ अलग भेने ओकरा की भेटतै? फेर नव तरीकासँ जीवन साथी चुनबा लेल प्रयास करू। आ की गारंटी जे ओहो लड़की बादमे कोनो दोसरे बखेरा ने ठाढ़ करए? प्रियाक संग ओ आठ नौ साल बिता लेलक अछि, एकटा अही जिद्दक अतिरिक्त प्रियासँ ओकरा कोनो शिकाएत नै छेलै। संगी साथीक बीच अपना दुनूक प्रशंसा आ ‘आइडियल कपुल’क उदाहरण आ प्रियाक तेज बढ़ैत कैरियर ग्राफ ओकरा सोचबाक लेल बाध्य केलकै। ओ सोचए लगल पहिलुका कथन जे ‘हरेक सफल व्यक्तिक पाछू एकटा स्त्रीक हाथ रहै छै।’ की एकरा उनटाैल नै जा सकै छै? यदि ओ मददि करैक तँ प्रियाक सफलताक ओहने श्रेय ओकरो भेटि सकै छै। फेर जॉब तँ घर बैसल सेहो कएल जा सकै छै। बहुत रास कम्पनीमे लोककेँ एहेन विकल्प भेटि रहलै अछि। रहल बात बेबी सिटिंग के। से तँ जेहने ओ अनाड़ी अछि तेहने प्रिया सेहो अनाड़ी। आइ कालि बंगलोरमे काज केनिहार सभ कपुल अनाड़ी रहैत अछि। तखनि फेर लोक किताब पढ़ि आ इंटरनेटसँ सीखि किछु दिन काज चलबैत अछि। बहुत कमे लोककेँ मम्मी पापा सम्हारि दइ छथिन्ह। ओ फ्लिपकार्टसँ बेबी सिटिंग सम्बन्धी एकटा अमेरिकन किताब आर्डर केलक आ प्रियासँ नुका कए पूरा पढ़ि गेल। ओकरामे किछु क्न्फिडेन्स जगलै जे ओ बच्चाकेँ सम्हारि सकत। आ फेर कोनो इमर्जेन्सी भेलापर बहुत रास्ता छैक, प्रिया अपना बच्चाकेँ छोड़ि थोड़बे देतै? ओ तँ मात्र ई आश्वासन चाहैत अछि जे ओकरा जॉब छोड़ए नै पड़ैक। अही सोच विचारमे आ जॉब फ्रोम होम तकबामे आर छओ मास लागि गेलै। तेकर बाद एक दिन सोमेश बेड रूम पहुँचैत घोषणा केलक- “प्रिया, हम अहाँक प्रस्ताव मानि लेल अछि। ओतबे नै हम दुनूक लेल एकटा एग्रीमेंटो बना लेलौं अछि।” आ ई कहैत ओ कागज प्रियाक सामने बढ़ा देलक जाहिमे ओ अपन सिग्नेचर पहिनहि कऽ देने छल। प्रियाकेँ तँ विश्वासे नै भेलै। ऐ विजयक खुशीमे ओ कागजकेँ फाड़ि देलक, घरक सभटा कन्डोमक पैकेट उठा कए फेकि देलक आ सोमेशसँ लिपटि गेल। ललन कुमार कामत :: बेटी सोमनाथजी म्युनसीपल आँफिसमे पैंतीस बरख नोकरी केला पछाति रिटायर भेला। जीवनमे एक्को पाइ नजायज नै ग्रहन केलनि। सोनमनाथजी हृदैसँ पवित्र, शालिन, विनम्र आ दयाक भाव हिनका मुख-मण्डलसँ हरिदम झलकैत रहैए तँए हिनकर बिशेषता बेक्तीगत संज्ञा (उपनाम) मे बदलि गेलनि आ घरसँ लऽ कऽ आँफिस धरि लोक सभ हिनका सोनाजी कहि बोलबए लगलनि। सोनाजीकेँ तीनटा सन्तान, बड़ दुइटा लड़का, जेठ बबलू तैपर सँ डबलू आ सभसँ छोटकी बेटी उषा छन्हि। उषाक बिआह नीक घरमे, इंजीनियर बड़सँ कऽ सम्पन्न केलखिन। जमाइबाबू मुजफरपुरमे नोकरी करै छथिन ओतै सरकारी अवास भेटल छन्हि, तइमे उषा सङ्गे रहै छथिन। जेठका बेटा बबलूक किरदानीसँ दुनू परानी सोनाजीक मन बेथित छन्हि। बबलू इंजीनियरिंग करैले दिल्ली गेला मुदा हरियानाक एकटा लड़िकीक प्रेममे फँसि अपन जीवनक नैयाकेँ किनार कऽ लेलनि आ ओतै प्रेम-बिआह करि बसि गेला। डबलू नागपुरमे बैंक मनेजर छथिन। हिनकरो बिआह भेला पछाति पत्नी सङ्गे आतै रहै छनिन। सालमे एक-आध बेर कभी-कभार घर अबै छथिन। सोनाजी अपन जीवनसंगिनी ममताक सङ्ग बुढ़ाड़ीक पहिया जेना-तेना खिंचै छथि। बेटा-पुतोहुक सुख हिनका नसीब नै होइ छन्हि मुदा उषा, बेटी रहैतो, बेटा जकाँ देखभाल करैए। सप्ताहमे एकबेर आबि कऽ जरूरे देखि जाइत अछि। उषाक सोभाव पिताजीसँ बिरासतमे प्राप्त भेल छन्हि तँए मधुरो आ एक दोसरसँ अनुकूलो छन्हि। सोनाजीक ई पैंसैठम बरख चलि रहल छन्हि। नोकरीसँ रिटायर भेल रहथि तँ शरीरसँ स्वस्थ छला आ भरोसा छेलनि जे आगुओ नीके रहता, मुदा मनुख तँ मात्र इच्छा करैए, होइ तँ अछि वएह जे ऊपरबलाक मरजी रहै छन्हि। उषाक बिआहक पछाति दुनू बेटा दू जगह अपन-अपन घर बसा लेलकनि। सोनाजी दुनू परानीकेँ चिन्ता-फिकिर घरेड़ देलकनि। जीवन-शक्ति शिथिल भऽ गेलनि। हाथ-पएर धीमा पड़ि गेलनि। आँखिक रोशनी कमि गेलनि। कानोसँ कम सुनाइ दिअ लगलनि। पाचनतंत्र गड़बड़ा गेलनि आ दिल-दिमाग सेहो दुरूस नै रहलनि। मतलब बुढ़ापा हिनकर समस्या बनि गेलनि। बेटा सभ कभी-कभार फोन घुमा हालचाल करैत रहै छन्हि। दोस्त-यारकेँ- दबाइ दोकनदार आ मोहल्लाक डाक्टर- सभकेँ फोन घुमा कहैत रहैए जे माए-बाबूकेँ देखैत रहबै। सोनाजी दुनू गोटेकेँ ई परिपक्व अवस्था अछि जइमे ज्ञान, स्थिरता आ अनुभव छन्हि आ तहिक सहारे दुनू बेकती जीवन रूपी नैयाकेँ आगू खिंच रहल छथि। ओना तँ बुढ़ापा भार नै होइत अछि मुदा जब खाएल-पीअल काया जड़जड़ भऽ जाइए आ परिवारक सदस्यक संग तालमेल नै रहैए तँ परीवारमे अपन उपयोगितापर विराम लगि जाइत अछि। वृद्ध लोकनिकेँ ऐ अवस्थामे सहायता आ सहयोगक जरूरत पड़ितै छै। जे बेटा-पुतोहु अपन वृद्ध माए-बापकेँ सेवा करैए वएह जीवनक उत्तम कर्म करैए। एहेन पूत जे माए-बापकेँ जीबिते छोड़ि दइए आ अपनेमे मगन रहैए ओ ओहने काज करैए जेना धिया-पुता सभ बालुक रेतसँ महल बना लइए आ तैपर गाछक डारि-पात गाड़ि कऽ बगीचा बना लइए आ खुशी मनबैत रहैए मुदा जेकरा ज्ञान अछि ओ अपन जीवनक उत्तम कर्म करैसँ पाछू नै हटैए। आजुक समाजमे बेकती अपन बाल-बच्चा संग परिवारमे रीझल रहैए। माए-बाप, बूढ़-पुरानक मान-मर्यादा, तेकर सेवा सत्कारकेँ साफे बिसरि जाइए। ओहेन मनुख हरिदम पाबैक पाछू बेहाल रहैए मुदा जे हिनका लग प्राप्त वस्तु अछि ओकर उपयोग करनाइ नै जानैए। बूढ़-पुरान अनुभवी होइ छथि तँए हिनका समाजमे विशिष्ट स्थान भेटबाक चाही। जे बेकती वृद्धक सेवा नै करैए, ओ कायर होइए आ कायर लोग काल्पनिक विचारक धनवान आ महा गप्पी होइत अछि। जाबे धरि वृद्धजनक आ जुबकक समाजमे तालमेल आ समानता नै बैसत ताबे धरि समाजिक आ सांस्कृतिक काजमे स्थइरूपसँ बिकास सम्भव नै भऽ सकत। सोनाजी शरीरसँ कमजोर होइत गेला आ बेटा पुतोहुक सहायता आ सहानुभूति घटैत गेलनि। आब हिनका याद आबै छन्हि ओ दिन, जइ दिन बेदरूकिया सभकेँ ठेहुनापर लऽ घौआ-छु मल्ले-छु करैत पढ़ैत रहथि ‘लब घर उठे आ पुरान घर खसे...। खैर जे ऐ हाथसँ करैए ओकरा ओइ हाथसँ भोगए पड़ैए। अहु अवस्थामे सोनाजीकेँ रोज-मर्ड़ाक समान कीनए बास्ते हाट-बजार जाइए पड़ै छन्हि। आइ सोनाजी सुति ऊठि कऽ शौचालय गेलखिन। होनीकेँ किछु भेनाइ रहनि, बाहर निकलितै चक्कर आबि गेलनि आ शौचालयक दरबाजासँ टकरा कऽ खसि पड़ला। ममताकेँ गिरैक अभास भेलनि, भिरकाएल फाटककेँ ठेल देखलखिन सोनाजी ढनमनाएल असहाय अवस्थामे ओङ्गराएल आ कहरि रहल छथि। ममता धबरा गेली आ उठबैक परियास केलखिन, हिला-डोला कऽ पुछै छथिन- “बबलूक पपा! की भेल! केना खसलिऐ! बाजू ने?” मुदा कोनो जवाब नै भेटलनि। सोनाजीकेँ मुहसँ छर-छर लेहू बहै छेलनि। ई देखि ममता हाय-बाप करए लगली, असगरि हिनकासँ उठि नै सकल, दौगल-दौगल दरबज्जापर जा हरेरामकेँ सोर पाड़लक, हरेराम दुनू परानी दौगल आएल, सोनाजीक ई दशा देखि हाँइ-हाँइ कऽ उठा-पुठा कऽ ओसार परहक खाटपर सुतेलकनि। सोनाजीक ई हलात देखि ममताक देह जेना केराक भालरि जकाँ काँपए लगलनि। की करब! आ केना हएत! किछु नै फुड़ै छेलनि। हरेराम हड़बराइत बाजल- “काकी! डागडरकेँ फोन करू!” मुदा फोनक डायरी सोनेजी रखने छेलखिन। ममताकेँ भेटिते ने रहनि। हरेरामक पत्नी मंजू बुझि गेलखिन जे बेगरतापर एहेन छोटसन चीज नै भेटैत छन्हि, डाक्टरकेँ बजबैले दौगल-दौगल गेली। मोहल्लेमे डाक्टर इकबालक घर छन्हि, एलखिन। सोनाजीक मुँहक ऊपरका दूटा दाँत नीचला ठोरमे भोंका गेल रहनि तइसँ मुहसँ लेहूक टघार चलै छेलनि।़ उपचार शुरू भेल, कनीएकाल पछाति सोनाजीकेँ होश एलनि। ममतोकेँ जानमे जान एलनि। डाक्टर इकबाल ढाढ़स दैत कहलखिन- “अखनि कोनो चिन्ता करैक बात नै छै, सोनाजीक ब्लडपेसर आ सूगर बढ़ि गेल छन्हि तइसँ, चक्कर एलनि मुदा समैसँ जाँच आ इलाज हेबाक चाही नै तँ हार्टएटेकक सम्भावना बाढ़ि सकैए।” डाक्टर इकबाल पूर्जी लीखि हरेरामकेँ हाथमे दैत कहलखिन- “ई दबाइ जल्दीए लऽ कऽ आउ, सोनाजीकेँ ठोरमे टाँका लगबए पड़त।” तत्कालीन उपचार भेल। सोनाजीक मन पहिनेसँ नीक भेल। ममताक जीक मन हल्लुक हुअ लगल आ बेटा सभकेँ फोन लगबए लगली। जेठका बेटा बबलुकेँ पहिने फोन लगा घटनाक जानकारी देलखिन मुदा बबलू ऐ बातकेँ गंभीरतासँ नै लैत कहलकनि- “केना खसि गेलौ? बाबूजी दबाइ खाइत रहौ की नै? तों केतए रही? दिन राति टेन्शन दइमे तूँ सब लगल रहै छँह।” ऐ घड़ीमे बेटासँ एहेन तरहक जवाब सुनि ममताक मोह भंग भऽ गेलनि। फेर छोटका बेटा डबलूकेँ फोन लगा स्थितिक जानकारी देलखिन। डबलू पिताक हाल सूनि अस्वासन दैत बाजल- “चिन्ता नै कर। डाक्टर साहेबसँ हम बात करै छी। दीपू दोस्तकेँ घरपर भेजै छियौ डाक्टरसँ देखा कऽ दबाइओ-दारू सभ लाबि देतौ। तूँ कान-खीज नै कर।” ममताकेँ बँचल-खोंचल आस नीरास भऽ गेलनि। खैर हिनका सभसँ ओते आसो नै लगेने छेलखिन। आब बेटी उषाकेँ फोन लगेलनि। आन दिन उषा माए-बाबूकेँ फोन करि हालचाल जनैत रहए मुदा, आइ माइक फोन देखि चौंकली आ उत्सुकता पूर्वक बाजलि- “हँ माय! हम सब नीके छी, मुदा बाबूजी केना छथिन?” ममता जनैत छेली जे साँच बात बतेलासँ उषा बेसी घबरा जाएत तँए बातकेँ छोट करैत बजली- “बाबूजीक तबीयत गड़बड़ा गेलौ आबि कऽ देखि जाही।” मुदा भारी मन आ अवाजक थड़-थड़ाहटिसँ उषा भाँपि गेली जे साइत बाबूजीकेँ तबीयत बेसी खराब भऽ गेल अछि। घबराहटि तँ भेबे केलनि मुदा संयमसँ फोन रखि सोचए लगली जे की करी! फेर उठि कऽ बैग झारि, कपड़ा-लत्ता चोपतए लगली आ तुरंत नैहर अबैक ओरयान करए लगली। उषाकेँ एक सालक बेटी छेलनि तेकरो मँुह-कान पोछि तैयार कऽ एक काँखमे बच्चा आ दोसर हाथमे बैग उठा ओसारपर रखि घर दरबज्जामे ताला लगबए लगली। घरक चाभी बिसवासी पड़ोसीकेँ दैत पति इंजीनियर साहेबकेँ फोन लगेलकनि जे घंटे भरि पहिले ड्यूटीपर नीकलले छेलखिन, इंजीनियर साहैब फोन रीसीभ करैत बजला- “हँ बाजू, की बात अछि?” उषाक मन तँ हड़बड़ाएले रहनि मुदा तैयो सम्हरि कऽ बजली- “हम बाबूजीकेँ देखैले गाम जा रहल छी, माइक फोन आएल जे बाबूजी सिरियस छथिन। अहूँ साँझ धरि बाबूजीकेँ देखैले आबि जाएब।” ई बात सुनि इंजीनियर साहैब चौंकि गेला। पुछलखिन- “अखनि! अचानक! किए गाम विदा भेलौं?” ताबे धरि उषा रिक्सापर बैसि बस स्टैण्ड दिस बिदा भऽ गेल छेली। हड़बड़ाइत बजली- “अखनि ओते गप हम नै करब, बूझि लियनु जे बाबूजीक हालत ठीक नै अछि।” उषाकेँ हड़बड़ाएल अवाजसँ इंजीनियर साहैब बूझि गेला जे आब हिनका कोइ नै रोकि सकैए। भरोस दैत बजला- “जाएब तँ जाउ, मुदा मनके अस्थीर केने जाउ, आ बाजू जे पाइ-कौड़ी किछु संगमे अछि किने?” उषा- “अहाँ पाइक चिन्ता नै करू, हमरा संगमे ओते पाइ अछि जइसँ, हम गाम जा सकै छी।” इंजीनियर साहैब बात टोहियबैत पूछि देलकखिन- “पाइ केतएसँ लाबलौं अहाँ? बजैत रहै छिऐ जे हमरा हाथमे एकोटा छिद्दीओ ने रहैए।” उषा सकपका गेली। सकपकेबो केना ने करितथि? पतिक जेबीसँ बँचल-खूचल पाइ रोजे निकालिते रहै छेली। तैपर सँ ऊपरौसँ किछु ने किछु मांगि जरूरतिक समान कीनैबिते रहै छेली आ सभसँ जरूरी काज माए-बाबूकेँ देखै बास्ते जाए पड़ै तइमे खर्चा-बर्चा तँ होइते रहै। ई बात इंजीनियरो साहैब जनिते रहथि तँए उषा बातकेँ खोलैत बजली- “अहाँक जेबी, जे रोज साफ होइत रहैए, वएह कोशलिया कऽ हम रखने रही, विशेष पाइक ओरीयान अहाँ साँझ धरि केने आउ।” बेटा सभकेँ नै एलासँ ममता दुखी तँ छेली। मुदा ऊषाकेँ एलासँ निरासाक बादल छँटि गेलनि। साँझ होइत-होइत उषाक पति इंजीनियरो साहैब ऑफिससँ छुट्टी लऽ पहुँच गलखिन। विहाने भने एम्बुलेन्ससँ सोनाजीकेँ दरभंगा लऽ गेलनि आ डाक्टर यू.के बिश्वाससँ इलाज चलए लगलनि। तत्काल किछु दबाइ शुरू काएल गेल, ऑक्सिजनक खगता सेहो पड़लनि आ दिनमे तीन बेर एकर परयोग हुअ लगल। विभिन्न तरहक जाँच कराैल गेल। जाँचक किछु रिपोट तीन दिनक पछाति आएल आ किछु रिपोट हप्ता भरिक बाद आएत। जे रिपोर्ट आएल ओइमे बी.पी हाइ, सूगर बढ़ल आ संगे-संग हार्ट अटेकक सम्भावना बताएल गेल। सप्ताह भरि इलाज चलैत रहल, तबीयतमे उतार-चढ़ाव होइत रहल, कखनो नीक जकाँ गप-सप्प करैत रहथि तँ कखनो आँखि पथरा जान्हि, दम फुलए लगनि आ बेहोस भऽ जाथि। कखनो बेसुधि अवस्थामे अपने-आपसँ बड़बड़ए लगथि- “बबलू! कखनि एलँह आ आ बैठ! कनियाँ! घर जा। अहाँ पोती छी हमर? आब! आब! बिस्कूट एकटा हमरो दिए ने! एे डबलू चाह लाबह! माएकेँ कहक चाह देत! ईह छिनरीक साँए! जेते खाएत नै तेते छिड़याएत!” दुनू पजरामे बैसि उषा आ उषाक माए- ममता- बेना होंकि रहल छन्हि। सोनाजीक ई बड़बड़ेनाइ रोकैक बास्ते उषा सोनाजीकेँ छातीपर हाथ रखि हिला-डोला कऽ कहैए- “बाबूजी! बाबूजी! केकरासँ गप करै छिऐ?” सोनाजी चौंकैत बजला- “ऊँह! नै नै गप करै छी। तोहर माए केतए छौ?” सोनाजी किछुकाल ऊपर एकटकी नजरिसँ तकैत रहला। फेरि जेना कोनो आहटि चौंकैए तहिना चौंकैत बजला- “डबलू गाड़ीसँ उतरि गेल जा अगुआ कऽ लाबि लहक! काल्हिए कहै छी तोहर माए किछु बुझिते नै छँह।” सोनाजीक स्मरण शक्ति छीन्न भऽ गेल रहनि। आँखिक रोशनी चलि गेल रहनि। रहि-रहि कऽ बिछाैन होंथड़ए लगै छला। ई बेचैनीक अवस्था देखि उषा आ ममताकेँ जी-मन उड़ैत रहनि। मुदा उषा साहसी, कखनो अपन घबड़ाहटिकेँ दृष्टिगोचर नै हुअ दैत रहनि। मनकेँ थिर करैत उषा बाजलि- “बाबूजी! बाबूजी? एम्हर ताकू ने! हमरा चिन्है छिऐ? हम के छी कहू ते?” सोनाजी आब देखि नै पबथि। मुदा जखनि स्मरण लौटैत रहनि तखनि अवाज परेखि नजरि घुमा-घुमा एम्हर-ओम्हर ताकि देखैक परियास करैत रहथि। कहलखिन- “हँ, चिन्है छी! उषा दाइ छी ने अहाँ? केतए छहक आगु आबह ने।” आइ अस्पतालमे नअ दिन भऽ गेल रहनि। एकटा जाँचक रिपोट आइ आएत। दस बजे डाक्टर बजौने छथिन। उषाक पति आ उषा रिपोटक जानकारीले क्लिनीकपर पहुँचला। कनीए कालक पछाति कम्पाउण्डर अवाज देलकनि- “सोनाजीक गारजियन डाक्टर साहैब से मिलिए।” उषा दुनू परानी वेटिंग हाॅलमे बैसल रहथि, बोलाहटि सुनिते डाक्टरक चेम्बरमे पहुँचला, सोफा-कुरसी लागल रहए, बैसैक संकेतक पछाति दुनू गोटे बैसि गेला। डाक्टर दुनू गोटेसँ सोनाजीक संग जे सम्बन्ध छेलनि तेकर परिचए लऽ कहलखिन- “मरीजक हालत गम्भीर अछि, रीकौभरक सम्भावना नै बँचल, जाबै धरि छथि, सेवा सत्कार करैत रहियनु।” डाक्टरक ई बात सुनि, उषा बौक जकाँ भऽ गेल। मुँहपर रूमाल रखि सिसैक-सिसैक कानए लगली। उषाक पति सेहो अवाक् रहि गेला! तैयो जिज्ञासु भऽ डाक्टर साहैबसँ पुछलखिन- “डाक्टर साहैब! केना एना भऽ गेलनि?” डाक्टर कहलखिन- “फेंफड़ा हिनकर बिल्कुल खतम भऽ गेल छन्हि। ब्रेन ट्युमर सेहो बढ़ि गेलनि आ शरीरक आनो-आनो अंग सबहक कार्यक्षमता शिथिल भऽ रहल छन्हि।” विभिन्न तरहक विमारी आ समस्याक विषयमे वार्तालापक पछाति निष्कर्ष यएह भेलनि जे सोनाजीक बिमारी ठीक हेबाक कोनो गुंजाइश नै छन्हि। दुनू बेकती नीराश भऽ चेम्बरसँ बाहर एला, उषा बाहर निकलिते भोकारि पाड़ि-पाड़ि कानए लगली। पति साहस बढ़बैत कहलखिन- “अहाँ जौं एना कनब तँ माएकेँ की हएत? शान्त रहू, मनकेँ बुझाउ! जे हेबक छै से तँ भाइए कऽ रहत। सुझि-बुधिसँ काम लिअ! माएकेँ ऐ बातक जानकारी नै चलक चाही। हुनको सम्हारि कऽ आब अहींकेँ राखए पड़त ने। नै कानू। चूप रहू।” उषो सोचलनि जे अखनि हमरा कानबसँ नोकसान छोड़ि आर किछु नै हएत। कहुना मनकेँ बुझबैत चुप भेली। सोनाजी कमरामे बेडपर पड़ल रहथि, बगलमे ममता पंखा हौंकैत रहनि, तइ बगलमे पजरा लागि उषा बैसि गेली आ सोनाजीकेँ मँुह निहारए लगली। बेटा सभ टाल-मटोल करैत पिताक पराण छुटैकाल गाम आएल जखनि सोनाजी केकरो ने चिन्ह सकै छेलनि आ ने केकराे देखिए सकै छला। ओम प्रकाश झा :: बेटीक बिआह आँगनमे बिआहक गीत चालू छल। दरबज्जापर पाहुनक मेला लागल छल। आइ देवकांतक बेटीक बिआह छै। देवकांत एकटा किसान छथि। हुनकर दू गोट सन्तानमे सुलेखा जेठ छन्हि आ शरत छोट। ओ बेटा-बेटीमे कहियो कोनो अन्तर नै बूझलखिन्ह आ दुनूकेँ समान रूपेँ पढ़ाइ-लिखाइ करबौलखिन्ह। एकर नतीजा सेहो नीक रहल जे सुलेखा नीक संस्थानसँ एम.बी.ए.क डिग्री लऽ कऽ एकटा प्राइभेट कंपनीमे नीक नौकरी प्राप्त केलन्हि। बेटा शरत सेहो इंजीनियरिंगक पढ़ाइ कऽ रहल अछि। बेटीक शिक्षा-दीक्षा पूर्ण भेलापर आ नौकरी भेटलापर देवकांत ओकर बिआहक तैयारी शुरू केलथि। सर-कुटुम आ मित्र-मण्डलीसँ एकटा नीक बर ताकबाक अनुरोध केलथि। पढ़ल-लिखल नौकरिहारा बेटी लेल सुयोग्य वरक खोजमे जहाँ-तहाँ अपने सेहो गेला। मुदा सभठाम बेवस्थाक नाओंपर मुद्राक माँग एते भयावह छल जे ओ मुँह लटकौने गाम आबि जाइ छला। सुलेखाकेँ जखनि ऐ तरहक फिरिशानीक पता चलल तँ ओ अपन माएकेँ कहलक- “बाबूकेँ कहुन जे हम अपन सहकर्मी हेमंतसँ बिआह करऽ चाहै छी।” हेमंत सुलेखा संगे काज करै छथि आ ओकर नीक संगी सेहो छथि। मुदा ऐ प्रस्तावपर देवकांत तैयार नै भऽ तमसाइत बाजला- “हेमंत अपन जातिक बर नै छै आ अनजातिमे अपन बेटी बियाहि कऽ हम समाजसँ भतबड़ी नै कराएब।” देवकांतक ई रूप देखि सुलेखा सहमि गेली आ सकदम भऽ पिताक गप मानबाक सहमति दऽ देली। पुरजोर ताक-हेरक पछाति देवकांतकेँ एकटा वर सुलेखा लेल भेटलन्हि। बरक पिता नंदलाल अपन आई.आई.टी. इंजीनियर, उच्च पदपर सेवारत बेटा शैलेश लेल सुलेखाक प्रस्तावपर मंजूरी देलन्हि। मुदा बिआह रातिक खर्चक माँग सेहो केलन्हि। देवकांत पुछलखिन्ह- “बिआह रातिक खर्च केतेक हेतै।” नंदलाल कहलखिन्ह- “ई अहाँ अपनेसँ विचार कऽ लिअ आ हमर सबहक हैसियत आ लड़काक योग्यता देखैत खर्च बिआहसँ पूर्व हमरा लग पठा दिअ।” देवकांत अपन जमा-पूजी तोड़ि पाँच लाख टाका अपन पुत्र- शरत-क मार्फत बिआहसँ दू दिन पूर्व पठा देलखिन्ह। पाँचे लाख टका देखि नंदलालक पारा चढ़ि गेलन्हि आ ओ शरतक फजहति करैत बजला- “हम पच्चीस लाख आ बीस लाखक कथा छोड़ि अहाँ ओइठाम सम्बन्ध कऽ रहल छी से की ऐ भीखमङ्गीए लेल!” शरत बाजला- “ई अहाँ हमर बाबूसँ कहियनु, हम की कऽ सकै छी।” खैर बिआहक दिन आएल आ नंदलाल वर-बरियाती साजि देवकांतक दरबज्जापर एला। बरियाती दुआरि लगि गेल छल आ नश्ता-पानि इत्र-फुलेलसँ हुनकर सबहक सुआगत होमए लगल छल। नंदलाल अपन होइबला समधि- देवकांत-केँ बजा कऽ कहलखिन्ह- “बिआह रातिक समुच्चा बेवस्था अहाँ नै पठेलौं, मुदा तखनो हम आएल छी किएक तँ हम सभ भलामानुस छी। अहाँ आर पाँच लाख टका अबिलम दिअ तँ वर वेदीपर जाएत।” देवकांत अकाससँ खसला आ नंदलालक निहोरा करैत बाजला- “अखनि पाँच लाख केतएसँ आनब। बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखइमे सभ जमा पूजी पहिनहि खरच भऽ गेल अछि। अहाँ अखनि बिआह हुअ दियौ। हम गछै छी जे शनैः शनैः हम अहाँक पाँच लाख टका आर दऽ देब।” मुदा नंदलालपर ऐ निहोराक कोनो प्रभाव नै पड़लन्हि आ ओ जिद्द ठानि बैसि गेला जे पाइ एखने चाही। कनी कालमे ई बात आँगनधरि पहुँच गेल जे जावत नंदलालकेँ पाँच लाख टका आर नै भेटतै तावत बिआह नै हेतै। सुलेखा अपन बापक दुर्दशा आ समाजक बेवहारसँ बेथित भऽ गेल छेली। हुनकर माए हुनका लग बैसि कऽ कानए लगली जे आब की हेतै। ओ बाजली- “हुनका कहैत रहियनि जे बेटी-बिआह लेल पाइ जमा करू मुदा ओ हमर नै सुनलनि आ सबटा पाइ बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखाइपर खर्च कऽ लेलनि। ई बेइज्जती लऽ कऽ केना जीअब हम, सभटा हुनके किरदानीसँ भऽ रहल अछि।” बापक दुर्दशा आ बेइज्जती सुनि सुलेखाक आँखिमे पानि भरि आएल। कनीकाल तँ ओ माइयक विलाप सुनैत रहलि। फेर ओ ठाढ़ भऽ गेल आ अपन नोर पोछि दलान दिस बढ़ि गेलि। दलानपर पाहुन-परक आ दोस्त-महिमक बीचमे ओकर सहकर्मी हेमंत सेहो बैसल छल। ओ सोझहे हेमंत लग गेलि आ ओकर हाथ पकड़ि पुछलक जे अहाँ अखनि हमरासँ बिआह कऽ सकै छी। हेमंत कहलक किएक नै, ई तँ हमर सौभाग्य हएत जे अहाँ सन पढ़ल लिखल सुन्नरि कनिञाँसँ हमर बिआह हएत। सुलेखा हेमंतकेँ लेने वेदीपर पहुँचली आ पंडितजी केँ कहलखिन्ह जे हमर आ हेमंतक बिआह संपन्न कराैल जाए। ई समाद दलानपर पहुँचल आ सौंसे अनघोल भऽ गेल। नंदलाल आ देवकांत आँगन दिस दौड़ला। देवकांत बेटीकेँ कहलखिन्ह- “ई की कऽ रहल छी अहाँ? हमर पगड़ी किएक खसा रहल छी!” सुलेखा बाजली- “एकटा नीक आ सुलझल वरसँ हमर बिआह भेलासँ अहाँक पगड़ी खसि रहल अछि बाबूजी? आ ई दहेजक राक्षस जे अहाँकेँ नोचि रहल अछि ऐसँ अहाँक सम्मान बढ़ि रहल अछि की? अहाँ पहिने पाँच लाख टका दऽ चुकल छिऐ आ ऊपरसँ आर पाँच लाख? किएक बाबू किएक? हम स्त्री छी, की ई एकर प्रायश्चितमे ई टाका अहाँ दऽ रहल छिऐ? कर्जा लऽ कऽ जँ अहाँ ई टका ऐ दहेज-दानवकेँ दैयौ देबै तँ की ई हमर सुखमय जीवनक गारंटी देता? अहाँ ओइ कर्जाक भारसँ दाबल कुहरैत रहब तँ की हम सुखी रहब? नै बाबू नै हम आब किन्नौं ऐ दहेज-दानवक बेटासँ बिआह नै करब आ हम हेमंतसँ बिआह करब।” हेमंत आगू बढ़ि देवकांतक पएर छूबि बजला- “बाबूजी, अहाँ हमरापर बिसवास करू। सुलेखा ठीक कहै छथि। अहाँ अपन बेटीकेँ पढ़ा लिखा सुयोग्य बनेलौं। तेकर बादो बेटी हेबाक प्रायश्चितमे अपन देह बेचबाक तैयारी किएक केने छी? अहाँ स्वीकृति दियौ तँ हम सभ बिआह करी।” देवकांतक मोनमे समाजक डर छेलनि जे परजातिमे बिआहसँ भतबड़ी भऽ जाइत। मुदा दोसर दिस नंदलाल जकाँ राक्षसक डर सेहो छेलन्हि। कनीकाल विचार केला उपरान्त बजला- “हाँ सुलेखा, अहाँ ठीक कहै छी। विआहक उपरान्त ई दहेज-दानव अहाँसँ की बेवहार करत, एकर कोनो गारंटी नै। आ समाज की कोनो हमरा मदति केलक अहाँकेँ पढ़ेबा-लिखेबामे आकि बेवस्थाक टाका गानैमे। हम समाजसँ किए डरू? हम अहाँकेँ सुयोग्य बनेलौं आ आगू अहाँक जिनगी जाइसँ सुखमय रहए, तेहने काज हेबाक चाही। जाउ हम अहाँकेँ असिरवाद दइ छी। अहाँ हेमंत संगे बिआह करू आ नंदलालजी बरियाती लऽ कऽ अपन गाम जाथु।” बाजा-गाजा फेरसँ बाजए लगल। बेदीपर हेमंत आ सुलेखा बैसल आ मंत्रोच्चार शुरू भऽ गेल। शिव कुमार प्रसाद :: झमकी एकटा गाममे एकटा गरीब परिवार रहै छल। परिवारक मुखियाक रूप-रंग, गुण-सोभाव, दह-दशा गामे सन छेलै। नाओं छेलै खखना। भरि-दिन मर-मजूरीसँ जे बोइन भेटै छेलै, खखना घरवालीकेँ सुमझा दइ छेलै। घरमे अपने तीनटा बेटा-बेटी आ कनियाँ। पाँच जनक परिवार। माए किछुए दिनक पछाति सरग सिधारि गेलै। जावत् माए जीबै छेलै ताबत् हुनका कियो पुछैबला छेलै। काजपर सँ लौटला उत्तर एक लोटा पानि, एकटा सूखल रोटी वा फुटहो दऽ हिया जुड़बै छेलै। माइक मुइने ठीके बेटा टुगर भऽ जाइ छै। घरवाली मुँहक जोर। एतबे नै, विधाता घरवाली चम-चिकनी दऽ देलखिन। नाओं छेलै ‘झमकी’। नाउँए गुण सौंसे टोल झमकेत रहैत छल। बाल-बच्चा फुटलीओ आँखि नै सोहाइत रहै। जाबत् सासु छेलै बाल-बच्चाकेँ थथमारने रहै छल। आब तँ धियो-पुतो छिछिआइत रहै छै। खखना बरद जकाँ खटैत अछि। तिरया चरित्तरकेँ ओकरा किछु पता नै। झमकीकेँ एसनो-पोडर, कनफुल-नकफुल चाही। सेहो नव-नव डिजाइनक। खखना सन भकुआ, भकुआएले रहि गेल। आब सुनू आगूक खिस्सा। खखना काजे अपसियाँत। घरवाली आँचे अपसियाँत। टोलसँ अलग एकटा दोसर जातिक घर छल। ओइ घरक अगल-बगलमे कएटा मालिकक कलम छेलै। जारनि बीछऽ झमकी केतए जेतै? कलमेमे ने! झमकीकेँ संगी-बहिनपाक कोन कमी। सबहक संगे कलमे-कलमे, गाछीए-गाछी जारनि बीछैत छल। केना-ने-केना दोसर जातिक एकटा नवतुरियासँ झमकीकेँ आँखि लड़ि गेलै। धीरे-धीरे ओही कलममे जारन-बिछनी सबहक पंचैती सेहो बैसए लगल। ओ छौंड़ा सेहो गामक भौजाइक नाते कखनो बैसल कखनो ठाढ़हे-ठाढ़ गोष्ठीक हिस्सा बनि गेल। ओइ छौंड़ाकेँ देखिते झमकीक चमकी दुगुन्ना भऽ जाइत छेलै। आब बुझू खिस्सा खतम। झमकी झपटा मारलक। झपटा तेहेन छेलै जे छौंड़ा घरक खुट्टा तोड़ि जे भागल से आइ धरि गाम नै घुरल। धिया-पुता फकरा बनेलक- “झमकी झमैक गेल, छौड़ा लऽ कऽ उड़ि गेल...।” खखना बाल-बच्चाक संग ताकि रहल अछि जे कही फेर...। राम विलास साहु :: अबिसवास काल्हिए नूनू बाबूक बेटीकेँ बिआह छी। नूनू बाबू बिआहक सरमजान सबहक ओरियानमे लगल छला। गिरहत आ सम्पन्न परिवार रहितो रूपैआक अभाव छेलनि। चारि लाख टाका, पाँच भरि सोना आ एकटा मोटर साइकिल देहेजपर बिआह फाइलन भेल छल। दुलहा इंजीनियरिंग कौलेजक छात्र। सुखी सम्पन्न परिवार। दुलहाक पिता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफिसक बाड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने छथि। तँए नूनू बाबू अपन बेटी सुचिताकेँ हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छथि। नूनू बाबू बहुत परियास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकिल, दू भरि सोना तिलकक समैमे चुकता कऽ देलनि। शेष तीन भरि सोना बेटीक गहना स्वरूप बिआहे दिन देब आ एक लाख रूपैआ जे बँकियौता रहि गेल ओ बेटीक नामे एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि। जे दू तीन मास पछाति मिलत सेहो चुकता कऽ देब। तिलक भेला पछाति बिआहक दिन ठेकल गेल। मुदा दुलहाक पिता मोहन बाबू बड़ लोभी। ओ मोने-मोन सोचलनि, पुतोहु जखनि हमर हएत तँ एल.आइ.सी.क रूपैआ आइ ने काल्हि हमरे हएत। बँकियौता रूपैआ बिआहसँ पहिने लऽ लेब तँ लाभमे रहब। मोहन बाबू बिआहसँ एक दिन पहिने समाद नूनू बाबूक घर पठौलनि जे हमर एक लाख टाका बँकियाहा अछि ओ रूपैआ चुकता करि दिअ तखने बरियाती जाएत नै तँ अहाँ जानू। नूनू बाबू समाद सुनिते जेना देहपर बज्ज्र खसि पड़ल। ओ सेचमे पड़ि गेला। होश सम्हारि मोहन बाबूसँ भेँट कऽ बड़ विनती केलनि। अखनि ऐ लेल माफी दिअ। हम बेटीबला छी। बहुत चीज-बौसक ओरियान करए पड़त। तैपर सँ बरियातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत। मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकेँ एकोटा बात नै सुनलकनि, आ ने आँखिक नोर पोछलकनि। तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तँ अहाँ बरियाती लऽ कऽ आउ, हम दरबज्जेपर बिअाहसँ पहिने रूपैआ बरियातीए घरमे चुकता करि देब तखनि बिआह करब।” नूनू बाबू खेत भरना रखि रूपैआक ओरियान केलनि। बरियाती समैपर आएल। सबहक सुआगत भेल। दरबज्जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पिता- मोहन बाबूकेँ चुकता कऽ देलनि। दुलहाक परिछन भेल, वरमालाक काज शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहिने दुलहिनकेँ देखता। पसिन भेला पछाति ने बरमाला आ सेनूरदान हएत। ऐ बातसँ कन्याँ पक्षमे खलबली मचि गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि गेल। अन्तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहिने कन्याँ देख लेल जाउ। तखने आगूक काज हएत। दुलहिन चित्रा तँ पहिनेसँ वरमाला लेल सजले छलि। एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनियाँ संगे बजौल गेल। ओही कोठलीमे दुलहिन चित्रा सहेलीक संगे आएल। चित्रा इण्टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि। दुलहा देखि कऽ मोने-मोन खुश भेला। किछु गप-सप्प सेहो भेलै। तखने चित्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्की मारि पीठे लागल बजला- “हँ, की हमहूँ अहाँकेँ...।” चित्रा तुरन्ते जवाब देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। तँए आब ई बिआह हम किन्नौं ने करब। चित्राक ई निर्णए सुनि सखी-बहिनपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्यादि बहुतो गोटे समझेलकनि मुदा एकेठाम चित्रा जिद्द धेने रहलि जे ऐ वरसँ हम बिआह नै करब।” दरबज्जा बरियाती-सरियातीसँ भरल छल। ई बात सुनिते लगले सनसना कऽ अगिलग्गी जकाँ चारू दिस सौंसे गाम पसरि गेल। बहुतो बुजुर्ग लोकनि दुलहिनक पिताकेँ बुझा-समझा कऽ कहलकनि मुदा चित्रा अपन दृढ़पर अरल रहलि। चित्रासँ कारण पूछल गेल। कहलक- “जखनि दुल्हाकेँ अपन माए-बाप आ सर-समाज किनकोपर बिसवास नै छन्हि तँ ओ हमरापर बिसवास केना करता आ हम केना हुनकापर बिसवास करब। दोसर बात जे हिनकर पिताजी दहेजक खातिर जमीन आइज्जत बेचबा सकै छथि तखनि ओ हमरो बेचि सकैत छथि किने। तँए हम बीख पीब मरि जाएब मुदा एहेन अविसवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बिआह नै करब। ऐसँ नीक तँ हम ओहेन दुल्हा जे गरीबे किएक ने हएत, तिनकासँ करब, जे अपन इज्जतक संगे दोसरोक इज्जत करत।” चित्रा सहेली संगे कोठलीसँ निकलि गेलि। दुल्हा आ लोकनियाँ सभकेँ ओही कोठलीमे बन्न कऽ ताला लगा आँगन आबि गेलि। बिआह नै भेल। ई खबरि रातिए भरिमे चौतरफा पसरि गेल। पंचैतीक बैसार भेल। पंच लोकनि बिआह हेबाक बहुत परियास केलनि मुदा चित्रा अपन संकल्पपर अडिग रहलि। अन्तमे जे दहेजक लेन-देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस भऽ जाए। दुलहिनक पिता नूनू बाबू बजला- “चारि लाख टाका, दू भरि सोना, मोटर साइकिल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च भेल अछि से सभटा आपस कऽ दिअ तखने हिनका सभकेँ छुट्टी भेटतनि। नै तँ हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबनि।” सभ पंचक विचार भेलनि। बात तँ उचिते ने नूनू बाबू कहै छथि। कोनो जबरन जुर्माना तँ नै...। दुल्हाक पिता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकिल घरसँ मंगबा नूनू बाबूकेँ पंचक बिच्चेमे आपस कऽ देलकनि। तखनि हुनक बेटाकेँ कोठलीसँ बाहर निकालि देल गेल। जहिना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगरि दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकड़ि सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहिना सभ कियो विदा भेला। चित्रा पिताक मुरझाएल मुँह देखि बाजलि- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह करब। पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नै। एही खातिर ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चिन्ता नै करू।” हेम नारायण साहु :: बेसी भऽ गेल आब नै गामक चौबटियापर एकटा झमटगर पीपड़क गाछ छल। गाछतर बैसल शीलाक मन उदास रहै। गुनधुनमे पड़ल छलि। हमर जिनगीक समए सभ शेषे अछि हम केना ऐ पहाड़ सन जिनगीकेँ पार लगाएब, से नै जानि। जिनका संगे जिनगीक जिनगीक शुरूआत बिआहक पवित्र बन्धनसँ भेल सेहो हमरासँ सदिखन लड़िते-झगड़िते रहै छथि। हरिदम गारि-बात दैत रहै छथि। सासु-ससुरक कोन चर्चा। जखनि-तखनि सासुक खोबहाटन लादले रहैए- “तोहर बाप हमरा बेटाकेँ ठकि बिआह करा लेलक। हम जे सोचने रही ओ सभटा मनक बात मनेमे रहि गेल। फल्लाँ गामक घरदेखिया मन-माफित टाका दइ छेलै। गाड़ी दइ छेलै। नै जानि रमुआक बाप कोन ठकहरबाक चालिमे पड़ि हमरा बेटाकेँ बोइर देलक।” एवं प्रकारे शीलाकेँ सभ दिन फझैत करैत रहै छेलै। बेर-बेर सासु कहैत रहै छेलखिन- “अहाँ नैहर जा कऽ अपन माए-बापसँ दू लाख टाका आ एगो मोटर साइकिल लाबि आनू नै तँ...।” शीला ऐ सभ उलहन-उपराग आ पड़तारनासँ उबि गेल छलि। उबबो केना ने करैत जखनि-तखनि सासुक खोबहाटन शुरू भऽ जाइ छेलै। पति सेहो माइक बातमे हँ-मे-हँ मिला दैत छेलै। वेचारी शीला कएक दिन खेनाइओ ने खाइ छलि, भूखले रहि जाइ छलि। भूखल-पिआसल देह कारी झामर भऽ गेल छेलै। शीलाक माए-बाबू ऐ पेनकट्टा झोड़ाकेँ भरिओ केना पबैत। तीन भाए-बहिनक संग माए-बाबूक परिवार। मध्यम वर्गीय परिवार, दस कट्टा जमीन छेलै जेकरा जोति-कोरि परिवारक भरन-पोषण करैत छल। आमदनीक आर कोनो साधन नै। ओही सिमित आमदनीमे तीनू भाए-बहिन पढ़ितो-लिखितो छल। शीला बी.ए. पास कऽ एम.ए.मे नाओं लिखौने छलि। छोट बहिन बारहमी कक्षामे निर्मली कौलेजमे पढ़ैत छलि तथा सभसँ छोट भाए एगारहमीमे पढ़ै छल। शिलाक बिआह फुलपरास निवासी श्रीधर ठाकुरक जेठ सन्तान रमाकान्तसँ भेल। शिलाक बिआह अपना भरि बड़ धूम-धामसँ केलनि। करबो केना ने करितथि जेठ बेटीक बिआह रहनि। दस कट्टा जमीनमे सँ तीन कट्ठा बेचि लेलनि आ किछु पैंचो-उधार कऽ शिलाक पिता कुटुमकेँ नगदी रूपैआक संग सभ सभ सरमजान देलकनि। किछु दिन तँ नीक जकाँ समए बीतल। मुदा पछाति शीला संग जे रामलीला शुरू भेल से असहनीय भऽ गेल। शिला कोनो उपए नै देखि सासुरसँ विदा भऽ चौबटियाक पीपड़क गाछतरमे बैसि गुनधुन कऽ रहल अछि। गुनधुन करैत दीदीक कहल बात मन पड़ि गेलै, बेटीक पएर सासुरसँ अन्तिम समैमे उठैत अछि। मुदा शिला ऐ विचारकेँ पुरान बूझि पएर उठा नेने छलि। शिला ओतएसँ अचानक उठि, हाथमे झोला लऽ नैहर दिस विदा भऽ गेलि। नीक-बेजए मनमे नचिते रहै। अन्तमे निर्णए केलक जे सै नै तँ पहिने गाम पहुँच माएकेँ सभ दुखनामा सुना देबै, पछाति देखल जेतै। नैहर आबि शिला अपन सभ दुखरा माएकेँ सुनौलक। माए दुखी भऽ गेली। दुनू आँखिसँ नोरक धार बहए लगलनि। जमीन बेचलौं संग-संग उधारो-पैंच केलौं अपना भरि कोनो कसरि नै कऽ हँसी-खुशीसँ जे बनि पड़ल से सभ किछु देलौं। मुदा तैयो...। माएक नोर पोछैत शीला बाजलि- “माए, तूँ कनै किए छेँ। नै कान। हमराले तूँ चिन्ता नै कर, हम ऐ समस्याक निदान निकालि लेब हमरामे ई सामर्थ्य अछि। हम कोनो मुर्ख नै छी। हमरा सन-सन बहुतो बेटीक संग ऐ तरहक समस्यासँ लड़ऽ पड़ि रहल छै। हम अहीठाम रहि अपन गुजर करब मुदा दहेज रूपे राक्षकसँ दूर रहब।” शीलाक ई विचार सुनि माए चुप रहली। गामक अभिभावक सभ सेहो शीलाक विचारसँ सहमि गेला। शीला अपन दलानमे बच्चा सभकेँ ट्यूशन पढ़ेनाइ शुरू केलक। देखिते-देखिते ट्यूशन खूब चलए लगल। आर्थिक रूपे कमजोर परिवारक बच्चाकेँ बिनु फीसेक पढ़बैत रहए। ट्यूशनक आमदनीसँ शीला एम.ए.क अधूरा कोर्सकेँ पूरा सेहो केलक। छोट बहिनक बिआहमे सेहो आर्थिक सहयोग केलक। आगू चलि बिहार सरकारक शिक्षक नियोजन हेतु टी.ई.टी. परीक्षा सेहो पास केलक। आ कनीए दिनक बाद शिक्षक पदपर बहाली सेहो भऽ गेल। एम्हर शीलाक सुखद दिनक चर्च सासुरमे पहुँच गेल। शीलाक ससुर रामाकान्तकेँ कहलखिन जे कनियाँक विदागरी करा आनहुन। साझक समए छल। रामाकान्त सासुर पहुँचि शीलाकेँ देखै छथि शीलाकेँ पढ़ैत। रामाकान्त शीलाकेँ हाल-चाल पुछलखिन। मुदा शीला किछु ने बाजलि। चुप-चाप सुनि रहल छलि। बातकेँ घुरियबैत कहलखिन- “हम आएल छी अहाँकेँ विदागरी करबए लेल। जे भेल से बिसरि जाउ। हमरा स्वयं गलतीक भान भेल। बिसरि जाउ सभटा। आब कोनो तरहक उलहन-उपराग नै देता हमर माए-बाबू।” शीला बाजलि- “अहाँ ई गप कोन मुहेँ हमरा कहै छी। आइ दिनकर केमहर उगि गेला। आइ जे हमरा विदागरी करबए एलौं से की।” रामाकान्त कहलखिन- “जे भेल से आब िकन्नौं ने हएत।” शीला उत्तर देलखिन- “आब तँ ठीके आेना नै हएत जेना अपने सभ एतेक दिन हमरा संग केलौं। आब तँ हमरा टाका अछि, नौकरी अछि। से तँ आब अहाँकेँ भेटिए रहल अछि। अहाँ हमरासँ थोड़े बिआह केने छी। अहाँ तँ टाकासँ बिआह केने छी। जइ कारण एते दिन फुटलियो आँखिए ने सोहाइ छेलौं। पति-पत्नीक सम्बन्धकेँ बिसरि गेल छेलौं। जे सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरक होइ छै। दुख-सुखमे सेहो ओहिना रहै छै। तेकरा अहाँ सनक पुरुखक पड़ितानासँ आइ समाजक सैकड़ो नव-विवाहिताकेँ आत्म हत्या करए पड़ै छै, मुदा से हम नै कऽ जे रस्ता धेलौं हमरा तहीपर रहए दिअ। अहाँ एतएसँ चलि जाउ, जे भेल से बहुत भऽ गेल आब नै। हमरा अहिना रहए दिअ।” शीलाक दृढ़ता देखि रामाकान्तकेँ जेना ठकमुड़ी लगि गेलनि। मने-मन उचित-अनुचितक भान हुअ लगलनि। उमेश मण्डल :: कोटाक चाउर लौकही बजारसँ घरक नून-तेल, हरदी, मेरचाय इत्यादि चीज-बौस कीनि कऽ अबैत रही। हमरा सबहक लौकहिये बजार छी। लटखेना दोकानसँ लऽ कऽ सोना-चानी तकक दोकान अछिए। किरिण डूमि झलफल होइत जाइत रहै। अन्हार नै भेल रहै, फरिचे जकाँ रहै। मुदा हम अपन गाड़ीक लाइट जरा देने रहऐ। पाँतरमे जखनि एलौं तँ देखलिऐ जे काकीकेँ माथपर नमहर मोटा छै। असगरे वेचारी पछड़ैत लफड़ल घर दिस जाइत रहए। लगभग मन भरिक चाउरक मोटा माथपर रहै। लग अबिते पुछलिऐ- “काकी, कथीक मोटा छी?” मनमे ई भेल जे एकबधू गाम छी जँ कहीं घास-तास होइ, ई तँ सभ दिना काज छीहे। हमहूँ किए कहबै जे गाड़ीएपर चढ़ि लिअ, भारी लगैत हएत। जेना काकीक कण्ठ सुखा गेल रहै, तहिना प्रश्नक जवाब धाँइ दे नै दऽ कनी बिलमल। कण्ठ सर्ड़ास करैत बाजलि- “कोटाक चाउर छी।” कोटाक चाउर सुनि मनमे भेल जे गाड़ीएपर लऽ लेब। जखनि घरे लगक छी, तखनि किए ने वेचारीकेँ एते असान भऽ जेतै। गाड़ी ठाढ़ कऽ अपने निच्चाँ भेलौं। हिला-डोला कऽ मोटरी देखए लगलौं जे सक्कतसँ बान्हल छै की नै, मुदा सक्कतोसँ बन्हलाहा माथपर चाइलिक झमारसँ कनी-मनी ढील-ढाल भाइए जाइ छै। पुछलिऐ- “चाउरेटा अछि आकि गहुमो?” चाउर-गहुम सुनि जेना काकीकेँ मनमे खुशी भेलनि। हलसि बजली- “बौआ, महीक्का अरबा चाउर छी। पैंतीस किलो हिस्सा देलक।” काकीक मनक खुशी नै बूझि पेलौं। पुछबो केना करितिऐ जे मन बड़ खनहन देखै छी। एहेन प्रश्न तँ संगतुरियामे उठैए तँए चुपे रही आकि काकी अपने बजली- “बौआ, चाउर-गहुम दुनू छेलै, डीलर पुछलक जे दुनू लेब आकि चाउरेटा लेब। चाउर कहुना भेल तँ राजा भेल गहुम किछु हएत तँ रोटीए भेल।” काकीक बात सुनि टराटक लगि गेल। टड़ाटक ई लगल जे भरिसक काकीकेँ पुरान विचार अखनो मनकेँ पकड़नहि छन्हि। मुदा मनमे घुरियौठ भेल, जे एना किए काकी चाउरकेँ राजा आ गहुमकेँ रोटीक अन्न बुझहै छथि। पुछलियनि- “काकी चाउर केना राजा भेल?” काकीकेँ रटलाहा विद्यार्थी जकाँ ठोरेपर रहनि प्रश्न खसिते धाँइ दऽ बजली- “बौआ, चाउर राजा ऐ दुआरे भेल जे खीर बना, आकि भात बना, आकि खिच्चरि बना, आकि मड़सटकी बना, आकि सोझहे पानिमे फुला, आकि पीसि कऽ रोटी बना आकि भुइज कऽ मुरही-भुज्जा बना, आकि ओहिना फाँकी, जेना मन हुअए तेना खाउ। से गहुमकेँ हएत?” काकीक जवाब सुनि चुप भऽ हिसाव जोड़ए लगलौं। जोड़ला पछाति बूझि पड़ल जे काकीक हिसाब ठीके छन्हि। मुदा राजा केतएसँ आएल ई तँ प्रश्न रहबे कएल। राज-पाटबला राजा होइए, चाउर केना राजा भेल। पुछलियनि- “काकी, जेते कहलिऐ से तँ चाउरक विन्यास भेल, राजा केना कहलिऐ?” जहिना मुण्डे-मुण्डे विचार अलग-अलग होइ छै तहिना काकीओक अपन विचार रहनि। बजली- “बौआ, भाँइमे दादा के भेल?” काकीक जवाब सुनि आरो ओझरा गेलौं। ओझरा ई गेलौं जे एते काल एकटा सबाल छल आब दोहरा गेल। ओझरीओ तँ दू भत्ता लगला पछातिए ने होइ छै। मुदा खोललो तँ जाइते छै। भलहिं एकेबेर नै दोहरा कऽ किए ने खोलऽ पड़ै। प्रश्नो तँ दू-दिसिया होइत अछि चाहे नाङरि पकड़ि उठाउ आकि मुँह पकड़ि। बजलौं- “भायमे दादा केकरा कहबै?” काकी बजली- “भैयारी-भैयारी भेल। एक माइक कोखिसँ एलहा सभ बरबरि भेल। मुदा जेकरामे जेते बेसी लूइर-बूइध रहतै, ओ ओते समधाइन कऽ परिवार चलौत, तँए ओ दादा भेल।” अपना सुरिए तँ काकी कहि देलनि मुदा मनमे एकटा खोंच तँ रहबे करए। बजलौं- “काकी, परिवारमे के जेठ भेल?” प्रश्न सुनिते काकी बजली- “जे जेठ भेल ओकरा तँ आरो बेसी समए, आन भाँइक अपेछा भेटल। जखनि बेसी समए पौलक तखनि आगू-बढ़ै (लूरि-बुधि सीखै) सँ ओकरा मनाही के करतै जे दादा नै बनत। ओहो बनह।” मनमे कनी सबुर भेल। गप-सप्प करैत अन्हारो भऽ गेल रहए। कहलियनि- “काकी अन्हार भेल जाइए। आब चलू।” काकी बजली- “कनी हमरा माथपर उठा दए, आ तूँ आगू बढ़। खाइ-पीबै धरि पहुँचिए जाएब।” काकीक बात सुनि हँसी लगि गेल। कहलियनि- “गाड़ीएपर मोटो दऽ दिऔ आ अपनो चढ़ि लिअ।” फागुलाल साहु :: मर्दानी नारी मर्दानीक मतलब होइत अछि, निडर, साहसी, स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता। नारी जेतेक अछि सबहक अन्दर ई तागत अछि, परन्तु खगता ऐ बातक अछि जे नारी सभ ई बातकेँ समझौ आ समझि कऽ बाहर निकालौ। ई कथा छी एकटा अब्बल-दुब्बर गरीब नारीक। बर्ख २०१३ तिथि स्वतंत्रता दिवसक दिन हरिपुर डीह टोलक रूपनी देवी, मधुबनीसँ कलुआही जाइवाली पक्की सड़कक कातमे एकटा छोट-छीन चाहक दोकान खोलि अपन रोजगारक शुरू केलक। रूपनीकेँ ई दोकान खोलैक प्रयोजन ऐ लेल पड़ल जे एक दिन अन्नक अभावमे बाले-बच्चे भूखले सूतए पड़लै। विहान भने रूपनीक पति भोला रोजी वास्ते गामक मालिक टुनटुन ठाकुरक हबेलीमे पहुँच मजदुरी करए लगल। दोकान खोलैसँ पनरह दिन पहिनेक बात छी। रूपनी अपन पतिक कमाएल बोइन लबैले टुनटुन ठाकुर हबेलीपर गेल। भिनसरक आठ बजैत रहै। रूपनीकेँ देखिते ठाकुर साहैब पुछि बैसल- “केतए एलेँ रूपनी?” बाजलि- “मालिक, बोइन लइले।” एतबे बात सुनैत टुनटुन बाबू भड़कि उठला। रूपनीकेँ फटकारैत बजला- “अखनि तँ भोलबा खेतमे पहुँचबे कएल आ तूँ बोइन ले चलि एलेँ।” रूपनी सकदम भऽ ठाढ़े छल। आकि पुन: टुनटुन बजला- “खुरपी ले, दरबज्जाक सभटा घास उखार तखने बोइन देबौ।” ई बात सुनिते रूपनीक आगू रातिक तरेगन सोझहामे आबि गेल। माथपर हाथ दऽ सोचए लगल। की करूँ, रातिमे तँ सब परानी भूखले सुति रहलौं। अखनि की खाएत आ खाएब। मालिकक बात तँ निठुर होइते अछि। कमाएलो बोइनपर लुलकार सुनैए पड़ै छै। आब की करब! पेटमे अन्न नै, गामपर बच्चा बाटे तकैत हएत जे मालिक ऐठामसँ किछु आनत माए तँ खाएब। मुदा ई कोन भगवानक चक्र छी। नै आब छूछ हाथे घर नै जाएब। सोचैत रूपनी चटे हबेलीसँ धुरियाएले पएरे घूमि बजार पहुँचल। बजारक एकटा किराना दोकानपर आबि दोकनदारकेँ कहलक- “मालिक, ई हमर नाकक छौंक रखि लिअ आ चाउर-आँटा दिअ।” दोकनदार बाजल- “भोला हमर दू दिन काज केने छल, जे बोइनो पछुआएल छै। अहाँ जे समान लेब से बाजू दऽ दइ छी।” रूपनी सोचैत बाजलि- “एक दिनक बोइनक चाउर-आँटा दऽ दिअ आ एक दिनककेँ चाहपती-चीनी आैर बिस्कुट आैरो पलाष्टिकक पचासटा गिलास दऽ दिअ।” दोकानदार बाजल- “पाहुन अबै छथि की?” रूपनी- “नै, चाहक दोकान खोलब।” दोकानदार चाहक दोकान खोलै जोकर सभ समान दैत समझबैत-बुझबैत दोकान चलबैक सभ तरीका बुझा रूपनीकेँ विदा केलक। रूपनी घर अबिते पहिने खेनाइ बना बाल-बच्चाकेँ खिआ पति लेल खेनाइ लऽ ठाकुर साहैबक खेत जा भोलोकेँ खिएलक। पछाति ओतएसँ घर आपस विदा भेल। बाटमे अबैत रूपनीकेँ ठाकुर साहैबक मलिकाना बात झुड़झुड़ाइत माथकेँ घुड़ियबैत, पछाति बरहम स्थानमे बैसि दोकानक जगह टोहिया लेलक। टोहियबिते ओतए घर आबि पहिने खेनाइ खेलक। दोसरे दिन रूपनी स्वतंत्रता दिवसक अवसरिपर चाहक दोकान खोलि अपन मधुर भाषाक सहयोगसँ चाह-बिस्कुट बेचए लगली। अपन हूनर संग साहसकेँ बटोरि पतिकेँ मजदूरी करैसँ मना करैत दोकानेपर काज करैक बोध देबए लगली। भोला सेहो मालिक ठाकुरक झझकारकेँ मोन पड़ैत दोकानक काजमे जतनसँ लागि गेल। रूपनी साले भरिमे काफी उन्नति करैत दोकानक रंग-ढंग बदलि देलक और अपन पति भोलाकेँ मालिक कहि सम्बोधित करैत चाहक दोकानसँ मिठाइ, जलपान आ भोजनक दोकान बना रूपनी अपन साहस आ मर्दानीक संग आत्म निर्भरताक परिचए दैत स्वतंत्रताक जिनगी जीवि रहल अछि। शम्भु सौरभ :: लाजो अजगर सन अथबल आ पहाड़ोसँ नमहर ई करियाही राति आइ ठेलनौं ने ठेलाइत अछि। बिजुरी आ जोगनीक चोरा-नुक्कीक संग झिंगुरक झंझनाहटिक बीच लाजोक करुण-क्रंदनक तिरोहित स्वर-वायुक हिलकोरमे जेना बिला जाइत होन्हि। सुगबा नाकक दुनू कछेर दऽ बहैत आँखिक नोर सुखा कऽ पीपरी जकाँ परि गेलै। ऐ बीच भनसा चारपर सँ एकटा टिटही टिटकारी भरैत दछिन दिस उड़ि गेल। पोखरिक उतरवारि भिण्डापर पछुआर दिस आएल गामवालीकेँ भयाैन सन लगलनि। ओ चट आँगन दिस घूमि गेली आ गोसाँइ असोराक ओरिआनी लग आबि धड़फड़ा कऽ खसि पड़ली। धब्ब दऽ किछु गिरबाक अवाज सुनि हाथमे टार्च नेने घरसँ लालकाकी बहरेली। “लाल, मर एना किए! की भेल अहाँकेँ?” कनियाँकेँ उठबैत बजली लालकाकी। “माँ।” “हँ-हँ, बाजू ने। किछु देखलिऐहेँ की, एना डेराएल जकाँ किए छी?” कनियाँकेँ भयभीत देखि पुछलनि लालकाकी। कनियाँ- “ऐ पोखरिक दछिनवरिया भिण्डापर सँ कोनो मौगीक कानबक अवाज आबि रहल छै। एतेक रातिमे के कनतै। हमरा तँ लागल कोनो डाकिनीक अवाज छिऐ। ओम्हरका भाग तँ भुताहियो छै ने।” लालकाकी- “दुर बताहि, अहाँकेँ किछु बेसी डर लगि गेल। ओम्हर एहेन कोनो बात नै छै। ओइ भिण्डापर तँ बैंक बाबूक पोखरा-पाटन मकान छन्हि।” कनियाँ- “हिनका हमर बातपर बिसवास नै होइ छन्हि तँ चलथु वारी आ सुनथुन ओइ अवाजकेँ।” लालकाकीकेँ घिचने-तिरने कनियाँ लऽ गेलखिन। वारीमे स्वर आरोहित होइत दिसा दिस आँगुर बतबैत कहलखिन। लालकाकी किछुकाल धरि ओइ कानबकेँ अकानैत रहली। तेकर बाद बजली- “कनियाँ, ई तँ बैंक बाबूक कनियाँ लालपुरवालीक कानब छी। नै जानि, की भेलै। अखनि तँ बिआहक सालो ने लगलै हेन। कनियाँ तँ इन्द्रक परीए सन बुझू। नीक-नकार सिकार, सुन्नरि आ गुणगरि।” तखने आँगुरसँ कियो सोर पाड़लकनि- “अहाँ सभ एतए की करै छी। जल्दी आँगन जाउ।” दुनू सासु-पुतोहु नमहर डेगे आँगन दिस चल गेली। ताधरि टोल-पड़ोसक सभ जागि गेल छेलै। विषादपूर्ण आभाक संग रातिक अन्तिम पहरक सम्पूर्णाहुति भऽ गेल छल। बैंक बाबूक आँगन आ दलान लोकसँ भरि गेल छेलनि। आँगनसँ दलान धरि गुदुर-गुदुर-फुसुर-फुसुर भऽ रहल छेलै। कियो कहै छेलै- “आह, बैंक बाबू बड़ नीक लोक छला। भगवानोकेँ केकरो नीक देखल नै जाइ छन्हि। एहेन मेहनतिया आ एहेन बेवहारिक। भरि मुँह केकरोसँ बजबो ने करै छला।” तैबीच ठोरमे खैनी दैत टुनटुन बाबू बजला- “भाइ, आइए साँझमे तँ सबहक संग बैसि कऽ भोज खेने छला फेर ई छने-मे-छनाक! महा आश्चर्य।” “आश्चर्य कोन, कोनो आश्चर्य नै। उढ़ारि कऽ जे अनने छथि एगो डाइनकेँ। गोर चमरी देखि कऽ लोभा गेला। कोनो टेना-मानी भेल हेतनि। पेस देने हेतनि। ओकरा की छै। एक बुलाया तेरह आया। हमर भतीजीसँ कथा लगैत रहै। बुड़हा-बुड़ही आ घरक सभ सदसकेँ हमर भतीजी पसीन रहै मुदा...।” “बुढ़िया काकी, बड बजै छी। चुप रहू ने।” बिच्चेमे बात कटैत बजला लूटन पुरहित। आ ओम्हर आँगनमे लाजो-अक्क-बक्क। एकदम बौक। मुहसँ बोल आ आँखिसँ नोर दुनू जेना बिला गेलनि। ओरियानीसँ ओंगठल एकटक बैंक बाबूक पार्थिव शरीरकेँ देखि रहल छेली। हृदए प्रान्तमे उठल बिहाड़ि हुनक हृदएस्त बुधि-विवेक आ विचारकेँ उधेश-पुधेश कऽ रखि देने छेलनि। हुनका मोनपर लगलनि, ओ कौलेज जइमे दुनू गोटे संग-संग पढ़ै छेली। हुनका मोन पड़ऽ लगलनि ओ काली मन्दिर जैठाम काली माँक समक्ष दुनू गोटे संगे-संग जीऐ-मरैक सप्पत खेने छेली। मुदा आइ सभ बात फूसि। सामनेक सत् गत सभ सत्तकेँ मटियामेट कऽ देने छल। आइ ओ केकरो लेल डाइन छेली तँ केकरो लेल काल रात्रि। केकरो लेल किछु तँ केकरो लेल किछु। विभिन्न अभद्र उपाधिसँ उपालम्भित भऽ लाजो ओत्तै ओरिआनीएमे ओङ्घरा गेली। सभ सामान जुटा लेल गेल छेलै। बाँसक रथ तैयार छेलै। बैंक बाबूक पार्थिव शरीरकेँ उठा-पुठा असमसान दिस विदा भऽ गेल। आ एमहर टोलक किछु विधवा सभ लाजोकेँ ओरियानीसँ उठा कऽ असोरापर बैसौलखिन। ओहीमे सँ कियो हाँइ-हाँइ सींथ धोइत बजली- “जो गे अभगली, भरले जुआनीमे चिबा गेलेँ साँएकेँ।” कियो ओकर हाथकेँ सिलौटपर रखि लोढ़ी लऽ चूड़ी फोरैत बजली- “गे, खाइए कए छेलौ तँ खइतेँ अपन बाप-भाएकेँ। हमर पोता तोरा की बिगारने छेलौ। डनियाही कहींके!” अही क्रममे चूड़ीक एकटा टुकड़ी लाजोकेँ पहुँचामे भोंका गेलै। मुदा निस्तेज लाजोक मुहसँ इस तक नै बहराएल। लाजो यथावत् सभ स्वीकारैत रहली। मुदा हुनक सासु हुनक गरदनिपर एक मुक्का मारैत बजली- “जो गे हरासंखनी, कनी कनबो तँ कर। ऐ इस-इसेबो तँ कर। हमरा बेटाकेँ भरल-जुआनीमे चिबा गेलेँ। रह हमरे जकाँ राँड़।” गालमे एक ठुनका मारि ओतएसँ उठि कऽ चल गेली। श्राद्धक भीड़-भाड़क पश्चात् कटाैन आ डेरौन एकान्तसँ लाजो घबरए लगलीह। सासुक ओल सनक बोल आ ननदिक ठुनका आ तैपर ससुर आ भैंसुरक दुत्कार-फटकार। बेसहारा लाजोक आँखिक समक्ष एकदम अन्हारे अन्हार। मुदा लाजो हिमतगरि आ कमासुत छेली। हुनका अपन चरित्र आ आचरणपर पूरा भरोस छेलनि। ओ सासु-ससुर वा परिवारक अन्य सदसक बेवहारसँ कखनो दुखी नै भेली। घरसँ निकालि देला पछाति ओ ओइ काली मन्दिरपर गेली जेतए ओ आ किसुन (बैंक बाबूक) संग-संग जीबा-मरबाक सप्पत नेने छेली। ओ कालीक समक्ष विनय-भावसँ सजले नेत्र एक टंगा दऽ किछु काल धरि ठाढ़ि रहली। तत्पश्चात बैसैक चेष्टामे भेली आकि पाछूसँ कियो टोकारा देलकनि- “लजवन्ती?” ओ अकबका कऽ पाछू तकली- “शालीग्राम?” हर्ष-विषादक बीच मुहसँ बकार तक नै बहरा सकलनि मुदा हृदैक करूर्णाद्र भाव आँखिसँ मोती बनि झहरए लगलनि। ताधरि शलीग्राम सहटि कऽ आर निकट आबि गेलनि। लाजो हुनक कन्हापर अपन मुड़ी गोंति हिचुकऽ लगली। शालीग्राम लाजोक पतिक घनिष्ठ मित्र छेलखिन। परिस्थितिक जानकारी भेटलासँ ओ बड़ दुखी भेला। ओ लाजाेकेँ अपन घर लऽ जा किछु ट्यूशन आ एकटा प्राइवेट स्कूलमे नोकरी धड़ा देलखिन। लाजो एकाग्रचित भऽ अपन ड्यूटी करए लगली। हिनक करतब निष्ठासँ संतुष्ट भऽ स्कूलक डायरेक्टर हिनका ओइ स्कूलक प्रिंसिपल बना देलकनि। ऐ बीच लाजो अपन दरमाहाक तीन-चौथाइ भाग अपन सासु-ससुरकेँ पठबैत रहलखिन। शनै: शनै: सासुरक परिवार सहानुभूति हिनका भेटए लगलनि। एक दिन बैंकक भैकेंसी निकललै। ईहो बी.कम. ऑनर्स फस्टक्लास छेली। शालीग्रामक सहयोगसँ हिनका बैंकमे नोकरी भऽ गेलनि। समए बदललै बितलाहा बात सभ नहु-नहु तरऽ लगलै मुदा लाजवन्तीक विचार आ बेवहार यथावत्। अखनो हुनका अपन सासु आ ससुरक प्रति श्रद्धा आ सिनेह ओहिना छन्हि जेना पूर्वमे छेलनि। यद्यपि ठामो-ठिम ई चर्चाक विषय बनि गेल छेलै जे लाजवन्तीकेँ दोसर बिआह कऽ लेबाक चाहियनि। जिनगी पहाड़ सनक छन्हि। कियो कहथि जे जइ सासुरसँ ओ तिरस्कृत भऽ निकालि देल गेली ओइ सासुरक प्रति एते मोह-ममता उचित नै। मुदा लाजो अपन नैहर आ सासुरक परम्पराक लीकसँ एक मिसियो टस्ससँ मस्स होमए लेल तैयार नै। समए बीतैत गेलै। बैंक बाबूक हिनक क्रिया-कलाप आ करतब परायणसँ प्रसन्न भऽ हिनकर कुर्सी अपन स्पेशल रूममे लगबा देलखिन। लाजो सेहो प्रसन्न रहए लगली। काम अधिक बढ़ि गेलापर लाजवन्तीकेँ छुट्टीक बादो देर साँझ धरि मेनेजर साहैबक संग काज करए पड़ै छेलनि। कहियोकाल ओ मैनेजर साहैबक संग हुनक डेरापर जा हुनक पत्नीक काम-काजमे सेहो सहायता कऽ दइ छेलखिन। एवम प्रकारेँ मैनेजर साहैब आ लाजो, लाजो आ मैनेजर साहैब, दुनू एक दोसराक प्रति पूर्ण विश्वस्त आ सिनेहिल भऽ चुकल छला। ई बात ऑफिसमे बहुचर्चित भऽ गेल छेलै मुदा कानो-कान, माने-मोन। एक दिन। “सुनै छी, कनी घुसकि कऽ एमरे आउ।” पूजाक दीप लेसैत बजली लक्ष्मी अपन पति मैनेजर साहैबसँ। “लक्ष्मी जीक आदेश आ हम घुसकी नै, से केना हेतै।” मुस्कियाइत मैनेजर साहैब घुसकि कऽ पत्नीक देहमे सटैत पुन: बजला- “आइ मोन बड़ हरियर लगैत अछि, की बात छै?” “बात की रहतै। मोनमे एकटा बात केतेक दिनसँ फुदकैत अछि, मुदा ठोरपर अबैत-अबैत...।” “बिला जाइत अछि सएह ने। एहेन कोन बात अछि जेकरा प्रगट करैमे एतेक संकोच।” बिच्चेमे लोकैत मैनेजर साहैब बजला- “पुन: बाजू, नि:संकोच बाजू।” लक्ष्मी- “हमरा इच्छा अछि जे आब आलोकक बिआह कऽ दियनि। कारण जे ओहो आब इंजीनियरिंग कौलेजक प्रोफेसर भऽ गेला अछि। आ बिआहक योग्य सेहो। हमहूँ आब बरबरि अस्वस्थे रहै छी। जँ लाजो नै रहितथि तँ हम कहिया ने सठि गेल रहितौं।” मैनेजर साहैब- “हँ हमरो इच्छा अछि जे आब घरमे सुलक्षण आ सुशील लागलि पुतोहु आबथि। मुदा...।” लक्ष्मी- “मुदा की?” मैनेजर साहैब- “मुदा यएह जे कोनो नीक कथा आबए तब ने।” लक्ष्मी- “कथा तँ...।” मैनेजर साहैब- “तँ की नीक कथा आएल अछि। लड़की अहाँ देखने छिऐ।” लक्ष्मी- “जँ अहाँ तमसाइ नै तँ बताबी।” मैनेजर साहैब- “ऐमे तमसाइक कोन बात।” लक्ष्मी– “लड़की तँ अहूँ देखने छिऐ। अहाँक हाथेमे अछि ई कथा।” मैनेजर साहैब- “हे, बुझौल जुनि बुझाउ। खेलाउ खुलि कऽ।” लक्ष्मी- “लाजो।” मैनेजर साहैब- “अहाँ तँ अन्तर्यामी छी यै। हमर मोनक बात...। कनी रूकि कऽ पुन:- “हमरो तँ यएह इच्छा छल, मुदा भय छल जे कहीं अहाँ...।” लक्ष्मी- “नै-नै, हम की। हम तँ आलोकसँ स्वीकृति आ सहमति दुनू लऽ नेने छी।” मैनेजर साहैब- “से तँ ठीक, मुदा...।” लक्ष्मी- “मुदा-तुदा किछु नै। अहाँ कहए चाहै छी से बुझलौं। बौआकेँ ओकर विधवा होइक बात मालूम छै। हम सभ बात फरिछा कऽ कहि देने छिऐ। ओकरा ओ कनियाँ बड़ पसिन छै। हम ऊपरका मोने किछु विरोधो करए चाहलिऐ मुदा ऐ धँसल परम्पराकेँ ओ मानैले तैयार नै अछि।” मैनेजर साहैब- “लाजो मानथि तखनि ने। ओ वर्तमान परम्परासँ हटि कऽ किछु करैले तैयारी नै होथि। ओना, हमरो ओ जीमे गरि गेल छथि। जहियासँ ओ हमर कार्यालयमे हमर सहयोगी बनि एलीह आ हम चैनक जिनगी जीबए लगलौं। हमरा मोनमे तँ अछि जे जे काल्हि होइ से आइ भऽ जाए। मुदा...।” लक्ष्मी- “एकटा बात करू ने। शालीग्राम बाबूकेँ फोन कऽ बजबियनु ने। हुनक बात लाजो नै टारथिन्ह। हमरा बिसवास अछि।” मैनेजर साहैब- “अच्छा ठीक अछि।” कहि घरसँ चल गेला। वएह काली मन्दिरक परिसर जेतए कहियो लाजो आ किसन संग-संग जीऐ-मरैक सप्पत नेने छला। आइ फेर एकबेर विवाह-मण्डपक रूपे सुसज्जित भऽ सुशोभित भऽ रहल अछि। लाजोक नैहर आ सासुर दुनू पक्ष लड़कीक दोसर बिआहक विरोधमे अपन अरियल रूख अपनौने छथि। परम्पराक विरूद्ध आचरण करब अपन बाप-पुरखाक अपमान बुझै छथि, प्रतिष्ठा बुझै छथि। शालीग्राम बाबूसँ नै रहि भेलनि ओ गरजैत बजला- “अँए यौ, जहिया ऐ निर्दोष अवला विधवाकेँ मारि-पीट कऽ घरसँ निकालि देने रहिऐ, केतए रहए अहाँ सबहक प्रतिष्ठा। आइ जँ कियो हिनका पत्नीक रूपमे स्वीकार कऽ हिनक पुनर्जीवन देबए चाहै छन्हि तँ एकरा अहाँ सभ अपन प्रतिष्ठाक विषय बनौने छी। धिक्कार ओइ परम्पराकेँ अछि जे असमैमे भेल विधवाकेँ अपन जर्जर शिशकीक सिक्करिमे बान्हि कऽ रखैत अछि आ ओकरा कुहरि-कुहरि कऽ जीबऽ लेल विवश करैत अछि। आउ तोड़ू ओइ परम्पराकेँ आ कालीकेँ साक्षी मानि सभ कियो दियौन्ह असिरवाद ऐ बर-बधूकेँ।” तखने केम्हरोसँ वसन्ती पूर्वा सिहकल आ हर्षोन्मुख भऽ गीत-नादक संग पुनर्विवाह सम्पन्न भेल। शिव कुमार मिश्र :: बाल विधवा हमरे पिसियौतक बिआह सुपौल भेल छन्हि। हमर पीसा दसे बर्खमे कन्याँदान पौत्रीक कऽ लेलन्हि। हुनके देखसी हमर मसियौत सुधांसु सेहो अपन कन्याँक बिआह केलन्हि। दस बर्षेत् भवेत कन्याँ, अर्थात् जइ कन्याँक रज स्वाला नै भेल होइ। ओहने कन्याँक दान करक चाही। ओ अपन द्वितीय कन्याँक बिआह भद्रपुर करबाक निश्चित केलन्हि। हमर मौसाक पूर्ण आकांक्षा छेलन्हि जे हम अपने हाथे कन्याँदान करब। और ओही कन्याँदानमे गोदान सेहो करब। हमर मौसा सुभद्रबाबू इलाकाक पंचैतिया मुँहफट्ट, केकरो मुहेँपर जवाब दैत छला। ओ वर-वधूक मिलान देखए लगला। वर पक्ष सेहो नामी-गामी। हिनके जकाँ ओहो पंचैतिया छला। दुनू पक्षक वर-वधूक गोत्र-मिलसार ठीक छल। पंजी प्रथानुसार सेहो मिलन उत्तम छल। लेन-देन सेहो अगुआ, सोन कक्काक बीच भऽ गेल छल। बिआहक दिन सुनिश्चित भेल। हमर मसियौत सुधांसु धूम-धामक संग बरियाती-सरियाती सबहक सम्मानक बेवस्था केलन्हि। गामक लोक सेहो पूर्ण मददि केलन्हि। वर पक्ष श्रीकान्त बाबू कपड़ा-लत्ता, सोना-चानी लऽ उपस्थित भेला। कन्याँ-राखी आ वर रमणक बिआह विष्णु बिआह पद्धतिसँ सम्पन्न भेल। मिथिलाक रीति-रिवाज अनुकूल पाणिग्रहण सम्पादन भेल। चारि दिनक चतुर्थी सेहो भऽ गेल। राखी आ रमण कनियाँ-पुतराक खेलक आनन्दमे छला। किछु दिनक बाद ईश्वरक अकृपा भऽ गेल, रमणकेँ साँप काटि लेलकन्हि। यावत् झाड़-फूक होइ, डाक्टर सेहो बजौल गेल, ओइ बिच्चेमे प्राण छूटि गेलनि। हमर मसियौतक सभ परिवार पेटकान दऽ देलक। वरियाती-सरियाती दुनू गामक लोक सभ अचम्भित रहि गेल। मुदा कएल की जाए। छातीपर पाथर राखै पड़त। ईश्वरक लीला अपरम्पार छन्हि। कखनि केकरा राजा, आकि रंक बनबै छथिन्ह तेकर ठीक नै। एक दिन हमर भौज राखी संग झंझारपुर गेली। ओइठाम एक सोना-चानीक दोकान छेलै। ओ सोनाक हाड़ आ पायल चाँनीक लइले कानए लागलि। ओकर सभ श्रृंगार उतरि गेल छल। बाल-विधवा पोसाकमे छल। माए ओकरा रोकए लागल मुदा ओ विश्वनाथ प्रसादक दोकानक हाड़ और पायल लेबाक लेल दृढ़ संकल्पित भऽ क्रन्दन-कोलाहल करए लागलि। ओकर कानब देखि सभ एकटक ताकए लगल। एतेक छोट बच्चिया ओ केतौ विधवा भऽ जाए, जेकरा कोनो सामाजिक चेतनाे ने छेलै। विश्वनाथ प्रसाद सेहो ओ दृश्य देखि कानए लगला। अन्तत: हाड़ तथा पायल ओकरा देल गेल। तखनि ओकर नोर बन्न भेल। बाल विधवाक भार हमर मसियौत सुधांसु यावत् जीला ओ अपन कन्याँक अपना ओइठाम राखि जीवन-यापन केलन्हि। राखीक सासुरसँ कोनो पहल नै ऊपरसँ केतेको कलंक लगौल जे एकरे माथमे सिनुर देलासँ हमर बेटा मरि गेल। राखीकेँ खेनाइ-खोराकी सेहो नै देल गेल। हमर मसियौतक अन्तक बाद हमर भातिज सभ ओकरा सम्मानित ढंगसँ रखलक। बीचमे सरकार द्वारा विधवा पेन्शन सेहो देल गेल। ओ भगवान राधा-कृष्णक उपासक भऽ हुनके भजन-कीर्तन-पूजा-अर्चना करैत अन्तत: शरीर छोड़लक। जे मीरा वाईक उक्ति छन्हि- “हमर तँ गिरिधर गोपाल दोसर कियो नै।” आजुक समैमे बाल-विधवा कानूनी अपराध तथा अज्ञानताक द्योतक अछि। शास्त्रोक्ति नै। मुदा अखुनका समैमे बाल बिआह नै व्यस्क बिआह होइ। ओम प्रकाश झा :: कुलच्छनी ऐबेर फेरसँ श्रीधरक कनिञाँकेँ बेटीए भेलै, ई समाचार पूरा टोलमे पसरि गेल छल। भोज खेबाक आस रखनिहार सज्जन लोकनिक मँुह बिधुआ गेल। किएक तँ आब भोज नहियेँ हेतै। श्रीधरक बाबू गदाधर पोताक आसमे पछिला तीन बरखसँ की की नै करबौलथि। यज्ञ भेलै, हवन भेलै, दान आ पुन्न तँ पूछू नै। एकबेर बुड़हा आ बुड़ही कामर लऽ कऽ बाबाधामसँ सेहो भऽ एला। मुदा एतेक उपय आ जतनक कोनोे प्रतिफल नै। सबहक मँुह लटकल छल, जेना घरमे कोनो मरनी-हरनी भऽ गेल होइ। गदाधर दलान परहक कोठलीमे चुपचाप बैसल छला आ अपन भाग्य आ विधाताक ऊपर प्रलाप केने जाइत छला। हुनकर कनिञाँ आँगनमे कोनटा धेने उपासपर छेली, जे सभ जतन आ प्रयोजन विफल भऽ गेल। ‘पोताक मुँह देखनाइ भाग्यमे नै लिखल अछि’ ई बाजि-बाजि अपन पुतोहुकेँ कोसै छेली। श्रीधर अपनो मुँह लटकेने दलानसँ आँगन एला आ मुड़ी झुकौने सोइरी घर तक एला आ दरबज्जासँ हुलकी मारलथि। कनिञाँ बिछौनपर चुपचाप निश्चेश्ट पड़ल छेलै आ बड़की बेटी सुनैना जे तीन बर्खक छेलै, ओही चौकीपर बैसि माएसँ नवका बच्चा दियए किछु-सँ-किछु सवाल करै छेलै। कनिञाँ ऐ सोचमे छल जे घरक सभ लोक फेरसँ बेटी होइक कारणेँ हुनके दोख लगाैत। बड़की बच्चियाक जन्मक समए सेहो ओकरा सभसँ यएह सुनऽ पड़ल छेलै। नब बच्चा पूरा दुनियाँ आ दुनियाँक सोचसँ बेखबर भऽ अपन क्रन्दनमे तल्लीन भऽ सभकेँ अपना दिस आकर्शित करै छल। बापकेँ देखैत देरी सुनैना बिछौनपर सँ उतरि कऽ लपकल आ श्रीधरक जांघमे लटपटाइत बाजल- “बाबू, हमरा भूख लगल अछि। कियो हमरा खाइले नै दइए।” श्रीधर ओकरा धकलैत कहलक- “चल कुलच्छनी, के देतौ खाइले। पहिनेसँ तूँ की कम बोझ छेलेँ हमर माथपर जे पाछूसँ एकटा आर बहिन लऽ आनलेँ।” सुनैना ऐ सभ बातसँ अनभिज्ञ छल। ओ हठ करैत कहलक- “बाबू हमरा बिस्कुट आ दालमोट आनि दियऽ बड्ड भूख लगल अछि।” ऐबेर श्रीधर तमसा गेल आ सुनैनाकेँ जोरसँ धकेलि देलक। सुनैना निच्चाँ खसि पड़ल, खसिते कानए लगल आ श्रीधरक मुँह दिस टुकुर-टुकुर ताकए लगल। ओकर माथमे चौकीक कोणसँ चोट लगि गेल छेलै। ओकर माए चौकीपर सँ उठैक कोशिश केलक मुदा नै उठि सकल तँ श्रीधरकेँ कहलक जे ऐमे ऐ बचियाक कोन दोख छै जे अहाँ ओकरापर तमसा गेलिऐ। देखियौ तँ केना हिचकि-हिचकि कऽ कानि रहल छै। कनी ओकरा उठा लियौ ने। ताबत सुनैना अपने उठि गेल आ फेरसँ श्रीधर दिस बढ़ए लगल कानैत आँखिसँ टुकुर-टुकुर तकैत रहए। श्रीधरक आँखि ओकर आँखिसँ टकड़ाएल तँ श्रीधरकेँ ई आभास भेलै जे ओइ निर्दोख आँखिसँ अवाज आबि रहल छेलै जे ‘बाबू हमर कोन गलती। हम तँ अहींक अंश छी, अहींक सन्तान।’ श्रीधर ओइ निर्दोख आँखिक सवालसँ सन्न भऽ गेल। ओकर करेज फाटऽ लगलै। ओ सोझहे सुनैनाकेँ उठौलक आ कोरामे लऽ कऽ चुम्मा लेबए लगल आ ओकर माथ हँसौथऽ लगल। ओ अपने मोने बाजए लगल- “तूँ हमर सन्तान छेँ। तूँ हमर अंश छेँ। तोहर छोटकी बहिन सेहो हमर सन्तान आ हमर अंश अछि। तूँ कुलच्छनी नै हमर कुलक सिंगार छेँ। हमर नाओं तोरेसँ हएत। तूँ नै कान बेटी। चल की खेबही हम तोरा अखने कीनि दैत छियौ।” कहैत श्रीधर सुनैनाकेँ कोरामे लऽ कऽ दोकान दिस विदा भऽ गेल। गौरी शंकर साह :: छोटकी छोटकी दलानपर कबड्डी-कबड्डी खेलि रहल छेली, छोटकी जइ दिशा रहै छेली ओकर पक्का जीतबाक गारंटी रहै छल, एतेक चुस्त, दुरुस्त आ फुर्ति कोनो लड़कीकेँ नै छल। अखनि धरि चारिटा केँ माइर देने छेली आ जीतैबला छेली, जहिना छोटकी खेलैमे नम्बर एक तहिना पढ़ैमे सेहो एक नम्बर छेली, समैसँ दस मिनट पहिने स्कूल चलि जाइ छेली, स्कूलमे सभसँ आगाँक ब्रेंचपर बैसै छेली, जँ कोनो दिन कियो लड़की ओकरा जगहपर बैसि रहैत तँ बिना उठौने नै मानैत, हुनका माथामे रहनि जे पाछूमे भूसकोल बैसैत अछि आ हम कोनो भूसकोल छी, तखनि पाछूमे किए बैसब, बड़ नीक सोच छेलनि छोटकीक। अपनासँ बड़का-बड़काकेँ समस्यासँ केतेको बेर छोड़ौने रहथि। छोटकीकेँ नीक जकाँ बूझल छेलनि जे सभ आदमीकेँ कपारमे मासु आ हड्डी रहै छै मुदा लोक अपन सोचक कारण डाक्टर बनि जाइ छै आ अपना सोचेक कारण चपरासीओ नै बनि पबै छै, छोटकी तँए हरिदम अपन सोच नीक बनबैले स्कूलक पुस्तकालयसँ महान-महान आदमीक किताब लऽ टिफिनमे पढ़ि आपस कऽ दइ छेली। हुनक बेवहार सेहो बड़ नीक रहनि, जइ कारणेँ स्कूलक सर, मैडम सेहो बड़ मानैत रहथिन। ईहो एकटा ओकरा लेल रामवाणक काज करै छल। जखनि छोटकी कबड्डी-कबड्डी खेलैत रहथि तखने छोटकीक बहिन रूबी स्कूलसँ गामपर एली, रूबीक मन उदास देखि छोटकी सेहो उदास भऽ गेली। छोटकी आ रूबी सहोदर बहिन। दुनूमे बड़ मिलान, एतेक मिलान शाइते आइ धरि कियो एक दोसरमे झगड़ैत देखने हेतै। घरक सभ काज दुनू बहिन मिलि-जुलि कऽ करि लैत छेली। रूबी भोरे-भोरे घर बहारैत तँ छोटकी बरतन माँजि लैत छेली। भारीसँ भारी काज चुटकीमे कऽ लैत छेली। दुनू बहिन, छोटकी आठमामे पढ़ै छल, आ रूबी इण्टरमे छल, छोटकी एतेक चन्सगर छल तँ ओइमे रूबीक सेहो सहयोग छेलै। रूबी छोटकीकेँ सभ सबाल बता दइ छल। की सबाल की अछि आ एकरा केना बनौल जेतै, एतेक नीक जकाँ तँ छोटकीकेँ स्कूलोक सर नै बता दइ छेलनि। छोटकी रूबीकेँ उदास देखि पुछलक- “दीदी, अहाँ उदास किए छी। बड़ फिरिसान लगै छी। की भऽ गेल अहाँकेँ, बाजू। नै बाजब तँ हम बुझबै केना।” रूबीकेँ छोटकीक जिज्ञासा देखल नै गेलै, रूबी बाजल- “आइ फेरो ने जाति, ने अवासीय आ ने आय प्रमाण पत्र भेटल, पता नै की हेतै, जँ काल्हि तक नै भेटत तखनि तँ हम छात्रवृत्ति लेल आवेदन नै कऽ सकै छी। आ नहियेँ हमर बैंकमे खाता खुगि सकत।” छोटकी बिच्चेमे रूबीक बात कटैत बाजलि- “दीपाक बहिन तँ तोरा बाद जाति, अवासीय, आय प्रमाण पत्रक लेल आवेदन जमा केने छेलै, ओकर सबहक तँ बनि गेलै, तखनि अहाँकेँ किए ने बनल दीदी?” रूबी बाजलि- “छोटकी अखनि बड़ छोट छी, दुनियाँदारी तों नै बुझबीही, केना दुनियाँ जलैत अछि। दीपाकेँ समैसँ पहिने ऐ दुआरे भेट गेलै, किएक तँ ओकर भाए जे ई कागज-पत्तर सभ बनबै छै तेकरा दू सए टाका देने छेलै, आ टाकाबलाकेँ तँ पहिने काज होइ छै। कहबी कोनो बेजए नै अछि जे बाप बड़ा ने भैया सबसँ बड़ा रूपैआ।” कहि रूबी चुप भऽ गेल। छोटकी किछु सोचए लगल। आ फेर बाजल- “सरकार तँ कहै छै जे घूस लेनाइ कानूनन अपराध छै, तखनि ई सभ एना किए करै छै, कहबा लेल कहै छै की ई लोक सेवाक अधिकार छै मुदा हमरा लगि रहल अछि जे ई लोभ सेवाक अधिकार छै। टाकाक कारणेँ आदमी किछु कऽ सकैए। मुदा दीदी हमरा एगो बात कहू तँ प्रमाण पत्र बनबैबला सभ केना बूझि जाइ छै जे के टाका देने अछि आ के नै देने अछि?” रूबी बाजलि- “कियो कहैत छेलए जे जखनि कियो आवेदक आवेदन करै छै तँ ओ अपना जेबीमे रखल पुर्जीमे ओकर नाओं आ आेवदन क्रमांक नोट कऽ लइ छै आ सभसँ पहिने ओकरे प्रमाण पत्र बना छै।” छोटकी बाजलि- “आ जे पैसा नै दइ छै तेकर की होइ छै।” रूबी- “तेकर की होइ छै, तेकर आवेदनक कोनो माए-बाप नै होइ छै, केतौ फेकि दइ छै, ओइपर कोनो धियान नै दइ छै आ एमहर आवेदक दौगैत-दौगैत तबाह भऽ जाइ छै तखनो नै कोनो असर पड़ै छै, केतबो लोक कहै छै तेकर कोनो परभाब नै पड़ै छै। आवेदककेँ कुकुर बूझि लैत छै आ बीस दिन दौगबबैत रहै छै जेना हम दस दिनसँ दौग रहल छी।” छोटकीकेँ सुनि बड़ तामस उठलै, छोटकी रूबीकेँ कहलक- “तोहर कागज काल्हि बनि जेतौ, कोनो हालमे चाहे काल्हि सुरूज उगै आकि नै उगै, हवा बहै आकि नै बहै, काल्हि अहाँकेँ कागज हर हालतिमे बनबाक छै चाहै किछु भऽ जाइ।” “से केना हेतै।” रूबी बाजलि। तैपर छोटकी बाजल- “से हम काल्हि कहब, अखनि चलू मुँह-हाथ धोइ कऽ किछु खा लिअ फेर भिनसर ऐपर बात हेतै।” छोटकी ऐ स्टाइलमे कहलक जे रूबीकेँ हँसी आबि गेलै आ छोटकी हँसए लगल। दुनू बहिन अँगना गेल आ एके थारीमे बैसि दुनू खए लगल। भिनसर भेल दुनू बहिन प्रखण्डपर पहुँचल। छोटकी रूबीकेँ बाहरे ठाढ़ कऽ अन्दर गेल। फेर पाँच मिनटक पछाति बाहर आएल आ रूबीकेँ कहलक- “दीदी, अहाँ अहीठाम बैसू हम चट्टे अबै छी।” रूबी किछु ने बाजल। ओतइ बैसि गेल। अदहा घंटा भेल, तखने एकाएक तीन-चारिटा गाड़ी प्रखण्डक मैदानमे आबि लागि गेल। गाड़ी देखि कऽ सभ कर्मचारी सभकेँ होश उड़ि गेलै, सभ अपन-अपन काजमे दनदुरुस्तीसँ लगि गेल। गाड़ी एस.डी.ओ.क छेलै। एस.डी.ओ. सीधे ओही कार्यालयमे गेला जैठाम जाति, आय, आवासीय कागज सभ बनैत अछि। एस.डी.ओ. घूमि-घूमि कऽ सभटा देखए लगला, जेना किछु हराएल चीज ताकि रहल छथि। ओइठाम जेतेक कर्मचारी छेलै, सबहक होश उड़ल छल। तखने एस.डी.ओ. साहैब पुछलखिन- “रमण के छी?” ओहीठाम ठाढ़ एकटा कर्मचारी बाजल- “हम छी सर।” कर्मचारी हाकिम लग आबि कऽ ठाढ़ भेल, हाकिम ओकर जेबीक तलासी लेलक। ओकरा जेबीसँ दू सए रूपैआ निकलल, हाकिम अपन जेबसँ पुर्जी निकालि, रूपैआक नम्बर अपना पुर्जीपर उतारलक। नम्बरसँ मिलौलक, सभटा नम्बर मिलि गेलै। हाकिम एक झापड़ कर्मचारीकेँ लगौलक। झापड़ कसबर छल, लगिते कर्मचारी निच्चाँमे खसि पड़ल। एस.डी.ओ. बजला- “ई पैसा कहाँ से आया?” कर्मचारी डरसँ बाजल- “सर घरसँ लाए थे।” एस.डी.ओ.केँ तामस उठि गेलनि फेर एक झापड़ कर्मचारीकेँ लगा देलखिन। तखनि कर्मचारी मुँह खोललक आ सभटा खिस्सा कहलक। एस.डी.ओ. तुरंत छोटकीकेँ बजौजलक आ कर्मचारीकेँ कहलखिन- “आइ बारह बजे तक रूबी का प्रमाण पत्र बना कर देना।” कहि एस.डी.ओ. साहैब चलि गेला। एमहर छोटकी तीनो प्रमाण पत्र लेबाक लेल बैसि रहल। तखने एकटा कर्मचारी रूबी कुमारी, रूबी कुमारी कहैत अबाज लगेलक। छोटकी तुरंते रूबीकेँ लऽ ओतए पहुँचल आ रजिष्टरपर शाइन कऽ कागज लऽ विदा भेल। रूबीकेँ किछु नै फुड़ाइ छेलै। हम दस दिनसँ दौगै छेलौं मुदा हमरा नै भेटल आ छोटकी केना एके दिनमे काज सलटिआ लेलक। रूबीकेँ रहल नै गेलै। छोटकीसँ पुछलक- “आँइ गे तों केना एक्के दिनमे कागज बनबा देलँह। तोरा लग कोन एहेन जादूक छड़ी छौ।” रूबीक गप सुनि छोटकीकेँ हँसी लगि गेलै। ओ फरिछा कऽ रूबीकेँ कहए लगलै- “देखू, काल्हि जखनि अहाँ कहलौं जे टाका देलासँ काज भऽ जाइ छै तखनि हम अपना डायरीमे दू सए टाका जाइ समए निकालि लेलिऐ आ जेते कोनो नम्बर छेलै तेकरा एकटा कागजपर उतारि लेलिऐ, जखनि हम अहाँकेँ ठाढ़ कऽ कर्मचारी लग गेलौं तँ हम ओकरा अहाँक आवेदनक क्रमांक देलिऐ आ दू सए टाका सेहो देलिऐ। ओ एको बेर आँइओं ने केलक हम ओकर नाओं सेहो ओकरासँ पुछि लेिलऐ, तेकर बाद हम अहाँकेँ चट्टे अबै छी कहैत सीधे एस.डी.ओ. लग गेलौं आ हुनका सभटा बात कहि देलयनि। हुनका बिसवासे ने भेलनि हमर गपक। किएक तँ हम देखैमे धिया-पुता लगैत लगलियनि। तखनि हम नोटक नम्बर जे नोट केने रहिऐ से पुर्जा देलियनि आ हुनका कहलियनि जे अगर हमर आरोप गलत होइ तँ हमरा जेल अहाँ सेहो पठा सकै छी, हमर गप सुनि हुनका हमरापर पूर्ण बिसवास भऽ गेलनि आ तुरंते उठि कऽ तीन-चारिटा हाकिमकेँ बजा संगमे लऽ प्रखण्ड कार्यालयपर पहुँचला। आ छापा मारलखिन। हमर गप सत् भेलनि बाँत अहाँक आगूऐमे घटल।” रूबी बाजलि- “छोटकी तों एतेक तेज छेँ से हम नै बुझैत रही।” छोटकी बाजलि- “सभटा अहींक असिरवाद अछि दीदी।” दुनू बहिन हँसए लगल। भोरे-भोर सबेर भने पेपरमे आएल छल जे घूसखोर रमणकेँ एस.डी.ओ. द्वारा निलंम्बित कऽ देल गेल। आ स्वतंत्रता दिवसक अवसरिपर म.वि.खड़ौआमे पढ़ैत छोटकीकेँ एस.डी.ओ. द्वारा घूसखोरकेँ पकड़ेबा लेल सम्मानित कएल जाएत। भरि खड़ौआक लोक छोटकीक गुणगान करए लगला। उमेश नारायण कर्ण :: यूज एण्ड थ्रो लिखो-फेको, राखू-फेकू वा यूज एण्ड थ्रो, एके बात अछि। नव बजारवादक यएह परिपाटी अछि। हाट-बजारमे सभ तरहक वस्तुजात बिकाइत अछि। भौतिक सुख सुविधा सम्पन्न लोक असंवेदनशील होइ छथि जइ कारणेँ देह वेपारक अदान-प्रदान बढ़ल अछि। पहिनौं मनुख बिकाइत छल आ अखनो बिकाइत अछि। जेतए धरि नारी सबहक नव-नव छबि अभरैत अछि तइमे माॅडलिंग चरमोत्कर्षपर अछि। नव यौवनाक मनभावन लोभावन सम्मोहक विज्ञानपनक भाव-भंगिमा पुरुखकेँ अपना दिस आकृष्ट करैत अछि ओ मधुरवाणी हृदैमे बैसि जाइत अछि। ई स्त्री-पुरुख लिंग भेद प्रकृति प्रदत्त जीवक गुण धर्म छी जे रूप लावण्य आ श्रृंगार-पेटारसँ उत्प्रेरित होइत आर आलिंगनवद्ध भऽ जाइत अछि। तखनि नवयुवक ओ नवयुवती सबहक उमंग-तरंग देखिते बनै छै। राजग्रामसँ राजधानी पटना पहुँचनिहार मित्र त्रय रहथि- राधेश्याम, गौरीशंकर आ मधुरेश। तीनू गोटे बालसंगी रहथि। ओ प्रथम श्रेणीमे मैट्रिक पास कऽ पटना कौलेजमे पढ़बाक हेतु आएल छथि। दैवयोगसँ पटना कौलेज पटनामे तीनू गोटेकेँ नामांकण भेल, ओ एकेठाम नयाटोलामे डेरा भाड़ापर रखलनि। गामसँ शहर आबि कौलेजयाबाबू उड़ाँत भेला। स्वच्छंद आहार-विहारमे सारिका, निहारिका ओ सुषभा सन रूवतती चतुर नारी अपन चंचलावृत्तमे घेरि लेलखिन। वैचारिक आदान-प्रदान भेल तैसंग परिचए-पात भेल आ दोस्तीक हाथ बढ़ल। व्यायफ्रेंड-गर्लफ्रेंडक नवोन्मेष भेल। जीवनमे नव उत्साह जागल, ओ उत्प्रेरित केलक। ई नव कल्चरल चेंज भेल, अल्ट्रामॉर्डन भेल। मित्र त्रय संग-संग घुमैत-फिरैत छला। साँझ-भोर टहलबाक आदति रहनि। एकेठाँ फिल्डमे स्त्री-पुरुख, युवक-युवती आ नेना-भुटका सभकेँ दौगैत देखि नीक लगल रहनि। ईहो दण्डबैसकी, कूदफान संगे दौगबाक अभ्यास करए लगला। हिनका सबहक गर्लफ्रेंड सेहो दौग लगबै छेली। एक संग पढ़ब-लिखब, खेल-धूप करब सम्बन्ध प्रगाढ़ बनौलक। एक-दोसराक डेरापर आन-जान लगल रहै छल। जौं कोनो कारणसँ सहपाठी अनुपस्थित होथि तँ हिनका लोकनिकेँ कछमच्छी लगि जाइ छल। जखनि केतौ भेँट-घाँट भऽ जाइ छल तँ बूझि लिअ जे मन एकदम गद्गद्। संध्याकाल निअमित कृष्णाघाटसँ गाँधीघाटक फेरी लगबै छला। कहियोकाल मन्दिर-मस्जिद, चिड़ियाँघर, तारामण्डल, अजायबघर जाइ-अबै छला। केतौ-ने-केतौ सारिका, निहारिका आ सुषमा सेहो टकरा जाइत रहनि। राधेश्यामकेँ नव-नव मोबाइल कीनैक आदति रहनि ओ गौरीशंकरकेँ नव-नव कनियाँ पसिन करब। ऊफाँटिमे मधुरेश मने-मन गुड़-चाउर फँकै छला। कम्मल ओढ़ि कऽ ओ घी पीबै छला। एक दिन यएह मित्रगण अशोक राजपथ, गाँधी मैदान दिस जाइ छला। गुलाबी सलवार-शूटमे एकटा नवयुवती अस्पतालसँ निकलल गोड़-नारि, छड़गर, कटगर लचकैत-मटकैत चलल जाइत रहए। गौरीशंकर झटकि कऽ ओकर पछोड़ धऽ लेलनि। पिरबहोर थाना पार केला बाद ओ टोकलनि- “हेलौ डार्लिग, हाउ आर यू?” ओ पलटि तकलक, कनियेँ काल ठमकल, फेर उत्तर देलकनि- “आइ डोंट नो यू।” “डोंट माईंड। आइ एम योर्स कजींस फ्रेंड।” ई प्रत्युत्तर रहए। ‘सॉरी’ कहि ओ आगू बढ़ि कऽ गलीमे चल गेली। गलीक मोड़पर अबिते ओ घूमि तकली आ मुस्काइत ससरि गेली। “जे हँसल से फँसल।” -मधुरेश बाजल। “की भेलौं?” -गौरीशंकरसँ राधेश्याम पुछलक। “औटर सिग्नलपर ठाढ़ छौ।” -गौरीशंकरक कहब रहनि। घुमतीकाल तीनू ओही गली बाटे टपलनि। कनियेँ आगू बढ़ला, एकटा छौड़ी छतपर सँ बजै छल- “रानी को भोली-भाली मत समझ। बड़ा महँगा पड़ेगा। जाओ, अभी झुनझुना बजाओ।” ऊपर ताकि तीनू गोटे अग्रसर भेला। “चल चल। डेग उठा। झटकारि कऽ चल। हमरा लगैए जेना शनिचरा सवार होउ।” -मधुरेश घबराएल। “जे डरि गेल से मरि गेल। कियो किछु नै करतौ।” -गौड़ीशंकर सम्हारलनि। बाट चलैत सुबोध आ प्रबोध दुनू भाँयकेँ अबैत देखलनि। “एने का करऽ?” -सुबोध टोकलक राधेश्यामकेँ। “किछु नै। ऐ गलीसँ हमसभ रूपक सिनेमा होइत डेरापर जाएब।” -ई राधेश्यामक उत्तर छल। “ठीक छै। जो।” -एतबा बाजि ओ दुनू गोटे आगू बढ़ि गेला। समए संग कम्पनीक एकटा मोबाइल कीनलनि आ खुशी-खुशी घर घुरला। घुरैत-फिरैत रातिक आठ बाजि गेल रहै से चटपट खिच्चड़ि अल्लूक सन्नाक जोगाड़ धरा स्टोव पजारलनि गौरीशंकर। मधुरेश पिआैज सोहए लगला। राधेश्याम डोल भरि पानि अनलनि आ थारी-बाटी गिलास पखारि कऽ रखलनि। अपन अंगपोछामे हाथ पोछैत राधेश्याम बाजल- “ई गौरीशंकर हमरा सभकेँ कहियो ने कहयो मारि खुआ देतह, हार-पाँजर तोड़बा देतह। ओ ई नै बुझै छै जे गामक छौंरी चुपे रहै छै आ शहरक छौरी मुँहफट्ट मुँहजोरगर होइ छै ओ मँह तोड़ि देतह से बूझि लैह।” “धुर बुड़ी। तों की बुझबह? ओ जालमे फँसलौ। से मंतर ने हम मारलिऐ जे अपने घुरिया कऽ लटपटा जेतौ। ओ लट्टू तँ भाइए गेल छौ।” ई गौरीशंकरक उत्तर रहै। “तों तकबहक की ओ तकतौ?” -मधुरेश पुछलक। “पहिने हम तकलिऐ आब वएह तकतै।” -ई गौरीशंकरक कहब रहै। “प्रेमक गंगा एकरंगा बहै छै। धार दुनू कछेरकेँ एके रंग छुबै छै। जखनि हिलकोर मारतै तँ कात लगि जेतै।” -राधेश्याम बाजल। “जे छिटकि कऽ चलै छै से लपकि कऽ धरै छै।” -मधुरेश कहलक। “हे, बड़ लबड़-लबड़ करै छँह। आब मुँह बन्न कर साढ़े दस बजै छै।” -उनटि कऽ गौरीशंकर बाजल। फेर तीनू पड़ि रहल। ओछाइनपर जाइते मातर निन पड़ि गेल। किताब-कौपी जस-के-तस छिड़िआएल रहै। विश्व विद्यालय स्तरीय सेमीनारक आयोजन- ‘नारी समस्या ओ समाधान’ विषयपर भेल। कौलेजक दस चयनपित प्रतिभागीमे सँ तीन सारिका, नहारिका आ मधुरेश रहथि। सारिकाक कहब रहनि नारी प्रताड़नाक मुख्य कारण अंधविश्वास संगे पुरुखक प्रभुताइ रहल अछि। अखनो लोक झार-फूक, टोना-टापर, तंत्र-मंत्रमे लटपटाएल अछि जे मिथ्या छिऐ। डाक्टर-वैद लग नै जा कऽ रोगीकेँ लोक ओझा-गुणी लग लऽ जाइए। ओ भूत-प्रेत, डाइन-गोगिनपर बिसवास करैए। ओझा-गुनी द्वारा कठोरसँ कठोरतम शारीरिक पीड़ा देल जाइए। ओ मरैए, पीटैए निर्मम हत्या करैए। रूक्त-भुक्त भोगी चिकरैए-भोकरैए दम तोड़ि दइए। ई सभ राक्षसी प्रवृति छी। लोक असंवेदनाशील दया-धर्म सभटा बिसरि जाइए। नारीपर जन्मसँ मृत्यु धरि केतेको अत्याचार होइए। ओ भ्रुण हत्या, दहेज हत्या, अपरहण आ बलत्कार दैनंदिनी भऽ गेल अछि। तँए नैतिक अनिवार्यता अछि जइसँ चरित्रवान नागरिक बनत। ऐ संग दुराचारीकेँ सार्वजनिक रूपसँ सामाजिक बहिष्कार ओ बलात्कारकेँ मृत्युदण्ड ओहिना जहिना ओ केकरो तड़पा-तड़पा कऽ मारैए। मधुरेशक कहब रहनि नव-नव तकनीकसँ बड़ चमत्कार होइए। टेस्ट ट्यूब बेबी भेल ओ ठाम-ठाम फर्टिलिटी सेंटर खुजल अछि। आब एकटा एहेन तकनीक नव अन्वेषण भेल अछि जे महिलाक गर्भसन गर्भाशय बना सम्पुष्ट ओ हृष्ट-पुष्ट नेना बाहर बनत। मात्र पति-पत्नीक सीमन-ओभमकेँ ओइ उपकरणमे राखल जाएत, मिलाैल जाएत। तखनि पुरुखे जकाँ महिला स्वतंत्र विचारण करती। सोइरीघर नै देखती आ प्रसव पीड़ासँ छुटकारा पाबि जेती। स्त्री-पुरुख दुनू एक रंग भेला उत्तर देशक खूब तरक्की हएत नेना सबहक लालन-पालन करत। तखनि निश्चित ‘परम सुखम’ प्राप्त हएत। निहारिकाक कहब रहनि नारीक पूर्णता मातृत्वमे छै। जौ नेना फर्टिलिटी सेंटरमे पलत-बढ़त तखनि ओ माएकेँ केना चिन्हत आ बापकेँ की हेतै। माए-बापक कोनो महत नै रहतै। परिवार सेहो नै रहतै ओ पति-पत्नीक सम्बन्ध नै बनतै। हास-परिहास, रोग-रभसमे जे प्रेम तत्व छै से सभ नै रहतै। दया-करुणा, ममता किछु नै रहतै। राग-द्वेषसँ लोक भरल रहतै आ मारि-काट, लूट-पाट, अपहरण, हत्या आ बलात्कार उद्योग भऽ जेतै। परिवार, समाज, राष्ट्र सबहक परिकल्पना बेकार भऽ जेतै। नारी भोग्या बनल रहती आ देवी नै हेती। जखनि लोकक जमीर मरिए जेतै तँ नैतिक शिक्षा पोथिए धेने रहत। जीवनमे प्यार, प्रीत, नम्रता परमावश्यक छै। जौं आबो नै चेतब तँ कंकाली काली खड़ग-खधर धय नरसंहार करती। आब तरुआरि उठत से बूझि लिअ। बेर-बेर मरबसँ एकबेर मरब नीक। यूज एण्ड थ्रो नै चलत। “तों मधुरेशकेँ बुद्धु बुझहै छीही। आब की करबीही।” -सारिका सुषमासँ पुछलखिन। “ऐ हेँ एहेन बुधु नै समझ।” -सुषमाक उत्तरपर सभ हँसि देलनि। मधुरेश सकपका गेला। “मधुरेश बड़ काबिल छथि से सभकेँ मानए पड़त।” -गौरीशंकरक कहब रहनि। एलीफिस्टन सिनेमा हॉलक बाहर तीनू गोटे मिलि कऽ दसटा टिकट कटौलनि। पाँचो गोटे गेटपर निहारिकाक बाट जोहैत रहथिन। गौरीशंकर कात दबल टिकट बेर-बेर गनै छला। छमकैत-दमकैत रानी गौरीशंकर लग पहुँचि गेली। ओ अनुनय-विनय करैत चारिटा टिकट मंगली। ‘दू सएमे चारि टिकट’ दाम सुनौल गेल। झट पर्ससँ दू सए रूपैआ बहार कऽ गौरीशंकरकेँ देलखिन आ मुस्किआइत ‘थैंक्यू’ कहि गेली। सबहक नजरि हिनकेपर रहै। औटोसँ निहारिका उतरली। गौरीशंकर बजला- “हम मैडमसँ इन्टरटेनमेंट टैक्स लेलिऐए। इन्टरभल इनज्वाय करबै।” “चलू-चलू लाइनमे लागू ओकरे लग सटि कऽ बैसब।” -सुषमा बाजि मुँह फेरि लेली। अच्छेलाल शास्त्री :: गुलटेनमा “हे यै। केतेक सूतब भोर भऽ गेलै। बाँस भरि दिन ऊपर चलि एलै। अहाँ सूतले रहब। माए गइ माए। ई मरदबा दूरि भऽ गेलै। भरि-भरि राति जागल रहैए। मैनजनक दलानपर डिबिया नेस कऽ दोकानदार, कमतिया, चोकीदार आ घोघाइ भैया संग बोतलपर बोतल चढ़बैत रहैए। तास-तास खेलाइत गाजाक मजा लऽ सोंटपर सोंट दैत चिक्करैत रहैए। भिनसरबामे आबि पलंग धऽ लइए। देखू तँ मारू मुँह धऽ कऽ। सीरक देह परहक फेक देलक। हाथसँ एतेक डोला रहल छी पलंग हिलैत कटकटा रहल अछि। मुदा नीन नै टुटि रहल छन्हि।” अगराहीवाली गुलटेनमाक पत्नी बजली। “हँ-हँ, भोर भऽ गेलै। बाप रे बाप। हमरा दन्द्रकान्त बाबूक दलानपर जेबाक छल। रौदा पछबरिया ओसारपर चलि एलै। जारलाहा मति अछि। सिकन्दरक माए चटसिन हमरा एक कप चाह पिआ दिअ।” इ्र कहैत गुलटेनमा पलंगकेँ हिलबैत हड़बड़ा कऽ धरतीपर पएर रखलक। “हे लिअ। रामदेव बाबाक पतंजलि योग पीठक जड़ी-बुटीसँ बनल पत्ती दऽ चाह बनौने छी।” सिकन्दराक माए अगराहीवाली बाजि चाहक कप हाथमे धरा देली। गुलटेनमा भोरक अहार पत्नीक हाथसँ लऽ प्रेमसँ पीब इन्द्रकान्त बाबूक दलान दिस जोड़-जोड़सँ नमहर-नमहर डेग दैत विदा भऽ गेल। दलापर गप-सर्ड़का भऽ रहल छल। बापमे आबि रहल छल गुलटेनमापर कमतियाक नजरि पड़ि गेलनि। ओ इन्द्रकान्त बाबूकेँ इशारा करैत बजला- “देखियौ मालिक जेकर चर्चा करै छेलौं, आबि रहल अछि।” गुलटेनमा इन्द्रकान्त बाबूकेँ प्रणाम कऽ घूर लग कमतियाक बगलमे बैसि रहल। कमतिया कहलखिन- “गुलटेन बाबू कहियो कुशल मंगल छै किने? सासुरक की हाल-चाल अछि? समए तँ बड़ नीक चलि रहल अछि। केतेक जमीन ब्रह्मदेवजी सँ रजिष्ट्री करेलौं?” गुलटेनमा बजला- “हँ कमतियाजी, हाल-चाल सभ अपनो आ सासुरक सेहो ठीक अछि। एगारह कट्ठा रजिष्ट्री भेल।” इन्द्रकान्त बाबू बजला- “गुलटेनमा अखनि धरिमे केतेक जमीन भऽ चुकल अछि। काका-बाबू अहाँक नओंसँ जमीन खरिदै छथि की नै?” गुलटेनमा बाजल- “मालिक हमरा नाओंसँ तीन बीघा भेलै।” इन्द्रकान्त बाबू कहियो देखने छला जे घरमे दुनू साँझक सीदहा रहै छेलै। हमरा दुआरपर एकर दादा सिपाहीगिरी करै छल। आइ एकर दिन बदलि गेल। दर्शनोटा करैले नै कहियो दुनू बापूत अबैए आ ने भाइए आकि कक्के कहियो बरो-बेमारीमे अबैए। मने-मन विचारि रहल छथि। घरमे झगड़ लगा कमतिया घूमि-घूमि गाममे सबहक हाल-चाल इन्द्रकान्त बाबूकेँ कहि गाम घर-घरमे झगड़ लगा फूट डालि राजनीति कऽ रहल अछि। हिनकर भाय जे दू काबिल भऽ गेला। केस करबा पितियौत भाय पिसियौत भायकेँ सीखा-पढ़ा उलटे गवाही घोघाइसँ करा केसमे दिया देलौं तखने जेदू बिना हमरा पूछने खर्चा देने अपने पैरवी-पाय सबूतपर बेस जीत भेल। केना आब ऐ दुनू भाँइमे झगड़ा लगाबी। विचारमे मगन छथि आकि मैनजन बजला- “मालिक हिनकर ससुर हाकिम भऽ गेला। सपकटीमे अविवाहित बेटा एकटा सेहो कालक गालमे चल गेल। मालिक हिनकर ससुर हाटपर भेटल छला, कहलनि जेद बेरी जमएकेँ धन दऽ रखि लेब।” कमतिया बजला- “मालिक ई गप बुझले नै छल गुलटेनमाक पत्नी अपन माए-बापक जेठ बेटी सभ किछु देखल-जानल राजपाट भऽ गेल। जहन अखनि अलग भऽ जाए गुलटेन तँ हमरा लोकनि सभ रजिष्ट्री मोल जमीन हिनके हिस्सामे दिया देबै। बाबू काकाकेँ मिला ओकर हिस्सा लिखा सकै छथि।” मैनजन बजला- “हँ, बड़ नीक होइतै। गुलटेनक माएपर चारिटा वृह वृद्धा अछि। जँ जमीन बाप-काका लिखतै तखनि ओकरा सभकेँ अलग कऽ देल जाएत। जमीन बेचि कऽ खाइ जाएत।” इन्द्रकान्त बाबू कमतिया मैनजन दोकनदार सभकेँ मिला अपन सहि लेत अधिकार दऽ देलनि आ कहलनि जे अपने लोकनि करब सहमति अछि। गामक अन्य लोक आन गामक लोक सभ सुनि रहल छला। दोकानदार कहलकनि- “मािलक आइए अलग हुअए तँ हमरा लोकनि बँटबारा कऽ काका बाबूकेँ मिला हुनकर हिस्स सेहो रजिस्ट्री करबा देबै। सासुरक जमीन सेहो भऽ जेतै। जेठ मुँहक तँ किते रहि जेता। गुलटेनमाकेँ अलग भेलापर नफा अछि। नै तँ दोसर सारहू सासुर आएत तँ हुनके गुलटेनमाक ससुर अपन धनक अधिकार दऽ देता।” गुलटेनमा हाथ जोड़ि बाजल- “मालिक-मालिक, हमरापर दया करियौ। आब हम जड़मे नै रहब। हमर पत्नी कहै छेली अखनि नै मिल भिन हाएब तँ कखनि। हमरा ऐ लेल सिकन्दरकेँ नानी बेर-बेर बजा कहैत रहै छथि जे पाहुन अलग भऽ जाउ। घनिक बना देब। आब बुढ़बा-बुढ़िया कमा कऽ जमीन नै कीनि देता। उलटे दवाय सेवामे सभ समए टाका खर्च भऽ जाएत। हुनकर दवाइक भार जेठूपर दऽ दियनु।” मैनजन बजला- “मालिक हमरा लोकनि चलै छी बखरा हेबाक छै। जखनि गुलटेनमा ठीक रहत तखनि सभ नीक-नीक बात हिनके हिस्सामे देबै।” बैठार विसर्जन कएल गेल। गुलटेनमाक मनमे ओकर पत्नीक मनमे एकटा कल्पनाक सागर उमरि रहल छल। तेकरा बातचितमे साकार भेलासँ अति उमंग होइत घर दिस जोड़-जोड़सँ चलैत सप्तरी काली दादीक द्वारपर पहुँच गेल। दादीकेँ देखैत पएर छू प्रणाम केलक। दादी घर-घर जा पुतोहु-बेटी सबहक मिठगर-मिठगर गप सुना घर-घरमे झगड़ा लगा चुल्ही फुटेबाक काज करै छेली। ओ बाजलि- “बौआ, मालिकक दलानपर जे मैनजन दोकनदार कमतिया देमानजी कहलनि अछि अबस्स करू। आब अछि के बड़ घाटा लागि रहल अछि।” झटसीन बाँहि सासुर जाउ। दादीसँ असिरवाद लऽ द्वारपर आएल तँ पत्नीक मन हर्षित लगि रहल अछि। “कहू काज सिद्ध भेल आकि नै।” गुलटेनमा बाजल- “सिकन्दरक माए अहाँ नैहर जा बाबूकेँ काकाकेँ बजा लाउ आइ सभ कियो सुढ़ियाएल छथि।” पत्नीक मनमे जे छल वएह तँ रहै बात भेल दू बेर माए-बाबूसँ भेँट कऽ सभ गप बुझा घूमि आएल। साँझ पड़ल बैसकमे इन्द्रकान्त बाबूक दलान परहक बैसारक गप लऽ पहुँच गेल। दोकानदार गुलटेनमाक बाबू काकाकेँ सभ तरहेँ बुझा कऽ कहलकनि जे अपन हिस्सा जमीन गुलटेनमाकेँ लिखि देल जाए नै तँ बखरा कऽ ओ सासुर चल जाएत। जमीन लिखबाक लेल जहन बाबू काका तैयार नै भेला तखनि। जे जमीन जिनका नाओंसँ सबूत छल हुनके दऽ पंच लोकनि अगराहीवालीकेँ मन खुश करबाक लेल गुलटेनमाक हिस्सामे दऽ वृद्ध लोकनिकेँ बहुत कम हिस्सा देलनि जे बेचि-बेचि दवाइ-भोजनमे लगबए लगला। गुलटेनमा सबहक दवाइ-सेवा छोड़ि कौशल टाका भाइक बाछा बेचि हुनकर गाछ काटि बेचि जमीन कीनि हिस्सा बढ़ौलनि। ससुरकेँ दोस्त एकटा विवाहिता सम्बन्ध विग्रह भेल सम्बन्धवालीसँ बिआह करा देलनि जइमे सन्तानक खबरि गुलटेनमाक कानमे आएल। अगराहीवाली घबरा उठली। सिकन्दरक सौतिनियाँ डाहसँ जरैत अप्रिय गप बाजए लगल। इन्द्रकान्त बाबूक दलानपर बैसार छल ओइमे जा अपन मनक अभिलाषा डाली लगा देलनि। मनक उदासी देखि कमतिया बजला- “आर किछु हिस्सा रहि गेल।” गुलटेनमा बाजल- “की कही जइ डरे भिन्न भ्ेालौं से पड़ल बखरा। हमर सिकन्दराक माए हमरा माए-बाबू आ काका-काकी आ भैया-भौजी संग भतिजा सभसँ सम्बन्ध छोड़ा नैहराक धनक लोभमे अलग हेबाक जिद्द केली। जेना ओकर माए हमरा सालाकेँ जनम लैत ससुरकेँ। नौकरीमे अछि तँए माए-बापसँ अलग करबा देली। ओहू परिवारमे कलह आ हमरो परिवारमे कलह।” ओ बाजि रहली- “भैया जेठ छथि। ओ अपन हिस्स काका दऽ देलनि। बाबू सेहो जे जमीन छल बेचि लेलनि बाँकी भैयाकेँ बेटाकेँ कहैत छथि लिखि देब। अपने लोकनि कहलौं मिलान भऽ जाउ। पत्नी सेहो सहित रहए। महाभारत बला युद्ध केलक। अखनि कहि रहली जेठकामे हिस्सा होइत छै से नै हमरा भायमे हिस्सा केना होएत से जोगाड़ लगा दियौ।” मैनजन बाजला- “हौ गुलटेनमा, भागसँ बेसी किनको नै भेटै छै। हमरा लोकनि तोरा लेल बदनाम भऽ गाछ बाँस धान कटबा देलौं दण्ड कऽ टाका घुमबा देलौं। थाना पंचायत सभकेँ मिला तोरा बँचा लेलौं। अखनि एकटा उपए अछि बलजोरी दखल करू। अगराहीवालीकेँ आगू कऽ बूढ़। सासुरसँ हँसेरी मंगबा लैह।” गुलटेनमा सहमति पाबि अगराहीवालीक बलपर ओहिना जमीनपर दखल कऽ लेलक। माए-बाबूकेँ नहियेँ दवाइ आ नहियेँ सेवा श्राद्ध गतिमे भायकेँ हिस्सा देलक। मैनजन पंचकेँ मिला खतियानी जमीनमे दखल जमा भाय-भातिज आ पड़ोसीक जमीनपर जा कोर्टमे बँटवारा करा लेलक। फूिसकेँ सत्य बना प्रचार कऽ देलनि। अगराहीवाली सासुरमे अगराही लगा घरबिगारू लोकनिक बलपनर जेना ओकर माए सिकन्दरक नानी भुलटेनमाक सासु अपना सोसरामे सिकन्दर परिवारकेँ नन्द विलास राय :: दिव्या निर्मली टीशनक पाछू, रेलबे परिसरेमे गुरु-चेलाक खेल भऽ रहल छल। गुरू लूंगी आ झोलंगा जकाँ कुरता पहिरि हाथमे डमरू नेने छला। लगभग दस बर्खक बालक चेला छल। ओकर समुच्चा देह कपड़ासँ झाँपल छल। चारू दिससँ लोक ठाढ़ भऽ खेलक मजा लेबए लेल तैयार छल। गुरु डमरू बजा चेलासँ पुछलखिन- “बोल चेला की हाल-चाल छौ?” चेला जवाब देलक- “गुरुजी, हमर हाल-चाल एकदम टनाटन अछि। अहाँ अपन कहू।” गुरु कहलखिन- “हमहूँ ठीक छी। अच्छा ई बता अखनि तों छेँ केतए।” चेला बाजल- “अखनि हम बरही गाममे छी।” गुरु- “ई बरही गाम केतए छै?” चेला- “बरही गाम नेपाल अधिराज्यक सप्तरी जिलामे पड़ै छै। राजविराजसँ लगधग तीन किलोमीटर दछिन। बरही गामसँ उत्तर पछिमी कोसी नहर छै।” गुरु- “अच्छा ई बता ओतए की कऽ रहल छेँ।” चेला- “विदेह इन्टरनेट पत्रिकामे खबरि जुटाबक समदियाक काज करए लगलौं हेन। नेपालक दौरापर छी।” गुरु- “तँ बरही गाममे एहेन काेन घटना भेलै जे तों बरही गाममे छेँ।” चेला- “घटना अथवा दुघर्टना तँ नै भेलै मुदा एकटा नव चीज जरूर भेलै।” गुरु- “काेन नव चीज भेलै हेन, कनी फरिछा कऽ बाज।” चेला- “बरही गाम सप्तरी जिलाक सदरमुकाम राजविराज बजारक लग रहितो मुख्य रूपसँ किसानक गाम छी। पश्चिमी कोसी नहरिसँ दछिन छै। सिचाईक भरपुर साधन रहैक कारण गरमा धान आ अगहनी धानक उपज बड़ नीक होइ छै।” गुरु- “कोन खेती गिरहस्तीक गप शुरू कऽ देलँह। नव बात जे भेलै से बाज ने।” चेला- “हम सभ गप फरिछा कऽ कहै छी। अहाँ धैर्यसँ सुनू। बरही गाममे रूपलाल नामक एकटा किसान छथि। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी छन्हि। बेटाक नाओं विवेक अछि। आे विराटनगर अस्पतालमे पेथोलौजिष्ट छथि। अपन प्राइवेट जाँच-घर सेहो रखने छथि। रूपलालक बेटी दिव्या बी.ए. पास कऽ राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन।” गुरु- “कोन आहे-माहेक कथा पसारि देलँह से नै जानि। हम कहै छियौ नव बात बता।” चेला- “एतएसँ शुरू होइत अछि नव बात। अखनि हम नव बात जे भेल तेकर पृष्ठभूमिमे चलि रहल छी। अहाँ कनी धैर्यसँ सुनियौ।” गुरु- “अच्छा बता। आब हम बीचमे नै टोकबौ।” चेला- “हँ तँ हम कहैत रही जे रूपलालक बेटी जेकर नाओं दिव्या छी, राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन। साल भरि पहिने दिव्याक बिआहक बात-चीज ठील्ला गामक रामअवतारक बेटाक संग चलल। रामअवतारक बेटा अनिल भोपालमे इंजीनियरिंग कऽ पढ़ाइ कऽ रहल छला। दस लाख नेपाली टकामे बात पक्का भऽ गेल छल। दुनू दिससँ छेका-छुकी सेहो भऽ गेलै। छह महिना पहिने अनिल इंजीनियरिंगक डिग्री लऽ भोपालसँ नेपाल आएल। दूर संचार विभागमे भैकेन्सी भेल। ओहो आवेदन देलक। अनिलक पिताजी रामअवतार तेज आदमी अछि। ओ दौग-धूप केलक। चारि लाख टका घूस मांगलकै। रामअवतार दौगल बरही आएल। रूपलालकेँ कहलखिन- अहाँ जमाएकेँ नौकरी भऽ रहल अछि। चारि लाख टका घूस लगै छै। अहाँ दस लाख टका जे बिआहमे देब तइमे सँ चारि लाख टका अखनि दऽ दिअ। बाँकी छह लाख टका बिआहसँ दस दिन पहिने दऽ देब। जमाएकेँ नोकरी भऽ जाएत तँ बेटी रानी भऽ कऽ रहत। रूपलाल विवेककेँ फोनपर सभ बात बतौलखिन। विवेक कहलकनि, ठीक छै, अहाँ रामअवतार बाबूकेँ विराटनगर भेज दियौ। हम चारि लाख टका दऽ देबनि। रामअवतार विराटनगर जा विवेकसँ चालि लाख टका आनि बेटाकेँ संग कऽ काठमाडू गेला। घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी लगौलनि। गुरु बजला- “अच्छा, ई बता दिव्याक बिआह रामअवतारक बेटा अनिलसँ भऽ गेल ने।” चेला- “असलका गप तँ आब सुनाबै छी। कनी धियानसँ सुनियौ ने। आइसँ दस दिन पहिने रूपलाल अपना भातीजकेँ संग कऽ ठील्ला पहुँचला। रामअवतारकेँ बिआहक दिन पक्का करैले कहलखिन। ओ तीनटा दिनक प्रस्ताव रामअवतार लग रखलनि। आ कहलखिन अही तीनू दिनमे जे दिन अहाँकेँ सहुलियत हुअए से दिन तँइ करि लिअ। ढौआ जे बाँकी अछि ओ नगद लेब आकि चेक, सेहो कहि दिअ।” रामअवतार कहलखिन- “यौ रूपलाल बाबू, हमरा बेटाक भठियन गामबला पनरह लाख टका नगद, एकटा पल्शर मोटर साइकिल आ पाँच भरि सुन दऽ रहल अछि। अहाँक बेटीसँ हमरा बेटाक बिआहक गप पक्का अछि। अहाँ अनिलक नोकरी लेल चािर टका देने छी। तँए अहाँसँ मात्र पनरह लाख टकेटा लेब। गाड़ी आ सुन छोड़ि देब। जँ अहाँ पनरह लाख टकापर बिआह करैले तैयार छी, तँ फागुन दस गतेक दिन पक्का भेल। हमरा नगद टका दी अथवा चेक दी, हम सभमे तैयार छी। अहांकेँ जइमे सुविधा हुअए से करब।” तैपर रूपलाल बजला- “अहाँसँ तँ हमरा दसे लाखपर बात भेल अछि। आब अहाँ मन नै बढ़ाउ। हम बँकियौता छह लाख टकाक चेक भातीज मार्फत भेज देब।” रूपलालक गप सुनि रामअवतार तैशमे बजला- “जँ हमरा बेटाक संग अहाँकेँ अपना बेटीक बिआह करबाक अछि तँ मोल-मोलाइ छोड़ू आ पनरह लाख टकामे बात पक्का करि तीन दिनक भीतर बाँकी एबारह लाख टका पहुँचाउ। नै तँ कुटुमैती नै हएत। अहाँ चारि लाख टका हम अगिला महिनामे आपस कऽ देब।” आब तँ रूपलाल झमा गेला। आँखिक आगू अन्हार पसरि गेलनि। किछु फुड़बे ने करनि। गुरु फेर टोकलखिन- “अँइ रौ चेला, ई रामअवतार तँ बड़ नीच आदमी बुझाइत अछि।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा कह, आगू की भेलै।” चेला कहए लगल- “कनीकालक बाद रूपलाल अपनाकेँ सम्हारैत बजला, ठीक छै हम गाम जाइ छी। बेटासँ विचार करब। ओ जे कहत सएह करब।” रूपलाल आपस गाम आबि गेला। मुँहक उदासी देखि हुनकर पत्नी बूझि गेली जे शाइत दिन पक्का नै भेल। कोनो झंझट लगि गेल। दिव्या राजविराजसँ पढ़ि कऽ आपस नै आएल छेली। रूपलाल सभ बात पत्नीकेँ बतौलखिन। पत्नी कहलकनि, विवेकसँ फोनपर गप करू। तैपर रूपलाल बजला, अखनि तँ ओ क्लिनिकपर हएत रातिमे निचेनसँ गप करब। रूपलाल दुनू परानी रातिमे खेबो ने केलनि। रातिमे रूपलाल मोबाइलपर विवेकसँ गप करए लगला। गप करिते-करिते ओ कानए लगला। जखनि ओ बेटासँ मोबाइलपर गप करै छला, तखनि दिव्या अपना कोठरीमे पढ़ै छेली। कोनो गपक पता नै छेलनि। जखनि पिताजीकेँ कानब सुनली तखिन कान पाथि कऽ सभ गप सुनए लगली। सभ गपक थाह लगि गेलनि जे पिताजी फोनपर किए कनै छथि। दिव्याकेँ भरि राति नीन नै भेलै। ओ भरि राति सोचिते रहली। रामअवतार केते नीच आ कमीना अछि। चारि लाख टका हमरे बाबूजी सँ लऽ घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी दियौलक। आइ बेटा नौकरी करए लगलनि तँ मन बढ़ि गेलनि। पाँच लाख टका बेसी कऽ हमरा बाबूजी सँ मंगै छथिन। एहेन नीच आ लोभी मनुखक बेटासँ हम अपन बिआह किन्नौं ने करब, चाहे जिनगी भरि कुमारिए किए ने रहि जाइ। गुरु फेर बजला- “वाह! वाह! दिव्या बड़ नीक बात सोचलक।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा सुना।” चेला कहए लगल- “विवेक फोनपर पिताजीकेँ कहलकनि, बाबू अहाँ जुनि कानू। हमरा एकेटा बहिन अछि दिव्या। अहाँक पएरक कृपासँ हम चारि-पाँच हजार टका डेली कमाइ छी। की करबै रामअवतार बाबूकेँ लोभ भऽ गेलनि। हम पाँच लाख टका आरो देबै। अहाँ शुक्र दिन रामअवतार बाबूकेँ बरही बजा लियौ। हम नगद एगारह लाख गिन देबै। चारि लाख तँ देनैहिए छियनि। शुक्र दिन साँझ धरि हमहूँ गाम पहुँच जाएब।” शुक्र दिन साँझमे रामअवतार बरही पहुँचला। सोचने रहथि जे नगद ढौआ देता तँ राजेविराज नेपाल बैंक लिमिटेडमे ड्राफ्ट बनबा लेब। नगद ढौआ लऽ जाइमे खतरा अछि। साँझमे विवेको गाम पहुँचला। खेनाइमे रामअवतारकेँ खूब सुआगत भेलनि। तरूआ, भुजुआक अलाबे खस्सीक मासु सेहो रहए। मुदा दिव्या एकदम गुमशुम। शनि दिन दस बजे रामअवतारकेँ पराठा आ अल्लुक भुजिया, हलुआ, सेबैक खीर आ रसगुल्लाक जलखै खुआएल गेल। जलखै करा एकटा कोठरीमे विवेक, रामअवतार आ रूपलाल बैसला। विवेक पुछलकनि- “ढौआ केना लऽ जेबै?” तैपर रामअवतार कहलखिन- “ढौआ दऽ दिअ आ अहाँ चलू राजविराज, नेपाल बैंकमे ड्राफ बनबा देब।” तैपर विवेक बजला- “आइ तँ शनि छी। छुट्टीक दिन छी। बैंक बन्न हएत।” रामअवतार बजला- “अच्छा अहाँ टका गिन कऽ दिअ। हम समधीकेँ संग कऽ ठील्ला चल जाएब। दू गोटे रहब तँ डर कम रहत।” विवेक आलमारी खोलि रूपैआ निकालि गिन कऽ रामअवतारकेँ देबए लगला आकि हहाएल-फुहाएल दिव्या पहुँच कऽ बजली- “रूकू भैया, रूकू। रूपैआ राखू। हम एहेन लोभी आ कमीना आदमीक बेटासँ अपन बिआह किन्नौं नै करब। चाहे जिनगी भरि कुमारि किएक ने रहि जाइ।” दिव्याक गप सुनि, सभ कियो अवाक् भऽ गेल। विवेक आ रूपलाल समझाबैक परियास केलनि तँ दिव्या अपना हाथमे एकटा शीशी देखबैत कहलकनि- “ऐ शीशीमे जहर छी। जँ अहाँ सभ जिद्द करब तँ हम जहर पीब लेब।” रामअवतार बाबू दिस घूमि बजली- “सुनू रामअवतार बाबू, अहाँ हमरा बाबूजीसँ चारि लाख टका लऽ गेल छी। जाबे धरि चारि लाख टका आपस नै करब अहाँ बरहीसँ आपस ठील्ला नै जा सकै छी।” गुरु डमरू बजबैत नाचए लगला। थोड़े काल नाचि बजला- “बड़ नीक बड़ सुन्नर। दिव्याकेँ बहुत-बहुत धैनवाद।” राम विलास साहु :: बौआ बाजल पढ़ल-लिखल बेरोजगार छी मुदा दिन केना कटै छल तकर कोनो सुधि-बुधि नै छल। ऊपरसँ परिवारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्छा रहितो किछु नै कऽ सकलौं। एक दिन मनमे फुराएल जे किछु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़िआएले छी औरो बुड़िया जाएब। एक दिन भोरमे बौआ-बुच्चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलिऐ। अहिना स्थितिमे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ किए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दिन मरिऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलिऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृतिक निअम छी। ओ निरंतर होइत रहैत अछि।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक किए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि-लिख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जिनगीकेँ सुलभ बना असली जिनगी जीबैए। लोक पढ़ि-लिखि डाक्टर-इंजिनियर, औफिसर, कवि लेखक आ उपदेशक इत्यादि बनैए। अच्छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?” बौआ बाजल- “हम पढ़ि-लिख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जिनगी बितबै छथि मुदा कवि-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्हि। अखबारमे पढ़लिऐ जे मरला बाद पुरस्कार भेटै छै।” फागुलाल साहु :: चतुर बालक ई कथा सोनू नामक एकटा दस बर्खक बालकक छी। सोनू गरीब परिवारमे जनम भेने गामक-घरक लड़का सभसँ कतराइते रहै छल जे, हमर माए-बाबू गरीबीक जिनगी जीब रहल अछि। एक दिन सोनू अपना गामसँ बजार चलि देलक। बाटमे सोचैत रहल जे गरीबसँ धनीक केना हएब। ई सोचैत सोनू एकटा होटलक सोझहा सड़कपर ठाढ़ भऽ गेल। सोचैत-सोचैत सोनू होटल दिस डेग बढ़ेलक। तखने होटलक मालिक मनेजरकेँ कहलक- “हम ऊपरका रूपमे सुतैले जाइ छी, बेसी खगता हुअए तखने हमरा उठाएब।” सोनू ऐ बखतकेँ मोनासीब बूझि दस मिनट रूकि कऽ मनेजरकेँ कहलक- “होटलक मािलक- बौधू बाबू हमर पिताक दोस्त छथिन। हुनकासँ भेँट करबाक अछि।” मनेजर एकटा बेड़ा दियए सोनूक समाद मालिक लग पठेलक। मािलक अधकचुआ नीनमे रहैक कारणे बेड़ाक बातकेँ ठीकसँ नै बूझि कहलनि- “जाउ, जे मगैत होइ से दऽ देबै।” निच्चाँ आबि बेड़ा मालिकक कहब मनेजरकेँ सुना देलक। आ अपन काजमे लगि गेल। मनेजर सोनूकेँ पुछलक- “बौआ, की लेबह?” सोनू उत्तर दैत कहलक- “खेनाइ खिआ दीअ आ जे बढ़ियाँ मिठाइ हुअए से दूटा डिब्बामे दऽ दीअ।” मनेजर सोनूकेँ खेनाइ खिआ दू डिब्बा बढ़ियाँ मिठाइ सजा कऽ दऽ देलक। सोनू होटलसँ दुनू डिब्बा मिठाइ लऽ विदा भऽ गेल। हाथमे दुनू डिब्बा लेने चतुराइ करबाक तजूरबा करबाक लेल दोसर शहर चलि गेल। ओतए सोना-चानीक दोकानमे पहुँचल। दोकानक मालिक लोभी छल। ई बात सोनूकेँ मालूम भऽ गेल छेलै। सोनू ओइ लोभी मालिककेँ चिन्ह, प्रेम-भाव देखबैत मिठाइक सुन्दर साजौल दुनू डिब्बा दैत बाबूजी शब्दसँ सम्बोधित करैत हाथमे थम्हा दैत अछि। लोभी मालिक मिठाइक डिब्बा अपन पत्नी निरूकेँ बजा दऽ दैत अछि। किछुए कालक बाद, जखनि दोकानमे गहिंकी सबहक भीड़ लगल, तखने बाजल- “बाबूजी, डिब्बा महक मिठाइ रखि लिअ आ डिब्बा हमरा दऽ दिअ।” मािलक बिनु सोचने सोनूकेँ कहलक- “जा भीतर, चाचीसँ डिब्बा मांगि लिहऽ।” सोनू भीतर गेल आ मालिकिनकेँ कहलक- “चाची, बाबूजी दूटा सोनाक सिक्का दइले कहलनि।” सुनिते मलिकिनी विचारए लगली। देबाक मन नै देखि सोनू जोरसँ बाजल- “बाबूजी, जाबए अपनेसँ नै कहबै ताबए चाची थोड़े देती, अपनेसँ कहियौ ने।” मालिक दोकानपर भीड़क कारणे गद्दीएपर सँ पत्नीकेँ कहलखिन- “दऽ दिऔ ने।” पतिक आदेश पाबि मलिकिनी सोनाक दूटा सिक्का सोनूकेँ दऽ देली। लऽ कऽ साेनू ओतएसँ ससरि गेल। आब सोनू ओतएसँ तेसर बजार गेल आ ओतए ओ दुनू सोनाक सिक्का बेचि धन इकट्ठा करए लगल। ऐ बातक जानकारी गामक मालिक नवीन बाबूकेँ सेहो भेलनि। नवीन बाबू दरबारक सिपाहीकेँ कहि सोनूकेँ बजा पूछ-ताछ केलनि। सभटा बात साँचे-साँच बतबैत कहलक- “अपन गरीबीसँ छुटकारा पबैले हम एना कऽ रहल छी।” ई बात कहैत सोनू मालिककेँ प्रणाम कऽ सोझहेमे ठाढ़ भेल रहल। किछुए कालक बाद सोनू फेर बाजल- “जाबे हमहूँ धनीक नै हएब ताबे कोनो ने कोनो चतुराइ तँ करिते टा रहब ने।” मालिक नवीन बाबू सोनूक चतुराइ संग धनीक हेबाक दृढ़ सोचकेँ देखैत गुम्म भऽ गेला। डण्डित करब सेहो मनमे एलनि मुदा ओ सोचलनि जे से नइ तँ एकरा निअमित काजमे लगा दिऐ जइसँ ऐ तरहक ठकपानासँ दूर भऽ जाएत। यएह सोचि अपना दरबारमे रखि लेलक। जगदीश प्रसाद मण्डल :: गावीस मोइस बड़का छिड़िएलहा छिट्टामे छाँछी-मटकुरी नेने दौरीवाली कुमहनि अङ्गने-अङ्गने चौरचनक छाँछी-मटकुरी दैत हमरो अङ्गना एली। हमहींटा नै हमर टोले हुनके सीमामे पड़ैए। जहिना जमीन्दारक अपन जमीन्दारीक सीमा होइए तहिना पसारी-उसारीक सेहो होइते अछि। परिवारमे भिनौज भेने जमीन्दारोक जमीन्दारी बँटाइए आ पसारीओ-उसारीक तँ बँटाइते अछि। मुदा से नै, एक पुरखियाह परिवार रहने तीन पुश्तसँ एके कुमहार परिवारक गाम रहल अछि। ओना पहिने एक परिवार रहने डोमो-चमारक रहलनि, मुदा बेटाक बाढ़ि एने दुनूक गाम टोल-टोल बँटा गेल। टोलो-टोल कि एक रङ्ग बँटाएल, चारि बेटा भेने डोम चारि टुकड़ीमे गाम बाँटि लेलक मुदा तीन बेटाक परिवार भेने चमार तीनिए टुकड़ीमे बँटने अछि। पछिले शुक्र दिन दुआइत फुटि गेल। सिलौट सोझहे, खोलियापर मोसिक दुआइत रखै छी आ बगलेक खुटीमे पाटी लटका कऽ रखै छी। स्कूल जाइबेर दुआइत उतारए लगलौं आकि हाथसँ छूटि सिलौटपर खसि पड़ल, फुटि गेल। सौंसे सिलौट गावीस मोइस पसरि गेल, आ मोसिदानी-लत्ता जे देने रहऐ ओ दुआतिक पेनीए धेने रहल। तही दिनसँ स्कूल कामे भऽ गेल। ओना माए शनिए दिन दौरीवालीसँ दुआइत मङ्गलखिन मुदा सठि गेल रहै, तँए वेचारी चौरचनक आबाक नाओं कहलकनि। माइयो मानि गेली। मानिओं केना नै जैतथि, पहिने माटिकेँ काँच दुआत बनत, तखनि रौदमे सुखौल जाएत, पछाति आबामे पकि ने काजक हएत, से थोड़े मुहसँ निकलने पुरि जाएत। ओना सुरुजो भगवान ऐबेर कुमहारपर खुशी छथिन, आबासँ पनरह दिन पहिनैसँ जे रौद रहल, ओ अनका ले जे होउ मुदा कुमहारक तँ भागे भेल। भादोक रौद कुमहारे हिस्सामे अछि। भेल रहै तेसराँ, तेहेन सतैहिया चौरचनसँ पहिने लधलक जे आबामे पकैकेँ के कहए जे सेरिआ कऽ एकोटा छाँछी-मटकुरी सुखबो ने कएल। बिनु पकौल छाँछी आकि मटकुरीमे दही केना पौरल जाएत। मुदा तँए कि लोक पावनि छोड़ि देत, अरबा चाउरक पीठर घोरि-घोरि पावनि तँ पुरेबे करत। चौरचनमे हाथ उठेबे करत। सगुन-अपसगुन तँ अपन-अपन सीमामे अछि, कियो खीर-पुड़ीसँ हाथ उठबैए तँ कियो अढ़मे रहि चानकेँ मुँह दुसैए। जहिना हमर कान खड़ल रहए तहिना माइओ आ कुमहनिओक रहनि। छिट्टा रखिते दौरीवाली मटकुरीक दोगसँ दुआइत निकालि बजली- “काकी, पहिने तीनिएटा भूरबला दुआइत बनबै छेलौं, जइमे कनीओं धक्का लगने उनटि जाइ छेलै, तँए चारिटा लटकबैबला अछि, आब उनटै-पुनटैक डर कम रहत।” दुआइत देखि मन चपचपा गेल। केना ने चपचपाइत, आठ दिनमे आठटा खाँत सीखने रहितौं, से तँ पछुएबे केलौं। मुदा काल्हिसँ से थोड़े हएत। दुआइतकेँ माए निङ्गहारि-निङ्गहारि देखए लगली जे पाक नीक छै की नै। किएक तँ भरि जिनगी थाले-पानिमे रहत। जँ कनीओं कँचकुह रहत तँ भसकिये जाएत माइयक परेखबकेँ दौरीवाली अपन तराजूपर तौलि बुझलनि जे भरिसक काकी पाक देखै छथि। जहिना वेचारी अपन सौदाकेँ गारन्टी दिअबैए जे एते दिन एक्केउपे चलत तहिना दौरीवाली बजली- “काकी, एना किए निहारि-निहारि देखै छथिन, जहिना विधाता अपन चाकक गढ़लकेँ देखै छथिन तहिना हमहूँ ने अपन गढ़लकेँ देखै छिऐ। जँ से नै देखबै तँ बाल-बोधक काज रोकैक दोखी के बनत।” वस्त्र उतरल बरकेँ जहिना दाइ-माइ आगू पाछू-पाछू चला नाक पकड़ि परीछा लइत तहिना माए आङुरसँ ठोकि-ठोकि दुआइतिक परीछा लऽ नेने छेली। जे बात कुमहनियोँ बूझि गेली। तैबीच हमरो मन पाछू घुसकि गेल। घुसकि ई गेल जे दुआइत भाइए गेल, गावीस चाही। बजलौं- “माेइस कथीकेँ बनाएब। गावीसो तँ नहियेँ अछि।” अोना केते दिन गावीस नै रहने चिक्कनि माटि सेहो घोड़ने छी। दुआइतमे जे से भट्ठा तँ सोलहो आना चिकनीए माटिक बनबै छेलौं। गावीस मुलाइम माटि होइ छै। तहूमे पड़तदार सेहो होइ छै। मुदा चिक्कनि माटि सक्कतो होइ छै आ रङ्गगरो तँ होइते छै। गावीस सुनिते जेना कुमहनिकेँ बिसरल बात मन पड़ि पानि चढ़ा देलकनि तहिना हाँइ-हाँइ कऽ लत्तामे बान्हल गावीस छिट्टाक पेनी लग देखैत बजली- “बौआ, अबैकाल ओरिया कऽ ते रखने छेलौं, मुदा तर पड़ि गेल अछि, अखनि जे हाथ गोड़ियेबै तँ बरतन ढनमना जाएत। तहूमे चौरचनक छी, टोनाह होइत अछि।” माए कहलखिन- “आेरिया कऽ ऊपरसँ उतारि-उतारि आङ्गनमे रखि लिअ, गावीस निकालि फेरि सेरिआ लेब।” माइयक बात सुनि दौरीवाली बाजलि- “जाबे बरतन सेरिआएब ताबे चारि-पाँच अङ्गनामे बाँटि सधाइए लेब। घुमैकाल देने जेबनि।” नव दुआइत देखि मन खुशी रहबे करए बजलौं- “जाबे अहाँ चारि पाँच अङ्गनासँ घूमब ताबे हमहूँ दुआइतकेँ धोइ, लत्ता भीजा लइ छी।” घुमैकाल गावीसक मोटरी दौरीवाली माइयक हाथमे दैत बाजलि- “काकी, अपने एकरा चोरा कऽ रखि लथु, जहिया-जहिया बौआकेँ मोइस सधतै तहिया-तहिया दिहथिन, नै तँ सोहनगर होइ छै, माटि ने खए लगनि।” एकटा ढेकरी दुआइतमे दैत कड़चीसँ घोड़ैत कुमहनिकेँ कहलिऐ- “यएह गावीस तँ सालोसँ बेसी चलत।”६८७ २९ अगस्त २०१४ शारदा नन्द सिंह :: फक दऽ निसाँस छूटल “की यौ भाय, एतै डेरा आबि गेलै की?” “हँ औ बाबू, की कहब एतेक दिनसँ...।” “हँ-हँ से की?” “अरे बा, आबो बुझैमे कोनो भाँगठ अछि?” “यौ, कहैबला कोनो बात छै ऐमे। की कहू कए पुश्त बीत गेलैए, हमर पुरखा, तिनको पुरखा आ हुनको, तीन मुँह घर एके दुरखा। छला कहबैत मुँहपरखा। गामेटा नै दिगारि भरिमे। तँ धिया-पुता बुझू काँकोरेक बच्चा भरा गेलै सभ खादि-चबहच्चा। मुदा वेमनसताक अपगम नै सभतरि रस्ता जाम कलह द्वेष कुलषित भावना, नीनो होइ हराम। भोर-साँझ एक्के रंग युद्ध होइ घमशान। केकरोसँ कियो कम नै, मनु-भैंसाक शान।” हम कहलिऐ अपन ननकिरबाकेँ- “चल छोड़ि एकरा सभकेँ, नै बँचतौ आब प्राण। तँए नै मुँह मलान। फक दऽ निसाँस छूटल रहै छै काजमे जुटल। घर फूटल गमारे लूटल। हे भूमि देब तीन पुरखाक झंझटसँ पिण्ड छूटल। रहै ने एना घर फूटल। ओहेन घरसँ बढ़ियाँ बरू ई केहनो छै मरैया लटकल।” परिवारक प्रभाव समाजपर, समाजक प्रभाव देशपर। मुदा हमरा परिवारपर तेकर कोनो ने असर। ने काजक प्रति समर्पण आ ने समैक प्रतिवद्धता, ओ अभावे भरल असभ्यता। डाॅ. कीर्ति नाथ झा :: शेफाली, फुलपरासवाली आ हम जहिआ ओ लोकनि जीबै छला तहिआ तँ ने एहेन प्रसिद्ध रहथि आ ने किछु सुनबाक पढ़बाक तेना भऽ कऽ साधन रहै। आब सुनै छिऐ एक गोटे ‘मुक्ति’ लिखने छला तँ केकरो पढ़ि कऽ ठकमुड़ी लागि गेलनि आ दोसर गोटे ‘फुलपरासवाली’ लिखलनि तँ कहाँ दन ‘मुक्ती’बला नोटिस नै लेलखिन। माने दूध-भात। जे किछु। आब किताब आ पोथी सेहो खूब छपै छै आ लोक किनितो अछि। मुदा हमरा लोकनि रामायण-महाभारत पढ़ब आकि नव-नव किताब। मुदा ओइ दिन संयोगेसँ टी.भी खूजल छेलै आ दू गोट गोट भऽ सकैए परफेसर छल हेता- बड़ीकाल धरि एक दोसरासँ बहस करैत रहथि माने ‘शेफाली’ नीक केलनि आकि ‘फुलपरासवाली’। धुर, एहन गप-सप्प केतौ एतेक खूजि कऽ होउ। धिया-पुता तँ अबधारि कऽ आरो रस लेत। बीचमे एक गोटे आैर छला जे बीचमे एकबेर टिपलखिन िक तँ, कियो कहने छेलखिन, जे ‘हिनका लोकनिक खीसा मर्यादाक बाहरक गप थिक।’ मुदा नै जानि ओ बुढ़ी लोकनि आइ जीबैत रहितथि तँ की कहितथिन। मोने अछि, मैयाँकेँ पुछने रहियनि, “मैआँ अहाँ कहिआ विधवा भेलिऐ?” तेतबे वयस रहए जे ई नै बुझिऐ जे एहेन गप पुछबाक नै छिऐ। आ जेहने हम तेहने मैयाँक जवाब- “जहिए बिआह भेल तहिए राँड़ भऽ गेलिऐ।” दूरस्थेसँ माए ई गप-सप्प सुनलनि तँ दबाड़ि कऽ भगा देलनि। मुदा हमरा ले धनि सन। हम तँ मैयाँसँ बस किछु गप करैले किछु फुछने रहियनि। देखियनि उज्जर धोती, काटल केश, चुड़ी-सिनुर-ठोप-ठीका किछु ने। तैपर हम आवेशसँ कखनौं आलताक ठोप करबाक लौल करियनि। कहियो चुड़ी पहिरबाक। गरमी मासक दुपहरियामे जखनि मैयाँ अपन टेकुरी लऽ कऽ जनौ कटैले बैसै छेली तँ हम सहटि कऽ लग जाइ। किछु-किछु छोट काज कऽ दियनि। ओहो कखनो मिसरी, कखनो एकटा छोहाड़ा तरहथ्थीपर रखि देथि। नातिन आ मैयाँक अही संग बहिनाक आपक्तामे तँ ओ बुझा कऽ कहने रहथि- “है चुड़ी सिनुर विधवा नै करै छै।” नेना तँ रहबे करी। पुछलियनि- “अहाँ विधवा छिऐ।” ओ कहलनि- “हँ।” हम पुछलियनि- “कहिआसँ?” बस हुनकर जवाब देल छेलनि आकि माँ सुनिते छेली गप-सप्प, दबाड़ि कऽ विदा केलनि। मुदा बिआहो दिन लोक विधवा भऽ सकै छै से पछाति बुझलिऐ। हमरो सरकार तँ हालहिमे गेलाहे मुदा हम? जे किछु सुनिऐ, तइसँ एतबे मोन अछि जे घर डेरा बड़ ऊँच रहनि, आ जाति बड्ड पैघ। किदुन सुनिऐ बाबू कहथिन- “शुद्ध गहुमनक पोआ छला, सरकार।” ठीके छल हेता। मुदा जहिया हुनकर पाला पड़ल रही दाढ़क डाँस बुझबाक वयए नै छल। मुदा आब जखनि बीख भरि देह निजाएल अछि तँ बुझै छिऐ। ओ साँप तँ नै छला मुदा हुनकर बीखक असरिसँ की कहियो उबरि सकलौं। अपना तँ बोध एतबे रहनि जे साबुन आ बर्फीक अन्तर नै बुझथिन। झोंक एलापर कथीमे दाँत काटि देता तेकर कोन ठेकान। कखनो बाटीक दालिकेँ बड़की पोखरि कहथिन आ फोड़नक मरचाइकेँ पोखरिक माँछ। बिआह भेलापर लोककेँ तँ खूब मोन लगै। हम आब बुझै छिऐ, लोक, देखि कऽ माँछी केना गिड़ै छल तहिया। मुदा सोचै छी हम के छी? ‘शेफाली’ कि फुलपरासवाली? एक गोटे उड़हरि कऽ मुक्त भेली। दोसर अपन मोनक सक्कसँ इज्जति बँचौलनि। मुदा इज्जति? रसिआरीवाली काकी जीवन भरि इज्जति बँचौने रहली मुदा मगज तँ फिरिए गेलनि। केतए-केतए ने गोहरिआ बनि कऽ गेली। केतेक ने इलाज करौलनि। किछु भेलनि नै। पछाति जखनि सभ किछु समन भऽ गेलनि तँ लगलनि जे अनकर आगि बाँचए नै देत आ आखिरी आबि कऽ अपनेसँ अगि लगा कऽ मरि गेली। मुदा हम? हमरा सरकारक सरकारीक वंशकेँ जे ऊक देखौलकनि तेकर मरला उत्तर मुखबत्ती लगा कऽ शरीर वलानमे भँसौल गेलै। यएह बलान तँ थिकी। अपने नोत पुरैले गेल रहथि। आ हम एसकरिए रही। मड़रटा मनेजर-हरवाह-कमतिआ-ओगरवाह सभ छला। बड़ जोर बाढ़ि आएल रहै। आ हमरा मथदुखीक राेग धऽ नेने छल। सभ राति पहिने दहिना कात कपारसँ शुरू हुअए। फेर कनपट्टी होइत माथक पाछूसँ गरदनि धरि जाए। गरदनि तर केत्ताबेर गेड़ुआ दहिना-बामा करी। चैन नै हुअए। शंकर बाम-कृष्णधारा- विक्स सभ लगाबी। रसे-रसे हुअए माथ दुखाएब दोसरो दिस ने पसरि जाए। तखनि भरि देहमे खौंत, पसेना। मोन आऊल। छट-पटी लगि जाए। बाबूक लिखौल- “सर्व बाधा प्रशमन....।” केर श्लोक पढ़ि अपने हाथ अपने माथपर ली। मुदा भरि राति पहाड़ भऽ जाइत छल। आ दिनमे जे निन्न हुअए से आँखि नै खुजए। तहिया डाक्टर बुझी कि वैद गोनर मिसरटा छला। नाड़ी देखथि मथाहाथ दथि। एक दिन एकटा जड़ी सेहो लत्तामे बान्हि कऽ देलनि जे गाड़ामे बान्हि लेथु। मुदा कोन भूत छल छूटए नै। एक दिन आजिज भऽ ओहो मथाहाथ देब मना करि देलनि। कहलखिन- “कि तँ नवटोल भगवती स्थानमे भगतासँ भाउ कराबथु।” तहिया कि से सनस्था रहै। जैतौं अपने मोने। दर-देआदक हवेली डौढ़ी सेहो कि लग-लग रहै। एक दिन रातिमे फेर असाद्ध मथदुक्खी धेने छल। कोठलीमे कुहरैत छेलौं। कहबो केकरा कहितिऐ? गोनर झा सेहो जवाब दऽ देने छला। सासु छेली नै। हमरा भेल जेना कियो आस्तेसँ कहलकैए- “बौआसीन!” अकानलिऐ। तँ ठीके जेना कियो हाक दैत हो। रोइआँ भुलकि गेल। हनुमान जीक नाम लेलौं। दमसि कऽ कहलिऐ- “के छी?” “हम, बौआसीन, लोटना!” “की छिअनि?” “बड़ कुहरै छथिन! गोनर मिसरकेँ हाक दिअनि?” “नै।” “एना कोना रहथिन। बड़ तरद्दुत् होइए।” “मरए देथु हमरा।” “बलानक पानिसँ ओसरा धरि छइहे। मरि जाएब तँ कहिहथिन फेक दइ जेता।” लोटना, लागल जेना गुम्म भऽ गेल छला। मुदा गोंगिआइत बाजल रहथि, से मोने अछि- “डोमा जे भाव खेलाइ छेलै, से हम देखने छिऐ। हमरो तँ मथाहाथ देब सिखौने छल। लाजे कहलियनि नै। टोलपर सभ जनी-जाति तँ हमरेसँ माथा-हाथ दिअबै छै, जखनि डोमा-भैया गाम-गमाइत जाइ छै।” मोन आउल-बाउल छल। प्राण अवग्रह छल। सोचए लगलौं जेकर सोझा पएर नै उघार भेले तेकरा सोझा माथपर सँ नूआ केना उतारब। आ केना मथा हाथ देत। मुदा प्राण अवग्रहमे छल। की करितौं? कहलिऐ- “केकरो कहिहथिन नै।” ‘जानथि भगवान। बौआसिन, एक चुरुक नारिकेरिक तेल देथु। आ हम बाहरक कोठलीक लाथे हमर कोठलीक जे केबाड़ रहै, खोलि देने रहिऐ। मुदा बिछौनसँ उठबाक हूबा नै छल। लगमे नारिकेरक तेलक बोतल राखि देने रहिऐ। डिबिआक इजोतमे हम आँखि मुननहि आँगुरसँ इशारा कऽ देने रहिऐ। हमरा एतबे मोन अछि, लोटना एक चुरुक तेल कपारपर ढारि कऽ मलए लागल छला। फुसुर-फुसुर किछु पढ़ितो छला। तेतबे मोन अछि। ओकर पछाति कखनि निन्न भऽ गेल आ ओ कखनि कोठलीसँ बहार गेला से मोन नै अछि। मुदा एतबा मोन अछि जे ने हमर मथदुक्खी छूटल छल आ ने फेर कहियो गोनर झा हमरा मथाहाथ देबए हमर अँगना पएर देलनि। ईहो सत्ते जे ने ओइ बलानक बाढ़िमे हमर देहे भँसिआएल। आ ने कहियो हमरा लोटनाक मथाहाथ देबाक गुणपर संदेहे भेल। हम की छेलौं? की छी? मोने जनैए। लोटना नि:संतान नै छला तैयो मुखबत्ती लगा कऽ बलानमे भँसौल गेला। सरकार नि:संतान छला मुदा संततिक हाथे वृषोत्सर्ग श्राद्ध भेलनि। मुदा हम? हम ‘शेफाली’ छी, की फुलपरासवाली? जे.पी. गुप्ता ऊर्फ मोनूजी :: बेटी रूपी बोझ रातिक दू बजैत रहै, चारू दिश अन्हार छल। सुमित्राक आँखिसँ जेना नीन उड़ि गेल रहनि। तखने एकाएक पतिक कराहब सुनि नीन टुटलनि। नीन टुटिते पति- श्याम-सँ पुछलखिन- “की होइए?” श्याम किछु ने बजला। हाथ छूलापर बूझि पड़लनि जे बड़ जोर बोखार छन्हि। छोटकी बेटी- गीता-केँ हड़बड़ाइत उठबैत, मुँह पटपटबैत बजली- “हमर तँ कपारे जरल अछि। भगवानो सभटा दुख हमरे देने छथि!” दू कठ्ठा जमीनक अलाबे एकटा छोट-छीन फूसिक घर। जइमे सुमित्रा पति आ छोटकी बेटी-गीता-क संग जिनगी गुजरि रहल छथि। पतिक तबियत सेहो बरबरि खरापे रहै छन्हि। बेटा नै छन्हि। भगवतीकेँ केतेक कबुला-पातीक पछातिओ बेटा नै भेलनि। बड़की बेटी गिरजा, जेकर बिआह बिनु लेन-देनक भेल छेलनि। बिनु लेन-देनक बिआह ऐ खातिर भेल रहनि जे गिरजा देखै-सुनैमे बड़ सुन्नरि संगे गुणशील आ कर्मशील सेहो। मुदा सुमित्राक जमाए आ समधि बड़ लालची। बिआहक साल भरिक पछतिओ कोनो-ने-कोनो बहानासँ गिरजाकेँ पड़तारित करैत रहथिन। गिरजाक सासु बिजनेसक नाओंपर बेटाकेँ ससुरारिसँ पाइ अँइठऽ सेहो कहैत रहथिन। बेटो एहेन जे महिने-महिने सासु-ससुरकेँ रूपैआक समाद पठबैत। मुदा कोनो असरि नै देखि एक दिन गिरजाक सासु समधिन लग स्वयं पहुचि कहलखिन- “जमाए तँ शराबी भऽ गेल, किएक तँ कोनाे रोजगार नै छै, भरि दिन एनए-ओनए बौआइत रहैए। अहाँ लाख-सबा-लाख मदति करि दियौ, जइसँ कोनो काज-धंधा शुरू करत। काज-रोजगार भेने अहाँक बेटीओ सुखी रहत।” एते कहैत ओ बड़बड़ाइत ओतएसँ विदा भऽ गेली। मनमे दू कठ्ठा जमीन आ गिरजाक नामे बीमाबला पाइ नाचैत रहनि। एक दिन थाकि-हारि कऽ गिरजाक सासु-ससुर गिरजाकेँ नैहर भेज देलक। पति सेहो पाछू लगल गिरिजा संग एला मुदा दुआरिपर रूकि गेला। गिरजा कानि-कानि कऽ अपन सभटा बेथा माएकेँ कहलखिन। बेटीक बात सुनि माए द्वन्द्वमे पड़ि गेली। बीमाबला पाइसँ गीताक बिआह करब आकि गिरजाक अशान्त जिनगीकेँ बँचाएब! आन कोनो अवलम्ब नै। सोचैत-सोचैत चाह-बिस्कुट आ पानि लऽ कऽ दरबज्जापर पहँुचली। जमाइओ हुनकर गोड़ कि लगितनि, ओ तँ अपने बेगरते आन्हर! गुस्साइले चाह पटकैत बजला- “ई सभ आदर-सत्कारक ढंग रहए दथुन। हमरा लग समए कम अछि। पुरनिमा दिन साइकिन दोकान खोलब। हमरा बीमाबला पाइ चाही। ओनाहितो बिना दान-दहेजक हिनका बेटी संग बिआह कऽ बहुते दिन घरमे बैसा कऽ खुएलियनि।” सुमित्रा गिड़गिड़ाइत बजली- “पाहुन, ई तँ घरक पैघ जमाए छथि, गीताक बिआहक भार जेतेक हमरा सभकेँ अछि तेते हिनको छन्हि ने।” कनीकाल जमाए बाबू किछु ने जवाब देलखिल मुदा किछुकालक पछाति गिरजाकेँ बजा कातमे लऽ गेलखिन आ कहलखिन- “आब, अहाँ अपन जिनगी एतै काटू। जाधरि पाइ नै मिलत ताधरि अहाँ घुरि कऽ हमरा लग नै आएब।” ई कहि जमाए बाबू तमतमाएल मोटर साइकिलपर बैस आँखिसँ ओझल भऽ गेला। गीता बहनोइक सभटा बात सुनि लेलक। बहनोइक रूखि देखि गीता बहुत दुखी भऽ गेल। मुदा माए-बाबूक लाख पुछलाक पछातिओ दुनू बहिनमे सँ कियो ई बात नै कहनि। कारण छल जे ओनाहितो माए-बाबू गरीबीक चलैत दम्माक इलाजो ने करा पबथि। ऊपरसँ ई सभटा झंझ-मंझ सुना दुखे होइतनि। एकान्तमे बैस दुनू बहिन अपन फूटल किस्मतपर कनैत रहए। दुनू बहिनक मनमे उठैत रहै, दहेजक कारण माए-बापक माथपर बाेझ बनल छी। अक्षय कुमार झा :: प्रेमक अधिकार अपन माँ आ पिताक हम आज्ञाकारी पुत्र छी, मुदा जहियासँ बिआह भेल, हुनका नजरिमे संदिग्ध भऽ गेल छी। हमर सोभाव, आचरण, आ हृदैक भावना पहिने जकाँ स्थिर आ तटस्थ अछि, मुदा हुनका नजरिमे अपन कनियाँक गुलाम छी। हमरा बुझने आनो घरमे हमरा सनक आज्ञाकारी बेटा ई मनोवैज्ञानिक दबाबमे अपन जिनगी बिता रहल छथि। कनियाँ घर कि एली, जेना नांगरि हमरा लगि गेल। आब ई आरोप सहनाइ कठिन लागैत अछि कि हमरा कियो कनियाँक आदेशपाल कहए। जेना लगैत अछि, बिआहे केनाइ हमर अपराध छल। जहिना एकटा बेटाक अपन माए-बापक प्रति दायित्व अछि तहिना अनकर घरक ओ बेटी जे अपन घर-दुआर छोड़ि कऽ हमरापर आश्रित छथि। हुनका प्रति जिम्मेवारीक निर्वहन केनाइ हमर फर्जे नै अपितु धर्म अछि। डरैत-डरैत एकबेर माएकेँ कहलियनि- “माए, रूकमणिक माइक मोन सप्ताह दिनसँ खराप छन्हि भोरे फोन आएल छल कि ओझा दुइए दिनक लेल आबए देथुन बुच्चीकेँ देखला बड़ दिन भऽ गेल।” हमर गप अधुरे अखनि छल, माए झटसँ कहली- “तोरा दुनूक पेट मिलले छौ। कनियाँकेँ नैहरेमे कहुन रहैले। दू आदमीक भोजन कि बनबै छथि, जेना लगैए बड़का उपकारे हमरा सबहक करै छथि।” ई कहैत मुँह चमकबैत आ पटपटबैत अपना कोठलीमे माँ चलि गेली। दू दिनक बाद रूकमणिक तबीयत बेसी बिगड़ि गेलनि। संयोगवश हम दरभंगामे छेलौं। सुलेखा हमर छोट बहिन फोन केली, भैया, भौजीक तबीयत खराप छन्हि। साँझ तक घर आबि हुनका अस्पतालमे डाक्टरसँ देखा दबाइ लऽ घर एलौं। डाक्टर साहैब दस दिनक बेडरेस्ट पूर्जापर लिखि देलखिन। गामपर आपस एलापर उमेद छल माए पुछती कनियाँक केहेन तबीयत अछि? डाक्टर साहैब की कहलनि? मुदा हमर सोचक उन्टा माए पुछै लगली- “दबाइमे पाइ केतेक लगलो?” जहाँ हजार टकाक नाओं कहलियनि, आकि तुरन्ते ताना मारए लगली- “छह माससँ बिजली बिल बकाया छै ओ तोरा नै सुझाइ छौ। हमर बातरसक दबाइ अखनि तक अबिते अछि। ओ तोरा नजरिपर किए रहतौ? अपन नौटंकीबाज कनियाँक बहानापर हजार टका फटसँ बुकि देलहिन। ई सभ हुनकर अराम करैक बहाना छियनि।” एक दिन रातिमे सूतल छेलौं, घड़ी दिस देखलौं, दू बजैत छल, नीन नै होइत छल। सोचैत रही बिआहसँ पहिने माए केतेक हमरा मानै छेली। मुदा आइ एहेन कोन अपराध हमरासँ भेल, जे ठीकसँ बातो ने करै छथि? आँखि डबडबा गेल। बहुत सोचलापर एकटा निष्कर्षपर पहुँचलौं कि जे बेटाकेँ माए जनम दइ छथि, एते कठीनसँ पालै-पोसै छथि। बिआहक बाद प्रेमक एकटा हिस्सेदार कनियाँ भेलासँ माइक अन्तर आत्मामे एकटा नाकारात्मक भावनाक जनम होइ छै। कि जे हमर हिस्साक प्रेम कियो बाँटि तँ नै रहल अछि। ई सोच हमरा जनैत गलत अछि। प्रेम तँ सागर सनक अथाह आ अनंत अछि। जेकरा अनन्त तक बढ़ौने आ बंटनै अपन हाथमे अछि। ईहो सोच हमर अहाँक हेबाक चाही जे अलग-अलग तरहक सम्बन्धक लेल, अलग-अलग तरहक प्रेमक रंग आ रूप छै। जेकरा उचित रूपमे देनाइ आ लेनाइ हमर अधिकार क्षेत्रमे अछि। परिचए-पात- जगदीश प्रसाद मण्डल- जनम : ५ जुलाइ १९४७ ई.मे, पिताक नाओं : स्व. दल्लू मण्डल। माताक नाओं : स्व. मकोबती देवी। पत्नी : श्रीमती रामसखी देवी। मातृक : मनसारा, भाया- घनश्यामपुर, जिला- दरभंगा। मूलगाम : बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बिहार) पिन- ८४७४१० मोबाइल : ०९९३१६५४७४२, ०९५७०९३८६११, ०९९३१७०६५३१ ई-पत्र : jpmandal.berma@gmail.com शिक्षा : एम.ए. द्वय (हिन्दी आ राजनीति शास्त्र), जीविकोपार्जन : कृषि सम्मान : गामक जिनगी लघुकथा संग्रह लेल पहिल “विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार” २०११क मूल पुरस्कार आ मैथिलीक पहिल “टैगाेर साहित्य सम्मान” २०११; तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान- २०१२; एवं बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह ‘‘तरेगन’’ लेल पहिल “बाल साहित्य विदेह सम्मान” २०१२ प्राप्त। साहित्यिक कृति : उपन्यास : (१) मौलाइल गाछक फूल, (२) उत्थान-पतन, (३) जिनगीक जीत, (४) जीवन-मरण, (५) जीवन संघर्ष, (६) नै धाड़ैए, (७) बड़की बहिन प्रकाशित। (८) सधबा-विधवा (९) भादवक आठ अन्हार अप्रकाशित। नाटक : (१०) मिथिलाक बेटी, (११) कम्प्रोमाइज, (१२) झमेलिया बिआह, (१३) रत्नाकर डकैत, (१४) स्वयंवर प्रकाशित। लघु कथा संग्रह : (१५) गामक जिनगी, (१६) अर्द्धांगिनी, (१७) सतभैंया पोखरि, (१८) उलबा चाउर, (१९) भकमोड़ प्रकाशित। तथा (२०) पतझार, (२१) अप्पन-बीरान, (२२) बाल गोपाल, (२३) रटनी खढ़, (२४) लजबिजी, शिघ्र प्रकाश्य। विहनि कथा संग्रह : (२५) बजन्ता–बुझन्ता, (२६) तरेगन प्रकाशित। एकांकी संग्रह : (२७) सतमाए, (२८) कल्याणी, (२९) समझौता, (३०) तामक तमघैल (३१) बीरांगना केर संग्रह “पंचवटी” नाओंसँ प्रकाशित। दीर्घ कथा संग्रह : (३२) शंभुदास प्रकाशित। कविता संग्रह : (३३) इंद्रधनुषी अकास, (३४) राति-दिन प्रकाशित। (३५) सतबेध अप्रकाशित। गीत संग्रह : (३६) गीतांजलि, (३७) तीन जेठ एगारहम माघ, (३८) सरिता, (३९) सुखाएल पोखरिक जाइठ प्रकाशित। शारदा नन्द सिंह- गाम+पोस्ट- वलथरी भाया- विरौल दरभंगा। राजदेव मण्डल- जन्म : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्व. सोनेलाल मण्डल उर्फ सोनाइ मण्डल। माता : स्व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्त मण्डल, कृष्णकान्त मण्डल, विप्रकान्त मण्डल। पुत्री : रश्मि कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा, भाया- िनर्मली, जिला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शिक्षा : एम.ए. द्वय (मैथिली, हिन्दी, एल.एल.बी) ई पत्र : rajdeokavi@gmail.com सम्मान : अम्बरा कविता संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान-२०१३ प्राप्त। प्रकाशित कृति : (१) अम्बरा- कविता संग्रह (२०१०), (२) बसुंधरा कविता संग्रह (२०१३), (३) हमर टोल- उपन्यास (२०१३) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अप्रकाशित कृति- चाक (उपन्यास), जाल (पटकथा), त्रिवेणीक रंग (लघु/विहनि कथा संग्रह)। लक्ष्मी दास- जनम- लगभग ५० बरख पूर्ब। पिताक नाओं- स्व. फन्न दास, माता- रेशमा देवी। गाम-बेरमा, पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी। जीविकोपार्जन- कृषि। दुर्गा नन्द मण्डल- जनम- २ जनवरी १९६५ ई.मे। गाम- गोधनपुर, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार)। पिताक नाओं- श्री रामदेव मण्डल, माता- श्रीमती भालसरी देवी। शीघ्र प्रकाश्य- कथा कुसुम (लघु/विहनि कथा संग्रह) कपिलेश्वर राउत- जनम- ३० मार्च १९५२ ई.मे। पिताक नाओं- स्व. राम स्वरूप राउत, माता- स्व. ज्ञानी देवी। गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, बिहार। जीविकोपार्जन- कृषि। साहित्यिक कृति- उलहन (विहनि/लघु कथा संग्रह) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। डा. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- जनम- अक्टूबर १९४८ई.मे। पिताक नाओं- स्व. सहदेव पाठक, माता स्व. माया देवी। गाम- लौफा, जिला- मधुबनी जिला (बिहार) छिटफुट रूपमे किछु कथा, कविता, यात्रा वृतांत आ विज्ञान लेख मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। प्रकाशित कृति- “विज्ञानक बतकही” (विज्ञान लेख संग्रह), आ “किछु तीत मधुर” (विदेश प्रवासक अनुभव पर आधारित यात्रा कथा।) ललन कुमार कामत- जनम- १० मार्च १९८४, पिताक नाओं- स्व. रामचन्द्र कामत, माता- स्व. तारा देवी। गाम- ललमनियाँ, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल। ओम प्रकाश झा- जनम- ५ दिसम्बर १९६९, पिताक नोओं- श्री पिताम्बर झा, माता- श्रीमती रामकुमारी झा, आदर्श अपार्टमेंट हटिया रोड तिलकामांझी, भागलपुर। मूल गाम- ड्योढ़- घोघरडीहा जिला- मधुबनी। प्रकाशित कृति- कियो जानि नै सकल हमरा (गजल संग्रह), संग-संग कथा, कविता, गीत, समीक्षा इत्यादि छिट-फुट पत्रिाक सभमे प्रकाशित। डा. शिव कुमार प्रसाद- जनम- १२ नवम्वर १९५६ई.मे। पिताक नाओं- स्व. निर्धन प्रसाद, माता- स्व. यमुना देवी। गाम- सिमरा, पोस्ट– सिमरा, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, बिहार। राम विलास साहु- जनम- ०१ जनवरी १९५७ई.मे। पिताक नाओं- स्व. नशीवलाल साहु, माता- मसोमात कैली देवी। गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) पिन नं.- ८४७१०८, मोबाइल- ९९५५८०२५२२ प्रकाशित कृति- रथक चक्का उलटि चलै बाट (पद्य संग्रह) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। हेम नारायण साहु- जनम- १ नवम्भर १९६५ पिताक नाओं- श्री लक्ष्मी साहु, माता- स्व. गंगिया देवी। गाम+पोस्ट- निर्मली, वार्ड न. ०७, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ उमेश मण्डल- माता-पिता : श्रीमती रामसखी देवी, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। पत्नी : श्रीमती पूनम मण्डल। जन्म तिथि : 31 दिसम्बर 1980 पत्रालय : गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, पिन- 847410, बिहार। सम्प्रति : गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. 06, पिन- 847452, जिला- सुपौल। शिक्षा : एम.ए. (मैथिली), बी.आर.अम्बेदकर बिहार विश्व विद्यालय, मुजफ्फरपुर। प्रकाशित पोथी : निश्तुकी (पद्य संग्रह), मिथिलाक संस्कार गीत, विध-बेवहार गीत आ गीतनाद (मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त मैथिली लोकगीतक पहिल संकलन), मिथिलाक जीव-जन्तु/ वनस्पति और जिनगी’क डिजिटल सचित्र ऑनलाइन संस्करण, मिथिलाक सभ जाति-धर्मक लोकमे प्रयुक्त लोकगीतक रेकार्डेड ऑनलाइन ऑडियो और वीडियो डिजिटल संकलन। अप्रकाशित कृति- भकइजोत पद्य संग्रह अप्रकाशित। सह सम्पादक : विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका एवं विदेह-सदेह पत्रिका- ISSN 2229-547X VIDEHA (www.videha.co.in) योगदान : विकीपीडियामे मैथिलीक स्थानीयकीकरणमे योगदान, मैथिली भाषाक मानकीकरणमे योगदान। दर्जनो गोष्ठी/संगोष्ठी/परिचर्चा (मैथिली)क आयोजन, दर्जनो पोथी प्रदर्शनी (मैथिली), विभिन्न लेखकक पचाससँ ऊपर मैथिली-पोथीक टंकन (Typeset)। ई-पत्र : umeshberma@gmail.com मोबाइल न. : 8539043668, 9931654742 फागुलाल साहु- जनम- १ फरवरी १९५३ ई.मे। गाम- सखुआ, पोस्ट- भपटियाही, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, बिहार। पिताक नाओं- स्व. रामजी साहु, माता- स्व. चुनचुन देवी। शम्भु सौरभ- पिताक नाओं- चिरंजीव लाल दास गाम- भरवाड़ा जिला- दरभंगा। सम्प्रति- गाम- बैका, पोस्ट- बैका-विष्णुपुर, भाया- घोघरडीहा, जिला- मधुबनी। गौड़ी शंकर साह- गाम+पोस्ट- तुलापत गंज थाना- झंझारपुर जिला- मधुबनी (बिहार) पिन- ८४७१०९ उमेश नारायण कर्ण- गाम- रामपुर, सरिसव पाही, जिला-मधुबनी। अच्छेलाल शास्त्री- जनम- १९५६ गाम- सोनवर्षा, पोस्ट- करहरी भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नन्द विलास राय- जनम- २ जनवरी १९५७ ई.मे। पिताक नाओं- स्व. बच्चा राय, माता- स्व. दुर्गा देवी आ श्रीमती परमेश्वरी देवी। गाम+पोस्ट- भपटियाही, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मोबाइल नम्बर- ९९३१९०९६७१ जीविकोपार्जन- कृषि। शैक्षणिक योग्यता- बी.एस-सी। प्रशैक्षणिक योग्यता- आइ.टी.आइ (टर्नर) प्रकाशित कृति- सखारी-पेटारी लघु कथा संग्रह श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अप्रकाशित कृति- (१) मरजादक भोज लघु कथा संग्रह, (२) छठिक डाला कविता संग्रह, (३) बहिनपा एकांकी संचयन। डाॅ. कीर्ति नाथ झा- सम्पर्क- Dr K N Jha MBBS (Honors),MS Professor of Ophthalmology Mahatma Gandhi Medical College & Research Institute Pillaiyarkuppam, Pondicherry- 607402 ( India) जे.पी. गुप्ता ऊर्फ मोनूजी- सम्पर्क- निर्मली, सुपौल (बिहार) अक्षय कुमार झा- सम्पर्क- निर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 91 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १६४ म अंक १५ अक्टूबर २०१४ (वर्ष ७ मास ८२ अंक १६४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA