ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १७२ म अंक १५ फरबरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८६ अंक १७२) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.राजदेव मण्डल-जल भँवर (उपन्यास) २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघु कथा- चौरचनक दही २.३.आशीष अनचिन्हार- मेक इन मिथिला भाग-१ (व्यंग्य निबंध) २.४.१.नन्द विलास राय-लघु कथा- सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट २.प्रणव झा- अपन अपन धर्म (संस्मरण) ३. पद्य ३.१.अशरफ राईन- गजल ३.२.राजदेव मण्डल ‘रमण’ ३.३.किशन कारीगर-गजल सन किछु ३.४.आशीष अनचिन्हार-गजल ३.५. पल्लवी मण्डल- लड़की ४.बालानां कृते-१.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- मैट्रिकक तैय्यारी 5.VIDEHA FOR NON RESIDENTS Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.राजदेव मण्डल-जल भँवर (उपन्यास) २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघु कथा- चौरचनक दही २.३.आशीष अनचिन्हार- मेक इन मिथिला भाग-१ (व्यंग्य निबंध) २.४.१.नन्द विलास राय-लघु कथा- सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट २.प्रणव झा- अपन अपन धर्म (संस्मरण) राजदेव मण्डल- जनम : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्व. सोनेलाल मण्डल उर्फ सोनाइ मण्डल। माता : स्व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्त मण्डल, कृष्णकान्त मण्डल, विप्रकान्त मण्डल। पुत्री : रश्मि कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा, भाया- िनर्मली, जिला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शिक्षा : एम.ए. द्वय (मैथिली, हिन्दी, एल.एल.बी) ई पत्र : rajdeokavi@gmail.com सम्मान : अम्बरा कविता संग्रह लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्मान-२०१३ प्राप्त। प्रकाशित कृति : (१) अम्बरा- कविता संग्रह (२०१०), (२) बसुंधरा कविता संग्रह (२०१३), (३) हमर टोल- उपन्यास (२०१३) श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित। अप्रकाशित कृति- चाक (उपन्यास), त्रिवेणीक रंग (लघु/विहनि कथा संग्रह)। जल भँवर उपन्यास १ पंचमीक राति अन्तिम पहरपर लटकल अछि। केतौ एकटा चिड़ै चुनचुनाएल। राजेसरक देह चौकीपर पड़ल अछि मुदा मन सपनामे दौगैत-पड़ाइत। निन्नमे डुमल साँसक तीव्रस्वर। ओइ गतिसँ दौगैत सपनामे केतएसँ केतए पहुँच गेल अछि। ओ देखि रहल अछि, सपनाक रंग भरल चित्र...। गाछक निचला भाग अन्हारमे डुमल अछि। ओइ अन्हारमे ओ ठाढ़ भेल अछि। धरती अा अकासक बीच विचारकेँ पकड़ने। अकस्मात भयंकर अट्टाहास सुनाइत अछि। राजेसर चौकैंत अछि। आकि पाछूसँ केकरो कनबाक स्वर ओकरा हिला दैत अछि। चारूभर तकैत अछि। वायुक गति बिहाड़ि सन। आगूमे जेना किछो गरजल। देखैत अछि जे राक्षस सन आकृतिबला एक हाँज जीव ठाढ़ भेल। ओ सभटा एकेबेर आक्रमणकरबाक लेल दौगैत अछि। जान बँचेबाक कोनो उपाय नै सुझैत अछि। लपकि कऽ ओ डारि पकड़ि गाछपर चढ़ि जाइत अछि। आक्रमणक मुद्रा बनौनेजीव सभ लपकबाक लेल चेष्टा कऽ रहल अछि। डरे थरथराइत राजेसर ऊपरका डारि पकड़बाक यत्न करैत अछि। किन्तु डारिकेँ पकड़िते मोचरा जाइत अछि। मोचराएल डारिपर लटकल राजेसर चिचिया रहल अछि। डारिकेँ कड़कड़ाइते राजेसरक धुकधुकी तीव्र भऽ जाइत अछि। भंयकर जीव सभ फानि-फानि कऽ ओकरा पकड़बाक कोशिश कऽ रहल अछि। बँचबाक लेल ओ एमहरसँ अोमहर डारिपर झूलए लगैत अछि। ओकर देह कखनोअन्हारमे तँ कखनो इजोतमे चलि जाइत अछि। तखने सौंसे गाछ कड़कड़ा उठैत अछि। राजेसर जोरसँ हल्ला करैत अछि- “हौ भागै जा... जल्दी। गाछ खसि रहल छै। तऽरमे पिचा जेबहक।” भयानक जीव सभ उनटि कऽ तकैत भागि रहल अछि। ओकरा सबहक आँखिमे परेम आ घृणा दुनू भरल अछि। तखैने राजेसरक जेठ भाय- जागेसर जोरसँ हल्ला करैत अछि- “रौ... राजेसर। उठ जल्दी। भिनसरबा भऽ गेलै। चल हमरा धार तक पहुँचा। नाह सबेरे खुगै छै।” राजेसरक सपना भंग भऽ जाइत अछि। डरसँ घमाएल देहकेँ पोछैत अछि। साँसकेँ सहज करैत बाहर दिस तकैत अछि। घरसँ बाहर इजोत हुलकी मारि रहल अछि। जारी...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल लघु कथा- चौरचनक दही कुशी अमवसियाक परात। आइसँ चौरचनक दही पौड़ल जाएत। सुतले रही कि पत्नी देह डोलबैत बजली- “सभ कियो दूध आनए जाइए आ अहाँ सुतले रहब।” गाढ़ नीनमे रही तखन ‘दूध आनए जाइए’ से बजली मुदा नीन टुटला पछाति ‘अहाँ सुतले रहब’ सुनलौं। ओना सुतैक इच्छा अपनो रहए आ अपना मनोकेँ। किएक तँ भादो, माघ आ जेठ मास जँ सूतल-सूतल बीतए तँ ओइसँ नीक की हएत। यएह ने भेल राज सुख। तहूमे आब कि भादो ओ खिच्चा रहल आकि अजोह रहल आब तँ अदहा परक अमवसिया सेहो बीति गेल, मुदा कड़कड़ाएल भादोक जुआनी तँ अछिए। ताकल आँखि बन्न भऽ गेल। पुन: दोहरबैत पत्नी बजली- “एक-एक किसान- गाए-महींस पोसनिहार-केँ जेते दूध होइ छै तइसँ बेसी लेबाले सभ पहुँच गेल हएत। तैठाम जँ अगुआ कऽ नइ जाएब, तँ दूध हएत?” ओना मन सुतैक रहए मुदा पावनिक दूध छी, जँ नै हएत तखनि पावनि केना हएत। तैसंग मन सुतैपर टंगेने ईहो भेल जे आब कि कोनो गाए कि महींसबला सुच्चा दूध थोड़े दइए, पानि मिला दूध बेचैए। मुदा लगले भेल जे पानियोँ मिला कऽ जे दइए तँ दइतो तँ दूधे कहि कऽ अछि। आ कहवेटा थोड़े करैए, दूधेक दामो तँ लइते अछि। तखनि तँ भेल जे दूध-पानि दुनू बरबरि...। ...फेर भेल जे जँ दूध-पानि दुनू बरबरि भेल तखनि अनेरे लोक एते हरान भऽ कऽ गाए-महींस किए पोसैए, इनारे-पोखरि किए ने एकेबेर खुना लइए जे पुस-पुसताइन चलैत रहतै। मुदा पेट-पेटक अपन-अपन महत छै ने, केकरो पेटमे पानि रहै छै, केकरो पेटमे दूध रहै छै, केकरो पेटमे बीख रहै छै तँ केकरो पेटमे अमृतो तँ रहिते छै। मुदा लगले मन उछैट गेल। उछैट ई गेल जे दूधोकेँ तँ लोक पनिछरहा दूध कहिते छै। माने ई जे जरसी वा आन-आन किसिमक जे गाए अछि ओकरा दूधकेँ पनिछराह दूध बूझि दामो कम दइए आ खाइक परियासो कम करैए। किए ने कम करत, ओकर पनिछरहा छालही, डारही, दही तक ने पनिछराहे हेतइ। ओछाइनेपर मन अकछि गेल जे अनेरे कोन लफड़ामे पड़ि गेलौं। दूध-पानिक फरिछौट खेनिहारे-पोसनिहारे अपन करत। कुत्ता रहै केकरो आ किदनि देखै आन। मुदा अपने तँ केतौ ने छी ने खेनहारे छी आ ने पोसनिहारे। पावनिक नामपर साल भरिपर दर्शन दहीक होइए। से केहेन दर्शन करब, मक्खनबला दहीक आकि पनिछरहाक? मन घुरिया गेल। घुरिया ई गेल जे दूधपनियाँ जकाँ दूध होइए। जइमे पानियोँ फेंटि देने तँ पचिये जाइए। मुदा डिब्बाबलामे तँ से नइ हएत, ओइमे हाफ क्रीम, फुल क्रीम दुनू रहै छै, जखनि दूधक सभ गुण अछिए, तैसंग ईहो अछिए जे गरदाएल रहैए, पानिक केतौ दरस नै रहै छै। अपना मने जेते फुड़त तेते पानि दऽ कऽ तेहेन दूध बना लेब...। ...फेर भेल जे जँ कम पानि दऽ कऽ गहुम-चाउरक चिक्कस जकाँ सानि कऽ मटकूरमे पाथि देबइ, ओहो तँ दहीए भेल। अनेरे किए एक बेर दूध आनब,दोसर बेर जोरन-ले वौआएब, सेहो केतौ मंगनी भेटत तँ भेटत नइ तँ दोकानसँ कीनि कऽ आनए पड़त, फेर ओकर ताकक गरे अमहौर देबइ, तखनि ने दही हएत। बड़ मेठनि अछि। मनमे अबिते पत्नीकेँ कहलियनि- “जेकरा-ले नोर बहावी, तेकरा कोनो ढेकारे ने।” पत्नी चौंकली। हम दूध आनैले जाए कहै छियनि आ ओ नोरक गप कहि देलनि! मुदा अनठेकानी किछु अनुमानो करब तँ नीक नहियेँ हएत। पानिक ऊपरसँ केना बुझबै जे थलगर अछि कि पंकिगर, पीछड़ाह अछि कि घुच्ची-घाची छै। रोड़ा-पत्थर छै आकि काँट-कुश। तँए नीक हएत जे पुछिए किए ने लियनि- “केकरा-ले नोर बहबै छी आ ओकरा ढेकारे ने छै?” मनमे खुशी भेल। खुशी ई भेल जे अनका जकाँ नहि ने जे अपना मने कऽ लेब आ दोख लगा देब घरक पुरुखकेँ। एते तँ जरूर भेल अछि जे पत्नी मनक बात बुझए चाहै छथि। कहलियनि- “अहींक दुख-धंधाक बात सोचै छी। मुदा से अहाँ बुझब थोड़े, कखनो देह पकड़ि डोलबै छी तँ कखनो बाँहि पकड़ि झमाड़ै छी।” पत्नीकेँ बूझि पड़लनि जे हमरे दुआरे मनमे बेथा छन्हि। जहिना मन-चोभिया नाचमे नंगेड़ाक संग डिगरी गिरगिराइत रहैए तहिना गिरगिराइत बजली- “हमरा दुआरे जँ मनमे वेदना अछि तँ लिअ, हम गलती मानै छी।” मन चपचपा गेल। मुँह-आँखि गम्भीर बनबैत बजलौं- “अखनिसँ दूधकेँ औंटै-पौड़ैमे लगल रहब, तइसँ नीक ने जे पौडरबला दूधकेँ सानि कऽ मटकुरीमे पावनियेँ बेर थोइप देब आ टटके दही खाएब।” मुदा हमर गप हुनका नीक नै लगलनि। पिनकि गेली। पिनकैत बजली- “अपन कोंढ़िपना दुआरे हमरा कोंढ़नी बनबै छी। हमरा कि नइ बुझल अछि, जे अरबा चाउरकेँ पीसि कऽ पिठरिया दही पौड़ लेब।” की करितौं, भोरे-भोर पत्नी-मुहेँ ‘कोढ़िया’ सुनि कनी इर-खा मनमे इर जगल। झझकारि कऽ बजलौं- “कनी दू घुस्सा मुँहमे दऽ कुर्ड़ा केने अबै छी ताबे लोटे आकि कमण्डले अखारि कऽ राखू। अखन चाह-ताह नै पीआउ, आइ पौडरबला दूधक चाह नहि, महींसे दूधक चाह पीब।” ओना पत्नीकेँ दुलरबैत कहलियनि मुदा मनक तमतमी नइ मिझाएल रहए। घरसँ भागल लोकक डेग जहिना झटकल होइत तहिना दरबज्जापर सँ निकललौं। ओना मनमे ईहो भेल जे एक बेर पाछू उनैट नजरि देखि लियनि मुदा जाबे तमतमी कमै-कमै ताबे डेढ़िया टपि रस्तापर चलि एलौं। रस्तापर अबिते तरंगल मन जेना वीणाक तार जकाँ तरंगित भऽ गेल। तरंगित मनमे पवन पाबन पावनि उठि गेल। जाबे पावनिक जोगाड़ नै करब ताबे हँसी-खुशीसँ मनाएब केना। जोगाड़ो की कोनो एके-आध टाक करए पड़त, तीन दिन पावनिक जोगाड़ेमे लगत। दूध बसियाएत तखनि दही बनत, दही तक अबैत-अबैत मन थीर भऽ गेल। थीर होइते मन चौरासी लाख जीवपर चलि गेल। कोनो दूध-पीवा तँ कोनो बिनु दूध-पीवा, मुदा छी तँ सभ जीवे-जन्तु। जेते मन फरीच करऽ चाही,तेते घोराइते गेल। घोराएले मनमे उठल, जीव तँ गाछो-बिरीछ छी, जे जीवो-जन्तुसँ नमहर होइए ओ कोन दूध पीबैए। बड़ पीबैए तँ सिरक गरे पानि पीबैए। मुदा ओकरा दूध नै होइ छै, सेहो तँ नहियेँ कहल जाएत। चौबली नीचाँ-ऊपर सीरबला गाछ, बिनु सिरबला गाछ आ बर्ड़ूबला गाछ केकर दूध पी कऽ एते-एते अछि...? ...फेर मन ओझरा गेल। ओझराइते आगू बढ़ल, ओह! जखनि एतए तक आबिए गेलौं तखनि झिंगुर काकाकेँ सेहो भेँट काइए लेबनि। बहू दिन भेँट भेना भऽ गेल। तहूमे आब निच्चाँ मुहेँ भेल जाइ छथि, आँखियोक रोशनाइ दिनो-दिन कमियेँ रहल हेतनि। िचन्हबो करता कि नै। मुदा फेर भेल जे जखने हाथ कहबनि जे ‘जोड़ि गोड़ गलै छी’ तँ अो अनेरे ने बोलीसँ परेखि लेता। मुदा बीचमे एकटा काजक झंझट तँ अछिए, पहिने दूधले जाएब कि हुनकासँ भेँट करबनि। फेर भेल जे जँ दूहैमे देरी हेतै तँ कमण्डल रखि कहि देबइ। नइ जँ दूहा गेल हएत तँ दूध लऽ लेब। जँ से नइ केने रहब तँ जहिना खिसिया कऽ घरसँ निकललौं तहिना पहुँचिते खिसिऐनीसँ फेर भेँट हएत। अनेरे किए खिस्सा-खिसनीक भाँजमे पड़ब। महींसोबला शिकारी, ओ महींस दूहबे ने केने रहए। महींस बोली दइ, मुदा ओहो दोहरी लाभक भाँजमे- पहिल जँ महींस डिरिआइत-डिरिआइत पन्हा जाएत तँ पर्ड़ूकेँ घासो-तासो दऽ कऽ निमाहि लेब। तैसंग दूधक गहिंकीओक भाँज-भुँज लगि जाएत। नपै-जोखैक भाँज बुझले रहए। दूहि कऽ पहिने आँगनमे ढार देत तखनि ने दरबज्जापर आबि बेचत। बुझले हिसाब छै, तीन हिस्सा दूध निकालि कऽ रखि तीन हिस्सा पानिक ढार दऽ नेने औत। जँ रतुका दूध रहितै तँ हाथेसँ गाव निकालि लेने रहैत। मुदा से नै रहै। तहूमे जँ कियो किछु बजबो करत तेकरा थोड़े चलए देत। थनसँ दूहि कऽ सभकेँ देखा देत। कोनो कि कच्चा खेलाड़ी अछि कि पुश्तैनी अछि। जखनि राम नामक लूटे भऽ रहल अछि तखनि की ओहए एहेन अछि जे छूटि जाएत। दरबज्जापर पहुँचिते मलकार पुछलक- “भाय साहैब, केते दूध लेबइ। अखनि नइ दूहलौं, कमण्डल रखि दियौ। नापि कऽ रखि देब।” सवुर भेल। सवुर होइते पत्नीक आदेश पालनक वफादारी बुझिते मनमे खुशी भेल। कहलिऐ- “कनी झिंगुरकाकासँ भेँट करए जाइ छी जँ कनी अबेरो भऽ जाए ते विथुत नइ करिहह।” बन्हौटा गहिंकी जकाँ मलकारक मनमे खुशी भेलै। बिसवास दिअबैत बाजल- “अखन ते भिनसरे अछि जे दुपहरोमे अबितौं तँ की विथुत हुअ दइतौं।” ओना झिंगुर काकासँ भेँटक अँटावेश देखि मन फुलाएल रहए मुदा मलकारक आश्वासन सुनि हवाक लहकीमे जहिना फूलो, पातो आ फलो अपना समैसँ पहिने बेसिया जाइए तहिना मन बेसिया गेल। बेसियाइते मनमे उठल- एकटा महींस छै, पाँच किलो कि सात किलो दूध भिनसर आ ओते साँझोमे होइत हेतइ,मुदा बिकरीक ठेकान अछि जे केते लेबाल औत केते नै, तखनि एहेन आश्वासन किए देलक? भेल जे पुछिऐ, मुदा गाइयो-महींसक कि ठेकान अछि। कोनो एहेन होइए जे साँझ-भिनसर बन्हौटा लागत तँ कोनो एकोशिया भऽ एकसँझू लागत। तहूसँ बेसी एकोशिया भऽ बेठेकान भऽ जाएत। गोटे दिन भोरेमे लागत तँ गोटे दिन रातिमे। मन मानि गेल जे एना तँ होइते छै। मुदा लगले भेल जे ऐसँ अखुनका प्रश्न हल कहाँ भेल? ई तँ भेल घटबी। मुदा अछि तँ बढ़बीक प्रश्न। मुदा लगले जेना मन चीतसँ पट भऽ गेल। माने ई जे धर्मक संग पाप, रातिक संग दिन, चोरक संग साधु एक्केठाम केना पति-पत्नी जकाँ रहैए...? ...एक तँ झिंगुर काकासँ भेँट करैक अछि, तैसंग पत्नीक आढ़ैत सेहो अछि तैपर अपने कोन ओझरीमे ओझरा गेलौं! मुदा टीकमे लागल चिड़चिड़ी जँ छोड़ा नइ लेब तँ अनेरे ताबे तक धेने रहत जाबे तक ओकरा छोड़ाएब नै। मन मानि गेल जे दूधक बढ़बीक विचार काइए लेब नीक। कहैले तँ गाइए-महींस भेल, मुदा सबहक चालियो-ढालि आ गुणो-धर्म एके रंग थोड़े होइ छै। कोनो साले-साल बच्चा दइए जेकरा पुरैहिया कहै छिऐ, तँ कोनो सालक-साल दूधे दइए आ कोनो एहेन टिपौड़ी होइए जे घासकेँ सूंघि कऽ छोड़ि देत, कोनो एहेन होइए जे निङ्गहेसो चिबा खाइए। तैसंग मनुखे जकाँ कोनो ढाहीओ मारत, लथारो मारत आ हूरियोहो लइए तँ कोनो एहनो तँ होइते अछि जे अपने बच्चा जकाँ पेट-थन सभतरि आनो बच्चाकेँ सिनेहसँ अपन दूधो देखबैए आ मुँहमे ढारो दइते अछि...! ...फेर मन घूमल। ऐसँ दूधक बढ़बी कहाँ बुझलौं? मन आगू दिस ससरल, गाइयो-महींस तँ एहेन होइते अछि जे समए-कुसमए नइ बाड़ैए। जखने थन लग कोनो वर्तन लऽ कऽ पहुँचब तँ पनहा जाएत। भलहिं बन्हौटा जकाँ पाँच किलो, सात किलो दूध नै होइ, अदहे किलो होइ मुदा दूध दइमे कोताही नहियेँ करैए? हँ से तँ ठीके। मुदा एहनो तँ अछिए जेकरा कामधेनु कहै छिऐ, ओकरा जखनि इच्छा हुअए तखनि दूहि लिअ। धर्र! अनेरे दूध-दहीक लपौड़ीमे मनकेँ घुरिऔने छी। जानए जअ जानए जत्ता। सतुआ संग घुन पीसाउ आकि घुन संगे सतुआ..; से ओ जानए। सालमे एक दिन चतुरथी चानक चमकमे छह-छह करैत आगू अबैए तइले एते बुधि खपौने अपने नोकसान हएत। मन-चित मारि झिंगुर काका ऐठाम विदा भेलौं। झिंगुर काका अखियासी लोक। ओना उमेरो उदियास्त दिस निच्चाँ उतरि रहल छन्हि, मुदा जहिना-जहिना भिनसुरका सुर्ज धीरे-धीरे प्रखर होइत बारह बजेक सीमा पार होइते साँझ दिस धीरे-धीरे उतरए लगैए तहिना झिंगुरो काकाकेँ भऽ गेल छन्हि। दरबज्जाक ओसारक दछिनवरिया चौकीपर देवालसँ ओंगठि पूब मुहेँ आँखि बन्न कऽ बैसल रहथि। आँखि मूनि भरिसक सुर्जपर धियान करैत रहथि। ओसारपर बैसल देखि मनमे खुशी भेल। खुशी ई भेल जे वाड़ी-झाड़ी केतौ ताक-हेर नै करए पड़ल, बैसकीएपर भेटि गेला। पएर छूबि कहलियनि- “गोड़ लगै छी, काका।” जेना कोनो विचारक बीच कानसँ अवाज गेलनि तहिना चौंकैत बजला- “के गौरीसुमन!” कहि जेना फेर अपने दिस नजरि खिरबैत चुप भऽ गेला। किछु कालक पछाति बजला- “बौआ, आब होइए मरबे नीक। अनेरे कोन जंजालमे पड़ि गेल छी।” काकाकेँ मरै दिस नजरि झूकल देखि मनमे छगुन्ता लगल। छगुन्ता ई लगल जे गाड़ी-सवारीसँ थौकचो भेल लोक जीबए चाहैए जेकरा जिनगी भरि अपनासँ ठाढ़ो ने भेल हेतै। मुदा झिंगुर काकाकेँ कोनो तेहेन भीर-भार नहियेँ देखै छियनि तैयो एहेन बात बजै छथि? कहलियनि- “काका, अखनि अहाँ बीस बर्खसँ ऊपरे जीब, तखन किए अखनेसँ गाड़ीक रिजरवेशन करबए चाहै छी।” जेना हमर गप काकाकेँ नीक लगलनि तहिना मुँहक सुरखीसँ बूझि पड़ल। बजला- “बौआ, जाबे जीवन भाय आ डाक भाय जीबै छला ताबे गपो-सप्प करैमे मन लगै छल। मुदा जहियासँ अो दुनू मरि गेला, तहियासँ होइए जे अनेरे जीबै छी।” झिंगुर कक्काक बात नीक जकाँ नहि बुझलौं, मुदा बीचमे नाकर-नुकूर करब सेहो नीक नइ बुझलौं। नाकर-नुकूर केने पाशा बदलि जाइए, तहूमे एकभग्गू लोक झिंगुर काका छथिए, जेम्हरे ढुलकता तेम्हरे धार-धूर, मोइन फोड़ैत आगू बढ़ि जेता। तइसँ नीक जे कनी पाछुएसँ सह दिअनि। सह देलियनि- “आ-हा-हा..; ओ-हो-हो...!” ‘आ-हा-हा, ओ-हो-हो’ सुनि जेना झिंगुर काकाकेँ सुनिनिहार संगी भेट गेल होन्हि तहिना मन कलशलनि। मुदा एक चिड़की मेघ उठि जहिना रौदकेँ रोकि अन्हरा दइए तहिना जेना मनमे भेलनि। भेलनि ई जे सुनिनिहार जँ बिच्चेमे उठि कऽ चलि जाए तखनि तँ सींग सुनने रहत तँ नांगरि छूटि जेतै, नइ जँ नांगरि सुनने रहत तँ सींग छूटि जेतै। मुदा लगले मनमे जेना किछु फुरि गेलनि। जोरसँ पत्नीकेँ कहलखिन- “बाँस भरि सुर्ज ऊपर आबि गेल, मुदा अखनि तक मुँहमे पानियोँ नइ लेलौं हेन। घरक लोक रही तखैन ने...?” खग जानए खगक भाषा, फुलटुस्सी काकीकेँ अनसोहाॅत नइ लगलनि। ओना चाह बना चुकल छेली, मुदा गौड़ीसुमनकेँ देखिते ठमैक गेली। ठमैक ई गेली जे जँ दुनू गोरेले चाह नेने जाइ आ ओ[1] कहथि जे अहाँक चाह नइ पीब। तखन तँ दरबज्जाक बेइज्जती हएत, जँ नइ लऽ कऽ जाएब, तखनि जँ अो अपनाकेँ अपमान बुझथि...? ...अही द्वन्द्वमे फुलटुस्सी काकी आगू बढ़ली। चाहक चुस्की लैत झिंगुर काका गौड़ीसुमनकेँ पुछलखिन- “केमहर-केमहर चललह गौड़ीसुमन?” गौड़ीसुमन- “दूध-ले आएल छी, कनी देरी देखलिऐ। अहूँसँ बहूदिन भेँट भेना भऽ गेल छल। तँए...।” झिंगुर काका- “की करबह दूध?” “चारिम दिन चौरचन छिऐ किने, तहीले दही पौड़ल जाएत।” ‘पावनि आ दही’ सुनि झिंगुर काका ठमैक गेला। एक दिस पावनि दोसर दिस जुआन भावदक दही! अपन दोख हटबैत बजला- “बौआ, जीवन भाय बेर-बेर कहै छला चैतक चूड़ा, भादवक दही, ऐ दुनूसँ बँचलै रही।”¦¦ [1] गौड़ीसुमन ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार व्यंग निबंध मेक इन मिथिला भाग-१ बहु-धंधी, बहुभाषी, बहुमुखी, आदि कतौ नै पराजित होइत अछि कारण ऐ शब्दक आगुएमे "बहु" लागल छै आ मैथिल हरेक काजमे पाछू रहि "बहु"केँ आगू कऽ दैत छथि। आब अहाँ सभ खिसिआउ नै। उपरका शब्द सभ बहुप्रचलित अछि मैथिलीमे। लिअ प्रचलितमे सेहो "बहु" मिथिलाक सभ चीजमे "बहु" भेटत। बहुदेव-वाद सेहो। ई "बहु" विशुद्ध मिथिलाक बनल अछि आ तँए खाँटी मैथिल सभ लग बहुयात रूपें भेटत। विश्वक आन कोनो भागमे एहन "बहु" नै भेटत। मिथिलामे बहु देववाद बहुत दिनसँ अछि। बेटा लेल राना माइसँ कबुला तँ बेटी लेल चौरचन्ना। नाती लेल मंगल केर उपास तँ साँए लेल किछु। मने एक एकटा लोक लेल एक एकटा देवता। मैथिल चतुर होइ छथि हुनका बुझाइ छनि जे एकै देवतासँ सभहँक लेल मँगबै तँ कनी-कनी हिस्सा भेटत तँए अलग-अलग देवतासँ अलग-अलग कबुला। मुदा ई तँ सभ जनिते हएब जे बेसी बुधियार तीन ठाँ माँखै छै। ई मैथिल सभ देवताकेँ जते बेकूफ बुझै छथिन तते बेसी बेकूफ ओ अपने छथि। भाइ देवता सभहँक आपसी लड़ाइ संपादके सनक होइ छै। जेना संपादक सभ कोहि निकालै छथि जे ओकरासँ जे दोस्ती राखत तकरा अपन पत्रिकामे नै छपबै तेनाहिते देवता सभकेँ सेहो छै। शंकर देवताकेँ विष्णुसँ दुश्मनी। आब विष्णुसँ जे वरदान मँगलक से शंकर देवता लेल अछूत। लक्ष्मी आ सरस्वतीक सौतिया डाहसँ के नै परेशान भेल। .... करैत रहू बहुदेव पूजा। तँए देखैत हेबै जे मैथिलक कोनो कबुला फलदायी नै होइ छै। भाइ, सभ देवताकेँ अपनामे झगड़ा छै। किनकोसँ सटब तँ हुनका दुख हेतनि।तँइ मैथिल सभ गरीब बनि ऐ कातसँ ओइ कात छिछिआएल फिरै छथि। आ कतौ सुख नै भेटै छनि। बहुउद्येशीय सेहो खाँटी मैथिल अछि। हरेक मैथिल लग कमसँ कम 100 उद्येश्य रहैत छनि। मंचपर जेता दू शब्द लेल मुदा आँखि बेटीक बियाह लेल वरक संधानमे। मँगता मिथिला विकास केर नामपर आ बनै छै अपन दूमहला-तिमहला। एहन बहुउदेसी जे हाट बजार जाइ छथि तँ मोने मोन सोचै छथि जे माए-बहिनिकेँ बेचि कऽ कोन समान लेल जाए। बहुराष्ट्रियता। ई शब्दे अपना-आपमे मैथिलमय अछि। एकटा आँगन मने चारि टा राष्ट्र। आ चारू राष्ट्रमे मूँहा-फुल्ली।ऐ शब्दक आर उपयोग छै। पोथीमे दम होइ की नै मुदा पोथीक पाछू लेखक बहु राष्ट्रिय कम्पनीमे काज करै छै से सूचना जरूर भेटत। मने ऐ सूचनासँ पोथीक ओजन बढ़ि जाइत छै। बहुरंगी ऐ मिथिलाक ठेठ शब्द अछि आ भाव अनुरूप अछि। एकर सूत्र अछि "तोरा लग तोरा सन, मोरा लग मोरा सन"। आ ऐ सूत्रक बलपर वैदिक मिथिलासँ एखनुक मिथिला धरि चलि रहल अछि। ओना ऐ सूत्रक अपवाद सेहो अछि। मिथिलाक लोक पीठ पाछू छूरा घोपैत अछि घोपबबैत अछि। आ सभ "बहु"मेसँ ई "बहु" मैथिलक मूल अछि। आब एतेक बहुलता देखि कनछी नै काटऽ लागब। वर्तमान समयमे मिथिलामे एकटा नव "बहु" केर जन्म भेल अछि जकर पूरा नाम छै "बहु भाषी लेखक"। ई विशुद्धोमे विशुद्ध मिथिलाक अछि। जेना आइसँ 100 बर्ख पहिने बिकौआ सभ बहु वियाह करैत छल तेनाहिते आजुक लेखक सेहो बहु-भाषी लेखन करै छथि। जे जते भाषामे लीखि सकता तिनका ततेक सामर्थ्वान बूझल जाइत अछि। ओना सभकेँ बूझल छै जे बिकौआ सभहँक "बहु"केँ गामक लोक टेबै छलै मुदा "बहु भाषी लेखक" केर लेखनकेँ कियो नै टेबै छै। एक बातमे बिकौआ आ बहुभाषी लेखक एक अछि जे बिकौआ केर संतान अवैध होइत छलै आ बहु भाषी लेखक केर रचना वर्णसंकर होइत अछि। ऐ प्रकारक लेखक सभमे "बहु छपास" रोग सेहो भेटत। ई रोग संक्रामक होइत छै। देखा-देखी पसरै छै। जिनका ई बेमारी नै लागल तिनकर जीबन बेकार। किछु गोटे तँ एहन स्टेजपर पँहुचि जाइ छथि जाइ ठाम हुनका अपना छपासक बेमारी ठीक करबाक लेल हिन्दी अखबारक कोनटा पकड़ऽ पड़ै छनि। ओना सच पूछू तँ पूरा हिन्दी अखबारमे दू शब्द मैथिलीक ओहने लागै छै जेना पूरा सरदर पैन्ट आगूमे कनी फाटि गेल हो। मुदा नोचनी बेमारी होइ छै मुदा ओकरा नोचलापर आनंद भेटै छै तेनाहिते हिन्दी अखबारक कोनटा पकड़ब सेहो बेमारी छै मुदा ओ बेमार लोक ओहीमे आनंदित रहै छथि। की करबै बेमारीक अवस्थे सएह रहै छै। आ अंतमे बहु प्रचारित ......................................... अरे ई रोग तँ हमरोमे अछि। तँए कहै छी ने जे ई व्यंग बहु प्रचारित हएत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नन्द विलास राय-लघु कथा- सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट २.प्रणव झा- अपन अपन धर्म (संस्मरण) १ नन्द विलास राय- लघु कथा सभसँ बड़का भीआइपी गेस्ट हम आँगनमे चाह पीबैत रही। तखने पत्नी आबि टोकली- “यै, सुनै छिऐ?” हम कहलियनि- “हँ, कहू ने की कहै छी।” पुछलनि- “बम्बइ आम लऽ कऽ जीतू बौआ ओतए कहिया जेबै?” अकचकाइत हमरा मुँहसँ बहराएल- “हँ। ठीके मोन पाड़लौं। परसू रबि दिन भोरुका बस पकड़ि लेब। बारहे बजे तक पटना पहुँच जाएब। बम्बइ आमो खूब पाकए लगल अछि। चारि आना आम गाछेमे पाकि कऽ खसि पड़ल। काल्हि केकरो बजा कऽ आम तोरा कऽ रखि लेब आ परसू छह-बजिया बस पकड़ि लेब।” पत्नी कहलनि- “दस-बीस गो गछपकुओ लऽ लेबै।” हँ-मे-हँ मिलबैत कहलियनि- “हँ-हँ अबस्से लऽ लेबै।” हम आ जीतू दू भाँइ। हमर नाओं भोगेन्द्र आ हमर छोट भाए जीतेन्द्र। माए-बाबू हमरा भोगी आ जीतेन्द्रकेँ जीतू कहै छला। माए-बाबूक देखा-देखी आनो-आन लोक हमरा भोगी आ ओकरा जीतूए कहैत अछि। हम गाममे रहि कऽ खेती-गिरहस्ती करै छी। खेती की करब। अपना तँ मात्र एक्के बीघा खेत अछि। दू बीघा खेत लालबाबूसँ मनकूतपर नेने छी। जीतू पटनामे पंजाब नेशनल बैंकमे पी.ओ अछि। दोसर दिन हम एकटा गछचढ़ा लड़िकाकेँ बजा आम तोड़ेलौं। लगधग पाँच सए आम भेल। जइमे सए-सबा-सए पकले रहए। सभटा आम एकटा बोरामे लऽ मुँह बान्हि कऽ रखि लेलौं। एकटा झोरामे पचासटा गछपकू आम सेहो ओरिया कऽ रखि लेलौं। अगिला दिन साइकिलपर आम लऽ नवटोली चौकपर गेलौं। चौकेपर एकटा चिन्हारए ऐठाम साइकिल रखि सतबजिया बसपर चढ़लौं। लगधग डेढ़ बजे दूपहरमे पटना पहुँचलौं। जीतू डेरेपर छल। हमरा देखिते आबि कऽ गोर लगलक आ गामक समाचार पुछलक। हम असिरवाद दैत कहलिऐ- “गामकसभ समाचार ठीके अछि। तों अपन समाचार कहह, सभ कियो नीके-ना छह किने?” जीतू कहलक- “अहाँक असिरवादसँ हम दुनू गोटे कुशल छी।” हम कहलिऐ- “भगवानक किरपा।” जीतू बाजल- “केकरो मोबाइलसँ फोन केने रहितिऐ तँ खाना बनल रहितए।” हम कहलिऐ- “केकरा मोबाइलसँ फोन करितौं।” जीतू फेर बाजल- “एमकी गाम जाएब तँ एकटा मोबाइल नेने आएब। मोबाइल रहत तँ दुनू भाँइक बीच गप-सप्प होइत रहत। भौजीओसँ गप हाएत। अहाँ फ्रेश भऽ कऽ चाह पीबू। चाह पी कऽ जाबे स्नान करब ताबेमे खेनाइ बनि जाएत।” हम बाथरू जा फ्रेश भेलौं। फ्रेश भऽ ड्राइंगरूममे आबि बैसलौं। जीतूक कनियाँ एकटा प्लेटमे दालमोट आ छह-सात गोट बिस्कुट रखि हमरा गोर लगली। हम कहलियनि- “नीके रहू।” जीतू एक जग पानिआ एकटा गिलास नेने आएल आ कहलक- “ताबे पानि पी कऽ चाह पीब लिअ।” हम दालमोट आ बिस्कुट खाए लगलौं। पाँचे मिनटक पछाति कनियाँ दू कप चाह दऽ गेली। हम दुनू भाँइ चाहो पीबी आ गाम-घरक गपो-सप्पो करी। करीब पनरह-बीस मिनटक पछातिकनियााँ आबि कऽ बजली- “भात-दालि बनि गेल अछि। जाबे भायजी स्नान करथिन, तरकारीओ बनि जाएत।” हम बजलौं- “एते जल्दी केना बनि गेल।” जीतू कहलक- “भैया, गैसपर प्रेशर कुकरमे भात-दालि बनबैमे देरी नै लगै छै। आब अहाँ जल्दी-जल्दी नहा लिअ।” हम बाथरूमे जा कऽ स्नान कऽ कपड़ा बदलि ड्राइंगरूममे आबि कऽ बैसलौं। हमरा बसिते देरी जीतू एक जग पानि आ गिलास टेबूलपर रखि भीतर चलि गेल। कनियाँ एकटा थारीमे भात, कटोरीमे दालि आ एकटा प्लेटमे तीमन आ दोसर प्लेटमे भुजियाआ पापड़ दऽ गेली। जीतू एकटा कटोरीमे घीउ नेने आएल। किछु घीउ भातमे ढारि बाँकी दालिमे ढारि बाजल- “आब भोजन करू।” हम भोजन करए लगलौं। जाबे धरि हम खेनाइ खेलौं जीतू हमरा लग ठाढ़ रहल। कनियाँ परसनपर परसन आबि कऽ दैत रहली। भोजन केलाबादहम हाथ-मुँह धोइ कुरसीपर बैसलौं। जीतू लगमे आबि बाजल- “आब अपने अराम करू।” कहलिऐ- “जा तहूँ अराम करए गऽ” हम ओछाइनपर अराम करए लगलौं। हमरा पछिला सभ गप मोन पड़ि गेल। इण्टरमे पढ़ैत रही। जीतू सेहो अठमामे पढ़ैत रहए। जीतू पढ़ैमे चन्सगर रहए। ओ अपना किलासमे फस्ट करए। हमर बिआह भऽ गेल रहए। बाबूजी हमरा बिआहेमे धुर-बहुर करा दुरागमनो करा देने रहथि। मुदा हमर कनियाँ तैयो नैहरेमे रहै छेली। बाबूजी दिल्लीमे दालि मीलमे मोटियाक काज करै छला। हुनका ओतए बोखार लगि गेलनि। ठीकसँइलाज नै करा सकला। तेकर नतीजा भेलनि जे बड़ कमजोर भऽ गेला। डाक्टर कहलकनि- “कालाजार हो गया है।” तखनि हमरे एकटा गौआँ बहादूर काका हुनका नेने निर्मली टीशनपर उतरला। ओइ समैमे सवारीक सुविधा नै छेलै। हमर बाबूजी तेतेक कमजोर भऽ गेल छला जे पएरे गाम नै आबि सकला। तखनि बहादूर काका बाबू जीकेँ मोसाफिर खानामे बैसा अपने गाम आबि हमरा माएकेँ सभ बात कहलखिन। हम खेनाइ खा कऽ निर्मली कौलेज जाइले साइकिल निकालने छेलौं। माए हमरा लग आबि कहलक- “भोगी, केकरो टायरगाड़ी लऽ कऽ निर्मली टीशन चलि जा। गाड़ीपर बैसा कऽ बाबूकेँ आनए पड़तह। बाबूजी मोसाफिर खानामे छथुन। बड़ दुखित छथिन। चललो ने होइ छन्हि। कहाँदिन कालाजार भऽ गेलनि। बहादूर बौआ दिल्लीसँ संगे नेने एलनि। वएह आबि कऽ कहि गेला हेन।” हम साइकिल रखि मने-मन हियासए लगलौं जे केकर टायर गाड़ी लऽ जाइ। हमर नजरि बेचन काकापर गेल। हम बेचन काका ओइठाम विदा भेलौं। बेचन काका सोकबामे बैसि कऽ बाँसक पातक कुट्टी कटै छला। हमरा देखिते बजला- “आबह-आबह भोगी। कहऽ की हाल-चाल छह। आइ कौलेज नै गेलह की?” कहलियनि- “काका हमर हाल-चाल नीक नै अछि। बाबूजी बड़ दुखित छथि। कहाँदुन कालाजार भऽ गेलनि हेँ। चललो-फिरल नै होइ छन्हि। दिल्लीसँ आबि निर्मली निर्मली टिशनपर बैसल छथिन। बहादूर काका संगे एला हेन। वएह अखनि कहि गेला।” बेचन काका बजला- “तँ टायरगाड़ी लऽ जेबहक बाबूकेँ आनैले?” कहलियनि- “हँ, काका। तँए एलौं हेन।” कहलनि- “ठीक छै कनी जलखै कऽ लइ छी। ताबे बरदो खाइ छै।” हम कहलियनि- “हमहूँ गामपर सँ भेल अबै छी। अहाँ जलखै करि कऽ तैयार रहब।” “ठीक छै।” ओ बजला। हम गामपर आबि माएकेँ कहलिऐ- “बेचन काका जलखै करै छथिन। जलखै कऽ टायर जोति देथिन। किछु पाइ-कौड़ी छौ तँ दे। हएत तँ बाबूकेँ लऽ रामानन्द डाक्टरसँ देखा देबनि।” माए घर गेली। घरसँ एकटा फुच्ची निकालि अनली। फुच्चीकेँ उनटि दसटकही, पँचटकही, दू-टकही,एकटकही सभटा सिक्का सभ निकालि गिनलनि। सभटा मिला कऽ पाँच सए पचपन रूपैआ भेल। सभटा पाइ दैत माए कहली- “बाबूकेँ डाक्टरसँ जँचा दबाइ कीनि लिहेँ।” पाइ लऽ बेचन काका ओतए विदा भेलौं। बेचन काका टायरपर पुआर दऽ एकटा सतरंजी बिछा हमरे बाट तकैत रहथि। हमरा देखिते बजला- “गाड़ीपर बैसह। जोइत दइ छिऐ।” हम टायरपर बैसलौं। बेचन काका टायर जोइत विदा भऽ गेला। साढ़े बारह बजे हम सभ निर्मली टीशन पहुँचलौं। हम मोसाफिर खाना गेलौं। हमर बाबूजी मोसाफिर खानामे तौनी ओछा पड़ल छला। एकदम नरकंकाल जकाँ हुनकर शरीर भऽ गेल रहनि। हम लगमे जा टोकलियनि- “बाबू, बाबू?” ओ उठि कऽ बैसला आ बजला- “के भोगी! गाड़ी अनलह की?” बाबू जीक पएर छूबि गोर लागि कहलियनि- “हँ बाबू। बेचन कक्काक टायर अनलिऐ हेन। अहाँ किछु पानि-तानि पीलिऐ किने?” बाबूजी बजला- “हँ। एक गिलास बदामक सतुआ पी कऽ एक कप चाह पीने रहिऐ। “अच्छा उठू चलू टायरपर बैसू गऽ। डाक्टर रमानन्द बाबू लग चलै छी। हुनकासँ देखा दइ छी। तेकर पछाति खेनाइ खाएब।” -हम कहलियनि। बाबूजी बजला- “मुदा हमरा लग ढौआ कहाँ छह। दू महिनासँ बैसिले छेलौं। जेहो ढौआ छल, सभ दबाइमे खरच भऽ गेल।” हम कहलियनि- “अहाँ ढौआक चिन्ता जुनि करू। हमरा माए किछु ढौआ देलक हेन। आेइसँ ताबे इलाज करा दइ छी। डाक्टर साहैब की कहै छथि, तेकर बाद आगूक बात आगू सोचब।” बाबू जीकेँ लऽ कऽ हम डाक्टर रामानन्द बाबूक क्लिनिकपर एलौं। जाँचि कऽ डाक्टर साहैब कहलखिन- “हम दबाइ लिखि दइ छी। दबाइ लऽ कऽ हमरासँ देखा कऽ शुरू कऽ दियौ। मुदा हिनकर इलाज नीकसँ करबए पड़त। दरभंगा लऽ जा कऽ होसपीटलमे भर्ती करा दियौ।” डाक्टर साहैबक फीस दऽ दबाइ कीनिलौं। किशन होटलमे खेनाइ खेलौं। खेनाइ खा तीनू गोटे टायरपर बैसि विदा भेलौं। गोसाँइ डुमैसँ पहिने गाम पहुँचलौं। माए बाबूक हालति देखि बोम फाड़ि कऽ कानए लगली। माएकेँ कनैत देखि जीतूओ कानए लगल। हमरो आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल छल। बेचन काका हमरा हमरा सभकेँ चुप करबैत बजल छला- “कनने, खीजनेसँ किछ ने होइ जेतह। पाँच-सात हजार टाकाक ओरियान कऽ दरभंगा लऽ जाहुन आ नीकसँ इलाज कराबहुन।” पाँच कट्ठा खेत सात हजारमे भरना रखि चारिम दिन हम, माएकेँ संग कऽ बाबूकेँ लऽ दरभंगा गेलौं। बाबू जीकेँ दरभंगा अस्पतालमे भर्ती करेलौं डाक्टर साहैबसँ पुछने रहिऐ- “सर, बाबूजी केतेक दिनमे ठीक भऽ जेथिन।” डाक्टर साहैब बजल रहथिन- “रोगीकेँ रोग गरसि नेने अछि। लीवर सेहो ठीकसँ काज नै करै छै। तँए किछु कहब मोसकिल।” दरभंगा जाइसँ पहिने माए बेचन काका आ जीतूकेँ हमरा सासुर भेज हमरा कनियाँकेँ विदागरी करा अनने रहथिन। दिल्लीसँ एलाक मासे दिनक भीतर बाबूजी हमरा सभकेँ छोड़ि दुनियाँसँ चलि गेला। जीतू बाबू जीक पएरपर माथा पटकि-पटकि कनैत रहए।बेचन काका जीतूकेँ समझबैत कहने रहथिन- “तोरा तँ बाप तुल जेठ भाए भोगी छेबे करथुन। चुप भऽ जा। भोगी तोरा सभ किछु करतऽ। पढ़ेतह-लिखेतह, बिआह-शादी करतऽ।” जीतू हमर पएर पकड़ि कानए लगल रहए। हम जीतूकेँ भरि पाँजमे लऽ कनैत कहने रहिऐ- “तों चिन्ता जुनि कर। हम तोहर जेठ भाय छियौ। तोहर सभ जवाबदेही हमरापर दऽ बाबूजी चल गेला। हम अपन फर्ज पूरा करब।” बाबू जीक मरला बाद हम पढ़ाइ छोड़ि खेती-गिरहस्ती करए लगलौं। बाबू जीक सोगे माए जे सोगेली से ओहो छबे मासक भीतर हमरा सभकेँ छोड़ि बाबूएजी लग स्वर्ग चल गेली। जीतूक दुनू आँखि कनैत-कनैत फूलि गेल छल। ओ माइक पएरपर माथ पटैक-पटैक कानै छल। हमर कनियाँ जीतूकेँ सम्हारने छली। मरैसँ पहिने माए हमरा कहने छेली- “बौआ भोगी, जीतूकेँ पढ़ा-लिखा हाकिम बनाबिहऽ।” हम माएसकेँ कहने छेछिऐ- “माए चिन्ता जुनि कर। जीतूकेँ पढ़बैमे हमरा डीहो बेचए पड़त तँ बेचि लेब।” जीतू पढ़ैमे तँ चन्सगर रहबे रहए। ओ मैट्रिससँ लऽ कऽ एम.काँम. धरि फर्स्ट डिविजनसँ पास केलक। एम.काँम. केला बाद जीतू पटनामे रहि प्रतियोगिता परीछाक तैयारी करए लगल। जीतूकेँ पढ़बैमे हमरा एक बीघा खेत बेचए पड़ल। एम.काँम. केलाक बाद साले भरिक भीतर जीतू पंजाब नेशनल बैंकमे पी.ओ, पदपर बहाल भऽ गेल। जइ बैंकमे ओकरा नौकरी भेटल ओ पटने शहरमे अछि। हाजीपुरक स्टेट बैंक मैनेजरक बेटी संग जीतूक बिआह भेल। जीतूक एकटा जेठका सार पी.एम.सी.एच.मे डाक्टर छथिन। ई सभ सोचैत-साेचैत हम नीन पड़ि गेलौं। नीन टुटल तँ सुनलिऐ, जीतू अपना कनियाँकेँ कहैत रहनि- “भैया रबि दिनकेँ माछ-मासु नै खाइ छथिन। तीमन तरकारीमे की सभ आनए पड़त।” कनियाँ बजली- “अल्लू-पीऔज तँ अछिए। परोर, रामझुनी, करैला आ सजमनि लऽ लेब।” जीतू बाजल- “अच्छा झोरा दऽ दिअ। हम जक्सन जाइ छी ओम्हरेसँ तरकारी कीनने आएब। हँ, भैया सुति कऽ उठथिन तँ चाह बना कऽ दऽ देबनि।” कनियाँ बजली- “अहाँ कहबै तब हम भायजी केँ चाह बना कऽ दऽ एबनि। हमरा एतबो विवेक नै अछि की।” जीतू बाजल- “नै से नै। सएह कहलौं। ठीक छै हम जाइ छी।” कनियाँ बजली- “कनी सबेरे आएब। आन दिन जकाँ आठ राति नै बजा देबै।” “हमरो धियान रहतै जे भैया आएल छथिन।” - ई कहि जीतू झोरा लऽ कऽ चलि गेल। जीतूकेँ गेलाक पनरह-बीस मिनटक पछाति हम ओछाइनपर सँ उठि गेलौं बाथरूमे जा हाथ-मुँह धोइ कऽ कुरसीपर आबि बैसिले रही आबि कनियाँ एक गिलास पानि आ एक कप चाह दऽ गेली। चाह पीब हम कनियाँकेँ कहलियनि- “हम टहलि अबै छी।” कहि हम कपड़ा बदलि डेरासँ निकलि गेलौं सात-सबा-सात बजे आपस डेरापर एलौं। जीतूओ जक्सनसँ आबि गेल रहए। ओ कनियाँकेँ कहैत रहए- “दुधक पैकेट आ सेबैक पैकेट नेने आएल छी। चीनी सेहो नेने एलौं हेन। तरकारीमे परोर, रामझुमनी,करैला आ सजमनि अछि। सोल्हन्नी घीउमे पुरी छानि दियौ। अल्लू-परोरक तरकारी आ रामझुमनीक भुजिआ बना दियौ। सेबैक खीर सेहो बना दियौ।” कनियाँ बजली- “कनीए देशी घी घर-वेद रखने छी। जौं अखनि खरच करि लेब तँ कोनो भी.आई.पी. गेस्ट औत तँ केतएसँ आनब।” “कोन भी.आई.पी. गेस्ट?” - जीतू पुछलकनि। “अहाँक बैंक मैनेजर आ हमर डाक्टर भैया।” -कनियाँ बजली। “हमरा लेल सभसँ बड़का भी.आई.पी.गेस्ट हमर भैया छथि। जे माए-बाबूक मुइला बादो हमरा पढ़बैमे कहियो ढौआक कमी नै हुअए देलनि। हमरा पढ़बै खातिर एक बीघा खेत बेचि देलनि। हुनके कृपासँ आइ हम बैंकमे पी.ओ. छी।” जीतूक बात सुनि हमर छाती सूप सन भऽ गेल। २ प्रणव झा अपन अपन धर्म (संस्मरण) ई वाकया अछि १५ जनवरी २०१३ के जखन हम अपन माँ-पप्पा संगे गंगा सागर (सागर आइलैंड) सेतिलासंक्रान्ति के बाद घुरै छलौं | जखन हम सब मिनीबस में बैसल जेटी घाट दिस जाइत रही तखने किछुनवतुरिया छौरा-छौरी सब हमर सब के गाडी के रोकलक | एतय हम ई बता देब चाहे छी के मकर संक्रांति मेलाके समय पर सागर द्वीप पर यातायात आ व्यवस्था के असुविधे देखय के लेल भेंटल छल | तीर्थयात्री सब केरेलमपेल पड़ल छल | एहन में अचानक ई एक झुण्ड नवतुरिया के अचानक गाडी रोकैत देख मोन आशंकित भेलजे की बात अच्छी ! इन्तु हमारा ई देख आश्चर्य भेल जे एहन बीहड़ में एतेक असुविधा के बीच ऐ हिन्दू तीर्थस्थलपर ई नवतुरिया छौरा-छौरी के झुण्ड क्रिस्चैनिटी के प्रचार करै लेल आयल छल | पहिने त हमारा आश्चर्य भेलकिन्तु पाछाँ हम अंदाज केलौं जे एहेन शायद ऐ लेल अछि किएक त एहि दुर्गम अनमार्केटाइज्ड आ अनब्रांडेडतीर्थस्थल पर अधिकांशत: मध्यमवर्गीय एवं निम्नवर्गीय तीर्थयात्री सब आबैत जाइ अछि जे एकर सब के मुख्यटारगेटेट वर्ग होइ अछि कन्वर्जन के लेल | खैर, हम ई कहै छलहुँ जे ई छौरा-छौरी सब एकटा डायरीनुमा किताबबाँटै छल ओहो फ्री में जे हिंदी अंग्रेजी आ बांगला में उपलब्ध छल | हमर माँ के बुझना गेलै जे कोनो धार्मिककिताब बैंट रहल अछि तहि सं ओहो एकटा ल लेलक | अपना देश में यदि कोनो वस्तु फ्री भेंटै त ओकरा प्राप्तकर से केयौ चूक नै चाहै अछि स्वाइत पप्पो एकटा ल लेलैथ | आगा बढ़ला पर माँ के पुछला पर हम हुनकाबतेलिएन जे ई क्रिस्चैनिटी (दोसर धर्म) के धर्म ग्रन्थ अछि आ ई छौंड़ा-छौंरी सब एहि किताब के मार्फ़त अपनधर्म के प्रचार करै छल | एहि पर पप्पा कहलैथ जे तखन त ई किताब के फेंक देब के चाहि | ऐ पर हमर माँ जेपढ़ल-लिखल नै अछि आ एकटा धार्मिक मैथिल ब्राम्हण महिला अछि ओ कहलक जे "नै ई एकटा धार्मिक ग्रन्थअछि (भले आने धर्म के किए नै होय) ताहि लेल एकरा एम्हर-आम्हार फेँकनाई उचित नै अछि , आ ताहि लेलएकरा अपना सब रास्ता में गंगाजी में भँसा देब (जेना की अपने सब अपन धार्मिक अवशेष संग सेहो करै छी ) |"आ आगा हम सब ओहि किताब के गंगाजी में भँसा देने छलिये | उपरोक्त घटना के बाद हम सोचै लागलौ जे हमर माँओ के एकटा धर्म अछि जे सनातन अछि जे अपना में आपके सास्वत राखैतो सब धर्म के सम्मान केनाइ सिखबै अछि (जेना की गीता में स्वयं गोविन्द सेहो कहै छैथ ) दोसर तरफ ओ नवतुरिया छौंड़ा-छौंरी के भी अपन धर्म अछि जे ओकरा सब के अपन मेहनत आ ढौआ खर्च कक अपन धर्म के प्रचार कर के लेल प्रेरित करै अछि | आ देश-दुनिया में किछु एहनो समूह अछि जे धर्म के नामपर अलगाववाद आ आतंकवाद सं घृणित काज के अंजाम दैत अछि आ अपने धर्म आ कौम के बदनाम करै अछि| त किछु लोक एहनो अछि जे जबरदस्ती अपन-अपन धर्म के ठेकेदार बैन जाइ अछि जिनका लेल धर्म केएकमात्र अर्थ दोसर धर्म के लोक सब के निंदा केनाइ आ ओकरा सब के प्रति घृणा फैलेनाइ अछि | एहन लोकसब या त धर्म के ठेकेदारी क एकर धंधा करै अछि या एहन गोरखधंधा करै बला सब के चंगुल में फँसलदिक्भ्रमित लोक सब होइ अछि | हम इहो सोचै लागलौं जे अपने सब के ओइ नवतुरिया सब से प्रेरणो लेबै केचाहि की अपने सब के धर्म, समाज, भाषा आदि के निक बात सब के अपन मेहनत आ व्यवहार द्वारा देशदुनिया के सामने राखै के चाहि | प्रेरणा त एट हमर माँओ के अवधारणा आ व्यवहार सं भेटै अछि ...फिलहाल तबस एतबे ...फेर भेंटइ छी बाद में.....नमस्कार ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.अशरफ राईन- गजल ३.२.राजदेव मण्डल ‘रमण’ ३.३.किशन कारीगर-गजल सन किछु ३.४.आशीष अनचिन्हार-गजल ३.५. पल्लवी मण्डल- लड़की अशरफ राईन गजल सब तँ लूटि लेलही बदला मे तूँ देलही की ? बनि गेलही कठोर मनक असरा पुरेलही की ?
तोरा अपन बुझि कऽ बिश्वास कि केलियौ चढ़ा कऽ बृक्ष पर निचे सँ जरि काटि लेलही की ?
बदलि गेल्ही समयक चक्र संग - संगे तूँ साथ जिअब मरब किरिया बिसरि गेलही की ?
जीवन भरि साथ कहि बिच बाटमे छोड़ले धेले आन के हाथ हमरा बिरान बुझि लेलही की ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजदेव मण्डल ‘रमण’, गाम- लकसेना, पोस्ट- महिन्दवाड़, नवटोली, भाया- तुलापत गंज, जिला- मधुबनी, (बिहार) पिन नं- ८४७१०९ १. जुरमाना करैए... बुड़हा सभ मिलि पंचैती करैए होइ छै मन जुरमाना करैए। पनमा मखनाक सुनू झगड़ा झगड़ा नइ बुझू ई रगड़ा पनमा भागल पंच तकैले मखना गौआँकेँ जमा करैले होइ छै मन जुरमाना करैए...। भेल पंचैती एहेन सोझगर छेँ दुनू दोखी एक केर दोसर भेला जमा पंचैती की करता दुनूसँ किछु-किछु कैंचा टनैए होइ छै मन जुरमाना करैए...। बाजल एकटा नवका पंच अइमे केतए क्षल-प्रपंच? सरपंचे छी हमहूँ जीतल बौआ अहिना गाम चलैए होइ छै मन जुरमाना करैए...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किशन कारीगर गजल सन किछु प्रेमक बरसै फुहार जेना हम भीजैत छी अहाँक चौअनियाँ मुस्की देखी केहेन मगन सँ हम जीबैत छी अहाँक कारी-कारी नैन किएक हमरा करै बेचैन अहिं हमरदम मोन परि हमरा की भेल ने जानि? अहाँक सोलहो सिंगार देखी केहेन मगन सँ हम जीबैत छी तकैत छी केना, जेना चंदा-चकोर हमरा करेजा मे, उठल हिलकोर आस्ते-आस्ते बाजू, जुनि करू अहाँ शोर लोक कनफुसकी करत, भ गेलै भोर आब कतेक कहू अहाँ के प्रेम अहिं सँ हम करैत छी हमरा प्रेम के बुझहब कहिया? अहिं लेल हम जीबैत छी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार गजल देश दशा नीके हेतै देह दशा ठीके हेतै जनताके खूनक कीमत बस पानक पीके हेतै जी कहने हाँ जी कहने लोको सभ जीके हेतै ऐठाँ मरबा काल सखी टोपी ने टीके हेतै अनचिन्हारक डेग कनी बढ़ि गेने लीके हेतै सभ पाँतिमे 22+22+22+2 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल सुझाव सादर आमंत्रित अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल लड़की जखन ओ हँसैत अछि अल्हर जकाँ तँ लोक ओकरा पागल कहैत अछि आ जखन चुप रहैए तँ बेचारी जँ बाजए ओ बेबाकीसँ तँ ऐपर टिप्पणी करैत अछि "बेसी पढ़ि-लिख लेलक अछि" बुझैयोक उत्सुकतासँ जँ किछु पुछैए "तूँ नै बुझबिही।" अहिना ओ चुप कराओल गेल की कही ओकरा कोन-कोन गप्प लेल कनाएल गेल तैयो ओ ठानलक तितली सदृश उड़ब मुदा... जखन ओ उड़ए चाहलक तितली जकाँ लोक देखैलके पारम्परिक पायल ऐ मोड़पर घरक लोक सेहो संग नहि आएल सम्हारलक पढ़ल-लिखल लड़कीकेँ कागज-कलम जे नै पढ़ि सकल कोनो कारणवश ओकरा भेटल एकटा कोणा जेतए ओ कानल मन भरि! अखनो नै सोहाइत अछि बेटी सभ गोटेकेँ नै लोग अपन नज़र बदलैत अछि नै नजरिया!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते १.आशीष अनचिन्हार-बाल गजल २.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-मैट्रिकक तैय्यारी १. बाल गजल छै ईसू बीसू जीसू मीसू हम्मर बौआकेँ बड़का बूझू जीबू जाबू आ ढनढन पादू खिलखिल झिलमिल चुनमुन सन लागू बौआकेँ नानी सुंदर सुंदर हुनकर गालेपर हरदी पीसू उपटन पिसतै बौआकेँ मौसी हुनकर नाम कनी जल्दी बाजू बाबाकेँ धोती कुरता गमछा नानाकेँ ढेका जल्दी घीचू सभ पाँतिमे 222+222+222 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। संबंध बदलिते संबंधवाची शब्दकेँ बदलल जा सकैए। उदाहरण लेल तेसर शेरमे नानी बदला दादी, बाबी, पीसी, मौसी काकी सेहो आबि सकैए। तेनाहिते चारिम आ पाँचम शेरमे सेहो बदलल जा सकैए। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल), पो॰- मकरमपुर, जि॰ – दरभंगा, पिन - ८४७२३४ मैट्रिकक तैय्यारी जीत – हारि (उच्चा॰ – हाइर) दुनु खूब मनेलियै पएर तर बगरा, बाप रौ बाप !*१ आब की करियै, आहि रौ बाप ! ! नओमाकेँ हम किछु ने बुझलियै । भरि नओमा हम खेलि गमेलियै । कहुना नओमा पास भऽ गेलियै । छओ महिना फेर खुशी मनेलियै । मैट्रिकमे दसमेक पुछै छै, नओमामे तेँ बेपरवाह ।*२ पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! दूर्गापूजा खूब घुमलियै । नाटक, थेटर, नाच देखलियै । दियाबाती छठि*३ मनेलियै । फॉर्म बोर्ड केर, सेहो भरलियै । दसमा केर सिलेबस एतबे, चारि मासमे दस – दस चास । पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! ठण्ढी आ शीतलहरी एलै । साटा पर कत’ मैच खेललियै । कतहु खेललियै, कतहु देखलियै । जीत – हारि दुनु खूब मनेलियै । पढ़बा कालमे ठण्ढी लागय, ट्वेण्टी – ट्वेण्टी केर उछाह । पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! नऽव बरख, बनभोजो केलियै । मंगलमयक सनेश पठेलियै । लाई, चुड़लाई आ तिलबा खेलियै । खिच्चरि – दऽही संगे देलियै । प्रात भने बुझना गेलै, छै मास एक मैट्रिक केर – आह ! पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! “एटम बम” कण्ठस्थ रटलियै ।*४ “गेस पेपर” केँ खूब चटलियै ।*५ महाबीरजीकेँ गोहरेलियै ।*६ जोड़ा - छागर कबुला केलियै ।*७ हाथ परीक्षाफल आयल तँऽ, जेना सूँघि नेने हो साँप ! पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! *१ - पएर तर बगरा, बाप रौ बाप – ई एकटा बुझौअलि अछि जकर मतलब होइत अछि “आगि” । *२ – आइ काल्हि बहुत रास धियापुता मोनमे ई विचार बहुत दृढ़तासँ पोषने रहैत छथि कि मैट्रिक केर पाठ्यक्रममे मात्र दशमे वर्गक पाठ्यक्रमसँ पूछल जाइत अछि । ई विचार अत्यन्त भ्रामक अछि । उदाहरणार्थ जँ नओमाक रसायनशास्त्रमे परमाणु संरचना, संयोजकता आदि नञि पढ़ने छथि तँऽ हुनिकालोकनिकेँ दशमाक रासायनिक बन्धन, रासायनिक समीकरण संतुलन आदि कोना कऽ बुझबामे अओतन्हि । *३ - उच्चारण भेल “छइठ” । *४ – “एटम बम” – एक प्रकारक अति सम्भावित प्रश्न सभक पुस्तिका थिक, जकर नाँव सँ मिथिलाक बच्चा – बच्चा (आ तेँ पैघलोकनि सेहो) चिर – परिचित छथि । ई कोनो “बम” वा “बम बनएबाक पुस्तिका” नञि अछि । *५ – “गेस पेपर” – एहि नाम सँ तँऽ पूरा देशे सुपरिचित अछि । *६ आ *७ – महाबीरजी वा अप्पन – अप्पन आन आराध्य देवी – देवता सभक परिचायक । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 31 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १७२ म अंक १५ फरबरी २०१५ (वर्ष ८ मास ८६ अंक १७२) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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