ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १७० म अंक १५ जनवरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८५ अंक १७०) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.जगदीश प्रसाद मण्डल - दूटा लघु कथा २.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी २.२.१.ललन कुमार कामत-किछु लघु कथा २.राम विलास साहु-अबिसवास ३.दुर्गानन्द मण्डल :: लघु कथा-छुतहरि २.३.१. फागुलाल साहु- किछु विहनि कथा २.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध- लिटरेचर फेस्टीभल ३.नन्द विलास राय :: किछुलघु कथा २.४.प्रणव झा- तेसर प्रण (लघुकथा) ३. पद्य ३.१.१.चित्रा अंशु-अस्तित्वकेँ चिन्हू २.उमेश मण्डल-२ टा कविता ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह ३.३.बिनीत कुमार ठाकुर ३.४.1.रमेश- महा-विस्फोटक महा-प्रयोग (दीर्घ गद्य कविता)2.आशीष अनचिन्हार-गजल ४.बालानां कृते-१.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html संपादकीय हैदराबादक मिथिला सांस्कृतिक परिषद् द्वारा श्री योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' जी केँ हुनक पोथी 'विज्ञानक बतकही'क लेल पहिल तिरहुत साहित्य सम्मान देल गेल। २०७१ सालक गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार ऐबेर श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ देल जाएत। नेवारी, नेपाली आ हिन्दी भाषाक साहित्यकार धुस्वाँ सायमी आ हुनकर पत्नी श्रीमति बसुन्धराक स्मृतिमे स्थापित गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार २०३९ साल सँ देल जा रहल अछि आ दू सालपर देल जाएबला ई पुरस्कार मैथिलीमे सर्वप्रथम देल गेल अछि। पाठकीय प्रतिक्रिया: कीर्तिनाथ झा प्रिय गजेन्द्र जी , विदेहक १६९ म अंक भेटल . एखन धरि मधुपजी सं सोझे संपर्क में रहैबला पीढ़ी उपलब्ध छथि. ओहि समुदाय सं ककरो कोनो लेख नहिं हयब अखरल. तथापि एहि अंकक सब सं विशिष्ट सनेस थिक ' मधुपजीक किछु गीत, कविता ,गजल आ दोहा. बानगीक रूप में मधुप जीक किछु गीत दितियैक तं नीक होइत . पूर्ववर्ती पीढ़ीक रचनाकारक रचना जखन नव पीढ़ी पढ़त तखने ने नीक बेजायक निर्णय हेतइ . अनिल चन्द्र ठाकुरजीक आलेखक माध्यमे मधुपजीक पोथीक लिस्ट तं लोककें भेटबे करतैक. हँ, छपाईमें अशुद्धि मधुर में बालु जकां प्रतीत भेल. विदेहक एहि अंकमे सुश्री ज्योतिक कविता आकृष्ट केलक; सनेस में लमनचुस आ कृष्णभोग आम आब विलुप्त भेल जा रहल छैक मुदा ममताक रंग तं ओएह छैक .डाक्टर अजित मिश्रक प्रसादें 'हम जेबै कुसेस्सर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन छाड़ा' सन गीत तकबाक इच्छा लोक कें होई से संभव . एकटा आओर गप्प. साहित्यमें मौलिक रचना आ समालोचना दुनूक महत्व छैक. मुदा, मैथिली में समालोचना सर्वत्र अनेरुआ घास जकां साहित्यके छारने रहैत अछि. एखुनका युग में छापू आ उतारू ( copy and paste ) एहि प्रवृत्तिक संगबहिना थिकै. युवक लोकनि सं हमर आग्रह अछि मूल लेखन करथि . नव वस्तु लोक नवीनताओ देखिकय कीनि लैत अछि. पछाति दोसरा बेर भले जांचि-परखि क लिअय. दोसर, समालोचना ले साहित्यक गहन अध्ययन चाही . पहिने अपने अवगति होयत तखन ने नीक बेजायक गुण-अवगुण अनका बुझयबइ . शास्त्र में कहने छैक - श्रोतव्यो ,मन्तव्यः ,निदिध्यासितव्यः ( सुनु , गुनु , मनन करू). तथापि जं समालोचनाक वृत्ति में रूचि हो तं सुनु , गुनु , मनन करू आ तखन अपन दृष्टि सं साहित्यकें भजारू आ अपन नीर-क्षीर विवेचना सं पाठककें अवगत कराऊ. एतद्धि. सादर, कीर्तिनाथ आशीष अनचिन्हार विदेहक १६९ म अंक विदेहक ई मधुप विशेषांक एकटा माइल स्टोन अछि। प्रायः देखल गेल अछि जे प्रिंट बला पत्रिकामे १२०-१३० पन्ना छपैत अछि मुदा ७०-८० पन्ना साभार बला लेखसँ भरल रहैत अछि। आ तरहें विदेह ओइ पत्रिका सभसँ अलग अछि कारण ऐमे एकटा छोड़ि आर सभ आलेख बिल्कुल नव आ फ्रेश अछि। आ इएह तत्व विदेहकेँ आर पत्रिकासँ अलग बनबैत छै। गप्प करी किछु आलेखकेँ गप्प करब। मुन्नाजीक आलेख एकटा नव प्रश्न ठाढ़ केलक अछि यात्रीजीक जनकवि हेबाक सम्बन्धमे। वियोगीक जीक आलेखमे नव तरीका छै जे ओइ समयक पचास पाइ आजुक समयमे कतेक हेतै आ ओकरासँ आजुक मजदूर कतेक घर निमाहत। मैथिलीमे मठाधिशी परंपराकेँ देखैत ओमप्रकाशजी सही कहि रहल छथिन जे मठाधीशक फर्माक कारणें मधुपजी बेसी गजल नै लीखि सकलाह। बाद बाँकी सभ आलेख अपन-अपन निष्कर्षमे नीक अछि मुदा सभसँ बड़का काज भेल जे प्रचुर मात्रामे मधुपजीक रचना नेटपर आएल। ई सभसँ बड़का काज भेल। एहन-एहन विशेषांक आर एबाक चाही। आशीष अनचिन्हार विदेहक उद्येश्य छै समानांतर चलब। साहित्य केर संग जीवनमे सेहो। विदेहक १६८म अंकमे प्रकाशित कपिलेश्वर राउतजीक कथा "बड़का खीरा" पुरने ब्राम्हणवादी ढ़ाँचापर अछि। जखन ओ अपन कथाक शुरूआते एना करै छथि जे-- "कहबी अछि, पुरुखक भाग आ स्त्रीकगणक चरित्र कखनि बदलि जाएत तेकर कोन ठेकान।" तखने ई निश्चित होइत अछि जे ई विदेहक परंपराक अंतर्गत नै अछि। ओना हमरा ई मानबामे कोनो संकोच नै जे कथाक मूल स्वर अंधविश्वास हटेनाइ अछि। मुदा ई बड़का दुर्भाग्य जे कथाक शुरूमे लेखक अपने अंधविश्वाससँ ग्रस्त छथि। कथासँ फिल्म जल्दी बनि सकैए मुदा फिल्मसँ कथा बहुत मोशकिल छै। ओमप्रकाशजीक कथापर जँ आबी तँ कहि सकै छी जे कथासँ फिल्म बनल अछि आ पाठक एकै पाराग्राफक बाद बुझि जाइत छथि जे अंतमे की हेतै। आ तँए शुरूआतेसँ ई कथा नीरस भऽ जाइए। कुंदन कुमार कर्णजीसँ ई अपेक्षा जे ओ अपन गजलमे नव-नव बिंब अनताह। प्रस्तुत गजलमे पुरने बिंब सभहँक भरमार अछि। इरा मल्लिकजीक आ अशरफ राइनजीक रचनासभ बड़ नीक छनि। नचिकेता (मिथिला दर्शन) विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ। शेफालिका वर्मा सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद। आशीष अनचिन्हार १६६म अंक संतुलित अछि। प्रस्तुत अंकमे वियोगीजीक कथा "विजय"केँ ऐ अंकक सर्वश्रेष्ठ रचना कहल जाए तँ दिक्कत नै। हिनक कथाक पहिल पार्टक अपेक्षा दोसर पार्ट बेसी मुखर अछि आ एकर मुल्याकंन पचास साल बाद जा कऽ फड़िच्छ हेतै।
संपादकीयमे जँ कहियो काल देशक राजनीति ओ समाजिक-आर्थिक पक्षपर चर्चा होइ तँ आ रुचिगर हएत से आशा अछि।
विदेहमे पहिल बेर कविता लऽ कऽ एबाक लेल महेश झा डखरामीजीक स्वागत छनि।
आशीष अनचिन्हार अंक 167मे डाॅ. कीर्ति नाथ झा जीक कथा कने आर फड़िच्छ हेबाक व्यग्रतामे अछि। पाठक ने ऐ पारक रहै छथि आ ने ओइ पारक। नन्द विलास रायजीक कथा कने पुरान ढ़र्राक बुझना गेल। पूरा संसारमे विषय एकै होइ छै मुदा ओकर शिल्पक प्रयोग अलग-अलग करै छै। आशा अछि जे रायजी आगूसँ शिल्पक खियाल रखता। अशरफ राईन जीक कता आ आजाद गजल नीक भाव लेने अछि। कीर्तिनाथ झा प्रिय गजेंद्रजी , 'विदेह' १६७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६७) भेटल . दूटा रचना आकृष्ट केलक. अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल आ जगदानन्द झा 'मनु ' केर ' मैथिली भाषामें एकरूपताक अभाव '. अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल अनुभूत सत्यक पीड़ाक सद्यः प्रतिबिम्ब थिक. अपन देश सं दूर रेगिस्तान में रहैत मजबूर जिनगीक आ अपन देश-कोस. माटि-पानि, आमा-बुआ सं दूर हेबाक दुःखक ई एहन बयान थिक जे ग़ज़ल सहजहिं मोनके छूबि लेलक. एतबे नहिं, एहि गजल में कोमल भावनाक अतिरिक्त आओर बहुतरास गंभीर गप्प छै, जेना, राजनेता लोकनिक प्रति आक्रोश आ संविधान नहिं बनबाक अफशोस . वाह अशरफ . लिखैत रहू . आब ' मैथिली भाषामें एकरूपताक अभाव ' क गप्प करी : हम पहिने स्पष्ट क दी , हम भाषा वैज्ञानिक नहिं छी . मुदा एहि विषय पर विचार तं अछिए . ' मैथिली भाषामें एकरूपताक अभाव ' समस्या थिक आ नहिओ थिक . मुदा ताहि पर भाषा वैज्ञानिक विचार करथु , समाधान ताकथु . ओना एहि विषय पर प्रायः चालीस आ पचास केर दशक में मैथिलीक तत्कालीन साहित्यकार लोकनि विचार केने छथि . से तकला उत्तर भेटत . भाषाक नमूना वा उदाहरणक हेतु रमानाथ झा , किरणजीक आ यात्रीक भाषा देखबाक थिक. ओना, भाषाक में एकरूपताक अभाव भाषाके समृद्ध करैत छैक . संगहिं, एकरूपताक अभाव जीवित भाषाक धुक-धुकीक प्रमाण थिकैक. नहिं तं अंग्रेजी किएक विश्यव्यापी भाश भ गेल आ फ्रेंच किएक फ्रांसहिं धरि सीमित भेल जा रहल अछि . ई नहिं बिसरबाक चाही जे भाषाक अनुसार व्याकरणक बनैछ. तें, जनसामान्यकें आ मौलिक लेखककें व्याकरणक अनुसार भाषा बाजबाक /लिखबाक बाध्यता नहिं हेबाक चाही. सादर , कीर्तिनाथ विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.१.जगदीश प्रसाद मण्डल - दूटा लघु कथा २.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी २.२.१.ललन कुमार कामत-किछु लघु कथा २.राम विलास साहु-अबिसवास ३.दुर्गानन्द मण्डल :: लघु कथा-छुतहरि २.३.१. फागुलाल साहु- किछु विहनि कथा २.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध- लिटरेचर फेस्टीभल ३.नन्द विलास राय :: किछुलघु कथा २.४.प्रणव झा- तेसर प्रण (लघुकथा) १.जगदीश प्रसाद मण्डल - दूटा लघु कथा २.डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी १ जगदीश प्रसाद मण्डल - दूटा लघु कथा मनुखदेवा जहिना रामभूमि अयोध्यामे रामनौमी दिन रंग-रंगक भेषधारी तहिना बिआह-पंचमीआंे आ रामनौमीआंेमे जनकपुर पहुँच एकरंगासँ सतरंगा धरि अपन पूजन करै छथि, तहिना गामो-घरमे ने गहवर अछिए। ने गुहरियाक कमी छै आ ने देवासँ मनुखदेवाक गहवरक। गामो तँ गामे छी थानाक जड़ि, जिलाक जड़ि,राजक जड़ि, देशक जड़ि...। ओना पहिलुको देवा-देवी घर नै रहने मने-मन छला आब इन्दिरा आवासमे घर भेटने घराड़ीओ भेटि गेलनि, तँए गहवरसँ गुहारि-स्थल धरि अनेको दसगरदा स्थल बनियेँ गेल अछि, जइसँ रंग-बिरंगक पावनियोँ-तिहार होइते अछि। गामे छी, गुहरियाक कमी रहबे करत मुदा जँ गुहारिक गहवर नै रहत तँ गुहारि केतए हएत? तहूमे तेते लोक कामाख्या-सीखि भऽ गेल अछि, जेकरा बिनु गहवरे बास केतए हएत। अनुकूल मौसम बनने जहिना अकासमे टिकुलीसँ लऽ कऽ चिल-चिल्होरि होइत सात जोजन देखैबला गीधोक गीत कहियौ आकि चिल्होरिक टाँहि कहियौ, अछिए। भलहिं भेद ई होइ जे कोनो खेत-चासै जकाँ पाहि लगा-लगा उड़ैए तँ कोनो केमहरसँ उड़त आ केमहर जाएत, तेकर कोनो ठेकान नै। मुदा साँझ-भोर बगुला पतियानी लगा पूबसँ पछिम आ पछिमसँ पूब जाइते अछि, जेबे करत…। तहिना अनुकूल सामाजिक परिवेश बनने तीनटा गहवर आने गाम जकाँ हमरो गाममे अछिए। ओना हमरो गाम सन दोसर गाम सेहो अछि, आ नम्हरो-छोट तँ अछिए। नमहर-छोट ऐ मानेमे जे आन गाममे मनुखदेवोक गहवर केते रंगक अछि आ विसहरो वा आनो तहिना अछि। जइसँ केतौ गुण बेसी अछि तँ केतौ मात्रा बेसी अछि। मुदा अछि सबतरि, कनी कम कि कनी बेसी...। ओना गाममे अछि तीनटा गहवर मुदा जमुना धाइमकेँ गहवर नै छन्हि, जैठामसँ गुहारिक डाली अबै जमुना धाइम तहीठाम जा गुहारि करै छथि। कहैले सौंसे गामक लोक कहलकनि जे सालतनी गहवर बनने बेसी लोकक गुहारि हेतइ, जैपर ओ कान-बात नै देलखिन। मनमे एकटा नान्हिटा कीड़ी घाेंसिया गेल रहनि..., कीड़ी ई घांेसियाएल रहनि जे जखनि ओ समरथाइ वयसमे अबैत रहथि, बिआह तँ बच्चेमे भऽ गेल रहनि मुदा दुरागमन हाले-सालेमे भेलनि, ...पत्नी बिमारीक चपेटमे पड़ि मरि गेलखिन। होइतो अहिना छै जे कियो, भूतक चपेटमे तँ कियो चुरीनक चपेटमे, कियो डाइनिक चपेटमे तँ कियो जोगिनक चपेटमे तँ कियो बिमारीक चपेटमे पड़ि मरिते अछि। पत्नीक प्रीत विपरीत बना देलकनि। विपरीत ई भेलनि जे मन कहलकनि- ‘स्त्रीजाति बड़ टोनाह होइए, कनीआंे किछु भेल आकि टुटिए-फुइट जाइए!’ मुदा पुरुखो तँ पुरुख छी। अपन सीमा-सरहद छै, अपन इज्जत-आवरू छै। काल्हि दिन जँ दोसर बिआह करब आ ओहो ओहिना हुअए तखनि तँ अनेरे लोक कहए लगत जे जमुना स्त्रीखौक अछि! केना लोक लग मुँह उठाएब, तइसँ नीक जे ने दोसर बिआह करब जे दोख लागत तइसँ नीक असगरे रहब। जखनि असगरो रहने परिवार होइते छै तखनि अनेरे किए नून-तेलक भाँजमे पड़ि मगजमारी करब। कमा कऽ आनब, बना कऽ खाएब, चैनसँ रहब, भोरे जाएब। मुदा कलंक सँ तँ बँचल रहब...। ओना गहवरो आ गहवरियोक चला-चलती तँ सभ मासमे रहिते छै मुदा आसीनक दुर्गापूजाकेँ किसानक अगहन जकाँ बुझैत। जहिना रंग-बिरंगक गहवर तहिना रंग-बिरंगक भगतो। कियो भगत कहबैत, तँ कियो भगता, कियो धाइम तँ कियो ओझा-गुनी। ओना आसीन मासक चला-चलतीक कारण दोसरो अछिए। ओ ई अछि जे चिड़चिड़ीक घौंदा जकाँ जहिना पावनि सोहरल अछि तहिना पितरसँ पितराइन आ देवसँ देवा-देवी धरिक आगमन सेहो होइते अछि। ओना आन मासमे वेरागने-वेरागने[1] भाउ करैत मुदा आसीनक दसमीमे कलशथापनसँ जे शुरू करैत से एकेबेर नौमी दिन विसर्जन करैत। मुदा तइ सभसँ भिन्न जमुनाक किरिया-कलाप छन्हि। ई आनसँ भिन्न छथि। भिन्न ई छथि जे धाइम छथि। मास-मसादि ऐ दुआरे नै करै छथि, जे अमवसिया-पर्णिमाक ठौर-ठेकान रहितो कतवाहि अछि आ संक्रान्ति मसांत-मसादि बीचमे अछि। तँए जखने जइ कहालीक डाली लगल तखने स्वीकारैत, गुहारि कऽ दइ छथिन। दोसर ईहो छन्हि जे आन भगता जकाँ ने वेरागनक बाट तकै छथि, आ ने जगरनथिया बेंत, ने नहा-धो पवित्र भऽ गंगाजलसँ देह सिक्त करै छथि आ ने दुबि, तुलसी, अच्छतक आशा रखै छथि...। ओना रंग-रंगक कहालीओ तँ अछिए। कियो कोखिया गुहारिक कहाली तँ कियो सुखैनी-टटैनीक, कियो धन-वीतक तँ कियो सर-समांगक। मुदा तैसंग ईहो तँ अछिए जे कहियो-काल हवा-विहारि उठने चला-चलतीमे कमी-बेसी सेहो होइते छन्हि। मुदा तइ सभकेँ जमुना धाइम कतवाहि मानि अपन विचारक अनुकूल चलै छथि। मनो सदिकाल गवाही दइते रहै छन्हि जे जेकरा देहमे रोग रहत तेकरे ने दवाइ खाए पड़तै। डाक्टर अपन अनुभवक हिसाबे रस्ता देखा देत, मुदा दवाइओ आ पथो-परहेज तँ अोकरे ने करए पड़तै। से जँ नै करत तँ नै करह। जानत अपने बूझत अपने...। सतमीक सुर्ज पूब दिस उगि गेल। सुर्जेक रोशनीक रोशनाइक रंगमे गाम डूमि गेल। बच्चासँ सियानो आ घरसँ गामो एके रंगमे रंगि गेल। घरे-घरक नेना-भुटका फुलडालीमे फूल लोढ़ि, गोबर-माटिसँ घर-अँगनाक संग देवो-स्थान[2] नीपै-पोतैमे बेहाल। मन्दिरक पुजेगरी फूल-पात जोड़ियबैमे बेहाल, कनीकालक पछाति बेलतोरीक प्रकरण शुरू हएत, पहिने डाली साजि, बेलक गाछ पूजि बेल तोड़ता, जइसँ भगवतीकेँ डिम्हा मूर्तिकारक हाथे पड़तनि। जहिना भगवती स्थानक जयन्ती पीड़ितसँ हरित दिस बढ़ैत तहिना गामक घरे-घरे सेहो बढ़िते अछि। घरे-घरे, परिवारे-परिवार फूल-पातक पूजनक संग गुग्गुल-सरड़-धुमन-अगरवत्तीक सुगंधसँ गामे महमहए लगल। मुदा गामक गहवर सबहक रंग-रूपमे फीकापन आबि गेल। तेकर कारण भेल जे गनि-गूथि तीनिएटा गहवर गाममे, तोहूमे एकटा भदवरिया बाढ़िमे खसि पड़ल जे दोसर बनबे ने कएल, दोसरक भगते बेमार भऽ लहेरियासराय-अस्पताल धेने अछि अा तेसर कोखिया गुहारिक भाँजमे पुलिसक डरे गामे छोड़ि पड़ा गेल अछि। मुदा जमुना धाइमिक कारोबार पुरवते छन्हि। ओना जमुना धाइमिक चालियो-ढालि आ किरियो-कलाप आनसँ भिन्न छन्हिहेँ। अस्पताल जकाँ सभ रंगक कहाली जमुना धाइम ऐठाम अबितो ने छन्हि। गनल-गूथल कहालीक आगमन होइ छन्हि। मुदा से नै भेल, ऐबेर सतमी दिन तेते कहालीक आगमन भऽ गेलनि जे मजबूड़न अपने ऐठाम बेवस्था करए पड़लनि। देवी-देवताक आगमन तँ देहपर नै होइ छन्हि मुदा मनुखदेवाक आगमन तँ होइते छन्हि। किरिण लहसि गेल, किछुए पछाति गुहारिक बेर हएत। जहिना जमुना धाइम अपने गुहारि करैक जोगारमे लगल तहिना कहालीओ सभ अपन कुहारि अगुआइ दुआरे पहुँच गेल। दरबज्जाक आगूमे बैसि जमुना काका पतियानी लगा कहाली सभकेँ देखलनि। तीन खाड़ीक कहाली बूझि पड़लनि। किछु दैहिक, किछु दैविक, किछु भौतिक। ओना दैहिक आ दैविक कहाली पतराएल रहनि, मुदा भौतिक बेसी रहनि। पहिल कहाली कहलकनि- “धाइम काका, घरमे उड़ी-बीड़ी लागल अछि। दिन-राति खटै छी, मुदा...।” यमुना धाइम- “अपन काजमे खटै छह कि अनका हाथे काज बेचने छह?” कहाली अवाक भऽ गेल। धाइमिक बात बुझबे ने केलक जे अनका हाथे काज केना बेचने छी। मनमे होइ जे भरि दिन काज करिते छी, दिनक-दिन बोइन होइते अछि, तखनि बेचने केना छी। गुनधुनमे पड़ल देखि यमुना धाइम पुछलखिन- “चुप किए छह, छुटि गेलह की?” कहाली बाजल- “कनी कए मन हल्लुक लगैए।” धाइम बाजल- “अहिना हल्लुक होइत-होइत हल्लुक भऽ जेबह। हँसी-खुशीसँ जाह।” ¦१०१६¦ २२ दिसम्बर २०१४ खलओदार तिला-सकराॅइत पावनिसँ एक दिन पहिने, पावनिक ओरियानमे लगल रही। आइए नै ओरिया लेब तँ काल्हि पावनि केना हएत? तहूमे तेहेन मेठनियाँ पावनि अछि जे केतबो धड़फड़ी करब तैयो पार लगत कि नै। पावनियोँ तँ पावनियेँ छी। तहूमे तिला सकराॅइत। पावनि नै पावनिक गाछ छी। किछु एहनो पावनि होइए जे दिन-रातिकेँ एकरंग बना दइए, किछु एहनो होइए जे दिनकेँ नमहर बना राति कपचि लइए आ किछु एहनो तँ होइते अछि जइमे दिने कपचा कऽ घपचा जाइए। एक दिस शुर-शुर, तँ दाेसर दिस मूड़-मूड़। जे दुनू एके घाटपर अाबि पबैए। जँ आइए सभ किछु नै ओरिया कऽ रखि लेब तँ काल्हि ओरियाएब आकि बनाएब-सोनाएब आकि पाएब, पहपटि तँ बीचमे अछिए। मन मानि धकेल कहलक, ‘काल्हि तँ भोरेसँ तजतरीन तड़ि-बगहारि, भोर मूड़-मूड़ दुपहर सुर-सुर आ साँझ फल पेब पावनिक विसर्जन करब किने? मने-मन गुनधुनो करी आ प्राप्तिक (पावनिक ओरियानक वस्तु) गरो अँटबैत रही। तही बीच रस्ता दिससँ दौगल आबि बारह बर्खक भातीज बाजल- “काका, निरजल बाबाकेँ देखैले नै गेलियनि, ओ तँ...।” फटफटहाक बोलक लहर जेना ठमकि गेलै। ठमकि ई गेलै जे ठनका जकाँ जेते जल्दी बाजए चाहै छल से नै भऽ पबै छेलै। होइतो अहिना छै, एक्के बेर बिजलोको आ ठनको उठि कऽ ठाढ़ होइए, मुदा रस्तामे अागू-पाछू भेने बिजलोका पहिने चलि अबैए आ ठनका पछाति पहुँचैए। पुछलिऐ- “बाउ, कोनो हलतलबी...।” ई बूझि बजलौं जे साल भरिक बच्चाकेँ जहिना माए, बाबू, भाए इत्यादि एक शब्द कहि सिखबैए आ जेकरा ओहो, ओहिना भात-रोटी कहि अपन विचार व्यक्त करैए। तैबीच व्याकरण जनैमितै रहैए। व्याकरण आएल नै रहै छै, पछाति अबै छै। मुहसँ जहिना निकलल, तहिना ओहो- भातीजो- लोकैत बाजल- “अब-तबमे छथि?” फटफटहाक बोल सुनि मन बेथा गेल। बेथए लगल जे पाकल जओमे कहीं पाथर ने खसए। अब-तबमे छथि जँ कहीं देरी भेल आ बिच्चेमे मरि गेला तँ अपन मन हुनके मनक पाछू ने बोन-झाड़मे औनाइत फीड़त। तइसँ नीक जे पहिने हुनके देख आबी। मुदा लगले भेल जे ओइठाम जाएब आ बिच्चेमे जँ पराण छूटि जेतनि तैठाम तँ समांग बनि हमहीं रहबनि, तखनि जँ असमसानक जोगार केने बिना, घरोपर केना घूरि कऽ आएब? मुदा जँ जीवैतमे अपन सम्बन्धक हिसाब-किताब नै फड़िछा नेने रहब तँ देखिते छिऐ केहेन फड़ेबी सभ अछि जे सामाजिक सम्बन्धकेँ तहस-नहस कऽ संस्कृति मेटबैपर लगल अछि। मनमे भेल जे पत्नीकेँ कहि दियनि जे हमर कोनो भरोस नै करब, जँ अपनो ले आ परिवारो ले पावनि करए चाहै छी तँ अपन ओरियानमे लगि जाउ। मुदा कहबो केकरा करबै, सभ तँ अपने ताले बेहाल अछि, तैबीच चुपे रहब नीक। विदा भेलौं। निरजल काका ओछाइनपर, जाड़ दुआरे मोटगर ओढ़ना ओढ़ि मुँह उघारि पड़ल रहथि। आँखि मुनने रहथि। फक-फक साँस चलैत रहनि। झूकि कऽ मुँह लग कहलियनि- “काका, काका...।” निरजल काका आँखि खोललनि। शकल-सूरतसँ बूझि पड़ल जे लगले तँ नै मरैबला छथि मुदा बेसी दिन टिकबो ने करता। सौंसे देहक ऊपरका चमरा खोंइचा जकाँ तेना ओदरि गेल छेलनि जे अमेरिकन गोराइक रंग पकड़ि नेने छन्हि। मछियाहा मासमे माछीओ हेरान करिते हेतनि जइसँ बैशाखोमे चद्दरि ओढ़ए पड़ैत हेतनि। ओना निरजल काकाकेँ शिक्षा-प्रेमी कहियनु आकि विद्या-प्रेमी, ज्ञान-प्रेमी कहियनु आकि वुद्धि-प्रेमी, से तँ छथिए। देहक रोग तँ दैहिक छी, मुदा मनक रोगी नै छथि। निरजल काका बजला- “बौआ, आब तँ चलचलौ भेलियऽ, जे दिन छी से दिन, मुदा मनमे एकटा प्रश्न रहि गेल।” कक्काक ‘प्रश्न रहि गेल’ सुनि नजरि चौकन्ना भेल। भेल ई जे अन्तिम अवस्थामे काका पड़ल छथि, जँ पूछि दियनि जे की, आ तही बीच कहीं दम टुटि जान्हि तखनि उतरी केकरा गरदनिमे पड़तै? मन छह-पाँच करए लगल। फेर भेल जे मरै बेरक प्रश्नक उत्तर सुनबैबला के रहता, जे किछु दिनक मेजमान छथि, दोसर दिनक समए लऽ लेब आ ठेकना कऽ आएब जखनि मरि गेल रहता। ने कियो पुछनिहार आ ने कियो कहनिहार, हिसाब राफ-साफ। जखने महाजन साफ, तखने खौदका राफ। दुनू हाथे छातीकेँ पकड़ि कहलियनि- “की प्रश्न रहि गेल काका?” बजला- “बौआ संस्कृत भाषा समासक भाँजमे पड़ि दुरूह भऽ गेल, जइसँ आमजनकेँ बाधा उपस्थित केलक। मुदा भाषाक भीतर जे जिनगीक कला पद्धति नुकाएल अछि, जैपर सभ ठाढ़ छी ओकर की हएत? भँसियाइत लोक केमहर जाएत?” कक्काक प्रश्नकेँ समर्थनमे मुड़ी झुला देलियनि। मुदा पछाति मन पड़ल जे आगूमे तँ हमहीं बैसल छियनि। जवाब तँ हमरे दिअ पड़त। उठिते मन सुक-पाक करए लगल। हुअए जे अखने मरि जैतथि तँ बेसी नीक होइत, कियो बुझबो ने करैत, जे कका की कहलनि। फेर भेल जे एहेन समए झूठ-फूइस नै बाजब। कहलियनि- “काका, काल्हि पावनि छी, तइ दिस मन ओझराएल अछि। पावनिक पछाति आएब, आ उत्तर देब। ताबे उधारी रहल।” निरजल काका बजला किछु ने मुदा नजरिसँ बूझि पड़ल जे मन सोगाएल जा रहल छन्हि। ¦७३१¦ १९ दिसम्बर २०१४ [1] सोम, बुध, शुक्र [2] सार्वजनिक स्थन २ डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी आधुनिक मैथिली कथा साहित्यमे नब-नब कथाकार नब-नब कथाक रचनामे संलग्न छथि। हुनक प्रयास निश्चित रूपे मैथिली कथाक संख्यात्म विस्तार हेतु सराहनीय छन्हि। मुदा मात्र संख्यात्मक विस्तारसँ साहित्यक सागरक गहराइकेँ विस्तार नै भऽ सकैत अछि। जहिना बाढ़िक पानिसँ धारक दुनू कात दूर-दूर तक धारक विस्तार बुझना जाइत रहै छै, मुदा बाढ़ि सटकिते धारक सत्यप्रकट भऽ जाइ छै तहिना साहित्योमे होइ छै। कथा एहेन हेबा चाही जाहिमे भाषा-भावक ताल-मेलक संगे-संग कथामे जीवंतता आ दीर्घजीवी होइक तथ्य समाहित होइ। मात्र आधुनिकताक चोला पहिरा देला मात्रसँ कोनो कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। शब्दाडम्बर कथा नै होइ छै। नीक आ दीर्घजीवन हेतु कथामे विविध तत्वक समावेशकसंगे-संग मानव जीवनक जीजिविषाक प्रखरबिम्ब आ प्रतीक आवश्यक होइ छै। कथामे जौं जीव-जगतक गहनतम गहराइ नै रहै छै तँ ओ कथा बहुत समए धरि जीवित नै रहि सकैए। मैथिलीमे आइ कथाक अनेक नाआें देल जा रहल अछि- दीर्घ कथा, लघु कथा, विहनि कथा इत्यादि। मात्र नाआें रखि देलासँ कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। अदौसँ आइ धरि वएह कथा जीवित अछि जइमे धार छै। जइमे गति छै। जइमे जिनगीक उहापोह छै। जइमे यथार्थ छै आ कल्पनाक एहेन गठन छै जेकरा पाठक छोड़ितो छोड़ि नै पबैत अछि। ऐ दृष्टिए हम नन्द विलास रायक “सखारी-पेटारी”क तानी-भरनीपर विचार करबाक प्रयास करब। ‘सखारी-पेटारी’ िहनक पहिल कथा कृति छियनि। पहिल-पहिल कोनो काज करैमे कोनो ने कोनो त्रुटि हएब आश्चर्य नै। तैयो साहित्य सृजनक सरोकारकेँ देखैत हमर प्रयास रहत जे ऐ संग्रहक नीक-नीक कथाक समीक्षा नीक होइ आ सामान्य भावक कथाक फराक कऽ आगूसँ लेखक अपन कथामे आवश्यकतानुसार सुधारक प्रयास करबा हेतु धियान रखथि। आब हम श्री नन्द विलास राय जीक कथा ‘सखारी-पेटारी’केँ सोझामे रखि खोलबाक कोशिश करब। ‘सखारी-पेटारी’केँ खोलैक काज तँ जनीजातिक छेलनि। साँठब सेहो हुनके सबहक काज छेलनि। आइओ साँठ-उसार करब हुनके अधीन छन्हि। मुदा पुरुख आब बुझू तँ अदहा जनानीए भऽ गेला। साँठ-उसारमे आब हुनक भूमिका अहम भऽ गेलनि अछि। की कहू! सभटा समैक खेल छिऐ। आब देखू ने, श्री नन्द विलास राय पुरुख छथि मुदा ‘सखारी-पेटारी’ साँठि कऽ हमरा पकड़ा देला। हमहूँ पुरुखे। केते दिन धरि सोचैत रहलौं जे ऐ पेटारीकेँ कोनो जनानीएसँ खोलबएब मुदा ओहेन जनाना ताकब केतए। सखारी-पेटारीमे साँठल बौसक सनोमानो तँ कोनो बूढ़े-पुरान ने बुझै छै। थाकि-हारि कऽ पुरुखक साँठल सखारी-पेटारीकेँ अपनेसँ खोलैले तैयार भऽ गेलौं। आब एकटा दिक्कत भऽ गेल। सखारी आ पेटारी जौं अलग-अलग रहितए तब ने बेरा-बेरी खोिलतिऐ। दुनू एक्केमे अछि। चलू सखारी-पेटारीक जगह तँ आब ट्रंक लऽ लेलक। आब ओइमे सँ हम एक सभ समान अलग-अलग करबाक कोशिश करै छी। अपने मने गिरथानि बनैक कोशिशमे आब जे हएत से देखल जेतै। सखारी खुलल। देखू केतेक नीक बौस छै अइमे। समस्त मिथिलावासी एवं मैथिली भाषा-भाषीकेँ समरपित। ठीक बात। यौ, सखारीमे जे समान अबै छै, ओ मात्र घरवारीए सभ समान नै ने रखि लइ छथिन। चाउर, दालि, तरकारी, अदौड़ी, दनौड़ी, करुतेल इत्यादिसँ कनियाँक अबैक खुशीमे भोज-भात होइ छै। सौंसे गौआँ मिलि कऽ बर-कनियाँकेँ आशीष दैत खाइ छै। मुदा ओइ महक काजर, तेल, डोरि, फित्ता आ ककही इत्यादिक बड़ काज। कनियाँ देखए बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ नेना-भुटका तक जे अबैए, सभकेँ कनियाँ अपने हाथे केशमे तेल दऽ ओकरा झाड़ि कऽ ककहै छथिन। ककहि कऽ डोरि वा फित्तासँ बान्हि काजर-सिनुर लगबै छथिन। अगर पेटारीवाली कनियाँ से नै करथिन तँ हुनका भरदुलाहि कहतनि। राय जीक सखारी-पेटारीक समर्पण हमरा मोहि लेलक। हमरा लगैत अछि जे सभ मैथिलकेँ ई पाँति जरूर मोहत। चलू, आब चलै छी जे सखारी-पेटारीमे कोन-कोन तरहक वस्तु-जात अछि। यौ, ‘अप्पन-बात’मे तँ सखारी-पेटारीक वस्तु-जातक कोनो चर्चे ने छै। खाली आत्मेकथा आ समर्पण भरल अछि। यौ रायजी, आब बिआहे संग दुरागमन होइ छै। अहाँ तैयो पछुआ गेलौं। लगैए अहाँक बिआह-दुरागमन दू बेर भेल अछि। चलू- दरब-जात संग हम सर-समान तँ खोलए लेब। मुदा सखारीक दोसर झँपना खोलए पड़त। खुलि गेल। एकसत्तरि। वाह...। आब तँ एके संग दरबजात-वस्तुजात आ सिनुर-टिकुली सभटा चमकए लगल। चलू, देरीसँ एलौं मुदा दुरूश एलौं। सोइरी छछारब, निपुतराहा, जाति-पाति, वाड़ीक पटुआ आ बाबाधाम- ऐ संग्रहक उत्तम श्रेणीक कथा अछि। आब हम सोइरी छछारैत बाबा धामक यात्रापर चलै छी। बीचमे निपुतराहा, जाति-पाति आ वाड़ीक पटुआ सन कथापर अँटकैत ऐ यात्राकेँ विश्राम देब। ई पाँचो कथा सखारी-पेटारीक विशेष लक्षणसँ युक्त अछि। लक्षणा आ व्यंजना शब्द शक्तिसँ युक्त पाँचो कथा पाठककेँ कल्पना लोकसँ उतारि कऽ यथार्थक धरतीपर उतारैमे सक्षम अछि। मैथिल समाजक पारिवारिक-परिवेश आ तइमे धनक पाछू दौड़ैवाली नारी समाजक सोचपर सोइरी छछारब कथा करारा प्रहार करैत अछि। मालती आ ललिताक जन्मासौचक पश्चात सोइरी छछारैले जे परिस्थिति बनल अछि ओ मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारक यर्थाथ अछि। ऐ कथामे रीनाकेँ उपस्थित कऽ कथाकार बहुत होशियारीसँ कथाकेँ अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचा देला अछि। जइ घरमे रीनानै रहै छै तैठाम विवश भऽ कऽ ललिता सन बेटीक सोइरी माइएकेँ छछारैले बाध्य हुअए पड़ै छै। मैथिल परिवारमे ललिता ऐ परिस्थितिकेँ भोगैत अखनौं जीबए लेल मजबूर अछि। ऐ कथाक व्यंग्य निश्चित रूपसँ पाठकक संग-संग भौजाइ लोकनिकेँ झमारबामे सक्षम अछि। सोइरी छछारबसँ निकलि हम जाति-पाति कथाक यथार्थपर अबै छी। मैथिल समाजक पतनक एकटा सभसँ महतपूर्ण कारण जाति-पातिक भेद-भाव सेहो अछि। तथाकथित बुधिजीवी समाजसँ लऽ कऽ श्रवजीवी समाज धरि जाति-पातिक रोग ऐ प्रकार पसरल अछि जे एकर निदान कैंसर आ एड्स विमारीक इलाजसँ अधिक कठिन अछि। कथाकार नुनुबाबूक चरित्रक मादे स्पष्ट कऽ देलनि जे जे समाजमे कोनो जातिक बेकती नुनुबाबूक उपकारसँ बाँचल नै अछि। ग्राम-पंचायतक प्रमुखक जे काज होइ छै तहूसँ अधिक नुनुबाबू समाज लेल कऽ रहल छथि। मुदा गामक जातिवादक समक्ष नुनुबाबू सन बेकती ताबत धरि नै चुनल जेता ताबे तक मैथिल समाजक माथमे जे जातिक कुण्ठाक भुस भरल रहल। आ जाधरि ओकरा बुधिकेँ आड़ीसँ चीरि कऽ विवेकक चुट्टासँ निकालि कऽ फेकल नै जाएत। ‘वाड़ीक-पटुआ’ ठीके बड़ तीत होइ छै। डाक्टर प्रमोद सन पटुआ तीत नै हेतै तँ फेर ई कहाबत किए बनतै। मंगनूबाबू असगरे एहेन बेकती नै छथि। जे सहज सुलभ होइत छै ओ निश्चित रूपे लोककेँ तीत लगै छै बरू ओ मिश्रीओसँ मीठ किएक ने होउ। लेखक निश्चित रूपे ऐ कथाक माध्यमसँ मंगनूबाबू सन लोकक मुँहक संग मनकेँ तीत करबामे सक्षम अछि। अटकैत-फटकैत बाबाधाम लग आबिए गेलौं। माए-बापक सेवा केने की हेतै। माल पोसने दूटा टका आ मनुख पोसने दूटा कथा ओहिना नै कहल गेल अछि। आन समाजक संगे-संग मैिथल समाजक स्थिति दारूण भेल जाइत अछि। ‘जिन मातु पिता की सेवा की’ (जे माए-बापक सेवा केला) केर भावना आइ मरल जा रहल अछि। आइ मैथिल समाजमे बाबाधाम जेबाक होड़ लागल रहैत अछि। बानरक देखा-देखीबला भावसँ भरल हेंजक-हेंज स्त्री-पुखख नब-नब वस्त्र आ तेहने आँखिक भावसँ भरल जखनि गामसँ विदा होइत अछि तँ हमरा सन मुरूख देखिते रहि जाइत छी। माए-बाप आ सासु-ससुरसँ भीन भऽ वृद्ध जनकेँ उपेक्षा करैत आजुक पीढ़ी नीचताक रस्तापर ऐ तरहेँ बढ़ि रहल अछि जे सुकनाक बाबू आ माए सन हजारो माता-पिता आइ पछताइत बाजि रहल अछि- जतने जतेक हम पाप बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाय मरनक बेर हरि क्यो नहि पूछलि एक करम संग जाय। उपर्युक्त पाँचो कथा अपन स्वरूप विस्तारक संगे-संग संवाद, पात्र योजना, परिवेश, भाषा शैली एवं उदेसक कसौटीपर कसल बुझना जाइत अछि। पाँचो कथाक शीर्षक सेहो आकर्षक एवं विषय-वस्तुक अनुरूप अछि। मैथिल समाजक विविध विडम्बनाक उपर्युक्त पाँचो कथा साक्षी अछि। आधुनिक व्यंग्य विधाक कथामे उपर्युक्त कथा जगह पबैक अधिकारी अछि। ‘सखारी-पेटारी’क छह गोट कथा आधुनिक समाजक पतनोन्मुख भाव-धाराकेँ रेखांकित करबाक प्रयास बुझना जाइत अछि। ‘डाक्टर बेटा’, ‘प्रोफेसर बेटा’,‘डिब्बाबला दूध, ‘सोच, ‘भोँट, आ ‘ऐना’ कथामे एक कात माता-पिताक प्रति उपेक्षा अछि तँ दोसर कात सन्तानक प्रति उपेक्षा। ‘सोच’, ‘भोँट’ आ ‘ऐना’मे एक कात विकास हेतु छटपटाहटि, तँ दोसर दिस समाजमे व्याप्त संकुचित मानसिकता। मध्यवर्गीय समाजमे डाक्टर आ प्रोफेसर बनल बेक्तीकेँ परिवारक प्रति उपेक्षा पारिवारिक सिनेह आ समरसताकेँ क्षिण्ण-भिन्न करैबला मानसिकतसँ मानवता मरत। आधुनिक नारी शारीरिक सौन्दर्य बँचबैले सन्तानकेँ स्तनपान करैसँ कटब मातृत्वक प्रति उपेक्षाकेँ प्रदर्शित करैत अछि। ‘सोच’ कथामे प्राद्योगिकी शिक्षाक प्रति युवाकेँ बढ़ेबाक प्रयास छै। ‘भोँट’ आ ‘ऐना’ मनुखक आँखि खोलैक प्रयास अछि। ऐ छबो कहानीमे छोट अकारमे अनेक विषयकेँ उठौल गेल अछि। मुदा ऐ कथा सभमे ऊपरका कहानी सन भाषामे धार नै बुझना जाइत अछि। कथाक शीर्षक आकर्षक एवं विषय-वस्तुक अनुकूल हेबाक चाही। ‘ऐना’आ ‘सोच’ शीर्षक तँ आकर्षक एवं विषयानुकूल अछि। शेष चारि गोट कथाक शीर्षक हमरा बुझने कमजोर अछि। नन्द विलास रायक सखारी-पेटारीमे दू गोट कथा जनता आ सरकारी तंत्रक आँखि मुनौबलिपर आधारित अछि। लेखक दुनू कथाक माध्यमसँ सरकारी क्रिया-कलाप आ गाम-गाममे सरकारी सहायताकेँ बन्दर-बाँटक आद्यान्त वर्णन करबाक प्रयास केला अछि। प्रयासमे लगभग सफलो भेला अछि। पोषाहारक अनाजक विरोधमे जेना प्रमुख मामिलाकेँ खतम करेलक से ‘निवास प्रमाण पत्र’ मे लगभग विरोधा भास लगैत अछि। जखनि मुखिया आ प्रमुख लेल एकटा प्रमाण-पत्र बनबबैमे संग नै दइ छै ओ गहुमकेँ बन्दर-बाँट कऽ सत्यताकेँ सिद्ध कऽ शिक्षककेँ गहुम कीनि कऽ बाँटैले केना कहि सकै छै? एतबे नै, ओइ शिक्षिकाक पति गामक दबंग अछि। पोषाहारक गहुम बेचि तँ अखनि साधारण बात छी। तँए दुनू कथाक प्रमुखक चरित्रमे विश्वसनीयतासँ अलग काल्पनिकता आबि गेल अछि। ‘गोबरबिछनी’, ‘असल बेटा’, ‘ननदि-भौजाइ’, ‘विवेकक विवेक’, ‘सभसँ पैघ पूजी’, ‘चौरचनक दही’क संग ‘महाजन’ शीर्षकक कथाकेँ हम आदर्शवादी कथाक रूपमे देखि सकै छी। अही कोटिक कथामे भावक सुन्दर समन्वय देखना जाइत अछि। कथा रचना, ओकर विस्तारक मध्य आ अन्तक सुन्दर परिपाक अछि। रायजी कथा गढ़ैमे माहिर छथि। कथाक ताना-बानामे बान्हब पुन:ओकरा अन्तिम परिणति धरि लऽ जाएबमे रूकै नै छथि। ऐ कोटिक कथाक भाषा आ भाव-भंगिमा सरस आ प्रवाहगामी छन्हि। “महान कथी? धनीक छी तँए महान? नै, जे हृदए महान हुअए। जेकर आत्मा महान हुअए। ...वएह महान आदमी हएत आ महाजन कहौत।” (महाजन) भाषाक एकटा आरो बानगी- “एक परनहिया तँ शोकेमे डुमल रहली। बेटी बुचनीक मुँह देखि फेरसँ काज-राज करए लगली।” (गोबर बिछनी) राय जीक भाषा परिवेश जनित भावकेँ समाहित करबामे पूर्णरूपेण सक्षम छन्हि। “जखनि नेना लाल पीसा साइकिलपर मीना बहिनकेँ बैसा मदना विदा भेला तँ ओ बौम फाड़ि कऽ कानए लगला।” (विवेकक विवेक) एे ‘कानब’मे एक्के संग अनेक भावक विस्तार अछि। समग्र कथा संग्रहकेँ पढ़ला पछाति केतौ-केतौ हिन्दी अथबा उर्दू शब्दक अनपच बेवहार भेल छै। ओ हमरा अनसोहाँत लागल। जेना- जे ‘दिल’ महान होअए। हमरा सभ बात ‘मालूम’ भेल। ‘लाइन, कौलेज, प्रोफेसरक, इंजीनियर, बी.ए, डी.एम.सी.एच, चौठियाकेँ अपन गलती ‘महसूस’भेल अछि। अन्तिम खानामे, विवेच्य कथाक शैली आ शीर्षक प्राय: अभिधामूलक छन्हि। लक्षणा आ व्यंजनाक माध्यमसँ ऐ कथा सभमे आरो आकर्षण बढ़ि सकैत छेलै। संगे-संग भावक अभिनय रूप सेहो। अन्तत: हम कहि सकै छी जे ‘सखारी-पेटारी’ मैथिली कथा साहित्यक विकासक एकटा नीक कड़ी सिद्ध होएत। लेखकसँ आग्रह जे भाषा विचारक माध्यमे टा नै वाहको होइ छै। तँए भाषा-भावक संतुलित बेवहारसँ साहित्यमे रमणीयता अथवा भावक प्रवाह तीव्रगामी होइत छै। कथामे विषयक संग-संग नब-नब प्रतीक बिम्ब आ बात उठा कऽ पाठककेँ सहजे कथाकार बान्हि सकै छथि। तँए कथामे उतरोत्तर विकास परिलक्षित हएब आवश्यक छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.ललन कुमार कामत-किछु लघु कथा २.राम विलास साहु-अबिसवास ३.दुर्गानन्द मण्डल :: लघु कथा-छुतहरि १ ललन कुमार कामत किछु लघु कथा- अप्पन माए-बाप सुनील जीकेँ दूटा सन्तान। सौरभ दस सालक जे पाँचमा कक्षामे आ छोटका सुमन छह सालक जे पहलामे मेडोना स्कूल, कटहल वाड़ी दरभंगामे पढ़ैए। स्कूल घरेक बगलमे छै। सुनीलजी अकाशवाणी दरभंगामे नौकरी करै छथि। हम सुनील जीक दुनू बच्चाकेँ घरपर जा ट्यूशन पढ़बै छी। हुनकर कनियाँ मंजू हरिदम बच्चाक कपड़ा-लत्ता, वर्तन-बासन आ आनो-आन घरक काम-काजमे ओझराएल रहै छथिन। सुनीलजी नौ बजे भोरे निकलै छथि अपना काजपर। दू बजे खेनाइ खाइले अबै छथि। फेर रातिमे दस बजे घर अबै छथि। चारि बजे बेरू पहरमे हम पढ़बैले सभ दिन जाइ छी। आइओ गेलौं। कनीए काल पछाति मंजू चाह लऽ कऽ हमरा लग एली। चाहक कप पकड़ा बच्चाक बदमाशीक उपराग कम मुदा काजक बेस्तताक पोथी खोलि छनेमे संसारक परेशानीक पाठ पढ़ि गेली। फेर काजमे एना लागि गेली जेना टाँग-पर-टाँग नै पड़ैए। छुट्टीक समैमे सुनीलजी सेहो घरक काम-काजमे बेस्त रहै छथि। दुनू गोटेक परिवारक प्रति समरपन देखि हमरा बुझाइत रहैए जे ऐ छोट परिवारक अलाबे हिनका सभकेँ ऐ संसारमे किछु ने छन्हि। अचानक गामसँ हुनका फोन एलनि जे हुनकर पिताजी सिरियस छथिन। सुनीलजी आॅफिसमे छुट्टी लेल दरखास दऽ गाम बिदा भेला। गाम जा पिता जीक संग माएकेँ सेहो संगे दरभंगा आनि लेलनि। बाबूजीकेँ असपतालमे डाक्टरसँ जँचबौलनि। डाक्टर कहलकनि- “अहाँक पिताजी केँ टी.बी. भऽ गेलनि हेन।” “आब की उपए अछि डाक्टर साहैब?” सुनीलजी पुछलखिन। “नौ मासक दबाइक कोर्स अछि। देख-रेखमे समैपर दबाइ चलबए पड़त।” सुनीलजी, आॅफिस जा अदहा दिनक छुट्टी छह मासक लेल दरखास लगा माए-बापक सेवामे लीन भऽ गेला। कटहल वाड़ी स्थित नीज अवासपर माए-बाबू रहए लगला। मुदा सप्ताहमे दू दिन असपतालमे जाए-आबए पड़नि। आब मंजू पहिनेसँ बेसी परेशान रहए लगली। एक दिन मंजूक वार्ता हमरासँ भेल। बजली- “की कहूँ सर, एक्को-रती मन नै होइए जे ऐ घरमे रही।” हम पुछलियनि- “किए, की भेल?” “तेतबे घरक काज तेतबे धिया-पुताक काज आ तैपरसँ माए-बाबूजी माथक बोझ बनि गेल छथि। अपने जे छथि ओ एकाेटा काज नै सम्हारै छथि।” हम कहलियनि- “अहिना होइ छै, काम-धाम तँ सभ दिन लगले रहै छै। मुदा माए-बापक सेवा सेहो ऐ जीवनमे जरूरी छै।” मंजूकेँ जेना हमर उपदेश एक्को-रत्ती नै सोहेलनि। तमतमाइत बजली- “मास्टरजी, हमरा अहाँ नै सिखाउ। अहाँकेँ दुनियाँ-दारीक थाह नै चलल अछि अखनि। सासु-ससुर हमर ओहेन अदरगर नै छथि।” मंजूक ई बात सुनि हम स्तब्ध रहि गेलौं। मुँहक बात मुहेँमे रहि गेल। संच-मंच बच्चा सभकेँ पढ़बए लगलौं। मुदा मंजू बड़बड़ाइत रहली- “चौबीस घंटा काजे-काज। सभ अढ़बैए बला। ऐ घरमे रहैक मन एकोरती नै होइत अछि। जेतबे घरक काम-काजसँ माथा दुखाइत रहैए आ तैपर सँ बुढ़बा-बुढ़िया माथ भुकबैत रहै छथि।” तही बीच बुढ़हाक खौंखी जोर-जोरसँ सुनि पड़ल। खौंखी करैत-करैत बदहाल भऽ कहरि-कहरि कऽ बाजए लगला- “कनहौलीवाली, सुनीलक माए, केतए छी? ओहू बुढ़ियाकेँ जेना हमरा लग नीक नै लगै छै। जेना हम काटैले दौड़ै छिऐ।” बुढ़हाक हफनीक अवाज फेर सुनि पड़ल- “कनियाँ छी हे, लहानवाली, ऐ सौरभक माइ? बाप रे बाप! कोइ ने सुनैए।” मंजू बड़बड़ाइत घुमली- “मरबो ने करैए बुढ़ा जे हमर सिरक बोझ हटैत। जानि ने कोन पापक फल छी।” सुनील जीक घरक ई कथा रोजक भऽ गेल। एक दिन अनायास हुनकर घरक हवा एकदम शान्त बुझना गेल। छतक चौकीपर जाजीम बिछौल छल। दुनू बच्चा ओइपर आबि पढ़ैले बैसल। हम पलास्टिकक कुरसी खिंच बैसलौं। कनीए काल पछाति मंजू पलेटमे जलपान आ कपमे चाह लऽ मीठ-मीठ चालिमे मुस्कीआइत एली। हमरा बुझाएल जे आइ मंजूजी तिरपित छथि। इच्छा भेल जे ऐ खुशीक कारण जानी। पुछलियनि- “भाभीजी, आइ अपने बड़ खुश नजरि अबै छी, की बात छिऐ?” “हँ, खुशी किए ने हएब। आइ हमर अपन माए-बाबू गामसँ एला अछि। खुशी तँ सोभाविक छै।” मंजुक ई बात सुनि खुश तँ भेबे केलौं जे माए-बापक दर्शनसँ सोभाविक खुशी जे हेबक चाही से हिनको भेलनि। मुदा दुख सेहो भेल। दुख ई भेल जे आखिर सासु-ससुरक विषयमे जे मिथिलाक दर्शनमे नारी लेल बतौल गेल छै जे अपन माए-बापसँ बढ़ि कऽ सासु-ससुर होइ छै से हिनकामे किए नै छन्हि।¦¦¦ सम्पर्क- ललमनियाँ, सुपौल। स्कूलक फीस- मानस तीन सालक छल तहिये माएक देहावसान भऽ गेलनि। पिताजी गामक मुखिया छथिन। समाजक कहलापर दोसर बिआह केलनि। लबकी कनियाँ थोड़-बहुत पढ़ल-लिखल, सोभावशील, विचारू आ सुन्दर भेलनि। तीन सालमे मुखिया जीकेँ दूटा सन्तान और भेलनि। चन्दन आ नन्दन। नन्दनक जन्मक छह मासक पछाति मुखियाजी स्वयं भगवानक प्रिय भऽ गेला। एकबेर फेर परिवारसँ लऽ कऽ गाम भरिमे शोकक लहरि पसरि गेल। मुदा मुखियानि शोकक सागरसँ बाहर आबि तीनू बच्चाकेँ लालन-पालनक लेल फेरसँ अपन दिन-दुनियाँमे लीन भऽ गेली। अपना सुइध-बुइधसँ बच्चा सबहक बरबरि लार-प्यारसँ पोसैमे कोनो कसरि नै छोड़ै छथिन। मानस आब दस सालक भऽ गेल। प्राइवेट स्कूलक चारिम कक्षामे पढ़ैए। महिनाक पाँच तारीख तक सभ बच्चा अपन-अपन फीस जमा करैए। लेट-सेट छह तारीख धरि विलम शुल्कक संग जमा करब आवश्यक अछि। नै देने नाओं काटि देल जाइ छै। मानस प्रत्येक महिना अतिरिक्त शुल्कक संग जमा करैत छल। मुदा ऐ मास सेहो नै भेलै। पीठपर पोथीक बैग टाँगि, अनजान चालिमे डेल उठबैत, एमहर-ओम्हर तकैत स्कूल दिस विदा भेल। घरसँ लगभग एक किलो मीटर भरि पूब स्कूल छै। बाटेमे मानसक मन फीपर गेलै। आइ तँ छह तारीख छी। मुदा फीस तँ अछि नै। सरजी की कहता की नै। असमंजसमे पड़ल मानस स्कूलक हाता धरि पहुँच गेल। हातासँ आगू नै बढ़ि बाहरेमे ठाढ़ रहल। किछु काल पछाति आपस घूमि गेल। अगल-बगलमे डबरा-डुबरीमे पहिल मानसुनक बर्खासँ पानिक जमाव सभकेँ देखैत, बेंगक टरटरेनाइ आदिकेँ देखैत-सुनैत लीन भऽ गेल। ओमहर स्कूलमे सरजी हाजली मिलौला पछाति मानसक अनुपस्थितिपर बजला- “मानस आइ नै एलौं?” एकटा बालक कहलकनि- “आएल तँ छल मानस, साइत बाहरमे हएत।” सरजी- “आइ फेर फीस नै अनने होएत।” फेर वएह बालक बाजल- “सरजी, अहाँ कहब तँ हम मानसकेँ बजा आनब।” सरजीक धियान मुद्रापर गेल। बजला- “जो, आ कहि दिहनि जे आइ जँ फीस नै लऽ कऽ आएत तँ दोबर फीस लगतै।” बालकक नाओं सौरभ अछि। सौरभ स्थानीय बेवारीक बेटा छी। सौरभ केर घर स्कूलक बगलेमे छै। मानससँ मित्रता छै। मानस केर प्रति सहायताक भाव सेहो रहै छै। सौरभ विदा भेल मानसकेँ तकैले। बाहर जा एमहर-ओम्हर नजरि दौड़ौलक। मानसपर केतौ नजरि नै पड़लै। कनी और आगू बढ़ल। देखलक एकटा गाछक छाँहमे ठाढ़ किछु देखि रहल अछि। देखिते चिकरि कऽ सोर पाड़लक- “मानस, की करै छी। एमहर आ।” मानस अवाज सुनि-ताकि लग आबि बाजल- “आइ हम स्कूल नै जेबौ। सरजीकेँ नै कहिहनि जे मानस गाछ तर अछि।” सौरभ- “जौं तूँ स्कूल नै जेमेँ तँ एतए की करै छीही। घरेपर रहितेँ।” मानस- “तूँ नै बुझै छीही। घरपर जँ रहब तँ माइक सैकड़ो प्रश्नक उत्तर दिअ पड़त। घरमे पाइ-कौड़ी नै छै। माए कहलक जे दू-चारि दिनमे पाइ देबौ।” सौरभ स्कूलक निअमसँ अवगत अछि। जौं छह तारीख तक फीस जमा नै हेतै तँ स्कूलसँ निकालि देल जाइ छै। ई सभ सोचि मानसकेँ कहलकै- “स्कूलक निअम नै बूझल छौ जे केते कड़ा छै। माएकेँ नै कहने छीही?” मानस किछु बाजल नै, आ ने किछु फुरेलै। चुप रहल। सौरभ घूमि कऽ स्कूल चलि गेल।।¦¦¦ सम्पर्क- ललमनियाँ, सुपौल। दस हजरिया नोट- हम अपन इलाकामे जानल पहचानल पेन्टर छेलौं। पेन्टिंगमे बेदरेसँ लगाव रखैक कारण, भाड़ी-सँ-भाड़ी चित्र पल भरिमे बनेनाइ हमरा लेल असान छल। एकटा लङोटिया दोस्त छल धीरेन्द्र, किराना दुकानदार आ जातिक भूमिहार। बखत-कु-बखतपर हम एक दोसरकेँ मदति निस्वार्थ भावसँ करै छेलौं। एक दोसरकेँ विशुद्ध दोस्त मानै छेलौं। लोक सभ हमरा ऐ दोस्तीकेँ देखि हैरत रहै छल। हैरत ऐ खातिर रहै छल जे हमर दोस्त धीरेन्द्र भुमिहार जातिक छल। केते लोग कहैतो छल- “की रौ, भुमिहारसँ दोस्ती केलँह..., ठीकसँ रहिहेँ. कहीं भुमिहारी दाउमे फँसलँह तँ बुझियैहनि!” मुदा ऐ बातपर हम कोनो कान-बात नै दइ छेलौं। एकदिन जहिना हम रंग-ब्रशक झोरा लऽ कऽ केतौ काजपर विदा भेल छेलौं आकि जनक काका दलानपर सँ चिकड़ि कऽ बजा कहलथि- “रौ, सुन कहै छियौ तूँ जौं भुमिहारसँ दोस्ती केलँह तँ भुमिहारी दाउ एकोटा सिखलेँ आकि नै?” हमरा जिज्ञासा भेल आ पुछलियनि- “काका, भुमिहारी दाउ केकरा कहै छै हौ?” “हम जँ बुझितौं तँ हमहीं ने तोरा सिखा दैतिऔ? लोक बाजै छै जे भुमिहारी दाउ बड़ पेंचिदा होइ छै।” हम भरि बाट गुन-धुन करैत एलौं ‘मुदा ई कोन दाउ छी? जे लोक सभ दोसक संग देखि पुछैत रहैए? से नै तँ, आइ हम दोसेसँ ऐ बिषयमे पुछि कऽ रहब। दुपहरियाक रौदामे हम कोसी प्रोजेक्टक देवालपर एकटा विज्ञापन लिखैत रही संयोगसँ तखने पाछूसँ मोटर साइकिलक सीटीक अवाज पिपियाएल! हम रंगक डिजाइन बनबैमे मगन रही। मने-मन तामससँ देह बहिर भऽ गेल! ‘के एहेन दुष्ट छी जे डिस्टर्ब करैए?’ मुदा ताकब केना? जौं ताकब तँ डिजाइन खराप भऽ जाएत। लगल हाथ छोड़ि,़ ताकलौं। अवाक् रहि गेलौं! वएह भुमिहार दोस धीरेन्द्र छल। दोस्तीमे कनी-मनी शैतानी तँ चलिते रहैत छल। मन्द मुस्कान चेहरासँ सेहो छुटल। तैबीच धीरेन्द्रक नजरि पेन्टिंगपर पड़ल आ प्रशंसा करए लगल। मुदा हमर प्रशंसा, जे हमरे मुँहपर बाजल जाइत अछि! नीक नै लगल, अंग्रेजीक एकटा मुहावरा मन पड़ि गेल, ‘रेस्ट ऑन वन्स लॉरेल्स’ अर्थ अछि, ‘अप्पन ख्यातिसँ संतुष्ट नै रहक चाही,’ हम विनम्रतासँ कहलियनि- “दोस, अहाँक ऐ प्रशंसासँ हम खुश नै छी। हम मात्र एकटा छोटका कलाकार छी, खरचा-पानि चलेबा लेल ई काज करै छी।” तैबीच हमरा मन पड़ल ‘भुमिहारी दाउ’ पुछलियनि- “दोस, लोक कहैए जे भुमिहारी दाउ बड़ नीक होइ छै, हमरो सिखा दिअ।” धीरेन्द्र पहिले तँ हमरा बातपर धियान नै देलक मुदा बेर-बेर जिद्द केलापर सोचए लगल, कनीकाल सोचि कऽ बाजल- “दाउ तँ अहाँकेँ सिखा देब मुदा बदलामे किछु दिअ पड़त।” हम पुछलियहन- “कथी देबए पड़त? बाजू।” धीरेन्द्र फेर बजला- “अहाँकेँ एकटा दस-हजरिया नोटक पेन्टिंग बना कऽ हमरा दिअ पड़त।” हम बजलौं- “रूपैआक नोट! दस-हजरिया आ पँच-हजरिया की, जौं पेन्टिंगेसँ बनाएब तँ किए नै? जरूर बना देब। कनीए दिन रूकू फुरसति हुअ दिअ तँ छापि देब।” पेन्टिंग हमर ईश्वरीय देन छल, बेदरेसँ अनेक प्रकारक चित्र पाड़ै छेलौं, स्कूलमे सरजीकेँ यार-दोस्तक आ संग पढ़ैत लड़कीओ सबहक। बाबूजी सधारण किसान छल, हमर पढाइ लेल पर्याप्त खर्चा नै रहैक कारण अध्ययनक संग उपार्जनक मार्ग अपनौने रहौं। अखनि हम निर्मली आ आसपासक क्षेत्रमे जानल-पहचानल चित्रकार छी। कामक व्यस्तता हरिदम रहैए। ऐ व्यस्ततामे दोसक लेल दस-हजरिया नोट बनेनाइ हम साफे बिसरि गेलौं। एकदिन हम नगर सेठक दोकानक बगलमे साइन बोर्ड बनबैत रही, तखने धीरेन्द्रक अवाज सुनि पड़ल। काम रोकि गद्दी लग हम ससरि कऽ एलौं, तही समैमे आउरो किछु जानल-पहचानल बेपारी सभ पहँुचल छल। धीरेन्द्र जोरसँ सभकेँ सुना कऽ हमरा कहैए- “की दोस, हमर काम नै हेतै?” हम चौंकि गेलौं जे हमरा कोन काम कहने छथि! पुछलियनि, “कोन काज?” “वएह दस हजारबला!” हमरा मन पड़ि गेल दस-हजरिया नोट! मुड़ी हिला स्वीकृति दैत कहलियनि- “ओऽ हाँ, हेतै, हेतै, किछुए दिन और रूकू।” सेठजी नोटक गड्डी गीनैत-गीनैत, चेश्माक भीतरे-भीतर, रूपैआक बात सुनि हमरा दिस ताकए लगल। हम चुपचाप, काम करए लगलौं। हमरा एला पछाति़, धीरेन्द्र सभ लग बाजल, जे ‘ई पेन्टर हमर दोस छी, हमरासँ दस हजार टाका लेने अछि, केतेक महिना भऽ गेल, मुदा टाका मांगलापर, आइ-काल्हि करैत, समए काटैए।’ समए बीतैत गेल, छह महिना-साल भरिक बाद, फेरि दोसर बेपारीक दोकानपर दस हजारक तकेजा केलक। हम दस-हजरिया पेन्टिंगक नोट समझि टाड़ि देलौं। मुदा हमरा गेलाक पछाति धीरेन्द्र सभ लग बाजल फिरै छल जे साँचेमे ई हमर रूपैआ लेने अछि। ऐ बातक दू बरख भऽ गेल। जेतए-तेतए लोक सभ हमरा कहए लागल- “धीरेन्द्रक रूपैआ किए ने फड़िया दइ छिही! दोस-बोनक पैसा एते-एते दिन रखनाइ नीक बात नै छै।” पहिले तँ हम असमंजसमे रहौं मुदा, जखनि पता चलल जे धीरेन्द्र दस-हजरिया पेन्टींगक बदलामे दस हजार टाका लोक सभ लग बाजल फिड़ैए, हम अवाक् रहि गेलौ! केतेक गोटेकेँ समझेबाक परियासो केलौं ई बात, मुदा जेकरे कहिऐ वएह, बुड़िबक बनबए लगल- ‘कलाकार भऽ कऽ एहेन नीयत तोहर नै हेबा चाही।’ हम चिंतित भऽ सोचए लगलौं, ‘ई दोस्त नै छी, दुश्मन छी, एते भाड़ी फेरामे पड़ा देलक! केतएसँ एते टाकाक ओरियान करब!’ हमर ओकाति हजार टाका जेना लाख टाकाक के बराबरि छल। बिना जमीन-जथा बेचने दोसर उपए नै छल। कनीए दिनक पछाति, पंचैती भेल, पंचक फैसला भेल, कटि-मारि कऽ दू हजार सुइदकक संग बारह हजारक देनदारी ठहरौल गेलौं। लोक सभ बाजए नै दैत छल। जीवनमे एहेन बेज्जती कहियो नै भेल रहए। दस दिनक समए देल गेल। टाकाक ओरियान नै भऽ रहल छल। कोनो गुंजाइश नै देखि, एकटा उपए सूझल, जमीन बेचु नै तँ, भरना लगाउ। एक बीघा जमीन भैयारीक फाँट पड़ल छल। बेचब तँ फेर कीनल नै हएत, से नै तँ भरने लगा देबाक चाही। हजार टाकाक दरसँ बारह कठ्ठा खेत भरना लगेलौं, रूपैआ लऽ कऽ दोसक घर पहुँचलौं। दलानपर कियो नै छल असगरे बैस गेलौं, दोस्तीनीकेँ खबरि गेल। कनीकालक पछाति, दोस्तीनी एक हाथमे पानिक लोटा आ दोसर हाथसँ घोघ तानि, अदहा मुँह झाँपल अदहा देखाइत, आगूमे पानि बढ़ा देली। तामससँ तँ हमर देह बहिर छल, सोचने छेलौं जे दोसकेँ किछु कहबनि, मुदा की करब! चोटपर दोस्तीनी पड़ि गेली। भाड़ीए मनसँ कहलियनि- “दोसकेँ बजाउ आ कहियन जे अपन टाका लेता।” कनी काल पछाति धीरेन्द्र हँसैत-हँसैत दलानपर एला। ई हँॅसी, हमरा हरियाएल घापर, नूनक लहरि जकॅंा लागल। चुप चाप रूपैआक गड्डी देलियनि,गिनला पछाति फेरसँ हमरे हाथमे धराऽ देलनि। हम चुपे छेलौं मुदा धीरेन्द्र बाजल- “दोस, याद करू। अहाँ हमरा कहने छलिएे ने भुमिहारी दाउ सिखबैले? यएह छिऐ भूमिहारी दाउ।” एकबेर फेर दोसक ऐ बर्तावसँ हम चकित रहि गेलौं। (लोक कथाक पुनर्लेखन) लगन गोनर बेदरेसँ संगीतक प्रेमी अछि। दिवाली, दशहारा, सरोसती पूजा आ आनो-आन अवसरिपर गाममे नाटक होइक परचलन अछि। मुदा गोनरकेँ ओइ सभमे मौका कमे मिलैए। मौका ओकरे पहिल बेर मिलैए जे ओइमे चन्दा दइए। गोनरक पिता साधारण किसान छथि। गोनरक पिताक दोस्त देबन पंडित गाममे कीर्तनियाँमण्डली चलबै छथि, तँए लोकसभ गबैया कहै छन्हि। गोनरकेँ संगीतसँ लगाउ देखि पिताजी केतेक बेर कहै छन्हि- “गोनर, दोसक ऐठाम जा कऽ घड़ी-घंटा हैरमुनियाँ किए ने सीख अबै छँह?” आइ स्कूलमे शनिचराक पछाति सरजी गोनरसँ गीत गबौलनि आ खुश भऽ खुब प्रसंशो केलनि। स्कूलसँ अबैतकाल बाट भरि गोनर सोचैत आएल जे आइ देबन काकाक घर जा हैरमुनियाँ सीखनाइ शुरू करब। दुपहरियाक टहटहाइत रौदमे, सभ लोक घरे-घर सूतल-पड़ल, अराम करैत रहए मुदा गोनर, देबन पंडितक घर बिदा भेल। देबन सभ दिन बेरूपहरमे अप्पन एकलौता पुत्र हरियाकेँ संग कऽ साज-बाजक संग रियाज करैत रहथि। आब गोनरो संग दिअ लगलनि। सप्ताहे दिनमे गोनर हरिमुनियाँक रीढ़ आ पटरीकेँ नीक जकाँ परखि लेलक आ सा रे गा मा पा पहिलुक धुन बजबए लगल। ई आकस्मिक आ तेज शुरूआत देखि देबन सोचमे पड़ि गेल, ‘हमर हरिया बेदरेसँ साज-बाजक संग खेलैत आएल तैयो अखनि धरि एतेक नै सीख सकल! देबनके डाहक संग पक्षपातक भावना सक्कत भऽ आ अगिले दिनसँ गोनरकेँ दुआरि पहुँचिते, साज-बाज समेटि रखि दैत रहए। एक-दू दिन गोनर जाइते रहल मुदा ओहिना घुमि कऽ आबि जाइत रहए। गोनर उदास तँ होइते रहए मुदा हताष आ निरास नै भेल, तँए संगीत सिखैक जीद्द मनसँ नै गेल। साँझ पड़ैत सभ दिन, देबन चाह-पान करैले बजार जाइ छल। ई बात गोनर जनैत रहए, तँए साँझ होइते देबनक घर पहँुच कऽ, हरियाकेँ फुसला कऽ साज-बाज पसारि सीखए लगल। मुदा ईहो सीखनाइ तीने-चारि दिनक पछाति स्थाइ रूपे बन्न भऽ गेल। जइ दिन देबन पण्डित दुनू छौड़ाकेँ साज-बाज निकालि सिखैत देखि गेला। कड़गर फटकारो दुनूटाकेँ लगेलखिन आ सभटा साज-बाज समेटि कऽ संदूकमे बन्न कऽ देलखिन। कहल जाइए जे समए आ लहरि केकरो इंतजार नै करैए। ई बात साँच भेल। गोनर ऐ दसे दिनमे जे किछु सिखने रहए वएह रामवाण भऽ गेल आ सक्कत अधार बनि, तारक गाछ सन बढ़ए लगल। कहल जाइए जे कोनो तरहक बुधि आ हूनर सिखैले निर्धारित समए नै होइए। जेतै-तेतै, चलैत-फिरैत गोनर सुर आ तानकेँ साधैत, गुनगुनाइत धूनमे रमल रहै छल। मुदा साँझ-भोर संगीतक अभ्यास केनाइ अप्पन दिनचर्या सेहो बना लेलक। टोल-टपड़ा आ गाममे जखनि केतौ भजन-कीर्तन आकि नाच-गानक आयोजन होइत रहए तइमे गोनर बड़ी तत्परतासँ भाग लैत रहए। तइसँ गाम भरिमे लोकसभ गोनरकेँ गबैया कहए लगल। गामक सटले शहर अछि। शहर छोटे सन अछि सुखी सम्पन्न लोक आ पैग-पैग बेपारीसँ लक हाकिमो-अफसर सभ एतए रहै छथि। गोनरकेँ शहरमे केकरोसँ जान-पहिचान नै अछि। एकटा डाक्टर सुरेन्द्र नारायण नामक गण्यमान बेकती छथिन जे महिला काैलेजमे हिन्दीक सरकारी प्रोफेसर आ संगै-संग महिला कल्याण संस्थानक अध्यक्ष सेहो छथिन। संगीतक प्रेमी रहैक कारण साले-साल सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन करबैत रहै छथि। प्रोफेसर साहैबक एगो बेदरूकिया संगी जे दिल्लीमे नाट्य आ कला विभागक प्रोफेसर छथि ओ रिटायर भऽ अपन पैतृक शहर पहिल बेर एला, तइसँ ऐबेरक आयोजन बड़ जोर सोरसँ भऽ रहल अछि। शहरक गण्यमान लोकसभ जे ऊँच-ऊँ पदपर कार्यरत छथि, सभकेँ कार्यक्रममे शामील होइक बास्ते न्योँत पठाएल गेल। तइमे ऐबेर टी.वी सीरियलक जानल-मानल कलाकार जीतुराज जोहर सेहो हिस्सा लऽ रहल छथिन। कार्यक्रमक दिन लगिचाइत गेल। शहरमे जगह-जगह बैनर-पोस्टर लगाएल गेल जे अमुख तिथिकेँ सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन जानल-मानल संगीत प्रेमी सबहक सहयोगसँ भऽ रहल अछि। मुदा गोनरकेँ ऐ बातक कोनो खबरि नै भेल छेलै। शहरमे स्टेशन चौकपर बबाजी पानबला अछि। हिनका दोकानपर गामक बेसी लोक पान खाइले साँझ-बिहान जाइत-अबैत रहैए। बबाजीकेँ बूझल छन्हि जे गाम भरिमे गोनर सेहो नीक गबैया छी। मात्र दू दिन बँचल रहए, जब गोनर अनायास बबाजीक पानक दोकानपर गेल, बबाजीकेँ मनमे ठहकलनि आ जनैक जिज्ञासा भेलनि जे गोनर ऐ कार्यक्रममे भाग लेने अछि की नै। पुछलखिन- “की रौ तूँ ऐ कार्यक्रममे हिस्सा लेने छेँ किने?” गोनर जिज्ञासु भऽ विनम्रतासँ पुछलक- “भैया हौ, के ई कार्यक्रम करबै छै हौ?” बबाजी बूझि गेला जे गोनर भाग नै लेने अछि तैयो आस्वासन दैत बजला- “अच्छा रूक, हम परोफेसर साहैबसँ बात करै छी।” बबाजी मोबाइल लऽ कऽ नम्बर मिलौलनि आ बात करए लगला- “हेल्लो सरजी, परनाम! हम बबाजी पानबला बजै छी।” ओमहरसँ जे जबाव पुछने होन्हि, मुदा बबाजी फेर बजला- “एकटा नवजुबक बड़ नीक गबैया छथि।” कनीए कालक पछाति फेरि बजला- “लड़का तँ लोकले छथि मुदा एक नम्मर गबैया छथि!” कनीए काल रूकि कऽ फेर आग्रहक स्वरमे बबाजी बजला- “सर! देखियौ कनीए, मौका देल जेबक चाही।” कनीकाल पछाति फोन डिसकनेक्ट भेल। गोनरकेँ बबाजी कहलखिन- संस्थापर चलि जो, ओतए बजेलकौ हेँ। पहिने गीत गबबेतौ तब चुनाव हेतौ। अखने चलि जो।” गोनरकेँ बसंती साइकिल रहबे करए, मुदा बूझल नै छल जे संस्थान छै केतए! तैयो पुछैत-पुछैत बिदा भेल। शहरक दच्छिन, बान्हक कछेरमे उजरा रंगक मकान, अगुआरे-पछुआरे नाना परकारक रंग-बिरंगक फूलक गाछसँ सजल-धजल फुलबाड़ी अछि। सड़कक कातमे साइनबोडपर लिखल अछि ‘महिला कल्याण संस्थान’। गोनर साइकिल नीचाँ धँसा संस्थानक प्राङगनमे पहुँचल, जैठाम दुचक्किया आ चरिचक्किया गाड़ीक पार्किंग लगल छल। बुझना गेल, एते सभकेँ-सभ भी.आई.पी. पहुँचल अछि। कातमे साइकिल लगा, एकटा हॉलमे लोक सबहक सुनगाम देखि भीतर घूसल। प्रोफेसर साहैबक नाओं पूछि गोनर लग गेल आ परिचए देलकनि। परिचए दइते बैसैक आदेश भेटलै। गीत गोनहार, नाच केनहार आ आनो आन कलाक प्रदर्शन केनहार सभ रहए आ रिहलसल होइत रहए। कनीए कालक पछाति गोनरसँ गीत गबबौल गेल, गोनरक सेलेक्सन नै हेबाक तँ कोनो सवाले नै रहए, आश्वासन भेट गेलै जे एकटा गीत गोनरो गाैत। गीतक आयोजन शुरू भेल। एक-सँ-एक भी.आइ.पी. सभ पहँुचल छला। विशिष्ठ अतिथि सभकेँ बैसैक बेवस्था मंचपर आ मंचक अगल-बगलमे कएल गेल रहए। ई आयोजन सार्वजनिक चंदा चिठ्ठासँ होइत रहए जइमे बड़का-सँ-बड़का पुजीबला लोकक धिया-पुता सभ भाग लेने रहए। सिवनाथ सहाय, जीतुराज जौहर आ स्थानीय सिविल अधिकारी सभ मुख अतिथिक रूपमे मंचपर आसीन भेल रहथि। गायन, वादन आ नृत्य ई तीनु संगीत छी एकर प्रस्तुति रसे-रसे हुअ लगल। हर-एक आदमी जे बाजि सकैए ओ गाइबो सकैए किएक तँ गायन बोलीएक एकटा उन्नत रूप छी। मुदा नव-सिखुआ गाबैया लेल समान रूपसँ निर्देशन आ निअमित रूपसँ अभ्यास जरूरी होइत अछि, जे बेसी-सँ-बेसी बच्चा सभमे ओतेक नै छन्हि। गायन एकटा एहेन काज छी जइमे स्वरक सहायतासँ संगीतमय ध्वनि निकालल जाइत अछि। सुवेवस्थित ध्वनि जे रस दैत अछि आ रसक अनुभूति करबैत अछि वएह संगीत कहबैत अछि। ऐ कलाक प्रदर्शन युद्ध, उत्सव, प्रार्थना आ भजनक समए मनुखक द्वारा गावन आ बजावनक माध्यमसँ कएल जाइत अछि। जे गाबैए ओकरा गबैया, जे नाचै ओकरा नचनियाँ आ जे बजबैए ओकरा बजनियाँ कहल जाइए। प्रोग्राम होइत-होइत अदहा राति बीति गेल मुदा अखनि धरि गोनरकेँ मौका नै भेटल। बखत केर पहिया बढ़ैत गेल आ राति दू बाजि गेल। विशिष्ठ अतिथि सभ घर दिस बिदा भेला, दर्शको सभ रसे-रसे जाए लगल, तब जा कऽ गोनरक नाओं एलोन्स कएल गेल। गोनर स्टेजपर आएल। गोनरक मुँहसँ राग लयात्मक रूपसँ बेवस्थित भऽ संगीतरूपी लहरि समुद्रक ज्वारि जकाँ पसरए लगल। जइ प्रस्तुतिमे कलाक प्रदर्शन हुअए आ जइ कलाकेँ संगीत या मनोरंजन कहल जाए, गोनरके कंठसँ वएह सुरीली कंठाध्वनि, ओहिना उत्पन्न हुट लगल जेना वाद्ययंत्रसँ सुसज्जित घ्वनि निकलैए। जे सभ प्रोग्राम छोड़ि,़ घर दिस बिदा भेल रहए, ऊहो ओतै ठमकि गेल, डेग पाछू खींचए लगलै, सभ आपस आबए लगल आ जेकरा घरपर अबाज जाइत रहए, ओकराे जिज्ञासा हुअ लगल जे के एहेन गवैया छी आ केतक छी? किछु विशिष्ठ मेहमान सभ सेहो घूमि आएल छला। गोनरक गाैला पछाति सभ हिनका लग बजा परिचए-पात पुछए लगल आ प्रसंशा सेहो करए लगल। गोनरकेँ आशा जगल जे कियो हिनका मदति करथि। जौं शुद्ध मनसँ भगवानकेँ यादि कएल जाए तँ भगवानो कोनो रूपमे दर्शन देबे करै छथिन। वएह भेल, जीतुराज जौहर टी.वी कलाकार, गोनरकेँ आश्वासन देलकनि- “दू महिना बाद अहाँ दिल्ली आउ, ओतए संगीतक ऑडिसन छै।” गोनर हर्षित भऽ गेल आ जोर-सोरसँ ऑडिसनक तैयारीमे लगि गेल। बेटी सोमनाथजी म्युनसीपल आँफिसमे पैंतीस बरख नोकरी केला पछाति रिटायर भेला। जीवनमे एक्को पाइ नजायज नै ग्रहन केलनि। सोनमनाथजी हृदैसँ पवित्र, शालिन, विनम्र आ दयाक भाव हिनका मुख-मण्डलसँ हरिदम झलकैत रहैए तँए हिनकर बिशेषता बेक्तीगत संज्ञा (उपनाम) मे बदलि गेलनि आ घरसँ लऽ कऽ आँफिस धरि लोक सभ हिनका सोनाजी कहि बोलबए लगलनि। सोनाजीकेँ तीनटा सन्तान, बड़ दुइटा लड़का, जेठ बबलू तैपर सँ डबलू आ सभसँ छोटकी बेटी उषा छन्हि। उषाक बिआह नीक घरमे, इंजीनियर बड़सँ कऽ सम्पन्न केलखिन। जमाइबाबू मुजफरपुरमे नोकरी करै छथिन ओतै सरकारी अवास भेटल छन्हि, तइमे उषा सङ्गे रहै छथिन। जेठका बेटा बबलूक किरदानीसँ दुनू परानी सोनाजीक मन बेथित छन्हि। बबलू इंजीनियरिंग करैले दिल्ली गेला मुदा हरियानाक एकटा लड़िकीक प्रेममे फँसि अपन जीवनक नैयाकेँ किनार कऽ लेलनि आ ओतै प्रेम-बिआह करि बसि गेला। डबलू नागपुरमे बैंक मनेजर छथिन। हिनकरो बिआह भेला पछाति पत्नी सङ्गे आतै रहै छनिन। सालमे एक-आध बेर कभी-कभार घर अबै छथिन। सोनाजी अपन जीवनसंगिनी ममताक सङ्ग बुढ़ाड़ीक पहिया जेना-तेना खिंचै छथि। बेटा-पुतोहुक सुख हिनका नसीब नै होइ छन्हि मुदा उषा, बेटी रहैतो,बेटा जकाँ देखभाल करैए। सप्ताहमे एकबेर आबि कऽ जरूरे देखि जाइत अछि। उषाक सोभाव पिताजीसँ बिरासतमे प्राप्त भेल छन्हि तँए मधुरो आ एक दोसरसँ अनुकूलो छन्हि। सोनाजीक ई पैंसैठम बरख चलि रहल छन्हि। नोकरीसँ रिटायर भेल रहथि तँ शरीरसँ स्वस्थ छला आ भरोसा छेलनि जे आगुओ नीके रहता, मुदा मनुख तँ मात्र इच्छा करैए, होइ तँ अछि वएह जे ऊपरबलाक मरजी रहै छन्हि। उषाक बिआहक पछाति दुनू बेटा दू जगह अपन-अपन घर बसा लेलकनि। सोनाजी दुनू परानीकेँ चिन्ता-फिकिर घरेड़ देलकनि। जीवन-शक्ति शिथिल भऽ गेलनि। हाथ-पएर धीमा पड़ि गेलनि। आँखिक रोशनी कमि गेलनि। कानोसँ कम सुनाइ दिअ लगलनि। पाचनतंत्र गड़बड़ा गेलनि आ दिल-दिमाग सेहो दुरूस नै रहलनि। मतलब बुढ़ापा हिनकर समस्या बनि गेलनि। बेटा सभ कभी-कभार फोन घुमा हालचाल करैत रहै छन्हि। दोस्त-यारकेँ- दबाइ दोकनदार आ मोहल्लाक डाक्टर- सभकेँ फोन घुमा कहैत रहैए जे माए-बाबूकेँ देखैत रहबै। सोनाजी दुनू गोटेकेँ ई परिपक्व अवस्था अछि जइमे ज्ञान, स्थिरता आ अनुभव छन्हि आ तहिक सहारे दुनू बेकती जीवन रूपी नैयाकेँ आगू खिंच रहल छथि। ओना तँ बुढ़ापा भार नै होइत अछि मुदा जब खाएल-पीअल काया जड़जड़ भऽ जाइए आ परिवारक सदस्यक संग तालमेल नै रहैए तँ परीवारमे अपन उपयोगितापर विराम लगि जाइत अछि। वृद्ध लोकनिकेँ ऐ अवस्थामे सहायता आ सहयोगक जरूरत पड़ितै छै। जे बेटा-पुतोहु अपन वृद्ध माए-बापकेँ सेवा करैए वएह जीवनक उत्तम कर्म करैए। एहेन पूत जे माए-बापकेँ जीबिते छोड़ि दइए आ अपनेमे मगन रहैए ओ ओहने काज करैए जेना धिया-पुता सभ बालुक रेतसँ महल बना लइए आ तैपर गाछक डारि-पात गाड़ि कऽ बगीचा बना लइए आ खुशी मनबैत रहैए मुदा जेकरा ज्ञान अछि ओ अपन जीवनक उत्तम कर्म करैसँ पाछू नै हटैए। आजुक समाजमे बेकती अपन बाल-बच्चा संग परिवारमे रीझल रहैए। माए-बाप, बूढ़-पुरानक मान-मर्यादा, तेकर सेवा सत्कारकेँ साफे बिसरि जाइए। ओहेन मनुख हरिदम पाबैक पाछू बेहाल रहैए मुदा जे हिनका लग प्राप्त वस्तु अछि ओकर उपयोग करनाइ नै जानैए। बूढ़-पुरान अनुभवी होइ छथि तँए हिनका समाजमे विशिष्ट स्थान भेटबाक चाही। जे बेकती वृद्धक सेवा नै करैए, ओ कायर होइए आ कायर लोग काल्पनिक विचारक धनवान आ महा गप्पी होइत अछि। जाबे धरि वृद्धजनक आ जुबकक समाजमे तालमेल आ समानता नै बैसत ताबे धरि समाजिक आ सांस्कृतिक काजमे स्थइरूपसँ बिकास सम्भव नै भऽ सकत। सोनाजी शरीरसँ कमजोर होइत गेला आ बेटा पुतोहुक सहायता आ सहानुभूति घटैत गेलनि। आब हिनका याद आबै छन्हि ओ दिन, जइ दिन बेदरूकिया सभकेँ ठेहुनापर लऽ घौआ-छु मल्ले-छु करैत पढ़ैत रहथि ‘लब घर उठे आ पुरान घर खसे...। खैर जे ऐ हाथसँ करैए ओकरा ओइ हाथसँ भोगए पड़ैए। अहु अवस्थामे सोनाजीकेँ रोज-मर्ड़ाक समान कीनए बास्ते हाट-बजार जाइए पड़ै छन्हि। आइ सोनाजी सुति ऊठि कऽ शौचालय गेलखिन। होनीकेँ किछु भेनाइ रहनि, बाहर निकलितै चक्कर आबि गेलनि आ शौचालयक दरबाजासँ टकरा कऽ खसि पड़ला। ममताकेँ गिरैक अभास भेलनि, भिरकाएल फाटककेँ ठेल देखलखिन सोनाजी ढनमनाएल असहाय अवस्थामे ओङ्गराएल आ कहरि रहल छथि। ममता धबरा गेली आ उठबैक परियास केलखिन, हिला-डोला कऽ पुछै छथिन- “बबलूक पपा! की भेल! केना खसलिऐ! बाजू ने?” मुदा कोनो जवाब नै भेटलनि। सोनाजीकेँ मुहसँ छर-छर लेहू बहै छेलनि। ई देखि ममता हाय-बाप करए लगली, असगरि हिनकासँ उठि नै सकल,दौगल-दौगल दरबज्जापर जा हरेरामकेँ सोर पाड़लक, हरेराम दुनू परानी दौगल आएल, सोनाजीक ई दशा देखि हाँइ-हाँइ कऽ उठा-पुठा कऽ ओसार परहक खाटपर सुतेलकनि। सोनाजीक ई हलात देखि ममताक देह जेना केराक भालरि जकाँ काँपए लगलनि। की करब! आ केना हएत! किछु नै फुड़ै छेलनि। हरेराम हड़बराइत बाजल- “काकी! डागडरकेँ फोन करू!” मुदा फोनक डायरी सोनेजी रखने छेलखिन। ममताकेँ भेटिते ने रहनि। हरेरामक पत्नी मंजू बुझि गेलखिन जे बेगरतापर एहेन छोटसन चीज नै भेटैत छन्हि, डाक्टरकेँ बजबैले दौगल-दौगल गेली। मोहल्लेमे डाक्टर इकबालक घर छन्हि, एलखिन। सोनाजीक मुँहक ऊपरका दूटा दाँत नीचला ठोरमे भोंका गेल रहनि तइसँ मुहसँ लेहूक टघार चलै छेलनि।़ उपचार शुरू भेल, कनीएकाल पछाति सोनाजीकेँ होश एलनि। ममतोकेँ जानमे जान एलनि। डाक्टर इकबाल ढाढ़स दैत कहलखिन- “अखनि कोनो चिन्ता करैक बात नै छै, सोनाजीक ब्लडपेसर आ सूगर बढ़ि गेल छन्हि तइसँ, चक्कर एलनि मुदा समैसँ जाँच आ इलाज हेबाक चाही नै तँ हार्टएटेकक सम्भावना बाढ़ि सकैए।” डाक्टर इकबाल पूर्जी लीखि हरेरामकेँ हाथमे दैत कहलखिन- “ई दबाइ जल्दीए लऽ कऽ आउ, सोनाजीकेँ ठोरमे टाँका लगबए पड़त।” तत्कालीन उपचार भेल। सोनाजीक मन पहिनेसँ नीक भेल। ममताक जीक मन हल्लुक हुअ लगल आ बेटा सभकेँ फोन लगबए लगली। जेठका बेटा बबलुकेँ पहिने फोन लगा घटनाक जानकारी देलखिन मुदा बबलू ऐ बातकेँ गंभीरतासँ नै लैत कहलकनि- “केना खसि गेलौ? बाबूजी दबाइ खाइत रहौ की नै? तों केतए रही? दिन राति टेन्शन दइमे तूँ सब लगल रहै छँह।” ऐ घड़ीमे बेटासँ एहेन तरहक जवाब सुनि ममताक मोह भंग भऽ गेलनि। फेर छोटका बेटा डबलूकेँ फोन लगा स्थितिक जानकारी देलखिन। डबलू पिताक हाल सूनि अस्वासन दैत बाजल- “चिन्ता नै कर। डाक्टर साहेबसँ हम बात करै छी। दीपू दोस्तकेँ घरपर भेजै छियौ डाक्टरसँ देखा कऽ दबाइओ-दारू सभ लाबि देतौ। तूँ कान-खीज नै कर।” ममताकेँ बँचल-खोंचल आस नीरास भऽ गेलनि। खैर हिनका सभसँ ओते आसो नै लगेने छेलखिन। आब बेटी उषाकेँ फोन लगेलनि। आन दिन उषा माए-बाबूकेँ फोन करि हालचाल जनैत रहए मुदा, आइ माइक फोन देखि चौंकली आ उत्सुकता पूर्वक बाजलि- “हँ माय! हम सब नीके छी, मुदा बाबूजी केना छथिन?” ममता जनैत छेली जे साँच बात बतेलासँ उषा बेसी घबरा जाएत तँए बातकेँ छोट करैत बजली- “बाबूजीक तबीयत गड़बड़ा गेलौ आबि कऽ देखि जाही।” मुदा भारी मन आ अवाजक थड़-थड़ाहटिसँ उषा भाँपि गेली जे साइत बाबूजीकेँ तबीयत बेसी खराब भऽ गेल अछि। घबराहटि तँ भेबे केलनि मुदा संयमसँ फोन रखि सोचए लगली जे की करी! फेर उठि कऽ बैग झारि, कपड़ा-लत्ता चोपतए लगली आ तुरंत नैहर अबैक ओरयान करए लगली। उषाकेँ एक सालक बेटी छेलनि तेकरो मँुह-कान पोछि तैयार कऽ एक काँखमे बच्चा आ दोसर हाथमे बैग उठा ओसारपर रखि घर दरबज्जामे ताला लगबए लगली। घरक चाभी बिसवासी पड़ोसीकेँ दैत पति इंजीनियर साहेबकेँ फोन लगेलकनि जे घंटे भरि पहिले ड्यूटीपर नीकलले छेलखिन, इंजीनियर साहैब फोन रीसीभ करैत बजला- “हँ बाजू, की बात अछि?” उषाक मन तँ हड़बड़ाएले रहनि मुदा तैयो सम्हरि कऽ बजली- “हम बाबूजीकेँ देखैले गाम जा रहल छी, माइक फोन आएल जे बाबूजी सिरियस छथिन। अहूँ साँझ धरि बाबूजीकेँ देखैले आबि जाएब।” ई बात सुनि इंजीनियर साहैब चौंकि गेला। पुछलखिन- “अखनि! अचानक! किए गाम विदा भेलौं?” ताबे धरि उषा रिक्सापर बैसि बस स्टैण्ड दिस बिदा भऽ गेल छेली। हड़बड़ाइत बजली- “अखनि ओते गप हम नै करब, बूझि लियनु जे बाबूजीक हालत ठीक नै अछि।” उषाकेँ हड़बड़ाएल अवाजसँ इंजीनियर साहैब बूझि गेला जे आब हिनका कोइ नै रोकि सकैए। भरोस दैत बजला- “जाएब तँ जाउ, मुदा मनके अस्थीर केने जाउ, आ बाजू जे पाइ-कौड़ी किछु संगमे अछि किने?” उषा- “अहाँ पाइक चिन्ता नै करू, हमरा संगमे ओते पाइ अछि जइसँ, हम गाम जा सकै छी।” इंजीनियर साहैब बात टोहियबैत पूछि देलकखिन- “पाइ केतएसँ लाबलौं अहाँ? बजैत रहै छिऐ जे हमरा हाथमे एकोटा छिद्दीओ ने रहैए।” उषा सकपका गेली। सकपकेबो केना ने करितथि? पतिक जेबीसँ बँचल-खूचल पाइ रोजे निकालिते रहै छेली। तैपर सँ ऊपरौसँ किछु ने किछु मांगि जरूरतिक समान कीनैबिते रहै छेली आ सभसँ जरूरी काज माए-बाबूकेँ देखै बास्ते जाए पड़ै तइमे खर्चा-बर्चा तँ होइते रहै। ई बात इंजीनियरो साहैब जनिते रहथि तँए उषा बातकेँ खोलैत बजली- “अहाँक जेबी, जे रोज साफ होइत रहैए, वएह कोशलिया कऽ हम रखने रही, विशेष पाइक ओरीयान अहाँ साँझ धरि केने आउ।” बेटा सभकेँ नै एलासँ ममता दुखी तँ छेली। मुदा ऊषाकेँ एलासँ निरासाक बादल छँटि गेलनि। साँझ होइत-होइत उषाक पति इंजीनियरो साहैब ऑफिससँ छुट्टी लऽ पहुँच गलखिन। विहाने भने एम्बुलेन्ससँ सोनाजीकेँ दरभंगा लऽ गेलनि आ डाक्टर यू.के बिश्वाससँ इलाज चलए लगलनि। तत्काल किछु दबाइ शुरू काएल गेल, ऑक्सिजनक खगता सेहो पड़लनि आ दिनमे तीन बेर एकर परयोग हुअ लगल। विभिन्न तरहक जाँच कराैल गेल। जाँचक किछु रिपोट तीन दिनक पछाति आएल आ किछु रिपोट हप्ता भरिक बाद आएत। जे रिपोर्ट आएल ओइमे बी.पी हाइ, सूगर बढ़ल आ संगे-संग हार्ट अटेकक सम्भावना बताएल गेल। सप्ताह भरि इलाज चलैत रहल, तबीयतमे उतार-चढ़ाव होइत रहल, कखनो नीक जकाँ गप-सप्प करैत रहथि तँ कखनो आँखि पथरा जान्हि, दम फुलए लगनि आ बेहोस भऽ जाथि। कखनो बेसुधि अवस्थामे अपने-आपसँ बड़बड़ए लगथि- “बबलू! कखनि एलँह आ आ बैठ! कनियाँ! घर जा। अहाँ पोती छी हमर? आब! आब! बिस्कूट एकटा हमरो दिए ने! एे डबलू चाह लाबह! माएकेँ कहक चाह देत! ईह छिनरीक साँए! जेते खाएत नै तेते छिड़याएत!” दुनू पजरामे बैसि उषा आ उषाक माए- ममता- बेना होंकि रहल छन्हि। सोनाजीक ई बड़बड़ेनाइ रोकैक बास्ते उषा सोनाजीकेँ छातीपर हाथ रखि हिला-डोला कऽ कहैए- “बाबूजी! बाबूजी! केकरासँ गप करै छिऐ?” सोनाजी चौंकैत बजला- “ऊँह! नै नै गप करै छी। तोहर माए केतए छौ?” सोनाजी किछुकाल ऊपर एकटकी नजरिसँ तकैत रहला। फेरि जेना कोनो आहटि चौंकैए तहिना चौंकैत बजला- “डबलू गाड़ीसँ उतरि गेल जा अगुआ कऽ लाबि लहक! काल्हिए कहै छी तोहर माए किछु बुझिते नै छँह।” सोनाजीक स्मरण शक्ति छीन्न भऽ गेल रहनि। आँखिक रोशनी चलि गेल रहनि। रहि-रहि कऽ बिछाैन होंथड़ए लगै छला। ई बेचैनीक अवस्था देखि उषा आ ममताकेँ जी-मन उड़ैत रहनि। मुदा उषा साहसी, कखनो अपन घबड़ाहटिकेँ दृष्टिगोचर नै हुअ दैत रहनि। मनकेँ थिर करैत उषा बाजलि- “बाबूजी! बाबूजी? एम्हर ताकू ने! हमरा चिन्है छिऐ? हम के छी कहू ते?” सोनाजी आब देखि नै पबथि। मुदा जखनि स्मरण लौटैत रहनि तखनि अवाज परेखि नजरि घुमा-घुमा एम्हर-ओम्हर ताकि देखैक परियास करैत रहथि। कहलखिन- “हँ, चिन्है छी! उषा दाइ छी ने अहाँ? केतए छहक आगु आबह ने।” आइ अस्पतालमे नअ दिन भऽ गेल रहनि। एकटा जाँचक रिपोट आइ आएत। दस बजे डाक्टर बजौने छथिन। उषाक पति आ उषा रिपोटक जानकारीले क्लिनीकपर पहुँचला। कनीए कालक पछाति कम्पाउण्डर अवाज देलकनि- “सोनाजीक गारजियन डाक्टर साहैब से मिलिए।” उषा दुनू परानी वेटिंग हाॅलमे बैसल रहथि, बोलाहटि सुनिते डाक्टरक चेम्बरमे पहुँचला, सोफा-कुरसी लागल रहए, बैसैक संकेतक पछाति दुनू गोटे बैस गेला। डाक्टर दुनू गोटेसँ सोनाजीक संग जे सम्बन्ध छेलनि तेकर परिचए लऽ कहलखिन- “मरीजक हालत गम्भीर अछि, रीकौभरक सम्भावना नै बँचल, जाबै धरि छथि, सेवा सत्कार करैत रहियनु।” डाक्टरक ई बात सुनि, उषा बौक जकाँ भऽ गेल। मुँहपर रूमाल रखि सिसैक-सिसैक कानए लगली। उषाक पति सेहो अवाक् रहि गेला! तैयो जिज्ञासु भऽ डाक्टर साहैबसँ पुछलखिन- “डाक्टर साहैब! केना एना भऽ गेलनि?” डाक्टर कहलखिन- “फेंफड़ा हिनकर बिल्कुल खतम भऽ गेल छन्हि। ब्रेन ट्युमर सेहो बढ़ि गेलनि आ शरीरक आनो-आनो अंग सबहक कार्यक्षमता शिथिल भऽ रहल छन्हि।” विभिन्न तरहक विमारी आ समस्याक विषयमे वार्तालापक पछाति निष्कर्ष यएह भेलनि जे सोनाजीक बिमारी ठीक हेबाक कोनो गुंजाइश नै छन्हि। दुनू बेकती नीराश भऽ चेम्बरसँ बाहर एला, उषा बाहर निकलिते भोकारि पाड़ि-पाड़ि कानए लगली। पति साहस बढ़बैत कहलखिन- “अहाँ जौं एना कनब तँ माएकेँ की हएत? शान्त रहू, मनकेँ बुझाउ! जे हेबक छै से तँ भाइए कऽ रहत। सुझि-बुधिसँ काम लिअ! माएकेँ ऐ बातक जानकारी नै चलक चाही। हुनको सम्हारि कऽ आब अहींकेँ राखए पड़त ने। नै कानू। चूप रहू।” उषो सोचलनि जे अखनि हमरा कानबसँ नोकसान छोड़ि आर किछु नै हएत। कहुना मनकेँ बुझबैत चुप भेली। सोनाजी कमरामे बेडपर पड़ल रहथि,बगलमे ममता पंखा हौंकैत रहनि, तइ बगलमे पजरा लागि उषा बैस गेली आ सोनाजीकेँ मँुह निहारए लगली। बेटा सभ टाल-मटोल करैत पिताक पराण छुटैकाल गाम आएल जखनि सोनाजी केकरो ने चिन्ह सकै छेलनि आ ने केकराे देखिए सकै छला। ललन कुमार कामत सम्पर्क- ललमनियाँ, मरौना, सुपौल। गोल इंग्लिश गार्डेन निर्मली। २ राम विलास साहु अबिसवास काल्हिए नूनू बाबूक बेटीकेँ बिआह छी। नूनू बाबू बिआहक सरमजान सबहक ओरियानमे लगल छला। गिरहत आ सम्पन्न परिवार रहितो रूपैआक अभाव छेलनि। चारि लाख टाका, पाँच भरि सोना आ एकटा मोटर साइकिल देहेजपर बिआह फाइलन भेल छल। दुलहा इंजीनियरिंग कौलेजक छात्र। सुखी सम्पन्न परिवार। दुलहाक पिता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफिसक बाड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने छथि। तँए नूनू बाबू अपन बेटी सुचिताकेँ हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छथि। नूनू बाबू बहुत परियास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकिल, दू भरि सोना तिलकक समैमे चुकता कऽ देलनि। शेष तीन भरि सोना बेटीक गहना स्वरूप बिआहे दिन देब आ एक लाख रूपैआ जे बँकियौता रहि गेल ओ बेटीक नामे एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि। जे दू तीन मास पछाति मिलत सेहो चुकता कऽ देब। तिलक भेला पछाति बिआहक दिन ठेकल गेल। मुदा दुलहाक पिता मोहन बाबू बड़ लोभी। ओ मोने-मोन सोचलनि, पुतोहु जखनि हमर हएत तँ एल.आइ.सी.क रूपैआ आइ ने काल्हि हमरे हएत। बँकियौता रूपैआ बिआहसँ पहिने लऽ लेब तँ लाभमे रहब। मोहन बाबू बिआहसँ एक दिन पहिने समाद नूनू बाबूक घर पठौलनि जे हमर एक लाख टाका बँकियाहा अछि ओ रूपैआ चुकता करि दिअ तखने बरियाती जाएत नै तँ अहाँ जानू। नूनू बाबू समाद सुनिते जेना देहपर बज्ज्र खसि पड़ल। ओ सेचमे पड़ि गेला। होश सम्हारि मोहन बाबूसँ भेँट कऽ बड़ विनती केलनि। अखनि ऐ लेल माफी दिअ। हम बेटीबला छी। बहुत चीज-बौसक ओरियान करए पड़त। तैपर सँ बरियातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत। मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकेँ एकोटा बात नै सुनलकनि, आ ने आँखिक नोर पोछलकनि। तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तँ अहाँ बरियाती लऽ कऽ आउ, हम दरबज्जेपर बिअाहसँ पहिने रूपैआ बरियातीए घरमे चुकता करि देब तखनि बिआह करब।” नूनू बाबू खेत भरना रखि रूपैआक ओरियान केलनि। बरियाती समैपर आएल। सबहक सुआगत भेल। दरबज्जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पिता- मोहन बाबूकेँ चुकता कऽ देलनि। दुलहाक परिछन भेल, वरमालाक काज शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहिने दुलहिनकेँ देखता। पसिन भेला पछाति ने बरमाला आ सेनूरदान हएत। ऐ बातसँ कन्याँ पक्षमे खलबली मचि गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि गेल। अन्तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहिने कन्याँ देख लेल जाउ। तखने आगूक काज हएत। दुलहिन चित्रा तँ पहिनेसँ वरमाला लेल सजले छलि। एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनियाँ संगे बजौल गेल। ओही कोठलीमे दुलहिन चित्रा सहेलीक संगे आएल। चित्रा इण्टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि। दुलहा देखि कऽ मोने-मोन खुश भेला। किछु गप-सप्प सेहो भेलै। तखने चित्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्की मारि पीठे लागल बजला- “हँ, की हमहूँ अहाँकेँ...।” चित्रा तुरन्ते जवाब देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। तँए आब ई बिआह हम किन्नौं ने करब। चित्राक ई निर्णए सुनि सखी-बहिनपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्यादि बहुतो गोटे समझेलकनि मुदा एकेठाम चित्रा जिद्द धेने रहलि जे ऐ वरसँ हम बिआह नै करब।” दरबज्जा बरियाती-सरियातीसँ भरल छल। ई बात सुनिते लगले सनसना कऽ अगिलग्गी जकाँ चारू दिस सौंसे गाम पसरि गेल। बहुतो बुजुर्ग लोकनि दुलहिनक पिताकेँ बुझा-समझा कऽ कहलकनि मुदा चित्रा अपन दृढ़पर अरल रहलि। चित्रासँ कारण पूछल गेल। कहलक- “जखनि दुल्हाकेँ अपन माए-बाप आ सर-समाज किनकोपर बिसवास नै छन्हि तँ ओ हमरापर बिसवास केना करता आ हम केना हुनकापर बिसवास करब। दोसर बात जे हिनकर पिताजी दहेजक खातिर जमीन आइज्जत बेचबा सकै छथि तखनि ओ हमरो बेचि सकैत छथि किने। तँए हम बीख पीब मरि जाएब मुदा एहेन अविसवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बिआह नै करब। ऐसँ नीक तँ हम ओहेन दुल्हा जे गरीबे किएक ने हएत, तिनकासँ करब, जे अपन इज्जतक संगे दोसरोक इज्जत करत।” चित्रा सहेली संगे कोठलीसँ निकलि गेलि। दुल्हा आ लोकनियाँ सभकेँ ओही कोठलीमे बन्न कऽ ताला लगा आँगन आबि गेलि। बिआह नै भेल। ई खबरि रातिए भरिमे चौतरफा पसरि गेल। पंचैतीक बैसार भेल। पंच लोकनि बिआह हेबाक बहुत परियास केलनि मुदा चित्रा अपन संकल्पपर अडिग रहलि। अन्तमे जे दहेजक लेन-देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस भऽ जाए। दुलहिनक पिता नूनू बाबू बजला- “चारि लाख टाका, दू भरि सोना, मोटर साइकिल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च भेल अछि से सभटा आपस कऽ दिअ तखने हिनका सभकेँ छुट्टी भेटतनि। नै तँ हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबनि।” सभ पंचक विचार भेलनि। बात तँ उचिते ने नूनू बाबू कहै छथि। कोनो जबरन जुर्माना तँ नै...। दुल्हाक पिता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकिल घरसँ मंगबा नूनू बाबूकेँ पंचक बिच्चेमे आपस कऽ देलकनि। तखनि हुनक बेटाकेँ कोठलीसँ बाहर निकालि देल गेल। जहिना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगरि दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकड़ि सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहिना सभ कियो विदा भेला। चित्रा पिताक मुरझाएल मुँह देखि बाजलि- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह करब। पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नै। एही खातिर ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चिन्ता नै करू।”¦¦¦ ३ दुर्गानन्द मण्डल :: लघु कथा छुतहरि सिमराक शिवनन्दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहिरन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। विधाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्दरि। मध्यम वर्गीए परिवारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बिआह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरियाती गेल रहथि, सभ कियो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि। बड़-बढ़ियाँ घर-परिवार छल। राजाबाबू बिआहक पछातिओ अध्ययन जाड़ीए रखलनि। नीक-नहाँति पढ़ैले पटनामे नाओं लिखा डेरा रखलनि। छुट्टी भेलापर गामो चलि अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहिल सन्तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्चो तेतबए सुन्दर छल। क्रमश: दुनू बच्चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लिखा देलखिन। बच्चा सभ ओतै रहि पढ़ए-िलखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति खराप हुअ लगलनि। जइसँ ओ दोस्ती-यारीमे पीबए लगला। एक दिनक गप छी, गाम एलाक बाद अधरतियामे जोरसँ हल्ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चिचिया रहल छथि। रातिक मौसम देखि गामक डाक्टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखिन। बिमारी उपकले रहनि। पत्नी विशेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि दुइए मासमे दुखकेँ कन्ट्रोल कऽ लेलनि। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जिद्द कऽ पटना चलि गेला। परिकल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि आ भैया जे पाइ दन्हि आकि नै दन्हि तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बितलै आकि वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली रातिमे राजाबाबू अपना बिछौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चिचियए लगला। निसिभाग राति रहने हो-हल्ला सुनि लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्टी करैत सदा-सदाक लेल शान्त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि गेल। टोल भरिक लोक सभ जागि गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रिस्ता–नाता तोड़ि परमधाम चलि गेल छला। परात भेने बिना बजौने सभ आदमी मिलि बाँस काटि, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि दऽ राजाबाबूक पहिल सन्तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि-जारि सभ कियो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि चलि गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि कुहैक रहल छथि। काल्हि तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रतिमूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहिरि कुहैक रहल छलि। केतए गेलनि भरि हाथ चुड़ी, केतए गेलनि भरि माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि दैत। केना ने बेधि दैत! आखिर वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहियो हुनक पएरो ने देखने रहनि ओ आब मुहोँ देखि रहल अछि। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्हि। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बितबए लगली। सासु-िदयादिनीक गपकेँ छोड़ि अनकर गपपर बेसी धियान दिअ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब किछु लोक हुनका गुरु मन्तर दिअ लगलखिन। आ ओहो नीक जकाँ धियान-बात दिअ लगली। जहिना कहबी छै जे खेत बिगड़ि गेल खढ़ बथुआ सन तिरिया बिगड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि तक ओकर उकासीओ ने कियो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि। बिना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखिया-सरपंचक संग हँसि-हँसि बजै-भुकए लगली। गामक राजनीतिमे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनियाँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्य जिनगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि रंगीन दुनियाँमे चलि आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि हल्का छिटबला साड़ी पहिरए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खिलए लगल। एक दिन मुखियाकेँ कहि-सुनि इन्दिरा अवास स्वीकृति करौलक आ बिच्चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कियो छौड़ा-माड़रि भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दिन जेकरा भाफो नै निकलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बिस्कुटी लोकक चक्कर-चािलमे पड़ि ओ भैंसुरसँ अरारि कऽ अपन हक-हिस्सा लेल लड़ए लगली। लड़ि-झगड़ि सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि जे मन फुड़ै तखनि सएह करए। कियो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कियो किछु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्बै पड़ा गेल। आहि रे बा! परात होइते घोल-फच्चका शुरू भेल ‘कनियाँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि दू दिनक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्बैमे अछि फलल्मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनियाँ गाम घूमि आबथि। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्हर। किछु दिनक बाद जेना-तेना पकड़ि-धकड़ि ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखिमे गर्दा झोंकि कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कियो समझबैक परियास केलनि। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि ओ ओकरा बुझबैत कहलखिन- “सुनू कनियाँ, अखनो किछु ने बिगड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि लिऔ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जातिमे मिला लेत। जाति नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जातिसँ बाड़ि आँगनासँ ई कहैत- “एकरा आँगनमे राखब उचित नै ई कनियाँ कनियाँ नै छुतहरि छी छुतहरि...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल किछु ने बाजि सकलौं, किछु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि नै बूझि पेलौं जे आइ बूझि रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहिआ कऽ पकड़ने अछि। ¦¦¦ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. फागुलाल साहु- किछु विहनि कथा २.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध- लिटरेचर फेस्टीभल ३.नन्द विलास राय :: किछुलघु कथा १ फागुलाल साहु किछु विहनि कथा- माइक डाँट बात बचपनक छी। हमर माए सदिखन हमरा नजरि चढ़ौने रहै छेली। पढ़ाइ खातिर सदिखन समझबैत रहै छेली, स्कूलक समैमे खिया-पिया कऽ सहियारैत-पुचकारैत विद्यालय पठबैत छेली। मुदा हम तँ बेसी दिन अदहे बाटमे संगतुरियाक संग खेलैत रहि जाइत रही। जखनि विद्यालयक छुट्टीक समए होइ छल तखनि झटदनि घर आपस आबि जाइ छेलौं। हमर माए नीक-निकुत खाइले दऽ दइ छेली। मुदा हम तँ विद्यालयक चौकैठो तक ने जाइ छेलौं। तँए, मन तँ गुदगुदाइत रहै छल। माए जखनि आन छात्र सभसँ पुछै छेलखिन हमर हाल-चाल तँ सभटा पोल खुलि जाइ छल। नै पढ़बा खातिर बहुतो टाँट-फटकार करैत लुलुआबैत छेली। हम मुँह लटकौने चुप्पी साधने सज्जनक स्वरूप बनौने लिबिर-लिबिर तकैत माइक ममता जगबैत अप्पन दोख छुपबैत सफाइ वचन बजैत रहै छेलौं। तेतबे नै! पीटाइओ तँ खाइए पड़ै छल। पिताजीक सेहो आ गुरुजीक तँ अलगे। मुदा हमरा तँ माइक डाँट बड़ अधला जकाँ लगै छल। हमरा ऐ बातक भान थोड़े छल जे माए पढ़ाइक महत जनै छथिन तँए डँटै छथिन। जेना-तेना मैट्रिक धरि तँ आबि गेलौं मुदा पढ़ाइमे हम केहेन छेलौं से तँ बुझिए गेल हएब। पिताजी सेहो हमर पढ़ाइ-लिखाइ खातिर चिन्तिते रहै छला। पिताजी सदिखन चिन्तामे डुमल रहै छला। एक दिन दिलक दौड़ा पड़ि गेलासँ स्वर्गधाम चलि बसला। आब हमरा विद्यालय जेबाक संग घर परहक पढ़ाइ सेहो बन्न भऽ गेल। चूकि घरोक काज-भार हमरेपर पड़ि गेल। बोर्ड परीक्षामे सेहो फेल भऽ गेलौं। मैट्रिक परीक्षामे फेल भेने लागल कि सम्पूर्ण जीवन दुखे-दुखमे बितल। संगी-साथीक सेझहा लज्जित सेहो रहए पड़त, ई सोचैत मन पड़ल माइक डाँट-फटकार। जखनि ओ हमरा पढ़ाइ खातिर डँटै छेली तखनि हमर अन्तर आत्मासँ अवाज आएल- “अखनि बेर नै भेल अछि, समए बँचल अछि शेष।” आब हमरा पढ़ाइक जुनुन सवार भऽ गेल। हम पुन: मैट्रिकक फार्म दुबारा भरैत पढ़ाइ शुरू केलौं। मैट्रिक परीक्षामे प्रथम स्थान केलौं। प्रथम स्थान पाबि आगूक पढ़ाइ जारी रखलौं। माइक कृपा भेल, संगे आसिरवाद भेटए लगल। आजूक दिन सरकारी सेवामे पदाधिकारीक पदपर रहि सेवा दऽ रहल छी। माइक डाँट, असिरवादमे बदलि गेल। हमर कामयावीक सभटा श्रेय माइक छी। संगे हमरा ई अनुभव भेल जे माता-पिताक डाँट-फटकार बेजा नै होइत अछि। किएक तँ माइक डाँटमे बच्चाक भलाइक कामना नुकाएल रहैत अछि। आत्म निर्भरता लेल कोनो उमेर नै- पछिला महिना हम अपन मित्रसँ मिलबाक खाितर राजस्थान गेल छेलौं। मित्रक घरक बगलमे एकटा साइठ बर्खक महिला छल। जिनकर माथ अँचरसँ झाँपल छल आ पल्थी मारि जमीनपर बैसल छेली। सहायता समूह जीविका प्रशिक्षण प्राप्त करि कऽ पापड़ बनबैत जीवनक आत्म निर्भर भऽ अपन सहायता समूहक माध्यमसँ गाममे एकटा परियोजना चला रहल छेली। परियोजनाक माध्यमसँ गामक बहुतो महिला सभ आत्म निर्भर प्रतिभावी प्राप्त केने कम्प्यूटर, सौर ऊर्जाक क्षेत्रमे समपन्न खुशहाली पकड़ि कऽ रखने छेली। संगे गामक बालक-बालिका सेहो सभ कुड़ा-कड़कट अथबा लकड़ीसँ खेलौना बनेनाइ सीख कऽ काबिलेतारिफ छल। हुनका सबहक प्रतिभा आ जीबठ देखैत बनै छल। देखैमे आएल जे ढलैत उमेरक औरत सभ जे कम्प्यूटरपर बैस अपन-अपन कारोबारक लेखा-जोखा तैयार करबामे सेहो काबिलेतारिफ छल। हमरा झाँकैत देखि ओ औरत मुस्कुराइत कहली- “अन्दर आबि जाउ ने।” हम अन्दर चलि गेलौं। पुछलियनि- “अहाँ की कऽ रहल छी?” बजली- “कम्प्यूटरपर नोटिश बना रहल छी। हमर काज अछि गाममे जा लोक सभसँ मिलि कऽ हुनकर सबहक तकलिफ आ सुझाव इकट्ठा करि कऽ कम्प्यूटरपर टाइप कऽ जीविका अधिकारीकेँ पठा देनाइ।” हम आगू पुछलियनि- “ई काज अपने केतेक दिनसँ करै छी?” ओ बजली- “किछुए सालसँ कऽ रहल छी। हम अनपढ़ छेलौं। ई काज करैले पढ़नाइ-लिखनाइ सीखलौं। आब हम ई-मेल करब।” ई कहैत हमरा धियानकेँ अपना तरफ खिंचैत टाइप करबामे लगि गेली। टाइप बिलकुल देवनागरी लिपिमे सुसज्जित छल, सजौल छल। ई साइठ बर्खक महिलाक तजुरबा देखि हम चकित भऽ गेलौं। आब हमर उत्सुकता आगू बढ़ल लगल। बढ़ैत उत्सुकताक क्रममे फेर पुछलियनि- “आर की सभ करै छी?” ओ बजली- “दू सए पचास लड़कीकेँ कम्प्यूटरक ज्ञान जेतेक हमरा अछि ओ सीखा चुकल छी।” हम ई सुनि आरो चकित भेलौं। नजरि बगलक कोठरीमे गेल। देखलौं एकटा नवयुवती कम्प्यूटरपर अपन आँगूर दौगा रहल अछि। ओइ नवयुवती दिस हमर नजरिकेँ देखैत पुन: बजली- “ओ नवयुवती जिनका अहाँ देखै छी, अनेक नव-नव लोककेँ आब हमरे जकाँ कम्प्यूटरक जानकारी दैत रोजगार योग्य बना रहल अछि।” हम एकबेर फेर चकित भऽ गेलौं। लागल जे किछु करबाक हेतु उमेर कोनो बाधा नै होइत सिरिफ जिज्ञासा चाही। ¦¦¦ मर्दानी नारी मर्दानीक मतलब होइत अछि, निडर, साहसी, स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता। नारी जेतेक अछि सबहक अन्दर ई तागत अछि, परन्तु खगता ऐ बातक अछि जे नारी सभ ई बातकेँ समझौ आ समझि कऽ बाहर निकालौ। ई कथा छी एकटा अब्बल-दुब्बर गरीब नारीक। बर्ख २०१३ तिथि स्वतंत्रता दिवसक दिन हरिपुर डीह टोलक रूपनी देवी, मधुबनीसँ कलुआही जाइवाली पक्की सड़कक कातमे एकटा छोट-छीन चाहक दोकान खोलि अपन रोजगारक शुरू केलक। रूपनीकेँ ई दोकान खोलैक प्रयोजन ऐ लेल पड़ल जे एक दिन अन्नक अभावमे बाले-बच्चे भूखले सूतए पड़लै। विहान भने रूपनीक पति भोला रोजी वास्ते गामक मालिक टुनटुन ठाकुरक हबेलीमे पहुँच मजदुरी करए लगल। दोकान खोलैसँ पनरह दिन पहिनेक बात छी। रूपनी अपन पतिक कमाएल बोइन लबैले टुनटुन ठाकुर हबेलीपर गेल। भिनसरक आठ बजैत रहै। रूपनीकेँ देखिते ठाकुर साहैब पुछि बैसल- “केतए एलेँ रूपनी?” बाजलि- “मालिक, बोइन लइले।” एतबे बात सुनैत टुनटुन बाबू भड़कि उठला। रूपनीकेँ फटकारैत बजला- “अखनि तँ भोलबा खेतमे पहुँचबे कएल आ तूँ बोइन ले चलि एलेँ।” रूपनी सकदम भऽ ठाढ़े छल। आकि पुन: टुनटुन बजला- “खुरपी ले, दरबज्जाक सभटा घास उखार तखने बोइन देबौ।” ई बात सुनिते रूपनीक आगू रातिक तरेगन सोझहामे आबि गेल। माथपर हाथ दऽ सोचए लगल। की करूँ, रातिमे तँ सब परानी भूखले सुति रहलौं। अखनि की खाएत आ खाएब। मालिकक बात तँ निठुर होइते अछि। कमाएलो बोइनपर लुलकार सुनैए पड़ै छै। आब की करब! पेटमे अन्न नै, गामपर बच्चा बाटे तकैत हएत जे मालिक ऐठामसँ किछु आनत माए तँ खाएब। मुदा ई कोन भगवानक चक्र छी। नै आब छूछ हाथे घर नै जाएब। सोचैत रूपनी चटे हबेलीसँ धुरियाएले पएरे घूमि बजार पहुँचल। बजारक एकटा किराना दोकानपर आबि दोकनदारकेँ कहलक- “मालिक, ई हमर नाकक छौंक रखि लिअ आ चाउर-आँटा दिअ।” दोकनदार बाजल- “भोला हमर दू दिन काज केने छल, जे बोइनो पछुआएल छै। अहाँ जे समान लेब से बाजू दऽ दइ छी।” रूपनी सोचैत बाजलि- “एक दिनक बोइनक चाउर-आँटा दऽ दिअ आ एक दिनककेँ चाहपती-चीनी आैर बिस्कुट आैरो पलाष्टिकक पचासटा गिलास दऽ दिअ।” दोकानदार बाजल- “पाहुन अबै छथि की?” रूपनी- “नै, चाहक दोकान खोलब।” दोकानदार चाहक दोकान खोलै जोकर सभ समान दैत समझबैत-बुझबैत दोकान चलबैक सभ तरीका बुझा रूपनीकेँ विदा केलक। रूपनी घर अबिते पहिने खेनाइ बना बाल-बच्चाकेँ खिआ पति लेल खेनाइ लऽ ठाकुर साहैबक खेत जा भोलोकेँ खिएलक। पछाति ओतएसँ घर आपस विदा भेल। बाटमे अबैत रूपनीकेँ ठाकुर साहैबक मलिकाना बात झुड़झुड़ाइत माथकेँ घुड़ियबैत, पछाति बरहम स्थानमे बैसि दोकानक जगह टोहिया लेलक। टोहियबिते ओतए घर आबि पहिने खेनाइ खेलक। दोसरे दिन रूपनी स्वतंत्रता दिवसक अवसरिपर चाहक दोकान खोलि अपन मधुर भाषाक सहयोगसँ चाह-बिस्कुट बेचए लगली। अपन हूनर संग साहसकेँ बटोरि पतिकेँ मजदूरी करैसँ मना करैत दोकानेपर काज करैक बोध देबए लगली। भोला सेहो मालिक ठाकुरक झझकारकेँ मोन पड़ैत दोकानक काजमे जतनसँ लागि गेल। रूपनी साले भरिमे काफी उन्नति करैत दोकानक रंग-ढंग बदलि देलक और अपन पति भोलाकेँ मालिक कहि सम्बोधित करैत चाहक दोकानसँ मिठाइ, जलपान आ भोजनक दोकान बना रूपनी अपन साहस आ मर्दानीक संग आत्म निर्भरताक परिचए दैत स्वतंत्रताक जिनगी जीवि रहल अछि। ¦¦¦ चतुर बालक ई कथा सोनू नामक एकटा दस बर्खक बालकक छी। सोनू गरीब परिवारमे जनम भेने गामक-घरक लड़का सभसँ कतराइते रहै छल जे, हमर माए-बाबू गरीबीक जिनगी जीब रहल अछि। एक दिन सोनू अपना गामसँ बजार चलि देलक। बाटमे सोचैत रहल जे गरीबसँ धनीक केना हएब। ई सोचैत सोनू एकटा होटलक सोझहा सड़कपर ठाढ़ भऽ गेल। सोचैत-सोचैत सोनू होटल दिस डेग बढ़ेलक। तखने होटलक मालिक मनेजरकेँ कहलक- “हम ऊपरका रूपमे सुतैले जाइ छी, बेसी खगता हुअए तखने हमरा उठाएब।” सोनू ऐ बखतकेँ मोनासीब बूझि दस मिनट रूकि कऽ मनेजरकेँ कहलक- “होटलक मािलक- बौधू बाबू हमर पिताक दोस्त छथिन। हुनकासँ भेँट करबाक अछि।” मनेजर एकटा बेड़ा दियए सोनूक समाद मालिक लग पठेलक। मािलक अधकचुआ नीनमे रहैक कारणे बेड़ाक बातकेँ ठीकसँ नै बूझि कहलनि- “जाउ, जे मगैत होइ से दऽ देबै।” निच्चाँ आबि बेड़ा मालिकक कहब मनेजरकेँ सुना देलक। आ अपन काजमे लगि गेल। मनेजर सोनूकेँ पुछलक- “बौआ, की लेबह?” सोनू उत्तर दैत कहलक- “खेनाइ खिआ दीअ आ जे बढ़ियाँ मिठाइ हुअए से दूटा डिब्बामे दऽ दीअ।” मनेजर सोनूकेँ खेनाइ खिआ दू डिब्बा बढ़ियाँ मिठाइ सजा कऽ दऽ देलक। सोनू होटलसँ दुनू डिब्बा मिठाइ लऽ विदा भऽ गेल। हाथमे दुनू डिब्बा लेने चतुराइ करबाक तजूरबा करबाक लेल दोसर शहर चलि गेल। ओतए सोना-चानीक दोकानमे पहुँचल। दोकानक मालिक लोभी छल। ई बात सोनूकेँ मालूम भऽ गेल छेलै। सोनू ओइ लोभी मालिककेँ चिन्ह, प्रेम-भाव देखबैत मिठाइक सुन्दर साजौल दुनू डिब्बा दैत बाबूजी शब्दसँ सम्बोधित करैत हाथमे थम्हा दैत अछि। लोभी मालिक मिठाइक डिब्बा अपन पत्नी निरूकेँ बजा दऽ दैत अछि। किछुए कालक बाद, जखनि दोकानमे गहिंकी सबहक भीड़ लगल, तखने बाजल- “बाबूजी, डिब्बा महक मिठाइ रखि लिअ आ डिब्बा हमरा दऽ दिअ।” मािलक बिनु सोचने सोनूकेँ कहलक- “जा भीतर, चाचीसँ डिब्बा मांगि लिहऽ।” सोनू भीतर गेल आ मालिकिनकेँ कहलक- “चाची, बाबूजी दूटा सोनाक सिक्का दइले कहलनि।” सुनिते मलिकिनी विचारए लगली। देबाक मन नै देखि सोनू जोरसँ बाजल- “बाबूजी, जाबए अपनेसँ नै कहबै ताबए चाची थोड़े देती, अपनेसँ कहियौ ने।” मालिक दोकानपर भीड़क कारणे गद्दीएपर सँ पत्नीकेँ कहलखिन- “दऽ दिऔ ने।” पतिक आदेश पाबि मलिकिनी सोनाक दूटा सिक्का सोनूकेँ दऽ देली। लऽ कऽ साेनू ओतएसँ ससरि गेल। आब सोनू ओतएसँ तेसर बजार गेल आ ओतए ओ दुनू सोनाक सिक्का बेचि धन इकट्ठा करए लगल। ऐ बातक जानकारी गामक मालिक नवीन बाबूकेँ सेहो भेलनि। नवीन बाबू दरबारक सिपाहीकेँ कहि सोनूकेँ बजा पूछ-ताछ केलनि। सभटा बात साँचे-साँच बतबैत कहलक- “अपन गरीबीसँ छुटकारा पबैले हम एना कऽ रहल छी।” ई बात कहैत सोनू मालिककेँ प्रणाम कऽ सोझहेमे ठाढ़ भेल रहल। किछुए कालक बाद सोनू फेर बाजल- “जाबे हमहूँ धनीक नै हएब ताबे कोनो ने कोनो चतुराइ तँ करिते टा रहब ने।” मालिक नवीन बाबू सोनूक चतुराइ संग धनीक हेबाक दृढ़ सोचकेँ देखैत गुम्म भऽ गेला। डण्डित करब सेहो मनमे एलनि मुदा ओ सोचलनि जे से नइ तँ एकरा निअमित काजमे लगा दिऐ जइसँ ऐ तरहक ठकपानासँ दूर भऽ जाएत। यएह सोचि अपना दरबारमे रखि लेलक। २ आशीष अनचिन्हार व्यंग निबंध लिटरेचर फेस्टीभल हिन्दु धर्म पाबनि प्रिय अछि। आ ई कोनो नव तथ्य नै अछि। मिथिला तँ हिंदु धर्मक गढ़ मने पाबनिक गढ़। पाबनि बहुत तरहँक होइत छै पारवारिक, समाजिक,धार्मिक, आफिसियल..................। आ ऐ भेद उपभेदक हिसाबें एकर उद्येश्य सेहो भिन्न प्रकारक होइत अछि। आन विकसित चीज जकाँ पाबनिमे सेहो नव प्रारुप जुड़ैत-हटैत रहल अछि। हेमनिमे पाबनिक नाम भिन्न रूपें सेहो आएल अछि आ लोक एकरा फेस्टीभल कहए लागल अछि। ऐ फेस्टीभल शब्दक बड़का विशेषता अछि जकरा पाछू ई लागि जाइत छै तकरा उद्धार कऽ दैत छै आ ऐ फेस्टीभल शब्दसँ आन जीच जते उद्धार भेल हो मुदा अपना मैथिलीमे "लिटरेचर" बड़ उद्धार भेलै। की कहलियै उद्धार भेलै? उद्धार तँ ओकर होइ छै जे पतित भऽ जाइत छै, नीच भऽ जाइत छै। तँ की मैथिली साहित्य..................। हँ सरकार ठीक बुझलियै अपने मैथिली साहित्य.................। आ नहुँ-नहुँ आब उद्धार भऽ रहल छै। ओना फेस्टीभल केर संग-संग आन बहुत रास चीजसँ उद्धार होइए। उदाहरण लेल पूरा जनममे जकर एकटा पोथी छपै छै तकरा अकादेमी पुरस्कार मने एकपोथिया साहित्यकारक उद्धार। जे कहियो मैथिली साहित्य केर मूँह नै देखलक से जूरी बनि जाइए मने जूरीक उद्धार। जे कहियो सर्च नै कऽ सकल तकर "रिसर्च" छपैए मने रिसर्चक संग गाइडक उद्धार। आ जिनका कोनो परि नै लगैए से कुरता पैजामापर बंडी पहीरि कविता पाठ करऽ पहुँचि जाइत अछि मने कविता संगे कुरता-पैजामा-बंडीक उद्धार।। जे कहियो मैथिली साहित्य केर मूँह नै देखलक से जूरी बनि जाइए मने जूरीक उद्धार। जे कहियो सर्च नै कऽ सकल तकर "रिसर्च" छपैए मने रिसर्चक संग गाइडक उद्धार। आ जिनका कोनो परि नै लगैए से कुरता पैजामापर बंडी पहीरि कविता पाठ करऽ पहुँचि जाइत अछि मने कविता संगे कुरता-पैजामा-बंडीक उद्धार। उद्धार आरो तरीकासँ होइत छै। ससुर अपन जामएक चेलाकेँ बजबै छथि तँ जमाए अपन ससुरक चेलाकेँ। मने ससुर-जमाएक संगे चेलाक उद्धार। बड़ महीन तरीका छै। सभ अपन-अपन गुट बना अध्यक्ष बनबाक फिराकमे। ओना गौर कऽ कऽ देखि लिअ जे जकर बेटी कुमारि छै वा जकरा खाली बेटिए छै से बेसी गुट बनेबाक फिराकमे रहै छै कारण ओकरा दहेज-मुक्त वियाह करेबाक छै। ई हमर अपन रिसर्च अछि गौरसँ देखि लिअ चारू कात। जकरा माथपर बेटा छै से कम गुट बनबै छै। आ एकर परिणाम जे गुट संगे बेटीक उद्धार। उद्धारे-उद्धार। ऐ उद्धार प्रकरणकेँ देखैत किछु गोटा उद्धारक कोचिंग सेन्टर खोलि लेला आ क्रैश कोर्सक आफर दऽ रहल छथि। किछु सेन्टर किश्तीपर उद्धार करबा रहल छथि। मने कैरियरक संगे समाज सेवाक सेहो उद्धार। ओना हम बहकि गेल छलहुँ हमरा फेस्टीभल द्वारा जे लिटरेचरक उद्धार होइ छै तैपर कहबाक छल। तऽ आब कहै छी। लिटरेचर फेस्टीभल ओहने लोक करबा सकैए जे अपना-आपकेँ अकादमी पुरस्कारक मजगूत दावेदार मानैत होथि मुदा हुनक दावेदारी हरेक बेर पाछू घुसकि जाइत अछि। ओना हमर कथनक जाँच आमंत्रण पत्रसँ सेहो कएल जा सकैए। आमंत्रण पत्रमे ओहने साहित्यकारक नाम भेटत जे अपने नाङरि रहितो ओइ आयोजन कर्ताक सोंगर बनि जाइत छथि। ओना गौर करबै तँ पता चलत जे असली बेरमे ई सोंगर सभ लाइन तोड़ि अकादमी लग पहिने पहुँचि जाइत छथि । आ आयोजकक हाथमे कठरी बाबाजीक ठुल्लू बचि जाइत छनि। खैर आगू बढ़ी। आयोजनक प्रारूप एहने होइत छै जे हम तोरा देबौ तों हमरा दे आ मामिला फिफ्टी-फिफ्टीपर निपटि जाइत छै। आ ई 50-50 सभ ठाम लागू होइत छै। ऐ बेर तों अकादमीक जूरी छह तँ हमरा दे आ अगिला बेर हम सकादमीक जूरी रहबौ तँ तोरा देबौ। जेना खेती आब बटैयापर होइत छै तेनाहिते साहित्योमे बटैया लागल छै...। हालेमे अकदमीमे पुरस्कार लेल एहन पोथीकेँ आमंत्रित कएल गेलै जकरापर आरोप छै जे ओ दोसरसँ लिखबाओल गेल छै मने पाइ दऽ कऽ..। जे किछु हो फेस्टीभलसँ जेबीक उद्धार सेहो होइत छै। आब ई नै पूछब जे कोना? ईहो नै कहब जे घाटे होइ छै। सरकार ई तँ बिजनेस छिऐ लाभ आ नोकसान तँ होइते रहतै। ऐ फेस्टीभलमे घाटा तँ ओइमे नफा। ई सभ चलिते रहै छै। जेना मोबाइल कम्पनी सभहँक हिडेन चार्ज रहै छै तेनाहिते फेस्टीभल आयोजक सभहँक हिडेन लाभ छै। किनको बेटा तँ किनको बेटीक बियाह भऽ जाइत छनि। किनको बच्चाक एडमीशन तँ किनको कनियाकेँ नौकरी। ई सभ हिडेन लाभ छै। दहेजमे 10लाख दबऽ पड़तनि आ ऐ आयोजनक मार्फत 8 लाखमे भऽ गेलै आ तै लेल जँ 50 हजार घाटे भेलै तँ कोन दिक्कत। 1.50 लाख रुपैया तैयो नफा छै। हिडेन लाभ जकाँ हिडेन एजेंडा सेहो रहैत छै। परुका बेर हम पत्ता गोल केने छल आब तँ हमरे हाथमे आयोजन अछि, हमहूँ गोल कऽ देबै एकरा। किनको एजेंडा छनि जे ऐ ग्रुपमे हमरा मोजर नै अछि तँए ओइ ग्रुपमे चलि जाइ। ऐ लिट.फेस्टमे बड़का बड़का नमूना सभ व्याख्यान दै छथि। एकटा महान लोक जे खाली फतवा देबऽमे बहादुर छथि ओ अपन जन्मसँ पहिनेसँ घोषैत आबि रहल छथि जे --"आब मैथिली मरि जाएत.."--"आब मैथिली मरि जाएत.."--"आब मैथिली मरि जाएत.."। से ऐ लिट.फेस्टमे बजला जे --"आब मैथिली नै मरत.."। ओना ई नुकाएल नै छै जे मंच भेटलापर लोक सापेक्षी कोना होइत छै। ओना दुनियाँमे बदमाशक कमी नै छै। फेसबुकपर एकटा बदमाश लिखलकै छै आब अमुक स्थानपर सेहो फेस्टी हेबाक चाही की उपरोक्त फतवा देनिहारक फतवा आबि गेल जे---"एक दिस मैथिली मरबा लेल अछि, आ दोसर दिस महोत्सव पर महोत्सव।" तकर बाद ओ बदमाश हुनकासँ पूछि बैसल जे --" अपने जखन ओइ फेस्टीमे रहिऐ तखन मैथिली जिंदा छलै की? फतवा देनिहारक गोल छला..... । आ एहने-एहने व्याख्यान सभहँक संग लिट.फेस्ट खत्म भऽ जाइत अछि मुदा जेना बाढ़ि गेलाक बाद कादो, गंध आ नष्टप्राय जीवनकेँ आगू बढ़ेबामे लागि जाइए तेनाहिते ऐ बेरुक चुकल आगिला बेर शामिल हेबाक चक्करमे लागि जाइत छथि आ जनिका ऐ बेर हाथ लगलनि सेहो अगिला बेर कंटीन्यू करबाक जोगाड़मे लागि जाइत छथि। मुदा फेस्टीभलक ऐ भागम-भगमे लिटरेचर हरेक बेर थकुचाइत रहल अछि। ३ नन्द विलास राय :: किछु लघु कथा- मदन-अमर रमणजी इलाहावाद विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर छथि। हुनका एक बेटा आ एकटा बेटी छन्हि। बेटाक नाओं मदन आ बेटीक मीरा रखने छथि। मीरा आ मदन इलहेवादक एकटा कॉनवेन्टमे पढ़ैए। मदन स्टैन्डर्ड पाँच आ मीरा स्टैन्डर्ड चारिमे पढ़ैए। रमणजीक सासुर मिथिलांचलक कोयलख गाममे अछि। रमणजीक ससुर महराज रमणजी सँ गर्मी छुट्टीमे आम खाइले कोयलख आबए आग्रह केलखिन। रमणजी सपरिवार कोयलख एला। नानी गाममे मीरा आ मदन दुइए-चारि दिनमे गामक धिया-पुता संग तेना ने मिलि गेल जेना पानिमे चीनी मिलैए। मदन नानी गामक धिया-पुता संगे कबड्डी आ हाथी-चुक्का खेल खेलाइत रहए। मदन तँ इलाहावादमे बैडमिन्टन आ क्रिकेट देखैत रहए। कखनो-काल क्रिकेट खेलबो करए। ओकरा लेल कबड्डी आ हाथी-चुक्का खेल नव छेलै, मुदा ओकरा नीक लगैत रहै। नानी गाममे मदनकेँ अमर नामक एकटा बालकसँ दोस्ती भऽ गेल। एक दिन अमर मदनकेँ अपना अँगना लऽ गेल। अमरक घर फूसक रहए। ओकर बाबूजी दिल्लीमे दालि मीलमे काज करै छथिन। अमरक माए एकटा गाए पोसने छथिन। आइ-काल्हि गाए लगबो करै छन्हि। खेत-पथारक नाओंपर अमरकेँ बाधमे दस कट्ठा खेत, दू कट्ठा गाछी आ दू कट्ठा घराड़ी। अँगनामे दूटा घर। अमरक माए नीकहा-नीकहा आम मदनकेँ खइले देलखिन। मदन अमरकेँ माएसँ बड्ड प्रभावित भेल रहए। मदनक नानाकेँ पक्काक घर। चारू भागसँ पोखरा-पाटन। ऊपरोमे चारि कोठरी। गामक लोक मदनक नानाक घरकेँ हवेली कहैत अछि। मदनक नाना गोकूलबाबू पुरान जमीन्दारक बेटा, तइमे रिटारयर डिप्टी कलक्टर। गामक गरीब-गुरबा हुनका हािकम मालिक कहैत छेलनि। एक दिन मदन अपना संग अमरकेँ अपना नानीक घर लऽ जाइत छल। मैल-कुचैल कपड़ामे अमर। ऐसँ पहिने ओ कहियो हवेली नै गेल रहए। ओ धखाइते-धखाइत मदनक संगे हवेलीक सीढ़ीपर चढ़ल। आगू बढ़ल। देखिते मदनक नानी मदनकेँ पुछलखिन- “ई छौड़ा के छी। तोँ एकरा भीतर किए अनै छेँ?” तैपर मदन बाजल- “नानी ई अमर छी। हम एकरा संगे खेलाइ छी। एकरासँ हमरा दोस्ती भऽ गेल अछि।” मदनक बात सुनि नानी मदनकेँ डँटैत कहलखिन- “समूचा कोयलखमे तोरा यएह छौड़ा दोस्ती करैले भेटलौ। छोट लोकसँ दोस्ती करै छेँ!” तैपर मदन बाजल- “नानी ई छोट कहाँ अछि। ई तँ हमरे अतेटा अछि।” “तोँ नै बुझलेँ। ई सभ छोट जाति छी। एकरा सभकेँ हम सभ अपना हवेलीक भीतर नै आबए दइ छिऐ।” अमर दिस देखैत नानी फेर बजली- “रे छौड़ा, केकर बेटा छीही?” अमर बाजल- “भोला चौपालक।” “कह तँ खतबे जातिक छौड़ाकेँ हवेलीक भीतर अनै छेँ। हवेलीओ छुआ जाइत। रे छौड़ा भोलबा बेटा, जो भाग एतएसँ।” अमर ओतएसँ चलि देलक। मदन किछु बूझि नै पौलक। बकर-बकर नानीक मुँह दिस तकैत रहल। नानी ओकर हाथ पकड़ि हवेलीक भीतर लऽ गेली। अमर अपना आँगन जा माएकेँ सभ गप कहलक। माए पुछलखिन- “तूँ हवेली गेलही किए?” तैपर अमर बाजल- “माए, हमरा तँ मदन लऽ जाइत रहए। हम कहियो कहाँ हवेली दिस जाइ छी।” माए- “बाउ रौ, उ सभ पैघ लोक छथिन। हम पनरह बर्खसँ कोयलखमे छी मुदा आइ धरि हवेलीक भीतर नै गेलौं। कहियो काल खेरही तोड़ए हाकिम मालिकक खेतमे जाइ छी तँ हेवलीक ओसारक निच्चेसँ खेरही राखि आ बोइन लऽ घूमि जाइ छी।” अमर माएक बात नै बूझि सकल। पुछलक- “पैघ लोक केकरा कहै छै?” माए जवाब देलखिन- “पैघ लोक माने बड़का आदमी। धनीक आदमी। पढ़ल-लिखल हाकिम-हुकूम।” अमर- “हमहूँ पैघ लोक बनब।” माए- “पढ़बीही तब ने पैघ लोक बनमेँ। देखै छीही ने जीतनीक मामा पढ़ि-लिख कऽ हाकिम बनलखिन। ओ अबै छथिन तँ हाकिमो मालिक हुनका चाह-पान करबै छथिन। तहूँ मनसँ पढ़-लिख आ हाकिम बन।” माएक बात सुनि अमर बाजल- “तूँ तँ हमरा किताबो-काैपी ने आनि दइ छीही। टीशनो ने धरा दइ छीही। कहैत रहै छीही गाए चरा आन।” तैपर माए बजली- “तूँ मोनसँ पढ़। तोरा किताप-कौपी सभ आनि देबौ। गाइओ चरबए नै कहबो। टीशनो धरा देबौ।” अमर बाजल- “हम मोनसँ पढ़ब आ हाकिम बनब।” अमर पढ़ए लगल। ओ अपना किलासमे फस्ट करए। मैट्रिक आ इण्टरमे अपना जिलामे पहिल स्थान लौलक। चटिया सभकेँ टीशन पढ़ा कऽ बी.ए. आनर्स फस्ट क्लाससँ पास भेल। जीतनीक मामा हरियरीबला बीडीओ साहैबसँ भेँट केलक। ओ कहलखिन- “कोनो भी कम्पीटीशनक तैयारी लेल पटनामे बैसए परतह। तइले ढौआ चाही।” ई सभ गप्प अमर अपना माए-बाबूसँ कहलक। अमरक बाबू दस कट्ठा जमीनमे सँ पाँच कट्ठा जमीन बेच देलक। अमर पटनामे रहि बी.पी.एस.सी.क तैयारी करए लगल। गाममे कुट्टी-चालि चलए लगलै। जे जमीन बेच कऽ सभटा बेरबाद करैए फल्लमा। मुदा तेकर परवाह नै केलक अमरक पिता। पहिले खेपमे अमर सफल भऽ गेल, बी.डी.ओ.क पदपर चयन भऽ गेलै। प्रशिक्षणक बाद अमरक पदस्थापना निर्मली अनुमण्डलमे भेल। योगदानक दोसरे दिन हुनका चैम्बरमे हुनकर सहायक संचिका लऽ कऽ आएल। बी.डी.ओ. साहैबकेँ ओ चेहरा जानल-पहचानल लगलनि। ओ गौर करि कऽ सहायक दिस ताकए लगलखिन। आ दिमागपर जोर देलखिन जे हिनका तँ केतौ देखने छियनि। मुदा केतए से मोने ने पड़नि। सहायकसँ पुछलखिन- “अहाँक नाओं की छी?” सहायक जवाब देलखिन- “मदन कुमार ठाकुर।” मदन नाओं सुनिते बी.डी.ओ साहैबकेँ बचपनक सभ घटा मोन पड़ि गेलनि। हुनका भेलनि शाइत ओ वएह मदन छी जे हमरा हवेली लऽ जाइत छल, मुदा ओकर नानी हमरा डपैट कऽ भगा देने रहए। मुदा शंका समाधान दुआरे पुछलखिन- “अहाँक मामा गाम केतए अछि?” सहायक जवाब देलखिन- “जी, हमर मामा गाम कोयलख भेल। आ नाना स्व. गोकूल प्रसाद ठाकुर।” आब तँ बी.डी.ओ साहैबकेँ कोनो शंके ने रहलनि। ओ सभ संचिका पढ़ि कऽ ओइपर दसखत करैत कहलखिन- “साँझमे हमरा डेरापर आएब।” तैपर सहायक मदन पुछलकनि- “सर, कोनो खास गप्प छै की?” बी.डी.ओ. साहैब कहलखिन- “अहाँ आएब तँ ओतए आम आ खास मालूम भऽ जाएत।” सहायककेँ छातीक धड़कन बढ़ि गेलनि। ओ सोचए लगला की बात छिऐ। किएक साहैब डेरापर बजौलनि। कियो चुगली तँ ने कऽ देलक। साँझमे मदन बी.डी.ओ साहैबक डेरापर पहुँचला। बी.डी.ओ. साहैब हुनका बड़ प्रेमसँ भीतर लऽ गेलखिन। एकटा कुरसीपर अपना बैसला आ दोसरपर इशारा करैत मदनकेँ बैसैले कहलखिन। दुनू गोटे कुरसीपर बैसला। बी.डी.ओ. साहैब पत्नीकेँ सोर पाड़ैत कहलखिन- “चाह-जलखैक ओरियान करू। मदन एला।” मदनकेँ किछु बुझेबे ने करए। ओ बाजल- “सर, कथी लऽ बजेलौं। की आदेश छै।” तैपर बी.डी.ओ. साहैब कहलखिन- “सर नै अमर बाजू अमर। हम वएह अमर छी जेकरा संगे अहाँ मामा गाममे कबड्डी, हाथी चुक्का खेलैत रही। एक दिन अहाँ अपना नीनीक हवेली लऽ जाइत रही तँ अहाँक नानी अहाँपर बिगड़ैत हमरो डँटने रहथि। की अहाँकेँ ओ घटना मोन अछि?” मदनकेँ ममहरक सभ गप मोन पड़ि गेल। ओ ठाढ़ भऽ कऽ हाथ जोड़ैत बाजल- “सर, हमरा माफ कऽ दिअ। हम बड्ड लज्जित छी।” तैपर बी.डी.ओ. साहैब कहलखिन- “फेर सर! अमर बाजू। अमर।” कहि बी.डी.ओ. साहैब ठाढ़ होइत पुन: बजला- “आउ मदन, गला मिलू।” कहि दुनू बाँहि फैला देलखिन। मदन झिझकैत अमरसँ गला मिलल। मदनक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलै।¦¦¦ दिव्या निर्मली टीशनक पाछू, रेलबे परिसरेमे गुरु-चेलाक खेल भऽ रहल छल। गुरू लूंगी आ झोलंगा जकाँ कुरता पहिरि हाथमे डमरू नेने छला। लगभग दस बर्खक बालक चेला छल। ओकर समुच्चा देह कपड़ासँ झाँपल छल। चारू दिससँ लोक ठाढ़ भऽ खेलक मजा लेबए लेल तैयार छल। गुरु डमरू बजा चेलासँ पुछलखिन- “बोल चेला की हाल-चाल छौ?” चेला जवाब देलक- “गुरुजी, हमर हाल-चाल एकदम टनाटन अछि। अहाँ अपन कहू।” गुरु कहलखिन- “हमहूँ ठीक छी। अच्छा ई बता अखनि तों छेँ केतए।” चेला बाजल- “अखनि हम बरही गाममे छी।” गुरु- “ई बरही गाम केतए छै?” चेला- “बरही गाम नेपाल अधिराज्यक सप्तरी जिलामे पड़ै छै। राजविराजसँ लगधग तीन किलोमीटर दछिन। बरही गामसँ उत्तर पछिमी कोसी नहर छै।” गुरु- “अच्छा ई बता ओतए की कऽ रहल छेँ।” चेला- “विदेह इन्टरनेट पत्रिकामे खबरि जुटाबक समदियाक काज करए लगलौं हेन। नेपालक दौरापर छी।” गुरु- “तँ बरही गाममे एहेन काेन घटना भेलै जे तों बरही गाममे छेँ।” चेला- “घटना अथवा दुघर्टना तँ नै भेलै मुदा एकटा नव चीज जरूर भेलै।” गुरु- “काेन नव चीज भेलै हेन, कनी फरिछा कऽ बाज।” चेला- “बरही गाम सप्तरी जिलाक सदरमुकाम राजविराज बजारक लग रहितो मुख्य रूपसँ किसानक गाम छी। पश्चिमी कोसी नहरिसँ दछिन छै। सिचाईक भरपुर साधन रहैक कारण गरमा धान आ अगहनी धानक उपज बड़ नीक होइ छै।” गुरु- “कोन खेती गिरहस्तीक गप शुरू कऽ देलँह। नव बात जे भेलै से बाज ने।” चेला- “हम सभ गप फरिछा कऽ कहै छी। अहाँ धैर्यसँ सुनू। बरही गाममे रूपलाल नामक एकटा किसान छथि। हुनका एकटा बेटा आ एकटा बेटी छन्हि। बेटाक नाओं विवेक अछि। आे विराटनगर अस्पतालमे पेथोलौजिष्ट छथि। अपन प्राइवेट जाँच-घर सेहो रखने छथि। रूपलालक बेटी दिव्या बी.ए. पास कऽ राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन।” गुरु- “कोन आहे-माहेक कथा पसारि देलँह से नै जानि। हम कहै छियौ नव बात बता।” चेला- “एतएसँ शुरू होइत अछि नव बात। अखनि हम नव बात जे भेल तेकर पृष्ठभूमिमे चलि रहल छी। अहाँ कनी धैर्यसँ सुनियौ।” गुरु- “अच्छा बता। आब हम बीचमे नै टोकबौ।” चेला- “हँ तँ हम कहैत रही जे रूपलालक बेटी जेकर नाओं दिव्या छी, राजेविराजमे बी.एड. कऽ रहली हेन। साल भरि पहिने दिव्याक बिआहक बात-चीज ठील्ला गामक रामअवतारक बेटाक संग चलल। रामअवतारक बेटा अनिल भोपालमे इंजीनियरिंग कऽ पढ़ाइ कऽ रहल छला। दस लाख नेपाली टकामे बात पक्का भऽ गेल छल। दुनू दिससँ छेका-छुकी सेहो भऽ गेलै। छह महिना पहिने अनिल इंजीनियरिंगक डिग्री लऽ भोपालसँ नेपाल आएल। दूर संचार विभागमे भैकेन्सी भेल। ओहो आवेदन देलक। अनिलक पिताजी रामअवतार तेज आदमी अछि। ओ दौग-धूप केलक। चारि लाख टका घूस मांगलकै। रामअवतार दौगल बरही आएल। रूपलालकेँ कहलखिन- अहाँ जमाएकेँ नौकरी भऽ रहल अछि। चारि लाख टका घूस लगै छै। अहाँ दस लाख टका जे बिआहमे देब तइमे सँ चारि लाख टका अखनि दऽ दिअ। बाँकी छह लाख टका बिआहसँ दस दिन पहिने दऽ देब। जमाएकेँ नोकरी भऽ जाएत तँ बेटी रानी भऽ कऽ रहत। रूपलाल विवेककेँ फोनपर सभ बात बतौलखिन। विवेक कहलकनि, ठीक छै, अहाँ रामअवतार बाबूकेँ विराटनगर भेज दियौ। हम चारि लाख टका दऽ देबनि। रामअवतार विराटनगर जा विवेकसँ चालि लाख टका आनि बेटाकेँ संग कऽ काठमाडू गेला। घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी लगौलनि। गुरु बजला- “अच्छा, ई बता दिव्याक बिआह रामअवतारक बेटा अनिलसँ भऽ गेल ने।” चेला- “असलका गप तँ आब सुनाबै छी। कनी धियानसँ सुनियौ ने। आइसँ दस दिन पहिने रूपलाल अपना भातीजकेँ संग कऽ ठील्ला पहुँचला। रामअवतारकेँ बिआहक दिन पक्का करैले कहलखिन। ओ तीनटा दिनक प्रस्ताव रामअवतार लग रखलनि। आ कहलखिन अही तीनू दिनमे जे दिन अहाँकेँ सहुलियत हुअए से दिन तँइ करि लिअ। ढौआ जे बाँकी अछि ओ नगद लेब आकि चेक, सेहो कहि दिअ।” रामअवतार कहलखिन- “यौ रूपलाल बाबू, हमरा बेटाक भठियन गामबला पनरह लाख टका नगद, एकटा पल्शर मोटर साइकिल आ पाँच भरि सुन दऽ रहल अछि। अहाँक बेटीसँ हमरा बेटाक बिआहक गप पक्का अछि। अहाँ अनिलक नोकरी लेल चािर टका देने छी। तँए अहाँसँ मात्र पनरह लाख टकेटा लेब। गाड़ी आ सुन छोड़ि देब। जँ अहाँ पनरह लाख टकापर बिआह करैले तैयार छी, तँ फागुन दस गतेक दिन पक्का भेल। हमरा नगद टका दी अथवा चेक दी, हम सभमे तैयार छी। अहांकेँ जइमे सुविधा हुअए से करब।” तैपर रूपलाल बजला- “अहाँसँ तँ हमरा दसे लाखपर बात भेल अछि। आब अहाँ मन नै बढ़ाउ। हम बँकियौता छह लाख टकाक चेक भातीज मार्फत भेज देब।” रूपलालक गप सुनि रामअवतार तैशमे बजला- “जँ हमरा बेटाक संग अहाँकेँ अपना बेटीक बिआह करबाक अछि तँ मोल-मोलाइ छोड़ू आ पनरह लाख टकामे बात पक्का करि तीन दिनक भीतर बाँकी एबारह लाख टका पहुँचाउ। नै तँ कुटुमैती नै हएत। अहाँ चारि लाख टका हम अगिला महिनामे आपस कऽ देब।” आब तँ रूपलाल झमा गेला। आँखिक आगू अन्हार पसरि गेलनि। किछु फुड़बे ने करनि। गुरु फेर टोकलखिन- “अँइ रौ चेला, ई रामअवतार तँ बड़ नीच आदमी बुझाइत अछि।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा कह, आगू की भेलै।” चेला कहए लगल- “कनीकालक बाद रूपलाल अपनाकेँ सम्हारैत बजला, ठीक छै हम गाम जाइ छी। बेटासँ विचार करब। ओ जे कहत सएह करब।” रूपलाल आपस गाम आबि गेला। मुँहक उदासी देखि हुनकर पत्नी बूझि गेली जे शाइत दिन पक्का नै भेल। कोनो झंझट लगि गेल। दिव्या राजविराजसँ पढ़ि कऽ आपस नै आएल छेली। रूपलाल सभ बात पत्नीकेँ बतौलखिन। पत्नी कहलकनि, विवेकसँ फोनपर गप करू। तैपर रूपलाल बजला, अखनि तँ ओ क्लिनिकपर हएत रातिमे निचेनसँ गप करब। रूपलाल दुनू परानी रातिमे खेबो ने केलनि। रातिमे रूपलाल मोबाइलपर विवेकसँ गप करए लगला। गप करिते-करिते ओ कानए लगला। जखनि ओ बेटासँ मोबाइलपर गप करै छला, तखनि दिव्या अपना कोठरीमे पढ़ै छेली। कोनो गपक पता नै छेलनि। जखनि पिताजीकेँ कानब सुनली तखिन कान पाथि कऽ सभ गप सुनए लगली। सभ गपक थाह लगि गेलनि जे पिताजी फोनपर किए कनै छथि। दिव्याकेँ भरि राति नीन नै भेलै। ओ भरि राति सोचिते रहली। रामअवतार केते नीच आ कमीना अछि। चारि लाख टका हमरे बाबूजी सँ लऽ घूस दऽ बेटाकेँ नोकरी दियौलक। आइ बेटा नौकरी करए लगलनि तँ मन बढ़ि गेलनि। पाँच लाख टका बेसी कऽ हमरा बाबूजी सँ मंगै छथिन। एहेन नीच आ लोभी मनुखक बेटासँ हम अपन बिआह किन्नौं ने करब, चाहे जिनगी भरि कुमारिए किए ने रहि जाइ। गुरु फेर बजला- “वाह! वाह! दिव्या बड़ नीक बात सोचलक।” चेला बाजल- “आगू सुनियौ ने।” गुरु- “अच्छा सुना।” चेला कहए लगल- “विवेक फोनपर पिताजीकेँ कहलकनि, बाबू अहाँ जुनि कानू। हमरा एकेटा बहिन अछि दिव्या। अहाँक पएरक कृपासँ हम चारि-पाँच हजार टका डेली कमाइ छी। की करबै रामअवतार बाबूकेँ लोभ भऽ गेलनि। हम पाँच लाख टका आरो देबै। अहाँ शुक्र दिन रामअवतार बाबूकेँ बरही बजा लियौ। हम नगद एगारह लाख गिन देबै। चारि लाख तँ देनैहिए छियनि। शुक्र दिन साँझ धरि हमहूँ गाम पहुँच जाएब।” शुक्र दिन साँझमे रामअवतार बरही पहुँचला। सोचने रहथि जे नगद ढौआ देता तँ राजेविराज नेपाल बैंक लिमिटेडमे ड्राफ्ट बनबा लेब। नगद ढौआ लऽ जाइमे खतरा अछि। साँझमे विवेको गाम पहुँचला। खेनाइमे रामअवतारकेँ खूब सुआगत भेलनि। तरूआ, भुजुआक अलाबे खस्सीक मासु सेहो रहए। मुदा दिव्या एकदम गुमशुम। शनि दिन दस बजे रामअवतारकेँ पराठा आ अल्लुक भुजिया, हलुआ, सेबैक खीर आ रसगुल्लाक जलखै खुआएल गेल। जलखै करा एकटा कोठरीमे विवेक, रामअवतार आ रूपलाल बैसला। विवेक पुछलकनि- “ढौआ केना लऽ जेबै?” तैपर रामअवतार कहलखिन- “ढौआ दऽ दिअ आ अहाँ चलू राजविराज, नेपाल बैंकमे ड्राफ बनबा देब।” तैपर विवेक बजला- “आइ तँ शनि छी। छुट्टीक दिन छी। बैंक बन्न हएत।” रामअवतार बजला- “अच्छा अहाँ टका गिन कऽ दिअ। हम समधीकेँ संग कऽ ठील्ला चल जाएब। दू गोटे रहब तँ डर कम रहत।” विवेक आलमारी खोलि रूपैआ निकालि गिन कऽ रामअवतारकेँ देबए लगला आकि हहाएल-फुहाएल दिव्या पहुँच कऽ बजली- “रूकू भैया, रूकू। रूपैआ राखू। हम एहेन लोभी आ कमीना आदमीक बेटासँ अपन बिआह किन्नौं नै करब। चाहे जिनगी भरि कुमारि किएक ने रहि जाइ।” दिव्याक गप सुनि, सभ कियो अवाक् भऽ गेल। विवेक आ रूपलाल समझाबैक परियास केलनि तँ दिव्या अपना हाथमे एकटा शीशी देखबैत कहलकनि- “ऐ शीशीमे जहर छी। जँ अहाँ सभ जिद्द करब तँ हम जहर पीब लेब।” रामअवतार बाबू दिस घूमि बजली- “सुनू रामअवतार बाबू, अहाँ हमरा बाबूजीसँ चारि लाख टका लऽ गेल छी। जाबे धरि चारि लाख टका आपस नै करब अहाँ बरहीसँ आपस ठील्ला नै जा सकै छी।” गुरु डमरू बजबैत नाचए लगला। थोड़े काल नाचि बजला- “बड़ नीक बड़ सुन्नर। दिव्याकेँ बहुत-बहुत धैनवाद।” ¦¦¦ सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट हम आँगनमे चाह पीबैत रही। तखने पत्नी आबि टोकली- “यै, सुनै छिऐ?” हम कहलियनि- “हँ, कहू ने की कहै छी।” पुछलनि- “बम्बइ आम लऽ कऽ जीतू बौआ ओतए कहिया जेबै?” अकचकाइत हमरा मुँहसँ बहराएल- “हँ। ठीके मोन पाड़लौं। परसू रबि दिन भोरुका बस पकड़ि लेब। बारहे बजे तक पटना पहुँच जाएब। बम्बइ आमो खूब पाकए लगल अछि। चारि आना आम गाछेमे पाकि कऽ खसि पड़ल। काल्हि केकरो बजा कऽ आम तोरा कऽ रखि लेब आ परसू छह-बजिया बस पकड़ि लेब।” पत्नी कहलनि- “दस-बीस गो गछपकुओ लऽ लेबै।” हँ-मे-हँ मिलबैत कहलियनि- “हँ-हँ अबस्से लऽ लेबै।” हम आ जीतू दू भाँइ। हमर नाओं भोगेन्द्र आ हमर छोट भाए जीतेन्द्र। माए-बाबू हमरा भोगी आ जीतेन्द्रकेँ जीतू कहै छला। माए-बाबूक देखा-देखी आनो-आन लोक हमरा भोगी आ ओकरा जीतूए कहैत अछि। हम गाममे रहि कऽ खेती-गिरहस्ती करै छी। खेती की करब। अपना तँ मात्र एक्के बीघा खेत अछि। दू बीघा खेत लालबाबूसँ मनकूतपर नेने छी। जीतू पटनामे पंजाब नेशनल बैंकमे पी.ओ अछि। दोसर दिन हम एकटा गछचढ़ा लड़िकाकेँ बजा आम तोड़ेलौं। लगधग पाँच सए आम भेल। जइमे सए-सबा-सए पकले रहए। सभटा आम एकटा बोरामे लऽ मुँह बान्हि कऽ रखि लेलौं। एकटा झोरामे पचासटा गछपकू आम सेहो ओरिया कऽ रखि लेलौं। अगिला दिन साइकिलपर आम लऽ नवटोली चौकपर गेलौं। चौकेपर एकटा चिन्हारए ऐठाम साइकिल रखि सतबजिया बसपर चढ़लौं। लगधग डेढ़ बजे दूपहरमे पटना पहुँचलौं। जीतू डेरेपर छल। हमरा देखिते आबि कऽ गोर लगलक आ गामक समाचार पुछलक। हम असिरवाद दैत कहलिऐ- “गामकसभ समाचार ठीके अछि। तों अपन समाचार कहह, सभ कियो नीके-ना छह किने?” जीतू कहलक- “अहाँक असिरवादसँ हम दुनू गोटे कुशल छी।” हम कहलिऐ- “भगवानक किरपा।” जीतू बाजल- “केकरो मोबाइलसँ फोन केने रहितिऐ तँ खाना बनल रहितए।” हम कहलिऐ- “केकरा मोबाइलसँ फोन करितौं।” जीतू फेर बाजल- “एमकी गाम जाएब तँ एकटा मोबाइल नेने आएब। मोबाइल रहत तँ दुनू भाँइक बीच गप-सप्प होइत रहत। भौजीओसँ गप हाएत। अहाँ फ्रेश भऽ कऽ चाह पीबू। चाह पी कऽ जाबे स्नान करब ताबेमे खेनाइ बनि जाएत।” हम बाथरू जा फ्रेश भेलौं। फ्रेश भऽ ड्राइंगरूममे आबि बैसलौं। जीतूक कनियाँ एकटा प्लेटमे दालमोट आ छह-सात गोट बिस्कुट रखि हमरा गोर लगली। हम कहलियनि- “नीके रहू।” जीतू एक जग पानिआ एकटा गिलास नेने आएल आ कहलक- “ताबे पानि पी कऽ चाह पीब लिअ।” हम दालमोट आ बिस्कुट खाए लगलौं। पाँचे मिनटक पछाति कनियाँ दू कप चाह दऽ गेली। हम दुनू भाँइ चाहो पीबी आ गाम-घरक गपो-सप्पो करी। करीब पनरह-बीस मिनटक पछातिकनियााँ आबि कऽ बजली- “भात-दालि बनि गेल अछि। जाबे भायजी स्नान करथिन, तरकारीओ बनि जाएत।” हम बजलौं- “एते जल्दी केना बनि गेल।” जीतू कहलक- “भैया, गैसपर प्रेशर कुकरमे भात-दालि बनबैमे देरी नै लगै छै। आब अहाँ जल्दी-जल्दी नहा लिअ।” हम बाथरूमे जा कऽ स्नान कऽ कपड़ा बदलि ड्राइंगरूममे आबि कऽ बैसलौं। हमरा बसिते देरी जीतू एक जग पानि आ गिलास टेबूलपर रखि भीतर चलि गेल। कनियाँ एकटा थारीमे भात, कटोरीमे दालि आ एकटा प्लेटमे तीमन आ दोसर प्लेटमे भुजियाआ पापड़ दऽ गेली। जीतू एकटा कटोरीमे घीउ नेने आएल। किछु घीउ भातमे ढारि बाँकी दालिमे ढारि बाजल- “आब भोजन करू।” हम भोजन करए लगलौं। जाबे धरि हम खेनाइ खेलौं जीतू हमरा लग ठाढ़ रहल। कनियाँ परसनपर परसन आबि कऽ दैत रहली। भोजन केलाबादहम हाथ-मुँह धोइ कुरसीपर बैसलौं। जीतू लगमे आबि बाजल- “आब अपने अराम करू।” कहलिऐ- “जा तहूँ अराम करए गऽ” हम ओछाइनपर अराम करए लगलौं। हमरा पछिला सभ गप मोन पड़ि गेल। इण्टरमे पढ़ैत रही। जीतू सेहो अठमामे पढ़ैत रहए। जीतू पढ़ैमे चन्सगर रहए। ओ अपना किलासमे फस्ट करए। हमर बिआह भऽ गेल रहए। बाबूजी हमरा बिआहेमे धुर-बहुर करा दुरागमनो करा देने रहथि। मुदा हमर कनियाँ तैयो नैहरेमे रहै छेली। बाबूजी दिल्लीमे दालि मीलमे मोटियाक काज करै छला। हुनका ओतए बोखार लगि गेलनि। ठीकसँइलाज नै करा सकला। तेकर नतीजा भेलनि जे बड़ कमजोर भऽ गेला। डाक्टर कहलकनि- “कालाजार हो गया है।” तखनि हमरे एकटा गौआँ बहादूर काका हुनका नेने निर्मली टीशनपर उतरला। ओइ समैमे सवारीक सुविधा नै छेलै। हमर बाबूजी तेतेक कमजोर भऽ गेल छला जे पएरे गाम नै आबि सकला। तखनि बहादूर काका बाबू जीकेँ मोसाफिर खानामे बैसा अपने गाम आबि हमरा माएकेँ सभ बात कहलखिन। हम खेनाइ खा कऽ निर्मली कौलेज जाइले साइकिल निकालने छेलौं। माए हमरा लग आबि कहलक- “भोगी, केकरो टायरगाड़ी लऽ कऽ निर्मली टीशन चलि जा। गाड़ीपर बैसा कऽ बाबूकेँ आनए पड़तह। बाबूजी मोसाफिर खानामे छथुन। बड़ दुखित छथिन। चललो ने होइ छन्हि। कहाँदिन कालाजार भऽ गेलनि। बहादूर बौआ दिल्लीसँ संगे नेने एलनि। वएह आबि कऽ कहि गेला हेन।” हम साइकिल रखि मने-मन हियासए लगलौं जे केकर टायर गाड़ी लऽ जाइ। हमर नजरि बेचन काकापर गेल। हम बेचन काका ओइठाम विदा भेलौं। बेचन काका सोकबामे बैसि कऽ बाँसक पातक कुट्टी कटै छला। हमरा देखिते बजला- “आबह-आबह भोगी। कहऽ की हाल-चाल छह। आइ कौलेज नै गेलह की?” कहलियनि- “काका हमर हाल-चाल नीक नै अछि। बाबूजी बड़ दुखित छथि। कहाँदुन कालाजार भऽ गेलनि हेँ। चललो-फिरल नै होइ छन्हि। दिल्लीसँ आबि निर्मली निर्मली टिशनपर बैसल छथिन। बहादूर काका संगे एला हेन। वएह अखनि कहि गेला।” बेचन काका बजला- “तँ टायरगाड़ी लऽ जेबहक बाबूकेँ आनैले?” कहलियनि- “हँ, काका। तँए एलौं हेन।” कहलनि- “ठीक छै कनी जलखै कऽ लइ छी। ताबे बरदो खाइ छै।” हम कहलियनि- “हमहूँ गामपर सँ भेल अबै छी। अहाँ जलखै करि कऽ तैयार रहब।” “ठीक छै।” ओ बजला। हम गामपर आबि माएकेँ कहलिऐ- “बेचन काका जलखै करै छथिन। जलखै कऽ टायर जोति देथिन। किछु पाइ-कौड़ी छौ तँ दे। हएत तँ बाबूकेँ लऽ रामानन्द डाक्टरसँ देखा देबनि।” माए घर गेली। घरसँ एकटा फुच्ची निकालि अनली। फुच्चीकेँ उनटि दसटकही, पँचटकही, दू-टकही, एकटकही सभटा सिक्का सभ निकालि गिनलनि। सभटा मिला कऽ पाँच सए पचपन रूपैआ भेल। सभटा पाइ दैत माए कहली- “बाबूकेँ डाक्टरसँ जँचा दबाइ कीनि लिहेँ।” पाइ लऽ बेचन काका ओतए विदा भेलौं। बेचन काका टायरपर पुआर दऽ एकटा सतरंजी बिछा हमरे बाट तकैत रहथि। हमरा देखिते बजला- “गाड़ीपर बैसह। जोइत दइ छिऐ।” हम टायरपर बैसलौं। बेचन काका टायर जोइत विदा भऽ गेला। साढ़े बारह बजे हम सभ निर्मली टीशन पहुँचलौं। हम मोसाफिर खाना गेलौं। हमर बाबूजी मोसाफिर खानामे तौनी ओछा पड़ल छला। एकदम नरकंकाल जकाँ हुनकर शरीर भऽ गेल रहनि। हम लगमे जा टोकलियनि- “बाबू, बाबू?” ओ उठि कऽ बैसला आ बजला- “के भोगी! गाड़ी अनलह की?” बाबू जीक पएर छूबि गोर लागि कहलियनि- “हँ बाबू। बेचन कक्काक टायर अनलिऐ हेन। अहाँ किछु पानि-तानि पीलिऐ किने?” बाबूजी बजला- “हँ। एक गिलास बदामक सतुआ पी कऽ एक कप चाह पीने रहिऐ। “अच्छा उठू चलू टायरपर बैसू गऽ। डाक्टर रमानन्द बाबू लग चलै छी। हुनकासँ देखा दइ छी। तेकर पछाति खेनाइ खाएब।” -हम कहलियनि। बाबूजी बजला- “मुदा हमरा लग ढौआ कहाँ छह। दू महिनासँ बैसिले छेलौं। जेहो ढौआ छल, सभ दबाइमे खरच भऽ गेल।” हम कहलियनि- “अहाँ ढौआक चिन्ता जुनि करू। हमरा माए किछु ढौआ देलक हेन। आेइसँ ताबे इलाज करा दइ छी। डाक्टर साहैब की कहै छथि, तेकर बाद आगूक बात आगू सोचब।” बाबू जीकेँ लऽ कऽ हम डाक्टर रामानन्द बाबूक क्लिनिकपर एलौं। जाँचि कऽ डाक्टर साहैब कहलखिन- “हम दबाइ लिखि दइ छी। दबाइ लऽ कऽ हमरासँ देखा कऽ शुरू कऽ दियौ। मुदा हिनकर इलाज नीकसँ करबए पड़त। दरभंगा लऽ जा कऽ होसपीटलमे भर्ती करा दियौ।” डाक्टर साहैबक फीस दऽ दबाइ कीनिलौं। किशन होटलमे खेनाइ खेलौं। खेनाइ खा तीनू गोटे टायरपर बैसि विदा भेलौं। गोसाँइ डुमैसँ पहिने गाम पहुँचलौं। माए बाबूक हालति देखि बोम फाड़ि कऽ कानए लगली। माएकेँ कनैत देखि जीतूओ कानए लगल। हमरो आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल छल। बेचन काका हमरा हमरा सभकेँ चुप करबैत बजल छला- “कनने, खीजनेसँ किछ ने होइ जेतह। पाँच-सात हजार टाकाक ओरियान कऽ दरभंगा लऽ जाहुन आ नीकसँ इलाज कराबहुन।” पाँच कट्ठा खेत सात हजारमे भरना रखि चारिम दिन हम, माएकेँ संग कऽ बाबूकेँ लऽ दरभंगा गेलौं। बाबू जीकेँ दरभंगा अस्पतालमे भर्ती करेलौं डाक्टर साहैबसँ पुछने रहिऐ- “सर, बाबूजी केतेक दिनमे ठीक भऽ जेथिन।” डाक्टर साहैब बजल रहथिन- “रोगीकेँ रोग गरसि नेने अछि। लीवर सेहो ठीकसँ काज नै करै छै। तँए किछु कहब मोसकिल।” दरभंगा जाइसँ पहिने माए बेचन काका आ जीतूकेँ हमरा सासुर भेज हमरा कनियाँकेँ विदागरी करा अनने रहथिन। दिल्लीसँ एलाक मासे दिनक भीतर बाबूजी हमरा सभकेँ छोड़ि दुनियाँसँ चलि गेला। जीतू बाबू जीक पएरपर माथा पटकि-पटकि कनैत रहए।बेचन काका जीतूकेँ समझबैत कहने रहथिन- “तोरा तँ बाप तुल जेठ भाए भोगी छेबे करथुन। चुप भऽ जा। भोगी तोरा सभ किछु करतऽ। पढ़ेतह-लिखेतह, बिआह-शादी करतऽ।” जीतू हमर पएर पकड़ि कानए लगल रहए। हम जीतूकेँ भरि पाँजमे लऽ कनैत कहने रहिऐ- “तों चिन्ता जुनि कर। हम तोहर जेठ भाय छियौ। तोहर सभ जवाबदेही हमरापर दऽ बाबूजी चल गेला। हम अपन फर्ज पूरा करब।” बाबू जीक मरला बाद हम पढ़ाइ छोड़ि खेती-गिरहस्ती करए लगलौं। बाबू जीक सोगे माए जे सोगेली से ओहो छबे मासक भीतर हमरा सभकेँ छोड़ि बाबूएजी लग स्वर्ग चल गेली। जीतूक दुनू आँखि कनैत-कनैत फूलि गेल छल। ओ माइक पएरपर माथ पटैक-पटैक कानै छल। हमर कनियाँ जीतूकेँ सम्हारने छली। मरैसँ पहिने माए हमरा कहने छेली- “बौआ भोगी, जीतूकेँ पढ़ा-लिखा हाकिम बनाबिहऽ।” हम माएसकेँ कहने छेछिऐ- “माए चिन्ता जुनि कर। जीतूकेँ पढ़बैमे हमरा डीहो बेचए पड़त तँ बेचि लेब।” जीतू पढ़ैमे तँ चन्सगर रहबे रहए। ओ मैट्रिससँ लऽ कऽ एम.काँम. धरि फर्स्ट डिविजनसँ पास केलक। एम.काँम. केला बाद जीतू पटनामे रहि प्रतियोगिता परीछाक तैयारी करए लगल। जीतूकेँ पढ़बैमे हमरा एक बीघा खेत बेचए पड़ल। एम.काँम. केलाक बाद साले भरिक भीतर जीतू पंजाब नेशनल बैंकमे पी.ओ, पदपर बहाल भऽ गेल। जइ बैंकमे ओकरा नौकरी भेटल ओ पटने शहरमे अछि। हाजीपुरक स्टेट बैंक मैनेजरक बेटी संग जीतूक बिआह भेल। जीतूक एकटा जेठका सार पी.एम.सी.एच.मे डाक्टर छथिन। ई सभ सोचैत-साेचैत हम नीन पड़ि गेलौं। नीन टुटल तँ सुनलिऐ, जीतू अपना कनियाँकेँ कहैत रहनि- “भैया रबि दिनकेँ माछ-मासु नै खाइ छथिन। तीमन तरकारीमे की सभ आनए पड़त।” कनियाँ बजली- “अल्लू-पीऔज तँ अछिए। परोर, रामझुनी, करैला आ सजमनि लऽ लेब।” जीतू बाजल- “अच्छा झोरा दऽ दिअ। हम जक्सन जाइ छी ओम्हरेसँ तरकारी कीनने आएब। हँ, भैया सुति कऽ उठथिन तँ चाह बना कऽ दऽ देबनि।” कनियाँ बजली- “अहाँ कहबै तब हम भायजी केँ चाह बना कऽ दऽ एबनि। हमरा एतबो विवेक नै अछि की।” जीतू बाजल- “नै से नै। सएह कहलौं। ठीक छै हम जाइ छी।” कनियाँ बजली- “कनी सबेरे आएब। आन दिन जकाँ आठ राति नै बजा देबै।” “हमरो धियान रहतै जे भैया आएल छथिन।” - ई कहि जीतू झोरा लऽ कऽ चलि गेल। जीतूकेँ गेलाक पनरह-बीस मिनटक पछाति हम ओछाइनपर सँ उठि गेलौं बाथरूमे जा हाथ-मुँह धोइ कऽ कुरसीपर आबि बैसिले रही आबि कनियाँ एक गिलास पानि आ एक कप चाह दऽ गेली। चाह पीब हम कनियाँकेँ कहलियनि- “हम टहलि अबै छी।” कहि हम कपड़ा बदलि डेरासँ निकलि गेलौं सात-सबा-सात बजे आपस डेरापर एलौं। जीतूओ जक्सनसँ आबि गेल रहए। ओ कनियाँकेँ कहैत रहए- “दुधक पैकेट आ सेबैक पैकेट नेने आएल छी। चीनी सेहो नेने एलौं हेन। तरकारीमे परोर, रामझुमनी, करैला आ सजमनि अछि। सोल्हन्नी घीउमे पुरी छानि दियौ। अल्लू-परोरक तरकारी आ रामझुमनीक भुजिआ बना दियौ। सेबैक खीर सेहो बना दियौ।” कनियाँ बजली- “कनीए देशी घी घर-वेद रखने छी। जौं अखनि खरच करि लेब तँ कोनो भी.आई.पी. गेस्ट औत तँ केतएसँ आनब।” “कोन भी.आई.पी. गेस्ट?” - जीतू पुछलकनि। “अहाँक बैंक मैनेजर आ हमर डाक्टर भैया।” - कनियाँ बजली। “हमरा लेल सभसँ बड़का भी.आई.पी.गेस्ट हमर भैया छथि। जे माए-बाबूक मुइला बादो हमरा पढ़बैमे कहियो ढौआक कमी नै हुअए देलनि। हमरा पढ़बै खातिर एक बीघा खेत बेचि देलनि। हुनके कृपासँ आइ हम बैंकमे पी.ओ. छी।” जीतूक बात सुनि हमर छाती सूप सन भऽ गेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड एन ए एम एस भवन अंसारी नगर नई दिल्ली - 110029 तेसर प्रण (लघुकथा) आइ राघव के सिविल सेवा के फ़ाइनल रिजल्ट आब बला छैन एहि लेल काल्हि रातिये सं हुनकर मोन अकसक्क भेल छैन. एक क्षण के लेल भी निन्द हुनकर आंखि में नहि आबि पेलैन. किये नै होयन, कैयेक बरष सं जे हुनकर आंखि में स्वप्न छल से आब हुनका सं मात्र एक क्लिक के दूरी पर छल. कांपैत हाथ सं ओ रिजल्ट के लेल क्लिक केला आ…. Raghav Jha: All India Rank 24 : Got Selected for Indian Administrative Service. इ देख हुनकर मन:स्थिति जे भेलैन तेकर व्याख्या नै कैल जा सकै अछि. हुनका भेलैन जेना हुनका पंख लाइग गेल होइन आ ओ उडल जाइ छैथ. परंच स्वयं के बिट्ठू काटि क ओ स्वयं के सचेत केला. फ़ेर बरबस हुनका नौ बरष पुराण ओ घटना मोन पैर गेलैन, आजुक स्थिति के जेकर प्रतिफ़ल कहल जा सकै अछि. तखन राघव दसवीं में गेल छलाह. बाबूजी एकटा सामान्य सरकारी कर्मचारी छलाह. घर में सबटा मौलिक सुविधा उपलब्ध छल किंतु भोग-विलासिता सं दूरी बनल छल. राघव के दू टा बाल सखा छलाह – बंटी आ मोंटी. बंटी के पिताजी सेहो सरकारी कर्मचारिये छलाह, आ मोंटी के पिताजी व्यापारी छलैथ. मोंटी के पिताजी ओकरा एकटा बढिया विडियो गेम खरीद के देलखिन जकरा देखा देखी बंटी सेहो अपन पापा सं कहि क ओहने विडियो गेम खरीदबा लेलक. आब दुनू दोस्त राघव के खिसियाब लागलैन जे हमरा सब लग एत्ते निक विडियो गेम अछि आ अहां लग नै अछि. इ सुनि-सुनि राघव बहुत दुखी भ गेल छला. ओ बाबूजी लग जिद्द क देलखिन जे बाबूजी हमरो लेल अहां ओहने विडियोगेम मंगा दिय. बाबूजी हुनका समझेला जे बौआ ओ विडियोगेम बहुत महग अछि आ एखन किननाइ गैर-आवश्याक अछि, एखन दीदी के इंजिनियरिंग मे एडमिशन कराब के अछि ताहि में खर्च हेतै,आर काज सब अछि. किन्तु राघव कहां मान बला छला. ओ कहला जे मोंटी आ बंटी के पापा भी त दियेलखिन कि नै. एहि पर बाबूजी बाजला जे मोंटी के पापा अमीर व्यापारी छैथ आ बंटी के पापा घुसखोर. हुनका सं आंहा अपन परितर किये करै छी. एही पर राघव तुनैक क बजला जे एहेन इमानदारी के ल क कि करब जे बेटा के सौख-मौज नै करा सकि. एते बाजि ओ मुंह फ़ुला क ओत से चैल गेला. किंतु हुनका आंखि में अखनो विडियो गेमे नाचि रहल छल. राति में ओ तामसे खानो नै खेने छला. सुतलि राति में हुनका विचार एलैन जे किये नै बाबूजी के पर्स चोरा ली आ ओहि में जे पैसा हेतै तहि से विडियो गेम खरीद लेब दोस्त संगे जा क. इ सोचिते ओ उठला आ चुप चाप सं बाबूजी के कुर्ता सं हुनकर पर्स निकाइल लेलैथ. भोरे बाबूजी के इलेक्शन ड्यूटी में जेबा के छलैन. एहि लेल ओ भोरे अन्हौरके पहर निकैल गेलखिन. हरबरी में ओ अपन कुर्ता के जेबीयो नै चेक केलखिन जै में हुनकर पर्स छलैन आ पर्स में पाई-कौरी के संग संग हुनकर आई-कार्ड बस पास आदि भी छलैन. बस में बैसल बाबूजी जाय छला कि तखने टिकट चेकर सब पहूंचल. बाबूजी सं टिकट मांगला पर ओ जेखने पास निकाल लेल जेब में हाथ दै छैथ त आहि रे बा पर्स त अछिये नै. आब हुनका भेलैन जे कि करी नै करी. ओ टिकट चेकर के बात बुझाब के प्रयत्न कर लगला पर ओ मान लेल तैयार नै. हिनका लग जुर्माना भर के लेल भी पाई नै छल. ताहि समय में मोबाईल फ़ोन के ओहन चलन सेहो नै छल. टीसी हुनका बस सं उतारि क जिरह कर लागल. खैर इ मामला के कहुना सल्टिया क कहुना कहुना बाबूजी ड्यूटी पर पहूंचला. किंतु समय पर इलेक्शन ड्यूटी पर नहीं पहूंच के कारण अधिकारी हुनका पर काज में लापरवाही के चार्ज लगा हुनका सस्पेंड क देलकैन. दुखी मन सं बाबूजी घर पहूचला आ मां के सबटा बात बता क पुक्कि पारि क कानय लगला. एहि बीच राघव सेहो कत सं खेलैत-कुदैत घर पहूचलैथ. पहिने त हुनका माजरा किछु बुझना में नै एलैन, किन्तु बात बुझला उत्तर त जेना हुनका काटु त खून नै. आत्मग्लानी सं ओ डूबल जा रहल छला. होय छलैन जे धरती फ़ाईट जै आ हम ऐ में समा जाय. सोचय लगला जे आइ हमरा कारण बाबूजी के सस्पेंड होब परलैन आ बदनामी से अलग. किछु क्षण त हुनका अपना आप सं,जिनगी सं घ्रिणा होमय लगलैन, रंग रंग के नाकारात्मक खयाल आब लागलैन, किंतु फ़ेर ओ अपना आप के सम्हारलैथ आ अपना आप सं कहलखिन जे हमरा सं आई बड्ड पैघ अपराध भेल अछि आ हम डरपोक नै छी,हम एहि अपराध के प्रायश्चित करब. किन्तु राघव के इ हिम्मत नै भेलैन जे ओ सबटा सच्चाई बाबूजी के जा क बता दी. तथापि राघव तत्क्षण तीन टा प्रण लेलैन: १. जिनगी में कखनो कोनो प्रकार के चोरी नै करब २. कखनो कोनो गैरजरूरी मांग नै करब ३. बाबूजी के आई.ए.एस बनि क देखायब आ तखन एहि अपराध के लेले क्षमा मांगब. तखन फ़ेर राघव बाबूजी के पर्स के अति गोपनिय रूप सं राखि देलैथ. ओ दिन अछि आ आइ के दिन अछि,राघव सदिखन अपन दोनो प्रण के पालन केलैथ आ प्रतिपल अपन तेसर प्रण के पालन करै के लेल प्रयत्नशील रहलैथ. आ आई ओ दिन आबिये गेल. इ सब सोचैत सोचैत राघव के आंखि सं खुशी के नोर बह लागलैन. ओ ओत स सीधे बाबूजी के पर्स निकाल गेलैथ, आ फ़ेर गेला बाबूजी के इ खबर सुनाब. आइ-काल्हि इंटरनेट के जमाना अछि आ कोनो न्यूज फ़ैलबा में मिनटो कहां लागै अछी. बाबूजी के आन लोक सब सं खबर भेट गेलैन जे हुनकर बेटा गाम-समाज के नाक उपर केलैथ आ मिथिला के नाम और रौशन. बाबूजी खुशी में झुमैत राघव के सामने एलैथ. आब राघव के अपना आप के रोकनाइ नामुमकिन भ गेल छल. ओ बाबूजी सं लिपैट क जोर जोर सं कान लागलैथ. हुनका आंखि सं गंगा-यमुना बह लागलैन. बाबूजी कहलखिन दुर बताह तों गाम-समाज के एते नाम केलैं आ एना बताह जेकां कानि किये रहल छैं! आब राघव कानैत कानैत नौ बरष पहिने के सबटा घटना सुनाब लगला आ अंत में बाबूजी के ओ पर्स निकालि क देलखिन. आब सभटा ग्लानि सभटा अपराध बोध समाप्त भ गेल छल. नोरक बसात में सब साफ़ भ गेल छल. जेना लागै छल जे घनघोर घटाटोप के बाद फ़रिच्छ भ गेल छल. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.चित्रा अंशु-अस्तित्वकेँ चिन्हू २.उमेश मण्डल-२ टा कविता ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह ३.३.बिनीत कुमार ठाकुर ३.४.1.रमेश- महा-विस्फोटक महा-प्रयोग (दीर्घ गद्य कविता)2.आशीष अनचिन्हार-गजल १.चित्रा अंशु-अस्तित्वकेँ चिन्हू २.उमेश मण्डल-२ टा कविता १ चित्रा अंशु अस्तित्वकेँ चिन्हू स्त्री चाहे कोनो देश के, ओकर व्यथा-कथा सब एक एक रंग सब बोली-भाषा लेकिन सबहक रूप अनेक चाहे पूरब होइछ या पश्चिम, अपन उत्तर या कि दक्षिण सबहक कर्म अछि निस्तेज शोषण दमनक रूप अनेक के मिटाएत नारी उत्पीड़न केँ मिटाएत शोषण अतिरेक भीषण हाल जगतमे हिनकर देखि मोन अछि व्याकुल भेल ई शोषणक जङि सँ मिटाऊ नारी केँ सब खूब पढ़ाउ शोषणकेँ हिनका चिन्हबाउ अपना पैर पर ठाढ़ कराउ नारी सभ आवाज उठाउ पितृसत्ता केँ मारि भगाउ समानताक दियौ सन्देश ईटा काज करू सभ नेक अपन अधिकारक मांग करू सब मिल प्रतिरोध करु ककरो पर निर्भर नै रहू अपन अस्तित्वकेँ चिन्हू २ उमेश मण्डल २ टा कविता १ अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस अपना-अपना आँखिए देख गामक देश भारत बेस भाय देखि-देखि, भाय देखि-देखि...। नदी अनेक नाला अनेक उद्गम अछि मुदा सबहक एक धार अनेक धारा अनेक लक्ष्य अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। काज अनेक बेवहार अनेक विधि अछि मुदा सबहक एक बाट अनेक बटोही अनेक मंजिल अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। चुल्हि अनेक व्यंजन अनेक स्वस्थ रहब अछि मुदा सबहक उदेस रोग अनेक औषधि अनेक वैद्य अनेक वैदशाला अनेक पथ्य-परहेज अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। कर्म अनेक धर्म अनेक मर्म अछि मुदा सबहक एक गाम अनेक राज्य अनेक राष्ट्र अछि मुदा सबहक एक गामक देश भारत बेस भाय...। २ भारत हमर पहिचान छी हम नै कियो आन छी भारत हमर पहिचान छी...। विश्वक महान देश भारत जेतए अछि भरल विचारक आध्यात्म दर्शन एकर प्रमाण छी श्रद्धा-प्रेम आपसी भायचारा भारतक अनुपम गान छी-२ हम नै कियो...। गाम-गाममे अछि विहार जेतए भरल अन्नक भण्डार माटि-पानि एकर प्रमाण छी आत्म निर्भर किसानी जिनगी स्वतंत्र भारतक ई गान छी हम नै कियो...। फलक चिन्ता छोड़ि काज जेतए करैत अछि एक-एक लाल कृषि-कर्म एकर प्रमाण छी श्रमिक, तपस्वी आे तियागी सम्पूर्ण भारतक पहिचान छी हम नै कियो...। खण्डन-मण्डन केर उदेस कल्याण जेतए बसैत अछि ई जायगान जन-गन-मन एकर प्रमाण छी दया-करूणा-श्रद्धा-सिनेह मानवता भारतक शान छी हम नै कियो आन छी भारत हमर पहिचान छी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल), पो॰- मकरमपुर, जि॰ – दरभंगा, पिन - ८४७२३४ १ ककरा नीक लागए की, पूछू ओकरा सँ ककरा नीक लागए की, पूछू ओकरा सँ । किए पुछै छी भाइ, अहाँ ई हमरा सँ ।। नीक बेजाए सापेक्ष चीज छी, से बूझू । एक्कर पड़तर किए करै छी, ओकरा सँ ।। कखनो छल जे प्रिय, आइ अप्रिय बनल । समयक सभटा खेल, कहू ई ककरा सँ ।। सोझ बाट चलबै तँऽ, लक्ष्य भेटबे करतै । जाल बुनब – की होयत, पूछू मकड़ा सँ ।। बातक अर्थ जँ नञि भेटए, पोथी तकने । बूझू दादीक, गाम – घरैय्या फकड़ा सँ ।। बलिदानक ने मोल, जगत् मे छी बौआ । फूसि लागए तँ, पूछू खस्सी – बकड़ा सँ ।। शांति शांति जिनगीभरि रटिते रहि जायब । छीनि लेत अधिकार अहँक, ओ झगड़ा सँ ।। २ नटवरलाल मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल । बड़ – बड़ नटवरलाल यौ भैय्या, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। एकक सोझाँ दोसर काहिल, दोसर सम्मुख पहिलुक जाहिल । सभहक हाथमे कुड़हरि – खुरपी, एकक दोसर लऽग ने चलती । सऽभ स्वयंभू अपनहि – अपनहि, सभहक अलगे ताल । मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। एक - सँ - एक महारथ ज्ञानी, सभ बेजोड़, ककरो नञि सानी । सभहक धूरा सोना – चानी, पर अभाव केर कननी कानी । खिस्से मे भेटताह अयाची, शंकर जनिकर लाल । मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। आनक संग दऽहीक प्रभाव, अपना लग माछक अछि ताव । सभहक जिह्वा बास शारदा, कानक नञि तेँ कोनहु बेगरता । सभ केओ कानमे तूरे रखने, बेस बजाबथि गाल । मिथिला केर धरती पर देखलौं, बड़ – बड़ नटवरलाल ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिनीत कुमार ठाकुर, शिक्षा-एम. ए. इंग्लिश, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, पी. जी. डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एण्ड मास कम्यूनिकेसन, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना, वृत्ति- प्रखंड शिक्षक, अंग्रेजी मध्य विद्यालय बिस्फी, मधुबनी, पता- ग्राम-पोस्ट- कमतौल, जिला- दरभंगा (बिहार) - 847304
अपनेमे किए लड़ै छी़? साँच अछि सेंट परसेंट, ई घर नै अछि परमानेंट । एना किए करै छी ? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़?
बसय ईमानक दुनियाँ । सुरीली तानक दुनियाँ । एहन सजाउ ई धरती, जेना पान आर बुनियाँ । मनमे किए धरै छी? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़?
केओ दुखमे पड़ि जाए, सभक आँखि भरि जाए । कागजक टुकड़ासँ, केओ धन्निक नै बूझल जाए । ककरो सँ किए जरै छी? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़?
अंतिम टाइम जे आ जाएत, तखन किछु नै फुराएत। अप्पन सोचि कऽ कथनी-करनी, आँखि डबडबाएत । अखने सँ किए नै सोचै छी? अपनेमे किए लड़ै छी़? अपनेमे किए लड़ै छी़? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.रमेश- महा-विस्फोटक महा-प्रयोग (दीर्घ गद्य कविता)2.आशीष अनचिन्हार-गजल 1 रमेश महा-विस्फोटक महा-प्रयोग (दीर्घ गद्य कविता) जहिया विद्या अविद्या भऽ कऽ/ चूकल-चेतना-सृजनमे, कोनो महामहोपाध्याय स्व-मूत्र-पानक आ कोनो संत शिरोमणि गो-मूत्र-पानक महत्व बुझौलनि, अपना तरहेँ। गाम, परम्परामे बोरऽ चाहलक, आ नगर आधुनिक बनबैत-बनबैत/ बनौलक वर्त्तमाने केँ विकृत! प्राचीनता भेलो नै छल। नेपथ्यगामी, आधुनिक मूल्य। लेनहुँ नै छल स्थापना, कि बथा गेल। माथपर उत्तर-आधुनिकता! इतिहासक लोप आ सभ्यता विलोपक/ होमऽ लागल फूकोयामा-भविष्यवाणी, नगरमे पहुँचल नीलवर्णी सियार द्वारा! फेर देरिदाक विखण्डनवाद/ नढ़ियाक ’हुआ-हुआ’सँ घोंसिया गेल व्यक्ति-परिवारमे! हम, असहज खिच्चड़िकेँ घी-पापड़-अंचारमे मथि देल! आ तीनूक सड़ल-गलल मूल्यसँ इनार बनल पेटकेँ भथि देल! तीनूक नीक मूल्य, गैस ढेकार जकाँ निकलैत रहल/ आ हम सभ पेटमे मसल्लाक गाछ/ जनमलाक बावजूदो ’छाहरिए’मे/ रहलौं हेहर बनल! सरकार गुटखा-सिकरेट आ कनियाँ तमाकुल मना केलनि तँ डाक्टर तेल-मसल्ला परहेज आ सन्तगण शाकाहारक महत्व बुझौलनि- उत्तर-आधुनिक समयमे! कोनो खट्टर-कका, साकठ बना देल! तँ जगन्नाथपुरी-यात्रा वैष्णव बना देल! अवसरवादक कृपासँ शास्त्रमे तकैत रहलौं- संकल्पक विकल्प! ने कंठी निमहल- ने बेमारी गेल! ने तामस गेल, ने स्वास्थ्ये भेल! भाग्यक महिमा-मण्डनमे कर्मे हेरा गेल! दोष कोनो बुझौनिहारक नै छल! स्व– विवेक- शयनक छल! हरि-शयनी एकादशीसँ – घाट परहक एकादशा- संपिडन धरि, जठराग्निमे होइत रहल, माँछ- विवेकक हवन/ हरिमोहनी द्वादशी धरि, ’वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति’ क/ इष्टमंत्र देलनि विख्यात तांत्रिक कामाख्या- सिद्ध बाबा, दर्जन भरि भागवत-शिरोमणि कथावाचकक / नारायणी– मंत्र सेहो बनि कऽ रहि गेल / आस्था- विहीन यांत्रिकता! ’महाजनो येन गतः सः पंथाः’ केर अनुसरण करैत/ पहिने मोहक पलाश-वनमे / भटकाव भेल –लक्ष्यहीन! फेर वासंती फुलवारीक विभ्रम पोसने/ मरुभूमिए-मरुभूमि लागल रहल- छिछियौनी! अति-भोगवादक धर्म-विधान/ सँ संगमक महा-प्रयोगक उपरान्त वाणप्रस्थक आहटि पाबि/ संतुलनक बेगरताक भेले छल अनुभूति, कि गार्हस्थ्य-गाड़ीक मादा पहिया लसकि गेल! दोष कोनो बुझौनिहारक नै छल! विवेक- सम्मत रटैत-रटैत/ विवेकहीन निर्णयक लागि गेल पथाड़! विवेक, तहिया चेतन भेल। जहिया विवेकहीनतासँ सभतरि अराजकता पसरि गेल! गौतमक न्याय तकैत रहल/ टुकुर-टुकुर आ नव्य –न्याय- प्रवाह, हकन्नन भऽ गेल/ नवधा-भक्तिक दुविधामे! समस्त जीवन उड़ैत चिड़ैक/ आँखि चिन्हबाक होइत रहल दाबी- पर- दाबी / मुदा नै भेल- अंतिम साँस धरि- व्यक्ति- परिचय! शब्द- ब्रह्मक चलैत रहल अनुसंधान! अर्थ, विलुप्त होइत रहल शब्दसँ! अर्थ, भऽ गेल शब्दक अर्थ! काम, भऽ गेल जीवनक अर्थ! धर्म, भऽ गेल ’अर्थक’ अर्थ! मोक्ष, भऽ गेल पाप- आवरण! पुण्य, भऽ गेल गौरवे आन्हर! कर्म, भऽ गेल कपार आ श्राद्ध! रुढ़ भऽ गेल शास्त्र आ जड़ भऽ गेल जीवन! पंथक पथाड़ लागि गेल! भौतिकता, धर्म बनि गेल! कन्या-दान, भेल ’धन-दान’! वरक दान, ’महा-कल्याण’! शब्द-ब्रह्मक चलैत रहल अनुसंधान- एकादशी- यज्ञ- उद्यापनमे! उप-नयनक मड़बापर/ वरुआक कानमे आचार्यक कनफुसकी- मंत्र द्वारा! वेदी तर, बीसलखिया वर द्वारा/ तरंगल कनियाँक हृदय-स्पर्श द्वारा! नवग्रह- शान्तिक हवनक टीकामे! ब्रह्मक चलैत रहल अनुसंधान! मुदा आत्म-परिचय सम्पूर्ण ब्रह्म- परिचय थिक/ कोनो एक मनुक्खकेँ/ सम्पूर्णतामे जानब/ जानब थिक सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकेँ/ तकर अभिज्ञान विरले/ भेल कहियो-ककरो! ज्ञान-ज्ञान। -होइत रहल अनघोल! भक्ति-भक्ति! –कीर्त्तनमे गर्दम गोल! अष्टयाम-सँ नवाह धरिक यांत्रिकतामे सपना भेल निष्काम भक्तिक आनन्द! कर्म! कर्म –रटैत –रटैत बना देल कर्मकेँ भाग्यक पर्याय! योग! योग –रटैत –रटैत ब्रह्मसँ वियोग/ शरीरसँ संयोग! अमाशयक असमर्थतासँ माँछ-मासु/ बनल तामसी- भोजन, तँ ’राधे-राधे’ कर्मकाण्डक जड़ि जड़िया गेल! सहह- भावक अभावमे दूरे रहल ब्रह्म, सभठाँ। सभसँ! ब्रह्म, -शब्द- ब्रह्मसँ दूर! ब्रह्म, -नाद- ब्रह्मसँ दूर! ब्रह्म, -बुद्धि- विलासीक मोट, -मोट पोथीसँ दूर! ब्रह्म, -धर्म, पंथ, अध्यात्मक/ संस्थानीकरणसँ दूर! ब्रह्म, भोगेन्द्र- वर्गक/ ज्ञानेन्द्रिय- कर्मेन्द्रियसँ दूर! ब्रह्म- सभ धर्मक शास्त्र-पुराण पुजेगरीसँ दूर! रुद्राक्ष- तुलसी –कंठी- गोमुखीसँ दूर! ब्रह्म-सभठाँ, सभसँ दूर! अनुसंधानेमे हेरायल! अनुसंधानक वस्तु बनल! अंशक खोजमे ब्रह्म/ ढहनाइत रने- वने! …. आ अंश निश्चिन्त/ भौतिक सुख- शयनमे! ब्रह्म- बौआइत, अंशक/ भक्ति- जागरणक प्रत्याशामे, जंगलसँ मरुभूमि धरि! सौर-मंडलसँ आकाश-गंगा धरि! ’ईश्वरीय-कण’ स्वयं छिछियाइत/ निहारिकासँ ध्रुवतारा धरि! अनुसंधानकर्त्ताक हृदय आ/ भक्ति-भावक खोजमे! परमाणु संरचनासँ, परमाणु-विस्फोट धरि! ’भू-तलक महा-विस्फोट’ सँ/ कृत्रिम गर्भाधान-केन्द्र धरि! परखनलीक सृष्टि-निर्माणसँ/ केदार-घाटीक महा-विनाश धरि! होइत रहल महा-प्रयोग! ’ईश्वरीय कण’ छिछियाइत/ नासाक प्रयोगशालासँ जेनेवाक/ भूतल-हाइड्रा-मशीन धरि, चन्द्र-अभियानसँ मंगल-अभियान-धरि, परिवारसँ व्यक्ति धरि/ मे होइत रहल अहं आ भोगवादक महा-विस्फोट! सरयूमे ठाढ़ लक्ष्मणक/ फटैत माथ जकाँ! विज्ञानसँ अध्यात्म धरिक झोड़ी भरि गेल, महा-उपलब्धिक पद्म-विभूषणसँ! दाबी-पर-दाबी होइत/ रहल एवरेस्ट –विषयक! अंशक खोजमे रने-वने/ बौआइत रहल ब्रह्म! …. आ अर्द्ध- निद्राक मध्यान्तर/ आकस्मिक चेतनामे, वेदनाइत रहल अंश! चमकी बेमारीसँ/ चमकबैत आँखि, मुँह, भौंह! मुदा, मनुक्खकेँ मनुक्खक/ व्यक्ति- परिचय नै भेल! आइंस्टीन नै चीन्हि सकलाह, अपन परमाणु बमकेँ! जापान नै चीन्हि/ सकल, अपन सूर्यकेँ! जर्मनी नै चीन्हि/ सकल, मानव-रक्तकेँ! धर्म, राजनीति, व्यक्ति आ समाज- एक-दोसरकेँ चिन्हिते रहि गेल! सहस्राब्दी-सहस्राब्दी धरि! सभ्यताक होइत रहल- विकास आ विनाश! कुरुक्षेत्र आ विश्व-युद्ध, लड़ल/ जाइत रहल- मानवक छातीमे! मस्तिष्क बनि गेल- कुटिलताक/ प्रयोग-स्थली आ हृदय/ बनि गेल हड़प्पा, मोहन –जो- दाड़ो! पेटमे होइत रहल गैसक/ महा-विस्फोट आ मच्छड़दानीमे/ होइत रहल निचैनसँ महा-दंशक/ मच्छड़- महा- प्रयोग! इतिहासी बनैत रहल आ प्रेरणो/ लेल जाइत रहल- विध्वंशक! संस्कृति, सभ्यता, विज्ञान, अध्यात्म, ककरो प्रकृतिक बदौलत/ कोनो व्यक्तिक सम्पूर्ण व्यक्ति-परिचय-नहिएँ ट्टा भेल! समयपर नै उतरल क्यो/ अपन छविक अनुकूल! व्यवहार-शास्त्र आ मनोविज्ञान/ अपन व्याख्या प्रस्तुत करबाक लेल आइयो/ कऽ रहल अछि, अनुसंधान-पर-अनुसंधान! जे, जे छल, समयपर, से नै रहल! बहाना बना-बना लोक कालकेँ/ दैत रहल- दोहाइ आ धिक्कार! कएटा दुस्साहसी- कालोसँ/ लैत रहल- होड़- पर- होड़! कएटा शास्त्रार्थी- ’कालो गच्छति धीमताम्’- पर चलैत, कखनो पराजित, कखनो अपराजित/ काल-कवलित भेलाह! कएटा ’भोगेन्द्र’ ’निद्रया- कलहेन वा’- मे खपि गेलाह! काल होइत रहल अपना गतिए- उत्तरायणसँ दक्षिणायन! दक्षिणायनसँ उत्तरायण! पंचाङ्ग छपैत रहल- शताब्दी-सँ-शताब्दी धरि! ज्योतिष- शास्त्र होइत रहल- नेहाल-सँ- सनाथ! ब्रह्मक होइत रहल अनुसंधान! ब्रह्म, अपन अंशक खोजमे/ ढहनाइत रहल रने-वने, … आ भूतल- महाप्रयोगक गुफामे! सभ्यताक थुड़ाइ/ करैत रहल असभ्यता! तीन सय सरकारक संगठन, शब्दकोषमे खोजैत रहल- आतंकवादक परिभाषा! व्यक्ति चिन्हैत रहल/ आन व्यक्ति- आ स्वयंकेँ/ सोइरी घरसँ शमशान धरि! सनातन अवतारवादसँ/ गौतम बुद्धक पुनर्जन्म, … आ कर्म-चक्र प्रवर्तिनी धरि! मनुक्खक बनैत रहल वंशावली, … आ इतिहासक चट्टानक तहमे, दबाइत रहल- जीवाश्म बनि कऽ! अंश, ब्रह्म-खोजमे भटकैत/ रहल- चारु धाम, सातो पुरी! अमरनाथसँ- कैलास- मानसरोवर धरि- झोड़ी टङने- लाठीक हाथें! ’मृग ढ़ँढ़े वन-माँहि’/ अर्द्ध-कुमोरीसँ वैष्णो-देवी गुफा/ आ भैरोनाथ धरि… बेदम- बेदम! ब्रह्म-खोजमे अंश बेदम! कहियो चट्टान तर, कहियो/ बर्फक शिला तरमे- ब्रह्मलीन अंश! शिलाजीत- सेवनक बावजूदो/ पिचड़ा भेल, जीवाश्म बनैत रहल अंश! शताब्दी- सहस्राब्दीक युगीन सन्दर्भक/ मरुभूमिमे भटकैत, समाजक आत्मा- ’परमात्मा! परमात्मा!’ – चिचियाइत रहल! आत्माक चिचियौनी आ छिछियौनी/ जारी अछि- मस्तिष्कसँ हृदय/ आ हृदयसँ मस्तिष्क धरिक/ विषाक्त रक्त-परिसंचरणमे सराबोर! अमाशयसँ छाती धरिमे/ जारी अछि- गैसक महा-विस्फोट! व्यक्ति आ परिवारक अस्तित्वमे/ जारी अछि, महा-विस्फोटक महा-प्रयोग! सौर-सुनामी चलि रहल अछि- माथ, हृदय आ पेटमे! वस्तुतः हजारो वैज्ञानिक, जेनेवाक/ भू-गर्भीय टनेलमे/ ’ईश्वर-कण’केँ/ मुट्ठीमे पकड़बाक/ कऽ रहल छथि प्रयास/ हकोप्रत्याश! … आ ’ईश्वर कण’ – हाइड्रा- मशीन/ सँ दूर… ब्रह्माण्डमे … उतफाल विध्वंश लेल, संत कबीरक हृदयमे… उतफाल सृजन लेल, … उपला रहल अछि, आनन्द-विभोर! मुदा, सम्प्रति, ब्रह्म-खोज/ जारी अछि! मुदा, सम्प्रति, अंशक आत्म-खोज/ जारी अछि! मुदा, सम्प्रति, व्यक्तिक सम्पूर्ण/ परिचयक प्रयास जारी अछि! वस्तुतः, जीवनमे/ महा-विस्फोटक महा-प्रयोग/ अनवरत, जारी अछि! 2 आशीष अनचिन्हार गजल आइ फेरो एलै अनचिन्हार हमर सारापर आइ फेरो जरतै अनचिन्हार हमर सारापर ताग सन झटपट टुटि गेलहुँ लोभमे पड़ि से ऐठाँ आइ फेरो कहतै अनचिन्हार हमर सारापर कमला कोशी गंगा जमुना बागमती छै तैयो आइ फेरो डुबतै अनचिन्हार हमर सारापर असगरें बड़ जड़लै जरिते रहलै मुदा हमरा संग आइ फेरो जरतै अनचिन्हार हमर सारापर हाथपर लिखने छल कहियो नाम सिनेहक नेहक आइ फेरो लिखतै अनचिन्हार हमर सारापर सभ पाँतिमे 2122+22+2221+12222 मात्राक्रम अछि। दोसर, तेसर आ चारिम शेरमे लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। संगे-संग चारिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा अतिरिक्त लघु अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा १ आशीष अनचिन्हार बाल गजल मोजा दे जुत्ता दे सीड़क दे सुइटर दे बड़ ठंडा लागै बस चद्दरि दे मफलर दे सुनि ले हमहूँ करबै खूब तमाशा सौंसे तंतर दे अंतर दे जंतर दे मंतर दे बड़ भूकै छै करिया कुक्कुर जोरे जोर टुटतै एक्कर हड्डी बस लाठी नमहर दे कफ जमि गेलै छातीमे खोंखीपर खोंखी तँइ तरकारी बेसी कड़ुगर दे झँसगर दे चिन्नी दे गूड़ो दे कुच्चा संगे दूधो खट्टा खेबौ कम हमरा बेसी मिठगर दे सभ पाँतिमे बारहटा दीर्घ अछि। दू टा अलग-अलग लघुकँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृतक हिसाबें दीर्घ मानल गेल अछि। २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल), पो॰- मकरमपुर, जि॰ – दरभंगा, पिन - ८४७२३४ भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा चुनावक बोखार छै, सभ केओ बेहाल छै, तकनहु भेटैछ केओ, नेता ने सुच्चा ।। मिथिलाक आँच पर, रोटी अछि सेकि रहल, मिथिलेकेँ बेचि रहल, लबड़ा आ लुच्चा ।। भाषणमे मिथिला छै, भाषणमे मैथिली, घऽर ओकर – मैथिली बूझय ने बच्चा ।। मिथिलाक जनगण छै, दिल्ली आ पटना लए, भोटक जोगार बस, जीत बुझू पक्का ।। योजनाक बात भेल, देशक बिकाश लेल, भेटत मजूर कतऽ - मिथिला केर बच्चा ।। देशक अजादी केर, सत्तरि अछि लागि रहल, पर ने उद्योग एतए, नहिञे छी धन्धा ।। सरकारक नीति ई, नञि जानि केहेन छी, भोगि रहल कुहरि रहल, मिथिलाक बच्चा ।। प्रदेशक जबार भल, मिथिलाक पात पर, मड़ुआक रोटी अछि, माँगू ने कुच्चा ।। आन भाग देशक, जोगार करए पेटक, पोल्हाबए कुटुमे छऽ, देशे समुच्चा ।। हर भाग देशक, जँ बनतै उत्पादक, तँऽ तोँही कहह, के हेतै उपभोक्ता ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 83 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १७० म अंक १५ जनवरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८५ अंक १७०) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA