VIDEHA — Issue 183 / अंक १८३

Publication: VIDEHA · Issue: 183
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८३ म अंक ०१ अगस्त २०१५ (वर्ष ८ मास ९२ अंक १८३) ऐ अंकमे अछि:- ऐ अंकमे अछि:- जल भँवर राजदेव मण्‍डल 1. पञ्चमीक राति अन्‍तिम पहरपर लटकल छल। केतौ एकटा चिड़ै चुनचुनाएल। राजेसरक देह चौकीपर पड़ल छेलै मुदा मन सपनामे दौगैत-पड़ाइत। निन्नमे डुमल साँसक तीव्रस्‍वर। ओइ गतिसँ दौगैत सपनामे केतएसँ केतए पहुँच गेल छेलै। ओ देखि रहल छल, सपनाक रंग भरल चित्र...। गाछक निचला भाग अन्‍हारमे डुमल छल। ओइ अन्‍हारमे ओ ठाढ़ भेल छल। धरती आ अकासक बीच विचारकेँ पकड़ने। अकस्‍मात भयंकर अट्टहास सुनलक। राजेसर चौंक उठल। आकि पाछूसँ केकरो कनबाक स्‍वर ओकरा हिला देलक। चारूभर तकलक। वायुक गति बिहाड़ि सन। आगूमे जेना किछो गरजल। देखलक जे राक्षस सन आकृतिबला एक हाँज जीव ठाढ़ भेल छेलै। ओ सभटा एकेबेर आक्रमण करैले दौगल। जान बँचेबाक कोनो उपाय नै सुझलै। लपैक कऽ ओ डारि पकैड़ गाछपर चढ़ि गेल। आक्रमणक मुद्रा बनौने जीव सभ लपकैले चेष्‍टा करए लगलै। डरे थरथराइत राजेसर ऊपरका डारि पकड़बाक यत्‍न करऽ लगल। किन्‍तु डारिकेँ पकड़िते मोचरा जाइ छेलै। मोचराएल डारिपर लटकल राजेसर चिचिया लगल। डारिकेँ कड़कड़ाइते राजेसरक धुकधुकी तीव्र भऽ गेल। भंयकर जीव सभ फानि-फानि कऽ ओकरा पकड़बाक कोशिश करऽ लगलै। बँचबाक लेल ओ एमहरसँ ओमहर डारिपर झूलए लगल। ओकर देह कखनो अन्‍हारमे तँ कखनो इजोतमे चलि जाइ छल। तखने सौंसे गाछ कड़कड़ा उठल। राजेसर जोरसँ हल्‍ला केलक- “हौ भागै जा... जल्‍दी। गाछ खसि रहल छै। तऽरमे पिचा जेबहक।” भयानक जीव सभ उनटि कऽ तकैत भागऽ लगलै। ओकरा सबहक आँखिमे परेम आ घृणा दुनू भरल छेलै। तखैने राजेसरक जेठ भाय- जागेसर जोरसँ हल्‍ला केलक- “रौ... राजेसर। उठ जल्‍दी। भिनसरबा भऽ गेलै। चल हमरा धार तक पहुँचा। नाह सबेरे खुगै छै।” राजेसरक सपना भंग भऽ गेल छेलै। डरसँ घमाएल देहकेँ पोछलक। साँसकेँ सहज करैत बाहर दिस देखलक। घरसँ बाहर इजोत हुलकी मारै छेलै। 2. सुर्जक स्‍वर्णिम किरिण पृथ्‍वीपर पसैर गेल छल। दूर-दूर धरि छुछे बाउल पसरल। हरियरीक नाओंपर केतौ-केतौ खढ़क झाँकुड़। बगलसँ बहैत धार। आ पानिपर दौगैत रंग-बिरंगक किरिण। चमकैत पसरल बाउलपर दूटा मनुखक छाँह ठाढ़ भेल छल। उड़ैत बाउलपर दौगैत आँखि जेना किछो ताकि रहल छेलै। अगिला पुरुखक देह दुबर-पातर। रौद-पानिमे रेताएल श्‍याम-शरीर। हाथमे लाठी आ छाता लेने जागेसर ठाढ़ छल। पाछूमे ओकर छोट भाए राजेसर। पुष्‍ट शरीर। वर्ण कनी साफ। जुआनीक रंगसँ चमकैत। मुख उत्‍साहसँ दमकैत। दुनू भाँइ भिनसरबे गामसँ चलल रहै। धारक किनारपर अबैत-अबैत भोरका किरिण देहपर पड़ए लगलै। जागेसर बेचैन दृष्‍टिसँ धारक फनकैत पानि दिस तकलक आ बजल- “रौ राजेसर, नाह कहाँ छै?” “नाहबला केानो साधारण लोक छै। ऊ अपना बखतसँ एतै। लोकक बेगरतासँ ओकरा कोन मतलब।” “हँ कहै छी ठीके। बड़ टेँटियाह होइ छै। एके मिनटमे अपन रूप बदलि लइ छै।” कहैत जागेसर अपना नजैरकेँ धार दिस दौड़ौलक मुदा मन बहिनक संकटमे घुरिया रहल छेलै। राजेसरक पएर स्‍वत: पानि लग पहुँच गेलै। सोचलक, केतेक पानि हेतै। हेलि कऽ टपल नै जा सकैत अछि। एकटा पएर पानिमे देलक। हड़बड़ा कऽ कछेरक माटि नेने पानिमे खसल। “आहि रौ तोरी के।” डाँड़ धरि पानिमे चलि गेल। जागेसर ‘हाँ हाँ’ करैत दौगल। आ ओकर हाथ पकैड़ घींच लेलक। जागेसर डपटैत बाजल- “एना जँ लुच्‍चा जकाँ करबहक तँ डुमि जेबहक। आब तूँ जवान भेलहक। देखै छहक, लोक प्रकृतिकेँ परनाम करै छै। मनकेँ एकाग्र करै छै तब सोचि-विचारि कऽ कोनो काज करै छै।” मुड़ी झुकौने राजेसर भीजल नुआँकेँ झाड़ए लगल। तखने एकटा पुरुख ओनएसँ आएल। सौंसे देह गरदा आ बाउल पड़ल। जागेसर ओकरा दिस तकैत बाजल- “हौ भाय। नाह कहाँ छै?” “हमहीं नाहक ठीकेदारी नेने छी। हम खढ़ बेचै छी। लेबहक?” जागेसर पुछलकै- “खढ़ बेचै छहक?” “उपजै छै खढ़ आ बेचबै चाउर।” पुरुख तमसाइत चलि देलक। राजेसर पुछलकै- “एना तमसाइ किए छै?” जागेसर बाजल- “एकर कोनो दोख नै छै बौआ।” धार दिस तकैत गम्‍भीर सुरमे बजल- “दुख आ अभावसँ बेथित लोक अमरीत-वाणी केतएसँ अनतै। अमरीतक अभावमे बीख तँ राज करबे करतै। ई लड़ाइ होइते रहतै।” नाहकेँ अबैत देखि दुनूक मनमे आसक संचार हुअ लगलै। 