ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १७१ म अंक ०१ फरबरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८६ अंक १७१) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.राजदेव मण्डल- लाज (एकांकी) २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक दूटा लघु कथा २.३.आशीष अनचिन्हार- फर्क (व्यंग्य निबंध) २.४.विन्देश्वर ठाकुर- आसे आसमे जिनगी (विहनि कथा) ३. पद्य ३.१.सुकोसुत शिशिर- पड़िकल जम ३.२.प्रणव झा-हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ ३.३.बिनीत कुमार ठाकुर- ३ टा कविता ३.४.आशीष अनचिन्हार-भक्ति गजल ४.बालानां कृते-१.जगदानन्द झा 'मनु'- बाल गजल २.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल ३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- चन्दाक धन्धा Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/new_page_15.htm Join official Videha facebook group. http://www.facebook.com/home.php?sk=group_104458109632326 Join Videha googlegroups http://groups.google.com/group/videha विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। http://www.videha.co.in/videhablog.html संपादकीय हैदराबादक मिथिला सांस्कृतिक परिषद् द्वारा श्री योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' जी केँ हुनक पोथी 'विज्ञानक बतकही'क लेल पहिल तिरहुत साहित्य सम्मान देल गेल। २०७१ सालक गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार ऐबेर श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ देल जाएत। नेवारी, नेपाली आ हिन्दी भाषाक साहित्यकार धुस्वाँ सायमी आ हुनकर पत्नी श्रीमति बसुन्धराक स्मृतिमे स्थापित गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार २०३९ साल सँ देल जा रहल अछि आ दू सालपर देल जाएबला ई पुरस्कार मैथिलीमे सर्वप्रथम देल गेल अछि। आगाँक अंक: पाठक जे मत आएल तैमे सभसँ बेसी मत अरविन्द ठाकुरजीक पक्षमे आएल तँए विदेहक मइ वा जून २०१५हक कोनो अंक "अरविन्द ठाकुर विशेषांक" रहत। संगेसंग बहुत रास पाठक मत जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जी लेल छनि। मुदा हुनक उम्र ६०सँ बेसी छनि तैयो हमरा लोकनि पाठकक मतकेँ सम्मान दैत ई निर्णय लेलजे विदेहक जून-जुलाइ २०१५हक कोनो अंक "जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल" विशेषांक रहत। रचना उपलब्धताक अधारपर समय आगू-पाछू भऽ सकैए। पाठकीय प्रतिक्रिया: आशीष अनचिन्हार विदेहक अंक 170मे विनीत ठाकुर, चित्रा अंशु आ प्रणव झाजीक रचनाक स्वागत छनि। इएह सभ भविष्य छथि। खास कऽ विनीत ठाकुरजीक नव गीत निर्गुणक आधुनिक स्वरूप अछि आ ई बेर- बेर एना स्पष्ट होइए-- अंतिम टाइम जे आ जाएत, तखन किछु नै फुराएत। अप्पन सोचि कऽ कथनी-करनी, आँखि डबडबाएत । अखने सँ किए नै सोचै छी? विशेष रूपें ई अंक भरिगर अछि गुण आ संख्या दूनू हिसाबें। जँ हरेक अंकमे एनाहिते दू-तीना टा नव आबथि तँ बेसी नीक। कीर्तिनाथ झा प्रिय गजेन्द्र जी , विदेहक १६९ म अंक भेटल . एखन धरि मधुपजी सं सोझे संपर्क में रहैबला पीढ़ी उपलब्ध छथि. ओहि समुदाय सं ककरो कोनो लेख नहिं हयब अखरल. तथापि एहि अंकक सब सं विशिष्ट सनेस थिक ' मधुपजीक किछु गीत, कविता ,गजल आ दोहा. बानगीक रूप में मधुप जीक किछु गीत दितियैक तं नीक होइत . पूर्ववर्ती पीढ़ीक रचनाकारक रचना जखन नव पीढ़ी पढ़त तखने ने नीक बेजायक निर्णय हेतइ . अनिल चन्द्र ठाकुरजीक आलेखक माध्यमे मधुपजीक पोथीक लिस्ट तं लोककें भेटबे करतैक. हँ, छपाईमें अशुद्धि मधुर में बालु जकां प्रतीत भेल. विदेहक एहि अंकमे सुश्री ज्योतिक कविता आकृष्ट केलक; सनेस में लमनचुस आ कृष्णभोग आम आब विलुप्त भेल जा रहल छैक मुदा ममताक रंग तं ओएह छैक .डाक्टर अजित मिश्रक प्रसादें 'हम जेबै कुसेस्सर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन छाड़ा' सन गीत तकबाक इच्छा लोक कें होई से संभव . एकटा आओर गप्प. साहित्यमें मौलिक रचना आ समालोचना दुनूक महत्व छैक. मुदा, मैथिली में समालोचना सर्वत्र अनेरुआ घास जकां साहित्यके छारने रहैत अछि. एखुनका युग में छापू आ उतारू ( copy and paste ) एहि प्रवृत्तिक संगबहिना थिकै. युवक लोकनि सं हमर आग्रह अछि मूल लेखन करथि . नव वस्तु लोक नवीनताओ देखिकय कीनि लैत अछि. पछाति दोसरा बेर भले जांचि-परखि क लिअय. दोसर, समालोचना ले साहित्यक गहन अध्ययन चाही . पहिने अपने अवगति होयत तखन ने नीक बेजायक गुण-अवगुण अनका बुझयबइ . शास्त्र में कहने छैक - श्रोतव्यो ,मन्तव्यः ,निदिध्यासितव्यः ( सुनु , गुनु , मनन करू). तथापि जं समालोचनाक वृत्ति में रूचि हो तं सुनु , गुनु , मनन करू आ तखन अपन दृष्टि सं साहित्यकें भजारू आ अपन नीर-क्षीर विवेचना सं पाठककें अवगत कराऊ. एतद्धि. सादर, कीर्तिनाथ आशीष अनचिन्हार विदेहक १६९ म अंक विदेहक ई मधुप विशेषांक एकटा माइल स्टोन अछि। प्रायः देखल गेल अछि जे प्रिंट बला पत्रिकामे १२०-१३० पन्ना छपैत अछि मुदा ७०-८० पन्ना साभार बला लेखसँ भरल रहैत अछि। आ तरहें विदेह ओइ पत्रिका सभसँ अलग अछि कारण ऐमे एकटा छोड़ि आर सभ आलेख बिल्कुल नव आ फ्रेश अछि। आ इएह तत्व विदेहकेँ आर पत्रिकासँ अलग बनबैत छै। गप्प करी किछु आलेखकेँ गप्प करब। मुन्नाजीक आलेख एकटा नव प्रश्न ठाढ़ केलक अछि यात्रीजीक जनकवि हेबाक सम्बन्धमे। वियोगीक जीक आलेखमे नव तरीका छै जे ओइ समयक पचास पाइ आजुक समयमे कतेक हेतै आ ओकरासँ आजुक मजदूर कतेक घर निमाहत। मैथिलीमे मठाधिशी परंपराकेँ देखैत ओमप्रकाशजी सही कहि रहल छथिन जे मठाधीशक फर्माक कारणें मधुपजी बेसी गजल नै लीखि सकलाह। बाद बाँकी सभ आलेख अपन-अपन निष्कर्षमे नीक अछि मुदा सभसँ बड़का काज भेल जे प्रचुर मात्रामे मधुपजीक रचना नेटपर आएल। ई सभसँ बड़का काज भेल। एहन-एहन विशेषांक आर एबाक चाही। आशीष अनचिन्हार विदेहक उद्येश्य छै समानांतर चलब। साहित्य केर संग जीवनमे सेहो। विदेहक १६८म अंकमे प्रकाशित कपिलेश्वर राउतजीक कथा "बड़का खीरा" पुरने ब्राम्हणवादी ढ़ाँचापर अछि। जखन ओ अपन कथाक शुरूआते एना करै छथि जे-- "कहबी अछि, पुरुखक भाग आ स्त्रीकगणक चरित्र कखनि बदलि जाएत तेकर कोन ठेकान।" तखने ई निश्चित होइत अछि जे ई विदेहक परंपराक अंतर्गत नै अछि। ओना हमरा ई मानबामे कोनो संकोच नै जे कथाक मूल स्वर अंधविश्वास हटेनाइ अछि। मुदा ई बड़का दुर्भाग्य जे कथाक शुरूमे लेखक अपने अंधविश्वाससँ ग्रस्त छथि। कथासँ फिल्म जल्दी बनि सकैए मुदा फिल्मसँ कथा बहुत मोशकिल छै। ओमप्रकाशजीक कथापर जँ आबी तँ कहि सकै छी जे कथासँ फिल्म बनल अछि आ पाठक एकै पाराग्राफक बाद बुझि जाइत छथि जे अंतमे की हेतै। आ तँए शुरूआतेसँ ई कथा नीरस भऽ जाइए। कुंदन कुमार कर्णजीसँ ई अपेक्षा जे ओ अपन गजलमे नव-नव बिंब अनताह। प्रस्तुत गजलमे पुरने बिंब सभहँक भरमार अछि। इरा मल्लिकजीक आ अशरफ राइनजीक रचनासभ बड़ नीक छनि। नचिकेता (मिथिला दर्शन) विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ। शेफालिका वर्मा सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद। आशीष अनचिन्हार १६६म अंक संतुलित अछि। प्रस्तुत अंकमे वियोगीजीक कथा "विजय"केँ ऐ अंकक सर्वश्रेष्ठ रचना कहल जाए तँ दिक्कत नै। हिनक कथाक पहिल पार्टक अपेक्षा दोसर पार्ट बेसी मुखर अछि आ एकर मुल्याकंन पचास साल बाद जा कऽ फड़िच्छ हेतै।
संपादकीयमे जँ कहियो काल देशक राजनीति ओ समाजिक-आर्थिक पक्षपर चर्चा होइ तँ आ रुचिगर हएत से आशा अछि।
विदेहमे पहिल बेर कविता लऽ कऽ एबाक लेल महेश झा डखरामीजीक स्वागत छनि।
आशीष अनचिन्हार अंक 167मे डाॅ. कीर्ति नाथ झा जीक कथा कने आर फड़िच्छ हेबाक व्यग्रतामे अछि। पाठक ने ऐ पारक रहै छथि आ ने ओइ पारक। नन्द विलास रायजीक कथा कने पुरान ढ़र्राक बुझना गेल। पूरा संसारमे विषय एकै होइ छै मुदा ओकर शिल्पक प्रयोग अलग-अलग करै छै। आशा अछि जे रायजी आगूसँ शिल्पक खियाल रखता। अशरफ राईन जीक कता आ आजाद गजल नीक भाव लेने अछि। कीर्तिनाथ झा प्रिय गजेंद्रजी , 'विदेह' १६७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६७) भेटल . दूटा रचना आकृष्ट केलक. अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल आ जगदानन्द झा 'मनु ' केर ' मैथिली भाषामें एकरूपताक अभाव '. अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल अनुभूत सत्यक पीड़ाक सद्यः प्रतिबिम्ब थिक. अपन देश सं दूर रेगिस्तान में रहैत मजबूर जिनगीक आ अपन देश-कोस. माटि-पानि, आमा-बुआ सं दूर हेबाक दुःखक ई एहन बयान थिक जे ग़ज़ल सहजहिं मोनके छूबि लेलक. एतबे नहिं, एहि गजल में कोमल भावनाक अतिरिक्त आओर बहुतरास गंभीर गप्प छै, जेना, राजनेता लोकनिक प्रति आक्रोश आ संविधान नहिं बनबाक अफशोस . वाह अशरफ . लिखैत रहू . आब ' मैथिली भाषामें एकरूपताक अभाव ' क गप्प करी : हम पहिने स्पष्ट क दी , हम भाषा वैज्ञानिक नहिं छी . मुदा एहि विषय पर विचार तं अछिए . ' मैथिली भाषामें एकरूपताक अभाव ' समस्या थिक आ नहिओ थिक . मुदा ताहि पर भाषा वैज्ञानिक विचार करथु , समाधान ताकथु . ओना एहि विषय पर प्रायः चालीस आ पचास केर दशक में मैथिलीक तत्कालीन साहित्यकार लोकनि विचार केने छथि . से तकला उत्तर भेटत . भाषाक नमूना वा उदाहरणक हेतु रमानाथ झा , किरणजीक आ यात्रीक भाषा देखबाक थिक. ओना, भाषाक में एकरूपताक अभाव भाषाके समृद्ध करैत छैक . संगहिं, एकरूपताक अभाव जीवित भाषाक धुक-धुकीक प्रमाण थिकैक. नहिं तं अंग्रेजी किएक विश्यव्यापी भाश भ गेल आ फ्रेंच किएक फ्रांसहिं धरि सीमित भेल जा रहल अछि . ई नहिं बिसरबाक चाही जे भाषाक अनुसार व्याकरणक बनैछ. तें, जनसामान्यकें आ मौलिक लेखककें व्याकरणक अनुसार भाषा बाजबाक /लिखबाक बाध्यता नहिं हेबाक चाही. सादर , कीर्तिनाथ विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.राजदेव मण्डल- लाज (एकांकी) २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डलजीक दूटा लघु कथा २.३.आशीष अनचिन्हार- फर्क (व्यंग्य निबंध) २.४.विन्देश्वर ठाकुर- आसे आसमे जिनगी (विहनि कथा) राजदेव मण्डल- जनम : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्व. सोनेलाल मण्डल उर्फ सोनाइ मण्डल। माता : स्व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्त मण्डल, कृष्णकान्त मण्डल, विप्रकान्त मण्डल। पुत्री : रश्मि कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा, भाया- िनर्मली, जिला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शिक्षा : एम.ए. द्वय (मैथिली, हिन्दी, एल.एल.बी) ई पत्र : rajdeokavi@gmail.com सम्मान : अम्बरा कविता संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान-२०१३ प्राप्त। प्रकाशित कृति : (१) अम्बरा- कविता संग्रह (२०१०), (२) बसुंधरा कविता संग्रह (२०१३), (३) हमर टोल- उपन्यास (२०१३) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अप्रकाशित कृति- चाक (उपन्यास), त्रिवेणीक रंग (लघु/विहनि कथा संग्रह)।पात्र परिचए :: लाज (एकांकी) पुरुष पात्र- १. हरिचरण- गामक किसान २. धिरबा- हरिचरणक बेटा ३. कुलानन्द— गामक सम्पन्न जमीनदार ४. भोगेन्दर- कुलानन्दक बेटा ५. बिसेखी- गामक एकटा मजदूर ६. श्यामबाबू- शिक्षक स्त्री पात्र- १. चनपटीवाली- हरिचरणक पत्नी २. सबिता- हरिचरणक बेटी (दू-तीनटा शिक्षक, चारिटा ग्रामीण, डाक्टर, नर्स, दस-बारहटा छात्र एवं छात्रा।) दृश्य- १ समए- दिन। स्थान- हरिचरणक घर। (चनपटीवाली भानस-भात कऽ बैसल अछि। हरिचरण अबैत अछि।) चनपटीवाली- केतए गेल छेलिऐ? खेबै की नै? हरिचरण- हँ... हँ। कनी हाथ-मुँह धोइ छी। धिरबा स्कूल गेल की नै? चनपटीवाली- हँ। ऊ तँ दसे बजे खा-पी कऽ चलि गेल। हरिचरण- ऊ छौड़ी, सवितियाकेँ नै देखै छी। चनपटीवाली- सबितिया तँ गाए-बकरी चरबैले बाध दिस गेल। की भेलै से? हरिचरण- हेतै की। बेटी-चाटीकेँ कनी दाबि-चापि कऽ राखी। देखै नै छिऐ गामक हवा। चनपटीवाली- हे, हमर कुल-खनदान ओहन नै अछि। जाउ अहाँ हाथ धोने आउ। (हरिचरण चलि पड़ैत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- २ स्थान- गामक विद्यालय। समए- दिन। (स्कूलक आगूमे तीन-चारि शिक्षक कुरसीपर बैसल अछि। आपसी गप-सप्प कऽ रहल अछि। किछु धिया-पुता पढ़ि रहल अछि आ किछु बाहरी भागमे खेल रहल अछि) श्याम बाबू- यौ हीरा बाबू, अहाँ जे अपना बचियाक बिआहक गप करै छेलिऐ, तइमे लेन-देन फाइनल भेल? शिक्षक दू- धुर की कहब। वरक माँग अलग आ वरक बापक माँग अलग। टका-पैसा लाउ। मोटर साइकिल लाउ, सोना लाउ, लैपटॉप लाउ। की कहूँ, हथियाक सूढ़ जकाँ डिमान्ड बढ़ले जा रहल अछि। हे यौ, जे बेटीक बिआह करैत अछि से बूझू जे जमपुरीसँ घूमि कऽ अबैत अछि। (एकटा छात्र लगमे अबैत अछि) छात्र एक- यौ मास्टर साहैब, ई छौड़ा हमरा गारि पढ़ै छै। श्याम बाबू- तूँ सभ गारि पढ़ैले एलही आकि पढ़ैले? (छौंकी देखबैत) हमरा सभ गप्प करै छी। ऐठामसँ जो जल्दी। छात्र दू- माहटर साहैब, पाँच मिनट। (जोरदार अवाजमे कहैत विदा होइत अछि।) शिक्षक दू- (छौंकी देखबैत) बैस चुपचाप नै तँ देखै छीही छौंकी। छात्र दू- नै जाए देबै तँ हम अहीठाम लगही करि देब। शिक्षक दू- पढ़ै छीही कथीले। जो ने लघीए करैत रहिहेँ। (शिक्षक सभ पुन: गप-सप्प करए लगै छथि। एकटा हरबाहा कान्हपर हर लेने ओही बाटसँ जा रहल अछि।) हरबाह- यौ माहटर साहैब, अहाँ सभ गप्प कटाबलि करैत रहू। बाहरमे छौड़ा सभ मारापीटी करैत अछि। अहिना चलै छै स्कूल यौ...? शिक्षक तीन- हे, अहाँ जा कऽ हर जोतू। (क्रोधमे) अहाँ स्कूलक भाँज की बुझबै यौ। हरबाह- हँ हँ छौड़ा सभ तँ भैंसवार बनबे करतै। अहाँ फोकटमे रूपैआ लैत रहू। कियो कहैबला तँ अछि नै। शिक्षक तीन- (छौंकी लऽ कऽ ठाढ़ होइत) कहै छी चल जाउ ऐठामसँ। हरबाह- यौ अहाँ छौंकी देखबै छी। हमरो हाथमे हरबाही पेना अछि। श्यामबाबू- हे यौ की लगल छी। जाउ ऐठामसँ। हरबाह- हमरा थोड़े ओते फुरसत अछि। हम अपना काजकेँ भगवान बुझै छी। अहूँ सभ अपना काजकेँ भगवान बुझियौ। बेमतलबमे अबेर भऽ गेल। जाइ छी। (हरबाहा भनभनाइत चलि जाइत अछि।) (शिक्षक एकटा बोर्डपर लिखैत अछि संगे पढ़बैत अछि। सबिता बकरीकेँ एकटा गाछमे बान्हि स्कूलक खिड़कीसँ सभ देखि-सुनि रहल अछि।) श्यामबाबू- ई सभटा पढ़ेलहा काल्हि मुँह-जबानी सुनबौ। (शिक्षक सबिताकेँ देखि लैत अछि। जोरसँ सोर पाड़ैत अछि) एमहर सोझहामे आ। के हुलकी मारै छँह? (सबिता डेराइत सोझहामे अबैत अछि) श्यामबाबू- तोहर नाम की छियौ? केकर बेटी छँह? सबिता- हम सबिता छी। हमरा बाबूक नाम श्री हरिचरण अछि। श्यामबाबू- ऐठाम कथीले एलही? सबिता- यौ मास्टर साहैब। हमरो पढ़ऽ दिअ। श्यामबाबू- पढ़बें, ई तँ नीक गप। अच्छा कह, पाँच जोड़ पाँच केतेक भेलै। सबिता- दस भेलै माहटर साहैब। श्यामबाबू- दिमाग तेज छौ। तोराले परियास करबाक चाही। घरपर जेबौ, तोरा बापकेँ समझबैले। अखनी तूँ जो। (सबिता चलि दैत अछि। बर्खाक छोट-छोट बून गिरए लगैत अछि। छात्र सभ भागए लगैत अछि।) एकटा छात्र- यौ माहटर साहैब। बरखा शुरू भऽ गेल। हम भागै छी। अहूँ भागू। (कहैत पड़ाइत अछि।) छुट्टी... छुट्टी...। पटाक्षेप। दृश्य- ३ स्थान- हरिचरणक घर। (शिक्षक-एक जे श्यामबाबूक नामसँ जानल जाइत अछि, प्रवेश करैत अछि) श्यामबाबू- हरिचरणजी छी यौ। (जोरसँ चिकरैत अछि।) हरिचरण- (अँगनासँ बाहर निकलैत) मास्टर साहैब, प्रणाम-प्रणाम। आउ बैसू। कहू, हमर छौड़ा ठीकसँ पढ़ैत अछि किने? श्यामबाबू- हँ हँ, नीकसँ पढ़ैत अछि। हम दोसरो काजसँ आएल छी। हरिचरण- कहू ने, आओर की बात छै। (अँगना दिस तकैत जोरसँ बजैत अछि।) सुनै छिऐ सबितियाक माए। चाह बनौने आउ। (श्यामबाबू दिस तकैत) कहू मास्टर साहैब, की कहै छी? श्यामबाबू- अहाँक बेटी बड्ड संस्कारी अछि। बुद्धियोमे तेज। पढ़त-लिखत तँ जरूर नाम रोशन करत। काल्हिसँ अोकरा स्कूल भेजू। हरिचरण- यौ मास्टर साहैब, बेटी की पढ़तै। ओकरा घर-अँगनाक काजसँ फुरसत कहाँ होइ छै। श्यामबाबू- फुरसत देबै तब ने पढ़तै। हे यौ, ऐ देशक बेटी तँ देशसँ विदेश धरि अपन नाम चमका रहल अछि। हरिचरण- हे यौ, ओहन पलिवारो रहै छै तब ने होइ छै। हमर तँ समाजो तेहेन अछि जे बेटीकेँ घरसँ निकलैत देखि खाली दोखे लगौत। श्यामबाबू- दोख लगौलासँ की हेतै। अपन-अपन चरित्र होइ छै। लोकक कहलासँ नीक बेकती अधला भ जेतै। हे यौ आब तँ सरकार, कानून सभटा ऐ दिशामे सहयोग कऽ रहल अछि। हरिचरण- बेटाकेँ पढ़बैमे तँ जुमबै ने करैए छी आ बेटीकेँ...। श्यामबाबू- देखियो, बेटा-बेटीमे कोनो अन्तर नै होइ छै। गाछ रोपबै तब ने फल भेटत। (हरिचरणक स्त्री चाह लेने आबि जाइत अछि।) हरिचरण- अँगनामे रहै छै तँ माइयोकेँ थोड़-बहुत काज सम्हारि दइ छै। असगरे तँ...। श्यामबाबू- यौ काजो करतै अा पढ़बोकरतै। खरचो बेसी नै छै। सरकारी सहयोग भेटै छै। चनपटीवाली- बात मानि लियौ। माहटर साहैब अधला नै कहैत हेथिन। हरिचरण- ठीके छै। जँ सभ कहै छी तँ स्कूल जेतै। श्यामबाबू- खुशी भेल। काल्हिसँ समैपर स्कूल भेजू। (एक-दोसराकेँ प्रणाम करैत श्यामबाबू विदा भऽ जाइ छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- ४ स्थान- स्कूल। समए- दिन। (शिक्षक पढ़ा रहल छथि। छात्र आ छात्रा सभ पोथी, कौपी, लेने पाँतिमे बैसल अछि।) शिक्षक दू- जे सवाल बनबैले देने छियो, जल्दी बना कऽ ला, जे सभसँ पहिने लाबबेँ से तेजगर कहेमेँ आ जे सभसँ पाछू देखेमेँ तेकरा छौंकी लगतौं। सबिता- माहटर साहैब, हम सवालकेँ हल कऽ लेलौं। (ठाढ़ भऽ कऽ कौपी देखबैत अछि।) शिक्षक दू- देखही रौ छौड़ा सभ। मेहनतक फल। किछे दिनमे सबितिया सभसँ आगू भऽ गेलौ। एकरे कहै छै कादोमे कमल फुलेनाइ। धिरबा- माहटर साहैब हमहूँ हिसाब बना लेलौं। शिक्षक दू- बनेलेँ तँ किन्तु पाछूसँ। तोरा तँ पहिने एबाक चाही, तोहर बहिन तँ किछे दिन पहिनेसँ स्कूल आबए लगलौ। तूँ तँ कहियासँ ऐठाम पढ़ै छेँ। छात्र दू- माहटर साहैब, भोगेन्दर हमरा बिठुआ काटि लेलक। शिक्षक दू- हँ-हँ बिठुआ काटतौ। आर की करतौ। एकर बाप कुलानन्द बाबू तँ कहैत रहै छै जे हमरा किछोक कमी नै अछि। बेटाकेँ चारि-चारिटा टीसन धरौने छी। आ बेटा तेहेन भुसकोल छै जे पाछूमे बैसि कऽ बिठुआ कटै छै। (मुड़ी उठा कऽ देखैत) हे रौ भोगेन्दरा, ला कौपी। हिसाब बनौलेँ? भोगेन्दर- यौ माहटर साहैब, अहाँक सवाल गलत अछि। शिक्षक दू- आँइ! सबाले गलत अछि। सबिता- यौ माहटर साहैब, ई तँ भरि दिन लोकक बाड़ीक लताम तोड़ैत अछि नै तँ परतीपर क्रिकेट खेलैत रहै छै। एकरा बुते कहूँ सवाल बनै। तँए सवालेकेँ गलत कहै छै। शिक्षक दू- ठीके, ई छौड़ा खचरपनी करै छै। रौ ला तँ कौपी। की गलत छै। भोगेन्दर- हिसाब बनतै तेकर बाद देखाएब। कोनो की हम बनरनी छी जे चट दऽ कूदि कऽ देखा देब। सबिता- माहटर साहैब, सुनै छिऐ। हमरा बनरनी कहै छै। भोगेन्दर- लगै छी बनरनी सन। तँ कहबौ बनरनी। देखही रौ बनरनीकेँ। शिक्षक दू- (उठि कऽ चारि-पाँच छौंकी भोगेन्दरक पीठ आ बाँहिपर लगबैत) गामोपर बदमासी आ स्कूलोमे खचरपनी। ऐठाम बिठुआ कटैले अबै छेँ आकि पढ़ैले? हमरो सोझहामे लुचपनी। भोगेन्दर- हे माहटर साहैब, हम कहि दइ छी। ई छौड़ी हमरा मारि खुआ रहल अछि। एकरो ठीक करि देबै। जाइ छी, बाबूकेँ सभटा गप्प कहबै। शिक्षक दू- (छौंकी उठबैत) जो, पहिने बाबूकेँ कहि आबही। भोगेन्दर- (विदा होइत अछि) कहि दइ छी, हम सभकेँ ठीक कऽ देब। हमरो नाम भोगेन्दरा छिऐ। (चलि दैत अछि) (घण्टी टुनटुनाइत अछि।) शिक्षक दू- जाइ जो। टिफिन भऽ गेलौ। (छात्र सभ बाहर दिस चलि दैत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- ५ स्थान- स्कूलक बाहरी भाग। समए- दिन। (शिक्षक सभ स्कूलसँ बाहर सड़क दिस जा रहल अछि। हरिचरण अपना बेटी सबिताक संगे दोसर दिससँ अबैत रहैए। ओकरा पाछू एकटा ग्रामीण बिसेखी अछि। सबिताक कपड़ा-लत्ता फटल अछि।) हरिचरण- प्रणाम, मास्टर साहैब। (सबिता कानि रहल अछि।) श्यामबाबू- प्रणाम, हरिचरणजी। सबिता किए कानि रहल अछि? की भेल? हरिचरण- हम तँ ओही दिन कहने छेलौं जे अपना बेटीकेँ नै पढ़ाएब। अहाँ हमरापर बड्ड जोर देलिऐ। तेकर फल देखि लियौ। श्यामबाबू- गप कहबै तखनि ने बुझबै। भेलै की? हरिचरण- हेतै की। गरीबक धिया-पुताकेँ पढ़बाक एहेन अधिकार छै। जे देखि लियौ। कुलानन्द बाबूक बेटाक किरदानी। ओ हमरा बेटीकेँ मारैत-मारैत बाटमे खसा देने छेलै। श्यामबाबू- कोन गपक झगड़ा भेलै? हरिचरण- सुनै छी, जे कुलानन्द बाबूक बेटाक बारेमे सबितिया किछो बजल रहै। तही कारणे अहाँ ओकरा मारने रहिऐ। श्यामबाबू- कम्पलेन केने रहै। सबितियाक बातो साँचे छेलै। ऊ छौड़ा ठीके बदमाश अछि। हरिचरण- बदमाशी केनाइ तँ धनिकक धिया-पुताक सिंगार छिऐ। श्यामबाबू- ई कोन गप भेलै। अधला गपक तँ विरोध हेबाक चाही। हरिचरण- देखै नै छिऐ। हमर बेटी विरोधमे बजलै तँ केहेन दशा भेलै। मास्टर साहैब, नीक होइतै जे हम अपना बेटीकेँ नै पढ़बितौं एकरा कपड़ा-लत्ताक हालत देखियौ। (आँखिमे नोर भरि जाइत अछि।) की हेतै पढ़ा कऽ? श्यामबाबू- एहेन गप नै बाजू। नीक काजमे अहिना अड़चन होइ छै। अहाँ अपना बेटीकेँ पढ़ाउ। हम कहै छी- अहाँक बेटी नाम रोशन करत। हरिचरण- केना पढ़ेबै यौ मास्टर साहैब? श्यामबाबू- अहाँ िचन्ता नै करब। हम कुलानन्द बाबूसँ भेँट करैले जाइ छी। चलू यौ बिसेखीजी, हमरा संगे। बिसेखी- हँ-हँ चलू। (सभ कियो विदा भऽ जाइ छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- ६ स्थान- कुलानन्दक घर। समए- दिन। (कुलानन्द अपन दरबज्जापर असगरे कुरसीपर बैसल छथि। कनेक हटि कऽ दूटा हथटुट्टा, पुरान कुरसी रखल अछि। शिक्षक श्यामबाबूक संग बिसेखी प्रवेश...। श्यामबाबू- प्रणाम यौ कुलानन्द बाबू। कुलानन्द- (मुड़ी उठा कऽ देखैत) प्रणाम मास्टर साहैब। प्रणाम-प्रणाम!! (व्यंग्य करैत) वाह! बिसेखीओकेँ देखै छी। हे रौ बिसेखी! कनी कुरसी ला ओमहरसँ। मास्टर साहैब बैसता। (बिसेखी कुरसी आनि कातमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि।) श्यामबाबू- हमरा सभ एकटा विशेष काजे आएल छी। कुलानन्द- बिना कारणे टिटही थोड़े लगै छै। हम बुझै छी। रौ बिसेखिया मुँह किए तकै छेँ, बाज ने की बात छिऐ? बिसेखी- की कहब मािलक। अहाँक भोगेन्दर बदमाशी केलक। ओ हरिचरणक बेटीकेँ बड्ड मारि मारलखिन। कुलानन्द- हे रौ हमर बेटा कोनो बताह छै। जे बिना कारणे केकरो पीटतै। ओकरो बेटी खचरपन्नी केने हेतै। श्यामबाबू- ओ तँ सिरिफ भोगेन्दरक कम्पलेन केने रहै। बिसेखी- धिया-पुताकेँ हाँटि-दबाड़ि देबाक चाही। एनामे धिया-पुता मनबढ़ू भऽ जाइत अछि। कुलानन्द- तू हमरा सिखबै छेँ। ऊ स्कूल हमरा जमीनपर ठाढ़ छौ। हम मदति केलियौ तँ स्कूल बनलौं। आइ हम अपने धिया-पुताकेँ मारि-पीट कऽभगा देबै!!! श्यामबाबू- भगबैले कहाँ कहै छी। कनी समझा-बुझा देबै तँ नीक रहतै। कुलानन्द- हमर गाम छी। हम नीक-अधला बुझै छिऐ। हरिचरणा बेटाकेँ तँ पढ़ाइए ने सकैए आ बेटीकेँ केतएसँ पढ़ाएत। ओकरा कारणे हम भोगेन्दरकेँ मारबै? ईह! बड़ छोट से उनचास हाथ!! बिसेखी- कनी बेसी गलती भऽ गेलै मालिक। मारैत-मारैत सबितियाकेँ सभटा कपड़ा-लत्ता फाड़ि देने छै। कुलानन्द- ओ, आब बुझलौं। कपड़ा-लत्ताकेँ हमरा दाम लगत! सएह ने रौ? बिसेखी- से हम कहाँ कहै छी। कुलानन्द- तूँ की कहै छेँ से हम बुझै छिऐ। दुआरिपर आबि कऽ उपराग देलेँ। मास्टर साहैबक सोझहामे की कहबौ। यौ मास्टर साहैब हमर गाम छी। हम सभ गप बूझि-समझि लेबै। अहाँ सभ ऐठामसँ अखनि चलि जाउ। (मास्टर साहैबक संग बिसेखी चलि जाइत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- ७ स्थान- हरिचरणक घर। (हरिचरण अपना साढ़ू संगे दुआरिपर बैसल अछि। साढ़ू रघुवीर घड़ीमे समए देखैत अछि।) रघुवीर- साढू! हम तँ किछुकालक बाद चलि जाएब। एकटा गप कहबाक छल। हरिचरण- हँ-हँ- कहू की बात? रघुवीर- हमर पत्नी तँ बेमार रहैत अछि। आ अखनि गर्भवती अछि। असगरे बेचारीकेँ बड्ड दिक्कत होइ छै। हम सरकारी सेवामे छी। कखनि घरपर आएब तेकर कोनो ठेकान नै। एहेन परिस्थितिमे...। हरिचरण- अहाँ की कहए चाहै छी? रघुवीर- अहाँ छोटकी बचियाकेँ हमरा घरपर जाए दैतिऐ तँ पत्नीकेँ सहारा भऽ जइतै। हरिचरण- ओ तँ पढ़ै छै। (निसाँस छोड़ैत) ओना लड़कीकेँ पढ़ौनाइ बड्ड कठिन छे। मुदा सबिताकेँ पढ़बए पड़तै। किए तँ ओ तेजगर छै। रघुवीर- तेकर चिन्ता अहाँ नै करू। हमहूँ सर्विस करै छी। शहरमे पढ़ौनाइ असान छै। टाइमपर पढ़बो करतै आ अपना मौसीकेँ देख-भालो करतै। पत्नीआंे असगर नै रहतै। अनमना लगल रहतै। हरिचरण- कहै तँ छी ठीके किन्तु अपन धिया-पुता अपने लग ठीक रहै छै। पढ़ाइमे खरचो तँ लगै छै। रघुवीर- खर्चाक िचन्ता नै करू साढ़ू। हमरो किछोक अभाव नै अछि। सबिता जेते धरि पढ़तै सभ खर्च-वर्च हमर। (हरिचरणक पत्नी चाह लेने अबैत अछि। ठमकि कऽ सभ सुनि लैत अछि।) पत्नी- आब एतेक जिद्द करै छथिन तँ जाए दियौ सबितियाकेँ। सुनने नै छिऐ जे माए मरे आ मौसी जिऐ। (सबिता ओनएसँ दौगल अबैत अछि। हरिचरण ओकरा रोकैत अछि।) हरिचरण- सबिता एमहर सुन! मौसा संगे गाम जेबही? (सबिता किछु ने बजैत अछि।) तोहर मौसा ओहीठाम स्कूलमे पढ़ैक बेवस्था लगा देतौ। सबिता- हँ जेबै। मौसी संगे रहबै आ ओहीठाम पढ़बै। हरिचरण- लिअ साढ़ू। अहाँक समस्याक समाधान भऽ गेल। रघुवीर- ठीक छै। तैयार होउ। दू घण्टा बाद गाड़ीसँ चलब। पटाक्षेप। दृश्य- ८ स्थान- गामक चौक। (तीन-चारिटा ग्रामीण सड़कक कातमे गाछतर बैसल अछि। चबूतरापर गप-सप्प कऽ रहल अछि।) ग्रामीण एक- (गाछ दिस इशारा करैत) देखियौ, ई गाछ केतनेटा रहै। देखिते-देखिते केतेक विशाल भऽ गेलै। ग्रामीण दू- एकरा रोपनिहार तँ जुआन भऽ गेलै। समए बितैत कोनो देरी होइ छै। ग्रामीण तीन- हँ यौ, ऐ स्कूलक धिया-पुता सभ एकरा रोपने रहै। ग्रामीण चारि- देखै नै छिऐ, धिरबा, सबितिया, भोगेन्दर सभ धिया-पुता आब जुआन भऽ गेलै। ग्रामीण एक- सुनै छिऐ, सबितिया शहरक स्कूलमे पढ़ि कऽ बड़का डागदरनी भऽ गेलै। हरिचरणकेँ नाम रोशन कऽ देलकै। ग्रामीण चारि- धुर हरिचरण बुते थोड़े होइतै। ई तँ ओकर साढ़ू पढ़ाइक खरचा देलकै तब भेलै। ग्रामीण तीन- हँ यौ ऊ बगलक शहरमे अस्पताल चलबैत अछि। हमर काकी तेतेक बीमार रहै जे नै जीबितै। सबितेक दवाइसँ बँचि गेलै। ग्रामीण दू- तब तँ नामी डाक्टर अछि यौ। ग्रामीण एक- अच्छा गामकेँ ऊँच केलक। (कुलानन्दक बेटा भोगेन्दर दारू पीने आ अड़-बड़ बजैत, गारि पढ़ैत, लड़खड़ाइत जा रहल अछि।) भोगेन्दर- ओऽऽऽ सा... ले... तेरी... माँ... के... छोड़बौ नै। (लड़खड़ाइत अछि।) ग्रामीण एक- के छी यौ? एना गारि पढ़ैत किए जाइ छी? ग्रामीण दू- पियक्कड़ छथि। भोगेन्दरा। माए-बापक नाम रोशन कऽ रहल छथि। (भोगेन्दर उनटि कऽ ग्रामीण-दू केँ पकड़ि लैत अछि।) भोगेन्दर- रे सार तूँ हमरा गारि देलही। तोरा हम आइ बापसँ मोलाकात करबा देबौ। (ग्रामीण तीन दुनूकेँ बीच होइत झगड़ाकेँ छोड़बैत अछि।) ग्रामीण तीन- एना नै करू। ई किछु नै बजला। अहाँ बेकारमे झगड़ा नै करू। जाउ, ऐठामसँ। भोगेन्दर- ई तोरा बापक जगह छियौ जे चलि जेबौ, ऐठामसँ। (भोगेन्दर गारि पढ़ैत-पढ़ैत बोकरए लगैए।) ग्रामीण एक- बाप रे बाप! ई तँ खून बोकरै छै। की भऽ गेलै यौ। सोर पाड़ू कुलानन्द बाबूकेँ। एकर हालत बड़ खराप छे! (ग्रामीण चारि कुलानन्दकेँ सोर पाड़ए जाइत अछि। भोगेन्दर बेहोश भऽ गिर पड़ैत अछि।) ग्रामीण तीन- एकरा जल्दी शहरक अस्पताल नै लऽ कऽ जेतै तँ परान बँचाएब मोशकिल भऽ जेतै। ग्रामीण दू- एकरे कहै छै- कर्मक फल। दुनू बापुत समाजमे कुकरम करैत रहै छेलै। डरसँ के बजतै? सभ किच्छो बरबाद कऽ देलकै। आइ देख लियौ फल। ग्रामीण एक- एकरे डरसँ हरिचरण अपना बेटीकेँ साढ़ू संगे भेजि शहरमे पढ़ौलकै। आ शहरक नामी-गिरामी डाक्टर बनल छै। (कुलानन्द अबै छथि। अपना बेटाक हालत देखिते आँखिसँ नोर खसए लगै छन्हि।) कुलानन्द- आब कोन उपाय करबै हौ। केना परान बँचतै हौ। हौ भाय, हमरा एकेटा बेटा अछि हौ। ग्रामीण एक- यौ कुलानन्द बाबू, एकरा शहरक अस्पताल लऽ कऽ चलू। अपने गामक बढ़ियाँ डाक्टर अछि ओइठाम। कुलानन्द बाबू- के हौ? ग्रामीण एक- हरिचरण बेटी डा. सबिता कुमारी। केहेन-केहेन बीमारीकेँ ठीक कऽ देलकै। एकरो ठीक करतै। कुलानन्द बाबू- (मुड़ी झूका लैत अछि।) हौ सुनने तँ छिऐ, मुदा की कहबै? अपने कएल किरदानी। सोझहामे केना जेबै? ग्रामीण तीन- अहाँ कोनो चिन्ता नै करू। लऽ कऽ चलू। हमहूँ सभ संगे चलै छी। सभ ठीक भऽ जेतै। एकरा उठाउ। चलै चलू। (भोगेन्दरकेँ उठाबए लगैत अछि।) पटाक्षेप। दृश्य- ९ स्थान- अस्पतालक बरामदा। (तीन-चारिटा ग्रामीण बेंचपर बैसल अछि। डाक्टर सबिता आ नर्स सभ एमहरसँ ओहमर आबि रहल अछि आ जा रहल अछि। कुलानन्द भीतरसँ निकलैत अछि।) ग्रामीण एक- यौ कुलानन्द बाबू! आब तँ अपना सभकेँ गाम दिस चलबाक चाही। कोनो तरहेँ भोगेन्दरक जान बँचि गेल। कुलानन्द- कोनो तरहेँ की कहै छी। ई कहियौ जे डाक्टरनी सबिताक कृपासँ परान बँचि गेल। ग्रामीण दू- से तँ ठीके। मुदा डागदरनीकँ धैनवाद देलिऐ? कुलानन्द- की कहब यौ। हमरा तँ सबिताक सोझहोमे जाइत लाज होइत अछि। हमर बेटा ओकरा मारि-पीट कऽ सकूलसँ भगा देने रहै। तइ कारणे ओकरा गामसँ बाहर रहि पढ़ए पड़लै। वएह आइ हमरा बेटाक जान बँचौलकै। ओइ दिन मास्टर साहैब हमरा उपराग देबाक लेल गेल रहै। मुदा हमहूँ किछो नै केलिऐ। उनटे मास्टर साहैबकेँ डपटि कऽ भगा देलिऐ। हम दुष्ट लोक छी। (आँखिमे नोर आबि जाइत अछि।) ग्रामीण दू- दुखित नै होउ। अपसोच नै करू। कुलानन्द- अपसोच तँ हेबाक चाही। गलतीकेँ स्वीकार करबाक चाही। अहूँ सुनि लिअ- समाजक धिया-पुता पढ़ैत-लिखैत हो वा कोनो नीक काज करैत हो तँ ओकरा सभकेँ सहयोग करबाक चाही। कोनो सुआरथक गप नै सोचबाक चाही। ग्रामीण एक- सबिता हरिचरणक बेटी नै अछि। समूचा समाजक बेटी अछि। अपना गामक डंका शहरमे बजा रहल अछि। (सबिताक संगे भोगेन्दर प्रवेश करैत अछि। भोगेन्दर मुड़ी झूकौने अछि।) सबिता- आब अहाँसभ गाम जा सकै छी। (भोगेन्दर दिस इशारा करैत) हिनकर स्थिति गाम जेबाक योग्य भऽ गेल छन्हि। बीमारी कन्ट्रोलमे अछि। मुदा ठीक समैपर दवाइ दैत रहबनि आ पुन: आबि कऽ चेक करबा लेब। ग्रामीण एक- (हाथ जोड़ैत) अहाँ धन्य छी- सबिताजी। सबिता- (ग्रामीणकेँ प्रणाम करैत) अहाँ सभ हमरा असीरवाद दिअ जे अहिना हम अहाँ सबहक सेवा करैत रही। ग्रामीण एक- चलै चलू। (कुलानन्द संगे ग्रामीण सभ हाथ जोड़ने विदा भऽ जाइत अछि। भोगेन्दर ठाढ़े रहि जाइत अछि। सबिता लगमे अबैत अछि।) सबिता- हमर देल किरिया-सप्पत मन राखब। कहियो दारू-शराब नै पीअब आ ने हाथसँ छूअब। दवाइ टेमपर खाइत रहब। (भोगेन्दरक आँखि नोरा जाइत अछि। नोराएल आँखिकेँ पोछए लगैत अछि।) भोगेन्दर- हम अपराधी छी। हमरा गलतीकेँ माफ कऽ दिअ। (हाथ जोड़ैत विदा भऽ जाइत अछि।) पटाक्षेप। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल - जगदीश प्रसाद मण्डलजीक दूटा लघु कथा- असुध मन तीन पहर रातिएसँ करिया काका आ गुड़की काकीक बीच उत्तरा-चौड़ी जे शुरू भेलनि ओ लधले रहलनि। दू-बजिया गाड़ी तमौरिया टीशनसँ आगू बढ़ि गेल। एक तँ माघ मास तैपर शीतलहरीक जुआएल राति, हाथ-हाथ नै सुझैत। मुहोँ देखैक शक्ति आँखिकेँ नै, तेहेन अन्हार पसरि गेल छल। मुदा तैयो करिया कक्काक आ गुड़की काकीक उत्तरा-चौड़ी शीतेलनि नै, पाला पाबि आरो पलाइते गेलनि। कटही गाड़ी जकाँ जेतए दहिना भाग खच्चा रहै तेतए दहिना पहिया आ जेतए बामा भाग खच्चा रहै तेतए बामा पहिया दब-उनार होइत चलिते रहल। चलबक कारणो रहनि, कारण रहनि करिया काका मध्यमा पास छथि, शिक्षा मित्रबला मध्यमा नै, रटि कऽ पास केलहा। जइसँ अपनापर बिसवास छन्हिहेँ, तँए पाछू घुसकैक प्रश्ने नै। मुदा गुड़कीओ काकीकेँ टटके अनुभव- पनरह दिन पहिलुका- रहनि तँए बन्ठा साँढ़ जकाँ माथा अड़ौने रहली। तहूमे एक-उमेरिया दुनू-परानी रहने दुनियाँकेँ जेते करिया काका देखने तेते गुड़कीओ काकी, जइसँ दुनूकेँ अपन-अपन नजरिये देखैक अपन-अपन शक्ति छन्हि। ओना दुनूक बीच जे उत्तरा-चौड़ी होइत रहनि ओ कखनो-कखनो बेठेकानो भऽ जान्हि। मुदा तैयो उनटैत-पुनटैत विचार एकठाम भऽ रगड़ी बनि रग्गड़ रगड़िते रहल, पाछू घुसकैले कियो तैयार नै। एक-चलिया करिया कक्काक उपजौल ज्ञान रहनि तँए अपन चौबीसो घण्टाक रूटिंग नियमित बनौने छथि। कखनि सुति कऽ उठी, उठला पछाति की करी, तैठामसँ लऽ कऽ रातिमे ओछाइनपर गेला पछाति की करी, से सभटा बेवहारमे रखने छथि। ओना कमी एते जरूर छन्हि जे ‘मौसमक अनुकूल किरियो बदलै छै’ ई पढ़ैमे छूटि गेल छन्हि। जेना केतौक लोक मल उत्सर्जनक पछाति छोंछ करैए, आ केतौ पनि-छू करैए। तहिना केतौ भरि छाती पानिमे पैसि नहाइए, तँ केतौ एक चुरूक पानि छीटि नहाइए। से बुझैक कमी करिया काकामे छन्हि। ओ ई नै बूझि पाएल रहथि जे माघ मास केते पानिसँ छोंछ करी आ बैशाख मास केतेसँ। सुखल आ गील उत्सर्जनक पछाति केते पानिक खगता होइए। नै बुझैक कारण भेलनि जे मध्यमे तक अध्ययन केने रहथि, तँए विस्तृत रूपे नै बूझि सकला। पुबरिया मेघ सुरूजक धाहीसँ ललिया गेल मुदा किरिण नै फूटल। तरे-तर करिया काका एते तरिया गेल छला जे बरदास नै भेलनि। घरसँ निकलैत पत्नीकेँ कहलखिन- “जेमा तँ जाइते छी मुदा घुरि कऽ फेर नइ मुँह देखब।” ओना करिया काका ठिकिया कऽ बजलथि जे कानमे पड़िते छातीकेँ चालनि बना देतनि, मुदा से भेल नै। हेबो केना करैत पनरह दिन पहिलुके ने घटना छी जे गुड़की काकी करिया काकाकेँ मृत्युक मुहसँ घुमा अनने छेली। तँए पतिक सेवा धर्म तेते प्रवल भऽ गेल छेलनि जे पतिक बात गरदनिसँ निच्चाँ उतरबे ने केलनि। बजली- “अहाँ नै मुँह देखब आकि अहाँक नइ देखब?” पत्नीक समगम उत्तर पाबि करिया काका विचलित भऽ गेला। डोरा-सूइयासँ अपन मुँह सीब, मात्र चद्दरि ओढ़ने घरसँ बहरा ओहिना आगूए-आगू देखैत जाइत रहथि जहिना असमसानसँ घुमतीकाल कियो पाछू उनटि नै तकैए। अखनि धरि गुड़की काकीकेँ मनमे नै छेलनि जे पति घर छोड़ि पड़ेता, मुदा जेना-जेना करिया काका आगू बढ़ैत जाइत रहथि तेना-तेना डेगो नमहर हुअ लगलनि। दूर हटैत देखि गुड़की काकीक मन सहमलनि। मुदा अपने पाछूसँ दौग पतिकेँ वौसब नीक नै बूझि पड़ोसिनीकेँ अपनासँ बेसी उमेरक बूझि लगमे जा बजली- “देखथुन की मनमे उठलनि की नै, घर छोड़ि अपने पड़ाएल जाइ छथि, कनी आगू बढ़ि वउस कऽ घुमा अनथुन।” ओना पड़ोसिनीक मन अपने दुनू बेकतीपर तमसाएल रहनि। तमसाइक कारण रहनि सवा पहर रातिएसँ तेना दुनू परानी नट-बखो जकाँ कुकुर-कटौज करैत एली जे तखनिसँ जगले छी। एना केतौ मनुखक घरमे हुअए! तँए भने एकटाकेँ घरसँ गेने झगड़ा तँ नै हएत। कियो अपने ने नीक सोचैए, भने हएत। मुदा से कहलो केना जाएत। ओना गुड़की काकीक मन पघिल कऽ मोमिया गेल रहनि। मुदा सोलहन्नी नै पिघलल रहनि। तरक मन सक्कत रहबे करनि। खूब जोरसँ बोलकेँ जुमा फेकैत बजली- “जेकर मन असुध अछि ओकरा लिए दुनियाँ असुधे छै, अनेरे किए पड़ाएल जाइ छी। पाछू घुरि ताकू। हे मुरहा घुरि ताकू।” करिया काका पत्नीक बाजब सुनलनि, मुदा उत्तर किछु ने देलखिन। तही बीच पड़ोसिनी पाछूसँ दौड़ कऽ पाछूएसँ बाँहि पकड़ि पाछूसँ रोकैत कहलखनि- “हमरा लिए जेहने अहाँ, तेहने ओ[1]। तेहल्ला बनि कहै छी- घरसँ पड़ाउ नै, दुनियाँमे केत्तौ जाएब, पेट-माथ संगे रहत। ओकरा सुधारि लिअ। आब ऐ उमेरमे अनेरे केतए वौआइले जाएब। पेट-ले भीख मांगि खाएब से नीक भेल?” पड़ोसिनीक बोल करिया कक्काक कानक ठेकीकेँ ठेलि मन तक पहुँच गेलनि। मन तँ मने छी केतौ आध मन, केतौ चौथाइ मन, केतौ एक-बटे तीन, तँ केतौ एक-बटे पाँच, तँ केतौ सवा मन, डेढ़ मन, पौने दू मन तकक सीमा-सड़हद तँ छइहे। मुदा से बात करिया कक्काक मनमे नै उठलनि, परिस्थितिक अनुकूल ई उठलनि जे जहिना अनभुआर जगहमे माल-जाल पएरो बाड़ैए आ मलकबो करैए, मुदा बिसवासू तँ कोनो एक्केटा अछि, चाहे पएर बाड़ह,चाहे मलकह। मलकै काल जँ काँट गड़तै तँ अपने मलकबक गुण बूझत तखनि जे मलकबे करत तँ मलकह...। करिया कक्काक अपन दैनंदिनक सूत्र गड़बड़ा गेलनि। जे उचितो तँ अछिए, ने घरसँ सभ दिन पड़ाइ छला आ ने ओहन सूत्रकेँ बुझैक खगता छेलनि, आ ने ओइपर नजरि गेलनि। मुदा अाइ तँ पड़ोसीक पछड़ा अछि। एक दिस घरक देवी दोसर दिस पड़ोसिनी-देवी। एकटा दइवाली, एकटा लइवाली। मुदा वाह रे अज्ञान! केहनो प्रश्नक उत्तर ठोरपर सदिकाल रखैए। ज्ञानकेँ तत-मती होइ छै। मुदा अज्ञानकेँ कोन लाज-धाक छै जे तत-मती रहतै। तँए कि अज्ञान निरलज अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकै छै, वेचारा अपन मान-अपमान उठा कऽ पीब गेल अछि। जेकरा माने-अपमान नइ छै, से अनेरे किए ऐ पाछू दौड़त। केकरो कियो बाधा कहाँ उपस्थित करै छै, जे भाय! जबरदस्ती तोरा घर रहबे करबह। तोहर खुशी छिअ जे नीक रस्ते भगाबह आकि अधला रस्ते। हमरा कोनो लाज-सरम नै अछि...। जेना किछु मनमे पीनपिनेलनि। जहाँ पीनपिनेलनि आकि भेलनि जे ई जे अनेरे देवा-देवी, देवी-अदेवीक भाँजमे पड़ि मगजमारी कऽ रहल छी। असल बात तँ ई अछि जे रावण सन महापण्डित आ रावण सन राक्षसक बास एकठाम केना भेल? भऽ सकैए, होइए। मुदा ऐ बातकेँ पहिनहि ने बुझैक छल जे पण्डिताइक मोल की? मनमे अबिते करिया कक्काक मन पड़ाेसिनीपर पड़लनि। ओना उमेरो बेसी आ वंशो दोसर, मुदा सभ दिनसँ दुनू गोरेक घर एकठाम अछि। केते पुश्तसँ हुनको परिवार छन्हि आ अपनो परिवार अछि। ने एक जाति आ ने एक दियादवाद, मुदा तैयो बोली-चालीसँ लऽ कऽ मनगानी-जिनगानी तक केना निमहल अछि। ओना भैयारीक भाइक बँटवारा पड़ोसी पैदा करैए। जइसँ दियादवाद, पड़ोसवाद बढ़ैए। मुदा दोसरो पड़ोसी तँ छथिए जे दियादवाद आकि पड़ोसवादसँ अलग छथि। ओना पड़ोसियोपन आ वंशोपन तँ अछिए। मुदा पड़ोसीपनक बीच अन्तरो तँ अछिए। अन्तर एते अछि- एक दिस दियाद आ राहरिक दालि जेते ढहै छै तेते रंगरो आ सुआदो बनबै छै, तँ दोसर दिस पट्टा-कुरथीकेँ बिनु दरड़नौं तँ दालि सुअदगरो आ रंगरो तँ बनिते छै। तेतबे किए, केतौ मीठ, मीठनूनो बनैए तँ केतौ दालियो दालचीनी नै बनैए सेहो बात तँ नहियेँ अछि। जैठाम करिया काकाकेँ बुझैमे दम नै अँटनि तेतए हाँफए लगथि। तही बीच पड़ोसिनी दोहरबैत कहलकनि- “अनेरे कोन िततम्हामे पड़ल छी। भिनसुरका पहर छिऐ, घूमै-फिड़ैले लोक बहराएत, पत्रकार जकाँ तेतेक सवाल पुछत जे अनेरे माथा ढील भऽ जाएत। तइसँ नीक भरमे-सरमे चलू। अनेरे किए कियो दोसर दुनू बेकतीक झगड़ा बूझि कठिया-लाड़नि चलौत।” पड़ोसिनीक बात करिया काकाकेँ जँचलनि। अपनो बूझल रहनि जे पुरुख तँ बहरबैया सभ दिन रहला तँए पड़ाएब अधला नै। मुदा झगड़ा करि कऽ पड़ाएबो तँ नीक नहियेँ भेल। जँ सएह हएत तँ सृष्टीए अँटैक जाएत। जखने खेत जकाँ अँटकल कि उपटब शुरू हएत। पड़ोसिनीक विचार मानैत करिया काका एकटा शर्त लगबैत बजला- “जखनि घूमि कऽ जाएब तखनि पहिले काज फड़िछाएब भेल। से जँ फरिछा दी तखनि घूमब?” जेना पड़ोसिनीक ठोरेपर रहनि तहिना बजली- “ब्रह्म मुहूर्तमे कियो ब्रह्मक उपासना करै छथि, तँ एहेन की कियो नै छथि जे दौड़ि-दौड़ि छाती सक्कत करै छथि।” पड़ोसिनीक बातपर बिनु सोचनहि करिया कक्काक मुहसँ खसलनि- “हँ से तँ छथिए।” बजैक वेगमे तँ करिया काका बाजि गेला मुदा लगले मन पड़लनि, योगक्रिया तँ नीक छी, मुदा पछिला एते नमहर इतिहासमे पाछू पड़ल, किए? मुदा आब उपाइये की? करिया काका तँ घरमुहाँ भऽ गेल छला। गुड़की काकीक तामस अखनो तक नै कमल छेलनि। मने-मन खौंझ उठै छेलनि जे एहेन सियाखी पुरुखे की जे अनेरे सियाखमे जाने गमबाए। कुकुर जकाँ अपने खून पीब रस लिअए। भगवान रच्छ रखलखिन जे लगमे छेलियनि। जँ अनका बेटा जकाँ हमहूँ बेटा-पुतोहुक संग परदेशमे रहितौं तँ की अखनि तक सराध नै भऽ गेल रहितनि। भेल ई जे पछिला अन्हरिया पख माघमे पूसेसँ लधाएल शीतलहरी दौगल आबि रहल छल। तैपर कश्मीरी हवाक पथराएल लहकी, आ ऊपरसँ बंगालक खाड़ीसँ उठल मेघ बरिस गेल छल। असाध कनकनी पसरि गेल छल। आने दिन जकाँ करिया काका अढ़ाइए बजे उठि कऽ नित्य क्रियामे लगि गेला। छोंछसँ लऽ कऽ आचमन धरिक जेते पानिक काज बैशाख-जेठमे करथि, तहिना जाड़ो-ठाढ़ मासमे करिते छथि। कलपर सँ घूमि कऽ अबैत-अबैत जाड़क असरिसँ खसि पड़ला। धड़फड़ाएल खसबक अवाज सुनि गुड़की काकी दौग कऽ लगमे पहुँच, लटुआएल देहकेँ पजिया कऽ समेटि ओछाइनपर अनलनि। कियो दोसराइत परिवारमे नै। आन किए औत? भोज खाइबेर जाति-जवार भँजियबै छिऐ आ बेर-विपतिमे पड़ोसिया फड़त! मुदा...? मुदा हाइ रे मिथिलांगना! जे अपन संग आकि दोसराइतिक संग मिलि मिथि-मालिनी बनि चुहटि कऽ पकड़ि लेती ओ अपन व्रतकेँ प्रियवत बनबैत प्रियात्मा बनि परमात्माक बीच साक्षात्कार लइ छथि। मुदा से नै, गुड़की काकीक तामसोक कारण छेलनि। कारण छेलनि जे जिनगीकेँ सम्हारि कऽ चललासँ लोक पाओल नै जाइए। जखने बेसम्हार हएत तखने रंग-बिरंगक अक्रमित हेबे करतै। ओना करिया कक्काक इच्छा रहनि जे आगू-आगू पड़ोसिनी चलनि। मुदा पड़ोसिनीक मनमे शंका रहनि जे भगौआक कोन भरोस, जे घरसँ भागि सकैए ओ रस्ता-बाटसँ नै घूमि कऽ भागि सकैए? ओना करिया कक्काक मनमे रहबे करनि जे जखनि पड़ोसियाक मध्यस्तमे आबि गेल छी तखनि बीचमे कोनो बाधाक बीआ रोपब नीक नै। तँए बेसी जोर-जार नै करैत करिया काका आगू-आगू डेग उठौलनि। एक दिस पएरक नापल डेग उठबथि, दोसर दिस आँखि उठा घर दिस तकलनि तँ किछु झल जकाँ बूझि पड़लनि। मनमे उठलनि पत्नीक कहल- ‘असुध मन!’ ...कोन बेजा बात कहली जे अहाँक मने असुध अछि? अशुधो-शुद्धोक की सींग-नांगरि छै? जहिना कखनो भूत वर्तमानमे नाचि देखिनिहारेकेँ भुतिया दइए, तहिना तँ ने भरिसक अपनो भेल? जखने केकरो मन शुद्ध हेतइ तखने दुनियोँ शुद्ध हेतइ। जँ बीचमे केतौ अशुधो छै तँ अोकरा निकालि शुद्ध कएल जा सकै छै। तइले दुनू बेकतीक बीचक सम्बन्ध तोड़ि भागव उचित भेल? मुदा तँए कि सोलहो-आना अनुचिते भेल सेहो तँ नहियेँ मानल जा सकैए। कोनो कि हमहींटा छी जे पत्नीसँ रगड़ि-झगड़ि कऽ सम्बन्ध विच्छेद करैत घरसँ पड़ेलौं। आकि हमरा सन-सन बहुत छै। मुदा शुद्धो-अशुद्ध बेराएब बाल-बाेधक खेलौना नै ने छी जे गुड़का दियौ। मन शुद्ध, वाणी शुद्ध, वाणी शुद्ध विचार शुद्ध, विचार शुद्ध काज शुद्ध, मुदा शुद्ध पानि- स्वच्छ पानि- आ अशुद्ध पाइनिक दूरीकेँ बिनु देखने-परखने केना शुद्ध बनौल जा सकै छै? वाणी शुद्ध आ विचार शुद्ध ओ तँ मात्र अक्षर बदललासँ शुद्ध भऽ जाइ छै, मुदा मूर्त रूपमे जखनि अशुद्ध भऽ जाइ छै, तखनि शुद्ध बनाएब असान थोड़े होइ छै? हँसनी-कननी आ कननी-हँसनीक रूप तँ बनियेँ जाइ छै, जइसँ धनुषक छुटल तीर जकाँ तँ भाइए जाइ छै!! आँगनक डेढ़िएपर बैसि गुड़की काकी आगूए दिस तकैत रहथि। ओना आगू-आगू करिये काका रहथिन आ पाछू-पाछू पड़ोसिनी, मुदा आगूमे रहितो करिया कक्काक धौना जेना खसल रहनि। गुड़की काकीक आँखि तरेगन जकाँ तरङ्गल रहनि। तरङ्गल ई रहनि जे पुरुख सबहक एहेन छीछे भऽ गेल अछि, जे ताड़ी-दारू पीब कऽ आएब आ ओछाइनेपर बोकरब। आब कहू जे जँ ओछाइनकेँ सुतली रातिमे धुअब तँ लोक अोइपर सुतत केना। मुदा लगले मन बदलि गेलनि। बदलि ई गेलनि जे अपना सेने से तँ नै भेल अछि, तँए केतौक ईटा, केतौक सिमटीपर साटब नीक नै हएत। मुदा फेर लगले मन तरङ्गि गेलनि। तरङ्गि ई गेलनि जे दस-बारह दिन जे एहेन समैमे दिन-राति एकबट कऽ सेवा करए पड़ल, तेकर कोन खगता छेलै। जैठाम बेसी ठण्ढ पड़ै छै तैठाम लोक छछाड़ी काटि कऽ अपनाकेँ शुद्ध बना लइए, जैठाम तइसँ कम ठरल रहल तैठाम पनि-छू करि कऽ शुद्ध भऽ जाइए, आ कोन सियाख भेल जे तमघैलिया लोटासँ छोंछ करब? मुदा पतिक नजरि खसल देखि गुड़की काकीक नजरि सेहो ओंघरा गेलनि। तँए किछु उपराग देबसँ नीक चुपे रहब बुझलनि। बिना किछु सुनने-बुझने पड़ोसिनी मध्यस्ता करैत बजली- “हम पड़ोसी भेलौं। जेहेन मिलानसँ दुनू बेकती रहब तेहेन मिलानसँ परिवार चलत। जेहेन परिवारक सिख-लिख हएत तेहने सिख-लिखक ने पड़ोसियाक पड़ोसीपन भेल। आगू जानी अपने।” कहि पड़ोसिनी प्रतिक्रिया सुनैक खियालसँ कान ठाढ़ केलनि मुदा कोनो सुनि-गुनि नै पाबि मुस्की भरैत विदा हुअ लगली आकि पाछूसँ गुड़की काकी बजली- “दीदी, बजली तँ बड़ निम्मन बात। मुदा एकटा कहने जथु- हम ओहन जनाना नै छी जे पुरुखपर ओंगठल रहब आकि पुरुखकेँ ओंगठौने रहब। अपन-अपन जिनगीक बर-बेमारी अछि खाइ-पीऐसँ जीबै धरिक उपाय करैक अछि, तैठाम जे ओंगठा-ओंगठी हएत तँ इहे कहथु जे अपन जान देखब कि हिनकर देखबनि?” गुड़की काकीक बात सुनि पड़ोसिनी ठमैक गेली। गुड़की काकी दिस नजरि गड़ा देखए लगली जे अनभुआर बात बजली आकि भुआर बात। भुआर परीछा भेल अनभुआर जानैक इच्छा भेल। पड़ोसिनीकेँ चुप देखि अपन चुटका सम्हारैत गुड़की काकी दोहरौलनि- “चुप भेने हेतनि, पुरुखक मुँहक कोनो ठेकान अछि। लगले पतिव्रत कहि टिरका देता अा अपना बेर मे गबदी मारि देता। बजबे ने करता जे स्त्रीव्रत-नारीव्रत की छी!” गुड़की काकीक बात पड़ोसिनीकेँ नीक लगलनि। ठोर-रंगू राँगी धान जकाँ विहुँसली। पड़ोसिनीक विहुँसी गुड़की काकीकेँ सेहो विहुँसा देलकनि। पड़ोसिनी विदा होइत बजली- “हे बहिना, बड़-बड़ लीला अछि मोरंगमे। तखनि तँ फुटा कऽ एते सुनि लैह जे तोहर पनचैती हम करियऽ आ हमर तूँ करऽ, तइसँ नीक ने भेल जे केकरो कियो किए खगैत काजकेँ आरो खगाएत। अपन-अपन फड़िछौठ लोक अपना बुधिये करह। जखने छोट बुधिबलाक पनचैती नमहर बुधिबला करतै, तखने ने अोकर गरदनि-कट्टी करतै। जे अखनि बुझै जोकर नै अछि ओकरा बुझनुक बना जखनि पनचैती हएत तखनि ओकरा संग न्याय हएत।” ओना पनचैतीमे जँ पंचो हँसैत आ दुनू पक्षो हँसैत विदा हुअए तँ अो सफल भेल। मुदा करिया काकाकेँ से नै भेलनि। अखनो तक मन मानैले तैयार नै छन्हि जे जेते न्याय पत्नीक संग भेलनि तेते हमरा संग नै भेल। मुदा तीन गोरेमे दू गोरे जखनि एक-भगाह भऽ गेली तखनि तँ उनार हेबे करब। ओना करिया काकाकेँ जेते अध्ययन छेलनि ओइ हिसाबक जिनगी बना, जीबैत आबि रहल छला। एते तँ मनमे बैसिले छेलनि जे नै केकरो नीक कएल हएत तँ अधलो नै करबै। मनमे एते छन्हिेँ जे भूल-चूकमे जँ केकरो अधला भऽ गेल होइ, तँ अखनो कहह। जँ वैचारिक बात हएत तँ विचारक तराजूपर तौल देबइ, नै जँ नइ हएत तँ जे गलती भेल हेतइ तइ िहसाबसँ सकारि लेबइ। नीक जिनगी आ नीक विचार रहितो करिया काकाकेँ सौनक ओइ कोदरवाह जकाँ भेलनि, जेकरा पहिने हवा-विहारि आ झाँट झँटियबै छै, लगले पछाति मेघ फाटि पानिक वोरा देहपर उझलै छै, आ लगले पछाति तड़ैक कऽ ठनका बनि तड़तड़ा दइ छै! मुदा लगले मन घुमलनि। घुमिते विचार उठलनि, पत्नी तँ जिनगीक संगिनी ने भेली। तँए ओइ रूपे चलब तखने ने निमहत। करिया काकाकेँ गुम देखि पड़ोसिनी डेग बढ़बैत बजली- “सँए-बहुक झगड़ा, पंच भेल लबड़ा। जाइ जाउ अपन-अपन हाल-रोजगार देखू।”¦२३५३¦ १९ जनवरी २०१५ चास-बास दुनू गेल बहुत दिनक पछाति देवलाल काका भेटला। तइ भेटैमे देवलालो कक्काक दोख नै छन्हि, से बात नइ। ओना दोख अपनो नै अछि सेहो नहियेँ कहल जेतइ। ई तँ कहले जाएत जे गामक जुआन-जहान जँ बुढ़-बुढ़ानुसक हाल-चाल नै पुछनि, तँ की ओ रजे-दैवक भरोसे रहि जाथि तेकरो तँ नीक नहियेँ कहल जाएत। मुदा दोखो किए लागत, किए ने टहलि-बूलि कऽ सभसँ भेँट-घाँट करैत, हाल-चाल बुझैक कोशिश करब। तीन किलोमीटर चक्कर मारैले पएर दुरुस अछि, मुदा ओही पएरे किनकोसँ भेँट करब से मनहानि हएत। मुदा तइमे देवलालो बाबाक दोख ई तँ छन्हिहेँ जे हुनका लग समैक ठेकान नै छन्हि। आब कहू जे सभ चाहैए जे लखिया छी तँ करोड़िया बनी,करोड़िया छी तँ अरबिया बनी आ हम काका लग बैसि जे समए गमाएब से उचित हएत। गोर लागि पुछलियनि- “काकाजी, की हाल-चाल रखने छी?” जेना पहिनेसँ बुझैत रहथिन कि की, अगिला बात अपन पछुआएले रहए जे ‘किछु हमरो सभकेँ दिअ’ मुदा बिच्चेमे बजला- “चास-बास दुनू गेल।” देवलाल काका सरकारी नोकरीसँ निवृत साहित्यसँ रूचि रखैबला छथि। ओना जहिना अपन कीर्तमे रंग-रंगक नाउओं आ आभूषणो पहिरा-पहिरा ठाढ़ करै छथि तहिना गामोक लोक नाउआंे आ आभूषणोसँ हुनका सजौनहि छन्हि। माने ई जे सइओ नाआंेसँ अपनो विभूषित छथि, कखनो जोगिया तँ कखनो भोगिया कहले जाइ छथि। तइमे मिसियो भरि कुवाथ मनमे नै होइ छन्हि। जहिना लोकक नाआंे हम बीछिलौं तहिना हमरो बीछलक। ओना नाआंे तँ कतेको लोक पहिरौने छन्हि मुदा बेसी लोक कविजी कहै छन्हि। ओना कियो झामोलाल कहै छन्हि तँ कियो कथाकार। कियो नटकिया कहै छन्हि तँ कियो फटकिया सेहो कहिते छन्हि। मुदा तइ सभले मन साफ छन्हि, भाय!भगवान जखनि बजैले सभकेँ मुँह देने छथिन तँ कियो अपना मुहेँ बाजत किने, तइले अनका तामस किए उठत। जे कियो हमर कविता पढ़लक आकि सुनलक, ओ जँ कवि कहलक, तँ कोन अनरगल कहलक। तहिना जँ कियो नाटक पढ़ि नटकिया कहैए तँ कोन अनुिचत कहैए। आ जे किछु ने पढ़लक ओ जँ झामेलाल कहैए तँ कोन बेजए कहैए। कियो नाटक देखलक मुदा पढ़लक नै, ओ जँ फटकिये कहैए तँ कोन अनुचित कहैए। तहिना जँ कियो कथोकारे कहैए तँ किए लागत। गौआँ-घरुआ जकाँ हम की कथाकेँ गारि बुझै छी जे हमरा लागत। तीन साल पहिने देवलाल काका जिला कार्यालयसँ सेवा-निवृत भेला। गामेमे रहै छथि। ओना नोकरीओ-समए गामसँ सम्बन्ध बनौने रहला, मुदा सेवा-निवृतिक पछाति सोलहन्नी गामेमे रहै छथि। स्पष्ट विचार छन्हि जे जइ जगहक चर्च रचनामे करै छी, जँ ओइ जगहपर ठाढ़ भऽ रची तँ ओ बेसी नीक हेबे करत। किरानीक नोकरीमे रहितो देवलाल कक्काक मन कहियो ने अलसेलनि। जे भरि दिन ऑफिसक फाइल तैयार करैत-करैत हाथक पाँचो आँगुर काजे ने करैए। भरि दिनक तेते थकान अछि जे ने पेन दिस आँखि उठैए आ ने कागज दिस। मुदा तइसँ फराक जिनगी देवलाल कक्काक रहलनि। अपन नियमित काजक सिलसिला रखने छला जइसँ आॅफिसोक काज नै बेसिआइ छेलनि। तइमे एकटा ईहो गुण बनौने छला जे आन संगी-साथी जकाँ नै जे आनो-आनो आॅफिसक फाइलक ठिकौती लइ छला। दरमाहापर संतोख छेलनि। ओना घूस कहि कऽ घूस नइ लइ छला, मुदा जहिना सरकारी रेट काजमे बान्हल अछि तहिना ऑफिसक कर्मचारीक फीस काजे-काज बान्हल रहिते अछि। जे सभ बुझै छथि। तेकरा देवलाल काका अधला नै बूझि उलफी कमाइ करैत रहला, आ स्पष्ट बजबो करै छला जे खाइते-पीविते रामलला। जे आएल से खाइ-पीबैमे गेल। दरमाहा दिन दरमाहा भेटबे करत। तइसँ ई छेलनि जे ऑफिसक जेते साहित्यसँ रूचि रखैबला छला तिनका सबहक बैसार एकठाम करिते छला। जे से एकटा समदर्शी समाज बनले छेलनि। तइमे खर्चो होइते छेलनि, तैसंग ईहो छेलनि जे अपनो पत्र-पत्रिका आ किताब पढ़ैक चसकी लगले छन्हि। परिवारक लेल एते जरूर केलनि जे बेटा-बेटीकेँ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ आ बिआह-दान दरमाहाक पैसासँ करा कऽ निचेन भऽ गेल छथि। अपनो बुझले छेलनि जे फल्लाँ दिन तक दरमाहा भेटत, पछाति पेंशन भेटत। तैसंग जे जमा-जिगिर अछि सेहो भेटबे करत, निचेनसँ जिनगी खेपि जाएब। तँए जहिया तक सेवा निवृत भेला तहिया तक ने मनमे मलिनता आ ने मुँहमे उदासी आएल छेलनि। एबो केना करितनि। दरमाहा अधिया हएत, तेकर भरपाइ तँ जमासँ भाइए जाएत। सोझ हिसाब रहनि जे बैंकक सूदि ओकरा भरि देत, तँए जिनगीमे केतौ टूट-फाँट नै बूझि पड़नि। जखनि टुटे-फाँट नै तखनि मुहेँ किए मलिन। मुदा से भेलनि नै, कचहरिया जमाए, धुरुफन्दा लोक, अपन हिस्सा-ले विरोध कऽ देलकनि। भाय, सर्वे भवन्तु सुखिन: ई सूत्र भेल, मुदा अपन बेटो-भातिज आकि दियादोवाद किए बेइमान कहैए, घेँटकट कहैए?जखनि बेटा-बेटीक बीच बाप एकरूपता नै आनि सकैए तखनि दुनियाँक सभ मनुख मनुखे छी से केना भऽ सकैए? आ केते सम्भव अछि? जखने जमाए विरोध केलकनि कि दुनू बेटा फाँड़ बान्हि विरोधमे तैयार भऽ गेलनि। किछु छी तँ माल-पत्तर छी किने। अपने देवलाल काका पाछू हटि देखथि तँ िहसाव केतौ ने गड़बड़ बूझि पड़नि। तहूमे रामायणमे पढ़नहि छथि जे रावणकेँ एक लाख बेटा, सवा लाख नाइत छेलनि। बेटा-नातिक चर्च अछि नइ कि बेटा-पोता आकि बेटी-नातिक। माने ई जे बेटा संग पुतोहु तेकर धिया-पुता पोता-पोती भेल, तहिना बेटी संग जमाए आ धिया-पुता नाइत-नातिन भेल। दुनू तँ एकरंगाहे भेल तैबीच अपने पड़ि गीजम-गीज हएब से नीक नै बुझलनि, जे से दुनूकेँ- बेटो आ बेटीओकेँ- कहि देलखिन जे अहाँ सभले कमेबो केलौं आ जमो केलौं हमरा ओइसँ कोनो मतलब नै। जमा छोड़ि पाछू ऐ खियालसँ हटला जे दरमाहा जकाँ नै महीने-महिना पेंशन भेटबे करत तखनि चिन्ते कोन अछि। अनेरे जे बूढ़ देहकेँ कोट-कचहरीमे रगड़नियाँ देब तइसँ नीक ने भेल जे कमसँ कम केकरोसँ ने मुहाँ-ठुठी हएत आ ने अपन दौड़-धुप। बुझले अछि जे कोट-कचहरीक रगड़ केहेन होइ छै। नामक एकटा अक्षरक गलती सही करैमे तीन बरख लगै छै। तहूमे पाइ-कौड़ीक बात छी रगैड़िते-रगैड़िते सभटा झाड़ि लेत। अनेरे फेड़मे पड़ब हएत। मनमे भेल जे जहिना मन खसल छन्हि तहिना मुहसँ निकललनि जे ‘चास-बास दुनू गेल।’ गिरहस्तक चास जोता जमीन भेल आ बास धराड़ी भेल मुदा जे जिनगी भरि नोकरी केलनि, नोकरी जीवनक आधार छेलनि, तिनका मुहसँ निकलि रहल अछि जे ‘चास-बास दुनू गेल!’ हिनकर चास भेलनि दरमाहा आ बास भेलनि भाड़ाक डेरासँ लऽ कऽ अपन घर-दुआर, तखनि किए एहेन बात बजला? फेर मन चनकल, चनकल ई जे साहित्यिक लोक छथि, जँ किछु घुमा कऽ कहि देने होथि जे बुझिए ने पबैत होइ। मुदा अनेरे एते मनकेँ बोन-झाँखुरमे किए वौआएब, जखनि सोझहेमे छथि तखनि पुछिए किए ने ली जे अनेरे गुन-धुनमे पड़ल रहब। पुछलियनि- “काका, की चास-बास चलि गेल। देखै छी जे केहेन निरोग बनि सेवा-निवृत भेलौं, अनका जकाँ ने कहियो घूस-घास दुआरे जहल गेलौं, आ ने कहियो एको दिनक दरमाहा कटेलौं आ ने एकोबेर सस्पेंड-िडसचार्ज भेलौं,तखनि किए एहेन अशुभ बात मुहसँ खसल?” हमर बात केते नीक लगलनि आकि अधला लगलनि से तँ ओ जानथि मुदा मन छ-पाँच करए लगलनि से बूझि पड़ल। किछु बाजि नै रहला अछि, एना किए भऽ गेलनि, से नै बूझि पबै छेलौं। ओना देवलाल काका बजैक वेगमे तँ बाजि गेला जे ‘चास-बास दुनू गेल’ मुदा पछाति मनमे एलनि जे अनेरे एहेन बात किए बजलौं। जैठाम मुहेँसँ सभ काज होइ छै तैठाम अधला काजक चर्चे फाजिल। केकरो कियो एक साँझ खाइयोले दइ छइ जे पेट जुड़ेने मनो जुड़ाएत, आ जुड़ेलहा मने नीक-अधलाक विचार करत। मुदा देवलाल काकाकेँ जिनगीक संघर्ष तोड़ि देने छेलनि। बाल-बच्चाकेँ पोसै-पालैसँ लऽ कऽ पढ़बै-लिखबै, बिआह-दान करैमे कहियो अर्थक अभाव नै खटकलनि, तेकर कारणो छेलनि जे जाबे तक परिवारमे रहि बाल-बच्चा पढ़लकनि ताबे तक कोनो बेसी भारो ने बूझि पड़लनि, तहिना कौलेजक शिक्षामे सरकारी लोन उठा पढ़ेबो-लिखेबो केलनि आ बिआहो-दान केलनि। ओना लोनक असुली दरमाहामे सँ होन्हि मुदा सबदिना आमदनी रहने कहियो बूझि नै पड़नि। मनोमे बेसी भार कहियो ने पड़लनि जे से कनी ठेकानसँ जिनगीक बात बुझितथि, ऊपरे-ऊपर चलैत रहलनि। हँसी-खुशीसँ मन मगन रहलनि। मुदा सेवा-निवृतिक पछाति जेना अट्ठा-बज्जर मनमे खसलनि। केतबो बेटा-पुतोहु अा बेटी-जमाइक बीच अपनाकेँ समान्य राखए चाहलनि ओ नै रहलनि। नै रहैक कारण ई भेलनि जे जखनि बेटा अा जमाइक बीच, जमा रूपैआक हिस्सा-ले मुकदमाबाजी भेलापर सबहक मुहसँ यएह निकलै जे सभटा बुड़हेक चकरचालि छियनि। एमहर बेटा-पुतोहुक तर्क होइ जे दुनियाँमे कोन बापक सम्पति बेटी-जमाएकेँ भेल जे हमर नै हएत। जँ बुड़हा स्वीकारि लितथि तँ की होइतै। तहिना बेटी-जमाइक तर्क होइत जे सभ दिन ऑफिसेमे रहला आ कानून-कायदासँ भेँटे ने भेलनि। परिवारक सबहक मुहेँ गंजन सुनि मन गीजम-गीज भऽ गेल रहनि। तहूमे जहिना लूटिमे चरखा नफा होइए तहिना दोसर नफा ईहो भेलनि, ने बेटा-पुतोहु घुरि कऽ तकै छन्हि अा ने बेटी-जमाए। मुदा तैयो जँ भरि पोख अन्न, भरि पोख अराम भेट गेलापर मन थीर होइत-होइत थीर भऽ जाइए, सेहो ने भेलनि। बेर-बेर पत्नी कहनि- “सभ दिन हमरा नवकिये कनियाँ बनौने रहब आकि साउसो बनए देब?” मुदा देवलाल कक्काक कोन शक जे मन मानि गेल छेलनि जे देहसँ लऽ कऽ परिवार-समाज सभटा तँ लंके छी। मनुखक सूत्र सबहक मनसँ लंक लऽ कऽ पड़ा गेल अछि। घोर-मट्ठा भेल मने देवलाल काका बजला- “बौआ, एतेटा जिनगीमे जे कमेलौं, सबटा चलि गेल।” मसुआएल बोले देवलाल कक्काक बात सुनि अपनो मन मसुआ गेल। पुछलियनि- “केना चलि गेल?” बेथाएल मन देवलाल कक्काक, कुहरि-कुहरि बजला- “बौआ, तीनटा अपन चास छल आ तीनटा बास छल, मुदा सब चलि गेल।” ‘तीनटा चास आ तीनटा बास’क अरथे ने बुझलौं, जे दृष्टिकूटमे काका की बाजि गेला? मुदा हमर अकबकी देखि ओ बूझि गेला। बूझि ई गेला जे तीन चास आ तीन बासक अर्थ नै बुझलक। व्याख्या करैत बजला- “तीन चासक माने भेल, तीन सीराउ, जइमे एकटा भेल पारिवारिक जिनगी, दोसर भेल- अपन श्रम लगा जे पाइ कमेलौं आ तेसर भेल- साहित्यसँ रूचि रहने जे किछु सिरजन केलौं।” सोझ-साझ कक्काक बात सुनि कहलियनि- “केहेन बढ़ियाँ तँ तीनू चासो अछि आ तीनू बासो अछि।” मुदा जेना ओ बूझि गेला तहिना बजला- “परिवारमे तेहेन कटौज शुरू भऽ गेल अछि जे बेटा बेटी दिस टाड़ैए आ बेटी बेटा दिस। सूप महक बैंगन भेल छी। तहिना की कहियऽ पाँच रंगक किताब नोकरी-समए छपबौने छेलौं अा हाथसँ लिखि घरोमे रखने छेलौं। पाइक कहियो अभाव नै रहल तँए उद्गारसँ जे छपेलौं, विलहि देलिऐ। अपना-ले किछु ने बँचल, सभटा हेरा गेल। दोहरा कऽ छपबैक तागत आब रहल नै जे छपाएब...।” कहि जेना किछु सोचए लगला। मुदा सोचो तँ सोच छी केमहर बहैक जाएत तेकर ठीक नै। तँए पुछलियनि- “बास की कहलिऐ?” ‘बास’ सुनि देवलाल विस्मित होइत विह्वल भऽ गेला। विहुँसैत बजला- “बौआ, कोन मुँह लऽ कऽ अपना बासपर[2] जाएब। किछु ने रहल।”¦१६१५¦ २९ जनवरी २०१५ [1] गुड़की काकी [2] साहित्यिक समाजक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार फर्क (व्यंग्य निबंध) 1 दूटा कुक्कुर लड़ैत रहै। बड़ लड़लै। खूने-खुनाम। दूनूक भुकनाइसँ टोला-पड़ोसा परेसान। बहुतों लाठी लऽ कऽ दौड़ल। दूनू कुक्कुर हटि गेल आ कनेदेरमे फेर लड़ाइ शुरु कऽ देलक। फेर वएह रंग फेर वएह ताल। ता ओम्हरसँ तेसर कुक्कुर एलै आ हालति बुझि पहिलुक दूनू कुक्कुरकेँ कहलकै--- "एना जे लड़ै छह तँए तँ कुक्कुर छह" एते सुनिते पहिलुक दूनू कुक्कुर पुछलकै-- "तखन तों आदमी किए नै छह?" 2 हमरा इंटरनेटपर बड़ मोन लागैए। सभ किछु नेटेपर। कहियो काल क बियाहक बात चलैए तँ मोन होइए जे इंटरनेटेपर बियाह कऽ ली। एक दिनएनाहिते हम दूनू आँखि समधानि नेटपर लागल रही की ओम्हरसँ भ्राता श्री पुछला की करै छही? हम कहिलिअन्हि किछु नै बस कने इंटरनेटपर कुश्ती लड़ै छिऐ। भ्राता श्री खिसिआ कऽ कहला जे लोक अखाड़ामे कुश्ती लड़ै छै आ तों इंटरनेटपर.... हम कने कम जोरसँ कहलिअन्हि जे हमहूँ तँ कगजिये पहलवान छी ने ---- 3 एकटा छला मनभौक महराज। सदिखन बाप बलें फौदारी करऽ बला। लोकक रचनापर हँसब, दूसब आ खाली अपने बापकेँ सर्वश्रेष्ठ मानब हुनक हिस्सक छलनि। हुनकर धारणा छलनि जे आलोचना करब हमर सभहँक परम कर्तव्य अछि। नित रचि-रचि कऽ अपन बापक प्रतिद्वंदी सभहँक आलोचना करथि। ओ बेर-बेर कहल करथि--- "आलोचनासँ रचना स्वस्थ होइत छै। गलती सुधरै छै..आदि-आदि" एक दिन एहन भेलै जे एकटा आर महान आलोचकक पदार्पण भेलै आ हुनकर बापक आलोचना होमए लागल। आब ओ नित कटकटाथि। खौंझाथि। भूकथि ... आ अंतमे ओ बेर-बेर कहऽ लगला-- "लेखककें अपन रचना संतान सन प्रिय होइत छैक। संतानक निन्दा माय-बापकें कनियों नै सोहाइ छै। तँइ ककरो बच्चाकें दूसब उचित नै। दुसबाक बदला साहित्यिक रचना रूपी संतानकें अधिकाधिक नीक बनेबाक सुझाव आ सहयोग कएल जेबाक चाही" 4 आइ-काल्हि साहित्यकारो सभकेँ आगू-पाछू लटकनमा चाही। कियो प्रगतिशील छथि तँ कियो जन चतनासँ भरल तँ कियो ............ मतलब साहित्यकार बादमे बनता मुदा लटकनमा पहिने चाही। आ जँ कोनो काजसँ हिनकर नामक आगू ई लटकनमा नै लगाउ तँ खिसिया कऽ फुच्च। आ ठीक ओहने मुद्रामे आबि जेता जेना कुक्कुर सभकेँ कुक्कुर कहलापर काटऽ लेल दोड़ै छै आ "डागी" कहलापर चाटऽ लागै छै।किछु साहित्यकारक संस्कार ओहने तेज भऽ जाइत छनि जेना "पैखाना" कहलासँ भाषा महकि जाइत छै आ "पोटी" कहलासँ हुनक जीह संस्कारित। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विन्देश्वर ठाकुर आसे आसमे जिनगी (विहनि कथा) ठन्डाके मौसम्, ताइ परसँ रातिक समै। चारु दिस धोनही लागल। कान कान नै सुझय। तेँ सब गोटे सबेरे खाना खा कऽ अपना अपना बेडपर ओङ्गठल। सन्तोषबा सेहो तुरन्ते अपना बेडपर ओङगठले रहए कि फोनक घन्टी बजलै- टिङ टिङ्…. सन्तोष समै देखलक रातिक ९ माने नेपालमे १२ बजे राति। कि भेलै? अते राति कऽ मिसकल किए? सन्तोष असमन्जसमे पड़ि गेल। आ कि फेर बजलै घन्टी- टिङ टिङ । सन्तोष तुरन्त फोन केलक। फोन उठलै। कोनो कनिया बाजल। - हेल्लो केना छी ? ठीक छी ने ? हमरा तँ बिसरिए गेलिऐ, नै? सन्तोष बुझि गेल, ओ आरो कियो नै ओकरे अर्धाङ्गनी बबिता छली। ओ बाजल- हँ, हम तँ ठीके छी। अहाँ कोना छी, कहू ने? नै-नै, कोना बिसरि जाएब। केहन बात करै छी, अच्छा कहू ने की भेल? अते राति कऽ किए फोन केलौं? एके साँसमे सन्तोषो पुछलक। बबिता: अहाँकेँ तँ हमरा पर कनियो मए- स्नेह नै अछि। जँ से रहितै तँ अते दिन भऽ गेल घर नै अबितौं?देखियौ तँ लालगरबाली दिदिकेँ, ताबत भाइजी आबि कऽ फेर चलि गेलथि आ फेरो देहमे एगो बौआ छै। मुदा हमरा हमरा तँ टोलोमे सब कोइ ताना मारैए आ भगवानो हमरे पर लागल अछि। ओइ जनममे कोन धार बिगार केने रहिऐ,से नै जानि। ठीक छै ठीक छै बबिता हे सुनु न - आब कनिए ऋण तिरकेऽ के बाकी रहि गेल अछि, बुचिके बियाहक। अहाँ धिरज धरु ने, हम जल्दिए लौट आएब,एह सब कहिते रहै कि फोन बजलै टु टु,,, माने पैसा सठि गेलै मोबाइलके, मुदा बातो पुरा नहित भेलै । तखन सन्तोष सोचैए - "३ साल पहिने सादीके ६ महिना बाद जे कतार आएल रहे से गप। साच्चे देखिते- देखिते कते दिन भऽ गेलै। तखन सम्झना एलै जे बबिता गर्भवती रहै से बच्चा गर्भेमे नोकसान भऽ गेलै आ तहियासँ ने सन्तोष घरे गेलैए आ ने बबिताकेँ दोसर बौआ भेलैए। अपन कर्जा, घरक कर्जा, बहिनक बियाहमे लेल गेल कर्जा। एहसबके ऋण तिरैत तिरैत एखन धरि बित गेलै आ नै जानि आरो कते दिन बित जेतै - एम्हर आसे-आसमे सन्तोषके जिनगी आ ओम्हर ओकर धर्मपत्नी बबिताके जिनगी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.सुकोसुत शिशिर- पड़िकल जम ३.२.प्रणव झा-हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ ३.३.बिनीत कुमार ठाकुर- ३ टा कविता ३.४.आशीष अनचिन्हार-भक्ति गजल सुकोसुत शिशिर शिक्षा- स्नातक (गणित), लखनऊ वि वि. गाम- बाउर, दड़िभंगा. सम्प्रति धनबाद, झारखण्ड मे रेल मे कार्यरत पड़िकल जम काठक पाटी, करची केर कलम गाबिशे लिखल ओनामासी धं. बाँसक झोझरि बीछल कोपरि दीयाबाती खेलल उकापाती हम....१ पान-मखान बिनु मुख मलान हेराएल सोन्हगर कुट्टीक गंध. चान उतरल, इजोरिया पसरल अष्टदल अरिपन करए छल चमचम..२ कतए गेल दौनी, कथी ओसाएब जाबी लागल बरद ने घंटीक टन. मड़ुआ के पुत्ती जनेर,चिन,कण उसनल अल्हुआ लागए अमृत सन....३ सुआदे ठोकुरा कुरकुर चूरा उखड़ि-समाठ जखनि करए धम. दहीक मटकुरी, सींक लटकल चार पिच्छर घैलची, पायल बाजए छम......४ पोखरिक जाइठ, धारक मोइन सभठाम खेलल सोनाडुबकी हम. साओन-भादो पानि बरखै झमाझम भरि छाबा हेंक परखै डेगक दम..........५ धार उधिआएल,बाट-घाट भुतलाएल चानी पीटल च'र चमकए चमचम. गुन घीचति नाह, लग्गी, करुआरि झिझरि खेलल कमला-कोसीक अंक........६ रोकल न जाए, फेरो घुरिआए, मुनलो देखाए कोना करी बन्न. लागए न मोन, उरिआए बाध-बोन अछि पड़िकल जेना गाछीक जम. ..........७ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ बढ़ू जग के संग आब आगू अहूँ तोरि कुंठित समाज क कुंठित बंधन प्रगति मार्ग पर चालू दन-दन अहूँ क सकै छि दुष्ट क मर्दन पर लेबय परत संकल्प एकर दहेज़-उत्पीडन के विरोध करू एहि दानव के निषेध करू नहीं आवश्यक विवाहक बंधन बस अपन पैर पर ठाढ़ रहू हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ आब हटा दियौ लाज क पर्दा आ आँखिक नोर अंहा पोछि लिय नहीं दुर्बल बनी रहू जग में युग के बदल के ठानि लिय आब राजनीति में अहूँ उतरु पायलट, आफिसर अंहा सेहो बनु हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ आई.ए.एस या आई.पि.एस या एहि देश क अंहा भविष्य बनु अछि गौरवशाली मिथिला क इतिहास अंहा मिथिलानी क इतिहास गढ़ु हे 'मिथिलानी' आब जागु अहूँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बिनीत कुमार ठाकुर, शिक्षा-एम. ए. इंग्लिश, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, पी. जी. डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एण्ड मास कम्यूनिकेसन, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना, वृत्ति- प्रखंड शिक्षक, अंग्रेजी मध्य विद्यालय बिस्फी, मधुबनी, पता- ग्राम-पोस्ट- कमतौल, जिला- दरभंगा (बिहार) - 847304
तीन टा कविता १ कवि बनाम नेता कवि छी हम तें भुखे मरै छी जौं रहिती कोनो नेता सुखल सुखल गप्प हमहुॅं हाॅंकिती के हमरा सॅं टक्कर लेता ।। सम्मेलन मे केओ नहि आवे मंच बैस सब कवि पछतावे आयोजक के एहनि हाल जेना केओ हुनका चूना लगावे विक्रेता के रहने की हैत जौं नहि रहत क्रेता ।। आब सुनू नेता के बात सभा मे नहि धर के लात झर-झर गिरै मुस्की जेना कोनो जलप्रपात भूलोक मे एतेक लोकप्रिय की हैत जौं स्वर्ग मे जैता ।। कवि छी हम तें भुखे मरै छी जौं रहिती कोनो नेता सुखल सुखल गप्प हमहुॅं हाॅंकिती के हमरा सॅं टक्कर लेता ।। २ पार लगाउ असरा अहीं के लागल अछि, पार लगाऊ ।। टूटि टूटि बिखरल हमर संसार सजाऊ ।। अगर बिना पुजली भगवन्, नहि फूल चढ़ैली चोरी के । दीप जलैली हम प्रेम के, फेरली मनका बिन डोरी के ।। फेरली मनका बिन डोरी के ।। पीड़ा अछि एहन बड़का, ककरा अनका हम ध्यान करू । कोन ताल के जल निर्मल, कोन सरोवर स्नान करू ।। कोन सरोवर स्नान करू ।। असरा अहीं के लागल अछि, पार लगाऊ । टूटि टूटि बिखरल हमर संसार सजाऊ ।। ३ कखन ई ठंडी जाय खोंखि रहल छी राति सॅं, कखन ई ठंडी जाय, लागि रहल अछि ठंडी ऐ बेर, बनि गेल घर जमाय । बड दिक्कत हमरा सॅं पूछू, कोना नहायब अपने बूझू, हाथ-गोर अछि ठिठुरल, देह नै ई गरमाय । रौद लगै या उगत, हवा मुदा नै रुकत, घर सामान अछि पसरल, गेस्ट नै कोनो आय । एक तँ ओहिना नै बुझाय या, कारियो कनिया गोर बुझाय या, ओहि पर सॅं ई धुंध-कुहासा, स्पीड पर ब्रेक लगाय । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार भक्ति गजल शारदे शारदे शारदे नीक बनबाक आधार दे जय विजय केर संगे कनी बेबहारक सुखद हार दे नै महल नै अटारी मुदा एकटा नीक सन चार दे दूर बैसल हमर लोक वेद नीक छै से समाचार दे लोक छै आब अनचिन्हरबा किछु दे की नै दे चिन्हार दे सभ पाँतिमे 212+212+212 मात्राक्रम अछि। मक्ताक अंतिम पाँतिमे दू ठाम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.जगदानन्द झा 'मनु'- बाल गजल २.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल ३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- चन्दाक धन्धा १. जगदानन्द झा 'मनु' बाल गजल नानी गेलै देखै लेए बारीमे आलू लाइ उठा क' ओकर भगलै लालू आँखि मुनि चारमे बेंग नुकाबै छै कालू कौआ बनल कतेक छै चालू केहेन होइ छै ई भोटक नाटक बनि गेलै राज मंत्री चोरबा कालू झट पट नेना सभ दौड़ क' आबै देखही देखही कते नचै छै भालू द' दे नानी आब 'मनु'केँ दू रुपैया नै सोचै मनमे कोना एकरा टालू (सरल वार्णिक बहर, वर्ण १३) २ आशीष अनचिन्हार बाल गजल चिन्नी खेलहुँ चोरा चोरा आरो धेलहुँ चोरा चोरा भैया छै बड़का तँइ हमहूँ बड़का भेलहुँ चोरा चोरा हमरो जे कनियाँ रहितै से खुब्बे गेलहुँ चोरा चोरा गेल छलहुँ गाछी पिकनिक लेल आँगन एलहुँ चोरा चोरा जे भेटल जत्ते भेटल से सभटा लेलहुँ चोरा चोरा सभ पाँतिमे 22+22+22+22मात्राक्रम अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अलग-अलग लघुकेँ मिला कऽ दीर्घ मानल गेल अछि। एही पाँतिक अंतिम लघु अतिरिक्त अछि। ३ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल), पो॰- मकरमपुर, जि॰ – दरभंगा, पिन - ८४७२३४ चन्दाक धन्धा धियापुता सभ दूइर भऽ रहल, अपने ठोकि रहल छी पीठ । पढ़बा - लिखबा केर उमेरमे, चन्दा माँगि रहल अछि ढीठ ।। सरस्वतीपूजा केर अवसरि, हाथमे कलम आ पोथी नीक । पढ़बा - लिखबा छाड़ि कऽ देखू, चन्दा माँगि रहल निर्भीक ।। नान्हि – नान्हि टा छौंड़ा – छौंड़ी, बाँस आ बत्ती हाथ नेने । सड़क जाम कऽ चन्दा माँगए, अपन भविष्यकेँ कात केने ।। ई घटना दृष्टान्त मात्र छी, बैसल छी हम माथ धेने । पूजा हो वा ईद – मोहर्रम, चन्दा केर सभ साथ धेने ।। पूजा – पाठ आ धर्म – संस्कृति, हमरा नञि तकरासँ विरोध । उचित हरेक संस्कार – संस्कृति, जाधरि ने करइछ गतिरोध ।। उत्सव – पाबनि – परब – तिहार, जिनगी केर छी रंग हजार । बिनु एकरा एकरस जिनगी, से हमहूँ मानै छी सरकार !! पर स्वरूप ई कतेक उचित छी, अपनहिसभ कने करू विचार । धियापुता देशक भविष्य छी, कतेक उचित एहेन बेबहार ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 55 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १७१ म अंक ०१ फरबरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८६ अंक १७१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA