ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६७) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डाॅ. कीर्ति नाथ झा- शेफाली, फुलपरासवाली आ हम २.२.जगदानन्द झा ‘मनु’- मैथिलीमे एकरूपताक अभाब २.३.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य निबंध- लास्ट टाइम सजेशन २.४.नन्द विलास राय :: दिव्या ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- गजल ३.२.बृषेश चन्द्र लाल ३.३.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.४.अशरफ राईन- कता आ गजल ४.बालानां कृते-आशीष अनचिन्हार Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html संपादकीय पाठकीय प्रतिक्रिया: विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ। - नचिकेता (मिथिला दर्शन) सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद। -शेफालिका वर्मा १६६म अंक संतुलित अछि। प्रस्तुत अंकमे वियोगीजीक कथा "विजय"केँ ऐ अंकक सर्वश्रेष्ठ रचना कहल जाए तँ दिक्कत नै। हिनक कथाक पहिल पार्टक अपेक्षा दोसर पार्ट बेसी मुखर अछि आ एकर मुल्याकंन पचास साल बाद जा कऽ फड़िच्छ हेतै।
संपादकीयमे जँ कहियो काल देशक राजनीति ओ समाजिक-आर्थिक पक्षपर चर्चा होइ तँ आ रुचिगर हएत से आशा अछि।
विदेहमे पहिल बेर कविता लऽ कऽ एबाक लेल महेश झा डखरामीजीक स्वागत छनि।
आशीष अनचिन्हार
आशीष अनचिन्हार विचारार्थ प्रस्तुत अछि-- हमरा लोकनि बहुत मेहनतिकेँ " भगीरथ प्रयास " कहै छिऐ। ई भगीरथ अपन तपस्यासँ अपन अकाल मृत्यु प्राप्त पूर्वजकेँ मोक्ष दिएबाक लेल गंगाकेँ पृथ्वीपर अनलाह। एकरा एनाहुतो बूझि सकै छिऐ जे भगीरथ अपन व्यक्तिगत काजक लेल ई प्रयास केला। जँ कदा्चित हुनक पूर्वज कपिल मुनिक श्रापसँ भस्म नै भेल रहितथिन तँ भगीरथ ई काज नै करितथि। आब कने मैथिल मलाह जातिमे पसरल महागाथा "दुलरा दयाल" कथापर विचार करी। ऐ महागाथाक अनुसार जखन राजा जयसिंह कमला नदीपर बान्ह बान्हि ओकर मूँह अपना देश दिस घुमा देलकै। आ ऐ कारणे भड़ौरा गाममे अकाल पड़ि गेलै आ जनताक हालति खराप भऽ गेलै तखन दुलरा दयालक सहायतासँ "कोइला वीर" आ "रन्नू सरदार" आ हुनक आन सहयोगी सभ कमला बान्हकेँ तोड़ि हुनक पुरने धार बना देला। आब ऐ दू गोट कथासँ ई स्पष्ट अछि जे भगीरथक प्रयास व्यक्तिगत अछि मुदा कोइला वीरक प्रयास सामूहिक अछि। हमरा जनैत आन देशक नायकसँ प्रेरणा पाबि शब्द ग्रहण करब उचित अछि मुदा अपन नायकक प्रेरणा बिसरि जाबए अधर्म अछि तएँ हमरा जनैत मैथिलीमे बहुत मेहनतिकेँ " कोइला प्रयास " वा "रन्नू प्रयास" कही तँ ठीक। ऐ विषयपर सार्थक चर्चा ओ बहस आमंत्रित अछि। Ashish Anchinhar @all--बहुत गोटाकेँ टैग नै कऽ सकै छी। विदेहक सभ सदस्य बहसमे सादर आमंत्रित छथि। November 19 at 8:06pm · Like
Jha Mahesh आशीषजी, सुन्नर मुद्दा आ जानकारी लेल , साधुवाद । भारतीय वाङमयक उद्दात्त उद्घोष " "उदारचरिता नाम्तु वसुधैव कुटुम्बकम् " [Global village ]. भारतीय औदार्य प्रसंशनीय आ नमनीय सेहो ।इएह विशेष । November 19 at 8:23pm · Like · 1
धनञ्जय झा कोइला के कथा विस्तार स कहू November 22 at 10:07pm · Like · 1
Gajendra Thakur इन्द्रलोकमे रहैवाली कमला। तेँ ने सभ धारक वर्णन इतिहास-पुराण मे छै मुदा कमला धारक नै। इन्द्रलोकमे रहै छली कमला महरानी तेँ। जखन ओ मिथिलामे एली तावत देरी भऽ गेलै। सभ ब्राह्मणकेँ ब्रह्मा कोनो ने कोनो धारक अभ्यर्थनाक भार दऽ देने रहथिन्ह आ से कोनो ब्राह्मण बचबे ने केलै हिनकर अभ्यर्थना करबा लेल। एम्हर मिथिलाक मलाहक जिनगी कमला धार एलासँ सुखितगर भऽ गेलै। ओ सभ खूब माछ मारथि आ बेचथि। से हुनका सभकेँ कमला मैय्यासँ बड्ड सिनेह भऽ गेलन्हि। तखन ब्रह्माकेँ फुरेलन्हि जे किए नै कमलाक अभ्यर्थनाक भार मलाह लोकनिकेँ दऽ देल जाए। से ओ कमलाकेँ कहलखिन्ह जे सिंहवाड़ा लग जे भरौड़ा गाम छै, ओतुक्का बिसम्भर सरदार आ ओकर कनियाँ रानी गजवन्तीकेँ पुत्र हेतै, जकर नाम राखल जेतै दुलरा गर्भी दयाल, सएह भरौड़ाक राजकुमार बनत। ओ तंत्र आ नृत्यमे पटु हएत आ लोक ओकरा नटुआ दयाल कहत। वएह शुरू करत कमलाक अभ्यर्थना।
दुलरा दयालक बियाह भेलै बेगूसराय लग बखरीक दुखहरन सरदार आ तंत्र-नृत्य साधिका बहुरा गोढ़िनक बेटी फूलमती धानीसँ। तिलयुगा लग कमला धारक पूजा शुरू केलक नटुआ दयाल। मुदा बहुरा गोढ़िनक किछु पुरान विद्रोही शिष्य मारि देलक नटुआ दयालकेँ। मुदा कामाख्याक योगिनी जिया देलक नटुआकेँ।
कमला पैघ हेबऽ लगली तँ किसान आ मलाह सभक जिनगी सुखितगर हेबऽ लगलन्हि।
एम्हर उगला बैदला चमारक मोनमे खोट एलै। ओ कमलासँ बरजोड़ी बियाह करबाक मोनसूबा बान्हलक। मलाह लोकनि भोला बाबाक तपस्या केलन्हि आ कमलाक सतीत्व बचेबाक गोहारि केलन्हि। भोला बाबाक वरदानसँ शिवरा गामक मलाह परिवारमे अमर सिंहक जन्म भेल।
कमला पैघ हेबऽ लगली। मलाह कोइलाबीर जकर कुरहड़ि अस्सी मोनक आ कुरहड़िक बेंट चौरासी मोनक रहै, से माटि काटि-काटि कमला लेल रस्ता तैयार करथि। कमला पैघ भऽ गेली।
उगला बैदला कमलाकेँ बान्हि देबाक प्रण केलक। बान्हल कमला जखन ऊपर उठती तँ ओ हुनका घीच लेत आ हुनकर सीथमे सिनूर धऽ देत आ बियाह कऽ लेत।
कमला ई गप कोइलाबीरकेँ सुनेलन्हि। कोइलाबीर माटिक बान्ह काटि देलक आ कमलाक रस्ता साफ भऽ गेल।
मुदा उगला बैदला तँ चामसँ हड्डी निकालबाक कारबार करै छल से ओ सभटा हड्डी मोरंग लग एकट्ठा केलक आ हड्डीक बान्हसँ कमलाकेँ घेर देलक। अपवित्र हड्डीकेँ कोइलाबीर कोना छुबितए। से ओ घुरि गेल। एम्हर अमर सिंह राजा बनि गेला, ओ बाल-ब्रह्मचारी रहथि। हुनकर सात तल्लाक गढ़ छलन्हि जकर दक्षिणमे चाननक गाछ लग सात कोसक घेराबाबला अखराहा छल। कमला ओतऽ गेली आ चाननक गाछपर बैसि गेली। अमर सिंहकेँ लगलन्हि जे कोनो स्त्री अखराहा लग छै कारण ओ बाल-ब्रह्मचारी रहथि आ तेँ हुनका अपन शक्ति घटल बुझना गेलन्हि। ओ तमसेला जे ई स्त्री जँ भेटत तँ ओकरा एक्के घुस्सामे अस्सी हाथ नीचाँ गाड़ि देबै। कमला मुदा नीचाँ आबि गोहारि केलन्हि आ अमरसिंह सत केलन्हि जे ओ कमलाक रक्षा करता नै तँ अस्सी कोस नरकमे खसता।
नौ हाथ नाम आ छह हाथ चाकर रहथि अमर सिंह।
अमरसिंह अखराहामे माटि देलन्हि आ उगला बैदलाकेँ मारलन्हि। उगला बैदलाक कनियाँ गढ़ुआरि छलि, ओकरा अमर सिंह मारि देलन्हि। मुदा तखने जन्मल उगला बैदलाक बेटा बड्ड बलगर छल। कमला अमर सिंहकेँ किछु भेद बतेलन्हि आ तखने ओ उगला बैदलाक बेटाकेँ मारि सकला।
मुदा जखन अमर सिंह बान्ह दिस बढ़ला तँ ओइ हड्डीक बान्ह देख कऽ ठमकि गेला आ कमलाकेँ मीरन फकीरकेँ बजा कऽ अनबा लेल कहलखिन्ह। ओ एला आ हड्डीक बान्हकेँ तोड़लन्हि। (सहस्रशीर्षा उपन्याससँ) November 23 at 3:34pm · Like · 1
Ashish Anchinhar धनञ्जय झा---ओना आब ऐपर विचार हो जे मैथिलीमे भगीरथ प्रयासक बदला जँ "कोइला प्रयास" वा "रन्नू प्रयास" कहल जाए तँ केहन रहतै ? November 23 at 3:39pm · Edited · Like
Gajendra Thakur कोसीक भित्तापर रानू सरदार अपन अस्सी मोनक कोदारि लऽ कऽ जकर बेंट बिरासी मोनक छै, चलि रहल अछि। चलि रहल अछि आगाँ आगाँ रानू सरदार आ कोसी लेल रस्ता बनबैए। गाममे कटनियाँ लगैए आ खेतमे भरना। धरमपुर कऽ तारलेँ माइ कोसिका कबखंड केँ बोरले सिंहेश्वर थान कइले पयान एतै दुख देलेँ हे माइ कोसिका एतै दुख देलेँ आरी चढ़ि रोबै छै किसान अखनी देबौ मैया पोसल पठिया चढ़तै अगहन दूध घर हे बखसुमे बखसु माइ कोसिका करै छी गोहार हे (सहस्रशीर्षा उपन्याससँ) November 23 at 3:41pm · Like · 1
Gajendra Thakur कमला जे पुछे छै सुन बहिन कोसिका हे केहेन छथिन रानू सरदार हे भैंसा सन मनुख गे बहिनो बजर सन गात हे मोँछ रानू कऽ बहिंगा सन सन आब हे कोसिका जे पूछै सुन बहिन कमला हे केहन छै कोइला देव आब हे ताड़ सन मनुख गे बहिना बजर सन गात हे मोंछ जइसन भमरा गुलजार हे गाड़ल जे खुटबा से कोइला देव जाल जे पसारल हे भीत चढ़ि भऽ गेल ठाढ़ हे
कोसीक प्रेमी बाँतर जातिक लोक देवता रानू सरदार। रानू सरदार अस्सी मोनक कोदारि लऽ कऽ जकर बेंट बिरासी मोनक छै, आगाँ आगाँ कोसी लेल रस्ता बनबैए।
आ कोसीक प्रेमी रैय्या रणपाल। उत्तर दिशासँ अबैए रणपाल आ कोसीकेँ देखि कऽ मुग्ध भऽ जाइए। झिमला मल्लाह आ बैदला चमार सेहो कोसीसँ बियाह करऽ चाहैए। हमेँ तोरा पुछियौ रे बैदला जतिया तँ ठेकान रे तोहूँ माँगे हमरो सँ बियाह रे हमहूँ जे छिकियै गे कोसिका ओइछ जाति चमार हे हमेँ मांगियौ तोरे सँ बियाह हे कथी ले खियोलियौ रे बैदला दूध भात कटोरबा रे पोइस-पाइल केलियौ जबान रे तोहूँ जे केलेँ रे बैदला जातियो कुल हरण रे
(सहस्रशीर्षा उपन्याससँ) November 23 at 3:47pm · Edited · Like · 1
Manoj Pathak देशक गाम गाममे प्रायः सब जातिक सब समाजक अपन नायक ओ पूरा ओहि संपूर्ण क्षेत्र विशेषक नायक छथि। कोन नायक छोट, किनक प्रयास निजी हित वा को न प्रयास समाजक हितके लेल कएल गेल ताहि उपरौझमे लगलासँ लाभ नहि, लाभ पैघ लाइन घीचलासँ होइत छैक। भगीरथक स्थान छोट साबित केलासं हम सब अपन सीमित मानसिकताक परिचय देब जखन कि रन्नू सरदार, आ दुलरा दयालके अपन संपूर्ण समाजक नायक स्वीकारि कए आ हुनका स्थापित कए क, अपन उद्देश्यक पूर्ति बेसी नीक जकाँ कए सकब। एखन आवश्यकता अछि मिथिलाक समस्त नायकके स्थापित करबाक, एक सूत्रमे जोड़बाक ने कि ककरो छोट साबित करबामे अपन ऊर्जा खर्च करबाक। November 24 at 5:51pm · Like · 1
Manoj Pathak रन्नू सरदार आ दुलरा दयालक संग मिथिलाक हर जाति विशेषक, क्षेत्र विशेषक नायकक स्मृति ओहि अवसर विशेष अर्थात हुनक जयंती आदि पर एक संग एकजुट भ,क, मनयबाक आवश्यकता अछि। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष द्धारा ऐ वर्ष प्रदान कएल गेल पुरस्कारक विवरणः
१. नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार-– श्री रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम— पुरस्कार राशि रु. २ लाख ।
२. नेपाल विद्यापति मैथिली कला–संस्कृति पुरस्कार— श्री श्याम सुन्दर यादव – पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
३. नेपाल विद्यापति मैथिली अनुसन्धान पुरस्कार— डा. वासुदेव लाल दास— पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
४. नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार— श्री चन्द्रशेखर लाल शेखर — पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
५. नेपाल विद्यापति मैथिली अनुवाद पुरस्कार— श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ VIDEHA-Maithili Literature Movement: 166 issues, 11000 manuscripts transcripted,50000 word Maithili-English database maintained,150+ hours audio files; 225+ hours Maithili Video files.+ Modern Photographs/ painting/mithila painting archive/ +scanned versions of Maithili Books for free download, Children literature archive. मैथिली विकीपीडिया http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html http://ultimategerardm.blogspot.in/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html http://ultimategerardm.blogspot.in/2008/01/maithili-language-and-mithilakshar.html http://ultimategerardm.blogspot.com/2014/11/wikipedia-now-in-maithili.html Words and what not Monday, May 09, 2011 The #Bihari #Wikipedia is actually written in #Bhojpuri This is the kind of article that has many people's eyes glaze over. It is about standards, scientific documents and it is about languages most of my readers have never heard about. For the people that do speak one of the languages that are considered Bihari it is extremely relevant and it has implications for Wikipedia. This is information provided by Umesh Mandal that explains about the "Bihari group of languages" in relation to the Maithili language: Kellogg (1876/1893) and Hoernle (1880) regarded Maithili as a dialect of Eastern Hindi; Beames (1872/reprint 1966: 84-85), regarded Maithili as a dialect of Bengali, Grierson has done a great service to Maithili language, however, he erred when he gave a false notional term of "Bihari" language, after that western linguists started categorizing Maithili as a dialect of "Bihari" language; although there is nothing known as "Bihari Language" and both Maithili and Bhojpuri are spoken in Bihar (of India) as well as in Nepal. Umesh is working on the localisation of MediaWiki for the Maithili language and as this language is currently in the Incubator, the language committee does its due diligence and tries to understand if Maithili can have a place in the Bihari Wikipedia. The information provided by Umesh makes it quite clear: "no". This still leaves us with the misnomer that is the Bihari Wikipedia. Apparently the language used for the localisation and the articles is Bhojpuri. Bhojpuri has the ISO-639-3 code "bho". Are you still following all this? Ok, there is one question I am not asking: How about the Kaithi script? Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 4:17 pm Words and what not Sunday, January 27, 2008 The Maithili language and the Mithilakshar script Maithili is a language spoken in India and Nepal by some 24.797.582 people. It is an official language in the Indian state of Bihar and it may be used in education. A request was made for a Wikipedia for Maithili, it conforms to the requirements so that is not a problem. What IS a problem is that Mithilakshar, the script used to write the Maithili language, is not yet part of Unicode. The script has not even been recognised in the ISO-15924 yet. This is the second request for a Wikipedia where the script that is used to write a language presents a problem. For modern Maithili there is the option to write in the Devangari script. Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 10:32 am Words and what not Thursday, November 06, 2014 #Wikipedia - Now in #Maithili It is a happy occasion when a new Wikipedia is created. Today we may welcome the Maithili Wikipedia. The website has been created and all the content that is currently still in the Incubator needs to be migrated. I wish the Maithili community well; I hope they will share with us in the sum of all available knowledge. Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 8:22 am विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/…/bihari-wikipedia-is-a… ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.डाॅ. कीर्ति नाथ झा- शेफाली, फुलपरासवाली आ हम २.२.जगदानन्द झा ‘मनु’- मैथिलीमे एकरूपताक अभाब २.३.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य निबंध- लास्ट टाइम सजेशन २.४.नन्द विलास राय :: दिव्या डाॅ. कीर्ति नाथ झा :: शेफाली, फुलपरासवाली आ हम जहिआ ओ लोकनि जीबै छला तहिआ तँ ने एहेन प्रसिद्ध रहथि आ ने किछु सुनबाक पढ़बाक तेना भऽ कऽ साधन रहै। आब सुनै छिऐ एक गोटे ‘मुक्ति’ लिखने छला तँ केकरो पढ़ि कऽ ठकमुड़ी लागि गेलनि आ दोसर गोटे ‘फुलपरासवाली’ लिखलनि तँ कहाँ दन ‘मुक्ती’बला नोटिस नै लेलखिन। माने दूध-भात। जे किछु। आब किताब आ पोथी सेहो खूब छपै छै आ लोक किनितो अछि। मुदा हमरा लोकनि रामायण-महाभारत पढ़ब आकि नव-नव किताब। मुदा ओइ दिन संयोगेसँ टी.भी खूजल छेलै आ दू गोट गोट भऽ सकैए परफेसर छल हेता- बड़ीकाल धरि एक दोसरासँ बहस करैत रहथि माने ‘शेफाली’ नीक केलनि आकि ‘फुलपरासवाली’। धुर, एहन गप-सप्प केतौ एतेक खूजि कऽ होउ। धिया-पुता तँ अबधारि कऽ आरो रस लेत। बीचमे एक गोटे आैर छला जे बीचमे एकबेर टिपलखिन िक तँ, कियो कहने छेलखिन, जे ‘हिनका लोकनिक खीसा मर्यादाक बाहरक गप थिक।’ मुदा नै जानि ओ बुढ़ी लोकनि आइ जीबैत रहितथि तँ की कहितथिन। मोने अछि, मैयाँकेँ पुछने रहियनि, “मैआँ अहाँ कहिआ विधवा भेलिऐ?” तेतबे वयस रहए जे ई नै बुझिऐ जे एहेन गप पुछबाक नै छिऐ। आ जेहने हम तेहने मैयाँक जवाब- “जहिए बिआह भेल तहिए राँड़ भऽ गेलिऐ।” दूरस्थेसँ माए ई गप-सप्प सुनलनि तँ दबाड़ि कऽ भगा देलनि। मुदा हमरा ले धनि सन। हम तँ मैयाँसँ बस किछु गप करैले किछु फुछने रहियनि। देखियनि उज्जर धोती, काटल केश, चुड़ी-सिनुर-ठोप-ठीका किछु ने। तैपर हम आवेशसँ कखनौं आलताक ठोप करबाक लौल करियनि। कहियो चुड़ी पहिरबाक। गरमी मासक दुपहरियामे जखनि मैयाँ अपन टेकुरी लऽ कऽ जनौ कटैले बैसै छेली तँ हम सहटि कऽ लग जाइ। किछु-किछु छोट काज कऽ दियनि। ओहो कखनो मिसरी, कखनो एकटा छोहाड़ा तरहथ्थीपर रखि देथि। नातिन आ मैयाँक अही संग बहिनाक आपक्तामे तँ ओ बुझा कऽ कहने रहथि- “है चुड़ी सिनुर विधवा नै करै छै।” नेना तँ रहबे करी। पुछलियनि- “अहाँ विधवा छिऐ।” ओ कहलनि- “हँ।” हम पुछलियनि- “कहिआसँ?” बस हुनकर जवाब देल छेलनि आकि माँ सुनिते छेली गप-सप्प, दबाड़ि कऽ विदा केलनि। मुदा बिआहो दिन लोक विधवा भऽ सकै छै से पछाति बुझलिऐ। हमरो सरकार तँ हालहिमे गेलाहे मुदा हम? जे किछु सुनिऐ, तइसँ एतबे मोन अछि जे घर डेरा बड़ ऊँच रहनि, आ जाति बड्ड पैघ। किदुन सुनिऐ बाबू कहथिन- “शुद्ध गहुमनक पोआ छला, सरकार।” ठीके छल हेता। मुदा जहिया हुनकर पाला पड़ल रही दाढ़क डाँस बुझबाक वयए नै छल। मुदा आब जखनि बीख भरि देह निजाएल अछि तँ बुझै छिऐ। ओ साँप तँ नै छला मुदा हुनकर बीखक असरिसँ की कहियो उबरि सकलौं। अपना तँ बोध एतबे रहनि जे साबुन आ बर्फीक अन्तर नै बुझथिन। झोंक एलापर कथीमे दाँत काटि देता तेकर कोन ठेकान। कखनो बाटीक दालिकेँ बड़की पोखरि कहथिन आ फोड़नक मरचाइकेँ पोखरिक माँछ। बिआह भेलापर लोककेँ तँ खूब मोन लगै। हम आब बुझै छिऐ, लोक, देखि कऽ माँछी केना गिड़ै छल तहिया। मुदा सोचै छी हम के छी? ‘शेफाली’ कि फुलपरासवाली? एक गोटे उड़हरि कऽ मुक्त भेली। दोसर अपन मोनक सक्कसँ इज्जति बँचौलनि। मुदा इज्जति? रसिआरीवाली काकी जीवन भरि इज्जति बँचौने रहली मुदा मगज तँ फिरिए गेलनि। केतए-केतए ने गोहरिआ बनि कऽ गेली। केतेक ने इलाज करौलनि। किछु भेलनि नै। पछाति जखनि सभ किछु समन भऽ गेलनि तँ लगलनि जे अनकर आगि बाँचए नै देत आ आखिरी आबि कऽ अपनेसँ अगि लगा कऽ मरि गेली। मुदा हम? हमरा सरकारक सरकारीक वंशकेँ जे ऊक देखौलकनि तेकर मरला उत्तर मुखबत्ती लगा कऽ शरीर वलानमे भँसौल गेलै। यएह बलान तँ थिकी। अपने नोत पुरैले गेल रहथि। आ हम एसकरिए रही। मड़रटा मनेजर-हरवाह-कमतिआ-ओगरवाह सभ छला। बड़ जोर बाढ़ि आएल रहै। आ हमरा मथदुखीक राेग धऽ नेने छल। सभ राति पहिने दहिना कात कपारसँ शुरू हुअए। फेर कनपट्टी होइत माथक पाछूसँ गरदनि धरि जाए। गरदनि तर केत्ताबेर गेड़ुआ दहिना-बामा करी। चैन नै हुअए। शंकर बाम-कृष्णधारा- विक्स सभ लगाबी। रसे-रसे हुअए माथ दुखाएब दोसरो दिस ने पसरि जाए। तखनि भरि देहमे खौंत, पसेना। मोन आऊल। छट-पटी लगि जाए। बाबूक लिखौल- “सर्व बाधा प्रशमन....।” केर श्लोक पढ़ि अपने हाथ अपने माथपर ली। मुदा भरि राति पहाड़ भऽ जाइत छल। आ दिनमे जे निन्न हुअए से आँखि नै खुजए। तहिया डाक्टर बुझी कि वैद गोनर मिसरटा छला। नाड़ी देखथि मथाहाथ दथि। एक दिन एकटा जड़ी सेहो लत्तामे बान्हि कऽ देलनि जे गाड़ामे बान्हि लेथु। मुदा कोन भूत छल छूटए नै। एक दिन आजिज भऽ ओहो मथाहाथ देब मना करि देलनि। कहलखिन- “कि तँ नवटोल भगवती स्थानमे भगतासँ भाउ कराबथु।” तहिया कि से सनस्था रहै। जैतौं अपने मोने। दर-देआदक हवेली डौढ़ी सेहो कि लग-लग रहै। एक दिन रातिमे फेर असाद्ध मथदुक्खी धेने छल। कोठलीमे कुहरैत छेलौं। कहबो केकरा कहितिऐ?गोनर झा सेहो जवाब दऽ देने छला। सासु छेली नै। हमरा भेल जेना कियो आस्तेसँ कहलकैए- “बौआसीन!” अकानलिऐ। तँ ठीके जेना कियो हाक दैत हो। रोइआँ भुलकि गेल। हनुमान जीक नाम लेलौं। दमसि कऽ कहलिऐ- “के छी?” - “हम, बौआसीन, लोटना!” - “की छिअनि?” - “बड़ कुहरै छथिन! गोनर मिसरकेँ हाक दिअनि?” - “नै।” - “एना कोना रहथिन। बड़ तरद्दुत् होइए।” - “मरए देथु हमरा।” - “बलानक पानिसँ ओसरा धरि छइहे। मरि जाएब तँ कहिहथिन फेक दइ जेता।” लोटना, लागल जेना गुम्म भऽ गेल छला। मुदा गोंगिआइत बाजल रहथि, से मोने अछि- “डोमा जे भाव खेलाइ छेलै, से हम देखने छिऐ। हमरो तँ मथाहाथ देब सिखौने छल। लाजे कहलियनि नै। टोलपर सभ जनी-जाति तँ हमरेसँ माथा-हाथ दिअबै छै, जखनि डोमा-भैया गाम-गमाइत जाइ छै।” मोन आउल-बाउल छल। प्राण अवग्रह छल। सोचए लगलौं जेकर सोझा पएर नै उघार भेले तेकरा सोझा माथपर सँ नूआ केना उतारब। आ केना मथा हाथ देत। मुदा प्राण अवग्रहमे छल। की करितौं? कहलिऐ- “केकरो कहिहथिन नै।” ‘जानथि भगवान। बौआसिन, एक चुरुक नारिकेरिक तेल देथु। आ हम बाहरक कोठलीक लाथे हमर कोठलीक जे केबाड़ रहै, खोलि देने रहिऐ। मुदा बिछौनसँ उठबाक हूबा नै छल। लगमे नारिकेरक तेलक बोतल राखि देने रहिऐ। डिबिआक इजोतमे हम आँखि मुननहि आँगुरसँ इशारा कऽ देने रहिऐ। हमरा एतबे मोन अछि, लोटना एक चुरुक तेल कपारपर ढारि कऽ मलए लागल छला। फुसुर-फुसुर किछु पढ़ितो छला। तेतबे मोन अछि। ओकर पछाति कखनि निन्न भऽ गेल आ ओ कखनि कोठलीसँ बहार गेला से मोन नै अछि। मुदा एतबा मोन अछि जे ने हमर मथदुक्खी छूटल छल आ ने फेर कहियो गोनर झा हमरा मथाहाथ देबए हमर अँगना पएर देलनि। ईहो सत्ते जे ने ओइ बलानक बाढ़िमे हमर देहे भँसिआएल। आ ने कहियो हमरा लोटनाक मथाहाथ देबाक गुणपर संदेहे भेल। हम की छेलौं? की छी? मोने जनैए। लोटना नि:संतान नै छला तैयो मुखबत्ती लगा कऽ बलानमे भँसौल गेला। सरकार नि:संतान छला मुदा संततिक हाथे वृषोत्सर्ग श्राद्ध भेलनि। मुदा हम?हम ‘शेफाली’ छी, की फुलपरासवाली? सम्पर्क- Dr K N Jha MBBS (Honors),MS Professor of Ophthalmology Mahatma Gandhi Medical College & Research Institute Pillaiyarkuppam, Pondicherry- 607402 ( India)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदानन्द झा ‘मनु’ मैथिलीमे एकरूपताक अभाब “कोस-कोसपर बदले पानी, तीन कोसपर बदले वाणी।” ई कथ्य किनकर अछि, हम नहि जानि मुदा अछि जग जाहिर। कोनो एहन सुधी मनुख नहि जे एहि पाँतिसँ अनभिक होथि। आ ई कथ्य सोलह आना सत्य अछि। एक गामसँ दोसर गामक इनार पोखरिक पानिमे अन्तर आबि जाइ छैक। ओना आब इनारक जमाना तँ रहल नहि। गामक घरे-घर चापा कऽल चलि गेलै आ शहरक घरे-घर टंकी। टंकीक पानिमे तँ कनिक समानता देखलो जा सकैत अछि मुदा एक आँगनक चापा कऽलक पानिक स्वाद दोसर आँगनक चापा कऽलसँ भिन्न होएत। परञ्च हम एहिठाम पानिक संदर्भमे गप्प नहि कहि कऽ भाषाक पक्षक मादे कहै चाहैत छी। पानि जकाँ भाषाक मिजाद सेहो सगरो तीन चारि कोसपर बदलल देखाइत छैक। ई असमानता मिथिले-मैथिलीमे नहि भऽ कँ कमबेसी सम्पूर्ण भारतीय वा अभारतीय भाषामे देखार भऽ चुकल अछि आ ओ गुण कोनो भाषाक विकास आ ओकर उन्नतिक पक्षक धियान राखि ठीके अछि। पानिक मादे जेना कोनो नदी हेतु ओहिमे बहाब भेनाइ स्वभाविक छैक नहि तँ ओ नदीसँ डबरा भऽ जेतैक। तेनाहिते कोनो भाषाक चहुमुखी विकास लेल ओहिमे निरन्तर बहाब, अर्थात नव-नव शव्दक वृद्धि, आन-आन भाषाक सटीक आ प्रचलित शव्दकेँ स्वीकार केनाइ आवश्यक छैक। आ दुनियाँक ओ कोनो भाषा जे अपना आपके एकटा बहुत पैघ रुपे स्थापित केलक, ओकर विकासक इहे अबधारना वा गुणक कारने संभब भेल अछि। हमरा इआद अछि जखन अंग्रेगीक प्रथम शव्दकोष बनल रहैक तँ ओहिमे मात्र एक हजार शव्दकेँ जगह भेटल रहैक आ आइ..... ? मुदा मैथिलीक संगे, ई गुण किछु बेसीए अछि। किएक तँ मैथिल किछु बेसीए बुद्धिजीवी, शिक्षित आ चलएमान छथि। जतए-जतए गेला अपना भाषाकेँ अपना संगे नेने गेला आ ओतुका भाषाक शव्दकेँ अपना संगे जोड़ने गेला। ओनाहितो अपन मिथिलांचलक प्रतेक दू तीन कोसक बादक भाषामे भिन्नता अछि। पछिमाहा मैथिली पुरबाहा मैथिली, दछिनाहा मैथिली उत्तर भरक मैथिली, कमला कातक मैथिली, कोसी कातक मैथिली। एक्के गाममे बड्डकाक मैथिली, छोटकाक मैथिली। नीक गामक मैथिली तँ बेजए गामक मैथिली। शिक्षित मैथिली तँ अशिक्षित मैथिली। आमिरक मैथिली तँ गरीबक मैथिली। एक्के बेर एतेक बेसी असमानता भऽ गेल अछि जे कतेक ठाम तँ मैथिली नहि कहि कऽ दोसर नामसँ संबोधन भँ रहल अछि। अपन जाहि गुणक कारण दुनियाँक कोनो दोसर भाषा विकासक रस्तापर चलि रहल अछि, ओतए हमर सबहक मैथिली एहि क्रममे पछुआ रहल अछि। एकर की कारण ? तँ उत्तरमे हमरा मैथिलीक एकटा लोकोक्ति इआद आबि रहल अछि। “जे बड्ड होशियार से तीन ठाम गूँह मखे।” एहि लोकोक्तिकेँ कनी फरिछादी; एकटा पढ़ल लिखल विद्वान् गूँह मँखि गेला, आब ओ एहि गप्पक खोजमे लागि गेला जे, जे मखलौं से गूँहे अछि वा किछु आरो। एहि क्रममे ओ पएरक गूँहकेँ अपन हाथक आंगुरसँ छुला बाद नाकसँ सुंघला। लगलनि ने तीन ठाम, पएरमे, हाथक आंगुरमे, अन्तोगत्बा नाकमे। ओतए एकटा दोसर व्यक्ति बेसी खोज बिन नहि कऽ मखला बाद पेएरकेँ पानिसँ धो लेलक। “अति सर्वत्र वर्जिते,” इहे रोग मैथिली भाषाक विकासमे लागि गेल अछि। जाहि गुणक कारणे हम आगू बढ़ि सकैत छलहुँ, अपन ओहि गुणकेँ कारण ठमैक गेल छी। एहि गुण, अतिसय गुण वा कही तँ अबगुनकेँ हम समान्य लोककेँ लेल जेनाकेँ तेना छोरिदी, विकासक क्रममे समयक संगे मानिली जे ओ अपने ठीक भए जेतैक। मुदा जे अपनाकेँ बुद्धिजीवी कहैत छथि, शिक्षित आ मैथिली विकासक ठेकेदार अपनाकेँ मानैत छथि तिनका सभकेँ तँ कदापि नहि छोरल जए आ हुनके सबहक एकरूपताक अभाबे मैथिलीक गति अबरुद्ध भेल अछि। एकटा समान्य लोक ककरा देखत, पढ़त ? एकगोट बुद्धिजीवीकेँ, साहित्यकारकेँ, पत्र-पत्रिकाकेँ, ऑडियो-विडिओ मिडियाकेँ मुदा एखुनका समयमे मैथिली भाषाक एकरूपतामे कतौ समानता नहि अछि। एहिठाम हम समान्य लोकक गप्प नै कहि रहल छी, पढ़ल-लिखल, मैथिलीमे ऑनर्स, एमए०, पिएचडी करै बलाक गप्प कए रहल छी। जिनक सबहक कतेको मैथिली पोथी छपा कऽ समान्य लोकक हाथमे आबि गेल अछि, मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक सम्पादक आ सम्पादक मण्डलीक गप्प कए रहल छी। कतेको मैथिलीक पुस्तक छापि चुकल प्रकाशकक गप्प कए रहल छी। ऑडियो-विडिओ बेच कऽ अपन कमाइ करै बला चैनल आ म्यूजिक विडिओज कम्पनीक गप्प कए रहल छी। सदति भाषाक एकरुपताक अभाब अछि। कनिक काल लेल किनको अज्ञान मानि कए क्षमा कएल जा सकैत अछि मुदा ओहि खन कि कएल जे जखन कियो गोटा अपनाकेँ मुख्य सम्पादक, सम्पादक, मैथिलीक ऑनर्स, एमए पिएचडीक चश्मा पहिरने, ओहि घोड़ा जकाँ लगैत अछि, जेकरा आँखिपर हरियर पट्टी बान्हल छैक आ ओकरा सगरो दुनियाँमे हरियरे-हरियर नजरि अबैत छैक। ई बिडम्बना मैथिलीए संगे किएक ? जीवन भरि अपन घर-परिवारमे मैथिली नहि बजै बला मैथिलीक ठीकेदार बनि जाइत छैक किएक ? एहिठाम हम विदेह ग्रुपक प्रसंशा करैत छी जे ओ अन्तर्जाल आ प्रिन्ट दुनू रूपे मैथिली भाषाक समृधि आ एकरूपता लेल कोइला प्रयासमे लागल छथि। कतेको प्रकाशकक पोथी, कतेको लेखक आ साहित्यकारक कृति, कतेको पत्र-पत्रिका, फलाँ फलाँ मैथिली एकादमीक पोथी आ पत्रिका हमरा लग अछि जाहिमे विभक्ति केर प्रयोग हिन्दीक तर्जपर कएल गेल अछि। कतेक मैथिलीक महान-महान विभूतिसँ हम व्यक्तिगत रुपे संपर्क कए हुनका सभसँ निवेदन केलहुँ जे, मैथिलीमे विभक्तिकेँ सटा कए लिखबा चाही मुदा नहि, ओहे आँखिपर पट्टी बान्हल घोड़ा बला हिसाब। एकटा मुख्य-सम्पादक, सम्पादक, ऑनर्स, एमए, पिएचडी, केनहार अपनाकेँ मैथिलीक ठीकेदार बुझनाहर, दोसर लोकक गप्प कोना मानि लेता। लागल छथि सभकेँ सभ मैथिलीकेँ हिंदी टच देबैमे। जीवन होए वा साहित्य ई गप्प मानै बला छैक जे लोक गल्तीए कए कऽ आगू बढ़ैत छैक। मुदा ओइ लोक आ संस्थाक कि जे गल्तीओ करत, गल्तीकेँ मानबो नहि करत, आ बाजु तँ लड़बो करत, ई तँ ओहे गप्प भेल जकर लाठी तकरे भैंस मुदा एहिठाम गप्प भैंसक नहि छैक, एहिठाम गप्प एकटा प्राचीन, समृद्ध आ श्रेष्ठ भाषाक भविष्य आ एकरूपताक छैक। दुनियाँक सभ समृद्ध भाषामे एना देखल गेलैए जे आम बोलचाल आ साहित्य, शिक्षा वा सार्वजनिक भाषामे भेद पाएल जाइत छैक। आम बोलचाल आ प्रचलनमे बहुत सगरो छूट छैक वा बन्हँन केर आभाव छैक मुदा साहित्य, शिक्षा आ सार्वजानिक मंच हेतु ओहि भाषाक एकटा मानक रूपक प्रयोग कएल जाइत छैक। एहि तरहक अभाब मैथिलीक संगे किएक ? मैथिली साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक मैथिलीक मानक रूपक प्रयोग किएक नहि करैत छथि। कतेको जन्मान्हर(ज्ञान रुपे) तँ सिखैक डरे एक्के बेर कहता, “चलू चलू अहाँ फलाँ-फलाँ ग्रुपसँ जुड़ल छी ई ओकर सबहक चर्च छै।“ यौ महराज ई चर्च अहाँ लगकेँ अनलक ई नहि देखि, ई देखू जे की अनलक। कनिक देखैक अपन नजरि बदलि लिअ तँ अहूँक विकास आ संगे संग भाषाक विकासक सेहो सम्भावना मुदा नहि हमर एकटा आँखि फूटेए तँ फूटेए तोहर दुनू फोरबौ। आ एहि फोरा फोरीमे ई किनको चिंता नहि जे ओहि माए बाबूक कि हाल जिनक करेजाक टुकरा अपन दुनू छी। मैथिलीमे एकरूपताक अभाब, इस्थीति, कारण आ निदानपर चर्चा करी तँ एकटा बेस मोटगर किताब बनि जाएत मुदा मैथिलीक अबरुद्ध विकास हेतु हमरा सभकेँ अपन अपन आँखि नै मुनि एहि चर्चाकेँ आगू बढ़ाबए परत। आ अति शीर्घ मैथिलीक वर्तमान पत्र-पत्रिकाक सम्पादक, प्रकाशक, साहित्यकार, लेखक आर कोनो सार्वजानिक मंचकेँ देखनिहार लोकनि सभकेँ मानक मैथिलीकेँ स्वीकार कए ओकरा आगू आनए परत नहि तँ ओ दिन दूर नहि जहिया हमर सबहक धिया पूरा एकरा इतिहासक पोथीमे पढ़त। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार व्यंग्य निबंध लास्ट टाइम सजेशन हम कोनो नौकरीमे सफल नै भऽ सकलहुँ। कारण ई नै छल जे हम काज नै करिऐ तैमे बस आठ घंटाक सुतबाक आदति छल तँए। बिजनेसो नै कऽ सकलिऐ कारण हेड़ा-फेरीमे हम माँजल लोक आ हम ओहूमे हेड़ा-फेड़ी करऽ लगलहुँ तँए ओहो असफल भेल। अंतमे हारि कऽ हम कुंजी लिखऽ बला बनि गेलहुँ। ने पूँजी लागल आ ने किछु सोलहो आना हेडा-फेरी। मोन बड़ लागल हमर ऐमे। हमर दिनानुदिन तरक्की भेल ऐ क्षेत्रमे जकर फलस्वरूप हम महान कंजीकार बनि गेलहुँ। प्रस्तुत अछि हमर एकटा कुंजी--- प्रिय विद्यार्थी गण, हम अपने लोकनिक समक्ष ई लास्ट टाइम सजेशन राखि रहल छी। आशा अछि जे ऐसँ अहाँ सभकेँ लाभे-लाभ भेटत। ओना हम पाठ्यपुस्तक सेहो लीखि सकैत छलहुँ मुदा नै लिखलहुँ कारण जे बिकाइत नै अछि किएक तँ अहाँ सभ खाली सजेशने केर माँग करैत छिऐ। तँइ हम अपने लोकनिक सामने ई प्रस्तुत कएल। बंधुगण ऐ सजेशनमे मात्र बीस गोट प्रश्न उत्तर सहित अछि। एकर अध्ययन केलासँ पास करबे टा करब से हमर गारंटी अछि। डीवीजन एनाइ कोनो आवश्यक नै संगहि संग हम ईहो कहब जे ई सजेशन कोर्से नै व्यावहारिक जीवनमे सेहो काज देत। तँ आउ अध्ययन करी ऐ लास्ट टाइम सजेशन केर। इति शुभम 1) नेताक परिभाषा दिअ- नेता ओहन लोककेँ कहल जाइत छै जे लेबा बेरमे सभसँ आगू आ देबा बेरमे सभसँ पाछू रहैत अछि। 2) नेता आ जनताक बीच केहन संबंध छै- जेना पानिमे तेल घोरल हो। दूनू एकैठाँ देखाएत मुदा दूनूक अलग-अलग अस्तित्व। 3) ठेकेदारपर संक्षिप्त टिप्पणी दिअ- कोनो बनैत चीजक नेओं कमजोर कऽ जे अपन नेओं मजगूत करथि से ठेकेदार कहाबथि छथि। 4) डाक्टर के छथि- डाक्टर ओ लोक छथि जे बेमारीकेँ तेना ने हटाबथि जे आदमी संसारिक आवागमनसँ मुक्त भऽ जाए। वस्तुतः डाक्टर महान योगी होइत छथि जे की साधारण साधककेँ सोझें मोक्षक बाट बतबैत छथि। 5) उच्च अधिकारीक दू काजक वर्ण करू- a) ओ घूस लै छथि, b) स्वंय नियम बना तोड़ै छथि। 6) पुलिसक दू काजक वर्णन करू- a) ओ अपराधी आ दुष्टक रक्षा करै छथि, b) फुसिक सबूतसँ निर्दोषकेँ फँसबै छथि। 7) बेसबाक परिभाषा प्रस्तुत करू- बेसबा ओ नै जे पेटक भूख लेल देह बेचैत हो। बेसबा तँ ओ अछि जे बेसी पाइ लेल देह बेचैत अछि। 8) जनताक संक्षिप्त काजक वर्णन करू- a) ओ पाइ लऽ कऽ भोट खसबैत छथि, b) अपन अधिकारक प्रति निष्चेष्ट रहि आनक अधिकारक उपभोग करै छथि। 9) हीरो किनका कहि सकैत छिअनि- हीरो ओ छथि जे की फिल्ममे दुष्टक संहार करै छथि मुदा असल जीवनमे ओकरा संग दोस्ती रखने रहै छथि। 10) मनुख आ कूकूरमे की अंतर- अंतर अतबए जे मनुख स्वर्थक पूर्ति लेल अपन माए सेहो बेचि सकैए मुदा कूकूरसँ से संभव नै। 11) सज्जनक दू टा लक्षण प्रस्तुत करू- a) ओ एकौट होथि, b) समाज हुनका बताह कहैत होइन। 12) पुजारी किनका कहि सकैत छिअनि- पुजारी ओ छथि जे मंत्रक सस्वर पाठ करैत स्वार्थक मानसिक पाठ करैत होथि। 13) संन्यासीक दू टा लक्षण प्रस्तुत करू- a) संन्यासी मठ आ कामिनी लेल बंदूको निकालि सकै छथि, b) अपने ज्ञान होइन की नै होइन मुदा अपना नामक आगू जगतगुरू लगबैत छथि। 14) साहित्यकार के छथि- साहित्यकार ओहन लोककेँ कहल जाइत छै जे की टका ओ पुरस्कारक लेल वाग्विलास करै छथि। जे खाली अपने लिखलकेँ पढ़ि-पढ़ि कऽ अनका सुनाबथि आ अनकर लिखलकेँ पढ़बे नै करथि तिनको साहित्यकार कहल जाइत छै। ओना संसारमे किछु एहनो साहित्यकारक प्रजाति अछि जे अपने आगू बढ़बाक लेल अपस्याँत रहत मुदा सदिखन दोसरकेँ छिटकी मारि कऽ। 15) जनपथ आ राजपथमे की अंतर छै- जै बाटपर गरीब चलै छै तकरा जनपथ आ पाइ बला लोकक बटाकेँ राजपथ कहल जाइत छै। 16) ओकील के छथि- ओकील हुनका मानल जाए जे टका लऽ कऽ एक आदमीक माध्यमें दोसर आदमीक छातीमे कील ठोकै छथि। 17) न्यायाधीश हेबाक मापदंड की अछि- जे न्यायपर आधीश भऽ ओकरा अपना इच्छे मोड़ि सकए से न्यायधीश भऽ सकै छथि। 18) की बेपारीके बेपार विशेषज्ञ बूझल जाए- बुझि सकै छी कारण हुनकर पार पेनाइ सभसँ संभव नै। 19) गुरू आ शिक्षकमे की अंतर थिक- गुरू ज्ञान दऽ कऽ बौआ दै छथि आ शिक्षक बिना ज्ञान देने। 20) विद्यार्थी के थिकाह- ओ बालक जे अनर्थसँ अर्थ आनि धर्म, काम ओ मोक्षक प्राप्ति करै छथि से विद्यार्थी भेला। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नन्द विलास राय :: दिव्या निर्मली टीशनक पाछू, रेलबे परिसरेमे गुरु-चेलाक खेल भऽ रहल छल। गुरू लूंगी आ झोलंगा जकाँ कुरता पहिरि हाथमे डमरू नेने छला। लगभग दस बर्खक बालक चेला छल। ओकर समुच्चा देह कपड़ासँ झाँपल छल। चारू दिससँ लोक ठाढ़ भऽ खेलक मजा लेबए लेल तैयार छल। गुरु डमरू बजा चेलासँ पुछलखिन- “बोल चेला की हाल-चाल छौ?” चेला जवाब देलक- “गुरुजी, हमर हाल-चाल एकदम टनाटन अछि। अहाँ अपन कहू।” गुरु कहलखिन- “हमहूँ ठीक छी। अच्छा ई बता अखनि तों छेँ केतए।” चेला बाजल- “अखनि हम बरही गाममे छी।” गुरु- “ई बरही गाम केतए छै?” चेला- “बरही गाम नेपाल अधिराज्यक सप्तरी जिलामे पड़ै छै। राजविराजसँ लगधग तीन किलोमीटर दछिन। बरही गामसँ उत्तर पछिमी कोसी नहर छै।” गुरु- “अच्छा ई बता ओतए की कऽ रहल छेँ।” चेला- “विदेह इन्टरनेट पत्रिकामे खबरि जुटाबक समदियाक काज करए लगलौं हेन। नेपालक दौरापर छी।” गुरु- “तँ बरही गाममे एहेन काेन घटना भेलै जे तों बरही गाममे छेँ।” चेला- “घटना अथवा दुघर्टना तँ नै भेलै मुदा एकटा नव चीज जरूर भेलै।” गुरु- “काेन नव चीज भेलै हेन, कनी फरिछा कऽ बाज।” चेला- “बरही गाम सप्तरी जिलाक सदरमुकाम राजविराज बजारक लग रहितो मुख्य रूपसँ किसानक गाम छी। पश्चिमी कोसी नहरिसँ दछिन छै। सिचाईक भरपुर साधन रहैक कारण गरमा धान आ अगहनी धानक उपज बड़ नीक होइ छै।” गुरु- “कोन खेती गिरहस्तीक गप शुरू कऽ देलँह। नव बात जे भेलै से बाज ने।” चेला- “हम सभ गप फरिछा कऽ कहै छी। अहाँ धैर्यसँ सुनू। बरही गाममे रूपलाल नामक एकटा किसान छथि। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी छन्हि। बेटाक नाओं विवेक अछि। आे विराटनगर अस्पतालमे पेथोलौजिष्ट छथि। अपन प्राइवेट जाँच-घर सेहो रखने छथि। रूपलालक बेटी दिव्या बी.ए. पास कऽ राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन।” गुरु- “कोन आहे-माहेक कथा पसारि देलँह से नै जानि। हम कहै छियौ नव बात बता।” चेला- “एतएसँ शुरू होइत अछि नव बात। अखनि हम नव बात जे भेल तेकर पृष्ठभूमिमे चलि रहल छी। अहाँ कनी धैर्यसँ सुनियौ।” गुरु- “अच्छा बता। आब हम बीचमे नै टोकबौ।” चेला- “हँ तँ हम कहैत रही जे रूपलालक बेटी जेकर नाओं दिव्या छी, राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन। साल भरि पहिने दिव्याक बिआहक बात-चीज ठील्ला गामक रामअवतारक बेटाक संग चलल। रामअवतारक बेटा अनिल भोपालमे इंजीनियरिंग कऽ पढ़ाइ कऽ रहल छला। दस लाख नेपाली टकामे बात पक्का भऽ गेल छल। दुनू दिससँ छेका-छुकी सेहो भऽ गेलै। छह महिना पहिने अनिल इंजीनियरिंगक डिग्री लऽ भोपालसँ नेपाल आएल। दूर संचार विभागमे भैकेन्सी भेल। ओहो आवेदन देलक। अनिलक पिताजी रामअवतार तेज आदमी अछि। ओ दौग-धूप केलक। चारि लाख टका घूस मांगलकै। रामअवतार दौगल बरही आएल। रूपलालकेँ कहलखिन- अहाँ जमाएकेँ नौकरी भऽ रहल अछि। चारि लाख टका घूस लगै छै। अहाँ दस लाख टका जे बिआहमे देब तइमे सँ चारि लाख टका अखनि दऽ दिअ। बाँकी छह लाख टका बिआहसँ दस दिन पहिने दऽ देब। जमाएकेँ नोकरी भऽ जाएत तँ बेटी रानी भऽ कऽ रहत। रूपलाल विवेककेँ फोनपर सभ बात बतौलखिन। विवेक कहलकनि, ठीक छै, अहाँ रामअवतार बाबूकेँ विराटनगर भेज दियौ। हम चारि लाख टका दऽ देबनि। रामअवतार विराटनगर जा विवेकसँ चालि लाख टका आनि बेटाकेँ संग कऽ काठमाडू गेला। घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी लगौलनि। गुरु बजला- “अच्छा, ई बता दिव्याक बिआह रामअवतारक बेटा अनिलसँ भऽ गेल ने।” चेला- “असलका गप तँ आब सुनाबै छी। कनी धियानसँ सुनियौ ने। आइसँ दस दिन पहिने रूपलाल अपना भातीजकेँ संग कऽ ठील्ला पहुँचला। रामअवतारकेँ बिआहक दिन पक्का करैले कहलखिन। ओ तीनटा दिनक प्रस्ताव रामअवतार लग रखलनि। आ कहलखिन अही तीनू दिनमे जे दिन अहाँकेँ सहुलियत हुअए से दिन तँइ करि लिअ। ढौआ जे बाँकी अछि ओ नगद लेब आकि चेक, सेहो कहि दिअ।” रामअवतार कहलखिन- “यौ रूपलाल बाबू, हमरा बेटाक भठियन गामबला पनरह लाख टका नगद, एकटा पल्शर मोटर साइकिल आ पाँच भरि सुन दऽ रहल अछि। अहाँक बेटीसँ हमरा बेटाक बिआहक गप पक्का अछि। अहाँ अनिलक नोकरी लेल चािर टका देने छी। तँए अहाँसँ मात्र पनरह लाख टकेटा लेब। गाड़ी आ सुन छोड़ि देब। जँ अहाँ पनरह लाख टकापर बिआह करैले तैयार छी, तँ फागुन दस गतेक दिन पक्का भेल। हमरा नगद टका दी अथवा चेक दी, हम सभमे तैयार छी। अहांकेँ जइमे सुविधा हुअए से करब।” तैपर रूपलाल बजला- “अहाँसँ तँ हमरा दसे लाखपर बात भेल अछि। आब अहाँ मन नै बढ़ाउ। हम बँकियौता छह लाख टकाक चेक भातीज मार्फत भेज देब।” रूपलालक गप सुनि रामअवतार तैशमे बजला- “जँ हमरा बेटाक संग अहाँकेँ अपना बेटीक बिआह करबाक अछि तँ मोल-मोलाइ छोड़ू आ पनरह लाख टकामे बात पक्का करि तीन दिनक भीतर बाँकी एबारह लाख टका पहुँचाउ। नै तँ कुटुमैती नै हएत। अहाँ चारि लाख टका हम अगिला महिनामे आपस कऽ देब।” आब तँ रूपलाल झमा गेला। आँखिक आगू अन्हार पसरि गेलनि। किछु फुड़बे ने करनि। गुरु फेर टोकलखिन- “अँइ रौ चेला, ई रामअवतार तँ बड़ नीच आदमी बुझाइत अछि।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा कह, आगू की भेलै।” चेला कहए लगल- “कनीकालक बाद रूपलाल अपनाकेँ सम्हारैत बजला, ठीक छै हम गाम जाइ छी। बेटासँ विचार करब। ओ जे कहत सएह करब।” रूपलाल आपस गाम आबि गेला। मुँहक उदासी देखि हुनकर पत्नी बूझि गेली जे शाइत दिन पक्का नै भेल। कोनो झंझट लगि गेल। दिव्या राजविराजसँ पढ़ि कऽ आपस नै आएल छेली। रूपलाल सभ बात पत्नीकेँ बतौलखिन। पत्नी कहलकनि, विवेकसँ फोनपर गप करू। तैपर रूपलाल बजला, अखनि तँ ओ क्लिनिकपर हएत रातिमे निचेनसँ गप करब। रूपलाल दुनू परानी रातिमे खेबो ने केलनि। रातिमे रूपलाल मोबाइलपर विवेकसँ गप करए लगला। गप करिते-करिते ओ कानए लगला। जखनि ओ बेटासँ मोबाइलपर गप करै छला, तखनि दिव्या अपना कोठरीमे पढ़ै छेली। कोनो गपक पता नै छेलनि। जखनि पिताजीकेँ कानब सुनली तखिन कान पाथि कऽ सभ गप सुनए लगली। सभ गपक थाह लगि गेलनि जे पिताजी फोनपर किए कनै छथि। दिव्याकेँ भरि राति नीन नै भेलै। ओ भरि राति सोचिते रहली। रामअवतार केते नीच आ कमीना अछि। चारि लाख टका हमरे बाबूजी सँ लऽ घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी दियौलक। आइ बेटा नौकरी करए लगलनि तँ मन बढ़ि गेलनि। पाँच लाख टका बेसी कऽ हमरा बाबूजी सँ मंगै छथिन। एहेन नीच आ लोभी मनुखक बेटासँ हम अपन बिआह किन्नौं ने करब, चाहे जिनगी भरि कुमारिए किए ने रहि जाइ। गुरु फेर बजला- “वाह! वाह! दिव्या बड़ नीक बात सोचलक।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा सुना।” चेला कहए लगल- “विवेक फोनपर पिताजीकेँ कहलकनि, बाबू अहाँ जुनि कानू। हमरा एकेटा बहिन अछि दिव्या। अहाँक पएरक कृपासँ हम चारि-पाँच हजार टका डेली कमाइ छी। की करबै रामअवतार बाबूकेँ लोभ भऽ गेलनि। हम पाँच लाख टका आरो देबै। अहाँ शुक्र दिन रामअवतार बाबूकेँ बरही बजा लियौ। हम नगद एगारह लाख गिन देबै। चारि लाख तँ देनैहिए छियनि। शुक्र दिन साँझ धरि हमहूँ गाम पहुँच जाएब।” शुक्र दिन साँझमे रामअवतार बरही पहुँचला। सोचने रहथि जे नगद ढौआ देता तँ राजेविराज नेपाल बैंक लिमिटेडमे ड्राफ्ट बनबा लेब। नगद ढौआ लऽ जाइमे खतरा अछि। साँझमे विवेको गाम पहुँचला। खेनाइमे रामअवतारकेँ खूब सुआगत भेलनि। तरूआ, भुजुआक अलाबे खस्सीक मासु सेहो रहए। मुदा दिव्या एकदम गुमशुम। शनि दिन दस बजे रामअवतारकेँ पराठा आ अल्लुक भुजिया, हलुआ, सेबैक खीर आ रसगुल्लाक जलखै खुआएल गेल। जलखै करा एकटा कोठरीमे विवेक, रामअवतार आ रूपलाल बैसला। विवेक पुछलकनि- “ढौआ केना लऽ जेबै?” तैपर रामअवतार कहलखिन- “ढौआ दऽ दिअ आ अहाँ चलू राजविराज, नेपाल बैंकमे ड्राफ बनबा देब।” तैपर विवेक बजला- “आइ तँ शनि छी। छुट्टीक दिन छी। बैंक बन्न हएत।” रामअवतार बजला- “अच्छा अहाँ टका गिन कऽ दिअ। हम समधीकेँ संग कऽ ठील्ला चल जाएब। दू गोटे रहब तँ डर कम रहत।” विवेक आलमारी खोलि रूपैआ निकालि गिन कऽ रामअवतारकेँ देबए लगला आकि हहाएल-फुहाएल दिव्या पहुँच कऽ बजली- “रूकू भैया, रूकू। रूपैआ राखू। हम एहेन लोभी आ कमीना आदमीक बेटासँ अपन बिआह किन्नौं नै करब। चाहे जिनगी भरि कुमारि किएक ने रहि जाइ।” दिव्याक गप सुनि, सभ कियो अवाक् भऽ गेल। विवेक आ रूपलाल समझाबैक परियास केलनि तँ दिव्या अपना हाथमे एकटा शीशी देखबैत कहलकनि- “ऐ शीशीमे जहर छी। जँ अहाँ सभ जिद्द करब तँ हम जहर पीब लेब।” रामअवतार बाबू दिस घूमि बजली- “सुनू रामअवतार बाबू, अहाँ हमरा बाबूजीसँ चारि लाख टका लऽ गेल छी। जाबे धरि चारि लाख टका आपस नै करब अहाँ बरहीसँ आपस ठील्ला नै जा सकै छी।” गुरु डमरू बजबैत नाचए लगला। थोड़े काल नाचि बजला- “बड़ नीक बड़ सुन्नर। दिव्याकेँ बहुत-बहुत धैनवाद।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- गजल ३.२.बृषेश चन्द्र लाल ३.३.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.४.अशरफ राईन- कता आ गजल आशीष अनचिन्हार गजल हमरा शराब चाही मुदा आँखिसँ कनियें हिसाब चाही मुदा आँखिसँ गेंदा बहुत चमेली बहुत हमरा लग तैयो गुलाब चाही मुदा आँखिसँ बाजल बिला कऽ चलि जाइ छै अन्तह तँइ सभ जबाब चाही मुदा आँखिसँ मानल गजल पसरि गेल छै तैयो गजलक किताब चाही मुदा आँखिसँ हारल छलहुँ तँए मानि लेबै सभ हमरा हियाब चाही मुदा आँखिसँ सभ पाँतिमे 2212+122+1222मात्राक्रम अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बृषेश चन्द्र लाल चारुभर पसरल अछि नभक स्नेह श्वेत पुष्प-रेणु लजाएलि धरती ओढ़ि लेलकि निर्मल चादरि । स्पर्श शीत तैयो गरमा दैत छैक बसन्त अछि लग से बता दैत छैक ! जिनगीमे पहिल बेर हिमपात देखल, छुअल आ' भोगल । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कुन्दन कुमार कर्ण गजल की जिनगीमे आउ की दूर जाउ बिनु मतलबकेँ राति दिन नै सताउ बोली मिठगर सन अहाँ बाजि फेर हमरा प्रेमक जालमे नै फँसाउ आगूमे देखाक मुस्की अपार पाछूमे सदिखन छुरा नै चलाउ सुच्चा अछि जँ प्रेम साँचे अहाँक सब किछु बुझि हमरे हियामे सजाउ राखू नित कुन्दन जँका शुद्ध मोन बस झूठक कखनो हँसी नै हँसाउ मात्राक्रम : 2222-21-221-21 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अशरफ राईन , सिनुरजोडा ,धनुषा , नेपाल , हाल :कतार कता हमरा लग मोह्बतक हुनर नै छल तइसँ प्रेमक बाजी हारि गेलौं हमरासँ बेसी पैसासँ प्रेम छलै ताइसँ जिते जिन्दगी मारि गेलौं
आजाद गजल १ छी हम लचार कपार हमर छै फुटल जबानी भेल जियान जीवन बिदेश मे लुटल पैसा ओर धियान देने मुसीबत सँ लडैत सपना देखल सब चुर -चुर भऽ कऽ टुटल सपना छल स्वर्ग नियन अपन देश सजायब मुदा जनता सब छल चित भऽ कऽ सुतल आस छल बनत ऐ बेर नया सम्बिधान चोर नेता देश फोड़ऽ लेल कुता नियन छल भुखल अपन देश मे रहि कऽ चलत नै जीवनक गुजारा तइसँ बिबश भऽ कऽ छी हम बिदेश मे रुकल २ मरुभूमिक पीड़ा कहिया तक सहब जिबन नर्क बनौने कहिया तक रहब अपन देशक कोसी कमला छोडिकऽ बिदेशक समुन्द्र मे कहिया तक बहब गामक हरयाली आ माटिक सुगन्ध बिसरि कऽ रेगिस्तानकेँ हरा भरा कहिया तक करब गाउ घरक साथी-सङ मोज्-मस्ती छोडिकऽ खाडी देशक रिङ्ग रोड मे कहिया तक चलब मनमे स्नेह अछि मुदा देहो अछि थाकल देश प्रेममे ऐ ठाम कहिया तक मरब ३ छोड़ि कऽ अपन देश एतेक दुर एलौं माइ-बाबूक मायासँ मुँह मोड़ि लेलौं रहिकऽ दु चाइर साल अपन देश सँ दूर केहन अभागल अपन मातृभाषा बिसरि गेलौं सपना सकार होबाक पछाडी दौडैत दौडैत प्रीतमक प्रेम भुला कऽ केहन कठोर भेलौं की छै सुख दुख जीवनमे अबिते रहै छै तैयो दिन राति परिश्रम कऽ के भोर केलौं ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृतेआशीष अनचिन्हार बाल कविता पहिने कहि दै छियौ घुमबे करबौ गाछी गाछी करबे करबौ मारी मारी आ घरो एबौ घुमि घुमि कऽ पहिने कहि दै छियौ पेट खराप हेतै तँ हेतै पेंट खराप हेतै तँ हेतै भुज्जा खेबौ भुजि भुजि कऽ पहिने कहि दै छियौ केकरो हेतै की नै हेतै भैया खेतै की नै खेतै तरुआ खेबौ तरि तरि कऽ पहिने कहि दै छियौ चाहे किताब दे नै दे चाहे पैसा दे नै दे बड़का बनबौ पढ़ि पढ़ि कऽ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 22 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १६७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA