VIDEHA — Issue 166 / अंक १६६

Publication: VIDEHA · Issue: 166
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६६ म अंक १५ नवम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८३ अंक १६६) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- रेहना चाची २.२.राजदेव मण्‍डल- दोख केकर २.३.दुर्गानन्‍द मण्‍डल-छुतहरि २.४.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- विजय ३. पद्य ३.१.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल२.मो. अशरफ खान- कता ३.२.१.ओम प्रकाश झा- २ टा गजल २.राजीव रंजन मिश्र- गजल ३.३.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.४.महेश झा 'डखरामी'- ५ टा कविता ४.बालानां कृते-आशीष अनचिन्हार-माछी मच्छर दू गो दोस Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html संपादकीय कियो बूझि नै सकल हमरा-(गजलकार श्री ओम प्रकाश झा) भदवारिमे मेघ लाधल रहै छै, विदागरी-तिदागरी नै होइ छै मुदा पनिऔरा फड़ै छै। भदवरिया लाधल छै, बितरोचारक कोनो खगता नै। गोलैसी नीक गप नै। मुदा जँ कोनो बहर दिस झोंकान भऽ जाए तँ कोनो हर्ज नै। जँ मैथिली साहित्यमे बहरमे कहल गजल सभक संकलन हुअए तँ तकर सर्वश्रेष्ठ  कहबैका हेता ओम प्रकाश जी। “करेजासँ शोणित बहाबैत रहलौं करेजामे प्रेम बसै छै आ ओइसँ शोणित बहि रहल छन्हि, तँ कियो चक्कू भोकने हेतन्हि तखने ने। के अछि एहेन चण्ठ! मुदा शेरक दोसर मिसरा कहैए.. विरह-नोर कखनो कहाँ खसल हमरा” इतिहास बनैत-बनैत रहि गेल कारण? एकटा खिस्सा बनि जइते अहाँ संकेत जौं बुझितहुँ हमही छलहुँ अहाँक मोनमे कखनो तँ कहितहुँ से ने हिनके दोष ने हुनके। से हिनकर इच्छा छन्हि जे जड़ैत करेज आगिमे जड़िते रहए: पता नै कोन आगिमे जरैत रहल करेज हमर पानि नै खाली घीए टा चाहैत रहल करेज हमर तँ कोनो प्रेमीक प्रेमक आघात सहने छथि गजलकार, आ ओइ प्रेमीसँ एतेक लग छथि जे विरह-नोर बहेने ओकर बदनामी भऽ जेतै तेँ विरह नोर नै बहबैछथि। चाहै छथि जे करेज आगिमे जड़िते रहए, आ आगिमे पानि नै घी ढारल जाइत रहए। आ लोककेँ होइ छै जे हुनकर हृदय आ मोन कठोर छन्हि! आ तेँ ओ कहै छथि.. कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा आ संगमे ईहो: एतेक मारि खेलक झूठ प्रेमक खेलमे जमानासँ कियो देखलक नै कुहरैत रहल करेज हमर मुदा लोकक बुझब नै बूझब, किदन साती ले! ओ बहरे मुतकारिबमे कहल एकटा दोसर गजलमे कहै छथि.. भिड़त आबि हमरासँ औकाति ककरो कहाँ छै जखन-जखन लडलौं हरदम अपनेसँ लडलौं हम तँ की गजलकार घमण्डी छथि, नै सेहो नै, ओ बहरे हजजमे कहै छथि: कटऽ दियौ "ओम"क मुड़ी आब दुनियाँ ले जँ गाम बचै झुकैसँ तँ पाग निखरै छै तँ की मैथिलीक गजलकार अखनो प्रेमे-विरहमे ओझराएल छथि? नव विषय नै पकड़ि रहल छथि? मुदा से नै छै, बहरे-सलीममे लिखल गजलक ई शेर सुनू: धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक आ ई बाल-गजल सुनू। बाल-कविता/ गजल सुनिते लोककेँ उल्लासक स्वर सुना पड़ै छै, मुदा बाल-मजदूरक  जिनगीमे से कतऽ पाबी, मुदा आस तँ छै, तेँ:- चारू कात पसरल दुखक अन्हरिया छै कटतै ई अन्हरिया आ बढ़बै हमहूँ आ ई आस आनो गजलमे अछि: सागरक कात सीप बिछैत रहब हम कोनो सीपमे कखनो मोती भेटेबे करतै ओम प्रकाश जीकेँ जहिया मोती भेटतन्हि तहिया, मुदा मैथिली साहित्यकेँ हुनका रूपमे एकटा मोती भेटि गेल छै, ओ चीन्हि लेल गेल छथि, बूझि लेल गेलछथि। -गजेन्द्र ठाकुर विचार अछि जे विदेहक काशीकांत मिश्र "मधुप" विशेषांक ०१ जनवरी २०१५ अंकमे निकलत। सभ गोटासँ आग्रह जे मधुपजीपर केन्द्रित रचना जल्दीसँ ggajendra@videha.com पर पठाबथि। पाठकीय प्रतिक्रिया: विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ। - नचिकेता (मिथिला दर्शन) सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद। -शेफालिका वर्मा विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष द्धारा ऐ वर्ष प्रदान कएल गेल पुरस्कारक विवरणः

१. नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार-– श्री रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम— पुरस्कार राशि रु. २ लाख ।

२. नेपाल विद्यापति मैथिली कला–संस्कृति पुरस्कार— श्री श्याम सुन्दर यादव – पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।

३. नेपाल विद्यापति मैथिली अनुसन्धान पुरस्कार— डा. वासुदेव लाल दास— पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।

४. नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार— श्री चन्द्रशेखर लाल शेखर — पुरस्कार राशि रु. १ लाख । 

५. नेपाल विद्यापति मैथिली अनुवाद पुरस्कार— श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।

Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. 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गाम कि‍ए छूटल? गुम-सुम भेल कि‍शुन भाय रेहना चाचीक झूर-झूर भेल चेहरा देखए लगला, जेना खेसारी-बदामक बीड़ि‍या झूर-झूर भेलो पछाति‍ गरदी तरकारीक रूप पकड़ि‍ भोज्‍य भोग पबैक सुख पबैत अपन जि‍नगी चैनसँ गमबए चाहैए, तहि‍ना चाचीक मन सेहो पुलकैत रहनि‍। मुदा बि‍नु बुझनौं तँ नहि‍ने लोक बुझैत। कोनो बात सूनब आ बूझब, दू भेल। बुझैले बेसी सुनए पड़ै छै, सुनै तँ लोक एकहरफीओ अछि‍। भाय पुछलखि‍न- “चाची, गाम केना छूटल?” कि‍शुन भायक प्रश्न सुनि‍ रेहना चाचीकेँ एको मि‍सि‍या बि‍सबि‍सी नै लगलनि‍, जेना नीक जि‍नगी पाबि‍ कि‍यो नीक सि‍रासँ अपन जि‍नगीक बाट पबि‍ते खुशी होइए तहि‍ना भगि‍न जमए पाबि‍ रेहना चाची खुशी छथि‍। मुदा पेटमे पेटेले झगड़ा उठि‍ गेलनि‍। झगड़ा ई उठलनि‍ जे बीतल जि‍नगीमे जे घटल सत बात अछि‍ ओ बाजल जा सकैए की‍ नै? ओना आब ओइ बातक खगतो नहि‍येँ जकाँ अछि‍ मुदा इति‍हास तँ काल-खण्‍ड वि‍हीन भाइए जाएत? मन बेकाबू भऽ गेलनि‍! मुदा बि‍सवास देलकनि‍। बि‍सवास ई देलकनि‍ जे अबैया दि‍न सुखैया तँ अछि‍ए तखनि‍ कि‍ए ने अपन जि‍नगीक बात भाइओ-भातीजकेँ कहि‍ दि‍ऐ। आब कि‍यो जि‍नगी लूटि‍ लेत। बजली- “बौआ, सात-आठ बर्खसँ गाम सभ छोड़लौं, ओना खटनी छूटने देहो हर-हरा गेल, मुदा मन अखनो कहैए जे जानि‍ कऽ रोगा गेलौं। गामे-गामे तेना ने छीना-झपटी हुअ लगल, जे आन गामक लोकक कारेबारेेटा नै चलैक रस्‍तो कटि‍-खोंटि‍ गेल।” एक संग कि‍शुन भायक मनमे रंग-बि‍रंगक अनेको प्रश्न उठि‍ गेलनि‍, मुदा जहि‍ना मुड़ी आ टाँग कटल लहासकेँ परखब कठि‍न भऽ जाइए तहि‍ना चाचीक बात सुनि‍ भेलनि‍। छीना-झपटी आकि‍ झपटी-झपटा, वएह ने जे जहि‍ना प्रखर वक्‍ता लोकनि‍ अपन मेहि‍का चाउरमे मोटका चाउर फेँटि‍ काज ससारि‍ लइ छथि‍ आकि‍ मोटके चाउरमे मेहि‍का फेँटि‍ दइ छथि‍न...। मुदा अनेरे मन वौअबै छी। मनकेँ थीर करैत बजला- “चाची, जहि‍या जे भेल, से भेल, आब नीके छी कि‍ने?” कि‍शुन भायक बात सुनि‍ रेहना चाची बि‍समि‍त भऽ गेली। ‘बि‍समि‍त’ ई भऽ गेली जे यएह देह छी, अपन गाम लगा पाँच गामक लोकसँ हबो-गब करै छेलौं आ खेबो-पीबो करै छेलौं, कमाइओ-खटा लइ छेलौं, से तँ छि‍नाइए गेल! ओना आब अपन उमेरो ने रहल जे माथपर पथि‍या लऽ चारि‍ गाम घूमि‍ कारोबार करब। रेहना चाची बजली- “अपन बेटा-पोता अल्‍ला हेरि‍ लेलनि‍, मुदा फेर वएह ने देबो केलनि‍।” रेहना चाचीक उत्तर कि‍शुन भाय नीक जकाँ नै बूझि‍ सकला। तेकर कारण भेलनि‍ जे लगले सुनला‍ जे बेटा-पोता हेरि‍ लेलनि‍ आ लगले सुनला जे प्रपौत्र बच्‍चा छी आ भगि‍न-जमएक परि‍वारमे रहै छी। मनकेँ सोझरबैत कि‍शुन भाय बजला- “चाची, हमरा ओहि‍ना मन अछि‍, जखनि‍ माइओ आ अहूँ एकेठीन बैसि‍ खेबो करी आ नीक-अधला गपो करी।” कि‍शुन भायक बात सुनि‍ रेहना चाचीक अपन सत्तरि‍ बर्खक जि‍नगी बि‍जलोका जकाँ मनमे चमकलनि‍। करि‍याएल मेघ, बदरि‍याएल मौसम, सरदि‍याएल राति‍मे जखनि‍ बि‍जलोका चमकै छै तखनि‍ ओ अपन इजोतक संग अवाज करैत कहै छै जे हम लाली इजोत छी नै कि‍ पीड़ी। पीड़ी दूर-देशक होइ छै लाली लगक। प्रमाण असतक होइ छै आकि‍ सतक? सत तँ अपने सत भऽ सौंसे फल फड़ जकाँ अछि‍। रेहना चाचीक आगूमे ठाढ़ कि‍शुन भायक ने ‘अक’ चलनि‍ आ ने ‘बक’। दि‍न सेहो लुक-झुका गेल। सुरूज तँ डूमि‍ गेल मुदा लाली ओहि‍ना पसरल छल। कि‍शुन भाय बजला- “चाची, अखनि‍ तँ दि‍न नि‍सचि‍त नै भेल मुदा अखने कहि‍ दइ छी जे अहाँकेँ लि‍औन करै छी।” कि‍शुन भायक ‘लि‍औन’ सुनि‍ रेहना चाचीक मन ठहकलनि‍। मन ठहकलनि‍ ई जे आब वएह जुग-जमाना रहल आकि‍ ओइसँ नीको-अधला भेल। नीक-अधलाक बीच रेहना चाची बोझक तर पड़ि‍ गेली। जइसँ बोथि‍या गेली। बोथि‍या ई गेली जे की सम्‍बन्‍ध छल! कोरा-काँख तर केते दि‍न कि‍शुन लालकेँ नेने छी, पावनि‍मे पवनौट खुएलौं आ अपने केतए खेलौं, तेकर कोन हि‍साब। जि‍नगीए ओही भरोसे बीतल कि‍ने। आइ ओइ कि‍शुन लालक बेटाक बि‍आह छी, की आब ओतए पहुँच पाइब सकै छी? केना पाबि‍ सकै छी? जैठाम लोक अधला काज करै छल तैठाम गंगाजलसँ सि‍क्‍त कऽ नीक बनौल जाइ छल, आ अखनो बनौल जाइए। मुदा ओहन तँ जगहे खि‍या गेल। मुदा जैठाम गंगेजल अधला बनि‍ जाएत, तैठाम की उपए। रेहना चाचीक मन ओझरा गेलनि‍। मुदा सँझुका तारा जकाँ जेना मनमे भुक दनि‍ उगलनि‍। उगलनि‍ ई जे जँ कहीं काजेक चर्च पाछू पड़ि‍ जाएत आ अनेरूए गप साँझ पड़ा देत तइसँ नीक जे काजक नांगरि‍ पकड़ि‍ धार पार होइ, बजली- “बौआ, ढौओ-कौड़ी लेलहक हेन?” ढौआ-कौड़ीक बात सुनि‍ कि‍शुन भायक मन पुलकलनि‍। बजला- “चाची, बि‍आहक अखनि‍ गपे-सप उठल हेन, ओ सभ गप पछुआएले अछि‍, जखनि‍ बि‍आहमे एबे करब तखनि‍ सभ गप बुझा देब।” कि‍शुन भायक झाँपल-तोपल बात सुनि‍ रेहनो चाचीक मनमे उठलनि‍, जेते अल्‍ला-मि‍याँ परि‍वार सभकेँ झाँपन-तोपन दैत रहथि‍न तेते नीक। भगवान सभकेँ नीक करथुन। बजली- “कि‍शुन बौआ, देखि‍ते छह जे अथबल भेलौं। चलै-फि‍ड़ै जोकर नै रहलौं, मुदा पोताक बि‍आह देखैक मन तँ होइते अछि‍, से...।” रेहना चाचीक बात सुनि‍ कि‍शुन भाय गुम भऽ गेला। गुम ई भऽ गेला जे की रेहना चाचीकेँ यज्ञ-काजमे लि‍यनु करा लऽ जा पएब? की समाज एकरा पसि‍न करत? जे दुरकाल समए बनल जा रहल अछि‍ ओ भरि‍याएल जरूर अछि‍। मुदा जात तर पड़ल ओंगरी जँ नि‍कालि‍ नै लेब, तँ जातक काजे केना चलत। कोनो एकेटा ने हएत या तँ पीसि‍या हएत वा ओंगरी पि‍साएत। मुदा भवि‍स...।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्‍डल :: दोख केकर इजोरि‍या रहै मुदा मेघक कारणे कनी अन्‍हार सन लगै छेलै। नि‍शि‍भाग राति‍। सभ सूतल। कि‍न्‍तु दि‍नेश दुनू परानीकेँ नि‍न्ने ने होइ। जेना नि‍न्ने रूसि‍ रहल। नै रहल गेलै तँ पत्नीकेँ कहलकै- “केतेकाल भूखल रहब? उठू खा लि‍अ।” पत्नी चुप्‍पे करोट फेड़ि‍ लेलक। पति‍ बाँहि‍ पकड़ि‍ हि‍लबैत पुछलकै- “की भेल? बजबै तब ने बुझबै।” “बूझि‍ कऽ की करबै? अहाँ बुते कि‍छो ने हएत। अहाँ तँ उनटे...।” “बुझबै तब ने। हमर दोख हेतै तँ हमरे दण्‍ड देब।” “कोनो बुझने नै छि‍ऐ। दोख अहाँ माएकेँ रहै आ गारि‍-बात हमरा देलौं। अहाँ हमरा बजा नै सकै छी।” पति‍- “तँ कहू जे रूसलासँ दि‍न-गुजर चलतै?” तमसाइत पत्नी बाजलि‍- “केतबो गल्‍ती अहाँक माए करै छै, तँ अहाँ एकोबेर बजै छि‍ऐ आ हमरापर डाँग लऽ कऽ हुड़कै छी। कहै छी, हमरा बजाउ नै। हम अहि‍ना भूखले मरि‍ जाएब।” समझाबैत पति‍ बाजल- “अच्‍छा एकटा खि‍स्‍सा सुनि‍ लि‍अ। फेर नै बजब। सुनि‍यौ। ई कथा चौबीस-पचीस बरख पहुलका छी। एकटा औरतक कथा। सुखक लीलशामे दुखक कथा। ओ बड्ड सुन्दर आ सुशील रहए। तँए शुरूमे पति‍क आँखि‍मे ओकरा लेल परेम भरल रहै। मुदा एक-आधटा एहेन घटना घटले जे ओइ औरतकेँ ससुर आ पति‍ दुनू दुख दि‍अ लगलै। ससुरकेँ मोनमाफि‍त दहेजो नै भेटल रहै आर बहुतो कारणेँ तमसाएल रहै छेलै। ओइपर सँ ओहने समए आ अवसर सेहो भेट गेल रहै। एहेन समैमे केतबो डाँट-डपट करतै तँ उनटा कऽ जवाबो केना देत। दू बेरसँ पँचमसु चि‍ल्‍का नोकसान भऽ जाइ छेलै। पाँचम मास चढ़ि‍ते दरद करै आ गरभपात भऽ जाइ। तँए ओकरा पति‍ओकेँ हरि‍दम नाकेपर तामस रहै। जे सभ सोचने रहए ओ सभ पूरा नै होइत देखि‍ मोन हरि‍दम बि‍धुआएले रहै छेलै। देखैत सपना टूटि‍ गेलासँ कठ तँ हेबे करै छै। ...सासु नै रहै। औरति‍या केकरा कहि‍तै। आ के ओकर दुख बाँटि‍तै। जेमहरे जाए तेमहरे डाँट-डपट आ ठोकर। कि‍यो अपन नै, सभ आन। काज-उदेममे लगल समए कटबाक परि‍यास करए आ असगरमे बैसि‍ भरि‍ मन कानि‍ मनकेँ हल्‍लुक करए। समए बि‍तैत रहै छै। बि‍तैत रहल।” अहूबेर ओरति‍या तीन महि‍नासँ गरभवती रहए। कानसँ स्‍वर टकरा जाइ- “फेर ओहि‍ना हेतै। ऐबेर भगा बेटाकेँ चुमौन करा देबै।” फेर दोसर काने पति‍क स्‍वर सुनै- “कोन-कोन डागदर-बैद आ ओझहा-गुणीसँ देखेलौं। कोनो फेदा नै। हेतै केतएसँ? पपि‍याही अछि‍ ई।” भातक दुख नै बातक दुख। जेना सान्‍हि‍ मरै। कलेजामे भूर करै। मोन आ शरीर दुनू संगी। एककेँ दुखि‍त भेने दोसर केना ठीक रहि‍ सकत। औरत बि‍मार रहए लगल। माए-बापकेँ पता लगलै। समाद गेलै आ एलै। ओ नैहर आबि‍ गेल। जेना बैशखा रौदमे गाछतर। नैहराक छाँह। सभ गप्‍प सुनि‍-बूझि‍ माए-बाप उपचारमे लगि‍ गेलै। की-की नै केलक। केतए-केतए ने गेल। अही क्रममे एकटा साधु बाबा उपदेश देलखि‍न- “एकरा छह महि‍ना वोनबास करबए पड़तौ।” “औरत तँ अहुना बोनवासेमे रहैत अछि‍। फेर कोन वोनबास?” “घर-अँगनासँ अलग। राति‍ओमे नै आबि‍ सकैत अछि‍। अपने हाथसँ बनौल खाएत-पीअत। आर सभ गप्‍प बुझए पड़तौ।” माए-बापकेँ मोन उड़ल रहै। सन्‍तानक सुखक लीलशा। वोनबास शुरू भऽ गेल। घर-अँगनासँ अलग। आमक गाछीमे। बास करए लगल। टोलक लगेमे रहै मुदा गप्‍प तँ केकरोसँ नै कऽ सकैत अछि‍। इशारासँ काम चलाउ। आन लोक हटले रहै। दि‍न तँ कटि‍ जाइ मुदा राति‍ पहाड़। कुशक ओछाइनपर गुदरी बि‍छौना। माटि‍एपर खाना आ माटि‍एपर सोना। मूजक डोरासँ डाँड़मे जखम भऽ गेलै। जाड़ा-गरमी-बरखा। अन्‍हरि‍या राति‍। साँप-कीड़ा, बि‍लाय-कुत्ता नढ़ि‍या-खि‍खि‍र। एकान्‍त बास। भरि‍ दि‍न तँ जे कि‍छु मुदा राति‍मे माएकेँ नै रहल जाइ। बारहो बजे राति‍मे आबि‍ बनवासी बेटीकेँ भरि‍ पाँज पकड़ि‍ सुति‍ रहए। नि‍न्न टुटि‍ते ओइठामसँ चलि‍ आबए। जे फेर कोनो दोख ने भऽ जाए। आ आबैबला संतानपर कोनो वि‍पति‍ ने पड़ि‍ जाए। केहनो कठि‍न समए रहै छै। कटि‍ तँ जेबे करै छै। लोको कोनो कम लगराह होइ छै। वोनबासक समए बीतल। गरभकाल पूरा भेलापर औरति‍याकेँ बेटा जनमलै। फेरसँ ओकर सुखक दि‍न घुरि‍ एलै। सभ दिससँ सि‍नेहक बरखा हुअ लगलै।” कि‍छुकाल  चुप रहला पछाति‍ दि‍नेश अपना पत्नीकेँ पुछलकै- “आब कहू जे ओइ माएकेँ जँ बेटा गारि‍-बात देतै तँ ओकर की दशा हेतै?” पत्नी गुम्‍मी साधने। कि‍छो बजले ने जाइ। फेर दि‍नेशे बाजल- “ओ औरत हमर माए छि‍ऐ आ ओ बेटा हमहीं छि‍ऐ।” दुनू परानी चुप। राति‍क चि‍ड़ै केतौ-केतौ बजै छेलै। आर सभ कि‍छु नि‍शब्‍द भेल। दुनू परानीक बीचसँ शब्‍द हेरा गेल छेलै। कि‍न्‍तु  हाथ-पएरक क्रि‍यासँ गप्‍प शुरू भऽ गेल छेलै। साँस-प्रश्‍वाँस गवाही दइ छेलै। मुस्‍कीकेँ अन्‍हार झँपने छेलै। आ दुनू परानीक बीच दोख बि‍ला गेल छेलै।  ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। दुर्गानन्‍द मण्‍डल :: छुतहरि सि‍मराक शि‍वनन्‍दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहि‍रन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। वि‍धाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्‍दरि‍। मध्‍यम वर्गीए परि‍वारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बि‍आह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरि‍याती गेल रहथि‍, सभ कि‍यो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि‍। बड़-बढ़ि‍याँ घर-परि‍वार छल। राजाबाबू बि‍आहक पछाति‍ओ अध्‍ययन जाड़ीए रखलनि‍। नीक-नहाँति‍ पढ़ैले पटनामे नाओं लि‍खा डेरा रखलनि‍। छुट्टी भेलापर गामो चलि‍ अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहि‍ल सन्‍तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्‍या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्‍चो तेतबए सुन्‍दर छल। क्रमश: दुनू बच्‍चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लि‍खा देलखि‍न। बच्‍चा सभ ओतै रहि‍ पढ़ए-ि‍लखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति‍ खराप हुअ लगलनि‍। जइसँ ओ दोस्‍ती-यारीमे पीबए लगला। एक दि‍नक गप छी, गाम एलाक बाद अधरति‍यामे जोरसँ हल्‍ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चि‍चि‍या रहल छथि‍। राति‍क मौसम देखि‍ गामक डाक्‍टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखि‍न। बि‍मारी उपकले रहनि‍। पत्नी वि‍शेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि‍ दुइए मासमे दुखकेँ कन्‍ट्रोल कऽ लेलनि‍। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जि‍द्द कऽ पटना चलि‍ गेला। परि‍कल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि‍ आ भैया जे पाइ दन्‍हि‍ आकि‍ नै दन्‍हि‍ तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि‍-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बि‍तलै आकि‍ वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि‍। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली राति‍मे राजाबाबू अपना बि‍छौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चि‍चि‍यए लगला। नि‍सि‍भाग राति‍ रहने हो-हल्‍ला सुनि‍ लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि‍ गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्‍टी करैत सदा-सदाक लेल शान्‍त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि‍ गेल। टोल भरि‍क लोक सभ जागि‍ गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रि‍स्‍ता–नाता तोड़ि‍ परमधाम चलि‍ गेल छला। परात भेने बि‍ना बजौने सभ आदमी मि‍लि‍ बाँस काटि‍, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि‍ दऽ राजाबाबूक पहि‍ल सन्‍तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि‍-जारि‍ सभ कि‍यो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि‍ चलि‍ गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्‍तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि‍ कुहैक रहल छथि‍। काल्हि‍ तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रति‍मूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि‍ छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहि‍रि कुहैक रहल छलि‍। केतए गेलनि‍ भरि‍ हाथ चुड़ी, केतए गेलनि‍ भरि‍ माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्‍चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि‍ ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि‍ दैत। केना ने बेधि‍ दैत! आखि‍र वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि‍ ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहि‍यो हुनक पएरो ने देखने रहनि‍ ओ आब मुहोँ देखि‍ रहल अछि‍। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्‍हि‍। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बि‍तबए लगली। सासु-ि‍दयादि‍नीक गपकेँ छोड़ि‍ अनकर गपपर बेसी धि‍यान दि‍अ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब कि‍छु लोक हुनका गुरु मन्‍तर दि‍अ लगलखि‍न। आ ओहो नीक जकाँ धि‍यान-बात दि‍अ लगली। जहि‍ना कहबी छै जे खेत बि‍गड़ि‍‍ गेल खढ़ बथुआ सन ति‍रि‍या बि‍गड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि‍ तक ओकर उकासीओ ने कि‍यो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि‍। बि‍ना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखि‍या-सरपंचक संग हँसि‍-हँसि‍ बजै-भुकए लगली। गामक राजनीति‍मे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्‍यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनि‍याँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्‍य जि‍नगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि‍ रंगीन दुनि‍याँमे चलि‍ आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि‍ हल्का छि‍टबला साड़ी पहि‍रए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खि‍लए लगल। एक दि‍न मुखि‍याकेँ कहि‍-सुनि‍ इन्‍दि‍रा अवास स्‍वीकृति‍ करौलक आ बि‍च्‍चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कि‍यो छौड़ा-माड़रि‍ भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दि‍न जेकरा भाफो नै नि‍कलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्‍जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बि‍स्‍कुटी लोकक चक्कर-चाि‍लमे पड़ि‍ ओ भैंसुरसँ अरारि‍ कऽ अपन हक-हि‍स्‍सा लेल लड़ए लगली। लड़ि‍-झगड़ि‍ सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि‍ भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि‍ जे मन फुड़ै तखनि‍ सएह करए। कि‍यो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कि‍यो कि‍छु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्‍जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि‍। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्‍बै पड़ा गेल। आहि‍ रे बा! परात होइते घोल-फच्‍चका शुरू भेल ‘कनि‍याँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि‍ दू दि‍नक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्‍बैमे अछि‍ फलल्‍मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनि‍याँ गाम घूमि‍ आबथि‍। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्‍हर। कि‍छु दि‍नक बाद जेना-तेना पकड़ि‍-धकड़ि‍ ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखि‍मे गर्दा झोंकि‍ कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कि‍यो समझबैक परि‍यास केलनि‍। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि‍ ओ ओकरा बुझबैत कहलखि‍न- “सुनू कनि‍याँ, अखनो कि‍छु ने बि‍गड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि‍ गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि‍ लि‍औ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जाति‍मे मि‍ला लेत। जाति‍ नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि‍ ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्‍तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जाति‍सँ बाड़ि‍ आँगनासँ ई कहैत‍- “एकरा आँगनमे राखब उचि‍त नै ई कनि‍याँ कनि‍याँ नै छुतहरि‍ छी छुतहरि‍...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल कि‍छु ने बाजि‍ सकलौं, कि‍छु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि‍ नै बूझि‍ पेलौं जे आइ बूझि‍ रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहि‍आ कऽ पकड़ने अछि‍। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ :: विजय-१ झुमकी हृष्ट-पुष्ट शरीर बाली युवती छलि। लूरि‍गर आ होशियार, खूब काज करैत। छोट परिवार, घरवाला कुसमाक अतिरिक्त मात्र दूटा बेटा, आठ आ छओ बरखक। दुनू बेकती कमाइत छल आ गुजर बसर करै छल। मुदा ओकरा एकेटा चिन्ता रहैक सभ दिन साँझकेँ घरवाला ताड़ी पीबैक आ घर आबि झुमकीकें अनेरे डेंगा दैत। झुमकी गम खा लइ छलि। एहिना ओ देखने छलि माए आ पितिआइनकेँ सेहो बाबू ओ काकासँ मारि खाति आ सहि लैति। ओकरो सिखाएले गेल छेलै जे घरवाला अपन पौरुष देखबै लेल मौगीकेँ कने मने मारबे पीटबे करतै, से सहि लेबाक चाही। झुमकी जतेक सहैत जाइ छल, कुसमाक डेंगाएब ओतबे बढ़ि जाइ। एक दिन तँ सभ सीमा पार कऽ देलक। ओइ राति झुमकीक देहपर कुसमा अपन हरवाही पेना तोड़िए कए छोड़लक। कारण एतबे जे झुमकी टोकि देलकै एतेक ताड़ी किएक पीबैत अछि ओ। सौंसे पीठपर चेन्ह भऽ गेलै आ केतेक ठामसँ खून सेहो निकलि गेलै। चोट तँ झुमकी अंगेजि लेने छल मुदा पीठ फुटि गेलासँ छनछनाए सेहो लगलै आ दर्द बहुत बेसी बढ़ि गेलै। झुमकीकेँ लगलै आब बर्दास्तसँ बहार भऽ गेल ई। ओ राति भरि सोचैत रहल एना किएक होइ छै। की ओकर शारीरिक ताकति कुसमासँ कम छैक? खोराक एके रंग छैक। काजो ओ बेसिए करैत अछि। कुसमा हरबाहि करैत अछि तँ ओहो जाँत ढेकीसँ लऽ कए जाड़नि तक फाड़िए लैत अछि। धनरोपनी रहौ कि धनकटनी, कोनो पुरुखसँ ओ कम नै रहैत अछि। धानक बोझ रहौक की नारक बोझ, जतेकटा बोझ कुसमा उठबैत अछि ततबेटा तँ ओहो उठबैत अछि। ओकरा जनानी बुझि कोनो छोट बोझ तँ बान्हल नै जाइ छै। खेत पथारसँ घर आँगन तक के कोनो काजमे एहेन ओकरा नै बुझेलै जे ओकर मात्र जनानी भेलासँ किछु न्यून भेल होइक। ओतबे नै, पुरुखकेँ जँ बच्चा बिअए पड़ितै तँ सभ आत्महत्ये कऽ लितए। एक बेर अपना बाँहिकेँ पहलमान जकाँ उठा कए देखलक, ओकरा विश्वास भऽ गेलै जे यदि कुसमाक संग ओकरा कुश्ती लड़ए पड़ै तँ ओकरा पछारि सकत। तखनि‍ फेर एना किएक? किएक पुस्त दर पुस्त मौगी सभ अपन घरवालासँ देह पिटबैत रहल अछि आ अपन बेटी सभकेँ बर्दास्त करए लेल सिखबैत रहल अछि? की पुरुख सभ पेना बजारिए कए अपन पुरुषार्थ देखबैत रहतै? ओकरा एकटा विचार एलै दिमागमे। अगिला दिन कुसमाकेँ नबका पेना बनबए पड़लै हरबाही करै लेल। दिन ओहिना बीतल। साँझखन कुसमा अपन कोटाक ताड़ी पीब कए आँगन आएल आ गेल पेना ताकए जेना ई एकटा रुटीन होइक। पेना ओकरा नै भेटलै। ताबत पाछूसँ झुमकी आबि ओही पेनासँ कुसमाकेँ तरतरबै लागल। कुसमा अवाक। जाबत ओ सम्हरए सम्हरए ताबत झुमकी ओकरा खसा कए ओकरा देहपर चढ़ि गेल छल आ एकदम दुर्गा भवानीबला रौद्र रूपमे कुसमाकेँ कहलक जे आइ रातिसँ नित्य प्रति ओकरा झुमकी ओहिना डेंगेतै जहिना एतेक दिन ओ झुमकीकेँ डेंगबैत रहलै अछि। ई कहि ओकरा देहपरसँ ओ उठि गेल, पेना कात कए रखलक आ गेल अपन भानस भातक काजमे। कुसमाक दिमाग चक्कर काटए लगलै। किछु बुझिएमे नै अबैक जे ई परिवर्तन कोना भेलै। बात एहेन छेलै जे केकरो कहियो नै सकै छल। अपन हारल आ बहुक मारल कियो नै बजैत अछि। ओकरा मोनो नै छैक जे कहिया मारि खेने छल। धि‍या-पुतामे एक दू चाट माए की बाबू मारने हेथिन्ह सएह टा। जहियासँ ज्ञान भेलै आ मालिक ओतए महींसक चरबाह बनल तहियासँ अखनि‍ तक, जखनि‍ ओ चरबाहसँ हरबाह भऽ गेल, ओकरा कहियो केकरो कथो सुनबाक अवसर नै भेटल छेलै। अपना तुरियाक छौंड़ा सभकेँ देखने छैक चरबाहीमे मालिक सभसँ मारि खाइत आ हरबाहीमे फज्जति सुनैत मुदा ओकर काजसँ ओकर मालिक सभ दिन खुशीए नै रहलखिन्ह, ओकर प्रशंसो करै छेलखिन्ह। अजुका चोट ओकरा सोचबापर बाध्य कऽ देलकै जे ओ झुमकीकेँ किएक मारै छल। झुमकीसँ ओकरा कोनो तेहन शिकाएत नहियेँ छेलै। ओ कोनो अलूरि अबूझ मौगी नहियेँ छल, अपितु होशियार मौगी छल। मुदा पसीखानामे सबहक मुहसँ सुनै ओ जे सभ अपना मौगीकेँ पीटै छै से ओकरो अनेरे लत लागि गेलै। आ झुमकीओ कहाँ कहियो प्रतिवाद केलकै? चोट खाइओ कए ओ अपन काजमे लागल रहै छल से आइ तक ओकरा बुझबेमे नै एलै जे ओ कोनो गलती काज कऽ रहल अछि। ओकरा आश्चर्य लगलै झुमकीक ताकतिपर। कोना ओकरा बजारि कए छातीपर चढ़ि गेलै। ओकरा पहिल बेर भान भेलै जे सत्ते यदि ओकरा झुमकीसँ कुश्ती लड़ए पड़ैक तँ ओ हारियो सकैत अछि। अही गुनधुनमे जखनि झुमकी खाए लेल कहलकै तँ ओ मना नै कऽ सकलै। एकदम आज्ञाकारी बच्चा जकाँ खा लेलक आ गोठुल्लामे जा कए पड़ि रहल। पहिल बेर भरि पोख ताड़ी पीबिओ कए ओकर निन्न निपत्ता भऽ गेल छेलै। सोचिते सोचिते ओ पड़ल छल कि देखलक झुमकी आबि कए ओकर पीठपर तेल मालिस कऽ रहल छैक। कुसमा साहस कऽ कए झुमकीकेँ पुछलक- “सत्ते तों कालि फेर हमरा मारबें।” झुमकीकेँ अपना पुरुखपर दया तँ एलै आ अपना केलहापर कने लज्जित सेहो भेल मुदा अपन दुर्गतिकेँ ध्यान करैत  ओ फेर कठोर भऽ गेल। कुसमाकेँ ओ एतबे कहलक- “दूटा शर्त करतै तखनि‍ हम किछु नै करबैक पहिल जे ताड़ी पीनाइ बन्द करतै आ दोसर हमरापर फेर कहियो हाथ नै उठेतै।” कुसमाकेँ मारिक चोट मोन पड़लै। ओ झुमकीक दुनू शर्त मानि लेलक। झुमकी अपना विजयपर हर्षित होइत ओही गोठुल्लाक अन्हारमे कुसमासँ लिपटि गेल। विजय-२ प्रिया अपन परिवारक बहुत विरोध सहैत सोमेशसँ बियाह केलक। दुनू इंजीनियरिंग कौलेजमे सहपाठी छल। प्रियाक मम्मी पापाक कहब छेलन्हि जे सोमेश पढ़बा लिखबामे प्रियासँ सभ दिन कमजोर रहलै अछि आ आगुओक जीवनमे ओ ढीले ढाल रहत। मुदा प्रिया की कोनो चुनि कए आ रिजल्ट देखि कए प्रेम केने छल? प्रेम एना केतौ कएल गेलै अछि? प्रेम तँ भऽ जाइ छै, बस एतबे। अन्तर देखेलै करीब दू सालक बाद जखनि दुनू पहिल प्लेसमेंट छोड़ि दोसर जॉब पकड़लक। प्रियाकेँ भेटलै पचीस लाख के पैकेज आ सोमेशकेँ बीस के। मुदा ऐ अन्तरसँ दुनूक बीच प्रेममे कहियो कोनो खटास नै एलै। अपितु अपना संगी साथी लोकनिक बीच ई जोड़ी आदर्शे मानल जाइत रहल। तेकर किछु दिनक बाद सोमेश एक दिन प्रियाकेँ कहलकै जे हमरा सभकेँ आब बच्चाक प्लानिंग करबाक चाही आ ओइले प्रिया किछु दिनक लेल जॉबसँ ब्रेक लऽ लिअए। प्रियाकेँ पहिल बेर सोमेशक कोनो बात अनसोहाँत लगलकै। ओ बच्चा तँ चाहै छलि मुदा ऐ लेल ओकरे किएक जॉबसँ ब्रेक लेबए पड़तै? ओ सोमेशकेँ पुछलक- “सोमेश, अहाँकेँ नोकरीक पैकेज अछि बीस लाखक, ठीक।” सोमेश सपाट उत्तर देलक- “ठीक।” “आ हमर जॉबक पैकेज अछि पचीस लाखक, ठीक?” फेर सोमेश ओहने उत्तर देलक- “ठीक।” फेर प्रिया ओकरा मोन पारि देलिऐ- “यद्यपि हम दुनू गोटे अलग अलग कम्पनीमे काज करैत छी, अहाँक पोजीशनसँ हमर पोजीशन इंडस्ट्री हिसाबें सीनियर सेहो अछि आ वर्कलोड बेसी सेहो, ठीक।” ऐपर ओ कने लजाइते कहलक- “ठीक मुदा ऐ बातक की माने अखनि‍?” प्रिया स्पष्ट ओकरा कहलकै- “तँ अहीं किएक ने जॉब छोड़ि दइ छिऐ?” ऐ बातपर ओ हँसय लागल- “लेकिन हमरा जॉब छोड़लासँ बच्चा केना आबि जेतै?” प्रिया ओकरा शान्त भावें बुझा देलक- “बच्चा हम जन्मा देब, ओइले हरेक कम्पनी मैटर्निटी लीव दइते छै। तेकर बाद ओकरा सम्हारैक काज अहाँ करू आ जॉब छोड़ि दियौ। अमेरिकामे आब बहुत पुरुष एना कऽ रहल छैक।” सोमेश एकरा हॅंसीमे टारि देलक। मुदा प्रियाकेँ लगलै जे ओ कोनो अनुचित प्रस्ताव नै देलकै। समय बीतैत गेलै। अगिला साल सोमेशकेँ दश प्रतिशत इन्क्रीमेंट भेटलै, प्रियाक कम्पनीमे ओकरा बीस प्रतिशत भेटलै। सोमेशक पैकेज रहलै बाइस लाखक, प्रिया पहुँचि गेल तीसपर। तेकर छओ मासक भीतरे प्रिया फेर जॉब चेन्ज केलक जतए नबका पैकेज छल चालीस के। नवका पोजीसनमे ओ सीधे वी.पी.केँ रिपोर्ट करै छल। ओ फेर सोमेशकेँ पुछलक- “की विचार केलौं? यदि परिवारमे बच्चा चाहैत छी तँ हमर प्रस्ताव मानि लिअ।” सोमेश किछु उत्तर नै देलकै, ओकर पुरुषबला अहं जागि जाइ छेलै। अखनि‍ तक ओ पूरा बंगलोरमे एहेन नै सुनने छल जे बच्चा पोसैक लेल पतिए जॉबसँ ब्रेक लेलकै आ पत्नी काज करिते रहलै। अमेरिकन सभ सनकी होइत अछि, ओकर नकल करबाक कोन काज? दिन बीतैत गेलै, प्रिया आ सोमेशक पोजीसन आ पैकेजमे अन्तर बढ़िते रहलै। बच्चाक लेल प्रिया अपना दिससँ कोनो हड़बड़ी नै देखा रहल छल। मुदा सोमेशकेँ ई जरूरी बुझाइत छेलै। ओ जखनि‍ प्रियाकेँ ऐ बातक कोनो हिन्ट दैत, ओ अपन प्रस्ताव दोहरा दैत। एक बेर तँ सोमेश सोचए लगल जे प्रिया जिद्दी अछि आ आब ओकरा संग बेसी दिन नै रहि सकत। ई एहेन समस्या छेलै जकरा ओ कोनो कलीग अथवा पुरना संगी साथीक बीच सेहो डिस्कस नै कऽ सकै छल। प्रियासँ अलग भेने ओकरा की भेटतै? फेर नव तरीकासँ जीवन साथी चुनबा लेल प्रयास करू। आ की गारंटी जे ओहो लड़की बादमे कोनो दोसरे बखेरा ने ठाढ़ करए? प्रियाक संग ओ आठ नौ साल बिता लेलक अछि, एकटा अही जिद्दक अतिरिक्त प्रियासँ ओकरा कोनो शिकाएत नै छेलै। संगी साथीक बीच अपना दुनूक प्रशंसा आ ‘आइडियल कपुल’क उदाहरण आ प्रियाक तेज बढ़ैत कैरियर ग्राफ ओकरा सोचबाक लेल बाध्य केलकै। ओ सोचए लगल पहिलुका कथन जे ‘हरेक सफल व्यक्तिक पाछू एकटा स्त्रीक हाथ रहै छै।’ की एकरा उनटाैल नै जा सकै छै? यदि ओ मददि करैक तँ प्रियाक सफलताक ओहने श्रेय ओकरो भेटि सकै छै। फेर जॉब तँ घर बैसल सेहो कएल जा सकै छै। बहुत रास कम्पनीमे लोककेँ एहेन विकल्प भेटि रहलै अछि। रहल बात बेबी सिटिंग के। से तँ जेहने ओ अनाड़ी अछि तेहने प्रिया सेहो अनाड़ी। आइ कालि बंगलोरमे काज केनिहार सभ कपुल अनाड़ी रहैत अछि। तखनि‍ फेर लोक किताब पढ़ि आ इंटरनेटसँ सीखि किछु दिन काज चलबैत अछि। बहुत कमे लोककेँ मम्मी पापा सम्हारि दइ छथिन्ह। ओ फ्लिपकार्टसँ बेबी सिटिंग सम्बन्धी एकटा अमेरिकन किताब आर्डर केलक आ प्रियासँ नुका कए पूरा पढ़ि गेल। ओकरामे किछु क्न्फिडेन्स जगलै जे ओ बच्चाकेँ सम्हारि सकत। आ फेर कोनो इमर्जेन्सी भेलापर बहुत रास्ता छैक, प्रिया अपना बच्चाकेँ छोड़ि थोड़बे देतै? ओ तँ  मात्र ई आश्वासन चाहैत अछि जे ओकरा जॉब छोड़ए नै पड़ैक। अही सोच विचारमे आ जॉब फ्रोम होम तकबामे आर छओ मास लागि गेलै। तेकर बाद एक दिन सोमेश बेड रूम पहुँचैत घोषणा केलक- “प्रिया, हम अहाँक प्रस्ताव मानि लेल अछि। ओतबे नै हम दुनूक लेल एकटा एग्रीमेंटो बना लेलौं अछि।” आ ई कहैत ओ कागज प्रियाक सामने बढ़ा देलक जाहिमे ओ अपन सिग्नेचर पहिनहि कऽ देने छल। प्रियाकेँ तँ विश्वासे नै भेलै। ऐ विजयक खुशीमे ओ कागजकेँ फाड़ि देलक, घरक सभटा कन्डोमक पैकेट उठा कए फेकि देलक आ सोमेशसँ लिपटि गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल२.मो. अशरफ खान- कता ३.२.१.ओम प्रकाश झा- २ टा गजल २.राजीव रंजन मिश्र- गजल ३.३.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.४.महेश झा 'डखरामी'- ५ टा कविता १.आशीष अनचिन्हार २.मो. अशरफ खान- कता १ आशीष अनचिन्हार गजल-१ छूटल हाथ फूटल माथ अपने संग करबै लाथ बहसल मोन आबू नाथ पेटक लेल गोबर पाथ छथि बकलेल भूपतिनाथ सभ पाँतिमे 2 221 मात्राक्रम अछि। गजल-२ कमसँ कम एकौटा फूल दे गे मलिनियाँ नीक नै अपने समतूल दे गे मलिनियाँ राखि ले गेंदा बेली चमेली गुलाबो बस हमर कोंढ़ी अड़हूल दे गे मलिनियाँ घाटपर बैसल हम बाट जोहै छी तोहर थरथराइत देहक पूल दे गे मलिनियाँ राहु शनि मंगल बुध केतु वशमे मुदा तों प्रेम सनकेँ ग्रह अनुकूल दे गे मलिनियाँ आम संगे महुआ महुआ संग आमे टा झूलै एहने सन झूलाझूल दे गे मलिनियाँ सभ पाँतिमे 2122+222+122+122 मात्राक्रम अछि। २ मो. अशरफ खान कता मायासँ दूर प्रेमसँ दूर प्रेमिकासँ दूर जेना लगै अपन जिन्दगीसँ दूर छी याद आबै जखन अपन पहिल प्रेम तब लगै जेना दुनियासँ दूर छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ओम प्रकाश झा- २ टा गजल २.राजीव रंजन मिश्र- गजल १ ओम प्रकाश झा गजल १ अपन मोनक कहल मारि बैसल छी छलै खिस्सा लिखल फाडि बैसल छी हँसी हुनकर हमर मोनमे गाडल करेजा अपन हम हारि बैसल छी पढू भाषा नजरि बाजि रहलै जे किए हमरा अहाँ बारि बैसल छी सिनेहक बूझलौं मोल नै कहियो अहाँ गर्दा जकाँ झारि बैसल छी जमाना कहल मानैत छी सदिखन कहल "ओम"क अहाँ टारि बैसल छी मफाईलुन-फऊलुन-मफाईलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) गजल २ कानैत आँखिक आगिमे जरल आकाशक शान छै बेथा करेजक लहकि गेलै, सभक झरकल मान छै बैसल रहै छी प्रभुक दरबारमे न्यायक आसमे हम बूझलौं नै बात, भगवान ऐ नगरक आन छै सदिखन रहैए मगन अपने बुनल ऐ संसारमे चमकैत मोनक गगनमे जे विचारक ई चान छै आसक दुआरिक माटि कोडैत रहलौं आठो पहर सुनगैत मोनक साज पर नेहमे गुंजित गान छै सूखल मुँहक खेती सगर की कहू धरती मौन छै मुस्की सभक ठोरक रहै यैह "ओम"क अभिमान छै

दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर) २ राजीव रंजन मिश्र गजल अपना चरजाकेँ हमरा हिसाब द' दिअ  जतबे पूछय छी ततबे जवाब द' दिअ

सीखू हम्मर वा हमरे सिखा कँ कहू  कोनो कहलौँ जे हमरे खिताब द' दिअ

अपने बूझय छी पढ़ि पढ़ि किताबक गप  फेर हमरा नै फाटल किताब द' दिअ

सुखमय सभदिन ई जीवन अहाँक रहै हमरा भन्ने हे सभटा खराब द' दिअ

नेहक डाहल छी राजीव तैँ तँ कही  राखू सभटा आ अगबे अदाब द' दिअ

२२२२ २२२ १२१ १२ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कुन्दन कुमार कर्ण गजल ओकरा देखिते देह अपने सिहरि जाइ छै आगि नेहक हियामे तखन यौ पजरि जाइ छै मारि कनखी दए छै जखन ताकि अनचोकमे डेग अपने हमर ओकरा दिस ससरि जाइ छै ओ हँसै छै त एना बुझाइत रहल बागमे फूल जेना गुलाबक लजाइत झहरि जाइ छै चानकेँ देखिते रातिमे चेहरा ओकरे झिलमिलाइत हमर आँखिमे सजि उतरि जाइ छै लाख लड़की करै छै हमर आब पाछू मुदा छोडि सभकेँ बहकि ओकरेपर नजरि जाइ छै प्रेम कुन्दन हए छै भरम से बुझा जे रहल एहने जालमे मोन सुधि बुधि बिसरि जाइ छै बहरे-मुतदारिक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। महेश झा 'डखरामी' ५ टा कविता १ --------सपना ---------- सोड़हो श्रृंगार नाचय दलबल, नैन देखाबय पलपल छलबल ; चलै नै जोड़ कलबल भुजबल , डोलय आब अप्पन सम्बल | कनिए अप्पन नाम बताबू , संगहि गाम ठाम बताबू ; मोनक बेग आब नै काबू , किए विवेकक मूँह जाबू | मिठगर पाइन अहाँके घाटक , सब पथिक ओहिए बाटक; हटाबू , दर्पण रूप समर्पण , रीति प्रीति आकर्षण अर्पण | दैव नै जानय अहाँक मतिगति , बिनु प्रसाद ककरा सद्गति ; सबहक दाता विमुख विधाता , मन मारुख ई नेहक नाता | दर्शन सदिखन सजल धजल , रूप कँवल सन नवल धवल ; चंचल चितवन चित्त चपल , मदहोशे देखू खसल पड़ल | भेल परात फूजल आँखि, उड़ल चिड़ैय्या लगाकऽ पाँखि; सपना सुन्दर चोट्टहि टूटल , सोड़हो तार हाथ सँ छूटल | केहेन जौउर सँ प्रीति बान्हल, मधुर बोल सँ बाती लेसल  कयल जतन बहुविधि , नहि जाय खुटेसल आब मोन नहि एना बिसनाऊ, दैबा आबू, परान बचाऊ | ------------------------------ [२७,अक्तूबर २०१४,रवि दिन नयी दिल्ली] २ --------उनटा बसात ------- पढ़ल लिखल बौक बनलिऐ , मुर्खाहा छाती तानि चलैए ; सब ओकरे साहब लाट बनाबय , देखू, अन्हरा बाट देखाबय | बिनु ढौआ ज्ञानी मूर्ख बनलिऐ, उल्लू सगरे सद्पुरुख बनलिऐ ; विधनो ओकरे ठाठ बढ़ाबय , देखू , अन्हरा बाट देखाबय | भ'रल गेठी दाबिकेँ च'लय , छुच्छा भजोखा खूब बजाबय ; खाली घइला 'माट' चिढ़ाबय , देखू, अन्हरा बाट देखाबय | निरधन जन सुशील गुणखान , धनिकक देखू मोन उत्तान ; सज्जन लेल किए टाट लगाबय देखू , अन्हरा बाट देखाबय। सरिता सूर्य चान वृक्ष मान, फल जल शीतल सदिखन दान; किए केओ सुविधा ढाठ लगाबय, देखू , अन्हरा बाट देखाबय | ---------------------------------- ३ ---------" अनुराग "--------- चिंतन जिनकर सतत मन मे , बनि साँस बहय प्राण पण मे ; देखू, विधनाक वेधन शक्ति , ओत्तहि बेसी भाव विरक्ति | चेतन चिंतन रंग रुधिर मे, स्नेह सिंचन संग सुधिर मे; देखू, भागक भेदन शक्ति , ओत्तहि बेसी आश आशक्ति | सरलक सउँसे लज्जित लाज, विरल पाबथि सज्जित साज ; देखू,प्रकृतिक विपरीत शक्ति, ओत्तहि शापित प्रेम प्रतप्ति | भद्रक भाव पथ पर लथ पथ , रुधिर रेणु रक्ताभ रथ पथ ; विधिक कृपा चित्तक सम्मति  शून्य पुण्य प्रीतिक सद्गति | हुनिकर आगाँ कक्कर जोर , वशमे जिनकर साँझ भोर ; आब नहि हो कोनो आपत्ति , ईश दया सभ विलीन विपत्ति | ----------------------------------- ४ -------राधे श्याम ----------- मुरली मनोहर आँचर थाम्हल , हियक अनुराग खूँट सँ बान्हल | मधुर बोल मन मोह जागल , आनन चानन प्रीति पायल | काटय करेज, काजर कोर , मेह मध्य मुस्की मन भोर | अद्भुत पुरुष , प्रकृतिक खेल , निज निज भाव अनुपम मेल |। जीभ निःशब्द नैन अनघोल , अन्दर बाजय अनहद ढोल | सेवा अविरल धेनु धाम , एकहि सम्बल राधा नाम | बिनु भजन नहि पल विश्राम , पुनि पुनि दर्शन राधे श्याम | ----------------------------------- ५ 'बेटी ' जहि घर भेटै', मान धिया केँ , ओहि घर बास, राम-सिया केँ। बसथि सिया, घर -घरक धिया मे , सहयोग, सम्मान जगाउ जिआ मे कन्याकेँ नै बुझू सामान, ताकू आबो, एकर निदान। दहेज निषेधक बनय विधान , आगाँ बढ़ि राखू प्रमाण ; तखने अछि पुत्रीक कल्याण। आब नहि जाय, बेटीक जान , जाहि घर पुत्री वएह दुर्गाथान। पुत्री पाबथि मान जाहि गाम , वएह गाम जनकपुर धाम।  ----------------------------------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते आशीष अनचिन्हार बाल कविता माछी मच्छर दू गो दोस दूनू खच्चर बड़ पकठोस माछी मच्छर दू गो दोस कही पानि तँ लाबै पानि कही खेत तँ जाइ बथान ने धोबै मूँह ने दिसा मैदान लीखै कौआ पढ़ै खरगोश माछी मच्छर दू गो दोस रहै दुन्नू बड़ नीक उक्ठ्ठी सभ दिन होइ कान कनैठी दिनमे खेलै दुन्नू खूब निनिया घेरै रातमे खूब खाइयो के नै रहै होश माछी मच्छर दू गो दोस मारि भेलै एक दिन दुन्नूमे बजरलै लाठी दुन्नूमे चिकरा-चिकरी पटका पटकी लत्तम जुत्तम दुन्नूमे दुन्नू दिस एलै जोश माछी मच्छर दू गो दोस माछी कहै हम रतिचर बनबै मच्छर कहै हम दिनगर रहबै मचलै दरबज्जा गर्दमिसान दुन्नू दिस छै बड़का रोस माछी मच्छर दू गो दोस सरपंच बनि एलै सनकिरबा केलकै दुन्नूपर बड़ किरपा देलकै दिन माछी राति मछरबाकेँ भलै समाधान सुंदर ठोस माछी मच्छर दू गो दोस ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 40 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १६६ म अंक १५ नवम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८३ अंक १६६) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA