VIDEHA — Issue 180 / अंक १८०

Publication: VIDEHA · Issue: 180
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60 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८० म अंक १५ जून २०१५ (वर्ष ८ मास ९० अंक १८०) ऐ अंकमे अछि:- कथा कुसुम (वि‍हनि‍/लघु कथा संग्रह) दुर्गानन्‍द मण्डल दुर्गा नन्‍द मण्‍डल जनम- २ जनवरी १९६५ ई.मे। स्‍थायी पता- गाम- गोधनपुर, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)। पि‍ताक नाओं- श्री रामदेव मण्‍डल, माता- श्रीमती भालसरी देवी। सम्‍पति- गाम- निर्मली जिला- सुपौल। मोबाइल नम्‍बर- ८४३४८१५०५० प्रकाशित कृति- कथा कुसुम (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) कथाक सत्तरि कुकर्मा 00 असली हीरा 00 पोस्‍टमार्टम 00 प्रदूषण 00 बुधि‍ 00 बुड़बक के? 00 सहोदर 00 बि‍आहक पहि‍ल साल गि‍रह 00 आत्‍म वि‍श्वास 00 लाल भौजी 00 पारस 00 बकलेल 00 कि‍सनामुट्ठी 00 बुढ़ि‍या फूसि 00 डाक्टर कर्मवीर 00 जेहने करनी तेहने भरनी 00 सभ कि‍छु नि‍अमसँ करू 00 छुतहरि 00 मोहन बाबू 00 सवक 00 टुटैसँ बँचि‍ गेल 00 ई की? 00 खाधूर 00 कर्मक भोग 00 लबकी कनि‍याँ 00 कुकर्मा मि‍थि‍लांचलक राजधानी जि‍ला मधुबनी धरमपुर गाममे एकटा प्रकाण्‍ड वि‍द्वान ज्‍योति‍षी रहै छला। ज्‍योति‍षी वि‍द्यामे एकदम नि‍पुण जइसँ भूत, वर्त्तमान आ भवि‍सक नीक ज्ञाताक रूपमे जानल जाइ छला। एक दि‍न मधेपुर प्रखण्‍डक लौफा गामसँ सत्‍य नारायण भगवानक चौपहरा पूजा करा सबेरे-सकाल गाम अबै छला। बाटमे, जोरला गाम जखनि एला तँ देखलनि‍। हाइ स्‍कूल जोरलाक पाछू बोहैत मरता धारमे एकटा नरमुण्‍ड धारक कातमे राखल छै। जैपर लि‍खल छेलै- “कि‍छु कर्म भऽ गेलै आ कि‍छु बाँकी अछि‍। एकटाक जनम आ तीनक मृत्‍यु।” ज्‍योति‍षी जीकेँ हरलनि‍ ने फुड़लनि‍, नरमुण्‍डकेँ उठा झोरामे रखि‍ लेलनि‍। घर आबि‍ चुपचाप, एकटा उज्‍जर कप्‍पासँ बान्‍हि‍, चि‍नवारमे खोंसि‍ देलनि‍। मुदा पण्‍डि‍ताइनकेँ ऐ सम्‍बन्‍धमे कि‍छु ने कहलकनि‍। एक-आध दि‍नक बाद पण्‍डि‍ताइनक नजरि‍ ओइ उज्‍जर कप्‍पापर पड़लनि‍। सोचथि‍ आखि‍र की बात छिऐ जे आन दि‍न जे कि‍छु ज्‍योति‍षीजी लाबथि‍ तँ हलसि‍ कऽ कहथि जे पण्‍डि‍ताइन ई लि‍अ उ लि‍अ, हे एकरा राखू ओकरा उसारू। मुदा...।‍ पण्‍डि‍ताइनकेँ हरलनि‍ ने फुड़लनि‍ ओ जि‍ज्ञासावस कप्‍पामे बान्‍हलकेँ उतारि‍ कऽ देलखनि‍, नरमुण्‍ड देखि‍ते बताहि‍ भऽ गेली आ तामसे ओइ नरमुण्‍डकेँ उक्‍खरि‍मे दऽ समाठ लऽ बढ़ि‍याँसँ कुटि‍ बुकनी-बुकनी कऽ देलनि‍। आ एकटा शीशीमे ओइ बुकनीकेँ भरि‍ भनसा घरक चारमे खोंसि‍ देलनि‍। आ सगर पोखरि‍मे एकटा मात्र पोठी जे कहबी छै, अति‍ सुन्नरि‍ नाओं सुनयना वएस सोलह बरख अपन बेटीकेँ कहलनि‍- “ऐ शीशीमे माहुर अछि‍। एकरा कि‍यो ने छुऐ आ ने खाए, जौं खएत तँ मरि‍ जाएत।” सुनयना नामक अनुरूप ओतबे सुन्नरि‍। बेस गोरि‍-नारि‍ नमगर-छड़गर-पोरगर केराक वीर जकाँ कोमल आ सुन्‍दर। सोल्‍हम साउन पार केने, अनेरे आँखि‍योक भाषासँ गप करैवाली। सुनयनाक आँखि‍मे धार तेहेन जे बि‍नु कटने‍ आँखि‍सँ घाएल करैवाली। दि‍न-राति‍ प्रेमक बोखारमे बौआइतो मुदा ज्‍योति‍षीक मर्यादाकेँ अखनि धरि‍ बचौने। उमेरक संग जे लांछन होइ छै से एक-कान-दू-कान होइत पण्‍डि‍ताइन आ ज्‍योति‍षी जीक कानमे पहुँचए लगल। कहबीओ ठीके छै जे बेटी जखनि जुआन होइ छै तँ घरबैयाकेँ बादमे मुदा बहरबैयाकेँ पहि‍ने पता लागि‍ जाइ छै। टोल-पड़ाेसक लोक काना-फुसी करए लगल जे पण्‍डि‍ताइनक बेटी तँ फल्‍लमाक बेटासँ बुढ़ि‍या गाछीमे गप-सप्‍प करै छेलै। एक-आध दि‍नक बाद फेर कि‍यो गप उखाड़ि‍ दइ जे ज्‍योति‍षी जीक बेटी तँ अरूण डाक्‍टरसँ हँसि‍-हँसि‍ कऽ काली स्‍थानमे गप करै छेलै। एकदि‍न सुखेतोवाली कनि‍याँ बाजलि‍ छेली जे पण्‍डि‍ताइनक बेटी रामदेब बाबूक खेतमे बदामक साग तोड़ै छेलै। हुनक मझि‍ला बेटा आड़ि‍पर ठाढ़ भऽ रेडी बजबै छेलै आ बड़ीकाल धरि‍ दुनू गोटे हँसि‍-हँसि‍ कऽ गप-सप्‍प करै छेलै। अर्थात् एक-आध दि‍नक पछाति‍ सुनायनासँ जुड़ल कोनो-ने-कोनो गप-सप्‍प चलि‍ते रहै छेलै। ज्‍योति‍षीजी बेटीक ई कि‍रदानी सुनि‍ सत्‍य नारायण भगवानकेँ कहथि‍न- “हे भगवान एक तँ एकटा कुलकन्‍या देलह, तहूपर एतेक मानि‍ हानि‍क गप! एे सँ तँ खनदानक बड़ हानि‍ भऽ रहल अछि‍। ऐसँ तँ नीक होइत जे सुनायना जहरो-माहुर खा लइतए आ ऐ दुनि‍याँसँ उठि‍ जइतए।” ई गप बूझू जे हरि‍दम ज्‍योति‍षी जीक मुहसँ नि‍कलैत रहै छेलनि‍। सुनायना एकदि‍न सुनलक, दोसर दि‍न सुनलक आ तेसर दि‍न जखनि सुनैत-सुनैत बरदाससँ फाजि‍ल भऽ गेलैक तँ सोचलक जे भनसा घरक चारमे माए तँ माहुरक एकटा शीशी खोंसि‍ रखने अछि‍। से आइ उ माहुर खा अपन प्राण ति‍यागब। सुनायना ओइ राति‍ सएह केलक। मुदा ओ तँ जहरक शीशी छल नै। छल तँ ओइ नरमुण्‍डक चूर्ण जैपर लि‍खल छेलै, कि‍छु भऽ गेल आ कि‍छु बाँकी..। जे खएलासँ सुनायना मरल तँ नै मुदा गर्भवती जरूर भऽ गेली। आब तँ दि‍न बी‍तल, मास बीतल। एक-कानसँ-दू-कान गुल-गुल हुअ लगल जे ज्‍योि‍तषीक बेटी तँ आब पेटसँ छै। एत्ते दि‍न कहै छलि‍यनि‍ तँ ज्‍योति‍षीजी आ पण्‍डि‍ताइन मुँहपर माछीओ ने बैसए दैत छल। बि‍‍सबासे ने होइ छेलनि‍। अाब देखथुन अपन बेटीक कि‍रदानी। जे बापक दुलारू धि‍या दूरि‍ गेली दूरि‍ गेली, आ माथापर तम्‍मा लऽ कऽ उड़ि‍ गेली उड़ि‍ गेली। आब देखथुन जे बेटी केहेन कुलगोरनि‍ छन्‍हि‍। देखि‍ते-देखि‍ते नअो मास बीतल आ सुनायना देलनि‍ एकटा अति‍ सुन्‍दर बालकक जनम। जेकर भाग्‍यक रेखा कि‍छु औरे कहि‍ रहल अछि‍। मुदा पण्‍डि‍ताइन आ ज्‍योति‍षीजी ओकर नाओं रखलनि‍ ‘कुकर्मा’। एक दि‍नक गप छी। जे ओइ राज्‍यक रानीकेँ माछ खएबाक मोन भेलनि‍। राजाक आदेश भेल, मलाह बजाैल गेल। नीकसँ-नीक माछ मारबाक आदेश दऽ देल गेल। संयोग एहेन जे कनि‍ये कालमे नि‍क्के माछ ऊपर भेल। मलाह राजाक आदेश पाबि‍ सोझे रनि‍वास धरि‍ गेल आ रानीक हाक देलकनि‍। हाक सुनि‍ रानी महलसँ बाहर एली। तँ देखै छथि‍ जे आँगनमे बड़ सुन्‍दर माछ राखल अछि‍। मुदा माछ देखि‍ जेतबए मन प्रसन्न भेलनि‍ मल्‍लाहकेँ देखि‍ मन तेतबे दुखी। कि‍एक तँ मल्‍लाह रानीकेँ देखि‍ लेलकनि‍। रानीकेँ तँ तामसे मन माहुर-माहुर भऽ गेलनि‍। मनमे उठलनि‍ जे केहेन मुरूख राजा छथि‍ जे हमर इज्‍जति‍केँ इज्‍जति‍ नै बूझि‍ जेकरे-तेकरे महलमे पठा दैत छथि‍। ई तँ नीक बात नै भेल। आ तामसे मलहाकेँ, अनाप-सनाप बजैत धक्का दऽ बाहर करबा देलकनि‍। आँगनमे जे माछ राखल छल। ओ ई सभ खेला देखि‍ जखनि बर्दास्‍त नै भेलै तँ ओ माछ हँसि‍ पड़ल। आब तँ रानीकेँ कोनो अर्थे नै लगनि‍ जे माछ हँसल तँ कि‍ए? आब रानी राजाकेँ कहलनि‍- “ई माछ हँसल कि‍ए, से कहू नै तँ हम अन्न-पानि‍ ति‍यागि‍ देब।” रानीक गप सुनि‍ राजाकेँ कि‍छु फुरबे नै करनि‍। असमंजसक स्‍थि‍ति‍मे आबि‍ राजा भरि‍ राज्‍यमे ढोलहो दि‍आ देलखि‍न जे रानीकेँ देखि‍ माछ कि‍ए हँसल? जे ई बात बता देत ओकरा भरपुर इनाम भेटत अन्‍यथा छअ मासक जहल दऽ देल जाएत। राज्‍यक पैघसँ पैघ वि‍द्वान, पण्‍डि‍त, ज्‍योति‍षी लोकनि‍ एला। दरबार लगल। मुदा माछ कि‍ए हँसल रहए से कारण कि‍यो नै बता सकला। जइ कारणे हुनका सभकेँ छअ मासक जहल दऽ देल गेलनि‍। अन्‍तमे धरमपुरक ज्‍योति‍षीजी बजाैल गेला। अबेर भेने ज्‍योति‍षीजी राजाकेँ समाद पठा देलनि‍ जे आइ तँ आब अबेर भऽ गेल तँए आइ नै, काल्हि‍ तरगरे आएब। प्रात भने ज्‍योति‍षी स्‍नान-धि‍यान कऽ चानन-ठोप दऽ बि‍दा भेला राज-दरबार दि‍स। कुकर्मा जे बथानपर मालक थैरमे खेलाइ छल, देखलक जे ज्‍योति‍षीजी चलला राज-दरबार दि‍स। कुकर्मा बाजल- “नाना, यौ नाना केतए जाइ छि‍ऐ? हमहूँ जाएब यौ नाना।” ज्‍योति‍षीजी अनेक प्रकारे कुकर्माकेँ फुसलौलनि‍। मुदा तखनो कुकर्मा बात मानक हेतु तैयार नै। एक्केटा जिद्द धेने जे आइ हमहूँ जाएब अहाँ केतए जाइ छि‍ऐ। हारि‍-थाकि‍ ज्‍योति‍षीजी बजला- “राज-दरबार।” “कि‍ए?” -कुकर्मा बाजल। ज्‍योति‍षीजी कहलखि‍न- “रानीकेँ देखि‍ माछ कि‍ए हँसल, राजा ऐ रहस्‍यकेँ जानए चाहै छथि‍। जे सही उत्तर देथि‍न तेकरा उचि‍त इनाम भेटतैक अन्‍यथा छअ मासक जहल। से तूँ अखनि धि‍या-पुता छह नै जाह।” मुदा तैयो कुकर्मा मानैले तैयार नै। फेर बाजल- “नाना अहाँ बुतै ऐ बातक जबाक नै देल हएत। अहाँकेँ तँ ई बुझले नै अछि‍ जे हमर माए कोन कुकर्म केलक आ तइ दुआरे हमर नाओं कुकर्मा राखल गेल। की अहाँ वा कि‍यो देखने छेलि‍ऐ? से नै तँ अहाँ राजाकेँ जबाक की देबै। अहाँ हमरा नेने चलू राजाकेँ हम जबाब देबै। नै तँ अहाँकेँ छअ मासक जेल हेबे करत।” ज्‍योति‍षीजी कुकर्माकेँ संग कऽ लेलनि‍। पहुँचला राज-दरबार। दरबार लगल। प्रश्नक संग शर्त राखल। सुनि‍ ज्‍योति‍षी बजला- “ई छोट-छीन प्रश्न हमरासँ नै पूछल जाए। एकर जबाब हमर नाति‍ कुकर्मा देत।” राजा एक ि‍दस कुकर्माकेँ देखथि‍ तँ दोसर दि‍स प्रश्नक जटि‍लताकेँ। मनमे भेलनि‍ जे आइ दुनू गोटाकेँ जलह लि‍खले छन्‍हि‍। प्रश्न सुनि‍ कुकर्मा बाजल- “राजा साहैब, ऐ प्रश्नक रहस्‍यकेँ नहि‍येँ बूझू तहीमे कल्‍याण अछि‍।” मुदा राजाक जि‍ज्ञासा बढ़ि‍ते गेल। अन्‍तमे राजा आदेश पाबि‍ कुकर्मा बाजल- “राज साहैब, अखनो सोचि‍ लि‍अ। भलाइ अहीमे अछि‍ जे नै बुझि‍यौ। अन्‍यथा अकल्‍याण नि‍श्चि‍त।” मुदा राजा बातकेँ मानैले तैयारे नै होथि‍। तखनि‍ कुकर्मा बाजल- “जौं अपने ऐ रहस्‍यकेँ बुझबे करब तँ रानीकेँ राज-दरबारमे बजाैल जाए।” राजाकेँ आदेश पाबि‍ रानी आ हुनक दुनू दाइ सेहो बजाैल गेल। कुकर्मा बाजल- “राजा साहैब, दस हाथक दुरीपर दूटा खम्हा गारल जाउ। आ भरि‍ जाँघ ऊपरमे एक खम्‍हासँ दोसर खम्‍हामे एकटा मजगूत रस्‍सी बन्‍हबा देल जाउ।” तहि‍ना कएल गेल। ओकर बाद कुकर्मा रानीकेँ कहलक- “रानी, आब अहाँ ऐ रस्‍सीकेँ फानू।” रानी रस्‍सीकेँ फानि‍ गेली। तेकर बाद रानीक संग आएल एकटा दाइकेँ कहलक जे आब अहँू ऐ रस्‍सीकेँ फानू। दाइ फानए लगल। तखने कुकर्मा हुनक साड़ीक एकटा खुट पकड़ि‍ लेलक। दाइ फानल सारी खूजि‍ गेल। भरल दरबारमे दाइ चि‍न्‍हार भऽ गेली जे ओ दाइक रूपमे मौगी नै मरद छल। तहि‍ना दोसरो दाइक सएह रूप। उहो दाइ मरदे। सबहक पोल खूजि‍‍ गेल। तखनि‍ कुकर्मा बाजल- “राजा साहैब, अखनो बुझलि‍ऐ जे माछ कि‍ए हँसल छेलै? जइ रानीकेँ अपन प्रजाकेँ पुत्र वत्‍सल मानक चाही तेकरा देखि‍ ओ अनेरे क्रोधसँ आन्‍हर भऽ गेली। आ अनेको तरहक बात कहलनि‍। मुदा जे स्‍वयं स्‍त्रीक भेषमे दूटा मरदकेँ अपन भजार बना मौगीक रूपमे रखने छथि‍न। तेकर कोनो लाजे-गराइन नै। यएह सभ कि‍रदानी देखि‍, तखनि उ माछ हँसल छल।” राजा सभ वृतान्‍त देखि‍ सुनि‍ म्‍यानसँ तलबार नि‍कालि‍ रानी सहि‍त दुनू मरदकेँ दू-दू खण्‍ड काटि‍ देलक। जहलमे भरल सभ वि‍द्वान आ ज्‍योति‍षी लोकनि‍केँ मुक्त कऽ देल गेल। धरमपुरक ज्‍योति‍षी जीकेँ उचि‍त आदर-सम्‍मानक संग प्रयाप्‍त अशर्फी पुरस्‍कार स्‍वरूप देल गेल। ज्‍योति‍षी जीकेँ कुकर्मा प्रतापे जय-जयकार भेल। ऐ तरहेँ ओइ मुण्‍डपर लि‍खल ई बात सत् भऽ गेल- जे कि‍छु होतब से भऽ गेल, कि‍छु बाँकी छै एकक जनम आ तीनक मृत्‍यु। ऐ तरहेँ कुकर्मा अपनो खूब नाओं कमेलक आ अपन माए सुनायनाक लाज बचेलक। असली हीरा मनमोहन गाम। गदाल बश्‍ती। एकसँ एक पहुँचल चोर गाममे। इलाकामे मनमोहन गामक पहि‍चान चोरबे गामसँ होइए। गामक वि‍शेषता चोरि‍ अछि‍। पढ़ल-लि‍खल तँ कम्मे मुदा एकसँ-एक बीहर चोर सभ। जेना हमरा खेती अध्‍ययन आ अध्‍यापन छी तहि‍ना ओकरा सबहक खेती चोरि‍ अछि‍। ओना ई फराक बात, ओ सभ एतेक गरीबो नै अछि‍ जे बि‍नु चोरि‍ केने जीब नै सकैए। मुदा ओ सभ अपन धंधा बुझैए। भरि‍ दि‍न सूतब आ राति‍मे चोरि‍ करब, ई ओकर सबहक धंधा अछि‍। ओही गामक करि‍या नामी चोर छल। करि‍याक नाओंए सुनि‍ इलाका थरथरा जाइ छल। चोरि‍ए टा नै अपि‍तु राहजनी, छीना-झपटी, खून-खराबा इत्‍यादि‍ करब ओकर दि‍नचर्या छल। एक दि‍नक गप छी। ओइ गाम दऽ ओम शान्‍ति‍‍ पंथसँ जूड़ल व्रह्मकुमार दुर्गा भाय जा रहल छला। हुनका संग यज्ञक सेवार्थ कि‍छु कैंचा आ गरदनि‍‍मे हीराक हार छेलनि‍। चलैत-चलैत झलफल भऽ गेल तात् केतए-ने-केतएसँ ओइ करि‍याक नजरि‍ दुर्गा भायपर पड़ल। करि‍या देखलक, सोचलक। ई श्वेत वस्‍त्रधारी कोनो महात्‍मा छी। एकरे घेरल जाए आ संगमे जे कि‍छु हेतै से छीनि‍ लेल जाए। दुर्गा भाय बढ़ल जा रहल छला। करि‍या अागू बढ़ि‍ दुर्गा भाइक कनपट्टीमे औजार सटा रूकैले कहलकनि‍। दुर्गा भाय रूकि‍ गेला। करि‍या दुर्गा भाइक सभ कि‍छु छीनि‍ लेलक। अन्‍तमे ओकर नजरि‍ हीराक हारपर पड़लै। बाजल- “महात्‍माजी, ई हीराक हार लाबह?” दुर्गा भाय कहलखि‍न- “सुनह, ई तँ नकली हीरा छी। असली हीरा तँ तोरा लगमे छह। ओकर खोज करह ने। ई नकली हीरा कथीले लेबह।” करि‍या तँ अवाक्। सोचए लगल। हमरा लग असली हीरा भऽ नै सकैए। मनमे उपकलै। ई महात्‍मा ठकैए। बाजल- “हे महात्‍मा, हम असली-नकली नै बुझै छी। तूँ ई हीरा लाबह।” दुर्गा भाय अपन गरदनि‍‍सँ हार नि‍कालि‍ करि‍याकेँ दैत बजला- “हे सुनह, अखनो कहै छि‍अ। ई नकली हीरा छी। असली हीरा तँ तोरा अपने छह। ओकरा खोजह।” करि‍याकेँ ई बात ठहकलै। आब तँ करि‍या खसल दुर्गा भाइक पएरपर- “से नै तँ बाबा तूँ हमरा बता दैह जे असली हीरा छै केतए?” दुर्गा भाय बजला- “ओइ हीराकेँ खोजैले तोरा ई धंधा छोड़ए पड़तह। दोसर गप तूँ जे करि‍हऽ से करि‍हऽ मुदा झूठ नै बजि‍हऽ।” करि‍या घूमि‍ घर आएल। मुदा दुर्गा भाइक बात ओकरा माथमे रहि‍-रहि‍ कऽ घूमए लगलै। आखि‍र असली हमर केतए हरा गेल! फलस्‍वरूप करि‍या चोरि‍ केनाइ छोड़ि‍ देलक। झूठ सेहो बाजब बन्न केलक। ई बात काने-कान पसरए लगलै। जे कि‍यो सुनै जे करि‍या चोरि‍ केना छोड़ि‍ देलकै तँ लोककेँ आश्चर्य लगै। करि‍या आब ने तँ चोरि‍ करए आ ने झूठ-फूस बाजए। आब तँ संगति‍या सभकेँ कि‍छु ने फुड़ैत। ऊहो सभ सोचलक। से नै तँ सरदार चोरी छोड़ि‍ए देलकै तँ हमहूँ सभ चोरि‍ छोड़ि‍ए देब आ झूठ नै बाजब। सभ सएह केलक। चोरि‍ करब छोड़ि‍ आ झूठ बाजब छोड़ि‍ देलक। कनीए दि‍न पछाति‍ सबहक सोझहा भूखमरी आबि‍ गेल। सबहक धि‍या-पुता भूखे टौअए लगल। करि‍याक सभ संगति‍या सभ लगमे आबि‍ पुछलक- “से नै तँ हम सभ तँ चोरि‍ छोड़ि‍ए देलौं। मुदा बाल-बच्‍चा तँ भुखे टौअाइए। आखरि‍ एकर उपए की हेतै?” करि‍या बाजल- “अच्‍छा ठीक छै। एते दि‍न जे भेलै से भेलै। जँए एते दि‍न ि‍नमलह तँए तूँ सभ हमरा चौबीस घंटाक समए दैह।” तोहर सबहक दूख दूर भऽ जेतए। करि‍या भरि‍ दि‍न गुनधुनमे लगल रहए जे की‍ करी की नै। अन्‍तमे वि‍चारलक, से नै तँ अपने राजक राजाकेँ सातटा लाल छै। आनठाम चारि‍ नै कऽ ओही लालकेँ चोरा लाबी। करि‍या भरि‍ दि‍न गुनधुनमे पड़ल रहए। भगवानकेँ यादि‍ करैत रहए। हे परमात्‍मा आइ हमरा लग कोनो उपए नै अछि‍ तँए हम चारि‍ सन ई पाप करब। जनि‍हऽ तोँ। भरि‍ दि‍न गमौला पछाति‍ करि‍या भगवानकेँ सुमरि‍ बि‍दा भेल राज ओइठाम। नीसोडण्‍ड राति‍। राजा नि‍सभेरि‍ सूतल। पहरू सभ पहरा दैत। दोग देखि‍ करि‍या भगवानकेँ सुमरि‍ सि‍ंहद्वार फाँनि‍ भीतर गेल। दुहारि‍एपर सि‍पाही टोकलकै- “है, के छि‍अह?” करि‍या बाजल- “चोर।” सि‍पाही सोचलक। चोर केतौ कहत जे हम चोर छी। से नै तँ ई रजेकेँ कोइ छी। एकरा भीतर जाए दइ छि‍ऐ। करि‍या भीतर गेल। दोसर फाटकपर दोसर सि‍पाही। ऊहो पुछलकै- “हे के छि‍अ?” बाजल- “चोर।” कि‍एक तँ दुर्गा भाय कहने रहथि‍न। जे करि‍हऽ से करि‍हऽ मुदा झूठ नै बजि‍हऽ। तँए ओकरा जे पुछै, ओ सही बात कहि‍ दइ हम छी चोर। ऐ प्रकारे करि‍या सातो फाटक टपि‍ गेल। पहुँच गेल राजमहल। राज नि‍सभेरि‍ सूतल। करि‍याक नजरि‍ ति‍जोरीपर पड़लै। चोर तँ रहबे करए। जुति‍-फाँति‍ लगा ति‍जोरी खोललक। देखलक जे ति‍जोरीमे सातटा लाल छै। सोचलक। एते लालसँ हमरा कोन काज। करि‍या ओइ सातो लालमे सँ चारि‍टा लऽ तीनटा छोड़ि‍ देलक आ बि‍दा भेल। ताबत राजाकेँ नीन टुटलै। नजरि‍ करि‍यापर पड़लै। पुछलक- “हे, के छि‍अ?” कहलकै- “हम छी चोर।” “केतए आएल छह?” करि‍या बाजल- “चोरी करैले।” “चोरी केलह?” कहलकै- “हँ।” “कथी?” “अहीं खजानामे सात गो लाल छल। हम चारि‍ गो चोरेलौं आ तीनटा छोड़ि‍ देलौं।” ई बात सुनि‍ राजा सोचलक। ई चोर नै भऽ सकत। चोर केतौ ई कहत जे हम छी चोर। आ तीनटा छोड़ि‍ओ देत। बाजल- “अच्‍छा, जाह।” सभ सि‍पाही सभ कि‍छु देख रहल छल। करि‍या अरामसँ चाेरि‍ कऽ लाल लऽ घूमि‍ घर आबि‍ गेल। परात भने सौंसे गाम घोल भऽ गेल जे राज दरबारमे चोरि‍ भऽ गेल। समुच्‍चा राजमे ढोलहो पड़ि‍ गेल। करियो ऐठाम खबरि‍ गेल। करि‍या अपन संगति‍याक संग राज-दरबारमे उपस्‍थि‍त भऽ गेल। दरबार लगल। दरबारमे पुछल गेलै- “गत राति‍ जे राजमहलमे चोरि‍ भेल से चोर के?” तही बीच राजा मंत्रीकेँ कहलक- “मंत्रीजी, राति‍ जे चोरि‍ भेल से देखू गऽ सातो लालमे कएटा चोरि‍ भेल आ कएटा अछि‍।” मंत्री सोचलक चोरी तँ भेबे केलै। जेहने एकटा तेहने सातटा। बँचल तीनू लालकेँ मंत्रीजी अपना घर रखि‍ आएल। दरबारमे सभसँ पुछल गेलै। अन्‍तमे करि‍याकेँ सेहो पुछल गेलै। करि‍याकेँ दुर्गा भायबला बात तँ मने रहै जे जे करि‍हऽ से करि‍हऽ मुदा झूठ नै बजि‍हऽ। करि‍या बाजल- “जी सरकार, चोरि‍ हम केलौं।” राजा आगू पुछलकै- “की चोरि‍ केलह?” करि‍या कहलकै- “ई गप तँ हम राति‍ए कहलौं। हम छी चोर। चारि‍ गो लाल चोरेलौं।” “तों जे चारि‍टा लाल चोरेलह तखनि‍ तीनटा की भेल?” करि‍या बाजल- “से हम नै कहब जे आरो लाल की भेल। हम जे चारि‍टा लाल चोरेलौं से हमरा संगेमे अछि‍। जँ लेब तँ लऽ लि‍अ। मुदा ई चोरी हम अपना पेट खाति‍र नै, अपन जाति‍-समाजक पेट खाति‍र केलौं।” राजा अकचका उठला। चोरी ई केलक मुदा अपना खाति‍र नै अपन जाति‍-समाजक खाति‍र। से की? करि‍या फरि‍छा कऽ सभ खि‍स्‍सा राजा साहैबकेँ कहलक। राजाकेँ बि‍सवास भऽ गेल। आब राजा लगला ओइ तीनू लालक खोजमे। मन पड़लनि‍ जे मंत्री जीकेँ देखैले कहने रहथि‍न। मंत्रीजी ओइ तीनू लालक संग पकड़ा गेला। सभा लगले रहए। तुरंते मंत्री जीकेँ जहलक सजा भऽ गेल। एमहर, करि‍याक सत्यवादी वि‍चारसँ प्रेरि‍त भऽ राजा मंत्रीक पद लऽ देलखि‍न। वेतनादि‍क रूपमे करि‍याकेँ जाति‍-समाजक लेल सालो भरि‍क खर्चा उठौलक। ऐ प्रकारे राजाक संग राजाक प्रजागण आन्‍नदमय जीवन जीबए लगल। चारूकात खुशहाली पसरि‍ गेलै। सभ चोर चोरि‍ छोड़ि‍ अपन उचि‍त काज-उदम लागि‍ गेल। केकरो कोनो तरहक दुख-तकलीफ नै। कथुक कमी नै रहलै। समए बीतैत गेल। राजा अपन समए नजदीक अबैत देखि‍ आ करि‍याक इमानदारीक प्रभावसँ प्रभावि‍त भऽ अपन एकमात्र कन्‍याँक हाथ करि‍याक हाथमे दऽ चारूधामक यात्रापर नि‍कलि‍ गेल। समए बीतैत गेल। मनमोहन गामक आ करि‍या समाचार पत्र-पत्रि‍का आ समाचारमे सेहो आएल। वर्त्तमान सरकारक धि‍यान सेहो मनमोहन गामपर गेल। सरकार सभकेँ इण्‍दि‍रा अवास दऽ लाल कार्ड बना जेकरा परि‍वारमे जेहेन लोक छेलै तेकरा तेहने नोकरी दऽ ओइ गामकेँ आदर्श गाम बना देलक। आइ ओ मनमोहन गाम एकटा आदर्श गामक रूपमे जानल जाइत अछि‍। आ करि‍याकेँ ई बात सेहो बुझबा जोगर भऽ गेल, ओ जे भरि‍ जीवन चोरि‍ केलक ओ हीरा आ सत् जानि‍ परमात्‍माकेँ पहचानि‍ सत्मार्गपर चलब ओइ हीरामे कोन छल नकली हीरा आ कोन छल असली हीरा। पोस्‍टमार्टम रामेश्वरबाबू गामक लब्‍धप्रति‍ष्‍ठि‍त बेकती, सभ तरहेँ सुखी-समपन्न, कथुक कमी नै। कनि‍याँ गामक प्राइमरी स्‍कूलमे शि‍क्षि‍का। छठम वेतन भेने दरमोहो बढ़ि‍याँ। अपने एकटा उच्च वि‍द्यालयमे प्रधानाध्‍यापक पदपर वर्तमान कार्यरत। कुल मि‍ला कऽ मासि‍क आमदनी लाखोसँ ऊपर! लहना-पातीसँ आमदनी अलगे। स्‍वयं जेतए-केतौ रहला। प्रधानाध्‍यापक रहबाक कारणेँ औटी आमदनीक जोगार हरि‍दम लगौने रहैत छला। आन-आन काज करबाक लेल आरो शि‍क्षकगण। मुदा आरम-फारम भर्ती-काल शुल्‍कादि‍सँ ऊपरी आदमनी अपने‍ जेबीमे। सहयोगी शि‍क्षक आ छात्रो सभसँ बननि‍ नै। हप्‍ता दस दि‍नपर कि‍छु-ने-कि‍छु रमन-चमन होइते रहै छेलनि‍। तखने हुनकर मन ठीक-ठाक रहै छेलनि‍। कएक बेर कौमनरूम, शौचालय, बोड आदि‍क लेल तोड़फोर भेल, मुदा हुनका लेल धैनसन! एक दि‍नक समए छल। समैसँ घंटी लगल, प्रार्थना भेल, शि‍क्षक लोकनि‍ अपन-अपन वर्गमे गेला। रामेश्वरबाबूक सेहो कक्षा दसमे वर्ग छेलनि‍। बच्‍चा सबहक आग्रहोपर वर्ग दसमे जेबाक लेल तैयार नै भेला तँ सभ बच्‍चा वर्गसँ नि‍कलि‍ हि‍नका ऑफि‍ससँ खीचि‍ बाहर आनि‍ कहा-सुनीक बाद, लाते-मुक्के गत्र-गत्र फोड़ि‍ देलकनि‍। आब कहबी परि‍... ‘अपने करनी, गै मुसहरनी’ भऽ गेलनि‍। प्रात भने गारजि‍यन सभ बजाैल गेला। स्‍कूलपर बैसार भेल। मनधनबाबा मास्‍सैबसँ पुछलखि‍न- “मास्‍सैब, कि‍एक हमरा लोकनि‍केँ बैसौलौं अछि‍?” रामेश्वरबाबू सभ बात कहलकनि‍। मनधनबाबा आँखि‍ मुनने नि‍चेनसँ सुनि‍ उत्तर देलकनि‍- “अहाँ अपने गुरु छी बच्‍चासँ समाज धरि‍ शि‍क्षा देबक अधि‍कारी छी ओहो मात्र समाजे नै‍ सरकारोक नजरि‍मे। तखनि...?” प्रदूषण आजुक भैति‍कवादी युगमे वि‍भि‍न्न प्रकारक संसाधनादि‍क उपभोगसँ मानव जीवन त्रस्‍त अइ। केतौ मि‍नटो भरि‍क लेल चैन नै। बढ़ैत जनसंख्‍या, गाड़ी-घोड़ा, रि‍क्‍शा-तांगा, जर-जनरेटरक अवाजसँ कान बहीर! शान्‍ति‍पूर्ण ढंगसँ कम मीठ अवाजमे बाजब, स्‍वच्‍छ हवा लेब कठि‍न! फलस्‍वरूप नाना प्रकारक रोग-वि‍याधि‍‍क साम्राज्‍य पसरल अछि‍। घरे-घर नेना-भुटका सभ कोनो-ने-कोनो प्रकारक रोग-वि‍याधि‍‍सँ ग्रसि‍त अछि‍। तात्‍पर्य, सुख लेल एतेक संसाधन होइतो कि‍यो सुख-चैनसँ जीब नै रहल छथि‍। दोसर दि‍स सहोदर होइतो सहोदराक संग भैयारी नै नि‍भा दुश्‍मनी राखब, प्रेमसँ नै रहि‍ झग्‍गर-झाटीमे फसि‍ जाएब। ने सुखसँ अपने रहब आ ने दोसरकेँ रहए देब। रोगहु पुछलक मोल्हुसँ- “भाय, तों तँ पढ़ल लि‍खल लोक छह। एकटा बात कहह औझका मनुखमे एतेक अलगाउ कि‍एक?” मोल्हु बाजला- “से नै बुझहक, ऐ सबहक जड़ि‍ बाहरी प्रदूषण नै, अपि‍तु मनुखक भि‍तरी प्रदूषण छी।” बुधि‍ गामक बूढ़, पीपरावाली काकी, माथक केस सोन सन उज्‍जर धप-धप। आँखि‍ भुमकमक दराड़ि‍ जकाँ धँसल। बत्तीसीसँ हाँसील गोल। गि‍नती लेल दूगो दाँत देखार छल। मुदा चेतना पूर्णरूपेण। पेशाब-पैखानक ज्ञान पुरा-पुरी छन्‍हि‍। लाठी हाथे ति‍कोण भऽ चलै छथि‍। मुदा गप एक्कोटा ने लटपटाइ छन्‍हि‍। गाम-घरक आ टोला-पड़ोसाक लोक सभ पीपरावाली काकीकेँ नीक खि‍स्‍सकरि‍, गीतगायन आ वि‍धकरीक रूपमे जनै छन्‍हि‍। मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ जूड़ल सभ वि‍ध-बेवहारसँ लऽ कऽ टोना-टापर आ अरि‍पन-पीढ़ी आदि‍ देबमे सि‍द्धस्‍त मानल जाइ छथि‍। पैरुख घटने पीपरावाली काकी माय-सँ-दाइ भऽ गेली। आनो-आनो समैमे धि‍या-पुता सभ पीपरावाली काकी लग खि‍स्‍सा सुनैले घूर लगौने रहैए। गरमी-गुमारमे तँ अरबधि कऽ। एक दि‍नक गप छी। काकी अपना जौत-भुटबा जे वर्ग आठमे गामेक स्‍कूलमे पढ़ैए काकीकेँ खि‍स्‍सा सुनबैले जि‍द्द पकड़ि‍ लेलक- “काकी गइ, एकटा नीक खि‍स्‍सा सुना। काल्हि‍ जे स्‍कूल जेबै तँ मास्‍सैब सुनतै। काल्हि‍ शनि‍ छि‍ऐ। मास्‍सैब कहने छथि‍न जे भुटबा काल्हि‍ एकटा खि‍स्‍सा सुनबए पड़तौ। से काकी एकटा खि‍स्‍सा कही ने।” काकी कहलखि‍न- “केहेन खि‍स्‍सा सुनमेँ से तँ कह।” भुटबा बाजल- “काकी, नीक खि‍स्‍सा कही बुधि‍-ज्ञानबला जे स्‍कूलमे सुनाबए पड़तै। कोनो राजा-महराजाबला नै तँ सोनपड़ीबला कही।” काकी शुरू केलनि‍ खि‍स्‍सा- “एक नगरमे एकटा राजा रहै छला। राजाक राजमे कथुक कमी नै। सगतरि‍ सुख-शान्‍ति‍‍ बनल रहै छेलए। राज भरि‍मे ने केकरोसँ कोनो दुश्‍मनी आ ने बाड़ि‍। सभ एक-दोसराक सहयोगी। केकरो कोनो चीजक दुख-तकलीफ नै। सौंसे राजमे अमन-चैन छल...।” काकी कनी रूकैत आगू कहए लगलखि‍न- “एक दि‍नक गप छी। राजाक छोटकी बेटी असलान करैले राज-महलसँ बाहर ढयोढ़ीमे खुनाएल पोखरि‍ जेकर चारूकात फुलवाड़ी छल तइमे अपन नौरी-खबासीनीक संग गेल। असलान करैकाल अपन सभ कपड़ा उतारि‍ नि‍च्‍चाँ जमीनपर रखलक आ गरदनि‍क हि‍राक हार एकटा फूलक डारि‍पर लटका देलक। राजाक बेटी असलान-धि‍यान कऽ कपड़ा पहि‍रि‍ नौरी-खबासीनीक संग राज दरबारमे चलि‍ गेल। मुदा गरदनि‍क हीराक हार बि‍सरि‍ गेल। ओ हार ओही फूलक डारि‍पर लटकल रहि‍ गेल। दि‍न बीति‍ गेलै। लूकझूक साँझक बेरमे घोड़सारक नोकरक नजरि‍ ओइ हारपर पड़ल। कि‍एक तँ दि‍न भरि‍क काज-उदमक बाद ओ नौकर हाथ-पएर घोइले ओही पोखरि‍मे गेल। नोकरबा ओ हार लऽ नुका कऽ रखि‍ लेलक। परात भने ओकर खोज-खबरि‍ शुरू भेल। मुदा कि‍यो गछबे ने करै जे हम लेलौं। राज भरि‍मे ढोलहो पड़ल। मुदा कोनो लाभ नै। राजक बेटी ओइ हार लेल सोगा गेल। दि‍न एक बीतल, दोसर बीतल। मुदा कोनो थाह-पता नै। एमहर राजाक बेटी सोगाएल बि‍छौन पकड़ने। राजा मंत्रीकेँ बजौलनि‍। सभा लगल। दबारक सभ सभासद् एकठाम बैसला। राजाकेँ कि‍छु ने फुड़नि‍। अन्‍तमे मंत्रीजी बुधि‍ बतबैत कहलखि‍न जे राजा साहैब चि‍न्‍ता जुनि‍ करू। राजकुमारीक हार चौबीस घंटाक पेसतर भेट जाएत। काल्हि‍ पुन: दरबारक सभ कर्मचारीक संग प्रजाकेँ सेहो बजौल जाए। सएह भेल। राजाक आदेशानुसार राज दरबारक सभ कर्मचारी आ प्रजागण उपस्‍थि‍त भेल। राजा फेर एकबेर सभकेँ पुछलखि‍न। मुदा हारक चोरि‍क वि‍षएमे कि‍यो ने बाजल...।” भुटबा बि‍च्‍चेमे पुछलक- “तब की भेलै?” काकी आगू कहए लगलखि‍न- “पश्चात मंत्रीजी बजला जे ठीक छै कोनो बात नै राजा साहैब। से नै तँ उपस्‍थि‍त कर्मचारी-दरबारीक संग प्रजागण अपने सभ ऐ ढेरीमे सँ एक-हकटा लाठी लि‍अ। आ धि‍यान राखब जे जे कि‍यो राजकुमारीक हार लेलि‍ऐ वा चोरौलि‍ऐ तेकर लाठी राति‍मे एकहाथ नमहर भऽ जाएत। सभ कि‍यो एक-हकटा लाठी लेलक। घोड़सारक नोकर सेहो एकटा लेलक। हार तँ ओ घोड़सारक नोकरबे लेने रहए। से नै तँ ओकरा भेलै जे हम तँ काल्हि‍ चोरीमे पकड़ाइए जाएब। तइ खातीर ओ अपन लाठीकेँ ऊपरसँ एक हाथ नापि‍ कऽ काटि‍ देलक। परात भेने पुन: दरबार लगल। सभ अपन-अपन लाठी लऽ दरबारमे पहुँचल। सबहक लाठी भजारल गेल। घोड़सारक नोकरक लाठी आन सभ लाठीसँ एक हाथ छोट छल। ऐ तरहेँ ओकर चाेरि‍ पकड़ा गेलै। राजा ओकरा आर्थिक जुरबानाक संग छह मासक जहलक सजा दऽ देलखि‍न। एे तरहेँ राजकुमारीक हार भेट गेलै। राजा आ प्रजा सभ खुश। राजा खुश भऽ कऽ मंत्रीकेँ इनाम देलखि‍न। राजाक संग रानी आ राजकुमारी खुश। संगे सभ सभासद् सेहो। से बुझ‍लीही रौ भुटबा जे कोन तरहेँ मंत्री चोरकेँ पकड़लक? एकरे कहै छै बुधि‍!” भुटबा छल चूप। कि‍एक तँ ओ खि‍स्‍सा सुनैत-सुनैत ओङहा गेल छल। बुड़बक के? मंगला आ बुधना दुनू सहोदर भाए। एक माएक ओद्रसँ जनमल। जनमसँ लऽ कऽ अखनि‍ धरि‍ दुनू भाँइक बीच बड़ ताल-मेल। केतौ कोनो काज दुनू भाँइ आपसमे वि‍चारि‍ लि‍अए तखने करए। एक दि‍नक गप छी। संध्‍याकालक समए दुनू भाँइ बाध-बोनसँ आबि‍ दुआरि‍पर बैसबै कएल आकि‍ आँगनसँ खबरि‍ एलै जे अगुआ साहैब ऐठीन सरकार एलखि‍न अछि‍। तात अगुआ साहैब सरकारक वन्‍दगी-भावमे लगल रहए। तत्खनात दुनू भाँइ अगुआ साहैब ऐठीन पहँूचल आकि‍ वन्‍दगी-भाव कऽ घूमि‍ आपस घर आएल। आ दुनू भाँइमे वि‍चार हुअ लगल। छोटका बजैए- “हौ भैया, सरकार एलखि‍न अछि‍। काल्हि‍ मकइ खेत सेहो तमैक ताक छै। जदि‍ सरकारमे ओझरा जाएब तँ खेत तामलो नै हेतह। से केना की करबहक?” अचताइत-पचताइत दुनू भाँइ वि‍चारलक जे सरकार तँ भि‍नसर आठ-दस बजेक पछाति‍ ने केतौ जेथि‍न, से नै तँ दुनू भाँइ तरगरे उठि‍ बाध जा खेत सबेरे-सकाल तामि‍-कोरि‍ आठ बजे धरि‍ चलि‍ आएब। बेस बड़ बढ़ि‍याँ दुनू भाँइ सहए केलक। तरगरे जा खेत तामए लगल। तमैत-तमैत अबेर भऽ गेलै। एमहर सरकार जे सबेरे उठला तँ देखलनि‍ जे आहि‍ रे वा सेवक सभ तँ घर छोड़ि‍ पड़ा गेल अछि‍। से नै तँ रहि‍ कऽ की करब। अगुआ साहैबकेँ कहलखि‍न जे से नै तँ सबेर-सकाल जलखै-तलखै छोड़ि‍ भोजनेक इजाम धराउ जे भोजन कऽ हमरो दीप जीबछ दास ऐठीम जेबाक अछि‍। से नै तँ गोधनपुरे होइत जाए पड़त तँ लक्ष्‍मी दासकेँ सेहो दरस-परत दइतै जाएब। अगुआ साहैब सएह केलक। सबेरे भोजन-छाजन कऽ सरकारकेँ लऽ दीप दि‍स बि‍दा भेला। जे कम-सँ-कम सीमा अबस्‍से टपा दि‍यनि‍। आगू-आगू सरकार आ पाछू-पाछू अगुआ साहैब। अगुआ साहैब सीमा टपा घूमि‍ गेला। सरकार असगरे बि‍दा भेला। दसे डेग जहाँ ने कि‍ आगू बढ़ै छथि‍ आकि‍ मंगला आ बुधना दुनू सेवककेँ देखै छथि‍ जे दुनू भाँइ तँ मकइक खेत तामि‍ रहल अछि‍। मंगला आ बुधना सेहो देखलक जे आब तँ सरकार देखि‍ लेलनि‍ से नै तँ आब की उपाए हेतै। घरो तँ लगमे अछि‍ नै जे पाइ-कौड़ी आनि‍ वन्‍दगी बजा लेतौं। मुदा हारि‍-थाकि‍ दुनू भाँइ सोचलक जे की करब भैया। से नै तँ भावेमे भाव छै से सरकारकेँ वन्‍दगी बजा ली। दुनू भाँइ सएह केलक। दुनू भाँइ बेरा-बेरी वन्‍दगी बजौलक। साहैब असीरवाद दऽ आगू बढ़ला। फेर दुनू भाँइ खेत तामए लगल। मुदा कनीए कालक पछाति‍ बुधना कहलक- “भैया, से नै तँ एकटा बात बुझलहक। सरकार तँ हमरे पहि‍ने मनसँ असीरवाद देलखि‍न।” “भक्, बूड़ि‍बक। सरकार तँ हमरा बादमे बढ़ि‍याँसँ असीरवाद देलक।” आब दुनू भाँइमे कि‍यो मानैले तैयारे नै जे सरकार केकरा भरि‍ मन असीरवाद देलक। एमहर दुनू भाँइक पेटक भूख आ पि‍यास सोहो जोर केने। तैपर सँ असीरवादबला झंझटि‍ अलगे। आब दुनू भाँइ आपसमे लड़ए-झगड़ए लगल। जे सरकार तँ हमरा भरि‍ मन असीरवाद देलक तँ हमरा भरि‍ मन असीरवाद देलक। ताबत सरकारो ससरि‍ दू बीघा आगू चलि‍ गेला। आब तँ बड़ा फसाद। एकर फैसला के करत। से नै तँ दुनू भाँइ वि‍चारक एकर फैसला चलि‍ कऽ सरकारे साहैब लग कएल जाए। आब देखू जे सरकार अलगे दौगल जा रहल छथि‍, आ पाछू-पाछू दुनू भाँइ। दुनू भाँइक कान्‍हपर कोदारि‍। सरकार आगू-आगू आ दुनू पाँइ पाछू-पाछू। सरकार उनटि‍ देखलनि‍ जे दुनू भाँइक पि‍त बि‍गड़ि‍ गेलै। से नै तँ कोदारि‍सँ काटि‍ ने दि‍अए। सरकारकेँ तँ जैयो ने होन्‍हि‍ तैयो भागल जाथि‍। पाछूसँ सहोदर महेशपुर गामक सिंघेसर बाबूक दरबज्‍जा, लोकसँ गदमि‍शान उठैत छल। एका-एकी हि‍त अपेछि‍त की, दुश्‍मनो धरि‍ पहुँच गेल छल। की अपन की परार, बुझने ने जाइ छल। दरबज्‍जापर तँ ति‍लो धरि‍ रखैक चगह नै। तखनो लोकक ढबाहि‍ भाइए रहल छल। उत्‍सुकतावश हमहूँ घरसँ बहार भऽ पता करए चाहलौं। जनतब भेल जे सिंघेसर बाबूक ओतए तँ डाका पड़ि‍ गेलनि‍। मन केनादुन करए लगल। जि‍गेसा करैले हमहूँ हुनका घरपर पहुँचलौं। सिंघेसर बाबू महेशपुर गामक एकटा प्रति‍ष्‍ठि‍त जमीनदार, सज्‍जन, सुशील एवं नीक पढ़ल-लि‍खल विद्वान। पढ़ि‍-लि‍खि‍ सरकारी सेवामे ऑडि‍टरक पदपर अपन कर्मक निर्वहन पूर्ण जि‍म्‍मेदारीसँ करैत सेवा नि‍वृत्त भेला। सेवारत्‍ रहैत कखनो कहि‍यो कुसऽकलेप नै लगल छेलनि‍। ऐ प्रकारे हुनकर सेवा काल इज्‍जतसँ नि‍महलनि‍। अपने वि‍द्वान रहने अपन दुनू बालक महेश आ दि‍नेशकेँ सेहो नीक शि‍क्षा दि‍औलनि‍। बड़का सुपुत्र महेशकेँ पठा-लि‍खा, डाक्‍टर बना समाज सेवा आ स्‍वसेवाक अर्थ सेहो बरकरार रखलनि‍। ‘स्‍व’क संग समाज सेहो डाक्‍टर साहैबक इलाज पाबि‍ स्‍वस्‍थ्‍य आ खुशी छथि‍। कखनो आ केकरो केनो तरहक गड़ू पड़लापर बि‍नु पाइक सेहो इलाज-बात कऽ महेश बाबू अपन आ अपन पि‍ताक मान बढ़ौलनि‍। नीक क्‍लि‍नि‍क खोलि‍ जन-कल्‍याणक लेल आ समाज सेवा सेहो अनवरत जारी रखलनि‍। डाक्‍टर महेशक जश समाजमे खूब पसरए लगल आ नामक सोरहा सेहो। नामक सोरहा भेने दर-देहातसँ मरीज सभ खाटपर टाँगि‍-टाँगि‍ आबए लगल। मरीज कनैत आबए आ हँसैत जाए। क्‍लि‍नि‍क नीक चलने नीक पाइक आमदनी सेहो हुअ लगलनि‍। सिंघेसर बाबू अपन बराबरीक जमीन-जत्‍थाबला प्रति‍ष्‍ठि‍त बेकती, एकटा उच्‍च वि‍द्यालयक शि‍क्षकक प्रथम सुपुत्री, लक्ष्‍मीसँ डाक्‍टर महेशक कथा लगल। जहि‍ना नाओं तहि‍ना रूप लक्ष्‍मीक। नाओंक अनुरूप सर्वगुण सम्‍पन्न लक्ष्‍मी, महेशक अर्द्धांगि‍नी बनि‍ महेश एली। सिंघेसर बाबूक घरक लक्ष्‍मी दि‍न दुना आ राति‍ चौगुना, पूजीत आ चर्चित भेली। लोको सभ बजैत- “लोके ने लक्ष्‍मी होइ छै। जे लक्ष्‍मी सन पुतोहु जहि‍यासँ सिंघेसर बाबूक घर एलनि‍, तहि‍यासँ घर तँ साक्षात्‍ लक्ष्‍मीक नि‍वास स्‍थान भऽ गेलनि‍।” सिंघेसर बाबूक दोसर लड़का दि‍नेश नाओंक अनुरूप सुरूज सन देदि‍व्‍यमान। जहि‍ना देखए-सुनएमे सुन्‍दर तहि‍ना गुणमे सेहो नि‍पूण। नन्‍हि‍येँटासँ पढ़ए-लि‍खएमे बड़ तेजगर। अक्षरो तहि‍ना सुन्‍दर होइ छेलै। तेजगर रहने नेतरहाटमे नामांकन भऽ गेलै। ओइठामसँ प्रवेशि‍का पास कऽ गाम आएल जे आगूक पढ़ाइ आनठाम जा करब। तीन-चारि‍ठाम आदेवन केला बाद, नाआें लि‍खा गेलै आ पढ़ल-लि‍खए लगल। पढ़ैक क्रममे चौरानबेमे शि‍क्षक वहालीक प्रति‍योगि‍ता परीछाक आयोजन भेल जइमे दि‍नेश अपनो आ संगे अपन भौजी, डाक्‍टर महेशक पत्नी, केर फार्म सेहो भरलक। तेजगर तँ रहबे करए। आरो मन लगा तैयारी करए लगल। समए नि‍कालि‍ अपन भौजीकेँ सेहो परीछाक तैयारी करा देलकनि‍। दि‍अर-भौजाइ दुनू मि‍लि‍ मनसँ करए लगल। परीछाक ति‍थि‍ प्रकाशि‍त भेल। ससमए दुनू गोटे परीछा केन्‍द्रपर पहुँच परीछा देलक। परीछा नीक नहाँति‍ भेल। कनीए दि‍नक बाद परीछाफल प्रकाशि‍त भेल। दुनू गोटे पास केलक। संयोग एहेन अपने पंचायत मध्‍य वि‍द्यालयमे नि‍अमि‍त शि‍क्षकक पदपर दुनू गोरे वहाल भेल। दुनू दि‍अर-भौजाइ पढ़ल-लि‍खल रहने बच्‍चा सभकेँ खूब मनसँ पढ़बए। बच्‍चो सभ खूब नीक नहाँति‍ पढ़ए। नव-नव ज्ञान भेटने उत्‍साह बढ़ए लगल। कमीशनसँ एलाक कारणे आ कनीए दि‍नक बाद पुरना हेड मास्‍टरक रि‍टायर भेलापर दि‍नेश जी ओइ पदपर सुशोभि‍त भेला। कुशल संचालनसँ वि‍द्यालयकेँ चमका देलनि‍। नीक नाओं आ प्रति‍ष्‍ठा भेटए लगलनि‍। दि‍अर-भौजी एक्के मोटर साइकि‍लसँ वि‍द्यालय अबरजात करए लगला। लक्ष्‍मीक एकटा छोट बहि‍न रूपा नामक अनुरूप तेतबे गुणवती आ शीलवती। शि‍क्षकक पुत्री रहने रूपा सेहो नीक नहाँति‍ पढ़लनि‍-लि‍खलनि‍। भौजीक गाम जात-अबरजात रहने दि‍नेश आ रूपाक भेँट-घाँट होइते रहै। जे हँसी-मजाकसँ आगू बढ़ि‍ प्रेमक रूप लऽ वि‍कसि‍त हुअ लगल। दुनूकेँ एक-दोसराक लेल बेचैनी। दि‍नेमे सपना देखब, भूख नै लागब, प्‍यास हरा जाएब, आँखि‍सँ नीन पड़ा जाएब इत्‍यादि‍ शुरू भऽ गेल। एे प्रेमक महक सभसँ पहि‍ने लक्ष्‍मीकेँ लगलै। लक्ष्‍मी ओकर सुगन्‍ध डाक्‍टर महेशकेँ कानमे दऽ सिंघेसर बाबूकेँ जनौलनि‍। सिंघेसर बाबू उचि‍त समए पाबि‍ सभ बात अपना समैध मास्‍टर साहैब लग रखि‍, घरक इज्‍जतकेँ इज्‍जत बूझि‍ नीक दान-दहेज दऽ नीक बरि‍याती साजि‍ रूपा आ दि‍नेशकेँ परि‍णय सूत्रमे बान्‍हि‍, जि‍नगीक बाट देखा चलबाक प्रेरणाक संग आशीरवचन दऽ संग जीबाक-मरबाक असीरवाद देलनि‍। बड़-बढ़ि‍याँ बड़-सुन्‍दर एक-दोसराक जि‍नगी चलए लगल। सबहक जि‍नगी सरसपूर्ण छल। एमहर दुनू भाँइ आ ओमहर दुनू बहि‍न। दुनू बहि‍न सभ दि‍न बहि‍ने रहली, कहि‍यो दि‍यादि‍नी नै। शुरूओमे जहि‍ना रूपा लक्ष्‍मीकेँ दीदी कहैत आबि‍ रहल छलि‍, तहि‍ना दीदी कहैत रहलि‍। आ लक्ष्‍मी सेहो कनि‍याँ आकि‍ फल्‍लाँ गामवाली नै कहि‍ रूपाकेँ रूपे कहैत रहलि‍। परि‍वारक उन्नति‍ दि‍न-दूना आ राति‍-चौगुणा होइत रहल। एमहर दुनू सहोदर भाए आ ओमहर सहोदर बहि‍न, परि‍वार परि‍वार नै बुझू जे सत्युगी सृष्‍टि‍क उदाहरण बनि‍ चूकल छल। परोपट्टामे एकटा आदर्श परि‍वारक रूपमे सिंघेसर बाबूक परि‍वारक चर्च होइत रहै छल। बाल-बच्‍चाक हँसी-खुशी देखि‍ सिंघेसर बाबू सेहो हरि‍दम अह्लादि‍त रहै छला। हुनको अपन सन्‍तानपर गर्व होइत रहनि‍। समए बीतैत गेल कालक्रमे सेवा नि‍वृत्त भऽ, तीन दशक खेपि‍ सिंघेसर बाबू सेहो ओइ धड़ा-धामकेँ छोड़ि‍ परमधाम चलि‍ गेला। आ ओ छोड़ि‍ गेला अपना पाछू दुनू सुपुत्र दूटा पुतोहु आ पोता-पोतीसँ भरल-पुड़ल परि‍वार। पि‍ताक मुइला पछाति‍ डाक्टर महेश एकटा पूर्ण गारजनक निर्वहन करए लगला। कुशल माली सदृश परि‍वार रूपी बगि‍याकेँ सिंचए लगला। हुनक सि‍नेहक छत्र-छायामे ओ परि‍वार दि‍न-दुना आ राति‍-चौगुण फड़ए-फुलए लगल। कि‍नको कथुक अभाव नै। प्राय: परि‍वारक तीन-तीनटा सदस्‍य सरकारी सेवामे बाल-बच्‍चा सभ सेहो नीक पब्‍लि‍क स्‍कूलमे पढ़ै-लि‍खै छल। कालक्रमे सभ अपन-अपन कर्मपर कर्मयोगी भऽ नि‍ष्‍ठापूर्वक ओकर निर्वहन करै छला। मुदा काल्हि‍ की हेतै से कि‍यो ने जानि‍ रहल छल। एक भाँइ डाक्‍टर तँ दोसर मास्‍टर। ि‍दनेश जे सभ दि‍न पूर्णरूपेण स्‍वस्‍थ्‍य छल, कहि‍यो कोनो खराप बि‍मारीक छाँहोँ ने देखने आ ने सुनने। मुदा एकाएक कौल्ही राति‍ छातीमे कनी दर्द उखड़लै आ दरद सेहो करए लगलै जइसँ उनटा साँस चलए लगलै। घरमे अफरा-तफरी मचि‍ गेल। डाक्‍टर महेश दौगल आबि‍ आला लगा जाँच-परताल केलनि‍। शंका भेलनि‍, उचि‍त सलाह लइले आवश्‍यक दवाइ दऽ गाड़ीसँ राता-राती दरभंगा बि‍दा भेला। मुदा वि‍धाताकेँ तँ कि‍छु औउरे मंजूर छेलै। अदहो रस्‍ता ने तँ गेल हेतै आकि‍ दि‍नेशक पराण छूटि‍ गेलै। भौजी जे दि‍नेशक माथ अपना जाँघपर रखने छेली सेहो एकाएक ओंघरा गेली। बुझू जे डाका पड़ि‍ गेलै। जुआनी मौगति‍ भऽ गेलै। डाक्‍टर महेश लहास लऽ रस्‍तेसँ गाम घूमि‍ गेला। लहास दरबज्‍जापर अबि‍ते समुच्‍चा परि‍वार हाक्रोश करए लगल। बाल-बच्‍चा अहुरि‍या काटए लगलै। टोला-पड़ोसाक लोक सभ जनि‍जाति‍ओ सभ सभ कानए-खि‍जए लगल। मुदा ओ की आब घूमि‍ कऽ आबएबला छेलै। दि‍नेश तँ सभसँ अपन रि‍स्‍ता-नाता तोड़ि‍ जेतएसँ आएल छल तेतए चलि‍ गेल। मृत शरीरक लेल मृत शरीरपर सभ अहुरि‍या काटि‍ रहल अछि‍। राताराती समाज सभ मि‍लि‍ ओइ मृत शरीरकेँ डाहि‍-जारि‍ घूमि‍ घर अबै गेला। परात भेलापर लोकक करमान सिंघेसर बाबू दरबज्‍जापर लगल छल। सबहक आत्‍मा दि‍नेशक लेल कुही भऽ रहल छल। सबहक आँखि‍ अश्रुपुरीत। के केकरा सन्‍तोख देत। डाक्‍टर महेश बौक भेल मुरूत जकाँ दरबज्‍जापर बैसल। आँखि‍सँ दहो-बहो नोर बोहि‍ रहल छल। वि‍चि‍त्र दारूण दुखक दृश्‍य छल। कि‍यो कि‍छु ने बजैत। कि‍छु फुड़बे ने करै। घुमतीकाल एक्केटा वाक्‍य लोकक मुहसँ नि‍कलै- “भगवान डाका दऽ देलकै। दि‍नेश केकर की बि‍गाड़ने रहै। उमेरे की भेल रहै।” डाक्‍टर महेशक बेथाक तँ कथे ने पुछू रहि‍-रहि‍ मुहसँ एक्‍केटा बात नि‍कलै- “सहोदर... दि‍नेश...। ऐसँ नीक होइतै ओ जीबतए..., हमहीं मरि‍ जइतौं...। मुदा ओ हमरा सहोदर नै बेमातर बना कऽ चलि‍ गेल...। हम तँ सहोदरे छेलि‍ऐ। सहोदर बनि‍ रहि‍तए...। आब के हएत हमर सहोदर...?” बि‍आहक पहि‍ल साल गि‍रह राधा आ मोहन दुनू बि‍आहक पहि‍ल साल गि‍रह। दुनू परानीक मनमे उठैत खुशीक कोनो सीमा नै। दुनूक बीच प्रेम एतेक जे साल केना बीतल से बुझि‍ए ने पेलक। परि‍वार छोट भेने जीवन जेतबए सुखमए तेतबए सरस सेहो। मोहन बैंकक कर्मचारी। तँए पटनेमे जमीन लऽ मकान बना, जेबा-एबा लेल नैनो गाड़ी सेहो कीनि‍ लेलक। भि‍नसरसँ लऽ कऽ जाधरि‍ ऑफि‍स जाइ छला ताधरि‍ राधाक मदमस्‍त जुआनी देखि‍ समए केना बि‍त जाइ छेलनि‍ से पते ने चलनि‍। मुदा दस बजे धरि‍ तैयार भऽ ऑफि‍स जरूर चलि‍ जाइ छला। दि‍न भरि‍मे ऑफि‍सोसँ एक-अाध बेर राधाकेँ फोन कऽ हालि‍-चालि‍ जरूर पूछि‍ लइ छेलखि‍न। पाँच बजे ऑफि‍स बन्न भेला पछाति‍ कि‍छु ने कि‍छु सनेस लऽ मोहन घर चल अबै छला। राधा ताधरि‍ बाट तकैत रहै छेली। जाधरि‍ गाड़ीक हौरन नै बाजि‍ उठै छेलनि‍। ऐ तरहेँ दुनू परानी लेल सभ दि‍न होली आ राति‍ दीवाली रहै छल। देखैत-देखैत साल बि‍त बेल आ आबि‍ गेल बि‍आहक पहि‍ल साल गि‍रह। दुनू परानी आपसमे वि‍चारलनि‍ जे बि‍आहक पहि‍ल साल गि‍रह छी, तँए ऐ शुभ अवसरि‍पर अपना दोस्‍त सभकेँ एकटा शानदार पाटी देल जाए। पाटीमे खेबाक-पीबाक पुरकस इजाम छल। रवि‍ दि‍न रहलाक कारणे पाटीओ समैसँ शुरू भेल ओइ दि‍न तँ राधा आ मोहनक सुन्‍दरते अपूर्व छल। दुनू परानी फि‍ल्‍मी हि‍रो-हि‍रोइन जकाँ लगै छला। साँझ पड़ि‍ते दोस्‍त-दोस्‍ति‍नी सभ आबए लगलनि‍। सभसँ उपहार लऽ राधा डैनि‍ंग हाॅलमे रखि‍-रखि‍ आबथि‍। पाटीमे कोनो वस्‍तुक कमी नै छल। सभ कि‍यो खूब खेलक-पीलक आ नाच-गान करए लगल। मोहनकेँ दोस्‍तक बीच रहैत-रहैत पीबैक चस्‍का लगि‍ गेल छेलनि‍। तँए आइ मोहनो खूब पीलनि‍। पीला पछाति‍ राधाकेँ डाॅरपर हाथ दऽ दोसर हाथ पकड़ि‍ ओहो नाचए लगला। नाच-गान खतम भेला बाद सभ दोस-दोसति‍नी अपन-अपन घर गेल। मुदा ओही दोसक बीच मोहनक एकटा अभि‍न्न दोस अरूण जेकरा पीबैक आदति‍ नै, ओ जलखै मात्र केला पछाति‍ अपन घर चलि‍ गेल। “राधा हे राधा, देखू अहाँले माेहन केते बेकरार अछि‍। आउ अहाँ तँ हमर जान छी। हमर परान छी, आउ ने।” कहैत मोहन उठएकाल पलंगसँ टकरा गेला। राधा दौग एली देखली जे मोहन तँ कि‍छु बेसीए पीब लेने छथि‍। मोहन बजला- “ओह राधा, छोड़ू ने ई गप-सप्‍प। प्‍लीज एमहर आउ ने। हमरा आब अहाँ एना जुनि‍ तड़पाउ। ओह राधा, अहाँ केते सुन्‍दर छी। मोन होइए अहाँकेँ हम देखि‍ते रही। कि‍छु बाजी अहाँ हम सुनि‍ते रही।” गीत गबैत मोहन राधाकेँ अपना बाँहि‍मे कसि‍ पलंगपर ओंघरा देलखि‍न। प्रेमक सागरमे डुमए चाहलक। मुदा सागरमे डुमैसँ पहि‍ने एना भेलै, मोहन औक करए चाहलक। राधा हाँइ-हाँइ मोहनकेँ उठाबए चाहलक। ताबए तँ मोहन पलंगेपर बोकरि‍-बोकरि‍ भरलक। सौंसे घर गंधसँ भरि‍ गेल। नाके ने देल जाइ। शराबक नि‍शाँमे मोहन बेसुधि‍। कनीए कालक बाद मोहनकेँ फेर मन भेलै जे औक हएत। निशेमे मातल मोहन जाकि‍ पलंगसँ उठल आकि‍ पलंगेपर खसि‍ पड़ल, कपार फुटि‍ गेलै, शोनि‍तक टघार चलए लगलै। राधा जेना-तेना मोहनक माथसँ बोहैत शोनि‍तकेँ रूमालसँ पोछि‍-पाछि‍ माथकेँ बान्‍हि‍ देलक। मुदा एतबोपर मोहनक मन थीर नै भेलै। पेटमे दर्द उठलै। दरदे छड़पटाए लगल। ओही अवस्‍थामे मोहन एकबेर फेर औक केलक। मुदा ऐबेर खुने केलक। समुच्‍चा घर खुने-खुनामे भऽ गेल। मोहन खून बोकरि‍ रहल छल। तथापि‍ओ ओकर दर्द कम नै भऽ रहल छेलै। एमहर असगरे राधा की करती। राधाकेँ मोन पड़लनि‍ अरूण। अरूण मोहनक दोस जे शराब नै पीब अपना घर चलि‍ गेल छल। अरूण... अरूण... अरूण... हल्‍ला करैत राधा अरूण दुनू परानीकेँ बजौलक। अरूण दुनू परानी दौगल राधा ऐठाम आएल। मोहनक हाल देखि‍ दुनू परानीकेँ होश उड़ि‍ गेल। अरूण बाजल- “भौजी, मोहन भैयाक हाल ठीक नै छन्‍हि‍। हम गाड़ी नि‍कालै छी अहाँ दुनू गोरे भैयाकेँ पकड़ि‍ बाहर लाउ।” गाड़ीक पछि‍ला दरबज्‍जा खोलि‍, सीटपर मोहनकेँ पाड़ि‍ राधा आ अपन पत्नीक संग अरूण अस्‍पताल दि‍स बि‍दा भेल। अरूण तीव्र गति‍सँ गाड़ी चला रहलए अपना धुनि‍मे। जे जल्‍दीसँ जल्‍दी अस्‍पताल पहुँच जाइ। बाटमे मोहनकेँ बड़ी जोड़सँ दर्द भेलै आ हि‍च्‍की उठलै दर्दसँ छटपटाइ-कछमछाइत एकबेर फेर खूब नमहर खूनक औक भेलै। कि‍छुए कालक पछाति‍ मोहन कालकलवि‍त भऽ गेल। राधाकेँ शंका भेलै। ओकर करेज भालरि‍ जकाँ काँपि‍ उठलै। जोरसँ कानए लगल। अरूण बोल-भरोस दैत अस्‍पताल पहुँचल। अरूण आ पूजा दुनू परानी मोहनकेँ स्‍ट्रेचरपर लादि‍ डाक्‍टर लग लऽ गेल। डाक्‍टर साहैब आला लगा नारी देखि‍ तजबीज करैत बजला- “माफ करू, ई आब नै छथि‍।” सुनि‍ते राधा पछाड़ खा मोहनक मृत शरीरपर गाछ जकाँ खसली। पूजा कनैत राधाकेँ सम्‍हारैत बजली- “दीदी, उठू होश करू। की करबै धैरज राखए पड़त। जि‍नगीकेँ जीबए पड़त।” पूजा उठौलनि‍। राधा उठली। मुदा फेर पछाड़ खा मोहनक शरीरपर खसि‍ पड़ली। जोर-जोरसँ कनैत राधा मोहनक देहकेँ डोलबैत बाजलि‍- “स्‍वामी यौ स्‍वामी, अहाँ केतए चलि‍ गेलौं यौ स्‍वामी? उठू ने अहाँ तँ कहैत रही जे मोहन होइए अहाँकेँ हम देखि‍ते रही। देखू ने हम छी अहाँक राधा। उठू ने। उठू ने। देखू ने। अहाँक राधा...।” अहुरि‍या कटैत राधाकेँ देखि‍ अरूण बाजल- “भौजी, उठू होश करू। आब ओ घुरि‍ नै औता।” ई कहैत अरूण एकबेर राधाकेँ सम्‍हारि‍ उठौलक। मुदा राधा पुन: पछाड़ खा स्‍वामी-स्‍वामी कहैत मोहनक मृत शरीरपर खसि‍ बेहोश भऽ गेलि‍। के... मोहनक राधा...। आत्‍म वि‍श्वास कंटीर बाबाकेँ दूटा बेटा, चुन्नु आ चन्‍दु। दुनू जौआँ जनमल छल। जौआँ भेने एक-दोसरामे बहुत अधि‍क समानता छल। बाबाक परि‍वार बेसीए सि‍नेहसँ दुनू बच्‍चाकेँ पालि‍-पोसि‍ नमहर केलक। देखए-सुनएमे दुनू बेजोर। सोभाव-संस्‍कार सेहो एक-दोसरासँ खूब मीलैत। छेटगर भेला बाद दुनू बच्‍चाक नाओं गामक स्‍कूलमे लि‍खा देल गेल। दुनू मनसँ पढ़ए लगल। मुदा दुनूक अध्‍ययनमे अन्‍तर छेलै जे आगू जा कऽ देखबामे आएल। चुन्नु जे सभ कथुमे चन्‍सगर। चन्‍दु थोड़ेक पानि‍क मन्‍द छल। यद्यपि‍ देखए-सुनएमे मुँहक पानि‍ बेजए नै छेलै। वर्ग दसमे जखनि‍ फारम भरैक बेर भेलै तँ चन्‍दु हनछि‍न-हनछि‍न करए लगल। ओ फारम भरै ने चाहै छल। जखनि‍ कि‍ चुन्नु फारम भरि‍ नि‍चेन छल। चन्‍दु फारम भरै बेर उदास भऽ गेल। फारम नइक नहि‍येँ भरलक। मार्च आठ तेरहकेँ परीछाक आयोजन भेल। करीब तेहर हजार छात्र-छात्रा लोकनि‍ परीछार्थी रहथि‍ जइमे चुन्नु सेहो छल। परीछा बड़-बढ़ि‍याँ जकाँ सम्‍पन्न भेल। चुन्नु परीछा दऽ घर घूमि‍ आएल। जुलाइक दोसर सप्‍ताहमे परीछाफलक प्रकाशन भेल। चुन्नु सनतानबे प्रति‍शत अंकसँ उतीर्ण भेल छल। नीक अंकसँ उत्‍साहि‍त भऽ इंजीनि‍यरिंगक फारम भरलक आ ओहो परीछामे बाजी सुतारि‍ लेलक। नतीजा स्‍वरूप ओकर नामांकण आइ.आइ.टी.क इंजीनि‍यरिंगमे भऽ गेल। एमहर चन्‍दु वर्ग दसेमे रहि‍ पढ़ए लगल। पढ़ाइमे मन की लगतै कपार। अवारागर्दी केने घुड़ए। नाओं जरूर सरकारी स्‍कूलमे छेलै। मुदा पढ़ाइमे कमजोर रहबाक कारणे वर्गमे आगाँक सीटपर बैसब काटए दौगै। कि‍एत तँ मास्‍टर साहैब अगि‍ला बेन्‍चपर बैसल वि‍द्यार्थीसँ सबाल-जवाब करै छथि‍न। अही दुआरे ओ या तँ बि‍चला नै तँ पछि‍ला बेन्‍चपर बैसै छल। यद्यपि‍ मास्‍सैब ओकर ऐ कमजोरीपर धि‍यान दऽ आगू आबि‍ बैसबाक प्रत्‍साहि‍त करै छेलखि‍न मुदा चन्‍दु ऐ बातपर धि‍याने दैत छल। ओकरा ले धैनसन। नतीजतन पढ़ाइमे दि‍नानुदि‍न कमजोर होइत गेल। बोड परीछा फेर लगि‍चाएल अबै छेलै। आब तँ चन्‍दु फेर परेशान रहए लगल। कि‍एक तँ तैयारी केनै ने छेलए। तैयारी केहेन छेलै से तँ भगवाने जनै छेलखि‍न। वर्गमे सेहो मास्‍टर साहैब आँगुरेपर गनल बच्‍चाक प्रशंसा करै छला। कि‍एक तँ सैंकड़ामे दसे-बीसटा बच्‍चा पढ़ैबला रहै छै जे मन लगा पढ़ैए। अधि‍कांश तँ बातेकेँ बतंगर करैमे लगल रहैए। कहबी छै ने ‘हरमे जँ तँ आ चौकीमे बि‍हाड़ि‍’ कुसंगति‍सँ आइ तक कि‍यो सुधरल अछि‍ की। सएह हेतै ऐसँ अधि‍क आर की। मास्‍टर साहैब सभ सेहो परीछाक पूर्वक तैयारीक समीक्षा जे करथि‍ तँ तइमे चन्‍दुक कोनो नाओं-ठेकान नै। चन्‍दुकेँ ऐ बातक सोग पसि‍ गेल। यद्यपि‍ चन्‍दु पढ़ाइमे भुसकोल छल मुदा पढ़ैक लालसा ओकरामे सभ दि‍न रहलै आ ओ पढ़ए चाहै छल। बि‍हार बोड परीछासँ पूर्व वि‍द्यालय स्‍तरीय एकटा जाँच परीछा लेल जाइ छै। ओइ परीछामे जे छात्र आ छात्रा लोकनि‍ जे पास भेल ओ फारम भरलक। अन्‍यथा ओकरा साल भरि‍ आर पढ़ए पड़ै छै। जाँच परीछासँ पाँच दि‍न पहि‍ने चन्‍दुक वर्ग शि‍क्षक सेहो अही बातक चर्चा केलनि‍ जे केकरा-केकरा पास करबाक उमेद छै आ केकरा अधि‍क मेहनति‍क खगता छै। वर्ग शि‍क्षक जखनि‍ कोनो लि‍स्‍टमे चन्‍दुक चर्चा नै केलनि‍ तखनि‍ तँ ओकर दुखक कोनो सि‍माने ने रहि‍ गेलै। ओकरा बि‍सवास भऽ गेलै जे हम जरूर फेल भऽ जाएब। ओकरा मनमे ऐ बातक द्वन्‍द चलि‍ए रहल छेलै। ओकर मन ओझरा जकाँ गेल छेलै। ओ अपना भवि‍सक लेल सोचि‍ रहल छल। तखने वर्ग शि‍क्षक महोदय द्वारा ओकर नाओंक पुकार भेल। ठाढ़ होइले कहलखि‍न। चन्‍दु उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। मास्‍टर साहैब कहलखि‍न- “बौआ, तोहीं एकटा एहेन बच्‍चा छह जे तूँ जे मनमे ठानि‍ लेबह तँ बहुत आगाँ तक जा सकै छह। तोहर भवि‍स हम देखि‍ रहल छि‍अ। जँ तूँ कनीओं मन लगा कऽ पढ़बऽ तँ तोराले कि‍छु असम्‍भव नै। तोरामे आत्‍म वि‍श्वास आ आत्‍मबल हम देखि‍ रहल छि‍अ। हम जनै छी जे कनीए मेहनति‍सँ अहाँ प्रथम श्रेणीमे नीक अंक लऽ परीछा उतीर्ण हएब आ अपन भाग्‍य रेखा अपने खिंच लेब। तोहर प्रश्‍स्‍त ललाट हमरा बहुत कि‍छु कहि‍ रहल अछि‍। तोरा भाग्‍यमे एकटा सरकारी नोकरी लि‍खल हम स्‍पष्‍ट देखि‍ रहल छी। बस खगता छै थोड़े पढ़ाइपर धि‍यान देबाक।” चन्‍दुक प्रति‍ वर्ग शि‍क्षकक एहेन भरोस देखि‍ चन्‍दुक आत्‍म वि‍श्वास जागल। ओकरा बुझेलै जे ओ बहुतो कि‍छु कऽ सकैए। यएह सोचि‍ ओकर मन-माथा घूरि‍ गेलै। ओकरा आँखि‍क सामने हरि‍दम बोड परीछा नाचए लगलै, आ ओ बीसो नहक जोर लगा पढ़ए लगल। पढ़ाइ-लि‍खाइ छोड़ि‍ आब ओकरा कोनो काजे ने रहलै। चन्‍दुमे ई आमूल परि‍वर्तन टोल-पड़ोसक बीच चर्चाक वि‍षय बनि‍ गेल। पढ़ाइक प्रति‍ जेना ओकरापर भूत सवार भऽ गेलै। पढ़ब अनि‍वार्य जानि‍ ओकर अभि‍रूचि‍ जागि‍ गेल। जे पढ़ाइ ओकरा कनैलक दूध जकाँ तीत बूझना जाइ छेलै तेकरा ओ अमृत बूझि‍ पान करए लगल। नतीजाक रूपमे ई भेलै जे आयोजि‍त बोड परीछा लेल चन्‍दु खूब मेहनति‍ केलक। परीछा नीक नहाँति‍ गेलै। सभ प्रश्नक उतारा चन्‍दु देलक। प्रथम श्रेणी पाबि‍ चन्‍दु पास केलक। एतबे नै, बि‍हार सरकार टी.ई.टी. परीछामे सेहो प्रथम श्रेणी लऽ पास केलक आ ओकर चयन मध्‍य वि‍द्यालय अमौजामे भेल। आइ ओ एकटा प्रति‍ष्‍ठि‍त शि‍क्षकक जि‍नगी जीब रहल अछि‍। ई छल ओकरामे जागल ओकर आत्‍म वि‍श्वास। लाल भौजी पछिला अड़तालिस बर्खक सभ रेकार्ड घ्वस्त करैत ऐ बेरक जाड़ पाँछा छोड़ि देलक। कहबी छै जाड़ मासमे रुइये आकि दुइये मुदा रुइ ततैक महग जे बेसाहब कठिन। जँ दाम पुछबै तँ माधो मास सौंसे देह पसीनासँ तर-बत्तर भऽ जाएत। जहाँ धरि दूइएक सबाल अबैत अछि तँ ई सुख प्रायः सबहक कपारमे लिखले नै अछि। जँ क्यो किशोरावस्थाक बालक-बालिका छथि तँ राति सपनाइते बीतैत छन्हि, आ बुड़हा-बुड़हीक तँ कथे नै पुछू किएक तँ आइ ने ओ बूढ़ भेलाहेँ मुदा एहेन केतेको जाड़ कऽ ओ लोकनि देखने छथि आ खेपने छथि। तँए फलक रूपमे केराक घोड़ जकाँ हथ्थे-हत्थाक असथानपर गन्डाक-गन्डा धिया-पुता सोहरल छन्हि। बाल-बच्चाक समर्थ रहबाक कारणे ओकरा सभकेँ तँ अपने खाए-खेलाएसँ पलखति नै। तहूपर सँ जँ कोनो पाहुन-परख चल आबैथि तँ घरक स्‍वार्थ अभावे। सभ घरकेँ बेटा-पुतोहु अलगे छेकने। तँए बुढ़ा- बुड़ही लेल तँ माघ मासक जाड़ प्राणक हार बनल रहैत छन्‍हि‍। कोनो तेहन अवसरे नै भेटि पबै छन्‍हि‍ जे समए सँ ओइ कहबीसँ किछु लाभ उठाबथि। तँए ओम्हर बुड़ही कोनेा कोन मे धोकरी लगा पुआर मे धोसिआइल रहैत छथि। आ ऐम्हर बुड़हा दलानक कोनो केानमे पोता पोतीक संग जाड़सँ सर्घष करैत रहैत छथि। कोनो तरहेँ दुनू परानी (बुड़हा-बुड़ही) राति खेपक लेल मजबुर। मुदा से केते दिन धरि? एक दिन मौका पाबि़ बुढ़ा बुड़हीकेँ हाक दैत छथिन- “सुनै छै हाथ-पाएर जाड़े ठिठुरि रहल अछि, कनी कोनो मालीमे लहसुन तेल पका कऽ लेने आबो तँ। बुड़ही आँगनेसँ उतारा दैत छथिन हँ हँ सुनै छि‍ऐ एते जोरसँ किए हाक दइ छै, कोनो की हम बहीर छी? लेने आबै छि‍ऐ। ताबे माले घरमे आगि तापो। बुड़हा पुनः बाजि उठैत छथि- “हे जल्दी सँ औते हम माले घरमे छी।” बुड़ही करीब दस मिनटक बाद मालीमे लहसुन तेल पका दुरुखे सँ हाक दैत छथिन- “केतए छै हइया लौ।” बुड़हा फेरि बाजि उठैत छथि- “एम्हरे लेने आबो ने हइया छि‍ऐ।” बुड़ही लग अबैत बाजि उठैत छथि- “ई किछो नै बुझै छै? जे बेटी-पुतोहुबला अँगना-घर भेलै। सुतौ तेल लगा दैत छि‍ऐ।” बुड़हा पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइ छथि आ बुड़ही तेलक मालीश करए लगैत छथिन। कनीकालक बाद बुढ़ा तेल लगबैत गरमा जाइ छथि। प्रेमसँ बुड़हीकेँ पुछै छथिन- “भानस भातमे देरी छै की? बच्चा सभकेँ अँगना दऽ आबौ खा पी कऽ सुइत रहतै आ ई एत्ते आगि तापो।” बुड़ही आँगन जा धिया-पुताकेँ पुतोहु सभकेँ दैत अपने बुड़हा लग आबि जाइ छथि आ मालक घरमे पजरल घुरा लग बैसि आगि तापए लगैत छथि। दुनू परानीक गप-सप्प करैत बुड़हा हाथ-पाएर सुग-बुगबए लगैत छथि। आ अपन दहिना हाथ बुड़हीक बामा... हाथ दैत बाजि उठैत छथि एकरा एक्को रत्ती कोनो बातक घ्यान नै रहै छै। कहौ तँ केतेक जाड़ होइत छै... कहैत बुड़हीकेँ पाँजमे उठा आ पुआरक बि‍छौनपर ओंघरा जाइ छथि। कनियेँ जा कि लट्टा-पटी होइत आकि तखने आँगनसँ पोता-पोती खा कऽ सुतैले बाबा किलोल करैत मालक घर दि‍स दौड़ पड़ैत अछि। बुड़ही बाजि उठैत छथि- “छोड़ौ ने, छोड़ौ धिया-पुता सभ आबि रहल छै।” आ दुनू परानी माने बुड़हा-बुड़ही गरमाएले अवस्थामे एक-दोसरासँ धड़फड़ा कऽ अलग भऽ जाइ छथि। रहल जबान-जुआनक गप, जबानीक धाह पाबि‍ जाड़ो गरमाएले रहैत अछि। बुझू तँ दू परानी जबान-जुआन होथि आ ऊपरमे रजाइ परल हो तँ जाड़ोकेँ जाड़मे पसीना छुटए लगैत छै। मुदा प्रकृति तँ स्थिर रहत नै। ओ तँ अपना कालक्रमे चलैत रहत। बीतल जाड़ मास आएल सरस्वती पूजा उड़ए लगल वातावरणमे रंग-अबीर जारु कात डारि-पातपर चीड़ै-चुनमुनी चहकए लगल। कोइली धि‍या-पुताकेँ मुँह दुसब शुरू कऽ देलक। आमक गाछ मंजरसँ महमह करए लगल। मुनगा फूल धरए लगल, राइ, तोड़ी, तीसी आ सरिसबमे पीअर-पीअर फूल सेहो लहलहाए लगल। वातावरण किछु दोसरे रंगक भऽ गेल। चारूकात महमह करैत। कथा-कुटमैती शुरु भऽ गेल। कथकिया सभ ठाम-ठाम जाए-आबए लगला। कथा फरिछैला उत्तर लाल-पीअर धोती आ तैपर लाठी हूरबला लाल-लाल ठप्पा अपन मैथिल सभ्यताक परिचए दिअ लगल। नेना-भुटका सभ फगुनहरि गीत गाबए लगल- “यै बड़की भौजी, करियौ बिचार, केते दिन रहबै आब हम कुमार दैखैत देखैत हमरा ई भऽ गेलै अहाँ बहि‍नसँ हमरा लभ भऽ गेलै...”। हरबाहो-चरबाहो सभ फगुआसँ सम्बन्धित मैथिली आ भोजपुरी गीत गाबए लगल। बाध-बोनमे मालो-महिंस चराबए आ घर-घसबहिनीकेँ देखैत ई गीत गाबए- “तोहर लहंगा उठा देव रीमौटसँ...।” घसबहिनीओ सभ उत्तारा देनाइ नै बिसराए ओहो सभ गाबए ई गीत- “रओ छोड़ा बज्जर खसतो...।” बुझू जे जाड़क खुमारी लोक सभ फागुनेमे उताड़ए चाहैत। जिनका परिवारमे नव बि‍आह भेल रहनि, बुझू तँ हुनकर छओ आंगुर घीएमे आखिर ऐ समएसँ भला गोधनपुर गामक रामदेव बाबूक छोटका बचबा उगन किएक ने लाभ उठबितथि। किएक तँ एहीबेर बाइस दिसम्बर २००९ इस्‍वीमे हुनक अग्रज दुर्गानन्द जीक बि‍आह दरभंगा जिलाक बरुआरा गाममे सम्पन्न भेल छेलनि। तँए भैयासँ तँ डर जरुर रहनि मुदा नवकि कनियाँ अर्थात लाल भौजीसँ खूब रंग-रभस होइ छेलनि। उगनक भौजी सेहो करीब एक्कैस बर्खक छेली। बीस बसन्त तँ सुखले-साखले बितौलनि मुदा एक्कैसम बंसन्त बुझू जे ओ तँ रससँ उगडुम करै छेली। बेस पाँच हाथ नमहर-छड़गर, देहो दशा बेस भरल-पूरल गाल तँ बुझू हाइ ब्रीड टमाटर जकाँ लाल टरैस आ बेस गुदगर। आँखि एहेन कटगर जे जेकरा दि‍स एक बेर ताकि देथिन तँ बुझू सोनित एक्को ठोप नै खसैत मुदा ओ बेचारे घाएल भऽ जाइत। हुनकर जुट्टी तँ बुझू सुच्चा गहुमन साँप जकाँ फूफकार छौड़ै छेलनि। नव विवाहित भेलाक कारणे सदिखन भरि बाँहि चुड़ी आ भरि हाथ मेहदी, आरतसँ रंगल पएर, भरि आँखि काजर आ भरि माङ सेनुर लाल टुहटुह करैत। क्यो जँ धोखहुँसँ देखति तँ आँखि चोन्हरा जाइत। सभसँ सुन्दर हुनक वस्त्राभुषणक परिरव आ ओढ़ब छन्हि। एक तँ गोड़ि नारि तैपर सँ सुगा पंखी रंगक साड़ी आ बेलाउज आ ओहीक तरमे उज्जर धप-धप करैत ब्रेसिअर जे पहिरथि ओकर उज्जरका फिता, से देखि से देखि उगनकेँ तँ मौगति भऽ जाइ छेलनि। ओ मने-मन बिचारथि जे ऐबेर फगुआमे लाल भौजीकेँ सभ तरहेँ लाल कऽ कए देबनि। दिन बीतैत कोनो कि देरी लगैत छै। संयोग एहेन जे ऐबेर फगुओ पहिले मार्चमे छल। जेना-जेना फगुआ लगिचाइल जाए उगनक मना तेना-तेना लाल भौजीक जुआनीसँ बौराइल जाइ छेलनि। फगुआसँ एक दिन पहिने उगन दरभंगा अपना डिपटीपर सँ गाम अबैत छथि। किलो दुइ मधुर नेने किलो एक अंगुर, आसेर काजू आ दू पैटिक किशमीस आ चारि-चारि पैटिक हरियर लाल रंग सेहो हाथमे टंगने आएल संग-संग दू शीशी रम सेहो नेने आएल। पीठपर एम.आर. बला बैग। उगन आँगनसँ ससरि ओसारपर जाइ छथि आ ओतैसँ हाक दइ छथिन- “भौजी, यै लाल भौजी केतए गेलौं, आउ-आउ लग आउ हम छी उगन।” लाल भौजी पलंगपर सँ उठि बाहर अबैत छथि। तात उगन पीठपरक बैग निचाँ राखि एक हाथे मधुरक पैकित लाल भौजीक हाथमे दैत आ दहिना हाथमे पहिनेसँ धोरल लाल रंग लाल भौजीक बामा गालपर लगबैत आ दहिना गालमे चुम्मा लइत बाजि उठैत छथि- “अधला नै मानब फगुआ छी। भौजी यै भौजी आब कहू मन केहन लगैए?” लाल भौजी चौबनियाँ मुस्की दैत बाजलि- “धूर जाउ, हमरा अहाँक ई चालि नै सोहाइए।” बाजि लाल भौजी अपना पलंगपर चलि जाइ छथि। आ उगन अपन कोठलीमे। राति भरि उगनक आँखिमे नीन नै भेल। सुतलीओ रातिमे रहि-रहि मन पड़ि उठैत छन्हि भौजी, लाल भौजी...। पारस “शान्‍ति‍ यै शान्‍ति‍ केतए नुकाएल छी यै फूलकुम्‍मरि‍?” शान्‍ति- “एलौं याए एलौं।” आँगनसँ शान्‍ति‍ हाक दैत लग आि‍ब सोझामे ठाढ़ि‍ होइत पुन: बाजि‍ उठैत छथि- “कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दैत छलौं? कोनो खास बात छै की?‍” हम- “एह, अहाँकेँ तँ हरि‍दम मजाके सुझाइत अछि‍। खास बात की रहत, अहाँ छी तँ सब खासे बात बूझु। ओना आइ वि‍द्यालयक छुट्टी समाप्‍त भऽ गेल तँए झब दऽ खाइले कि‍छु बनाउ। जे हम समएसँ वि‍द्यालय चल जाएब।” शान्‍ति‍ बजली- “ओ..., आब ने बुझलौं। अहाँ तँ सब दि‍न गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपने‍ बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि‍ अनलौंहेँ। तँए आइ साग-भात आ आल्‍लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवि‍तहुँ से नि‍आरने रही। मुदा तइ‍मे तँ देरी होएत। ताबत अहाँ स्‍नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरि‍ओन कऽ दइ छी।” “बेस, बड्ड बढ़ि‍याँ। कनी अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दि‍अ।” हम धोलूकेँ हाक दइ छी- “धोलू हौ धोलू। केतए छह हौ?” “ऐलौं, याए ऐलौं बाबू जी, कनी नदी फीरि‍ रहल छी।” “वेस, बड्ड बढ़ि‍याँ। आ बौआ, है सुनै छह? आइ हमरा वि‍द्यालय जेबाक अछि‍। से जात हम स्‍नान करै छी। तात् तौं साइि‍कलकेँ बढ़ि‍याँ जकाँ झारि‍-पोछि‍ दाए।” ई कहैत हम स्‍नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि‍ जाइ छी। स्‍नानोपरान्‍त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीि‍र तैयार होइते छी तात् शान्‍ति‍क आग्रह- “सुनै छी, अहाँले जलखै नि‍कालि‍ देने छी, कऽ लि‍अ।” ई कहैत आगूमे सि‍कीक चंगेरी, जे रंग-वि‍रंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, तइ‍मे मुरही-चूड़ा, दूटा चूड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे काँच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगू बढ़ौलनि‍। एक क्षणक लेल हम मि‍थि‍ला, मैथि‍ल, मैथि‍लक संस्‍कार आ स्‍भयतासँ बहुत बेसी आनन्‍दि‍त भेलौं। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्‍ति‍क मधुर अवाज- “केतए हेरा गेलौं? अखनि‍ यएह खा, वि‍द्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएब तँ गरमे-गरम साग, भात, अल्‍लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि‍ मन खाएब। ओना जाड़ मास छै यदि‍ कि‍छु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नै‍।” कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेली। आ हम जलखै करैत ऐ‍ मादक अदाक मादे सोचए लगलौं। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लगल। जलखै करैत एक बेरि‍ पुन: हाक देलि‍यनि‍‍- “शान्‍ति‍, यै शान्‍ति‍...।” नै‍ जानि‍ जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि‍ रहल छलन्‍हि‍। ओ गुनगुनाइत ई गीत- “एगो चुम्‍मा दे दऽ राजा जी, बन जाइ जतरा...।” आबि‍‍ वाणभटक नायि‍का जकाँ लगमे सटि‍ कऽ ठाढ़ि‍ होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्‍मा लऽ छथि‍ आ मुस्‍की दैत घरसँ बहार भऽ जाइ छथि‍। हम लजा जाइ छी। करीब चालीस मि‍नटक उपरान्‍त वि‍द्यालय पहुँचै छी। हाथ-पएर धोला पछाति‍ हाजरी बनबै छी। प्राथनाक घंटी बजैत अछि‍ आ धि‍या-पुताक संग हमहूँ एक पाति‍मे ठाढ़ भऽ जाइ छी। उपरान्‍त एकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि‍। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करै छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग रहैत अछि‍, स्‍वागतार्थ सभ बच्‍चि‍या उठि‍ कऽ ठाढ़ि‍ भऽ जाइत अछि‍। बैसबाक आदेश पाबि‍‍ यथास्‍थान सभ बैसि‍ जाइत अछि‍। सबहक हाजरी लेब सम्‍पन्‍न होइत अछि‍। तखन कि‍छु बच्‍चि‍या सभ बाजि‍ उठैत अछि‍- “मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बि‍यौ।” कि‍यो कहैत-‍ “जी नै सर आइ ग्रेजुएत पुतोहु पढ़बि‍यौ।” मुदा कि‍छु खास बच्‍चि‍या यथा- राखी, गीतांजली, खुसबू, बबीता, रि‍ंकी आ पि‍ंकी कहि‍ उठैत अछि‍- “जी नै सर आइ अहाँ अपने ि‍लखल कोना कथा कहि‍यौ। आ हम ओइ‍ आग्रहकेँ नै‍ टारि‍ पबै छी। शुरू कऽ दइ छी अपन लि‍खल ई कथा- ...पारस।” माँ मि‍थि‍लाक गोद आ कमला महरानीक कछरि‍मे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जइमे छल एकटा चाहबला ओकर नाओं छल पारस पि‍ता श्री सत्‍य नारायणजी। नामक अनुरूप दुनू बापूत वि‍परीत छल। पि‍ता श्री सत्‍य नारायण जरूर मुदा, सब चीजले खगले रहैत छला। एकटा प्राइवेट स्‍कूलमे अध्‍यापण कार्य करथि‍ आ कोनो तरहेँ बाल-बच्‍चाकेँ पोसथि‍-पालथि‍। हुनकेर बालकक नाओं पारस। नामक अनुरूप एकदम ि‍वपरीत, मझौले कदक जुआन देहो-हाथ सुखले-टटाएल कारी-झामर हाथ-पाएर एकदम सूखल-साखल मुदा, पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, हरि‍दम जेना मुहसँ लेर चुबि‍‍ते छेलै। फाटले-चि‍टले कोनो जूता-चप्‍पल पहि‍र ओही प्राइवेट स्‍कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकि‍लगल कम नै‍। सत्‍य नारायणजीक घर जरूर बान्‍हेँ कातक सए फि‍ट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल, मुदा संस्‍कार कोनो सुसभ्‍य समाजक प्रति‍क छल। सत्‍य नारायण बाबूकेँ हरलनि‍‍ ने फुरलनि‍‍ खेलवा देलखि‍न पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि‍ अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-बासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्‍टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटि‍क मटकुरी छाल्‍ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नि‍त्‍य समएसँ खुलैत आ बन्न होइ छल। क्रमश: महि‍ंसि‍क अगब दूधक चाह, एक्‍को ठोप पानि‍क छुति‍ नै‍, बरतन-बासन खूब पवि‍त्र आ संस्‍कारी हेबाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचि‍त सम्‍मान भेटनि‍। चाहक दोकान खूब चलनि‍। क्रमश: पॉंच सेर दूधक बदला आध-आध मन दूध खपत होमए लगल। आमदनी नीक होमए लगलैक। कि‍छु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि‍ लऽ लेलक पक्‍काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्‍टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लगल सि‍ंहहारा आ गरमा-गरम जि‍लेबी बात एककानसँ दूकान होइत गेलै एकर दोकानक नाओं भऽ गेलै दोकान खूब चलए लगल। समए पाबि‍ २६ जनवरी आ १५ अगस्‍तमे प्रसादक लेल वि‍शेष आदर पाबि‍‍ बनाबए लगल मनक मन बुनि‍याँ आ भुजि‍या। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचि‍ंग चलौनि‍हार संचालक आ ि‍नदेशक महोदयक योगदान ऐ‍ दोकनकेँ चलाबएमे अहम भूमि‍का रखलक। दि‍न दुना आ राति‍ चौगुना उन्‍नति‍ होमए लगलैक। मनक-मन दूध खपत हेबाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचाए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि‍ लेलक ओ तीन‍ बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्‍तो ओ चाहो बेचाए आ पढ़बो करए। समए पाबि‍ प्राइवेट स्‍कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्‍कृत वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खा लेलक, आ मध्‍यमाक फारम भरि‍ फस्‍ट डि‍वि‍जनसँ पास केलक। आब तँ ओ कि‍छु बेसी‍ए खुश रहैत छल। मध्‍यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओं जनता कौलेजमे झंझारपुरमे लि‍खा लेलक। तखनो ओ वेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परि‍वर्तन नै‍। कौलेजसँ एला पछाति‍ चाहक दोकानपर ओ जमि‍ जाए। यद्यपि‍ चाह बेचब एकटा केहन काज मानल जएतैक ई वि‍वादक वि‍षए अछि‍। ओकरा एक्‍को पाइ लाज-संकोच नै‍। कि‍एक तँ कर्म कोनो खराप नै‍ होइत छै। कमा कऽ खाइ ऐ‍मे कोन लाज कोनो कि‍ ककरोसँ भीख मंगबै जे लाज होएत। तँए चाह बेचब अधला काज नै‍ से मानि‍ ओ खूब जतनसँ अपन कर्तव्‍यक नि‍र्वहन करए। बुझि‍नि‍हार मैथि‍लमे एकर चर्च होमए लगल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखि‍ते-देखति‍ ओ मैथि‍ली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाओं भऽ गेलैक जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नै‍ छोड़लक। बात पसरैत गेल। एकबेरि‍ एकटा कथा गोष्‍ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि‍ गोट मात्र कथाकार बि‍दा भेलथि‍ दि‍न अछैते मुदा, कोशी महरानीक अभि‍शापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरि‍क बाट मात्र चारि‍ घंटामे तय भेल। सुपौलसँ पहि‍ने‍ झल अन्‍हार भऽ जरा सेहो गेल रही। तँए चारू कथाकार चाह पि‍बाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- “हौ, चारि‍ कप चाह ि‍दहह।” ओ बाजल- “जी, श्रीमान् दइ छी।” कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लगल। तात् ओतए गप कि‍यो तेसरे आदमी चलौलन्‍हि‍। जे गोधनपुर गाममे एकटा चाहबला अछि‍ पारस बी.ए. पास। बी.ए. पास केलाक बादो ओ चाह बेचब अधला नै‍ बुझैत अछि‍। चाहो तेतबेक सुन्‍दर आ बेवहारो ओकर तेतबेक सुन्‍दर छै। वाह। हर्ष भेल जे समाजकेँ ऐ‍ बातक नजरि‍ जरूर छन्‍हि‍ जे एकटा पढ़ल-लि‍खल लोक चाह बेचैत अछि‍। ओकर नजरि‍मे कोनो काज करबामे हर्ज नै‍। एमहर देखू जे वर्तमान सरकारमे नगर-पंचायत, जि‍ला परि‍षद, टेन पलस टू वि‍द्यालयमे नि‍योजनक भेकेन्‍सी भेल। तात पारस मैथि‍लीसँ एम.ए. सेहो कऽ लेलक। भैकेन्‍सीक अनुसार वि‍भि‍न्‍न जि‍लामे आवेदन केलक। समए तँ जरूर लगल। मधुबनी जि‍लाक मेघा सुचीक प्रकाशि‍त भेल ऊपरे‍मे ओकर नाओं छेलै। नि‍योजनक नि‍मि‍त्त सभ आवश्‍यक कागजात, मूल प्रमाण पत्र एवं शपथ पत्र देला पछाति‍ ओकर चयन इच्‍छानुकूल परि‍योजना वि‍द्यालय मनसापुरमे मैथि‍ली लेल भेल। समाजक सभ वर्गकेँ ऐ‍ बातसँ हर्ष भेल जे सत्‍य नारायण जीक बालक पारस आइ टेन पलस टू वि‍द्यालयमे मैथि‍ली पद्पर नि‍योजि‍त भेला। साझखन सभ ओही चाहक दोकानपर उपस्‍थि‍त भऽ पारस आ हुनक पि‍ता सत्‍य नारायणजीकेँ सभ शुभकामना आ बधाइ दैत कहलकनि‍- “सत्‍य नारायण आब ओना काज नै‍ चतल, आब भोज-भातक आयोजन कएल जाउ। भोज लागत।” सत्‍य नारायण आरो अह्लादि‍त होइत बजला- “सभ ऐ‍ समाजक असीरवाद छी। अहीं सबहक असीरवाद छी जे आइ पारस चाह बेचैत-बेचैत एकटा टेन-पलस टू वि‍द्यालयक शि‍क्षक भेल। हम ऐ‍ समाजक ऋृणी छी। आइ जे समाज नै‍ तँ हमर कोनो अस्‍ति‍त्‍व नै‍। आइ हमहूँ गौरवान्‍वि‍त भऽ रहल छी जे हमर बेटा हमरे बेटा नै‍ ऐ‍ समाजोक बेटा। जे ऐ‍ समाजमे सि‍र उठा कऽ जीवैक, एकटा अलग स्‍वाभि‍मान देलक। एकटा आदर्श देलक। तँए हम भोज देवेटा करब। भोज जरूर करब।” समए सुअवसर पाबि‍‍ सत्‍य नारायण बाबू केलनि‍ बड़का भोजक आयोजन। लगुआ-भगुआ हि‍त अपेक्षि‍त मि‍त्र-बन्‍धु आदि‍ ऐ‍ भोजमे नै‍ छुटथि‍ आ हुनकर उचि‍त सम्‍मान हुअए ऐ‍ बातक हरि‍दम खि‍याल रखलनि‍। दुनू तरहक आयोजन छल, शाकाहारी आ मांसाहारी। नि‍मंत्रि‍त बेकती सभ समएसँ उपस्‍थि‍त भऽ आ स्‍वरूचि‍ भोजन केलनि‍। शाकाहारीक लेल आयोजन छल। पुरान तीन-सलि‍या बासमती चाउरक भात, राहरीक दालि‍ आमि‍ल देल, पालक पूड़ी, पालक पनीर, आमक चटनी, सलाद, तरल मि‍रचाइ, मटर-अल्‍लु-परोर देल डलना, बड़ी अदौड़ी, सकरौड़ी तै‍पर डब्‍बूक डब्‍बूक घी। महिंसि‍क अगब दूधक तौलाक-तौला दही, तरहत्‍थी सन मोट छाल्‍ही बुझू तँ खेनि‍हार तर आ भोजेतक बेवस्‍था ऊपर। दहीक तँ कथा नै‍ पुछू खेनि‍हार कम आ तौले बेशी। सभ कि‍यो गद्-गद् भऽ गेला। एमहर मांसाहरी लोकनिकेँ‍ लेल अरबा चाउरक भात आ आध-आध मनक जुआएल खस्‍सीक लद-बद करैत मासु। कि‍सि‍म-कि‍सि‍मक मश्साला देल गम-गम करैत एकहक टा पीस बुझू जे सए-डेढ़ सए ग्रामक। एह अजोध खस्‍सी, मासु। बनलौ तेतबेक सनगर। सभ भरि‍ मन खएला। आ ऊपरसँ सेरक सेर दही फी आदमीपर। तर-बत्‍तर छला, भोज तँ जस-जस भऽ भेल। सभ कि‍यो भोजनो करथि‍ आ पारसक चर्चो करथि‍। जे पारस तँ पारसे अछि‍। वस्‍तुत: पारस आब ओ पारस नै‍ रहल जे चाह मात्र बेचै छल। चाहे बेचेत ओ पारस तँ आब समाजक लेल ओ पारस भऽ गेल। जेकर गुणसँ केतेको नेना-भूटका आब चाहेटा नै‍ बेच समाजक बीच शि‍क्षाक ज्‍योति‍ जगाओता। जइ‍सँ अपना समाजमे पारस, पारस मणि‍ गुणसँ प्रभावि‍त होएत आ पारसक गुणसँ अपना समाजक केतेको बच्‍चा पारस बनता। अन्‍तत: बाउ लोकनि‍ अहीं सभ कहू जे अहाँ सभ घर आँगनाक काज करैत पढ़ि‍ लि‍खि‍ की बनए चाहै छी?” एक स्‍वरमे उत्तर भेटैत अछि‍ मास्‍सैव हमहूँ पारस बनबै पारस। कहैत सभ बच्‍चि‍याक संग राखी, गीतांजली, खुशबू, बबीता, रि‍ंकू, पि‍कूक नोरसँ भरल आँखि‍मे एकटा वि‍शेष आत्‍म वि‍श्‍वास हमरा बुझना जाइत अछि‍। जेना ओ प्रखर ज्‍योति‍ बहराएल हुअए अनमोल मोती पारससँ। बकलेल गर्मीक समए, जेठक दुपहरिया, प्रचण्ड रौद, बिजली लापत्ता। एहेन बुझना जाइ छल, जेना दाता-दीनानाथ आइ मनुखक परीछा लेमए चाहैत छथि। केतौसँ वसातक कोनो आश नै। नेेना-भुटका सभ एमहर भेँए तँ ओम्हर भेँह, एम्हर केँ तँ ओम्हर कें करैत छल। बुझना जाइ छल जेना मखना तेलीक पहरा होअए। माल-जाल गर्मी सँ परेशान भऽ एकहक हाथ जीभ बबैत छल। लेड़ू आ परड़ुक तँ तेरहो करम भऽ गेल छल। कोनो तरहेँ चंडलबा रौद आ दुपहरिया झुकल, मन कनेक थिर भेल मुदा राति खन उएह हाल, जतवे गर्मीसँ परेशानी तेतबेक मच्छड़ आ उड़ीसक उपद्रब। ओकरा सभमे एकता तेतेक जँ हाँ-हाँ नै करियोक तँ सोझे उठालेत आ नेने-नेने सकरी चीनी मील लग रखि आओत। केतौ चैन नै...। भोजनोपरान्‍त देह-हाथ सोझ करबाक लेल विछाउनपर गेलौं, मुदा चैन नै। कछमछ-कछमछ कऽ रहल छलौं। कती राति गुजारला पछाति‍ कनी जा कि आँखि‍ लगल, आकि‍ ध्यान किछु आर-आर विषय दिस चल गेल। आँखि‍ यधपि बन्न मुदा चेतनामे अनेकानेक तरहक बात धुमए लगैत अछि। पड़ल छी विछौनपर मुदा मन जीनगीक चौबट्टीपर ठढ़ वर्तमानक अधरपर भूतसँ भविष्यक, भविष्यकेँ विषयमे सोचए लगैत अछि। सरकारी सेवामे रहबाक करणें कमे-काल गाम जेबाक मौका लगैत अछि। पावनिओ तिहार जतै छी ततै करए पडै़त अछि। तखनो अस्सी बर्खक बुड़ही माए आ करीब सए बर्खक बूढ़ बाबूजीकेँ देखए लेल गाम जरुरे चल जाइ छी। टोला-पड़ोसाक सभकेँ भेँट कऽ सबहक कुशल-छेम जानि अपना कऽ धन्य बुझै छी। ऐ प्रकारे विभिन्न प्रकारक लोकक चारित्रिक विश्लेषण करबाक सेहो मौका लागि जाइत अछि। सम्‍भवतः एहने स्थितिमे मोन पड़ैत छथि एकटा सज्जन सरोज बाबू। ओ एहेन बेकती जे कोनो सुरतमे अपने कऽ किनकोसँ कम मानक लेल तैयार नै होइ छथि। माए-बापक एक मात्र वेटा नान्हिएटा सँ पढ़ै-लिखैमे तेजगर मुदा तेतबेक थेथरलोजीमे सेहो निपुण। विषय कोनो किएक नै हो मुदा एक चोखरि‍ थेथरलोजी जरुर करता। जेना की ओ सर्वज्ञ होथि। तँए हुनकर किछु संगी-साथी हुनका “मिस्टर नो आॅल” सेहो कहै छेलनि। लोक सभ बकलेल सेहो कहथि‍न। परुकेँ साल अगहन मासमे हुनकर बि‍आह झंझारपुरक बगले महरैल गाममे सम्पनन भेल। बि‍आहक मादे एकोटा सर-कुटुम नै छुटथि अइले ओ एकटा बही अलगसँ बना आ क्रमबद्ध सभकेँ नत-लिऔन आ हकार पठाएब नै बि‍सरला। बि‍आहोत्सवमे सभ उपस्थित भऽ बराती गेला। जइसँ एक बात स्पष्ट भऽ गेल जे लड़का कोनो नीके समाजसँ जुड़ल छथि। गौआँ-धरुआ आति प्रसन्न भऽ बढ़ि-चढ़ि कऽ बारातीक सुआगत-बात केलनि। ममिऔत-पिसिऔत सभ ऐसँ प्रसन्न जे बर-आ कनियाँ दुनूक जोड़ी सीता-रामक जोड़ी लगैत अछि। भगवानक असीम कृपासँ अनुगृहित भऽ नीके कथा सम्पन्न भेल। असली कथा आब ऐठामसँ शुरु होइत अछि। बि‍आहोपरान्‍त कनियाँ विदागरी भऽ सासुर एली। दाइ-माइ लोकनि अरधि-परधि कनियाँ घर केलनि। आ अइहब-सुहब होथू असीरवाद दैत अपन-अपन घर चल गेली। कनियाँ तँ कनीयेँ दिनमे अपन सासु-ननदिक दिल जीत लेलनि। बर-कनियाँ समर्थ रहबाक कारणें विदागरी चौठारी दिन नै भऽ सौन-भादोमे भेल। पहिल सौन-भादो नवकी कनियाँ नैहरमे मनबैत छथि, ऐ तरहक मिथिलाक आ मैथिलक एकय मान्यता छै। नीक दिन तका कनियाँ विदागरी भऽ सासुरसँ नैहर चल गेली। आब तँ भेल पहपटि। सरोज बाबू जे एते दिन सदिखन घरेमे धुसल रहथि आ सदिखन कनियाँए कऽ निंधारैत आ गबैत छला ई गीत- “मन होइए अहाँ केँ हम देखते रही, किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही, मन होइए अहाँकेँ...। आठ मास कोना वितल से नै बूझि‍ सकला आ कनियाँ आठे मासक फला-फलक रूपमे नौ मासक सनेश लऽ नैहर चल गेली। से तँ, एको दिन, एको पहर बि‍तब सरोज बाबूक लेल पहाड़ सन बुझना जाइ छेलनि। कोनो बातक सुधए-बुधिए नै रहैन्हि। सदिखन एकदम बकलेल जेँका करथि। एहेन सन बुझना जाइ छेलनिे जे शरीर गाममे होइन्हि आ आत्मा सासुरमे। भोजनक प्रति अरुची जागए लगलनि। समएसँ स्नान-भोजन करब सेहो सुधि-बुधि नै। लोक सभ अपनेमे बाजथि जे सरोज बाबू ऐना किएक करैत छथि- एकदम बकलेले जकाँ जहिना अपना गाम बेरमामे सरोज बाबू तहिना अपना नैहर महरैलमे सरोजनी दुनू बेकती एक दोसराक विरहाग्निमे जरैत। दिनो-दिन मुरझाएल जाइ छला। सोभाविके अछि‍। किएक तँ बड़-कनियाँ समर्थ रहबाक कारण जीवनक अपूर्व आनन्द जे उठौने रहथि। एकय पूर्ण पति पत्नीक रूपमे। एक-एक दिन पहाड़ भेल चल जाइ छेलनि। नै तँ ऐम्हरे आँखिमे निन्न आ ने ओम्हरे एको मिन्टक चैन। माए-बापक डरे नै तँ कनियाँ करैन्हि आ ने बाबूजीक डरे सरोज सासुर जेबाक साहस कऽ पबथि। किएक तँ अखनो केतौ- केतौ एहेन प्रथा छे जे विना दिन-दूरागमनक बर-सासूर नै जाइ छथि। तँए सरोज बाबूक डेग सासुर जइले नै उठैन्हि। समए बीतेत देरी नै लगैत छै देखैत-देखैत चौठ-चन्द्र पावनि आएल... चल गेल। जीतीआ बीतल आबि‍ गेल आसीन मास... सगरो दुर्गापूजाक तैयारी शुरु भऽ गेल। ओम्हर सरोजनीक नैहरमे जोड़ा करिआ छागर बलि-प्रदानक लेल राखल छल। जेकरा ओ लोकनि खूब जतनसँ दाना-पानि खुआबथि-पिआबैथि। देखते-देखते दुनू छागर, सबैयासँ डोढ़ा भऽ गेल। जँ जँ दुर्गापूजा लग आएल जाइत, सरोज बाबू आ सरोजनीक हृदैक धड़कन हृदयागंम हेबाक लेल मचलए लागलि। देखते-देखते कलश स्थापन भेल। पहिल पूजा बीतल दोसर बीतल आबि‍ गेल पंचमी। मुदा अखनि‍ धरि सासुरसँ सरोज बाबूक लेल कोनो खोज-खबरि‍ नै कएल गेल! एकदिन माए पुछलखि‍न- “बौआ, पत्नीक खोज खबरि‍ नै केलहक? कोनो फोनो-तौनो नै अबै छह?” बेचारे की बजता अपन हारल आ बहुक मारल क्यो की बजै छै? हारि-थाकि पंचमी राति फोन लगौलन्हि। घंटी भेल, फोन उठौलखि‍न हुनकर शारि- कमलनी, ओम्हरसँ अवाज अबैत अछि- “हेलो... हम महरैलसँ बजै छी?” “हम छी सरोज बेरमासँ। कनी... दीदी... केँ फोन...।” कमलनी माँ दिस तकैत बाजि उठैत अछि- “माए गे माए जीजा जीकेँ फौन छिए।” एम्हरसँ हेलौ-हेलौ होइत रहैत अछि। कमलनी फोन लऽ कऽ दैत छै अपन दीदी सरोजनीकेँ। सरोजनी फोन लइत- “परनाम करै छी। अहाँ नीके छी की नै? माँ बाबूजी कोना छथि? अपना शरीरपर धि‍यान दइ छी की नै? मन लगैए की ने? मेला देखऽ कहिआ ऐबै? कमलनी आ अजय, विजय अहाँक विषयमे पुछैत रहैए। दीदी गै दीदी, जीजा जी कहिया ऐतौ?'' सरोज बाबूक जवाब छल एको राति मन नै लगैत अछि। सम्‍भवतः दुर्गापूजामे नै आबि‍ सकब। धिया-पुताकेँ मेला देखक लेल दस-दसटा टाका दऽ देबै। तामसे टीक ठाढ़ केने फोन काटि दैत छथि। सरोज बाबूक लेल असमंजसक स्‍थिति रहनि, जे जेकरा घरमे जोड़ा छागर बलि प्रदान हेतै, से अखनि‍ धरि एको बेर एबाक लेल नै कहलनि। एहेन कोन सासुर, कोन सासु आ ससुर, केहेन सारि आ शरहोजि। तामसे मन अधोड़ आ टीक ठाढ़। की करी आ की नै करी? ई द्वन्‍द्वात्‍मक स्‍थिति बनल रहैन्‍हि। किछु नै फुरैन्‍हि। मुदा अष्‍टमी अबैत-अबैत- ये दिल है कि मानता नहीं ये वेकरारी क्‍यों हो रही है, ये जानता नहीं...। अपना कऽ नै रोकि सकला। आ चलि गेला अपन सासुर महरैल। भगवती दर्शन कऽ जहाँ की पानक दोकानपर जाए छथि, पान खेबाक लेल, आकि मेला देखक लेल आएल सारि-शरहोजिक नजरि हुनकापर पड़ैत अछि आ ओ सभ पकड़ि लैत अछि हिनकर गट्टा। जीजा जी, जीजा जी अहाँकेँ गामपर चलए पड़त। दीदीओ कहने छलि, सप्‍पत दऽ कऽ। मुदा सासु ससुरक आग्रह नै तँए अखनो धरि हिनक टीक ठाढ़े। अन्‍ततः थाकि-हारि एक किलो मधुर लऽ सारि-शरहोजिक संग चलला सरोज बाबू सासुर। पहिल-पहिल बेर सासुर गेल छला तँए सुआगत-बातमे कोनो कमी नै रहल। चाह-पान बढ़ि‍याँसँ भेल। मुदा खेबा काल ओ पसारलनि बड़का नाटक, जे हम नै खाएब। हम खाऽ आएल छी, भुख नै अछि। सासु आग्रह केलथिन कोनो असर नै, ससुर हाथ पकड़लखि‍न, कोनो फरक नै, बड़का सार सेहो खुशामद्‌ केलखि‍न मुदा कोनो असर नै। एकहि ठाम जे हम खा कऽ आएल छी, भूख नै अछि। आ ओ भोजन नहियेँ केलनि। ओमहर दुनू छागर जे बनल ओकर सुगन्‍धसँ टोला-पड़ोसा गम-गम करैत। टोलाक निमंत्रित सज्‍जन सभ आबि मासु-भात अर्थात छागर रुपी प्रसाद पाबथि‍ आ ओकर स्‍वादक सविस्‍तार चर्चा करथि। एह छागर जे जुआएल छल, चर्वी केहेन तरहथ्‍थी सन छेलै आ प्रसाद बनल केतेक सुन्‍दर अछि! वाह मन तँ भीतरसँ प्रसन्‍न भऽ गेल, चर्चा करैत बाँकी सीक्‍कीसँ खैरका करैत कुरूर कऽ पान खा ओ लोकनि तृप्‍तिक ढेकार लैत चल जाइ गेला। एमहर सरोज बाबूक पेटमे बिलाड़ि कुदऽ लगल। ओत भुखे लहालोट। राति खसल जाए, बहरबैआक बाद घरबैओ सभ खा कऽ सुतए गेला। मुदा किछु लिऔनवाली सभ अखनो जगले, ओ लोकनि पाँछा काल कऽ भोजन करथि, फैलसँ पलथा मारि मासु आ भात, खाथि आ ओइ छागरक मासुक चर्चा करथि। आग्रह अलग जे दीदी कलेजी दू पीस लिअ। हे यै फल्‍लाँ गामवाली हे ई सुस्‍ता लिअ। हे यै दाय, हे, ई हड्‌डी बला दूटा पीस लिअ। आग्रहपर आग्रह। आ ओ लोकनि बड़ी काल धरि गप-सप्‍प करति, भोजन करए गेली। एमहर सरोज बाबू जठराग्‍नि आरो तेज भेल चल जा रहल छल। आब होइ छेलनि जे कि‍यो आबि‍ आग्रह करितथि तँ भरि पेट मासु-भात खइतौं। मुदा से तँ आब सभ कि‍यो सुतए चल गेल छल। धियो-पुता मासु-भात खा फोफ कटैत छल। आब तँ हिनका किदुन- जे अपने करनी गै मुसहरनीक परि भऽ गेल छल। थाकि हारि किछु काल पछाति‍ हरलनि ने फूरलनि सरोज विदा भेला भनसा घर दिस। आ अपने सँ मासु-भात भरि थारी निकालि आ चुपे-चाप भोकसए लगला। किनको ऐ बातक पत्तो नै। जागल जे सभ रहथि से सभ हिनका खोजए लगल जे पाहुन केतए, पाहुन केतए। आ पाहुन तँ भनसा घरकेँ केबाड़ तर नुका कऽ गुप-गुप मासु-भात दऽ रहल छथि‍न। तात गणेश जीक वाहन ऐ कोठीसँ ओइ कोठी जा कि छरपल आकि‍ कोठीपर राखल खापड़ि पाहुनक कपारपर खसल। अवाज सुनि‍ते लोक सभ ओइ घर दिस दोगल। देखलक जे पाहुन तँ केबाड़क दोगमे नुका कऽ मासु-भात भोकसि रहल छथि। परल बड़का पिहकारी, शारि-शरहोजि मारलक ताली खूब जोरसँ शोर-गुल सुनि सुतलहो लोक सभ जागि गेल। ताली आ पिहकारी पड़ि रहल अछि। पाहुन तँ लाजे कठौत भऽ गेला। रति जखन सुतए घर गेला तँ कनियाँक कटू व्‍यंग वाणक बर्खा होमए लगल। पाहुनक तँ मने शान्‍त। किछु नै फुड़नि‍। सोचला जे अन्‍हरोखे गाम चल जाएब। बि‍दाओ भेला, मुदा अन्‍हार बेसी रहबाक कारणे कुकुर सभ झॉउ-झॉउ करए लगल। लोक सभ जागि गेल देखलक जे आगू-आगू पाहुन आ पाछू-पाछू कुकुर हिनका खिहारने जाइत अछि। लोक सभ दोड़र महरैलक हाटपर आबि‍ हिनका पकड़लक। घूमि‍ जेबाक आग्रह केलक। मुदा हिनकर मन तँ तामसे अधोर छल। किनको बातक मोजर नै, दऽ हाक दैत दैत धोती पकड़लक से हुनकर ढेका खुजि गेल, धड़फड़ा खसला, मुदा ओ तैयो नै रूकि‍ लटपटाइत धोती खोलि फेकेत गारि दैत परात होइत-होइत अपन घर पहुँचला। कहू तँ एतेक पढ़ल-लिखल लोकक ई काज कोनो बकलेल जकाँ काज केलनि। सरिपों जँ अधला नै लागए तँ हुनका बकलेले न कहबैन्‍हि। कि‍सनामुट्ठी मरनी भि‍नसुरके पहर बेलाराही चौरीसँ एक गैलन काकोड़ बीछि‍ अनने रहए। मेला-ठेलाक समए रहै तैं, काेठीसँ दू मुजेला काटू नि‍कालि‍ अँगनामे सुखैले देलकै। ओकर बाद नहा-सोनाह आ खाए कऽ सुतैले खेन्हरा लऽ डेढ़ि‍यापर चल गेल। पुरबा हलफी दैत छले, नि‍न्न टुटलै। आँखि‍ मि‍ड़ते उठल आ हाँइ-हाँइ कऽ काँटू डेंगाबऽ लगल। डेंगा-ठठा लेलाक बाद सुपसँ फटकि‍ माएक तहवनमे बान्‍हि‍ माएसँ नुका कऽ धऽ अाएल कोठि‍क दोगमे। झल अन्‍हार भेलै तँ भगबत्ता दोकानसँ बेच अनलक। तीन सेर भेलै। आठ अने दरसँ डेढ़ गो टाका भेलै। ओ भगवतेसँ कहि‍ सुनि‍ कऽ चारि‍ गो चौबन्नी आ दू गो अठन्नी भजोखा लऽ चुपे-चाप आँगन चल गेली। वि‍हान भेने मेला छेलै ‘कि‍सना मुट्ठी’। मरनी तरे-तर हि‍साब लगोने जे चारि-चारि‍‍ आना पाइ दुनू छोटकी बहि‍न अभेलि‍या आ सुगि‍याकेँ देवे। चारि‍ आनामे बौआले एकटा कठपुतरी कि‍न लेब आ एकटा फूका। चारि‍ आनाक कचौरी आ चप कीनि‍ लेब। ओकर तँ मने छेलै चप-चप। आठ आनामे एकटा अलता आ फीता लऽ लेब। घुरती काल आठ आनाक जि‍लेबी कीनि‍ लेब। भोरे वि‍हान फेर ओ अपन गैलेन लऽ चलि‍ गेल चौरि‍ आ बीछि‍‍ लेलक एक गैलेन काँकोड़। आँगन आबि‍ बकरी घरमे गैलेन राखि‍ ओ नहाइ-सोनाइले चलि‍ गेल आ नाहा-सोना, खा-पी कऽ सुति‍ रहल। एमहर नहेबा काल ओकरा माएकेँ तहबन नै‍ भेटलै तँ औना कऽ एमहर-ओमहर तकलक तँ देखलक, ओ तँ कोठी दोगमे फेकल अछि‍- आ मरूआक कि‍छु दाना लगल छेलै। कोठी मुन्ना से फूटल। से देखि‍ ओकरा आगि‍ लेस देलकै। ओकरा हरलै ने फुरलै सुतलैमे मरनीकेँ गट्टा पकड़ि‍ लात्ते-मुक्के धुनि‍ देलकै। गाड़ि‍ पढ़ि‍-पढ़ि‍ पूछए लगलै- “बाज सौतीन बाज की केलही पाइ मरूआ बेच कऽ?‍” अबोध बच्‍चा कनैत बाजल- “माए गै माए मेला देखैले जेबै बलबा परतीपर मेला।‍” माए तामसे अघोड़ रहबे करै फेर बाजलि‍- “बाज सौतीन ‍बाज कथीक मेला।” माए, गै माए, मेला देखैले जेबइ मेला ‘कि‍सना मुट्ठीक मेला।’ बुढ़ि‍या फूसि‍ कि‍छु कहैत संकोच नै‍, लाजो नै‍ होइत अछि‍ जेना नि‍र्लज्‍ज भऽ गेल छी। आँखि‍क पानि‍ जेना सुखि‍ पड़ल हो। एहेन बुझना जाइत अछि‍ जेना द्वापरेसँ अथार्थ ६३ जनम पहि‍ने ‍सँ फूसि‍क खेती करैत आबि‍ रहल छी, नि‍श्‍तुकी बाप-पुरखा सेहो एहेने सि‍द्धस्‍त खेति‍हर हेता। मुदा उपजा तइ‍ समैमे कम होइ छल, आ आइ बुझू जे बोड़े कट्ठा फूसि‍ सभठाम उपजि‍ रहल अछि‍। आ सभ सभ दि‍न सभठाम फूसि‍ये फूसि‍ बाजि‍ रहल हो। यर्थातोमे २६जनवरी हो या १५अगस्‍त, एहनो राष्‍ट्रीय पावनि‍क सुअवसरोपर बाजब हमरा लोकनि‍ अपन जनम सि‍द्ध अधि‍कार बुझै छी। सरकारी वा कोनो गैर सरकारी कार्यालय कि‍एक ने हो, राष्‍ट्रक सम्‍मानक अढ़मे अपमान करब हमरा लोकनि‍ नै‍ वि‍सरि‍ पबै छी। ि‍सया लइ छी बेस नम्‍हर-चारि‍ मीटर खादीक एकटा डलगर कुर्त्ता, एक गोट पैजामा आ एकटा गाँधी टोपी। आध सेर सुतरी दू जि‍स्‍ता सभ रंगक कागत आ कागतेक बनल प्‍लेट। उज्‍जर आ ईंटा रंगक बुकनी, पुरने झंडाकेँ साफ-सुथरा कऽ कि‍छु फूल लऽ सए-पचास झूठाक समक्ष झंडोत्‍वलन पछाति‍ छोड़ए लगै छी, फूसि‍क गपौड़ी। अनेने बेर्थ- कि‍एक तँ आत्‍मासँ एहेन कोनो गप नै‍ जे स्‍वीकार करैत हो, मुदा अनेरे ठोर पटपटा-पटपटा अपनाकेँ सूच्‍चा देश भक्‍त, कर्मठ, सुयोग्‍य, इमानदार पदाधि‍कारी वा कर्मचारी सावि‍त करए लगै छी- फूसि‍क बखारी खोलि‍ दइ छी। एकसँ बढ़ि‍ कऽ एक फूसि‍ बजै छी झुट्ठा सभ थोपड़ी बजबैत अछि‍। उहो थपड़ी पारए लगैत अछि‍। फूसि‍ए चन्‍द्रशेखर आजाद, गाँधी, नेहरू, भगत सि‍ंह, उधम सि‍ंह, सुभाष आदि‍क नाओं लऽ बच्‍चा सभकेँ फूसलाबए चाहै छी। फूसि‍ये राष्‍ट्रक वि‍कासक लेल छि‍ट्टाक-छि‍ट्टा सप्‍पत कि‍रि‍या खाइ छी। कि‍रि‍या खाइत-खाइत ने तँ पेट भरैत अछि‍ आ ने मुँह दुखाइत अछि‍। एकरो एकटा कारण अछि‍ जे हमरा लोकनि‍ पुश्‍तैनी झुट्ठा छी। सालमे तीन-चारि‍टा एहेन पावनि‍ तँ जरूर अबैत अछि‍ जे भरि‍ मन फूसि‍ बजै छी से कोनो की चोरा कऽ नै यौ ि‍चकरि‍-ि‍चकरि‍ फूसि‍ बजै छी। आ फूसि‍याही सभ सुनैत रहैत अछि‍। मुदा जखन सेबै-बुनि‍याँ रूपी प्रसादक तलक लगैत अछि‍ तखने फूसि‍क सप्‍पत खा वि‍राम लैत अछि‍। तत्पश्‍चात बुनि‍याँ-भुजि‍या खा तृप्‍ति‍क ढेकार लऽ उगरलाहा बुनि‍याँ-भुजि‍या रूमालमे बान्‍हि‍ अपन-अपन जनम स्‍थानपर अबै छी। कहूँ जे एहेन तरहक जे बेर्थ बातक सम्‍भाषण करब कहाँ तक उचि‍त? राष्‍ट्रकेँ ठकब कि‍ अपने ठकाएब नै‍ छी। कि‍ फूसि‍ बाजि‍ अपने आपकेँ नै‍ परतारि‍ रहल छी? राष्‍ट्र ध्‍वजक समक्ष लेल यएह सभटा सप्‍पत साँच अछि‍ आकि‍ बुढ़ि‍या फूसि‍? सत्ते- ई छी बुढ़ि‍या फूसि‍। डाक्टर कर्मवीर मोन पड़ैत अछि ६ जून २००३। जहि दिन तय ई छल जे भारतक प्रधानमंत्री मिथिलांचलक घरती निरमली (जे सभ तरहेँ, सभ दृष्टिकोणसँ सभ मामलामे किछु बेसीए पिछड़ल अछि) औता। आ कोशीमे बनऽ बला रेल पुलक शिलान्यास करता। जेठक दुपहरिया, सभठाम लोक सभ गर्मी-गुमाड़सँ अफसेआंत, सबहक देह धामे-पसीने तर-बतर मुदा सभ कि‍यो मंत्रीजीकेँ देखबाक लेल ओतबे हरो-हरान, ओतबे फिरिशान। एहेन बुझना जाइ छल जे खेत-पथाड़, बाध-बोनसँ आग उठि रहल अछि, सड़कपर धुरा-विड़ोक रूप लैत, सन-सन सन-सन हवा आ लू चलैत। तखनो ओइ दिन परोपट्टाक लोक सबहक उजाहि उठल, सगर बाजार, बाजारक चारूकातक, जे पूर्णरुपेण अतिक्रमित छल, प्रशासनक चुस्ती-दुरुस्तीसँ एकदम साफ-सुथड़ा। ऐना, जेना ऐना झक-झक करैत। खूब प्रचार-प्रसार भेल, जगह-जगह पर्चा-पोस्टर साटल गेल, उदेस अधिकसँ अधिक लोक आबि‍ मंत्री जीक भाषणसँ लाभ उठाबथि‍। ओइ दिनक रौदो एहेन बुझना जाइ छल जेना छाहरिओ रौद आ गर्मीसँ फिरिशान भऽ केतौ छाहरि ताकि रहल अछि। किछुए काल पछाति‍ एहेन बुझना गेल जे चारूकातक वाट कौलेजेक फिल्ड दिस मुड़ि गेल हो जैठाम मंत्रीजीक प्रोग्राम तय छल। जेम्हरे ताकू मुड़ीए मुड़ी, कपारे-कपार, लोकहिपर लोक, लोकक मुड़ी छोड़ि आर किछु नै। सभ एक दोसराकेँ धकियबैत, आगू बढ़बाक अथक प्रयास करैत, किछु सफलो भेला, आ असफल बेसी। साँझ पड़ैत-पड़ैत लोकक लेल गदमिशान उठऽ लगल। जे जेतै रहथि से ओतै रहि गेला। एको मिशिया-आगू या पाछु हेबाक साहस नै कऽ सकला। एतबेमे सबहक आँखि अकाशमे हहाइत किदुनपर पड़लै। किदुन तँ बढ़-बढ़िया नाओं छै ओकर। किदुन तँ कहै छै हँ-हँ मोन पड़ल हेली-कोप्टर। सभसँ पहिने उतरला सेनाक जवान पछाति‍ ओकर प्रधान मंत्री जी, जोर-जोरसँ हल्ला होमय लगल- “इन्कलाव जिन्दावाद!” “जिन्दावाद-जिन्दावाद।” “आज का नेता कैसा हो?” ... जैसा हो।” तत्पश्चात शुरु भेल भाषण-भूषणक कार्यक्रम सभ क्यो कान पोति सुनऽ लगला- बीच-बीचमे फेरि वएह नारावाजी। इन्कलाव-जिन्दावाद। जिन्दावाद-जिन्दावाद।। ऐ तरहेँ ऐ सबहक मध्य भाषणक कर्यक्रम समाप्त भेल। सभ अपन-अपन घरक बाट धेलनि। हुनकहि सबहक संग हमहूँ अपन वासापर एलौं। हाथ-पैर धोइत जाकि खुरसीपर बैसलौं देखै छी एकटा बेकती हमर अता-पता पुछैत अबैत छथि आ अपन परिचए ऐ तरहेँ दैत छथि- श्रीमान् सम्‍भवतः अपने हमरा नै चिन्ह सकलौं! हम कनी अकचकाइत पुछलियनि‍, से की? अपने पहिने बैसल तँ जाउ, सामने राखल विरिंचपर बैसि‍ते ओ बजला- “हम छी कर्मवीर।” एतबे सुनिते करेज सूप-सन चाकर भऽ गेल। हृदए आनन्दातिरेकसँ झुमि उठल। नै जानि किएक आँखि‍सँ दू ठोप नोर खसि पड़ल। ओ बजला- “श्रीमान् अपने कनैत किएक छी? हम कहलियनि‍- “तो नै बुझबहक। तोरा देखिते हम अपने आपकेँ नै रोकि सकलौं, आ ई नोर तँ खुशीक अछि‍। आई एहेन सौभाग्य जे पाहुन बनि‍ ऐठाम एलह, अहो भाग्य हमर। ओ तँ अबाक। किछु नै बजला, बजला किछुकालक पश्चात जे- “श्रीमान् हमरा चरि बज्जि‍आ गाड़ी छुटि गेल। हम आइ अपने ऐठाम रहब आ भोजनो करब। सुनिते हर्ष भेल जे कर्मवीर कमे उमेर मे एतेक स्‍पष्‍टवादी, सभ किछु खोंइलचा छोड़ा कऽ बजनिहार, जे चाहे अहाँकेँ कष्ट हुअए वा खुशी। कनेक काल पछाति‍ हमरा लोकनि चाह-पान करऽ लेल चौक दिस बि‍दा भेलौं। गामक चौक। बड़़कीटा पाखरीक गाछ चारूकात चबुतरासँ घेरल। गामक अधिकांश लोक चाह-पान पीबाक लेल साँझ-परात ओते आबथि। बगलमे छल फुसियाही दूसाधक धान-गहुम पीसऽ बला मीशील, आ घोघना मियांक कोटाक दोकान। सटले छल मुनेसराक कनीयेँटा नोन-तेलक दोकान। आ बगलेमे छल रामा मुखियाक मुरही, कचड़ी, मटर, घुघनी आ इचना माछक चखना बला एकचारी देल दोकान। दसे डेग हटिकेँ छल अगहनियाँ पसीनीयाँक ताड़ीक दोकान, जैठाम दर्जनो घैल ताड़ीसँ भरल, पूब मुहेँ राखल आ घैलसँ बहरा रहल छल जे बुलबुला, बुलबुला-बुलबुलाकेँ ससरि घैलक पेन तरमे राखल बीरबापर खसैत छल। किछु पीयाकक आगूमे राखल छेलै दू बेचाही ताड़ी, मुरही, कचड़ी आ इचना माछक चखना। लोकसभ ताड़ी पीब झुमय, मने मस्त छेलै सबहक आ समवेग स्वरमे गबैत छल ई गीत- “ताड़ीवाली ताड़ी पी आ दऽ... ताड़ बला ताड़ी दऽ खजूर बला कम... ताड़ीवाली ताड़ी पिआ दऽ। दृश्ये छल लाजबाब! सभ किछु देखैत हमरा लोकनि पहुँचलौं ठको कक्काक चाहक दोकानपर। एकेटा चाहक दोकान आ ढ़ेर रास लोक चाह पीबि‍निहार। पाखरीक गाछक चबुतरापर बैसेत हम हाक देल- – “ठको काका दू कप चाह हमरो सभकेँ दिहह.. करीब दस मिनटक बाद‍ ठको काका डंटी वि‍हीन कप, जे कोरोपर कनी फुटले छले नेने आएल चाह। एह चाह तँ चाह छल! महिंसक दूधक अगब चाह, एको ठोप पानि‍क छुति नै, मीठगरो तेतबे, ठोरमे ठोर सटऽ बला चाह। अर्थात् चाहक चाह। चाह पीब कैंचा दऽ हमरा लोकनि बढ़लौं बौआ कक्काक पान दोकान दि‍स। लग पहुँचैत कहलियनि- “गोड़ लगै छी काका कनी दू सीक्की पान देब”। कठघारामे बैसल बौआ काका पुछलनि- “हौउ नीके छह किने? बहुत दिनक बाद देखलियह, कहऽ कोना की हालचाल छह अरविन्दक आ घौलुक?” पुछैत पान लगबए लगला। “हँ काका सभ अहाँ सबहक असीरवाद छी। सभ कियो नीके -सुखे छी।” बौआ काका पान लगा आगा बढ़ौलनि। हमरा लोकनि पानक आनन्द लेबए लगलौं। पानो तेतबे सुअदगर। किएक तँ शुद्ध देशी पान छल। तहूमे बेरमा बरैबक। एक तँ मिथिला दोसर मैथिल ऊपरसँ बेरमा बरैबक पान, बौआ कक्काक लगाैल। अपूर्व! गप-सप्पक क्रमे लोक सभसँ भेँट भेल, कुशल- छेम सभ एक-दोसराक हाल चाल पुछैत सभसँ कर्मवीरक परिचए करौलियनि‍। नै जानि जे हिनकामे कोन एहेन गुण छेलै जे जिनकेसँ परिचए बरबैयनि‍ सभ हुनकासँ प्रभावित भऽ जाथि‍। अकानि नै सकलौं जे कर्मवीरक मनमे कोन कल्पना जन्म लऽ रहल छेलै। ओ तँ जेकरा हम कल्पना मात्र बुझै छेलौं से तँ साकार करक प्रवल सम्‍भावना लैत राति खेबाक काल बजला...। दुनू गोटाक आगूमे दूटा थारी राखल छल, जइमे कनीयेँटा कटोरी, आ कटोरीमे घीड़ाक तीमन खेड़हीक दालि देल, दू फाॅक पि‍याजु आ नान्हिएटा टुकड़ी छल अचाड़क, आर छल काँच मेरचाई एक-एक प्रति, प्रति थाड़ीमे। लोटा आ गिलास जलसँ भरल छल, आ दुनू गोटे बैसल रही खेबाक लेल, तेतबेमे अरविन्द आ घोलू दुनू बौआ टीशन पढ़ि कऽ आएल। कर्मवीर जीकेँ गोड़ लागि असीरवाद लऽ अपन-अपन छिपलीमे रोटी लऽ खैए लगला। भोजनक क्रमे किछु काल धरि गुम्म-सुम्म रहला पछाति‍ कर्मवीरजी बजला- “श्रीमान् मोन होइत अछि जे जँ अपने आदेश दी तँ हमहूँ एकटा क्लीनिक खोलि प्रैक्टिस करितौं। सुनि मन हर्ष भेल जे हिनकामे किछु करबाक उत्साह छन्‍हि। आ गामक प्रति एतेक सिनेह जे केतौ आन ठाम नै जा कए बल्‍की गामेमे सेवा करता। नै तँ प्रायः परदेश खटऽ बलाक तँ उजाहि उठल छै। एहेन सन बुझना जाईछ जे सभ सुख परदेशेमे छै! मुदा ई तँ हमरा लोकनिक धोखा छी धोखा! हम कहए चाहै छी जे जँ देहमे खुन अछि तँ गामोमे कियो भुखे नै रहता। एक तँ साधारणो मजुरी ८० टाकासँ १५० टाका धरि अछि, तहूपर जन-मजदूरक अभावे। दस दिन खुशामद करिऔक तखन एक दिन आबि‍ काज कए देत। ओतबे नै माए-बाप, भाय-भौजाई, पर-परिवार बाल-बच्चाक संग रहबाक सुख केतए पएब गामेमे ने? आकि‍ परदेशमे? उत्तर एकेटा भेटत- गामेमे, तखन अहीं सभ कहूँ जे परदेश खटबै कथी लेल? की ऐ लेल जे अबैकाल सनेशमे एड्स लेने आएब। हम तँ सप्पत दऽ कहऽ चाहै छी, जे गामक माटि-पानि आ थाल-कादोमे सभ सुख अछि। कोनो गामसँ चिक्कन अप्पन गाम, आ कोनो धामसँ चिक्कन मिथिलाधाम। अहूँ सभ अप्पन-अप्पन करेजपर हाथ राखि कहू जे हम फुसि कहैै छी? आब प्रश्न ई उठैत अछि जे जखन सभ कियो परदेशे खटबै तखन गामक विकाश हेते कोना? मुदा कर्मवीर जीमे हमरा भेटल जे ओ गामेमे रहि गामक आ समाजक विकाश करबाक भावना हुनका हृदैमे हिलकोर मारि रहल छल। मन गद-गद भऽ उठल। आर किछु काल गप-सप्प करैत हमरा लोकनि सुति रहलौ। प्रातः किछु गोटा (मेडिकल लाईनसँ जुड़ल) सँ भेँट करौलियनि‍, तत्पश्चात एकटा नीक दिन तका हिनक क्लिनिकक उद्धाटन सम्पन भेल। जीवनक दोसर रूप संधर्ष होयत छै। मुदा तइसँ कर्मवीर जी धबरेला नै बल्‍की जीवनक लेल संधर्ष करए लगला। से तइ तरहेँ जे काल्हुक कारी झामड़ सूखल-साखल देह, पिचकल-पुचकल गाल, धसल- धसल आँखि‍ पेट पाँजरमे सटल खपटासन, कोनो पहिरलहे पेन्ट आ बुशर्ट पहिरि पुराने-धुराने जूता आ चप्पलसँ समए खैपऽ बला, जीवनकेँ एतेक लगसँ देखऽ बला कर्मवीर, हमरा आइओ हुनक ई बात मोन पडै़त अछि जे ओ पुछने रहथि- “श्रीमान् की अपने कहियो राति भरि‍ भुखले सूतल छी? माथमे नै घुसल ई बात जे हुनक प्रश्नक भाव की छन्‍हि? मुदा सत बात तँ ई छल जे ओ काल्हुक राति उपासे रहला, भुखले सुति रहला। भरि राति धरि निन्न नै भेलनि, कोनो तरहे कछमछा केँ राति बि‍तौलनि‍। प्रातः भेँट भेलापर हुनक धसल आँखि‍ आ भुखल पेट हमरा किछु पुछि रहल छल। मुदा हम छेलौं निःशब्द। काल क्रमे समैक संग मेहनत रंग देखौलक। रोगी सभ आबए लगलनि, भगवती जस लगबैत गेलखि‍न। गुजर-बसर करए लगला तँ पत्नीओकेँ लए अनलनि आ आनन्दसँ रहए लगला। भोला बाबाक कृपासँ दिन दूना आ राति चौगुना आमदनी होमय लगलनि। आइ ओ दस धूर जमीन लए घर बना बाल-बच्चाक संग हँसी-खुशीसँ छथि। एकटा सफल बेक्तीक रूपमे आ सफल डाक्‍टरक रूपमे। डाक्‍टर कर्मवीर। कहियो कताल हमरो हुनका घरपर जेबाक मौका लगैत अछि। एक डिब्बा बटर-बेक बिस्कुटक संग। डाक्‍टर साहैबक दुनू बच्चा निछोह दौड़ल अबैत अछि ऐ अवाजक संग मम्मी-मम्मी अंकल जी आए- अंकल जी आए। तात घरसँ बहार होइ छथि डाक्‍टर साहैबक पत्नी-पुनम, जेहने नाओं-तेहने पुनमक चाँन सन मुँह। आँखि चोन्हिआ जाइत अछि। बेस पाँच हाथ ऊँच! देहो दशा खूब भरल-पूरल। कनेक श्याम रंग, कलकत्तिया आमक फारा सन-सन आँखि, बादामी नाक, औंठिया केश कारी भौर, दुनू कात जुट्टी गुहल आ तइ जुट्टीकेँ धुमा कऽ खोपा बन्हने, कसल-कसल वाँहि, आ पाकल तिलकोरक फड़ सन दुनू ठोर। जतवे देखऽ मे सुन्दर, तेतबे मीठ-मीठ बोल। नम्हर-नम्हर हाथ आ दुनू हाथमे रहन्हि भरि-भरि हाथ चुड़ी। हाथक आँगुरमे बेस कीमती पाथड़क अौठी। सुगा पंखी रंगक ब्लाउज आ साड़ी पहिरने, माथपर साड़ी लैत, आँचर सम्हारि दुनू हाथ जोड़ि, पएर छूबि‍ गोड़ लगैत छथि। सौभाग्यवती भवः असीरवाद दैत आँखि नोड़ा जाइत अछि। मन पड़ैत छथि डाक्‍टर कर्मवीर छह फीट छह इन्‍ची ऊँच, भरल-पूरल देह, मोती जकाँ झलकैत दाॅत, क्लीन सेभ, कनेक बहराएल पेट आ हँसैत ई अभिवादन- “प्रणाम श्रीमान् कुशल छी कि‍ने? अन्तर स्‍पष्‍ट भए जाइत अछि कौल्हुका कर्मवीर- आजुक डाक्‍टर कर्मवीर। जेहने करनी तेहने भरनी लक्ष्‍मीपुरमे एकटा ब्रह्मचारी बाबा रहै छला। बड़-बढ़ि‍याँ स्‍थान छेलै। साँझ-भि‍नसर कीर्तन-भजन होइते रहै छेलै। नाओं छेलनि‍ बाबा लक्ष्‍मी दास। शास्‍त्रक संग अध्‍यात्‍म सेहो बढ़ि‍याँ ज्ञानी छला। शास्‍त्रसँ जुड़ल रहने साँझ-भोर योग-धि‍यानमे मगन भऽ परमपि‍ता परमात्‍मा सेहो गीता सारक मोताबि‍क मनमना भव: आ मध्‍याजी भव: केर मंत्रक सफल प्रयोगसँ अति‍ इन्‍द्रि‍य सुखक भेट जेबाक कारणे लौकि‍क सुख काग वि‍ष्‍ठाक समान बुझना जाइ छेलनि‍। तँए ओ पूर्ण नष्‍टोमुहाँ भऽ गेल रहथि‍। स्‍थानपर अपने आ एकटा चेला- मुरती दासकेँ रखने छला। दि‍न भरि‍ सर-सेवकानसँ जे कि‍छु अन्न-पानि‍ अबै छेलनि‍ तइसँ परमात्‍मा लेल पूर्ण पवि‍त्रताक संग भोग बना, लगा पछाति‍ बाबा आ चेला पबै छेलथि‍। एक दि‍नक कथा छी बाबा आ चेला दुनू चलला सेवकान दि‍स। जेठ मास रहने रौद लगि‍ गेलनि‍ तँए एकटा नमहर पाखरी गाछ तर बैसि‍ दुनू गोटे सुसतए लगला। कनीए कालक पछाति‍ बाबाकेँ मैदान दि‍स जाइक शंका बुझेलनि‍। बाबा चेलाकेँ कहलखि‍न- “रे चेला, देख तँ बगलमे नदी बोहि‍ रहल अछि‍ से तूँ कनी जा एक कमण्‍डल जल ला से कनी हम दि‍सा जाएब।” चेला मुरती दास कमण्‍डल उठा जल भरैले नदी दि‍स बि‍दा भेल। नदी कातमे गेबे तँ कएल आकि‍ देखलक जे एकटा मुर्दा नदीमे भाँसि‍ रहल छै। जेकर आँखि‍ नि‍कलि‍ कखनो अकास दि‍स चलि‍ जाइ छै आ फेर आबि‍ कऽ लगि‍ जाइ छै। कखनो हाथ छूटि‍ अकास दि‍स चलि‍ जाइ छै आ फेर आबि‍ जुटि‍ जाइ छै। कखनो एकटा टाँग अकास दि‍स चल जाइ छै आ पुन: आबि‍ सेट भऽ जाइ छै। आब तँ मुरती दासकेँ कि‍छु फुड़बे ने करै, ओ जल की भरल कपार। डरे कमण्‍डल लऽ पड़ाएल बाबा लग। जा कऽ बाबाकेँ सभ खेरहा सुनौलक- “बाबा, आखि‍र ई की बात छि‍ऐ से पहि‍ने कहऽ तखनि‍ तँ तूँ हमर बाबा आ हम तोहर चेला। नै तँ तहूँ घर हमहूँ घर।” बाबा ने तँ कहैले तैयार आ ने चेला मानैले तैयार। अन्‍तमे बाबाकेँ सभटा खेरहा कहए पड़लनि‍- “सुन रे चेला मुरती, जँ नै मानमेँ तँ सुन कहै िछयौ। तँू जे आइ नदीमे देखलीही ओ मुर्दा पूर्व जनममे एकटा बड़ पैघ महात्‍मा छल। मुदा एक दि‍नक कथा छि‍ऐ, जे ओ एकटा सेवकान ऐठाम गेल। बड़-बढ़ि‍याँ सेवक जे जुड़लै से आदर-भाव, सुआगत-बात केलक। भोरका पहर भोरे-भोरे महिंस चरबैले बाध चलि‍ गेल। सोचलक जे जाबे प्रात हेतै आ बाबा जगता ताबत हम महिंस चरा चलि‍ आएब। से रौ चेला, ओ सेवक महिंस चरबैले चलि‍ गेलै मुदा ओइ सेवकक एकटा जुआन बेटी छेलै, देखै-सुनैमे इन्‍द्रक परी। भोरुका समए। लड़की नि‍कास-बातक लेल नि‍कलल। आकि‍ बाबाक नजरि‍ ओकरा पड़लै। सोचलक जे सेवक तँ घरपर अछि‍ नै, बच्‍चि‍या असगरे छै। बाबा अपन कामदेव महराज बनि‍ सोलहो कलाक संग रावणक रूप लऽ लेलक। बाबा तँ कामसँ आन्‍हर भऽ गेल। पछाति‍ ओइ बच्‍चि‍याक संग बाबा अपन मुँह कारी केलक। मुदा ई बात कि‍यो नै बुझए तइ खाति‍र बाबा ओतएसँ अन्‍हरगरे बि‍दा भऽ गेल। रस्‍तामे सेवक महिंस चरा अबैत रहै। बाबाकेँ देखलक देखि‍ते सोचलक जे ई तँ अनर्थ भऽ गेल, बाबा तँ तामसे भागल जा रहल छथि‍। से कहीं सरापि‍ ने दथि‍। सेवक धड़फड़ा कऽ बाबाक पएरपर खसि‍ पड़ल। आ माफीपर माफी मांगए लगल। बाबा माफ करि‍ देल जाउ गल्‍ती भऽ गेल आब एहेन गल्‍ती हमरासँ ऐ जनममे नै भऽ सकैए। मुदा बाबा अपनाकेँ बजबैत बाजल- ‘तूँ जे गल्‍ती केलँह से केलँह मुदा तोहर जे बच्‍चि‍या छौ से हमरा संग अभद्र बेवहार केलकौ तँए हम आब घूमि‍ कऽ तोरा घर जा नै सकै छि‍यौ। शर्त एकटा छौ जँ तूँ काठक सन्‍दूक बना जीवि‍तेमे ओइ बच्‍चि‍याकेँ ओइमे रखि‍ धारमे भँसि‍या देबही तँ हम घूमि‍ कऽ तोरा घर जा सकै छि‍यौ। सेवक तँ लाजे माटि‍मे गड़ि‍ गेल जे हमर बेटी केहेन कुलकलंकनी अछि‍। ओ शर्त गछि‍ लेलक। बाबा संग घूमि‍ कऽ घर आएल। घरपर आबि‍ कमराकेँ बजा सन्‍दूक बना ओइमे अपन बेटीकेँ बन्न कऽ धारमे भँसि‍या देलक। आब तँ बाबाक मनक मुराद पूरा भऽ गेल। सोचलक, से नै तँ ई सन्‍दूक भँसि‍याइत अपना स्‍थान दि‍स जेबे करत तँए जल्‍दीसँ जल्‍दी एतएसँ चली। औगताइत सेवककेँ कहलक जे से नै तँ आब जे कि‍छु खुएबऽ से खुआबए हम चलबऽ। धड़फड़ेमे असि‍द्ध भोजन, दही-चूड़ा-चीनीक इंजाम भेल। बाबा भरि‍ पोख खा अपना कुटी दि‍स लफरल बि‍दा भेल। स्‍थानपर आबि‍ चेला सभकेँ कहलक जे धारमे एकटा सन्‍दूक भँसि‍याइत अबै छौ ओइमे भगवती छथि‍न से जा कऽ नेने आबह, राति‍मे हमरा वरदान देथि‍न। चेला सभ सन्‍दूकक भाँज लगबए लगल। ओमहर ओ सन्‍दूक जे भँसल अबै छल तैपर एकटा राजाक बेटाक नजरि‍ पड़लै जे जंगलसँ शि‍कार कऽ एकटा बाघकेँ जालमे बझा नेने अबै छल। ओ अपना सैनाकेँ आदेश देलक जे ओइ सन्‍दूककेँ ऊप्‍र करू। सन्‍दूक ऊपर कएल गेल। खोललापर देखलक जे ऐमे तँ इन्‍द्रक परी सन एकटा लड़की अछि‍। ओकरा सन्‍दूकसँ नि‍कालि‍ अपना संग केलक। आ बाघकेँ ओइ सन्‍दूकमे बन्न कऽ जालकेँ काटि‍ धारमे भँसा देलक। एमहर नदीमे भँसि‍याएल सन्‍दूकेँ अबैत बाबा संग चेला सभ खुश। लगमे एलापर सभ कि‍यो मि‍लि‍ सन्‍दूककेँ ऊपर केलक। आ लऽ कऽ कुटीमे रखि‍ आएल। बाबाक मन सन्‍दूक देखि‍ चपचप आ लपलप करनि‍। खने कुटीसँ बाहर अबथि‍ आ खने भीतर। चेला सभकेँ कहलखि‍न, तों सभ एकटा बात धि‍यानसँ सुनह जे भगवती आइ राति‍मे वरदान देथि‍न। से अधोरात्रीमे। तखनि‍ हम जे कोनो तरहक अवाज नि‍काली, कानी-खीजी आकि‍ हल्‍ला करी तँ से तूँ सभ नै अबि‍हऽ नै तँ हमर जीवन भरि‍क तपस्‍या नि‍सफल भऽ जाएत। ...सबेरे सकाल भनडाराक आयोजन भेल। बाबाक संग सभ चेला पौलक। आ अपन-अपनपर वि‍श्राम करए गेल। बाबा तँ इमहर ताकेमे रहथि‍। नि‍शोडण्‍ड राि‍त बाबा कुटीमे प्रवेश केलनि‍। केबाड़-खि‍ड़कीमे बि‍लैया भरि‍ जा कि‍ सन्‍दूक खोललनि‍ आकि‍ बघबा तँ...। एक तँ भरि‍ दि‍नक भूखल रहबे करए, बाबापर झपटल। बाबाकेँ पकड़ि‍ गरदनि मचोरि‍, सीना फाड़ि‍ अँतरी-भोंतरी नि‍कालि‍ भरि‍ मन खून पीब, भरि‍ इच्‍छा मासु खा पड़ाएल जंगल दि‍स। ...परात भेलापर चेला सभ देखलक, जे बाबा तँ भगवतीक वरदान भरि‍ इच्‍छा पौलनि‍। बाबाक अधखरू लहास उठा ओही नदीमे फेक देलक। से रइ चेला मुरती, तूँ जे देखलेँ ओइ नदीमे भँसैत लहासकेँ से चेला ओही बाबाक कि‍रदानीक उदाहरण छि‍ऐ। से बुझलीही। चेला मुरती बाजल, बाबा हौ बाबा! तोरा मानि‍ लेलि‍यऽ हौ जे तूँ सुच्‍चा बाबा छहक आ हम तोहर चेला। बाबा लक्ष्‍मी दास कहलखि‍न, चेला! आबो चल, कहबी छै जेहने करनी तेहने भरनी।” सभ कि‍छु नि‍अमसँ करू भखरौली गाममे दू भाँइ जेकर नाओं सुरति‍ आ मुरति‍। दुनू भाँइ भक्‍ति‍-भाव, सेवा-वन्‍दीमे नीक जकाँति‍ लगल रहै छल। जखने कोनो गुरु-गोसाँइ अबथि‍ तँ दुनू भाँइ खूब मनसँ सेवा भाव करए। सेवामे केतौ केनो कमी नै रहि‍ जाइ, एकर खि‍याल हरि‍दम रखै छल। दुनू भाँइमे मेलो-मि‍लान खूब रहै छल। मुदा एकटा गप एकदम भि‍न्न छेलै जे दुनू भाँइक गुरु-गोसाँइ माने सरकार अलग-अलग रहथि‍न। एक दि‍नक गप छी जेठ महि‍ना छल, कराचूर गरमी, असमानसँ बुझू आगि‍ बरि‍स रहल छल। जेठका भाय सुरति‍क सरकार एलखि‍न। बोले-बच्‍चे मि‍लि‍ सरकारक वन्‍दगी-भावमे लगि‍ गेल। मुदा सरकार देखलनि‍ जे मुरति‍ सेहो सेवा-भावमे लगल अछि‍। जखनि‍ कि‍ ओकर सरकार अलग छै। मुरति‍ तँ ओइ सरकारक सेवकान नै। तँए सरकार बि‍गड़ैत कहलखि‍न- “सुरति‍! सुनू! एना धड़फड़-धड़फड़ जुनि‍ करू। अरे जे कि‍छु करबाक हुअए से नि‍अमसँ करू। सभसँ पहि‍ने असलानी चौकी लाउ।” सुरति‍ झट दऽ असलानी चौकी अनलक। तब फेर सरकार बजला- “दोकानसँ एकटा लबका साबुन लाउ।” सुरति‍ लपैक कऽ दोकानसँ एकटा साबुन अनलक। पछाति‍ सरकार बजला- “पहि‍ने दस बाल्‍टीन जल इनारपर भरू।” जल भरल गेल। सरकार दसो बाल्‍टीन पानि‍सँ भरि‍ मन स्‍नान केलनि‍। पछाति‍ गम्‍छासँ रगड़ि‍-रगड़ि‍ देह-हाथ पोछि‍ आसन जमौलनि‍। पछाति‍ चरण खटि‍औल गेल। धूप-आरती भेल। सरकार बजला- “से नै तँ आब दू लोटा शर्बत झब दऽ बनाउ। कि‍एक तँ सभ काज नि‍अमसँ करू।” बनौल गेल। सरकार आ अगुआ साहैब दुनू गोटे गटाक-गटाक भरि‍ पोख शर्बत पीलनि‍। एमहर मुरति‍ अपना आँगनमे बैसि‍ एकटा कौपीपर ई सभटा नि‍अम लि‍खि‍ रहल अछि‍ जे कोनो काज करी तँ नि‍अमसँ करी। तेकर बाद दू घंटा भजन-भाव भेल। पछाति‍ पंगहैतक आग्रह भेल। पंगहैतमे प्रयाप्‍त दही, चूड़ा, चि‍न्नी आ केराक बेवस्‍था मुरति‍ केने छल। बेस नीके नहाँति‍ सभ कि‍छु पौलनि‍। पछाति‍ सरकार अाराममे गेला। परात भने डोलडालसँ एला पछाति‍ दू घंटा धरि‍ भजन चलल। फेर आरो-आरो संत-महात्‍मा रूपी बाबा सभ भनडारा पौलनि‍। आ करीब चारि‍ बजे उचि‍त बर-वि‍दाइ दऽ मुरति‍ सरकारकेँ बि‍दा कऽ अपन गामक सि‍मान टपा बेरमा दि‍स आपस भेला। ि‍कछुए दि‍नक बाद माघ मासक जड़कला समैमे मुरति‍क सरकार एलखि‍न। साैझुका पहर। मास मास। जाड़े सबहक हाड़ कपैत। सरकारकेँ वस्‍त्रोक अभावे। जाड़े थर-थर कँपैत रहनि‍। अबि‍ते सरकार आदेश फेकलखि‍न- “मुरति‍, तहन सभसँ पहि‍ने धुनी रमौल जाए।” मुरति‍ बाजल- “हँ हँ सरकार। तखनि‍ जे कि‍छ सेवा करब। से नि‍अमसँ करब। नि‍अम नै तोड़ल जाए।” मुरति‍ अपना बचबा भगति‍केँ हाक दैत कहलक- “सभसँ पहि‍ने असलानी चौकी लाबह।” चौकी आनि‍ इनारपर राखल गेल आ दस बाल्‍टीन जल सेहो भरल गेल। दोकानसँ मुरति‍ अपने लबका साबुन लबलक। लाबि‍ कऽ सरकारकेँ कहलक- “तखनि‍ सरकार चलू असलान कऽ लेल जाउ। कि‍एक तँ सभ िकछु नि‍अमसँ हेबक चाही।” एमहर सरकार कहथि‍न- “हौ मुरति‍, जाड़ होइए हौ। आगि‍क बेवस्‍था करह। धुनी रमौल जाए।” मुरति‍ बाजए- “नै सरकार, सेवा एना नै होइ छै। सेवा हमरा नि‍अमसँ करऽ दि‍अ।” एहमर सरकार जाड़े थरथराइ। देह कँपकँपाइत। ओहमर मुरति‍ ऊपरसँ बाल्‍टीनक बाल्‍टीन जल सरकारक देहपर ढारि‍ रहल अछि‍। सरकार कहथि‍न- “हौ मुरति‍, हौ भेलै हौ। छोड़ह ई सभ। हौ भाभट समटऽ।” मुरति‍ बाजए- “नै सरकार, हमरा सेवा नि‍अमसँ करऽ दि‍अ। सेवा आ वन्‍दगी-भाव नि‍अमसँ हेबक चाही।” सरकार जाड़े थरथरा रहल छथि‍। चि‍चि‍आ-चि‍चि‍आ कहि‍ रहल छथि‍। मुदा मुरति‍ रगड़ि‍-रगड़ि‍ सरकारक मोलि‍ छोड़बैत बाल्‍टीनक-बाल्‍टीन पानि‍ ढारि‍ असलान करा रहल अछि‍। सरकार बाजथि‍- “हौ मुरति‍, हौ भेलै हौ आबो छोड़ह।” मुदा मुरति‍ सरकारक सेवा वन्‍दगी-भाव नि‍अमसँ कऽ रहल अछि‍। पछाति‍ सरकारकेँ आसनीपर आनि‍ भगति‍केँ झब दऽ दू लोटा शर्बत अनलक। सरकारकेँ नै नै करि‍तो लाचारीमे दुनू लोटा शर्बत पीबए पड़लनि‍। सरकारक तँ जान बुझू अवगरहमे। तूरत पंगहैतक इंजान कएल गेल। एक तँ माघ मास तैपर सँ दही-चूड़ा चि‍न्नीक इन्‍तजाम। सरकार पंगहैतक लेल बजौल गेला। आसन लगा मुरति‍ सरकारकेँ मुट्ठी एक चूड़ा आ छाँछीओ भरि‍ दही चूड़ापर उझैल आसेर चि‍न्नी खसौलक। सरकार जे दहीपर हाथ फेरलनि‍ तँ जाड़े छि‍हुल उठला। एक तँ माघ मास, दसो बाल्‍टीन पानि‍सँ असलान तैपर सँ दू लोटा शर्बत आ तैपर सँ चही-चूड़ा-चि‍न्नीक पंगहैत। आह! सरकारक तँ हालते खराप। सरकारकेँ जैयो ने खा होन्‍हि‍ तैयो आग्रह करि‍ करि‍ भोजन करबनि‍। अन्‍तत: खाइते-खाइते सरकार ओतै टगि‍ गेला। सभ उठा-पुठा सरकारकेँ आसनीपर आनलक। मुदा सरकार तँ ताबे प्रकृति‍क नि‍अमानुसार संसार छोड़ि‍ चूकल छला। एमहर मुरति‍ सेहो नि‍अम तोड़ैले तैयार नै कि‍एक तँ ओकरा माथामे एक्केटा बात घुमै छेलै जे वन्‍दगी-भाव जे कि‍छु करू से सभ कि‍छु नि‍अमसँ करू। कहू तँ केतेक उचि‍त? छुतहरि ‍ सि‍मराक शि‍वनन्‍दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहि‍रन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। वि‍धाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्‍दरि‍। मध्‍यम वर्गीए परि‍वारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बि‍आह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरि‍याती गेल रहथि‍, सभ कि‍यो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि‍। बड़-बढ़ि‍याँ घर-परि‍वार छल। राजाबाबू बि‍आहक पछाति‍ओ अध्‍ययन जाड़ीए रखलनि‍। नीक-नहाँति‍ पढ़ैले पटनामे नाओं लि‍खा डेरा रखलनि‍। छुट्टी भेलापर गामो चलि‍ अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहि‍ल सन्‍तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्‍या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्‍चो तेतबए सुन्‍दर छल। क्रमश: दुनू बच्‍चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लि‍खा देलखि‍न। बच्‍चा सभ ओतै रहि‍ पढ़ए-ि‍लखए लगल। एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति‍ खराप हुअ लगलनि‍। जइसँ ओ दोस्‍ती-यारीमे पीबए लगला। एक दि‍नक गप छी, गाम एलाक बाद अधरति‍यामे जोरसँ हल्‍ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चि‍चि‍या रहल छथि‍। राति‍क मौसम देखि‍ गामक डाक्‍टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखि‍न। बि‍मारी उपकले रहनि‍। पत्नी वि‍शेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि‍ दुइए मासमे दुखकेँ कन्‍ट्रोल कऽ लेलनि‍। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जि‍द्द कऽ पटना चलि‍ गेला। परि‍कल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि‍ आ भैया जे पाइ दन्‍हि‍ आकि‍ नै दन्‍हि‍ तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि‍-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बि‍तलै आकि‍ वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि‍। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली राति‍मे राजाबाबू अपना बि‍छौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चि‍चि‍यए लगला। नि‍सि‍भाग राति‍ रहने हो-हल्‍ला सुनि‍ लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि‍ गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्‍टी करैत सदा-सदाक लेल शान्‍त भऽ गेला। अँगनामे कन्ना-रोहट उठि‍ गेल। टोल भरि‍क लोक सभ जागि‍ गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रि‍स्‍ता–नाता तोड़ि‍ परमधाम चलि‍ गेल छला। परात भेने बि‍ना बजौने सभ आदमी मि‍लि‍ बाँस काटि‍, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि‍ दऽ राजाबाबूक पहि‍ल सन्‍तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि‍-जारि‍ सभ कि‍यो घर घुमला। कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि‍ चलि‍ गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्‍तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि‍ कुहैक रहल छथि‍। काल्हि‍ तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रति‍मूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि‍ छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहि‍रि कुहैक रहल छलि‍। केतए गेलनि‍ भरि‍ हाथ चुड़ी, केतए गेलनि‍ भरि‍ माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्‍चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि‍ ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि‍ दैत। केना ने बेधि‍ दैत! आखि‍र वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि‍ ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहि‍यो हुनक पएरो ने देखने रहनि‍ ओ आब मुहोँ देखि‍ रहल अछि‍। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्‍हि‍। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बि‍तबए लगली। सासु-ि‍दयादि‍नीक गपकेँ छोड़ि‍ अनकर गपपर बेसी धि‍यान दि‍अ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब कि‍छु लोक हुनका गुरु मन्‍तर दि‍अ लगलखि‍न। आ ओहो नीक जकाँ धि‍यान-बात दि‍अ लगली। जहि‍ना कहबी छै जे खेत बि‍गड़ि‍‍ गेल खढ़ बथुआ सन ति‍रि‍या बि‍गड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि‍ तक ओकर उकासीओ ने कि‍यो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि‍। बि‍ना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखि‍या-सरपंचक संग हँसि‍-हँसि‍ बजै-भुकए लगली। गामक राजनीति‍मे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल। एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्‍यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनि‍याँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्‍य जि‍नगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि‍ रंगीन दुनि‍याँमे चलि‍ आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि‍ हल्का छि‍टबला साड़ी पहि‍रए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खि‍लए लगल। एक दि‍न मुखि‍याकेँ कहि‍-सुनि‍ इन्‍दि‍रा अवास स्‍वीकृति‍ करौलक आ बि‍च्‍चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कि‍यो छौड़ा-माड़रि‍ भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दि‍न जेकरा भाफो नै नि‍कलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्‍जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बि‍स्‍कुटी लोकक चक्कर-चाि‍लमे पड़ि‍ ओ भैंसुरसँ अरारि‍ कऽ अपन हक-हि‍स्‍सा लेल लड़ए लगली। लड़ि‍-झगड़ि‍ सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि‍ भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि‍ जे मन फुड़ै तखनि‍ सएह करए। कि‍यो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कि‍यो कि‍छु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्‍जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि‍। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्‍बै पड़ा गेल। आहि‍ रे बा! परात होइते घोल-फच्‍चका शुरू भेल ‘कनि‍याँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि‍ दू दि‍नक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्‍बैमे अछि‍ फलल्‍मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनि‍याँ गाम घूमि‍ आबथि‍। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्‍हर। कि‍छु दि‍नक बाद जेना-तेना पकड़ि‍-धकड़ि‍ ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखि‍मे गर्दा झोंकि‍ कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कि‍यो समझबैक परि‍यास केलनि‍। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि‍ ओ ओकरा बुझबैत कहलखि‍न- “सुनू कनि‍याँ, अखनो कि‍छु ने बि‍गड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि‍ गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि‍ लि‍औ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जाति‍मे मि‍ला लेत। जाति‍ नाम गंगा होइ छै।” मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि‍ ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्‍तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जाति‍सँ बाड़ि‍ आँगनासँ ई कहैत‍- “एकरा आँगनमे राखब उचि‍त नै ई कनि‍याँ कनि‍याँ नै छुतहरि‍ छी छुतहरि‍...।” हम ओत्तै ठाढ़ भेल कि‍छु ने बाजि‍ सकलौं, कि‍छु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि‍ नै बूझि‍ पेलौं जे आइ बूझि‍ रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहि‍आ कऽ पकड़ने अछि‍। मोहन बाबू मानपुरक प्रति‍ष्‍ठि‍त जमीनदार कन्‍टीर मड़ड़। जि‍नका मात्र दू गोट सुपुत्र पहि‍ल राम वि‍लास बाबू आ दोसर श्‍याम वि‍लास बाबू। राम वि‍लास बाबूक पाँच गोट पुत्रकरण। आ श्‍याम वि‍लास बाबूकेँ दूटा कनटि‍रबी आ दू गोट पुत्र। परि‍वार नमहर भेने एक आँगनमे अँटाबेश नै हेबाक कारणे आँगन जरूर दू भऽ गेल मुदा भावना सबहक एक्के छल। राम वि‍लास बाबूक पाँचो पुत्र सभ तरहेँ सम्‍पन्न। सभ अपन-अपन दुख-धंधामे लागल। एमहर श्‍याम वि‍लास बाबूक जेठ पुत्र राम बाबू नामक सार्थकताक अनुरूप कमाइ-खाइबला रहथि‍। एकोटा रूपैआ जेतबए मेहनति‍सँ कमाइ छला तेतबे रखि‍-जोगा कऽ खर्च करै छला। दुनू भैयारीक परि‍वार सभ तरहेँ भरल-पुड़ल कथुक कमी नै। सर-कुटुमथि‍ सेहो भरले-पुड़ले। राम बाबूक सासुर श्‍यामपुरक मुखि‍याजीक परि‍वार। मुखि‍या भेने हुनकर बेटी सेहो नीके लि‍खल-पढ़ल आ तेतबए देखए-सुनएमे सेहो सुन्नरि‍। बड़-बढ़ि‍याँ परि‍वारक भरन-पोषन चलैत रहए। श्‍याम बाबूक छोट पूत्र मोहन बाबू। बेस छह फि‍ट दू इन्‍ची लम्‍बा। तहि‍ना शरीरो लालबून। पढ़ै-लि‍खैमे सेहो तेतबे तेजगर। मुदा हाथक बड़ खुजल। भैयासँ पाइ लऽ लऽ संगी सबहक संग चाह-पानमे खूब उड़बथि‍। दोस-महि‍मक कोनो कमी नै। देखि‍ते-देखि‍ते मोहन बाबू बी.ए पास केलनि‍। शादी-बि‍आहक गप-सप्‍प चलए लगल। एकठाम दूठाम देखैत कथा केतौ पसि‍ने ने पड़ै छेलनि‍। अन्‍तमे बड़ बढ़ि‍याँ अपने गताति‍ सरायगढ़मे एकटा कन्‍याँ देखि‍ सम्‍पन्न भेल। पत्नी देखै-सुनैमे जहि‍ना सुन्नरि‍ तहि‍ना पढ़बो-लि‍खबोमे। मैट्रि‍क केला पछाति‍ कौलेजमे नाओं लि‍खौने छलि‍। एमहर लालो बाबू पढ़थि‍ आ ओमहर पत्नी सेहो। मौका-कुमौका देखि‍ जेठ भायसँ नजरि‍ बँचा मोहन बाबू सासुरो चलि‍ जाथि‍। जाइत-अबैत पत्नी जखनि‍ एक जानसँ दू जान भेली तँ घरवारी काहा पठा दुरागमन करा सासुर बसए लगली। लक्ष्‍मी पात्र कनि‍याँ आ स्‍वामीक रूप मोहन बाबू । दुनूक जोड़ा बड़ सनगर। समए बीतैत गेल। मोहन बाबू बी.ए. करि‍ शि‍क्षक प्रशि‍क्षण लेल दरभंगा गेला। ओतए मास-मास भरि‍ रहथि‍। कहि‍यो कताल गाम आबथि‍। लोक सभ बुझैत जे बड़ पढ़ुआ छै तँए मन लगा पढ़ैत रहै छै। पढ़ै-ि‍लखैसँ पलखति‍ नै हेबाक कारणे गाम-घर कमे काल अबैए। एमहर मोहन बाबूक मासि‍क खर्च बढ़ल जा रहल अछि‍। पढ़ाइक नाअोंपर समए-कुसमए भैयासँ पाइ ऐठैमे नै चुकै छल। समपन्न रहबाक कारणे राम बाबू कथुक कमी नै रखथि‍। जमीन-जत्‍था बेचि‍-बेचि‍ पढ़ाइक खर्च देबए लगलखि‍न। दि‍नसँ मान बि‍तल माससँ साल। मुदा मोहन बाबूक पढ़ाइक अन्‍ते नै। ओ जेतेक पढ़ै छला तइसँ बेसी कि‍छु दि‍नसँ गढ़ौ लगला। जइसँ खर्च बहुत बढ़ि‍ गेलनि‍। दोगा-दोगी व्‍यस्‍क सि‍नेमा देखैक आदति‍ सेहो लगि‍ गेलनि‍। बेर-कुबेर साँझमे पाटीक नाओंपर शराबक आयोजन सेहो होमए लगल। खर्च मोहन बाबूक आ मौज-मस्‍ती सभ उड़बए। कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ दोस-महि‍मक गलत संगतमे पड़ि‍ मोहन बाबू कटकी बजार सेहो जाए लगला। तेकर बाद तँ कोनो एहेन दि‍ने ने होइ जइ दि‍न ई एको साँझ बि‍ना पीने रहथि‍ आ एक्को राति‍ बि‍ना कटकी बजार गेने बि‍तबथि‍। आब तँ बुझू पानि‍ नाक धरि‍ पहुँच गेल। रसे-रसे एकर भनक राम बाबूकेँ सेहो लगलनि‍। समझेला-बुझेलाक बादो जखनि‍ मोहन बाबू नै मानलनि‍ तँ राम बाबू अपन परि‍वार लऽ भीन भऽ गेला। आब तँ मोहन बाबू आरो छुट्टा खजाना भऽ गेला। एक दि‍नक गप छी। मोहन बाबू गाम आएले रहथि‍। सुतली राति‍मे टोल दलमलि‍त भऽ गेल जे मोहन बाबूकेँ कीदनि‍ भऽ गेल। अड़ोसि‍या-पड़ोसि‍या सभ थाहाथही आँगनमे जमा भऽ गेल। मोहन बाबूकेँ घरसँ बाहर आनल गेल। एकटा हाथ छातीपर रखने दर्दसँ छड़पटा रहल छथि‍। तत्खनात् ग्रामीण डाक्‍टर बजौल गेला। चेक-चाक कऽ दूटा सुइया लगा कहलखि‍न- “हमरा हि‍नका हाडपर शंखा होइए तँए आगू लऽ जैअनु।” परात भेने राम बाबूक परि‍वार आ मोहन बाबू रि‍क्‍शासँ आ राम बाबू पाछाँ-पाछाँ बि‍दा भेला। झंझारपुर जा महासेठसँ देखौलनि‍। डाक्‍टर महासेठ सभ तरहक जाँचोपरान्‍त दवाइक संग परहेज बतबैत कहलखि‍न- “हि‍नका हर्टक बि‍मारी छन्‍हि‍। ताड़ी-दारू पीबाक कारणे फेफड़ा सेहो खत्‍मे बुझू। ई कोनो भि‍रहगर काज नै करथि‍ आ ने एको बून दारू पीबथि‍।” गाम आबि‍ सबहक बात मानि‍ मोहन बाबू दारू पीनाइ छोड़ि‍ देलनि‍ आ दवाइक संग पथ्‍य भेने चेहरा फेर लालबुन भऽ गेल। नि‍केना भेला पछाति‍ मोहन बाबू पढ़ाइक बहन्ने फेर दरभंगा जाए चाहलनि‍। कनि‍याँ केतेको सप्‍पत-कि‍रि‍या खुआ अन्‍तमे बालो-बच्‍चाक सप्‍पत दऽ हुनका दरभंगा जाए देलखि‍न। दरभंगा एला पछाति‍ मोहन बाबूक वएह कि‍रदानी। मासो ने लगलनि‍ आकि‍ घूमि‍ घर एला। फेर सभ कि‍यो वि‍चारि‍ महासेठ लग गेला। देखि‍-सुनि‍ आगू पढ़ैक सलाह देलखि‍न। तत्‍खनात् टोल भरि‍मे जि‍नका लग जे औसलि‍या-कौसलि‍या छल ओ सभटा उघार-पैंच कऽ राम बाबू पत्नीक संग मोहन बाबूकेँ दरभंगा लऽ जाइक वि‍चार केलनि‍। टोल भरि‍क लोक कानि‍-खि‍ज रहल छल। अश्रुपुरि‍त आँखि‍ए सभ कि‍यो दरभंगाक गाड़ीमे एकटा सीट छेकि‍ भोरुके गाड़ीसँ बि‍दा भेला। मोहन बाबू बेहोश रहथि‍। ओना कखनो-कखनो कुहरि‍ जरूर उठथि‍। श्‍यामपुरवाली कनि‍याँ बि‍अनि‍ हौंकि‍ रहल छेली। मुदा दैवक लि‍ला एहेन जे सकरीए जाइत-जाइत मोहन बाबूकेँ एकटा नमहर हि‍च्‍की भेलनि‍ आ वएह भेल जेकर डर सभकेँ छल। श्‍यामपुरवाली कनि‍याँ सभ कि‍छु अकानि‍ ओतैसँ आपस घुमैक सलाह देलखि‍न। सभ कि‍यो बि‍नु कन्नारोहटक आपस आबि‍ घर अबै गेला। घर पहुँचि‍ते कन्नारोहट शुरू भेल। गौआँ-घरूआ टोला-पड़ाेसाक लोक सभ जमा हुअ लगल। बि‍च आँगनमे मोहन बाबूक लहाश राखल गेल। सबहक टि‍प्‍पणी सभ तरहक छेलनि‍। मुदा मोहन बाबूक पत्नीक पछारि‍ मारि‍-मारि‍ कानब लोककेँ बेबरदास भऽ गेलै। सबहक वि‍चार भेल जे लहाशकेँ राताराती जरा देल जाए। जुआनी मौगति‍ ठीक नै होइ छै। से वि‍चारि‍ समाजक सभ कि‍यो कुरहैर, टेंगारी, जोरी, कोदारि‍, कोहा, कौड़ी, धूमन, घी, आगि‍ इत्‍यादि‍ लऽ बुढ़ि‍या गाछी गेल। आ राता-राती लहाशकेँ डाहि‍-जारि‍ खतम कऽ कोदारि‍-टेंगारीक बेंट उनटा पचकठि‍या दैत सभ अपन-अपन घर पोखरि‍ होइत आएल। लाेह-पाथर आ आगि‍ छूबि‍-छूबि‍ सभ एकहक मुट्ठी भूजल चाउर, नीमक पात आ मि‍रचय मुँहमे लऽ चि‍बौलक। सभ कि‍यो शोकाकुल छल। मुदा मोहन बाबूक पत्नीक आँगनसँ पछार मारि‍-मारि‍ कानब- “राजा हौ राजा, हमरा छोड़ि‍ केतए गेलह औ राजा। बाबू हौ बाबू हमरा छोड़ि‍ केतए गेलह हौ बाबू।” सबहक अश्रुपुरि‍त आँखि‍मे नाचि‍ रहल छल। मोहन बाबू। ‍ सवक शि‍बू धरमपुर गामक वासी। मध्‍यम वर्गीए परि‍वार। एक्केटा बेटा कि‍शुन आ पुतोहु चमेली छल। शि‍बू सभ दि‍नसँ बि‍मार रहै छल। टीबी सन उगहा रोग ओकर भऽ गेल छल। परि‍णाम सदि‍खन खौं-खौं करैत रहै छल। दवाइ-वि‍र्ड़ो तँ कनीमनी होइते रहै छेलै मुदा पथ्‍य-परहेज समए-समैपर नै भेलाक कारणे नि‍रोग नै भऽ सकल। पथ्‍य-परहेजक इंजामो के करि‍तै, कि‍एक तँ पत्नीक असमए मुइने वेचारेकेँ सभ कथुक दुख-तकलि‍फ होइते रहै तँए ओ ओरो दुखताह होइत गेल। मन सतत् खि‍न्ने रहै छेलै। तैपर पुतोहु दुआरा कुभेला भेलासँ ओ ठीक की हएत जे आरो लचारे आ बेमारे होइत गेल। एक दि‍नक गप छी। जेठ मासक समए। कराचुर गरमी, रौद तेहने करगर। दि‍नक एक बजैत। भूखल-पि‍आसल शि‍बुक हालति‍ खराप भऽ गेलै। कएक बेर पुतोहुकेँ हाक दैत शि‍बु कहलक- “हे कनि‍याँ, बड़ जोर भूख लगल अछि‍। पि‍आससँ कण्‍ठ सुखैए। कनी खाइले कि‍छु आ पीबैले पानि‍ दएह। नै तँ हम भूखे-पि‍आसे मरि‍ जाएब।” मुदा कनि‍याँ लेल धनि‍सन। ओकरा तँ कोनो परबाहे नै। एमहर शि‍बु चि‍चि‍आ रहल अछि‍। ओमहर कनि‍याँ पुतोहु जे गामक सी-नम्‍बरक बि‍स्‍कुट्टी, लोकक घरकेँ बि‍गाड़नि‍हारि‍, लोकक घरमे झगरा लगौनि‍हारि‍ बनो मौसी लग बैसि‍ गप छकड़ि‍ रहल अछि‍। बनो मौसी जेकर एतबे कि‍रदानी जे अनकर बेटी-पुतोहुक नि‍न्‍दा-खि‍स्‍सा कऽ ओकरा घरकेँ नरक बना देब। कोन छौड़ी-मौगी आ छौड़ा-मुनसा केतए के की कऽ रहल अछि‍ ई समाचार तँ बीबीसी जकाँ बनो मौसी लग तुरत पहुँच जान्‍हि‍। जेकरा ओ नून-मरीच लगा आरो बढ़ा-चढ़ा कऽ गामक बेटी-पुतोहु लगा सुना-बझा कऽ ओकरा बि‍गाड़ि‍ देब ओकर काज। गामक बेटी-पुतोहुकेँ ई चहटगर गप-सप्‍प नीक लगैत। चमेली सेहो तहीमे सँ छल। ओइ दि‍न कि‍शुन अपन जमीनक मालगुजारीबला रसीद कटबैले दरभंगा गेल छल। ओना ओ खेती-पथारी साढ़े बाइसे करै छल आ एकनम्‍बरक आसली अछि‍। मुदा घरवाली नमहर आशि‍क। घरवाली बि‍ना ओकर जीवन कोनो जीवने नै। जेना साफ नि‍रस बुझाइ छेलै। एमहर चमेलीक गदराएल जुआनी, बि‍आह चारि‍ साल पहि‍ने भेल। मुदा एकोटा बाल-बच्‍चा नै भेल जइसँ ओ आरो खि‍लल बुझाइत। देहो-दशा बेस चुहचुहीपूर्ण। खेने-पीने बेस मस्‍त-मौला। बाल ने बच्‍चा दुनू परानीकेँ जे जखनि‍ मन फुड़ै से तखनि‍ करए लगए। बेर-बेर शि‍बुकेँ मना केला बादो कि‍शुन जमीन बेचि‍-बेचि‍ खूब मौज-मस्‍ती करए। घरवाली जे जे फुड़बै कि‍शुन ओकरा से से पुड़बै। आ दुनू परानी सदि‍खन जुआनीक नि‍शाँमे मतल रहै छल। कि‍शुनकेँ कहबी परि‍ भऽ गेल छेलै। कहबीओ छै धैन छी अहाँ की धैन छी हम आ चलै छी अहाँ तँ निग्‍हारै छी हम। अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलौं भौजी। यहए दुनू परानीक कि‍शुनक संसार छल। बूढ़ बापकेँ के देखत। आब की श्रवण कुमारबला जमाना छै जे माए-बापकेँ कान्‍हपर लाधि‍ चारूधाम करौत। एमहर पत्नीकेँ मुइने, टीबी बेमारी भेने, उचि‍त इलाज नै भेने आ बेटा-पुतोहु दुआरा कुभेला भेलासँ शि‍बुक स्‍थि‍ति‍ आरो खरापे भेल जाइ छल। ओकर ब्‍लडपेसर बहुत अधि‍क भेने लकबा सेहो मारि‍ देलकै। जइसँ ओकर एककातक अंग काज करब कम कऽ देलकै। आब शि‍बुक दुनि‍याँ दि‍न भरि‍ एकटा खटि‍यापर सूतल काहि‍ काटब भऽ गेलै। वेचारा कोनो काजक लेल दोसरेपर आश्रि‍त भऽ गेल छल। ओइ दि‍न शि‍बु बड़ीकाल धरि‍ गि‍रगि‍राइत रहल मुदा कि‍यो ओकरा नै सुनलक। सुनबो के करतै पुतोहु तँ बनो मौसी लग बैसि‍ गप पसारने आधुनि‍क महाभारक कथा सुनि‍ रहल छल। शि‍बुक बेर-बेर अवाज देब, कानब, कुहरब सुनि‍ बनो मौसी चमेलीकेँ कहलक- “धुर कनि‍याँ, केहेन तोहर ससुर छह जे कनीओं काल धरि‍ लोक लग उठए बैसए नै दइ छह। ई बुढ़बा तँ ढौंग केने अछि‍। झुट्टे कुहरि‍ रहल अछि‍। धुर हम जाइ छि‍अ एतएसँ।” कहैत मौसी ओइठामसँ ससरि‍ गेली। पछाति‍ चमेली घर आबि‍ पएर पटकैत एक लोटा पानि‍ भरि‍ बुढ़बाकेँ सरापैत भरलो लोटा पानि‍ खाटक नि‍च्‍चाँ राखि‍ अपने रूमेमे जा पलंग तोड़ए लगल। शि‍बुकेँ पानि‍ देखि‍ते जानमे जान एलै। ओ हाथ बढ़ा पानि‍ पीबए चाहलक। मुदा तागति‍ नै भेटने पानि‍ हरा गेलै। शि‍बु अपना भाग-तकदीरकेँ कोसए लगल। एमहर पानि‍ जे हरा गेल रहै से देखि‍ कनि‍याँ शि‍बुकेँ गारि‍-बात दैत आसमान कपारपर उठा लेलक। जइसँ टोल-पड़ाेसक लोक जुटि‍ गेल। बात की छि‍ऐ से केकरो बुझैमे देरी नै लगलै। ओही भीड़मे सँ लक्ष्‍मीपुरवाली कनि‍याँ शान्‍ति जे वि‍धवा भऽ गेल छथि‍, कलपर जा एक लोटा पानि‍ भरि‍ शि‍बुकेँ पीऔलनि‍। पानि‍ पीला पछाति‍ शि‍बुकेँ होश भेल। ई काज चमेलीकेँ जेना नै नीक लगलै। बरदास नै भेलै। ओ शान्‍ति‍केँ बुढ़बा लगा-लगा एक हजार गारि‍ पढ़लक। शाि‍न्‍त वेचारी चुपचाप अपना आँगन चलि‍ गेली। परात भेने टोला-पड़ोसाक लोक सभ कि‍शुन आ चमेली दुनू परानीकेँ धुर छी-धुर छी करैत कहै गेल- “तूँ सभ बुढ़बाकेँ‍ खाइले नै दइ छहक। ओकर सेवा-सुश्रुषा नै करै छहक। एहेन जुलुम तूँ सभ कि‍ए करै छहक। तोरा सभकेँ नीक नै हेतह।” ई बात सुनैत चमेली कनैत-खि‍जैत भागि‍ कऽ अपना नैहर चलि‍ गेल। कि‍शुनक कमजोरी तँ ओकर कनि‍याँ छेलै। ओकरा तँ बहु बि‍ना कि‍छु नीके ने लगै छेलै। साँझ धरि‍ ऊहो सासुर चलि‍ गेल। ओकरा धुर छी धुर छी करैत ओकर सासु कहलक- “एकटा गप कान खोलि‍ सुनि‍ लथु पाहुन, जाबे तक ओ बुड़हा ओइ घरमे जि‍न्‍दा रहत ताबे तक हमर बेटी कोनो हालतमे ओइ घर पएर नै देत।” आब तँ कि‍शुनकेँ कि‍छु फुड़बे ने करै। लाख मनौला बादो चमेलीकेँ घुरि‍ घर नै एलापर कि‍शुनो सासुरेमे रहए लगल। एमहर शि‍बुकेँ दि‍न तँ कहुना बीतल मुदा राति‍ बीतबे ने करए। ओकरा होइ जे आब हमर दि‍न कुदि‍न आ भाग अभाग भऽ गेल। कोनो रस्‍ता नै देखि‍ ओकरा आत्‍महत्‍या करबाक वि‍चार मनमे उपकलै। वि‍चार उपकि‍ते मन अघोड़ भऽ गेलै। कोनो बाटे ने सुझहै। करत तँ करत की वेचारा। होश सम्‍हारि‍ कहुना कऽ लड़खराइत उठि‍ अपना रूमक बि‍जलीक नंगा तार जँए की पकड़लक आकि‍ बड़ी जोरसँ झटका लगलै। लगि‍ते हृदए बि‍दारक चीख नि‍कललै आ शि‍बु एकटा देबालसँ टकड़ा कऽ बेहोश भऽ गेल। चीख सुनि‍ शान्‍ति‍ दौड़ल एली। देखली जे शि‍बु तँ बेहोश भऽ गेल। जनु मरि‍ ने गेलै। छातीपर हाथ देलखि‍न। बुझेलनि‍ साँस चलै छन्‍हि‍। तुरन्‍ते दौगल जा पड़ोसक डाक्‍टरकेँ बजा अनलक। सुइया-दवाइ पड़ि‍ते शि‍बुकेँ कनी होश एलै। होश अबि‍ते उठैक कोशि‍श केलक। उठि‍ कऽ लड़खराइत ठाढ़ भेल। मनमे खुशी भेलै जे हम तँ आब ठीक भऽ गेलौं। बेजान हाथ-पएरमे जान चलि‍ आएल। डाक्‍टर साहैब चेक कऽ बतौलखि‍न जे बि‍जली करेन्‍ट लगलासँ हि‍नक सुन्न अंगमे जान चलि‍ एलनि‍। जदी ठीकसँ हि‍नक इलाज-बात कएल जाए आ पथ-परहेज होन्‍हि‍ तँ आब ई सोल्हनी ठीक भऽ सकै छथि‍। शि‍बुकेँ ई बात सुनि‍ते आ अपन देहक दशाक अनुभव करि‍ते बदलल बदलल बुझा पड़लै। खुशी भऽ एक नजरि‍ शान्‍ति‍पर उठा याचनापूर्ण भावे देखए लागल। जेना ओ आँखि‍एसँ कि‍छु कहै रहल छै। बात अकानैत शान्‍ति‍ बजली- “ठीक छै डाक्‍टर साहैब, अहाँ दवाइ दि‍यौ। हि‍नकर बेटा-पुतोहु तँ एतए नै छन्‍हि‍ मुदा इंसानि‍यतक नाते हम हि‍नकर देख-भाल करबनि‍।” डाक्‍टर साहैब दवाइ दऽ चलि‍ गेला। हप्‍ता-दस दि‍न गुजरि‍ गेल। शान्‍ति‍क सेवा-सुसुर्षासँ शि‍बु नीक हुअ लागल। मने-मन शान्‍ति‍क एहसानमन्‍द भऽ गेल। शान्‍ति‍क प्रति‍ भरि‍-भरि‍ दि‍न सोचए लगल। मनमे प्रेम उपकि‍ गेलै। रहि‍-रहि‍ कऽ शान्‍ति‍ शि‍बुक मनमे जगह ओहन छेकि‍ लेलक जे आर कि‍छु रहि‍ए ने गेलै। सोचए लगल की शान्‍ति‍केँ अप्‍पन बुझि‍ऐ आकि‍ ऐ बीरान बेटा-पुतोहुकेँ आकि‍ ऐ समाजकेँ जे शान्‍ति‍क ओहेन दशापर आइ धरि‍ कि‍छु नै सोचि‍ सकल। शि‍बु कि‍छु वि‍शेष निर्णए लेलक। मुदा मनमे ठहकलै जे शान्‍ति‍ तँ वि‍जातीय वि‍धवा अछि‍। एमहर गौआँ-घरूआ सभ शान्‍ति‍क बेवहार देखि‍ जे शि‍बु ऐठाम कि‍ए जाइ-अबैए, सँ नाराज भऽ ओकरा जाति‍-बेरादरीसँ बारि‍ गामसँ नि‍कलि‍ जेबाक बात सेहो कहि‍ देलकै। ई खबरि‍ सुनि‍ शि‍बु शान्‍ति‍केँ बजा सभ खि‍स्‍सा सुनि‍ अपन कएल ठोस निर्णएपर आरूठ भऽ शान्‍ति‍केँ कहलक- “शान्‍ति‍, अहाँ हमरा नवका जीवन देलौं। हमर बेटा-पुतोहु हमरा मरैले छोड़ि‍ गेल। हम असगरे काहि‍ काटि‍-काटि‍ मरै छेलौं तखनि‍ ई समाज हमर कि‍यो नै आ हम समाजक कि‍यो नै। की असतूत छै ऐ समाजक? अहाँकेँ गामसँ नि‍कालत? एना कि‍न्नहु नै हएत। अहाँ नि‍राश नै होउ ऐ समाज आ दुनि‍याँकेँ जवाब दइले हमरा लग उपए अछि‍। हम जवाब देबै। औरतक कोनो जाति‍ नै होइ छै। हम अहाँसँ बि‍आह कऽ लेब, अहाँ हमर पत्नी भऽ जाएब। फेर देखै छी जे ई समाज अहाँक की बि‍गाड़ैए कि‍यो जे आँगूर उठौत तँ आँगूर काटि‍ लेबै, आँखि‍ देखौत तँ आँखि‍ नि‍कालि‍ लेबै। ऐ लेल हमरा अपन बेटो आ पुतोहुओक चि‍न्‍ता नै अछि‍।” मने-मन शि‍बु एकटा ठोस निर्णए लऽ कोट मैरि‍ज कऽ ओकीलसँ मि‍लि‍ एकटा वसि‍यत बना अपन सभ सम्‍पति‍ शानति‍क नाओंसँ कऽ देलक। ई खबरि‍ जखनि‍ कि‍शुन आ चमेलीकेँ भेटलै जे सभटा धन-सम्‍पति पि‍ता‍ एना-एना कऽ केलनि‍। तँ दुनू परानी कपार पीटब शुरू केरैत अड़-दड़ बाजए लगल- “हमर बाप हमरा भि‍खाड़ी बना देलक। हम भीखमंगा भऽ गेलौं।” मुदा समए तँ सभ कि‍छु कराइए लइए। समए अपन निर्णए लऽ काज कऽ चुकल छल। शि‍बु सेहो समए सापेक्ष्‍य निर्णए लेबए लेल तैयार छल मुदा समाज दुनू परानीकेँ अलग-थलग करैमे मजा लैत रहल। टुटैसँ बँचि‍ गेल बाबा राम मनोहर दास नीक संत प्रवृति‍क बेक्‍ती। समाजमे नीक प्रति‍ष्‍ठा। राम मन्‍दि‍रक पुजारी भेने आरो यश-मान आ नाम। सभ दि‍न सबहक हि‍‍तेक काजमे लागल रहला। सभ हुनकर हि‍ते मुद्दे कि‍यो ने। यद्यपि‍ हुनका दूटा पत्नी मुदा सौति‍नक सम्‍बन्‍ध कहि‍यो देखैमे नै आएल। अपि‍तु दू बहि‍नक रूपमे सभ दि‍न। बाबाकेँ जत्‍था–पात सेहो नीक्के, कहि‍यो कथुक दुख-तकलीफ नै। बाबाक दुनू पत्नीसँ एकटा पुत्री आ दूटा पुत्र सन्‍तानक रूपमे छल। पुत्रीकेँ समए-साल पाबि नीक कुल-खनदानमे बि‍आह-दान कऽ बाबा निचेन छला। बड़का बेटाक बि‍आह सेहो मध्‍यम परि‍वारमे कऽ बाबाक जीवन सुखमय छल। घर-आँगन नाति‍-नाति‍न, बेटा-पुतोहु आ पोता-पोतीसँ सदि‍खन भरल रहैत छल। सजना जखनि‍ बि‍आह करै जोग भेल तँ कथा-बर्ताक चर्च चलए लगल। सजना देखै-सुनैमे बड़ सुन्नर आ पढ़ै-लि‍खैमे सेहो बड़ तेजगर छल। मैट्रि‍क केला बाद आइ.एस-सी.मे मधुबनीमे नाओं लि‍खा देल गेल जेतए ओ मन लगा कऽ पढ़ए लगल। ओकरे कथाक प्रति‍ए कैएक ठाम लड़की देखल गेल मुदा बाबाकेँ पसि‍ने ने होइ छेलनि‍। केतेको दि‍न बाद घुमैत-फि‍ड़ैत शहर तँ नै मुदा शहरी वातावरणमे पलल-बढ़ल बेस गोरि‍-नारि‍ नमहर-छड़गर कर्चीए सन पातर एकटा लड़की देखल गेल। नाक-नक्‍शा सेहो बड़ सनगर। लड़की देखए-सुनएमे बड़ पवि‍त्र। एकदम कारीभौर केश, बेस डाँर लगतक नमहर जुट्टी एना लटकल जेना गहुमन साँप। चालि‍ ठुमकी, आँखि‍ आमक फारा सन-सन नमहर, हाथ-पएर एकदम सोंटल-साँटल कुल मि‍ला लड़की बाबाकेँ पसि‍न भऽ गेल। दुनू पक्षसँ बर-कन्‍याँ देखल गेल आ एकटा शुभ मुहुर्तमे कथा सम्‍पन्न भेल। समए गुदस होइत गेलै। बाबाक छोटका बेटा सजनाकेँ ओइ कनि‍याँसँ एकटा पुत्र आ दूटा पुत्रीक जनम भेल। बड़ हर्षक वि‍षय रहल। समए बदलैत गेलै। सजनाकेँ पढ़ाइपर सँ धि‍यान हटि‍ रंगीन दुनि‍याँमे दि‍ल लागए लगलै जइसँ ओ ने तँ मन लगा पढ़ए-लि‍खए आ ने कमाइ-खटाइ। एक तँ बेरोजगार तैपर सँ खर्च बेसी। तेतबए नै ओ अपन एहेन सुन्नर कनि‍याँकेँ छोड़ि‍ आन-आन लग सेहो जाए-आबए लगलै। कनि‍याँकेँ ई बात पसि‍ने ने होइ। पसि‍नो केना हेतै आखि‍र औरत-तँ-औरत छी ने। कि‍यो केना बरदास करत जे ओकर स्‍वामी ओकरा छोड़ि‍ आन छोड़ी-मौगी लग जाए। कनि‍याँकेँ बेर-बेर मना केला बादो जखनि‍ ओकर घरबलाकेँ छुतहरबला चालि‍ नै सुधरलै तँ कनि‍याँ कहलखि‍न- “जो रे मरदाबा, जहि‍ना तों अखनि‍ हमरा तरसबै छेँ तहि‍ना समए एलापर हम तोरा तरसेबौ। हम तोरा बबाजी बना कऽ रखबौ। अगर नै रखलि‍औ तँ हम एकबापक बेटी नै।” ऐ तरहेँ दुनूक जि‍नगीमे जहर घोरा गेल। ऐ तरहेँ सजना कनी दि‍नक बाद दि‍ल्‍ली-पंजाब गेल मुदा केतौ पाच नै लगलै। घूमि‍ घर आएल। मुदा घरो अशान्‍त। पहि‍ने जइ छौड़ी-मौगीकेँ धेने छल से केते दि‍न? बड़ बढ़ि‍याँ कबीर साहैब कहने छथि‍न- “सभ दि‍न होत ने एक समाना... संतो होत ने एक समाना...।” आब तँ बाजी कनि‍याँ हाथ आएल। ओकर घरबला घूमि‍-फि‍रि‍ कऽ घर अबै मुदा कनि‍याँ गछबे ने करै। ओ कहै- “तोरा हम रखबौ जरूर मुदा बबाजी बना कऽ।” आब तँ कोनो उपाइए ने रहि‍ गेल। आब ओ करत तँ की करत। खर्चा-पानि‍ जे घटै सेहो ओकर कनि‍याँ दइले तैयारे ने होइत। समए पाबि‍ धि‍यो-पुतोकेँ जुआन भेने बेटा घरक गारजन भऽ गेल। आ ओहो गारजन वि‍हीन भेने जे मनमे अबै सएह करए। बाबाक अरजलहा जमीन बेचि‍-बेचि‍ अपन खर्च पुड़बए लगल। बापक अछैते जइ जमीनक दाम पचास हजार रूपैए कट्ठा हेतै तेकरा पचीसे हजार रूपैए बेचि‍ उड़बए-पुड़बए लगल। सत-संगति‍ ओकराे खराप भऽ गेलै। आब तँ सजनाकेँ कहबी परि‍ भऽ गेलै, अपने करनी गइ मुसहरनी...। ओ करत तँ की करत। कि‍छु फुड़बे ने करै, आ ने परि‍वारेमे कि‍यो गुदानै। आब तँ खर्चो-पानि‍क अभाव हुअ लगलै। जीवन तँ कुकुर सन भऽ गेलै, जे एक कौर खा केतौ पड़ि‍ रहए। आखि‍र से केते दि‍न? जुति‍-भाँज‍ लगा ओ जमीनक कि‍छु कागत लऽ झंझारपुर आबि‍ एकटा नीक ओकीलसँ सलाह लेलक। सलाह लऽ घरपर कानूनी नोटि‍श पठबौलक। जइमे ऐ बातक जि‍कि‍र छेलै जे ओकर नाओंक जमीनकेँ कि‍यो बेचि‍ नै सकैए, परि‍वारमे कि‍यो आेकरा मारि‍-पीट नै सकैए, अन्‍यथा ओकर जि‍म्‍मेबार ओकर पत्नी आ बेटा हेतै जे ओकरा जीवन भरि‍ जहल काटए पड़तै। आब तँ भेल पहपटि‍। कनि‍याँकेँ तँ हाथो महक गेल आ लातो तरक गेल। आब तँ दुनू मायपुत कानूनन लचार भऽ गेल। कानूनमे बन्‍हा गेल। एमहर आब ओ अपना नामक एककि‍त्ता दसकठबा जमीन एकटा हरि‍जनक नामे पाँच लाखमे बेचि‍ चारि‍ लाख रूपैआ बैंकमे रखलक आ एक लाख पूजी लगा एकटा जेनरल स्‍टोर खोलि‍ लेलक। आ जखनि‍ दोकान नीक-नहाँति‍ चलए लगल। आब तँ सजनाक दि‍ने बदलि‍ गेल समए ओकरा नीक-नहाँति‍ सवक दऽ देलकै। समैकेँ परेखि‍ ओ ओकर मुल्‍य जानि‍ अपना बुधि‍ए काज करए लगल। आब सजनाकेँ ने तँ पत्नीक मदति‍क खगता रहलै आ ने बेटाक। बेटा जे कुकुरचालि‍ पकड़ि‍ नेने छेलै से आब ओकरा चाउर-चि‍क्कसक भाव बुझबामे अाबि‍ गेलै आब तँ सभ तरहेँ लचरि‍ गेल। कि‍छु फुड़बै ने करै, करत-तँ-करत की? कानूनक डर सेहो होइ। एमर खर्चा-पानि‍क दि‍क्कत भेलासँ कनि‍याँकेँ सेहो अकास-पताल सुझए लगलनि‍। ऊहो अपना करनीपर पचतए लगली। कोनो उपए नै देखि‍ हारि‍-थाि‍क कऽ दुनू मायपुत झंझारपुर आबि‍ स्‍वामीक पएरपर खसैत अपन गल्‍तीकेँ स्‍वीकार केलक। ऐ तरहेँ एकटा टुटैत परि‍वार टुटएसँ बँचि‍ एक भऽ गेल। ई की? अपना ऐठाम प्राय: सभ दि‍न कोनो ने कोनो पावनि‍-ति‍हार लधले रहैए। आइ भरदुति‍या तँ काल्हि छठि‍। लगले दि‍वाली तँ पीठेपर कालीपुजा। केतौ चैती नवरात्रा तँ केतौ शि‍तलापुजा। केतौ इन्‍द्रपुजा तँ गणेशपुजा। मुदा एकटा बात सभठाम एकदम समान देखैमे अबैए जे एहेन पूजाक आवसरपर पूजा स्‍थलक संग खुलल मैदानमे सोर-सराबा आ धूम-धर्ड़काक माहौल चौबीसो घंटा बनले रहैए। पछि‍ला केतेको बर्खसँ पुजनोपरान्‍त झाकी नि‍कालब एकटा प्रति‍योगि‍ता सन भऽ गेल अछि‍। सजाबट आ झाकी एकसँ एक बढ़ि‍-चढ़ि‍ कऽ हुअए ऐ लेल अधि‍कसँ अधि‍क टाका खर्च करबामे कि‍यो केकरोसँ पाछू नै रहए चाहैए। प्राय: अहुमे एकटा प्रति‍योगि‍ते देखबामे अबैए। जइमे कि‍शोरक तँ हाले ने पुछू। जेना पूजाक ठि‍केदारी ओही उमेरबलाकेँ भेटल होइ। प्रोग्रामक नाओंपर फुहर्ता एहेन जे देखि‍नि‍हारोकेँ लाज नै होइ छन्‍हि‍। जेना कि‍ आँखि‍मे लाजक पानि‍ए सुखि‍ गेल हुअए। एतबे नै, लाजक जगहपर गौरव महसूस होइत हो। ऑरकेस्‍ट्राक नाओंपर छौड़ी सबहक ठुमकी लगा अपनेमे मारि‍-पीट करब आम भऽ गेल अछि‍। सभसँ बेसी मजा तँ ई जे पूजाक ठि‍केदार सभ धर्मक आड़ि‍मे जबरदस्‍ती चन्‍दा असुलि‍ कऽ समुच्‍चा स्‍टेजकेँ लाल-पीअर बत्तीसँ जगमगबैत रहैए। ऐ तरहक कार्यक्रममे मारि‍-पीट, झगड़ा-झाटी, गारि‍-गलौज इत्‍यादि‍ आम बात भऽ गेल अछि‍। मुदा तखनो कि‍यो बुझैले तैयार नै। खास कऽ दुर्गापूजा, कालीपूजा आदि‍मे बायजीक नाच भरि‍-भरि‍ राति‍ चलैत रहैए। लॉडस्‍पीकर तेतबे कम जोरसँ बाजत जे काने ने देल जाएत। भरि‍-भरि‍ राति‍ अनघौल होइत रहत जइसँ सूतब मसकि‍ल। रस्‍ता-पेरामे चलब मसकि‍ल भऽ जाएत जे एक-दू दि‍न नै अपि‍तु तीन-चारि‍ दि‍नसँ लऽ कऽ दसो दि‍न धरि‍ व्‍याप्‍त रहैए। यद्यपि‍ देश धर्मप्रधान अछि‍। जइमे खास कऽ मि‍थि‍लांचल तँ बुझू पूजा-पाठक जननीए बुझू। मुदा प्रश्न तँ ई उठैए जे हमरा लोकनि‍केँ धर्म अादि‍क नाओंपर करक की चाही आ हम सभ कऽ की रहल छी? ऐ तरहक काज करब केते उचि‍त आकि‍ अनुचि‍त। ई हमरो लोकनि‍ लेल आजुक वि‍चारणीय वि‍न्‍दु अछि‍। ऐ सभ वि‍न्‍दुपर रामनरेशकेँ बैसल दलानपर माथमे बि‍नबि‍न्नी जकाँ उठल छेलनि‍। तखने पत्नी चाह नेने आबि‍ हाथमे देलकनि‍। चारि‍ घोंट चाह पीब पत्नीकेँ कहलखि‍न- “आँइ यै रामपुरवाली, ई सभ की भऽ रहलैए?” रामपुरवाली अकचकाइत पुछलखि‍न- “कथी की भऽ रहल छै जे एना बताह जकाँ बजै छी?” रामनरेशकेँ अपना गल्‍तीपर भान भेलै। जवाबमे समुद्र उपछबसँ नीक अपनाकेँ असथि‍रे करब बुझैलनि‍ बजला- “जेकरा जइ मन फुड़ै छै से से करैए। अच्‍छा जाउ भानस-भात करू गऽ” ई गप सुनि‍ रामपुरवालीकेँ आरो ओझरी लगि‍ गेलनि‍। बजली तँ कि‍छु ने मुदा मनमे उठि‍ गेलनि‍- ई की भऽ गेलनि‍ हि‍नका। रामनरेशक आत्‍मा अघोर-अघोर भऽ गेल ओ वि‍चारक धारामे बहए लगल। बहैत-बहैत पुन: ओकरा मन पड़लै अपन पत्नी रामपुरवाली। रामनरेश बाजल- “रामपुरवाली, से नै तँ अहीं कहू जे ऐ तरहक पूजा-पाठ करब केतेक उचि‍त भेल वा अनुचि‍त?” रामपुरवाली बि‍ना कोनो भूमि‍काक बजली- “जइ पूजासँ एतेक प्रदूषण बढ़ए, समाजक अमन-चैन छीना जाए, आपसेमे समाज कटि‍-मरि‍ जाए, दंगा-फसादसँ लऽ कऽ मोकदमा धरि‍ भऽ जाए तेतबे नै जे रोग शहरसँ लऽ कऽ गामो-घरमे पसरल जा रहल छै, ई तँ सरासर अनुचि‍त भेल। मुदा वि‍चारणीय प्रश्न ई उठैए जे समाज आखि‍र ई कोन बाट पकड़ि‍ लेलक अछि‍। हम सभ कोन मकड़जालमे ओझरा गेल छी। आखि‍र ई के सोचत हम जे कऽ रहल छी से आखि‍र ई की कऽ रहल छी।” कपक शेष चाह सेहो ठंढ़ा गेल छल। उठि‍ हाथ-मुँह धोइले रामनरेश कलपर चलि‍ गेल। खाधूर केते दि‍नक बाद ऐबर ति‍लासंक्राति‍क अवसरि‍पर गाम जेबाक मौका भेटल। सोभावि‍को अछि‍। रहू केतौ मुदा अपन सांस्‍कृति‍क मान-मर्यादाक रक्षा हेतु पावनि‍-ति‍हार करब हम सभ ने बि‍सरै छी आ ने बि‍सरक चाही। अपि‍तु पानवि‍-ति‍हार तँ आरो हर्ष आ उल्‍लासक संग मनेबाक चाही। जनम-जनमान्‍तरसँ माए-बाप, दादा-दादी, दीदी-पीसा, काका-काकीक हाथक फुलौल ति‍ल-चाउर जइमे पर्याप्‍त गुड़ देल बेस झोरगर खूब मजा लऽ लऽ खाइ छी। माघक जाड़ मासमे छोट-छोट नैनाक संग पजरल घूर तपैत बैसल छेलौं तखने बौआ काका पोखरि‍-झाँखरि‍ दि‍ससँ लग्‍ही-नदी कऽ आबि‍ बैसला। हाथक सेरही टि‍न्‍हा लोटाकेँ घूरक दहि‍ना कातमे रखि‍ खोरनीसँ आगि‍ खोरि‍ तापए लगला। पछाति‍ बाँसक उबहीबला दतमनि‍ जे रामपुरी चक्कुसँ छीलि‍-मोथि‍ अपन अण्‍डाकार मुँहमे दैत थू-थू करैत बजला- “मास्‍टर हौ, केते दि‍नक छुट्टी लऽ कऽ गाम एहल। अहोभाग हमर जे आइ तोरासँ भेँट भेलह। तों सभ तँ आब परदेशी भेलहक कि‍ने।” हम कहलि‍यनि‍- “नै बौआ काका, से बात नै छै। हम तँ अहींसँ भेँट करैले औना रहल छेलौं। कनी बेर-बि‍हान होइते तँ अहाँसँ भेँट करि‍तौं। अहाँ पहि‍ने हाथ-मुँह धोइ लि‍अ तखनि‍ भरि‍ पोख गप करब।” बौआ काका बजला- “हँ हँ दूइए तीन घुस्‍सा देबाक अछि‍ दाँत की मासज, हँ बरू जि‍बि‍या करब तँ सोभावि‍के अछि‍।” बौआ काका चारि‍-बेर ओइ दतमनि‍केँ एमहर-सँ-ओहमर ठोकरा जकाँ लाड़ि‍-चाड़ि‍ दू फाँक चीरि‍ जेना चास केलापर चौकी देल जाइ छै तहि‍ना जि‍बि‍यासँ जीकेँ चौकि‍या लेलनि‍। पछाति‍ कलपर जा हाथ-मुँह धोइ कुकुर-आचमनि‍ कऽ थरथराइत घूर लग आबि‍ पुन: बैस जाइ छथि‍। घूर लग बैसि‍ते ओ पुछलनि‍- “मास्‍टर, असगरे एलौं आकि‍ कनि‍योँ?” हम कहलि‍यनि‍- “हँ काका, ओहो एली हेन।” बौआ काका लगले बाजि‍ कहलनि‍- “तखनि‍ कनि‍याँकेँ कहुन गऽ महिंसक अगब दूधमे गुड़बला चाह तेजपात दऽ बनबैले।” कहलि‍यनि‍- “हँ काका, नि‍श्‍तुकी हेतै।” बौआ काका पुछै छथि‍- “मास्‍टर, और हाल-चाल सुनाबह। केना कि‍ हाल-चाल छै देश-कोश आ अर-इलाकाकेँ। केतए केना कि‍ भऽ रहल छै?” हुनका बातक हस्‍तक्षेप करैत हम पुछलि‍यनि‍- “बौआ काका, एकटा बात कहू जे राति‍खन अहाँकेँ भोजमे नै देखलौं। अहाँ तँ बुच्‍ची बाबक लंगोटि‍या संगी रहि‍यनि‍। मुदा हुनकर श्राधमे अहाँक अनुपस्‍थि‍ति‍? ई तँ चर्चाक वि‍षय बनल छल। लाक सभ बजै छला जे जैबारक भोज, तहूमे बुच्‍ची बाबूक श्राधक आ तइमे बौआ कक्काक अनुपस्‍थि‍ति‍, ई तँ बड़ आश्चर्य।” बौआ काका बातकेँ कटैत बजला- “हौ मास्‍टर, आब तँ भोज-भात खेबाक इच्‍छे ने रहैए। तहूमे एक तँ अन्‍हरि‍या राति‍, दोसर जाड़ मास, तेसर महार टोलपर एते दूर जाएब। ऐ अवस्‍थामे हमरा लऽ सम्‍भव नै अछि‍।” हम कहलि‍यनि‍- “बौआ काका, मुदा सौंसे गाम तँ दोसरे उड़ेबा उड़ल अछि‍।” “से की हौ?” बौआ काका अकचकाइत पुन: बजला- “कनी फरि‍छा कऽ कहए ने?” कहलि‍यनि‍- “लोक सभ बजै छला जे बुच्‍ची बाबूक श्राधमे जखनि‍ कोनो बातक कनी नै तखनि‍ बौआ काका आखि‍र कि‍ए ने एला।” बजला- “ओह, आब छोड़ह ने ओ गप-सप्‍प।” कहलि‍यनि‍- “छोड़ू कि‍ए? आब एटा बात अहाँ बताउ जे लोक सभ आहाँकेँ खाधूर कि‍ए कहैए?” ई गप सुनि‍ते बौआ कक्काक ब्‍लडपेसर जेना बढ़ि‍ गेलनि‍। जोशमे आबैत बजला- “हौ मास्‍टर, ऐ संसारमे दू तरहक लोक अछि‍। एकटा जे जीबैले खाइए आ दोसर जे खाइले जीबैए। हमरा हि‍साबसँ जे जीबैले खाइ छथि‍ हुनका तँ जीबाक कोनो अधि‍कारे ने छन्‍हि‍। ऐ दुनि‍याँमे एक-सँ-एक पैघ लोक सभ छथि‍। जे भगवानक बनौन दि‍व्‍य पदार्थ जँ ओ पेबे ने करता तँ ऐ तरहेँ जीअबसँ मरबे नीक। हम जे चारि‍ कर भोजन करै छी तँ लोक हमरा खाधूर करैए।” बातकेँ आगू बढ़बैत काका पुन: बजला- “हमरा हि‍साबसँ ने तँ आब ओ देवी रहली आ ने कराह। नै मानबह तँ सुनह। हमर एकटा अपेछि‍त छथि‍ धनीबाबू बेस पाँच हाथ मनगर। मुदा पेटक नापक मोताबि‍क हाथ-पएर झुझुआन भऽ जाइ छन्‍हि‍। इलाकामे जे केतौ भोज-भातक ओयोजन होइए तँ हुनका नौत अबस्‍से भेटै छन्‍हि‍। संजोगसँ हुनका एकबेर गामेक वि‍द्यालयक मास्‍टर साहैबक बि‍च्‍चि‍याक बि‍आहमे नौत पड़लनि‍। तीन बजि‍ये गाड़ीसँ ओ दीप पहुँचला। हाथ-पएर धोइते सभसँ पहि‍ने एगारह गि‍लास शर्बत चढ़ौलनि‍। जलखैक पौकि‍ट अबि‍ते लगातार पाँचटा शेष केला पछाति‍ अल्‍प वि‍राम देलखि‍न। भोजनक समैमे करीब पाँच दर्जन पुरी जेकरा कचौरी कहै छहक से आ संगमे एक पसेरीक लगभग तरकारी चढ़ेलखि‍न। तैपर सँ कनी जल पीब मधूरक दौड़मे एला। एक चंगेरा लड्डूकेँ तह लगा करीब डेढ़ सए छेनापर कौमा लगेलनि‍। गोर पचासे लालमोहन देलापर दहीक जखनि‍ बेर भेलै तँ गमछा जाँघसँ लऽ कऽ कण्‍ठ धरि‍ पसारि‍ दू कसतारा दही नि‍छोह घि‍चला बाद पाहि‍ लगबैत मास्‍टर साहैबकेँ हाक देलखि‍न, की यौ मास्‍टर साहैब ऐ छुरछुरहा पानिबला देहीसँ की हेतै। कनी अपनेसँ डेबि‍ ढंगगर दही उठाउ ने। लाजे मास्‍टर साहैब करता की। आँगन जा डाल परहक दहीबला तौला उठा धनीबाबूक पातपर रसे-रसे उझलए लगला। जाधरि‍ तौलाै भरि‍ दही खतम नै भऽ गेल ताधरि‍ अपन थुथुन ऊपर नै केलनि‍। दही खतम होइते ओ एकटा नमहर साँस लेलनि‍।” हम कहलि‍यनि‍- “काका, यौ धनीबाबू तँ बेजोर लोक छथि‍?” बौआ काका बजला- “से की कहै छहक मास्‍टर। अपने लकसेनाबला पाहुन प्रोफेसर साहैब ओ जखनि‍ अपन सारक बि‍आहमे सेरसोपाही बरि‍याती गेल छला, संजोगसँ आल्‍लू-परोड़क तरकारी हुनका रूचि‍पर चढ़ि‍ गेलनि‍। से जलखै करैकाल चूड़ा-दहीक संग तरकारीपर कनी भड़ दऽ देलखनि‍ से ओ तखने पूर्ण वि‍रान लगेलखि‍न जखनि‍ घरवारी कलजोड़ि‍ आगूमे ठाढ़ भेलनि‍। पुरनि‍क पातक दहि‍ना कात अल्‍लूक खोंइचाक ढेरी बुझू जे पुआरक टाल जकाँ भऽ गेल रहै। एतबे नै, भखरौलीएक गप लएह भखरौलीमे एकटा गुंजन महतो अछि‍, एतेक कलेबर जे हुनका कि‍रपासँ कोनो भोजमे कोनो वस्‍तुक भण्‍डार कखनि‍ सठि‍ जाएत से कहब मोसकि‍ल। एकबेर रामदेव बाबूक बेटाक बि‍आहमे ओ बरूआरा बरि‍याती गेल छला, मरजादी होइ छै ने, तहीबेर मे ओकर धि‍यान बरी-झोरीपर चलि‍ गेलै से ताधरि‍ ओ बरी-झोरी सुरकैत रहल जाधरि‍ दसो बाल्‍टीन ओरा नै गेलै आ अन्‍तमे बेटीबला आबि‍ कऽ माफी नै मंगलकै।” हम कहलि‍यनि‍- “धैन छी बौआ काका अहाँ आ अहाँक संगी सभ।” बौआ काका चाह पीब पनबटीसँ तीनटा पान नि‍कालि‍ मुँहमे लैत गलि‍यबैत बजला- “हौ मास्‍टर, लोक तँ एकपर एक छै ऐ दुनि‍याँमे। मुदा नामी चोर बहदुरबा। बगलमे लक्ष्‍मी भाइक गप लैह ने ओ जखनि‍ भोज-भातमे बैसता तँ धूर भरिमे पात बि‍छबै छथि‍ चूड़ा जलसँ भि‍जाएब तँ एकदम नि‍सि‍द बुझै छथि‍ जौं कोनो भोज-भातमे कोहा भरि‍ दहीसँ कम भेलनि‍ तँ वारीककेँ तँ मौगति‍ बुझह। स्‍पष्‍ट कहि‍ दइ छथि‍न जे जँ उपए नै छह तँ नत कि‍ए देलह। बगलेमे हरि‍भंगेक गप लैह, अपने मनेजर साहैबक जे कनि‍याँ छथि‍न। हुनका तँ थारी-बाटीमे पेटे ने भरै छन्‍हि‍। जँ खाए लगती तँ गोर दसे मक्केक रोटी देख लइ छथि‍न। केरा तँ आरो हुनका चसगर छन्‍हि‍। ओहोमे झुरकुि‍टया नै बाघनर चारि‍ घौरसँ ऊपर चाही। तरकारीए तँ लोहि‍ओ भरि‍। पाइने जँ पीती तँ डोल भरि‍। जँ चाहै पीती तँ कपमे नै इसटि‍लि‍या नमहरका गि‍लासमे। हौ मास्‍टर आब केते कहबह। हमरे एकटा महापात्र संगी छथि‍ देबही टोलमे। दू पसेरी धानक चूड़ा चारि‍ तौला दहीक संग दू सेर चीन्नी आसेर अचार आ पाभरि‍ मि‍रचाय ई तँ एकदम सहज। ऊपरसँ कमसँ कम दू मेलक तरकारी एते तँ बुझहक आवश्‍यक छन्‍हि‍। घरोमे लोक हुनका बीस रोटि‍ए भैया कहै छन्‍हि‍। सरो कुटुमैतीमे ओ खाधूरे नाओंसँ जानल जाइ छथि‍। हमर कोन कथा एकसँ एक लोक छथि‍ खाधूर।‍” तात् घूरोक ताव कम भऽ गेल। उठि‍ दुनू गोटे ि‍वदा भेलौं। कर्मक भोग कोनारि‍मे एकटा पहुँचल महात्‍मा रहै छला। तेलि‍यामसान सधने छला। तँए भूत-वर्तमान आ भवि‍सक नीक ज्ञाता। महात्‍मा भेने चेला-चाटी सेहो नीके मुड़ने छला। समए पाबि‍ चेला-चाटीसँ सेवा-सत्‍कार करा अपनाकेँ धन्‍य बुझै छला। एक दि‍नक बात छी। सौंसे देहमे भष्‍म रमौने, दाढ़ी बढ़ौने, नमहर-नमहर जटा लटकौने, एक हाथमे त्रि‍शूल आ दोसर हाथमे कमण्‍डल-झोरा-चि‍मटा आदि‍ लऽ वि‍दा भेला। थोड़ेक दूर नि‍कलला पछाति‍ महात्‍माजीकेँ ची‍लम पीबैक इच्‍छा भेलनि‍। एकटा पाखड़ी गाछतर छाहरि‍मे आसन जमा चेलाकेँ कहलखि‍न- “रे चेला रमादास, हमरा चीलम पीबैक तीव्र इच्‍छा भऽ गेलौं तँए केतौसँ आगि‍ ला?” महात्‍मा जीक आदेश पाबि‍ रामदास आगि‍ लाबए, बगलेक टोलपर गेल। एकटा आँगन जा देखलक जे एकटा कनि‍याँ भानस कऽ रहल अछि‍। ओकरा बगलेमे एकटा खस्‍सी बान्‍हल छै। कनि‍याँ जे कोनो काजै घर जाए लगए तँ एक ऐंड़ ओइ खस्‍सी लगा दइ तैपर खस्‍सी भेमि‍अए उठै। रामदास एकबेर देखलक दोसरबेर देखलक, ओकरा कि‍छु फुड़बे ने करै। आगि‍ की मांगत। सोझहे आपस भऽ महात्‍माजी लग पहुँचल। आ सभटा खेरहा सुनबैत कहलक- “सुनि‍ लैह बाबा, तों हमरा सभटा कारण खोलि‍ कऽ पहि‍ने कहि‍ दैह जे ओ कनि‍याँ कि‍ए एना करै छै तब तँू हमरा बाबा आ हम तोहर चेला नै तँ आइसँ तहूँ घर आ हमहूँ घर।” बाबा कहलखि‍न- “रे चेला, पहि‍ने आगि‍ तँ ला। चीलम पीब बुझा देबौ।” मुदा चेला एक्केरट पकड़ने। से नै तँ तूँ हमरा पहि‍ने सभ खेरहा कहऽ। रामदासक बहुत जि‍द्द केलापर मजबूर भऽ बाबाकेँ सभटा कहए पड़लनि‍- “सुन रे चेला, एकटा राजाक बेटाकेँ एकटा लौआबासँ दोस्‍ती छल। एक दि‍न ओकरा मोन भेलै जे बहुत दि‍न भऽ गेल सासुर गेना। से नै तँ सासुरसँ भऽ आबी। राजाक बेटा माएकेँ अपन बात कहलक। माए सभ कथुक बेवस्‍था कऽ देलकै। ओ सासुर वि‍दा भऽ गेल। बाटेमे ओ लौआबासँ भेँट भऽ गेल। ओ पुछलकै- केतए जा रहल छी दाेस? ई कहलकै- हम तँ सासुर जा रहल छी। ओ कहलकै- हमहूँ अहाँक संग जाएब। दोस अहूँ केहेन छी ई कोन बड़का भाड़ी बात भेलै चलू संगे चलै छी। दोस, सासुर तँ हम जाएब मुदा हमर एकटा शर्त अछि‍, रानी लग पहि‍ल राति‍ हमहीं जाएब? आब तँ राजाक बेटा लचार भऽ गेल। मुदा दोस्‍तीबला बात, करत तँ करत की। अंतमे दुनू दोस वि‍दा भऽ गेल। जाइत-जाइत मुनहारि‍ साँझमे पहुँचल। महलमे खबर भेलै। सभ नौरी आ दासी सकालेसँ सेवामे जुटि‍ गेलै। बड़-बढ़ि‍याँ आगत-सुआगत भेल मुदा सुतैकाल...? ....एमहर रानी देखलक, राजाबेटा तँ अपना संग एकटा पच्‍चर नेने आएल अछि‍। तँए एकर परीछा ली। रानी सोल्हो सिंगार बत्तीसो आवरण कऽ अपना महलमे जाइसँ पहि‍ने माएकेँ कहि‍ गेल जे दूटा पहलवान हमरा महलक गेटपर तैयार रहए, जखनि‍ जे कहबै से करत। भोजनक बादेसँ‍ लौआबा मोँछपर ताव दैत रहए। आब रानीक महल दि‍स वि‍दा भेल। जखनि‍ ओ गेटपर पहुँचल तँ दुनू पहलमान रोकि‍ देलकै जे के छी, कहलकै हम तँ राजाबेटा छी। आगू बढ़ि‍ रानीक महलक दरबाजा खटखटौलक, भीतरसँ अवाज एलै, अहाँ के? कहलकै- हम राजाक बेटा। रानीकेँ शंका भेलै। पुछलक- अच्‍छा कहू तँ हमर कोन छातीपर तीलक नि‍शान अछि‍? बि‍नु सोचनै-वि‍चारने लौआबा बाजल- दहि‍ना छातीपर। रानी बूझि‍ गेल जे ई लौआबा छी। रानी मोख लग ठाढ़ दुनू सि‍पाहीकेँ आदेश देलक, अहाँ दुनू गाेटे मि‍लि‍ हि‍नका बढ़ि‍याँसँ सुआगत कऽ दि‍अनु। रानीक आदेश पबि‍ते दुनू पहलवान ओकरा पकड़ि‍ थुड़ि‍-थाड़ि‍ देलक। लौआबा कोनो भाँजे दलानपर आएल। मुदा ओतएसँ भागल नै दलानेपर रहल, ई सोचि‍ जे जखने मौका लगत बदला लेब। पछाति‍ सभटा हाल राजाबेटाकेँ कहलक। ओ तँ सुनि‍ते खुशी भऽ गेल। आब स्‍वयं रानीक महल दि‍स वि‍दा भेल। गेटपर पहुँचल। सि‍पाही रोकैत पुछलक उतारा दैत गेट ढकढकौलक। रानी भि‍तरेसँ पुछलकै- अहाँ के? कहलकै- हम राजाक बेटा। फेर पुछलकै- अच्‍छा अहाँ ई बताउ जे हमरा कोन छातीपर तीलक नि‍शान अछि‍? ओ बाजल- अहाँक बामा छातीपर। सुनि‍ रानी खि‍लखि‍लाइत दरबाजा खोललक। आ दुनू परानी ऐश-मौज करए लगल। ...से रौ चेला, तूँ जे ओ खस्‍सी देखलीही से ओहए लौआबा छी। जे ऐ ताकमे अछि‍ जे ओइ जनम तँ नै मुदा ऐ जनममे रानीसँ कोन रूपे बदला ली। आ ओ लड़की ओएह रानी छी जे घर जाइत-अबैत ऐंड़ लगा दइ छै। जे ओइ लौआबाक कि‍रदानीपर। आ ओ भेमि‍अए लगैए। से रौ चेला, बुझि‍लि‍ही। इएह छि‍ऐ ओकर कर्मक भोग चल आब आगू चल। आगि‍ तँ नहि‍येँ लबलेँ।” चल बढ़ कहैत बाबा-चेला वि‍दा भेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८० म अंक १५ जून २०१५ (वर्ष ८ मास ९० अंक १८०) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA