ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६८ म अंक १५ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६८) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.दुर्गानन्द मण्डल- छुतहरि २.२.कपिलेश्वर राउत-बड़का खीरा २.३.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य निबंध- निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष २.४.ओम प्रकाश झा- बेटीक बिआह ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार ३.२.बिन्देश्वर ठाकुर ३.३.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.४.१.इरा मल्लिक २.अशरफ राईन ४.बालानां कृते-१,कुन्दन कुमार कर्ण- बाल गजल २.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html संपादकीय १ चारिटा उत्तर आधुनिक नाटक: सैमुअल बैकेटक फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” ....................................... "वेटिंग फॉर गोडो” दू अंकीय ट्रेजी-कॉमेडी अछि। सैमुअल बैकेट द्वारा ई 1952 ई. मे फ्रेंच भाषामे लिखल गेल आ एकर पहिल प्रदर्शन पेरिसमे 1953 ई. मे भेल। एकर अंग्रेजी संस्करणक प्रदर्शन लंदनमे 1955 ई. मे भेल आ अंग्रेजी संस्करण 1956 ई. मे प्रकाशित भेल। हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी” कैम्ब्रिजमे 1958 ई. मे मंचित भेल आ 1960 ई. मे प्रकाशित भेल। बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” 1962 ई. मे लिखल गेल आ ई 1965 ई. मे कलकत्तामे मंचित भेल। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क “नो एण्ट्री: मा प्रविश” 2008 ई. मे ई-प्रकाशित आ फेर ओही बर्ख प्रकाशित भेल। 19 फरबरी 2011 केँ कुणालक निर्देशनमे कालिदास रंगालय, पटनामे ई डेढ़ घण्टाक नाटक मंचित भेल। फ्रेंच, अंग्रेजी, बांग्ला आ मैथिलीक ई चारू नाटक पोस्ट-मॉडर्न नाटकक श्रेणीमे गानल जाइत अछि। जखन सैमुअल बैकेटक “वेटिंग फॉर गोडो” देखि कऽ लोक सभ घुरल रहथि तँ हुनका लोकनिकेँ एकटा विचित्र अनुभवसँ साक्षात्कार भेल छलन्हि। ऐ नाटकमे मात्र पाँचटा पात्र अछि- एस्ट्रागोन, व्लादीमीर, लकी,पोजो आ एकटा छौड़ा। एकटा कण्ट्री रोडपर साँझमे एकटा गाछ लग एस्ट्रागोन एकटा ढिमकापर बैसल अछि आ अपन जुत्ता दुनू हाथसँ निकालबाक प्रयास कऽ रहल अछि आ अपस्याँत अछि, आ थाकि जाइए। व्लादीमीर संगे ओकर गपक प्रारम्भ होइ छै, एम्हर ओम्हरक फुसियाँहीक नमगर गपशप होइ छै। पोजो आ लकी अबैए। पोजो बुझाइए मालिक अछि आ लकी दास। दासो तेहेन जकरा गर्दनिमे नमगर रस्सा पोजो लगेने अछि। पहिने लकी अबैए, फेर रस्सा पकड़ने पोजो। लकी बड़का बैग, एकटा फोल्डिंग स्टूल, एकटा पिकनिक बास्केट आ ग्रेटकोट उघने अछि। पोजो लग चाबुक छै। लकी आदेशपालक अछि। मालिकक गप मानि फेर सभ बोझ उठा कऽ ठाढ़ भऽ जाइए। एस्ट्रागोन आ व्लादीमीरकेँ ओकर बोझा उघनाइ नीक नै लगै छै। मुदा पोजो जखन कहै छै जे ओ ओहने छै तँ एस्ट्रागोन पोजोकेँ आततायी बुझै छै। एस्ट्रागोन लकीक नोर पोछैए तखन ओकरा लकी मुक्का मारै छै। पोजो कहै छै जे तोरा कहलियौ ने जे लकीकेँ अनचिन्हार लोक पसिन्न नै छै। आ एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर ओतऽ की कऽ रहल अछि? ओ दुनू गोटे कोनो गोडो नाम्ना व्यक्तिक बाट जोहि रहल अछि। पोजो आ लकी चलि जाइए। एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर लग एकटा छौड़ा अबै छै आ कहै छै जे गोडो आइ नै आबि सकता, काल्हि एता। फेर एम्हर-ओम्हरक फुसियाँहीक गपशप होइए आ ओहो छौड़ा चलि जाइए। तखने मंचपर सँ बिजली चलि जाइ छै आ फेर राति भऽ जाइ छै, चन्द्रमा उगल छै। व्लादीमीर आ एस्ट्रागोनक गपशप शुरू होइ छै। फुसियाँहीक गपमे किछु अर्थपूर्ण गपशप सेहो होइ छै। दुनू गोटे जेबाक निर्णय करै छथि मुदा हिलै नै छथि। पहिल अंकक पर्दा खसैए। दोसर अंक, वएह समए आ स्थान। व्लादीमीरकेँ सभ किछु मोन छै मुदा एस्ट्रागोन बिसरि गेल अछि। एस्ट्रागोन कहैए जे ओ सभ किछु तुरत्ते बिसरि जाइए बा कहियो नै बिसरैए। ओकरा किछु-किछु मोनो पड़ै छै। पोजो आ लकी अबैए। पोजो आन्हर भऽ गेल अछि, लकी ओहिना बोझा उघने अछि। रस्सा सेहो छै मुदा किछु छोट। पोजो आ लकी खसि पड़ैए। पोजो सहायता लेल कहैए मुदा एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर गपशप करैए। एस्ट्रागोन व्लादीमीरकेँ पहिल अंक जेकाँ “दीदी” कहैए। व्लादीमीर बाजैए जे “हमरा सभकेँ फुसियाँहीक गपशपमे समय नै बर्बाद करबाक चाही।” पोजोक“सहायता”क आर्तनाद नियत अंतरालपर बेर-बेर होइ छै। मुदा तइपर एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर ध्यान नै दैए। पोजो आब सहायता लेल सए फ्रैंक, फेर दू सए फ्रैंकक लालच दैए। व्लादीमीर ओकरा उठबैले जाइए, प्रयासमे अपनो खसि पड़ैए आ सहायताक पुकार करैए। फेर किछु गपशपक बाद व्लादीमीरकेँ उठेबाक प्रयासमे एस्ट्रागोन खसि पड़ैए। व्लादीमीर पोजोकेँ मारैए, पोजो घुसकुनिया दैए। तखन व्लादीमीर ओकरा ताकैए, कहैए- आबि जो, तोरा नोकसान नै पहुँचेबौ। एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर उठबाक प्रयास करबाक सोचैए आ उठि जाइए। एस्ट्रागोन कहैए- उठनाइ बच्चाक खेल सन हल्लुक अछि आ व्लादीमीर बजैए- ई मात्र आत्मशक्तिक प्रश्न अछि। पोजो सहायता लेल कहैए। दुनू पोजोकेँ उठबैए, फेर छोड़ैए, पोजो खसि पड़ैए। फेर दुनू ओकरा उठबैए आ पकड़ने रहैए। किछु कालमे कने छोड़ि कऽ जाँचैए मुदा जखन पोजो खसऽ लगैए तँ पकड़ि लैए। पोजो सेहो बुझा पड़ैए जे काल्हिक घटना बिसरल सन अछि। ओ कहैए जे ओ एक दिन सुति कऽ उठल तँ अपनाकेँ आन्हर पेलक, ओ कहैए जे ओकरा लगै छै जे ओ अखनो सुतले तँ नै अछि। ओ लकीक विषयमे पूछैए। लागैए जे कोना ओ दुनू खसल, से ओकरा मोन नै छै। पोजो कहैए जे लकीक गर्दनिक रस्साकेँ जोरसँ खीचू बा मुँहपर जूतासँ मारू तँ ओ उठि जाएत। व्लादीमीर एस्ट्रागोनकेँ कहैए जे ओकरा लेल बदला लेबाक नीक अवसर छै। एस्ट्रागोन पुछैए (ओकर स्मृति घुरै छै!) जे जँ लकी अपन रक्षा करए तखन? तइपर पोजो बाजैए जे लकी कखनो अपन रक्षा नै करैए। मुदा एस्ट्रागोन नै व्लादीमीर लकीकेँ पएरसँ मारऽ लगैए मुदा अपने ओकरा चोट लागि जाइ छै। घटनाक्रमसँ लगै छै जे पोजो आब अपनासँ ठाढ़ भऽ गेल अछि। पोजो जे लकीकेँ कोनो हाटमे बेचैले लऽ जा रहल अछि, केँ ने काल्हिक किछु मोन छै आ नहिये काल्हि आजुक किछु मोन रहतै। ओ लकीकेँ उठैले कहैए आ लकी उठि जाइए आ अपन बोझ उठा लैए। पोजो अपन चाबुक मांगैए। लकी सभ बोझ राखैए, आ चाबुक पोजोक हाथमे दऽ कऽ सभ बोझ उठा लैए। पोजो रस्सा मांगैए, लकी सभ बोझ राखि रस्सा पोजोकेँ पकड़ा कऽ सभ बोझ उठा लैए! लकी आ पोजो चलि जाइए। ओ छौंड़ा अबैए। ओ व्लादीमीरकेँ अल्बर्ट कहि सम्बोधित करैए। व्लादीमीर पुछै छै जे की ओ ओकरा नै चिन्हलक, की ओ काल्हि नै आएल छल। छौड़ा कहैए जे आइ ओ पहिल बेर आएल अछि। संदेश वएह छै, गोडो आइ नै आएत मुदा काल्हि अवश्य आएत। व्लादीमीर पुछैए जे“गोडो” करैए की? तँ छौड़ा कहैए जे गोडो किछु नै करैए। व्लादीमीर पुछैए जे छौड़ाक भाए केहन छै। तँ उत्तर भेटै छै , ओ दुखित छै। व्लादीमीर पुछैए जे की काल्हि ओकर भाए आएल छलै- तँ से छौड़ाकेँ नै बुझल छै। छौड़ा उत्तर दैत कहैए जे गोडोकेँ दाढ़ी छै आ ओ कारी नै गोर छै। छौड़ा (पहिल अंक जकाँ) पुछैए जे ओ गोडोकेँ की जा कऽ कहतै। व्लादीमीर कहैए- जा कऽ कहू जे तोरा हमरा सभसँ भेँट भेलौ। व्लादीमीर छौड़ापर छड़पैए मुदा ओ पड़ा जाइए। सूर्यास्त होइ छै। चन्द्रमा देखा पड़ै छै। एस्ट्रागोन कहैए जे जँ दुनू गोटे अलग भऽ जाए तँ ई दुनू लेल नीक हेतै। जँ काल्हि गोडो नै एतै तँ ओ दुनू गोटे रस्सासँ लटकि जाएत (व्लादीमीर कहैए) आ जँ एतै तँ बचि जाएत। व्लादीमीर लकीक हैटमे ताकैए, हिलबैए, फेर पहिरैए। दुनू जेबाक निर्णय करैए मुदा कियो नै हिलैए। पर्दा खसैत अछि। ............ हैरोल्ड पिंटरक तीन अंकीय नाटक छन्हि “द बर्थडे पार्टी”। पीटे, मेग, स्टैनले, लुलु, गोल्डबर्ग आ मैककान एकर पात्र छथि। पहिल अंक- मेग पीटेकेँ जलखै दैए, पुछैए जे स्टेनली उठलै आकि नै। स्टेनली अबैए, ओकरो मेग जलखै दैए। पीटे काजपर चलि जाइए। मेग आ स्टैनलेमे अंतरंग गप होइए, हँसी मजाक होइए। पीटे मेगसँ कहने रहै जे दू गोटे एतै आ किछु दिन ओकरा घरमे रहतै। ओकर घर सूचीमे (बोर्डिंग हाउसमे) छै। स्टैनली ई सुनि पूछ-पाछ करै छै, ओ चिंतित भऽ जाइए। स्टैनली कहैए जे ओकरा पेरिसमे नाइट क्लबमे पियानो बजेबाक नोकरीक ऑफर आएल छै। फेर एथेंस, कॉन्सटेनटिनोपल, जाग्रेब, व्लादीवोस्टक सेहो, ई सम्पूर्ण विश्वक दर्शनबला नोकरी अछि। पुछलापर ओ कहैए जे ओ संपूर्ण विश्व, संपूर्ण देशमे पियानो बजेने अछि। एक बेर ओ कंसर्ट सेहो केने रहए। फेर ओ कहैए जे पहिल कंसर्टमे ओ स्थानक पता हरा देलक आ नै पहुँचि सकल। दोसर कंसर्टमे जखन ओ पहुँचल तँ स्थलपर ताला लागल रहै। मेगक इच्छा नै छै जे स्टेनली कतौ जाए। स्टेनलीकेँ लागै छै जे ओ दुनू गोटे ककरो खोजमे अछि। लुलुक अबाज अबैए। मेग खरीदारीक झोरा लऽ कऽ बहरा जाइए, कियो ओकरासँ मिसेज बोल्स सम्बोधित कऽ गप करै छै। लुलु अबैए आ स्टैनलीसँ गप करैए। लुलु बहराइए तँ गोल्डबर्ग आ मैककेन अबैए। मैककेन गोल्डबर्गकेँ नैट कहि सम्बोधित करैए। स्टैनली चोरा कऽ पहिनहिये बहरा जाइए। मेग अबैए, गोल्डबर्ग ओकरा मिसेज बोल्स कहि सम्बोधित करैए आ अपनाकेँ गोल्डबर्ग आ संगीकेँ मैककेन कहि परिचय दैए। गपशपक क्रममे गोल्डबर्ग पुछै छै जे ओइ रहनिहारक नाम की छै आ ओ की करैए। मेग कहैए जे ओकर नाम स्टैनले वेबर छै आ ओ एक बेर कंसर्ट देलक मुदा केयरटेकरक गलतीसँ रातिमे ओ ओतै बन्द रहि गेल आ भोर धरि बन्द रहल। आ फेर “टिप” लऽ कऽ ट्रेन पकड़ि एतऽ आबि गेल। तखने मेग कहैए जे आइ ओकर “बर्थडे” छिऐ। आ फेर “बर्थडे पार्टी” निर्धारित होइ छै 9 बजे। लुलुकेँ सेहो बेरू पहर नोति देल जेतै। तीनू बहराइए आ स्टैनली खिड़कीसँ ताकैए। मेग अबैए। स्टैनली ओइ दुनूसँ आशंकित अछि। नाम पुछैए तँ मेग नाम बिसरि जाइए आ ओकरा गोल्ड.. मोन पड़ै छै तँ स्टैनली मोन पाड़ै छै- गोल्डबर्ग। मेग पुछैए जे की स्टेनली ओकरा चिन्हैए तँ स्टैनली गुम्म रहैए। फेर स्टैनली कहैए जे आइ ओकर बर्थडे नै छिऐ। मेग ओकरा लेल बच्चाक ड्रम उपहारमे अनने अछि आ तकर बदलामे ओ स्टैनलीसँ चुम्मा मांगैए। अंक 2 मे स्टैनली आ मैक्कानक गपशप भऽ रहल छै। स्टैनली बाहर जाए चाहैए। ओ मैक्कानकेँ कहै छै जे ई बोर्डिंग हाउस नै छी, नहिये कहियो रहै। पीटे आ गोल्डबर्ग अबैए। गोल्डबर्ग पीटेकेँ मिस्टर बोल्स कहि सम्बोधित करैए। पीटेक गेलाक बाद स्टैनली कहैए जे ऐ घरक लोकक सुंघबाक शक्ति चलि गेल छै तेँ ओ गोल्डबर्ग आ मैक्कानक खतरा नै चीन्हि पाबि रहल छथि, हुनका सभक प्रति ओकर (स्टैनलीक) जिम्मेवारी छै। मैक्कान ओकरासँ चश्मा छीनि लैए। मैक्कान आ गोल्डबर्ग ओकरासँ पुछैए जे ओ किए अपन पत्नीक हत्या केलक। ओ नाम बदलने अछि आ चरित्रहीन अछि,स्त्रीकेँ दूषित करैए। झगड़ा शुरू होइ छै। मुदा झगड़ा रुकलाक बाद (प्रायः मेगकेँ नै बुझल छै) मेग पार्टी ड्रेसमे अबैए। सामान्य गप होइ छै। लुलु अबैए, गोल्डबर्ग ओकरा कोरामे बैसबैए। लुलुक पुछलापर जे ओकरा तँ होइ छलै जे ओ “नैट” छी, गोल्डबर्ग कहै छै जे ओकर पत्नी ओकरा “सिमे”कहि बजबै छै। पार्टीमे खेल शुरू होइए, आँखिमे पट्टी बान्हि कऽ। मिसेज बोल्सकेँ लुलु स्कार्फसँ आँखि बान्हैए। ओ जकरा छू देत तकरा आँखिपर पट्टी बान्हल जाएत। ओ मैक्केनकेँ छुबैए। फेर स्टैनली छुआइए। ओकर चश्मा लेल जाइ छै। स्टेनलीकेँ पट्टी बान्हल जाइ छै। मैक्केन स्टेनलीक चश्मा तोड़ि दैए। मैक्केन ड्रमकेँ स्टेनलीक रस्तामे राखैए, ओ खसि पड़ैए आ मेगक गर्दनि दबबऽ चाहैए, मैक्केन आ गोल्डबर्ग बचबै छै। अन्हार पसरैए। स्टैनलीकेँ अबैत देखि लुलु बेहोश भऽ जाइए। स्टैनले लुलुकेँ टेबुलपर राखैए। मैक्कानकेँ टॉर्च भेटै छै। ओ टेबुल आ स्टैनलीपर टॉर्च बाड़ैए। अंक 3: पीटे आ मेगमे गप होइ छै। मेग स्टैनलीक विषयमे पीटेसँ पुछैए। लुलु अबैए, गोल्डबर्गसँ पुछैए जे ओकर पिता बा एडी (ओकर पहिल प्रेमी) की सोचत जँ ओ ई सुनत। ओ कहैए जे गोल्डबर्ग अपन दुष्ट पियास तृप्त केलक, ओ लुलुकेँ से सभ सिखेलक जे एकटा युवती तीन बेर बियाहल जेबाक बादे सीखत। गोल्डबर्ग कहैए जे ओ ई केलक कारण लुलु ओकरा ई करऽ देलक। लुलु जाइए। मेगक अनुपस्थितिमे गोल्डबर्ग आ मैक्कान स्टेनलीकेँ लऽ जाइए। पीटे ओकरा छोड़ैले कहैए। गोल्डबर्ग आ मैक्कान पीटेकेँ सेहो संगमे चलैले कहैए, कारमे जगह छै। पीटे स्थिर रहैए। पीटे असगरे रहि जाइए, मेग अबैए। पुछैए, ओ सभ गेल? पीटे कहैए- हँ। स्टेनलीक विषयमे मेग पुछैए- ओ सुतले अछि? पीटे कहैए- ओ सुतल अछि। -सुतऽ दियौ। मेग पुछैए- की ई नीक पार्टी नै छल तँ पीटे कहैए- ओ बादमे आएल। पर्दा खसैए। ....... बादल सरकारक “एवम् इन्द्रजीत”। “एवम् इन्द्रजीत” मे लेखक, काकी, मानसी, अमल, विमल, कमल, इन्द्रजीत आ इन्द्रजीतक पत्नी ( नाटकमे बादमे) दोसर मानसी पात्र अछि। अंक 1- लेखक एकटा नाटकक खोजमे अछि। ओकर काकी ओकर खेनाइ-पिनाइ छोड़ि लिखैत रहबापर तमसाएल छै। मानसी पुछैए जे ओ पढ़त जे किछु ओ लिखलक। लेखक कहैए, ओ किछु नै लिखलक। मानसी ओकरा प्रयास करैले कहै छै। लेखक दर्शकमेसँ चारिटा बादमे आबैबलाकेँ स्टेजपर बजबैए,अमल, विमल, कमल। चारिम अपन नाम निर्मल कुमार कहैए। लेखक कहैए- ई नै भऽ सकै छै, अपन असली नाम बताउ। ओ कहैए- इन्द्रजीत राय। अमल, विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत। मानसी (असली नाम दोसर मुदा लेखक कहैए मानसीये) ओकर ममियौत बहिन छिऐ। ओ ओकरासँ प्रेम करैए, परम्परा तोड़ऽ चाहैए। अंक 2- बादमे ओकरा लागै छै जे की जँ ई प्रेम सफल भइयो जेतै तँ ओकरा उत्तर भेटतै? नै ने। ओ लंदन सेहो जाएत। मृत्यु चाहैए, नै कऽ पाबैए। लेखक द्वारा नामित इन्द्रजीतक मानसी अविवाहित अछि, हजारीबागमे पढ़बैए। मुदा अमल, विमल, कमलक विपरीत इन्द्रजीत लीखपर नै चलैए। अलग किछु करऽ चाहैए। काका, जकरा ओ माए कहैए, खाइले कहै छै आ मानसी लिखैले। मुदा जखन एक बेर मानसी लेखककेँ खाइले कहि दैए तँ लेखक दुखी भऽ जाइए, नै, अहूँ? नै। मुदा फेर मानसीकेँ गलतीक भान होइ छै, ओ ओकर लेखनक विषयमे पुछैए। लेखक चिंतित अछि, ई इन्द्रजीत वास्तविकताकेँ नै मानैए, कोनो प्रतिबद्धता ओकरामे नै छै। मुदा मानसी से नै मानैए। ओ सपना तँ देखैए ने। इन्द्रजीत लंदनसँ कोलकाता घुरैए, एकटा दोसर स्त्रीसँ बियाह करैए, ओकरो नाम मानसी छिऐ (इन्द्रजीत एकरा मानसी कहैए, पहिलुका मानसी जेकरा लेखक मानसी कहैए ओ इन्द्रजीतक ममियौत छिऐ, जकरासँ इन्द्रजीत प्रेम करैए मुदा ओ भाएक रिश्तासँ ओकरासँ बियाह नै करैए जे लोक की कहतै, आ इन्द्रजीत लेखककेँ कहैत रहैए जे ओकर नाम मानसी नै छिऐ। ) इन्द्रजीत बुझऽ लगैए (मानसीकेँ ओ कहैए) जे व्यक्तिक भिन्नताक मात्र भ्रम अछि। स्वप्न स्वप्न अछि ओ वास्तविकता नै बनि सकैए। मानसी, मानसी, मानसी,सभ मानसी, जेना अमल, विमल, कमल। लेखक पूछैए तँ इन्द्रजीत कहैए- अमल, विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत (सेहो!)। लेखकक यात्राक कोनो लक्ष्य नै, कोनो उद्देश्य नै, फुसियाँहीक यात्रा जकर कोनो कारण नै। लेखक इन्द्रजीतकेँ कहैए, हमरा सभकेँ जीबाक अछि, चलबाक अछि, कोनो धर्मस्थल नै तैयो तीर्थयात्रा करबाक अछि। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क “नो एण्ट्री: मा प्रविश” प्रथम कल्लोल: ई नाटक ज्योतिरीश्वरक परम्परामे कल्लोलमे (हुनकर वर्ण रत्नाकर कल्लोलमे विभक्त अछि जे नाटक नै छी, धूर्त-समागम जे ज्योतिरीश्वर लिखित नाटक अछि- अंकमे विभक्त अछि) विभाजित अछि। चारि कल्लोलक विभाजनक प्रथम कल्लोल स्वर्ग (बा नरक) केर द्वारपर आरम्भ होइत अछि। ओतऽ बहुत रास मुइल लोक द्वारक भीतर प्रवेशक लेल पंक्तिबद्ध छथि। कियो पथ दुर्घटनामे शिकार भेल बाजारी छथि तँ संगमे युद्दमे मृत भेल सैनिक आ चोरि करऽ काल मारल गेल चोर, उचक्का आ पॉकिटमार सेहो छथि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागममे जे अति आधुनिक अब्सर्डिटी अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो देखबामे अबैत अछि। प्रथम कल्लोलमे जे बाजारी छथि से, पंक्ति तोड़ि आगाँ बढ़ला उत्तर, चोर आ उचक्का दुनू गोटेकेँ, कॉलर पकड़ि पुनः हुनकर सभक मूल स्थानपर दऽ अबै छथि। उचक्का जे बादमे पता चलैत अछि जे गुण्डा-दादा थिक मुदा बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैए, हुनकासँ अंगा छोड़बाक लेल कहैए। मुदा जखन पॉकेटमार बाजारी दिससँ चोरक विपक्षमे बजैए तखन उचक्का चक्कू निकालि अपन असल रूपमे आबि जाइए आ पॉकेटमारपर मारि-मारि कऽ उठैए। मुदा जखन चोर कहै छनि जे ई सेहो अपने बिरादरीक अछि जे छोट-छीन पॉकेटमार मात्र बनि सकल, ओकर जकाँ माँजल चोर नै, आ उचक्का जेकाँ गुण्डा-बदमाश बनबाक तँ सोचिओ नै सकल, तखन उचक्का महराज चोरक पाछाँ पड़ि जाइ छथि, जे बदमाश ककरा कहलँह। आब पॉकेटमार मौका देखि पक्ष बदलैए आ उचक्काकेँ कहै छन्हि जे अहाँकेँ नै हमरा कहलक। संगे ईहो कहैए जे चोरि तँ ई तेहन करऽ जनैए, जे गिरहथक बेटा आ कुकुर सभ चोरि करै काल पीटैत-पीटैत एतऽ पठा देलकए आ हमर खिधांश करैत अछि, बड़का चोर भेला हँ। भद्र व्यक्ति चोरक बगेबानी देखि ई विश्वास नै कऽ पबै छथि जे ओ चोर थिकाह। तइपर पॉकेटमार, चोर महाराजकेँ आर किचकिचबै छन्हि। तखन ओ चोर महराज ऐ गपपर दुख प्रकट करै छथि जे नै तँ ओइ राति ऐ पॉकेटमारकेँ चोरिपर लऽ जइतथि आ ने ओ हुनका पिटैत देखि सकैत। एम्हर बजारी जे पहिने चोर आ उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ि घिसिया चुकल छला, गुम्म भेल सभटा सुनै छथि आ दुख प्रकट करै छथि जे एकरा सभक संग स्वर्गमे रहब, तँ स्वर्ग केहन हएत से नै जानि। आब बजारी महराज गीतक एकटा टुकड़ी ऐ विषयपर पढ़ै छथि। जेना धूर्तसमागममे गीत अछि तहिना नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो, ई ऐ स्थलपर प्रारम्भ होइए जे ऐ नाटककेँ संगीतक बना दैए। ओम्हर पॉकेटमारजी सभक पॉकेट काटि लै छथि आ बटुआ साफ कऽ दै छथि। आब फेर गीतमय फकड़ा शुरू भऽ जाइए मुदा तखने एकटा मृत रद्दीबला सभक तंद्राकेँ तोड़ि दैए, ई कहि जे यमालयक बन्द दरबज्जाक ओइ पार, ई बटुआ आ पाइ-कौड़ी कोनो काजक नै अछि। आब दुनू मृत भद्र व्यक्ति सेहो बजै छथि, जे हँ दोसर देसमे दोसर देसक सिक्का कहाँ चलैत अछि। आब एकटा रमणीमोहन नाम्ना मृत रसिक भद्र व्यक्तिक दोसर देसक सिक्का नै चलबाक विषयमे टीप दै छथि, जे हँ, ई तँ ओहिना अछि जेना प्रेयसीक दोसराक पत्नी बनब। आब ऐ गपपर घमर्थन शुरू भऽ जाइए। तखन रमणी मोहन गपक रुखि घुमा दै छथि जे दरबज्जाक भीतर रम्भा-मेनका सभ हेती। भिखमंगनी जे तावत अपन कोरामे लेल एकटा पुतराकेँ दोसराक हाथमे दऽ बहसमे शामिल भऽ गेल छथि, ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की इत्यादि कहै छथि। मुदा पॉकेटमार कहैए जे भीतरमे सुख नै दुखो भऽ सकैए। ऐपर बीमा बाबू अपन कार्यक स्कोप देखि प्रसन्न भऽ जाइ छथि। आब पॉकेटमार इन्द्रक वज्र पर रुपैय्याक बोली शुरू करैत अछि। ऐ बेर बजारी तन्द्रा भंग करैत अछि आ दुनू भद्र व्यक्ति हुनकर समर्थन करैत कहैत अछि, जे ई अद्भुत नीलामी अछि, जे करबा रहल अछि से पॉकेटमार आ ओइमे शामिल अछि चोर आ भिखमंगनी, पहिले-पहिल सुनल अछि आ फेर संगीतमय फकड़ा सभ शुरू भऽ जाइत अछि। मुदा तखने नंदी-भृंगी शास्त्रीय संगीतपर नचैत प्रवेश करै छथि। आब नंदी-भृंगीक ई पुछलापर जे दरबज्जाक भीतर की अछि, सभ गोटे अपना-अपना हिसाबसँ स्वर्ग-नरक आ अकास-पताल कहै छथि। मुदा नंदी-भृंगी कहै छथि जे सभ गोटे सत्य कहै छी आ क्यो गोटे पूर्ण सत्य नै बजलौं। फेर बजैत-बजैत ओ कहऽ लगै छथि, कियो चोरि काल मारल गेला (चोर ई सुनि भाऽ लगै छथि तँ दु-तीन गोटे पकड़ि सोझाँ लऽ अनै छन्हि!) तँ कियो एक्सीडेन्टसँ, आ ऐ तरहेँ सभटा गनबऽ लगै छथि, मुदा बीमा-बाबू कोना बिन मृत्युक एतऽ आएल छथि से हुनको लोकनिकेँ नै बुझल छन्हि ! बीमा बाबू कहै छथि जे ओ नव मार्केटक अन्वेषणमे आएल छथि ! से बिन मरल सेहो एक गोटे ओतऽ छथि! भृंगी नंदीकेँ ढ़ेर रास बीमा कम्पनीक आगमनसँ आएल कम्पीटिशनक विषयमे बुझबैत छथि ! एम्हर प्रेमी-प्रेमिकामे घोंघाउज शुरू होइ छन्हि, कारण प्रेमी आब घुरि जाए चाहै छथि। रमणी मोहन प्रेमीक गमनसँ प्रसन्न होइ छथि जे प्रेमिका आब असगरे रहती आ हुनका लेल मौका छन्हि। मुदा भृंगी ई कहि जे एतऽसँ गेनाइ तँ संभव नै मुदा ई भऽ सकैए जे दुनू जोड़ी माय-बाप (!) केँ एक्सीडेन्ट करबाए एतै बजबा लेल जाए। मुदा अपना लेल माए-बापक बलि लेल प्रेमी-प्रेमिका तैयार नै छथि। तखन नंदी भृंगी दुनू गोटेक विवाह गाजा-बाजाक संग करा दै छथि आ कन्यादान करै छथि बजारी। दोसर कल्लोल: दोसर कल्लोलक आरम्भ होइत अछि ऐ आभाससँ, जे कियो नेता मरलाक बाद आबएबला छथि, हुनकर दुनू अनुचर मृत भऽ आबि चुकल छथि आ नेताजीक अएबाक सभ कियो प्रतीक्षा कऽ रहल छथि, दुनू अनुचर छोट-मोट भाषण दऽ नेताजीक विलम्बसँ एबाक (मृत्युक बादो!) क्षतिपूर्ति कऽ रहल छथि,गीतक योग दऽ। एकटा गीत चोर नै बुझै छथि मुदा भिखमंगनी आ रद्दीबला बुझि जाइ छथि, तइपर बहस शुरू होइए। चोरकेँ अपनाकेँ चोर कहलापर आपत्ति छन्हि आ भिखमंगनीकेँ ओ भिख-मंग कहैए तँ भिखमंगनी ओकरा रोकि कहैए जे ओ सरिसवपाहीक अनसूया छथि, मिथिला-चित्रकार, मुदा दिल्लीक अशोकबस्ती आबि बुझलन्हि जे ऐ नग्रमे कला-वस्तु कियो नै किनैए आ तखन चौबटियाक भिखमंगनी बनि रहि गेली। चोर कहैए जे मात्र ओ बदनाम छथि, चोरि तँ सभ करैए। नव बात कोनो नै अछि, सभ अछि पुरनकाक चोरि। तकर बाद नेताजी पहुँचि जाइ छथि आ लोकक चोर, उचक्का आ पॉकेटमार हेबाक कारण समाजक स्थितिकेँ कहै छथि। तखने एकटा वामपंथी अबे आ ओ ई देखि क्षुब्ध छथि जे नेताजी चोर, उचक्का आ पॉकेटमारसँ घिरल छथि। मुदा चोर अपन तर्क लऽ पुनः प्रस्तुत होइए आ नेताजीक राखल “चोर-पुराण” नामक आधारपर बजारी जी गीत शुरू कऽ दै छथि। तेसर कल्लोल: आब नेताजी आ वामपंथीमे गठबंधन आ वामपंथी द्वारा सरकारक बाहरसँ देल समर्थनपर चरचा शुरू भऽ जाइए। नेताजी फेर गीतमय होइ छथि आकि तखने स्टंट-सीन करैत एकटा मुइल अभिनेता विवेक कुमारक अएलासँ आकर्षण ओम्हर चलि जाइत अछि। टटका-ब्रेकिंग न्यूज देबाक मजबूरीपर नेताजी व्यंग्य करै छथि। वामपंथी दू बेर दू गोट गप- नव गप कहि जाइ छथि, एक जे बिन अभिनेता बनने कियो नेता नै बनि सकैत अछि आ दोसर जे चोर नेता नै बनि सकैए (ई चोर कहैत अछि) मुदा नेता सभ तँ चोरि करबामे ककरोसँ पाछाँ नै छथि। तखने एकटा उच्च वंशीय महिला अबै छथि आ हुनकर प्रश्नोत्तरक बाद एकटा सामान्य क्यूक संग एकटा वी.आइ.पी.क्यू बनि जाइए। अभिनेता, नेता आ वामपंथी सभ वी.आइ.पी.क्यूमे ठाढ़ भऽ जाइ छथि ! ई पुछलापर जे पंक्ति किए बनल अछि (?) तइपर चोर-पॉकेटमार कहै छथि जे हुनका लोकनिकेँ पंक्ति बनेबाक (आ तोड़बाक सेहो) अभ्यास छन्हि। चतुर्थ कल्लोल: यमराज सभक खाता-खेसरा देखि लै छथि आ चित्रगुप्त ई रहस्योद्घाटन करै छथि जे एक युग छल जखन सोझाँक दरबज्जा खुजितो छल आ बन्न सेहो होइ छल। नंदी भृंगी पहिनहिये सूचित कऽ देलन्हि जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नै, मात्र बुझबाक दोष छल। दरबज्जाक ओइ पार की अछि तइ विषयमे सभ कियो अपना-अपना हिसाबसँ उत्तर दै छथि। चित्रगुप्त कहै छथि जे सभक वर्णनक सभ वस्तु छै ओइपार। नंदी-भृंगी सूचित करै छथि जे ऐ गेटमे प्रवेश निषेध छै, नो एण्ट्री केर बोर्ड लागल छै। आहि रे ब्बा! आब की हुअए ! नेताजीकेँ पठाओल जाइ छन्हि यमराजक सोझाँ, मुदा हुनकर सरस्वती ओतऽ मन्द भऽ जाइ छन्हि। बदरी विशाल मिश्र प्रसिद्ध नेताजी, केर लतारनाइ शुरू होइ छन्हि, असली केर बदला सर्टिफिकेट बला कम कऽ लिखाओल उमरिपर। पचपन बरिख आयु आ शश योग कहैए जे सत्तरि सँ ऊपर जीता, से ओ आ संगमे मृत चारू सैनिककेँ आपिस पठा देल जाइए। दूटा सैनिक नेताजीक संग चलि जाइ छथि आ दू टा अनुचर सेहो जाए चाहैए। मुदा नेताजीक अनुचर सभक अपराध बड़ भारी, से चित्रगुप्तक आदेशपर नंदी-भृंगी हुनका लऽ, कराहीमे भुजबाक लेल बाहर लऽ जाइ छथि तँ बाँचल दुनू सैनिक हुनका पकड़ि केँ लऽ जाइ छथि आ नंदी-भृंगी फेर मंचपर घुरि अबै छथि। तहिना तर्कक बाद प्रेमी-प्रेमिका, दुनू भद्र पुरुष आ बजारीकेँ सेहो त्राण भेटै छन्हि, ढोल-पिपही संग हुनका बाहर लऽ गेल जाइए। आब नन्दी जखन अभिनेताक नाम विवेक कुमार उर्फ...बजै छथि तँ अभिनेता जी रोकि दै छथि, जे कतेक मेहनतिसँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़ि सकल अछि, से उर्फ तँ छोड़िए देल जाए। वामपंथी गोष्ठीकेँ अभिनेता द्वारा मदति केर विवरणपर वामपंथी प्रतिवाद करै छथि। हुनको पठा देल जाइ छन्हि। वामपंथीक की हेतन्हि, हुनकर कथामे तँ ने स्वर्ग-नर्क अछि आ ने यमराज-चित्रगुप्त। हुनका अपन भविष्यक निर्णय स्वयं करबाक अवसर देल जाइ छन्हि। मुदा वामपंथी कहै छथि जे हुनकर शिक्षा आन प्रकारक छलन्हि, मुदा एखन जे सोझाँ घटित भऽ रहल छन्हि तइपर कोना अविश्वास करथु? मुदा यमराज कहै छथि जे- भऽ सकैए, जे अहाँ देखि रहल छी से दुःस्वप्न हुअए, जतऽ पैसै जाएब ओतऽ लिखल अछि नो एण्ट्री। आब यमराज प्रश्न पुछै छथि जे विषम के, मनुक्ख आकि प्रकृति? वामपंथी कहै छथि जे दुनू, मुदा प्रकृतिमे तँ नेचुरल जस्टिस कदाचित् होइतो छै मुदा मनुक्खक स्वभावमे से गुन्जाइश कतऽ? मुदा वामपंथी राजनीति एकर (समानताक, सुधार केर) प्रयास करैए। तइपर हुनका संग चोर-उचक्का आ पॉकेटमारकेँ पठाओल जाइए, ई अवसर दैत जे हिनका सभकेँ बदलू। चोर कनेक जाएमे इतस्तः करैए आ ई जिज्ञासा करैए जे हम सभ तँ जाइए रहल छी मुदा ऐसँ आगाँ ? नंदी-चित्रगुप्त-यमराज समवेत स्वरमे कहै छथि- नो एण्ट्री। भृंगी तखने अबैए, अभिनेताकेँ छोड़ने। यमराज कहै छथि - मा प्रविश। भृंगी नीचाँमे होइत चरचाक गप कहैत अछि, जे एतुक्का निअम बदलल जेबाक आ कतेक गोटेकेँ पृथ्वीपर घुरऽ देल जेबाक चरचा सर्वत्र भऽ रहल अछि। यमदूत सभ अनेरे कड़ाह लग ठाढ़ छथि, कियो भुजऽ लेल कहाँ भेटल छन्हि (मात्र दू टा अनुचर छोड़ि)। आब कियो नै आबऽ बला बचल अछि, से सभ कहै छथि। चित्रगुप्त अपन नमहर दाढ़ी आ यमराज अपन मुकुट उतारि लै छथि आ स्वाभाविक मनुक्खक रूपमे आबि जाइ छथि! मुदा चित्रगुप्तक मेकप बला नमहर दाढ़ी देखि भिखमंगनी जे ओतऽ छली, हँसि दै छथि। भृंगी उद्घाटन करै छथि जे भिखमंगनी हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि ! कोन अभिनय ! तकर विवरण मुहब्बत आ गुदगुदीपर खतम होइए, तँ भिखमंगनी कहै छथि जे नै, ऐ तरहक अभिनय तँ ओतऽ (देखा कऽ) भऽ रहल अछि। ओत्तऽ रमणी मोहन आ उच्चवंशीय महिला निभाक रोमांस चलि रहल अछि। मुदा निभाजी तँ बजिते नै छथि। भिखमंगनी यमराजसँ कहै छथि जे ओ तखने बजती जखन ऐ दरबज्जाक तालाक चाभी हुनका भेटतन्हि, बुझती जे अपसरा बनबामे यमराज मदति दऽ सकै छथि, ई रमणीक हृदय थिक एतौ नो एण्ट्री ! यमराज खखसै छथि, तँ चित्रगुप्त बुझि जाइ छथि जे यमराज “पंचशर”सँ ग्रसित भऽ गेल छथि! चित्रगुप्तक कहला उत्तर सभ कियो एक कात लऽ गेल जाइ छथि मात्र यमराज आ निभा मंचपर रहि जाइ छथि। यमराज निभाक सोझाँ- सुनू ने निभा... कहि रुकि जाइ छथि। सभक उत्साहित केलापर यमराज बड़का चाभी हुनका दै छथि, मुदा निभा चाभी भेटलापर रमणी मोहनक संग तेना आगाँ बढ़ै छथि जेना ककरो अनका चिन्हिते नै होथि! ओ चाभी रमणी मोहनकेँ दऽ दै छथि मुदा ओ ताला नै खोलि पबै छथि। फेर निभा अपने प्रयास करऽ लेल आगाँ बढ़ै छथि मुदा चित्रगुप्त कहै छथि जे ई मोनक दरबज्जा थिक, ओना नै खुजत। महिला ठकै लेल चाभी देबाक (!) गप कहै छथि। सभ कियो हँसी करै छन्हि जे मोन कतऽ छोड़ि एलौं ? तइपर एकबेर पुनः रमणी मोहन आ निभा मोन संजोगि कऽ ताला खोलबाक असफल प्रयास करै छथि। नंदी-भृंगी-भिखमंगनी गीत गाबऽ लगै छथि जकर तात्पर्य यएह जे मोनक ताला अछि लागल, मुदा ओतऽ अछि नो एण्ट्री। मुदा ऋतु वसन्तमे प्रेम होइछ अनन्त आ करेज कहैत अछि मैना-मैना। तँ एतहि नो एण्ट्री दरबज्जापर धरना देल जाए। उत्तर आधुनिक भावप्रधान निरर्थक (एबसर्ड) नाटक: एन एटेण्डेन्ट गोडो क सैमुअल बेकैट द्वारा स्वयं फ्रेंचसँ अंग्रेजीमे अनुवाद कएल गेल “वेटिंग फॉर गोडो”शीर्षकसँ आ उपशीर्षक “अ ट्रेजिकॉमेडी इन टू एक्ट्स” सेहो जोड़ल गेल जे फ्रेंच संस्करणमे नै छल। ट्रेजीकॉमेडी माने ट्रेजेडी आ कॉमेडीक मिश्रण। एकरकथानकसँ स्पष्ट भऽ गेल हएत जे एकर मुख्य पात्र “गोडो” ऐ नाटकमे छैहे नै, दोसर ओ भावक दृष्टिसँ सेहो नाटकक मुख्य तत्व नै छै। नाटकक मुख्यतत्व छै “वेटिंग” माने बाट तकनाइ। भाषा, स्टेज, बाजब, चुप्प रहब, चलबाक तरीका, ई सभ ऐ नाटकक अभिन्न अंग छिऐ। देश-कालमे भागैबला बनजाराजीवनशैलीक लोक सभ अछि एकर मुख्य पात्र। बिनु बजने शारीरिक भावसँ अभिनय करैबला “माइम कलाकार” जेकाँ ऐ नाटकक पात्र अभिनय करै छथि।नाटकमे प्लॉट आ संतुलनक नव परिभाषा ई नाटक गढ़ैए। आधुनिक थियेटरकेँ ई नाटक नव युगमे प्रवेश करबैए। ब्रिटेनक “म्यूजिक हॉल” थियेटर मे संगीतहास्य रहै छलै जइमे जीवनक निराशा “क्रॉस-टॉक”सँ बेकेट आ राजनैतिक-सामाजिक आतंककेँ हैरोल्ड पिन्टर हास्य रूपमे देखबै छथि। “नो एण्ट्री: माप्रविश” सेहो स्वर्क (बा नरक) क द्वारपर आरम्भ होइए जतऽ ओना तँ सभ मृत लोक पंक्तिबद्ध छथि मुदा एकटा जीवित व्यक्ति सेहो छथि! उचक्का बाजारी लगसञ्च-मञ्च रहैए! प्रेमी-प्रेमिकाक ओतऽ बियाहो भऽ जाइ छै! नेताजी मृत्युक बादो विलम्बसँ एबा लेल अभिशप्त छथि! वामपंथी ओतौ बाहरसँ समर्थन दै छथि!वी.आइ.पी. क्यू सँ ओतौ त्राण नै भेटै छै! मुदा जइ दरबज्जाक बाहर लोक पंक्तिबद्ध छथि से एक युगमे खुजितो छल आ बन्न सेहो होइ छल, ई रहस्योद्धाटनचित्रगुप्त करै छथि! माने आब ई नै खुजत तखन इन्तजारी कथीक? नन्दी-भृंगी कहैए जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नै, मात्र बुझबाक दोष छल! अभिनेता विवेककुमार अपन “सरनेम” पुछल गेलापर कहै छथि जे कतेक मोश्किलसँ तँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़लक अछि से उर्फ तँ छोड़िये देल जाए। वामपंथीक कथामेने स्वर्ग-नर्क होइ छै आ नहिये यमराज-चित्रगुप्त, मुदा एतुक्का परिस्थिति देखि कऽ ओ अविश्वास कोना करथु? मुदा यमराजे हुनका कहै छथिन्ह जे सम्भव जे ईदुःस्वप्न हुअए। यमदूत सभ कड़ाह लग अनेरे ठाढ़ छथि कियो भूजैले भेटिते नै छन्हि, चित्रगुप्तक मेकप बला दाढ़ी देखि भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहै छथिजे भिखमंगनी सेहो हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि। मोनक दरबज्जा मोन छोड़ि एलापर कोना खुजत? फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” पुरान नाटक जेकाँ परिभाषित आरम्भ आ अन्तक परिधिसँ अलग अछि। ई कतौ सँ शुरू भऽ जाइत अछि,कतौ खतम भऽ जाइत अछि। एवम् इन्द्रजीत मे लेखक पात्र ताकि रहल अछि, आ अनचोक्के ओ दर्शक दीर्घाकेँ सम्बोधित करैत चारिटा देरीसँ आएल दर्शककेँ मंचपर बजा लैए आ ओकरा नाटकक पात्र बना दैए। चारिम पात्र ओकरा प्रिय छै, ओ निर्मल नै “इन्द्रजीत” छी। ओ अलग अछि, इन्द्रकेँ जीतैबला ऐतिहासिक पात्र अछि। ओ अमल विमल, कमल जेकाँ लीखपर नै चलत। मुदा अन्त जाइत जाइत इन्द्रजीत सेहो अमल, विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत भऽ जाइए। हैरोल्ड पिन्टरक “द बर्थडे पार्टी”क प्रारम्भमे तेहेन समीक्षा भेल जे हुनकर लेखकीय जीवन समाप्त हुअए पर आबि गेल। मुदा एकर पुनर्पाठ एकरा क्लासिक बना देलक। किछु रहस्य, किछु आतंककेँ ओ सम्पूर्ण नाटकमे बनेने रहला, हास्य कथ्यकेँ आर मजगूत केलक। स्टैनले की अछि, छल बा बनऽ चाहैत अछि?की ओ स्त्रीकेँ दूषित करैए, बा ओ अपन पत्नीक हत्या केलक? मुदा मेग तँ ओकरा पसिन्न करै छै? ओकर पहिल आ दोसर कन्सर्ट, के तकर बाधक बनलै?की ओ झूठ बजैए बा वर्तमान सामाजिक आ राजनैतिक परिभाषासँ अलग व्यवहारक अछि? ओ मेगकेँ मोकऽ चाहैए मुदा तैयो किए मेग ओकरा पसिन्न करै छै आ सामाजिक आ राजनैतिक शक्ति ओकरा किए आ कोना उठा कऽ लऽ गेल जाइत रहै छै, जकर सिपाही गोल्डबर्ग (गोल्डबर्गक लुलुक संग रहस्यमय व्यवहार) स्वयं आदर्श उपस्थित नै कऽ पबै छथि। सुन्न-मसान सड़कक कातक माटिक ढिमका आ पत्रहीन नग्न गाछ “वेटिंग फॉर गोडो” क स्टेज छिऐ, ताला लागल दरबज्जाक बाहरक स्थल/ मण्डप “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क स्टेज छिऐ तँ “एवम् इन्द्रजीत”मे दर्शक दीर्घा, सएह स्टेज बनि जाइए। “द बर्थडे पार्टी”मे घरक कोठली स्टेज छिऐ मुदा पिन्टर एकर पात्र स्टैनले केँ डेरीडाक “विखण्डन” पद्धतिसँ कखनो खण्ड कऽ दै छथि तँ कखनो फेरसँ जोड़ि दै छथि। लोक बा दर्शक ओकरासँ ईर्ष्या करऽ लगैए, खने सहानुभूति करऽ लगैए खने घृणा करऽ लगैए, मुदा स्टैनली गोल्डबर्ग आ मैक्कानक सोझाँ जखन निर्बल बुझि पड़ैए तँ दर्शक ओकरा संग अपनाकेँ देखैए, जेना ओ “एवम् इन्द्रजीत” मे इन्द्रजीत संग अपनाकेँ देखैए। “वेटिंग फॉर गोडो” मे जखन लोक गुलाम संग अपनाकेँ देखैए तखने सहानुभूति देखेलापर, चमेटा पड़लापर ओ हतप्रभ रहि जाइए। “नो एण्ट्री: मा प्रविश” मे भिखमंगनी ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की कहैए! पॉकेटमार इन्द्रक व्रजपर रुपैय्याक बोलीलगबैए। नन्दी-भृंगी कहैए जे सभ गोटे सत्य छी मुदा क्यो गोटे पूर्ण सत्य नै बजलौं। “एवम् इन्द्रजीत”मे इन्द्रजीतक हाल सिसीफस सन छै। शापित ग्रीक मिथक सिसीफस, संगमरमरक पाथरपर चढ़बा लेल अभिशप्त, आ जखने ओ चोटीपर पहुँचैए आकि पाथर फेर गुरकि कऽ ओकरा नीचाँ आनि दै छै। मनुक्खक काज आ जीवन निरर्थकतापर आधारित अछि। मनुक्ख असफल होइले अभिशप्त अछि, इन्द्रजीत जेकाँ? आकि “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क स्वर्ग-नरक, यमराज-चित्रगुप्तक अमान्यता देखलाहा गपकेँ देखि बदलत? मुदा तखन यमराजे कहै छथि जे देखलाहा गप दुःस्वप्न भऽ सकैए? “वेटिंग फॉर गोडो” ईश्वरक इन्तजारी नै छिऐ, बेकेट स्वयं कहै छथि जे इन्तजारी “गॉड”क नै “गोडो”क भऽ रहल अछि, ओना क्रिस्टियेनिटी “मिथोलोजी” अछि से ओ तकर प्रयोग करै छथि। अस्तित्ववादी विचारधारा, मनुक्ख आ ब्रह्माण्ड सभ निरर्थक अछि, अबसर्ड अछि। २ आयातित शब्दावलीबला साहित्य कोना मैथिली पाठक घटेलकै; आ खाँटी शब्दावली कोना मैथिली साहित्यक स्तर ऊँच केलकै, आ पाठक बढ़ेलकै, ई आब ककरोसँ नुकाएल नै अछि। उपन्यास लेल दू-दू बेर बूकर पुरस्कार आ साहित्यक लेल नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित जॉन मैक्सवेल कुट्सी भाषाक सन्दर्भमे कहने रहथि जे अफ्रीकान्स आ अंग्रेजी भाषाक द्विभाषिया माहौलमे हुनकर अंग्रेजी लेखन हुनका लेल बहुत रास संप्रेषण सम्बन्धी समस्या सोझाँ अनैत छल। ओ अफ्रीकान्ससँ अंग्रेजीमे तकर प्रतिकार स्वरूप ढेर रास अनुवाद केलन्हि। मुदा मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (आ किछु ऐ पुरस्कार लेल ललाइत आकांक्षी लोकनि), जे तथाकथित साहित्यकार लोकनि छथि, से जइ प्रकारेँ मैथिली आ हिन्दी दुनूक डोरी पकड़ि माहौल खराप करबामे लागल छथि, से जॉन मैक्सवेल कुट्सीसँ किछु शिक्षा ग्रहण करता, से मात्र आशा कऽ सकै छी। अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे -अपवाद स्वरूप आंचलिक पोथी छोड़ि- हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्टकेँ मैथिलीमे आयात करऽ चाहै छथि, आ ओतबे धरि सीमित रहऽ चाहै छथि, जखन जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइत अछि। तारानन्द वियोगीजीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंकhttps://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ पर वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ओ टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथिन्ह। छपैत-छपैत छपैत-छपैत साहित्यकार कुमार शैलेन्द्रक असामयिक निधन भऽ गेल। विदेह परिवार दिससँ श्रद्धांजलि। विचार अछि जे विदेहक काशीकांत मिश्र "मधुप" विशेषांक ०१ जनवरी २०१५ अंकमे निकलत। सभ गोटासँ आग्रह जे मधुपजीपर केन्द्रित रचना जल्दीसँ ggajendra@videha.com पर पठाबथि। पाठकीय प्रतिक्रिया: विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ। - नचिकेता (मिथिला दर्शन) सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद। -शेफालिका वर्मा १६६म अंक संतुलित अछि। प्रस्तुत अंकमे वियोगीजीक कथा "विजय"केँ ऐ अंकक सर्वश्रेष्ठ रचना कहल जाए तँ दिक्कत नै। हिनक कथाक पहिल पार्टक अपेक्षा दोसर पार्ट बेसी मुखर अछि आ एकर मुल्याकंन पचास साल बाद जा कऽ फड़िच्छ हेतै।
संपादकीयमे जँ कहियो काल देशक राजनीति ओ समाजिक-आर्थिक पक्षपर चर्चा होइ तँ आ रुचिगर हएत से आशा अछि।
विदेहमे पहिल बेर कविता लऽ कऽ एबाक लेल महेश झा डखरामीजीक स्वागत छनि।
आशीष अनचिन्हार
आशीष अनचिन्हार विचारार्थ प्रस्तुत अछि-- हमरा लोकनि बहुत मेहनतिकेँ " भगीरथ प्रयास " कहै छिऐ। ई भगीरथ अपन तपस्यासँ अपन अकाल मृत्यु प्राप्त पूर्वजकेँ मोक्ष दिएबाक लेल गंगाकेँ पृथ्वीपर अनलाह। एकरा एनाहुतो बूझि सकै छिऐ जे भगीरथ अपन व्यक्तिगत काजक लेल ई प्रयास केला। जँ कदा्चित हुनक पूर्वज कपिल मुनिक श्रापसँ भस्म नै भेल रहितथिन तँ भगीरथ ई काज नै करितथि। आब कने मैथिल मलाह जातिमे पसरल महागाथा "दुलरा दयाल" कथापर विचार करी। ऐ महागाथाक अनुसार जखन राजा जयसिंह कमला नदीपर बान्ह बान्हि ओकर मूँह अपना देश दिस घुमा देलकै। आ ऐ कारणे भड़ौरा गाममे अकाल पड़ि गेलै आ जनताक हालति खराप भऽ गेलै तखन दुलरा दयालक सहायतासँ "कोइला वीर" आ "रन्नू सरदार" आ हुनक आन सहयोगी सभ कमला बान्हकेँ तोड़ि हुनक पुरने धार बना देला। आब ऐ दू गोट कथासँ ई स्पष्ट अछि जे भगीरथक प्रयास व्यक्तिगत अछि मुदा कोइला वीरक प्रयास सामूहिक अछि। हमरा जनैत आन देशक नायकसँ प्रेरणा पाबि शब्द ग्रहण करब उचित अछि मुदा अपन नायकक प्रेरणा बिसरि जाबए अधर्म अछि तएँ हमरा जनैत मैथिलीमे बहुत मेहनतिकेँ " कोइला प्रयास " वा "रन्नू प्रयास" कही तँ ठीक। ऐ विषयपर सार्थक चर्चा ओ बहस आमंत्रित अछि। Ashish Anchinhar @all--बहुत गोटाकेँ टैग नै कऽ सकै छी। विदेहक सभ सदस्य बहसमे सादर आमंत्रित छथि। November 19 at 8:06pm · Like
Jha Mahesh आशीषजी, सुन्नर मुद्दा आ जानकारी लेल , साधुवाद । भारतीय वाङमयक उद्दात्त उद्घोष " "उदारचरिता नाम्तु वसुधैव कुटुम्बकम् " [Global village ]. भारतीय औदार्य प्रसंशनीय आ नमनीय सेहो ।इएह विशेष । November 19 at 8:23pm · Like · 1
धनञ्जय झा कोइला के कथा विस्तार स कहू November 22 at 10:07pm · Like · 1
Gajendra Thakur इन्द्रलोकमे रहैवाली कमला। तेँ ने सभ धारक वर्णन इतिहास-पुराण मे छै मुदा कमला धारक नै। इन्द्रलोकमे रहै छली कमला महरानी तेँ। जखन ओ मिथिलामे एली तावत देरी भऽ गेलै। सभ ब्राह्मणकेँ ब्रह्मा कोनो ने कोनो धारक अभ्यर्थनाक भार दऽ देने रहथिन्ह आ से कोनो ब्राह्मण बचबे ने केलै हिनकर अभ्यर्थना करबा लेल। एम्हर मिथिलाक मलाहक जिनगी कमला धार एलासँ सुखितगर भऽ गेलै। ओ सभ खूब माछ मारथि आ बेचथि। से हुनका सभकेँ कमला मैय्यासँ बड्ड सिनेह भऽ गेलन्हि। तखन ब्रह्माकेँ फुरेलन्हि जे किए नै कमलाक अभ्यर्थनाक भार मलाह लोकनिकेँ दऽ देल जाए। से ओ कमलाकेँ कहलखिन्ह जे सिंहवाड़ा लग जे भरौड़ा गाम छै, ओतुक्का बिसम्भर सरदार आ ओकर कनियाँ रानी गजवन्तीकेँ पुत्र हेतै, जकर नाम राखल जेतै दुलरा गर्भी दयाल, सएह भरौड़ाक राजकुमार बनत। ओ तंत्र आ नृत्यमे पटु हएत आ लोक ओकरा नटुआ दयाल कहत। वएह शुरू करत कमलाक अभ्यर्थना।
दुलरा दयालक बियाह भेलै बेगूसराय लग बखरीक दुखहरन सरदार आ तंत्र-नृत्य साधिका बहुरा गोढ़िनक बेटी फूलमती धानीसँ। तिलयुगा लग कमला धारक पूजा शुरू केलक नटुआ दयाल। मुदा बहुरा गोढ़िनक किछु पुरान विद्रोही शिष्य मारि देलक नटुआ दयालकेँ। मुदा कामाख्याक योगिनी जिया देलक नटुआकेँ।
कमला पैघ हेबऽ लगली तँ किसान आ मलाह सभक जिनगी सुखितगर हेबऽ लगलन्हि।
एम्हर उगला बैदला चमारक मोनमे खोट एलै। ओ कमलासँ बरजोड़ी बियाह करबाक मोनसूबा बान्हलक। मलाह लोकनि भोला बाबाक तपस्या केलन्हि आ कमलाक सतीत्व बचेबाक गोहारि केलन्हि। भोला बाबाक वरदानसँ शिवरा गामक मलाह परिवारमे अमर सिंहक जन्म भेल।
कमला पैघ हेबऽ लगली। मलाह कोइलाबीर जकर कुरहड़ि अस्सी मोनक आ कुरहड़िक बेंट चौरासी मोनक रहै, से माटि काटि-काटि कमला लेल रस्ता तैयार करथि। कमला पैघ भऽ गेली।
उगला बैदला कमलाकेँ बान्हि देबाक प्रण केलक। बान्हल कमला जखन ऊपर उठती तँ ओ हुनका घीच लेत आ हुनकर सीथमे सिनूर धऽ देत आ बियाह कऽ लेत।
कमला ई गप कोइलाबीरकेँ सुनेलन्हि। कोइलाबीर माटिक बान्ह काटि देलक आ कमलाक रस्ता साफ भऽ गेल।
मुदा उगला बैदला तँ चामसँ हड्डी निकालबाक कारबार करै छल से ओ सभटा हड्डी मोरंग लग एकट्ठा केलक आ हड्डीक बान्हसँ कमलाकेँ घेर देलक। अपवित्र हड्डीकेँ कोइलाबीर कोना छुबितए। से ओ घुरि गेल। एम्हर अमर सिंह राजा बनि गेला, ओ बाल-ब्रह्मचारी रहथि। हुनकर सात तल्लाक गढ़ छलन्हि जकर दक्षिणमे चाननक गाछ लग सात कोसक घेराबाबला अखराहा छल। कमला ओतऽ गेली आ चाननक गाछपर बैसि गेली। अमर सिंहकेँ लगलन्हि जे कोनो स्त्री अखराहा लग छै कारण ओ बाल-ब्रह्मचारी रहथि आ तेँ हुनका अपन शक्ति घटल बुझना गेलन्हि। ओ तमसेला जे ई स्त्री जँ भेटत तँ ओकरा एक्के घुस्सामे अस्सी हाथ नीचाँ गाड़ि देबै। कमला मुदा नीचाँ आबि गोहारि केलन्हि आ अमरसिंह सत केलन्हि जे ओ कमलाक रक्षा करता नै तँ अस्सी कोस नरकमे खसता।
नौ हाथ नाम आ छह हाथ चाकर रहथि अमर सिंह।
अमरसिंह अखराहामे माटि देलन्हि आ उगला बैदलाकेँ मारलन्हि। उगला बैदलाक कनियाँ गढ़ुआरि छलि, ओकरा अमर सिंह मारि देलन्हि। मुदा तखने जन्मल उगला बैदलाक बेटा बड्ड बलगर छल। कमला अमर सिंहकेँ किछु भेद बतेलन्हि आ तखने ओ उगला बैदलाक बेटाकेँ मारि सकला।
मुदा जखन अमर सिंह बान्ह दिस बढ़ला तँ ओइ हड्डीक बान्ह देख कऽ ठमकि गेला आ कमलाकेँ मीरन फकीरकेँ बजा कऽ अनबा लेल कहलखिन्ह। ओ एला आ हड्डीक बान्हकेँ तोड़लन्हि। (सहस्रशीर्षा उपन्याससँ) November 23 at 3:34pm · Like · 1
Ashish Anchinhar धनञ्जय झा---ओना आब ऐपर विचार हो जे मैथिलीमे भगीरथ प्रयासक बदला जँ "कोइला प्रयास" वा "रन्नू प्रयास" कहल जाए तँ केहन रहतै ? November 23 at 3:39pm · Edited · Like
Gajendra Thakur कोसीक भित्तापर रानू सरदार अपन अस्सी मोनक कोदारि लऽ कऽ जकर बेंट बिरासी मोनक छै, चलि रहल अछि। चलि रहल अछि आगाँ आगाँ रानू सरदार आ कोसी लेल रस्ता बनबैए। गाममे कटनियाँ लगैए आ खेतमे भरना। धरमपुर कऽ तारलेँ माइ कोसिका कबखंड केँ बोरले सिंहेश्वर थान कइले पयान एतै दुख देलेँ हे माइ कोसिका एतै दुख देलेँ आरी चढ़ि रोबै छै किसान अखनी देबौ मैया पोसल पठिया चढ़तै अगहन दूध घर हे बखसुमे बखसु माइ कोसिका करै छी गोहार हे (सहस्रशीर्षा उपन्याससँ) November 23 at 3:41pm · Like · 1
Gajendra Thakur कमला जे पुछे छै सुन बहिन कोसिका हे केहेन छथिन रानू सरदार हे भैंसा सन मनुख गे बहिनो बजर सन गात हे मोँछ रानू कऽ बहिंगा सन सन आब हे कोसिका जे पूछै सुन बहिन कमला हे केहन छै कोइला देव आब हे ताड़ सन मनुख गे बहिना बजर सन गात हे मोंछ जइसन भमरा गुलजार हे गाड़ल जे खुटबा से कोइला देव जाल जे पसारल हे भीत चढ़ि भऽ गेल ठाढ़ हे
कोसीक प्रेमी बाँतर जातिक लोक देवता रानू सरदार। रानू सरदार अस्सी मोनक कोदारि लऽ कऽ जकर बेंट बिरासी मोनक छै, आगाँ आगाँ कोसी लेल रस्ता बनबैए।
आ कोसीक प्रेमी रैय्या रणपाल। उत्तर दिशासँ अबैए रणपाल आ कोसीकेँ देखि कऽ मुग्ध भऽ जाइए। झिमला मल्लाह आ बैदला चमार सेहो कोसीसँ बियाह करऽ चाहैए। हमेँ तोरा पुछियौ रे बैदला जतिया तँ ठेकान रे तोहूँ माँगे हमरो सँ बियाह रे हमहूँ जे छिकियै गे कोसिका ओइछ जाति चमार हे हमेँ मांगियौ तोरे सँ बियाह हे कथी ले खियोलियौ रे बैदला दूध भात कटोरबा रे पोइस-पाइल केलियौ जबान रे तोहूँ जे केलेँ रे बैदला जातियो कुल हरण रे
(सहस्रशीर्षा उपन्याससँ) November 23 at 3:47pm · Edited · Like · 1
Manoj Pathak देशक गाम गाममे प्रायः सब जातिक सब समाजक अपन नायक ओ पूरा ओहि संपूर्ण क्षेत्र विशेषक नायक छथि। कोन नायक छोट, किनक प्रयास निजी हित वा को न प्रयास समाजक हितके लेल कएल गेल ताहि उपरौझमे लगलासँ लाभ नहि, लाभ पैघ लाइन घीचलासँ होइत छैक। भगीरथक स्थान छोट साबित केलासं हम सब अपन सीमित मानसिकताक परिचय देब जखन कि रन्नू सरदार, आ दुलरा दयालके अपन संपूर्ण समाजक नायक स्वीकारि कए आ हुनका स्थापित कए क, अपन उद्देश्यक पूर्ति बेसी नीक जकाँ कए सकब। एखन आवश्यकता अछि मिथिलाक समस्त नायकके स्थापित करबाक, एक सूत्रमे जोड़बाक ने कि ककरो छोट साबित करबामे अपन ऊर्जा खर्च करबाक। November 24 at 5:51pm · Like · 1
Manoj Pathak रन्नू सरदार आ दुलरा दयालक संग मिथिलाक हर जाति विशेषक, क्षेत्र विशेषक नायकक स्मृति ओहि अवसर विशेष अर्थात हुनक जयंती आदि पर एक संग एकजुट भ,क, मनयबाक आवश्यकता अछि। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष द्धारा ऐ वर्ष प्रदान कएल गेल पुरस्कारक विवरणः
१. नेपाल विद्यापति मैथिली भाषा साहित्य पुरस्कार-– श्री रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम— पुरस्कार राशि रु. २ लाख ।
२. नेपाल विद्यापति मैथिली कला–संस्कृति पुरस्कार— श्री श्याम सुन्दर यादव – पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
३. नेपाल विद्यापति मैथिली अनुसन्धान पुरस्कार— डा. वासुदेव लाल दास— पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
४. नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार— श्री चन्द्रशेखर लाल शेखर — पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
५. नेपाल विद्यापति मैथिली अनुवाद पुरस्कार— श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- पुरस्कार राशि रु. १ लाख ।
Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ VIDEHA-Maithili Literature Movement: 166 issues, 11000 manuscripts transcripted,50000 word Maithili-English database maintained,150+ hours audio files; 225+ hours Maithili Video files.+ Modern Photographs/ painting/mithila painting archive/ +scanned versions of Maithili Books for free download, Children literature archive. मैथिली विकीपीडिया http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html http://ultimategerardm.blogspot.in/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html http://ultimategerardm.blogspot.in/2008/01/maithili-language-and-mithilakshar.html http://ultimategerardm.blogspot.com/2014/11/wikipedia-now-in-maithili.html Words and what not Monday, May 09, 2011 The #Bihari #Wikipedia is actually written in #Bhojpuri This is the kind of article that has many people's eyes glaze over. It is about standards, scientific documents and it is about languages most of my readers have never heard about. For the people that do speak one of the languages that are considered Bihari it is extremely relevant and it has implications for Wikipedia. This is information provided by Umesh Mandal that explains about the "Bihari group of languages" in relation to the Maithili language: Kellogg (1876/1893) and Hoernle (1880) regarded Maithili as a dialect of Eastern Hindi; Beames (1872/reprint 1966: 84-85), regarded Maithili as a dialect of Bengali, Grierson has done a great service to Maithili language, however, he erred when he gave a false notional term of "Bihari" language, after that western linguists started categorizing Maithili as a dialect of "Bihari" language; although there is nothing known as "Bihari Language" and both Maithili and Bhojpuri are spoken in Bihar (of India) as well as in Nepal. Umesh is working on the localisation of MediaWiki for the Maithili language and as this language is currently in the Incubator, the language committee does its due diligence and tries to understand if Maithili can have a place in the Bihari Wikipedia. The information provided by Umesh makes it quite clear: "no". This still leaves us with the misnomer that is the Bihari Wikipedia. Apparently the language used for the localisation and the articles is Bhojpuri. Bhojpuri has the ISO-639-3 code "bho". Are you still following all this? Ok, there is one question I am not asking: How about the Kaithi script? Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 4:17 pm Words and what not Sunday, January 27, 2008 The Maithili language and the Mithilakshar script Maithili is a language spoken in India and Nepal by some 24.797.582 people. It is an official language in the Indian state of Bihar and it may be used in education. A request was made for a Wikipedia for Maithili, it conforms to the requirements so that is not a problem. What IS a problem is that Mithilakshar, the script used to write the Maithili language, is not yet part of Unicode. The script has not even been recognised in the ISO-15924 yet. This is the second request for a Wikipedia where the script that is used to write a language presents a problem. For modern Maithili there is the option to write in the Devangari script. Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 10:32 am Words and what not Thursday, November 06, 2014 #Wikipedia - Now in #Maithili It is a happy occasion when a new Wikipedia is created. Today we may welcome the Maithili Wikipedia. The website has been created and all the content that is currently still in the Incubator needs to be migrated. I wish the Maithili community well; I hope they will share with us in the sum of all available knowledge. Thanks, GerardM Posted by Gerard Meijssen at 8:22 am विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/…/bihari-wikipedia-is-a… ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.दुर्गानन्द मण्डल- छुतहरि २.२.कपिलेश्वर राउत-बड़का खीरा २.३.आशीष अनचिन्हार- व्यंग्य निबंध- निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष २.४.ओम प्रकाश झा- बेटीक बिआह दुर्गानन्द मण्डल छुतहरि सिमराक शिवनन्दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहिरन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। विधाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्दरि। मध्यम वर्गीए परिवारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बिआह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरियाती गेल रहथि, सभ कियो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि। बड़-बढ़ियाँ घर-परिवार छल। राजाबाबू बिआहक पछातिओ अध्ययन जाड़ीए रखलनि। नीक-नहाँति पढ़ैले पटनामे नाओं लिखा डेरा रखलनि। छुट्टी भेलापर गामो चलि अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहिल सन्तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्चो तेतबए सुन्दर छल। क्रमश: दुनू बच्चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लिखा देलखिन। बच्चा सभ ओतै रहि पढ़ए-िलखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति खराप हुअ लगलनि। जइसँ ओ दोस्ती-यारीमे पीबए लगला। एक दिनक गप छी, गाम एलाक बाद अधरतियामे जोरसँ हल्ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चिचिया रहल छथि। रातिक मौसम देखि गामक डाक्टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखिन। बिमारी उपकले रहनि। पत्नी विशेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि दुइए मासमे दुखकेँ कन्ट्रोल कऽ लेलनि। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जिद्द कऽ पटना चलि गेला। परिकल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि आ भैया जे पाइ दन्हि आकि नै दन्हि तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बितलै आकि वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली रातिमे राजाबाबू अपना बिछौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चिचियए लगला। निसिभाग राति रहने हो-हल्ला सुनि लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्टी करैत सदा-सदाक लेल शान्त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि गेल। टोल भरिक लोक सभ जागि गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रिस्ता–नाता तोड़ि परमधाम चलि गेल छला। परात भेने बिना बजौने सभ आदमी मिलि बाँस काटि, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि दऽ राजाबाबूक पहिल सन्तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि-जारि सभ कियो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि चलि गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि कुहैक रहल छथि। काल्हि तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रतिमूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहिरि कुहैक रहल छलि। केतए गेलनि भरि हाथ चुड़ी, केतए गेलनि भरि माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि दैत। केना ने बेधि दैत! आखिर वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहियो हुनक पएरो ने देखने रहनि ओ आब मुहोँ देखि रहल अछि। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्हि। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बितबए लगली। सासु-िदयादिनीक गपकेँ छोड़ि अनकर गपपर बेसी धियान दिअ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब किछु लोक हुनका गुरु मन्तर दिअ लगलखिन। आ ओहो नीक जकाँ धियान-बात दिअ लगली। जहिना कहबी छै जे खेत बिगड़ि गेल खढ़ बथुआ सन तिरिया बिगड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि तक ओकर उकासीओ ने कियो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि। बिना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखिया-सरपंचक संग हँसि-हँसि बजै-भुकए लगली। गामक राजनीतिमे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनियाँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्य जिनगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि रंगीन दुनियाँमे चलि आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि हल्का छिटबला साड़ी पहिरए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खिलए लगल। एक दिन मुखियाकेँ कहि-सुनि इन्दिरा अवास स्वीकृति करौलक आ बिच्चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कियो छौड़ा-माड़रि भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दिन जेकरा भाफो नै निकलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बिस्कुटी लोकक चक्कर-चािलमे पड़ि ओ भैंसुरसँ अरारि कऽ अपन हक-हिस्सा लेल लड़ए लगली। लड़ि-झगड़ि सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि जे मन फुड़ै तखनि सएह करए। कियो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कियो किछु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्बै पड़ा गेल। आहि रे बा! परात होइते घोल-फच्चका शुरू भेल ‘कनियाँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि दू दिनक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्बैमे अछि फलल्मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनियाँ गाम घूमि आबथि। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्हर। किछु दिनक बाद जेना-तेना पकड़ि-धकड़ि ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखिमे गर्दा झोंकि कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कियो समझबैक परियास केलनि। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि ओ ओकरा बुझबैत कहलखिन- “सुनू कनियाँ, अखनो किछु ने बिगड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि लिऔ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जातिमे मिला लेत। जाति नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जातिसँ बाड़ि आँगनासँ ई कहैत- “एकरा आँगनमे राखब उचित नै ई कनियाँ कनियाँ नै छुतहरि छी छुतहरि...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल किछु ने बाजि सकलौं, किछु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि नै बूझि पेलौं जे आइ बूझि रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहिआ कऽ पकड़ने अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कपिलेश्वर राउत बड़का खीरा कहबी अछि, पुरुखक भाग आ स्त्रीकगणक चरित्र कखनि बदलि जाएत तेकर कोन ठेकान। सएह भेलै जुगुत लालक जिनगीमे। करियाकाकाकेँ तीनटा बेटीपर सँ एकटा बेटा भेलनि। पहिल पुत्र भेने परिवारमे खुशीक माहौल बनि गेल। छठिआरे दिन पमरिया तीन गोटेसँ आबि ढोलकी-कठझालि आ मजिरा लऽ अँगनामे नाचए लगल। केना ने पमरिया अबैत ओहो तँ गामक चमनि आ अड़ोसी-पड़ोसीसँ सूर-पता लगबैत रहैए। से भनक लगित पहुँच गेल। कखनो बधैया गीत तँ कखनो सोहर, कखनो समदौन गाबए लगल। अँगनामे लोकक भीड़ लगि गेलै। करियाकाका कोनो तरहेँ एक सए रूपैआ आ सबा किलो अरबा चाउर निछौरमे दऽ पमरियाकेँ विदा केलनि। कियो पड़ासी टीप देलकनि- “भाय साहैब पत्थरपर दुभि जनमल हेन तँए दसटा साधु-संतकेँ तथा अड़ोसी-पड़ोसीकेँ नोत दऽ भोज-भात खुऔत जइसँ बच्चाकेँ असिरवाद देत तँ बच्चाकेँ नीक हेतै।” करियाकाका बजला- “ठीक छै।” छठियारक रातिमे दसटा साधु-संतकेँ आ दसटा अड़ोसीओकेँ नोत दऽ भंडाराक इंजाम केलनि। छठिआरक विधि-बेवहार भेला बाद दादी-दादी बच्चाक नाओं रखलनि जुगुत लाल। विहान भेने लौअनियाँकेँ साड़ी-साया-ब्लौज आ एक सए टाका दऽ विदा केलनि। करियाकाकाकेँ मात्र एक बीघा खेत। चारि कट्ठा चौमास बँकिए धनहर। कोनो दू-फसिला तँ कोनो एक-फसिला। खेतीक नव-नव तरिका एलाक बादो करियाकाका पुरने ढंगसँ खेती करथि। छह-सात गोटेक परिवार लेल बीघा भरि खेत कम नै भेल। जँ खेती करैक ओजार आ पानिक साधन रहए। वैज्ञानिक तरिकासँ खेती करैक लूरिक अभाव छेलनि करियाकाकाकेँ। तैपर सँ प्रकृतिक प्रकोप सेहो। कोनो साल दाही तँ कोनो साल रौदी अलगे तबाह केने। तथापि परिवारकेँ कोनो तरहेँ खिंचैत चलै छला। गामोक लोक सभ पुरने ढंगसँ खेती करैत रहए। परिवार मात्र सात गोटेक। अपने दुनू प्राणी, पिता रामधन आ माता-सुमित्रा, आ तीनटा धिया-पुता। एकटा बेटी सासुरे बसैत। करियाकक्काक मन छेलनि जे बेटा पढ़ि-लिखि कऽ ज्ञानवान बनए, मुदा अपना सोचलासँ की हएत। जेकरा प्रति हम जे सोचै छी तेकरो मन आ लगन ओहेन तखनि ने। जहिना जेठुआ हाल भेने किसान तँ धानक विहनि खेतमे खसा लैत अछि आ रौदी भेलापर ओहो विहनिकेँ काटए पड़ै छै। सएह हाल करियाकाकाकेँ भेलनि। बेटा जुगुत लालकेँ पढ़ैले स्कूल पठबैत छेलखिन। मुदा जुगुत लाल स्कूल जाइक बदला रस्तेमे कहियो कबड्डी तँ कहियो तास-तास तँ कहियो गोली-गोली खेलए लगैत। अवण्ड जकाँ करैत रहए। चालि-चलनि केहेन तँ केहनो फुनगीपर पाकल आम किए ने होइ जुगुत लालक लेल तोड़नाइ बामा हाथक खेल छल। केकरो वाड़ी-झाड़ीमे लतामक गाछसँ कहुना तोड़ि संगी-साथीकेँ खिआ दैत। कोनो चिड़ै-चुनमुनीक खोंता उजारि अण्डाकेँ छूबि सरा दैत। कियो गाए वा भैंसकेँ पाल खुअबैले विदा हुअए आ जुगुत लाल जे देखैत तँ ओकरे संग लागि इहैत-इहैत करैत घुरए। गैवार-भैंसवारसँ कहबो करैत नीक साँढ़-पारासँ पाल खुआउ जइसँ बाछा हुअए आकि बाछी, पारा हुअए आकि पारी नीक नश्लक हएत, दुधगर माल हएत नै तँ पुष्टगर बाछा वा भैंस हएत। एवं तरहेँ कोनो ने कोनो उपराग, उलहन माए-बापकेँ सभ दिन सुनए पड़ै। तंग भऽ गेल माए-बाप। जुगुत लालक उमेर आब बारह-चौदह बर्खक भऽ गेल छल। जहिना पहिल सीख केकरो माए-बापसँ भेटै छै, दोसर सीख समाजसँ आ तेसर स्कूल आ देश-विदेशसँ भेटै छै, तइमे जेकर बुधि, विवेक, ज्ञान जेहेन रहै छै से अपनाकेँ ओइ रूपमे ढालि लइए। मुदा जुगुत लालले धनिसन। ठेलि-ठुलि कऽ सतमा तक पढ़लक। किएक तँ सरकारो दिससँ मास्टर सभकेँ आदेश भेटल छै जे ‘केकरो फेल नै कएल जाए।’ समए बीतैत गेेल, जखनि जुगुत लाल सोलह-सतरह बर्खक भेल तँ माए-बाप सरस्वती कुमारी नामक लड़कीसँ बिआह करा देलकै। करियाकक्काक मनमे रहनि जे बिआह करा देबै तँ कहीं पत्नी एलासँ सुधरि जाएत। बिआहक बाद जुगुत लाल मोबाइल लऽ हरिदम गीते-नादक पााछू अपसियाँत रहए लगल। माए-बाप सोचथि जे उझट बात आकि एक थप्पर मारि देबै आकि हाँट-दबार करबै तँ कहीं केतौ भाग ने जाए। मन मसोसि कऽ रहि जाए। संयोग भेलै एक दिन रमेश- जुगुत लालक पित्ती- एकटा बिजू आमक गाछक थल्ला काटि रहल छला। जुगुत लाल देखैत छल। देखलक जे बिजू आमक थल्लाकेँ कलकतिया आमक गाछ लग गाड़ि देलकै आ कलकतिया आमक नीचला डारिकेँ चक्कूसँ कनीयेँ छीलि कऽ सरहीकेँ सेहो छीिल दुनूकेँ सटा कऽ बान्हि देलकै। कनी दिनक पछाति मुड़ीकेँ बन्हलाहासँ कनी ऊपर काटि देलकै। आब भऽ गेल सरहीसँ कलमी। जुगुत लालक माथामे जेना चोट पड़लै। जहिना माघक शितलहरीमे कड़गड़ रौद उगिते सभ रौद ताप दौगैत अछि, तहिना जुगुत लालकेँ भेलै। वाड़ीमे चारिटा सजमनिक गाछ तीन-चारि हाथक भेल छेलै कनियेँ हटि कऽ तीन गो खीराक लत्ती छेलै ऊहो दू तीन हाथक भेल छेलै। सजमनि आ खीरा, दुनू लत्तीकेँ सुतरीसँ बान्हि देलकै। जड़िक बगलमे सड़लाहा गोबर दऽ माटि चढ़ा देलकै। पिता तँ पहिनै खेतकेँ एकसलिया गोबर सड़ा कऽ छीटने छला आ खेत तैयार केने छला। कीड़ाक प्रकोप द्वारे पहिने नीक पत्ताकेँ सड़ा, तमाकुलक डाँटकेँ डाहि, गाइयक गोंतक संग मिला कऽ खेतमे छीटने छला। सजमनि आ खीरा दुनूक लत्ती भोगगर भेलै। बरसातक बुढ़ापाक समए छल। पानिक जरूरत कमे पड़लै। जाबे अपन मन कोनो काजक दिस आगू नै बढ़त, ताबे अनका जोरे-जबरदस्तीसँ बुधिक गठरी नै ने खुलै छै। बीस-पचीस दिनक बाद सजमनिक मुड़ीक बन्हलाहाक एक ठुट्ठी ऊपरसँ काटि देलकै आ खीराक मुड़ीकेँ रहऽ देलकै। नीक जकाँ जखनि गाछ लागि गेलै तखनि खीराक जड़ि हटा देलकै। नीक जकाँ जखनि गाछ लागि गेलै आ फूल-बतियाक समए एलै, तखनि गाछक जड़िमे डेढ़ बीत हटा कऽ डी.ए.पी खाद लगभग सए ग्राम सेहो छीटि देलकै आ थोड़ेक पानि देलकै। एक हाथसँ ऊपरे खीरा फड़लै। अड़ोसी-पड़ोसी मचानसँ लटकल खीरा फड़ल देखै तँ बिसवासे ने होइ जे खीरा छिऐ आकि कैता आकि सजमनिक बतीया। मुदा जखनि लग जा कऽ देखै तँ छगुन्ता लगि जाइ। पिताकेँ फुट्टे छाती जुरै जे आब बूझि पड़ैए जुगुत लाल सुधरत। सरकार दिससँ ओही साल मधुबनी स्टेडियममे फल-फूल, तरकारी-फड़कारीक प्रतियोगिता, जिला स्तरपर आयोजन कएल गेल छल। सरकारक उदेस छल हरित क्रान्ति दिस किसानकेँ प्रोत्साहित कऽ देशकेँ आगू बढ़ेबाक। जिला भरिक किसान अपन-अपन जे नीक कदीमा, सजनि, मुरै, ओल, मिरचाइ इत्यादि सभ तरहक तरकारीक मेला लगल छल। सभ कियो अपना-अपना आगूमे जेकर जे सामान छेलै से लऽ कऽ बैसल छल। मुरैए छेलै तँ दू-दू हाथक, सजमनिए छेलै तँ दू-दू हाथक, कदीमे छेलै तँ तीस-तीस-चालिस-चालिस किलोक, ओले तँ पनरहसँ बीस-बीस किलोक। मिरचाइओक गाछ छेलै तँ एक हाथक गाछ आ लुबधी लगल मिरचाय फड़ल, फूले रहै तँ रंग-बिरंगक। रंग-बिरंगक दोकान जकाँ फल, फूल सजौल छल। जुगुत लाल सेहो अपन तीनटा खीराकेँ लटकौने छल, बाँकी पथियामे रखने छल। खीरा देखि-देखि एके-दुइए देखिनिहारक भीड़ लगि गेल। पूसा फार्मक कृषि वैज्ञानिक सभ सेहो छला। ऊहो लोकनि जुगुत लालक खीरा देखलनि। हुनको सभकेँ छगुन्ता लगि गेलनि। जुगुत लालक संग राय-मसबिरा केलनि। स-विस्तार जुगुत लाल खीराक उपजाक बारेमे कहलकनि। अन्तमे पुरस्कारक बेर जिलाधिश महोदय घोषणा केलनि जे खीराक उपजामे प्रथम पुरस्कार जुगुत लालकेँ देल जाइए। अही तरहेँ केकरो अल्लू, तँ केकरो कदीमा, तँ केकरा सजमनिमे, जेकर जेहेन बौस रहै तेहेन पुरस्कारक संग प्रशस्ती-पत्र देल गेलै। पूजाक वैज्ञानिक जुगुत लालकेँ संग लऽ पूसा फार्म लऽ गेलखिन। आ फार्ममे उन्नति खोज विभागमे कोनो पदपर पदस्थापित कऽ देलकनि। शनि-रविकेँ अठबारे जुगुत लाल गाम आबए, फार्ममे नीक-नीक तरकारी आ फल-फूल, धानक बीज इत्यादिकेँ उन्नति किसिमक सभ बनबऽ लागल। आइ वएह जुगुत लाल दस कट्ठा भीठबला जमीन खरीद रंग-बिरंगक कलमी आम गुलाब खास आम्रपाली, सिकूल, सिपिया, गुलाब भोग आदि तैसंग गुल जामुन, बेल, धात्रीम, लताम, अनार, शरीफा इत्यािद रंग-बिरंगक फल सभ लगौने अछि। अपन चारि कट्ठा चौमासमे शोध केलहा कोबी, सजमनि, खीरा, मुरै ओल सबहक खेती करैत अछि। समाजोमे क्रान्ति जगलै, देखौंस केलक तँ समाजक रंगे बदलि गेलै। करियाकेँ जुगुतक खेती देखि छाती तँ जुड़ाइए गेलै जे केतौ-केतौ बजबौ करथिन- “देखू ठहलेलहा जुगुत लालकेँ, की करैत की भऽ गेलै।” लोको कहै- “तँ ठीके, केलासँ की नै होइ छै।” आब तँ जुगुत लाल बाबू जुगुत लाल भऽ गेल। भगवानोक लीला अजीव अछि, तइमे कर्मेक प्रधानता देल गेल अछि। कर्म करबै तँ फल निश्चित भेटत। भाग भरोसे केतेक दिन जीब। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार व्यंग निबंध निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष सभकेँ सभ तरहँक निसाँ होइत छै हमरो अछि। बहुत लोकक निसाँ देखार होइत छै मुदा हमर भितरिया अछि। किनको पाइकेँ निसाँ छनि तँ किनको जमीनकतँ किनको नौकरीक तँ किनको किछु मुदा हमरा सभ समय यूनिक चीज रखबाक आदति अछि तँए हमर निसाँ सेहो यूनिक अछि। हमरा गुट-निरपेक्ष बनबाकनिसाँ अछि। हम सदिखन निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष बनबाक प्रयासमे रहैत छी। सभ तरहँक निसाँ सुलभ छै मुदा हमर निसाँ बड़ कष्ट साध्य। बड़-बड़ करतब करऽ पड़ै छै ऐमे। मोनकेँ अनेको तरहसँ असफल रूपें मनबऽ पड़ै छै।असफल रूपेम ऐ दुआरे जे संसारक तँ नियमे छै जे जँ हम अपना आपकेँ "निष्पक्ष" कहै छिऐ ताहिसँ स्पष्ट भऽ जाइत छै जे हम "केकरो" पक्षमे छिऐ।वस्तुतः बिनु केकरो पक्ष लेने हम "निष्पक्ष" भैए ने सकै छी। ओना संसारमे बड़का-बड़का भूप सभ छथि। मानि लिअ जे हम कहलहुँ जे "हम सत्यक संगमेछी" आब एहीसँ स्पष्ट भऽ जाइत छै जे हम "सत्यक पक्षमे छी" तखन फेर हम निष्पक्ष कोना भेलहुँ ? तँए कहलहुँ जे ई निसाँ बड़ कष्ट साध्य छै। बड़ करतब करऽ पड़ै छै। नील-टिनोपाल देल धोती पहीरि कऽ मंचपर बैसि कऽ हम "निष्पक्ष" बनि जाइत छीआ अपना आपकेँ भरममे राखि लैत छी। उदाहरण देब हमरा अभीष्ट नै मुदा ई जग-जाहिर अछि जे कोनो महापुरूष वा क्रांतिकारी वा युग-प्रणेता अपना आपकेँनिरपेक्ष नै कहला अछि। महात्मा गाँधी की सुभाष चंद्र बोस की नेहरू की भगत सिंह। ओ लोकनि सभ दिन अपन पक्ष प्रस्तुत कऽ ओइपर अड़ल रहला।गप्प चाहे नेल्सन मंडेलाक हो की मार्टिन लूथर किंग केर ईहो सभ कहियो अपनाकेँ निरपेक्ष नै कहला। जँ मध्यगुगमे चली तँ ने भगवान महावीर आ नेभगवान बुद्धे अपनाकेँ निरपेक्ष कहला आ ने हुनक विरोधी। तइसँ पाछू चली तँ भगवान कृष्ण तँ साफे-साफ अपनाकेँ "निरपेक्ष" मानबासँ मना कऽ देने छथि।जँ गीता केर निचोड़ देखी तँ ई साफे बुझाएत जे " निरपेक्ष" आ "नपुंसक" एकै थिक। राम की परशुराम की आन सभ अपन-अपन पक्ष संसारक सामनेरखला। एतऽ धरि जे रावण, कौरव, बुद्ध-महावीर युगीन कर्मकांडी आ अंग्रेजसँ गोडसे धरि सभहँक अपन पक्ष छलै। मुदा ई सभ देखितो हम अपनाकेँ"निरपेक्ष" कहि रहल छी तकर कारण छै आ ओकरा ऐठाँ देब जरूरी नै। ओना हम ई कहि दी जे हम अपना मोने ई निसाँ नै चुनलहुँ। हमरा संसारक बड़ अनुभव अछि आ हम देखलहुँ जे विरोध करबै तँ किछु नै भेटत आ चमचइकरबै तखन सभ दूसत तँए बहुत मंथन केर बाद हम निरपेक्षताक चद्दरि ओढ़ि लेलहुँ। मने दुन्नू हाथमे लड्डू। विरोधो नै करबै आ ने चमचइ करबै से मोनमेअछि। भने हमर नाम महापुरूष वा क्रांतिकारी वा युग-प्रणेताक रूपमे नै आबए तात्काल तँ हम राजा-महराजा सन छी हमरा लेल सएह बहुत अछि। हमआशीष अनचिन्हार, पिता श्री कृष्ण चंद्र मिश्र, गाम भटरा-घाट, थाना बिस्फी, जिला मधुबनी, प्रांत-बिहार, गोत्र-शांडिल्य,मूल सोदरपुरिये-सरिसब,एखन धरिअविवाहित पूरा होशो-हवासमे घोषणा करै छी जे हम "निरपेक्ष-गुट-निरपेक्ष" छी। हमरा कोनो वस्तुसँ जोड़ि कऽ नै देखल जाए। आब हम विआह किए नै कऽरहल छी से नै पूछू। हमरा डर अछि जे लोक कहीं ई नै पूछए जे सरकार बाल बच्चाक समयमे "निरपेक्ष" रहलिऐ की नै? ओना ऐमे डरेबाक कोनो प्रेश्ने नैछै। जमीन पलटि जाइ छै. अकास पलटि जाइ छै बसातो पुरबा-पछबाक बदला उतरा-दछिना भऽ जाइ छै तखन बाल-बच्चाक समय जँ निरपेक्षता छोड़ि हम"पक्षी" बनब तँ कोन अपराध। लोक किताबमे प्रगतिशील बनि अपन बेटीक प्रेम-विआहक विरोध करैए। पुरस्कार प्रतिनिधिक विचारक विरोध कऽ फेर ओकरेहाथसँ पुरस्कार लैए आ जखन ई सभ अपराध नै छै तखन हमहीं जँ पलटि जाएब तँ कोन अपराध। ओना पलटि गेनाइ अपराध तँ नै छै मुदा हम ईहो बूझैछी जे भने मिनट-दू मिनट लेल हम कूदि-फानि ली मुदा ई निसाँ पूरा जीवन नै चलत। रंगल सियारक रंग सेहो एक दिन उतरल रहै आ हमहूँ तँ रंगलेमनुख छी ने? मुदा जा धरि चलै छै चलऽ दियौ। जहिया निसाँ उतरतै देखल जेतै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश झा बेटीक बिआह आँगनमे बिआहक गीत चालू छल। दरबज्जापर पाहुनक मेला लागल छल। आइ देवकांतक बेटीक बिआह छै। देवकांत एकटा किसान छथि। हुनकर दू गोट सन्तानमे सुलेखा जेठ छन्हि आ शरत छोट। ओ बेटा-बेटीमे कहियो कोनो अन्तर नै बूझलखिन्ह आ दुनूकेँ समान रूपेँ पढ़ाइ-लिखाइ करबौलखिन्ह। एकर नतीजा सेहो नीक रहल जे सुलेखा नीक संस्थानसँ एम.बी.ए.क डिग्री लऽ कऽ एकटा प्राइभेट कंपनीमे नीक नौकरी प्राप्त केलन्हि। बेटा शरत सेहो इंजीनियरिंगक पढ़ाइ कऽ रहल अछि। बेटीक शिक्षा-दीक्षा पूर्ण भेलापर आ नौकरी भेटलापर देवकांत ओकर बिआहक तैयारी शुरू केलथि। सर-कुटुम आ मित्र-मण्डलीसँ एकटा नीक बर ताकबाक अनुरोध केलथि। पढ़ल-लिखल नौकरिहारा बेटी लेल सुयोग्य वरक खोजमे जहाँ-तहाँ अपने सेहो गेला। मुदा सभठाम बेवस्थाक नाओंपर मुद्राक माँग एते भयावह छल जे ओ मुँह लटकौने गाम आबि जाइ छला। सुलेखाकेँ जखनि ऐ तरहक फिरिशानीक पता चलल तँ ओ अपन माएकेँ कहलक- “बाबूकेँ कहुन जे हम अपन सहकर्मी हेमंतसँ बिआह करऽ चाहै छी।” हेमंत सुलेखा संगे काज करै छथि आ ओकर नीक संगी सेहो छथि। मुदा ऐ प्रस्तावपर देवकांत तैयार नै भऽ तमसाइत बाजला- “हेमंत अपन जातिक बर नै छै आ अनजातिमे अपन बेटी बियाहि कऽ हम समाजसँ भतबड़ी नै कराएब।” देवकांतक ई रूप देखि सुलेखा सहमि गेली आ सकदम भऽ पिताक गप मानबाक सहमति दऽ देली। पुरजोर ताक-हेरक पछाति देवकांतकेँ एकटा वर सुलेखा लेल भेटलन्हि। बरक पिता नंदलाल अपन आई.आई.टी. इंजीनियर, उच्च पदपर सेवारत बेटा शैलेश लेल सुलेखाक प्रस्तावपर मंजूरी देलन्हि। मुदा बिआह रातिक खर्चक माँग सेहो केलन्हि। देवकांत पुछलखिन्ह- “बिआह रातिक खर्च केतेक हेतै।” नंदलाल कहलखिन्ह- “ई अहाँ अपनेसँ विचार कऽ लिअ आ हमर सबहक हैसियत आ लड़काक योग्यता देखैत खर्च बिआहसँ पूर्व हमरा लग पठा दिअ।” देवकांत अपन जमा-पूजी तोड़ि पाँच लाख टाका अपन पुत्र- शरत-क मार्फत बिआहसँ दू दिन पूर्व पठा देलखिन्ह। पाँचे लाख टका देखि नंदलालक पारा चढ़ि गेलन्हि आ ओ शरतक फजहति करैत बजला- “हम पच्चीस लाख आ बीस लाखक कथा छोड़ि अहाँ ओइठाम सम्बन्ध कऽ रहल छी से की ऐ भीखमङ्गीए लेल!” शरत बाजला- “ई अहाँ हमर बाबूसँ कहियनु, हम की कऽ सकै छी।” खैर बिआहक दिन आएल आ नंदलाल वर-बरियाती साजि देवकांतक दरबज्जापर एला। बरियाती दुआरि लगि गेल छल आ नश्ता-पानि इत्र-फुलेलसँ हुनकर सबहक सुआगत होमए लगल छल। नंदलाल अपन होइबला समधि- देवकांत-केँ बजा कऽ कहलखिन्ह- “बिआह रातिक समुच्चा बेवस्था अहाँ नै पठेलौं, मुदा तखनो हम आएल छी किएक तँ हम सभ भलामानुस छी। अहाँ आर पाँच लाख टका अबिलम दिअ तँ वर वेदीपर जाएत।” देवकांत अकाससँ खसला आ नंदलालक निहोरा करैत बाजला- “अखनि पाँच लाख केतएसँ आनब। बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखइमे सभ जमा पूजी पहिनहि खरच भऽ गेल अछि। अहाँ अखनि बिआह हुअ दियौ। हम गछै छी जे शनैः शनैः हम अहाँक पाँच लाख टका आर दऽ देब।” मुदा नंदलालपर ऐ निहोराक कोनो प्रभाव नै पड़लन्हि आ ओ जिद्द ठानि बैसि गेला जे पाइ एखने चाही। कनी कालमे ई बात आँगनधरि पहुँच गेल जे जावत नंदलालकेँ पाँच लाख टका आर नै भेटतै तावत बिआह नै हेतै। सुलेखा अपन बापक दुर्दशा आ समाजक बेवहारसँ बेथित भऽ गेल छेली। हुनकर माए हुनका लग बैसि कऽ कानए लगली जे आब की हेतै। ओ बाजली- “हुनका कहैत रहियनि जे बेटी-बिआह लेल पाइ जमा करू मुदा ओ हमर नै सुनलनि आ सबटा पाइ बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखाइपर खर्च कऽ लेलनि। ई बेइज्जती लऽ कऽ केना जीअब हम, सभटा हुनके किरदानीसँ भऽ रहल अछि।” बापक दुर्दशा आ बेइज्जती सुनि सुलेखाक आँखिमे पानि भरि आएल। कनीकाल तँ ओ माइयक विलाप सुनैत रहलि। फेर ओ ठाढ़ भऽ गेल आ अपन नोर पोछि दलान दिस बढ़ि गेलि। दलानपर पाहुन-परक आ दोस्त-महिमक बीचमे ओकर सहकर्मी हेमंत सेहो बैसल छल। ओ सोझहे हेमंत लग गेलि आ ओकर हाथ पकड़ि पुछलक जे अहाँ अखनि हमरासँ बिआह कऽ सकै छी। हेमंत कहलक किएक नै, ई तँ हमर सौभाग्य हएत जे अहाँ सन पढ़ल लिखल सुन्नरि कनिञाँसँ हमर बिआह हएत। सुलेखा हेमंतकेँ लेने वेदीपर पहुँचली आ पंडितजी केँ कहलखिन्ह जे हमर आ हेमंतक बिआह संपन्न कराैल जाए। ई समाद दलानपर पहुँचल आ सौंसे अनघोल भऽ गेल। नंदलाल आ देवकांत आँगन दिस दौड़ला। देवकांत बेटीकेँ कहलखिन्ह- “ई की कऽ रहल छी अहाँ? हमर पगड़ी किएक खसा रहल छी!” सुलेखा बाजली- “एकटा नीक आ सुलझल वरसँ हमर बिआह भेलासँ अहाँक पगड़ी खसि रहल अछि बाबूजी? आ ई दहेजक राक्षस जे अहाँकेँ नोचि रहल अछि ऐसँ अहाँक सम्मान बढ़ि रहल अछि की? अहाँ पहिने पाँच लाख टका दऽ चुकल छिऐ आ ऊपरसँ आर पाँच लाख? किएक बाबू किएक? हम स्त्री छी, की ई एकर प्रायश्चितमे ई टाका अहाँ दऽ रहल छिऐ? कर्जा लऽ कऽ जँ अहाँ ई टका ऐ दहेज-दानवकेँ दैयौ देबै तँ की ई हमर सुखमय जीवनक गारंटी देता? अहाँ ओइ कर्जाक भारसँ दाबल कुहरैत रहब तँ की हम सुखी रहब? नै बाबू नै हम आब किन्नौं ऐ दहेज-दानवक बेटासँ बिआह नै करब आ हम हेमंतसँ बिआह करब।” हेमंत आगू बढ़ि देवकांतक पएर छूबि बजला- “बाबूजी, अहाँ हमरापर बिसवास करू। सुलेखा ठीक कहै छथि। अहाँ अपन बेटीकेँ पढ़ा लिखा सुयोग्य बनेलौं। तेकर बादो बेटी हेबाक प्रायश्चितमे अपन देह बेचबाक तैयारी किएक केने छी? अहाँ स्वीकृति दियौ तँ हम सभ बिआह करी।” देवकांतक मोनमे समाजक डर छेलनि जे परजातिमे बिआहसँ भतबड़ी भऽ जाइत। मुदा दोसर दिस नंदलाल जकाँ राक्षसक डर सेहो छेलन्हि। कनीकाल विचार केला उपरान्त बजला- “हाँ सुलेखा, अहाँ ठीक कहै छी। विआहक उपरान्त ई दहेज-दानव अहाँसँ की बेवहार करत, एकर कोनो गारंटी नै। आ समाज की कोनो हमरा मदति केलक अहाँकेँ पढ़ेबा-लिखेबामे आकि बेवस्थाक टाका गानैमे। हम समाजसँ किए डरू? हम अहाँकेँ सुयोग्य बनेलौं आ आगू अहाँक जिनगी जाइसँ सुखमय रहए, तेहने काज हेबाक चाही। जाउ हम अहाँकेँ असिरवाद दइ छी। अहाँ हेमंत संगे बिआह करू आ नंदलालजी बरियाती लऽ कऽ अपन गाम जाथु।” बाजा-गाजा फेरसँ बाजए लगल। बेदीपर हेमंत आ सुलेखा बैसल आ मंत्रोच्चार शुरू भऽ गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार ३.२.बिन्देश्वर ठाकुर ३.३.कुन्दन कुमार कर्ण- गजल ३.४.१.इरा मल्लिक २.अशरफ राईन आशीष अनचिन्हार दू गजला कुरता सौंसे पसरल छै झगड़ा सौंसे पसरल छै गाछक पातक आ फूलक चरचा सौंसे पसरल छै जीबछ कोशी बागमती कमला सौंसे पसरल छै मंदिर मस्जिद गिरजा हो भगता सौंसे पसरल छै दिल्ली भेटत बाटेपर पटना सौंसे पसरल छै खादी भागल काते कात चरखा सौंसे पसरल छै बेंगक टर टर सुनि सुनि कऽ बरखा सौंसे पसरल छै पानिसँ बेसी मटिया तेल धधरा सौंसे पसरल छै मंझा चाहै गुड्डी तँइ धागा सौंसे पसरल छै ताड़ी लबनी पासी भाइ चिखना सौंसे पसरल छै सीता जनमै एकै गो रामा सौंसे पसरल छै पाचक भागै दूरे दूर कर्ता सौंसे पसरल छै चोरी लूट डकैतीके खतरा सौंसे पसरल छै छिटलहुँ खाद मुदा तैयो खखरा सौंसे पसरल छै लोटा थारी बाटी चुप्प तसला सौंसे पसरल छै सूदिक सुख मूरे जानै कर्जा सौंसे पसरल छै अनचिन्हारक संगे संग फकड़ा सौंसे पसरल छै सभ पाँतिमे 222+222+2 मात्राक्रम अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल छै। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु सेहो छूटक तौरपर अछि। किछु शेरक पहिल पाँतिक अंतिमलघुकेँ संस्कृत व्याकरणानुसार दीर्घ मानल गेल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिन्देश्वर ठाकुर ** गीत ** १ बियाह बियाह घोसैत रहलौं सेहो ने भेल हमर नवकी भौजी ...........२ दियौ न अहू बेर कराइ ए हमर नवकी भौजी ..........२ भैयासँ कहियौ अहाँ बाबुके मनैयौ हमर नवकी भौजी दियौन लगन जगाइ हमर नवकी भौजी बड़कीसँ कहलौं भौजी छोटकीसँ कहलौं हे तब गेलौं मायोके दुवार हमर नवकी भौजी ए हमर नवकी भौजी भेलै ने तैयो कोनो जोगार हमर नवकी भौजी अहिपर लागल भौजी आब मोर आस हे तोड़ू ने भौजी अहाँ हमर बिश्वास हे दियौ न जल्दी मौर चढाइ हमर नवकी भौजी दियौं न बियाह कराइ हमर नवकी भौजी .... २ जनकपुरमे अलु बेचै छे तीनकौरियामे कोबी गे ....... 2 सब छौडाके गै गै गै गै गै गै सब छौडाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे ......... 2 ढोढी तोहर इनार लगै छौ देह तोहर कचनार बुझाइ छौ केश तोहर जे मेघोसँ कारी कपडा आरपार देखाइ छौ एहन सुन्दर फिगर देखि कS कोना ने मरतौ धोबी गे सब छौडाके गै गै गै गै गै गै सब छौडाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे ........ सुटुर छौडाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे चन्दे बनियाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे..... आबो कनी सुधरि जो गे छौडी कौडी फसाएब बिसरि जो गे छौडी ठैक ठेठा कऽ सब मुन्साके लुटि कऽ लाएब बिसरि जो गे छौडी इकराहीमे कचरी बेचै छे जोगियारामे फोफी गे .........2 सब छौडाके गै गै गै गै गै गै सब छौडाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे .........2 बुढ्बो सबके पागल ...... तोहर ढोढी गे जुअनको सबके पागल ....... तोहर ढोढी गे सब छौडाके पागल बनेलकौ छौडी तोहर ढोढी गे ......... ३ कऽ कऽ देखू प्यार सजनी जिनगी लुटा देब ..........२ दैबो ने देत ओते जते दुलार देब हाथेसँ हम दूध पिलाएब खुवाएब मलाइ महँगा भिटामिन खुब खुवाइ अहाकेँ मोटाएब सेउ, सुन्तला, केरा भोरे उठिते अनार देब कऽ कऽ देखू प्यार सजनी ...... लुटा देब दैबो ने देत जते .......... दुलार देब मोनक हम रानी बनाएब दिलमे छुपाएब चान्द तारा लाबि अहाकें चेहरा सजाएब टिका, नथिया, बिचिया आरो हिराके हार देब कऽ कऽ देखू .......... लुटा देब दैबो ने देत .......... दुलार देब ४ राजा जी हमरा सँ करै नै छै प्यार हे नै जानि कोना अते भेलनि गजदार हे हम त केने रहूँ उनके ला शृङ्गार जबानी जियान भऽ गेलै ......२ हम उनका संगे रही ओ हमरा संगे रहे मुदा ने कहियो किछो अपना बारेमे कहे .......२ एक दिन अएलनि सैंया बिजुली गिरा कऽ करिया मुझौसी एकटा सौतीन उठा कऽ हमर उड़ि गेल होस हबास जबानी जियान भऽ गेलै हम त केने रँहू .....शृङ्गार जवानी जियान ......भऽ गेलै लागे भाग हमर अछि फुटल तखने स्नेहक डोरी टुटल जिनका जानसँ बेसी चाहूँ ओहे बिच बाटमे रुसल ........२ लगैय देहमे ने कनियो प्राण छै सारा संसार जेना एक समसान छै आब बुझु हमर जियब बेकार जवानी जियान भऽ गेलै हम तँ केने रहूँ .......शृङ्गार जवानी जियान .......भऽ गेलै ५ सेब सनके लाल छियै देखऽमे कमाल बड बबाल छियै यै ....2 अहाँके ने कोनो जबाब लाजबाब छियै यै .....2 मुँह लगैयऽ जेना दूधोसँ उज्जर चलि जेतै अहाँ सङ्गे रानी यै गुज्जर पाबी अहाँकेँ भेलौ हम मलेमाल बड बबाल छियै यै ......2 अहाँकेँ ने कोनो जबाब लाजबाब छियै यै .....2 अहाँके सङ्ग रानी जिनगी बितेबै मरलोके बाद धनी अहींकेँ कहेबै जुटल ई नेह अहाँसँ हमर सालो साल बड बबाल छियै यै ......2 अहाँकेँ ने कोनो जबाब लाजबाब छियै यै .....2 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। कुन्दन कुमार कर्ण गजल दुख केर मारल छी ककरा कहू केहन अभागल छी ककरा कहू हम आन आ अप्पनकेँ बीचमे सगरो उजारल छी ककरा कहू नै जीत सकलहुँ आगू नियतिकेँ जिनगीसँ हारल छी ककरा कहू बनि पैघ किछु नव करऽकेँ चाहमे दुनियाँसँ बारल छी ककरा कहू कुन्दन पुछू संघर्षक बात नै दिन राति जागल छी ककरा कहू मात्राक्रम : 221-222-2212 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.इरा मल्लिक २.अशरफ राईन १ इरा मल्लिक कविता जिनगीक राहमे, धूप छाँह बहुत छैक| संग अहाँक पाबि, मोनमे ई अहसास जागल, धूप हो कि छाँह हो, अहाँक स्नेहक तपीसक सन्मुख, धूप की? छाँह की? किनको किछु सामर्थ्य की! सब भऽ जाइत अछि, सामर्थ्ययहीन! शक्तिहीन! रौद तँ रौद अछि, दहकैत! भकाभक तेज! लाल-लाल! आगि उगलैत गर्म गर्म! कतहु त्राण नै! किंतु!! अहाँक स्नेह पाबि, ई तीख रौद, बदलि जाइत अछि ! गंध पुष्प मे!! हमर जिनगीक राहमे सुख फूल जकाँ बिछ जाइत अछि! चानन शीतल छाँह बनि, सुरभित सुवासित बाट, गन्ध मादक नगर , बनि जाइत अछि! अहाँक स्नेह-डोरि पकड़ि हम, ओइ नगरमे घुमैत छी, बनि बावरि ! मतवारि! अइ गली! ओइ गली! हमरा नीक लगैत अछि, धूप छाँह भरल , जिनगीक ई रंग! अइमे! अहाँक प्रीतक समर्पण, सामीप्य पाबि, सिमटि जाइत छी, ओइ गेह मे! जतय अहाँक ,मजगूत दुनू, बाँहिक घेरा अछि! मजगूत दुनू बाँहिक घेरा अछि!! ओइ बहुपाशक घेरमे, हमर एक सुंदर संसार बसल अछि! ओइ मजबूत परिधिमे, हमर सुख ,चैनक बसेरा अछि! हमर सुख ! चैनक बसेरा अछि!!! २ अशरफ राईन , सिनुरजोडा ,धनुषा , नेपाल , हाल :कतार कता रुप अहाँक देख दिल पकड़ि कूदि रहल छलौं अहाँक खुशी सङ हमहूँ झुमि रहल छलौं सपनामे रखैत छलौं सटा कऽ करेजसँ बिपनामे अहाँक फोटोकेँ चुमि रहल छलौं गीत सपना सपने रहि गेल चमकैत चेहरा चान्द सन देख मन मे उठल तुफान बना कऽ दुल्हिन सजा कऽ लैतौं घर बनैतौं उनका जान । इन्तजार छल हमरा ओइ घड़ी के घुङ्हट हटा कऽ देखतौं मनक परी के बहल पुरबा संग हमर मित बहि गेल देखल सपना हमर सपने रहि गेल।। हृदय मे उनका छुपा क रखितौं मनक बगैचामे सजा कऽ रखितौं कोइ तोड़ि नै लऽ जाए ओइ फूल केँ तही लऽकऽ बगैचाक माली बनितौं। मिला कऽ हाथ रहितौं सङ्गे साथ करितौं मीठ-मीठ प्रेमक बात बिधिक बिधान केहन रहल दू जान एक बनल खार भेल दू बाट । । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १,कुन्दन कुमार कर्ण- बाल गजल २.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल १ कुन्दन कुमार कर्ण बाल गजल फूल पर बैस खेलै छै तितली डारि पर खूब कूदै छै तितली भोर आ साँझ नित दिन बारीमे गीत गाबैत आबै छै तितली लाल हरिअर अनेको रंगक सभ देखमे नीक लागै छै तितली पाँखि फहराक देखू जे उडि-उडि दूर हमरासँ भागै छै तितली नाचबै हमहुँ यौ कुन्दन भैया आब जेनाक नाचै छै तितली मात्रक्रम : 212-2122-222 २ आशीष अनचिन्हार बाल गजल छोट्टे सनकेँ हम्मर बौआ नमहर नमहर ता ता थैया उज्जर बगुला हरियर सुग्गा ललका मैना कारी कौआ थारी बाटी भरले सनकेँ खत्मे छै तिलकोरक तरुआ दूधक पौडर तोरे लेल चिन्नी खेतै पौआ पौआ हम्मर बौआ बेली सनकेँ सुंदर सुंदर गेंदा गेंदा सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ मात्राक्रम अछि चारिम शेरक पाहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत काव्यशास्त्रानुसार दीर्घ मानल गेल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१४. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-14 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 1 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १६८ म अंक १५ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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