3. सघन मेघक खण्‍ड सुरुजकेँ झँपने छल। दौगैत-पड़ाइत खोजैत मेघ। मेघक दोगसँ हुलकी मारैत तीखर किरिण। बाध-बोनमे काज करैत लोककेँ दुपहरियाक भूख बेसी तंग-तवाह करै छै। नचैत दुपहरियामे बाध-बोन सुन-मसान। सुनहट बाट जेना निसाँस छोड़ैत रहै। बाटक दुनूकात पसरल खेत। केतौ-केतौ गाछी-बिरछी ठाढ़ भेल। सुनहट बाटपर राजेसर बढ़ल जा रहल छल। रस्‍ता-पेराक नापैत पएर। मुदा मनमे सनसना रहल छेलै, साँझक गप्‍प। साँझेमे तँ सुनने रहै जे ओकर बहिन बेसी बेमार पड़ि गेल छै। तँए आइ भिनसरे ओकर जेठ भाय- जागेसर- बहिनक हाल-चाल बुझैले विदा भऽ गेल छेलै। जागेसरकेँ कोसीक कछेर तक पहुँचबैले राजेसर संगे गेल छल। जागेसरकेँ नाहपर चढ़ेला बाद राजेसर आपस गाम दिस आबि रहल छेलै। ओकर बढ़ैत पैरक संगे विचारक क्रम सेहो बढ़ऽ लगलै। सोचए लगल, जिनगीमे केहेन-केहेन वियोगक छन अबै छै आ ओइ छनकेँ कल्‍पना मात्रसँ लोक केतेक दुखित रहैत अछि। मुदा जखैन ओ दुखक छन आबि जाइ छै तँ केहेन सहजतासँ सभ सहि लैत अछि। एके अँगनामे भाए-बहिन खेलैत-कुदैत, पलैत-बढ़ैत रहैए। माए-बाप, भाए-बहिनक बीच सिनेहक जाल केतेक सघन भऽ गेल रहैत अछि। किन्तु बिआह भेला बाद बहिनकेँ ऐ घरसँ विदा हुअ पड़ै छै। दिन-दिनसँ जुआन भेल सिनेहकेँ छोड़ैत आ तोड़ैकाल केहेन पीड़ासँ गुजरए पड़ैत हेतै? भाए-बहिनक बीच निरन्‍तर बढ़ैत दूरी। गाम-घर, माए-बाप, अड़ोसी-पड़ोसी सभकेँ बिसैर बहिन सासुर दिस विदा भऽ जाइत अछि। ओइ बिछुड़ैत घड़ीमे बहिनक हृदए केना फटैत हेतै...? ओह...! बिआह लगीचेमे हेबाक चाही। जइसँ भेँट करैमे समस्‍या नै होइ। जागेसर भैया ई नीक नै केलक, जे बहिनक बिआह एतेक दूर कोसी धारक ओइ पार कऽ देलकै। फेर ओकरा मनमे बहिनक संग खेलल गेल खेल सबहक स्‍मरण हुअ लगल। तखने टिपिड़-टिपिड़ पानि पड़ऽ लगल। राजेसरक सोचक क्रम टुटल। ओ मुड़ी उठा अकास दिस तकलक। मेघ धरती दिस नमरल जा रहल छल। सौनक मेघ होइते छै अहिना। केनौउसँ एगो टुकड़ी नमरल आ झर-झरा कऽ बरैस गेल। राजेसर अंग-पोछासँ मुँहपर पड़ल पानिकेँ पोछलक। आ आगू मुहेँ नजैर दौगेलक। बलान धारमे बाढ़ि आबि गेल छेलै। कछेरक खेत सभ पानिसँ डुमल जा रहल छेलै। बाउलक ऊँचका भिण्‍डा सभ सूखल छेलै। रोपल धानकेँ बाउलसँ भरैत बलान माय। केतेको बरिससँ ई बलान नदी ऐठाम घुरिया रहल छै। आस-पासक गाम सबहक माटकेँ प्राण विहीन कऽ देने छै। कोनो ठाम बाउलक भिण्‍डा तँ कोनो ठाम खत्ता। केतौ समतल नहि। केकरो खेतमे नीक माटि तँ केकरो खेते मरा गेल। कोइ मनक मन धान उपजबैत तँ कोइ हक्कन कनैत। तब ने कोइ ईहो कहै छै, आएल बलान तँ बान्‍हू दलान आ गेल बलान तँ टुटल दलान। स्‍वतंत्रताक लेल ई नदी किछो कऽ सकैत अछि। केतबो ऊँचगर बान्‍हसँ घेर दियौ बाउलसँ भरना करैत फानि कऽ ओइपार टपि जाएत। जइ बाटे मन होइ, जइ गाम जेबाक होइ, ओतए चलि जाएत। ऐबेर ई नदी राजेसरक गामकेँ चारूभरसँ घेरने छै। उत्तरसँ अबैत धारा दू भागमे विभक्‍त। गामक पुबरिया धारा मोट-गहींर मुदा पछबरिया धारा पातर। जेना बड़का साँप गामकेँ घेरने होइ। गामक उतरबरिया कात ऊँचका भिण्‍डापर स्‍कूल। धारक घेरासँ बँचल छै। स्‍कूलक भिण्‍डापर ठाढ़ भऽ कऽ सौंसे गामक छप्‍पर देखल जा सकै अछि। दूर-दूर धरि पसरल खेत...। राजेसरक गाम। कोनो बेसी नमहरो नै आ ने कोनो बेसी छोट। सभ तरहक लोक आ जाति। जातिक भेद नहि, एकेठाम बसल। दूटा टोल मुदा एकेमे मिलल। किन्‍तु अन्‍तर अछि-एकटा। गरीब, मजदूरक विचार सभ रंगक। मुदा जमीनबला धनिक सबहक विचार एके रंग। राजेसर सोचलक, की होइ छै जे हमरा सभकेँ आपसी झगड़ासँ फुरसति नहि भेटैए आ ओकरा सभकेँ एके इशारा...। मेघक गर्जनासँ ओकर धियान दोसर दिस भऽ गेल। पानिक झीसी बन्न भऽ गेल छेलै। हवामे ठण्‍ढी आबि गेल छेलै। मनकेँ प्रसन्न करैबला समए...। राजेसर अपना गामक बाधमे पहुँच गेल छल। कनी आगूसँ हड़हड़ाइत, फनकैत भूतही बलानक धारा...। राजेसरक पएर गाम दिसक बाटपर बढ़ऽ लगल। बर्खामे भीजला कारणे देहक ठेही निकलि गेल छेलै। ठण्‍ढाएल हवासँ मन आन्‍नदित हुअ लगलै। ओ गुनगुनाए लगल। शनै: शनै: अवाज तीव्र हुअ लगलै- “कहमाँ बहै छै मैया कमलेसरी कहमाँ बहै छै बलान। माँझ तिरहुत बहै छै मैया कमलेसरी अलापुरमे बहै छै बलान। केते जल बहै छै मैया कमलेसरी केते जल बहै छै बलान। अगम जल बहै मैया कमलेसर रिमझिम बहै छै बलान। कथी दऽ बोधबै मैया कमलेसरी कथी दऽ बोधबै बलान। पान-फूल दऽ बोधबै मैया कमलेसरी पाठी दऽ बोधबै बलान।” ‘छपाक’ दऽ पानिमे किछु खसल। ओही शब्‍दसँ गीतक क्रम टुटि गेल। राजेसर अकचका कऽ चारूभर तकलक। आँखि खोललक मुदा किछो नै भेटल। मन घुरिया लगलै आ देह आगू बढ़ल। ओ बाउलक ऊँचगर ढूहपर चढ़ि चारूभर नजैरकेँ दौगेलक। आँखि ठाढ़ भऽ गेल। धुरक कातसँ एकटा नारीक आकृति ओकरे दिस टक-टक तकैत। ठोरपर मन्‍द मुस्‍कान। राजेसर छड़ैप कऽ ढूहपर सँ उतरल। ओ गमछासँ मुँह पोछैत ओम्‍हरे टाँग बढ़ेलक। लग गेलापर देखैत अछि जे नीता धूरक कातमे बैसल अछि। मुड़ी नमरौने खुरपीसँ माटि कैच रहल अछि। कातमे घाससँ भरल छीटा छै। राजेसर अनुमान लगेलक जे यएह माटिक ढेपा पानिमे फेकने हएत। मुदा तेना अनठौने अछि जे के कहत एकर किरदानी छी। राजेसर किछुकाल धरि ओकरे दिस तकैत रहि गेल। हरिअर रंगक साड़ीकेँ ठेहुन धरि समेटने। बाँहिपर कसल ब्‍लाउज। सिनुरिया भेल मुँहपर लटकल एकटा लट। बरखामे भीजल केशसँ चुबैत पानिक बून ललियाएल कपोलपर ससैर रहल छल। लगै छेलै जेना करियाएल मेघसँ टपकैत मोती चानपर गिर रहल होइ। पिआसल नजैर पिबैत रहल रूपक पानि, किन्‍तु केतेकाल? किछु एहनो समए होइ छै जइमे अभिनय चलैत-चलैत यर्थाथ बनि जाइ छै। आ ओइ यर्थाथकेँ सहजताक संग अंगीकार करऽ पड़ै छै। राजेसर खखसल। नीता अकचकाइत मुड़ी घुमौलक। पातर ललियाएल ठोरपर मन्‍द मुस्‍कान। आँखिक भवमे सहज आकर्षण। राजेसर तकिते रहि गेल। नीता बजली- “की यौ गबैया, बड़ी टहकारसँ गाबै छेलौं। जेहने गीत तेहने मधुर गला।” राजेसर ठाढ़भेल ओहिना तकैत रहल, जेना पहिने तकै छल। नीता नजैर घुमबैत पुन: बजली- “हे यौ, एना किए टकटकी लगौने छी, हम की कोनो चुड़ीन छी।” राजेसर हँसैत बाजल- “हमरा तँ बूझि पड़ैत अछि जे अहाँ जलपरी छी। तुरन्‍ते पानिसँ निकलि कऽ बैसल छी। तँए मन होइए जे अहाँकेँ देखिते रही।” “अहाँकेँ तँ हरदम मजाके सुझैए।” “ई मजाक नै अछि नीतू। लोक जँ नीक कहैत तँ अहाँकेँ आँखिक सोझहासँ परोछ नइ हुअ दइतौं। मुदा करब की...।” “रोकैत के अछि, अहाँकेँ?” “रोकत के हमरा। मुदा बिआहसँ पहिने ई गप्‍प ठीक नै अछि। समाजक लाज-धाक तँ राखए पड़ै छै। जनिते छिऐ, अपना गाममे केहेन-केहेन अगिलगौना सभ अछि। छनेमे तिलकेँ ताड़ बना देत।” “तँए ऐ डरे चारि दिनसँ नुकाएल छेलौं।” “से बात नै छै। माइक बेमारीक कारणे ओझरा गेल छेलौं। पथ-पानि,दवाइ करैमे अपसियाँत छेलौं।” “सएह यौ, हमरा तँ कखनो-काल डर भऽ जाइत अछि। कहींहम बिच्‍चे धारमे ने डूमि जाइ।” “अहाँ घबराउ नै। हमरा शपथपर बिसवास राखू। अहाँकेँ छोड़ि दोसरसँ हमर बिआह नै हएत। किछु दिन परतीछा करए पड़त।” नीताक मुँहपर खुशीक रेखा आएल आ सिनुरिया रंग छोड़ैत चलि गेल। गप्‍प दुनूकेँ आर निकट लाबि लेलक। नीता मुड़ी नुहरौने बजली- “परतीछा तँ हम जिनगी भरि कऽ सकै छी। मुदा एकटा गप्‍प बूझि लिअ। जहिया ई बात होएत तहिया गाममे हड़कम्‍प मचि जाएत।” “से किए? बिआह तँ होइते रहै छै।” “होइ छै। अपना जातिमे। आन जातिमे नहि। गरीब-धनिक सेहो देखल जाइ छै। हम तँ जातियो आ धनोमे अहाँसँ हीन छी। ओनऽ परिवार आ समाज ओहो सभ रोकत।” “अहाँ बेकारे चिन्‍ता करै छी। हमरापर बिसवास राखू। हम केकरोसँ डरेबला नै छी।” कहैत राजेसर आरो लग सहटि गेल। नीताक बाँहि दिस तकैत बाजल- “अहाँक बाँहिपर ई कथीक चेन्‍ह छी? कोइ मारलक की?” “हँ, बाबू खिसया कऽ एक छौंकी मारलक।” “की भेल रहै से?” “धरमलालक काज गछने रहै। हमरा कहने रहै जे ओकरा अँगना जा कऽ काज कऽ दिहनि। हम नइ गेलिऐ।” “किए नै गेलिऐ?” “हे यौ, ओकरा ऐठाम जँ काज करैले जाइ छी तँ लगैत रहैए जे धरमलाल आँखिमे गिर लेत। हरदम टकटकी लगौने रहै छै। हमरा डर होइए। बाबू ई बात बुझबे ने करै छै। कहबै केना।” “अहाँ चिन्‍ता नै करू। हमर मोटका डेरहत्‍थी लाठी राखल छै। जँ अहाँक किछ कहत तँ कपारे फोड़ि देबै।” “हे यौ, बापक संगे ओकर बेटो ओहने छै।” गप-सप्‍पक क्रममे राजेसरक अंग नीतासँ स्‍पर्श भऽ गेलै। स्‍पर्शक सुखद आकर्षण...। राजेसर चाहलक जे नीताकेँ पाँजिया ली। नीता बँचबाक लेल चेष्‍टा केलक आ धड़फड़ाइत धारमे खसि पड़ल।जलक तीव्र वेगक कारणे भँसिया लगल। मुदा राजेसर चट दऽ धारमे धसि गेल आ नीताक बाँहि पकैड़ कछेर दिस घिंच लेलक। दुनू हतप्रभ। एक दोसर दिस तकैत। डर आ सिनेह एके संग बरखैत...। नीताक सभटा वस्‍त्र भीज कऽ देहमे सटि गेल छेलै। राजेसरोक वस्‍त्र डाँड़ धरि भीजल। अपना दिस धियान जाइते नीताक नजैर नीचा झूकि गेल। पानिक शोर सुनहटकेँ भंग कऽ रहल छेलै। दूरसँ कोइ खखसल। दुनू गोरे मुड़ी उठा कऽ देखलक। कालीकान्‍त कोदारि कान्‍हपर नेने आबि रहल छेलै। किछु एहनो लोक होइ छै जेकर डर सभकेँ होइत रहै छै। आ ओकरा तापसँ लोक हटले रहैए। नीक आ अधलाहक मध्‍य डरक सत्ता। ...आ सत्ताक निच्‍चाँ सुख-दुखमे डुमल लोक। राजेसर आ नीताकेँ जेना डर चारूकातसँ घेरि लेलक। दुनू आँखिएसँ किछु गप्‍प केलक आ अपन-अपन बाट धऽ लेलक। आ धारक पानि जेना हँसए लगल। 4. राजेसरक देह थाकल-ठेहियाएल आ निन्नमे मातल छेलै। मुनल ऑंखिमे नचैत रहै- सपनाक सतरंगी संसार। ओ स्‍वच्‍छ झीलमे हेल रहल छल। गहींर झील। अगम-अथाह, झलमलाइत पानि। कनी अन्‍हार कनी इजोत। मुदा ओइ पानिमे राजेसरकेँ डर नइ होइ छेलै। शरीरमे स्‍पर्श करैत जलसँ ओकरा सुखद अनुभूति भऽ रहल छेलै। ओ हेलैत आगू बढ़ले जा रहल छल। आकि कियो गट्टा पकैड़ झमारऽ लगलै। कानकेँ कोनो शबद हिलौलकै। भुक्क दऽ ओकर निन्न टूटि गेलै। धड़फड़ा कऽ उठि गेलै। छनेमे सुन्‍दर सपना आगूसँ अलोपित भऽ गेल छेलै। ओ अँङ्गैठी करैत उठि कऽ बैसल। आगूमे भौजाइकेँ ठाढ़ भेल देखलकै। ओसारसँ नीचॉं उतैर अकास दिस तकलक तँ देखलक जे ललियाएल सुरुज धरती दिस हुलकी मारि रहल छेलै। खोंतासँ बाहर चिड़ै-चुनमुनी चुन-चुना रहल छल। मेघ अपन मोहक चित्र बना रहल छेलै। भौजाइक शबदसँ राजेसर पाछू घूमि तकलक। “गिरहत तकैले आएल छेलै। काज गछने छल। जाइयौ ने। आइ भाइक बदलामे काज कऽ देबै।” गप्‍प सुनि जेना तुरतेमे राजेसरक मन तितौंस भऽ गेलै। मुँह घोंकचबैत ओ दुआरिसँ बाहर विदा भऽ गेलै। अदहा सौन सनसना कऽ बीति गेल छेलै। रेड़-बरहा करितो धन-रोपनी तेजीसँ भऽ रहल छल। एहेन समैमे जनो-मजदूर खुशामदोपर नइ भेटत। रोपनी-कटनीक लेल लोक बाहर चलि जाइत अछि। काज केनिहारक अभाव सोभाविक छै। काज करेबाक अछि तँ खुशामद करए पड़त। अहिना होइ छै- कखनो नाहपर गाड़ी तँ कखनो गाड़ीपर नाह। जन-मजदूर, काज केनिहार, श्रमशक्‍तिकेँ ने मान-सम्‍मान आ ने उचित श्रमक मूल्‍य भेटै छै। सोभाविक छै जे ओ सभ पलायन करतै। राजेसरक सोच फेर दोसर दिस घुमलै। गछल छै तँ काज करैले जाए पड़त। ओकर पएर पोखरिक महार दिस बढ़ल। दरबज्‍जापर सबहक बरद सानी-कुटी खा रहल छेलै। किछु गिरहत टेक्‍टरक जोगाड़मे लगल। गप हँकैत। धनक ठेसी सभसँ बेसी। “धुर हम तँ दू दिनमेखेती कऽ लेबै।” अधिक खेतबला सभ जनकेँ होहकारने खेत दिस जा रहल छल। “रौ जल्‍दी चल। खेत चटपटाएल छै। पानि सुइख जेतौ तँ मुँह तकैत रहि जेमेँ।” चौबटियापर मलकेसर जोर-जोरसँ सोर पाड़ि रहल छेलै- “रौ ढोकबाऽ ऽ ऽ। दुपहरिया भेल जाइ छै। तूँ सभ पड़ले रहमेँ।” ओइ टोलक लोककेँ बुझले छै जे गिरहतकेँ चिचियाइक आदत छै। तँए अनठौने अछि। मलकेसर फेर हल्‍ला केलक- “रौ सुनै छीही आकि नइ। रौ ढोकबाऽ ऽ ऽ। मरि गेल छी की...?” मखना ओही टोलपर सँ आबि रहल छल। एक नम्‍बरक बकटेँट अछि। ओकरा बुझल छेलै जे मलकेसरक बाप कारी बाबू एकबेर घरढुक्का काण्‍डमे पकड़ा गेल रहइ। ओही दिनसँ परोछमे लेाक ओकरा करिया बोता कहए लगलै। मलकेसर जँ अनछपोमे सुनि जाइ तँ झगड़ा शुरू...। मलकेसर हल्‍ला करिते छल। मखनो जोरसँ सोर पाड़लक- “बक् छू...। बक् छू...। करिया बोता बक् छू...।” मलकेसरक ऑंखि ललिया गेलै। तामसे हाथ थरथराए लगलै। हाथमे लाठी रहबेकरै। लाठीक हूर उठा कऽ ओकरा लगीच गेलै। “रौ सार, तूँ एहेन बात बजमेँ। देखै छी लाठीक हूराठ। एके हूराठमे...।” “हे, हम तोहर करजा धारने छियह आकि कमाएल खाइ छियह। ईह, टेरही देखबैत अछि!” “तूँ एहेन अधला गप बजलेँ किएक? तूँ हमरा...।” “हम तोरा नहि कहलियऽ हम तँ अखनियोँ बोताकेँ सोर पाड़बै- बक् छू...। बक् छू...।” मलकेसर तामसे थरथराए लगल। करोध बरदाससँ बाहर। ओ मखनाक मुँहकेँ लाठीक हूराठसँ हूराठि देलकै। अचक्‍केमे चोट लगलासँ मखना चितंगे खसि पड़ल। लाठीकेँ सोझ करैत मलकेसर बाजल- “की बूझि पड़ै छौ तोरा, कमजोर। रौ बाप तँ हमरा सोझहामे बजबे नइ करतौ आ तूँ फटर-फटर...।” कहैत घूमि कऽ विदा हुअ लगल आकि मखना सुतले-सुतल ओकर टॉंग पकैड़ सट दऽ घींच लेलक। मलकेसर मुहेँ भरे गिरल। ओइठाम राखल पथ्‍थलपर गिरलाक कारणे डॉंड़मे बेसी चोट लगि गेलै। बात आगू बढितै ताबे ‘हॉं हॉं’ करैत राजेसर बीचमे पहूँच गेलै। खेत-पथार दिस जाइत गौऑं-घरूआ ठमैक गेल। दुनू गोरेकेँ पकैड़ अलग केलक। फोंफियाइत मलकेसर बाजल- “देखलिऐ ने यौ अपने लोकनि, ई छौड़ा हमरा डॉंड़ सरका देलक। रौ रजेसरा गवाही रहिहेँ।” भीड़सँ अवाज निकलल- “यौ मलकेसर बाबू, अहॉं शान्‍त रहू। साँझहेमे पंचैती करब। एतेक ठेसी।” “हँ यौ, एकरा सबहक मन बढ़ि गेलै। जेतए देखियौ, जबरदस्‍तीए बात करत। बुढ़बाकेँ डॉंड़ सरका देलकै।” “मखनोक मुँह फुला देलकै। कोनो की एके दिस गलती भेलै। फटाक दऽ पहिने लाठी नै चला देबाक चाही।” “साँझेमे फरिया जेतै जे केकर गलती छै।” “हँ हँ, बुझले तँ छै जे गाममे केहेन पंचैती होइ छै। मुँह देखि मुंगबा...।” राजेसर चुपचाप ओही भीड़मे ठाढ़ छल। कालीकान्‍त कार कौआ जकॉं टॉंहि दऽ बाजल- “रौ रजेसरा हम तोरा तकने फिरै छियौ। तूँ पंचैती करै छेँ। हर-जन खेत पहुँच गेलै। जल्‍दी चल।” लबरा अबिते बाजल- “रौ चल करैले खेती-पथारी, नइ तँ बिका जेतौ बाड़ी-झाड़ी।” “देखही लबरा अबिते अपन लबरपन शुरू करि देलकै।” “तँ हम कहॉं कहै छिऐ- बक् छू...। बक् छू...।” सभ हँसैत-मुस्‍कियाइत चलि देलक। 5. दिन भरिक काज कऽ जखैन लोक आपस अबैत रहै छै तखैन सफलता-विफलता, जश-अपजश, नीक-अधला सभ घेरने रहै छै। रोपनी-कमैनी करैबलाकेँ तँ बाते किछु आर रहै छै। रौदाएल देह, घामसँ भीजल कपड़ा-लत्ता। भुखाएल पेट, पियासल मन, मुरझाएल मुँह, टॉंग-हाथमे सटल थाल-कादो। गाम दिस बढ़ैत पएर बाधक चिन्‍ता छोड़ि दइ छै। किन्‍तु गाम परहक चिन्‍ता कपारपर चढ़ि जाइ छै। एहेन बखतमे ऑंखिमे तामस नचिते रहै छै। सुरूज डुमैमे अखैन किछु बिलम्‍मे छेलै। राजेसर बँसबिट्टी लग आबि ठाढ़ भऽ गेलै। ऑंखि चारूभर घूमि-घूमि ताकए लगलै। अहीठाम तँ नीता भेँट करैले कहने छल? कहॉं देखै छिऐ। ठकि लेलक की? फेर ओकर पूर्व मिलनक घटना सभ मन पड़ए लगलै। आ जेना शीतल बसातक एकटा झोंक आबि देहकेँ सिहरा देलकै। आहट सुनलक तँ मुड़ी उठा कऽ आगू तकलक। धरमलाल बाबूक बेटा कुलानन्‍द लगमे आबि गेल छेलै। चारूभर नजैर घुमबैत कुलानन्‍द ऍंठि कऽ बाजल- “रौ रजेसरा, एना चोर जकॉं की तकै छी?” राजेसरो केना चुप रहितए, बाजल- “जेकरा काज-धंधा नै रहै छै से अहिना बताह जकॉं वौआइत रहै छै आ लबर-लबर केने घुमै छै।” दुनूमे बकटेँटी शुरू भऽ गेलै। “हे रौ, हम सबटा गप बुझै छियौ। बाधे-बोनमे जे रसलीला केने घुमै छीही से के नइ जनै छौ। जहिया चोटपर चढ़बीही तहिया बुइझ पड़तौ।” “यौ कुलानन्‍द, हमहूँ सभ बात जनै छी जे घरेमे अहॉं की सभ करै छिऐ। डुमि कऽ एना पानि किए पीबै छी। हमरा डेराउ नइ। जहिया हमर मन गरमा जाएत तँ डेरहथ्‍थी हमरा काँखे तर रहै छै।” “ओऽ ऽ, ई गप तँ बिसैर गेल रहियौ जे तूँ गरीबक नेता छेँ। सुनै छियौ जे मुखियासँ ठाढ़ हेमेँ। एहने चोरा-छीनरा मुखिया होइ छै रौ।” “गौआँ-घरूआ चाहतै तँ हम मुखिया पदसँ लड़बै। आ अहॉंकेँ कहने थोड़े किछो हएत। अखैन केहेन मुखिया अछि से तँ जनिते छिऐ।” “रौ, शिवकान्‍त बाबू तँ दू पीढ़ीसँ मुखिया बनल छथिन। हुनकर मोकाबला तूँ करबीही। पसङ्गो बरबैर छीही, हुनका सोझहामे तूँ। फूकतौ तँ उड़ि जेबही। रे बुड़ी, देहपर न लत्ता, चौधरी बोलत्ता। बापसँ भेँट भऽ जेतौ।” राजेसर डेरहथ्‍थी कॉंख तरसँ निकालैत बाजल- “हे, मुँह सम्‍हारि कऽ बात करू आ नइ जँ अखने फरियेबाक अछि तँ फरिया लिअ।” “रौ, हम तोरासँ लड़ि कऽ अपन मान घटाएब। लोक कहत जे लड़बो केलकै तँ कीड़ी-मकौड़ीसँ।” “से तँ हमहूँ घरढुक्कासँ नहि लड़ऽ चाहै छी।” “समए आबऽ दही डॉंड़ सरका देबौ जे उठले ने हेतौ।” “लोक हमरा संगे अछि। हमरा गीदर-भौकी नइ देखाउ। नहि तँ डेन-बॉंहि टूटि जाएत।” “ठीक छै।” तामसे डेन फरकबैत दुनू दू दिसामे चलि देलक। बँसबिट्टीसँ एक हेँज कौआ-मेना फड़फड़ाइत उड़लै आ अपन-अपन संगीक संगे अकासमे निर्विघ्‍न विचरण करए लगल। 6. गामक चौबटियापर ठाढ़ ई पीपरक गाछ आब केतेक चतैर गेल छै। कोनो आइसँ ई गाछ छै। बुढ़े-पुरान कहत जे कहिया रोपल गेल। आब तँ माटि भरि कऽ चबुतरो बना देल गेलै। पहिने तँ लोक भुँइएपर बैसै छेलै। पंचैती की कोनो आइसँ होइ छै। हँ, जमानामे तँ कोटो-कचहरी नहियेँ रहइ। पंचैतीएमे न्‍याय होइ छेलै। जेतए न्‍याय ओतै अन्‍याय। लगबैत रहू उपाय। मनुख छै तँ झगड़ा हेबे करतै। तामसो तँ लोककेँ संगे छन्‍हि। तामसपर लोक की नियंत्रण करत। लोकेपर तामस नियंत्रण करैत अछि। तामसपर नियंत्रण केलासँ की हेतै? दोसर बाटे आर दूना बैगसँ बहतै। कोनो तरहेँ जँ तामस एबाक दुआरि सभ बन्न भऽ जेतै। पहिने तँ ओकरा संगी सभपर रोक लगबए पड़तै। गामक चौबटियापर लोक सभ एका-एका जमा भऽ रहल छेलै। आइ कोजो करैत काल सभकेँ पंचैतीएपर धियान रहइ।मनमे रहै छै- अपना लड़ाइ-झगड़ा नै करब तँ दोसरोकेँ लड़ाइ करैत देखबै। अन्‍तरक सभ बातसँ परिचित भऽ जेनाइ की सहज छै। भीतरिया कंकालकेँ देखनाइ बड़ डेरौन...। पंचैती तँ जमानामे होइ छेलै। दूधक दूध आ पानिक पानि बेरा दइ छेलै। अखैन तँ पंचैतियोमे घूसखोरी, जातिवाद, पाटीवाद, अपन-आन...। सभ अपना-अपना सुआरथमे डुमल। न्‍यायक कण्‍ठ मोका जाइत अछि। केतेको समस्‍या फन-फना कऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि।अन्‍यायक बदला आइ नहि काल्‍हि अन्‍याय भेटते अछि। गाछ रहतै तब ने झटहो मारलापर फले भेटतै। सॉंझक अन्‍हार गाछ-पत्ता सभपर पसरए लगल छल। पछुआएल कौआ-मेना कॉंइ-काँइ करैत खोंता दिस पड़ाएल जा रहल छेलै। गोसॉंइ घरमे दियावाती भुकभुकाए लगल छेलै। चबूतरा लग तीन-चारिटा पटिया बिछा देल गेल छेलै। लालटेनक मधिम इजोतमे सबहक मुँह ठीकसँ नहि देखाइत रहइ। गाम-घरमे बिजलीक कोन काज। चौबीस घण्‍टामे कखनो काल एक आध घण्‍टाक लेल आबि गेल तँ लोक तिरपित भऽ जाइत अछि। किछु लोक पटियापर बैसल छेलै तँ किछु कातेमे फुसराहटि कऽ रहल छेलै। मधुमाछी जकॉं घनघनाइत स्‍वर। स्‍पष्‍ट रूपें नहि सुनाइ छेलै। किछु लोक निरंतर उपेक्षित आ दबावमे रहलाक कारणे सबहक सोझहामे बजबाक साहस नै कऽ पबैत अछि। ओहन बेकती सभ काते-करोटमे बाजि-भुकि कऽ संतोख कऽ लैत अछि। सभ ढंगक बेकतीकेँ समाजमे जरूरतो तँ रहबे करै छै। किछु जन-मजदूर सभ राजेसरकेँ कातेमे घेरि लेने छेलै। अपन-अपन उपदेश झाड़ि रहल छल। स्‍वार्थक तँ रूपे तेतेक होइ छै जे के चीन्‍ह सकत। कखैन केना कऽ परगट हएत आ कखैन लुप्‍त भऽ जाएत, कहनाइ कठिन। ओ अपना अनुरूपें नाच नचबैत रहैत अछि। आ बेकती अपनाकेँ बिसैर नचैत रहैत अछि। सबहिं नचावत सुआरथ गोसॉंइ। “सुनि ले राजेसर! अपन गप्‍प कहैमे डेरा जेबही तँ जुलुम भऽ जेतौ।” “हँ, उनटे मखनाकेँ जरिमाना लगि जेतै।” “डेरेतै किएक? कोनो की कोइ बाघ छिऐ।” “हँ, अखनीसँ धाक टुटल रहतौ तब ने मुखिया पदसँ लड़बीहीं।” “हे रौ, ओहो सभ कोनो काला पहाड़ नै छिऐ। छूच्‍छे हवा-पानि देने रहै छै।” “रौ, अपना सभ गरीब छिऐ तँ की कण्‍ठ मोंकि देतै।” “हौ, राजेसरकेँ बजैक छमता छै। के एकरा गप्‍पकेँ काटि सकतै?” “चलू बहादूर डर नै राखू। पाँछा छी हम सभ तैयार।” “रौ, एना राजेसराकेँ गरपर नै चढ़ाबीही,चारि दिनक बादक तँ सभ कमाइले बाहर चलि जेबही आ बेचारा असगरे सबहक चोटपर चढ़ि जेतइ।” “अखनी की नजैरपर नै चढ़ल छै, केतेक बेर मुँहपुरखा सभकेँ मुहेँपर गारि-बात देने छै। लाठी चमकौने छै। ओ सभ छोड़ि देतै?” “सएह हौ, गरीबक एकता आ बालुक बान्‍ह। हौ काका, एके धक्कामे चारि फक्का। केतेकोकेँ तँ चढ़ौआ छागर बना कऽ परान लेलहक आ ऐबेर...।” “चुप रह, मौगा-मरद अहिना बजै छै।” “ठीके, ओकरा सबहक काजमे जे बारम्‍बार अड़चन करतै तेकरा...।” “तरेतर राजेसरापर सभ गुम्‍हैड़ रहल छै।” “चुप, चूड़ी पीन्‍ह कऽ घरमे बैसि रह। की करतै? गिर लेतै?” आपसी घेंघौज शुरू भऽ गेल छेलै। सभकेँ शान्‍त करबाक लेल राजेसरकेँ बाजए पड़ल- “अहॉं सभ चिन्‍ता नइ करू। अन्‍याय नै हेतै। हम जबाव देबै। चलू लगमे बैसै छी।” गाछ तर पंच सभ बैसि गेल छल। चारूभर तकैत प्रमुख पंच बजला- “यौ, मलकेसर बाबू एला?” “आबि रहल अछि।” नेंगराइत मलकेसर पहुँचल। ओ कुहरैत पटियापर बैसि गेल। “मखना कहॉं अछि यौ?” “आबि गेलौं पंच साहैब। हम कोनो पछुआइबला मरद नै छी।” मखना गमछासँ मुँह बन्‍हने छल। “सभ गोटे तँ आबिए गेल आब शुरू कएल जाए।” “रौ मखना, तूँ मुँह किए झँपने छेँ। उघारि कऽ देखा।” मखनाक मुँह फुलि कऽ कुप्‍पा भेल छेलै। “पहिने तँ मलकेसरसँ पूछल जाए- जे की भेल छेलै।” “हँ-हँ, पहिने मलकेसरजी सँ पूछल जाए।” धरमलाल ऑंखि नचबैत बाजल। मलकेसर देह-हाथ सोझ करैत बाजल- “यौ सरपंच साहैब, जन-मजदूरकेँ मने बढ़ि गेल छै। तइमे लबका छौड़ा सभ तँ पानियोँ मे आगि लगबै छै। देखियो ने, भोरमे हम जनकेँ हाक दइ छेलिऐ। मखना ओनएसँ आबि कऽ हमरा अधला बात सभ कहऽ लगल। हम ओकरा डॉंट-डपट देलिऐ तँ ओ हमरा पथ्‍थलपर पटैक देलक। डॉंड़ सरैक गेल अछि।” “ई तँ जुलुम भेलै। एहेन-एहेन डकलीलामी।” -कुलानन्‍द ऑंखि उनटबैत बजल। “चुप रहबै तँ अहिना कपारपर चढ़ि कऽ लगही करत।” “नहि यौ, कसि कऽ डण्‍ड-जुरिमाना कएल जाए।” “एहेन अगिमुत्ता सभकेँ तँ मुइलाह बापसँ भेँट करबा दइके चाही।” “धड़फड़ नइ करियौ, कनी मखनोसँ बात बुझियौ। ‘कुछ बुझा न समझा आ फरमा दिया फॉंसी।’ एना नइ करियौ।” मलकेसरसँ राजेसर करजा नेने रहइ। सोचलक,राजेसर हमरे दिस बजत किने। तँए मलकेसर कुहरैत बाजल- “मखनासँ पुछबै। ओ तँ अपने दिस बजत। राजेसरो ओहीठाम रहै, ओकरासँ पुछियौ।” कुलानन्‍द फरकैत बाजल- “रजेसरा किए बजतै? ऐ बीचमे ओकर बात किए मानल जेतइ?” “किए नइ बजतै? ओ हमरा सबहक मुँहपुरुख छिया।” “एकेबेर एना नै बजियौ। मलकेसरजी जँ अपने कहै छथि जे राजेसर ओइठाम रहै तँ ओकर गप सुनए पड़त। कहि कऽ सुनाबह हौ राजेसर केकर गलती रहइ।” राजेसर ठाढ़ भऽ कऽ बाजल- “यौ पंच लोकनि! हम जे देखलौं से कहि दइ छी। ठीके मलकेसर बाबू जनकेँ जोर-जोरसँ हाक दैत रहथिन। तखैने मखना जोर-जोरसँ बोकराकेँ हाक दैत ओमहरसँ एलै। मलकेसर बाबू खिसिया कऽ लाठीक हूराठसँ मखनाक मुँह फोड़ि देलखिन। पहिलुक गलती तँ मलकेसरे बाबूसँ भेलैन। बाता-बातीमे लाठी नै चलेबाक चाही। तैपर मखना बँचैले पाछूसँ टॉंग पकैड़ घींच लेलकनि। चुट्टीओकेँ चीपबै तँ काटबे करत।” मलकेसर खिसियाइत बाजल- “मखना हमरा देखि कऽ बक छू-बक छू करै छल हमरा गारि पढ़ै छल। ओकरा लग बकरी कहॉं रहइ।” मखना फानि कऽ बाजल- “बकरी हमरा हाथसँ छूटि कऽ भागि गेलै। तँ हाथमे केना रहितै?” “तूँ हमरासँ बोता बारेमे पुछलेँ किएक नहि? तब ने हाक दैतही।” “आब लिअ। मूतबै आकि घरमे सुतबै। बजबै-भुकबै आकि नहि। पहिने मलकेसर बाबूसँ औडर लिअ पड़त। हे, आब ई जेठरैती नै चलत।” “दाबी देखबैत अछि। जेना कोय गुलाम रहइ।” कुलानन्‍द बाजल- “हम तँ पहिने बुझैत रहिऐ जे रजेसरा सबहक मगज उनटा देतै।” “काज करै छी तँ मजदूरी भेटैत अछि। कियो मँगनी नै दइ छै। राजेसरक सभ गप्‍प सॉंच छै।” “तँ की मलकेसरजी झूठ बजै छै? सभ तँ पंचे छिऐ। केकरा के रोकत। दुनू दिससँ भारी घेंघौज शुरू भऽ गेल छेलै।” “कोय धनीक अछि तँ अपना-ले अछि। कमाइ छी तँ ठाठसँ खाइ छी। केकरोसँ माङऽ नै जाइ छिऐ। दाबी कथीक देखा रहल अछि।” “तँ तोरा सभ गामसँ उजारि देबहक। बुढ़-पुरानकेँ परतिष्‍ठा घिना देबहक।” गमछा कपारमे बान्‍हैत एक गोरे फनकल- “झगड़े-लड़ाइ करैक विचार छौ तँ फरिया ले।” “हे मुँह सम्‍हारि कऽ बात कर। एनए कोइ कमजोर नइ छै।” परभुदास गामक संत छथि। हॉं..हॉं... करैत ओ आगू एला। “कहू जे ई पंचैती छिऐ आकि युद्ध। पंचैतीमे जँ अन्‍याय हेतै तँ हजारो समस्‍याक जनम भऽ जेतै। देखलिऐ कहियो लड़ाइ-मारिसँ विकासक काज होइत? गामक संस्‍कारकेँ एना नै बिसरू। बात आगू बढ़त तँ सभटा राखल-उसारल धन पानि जकॉं बोहि जाएत।” लबराकेँ नहि रहल गेलै। बिच्‍चेमे टपैक उठल- “रौ भाय बगरा नहि कर झगड़ा। खोंताक बच्‍चा सेहो छौ कच्‍चा सेवलहा अण्‍डा सेहो हेतौ गण्‍डा। मन थिर कर नहि तँ हेतौ वितण्‍डा।” ताल ठोकैत फेर बाजल- “आबि जो फरिया ले नहि तँ गरिया ले। तूँ उनचास तँ हमहूँ पचास। रौ भाय बगरा हम छी लबरा।” केते गोटेकेँ हँसी लगि गेलै। लोक सभ किछु शान्‍त जकॉं भऽ गेल छल। “यौ सरपंच साहैब। बात बिगड़ल जाइत अछि। एना नहि हएत।” “ऐठामसँ पॉंच पंच उठि कऽ बाहर जाउ। एकान्‍तमे विचार करू। आ फैसला सुना दियौ।” “ठीक छै सएह कएल जाए।” “देखलीही बँचा लेलियौ।” “हमरा की बँचाएब ओकरा बँचा लेलिऐ।” पंचैतीसँ पॉंच पंच बाहर निकलि गेल छल। निर्णए की होइत की नहि। सबहक धियान ओम्‍हरे चलि गेल छेलै। आपसी कनफुसकी शुरू भऽ गेल छेलै। लालकान्‍त पाछूमे बैसल छल। उचित अवसर देखि आगू आएल आ ठाढ़ भऽ बाजए लगल- “यौ पंच भगवान! हमरा एकटा पंचैती कऽ दिअ।” झपसूलालक देह सिहैर गेल छेलै। कातेसँ टपैक उठल- “अखनी दोसर गोटेक पंचैती नइ हेतौ।” लालकान्‍तक ऑंखि ललिया गेल छेलै। “किए ने हेतै? पंचैतीए करैले ने पंच सभ बैसल छथि। तूँ रोकनिहार के?” बात आगू बढ़ितै तइसँ पहिने एकटा पंच बाजल- “अच्‍छा झगड़ा नै करू। बाजह हौ लालकान्‍त,की बात छै?” “की बजबै यौ पंच साहैब। बजितो लाज होइए।” “बजबहक नै तँ बुझबै केना?” लालकान्‍त नजैर उठा कऽ झपसूलाल दिस देखलक आ बाजल- “पुछियौ झपसूकेँ जे अधरतियामे हमरा अँगना कथीले गेल रहए?” झपसू बातकेँ काटैत बाजल- “देखियौ, केकरा ऐठाम के नहि जाइ छै।” लालकान्‍त ऑंखि गुड़रैत बाजल- “झपसू, तूँ हमरा बातमे टोक नै दऽ सकै छेँ। हम पुछै छी- अधरतियामे हमरा अँगना की करैले गेल रहए?” “कोनो चीज चोरा लेलियो? हम कोनो चोर छी?” “की करैले गेल रही?” पंच टोकलक- “जबाव दहक झपसू। कथीले गेल छेलहक?” झपसू छीना काटैत बाजल- “हमर अँड़िया बछा रातिमे खुलि गेल रहए। तेकरे ताकैले गेल रहिऐ।” लालकान्‍त तामसे ठाढ़ भऽ कऽ बाजल- “रौ झपसू, झूठ किए बजै छेँ। पंचक सोझहामे..। बजर खसतौ।” “तँ तोहीं कहऽ जे सॉंच की छै?” “तूँ हमरा स्‍त्रीकेँ किए सोर पाड़ैत रही?” “झूठ गप्‍प। तोहर पत्नी स्‍वीकार करतौ ई बात। ओ तँ साँझोमे हमरे अँगनामे बैसल रहौ। कहै छेलौ हमरा खेतमे हर जोति दिअ।” “हमरा इज्‍जतकेँ उघार करबेँ। देखबीही?” “देखबै की? तोरासँ हम कमजोर थोड़े छी।” पंच रपटैत बाजल- “अहॉं सभ मुँहकेँ बन्न करू।” मनधत्ता धड़फड़ाइत पहुँचल आ जोरसँ हल्‍ला करैत बाजल- “हौ जुलुम भऽ गेलै हौ।” “की भेलै हौ?” मनधत्ता राजेसर दिस ताकैत बाजल- “रौ रजेसरा तोहर भाए जागेसर दुनियॉंसँ चलि गेलौ रौ।” “केना भेलै हौ।” मनधत्ता कानैत बाजल- “हौ, हम आ जागेसर एके नाहपर चढ़ि धार पार करैत रहिऐ।धारमे बाढ़ि आएले रहै। नाह डुमि गेलै। केतेक गोरे डुमि कऽ मरि गेलै।” “तूँ केना बचलीही?” “हमरा एकटा नहवरिया छानिकेँ ऊपर केलक। केतबो तकलिऐ जागेसरक लहाशकेँ, केतौ ने भेटल।” मनधत्ता फेर कानए लगल। किछुकालक लेल सभकेँ जेना बघजर लगि गेल होइ। नि:शब्‍द...। सभकेँ ऑंखिक सोझहामे जेना जागेसरक मुखाकृति नाचि उठल...। जेना एक-एकटा ओकर गुण मन पड़ि आएल होइ। मुइलासँ पूर्व लोकमे दोष-गुण केतबो होइ मुदा मुइला उपरान्‍त लोककेँ ओकर गुणे बेसी स्‍मरण होइ छै। जेना सभटा अवगुण मृत्‍यु अपना संगे नेने चलि जाइ छै। तइमे गौऑं-घरूआकेँ जागेसरसँ बेसी फैदे भेटल छेलै। हरक्षण दसगरदा काजले तैयारे। केकरो ऐठाम कोनो कठिन समस्‍या आबि जाइ छेलै तँ राति-बिराति हौउ चाहे पानि-पाथल झहरैत हौउ, जागेसर ओइठाम तत्काल पहुँच जाइ छेलै। कहियो समाजकेँओकरासँ हानि नइ भेल छेलै। एहेन लेाकक मृत्‍युसँ सबहक ऑंखि नोरा जाएब सोभाविके...। किछु गोरे एक-दोसरक मुँह ताकि रहल छल आ किछु गोरेक ऑंखिसँ दहो-बहो नोर बहि रहल छेलै। मुदा किछु एहनो बेकती होइ छै जेकरा अनकर उन्नतिसँ दुख होइ छै। अपना दिस धियाने नहि रहै छै। ओइठाम किछु एहनो लोक छल जे मुँह नेरौने दुखितक नाटक कऽ रहल छल। राजेसर सभसँ कातमे बैसि गेल छल। ओ निरंतर उत्तरेमुहेँ ताकि रहल छल। जेना आँखिमे असीम पीड़ा भरि गेल होइ। भीतरे-भीतर औनाइत दुखक धुइऑं। मुहसँ बोल नै फुटै छेलै मुदा कुहैर रहल छल। ‘मिले न जगत सहोदर भ्राता।’ राजेसरपर लोकक धीरजभरल शब्‍दसँ कोनो परभाव नहि पड़ि रहल छेलै। ओ असथिरेसँ उठल। बुझेलै टॉंगमे कोनो शक्‍ति नइ अछि। तैयो धीरे-धीरे घर दिस टॉंग बढ़ि रहल छेलै। मलकेसर ठाढ़ होइत बाजल- “रौ तँ हमर पंचैती केना हेतै?” कालीकान्‍त रपैट कऽ कहलक- “ईह, ओनेए वेचारापर दुखक पहाड़ खसि पड़लै आ एकर पंचैती हुसल जाइ छै।” सरपंच ठाढ़ होइत बजला- “अखनी पंचैती नै हएत। वेचाराकेँ जुआनी मौत भऽ गेलै। पहिने पॉंच गोटेजाउ आ धारक कातसँ जागेसरक लहाश ताकि-हेरि कऽ लाउ। अन्‍तिम संस्‍कार कएल जेतै।” एकाएकी सभ विदा भऽ गेल छल। राजेसरक अँगनासँ कनबाक स्‍वर आबि रहल छेलै। रातिक अन्‍हार जेना आरो सघन भऽ गेल छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 20 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८३ म अंक ०१ अगस्त २०१५ (वर्ष ८ मास ९२ अंक १८३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA