VIDEHA — Issue 177 / अंक १७७

Publication: VIDEHA · Issue: 177
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2 43 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १७८ म अंक १५ मइ २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १७७ म अंक ०१ मई २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७७) ऐ अंकमे अछि:- राम वि‍लास साहु- किछु विहनि कथा/ तीनटा लघु कथा- गंगा नहाएब/ डोमक आगि/ स्वर्गक सुख राम वि‍लास साहु- किछु विहनि कथा मिथिलाक माटिमे पसरल कहबी- संकलनकर्ता- राम वि‍लास साहु राम वि‍लास साहु- टनका राम वि‍लास साहु- किछु विहनि कथा स्‍कूलक खि‍चड़ी एकटा अभि‍भावक तमसा कऽ स्‍कूल पहुँचला। हेड मास्‍टरकेँ उपराग दैत बजला- “पढ़ाइ-लि‍खाइ तँ जएह-सएह होइए। खाली खि‍चड़ीयेमे बेहाल रहै छी। जखनि‍ धि‍या-पुता पढ़बे नै करतै तखनि‍ तँ हाकि‍म-हुकुमक तँ बाते छोड़ू चपरासि‍यो नै बनतै। एसँ नीक तँ प्राइवेटे स्‍कूल ने जइमे दूटा पाइये ने लगै छै, पढ़ाइ तँ नीक होइ छै। आइ तक ऐ स्‍कूलक बच्‍चा पढ़ि‍ कऽ कोन नाम कमेलकै।” मास्‍टर सहाएब शान्‍त भावसँ अभि‍भावककेँ समझबैत बजला- “देखू, तमसाउ नै कोनो हम खि‍बै छी खि‍चरी। ई तँ सरकारक योजना छी। ऐ योजनासँ लाभो बहुत छै। नि‍च्‍चासँ ऊपर धरि‍ सभ माले-माल होइ छै।” अभि‍भावक बजला- “से केना?” मास्‍टर सहाएब कहलखि‍न- “सहीमे प्राइवेट स्‍कूलक बच्‍चा सभ पढ़ि‍-लि‍खि‍ हाकि‍म-हुकुम बनै छै। आ ईहो देखैत हेबै जे ओ सभ माए-बाप, गाम-समाजकेँ छोड़ि‍ एवं मातृभूमि‍केँ बि‍सरि‍ जाइए, बूझू बौर जाइए। से तँ ऐ स्‍कूलक बच्‍चामे नै हाेइए।” चोर-सि‍पाही माघ मास अन्‍हरि‍या राति‍। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चारि‍ कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सि‍पाही गस्‍तीमे आबि‍ रहल छल। चोर सि‍पाहीकेँ देखि‍ते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सि‍पाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपटि‍ कऽ पकड़लक सि‍पाही। पकड़ि‍ हाजति‍ लेने जाइ छल। चोरकेँ डंढ़ासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि‍ कऽ देखल जे सड़कसँ हटि‍ एकटा घूर रहै। आगि‍ देखि‍ते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बि‍ड़ी नेसने अबै छी?” सि‍पाही कने सोचि‍ कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जे तूँ भागि‍ जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।” इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि‍ तँ गामोक स्‍कूलमे बड़ सुवि‍धा भेटै छै आ पढ़ाइओ होइ छै तैयो वि‍द्याथी सभ शहरक स्‍कलमे कि‍ए पढ़ै छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्‍कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्‍कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक। कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्‍कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खि‍याबए। ई छि‍ऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक इस्‍कूलमे वि‍द्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि‍-ि‍लखि‍ रोजगार लेल आन-आन शहर चलि‍ जाइ छै। अपन घर-परि‍वार आ समाज सेहो छुटि‍ जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” बौआ बाजल पढ़ल-लि‍खल बेरोजगार छी मुदा दि‍न केना कटै छल तकर कोनो सुधि‍-बुधि‍ नै छल। ऊपरसँ परि‍वारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्‍छा रहि‍तो कि‍छु नै कऽ सकलौं। एक दि‍न मनमे फुराएल जे कि‍छु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़ि‍आएले छी औरो बुड़ि‍या जाएब। एक दि‍न भोरमे बौआ-बुच्‍चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलि‍ऐ। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ कि‍ए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दि‍न मरि‍ऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलि‍ऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। ओ नि‍रंतर होइत रहैत अछि‍।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक कि‍ए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि‍-लि‍ख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जि‍नगीकेँ सुलभ बना असली जि‍नगी जीबैए। लोक पढ़ि‍-लि‍खि डाक्‍टर-इंजि‍नि‍यर, औफि‍सर, कवि‍ लेखक आ उपदेशक इत्‍यादि‍ बनैए। अच्‍छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?‍” बौआ बाजल- “हम पढ़ि‍-लि‍ख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि‍-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जि‍नगी बि‍तबै छथि‍ मुदा कवि‍-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्‍हि‍। अखबारमे पढ़लि‍ऐ जे मरला बाद पुरस्‍कार भेटै छै।” घूसहा घर- मुखि‍याजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल डोल्हो दि‍यौलनि‍। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचला। सभाकेँ संवोधि‍त करैत मुखि‍याजी बजला- “ऐ बैसारमे सभ कि‍यो मि‍ल ि‍नर्णए लि‍अए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जि‍नकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ छै। ओइ व्‍यक्‍ति‍क सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्‍दि‍रा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतनि‍।” वार्ड सदस्‍यक सहयोगसँ मुखि‍याजी लग इन्‍दि‍रा आवासबला सूची पहुँचल। बि‍हानेसँ मुखि‍याजीक दलाल सभ सूचीमे नामांकि‍त व्‍यक्‍ति‍सँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि‍ देलक जे फार्म भरि‍ कऽ मुखि‍याजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दि‍अए पड़त। तखनि इन्‍दि‍रा आवास भेटै जाएत। बहुत गोटे तँ अपन गाए-महि‍ंस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि‍ कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। कि‍छु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचि‍त रहि‍ गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। कि‍छु दि‍नक बाद रघि‍या मसौमात इन्‍दि‍रा-आवास ले फार्म भरि‍ मुखि‍या जी लग पहुँचलीह। मुखि‍याजी फार्म पढ़ि‍ बजला- “पहि‍ले इन्‍दि‍रा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालि‍स हजार भेटै छै मुदा आगू भेटैबला साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्‍चीसमे पाँच हजार आ अखनि चालि‍समे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।” रधि‍या सुनिते कानि‍-कलपि‍ कऽ अपन मजबूरी सुनौलकनि‍। मुखि‍याजी मुड़ी डोलबैत बजला- “यइ काकी, हमरे केनेे नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकि‍म-हुकुम बैसल छै। ओहो तँ कटि‍या सोन्‍हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे नि‍महै छि‍ऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।” सुनि‍ रधि‍या सभ बात सुनि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍ बूझि‍ आपस आबि‍ गेलीह। बुधनी बुढ़ि‍या गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनि‍येमे घरबला बाढ़ि‍मे डुमि‍ मरि‍ गेलखि‍न। दूटा बेटाक संग बुधनी कहि‍यो हि‍म्‍मत नै हारलि। संघर्ष करैत आत्‍म-ि‍नर्भरतापर धि‍यो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छथि‍। हलाँकि‍ आर्थिक रूपे कमजोरे छथि‍। एक दि‍न मुखि‍याजीक नजरि‍ बुधनी बुढ़ि‍यापर पड़लनि‍ आ देखि‍ते पुछलखि‍न- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन ओ दोसर इन्‍दि‍रा आवासक।” बधनी बजलीह- “ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखि‍याजी- “हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्‍दि‍रा-आवासमे पनरह हजार।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब।” मुखि‍याजी- “कि‍ए नै लेब?” बुधनी- “घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखि‍याजी आ बुधनी बुढ़ि‍याक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधि‍या मसोमात सुनैत छलीह अपना मनकेँ बुझबैत बजलीह- “इन्‍दि‍रा आवास कि‍ए घूसहा घर कहि‍यो ने।” जाति‍क भोज आइ फूलबाबूक बेटाक बिआहक भोज अछि‍। गौआँ सबहककेँ आशा छेलनि जे ई भोज हमरो सभकेँ खेबाक अवसरि भेटत। किएक तँ ऐ भोजकेँ सफल बनेबाक लेल बहुतो जाति-वर्गक लोकक सहयोग छेलनि। कियो जारनि फारए तँ कियो साफ-सुथरा करए। कियो बर्तन-बासन माजै छल। गामक डोम बाँससँ बनल छिट्टा-पथिया, ढकैस, डाल-दौरा, चङेरा बना देलक। मालि फूल आ फूलक माला, कुमहार वर्तन-वासन, महला पोखरिसँ माछ मारि मनक मन ढेर लगौलक। कतेको करीगर आ हलुआइ सभ भोजक समग्री बनबैमे भिरल छल। भोजमे सहयोग तँ सभ जातिक लोक द्वारा भेल। मुदा खाइक अवसर सभकेँ नै भेटलनि। ओतबे नै, किनको नगद टाका देल गेल तँ किनको उधार रहलै आ किनको सीदहा भेटलै। मुदा भोज खाइक नोत सभकेँ नै भेटलै। भोजक आयोजक भलहिं फूलबाबू छला मुदा करबारी तँ सभ जातिक लोक छेलखिन। किछु लोकक मनमे, जि‍नका सभकेँ नोत नै देल गेलनि‍। हुनका सबहक मनमे ईहो होन्‍हि‍ जे काज जखनि नै छुआइ छै तँ पाँति‍मे बैस खेलापर पाँति‍ केना छुबा जेतै। शि‍क्षाक महत जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि‍ छलि। रधि‍याक पि‍ताकेँ चारि‍ बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जि‍नगी चलै छेलनि‍। सोझमति‍या रहने कोनो क्षल-कपट नै रहनि। पि‍तमरू छला। परि‍वारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहनि‍ खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधि‍याक पि‍ता जरूरति‍ पड़लापर जखनि‍ समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक नि‍शान दइ छला। एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि‍-पानि‍सँ दहि‍ गेलै। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलै। दोसर साल रौदी भऽ गेलै। एक तँ बाढ़ि‍क मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलै। केतेको परि‍वार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा कि‍छु दि‍न समए कटकल। मुदा ई सुवि‍धा सबहक नशीव नै छेलै। गामक नम्‍हर जमीनदार, मालि‍क-गुमस्‍ता जे छला हुनका तँ पहुलके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलनि। हुनका सभकेँ कोनो चि‍न्‍ता नै छेलनि‍। रधियाक माए-बाप बूढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालि‍कसँ कहि‍यो मरूआ तँ कहि‍यो धान तँ कहि‍यो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनि‍हार मालि‍क सभ वि‍पति‍क समैमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक नि‍शान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखि‍न। गरीब अपन परान बँचाएत आकि‍ छापक परबाह करत। कर्जा खेनि‍हार थोड़े बुझै छल कि‍ छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्‍था चलि‍ जेतै तक्खापर। एक दू साल समए बि‍तलै। जीबछ अपन सौसुराइरिएमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। कि‍छु समए पछाति‍ सासु-ससुर मरि‍ गेलखि‍न। श्राद्ध-कर्मसँ नि‍वृत भेलै छल आकि‍ गामक मालि‍क-गुमस्‍ता लोकनि‍ अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहनि‍। ओ अवधि‍ बीति‍ गेल छल। कर्जा खेनि‍हार पहि‍ले कागतपर छाप देने रहनि‍। ओइ कागतपर मालि‍क-जमीनदार लोकनि‍ जमीनक खाता-खेसरा रकबा लि‍खि‍ कऽ अपन नाओं कऽ लेलनि‍। गरीब सबहक जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरपि‍ लेलकनि‍। जइमे रधि‍याक जमीन सेहो चलि‍ गेल। आब जीबछ-रधि‍याकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परि‍वारक भरन-पोषण करनाइ कठि‍न भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि‍ गेल। बाहरमे पढ़ल-लि‍खल आदमीकेँ नोकरी जल्‍दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलै। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शि‍क्षाक महत जि‍नगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल। जीबछ ट-ब-ट काए कहुना कऽ चि‍ट्ठी लि‍खि‍ घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधि‍याकेँ प्रेरि‍त करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धि‍या-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधि‍यो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शि‍क्षाक बड़ महत छै। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालि‍क-गुमस्‍ता हरपि‍ लेलनि‍। जखनि‍ पढ़ल रहि‍तौं तँ ई मुसि‍बत नै अबि‍ताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धि‍या-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परि‍श्रम आ ति‍याग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दि‍न अपन धि‍या-पुताकेँ समैपर संगे जा स्‍कूल पहुँचाबए लगली। रधि‍याक टोलेमे बुच्‍ची बाबू छला। बुच्‍ची बाबू अंचलमे बाड़ाबाबू छथि‍। छुट्टीमे घर आएल छथि‍। हुनका काल्हि‍ भोरे ट्रेन पकड़ि‍ ड्यूटीपर जेबाक छेलनि‍ से रधि‍याकेँ कहलखि‍न- “रधि‍या, कि‍छु सामान अधि‍क अछि‍। गाममे कएक गोटेकेँ कहलि‍ऐ जे काल्हि‍ भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी सामान स्‍टेशनपर पहुँचा दि‍अ, मुदा कि‍यो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।” रधि‍या बाजलि‍- “ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि‍ दि‍अ हम समान पहुँचा देब।” बुच्‍ची बाबू बजला- “सात बजे भाेरेमे चलब। कि‍एक तँ आठ बजेमे ट्रेन छै। तीन-चारि‍ कि‍लो मि‍टर स्‍टेशन दूरो छै।” रधि‍या भोरे उठि‍ सभ काज कऽ जलखै बना धि‍या-पुताकेँ खाइले दऽ बजली- “तँू सभ जल्‍दीसँ खो, आइ कनी पहि‍नहिए तोरा सभकेँ स्‍कूल पहुँचा दइ छि‍यौ, तखनि‍ बुच्‍ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।” एम्‍हर बुच्‍ची बाबू तैयार भऽ रधि‍याक बाट तकै छला। पाँच मि‍नट पछाति‍ रधि‍या पहुँचली। बुच्‍ची बाबू तमसाइत बजला- “रधि‍या, तोरा कहने छेलि‍ओ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छूटि‍ जाएत। तोरा कोनो चि‍न्‍ता नै।” रधि‍या बजली- “अपने तमसाउ नै। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पि‍ट्ठेपर आबि‍ रहल छी। कनी धि‍या-पुताकेँ स्‍कूल पहुँचबैमे देरी लागि‍ गेल।” बुच्‍ची बाबू- “पहि‍ले सामान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छूटि‍ जाइत। एक दि‍न तोहर बेटा-बेटी स्‍कूल नै जेतौ तँ की हेतै। एक्के दि‍न कोनो पढ़ि‍ कऽ कलक्‍टर बनि‍ जेतौ?” रधि‍या मोने-मन सोचए लगली, कहै छि‍यनि‍ आगू बढ़ैले से उठि‍ए ने होइ छन्‍हि‍। हम तँ लफरल हि‍नकासँ पहि‍नहि‍ पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतनि‍। अपने बेगरते आन्‍हर छथि‍। अनेरे गछलौं। ‍ ई छी हमर मजबूरी जमुना बाबाक दुआरि‍पर सतसंग-प्रवचन होइ छेलै। भीड़ देखि‍ हमहूँ ससरि‍ कऽ गेलौं आ बैस सुनए लगलौं। प्रवचनकर्ता सेहो ज्ञानी आ वि‍द्वान बूझि‍ पड़ला। ओ मनुखक जि‍नगीक समरूपता बतबै छला। कहब रहनि‍ जे सभ मनुख एक समान छी। सभ एके ईश्वरक संतान छी आ सबहक अत्‍मामे एके परमात्‍माक अंश रमि‍ रहल-ए। मुदा हम तँ बड़ अंतर देखै छी। सबहक क्रि‍या-कलाप, रहन-सहन आ खानो-पानमे बड़ पैघ भि‍न्नता अछि‍। केकरो बोरे-बोरे नून आ केकरो रोटीओपर ने नून। कोइ खाइते-खाइते मरैए आ कोइ खाइए बि‍नु मरैए। केकरो बीघा-बीघे कोठा-सोफा केकरो खोपड़ीओपर आफत। कोइ रौदे-वसाते जरि‍-मरि‍ काज करैए तँ कोइ ए.सी.मे मौजु करैए। कि‍यो उड़न जहाजसँ देश-वि‍देशक यात्रा करैए तँ कि‍यो पएरे चलि‍-चलि‍ सड़केपर पराण ति‍यागैए। कि‍नको बि‍मारीक इलाज करोड़ो रूपैआसँ वि‍देशमे होइए तँ कि‍नको पराण साधारण इलाज बि‍नु चलि‍ जाइए। ऐ सभ मुद्दापर सोच-वि‍चार करैत जखनि‍ प्रवचन खतम भेल तखनि‍ हम हुनका लग जा कहलि‍ऐ- “महराज, अपने प्रवचनमे सभ मनुखकेँ समरूप बतौलि‍यनि‍। मुदा हम तँ बड़ अन्‍तर देखै छी। से कनी फड़ि‍छा कऽ कहि‍यौ।” प्रवचनकर्ता मधुर स्‍वरमे बजला- “से तँ ठीके अहूँ कहै छी। हम जे प्रवचनमे कहलौं सेहो ठीक आ अहाँ जे कहै छी सेहो ठीक। सत्‍ ई छै प्राकृति‍ द्वारा जे सुवि‍धा मनुखक लेल उपलब्‍ध छै ओ समरूप छै। मुदा मनुखक बीचमे जे अन्‍तर छै से अन्‍तर बेवस्‍थामे कमीक कारणे छै। मनुखे मनुखक दुश्‍मन छि‍ऐ। जे जेते सवल छै ओ ओते दोसराक हक मारि‍ बेवस्‍थाकेँ दुरूपयोग करै छै। जहि‍ना हाथीकेँ दूटा दाँत होइ छै एकटा खाइबला आ दोसर देखबैबला तहि‍ना बेवस्‍था करैबलाकेँ दू नजरि‍ होइ छै। कथनी आ करनीमे अन्‍तर रखने छै। ऐ सभ बातक वि‍चार-अनुभव मनुखकेँ अपने करए पड़तै। ओकर समाधान लेल सघर्ष करए पड़तै। बि‍नु मांगने तँ भीखो नै मि‍लै छै। ई तँ अहाँ अधि‍कारक बात करै छी। जौं हम प्रवचनमे समरूपताक बात नै कहबै तँ बेवस्‍था हमरा नै ने जीबए देत। अहाँ जकाँ जौं हमहूँ प्रवचनमे बाजब तँ कहि‍या ने हमरा जमपुरी पहुँचा देने रहि‍तए। यहए छी हमर मजबूरी।” बाल-बोध दुखीलालकेँ दुखक पहाड़ माथसँ कहि‍यो नि‍च्‍चाँ नै भेल। बूढ़ माए-बापक सेवा टहल, तैपर सँ दूटा भलढ़ेरबा बेटी, छोट-छोट दूटा बेटा, पत्नी आ अपने कुल आठ बेक्‍तीक परि‍वार। पत्नी- फुलि‍या- परि‍वारक काजमे पि‍साइत छेली। सासु-ससुरक टहल-टि‍कोरा आ सेवासँ पलखति‍ए नै। ऊपरसँ एकटा पोसि‍या गाए, एकटा भजैति‍या बरद। मुदा दुनू बेटी चठेलगरि‍ आ हुनरगरि‍ छन्‍हि‍। घरक कमौआ दुखीलाल असकरे दि‍न-राति‍ फि‍रि‍शान रहैए। घरक खर्चा पुग्‍बे ने करैए जे पलखति‍ मारत। खेतीओ-पथारी कम्मे भेने जने-बुत्तापर घरक खर्चा चलैत अछि‍। जखनि‍ खेनाइओ-पीनाइओमे ढनसने तखनि‍ बेटा-बेटी पढ़त केना? बर्खक पेसतरे दुखीक माए लकबा रोगसँ मरि‍ गेली। पछाति‍ बूढ़ बाप सेहो रोगसँ रोगा-सोगा दम तोड़ि‍ देलकनि‍। श्राध-कर्म आ भोज-भात कर्जे हाथे भेल। दुखीलालकेँ एक-सबा कट्ठा डीह, तीन कट्ठा चौमास आ छह-सात कट्ठा तीन-फसि‍ला खेत छन्‍हि‍। जइसँ छह मास परि‍वारक गुजर चलै छन्‍हि‍। जन-मजदूरी कऽ शेष छह मास बि‍तबैत अछि‍। मुदा अखनि‍ तँ चौमास आ तीन-फसि‍ला खेत दस हजारमे डेढ़ा सूदि‍पर भरना लगि‍ गेल अछि‍। तैपर सँ दूटा बेटीक बि‍आहक अलगे। दुनू बेटा अखनि‍ बाल-बोध! समस्‍या-पर-समस्‍या लदल जा रहल अछि‍। जँ चारि‍-पाँच साल खेत-भरना रूपैआ आ सूदि‍ नै भरब तँ खेतो सूदि‍ए तरे चलि‍ जाएत। गाए बि‍कल चरबाहि‍येमे कहबी सन हएत। एक दि‍न दुखीलाल बैसारीए छल। कि‍छु सोचैत छल आकि‍ मनमे उपकलै खेतक भरना। जइ खेतसँ हमर बाप-दादा परि‍वार चलबै छला वएह खेत हमरो जीवि‍का अछि‍। मुदा आब बूझि‍ पड़ैए ओ खेत बि‍लटि‍ जाएत। ऐ क्रममे सोचैत दुखीलाल टहलि‍ मालि‍क प्रभूनाथजीक दरबज्जापर पहुँचल। प्रभूनाथजी दुखीकेँ देखि‍ते कहलखि‍न- “आबह दुखी, एमकी बहू दि‍नपर भेँट करए एलह।” दुखीलाल- “मालि‍क, अहाँसँ कथी छुपल अछि‍। एतेक दि‍नसँ माए-बापक कहुना रीन उतारलौं मुदा अपनेक रीन केना चुकाएब से फुड़ेबे ने करैए।” प्रभूनाथजी- “केना चुकेबऽ से तँ तोहर काज छि‍अ। तइले हम कि‍ए मगजमारी करब। साले-साले हमरा रूपैआक डौरहा सूदि‍ बढ़ैत जेतह। पाँच सालक कराड़ी छह, नै चुकेबहक तँ खेत छोड़ह पड़तऽ।” दुखीलाल- “माि‍लक, एना नै ने बाजू। खेतक नाओं सुनि‍ हमर करेजा फाटि‍ जाइए। ई खेत हमर खनदानक पूजी आ इज्जति‍ छी। अपना जीबैत हम केना बि‍लटए देब।” प्रभूनाथजी- “से तँ तूँ ठीके कहै छह। रूपैआक सूदि‍ जोड़ि‍ चुकता कऽ दहक आ अपन खेत छोड़ा लैह।” दुखीलाल- “मालि‍क, अहींक दरबारमे जन-मजुरी कऽ जीब लेब। रहल अहाँक रूपैआक सूदि‍, तइ एबजमे हम अपन दुनू बेटाकेँ अहीं ऐठाम नोकरी राखि‍ दइ छी। बँचलोहो बासि‍-बेरहट खा जीब लेत आ अहूँक काज चलत। जाधरि‍ अहाँक रूपैआक सूद-मूर‍ नै सधत ताधरि‍ अहींक दरबारमे नोकर बनि‍ खटि‍ देत। रूपैओक चुकता भऽ जाएत आ हमरो खेत छुटि‍ जाएत।” प्रभूनाथजी- “कहलह तँ बड़ नीक। युक्‍ति‍ओ तोहर नीमन छह मुदा...।” दुखीलाल- “माि‍लक ‘मुदा’ कि‍ए कहलौं?” प्रभूनाथजी- “मुदा ऐ दुआरे बजलौं कि‍ तोहर बेटा दुनूकेँ तँ देखने नै छी। अबोध अछि‍ आकि‍ बाल-बोध ” दुखीलाल- “बल-बोध अछि‍। ठेकनगरि‍, एकबेर सेरि‍या कऽ बता देबै तँ दोसर बेर अढ़बए नै पड़त। देखि‍ते-देखि‍ते फुर्र-फुर्र काज कऽ देत। एक्को मि‍सि‍या असकति‍या नै अछि‍।” प्रभूनाथजी- “बेस काल्हि‍ए दुनूकेँ बजौने आबह। नैनसँ देखि‍यो लेब आ काज करै जोकर अछि‍ कि‍ नै सेहो ठेकानि‍ लेब।” दुखीलाल- “बेस मालि‍क, जाइ छी काल्हि‍ए दुनूकेँ संगे नेने अबै छी।” दुखीलाल अपन कर्तव्‍यकेँ हीन बूझि‍ चि‍न्‍तामे डूमि‍ गेल। हम केहेन बाप छी जे बाल-बोध बेटाकेँ भोजन-बस्‍त्र-शि‍क्षा इत्‍यादि‍ पूर नै कऽ अपने बेगरते नोकरी लगबै छी। बेटा-बेटी राजाक हुअए आकि‍ गरीबक सभकेँ अपन सन्‍तान दुलरूआ होइ छै। जखनि‍ नमहर-बुधि‍गर-ठकनगर हएत तँ की कहत! हमर बाप केहेन नि‍ष्‍ठुर छथि‍ जे हमरा संगे एहेन अन्‍याय केलनि‍। मुदा हमरा लग रस्‍ते कोन अछि‍। दोसर कोन उपए लगा सकब। मोनक बात मोनमे रखैत हृदैकेँ सक्कत कऽ बि‍हाने भने पनि‍पि‍आइ करा संगे नेने प्रभूनाथजीक दरबार पहुँचल। दुनू बाल-बोध भाए गांगी-जमुनी, देखैओमे बड़ नुनुआगर, उमेरो आठ-दस बर्खक। प्रभूनाथ जीकेँ मनमे भेलनि‍ बड़ नीमन टहलू हएत। मुदा अनठबैत बजला- “दुखी दुनू बौआ तँ अखनि‍ लेधुरि‍ए अछि‍। हमरा ऐठाम कोन काज करत। ऐठाम तँ भीड़गर काज अछि‍।” दुखीलाल बूझि‍ गेल जे मालि‍क हमरा टाड़ि‍ रहल अछि‍। बाजल- “मालि‍क, छोट देखि झुझुआउ नै। घरक छोट-छोट सभ काज करत। गाए-बरदक कुट्टी-सानी, दरबज्जा, माल-जालक बथान आ गोहाल घरक झार-बहार करत। गोबर-करसी ढुल-ढालकेँ हटाएत। अहूँकेँ कि‍यो टहल-टि‍कोरा करैबला नै अछि‍ सेहो अपन समझि‍ करत। अहूँ अपने पोता सन बेवहार करबै। घरे ने बदलि‍ जेतै मुदा रहतै तँ गामेमे। अहाँ लग रहत तँ हम नि‍फि‍कि‍र रहब। ओना हमहूँ तँ अबि‍ते-जाइते रहब।” प्रभूनाथजी- “दुखी, तँू ने गाम-घरक बात करै छह। लोक तँ शहर जाइले जान गमौने अछि‍।” दुखीलाल- “मालि‍क की कहब, लोक तँ चि‍ड़ै भऽ गेल अछि‍। जेतै पेट भरै छै ओतै खोंता बना रहैत अछि‍।” प्रभूनाथजी- “से ठीके। हमरे बेटाकेँ नै देखै छहक। गाम-समाज छोड़ि‍ हैदराबादमे रहैए। पावनि‍-ति‍हार तँ हम जाबै जीबै छी ताबे कहुना कऽ दइ छि‍ऐ, नै तँ घरक देवताकेँ एक चुरुक पानि‍ओ के देत।” दुखीलाल- “माि‍लक, छोड़ू दुनि‍याँ-दारीक गप-सप्‍प। हमरो काजपर जाइक अछि‍। और गप-सप्‍प दोसरो दि‍न हेतै। दुनू बाल-बोधकेँ सम्‍हारू।” प्रभूनाथजी- “दुखी, कनी आर बैसह। ई दुनू बौआ अनचि‍न्‍हार अछि‍। कनी बति‍या लइ छी। नाओं बूझल रहत तँ समैपर समझा-बुझा देबै। नै तँ पोसो नै मानत। तँू तँ बुझबे करै छहक जे हमरासँ दुनू बौआकेँ खटपट तँ नै हएत मुदा हमर बुढ़ि‍याक सोभाव आ बेवहारकेँ तँ तूँ नीकसँ जनै छह, ओ मक्कै लाबा जकाँ दि‍न भरि‍ फटफटाइते रहै छथि‍। तेहेन झनकाहि‍ अछि‍ जे केकरोसँ पटरीए ने खाइ छै। दि‍न-भरि‍ पूजे-पाठमे लगल रहैए, दि‍नक भोजन राति‍ आ रतुका भोरमे पाड़न करैए। जँ कि‍यो लागि‍ओ-भीड़ीओ देतै तँ कहत जे हमर सभ कि‍छु छुबा गेल। एकबेर के कहए जे तीन-तीन बेर नहाएत आ गंगाजलसँ शुद्ध करत। बेटो-पुतोहु आ पोता-पोती जखनि‍ अबैए तँ देखि‍ते बनरनी जकाँ लड़ि‍ते रहैए। तखनि‍ हमर जि‍नगी केहेन अछि‍ से बि‍नु कहने बूझि‍ गेल हेबह।” दुखीलाल- “मालि‍क, ई तँ घरक बात छी। ओइमे हम कि‍ए दखल देब। मनुखो कोनो एक्के रंगक होइए। लोक अपन सुख-दुखक सृजन अपने करैए। अपजश दोसरकेँ लगबैए।” बात समटैत दुखी दुनू बाल-बोधक दि‍स इशारा केलक। प्रभूनाथजी पुछलखि‍न- “बौआ, नाओं की छि‍अ?” दुनू भाँइ एक्के स्‍वरमे अपन-अपन नाओं बाजल- “बुधन-बेचन।” प्रभूनाथ- “मुँह सूखल छह। कि‍छु खेबह?” दुनू भाँइ बाजल- “नै, पनि‍पि‍आइ कऽ लेने छी।” प्रभूनाथजी- “तोहर बापक कहब अछि‍ जे दुनू भाँइ अहीठाम काज करत से करबहक ने?” बुधन- “हँ।” प्रभूनाथजी- “अपन काज कहुना सभ करैए मुदा बीरानक काज कि‍यो करैए आ कि‍यो नै करए चाहैए।” बुधन- “हम अपन आ बीरानमे नै बुझै छी। काज करब।” दुखीलाल बूझि‍ गेल जे बात बढ़ि‍ जाएत। बातकेँ सम्‍हारैत बाजल- “मालि‍क गरीबक बेटाकेँ कथी परीक्षा लइ छि‍ऐ। जे कहबै से करत।अबेर भऽ गेल काजपर जाइ छी।” प्रभूनाथजी- “कनी दरमाहा फरि‍आ लैह जे पछाति‍ कोनो मुहाँ-ठुठी ने हुअए।” दुखीलाल- “मालि‍क, दरमाहा की हेतै। अहाँसँ रूपैआ दस हजार नेने छी। सालमे पनरह हजार हएत। पँच-पँच सए रूपैआ महि‍नाक हि‍साबसँ दुनू भाँइक एक हजार भेल। पनरह महि‍नामे अहाँक रूपैआ फरि‍या जाएत, नै मानब तँ एक मास बेसीए खटि‍ देत। हमरो खेत छूटि‍ जाएत। ने अहाँकेँ दि‍अ पड़त आ ने हमरा। दुनू भाँइ अहींक दरबारमे खाएत-पीअत काज अहाँक अनुकूल करत।” प्रभूनाथजी- “ठीक छै मानि‍ लेलि‍अ। तँू तँ हमरोसँ तेज नि‍कललह। हम तँ बाल-बोधक फेरमे अबोध बनि‍ गेलौं।” अबि‍सवास काल्हि‍ए नूनू बाबूक बेटीकेँ बि‍आह छी। नूनू बाबू बि‍आहक सरमजान सबहक ओरि‍यानमे लगल छला। गि‍रहत आ सम्‍पन्न परि‍वार रहि‍तो रूपैआक अभाव छेलनि‍। चारि‍ लाख टाका, पाँच भरि‍ सोना आ एकटा मोटर साइकि‍ल देहेजपर बि‍आह फाइलन भेल छल। दुलहा इंजीनि‍यरिंग कौलेजक छात्र। सुखी सम्‍पन्न परि‍वार। दुलहाक पि‍ता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफि‍सक बाड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने छथि‍। तँए नूनू बाबू अपन बेटी सुचि‍ताकेँ हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छथि‍। नूनू बाबू बहुत परि‍यास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकि‍ल, दू भरि‍ सोना ति‍लकक समैमे चुकता कऽ देलनि‍। शेष तीन भरि‍ सोना बेटीक गहना स्‍वरूप बि‍आहे दि‍न देब आ एक लाख रूपैआ जे बँकियौता रहि‍ गेल ओ बेटीक नामे एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि‍। जे दू तीन मास पछाति‍ मि‍लत सेहो चुकता कऽ देब। ति‍लक भेला पछाति‍ बि‍आहक दि‍न ठेकल गेल। मुदा दुलहाक पि‍ता मोहन बाबू बड़ लोभी। ओ मोने-मोन सोचलनि‍, पुतोहु जखनि‍ हमर हएत तँ एल.आइ.सी.क रूपैआ आइ ने काल्हि‍ हमरे हएत। बँकि‍यौता रूपैआ बि‍आहसँ पहि‍ने लऽ लेब तँ लाभमे रहब। मोहन बाबू बि‍आहसँ एक दि‍न पहि‍ने समाद नूनू बाबूक घर पठौलनि‍ जे हमर एक लाख टाका बँकि‍याहा अछि‍ ओ रूपैआ चुकता करि‍ दि‍अ तखने बरि‍याती जाएत नै तँ अहाँ जानू। नूनू बाबू समाद सुनि‍ते जेना देहपर बज्‍ज्‍र खसि‍ पड़ल। ओ सेचमे पड़ि‍ गेला। होश सम्‍हारि‍ मोहन बाबूसँ भेँट कऽ बड़ वि‍नती केलनि‍। अखनि‍ ऐ लेल माफी दि‍अ। हम बेटीबला छी। बहुत चीज-बौसक ओरि‍यान करए पड़त। तैपर सँ बरि‍यातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत। मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकेँ एकोटा बात नै सुनलकनि‍, आ ने आँखि‍क नोर पोछलकनि‍। तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तँ अहाँ बरि‍याती लऽ कऽ आउ, हम दरबज्‍जेपर बि‍अाहसँ पहि‍ने रूपैआ बरि‍यातीए घरमे चुकता करि‍ देब तखनि‍ बि‍आह करब।” नूनू बाबू खेत भरना रखि‍ रूपैआक ओरि‍यान केलनि‍। बरि‍याती समैपर आएल। सबहक सुआगत भेल। दरबज्‍जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पि‍ता- मोहन बाबूकेँ चुकता कऽ देलनि‍। दुलहाक परि‍छन भेल, वरमालाक काज शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहि‍ने दुलहि‍नकेँ देखता। पसि‍न भेला पछाति‍ ने बरमाला आ सेनूरदान हएत। ऐ बातसँ कन्‍याँ पक्षमे खलबली मचि‍ गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि‍ गेल। अन्‍तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहि‍ने कन्‍याँ देख लेल जाउ। तखने आगूक काज हएत। दुलहि‍न चित्रा तँ पहि‍नेसँ वरमाला लेल सजले छलि‍। एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनि‍याँ संगे बजौल गेल। ओही कोठलीमे दुलहि‍न चि‍त्रा सहेलीक संगे आएल। चि‍त्रा इण्‍टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि‍। दुलहा देखि‍ कऽ मोने-मोन खुश भेला। कि‍छु गप-सप्‍प सेहो भेलै। तखने चि‍त्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्‍की मारि‍ पीठे लागल बजला- “हँ, की हमहूँ अहाँकेँ...।” चि‍त्रा तुरन्‍ते जवाब देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। तँए आब ई बि‍आह हम कि‍न्नौं ने करब। चि‍त्राक ई निर्णए सुनि‍ सखी-बहि‍नपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्‍यादि‍ बहुतो गोटे समझेलकनि‍ मुदा एकेठाम चि‍त्रा जि‍द्द धेने रहलि‍ जे ऐ वरसँ हम बि‍आह नै करब।” दरबज्‍जा बरि‍याती-सरि‍यातीसँ भरल छल। ई बात सुनि‍ते लगले सनसना कऽ अगि‍लग्गी जकाँ चारू दि‍स सौंसे गाम पसरि‍ गेल। बहुतो बुजुर्ग लोकनि‍ दुलहि‍नक पि‍ताकेँ बुझा-समझा कऽ कहलकनि‍ मुदा चि‍त्रा अपन दृढ़पर अरल रहलि‍। चि‍त्रासँ कारण पूछल गेल। कहलक- “जखनि‍ दुल्हाकेँ अपन माए-बाप आ सर-समाज कि‍नकोपर बि‍सवास नै छन्‍हि‍ तँ ओ हमरापर बि‍सवास केना करता आ हम केना हुनकापर बि‍सवास करब। दोसर बात जे हि‍नकर पि‍ताजी दहेजक खाति‍र जमीन आइज्‍जत बेचबा सकै छथि‍ तखनि‍ ओ हमरो बेचि‍ सकैत छथि‍ कि‍ने। तँए हम बीख पीब मरि‍ जाएब मुदा एहेन अवि‍सवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बि‍आह नै करब। ऐसँ नीक तँ हम ओहेन दुल्हा जे गरीबे कि‍एक ने हएत, ति‍नकासँ करब, जे अपन इज्‍जतक संगे दोसरोक इज्‍जत करत।” चि‍त्रा सहेली संगे कोठलीसँ नि‍कलि‍ गेलि‍। दुल्हा आ लोकनि‍याँ सभकेँ ओही कोठलीमे बन्न कऽ ताला लगा आँगन आबि‍ गेलि‍। बि‍आह नै भेल। ई खबरि‍ राति‍ए भरि‍मे चौतरफा पसरि‍ गेल। पंचैतीक बैसार भेल। पंच लोकनि‍ बि‍आह हेबाक बहुत परि‍यास केलनि‍ मुदा चि‍त्रा अपन संकल्‍पपर अडि‍ग रहलि‍। अन्‍तमे जे दहेजक लेन-देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस भऽ जाए। दुलहि‍नक पि‍ता नूनू बाबू बजला- “चारि‍ लाख टाका, दू भरि‍ सोना, मोटर साइकि‍ल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च भेल अछि‍ से सभटा आपस कऽ दि‍अ तखने हि‍नका सभकेँ छुट्टी भेटतनि‍। नै तँ हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबनि‍।” सभ पंचक वि‍चार भेलनि‍। बात तँ उचि‍ते ने नूनू बाबू कहै छथि‍। कोनो जबरन जुर्माना तँ नै...। दुल्हाक पि‍ता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकि‍ल घरसँ मंगबा नूनू बाबूकेँ पंचक बि‍च्‍चेमे आपस कऽ देलकनि‍। तखनि‍ हुनक बेटाकेँ कोठलीसँ बाहर नि‍कालि‍ देल गेल। जहि‍ना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगरि‍ दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकड़ि‍ सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहि‍ना सभ कि‍यो वि‍दा भेला। चि‍त्रा पि‍ताक मुरझाएल मुँह देखि‍ बाजलि‍- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चि‍न्‍ता नै करू। हम मनुख संगे बि‍आह करब। पढ़ल-लि‍खल कम्‍मो रहत तइले एको पाइ चि‍न्‍ता नै। एही खाति‍र ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चि‍न्‍ता नै करू।” डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्‍यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि। सौंसे गाममे सोग पसरि गेल। गाममे दलमलित हुअ लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्‍त भेने एकटा युगक अन्‍त भऽ गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक मानैत तहिना आदरो करैत। मुइला पछाति समुच्‍चा गामक लोक दाह संस्‍कारमे पँचकठिया दइले पहुँचल छल। भीड़ बहुत मुदा अखनि धरि अछियामे अागि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ठाढ़, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्‍हरा बनि हे...।” “सभ दिन होत ने एक समाना...।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर...।” भिनसरसँ दुपहर भेल जाइत रहै। अखनि धरि लोक काेन आशामे समए बीतबै छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल। जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखसँ पेटमे बिलाइ कुदऽ लगलै। तखनि जा कऽ विलमक कारणक पता लगबऽ लगल। मलिकपनाबला बात, के हिम्‍मत करत जे आगू भऽ पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करैत रहए। तखने रौदी बाबा पहुँचला। पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने पड़ल। किए एते अबेर भेल। धिया-पुता सभ भूखे लहालोठ होइए!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “अहाँ बुढ़ो-पुरान छी आ गामक अनुभवी सेहो छी, से कनी झबदे पता करियनु जे...।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। ओइ ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल कुटुम सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल...। लगमे जा रौदी बाबा जोरसँ पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकेँ जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्‍द- कहलकनि- “दादा, सभ किछु तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्‍तजारमे छी।” रौदी बाबा पुछलखिन- “से किए?” रूपचन्‍द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकेँ जरौलासँ मौक्षक प्राप्‍ति होइ छै तँए कनी बौकू डोमक बाट तकै छी।” रौदी बाबा बजला- “अहीले एते अबैर होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो भोरसँ आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै।” रूपचन्‍द- “नइ हौ काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, खबरि भऽ गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि।” रूपचन्‍दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकेँ अनरगल लगलनि। तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि। जोरसँ बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके छथि की! जखनि एते बुझै छहक जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब तँ पहिने डोमकेँ बजा लइतह। पछाति लोक सभकेँ बजैबतह। भिनसरसँ दुपहर भऽ गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ भऽ रहल अछि आ बौकू डोमक अखनेा कोनो था-पता नइ छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून। जखनि जे मनमे फुड़ैए सहए करऽ लगैए! नव-नव जोगीकेँ भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग अबऽ लगल। सभकेँ होइ कखनि झबदे आगि पड़ै जे लोक पँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत। मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल। सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्‍द मालिक, कनीले एते लेट भऽ रहल छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल। जखनि बुझै छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककेँ मरलोमे मुक्‍ति नइ भेटै छै, तखन डोमकेँ एते निच्‍चा किए बुझै छिऐ...। जखनि कि जीबैतमे सभ डोमसँ छूबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै छी...। डोमो तँ अही समाजक लोक छी, मुदा गामसँ हटि कऽ वेचारा सभ गाममे बसैए। सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैसि खेनाइ तँ दूर जे बातो ने करैए। एक लग्‍गा फटिकेसँ पुछ-पाछ करैए...। ऐबेरमे कोन असोगरज लगि जाइए...। रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नचऽ लगलनि। मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर धियान गेलनि। जाइते मन जेना आरो चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्‍थाक जलियाएल रूप सभ सोझा अबऽ लगलनि। किछु बाजि नइ रहल छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू डोमसँ कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला तँ हमरो मालिक। हमरा कोनो लोभ-लालच नइ अछि मुदा दान-दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी दऽ दिअ।” रूपचन्‍द एकटा चानीक सिक्का दऽ आगि कीनऽ आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा आ सीताराम दास अपनामे विचार बजला- “ई उचित नइ भेलऽ रूपचन्‍द। जेकरा खातिर भोरसँ दुपहर भऽ गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ सधत। अपनो समांग बूझि बौकूकेँ जे देबै से दियौ, तखन ने बौकूओ अप्‍पन बूझत।” सएह भेल। मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्‍त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल। निगुन गौनिहारकेँ जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि। पुन: गाबए लगला- “सभ दिन होत ने एक समाना....।” राम विलास साहु-लक्ष्‍मिनियॉं, मधुबनी। तीनटा लघु कथा- गंगा नहाएब/ डोमक आगि/ स्वर्गक सुख गंगा नहाएब कातिक मासक पुर्णिमा लगिचाएल। सालक तेरहम मास, बेसी पावनि-तिहार भेने हाथो खालीए, मुदा गाममे दलमलित होइए- गंगा नहाइले सिमरिया घाट जाएब। ऐबेर पुरुखसँ बेसी जनानीए सभ गंगा नहाइ जाइले छाल छीलने। तीनू टोलक जनानी सभ गुदुर-फुसुर करैमे भरि-भरि दिन लगल। चनरदेव भोरे उठि गाए-बरदकेँ कुट्टी-सानी लगा धनखेती दिस विदा भेल कि बड़की भौजी आ सावित्री माए डेढ़ियापर आबि गेली। बड़की भौजी मुस्‍की मारि बजली- “बौआ चनरदेव, सुनै छी गामक लोक सभ गंगा नहाइले जा रहल अछि। अहाँ नइ जाएब। कहिया पुर्णिमा छिऐ।” चनरदेव दिन-तिथि गीनैत बाजल- “पुरसुए पुर्णिमा छी। हमर तँ हाथे खाली अछि, तहन छुच्‍छे हाथ जाएब केना। ऐबेर नइ जाएब। गंगा मैया जँ ऐ साल निके-सुखे रखलनि तँ पौरुकॉं अबस्‍स जाएब।” सावित्री माए बजली- “चनरदेव, एहनो बात लोक बजैए! गंगा नहाइले तँ बिना जतरो-के-जतरा बनबैए, अहाँ किए मुँह मोड़ै छी।” गंगा नहाइक चर्च सुनि एक्के-दुइए जनिजाति सभ ससरि-ससरि बहुतो आबि चनरदेवकेँ घेरि लेली। बड़की भौजी चौल करैत कहलखिन- “यौ अहॉं सभ दिनक बहन्नाबाज छी, से बहन्ना छोड़ू जे हाथ छुच्‍छे अछि। अपनो चलू आ हमरो सभकेँ नेने चलू। रहल खर्चाक बात, हम तँ खर्चा देखबे ने करै छी। घरेसँ खेनाइ-पीनाइक समान बना लऽ लेब। रेलगाड़ीमे मेलाक भीड़ रहबे करत, टिकट कोनो लगबे ने करत। एक गड़ीसँ रातिए-राति जाएब आ दोसर दिन घर घूमि चलि आएब। ने कोनो घरक काज पछुआएल आ मंगनीमे गंगा नहा लेब। जखन मेलामे कोनो चीज-वौस कीनबे ने करब तखन खर्च बेसी किए हएत। अहूँ तँ सियार गुँहकेँ परबत बनबै छी।” बड़की भौजी गपक बखाड़ी खोलि चारू दिससँ चनरदेवकेँ गछारि लेली। चनरदेव सकदम भऽ गेल। किछु उत्तर नइ देलक। जनिजाति सभ समझि गेली जे चलैले तैयार भऽ गेल। चनरदेव मने-मन सोचए लगल जे वेद-पुराणसँ लऽ कऽ साइयो पोथीमे गंगा स्‍नानक बड़ पैघ महत बतौने अछि। सतयुगसँ लऽ कऽ अखनि धरि अपन देशक लोक आ आनो देशक लोक गंगा नहाइए तँ चनरदेव किए पाछू रहत। हमहूँ किए ने लगले सूरमे बेड़ा पार भऽ जाइ। एमहर भरिए दिनमे जनिजाति सभ खेनाइ-पीनाइक ओरियानमे लगि गेली। कियो अरबा चारक रोटी, अल्‍लूक भुजिया बनौलक तँ कियो परोठा-भुजिया, तँ कियो चूड़ा-मुरही, सतुआ-नोन आ मिरचाइक मोटरी बान्‍हि चलैले तैयार भऽ गेल। पचीस-तीस गोटे सँझुके गड़ी पकड़ैले टिशन दिस विदा भेल। निरमलीसँ सकरी जाइत-जाइत भीड़क कारणे बुझू देहक मोलि छुटि गेल। मुदा कोनो धरानी भोरे-भोर सिमरिया टीशन पहुँच गेल। किछुकाल टिशनेपर अँटकै गेल आ अन्‍हरोखे गंगा घाट दिस सभ कियो विदा भेल। टिशनसँ घाट धरि चुटी जकॉं सत्तरि लगल लोक। केतौ कनीयोँ जगहे नइ जे ठाढ़ो भऽ लोक जीड़ाएत। ससरैत-ससरैत कहुना गंगा घाट पहुँच गेल। दिसा-मैदानसँ आबि चनरदेव दतमनि करए लगल। गामेसँ साहोरक दतमनि अनने छेलए। मुँह-हाथ धोय बेरा-बेरी गंगामे नहाइ गेल। चोर उचक्काक कोनो कमी नइ, जँ एकेबेर सभ कियो नहाइले जेइतए तँ झोड़ा-झंटी लऽ पार भऽ जइतए। लोक तँ गंगाइ नहाइत अछि पुन्‍य समझि कऽ मुदा पापो करैबला ओतइ बेसी होइए। सभ कोय नहा एक-एक डिब्‍बा गंगाजल भरि आनि ऊपर रखलक। पानि तेते घोर-मट्ठा भेल घिनाएल छेलै जे मुहोँमे नइ लइके मन होइत। घाटसँ हटि ऊपरमे एकटा मन्‍दिर छल। ओतइ एकटा चापाकल सेहो छल। सभ कियो धक्कम-धुक्का करैत कल लग पहुँचल। भूख-पियास सभकेँ लगल छेलै अपन-अपन खाएक निकाइल खा-खा पानि पीब, मोटरी-चोंटरी बान्‍हि लेलक। सबहक विचार भेल जे गड़ीमे बड़ देरी छै तँए हम सभ ताबे मेला घूमि देखब। घूमि-घूमि गंगा घाटक मनोरम छबिक आनन्‍द लेब। सभ कियो घुमैत दछिन-पूब दिस गेल। जेतए खाली मुरदे जरै छेलै। लाश अधजरू होइ कि पानिमे धफारि-धफारि कऽ भँसा दइ छेलै। तइ बगलेमे एतेक घिनाएल छेलै जे थुको फेकनाइ अपराधे बुझै छल। नाक-मुँह मुनि सभ कियो पड़ाएल। गंगा कातमे किछु दूर तक घाट बनल। नहाइक भीड़ ओरेबे नइ करैबला। तखन घुमैत सभ कियो राजेन्‍द्र पुल लग आबि गेल। जेना पुल कियो देखने नइ छल तहिना ऑंखि फारि-फारि पुलकेँ देखऽ लगल। घुमैत-फिड़ैत सभ थाकि-हारि गेल। कातिकक दुपहरियाक तिखर रौद भेने गरमी बढ़ि गेल। छाहरिक कोनो असे नइ। भिजलाहा वस्‍त्र माथपर राखि हाथसँ पकड़ि झॉंह बना-बना हाथसँ पकड़ि सभ घुरिया कऽ बैसल। बैसले-बैसल लोक सभ गंगा महात्‍मक चर्च करए लगल। जेकरा जे बुझल-सुनल आकि मनमे फुराइ से बजै छल। तखने बड़की भौजी आ कुपहावाली काकीकेँ रहि-रहि कऽ मन हौंरऽ लगलनि। बोकरि-बोकरि भरली। गंगामे कखनो मरलाहा जीव-जन्‍तुकेँ भँसैत जाइत देखै तँ कखनो मुरदाकेँ, तहिना चारूकात जे घिनाएल देखै से परपंचे ने होइ। चनरदेवक मनमे गंगाक प्रति श्रद्धा-भक्‍ति आ आस्‍था छल ओहो कमए लगलै। कथा-पुराण आ साधु-संतक प्रवचनमे गंगा-महात्‍म पढ़ने-सुनने रहए ओ सॉंच छी की झूठ तइ ओझरीमे ओझरा गेल। तैयो चनरदेव मनमे सवुर बान्‍हि सोचए- जेतए चारू जुगमे लोक गंगा-महात्‍मकेँ मानैत आएल छथि, तेतए हमरा मानने वा नइ मानने की हएत। एतेक लोक जे गंगा नहाइए, की ओइ पुण्‍य-प्रतापे सभ स्‍वर्ग जाइए? आ जे गंगा नइ नहा पबैए ओ की नरक जाइए? तखन तँ केहनो कुकर्म करि लिअ आ गंगा नहा स्‍वर्ग चलि जाउ, सुकर्मक कोनो जरूरते नइ! तही बिचमे सुगापट्टीवालीकेँ बड़बड़ैनी धेलकै। अकचकाइत वीरपुरवालीकेँ कहलक- “दीदी, एगो बात फरिछा कऽ बुझा दथु। जखन गंगा अपने एते घिनाएल अछि आ लोक सभ नहा कऽ अपन पाप धोइए तँ एतेक गंदकी आ पापकेँ गंगा मैया केतए जमा करैए?” वीरपुरवाली काकी सुगापट्टीवालीकेँ समझबैत कहलखिन- “देखै नइ छहक गंगा मैयाकेँ कोनो बखारी आकि गोदाम छै जे ओइमे जमा राखत।” सुगापट्टीवाली- “तखन गंगाजी अपना पेटमे सोन्‍हि–मोइन बना रखैत हेती।” तैपर वीरपुरवाली बजली- “हे हइ, एना अनरगल किए बजै छहक! गंगा मैया एहेन नइ छथि जे एतेक रास पाप आ गंदकीकेँ जमा करत। कथीले करत आ किए जमा करत। पाप आ गंदा तँ लोक करैए। जे करत से ने भोगत। ओ अपने ने पाप करैए आ ने गंदा। सभटा लोककेँ बॉंटि दइए।” सुगापट्टीवाली- “से केना दीदी। एतेकालसँ छी, कहॉं किछु बँटैत देखै छी गंगाजीकेँ।” वीरपुरवाली काकी बजली- “हइ सुगापट्टीवाली, तोरा सनक सोझमतिया जनानी अहू जुगमे अछि से हम नइ बुझने छेलौं। एक गाममे जनमलह आ दोसर गाममे गिरथाइन बनल छहक से ओहिना। देखहक गंगा केना पाप आ गंदगीकेँ बँटै छथिन। जेते लोक गंगा नहा कऽ पाप धोइए ओ अपना-अपना मनक भरम दूर करैए। जखनि ओ डुबकी मारि डिब्‍बामे जल घरक खातिर भरैए, जइ जलसँ लोक तन-मन शुद्ध करैए तखने जेकर जे पाप केलहा रहै छै, तेकरा गंगा बॉंटि दइ छै।” बिच्‍चेमे कुपहावाली काकी आ बड़की भौजीकेँ विषयसँ भँसियाइत देखि सावित्री माए बजली- “बौआ चनरदेव, हम तँ कान पकड़ै छी एहेन करम जिनगीमे फेर कहियो ने करब। ई तँ देखौंस केलौं। असल गंगा तँ सबहक मनेमे बसैए। जे कियो देखबे ने करैए। कहबीओ छै, मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा। रहल गंगा नहा कऽ पाप धोअब आ पुण्‍य लूटब। तँ जखन पाप करबै ने करब तँ पुण्‍यक कोन काज अछि। जखन करमकेँ धरम बूझि करब तखन अधरम किए हएत। जे जेहेन करत तेकर फलो तँ तेहने ओकरा भोगए पड़त। हमरा बुझने ई सभटा मनक भरम छिऐ।” गप-सप्‍पक बीच दुपहरिया बितल कि तखने घर जाइए गड़ी धुधुआइत आबि गेल। सभ कियो गड़ीपर चढ़ि विदा भेल। टिशनसँ चलि जखन गामक सीमा कात आएल तखने सभ कियो तीन-तीन बेर गंगाजी केँ गोड़ लागि बाजल जे एहेन दिन नइ करिहह जे दोसर बेर आब कहियो गंगा नहाइले जाए पड़ए। कान पकड़ि-पकड़ि जिनगी भरिक लेल गंगाजी सँ माफी मांगि लेकक। डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्‍यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि। सौंसे गाममे सोग पसरि गेल। गाममे दलमलित हुअ लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्‍त भेने एकटा युगक अन्‍त भऽ गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक मानैत तहिना आदरो करैत। मुइला पछाति समुच्‍चा गामक लोक दाह संस्‍कारमे पँचकठिया दइले पहुँचल छल। भीड़ बहुत मुदा अखनि धरि अछियामे अागि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ठाढ़, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्‍हरा बनि हे...।” “सभ दिन होत ने एक समाना...।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर...।” भिनसरसँ दुपहर भेल जाइत रहै। अखनि धरि लोक काेन आशामे समए बीतबै छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल। जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखसँ पेटमे बिलाइ कुदऽ लगलै। तखनि जा कऽ विलमक कारणक पता लगबऽ लगल। मलिकपनाबला बात, के हिम्‍मत करत जे आगू भऽ पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करैत रहए। तखने रौदी बाबा पहुँचला। पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने पड़ल। किए एते अबेर भेल। धिया-पुता सभ भूखे लहालोठ होइए!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “अहाँ बुढ़ो-पुरान छी आ गामक अनुभवी सेहो छी, से कनी झबदे पता करियनु जे...।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। ओइ ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल कुटुम सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल...। लगमे जा रौदी बाबा जोरसँ पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकेँ जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्‍द- कहलकनि- “दादा, सभ किछु तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्‍तजारमे छी।” रौदी बाबा पुछलखिन- “से किए?” रूपचन्‍द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकेँ जरौलासँ मौक्षक प्राप्‍ति होइ छै तँए कनी बौकू डोमक बाट तकै छी।” रौदी बाबा बजला- “अहीले एते अबैर होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो भोरसँ आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै।” रूपचन्‍द- “नइ हौ काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, खबरि भऽ गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि।” रूपचन्‍दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकेँ अनरगल लगलनि। तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि। जोरसँ बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके छथि की! जखनि एते बुझै छहक जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब तँ पहिने डोमकेँ बजा लइतह। पछाति लोक सभकेँ बजैबतह। भिनसरसँ दुपहर भऽ गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ भऽ रहल अछि आ बौकू डोमक अखनेा कोनो था-पता नइ छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून। जखनि जे मनमे फुड़ैए सहए करऽ लगैए! नव-नव जोगीकेँ भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग अबऽ लगल। सभकेँ होइ कखनि झबदे आगि पड़ै जे लोक पँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत। मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल। सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्‍द मालिक, कनीले एते लेट भऽ रहल छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल। जखनि बुझै छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककेँ मरलोमे मुक्‍ति नइ भेटै छै, तखन डोमकेँ एते निच्‍चा किए बुझै छिऐ...। जखनि कि जीबैतमे सभ डोमसँ छूबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै छी...। डोमो तँ अही समाजक लोक छी, मुदा गामसँ हटि कऽ वेचारा सभ गाममे बसैए। सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैसि खेनाइ तँ दूर जे बातो ने करैए। एक लग्‍गा फटिकेसँ पुछ-पाछ करैए...। ऐबेरमे कोन असोगरज लगि जाइए...। रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नचऽ लगलनि। मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर धियान गेलनि। जाइते मन जेना आरो चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्‍थाक जलियाएल रूप सभ सोझा अबऽ लगलनि। किछु बाजि नइ रहल छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू डोमसँ कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला तँ हमरो मालिक। हमरा कोनो लोभ-लालच नइ अछि मुदा दान-दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी दऽ दिअ।” रूपचन्‍द एकटा चानीक सिक्का दऽ आगि कीनऽ आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा आ सीताराम दास अपनामे विचार बजला- “ई उचित नइ भेलऽ रूपचन्‍द। जेकरा खातिर भोरसँ दुपहर भऽ गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ सधत। अपनो समांग बूझि बौकूकेँ जे देबै से दियौ, तखन ने बौकूओ अप्‍पन बूझत।” सएह भेल। मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्‍त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल। निगुन गौनिहारकेँ जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि। पुन: गाबए लगला- “सभ दिन होत ने एक समाना....।” स्‍वर्गक सुख कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल। अगल-बगलमे मुसहर सभ सेहो काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल। कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजरि गेल। माघ मासक समए। वस्‍त्रक अभावसँ जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल। जखने घूरमे आगि जरेलक आकि बौकूक बेटा-बेटा सटि कऽ बैसि आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली खोपड़ीसँ बकड़ी निकालैत जोरिसँ बजली- “रातियोँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्‍चा की खाएत। भूखसँ तरपि की बाल-बच्‍चाक संगे कोसीमे डुमि मरब।” बौकू सदाय बाजल- “भोरे-भोर एहेन अशुभ बात नइ बाजू। शीतलहरी भरि कोनो तरहेँ परान बँचाउ। परान बँचत तँ लाखो उपए करब। कनीको समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगाड़ करब। एक तँ कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि।” शीतलहरीक कोनो ठेकान नइ अछि मुदा भूख तँ समैपर लगिए जाइए। बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक। भिनसर होइते जोर-जोरसँ खाइले मॉंगए लगल। बलबावाली पड़ोसीसँ दू सेर पँचि आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक। अपनो दुनू परानी खेलक। ऊपरसँ पानि पीब-पीब भूख मेटेलक। कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल। बलबावाली पतिकेँ कहलकनि- “दू दिनसँ सुखल रोटी आ अल्‍हुआ खा कऽ कोनो तरहेँ दिन कटलौं मुदा आइ भातक कोनो जोगाड़ करू।” बौकू जाड़क कोनो परवाह नइ करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल- “सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब।” साबीकेसँ परसा चौरी सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धानक नामी अछि। चौरी पहुँचिते बौकू बेटा-बेटीकेँ कहलक- “तूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी।” दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक। बेटा-बेटी घोंघी-डोका छिट्टामे उठौलक। जखन घर चलैले तैयार भेल तँ बौकूक पत्नी बजली- “सुतैले एकेटा गोनरि अछि। किछ नार सेहो नेने चलू। बिछौना मोटसँ देबै। ” नार बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक काछुकेँ देखलक। देखिते बौकू काछुकेँ उनटौलक। काछुकेँ उनटा देने भागल नइ होइ छै। उठा कऽ तौनीमे बान्‍हलक। धान आ नार पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घोंघी-काछु लऽ बेटा-बेटीकेँ संग केने विदा भेल। घर पहुँचिते धान रौदमे पसारक। पड़ासीसँ उखरि-समाठ आनि धान-कुटि कऽ चाउर तैयार केलक। कौछक मासु बना रान्‍हलक। दोसर बर्तनमे भात रान्‍हलक। सभ कोइ संगे खेनाइ खाइले बैसल। जाड़क समैमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल भात तेलगर आ स्‍वादिष्‍ट होइते अछि। तैपर सँ कौछक मासु अपने तेलसँ ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो तेलसँ तर-बतर भऽ गेल। बौकू बमरोटिया हाथसँ भात-मासु बँटबो करैत आ खेबो करए। खेनाइ अधपेटा भेल तँ पानि पीब पियास मिझा नहमर सॉंस लैत बाजल- “एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए। राजा-महराजाकेँ नशीव नइ होइ छै। ई खेनाइ देखिते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकेँ सेहो मन ललिचा जेतइ।” भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक। बलबावाली अरामसँ सुतैले ठेहुन भरि नार बिछौलक आ बाल-बच्‍चाक संग ओइपर सुतल। आ ऊपरसँ गोनरि ओढ़ि लेलक। कनीकालक पछाति सबहक देह गरमा गेलै। बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली- “औझका मेहनत साफल भेल। एहेन बिकट समैमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल।” नीक अवसर देख बौकू बाजल- “ई छी स्‍वर्ग सुख। एहेन सुख रजो-रजवारकेँ सुन्‍दर महल आ सजल पलंगपर नइ भेटैए। अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्‍द छै आ बीचमे बौकूक परिवार अरामसँ सुतल छै। नइ कोनो डर-भर छै आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़ै छै।” मिथिलाक माटिमे पसरल कहबी- संकलनकर्ता- राम वि‍लास साहु एक तँ राकस दोसर नोतल। कुमहरपर सि‍तुआ चोख। चट मंगनी पट बिआह। मंगनी बरदक दाँत नै देखल जाइत। खेत खाए गदहा मारि‍ खाए जोलहा। मुँह दुबराक कनियाँ सबहक भौजाइ। बाबाजीक बेल हाथे-हाथे गेल। पढ़ल सुग्‍गा बौक बनल। हगबा मानए बघबाक डर। डूमि कऽ पानि पीबी तँ एकादशीक माइओ ने जानए। चोर-चोर मसिऔत भाय। सड़लो भुन्ना तँ रेहुक दुना। सखुआ सड़ै तँ खैर घमै। पिआस ने जानए धोबी घाट, प्रीत ने जानए ओछी जाति। नीन ने जानए टुटल खाट, चोर ने जानए गंगा घाट। धर्मक सोरि पताल तक। लोठगर देह सि‍लौटी लेने जाए, दलकल-दलकल नैहरा जाए। बनियाँ काटे चि‍न्हारकेँ, कुकुर काटे अनचिन्‍हारकेँ। खाइले लाइ नै, मुँह पोछैले मि‍ठाइ। छोट खिखिरकेँ मोट नांगरि। भोज भारी दालि खेसारी। हाकीम छोट इजलाश भारी। ऊपरसँ फीट-फाट नि‍च्‍चाँसँ सिमरिया घाट। मारि‍ कम बपहारि बेसी। अपने खाए दोसरकेँ लजाए। कोढ़िया बरदक फूंफकार भारी। हँसि कऽ बजै नारी तीनू कूल बि‍गाड़ी। भाए-भैयारी भैंसी सींग जखने जनमल तखने भीन। छोट गहबरमे नमहर पूजा। भादवक ओल कि‍छु खाए राजा कि‍छु खाए चोर। कान तँ सोन नै सोन तँ कान नै। आन्‍हर गुरु बहीर चेला मांगे गुड़ दैत ढेला। पाप नै पापी लजाए आँखि मुनि गंगा नहाए। भजन कम हरिबोल बेसी। चालि‍ चली सादा नि‍महए बाप-दादा। अण्‍डी-बघण्‍डी गाछ भेल सभ पाखण्‍डी महन्‍थ भेल। निच्‍चाँसँ झर ऊपरसँ भर तेकरा नै कोनो डर। माल केकरो कमाल करए कोइ। बकरी करए पाैज तँ महत्तमानि‍ कहै हमरे गड़ियबैए। जुन्ना जरि‍ गेल मुदा ऐंठन नै जरल। आँखि‍ बन्न डिब्‍बा गाइब। भरि‍दि‍न मलहा पानि‍मे नहाइक फुर्सते नै। जनमल बेटा मरल जाइ दोसर ले ओझाइ करए जाइ। मालिककेँ लेबाने नै चोर करए दौनी। छुतहर कहीं घरहर होइ। अरजै काशी भोगए बि‍सनाथ। देहातक दालि‍-भात शहरक सीता-राम। बहिरा नाचए अपने ताल। गज भरि नै फाड़ै थान भरि‍ हारै। तेल घटैत गेल नाच बढ़ैत गेल। जे रोगीकेँ भाबए से वेदा फरमाबए। डाक्‍टर लग गेने दुख ओझहा लग भूत। नंगटे नहाएब तँ गारब कथी। चोरबा कमाएल सभ खाए असगर चोरबा जहल जाए। अनकर दालि‍-चाउर अनकर घी हमरा परसैमे लगैए की। चाउर-दालि‍ केकरो घी परसै दलाल। जड़, जमीन, जोरू जोरकेँ नै तँ केकरो औरकेँ। चोरक आगू ताला की बेइमानक आगू केबाला की। घसटन वि‍द्या लपटन जोर नै कि‍छु तँ थोड़बो थोड़। कनफूकासँ चुल्हि‍फूका नीक। गाए बि‍काएल चरवाहि‍ तरे। पानि‍मे मछरी नौ-नौ कुटि‍या बखरा। बैलक बैल गेल नौ हाथक पगहा संगे गेल। धनि‍ छी अहाँ धनि‍ छी हम चलै छी अहाँ निहारै छी हम। दस सेरे नै अगराइ दस समांगे अगराइ। लगमे कचहरी घूस दऽ बेगार। धूर्त्तसँ मूर्ख नीक। मन हर्षित तँ गाबी गीत। सौ चोट सोनारक एक चोट लोहारक। खाइक मन अपना तँ गोसाइ देलक सपना। बारह बापूतमे तेरह हुक्का तइमे उठै धक्कम-धुक्का। पसेरी भरि‍ नै खाए सेर भरि‍ले रूसल जाए। अनेर गाएक धरम रखबार। केकर खेती केकर गाए कोन पापी रोमए जाए। नमरी जाए तँ जाए मुदा दमरी नै जाए। अपने करनी भेलौं बतरनी। उ दि‍न कहि‍या एतै जे पुतोहु कहत बौंग्‍मरना। गै मौगी तोहर अँगने केत्तेटा। अपन कनही चल गै खोनही। कनही गाएक भिन्ने बथान। अन्‍हरा दुसए डि‍ठराकेँ। अपना ले लल साग तोड़ए चल। घरमे भात तँ पड़ोसनी पकड़ए हाथ। ऐ बेटबासँ नै पोताक आश। हरबरी बिआह कनपट्टी सेनुर। बड़-बड़ जन भाँसल जाए गदहा कहए केते पानि। अपन हारल बहुक मारल कि‍यो केतौ नै बाजैत। झगड़ा ने दंग चुन-तमाकुल बन्न। सत्तरि‍ मूस खा बि‍लाइ हज करए जाइ। दूधगरि‍ गाएक लथार सहए पड़ै छै। नदीकातक चास बैरनी लगक बासक कोन ठीक। वर भेल बुड़िबक तँ जैतुक के लेत। सात रार सात पेट सात बाभन एक पेट। मनुख एक रंगा, जाति‍ बहुरंगा। मि‍थि‍ला मैथि‍लीक झगड़ामे मैथि‍ली डूमि‍ गेल सवर्ण आबि‍ सुरूज भेल। बुड़िबक केर धन भेल तँ कबि‍लाहा कहीं उपास पड़ए। रूसल कनियाँ दूध दूध-भात नै खाए डोका ति‍मल ले घुसकल जाए। हालमे भेल बबाजी तँ दालि‍केँ कहलक बैकुण्‍ठी। लब लौकार बूढ़ बौकार। 100. आपे पुत्ता बापे खाए एक्को हिस्‍सा बाहर ने जाए। 101. सौ रत्ती सोना नै नीक एक रत्ती तकदीर नीक। राम वि‍लास सहु टनका हँसैत फूल देखि‍ भौंरा कहए नि‍त्‍य रहब दु:ख-सुखक संग सूतब अहीं अंक बात सुनि‍ते फूल भेल प्रसन्न झूला झूलब पवन संगे-संग रहब उपवन रहब वन पीअब मकरन्‍द मधुर रस डुमल अंग-अंग सुख-दु:खक संग स्‍वर्ग मि‍थि‍ला जेहने माटि‍-पानि‍ तेहने गाम खेत-खड़ि‍हाँनमे भरल धान-पान अनपढ़केँ दी अक्षरक वोध पोथी पढ़ि‍ कऽ ज्ञानी बनि‍ ज्ञानकेँ घर-घर बाँटतै अज्ञानीकेँ दी काज करैक ज्ञान भूखलकेँ दी दू रोटी भोर-साँझ बनू नेक इंसान आँखि‍ मि‍ला कऽ सभ हाथ मि‍लबै दि‍ल मि‍लबै नै कोइ, जौं मि‍लबै दि‍लमे जग प्रेम सभ जाि‍तमे छोट-छीन झगड़ा अखनि‍ धरि‍ जाति‍-सम्‍प्रदायमे बँटल बौआइए जन कल्‍याण समाजक ि‍नर्माण शि‍क्षाक दान देशक उत्‍थानमे सभक जरूरी छै धन लगाबी समाज कल्‍याणमे होइत रहै आगूओ हि‍त काज बँटैत रहू ज्ञान दहेज रूपी दानव पहि‍ने नै आइ सबल बेकार चक्करमे बेचि‍ कऽ लूटाइ छी भोरक तारा उगल भुरुकबा गमकै फूल भोरु पहर घुमू रहत चि‍त्त खूश माटि‍क घैला पानि‍ निर्मल करै सोना नै शुद्ध मन्‍दि‍र मन शुद्ध ज्ञानी वाणि‍ अमृत आगि‍ नै मुझै हवासँ, मुझै दीप प्‍यास नै मुझै भरल सागरसँ कूप मुझबै प्‍यास पढ़ब नै वेद भेद जानब केना भूखल पेट नै सूतब बि‍छौना खेत उपजै सोना मठ मस्‍जि‍द नै मि‍लै भगवान वन घुमैत नै मि‍लै कोनो देव मन बसै भगवान रोगीक रोग दवासँ छुटैत छै मन रोग नै छुटै छै दवाइसँ प्रेमसँ छुटै रोग नेत्र दानसँ जग इजोत होइ जीवन दान रक्तदान भूदान सँ होइए भुदान सफलताक करू नीक तैयारी राति‍ अपन जागि‍ करू तैयारी प्रयास राखू जारी देशक खाति‍र करब बलि‍दान रक्षा करब देशक छै कल्‍याण काज छै ई महान स्‍वर्गक सुख नै चाही हमरा दुखसँ मि‍लै हरि‍ दर्शन सुख सभ सुखक खान मेहनति‍सँ मि‍लै धन अपार आलस अछि‍ दुखक पैघ राह करू नीक वि‍चार तीन बातसँ राखक परहेज मि‍ठ बोलि‍या चटगर भोजन झूठसँ रहू कात कन्‍याँदानसँ जगमे करू नाम काम महान बड़ पैघ छै काम होइ जग कल्‍याण पंचतत्वसँ बनल छै शरीर अनमोल छै ई जि‍नगीक गाड़ी अन्‍त कि‍ए होइ छै धानक बीज उखाड़ै बोनि‍हार गीत गबैत करै धनरोपनी सबहक खाति‍र बच्‍चा कनैत स्‍कूल जाइ खाति‍र जरूरी अछि‍ कौपी-कलम-पोथी शि‍क्षाक छै जरूरी दूध पीब कऽ बच्‍चा पलै बढ़ैए भवि‍स बनै उपकारी बनैत देशक रक्षा करै माटि‍क मुर्ति हि‍लै-डोलै नै बोलै श्रद्धा जगाबै पान-फूल प्रसाद सँ भक्‍तकेँ मनाबै मानव तन खाति‍र तप करै छै ऋृषि‍-मुनी दर्लभ छै देवोकेँ नै भेटै छै ई तन हाड़-मासुसँ बनल छै शरीर नाश्वर अछि‍ की भेटै छै तनसँ मायामे फँसल छै राजा सेवक छै जनता मालि‍क लोक बुझैत छै उलटे सेवककेँ अछि‍ राजा माि‍लक गरीब लेल जेल जुर्माना अछि‍ नेताक लेल कालाधन खजाना जनता छै दि‍वाला सभ अपन नहि‍ कोइ पराया दुखक साथी निभाबै जे दोस्‍ताना अनमोल खजाना मोती मालासँ शोभा बढ़ैत अछि‍ कंठी मालासँ हरि‍ भजन होइ कोन उपयोगी छै मजदूरक श्रमसँ बनै टुटै घर-मकान मालि‍क छै महान श्रमि‍ककेँ नै नाम चान-सुरूज अकासमे चमकै लोक चमकै छै अपने कर्मसँ जग इजोत होइ आगि‍ जरैत सभ देखैत अछि‍ दि‍ल जरैत नै देखैत कोइ कि‍ए अन्‍तर होइ पानि‍क बून मि‍लि‍ सागर बनै सींचै धरती प्‍यास मुझै सभकेँ नै दाम दइ कोइ मोट रोटीसँ पेट भरैत अछि‍ नीक पोथीसँ ज्ञान बढ़ैत अछि‍ दुनूकेँ छै मान जरैत दीप सभकेँ रोशनी दइ मुदा अपने अन्‍हारेमे रहै छै उपकार करै छै सेना देशक रक्षा करैत मरैत उपकारी छै अपन रक्षा नै देश गर्वीत करैत चोरक माल सभ मि‍लि‍ कऽ खाए उलटे चाेर फाँसीपर चढ़ैए संगे नै कोइ जाइ नाचए बानर भात खाए मदारी बानल कहै माल अछि‍ केकरो कमाल करै कोइ पढ़ल सुगा बोली छै अनमोल बन्‍न पिंजरा कैद रहि‍ कहै छै अजादी केना होइ गाछक फल सभ खाइ जुराइ गाछ नै खाए कहि‍यो आन फल धर्म पालन करै धान-पानसँ मि‍थि‍लामे सम्‍मान धोती-कुर्तासँ गौरव पहि‍चान स्‍वागत करै मखान पकै फसल कटनी दौनी होइ कुटि‍ पीस बनै मधुर भोज सभकेँ पेट भरै बि‍ना खेने नै पेट भरैत अछि‍ नै देखने नयन जुराइ छै नै ज्ञान मुर्ख होइत प्रेमक राह जे चलै सुख पाबै स्‍वर्ग पाबैत सफल जीवनक उत्तम फल पाबै हरीन देत सि‍यारक गवाही दुनू भागि‍ कऽ जंगल चलि‍ गेल सजामे प्राण गेल सौनक साग भादवक दहीसँ बँचल रही आसि‍न-काति‍कक ओससँ बँचल रही चंचल मन चि‍त्त घबराइ छै जान जोखि‍म पैर लड़खड़ाइत राह नै देखाइ छै चोर चोर छै मसि‍औत बनल अधि‍कारी छै पि‍सि‍औत बनल प्रजा साधू कि‍ए छै राधा नचैत वृन्‍दावन-गोकुल कृष्‍णक बंशी बजैत मथुरामे मक्‍खन चोर कहैत आमक डारि‍ झुलुआ झुलै छेलै कोइली बोली सुनि‍ गीत गबैत बौका हँसैत छेलै बाग-वगि‍चा लगबैत सिंचैत आम-लताम खाइत जीवैत छेलै चैनसँ सुतै छेलै रंगक धार बहैत छै होलीमे खूनक धार बहै छै दुर्गापूजा दीप सजै दीवाली मोतीक माला खरि‍दै धनवाला हलुआ-पुड़ी खाइ छै दि‍लवाला दूध बेचै छै ग्‍वाला खीरा छै हीरा भोर पहर खाइ नूनू लगा कऽ साँझ पहर खाइ खीरा तँ होइ पीड़ा गंगाक पानि‍ छै अमृत समान सागर मि‍लि‍ बनैए नोनगर पानि‍ करै छै हाि‍न नार-पुआर घास-पात भूसीकेँ चि‍बा-खा गाए बदलामे दै दूध पी कऽ जीबै मनुख देश अजाद मुदा हम गुलाम भूखल पेट केना खुशी मनेबै स्‍वतंत्रा दि‍वस हमर माए गंगा सन पवि‍त्र नौ मास धरि‍ गर्भ पालन करै मनक बात बुझै पुरान अन्न रोगीकेँ पथ्‍य पड़ै पुरान लोक समाजकेँ बँचाबै पाबै छै ऊँच स्‍थान दुभि‍ घास छै अमर शुभ सभ पूजामे शुभ काज करै छै सम आँखि‍ देखै छै सभ महग कोनो नै अछि‍ सस्‍त मुदा देशमे खून-चून-बेचैनी अछि‍ सभसँ सस्‍त खोजलासँ नै भेटै छै भगवान मन मन्‍दि‍र बसै छै भगवान जे पूजै छै महान आँखि‍ रहि‍तो अन्‍हर बनल छै केना खोजत ज्ञानक आँखि‍ मानि‍ करै जगमे हाि‍न पानि‍ फलसँ जि‍नगी बँचैत छै बि‍नु काज नै आगू चलै जि‍नगी रूकि‍ते अन्‍त होइ वि‍द्वानक छै मि‍थि‍लामे खान बढ़बै शान करै ज्ञानक काम पबै मान-समान गरीबकेँ नै मान अमीर करै अमीर कहै से गरीब करै छै दुखे दुख सहै छै मोह-मायामे सभ फँसल अछि‍ उबरि‍ नहि‍ सकै जगम कोइ कर्म अधूरा होइ धनक चि‍न्‍ता मौतक कारण छी चीतासँ चीता चढ़ि‍ भष्‍म बनि‍ कऽ माटि‍मे मि‍लैत छै वि‍द्याधन छै अनमोल रतन खर्चसँ बढ़ै नहि‍ छीनै छै राजा नै चोरबै छै चोर फूलक मांग देखैत खेति‍हर फूल लगबै हाट-बजार बेचि‍ धन-कमबैत छै आत्‍मा अमर अवि‍नाषी होइ छै चोला बदलि‍ रूप रंग देखबै रहस्‍य नै जनै छै आगि‍ जरैत सभ देखैत अछि‍ मन जरैत नहि‍ देखै छै कोइ बि‍नु प्रेम नै बुझै फूलक रक्षा काँट-पात करै छै संगे रहै छै सुखक संग फूल काँट दुख दइ छै कोइली बजै अधरति‍या उठि‍ प्रेमक बोल प्रेमी छै बि‍छुड़ल पि‍या नै भेल भोर चि‍ट्ठी-पतरी केना लि‍खब पि‍या भेजै नहि‍ छी खबरि‍ ने सनेस अहाँ छी परदेश खेलसँ राखू सभ लोकनि‍ मेल स्‍वस्‍थ्‍य रहब तन रहत चुस्‍त मन रहत खुश देशक लेल खेलब सभ दि‍न कठि‍न खेल नाओंक लेल नहि‍ देशक गौरव ले ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु

'विदेह' १७७ म अंक ०१ मई २०१५ ( वर्ष ८ मास ८९ अंक लिन; २५७५७ ) लिन ऐ अंकमे अछि:- राम विलास साहु- fre विहनि कथा/ तीनटा लघु कथा- गंगा नहाएब/ डोमक आगि/ स्वर्गक सुख राम विलास साहु- fre विहनि कथा मिधिलाक माटिमे पसरल कहबी - संकलनकर्ता- राम विलास ATE राम विलास साहु- टनका राम विलास साहु- fre विहनि कथा स्कूलक खिचड़ी एकटा अभिभावक तमसा HS स्कूल USAT | हेड मास्टरकें उपराग दैत बजला- “पढ़ाइ-लिखाइ FT जएह-सएह होइए। खाली खिचड़ीयेमे बेहाल रहै छी। जखनि घिया-पुता पढ़बे नै करतै cart तैँ हाकिम-हुकुमक तैँ बाते छोड़ चपरासियो नै बनतै। एसैं नीक a प्राइवेटे स्कूल ने जमे दूटा पाइये ने AAD, पढ़ाइ a नीक @s छै। आइ तक ऐ स्कूलक बच्चा पढ़ि क५ कोन नाम कमेलकै |” ही

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA चोर-सिपाही माघ मास अन्हरिया राति। ओस-कुहेससैँ हाथो-हाथ ने सुझैत | एकटा चोर चारि Hs भागल जाइ छल। तखने एकटा सिपाही गस्तीमे आबि रहल छल | चोर सिपाहीकें देखिते भागल | चोर बूढ़ छल Far सिपाही बलंठ wel | भागैत चोरकें रपटि Hs पकड़लक सिपाही | पकड़ि हाजति लेने जाइ छल | चोरकें डंढ़ासँ देह थरथराइ छल | मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथरस बचब। थोड़े आगू चलि ms देखल जे सड़कसैँ Sle एकटा घूर रहै । आगि देखिते चोर बाजल- “सर, Tel Ta रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बिड़ी नेसने अबै छी?” सिपाही कने सोचि ws बाजल- “अरे, हूँ हमरा मूर्ख ast SU आ जे तूँ भागि जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसैँ AS सुनगेने अबे छी POO 3

वि दे ह विदेह Videha = www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसैं- “भैया आइ-काल्हि तँ गामोक TEA बड़ सुविधा Ve S at पढ़ाइओ होड़ छे तैयो विद्याथी ay शहरक स्कलमे किए पढ़े छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्कूलमे रोजगारक पाठ पढ़ने |” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक | कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्कूलमे UST पाठ पढ़बे छै जे HEAT साक्षर AS जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती HAT | अन्न उपजा HS अपनो खाए आ आनोकें खियाबए | ई छिऐ ने इमानदारीक पाठ Fal शहरक इस्कूलमे विद्यार्थी सभकें रोजगारक पाठ पढ़बै B | att सभ पढ़ि-:लखि रोजगार लेल आन-आन शहर चलि जाइ S | अपन घर-परिवार आ समाज सेहो छुटि जाइ B | Tas बेमुख ys Ws छै | आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” OOO 4

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA बौआ बाजल पढ़ल-लिखल बेरोजगार छी मुदा दिन Sar He छल तकर कोनो सुधि-बुधि नै छल । Sa परिवारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्छा रहितो किछु नै क५ सकलौं | एक दिन मनमे फुराएल जे few नेना-भुटकाकें पढ़ाएल जाए। अहुना ct हम बुड़िआएले छी औरो बुड़िया जाएब। एक दिन भोरमे बौआ-बुच्चीकें ओसारपर vest well | दुनू बेरा-बेरी Wa YSU आ हम उत्तर as छेलिऐ। अहिना स्थितिमे बौआ पुछलक- “लोक Ud मेहनतसैं किए पढ़ैए, जे पढ़ैए Sel आ जे नै पढ़ैए ओहो तैँ एक ने एक दिन मरिऐ जाइए?” बौआकें हम समझबैत कहलिएऐ- “जीवन-मरण हैँ प्रकृतिक निअम ch | ओ निरंतर होइत रहैत अछि ।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक किए पढ़ेए?” “मनुख पढ़ि-लिख ज्ञान अर्जित करैए आ atts ज्ञानसँ अपन जिनगीकें सुलभ बना असली जिनगी जीबैए | लोक पढ़ि-लिखि डाक्टर-इंजिनियर, औफिसर, कवि लेखक आ उपदेशक इत्यादि बनैए | अच्छा ई कहह जे तूँ की बनब५?” बौआ बाजल- “हम पढ़ि-लिख कोनो काज Hs सके छी Yer कवि-लेखक नै बनब | सभ कमा Hs सुख-मौजसँ जिनगी बितबै छथि qa कवि-लेखककें कोनो कमाइ नै होइत OFS | अखबारमे पढ़लिऐ जे मरला बाद पुरस्कार Res” OOO 5

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA घूसहा घर- मुखियाजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल Steel दियौलनि | गामक लोक सभ एकजुट Bs आम सभामे पहुँचला | सभाकें संबोधित करैत मुखियाजी बजला- “ऐ बैसारमे सभ feat मिल fete लिअए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जिनकर घर टुटल-फाटल SS वा रहबा योग नै Ss छै। ओइ व्यक्तिक सूची बनाएल SS | हुनका सभकें सरकार तरफ घर बनबैले इन्दिरा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतनि ।” वार्ड सदस्यक Tears मुखियाजी लग इन्दिरा आवासबला सूची पहुँचल | fers मुखियाजीक दलाल ay सूचीमे नामांकित cafes we ms एक-एकटा फार्म es कहि देलक जे फार्म भरि क$ मुखियाजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लड़ जाउ | संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दिअए Ged | तखनि इन्दिरा आवास भेटै जाएत। बहुत Me तँ अपन गाए-महिःस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि Hs रूपैआ gs रूपैआ उठेलक | fee आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै at वंचित रहि गेल । बदलामे पाइबला लोक अपना AA उठा लेलक | fre दिनक बाद रघिया मसौमात इन्दिरा-आवास ले फार्म भरि मुखिया जी लग पहुँचलीह | मुखियाजी फार्म पढ़ि बजला- “पहिले इन्दिरा आवासमे पचीस हजार भेटै Set आब चालिस हजार Ae छै मुदा आगू भेटैबला साइठ हजार भेटतै। TSA पच्चीसमे पाँच हजार an अखनि चालिसमे दस हजार खर्चा लगे S मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै |” रघथिया सुनिते कानि-कलपि क$ अपन मजबूरी सुनौलकनि | मुखियाजी मुड़ी डोलबैत बजला- “Ts काकी, GR HAL नै ने Be B, डेगे-डेग हाकिम-हुकुम बैसल छे | ओहो तैँ कटिया aT ws रखने रहे छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा He छे aug a ata निमहै छिऐ। a ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो |” सुनि रघिया सभ बात सुनि परिस्थिति बूझि आपस आबि गेलीह | बुधनी बुढ़िया maa aad उमेरगर । जुआनियेमे घरबला बाढ़िमे डुमि मरि गेलखिन | Get बेटाक संग बुधनी कहियो हिम्मत नै हारलि। संघर्ष ata आत्म-रिःनर्भरतापर घियो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छथि। हलाँकि आर्थिक रूपे कमजोरे BFE | एक दिन मुखियाजीक नजरि बुधनी बुढ़ियापर पड़लनि आ देखिते पुछलखिन- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तैँ दूटा लाभ भेटतौं | एकटा वृद्धा-पेंसन ओ दोसर इन्दिरा आवासक ।” बधनी बजलीह- “Ua कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखियाजी- 6

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA "हैँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्दिरा-आवासमे पनरह हजार ।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब ।” मुखियाजी- “किए नै लेब?” बुधनी- “घूस ES HS घर बनाएब F ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखियाजी आ बुधनी बुढ़ियाक गप अपना घरक कोनचर लगसँँ रधिया मसोमात सुनैत छलीह अपना AA बुझबैत बजलीह- “इन्दिरा आवास किए घूसहा घर कहियो ने ।१000 7

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA जातिक भोज ais फूलबाबूक बेटाक बिआहक भोज अछि | गौआँ सबहककें आशा छेलनि जे ई भोज हमरो सभकें खेबाक अवसरि Fed | किएक FU भोजकेँ सफल बनेबाक लेल बहुतो जाति-वर्गक लोकक सहयोग छेलनि। कियो जारनि फारए तैँ कियो साफ-सुथरा करए | कियो बर्तन-बासन माजै छल | गामक डोम aaa बनल छिट्टा- पणथणिया, SHA, डाल-दौरा, चडेरा बना देलक | मालि फूल आ फूलक माला, कुमहार वर्तन-वासन, महला पोखरिसँं माछ मारि मनक मन ढेर लगौलक | कतेको करीगर आ हलुआइ सभ भोजक TA बनबैमे भिरल छल | भोजमे सहयोग तँँ सभ जातिक लोक द्वारा भेल | Yel खाइक अवसर सभकें नै भेटलनि | ओतबे नै, किनको नगद टाका देल गेल तँ किनको उधार रहलै आ किनको सीदहा भेटलै | मुद्दा भोज खाइक नोत BAH नै भेटलै । भोजक आयोजक भलहिं फूलबाबू छला Fal करबारी तँ सभ जातिक लोक छेलखिन | किछु लोकक मनमे, जिनका सभकें नोत नै देल गेलनि | हुनका सबहक TAA ईहो SPS जे काज जखनि नै wanes कै तैँ पाँतिमे बैस खेलापर पाँति Hat छुबा जेतै 000 8

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly cjournal fee प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका"विदेह' १७८ म अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हक मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA शिक्षाक महत जीबछ घरजमैया छल | हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि छलि । wear पिताकें चारि बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल । खेती-बाड़ीसँ जिनगी wet छेलनि । सोझमतिया रहने कोनो क्षल-कपट नै रहनि | पितमरू Sel | परिवारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहनि खाली जीबछ ट-ब HU HS साक्षर छल | रघियाक पिता जरूरति पड़लापर जखनि समाजमे कोनो लेन-देन करै Gell तैँ औंठेक निशान os छला। एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि-पानिसैं दहि Tet | ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलै। दोसर साल रौदी भड गेलै। एक st बाढ़िक मारल, दोसर रौदीक जरल | गरीब-गुरबाकें गुजर कटनाइ पहाड़ भड गेलै। केतेको परिवार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा fies दिन समए कटकल | मुदा ई सुविधा सबहक नशीव नै छेलै। गामक Te जमीनदार, मालिक-गुमस्ता जे छला हुनका तैँ पहुलके सालक पुरना अन्न बसारीक-बखारी भरल छेलनि | हुनका सभकें कोनो चिन्ता नै छेलनि । रघियाक माए- बाप बूढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत | ओ दुनू गामेमे Aric कहियो मरूआ तैँ कहियो धान ct कहियो छाँटी चाउर Hull AS समए Hie छल | Hol देनिहार मालिक सभ विपतिक समैमे गरीबक शोषण सेहो करैत । एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत | तेकर बादो औंठाक निशान एकटाकें के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लड़ छेलखिन | गरीब अपन परान Sa आकि छापक परबाह करत | कर्जा खेनिहार थोड़े बुझे छल कि छाप Ta कागतपर आ हमर जमीन जत्था चलि जेतै THAT | एक दू साल समए बितलै। जीबछ अपन सौसुराइरिएमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी Hs गुजर-बसर at छल | किछु समए पछाति सासु-ससुर मरि गेलखिन । श्राद्ध-कर्मसँ निवृत Ae छल आकि गामक मालिक- गुमस्ता लोकनि अपन-अपन कागत AS जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला | कर्जा तँँ करारीपर देने रहनि । ओ अवधि बीति गेल छल। कर्जा खेनिहार पहिले कागतपर छाप देने रहनि । ओइ कागतपर मालिक-जमीनदार लोकनि जमीनक खाता-खेसरा रकबा लिखि ws अपन नाओं क$ लेलनि । गरीब सबहक जमीन मालिक-गुमस्ता हरपि लेलकनि। जइमे रधियाक जमीन सेहो चलि गेल | आब जीबछ-रघियाकें get बेटी, एकटा बेटा at परिवारक भरन-पोषण करनाइ कठिन Us गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि गेल । बाहरमे पढ़ल-लिखल आदमीकें नोकरी जल्दीए dis Sat आ बेसी दरमाहा सेहो At छेलै। जीबछ बेसी पढ़ल तैँ नै मुदा साक्षर Bet! जइसैं शिक्षाक महत जिनगीमे केतेक होइ कै से मोने-मन महशूस करै छल | जीबछ ट-ब-ट काए कहुना क$ चिट्ठी लिखि घर पठेलक | ओइमे बेटा-बेटीकें पढ़बैले रथियाकें प्रेरित करैत we छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए HS पठाएब Yar अहाँ घिया-पुताकें पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब | MAA मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शिक्षाक बड़ Hed छै । जे हम आ हमर माए-बाप Su नै पढ़ल छेलौं तैए ने सभटा जमीन मालिक-गुमस्ता aft लेलनि। जखनि पढ़ल रहितौं FS मुसिबत नै अबिताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा घिया-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब | अइले हमरा जे परिश्रम आ तियाग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दिन अपन घिया-पुताकेँ समैपर संगे जा स्कूल पहुँचाबए लगली | रघियाक टोलेमे बुच्ची बाबू छला | बुच्ची बाबू अंचलमे बाड़ाबाबू छथि | छुट्टीमे घर आएल छथि। हुनका orice AR ट्रेन पकड़ि ड्यूटीपर जेबाक छेलनि से रघियाकेँ कहलखिन- “रथिया, fers सामान अधिक अछि | गाममे कएक गोटेकें कहलिऐ जे काल्हि भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी सामान स्टेशनपर पहुँचा feat, मुदा feat तैयार नै भेल । तूँ कनी पहुँचा ae! हम तोहर बड़ उपकार मानबो |” 9

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA रथिया बाजलि- “ठीक S, कअए बजै चलब | His fat हम समान पहुँचा देव |” बुच्ची बाबू बजला- “सात बजे भारेरेमे चलब | किएक a आठ बजेमे ट्रेन ठै । तीन-चारि किलो मिटर स्टेशन दूरो छै ।” रिया भोरे उठि सभ काज Hs जलखे बना घिया-पुताकें खाइले Es बजली- C3; सभ Tea खो, आइ कनी पहिनहिए तोरा सभकें स्कूल पहुँचा as छियौ, Ta बुच्ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब ।” WR बुच्ची बाबू तैयार Us रघियाक बाट तके छला | पाँच मिनट पछाति रघथिया पहुँचली | Tet बाबू तमसाइत बजला- “Sea, AT कहने छेलिओ साते बजै चलैले, देरी as गेल । ट्रेन छूटि जाएत । तोरा कोनो चिन्ता नै ।” रथिया बजली- “अपने तमसाउ नै। धीरे-धीरे बढ़ हम समान लेने लफरल पिट्वेपर आबि रहल छी। कनी घिया-पुताकें स्कूल पहुँचबैमे देरी लागि गेल ।” बुच्ची बाबू- “पहिले सामान पहुँचा asd, हमरा ट्रेन छूटि ssa | एक दिन तोहर बेटा-बेटी स्कूल नै जेतौ तैँ की हेतै। Um fea कोनो पढ़ि क५ कलक्टर बनि जेतौ?” रथिया मोने-मन सोचए लगली, He छियनि आगू asa से उठिए ने होइ OFS हम तँ लफरल हिनकासँँ पहिनहि पहुँच जाएब | ट्रेन थोड़े छुटतनि | अपने बेगरते आन्हर छथि। अनेरे गछलौं (000 0

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA ई छी हमर मजबूरी जमुना बाबाक दुआरिपर सतसंग-प्रवचन Bs छेलै। भीड़ देखि हमहूँ ससरि ws गेलौं आ बैस सुनए weit | प्रवचनकर्ता सेहो ज्ञानी आ विद्वान बूझि पड़ला। ओ मनुखक जिनगीक समरूपता बतबे Ge | कहब रहनि जे सभ मनुख एक समान छी । सभ एके ईश्वरक संतान छी आ सबहक अत्मामे एके परमात्माक अंश रमि रहल-ए। मुदा हम तैँ बड़ अंतर VA SH सबहक क्रिया-कलाप, रहन-सहन आ खानो-पानमे बड़ पैघ भिन्नता अछि | केकरो बोरे-बोरे नून आ केकरो रोटीओपर ने नून। कोइ खाइते-खाइते मरैए आ als खाइए बिनु मरैए । केकरो बीघा-बीघे कोठा-सोफा केकरो खोपड़ीओपर आफत। कोइ रौदे-वसाते जरि-मरि काज RT तैँ कोइ ए.सी.मे मौजु करैए | कियो उड़न जहाजसैं देश-विदेशक यात्रा करैए तँ कियो पएरे चलि-चलि सड़केपर पराण तियागैए। किनको बिमारीक इलाज करोड़ो Stars विदेशमे होइए F किनको पराण साधारण इलाज बिनु चलि जाइए। ऐ सभ मुद्दापर सोच-विचार करैत जखनि प्रवचन खतम भेल तखनि हम हुनका लग जा कहलिएऐ- “महराज, अपने प्रवचनमे सभ Aah समरूप बतौलियनि | मुदा हम तैँ बड़ अन्तर देखे ST से कनी फड़िछा HS कहियौ |” प्रवचनकर्ता मधुर TA बजला- “Sa ठीके arg कहै छी । हम जे प्रवचनमे कहलौं सेहो ठीक आ sel जे कहै छी सेहो ठीक ass प्राकृति द्वारा जे सुविधा मनुखक Aa उपलब्ध S ओ समरूप छै | मुदा मनुखक बीचमे जे अन्तर कै से अन्तर बेवस्थामे कमीक कारणे छै | मनुखे मनुखक दुश्मन fT | जे जेते सबल छै ait ओते दोसराक हक मारि बेवस्थाकें दुरूपयोग at छै | जहिना हाथीकें दूटा दाँत Ss S एकटा खाइबला आ दोसर देखबैबला तहिना बेवस्था करैबलाकें दू नजरि As छै । कथनी आ SAM अन्तर रखने कै । ऐ ay बातक विचार- अनुभव मनुखकें अपने करए पड़तै। ओकर समाधान लेल Tas करए पड़तै। बिनु मांगने a भीखो नै fact छै। ई a अहाँ अधिकारक बात करै छी। जौं हम प्रवचनमे समरूपताक बात नै Hed Gd बेवस्था हमरा नै ने जीबए देत। अहाँ जकाँ जौं हमहूँ प्रवचनमे बाजब Ft कहिया ने हमरा जमपुरी पहुँचा देने say | यहए St हमर मजबूरी "OOO 4

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA बाल-बोघ दुखीलालकें दुखक पहाड़ mead कहियो निच्चाँ नै भेल। बूढ़ माए-बापक सेवा cea, तैपर सैं दूटा भलद़ेरबा बेटी, छोट-छोट दूटा बेटा, पत्नी आ अपने कुल आठ बेक्तीक परिवार | पत्नी- फुलिया- परिवारक काजमे पिसाइत छेली। सासु-ससुरक टहल-टिकोरा आ सेवासँ पलखतिए नै। Sas एकटा पोसिया गाए, एकटा भजैतिया बरद | मुदा दुनू बेटी चठेलगरि आ हुनरगरि छन्हि | घरक कमौआ दुखीलाल असकरे दिन-राति फिरिशान रहैए। घरक खर्चा पुग्बे ने करैए जे पलखति मारत। खेतीओ-पथारी कम्मे भेने जने-बुत्तापर घरक खर्चा चलैत अछि। जखनि खेनाइओ-पीनाइओमे ढनसने तखनि बेटा-बेटी ved केना? बर्खक पेसतरे दुखीक माए लकबा tore मरि गेली । पछाति बूढ़ बाप सेहो MTS रोगा-सोगा दम तोड़ि देलकनि | श्राध-कर्म आ भोज-भात कर्जे हाथे भेल | दुखीलालकें एक-सबा कट्ठा डीह, तीन कट्ठा चौमास आ छह-सात कट्ठा तीन-फसिला खेत छन्हि। Ss छह मास परिवारक गुजर चलै OFS | जन-मजदूरी ws शेष छह मास बितबैत अछि | ger अखनि af चौमास आ तीन-फसिला खेत दस हजारमे डेढ़ा सूदिपर भरना लगि गेल अछि | तैपर सैं Ger बेटीक बिआहक अलगे। दुनू बेटा अखनि बाल-बोध! समस्या-पर-समस्या लदल जा रहल अछि | जैं चारि-पाँच साल खेत-भरना रूपैआ आ सूदि नै भरब तैँ खेतो सूदिए तरे चलि जाएत | गाए बिकल चरबाहियेमे कहबी सन STA | एक दिन दुखीलाल बैसारीए छल | fee सोचैत छल आकि मनमे उपकलै खेतक भरना | जड़ Aas हमर बाप-दादा परिवार चलबै छला वएह खेत हमरो जीविका अछि | मुदा आब बूझि पड़ैए ओ खेत बिलटि जाएत। ऐ क्रममे सोचैत दुखीलाल टहलि मालिक प्रभूनाथजीक द्रबज्जापर पहुँचल | प्रभूनाथजी दुखीकें देखिते कहलखिन- “आबह दुखी, एमकी बहू दिनपर Ye करए एलह ।” दुखीलाल- “मालिक, sett कथी छुपल अछि | ude fers माए-बापक HET रीन उतारलौं मुदा अपनेक रीन केना चुकाएब से फुड़ेबे ने करैए ।” प्रभूनाथजी- “केना Gas से a तोहर काज छिअ। asa हम किए मगजमारी wea | साले-साले हमरा रूपैआक Shel सूदि बढ़ेत Sag | पाँच सालक कराड़ी छह, नै चुकेबहक a खेत Biss Teas |” दुखीलाल- “Tah, एना नै ने बाजू Baw नाओं सुनि हमर करेजा फाटि जाइए। ई खेत हमर खनदानक पूजी आ इज्जति छी | अपना जीबेत हम केना बिलटए देब |” प्रभूनाथजी- “से तैँ तूँ ठीके He छह | रूपेआक सूदि जोड़ि Goal Hs दहक आ अपन खेत छोड़ा लैह ।” दुखीलाल- “मालिक, अहीं क दरबारमे जन-मजुरी ws जीब लेब | रहल अहाँक रूपैआक AR, तड़ एबजमे हम अपन दुनू बेटाकें अहीं ऐठाम नोकरी राखि os छी। बैंचलोहो बासि-बेरहट खा जीब लेत आ अहूँक काज 42

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA चलत | STUER अहाँक रूपैआक सूद-मूर नै सधत ताधरि अहीं क दरबारमे नोकर बनि खटि देत | रूपैओक चुकता AS जाएत आ हमरो खेत छुटि जाएत |” प्रभूनाथजी- “कहलह a बड़ नीक | युक्तिओ तोहर नीमन छह मुदा... |” दुखीलाल- “acre “मुदा' किए कहलौं?” प्रभूनाथजी- “मुदा ऐ दुआरे बजलौं कि तोहर बेटा दुनूकें तै देखने नै छी । अबोध अछि आकि बाल-बोध ” दुखीलाल- “बल-बोध अछि | Spank, एकबेर सेरिया Hs बता देबै TF दोसर बेर अढ़बए नै usa | देखिते-देखिते फुर्र-फुर काज HS देत | एक्को मिसिया असकतिया नै अछि ।” प्रभूनाथजी- “बेस काल्हिए Gh TAM alas | ATS देखियो लेब आ काज He जोकर अछि कि नै सेहो ठेकानि लेब ।” दुखीलाल- “बेस मालिक, जाइ छी काल्हिए दुनूकें संगे AA atest छी ।” दुखीलाल अपन कर्तव्यकेँ हीन बूझि चिन्तामे डूमि गेल । हम केहेन बाप छी जे बाल-बोध बेटाकेँ भोजन- बस्त्र-शिक्षा इत्यादि पूर नै Hs अपने बेगरते नोकरी लगबै छी । बेटा-बेटी राजाक हुअए आकि गरीबक सभकें अपन GA दुलरूआ Bs कै । जखनि नमहर-बुधिगर-ठकनगर हएत a की Hea! हमर बाप केहेन निष्ठुर छथि जे हमरा संगे एहेन अन्याय केलनि | मुदा हमरा लग TEA कोन अछि | दोसर कोन SUT लगा सकब | मोनक बात AMA रखैत हदैकें सक्कत HS बिहाने भने पनिपिआइ करा संगे नेने प्रभूनाथजीक दरबार पहुँचल | दुनू बाल-बोध भाए गांगी-जमुनी, देखैओमे बड़ नुनुआगर, उमेरो आठ-दस बर्खक | ETA जीकें मनमे भेलनि बड़ नीमन टहलू BUA | मुदा अनठबैत बजला- “दुखी दुनू बौआ a अखनि लेधुरिए अछि । हमरा ऐठाम कोन काज करत। ऐठाम तैँ भीड़गर काज अछि |” दुखीलाल बूझि गेल जे मालिक हमरा टाड़ि रहल अछि | बाजल- “मालिक, Ble देखि झुझुआउ नै UH छोट-छोट सभ काज करत । गाए-बरदक कुट्टी-सानी, ASM, माल-जालक TAM आ गोहाल घरक झार-बहार करत | गोबर-करसी ढुल-ढालकेँ हटाएत। अहूँकें कियो टहल-टिकोरा करैबला नै अछि सेहो अपन समझि करत | Ag अपने पोता सन बेवहार HT घरे ने बदलि जेतै मुदा ted F गामेमे । अहाँ लग रहत तैँ हम निफिकिर tea ओना हमहूँ J अबिते-जाइते weal” प्रभूनाथजी- “दुखी, See ने गाम-घरक बात Ht छह | लोक SF शहर जाइले जान गमौने अछि ।” 3

वि दे ह विदेह Videha = www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA दुखीलाल- “मालिक की कहब, लोक तैं fas Us गेल अछि | जेतै पेट WLS sited खोंता बना रहैत अछि ।” प्रभूनाथजी- “से ठीके GR बेटाकें नै देखे Sew | गाम-समाज छोड़ि हैदराबादमे WT | पावनि-तिहार Ff हम जाबे जीबै छी ताबे HEAT Hs Ts छिऐ, Fa घरक देवताकेँ एक चुरुक पानिओ के देत ।” दुखीलाल- confer, छोड़ दुनियाँ-दारीक गप-सप्प | हमरो काजपर जाइक अछि | और गप-सप्प दोसरो दिन et | दुनू बाल-बोधकें सम्हारू ।” प्रभूनाथजी- “दुखी, कनी आर dae | ई दुनू बौआ अनचिन्हार अछि | कनी बतिया लड़ ST नाओं बूझल tet SF समैपर समझा-बुझा देबै । नै तँ पोसो नै मानत | ee तैँ बुझबे करै छहक जे हमरासँ GA Sach खटपट F नै हएत मुदा हमर बुढ़ियाक सोभाव आ बेवहारकें तैँ तूँ नीकसैँ जनै छह, ओ ae cer जकाँ दिन भरि फटफटाइते रहै छथि | तेहेन झनकाहि अछि जे Hats पटरीए ने खाइ S| दिन-भरि पूजे-पाठमे लगल रहैए, दिनक भोजन Ufa आ रतुका AA पाड़न करैए | जैं कियो लागिओ-भीड़ीओ देतै तँ Hed जे हमर सभ किछु GA गेल | एकबेर के कहए जे तीन-तीन बेर नहाएत आ गंगाजलसैं शुद्ध करत | बेटो-पुतोहु आ पोता-पोती जखनि atau तैँ देखिते बनरनी जकाँ लड़िते we | तखनि हमर जिनगी केहेन अछि से बिनु कहने बूझि गेल हेबह |” दुखीलाल- “मालिक, $f घरक बात छी | ओइमे हम किए दखल देब | मनुखो कोनो एक्के रंगक SST | लोक अपन सुख-दुखक सृजन अपने करैए | अपजश aA लगबैए |” बात समटैत दुखी दुनू बाल-बोधक दिस इशारा केलक | प्रभूनाथजी पुछलखिन- “बौआ, नाओं की छिअ?” दुनू भाँड एक्के स्वरमे अपन-अपन नाओं बाजल- “बुधन-बेचन |” प्रभूनाथ- “मुँह Tad छह | fs खेबह?” दुनू भाँड बाजल- “नै, पनिपिआइ कड लेने छी ।” प्रभूनाथजी- “तोहर बापक HET अछि जे दुनू Als अहीठाम काज करत से करबहक ने?” बुधन- 4

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA “< ।” प्रभूनाथजी- “अपन HIT HET सभ HUT मुदा बीरानक काज कियो करैए आ कियो नै करए चाहैए |” बुधन- “हम अपन आ बीरानमे नै बुझे छी | काज HTT” दुखीलाल बूझि गेल जे बात बढ़ि जाएत | बातकें सम्हारैत बाजल- “मालिक गरीबक बेटाकें कथी परीक्षा लड़ छिऐ । जे Hes से करत ।अबेर Ys गेल काजपर जाइ छी ।” प्रभूनाथजी- “कनी दरमाहा फरिआ लैह जे पछाति कोनो मुहाँ-ठुठी ने हुअए |” दुखीलाल- “मालिक, दरमाहा की Sd | Seta SUS दस हजार AA छी | सालमे VARS हजार BUA | Ta-Tas सए Stan महिनाक हिसाबसँँ दुनू Nise एक हजार भेल | पनरह महिनामे अहाँक रूपेआ फरिया जाएत, नै मानब तँ एक मास बेसीए wale देत | हमरो खेत छूटि जाएत । ने अहाँकें दिअ पड़त आ ने हमरा | दुनू ATS AH दरबारमे खाएत-पीअत HT अहाँक अनुकूल करत |” प्रभूनाथजी- “ठीक छै मानि लेलिअ। ct: a eas तेज निकललह। हम तैँ बाल-बोधक फेरमे अबोध बनि iit 000 45

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA अबिसवास काल्हिए नूनू बाबूक बेटीकें बिआह छी । नूनू बाबू बिआहक सरमजान सबहक ओरियानमे लगल छला। fired आ सम्पन्न परिवार रहितो रूपैआक अभाव छेलनि। चारि लाख टाका, पाँच भरि सोना आ एकटा मोटर साइकिल देहेजपर बिआह फाइलन भेल छल। Gael इंजीनियरिंग कौलेजक छात्र । सुखी सम्पन्न परिवार । दुलहाक पिता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफिसक बाड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने OPA GT नूनू बाबू अपन बेटी सुचिताकें हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छथि । नूनू बाबू बहुत परियास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकिल, दू भरि सोना तिलकक समैमे चुकता HS देलनि। शेष तीन भरि सोना बेटीक गहना स्वरूप बिआहे दिन देब आ एक लाख रूपैआ जे बैंकियौता रहि गेल ओ बेटीक aA एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि । जे टू तीन मास पछाति मिलत Set चुकता Hs देब | तिलक भेला पछाति fasten दिन ठेकल गेल । मुदा दुलहाक पिता मोहन बाबू बड़ लोभी । ओ मोने-मोन सोचलनि, पुतोहु जखनि हमर हएत तैँ एल.आइ.सी.क रूपैआ ans ने काल्हि हमरे हएत | बैंकियौता Star बिआहरं पहिने as लेब a लाभमे रहब | मोहन बाबू बिआहरँँं एक दिन पहिने समाद नूनू बाबूक घर पठौलनि जे हमर एक लाख टाका बैकियाहा अछि ओ Stan gad करि feat तखने बरियाती जाएत नै तँ अहाँ जानू EL बाबू समाद सुनिते जेना देहपर बज्जर खसि पड़ल | ओ सेचमे पड़ि गेला । होश सम्हारि मोहन TES We Hs बड़ विनती केलनि | अखनि ऐ लेल माफी दिअ। हम बेटीबला छी | बहुत चीज-बौसक ओरियान करए ved | तैपर सै बरियातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत | मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकें एकोटा बात नै सुनलकनि, आ ने आँखिक AR पोछलकनि | तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तैँ अहाँ बरियाती as HS as, हम द्रबज्जेपर बिअःशहरसँँ पहिने Stan बरियातीए घरमे चुकता करि ta तखनि बिआह करब |” नूनू बाबू खेत भरना रखि रूपैआक ओरियान daft बरियाती समैपर आएल | सबहक सुआगत भेल । दरबज्जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पिता- मोहन STH चुकता Hs देलनि | दुलहाक परिछन भेल, वरमालाक HT शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहिने दुलहिनकेँ देखता | पसिन भेला पछाति ने बरमाला आ सेनूरदान हएत U as Heat पक्षमे खलबली मचि गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि गेल | अन्तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहिने Haat देख लेल जाउ | TE आगूक काज हएत। दुलहिन चित्रा तँ पहिनेसैँ वरमाला लेल सजले छलि | एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनियाँ संगे बजौल गेल । ओही कोठलीमे दुलहिन चित्रा सहेलीक संगे आएल | चित्रा इण्टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि । दुलहा देखि कड मोने-मोन खुश भेला | fees गप-सप्प Sat भेलै। तखने चित्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्की मारि पीठे लागल बजला- “हैं, की हमहूँ अहाँकें... ।” चित्रा Ged Sara देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। au ana ई बिआह हम किन्नौं ने करब। चित्राक ई निर्णए सुनि सखवी- बहिनपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्यादि बहुतो गोटे समझेलकनि Feat एकेठाम चित्रा fore थेने रहलि जे ऐ aa हम बिआह नै करब ।” 6

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA दरबज्जा बरियाती-सरियातीसँ भरल छल | ई बात सुनिते लगले सनसना HS अगिलग्गी जकाँ are दिस सौंसे गाम पसरि गेल । बहुतो बुजुर्ग लोकनि दुलहिनक पिताकें बुझा-समझा ws कहलकनि मुदा चित्रा अपन FSU अरल रहलि | चित्रासँ कारण पूछल गेल | कहलक- “जखनि Geel SCT माए-बाप आ सर-समाज किनकोपर बिसवास नै छन्हि a ओ हमरापर बिसवास केना करता आ हम केना हुनकापर बिसवास करब। दोसर बात जे हिनकर पिताजी दहेजक खातिर जमीन आइज्जत बेचबा सकै छथि तखनि sit हमरो बेचि सकैत ofa fea! av हम बीख पीब मरि जाएब Fal एहेन अविसवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बिआह नै करब | VS नीक a हम ओहेन eel जे गरीबे किएक ने हएत, तिनकासँ करब, जे अपन इज्जतक संगे दोसरोक इज्जत करत |” चित्रा सहेली संगे कोठलीसैँ निकलि गेलि | Geer an लोकनियाँ सभकें ओही कोठलीमे aa Hs ताला लगा आँगन आबि गेलि। बिआह नै भेल। ई खबरि रातिए भरिमे चौतरफा पसरि गेल । पंचैतीक बैसार Aa! पंच लोकनि बिआह हेबाक बहुत परियास केलनि मुदा चित्रा अपन संकल्पपर SST रहलि। STA जे दहेजक लेन- देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस As जाए। दुलहिनक पिता नूनू बाबू बजला- cat लाख टाका, दू भरि सोना, मोटर साइकिल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च Aa अछि से सभटा आपस क$ दिअ तखने हिनका सभकें छुट्टी भेटतनि At हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबनि |” सभ पंचक विचार भेलनि । बात तैँ उचिते ने नूनू बाबू कहै OHA | कोनो जबरन जुर्माना TA... । दुल्हाक पिता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकिल US मंगबा नूनू बाबूकें पंचक बिच्चेमे आपस क$ देलकनि। तखनि हुनक बेटाकें कोठलीसैँ बाहर निकालि देल गेल। जहिना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगरि दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकड़ि सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहिना सभ कियो विदा भेला। चित्रा पिताक मुरझाएल मुँह देखि बाजलि- “बाबूजी, अहाँ एक्को urs चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह Hea | पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नै । एही खातिर ने Ud झमेल होइए | एक्को पाइ चिन्ता नै करू ।१000 7

वि दे ह विदेह Videha = www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि । सौं से गाममे सोग TAR गेल । गाममे दलमलित Bat लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्त भेने एकटा युगक अन्त Ys गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक मानैत तहिना आदरो करैत | मुइला पछाति समुच्चा गामक लोक दाह संस्कारमे पैंचकठिया दइले पहुँचल छल | भीड़ बहुत मुदा अखनि aft अछियामे अधशगि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ore, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ few लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्हरा बनि हे... ।” “सभ दिन होत ने एक समाना... ।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर... ।” fered दुपहर भेल जाइत रहै। अखनि aft लोक I आशामे समए saa छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल | जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखर पेटमे बिलाइ कुद५ लगलै। तखनि जा HS विलमक कारणक पता TAS ATCT | मलिकपनाबला बात, के हिम्मत करत जे आगू As पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत Tau | कियो आगू जेबे ने करैत TST | तखने रौदी बाबा पहुँचला | पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने age | किए एते अबेर भेल | घिया-पुता सभ भूखे लहालोठ SST!” ay कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “Stel बुढ़ो-पुरान छी आ WAH अनुभवी सेहो छी, से कनी Hae पता करियनु जे... ।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। sits ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल HEA सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल... | लगमे जा रौदी बाबा SIRS पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ AM जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्द- कहलकनि- “दादा, सभ fas तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्तजारमे छी |” रौदी बाबा पुछलखिन- रूपचन्द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकें Ses मौक्षक प्राप्ति होइ OU कनी बौकू डोमक बाट तके छी ।” 8

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA रौदी बाबा बजला- “अहीले Ud stax होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो As आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै ।” रूपचन्द- “नइ St काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, Tae As गेल S | ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि ।” रूपचन्दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकें अनरगल लगलनि | तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि | SRS बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके ofa की! जखनि us TH Sew जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब a पहिने sah बजा लड़तह। पछाति लोक सभकेँ बजैबतह | PES दुपहर Ys गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ as Teer अछि an बौकू डोमक अखने कोनो था-पता Ag छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून | जखनि जे मनमे HSU सहए as लगैए! नव-नव जोगीकें भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग stars लगल। सभकें Ss कखनि झबदे आगि पड़े जे लोक पैँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत | मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल | सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्द मालिक, कनीले Ud लेट AS Wet छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल | जखनि get छिऐ जे डोम समाजक लेल us पैघ लोक कै, बिना डोमक आगिसँ लोककें मरलोमे मुक्ति as भेटै छै, तखन डोमकें एते निच्चा किए ae छिऐ... । जखनि कि जीबैतमे सभ Ss wars छी, आ मुइलापर पैघ gS SH... | डोमो ct अही समाजक लोक छी, मुदा mss हटि WS TART सभ गाममे TAT | सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैसि VTS तैँ टूर जे बातो ने करैए | एक लग्गा Mees पुछ-पाछ करैए... | VATA कोन असोगरज लगि जाइए... । रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नच5 लगलनि | मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर घियान Teal | जाइते मन जेना आरो चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्थाक जलियाएल रूप सभ सोझा sas लगलनि। feos बाजि Ag tect छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू SHS कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला t हमरो मालिक | हमरा कोनो लोभ-लालच Ag अछि Far दान- दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी es fear” रूपचन्द एकटा चानीक सिक्का es आगि Aras आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा at सीताराम दास अपनामे विचार बजला- 9

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA “ई उचित as Yas रूपचन्द। जेकरा खातिर ARG दुपहर YS गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ Gea | अपनो समांग बूझि बौकूकें जे As a feat, तन ने बौकूओ अप्पन बूझत |” सएह भेल | मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल । निगुन गौनिहारकें जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि | पुन: गाबए लगला- “ay दिन होत ने एक समाना.... ।*000 राम विलास सा हु-लक्षिमनियाँ, मधुबनी | तीनटा लघु कथा- गंगा नहाएब/ डोमक आगि/ स्वर्गक सुख गंगा नहाएब कातिक मासक पुर्णिमा लगिचाएल। सालक तेरहम मास, बेसी पावनि-तिहार भेने हाथो खालीए, मुदा गाममे दलमलित होइए- गंगा नहाइले सिमरिया घाट जाएब | ऐबेर Teas tet जनानीए सभ गंगा नहाइ जाइले छाल छीलने | तीनू टोलक जनानी सभ गुदुर-फुसुर करैमे भरि-भरि दिन लगल | चनरदेव AR उठि गाए-बरदकें कुट्टी-सानी लगा धनखेती दिस विदा भेल कि बड़की भौजी आ सावित्री माए डेढ़ियापर आबि गेली | बड़की भौजी मुस्की मारि बजली- “बौआ चनरदेव, सुनै छी गामक लोक सभ गंगा नहाइले जा रहल अछि। अहाँ as जाएब। कहिया पुर्णिमा छिऐ |” चनरदेव दिन-तिथि गीनैत बाजल- “पुरसुए पुर्णिमा छी । हमर a aa खाली अछि, तहन छुच्छे हाथ जाएब केना। ऐबेर ag जाएब । गंगा मैया जैं ऐ साल निके-सुखे रखलनि Ft पौरुकाँ अबस्स जाएब |” सावित्री माए बजली- “TRA, एहनो बात लोक TAT! गंगा नहाइले a बिना जतरो-के-जतरा बनबैए, अहाँ किए मुँह मोड़ st ia गंगा नहाइक चर्च सुनि एक्के-दुइए जनिजाति सभ ससरि-ससरि बहुतो आबि चनरदेवकें घेरि लेली | बड़की भौजी dla करैत कहलखिन- “यौ अहाँ सभ दिनक बहन्नाबाज छी, से बहन्ना छोड़ जे हाथ छुच्छे अछि | अपनो चलू आ TAR TAH नेने चलू । रहल खर्चाक बात, हम a खर्चा देखबे ने करै छी | MS खेनाइ-पीनाइक समान बना Gs लेब | रेलगाड़ीमे मेलाक भीड़ रहबे करत, टिकट कोनो लगबे ने करत | एक TSS रातिए-राति जाएब आ दोसर दिन घर घूमि चलि आएब | ने कोनो घरक काज पछुआएल आ मंगनीमे गंगा नहा लेब। जखन मेलामे कोनो चीज-वौस कीनबे ने करब तखन खर्च बेसी किए हएत | अहूँ ct सियार गुँहकें परबत बनने छी ।” 20

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly cjournal fee प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका"विदेह' १७८ म अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हक मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA बड़की भौजी गपक बखाड़ी खोलि are दिससैं चनरदेवकें गछारि लेली | चनरदेव सकदम Us गेल । किछु SM AS देलक | जनिजाति सभ समझि गेली जे चलैले तैयार as गेल । चनरदेव मने-मन सोचए लगल जे वेद-पुराणसैँ ल$ HS साइयो Teta गंगा स्नानक बड़ पैघ महत बतौने अछि | सतयुगसँ cis Hs अखनि धरि अपन देशक लोक आ आनो देशक लोक गंगा नहाइए तँ चनरदेव किए पाछू Ted | हमहूँ किए ने लगले सूरमे AST पार भ5 TTS | एमहर भरिए दिनमे जनिजाति ay खेनाइ-पीनाइक ओरियानमे लगि गेली। feat अरबा ue रोटी, अल्लूक भुजिया बनौलक & feat परोठा-भुजिया, तँ कियो चूड़ा-मुरही, सतुआ-नोन आ मिरचाइक मोटरी ans चलैले तैयार US गेल । पचीस-तीस गोटे teh गड़ी पकड़ैले टिशन दिस विदा Aer निरमलीसँ सकरी जाइत-जाइत भीड़क कारणे बुझू देहक मोलि छुटि गेल । मुदा कोनो धरानी भोरे-भोर सिमरिया टीशन पहुँच गेल | किछुकाल टिशनेपर अँटके गेल आ अन्हरोखे गंगा घाट दिस सभ feat विदा भेल fees घाट aft GA जकाँ सत्तरि लगल लोक | केतौ कनीयाँ जगहे AS जे ठाढ़ो US लोक जीड़ाएत | ससरैत-ससरैत कहुना गंगा घाट पहुँच गेल। दिसा-मैदानसैँ आबि चनरदेव दतमनि करए लगल। TAT साहोरक दतमनि अनने Sew | मुँह-हाथ धोय बेरा-बेरी गंगामे नहाइ गेल । चोर उचक्काक कोनो कमी ag, Si Ue ay कियो नहाइले जेइतए तैँ झोड़ा-झंटी As पार US जइतए। लोक ons नहाइत अछि Ga समझि Hs मुदा पापो करैबला ओतडइ बेसी SST | सभ कोय नहा एक- एक डिब्बा गंगाजल भरि आनि ऊपर रखलक। पानि तेते घोर-मट्ठा भेल घिनाएल Set जे मुहाँमे ag लड़के मन Bisa | Mes हटि ऊपरमे एकटा मन्दिर छल | ओतइ एकटा चापाकल सेहो छल | सभ कियो धक्कम-धुक्का करैत कल लग पहुँचल | भूख-पियास सभकें लगल Set अपन-अपन खाएक निकाइल खा-खा पानि पीब, मोटरी-चों टरी ate लेलक। सबहक विचार भेल जे गड़ीमे बड़ देरी S ay हम सभ ताबे मेला घूमि देखब । घूमि-घूमि गंगा घाटक मनोरम छबिक आनन्द ae | सभ feat घुमैत दछिन-पूब दिस गेल । जेतए खाली मुरदे जरै छेलै। लाश अधजरू होड़ कि पानिमे धफारि-धफारि es भैंसा as Set | तड़ बगलेमे एतेक घिनाएल Set जे थुको फेकनाइ अपराधे बुझे छल | नाक-मुँह मुनि सभ कियो पड़ाएल | गंगा कातमे es दूर तक घाट बनल | नहाइक भीड़ ओरेबे As करैबला | तखन घुमैत सभ कियो राजेन्द्र पुल लग आबि गेल | जेना पुल कियो देखने As छल तहिना आँखि फारि-फारि पुलकें Seas लगल | घुमैत-फिड़ैत ay थाकि-हारि गेल। कातिकक दुपहरियाक तिखर de भेने गरमी बढ़ि गेल। छाहरिक कोनो असे नइ। भिजलाहा वस्त्र माथपर राखि हाथरस पकड़ि झाँह बना-बना हाथरस पकड़ि सभ घुरिया ws बैसल | बैसले-बैसल लोक सभ गंगा महात्मक चर्च करए लगल | जेकरा जे बुझल-सुनल आकि मनमे Gas से बजै छल। तखने बड़की भौजी आ कुपहावाली काकीकें रहि-रहि Hs मन हौंर५ लगलनि। बोकरि-बोकरि भरली। गंगामे SEAT मरलाहा जीव-जन्तुकें Waa जाइत देखे तँ Hert मुरदाकें, तहिना चारूकात जे घिनाएल देखे से परपंचे ने होइ | चनरदेवक मनमे गंगाक प्रति श्रद्धा-भक्ति आ आस्था छल ओहो HAT लगलै। कथा-पुराण आ साधु-संतक प्रवचनमे गंगा-महात्म पढ़ने-सुनने TEU ओ साँच छी की झूठ As ओझरीमे ओझरा गेल | तैयो चनरदेव मनमे सवुर oie सोचए- जेतए चारू जुगमे लोक गंगा-महात्मकें मानैत आएल OLA, AAT हमरा मानने वा AS मानने की हएत। एतेक लोक जे गंगा नहाइए, की sits पुण्य-प्रतापे सभ स्वर्ग जाइए? आ जे गंगा नइ नहा पबैए ओ की नरक जाइए? तखन ot केहनो कुकर्म करि लिअ आ गंगा नहा स्वर्ग चलि जाउ, सुकर्मक कोनो जरूरते As! तही बिचमे सुगापट्टीवालीकें बड़बड़ैनी धेलके । अकचकाइत वीरपुरवालीकें कहलक- 2

वि दे ह विदेह Videha = www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA “दीदी, एगो बात फरिछा HS बुझा TY | जखन गंगा अपने एते घिनाएल अछि आ लोक सभ नहा HS अपन पाप धोइए तैँ एतेक गंदकी आ पापकें गंगा मैया केतए जमा करैए?” वीरपुरवाली काकी सुगापट्टीवालीकें समझबैत कहलखिन- “देखे नइ छहक गंगा Fah कोनो बखारी आकि गोदाम छै जे ओइमे जमा राखत |” सुगापट्टीवाली- “तखन गंगाजी अपना पेटमे सोन्हि-मोइन बना रखैत हेती ।” तैपर वीरपुरवाली बजली- “हे हइ, एना अनरगल किए बजै छहक! गंगा मैया एहेन AS छथि जे एतेक रास पाप आ गंदकीकेँ जमा करत | कथीले करत आ किए जमा करत | पाप आ गंदा तँ लोक करैए । जे करत से ने भोगत | ओ अपने ने पाप करैए आ ने गंदा । सभटा लोककें बाँटि दइए ।” सुगापट्टीवाली- “से केना दीदी । एतेकालसैं छी, कहाँ किछु sea देखे छी गंगाजीकें |” वीरपुरवाली काकी बजली- “es सुगापट्टीवाली, तोरा सनक सोझमतिया जनानी aig GTA अछि से हम As बुझने छेलौं | एक गाममे जनमलह आ दोसर TAA गिरथाइन बनल छहक से ओहिना । देखहक गंगा केना पाप आ गंदगीकें Te छथिन | जेते लोक गंगा नहा HS पाप MSU ओ अपना-अपना मनक भरम दूर करैए | जखनि ओ डुबकी मारि डिब्बामे जल घरक खातिर ORT, जड़ Hee लोक तन-मन शुद्ध करैए तखने जेकर जे पाप केलहा WS, तेकरा गंगा बाँटि as छै ।” बिच्चेमे कुपहावाली काकी an बड़की भौजीकें विषय भैंसियाइत देखि सावित्री माए बजली- “बौआ चनरदेव, हम तैँ कान पकड़े Ot एहेन करम जिनगीमे फेर कहियो ने करब । Sd देखौंस केलौं । असल गंगा तँ सबहक मनेमे बसैए | जे कियो देखबे ने करैए | कहबीओ छे, मन चंगा FT कठौतीमे गंगा । रहल गंगा नहा BS पाप धोअब आ पुण्य Aes! | जखन पाप करबै ने करब तैँ पुण्यक कोन काज अछि | जखन करमकेँ धरम बूझि करब TET अधरम किए EU | जे जेहेन करत तेकर फलो तैँ तेहने ओकरा भोगए US | हमरा बुझने ई सभटा मनक भरम FST” गप-सप्पक बीच दुपहरिया बितल कि तखने घर जाइए गड़ी Yess आबि गेल | सभ कियो गड़ीपर चढ़ि विदा भेल । fed चलि जखन गामक सीमा कात आएल तखने सभ कियो तीन-तीन बेर गंगाजी कें गोड़ लागि बाजल जे एहेन दिन As Hes जे दोसर बेर आब कहियो गंगा नहाइले जाए पड़ए | कान पकड़ि-पकड़ि जिनगी भरिक लेल गंगाजी सँँ माफी मांगि लेकक | डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि । TA गाममे सोग पसरि गेल । गाममे दलमलित Bat लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्त भेने एकटा युगक अन्त Ys गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक 22

वि दे ह विदेह Videha = www.videha.co.in face प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA मानैत तहिना आदरो करैत | मुइला पछाति समुच्चा गामक लोक दाह संस्कारमे पैंचकठिया दइले पहुँचल छल | भीड़ बहुत मुदा अखनि aft अछियामे अध्शगि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ore, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्हरा बनि हे... ।” “सभ दिन होत ने एक समाना... ।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर... ।” fared दुपहर भेल जाइत Ve | अखनि aft लोक arta आशामे समए बीतबै छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल | जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखर पेटमे बिलाइ कुद५ लगलै। तखनि जा HS विलमक कारणक पता लगब5 लगल | मलिकपनाबला बात, के हिम्मत करत जे आगू As पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करैत TST | तखने रौदी बाबा पहुँचला | पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने age | किए एते अबेर भेल | घिया-पुता सभ भूखे लहालोठ SST!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “Stel बुढ़ो-पुरान छी आ WAH अनुभवी सेहो छी, से कनी झबदे पता करियनु जे... ।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल Yat लग पहुँचला। sits ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल HEA सभ अपनामे कहा-सुनी Ht छल... | लगमे जा रौदी बाबा SIR पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकें जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्द- कहलकनि- “दादा, सभ fas तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्तजारमे छी |” रौदी बाबा पुछलखिन- रूपचन्द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि cere Ses मौक्षक प्राप्ति होइ कै au कनी बौकू डोमक बाट तके छी ।” रौदी बाबा बजला- “अहीले Ud sax होइए आकि ARI कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो ARS आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै ।” रूपचन्द- “ag हौ काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, खबरि As गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि ।” 23

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA रूपचन्दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकें अनरगल लगलनि | तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि | SRS बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके ofa की! जखनि us TH Sew जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब तैँ पहिने डोमकेँ बजा लड़तह। पछाति लोक aah बजैबतह | Ee दुपहर Ys गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ as रहल अछि an बौकू डोमक अखने कोनो था-पता Ag छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून | जखनि जे मनमे HSU सहए as लगैए! नव-नव जोगीकें भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग sas लगल। सभकें Ss HST झबदे आगि पड़े जे लोक पैँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत | मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल | सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्द मालिक, कनीले Ud लेट US Wet छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल | जखनि get छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक कै, बिना डोमक आगिसँ लोककें मरलोमे मुक्ति as भेटै छै, तखन डोमकें एते निच्चा किए बुझे छिऐ... । जखनि कि जीबैतमे सभ Ss wars छी, आ मुइलापर पैघ gS छी... | डोमो तँ अही समाजक लोक छी, मुदा mss हटि WS TINT सभ गाममे TAT | सभ कियो ओकरा अछोप बूझि ang धरि लग बैसि खेनाइ तैँ टूर जे बातो ने करैए | एक लग्गा Mees पुछ-पाछ करैए... | VATA कोन असोगरज लगि जाइए... | रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नच5 लगलनि | मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर fla गेलनि | जाइते मन GAT ANT चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्थाक जलियाएल रूप सभ सोझा Sas लगलनि। feos बाजि Ag tect छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू SHS कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला t हमरो मालिक | हमरा कोनो लोभ-लालच Ag अछि Far दान- दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी es fear” रूपचन्द एकटा चानीक सिक्का es आगि Aras आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा at सीताराम दास अपनामे विचार बजला- “ई उचित ag Yas रूपचन्द। जेकरा खातिर ARG दुपहर भ5 गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ Gea | अपनो समांग बूझि बौकूकें जे As a feat, तन ने बौकूओ अप्पन बूझत |” सएह भेल | मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल । निगुन गौनिहारकें जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि | पुन: गाबए लगला- “ay दिन होत ने एक समाना.... |” 24

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA स्वर्गक सुख कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल | अगल-बगलमे मुसहर सभ सेहो काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल | कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजरि गेल । माघ मासक समए | वस्त्रक ATG जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल । जखने घूरमे आगि जरेलक आकि बौकूक बेटा-बेटा सटि ws बैसि आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली Gas बकड़ी निकालैत जोरिसैँ बजली- “रातियाँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्चा की खाएत। भूख तरपि की बाल-बच्चाक संगे कोसीमे SPA मरब ।” बौकू सदाय बाजल- “भोरे-भोर UST अशुभ बात AS बाजू। शीतलहरी भरि SM AE परान Fas | परान बचत तैँ लाखो उपए ata | कनीको समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगाड़ Hea! एक a कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि ।” शीतलहरीक कोनो ठेकान ag अछि मुदा भूख a समैपर लगिए जाइए | बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक | भिनसर होइते जोर-जोरसैँ खाइले माँगए लगल | बलबावाली पड़ोसीसैं दू सेर पैंचि आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक । अपनों दुनू परानी खेलक | SRG पानि पीब-पीब भूख मेटेलक | कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल | बलबावाली पतिकेँ कहलकनि- “दू दिनसैँ सुखल रोटी आ अल्हुआ खा Hs कोनो तरहें दिन कटलौं मुद्दा आइ भातक कोनो जोगाड़ करू ।” बौकू जाड़क कोनो परवाह As करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल- “सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब ।” साबीकेसैँं परसा चौरी सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धानक नामी अछि। चौरी पहुँचिते बौकू बेटा-बेटीकें कहलक- “हूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी ।” दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक | बेटा-बेटी घों घी-डोका छिट्टामे उठौलक | जखन घर चलैले तैयार भेल a बौकूक पत्नी बजली- “सुतैले एकेटा गोनरि अछि | किछ aK सेहो AA चलू । बिछौना Ales BI” aR बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक काछुकें देखलक | देखिते बौकू काछुकें उनटौलक | काछुकें उनटा देने भागल AS Ss कै | उठा HS तौनीमे बान्हलक | धान आ A पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घों घी-काछू cs बेटा-बेटीकें संग केने विदा भेल | घर पहुँचिते धान रौदमे पसारक | पड़ासीसैँं उखरि-समाठ आनि धान-कुटि ws चाउर तैयार केलक | कौछक मासु बना रान्हलक | दोसर बर्तनमे भात रान्हलक | सभ कोइ संगे Ss खाइले बैसल | जाड़क समैमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल Ala तेलगर आ स्वादिष्ट होइते अछि। तैपर & कौछक मासु अपने aed ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो ders तर-बतर भड गेल। बौकू 25

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA बमरोटिया SAIS भात-मासु बैंटबो करैत आ खेबो करए | खेनाइ अधपेटा भेल तैँ पानि पीब पियास मिझा नहमर साँस लैत बाजल- “एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए | राजा-महराजाकेँ नशीव As Gis छै | ई खेनाइ देखिते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकें सेहो मन ललिचा Stas |” भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक | बलबावाली अरामसैं सुतैले Set भरि नार बिछौलक at बाल-बच्चाक संग ओइपर सुतल | आ BUS गोनरि ओढ़ि लेलक | कनीकालक पछाति सबहक देह गरमा Ta | बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली- “औझका मेहनत साफल भेल | एहेन बिकट समैमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल ।” नीक अवसर देख बौकू बाजल- “ई छी स्वर्ग सुख | एहेन सुख रजो-रजवारकें सुन्दर महल आ सजल पलंगपर As HET | अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्द छै आ बीचमे बौकूक परिवार sess सुतल छै। As BA डर-भर छे आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़े छै ।” मिथिलाक माटिमे पसरल कहबी - संकलनकर्ता- राम विलास aE 4. एक ad राकस दोसर नोतल | 2. कुमहरपर सितुआ are | 3. चट मंगनी पट बिआह | 4. मंगनी बरदक दाँत नै देखल जाइत | 5. खेत खाए गदहा मारि खाए जोलहा। 6. मुँह दुबराक कनियाँ सबहक भौजाइ | 7. बाबाजीक बेल हाथे-हाथे गेल । 8. पढ़ल सुग्गा बौक बनल | 9. हगबा मानए बघबाक डर | t0. डूमि ms पानि पीबी तँ एकादशीक माइओ ने STAT | . चोर-चोर मसिऔत भाय | 42. सड़लो भुन्ना A रेहुक दुना । 43, सखुआ Bs FER TA । 44. पिआस ने जानए धोबी घाट, प्रीत ने जानए ओछी ore | 45. नीन ने जानए टुटल खाट, चोर ने जानए गंगा घाट | (6. धर्मक सोरि पताल तक | 47. लोठगर देह सिलौटी लेने जाए, दलकल-दलकल नैहरा जाए। 48. बनियाँ काटे Fach, कुकुर काटे अनचिन्हारकें | 49. खाइले लाइ नै, मुँह पोछैले मिठाइ | 26

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly cjournal fee प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका"विदेह' १७८ म अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हक मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA 92. वर भेल बुड़िबक a जैतुक के लेत | 93. सात रार सात पेट सात बाभन एक पेट | 94. मनुख एक रंगा, जाति बहुरंगा | 95. मिथिला मैथिलीक झगड़ामे मैथिली डूमि गेल सवर्ण आबि सुरूज Aer । 96. बुड़िबक केर धन Nett कबिलाहा कहीं उपास TST | 97. रूसल कनियाँ दूध दूध-भात नै खाए डोका तिमल ले घुसकल जाए। 98. हालमे भेल बबाजी तैँ दालिकें कहलक बैकुण्ठी | 99. लब लौकार IS बौकार | 00. आपे पुत्ता बापे खाए एक्को हिस्सा बाहर ने जाए। ]07. सौ रत्ती सोना नै नीक एक रत्ती तकदीर नीक । राम विलास AE टनका हैँसैत फूल देखि भौंरा कहए नित्य रहब दुःख-सुखक संग सूतब अहीं अंक बात सुनिते फूल भेल प्रसन्न झूला झूलब पवन संगे-संग रहब उपवन रहब वन पीअब मकरन्द मधुर रस डुमल अंग-अंग सुख-दुःखक संग 29

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA स्वर्ग मिथिला जेहने माटि-पानि तेहने गाम खेत-खड़िहाँनमे भरल धान-पान अनपढ़कें दी अक्षरक वोध पोथी पढ़ि es ज्ञानी बनि ज्ञानकेँ घर-घर बाँटतै अआज्ञानीकें दी काज करैक ज्ञान भूखलकें दी दू रोटी भोर-साँझ बनू नेक इंसान आँखि मिला es ay हाथ fart दिल facet नै कोइ, जौं मिलबे दिलमे जग प्रेम सभ aaa छोट-छीन झगड़ा अखनि aft जाति-सम्प्रदायमे बैटल बौआइए जन कल्याण समाजक रिःनर्माण शिक्षाक दान देशक उत्थानमे 30

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA सभक जरुरी छै धन लगाबी समाज Hea होइत रहे आगूओ हित काज aed रह ज्ञान दहेज रूपी दानव पहिने नै आइ सबल बेकार चक्करमे बेचि as लूटाइ छी भोरक तारा उगल भुरुकबा Ta फूल भोरु पहर घुमू रहत चित्त खूश माटिक चैला पानि निर्मल करै सोना नै शुद्ध मन्दिर मन शुद्ध ज्ञानी वाणि अमृत आग नै मुझै हवासँ, Fa दीप प्यास नै मुझे भरल APRS कूप मुझबै प्यास पढ़ब नै वेद भेद जानब केना भूखल पेट नै सूतब बिछौना 3

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA खेत उपजै सोना मठ मस्जिद नै मिलै भगवान वन घुमैत नै मिलै कोनो देव मन बसै भगवान रोगीक रोग दवासँ छुटैत छै मन रोग नै pes waa wae we रोग नेत्र are जग इजोत होइ जीवन दान रक्तदान भूदान Gast भुदान सफलताक करू नीक तैयारी राति अपन जागि करू तैयारी प्रयास राखू जारी देशक खातिर करब बलिदान रक्षा करब देशक छै कल्याण काज छै ई महान स्वर्गक सुख नै चाही हमरा gad मिलै हरि दर्शन सुख 32

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA सभ सुखक खान मेहनतिसँँ मिलै धन अपार आलस अछि दुखक पैघ राह करू नीक विचार तीन बातसँँ राखक परहेज मिठ बोलिया चटगर भोजन Wed रह कात ware जगमे करू नाम काम महान बड़ पैच छै काम होइ जग कल्याण waa बनल & शरीर अनमोल & ई जिनगीक गाड़ी अन्त किए dig & धानक बीज उखाड़ै बोनिहार गीत गबैत करै धनरोपनी सबहक खातिर बच्चा कनैत स्कूल जाइ खातिर जरूरी अछि कौपी-कलम-पोथी 33

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA शिक्षाक & जरूरी दूध tia as बच्चा Tet बढ़ैए भविस बनै उपकारी बनैत देशक रक्षा करै माटिक मुर्ति हिलै-डोलै नै बोलै श्रद्धा जगाबै पान-फूल प्रसाद सँँ भक्तकें HATS मानव तन खातिर तप करै छै ऋषि-मुनी दर्लभ छै देवोकें नै भेटै छै ई तन हाड़-मासुसँ बनल छै शरीर नाश्चर अछि की भेटै छै तनसैं मायामे फँसल कै राजा सेवक कै जनता मालिक लोक yaa कै उलटे सेवककें अछि राजा माध्श्लिक गरीब लेल जेल जुर्माना अछि नेताक लेल कालाधन खजाना 34

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA जनता & दिवाला सभ अपन नहि कोइ पराया दुखक साथी निभानै जे दोस्ताना अनमोल खजाना मोती मालासँ शोभा बढ़ैत अछि कंठी मालासँँ हरि भजन as कोन उपयोगी छै मजदूरक TAS बनै टुटै घर-मकान मालिक & महान श्रमिककें नै नाम चान-सुरूज अकासमे चमकै लोक चमकै कै अपने ae जग guild होइ आगि जरैत सभ देखैत अछि दिल जरैत नै देखैत कोइ किए अन्तर होइ पानिक बून मिलि सागर बनै सींचै धरती प्यास मुझे सभकें 35

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA नै दाम as HS मोट रोटीसँ पेट भरैत अछि नीक ae ज्ञान aed अछि Se छै मान जरैत दीप सभकें रोशनी as मुदा अपने SERA GS उपकार करै छै सेना देशक रक्षा करत मरैत उपकारी छै अपन रक्षा नै देश गर्वीत करैत चोरक माल सभ fafa ms खाए Sele AST फाँसीपर चढ़ैए संगे नै कोइ जाइ नाचए बानर भात खाए मदारी बानल कहै माल अछि केकरो कमाल करै कोइ पढ़ल सुगा बोली छै अनमोल ot पिंजरा कैद te कहै छै 36

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA अजादी केना BS गाछक फल ay Gis जुराइ गाछ नै खाए कहियो आन फल धर्म पालन करै धान-पानसैँ मिथिलामे सम्मान धोती-कु्तारिं गौरव पहिचान स्वागत करै मखान पकै फसल कटनी दौनी होइ कुटि पीस बनै मधुर भोज सभकें पेट ut बिना खेने नै पेट भरैत अछि नै देखने नयन जुराइ कै नै ज्ञान मुर्ख होइत प्रेमक राह जे चलै सुख पाबै स्वर्ग पाबैत सफल जीवनक उत्तम फल पाबै हरीन देत सियारक गवाही दुनू भागि as जंगल चलि गेल 37

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA सजामे प्राण गेल सौनक साग भादवक cet बैचल रही आसिन-कातिकक ead बैंचल रही चंचल मन चित्त घबराइ कै जान जोखिम पैर लड़खड़ाइत राह नै देखाइ छै चोर चोर कै मसिऔत बनल अधिकारी & पिसिऔत बनल प्रजा साधू किए कै राधा नचैत वृन्दावन-गोकुल कृष्णक बंशी बजैत मथुरामे मक्खन चोर कहैत आमक डारि झुलुआ झुलै Set कोइली बोली सुनि गीत गबैत बौका gaa छेलै बाग-वगिचा लगबैत सिंचैत आम-लताम खाइत जीवैत छेलै 38

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वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA स्वतंत्रा दिवस हमर माए गंगा सन पवित्र नौ मास aft गर्भ पालन करै मनक बात Tat पुरान अन्न रोगीकें पथ्य पड़े पुरान लोक समाजकें Sarat Ua छै ऊँच स्थान दुभि घास कै अमर शुभ सभ पूजामे शुभ काज RS सम आँखि देखै कै सभ महग कोनो नै अछि GET मुदा देशमे खून-चून-बेचैनी अछि सभरँ Tet ane नै भेटै छै भगवान मन मन्दिर बसै छै भगवान जे पूजै छै महान आँखि रहितो SRR बनल छै केना खोजत ज्ञानक आँखि मानि 40

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वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA नै चोरबै o चोर फूलक मांग देखैत खेतिहर फूल लगबै हाट-बजार बेचि धन-कमबैत कै आत्मा अमर अविनाषी होइ & चोला बदलि रूप रंग tat रहस्य नै जनै छै आगि sitet सभ देखैत अछि मन जरैत नहि देखै छै कोइ बिनु प्रेम नै बुझे फूलक रक्षा काँट-पात HLS MWS सुखक संग फूल ale दुख दइ़ कै कोइली बजै अधरतिया उठि प्रेमक बोल प्रेमी ठै बिछुड़ल पिया नै भेल भोर चिट्टी-पतरी केना लिखब पिया भेजै नहि छी खबरि ने सनेस 42

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) नि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA अहाँ छी परदेश खेलसैं राखू सभ लोकनि मेल स्वस्थ्य रहब तन रहत Get मन रहत खुश देशक लेल खेलब सभ दिन कठिन खेल नाओंक लेल नहि देशक गौरव ले ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह नि मैथिली साहित्य आन्दोलन (८)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ STATS लेखकक नाम नै अछि ततड$ संपादकाधीन | विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर | सह-सम्पादक: उमेश मंडल | सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, Are विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण) । कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी । सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर । सम्पादक- सूचना- सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल | सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। 43

वि दे ह विदेह Videha Wee www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal fate प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १७८ A अंक १५ AE २०१५ (वर्ष ८ मास ८९ अंक १७८) हि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ISSN 2229-547X VIDEHA रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य wiz) ggajendra@videha.com कें मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ doc, .docx, .rtf वा txt फॉर्मेटमे पठा सके छथि | रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी । रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकें देल जा रहल अछि | एत5 प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक);/ प्रिं-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकें छै । ऐ ई पत्रिकाकें श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकें ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (८) 2004-5 सर्वाधिकार सुरक्षित | विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकत्ताक लगमे OFS | रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू | ऐ साइटकें प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल ।५ जुलाई २००४ कें http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “ भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसैं प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका aft पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि | आब “भालसरिक Tre” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक Wace संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त US रहल अछि | विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA N 2 | सिद्ध्रिस्तु 44