21 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १७५ म अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १७५ म अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) ऐ अंकमे अछि:- आलेख- मिथिलाक इतिहास-:: डॉ. श्रीमोहन झा राजदेव मण्डल ‘रमण’- लघु कथा-दियादी डाह २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना / जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतना-राजेन्द्र कुमार प्रधान बीणा प्रसाद- निर्मलीक गीत पंकज कुमार प्रभाकर- समकालीन चेतनाक सम्वाहक :: अर्द्धांगिनी आलेख- मिथिलाक इतिहास :: डॉ. श्रीमोहन झा इतिहास साक्षी अछि जे वैदिक कालहिसँ जाहि मिथिलाक प्रतिष्ठा ब्रह्मज्ञानक विकास-केन्द्रक रूपमे भेल, जतय खेलहुमे ब्रह्मविद्या सिखाओल जाइत छल, जकर अनुशासन द्वारा स्मार्त कालहुमे देश-देशान्तरक आचार-विचारक क्षेत्रमे प्रेरणाक श्रोत रहल, जे जनपद अपन दर्शनक विचार-धारासँ सम्पूर्ण भारतकेँ आलोकित कयलक ओ जकर काव्य-कल्पना भारतीय साहित्यक रस-प्रवाहकेँ निरन्तर समृद्धि कयलक ओहि मिथिलाक पावन भूमि जनक, याज्ञवल्क्य, गौतम, कपिल, कणाद, गंगेश, चिन्तामणि, मण्डन, उदयन, वाचस्पति, पक्षधर, विद्यापति, गोकुलनाथ, अयाची, शंकर ओ ज्योतिरीश्वरक मिथिला न्याय, तत्वमीमांसा एवं सांख्यक जन्मभूमि मिथिला कृतिसँ भारते नहि अपितु समस्त विश्व आलोकित अछि। मिथिलाक सीमा प्रसंग वृहद् विष्णु पुराणमे कहल गेल अछि जे मिथिलाक उत्तरमे नागाधिराज हिमालय एकर प्रहरीक रूपमे ठाढ़ छथि। दक्षिणमे पतित पावनी गंगा अपन कलकल-ध्वनिसँ एकर चरण स्पर्श करैत छथि। पूरबमे नृत्य करैत चिर-चंचला कौशिकी एकर सम्यता आ संस्कृतिक संवाहिका तथा विध्वंशिका दुनू मानल जाइत छथि तँ पश्चिममे धीरगमिनी गण्डकी स्वर्णक समान चकमक करैत एकर श्रृंगार करैत छथि। कवीश्वर चन्दा झा सेहो अपन रामायणमे उपर्युक्त आधारकेँ स्वीकार करैत मिथिलाक सीमाक प्रसंग कहने छथि- “गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूर्व कौशिकाधारा। पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत वल विस्तारा।। कमला त्रियुगा अमृता धमुरा वागमती कृतसारा। मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा...।” वर्तमान समयमे मिथिलाक पूर्ण विस्तार भऽ गेलाक कारणें एकर सीमा दरभंगा, मधुबनी, चम्पारण, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, किशनगंज, भागलपुर एवं हिमालय केर तराइ धरि पसरि गेल अछि। एहि प्रकारेँ गंगा-प्रवाहसँ लऽ कऽ उत्तर हिमालय धरि सए मील तथा पूरबमे महानन्दासँ पश्चिम गण्डकी धरि २५० मीलमे मिथिला देश अछि। अति प्राचीन कालसँ मिथिला तीरभुक्ति नामसँ प्रचलित छल। एहिठाम नदीक बाहुल्य अछि एवं ओहि सभक तीरमे लोक सभ बसैत गेलाह तेँ मिथिलाक पर्याय तीरभुक्ति नाम प्रचलित छल जे वर्तमान समयमे तिरहुत नामसँ प्रसिद्ध अछि। मिथिला नामकरणक प्रसंग अनेक पौराणिक आधार अछि। भविष्य पुराणक अनुसार मिथिलाक नामकरण राजा ‘निमिक’क पुत्र मिथिक नामपर राखल गेल अछि। अयोध्याक राजा निमि एहि पूण्य भूमिपर अयलाह तेँ निमिक पुत्र मिथिक नामपर एहि प्रदेशक नाम मिथिला पड़ल। मुदा पाणिनिक कथन छनि जे जतय शत्रुक उन्मूलन कयल जाय ताहि भू-खण्डक नाम मिथिला अछि। महाभारतक युद्धमे मिथिलाक राजा पाण्डवक संग युद्ध कयने छलाह। एहिसँ स्पष्ट अछि जे मैथिल लोकनि योद्धा सेहो होइत छलाह। बाल्मीकि रामायणमे सेहो मिथिला नरेशक वीरताक वर्णन भेल अछि। विश्व वाङ्गमयमे संस्कृतक साहित्य-सरिता अत्यन्तव्यापक, दीर्घकालिक ओ निरन्तर प्रवहमान रहल अछि। एहि अमृत सिन्धुसँ बिन्दु-बिन्दु ग्रहण कय भारतक समस्त लोक भाषा-साहित्य समृद्ध ओ संबलित भय युग-युगसँ समस्त विश्वकेँ प्रेरणा-पुंज आलोक प्रदान करैत आबि रहल अछि। संस्कृतक अक्ष्य-भण्डारसँ भाव राशि ग्रहण कय भाषा-साहित्यक परती-पाँतर पर्यन्त सुरभित ओ सुवासित होइत रहल अछि। भारतीय इतिहासक ओ सांस्कृतिक मर्मज्ञ मनीषी लोकनि जनैत छथि जे भारत वर्षक राष्ट्रीय अखण्डतामे संस्कृत भाषाक अद्वितीय स्थान रहल अछि। प्राचीनकालसँ लय आसेतु हिमालय सांस्कृतिक, धार्मिक ओ दार्शनिक विचारक आदान-प्रदानक माध्यमे संस्कृते भाषा रहल अछि। काव्यक कोनो विधाक सर्जना एहिमे भेल अछि। इतिहासकार लोकनि भारत वर्षक ओहि भू-भागकेँ मिथिला कहल अछि जे कतेको दृष्टिसँ अपन अप्रतिम विशिष्टताक महत्वकेँ अद्यावधि सुरक्षित रखने अछि। मिथिलाक ओ पावन-भूमि अपन सभ्यता-संस्कृति, जप-तप, ध्यान-धारणा-समाधि आदि उन्नत मानवताक साधक गुणक कारणेँ आइ संसार मध्य शीर्षस्थ स्थान रखने अछि। मिथिलाक माटि-पानिमे किछु एहन विलक्षण शक्ति सर्वदासँ सन्निहित रहलैक अछि जाहिसँ एहिठामक लोक शिष्ट, सज्जन, प्रतिभाशाली, विद्या-व्यवसायी एवं तत्व चिन्तनक होइत रहल अछि। यज्ञ-स्थलक केन्द्र मिथिला जे अपन यज्ञक धूआँसँ समस्त वातावरणकेँ पावनमय बनौने रहल अछि। वैदिक कालसँ लय अद्यावधि मिथिलामे उत्पन्न भय अपन दिव्य अवदानसँ समस्त-विश्वकेँ चकित-स्तम्भित कयनिहार ऋृषि-मुनि, योगी-साधक, दर्शनिक विद्वानक जँ सूची बनाओल जाय तँ ओहिसँ केओ आश्चर्यचकित भय जायत। दर्शनक क्षेत्रमे मिथिलाक नाम अग्रगण्य रहल अछि।न्याय सूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक प्रणेता कणाद एवं नव्य-न्यायक जनक गंगेश उपाध्यायक कारणें मिथिला दर्शन क्षेत्रमे पूर्ण ख्याित प्राप्त कयने छल। हिनक अतिरिक्त उद्योतकर, मण्डन, वाचस्पति आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। वेदान्त सूत्रक शंकरक व्याख्या वाचस्पति द्वारा भामती नामसँ लिखल गेल अछि। मण्डन एवं शंकराचार्यक शास्तार्थ तँ जगत प्रसिद्ध अछि। जैमिनिक मीमांसा तथा कपिल मुनिक सांख्य दर्शनक निर्माण सेहो एहि पवित्र भूमिपर भेल। मिथिलाक महान नगरी तथा बौद्ध एवं जैन धर्मक मुख्य प्रभाव क्षेत्र लिच्छवी वंशक राजधानी वैशाली प्राचीन इतिहासमे महत्वपूर्ण स्थान रखने अछि। मिथिलाक इतिहास एकर साक्षी अछि जे वैदिक युगहिसँ मिथिला संस्कृति, न्याय, तर्कशास्त्र, विज्ञान, गणित, कामशास्त्र, मीमांसा, व्याकरण, धर्मशास्त्र तथा दर्शनक अध्ययन-अध्यापनक केन्द्र दीर्घकाल धरि बनल रहल। सम्बद्ध युगहिमे विभिन्न प्रकारक विशाल साहित्य अस्तित्वमे आयल, जाहिमे वौद्धिक विकास तथा आध्यात्मिक प्रगतिक पराकाष्ठाक रूपमे स्थित विभिन्न उपनिषद सभ सम्मिलित अछि। विश्वास देवीक समयमे मिथिलामे चौदह सय मीमांसकक एक वैसक भेल छल। अत: उक्त युगहिमे गार्गी, मैत्रेयी तथा सुलभा सनक प्रतिभाशाली नारीक उदाहरण भेटैत अछि। एहि प्रकारेँ तद्युगीन राजा सबहक संरक्षणमे उच्च शिक्षाक अनेक नियमित संस्था छल। एहन संस्था सभ सामान्यत: ‘चरण’क नामसँ ज्ञात छल। अत: एही वैदिक युगहिमे जनक ओ याज्ञवल्क्य सन श्रेष्ठओ अग्रणी दार्शनिक छलाह। ओहि समयमे अन्य प्रान्तहुसँ दार्शनिक लोकनि जनक ओ याज्ञवल्क्यसँ अध्यात्म सम्बन्धी शिक्षाक ज्ञानोपार्जन हेतु अबैत छलाह। याज्ञवल्क्यक जीवनवृत्त वस्तुत: हुनक मातृभूमिक तत्कालीन सांस्कृतिक इतिहास थिक। याज्ञवल्क्यक अतिरिक्त गौतम, कपिल, विमाण्डक, शतानन्द तथा श्रृंग-ऋृषि ततेक विख्यात छलाह जे राजा दशरथ सेहो हिनका पुत्रेष्टि-यज्ञक सम्पादन हेतु कौशिकी घाटामे आमंत्रित कयने छलथिन। ओ काश्यप शाखासँ सम्बद्ध छलाह। अत: जाहि मिथिलाक पावन भूमिपर ब्रह्मज्ञानक सर्वश्रेष्ठ महर्षि याज्ञवल्क्यक सिद्धता आदि मिथिलाक आध्यात्मिकताकेँ सिद्ध-प्रसिद्ध करैत अछि। स्मृतिकार याज्ञवल्क्य परम धर्मकेँ िनरूपित करैत कहने छथि- “अयं तु मरमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्।” मिथिलाक सभ्यता आ संस्कृतिक प्रसंग महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ऋृग्वेदकेँ ‘प्राचीन ऋृर्षि’ शीर्षक लेखमे कहने छथि जे गौतम, रहुगण, दीर्घतमा, कुक्षिवन्त, विश्वामित्र आदि पूर्वोत्तर बिहारक सभ्यता आ संस्कृति आदिक जनक छलाह। विश्वामित्र ‘कौशिक’ नामसँ प्रख्यात भेलाह तथा कौशिकी हिनकर शापभ्रष्टा सहोदरा छलथिन। एही कौशिकी क्षेत्रमे विश्वामित्र ब्राह्मणत्व प्राप्त कयने छलाह। आ ई कौशिकी क्षेत्र नि:सन्देह मिथिलाक भू-भाग रहल अछि। मिथिलाक सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवस्थाक सम्बन्धमे ज्योतिरीश्वर अपन ‘धूर्तसमागम’ तथा ‘वर्णरत्नाकर’ मे पूर्ण सामग्री प्रस्तुत कयने छथि। वर्णरत्नाकर महत्व ऐतिहासिक दृष्टिसँ भारतीय पुरातत्वक एकटा कोष अछि तथा मध्यकालीन पूर्वोत्तर भारतक एवं विशेषतया मिथिलाक जनजीवन एवं संस्कृतिक जीवन्त चित्रण प्रस्तुत करैत अछि। समाजमे संस्कृतक एतेक अधिक प्रभाव एवं प्रचार छल जकर उदाहरण स्वयं विद्यापति देने छथि। राजा हरि सिंहदेवक आदेश तथा प्रेरणासँ बनाओल पंजी-प्रबन्ध, जे तत्कालीन समाजमे अत्यधिक प्रचलित भेल, संस्कृतहिमे लिखल गेल। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे तत्कालीन समाजक रीति-नीति, आचार-विचार, धर्म-कर्म सामाजिक बन्धन, क्रिया-कलाप, दर्शन, स्मृति आदि सम्बन्धी विषय-वस्तुक रचनाक माध्यम संस्कृते छल। तकर मूल कारण जे मिथिलाक राजन्य वर्ग संस्कृति, साहित्य, दर्शन, ललित कलामे रूचि रखैत छलाह ओ कतोक राजा संस्कृतक विद्वान सेहो छलाह। एहिठामक राजा लोकनि संस्कृत रचनाक अध्यापन तथा वद्वान लोकनिक आश्रयदाता रहैत अयलाह। महाराज महेश ठाकुर तँ अपन विद्वताक कारणेँ मिथिलाक राज्य प्राप्त कयने छलाह। विद्यापतिक रचनापर दृष्टिपात कयलासँ स्पष्ट होइत अछि जे तत्कालीन रचनाक माध्यम कोन भाषा छल तथा राज दरबारमे कोन-कोन विषय सबहक रचना होइत छल विद्यापति राज पण्डित छलाह। पण्डित वर्गक भाषा संस्कृत छल। अत: अपन पाण्डित्य प्रदर्शन करबाक हेतु संस्कृतेमे रचना करब अनिवार्य बूझि पड़लनि। मिथिला तंत्र विद्याक प्रधान केन्द्र छल एवं कतेको तांत्रिक एवं वैज्ञानिक सेहो छलाह। मिथिलामे नवीन भक्ति मार्गक रूपमे तंत्र मार्गक बेस प्रचार भेल। फलत: जाहि वंशमे सिद्ध तांत्रिक रहथि, ओहि वंशमे सिद्ध तांत्रिकक उपास्य देवीक मंत्र ग्रहण कय ओही देवीक उपासना करबाक प्रथा मिथिलामे अद्यपर्यन्त प्रचलित अछि। वस्तुत: प्राचीन धर्मशास्त्र आदिक मनन ओ चिन्तनकय युगक आवश्यकतानुसार आचार सूत्रक अन्वेषणक संगहि ओकरा नव व्याख्या देबाक आवश्यकता छल। ई ओहि समयक समाजक हेतु जीवन-मरण ओ अस्तित्वक प्रश्न छल। मिथिलाक पण्डित लोकनि एहि उत्तरदायित्वकेँ निष्ठापूर्वक विर्वाह कयलनि। अतएव महाकवि विद्यापति सेहो एही परम्पराक आश्रय ग्रहण कयलनि। प्राचीन कालहिसँ मिथिलाक ई विशेषता रहल अछि जे एहिठामक राजा लोकनि जनक वंश, कर्णाट क्षत्रिय अथवा ओइनवार शासक होयबाक संग-संग धर्म-कर्म एवं सामाजिक आचार-विचारक नियामक सेहो होइत छलाह। एही कारणेँ स्मृति ग्रन्थक रचना एतेक सुदृढ़ भय गेल छल। अपन आचार रक्षाक हेतु संस्कृतक ज्ञान आवश्यक छलैक तेँ समाजक जनमानसमे सेहो संस्कृतक प्रचार-प्रसार छलैक। एवं प्रकारेँ भारतक धर्म, संस्कृति-साहित्य, संगीत ओ कलाक क्षेत्रमे कर्णाट शासक लोकनि जे प्रेरणा-पुंज लय अवतीर्ण भेलाह से ओइनवार कालमे गतिमान नहि रहल अपितु ओकर व्यापक प्रभावक समता परवर्ती कोनो शताब्दीमे नहि भय सकल। कर्णाट आ ओइनवार वंशक पतन मिथिलाक हेतु कष्टकर सिद्ध भेल। राजनीतिक अद्य:पतनक संग-संग परवर्ती कालमे मिथिला सांस्कृतिक क्षेत्रमे सेहो अवनतिक दशामे आबि गेल। किन्तु आलोच्य कालमे साहित्य आ कलाक क्षेत्रमे मिथिलाक उल्लेखनीय अवदान रहलैक। एहि स्तरपर कर्णाट-ओइनवार-युगीन मिथिला जनक-याज्ञवल्क्य कालीन मिथिलासँ तुलनीय अछि। ओइनवार काल भारतीय साहित्येतिहासमे वस्तुत: ‘स्वर्णयुग’क रूपमे गनल जाइत अछि, कारण उक्त काल पर्ववर्ती युगसँ एहि दृष्टिसँ भिन्न अछि जे एहिमे संस्कृत-विद्याक क्रमिक प्रचार-प्रसारक संग-संग लोक भाषा साहित्योक विकासक मार्ग प्रशस्त भेल। मिथिलाक विदेह राजा जनकक समयमे जाहि संस्कृतिक सूत्रपात भेल छल ओकर पूर्णोत्कर्ष महाकवि विद्यापतिक युगमे भेल। ज्योतिरीश्वरक पश्चात् महाकवि विद्यापतिक कोमलकांत पदावलीक रसास्वादन कय सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारतवर्षक साहित्य-प्रेमी भाव-विभाेर भय गेलाह। मिथिलाक संग घनिष्ट सम्पर्क रहबाक कारणेँ एहिठामक चिन्तन, साहित्य तथा संस्कृति बंगाल, आसाम एवं उड़ीसाक प्रेरणा श्रोत बनि गेल। हिनक गीतक अनुकरणपर एकटा नवीन भाषा ब्रजबुलि साहित्यक जन्मभेल। आसामक प्रमुख वैष्णव भक्त शंकरदेव तथा बंगालक महा प्रभु चैतन्यदेव तँ सहजहि विद्यापतिक गीत गबैत-गबैत मूर्छित भय जाइत छलाह। एगारहम ई.मे भारतमे मुसलमान सबहक आगमन भेलासँ हिन्दु समाजक अस्तित्व वस्तुत: संकटापन्न भय गेलैक। हिन्दू लोकनिक राजनीतिक स्वतंत्रता समाप्त भय गेल। एहि जातिक समाजिक श्रृंखला तथा पारस्परिक सौमन्स्यक अन्त भय रहल छलैक। एहि संकटसँ बचबा लेल ब्राह्मणवर्ग निबन्ध लिखि ओहि सामाजिक मन्दिरकेँ ध्वस्त होयबासँ बचयबाक प्रयास कयलक। राजनीति तथा अर्थ व्यवस्थापर कोनो अधिकार नहि रहि जयबाक कारणेँ उक्त ब्रह्मण लोकनि अपन ध्यानकेँ मुख्यत: सामाजिक तथा पारिवारिक जीवनपर केन्द्रित कयलनि। ओकर परिणति जीवनक विभिन्न क्षेत्रक नियमनक हेतु आचार संहिता तथा विधि-व्यवस्थाक सम्बन्धी निबन्धक ओ नियम-परिनियम निर्माण भेल। उक्त स्मृति विषयक रचना अपन आन्तरिक मूल्य, सार्थकता आ सबलताक कारणेँ अनेक शतकक दुर्दशा ग्रस्त स्थितिओमे हिन्दू समाजक स्वतंत्र व्यक्तित्वक रक्षा कय सकल। हिन्दू विद्याक एकटा प्रमुख केन्द्र रहबाक कारणेँ मिथिलामे निबन्ध लेखनक स्वतंत्र परम्पराक अस्तित्व आश्चर्यजनक अछि। ओइनवार कालहुमे प्रशासनिक स्वरूप ओहिना रहल जे कर्णाट कालमे छल। मैथिल लोकनि वर्णाश्रम-व्यवस्थाक कट्टर अनुयायी रहलाह अछि। सम्बद्धकालक मैथिल समाजमे सनातन धर्मक पालनुक प्रति पर्ण निष्ठा परिलक्षित होइत अछि। विदेशी सभसँ आक्रान्त भेलहुँ मैथिल समाज अपन स्वतंत्र व्यक्तित्वकेँ सुरक्षित रखबामे पूर्ण सफल रहल। महाकवि विद्यापति सेहो तत्कालीन समाजक विशद वर्णन कयलनि अछि। हुनक कीर्तिलताक विभिन्न स्थलसँ ज्ञात होइत अछि जे मुसलमानी आक्रमणक फलस्वरूप तिरहुतमे बहुत दिन धरि अराजकता तथा अव्यवस्था व्याप्त रहल। हिन्दू समाज उत्पीड़ित तथा अपमानित जीवन व्यतीत करबाक हेतु विवश छल। मुसलमान आक्रमकक आतंककारी प्रशासनसँ साहित्य साधना ओ परम्परा सेहो क्षत-वक्षत भय गेल छल। भारत पर मुसलमानी प्रभाव जाहि निर्मम ओ नृशंस रूपमे बढ़ि रहल छल ताहिसँ समस्त भारतीय जन-मानस आलोड़ित भय उठल छल। विद्यापति तत्कालीन समाजक विशद वर्णन ‘कीर्तिलता’ मे कयने छथि जे दृष्टव्य अछि- “धरि आनए बाभन बड़ुआ।” मथाँ चढ़ाबए गाइक चुड़ुआ।। फोर चाट जनउ तोड़ ऊपर चढ़ाबए चाह घोड़।।” एहि प्रकारेँ ईसाक तेरहम-चौदहम शतकमे एहि ब्राह्मण धर्म प्रधान प्रदेशकेँ एकटा सर्वथा भिन्न आ प्रतिकुल धर्मक सामना करय पड़लैक। ओ धर्म छल इसलाम जे मुसलमान विजेता सबहक संग एहि प्रदेशमे प्रवेश पओलक। निबन्धकार तथा धर्मिक नेता लोकनि बहुत दिन धरि एहि धर्मक प्रभावकेँ रोकबाक प्रयास कयलनि। किन्तु समयक प्रवाहक संग-संग इसलाम सेहो हिन्दू धर्म आ समाजपर अपन प्रभावक प्रसार करए लागल। मैथिलीमे व्यवहृत अनेक फारसी तथा अरबी शब्द, मिथिलाक आदालतिमे पारम्परिक हिन्दू विधिक अनुसार न्यायिक क्रिया-कलापक सम्पादन, तजिया, दाहा आदि मुसलमानी पर्व-त्योहारक प्रति हिन्दूक सम्मान तथा छठि, घड़ी आदि हिन्दू पर्व आ धार्मिक अनुष्ठानमे मुसलमान सबहक आस्था, अकबर द्वारा चलाओल गेल फसलीसालक राष्ट्रीय संवतक रूपमे मिथिलामे प्रचलन, अनेक मुसलमान सन्त द्वारा अपन राग तरंगिणीमे इमाम तथा फिरदासी नामक मुसलमानी रागक समावेश आदि कतिपय तत्व हिन्दू आ मुसलमान जन समुदायमे सांस्कृतिक तत्वक आदान-प्रदान तथा सम्मिश्रणक सूचक थिक। ओइनवार काल तुर्क आक्रमणक युग छल। जखन मुसलमानी आक्रमणक पहिल बाढ़ि बिहार धरि पहुँचि गेल छल, मुदा तखनहुँ मिथिला ओहिसँ बचल रहल आ मैथिल राज सभामे संस्कृत काव्य साहित्य आदर पबैत रहल। यद्यपि उक्त युग-पूर्ववर्ती युग जकाँ प्रकाण्ड विद्वान सभकेँ जन्म नहि दय पओलक। एहि राजवंशक शासनकालमे जगधर, विद्यापति, शंकर मिश्र तथा वाचस्पति मिश्र ई चारिटा मिथिला विभूति भेलाह। विद्यापतिक समयमे इसलाम एवं हिन्दू धर्मक बीच सेहो एक प्रकारक आदान-प्रदान प्रारम्भ भय चुकल छल। उत्तर बिहार ओहि समयमे सूफी लोकनिक एक प्रधान केन्द्र बनि चुकल छल। महाराज शिवसिंह मुसलमान सन्त एवं फकीरकेँ जे दान देने छलाह ओकर प्रमाण सेहो प्राप्त भेल अछि। ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’मे जे विदेशी अरबी-फारसी- शब्द भेटैत अछि जाहिसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे राजनीतिक आधिपत्यक बहुत पूर्बहि मिथिलामे अरबी-फारसी भाषासँ सम्पर्क भय गेल छल। सूफी सन्त एवं फकीरक माध्यमसँ एहि प्रकारक सम्पर्क सम्भव भेल होयत। तिब्वती यात्री धर्म स्वामी जखन १२३६ ई.मे हिरहुतक राजा रामसिंह देवक ओतय आयल छलाह ओही समयमे एहि क्षेत्रमे मुसलमानक प्रकोप बढ़ि रहल छल। दुनू धर्मक समन्वय एवं समागमसँ नवीन दृष्ट्रिकोणक बीजारोपण भय रहल छल एवं विद्यापति युग धरि अबैत-अबैत एकर आओरो विकास भेल। उन्नैसम शताब्दीक मध्यमे अबैत-अबैत मिथिलाक सामाजिक जीवनमे परिवर्तनक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। अंगेज लोकनिक राज्य तावतधरि नीक जकाँ प्रतिष्ठित भय गेल छल। एहि क्रममे ओलोकनि अपन धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्रचार जोर-शोरसँ प्रारम्भ कयल। अपन धर्मग्रन्थक भारतक विभिन्न भाषामे अनुवाद कराय जनतामे प्रचार प्रारम्भ कयल। भारतक अनेक भागमे लोक सभ इसाई बनय लागल। एकरे प्रतिक्रियाक रूपमे प्राय:एतय ब्रह्म समाज एवं आर्य समाजक आन्दोलन आरम्भ भेल। राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द ओ स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि धर्मिक एवं सामाजिक नेता लोकनिक आन्दोलनक फलस्वरूप जन साधारणमे एक नवीन चेतनाक संचार भेल। फलत: पाश्चात्य साहित्यसँ प्रेरित भय अपन क्षेत्रिय आन्दोलनसँ उद्वोधित भय एहिठामक लोक अपन-अपन मातृभाषा साहित्यकेँ नवीन भाव-शिल्पसँ सम्न्वित करबाक हेतु अग्रसर भेल।१८५४ ई.मे चार्ल्स उड जाहि प्रणालीक शिक्षाक आधारशिला राखल ताहिमे मातृभाषाकेँ शिक्षाक माध्यमक रूपमे स्वीकार कयल गेलैक। अंग्रेजी प्रशासनक समय मैथिली साहित्यक साधक लोकनि पुन: अपन प्रशस्त मार्गपर अग्रसित भेलाह जे स्वतंत्रता संग्रामक पृष्ठ भूमिमे पुन: नव चेतना ओ नव स्फूर्ति बीजरूपमे मैथिली भाषा ओ साहित्यक बहुमुखी उत्थानक प्रेरक होइत आबि रहल अछि। विद्यापतिक पश्चात् गोविन्ददास, मनबोध, हर्षनाथ, चन्दा झा आदि कविगण भेलाह। अत: मिथिला अपन वैभवपूर्ण साहित्यिक परम्पराक कारणेँ भारतवर्षमे अद्वितीय स्थान रखने अछि। (१) बी.सी. ला ग्रन्थ भाग-१ १२८-१३९ तृ. सरकार, क्रीएटिव इण्डिया पृ. ४ (२) वृह. उप. ६, २-१-७ ऐ. पृ- ८५-८८ (३) मुखर्जी, मेल एण्ड थाट इन एनशिएन्ट इण्डिया- पृ- ५५ (४) दु. झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ- २१६, महा. वनपर्व- ११० (५) विद्यापति लिखनावली (६) पंजी प्रबन्ध- श्लोक- १-२, मि. त.- पृ- १३६ (७) ज. ए. सी. ब. १९१५/ न. स./ पृ- ४३२ (८) ज. वि. ओ. रि. सो.- १३/ सर्च फॉर संस्कृत एण्ड प्राकृत मैन्यूस्क्रिप्ट्स इन ऐण्ड ओड़ीया/ ३-४ (९) वाचस्पति मिश्र- विवाद चिन्तामणि/ डॉ. गंगानाथ झाक अनुवाद/ भूमिका-९-२४ (१०) ज्योतिरीश्वर, वर्णरत्नाकर, सम्पादक डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी एवं बबुआ जी मिश्र, एसिएटिक सोसायटी आॅफ बंगाल, कलकत्ता, प्रथम संस्करण, १९४० (११) रोयरिक द्वारा सम्पादित, वायोग्राफी ऑफ धर्मस्वामी, १९५९ अध्यक्ष- मैथिली विभाग हरि प्रसाद साह महाविद्यालय, निर्मली (सुपौल) राजदेव मण्डल ‘रमण’-दियादी डाह कातिक मासक साँझक समए। जाड़क पहिल दस्तक, पछवा हवाक संग भेल। बटेसर बाबू अस्सी बर्खक उमेरक अनुभवक हिसावसँ बजला- “हौ चलितर, घूर लगलह?” चलितर हँ-मे-हँ मिलबैत बाजल- “मालिक! घूर तँ भरिगर भेल।” चलितरक बाजक वीराम लगिते मलिकाइन एकटा स्टीलक थाड़ीमे दू गिलास चाह धमकली- “लिअ, चाह पीबू।” मालिक चाहक गिलास दिस ठेकनबैत हाथो बढ़बथि आ गामवालीक मुहोँ दिस तकबो करथि। भेलनि जे जेना किछु अरहौती अरहेतनि। अनदाजैत बुदबुदेलथि- “पहिने असथिर मने चाह पीब तखनि किछु गपो हेतै।” चाहक चिस्की लैत चलितर दिस ताकि बजला- “चाह पीब लएह चलितर।” “थम्हू, पहिले हाथ-पएर धूअ दिअ गोंत-गोबर लागल अछि।” कहि चलितर दुआरिपर गारल कल दिस बढ़ल। इमहर पत्नी दिस तकैत बटेसर हाथक इशारा दैत पुछलखिन- “बाजू की कहऽ चाहै छी?” “की कहब कनियाँके अपन जान नै छन्हि। कहुना-कहुना कऽ अपनो निमरजाना करै छथि। नहि जानि कखनि की हेतै। तेहेन-तेहेन आब धानो रोपाइत अछि जे अगहन तँ अाब कातिके भऽ जाइए। अगहनसँ पहिने धनकटनी भऽ जाइए, मनसम्फे उबजबो करैए! गरीब की गरीब रहल! तकनौं ने कियो एकटा खढ़ो हटबैले भेटैए...!” बटेसर बाबू बिच्चेमे टोकलखिन- “की कहक अछि से खोलि कऽ कहू।” “की कहब राति-विराति जँ किछु भऽ जेतै तँ की करब? अन्हराठाढ़ीक होसपिटलमे सुनै छिऐ नीक बेवस्था छै।” कहि मलिकाइन आँगन दिस विदा भेली। “चलितर, कनी लगमे आबह। सन्तोसो हएत आ किछु विचारबो करब। लग आबह।” चलितर लग आबि चौकीक पौआ लग बैसि गेल। बटेसर बाबू बजला- “अँइ हौ चलितर, कोन जुग भऽ गेल जे बिना डागडरसँ देखौने कोनो काजे ने चलत! चारिटा बेटा आ चारिटा बेटी भगवान देलनि। कहियो पाइयो भरिक दवाइ आनैक जरूरत नै पड़ल। पल्हनिकेँ बजाबै छेलौं आ ओ असगरे आबि घरवारीकेँ निश्चिन्त कऽ दइ छल। सिदहा, परसौतीक फेड़ल साड़ी आ छठिहार दिन एकटा नव नुआँ देने पल्हैनीसँ फारकतियो भऽ जाइ छेलौं। पल्हैनीआंे अपन काज बूझि महिना भरि नेनाक तेल लगबैसँ दूध पिअबैमे लगल रहै छलि...।” बटेसर बाबू बाजैत-बजैत बिच्चेमे जेना ठमैक गेला। ठमकल देखि चलितर बूझलक जे मािलक बड़ चिन्तित छथि, बाजल- “से की करबै मािलक। जेना-जेना जुग बददलै तेहने-तेहने परियोजनि एलै। आबक समैमे की देवतो-गोसाँइकेँ सतिया रहल। मखना भायकेँ देखियौ, वेचाराकेँ जौआँ बेटा भगवान देलखिन। जनमक समए अहिना धड़फड़ी भेल। गामेक डाकटर बजौल गेल मुदा कोनो जोगाड़े ने धरै, आकि तखने किम्हरौसँ खराम खटखटबैत बुधनबाबा पहुँचला, परसौतीक कुहरब सुनिते एकटा जड़ी देलखिन आ लगले दसे-पाँच मिनटेमे फलित भऽ गेल।” “से तँ हमरा अपने बितल अछि। जेठ बौआक जन्म-समए कि कम फिदरति भेल। मलिकाइनकेँ लूक-झूक साँझ पड़िते दरद उखड़लनि, तहिया तोहर हमरा ऐठाम आएब-जाएब कम रहऽ, हथिया-झटक चलि रहल छेलै। मोतीलाल, रामकिसुन, गढ़बा तीनू गोटे मेघडम्बर, फराठी आ चोरबत्ती नेने मधु डाक्टरकेँ बजा अनलक। डाक्टर उपचारमे लगि गेला। भोरबामे मिहिरक जनम भेल।” बटेसर बजबो करथि आ आँगनो दिस देखि-देखि साकांचो रहथि। तखने मलिकाइन डेढ़ियापर आबि टोकलकनि- “गपक खण्ड नै लागल? अखनि तक फदकिते छी। कोनो फिकिरो अछि की नै से नइ जान्हि।” “की हालत छन्हि कनियाँक? बाजू ने डाक्टर मंगाबी आकि होसपिटल चलबाक ओरियौन करी।” “हम की बाजब। हम सभ तँ मौगी-मेहरि छी जेना जे नीक होइ से करू, अनेरे अनठाएब ठीक नै।” कहैत मलिकाइन आँगन गेली। “चलितर, कनी जा झट दे राजिन्दरकेँ बजा लाबह। कहियनु मालिक बजौलनि, संगे लागल औता।” चलितरकेँ कहि बटेसर आँगनक सुढ़ि-पता बुझैले हवाइ चप्पल सोझराबए लगला। चप्पल पहिरिते छला आकि आँगनसँ कुहरब आ पल्हनिक बाजब संगे बुझि पड़लनि, अकानए लगला। तखने पल्हनि बाजलि- “हमर शक जेते छल ओ केलौं, आब असपतालक आश करू, आ घरोक गोसाँइ-पितरक अरदास लगाउ।” “डीहवार बाबा की जाय! हे कलिया महरानी ओझरी छोड़ाउ। जोड़ा भरि छागरोक बलि चढ़ाएब।” मलिकाइन मने-मन जेते देवता जेहेन सहजोर स्मृतिक हिसावे कबुला करैत बजली। ताबए चलितर संग लागल राजिन्दर हथबत्ती बाड़ैत पहुँचल। “बड़का कका, बड़का काका। की बात बाजू?” “राजिन्दर...। मिहिर गाम नै एला लगैए कोनो अपनासँ पैघ हाकिमक अढ़ौतीमे बाझल छथि। नोकरी तँ नोकरीए छी किने। ‘परअधिन सपनो सुख नाही’ तुलसीदास कोनो बेजा थोड़े कहने छथिन।” “कनियाँके मास पुरल छन्हि आ अखन दरदसँ हाल बेहाल छन्हि। बजौलियऽ की करक चाही, डाक्टर बजाबी आकि होसपिटल चल?” “काका, थम्हूँ पहिले चारिचक्का बोलेरो गाममे गामेमे सोमन भाइकेँ छन्हि बजा लइ छी, होसपिटले गेनाइ नीक रहत। ओइठाम सभ इन्तजामो-बात आ परसौतीले टको-पैसा भेटत।” राजिन्दर बजबो करए आ फौनो मिलबए। लगैए फौन मिल गेलै बाजल- “हँ! कनी फुर्तीमे।” फोन काटि कऽ पुन: बाजल- “काका, चीस-वौस दरबज्जापर आनैक उपक्रम करू।” मालिक-बटेसर लगले सूरे बजला- “गामवाली आब फुरती करू, ओछाैन-बिछौन, ओढ़ना, खेबा-खर्चा, सिदहा-समर सभ किछु ठेकना लिअ। गाड़ी आबि गेल।” बटेसर घरवाली दिस बजथि आ मलिकाइन बटेसरक दिस चाहक जिज्ञासा केलखिन। मुदा बटेसर मना करैत बजला- “नै। आब जे किछु करब से अन्धरेमे करब।” एमहर राजिन्दर आ चलितर चीज-वौसकेँ सम्हारि-सम्हारि आँगनसँ आनि-आनि दरबज्जापर रखैत रहए। गाड़ीओ आबि गेल। सभ समान डिक्कीमे लदलक। ताबे पल्हनि आ पड़ोसिनी सभ कनियाँकेँ गाड़ीक सीटपर आनि सुतौलनि। डरेवर सेहो अपन सीट पकड़ि गाड़ी खोलकक। सिटी बजा सभकेँ तैयार हेबाक आग्रह केलक। मौगी-मरद, ढेरबा- धिया-पुताक भीड़ दू दिस भेल। बीचसँ गाड़ी निकलैत रहै कि अगिला सीटसँ बटेसर मुड़ी निकालि इशारासँ चलितरकेँ किछु कहलखिन। चलितरो बसाहा जकाँ मुड़ी हिला मालिककेँ भरोस दैत बाजल- “जय दाहो-लछन बाबा, जय रकतमाला माए, जनिहऽ तूँ मालिककेँ मदति करिहनु...।” बोलेरो गर्दा उड़बैत अन्धराठाढ़ीक असपतालक डगर पकड़लक। बेलेरोक छोड़ल धुआँ आ गर्दाक मिलल गन्ध धिया-पुताक संग ढेरबोकेँ सोहनगर लगलै। बिहान भने अन्हरगरे साइकिल घण्टी टनटनबैत दुआरे-दुआर अखबार बँटैत गामक चौकपर पहुँचल। चाहो पीबैत आ चौक परहक दोकानदारकेँ अखबारो दैत अखबारबला। एकटा अखबार लऽ प्रमोद मधुबनीबला पन्ना उनटौलक। “प्रखण्ड विकास पदाधिकारी मिहिर कुमार गिरफ्तार।” कनी ऊँचे स्वरमे पढ़लक। ई खबर पढ़ि एकबेर अपन चकित आँखिए दोकानपर बैसल सभ दिस तकैत बाजल। चाह पीनिहार सबहक जिज्ञासा बढ़ल। सबहक नजरि प्रमोदक चेहराक बनैत-बिगड़ैत आकृति जकाँ बनए-बिगड़ए लगल। चाहबला श्रीप्रसादक धियान अखनि धरि सरपोख अखबारक खबरि दिस नै रहनि। ओ तँ सदिखन एतबे रामा-खटोलबा देखैत अपन जिनगी काटए। गहिंकीओ रंग-बिरंगक अछि। के केमहर जाएत चाह पीब-पीब तेकर कोनो ठीक नै तँए तइपर धियान देने। मुदा तैयो ठेकनबैत श्रीप्रसाद पुछलक- “की भेलै परमोद? कनी बुझा कऽ कहू। एना किए अखबार देखिते सभ गुम भऽ गेलौं।” “श्रीप्रसाद भाय, बटेसर बाबूक बेटा मिहिर पकड़ा गेला।” “आहिरेबा! हौ प्रमोद, मालिकक दिने गड़बड़ाएल छन्हि। एमहर पुतोहुकेँ लऽ दुनू परानी होसपिटलमे छथि आ ओमहर बेटा जहल गेलनि। गोसाैंया सभटा फेड़ीए-पर-फेड़ी दइ छन्हि।” नमहर साँस छोड़ैत श्रीप्रसाद बाजल। बिच्चेमे एकगोरे टिपलक- “जमानाक खियाल नै करब तँ अहिना ने हएत। आब कि कोनो ओ जमाना रहल कंगरेशियाक आब तँ बदलल।” राजेन्द्र कुमार प्रधान जन्म- 03/09/1970 पिता स्व. बैद्यनाथ प्रधान गाम- मरूकिया, पोस्ट अन्धड़ाठाढ़ी, जिला-मधुबनी। पिन- 847401 योग्यता- एम.ए. पटना विश्वविद्यालय, पटना शोधरत्त (पीएच.डी) ल.ना.मि.वि.वि. दरभंगा, अन्य योग्यता- संगीत गायणमे जेड.एल. कम्युनिकेशन द्वारा आयोजित ऑल बिहार फिल्म संगीत प्रतियोगितामे प्रथम स्थान प्राप्त। २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना- राजेन्द्र कुमार प्रधान उपरोक्त शीर्षक 21म शताब्दीक पहिल दशकक उपन्यासमे राजनीतिक चेतना- कोनाे सामाजिक उपन्यासमे प्रस्तुत विषय-वस्तुक हएब प्राय: स्वभाविक अछि। उपन्यास एक एहन विधा थिक जइमे सम्पूर्ण जिनगीक वर्णन रहैत छैक। जिनगीक एकटा अहम अंग राजनीति होइछ। जाहिसँ उपन्यासमे मोड़ आनल जाइत अछि आ दिशाकेँ बदलि दैत छैक। व्यक्ति भलहिं व्यक्तिगत स्थितिकेँ द्योतक हुअए मुदा जिनगी एकटा एहन विशाल परिक्षेत्रक नाओं थिक जे समाजक बीच पसरि जाइत अछि। मनुख जखने समाजसँ जुड़त तँ ओइमे राजनीति स्वत: एक अंग बनि जाएब स्वभाविक अछि। पहिल दशकमे प्रकाशित उपन्यास तँ बहुतो होएत मुदा हम जेतबा पढ़ि वा देखि सकल छी मात्र तेकरे वर्णन एे आलेखमे कऽ रहलौं अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल- जीक उपन्यासकेँ मैथिली साहित्यमे सार्थक राजनैतिक चेतना जगेबाक प्रारम्भक रूपमे देखि सकै छी, मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे राजनीतिक चेतना ओत-प्रोत अछि। जाहिमे ग्रामीण जीवनमे पसरल समस्याक यर्थाथ चित्रण केलनि अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे सुबुध नामक एकटा पात्र जे शिक्षक छथि ओ अध्यापन कार्यमे लागल रहैत छलाह। गाम-समाजक चिन्तासँ मुक्त छलाह। जखन रमाकान्त बाबू मद्राससँ घुरि अपन गाम एलाह आ हुनकामे ई चेतना भेलनि जे अनेरे जमीन हम किअए रखने छी तखन अपन 2 सए बीघा जमीन समुच्चा ग्रामीणमे बाॅटि समाजकेँ परिवार रूपमे देखए केर नजरिक पता शिखक सुबुधकेँ लगलनि तखन हुनकामे सेहो चेतना एलनि आ अपन नौकरीसँ तियाग पत्र द’ पुन: आपस आबि जाइ छथि। गाम-समाजक बीच ऐबाक लक्षण एकटा राजनीतिक चेतनाक अपूर्व कृतिमान उपस्थित करैत अछि। तहिना जिनगीक जीत उपन्यामे समाज दशा-दिशाक यर्थाथ चित्रण करैत अर्थनीति केर मूल रहस्यकेँ उद्घाटित करबाक जे प्रयास मंडलजी केलनि अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि। जगदीश प्रसाद मंडलक अगिला उपन्यास उत्थान-पतन एहि उपन्यासक माध्यमे सामंती सोचकबला समाज आ समाजिक सोचक समाज बीच आधुनिक वैज्ञानिक समन्वयवादी सोचक यर्थाथ चित्रण तेहन मार्मिक आ इमानदारीसँ मंडलजी केलनि अछि जे एक तेहन राजनीतिक चेतनाक संवाहक बनैए जे प्रत्येक मनुखकेँ उत्थान आ पतनक मार्ग दर्शन रूपमे सिद्ध करैत अछि। ‘जीबन-मरन’ उपन्यासक लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जी छथि- एहि उपन्यासक मूल पात्र छथि रघुनंदन। रघुनंदनक मृत्यु जइ दिन भेलनि ओही दिनसँ उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि। मिथिलाक समस्यामे बाढ़ि, रौदी आदि प्राकृतक समस्या केर अलाबे आर बहुत रास समस्या छैक जे मानव द्वारा अक्तियार क’ समाजकेँ जकरने छैक। प्रस्तुत विषय केर चित्रण ताहि रूपे मंडलजी अपन जीबन-मरन उपन्यासमे केलनि अछि जे एक खास राजनीतिक चेतनाक जन्म दैत अछि। हिनक अगिला उपन्यास अछि ‘जीवन-संघर्ष’ अध्यात्मक मूल उद्देश्य थिक मानव-मानवक बीच अगाध प्रेमक जन्म देनाइ जइसँ सभ कियो सहमत छी। प्रस्तुत उपन्यास जीवन-संघर्ष केर माध्यमसँ मंडलजी सम्प्रदाय आ धर्म कोना व्यक्तिसँ समाज धरिकेँ तोड़ैए आ कोना लोक अपनाकेँ महामानवक वाटपर चलि सकैए ताहि परिपेक्ष्यमे चित्रण भेल अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक चेतनाक द्योतक अछि। निष्कर्षत: ऐ सभ उपन्यासमे जीवन आ राजनैतिक चेतना समाहित अछि। लोकक कार्यक प्रति मण्डल जीक विश्वास जिनगीक प्रति विश्वास बिनु राजनैतिक चेतनाक सम्भव नै। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास रजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथाल-पुथलक गबाह अछि, तँ हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रतासँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यमसँ राजनैतिक चेतना पसारबाक अद्भुत सफल प्रयास अछि, तँ एकर बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति गामसँ दिल्ली धरि पसरल अछि। राजदेव मण्डल जीक ‘हमर टोल’ धारावाहिक रूपेँ विदेहमे ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि आ ई मैथिलीक सभसँ बेसी पठित उपन्यासक रूपमे उभरि रहल अछि। ओना तँ ई उपन्यास अखन छपिये रहल अछि मुदा घृणा आ प्रेम दुनूसँ सराबोर राजनैतिक घटनाक्रमक लेखक द्वारा जे प्रस्तुतीकरण भऽ रहल अछि से अतुलनीय अछि। केदारनाथ चौधरी- जीक चमेलीरानी आ एकर सेक्वेल माहुर वर्तमान राजनैतिक स्थितिक सुन्दर प्रस्तुतिकरण अछि आ अपराधीक राजनीतिमे प्रवेशक सुन्दर विवरण अछि, जतए पाठक चमेलीरानीसँ प्रेम करए लगैए आ ओकर अपराधकेँ स्वीकृति करबा लेल विवश भऽ जाइए। आशा मिश्रक- उचाट आ अशोक कुमार ठाकुरक निशांत आ वसुधाक संसार सेहो ठाम-ठीम एकर विवरण करैत अछि। श्याम चन्द्रक "रूपा दीदी" लेखकक कलाक प्रति उदासीनतासँ ओतेक निस्सन प्रभाव उत्पन्न नै करैए मुदा विषय-वस्तुक दृष्टिए ई राजनैतिक चेतनाकेँ आधार लऽ लिखल गेल अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़ि आ राहतक राजनीतिक डोक्यूमेन्ट्री फिक्शन अछि। अनिलचन्द्र ठाकुरक “आब मानि जाउ” उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि। असंख्य गामक ई कथा कुलीनताक अधःपतनक कथा, संस्कार विहीनताक उद्घाटन आ भविष्यक पीढ़ीकेँ बचएबाक चुतौनी छी। वीणा ठाकुरक ‘भारती’ उपन्यासमे सेहो राजनीतिक चेतना झलकैत अछि। रिसर्च स्कॉलर, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय- दरभंगा। जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतना राजेन्द्र कुमार प्रधान शोध प्रज्ञ, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, दरभंगा मैथिली साहित्यक पहिल तथा एकमात्र पुरस्कार “टैगौर साहित्य पुरस्कार”सँ पुरस्कृत एवं विदेह भाषा सम्मानसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डल अपना सबहक बीच एक ओहन साहित्यकार छथि, जिनकर किछुए दिनमे बहुत रास रचना मैथिली साहित्याकाशमे अपन स्थान बना लेलक अछि। प्राय: २००४ इस्वीक बाद लिखब शुरू केलनि आ प्रकाशित हुअ लगलनि २००७ इस्वीक पछातिसँ। २००९ इस्वीमे आठ गोट पोथी प्रकाशित भेलनि। यथा- गामक जिनगी- कथा संग्रह, तरेगन- विहनि कथा संग्रह, मिथिलाक बेटी- नाटक तथा पाँच गोट उपन्यास यथा- मौलाइल गाछक फूल, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत, जीवन-मरण आ जीवन-संघर्ष। पछाति २०१२-सँ-२०१४ इस्वीक मध्य विभिन्न विधाक दू दर्जनसँ ऊपर पोथी प्रकाशमे एलनि। यथा- अर्द्धांगिनी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, शंभुदास आ बजन्ता-बुझन्ता, कथा संग्रह। सतमाए, कल्याणी, समझौता, तामक तमघैल, बीरांगना, कम्प्रोमाइज, झमेलिया बिआह, रत्नाकर डकैत तथा स्वयंवर- नाटक एवं एकांकी। इंद्रधनुषी अकास, राति-दिन, सतबेध, गीतांजलि, तीन जेठ एगारहम माघ, सरिता आ सुखाएल पोखरिक जाइठ गीत एवं कविता संग्रह। तहिना, सधबा-विधवा, भादवक आठ अन्हार, नै धाड़ैए तथा बड़की बहिन नामक उपन्यास सेहो लिखिलनि अछि। आ अनवरत लिखिओ रहल छथि। हमरा एतए मण्डलजी केर “साहित्यमे समकालीन बोध” विषयक आलेख प्रस्तुत करब अछि। एहि प्रसंग हम ई छूट लेमए चाहै छी जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक तँ अनेक उपन्यास छन्हि, कथा छन्हि, नाटक छन्हि, कविता छन्हि, गीत छन्हि...। मुदा हम “बड़की बहिन” उपन्यासपर केन्द्रित एहि आलेखक इतिश्री करब। अर्थात् “जगदीश प्रसाद मण्डलक बड़की बहिन उपन्यासमे समकालीन चेतना”,पर ई आलेख अपने सबहक सोझा प्रस्तुत कए रहल छी। समकालीन शब्दक बेस व्यापक अर्थ-परिधि अछि। एहि शब्दक प्रयोग प्राय: तात्कालिक वर्तमान लेल कएल जाइत अछि। एक तरहक निश्चित समए-खण्डक लेल सेहो कएल जाइत अछि। से बितलोहो आ चलितो परिपेक्ष्यमे। बितलाहासँ तात्पर्य ई जे विद्यापतिक समकालीन फल्लाँ...। आ एकटा भेल आइ माने औझुका वर्तमान। औझको-वर्तमानमे सभ चीज लेल एक्के नजरिसँ समकालीक निर्णए करब कठिनाहे जकाँ अछि। बहुत एहनो व्यवहार अछि जे ज्योतिरीश्वरकालीन मिथिलामे व्याप्त छल जे आइयो यथावते अछि, खाली परिपेक्ष्यमे फेर-बदल भेल अछि। खैर जे से...। नारी-समस्यापर, नारी विमर्श करैत एक ओहन उपन्यासक नाओं बड़की बहिन छी जे हमरा सभकेँ एकर कथा वस्तु चौंका दइए, आत्म मण्थन हेतु विवश कऽ दइए, संगे ओहन चेतनामुलक अछि जे कोनो काज करैसँ पूर्व आकि कोनो काजक लेल डेग उठबैसँ पहिने ओइ काजक दिशापर सोचैले प्रेरित करैए। कारण एहि भाग-दौड़क आपा-धापीमे हम सभ बहुत ओहन परिपेक्ष्यकेँ बुझिओ ने पबै छी जे एकर काल्हि की हेतै...। हलाँकी तइ पाछू कएटा ओहन बिन्दु अछि जइ दिससँ हम सभ मुँह घुमा लेने छी। उपन्यासकार हमरा सभ लेल किछु एहने परिपेक्ष्यकेँ बड़की बहिन उपन्यासक मध्यमसँ सुलोचना बहिनक जिनगीक कथा परोसलनि अछि, जे समकालीक अछि, यथार्थ अछि आ समकालीन समस्यासँ एवं बोधसँ ओतप्रोत् अछि। मिथिलाक एकटा ओहन गाम जे कोसी आ कमलाक बीचक अछि, जइ गामक सुलोचना बहिन छथि। माने ओ गाम सुलोचना बहिनक जन्मभूमि छियनि। चौदह बर्खक अवस्थामे सुलोचनाक बिआह भेलनि। जहिना पिताक साधारण किसान परिवार रहनि तेहने परिवारमे बिआहो भेलनि। समाजमे अखन धरि धन नहि कुले-मूलक महत अधिक रहल मुदा लेनो-देन तँ चलिते छल। नीक-मूलक कन्याक मांगो बेसी। ओना अपन-पिताक कुल-मूलसँ दब परिवारमे बिआह भेलनि, मुदा कोनो हिनके टा नै, समाजमे कतेको गोटेकेँ भेल छन्हि आ होइतो अछि। तँए कोनो प्रश्ने नहि उठल। सरस्वतीक आगमनसँ नैहरक परिवारक विचारमे किछु नवीनता तँ आबिए गेल छल। बिआहक तीन साल पछाति सुलोचनाक दुरागमन भेल, सासुर गेली। बरख-पाँचे-छबेक पछाति सासुरसँ सुलाचनाकेँ भगा देलकनि। भगबैक कारण रहै जे सन्तान नहि भेलनि। ओना ने कहियो डाक्टरी जाँच करौल गेलनि आ ने सन्तान नहि हेबाक दोष किनकामे छन्हि, से फड़िछौल गेल। सासुरसँ भगौल सुलोचनाकेँ परिवार सहर्ष अपना लेलनि। अपनबैक कारण भेल जे परिवारक सभ अपने गल्ती मानि लेलनि जे ओहन कुल-मूलमे डेगे नहि उठबैक चाही। ओहनसँ मुहोँ लगाएब नीक नहि हएत। सरस्वतीक रूप परिवारमे बदलल। संस्कृत पद्धतिक जगह नव-नव पद्धति शुरू भेल। संस्कृतोक पद्धति रहबे कएल। मुदा शिक्षाकेँ बुनियादी पद्धतिसँ उछालि देलक। सुलोचनाक पीठ परहक जेठ भाय जुगेसर मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। गरीबी-बेकारीसँ त्रस्त परिवार। पछाति जुगेसर टीचर्स ट्रेनिंग केलनि। लोअर प्राइमरीक शिक्षक बनला। तहिना जुगेसरसँ छोट मुनेसर सेहो मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। आगू पढ़ैक गर लगबए लगला, खगड़ियाक गर लगलनि। ओइ ठामक संस्कृत विद्यालयमे विद्यार्थीकेँ भोजन-डेराक व्यवस्था सेहो करैए। कोसी कौलेज सेहो छइहे। साइंसक विद्यार्थी मुनेसर, नीक जकाँ बीएस-सी केलनि तैबीच बिआहो अफसरक परिवारमे भऽ गेलनि। दुरागमनक किछुए-दिन पछाति मुनेसरक पत्नी साधना नैहर एली। अखन धरि पिता-श्यामानन्द बेटी-जमाएक घर-दुआर नहि देखने। बीएस-सी लड़का, शरीरसँ स्वस्थ सुनि बेटीक बिआह केलनि। नैहर आपसीक पछाति साधना जखन सासुरक सभ हाल माए-पिताकेँ कहलनि तखन पिताक मनमे जमाएक नोकरीक प्रश्न उठलनि। मुनेसरकेँ राँचीए बजा लेलनि। आ संगी-साथीक सहयोग लऽ मुनेसरकेँ स्कूलमे नौकरी धरा देलखिन। मुनेसरो नोकरी करए लगला। समए बितैत गेल। जुगेसर आठ कट्ठा जमीन कीनैक विचार केलनि। ओना दुनू परानीक विचार जे मुनेसरकेँ एहि जमीनमे संग नहि करब। मुदा परिवारक तँ विधिवत् बँटबारा भेल नहि छेलनि। तखन जेठ भाय छिऐ, छोट भाएक हिस्सा तँ भइए जाएत। तँए कहि देब जरूरी अछि। जँ अदहा खर्च देत तँ ठीके छै नहि तँ अपन दोख तँ मेटा लेब। विचारक पाछू पेटमे रहनि जे मुनेसरक आमदनी ततबे छै जे कहुना कऽ परिवार चलै छै। तखन रूपैआ केतए सँ आनत? तैबीच मनमे ईहो होन्हि जे गुप-चुप दाम भेल अछि किने, बढ़ा देबै। कहुना (अधिया दाम भेने) चारि कट्ठा तेफैसला (तीन फसिला) खेतक भैलू कम नहि भेल। पोस्ट कार्डक माध्यमसँ जुगेसर मुनेसरकेँ जनतब देलखिन। स्कूलक दरमाहा तँ जुगेसरकेँ बूझल, मुदा ट्यूशनक आमदनी तँ नहि बूझल। तैसंग पत्नीओ (मुनेसरक) विचार देलखिन जे नैहरमे देल बरतन-बासन जे अछि ओ अनेरे घरमे ढनमनाइत रहैए, ओकरा बेचि कऽ जमीन कीनि लिअ। अखन धरि दुनू भाँइ -जुगेसर-मुनेसरक- बीच पहिलुके सम्बन्ध जीवित छल। मुनेसर अदहा खर्च दइले तैयार भऽ गेला। अपन कमजोर पाशा देखि जुगेसर दुनू परानी विचार केलनि जे नीक हएत बेटा नाओंसँ जमीन लिखौल जाए। मुनेसरकेँ कोनो पता नहि। अनुकूल विचार बूझि जुगेसर अपना बेटाक नाओंसँ आठो कट्ठा जमीन लिखा लेलनि। जे पछाति दुनू भाँइक बीच विस्फोटक भऽ गेल। गामक समस्या (भाइक व्यवहार) दुनू परानी मुनेसरक सम्बन्धमे खाधि बनैत गेल। दुनू भाँइक भिनौजी सुलोचनाकेँ सेहो बाँटि देलकनि। मुदा झगड़ाक बीआ पहिने सुलोचना बहिन रोपि लेलनि। रोपि ई लेलनि जे खेत कीनला पछाति मुनेसर दिससँ बाजि देलखिन जे जखन दुनू भाँइ अदहा-अदहा खर्च दऽ खेत कीनलक तखन हिस्सा किए ने हेतै? अपना मुहेँ वेचारी एक भाँइसँ दूर आ दोसरसँ लग चलि एली! दुनू भाँइ-जुगेसर-मुनेसरक विवाद समाजक मंचपर सेहो आएल। जुगेसरक जे बेटा मारिमे केस केलनि ओ घटना कर्ताक संग समाजोक लोककेँ भँसा देलनि। केसकेँ ओइ गतिए बढ़ौलनि जे घटनाक परात भने चारि थाना गाममे आबि गेल। हरबिर्ड़ो गाममे भऽ गेल। दौड़ा-दौड़ी खेहारा-खेहारी जमि कऽ भेल। दू गोटे जहलो गेल। लगले बाँकी मुद्दालहक जब्ती-कुर्की भऽ गेल। जकर प्रतिक्रिया समाजमे जमि कऽ भेल। आगू चलि मुनेसर बेमार पड़ि गेला। छह मास आराम करैले डाक्टर सलाह देलकनि। जीवन-मुत्युक बीच पड़ल मुनेसरक मन छँहोछित भऽ गेलनि। एक दिस अपन अगिला जिनगी हरिअर बूझि पड़नि, अपन कमाइक संग दुनू बेटाक कमाइ देखि तँ दोसर दिस अपन स्थिति देखथि जे अपन सेवा केना हएत? पत्नीओ पत्नीए छथि। अकास उड़ैत चिड़ै जकाँ। कमा कऽ हाथमे दियनु, हुकुम पुरबियनु तँ बड़बढ़ियाँ नहि तँ अपनाकेँ कपरजरूआक पत्नी कहि डाकनि देती। अपन शेष नोकरी आ पेन्शनक आशा पत्नीकेँ देखथि, तँ बेटाकेँ कमासुत बूझि संतोष होन्हि, मुदा बड़की बहिनक की हएत? वेचारीकेँ अछैते भाइए ने भाए रहलनि, आ ने अछैते पतिए ने पति रहलनि! घरपर ओते सम्पति नै, तहूमे जँ बेचैओक अधिकार रहितनि तँ किछु बेसीओ दिनक आशा होइतनि, सेहो नहि। समए रौदियाहे अछि। अपने ओछाइन धेने छी, पाइक कोनो आमदनी नहि। बेटासँ मांगि केना सकै छी, ओकरो ई बात (बहिनक खर्च) बूझल नहि छै तैपर जँ मंगबै आ ओ माएकेँ कहत तँ जेहो किछु दिन जीवैक आशा अछि सेहो चलि जाएत। आइने-अवगरानिसँ लोक जहर-माहूर खाइए। अपन विचारकेँ अपने मनमे दाबि मुनेसर बहिनकेँ बिसरि देलनि। महिना-दू महिना तँ सुलोचना आशा धेने रहली मुदा पेटक आगि तँ ओहन आगि होइ छै जेकरा मिझबैले लोक आचार-विचार कुल-खनदान सभ बिसरि जाइए। ततबे नै, सुलोचना ओहन परिवारमे जनम नेने छथि जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि केना सकै छथि। अपन ओहन वाड़ी-झाड़ी खेत नहि जे अपनो जोकर सागो उपजा सकै छी। बाधक खेत। बेवस सुलोचना गाममे टुटली मरैआमे बैस गाबए लगली- “हे भोलादानी कहिया हरब दुख मोर।” चारू दिसक अपन बन्न रस्ता देखि सुलोचना बहिन चारूकात तकली तँ एकटा घर लगमे बूझि पड़लनि। ओ घर अपन दीदी-पीसाक। गामसँ सटले, करीब कोस भरिपर दीदीक घर। बेरू पहरमे सुलोचना बहिन दीदी गामक रस्ता पकड़लनि...। सुलोचनाक पिसियौत भाए, हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि। प्रतिष्ठित शिक्षक। जिनगीमे डेरापर कहियो कोनो विद्यार्थीकेँ ट्यूशन फीस नहि लनि। मास्सैबक परियाससँ सुलोचना बहिन सासुर गेली। दोहरा कऽ साठि बर्खक उमेरक पछाति जहिना जिनगी हारल-थाकल तहिना अपन जिनगी पाँच कौर अन्न आ पाँच हाथ वस्त्रपर अँटका लेलनि...। उपरोक्त कथा-वस्तु सद्य: यर्थाथक परिचए अपनामे समेटने अछि। औझका पढ़ाइ-लिखाइक मात्र एक लक्ष्य नोकरी करब अछि। परिवारक अर्थ सिकुड़ि रहल अछि। समाजक बीच रंग-रंगक कलह केर भावना बढ़ि रहल अछि। भाए-भैयारीमे प्रेमक भावना कमि रहल अछि। पूजीवादी विचार मनुखमे एहि तरहेँ अपन जगह बना रहल अछि जे बैमानी भावना एते प्रवल भेल जा रहल अछि जे समाजक बात तँ दूर जे भैयारीओमे बैमानी शुरू भऽ गेल अछि। जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि कोना सकै छथि। अपना ऐठाम आइयो विधवा बिआहक सामाजिक मान्यता सभ समाजमे नहि देल गेल अछि। जकर जरूरत सजहे उपरोक्त कथा-वस्तुमे उपन्यासक माध्यमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल सुलोचना नामक पात्रक अवतारणा कऽ देखार केलनि अछि। जखन कि एहन मात्र सुलोचने बहिनटा नहि अपितु बहुत बहिन छथि...। ऐ तरहेँ ऐ उपन्यासमे समकालीन चेतना वृहद पात्रक समस्त चरित्र-चित्रणसँ लऽ अन्त आएल अछि। निर्मलीक गीत :: बीणा प्रसाद गर्व करू ‘निर्मली’पर ई मिथिलाक शान। जतए हरि शाह महाविद्यालय एहि क्षेत्रक पहचान।। बीचो-बीच हृदयस्थलसँ जाइत राज मार्ग महान। ‘निर्मली’क निर्मलतासँ आब कियो नहि अन्जान।। जेकरा हृदयमे बास करैत अछि मानवताक केर ज्ञान। जेकर आँगनमे बसथि हिन्दू संग मुसलमान।। हिलमिल देखबैत अखण्ड एकताक अभियान। सिनेहमयी आँचरसँ झँपने, कोसी, भुतही आैर बलान।। खेते-खेत उपजैत अछि मुंग, मरूआ आ धान। गहुम, खेसरी, दलहन तेलहन खुब फड़ैत अछि आम।। वाड़ी-झाड़ी भेटत पान पोखरिमे माछ-मखान। भोजन वस्त्रक त्रुटि रहितो करथि अतिथि सम्मान।। पशु-पक्षी संग पाएब घरे-घर जेतए विद्वान। भारतीक पोसल सुग्गा करथि श्लोकक गान।। एतै भेला आयाची लेलनि ने कहियो दान भोर-साँझ होइत अछि जेतए लोक गाथा केर गान।। सम्पर्क- शोधप्रज्ञ, ल.ना.मि.वि. विद्यालय, दरभंगा। ग्राम+पोस्ट- रखवारी जिला- मधुबनी, ८४७४११ मो. ८८७७५८५९५८ समकालीन चेतनाक सम्वाहक :: अर्द्धांगिनी पंकज कुमार प्रभाकर शोध छात्र, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, कामेश्वरनगर- दरभंगा। जीवनमे होइत नित्य नूतन परिवर्त्तनक खण्ड चित्रकेँ यथावत् प्रस्तुत करब श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन एक फराक शैली छन्हि। मण्डलजी वहुआयामी रचनाकार छथि। गद्य हो आकि पद्य विभिन्न विधामे जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेने छथि। विभिन्न विद्वानक मत सेहो ऐ सन्दर्भमे आएल अछि। अर्द्धांगिनी कथा संग्रहक आमुखकार डॉ. योगानन्द झा लिखलनि अछि- “युगीन समस्या ओ समस्याक कारण एवं तेकर समाधानक प्रति चिन्तनशीलता हिनक वस्तु-विन्यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि अछि जइमे परम्परित कथाधाराक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूपेँ प्रस्फुटित देखि पड़ैछ। मिथिलाक लोकजीवनक उत्थानक प्रति सम्वेदनात्मक अभिव्यक्ति कौशलक कारणे मण्डलजीक कथा सभ हिनका आधुनिक कथाकार लोकनिक अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ कऽ देलकनि अछि।” मण्डलजीक कथा सभ मिथिलाक माटि-पानिक कथा छी। हिनक कथा सभमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आशा-निराशा, सुख-दु:ख, हर्ष-उल्लास आ जीवन-संघर्षक व्याख्या भेटैत अछि। मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक ओ राजनीतिक जीवनमे होइत परिवर्त्तन सभकेँ सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा ई अपन कथा सभकेँ प्रवाहमयता, रोचकता ओ विश्वसनीयताक संग प्रस्तुत करबामे सिद्धहस्त कलाकारक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। दर्जन भरि उपन्यास, दर्जनसँ बेसी कथा संग्रह, करीब दर्जन भरि नाटको तथा पद्यक (गीत, काव्य) पोथी सेहो आधा दर्जनसँ ऊपर प्रकाशमे आबि चुकल अछि, संगे-संग आलोचनात्मक आलेख सेहो पत्रिकादिमे पढ़बाक अवसरि भेटल अछि यथा- अवतारवाद, सगर राति दीप जरय :: एकटा यात्रा, मिथिलाक लोक बेवहार गीत एवं संस्कार गीत, उपन्यासमे ग्रामीण चित्रण, कामरूप आ मिथिला इत्यादि। तइ संग कएक गोट साक्षात्कार सेहो हिनकर आएल अछि। ओना तँ हिनक विभिन्न कथा संग्रह अछि जेना, गामक जिनगी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, बजन्ता-बुझन्ता, तरेगन, शंभुदास तथा अर्द्धा्ंगिनी। मुदा अखन हम अर्द्धांगिनी कथा संग्रहमे संग्रहित कथा सबहक अध्ययन कऽ समकालीन बोधकेँ ऐ आलेखमे निरूपण करब। ‘अर्द्धांगिनी’ कथा संग्रहमे बीस गोट कथाक समावेश कएल गेल अछि। जइमे संग्रहक पहिल कथाक नाओं- ‘दोहरी मारि’ छी। दोहरी मारि कथा केर पुरुख पात्र गुलाब छथि। गुलाबक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भेल अछि। अवकाश प्राप्त प्रोफेसर गुलाब केतेको वर्षसँ डाइबीटीज ओ ब्लड-प्रेसर सदृश बिमारी सभसँ ग्रस्त छथि। गामक घर-घराड़ी पर्यन्त बेचि शहरमे बनौल मकानमे पति-पत्नी एकाकी रहै छथि। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहै छन्हि तँए हिनकालोकनिक सुधि लेनिहार कियो नै छन्हि। हद तँ तखनि भऽ जाइत अछि जखनि पुत्र द्वारा ई समाद भेटै छन्हि जे पौत्रक मूड़न घरपर नै भऽ कऽ वैष्णो देवीमे हेतनि, जइ लेल हुनकोलोकनिकेँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटै छन्हि आ ओ अपनाकेँ अशक्य बूझै छथि। दोसर कथा- ‘केना जीब’ सेहो अवकाशप्राप्त प्रोफेसरेक कथा अछि। प्रोफेसर साहैब बेटाकेँ पढ़ा-लिखा कऽ विदेश पठयबामे सफल तँ होइ छथि मुदा बेटा विदेशी सभ्यता ओ संस्कृतिक रंगमे रमि जाइ छन्हि आ हिनकालोकनिक खोजो-पुछारि नै कऽ पबै छन्हि। परिणामत: दुनू परानी एकाकी जीवन बितेबाक हेतु बाध्य होइ छथि। तेसर कथाक नाओं- ‘नवान’ छी। ऐ कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विभिन्न खण्डचित्र उपस्थित कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल फड़ देवताकेँ चढ़ाएब, गाए बिआएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभिषेक करब आदि ऐ कथाक विषय-वस्तु अछि। चारिम कथा- ‘तिलासंक्रान्तिक लाइ’ पर लिखल गेल अछि। ऐ कथामे गामक जिनगीमे पसरल अन्धविश्वासपर प्रहार कएल गेल अछि। पाँचम कथा- ‘भाइक सिनेह’ भाए-भैयारीक आपसी कलहपर केन्द्रित एक प्रकारक प्रेमक कथा छी। छठम कथा- ‘प्रेमी’ वस्तुत: प्रेमकथाक रूपमे लिखल गेल अछि। मुदा ऐ कथामे रचनाकारक उद्देश्य समाजिक जीवनमे व्याप्त दहेज प्रथाक कुरीतिकेँ समाप्त करबाक संदेश अभिव्यक्त भेल अछि। संग्रहक सातम कथा- ‘बपौती सम्पति’ कृषक जीवनमे जातीय बेवसायक महत्तवक अवधारणापर आधारित अछि। सम्प्रति कृषक-मजदूरक पलायनसँ जे गामक अर्थ-बेवस्था चरमरा गेल अछि तेकरा सुधारबाक हेतु ऐ कथामे चिन्तनक एकटा दिशा भेटैत अछि। आठम कथा- ‘डंका’ लोकजीवनक अवमूल्यनकेँ रेखांकित करैत अछि। नवम कथा- ‘संगी’ शिक्षा जगतमे भेल अद्य:पतनक कथा छी जइमे स्कूल-कौलेजमे शिक्षाक बेवसायीकरणक फलस्वरूप सामान्य जनसँ छीनल जाइत शिक्षाक समस्यापर विमर्श भेल अछि। संग्रहक केन्द्रिय कथा “अर्द्धांगिनी”मे ऐ अवकाशप्राप्त शिक्षकक अत्यन्त सूक्ष्म मनोविश्लेषण भेल अछि। अपन कमाइक बलेँ ओ आजीवन अपन पत्नीकेँ दासीसँ आगू बुझबाक हेतु तैयार नै होइ छथि मुदा जखन नोकरी समाप्त भऽ जाइ छन्हि तखन पत्नीक आवयकतापर धियान जाइ छन्हि आ अर्द्धांगिनीक महत बूझि पबै छथि। लेखक नारीक सेविका स्वरूपकेँ मर्यादित कऽ ओकरा पुरुखक समानान्तर मूल्य प्रदान करैक पक्षपाती छथि, जेकर अभिव्यक्ति ऐ कथाक लक्ष्य रूपमे प्रदर्शित होइत अछि। अतिरिक्त आरो कथा सभ अछि जेना- “ठकहरबा”, “अतहतह”, “ऑपरेशन”, “धर्मनाथ”, “सरोजनी”, “सुभद्रा”, “सोनमाकाका”, “दोती बिआह”, “पड़ाइन” तथा अन्तिम कथा “केतौ नै”। कथा सबहक विषयमे आमुखकार अपन विचार व्यक्त केने छथि- “मण्डलजी कथाक भाषामे मैथिलीक गमैया बोली-वाणीक सहज स्वरूप अभिव्यक्त भेल अछि। ई पात्रानुरूप भाषाक प्रयोग केलनि अछि जइसँ प्रत्येक पात्रक बौद्धिक ओ सामाजिक स्थिति स्पष्ट होइत चलि जाइत अछि। हिनक कथा सभमे कथाकारक भाषा सेहो मैथिलीक लोकजगतक भाषाहिक अनुगमन करैत अछि जइमे सहजता अछि। कनेको कृत्रिम प्रयोगसँ ई बँचैत रहल छथि। हिनक भाषामे तद्भव ओ देशज शब्दक प्रचुर प्रयोग भेल अछि। युग्म शब्दक प्रयोग हिनक भाषाकेँ लालित्य प्रदान करबामे आ ओकर प्रवाहमयतामे सहायक रहलनि अछि। उदाहरणक हेतु माल-जाल, लेब-देब, दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी, ताड़ी-दारू, छहर-महर, चोरी-डकैती, बाल-बोध, बेटा-पुतोहु, भोज-काज, अन्हर-बिहाड़ि, दार-मदार, सुक-पाक, भूखल-दुखल, चीज-बौस, घुसका-फुसका आदिकेँ देखल जा सकैछ। मण्डलजी कथा भाषाक ई अन्यतम विशिष्टता छी जे ई कोनो स्थितिकेँ पाठकक समक्ष अभिव्यक्त करैक हेतु चमत्कारिक उपमानक प्रयोग करै छथि जइसँ वस्तुस्थितिक स्पष्ट चित्र पाठकक सोझाँ आबि जाइत अछि यथा- “जहिना खढ़ाएल खेतमे हरबाहकेँ हर जोतब भरिगर बूझि पड़ै छै तहिना सुशीलक मन समस्याक वोनाएल रूप देखलक। जहिना पहाड़सँ निकलि अनवरत गतिसँ चलि नदी समुद्रमे जा मिलैए तहिना ने टटघरक ज्ञान उड़ि कऽ सर्वोच्च ज्ञानक समुद्रमे मिलत।” आदि। एतावता कहल जा सकैछ जे मण्डलजीक कथा वर्णनक दृष्टिएँ मिथिलाक ग्रामजीवनक यथार्थवादी चित्र, घटनाक दृष्टिएँ आदर्शक प्रति अभिभूत, सूक्ष्म मनोविश्लेषणक प्रति प्रतिबद्ध तथा उदेसक दृष्टिएँ लोक मंगलकारी अछि।” युग्म शब्दक प्रयोग कथाकारक विशेषता होइत अछि संगे समकालीनताक द्योतक सेहो। कारण, भाषाक अनन्तकालिन यात्रामे शब्द अपन रूपमे परिवर्त्तन सेहो करैए। जहू दिसि ऐ संग्रहक कथाकारक कलम चललनि अछि। जइपर दृष्टिपात केला पछाति समकालीन रचनाक हँ-निहँस सेहो सहज भऽ सकैए। सत्य आकि यर्थाथ एक ओहन शब्दावलीक नाओं छी जेकर परिधिमे सहज स्वरूप, सामाजक खाँटी स्थिति, स्वत: स्फुट पात्रक चरित्र, सहिष्णुता, समकालीनता आदिक समावेश सवत: रहैत अछि। मिथिलामे रहएबला सभ स्तरक समाजक पात्र ऐ संग्रहक विभिन्न कथा सभमे आएल अछि। विभिन्न समस्यासँ ग्रसत मनुख जे जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यक पात्र अछि, हिनका सभ लग एकमात्र अवलम्ब बँचि जाइ छन्हि- जिजीविषा ओ संघर्ष। यएह जिजीविषा ओ संघर्ष करबाक मानसिकता ऐ कथाक युग जीवनक अनुकूल संदेश दैत अछि। जे सद्य: समकालीन अछि। ग्राम+पोस्ट- भपटियाही-कदमपुरा, भाया- नरहिया (मधुबनी) मोबाइल- 9771721388 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली widen ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA जिम हि हि ® 'विदेह' १७५ म अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) हा ऐ अंकमे अछि:- आलेख- मिथिलाक इतिहास-:: डॉ. श्रीमोहन झा राजदेव मण्डल “रमण”- लघु कथा-दियादी डाह 22 शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना / जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतनाराजेन्द्र कुमार प्रधान बीणा प्रसाद- निर्मलीक गीत USS कुमार प्रभाकर- समकालीन चेतनाक सम्बाहक :: SGI ही
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA आलेख- मिधिलाक इतिहास :: डॉ. श्रीमोहन झा इतिहास साक्षी अछि जे वैदिक कालहिसैँ जाहि मिथिलाक प्रतिष्ठा ब्रह्मज्ञानक विकास-केन्द्रक रूपमे भेल, जतय खेलहुमे ब्रह्मविद्या सिखाओल ASA छल, जकर अनुशासन द्वारा स्मार्त कालहुमे देश-देशान्तरक आचार- विचारक क्षेत्रमे प्रेरणाक श्रोत tee, जे जनपद अपन दर्शनक विचार-धारासैँ सम्पूर्ण भारतकेँ आलोकित कयलक ओ जकर काव्य-कल्पना भारतीय alsa रस-प्रवाहकें निरन्तर समृद्धि कयलक ओहि मिथिलाक पावन भूमि जनक, याज्ञवल्क्य, गौतम, कपिल, कणाद, गंगेश, चिन्तामणि, मण्डन, उदयन, वाचस्पति, पक्षधर, विद्यापति, गोकुलनाथ, अयाची, शंकर ओ ज्योतिरीश्वरक मिथिला न्याय, तत्वमीमांसा एवं सांख्यक जन्म भूमि मिथिला piers भारते नहि अपितु समस्त विश्व आलोकित अछि। मिधिलाक सीमा प्रसंग gee विष्णु पुराणमे कहल गेल अछि जे मिथिलाक उत्तरमे नागाधिराज हिमालय 'एकर प्रहरीक रूपमे ठाढ़ छथि | दक्षिणमे पतित पावनी गंगा अपन कलकलध्वनिसैँ एकर चरण स्पर्श करैत छथि | पूरबमे नृत्य करैत चिर-चंचला कौशिकी एकर सम्यता आ संस्कृतिक संवाहिका तथा विध्वंशिका दुनू मानल जाइत छथि तैँ पश्चिममे धीरगमिनी गण्डकी स्वर्णक समान चकमक करैत एकर श्रृंगार करैत छथि | peat चन्दा झा सेहो अपन रामायणमे उपर्कुत आधारकें स्वीकार करैत मिथिलाक सीमाक प्रसंग कहने छथि- “गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूर्व कौशिकाधारा | पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत वल विस्तारा । । कमला त्रियुगा अमृता TAT वागमती HAT | मध्य बहथि लक्ष्मणा wafer से मिथिला विद्यागारा... ।” वर्तमान समयमे मिथिलाक पूर्ण विस्तार भ$ गेलाक कारणें एकर सीमा दरभंगा) मधुबनी, चम्पारण, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, किशनगंज, भागलपुर एवं हिमालय केर तराइ धरे पसरि गेल अछि । एहि Wert गंगा-प्रवाहसैँ TS HS उत्तर हिमालय धरि सए मील तथा पूरबमे महानदासँ पश्चिम गण्डकी धरि २५० मीलमे मिथिला देश अछि | अति प्राचीन कालसैं मिथिला तीरभुक्ति ars प्रचलित छल | एहिठाम नदीक बहुल्य अछि एवं ओहि सभक तीरमे लोक सभ aaa गेलाह afters पर्याय तीर भुक्ति नाम प्रचलित छल जे वर्तमान समयमे तिखुत नामसैं प्रसिद्ध अछि | मिथिला नामकरणक प्रसंग अनेक पौराणिक आधार अछि । भविष्य पुराणक अनुसार मिथिलाक नामकरण राजा fara पुत्र मिथिक नामपर राखल गेल अछि । अयोध्याक राजा निमि Ue wa भूमिपर अयलाह तेँ निमिक पुत्र मिथिक नामपर एहि प्रदेशक नाम मिथिला use! मुदा पाणिनिक कथन of जे जतय BF 2
वि दे ह विदेह Videha wre www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Formightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA उन्मूलन कयल जाय ताहि भू-खण्डक नाम मिथिला अछि | महाभारतक युद्रमे मिथिलाक राजा पाण्डवक संग युद्ध कयने छलाह | एहिसैंस्पष्ट अछि जे मैथिल लोकनि योद्धा सेहो होइत छलाह | set रामायणमे सेहोमिथिला नरेशक वीरताक वर्णन भेल अछि | विश्व वाज़्मयमे संस्कृतक साहित्य-सरिता अत्यन्तव्यापक, दीर्घकालिक ओ निरन्तर प्रवहमान रहल SHS एहि अमृत सिन्धुसैं बिन्दु-बिन्दु ग्रहण कय भारतक समस्त लोक भाषा-साहित्य समृद्ध ओ संबलित भय PEAT समस्त विश्वकें प्रेरणा-पुंज आलोक प्रदान करैत आबि रहल अछि | संस्कृतक अक्ष्य-भण्डारसैं भाव राशि ग्रहण HT भाषा-साहित्यक परती-पाँतर पर्यन्त सुरभित ओ सुवासित होइत रहल BHT | भारतीय इतिहासक ओ सस्कृतिक mig मनीषी लोकनि जनैत fa जे भारत वर्षक राष्ट्रीय अखण्डतामे संस्कृत भाषाक अद्वितीय स्थान रहल अछि। प्राचीनकालसैँ लय आसेतु हिमालय सस्कृतिक, धार्मिक ait दार्शनिक विचारक आदान-प्रदानक माध्यमे संस्कृते भाषा रहल अछि | काव्यक कोनो विधाक सर्जना एहिमे Act अछि। इतिहासकार लोकनि भारत वर्क्क ओहि भू-भागकेँ मिथिला कहल अछि जे कतेको दृष्टिसँं अपन अप्रतिम विशिष्टताक महत्वकेँ अद्यावधि सुरक्षित रखने अछि | मिथिलाक at पावन-भूमि अपन सभ्यता-संस्कृति, जप- तप, ध्यान-धारणा-समाधि आदि उन्नत मानवताक साधक गुणक Het आइ संसार मय शीर्षस्थ स्थान रखने अछि | मिथिलाक माठि-पानिमे fee ver विलक्षण शक्ति सर्वदासँ सच्निहित रहलैक अछि जाहिसँ एहिठामक लोक शिष्ट, सज्जन, प्रतिभाशाली, विद्या-व्यवसायी एवं तत्व चिन्तनक होइत रहल अछि। यज्ञ-स्थलक केन्द्र मिथिला जे अपन यज्ञक Yas समस्त वातावरणकेँ पावनमय बनौने रहल 3छि | वैदिक rere लय अद्यावधि मिथिलामे उत्पन्न भय अपन दिव्य अवदानसैं समस्त-विश्वकें चकित-स्तम्भित कयनिहार ऋषि-मुनि, योगी-साधक, दर्शनिक विद्वानक S सूची बनाओल जाय a ओहिसैँ केओ अश्चर्यचकित भय जायत। दर्शनक dat मिथिलाक नाम अग्रगण्य रहल अछि [न्याय सूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक प्रणेता कणाद एवं नव्य-न्यायक जनक गंगेश उपाध्यायक कारणें मिथिला दर्शन AAA पूर्ण ख्यारिश्त प्राप्त कयने छल | हिनक अतिरिक्त उद्योतकर, मण्डन, वाचस्पति आदिक नाम उल्लेखनीय अछि | वेदान्त सूत्रक शंकरक CARAT वाचस्पति द्वारा भामती नामसैँ लिखल गेल अछि | मण्डन एवं शंकराचार्यक शास्तार्थ तँ जगत प्रसिद्ध अछि । जैमिनिक मीमांसा तथा कपिल मुनिक wer दर्शनक निर्माण सेहो ule afer भूमिपर Aer मिथिलाक महान नगरी तथा बौद्ध एवं जैन धर्मक मुख्य प्रभाव क्षेत्र लिच्छवी dere राजधानी वैशाली प्राचीन इतिहासमे महत्वपूर्ण स्थान रखने अछि | मिथिलाक इतिहास एकर सक्षी अछि जे वैदिक anied मिथिला संस्कृति, न्याय, तर्कशास्त्र, विज्ञान, गणित, कामशास्त्र, मीमांसा, व्याकरण, धर्मशास्त्र तथा दर्शनक अध्ययन-अध्यापनक केन्द्र दीर्घकाल धरि बनल रहल। सम्बद्ध युगहिमे विभिन्न vere विशाल साहित्य अस्तित्वमे आयल, जाहिमे वौद्धिक विकास तथा आध्यात्मिक प्रगतिक पराकाष्ठाक रूपमे स्थित विभिन्न उपनिषद सभ सम्मिलित अछि | विश्वास देवीक समयमे मिथिलामे dee wa मीमांसकक एक वैसक भेल छल । अत उक्त युगहिमे गार्गी, मैत्रेयी तथा सुलभा सनक प्रतिभाशाली नारीक उदाहरण भेटैत अछि ue wert ceria राजा सबहक संरक्षणमे उच्च शिक्षाक अनेक नियमित संस्था छल | एहन संस्था सभ सामान्यत: OPH नामसैंज्ञात छल I अत: Val वैदिक युगहिमे जनक ओ TATA सन श्रेष्ठओ अग्रणी दार्शनिक were | ओहि समयमे अन्य प्रान्तहुसँ दार्शनिक लोकनि जनक ओ ace अध्यात्म सम्बन्धी शिक्षाक ज्ञानोपार्जन हेतु अबैत छलाह। 3
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA याज्ञवल्क्यक जीवनवूत्त वस्तुत: हुनक Ay तत्कालीन सांस्कृतिक इतिहास थिक | याज्ञवल्क्यक अतिरिक्त गौतम, कपिल, विमाण्डक, शतानन्द तथा श्रृंग-ऋषि ततेक विख्यात छलाह जे राजा दशरथ सेहो हिनका फेष्टि- यज्ञक सम्पादन हेतु कौशिकी घाटामे आमंत्रित कयने छलथिन | ओ काश्यप MS सम्बद्ध छलाह | अत: जाहि मिथिलाक पावन भूमिपर ब्रह्मज्ञानक सर्वश्रेष्ठ महर्षि याज्ञवजल्क्यक सिद्धता आदि मिथिलाक आध्यात्मिकताकें सिद्ध-प्रसिद्ध करैत अछि | स्मृतिकार याज्ञवल्क्य परम धर्मकें refi करैत कहने छथि- “अये तु मरमो Tat यद्योगेनात्मदर्शनम् |” मिथिलाक सभ्यता आ संस्कृतिक प्रसंग महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ऋग्वेदकें “प्राचीन Ale शीर्षक लेखमे कहने छथि जे गौतम, रहुगण, दीर्घतमा, Hier, विश्वामित्र आदि पूर्वोत्तर बिहारक सभ्यता आ संस्कृति आदिक जनक छलाह | विश्वामित्र 'कौशिक' नामसैं प्रख्यात भेलाह तथा कौशिकी हिनकर शापश्रष्टा सहोदरा छलथिन | एही कौशिकी aaa विश्वामित्र ब्राह्मणत्व प्राप्त HAA छलाह | आ ई कौशिकी क्षेत्र नि:सन्देह मिथिलाक भू-भाग रहल अछि। मिथधिलाक सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवस्थाक सम्बन्धमे ज्योतिरीश्वर अपन “धूर्तसमागम' तथा *वर्णरत्नाकर' मे पूर्ण सामग्री प्रस्तुत कयने छथि | वर्णरत्नाकर महत्व ऐतिहासिक Eee भारतीय पुरात्त्वक एकटा कोष अछि तथा मध्यकालीन पूर्वोत्तर भारतक एवं विशेषतया मिथिलाक जनजीवन एवं संस्कृतिक जीवन्त चित्रण प्रस्तुत करैत अछि | समाजमे संस्कृतक एतेक अधिक प्रभाव एवं प्रचार छल जकर उदाहरण स्वयं विद्यापति देने छथि । राजा हरि सिंहदेवक आदेश तथा प्रेरणासँ बनाओल पंजी-प्रबन्ध, जे तत्कालीन समाजमे अत्यधिक प्रचलित भेल, संस्कृतहिमे लिखल गेल | एहिसैं स्पष्ट होइत अछि जे तत्कालीन समाजक रीति-नीति, आचार-विचार,धर्म-कर्म सामाजिक बन्धन, क्रिया-कलाप, दर्शन, स्मृति आदि सम्बन्धी विषय-वस्तुक रचनाक माध्यम संस्कृते छल | तकर मूल कारण जे मिथिलाक tera वर्ग संस्कृति, साहित्य, दर्शन, ललित कलामे रूचि रखैत छलाह ओ कतोक राजा Cpa विद्वान सेहो were | एहिठामक राजा लोकनि Sepa रचनाक अध्यापन तथा वद्वान लोकनिक आश्रयदाता रहैत अयलाह | महाराज महेश ठाकुर तँ अपन किरताक HoT मिथिलाक राज्य प्राप्त HAT छलाह | विद्यापतिक रचनापर दृष्टिपात कयलासं स्पष्ट Bled अछि जे तत्कालीन रचनाक माध्यम कोन भाषा छल तथा राज दरबारमे कोन-कोनविषय सबहक रचना होइत छल fanaa राज पण्डित छलाह | पण्डित वर्गक भाषा संस्कृत छल | अत: अपन पाण्डित्य प्रदर्शन करबाक हेतु संस्कृतेमे रचना Hee अनिवार्यबूझि पड़लनि | मिथिला तंत्र विद्याक प्रधान केन्द्र छल एवं कतेको तांत्रिक एवं वैज्ञानिक सेहो छलाह | मिथिलामे नवीन भक्ति ante रूपमे तंत्र मार्गक बेस प्रचार भेल । Here जाहि वंशमे सिद्ध तांत्रिक रहथि, ओहि वंशमे सिद्ध तांत्रिकक sore देवीक मंत्र ग्रहण कय ओही देवीक उपासना करबाकप्रथा मिथिलामे अद्यपर्यन्त प्रचलित अछि । वस्तुत: प्राचीन धर्मशास्त्र आदिक मनन ओ चिन्तनकय युगक आवश्यकतानुसार आचार सूत्रक अन्वेषणक संगहि ओकरा नव व्याख्या देबाक आवश्यकता छल । ई ओहि समयक समाजक हेतु जीवनमरण att अस्तित्वक प्रश्न छल। मिथिलाक पण्डित लोकनि एहि उत्तरदायित्वकें निष्ठापूर्वक विर्वाह कयलनि। अतएव महाकवि विद्यापति सेहो एही परम्पराक आश्रय ग्रहण कयलनि | प्राचीन कालहिसैँ मिधिलाक ई विशेषता tect अछि जे एहिठामक राजा लोकनि जनक ay कर्णाट क्षत्रिय अथवा ओइनवार शासक होयबाक संगसंग धर्म-कर्म एवं सामाजिक आचार-विचारक नियामक सेहो होइत छलाह। Ud कारण स्मृति ग्रन्थक रचना एतेक GES भय गेल छल । अपन आचार BH हेतु संस्कृतक ज्ञान 4
वि दे ह विदेह Videha wre www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Formightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA आवश्यक छलैक F समाजक जनमानसमे सेहो स्स्कृतक प्रचार-प्रसार छलैक | एवं प्रकारें भारतक धर्म, संस्कृति- साहित्य, संगीत ओ कलाक क्षेत्रमे कर्णाट शासक लोकनि जे प्रेरणा-पुंज लय अवतीर्ण भेलाह से ओइनवार कालमे गतिमान नहि tect अपितु ओकरव्यापक प्रभावक समता परवर्ती कोनो शताब्दीमे नहि भय सकल | कर्णाट आ ओइनवार वंशक पतन मिथिलाक हेतु कष्टकर सिद्ध भेल । राजनीतिक अद्य:पतनक संग-संग परवर्ती कालमे मिथिला सांस्कृतिक क्षेत्रगे सेहो अवनतिक SATA आबि गेल | कितु आलोच्य कालमे साहित्य आ were aaa मिथिलाक उल्लेखनीय अवदान रहलैक | Ue स्तरपर कर्णाट-ओइनवार-युगीन मिथिला जनक- याज्ञवल्क्य कालीन मिथिलासँ तुलनीय अछि । ओइनवार काल भारतीय साह्यितिहासमे वस्तुत: “स्वर्णयुग'क SIA गनल जाइत अछि, कारण उक्त काल पर्ववर्ती gre एहि हृष्टिसैँ भिन्न अछि जे एहिमे संस्कृत-विद्याक क्रमिक प्रचार-प्रसारक संग-संग लोक भाषा साहित्योक विकासक मार्ग प्रशस्त भेल | मिथिलाक विदेह राजा जनकक समयमे जाहि स्स्कृतिक सूत्रपात Act छल ओकर पूर्णोत्कर्ष महाकवि विद्यापतिक युगमे Act | ज्योतिरीश्वरक पश्चात् महाकवि विद्यापतिक कोमलकांत पदावलीक रसस्वादन कय सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारतवर्षक साहित्य-प्रेमी भाव-विभाएर भय Tere | मिथिलाक संग घनिष्ट सम्पर्क रहबाक कारणेँ एहिठामक चिन्तन, साहित्य तथा संस्कृति बंगाल, आसाम एवं उड़ीसक्क प्रेरणा sitet APT गेल | हिनक गीतक अनुकरणपर एकटा नवीन भाषाब्रजबुलि साहित्यक THA | आसामक प्रमुख वैष्णव भक्त शंकरदेव तथा बंगालक महाप्रभु चैतन्यदेव तँ सहजहि विद्यापतिक गीत गबैत-गबैत HSA भय जाइत छलाह। एगारहम ई.मे भारतमे मुसलमान सबहक आगमन भेलासैंहिन्दु समाजक अस्तित्व वस्तुत: संकटापन्न भय गेलैक | हिन्दू लोकनिक राजनीतिक स्वतंत्रता समाप्त भय गेल | एहि जातिक समजिक श्रृंखला तथा पारस्परिक सौमन्स्यक अन्त भय रहल छलैक | US संकट बचबा लेलब्राह्मणवर्ग निबन्ध लिखि ओहि सामाजिक Aras ध्वस्त होयबासँ बचयबाक प्रयास कयलक | राजनीति तथा अधव्यवस्थापर कोनो अधिकार नहि रहि जयबाक Ro उक्त ब्रह्मण लोकनि अपन ware मुख्यत: सामाजिक तथा पारिवारिक जीवनपर केन्द्रित कयलनि | ओकर परिणति जीवनक विभिन्न क्षेत्रक नियमनक हेतु आचार संहिता तथा विंधि-व्यवस्थाक सम्बन्धी निबन्धक at नियम-परिनियम निर्मीण भेल । उक्त स्मृति विषयक रचना अपन आ्तरिक मूल्य, सार्थकता आ सबलताक कारणेँ अनेक शतकक Gan ग्रस्त स्थितिओमे हिन्दू समाजक स्वतंत्र व्यक्तित्वक रक्षा Ha सकल | हिन्दू विद्याक एकटा प्रमुख केन्द्र रहबाक कारणेँ मिथिलामे निबन्ध लेखनक स्वतंत्र परम्पराक अस्तित्व आश्चर्यजनक अछि | STAR कालहुमे प्रशासनिक स्वरूप ओहिना tect जे कर्णीट कालमे छल | मैथिल लोकनि वर्णीश्रम- व्यवस्थाक कट्टर अनुयायी रहलाह अछि | सम्बद्धकालक मैथिल समाजमे सनातन धर्मक पालनुक प्रति पर्ण निष्ठा परिलक्षित होइत अछि | विदेशी are अक्रान्त Ag मैथिल समाज अपन स्वतंत्र व्यक्तित्वकें सुरक्षित रखबामे पूर्ण सफल रहल | महाकवि विद्यापति सेहो तत्कालीन समाजक विशद वर्णन कयलनि अछि । हुनक कीर्तिलताक विभिन्न wes ज्ञात होइत अछि जे मुसलमानी अक्रमणक फलस्वरूप तिरहुतमे बहुत दिन धरि अराजकता तथा अव्यवस्था व्याप्त tet | हिन्दू समाज उत्पीड़ित तथा अपमानित जीवन व्यतीत करबाक हेतु विवश छल। मुसलमान आक्रमकक आतंककारी MAT साहित्य साधना ओ परम्परा Sel क्षत-वक्षत भय गेल छल | भारत पर मुसलमानी प्रभाव जाहि निर्मम ओ नृशंस रूपमे बढ़ि रहल छल ताहिसँँ सम्त भारतीय जन-मानस आलोड़ित भय उठल छल | विद्यापति तत्कालीन समाजक विशद् वर्णन “कीर्तिलता' मे कयने छथि जे हृष्टव्य अछि- 5
वि दे ह विदेह Videha कन्तिर www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA “aft आनए बाभन बड़आ |” मथाँ चढ़ाबए गाइक FST | | फोर चाट Was तोड़ ऊपर चढ़ाबए चाह AS । ।” एहि प्रकार ईसाक तेरहम-चौदहम शतकमे Us ब्राह्मण धर्म प्रधान प्रदेशकें एकटा सर्वथा भिन्न आ प्रतिकुल धर्मक सामना करय पड़लैक। ओ धर्म छल इसलाम जे मुसलमान विजेता सबहक संग एहिप्रदेशमे प्रवेश पओलक | निबन्धकार तथा धर्मिक नेता लोकनि बहुत दिन धरि एहि धर्मक प्रभावकेँ रोकबाक प्रयास कयलनि। किन्तु समयक प्रवाहक संग-संग इसलाम सेहो हिन्दू धर्म आ समाजपर अपन प्रभावक प्रसार करए लागल। मैथिलीमे saga अनेक फारसी तथा अरबी शब्द, मिथिलाक आदालतिमे पास्परिक हिन्दू विधिक अनुसार न्यायिक क्रिया-कलापक सम्पादन, तजिया, दाहा आदि मुसलमानी पर्कत्योहारक प्रति हिन्दूक सम्मान तथा छठि, घड़ी आदि हिन्दू पर्व आ धार्मिक अनुष्ठानमे मुसलमान सबहक ARM, अकबर द्वारा चलाओल गेल फसलीसालक राष्ट्रीय संवतक रूपमे मिथिलामे प्रचलन, अनेक मुसलमान सन्त द्वारा अपन राग तरंगिणीमे इमाम तथा फिरदासी नामक मुसलमानी रागक समावेश आदि कतिपय क्र हिन्दू आ मुसलमान जन समुदायमे सांस्कृतिक तत्वक आदान-प्रदान तथा सम्मिश्रणक सूचक थिक | ओइनवार Het TH आक्रमणक युग छल | जखन मुसलमानी अक्रमणक पहिल बाढ़ि बिहार धरि पहुँचि गेल छल, मुदा तखनहूँ मिथिला shies बचल रहल आ मैंथिल राज सभामे संस्कृत काव्य साहित्य आदर पबैत रहल। यद्यपि उक्त युग-पूर्ववर्ती युग जकाँ प्रकाण्ड विद्वान सभकेँ जन्म नहि ca पओलक। Ue राजवैशक शासनकालमे जगधर, विद्यापति, शंकर मिश्र तथा वाचस्पति मिश्र ई चारिटा मिथिला विभूति भेलाह | विद्यापतिक समयमे इसलाम एवं हिन्दू धर्मक बीच Vel एक प्रकारक आदान-प्रदान प्रारम्भ भय चुकल छल | उत्तर बिहार ओहि समयमे सूफी लोकनिक एक प्रधान केन्द्र बनि चुकल छल | महाराज शिवसिंह मुसलमान सन्त एवं फकीरकें जे दान देने छलाह ओकर प्रमाण सेहो प्राप्त भेल अछि। ज्योतिरीश्वरक “वर्णरत्नाकर'मे जे विदेशी अरबी-फारसी- शब्द भेटैत अछि जाहिसैं ई स्पष्ट होइत अछि जे राजनीतिक आधिपत्यक बहुत पूर्बहि मिथिलामे अरबी-फारसी भाषासँ सम्पर्क भय गेल छल | सूफी सन्त एवं फकीरक माध्यम एहि प्रकारक सम्पर्क सम्भव भेल होयत | feat यात्री धर्म सूवामी जखन १२३६ SA हिरहुतक राजा रामसिंह देवक ओतय आयल छलाह ओही समयमे एहि क्षेत्रमे मुसलमानक प्रकोप बढ़ि रहल छल । दुनू धर्मक समन्वय एवं समागमसँँ नवीन हृष्ट्रिकोणक बीजारोपण भय रहल छल एवं erate युग धरि अबैत-अबैत एकर आओरो विकास Aer | aan शताब्दीक मधूयमे अबैत-अबैत मिथिलाक सामाजिक जीवनमे परिवर्तनक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल | अंगेज लोकनिक राज्य तावतधरि नीक stat प्रतिष्ठित भय गेल छल । एहि क्रममे ओलोकनि अपन धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्रचार जोर-शोरसैं प्रारम्भ कयल | अपन धर्मग्रन्थक भारतक विभिन्न भाषामे अनुवाद कराय जनतामे प्रचार प्रारम्भ कयल | भारतक अनेक भागमे लोक सभ SAS TAT लागल | एकस्तिक्रियाक रूपमे प्राय:एतय ब्रह्म समाज एवं आर्य समाजक आन्दोलन आरम्भ भेल। राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द ओ स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि धर्मिक एवं सामाजिक नेता लोकनिक आन्दोलनक फलस्वरूप जन साधारणमे एक नवीन चेतनाक संचार भेल | Hed: पाश्चात्य साहित्यसैं प्रेरित भय अपन क्षेत्रिय आन्दोलनसैं उद्बोधित भय एहिठामक लोक अपन-अपन मातृभाषा साह्हयिकें नवीन भाव-शिल्पसैं Ulead करबाक हेतु अग्रसर भेल १८५४ FA चार्ल्स 6
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly cjournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ म अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक _ es मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA उड जाहि प्रणालीक शिक्षाक आधारशिला राखल ताहिमे मातृभाषाकें शिक्षाक माध्यमक रूपमे स्वीकार कयल गेलैक | अंग्रेजी प्रशासनक समय मैथिली साहित्यक साधक लोकनि पुन: अपन प्रशस्त मार्गपर अग्रसित भेलाह जे स्वतंत्रता संग्रामक पृष्ठ भूमिमे पुन: नव चेतना ओ नव स्फूर्ति बीजरूपमे मैथिली भाषा at साहित्यक बहुमुखी उत्थानक प्रेरक होइत आबि tect अछि | विद्यापतिक पश्चात् गोविन्ददास, मनबोध, हर्षनाथ, Tat झा आदि कविगण Ferg | अत: मिथिला अपन वैभवपूर्ण साहित्यिक परम्पराक कारणेँ भारतवर्ष अद्वितीय स्थान रखने अछि। (१) बी.सी. ला ग्रन्थ भाग-१ १२८-१३९ तु सरकार, क्रीएटिव इण्डिया पृ. ४ (२) FS. उप. ६, २-१-७ ऐ. | ८५-८८ (३) मुखर्जी, मेल एण्ड थाट इन WARES इण्डिया- पृ- ५५ (४) दु. झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ- २१६, महा. वनपर्व- ११० (५) विद्यापति लिखनावली (६) पंजी प्रबन्ध- श्लोक- १-२, मि. त.- | १३६ (७) ज. ए. सी. ब. १९१५/ न. स./ पृ ४३२ (८) ज. वि. ओ. रि. सो.- १३/ सर्च फॉर संस्कृत एण्ड प्राकृत मैन्यूस्क्रिप्ट्स इन ऐण्ड ओड़ीया/ ३-४ (९) वाचस्पति मिश्र- विवाद चिन्तामणि|/ डॉ. गंगानाथ झाक अनुवादु/भूमिका-९-२४ (१०) ज्योतिरीश्वर, वर्णरत्नाकर, सम्पादक डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी एवं बबुआ जी मिश्र, एसिएटिक सोसायटी sh बंगाल, कलकत्ता, प्रथम संस्करण, १९४० (३१) रोयरिक द्वारा सम्पादित, वायोग्राफी ऑफ धर्मस्वामी, १९५९ अध्यक्ष- मैथिली विभाग हरि प्रसाद साह महाविद्यालय, निर्मली (सुपौल) राजदेव मण्डल *रमण”-दियादी डाह कातिक मासक साँझक TAT | जाड़क पहिल GH, पछवा हवाक संग Net | बटेसरबाबू अस्सी बर्खक उमेरक अनुभवक हिसावसँँ बजला- 7
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) हि मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA “St चलितर, घूर लगलह?” चलितर हैं-मे-हैं मिलबैत बाजल- “मालिक! घूर a भरिगर भेल ।” चलितरक बाजक वीराम लगिते म्लिकाइन एकटा स्टीलक थाड़ीमे दू गिलास चाह धमकलीः “लिअ, चाह पीबू ।” मालिक चाहक गिलास दिस ठेकनबैत हाथो बढ़बथि आ गामवालीक मुहाँ दिस तकबो HA । भेलनि जे जेना few अरहौती अरहेतनि | अनदाजैतबुदबुदेलथि- “पहिने असथिर A चाह Ula तखनि few गपो हेतै चाहक चिस्की लैत चलितर दिस ताकि बजला- “चाह पीब लएह चलितर ।” “og, पहिले हाथ-पएर yar दिअ गोंतगोबर लागल अछि |” कहि चलितर दुआरिपर गारल कल दिस बढ़ल | इमहर पत्नी दिस तकैत बटेसर हाथक इशारा दैत पुछरलखिन- “बाजू की Hes चाहै छी?” “की कहब कनियाँके अपन जान नै ORS | कहुना-कहुना क५ अपनों निमरजाना wt Aa नहि जानि कखनि की हेतै। तेहेन-तेहेन आब धानो रोपाइत अछि जे अगहन A seve कातिके As जाइए। अगहनसैँ पहिने धनकटनी Ws जाइए,मनसम्फे Sacral करैए! गरीब की गरीब रहल! तकनौं ने कियो एकटा खढ़ो हटबैले भेटैए...!” बटेसर बाबू बिच्चेमे टोकलखिन- “की कहक अछि से खोलि Hs कहू |” “की wea राति-विराति जैं fies भड जेतै ct की करब? अन्हराठाढ़ीक होसपिटलमे सुनै छिऐ नीक बेवस्था छै |” कहि मलिकाइन आँगन दिस विदा Act । “चलितर, कनी लगमे आबह | SRA हएत आ fees विचारबो करब | लग आबह |” चलितर लग आबि चौकीक पौआ लग बैसि गेल । बटेसर बाबू बजला- “stg हौ चलितर, कोन जुग As गेल जे बिना डागडरसैं देखौने कोनो काजे ने चलत!वारिटा बेटा आ चारिटा बेटी भगवान tet | कहियो पाइयो भरेक cals आनैक जरूरत नै पड़ल । पल्हनिकेँ बजाबै छेलौं आ ओ असगरे आबि घरवारीकें निश्चित Hs as छल । सिदहा, परसौतीक tect साड़ी आ छठिहार दिन एकटा नव नुआँ देने wes फारकतियो vs जाइ छेलौं | gested अपन काज बूझि महिना aft नेनाक तेल लगबैसैं दूध पिअबैमे लगल रहै छलि... ।” 8
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) हि मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA बटेसर बाबू बाजैत-बजैत बिच्चेमे जेना ठमैक गेला। ठमकल Fa चलितर बूझलक जे माध्श्लिक बड़ चिन्तित ofa, बाजल- “से की करबै eee | जेना-जेना जुग बददलै तेहनेतेहने परियोजनि एलै। आबक समैमे की देवतो- गोसाँइकें सतिया रहल ।मखना भायकें देखियौ, वेचाराकेँ जौआँ बेटा भगवान देलखिन | जनमक समए अहिना धड़फड़ी भेल । गामेक डाकटर बजौल गेल मुदा कोनो जोगाड़े ने धरै,आकि तखने किम्हरौसँं खराम खटखटबैत बुधनबाबा फूुँचला, परसौतीक कुहरब सुनिते एकटा जड़ी देलखेन आ लगले दसे- पाँच मिनटेमे फलित As गेल |” “से a हमरा अपने बितल अछि | जेठ बौआक जन्म-समए कि कम फिदरति भेल ।मलिकाइनकें लूक- झूक साँझ पड़िते ae उखड़लनि, तहिया तोहर हमरा ऐठाम आएब-जाएब कम रह्थिया-झटक चलि रहल Sat | मोतीलाल, रामकिसुन, गढ़बा तीनू Me Fase, फराठी आ चोरबत्ती नेने मधु डाक्टरकें बजा अनलक | डाक्टर उपचारमे लगि गेला | भोरबामेमिहिरक जनम भेल er बटेसर बजबो करथि आ आँगनो दिस देखि-देखि साकांचो रहथि। तखने मलिकाइन डेढ़ियापर आबि टोकलकनि- “गपक खण्ड नै लागल? अखनि तक फदकिते छी | कोनो फिकिरो अछि की नै से नइ जान्हि।” “की हालत Os कनियाँक? बाजू ने डाक्टर मंगाबी आकि होसपिटल चलबाक अरियौन करी ।” “हम की बाजब | हम सभ तैं मौगी-मेहरि छी जेना जे नीक होइ से करू, अनेरे अनठाएब ठीक नै ।” कहैत मलिकाइन आँगन गेली | “चलितर, कनी जा झट दे राजिन्दरकें बजा लाबह | कहियनुमालिक बजौलनि, संगे लागल औता।” चलितरकें कहि बटेसर आँगनक सुढ़िपता Gale हवाइ चप्पल सोझराबए लगला । चप्पल पहिरिते छला आकि आँगनसँँ कुहरब आ फ्ल्हनिक बाजब संगे बुझि पड़लनि, अकानए लगला | तखने फ्लहनि बाजलि- “हमर शक जेते छल ओ केलौं, आब असपतालक आश करू, आ घरोक गोसाँइ-पितरक अरदास लगाउ।” “डीहवार बाबा की जाय! हे कलिया महरानी ओझरी छोड़ाउ । जोड़ा UR छागरोक बलि चढ़ाएब |” मलिकाइन मने-मन जेते देवता जेहेन सहजोर स्मृतिक हिसावे कबुला करैत बजली। ताबए च॑लितर संग लागल राजिन्दर हथबत्ती बाड़ैत पहुँचल | “TSH HHT, बड़का काका | की बात बाजू?” “राजिन्दर... । मिहिर गाम नै एला लगैए कोनो अपनासँ te हाकिमक अढ़ौतीमे बाझल Ga | नोकरी तैँ नोकरीए छी किने । 'परअधिन सपनो सुख नाहीं तुलसीदास कोनो बेजा थोड़े कहने छथिन ।” “कनियाँके मास पुरल GS A अखन ae हाल बेहाल SS | बजौलिय5 की करक चाही, डाक्टर बजाबी आकि होसपिटल चल?” “काका, UE पहिले चारिचक्का बोलेरो गाममे गामेमे सोमन भाइकें चन्हि बजा लड़ छी, होसपिटले गेनाइ नीक रहत | ओइठाम सभ इन्तजामो-बात आ परसौतीले टको-पैसा भेटत |” राजिन्दर बजबो करए आ फौनो मिलबए | लगैए फौनमिल गेलै बाजल- 9
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) हि मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA “हैं! कनी फुर्तीमि ।” फोन काटि HS पुन: बाजल- “काका, चीस-वौस दरबज्जापर आनैक SERA करू |” मालिक-बटेसर लगले सूरे बजला- “गामवाली आब फुरती करू, ओछाशन-बिछौन, ओढ़ना, खेबाखर्चा, सिदहा-समर सभ fee ठेकना लिअ। गाड़ी आबि गेल ।” बटेसर घरवाली दिस बजथि at मलिकाइन बटेसरक दिस चाहक जिज्ञासा केलखिन | Yel बटेसर मना करैत बजला- “नै। आब जे किछु करब से अन्धरेमे करब |” एमहर राजिन्दर ott चलितर चीज-वौसकें सम्हारि-सम्हारि आँगनसैँ आनि-आनि दरबज्जापर रखैत WTI गाड़ीओ आबि गेल | सभ समान ड्क्िकीमे लदलक | ताबे पल््हनि आ पड़ोसिनी सभ कनियाँकेँ ate सीटपर आनि सुतौलनि | Rat सेहो अपन Taras गाड़ी खोलकक | सिटी बजा सभकें तैयार हेबाक अप्रह केलक | मौगी-मरद, ढेरबा- धिया-पुताक भीड़ दू दिस भेल। बीचसैं गाड़ी निकलैत रहै कि अगिला ded stax मुड़ी Prater इशारासँ afer fee कहलखिन | चलितरो बसाहा जकाँ मुड़ी हिला मलिककें भरोस दैत बाजल- “जय दाहो-लछन बाबा, जय रकतमाला माए, जनिह॒ण्तूँ मालिककें मदति करिहनु... ।” बोलेरो गर्दा उड़बैत अन्धराठाढ़ीक असपतालक डगर पकड़लक | बेलेरोक छोड़ल धुआँ आ Te मिलल Try घिया-पुताक संग ढेरबोकें सोहनगर लगलै। बिहान भने अन्हरगरे साइकिल WET टनटनबैत दुआरे-दुआर अखबार Sea गामक चौकपर Uae | चाहो पीबैत आ चौक परहक दोकानदारकेँ अखबारों दैत अखबारबला | एकटा अखबार लड प्रमोद मधुबनीबला Ua उनटौलक | “प्रखण्ड विकास पदाधिकारी मिहिर कुमार गिरफ्तार ।” कनी ऊँचे स्वरमे पढ़लक | ई खबर पढ़ि एकबेर अपन चकित आँखिए दोकानपर saa ay दिस तकैत बाजल। चाह पीनिहार सबहक जिज्ञासा बढ़ल | सबहक नजरि प्रमोदक चेहराक बनैत-बिगड़ैत आकृति जकाँ बनए- बिगड़ए wet | चाहबला श्रीप्रसादक faa अखनि at aka अखबारक walt दिस नै रहनि। ओ तैं सदिखन एतबे रामाखटोलबा देखैत अपन जिनगी काटए। गहिंकीओ रंग-बिरंगक अछि | के केमहर जाएत चाह पीब-पीब तेकर कोनो ठीक नै ae तड़परधियान देने | मुदा तैयो ठेकनबैतश्रीप्रसाद पुछलक- “की Tet परमोद? कनी बुझा क$कहू | UAT किए अखबार Fea सभ गुम ws गेलौं । “श्रीप्रसाद भाय, बटेसर बाबूक बेटा मिहिर पकड़ा गेला ।” “आहिरेबा! हौ प्रमोद, मालिकक दिने गड़बड़ाएल oe एमहर Ue ल5 दुनू परानी होसपिटलमे छथि an ओमहर बेटा जहल गेलनि । गोसार:#या सभटा पेड़ीए-पर-फेड़ी as OPE I” नमहर साँस छोड़ैत श्रीप्रसाद बाजल । बिच्चेमे एकगोरे टिपलक- 0
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली widen ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA “जमानाक खियाल नै करब तैँ अहिना ने हएत | आब कि कोनो ओ जमाना रहल कंगर्रेशयाक आब तैं बदलल |” | ‘ राजेन्द्र कुमार प्रधान जन्म- 03/09/7970 पिता स्व. बैद्यनाथ प्रधान गाम- मरूकिया, पोस्ट अन्धड़ाठाढ़ी, जिला-मधुबनी | पिन- 84740 योग्यता- एम.ए. पटना विश्वविद्यालय, पटना शोधरत्त (पीएच.डी) ल.नामि.वि.वि. दरभंगा, अन्य योग्यता- संगीत गायणमे जेड.एल.कम्युनिकेशन द्वारा आयोजित ऑल बिहार फिल्म संगीत प्रतियोगितामे प्रथम स्थान प्राप्त । २१्म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना- राजेन्द्र कुमार प्रधान उपरोक्त शीर्षक 279 शताब्दीक पहिल दशकक उपन्यासमे राजनीतिक चेतना- era? सामाजिक उपन्यासमे प्रस्तुत विषय-वस्तुक हएब प्राय: स्वभाविक अछि | उपन्यास एक एहन विधा थिक tea सम्पूर्ण जिनगीक वर्णन रहैत Sen | जिनगीक एकटा अहम अंग राजनीति होइछ | wifes उपन्यासमे मोड़ आनल जाइत अ3छि आ दिशाकें बदलि दैत छैक | व्यक्ति भलहिः व्यक्तिगत स्थितिकें द्योतक gare Yar जिनगी एकटा एहन किशाल परिक्षेत्रक नाओं थिक जे समाजक बीच पसरि जाइत अछि। मनुख जखने समाजसैं जुड़त तँ ओइमे राजनीति स्वत: एक अंग बनि जाएब स्वभाविक अछि। पहिल दशकमे प्रकाशित उपन्यास Ff बहुतो Ut Far हम जेतबा पढ़िवा देखि सकल छी मात्र तेकरे वर्णन UD: आलेखमे HS रहलौं अछि | जगदीश प्रसाद मण्डल- जीक उपन्यासकेँ मैथिली साहित्यमे सार्थक राजनैतिक चेतना जगेबाक प्रारम्मक रूपमे देखि सके छी, मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे राजनीतिक चेतना ओत-प्रोत अछि । जाहिमे ग्रामीण जीवनमे पसरल समस्याक यर्थाथ चित्रण केलनि अछि | प्रस्तुत उपन्यासमे सुबुध नामक एकटा uA जे शिक्षक छथि att
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA अध्यापन BAA लागल रहैत GENS | गामसमाजक चिन्तासँँ मुक्त छलाह | जखन रमाकान्त बाबू मद्राससै घुरि अपन WA एलाह आ हुनकामे ई चेतना भेलनि जे अनेरे जमीन हम किअए रखने GH तखन अपन 2 सए बीघा जमीन समुच्चा ग्रामीणमे are समाजकेँ परिवार रूपमे देखए केर नजरिक पता शिखक सुबुधकेँ लगलनि तखन हुनकामे सेहो चेतना एलनिआ अपन नौकरीसैँ तियाग पत्र द* पुन: आपस आबि जाइ छथि। गाम-समाजक बीच ऐबाक लक्षण एकटा राजनीतिक चेतनाक अपूर्व कृतिमान उपस्थित करैत अछि | तहिना जिनगीक जीत उपन्यामे समाज दशा-दिशाक यर्थाथ चित्रण करैत अर्थनीति केर मूल रहस्यकें उद्घाटित करबाक जे प्रयास मंडलजी केलनि अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि | जगदीश प्रसाद मंडलक अगिला उपन्यास उत्थान- पतन Ue उपन्यासक माध्यमे सामंती सोचकबला समाज आ समजिक सोचक समाज बीच आधुन्क्ि वैज्ञानिक समन्वयवादी सोचक यर्थीथ चित्रण तेहन मार्मिक आ इमानदारीसैँ मंडलजी केलनि अछि जे एक तेहन राजनीतिक चेतनाक संवाहक TAT जे प्रत्येक मनुखकें उत्थान आ पतनक मार्ग दर्शन रूपमे सिद्ध करैत अछि । “जीबन-मरन' उपन्यासक लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जी छथि- एहि उपन्यासक मूल पात्र छथि रघुनंदन | रघुनंदनक मृत्यु जड़ दिन भेलनि ओही Raa उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि | मिथिलाक समस्यामे बाढ़ि, रौदी आदि प्राकृतक समस्या केर अलाबे आर बहुत रास समस्या SH जे मानव द्वारा अक्तियार क' समाजकें जकरने छैक | प्रस्तुत विषय केर चित्रण ताहि et मंडलजी अपन जीबन-मरन उपन्यासमे केलनि अछि जे एक खास राजनीतिक चेतनाक जन्म दैत अछि | fete अगिला उपन्यास अछि “जीवन-संघर्ष' अध्यात्मक मूल उद्देश्य थिक मानव-मानवक बीच अगाध प्रेमक जन्म देनाइ Sige सभ कियो सहमत छी । प्रस्तुत उपन्यास जीवन-संघर्ष केर माध्यमसै मंडलजी सम्प्रदाय आ धर्म कोना व्यक्तिसँ समाज धरिकें तोड़ैए आ कोना लोक अपनाकेँ महामानवक वाटपर चले सकैए ताहि परिपेक्ष्यमे चित्रण भेल अछि at एक अद्भुत राजनीतिक चेतनाक द्योतक अछि। निष्कर्षत: ऐ सभ उपन्यासमे जीवन आ राजनैतिक चेतना समाहित अछि | लोकक कार्यक प्रति मण्डल जीक विश्वास जिनगीक प्रति विश्वास बिनु राजनैतिक चेतनाक सभव नै। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास रजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथाल-पुथलक गबाह अछि, & हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रतासँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यम राजनैतिक चेतना पसारबाकअद्भुत सफल प्रयास अछि, Fuente बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति Tae दिल्ली धरि पसरल अछि | राजदेव मण्डल जीक “हमर cher धारावाहिक रूपेँ विदेहमे ई-प्रकाशित ws रहल अछि on ई मैथिलीक avs बेसी पठित उपन्यासक रूपमे उभरि रहल अछि | ओना तैँ ई उपन्यास अखन छपिये रहल अछि Yar घृणा आ प्रेम SS Bera राजनैतिक घटनक्रमक लेखक द्वारा जे प्रस्तुतीकरण Us रहल अछि से अतुलनीय अछि | केदारनाथ चौधरी- जीक चमेलीरानी आ एकर सेक्केल माहुर वर्तमान राजनैतिक स्थितिक सुन्दर प्रस्तुतिकरण अछि an अपराधीक राजनीतिमे प्रवेशक सुन्दर विवरण अछि, जतए पाठक चमेलीरानीसँ प्रेम करए लगैए आ ओकर अपराधकेँ स्वीकृति करबा लेल विवश AS जाइए | आशा मिश्रक- उचाट आ अशोक कुमार ठाकुरक निशांत आ वसुधाक संसार सेहो ठाम-ठीम एकर विवरण करैत अछि। श्याम चन्द्रक "रूपा दीदी" लेखकक कलाक प्रति उदासीनतासैँ ओतेक Pert प्रभाव उत्पन्न नै करैए Yar विषय- वस्तुक दृष्टिए ई राजनैतिक चेतनाकेँ आधार लघलिखल गेल अछि। 2
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़ि आ राहतक राजनीतिक डोक्यूमेन्ट्री फिक्शन अछि । अनिलचन्द्र ठाकुरक “आब मानि जाउ” उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि | असंरख्य गामक ई कथा कुलीनताक अधःपतनक कथा,संस्कार विहीनताक उद्घाटन an भविष्यक पीढ़ीकें बचएबाक चुतौनी छी | वीणा ठाकुरक “aed? उपन्यासमे सेहो राजनीतिक्र चेतना झलकैत अछि | रिसर्च स्कॉलर, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय- दर भंगा | जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतना राजेन्द्र कुमार प्रधान शोध wa, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, दरभंगा मैथिली साहित्यक पहिल तथा एकमात्र पुरस्कार “टैगौर साहित्य पुरस्कार”सैं पुरस्कृत एवं विदेह भाषा ware सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डल अपना सबहक बीच एक ओहन साह्यिकार छथि, जिनकर किछुए दिनमे बहुत रास रचना मैथिली साहित्याकाशमे अपन स्थान बना लेलक अछि | प्राय: २००४ इस्वीक बाद लिखब शुरू केलनि आ प्रकाशित हुअ लगलनि २००७ इस्वीक पछातिसँँ | २००९ इस्वीमे आठ गोट पोथी प्रकाशित भेलनि । यथा- गामक जिनगी- कथा संग्रह, तरेगन- विहनि कथा संग्रह, मिथिलाक बेटी- नाटक तथा पाँच गोट उफ्यास यथा- मौलाइल गाछक फूल, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत, जीवन-मरण ant जीवनसंघर्ष। पछाति २०१२-सैं-२०१४ इसवीक मध्य विभिन्न विधाक दू दर्जनसै ऊपर पोथी प्रकाशमे एलनि | यथा- अद्धाँगिनी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, शंभुदास आ बजन्ता-बुझन्ता, कथा संग्रह । सतमाए, कल्याणी, समझौता, तामक तमचैल, बीरांगना, कम्प्रोमाइज, झमेलिया बिआह, रल्लाकर डकैत तथा स्वयेवर- नाटक एवं एकांकी | इंद्रधनुषी अकास, राति-दिन, सतबेध, गीतांजलि, तीन sto एगारहम माघ, सरिता आ सुखाएल पोखरिक sige गीत एवं कविता tae | तहिना, सधबा-विधवा, भादवक आठ अन्हार, नै UST तथा बड़की बहिन नामक उपन्यास सेहो लिखिलनि अछि | आ अनवरतलिखिओ tea छथि। हमरा एतए मण्डलजी केर “साहित्यमे समकालीन बोध” विषयक आलेख प्रस्तुत करब अछि । एहि प्रसंग हम ई छूट लेमए चाहै BS श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक तँँ अनेक उपन्यास os, कथा wie, नाटक ole, 3
वि दे ह विदेह Videha कन्तिर www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA कविता छन्हि, गीत OFS... । मुदा हम ‘echt बहिन” उपन्यासपर केन्द्रित एहि आलेखक इतिश्री करब | अर्थात् “जगदीश प्रसाद मण्डलक बड़की बहिन उपन्यासमे समकालीन ATA A ई आलेख अपने सबहक सोझाप्रस्तुत HU रहल छी | समकालीन शब्दक बेस व्यापक अर्थ-परिधि अछि । wis शब्दक प्रयोग प्राय: तात्कालिक वर्तमान लेल कएल जाइत अछि | एक तरहक निश्चित समए-खण्डक लेल सेहो कएल जाइत अछि । से बितलोहो आ चलितो परिपेक्ष्यमे । बितलाहासँ तात्पर्य ई जे विद्यापतिक समकालीन फ्ल्लॉ...। आ एकटा भेल आइ AA sitet वर्तमान । औजको-वर्तमानमे सभ चीज लेल एक्के नजरिसँ समकालीक निर्णए करब कठिनाहे जकाँ अछि | बहुत Ved व्यवहार अछि जे ज्योतिरीश्वरकालीन मिथिलामे व्याप्त छल जे आइयो यथावते अछि, खाली परिपेक्ष्यमे फेर-बदल भेल अछि । खैर जे से... | नारी-समस्यापर, नारी विमर्श करैत एक ओहन उपन्यासक नाओं बड़की बहिन छी जे हमरा सभकेँ एकर कथा वस्तु चौंका दइए, आत्म मण्थन हेतु विवश क$ दइए, संगे ओहन चेतनामुलक अछि जे कोनो काज करैसैं पूर्व आकि कोनो काजक लेल डेग seas पहिने ओइ काजक दिशापर सोचैलेप्रेरित करैए | कारण एहि भाग: दौड़क आपा-धापीमे हम सभ बहुत ओहन परिपेक्ष्यकें बुझिओ ने oa Gt जे एकर काल्हि की हेतै... | हलाँकी aS पाछू कएटा ओहन बिन्दु अछि ae eas हम सभ मुँह घुमा लेने S| उपन्यासकार हमरा VA लेल fs एहने परिपेक्ष्यकें बड़की बहिन उपन्यासक मध्यम सुलोचना बहिनक जिनगीक कथा परोसलनि अछि, जे समकालीक अछि, यथार्थ अछि आ समकालीन THATS एवं TTS ओतप्रोत् अछि । मिथधिलाक एकटा ओहन गाम जे कोसी आ कमलाक बीचक ae, जड़ गामक सुलोचना बहिन Fa | माने at गाम सुलोचना बहिनक जन्मभूमि छियनि। dee बर्खक अवस्थामे सुलोचनाक बिआह भेलनि। जहिना पिताक साधारण किसान परिवार रहनि तेहने परिवारमे बिआहो भेलनि। समाजमे अखन धरि धन नहि कुले-मूलक महत अधिक रहल मुदा लेनो-देन तँ चलिते छल | नीक-मूलक कन्याक मांगो बेसी । ओना अपन-फ्तक कुल- Ferd दब परिवारमे बिआह भेलनि, मुदा कोनो हिनके टा नै, समाजमे कतेको गोटेकें भेल छन्हि आ होइतो अछि। ag कोनो प्रश्ने नहि sort | सरस्वतीक आगमनसैँ नैहरक परिवारक विचारमे किछु नवीनता Ft आबिए गेल छल। बिआहक तीन साल vera सुलोचनाक दुरागमन Aa सासुर गेली। बरख-पाँचेछबेक पछाति ag सुलाचनाकेँ भगा देलकनि। भगबैक कारण रहै जे TAM नहि भेलनि। ओना ने कहियो डाक्टरी जाँच करौल गेलनि आ ने aa नहि हेबाक दोष fora छन्हि, से फड़िछौल गेल । ages भगौल सुलोचनाकें परिवार Bes अपना लेलनि। अपनबैक कारण भेल जे परिवारक सभ अपने गलती मानि लेलनि जे ओहन कुल-मूलमे ST नहि उठबैक चाही | ओहनसैं मुहाँ लगाएब नीक नहि हएत । सरस्वतीक रूप परिवारमे बदलल | संस्कृत पद्धतिक जगह नव-नव पद्धति शुरू भेल | संस्कृतोक पद्धति tet कएल। मुदा शिक्षाकेँ बुनियादी ugha उछालि देलक | सुलोचनाक पीठ परहक Go भाय जुगेसर मैक्कि पास तमुरिया स्कूलसैं केलनि। गरीबी-बेकारीसँँ त्रस्त परिवार | पछाति जुगेसर टीचर्स ट्रेनिंग केलनि। लोअर प्राइमरीक शिक्षक ater | तहिना TER Ble मुनेसर सेहो मैक्कि पास तमुरिया स्कूल केलनि । आगू पढ़ैक गर लगबए लगला, खगड़ियाक गर लगलनि। ओइ ठामक संस्कृत विद्यालयमे विद्यार्थीकँ भोजन-डेराक व्यवस्था सेहो HAT | कोसी कौलेज सेहो Ose | साइंसक किद्यार्थी मुनेसर, नीक wet बीएस-सी केलनि तैबीच fers अफसरक 4.
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA परिवारमे us गेलनि। दुरागमनक किछुए-दिन पछाति मुनेसरक पत्नी साधना नैहर एली। अखन ef पिता- श्यामानन्द बेटी-जमाएक घर-दुआर नहि देखने | बीएस-सी लड़का, Ws स्वस्थ सुनि बेटीक बिआह केलनि। Ae आपसीक पछाति साधना जखन सासुरक सभ हाल ATs कहलनि तखन पिताक मनमे जमाएक नोकरीक प्रश्न उठलनि। मुनेसरकें राँचीए बजा लेलनि। आ संगी-साथीक सहयोग as मुनेसरकें स्कूलमे नौकरी धरा देलखिन | मुनेसरो नोकरी करए लगला | सम बितैत गेल । जुगेसर आठ कट्टा जमीन कीनैक विचार केलनि। ओना दुनू परानीक किचार जे मुनेसरकें एहि जमीनमे संग नहि करब | मुदा परिवारक तैँ विधिवत् बैटबारा भेल नहि छेलनि ।तखन Go भाय छिऐ, ste भाएक हिस्सा तैँ भइए जाएत | aU Hes जरूरी अछि | जैं अदहा खर्च देत तैँ ठीके छै ale तँ अपन दोख a Aer लेब | क्विरक Ue पेटमे रहनि जे मुनेसरक आमदनी ततबे छै जे ae Hs परिवार चलै छै। तखन रूपैआ केतए S आनत? तैबीच मनमे ईहो हॉन्हि जे गुप-चुप दाम भेल अछि किने, बढ़ा देबै। HET (अधिया दाम भेने) चारि wer तेफैसला (तीन फसिला) खेतक भैलू कम नहि भेल । पोस्ट कार्डक माध्यम जुगेसर मुनेसरकें जनतब देलखिन | स्कूलक दरमाहा तैँ GPa बूझल, मुदा ट्यूशनक आमदनी a नहि बूझल | तैसंग प्लीओ (मुनेसरक) किवार देलखिन जे नैहरमे देल बरतन-बासन जे अछि ait अनेरे घरमे ढनमनाइत रहैए, ओकरा बेचि Hs जमीन कीनि लिअ। अखन aft दुनू aig -जुगेसर-मुनेसरक- बीच पहिनुके सम्बन्ध जीवित छल । मुनेसर अदहा खर्च दइले तैयार भड Tet अपन कमजोर पाशा देंखि जुगेसर दुनू परानी fare केलनि जे नीक हएत बेटा नाओंसैँ जमीन लिखौल जाए। मुनेसरकेँ कोनो पता नहि। अनुकूल fears बूझि जुगेसर अपना बेटाक नाओंसैँ आठो क्ट्टा जमीन लिखा लेलनि। जे पछाति दुनू भाँडक बीच विस्फोटक As गेल | गामक समस्या (भाइक व्यवहार) दुनू परानी मुनेसरक सम्बन्धमे खाधि बनैत गेल । दुनू Vise भिनौजी सुलोचनाकें सेहो बाँटिदिलकनि | Yel झगड़ाक बीआ पहिने सुलोचना बहिन रोपि लेलनि। रोपि ई Aah जे खेत कीनला पछाति मुनेसर दिससैं बाजि देलखिन जे जखन दुनू भाँड अदहा-अदहा खर्च Es खेत कीनलक तखन हिस्सा किए ने हेतै? अपना We बेचारी एक भाँइसैं दूर आ दोसरसँँ लग et एली! दुनू भाँइ-जुगेसर-मुनेसरक fare समाजक मंचपर सेहो आएल | जुगेसरक जे बेटा मरिमे केस केलनि ait चटना कर्ताक संग समाजोक लोककें भैंसा देलनि। केसकें ओइ गतिए बढ़ौलनि जे घटनाक परात भने a थाना गाममे आबि गेल | eet गाममे 4s गेल । दौड़ा-दौड़ी खेहारा-खेहारी जमि Hs भेल । दू गोटे जहलो गेल | लगले बाँकी मुद्दालहक जब्ती-कुर्की भ$ गेल । जकर प्रतिक्रिया समाजमे जमि Hs भेल । आगू चलि मुनेसर बेमार US Te | छह मास आराम करैले SET सलाह देलकनि। जीवन-मुत्युक बीच Use मुनेसरक मन छँहोछित Hs गेलनि। एक दिस अपन अगिला जिनगी हरिअर बूझि पड़नि, अपन कमाइक संग दुनू बेटाक कमाइ देखि a दोसर दिस अपन स्थिति Sala जे अपन सेवा केना हएत? पत्नीओ पत्नीए छथि। अकास उड़ैत FAS जकाँ। कमा Hs हाथमे दिधिनु, हुकुम पुरबियनु a बड़बढ़ियाँ नहि तँ अपनाकेँ कपरजरूआक पत्नी कहि डाकनि देती । अपन शेष नोकरी आ Barre आशा पत्नीकेँ Sala, तँँ बेटाकँ कमासुत बूझि संतोष Shs, मुदा बड़की बहिनक की हएत? Faris ade भाइए ने भाए रहलनि आ ने arse पतिए ने पति रहलनि! चघरपर ओते सम्पति नै, AEA जैं बेचैेओक अधिकार रहितनि तैँ fee बेसीओ दिनक आशा होइतनि, सेहो नहि। 5
वि दे ह विदेह Videha कन्तिर www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA समए रौदियाहे अछि | अपने ओछाइन AA GB, पाइक कोनो आमदनी नहि | Aer मांगिकेना सकै छी, ओकरो ई बात (बहिनक खर्च) बूझल नहि कै dae जैं Ta an ait माएकें Hea ct जेहो few दिन जीवैक आशा अछि सेहो चलि जाएत। आइने-अवगरानिसँ लोक TSCA खाइए। अपन fee अपने मनमे दाबि मुनेसर बहिनकें बिसरि देलनि । महिना-दू महिना & सुलोचना आशा धेने रहली Yar पेटक आगितेँ ओहन आगि होड़ छै जेकरा मिझबैले लोक आचार-विचार कुल-खनदान सभ बिसरि जाइए | ततबे नै, सुलोचना ओहन परिवारमे जनम नेने of as परिवारक औरतकें भूमि छेदनसैं बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम A केना सकै छथि। अपन ओहन वाड़ी-झाड़ी खेत नहि जे अपनो जोकर सागो उपजा सके छि। बाधक खेत | बेवस सुलोचना गाममे टुटली मरैआमे बैस गाबए लगली- “हे भोलादानी कहा हरब दुख मोर P चारू दिसक अपन बन्न Tem देखि सुलोचना बहिन चारूकात तकली तैँ एकटा घर लगमे बूझि पड़लनि। ओ घर अपन दीदी-पीसाक | TS सटले करीब कोस भरिपर दीदीक घर । बेर पहरमे सुलोचना बहिन दीदी गामक a पकड़लनि... | सुलोचनाक पिसियौत भाए, हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि । प्रतिष्ठित शिक्षक । जिनगीमे डेरापर कह्तयो कोनो विद्यार्थकिं ट्यूशन फीस नहि लनि i मास्सैबक परियाससैं सुलोचना बहिन सासुर गेली । दोहरा ws साठिबर्खक उमेरक पछाति जहिना जिनगी हारल-थाकल cafe अपन जिनगी पाँच कौर आन्न आ पाँच हाथ वस्त्रपर अँटका लेलनि... | उपरोक्त कथा-वस्तु Ta: यर्थाथक परिचए अपनामे समेटने अछि | औझका पढ़ाइ-लिखाइक मात्र एक लक्ष्य नोकरी करब अछि | परिवारक अर्थ सिकुड़ि रहल अछि | समाजक बीच रंगःरंगक कलह केर भावना बढ़ि रहल अछि। भाए-भैयारीमे प्रेमक भावना कमि रहल अछि। पूजीवादी विचार मनुखमे एहि तरहेँ अपन जगह बना रहल अछि जे बैमानी भावना एते प्रबल भेल जा रहल अछि जे समाजक बात तैँ दूर जे भैयारीओमे बैमानी FE as गेल अछि | ae परिवारक औरतकें भूमि Sars बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि कोना सके छथि। अपना ऐठाम sisal विधवा बिआहक सामजिक मान्यता सभ समाजमे नहि देल गेल अछि। जकर जरूरत सजहे उपरोक्त कथा-वस्तुमे उपन्यासक माध्यमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल सुलोचना नामक TA अवतारणा HS VAR केलनि अछि | जखन कि एहन मात्र सुलोचने बहिनटा नहि अपितु sect बहिन SH... । Vast उपन्यासमे समकालीन चेतना Fee पन्नन समस्त चरित्र-चित्रणसैँ Gs अन्त आएल अछि। निर्मलीक गीत :: बीणा प्रसाद गर्व करू “निर्मली'पर ई मिथिलाक शान | जतए हरि शाह महाविद्यालय Ue क्षेत्र पहचान । । 6
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly cjournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ म अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक _ es मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA बीचो-बीच Cees जाइत राज मार्ग महान । “निर्मली'क निर्मलतासँ आब कियो नहि अनजान । । जेकरा हृदयमे बास करैत अछि मानवताक केर ज्ञान । Sar आँगनमे safe हिन्दू संग मुसलमान । । हिलमिल देखबैत अखण्ड एकताक अभियान | सिनेहमयी आँचरसँ झँपने कोसी, भुतही आर बलान । । खेते-खेत उपजैत अछि मुंग, ASA आ धान | गहुम, Gad, दलहन तेलहन खुब Hse अछि आम । । वाड़ी-झाड़ी भेटत पान पोखरिमे माछ-मखान | भोजन वस्त्रक gle रहितो करथि अतिथि सम्मान । । पशु-पक्षी संग पाएब घरे-घर जेतए विद्वान । भारतीक पोसल सुगा करथि श्लोकक गान । । एतै भेला आयाची लेलनि ने कहियो दान भोर-साँझ होइत अछि Say लोक गाथा केर गान । । सम्पर्क- शोधप्रज्ञ, ल.ना.मि.वि. विद्यालय, दरभंगा । ग्राम+पोस्ट- रखवारी जिला- मधुबनी, ८४७४११ मो. ८८७७५८५९५८ समकालीन चेतनाक सम्बाहक :: अरद्धाँगिनी पंकज कुमार प्रभाकर शोध छात्र, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, कामेश्वरनगर- दरभंगा | जीवनमे होइत नित्य नूतन परिवर््तनक खण्ड चित्रकेँ यथावत् प्रस्तुत करब श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन एक फराक शैली छन्हिं। मण्डलजी वहुआयामी रचनाकार छथि। गद्य हो आकि पद्य विभिन्न विधामे जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन स्थान सुरक्षित HS लेने SA विभिन्न विद्वानक मत सेहो ऐ सन्दर्भभे आएल 7
वि दे ह विदेह Videha कन्तिर www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ate | अद्धांगिनी कथा संग्रहक आमुखकार डॉ. योगानन्द झा लिखलनि अछि- “युगीन समस्या ओ समस्याक कारण एवं तेकर समाधानक प्रति चिन्तनशीलता हिनक वस्तु-विन्यासकें प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि अछि जमे परम्परित कथाधाराक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी हष्टिकोण स्पष्ट रूपेँ प्रस्फुटित देखि use| मिथिलाक लोकजीवनक उत्थानक प्रति सम्बेदनात्मक अभिव्यक्ति कौशलक कारणे मण्डलजीक कथा सभ हिनका आधुनिक कथाकार लोकनिक अग्रिम पंक्तिमे ote Hs देलकनि अछि ।” मण्डलजीक कथा सभ मिथिलाक माटि-पानिक कथा ot हिनक कथा सभमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आशा-निराशा, सुख-दुःख, हर्ष-उल्लास आ जीवन-संघर्षक व्याख्या भेटैत अछि | मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक att राजनीतिक जीवनमे होइत परिवर्त्तन सभकें सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा ई अपन कथा wah प्रवाहमयता, रोचकता ait किश्वसनीयताक संग प्रस्तुत करबामे सिद्धहस्त कलाकारक रूपमे प्रतिष्ठित GT | दर्जन aft उपन्यास, astra बेसी कथा संग्रह, करीब दर्जन भरि नाटको तथा cere (गीत, काव्य) पोथी सेहो आधा WHT ऊपर प्रकाशमे आबि चुकल अछि, संगे-संग आलोचनात्मक आलेख Set पत्रिकादिमे पढ़बाक अवसरि भेटल अछि यथा- अवतारवाद, सगर राति दीप जरय ::एकटा यात्रा, मिथिलाक लोक बेवहार गीत एवं संस्कार गीत, उपन्यासमे ग्रामीण चित्रण, कामरूप आ मिथिला इत्यादि। as संग कएक गोट सक्षात्कार सेहो हिनकर आएल अछि। ओना तैँ हिनक विभिन्न कथा संग्रह अछि जेना, गामक जिनगी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी we, crores, गामक शकल-सूरत, बजन्ता-बुझन्ता, तरेगन, शंभुदास तथा agit मुदा अखन हम gift कथा संग्रहमे संग्रहित कथा सबहक अध्ययन ws समकालीन Shes ऐ आलेखमे निहपण करब | ‘git? कथा संग्रहमे बीस गोट कथाक समावेश कएल गेल se | जइमे संग्रहक पहिल कथाक नाओं- “दोहरी मारि' छी । दोहरी मारि कथा केर पुरुख पात्र गुलाब छथि | गुलाबक मनोकैज्ञानिक विश्लेषण भेल अछि। अवकाश प्राप्त प्रोफेसर गुलाब केतेको TES डाइबीटीज ओ ब्लड-प्रेसर सहश बिमारी ars ग्रस्त छथि | गामक घर-घराड़ी पर्यन्त बेचि शहरमे बनौल मकानमे पत्पपत्ली एकाकी रहै छथि | बेटा-पुतोहु परदेशमे रहै OS IT हिनकालोकनिक सुधि लेनिहार frat नै छन्हिं । eat तखनि as जाइत अछि जखनि पुत्र द्वारा ई समाद भेटै छन्ति जे पौत्रक मूड़न घरपर नै भ5 Hs Soil देवीमे हेतनि, Sts लेल हुनकोलोकनिकें ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटै छन्हि आ ओ अपनाकें अशक्य बूझे छथि। दोसर कथा- Sat iter Sel अवकाशप्राप्त प्रोफेसरेक कथा अछि | प्रोफेसर साहैब बेटाकें पढ़ा-लिखा ws विदेश पठयबामे सफल तैँ होइ SA मुदा बेटा विदेशी सभ्यता at संस्कृतिक रंगमे fA जाइ छन्हि आ हिनकालोकनिक खोजो-पुछारि नै as us oe | परिणामत: दुनू परानी एकाकी जीवन बितेबाक हेतु बाध्य Sts छथि। ] पृष्ठ संखूया- ७ एवं cat 8
वि दे ह विदेह Videha कन्तिर www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA तेसर कथाक नाओं- *नवान' St ऐ कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विंभिन्न खण्डचित्र उपस्थित कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल ws देवताकें चढ़ाएब, गाए बिआएलापर महादेवकें Gua अभिषेक करब आदिएऐ कथाक विषय-वस्तु अछि | aka कथा- “तिलासंक्रान्तिक oe पर faa गेल af) ऐ कथामे mae जिनगीमे पसरल अन्धविश्वासपर प्रहार HUT गेल अछि। पाँचम कथा- Wise सिनेह' भाए-भैयारीक आपसी कलहपरकेन्द्रित एक प्रकारक प्रेमक कथा छी | छठम कथा- THY वस्तुत: प्रेमकथाक रूपमे लिखल गेल अछि। मुदा ऐ कथामे रचनाकारक उद्देश्य समाजिक जीवनमे व्याप्त दहेज प्रथाक कुरीतिकेँ समाप्त करबाक संदेश अभिव्यक्त भेल SHS | संग्रहक सातम कथा- “*बपौती सम्पति' कृषक जीवनमे जातीय बेवसायक Hea अवधारणापर आधारित अछि। सम्प्रति कृषक-मजदूरक पलायनसँँ जे गामक अर्थबेवस्था चरमरा गेल अछि तेकरा सुधारबाक हेतु ऐ कथामे चिन्तनक एकटा दिशा भेटैत अछि | आठम कथा- “डंका'लोकजीवनक अवमूल्यनकें रेखांकित करैत अछि | नवम कथा- ety शिक्षा जगतमे Aa अद्य:पतनक कथा छी wea स्कूल-कौलेजमे शिक्षाक बेवसायीकरणक फलस्वरूप सामान्य Se छीनल जाइत शिक्षाक समस्यापर विमर्श भेल अछि । wen केन्द्रिय कथा “अद्धांगिनी”मे ऐ अवकाशप्राप्त शिक्षकक अत्यन्त सूक्ष्म मनोविश्लेषण भेल अछि। अपन कमाइक बलें ओ आजीवन अपन VA दासीसैं आगू बुझबाक हेतु तैयार नै होड़ GHA Yar जखन नोकरी समाप्त US जाइ छन्हि तन Udi आवयकतापर fla wis छन्हि आ अद्धांगिनीक महत बूझि पते छथि। लेखक नारीक सेविका स्वरूपकें मर्यादित Hs ओकरा पुरुखक समानान्तर मूल्य प्रदान करैक पक्षपाती छथि, जेकर अभिव्यक्ति ऐ कथाक लक्ष्य रूपमे प्रदर्शित होइत अछि । अतिरिक्त आरो कथा सभ अछि जेना- “ठकहरबा”, “अतहतह”, “ऑपरेशन”, “धर्मनाथ”, “सरोजनी”, “quer, “सोनमाकाका”, “दोती बिभाह”, “पड़ाइन” तथा अन्तिम कथा “केतौ नै” । कथा सबहक विषयमे आमुखकार अपन विचारव्यक्त केने छथि- “मण्डलजी कथाक भाषामे मैथिलीक गमैया बोली-वाणीक सहज स्वरूप अभिव्यक्त भेल अछि । ई पात्रानुरूप भाषाक प्रयोग केलनि अछि vss प्रत्येक पात्रक बौद्धिक ओ सामाजिक स्थिति स्पष्ट होइत चलि जाइत अछि | हिनक कथा सभमे कथाकारक भाषा सेहो मैथिलीक लोकजगतक wien अनुगमन करैत अछि जमे सहजता अछि | कनेको कृत्रिम प्रयोगसैँ ई Sat रहल छथि। हिनक भाषामे ge ओ देशज शब्दक प्रचुर प्रयोग भेल अछि | युग्म शब्दक प्रयोग हिनक भाषाकेँ लालित्य प्रदान करबामे आ ओकर प्रवाहमयतामे सहायक रहलनि अछि | उदाहरणक हेतु माल-जाल, लेब-देब, दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी, ताड़ी-दारू, छहर-महर, चोरी-डकैती, बाल-बोध, बेटापुतोहु, भोज-काज, अन्हर- बिहाड़ि, दार-मदार, सुक-पाक, भूखलडुखल, चीज-बौस, घुसका-फुसका आकिक्रिं देबल जा सकैछ | मण्डलजी कथा भाषाक ई अन्यतम विशिष्टता छी जे ई कोनो स्थितिकें पाठकक समक्ष अभिव्यक्त करैक हेतु चमत्कारिक उपमानक प्रयोग करै छथि जइसैं वस्तुस्थितिक स्पष्ट चित्र पाठकक सोझाँ आबि जाइत अछि यथा- 9
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA “जहिना खढ़ाएल BAA हरबाहकें हर जोतब भरिगर बूझि पड़े छै तहिना सुशीलक मन समस्याक वोनाएल रूप देखलक | जहिना Tess निकलि अनवरत Tes चलि नदी समुद्रमे जा मिलैए तहिना ने टटघरक ज्ञान उड़ि क$ सर्वोच्च ज्ञानक समुद्रमे मिलत ।” आदि। Uda कहल जा सकैछ जे मडलजीक कथा वर्णनक दृष्टिएँ मिथिलाक ग्रामजीवनक यथार्थ्वादी चित्र, चघटनाक दृष्टिएँ आदर्शक प्रति अभिभूत, सूक्ष्म मनोविश्लेषणक प्रति प्रतिबद्ध तथा उदेसक दृष्टिएँ लोक मंगलकारी अछि ।”2 युग्म शब्दक प्रयोग कथाकारक विशेषता होइत sf संगे समकालीनताक द्योतक Set | कारणु भाषाक अनन्तकालिन यात्रामे शब्द अपन रूपमे परिवर्त्तन सेहो करैए | wg दिसि ऐ संग्रहक कथाकारक कलम चललनि अछि | जइपर दृष्टिपात केला पछाति समकालीन रचनाक हैं-निहूँस सेहो सहज US BHT | सत्य आकि यर्थाथ एक ओहन शब्दावलीक नाओं छी जेकर परिधिमे सहज स्वरूप, सामाजक खाँटी स्थिति, स्वत: स्फुट पात्रक चरित्र, सहिष्णुता, समकालीनता आदिक समावेश सवतःरहैत अछि | मिथिलामे रहएबला सभ स्तरक समाजक पात्र ऐ संग्रहक विभिन्न कथा सभमे आएल अछि। विभिन्न समस्यासँ ग्रसत AGE जे जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यक पात्र अछि, हिनका ay लग एकमात्र अवलम्ब बैचि ong छन्हि- जिजीविषा sit संघर्ष। यएह जिजीविषा ओ संघर्ष करबाक मानसिकता ऐ कथाक युग जीवनक अनुकूल संदेश दैत अछि । जे Oe: समकालीन अछि | ग्राम+पोस्ट- भपटियाही-कदमपुरा, भाया- नरहिया (मधुबनी) मोबाइल- 977772388 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नि मैथिली साहित्य आन्दोलन (८)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखका धीन आ Mes लेखकक नाम नै अछि ats संपादकाधीन | विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर | सह-सम्पादक: उमेश 2 पृषुठ संखूया- १८ एवं १९ 20
वि दे ह face Videha चमक www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' १७५ A अंक ०१ अप्रैल २०१५ (वर्ष ८ मास ८८ अंक १७५) me मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA मंडल | सहायक सम्पादक: राम विलास ATS, AS विलास राय, सन्दीप कुमार ATH आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण) | कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी | सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर | सम्पादक- सूचना- सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल | सम्पादक- अनुवाद विभाग-विनीत उत्पल | रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य wis) ggajendra@videha.com® मेल अटैचमेण्टक Sa .doc, .docx, .rtf वा .txtHlaea पठा सके छथि | रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो फेता, से आशा करै छी | रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकें देल जा रहल अछि | एत5 प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक संग्रहकर्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकें छै। ऐ ई पत्रिकाकें श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकें ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (८) 2004-5 सर्वाधिकार सुरक्षित | विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकत्ताक लगमे OFS | रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन far आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू | ऐ साइटकें प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल ।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवूत्तसैं प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका aft पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि | आब “भालसरिक गाछ” जालवूत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक््ताक संग मैथिली भाषाक जालवकूत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त Us रहल अछि | fate Surat ISSN 2229-547X VIDEHA N = | सिद्ध्रस्तु 2