VIDEHA — Issue 169 / अंक १६९

Publication: VIDEHA · Issue: 169
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १६९ म अंक ०१ जनवरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८५ अंक १६९) १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.ओम प्रकाश झा- काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल2.मुन्नाजी- जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप  3.डॉ. शंभु कुमार सिंह- घसल अठन्नी : एकटा विमर्श 4.विनीत उत्पल- मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप २.२.1.योगेन्द्र पाठक “वियोगी”- एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता 2.केदार कानन-  मधुपक रचना-व्यक्तित्व 3.कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा- मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि २.३.1.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- मधुपक गीत अमर,मिथिलामे 2.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध “प्र.म” २.४.1.डॉ. अरुण कुमार सिंह -मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना 2.आशीष अनचिन्हार- नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद ३. पद्य ३.१.मधुपजीक किछु गीत, कविता, गजल आ दोहा ३.२.डॉ. अजीत मिश्र- अर्पण-तर्पण-समर्पण ३.३.ज्योति- १.प्रदूषण २.बुजुर्गक ममता ३.४.1.आशीष अनचिन्हार- गजल 2.जगदानन्द झा 'मनु'-गजल ४.बालानां कृते-आशीष अनचिन्हार-बाल गजल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html संपादकीय काशीकान्त मिश्र "मधुप" (1906-1987)-"राधाविरह" (महाकाव्य) पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मैथिलीक प्रशस्त कवि आ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक समर्पित कार्यकर्ता "झंकार" कवितासँ क्रान्ति गीतक आह्वान कएलनि । प्रकृति प्रेमक विलक्षण कवि ।"’घसल अठन्नी" कविताक लेल कथ्य आ शिल्प-संवेदना—दुहू स्तर पर चरम लोकप्रियता भेटलनि। मधुप जीक कवितामय चिट्ठी (अप्रकाशित पद्य-डॉ.पालन झाक सौजन्यसँ) चि. श्री चन्द्रकान्त मिश्र शुभाशीर्वाद पाबि अहाँकेँ कुशल थिकहुँ सह्लाद गामहुमे परिवार अपन आनन्द अहींक हेतु छल चिन्तित चित्त अनन्त। घेंट-पेट ओ तैठ पेटसँ हीन उदय रहए अछि मनहि मन किछु खिन्न। मंगलमय श्री मंगल झा सूरधाम काशीवासी ’तजि वनता’ आराम। अहूँ हुनक सेवामे मेवा छी चखैत छी तहिठाम जतए केओ नहि अछि झखैत। (चन्द्रकान्त मिश्र-मधुप जीक छोट भाइ उदय- चन्द्रकान्त मिश्रक बालक चन्द्रकान्त मिश्रक विवाह मंगलदत्त झा, गाम हरौलीक कन्यासँ। मंगल झाक काशी प्रवासमे लिखल पत्र, सूर्यक उत्तरायणमे गेलापर मृत्युक वरण, संगमे उदय आ मंगल झाक पौत्र श्री प्रद्युम्न कुमार झा सेहो संगमे रहथि।) Original Maithili poem "Ghasal Athanni" by Late Kashikant Mishra Madhup (1906-87)translated into English by GAJENDRA THAKUR Worn- out fifty paise coin

Noon of Jyeshtha month, With all his twelve mouths vomiting fire-ball Up-stooping The Sun Burning the three worlds aflaming Violent western wind The tempest The san-san-san sound of it Like fire particle Anguished blowing the dust.

The birds in nest, composed Not shaking the wings Not opening the eyes Under the tree Animals puffing with tearful eyes The herdsman went home unwillingly Pond water turns hot The water and land habitants tremble The surrounded husk-bamboo enclosures, doors, windows of houses shut This fire-rain! No wayfarer to be seen on road Will the world create the nature This fire-rain!

The hi-fis Having Big bellies Relaxing supported on big cushions, Making and filtering Sherbet Sugar-candy, nut and ice mixed Beneath the dancing electric-fan They too peace starved asking –Hari! Hari! What to tell about the Living The shadow also asking for shadow The noon of Jyeshtha-month!

Though at this time Even then Buchni Left the courtyard of house Is digging the field of Landowner What can do the poor-women! Having been beaten by the lord-of-bad-fate, through all the eight portions of day-night The widow without family without any standing Only child of six months The hope for future Who is weeping beside the road adjacent to the field How can she console him? Even the blood within her is in scarcity Then how the milk will come out? After fasting three times in a row (of morning-evening) Became labourer @ fifty paise From sunrise to sunset Will do work Will not get even the labourer’s breakfast!

Evening time World now fearless The moon rose with compassion By cold light did the universe ecstatic The cow caring for her child raced by echoing hukara-sound Tun-tun-tun-tun sound Tan-tan-tan-tan sound The sound of bell The smoke coming out of houses Even that time starved-thirsty Buchni Bosom drawn covering his son with saree Torn faded clothes The bones coming out The beauty burnt, marked by poverty Fearing for being burnt by the fire of hunger The youth of her fled as soon as it came

Even more than that of riped betel-leaf Yellowish and thin body Cracked and split lips Eyes like mango cut to size In the ditch is whose ill-fate-thief Bitch-anxiety stepping to the tip of saree Burning her body Every moment oh! Hope becoming fireball “give some grain-water” whose life Speaking through treachery of tear That becoming helpless Telling with fear somehow With folded hands: That rubbed fifty-paise coin was not accepted (in market) I went to all the shops Coming Please give another fifty-paise coin I came am only for this Has become night Landowner, do not take time With hunger and thirst I am dying Buy with that Will thresh and crush grain The child is weeping since morning Restless and taking out my life.

She again came disturbing my forehead Changing the real fifty-paise coin somehow Clearly doing mischief Hey! Hold her neck and push beside She is witch See the eyes How onlooking Swallowed such person as her master (husband) Budhna when she came Chewed suddenly At the time of Goddess LakShmi doing lending business Nobody here? Took beside this ill-fated women?

Master! I am not asking debt Or came for begging The cultivated labour-charge be given I am your subject-son Many times came here Legs crumbling For grain my body starving The third-class-god not assigns even death to me What time has come Ha! Did work with all body-strength That good-line even then the labour-charge not coming That’s why this famine in world has appeared I will not be able to go When I step up the legs it seems dark in-front Will die here only To whom I will tell? Nobody is my own The wrong-doing is also the splendor of the powerful God! Oh!

Hey you have no fear? Many murder I have done and lived Not even my body-hair got damaged Long live the Daroga (police-incharge) Will murder you Flee women flee By giving enough wage to labourer I will put a blemish to my ancestry? This false-acting do before someone else I am black-cobra will she go simply? The lord of death is dancing over her head O, what you are looking at my face That much courage the third-class people will show?

Cath-cath-cath-cath Even more heavy than the heaviest With slap of Makhna she became helpless Both mother-son fell on earth Became senseless she Even then with anger By doing heavy-echo Bhutkanbabu stood roaring: Makhna! Makhna! She is doing false-acting Bring my stick What will you know about women’s character? My whole life dealt with all these.

Dan-dan-dan-dan Stick thrashing on the senseless body Only once unrecognizable weeping With child left Buchni this Creation!

With sorrow amidst laughter of Moon That rubbed-worn-out fifty-paise-coin spoke: “where should I” go To get shelter Who will give? Worn-out is whose fate! घसल अठन्नी- काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’

जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन छन छन छन छन आगिक कण सन सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। खोंतामे पक्षी संच मंच हिलबए न पाँखि खोलए न आँखि तरुतर पशु हाँफै सजल नयन चरबाह भागि घर गेल विमन इनहोर बनल पोखरीक पानि जलचर-थलचर काँपए थर थर टाटी, फड़की, खिड़की, केवाड़ लागल घर-घर ई अग्निवृष्टि! नहि कतउ बाटमे बटोहीक हो एखन दृष्टि संहार करत की प्रकृति सृष्टि- ई अग्निवृष्टि! श्री मान लोकनि जे तुन्दिल बनि मसलंगमे ओंगठल शरबत छनि-मिसरी बदाम बरफें घोरल नर्तित बिजुली पंखा तर छथि सेहो अशान्त बाजथि हरि! हरि!! की कथा सजीवक छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि जेठक दुपहरि! ई समय यदपि बुचनी घर आँगन छोड़ि तदपि गिरहस्थक कोड़ए खेत एखन की करति बेचारी! आठ पहर दुर्दैवक डाँगें अछि पीटलि विधवा परिवारहीन बिलटलि छौ मासक एके टा बच्चा भाविक सम्बल जे कानि रहल छै धूर उपर परिबोध कोना क’ करति तकर? शोणितोक आब नहि छैक शेष पुनि दूधक हएत कोना सम्भव? सहि तीनि सांँझ ई आइ आएल बनि मजदुरनी अठ अन्नी पर सूर्योदयसँ सूर्यास्त तक्क करतैक काज नहि पनिपिआइयो पाबि सकति! सन्ध्याक समय संसार अभय उगि चान सदय शीतल ज्योत्सनासँ कएल मुदित ब्रह्माण्ड सकल नेरूक हित दौड़लि हुँकरि गाय टुन-टुन-टुन-टुन टन-टन-टन-टन घण्टीक शब्द घर-घरसँ बाहर भेल धूम तैयो भूखलि-प्यासलि बुचनी आँचल तर झपने पुत्र अपन कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन हड्डी जागल सौन्दर्य गरीबीसँ दागल भूखक ज्वालासँ जरक डरें तारुण्य जकर अबितहिं भागल पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल पीयर ओ दूबर-पातर तन फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर आमक फाड़ा सन नयन खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर चिन्ता-चुड़ैल केर चढ़ल कोर झरकाइ रहल छै आंग जकर प्रतिपल हा! आशा बनि अंगोर दे कने अन्न-जल प्राण जकर अछि बाजि रहल छलसँ नोरक, से बनि कातरि कहुना क’ डरि कर जोरि कहल: ओ घसल अठन्नी चलि न सकल हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि छी आबि रहलि करु कृपा अठन्नी द’ दोसर एसकरुआ हम भ’ गेल राति गिरहत, न आब देरी लगाउ भूखें-प्यासें हम छी मरैत लेबै बेसाह कूटब-पीसब बच्चा भोरेसँ कानि-कानि छट-पट करैत अछि जान लैत। ई फेर आएल भुकब’ कपार कहुँ असल अठन्नी अदलि-बदलि क’ रहलि चलाकी साफ-साफ रौ! ठोंठ पकड़ि क’ कर न कात ई डाइनि अछि देखही न आँखि अछि गुड़रि रहलि अबिताहिं बुधना सन स्वामीकें चट चिबा गेलि लक्ष्मीक बेरिमे महाजनी अछि चुका रहल क्यो अछि नहि ? एहन अलच्छीकें क’ देत कात ? मालिक! हम कर्ज न छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत कै बेरि एलउँ टुटि गेल टाँग अन्नक मारल अछि हमर आँग जरलहा दैव मरनो न दैछ की समय भेल हा! देह तोड़ि क’ कएल काज सुपथो न बोनि अछि भेटि रहल तें जगमे ई पड़लै अकाल उठबितहिं डेग लागए अन्हार मरि जाएब एतइ ककरा कहबै? हित क्यो ने हमर अनुचितो पैघ जनकें शोभा भगवान! आह! गै छौक न डर? कै खून पचैलनि ई बण्डा रोइयों न भंग युग-युग दारोगाजी जीबथु क’ देबौ खून गै भाग भाग बनिहारकें द’ क’ उचित बोनि कुलमे लगाएब की हमहिं दाग? ई अपन भभटपन आनक लग तों देखा थिकहुँ हम काल नाग ई ओना जाएत? यम माथ उपर छै नाचि रहल रौ, की तकैत छें मूँह हमर छोटका लोकौक एते ठेसी? चट-चट-चट-चट कुलिशहँुसँ कर्कश भीमकाय मखनाक चाटसँ निस्सहाय भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत भ’ गेलि बेहोश तैयो सरोष क’ बज्रनाद भुटकुनबाबू उठलाह गरजि: मखना! मखना! केलकौक भगल ला बेंत हमर नारिक चरित्र तों की बुझबें? जीवने बितौलहुँ ऐ सबमे। दन-दन-दन-दन मूर््िछतो देह पर बेंत वृष्टि बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! सविषाद हासमे चन्द्रमाक ओ घसल अठन्नी बाजि उठल: हम कत’ जाउ अवलम्ब पाउ के शरण? घसल जनिकर अदृष्टि! पाठकीय प्रतिक्रिया: आशीष अनचिन्हार विदेहक उद्येश्य छै समानांतर चलब। साहित्य केर संग जीवनमे सेहो। विदेहक १६८म अंकमे प्रकाशित कपिलेश्वर राउतजीक कथा "बड़का खीरा" पुरने ब्राम्हणवादी ढ़ाँचापर अछि। जखन ओ अपन कथाक शुरूआते एना करै छथि जे-- "कहबी अछि‍, पुरुखक भाग आ स्‍त्रीकगणक चरि‍त्र कखनि‍ बदलि‍ जाएत तेकर कोन ठेकान।" तखने ई निश्चित होइत अछि जे ई विदेहक परंपराक अंतर्गत नै अछि। ओना हमरा ई मानबामे कोनो संकोच नै जे कथाक मूल स्वर अंधविश्वास हटेनाइ अछि। मुदा ई बड़का दुर्भाग्य जे कथाक शुरूमे लेखक अपने अंधविश्वाससँ ग्रस्त छथि। कथासँ फिल्म जल्दी बनि सकैए मुदा फिल्मसँ कथा बहुत मोशकिल छै। ओमप्रकाशजीक कथापर जँ आबी तँ कहि सकै छी जे कथासँ फिल्म बनल अछि आ पाठक एकै पाराग्राफक बाद बुझि जाइत छथि जे अंतमे की हेतै। आ तँए शुरूआतेसँ ई कथा नीरस भऽ जाइए। कुंदन कुमार कर्णजीसँ ई अपेक्षा जे ओ अपन गजलमे नव-नव बिंब अनताह। प्रस्तुत गजलमे पुरने बिंब सभहँक भरमार अछि। इरा मल्लिकजीक आ अशरफ राइनजीक रचनासभ बड़ नीक छनि। नचिकेता (मिथिला दर्शन) विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ। शेफालिका वर्मा सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद। आशीष अनचिन्हार १६६म अंक संतुलित अछि। प्रस्तुत अंकमे वियोगीजीक कथा "विजय"केँ ऐ अंकक सर्वश्रेष्ठ रचना कहल जाए तँ दिक्कत नै। हिनक कथाक पहिल पार्टक अपेक्षा दोसर पार्ट बेसी मुखर अछि आ एकर मुल्याकंन पचास साल बाद जा कऽ फड़िच्छ हेतै।

संपादकीयमे जँ कहियो काल देशक राजनीति ओ समाजिक-आर्थिक पक्षपर चर्चा होइ तँ आ रुचिगर हएत से आशा अछि।

विदेहमे पहिल बेर कविता लऽ कऽ एबाक लेल महेश झा डखरामीजीक स्वागत छनि।

आशीष अनचिन्हार अंक 167मे डाॅ. कीर्ति नाथ झा जीक कथा कने आर फड़िच्छ हेबाक व्यग्रतामे अछि। पाठक ने ऐ पारक रहै छथि आ ने ओइ पारक। नन्‍द वि‍लास रायजीक कथा कने पुरान ढ़र्राक बुझना गेल। पूरा संसारमे विषय एकै होइ छै मुदा ओकर शिल्पक प्रयोग अलग-अलग करै छै। आशा अछि जे रायजी आगूसँ शिल्पक खियाल रखता। अशरफ राईन जीक कता आ आजाद गजल नीक भाव लेने अछि। कीर्तिनाथ झा प्रिय गजेंद्रजी , 'विदेह' १६७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६७) भेटल .  दूटा रचना आकृष्ट केलक. अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल आ जगदानन्द  झा 'मनु ' केर ' मैथिली भाषामें एकरूपताक  अभाव '.  अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल अनुभूत सत्यक पीड़ाक सद्यः प्रतिबिम्ब थिक.  अपन देश सं दूर  रेगिस्तान में रहैत मजबूर जिनगीक आ अपन देश-कोस. माटि-पानि, आमा-बुआ सं दूर हेबाक दुःखक ई  एहन बयान  थिक जे ग़ज़ल सहजहिं मोनके  छूबि लेलक. एतबे नहिं, एहि गजल में कोमल भावनाक अतिरिक्त  आओर बहुतरास  गंभीर गप्प छै, जेना, राजनेता लोकनिक प्रति आक्रोश आ संविधान नहिं बनबाक अफशोस . वाह अशरफ . लिखैत रहू . आब ' मैथिली भाषामें एकरूपताक  अभाव ' क गप्प करी : हम पहिने स्पष्ट क दी , हम भाषा वैज्ञानिक नहिं छी . मुदा एहि विषय पर विचार तं अछिए . ' मैथिली भाषामें एकरूपताक  अभाव ' समस्या  थिक आ नहिओ थिक . मुदा ताहि पर भाषा वैज्ञानिक विचार करथु , समाधान ताकथु . ओना एहि विषय पर प्रायः चालीस आ पचास केर दशक में मैथिलीक तत्कालीन  साहित्यकार  लोकनि विचार केने छथि . से तकला उत्तर भेटत . भाषाक नमूना वा  उदाहरणक हेतु  रमानाथ झा , किरणजीक आ यात्रीक भाषा  देखबाक थिक. ओना, भाषाक में एकरूपताक अभाव भाषाके समृद्ध करैत छैक .  संगहिं, एकरूपताक अभाव जीवित भाषाक धुक-धुकीक प्रमाण थिकैक. नहिं तं अंग्रेजी किएक विश्यव्यापी भाश भ  गेल आ फ्रेंच किएक फ्रांसहिं धरि सीमित भेल जा रहल अछि . ई नहिं बिसरबाक चाही जे   भाषाक अनुसार व्याकरणक बनैछ. तें,  जनसामान्यकें आ मौलिक लेखककें व्याकरणक अनुसार भाषा बाजबाक /लिखबाक   बाध्यता नहिं हेबाक चाही.  सादर , कीर्तिनाथ विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.1.ओम प्रकाश झा- काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल2.मुन्नाजी- जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप 3.डॉ. शंभु कुमार सिंह- घसल अठन्नी : एकटा विमर्श 4.विनीत उत्पल- मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप २.२.1.योगेन्द्र पाठक “वियोगी”- एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता 2.केदार कानन-  मधुपक रचना-व्यक्तित्व 3.कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा- मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि २.३.1.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- मधुपक गीत अमर,मिथिलामे 2.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध “प्र.म” २.४.1.डॉ. अरुण कुमार सिंह -मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना 2.आशीष अनचिन्हार- नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद 1.ओम प्रकाश झा- काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल2.मुन्नाजी- जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप  3.डॉ. शंभु कुमार सिंह- घसल अठन्नी : एकटा विमर्श 4.विनीत उत्पल- मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप 1 ओम प्रकाश झा काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल :: काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ जीक नाओं मैथिली साहित्‍यमे एकटा उच्‍च स्‍थान रखैत अछि। मधुपजी मैथिलीमे अनेको रचना केने छथि। हिनकर अटुट मैथिली-प्रेम के नै जनैत अछि। एकसँ एक काव्‍य रचना हिनका मैथिली साहित्‍यमे ‘अमर’ बनौने अछि। की मधुपजी मैथिलीमे गजल सेहो कहने छथि, ई जनबाक उत्‍कण्‍ठा  गजलक सिनेही हेबाक कारणेँ हमरा छल। “अनचिन्‍हार आखर” जलवृत्तसँ पता चलल जे मधुपजी मैथिलीमे एकटा गजल रचने छथि जे १९३२ ई.मे मैथिली साहित्‍य समिति द्वारा काशीसँ प्रकाशित पत्रिका- “मैथिली-संदेश”मे छपल छल। ई गजल हम नीचाँ उद्धृत कऽ रहल छी- “मिथिलाक पर्व गौरव नहि ध्‍यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियेँ जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तही ठाँ हा आइ ‘आइ गो’ टा पढ़ि उच्‍चता करै छी हम कालिदास विद्या-पति- नाम छोड़ि मुँहमे बाड़क तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्‍यदेशी देशीक गोल ठेसी की पाँक पड़ै छी औयत्र-तत्र देखू अछि पत्र सेकड़ो टा अछि पत्र मैथिलीमे एको ने तैं डरै छी” ऐठाँ ई देखबाक चीज अछि जे ई गजल पूरा-पूरी अरबी बहरपर आधारित अछि। ऐ गजलक प्रत्‍येक पाँतिमे मुस्‍तफइलुन (दीर्घ-दीर्घ-ह्स्‍व–दीर्घ) आ फऊलुन (ह्स्‍व-दीर्घ-दीर्घ)क प्रयोग २ बेर कएल गेल अछि। कहबाक मतलब जे ई गजल बहरमे कहल गेल अछि। ई अचरजक विषय अछि जे मधुपजी अरबी बहरमे गजल कहबाक योग्‍यता रखितो मात्र एकेटा मैथिली गजल किए कहलनि? आब एतेक दिनक पछाति ऐ विषयपर अनुमानेटा लगौल जा सकैत अछि। तथापि ई उत्‍कण्‍ठाक विषय छै, तँए विषयपर विमर्श आवश्‍यक बुझना जाइए। ई गौरवक बात अछि जे मैथिलीमे पछिला सए बरख पहिनेसँ गजल कहल जा रहल अछि। मुदा ई चिंतनीय आ सोचनीय बात अछि जे घनेरो साहित्‍यकार सभ एकटा वा दूटा गजल कहला बाद फेरसँ आगू गजल एकदमे नै कहलथि। एकर की कारण भऽ सकैत अछि? ई बात सर्वविदित अछि जे मैथिली साहित्‍यकारक एकटा वर्ग हरदम ई मानैत रहल जे मैथिलीमे बहरयुक्‍त गजल नै कहल जा सकैए। अपितु किछु गोटे एतए तक मानैत रहला जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैत अछि! ओना ऐ बातक प्रतिवाद स्‍वरूप बीच-बीचमे मैथिलीमे गजल कहल जाइत रहल, जेकर उदाहरण ‘मधुप’जीक ई एकमात्र गजल सेहो अछि। फेर ई सवाल जे जखनि मधुपजी बहरमे एकटा गजल कहने छथि तखनि फेर दोसर गजल किए ने कहने हेता? एकर जवाब तकैले जखनि आधुनीक मैथिली साहित्‍यक पूरा इतिहासकेँ देखै छी, तखनि बहुत किछु स्‍पष्‍ट भऽ जाइए। आधुनिक मैथिली साहित्‍यक इतिहास सामंतवाद आ दादागीरीक इतिहासक एकटा सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण रहल अछि। सदिखन एकटा खास ग्रुप वा वर्ग मैथिली साहित्‍यकेँ अपन जागीर बुझैत मैथिली साहित्‍यकेँ बन्‍हकी लगौने रहल अछि। ओना ई प्रक्रिया आइयो धरि रहल अछि, मुदा पहिनेसँ यएह परिवर्तन भेल अछि जे आब प्रतिवादक स्‍वर सेहो मुखर भेल जा रहल अछि। एकर सुगबुगाहटि आब बुझाए लगल अछि। अस्‍तु, हमर कहबाक तात्‍पर्य ई अछि जे मैथिली साहित्‍यक मठाधीश आ सामंत लोकनि ई घोषणा केलन्‍हि जे मैथिलीमे गजल नै भऽ सकैत अछि। प्रयोगधर्मी साहित्‍यकार जँ किछु नव करबाक दुस्‍साहस केलनि तँ हुनका नाना प्रकारसँ समझा-बुझा वा त्रास देखा मठाधीश सभ अपन बात मानबा लेल मजबूर करैत रहलखिन। ऐ क्रममे विषयसँ इतर ईहो चर्चा करए चाहै छी जे मैथिली साहित्‍यमे पुरस्‍कारक राजनीतिकेँ के नै जनै छथि। कोनो पोथीकेँ पढ़ैबला होइ वा नै, जँ मठाधीश प्रसन्न छथि तँ पुरस्‍कार निश्चित अछि पता नै किएक ई बात काल-क्रमे अनेको साहित्‍यकारक बलि ऐ रूपमे लैत रहल अछि जे ओ सभ अपन मेधा मैथिली साहित्‍यकेँ समृद्ध करबामे नै लगा मठाधीश सभकेँ प्रसन्‍न  करैमे लगबए लगै छथि। केतेको बेर ईहो होइत अछि जे अपन पहिचान हेरेबाक डरसँ मेधावी साहित्‍यकार मठाधीश आ सामंत सबहक पैदा कएल अवधारणाक अनुरूपेँ चलए लगै छथि। अस्‍तु पहिचान हेरा जाइक डर होइ वा पुरस्‍कार नै भेटबाक डर वा साहित्‍य समाजमे अछूत हेबाक डर, कोनो ने कोनो कारणेँ केतेको साहित्‍यकार अपन मेधा स्‍वान्‍त: सुखाय लेखनसँ हटा मठाधीश सुखाय लेखन दिस बढ़ि जाइ छथि! ऐ दुष्‍चक्रक शिकार मैथिली होइत रहली अछि। आब फेरसँ मूल विषयपर आबि ऐ बातक परताल जाए जे आखिर मधुपजी एक्के गोट गजल किए रचलनि? जखनि कि ओ अरबी बहरमे गजल कहैमे सक्षम आ समर्थ छला? ई बात अबस्‍स छै जे मधुपजी मैथिली साहित्‍यक एकटा मजगूत खाम्‍ह रहला आ पूरा मनोयोग पूर्वक मैथिलीक सेवा केलनि। हिनका द्वारा कहल गेल एकमात्र गजल विशेष क्षमताक परिचए सेहो करबैए। तइ दिनमे[1] मधुपजीक उमेर २५-२६ बर्खक छेलनि। ओइ समए मधुपजी एकटा युवा,उदीयमान आ ऊर्जावान रचनाकार छला आ प्रयोग धर्मितामे बिसवास रखै छला। ऐ बातक सम्‍भावना अछि जे युवा मधुपजी तत्‍कालीन मठाधीश सबहक प्रभावमे आबि आगू गजल नै कहने हेता। किएक तँ मठाधीश सबहक मान्‍यता रहल छन्‍हि जे मैथिलीमे गजल भाइए ने सकैए!! ...आ तँए मधुपजीक गजलकेँ मठाधीश सबहक समर्थन नहियेँटा भेटल हेतनि। एकर परिणाम स्‍वरूप मधुपजी आगू गजल लिखैक दुस्‍साहस नै केने हेता। दोसर सम्‍भावित कारण ईहो भऽ सकैए जे रचनाकारक मन अा रूचिक अनुरूप रचना-विधा सेहो होइ छै। खास कऽ आधुनिक मैथिली साहित्‍य लेखनमे रचनाकार स्‍वतंत्र रूपेँ अपन मन आ रूचिक अनुसार रचना करैत रहला अछि। तँए ईहो बातक सम्‍भावना भऽ सकैत अछि जे मधुपजीक रूचि आ मन गजल दिस नै भऽ कऽ आन विधा दिस बेसी रहल हेतनि। ओना अन्‍यान्‍य विधामे अनेको रचना केनौं छथि। उपरोक्‍त कारण सभमे कारण चाहेजे रहल होइ, ई बात तँ अबस्‍से अछि जे मैथिली साहित्‍य आ मैथिली साहित्‍यक विद्यार्थी सभकेँ मधुपजी सँ बहरयुक्‍त गजलक जे उपहार भेटबाक चाही छल से नै भेटल।  सम्‍पर्क- भागलपुर (मिथिला) [1] जइ समैमे गजल लिखलनि 2 मुन्नाजी जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप "हेड़ा गेलै, तकनो नै भेटत आब"। ई कोनो मूल्यवान वस्तु नै लोकक चेतना शून्य संस्कार दिस संकेत करैत मधुपजी मैथिली साहित्य परिषद्क सम्मेलन (बहेड़ा)मे देने रहथि। तात्कालीन वा समकालीन साहित्यकारक भीड़ मध्य ओ एकसर कवि, गीतकार छलाह जनिक स्वर लो चेतनाक स्वर बनि सोंझा अबैत छल। ओ अपन बौद्धिक वा मानसिक सोचसँ लोकक खसैत संस्कार, घटैत मानवीय संवेदनापर सतत चिंतित रहि लोककेँ उठेबाक आ झकझोरबाक काज करैत रहलाह। हुनक कविताक केंद्र-बिंदुमे रहैत छल गाम समाजक वंचित-उपेक्षित वर्ग आ ओकर मानसिक पीड़ा। तहिया सामंती विचारसँ पनघैत अत्याचार आ मूँहसँ लाचार बोनिहारक दुख-दर्दकेँ अपन कविता माध्यमे चित्रित कऽ मधुपजी जगजियार भेला। सभ रस-अलंकारसँ सुशोभित रचना सब मार्मिक आ हृद्यस्पर्शी बनि कऽ सोंझा अबैत रहल। एकटा रोटीक कतेको बखरा आ ओइपर छुच्छ नूनसँ गुजर करै बलाक मर्मान्तक पीड़ा। दोसर दिस नव-धनिकक छल-छद्म-घमंड। एक दिस भरि दिन बैसि कऽ ताश ओ तमाशा आ दोसर दिस भरि दिन खटियो कऽ घसल अठन्नी लेल मरैत जन बोनिहार। एक दिस भभा-भभा कऽ हँसैत चेहरा आ दोसर दिस जाबल मूँह। एक दिस डाक-निलामी बला जमिंदारक प्रशंसामे रचल साहित्य आ दोसर दिस......................................................खाली शून्य। मुदा मधुपजी ऐ दोसर दिसकेँ बेसी दिन खाली नै रहऽ देला। ओहन भीषण सामंती व्यवस्था रहितों ओ शब्दकेँ अपन हथियार बना लेला। भने ओ शब्द कहियो प्रगतिवादी कविता बनि गेल तँ कहियो नचारी तँ कहियो किछु मुदा मधुपजी केंन्द्रमे सभ दिन वंचित वर्गेके रखलखिन। जन-मनक पीड़ासँ पीड़ित कविक स्वर जँ केकरो रचनासँ बहराएल तँ ओ स्वर छल मधुपजीक जे खेत-खरिहान, जमीन-असमानके अपन आंतरिक विद्रोह वा समाजिक विसंगतिकेँ कागजपर आनि सभहँक सोंझा देखार कऽ कऽ रूकै छला। मधुपजी कविते लेल नै बल्कि अत्यंत लोकप्रिय गीताकरक रूपमे सेहो स्थापित छथि। हुनक गीतक एक-एक पाँति अनमोल अछि। कविते जकाँ समाजिक उत्पीड़न। जीवनक आन विसंगतिकेँ गीतोमे अनलाह आ ई सिद्ध केला जे राग-लय-ताल प्रगतिशील ओ बौद्धिक हेबाकमे रुकावट नै छै। मैथिलीक किछु आलोचकक मत जँ छोड़ि देल जाए तँ ई स्पष्ट रूपें ध्वनित होइए जे ओइ समयमे मधुपजी एकमात्र ओहन साहित्यकार छला जिनकर गह-गह लोक-चेतनासँ भरल छल। कहबा लेल तँ कविवर सीताराम झाजी सेहो छथि मुदा हमर मतानुसार ओ भाषामे लोक-चेतनाक पक्षधर छला। विचारमे सीताराम झा प्रगतिशील रहितों मधुपजीक आगू कमजोर सिद्ध होइत छथि। आ तँए हम मधुपजीकेँ तात्कालीन मैथिलीक पहिल जन-कवि मानै छी। ओना किछु आलोचक जनिका वैचारिक दरिद्रता छनि ओ वैद्यनाथ मिश्र "यात्री"केँ जन-कवि मानै छथि मुदा ऐ संबधमे 2 टा गप्प मोन राखब जरूरी— 1) यात्रीजी लेल जे जन-कवि प्रयोग होइत अछि से हिंदीसँ आयातति अछि। भऽ सकैए जे ओ हिंदीमे जन-कवि होथि मुदा मैथिली लेल अनफिट छथि। मैथिलीक अपन समस्या छै आ तकर समाधान मात्र मैथिलीए साहित्यकार कऽ सकैए। ई आयातित साहित्यकार ओ आयातित पदवीसँ मैथिलीक कल्याण नै हेतै। प्रायः मधुपजी कुल 23गोट प्रकाशित आ 12-13 टा अप्रकाशित पोथी छनि जैमे ओ कुल 1टा हिंदी रचना केला (भऽ सकैए कोनो आत्मीय संपादकक बलजोरी केलापर) तँए हमरा हिसाबें यात्रीजी नै मधुपजी जन-कवि छथि। 2) यात्री जीक जीवन चरित्र देखलासँ ई स्पष्ट अछि जे हुनका अपना-आपपर विश्वास नै छलनि। कहियो ओ हिंदू बनि जाइत छथि तँ कहियो बौद्ध। खन ओ अपनाकेँ प्रतिमा-भंजक कहै छला तँ खन पतिया करबाबै छला। कहियो अपनाकेँ निरपेक्ष कहै छला तँ कहियो वामपंथमे प्रतिबद्ध रहबाक लेल फाँड़ बन्हैत छला। कुल मिला कऽ यात्रीजीकेँ अपना उपर विश्वास नै छलनि आ जकरा अपना उपर विश्वास नै से अपन समाजक उपर विश्वास कोना करत। आ तँए हमरा हिसाबें मधुपजी जन-कवि छथि । गाम समाजमे चेतनाक निर्माण करऽ बला मधुपजी, अपन उर्जासँ समाजक कटु सत्यकेँ हटबऽ बला मधुपजी जे की जन-कविक सुच्चा हकदार छथि से किछु हिंदी बला सभहँक कारणें कतिया देल गेला। मुदा कतिएलासँ कियो कतिया नै जाइ छै। मधुपजी मोन पड़ैत रहता बेर-बेर, पुश्त-दर-पुश्त। 3 घसल अठन्नी : एकटा विमर्श डॉ. शंभु कुमार सिंह राष्ट्रीय अनुवाद मिशन भा.भा.सं., मैसूर साहित्य अथवा काव्य समय-सापेक्ष होइत अछि; एहि कारणेँ समयक संग-संग काव्यक सेहो स्वरूप बदलैत रहैत अछि। काव्य कखनो काल ईश-महिमाक बखान करैत अछि तँ कखनो वीरगाथाक, कखनो कामिनीक देहयष्टिक सांगोपांग वर्णन करैत अछि तँ कखनो सामान्य मानव जीवनक पीड़ा, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदिक। कहबाक तात्पर्य जे साहित्यक यात्रामे काल आ स्थितिक कारणेँ काव्यक उद्देश्य बेर-बेर बदलैत रहैत छैक। अतः मूल रूपमे जँ विचार कएल जाए तँ साहित्य अथवा काव्य रचनाक मुख्य उद्देश्य भेल प्रकृति (सजीव/निर्जीव)क प्रकृतिसँ तारतम्यता स्थापित कए मनुखमे मनुखताक अर्थ ताकब। एहि दृष्टिएँ कविताक सार्वभौमिकता आ सर्वकालिकता एहि शर्त पर निर्भर करैत अछि जे ओहिमे मनुखक संवेदनाक अभिव्यक्ति कतेक प्रभावी रूपेँ भेल छैक। ई संवेदना देश-कालकेँ समान रूपेँ प्रभावित करैत अछि। कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ मैथिली काव्य काननक एकटा एहन नक्षत्र छथि जे अपन कविकर्मक हेतु युग-युगान्तर धरि मैथिली साहित्यमे पूजित रहताह। हम एतए “राधाविरह” सन उच्चकोटिक काव्य रचयिता मधुपक चर्चा नहि करए जा रहल छी। हम चर्चा करए जा रहल छी ‘घसल अठन्नी’क रचयिता मधुपजीक। एतए प्रश्न उठैत छैक जे कोन एहन परिस्थिति रहैत छैक जकरा कारणेँ ‘घसल अठन्नी’ सन काव्य रचना करबा लेल काव्यकार बाध्य होइत छथि अथवा प्रेरित होइत छथि। हमरा बुझने जखन लेखकक समक्ष ओहि कालखण्डक कोनो विस्मयकारी यथार्थ (जे कि घसल अठन्नीमे चित्रित कएल गेल अछि) उपस्थित भ’ जाइत छैक तँ ओहि यथार्थसँ कवि मन सेहो अपना आपकेँ मर्माहत महसूस करैत छथि आ तखने एहि पीड़ाकेँ जनमानसक सोझा आनबाक लेल ओ आतुर भ’ जाइत छथि। बुचनी सन शोषित, पीड़ितक पीड़ाकेँ एहन मार्मिक रूपेँ प्रस्तुत करबाक हिम्मत संभवतः मधुपेजीसँ संभव रहनि किएक तँ समकालीन व्यवस्था किन्नहुँ हुनका पक्षमे नहि छलनि। घसल अठन्नी कविताक अध्ययन केलाक पश्चात् निम्न बिन्दु सभ पर विचार कएल जा सकैछ: शब्द-चित्रक माध्यमे प्रकृतिक चित्रण, भुटकुन बाबू (शोषक वर्ग)क अत्याचार, मखना सन भटकल प्रजावर्ग, बुचनी (शोषित)क रेखाचित्र, घसल व्यवस्थासँ घसाएल अठन्नीक आर्तनाद। घसल अठन्नी कविताक सभसँ पैघ विशेषता थिक एकर व्यावहारिक भाषा, जकर पाठ कएलाक उपरान्त पाठकक मोनमे वैह भाव, वैह चित्र सोझा नाचए लागैत अछि। शब्द-चित्रक एहन जादूगरी कि गरमीक वर्णन पढैत काल पाठकक सोझा ओ दृश्य चलचित्र जकाँ चलए लागैत छैक आ पाठक ओहि स्थितिसँ अपन तादात्म्य स्थापित कए लैत अछि, जेना निम्न पाँति पढ़बा काल अंतिम पाँति पर अएलाक पश्चात् एहन अनुभूति होएत जे जँ आँखिकेँ झाँपि नहि लेब तँ ई तापत धूरा कतहुँ आँखिमे नहि पड़ि जाए; पछबा प्रचण्ड/बिरड़ो उदण्ड/सन सन सन सन/छन छन छन छन/आगिक कण सन/सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। अथवा इनहोर बनल पोखरिक पानि...। वा ई अग्निवृष्टि!/ संहार करत की प्रकृति सृष्टि! आदि कहैत-कहैत जखन ओ कहैत छथि- छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि...तँ बुझाइत अछि जे एहिसँ आगू कविक कल्पना जाइए नहि सकैए। कल्पनाक एहन सजीव चित्रण! एहन विलक्षण पराकाष्ठा! कवि मधुपेसँ संभव छनि। वस्तुतः कविताक पहिल भागमे कवि प्रकृतिक वर्णन करबाक लाथे एकटा भूमिका तैयार केलनि अछि जाहिसँ प्रकृतिक एहि रौद्र रूपकेँ भुटकुन बाबूक सामन्ती प्रवृति पर आरोपित कएल जा सकए। मार्क्सवादी विचारधारामे सम्पूर्ण समाजकेँ दुइए वर्गमे विभाजित कएल गेल अछि-एकटा शोषक वर्ग आ दोसर शोषित वर्ग। एतए भुटकुन बाबू शोषक वर्गक प्रतिनिधित्व करैत छथि आ बुचनी शोषित वर्गक। गै छौक ने डर?/कै खून पचैलनि ई बण्डा/रोइयों न भंग/युग-युग दारोगाजी जीबथु/क’ देबौ खून। पहिने मखनाक अत्याचार- चट-चट-चट-चट/कुलिशहुँसँ कर्कश भीमकाय/मखनाक चाटसँ निस्सहाय/भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत/भ’ गेलि बेहोश। आ ताहूपर मोन नहि भरलनि तँ- दन-दन-दन-दन/मूर्छितो देह पर बेंत वृष्टि/बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन/शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! एतए मखनाक चरित्र ओहि भटकल युवावर्गक सदृश अछि जे अपनहि हाथेँ अपन आ अपन समाजक सर्वनाश करबा लेल आतुर अछि। आखिर मखना सन नोकरकेँ भुटकुन बाबू सन मालिकसँ की सभ सुविधा भेटैत हेतैक? मालिकक पहिरलाहा पुरनका धोती-तौनी, खएबा लेल नीक-नुकुत भोजन आ कोनहुँ जग-जाजन पर खर्च करबाक लेल कर्ज, सैह ने? मुदा मखना सन नोकर एहि भ्रमकेँ नहि तोड़ि पबैत अछि जे यैह कर्ज ओकरा पुश्त-दर-पुश्त भुटकुन बाबूक चाकरी करबाक ले बाध्य करैत रहैत छैक आ करैत रहतैक। मालिकक सह पाबि ओ जाहि प्रकारेँ बुचनी पर प्रहार करैत अछि ताहिसँ सिद्ध भ’ जाइत अछि जे जाधरि मखना सन मूर्ख एहि समाजमे अछि ताधरि भुटकुन बाबू सन शोषकक अत्याचार निर्बाध रूपेँ चलिते रहत। रौ, की तकैत छें मूँह हमर/छोटका लोकक एते ठेसी? जहिया मखना सन लोक एहि ‘छोटका लोक’ आ ‘बड़का लोक’मे भेद जानि जाएत तहिए सँ समाजक कायाकल्प होएब प्रारंभ भ’ जाएत। कहल जा चुकल अछि जे प्रस्तुत कवितामे कवि जे किछु कहने छथि, जाहि कोनो परिस्थितिक वर्णन केने छथि ओ प्रस्तुतिक पराकाष्ठा थिक। बुचनीक दुर्दैन्य दशाक वर्णन करैत काल कवि द्वारा बुचनीक खीचल गेल रेखाचित्र- कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन/हड्डी जागल/सौन्दर्य गरीबीसँ दागल...। आभूखक ज्वालासँ जरक डरें/तारुण्य जकर अबितहिं भागल/पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल/पीयर ओ दूबर-पातर तन/फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर/आमक फाड़ा सन नयन/खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर। एहन देहक परिणति की भ’ सकैछ? शोणितोक आब नहि छैक शेष/पुनि दूधक होएब कोना सम्भव? एहनो स्थितिमे बुचनी अपन आ अपन बच्चाक जीवनक रक्षार्थ एहन भीषण समयमे खेतमे काज करैत अछि। घसल अठन्नी कोनहुँ दोकानमे नहि चललाक स्थितिमे ओ पुनः मालिकसँ गोहारि करैत अछि- ओ घसल अठन्नी चलि न सकल/हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि/छी आबि रहलि/करु कृपा अठन्नी द’ दोसर/एसकरुआ हम/भ’ गेल राति/गिरहत, न आब देरी लगाउ/भूखें-प्यासें हम छी मरैत/लेबै बेसाह/कूटब-पीसब/बच्चा भोरेसँ कानि-कानि/छट-पट करैत अछि जान लैत। मुदा भुटकुन बाबू पर एहि गोहारिक कोनो असर नहि पड़ैत छैक। एतए बुचनीक भूख तँ नहि मेटा सकल, हँ ओकरा अपन शिशुक संगहि एहि इहलोकसँ मुक्ति अवश्य भेटि गेलैक-शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! एतए बुचनिक मुक्त सृष्टि! क संगहि कविताक अंत नहि भ’ जाइत अछि। हम कत’ जाउ/अवलम्ब पाउ/के शरण?/घसल जनिकर अदृष्टि! कहि कवि समाजक सोझा एकटा बड़का टा प्रश्नचिह्न छोड़ि देने छथि। एतए घसल अठन्नीकेँ समाजक शोषित वर्गक प्रतीकक रूपमे कवि प्रस्तुत केने छथि। अठन्नी अथवा पाइ माने की? अठन्नीक माने मौद्रिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, अर्थव्यवस्थाक रीढ़। आ गरीब-गुरबा वा मजदूर माने की?सामाजिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, समाजक निर्माण, कल्याणक सभसँ पैघ संसाधन। समाजक भौतिक सुख-साधन सँ ल’ कए सभ्यता, संस्कृतिक विकासक लेल दुनूक दोहन आवश्यक। मुदा दोहनक दृष्टिकोण की हेबाक चाही, यैह सभसँ महत्वपूर्ण प्रश्न अछि। भुटकुन बाबू सन सामंती प्रवृतिक लोक दोहनक माने बुझैत छथि ‘खून चोसब’ आ जखन बुचनी सन पीड़ित, शोषितक देहमे शोणितक अंश मात्र रहि जाइत अछि तखन ओकर अस्तित्व मेटा देबाक ई प्रवृति निश्चये दानवी प्रवृतिक द्योतक अछि। तहिना जखन हम घसल अठन्नीक अर्थविस्तारमे जाइत छी तँ ओहिमे समाजमे व्याप्त ओ सभटा कुरीति समा जाइत अछि जे जकरा कारणेँ मनुख जातिक मूल्यक तीव्र गतिएँ ह्रास भेल जा रहल छैक। घसल अठन्नीक एहि आर्तनादक रूपमे वस्तुतः कवि अपन आर्तनादसँ जनमानसक ध्यान आकृष्ट करबाक प्रयास केने छथि। आखिर ई व्यवस्था कहिया धरि चलैत रहत? एकरा सँ त्राण कोना हो? कि एहि व्यवस्थासँ त्राण दिआएब कोनो एक व्यक्ति/संस्था सँ संभव छैक? निश्चिते रूपसँ नहि। एकरा लेल हमरा सभकेँ सामूहिक प्रयास करए पड़त। * 4 विनीत उत्पल मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप 'मैथिलीक नवलेखन एक 'जनावर' जकाँ जीव बुझल जाइत छल, जाहिसँ परम्परावादी साहित्यकार लोकनि भयाक्रांत भs उठल छलाह. असलमे ने नवलेखन कोनो अजुगत वस्तु छल आ ने कोनो 'अजूबा' वस्तु छल. साहित्यक परिवर्तित रूपक एक 'तेबर' छल. नबतावादी लोकनि नवलेखनक आरम्भ राजकमल सं मानैत छथि, मुदा हमरा जनैक तकर उत्स यात्रीजीये में छनि. यात्रीजी अंततः सुमन व मधुप सं जे भिन्न छलाह से ने केवल मार्क्सवादीसं प्रभावित होयबाक कारण अपितु हुनक साहित्यिक अभिव्यक्ति, भंगिमा,  ओहि दुनू गोट सं भिन्न छल आ तकरे गहिकs सं राजकमल आगां बढ़ल छलाह।' ई बात सुधांशु शेखर चौधरी १९८३ में चेतना समिति द्वारा आयोजित विद्यापति पर्वक अवसर पर आयोजित विचार गोष्ठीक विषय 'आधुनिक साहित्य में परिवर्तनक स्वर' में कहने छल. अहि विचार गोष्ठी कs लs कs छपल 'आधुनिक साहित्य मे परिवर्तनक स्वर किताब मे रामनुग्रह झा लिखैत छैथ, 'आधुनिकतम काव्य प्रवृति पर विहंगम दृष्टि सं विचार करैत तीन वर्ग केल जा सकैत छथि. यथा,संस्कृत साहित्यपेक्षी (सुमनजी, जीवनाथ झा प्रभृति), उदार दृष्टिवादी (भुवनजी, मधुपजी, किरणजी, तंत्रनाथ झा, गोविन्द झा प्रवृति) तथा वाममार्गी (यात्रीजी, राजकमल, सोमदेवजी, किसुनजी, मायानन्द जी प्रवृति). 'आधुनिक गीत में परिवर्तनक स्वर' मे भीमनाथ झा लिखैत छैथ जे एके कवि गीतक स्वर आ शिल्प दुहू में व्यापक परिवर्तन अनबाक काज कयलनि, से थिकाह कवि चूड़ामणि श्री मधुप. आधुनिक काल मे गीत कें सभसँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय हिनके छनि. ई मैथिलीक अपन छंद में शताधिक गीतक रचना तं करबे कयलनि, संगहि हिंदी आ हिंदीतर भाषाक लोकगीत आ फिल्म संगीतक अनेक सुर पर अपन शब्द कें सजौलनि। सुधांशु शेखर चौधरी, रामनुग्रह झा आ भीमनाथ झाक तथ्य केर सोचैत आ मधुपजीक कविता आ गीत पढ़ैत ई बात सुदृढ़ भेल जे मधुपजी एकटा विद्रोही कवि छैथ आ उपर लिखल तीनू गोटेक लिखल बात मे विरोधाभाष अछि. जखन राजकमल चौधरी स्वरगंधाक भूमिका मे लिखैत छैथ, 'कविता अनुभव, ज्ञान, आवेग आ अभिव्यक्तिक एकटा सशक्त प्रक्रिया होइत अछि. एहि प्रक्रिया मे शब्द,ध्वनि, छन्द आ लय, एकटा विशिष्ट सत्यक अनुभूति बनि जाइत अछि. तखन साहित्यिक अभिव्यक्ति आ भंगिमाक अंतर कोन धरातल पर केल जा सकैत अछि. जहि काल जेहन सामाजिक, राजनीतिक आ आर्थिक वातावरण रहल, तहिने कवि आ लेखक अपन रचना केलखिन. कोनो भी रचनाकारक रचना हुनकर जीवनानुभव पर आधारित होयत अछि. ओना मानल जायत अछि जे विद्यापतिक बाद जतेक कवि आ गीतकार भेल, ओहि मे मधुपजीक गीत सर्वाधिक मुखर भेल छथि. मोहन भारद्वाज 'गीत, नवगीत,गजल' नामक एकटा लेख मे लिखहि छैथ जे देश-दशा आ मातृभाषा कें पृष्ठभूमि में राखिकेर गीत लिख- निहार मे हिनका नाम सबसे बेसी महत्वपूण अछि. चारिम दशकक रचनाकार मधुपजी केर गीतक आठटा पोथी प्रकाशित भेल अछि. एखन धरि हुनकर रचनाक समीक्षा  अहि बात पर भेल अछि जे हुनकर गीत आ कविता फिल्म संगीत पर आधारित छल. मुदा अध्ययन मे ई बात आगू आब रहल अछि जे मधुपजी जे विषय पर कविता आ गीत लिखने छथिन, ओ विषय अाजुक युग मे, आजुक कविता मे हासियो से बाहर अछि. आजुक कोनो मैथिलीक कवि अपन कविताक आधार रसगुल्ला, छुतहर, पतित पीक, टटका जिलेबी केर नहि बनाबैत अछि. एखन हम सब ओहि काल खंड सँ गुजरि रहल छी जखन दुनियाक सबसँ पैघ लोकतंत्र भारतक राजधानी मे निर्भया कांड होयत अछि. अहि कालक दुनियाक सबसें तागतवर देश अमेरिकाक राष्ट्रपति क्लिंटनक सेक्स स्कैंडल वा रूस राष्ट्रपति पुतिनक प्रेम प्रसंग अखबार सुर्खी  बनैत अछि. महिला सशक्तिकरण गप अहि कालखंड मे सबसें बेसी भेल, तखन आजु सँ सत्तर- अस्सी बरख पिहन नारी समाजक विद्रूपता आ सुतल अंतरात्माक आवाज गीतक माध्यम सँ बाहर आनैक काज केर विद्रोह ने कहल जाय ते की कहल जाय. ओहि कालक कतेक रास रचना मिथिलाक स्त्री समाजक गप आगू आनलक, एकर गिनती केल जा सकैत अछि. कतेक रास समीक्षक  हुनका श्रृंगारक  कविता गीत लिखहि बलाक रूप मे प्रस्तुक करैत अछि,मुदा हुनकर कविता आ गीत विद्रोह कविक गीत अछि. 'पतित पीक' कविता मे मधुपजी कहैत अछि, 'स्वाथी संसारक केहन नियम, उपक्रतो उपद्रव करै न कम.' और ते और कहैत अछि, 'नहि पतन एक दिन ककर हैत, पृथ्वीक कोर मे के न जाइत.' मधुपजी ब्राह्मण वर्ण मे भेला के बादो 'छुतहर' गीत मे लिखैत अछि, 'हो सदिखन संसारक सुधार, पतितौक बनथि क्यो कर्णधार. उद्धार सुधारक सँ न हमर, ई सभ्य समाजक छिक प्रताप.' कविताक ई सभटा शब्द आ भाव केर श्रृंगार कहल जाय या एकटा विद्रोही कविक शब्द. ई कविता औहि काल मे लिखल गेल छल जहिया ने ते ओतेक संचारक साधन छल आ ने ओतेक सामाजिक विकास. हुनकर कविता "झंकार" आ "घसल अठन्नी" मे सेहो यहि भाव अछि. एकटा गीत मे ओ लिखैत अछि, "करू भेदभाव दूरे, संसार केर सूरे, करनीक किंतु काया, इँगित करय न छू रे." ओहि कालक कोनो कविता मे एहन धार नहि देखा पड़ैत अछि. भीमनाथ झा एक ठाम लिखैत अछि जे 'हल्लुक' कविता मे ओ नायिका समाजक कुप्रथाक प्रतिकार करबाक साहस जुटबैत अछि, 'मन हवैद्य डाक देल जे तनिका केँ दी तलाक, घुमबी नवीन सृष्टि हेतु एक नवचाक, भै जाइ आर छोड़ि से समाजकेँ फराक.' हुनकर ख्याति प्राप्त गीत 'हम जेबै कुशेश्वर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन धारा' क माधयम सँ ओ स्त्री चेतनाक जे रूप राखने छथि, ओ दुलभ छथि. भले ही कतेक रास कवि कं हुनकर समकक्ष  राखल जायत अछि, मुदा मधुपजी पूर्णरूपेण विद्रोही कवि छल, जकर पहचान करब अा समीक्षा करब आवश्यक अछि. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.योगेन्द्र पाठक “वियोगी”- एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता 2.केदार कानन-  मधुपक रचना-व्यक्तित्व 3.कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा- मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि 1 योगेन्द्र पाठक “वियोगी” एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता घसल अठन्नी कविताक रचना कें प्रायः सात-आठ दशक बीत गेलैक। ओहि समय अठन्नीक मोल बहुत बेसी छलैक। आठ आना मे चारि पाँच सेर चाउर कीनल जा सकैत छल। घसल अठन्नी हमहू देखल अछि, ओ दू तरहें प्रचलित छल -  एक तS वास्तविक अठन्नी जे बहुत पुरान भS गेला सॅं ओकर छपलाहा किछु अंश मेटा जाइत छलैक आ दोसर जे सही मे नकली छल से अठन्नीक आकारक कोनो अन्य धातुक टुकड़ा जाहि मे किछु छपले नहि रहैत छलैक। नेतघट्टू लोक एहेन सिक्का साधारणतः रातिक अन्हार मे चला लैत छल। पहिल प्रकारक सिक्का चलेबा मे ओतेक कष्ट नहि होइत छलैक कारण किछु छाप तS रहितहि छलैक मुदा दोसर तS सोर फोर ठकी छलैक। ओ सिक्का रहितहिं नहि छलैक। कविता मे समाजक एकटा चित्रण अछि। ओहि समयक समाज मे भुटकुन बाबू छलाह जिनका लेल हत्या केनाइ मामूली बात छलन्हि कारण हुनका दरोगाक बरदहस्त प्राप्त छलन्हि - “कै खून पचौलनि ई बंडा रोइयों न भंग युग युग दरोगाजी जीबथु”। भुटकुन बाबू दरोगा कें खुआ पिया कए अपना पक्ष मे रखैत छलाह। कियो दरोगा आबथु, भुटकुन बाबूक ओतए सॅं डाली हुनका पहिनहिं पठा देल जाइत छलन्हि। मधुपजीक समयक भुटकुन बाबू जमीन जथा बला सामंत छथि। हुनकर अपन अहंकार छनि - “बनिहारक दS कए उचित बोनि, कुल मे लगाएब की हमहिं दाग?” आइ एकैसम शताब्दीक दोसर दशक मे यदि समाज पर दृष्टिपात करी तS स्पष्ट भए जाएत जे कतहु किछु नहि बदललैक अछि। ढंग ओएह छैक, हॅं कने रंग बदलि गेलैक अछि। गामक भुटकुन बाबू कें आब मखना खबास नहि रहल होन्हि मुदा बाहुबली लोक अपना संग हॅंसेरी रखितहिं छथि, जे देखबा मे “कुलिशहुँ सॅं कर्कश भीमकाय” रहितहिं अछि आ जकर आतंक जनसाधारणक लेल मखनाक चाट सॅं बेसिये घातक होइत छैक। भुटकुन बाबूक चोला बदलि गेलन्हि अछि। जमीन जथा बला सामंत सॅं बदलि आब ओ नेता आ ठीकेदारक रूप धs लेलन्हि अछि। ओ नेता-ठीकेदार, जे बात बात पर दरोगा कें बदली करबा देबाक धमकी दैत अछि, तकरा दरोगा कोना नहि मददि करतै? ओकर अपन हित साधन सेहो ओही नेता-ठीकेदारक संग देला मे होइत छैक। अठन्नीक मोल आब नहि रहलैक। परिवर्तित रूप मे पचास पैसाक सिक्का सेहो बन्ने भS गेल। मात्र सरकारी खाता पर चालू छैक। यदि क्रेय मूल्यक बराबरी करी तs साठि सत्तरि साल पहिलुक अठन्नी एखनुक दू सौ टाकाक समतुल्य भs जाएत। एखन समाज मे जन बोनिहारक न्यूनतम बोनि सेहो दू सौ सॅं कम नहिए छैक। एहेन स्थिति मे पाँच सौ टाकाक नकली नोट मधुप जीक घसल अठन्नीक तुलना मे राखल जा सकैत अछि। आब कल्पना करियौ जे गाम घरक कियो बाहुबली (आ कि कियो आने नेतघट्टू लोक, नेताक चमचा आ कि ठीकेदार) साँझू पहर दूटा जन कें बोनिक रूप मे पाँच सौ टाकाक नोट देलखिन्ह ई कहि जे चौक पर भजा कए दूनू बाँटि लिहें। चौक पर ओ नोट नहि भजलैक कारण ओ नकली छलैक। एहन स्थिति मे यदि ओ नोट घुरेने हुनका लग आओत तs की ओ स्वीकार कs लेथिन्ह जे सम्भवतः हुनके देबा मे भूल भेल हेतन्हि आ नोट बदलि देथिन्ह ? के स्वीकार करत अपन ई गलती ? आ गलती भेलैक कोना जखन जानिये कए कएल गेलैक ? मधुपजीक बुचनी अन्यायक प्रतीकार करैत अछि - “मालिक, हम कर्ज न छी मॅंगैत, अथवा नहि एलहुँ भीख हेतु, उपजले बोनि टा देल जाए…” मुदा फल की भेटैत छैक ? मखनाक लात घूसा आ बेहोस भs कए खसि पड़ला पर फेर भुटकुन बाबूक बेंतक प्रहार। बुचनी भागमन्त छल, कष्ट सॅं मुक्ति भेटि गेलैक। सोचियौक यदि ओहि दिन ओ मरैत नहि आ अपंग भs जाइत तखन ओकर जिनगी केहन बोझ भs जइतैक ? अथवा यदि अपने ओ मरि जाइत आ बच्चा टुअर भs कए जीबैत रहि जइतैक ? मधुपजी अपन नायिका कें ओहि कष्ट सॅं बचा लेलखिन्ह - “बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि” मुदा कतेको एहन “घसल जिनकर अदृष्टि” बुचनी सन भाग्यशाली नहियो भs सकैत अछि। आजुक जन बोनिहार कतए जा कए नालिस करत ? एखनहु समाज ओहिना छैक जे दरोगा तs पैघ बात, सिपाहिए ओकरा थाना पर टपए नहि देतैक। उनटे झूठक कोनो अपराध बना कए दश लाठी मारबो करतै आ बेसी टेंटें करत तs ओकरा हाजतक भीतर बन्न सेहो कs देतैक। आ तकरा छोड़बै लेल फेर ओएह नेता जीक सहारा। भुटकुन बाबूक घमंड आ बेइमानी पोषित छलन्हि भ्रष्ट प्रशासनक कारण। आ प्रशासनक भ्रष्टाचार बढ़बे केलै अछि, बहुत बेसी बढ़लैक अछि। नकली नोटक व्यवसाय जे फरि आ फुलाए रहलैक अछि से किएक ? नवका भुटकुन बाबू अर्थात् ठीकेदार साहेब यदि पूरा बोनि दs देथिन्ह तs बूझू जमाना उनटिए गेलैक। सब जनैत छी मनरेगा मे कतेक पर औंठा छापल जाइत छैक आ कतेक हाथ पर देल जाइत छैक। बोनिहारक उचित बोनि एकटा साधारण किसान भले दs दैत होइक, ठीकेदार तs कतहु नहिए दैत छैक। घसल अठन्नी कें एखनहु ठौर नहि भेटलैक अछि। ओ एखनहु ओहिना बौआ बौआ कए गाबि रहल अछि “हम कतए जाउ, अबलम्ब पाउ ?” आ बुचनीक बेटा बेटी नाती पोता खटि रहलैक अछि आ हाथ मे पाँच सौक नकली नोट लेने दोकाने दोकान बौआ रहलैक अछि। जेना समय ठाढ़ भs गेल होए। मधुपजीक ई रचना काल निरपेक्ष भs गेल। काल बीतैत रहल मुदा रचना सदिखन अपन प्रासंगिकता बनौने रहल। ------ 2 केदार कानन मधुपक रचना-व्यक्तित्व ( आलेख- मधुप अभिनंदन ग्रंथसँ साभार) प्रकृतिक विराटता आ ओकर गह-गहमे भरल सौन्दर्यक रूपराशि, मानवीय करुणा आ ओकर पोर-पोरमे भरल हृद्यस्पर्शी तरलता, श्रृंगार आ ओकर अंग-अंगमे भरल चमक-दमकक कवि काशी कान्त मिश्र "मधुप" मैथिली काव्य-साहित्यिक अद्वितीय आ अपना ढ़ंगक एकसर कविक रूपमे स्थापित छथि। जहिना मेथिली गद्य-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबामे प्रो. हरिमोहन झाक अन्यतम स्थान छनि, ठीक तहिना महाकवि विद्यापतिक बाद मधुपे जीक गीतकेँ ई महत्व प्राप्त छैक जे अपन लोकप्रियता आ अपन गेयधर्मिताक बलें संपूर्ण मिथिलांचलक लोककंठमे रचि-पचि आ बसि गेल। ई मधुपजीक अद्वितीय प्रतिभाक परिचायक थिक जे ओ प्रायः एखन धरि पद्येमे सभ किछु लिखलनि, एतए धरि जे आन-आन साहित्यिक बंधु-बांधव लोकनिकेँ ओ पत्रो पद्यबद्धे लिखलनि। एकरा कम महत्वक बात नै बूझक चाही। मधुपजीक कविताक विषय-वस्तु आ शिल्प-शैली आ काव्यगत विशिष्टता शुरुहेसँ व्यापक आ अनेक धारामे प्रभावित रहलनि, इएह कारण थिक जे हुनक काव्य-संपदामे अनेक ढ़ंगक नव-नव प्रयोग आ विभिन्न धारा आ दिशाक कविता सभ भेटैत अछि। मैथिलीक आलोचक लोकनि (?)केँ मैथिलीमे लिकल मधुपजीक फिल्मी पैरोडी अथवा ओहि प्रकारक हुनक अनेक गीतमे भने विशुद्ध साहित्यिक तत्व नै भेटैत होनि मुदा ओदा ओहि प्रकारक अनेक गीत सभक लोकप्रियता आ लोकानुरंजकताकेँ अनठाओल अथवा बिसराओल नै जा सकैत अछि। अपना ढ़ंगक ओ गीत सभ मैथिलीमे एकदमसँ फराक भऽ अपन स्थान सुरक्षित बनौने अछि। मधुपजीक महत्व एहू लेल अछि जे ओ संपूर्ण मैथिली साहित्यमे प्रथम आ एकसर ओहन कवि छथि जे तमाम हेय, तिरस्कृत आ काव्यसंसारक अछोप-अजाति विषय-वस्तुकेँ अपन कविताक विषय सेहो बनौलनि आ हुनक ओ सभ कविता वस्तुतः मानवीय करूणा आ वेदनासँ ओत-प्रोत अछि। एहि प्रसंगमे मुकन पतित पीक, छुतहर आ सारा परक तुलसी आदि कविताकेँ देखल जा सकैत अछि। दोसराक दुखसँ उत्पन्न करूणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करुणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करूणाक बावना समाजिक क्षेत्रमे मानवतावादी विचारकेँ जन्म दैत अछि। व्यावहारिक जीवनमे सेहो जीवनक विषमता आ असारताक अनुभूतिसँ करूणाक भावना उत्पन्न होइत अछि। आ एहू पृष्ठभूमिमे हिनक अनेक रचनाक जन्म भेल अछि। बहुआयामी प्रतिभाक अद्भुत रूपें धनी मधुपजी एक दिस अत्यन्त सहज आ सरस आ लोकग्राह्य गीत लिखने छथि तँ दोसर दिस जटिल आ दुहूह छंदमे तत्सम शब्दक प्रयोग कऽ सेहो अनेक गीतक रचना केने छथि। भने मधुपजीक एहन अनेक रचना लोकप्रियताकेँ नहि प्राप्त कयलक मुदा एहि प्रसंगे दू मत नहि जे एहन हुनक सभटा रचना विद्वन्मंडलीक बीच बेस चर्चित आ प्रशंसित रहल अछि। प्रकृतिक विराटताक कवि मधुप अपन अनेक गीतमे प्रकृति-सौन्दर्यक चित्रकेँ चित्रित केने छथि। प्रकृति संबंधी हुनक गीतकेँ पढ़िकेँ कतहुँ ई नहि बुझाइत अछि जे आयातित भाव-बोधसँ हुनक गीत दबल अछि अपितु प्रकृतिक उन्मुक्तता आ व्यापकताक बोध हुनक गीत सभमे अनायासे दबल प्रकट होइत अछि। हिनक प्रकृतिसँ संबंध गीत सभ अपन स्वाभाविक रूपमे विकसित होइत अछि। प्रकृति मधुपजीक कविता संसारमे मात्र प्रकृति-ए नहि रहैत अछिअपितु प्रकृतिक अनेक-अनेक स्रोत, अनेक-अनेक अर्थ आ अनेक अनेक संदर्भ प्रकट होइत अछि। मधुपक काव्य-संसारमे श्रृंगारिकता भरल पड़ल अछि किन्तु ओहिमे एकटा सहज स्वाभाविकता आ निश्छलता भेटैत अछि आ तें ओकर रसानुभूति पाठककेँ आह्लादित करैत अछि। ई श्रृंगारिकता पाठकक भीतर कोनो तरहक विकार आ पापकेँ जन्म नहि दैत अछि अपितु काव्यमय श्रृंगारिकता पाठककेँ मुग्ध आ मोहने रहैत अछि। हिनक अनेक गीत रचना पारंपरिक ढ़ंगक अछि तँ अनेक प्रगतिशील रचना सेहो अछि। छोट-छोट। रमनगर। बहुत सहज। बहुत लोकप्रिय आ सरस। संस्कृतक पंडित रहितो हिनक पांडित्य हिनक प्रगतिशीलतामे कतहुँ अवरोध बनि ठाढ़ नहि भेल। हिनक अनेक कथाकाव्यमे सभसँ बेसी चर्चित आ प्रशंसित भेल हिनक "घसल अठन्नी"। समाजिक जीवनक विद्रूपता आ कुरूपता, सामंत आ सर्वहाराक असमानता आ विशाल खाधि, गाम-घरमे जन-हरबाहक दुःस्थिति, ओकर सभहँक जीवनक नारकीयता, मजूरक पोर-पोरमे गस्सल दुख आ व्यथा आ करूणाक चित्रण घसल अठन्नीमे अपन स्वाभावितक संग व्यंजित भेल अछि।कविताक अंतिम पाँति पाठकक मोनकेँ भयंकर अवसाद आ गंभीर करुणासँ भरि दैत अछि, जखन मधुपजी ओहि घसल अठन्नीक निराश्रायता आ निर्थकताक चित्रण करैत कहै छथि— सविषाद हासमे चन्द्रमाक ओ घसल अठन्नी बाजि उठल: हम कत’ जाउ अवलम्ब पाउ के शरण? घसल जनिकर अदृष्टि! एहि सभहँक अतिरिक्त मधुपजी महाकाव्य सेहो लिखलनि आ हुनक एहि महाकाव्य "राधा-विरह"केँ १९७० ई.क साहित्य अकादमीक पुरस्कारसँ पुरस्कृतो कएल गेल। मधुपजी साहित्यकारक एकटा विशिष्ट वर्गकेँ अपन प्रेरणा, अपन सेजन्यता आ अपन व्यवहार-कुशलतासँ प्रेरित-उत्साहित केलनि आ तकर परिणाम थिक मैथिली साहित्यिक अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व यथा मणिपद्म, किसुन, बहरड़ आ अणु आदि। अंतमे हम भीमनाथ झाक निम्नलिखित पाँति हमरा मधुपजीक काव्य-संसारक विषयमे बहुत सटीक आ संगत लगैत अछि--"मधुपक काव्य-समुद्र थिक-- मधुपक काव्य आ समुद्र- अत्यंत विशाल भंडार थिक, जाहिमे जएह ताकब सएह टालक टाल भेटत"। 3 कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि मधुपजी मैथिली साहित्यक विभूति छलाह से के नहिं मानत. मधुपजी मैथिलीक प्रचार-प्रसारक हेतु बेहाल, प्रथम पीढ़ीक सिपाही छलाह सेहो निर्विवाद. ओ अपन रचना सं मैथिली साहित्यकें ततेक समृद्ध केने छथि जे हुनक प्रशंसा में बहुतो किछु कहल गेल अछि आ बहुतो कहब बांकी अछि. मधुपजीकें हम किरणजीक ओतय देखने अवश्य छियनि मुदा हुनका सं हमरा व्यक्तिगत परिचय तं नहिएँ छल. मधुप जीक कविता सं परिचित हेबा सं पूर्व हम मधुपजीक  नाम सं परिचित भेलहुँ . कारण साठिक दशकमें ओ सुपरिचित कविक  रूपमें प्रतिष्ठित भ चुकल छलाह, आ मैथिली कवि लोकनिक जं कतहु चर्चा होइक तं मधुपजी अग्रगण्य होथि . पछाति, हाइ स्कूलक मैथिली पाठ्य-पुस्तक में मधुपजी कविता 'घसल अठन्नी' पढ़लहुं. ओ कविता ततेक सुपरिचित छैक जे कतेको गोटे ओहि कविताक  पक्ष -विपक्षमें अपन अभिमत देने होथि से संभव. मुदा, राजनैतिक विचारधाराक बखेड़ा सं दूर कविताक भाषा आ मर्मस्पर्शी चरित्र-चित्रणक गप्प हो तं 'घसल अठन्नी' कविता पढ़ि सहृदय मनुक्खक आंखिमें नोर अवश्य आबि जयतैक. मुदा, हम सोचै छी , मधुप जी हमरा किएक मन पड़ैत छथि ? सत्य पूछी तं मधुपजी हमरा 'घसल अठन्नी'क कारण नहिं मन पडैत छथि. मधुपजीक स्मरणक असली कारण अछि हुनकर लिखल मैथिली लोकगीत, जे स्वतः हरबाह- चरबाह सं ल कय विदेश्वर-कुशेश्वर स्थान जेबाबाली किशोरी धरिक कंठ सं अनायास प्रवाहित होमय लगैत छल . तें मैथिली गीतकें लोकप्रिय बनेबाले  मधुपजी  हिंदी सिनेमाक लोकप्रिय गीत सबहक तर्ज पर सेहो गीत सब बनौलनि. ओ संस्कृतक विद्वान छलाह, हुनका महाकाव्य लिखबाक कल्पना आ सामर्थ्य छलनि . तथापि मधुपजी मैथिली लोकगीत दिस किएक प्रवृत भेलाह . हमरा जनैत, मधुपजी विद्यापतिएक परम्पराक कवि छलाह. हुनका बूझल छलनि, जन-बोनिहार, आइ-माइ लोकनि ने विद्यापति पुरुष-परीक्षा पढ़इत  छथि आ ने हुनका लोकनिकें कीर्तिलता वा कीर्तिपताका सं कोनो सरोकार छनि. मुदा, महिस पर बैसल महिसबार बिदेश्वरक बाट में 'कखन हरब  दुःख मोर हे भोलानाथ ' ओही  तन्मयतासं गबैत अछि जेना कोनो चानन-तिलक धारी पण्डित गबैत छथि. तें लोकभाषाक प्रचारक हेतु  मधुपजी   लोकगीतक  लोकप्रिय विधा कें सेहो संपोषित केलनि. आजुक मिथिलांचल में दुर्गापूजा-दसमीमें  जखन ' मुंह खोल' मुंहबे में डाल दी' सन-सन वीभत्स गीतक अनवरत अष्टयाम चलैछ, नेपालक मैथिली टीवी चैनल सब पर पंजाबी गीतक तर्जपरक  विकट गीत सब सुनैत छी आ  मैथिली लोकगीतक दुर्दशा देखैत छी तं 'राधा-विरह' महाकाव्य क प्रणेता महाकवि क संग-संग, 'पंचमेर' आ  'टटका जिलेबी' सन गुटका गीतमाला लिखनिहार लोककवि मधुपजी सहजहिं मन पड़ैत छथि. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- मधुपक गीत अमर,मिथिलामे 2.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध “प्र.म” 1 जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ मधुपक गीत अमर,मिथिलामे ‘मधुप’जीक नाम सुनिते मोन पडि अबैत अछि हुनका द्वारा  लिखल कतेक पांती सभ : ‘ओ घसल अठन्नी बाजि उठल हम कत’ जाउ....’ ‘सुरुज डुबैत भैया केर ताकि बटिया बहि गेल कमला बलान हे...’ ‘हम जेबै कुसेसर भोर, रंगि क’ ठोर....’ ‘कलबल कें भोरे-भोरे ई कोमलांगी औंघेले एली चौंकि चुप्पे...’ मधुपजीक साहित्य-संसारक एक अवयव गीत मात्रपर एखन चर्च क’रहल छी । सिनेमाक गीतक भासपर मधुपजीक गीत सभ ‘टटका जिलेबी’ आ ‘अपूर्व रसगुल्ला’नामक   पुस्तिका मे प्रकाशित होइत छल । बादमे ‘चौंकि चुप्पे’ नामकसंकलन-पोथीमे बहुत रास गीत सभ आएल। ई गीत सभ बहुत लोकप्रिय भेल । पढल-लिखल लोक आ अनपढो लोक सभ गायक लोकनिसं फरमाइस क’क’मधुपजीक गीत सुनैत छलाह आ आनन्दित होइत छलाह । मधुपजीक  श्रृंगारोक गीत सभ स्तरीय रहैत छलनि । मैथिल युवा-युवतीवर्गमे सिनेमाक गीतक प्रभावक विरुद्ध मधुपजीक गीत सभ एकटा सशक्त हस्तक्षेप छल । सिनेमाक गीतक धुन केहनो हो ओकर भासपर  मैथिलीमे गीत लीखि देब मधुपजी लेल सहज आ स्वाभाविक होइत छलनि। मधुपजी एहि तरहक गीतक रचना कए मैथिलीक लोकप्रियता बढौलनि। गीतमे बिम्ब मौलिक रहबाक कारण गीतक अपन आकर्षण होइत छलैक जे जन-सामान्यक कण्ठमे स्थापित भ’ जाइत छल। एकर अतिरिक्त सोहर,समदाउन, लगनी, उदासी आदिक भासपर सेहो नव गीत लीखि ओहि भास सभमे  नवजीवन,नव उर्जा  भरलनि । मधुपजी डेढ हजारसं बेसी विविध गीतक रचना केने छथि । ई गीत सभ निम्नलिखित छोट-पैघ आठ टा पुस्तकमे प्रकाशित भेल अछि : 1.अपूर्व रसगुल्ला 2.टटका जिलेबी 3.पचमेर 4.गीत मंजरी 5.चौंकि चुप्पे 6.बटसावित्री 7.बिदा गीत 8.बोल बम गीतक अप्रकाशित पोथी सभ निम्नलिखित अछि : 1.विनयांजलि 2.दुलहा रे नंगटे नाचय 3.गंगा गीतामृत एकर अतिरिक्त दुर्गा सप्तसतीक अनुवादक पोथी ‘दुर्गा सप्तसती मैथिली सुधा’मे तेरहो अघ्यायक आरम्भमे एक-एकटा घ्यान गीत छनि। मधुपजी अपन आत्मगीतक शीर्षक रखलनि ‘मधुचक्र’जाहिमे करुणाक प्रवाह अनुपम अछि । गीत सबहक वर्गीकरण मुख्यतः 4 भागमे क’ सकैत छी : 1.श्रृंगार 2.करुणा 3.भक्ति 4.अन्य-सामाजिक सरोकारक गीत । मधुपजी सभ देवी-देवता पर गीतक रचना केने छथि जकर संख्या 500 सं कम नहि छनि । सभसं बेसी गीत शिव पर छनि । 26 टा गीत राम पर छनि । सामाजिक विषमता पर लिखल गीतक संख्या सेहो बहुत छनि । मधुपजीक गीतक सम्बन्धमे किछु समीक्षक लोकनिक मत एहि प्रकारें व्यक्त कएल गेल अछि : प्रो. रमानाथ झाक अनुसार : ‘मधुपजीकें गीत रचनामे प्रकृष्टता प्राप्त छैन्हि,किन्तु हिनक गीतक लोकप्रियता भाव-भाषाक सरलता ओ स्वाभाविकतापर आधारित नहि अछि, लोकप्रियताक कारण थिक ओकर संगीतात्मकता एवं िचत्रात्मक होएब। ई नव-नव लय, नव-नव तर्ज पर रचना करैत रहैत छथि जे हिनक रचनामे अन्तर्भूत कृत्रिम भाव-विन्यासक आवरणक कार्य करैत अछि,दोषकें झांपि दैत अछि।’ रमानाथ बाबू आगां लिखैत छथि : ‘लोकगीतक पहिल धर्म थिक सहजता ओ स्वाभाविकता। से रहनहि साधारण जनताक बीच ओकर प्रवेश भ’ सकैछ। आ ई तत्व मधुप प्रणीत लोकगीतमे प्रचुरतासं प्राप्त अछि।’ मधुपजीक शिव विषयक लोकगीतक प्रसंगमे शैव साहित्यक समर्थ समीक्षक डा.श्री रामदेव झा कहैत छथि : ‘मधुपजी नवीन-नवीन लय, छन्द ओ भावखण्डकें आधार बनाय शिवगीतक रचना करैत रहलाह अछि ।.....कीर्तनक हेतु उपयुक्त ढोल-झालिपर गेय धुनि सभक पद्धतिपर बहुतो शिवगीतक रचना कयलनि अछि। महिला कण्ठमे, गाम-गामक कीर्तन मण्डलीमे, गायक ओ नटुआ सभमे, ग्रामीण नाटकक रंगमंचपर, स्कूल कालेजक छात्रगण द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोहमे मधुपजीक शिवगीत सुनल जा सकैत अछि ।’ मैथिली साहित्यक इतिहास लेखक डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क अनुसार : ‘शिल्पक क्षेत्रमे मधुपजी लोकगीत काव्यक सरल भाषा शैलीक  अतिरिक्त चमत्कारपूर्ण आलंकारिक  भाषा शैलीक सेहो प्रयोग कएल जाहिमे मुख्यतःचमत्कारपूर्ण अनुप्रास ओ यमकक पाण्डित्यपूर्ण शब्द विन्यासक छटा दिस कविक विशेष ध्यान अछि। किन्तु मधुपक सर्वश्रेष्ठ ओएह रचना थिक जे सरल सहज भाषामे लिखल गेल अछि ।’ डा. व्रज किशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ लिखैत छथि : ‘मधुपजीक अन्तर-वीणा मने कोनो नीक धुन सुनितहि झंकृत भ’ उठैत छनि्। ओइ झंकारकें ओ तखनहि मैथिलीक गीतपंक्तिमे बान्हि दैत छथिन ।.....ओना धुन जे अरबधि क’ मांगल-चांगल होइ, किन्तु गीतक बिम्ब रहैत छैक मौलिक। ई लोक जीवनक क्षणकें साकार क’ दैत छैक  आ नटुआ-सुलभ छैक। एहेन गीत सभमे जेना मधुपजी पुरान धारक मैथिली-चिन्तनक तटपर साधना कयने होथि।’ डा.प्रेम शंकर सिंहक अनुसार  : ‘कविचूडामणि मधुप नवगीतकारक आदि गुरु कहल जा सकैत छथि। आधुनिक तर्जपर लिखल मधुपजीक गीत विद्यापतिक उपरान्त सर्वाधिक लोकरंजन कयलक।’ श्री कुलानन्द मिश्रक मत छनि : ‘निश्चित रुपसं गीतकारक रुपमे मधुपजी सभसं अधिक सफल भेल छथि। मधुपजीक गीतकार हुनक कविक स्थापनामे सहायक भेलनि ।.....ई स्पष्ट थीक जे जं हुनक गीत रचना सभ लोकप्रिय नहि भेल रहितनि तं हुनक कवि व्यक्तित्वो एतेक आदरणीय किंवा व्यापक नहि भेल रहितनि।’ युवा वर्गक बीच मैथिलीक आकर्षणमे निरन्तर वृद्धि करैत रहबाक लेल मधुपजी फिल्मी गीतक धुनपर गीत लीखि क’ छोट-छोट संकलनमे कम पाइमे गायक,पाठक आ मैथिली प्रेमी लोकनिक बीच उपलब्ध करयबाक प्रयासमे लागल रहलाह। ओ एकर चिन्ता नहि केलनि जे एहि लेल विद्वान लोकनिक प्रतिक्रिया केहेन हेतनि । मधुपजी गीतक अतिरिक्त मुक्तक काव्य, कथा काव्य, प्रबन्ध काव्य, संस्मरणात्मक काव्य, प्रशस्ति काव्य, शोक काव्य,अनुवाद आदिसं मैथिली साहित्यक भण्डार भरलनि जाहि लेल विभिन्न संस्था द्वारा प्रशंसित आ पुरस्कृत सेहो कएल गेलाह । मुदा जं मात्र गीते लिखने रहितथि तइयो मिथिलाक जनमानसमे आ जन सामान्यक कण्ठमे अमर रहितथि । हमरा आदरणीय श्री ‘अमर’जीक निम्नलिखित कथन नीक लगैत अछि ‘ ‘.....यद्यपि गोविन्द दास झा तथा चन्दा झाक गीत सेहो जनकण्ठमे प्रचुरतासं प्रचार पौलकनि, किन्तु विद्यापति जकां जनसामान्यक कण्ठहार नहि बनि सकलनि । ताहि दृष्टिएं मधुपजीक पदकें जे लोकप्रियता प्राप्त भेलनि से हिनका ‘अभिनव विद्यापति ’ कहयबाक उपयुक्त सिद्ध करैत छनि । मधुपजीक मुहें हुनक गीत ‘बातरससं छी तबाह, नहि बातक रस अछि...’ सुनबाक सुअवसर प्राप्त भेल अछि कोइलखमे विद्यापति स्मृति पर्वक अवसरपर । ओहि अवसरपर हुनक मैथिली-प्रेमक अनुभवक स्मृति एखनहु हुनका प्रति असीम श्रद्धासं भरि दैत अछि । हृदयसं निकलैत अछि : ‘ कत तोर करब बडाई..’ सन्दर्भ पोथी : श्री काशीकान्त मिश्र ‘मधुप ’ पर श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ द्वारा लिखित आ साहित्य अकादमी द्वारा 1994 मे प्रकाशित पोथी । २ आशीष अनचिन्हार व्यंग निबंध “प्र.म” जेना जीव-जंतुक अनेक योनि होइत छै। तेनाहिते मंत्री-संत्रीक सेहो अनेक योनि होइत छै। मनुख सेहो जन्म आ मरणक चक्रमे फँसैत अछि तँ मंत्री सभज्वाइन आ रिजाइन केर चक्रमे। जेना मनुखक बहुत रास नाम होइत छै तेनाहिते मंत्रीक सेहो बहुत्ते नाम होइत छै। किछु नाम काजक अधारपर होइत छै तँकिछु शारीरिक लक्षणपर तँ किछु नाम किछुपर। प्राचीन कालमे जेना-जेना संस्कृत पसरैत गेल तेनाहिते-तेनाहिते ओकरा सम्हारब कठिन भऽ गेल। ठीक तेहनेहालति मंत्री-संत्रीक नामावलीक भऽ गेल अछि। प्राचीन कालमे पाणिनी सूत्र रूपमे संस्कृतकेँ बान्हि देला तेनहिते आधुनकि कालमे हम अपनाकेँ नव पाणिनी मानि आइ-काल्हि मंत्री-संत्रीक नामावली प्रस्तुतकेलहुँ। आब चूँकि एखनुक समयमे केकरो लग फुरसति नै छै जे ओ सूत्रक टीका-भाष्य करत। तँए ऐठाम हम अपने टीका ओ भाष्य प्रस्तुत कऽ रहल छी(ओना सूत्र भाष्यमे बहुत रास केटेगरी छूटि जाएत जेना प्रमेह मंत्री, प्रसिद्ध मंत्री, प्रबंध मंत्री आदि तँइ आब हम अति महत्वपूर्ण नामावली सभहँक दर्शनकराबी....) --- 1) दिनक गरीब आ रातुक धनिक जकर असीमित प्रवचनसँ तृप्त होइत छथि, अथवा खाली पेट जकर परम पवित्र शब्द, धातु, अलंकार आदिसँ भरि जाएअथवा, जकर मूँहक शब्देसँ सभ समस्याक समाधान भऽ जाए से प्रवचन मंत्री भेल। 2) जे लोक समाजक नामपर अपन ओ अपन गोंतिया आदिक विकास करए, अथवा जकर शासन कालमे समाजक विकास ओ प्रगति रुकि जाए अथवादुराचारी सभहँक प्रगति हुअए से प्रगति मंत्री छथि। 3) ओहन लोक जे अपन प्रतिमा मू्र्तिकेँ बाग-बगैचा, चौराहा, आदिपर लगाबथि। अथवा, ओहन लोक जे समाजक विकासकेँ नकारि प्रतिमा आदिक निर्माणपरव्यय करए से प्रतिमा मंत्री भेल। 4) प्रति शब्दसँ सजल आन शब्दक मालिक सेहो मंत्रीक काबिल होइत छथि जेना जे लोक छाँह जकाँ मुख्यमंत्री पदक मर्यादा तेयागि कोनो युवा लड़कीक छाँहजकाँ जासूसी कराबथि से प्रतिछाया मंत्री छथि। जे लोक सदिखन प्रतिवादे टा कऽ अपन वा अपन लोकक विकास करथि से प्रतिवाद मंत्री छथि, प्रतिरोधमंत्री सेहो कहि सकै छिऐ कहबाक लेल प्रतिक्रिया मंत्री सेहो कहि सकै छिऐ। जे लोक खाली प्रतिशोध लेल बैसल रहथि से प्रतिशोध मंत्री छथि, अथवापहिलुक सोधल पद ओ खजानाकेँ फेरसँ सोधि लेथि से प्रतिशोध मंत्री छथि। ऐ खंडमे बहुत रास संभावना छै जेना प्रतिदेह मंत्री, प्रतिदान मंत्री, प्रतिदिन मंत्री,प्रतिरास मंत्री आदि-आदि। ऐठाम सभहँक भाष्य संभव नै। ओना ऐ खंडक सभसँ शक्तिशाली "प्रतिफल मंत्री" छथि। भोटक रिज्लटक बाद जनताकेँ सेहो आसत्ता-विपक्षीकेँ सेहो सभकेँ अपन-अपन कर्मक प्रतिफल भेटि जाइत छै। कियो ऐ मंत्रीक प्रकोपसँ बचि नै पाबैए आ जे बचि जाइए तकरा लेल तँ भगवान 5बर्ख देने छथिन। ऐ खंडमे प्रतिबिंब नामक मंत्री पद सेहो महत्वपूर्ण अछि। जे लोक चुनावसँ पहिने आ चुनावक बाद बिंब निर्धारणमे निपुण छथि से ऐ मंत्रीपदक अधिकारी छथि। 6) जे लोक विदेश भ्रमण कऽ खाली प्रपोज करथि आ देशकेँ रिज्लट सुन्ना भेटै से प्रपोज मंत्री बनि सकै छथि। एकरा प्रस्ताव मंत्री कहि कऽ भारतीयकरणकऽ सकै छी। 7) लोक सभा ओ विधान सभामे जे उत्तर देबाक बदला जे जनतासँ प्रश्न पूछथि आ जनताक मूँह बंध कऽ देथि से प्रश्न मंत्री छथि। 8) जे लोक जनताक बीच योजना सभहँक लाभ प्रसाद रूपें बाँटि सकथि आ अंतमे अपने ओकर पूर्ण भोग करथि से प्रसाद मंत्री छथि। 9) जे खाली प्रथम-प्रथम मने इतिहासमे अपना-आपकेँ पहिल घोषित करऽ से प्रथम मंत्री बनि सकैए। ओना ऐ मंत्री पद लेल कम्पीटीशन बहुत कड़गर छै आऐ लेल बहुत रास कोंचिग सेन्टर सेहो खुलल छै। बहुत रास लोक ऐमे सफल होइए मुदा जे पहिनेसँ साहित्यकार अछि से ऐ मंत्री पदककेँ एकै बेरक परीक्षामेपाबि लैए। तँइ सभ क्षेत्रक अलावे साहित्यमे ऐ मंत्री पदक बहुत डिमांड छै। एकटा खिस्सा लिअ-- एकटा गाम रहै जैमे सभ साहित्यकारे रहै। मर्दसँ जनानी धरि सभसाहित्यकार। बच्चासँ बुढ़बा धरि सभ कियो साहित्यकार। ओइ गाममे सभ कम्पीटीशन लेल मरै। ओइ गाममे कियो कोनो कहियो 3 बजे भोरसँ पहिने दिसामैदान नै गेल रहै... बस एकटा बुढ़बा चारि दिन उपास कऽ कऽ पाँचम दिन भुज्जा फाँकि लेलक। आ दू बजे लोटा लऽ कऽ विदा भऽ गेल। भोरे-भोर सौंसेहल्ला भऽ गेलै जे ऐ गामक इतिहासमे फल्लाँ महाकवि पहिल बेर दू बजे दिसा-मैदान गेला। हाले-फिलहालमे एकटा संगोष्ठी भेल जकरा कहल गेल जे मैथिलीक इतिहासमे पहिल बेर "सेब संगोष्ठी" भेल अछि। हुनके मोताबिक ऐ संगोष्ठीमे भाग लेनिहारसभ प्रतिभागी कहियो सेब नै देखने रहथिन। सभकेँ सेब देखाओल गेलै। बताएल गेलै जे सेबपर छूरी कोना चलाओल जाइत छै। कोना फाँक काँटल जाइतछै। फेर हुनके मोताबिक प्रतिभागी लोकनि पहिल-पहिल बेर सेब खेलथि। एहन- एहन बहुत उदाहरण अछि। एकटा लोकक ई बेमारी तँ बहुत उपर चलि गेलछनि। हुनका इंटरनेटपर पहिल हेबाक बेमारी छनि। आँखिक सोंझा देल सभ सबूतकेँ ओ इग्नोर कऽ दै छथि। हुनका मोताबिक ओइ समयमे हम ई नै देखनेरहिऐ तँए ई पहिल नै हएत। आब हुनका के कहतनि जे सरकार ई अहाँक आँखि आ दिमागक कमजोरी अछि। अस्तु किछु गोटेक ईहो दाबी करै छथि जेराजकमल चौधरीकेँ पहिले-पहिल हमहीं दारू पिएलियै। कियो ईहो कहै छथि जे प्रो. हरिमोहन झाकेँ पहिले-पहिल हमहीं पेशाब करैत देखलिऐ आ तखने पहिलबेर कहिलिऐ जे ई बच्चा आगू बढ़त। ई पहिल हेबाक चक्करे तेहन छै जे एकटा बालक 2009मे बनाएल ब्लागकेँ डी-एक्टिभेट कऽ कऽ घोषणा केला जे हम2007मे ब्लाग बनेने रही। औ महराज जँ बनेने रही तँ कमसँ कम लोककेँ देखबाक लेल लिंक तँ छोड़ि दितिऐ ने। कतेक कहू ओना टटका-टटकी एखनेपता चलल अछि जे एकटा युवा साहित्यकार घोषणा केला अछि जे मैथिली साहित्यमे पहिले-पहिल हमहीं अंडा देलिऐ। हेबाक लेल तँ आरो भऽ सकै छथि मुदा जे ऐ सभहँक जे प्रधान होथि से................. ईहो लिखनाइ जरूरी छै की? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.डॉ. अरुण कुमार सिंह -मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना 2.आशीष अनचिन्हार- नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद 1 मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना डॉ. अरुण कुमार सिंह एल. डी. सी. आई. एल., सी. आई. आई. एल., मैसूर-6 परिचय ‘निरंकुशाः कवयः’ केँ सार्थक करैत संसारक कोनो बाधाकेँ बिनु अंगीकार कएने, अपन इच्छानुसार काव्यक सृष्टि-सर्जन करयवला युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा कवि चूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ स्वभावत: जन्मजात सारस्वत प्रतिभा-सम्पन्न संस्कारेसँ आशुकवि छलाह। जाहि वस्तु पर नजरि गेलनि, भाव उमड़लनि, बस्स, तकरा अपन लेखनीसँ भव्यता प्रदान कए देलनि। पं॰ सुरेन्द्र झा ‘सुमन’सँ प्रभावित भए मैथिलीमे लेखन कार्य प्रारंभ करयवला कलमक जादूगर मधुपजीक गीत विद्यापतिए जकाँ मिथिलाक सभ अंगनामे सभ अवसर पर सुनल जाइत छल। एहि ठाम छलसँ अभिप्राय अछि वर्त्तमान समयमे मैथिलीक वस्तुस्थिति। प्रकाशित कृति मधुपजीक प्रकाशित रचनाकेँ सुविधाक लेल निम्न भागमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि- 1.    महाकाव्य- राधाविरह(1969); मुक्त मधुप(2006)। 2.    गीतकाव्य- अपूर्व रसगुल्ला(1941); टटका जिलेबी(1945); पचमेर(1949); गीत मंजरी(1963); चौंकि-चुप्पे(1968); विदागीत(1973); बटसावित्री(1975); बोल-बम(1981)। 3.    मुक्तक काव्य- झंकार(1942); शतदल(1944); ताण्डव(1959); गंगातरंगावली(1974); मधुप-सप्तशती(1982); परिचय-शतक(1988)। 4.    कथाकाव्य-  त्रिवेणी(1945); त्रिकुशा(1958); द्वादशी(1979)। 5.    संस्मरणात्मक आ आत्मकथात्मक काव्य- प्रेरणापुंज(1980)। 6.    प्रशस्तिकाव्य-  कोबर गीत(1945)। 7.    अनुवादकाव्य- दुर्गासप्तशती, मैथिली-सुधा(1977)। दलित चेतना : एक परिचय धर्मसूत्र तथा दोसर ब्राह्मण पुस्तकमे ब्राह्मण, क्षत्रिय आओर वैश्यकेँ छोड़ि सभ श्रमजीवी जातिकेँ शूद्र घोषित कए देल गेल छल। महाभारतक अनुशासन पर्वमे कहल गेल अछि जे शूद्र मजदूर अछि। शूद्र नहि रहत तँ परिश्रमक काज के करत? नृसिंह पुराणमे कहल गेल अछि जे खेती-बारी शूद्रक काज थिक। ई निर्विवाद जे सबटा औद्योगिक उत्पादन करयवला लोककेँ भारतीय समाजमे हजारक हजार वर्षसँ शूद्र कहिकेँ दुर्दशाग्रस्त जीवन बितैबाक लेल बाध्य कएल गेल अछि। एहि स्थितिक विरोध अठारहवीं सदीसँ शुरु भेल जे अन्ततः बीसवीं सदीमे एकटा पैघ सामाजिक आन्दोलनमे परिवर्त्तित भए गेल। पंजाबसँ दक्षिण भारत धरि, पूर्वमे बंगालसँ महाराष्ट्र धरि जातीयता आओर वर्णव्यवस्थाक कारणेँ उत्पीड़ित समाजमे सामाजिक, राजनैतिक आओर सांस्कृतिक मुक्ति आन्दोलन होएब प्रारंभ भेल। एहि सामाजिक क्रांतिमे महाराष्ट्रमे ज्योतिबा फुले, केरलमे नारायण गुरु, तमिलनाडुमे रामास्वामी पेरियार, उत्तरप्रदेशमे झण्डुदास, बंगालमे चाँद गुरु ओ मध्यप्रदेशमे घासी दास आओर सम्पूर्ण राष्ट्रीय रुपमे बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकरक भूमिका एहि अर्थमे बहुत पैध छल जे ओ लोकनि समाजक उपेक्षित वर्गक मुक्ति आंदोलनकेँ तार्किक, वैचारिक आओर सैद्धांतिक आधार देलन्हि। भारतीय इतिहासक ई एकटा दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठ अछि जे लगभग तीन हजार वर्षसँ बेसी अवधि धरि शूद्र घोषित जनसमुदायकेँ अन्तहीन दासता आओर दुर्दशा भोगए पड़ल। एहिमे संदेह नहि जे भारतक जे संस्कृति ब्राह्मणधर्मक प्रभावसँ मुक्त छल ओ एहि दुर्दशासँ बचल रहल, उदाहरणस्वरुप शिल्पी समाजकेँ देखल जाए सकैछ। बौद्ध, जैन आओर लोकायतक जीवन दर्शनमे शूद्र व्यवस्थाक सबसँ तीखगर तार्किक विरोध बुद्ध कएने छलाह। संभवतः इएह कारण अछि जे आइ भारतक सवर्णेत्तर समाजमे सबसँ बेसी आदर बौद्ध धर्मकेँ देल जाइछ। बौद्ध विचारक समाजकेँ अंधविश्वाससँ बाहर निकालि तार्किक बौद्धिक संस्कृतिक विकास कएने छलाह। समाजक निम्न वर्गक आन्दोलनक इएह बुनियादी ताकत रहल अछि। अम्बेदकर प्रेरित दलित पैन्थर आन्दोलन मराठी कविता एवं कथासाहित्यमे सहसा एकटा चमत्कार आनि देने छल, जकर आबाज मैथिलीमे सेहो सुनल गेल। तकरे परिणाम थिक मधुप विरचित कथा काव्य ‘द्वादशी’क अन्तर्गत समाहित ‘घसल अठन्नी’, जकरा मध्य दलित चेतनाकेँ देखब हमर ध्येय अछि। घसल अठन्नीमे दलित चेतना घसल अठन्नी ‘मधुप’क सर्वाधिक प्रख्यात, सर्वाधिक प्रशंसित कथाकाव्य थिक। एहिमे दलित वर्गक एकटा विधवा स्त्री बुचनीक चित्रण कएल गेल अछि। ओ जेठक विकराल समयमे खेतमे बिनु जलखै-कलोक काज करबाक लेल विवश छल, अपन आ अपन बच्चाक जीवन रक्षार्थ। एहि काजक बदला ओकरा भेटतैक मात्र आठ आना। ओकर पति मरि गेल छैक। ओकरा एकटा छौ मासक नेना छैक। साँझमे ओकरा भुटकुन बाबू दिससँ बोनिमे भेटैत छैक अठन्नी, जे कोनो दोकानमे नहि चलैत छैक कियैकतँ ओ घसल छैक। बुचनी ओहि अठन्नी लएकेँ परेसान अछि आ ओ भुटकुन बाबू लग पहुँचि बदलि देबाक आग्रह करैत छैक। ताहि पर भुटकुन बाबू औरतक त्रियाचरित्रकेँ व्याख्यायित करैत उचित बोनि देलासँ अपन कुलमे दाग नहि लगोताह सन बात कहैत ओकरा पिटैत छथिन्ह आ एहि दुहू माय-बेटाक प्राणांत भए जाइत छैक। ई तँ भेल कविताक संक्षिप्तसार। द्वादशीक आमुखकक अनुसारेँ- ‘‘प्रस्तुत द्वादशी संकलन एहने करुणाक निर्झरिणी थिक जाहिमे अवगाहन कयलासँ करुणाक एहि आवरणमे क्रांतिक ज्वालामुखी पाठककेँ दृष्टिगोचर होयतनि। एहि संकलनमे 1940सँ 50 ई.क मध्य रचित 12 गोट करुण रसात्मक कथाकाव्य संकलित अछि। ई संकलन सामाजिक वैषम्य, शोषण ओ अत्याचारक जीवन्त चित्र समक्षमे उपस्थित करैत अछि।’’- आमुख, पृ.- ख उपरोक्त परिप्रेक्षमे आलेखक मूल उद्देश्य बुचनीक मुँहसँ निःसृत पाँति- ‘‘मालिक! हम कर्ज नहि छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए’’    सँ अछि। जाहि मध्य दलित चेतनाक अवगाहन होइत अछि। बुचनीक वाणीमे दृढ़ता छैक जे भुटकुन बाबूक अहंकार अत्याचरक समक्ष टूटि भनहि गेल अछि, मुदा झुकल नहि। बहुत रास आलोचकक कहब छन्हि जे मधुपजीक कविताक पात्र विद्रोहक स्वर मुखरित नहि कऽ परिस्थितिक आगू आत्मसमर्पण कए दैत छनि। मुदा एहि ठाम हम कहए चाहब जे एकाएक बिद्रोहक स्वर नहि उठैछ अर्थात् बिनु चेतनाक बिद्रोह कोना संभव भए सकैछ? स्वतंत्रतासँ पूर्व दलित वर्ग अपन हकक प्रति सावधान भए उचित मांग करब प्रारंभ कए देलनि सैह तँ भेल दलित चेतना। जेकि ‘घसल अठन्नी’क बुचनी अपन पारिश्रमिक मांगैत सिद्ध कए देलनि। एक हिसाबेँ बात बड्ड छोट छैक, अदौसँ सामर्थ्यवान असहायकेँ कष्ट पहुँचबैत आएल छथि, जनिका लग शक्ति छनि, ओ ओकर उपयोग निरीह पर करैत अएलाह अछि, मुदा ‘घसल अठन्नी’ अपन प्रकाशनक संग सभक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करबाक हेतु वाध्य कएलक, जे एकर सबसँ पैघ उपलब्धि मानल जाए सकैछ। शक्तिशाली होथि वा शक्तिहीन, सभ केओ एहि दिशामे किछुओ काल अवश्य मनन कएलनि, जाहिसँ एहि साहित्यक उद्देश्य सोलहो आना सफलता प्राप्त कएलक, जे चिकड़ि-चिकड़ि ओहि साहित्यकारक गुणगान अदौसँ आइ धरि कए रहल अछि, एहिसँ बेसी एकटा साहित्यकारसँ एहि समाजकेँ अपेक्षा की? निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे समाजक दलित-पीड़ित वर्गक वेदनाकेँ मुखर करब, ओकरा समाजक सहानुभूति अर्जित करैब हिनक कथाकाव्यक उद्देश्य रहल अछि। हिनक कथाकाव्यक नायक दलित वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि तथा खलनायक सामन्त वर्गक। शोषित वर्गक अमानुषिक अत्याचारक चक्कीमे दलित वर्गकेँ पिसाइत देखाएब एवं ओकरामे अपन हकक प्रति चेतनाकेँ जागृत करब हिनक ध्येय छन्हि। *********** 2 आशीष अनचिन्हार नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद आधुनिक समयमे जतेक बेसी गंजन "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामधारी विचार सभहँक भेलै ततेक आन कोनो विचारक नै। आ ऐ गंजन लेल मात्र आ मात्र ओ तथाकथित "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ जिम्मेदार छथि जे छद्म रूपें एकरा मात्र कैरियर वा फैशन लेल अपनेलथि। जँ उपरलिखित विचार सभहँक अर्थ पूछल जाए तँ वस्तुतः सभहँ अर्थ एकै आएत आ तकरा सरल शब्दमे एना कहि सकैत छी--"जे मनुख धन संचयक प्रवृति छोड़थि आ आनो लोकेँ ऐ लेल प्रोत्साहित करथि संगे-संग ओइ धनक उपयोग सामूहिक हितमे हो से "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" कहेता। आब ऐ प्रवृति लेल नास्तिक भेनाइ जरूरी छै की नै से कहब मोश्किल कारण बंगालक करोड़पति "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ हरेक बर्ख धूमधामसँ दुर्गापूजा मनबै छथि। ओना प्राचीन कालमे वाममार्गी ओहन लोककेँ कहल जाइत छलै जे की संसारक प्रचलित परंपरासँ हटि कऽ काज करथि। मुदा ऐठाम हम ऐ सोचमे छी जे प्राचीन भारतक तंत्र-वाममार्गी आ आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गीमे की संबंध छै तँ हमर नजरि अनायासे "पंच-मकार" दिस चलि जाइत अछि आ अद्भुत साम्य भेटि जाइए। तँए हम "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभकेँ साम्यवादी सेहो बुझैत छी। ओना कतबो ताकै छी तँ धन-संचयक प्रवृतिकेँ छोड़बाक आदति "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभमे नै भेटैए। स्वतंत्रता समयमे जखन जमिंदारी प्रथा समाप्त भेलै आ जमिंदार सभ कांग्रेसक सदस्यता लऽ कऽ अप्रत्यक्ष रूपें अपन जमिंदारी बचेलक तेनाहिते किछु अति-महत्वाकंक्षी लोक सभ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक चोंगा पहीरि कऽ सामजाक सभ क्षेत्रमे प्रवेश केलक। आ, "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामक ऐ विचारक सभहँ छद्म रूपसँ साहित्यकेँ सभसँ बेसी नोकसान भेलै। ओना हमरा ई स्वीकार करबामे कोनो हर्जा नै जे किछु लाभ सेहो भेलै मुदा ओकरा एना बुझू जेना कोनो लोक दस रूपैयाक उगाही लेल पचास रूपैया खर्चा करथि। 2 जँ नास्तिकताकेँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए चार्वाक आ हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। प्रस्तुत अछि हुनक किछु विलक्षण विचार— १) मानं त्वक्षजमेव हि' हिशब्दोऽत्र विशेषणार्थो वर्तते। विशेष: पुनश्चार्वाकैर्लोकयात्रानिर्वहणप्रवणं धूमाद्यनुमानमिष्यते क्वचन न पुन: स्वर्गादृष्टादिप्रसाधकमलौकिकमनुमानमिति।–षड्दर्शनसमुच्चय- पृ0 457 २) केचित्तु चार्वाकैकदेशीया आकाशं पंचमं भूतमभिमन्यमाना: पंचभूतात्मकं जगदिति निगदन्ति। षड्दर्शन समुच्चय- पृ0 450 ३) लोकसिद्धो भवेद् राजा परेशो नाऽपर: स्मृत:। देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9 ४) अंगनाऽऽलिंगनाजन्यसुखमेव पुमर्थता। कण्टकादिव्यथाजन्यं दु:खं निरय उच्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9 जँ प्राचीन मतकेँ खंडन करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए तखन तँ सभ उपनिषद्कार गीता संग हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। कारण उपनिषद् सभमे कर्मकांडक ओ वेदक यज्ञकेँ विरोध भेल अछि। जँ समानताकेँ प्रतिपादित करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" थिक तखन याज्ञवल्क्यक विचार सर्वाधिक महान अछि। याज्ञवल्क्यस्मृतिक गृहस्थधर्मप्रकरणमे लिखल ई श्लोक देखू-- बालस्ववासिनीवृद्ध- गर्भिण्यातुरकन्यकाः । संभोज्यातिथिभृत्यांश् च दंपत्योः शेषभोजनम् ॥ यास्मृ१.१०५ ॥ मने बाल बच्चा बूढ़ ओ संगमे रहए बला लोक (नौकर-चाकर सहित), आतुर, गर्भिणी, कन्या अतिथिक आदि भोजन पहिने हेबाक चाही तकर बादे गृह मालिक अपने करथि। निश्चित रूपसँ नौकर चाकरकेँ ऐ सूचीमे आनि याज्ञवल्क्य अपन महानताक परिचय देने छथि। आ निश्चित रूपसँ आजुक "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील"सँ बेसी महान छथि। जँ दया ओ करुणा "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक लक्षण थिक तखन बौद्ध आ जैन धर्मक पालन करऽ बला सभ सेहो महान बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" छलाह ओ छथि। जँ अखिल विश्वक नारा देलासँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" बुझल जाए तखन वैदिक ऋषि सभहँक ओ ऋचा बेसी जोरगर अछि जैमे कहल गेलै जे-- वसुधैव कुटुम्बकम्। जँ वस्तुतः देखल जाए तँ संसारमे "नियंत्रित पूँजी" वा "नियंत्रित पूँजीवाद" केर बहुत महत्व छै। मने एहन पूँजीवाद जैमे शोषणक दर कम होइ ( जी ठीक पढ़लिऐ अपने "जैमे शोषणक दर कम होइ )। आब बहुत लोक एकरा काल्पनिक कहता मुदा वर्तमान समयमे स्वंय सोवियत रूसक विघटन आ चीनक आर्थिक प्रसार देखि ई निश्चित होइत अछि जे पूँजीवाद बहुत जरूरी छै। आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी। बहुत लोक एकरा एखनो काल्पनिक मानता। एकटा उदाहरण लिअ- "जँ सभहँक पेट भरि जाएत तँ ई संसार कतेक समय टिकतै। हमरा हिसाबें मात्र एक घंटा कारण सभहँक पेट भरले छै तखन एक दोसरक मोजर की? तँए हमरा हिसाबें जा धरि पेट खाली छै ता धरि लोक एक दोसरक गप्प मानऽ लेल मजबूर छै। हँ, कमसँ कम चारि घंटासँ बेसी पेट खाली नै हेबाक चाही आ ऐ लेल जै पूँजीवादक अवधारणा देलहुँ से भेल "नियंत्रित पूँजीवाद"। 3 साफ शब्दमे कही तँ मधुपजी भारतीय परंपराक मार्क्सवादी छथि। ई अलग गप्प जे ओ अपन साहित्यमे लाल झंडा कहियो नै उघला। मुदा की जेना सभ लोक जानै छथि जे साहित्यमे लाल झंडा उघनिहार छद्म मार्क्सवादी छला वा छथि। आब हम मधुपजीक किछु साहित्यक उदहारण दैत ई सिद्ध करब जे मधुपजी नियंत्रित पूँजीवादक समर्थक छला। मधुपजीक सर्वाधिक लोकप्रिय कविता थिक "घसल अठन्नी" एकर अंतिम भागमे पात्र बाजि उठैत अछि --- हम कर्ज न छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत कै बेरि एलउँ टुटि गेल टाँग अन्नक मारल अछि हमर आँग.... सप्ष्टतः मधुपजीक विचार अछि जे सुप्पत उपजल बोनि देल जाए। आ इएह तँ नियंत्रित पूँजीवाद छै। हम फेर कहब जे आब ई  हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी। तेनाहिते मधुपजी अपन आन दोसर प्रसिद्ध कविता "पीक" केर माध्यमें कहै छथि-- नहि पतन एक दिन ककर हैत ? पृथ्वीक कोरमे के न जैत ? तें सकल वस्तुमे एक भाव निश्चित रूपसँ ई साधारण भारतीय जन-मानस केर अभिव्यक्ति अछि मुदा एकर मूल "नियंत्रित पूँजी"मे नुकाएल छै। जैठाँ नियंत्रित पूँजी छै ताही ठाम सुव्यवस्थित ढ़ंगसँ उत्थान-पतन संभव छै। मधुपजीक बहुत रास कविता गीत हमर तथ्यक गवाही दैए मुदा ऐठाम सभकेँ राखब हमर अभीष्ट नै। कारण ऐ लेखकेँ हम मात्र प्रारंभिक मानै छी। की कारण छै आन आलोचक सभ मधुपजीकेँ प्रगतिशील तँ मानै छथि मुदा मार्क्सवादी नै जखन की मधुपजी आन कथित मार्क्सवादीसँ बेसी प्रमाणिक मार्क्सवादी छथि। हम ऐ लेखकेँ आर आगू बढ़ाएब आ ओत्तहि ई बुझना जाएत जे मैथिलीक आलोचक सभ कोना " कथित मार्क्सवादी" सभ मात्र पार्टी ज्वाइन करैत छल राजैनितिक ओ पुरस्कारक स्वार्थ लेल ऐ फेरमे मधुपजी सन सुच्चा मार्क्सवादी कोन कतिया गेला। 21 दिसम्बर 2014केँ गाम कोर्थुमे स्व. काशी कान्त मिश्र "मधुप"जीक प्रतिमा हुनक पत्नीक प्रतिमा संग स्थापित भेल। ऐ कार्यक्रमक विवरण एना अछि-- कविचूड़ामणि मधुपजी 27म बरखीपर हुनक गाम कोर्थुमे मधुप स्मृति मनाओल गेल अहि अवसर पर मधुप जीक स्मारकक स्थापना सेहो कएल गेल। राम जी ठाकुर दीप जरा कऽ कार्यक्रमक शुरुआत केलनि आ मंचक अध्यक्षता जीतेन्द्र नारायण झा " जीतू" आ संचालन डॉ जयप्रकाश चौधरी "जनक" जी केलनि। मुख्य अतिथि श्रीमती नीरजा रेनु, किशोर नाथ झा आ विशिष्ठ अतिथि चंद्रभानु सिंह आ बैजनाथ मिश्र "बैजू" छलाह। ऐ संगे आरो प्रबुद्ध लोक छला-  शंभु नाथ मिश्र, सारदा सिंह, दिनेश चन्द्र झा, बैधनाथ झा, उमेश झा, कृष्ण कुमार झा, रामचंद्र झा शिवशंकर श्रीनिवास, चंद्रदेव झा, जटाशंकर मिश्र, रमन जी ठाकुर, प्रो. महेश झा, त्रिपुरारी ठाकुर, सुरेन्द्र झा, चंद्रकिशोर राय सरस जी, मदन झा, वरुण चौधरी, सरवन झा, सहयात्री जी, फूलचंद्र मिश्र"रमण", उदय चन्द्र झा "विनोद", मिथिलेश झा, सुमन सौरभ, उमानाथ झा ,कमल पाठक जी,  चंद्रकिशोर झा, राघवेन्द्र चौधरी, आ राजीव मिश्र। प्रस्तुत अछि किछु फोटो (स्रोत- राजीव मिश्र, कोर्थु ग्रुप)— ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.मधुपजीक किछु गीत, कविता, गजल आ दोहा ३.२.डॉ. अजीत मिश्र- अर्पण-तर्पण-समर्पण ३.३.ज्योति- १.प्रदूषण २.बुजुर्गक ममता ३.४.1.आशीष अनचिन्हार- गजल 2.जगदानन्द झा 'मनु'-गजल मधुपजीक किछु गीत, कविता, गजल आ दोहा... कविता खंड 1 पतित पीक नहि घृणा करू बुझि पतित पीक। ताम्बूल तेज-तरूआरि-दशन- सँ चिरा हृदय, रस-लाल अपन- शोभाक हेतु जे कैल दान, तकरे पवित्र हम छी प्रतीक।। मुख-निधिमे उठल तरंग तरल, नहि रहि सकलहुँ चुपचाप पड़ल। आननमे पावन, भूमिलग्न होइतहि अपूत, की उचित थीक। हम दशन बसन केर अनुरंजक जे रसिकक पूर्ण मनोरंजक। जधरस्थ हमर बुध करथि पान, अधरस्थ देखि पुनि हँटब ठीक।। नन्दनवन-विहरणशील सुरक पितरक अथवा नृप भूमिसुरक नैवेद्यक रस छी हमहि मुख्य; तें ई अपमान न करब नीक।। स्वार्थी संसारक केहन नियम, उपकृतो उपद्रव करै न कम भूषित भै भूशित कैल अहाँ, ई रीति नीति नहिएँ सुधीक।। नहि पतन एक दिन ककर हैत ? पृथ्वीक कोरमे के न जैत ? तें सकल वस्तुमे एक भाव राखक थिक, गीता पढु सटीक।। 2 छुतहर अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप ? मृत्तिका एक एके कुम्हार, ओ दण्ड चक्र चीवर सम्हार। आकार एक क्यों मंगल घट, गौबरौड़ बनल हम सही ताप।। जाहि मृगनयनिक कटि माथ उपर, घुमलहुँ कतेक दिन रसनिर्झर। से देखि दूर कहि दूर जाथि, नहि जानि देल के एहन शाप ? जे कुकुरौं कैं सुतधि पलंग, पी मद्य विलोचन करथि रंग। से देखि हमर मुख करथि घृणा; दुर्भाग्यक पड़ि गेल केहन छाप ? चढ़ि चाक प्रदक्षिण हरिक कएल, आवामे तनकें हवन कएल। फल तकर केहन विपरीत भेल, झूठे थिक सबटा योग-जाप।। घट-घटमे वासी ब्रह्म एक, हो भान अविद्यासँ अनेक। बुझितहुँ वेदान्ती हमर वारि। अपवित्र कहथि क’ क’ प्रलाप।। हो सदिखन संसारक सुधार, पतितौक बनथि क्यो कर्णधार। उद्धार सुधारकसँ न हमर, ई सभ्य समाजक थिक प्रताप।। 3 घसल अठन्नी जेठक दुपहरि बारहो कलासँ उगिलि उगिलि भीषण ज्वाला आकाश चढ़ल दिनकर त्रिभुवन डाहथि जरि जरि पछबा प्रचण्ड बिरड़ो उदण्ड सन सन सन सन छन छन छन छन आगिक कण सन सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। खोंतामे पक्षी संच मंच हिलबए न पाँखि खोलए न आँखि तरुतर पशु हाँफै सजल नयन चरबाह भागि घर गेल विमन इनहोर बनल पोखरीक पानि जलचर-थलचर काँपए थर थर टाटी, फड़की, खिड़की, केवाड़ लागल घर-घर ई अग्निवृष्टि! नहि कतउ बाटमे बटोहीक हो एखन दृष्टि संहार करत की प्रकृति सृष्टि- ई अग्निवृष्टि! श्री मान लोकनि जे तुन्दिल बनि मसलंगमे ओंगठल शरबत छनि-मिसरी बदाम बरफें घोरल नर्तित बिजुली पंखा तर छथि सेहो अशान्त बाजथि हरि! हरि!! की कथा सजीवक छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि जेठक दुपहरि! ई समय यदपि बुचनी घर आँगन छोड़ि तदपि गिरहस्थक कोड़ए खेत एखन की करति बेचारी! आठ पहर दुर्दैवक डाँगें अछि पीटलि विधवा परिवारहीन बिलटलि छौ मासक एके टा बच्चा भाविक सम्बल जे कानि रहल छै धूर उपर परिबोध कोना क’ करति तकर? शोणितोक आब नहि छैक शेष पुनि दूधक हएत कोना सम्भव? सहि तीनि सांँझ ई आइ आएल बनि मजदुरनी अठ अन्नी पर सूर्योदयसँ सूर्यास्त तक्क करतैक काज नहि पनिपिआइयो पाबि सकति! सन्ध्याक समय संसार अभय उगि चान सदय शीतल ज्योत्सनासँ कएल मुदित ब्रह्माण्ड सकल नेरूक हित दौड़लि हुँकरि गाय टुन-टुन-टुन-टुन टन-टन-टन-टन घण्टीक शब्द घर-घरसँ बाहर भेल धूम तैयो भूखलि-प्यासलि बुचनी आँचल तर झपने पुत्रा अपन कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन हड्डी जागल सौन्दर्य गरीबीसँ दागल भूखक ज्वालासँ जरक डरें तारुण्य जकर अबितहिं भागल पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल पीयर ओ दूबर-पातर तन फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर आमक फाड़ा सन नयन खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर चिन्ता-चुड़ैल केर चढ़ल कोर झरकाइ रहल छै आंग जकर प्रतिपल हा! आशा बनि अंगोर दे कने अन्न-जल प्राण जकर अछि बाजि रहल छलसँ नोरक, से बनि कातरि कहुना क’ डरि कर जोरि कहल: ओ घसल अठन्नी चलि न सकल हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि छी आबि रहलि करु कृपा अठन्नी द’ दोसर एसकरुआ हम भ’ गेल राति गिरहत, न आब देरी लगाउ भूखें-प्यासें हम छी मरैत लेबै बेसाह कूटब-पीसब बच्चा भोरेसँ कानि-कानि छट-पट करैत अछि जान लैत। ई फेर आएल भुकब’ कपार कहुँ असल अठन्नी अदलि-बदलि क’ रहलि चलाकी साफ-साफ रौ! ठोंठ पकड़ि क’ कर न कात ई डाइनि अछि देखही न आँखि अछि गुड़रि रहलि अबिताहिं बुधना सन स्वामीकें चट चिबा गेलि लक्ष्मीक बेरिमे महाजनी अछि चुका रहल क्यो अछि नहि ? एहन अलच्छीकें क’ देत कात ? मालिक! हम कर्ज न छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत कै बेरि एलउँ टुटि गेल टाँग अन्नक मारल अछि हमर आँग जरलहा दैव मरनो न दैछ की समय भेल हा! देह तोड़ि क’ कएल काज सुपथो न बोनि अछि भेटि रहल तें जगमे ई पड़लै अकाल उठबितहिं डेग लागए अन्हार मरि जाएब एतइ ककरा कहबै? हित क्यो ने हमर अनुचितो पैघ जनकें शोभा भगवान! आह! गै छौक न डर? कै खून पचैलनि ई बण्डा रोइयों न भंग युग-युग दारोगाजी जीबथु क’ देबौ खून गै भाग भाग बनिहारकें द’ क’ उचित बोनि कुलमे लगाएब की हमहिं दाग? ई अपन भभटपन आनक लग तों देखा थिकहुँ हम काल नाग ई ओना जाएत? यम माथ उपर छै नाचि रहल रौ, की तकैत छें मूँह हमर छोटका लोकौक एते ठेसी? चट-चट-चट-चट कुलिशहँुसँ कर्कश भीमकाय मखनाक चाटसँ निस्सहाय भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत भ’ गेलि बेहोश तैयो सरोष क’ बज्रनाद भुटकुनबाबू उठलाह गरजि: मखना! मखना! केलकौक भगल ला बेंत हमर नारिक चरित्रा तों की बुझबें? जीवने बितौलहुँ ऐ सबमे। दन-दन-दन-दन मूचर््िछतो देह पर बेंत वृष्टि बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! सविषाद हासमे चन्द्रमाक ओ घसल अठन्नी बाजि उठल: हम कत’ जाउ अवलम्ब पाउ के शरण? घसल जनिकर अदृष्टि! 4 लोटन सोंटन वार्तालाप सोंटन हयतै आब स्वराजकाज, ह किच्छु करब नहि करब चोरि सभ छोड़ि, पूर्वजक बात मान्य नहि जे बजताह बताह हुनक मुँह दूसि लेब हम खायब घीउ मलाइ बाइकँ देखब हरदम दऽ डाका टाका हरब काका तकसँ भिन्न रहि द्वारि द्वारि सौं नरिपर, आनब घूमब समस्त महि लोटन हो अनर्थ तों व्यर्थ स्वराजक अर्थ करैत छह फूसि फटक गप चटक घटक सन व्यर्थ गढ़ै छह लूरि शून्य की बूढ़ि तोर सन दूरि न जायत चोरक ठोरक कठोर न की इनहोर समायत खल नाशन शासन हयत, अर्गासन कोहाक सन मूह करह जनि, बनि सगुन चालि चलह पौर्बिक अपन सोंटन गद्य-पद्य गढ़ताह पढ़ताह लोक ई जे शक्तिहीन धनहीन दीन सहताह शोक से जे प्रचंड पुन दण्ड खेलि गप अन्ड-वण्ड कै सबल रहत, से सदल पूज्य होयत मक्खन खै कारण राजक काज सभ रहत समाजक बीच कर अपना घरमे डर ककर? जकर लट्ठ महीसो तकर लोटन हौ स्वराजसँ मान सदा विद्वानक होयत नीच कीचमे जैत खैत बहुदण्ड भूमगत विद्या बुद्धि विवेक अनेक गुणक आलोचन सौं हयता भूपाल पालता प्रजा सदच्छन धरम करम म सभ रहत "मधुप" न पावत कष्ट जन मानह आनह छाग वा कुड़हरिसँ नाथह अपन 1931मे मैथिली सुधाकरमे प्रकाशित गजल खंड गजल मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी हम कालिदास विद्या-पति-नामछाड़ि मुँहमे बाड़ीक तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्यदेशी देशीक गेल ठेसी की पाँकमे पड़ै छी? औ यत्र-तत्र देखू अछि पत्र सैकड़ो टा अछि पत्र मैथिलीमे एको न तैं डरै छी (2212-122-2212-122) १९३२मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ "मैथिली-संदेश" नामक पत्रिकामे प्रकाशित गीत खंड गीत 1 जनम अवधि हम अहींक चरण धय शरण अनत नहि जाइत छी आन देव सेवन तजि शिव भजि भाङक गोला खाइत छी गाल बजाय नेहाल बनै सब सुनि सुनि वेद पुरान विभो जप तप तीर्थ बर्थ नहि कयलहुँ, भसम रमा अगराइत छी आब नाव भव निधिमे उबडुब, कर्णधार क्यो नै भोला क्रन्दन कै रहलहुँ विमन, नाथ किए अलसाइत छी की करुणा कमि गेल , हमर वा पाप पहाड़क हो शंका आशा भंग दोष बुझितहुँ, जै भंगक विवश ओंघाइत छी तरब नरक वा पड़ब मधुपकेँ नहि परबाहि तकर कनियों उठत अहिंक विश्वास जगतसँ सैह सुमिरि घबड़ाइत छी ।। 2 बनलीह गंगा जैं ईश शीस माला अचल सोहागवाली तैं शैलवाला नहि तँ सुनैत देरी सती देह दाहे वियोग वेदन वश बनल बताहे सम्मत न होइतथि कदापि बैलवाला कहाँसँ प्रीति प्याला और कण्ठ बीच कालकूट केर धाहे धह-धह दृग जैसँ भेल मदन सुड्डाहे तदपि कुशल छथि भूतेश निराला बसि प्रेतशाला मसानी बनैत विष व्याल मालधारी कोटियो धथुर भाङो संखियो अहारी पुनि मृत्युंजये शिव धन्य जह्नुवाला मधुप नेहाला ।। 3 फाँकै झोरी भरि भरि भाँग, साँपो सोहरै सौंसे आङ जेबै परिछै कोना कै जैतहुँ होइए डर नङटे मसानी चकमक चानी सन चमकै छै उज्जर चानी माथामे सोभै छै गाङ, आगू हो कथमपि नहि टाङ घर ने घराड़ी, बयस बुढ़ारी, धनमे धन छै बड़द सवारी गौरी हेती गलि के राङ, जखने सिनुरौथिन ई माङ मधुप न बाजी उमा छथि राजी थिक उचित व्याहक विधि साजी हेतौ ओझरौने की बाङ, मानि सकै नहि कर्मक डाङ ।। 4 अशरण शरण तोहर गुनि नामे जपिअ निरंतर आठो यामे सेवय वय भरि क्यो श्री नाथे क्यो काली पद सेवि सनाथे भाल बाल विधु के जे राखै गति मति सैह हमर हिय भाखै दोष हमर की गुणबह स्वामी दोषाकर तुअ भूषण नामी सत्त अशुचि हम यद्यपि जानी तदपि मुदित बुझि तोहि मसानी तुअ पद पंकज मधु अभिलाषे घुमय मधुप चौरासी लाखे 5 मन लागि गेल जौं कने भुजगेन्द्रहारमे चिन्ताक काज कोन ऐ संसार धारमे जप तप उपास तीर्थवास केर आश की कनियों विभूति छूति जौं कय ली कपारमे यमराज श्वास पाश छोड़ि पाससँ जेता कैलास वास दास ई बुझि पड़ि विचारमे बम बाजि बजा गाल मधुप चंद्रभालकेँ जौं ली रिझा बझा न क्यो सकताह जालमे 6 हम तोरे पथ अनुगामी हे हर कहबह नाथ हमहुँ तँ छी हेहरमे नामी।। तों भव नर्तक हम भव नर्तक युग युगसँ विख्यात नाचि नाचि चौरासी लाखो धऽ कत भूषा गात तुअ प्रिय झाड़ी सब तरि झाड़ी हमहुँ लैत बदनामी।। अंग भुजंग विभूषित तोहर कत भुजंग मम अंग वामा चरण सेवके तों मम वामा चरण उमंग तों भंगक प्रिय ककरो भ्रू भंगक हमहूँ प्रिय स्वामी।। अशुचि मसानी अहाँ नाथ अछि अशुचि सतत मम काय रहितहुँ तोर अभिन्न भिन्न की छह रखने प्रभु हाय मालिक मने बनल रहु मधुपो आब न रहत असामी।। 7 देव पितर कत पूजल कए व्रत निर्जल रे पाओल जीवन संबल दुइ सुत केवल रे किन्तु न सासु ननदि घर, पति छथि औघर रे लालन पालन के कर काँपिअ थर थर रे भेटय तेल न उबटन गरिबक जीवन रे की लय पूत उङारब, अछि मन उन्मन रे गजमुख षटमुख बालक के परिपालक रे छोटि तेहन हम भालक दबलि जंजालक रे सदिखन उछलथि सुरसरि, अहि आङग भरि रे कोन परि राखु सम्हारि, उपद्रव सब तरि रे हो मन चलि दी नैहर भवथि नै हर रे पाग खसनु गिरिराजक जैं देल ई घर रे मधुप उमा जगदीश्वरि चाकर विधि हरि रे पति भवनेश तदपि दुख कर्म सभक जड़ि रे 8 ऐला मैनाक गेह बुरहा दुलहा हुनि लयला उठाय नारद छुलहा केश सभ तँ श्वेत छनि मुँहमे ने एको दाँत छनि तीन नयन विशाल छनि अहिकेर गर मे माल छनि संगे नाङट खोड़ तथा लुलहा।। भूत प्रेत बेताल बनि बरियात ताल ठोकैत छै ताल तकर देखैत डरसँ क्यो कने न टोकैत छै लेपि लेने विभूति यथा चुलहा।। जैत परिछऽ के उछलि रहलै गंगाधर रे आँखिमे धधकैत अनलि जैत जरि सब छार रे मैना कानै छै भेल बिआकुल हा।। गाबि गीत चुमाउ चटपट छथि उमा केर प्राण ई तीन भुनक नाथ करता व्याह होइते त्राण ई काशी कान्त समान के जग दुलहा।। 9 हहरय हिय झहरय नयन नोर दारुण दुखनिधिक न ओर छोर बाल बयस खेलेमे गेले यौवन युवती संग गमेले कैल न कहियो भजन तोर।। आब करब की पाबि बुढ़ारी साधन योग न तव त्रिपुरारी आधि व्याधि वाधित अथोड़।। घर्घर कंठ बात पीड़ित तन तैयो तृष्णामे सीदित मन हमर हमर रट हो न थोड़ अथ मधुपक तोंही टा दानी करु करुणा अथवा जे जानी तों औढ़र हमहूँ अघोर।। 10 छी हम अनाथे तों दीनानाथे कऽ दे सनाथे दयाक कोशे के आशुतोषे जौं गति देबै ने अपकीर्तिक दोषे नैना कने दी तँ हम भने छी हे छोड़ू अपेक्षा आशे वैद्यनाथे।। से तोर माया सुत वित्त जाया हित जान देले बनि कऽ बेहाया आबो सम्हारी शिशु चंद्रधारी ने नीच कैले रहि नीच साथे।। सदिकाल कानी अपने से जानी रहितो मशानी विख्यात दानी से तँ अहींटा मधुपक भरोसे तें प्रार्थना ई युग जोड़ि हाथे।। 11 अविनय हम किछु विनय सुनाबी जे जे विविध विषय ललचाबै जगकेँ जकरे राग लचाबै लोलुप इन्द्रिय गणहुँ नचाबै जकर वश्य युग युग मुँह बाबी।। ताहि सकल वस्तुक न सकल हर चिरस्थायि बुझितहुँ हम हे हर राग तड़ागहिँ उबडुब तोहर ध्यान तेजि पुनि पुनि भव आबी।। राग लब्ध विषयक अवसाने निश्चित जे लखि हो न मलाने रुचि परिणाम शोक जानथि बुध तै हित तोर भक्ति टा जाबी।। तेँ सुन्दर शिव सत्य सरूपे निज छविमे अनुराग अनूपे दैह मधुपकेँ जे रुचि उद्भव दुखकेँ दृष्ट न ई हम गाबी।। 12 जाउ कहाँ तजि तोहि पुरारी केवल एक रहल तोहर बल दोसर देवक देखल न द्वारी।। बाल बयस हम खेलि बिताओल यौवन युवतिक संग गमाओल तुअ गुण गौरव गाबि न पाओल आब करब की पाबि बुढ़ारी।। मदमातल मानस नहि मानै बिनु लगाम घोटक सम फानै तें भऽ पतित पतित हम कानी तों कठोर नहि करह पुछारी।। आशुतोष कहबह तों नामी मधुपक बेर हेतउ बदनामी आबहुँ करबह पार न जँ हर के विश्वास करत संसारी।। 13 नागनाथक आसानेथित फणिफणालंकरणमणिकृत हारशोभिशरीरलतिका, रविनिभोल्लसिता। कमल कुम्भ कपाल माला कलित कर निकराद्रि वाला अर्धचन्द्रोद्भासि चूड़ा त्रिलोचन सहिता। सकल सर्वज्ञक अधीश्वर भैरवांक निवास जनिकर से मधुप सुर-सेविता पद्मावती विदिता। 14 जरि रहलै हमर उदर घर हे सातो निधिमे जल न तते जे जलन मेटाय सकत हर हे।। की करू तों करुणा तहि देलह आशुतोष फुसिये भऽ गेलह आबहु औढ़र ढ़र ढ़र हे।। मरब न हम, अमरे छी मृत्युक बादो कण कणमे छी पाँचो तत्व हमर घर हे।। केवल एखन कलेश मात्र हो ज्ञान ध्यानसँ हीन गात्र हो शंकर मधुपक धरु कर हे।। आब महाअभियाने इच्छित बिनु कलेश जे रहइछ लक्षित दैह दया से शशिधर हे।। 15 पाग बिनु जाइ न बहार हे दुलरुआ दुलहा सासुरक ई बेबहार हे दुलरुआ दुलहा सासु देल मणिमय हार हे दुलरुआ दुलहा तेजू माल नाग मणिआर हे दुलरुआ दुलहा धथूर तेजि भाङ आहार हे दुलरुआ दुलहा जिमि लिअ छप्पन प्रकार हे दुलरुआ दुलहा एकेटा मैनाक सनसार हे दुलरुआ दुलहा भागै सुनि फणि-फुफकार हे दुलरुआ दुलहा सहज सिनेहक सार हे दुलरुआ दुलहा सरहोजि वचन उचार हे दुलरुआ दुलहा करू शिव ई स्वीकार हे दुलरुआ दुलहा हो मधुपक गुंजार हे दुलरुआ दुलहा।। दोहा खंड १ की न प्रिया हित पति करै, मधुप लुटा मति कोष पद तर पशुपति पड़ल छथि करिते कालिक रोष २ गुण अवगुण बुझि नायिका करै मान अपमान गंगा हरि पदपर शिवक शिरपर मधुप प्रमाण ३ किछु अपात्रकेँ दान दय मधुप न हो कल्याण शंकर आ भष्मासुरक अछि इतिहास प्रमाण ४ कर्मक फल भेटबे करत, केहनो बनब महान नीलकण्ठ नङटे रहथि सर्पशयन भगवान ५ मधुप उकाही शिशुक हित विवुध सतर्क रहैछ गंग चुभुकि जड़ गजमुखहि शिव दृगाग्नि तपबैछ ऐमेसँ किछु गीत अप्रकाशित छै आ ऐठाम जयप्रकाश चौधरी "जनक"जीक शोधग्रंथसँ साभार लेल गेल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ. अजीत मिश्र अर्पण-तर्पण-समर्पण कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’क “हम जेबै कुसेस्सर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन छाड़ा”सन-सन कतेको मनोरम पद मिथिलाक रग-रगमे बसल अछि, बसल अछि हुनक नाना नाम साहित्य, बसल अछि जनिक मनमोहक काया-छाया मैथिल जन-जनकेर हृदयमे- ओहि पुण्यात्माकेँ शत-शत नमन करैत सादर समर्पित ई शब्द-पुष्प... प ण्डित केर जे पण्डित बनि-बनि, कएल मैथिली श्रृङ्गार, का मना जनिकर सदा, मैथिलीक हो जय-जयकार। शी तलता जे पसारल सबतरि, मधुपक कएल झंकार, का रीगर तँ रहथि तेहन जे, साधल साहित्य भरमार। न् यासी बनि जे ललित गीतकेर, बनि गेला कण्ठहार, त एँ तँ आइओ पूजित छथि ओ, सभ घरकेर चिनबार। मि सरीसन राधा-विरह, मधुप सप्तशती आ द्वादशी पचमेर, श्र द्धा भाव जनिका प्रति सबतरि, झंकार टटका जिलेबीकेर। म ङ्गल गीत सुनाओल जखने, श्रोता तखने धएल पछोड़, धु नी रमाकेँ साधल धुन जे, सभहिँ जना भेला चकबिदोर। प टु छलाहे अपन कलामे, कएलनि एहन सुन्दर सङ्गोर, जी वन सदा साहित्य समर्पित, सदा माँ मैथिलीकेर कोर। केँ ड़ा बनि गेल जनिक रचनासभ, रचल साहित्य पूरजोर। श ब्द जनिक घर कएलक जन-जन, मोहि लेलक छुतहर, त गमा जनिका चाही ने कोनो, छथि मात्र मैथिल खेतहर। श ब्द-शब्दमे मैथिली सिरजथि, मात्र बोल बम हर-हर, त रा-उपरी जनिक रचनासभ, तेँ तँ सजथि ओ घर-घर। न ख-शिख रूप सिरजल जे मैथिली, कएलनि चहुदिस चमत्कार। म करन्द जकर चहुदिस पसरल अछि, छिड़िआएल सौसेँ कचनार। न मन करी ओहि पुण्य धराकेँ, जतए मधुपकेर सबतरि झंकार।। नोट : रेखाङ्कित शब्द हुनक अमूल्य रचना आ साहित्यिक-कृति थिक, तँ ‘केँड़ा’ (plumb-rule of mason)कहल जाइत छैक  साहुलमे लागल काठीकेँ। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ज्योति १.प्रदूषण २.बुजुर्गक ममता १ प्रदूषण बसहाक गरदनिक झूमरि छल आकि तैयारी भऽ रहल काँवरक जे सावनक झमकैत किलकारी रुनझुन रुनझुन कऽ सुनेलक पानिक फुहार नभसँ फेर मानू शिवजीक जटा अछि मेघ जाह्नवीक धरापर पुनरागमन नै जानि के भगीरथ ऐबेर तपस्यामे ऐबेर त्रुटि निश्चित पर्यावरण तैं सभपर क्रोधित आकाशसँ भऽ रहल अम्लवृष्टि गंगा सेहो अतिशय प्रदूषित काँवरिया जे बैद्यनाथधाम जाएब अहाँक भाग्य के सभ गुण गाएब एक प्रार्थना कृप्या हमर मानू बाबासँ प्रदूषण रहित जग मांगू शम्भु दिअ बुद्धि, शक्ति आ साधन जइसँ करी गंदगीक निवारण फेर जल आनि सुल्तानगंजसँ श्रद्धा आ शुद्धतासँ करी अहाँकेँ अर्पण॥ २ बुजुर्गक ममता घर भरल छल लोक-बागसँ औ बाबू तत्पर बच्चा लऽ जन्मदिनपर केक परोसल बौआक नजरि टिकल गेटपर ताकि रहल छल बाबाक बाट तामसमे लगाबैत हाक चॉकलेट जूसक लालच काबू नै कऽ सकल हालत फेर पी-पी ध्वनि सुनाएल नेन्नाक आँखिमे चमकि आएल नोर पोछैत अपने हाथे मुस्की आ आशंका साथे-साथे हँ ई तऽ बाबाक गाड़ी छल दाइजी सेहो छली आएल उचाट उम्हरो ओहने मुदा अबिते पुछली कतऽ हमर पोता डेगा-डेगी करैत बौआ पहुँचि गेला दाइक कोरा दाइक देल एक लमनचूस पोताकेँ केल बड़ खुश बाबा पुछलखिन की छौ नाम झपटलक हाथसँ कृष्णभोग आम कोनो उपहारमे कहाँ ओ क्षमता तेहेन होइत अछि बुजुर्गक ममता॥ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.आशीष अनचिन्हार- गजल 2.जगदानन्द झा 'मनु'-गजल 1 आशीष अनचिन्हार गजल हमरो मोन पियासले रहि गेलै हुनको मोन पियासले रहि गेलै चुप्पेचाप बहुत पिया देलक ओ तैयो मोन पियासले रहि गेलै तोरा देखि कऽ धन्य बुझलक जे जे तकरो मोन पियासले रहि गेलै अप्पन लोक तँ सहजें अगियासल छै अनको मोन पियासले रहि गेलै ठोपे ठोप चुबै छलै रस तैयो सगरो मोन पियासले रहि गेलै चारिम शेरमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। सभ पाँतिमे 2221+12+12222 मात्राक्रम अछि सुझाव सादर आमंत्रित अछि 2 जगदानन्द झा 'मनु' गजल सपना हमर हम वीर बनी करतब करी आ धीर बनी

जे देशकेँ अपमान करै ओकर करेजक तीर बनी

सबहक सिनेहक मीत रही ककरो मनक नै पीर बनी

आबी समाजक काज सदति धरतीक नै हम भीर बनी

किछु काज ‘मनु’ एहन तँ करी मरियो कऽ  आँखिक नीर बनी (मत्रा क्रम : २२१२-२२१-१२) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते आशीष अनचिन्हार बाल गजल खेने रहियै आमक कुच्चा चिनियो लागै खट्टे खट्टा हमरा नामे कोड़ो बाती हमरे नामे खुट्टा खुट्टा हमरा सन के छै उकपाती सभके मारी घुस्से घुस्सा छै झिल्ली कचरी आलूचप मुरही फाँकी फक्के फक्का नै नीक लगैए मस्टरबा नीक लगैए अट्टा पट्टा सभ पाँतिमे 22+22+22+22 मात्राक्रम अछि। अंतिम शेरक दूनू पाँतिमे अलग-अलग लगूकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 91 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १६९ म अंक ०१ जनवरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८५ अंक १६९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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