ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६५ म अंक ०१ नवम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८३ अंक १६५) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (आलोचना)/ चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी(आलोचना)/ मायानंद मिश्रक "मैथिली साहित्यिक इतिहास" २.२.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी २.३.डॉ. अरुण कुमार सिंह-सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- समधीन ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- 2 टा गजल ३.२.कैलाश- जहिना करब ओहिना पाएब ३.३.संतोष कुमार राय 'चंदू'-2टा कविता ३.४.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-2 टा कविता ४.बालानां कृते-जगदानंद झा मनु- छुट्टी भऽ गेलै Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष द्धारा यहि वर्ष प्रदान कएल गेल पुरस्कारक विवरणः
१. नेपाल विद्यापति मैथिलि भाषा साहित्य पुरस्कार– श्री रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम— पुरस्कार राशि रु. २ लाख ।
२. नेपाल विद्यापति मैथिलि कला–सांस्कृति पुरस्कार— श्री श्याम सुन्दर यादव – पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
३. नेपाल विद्यापति मैथिलि अनुसन्धान पुरस्कार— डा. वासुदेव लाल दास— पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
४. नेपाल विद्यापति मैथिलि पाण्डुलिपि पुरस्कार— श्री चन्द्रशेखर लाल शेखर — पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
५. नेपाल विद्यापति मैथिलि अनुवाद पुरस्कार— श्री धीरेनद्र प्रेमर्षी— पुरस्कार राशि रु. १ लाख । २. गद्य २.१.आशीष अनचिन्हार- मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (आलोचना)/ चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी(आलोचना)/ मायानंद मिश्रक "मैथिली साहित्यिक इतिहास" २.२.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी २.३.डॉ. अरुण कुमार सिंह-सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- समधीन आशीष अनचिन्हार- मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (आलोचना)/ चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी(आलोचना)/ मायानंद मिश्रक "मैथिली साहित्यिक इतिहास" १ मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (आलोचना) कोनो साहित्यिक विधा अपना आपमे ता धरि स्वतंत्र नै मानल जा सकैए जा धरि ओकर हरेक समयमे कमसँ कम आठ-दस टा पूर्णकालिक रचनाकार नै भेटै। मुदा ई तथ्य मैथिली साहित्यक कोनो विधापर लागू नै होइत अछि। कहबाक मतलब जे जिनका जते मोन भेलनि से तते विधाक संग बलात्कार केलथि। ई मैथिली भाषा थिक जैमे कोनो लेखक जँ नीक कविता लिखै छथि तँ हुनका नीक कथाकार ओ अन्य विधाक मास्टर सेहो मानि लेल जाइत अछि। आ ऐ तरहँक सर्टिफिकेट बँटबामे मानसिक रूपसँ लोथ विश्वविद्यालीय आलोचक सभहँक भूमिका बेसी रहैत छनि। ऐ ठाम हम स्पष्ट कही जे हरेक विधामे लीखब आ हरेक विधामे अपना-आपके मास्टर कहब वा कहेबाक लेल येन-केन-प्रकारेण छद्म करब दूनू अलग -अलग वस्तु अछि। ऐ ठाम हम जिनकर गप्प करए जा रहल छी से हमरा नजरिमे मूलतः गवेषक ओ कोशकार छथि मुदा ओ गजल, हाइकू, कविता, लघुकथा, विहनि कथा, आलोचना सहित आन विधामे सेहो रचनारत छथि (मुदा ई उल्लेखनीय अछि जे रचना करैत-करैत ई सभ विधाक लेल एकटा मानक आलोचना कहू वा विधागत नियक कही की व्याकरण कहू से मैथिली भाषाक अनुकूल बनेलाह) आ पाठक ई कहबामे धुकचुका जाइ छथि जे कोन विधाक कोन रचना नीक छै। ऐ ठाम ईहो हम कही जे कोनो लेखक केर सभ रचना उत्कृष्ट नै होइ छै। कोनो दब, तँ कोनो नीक तँ कोनो मध्यम। ईएह चक्र सभ लेखक संग छै। केओ ऐ चक्रक वास्तविकाकेँ मानै छथि तँ बहुत रास लेखक ओकरा घमंडमे आबि नकार दै छथि। मुदा हमर आलोच्य लेखक ऐ वस्तुकेँ मानै छथि आ ओ तर्क दै छथि जे ई हरेक लेखककेँ मानबाक चाही। ओना साहित्यिक विधाकेँ छोड़ि ई नव लेखककेँ बढ़ावा देबऽमे सभसँ आगू छथि आ हिनक ई विधा आन सभ विधापर भारी अछि। आब ऐठाम अहाँ सभ चकित होमए लागब तँए हम हिनक आन विधाकेँ छोड़ि मात्र गजलपर केंद्रित कऽ रहल छी। जँ मैथिली गजलकेँ देखी तँ भने ई 103 बर्खसँ लिखाइत रहल हो मुदा गजलक व्याकरण बनल 2009मे। आब एकर कारण जे हो । "अनचिन्हार आखर " ब्लागपर श्री गजेन्द्र ठाकुरजी बर्ख 2009सँ "मैथिली गजल शास्त्र " केर शुरूआत केलाह जे 14 खंडमे पूरा भेल। आब ई आलेख हुक गजल संग्रह "धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ"मे आएल अछि।प्रस्तुत गजल शास्त्रमे मैथिली गजल अनेक मौलिक अवधारणाक जन्म भेल। आगू बढ़बासँ पहिने ऐ गजल शास्त्रक किछु मुख्य विशेषता देखल जाए--- 1) सरल वार्णिक बहर-- ई ऐ गजल शास्त्रक सभसँ बड़का विशेषता अछि। चूँकि मैथिलीक बहुसंख्यक शाइर बहरक अभावसँ ग्रसित छलाह तँए हुनका सभकेँ एक सूत्रमे अनबाक लेल वैदिक छंदक प्रयोग भेल जकर नाम पड़ल " सरल वार्णिक बहर" ऐ बहरक मोताबिक मतलाक पहिल पाँतिमे जतेक वर्ण हो ओतेक बर्ख गजलक हरेक पाँतिमे भेनाइ आवश्यक। ई बहर ततेक ने लोकप्रिय भेल जे सभ शाइर एक प्रचुर प्रयोग केलथि संगे-सग ई बहर सभ शाइरकेँ वर्णवृत प्रयोग करबाक लेल एकटा नीक बाट देलक तँए हमरा नजरिमे ई बहर आधुनिक मैथिली गजलमे वर्णवृतक प्रयोगक पहिल सीढ़ी अछि। 2) वैदिक छन्दक पुनर्जागरण-- ऐ गजल शास्त्रसँ विलुप्त होइत वैदिक छन्दक पुर्नजागरण भेल। सभ वैदिक छन्द सरल वार्णिक छन्द अछि। वर्तमानमे श्री गजेन्द्र ठाकुर जी एकरा विवेचित कए मात्र किछुए समयमे आ सेहो सरल रूपें वेद-विज्ञानक परिचय करबौलथि। एखन जे गजल लिखै छथि वा जे गजेन्द्र ठाकुर जीक पोथी वा अनचिन्हार आखर पढ़ताह हुनका स्वतः ई बुझा जेतन्हि जे गायत्री छन्द की छै आ अनुष्टुप छन्द की। गायत्री छंद ओ गायत्री मंत्रक बीच की संबंध छै से ऐ लेखक सहायतासँ आब सभ बूझऽ लगलाह अछि। 3) बहरक निर्धारण--- ओना तँ वर्णवृत वा बहर गजल विश्वस्तरपर मान्य अछि मुदा भारतमे अबिते ओ विखंडित भेल। केओ हिंदीक अनुकरण करैत मात्रिक लेलाह तँ केओ किछु " मुदा श्री ठाकुरजी बिना कोनो दबाब बनेने शाइर लेल सीमा बना देलखिन। श्री ठाकुरजी कहैत छथि "कोनो गजलक पाँती(मिसरा)क वज्न/ वा शब्दक वज्न तीन तरहेँ निकालि सकै छी, सरल वार्णिक छन्दमे वर्ण गानि कऽ; वार्णिक छन्दमे वर्णक संग ह्रस्व-दीर्घ (मात्रा) क क्रम देखि कऽ; आ मात्रिक छन्दमे ह्रस्व-दीर्घ (मात्रा) क क्रम देखि कऽ। जिनका गायनक कनिकबो ज्ञान छन्हि ओ बुझि सकै छथि जे गजलक एक पाँतीमे शब्दक संख्या दोसर पाँतीक संख्यासँ असमान रहि सकैए, मुदा जँ ऊपर तीन तरहमे सँ कोनो तरहेँ गणना कएल जाए तँ वज्न समान हएत। मुदा आजाद गजल बे-बहर होइत अछि तेँ ओतऽ सभ पाँती वा शब्दमे वज्न समान हेबाक तँ प्रश्ने नै अछि। ऐ तीनू विधिसँ लिखल गजलमे मिसरामे समान वज्न एबे टा करत। ओना ई गजलकार आ गायक दुनूक सामर्थ्यपर निर्भर करैत अछि; गजलकार लेल वार्णिक छन्द सभसँ कठिन, मात्रिक ओइसँ हल्लुक आ सरल वार्णिक सभसँ हल्लुक अछि, मुदा गायक लेल वार्णिक छन्द सभसँ हल्लुक, मात्रिक ओइसँ कठिन, सरल वार्णिक ओहूसँ कठिन आ आजाद गजल (बिनु बहरक) सभसँ कठिन अछि।" आब ई शाइरपर निर्भर अछि ओ लिखबाक लेल कोन बहर प्रयोग करै छथि मुदा जेना की ठाकुर जी कहै छथि गेबाक लेल वार्णिक छंद सभसँ हल्लुक छै तैसँ अरबी-फारसी-उर्दू गजलक व्याकरणक प्रमाणिकता भेटैत अछि आ हिंदीक नकलवादी शाइर सभहँक धज्जी उड़ि जाइत अछि आ ऐ तरहें मैथिली गजलमे वर्णवृतक प्रयोग सुनिश्चित होइत अछि। 4) गजल, बहर आ संगीत-- ऐ गजल शास्त्रमे गजल, बहर आ संगीतक मध्य समता ओ विषमताक नीक चर्च अछि। जिनका संगीतक जानकारी नै अछि तकरा लेल ई पोथी अमृतक समान काज करत। मूल तथ्य सभ नीक जकाँ फड़िछाएल अछि जेना--- "जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओइ युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- 1.उदात्त 2. उदात्ततर 3. अनुदात्त 4. अनुदात्ततर 5. स्वरित 6. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, 7. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओलापर उत्पन्न होइत अछि)। 1. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नै अछि। 2. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। --------------------------------- ---------------------ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान ऐ विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थानपर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- 1.स्वर-7 ग्राम-3 मूर्छना-21तान-49 सात टा स्वर सा, रे, ग, म, प, ध ,नि, आ तीन टा ग्राम- मध्य, मन्द, तीव्र। 7*3=21 मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण 7*7=49 तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक 2 सामगान (पर्कक) आ काश्यपक 1 सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि,मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ ऐ सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- 1. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। 2. पद पाठ- ऐमे प्रत्येक पदकें पृथक कऽ पढ़ल जाइत अछि। 3. क्रमपाठ- एतऽ एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कऽ पाठ कएल जाइत अछि। 4. जटापाठ- ऐमे जँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम ऐ रूपमे हएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। 5. घनपाठ- ऐ मे उपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप हएत- कख, खक, कखग, गखक, कखग। 6. माला, 7. शिखा, 8. रेखा, 9. ध्वज, 10. दण्ड, 11. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो 6 टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। 1. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। 2. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ 3.विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाइ/अधिक मात्राक बराबर बजेनाइ। 4. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।5. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कऽ पदक मध्यमे ‘यति’। 6. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि।" ई तँ छल वैदिक संगीतक जानकारी । लौकिक संगीतक चर्च श्री ठाकुर जीन एना करै छथि--- संगीतक वर्ण अछि सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सां एकरा मिथिलाक्षर/ देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नै करब। आरोह आ अवरोहमे स्वर कतेक नीच-ऊँच हुअए तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेना “क” केँ लिअ आ की-बोर्डपर निकलल सा, रे... केर ध्वनिक अनुसार “क” ध्वनिक आरोह आ अवरोहक अभ्यास करू। ऐ सातू स्वरमे षडज आ पंचम मने सा आ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ हेबाक गुंजाइश नै छै। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइश अछि ऐमे। सा आ प मात्र शुद्ध होइत अछि, आ विकृति भऽ सकैत अछि दू तरहेँ, शुद्धसँ स्वर ऊपर जाएत आकि नीचाँ। यदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ नीचाँ रहत तँ ओ कोमल कहाएत। म कँ छोड़ि कऽ सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग, ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ शुद्ध। म केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह, ग दैत अछि शांति, म सँ होइत अछि भय, ध सँ दुःख आ नि सँ होइत अछि आदेशक भान। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थानपर रहैत अछि। ऐ सातोपर कोनो चेन्ह नै होइत अछि। जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि आ ई चारिटा होइत अछि, ऐमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒। शुद्ध आ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, ऐमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि-म॑। एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा, रे, ग, म, प, ध, नि, चारिटा कोमल यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒ आ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कऽ 12 टा स्वर भेल। ऐमे स्पष्ट अछि जे सा आ प अचल अछि, शेष चल वा विकृत।" ऐ विवरणसँ स्पष्ट अछि जे श्री ठाकुर जी गजल, बहर आ संगीतक प्रमाणिक जानकारी पाठकक आगू रखलाह अछि। 5) मैथिली भाषा संपादन--- बहुत रास विशेषतामेसँ ई एकटा यूनिक विशेषता अछि। एकर अध्ययन केलासँ अधिकत्तम शुद्ध मैथिली लीखब आबि सकैए (कोनो भाषा पूर्ण रूपेण शुद्ध नै होइ छै)। किछु उदाहरण देखल जाए-- उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम, मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ, षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइए आ बाजलो जेबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) ---------------------------------------- मने ऐ लेखकेँ पढ़लासँ लिखित आ उच्चरित दूनू रूपक दर्शन भेटत आ पाठक एकै ठाम ई व्याख्या देखि सकै छथि। वर्तमान समयमे ई आलेख मैथिली भाषाक मानकीकरण लेल मीलक पाथर जकाँ अछि संगे संग ई मिथिलाक सभ जातिक उच्चारणपर अधारित अछि तँए पुरान व्याकरणशास्त्री सभहँक व्याख्यासँ बेसी प्रमाणिक ओ लोकप्रिय अछि। 6) मैथिलीक बहर विहीन गजलक संदर्भ-- श्री ठाकुर प्रमाणिकता पूर्वक बहर विहीन गजल सभहँक खंडन केलाह कर विस्तृत विवरण ऐ शास्त्रमे भेटैए-- लोकवेद आ लालकिला: आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”, रामभरोस कापड़ि“भ्रमर”, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि। कलानन्द भट्ट भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-17 वर्ण दोसर पाँती- 18 वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-21 मात्रा, दोसर पाँती- 21 मात्रा, मात्रा मिल गेलासँ आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतऽ दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतऽ गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रम टूटि गेल। --------------- आ एनाहिते सभ बहर विहीन गजलक तक्ती कएल गेल अछि। ऐ पद्धितसँ समान्य पाठक सेहो बहरक निर्धारण कऽ सकै छथि। 7) मैथिली गजलक इतिहासकेँ दू भागमे बाँटब--- श्री ठाकुरजी मैथिली गजलक प्रवृति, काल ओ प्रमाणिकताकेँ हिसाबसँ दू खंडमे बटलाह 1) 1905सँ लऽ कऽ 2008 धरि "जीवन युग" आ 2008कक बाद बला कालखंडकेँ ओ "अनचिन्हार आखर"क नामपर "अनचिन्हार युग"। संगीतकार आ संगीतविद भेनाइ अलग-अलग गप्प छै। संगीतकार संगीतक रचना करै छै तँ संगीतविद संगीतक फार्म के। तेनाहिते शाइर आ अरूजी भेनाइ अलग-अलग गप्प छै। शाइर शाइरी केर रचना करै छै तँ अरूजी ओकर फार्म के। केखनो काल बहुमुखी प्रतिभा बला रचयिता दूनू काज करै छै। मुदा काजमे अंतर रहितों दूनू एक दोसरापर टिकल छै। केखनो काल शाइर वा संगीतकार भावमे आबि कऽ फार्मकेँ तोड़ि नव फार्म बना दै छै। आब ऐठाम अरूजी वा संगीतविद ओकरा अपन भाषा वा स्वरक अनूकूल बनेबाक ले प्रयत्न भऽ जाइ छथि आ एही ठाम शुरू भऽ जाइत छै संगीतकार आ संगीतविद वा शाइर आ अरूजी के झगड़ा। मुदा ई झगड़ा शुद्ध रूपसँ वैचारिक होइत छै। केखनो काल कऽ व्यक्तिगत सेहो बनि जाइत छै। मुदा सभ पक्षकेँ बुझबाक चाही जे केहनो नीक फार्म वा भाव किएक ने हो अपन भाषा वा अपन लय केर हिसाबसँ हेबाक चाही। जँ हम भारतीय शास्त्रीय संगीतमे वेस्टर्न सुर लऽ रहल छिऐ तँ ई धेआन राखऽ पड़त जे ओकर लय पूर्ण रूपेण भारतीय हो। जँ सुर भारतीय नै हएत तँ ओ गीत किछुए दिनमे बिला जाएत। हमरा हिसाबें भारतमे फ्यूजन संगीत किछु दिन लेल लोकप्रिय तँ भेल मुदा जल्दिए बिला गेल कारण संगीतकार सभ वेस्टर्न तत्व तँ लऽ लेलाह मुदा ओकर भारतीयकरण करबामे असफल भऽ गेलथि। मैथिलीक शाइर सभ वैचारिक युद्ध करबाक बदला घर-घराड़ीक गप्प आनि दै छथि। हुनका बुझाइन छनि जे हमरा लग पाइ अछि तँ हमर बात किएक ने उपर रहत। ओहन शाइर ईहो कहै छथि जे अमुक लोक वा अमुक संस्था जोनो हमर रोजी-रोटी चलबै छथि जे हम हुनकर गप्प मानब। श्री गजेन्द्रजी द्वारा लिखल गजलशास्त्रक दोसरे खंडसँ मैथिलीक किछु नकली शाइर सभ क्रोधित भऽ गेलाह कारण ई शास्त्र हुनकापर प्रश्नचिन्ह लगा देलक। तँए ओ नानाप्रकारक आरोप-प्रत्यारोपपर आबि गेलथि मुदा सच सदिखन सच होइ छै आ ओकर कोनो विकल्प नै छै। ऐ मुख्य विशेषता सभकेँ अलावे आर बहुत रास विशेषता छै जेना मैथिली-उर्दू गणना, विकारी प्रयोग आदि जकरा ऐ छोट आलेखमे समटल नै जा सकैए। पाठकसँ आग्रह जे पूर्ण रसास्वादन लेल मूल पाठ पढ़थि। आब आबी ऐ पोथीमे संकलित गजल सभपर। गजल दिस चलबासँ पहिने हम किछु निवेदन करब। जेना की पहिनहें हम कहने छी जे गजेन्द्र ठाकुरजी रचैत-रचैत गजल ओ गजल शास्त्रकेँ मजगूत केलाह तँए ऐ संग्रहमे ओहनो गजल सभ अछि जैमे काफिया नै अछि (ओना पोथीक अंतमे शुद्धि पत्र देल गेल अछि अजुक हिसाबसँ)।, तेनाहिते कोनो गजलमे बिनु काफियाक रदीफ भेटत। हँ, सभ गजल अरबी बहर ओ सरल वार्णिकमे अछि। जँ बिना शुद्धिपत्रकेँ देखी तँ आलोचक ऐ गजल सभकेँ खारिज कऽ सकै छथि आ तैमे किनको आपत्ति नै। मुदा ऐ ठाम ई धेआन राखब बेसी जरूरी जे ई गजल सभ प्रयोगिक स्तरपर लिखल गेल अछि चाहे ओ संस्कृतक तुकांत विहीनि काय्यक प्रयोग कहियौ की मैथिली गीतक पारंपरिक गीतक तुकांतक प्रयोग आ ऐ प्रयोग सभसँ गुजरलाक बादें श्री ठाकुजी गजलशास्त्र दिस गेलाह। जँ ऐ संग्रहक गजल सभकेँ नीक जकाँ पढ़बै तँ तीनटा प्रयोग नीक जकाँ लक्षित हएत--- 1) जँ गजल बिना कफियाक हेतै ( संस्कृत जकाँ ) तखन केहन हेतै 2) जँ काफिया नै मुदा खाली रदीफ होइक तखन केहन हेतै आ 3) जँ अरबी बहरमे होइक तखन ओकर गायन केहन हेतै। ऐ लेल श्री ठाकुरजी दीक्षा ठाकुरसँ अपन किछु सलेक्टिव गजल गबा कऽ प्रयोग कऽ लेने छथि जे की ऐ लिंकपर अछि-- आब आलोचक सभ ऐ ठाम ई कहि सकै छथि जे प्रकाशित होमएसँ पहिने एकरा सही कएल जा सकै छलै आ से गप्प सही अछि मुदा से केलासँ कोन प्रयोग कोना भेलै से हटि जाइत तँए संग्रहमे गजल मूल प्रारूपमे अछि आ अंतमे शुद्धिपत्र देल गेल अछि। तँ आब ऐ संग्रहक किछु गजलक मूल प्रारूपकेँ देखी--- ऐ संग्रहक पहिल गजलक मतला अछि-- बझाओल गेलैए चिड़ैया एना रे कहैए हितैषी ई शिकारी बड़ा रे अजुके नै सभ दिनसँ सभ दिनसँ शिकारी अपना आपकेँ चिड़ैयाक हितैषी कहैए आ तकर परिणाम की होइ छै से सभकेँ बूझल छै............... दोसर गजलक दोसर शेर देखल जाए--- क्रूर स्वप्न आ सुन्दर जीवन देखलौं निन्नसँ जगलापर कोना हम मानब जँ कियो ई कहलक किछु नै बदलैए सपना आ यथार्थपर बहुत तर्क वितर्क छै मुदा एकरा काव्यत्मक रूपमे देखू जे की मजा छै। कहबी छै जे मिथिलामे आगि लागि गेल रहै मुदा तैयो जनक अविचलित रहि गेल छला। दोसर कहबी छै जे रोम जरैत छल आ नीरो बंसी बजा रहल छल। दूनू घटना दुनियाँक दू छोड़पर भेल छल मुदा कतेक साम्यता छै से देखू। एही घटनाकेँ श्री ठाकुरजी ऐ शेरमे बान्हि देला-- मनुख जरैए गाम कनैए हमरा की चद्दरि तनने फोंफ कटैए हमरा की तेरहम गजल देखू-- अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथसँ निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तँ अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ ऐ गजलमे शाइर संस्कृतक अनुकरणपर काफिया मात्र चंद्रबिंदुकेँ लेने छथि ( मात्र प्रयोगक खातिर)। ऐ गजल सभहँक अलावे ऐ संग्रहमे अजाद गजल ओ बाल गजल सेहो अछि मुदा हम अपन विचारकेँ विराम दऽ रहल छी आ आग्रह करै छी जे मैथिली गजलक प्रयोगसँ गुजरबाक लेल ऐ संग्रहकेँ जरूर पढ़ी। 2 चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी (आलोचना) अपन समीक्षाक श्रृंखला लेल आइ हम रमेश कृत कथित गजल संग्रह " नागफेनी " अनने छी। चूँकि ऐ संग्रहक सभ गजल बेबहर अछि तँए ऐ गजल सभपर हमर कोनो टिप्पणी नै रहत। कारण सभ समीक्षामे वएह तर्क, वएह घोंघाउज बेर-बेर आएत। एक बेर फेर हम कही जे हमर समीक्षा वा आलोचना-समालोचनाक अधार सदिखन व्याकरण रहैत अछि कारण हरेक लेखक रचनामे भाव (भावना) तँ रहिते छै संगे-संग सभ लेखक भावना अलग-अलग होइत छै तँए हम भावक अधारकेँ स्थायी नै मानै छी। ऐ पोथीमे लेखकक छोड़ि शिवशंकर श्रीनिवासजी भूमिका अछि मने कुल दू टा भूमिका। आ हम अपन समीक्षा लेल इएह दूनू भूमिकाकेँ चुनलहुँ अछि। एही दूनू भूमिकाक अधारपर हम तात्कालीन गजल आ ओकर रचियताक मनोवृतिकेँ उजागर करबाक प्रयास केलहुँ अछि। पहिने शिवशंकरजीक भूमिका अछि तकर बाद शाइरक मुदा हम पहिने शाइरक भूमिकाकेँ विवेचित करब तकर बादें शिवशंकरजीक भूमिकापर आएब। शाइरक भूमिकामे कुल 13टा बिंदु अछि ऐमेसँ मात्र हम पहिल,दोसर, चारिम आ पाँचम बिंदुकेँ विवेचित करब। बाद बाँकी बिंदु सभ हुनक व्यक्तिगत छनि। बिंदु-1) "गजलक ई कृति ओहि समालोचक लोकनिकेँ समर्पित छनि, जिनका लोकनिक घोंकचि जाइत छनि नाक, गजलक नामें सुनि।“ ऐ पहिल बिंदुसँ ई नीक जकाँ बुझाइत अछि जे रमेशजी सेहो आलोचक सभकेँ बिना मापदंड देने बिना आलोचनाक उम्मेद केने छथि। मुदा हमर स्पष्ट मानब अछि जे ओइ समयक आलोचक सभ गजलक आलोचना नै कऽ कऽ गजलपर बड़का उपकार केने छथि कारण ओहि समयक 99 प्रतिशत अयोग्य अछल आ अछि एवं बचल 1 प्रतिशत गजल विजयनाथ झा ओ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक अछि जिनका ई सभ गजलकार मानिते नै छथि। बिंदु-2) "गजलक स्थापना हेतु ओकरा पक्षमे तर्ककेँ ओतबे मथल गेल जतबा ओकरा विपक्षमे कुतर्ककेँ। तँए आब हम कए टा तथ्यकेँ नहिं दोहराबए-तेहराबए चाहैत छी जे गजल आब ओ नहिं अछि जे अपन शास्त्रीय रूपमे छल, एकरामे नवकविता बला क्लिष्टता, दुरूहता आ अ-संप्रषेणीयता आदि नकारात्मक नहि छैक, एकरामे भाव आ अभिव्यक्ति दुनू आसान आ सकारत्मक छैक, आधुनिकताक कोनो कमी नहि छैक,आब ई माशूकाक आँचर नहि अछि आ ने शाकी. शराब, जाम आदिक बंधनमे जकड़ल अछि, ई नवकविता आ पुरान कविताक बीचक रस्ता थिक, एकरा गेयधर्मिताक पैमानापर नापब पुरान कट्टरता थिक,एकर शास्त्रीय चरित्रकेँ दँतिया कऽ एकर आलोचना करब मात्र गेंग रोपब थिक,दुष्यंत कुमार, फैजसँ लऽ कऽ अदम गोंडवी धरि जे एकर नव कलेवर तरासलनि तकरा स्वीकार करबाक आब कोनो टा अधारे नहिं छेक,आदि-आदि----------|” ऐ दोसर बिंदुसँ ई गप्प स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे आने आन कथित प्रगतिशील गजलकार जकाँ रमेशजी सेहो गजलक संबंधमे भ्रमित छथि। वस्तुतः माशूका एहन नकली शब्द (जे की हिंदीसँ उधार लेल गेल अछि) केँ गजलसँ जोड़ि कऽ ओ अपन भ्रमकेँ प्रदर्शित केलाह अछि। ऐ बिंदुमे सभसँ आपत्तिजनक गप्प दुष्यंत कुमार, फैज अहमद फैज ओ अदम गोंडवीक संबंधमे अछि। ई तीनू गजलकार पूर्ण रूपेण शास्त्रीय गजल लिखने छथि खाली ओ सभ विषय वस्तुकेँ परिवर्तन कऽ देलखिन्ह व्याकरण ओहिना के ओहिना रहलै। मुदा मैथिलीक ई कथित प्रगतिशील सभ बिना बुझने-सुझने हिका सभकेँ प्रसंगमे आनि दै छथि जे की हिनकर सभहँक ज्ञानक सीमाकेँ देखार करैत अछि। ऐ ठाम हम किछु गजलकारक तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी जे कोना हिनकर सभहँक गजल व्याकरण ओ बहरमे अछि--- पहिने कबीर दासक एकट गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी-- बहर—ए—हजज केर ई गजल जकर लयखंड (अर्कान) (1222×4) अछि-- ह1 मन2 हैं2 इश्2, क़1 मस्2ता2ना2, ह1 मन2 को 2 हो 2, शि1 या2 री2 क्या2 हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है, हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ? न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ? तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू-- बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है नकाब उलटे हुए जब भी चमन से वह गुज़रता है समझ कर फ़ूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है मुनव्वर राना (घर अकेला हो गया, पृष्ठ - 37) तक्तीअ बहुत पानी / बरसता है / तो मिट्टी बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 न रोया कर / बहुत रोने / से छाती बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 यही मौसम / था जब नंगे / बदन छत पर / टहलते थे 1222 / 1222 / 1222 / 1222 यही मौसम / है अब सीने / में सर्दी बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 नकाब उलटे / हुए जब भी / चमन से वह / गुज़रता है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 (नकाब उलटे के अलिफ़ वस्ल द्वारा न/का/बुल/टे 1222 मानल गेल अछि) समझ कर फ़ू / ल उसके लब / पे तितली बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 आब राहत इन्दौरी जीक ऐ गजलकेँ देखू-- ग़ज़ल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज की मुज़ाहिफ सूरत) चरागों को उछाला जा रहा है हवा पर रौब डाला जा रहा है न हार अपनी न अपनी जीत होगी मगर सिक्का उछाला जा रहा है जनाजे पर मेरे लिख देना यारों मुहब्बत करने वाला जा रहा है राहत इन्दौरी (चाँद पागल है, पृष्ठ - 2४) तक्तीअ = चरागों को / उछाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 हवा पर रौ / ब डाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 न हार अपनी / न अपनी जी / त होगी 1222 / 1222 / 122 (हार अपनी को अलिफ़ वस्ल द्वारा हा/रप/नी 222 गिना गया है) मगर सिक्का / उछाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 जनाजे पर / मेरे लिख दे / ना यारों 1222 / 1222 / 122 मुहब्बत कर / ने वाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 फेरसँ मुनव्वर रानाजीक एकटा आर गजलकेँ देखू-- हमारी ज़िंदगी का इस तरह हर साल कटता है कभी गाड़ी पलटती है कभी तिरपाल कटता है सियासी वार भी तलवार से कुछ कम नहीं होता कभी कश्मीर कटता है कभी बंगाल कटता है (मुनव्वर राना) 1222 / 1222 / 1222 / 1222 (मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन) हमारी ज़िं / दगी का इस / तरह हर सा / ल कटता है कभी गाड़ी / पलटती है / कभी तिरपा / ल कटता है सियासी वा/ र भी तलवा/ र से कुछ कम / नहीं होता कभी कश्मी/ र कटता है / कभी बंगा / ल कटता है आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू-- 2122 / 2122 / 2122 / 212 हो गई है / पीर पर्वत /-सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए। आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू— 1222 / 1222 / 1222 / 1222 ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी क़तारों में अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक़ के चाँद-तारों में रहे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तज़रबे से बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में. फेर गोंडवीजीक दोसर गजल लिअ— 2122 / 2122 / 2122 / 212 भूख के एह / सास को शे / रो-सुख़न तक /ले चलो या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद में पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो गंगा जल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो. ऐ गजल सभमे छंदानुसार छूट सेहो लेल गेल छै मुदा रमेशजीक वा अन्य कोनो मैथिली गजलकार जे भ्रमवश कहै छथि जे उर्दू-हिंदीक गजलमे बहर नै छै से हुनक बेसी ज्ञानक (??????????) परिचायक अछि। चाहितों हम फैज अहमद फैज केर गजलक तक्ती नै देखा रहल छी कारण समझदार आदमी कम्मे तथ्यसँ बेसी बात बूझै छथि। बिंदु-4) मुदा शास्त्रीयतासँ दूर भैयो कऽ गजलत्व आ गजलजन्य अनुशासन समान्यतः गजलमे कायम रहय से प्रायः जरूरी छै। फैशनपर उकड़-गजल लीखि गजलक इतिहासमे नाम घोंसियायब एकटा कुत्सित प्रयास थिक, एहन लोक नवकविते अथवा आने कोनो विधामे डंड-बैसकी करथि से प्रायः उचित। किछु तुकबंदी मिला कऽ लीखि लेब गजलक संग अ-चेतनमे कयल गेल बलात्कार थिक। एहन लोक ओना सभ विधामे थोड़ेक दिन कुथैत छथि आ पुनः अपने आप साहित्यसँ पोछा जाइत छथि। तँए एहन गजलकारक कोनो तेहन चिन्ता आलोचक नहि करथि।“ ऐ चारिम बिंदुमे रमेशजी अपन भ्रमक सीमापर पहुँचि गेल छथि। बंधु गजलजन्य अनुशासने के तँ गजलक शास्त्रीय रूप वा गजलक व्याकरण कहल जाइत छै। ऐ बिंदुक हिसाबें देखल जाए तँ रमेशजी अपने फैशनक नामपर गजल लिखला आ गजलक संग बलात्कार केलथि। बिंदु-5) "गजलमे निहित सौंदर्य-बोधकेँ चीन्हब आवश्यक छैक।“ ई पाँचम बिंदु पूरा-पूरी गलत आ भ्रमयुक्त अछि। रमेशजीक हिसाबसँ "सौंदर्य-बोधकेँ चीन्हब आवश्यक छैक" मुदा हमर कहब जे जखन एकबेर "सौंदर्य-बोध" भइये गेलै तखन फेरसँ चिन्हबाक बेगरता की? सही कथन एना हेतै---“गजलमे निहित सौंदर्यकेँ चीन्हब आवश्यक छैक।“ओनहुतो ई वाक्य हिंदीक नकल अछि। आब बहुतों भक्त लोकनि एकरा प्रेसक गड़बड़ी कहता...................... कुल मिला कऽ देखल जाए तँ रमेशजी अपने गजलक संबंधमे ततेक ने भ्रमित छथि जे वास्तवमे ई पोथी "नागफेनी" बनि गेल अछि आ वास्तविक गजलकेँ लहुलुहान केने अछि। शिवशंकरजीक आलेख अपेक्षाकृत नीक अछि ( ओहि समयक अन्य आलेखक मुकाबले) मुदा शिवशंकरोजी बहुत रास तथ्यपर भ्रमित छथि। प्रथमतः ओहो आन कथित प्रगतिशील गजलकार जकाँ गजलकेँ दरबारी मानै छथि जखन की गजलमे प्रयुक्त शराब, माशूक, हुस्न, इश्क आदिक परलौकिक अर्थ सेहो होइत छै आ सभ शाइर ऐ शब्द सभकेँ प्रतीकक रूपमे प्रयोग करै छथि। दोसर जे श्रीनिवासजी कहै छथि----"गजलक अपन अनुशासन छैक, बंदिश आ सीमा छैक। ओकरा रखैत रमेशजी गजल कहबामे सफल भेला हे जे हिनक विशेषता आ सफलता दुनू थिक"......... मुदा गजलक अनुशासन की छै आ बंदिश की छै तकर जानकारी श्रीनिवासजी पाठककेँ नै दऽ रहल छथि आ ने रमेशजीक गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ कहि रहल छथि जे ऐ कारणें रमेश जीक गजलमे अनुशासन अछि। कुल मिला कऽ ई दुन्नू आलेख भ्रमयुक्त अछि आ मैथिली गजलक वास्तविक साक्ष्यसँ बहुत दूर अछि। ओना हमरा ई मानबामे कोनो दुविधा नै जे ऐ संग्रहक सभ रचना नीक तुकांत कविता अछि ( उपरमे साबित भऽ चुकल अछि जे ई सभ गजल नै थिक )। खास कऽ ओहि समय आन गजलकार ( तारानंद वियोगी, देवशंकर नवीन,) आदिक अपेक्षा अपन रचनामे बेसी मैथिली शब्दक प्रयोग केलह अछि जे की ऐ पोथी विशेषता अछि ऐ विशेषता दिस शिवशंकरजी इशारा सेहो केने छथि। तँ चली ऐ संग्रहक किछु रचना दिस जे की हम पाँतिक उदाहरण दऽ कऽ देखाएब-- नवम रचनाक ई पाँति नीक अछि-- लाख लाख कोस सागर के अगम अगम जल देख हेलवाक छौ तँ तुरंत जूटि जो एगारहम रचनाक ई पाँति देखल जाए-- कियो केकरो पुछारि क' क' की करतै सभ अपन-अपन दर्द के पिबैत अछि जँ अप्रस्तुत योजना विधान देखबाक हो तँ सोलहम रचनापर आउ-- जामु आ गम्हारि केर छाह तर मे बाँस केर कोपर सुखैल जा रहल मानल जाइत अछि जे बाँसक छाहरि तर कोनो गाछ नमहर नै भ' सकैए कारण बाँसक प्रकृति गरम होइत छै मुदा रचनाकार एतऽ उन्टा गप्प कहि अप्रस्तुतकेँ प्रस्तुत केलाह अछि। सैतीसम रचनाक ई पाँति देखू- की सोचय अइ देसक जनता एक्कहि खिच्चड़ि एक्कहि हंडा जँ 58 टा रचनामेसँ हमरा कोनो एकटा रचना चूनबाक जरूरति पड़त तँ हम 12हम रचनाकेँ ऐ संग्रहक श्रेष्ठ रचना कहब। तँ लिअ ऐ बारहम रचनाक टूटा पाँति-- सौंथ जए टा चाही तए टा छूबि लिअ टीस मुदा ताजिन्दगी रहैत छै 3 मायानंद मिश्रक "मैथिली साहित्यिक इतिहास" स्व. मायानंद मिश्रजीक लिखल पोथी "मैथिली साहित्यिक इतिहास" जे की 2014मे प्रकाशित भेल अछि तकर पृष्ठ 243पर लिखल अछि--" अभिव्यंजनावादी काव्यक उत्तरार्धमे एकटा नवीन गीत प्रवृतिक जन्म भेल अछि जे अछि गीतलक परम्परा जकरा भ्रमे गजल कहल जाइछ जकर जन्मदाता मैथिलीमे जीवन झा छथि-----। एहि धाराक मुख्य कवि गीतकार छथि मायानंद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कलानंद भट्ट, डा. महेन्द्र, सरस आदि"। हमरा जनैत एहि पाँतिक लेखक मायानंद मिश्रजी नै छथि कारण पृष्ठ संख्या 206पर माया बाबू जीवन झाजीक प्रसंगे लिखने छथि " ई महेशवाणी ओ भास गीतक संगहि प्रथम-प्रथम गजल रचना कयल"। प्रश्न छै जे पृष्ठ 206पर जे गजल कहा सकैए से पृष्ठ243पर किएक नै ? ई भ्रमक उल्लेख पृष्ठ 206पर हेबाक चाही छल। ओना बहुत आदमी कहि सकै छथि जे माया बाबू अपन पूर्वमतक खंडन केलाह अछि। कहब बहुत सोंझ होइत छै कारण भारतमे लोकतंत्र छै मुदा साबित केनाइ बहुत कठिन कारण ओइमे मेहनति लागै छै। ओनाहुतो जे गजल ओ कथित गजलक अध्येता छथि से जानै छथि जे ऐ पोथीसँ पूर्व माया बाबू एहन कोनो लिस्ट वा चर्चा नै केने छथि। ई लिस्ट पहिले पहिल ऐ पोथीमे आएल अछि हमरा जनैत ( जँ हम गलत छी लेख अवश्य उद्धृत कएल जाए)। आब कने 9 फरवरी 2014मे दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला अवाजमे आशीष अनचिन्हारक गजल संबंधी आलेख " मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक भूमिका देखल"जाए। ओहि आलेखमे स्पष्ट रूपें साबित कएल गेल छै जे माया गुट ओ सरस गुट केर कथित रचना गजल नै गीतल श्रणीमे अबैए। ऐ लेखसँ पहिने सरस गुट केर सभ कथित गजलकारक रचनाकेँ गजल मानल गेल अछि। मुदा प्रथमतः 9 फरवरी 2014मे ऐ भ्रमकेँ तोड़ल गेल। आब कने ऐ पोथीमे देल गेल भूमिकाकेँ देखू जे की भीमनाथजी द्वारा लिखल गेल अछि आ 23 फरवरी 2014केँ लिखल गेल अछि। आब ईप्रश्न उठैत अछि जे जँ पृष्ठ संख्या 243परहँक अंश माया बाबूक लिखल नै छनि तँ किनकर लिखल छनि। उत्तर अनिर्णीत अछि मुदा जँ 9फरवरी 2014मे प्रकाशित आशीष अनचिन्हारक लेख ओ माया बबू किताबक उक्त पोथीमे देल तथ्यकेँ मिला कऽ अनुमान कएल जाए तँ कहल जा सकैए जे भीमनाथ झा जी ओइ अंशकेँ लिखने छथि संगे-संग ऐ पोथीक आर बहुत रास तथ्यमे संशोधन केने छथि। जखन कोनो अपराधी अपराध करै छै तखन ओ सबूत मेटेबाक प्रयास करै छै जैमे ओ मात्र 99 प्रतिशत सफल होइ छै। भीमनाथ जी संशोधन केलाक बाद अपन भूमिकामे पृष्ठ 6-7पर लिखै छथि जे--" लेखक ऐहि ग्रंथकेँ सम्पन्न कयलनि 1990 ई.मे।------- ठाम ठीम परिशोधनक सेहो इच्छा रहल होनि। मुदा ओहि लेल पलखति नहि भेटलनि।--------- तें ई ग्रंथ ठीक ताही रूपमे आयल अछि जाहि रूपमे प्रथम लेखन कऽ लेखक राखि देने रहथिन"।---- एकर मतलब जे ई पोथी 1990मे सम्पन्न भेल आ बिना कोनो संशोधनकेँ 2014मे प्रकाशित भेल। मुदा आदरणीय भीमनाथजीक उपरक मंतव्यक खंडन ऐ पोथीमे जत्र-कुत्र छिड़िआएल अछि। विशेष नै कहि पृष्ठ 286पर चली जतऽ 1991मे डा. रामदेव झाजीकेँ साहित्य पुरस्कार भेटबाक वर्णन अछि। जँ 1990 आ 1991केँ सम मानी तैयो ओही पृष्ठपर रामदेवजीकेँ सेवानिवृति घोषित कएल गेल अछि जे 1990 के बहुत बादक घटना अछि विशेषतः 1996-1998 लगीचक। तेनाहिते पृष्ठ 287पर प्रभाष कुमार चौधरीजीक मृत्युक सूचना अछि। आब ई कहू जे 1990मे प्रभाषजी कोना मरि गेलाह। हुनक मृत्यु तँ 1998मे भेल छनि। उपरक ऐ बहुत रास महत्वपूर्ण संशोधन सभसँ ई साबित भऽ जाइए जे माया बाबूक मृत्युक बाद आ ऐ पोथीक प्रकाशित हेबासँ पहिने बहुत रास मन इच्छित संशोधन कएल गेल छै आ से संभवतः भीमनाथजी केने छथि। आब दू टा प्रश्न उठैए पहिल जे भीमनाथजी ई संशोधन किएक केलाह आ दोसर जे हुनकासँ ई गलती कोना छुटलनि। पहिल प्रश्नक उत्तर सद्यः अछि जे ई संशोधन माया बाबूक गजल संबंधी अक्षमताकेँ झपबाक लेल कएल गेल अछि। चूँकि वर्तमान समयमे गजल संबंधी सभ निष्कर्ष सभकेँ बूझल छनि तद्अनुरूप माया बाबूक नीक छवि बनेबाक लेल ई काज कएल गेल। एकर सबूत पोथीक पाछू बला कवरमे मायाबाबूक परिचयसँ भेटत। उक्त परिचयमे "अवान्तर"केँ कविता संग्रह घोषित कएल गेल छै जखन की माया बाबू अपने एकरा गीतल बाहुल्यक कारणें "गीतल संग्रह" कहने छथिन्ह। हमरा बुझने सायास आ सुनियोजित ढ़ंगे ऐ पोथीमे संशोधन कएल गलै जकर उद्येश्य छल माया बाबूक गजल संबंधी अक्षमताकेँ झाँपब जे की अंततः सफल नै भेल। आब दोसर प्रश्नपर चली मूलतः ई भीमनाथजी जानि बूझि कऽ कएल गेल गलती नै अछि बल्कि ई तँ हुनक बिनु पढ़ने किछु लीखि देबाक हिस्सक बुझाइत अछि। हमर देल गेल तथ्यसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे माया बाबू ऐ पोथीकेँ 1998-99सँ शुरू कऽ मृत्यु धरि लिखला मुदा भीमनाथजी अपन हिस्सकक अनुसार ऐ पोथीकेँ नै पढ़ला जकर परिणाम भूमिकामे स्पष्ट अछि। माया बाबूक ऐ पोथीक बहन्ने भीमनाथजी द्वारा लिखल सभ भूमिका, आलोचना, समालोचना,समीक्षा केर अध्य्यन हेबाक चाही आ देखबाक चाही जे कहीं ईहो सभ बिनु पढ़ने तँ नै लिखल गेल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी आधुनिक मैथिली कथा साहित्यमे नब-नब कथाकार नब-नब कथाक रचनामे संलग्न छथि। हुनक प्रयास निश्चित रूपे मैथिली कथाक संख्यात्म विस्तार हेतु सराहनीय छन्हि। मुदा मात्र संख्यात्मक विस्तारसँ साहित्यक सागरक गहराइकेँ विस्तार नै भऽ सकैत अछि। जहिना बाढ़िक पानिसँ धारक दुनू कात दूर-दूर तक धारक विस्तार बुझना जाइत रहै छै, मुदा बाढ़ि सटकिते धारक सत्यप्रकट भऽ जाइ छै तहिना साहित्योमे होइ छै। कथा एहेन हेबा चाही जाहिमे भाषा-भावक ताल-मेलक संगे-संग कथामे जीवंतता आ दीर्घजीवी होइक तथ्य समाहित होइ। मात्र आधुनिकताक चोला पहिरा देला मात्रसँ कोनो कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। शब्दाडम्बर कथा नै होइ छै। नीक आ दीर्घजीवन हेतु कथामे विविध तत्वक समावेशकसंगे-संग मानव जीवनक जीजिविषाक प्रखरबिम्ब आ प्रतीक आवश्यक होइ छै। कथामे जौं जीव-जगतक गहनतम गहराइ नै रहै छै तँ ओ कथा बहुत समए धरि जीवित नै रहि सकैए। मैथिलीमे आइ कथाक अनेक नाआें देल जा रहल अछि- दीर्घ कथा, लघु कथा, विहनि कथा इत्यादि। मात्र नाआें रखि देलासँ कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। अदौसँ आइ धरि वएह कथा जीवित अछि जइमे धार छै। जइमे गति छै। जइमे जिनगीक उहापोह छै। जइमे यथार्थ छै आ कल्पनाक एहेन गठन छै जेकरा पाठक छोड़ितो छोड़ि नै पबैत अछि। ऐ दृष्टिए हम नन्द विलास रायक “सखारी-पेटारी”क तानी-भरनीपर विचार करबाक प्रयास करब। ‘सखारी-पेटारी’ िहनक पहिल कथा कृति छियनि। पहिल-पहिल कोनो काज करैमे कोनो ने कोनो त्रुटि हएब आश्चर्य नै। तैयो साहित्य सृजनक सरोकारकेँ देखैत हमर प्रयास रहत जे ऐ संग्रहक नीक-नीक कथाक समीक्षा नीक होइ आ सामान्य भावक कथाक फराक कऽ आगूसँ लेखक अपन कथामे आवश्यकतानुसार सुधारक प्रयास करबा हेतु धियान रखथि। आब हम श्री नन्द विलास राय जीक कथा ‘सखारी-पेटारी’केँ सोझामे रखि खोलबाक कोशिश करब। ‘सखारी-पेटारी’केँ खोलैक काज तँ जनीजातिक छेलनि। साँठब सेहो हुनके सबहक काज छेलनि। आइओ साँठ-उसार करब हुनके अधीन छन्हि। मुदा पुरुख आब बुझू तँ अदहा जनानीए भऽ गेला। साँठ-उसारमे आब हुनक भूमिका अहम भऽ गेलनि अछि। की कहू! सभटा समैक खेल छिऐ। आब देखू ने, श्री नन्द विलास राय पुरुख छथि मुदा ‘सखारी-पेटारी’ साँठि कऽ हमरा पकड़ा देला। हमहूँ पुरुखे। केते दिन धरि सोचैत रहलौं जे ऐ पेटारीकेँ कोनो जनानीएसँ खोलबएब मुदा ओहेन जनाना ताकब केतए। सखारी-पेटारीमे साँठल बौसक सनोमानो तँ कोनो बूढ़े-पुरान ने बुझै छै। थाकि-हारि कऽ पुरुखक साँठल सखारी-पेटारीकेँ अपनेसँ खोलैले तैयार भऽ गेलौं। आब एकटा दिक्कत भऽ गेल। सखारी आ पेटारी जौं अलग-अलग रहितए तब ने बेरा-बेरी खोिलतिऐ। दुनू एक्केमे अछि। चलू सखारी-पेटारीक जगह तँ आब ट्रंक लऽ लेलक। आब ओइमे सँ हम एक सभ समान अलग-अलग करबाक कोशिश करै छी। अपने मने गिरथानि बनैक कोशिशमे आब जे हएत से देखल जेतै। सखारी खुलल। देखू केतेक नीक बौस छै अइमे। समस्त मिथिलावासी एवं मैथिली भाषा-भाषीकेँ समरपित। ठीक बात। यौ, सखारीमे जे समान अबै छै, ओ मात्र घरवारीए सभ समान नै ने रखि लइ छथिन। चाउर, दालि, तरकारी, अदौड़ी, दनौड़ी, करुतेल इत्यादिसँ कनियाँक अबैक खुशीमे भोज-भात होइ छै। सौंसे गौआँ मिलि कऽ बर-कनियाँकेँ आशीष दैत खाइ छै। मुदा ओइ महक काजर, तेल, डोरि, फित्ता आ ककही इत्यादिक बड़ काज। कनियाँ देखए बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ नेना-भुटका तक जे अबैए, सभकेँ कनियाँ अपने हाथे केशमे तेल दऽ ओकरा झाड़ि कऽ ककहै छथिन। ककहि कऽ डोरि वा फित्तासँ बान्हि काजर-सिनुर लगबै छथिन। अगर पेटारीवाली कनियाँ से नै करथिन तँ हुनका भरदुलाहि कहतनि। राय जीक सखारी-पेटारीक समर्पण हमरा मोहि लेलक। हमरा लगैत अछि जे सभ मैथिलकेँ ई पाँति जरूर मोहत। चलू, आब चलै छी जे सखारी-पेटारीमे कोन-कोन तरहक वस्तु-जात अछि। यौ, ‘अप्पन-बात’मे तँ सखारी-पेटारीक वस्तु-जातक कोनो चर्चे ने छै। खाली आत्मेकथा आ समर्पण भरल अछि। यौ रायजी, आब बिआहे संग दुरागमन होइ छै। अहाँ तैयो पछुआ गेलौं। लगैए अहाँक बिआह-दुरागमन दू बेर भेल अछि। चलू- दरब-जात संग हम सर-समान तँ खोलए लेब। मुदा सखारीक दोसर झँपना खोलए पड़त। खुलि गेल। एकसत्तरि। वाह...। आब तँ एके संग दरबजात-वस्तुजात आ सिनुर-टिकुली सभटा चमकए लगल। चलू, देरीसँ एलौं मुदा दुरूश एलौं। सोइरी छछारब, निपुतराहा, जाति-पाति, वाड़ीक पटुआ आ बाबाधाम- ऐ संग्रहक उत्तम श्रेणीक कथा अछि। आब हम सोइरी छछारैत बाबा धामक यात्रापर चलै छी। बीचमे निपुतराहा, जाति-पाति आ वाड़ीक पटुआ सन कथापर अँटकैत ऐ यात्राकेँ विश्राम देब। ई पाँचो कथा सखारी-पेटारीक विशेष लक्षणसँ युक्त अछि। लक्षणा आ व्यंजना शब्द शक्तिसँ युक्त पाँचो कथा पाठककेँ कल्पना लोकसँ उतारि कऽ यथार्थक धरतीपर उतारैमे सक्षम अछि। मैथिल समाजक पारिवारिक-परिवेश आ तइमे धनक पाछू दौड़ैवाली नारी समाजक सोचपर सोइरी छछारब कथा करारा प्रहार करैत अछि। मालती आ ललिताक जन्मासौचक पश्चात सोइरी छछारैले जे परिस्थिति बनल अछि ओ मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारक यर्थाथ अछि। ऐ कथामे रीनाकेँ उपस्थित कऽ कथाकार बहुत होशियारीसँ कथाकेँ अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचा देला अछि। जइ घरमे रीनानै रहै छै तैठाम विवश भऽ कऽ ललिता सन बेटीक सोइरी माइएकेँ छछारैले बाध्य हुअए पड़ै छै। मैथिल परिवारमे ललिता ऐ परिस्थितिकेँ भोगैत अखनौं जीबए लेल मजबूर अछि। ऐ कथाक व्यंग्य निश्चित रूपसँ पाठकक संग-संग भौजाइ लोकनिकेँ झमारबामे सक्षम अछि। सोइरी छछारबसँ निकलि हम जाति-पाति कथाक यथार्थपर अबै छी। मैथिल समाजक पतनक एकटा सभसँ महतपूर्ण कारण जाति-पातिक भेद-भाव सेहो अछि। तथाकथित बुधिजीवी समाजसँ लऽ कऽ श्रवजीवी समाज धरि जाति-पातिक रोग ऐ प्रकार पसरल अछि जे एकर निदान कैंसर आ एड्स विमारीक इलाजसँ अधिक कठिन अछि। कथाकार नुनुबाबूक चरित्रक मादे स्पष्ट कऽ देलनि जे जे समाजमे कोनो जातिक बेकती नुनुबाबूक उपकारसँ बाँचल नै अछि। ग्राम-पंचायतक प्रमुखक जे काज होइ छै तहूसँ अधिक नुनुबाबू समाज लेल कऽ रहल छथि। मुदा गामक जातिवादक समक्ष नुनुबाबू सन बेकती ताबत धरि नै चुनल जेता ताबे तक मैथिल समाजक माथमे जे जातिक कुण्ठाक भुस भरल रहल। आ जाधरि ओकरा बुधिकेँ आड़ीसँ चीरि कऽ विवेकक चुट्टासँ निकालि कऽ फेकल नै जाएत। ‘वाड़ीक-पटुआ’ ठीके बड़ तीत होइ छै। डाक्टर प्रमोद सन पटुआ तीत नै हेतै तँ फेर ई कहाबत किए बनतै। मंगनूबाबू असगरे एहेन बेकती नै छथि। जे सहज सुलभ होइत छै ओ निश्चित रूपे लोककेँ तीत लगै छै बरू ओ मिश्रीओसँ मीठ किएक ने होउ। लेखक निश्चित रूपे ऐ कथाक माध्यमसँ मंगनूबाबू सन लोकक मुँहक संग मनकेँ तीत करबामे सक्षम अछि। अटकैत-फटकैत बाबाधाम लग आबिए गेलौं। माए-बापक सेवा केने की हेतै। माल पोसने दूटा टका आ मनुख पोसने दूटा कथा ओहिना नै कहल गेल अछि। आन समाजक संगे-संग मैिथल समाजक स्थिति दारूण भेल जाइत अछि। ‘जिन मातु पिता की सेवा की’ (जे माए-बापक सेवा केला) केर भावना आइ मरल जा रहल अछि। आइ मैथिल समाजमे बाबाधाम जेबाक होड़ लागल रहैत अछि। बानरक देखा-देखीबला भावसँ भरल हेंजक-हेंज स्त्री-पुखख नब-नब वस्त्र आ तेहने आँखिक भावसँ भरल जखनि गामसँ विदा होइत अछि तँ हमरा सन मुरूख देखिते रहि जाइत छी। माए-बाप आ सासु-ससुरसँ भीन भऽ वृद्ध जनकेँ उपेक्षा करैत आजुक पीढ़ी नीचताक रस्तापर ऐ तरहेँ बढ़ि रहल अछि जे सुकनाक बाबू आ माए सन हजारो माता-पिता आइ पछताइत बाजि रहल अछि- जतने जतेक हम पाप बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाय मरनक बेर हरि क्यो नहि पूछलि एक करम संग जाय। उपर्युक्त पाँचो कथा अपन स्वरूप विस्तारक संगे-संग संवाद, पात्र योजना, परिवेश, भाषा शैली एवं उदेसक कसौटीपर कसल बुझना जाइत अछि। पाँचो कथाक शीर्षक सेहो आकर्षक एवं विषय-वस्तुक अनुरूप अछि। मैथिल समाजक विविध विडम्बनाक उपर्युक्त पाँचो कथा साक्षी अछि। आधुनिक व्यंग्य विधाक कथामे उपर्युक्त कथा जगह पबैक अधिकारी अछि। ‘सखारी-पेटारी’क छह गोट कथा आधुनिक समाजक पतनोन्मुख भाव-धाराकेँ रेखांकित करबाक प्रयास बुझना जाइत अछि। ‘डाक्टर बेटा’, ‘प्रोफेसर बेटा’,‘डिब्बाबला दूध, ‘सोच, ‘भोँट, आ ‘ऐना’ कथामे एक कात माता-पिताक प्रति उपेक्षा अछि तँ दोसर कात सन्तानक प्रति उपेक्षा। ‘सोच’, ‘भोँट’ आ ‘ऐना’मे एक कात विकास हेतु छटपटाहटि, तँ दोसर दिस समाजमे व्याप्त संकुचित मानसिकता। मध्यवर्गीय समाजमे डाक्टर आ प्रोफेसर बनल बेक्तीकेँ परिवारक प्रति उपेक्षा पारिवारिक सिनेह आ समरसताकेँ क्षिण्ण-भिन्न करैबला मानसिकतसँ मानवता मरत। आधुनिक नारी शारीरिक सौन्दर्य बँचबैले सन्तानकेँ स्तनपान करैसँ कटब मातृत्वक प्रति उपेक्षाकेँ प्रदर्शित करैत अछि। ‘सोच’ कथामे प्राद्योगिकी शिक्षाक प्रति युवाकेँ बढ़ेबाक प्रयास छै। ‘भोँट’ आ ‘ऐना’ मनुखक आँखि खोलैक प्रयास अछि। ऐ छबो कहानीमे छोट अकारमे अनेक विषयकेँ उठौल गेल अछि। मुदा ऐ कथा सभमे ऊपरका कहानी सन भाषामे धार नै बुझना जाइत अछि। कथाक शीर्षक आकर्षक एवं विषय-वस्तुक अनुकूल हेबाक चाही। ‘ऐना’आ ‘सोच’ शीर्षक तँ आकर्षक एवं विषयानुकूल अछि। शेष चारि गोट कथाक शीर्षक हमरा बुझने कमजोर अछि। नन्द विलास रायक सखारी-पेटारीमे दू गोट कथा जनता आ सरकारी तंत्रक आँखि मुनौबलिपर आधारित अछि। लेखक दुनू कथाक माध्यमसँ सरकारी क्रिया-कलाप आ गाम-गाममे सरकारी सहायताकेँ बन्दर-बाँटक आद्यान्त वर्णन करबाक प्रयास केला अछि। प्रयासमे लगभग सफलो भेला अछि। पोषाहारक अनाजक विरोधमे जेना प्रमुख मामिलाकेँ खतम करेलक से ‘निवास प्रमाण पत्र’ मे लगभग विरोधा भास लगैत अछि। जखनि मुखिया आ प्रमुख लेल एकटा प्रमाण-पत्र बनबबैमे संग नै दइ छै ओ गहुमकेँ बन्दर-बाँट कऽ सत्यताकेँ सिद्ध कऽ शिक्षककेँ गहुम कीनि कऽ बाँटैले केना कहि सकै छै? एतबे नै, ओइ शिक्षिकाक पति गामक दबंग अछि। पोषाहारक गहुम बेचि तँ अखनि साधारण बात छी। तँए दुनू कथाक प्रमुखक चरित्रमे विश्वसनीयतासँ अलग काल्पनिकता आबि गेल अछि। ‘गोबरबिछनी’, ‘असल बेटा’, ‘ननदि-भौजाइ’, ‘विवेकक विवेक’, ‘सभसँ पैघ पूजी’, ‘चौरचनक दही’क संग ‘महाजन’ शीर्षकक कथाकेँ हम आदर्शवादी कथाक रूपमे देखि सकै छी। अही कोटिक कथामे भावक सुन्दर समन्वय देखना जाइत अछि। कथा रचना, ओकर विस्तारक मध्य आ अन्तक सुन्दर परिपाक अछि। रायजी कथा गढ़ैमे माहिर छथि। कथाक ताना-बानामे बान्हब पुन:ओकरा अन्तिम परिणति धरि लऽ जाएबमे रूकै नै छथि। ऐ कोटिक कथाक भाषा आ भाव-भंगिमा सरस आ प्रवाहगामी छन्हि। “महान कथी? धनीक छी तँए महान? नै, जे हृदए महान हुअए। जेकर आत्मा महान हुअए। ...वएह महान आदमी हएत आ महाजन कहौत।” (महाजन) भाषाक एकटा आरो बानगी- “एक परनहिया तँ शोकेमे डुमल रहली। बेटी बुचनीक मुँह देखि फेरसँ काज-राज करए लगली।” (गोबर बिछनी) राय जीक भाषा परिवेश जनित भावकेँ समाहित करबामे पूर्णरूपेण सक्षम छन्हि। “जखनि नेना लाल पीसा साइकिलपर मीना बहिनकेँ बैसा मदना विदा भेला तँ ओ बौम फाड़ि कऽ कानए लगला।” (विवेकक विवेक) एे ‘कानब’मे एक्के संग अनेक भावक विस्तार अछि। समग्र कथा संग्रहकेँ पढ़ला पछाति केतौ-केतौ हिन्दी अथबा उर्दू शब्दक अनपच बेवहार भेल छै। ओ हमरा अनसोहाँत लागल। जेना- जे ‘दिल’ महान होअए। हमरा सभ बात ‘मालूम’ भेल। ‘लाइन, कौलेज, प्रोफेसरक, इंजीनियर, बी.ए, डी.एम.सी.एच, चौठियाकेँ अपन गलती ‘महसूस’भेल अछि। अन्तिम खानामे, विवेच्य कथाक शैली आ शीर्षक प्राय: अभिधामूलक छन्हि। लक्षणा आ व्यंजनाक माध्यमसँ ऐ कथा सभमे आरो आकर्षण बढ़ि सकैत छेलै। संगे-संग भावक अभिनय रूप सेहो। अन्तत: हम कहि सकै छी जे ‘सखारी-पेटारी’ मैथिली कथा साहित्यक विकासक एकटा नीक कड़ी सिद्ध होएत। लेखकसँ आग्रह जे भाषा विचारक माध्यमे टा नै वाहको होइ छै। तँए भाषा-भावक संतुलित बेवहारसँ साहित्यमे रमणीयता अथवा भावक प्रवाह तीव्रगामी होइत छै। कथामे विषयक संग-संग नब-नब प्रतीक बिम्ब आ बात उठा कऽ पाठककेँ सहजे कथाकार बान्हि सकै छथि। तँए कथामे उतरोत्तर विकास परिलक्षित हएब आवश्यक छै। तथास्तु। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. अरुण कुमार सिंह-सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा एल. डी. सी. आई. एल., भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 maithiliarun@gmail.com Mobile- 8553307071/8880834178 सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा आइ जखन विश्व-मानव इक्कैसम सदीक दोआरि पर ठाढ़ अछि, भारतीय गणतंत्र अपन सतसठिम वर्ष गाँठ मना चुकल अछि, खासकए एहन हालतिमे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक, जे मिथिलाक एकटा भूभाग अछि, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक अवलोकन, विश्लेषण आओर ओकर पुनर्निर्माणक आवश्यकता बहुतो दिनसँ अनुभव कएल जाए रहल अछि। एहि क्रममे साक्षात् होइछ किछु विषय, जेना- गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे आजादीक सतसठि वर्ष कोना बीतल? भारतीय गणतंत्रक एगारहम (11) पंचवर्षीय योजनाक एहि क्षेत्रमे की परिणाम निकलल? एहि क्षेत्रक वर्त्तमान स्थिति केहन अछि? एकर अध्ययन एक गोट आकर्षक विषय अछि; कारण जे आब हमरासबकेँ एकटा स्वतंत्र मिथिला राज्य चाही। सर्वप्रथम गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक भौगोलिक परिवेश, पर्यावरण आ परिस्थितिसँ परिचित भेल जाए। ई अछि बिहारक उत्तर पूर्वांचल क्षेत्र- नदी संस्कृतिक परिशिष्ट भूमि, मैथिली भाषायी प्रदेश.... एहि क्षेत्रक शीर्ष पर अछि नेपालक सप्तरी आओर मोरंग राज धन-धान्यबला प्रांगण... गांजाक खेती तथा ओकर तस्करी.... एकर नीचाँक भाग अछि- दक्षिण गंगाक कछेर ...झरवेर, पटेर, झौआ, बांस तथा अनकठ-गाछक जंगल- कछेरसँ कछेर धरि कतोक कोसक बीहड़! जतए चोर-डकैतक आतंकसँ भयंकर राति लग-पासक लोकक नीन हराम करैत रहैत अछि। कज्जलबन नामधारी एतुका खोपड़ीवला गाम, जे बासाक रुपमे बसैत आ उजड़ैते रहैत अछि, जकर कतहु कोनो स्थायी अस्तित्व नहि- आइ एतएतँ काल्हि ओतए। आखिर कछेर पर बसल लोकक अस्तित्वे की? कखनहुँ प्राकृतिक आपदासँ राति-दिनु सामना तँ कखनो भूखमरीक समस्या, ई तँ साधारण व्यक्तिक दैनन्दिनी, एहीमे किछु एहनो जे अपन लूटि-खसोटिसँ अर्जित सम्पत्तिक भंडाफोड़ भए जएबाक डरसँ प्रशासनकेँ रोकबाक लेल कृतसंकल्पित, मुदा स्थिति दुहूक एकहि अर्थात् सुतलोमे सदिखन जगले रहबाक हेतु विवश। एकर दोसर भाग अछि कोशीक उपत्यका.... कास एवं मोथा वला घाससँ आच्छादित मैदान। एहि भू-भागक पूरबमे पश्चिम बंगाल एवं बंगला देशक सीमा तँ पश्चिममे अछि सारन तथा चम्पारनक भोजपुरी भाषी गाम! एही सीमा-रेखासँ बान्हल ई छोटसन द्वीप खण्ड जकर गाम, शहर तथा कसबाक अपन इतिहास छैक जे कखनहुँ कोशीक ताण्डवक बीच भसिआइत रहल, तँ कखनहुँ ओकर कछेरक लोककेँ बीतल संस्कृतिक बोध करबैत रहैत अछि। एहि कोशीक भौगोलिक पृष्ठभूमि एकहि सङ्ग अत्यन्त मनोहारी ओ कुख्यात रहल अछि। एतुका पुरबा बयारमे भोर-साँझ एक दिस जतए कृषि कार्यक सुगन्धि व्याप्त रहैत अछि तँ दोसर दिस विभिन्न जीव जन्तुकेर अवसानक दुर्गन्ध, हँ बीच-बीचमे भिन्न-भिन्न माछक सुकठिक गन्ध-सुगन्धि सेहो....भने हम किछु गोटए ओकर गन्धसँ नाक सिकोड़ि ली, मुदा पड़ोसी बंगाली मोसाएसभक निन्नतँ एकरहि सुगन्धिसँ खुजैत छनि। एकर पच्छिम कुशगामा गाम अछि- कुश आ काससँ आच्छादित भूखंड, उत्तर नेपालसँ सटल कुनौली आ दक्षिण बुढ़िया कोसीक कछेर, जतए नदी समय-समय पर कालबद्ध भए अपन बाट बदलैत रहल छथि.... कखनहुँ पाँच-सात कोसक लपेटमे बालु आ परती-पराँत भू-भाग तँ कखनहुँ धरतीक हरिअरीकेँ सज्जित-सुसज्जित करैत शस्य श्यामला। बिहारसँ बहएवाली गंगाक उत्तरी कछेरक विस्तार- तिरहुत, दरभंगा, कोशी तथा पूर्णियाँ प्रमण्डल एवं नवगछिया अनुमंडलक लगभग 56,980 वर्ग किलो मीटर क्षेत्रमे अछि। हिमालयक गिरिपादमे बसल गंगाक ई उत्तरी मैदान कौशिकी अपन सर्वाधिक उर्वर-भूमि एवं उन्नत संस्कृतिक लेल आदिकालहिसँ मानव समुदायक आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। किएक नहि हो भला? हिमालयसँ निकलि कए गंगा मिलन करएवाली- घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, बलान, बागमति, कोसी तथा महानंदा सदृश सालो भरि पानि भरल नदीसँ अभिसिंचित ई भूमि भला ककरा ने नीक लगतैक? नदी-चओर, बाड़ी-फुलबाडी, खेत-खरिहान, गाछ-बिरिछ, पशु-पक्षी, अन्न-फल, तीमन-तरकारी आर माछ-दूधसँ सम्पन्न ई चौरस मैदान अपन कोरामे मैथिल संस्कृतिकेँ पोषण दए रहल अछि। एतबे नहि शस्य-श्यामल, हरित-पीत वसन पहिरने एहि कौशिकीक गौरव-गाथा गुनगुनएबाक इच्छा हो तँ मनन करू मैथिली, हिन्दी आर बंगलाक भाषा- साहित्य। सर्वविदित अछि जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जलवायु, मौसम एवं भौगोलिक स्थिति अत्यन्त मनमोहक, रुचि पूर्ण आ अनुकूल अछि। समतल मैदानमे प्रकृति अपन समस्त सम्यकताक संग उपस्थित भेल छथि। ई ओ क्षेत्र थिक जतए जीवन नहि तँ अतिशय गर्मीक कारण झुलसैछ आ नहि अत्यधिक जाड़सँ ठिठुरैछ। बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न समशीतोष्ण वातावरणक ई समतल भूमि अकूत प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन रहितो सोचबाक हेतु बाध्य करैछ जे हमसभ प्रतियोगिताक एहि विश्व-बाजारमे किएक पिछड़ैत रहल छी? अदौसँ कृषि मानव-जीवनक अनिवार्य आ आधारभूत उद्योग अछि। एतए एक बेर फेर किंकर्त्तव्यविमूढ़क स्थितिमे अपनाकेँ पबैत छी जे मूलतः कृषि आ तद्जनित उद्योग पर आधारित जीवन-यापन करएवला गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जन समुदाय इक्कैसम सदीक स्वागत कोन अक्षत-चंदन आ फर-फूलक भोग लगाकेँ करए? कौशिकी भारतीय गणतंत्रक ओ हिस्सा थिक, जतए आजादीक सतसठि साल बादो 85.5% लोक कृषि पर आधारित जीवन-यापन करैत छथि, जाहिमे 70%सँ बेसी भूमिहीन मजदूर, 20%सँ बेसी छोट किसान आ 5%सँ कमे पैघ काश्तकार छथि। फलतः आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रमे भूमि-विवाद विकराल रूप धारण कए सामूहिक नर-संहारकेँ जन्म दैत रहल अछि। एहि भूमि-विवादकेँ नहि तँ बिनोबाक भूदान आन्दोलन शान्त कए सकल आ नहि तँ कम्युनिष्टक कोनो लड़ाइ वा सरकारेक कोनो नीति। आइयो एहि क्षेत्रसँ नहि तँ सामंतशाही टूटल अछि आर नहि तँ हदबन्दी-चकबन्दी योजना सफल भेल अछि। मुदा नारा फेर वैह लगाओल जाए रहल अछि--‘इन्कलाब जिन्दाबाद’, ‘हमरा हमर धरती दियऽ।’ आखिर फेरसँ ई नारा किएक?..... ककर धरती आ ककर देश? हमरा तँ हमर देश भेटि गेल, हमर धरती भेटि गेल। तँ फेर?....नहि-नहि, धरतीक मालिककेँ धरती नहि भेटल। .... धरती ओकरे होइछ, जे धड़सँ धार बहाबैत अछि; कन्हा पर जे हर-फार उठबैत अछि.... तखन एहि धरतीक असली मालिक अछि के?....??? नहि, नहि, नहि। नाना प्रकारक विसंगतीसँ जूझैत एहि देशक आ एहि प्रश्नक एकेटा उत्तर अछि- हजारक हजार, लाखक लाख लोक जे पुआरमे सिकुड़ि, फाटल-चीटल कपड़ामे जाड़क पैघ राति गुजारि लैत अछि। भारतीय गणतंत्रक आरम्भिक कालमे पंचवर्षीय योजनाक अन्तर्गत हरित-क्रांतिक लप्पो-चप्पोक संग गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे सेहो विभिन्न नदी योजना (सन् 1955 मे कोसी नदी योजना आदि) एवं कृषि आधारित उद्योग धंधाक विकास कार्य आरम्भ भेल;मुदा शीघ्रहि एहि क्षेत्रक एक-एक कए चीनी, चाउर आ जूट मिल बन्न भए गेल अर्थात् नदी-योजना टाँइ-टाँइ फिस्स। नहि तँ पनबिजली (20 मेगावाट, कटैया) उत्पादन भेल आर नहि तँ नहर-योजनाक पटौनी व्यवस्था किछुओ चमत्कार देखा सकल। अनेक बाढ़-नियंत्रक योजना सभक लूट होइत रहल आ बाढ़ि अपन तबाही मचबैत रहल। पटौनीक पर्याप्त व्यवस्थाक नाम पर लूट चलैत रहल आर सुखाड़मे ई क्षेत्र जरैत रहल। आश्चर्यक विषय थिक कि नहि, जे आजादीक सतसठि वर्ष बितलाक आ एगारहम पंचवर्षीय योजनाक समाप्तिक बादो बिहार सरकार अखन धरि मात्र 14.83 लाख हेक्टेयर भूमिमे वास्तविक पटौनीक सुविधा उपलब्ध करा सकल अछि; जखन कि बिहारक अधिकतम 122.89 लाख हेक्टेयर जमीनक पटौनी सुविधाक आवश्यकता अछि। एहिमे तँ कोनो शक नहि जे बिहारक सिंचाई विभाग लूटक एकटा पैघ केन्द्र रहल अछि। तेँ तँ जाहि परियोजनाक पूर्ण होएबामे महज 8 करोड़ रूपैयाक खर्च अबिते, ओकरा बिहार सरकार 30 वर्षसँ लगभग 66 करोड़ रूपैया खर्च कएकेँ पूरा नहि कए सकल अछि। फलतः ओहि परियोजनाकेँ एगारहम पंचवर्षीय योजनामे सेहो सम्मिलित कए लेल गेल। ई कोनो उलटबासी नहि अछि-- सत्ता आ राजनीतिक खेलमे सब किछु जायज अछि? पटौनीक व्यवस्था गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक कृषि-संस्कृतिक लेल कतबा अहम्, अनिवार्य आ अपेक्षित अछि? किऐकतँ समुचित पटौनी-योजनाक विकास आ सफल क्रियान्वयनसँ एहि क्षेत्रकेँ नहि तँ केवल सुखाड़सँ बचाओल जाए सकैत अछि, अपितु जल-वितरणक समुचित व्यवस्था कए बाढ़िसँ सेहो एहि क्षेत्रक रक्षा कएल जाए सकैछ। बाढ़ि आ सुखाड़ सदृश प्राकृतिक आपदासँ बचाव होइते एहि क्षेत्रक आधि-व्याधि, दुःख-संताप सभ किछु दूर भए जाएत। मुदा ओएह गप्प, बिलाइकेर गरदनिमे घण्टी के बान्हत? जखन दुनियाक सबसँ उपजाऊ जमीनमे सँ एक गंगाक उत्तरी मैदान पर बसए वला जन-समुदायक एहि औद्योगिक-पूंजीवादी वैज्ञानिक युगमे एतबा खास्ता हाल भए जाए तँ आश्चर्य होइत अछि अपन पूर्वजक सोच पर जे अपन संततिक रक्षार्थ एहि नदीक कछेर, समतल मैदानमे अपन सभ्यता आ संस्कृति विकसित नहि कए सकलाह। ध्यान देबाक छैक जे बीसम सदीक उत्तरार्द्धमे भारतक कोन रंग विकास-यात्राक अग्रिम सोपान मानल जाइत छल? लोक पहाड़ी आ पठारी भागक तुलनामे समतल मैदानमे बसब बेसी पसंद करैत छलाह;किएक तँ ई सामान्य धारणा छल जे पहाड़ी प्रदेशमे जीवन कने कठिन होइत अछि, जखन की समतल मैदानक जिनगी सरल। गंगाक उत्तरी किनार विशाल समतल मैदान अछि। जाहिमे बिहारक 60% आवादी निवास करैत छथि; जखन की ई क्षेत्र बिहारक कुल क्षेत्रफलक 40% अंश थिक। ई भारतक सर्वाधिक आबादी घनत्व (885 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर) वला क्षेत्र अछि। विचारणीय अछि जे आजादीक सतसठि वर्षसँ भारतीय गणतंत्रमे ओ केहन शतरंजी राजनीति चलैत रहल जे आइ गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक लोक सबसँ बेसी चिंतित छथि? चिंता स्वाभाविक छैक। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक एहि पछुआएल क्षेत्रमे नहि तँ उर्जा-स्रोत अछि, नहि तँ कोनो सफल उद्योग; नहि तँ वैज्ञानिक कृषि-तकनीकि अछि आ नहि तँ उन्नत यातायात। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक ई समतल इलाका आइयो लालटेन युगमे जीवन बसर कए रहल अछि। बिहारक एहि क्षेत्रमे गामक परिकल्पना करैत लालटेन युगक बात के कहय, एतएतँ शहरोमे अन्हारे पसरल अछि। कारण स्पष्ट छैक- एहि क्षेत्रमे पनबिजली आ ताप विद्युत उत्पादनक विकासक दिशामे आइ धरि सरकारक डेगे नहि बढ़ल अछि। सन् 1971-72 मे गंगाक उत्तरी मैदानी भागक प्रति व्यक्तिक बिजली-खपत क्षमता मात्र 10.10 किलोवाट प्रतिघंटा छल जखन कि एही वर्ष गंगाक दक्षिणी मैदान आ छोटानागपुरमे उर्जाक खपतक क्षमता क्रमशः 41.5 किलोवाट एवं 201.9 किलोवाट प्रतिव्यक्ति प्रतिघंटा छल। मानल तँ इएह जाइछ जे उर्जा-खपतक क्षमता जीवन-स्तरक सूचक होइत अछि। उर्जा-स्रोत सदृश यातायातक विकास सेहो कोनो क्षेत्रक सर्वांगीण विकासक कारण आओर परिणाम होइत रहल अछि। किएकतँ यातायात ओहि ठामक जनजीवनकेँ मात्र आवागमनक सुविधे नहि प्रदान करैत अछि, अपितु उत्पादनक आयात-निर्यात एवं वितरण-उपभोग द्वारा ओहि ठामक जीवन-स्तरकेँ सेहो प्रभावित करैछ। एहि वैज्ञानिक युगमे मनुक्ख जल, थल आओर नभ सदृश तीनू मार्ग पर विजय प्राप्त कए लेने अछि। मुदा दुर्भाग्य छैक जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे हवाई अड्डाक संख्या ईकाई अंककेँ पार नहि कए पओलक अछि। आइयो एहि क्षेत्रमे एहन मैथिल भेटि जएताह जे हवाई जहाज नहि देखने छथि; किएकतँ कहियो-काल कोनो सरकारी कार्यक्रमक अवसरे पर कोनो हवाई जहाज एहि क्षेत्रमे उतरैत अछि। हवाई-मार्गक विकास नहि भेलासँ एहि क्षेत्रक लोककेँ कोनो मलाल नहि छनि; किएकतँ एहन खर्चावला यात्राक हेतु क्षमतो तँ होएबाक चाही? मुदा दुख अछि तँ एहि बातक जे कमे खर्चमे सुगम यात्रावला जल मार्ग, जकर विकासक अकूत सम्भावना एहि क्षेत्रमे बनैत छैक, किएकतँ एतुका सभ नदीमे सालो भरि पानि रहैत अछि, तकरो हाल तँ ओएह छैक। रहल-सहल एक मात्र थल मार्गक विकासमे सरकार सतसठि वर्षसँ प्रयासरत अछि, मुदा नतीजा ढाकक तीन पातक बराबरिओ नहि निकलैत अछि। एक दिस भारत सरकार मैट्रो रेलवेक विकासमे लागल अछि; आ दोसर दिस ई क्षेत्र बड़ी रेल लाइन मधेपुरा-कटिहार एवं सहरसा-फारबिसगंज शाखाक लेल संघर्षरत अछि। आइ जखन विश्व-बैंक सम्पूर्ण दुनियामे सड़कक जाल बिछैबाक लेल प्रयासरत अछि, तखनो एहि क्षेत्रक कतेको अनुमंडल जिला मुख्यालयक सड़क मार्गसँ जुड़बाक लेल लालायित अछि। एहनो नहि छैक जे सड़क योजना-मदमे कम खर्च भेल अछि। मुदा ओ तँ भारतीय नौकरशाहीक लूटक कमाल अछि जे बहुत रास देशी-विदेशी योजनाक बादो एतुका खाधि सबमे सड़क आ कि सड़कमे खाधि से ताकब मुश्किल अछि। योजना-कार्यालयसँ ठीकेदार धरिकेर पसरल लूट तंत्रक परिणाम भुगतैत सड़क आइ गिट्टी आ अलकतराक लेल तरसि रहल अछि। जा धरि सड़ककेँ‘भूमि क्षरण’आ पानिक बहावसँ बचाओल नहि जाओत-- ता धरि मजबूत सड़क सेहो टिकाऊ नहि भए सकैत छैक, मुदा लूटक शिकार बनल ई सड़क एहिना कहिआ धरि टिटिआइत रहत? सर्वाधिक सघन आवादीकेँ पालन-पोषण देबाक एकमात्र साधन अछि-- पारम्परिक कृषि। एम्हर भारत सरकारक कृषि-नीतिक हाल ई अछि जे पंचवर्षीय योजनामे कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्रक विकासक लक्ष्य दिनानुदिन घटबैत जाए रहल अछि। पंचवर्षीय योजनाक माध्यमसँ भारत सरकार भनहि पंजाब एवं हरियाणामे हरित-क्रांति आनि लेने होअए-- मुदा गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी आइयो अपन बदहाली आ बदकिस्मतीक गीत गाबि रहल अछि। आइयो ई क्षेत्र भारत एवं बिहार सरकारक कृपा-दृष्टिक लेल लालायित अछि। आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमतामे 100% क वृद्धि भेल ; जखन कि एतबहि दिनमे एहि क्षेत्रक जनसंख्यामे 125% क वृद्धि भेल अछि। आब एहि क्षेत्रमे आओरो कृषि-भूमिक विस्तार सम्भव नहि अछि। हँ, कृषि-विज्ञानमे वैज्ञानिक तकनीकी विकास कए एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमताक विकास कएल जाए सकैत अछि; परंच प्राकृतिक संसाधनक वैज्ञानिक विकासक अभाव आ अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट एहि क्षेत्रक सामाजिक-आर्थिक हालतिकेँ बदतरि बना देलक अछि। फलस्वरूप एतए बेरोजगारीक एहन भयानक विस्फोट छैक जे जनसेवा, गरीबरथ, महानंदा, नार्थ-ईस्ट एवं दिल्ली तथा पंजाब जाइबला सभ ट्रेन एहि क्षेत्रसँ पलायन कएनिहार मजदूरकेँ ढोएबाक कीर्त्तिमान स्थापित कएल अछि। मजदूर सभक पलायनसँ दिल्ली सरकार चिंतित भए रहल अछि। की, ई भारतीय गणतंत्रक असमान विकास गतिक प्रमाण नहि थिक? की, भारत सरकारक श्रम एवं कल्याण मंत्रालयकेँ एकर चिंता नहि करबाक चाही? मजदूरक बहुसंख्य पलायन एहि क्षेत्रक अनियंत्रित आबादी आ श्रम-नियोजनक अभावक परिणाम एवं प्रमाण थिक। आइ आजादीक सतसठि वर्ष बाद भारतक संसदीय राजनीतिमे क्षेत्रीय दलक बढ़ैत दबाव स्पष्ट देखा रहल अछि। मुदा आइ धरि गंगाक उत्तरी मैदानी भाग अर्थात मिथिलाक समस्याकेँ केन्द्रमे राखि राजनीति जन्म नहि लए सकल अछि। अतः आवश्यकता छैक गंगाक उत्तरी मैदान अर्थात मिथिलाक सांस्कृतिक समुदायक सामूहिक राजनीतिक हस्तक्षेपक, जे भारतीय गणतंत्रमे एहि क्षेत्रक समस्याकेँ केन्द्रमे राखिकए एकर अधिकारक लेल संघर्ष करए। कोनो क्षेत्रक पर्यावरण ओतुका जन जीवनक प्राण होइत अछि। गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी समशीतोष्ण वातावरण, अपार जल, बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न अछि। कहल जाइत अछि जे अकबरक जमानामे जखन भूमि बंदोबस्त करए टोडरमल जी एहि क्षेत्रमे आएल छलाह तँ ई क्षेत्र एक गोट घनघोर जंगल छल। नतीजतन भूमिक बंदोबस्ती नहि भए सकल। मुदा अकूत प्राकृतिक संसाधन एवं अनुकूल पर्यावरणक कारण एहि क्षेत्रक जनसंख्या तीव्र गतिसँ बढ़ैत गेल। बढ़ैत आवादीकेँ पोषण देबाक हेतु जंगल काटिकए खेती योग्य जमीन बनाओल गेल। तखन पारिस्थितिक संतुलन बिगड़बाक डर किनका छलनि? परंच आइ एहि क्षेत्रक साठि वर्षीय सभ व्यक्ति बेबाकीसँ कहि सकैत अछि जे एहि क्षेत्रक सभ नदी कृशकाय भए गेल अछि। सामान्यतः गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक मूल भौगोलिक समस्या अछि-- बाढ़ि, सूखार, अनियंत्रित वन विनाश, मृदाक्षरण, नदीसँ पानिक सूखब शुभ संकेत नहि अछि। ई दुबर-पातर होइत नदी रहि-रहिकए बरसा मासमे अपन तामसकेँ जगजाहिर करैत सम्पूर्ण क्षेत्रकेँ बाढ़िक चपेटमे लए लैत अछि। एहि नदी सभक तामसकेँ बुझए पड़त। ई बान्हल नदी जाहि रफ्तारसँ एहि क्षेत्रकेँ बालूक ढेरमे बदलैत जाए रहल अछि, जाहि गतिसँ एहि जमीनसँ पैघ गाछसभ समाप्त भए रहल अछि-- ओ एहि क्षेत्रकेँ रेगिस्तानमे बदलि जएबाक संकेत दैछ। ओहुना हिमालयक ग्लेशियर फटबाक आतंक पूर्वेसँ एहि क्षेत्र पर मौजूद अछि। पर्यावरण केँ लएकए हाय-तौबा मचाबैवला लोकक नजरिसँ किऐक ओझल अछि ई क्षेत्र कौशिकी। पृथ्वीक ई सुन्दरतम अंश गंगाक उत्तरी समतल मैदान कौशिकी आइ पारिस्थितिक असंतुलनक भंवर जालमे फँसि गेल अछि। आजादीक आरम्भिक सालमे नहरक काते कात वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाओल गेल, मुदा रख-रखावक अभावमे ओ हरियर हरियर गाछो सुखिकए रक्षकक भक्षण भए रहल अछि। खासकए सुपौल, सहरसा, अररिया आ मधेपुरा जिलाक नहर-शाखाक काते कात लगाओल शीशोक गाछ पानिक बिना सुखिकए जारन भए गेल। बेचारा नहरे की करत? ओ तँ अपने पिआसल अछि, तखन खेत आ गाछकेँ कतएसँ पानि पिआओत? उत्तम नस्लक पशु एवं चरागाहक अभाव, कृषि-भूमि पर जनसंख्याक बेस दबाव, स्थिर आ असंतुलित औद्योगिक प्रगति, शक्ति स्रोतक अल्प विकास तथा जनसंख्या एवं संसाधनक बीच असंतुलनक वृद्धि, तेँ आवश्यक अछि-- भूमि-संरक्षण, वृक्षारोपण एवं जलाशयक सुरक्षा कए एहि क्षेत्रक पर्यावरणकेँ बचाएब। एहि क्षेत्रक नदी सभकेँ बान्हसँ बान्हब बान्हक काते-कात वृक्षारोपण द्वारा जंगल उगाएब, यातायातक लेल सड़क मार्ग विकसित करब, नहर योजना द्वारा सिंचाई आ उर्जाक व्यवस्था करबाक चिर आकांक्षित सपनाकेँ साँच करबाक आवश्यकता अछि जे आब मिथिला राज्य बननहि सम्भव अछि। मिथिला राज्य आब हमरासभक हेतु प्राण-वायु सदृश् आवश्यकता बनि गेल अछि, जकर अभावमे एहि क्षेत्रक विकासकेर सपनो देखब असम्भव सन बुझबामे आबि रहल अछि। यद्यपि दोष अनका पर मढ़ब अति साधारण छैक, अपन दोष-अपन कर्मच्युतताकेँ जँ देखबाक सामर्थ्य हमसभ मिथिलावासी प्राप्त कए ली तँ ककर सामर्थ्य छैक जे हमरासभकेँ अपन अधिकारसँ वंचित करत। मुदा, की हमसभ अपन-अपन छाती पर हाथ राखि एहि विषयक गॉरन्टी दए सकैत छी जे हमसभ सबतरि अपन कर्मपथ पर सजग-सतर्क भए प्रयासरत छी? हमरा जनैत जँ केओ एकर गॉरन्टी देबाक असफल प्रयास करबो करताह तँ कमसँकम ओहि राति तँ हुनका निन्न निश्चये नहि होएतनि। कतेक सोचनीय विषय अछि जे मिथिला क्षेत्रक तथाकथित पब्लिक विद्यालयमे बंगलाक सङ्ग-सङ्ग आनो क्षेत्रीय भाषा पढ़ाओल जाए रहल अछि, मुदा मैथिली नहि। मैथिलीकेँ संवैधानिक मान्यता भेटबासँ पूर्व ओहि विद्यालयक संचालक महोदयलोकनिक कहब छलनि जे मैथिली पढ़ि की होएत? मुदा आब? आब तँ मैथिली पढ़ि भारतक सबसँ पैघ परीक्षा यूपीएससी पास कएल जाए सकैछ, तखन आब कोन समस्या? हँ समस्या अछि मानसिक हीनताक, जाहिसँ एखनहुँ धरि हमसभ निकलि नहि सकलहुँ अछि। ई तथाकथित विद्यालय चलौनिहार केओ कि मिथिलासँ बाहरक छथि, तखन फेर एना किएक? तेँ आवश्यकता अछि जे हमसभ सबसँ पहिने निचुला स्तरसँ एहि दिसमे आगाँ बढ़ी तँ परिणाम सार्थक भए सकैछ। जँ मिथिलावासी निश्चय कए लेथि जे सम्पूर्ण मिथिलाक पढ़ाइ ओकर मातृभाषाक माध्यमे होएत, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ मिथिलावासी अपन आवेदन मात्र मैथिलीमे लिखब प्रारम्भ कए देथि, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ हमसभ अपन पावनि-तिहारमे अपन संस्कृतिकेँ बढ़एबाक निश्चय कए ली तँ फेर के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? मुदा, ई तँ होएत नहि, कारण जे हमसभ तँ “तीन तिरहुतिआ तेरह पाक”मे विश्वास करैत आएल छी आ तकरे फल उठाए हमर-अहाँक संस्कृतिकेर दुश्मन लोकनि मैथिलीकेँ जाति-विशेषसँ बान्हि अपन मनोवांछित फल प्राप्त करबाक प्रयासमे लागल छथि। यद्यपि आशा नहि पूर्ण विश्वास जे ओ दुश्मनलोकनि कहिओ अपन एहन नीच कर्ममे सफलता प्राप्त नहि कए सकताह, मुदा हमर प्रयासकेँ शिथिलतँ कइए सकैत छथि। तेँ आवश्यक अछि जे हमसभ एकजूट भए एहि दिशामे सोची आ अपन पीठ थपथपएबासँ पूर्व दोसराक पीठ थपथपएबाक कार्य करी। ई दृढ़ विश्वास रखबाक आवश्यकता छैक जे ककरहु नीक कार्यक फल आइ-ने-काल्हि भेटबे करतैक, ओकर कार्य जनसाधारण द्वारा चिन्हले जएतैक। तेँ शुद्ध मनसँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीक विकास दिशामे सोचनिहारकेँ आगाँ आबि नेतृत्व सम्हारबाक आवश्यकता अछि जे अदौसँ आबि रहल मिथिलाक मांगकेँ पूरा करबाक सामर्थ्य प्राप्त करताह। ***************************** जन्म स्थान- अर्राहा, पो.- अर्राहा, भाया- मठाही, थाना- घैलाढ़, जिला- मधेपुरा, बिहार, पिन-852121 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल समधीन बरदहट्टामे जहिना गोटे बरदक जोड़ा एहेन रहैत जेकर सिंग-सिंगहारक संग रंगो-रूप आ पूछो-पएरक एहेन मिलान रहैए जे अनठियाकेँ परेखेमे ने अबैए जे दुनू दू छी आकि एक्के, तहिना गाममे सिनुरिया काका आ खजुरिया समधीनक बीच अछि। ओना सिनुरिया कक्काक असल नाआें ‘राधारमण’ आ खजुरिया समधीनक नाआें ‘हसीना खातून’छियनि। मुदा से छियनि माए-बापक देल नाआें। जाबे राधारमणक माता-पिता जीबैत रहथिन ताबे तक तँ राधारमणे नाआें बेसी लोक जनै छेलनि मुदा अपन आँखि-पाँखि भेला पछाति ‘सिनुरिया काका’ नाआें अरजि लेलनि। जइसँ पछिला नाआें मटिया-मेट भऽ गेलनि आ ‘सिनुरिया काका’क नाआेंसँ सभ जानए लगलनि, जनैत-जनैत नाउँए पड़ि गेलनि। मुदा तइले सिनुरिया काकाकेँ मिसियो भरि रोग-राग मनमे नै छन्हि, जहाँ धरि खुशीए छन्हि। खुशीक कारण ई छन्हि जे गामक लोक जखनि बहराए लगल आ जाबे तक गाम बिसराएल नै छेलै ताबे तक जे कोनो-कोनो फूल,फल, तरकारी आ अन्नोक बीआ अनतएसँ आनि गाममे लगौलक, तहीमे दस-बारह तरहक सिनुरिया आम सेहो आबि गेल। ओना सभ आमक रंगो आ साइजो एके रंग नहियेँ आ ने सुआदे आकि रसे-गुद्दा एकरंग। मुदा देखैमे तँ लाले-लाल, सिनुराएल लाल, अलाएल लाल, गुलाएल लाल तँ अछिए। किछु एहनो अछि जे जखने टिकुला होइए तखनेसँ ललए लगैए आ किछु एहनो अछि जे जखनि कोशाइए तखनि लाली पकड़ै छै अा किछु एहनो अछि जे जुआइत-जुआइत पकड़ै छै। ओना पकलापर तँ अधिकांश आनो आम ललिआइए जाइए। गाममे आम तँ दस-बारह रंगक बढ़ि गेल, मुदा नाआें सबहक हेरा गेल। हेराएल ऐ दुआरे जे रोपिनिहारे बिसरि गेला। बिनु फड़ने गौआँकेँ मतलबे कोन, बिसरबो केना ने करैत, समए छल जखनि उत्तर-प्रदेश, भोजपुरसँ लऽ कऽ ढाका-बंगाल तक जोड़ल छल, जे ससरि पंजाब दिस बढ़ल आ बढ़ैत-बढ़ैत दिल्ली, बंगलोर, बम्बइ दिस बढ़ि गेल। नोकरीए करैक छै तँ जेतए बेसी पाइ हेतै, तेतए जाएत। ओकरा कोन जरूरी छै जे गामक गुलाब खासक सिनुर परखत। जखनि गामेक नै परखत तँ आनठामक तँ सहजे बाढ़िक पानि जकाँ आएल-गेल। सुभ्यस्त समए भेने अदरो नक्षत्र अपन रंग जहिना देखा देलक, तहिना गामक आमो गाछी देखौलक। लाले-लाल गाछी सबहक बहरबैया आम चमकए लगल। कोनो नब वस्तु भेटने मनमे उत्साह जगिते छै, तहिना आमक रंग देखि-देखि लोकोकेँ जगल। मुदा सभ साइजक रहितो सबहक रंग एकरंगाहे छै। गुलाब-लाल, सिनुर-लाल आ आल-लाल परखैक लोककेँ जरूरते की छै। आम छी खाइक वस्तु भेल। ओकर गुण तँ ओतबे ने भेल जे मीठो हुअए आ बेसीओ हुअए। तैसंग बेसी फड़बो करए। गौआँक उत्साह एते बढ़ि गेल जे आमक विचार करब जरूरी भऽ गेल। तइमे सबहक गाछीक आम सहरगंजा भऽ गेल। एक तँ अपन जे पुश्तैनी अछि ओ तँ अपन नाआें जपिए रहल अछि मुदा नबकाक नामकरण भेने बिना काज केना चलत। अही नामकरणक उत्सवमे राधारमणक नाआें‘सिनुरिया काका’ पड़ि गेलनि। जेकरो पित्ती हेथिन सेहो कक्के कहै छन्हि। आ जेकर भातीज हेथिन सेहो कके कहै छन्हि। अहुना लाेक अपन नामो बाबा, दादा, काका इत्यादि रखिते अछि। सिनुरिया काका नाआें किए समाज देलकनि? एके समैमे सभ बहरबैया आम पकैक समए भेल, अहुना जेठसँ शुरू भऽ अखाढ़मे भरखरि पकिते अछि। उत्सवक माहौल रहबे करै, गाछीए-कलम देखैत-देखैत दस गोटे बिनु बजौले एकठाम भऽ बैसि गेला। बैसारमे प्रश्न उठल जे, जे आम टिकुलासँ जुआइ धरि लाले-सिनुराएले अछि, ओ जे पाकत से केना बुझबै? दोसर प्रश्न उठल जे कोन राज्यसँ कोन आम आएल अछि तेकरो ठेकान नहियेँ अछि, ओ केना ठेकनाएब? तेसर प्रश्न उठल जे कोन आम कोगर हएत, कोन गुदगर हएत आ कोन रसगर हएत से ठेकान केना पएब? तहूमे सभ आम सभकेँ अछिओ नहियेँ,तँए अन्हराक हाथी भऽ जाएत, जेकर रसगर हएत ओ रसगरे बुझबै आ जेकर गुदगर हएत ओ गुदगरे बुझबै। रंग-बिरंगक प्रश्नक बीच सभ ओझरा गेला। मुदा बिना रस्ता भेटने समाज चलबो केना करत। जहिना लोक चलैए तहिना ने समाजो चलै छै। गुम्मा-गुम्मी बैसार देखि राधारमण फनकि बाजल- “एतबे टा ओझरीमे जखनि सभ ओझरा गेलह, तखनि काज केना चलतह?” राधारमणक विचार सुनिते सुकरतिया प्रश्नकेँ उनटबैत बाजल- “राधारमणे जे कहता से सभ मानि लेब।” आगू-पाछू जेते राधारमण सोचने हुअए मुदा ठाँहि-पठाँहि बाजल- “भाय, आम तँ सहजे अामे छी जे सिनुरिया चानिकेँ सेहो चीन्हि सकै छी।” तहीपर गौआँ ‘सिनुरिया काका’ नाआें रखि बजबए लगलनि। अपन अरजल नाआें छियनि तँए केकरो अधला नजरिए देखबे किए करता। पितातुल्य पित्तीए भेला। खजुरिया समधीन गामक समधीन छथि। अपन माए-बापक देल नाआें ‘हसीना खातून’ छेलनि। मुदा जगह बदलने बेटीए ने कनियाँ आ आकि आरो-आरो नाआें अरजैत अछि। तीस बर्खसँ अपने बेटी-जमाए लग रहै छथि। ताड़क आ खजूरक पातक बौस गढ़ैक लूरिसँ हसीना भरल। खजूर-पातक ओछाइन, सिरमा, पौती बीअनि इत्यादि रंग-रंगक बौस बनबैक लूरि, तहिना ताड़क पातकेँ चटाइ, पंखा, झुनझुना इत्यादि गढ़ैक लूरिसँ सेहो भरल छथि। जहिए बेटी ऐठाम हसीना पएर रोपि काजमे भागीदारिनी भेली तहिएसँ लोक खजुरिया समधीन कहए लगलनि। ओना वयस पौला पछाति समधि-समधीनक समए अबैए मुदा से हसीनाक संग नै भेल। भेल ई जे जहिना कु-समैओमे अन्हर-बिहाड़ि, पानि-पाथर आबि जाइ छै तहिना खजुरियाे समधीनकेँ भेल। सिनुरियाे काका समधीने कहै छन्हि आ जे सभ सिनुरिया काका कहै छन्हि सेहो खजुरिये समधीन कहै छन्हि। मुदा जे जे कहनि, समाज तँ विशेषाधिकार दइए देने छन्हि। जइसँ किए ओ बुझती जे गाम अपन नै छी, तहूमे बराबरीक हिस्सा। कहुना भेली तँ गामक समधीन भेली, किए मनमे कुवाथ हेतनि जे कोनो पुरुख आँखि चढ़ि किछु कहैए। बजैक अधिकार जेते समधिकेँ तइसँ कम किए समधीनकेँ हेतनि। हएबो उचित नहियेँ। किएक तँ सृष्टिक सृजनमे दुनू एहेन अछि जे जात जकाँ असगरे चलिओ नहियेँ सकैए। ओना महिला जगत नमहर अछि, तँए रंग-रंगक घर-दुआर, बोल-बाइन, सर-सम्बन्ध तँ अछिए मुदा तइमे समधीन अगिला मुहराक भेली। अगिले मुहरा ने गाड़ीकेँ रस्तो धड़ा चला सकैए आ दब-उनार करैत उनटाइओ सकैए। जँ समधि प्रेमसँ कहथिन, तँ समधीनो प्रमाग्नि भऽ बजती, नै जँ क्रोधसँ कहथिन तँ ऊहो क्रोधाग्नि नै होथि, सेहो उचित नहियेँ। मुदा से बात सिनुरिया काका आ खजुरिया समधीनक बीच नै अछि। जहिना राधारमणकेँ सौंसे गामक लोक सिनुरिया काका कहै छन्हि तहिना हसीनाकेँ सेहो ‘खजुरिया समधीन’ कहिते छन्हि। से कोनो पुरुखे-पात्र नै महिलो-पात्र। जहिना एक उमेरिया दुनू तहिना एक कान्हीक सेहो। रंगो-रूप भगवानेक देल। कोन भगवानक देल, से ओ दुनू जानथि। मुदा मासक हिसावसँ जहिना भगवान रंग बँटै छथि तहिना दुनूकेँ एकमसुआ बूझि रंगो-टीप देने छथिन। तेतबे नै, हाथ-पएरक मिलान एहेन जे तेहल्लाकेँ परखब कठिन। एक तँ अहुना जखनि लोक घर छोड़ि आगू निकलैए तखनि बोलीमे टाँस आनए पड़ै छै, हसीना तँ सहजे माए-बापक घरसँ सासु-ससुरक घर होइत बेटी-जमाए ऐठाम समधीन बनि रहली अछि, तँए तेखार कएल खेत जकाँ जहिना गामक समधीन तहिना समतल बोल। सिनुरियो काका तेहने, जखनि जे मनमे उचरल तखनि सएह बजलौं। मुदा से पारखी खजुरिया समधीन। तहूमे ताड़-खजूरक बीच रहनिहारि, जइ जगहपर टगल-मरल आबि सिंहासन जमा सिंह बनि घण्टे भरिमे केते राज-पाट उनटा अपने उनटि घर दिस विदा होइए। तइ खेत परहक उपज हसीना। ओना सिनुरिया काका सौंसे गाम एक-बेर-दू-बेर दिनमे घुमिते छथि, मुदा बैसार तीनिए-चारिठाम छन्हि। चारू बेवसायी जगह, जइमे एकटा खजुरियो समधीनक छन्हि। ओना घर, बेटी-जमायक छी, मुदा घरोक बात तँ छोट-छीन नहियेँ अछि। जइ नाआेंसँ बेसी लोक घरकेँ जनलक घर तेकर भेल। जेकरा समाजक अधिकार भेटि जाइ छै। केना नै भेटौ, जएह पंचवैया, सएह नीर-नैया। मुदा किछु होउ, हसना तँ हसने भेली। जमाए-रशूलोक विचारमे कोनो घटी-बढ़ी नै। अनुकूले। अनुकूल ई जे घरक सभ कियो तँ जोटले छी, सभ सबहक तरी-घटी जनिते छी, तखनि माइए-बापक नाआें ने लोक जगबए चाहैए से तँ अछिए, जेहने अपन माए तेहने ने घरोवालीक माए। तेतबे किए,कुलक्षण-सुलक्षणक परीछा सेहो एकेठाम वृतिए अछि, भलहिं कियो अनेरूआ आ कियो कुलपूज हुअ। बरसाती समए भेने सिनुरिया काकाकेँ बैसारीमे बढ़ोतरी भऽ गेल छन्हि। हाटक काजसँ विदा भेला, रस्तामे खजुरिया समधीनक घर पड़ैत, दुनूकेँ अजमा नेने रहथि। करीब अदहा किलो मीटरक दूरीमे दुनू गोटेक घर। ओना ई बात सिनुरिया काकाकेँ बूझल जे माघक चद्दरि, भदवरिया छत्ता-लाठी लाइए कऽ घरसँ निकली मुदा गामसँ कनीए हटि हाट, करीब किलो मीटरक दूरीपर। तहूमे जँघियाएल हाट। जँघियाएल ई जे एक दिन अहिना हाटपर रहथि तखने बरखा शुरू भेलै, पुबरिया हवा सह दैत रहै आ पुबेसँ बरखो अबैत रहै, जेकरा लोक कातेसँ घुआँ जकाँ देखै। तीमन-तरकारी कीनि गमछामे बान्हि विदा होइत रहथि आकि बर्खा-पानि अबैत देखलखिन। मनमे एलनि जे जखनि हाटक काज भाइए गेल तखनि अनेरे किए हाटोकेँ अजबाड़ने रहबै। अनेरे हाट-बजार भरल रहने जेबीक हेरा-फेरी हएत। तहूमे पँजराक जेबी, एक-दोसरसँ सटल, लोकक जेबीमे हाथ दऽ दियौ, जँ बूझि गेल तँ कहबै, अपना जेबीमे दइ छेलिऐ,अहाँमे चलि गेल। जँ सुतरल तँ शिकारी भेलौं। नै सुतरल तँ शिकार भेलौं। धोतीक ढट्ठा बान्हि सिनुरिया काका घर दिस दौगला, घर तक दौगले एला, मुदा बरखाकेँ पकड़ऽ नै देलखिन। से केलहा अनुभव रहनि, तँए बेसी बिसवास छेलनि। ओना मेघो छँटल सन रहै। दोसर, मनमे ईहो रहनि जे जखनि टोले-टोल जाएब तखनि जेतै बरखा हुअ लगतै, तेतै अँटकि जाएब। तहूमे कोनो कि हम ओहेन रूआबी लोक छी जे केकरो दुआर-दरबज्जा दिस तकबो ने करबै। तहूमे कोनो कि बड़का भोजनदास छी जे हजारटा रसगुल्ला, पनरह किलो अण्डाएल ललमुहाँ रोहु माछक ओरियान घरबैयाकेँ करए पड़तै। उनाड़ी बर्खाक ओकातिए केते होइ छै, दस-पाँच मिनट भेल, तइले एक जुम तमाकुले की कम भेल। खजुरिया समधीनक घरसँ कनी पाछूए रहथि तखने टोपर बान्हि मेघ आबि टीपा-टीपी टीप-टीपाए लगल। टीपो-टीपी कि कोनो एके रंगक होइए, केतौ झिसिआएल, केतौ बुनिआएल, केतौ गोलिआएल, केतौ पथराएल, तँ केतौ बिजलिआएल। मुदा से नै गोलिआएल टीपा-टीपी देखि सिनुरिया काका दौगल खजुरिया समधीनक ऐठाम पहुँचला। पूबे-पछिमे रस्ता, दछिन मुहेँ उत्तरसँ मुँह खुजल घर। ओना घरक मुहोँ केते रंगक होइए, एक फीट, एक हाथ, दू फीट, डेढ़ हाथसँ साढ़े तीन फीट पर्याप्त भेल। मुदा जइ घरक एक भागे खुजल रहत तेकरा की कहबै? ओहने खुजल मुँहक खजुरिया समधीनक घर। रस्तेपर सँ छड़पि कऽ सिनुरिया काका ऊपर चढ़ला। ऊपर चढ़िते, बजला- “जेहने छुदराही घरवाली तेहने छुदराहा ओछाइन, केना पहुनमाक पैत बँचत?” ओना हसीना समधीनकेँ मनमे जोरसँ धक्का लगलनि, मुदा किछु जगह एहनो तँ होइते अछि जैठाम सोचै-विचारैक समैए ने भेटै छै। बनौआ हुअ आकि सिरजौआ मुदा भेल तँ समधीने मिलान। की ओ नै जनै छथि जे हमरे सन नारी अपनो घरमे छन्हिहेँ। तखनि तँ भेल भरि मुँह बाजि जिनगीक सुख-दुखमे भागीदार बनब। सिनुरिया कक्काक बात सठलो ने छेलनि आकि बिच्चेमे खजुरिया समधीन बजली- “जेहने छुदराएल पहुनमा तेहने ने सुआगत। केतौ प्रेमो भेटत केतौ परानो जाएत।” ताड़क नमहर चटाइ। जैपर अपन समचा पसारि खजुरिया समधीन पंखा बनबैत रहथि, सिनुरिया काकाकेँ देखिते, चीज-वौस एक भाग करए लगली। बिना एकबगली केने बैसैक जगहो नै बनैत। तैबीच अधभिज्जू काका गमछासँ देह परहक पानि पोछए लगला। ओना खजुरियो समधीन बैसिले-बैसलि चीज-वौस नै बगलौलनि। उठि कऽ ठाढ़ भऽ निहुरि कऽ हटबए लगली। कारखाना बीच जहिना समधीन तहिना स्नान कएल सिनुरिया काका। दुनू अपना-अपना नजरिए एक-दोसराकेँ पढ़बो करथि। ओना सिनुरिया काका देखौआ नहाएल नै रहथि बर्खाक पानिमे भीजल रहथि। मुदा मन अपन से मानैले तैयारे नै रहनि। कहनि जे लोक कलोपर नहाइए, इनारोपर नहाइए,डबरोमे नहाइए, पोखरिओमे नहाइए, मरलो धार[1]मे आ जीतहो धारमे तँ नहाइते अछि। तेतबे किए, गंगाक सिमरिया घाट आ इलाहावादक त्रिवेणी घाटमे सेहो स्नान करिते अछि, मुदा वदलाएल स्नानकेँ की कहबै? मन मानि गेल रहनि जे समधीनियाँ-आँखि जेहेन चमकनि मुदा अपने तँ से नै छी। बजला- “समधीन, की हाल-चाल अछि?” सिनुरिया काका विचारकेँ दाबि छोट करैत बजला तेकर कारण जे एक तँ लोक अपने बेथे तेते बेथाएल अछि जे कियो सुनिनिहार नै भेटै छै, तैपर जँ खोंरना लऽ खोंचारि देबै तखनि तँ एकेबेर चुल्हे धधकि जाएत। मुदा मन गवाही दैत रहनि जे समधीन ओना बुढ़ाएल जकाँ बूझि पड़ै छथि, दस-पाँच बर्खक खेल छन्हि, मुदा मुर्दघट्टीक बाटपर तँ ठाढ़े छथि। बिजली-पंखाक आगू ताड़क पंखाक पुछ केते काल, जेतेकाल बिजली नै रहल मात्र तेतेकाल। मुदा मुँहक बरीसँ पहुनमा थोड़े खुश हेता, जखने बिजली औत तखने कारखनााक इंजन सेहो औत। मुदा एते बात तँ जरूर जे समधीनक भोगल जिनगीक किछु रहस्यमय विचार छिपल अछि। जँ से नै अछि तँ लोक ऐ बेवसायकेँ अंगीकार किए केलक। जाबे सिनुरिया काका देह-हाथ पोछि कऽ सुखौलनि ताबे खजुरिया समधीन सेहो चटाइकेँ दुनू कोड़ पकड़ि दूबेर झाड़ि आगूमे पसारि देलनि। सिनुरिया काकाकेँ बैसबैत अपना बैसलो ने छेली अाकि बिच्चेमे बजली- “हमरा सबहक दिने-दुनियाँ बेपाट भऽ गेल अछि तखनि तँ कहुना दिन खेपिए जाइ छी। ऐ देहक ठेकाने केते जेते काल आँखि तकै छी खाली तेते।” एक संग खजुरिया समधीन अपन जिनगीक प्रश्न उठा सिनुरिया कक्काक मनकेँ तोपि देलकनि, मुदा दोसर दिस मनमे एलनि, आशा बान्हि जिनगीक बाट चलब। प्रश्न उठबैत काका पुछलखिन- “कारोबारक की हाल-चाल अछि?” सिनुरिया कक्काक बात सुनि खजुरिया समधीनक मनमे उठलनि। हाल की रहत, बेहाल कहियौ आकि नेहाल कहियौ, छी तँ दुनूक बिच्चेमे। अपन झँपले-तोपल बात खजुरिया समधीन बेटी-जमाए घरक मान सेहो रखबे करती। बाघ रखए बोन आ बोन रखए बाघ। किछु भेलखिन तँ गामक खेलौनेटा नै बेटी-जमाए घरक सिरिषेजन भेली। बजली- “खाइ-पीबै जोकर जखनि भाइए जाइए तखनि नीक नै कहबै तँ अधलो नहियेँ कहबै, सएह अछि।” ठििकया कऽ सिनुरिया काका जे विचार रखलनि से नै सुतरलनि। ओ ठीकियौने रहथि जे पंखाक आमद-खर्चक बात उठौती, मुदा से नै उठौलनि। जहिना अपन चलाकी अढ़ दबि कऽ छेलनि तहिना ओहो अढ़े दाबि बजली। फेर मनमे उठलनि, मनुख की वनमानुख बनि बोनमे रहल, झाड़ी, डवहारी, दुभिआएल, छीलाएल, चिकनाएल सभतरि तँ ओकर बास छइहेँ। हालो-चाल की कोनो एके रंग रहैए, कियो सासुरसँ मारि खा अबैए तँ कियो सासु-ससुरकेँ मारि कऽ अबैए, कियो माए-बापक हाथे मारि खा चानक बनबैए, तँ कियो माए-बापकेँ मारि, बाेहुक संग बंगलोर-बम्बइ ओगरैए। तहूमे परिवार तँ आरो बेसी झँखुराएल अछि। एक दिस बच्चाक स्कूलक समाचार रहल तँ दोसर दिस बेटी बिआहक, तेसर दिस पेटपूजाक रहल तँ चारिम दिस भोजनदासक। इत्यादि-इत्यादि। अपनाकेँ समटैत सिनुरिया काका बजला- “केते उमेरमे पंखा बनौनाइ सिखलिऐ?” ओना मनक असल विचार अखनो नै रखलनि। मनमे पंखाक प्रयोजन रहनि जे केते दिन लोक एकरा अभावमे कष्ट कटलक, तेकर निमरजना लेल उपए सोचि कथी उपए केलक। मुदा से नै, कियो पाकल आम देखि बेठिकियाएल गोला सोझा-सोझी फेकि तोड़ि लेत से केना मानल जेतै? किए ने मानल जेतै, अनुभवीक फेकब भलहिं नै होउ, मुदा एहनो तँ सम्भव अछिए जे आममे गोला लागिओ सकै छै। मन गुम्हरलनि। गुम्हरलनि ई जे एके तीरे आकि एके गोलीए निशान नै सधै, मुदा अनधुन हजार-पान सए फेकला बाद तँ आम टुटिओ सकैए। जहिना प्रश्न फेकि सिनुरिया कक्काक मन बौड़ाए लगलनि तहिना दोसर दिस खजुरिया समधीनक। समधीनक मनमे एक संग अनेको प्रश्न उठि गेलनि- अपन जनम डीह थोड़े छी, जे झूठ बजने माए-बापक नाक कटाएत। तहूमे ऊपर बाइली बेटी-जमाए ऐठाम छी, कनी-मनी कलछपनक मोजर थोड़े हेतै। ई बात मनमे अबिते जेना छाती सकतेलनि। छाती सकताइते ताना मारैत बजली- “समैध, हाल-चाल की कहबनि, हिनके सबहक आँखि-मुँह देखि तीस बर्खसँ जीवैत एलियनि, आब केते दिन जीवे करब, बस एतबे हकार देने जेबनि जे मुइला पछाति देख लिहथि जे खजुरिया समधीन चोरी-छिनरपन कऽ धरतीक अन्न-पानि खेलकनि आकि अपन बाँहि-बलसँ कमा कऽ खेपलनि, जे किछु देलनि तेकरा उपयोग कऽ जीलकनि आकि उपभोग कऽ।” गैंची माछ जकाँ खजुरिया समधीन तेना ने तरे-तर छछाड़ी कटैत तेते पनिगर थालमे पहुँचि गेली जे सिनुरिया काकाकेँ भाँजे बेभाँज भऽ गेलनि। फेर मनमे भेलनि जे एना नै काज चलत। बजला- “समधीन, बिआहमे केतेटा रहिऐ?” सिनुरिया काका ई सोचि प्रश्न फेकलनि जे जुआनी-जबानी जिनगीक वसन्त छी। जेकरा सभ चाहैए मुदा भऽ की रहल अछि? मुदा खजुरिया समधीनकेँ अपन जनमदात्री माए-बापपर नजरि पहुँच गेलनि। देखल, भोगल माए-बापक परिवार, जइ परिवारसँ बिआह-संस्कार तक भेलनि। साधारण किसान परिवार, कट्ठा दसेक अपन खेत,परदेशिया सबहक खेत मनखप लऽ पाँच बीघा जोतक किसान परिवार। खेतीसँ जुड़ल परिवार तँए खेतीक सभ लूरि परिवारमे सभकेँ। ओना बिअाह माए-बाप ठेकनाइए कऽ केने रहनि। ठेकनाएल ई जे अपने तरहक किसाने परिवारमे केने रहथि। मुदा जातीय दुर्गुणक चलैत खेत बोहा गेलनि। बँचैत-बँचैत कट्ठा भरिक घराड़ीमे चौघारा घरटा बँचलनि। मुदा जहिना जातीय दुर्गुण छै तहिना सु-गुण तँ सेहो छइहे। ताड़-खजूरक पत्ताक कारोबार करैक रोजगारो तँ आबिए रहल अछि। मनमे उठिते जेना खजुरिया समधीनक छाती डेालि गेलनि। बाट-पड़ल घुच्चीक बीच अँटकि गेली। घुच्ची ऐ दुआरे जे मनुखमे अपन शक्ति छै, जे बाटक घुच्चीकेँ छीलि-छालि एकबट्ट कऽ लैत अछि। सासुर अबिते खजुरिया समधीनक जिनगी घुच्चीमे फँसि मोड़ा गेलनि। जिनगीक बदलैक परिस्थिति बनलनि। जे हसीना माए-बापक ऐठाम अपन खेत-पथार, वाड़ी-फुलवाड़ीमे बारहो मास गीति गाबि समए बितबै छेली, सएह आइ हसीनाकेँ जिनगी मोड़ि सोलहन्नी अनाड़ी बना देलकनि। तीन भाँइक भैयारीक परिवारमे खजुरिया समधीन छोट दियादनीक रूपमे सासुर एली। खगल घर, हाथे-पएरक बले चलैत। बरख दुइए-अढ़ाइएक पछाति भैयारीमे भीन-भिनौज भऽ गेल। कट्ठा भरि घराड़ीमे चौवगली घर, घरक आगूओ आ पाछूओमे किछु-किछु जमीन खाली। तीनू भाँइक बीच सबूतन छह धुर दू पौआ, दू कनमा, दस कनइ आ दस फनइक बँटबारा भेल। जे बँटवारा भाग लगा-लगा भेल, मुदा घरक अगवास तेहेन जे लग्गी-डंटासँ बँटवारा हएबे कठिन भऽ गेल। तत्काल तँ घरे-घर आ अगवास साझीए रखलक, मुदा परिवारो तँ परिवार छी, दुनू जेठ भायकेँ तीन-तीन सन्तान, छोट भाए सन्तान विहिन। हालेमे बिआहो भेल आ उमेरोमे सभसँ छोट। चारि-पाँच बरख भीन-साझीक बीच परिवार चलल। भीन-साझीक माने ई जे घरे-घर बँटा, चुल्हि गड़ा गेल, चारिम घर जे दरबज्जा जकाँ छल ओ साझीए रहल। ताड़-खजूरक पातक कारोबार। कारोबार ई जे जहिना खजूरक पातकेँ बीअनि, ओछाइन,मौनी-पौती बनबैत तहिना ताड़क पातकेँ पंखा, चटाइ, झुनझुना इत्यादि बनबैत। जे कारोबार घर-अँगनासँ बाहर धरिक छेलनि। घर-अँगनाक माने ई जे आँगन-घरमे बीनै छेली आ बाहर जा बिकाइ छेलनि। गाममे ताड़ो-खजूरक गाछक कमी नहियेँ। कमीआें केना रहत जइ गामक लोक आमक शौखीन रहत ओइ गाममे आमक गाछी बेसी रहत,मुदा जइ गाममे ताड़ीक शौखीन रहत ओइ गाममे तँ तड़बोनीए-खजूरबोनी ने बेसी रहत। जहिना कँटाह खजूरक पात, तहिना धराह ताड़क पात। दुनू दिस धार, जहिना छाजामे तहिना पातमे। गाछक कँचका पातकेँ सुखबैले जगह चाही, ओना खजूरक पात घरक चारपर सुखबैत, मुदा ताड़क छाजा तँ भाड़ी होइ छै जे घरेक छार उजारत, तँए जमीनेपर सुखबए पड़ै छै। तैपर सँ हरोथिया करचीओ, जेकर डाँट पंखामे लगैत, आ बाँसो, जेकर बत्ती डाँटमे लगैत तइ रखैले रक्का-टोकी शुरू भाइए गेल रहै, मुदा दोसरो कारण भेल। दोसर कारण ई भेल, जेठ दुनू भाँइक परिवार नमहर, काज केनिहार दू-दू गोटे, मुदा छोट-छोट बच्चाकेँ सम्हारैमे समए लगैत तँए तेसर भाएकेँ माने खजुरिया समधीनकेँ बेसी काज भेने आमदनीआें बेसी होइ। खसैत जिनगी अपन जेठ दुनू भाँइ उठैत तेसर भाइक जिनगीसँ द्वेष रोपि दोषारोपन शुरू करए लगल। माए-बापक देल संस्कार खजुरिया समधीनक परिवारकेँ अनुकूल बनौलक। अनुकूल ई बनौलक जे जहिना पिता तहिना माता बनि पोस पबैक लूरि सिखा देने रहथिन। जइसँ खजुरिया समधीन अपना पतिओकेँ अनुकूल बना नेने रहथि, जे यएह उमेर दुनियाँकेँ चिन्हैक अछि ई उमेर अवोधसँ सुवोध बनैत सियान बनैत अछि। चाहे सियान पागल बनू आकि सियान मनुख, मुदा हूसब तँ हुसिते हूसैत-हूसैत हुसिया जाएब। जँ अपन तराजूपर घरमराजक काँटा लगा तौल लेब सेहो भऽ सकैए आ नै जँ धोपचटेमे रहि जाएब तँ समाजक काँटा होइ आकि अपने वंशक, जइ दिन तौलल जाएब तइ दिन सभ कियो कानि कऽ रहि जाएत जे फल्लाँक वंश बँचल छै आकि बिलटि गेलै। मुदा से नै सासुर अबिते खजुरिया समधीन फाँड़ बान्हि जिनगीमे कूदि गेली। मनुखकेँ खगते केते छै, जेहेन जिनगी तेहेन खगता। जखनि दुर्वासा मुनि दुभि खा कऽ कृष्णक गुरु बनैक दम अपनामे भरि लेलनि तखनि हम सभ तँ अन्न खाइ छी। आगू दिस सम्बन्ध बनैक जहिना स्तर अछि तहिना पाछूओ दिस तँ अछिए, ओही स्तरानुकूल दुनू जेठ भायक परिवारक बीच सम्बन्धमे प्रगाढ़ता आएल आ तेसर भाएकेँ आगू बढ़ैसँ रोकैक षड्यंत्र रचए लगल। वएह रचना दुनू भैयारीक परिवारक धर्म ग्रन्थ बनि गेल। सात सालक बेटी खजुरिया समधीनकेँ, मुदा साँझ-परात दुनू दियादिनीआें आ भैंसुरोक मुँहक गारिसँ तरे-तर गड़ैत पताल पहुँच, अपनाकेँ सवूरक गाछमे बान्हि मानि लेलनि जे मुँहक गारि ताधरि लागि नै करैत जाधरि ओकरा बेवहारिक रूप नै देल जाएत। तँए जेठक बात छियनि, अपन जिनगी तँ लोककेँ अपने हाथ-पएरक असिरवादे चलैए, हुनका सबहक बातकेँ असिरवादे बुझबनि, कमसँ कम अपन सम्बन्धक परिचए तँ कराइए रहल छथि। खैर जे-से। दिन झूकि गेल रहै, मुदा साँझ नै पड़ल रहै। संजोगसँ तीनू भाँइआें आ तीनू दियादिनीआें अँगनेमे रहथिन। स्त्रीगणक बीच नैहरक बड़प्पन आ छोटप्पनक बात जेठकी दियादिनी चालि देलनि। खजुरिया समधीन ई नै बूझि पेली जे स्त्रीगणक एहनो सु-भाव बनै छै जे जँ अपन सासुर परिवारमे डुमैत देखै तँ नैहरक झाँपल-तोपल बातसँ दोसराकेँ झाँपए चाहैए। खजुरिया समधीनकेँ एक दिस भाए-बापक किसानी संस्कार आ दोसर दिस अपन लूरि-बुइधिक संस्कार एते जोड़ मारि देलकनि जे फाँड़ बान्हि आँगनमे माटि फेकि बजली- “जँ केकरो माए-बाप जनमा दूध पिऔलकै तँ की हमरा पानि पीआ पोसलकै?” नक्शा बनाएल सिपाही जकाँ एक दियादिनी, खजुरिया समधीनक बाँहि पकड़ि आगूमे बेटाकेँ ठाढ़ केलक,तहिना एक भाँइ पतिओकेँ। अनधुन तीनू बेटीओ, अपनो आ पतिओ मारि खेलक। मारि खेला पछाति खजुरिया समधीन पतिकेँ कहलनि- “जिनगीक पहिल मरन भऽ गेल। जे बँचल अछि आकि बँचल रहत, ओहीसँ अगिला जिनगी बनबैक अछि।” अपना देहमे खजुरिया समधीनकेँ स्त्रीगणक मारि लगल रहनि तँए देहक चोट कम आ मनक बेसी रहनि,दोहरी चोट दुनू दियादिनीआें आ दुनू भैंसूरो मिलि पतिक सोझहामे नंगटे ठाढ़ कऽ देने रहनि। मुदा तैयो तीनूमे अपनाकेँ होशगरि बूझि खजुरिया समधीन पतिओ आ बेटीओक सेवा करए लगली। धिया-पुताक मारि, बेटी लगले नीक भऽ गेलनि, मुदा लाठीक मारिसँ पतिक कपारो फुटल, डेनो टुटल आ देहो चुराएल रहनि। एक मास धिसियौर काटि पति मरि गेलनि। ओना लोक-लाज दुआरे दुनू दियादिनीआें आ भाइओ कनबे कएल, माटिओ देलक मुदा खजुरिया समधीनक मन बड़प्पनसँ अड़प्पन दिस ससरए लगलनि। पतिक मुइला पछाति खजुरिया समधीन मास दिन तक अगिला जिनगीक विचार करैमे हेराएल रहली। कारणो छल जे एक तँ पति विहिन सोग, दोसर काजो-उदेम आन समैसँ अलग बदलि गेलनि, जइसँ मन नब काज दिस खिंचा गेल रहनि। जेना-जेना आगू मुहेँ समए ससरए लगल तेना-तेना अपनो ‘पतिक’ सोग कमए लगलनि। जे सोभाविको अछि। सोभाविक ई जे जिनगीक जे मूल समस्या, जिनगी ठाढ़ भऽ चलैक, अछि ओ तँ आन कोनो समस्याकेँ ढकेलिते अछि। ओना दोसर कारण ईहो छेलनिहेँ, जे पछिला जे कमाइ रहनि ओ पतिक दबाइ-दारूक संग पथ्य-पानि, होइत दुनू माए-बेटीक खेनाइ-पीनाइ धरि पार लगौलकनि। मुदा मास दिन बीतैत-बीतैत ओहो सभटा जे घरक धएल धड़ल रहनि, निंग्हटि गेलनि। मास दिनक समए खजुरिया समधीनकेँ झिकझोड़ि देलकनि। पछिला जिनगीकेँ झिकझोड़ि खसा-पड़ा एकबट कऽ देलकनि। मुदा जाधरि मनुखो आ आनो-आन जीव-जन्तुक घटमे परान रहै छै ताधरि जिनगीक आशा रहिते छै। सएह खजुरिया समधीनकेँ सेहो भेलनि। आँखि उठा घर दिस तकली तँ बूझि पड़लनि जे घरक तँ चीनमारेक खुट्टा टुटि गेल! आब केना परिवार ठाढ़ रहत? कोनो परिवार उपारजनपर ठाढ़ रहैए। जेहेन उपारजन तेहेन घरक चुहचुही आ जेहेन घरक चुहचही तेहेन लोकक चुहचुही। खजुरिया समधीनक मनमे उठलनि, अछैते लूरिए जीब केना पएब?ताड़-खजूरक पातक बौस बनबैक लूरि अछि, जेकर खगता अपनो अछि आ लोकोकेँ छै, मुदा पात हाथ तक पहुँचत केना? जहिना कुशल स्वावलंबी करीगर कँच्चा माल आ औजारक अभावमे अपनाकेँ अधमिरित बूझि आशा बान्हि हँसैत-खेलैत आगू डेग ई सोचि बढ़बैए जे जहिना जमीनसँ सात सीढ़ी ऊपर अकास अछि, तहिना सात सीढ़ी नीचाँ पताल अछि जैबीच दुनियाँ अछि, तहीमे ने हमहूँ छी। परिवारक उपारजनक अदहा काज मरल देखलनि। मरल ई जे अपने सूखल पातकेँ चीरि बौस बनबै छी, से गाछसँ आँगन धरि पहुँचत केना। जहिना उत्तरी बिहारे नै आनो-आनो राज्यमे दछिनसँ सिमटी-लोहा पार नै भेने ईटाक घरे नै बनि पएल। जँ केतौ बनबो कएल तँ लोहाक काज लकड़ी आ सिमटीक काज माटि केलक, तहिना अपना मनकेँ खजुरिया समधीन पुछलनि- “रे मनमा, बाज! बिनु डारिक गाछपर चढ़ि कऽ ताड़-खजूरक पात काटल हेतौ?” प्रश्न उठिते खजुरिया समधीनक मन थकथका गेलनि। थकथकाइते थाकक-थाक सोग-पीड़ा मनमे उचरि गेलनि। उचरि ई गेलनि जे की एहेन समाजमे हमरा सन तीस बर्खक विधवाक बास सम्भव अछि? तीन भाँइक भैयारीक परिवारमे जे हाथ पकड़ि अनने छला ओ दुनियाँमे रहबे ने केला, कहबो केकरा करबै। लगले मन तमतमा गेलनि, तमतमा ई गेलनि जे पुरुख हुअ आकि मौगी, जँ अपन झाँपन-तोपन अपने नै राखत तँ आनक आशा केतेक काल। लगले मन आगू बढ़ि निर्णए करए लगलनि। करए ई लगलनि जे कारोबार अधखरूआ भेला पछाति जँ ओकरा पुड़बै दिस नै बढ़ब तँ जिनगी भार भऽ जाएत। मुदा जैठाम परिवारक संग एते पैघ अन्याय भेल आ समाज मुँह तकैत रहि गेल, ओ समाज तँ अपने मरल अछि! तैठाम हमरा सन मनुखक बास हएत? तखनि? तखनि तँ यएह ने जे जेतएसँ ऐठाम आएल छी तैठाम जा बसी, आकि बेटी-जमाए ऐठाम जा बसी। तीन-मुहाँनीपर अबिते खजुरिया समधीनक मन जेना लसकलनि। एक दिस वृद्ध माता-पिता, दोसर दिस डम्हाइत बेटी-जमाए। माता-पिता मनमे अबिते अपन जिनगीक भविस ‘केते दिन जीब’ आ माए-बापक भविस ‘केते दिन जीवित रहता’मे बहुत अन्तर अछि। माए-बाप तँ बेटीए जकाँ बुझता मुदा भाए-भौजाइक सम्बन्धक जे हवा-बिहाड़ि बहि गेल अछि तइमे तँ आरो दम घोंटि-घोंटि मरब। एक कोखिक सन्तानक बीच जैठाम एते दूरी बनि गेल अछि तैठाम मानव धर्म मात्र कल्पना छी। भाए-भौजाइपर नजरि पड़िते जेना मन तमतमा गेलनि। होन्हि जे केते बाजी केते नै, मुदा वकार नै फुटलनि। वकारो केना फुटितनि, जैठामक पुरुख महापात्र, सहोदर बहिनकेँ कोसो दूर भगबए चाहैए तैठाम आन तँ सहजे आने भेल। खजुरिया समधीनक मन फेर थकथका गेलनि। तीन बट्टीपर ठाढ़ भऽ हिया कऽ तकलनि तँ देखा पड़लनि जे एकटा मरिए गेल दाेसर अधमरूए अछि...। बेटी-जमाएपर तेसर नजरि गेलनि। ओहो तँ बन्ने अछि, लोक बजै छै जे दुनियाँमे भीख माँगि खाइ बेटी ऐठाम नै जाइ। तखनि? हँ, तखनि उपए अछि, मनुख-मनुखेक अशरामे रहत, तखनि तँ भेल जे पाहुनक रूपमे अपनाकेँ नै बूझि घरबैया बना रही। मनमे खुशी एलनि। एते दिन पति कारबारी छला आब जमाए हएत, तखनि तँ एतबे ने अपन इमान राखए पड़त जे जइ समाजमे बास भूमि छल से नै रहल तँए आन समाजकेँ पहुनाइक सनेस किछु दिऐ। जेते खेबै-पीबै तइसँ बेसी कमा कऽ देबै। खजुरिया समधीनक मन मानि गेलनि जे बेटी-जमाए ऐठाम रहब। मुदा लगले मनमे उठलनि बेटी-सहनाक बिआह ने दू बरख पहिने भेल, मुदा दुरागमन तँ नै भेल अछि। मन कुचकुचेलनि। कुचकुचेलनि- दुरागमनोकेँ की सीमा-नांगरि छै, तहूमे आब, आब लोक दुरागमन करैए आकि माल-जाल फरिछौट करैए। जँ माल-जालक फरिछौट नै होइ छै तँ पति-पत्नीक दुरागमन भेल,मुदा बाल-गोपालक की भेल? देखा-देखी अहिना ने दुनियाँ चलै छै। मुदा लगले मन बसैसँ पहिने छोड़ैक विचार केलकनि। मनुख तँ मनुख छी जे बोनैया जानवर आकि मेघैया चिड़ै थोड़े छी, चास-बासबला ने छी। घराड़ीकेँ जँ खरका नै लेब तँ तेहेन-तेहेन गरदनि कट दियाद सभ अछि जे घराड़ी कटैमे केते समए लगतै। योगी जकाँ खजुरिया समधीन तीनू काजकेँ एकठाम जोड़लथि। जोड़लथि ई जे घराड़ी ओहेन लोकक हाथे बेचि ली जे दुनू परिवारकेँ कहियो चैनसँ नै रहए दइ। फेर भेलनि जे जखनि गामसँ जाइते छी, तखनि जँ समाजो रूपे कहियो नजरि पड़ता तँ आँखि डोलि जाएत। तँए नीक हएत जे तेहल्लाक बीचमे आड़ि-पाटिक दरमे दुनू भाँइएकेँ दऽ देबनि। तइसँ ईहो हएत जे जँ पहिनौं दाम लऽ लेबै तैयो आशापर ओते काल रहबे करब, जेते काल बेटी-जमाइक संग घरसँ नै विदा हएब। बेटीक संग जमाए आ तैसंग अपने जाएब नीक नै, मुदा कएलो की जाए? किछु ने। बेटीकेँ अगुआ अपने जाएब। खजुरिया समधीनक मन ठमकलनि। ठमकिते विचार करए लगली जे तीनूक संग चलैक बन्धन समाजमे अछि तैठाम जँ बन्धन तोड़ि निकली आ दोसर समाज रहैक अनुमति नै दिअए तखनि केतए भऽ रहब? फेर लगले मन घुरलनि जे समाज तँ समुद्र छी, जइमे लाल मोतीक संग घोंघी-सितुआ सेहो रहिते अछि। तैठाम दुनूकेँ बेराएब कठिन अछि। केते एहेन पारखी अछि जे घोंघा-सितुआ आ लाल-मोतीक सम्बन्धकेँ परेखि पौत? के बूझत जे घोंघे-सितुआक पेटसँ लाल मोती सेहो अबैए? एक जिनगीक इतिहास छी, तैठाम हमरा नुकाएल नै हएत। डंका बजा कऽ नै कहबै जे समधीन बनि आएल छी, कहबै जे अपन बेटी-जमाइक सेवा करए आएल छी। देखै छी जे नेपालमे नागरिकता लेल एते छान-बान रहितो लोक अपन अंगीतक ऐठाम रहि नागरिकता पाबिए लइए, गाम-समाज तँ ओइ देशसँ बहुत छोट भेल, मनमे अबिते खजुरिया समधीनकेँ खुशी भेलनि। मन-मानि गेलनि जे बेटी-जमाए ऐठाम रहब अनुचित नै भेल। मुदा लगले फेर भेलनि, मुँह नुका कऽ गाम छोड़बो आ प्रवेशो करब नीक नै। जँ गामसँ मुँह नुका कऽ जाएब तँ सभ दिन समाजक आगू मुँह खसले रहत, तहिना जइ गाममे छिप कऽ प्रवेश करब ओहो तँ तहिना हएत। ई सम्भव अछि जे जैठामसँ निकलब, तेकरा सोझा नै पड़ने मुँह निच्चाँ करैक प्रश्ने ने औत, मुदा जैठाम आगू जिनगी चलत तैठाम मुँह खसा कऽ रहब...? खजुरिया समधीनक मन तरसऽ-कलपऽ लगलनि। जहिना एक समाजसँ तरस रहनि तहिना दाेसर समाज तड़पि कऽ पहुँचब छेलनि। लगले मनमे उठलनि सभसँ बड़ो समाज,जे परिवार आ परिवारक लोककेँ जीवन-मरण दइक शक्ति रखैए। तँए पहिने अपना समाजकेँ पुछि, अनुमति लऽ ली। तखनि भेल जे जइ समाजमे जाएब से समाज अंगीकार करत की नै? किए ने करत, जखनि ओइ समाजक सीख-लीख पकड़ि चलब तँ किए ने समाज समाज बूझत...। मनमे उठिते खजुरिया समधीन अदहा रस्ता खोलि लेली आ अदहा खोलैक विचार करए लगली। समाजो तँ समुद्रे जकाँ ने गुँहखत्ताक पानिसँ लऽ कऽ गंगा-यमुना,सरस्वती नदी धरिक पानि अपना पेटमे समेटि रखने अछि। जँ समाजमे कियो एहेन अछि जे कोनो बातकेँ बिनु बुझनौं बतोत्तर करैए, तँ एहेनो तँ छथिए जे बातोत्तर करै छथि, तखनि? तखनि किछु ने। एतबे जे पाँच-दस गोटेसँ विचारि ली। पाँच-दस मीलि करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज। आगू बढ़िते खजुरिया समधीन घरक थारी लोटा, घराड़ीक रूपैआक संग बेटीकेँ अगुआ जमाए ऐठाम विदा भेली। गामक सीमान टपिते पाछू घूमि गामकेँ गोर लागि दुनू माए-बेटी आगू दिस बढ़ली। बाटमे माए बेटीकेँ कहली- “बुच्ची, बिनु पुरुखक परिवार ओहने भऽ जाइ छै, जेहने बोनमे राम विहिन सीताकेँ रावणक फाँसमे फँसि भेलनि।” सहनाक मनमे कोनो विकार नै। अखनि ओ उमेर नै जे सासुरक बास बुझैत, दूधमुहोँ बच्चा जहिना माइक संग काँट-कुशसँ लऽ कऽ कोठा-सोफा धरि, माइक संग एके रंग बुझैए, तहिना सहनो। बाजलि- “से की, से की माए?” बेटीक जिज्ञासा देखिते हसीना फूलक कोढ़ी जकाँ प्रस्फुटित होइत बजली- “बेटी, बेटी चाहे राजघाटक हुअए आकि मुर्दघाटक, बेटी-बेटीए होइए।” माइक झाँपल-तोपल बात सहना नै बूझि पेलक, फेर जिज्ञासा करैत बाजलि- “से की माए?” सह पबिते हसीना सहटि आगू बढ़ि बजली- “बुच्ची, जहिना सीता महरानी महरानी नै बनि बोने-बोन बितेली, तहिना सभ बेटीकेँ बितबैले कलेजा थामि लेबा चाही। जाबे तक आँखि तकै छी ताबैए तकक ने हमर आशा तोरो हेतौ, तेकर पछाति तँ अपने लूरिए-मुहेँ ने जिनगी बितेमेँ।” माइक बातसँ जेना सहनाकेँ माथपर किछु भार-स्वरूप पड़ल। मुदा भारो तँ साधारण भार नहियेँ जे सहना बूझि पबैत। आने मिथिलांगना जकाँ सहनो मुँह बन्न कऽ सुनि लेलक। बाजल किछु ने। गामक सीमान माने सहनाक सासुर आ खजुरिया समधीनक समधियौरक सिमानपर पहुँचिते दुनू माइ-धी बैसि रहली। किरिण डुमैक समए बाध-बोनसँ गैवार-महिंसवारक संग गोबरबिछनी, घसवाहिनी सभ गाम दिस विदा भेल तँ दुनू माए-बेटीकेँ बैसल देखि एकटा घसवाहिनी पुछलकनि- “सुआसिनी, कोन गाम जाएब?” गैवार-महिंसवार गाए-महिंसक संग आगू बढ़ि गेल मुदा गोबरबिछनीआें आ घसवाहिनीआें ठाढ़ भऽ गेली।‘सुआसिनी’ सुनि खजुरिया समधीनकेँ सुआस एलनि। सुआस अबिते बजली- “अखनि धरि बटोही छेलौं, मुदा आब से नै छी, जँ ऐ गामक लोक रहए देता तँ अही गाममे रहि जाएब।” ‘अही गाम’ सुनि सभकेँ आगूक बात बुझैक जिज्ञासा भेलनि। घासक छिट्टो-खुरपी आ गोबरक पथीओ सभ रखि चारूभर सँ दुनू माइ-धीकेँ घेरि कऽ बैसि गेली। सोनियाँ दादी सभसँ उमेरगर, तँए सभ हुनके गप करैले देलकनि। सोनियाँ दादी खजुरियाकेँ पुछलखिन- “ऐ गाममे कियो अंगीतो छथि?” ‘अंगीत’ सुनि खजुरिया समधीन सहनाकेँ देखबैत बजली- “ऐ बच्चाक सासुर छिऐ, बाप नै छै, हम माए छिऐ, तँए जिनका संग दान केने छी, तिनका लग पहुँचबए जा रहल छी।” सहनाकेँ गामक बेटी नै पुतोहु बूझि संकोच करैत सोनियाँ दादी पुछलखिन- “किनकर पुतोहु छथिन?” जहिना पत्नी पतिक नाआें लइसँ संकोच करैत तहिना कनियाँक माइओ तँ संकोची भाइए जाइ छथि। से खजुरियो समधीनकेँ भेलनि, मुदा संकोचकेँ संकुचित करैत खजुरिया समधीन बजली- “रशूल, जमाए हेता।” रशूलक नाआें सुनिते सोनियाँ दादी थकमका गेली। थकमका ई गेली जे रशूलक घर तँ अपने घर लग अछि। लगक पड़ोसीआ तँ हम भेबे केलिऐ, तँए अरिआति कऽ लऽ जाएब नीक हएत। बाल-बोध हुअ आकि सियान मुदा गामक बेटी नै पुतोहुए ने भेली। मुदा हमहूँ किछु भेलौं तँ तेहल्ले भेलौं। कोनो जरूरी छै जे दुनू परिवारमे प्रेमक मिलानीए होइ, गरमिलानीआें तँ भाइए सकै छै। एहेन स्थितिमे संगे लऽ जाएब नीक हएत? अनेरे दुनू परिवारक बीच घड़हरिया जकाँ गनजन हएब। मुदा संगो छोड़बकेँ कियो नीक थोड़े कहत? अनेरे लोक कहबे करत जे सोनियाँ दादी चीन्हि कऽ अनचीन्ह केलक। असमनजसमे सोनियाँ दादी पड़ि गेली। मुदा लगले जुइत फुड़लनि। जुइत ई फुड़लनि जे एहेन विचार असगर-दुसगरमे आबि सकैए, ऐठाम कि कोनो असगरे छी। एक गोटेकेँ समदिया बना घरपर समाद पठा देब नीक हएत, समाज छी अपन सामाजिकता निमाहैक ताबैए तक ने भागी छी, जाबे तक घरवारीक कान तक समाद नै पहुँचल। सुनला पछातिए ने नीक-अधलाक विचार हएत। सहरगंजे सोनियाँ दादी बजली- “रशूल ऐठामक समदिया के हेमे?” जहिना कोनो नब बात, नब काज वा नब समाचार पबिते कियो ओकरा बाँटए चाहैए तहिना गोबरबिछनीआें आ घसवाहिनीआेंक बीच भेल। एककेँ के कहए जे अनेको समदिया भऽ गेल। दूटा अधढेरबा बच्चियाक माध्यमसँ समाद रशूलक परिवारमे पहुँचल। समाद पबिते रशूल माइक संग पहुँच दुनू गोटेकेँ अरिआति अपना ऐठाम अनलकनि। जेकरा तीस बरख भऽ गेल। अपन बात पुछि सिनुरिया काका खजुरिया समधीनपर नजरि अँटका उत्तर तलासए लगला। सिनुरिया कक्काक बात सुनि खजुरिया समधीन ठमकि गेली। ठमकिते मन नाचए लगलनि। नचैत मन माए-बापक संग वाड़ी-झाड़ीमे केना सजमनि, कदीमा इत्यादि अपन हाथक लगौल लत्तीसँ आनि खाइ छेलौं, मनमे अबिते बिहुँसि गेली। बिहुँसब देखि सिनुरिया काकाकेँ भेलनि जे समधीन नीक जकाँ सभ बात कहती, मुदा लगले खजुरिया समधीनक मन दहकि गेलनि। दहकि तखनि गेलनि जखनि नैहर-सासुरक बीच अपन टुटैत जिनगी देखलनि। देखिते दहकल मन बिदकि गेलनि। समधीनक बिदकब देखि सिनुरिया काका भोथिया गेला। भोथिया ई गेला जे ई की भेल- एक मुँह कानब एक मुँह गीत? जहिना सिनुरिया काका भोथियाएल तहिना खजुरिया समधीन सेहो बौड़ाएल बतही बटोहीन जकाँ कखनो हँसैत तँ कखनो कनैक सुरसार करए लगली। मुदा बेटी-जमाए ऐठाम कानबो उचित नै बूझि अपन सासुरपर नजरि गेलनि। नजरिकेँ सासुर पहुँचिते मुँह मुस्कुरेलनि। मुस्कुराइते सिनुरिया काकापर नजरि देलनि तँ बूझि पड़लनि जे भरिसक अपने बातमे ओझराएल छथि अखनि सुनैक मन नै छन्हि। समैओ तँ सएह भऽ गेल अछि जे केकरा एते पलखति छै जे माए-बाप आ सर-समाजक बात सुनत आकि बूझत। मुस्कुरेली ऐ दुआरे जे जखनि सासुरमे तीनू भैयारीमे अपनाकेँ उठैत देखलनि। मुदा लगले भैयारीक दुश्मनी मन पाड़ि मनकेँ चूड़ि देलकनि। लगले हसनमुँह आ लगले कननमुँह समधीनक देखि सिनुरिया काका आरो भोथिया गेला। ई की भेल? की विपटाइ आ हँसोर कला एके भेल? जोकराइ तँ अो भेल जे धारा छोड़ि कुधाराक प्रदर्शन करैए, मुदा...। सिनुरिया कक्काक मन बेकाबू भऽ गेलनि। होश हवसा गेलनि। हवास होइते मनमे उठलनि जे एना झाँपि-तोपि बजने काज नै चलत। खोलि कऽ बजला- “समधीन, अखनि परिवारमे केते आमद अछि आ केते खरच?” जहिना थलाह हाथे गैंची पकड़ि राखब, आकि अधडरेड़पर सँ बिलक साँप पकड़ब कठिन अछि तहिना खजुरिया समधीनक पेटक बात िनकालब सिनुरिया काकाकेँ उकड़ू भऽ गेलनि। गैंची जकाँ ससरि खजुरिया समधीन बजली- “जानए जअ आ जानए जत्ता। हम तँ उलफी भेलौं, अनेरे कोन जरूरी अछि केकरो घरक नीक-बेजए बुझैक।” गैंची जकाँ गैंचिआइत समधीनकेँ देखि सिनुरिया कक्काक मनमे भेलनि, एना नै हएत। बजला- “समधीन, जँ आइ अहाँक पाहुन भऽ जाइ तँ पौहुनाइ कराएब? देखिते छिऐ जे केहेन पानि होइए जे ने बाट छोड़ैए आ ने बाट पकड़ैए।” ऐबेर सिनुरिया काकाकेँ सुतरलनि। खजुरिया समधीन बजली- “समधि, नै पान तँ पानक डंटीओ लऽ कऽ सुआगत करबे करबनि। जानियेँ कऽ तँ भगवान गरीब बनौने छथि, तखनि दरबज्जापर आएल पहुनकेँ नै किछु तँ एक लोटा पानियोँसँ तँ मान रखबे करबनि।” जहिना पनहाइत गाए महिंसकेँ मलकार परेखि लैत अछि तहिना सिनुरिया काका खजुरिया समधीनकेँ परखलनि। परेखि बजला- “भरि दिनमे कएटा पंखा बना लइ छिऐ?” ‘कएटा बना लइ छिऐ’ सुनि खजुरिया समधीन ठमकि गेली। ठमकि ई गेली जे एके गरे काज थोड़े होइए। पहिने गाछसँ काँच डारि काटि सुखौल जाइए, तखनि ओकरा पत्ताकेँ चीरि-चीरि छोड़ौल जाइए, तेकरा बाद ओकरा छाँटि-छूँटि बाँसक डाँट बना ने बनौल जाइए। तँए ठाँहि-पठाँहि किछु कहब कठिन अछि। बजली- “कोनो कि एक दिनक काज छी जे दिने-दिन हिसाब बुझबै।” जइ दुआरे सिनुरिया काका बात उठौलनि से फेर नै भेलनि। मनमे छन्हि जे एको गोटेसँ पातक भाँज लगलासँ सभ भाँज जँ नहियोँ तँ बहुत भाँज तँ लगिए जाएत। तेकर कारण भेलनि जे जहिना कोनो गाछक सिर उखाड़ला पछाति उखाड़ैक सम्भावना बढि जाइए, तहिना भेलनि, मुदा गाछक मुसरा उखड़त आकि नै उखड़त ई तँ प्रश्न अछिए। उखड़ियो सकैए आ नहियोँ उखड़ि सकैए। ई तँ गाछपर निर्भर करैए। मुदा जिनगीक गाछक मुसरा सिराहेटा नै जलाहो होइए। सिनुरिया कक्काक मन थकमकेलनि। थकमकाइते पाछू उनटि देखलनि तँ एकटा मोटगर सोड़ि पकड़ल बूझि पड़लनि। बजला- “समधीन, नै बुझलौं जे की कहलिऐ- जानियेँ कऽ गरीब भेलौं?” खजुरिया समधीन जानि आ मानिक अरथे ने बुझै छेली। एकेकेँ दुनू बुझै छथि, मुदा सिनुरिया काका तेहेन बात पुछि रहल छथि जे की कहबनि। धकाइत बजली- “समधी, ईहो बड़ बतबनौन छथि, हमरा गाम दिस अहिना लोक बजैए जे जान-मान एके छी।” ओना सिनुरिया काका जान-मानमे ओझरए लगला। मुदा मनमे एलनि, जिनगी जाल छी, एक दिस घुरछी छोड़बै छी दोसर दिस लगि जाइए। आकि नबके बनि जाइए। आब कहू जे अमीर-गरीब जनमाउ छी आकि बरखाउ? ई केना झाँपल-तोपलमे बूझब? होइ तँ दुनू छइहे, बुढ़ाड़ीमे बजै काल सभ बजैए जे हमर जिनगीक अमुक समए स्वर्ण काल छल, आ अमुक समए अन्धकार काल। मुदा केना स्वर्ण काल एबो कएल आ गेबो कएल, से केना बुझबै? जी जाँति बजला- “समधीन, एहनो तँ समए रहबे ने कएल हएत जे नीक-निकुत खेबो-पीबो केने हएब आ घरो-दुआर बनौने हएब?” सिनुरिया कक्काक बात सुनि खजुरिया समधीनक मनमे खुशी उधकलनि। उधकिते चौअनियाँ मुँह फुल-फुलेलनि। फुल-फुलाइते बजला- “समधी, की दिन छल आ की दुनियाँ, चारूकात हरिहरे देखिऐ। मुदा दिन धराबए तीन नाम।” खजुरिया समधीनक बात सुनि सिनुरिया काका फेरि भोथियए लगला। मनमे उठलनि कहू, ई की भेल? एक दिस ‘हरिहरे’ दोसर दिस ‘तीन नाम’ सेहो बाजिए देलनि। मन कहलकनि, जहिना अपनेकेँ पीछराह पुरुख बुझै छी तहिना भरिसक समधीनो पिछराहे छथि। एक तँ एके पीच्छर केतेकेँ पीछरा खसबैए, तैपर टिकाशन धेने समधीनो...। लगले मन धक्का मारलकनि। बजला- “घरक नोन-तेल जारनि-काठीसँ लऽ कऽ लत्ता-कपड़ा अा घर-घरहट करैत हाथ-मुट्ठीमे केते, सालक पछाति बँचै छेलए?” सिनुरिया कक्काक बात सुनि फेर खजुरिया समधीन सुरकुनियाँ मारि बजली- “समधी, हिनकासँ कोनो लाथ किए करबनि। जहिना ई पोता-पोतीक बीच जीबै छथि तहिना ने हमहूँ नाति-नातीन संग अही समाजमे जीबै छी। दुनू गोटे एक बतरिया भेलौं, हम अहाँ जे करबै, जेना चलबै तहिना ने बालो-बच्चा ठेकना कऽ चलतै। जखनि अहूँ बाबा-दादाक कोरामे छेलौं तही समए ने हमहूँ छेलौं, जखनि दुनू गोरेक माए-बाबू एकठाम दुनू गोरेकेँ रखि खेलौने हेता तखनि भाइए-बहिनक सम्बन्ध बनौने हेता किने?” एक संग अनेको प्रश्न खजुरिया समधीनक सिनुरिया कक्काक मनमे आबि अँटकि गेलनि। बर्खाक बुन्नो छोट होइत-होइत छूटि गेल। वादलो टुकड़ी-टुकड़ी होइत छँटए लगल। बीच दोग देने सुर्जक लाली उगल। लाली उगिते खजुरिया समधीनक मन सेहो ललियए लगलनि। सिनुरिया काका बजला- “समधीन, जेतबो दिन हम सभ ललियाएल रहलौं तेतबो दिन धिया-पुता थोड़बे ललियाएल रहत। तखनि तँ जेतबे दिन जीबै छी तेतबे दिनक ने भागी हेबै। जाइ छी।” [1] मोनि वा रूकल पानि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- 2 टा गजल ३.२.कैलाश- जहिना करब ओहिना पाएब ३.३.संतोष कुमार राय 'चंदू'-2टा कविता ३.४.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-2 टा कविता आशीष अनचिन्हार गजल 1 दुनियाँ अन्हार तोरा बिनु सभटा बेकार तोरा बिनु हेड़ा गेलै हँसी हम्मर छै नोरक धार तोरा बिनु आँचर काजर पिआसल छै नै छै उद्धार तोरा बिनु तोहर छोड़ल इयादे टा करतै उपकार तोरा बिनु चीन्हल जानल मुदा तैयो छी अनचिन्हार तोरा बिनु सभ पाँतिमे 2222-122 मात्राक्रम अछि 2 गेलहुँ हम हुनका लग एलथि ओ हमरा लग चोट छलै पैघ मुदा बजबै हम ककरा लग रंगक धुरखेलामे करिया छै उजरा लग हुनकर देह हमर देह धधरा छै धधरा लग बनि गेलै जोग हमर अपने छथि पतरा लग सभ पाँतिमे 22+22+22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग शब्दक लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त छूट अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कैलाश जहिना करब ओहिना पाएब
प्रचण्ड धूम मे साठी वर्षक दुःखीआ जखन खेत सँ काम कऽ घर आएल अक बके रहि गेल ......२
बेटा ‘सोभिता’ खाइत छल पुतहुँ खुब गनगनाइत छल । ई बुढवा एकटा काल छै जखन कोई खाइत, तखने आबि जाइत
थाकल पिडाएल दुःखीआ भुकुर भुकुर कानए लागल तखने पोता ‘राहुल’ चिहुक बाजल अहाँ किया कनैत छी बाबा एक दिन ओहो सभ बुढ हएत ...२
ओहि पर सोभिता बोमकि उठल पुतहुँ बाढनि लऽ कऽ दौडल हम सोचने छली पढा लिखा के डाक्टर बनाएब बुढवा लग रहि के भऽ गेल अभागल...२
दुःखीआ अतित मे डुबि गेल जहिया सोभिता बौआ रहय बाबु हमरा ई चाही तुरुन्त फरमाईस पुरा होबाक चाही....२
कनिको हम खिसिआइत छली कनियाँ हमर लोहैछ बजैत छल ऐना किया करैछी इहे ते बुढपा के सहारा छै अखन बौआ के खिअबै बुढपा में बौआ खिआएत...२
आई ओ दुनयिाँ छोडि चली गेल ऐह देखबाक लेल हम रहिगेली हे भगवान ! उठा लिए हमरो । सोचि सोचि ओ कानए लागल
तखने पोता भात लाबि कऽ बाबा के गोदी में बैसि गेल बाबा ! खाउँ न भात, किया कनैत छी । हम बडका होएब, खुब कमाएब सबटा ढौवा अहिके देव.....२
इएह बोलि सुनिक दुःखीआ केँ दूनू आँखि के नोर रौदी जेकाँ सुखि गेल जखन देह पकडि हिलबैअ पौता ओ ओहि ठाम लुढैक गेल....२
३० वर्षक बाद सोभिता सेहो बुढ भऽ गेल बेटा आ बापक बीच दुरी बढि गेल गाम में पञ्चायत बैसल पञ्च सब बाजल, बाप अब थलि गेलौ अब तोरे खिआबए पडतौ...२
बेटा राहुल कडैक कऽ बाजल बाबा हमरो बड बुढ छल तहिया अहाँ सभ कता छली जेना बाबा बेटा के छोड़ि परलोक गेलन्हि आई हमहुँ बाप के छोड़ि चलि जाइब....२
नहि हमरा सम्पति चाही नहि चाही ऐहन बाप ई त दुनियाँ के रित छैक जहिना करब ओहिना पाएब....२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। संतोष कुमार राय 'चंदू' जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नव दिल्ली-११००२५ सँ एम.ए.,बी.एड,बी.ए., ग्राम-मंगरौना,डाकघर-गोनौली थाना-अंधराठाढ़ी,जिला-मधुबनी, बिहार,पीन-847401 1 गिरवी
हमर जिनगी दोसरक हाथ मे अछि, हमर सून्न देह काठ जँका लोथ परल अछि जेना माँसक लोथरा, ई समयक फेरि अछि.
जकरा हाथ मे दम नहि से हाथी कहावति अछि मजबूरी सभहक द्वारि खटकवैत छै, आई हमर तँ काल्हि अहाँक.
टकाक खेल मे बड़ि दाव-पेंच छै, गाड़िक ड्राइवर जँका ध्यान राख' पड़ैत छै, कनिको चूक थाल मे पैर बुझियौ, किएक तँ मनुक्ख मनुक्ख नहि रहि गेलै.
कारिख सँ दूरि कते दिन भागि सकैत छी, जखन घरे कारिखक यदि बनौल गेल अछि, आत्मा केर कैद करनै नीक नहि, किएक तँ गिरवी देह अछि.
ई हमर अप्रकाशित आओर स्वरचित रचना अछि. कोनहु विवादक स्थिति मे जिम्मेदार हम रहब.
2 प्रधानमंत्री के छथि?
निक दिन आएत, इ मोनक वहम अछि, सत्ता केर खेल मे , सभहक पाएर मे थाल छन्हि.
बजटक हो- हल्ला, आओर संसद मे बानर नाच, गरीबक पेट पर डाका छियैय, जनता सँ फेर दगाबाजी भएल.
रैला-पर-रैला, जनता सँ वोट लेबाक रणनीति छियैय, सत्ता-परिवर्तन केर नाम पर ठगि, झूठ केर खेती छियैय...
जनता पिसा रहल छथि, थारी सँ रोटी दूर भ' रहल छै, माय हमरा सँ पुछैत छथि- प्रधानमंत्री के छथि-मोदी वा मनमोहन?
ई हमर मौलिक आओर अप्रकाशित रचना अछि. कोनहु विवादक स्थिति मे एकर जिम्मेदारी हम लैत छी. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल) पो॰- मकरमपुर, जि॰ – दरभंगा पिन - ८४७२३४ 1 ओजोन ओजोन – ओजोन बड्ड सुनै छी, की थिक कने बताउ । सुनलहुँ बहुते किछु नञि बुझलहुँ, हमरो किछु समझाउ ।। एक तत्त्व थिक गैस रूपमे, नाँव जकर ऑक्सीजन । दू परमाणुक युतिक अणु जे, से परिचित ऑक्सीजन । गाछ-बिरिछ सभ जन्तु मनुक्खो, इएह साँसमे लैत’छि । गाछ बिरिछ पुनि आन क्रियामे, ऑक्सीजन छोड़ैत’छि । ऑक्सीजन केर त्रिपरमाणुक, युतिसँ बनल ओजोन । साँस लेबा केर ऑक्सीजनसँ, बिल्कुल अलग ओजोन । जँ एतबा धरि समझि गेलहुँ, तँऽ आगू बात बढ़ाउ । नञि बुझलहुँ - तँऽ सेहो बाजू, की दिक्कत कतऽ बताउ ।। तापक्रमक घट-बढ़ अनुसारेँ, चारि पड़त वायुमण्डल केर । आन विशिष्ट गुणक आधारेँ, उपविभाग पुनि हर मण्डल केर । पहिल क्षोभ, समताप फेर, आ मध्य-ताप तेसर-चारिम । समतापक उपरी सीमा पर, घटना एक घटय बंकिम । सूर्यकिरण केर एक घटक जे, पराबैगनी किरण कहाबय । तकरा अवशोषित कऽ एहि ठाँ, ऑक्सीजन ओजोन बनाबय । ओजोनक ई जन्म - प्रक्रिया, सुनि कऽ ने अनठाउ । ई घटना नञि थिक मामूली, मुँहकेँ जुनि बिचकाउ ।। ई ओजोन रहय ओहि ठाँ, ने ऊपर – नीचाँ जाय । पातड़ सन स्तर बनबय, से ओजोन पड़त कहाय । छत्ता सन धरती पर तानल, ओ जीवन रक्षक बनइछ । दुष्ट पराबैगनी किरण केर, ई सद्यः भक्षक बनइछ । टूटय – बनय – पुनः टूटय, ओजोनक अणु निरन्तर । सन्तुलित निर्माण – ध्वंश, तेँ बुझि ने पड़इछ अन्तर । पराबैगनी अछि गुनधुनमे, भीतर कोना कऽ जाउ । ओजोनक अभेद्य दुर्गमे, कोना कऽ सेन्ह लगाउ ।। एतबामे मानव विकाश केर, शंखनाद सौंसे भेलै । औद्योगिक विकाशक परचम, ओजोनहु पर फहरेलै । सी॰एफ॰सी॰ छल सेनापति, ओ ओजोनक संहार केलक। भूर बना ओजोन पड़तमे, दुष्ट किरणकेँ बाट देलक । पराबैगनी जा धरती पर, डी॰एन॰ए॰ पर घात करय । डी॰एन॰ए॰ गुणसूत्र जीवनक, तकरे संग उत्पात करय । कर्करोग त्वक् सँ सम्बन्धित, बाढ़त से बुझि जाउ । जल-थल-नभ-ऋतुचक्र एखनुका, बदलत एकदम बाउ ।। जँ भविष्यमे नञि चाही, एहेन सन किछु बदलाव । बन्न करू हर एक घटक,जनि सी॰एफ॰सी॰ सन भाव । प्रशीतक ए॰सी॰ आ फ्रीज केर, तत्क्षण बदलल जाए । प्रणोदक-रॉकेट ईन्धन केर, हो उपयुक्त उपाय । एखनहु चेतब तँऽ बर्षो धरि, क्षतिपुर्तिमे लागत । जँ विलम्ब कनिञो होएत तँऽ, हमसभ होएब अभागल । विकसित राष्ट्र सक्षम अधिभारक, तेँ अधिभार उठाउ । अन्य राष्ट्र बिनु मुँह बिचकओने, निज दायित्व निभाउ ।। 2 प्रदूषण प्रकर्षेण दूषित सभ किछु थिक, अनारोग्य केर जननी । ई दैवक नञि छी प्रकोप, छी मनुक्खक अपनहि करनी ।। कोनहु बस्तु जञो गन्दा भऽ गेल, दूषित ओ कहबैत’छि । प्रकर्षेण मतलब अतिशय अछि, सीमा – हद जनबैत’छि ।। सीमासँ बेसी अबाज जञो, कहबै ध्वनिक प्रदूषण । ऊँच सुनब, अनुनाद – नाद, बाधिर्य एकर अछि लक्षण ।। दुषित हवा जञो साँस लेल तँऽ, साँसक होएत बेमारी । दमा – एलर्जी आओर पता नञि, की – की महामारी ।। दुषित पानि पिउबा सँ जेसब, होइत’छि से बुझले अछि । पेट खड़ाब आ हैजा पेचिश, सभटा देखले–सुनले अछि ।। मृदा – भूमि सेहो दूषित भऽ, बहुते करैछ समस्या । कऽलक पानि आ खेतक उपजा, माहुर सनक अभक्ष्या ।। रेडियोधर्मी अछि पदार्थ जञो, विकिरण करय प्रदूषण । धरा – पानि तँऽ दूषित अछिए, सीधे मारक लक्षण ।। एखनहुँ जँ संसार ने चेतत, बदलत नञि निज करनी । हाथ ने किछु बाँचत भविष्यमे, अपन दशा पर कननी ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते जगदानंद झा मनु छुट्टी भऽ गेलै टन टन टन टन घंटी बजलै धिया पुताकेँ मनमा दोललै मौलाएल मुँह झट हँसि गेलै हजारो कमल संग फूलि गेलै हाथमे झोड़ा लए कऽ दौड़ल खुशीसँ मोनमे दही पौड़ल नै छै चिंता काल्हि की हेतै नै छै चिंता आइ की हेतै सबहक मोनमे खुशी छै ऐकेँ छुट्टी भऽ गेलै आइ इस्कूलकेँ छुट्टी भऽ गेलै छुट्टी भऽ गेलै आइ इस्कूलकेँ छुट्टी भऽ गेलै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 62 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १६५ म अंक ०१ नवम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८३ अंक १६५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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