ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १७४ म अंक १५ मार्च २०१५ (वर्ष ८ मास ८७ अंक १७४) ऐ अंकमे अछि:- लघु कथा-पसेनाक धरम-जगदीश प्रसाद मण्डल लघु कथा-जमीला-डॉ. शिव कुमार प्रसाद लघु कथा-पसेनाक धरम-जगदीश प्रसाद मण्डल जहिना अंग्रेज-मासक जून काल्हि समाप्त भेल तहिना अपन जेठ मास सेहो ओरानीपर आबि गेल। पछिला साल जे दुर्गापूजामे हथिया नक्षत्रक बर्खा भेल, तहियासँ एको बून पानि मेघसँ नै खसल। ओना मघाइर बर्खा भेने जाड़ो किछु बेसियाइए जाइए, मुदा सेहो नहियेँ बेसियाएल। तइसँ जाड़क दुख तँ कनी कमबे कएल मुदा रब्बी-राइकेँ लाही चाटि गेल। हथियाक पछाति आठ माससँ अकास धरतीकेँ सरकारी राशन जकाँ पानि बन्न कऽ देलक। जइसँ रंग-रंगक विचार धरतीपर उठऽ लगल। कियो बजैत जे रौदी हएत, तँ कियो कहैत आगूसँ रौदी भेने थोड़े रौदी हएत आ जँ पाछूसँ मेघ फाटि बर्खो हुअए आ बाढ़ियो आबए तखन रौदी कहबै कि दाही। तहिना कियो ईहो कहैत जे कालीओ दास अखाढ़सँ बर्खा-मेघक आगमन मानै छथि तखन रौदी केना भेल। मुदा तेतबे थोड़े अछि, किम्हरो कमला पूजा तँ किम्हरो पानिक यज्ञ तँ किम्हरो रौदी भगबैले रामधुन-अष्टयाम-नवाह तँ किम्हरो मनुखदेवा गहवरमे पूजो अनधुन हुअ लगल। मुदा जे भेल, एते तँ भेबे कएल जे हथियाक बरिसल, माघक गुजरल फागुनक मोजर रौद आ पछिया हवामे तेना झड़कल जे आमे अलोपित भऽ गेल। चारि बजे भोरेसँ शिवपूजन काका काजमे लगता तँए साढ़े तीनियेँ बजे नीन तोड़ि उठि, प्रभात कर्मसँ निवृत होइत चाह बना पीब घड़ीपर नजरि देलनि तँ चारि बजैत देखलनि। पत्नीकेँ सोर ऐ दुआरे पाड़लनि जे ओ जगि कऽ तैयार भेल छथि कि नइ, मुदा सुगियो काकी पतिक कोठरीक खट-खुटक अवाज सुनि तैयार भऽ गेल छेली। तैयारो केना ने होइतथि, काल्हि साँझूए पहर तीनू गोरे एकठाम बैसि विचारि नेने छला जे पराते बीघो भरि खेतक चास लगाएब। गोरहा खेत छी ओतबो जँ सम्हरि कऽ उपैज जाइए तँ बुतातक साल-माल लगिए जाइए। तहूमे कि आब लोक पहिलुका जकाँ दुनू साँझ भात खाइए, एकसंझू भेने अदहे साल ने भेल। जेठ अखाढ़क सीमा परहक समए छी, माघ मास थोड़े छी जे लोक आठ बजेक पछाति काज दिस ताकत। अखनि तँ चारि बजे भोरेमे फरीच हुअ लगै छै। काजक अनुकूल समए तँ बनियेँ जाइ छै। तहूमे काजो नमहर अछिए। बीघा भरिक चास। एक दिस पहिने खेत पटत, तखन कदबा हएत तहिना दोसर दिस बीआ उखाड़ल जाएत, तखनि ने कदबाक पछाति रोपल जाएत। जेरगर जनकेँ जोड़ियबैओमे समए लगिते अछि। तेतबे किए! दमकलसँ पटौल जाएत ट्रेक्टरसँ जोतल जाएत, दुनू लोहे-लक्कठ भेल, जँ कोनो पाट-पुर्जा गड़बड़ेतै तँ काजे रूकि जाएत। ओना सुगिया काकीकेँ बूझल रहनि जे अँगनाक काज पुतोहुक हाथे अपने सम्हारऽ पड़त। तँए भोरेसँ जलखै-खेनाइक ओरियानक पाछू जारनि-काठीक व्योँत-बाँत मने-मन करिते रहथि, तेतबे नइ जँ कहीं पुरुख-पातर खेतेक काजमे ओझरा जेता तँ पानि-जलखै सेहो खेत पहुँचबऽ पड़त। सुगिया काकीकेँ शिवपूजन काका पुछलखिन- “बौआ उठल? चारि बजि गेल। घटही गाड़ी जकाँ जँ शुरूएमे लेट भेल तँ टीशने-टीशन लेट होइते जाएत।” भिनसुरका समए तँए सुगिया काकीकेँ पतिक बोल नीक लगलनि। नीको केना ने लगितनि, कौआ जकाँ थोड़े पति बाजल छला, काग जकाँ कुचड़ल छला किने। मुदा काजक मोड़पर तेना सुगिया काकी पड़ि गेली जे किछु करैत किछु ने बनै छेलनि। मोड़ ई जे सोनेलाल खा-पी कऽ नबे बजे रातिमे पितासँ छिप कऽ आॅरकेस्ट्रा देखए चलि गेल छल जे पौने चारि बजे आपस आबि ओछाइनपर पड़ले छल कि उठबैक आदेश पतिक भेलनि। ओना सुगिया काकीक अपनो मन घिरनी जकाँ नचैत जे चारि बजेमे दमकल चलत तखन ने कदबा बेरमे कदबा हएत आ रोपै बेरमे खेत रोपाएत। कहुना-कहुना तँ सात-आठ घण्टा खेत पटैमे लगत। एक तँ गोलगर खेत तैपर जेठुआ जरल सेहो अछि। तहूमे कि फूलक छीच्चा छी, आ कि तीमन-तरकारीक जड़िपनियाँ छी, कदबाक पटौनी छी जइमे कहुना तँ भरि घुट्ठी पानि लगौल जाएत। तँए ओहो समए खिंचबे करत। पत्नीक उत्तर नहि पाबि शिवपूजन काका कनी कड़ैक कऽ दोहरबैत बजला- “की कहलौं, नइ सुनलिऐ?” पतिक दहकैत अवाज सुनि सुगिया काकीक नजरि नचलनि। नचिते मनमे एलनि, एक दिस पति परिवारेक नीक-ले आफन तोड़ि रहला अछि, दोसर दिस ई छौड़बा किए भरि राति जागि कऽ गमा लेलक...! ...आब ओ सूतत आकि जगि कऽ काज सम्हारत। अखनि जे ओकरा उठबऽ जेबै तँ ढोँढ़ साँप जकाँ फुफकार छोड़त...! जँ नइ उठेबै तँ अपने आरो बेसी दहकता! ऐ परिस्थितिसँ निबटब केना...? परिस्थितिसँ वैचारिक दौड़मे निपटियो सकै छी मुदा काजक जे जाल पसरि गेल, माने रोपनिहारकेँ कहि देने छिऐ, जे अपन समांगक गलतीसँ ओकर काज बाधित हेतै! कहुना छी तँ पेट-बोनियाँ छी, भरि दिन थाल-पानिमे लेटाएत तखनि जा कऽ बाल-बच्चाक संग दुनू साँझ खाएत। अपनो परिवारमे जेते जोड़ि-बन्हन कऽ नेने छी, माने दमकल चलैक ओरियान, खेत जोतैक ओरियानक संग जलखै-चाहक ओरियान, ओहो तँ राइए-छीती भऽ जाएत...! ...मने-मन साहस बटोरि सुगिया काकी सोनेलालक कोठरीक मुँह लग जा ठाढ़ भेली। केवाड़ बन्न रहने बाहरेसँ बजली- “बौआ, बौआ सोनेलाल?” कनी पहिने सूतल सोनेलाक मोनमे ओहिना आॅरकेस्ट्राक सीनो सभ आ गीतो-नाद नचिते रहै जइसँ नीन गहराएलो नहियेँ छेलै। मुदा माइक बोलकेँ अनसुन करैत सोनेलाल हँ-हूँ किछु बजबे ने कएल। जइसँ सुगिया काकी केबाड़ लग ठाढ़ छेली। ने आगू ससरि पति लग जाइक साहस होइ छेलनि आ ने बेटाकेँ जोरसँ दबारि उठबैक साहस होन्हि। एक तँ ओहुना भोरुका समए छी, सिताएलमे केतौ अगियाएल दौड़ै...। ...शिवपूजन काका पत्नीकेँ कहला पछाति, पत्नीएपर नजरि रोपि लेलनि। रोपि ई लेलनि जे काजक दौड़मे जँ काजक सूत्र मनसँ ससरि जाएत तखनि तँ काजो ओही लाथे ससरऽ लगत। जइसँ काज या तँ भरियाएत या ओझराएत। पत्नीक क्रिया-कलाप देखि शिवपूजन कक्काक मन ठमैक गेेलनि। जैठाम ठमकलनि तहीठाम ठाढ़ सेहो भऽ गेलनि। तँए मिसियो भरि आगू-पाछू नइ डोललनि। असथिर भेल दरबज्जाक मुँह लग ठाढ़ भेल पत्नीपर आँखि गरौने रहलथि। मुदा नजरि घूमि कऽ काजक बीच सीमानपर आबि अँटैक गेलनि। अँटैक गेलनि ई जे कियो पसेना चुबा श्रम करैए आ कियो श्रमसँ छिटैक श्रमचोर बनि जाइए जे मेहनतक पसेनाक धरम नै बूझि पबैए, श्रमहीन बनि जाइए। एना किए एक्के मनक दुनू क्रिया छी। क्रिया तँ कर्मक अनुकूल चलैत अछि, कर्म चलैत अछि विचारानुकूल, आ विचार चलैत अछि धर्म-धारणक अनुकूल। माने जे जेहेन जिनगीकेँ धरम बूझि धारण करैए...। ...मुदा लगले मन नाचि गेलनि जे पसेनाक धरम की? जहिना एक-बट्टी, दू-बट्टी, तीन-बट्टी, चरि-बट्टी, पँच-बट्टी लग पहुँच अपन जीवन यात्राक पथ कियो देखए लगैए तखने ने देखैए जे पसेना तँ ओ शीतल बून छी जे कुवृत्तिकेँ धोइ जेते बढ़ैत जाइए से तेते धोइत-धुआइत अपन धरम धारण करैए। से कहाँ सोनेलालमे देखि पाबि रहल छी। धिया-पुता जकाँ जेना कोनो धनियेँ-ढेकार ने छै, तहिना बूझि रहल अछि। जीबैले जीबैक उपाए सेहो तँ करए पड़ै छै। से कहाँ देखैमे आबि रहल अछि...! विचारैत-विचारैत शिवपूजन कक्काक मन अपन औझका काजमे ओझरा गेलनि। ओझरा ई गेलनि जे जे गर्भे नाश भऽ जाएत ओकर जिनगीक आशा केते कएल जाए सकैए...। ...फेर मन घुमलनि, जून मासक अन्त भऽ गेल, जइ बीआकेँ बीस-पचीस दिनक बीच रोपैक छल, ओ अदहा मइमे छीटने छेलौं, जेकरा आइ डेढ़ माससँ बेसी भऽ गेल, जे समए ओकर वृद्धिक छेलै, तइमे अदहा समए ओहिना चलि गेल। जाइक कारण भेल बर्खाक आशा-अाशी देखब। जहिना शिवपूजन काका दरबज्जाक मुँहपर ठाढ़ भेल घड़ी दिस देख निराश भऽ रहल छथि, तहिना सुगिया काकी सूतल बेटाकेँ देखि उतरीत भऽ रहल छेली। मुदा दुनूक मनक प्रश्न अन-उतरीत छेलनि। उतरीत तँ केला पछाति भेलापर होइ छै। निराशमे आस भरैत शिवपूजन काका सुगिया काकीकेँ कहलखिन- “सोनेलाल सुतले अछि। चारि बजि गेल अछि, अखनि जँ ओकरा चरिया कऽ नइ उठाएब तँ अो सुतले रहि जाएत।” अपन मनक बात खोलैत सुगिया काकी बजली- “भरि राति अरकेस्ट्रा देखै छेलै, अखनि जँ उठेबो करबै तँ काजमे भकुआएले रहत।” ‘ऑरकेस्ट्रा’क नाओं सुनि शिवपूजन कक्काक मनमे उठलनि, अखन तँ खेती-बाड़ीक समए छी, कोनो उत्सवक समए तँ नहियेँ छी, अखुनका उत्सव तँ सभसँ पैघ खेतीक अछि, तहूमे काल्हि साँझूए पहर, काजक सभ व्योँत लगा नेने छेलौं, तखन किए एना केलक। बजला- “जखन अौझका काजक सभ व्योँत बूझल छेलै, तखन किए देखऽ गेल। जँ गेबो कएल तँ घण्टा-दू घण्टा देखैत आ आबि कऽ सुति रहैत, जइसँ काजमे बिथुत नइ होइतै।” मुदा सुगिया काकी चुपचाप पतिक बोल बेटा निविते सुनि रहल छेली। कोनो उत्तर नै छेलनि। छेलनि सिरिफ एतबे जे आँखिक ज्योति झूकल छेलनि। १६ मार्च २०१५, शब्द– १२५६ संक्षिप्त परिचए- जनम : ५ जुलाई १९४७ ई., पिताक नाआंे : स्व. दल्लू मण्डल। माताक नाआंे : स्व. मकोबती देवी। पत्नी : श्रीमती रामसखी देवी। मातृक : मनसारा, भाया- घनश्यामपुर, जिला- दरभंगा। मूलगाम : बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला-मधुबनी, (बिहार) पिन-८४७४१० ई-पत्र : jpmandal.berma@gmail.com मो. ९९३१६५४७४२, ९५७०९३८६११ शिक्षा : एम.ए. द्वय (हिन्दी आ राजनीति शास्त्र), जीविकोपार्जन : कृषि सम्मान : “टैगाेर साहित्य पुरस्कार”, “विदेह भाषा सम्मान”, “विदेह बाल साहित्य पुरस्कार” तथा “वैदेह सम्मान”सँ सम्मानित-पुरस्कृत। प्रकाशित पोथी : उपन्यास : (१) मौलाइल गाछक फूल, (२) उत्थान-पतन, (३) जिनगीक जीत, (४) जीवन-मरण, (५) जीवन संघर्ष, (६) नै धाड़ैए, (७) बड़की बहिन, (८) सधबा-विधवा (९) भादवक आठ अन्हार। नाटक : (१०) मिथिलाक बेटी, (११) कम्प्रोमाइज, (१२) झमेलिया बिआह, (१३) रत्नाकर डकैत, (१४) स्वयंवर। लघु कथा संग्रह : (१५) गामक जिनगी, (१६) अर्द्धांगिनी, (१७) सतभैंया पोखरि, (१८) उलबा चाउर, (१९) भकमोड़, (२०) पतझाड़, (२१) अप्पन-बीरान, (२२) बाल गोपाल, (२३) लजबिजी, (२४) गामक शकल-सूरत (२५) समरथाइक भूत, (२६) उकड़ू समय, (२७) अपन मन अपन धन। विहनि कथा संग्रह : (२८) बजन्ता–बुझन्ता, (२९) तरेगन। एकांकी- (३०) सतमाए, (३१) कल्याणी, (३२) समझौता, (३३) तामक तमघैल (३४) बीरांगना- संग्रह, पंचवटी। दीर्घ कथा संग्रह: (३५) शंभुदास, (३६) रटनी खढ़। कविता संग्रह : (३७) इंद्रधनुषी अकास, (३८) राति-दिन, (३९) सतबेध। गीत संग्रह : (४०) गीतांजलि, (४१) तीन जेठ एगारहम माघ, (४२) सरिता, (४३) सुखाएल पोखरिक जाइठ। लघु कथा- जमीला-डॉ. शिव कुमार प्रसाद १ अगियाएल मन कन घमले छेलै कि कनियाँ बिअनि नेने ठाढ़। सुमनजी तम-तमा गेला। अबते जँ पत्नी बिअनि नेने ठाढ़ भेली कि बुझू जे हुनक चरखा शुरू। शुरू भाइए गेली- “अँए यौं! आर कियो नोकरी करै छै कि नहि। हमरा तँ लगैत अछि जेतेक दरमाहा अहाँक औपिसमे अबै छै सभटा अहींकेँ भेटि जाइत अछि... ...हे कियो काज नइ देत।” सुमनजी की बजता। सभ दिन एके खिस्सा। ऑफिसमे सभ काज करै छै मुदा सुमनजीक कुशल, कर्मठ आ दृढ़ व्यक्तित्वक सोझा सबहक माथ झूकले रहै छै। चामक पूजासँ कामक पूजा पैघ होइ छै। ऐ बातक प्रत्यक्ष प्रमाण सुमनजी छथि। हुनक सहकर्मी संगे-संग हुनक पदाधिकारीओ सुमनजीकेँ सम्मान दइ छथिन। मुदा पत्नी लेल धैनसन। सुमनजी बजला- “हे यै, एक गिलास जलो तँ नेने अबितौं! के काज देत। यै, जिनगी भरि तँ अहाँ आ अहाँक बाल-बच्चा लेल कमा-कमा कऽ देलौं से तँ एक गिलास पानियोँ नदारत अछि। फेर आनसँ हम की आशा करब।” पत्नी मुँह फुलौने घरसँ निकलि बेटीपर फुफकार छोड़ऽ लगली कि तावत रस्तापर हो-हल्ला हुअ लगलै। सुमनजी कपड़ो ने बदलने रहथि। ओ ओहिना दरबज्जा दिस विदा भऽ गेला। पत्नी सेहो पाछू-पाछू दरबज्जापर एलखिन। बीच सड़कपर सौंसे टोलक जनानी-पुरुखक करमान लागल छल। बीचमे कोनो जनानी कानि-कानि कऽ नगरक लोककेँ बिखैन-बिखैन गारिसँ असिरवाद दैत अल्ला निसाफ करतौ, अल्ला निसाफ करतौ...। कहैत बीच सड़कपर पड़ल छल। सुमनजी चकित। ई अल्लावाली स्त्री केतएसँ टोलपर आबि गेल। कोनो चाेरनी ने तँ छी...। ...ई सोचिते छला कि पत्नी हाथ पकड़ि कहलखिन- “चलू-चलू, कथीले गारि सुनब। ई छुतराही केकरो ने छोड़तै। जे जेहने करम करत ओकरा ओहने ने फल भेटतै।” सुमनजीकेँ किछु भाँज नै लगलनि। परंच ई अबस्स बुझना गेलनि जे कोनो विशेष बात अबस्स छइ। ओ चुप-चाप पत्नी संग अँगना आबि गेला। अाँगन अबिते बेटी माएपर बाजलि- “एतेकाल फुफकार कटै छेलेँ जे एक लोटा पानियोँ ने बाबूकेँ देल होइ छौ, हम पानि लऽ कऽ ठाढ़ छी आ दुनू गोरे तमाशा देखऽ चलि गेलेँ।” सुमनजी बेटीक बात सुनि झमा कऽ खसला। कियो कम नहि। जल की पीता। बेटी दिस तकैत हतास् भेल अपन कोठरी दिस विदा भऽ गेला। मन तँ भेलनि जे बेटीक हाथसँ लोटा लऽ जुमा कऽ बाड़ीमे फेकि दी, मुदा फेर अपनाकेँ रोकला आ ओहिना बिछौनपर निढ़ाल भऽ पड़ि रहला। बेटी टेबुलपर लोटा रखि चलि गेलनि। पत्नी पतिक मुँहक भाव देख नेने छेलखिन। भयसँ हुनका लग नहि एलखिन। हुनका बुझबामे कनिको भाँगठ नै रहलनि जँ अखन अगर लगमे जेबनि तँ निश्चित लोटा पानि समेत बाड़ीमे चलि जेतै। सुमनजी बहुत सोझ आ शान्त बेकती। किनको किछु अधला नै करता। किनको श्राद्ध आकि बिआहमे मदति करैले सदिखन तत्पर। हुनका लेल कियो आन नहि। बाल-बच्चा तँ हुनक प्राण। मुदा जखन क्रोध अबै छन्हि तँ कियो हुनका सामने जाइक साहस नइ कऽ सकैत अछि। एकटा माए आ बाबूएजी एहेन छथिन जिनका सोझा सुमनजीकेँ कोनो वश नइ चलै छन्हि। अपन जनमदाताक प्रति हुनका अगाध श्रद्धा छन्हि। सुमनजीक भाव-धारा पुन: रस्ता दिस बहऽ लगल। की बात छिऐ...? ओ जनानी के...? किए सौंसे टोलक लोक जमा भऽ ओइ अवलाकेँ मारि रहल अछि...? ओ कोन कारणे ‘अल्ला’केँ गवाही रखि सैंसे टोलसँ लड़ैले तैयार अछि...? जरूर कोनो असाधारण बात अछि। पुन: सभ बातसँ अलग सिरमापर माथ देने छतकेँ निहारऽ लगला। पत्नी चुप-चाप तावत् टेबुलपर चाह आनि कऽ रखि देने छेलखिन। हुनकर मुँहक भाव सेहो बदलि गेल छेलनि। सुमनजीकेँ कहलखिन- “कपड़ो ने बदललौं। चाह पीब लिअ, फेर कपड़ा बदलि लेब। अलगनीपर सभटा कपड़ा राखल अछि।” पुन: अलगनी दिस तकलथि तँ ओइपर गमछा नइ छेलै। ओ पुन: घरसँ बाहर निकलि गमछा नेने घरमे एलखिन। तावत् सुमनजी बिछानसँ उठि चाह पीबै छला। पत्नी गमछा बिछानपर राखि पान लगबऽ लगलखिन। सुमनजी बिछानसँ उतरि कपड़ा बदलैमे व्यस्त भऽ गेला। पत्नी पानो लगबै छेलखिन आ कनडेरीए आँखिए पतिपर तकितो रहथिन। पति चुप-चाप कपड़ा बदलैत रहला। पत्नी पतिकेँ किछु बतबैले उताहुल छली मुदा साहसे ने होइ छेलनि। ओ सोचि-विचारि कऽ पतिक हाथमे पान दैत बजबाक असफल प्रयास केली मुदा पति केर भाव नै पाबि चुप-चाप घरसँ निकलि गेली। सुमनजी कपड़ा बदलि पुन: अपनेसँ पान लगा खा लेला आ चुप-चाप आँगनसँ बाहर निकलि गेला। रस्तापर तमाशा समाप्त भऽ गेल छेल। ओ टहलैत खेत दिस निकलि गेला। २ बाधमे दोसर गामक एकटा किसानसँ भेँट भऽ गेलनि। हिनका देखिते ओ प्रणाम करैत पुछलखिन- “की यौ सुमनजी, अहाँ तँ खेत-पथार बिसरिये गेलौं। कहियो देखबो ने करै छी। आ लोक खेत दिस एबो किए करत। दू सालसँ एकटा अन्न केकरो खेतमे नै उपजि रहल अछि।” सुमनजी ओइ किसानकेँ थाहैत लगमे जा बजला- “कहू-कहू की हाल अछि खुशी भाइ। खेती-पथारीक की हाल अछि?” खुशीलाल बाजल- “की हाल रहत। कहुना अहुबेर चिचोरि-मिचोरि कऽ धान रोपि देलिऐ। आशा तँ नहियेँ अछि। तैयो रोपि देलिऐ...। हम सभ आब नोकरीओ तँ कऽ नइ सकै छी।” पुन: फुसफुसा कऽ बाजल- “सुमनजी, एकटा बात पूछी?” खुशी भाइक फुसफुसाहटिपर सुमनजीक कान ठाढ़ भेलनि। सहटि कऽ खुशीलालक लग आबि पुछलखिन- “की बात यौ!” खुशीलाल ओहिना फुसफुसाइत बाजल- “अहाँ टोलमे सुनलौं जे मुसहरवाक बेटा एकटा जोलाहिनसँ बिआह कऽ गामपर अनलक अछि।” सुमनजीकेँ धक् दऽ मोन पड़लनि। ओ... जनु एकरे झगड़ा होइ छेलै...। खुशीलालकेँ कहलखिन- “अँए यौ, अहाँकेँ ई बात बूझल अछि? हमरा तँ किछु ने बूझल अछि! अखनो रस्तापर हल्ला-गुल्ला होइ छेलै। वएह-वएह ओकरे झगड़ा होइत हेतैक।” खुशीलाल बातकेँ आगू बढ़बऽ लागल। सुमनजीकेँ असली बात बुझबामे आबि गेलनि। अपन गामक निन्दाक बात सोचैत सुमनजी खुशीलालकेँ कहलनि- “छोड़ू ऐ बात सभकेँ। केकरा की कहबै। और सुनाउ बाल-बच्चा केना अछि। की कऽ रहल अछि। यौ सुनलौं अहाँ-कनियाँकेँ मन खराप भऽ गेल छल। ठीक भेली किने।” खुशीलाल अपन घरवालीक बात सुनिते बाजल- “यौ सुमनजी, ओ पूर्वजन्मक पुनेक कारण बँचि गेली। नइ तँ मरबामे कोनो भाँगठ नहि रहि गेल छेलनि। काल्हि आऊ ने, देखियो लेबनि।” सुमनजी ‘हूँ-हूँ’ करैत घर दिस घूमि गेला। गाम-घरक कोनो बात छपित रहि केना सकैत अछि...। दोसर दिन सुमनजीकेँ छुट्टीए रहनि। घरसँ चाह पी कऽ एकटा मित्रक घरपर विदा भेला। रस्तेमे एकटा दरबज्जापर परचित-अपरचित सबहक अड्डा जमल छल। सुमनजी सेहो धरा गेला। एकटा नेताजी सेहो हुनका सबहक बीच विराजमान रहथिन। बैसला बाद पुन: चर्चा शुरू भेल। मुसहरबा गामक एकटा किसान छल। विधाता ओकरापर दहिन छेलखिन। मात्र आठे-गोट बेटा देलखिन। आरो होइतै तैयो ओकरा खुशीए होइतै। जर-जमीन तँ मुसकिलसँ दू बीगहा छै। दोसर-तेसर गिरहतक जमीनमे बटाइ करि कऽ गूजर-बसर करैत अाबि रहल अछि। एक जोड़ा बरद, दूटा भैंस, गाए, बकरी सभटा आमदनीए। जखनि समरथ छल, केहनो काजकेँ किछु ने बुझै छल। घरवाली सेहो विधाता दहिन भऽ कऽ देलखिन। हऽर-कोदारि छोड़ि एहेन कोनो काज नै अछि जे ओ नहि कऽ सकैए। तेहने काया, तेहने रंग आ तेहने रूप। जखन मुसहरबाकेँ दुरागमन भेल रहै ओही समए ओकर पत्नीकेँ देखबा लेल ओकरा अँगनाक टाटमे केतेक भूर भेल से गनब कठिन छल। मुसहरबाक माए सभ दिन दसटा गारि दऽ टाटक खरही सभकेँ ठीक कऽ दैत रहए, मुदा दोसर दिन फेर ओहिना-क-ओहिना। गेल जवानी फेर ने लौटए। अठ-अठटा बेटाक जनम दइवाली जनाना आ पुरुखक धीरे-धीरे परिवारक लगाम ढील होइत गेलै। एकटा, दोसर, तेसर पुतोहु तक तँ कहुना मुसहरबाक कनियाँ बेटा-पुतोहुकेँ बान्हि कऽ रखलक मुदा चारिम पुतोहुकेँ अबिते वेचारी हाफऽ लगली। जखन छोटकीक मुहसँ लुत्ती-उड़ए लगै, तँ मात्र मुसहरबे दुनू परानी नहि समुच्चा परिवारक लोक तेना ने दगैत छल जे सभटा मलहमो जरि जाइ छेलै। एक दिनक बात छी। सुमनजी मुसहरबाक पड़ोसीक ओइठाम कोनो काजे गेल छला। बैसले छला कि मुसहरबाकेँ अँगनासँ वएह लुत्ती उड़ब शुरू भेल। लुत्तीक जवाब आगि-अँगोरासँ देल जाइत रहै। आब लुत्ती आ अँगोरामे अपन घरकेँ के कहए जे पास-पड़ोसक संगे संग एक-एकटा जाति-अजातिक संग कोन-कोन सम्बन्ध ने उजागर होमए लगल। मुसहरबाक अँगनामे तिल रखैक जगह नहि। अचानक कुट्टा-कुट्टी शुरू भेल। तीन दियादिनी एक तरफ, छोटीक असगरे एक तरफ। अँगनामे ठाढ़ पुरुख-पात्र लाजे ओतएसँ भागल। धरहरिया करैवाली सभ थाकि कऽ कात भऽ गेल। गइ सँइकटनी, गइ बपडाही, गइ सौतिन, आर की की नहि...। आइ मुसहरबाक परिवारक गाड़ीक कनैल, पालोक संग-संग चक्का, धूरी सभटा टुटि-फुटि कऽ नाश भऽ गेलै। मुसहरबा जीविते अछि। पत्नीओं जीविते छै। बेरा-बेरी बेटा-पुतोहु भीन होइत गेलै। आइ सभसँ बुरबक बेटा-पुतोहुक संग कहुना जिनगी काटि रहल अछि। मुसहरबाकेँ बेटाक विषयमे सोच छेलै जे भगवान बेटा दइ छथिन तँ हम रोकैबला के। जीतै तँ बोइन कऽ कऽ खेतै। सभटा बेटा ठीके बाेइन कऽ कऽ जीब रहल छै। कियो पंजाब, तँ कियो दिल्ली आ कियो गामेमे। मुदा पुछैबला कियो ने। एकटा बेटा परसाल गामेमे रहि एकटा भट्ठापर ईंटा बनबऽ गेल। ओतै एकटा जनानी जमीला सेहो रेजाक काम करैत छेलै। छौड़ा देखऽमे सुन्दर, लम्बा आ मजगूत देहक छेलै। धीरे-धीरे दुनूक बीच पेंच फँसि गेलै। ओकर नाओं रखि दियौ ‘पंचा’। तँ पंचा आ जमीलाक बीच शारीरिक सम्बन्ध भेलाक कारणे ओकरा गर्भ भऽ गेलै। जखन मामला उजागर हुअक स्थिति भेलै तँ दुनू परा कऽ बाहर भागि गेल। ओतै गर्भपात करबा कऽ दुनू फेर कामो-काज करए लगल। पंचाकेँ दूटा बाल-बच्चा भऽ चुकल छेलै। जमीलाकेँ सेहो तीनटाबाल-बच्चा। जमीलाक घरबला एक-दू बर्ख पहिने छोड़ि कऽ भागि गेल छेलै। ओअपन माइक संगे रहैत छल। आब दुनू बेक्ती भट्ठापर कमाइत छल। दुनू अपन-अपन घरपर बाल-बच्चा लेल रूपैआ-पैसा सेहो पठबैत छल। ऐ क्रमे एक-डेढ़ बर्ख भऽ गेल। दुनूकेँ अपन-अपन बाल-बच्चाकेँ देखना बहुत दिन भऽ गेल छेलै।दोसर जमीला जेतेक पाइ कमाइ छल ओ बैंक वा पोस्ट-आॅफिससँ भेजैले पंचाकेँ दइ छेलै। फोनपर जमीला जखन पाइ दऽ पुछै छेलै तँ बड़की बेटी कोनो बेर सही कोनो बेर कम बतबैत छेलै। धीरे-धीरे जमीला बूझि गेल जे ई मुनसा हमर पाइ अपन घरपर पठा दइए, या रखि लइए। आब ओ पंचापर गाम जेबा लेल जोर देमए लगल। पंचा कहुना-कहुना ओकरा पोल्हबै छल मुदा जनानीओं कम खेलल नहि छल। अन्तमे दुनू गाम लेल विदा भेल। दुनूमे शर्त भेलै जे हम ने तोरा ओइठाम जेबो आ ने तों हमरा ऐठाम जेमे। दुनू गोटे अपन-अपन बाल-बच्चाक संगे दस दिन-मास दिन रहि फेर घूमि जाएब। गाम एलापर बात बिगरि गेलै। जमीला गामपर आबि कऽ जे पाइ-कौड़ीक हिसाव केलक तँ पता चललै जे ओकर कमेलहा ५५-६० हजार रूपैआ पंचा बेइमानी कऽ लेलकै। ओ जनानी पहुँचल पंचा गामपर आ एमहर पंचा घरसँ फरार। टोलपर मेला लगि गेल। जमीला पहिने तँ पाइक बात कहलकै। फेर पंचाकेँ अपन घरवला घोषित कऽ देलकै। पंचाक अँगनामे ढुकि एकटा घरक ओसरापर जा कऽ बैसि रहल। पंचाक भौजाइ संगे-संग सौंसे गामक जनानी एक दिस आ पंचाक तथाकथित मुसलमानि पत्नी एक दिस। आब जमीला कहै- “जाबत मुनसा गामपर नहि औत ताबत हम ऐ ओसरापरसँ नहि उतरब।” पंचाक घरवाली आ बाल-बच्चा संगे-संग आन भाए-भौजाइकेँ पहपटि भऽ गेल। की करी की नै। भरि दिन जमीला ओसारपर बैसल रहल आ अँगनामे रहनिहार सभटा धीरे-धीरे अँगनासँ बाहर भऽ गेल। पंचाकेँ सेहो खबरि कएल गेल मुदा ओ किए औत। साँझ भेलापर जमीला जे से बजैत अपन घरपर चलि आएल। गामक लोक सेहो निसाँस छोड़लक। रातिमे मुसहरबापर पंचायत बैसल। “तोहर बेटा मियनि संग बिआह केलकौ तँए नै एलौ। बेटाकेँ बजा। कोनो बात अबस्स छै।” मुसहरबा कहलकै- “हौ पंच सभ। तों सभ हमरा किए कहै छह। पंचाकेँ भीन भेना सात बरख भऽ गेलै। आब ओ हमरा बसमे अछि? ओही छौड़ाकेँ पुछहक। हम तँ नचार छी। कहुना जीबै छी। ओकर घरवाली छै। कहक पुछतै।” पंचाक घरवाली एतेक लोकमे की बजतै। गुड़क मारि धोकरे जनै छै। ओकरा छाती अपने हहरै छै। तीनिटा धिया-पुता। तहूमे एकटा बेटी। सौतिन मुसलमानि। ओकरा आँखिक नोर नइ सुखा रहल छै। जे से बाल-बच्चाकेँ ताना मारै छै। नवकी माए एलौ रौ? की सभ अनलकौ? पंचैतीमे सभ मुसहरबाकेँ दोमैत रहल। ओ सभ बात सुनि कऽ चुप्पे रहल। पंचाक घरवाली अपना माए-बापकेँ फोन करैलक। सभटा बात कहलकै। भाए सभ ओकर पीट्ठा-पहलवान। बहिनकेँ ढाढ़स देलकै। भोरे दूटा भाए एलै। सभटा बात सुनलकै। गौआँकेँ फेर बैसार भेल। बैसार शुरूए भेल छेलै कि पंचाकेँ ओ नवकी कनियाँ फेर दरबज्जापर पहुँचगेलै। पंचाक सार संगे-संग सभटा नवतुरिया पंचैती छोड़ि जमीलाकेँ घेर लेलक। ओकरा एक आदमी पुछलकै- “तों हिन्दू बनबीही तँ पंचा राखि लेतौ।” ओ जनानी कहलकै- “एनुका चान ओनए किए ने चलि जेतै मुदा हम हिनू नइ बनबै।” एतबा बात निकलिते पंचाक सार चटाक् दऽ जमीलाकेँ मुँहपर थापड़ मारि देलकै। थापड़ लगिते जनानी जमीनपर बैसैत-बैसैत ओंघरा गेल। किछु आदमी पंचाक सारकेँ अलग केलक। ताबत् लोक देखलकै जे जनानी बेहोश छै। पंचाक घरवाली दौग कऽ पानि अनलक आ ओकरा मुँहपर हाथसँ छिच्चा देबए लगलै। थोड़ेकालमे ओइ जनानीकेँ होश एलै। साड़ी खुलि गेल रहै ओकरा देहमे लटपटबैत गारि दैत ओ थाना जाइक बात कहैत विदा भऽ गेल। थानाक नाओं सुनिते टोलबैया अपन-अपन अँगना दिस विदा भऽ गेल। मुसहरबा अँगनाक जर-जनानी सभटा अपन-अपन नहिरा दिस विदा भेल। पंचाक सार सेहो अपन बहिन आ भगिनीकेँ लऽ विदा भऽ गेल। एकटा बेटा जे बारह-तेरह बर्खक रहए ओकरा माल-जाल देखैले छोड़ि देलकै। मुसहरबा दुनू परानी टुकुर-टुकुर देखि रहल अछि। सुनि रहल अछि। ओइ मादे बलु सोचितो हएत। अँगनामे मात्र दूटा पोता छै। बेटो सभ किछ-मिछ खा कऽ बाध-बोन दिस टरि गेल। ३ कथा अनसोहाँत तँ ने लगैए? चलू कथा तँ बड़ ओझराएल अछि मुदा ओ ओझरीसँ निकालि कऽ हमहूँ निस्तार पाबए चाहै छी। जमीला ठोकले थाना पहुँचल। संगमे माए आ एकटा छोटका बेटा सेहो रहै। सभटा खिस्सा कहैत ओ दरोगाजीकेँ पंचाक गामपर जेबाक जिद्द करऽ लगलै। जनानीबला बात। दरोगा ओइ जनानीकेँ टोलक चौकीदारकेँ बजबेलक। पंचाक गामक चौकीदारकेँ बजा पंचाक घरसँ बजबैले पठेलक। जखन जमीलाक बारेमे चौकीदारसँ दरोगा जिज्ञासा केलक तँ ओ साफ-साफ दरोगाजीकेँ बता देलकै जे ई जनानी ओही लाइक अछि।एकरा संगे जे भेलै से उचिते भेलै। ऐ जनानीक इहए धंधे छै। दरोगाक सामने अपन चरित्रपर चौकीदार द्वारा देल गवाही ओकरा उत्तेजित कऽ देलकै। ओ दरोगाकेँ सोझहेमे गारि दैत चौकीदार दिस झपटल। मुदा ओकर माए आ बेटा कहुना ओकरा रोकलक। तावत पंचा गामक चौकीदार सेहो घूमल। पंचाकेँ भागब आ गामक खिस्सा कहैत ओ सेहो अपन विचार दरोगाजी लग रखलक। सभ बात सुनि दरोगाजी जमीलाकेँ दोसर दिन थानापर एबाक बात कहि डाॅटि-डपैट कऽ कहुना घर पठेलक। दरोगाजीकेँ बुझैमे बहुत किछु आबि गेलनि। मुदा पंचोकेँ दोख तँ छइहे। दोसर दिन जमीला भिनसरे थानापर पहुँचल। दरोगाजीकेँ पंचा ओइठाम चलऽ लेल जोर देमए लगलै। ऐ बीचमे पंचाक तरफसँ कियो दरोगाजीकेँ दुआ-सलाम कऽ कऽ सम्हारि गेल छल। दरोगाजी एमहर-ओमहर करैत जखन एक घण्टा बिता देलखिन तँ जनानी अचानक थानाक ओसरापर चढि ओइठाम राखल दू-तीनटा प्लाष्टिकक कुर्सीकेँ उल्टैत दरोगेजीकेँ धमकी दैत कहलकै- “अगर अहाँ नइ जाएब तँ हम अखने डी.एस.पी. पुलिस लग जाएब। अहाँ हिन्दू छी तँए हिन्दूक पक्ष लइ छिऐ।” एकटा सिपाही ठेंगा लऽ ओकरा दिस हूरकल मुदा दरोगाजी रोकि देलखिन। फेर किछु सोचैत सिपाही सभकेँ संग लगा जनानीकेँ गाड़ीमे बैठा पंचाक घरपर विदा भेला। पंचा नइ छल। टोल-पड़ोसक धिया-पुता संग पुरुख-जनानीक भीड़ लागि गेल। दरोगाजी दू-चारि आदमीसँ पूछ-ताछ केलखिन। कियो जनानीक पक्षमे नइ ठाढ़ छेलै। सबहक सोझामे दरोगाजी अल्लावाली जनानीकेँ पुछलखिन- “तों की चाहै छेँ?” ओ कहलकै- “पंचाकेँ हमरा अपना घरमे बौह बना कऽ राखऽ पड़तै।” बिच्चेमे एक आदमी बाजल- “हँ रखतौ मुदा तोरा हिन्दू बनऽ पड़तौ, दोसर बात तों अपन बाल-बच्चाकेँ एतए नहि आनि सकै छें। तेसर बात जँ तोरा पंचा घरवाली बनेतौ तँ तों जिनगीमे कहियो जोलहटोली नहि जा सकै छेँ। छौ मंजूर तँ दरोगाजीकेँ सामने कागज बना। हम सभ तोरा पंचा संग रखैले तैयार छियौ।” सुमनजी ऐ कार्यक्रमक दर्शक छला ने सलाहकार। मुदा समाजमे ऐ तरहक घटनासँ अत्यन्त चिन्तित छला। दस आदमी। दस तरहक बात। मुदा ऐ तरहक घटना समाजक संस्कृतिक लेल स्वास्थ्यप्रद नहि। दरोगाजी जमीलाकेँ पुछलखिन- “जब तों दुनू समाजकेँ बन्हनकेँ तोड़ि ऐ तरहक कर्म केलहिन तखन दुनू गाेरे सजाक भागी छेँ। तों धर्म नहि छोड़बिही, बाल-बच्चाकेँ नइ छोरबिही।जखन तों जोलहटोली जेबे करबिही तखन बिआह सम्बन्ध केना भऽ सकै छौ?” समाजक लोककेँ दरोगाजी कहलखिन- “अहींक समाजक पंचा छी। अहाँ ओकरा बजा समाधान करू। जावत् ओ नहि अबैत अछि तावत् एकर समाधान नहि होएत।” फेर जमीला दिस घूमि कऽ कहलखिन- “जे तोरा संग रहतौ ओ भागल छौ। तों ओकर पता कर। दुनू गाेरेक कारणे अगर समाज परेशान हेतौ तँ तोरा दुनूकेँ समाजो दण्डित करतौ। आ सरकारो समक्ष दण्डित हेमेँ।” जमीला बाजल- “हमरा पंचासँ मतलब अछि। हम पंचाकेँ कारणे बौआइ छी। समाज हमरा किए मारत? समाज निर्णए करऽ पड़तौ।” दरोगाजी दू दिनक समए दऽ चलि गेला। गेला बाद जमीलाकेँ कहल गेल, जे काल्हि भिनसरमे तूँ आ। अपना संग जेकरा आनबाक हउ सेहो नेने आ। पंचैती हेतौ। पंचा जेतए नुकाएल छल ओकरा समाद दऽ बजाएल गेल। आइ दुनू समाजक बीच पंचा आ जमीला दुनू बैसल अछि। पंचा समाजक सामने जमीलाक कथनकेँ स्वीकार केलक। समाजक एकटा आदमी ओकरा दू-चािर थापड़ मारबो केलकनि। मुदा आर लोक बीच-बँचाउ केलक। बादमे पंचाकेँ पूछल गेल जे ओ की चाहैए।पंचा चुप। जमीला चुप। अन्तमे पंच निर्णए देलक- “दुनू जे काज केलेँ से अनुचित अछि। तीन-तीनटा बाल-बच्चा रहैत तोरा सबहक कर्म नींदनीय छौ। तों दुनू धर्म समाज, जाति आ परिवारक विध्वंसक छेँ। पति-पत्नीक रूपमे तोरा दुनूकेँ रहब सम्भव नहि।” पंचाक पत्नी आ बाल-बच्चा जमीला आ ओकर तीनटा बाल-बच्चाकेँ स्वीकार नहि कऽ सकैत अछि। धर्म आ जातिपर सेहो एकर प्रभाव पड़तै। तँए अगर पंचा मुसलमान भऽ जमीलाक संग चलि गेल तँ ओकर बाल-बच्चाक भार के लेतै? तोरा दुनूक ऐ सम्बन्धसँ धार्मिक विवाद भऽ सकैत अछि। मुदा हम सभ से नै होमए देलिऐक। समाजक निर्णए भेलै जे तों दुनू काल्हि भोर होइसँ पहिने गाम छोड़ि दे। जमीला पंचाक घर भविसमे कहियो ने आबि सकैत अछि। पंचा कहियो जमीलाक घर नइ जा सकैत अछि। गामक बाहर तों भलहिं पति-पत्नी बनि रह मुदा गाममे दुनू संग-संग पएर नहि राखि सकै छेँ। अगर समाजक बात नहि मानमें तँ आगू तों सभ अपन बाल-बच्चाक संग अपनकेँ जातिसँ बहिस्कृत बूझ। कागतपर हिन्दू आ मुसलमान दुनू तरफसँ पाँच-पाँच आदमी चारि फर्द कागत बनेलक। चारू फर्दपर पाँचो पंचक संग जमीला आ पंचासँ निशानक संग संग सही कएल गेल। दूटा फर्द पंचा आ जमीलाकेँ देल गेलै। एकटा पंचाक गामक पंच रखलक। पंचा आ जमीला चुपचाप कागत लऽ ओतएसँ विदा भऽ गेल। आइ धरि पंचा गाम नहि आएल। ओकर बाल-बच्चाक संग पत्नी पंचाकेँ भेजल पाइ अथवा अपने बुतापर जीब रहल अछि। जमीला आइ धरि गाम नहि घूमल। जमीलाक बाल-बच्चा सेहो जमीला अथवा अपन नाना-नानीक संग जीब रहल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 1 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १७४ म अंक १५ मार्च २०१५ (वर्ष ८ मास ८७ अंक १७४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA