VIDEHA — Issue 181 / अंक १८१

Publication: VIDEHA · Issue: 181
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28 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८१ म अंक ०१ जुलाइ २०१५ (वर्ष ८ मास ९१ अंक १८१) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८१ म अंक ०१ जुलाइ २०१५ (वर्ष ८ मास ९१ अंक १८१) ऐ अंकमे अछि:- राजदेव मण्डल त्रिवेणीक रंग- (विहनि/लघु कथा संग्रह) आ २ टा कविता- व्यथित तरु/ हेरा गेल डा. शिव कुमार प्रसाद विहनि/ लघुकथा- अदिया/ झमकी/ बनमानुष कविता- निर्मलीक निर्मलतामे/ बौआ केर उबटन/ शहर ओ गेल/ खेबैया/ माय हमर नव कुम्भ नहेली/ देख एलौं हम पटना समीक्षा-सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी राजदेव मण्डल त्रिवेणीक रंग- (विहनि/लघु कथा संग्रह) आ २ टा कविता- व्यथित तरु/ हेरा गेल त्रिवेणीक रंग- (विहनि/लघु कथा संग्रह) राजदेव मण्डल रूसल बौआ दुर्गापूजाक मेला शुरू भऽ गेल छै। अष्टमी बीत गेलै, आबो नै हेतै मेला। मेलामे तँ होइते छै, खुशी, उत्साह, मनोरथ, मिलन। घर-घर बनि रहल छै मेवा-मिष्टान, तरुआ-भुजुआ आर कते चीज-बोस। रंग-बिरंगक नुआ-बस्तर पहिरने धि‍या-पुताक मुँहपर खुशी नाचि रहल अछि। सभ मेला देखबाक लेल तैयार भऽ रहल अछि। फेकन हड़बड़ाइत अँगना आएल आ पत्नीसँ पुछलक- “बेचू बौआ कहाँ अछि? खेलक आकि भुखले अछि?” पत्नीक मोनमे तामस औनाइते छलै। एकबेर तामससँ भरल आँखिए ताकलक आ बजल किछो नै। ओकरा दिश बिनु देखनहि फेकन फेर बजल- “एकोटा रुपैया तँ घरमे छलै नै। सोचलौं- छौड़ा मेला देखैले जाए लगितै तँ मांगबे करतै। एक गोड़ेसँ हथपैंच लेलौं। आ बौआकेँ देखबे नै करै छी। कते गेल अछि?” “जेतै कते, कानै छलै। दुआरिपर रुसल बैसल छै।” “की भेलै से?” “हेतै की, लवका पेण्ट-शर्ट लेतै।” “ओह, अखनी तँ पैसाक बड्ड अभाव छै। ओकरा समझा-बुझा दैतिऐ से नै।” “अहाँक धि‍या-पुताकेँ के समझाइत। कहै छलै जे अमितकेँ लवका पेण्ट-शर्ट ओकर बाबू आनि देलकै। ओ भोरेसँ देखा-देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबैत अछि। औंठा देखा कऽ इहू-इहू कहैत अछि।” “अहाँकेँ कहबाक चाही ने जे अमितक बाप धीरेन्द्र बाबू बड़का लोक छथि। पलिबारमे सरकारी नौकरीयो छै। जमीनो हमरासँ बहुत बेशी छै। हुनकर बराबड़ि हम केना करबै?” “से गप्प हम कहलिऐ। रौ बौआ, अमित बड़का लोक छिऐ। उनटे तमसाकेँ बजल- “अमितवा कद-काठीमे हमरासँ छोट अछि। परीक्षामे हमरासँ कम नम्बर लाबैत अछि। खेलो-कूदमे हमरासँ हारले रहैत अछि। ऊ हमरासँ नम्हर केना भेलै।– आब अहीं कहू जे केना बुझेबै? की कहबै?” बझल कंठे फेकन बजल- “आ हमहीं की करबै? एक साल रौदी तँ एक साल दाही। जी-जान लगा कऽ काज करै छी, तइयो उपजा ओतने होइत अछि। देह रोगाएल रहैत अछि। बाहरो कमेबाक लेल केना जाएब। हमरा सन छोट गिरहतकेँ देखनिहार कियो नै। अहाँ तँ देखबे करै छी। घरक खर्चा नै जुमैत अछि, तइयो धि‍या-पुताकेँ पढ़बै छी।” पत्नीक सुरमे तामस भरल छल- “हमर सऽख-सेहन्ता तँ डहि-जरि गेल। आब धीयो-पुतोक वएह गति भऽ रहल अछि। अहाँ कोनो करमक लोक नै छी। अहाँ बुत्ते नै किछो भेल आ नै हएत।” अहाँ कोनो करमक लोक नै छी, ई वाक्य जेना फेकनक कलेजामे बरछी बनि गड़ि गेलै। तन-मनसँ समर्पित भावे काज केनिहारकेँ जँ फलक रूपमे दुत्कार भेटै तँ एकर प्रतिकार की? फेकनक मोन औना रहल छै। बेवश, लचार। ओकरा आँखिसँ भरभरा कऽ लोर खसि पड़लै। आसमे जेना आगि लागि गेल होइ। ओकर बेचू बेटा अढ़मे ठाढ़ भऽ कऽ सब किछो सुनै छलै। बापकेँ कानैत देखि नै रहल गेलै तँ लगमे जा कऽ बाजल- “बाबू अहाँ नै कानू। कोनो कि अंगे-पेण्टसँ लोक मेला देखै छै। ऊ लवका पेण्ट-शर्ट देखा कऽ हमरा बुड़बक बनबै छै। हम परीक्षामे ओकरासँ बेसी नम्बर लाबि कऽ ओकरा बुड़बक बनेबै।” सपना सन….। क्षण भरिक लेल जेना नम्हर-छोट, ऊँच-नीच एके रंग बुझेलै। फेकन बेटाकेँ भरि पाँज पकड़ि लेलक। बाप-बेटा मिलैत देखि पत्नी मुस्की मारलक जे बाप-बेटा दुनूक लेल प्रश्न बनि ठाढ़ भऽ गेल।४६३ दोख केकर इजोरि‍या रहै मुदा मेघक कारणे कनी अन्‍हार सन लगै छेलै। नि‍शि‍भाग राति‍। सभ सूतल। कि‍न्‍तु दि‍नेश दुनू परानीकेँ नि‍न्ने ने होइ। जेना नि‍न्ने रूसि‍ रहल। नै रहल गेलै तँ पत्नीकेँ कहलकै- “केतेकाल भूखल रहब? उठू खा लि‍अ।” पत्नी चुप्‍पे करोट फेड़ि‍ लेलक। पति‍ बाँहि‍ पकड़ि‍ हि‍लबैत पुछलकै- “की भेल? बजबै तब ने बुझबै।” “बूझि‍ कऽ की करबै? अहाँ बुते कि‍छो ने हएत। अहाँ तँ उनटे...।” “बुझबै तब ने। हमर दोख हेतै तँ हमरे दण्‍ड देब।” “कोनो बुझने नै छि‍ऐ। दोख अहाँ माएकेँ रहै आ गारि‍-बात हमरा देलौं। अहाँ हमरा बजा नै सकै छी।” पति‍- “तँ कहू जे रूसलासँ दि‍न-गुजर चलतै?” तमसाइत पत्नी बाजलि‍- “केतबो गल्‍ती अहाँक माए करै छै, तँ अहाँ एकोबेर बजै छि‍ऐ आ हमरापर डाँग लऽ कऽ हुड़कै छी। कहै छी, हमरा बजाउ नै। हम अहि‍ना भूखले मरि‍ जाएब।” समझाबैत पति‍ बाजल- “अच्‍छा एकटा खि‍स्‍सा सुनि‍ लि‍अ। फेर नै बजब। सुनि‍यौ। ई कथा चौबीस-पचीस बरख पहुलका छी। एकटा औरतक कथा। सुखक लीलशामे दुखक कथा। ओ बड्ड सुन्दर आ सुशील रहए। तँए शुरूमे पति‍क आँखि‍मे ओकरा लेल परेम भरल रहै। मुदा एक-आधटा एहेन घटना घटले जे ओइ औरतकेँ ससुर आ पति‍ दुनू दुख दि‍अ लगलै। ससुरकेँ मोनमाफि‍त दहेजो नै भेटल रहै आर बहुतो कारणेँ तमसाएल रहै छेलै। ओइपर सँ ओहने समए आ अवसर सेहो भेट गेल रहै। एहेन समैमे केतबो डाँट-डपट करतै तँ उनटा कऽ जवाबो केना देत। दू बेरसँ पँचमसु चि‍ल्‍का नोकसान भऽ जाइ छेलै। पाँचम मास चढ़ि‍ते दरद करै आ गरभपात भऽ जाइ। तँए ओकरा पति‍ओकेँ हरि‍दम नाकेपर तामस रहै। जे सभ सोचने रहए ओ सभ पूरा नै होइत देखि‍ मोन हरि‍दम बि‍धुआएले रहै छेलै। देखैत सपना टूटि‍ गेलासँ कठ तँ हेबे करै छै। ...सासु नै रहै। औरति‍या केकरा कहि‍तै। आ के ओकर दुख बाँटि‍तै। जेमहरे जाए तेमहरे डाँट-डपट आ ठोकर। कि‍यो अपन नै, सभ आन। काज-उदेममे लगल समए कटबाक परि‍यास करए आ असगरमे बैसि‍ भरि‍ मन कानि‍ मनकेँ हल्‍लुक करए। समए बि‍तैत रहै छै। बि‍तैत रहल।” अहूबेर ओरति‍या तीन महि‍नासँ गरभवती रहए। कानसँ स्‍वर टकरा जाइ- “फेर ओहि‍ना हेतै। ऐबेर भगा बेटाकेँ चुमौन करा देबै।” फेर दोसर काने पति‍क स्‍वर सुनै- “कोन-कोन डागदर-बैद आ ओझहा-गुणीसँ देखेलौं। कोनो फेदा नै। हेतै केतएसँ? पपि‍याही अछि‍ ई।” भातक दुख नै बातक दुख। जेना सान्‍हि‍ मरै। कलेजामे भूर करै। मोन आ शरीर दुनू संगी। एककेँ दुखि‍त भेने दोसर केना ठीक रहि‍ सकत। औरत बि‍मार रहए लगल। माए-बापकेँ पता लगलै। समाद गेलै आ एलै। ओ नैहर आबि‍ गेल। जेना बैशखा रौदमे गाछतर। नैहराक छाँह। सभ गप्‍प सुनि‍-बूझि‍ माए-बाप उपचारमे लगि‍ गेलै। की-की नै केलक। केतए-केतए ने गेल। अही क्रममे एकटा साधु बाबा उपदेश देलखि‍न- “एकरा छह महि‍ना वोनबास करबए पड़तौ।” “औरत तँ अहुना बोनवासेमे रहैत अछि‍। फेर कोन वोनबास?” “घर-अँगनासँ अलग। राति‍ओमे नै आबि‍ सकैत अछि‍। अपने हाथसँ बनौल खाएत-पीअत। आर सभ गप्‍प बुझए पड़तौ।” माए-बापकेँ मोन उड़ल रहै। सन्‍तानक सुखक लीलशा। वोनबास शुरू भऽ गेल। घर-अँगनासँ अलग। आमक गाछीमे। बास करए लगल। टोलक लगेमे रहै मुदा गप्‍प तँ केकरोसँ नै कऽ सकैत अछि‍। इशारासँ काम चलाउ। आन लोक हटले रहै। दि‍न तँ कटि‍ जाइ मुदा राति‍ पहाड़। कुशक ओछाइनपर गुदरी बि‍छौना। माटि‍एपर खाना आ माटि‍एपर सोना। मूजक डोरासँ डाँड़मे जखम भऽ गेलै। जाड़ा-गरमी-बरखा। अन्‍हरि‍या राति‍। साँप-कीड़ा, बि‍लाय-कुत्ता नढ़ि‍या-खि‍खि‍र। एकान्‍त बास। भरि‍ दि‍न तँ जे कि‍छु मुदा राति‍मे माएकेँ नै रहल जाइ। बारहो बजे राति‍मे आबि‍ बनवासी बेटीकेँ भरि‍ पाँज पकड़ि‍ सुति‍ रहए। नि‍न्न टुटि‍ते ओइठामसँ चलि‍ आबए। जे फेर कोनो दोख ने भऽ जाए। आ आबैबला संतानपर कोनो वि‍पति‍ ने पड़ि‍ जाए। केहनो कठि‍न समए रहै छै। कटि‍ तँ जेबे करै छै। लोको कोनो कम लगराह होइ छै। वोनबासक समए बीतल। गरभकाल पूरा भेलापर औरति‍याकेँ बेटा जनमलै। फेरसँ ओकर सुखक दि‍न घुरि‍ एलै। सभ दिससँ सि‍नेहक बरखा हुअ लगलै।” कि‍छुकाल चुप रहला पछाति‍ दि‍नेश अपना पत्नीकेँ पुछलकै- “आब कहू जे ओइ माएकेँ जँ बेटा गारि‍-बात देतै तँ ओकर की दशा हेतै?” पत्नी गुम्‍मी साधने। कि‍छो बजले ने जाइ। फेर दि‍नेशे बाजल- “ओ औरत हमर माए छि‍ऐ आ ओ बेटा हमहीं छि‍ऐ।” दुनू परानी चुप। राति‍क चि‍ड़ै केतौ-केतौ बजै छेलै। आर सभ कि‍छु नि‍शब्‍द भेल। दुनू परानीक बीचसँ शब्‍द हेरा गेल छेलै। कि‍न्‍तु हाथ-पएरक क्रि‍यासँ गप्‍प शुरू भऽ गेल छेलै। साँस-प्रश्‍वाँस गवाही दइ छेलै। मुस्‍कीकेँ अन्‍हार झँपने छेलै। आ दुनू परानीक बीच दोख बि‍ला गेल छेलै।६८९ डरक नदी सरि‍ताकेँ नि‍न्न नै होइ छेलै। आ नि‍न्न पड़लै तँ सपनामे डूमि‍ गेल। सपनामे देखैत अछि‍ जे- ऊँचगर जगहपर एकटा नमहर मूसक बि‍ल अछि‍। चारूभर झौंकड़ा-झौकड़ी आ बि‍च्‍चेमे बि‍ल। बि‍लसँ कनी हटि‍ कऽ मूसक पूरा पलि‍वार घुरि‍या रहल अछि‍। सभ डेराएल, आपसी कनफूसकी करैत। ओइमे बेटा-पुतोहु, पोता-पोती, काका-भतीजा सभ गोटे। बाबाक प्रतीछा कऽ रहल अछि‍। संकटकालमे बूढ़ बुजुर्गसँ सलाह-वि‍चार केनाइ बड़ जरूरी होइ छै। ओहन बूढ़ जे अपन काज-वेपारसँ पलि‍वारमे धाक जमौने रहै छै। ओकरासँ काजक पहि‍ने पूछि‍ लेब आरो आवश्‍यक। कनीओं खड़-पात खड़खड़ाइते मुसक धि‍या-पुता डेरा जाइत अछि‍। डेराएल तँ सभ अछि‍ कि‍न्‍तु कि‍छु गोटे अपना डरकेँ झँपने अछि‍ आ ऊ सभ रहि‍-रहि‍ कऽ अपनासँ छोट डेराएल धि‍या-पुताकेँ रपटि‍ दैत अछि‍। “रौ, कनै छेँ कि‍ए। चुप रह। डेरा नै हम छि‍यौ ने।” “हौ काका जमराज आबि‍ जेतै तँ तोरा सभ पहि‍ने भागि‍ जेबहक। तब की करबै? तूँ सभ तँ नांगरि‍ ठाढ़ कऽ बड़ी रेशमे भगै छहक, हमरा सभकेँ तँ एके झपटमे पकड़ि‍ लेतै।” “धू बुड़बक, बड़ डेरबुक छेँ, एनए एतै तब ने रौ।” बुढ़बा मूस जखैत-तपैत आबि‍ रहल अछि‍। ओकरा देखि‍ते मूसक धि‍या-पुता सभ चारूभरसँ घेरि‍ लेलक- “हौ बाबा, जुलुम भऽ गेलै हौ, आब केतए रहबहक?” “की भेलै रौ?” “हौ, अपना बि‍लक मुँहपर बड़का साँप बैसल छै। चलह दोसरे ठाम रहबै। ऐठि‍नासँ भागह जल्‍दी।” “रौ केतए जेबही। मनकेँ थि‍र कर बौआ। संसारक कोनो कोणमे नुकेबही डर ओतौ पाछूसँ पहुँच जेतौ। केतौ खतरासँ खाली जगह नै छै। रौ नूनू, जीबैले संघर्ष करए पड़तौ।” बूढ़ मूसक जेठका पोता फनकि‍ कऽ बाजल- “हे यौ बाबा, गप तँ खौब हँकै छी। तँ जा कऽ देखि‍यौ। एकबेर संघर्ष करि‍यौ।” मूसक दोसर पोता बाजल- “ठीके यौ बाबा, अहाँ तँ खि‍स्‍सा सुनबै छेलि‍ऐ जे जुआनीमे जमराजकेँ पछाड़ि‍ देने रहि‍ऐ, एकबेर वएह चि‍तरसेना दाउ-पेंच लगाउ बुढ़ाड़ीमे।” बुढ़बा मूस मने-मन सोचलक, छौड़ा सभ गरपर चढ़ा देलक। बँचबाक उपए ताकए पड़त। बुझबैत बाजल- “हे रौ ई सभ जवान-जुआनक काज छि‍ऐ। जवान जँ लड़तै तँ कि‍छ देर लड़ाइमे ठठबो करतै। हमरा सबहक उमेर आब संघरषक जोग छै? ठीकसँ सुझबो ने करैए। की कहबो-सभटा दुख चढ़ल बुढ़ाड़ी, नैन बि‍नु पंथ भारी।” बुढ़बा मूसक जेठका पोताकेँ नै रहल गेल तँ फेर बाजल- “हे, माए-बाबू, काकी-काका सबहक वि‍चार इहए भेल छै जे बि‍ल लग सभसँ पहि‍ने तोरे जाए पड़तह। सभ कहै छेलै जे बुढ़बा आब बेसी जीि‍व कऽ की करतै। पलि‍वारोपर तँ भारे बनल छै।” बुढ़बा चौंक कऽ बाजल- “अँए, तँ आब हम भार बनि‍ गेलि‍यौ रौ। तेकर मतलब हमर कएल-धएल पानि‍मे चलि‍ गेलै। आरौ तोरीकेँ ठीके कहै छै...।” बूढ़ मूसक जेठकी पुतोहु मुँह दाबि‍ कऽ बजली- “एकटा गप पुछै छी बाबू। अपना सोझहामे बेटा-पोताकेँ मरैत देखबै से नीक लागत? एकरा सभकेँ तँ देश-दुनि‍याँ देखबाक आ भोगबाक समए छै- अखनी।” मूसक जेठका बेटा मुँह फेड़ दोसर दि‍स तकैत बाजल- “हम तँ तखैने जाइ छेलि‍ऐ। देखबै एक धक्का। ऐपार आकि‍ ओइपार। की करबै। सभ गोटे टाँग छानि‍ कऽ कानए लगलै आ कहलकै- सौंसे पलि‍वारक भार अहीं उठौने छि‍ऐ। अहाँकेँ कि‍छो भऽ जाएत तँ पलि‍वारक देख-भाल केना हेतै।” पोता चट दऽ टपकि‍ उठल- “काका, कहै छेलै जे बुढ़बा तँ भरि‍दि‍न बि‍छौना धेने रहै छै। ओकरा रहने की आ नै रहने की। आबए दही, काल लग पहि‍ने वएह जेतै।” गप सुनि‍ बुढ़बाकेँ सभसँ मन टूटि‍ गेलै। जेना चारू पाजासँ हारल लोक। केकरोसँ कोनो मोह ममता नै। बुझेलै आब ऐ दुनि‍याँसँ चलि‍ जाइ, सएह नीक। तैयो प्राणक मोह सभसँ बड़का मोह। दुनि‍याँसँ केतबो वि‍राग भऽ जाए। सभसँ नाताक डोरि‍ टूटि‍ जाए। तैयो साक्षात कालक मुँहमे जाइ बखत डर समेनाइ सोभावि‍के छै। बुढ़बा मूस जोशमे कि‍छु कदम तँ खौब लफड़ि‍ कऽ चलल तेकर बाद टाँग नै उठै। खुच-खुच लगही लगै। जखनि‍ बि‍लक नि‍कट चलि‍ गेलै आ साँपक आकृति‍ देखाइ पड़ए लगलै, तखनि‍ मल-मूत्रपर सँ नि‍यंत्रन हटि‍ गेलै। दड़बड़ मारि‍ बि‍लक लगमे जे झौंकड़ा रहै तइमे ढूकि‍ गेलै। कि‍छु देर तक कोनो तरहक आक्रमण नै भेलै, तब झाँकुरसँ नांगरि‍ ि‍नकालि‍ साँपक आँखि‍ दि‍स डोलोलकै। तैयो कोनो प्रतक्रि‍या नै भेलै। बुढ़बाकेँ भारी अचरज भेलै, ओकर पकल दि‍माग दौगए लगलै। “कहीं मुइल साँप तँ ने छै?” मनमे प्रश्न उठलै डर कि‍छु छँटि‍ गेलै। देव-पि‍तरकेँ सुमरैत देह-हाथ सम्‍हारि‍ बाहर नि‍कलल। पूरा सतर्क भेल। टक-टक तकैत साँप दि‍स बढ़ल। भागैले तैयारो अछि‍। घुसकैत-घुसकैत लग जा कऽ देखलक, ठीकसँ देखि‍ते ठि‍ठि‍या कऽ हँसल आ हँसैत बाजल- “रौ तोरी! साँप कहाँ छै ई तँ साँप खोल छि‍ऐ। केचुआ।” जोरसँ सोर पाड़लक- “रौ आबै जो, आब डेराइक कोनो गप नै।” धि‍या-पुता दौग कऽ लग आएल आ पुछलक- “बाबा, जीअत छै की मुइल हौ?” बुझबैत बुढ़बा बाजल- “हे रौ, ई तँ खोल छि‍ऐ ओकर। ऊ तँ ऐ मे सँ नि‍कलि‍ गेल छै।” “नि‍कलि‍ कऽ केतए गेलै हौ?” “हेतौ तँ अही आसे-पासेमे। जँ मुइलाक बादो जीव खोल छोड़ैले तैयार नै रहै छै, तँ जीअत की करतै...।” फेर डर सबहक मनमे नाचए लगलै। मूसक जेठका पोता बाजल- “अच्‍छा, हटि‍ जा बि‍लक मुँहपर सँ। एेते बात कि‍ए बनबै छहक।” बुढ़बा कऽ जल्‍दीसँ नै हटल भेलै। सभटा मूस एकेबेर बि‍ल दि‍स रेड़ देलक। बुढ़बाक देह-कपारपर चढ़ैत। ठेलैत-धकि‍यबैत। बुढ़बा केंकि‍आइत ओंघरा कऽ खसल। मूसक जेठका बेटा अपना पत्नीक मुँहपर दाँत गड़ा देलक। दुनू एकेबेर खेंखि‍याइत बि‍लमे ढुकि‍ गेल। सरि‍ताकेँ सपनामे बुझेलै जे कि‍यो ओकरो गालपर कि‍छु गड़ा देलक आ जेना मूस सभ देहपर दौगए लगल। ओकर देह चमकि‍ उठलै। सौंसे देह सि‍हरि‍ कऽ काँटो-काँट भऽ गेलै। सपना भंग भऽ गेलै। बुझेलै देहपर एगो हाथ चलि‍ रहल अछि‍। अन्‍हारमे टेबलक। ई हाथ ओकर पति‍क छेलै। फेर मन पड़लै, अपना धि‍या-पुताक फौज। जे नि‍रंतर बढ़ले जा रहल छेलै। अनन्‍त आवश्‍यकताक संग। कि‍छु चलैत-चलैत जेना ठाढ़ भऽ गेलै। मनमे जे डरक नदी बहै छेलै ओइमे अकस्‍मात बाढ़ि‍ आबि‍ गेलै।९०५ कविता- (१) व्‍यथित तरू :: राजदेव मण्‍डल चारूभर तरू ताकि रहल जनकल्‍याणक भाव भरल निच्‍चाँमे कुरहड़ि चमकि रहल रहि-रहि कऽ ओ बमकि रहल। नि:सृत होइत मन्‍द-मन्‍द धेरि रहल अछि मृत्‍युक गंध डरे थरथराइत भेल लाचार मने-मन करैत विचार। कोन पापक वा अभिशापक भेटि रहल अछि ई फल नइ अछि हमरा विरोधक बल छोड़त नहि ई निर्दय खल। भेल छी सर्द हृदैमे दर्द आँखिमे भरल नोर केकरा लगबै गोड़ काटत हमरा खण्‍ड–खण्‍ड कोन दोषक अछि ई दण्‍ड। केतेकोकेँ प्रेमक इतिहास हमरे संगे होएत विनाश। कटत हमर गात होएत सभपर आघात छेलौं संग-साथ दुसमनो छल कात अपने कर्ममे रहलौं तल्‍लीन पल-पल आ राति-दिन नइ चाहै छी कोनो प्रतिदान सेवामे लगौने जी-जान समता भाव रखि मन-मान कहाँ बुझै छी केकरो आन। केहेन कठिन अछि ई पल हमरा लेखे कियो ने खल दुसमनोपर बरिस रहल शीतल छाँह आ अमरीत फल। बुद्धिहीन सभ बनलौं मीत नइ जानै छी हित-अहित जनशत्रुकेँ मान-सम्‍मान उपकारी केर लैत प्राण। (२) हेरा गेल सुखक सागर कल-कल करैत जल डुमकी लगबैक मन करै छल। बाटमे छेलै बाधा केतेक एक नै अनेक केना पहुँचब ओइठाम जँ कियो पूछत- अछि कोन काम किए एलौं ऐठाम? किन्‍तु उत्‍कट भेल इच्‍छा एकरा रोकब केना जाएब जेना-तेना यादि पड़ल मनक गड़ल मुँह झाँपियो करैए लोक केतेक काज हमरो लगबए पड़त एहने कोनो भाँज मुखौटाक अछि हजारो रंग एकटा रखलौं मुँहपर आर रखलौं संग अनचिन्‍हारकेँ नै करत तंग। नीक-अधला, बाट-कुबाट सभकेँ करैत पार पहुँच गेलौं निकट आगूमे छल किनार। ठमैक छुबै छी मुँहकेँ हाथसँ अकचका उठलौं ऐ बातसँ। हेरा गेल हमर मुख तब भेटल ई सुख केहेन भेल चूक ई सुख छी आकि दुख? रचनाकारक संक्षिप्‍त परिचए- जनम : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्‍व. सोनेलाल मण्‍डल उर्फ सोनाइ मण्‍डल। माता : स्‍व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्‍द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्‍त मण्‍डल, कृष्‍णकान्‍त मण्‍डल, वि‍प्रकान्‍त मण्‍डल। पुत्री : रश्मि‍ कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शि‍क्षा : एम.ए. द्वय (मैथि‍ली, हि‍न्‍दी, एल.एल.बी) ई पत्र : rajdeokavi@gmail.com सम्‍मान : अम्‍बरा कवि‍ता संग्रह लेल वि‍देह समानान्‍तर साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्‍कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्‍मान-२०१३ प्राप्‍त। प्रकाशि‍त कृति : (१) अम्‍बरा- कवि‍ता संग्रह (२०१०), (२) बसुंधरा कवि‍ता संग्रह (२०१३), (३) हमर टोल- उपन्‍यास (२०१३) श्रुति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त। अप्रकाशि‍त कृति‍- चाक (उपन्‍यास), त्रि‍वेणीक रंग (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह)। शिव कुमार प्रसाद विहनि/ लघुकथा- अदिया/ झमकी/ बनमानुष अदि‍या एकटा गाममे छोट-छि‍न परि‍वार छल। ओइ परि‍वारमे एकटा नेनाक जनम भेल। माए-बापक आँखि‍क तरेगन। शरीरसँ लक-लक। ओकर सौंसे देहक हाड़ गनल जा सकैत छल। मुदा आँखि‍मे तेज दप-दप करैत रहै। धीरे-धीरे ओ पैघ भेल। नेनाक माथमे कतेक बात सन्‍हि‍याएल छल तेकर हि‍साब करब असान नै छल। नेनाक माए-बाप कुटौन-पि‍सौन आ मजूरी कऽ कहुना गुजर करैत छल। अपन एक मात्र नेना लेल दुनू परानी दि‍न-राति‍ सौचैत रहैत छल। आब नेना वि‍द्यालय जेबाक योग भऽ गेल। माए-बाप ओकरा पढ़बैले गुन-धुनमे लागल छल। संयोगसँ गामेमे एकटा चि‍मनी-भट्ठा खुगलै। नेनाक बाप गामक आन मजूरक संग भट्ठापर गेल। भट्ठाक मुंशी ईटा बनबैले मजूर सभकेँ नाओं लि‍खैत छल आ कि‍छु-कि‍छु टका दऽ एकटा आदमीक संग जमीन देखबैले भेजने जाइत छल। नेनाक बाप मुंशीसँ पुछलकै- “हमरा लेल कोनो काज नै छै मालि‍क?” मुंशी पुछलकै- “तों की करबह। ईटा पाथल हेतह?” ओ बाजल- “नै मालि‍क हम तँ मजूरी करै छेलौं। मजूरीबला कोनो काज...।” मुंशी बाजल- “माथपर ईटा ऊघल हेतह?” “हँ मालि‍क, ई तँ भऽ जेतै।” मुंशी बाजल- “ठीक छह, तों काल्हि‍ आबह। मालि‍क सेहो काल्हि‍ एतहि‍न। अखनि‍ चि‍मनी बनतै। भट्ठा बनतै। मजदूरक जरूरी तँ छइहे।” नेनाक भागसँ ओकर बापकेँ भट्ठापर मालि‍क महि‍नवारीपर रखि‍ लेलखि‍न। अपन ओकाति‍सँ ओइ नेनाकेँ माए-बाप एकटा छोट-छि‍न वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खबा देलकै। टीनबला रि‍क्‍शापर बैस नेना वि‍द्यालय जाए लगल। गाम-घरक आनो-आनो घरक बच्‍चा ओही स्‍कूलमे पढ़ैत छेलै। सभसँ कातमे दुबकल ओइ बच्‍चाकेँ देखि‍ कऽ कोइ सोचि‍ओ नै सकैत छल कि‍ ओइ बकुटा भरि‍क बच्‍चामे खाली बुधि‍एटा भरल छै। वि‍द्यालयमे एक बरख पुड़ैत-पुड़ैत ओ नेना देखार होमए लगल। माए-बाप, दादा-दादीक संगे-संग सर-समाजक जेतेक लोक छल, ओइ बच्‍चाक बात सुनि‍-सुनि‍ ओकर मुहेँ तकैत रहि‍ जाइत छल। केकरो-केकरो तँ बि‍सवासे ने होइ जे अखनि‍ ओ जे बाजल से ओकरे मुँहसँ बात नि‍कललै वा कोनो आन मुहसँ। आब जखनि‍ ओइ नेनाकेँ वि‍द्यालयमे नाओं लि‍खा गेलैक तँ कोनो नामो तँ हेबक चाही। ओकर नाओं राखल गेल आदि‍त्‍य। मुदा ओ कोनो बड़का बापक बेटा थोड़े छेलै। गामसँ वि‍द्यालय धरि‍ ओ भऽ गेल ‘अदि‍या’। अदि‍या माने आदी वा आरम्‍भ। अपने सभ जे अनुमान करी। हमरा तँ लगैत छल जेना ओ सच्‍चोमे आदी होमए। ऊपरसँ सुखल-पुखल भीतरसँ रसगर। मुदा रस केतए तँ आदीए सन कठगर रेसादार गीरहक समग्र भागमे सन्‍हि‍याएल। आब सुनू ओकर आगूक खि‍स्‍सा। वि‍द्यालयक सभ गुरुजीकेँ ओकरापर सए प्रति‍शत बि‍सवास। कोनो वि‍षयक गुरुजीकेँ सेहन्‍ते लागल रहलनि‍ जे ओकरा कहि‍यो दबारि‍तथि‍। बेंचपर ठाढ़ करब तँ बहुत दूरक बात छल। सभटा बड़-बढ़ि‍याँ। परीक्षा होइत गेल। मासि‍क, त्रेमासि‍क, छमाही आदि‍। आब वार्षिक परीक्षा हएत। अदि‍या चिंतामे फँसल। “गुरुजी, हमरा सभ परीक्षामे कम नम्‍बर कि‍एक अबैत अछि‍।” ई बात अपन गुरुजी सभसँ ओ पुछैत रहल मुदा कोनो गुरुजी ओकरा सही उत्तर नै दइ छेलखि‍न। अदि‍या मन मारि‍ कऽ माए लग आबि‍ पुछलकै- “माए गइ, हम फस्‍ट नै कऽ सकै छी की?” माए बुझबैत कहलखि‍न- “बाउ, खूम मन लगा कऽ पढ़ू। फस्‍ट कऽ कऽ की हेतै अगर ज्ञाने ने हएत।” अदि‍या कहैत छल- “माए गइ, हमरा वर्गमे जे फस्‍ट करैत अछि‍ अेकरा तँ हमरो एतेक नै अबै छै। गुरुजी सभ तँ सब दि‍न ओकरा बेंचेपर ठाढ़ केने रहै छन्‍हि‍। फेर नम्‍बर केना पबैत अछि‍?” वि‍द्यालयमे वार्षिक परीक्षा भेल। अदि‍या वर्गमे फस्‍ट नै केलक। ओ तेसर स्‍थानपर आएल। फेर वएह सरलहबा फस्‍ट कऽ गेलैक। अदि‍या जखनि‍ परीक्षाक रि‍जल्‍ट सुनलक तँ हँसए लगल। ओकरा संगे आनो साथी हँसैत रहल। ओ जखनि‍ गामपर आएल तँ माएसँ कहलक- “माए गे, अहूबेर वएह सरलहबा छौड़ा फस्‍ट कए गेल। जाए दही, मास्‍टर सभकेँ लाजो ने होइ छै। ओकरा केना फस्‍ट करा दइ छै। हमरासँ तँ ओकरा अदहो वि‍षय नै बूझल छै।” गुरुजीक खि‍धांस सुनि‍ माए दुखी भऽ गेली। ओ अदि‍याकेँ बुझबैत कहलखि‍न- “बाउ, मास्‍टरक वि‍षयमे एहेन बात नै बाजी। मास्‍टरसँ ऊपर संसारमे कि‍यो नै होइ छै। हुनक आदर करी। तखने अहाँकेँ वि‍द्या औत।” अदि‍याकेँ अपन गल्‍तीक भान तुरंत भेलै। बाजल- “हँ गइ माए, हमरासँ गल्‍ती भऽ गेल। हम काल्हि‍ सभ गुरुजी सँ माफी मंगबनि‍।” अदि‍या आगू बढ़ैत गेल। आब पैघ सेहो भऽ रहल अछि‍। टि‍नही रि‍क्‍शासँ साइकि‍लपर सवार भऽ वि‍द्यालय जाइत अछि‍। वर्गमे तेसर-चारि‍म स्‍थान अनि‍तौं ओ खुश अछि‍। एकटा गुरुजी अदि‍याकेँ एकान्‍तमे बजा कऽ बजा कहलखि‍न- “बाउ, अहाँ वि‍द्यालयक रि‍जल्‍टकेँ चिंता जुनि‍ करू। बोर्डक परीक्षामे अहीं फस्‍ट करब। ऐ बातक गि‍रह बान्‍हि‍ लि‍अ।” दशमी परीक्षाक तैयारीमे सभ वि‍द्यार्थी लागल अछि‍। अदि‍या सेहो यथासाध्‍य अपने अथवा संगी-साथीक मददि‍सँ तैयारीमे लागल अछि‍। अदि‍याकेँ दि‍न-राति‍क होश नै। बोर्डक परीक्षा जि‍ला मुख्‍यालयमे छै। अदि‍या एगो संगी संगे एकटा डेरा ठीक केलक। माएक जी हराएल छै। बाबू साइकि‍लसँ पहुँचा गेलै। अदि‍या बाबूकेँ प्रणाम कऽ असि‍रवाद लेलक आ बाबू गामपर घूमि‍ एलै। अदि‍याक परीक्षा शुरू भेल। अदि‍या सभ दि‍न परीक्षा दऽ खुशी-खुशी डेरापर अबैत छल। आइ परीक्षाक अन्‍ति‍म दि‍न अछि‍। अदि‍या परीक्षा दऽ अपन गर्वसँ नि‍कलल। वि‍द्यालयक ओसारि‍पर वर्गमे प्रथम स्‍थान आनए बला लड़का ठाढ़ छल। ओ अदि‍याक हाथ पकड़ि‍ परीक्षा केन्‍द्रक गेटसँ बाहर भेल। गेटसँ बहराइते ओकर आँखि‍ डबडबा गेलै। अदि‍या ओकरासँ पुछलकै- “परीक्षा खराब भऽ गेलौ की?” ओ वि‍द्यार्थी बाजल- “आदि‍त्‍य, हमर परीक्षा तँ ओही दि‍न खराप भऽ गेल जइ दि‍न हम वि‍द्यालयक परीक्षामे फस्‍ट केलौं। ऐ परीक्षामे अहाँ प्रथम आएब। हम अखने अहाँकेँ वधाई दइ छी। ऐ जि‍नगीमे ने हम अहाँक बरबरि‍ छेलौं ने आब भऽ सकब।” आदि‍त्‍य कि‍छु कहि‍तै तइसँ पहि‍ने ओ वि‍द्यार्थी मुँह दाबि‍ फफकैत वि‍द्यार्थीक भीड़मे सन्‍हि‍या गेल। (82म सगर राति‍ दीप जरय’ मेंहथमे पठि‍त...।) झमकी एकटा गाममे एकटा गरीब परि‍वार रहै छल। परि‍वारक मुखि‍याक रूप-रंग, गुण-सोभाव, दह-दशा गामे सन छेलै। नाओं छेलै खखना। भरि‍-दि‍न मर-मजूरीसँ जे बोइन भेटै छेलै, खखना घरवालीकेँ सुमझा दइ छेलै। घरमे अपने तीनटा बेटा-बेटी आ कनि‍याँ। पाँच जनक परि‍वार। माए कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ सरग सि‍धारि‍ गेलै। जावत् माए जीबै छेलै ताबत् हुनका कि‍यो पुछैबला छेलै। काजपर सँ लौटला उत्तर एक लोटा पानि‍, एकटा सूखल रोटी वा फुटहो दऽ हि‍या जुड़बै छेलै। माइक मुइने ठीके बेटा टुगर भऽ जाइ छै। घरवाली मुँहक जोर। एतबे नै, वि‍धाता घरवाली चम-चि‍कनी दऽ देलखि‍न। नाओं छेलै ‘झमकी’। नाउँए गुण सौंसे टोल झमकेत रहैत छल। बाल-बच्‍चा फुटलीओ आँखि‍ नै सोहाइत रहै। जाबत् सासु छेलै बाल-बच्‍चाकेँ थथमारने रहै छल। आब तँ धि‍यो-पुतो छि‍छि‍आइत रहै छै। खखना बरद जकाँ खटैत अछि‍। ति‍रया चरि‍त्तरकेँ ओकरा कि‍छु पता नै। झमकीकेँ एसनो-पोडर, कनफुल-नकफुल चाही। सेहो नव-नव डि‍जाइनक। खखना सन भकुआ, भकुआएले रहि‍ गेल। आब सुनू आगूक खि‍स्‍सा। खखना काजे अपसि‍याँत। घरवाली आँचे अपसि‍याँत। टोलसँ अलग एकटा दोसर जाति‍क घर छल। ओइ घरक अगल-बगलमे कएटा मालि‍कक कलम छेलै। जारनि‍ बीछऽ झमकी केतए जेतै? कलमेमे ने! झमकीकेँ संगी-बहि‍नपाक कोन कमी। सबहक संगे कलमे-कलमे, गाछीए-गाछी जारनि‍ बीछैत छल। केना-ने-केना दोसर जाति‍क एकटा नवतुरि‍यासँ झमकीकेँ आँखि‍ लड़ि‍ गेलै। धीरे-धीरे ओही कलममे जारन-बि‍छनी सबहक पंचैती सेहो बैसए लगल। ओ छौंड़ा सेहो गामक भौजाइक नाते कखनो बैसल कखनो ठाढ़हे-ठाढ़ गोष्‍ठीक हि‍स्‍सा बनि‍ गेल। ओइ छौंड़ाकेँ देखि‍ते झमकीक चमकी दुगुन्ना भऽ जाइत छेलै। आब बुझू खि‍स्‍सा खतम। झमकी झपटा मारलक। झपटा तेहेन छेलै जे छौंड़ा घरक खुट्टा तोड़ि‍ जे भागल से आइ धरि‍ गाम नै घुरल। धि‍या-पुता फकरा बनेलक- “झमकी झमैक‍ गेल, छौड़ा लऽ कऽ उड़ि‍ गेल...।” खखना बाल-बच्‍चाक संग ताकि‍ रहल अछि‍ जे कही फेर...। (83म सगर राति‍ दीप जरय’ भपटि‍याहीमे पठि‍त...।) बनमानुष- एकटा भयंकर जंगल छल। ओइ जंगलमे भाँति‍-भाँति‍क गाछ-वि‍रि‍छ आ जानवर रहै छल। लोभी मनुख जंगलक जारनि‍, लकड़ी आ पशु-पक्षीकेँ व्‍यापार करैले ओइ जंगलमे जाइ छल। एकटा जंगल जाइक खूब चाकर रस्‍ता बनि‍ गेल छल। ट्रक-ट्रेक्‍टरक अवाज सुनि‍ते जानवर सभ लंक लऽ भागि‍ जाइ छल। ओही जंगलमे कि‍छु बनमानुख सेहो रहै छल। एक दि‍न एकटा मनुख ओइ जंगलक कातमे एकटा बनमानुखकेँ देखलक। मनुख सन बुधि‍यार जीव केतए भेटत। बनमानुखकेँ देखि‍ कऽ ओ सोचए लगल। हे भगवान! ई केहेन जीव अछि‍। ने नुआँ ने लत्ता। भक्ष-अभक्ष कि‍छु ने बुझैत अछि‍। सौंसे देह केश केना झबड़ल छै। देह गन्‍ह तोड़ैत छै। बनमानुख सेहो मनुखकेँ देखलक। ओ चुप्‍प! गुमशुम बैसल छल। मनुखकेँ मन भेलै जे ईहो तँ हमरे जकाँ अछि‍, मुदा कोन कि‍सि‍मक जीव अछि‍। छी: छी: एहनो जीव होइ छै। बनमानुखकेँ मने-मन धि‍क्कारैत मनुख पुछलक- “हौ बनमानुख, पूर्व जन्‍ममे कोन-कर्म केलह जे भगवान बनमानुख बना देलकह?” बनमानुख सुनि‍ कऽ चुप्‍पे रहल। मनुख वएह बात फेर दोहरेलक। आब बनमानुख मनुख दि‍स बि‍नु देखनहि‍ बाजल- “हौ मनुख, भगवान जे करै छथि‍न से नीके करै छथि‍न। हम पूर्व जन्‍ममे बड़ नीक कर्म केने रही तँए भगवान हमरा बनमानुख बनौलनि‍। हमरासँ तों कथीमे नीक छह से बता सकै छह की?” मनुख ई बात सुनि‍ते कूदि‍ उठल। बाजल- “हौ बनमानुख, सौंसे संसारमे तोहीं सभसँ काबि‍ल? अँइ हौ, ने देहपर कपड़ा, आ ने अन्न-पानि‍क ठेकान! ने घरक ठेकान। बि‍मारी होइते पट्ट दनि‍ मरि‍ जेबो से कोनो ठेकाने ने। पेटक खाति‍र सौंसे जंगल ढहनाइत फि‍रै छह। आ...।” जाबत् मनुख कि‍छु आर बजैत तइसँ पहि‍ने बनमानुख बाजल- “हौ मनुख, थम्‍हऽ-थम्‍हऽ दम लऽ लैह, अपसि‍याँत भऽ गेल हेबऽ। कनी हमरो सुनि‍ लैह, हौ, चालनि‍ दुसलक सूपकेँ जइमे बहत्तरि‍ गो भूर, ईह!” तैपर मनुख बाजल- “हौ, ई बात ठीके कहलह, ने देहपर कपड़ा-लत्ता! एकटा बात कहऽ तँ, तों सभ केते कपड़ा पहि‍रै छह। हमरा तँ ओतेकेँ नामो ने बूझल अछि‍। मुदा कि‍छु हमहूँ कहऽ चाहै छि‍अ। हौ, कोट-पेंट, पतलून, धोती-साड़ी, सलवार-फराक की-की नै तों सभ बनेलह। मुदा सभटा बुधि‍यारी तँ घोंसरल जाइ छह। मौगी-मुनसा सभ कि‍यो आइ एकटा छोटका पेंट गंजी पहि‍रने हाट-बजारमे बौआएत फि‍रै छह। अछैते कपड़ा दि‍न-दि‍न देह परहक कपड़ा घटले जाइ छह। हौ, तोरा सबहक बहुरुपि‍या भेषसँ तँ हमहीं ने नीक। वि‍धाता जे वस्‍त्र देलक ओहीसँ अपन देह झँपने छी। सर्दी-गर्मी आ बरखोसँ अपन सुरक्षा करैत रहै छी। हौ मनुख, तों घरक बात कहै छह। चुप रहऽ तों सभ की बजबह। एक-एक इंच जमीन लेल कि‍यो केकरो छोड़लहक हौ? जमीन लेल भाएकेँ भाए, बापकेँ बेटा, बेटाकेँ बाप, भायकेँ बहि‍न, काकाकेँ भतीजा, सारकेँ बहनोइ, माएकेँ बेटा-बेटी कोनो नतीजो बाँकी रखने छहक। राम-राम। हौ ईंटा-खपड़ा कि‍ फूसि‍-फटकसँ बनल घर घर नै होइ छै। जेतए जीव शान्‍ति‍सँ साँस लऽ सकए, जेतए सभकेँ सभसँ प्रेम होइ ओ घर घर होइ छै। हौ, हमसब खेत-पथार, घर-दुआर आ धन-सम्‍पति‍ लेल कहि‍यो केकरो खून नै करै छि‍ऐ, आ ने केलि‍ऐ। आर सुनह, दादा-परदादाक लगौल गाछ-वि‍रि‍छ, परती-पराँत सभटा तँ चटने जाइ छह, आब की चटबह। बि‍हाड़ि‍-सुखार, भुमकम-सुनामी जीबह देतह। हो लाखक लाख सभ ि‍दन मरै छह से नै बुझै छहक।” कनीकाल रूकि‍ पुन: बाजल- “आब चलऽ अन्नक बातपर। हौ, जंगल-खेत-खरि‍हाँनमे जे अन्न, फल, कन्‍द-मूल छेलह तइमे केतेक बँचल छह? कि‍छु रहऽ देबहक तब ने। हौ, केतेक बड़का पेट बना लइ गेलह? तोरो तँ हमरे जकाँ फेंफि‍एे पड़ै छह। अमेरि‍का, रूस, चीन, जपाने नै सौंसे संसारमे सभ कोइ फेंफि‍ऐ रहल छल। हौ, तोरे सबहक मारने सभ मरल जाइत अछि‍। पहाड़, जंगल, नदी, समुद्र, धरती, सुरूज, सभटा धीरे-धीरे खतम भेल जाइत अछि‍। हौ, पहाड़, जंगल, नदी सभ जँ मरि‍ जेतह तँ तोहूँ सभ नै बँचबह, मरबऽ मरबे करबह। हम तँ ठीके पएरे-पएर बौआइ छी। मुदा तोरा जकाँ पाँचे डेग चललापर थुसुकुनि‍याँ नै पाड़ै छी। परमात्‍माक देल फल खाइ छी। कन्‍द-मूल खाइ छी। नदी, पोखरि‍क पानि‍ पीबै छी। पहाड़क खोहमे हमर घर अछि‍। केशे हमर नुआँ अछि‍। तोरा सभसँ अधि‍क तागति‍ओ अछि‍ अधि‍क उमेर धरि‍ जीवि‍तो छी। तों दवाइ खाह, सुइया भोंकाबह। टी.बी. तोरा होइ छह। कैंसर तोरा होइ छह। एड्स आ नवका-नवका बेमारी तोरा हेतह। हमरा नै। दैवक डाँगसँ बँचब बहुत कठि‍न होइ छै। जा-जाह अपन रस्‍ता देखऽ गऽ।” एतबा कहि‍ ओ चुप भऽ गेल। मनुख सन्न छल। कि‍छु नै जवाब दैत देखि‍ बनमानुख फेर बाजब शुरू केलक- “बापकेँ बेटा खून करै छह। बहि‍नक गरदनि‍पर लात दऽ कऽ हि‍स्‍सा लेल घरसँ नि‍कालैत छहक। तँए तों बड़ नीक आ हम बड़ अधला। हौ, तोरासँ हम लाख गुणा नीक। भगवानसँ हम कहै छि‍ऐ जे हे भगवान, कहि‍यो हमरा मनुख नै बनाएब। जाह, हम जे कहलि‍अ तैपर सभ मनुख मि‍लि‍ कऽ वि‍चार करि‍हऽ।” मनुख अपने सन मुँह बनौने बनमानुखकेँ तकि‍ते रहि‍ गेल। बनमानुख जंगल दि‍स वि‍दा भऽ गेल। (81म सगर राति‍ दीप जरय’ देवघरमे पठि‍त...।) शिव कुमार प्रसाद कविता- निर्मलीक निर्मलतामे/ बौआ केर उबटन/ शहर ओ गेल/ खेबैया/ माय हमर नव कुम्भ नहेली/ देख एलौं हम पटना डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद अध्‍यक्ष हि‍न्‍दी वि‍भाग हरि‍ प्रसाद साह महावि‍द्यालय- ि‍नर्मली (सुपौल) जनम- 12/11/1956 गाम+पोस्‍ट- सि‍मरा भाया- झंझारपुर जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मोबाइल- 8544222097 ि‍नर्मलीक ि‍नर्मलतामे ि‍नर्मलीक ि‍नर्मलतामे मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि‍। शि‍क्षाक ऐ महापंकमे गामक जि‍नगी लेटा रहल अछि‍। कैंचा-पैसा जोरि‍-जोरि‍ कऽ माए-बाप सभ पठा रहल अछि‍। कोचि‍ंग, वि‍द्यालय, काओलेजमे एक-एक जन आइ लुटा रहल अछि‍। गामक जि‍नगी..............। के पठाओत ककरा लग जा कऽ नेना भुटका पढ़ि‍ रहल अछि‍। नै दू सुधि‍ बुइध केकरो छैक अपने झंझट ओझराएल अछि‍। गामक जि‍नगी....। दौगैत-दौगैत चटि‍या सभटा पढ़बैत-पढ़बैत बड़का सर सभ अपन-अपन भाॅजमे सभकोइ डॉरहि‍ छुबए लेल अपसि‍याँत अछि‍। गामक जि‍नगी लेटा रहल अछि‍। मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि‍। 2 तैं कि‍छु ने कि‍छु लि‍खैत जाउ लि‍खैत-लि‍खैत लि‍खि‍ये देबै मैथि‍लीक उपकारी हेबै तैं कि‍छु-ने-कि‍छु नि‍त लि‍खैत जउ। छपैत-छपैत छैपि‍ये जेबै एकदि‍न लेखक बनि‍ए जेबै मंच आर इनामो भेटत तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खते जाउ। मौलि‍कता ककरा कहैत छी कि‍नकामे मौलि‍कता देखल सभ कि‍यो एक्के बात लि‍खैत छथि‍ सबहक नीयत साफ देखैत अछि‍ तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खते जाउ। नीर-क्षीर वि‍वेक कि‍नका छन्‍हि‍ लि‍खि‍नि‍हारमे हंस के छथि‍ पूर्जा-पूर्जी जोड़ि‍-तोड़ि‍ कऽ कि‍छु-ने-कि‍छु अहाँ घसैत जाउ तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खैत जाउ। बौआ केर उबटन कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर उबटन बि‍ला गेल। सोइरी केर अशौचक संगे भारतीय संस्‍कार हरा गेल। बौआ केर......। नव युगक नव संस्‍कारमे जॉनसन बेबीक पाउडर मि‍लि‍ गेल माइक स्‍तन छोड़ि‍ कऽ नेना बोतल संगे माए भुला गेल। बौआ केर......। सि‍नेहक डोरि‍ तोड़ि‍ कऽ ममता सुन्‍दरता केर मोल बि‍का गेल दाइ नौरि‍नक संग पाबि‍ कऽ नेना माइक शोक भुला गेल बौआ केर......। अपन आन सभ पाइपर बि‍क गेल सम्‍बन्‍धक सभ आँच बुता गेल धन लक्ष्‍मीक चकाचौंधमे तन मन रागक रंग मेटा गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। सोहर जन्‍म बधैया संगे मूड़न उपनैनक महत मेटा गेल लकदक गाड़ी वस्‍त्राभूषणमे बरूआ केर आचार्य भुला गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर......। शहर ओ गेल...... शहर ओ गेल मनुक्‍ख बनै लेल गाममे रहि‍ बन-मानुख छल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। गाममे सभ छल भाए-बहि‍न सभ कि‍यो बाबू कि‍यो काका छल भैया-भौजी बेटी-भतीजी नै कि‍यो बि‍नु नाता छल। शहरमे जाइते रि‍श्‍ता-नाता सभटा मटि‍या-मेट भऽ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। पथराएल शहरी पाथरमे कन्नि‍को मानवता नै बाँचल चारि‍ बरखसँ चालीस बर्ख केर नेना-युवती बलि‍ चढ़ि‍ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। बाट-बटोही देखतो आन्‍हर सनि‍तो रूदन बहि‍र भऽ गेल पशुतो एहेन कुकर्म सुनि‍-सुनि‍ चुड़ुक पानि‍मे डूमि‍ मरि‍ गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। खेबैया सबहक नाॅकेँ भेटल खेबैया बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि देखू पार आब केना लगैत अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि। कि‍नको टाका पार लगौतन्‍हि‍ कि‍नको नेता पार लगौतन्‍हि‍ अपन-अपन बाँस भि‍रौने बहुतो पार उतरलौ जाइ छथि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। दूर-दूर धरि‍ नजरि‍ खि‍रौने ताकि‍ रहल छी आँकि‍ रहल छी कि‍नका पछुऔने पार लगत नाॅ कि‍यो संगी नै भेटि‍ रहल अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। कि‍नको बड़का पैघ हबेली कि‍नको बड़का पागक डौड़ही कि‍नको सार कि‍नको मामा धोती जि‍नक अकास सुखाइत अछि‍ बि‍नु खेबैया हमरे नाॅ अछि‍। माय हमर नव कुम्‍भ नहेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली नै हुनका मन पापक गेठरी नै हुनका मन बाँझक धोकरी नैना-भुटुकाक साँस हास सन जि‍नगी भरि‍ ओ खूब नहेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। नै कहि‍यो ओ चानन केली नै कहि‍यो संन्‍यासि‍न भेली गि‍रहस्‍थीकेँ स्‍वर्ग बूझि‍ ओ कर्मक संग प्रभु गुण गेली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। नै ओ ि‍वदुषी नै ओ सुन्नरि‍ नै आडम्‍वरी नै कनसोही बाट-बटोही सभ जन हि‍नका मनुक्‍ख रूपमे भेटल सि‍नेही माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। मन प्रयागमे त्रि‍वि‍ध तापकेँ कर्मक हूलासमे अपन गर्वकेँ अपन मनोरथ परक दुखमे आजीवन ओ डुमौने रहली माय हमर नव कुम्‍भ नहेली। देख एलौं हम पटना हलसल-फुलसल बसमे बैस कऽ पहुँचि‍ गेलौं हम पटना देख एलौं हम पटना। भरि‍ रस्‍ता हम उड़ि‍ते गेलौं राति‍क नीन भेल सपना केतबो गुहारि‍ देव-गोसाओनकेँ मन पड़ैत छल फेकना देख एलौं हम पटना। बाप जनम नै देखने छलौं एहेन मनुक्‍ख जंगल भोजे बेरमे पहुँचि‍ गेल ओ पपि‍आहा घर-घुसना देख एलौं हम पटना। चोर-उच्चका डेग-डेगपर भीड़ देखि‍ कऽ जी उड़ैत छल बाहर-भीतर जाएब कठीन छल बेथाक नाओं अछि‍ पटना देख एलौं हम पटना। हुनकर बात काटि‍ हम एलौं बाल-बोधकेँ छोड़ि‍ कऽ एलौं नेताजी कि‍ बात बनौता मोन रहत ई घटना देख एलौं हम पटना। मन होइत अछि‍ उड़ि‍ कऽ पहुँचि‍ जाइ अपन सोहागक अंगना। मेटा रहल अछि‍ झँपा रहल अछि‍ अपन परि‍चि‍ति‍ देख एलौं हम पटना। ‍‍ डॉ. शिव कुमार प्रसाद- सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी आधुनिक मैथिली कथा साहित्‍यमे नब-नब कथाकार नब-नब कथाक रचनामे संलग्‍न छथि। हुनक प्रयास निश्चित रूपे मैथिली कथाक संख्‍यात्‍म विस्‍तार हेतु सराहनीय छन्‍हि। मुदा मात्र संख्‍यात्‍मक विस्‍तारसँ साहित्‍यक सागरक गहराइकेँ विस्‍तार नै भऽ सकैत अछि। जहिना बाढ़िक पानिसँ धारक दुनू कात दूर-दूर तक धारक विस्‍तार बुझना जाइत रहै छै, मुदा बाढ़ि सटकिते धारक सत्‍यप्रकट भऽ जाइ छै तहिना साहित्‍योमे होइ छै। कथा एहेन हेबा चाही जाहिमे भाषा-भावक ताल-मेलक संगे-संग कथामे जीवंतता आ दीर्घजीवी होइक तथ्‍य समाहित होइ। मात्र आधुनिकताक चोला पहिरा देला मात्रसँ कोनो कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। शब्‍दाडम्‍बर कथा नै होइ छै। नीक आ दीर्घजीवन हेतु कथामे विविध तत्‍वक समावेशकसंगे-संग मानव जीवनक जीजिविषाक प्रखरबिम्‍ब आ प्रतीक आवश्‍यक होइ छै। कथामे जौं जीव-जगतक गहनतम गहराइ नै रहै छै तँ ओ कथा बहुत समए धरि जीवित नै रहि सकैए। मैथिलीमे आइ कथाक अनेक नाआें देल जा रहल अछि- दीर्घ कथा, लघु कथा, विहनि कथा इत्‍यादि। मात्र नाआें रखि देलासँ कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। अदौसँ आइ धरि वएह कथा जीवित अछि जइमे धार छै। जइमे गति छै। जइमे जिनगीक उहापोह छै। जइमे यथार्थ छै आ कल्‍पनाक एहेन गठन छै जेकरा पाठक छोड़ितो छोड़ि नै पबैत अछि। ऐ दृष्‍टिए हम नन्‍द विलास रायक “सखारी-पेटारी”क तानी-भरनीपर विचार करबाक प्रयास करब। ‘सखारी-पेटारी’ िहनक पहिल कथा कृति छियनि। पहिल-पहिल कोनो काज करैमे कोनो ने कोनो त्रुटि हएब आश्चर्य नै। तैयो साहित्‍य सृजनक सरोकारकेँ देखैत हमर प्रयास रहत जे ऐ संग्रहक नीक-नीक कथाक समीक्षा नीक होइ आ सामान्‍य भावक कथाक फराक कऽ आगूसँ लेखक अपन कथामे आवश्‍यकतानुसार सुधारक प्रयास करबा हेतु धियान रखथि। आब हम श्री नन्‍द विलास राय जीक कथा ‘सखारी-पेटारी’केँ सोझामे रखि खोलबाक कोशिश करब। ‘सखारी-पेटारी’केँ खोलैक काज तँ जनीजातिक छेलनि। साँठब सेहो हुनके सबहक काज छेलनि। आइओ साँठ-उसार करब हुनके अधीन छन्‍हि। मुदा पुरुख आब बुझू तँ अदहा जनानीए भऽ गेला। साँठ-उसारमे आब हुनक भूमिका अहम भऽ गेलनि अछि। की कहू! सभटा समैक खेल छिऐ। आब देखू ने, श्री नन्‍द विलास राय पुरुख छथि मुदा ‘सखारी-पेटारी’ साँठि कऽ हमरा पकड़ा देला। हमहूँ पुरुखे। केते दिन धरि सोचैत रहलौं जे ऐ पेटारीकेँ कोनो जनानीएसँ खोलबएब मुदा ओहेन जनाना ताकब केतए। सखारी-पेटारीमे साँठल बौसक सनोमानो तँ कोनो बूढ़े-पुरान ने बुझै छै। थाकि-हारि कऽ पुरुखक साँठल सखारी-पेटारीकेँ अपनेसँ खोलैले तैयार भऽ गेलौं। आब एकटा दिक्कत भऽ गेल। सखारी आ पेटारी जौं अलग-अलग रहितए तब ने बेरा-बेरी खोिलतिऐ। दुनू एक्केमे अछि। चलू सखारी-पेटारीक जगह तँ आब ट्रंक लऽ लेलक। आब ओइमे सँ हम एक सभ समान अलग-अलग करबाक कोशिश करै छी। अपने मने गिरथानि बनैक कोशिशमे आब जे हएत से देखल जेतै। सखारी खुलल। देखू केतेक नीक बौस छै अइमे। समस्‍त मिथिलावासी एवं मैथिली भाषा-भाषीकेँ समरपित। ठीक बात। यौ, सखारीमे जे समान अबै छै, ओ मात्र घरवारीए सभ समान नै ने रखि लइ छथिन। चाउर, दालि, तरकारी, अदौड़ी, दनौड़ी, करुतेल इत्‍यादिसँ कनियाँक अबैक खुशीमे भोज-भात होइ छै। सौंसे गौआँ मिलि कऽ बर-कनियाँकेँ आशीष दैत खाइ छै। मुदा ओइ महक काजर, तेल, डोरि, फित्ता आ ककही इत्‍यादिक बड़ काज। कनियाँ देखए बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ नेना-भुटका तक जे अबैए, सभकेँ कनियाँ अपने हाथे केशमे तेल दऽ ओकरा झाड़ि कऽ ककहै छथिन। ककहि कऽ डोरि वा फित्तासँ बान्‍हि काजर-सिनुर लगबै छथिन। अगर पेटारीवाली कनियाँ से नै करथिन तँ हुनका भरदुलाहि कहतनि। राय जीक सखारी-पेटारीक समर्पण हमरा मोहि लेलक। हमरा लगैत अछि जे सभ मैथिलकेँ ई पाँति जरूर मोहत। चलू, आब चलै छी जे सखारी-पेटारीमे कोन-कोन तरहक वस्‍तु-जात अछि। यौ, ‘अप्‍पन-बात’मे तँ सखारी-पेटारीक वस्‍तु-जातक कोनो चर्चे ने छै। खाली आत्‍मेकथा आ समर्पण भरल अछि। यौ रायजी, आब बिआहे संग दुरागमन होइ छै। अहाँ तैयो पछुआ गेलौं। लगैए अहाँक बिआह-दुरागमन दू बेर भेल अछि। चलू- दरब-जात संग हम सर-समान तँ खोलए लेब। मुदा सखारीक दोसर झँपना खोलए पड़त। खुलि गेल। एकसत्तरि। वाह...। आब तँ एके संग दरबजात-वस्‍तुजात आ सिनुर-टिकुली सभटा चमकए लगल। चलू, देरीसँ एलौं मुदा दुरूश एलौं। सोइरी छछारब, निपुतराहा, जाति-पाति, वाड़ीक पटुआ आ बाबाधाम- ऐ संग्रहक उत्तम श्रेणीक कथा अछि। आब हम सोइरी छछारैत बाबा धामक यात्रापर चलै छी। बीचमे निपुतराहा, जाति-पाति आ वाड़ीक पटुआ सन कथापर अँटकैत ऐ यात्राकेँ विश्राम देब। ई पाँचो कथा सखारी-पेटारीक विशेष लक्षणसँ युक्‍त अछि। लक्षणा आ व्‍यंजना शब्‍द शक्‍तिसँ युक्‍त पाँचो कथा पाठककेँ कल्‍पना लोकसँ उतारि कऽ यथार्थक धरतीपर उतारैमे सक्षम अछि। मैथिल समाजक पारिवारिक-परिवेश आ तइमे धनक पाछू दौड़ैवाली नारी समाजक सोचपर सोइरी छछारब कथा करारा प्रहार करैत अछि। मालती आ ललिताक जन्‍मासौचक पश्चात सोइरी छछारैले जे परिस्‍थिति बनल अछि ओ मिथिलाक मध्‍यवर्गीय परिवारक यर्थाथ अछि। ऐ कथामे रीनाकेँ उपस्‍थित कऽ कथाकार बहुत होशियारीसँ कथाकेँ अन्‍तिम लक्ष्‍य तक पहुँचा देला अछि। जइ घरमे रीनानै रहै छै तैठाम विवश भऽ कऽ ललिता सन बेटीक सोइरी माइएकेँ छछारैले बाध्‍य हुअए पड़ै छै। मैथिल परिवारमे ललिता ऐ परिस्‍थितिकेँ भोगैत अखनौं जीबए लेल मजबूर अछि। ऐ कथाक व्‍यंग्‍य निश्चित रूपसँ पाठकक संग-संग भौजाइ लोकनिकेँ झमारबामे सक्षम अछि। सोइरी छछारबसँ निकलि हम जाति-पाति कथाक यथार्थपर अबै छी। मैथिल समाजक पतनक एकटा सभसँ महतपूर्ण कारण जाति-पातिक भेद-भाव सेहो अछि। तथाकथित बुधिजीवी समाजसँ लऽ कऽ श्रवजीवी समाज धरि जाति-पातिक रोग ऐ प्रकार पसरल अछि जे एकर निदान कैंसर आ एड्स विमारीक इलाजसँ अधिक कठिन अछि। कथाकार नुनुबाबूक चरित्रक मादे स्‍पष्‍ट कऽ देलनि जे जे समाजमे कोनो जातिक बेकती नुनुबाबूक उपकारसँ बाँचल नै अछि। ग्राम-पंचायतक प्रमुखक जे काज होइ छै तहूसँ अधिक नुनुबाबू समाज लेल कऽ रहल छथि। मुदा गामक जातिवादक समक्ष नुनुबाबू सन बेकती ताबत धरि नै चुनल जेता ताबे तक मैथिल समाजक माथमे जे जातिक कुण्‍ठाक भुस भरल रहल। आ जाधरि ओकरा बुधिकेँ आड़ीसँ चीरि कऽ विवेकक चुट्टासँ निकालि कऽ फेकल नै जाएत। ‘वाड़ीक-पटुआ’ ठीके बड़ तीत होइ छै। डाक्‍टर प्रमोद सन पटुआ तीत नै हेतै तँ फेर ई कहाबत किए बनतै। मंगनूबाबू असगरे एहेन बेकती नै छथि। जे सहज सुलभ होइत छै ओ निश्चित रूपे लोककेँ तीत लगै छै बरू ओ मिश्रीओसँ मीठ किएक ने होउ। लेखक निश्चित रूपे ऐ कथाक माध्‍यमसँ मंगनूबाबू सन लोकक मुँहक संग मनकेँ तीत करबामे सक्षम अछि। अटकैत-फटकैत बाबाधाम लग आबिए गेलौं। माए-बापक सेवा केने की हेतै। माल पोसने दूटा टका आ मनुख पोसने दूटा कथा ओहिना नै कहल गेल अछि। आन समाजक संगे-संग मैिथल समाजक स्‍थिति दारूण भेल जाइत अछि। ‘जिन मातु पिता की सेवा की’ (जे माए-बापक सेवा केला) केर भावना आइ मरल जा रहल अछि। आइ मैथिल समाजमे बाबाधाम जेबाक होड़ लागल रहैत अछि। बानरक देखा-देखीबला भावसँ भरल हेंजक-हेंज स्‍त्री-पुखख नब-नब वस्‍त्र आ तेहने आँखिक भावसँ भरल जखनि गामसँ विदा होइत अछि तँ हमरा सन मुरूख देखिते रहि जाइत छी। माए-बाप आ सासु-ससुरसँ भीन भऽ वृद्ध जनकेँ उपेक्षा करैत आजुक पीढ़ी नीचताक रस्‍तापर ऐ तरहेँ बढ़ि रहल अछि जे सुकनाक बाबू आ माए सन हजारो माता-पिता आइ पछताइत बाजि रहल अछि- जतने जतेक हम पाप बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाय मरनक बेर हरि क्‍यो नहि पूछलि एक करम संग जाय। उपर्युक्‍त पाँचो कथा अपन स्‍वरूप विस्‍तारक संगे-संग संवाद, पात्र योजना, परिवेश, भाषा शैली एवं उदेसक कसौटीपर कसल बुझना जाइत अछि। पाँचो कथाक शीर्षक सेहो आकर्षक एवं विषय-वस्‍तुक अनुरूप अछि। मैथिल समाजक विविध विडम्‍बनाक उपर्युक्‍त पाँचो कथा साक्षी अछि। आधुनिक व्‍यंग्‍य विधाक कथामे उपर्युक्‍त कथा जगह पबैक अधिकारी अछि। ‘सखारी-पेटारी’क छह गोट कथा आधुनिक समाजक पतनोन्‍मुख भाव-धाराकेँ रेखांकित करबाक प्रयास बुझना जाइत अछि। ‘डाक्‍टर बेटा’, ‘प्रोफेसर बेटा’, ‘डिब्‍बाबला दूध, ‘सोच, ‘भोँट, आ ‘ऐना’ कथामे एक कात माता-पिताक प्रति उपेक्षा अछि तँ दोसर कात सन्‍तानक प्रति उपेक्षा। ‘सोच’, ‘भोँट’ आ ‘ऐना’मे एक कात विकास हेतु छटपटाहटि, तँ दोसर दिस समाजमे व्‍याप्‍त संकुचित मानसिकता। मध्‍यवर्गीय समाजमे डाक्‍टर आ प्रोफेसर बनल बेक्‍तीकेँ परिवारक प्रति उपेक्षा पारिवारिक सिनेह आ समरसताकेँ क्षिण्‍ण-भिन्न करैबला मानसिकतसँ मानवता मरत। आधुनिक नारी शारीरिक सौन्‍दर्य बँचबैले सन्‍तानकेँ स्‍तनपान करैसँ कटब मातृत्‍वक प्रति उपेक्षाकेँ प्रदर्शित करैत अछि। ‘सोच’ कथामे प्राद्योगिकी शिक्षाक प्रति युवाकेँ बढ़ेबाक प्रयास छै। ‘भोँट’ आ ‘ऐना’ मनुखक आँखि खोलैक प्रयास अछि। ऐ छबो कहानीमे छोट अकारमे अनेक विषयकेँ उठौल गेल अछि। मुदा ऐ कथा सभमे ऊपरका कहानी सन भाषामे धार नै बुझना जाइत अछि। कथाक शीर्षक आकर्षक एवं विषय-वस्‍तुक अनुकूल हेबाक चाही। ‘ऐना’आ ‘सोच’ शीर्षक तँ आकर्षक एवं विषयानुकूल अछि। शेष चारि गोट कथाक शीर्षक हमरा बुझने कमजोर अछि। नन्‍द विलास रायक सखारी-पेटारीमे दू गोट कथा जनता आ सरकारी तंत्रक आँखि मुनौबलिपर आधारित अछि। लेखक दुनू कथाक माध्‍यमसँ सरकारी क्रिया-कलाप आ गाम-गाममे सरकारी सहायताकेँ बन्‍दर-बाँटक आद्यान्‍त वर्णन करबाक प्रयास केला अछि। प्रयासमे लगभग सफलो भेला अछि। पोषाहारक अनाजक विरोधमे जेना प्रमुख मामिलाकेँ खतम करेलक से ‘निवास प्रमाण पत्र’ मे लगभग विरोधा भास लगैत अछि। जखनि मुखिया आ प्रमुख लेल एकटा प्रमाण-पत्र बनबबैमे संग नै दइ छै ओ गहुमकेँ बन्‍दर-बाँट कऽ सत्‍यताकेँ सिद्ध कऽ शिक्षककेँ गहुम कीनि कऽ बाँटैले केना कहि सकै छै? एतबे नै, ओइ शिक्षिकाक पति गामक दबंग अछि। पोषाहारक गहुम बेचि तँ अखनि साधारण बात छी। तँए दुनू कथाक प्रमुखक चरित्रमे विश्वसनीयतासँ अलग काल्‍पनिकता आबि गेल अछि। ‘गोबरबिछनी’, ‘असल बेटा’, ‘ननदि-भौजाइ’, ‘विवेकक विवेक’, ‘सभसँ पैघ पूजी’, ‘चौरचनक दही’क संग ‘महाजन’ शीर्षकक कथाकेँ हम आदर्शवादी कथाक रूपमे देखि सकै छी। अही कोटिक कथामे भावक सुन्‍दर समन्‍वय देखना जाइत अछि। कथा रचना, ओकर विस्‍तारक मध्‍य आ अन्‍तक सुन्‍दर परिपाक अछि। रायजी कथा गढ़ैमे माहिर छथि। कथाक ताना-बानामे बान्‍हब पुन:ओकरा अन्‍तिम परिणति धरि लऽ जाएबमे रूकै नै छथि। ऐ कोटिक कथाक भाषा आ भाव-भंगिमा सरस आ प्रवाहगामी छन्‍हि। “महान कथी? धनीक छी तँए महान? नै, जे हृदए महान हुअए। जेकर आत्‍मा महान हुअए। ...वएह महान आदमी हएत आ महाजन कहौत।” (महाजन) भाषाक एकटा आरो बानगी- “एक परनहिया तँ शोकेमे डुमल रहली। बेटी बुचनीक मुँह देखि फेरसँ काज-राज करए लगली।” (गोबर बिछनी) राय जीक भाषा परिवेश जनित भावकेँ समाहित करबामे पूर्णरूपेण सक्षम छन्‍हि। “जखनि नेना लाल पीसा साइकिलपर मीना बहिनकेँ बैसा मदना विदा भेला तँ ओ बौम फाड़ि कऽ कानए लगला।” (विवेकक विवेक) एे ‘कानब’मे एक्के संग अनेक भावक विस्‍तार अछि। समग्र कथा संग्रहकेँ पढ़ला पछाति केतौ-केतौ हिन्‍दी अथबा उर्दू शब्‍दक अनपच बेवहार भेल छै। ओ हमरा अनसोहाँत लागल। जेना- जे ‘दिल’ महान होअए। हमरा सभ बात ‘मालूम’ भेल। ‘लाइन, कौलेज, प्रोफेसरक, इंजीनियर, बी.ए, डी.एम.सी.एच, चौठियाकेँ अपन गलती ‘महसूस’ भेल अछि। अन्‍तिम खानामे, विवेच्‍य कथाक शैली आ शीर्षक प्राय: अभिधामूलक छन्‍हि। लक्षणा आ व्‍यंजनाक माध्‍यमसँ ऐ कथा सभमे आरो आकर्षण बढ़ि सकैत छेलै। संगे-संग भावक अभिनय रूप सेहो। अन्‍तत: हम कहि सकै छी जे ‘सखारी-पेटारी’ मैथिली कथा साहित्‍यक विकासक एकटा नीक कड़ी सिद्ध होएत। लेखकसँ आग्रह जे भाषा विचारक माध्‍यमे टा नै वाहको होइ छै। तँए भाषा-भावक संतुलित बेवहारसँ साहित्‍यमे रमणीयता अथवा भावक प्रवाह तीव्रगामी होइत छै। कथामे विषयक संग-संग नब-नब प्रतीक बिम्‍ब आ बात उठा कऽ पाठककेँ सहजे कथाकार बान्‍हि सकै छथि। तँए कथामे उतरोत्तर विकास परिलक्षित हएब आवश्‍यक छै। तथास्‍तु। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ 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