ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८४ म अंक १५ अगस्त २०१५ (वर्ष ८ मास ९२ अंक १८४) ऐ अंकमे अछि:- ऐ अंकमे अछि:- लजबिजी लघु कथा संग्रह जगदीश प्रसाद मण्डल समरपन- ...सगर राति दीप जरय’क नारी केन्द्रित गोष्ठी (भपटियाही-सखुआ, मधुबनी) केँ सेवा समरपित... एकसत्तैर- अकाल/ 8 उझट बात/ 15 कर्जखौक/ 22 उनटन/ 28 रेहना चाची/ 35 बुधनी दादी/ 42 अउतरित प्रश्न/ 48 हारि / 55 सोनाक सुइत / 61 मरूभूमि / 67 असगरे / 73 पुरनी नानी / 80 कटा-कटी / 86 केते लग केते दूर/ 92 घर तोड़ि देलिऐ/ 98 सजल स्मृति/ 106 सए कच्छे/ 117 एक मुठी घास/ 120 करिछौंह मुँह/ 123 कथा लेखन क्रम/ 125 अकाल किरिण फुटिते सुगापटीवालीक माथपर दस-बारहटा छिट्टा-पथिया गेँटल देखि बौकी दीदी पुछलखिन- “आइ भोरे-भोर केम्हर दिन उगल हइ सुगापटीवाली?” बौकी दीदीक बोल जेना सुगापटीवालीक मनकेँ हौंड़ देलक। ओना घण्टा-घण्टा भरि बौकी दीदी लग बैसि सुगापटीवाली अपनो आ अपन परिवारोक संग-संग देशो-दुनियाँक गपो-सप्प करैत आ बाइस तेबाइस खेबो करैत। खास कऽ पावैनक ठकुआ आ भोज-काजक लड्डू तँ अरबैध कऽ बौकी दीदी पुतोहु सभसँ चोरा कऽ सुगापटीवाली लेल रखबे करैत। दसो-बारहोटा छिट्टा-पथियाक गेँट माथपरसँ उतारि सुगापटीवाली अँगनाक मुहथैरपर रखलक। भतझँक्का छिट्टासँ लऽ कऽ घस-छिल्ला, छौर-फेक्काक संग सगतोड़ा, सग-धुआ पथिया धरिक गेँट। करीब महिना दिनक पछाति बौकी दीदीकेँ सुगापटीवालीसँ भेँट भेल छेलैन, तँए मास दिनक गपो-सप्प बाँकीए रहैन, जे बात सुगोपटीवाली बुझैत आ दीदियो। माथक छिट्टा उतरिते दीदीक नजैर सुगापटीवालीक मुँहपर पड़लैन। मन्हुआएल मन मौलाएल फूल जकाँ बूझि पड़लैन। मुदा बजली किछु ने। नै बजैक कारण भेलैन जे अपने मन कहलकैन जे जरूर कोनो वेर-विपैतमे वेचारी पड़ल अछि। आन दिन केहेन लहटगैर मुँह देखै छेलिऐ आ आइ किए धुमनाइन मौलाएल बूझि पड़ैए। केना वेचारीकेँ बेथाक बात पूछि आरो लटका दिऐ। तइसँ नीक किए ने दोसरे-तेसरे बात पूछि विचारक धारमे भँसिया दिऐ। अनेरे तँ अपने सभटा गप गुड़ घाउ जकाँ मुइलहा खून-पीजक संग खील निकैल जेतै। तहूमे एक मासक कथा-पुराण पछुआएले अछि। जखने पछिला अन्तिम भेँटक गपक नाङैर पकड़ा देबै आकि अनेरे ने बड़बड़ए लगत। तइमे जे अपना बुझैक अछि से परेख लेब। सएह सोचि दीदी बजली- “कनियाँ, केतए हराएल छेलह जे एते दिनक पछाति नजैर पड़लह?” बौकी दीदीक प्रश्नक उत्तर नै देब सुगापटीवाली उचित नै बुझलक। उचित ऐ दुआरे नै बुझलक जे प्रश्नक उत्तर बिनु पौने प्रश्नकर्तोक मनमे उठि जाएत जे भरिसक कोनो बातक कचोट हमरेसँ ने तँ भेल छै, जे तामसे नै बजैए। मलिन मनक बात रखैत सुगापटीवाली बाजलि- “दीदी, हिनकासँ लाथ कोन? लोककेँ बेटा सोग सहल जाइ छै मुदा धनक सोग नै सहल जाइ छै। ऐबेर भगवान हमरा सभकेँ जचनामे दऽ देलैन!” कहि सुगापटीवाली गाल दिस टघरल अबैत नोरकेँ आँचरसँ पोछए लागलि। मुँहपर आँचर पड़िते आगूक बोल झँपा गेलैन। मुदा बौकी दीदीक मन ओतै लटकल जे बेथाक कथा कखन औत। मुदा से काते-कात वेदीक लाबा जकाँ छिड़िया गेल। शिकार फँसैत नै देखि बौकी दीदी दोसर वाण छोड़लैन- “कनियाँ, आब तँ अदहा अखारो बीत गेल, आब किए भतझँक्का छिट्टा आ सगतोड़ा पथिया बीनै छह?” भरि मुँह बौकी दीदी ऐ दुआरे ने बजैत जे जखन हमरा बुते केकरो नीक नै कएल होइए तखन अनेरे किए केकरो जिनगीक सोग-पीड़ा जगा पीड़ित करबै। मुदा बौकी दीदीक वाणि सुवाणि भेलैन। जहिना बीमारीमे पड़ल कियो कष्टसँ भीतरे-भीतर कुहरैत अपन बेथा अपने मनमे दाबि सहैत रहैए, मुदा रोगक निदानक- डाक्टर-केँ देखिते मन भुभुआ उठै छै तहिना सुगापटीवालीक मुँह भुभुआएल- “दीदी, हिनका तँ अपन पेटक बात सभ दिन कहै छिऐन, तँए नै कहिऐन सेहो नीक हएत? बड़का अकालमे पड़ि गेने बुधिये बौआ गेल अछि!” सुगापटीवालीक बात सुनि बौकी दीदी सहमली, मुदा जे मनमे छैन से अखनो नै बूझि पड़ैन। बजली- “अकालोक कि जड़ि-पालो अछि!” बौकी दीदीक बात सुनियोँ कऽ सुगापटीवाली अनठौलक। ओना जानि कऽ नै अनठौलक, भेल ई रहै जे जखने पथियाक चर्च दीदी केने रहथिन तखनेसँ सुगापटीवालीक मन अपन बेथामे तेना बंशी लगल माछ जकाँ नथा गेल रहै जइसँ सुधिये-बुधि घुसैक गेल छेलै। मुदा दोसर प्रश्नक पछाति वएह अपन हिस्सेदारी मंगैत आगू आबि बाजल- “दीदी, महिना दिन पहिने, ई सभटा छिट्टा-पथिया बनेने छेलौं, किए तँ महिना दिनक रोजगार अमबेच्चा टोकरी बनबैमे लगै छल, नफगर काज रहए। चारिटा पेटी आ चारिटा कारामे टोकरी बनि जाइए। दिन-राति खटि कऽ पाँच-दस हजार हाथो-मुट्ठीमे बँचा लइ छेलौं। मुदा तइमे ऐबेर अकाल पड़ि गेल!” सुगापटीवालीक बात बौकी दीदीक मनमे धँसलैन। मनमे धँसिते जेना फुन-फुनी धेलकैन। फुन-फुनी ई धेलकैन जे अपनो रौदियाह समैमे केते दिन आ केते राति अन्न बिनु कटल छेलैन। दिन तँ कटि गेल छेलैन मुदा ओकर तरियाएल जे सोग-पीड़ा अछि, से तँ कटबे ने केलैन। पावैन-तिहारकेँ के कहए जे अनदिनो वेचारीकेँ एक मुट्ठी खाइले दैते छिऐ, पावैनमे पवनौट दैते छिऐ। जँ कहीं रातिमे भानस नै भेल होइ तँ केना आध मन-एक मन भारी पथियाक जाँक लऽ कऽ बेचए जाएत। तहूमे भतझँक्काबला बड़का छिट्टा आब के लेत। लगनो तँ ओराइए गेल। भदबरिया श्राद्धक भोजो तँ लोक उठाइए कऽ रैख लइए। मासे-मास सुइद दैत सालक अन्त होइत-होइत भोज निबटा लइए। तेहने सग-धुआ पथिया सेहो अछि। एक तँ फड़ाएल साग दोसर कफ-ठेँरक घर सेहो बनियेँ जाइए। बौकी दीदी बजली- “कनियाँ, गप-सड़क्का पाछुओ हेतै, पहिने ई कहऽ जे रौतुका खेलहा छह आकि भूखल?” बौकी दीदीक बात सुगापटीवालीकेँ अनसोहाँत जकाँ बूझि पड़ल। अनसोहाँत ई जे अखन भोरे अछि, रौतुका भूखल छी आकि भरि पेट खेलहा! आब ने लोक मुहोँ-हाथ धुअत आ भानसक ओरियानो करत। अखन जे बाजिये देब जे भूखल छी, तँ दीदियो यएह ने कहती जे कनी बिलैम जाह, रोटी कि भुज्जा भुजबै छी, खा कऽ जइहऽ। मुदा लगले मन उनैट गेलै जे तीन-तीन, चारि-चारि दिनक पावैनक ठकुआ आ भोज-काजक लड्डू तँ सेहो दीदी रखबे करै छैथ। सामंजस्य करैत सुगापटीवाली बाजलि- “हिनका ऐठाम खाइ-पीबैमे कोनो कि लाज-धाक होइए। जखन मन हएत मांगियोँ कऽ खा लेब।” सुगापटीवालीक बात सुनि बौकी दीदीक मन थम्हलैन। मन थम्हिते आगूक बेथा-कथा सुनैक इच्छा भेलैन। मुदा वाह रे मिथिलांगना! कठिन-सँ-कठिन दुख-पीड़ाक बोझ माथमे समेट रखने रहै छैथ मुदा पति वा परिवारक बीच नहियेँ राखब नीक बुझै छैथ। ओना नीको तँ ऐछे। पुरुख हुअए आकि नारी, जँ अपन दुख-पीड़ाक निराकरणक ओरियान अपने करए तँ ओ घीओसँ चिक्कन बाट चलब भेल। मुदा जँ ने अपने करी आ ने परिवारक बीच राखी तँ ओ दुखद जरूर भेल। बौकी दीदी बजली- “कनियाँ, कीदनि कहलहक जे बड़का अकाल?” ‘बड़का अकाल’ सुनि सुगापटीवाली चौंक गेलि। चौंक ई गेलि जे हवा-विहाड़िकेँ लोक अबितो देखैए आ जाइतो देखैए। मुदा भेल केतौ आ बजैर गेल अपना ऊपर। हजारो-लाखो बीघाक गाछी-कलम नै फड़ल, किसानक साल भरिक उपज मारल गेल। अपन तँ किछु ने नोकसान भेल मुदा तँए कि जिनगी नै मारल गेल? अपने नै परिवारो समाजोक जिनगी तँ मारले गेल अछि। भोरे-भोरे सकाल-अकालक चर्च लाधब नीक नै। ई तँ दुकाल-तिकालक विषय छी। मुदा बौकियो दीदी रगड़ाह तँ छैथे। रगैड़ कऽ सुनबे करती। विचित्र स्थिति देखि सुगापटीवाली बाजलि- “दीदी, दुख-बेथा कि केतौ पड़ाएल जाइए, अभावी लोकक तँ भावीए छिऐ किने। अखन भिनसुरका समए छी, जँ पथिया बिका जाएत तँ बालो-बच्चा आ अपनो सबहक मुँहमे जाबी नै लगत। बेचि कऽ घुमैबेर खेबो करबैन आ अकालोक किरदानी सुना देबैन।” सुगापटीवालीक विचार बौकी दीदीकेँ जँचलैन। मुदा तैयो मनमे तेहेन बिसबिसी धेने रहैन जे पनचैती तँ मानै छी मुदा खुट्टा गाड़ब अहीठाम। फेर दोहरबैत बौकी दीदी पुछलखिन- “कनियाँ, छाहोँ-छूँह जे कहि देने रहबऽ किने तँ अपनो विचारब आ तोरोसँ सविसतर पछाति सुनि लेब।” बौकी दीदीक रगड़ देखि सुगापटीवाली बाजलि- “दीदी, ऐबेर आम नै फड़ने, महिना दिनक आमो खेनाइपर आफत भऽ गेल आ रोजगारो चैल गेल। चारिटा पेटी, चारिटा कारा आ चारिटा कैमचीसँ एकटा टोकरी बनि जाइए। भरि दिनमे चालिस-पचासटा बना लइ छेलौं। दिन-राति काज पसरल रहै छल। रातिके डिबिया नेसि कऽ खाइबेर तक काज चलै छल। टोकरी दामक संग-संग किसानो आ वेपारियो तेते पाकल आम दइ छला जे सबतूर खेबो करै छेलौं। से ऐबेर नै भेल।” बौकी दीदीकेँ सेहो तीन बीघा गाछी-कलम। ओना परिवारक हिसाबसँ बौकी दीदीकेँ बेसी गाछी-कलम छैन मुदा किसानी जिनगीमे सभ रंगक खेतीक अपन महत छै। करताइत दुआरे बौकी दीदीकेँ बेसी-गाछी कलम छैन। सुगापटीवालीक सूर-मे-सूर मिलबैत बौकी दीदी बजली- “कनियाँ, बिनु रहनौं जेहने तोहर भाग तेहने अपनो भाग ने भऽ गेल। तहिना रहने अपनो भाग आ तोरो एक रंग भेल किने। हमहींटा किए, जखन हजारो-लाखो किसान छातीमे मुक्का मारि जीविते छैथ तखन तोँ की मरि जेबह? समए केतौ दूर चैल गेल, फेर आम फड़त आ तोहर टोकरीक धन्धा चलबे करतह। भेल तँ बीचमे किछु दिन, तइले अनेरे सोग-पीड़ा मनमे किए रखने छह। बिसैर जाह।” बौकी दीदीक बात सुनि सुगापटीवालीक करिछोंह मुँह ललिया गेल। पथिया माथपर उठा गाम दिस डेग बढ़ौलक। 24 जुन 2014, शब्द संख्या- 1238 उझट बात चारि बैज कऽ पाँच मिनट भऽ गेल। राजमिस्त्रीक संग काज केनिहारि आने संगी-साथी जकाँ बुधनियोँ बहिन दरबज्जेक चापाकलपर देह-हाथ धो कऽ ओसारपर राखल झोरा लिअ एली। ओसारपर बैसल प्रोफेसर साहैब, मिस्त्रीकेँ कहलखिन- “सभ कियो चाह-पीब लिअ तखन जाइ जाएब।” चाह पीबैक प्रतिक्षामे दुनू मिस्त्री आ दुनू सहयोगी ओसारक आगूमे, जैठाम चबुतरा बनि रहल अछि, बैसि गप-सप्प जे आइ केते काज भेल आ काल्हि की सभ करैक अछि, शुरू केलक। आठ बजे भिनसरसँ चारि बजे बेर तक काज चलैए। पाँच गोरेक मेरिया अछि। ओना प्रोफेसर साहैबक नजैर बुधनी बहिनपर आठे बजे, जखन काजपर आएले छेली, पड़लैन मुदा बजला किछु ने। बजबे की करितैथ, रंग-रंगक विचार तँ मनमे रहबे करैन। बुधनीक उमेर जरूर पचास-पचपनक हएत, पचास-पचपनक उमेर जिनगी उतरैक समए भेल। परिवारोमे बेटा-पुतोहु हेबे करतै। मुदा हेबे करतै, तेकरो कोनो ठीक थोड़े अछि, नहियोँ भऽ सकै छै। मुदा हाथक चुड़ी आ माथक सेनुर तँ किछु गवाही दैते अछि। मुदा ई गवाही तँ पतिक भेल, बेटाक नै। जहिना कोनो काजक अपन समए होइए तहिना किछु बजबोक तँ अपन समए होइते अछि। तँए मिस्त्रीकेँ गिट्टी, सिमेन्ट, बालु इत्यादि सभ समान सुमझा काज देखा अपना काजमे प्रोफेसर साहैब लैग गेला। मुदा बुधनी बहिन प्रोफेसर साहैबक मनकेँ पकैड़ लेलकैन। लाली गोराइ, गठल देह, काज करैक वएह चुमकी जे जुआनीमे रहैक। मुदा बिना गप-सप्प केने बुइझो तँ नहियेँ सकै छी। सभ अपन-अपन जिनगीमे काजक चक्कीक संग चैल रहल अछि तैठाम अनका बाधित कऽ गपो-सप्प करब नीक नहियेँ हएत। ठेकनबैत प्रोफेसर साहैब बेरुका चाह पीबैक समैक गर अँटौलैन। गर अँटौलैन जे दस बजेमे कौलेज जाएब, अबैक कोनो ठेकाने ने अछि, चारि बजेक पछाइतो आबि सकै छी, आ लगलो आध घण्टा पछाति घूमि कऽ आबि सकै छी। अपनो परियास करब जे चारि बजेक चाह संगे पीब जइसँ चाहे पीबैकाल बुधनी बहिनकेँ लगेमे बैसा चाहो पीब आ गपो सभ करब। ट्यूसनियाँ विद्यार्थी जकाँ प्रोफेसर साहैब अपन समैपर तैयार भऽ गेला। बुधनी बहिनकेँ अपनो संगी साथी आ रस्तो-पेरामे चिन्हारए सबहक संग-संग बजारक दोकानदारो सभ बुधनीए बहिन कहैत, मुदा प्रोफेसर साहैब गामक नाओं लऽ कऽ ‘राधोपुरवाली’ कहै छथिन। झोरा लैतेकाल प्रोफेसर साहैब बुधनी बहिनकेँ कहलखिन- “ऐ राघोपुरवाली, अहाँसँ किछु गपक काज अछि तँए अहाँ एतै बैसि कऽ चाह पीबू।” बुधनी बहिनक मनमे कोनो मेख-वृख नै। दुनू परानी प्रोफेसर साहैब जहिना कुरसीपर बैसला तहिना बुधनियोँ बहिन चौकीपर बैसलि। प्रोफेसर साहैबक बेटी चाह बना पहिने चारू मिस्त्री-हेल्परकेँ देलक। पछाति, दुनू परानी प्रोफेसर साहैब आ बुधनी बहिन लेल चाह अनलक। एक घोँट चाह पीब प्रोफेसर साहैब मिस्त्रीकेँ कहलखिन- “सिंहेसर, काजक पछाति एकेठाम सभ हिसाब दऽ देब, जइसँ किछु आनो काज परिवारक भऽ जाएत।” सभ दिन काज करैबला श्रमिक अपन जिनगी अपन कमाइपर ठाढ़ केने चलैए। मुदा जिनगी चलैले तँ सहयोगीक सहयोग पड़िते छै। तँए बजारक सैयो दोकानक बीच लोक अपन कारोबार किछु सीमित तँ काइए लैत अछि। जैबीच अपन काज चलबैए। नगद-उधारक बीच तँ जिनगी चैलते अछि। तँए केकरो प्रोफेसर साहैबक विचार अधला नै लगलै। चाह पीब सभ-मिस्त्री, हेल्पर- चैल गेल। बेटीक संग प्रोफेसर साहैब दुनू परानी आ बुधनी बहिनक बीच गप-सप्प शुरू भेल। प्रोफेसर साहैबक पत्नी- जूही- बुधनी बहिनकेँ पुछलखिन- “बेटा-पुतोहु नै अछि जे अहाँ अहू उमेरमे एते भारी काज करै छी?” पत्नीक बात प्रोफेसरो साहैबकेँ नीक लगलैन। नीक ई लगलैन जे कतारबंदी गप तँ ओतए ने चलैए जेतए पहिनेसँ निर्धारित रहैए। मुदा जैठाम से नै, तैठाम तँ रोटीक मुड़ी बनबैए पड़त। जूहीक प्रश्न सुनि बुधनी बहिनक मनमे जेना रीश उठलैन। मुदा परिवारक बात सभठाम बजलो तँ नहियेँ जाइ छै। तँए रीशकेँ दबैत बुधनी बहिन बाजलि- “बेटो-पुतोहु अछि आ पतियो छैथे। मुदा...?” ‘मुदा’ सुनि जूही चौंकैत पुछलखिन- “मुदा की?” विस्मित होइत बुधनी बहिन बाजलि- “जहिना अखन काज करैत देखै छी तहिना सभ दिन करैत एलौं हेन। मुदा जइ दिन पुतोहु कहलक, सासु सन कोनो लछने नै छैन, तही दिनसँ बेटा-पुतोहुकेँ छोड़ि अपन अपंग पतियोक भार उठा चैल रहल छी।” बुधनी बहिनक उत्तर पाबि जेना प्रोफेसर साहैबकेँ बजैक गर भेटलैन। गर भेटिते बजला- “ओइ चारू गोरेकेँ रोज नै देलिऐ एकेबेर अन्तमे फरिछा देबै। मुदा अखन तँ अहाँ असगरे रहि गेलौं। जँ पाइक जरूरी हुअए तँ अहाँकेँ औझका रोज सम्हारि सकै छी।” प्रोफेसर साहैबक बात सुनि बुधनी बहिनक मनमे उठल, एक दिनक के कहए जे सालो भरि निरमलीक कोनो दोकानदारसँ उधार मांगब तँ एको बेर नै नहियेँ कहत। उधार लऽ लेब हिसाब फड़िछौट भेला पछाति दऽ देबै। तँए बुधनी बहिनक मनमे मिसियो भरि चिन्ता नै। मुदा जखन प्रोफेसर साहैब मुँह खोलि बजला तखन अपन कमाइक बोइन लेब कोन अधला भेल। बुधनी बहिन बाजलि- “भाय साहैब, अखन फुटा कऽ हमरा कहलौं मुदा जखन ओहो सभ छला तखन समए किए लऽ लेलिऐ?” निभर, निरभय होइत अपन बात रखैत प्रोफेसर साहैब उत्तर देलखिन- “आन प्रोफेसर जकाँ हम नै छी जे अनेरो दूधबलाक तगेदा, तरकारीवालीक तगेदा आ हित-अपेछितक तगेदा सुनैत रहब। ओना तगेदो सभ अधले होइए सेहो बात नहियेँ अछि। जेना केकरो कोनो विचार करैक समए बना लेलौं, मुदा काजक दवाबमे समैपर नै जा सकलौं, तैठाम जँ दोबारा-तेबारा तगेदो भेल तँ अधला नहियेँ भेल।” प्रोफेसर साहैबक विचार बुधनी बहिन नीक जकाँ नै बूझि सकलि। दोहरी बात बूझि पड़लै। एक दिस केकरो तगेदा नै दोसर काजक पछाति हिसाब देब। बाजलि- “भाय साहैब, हमरा रोज दइक बात कहै छी आ संगी सभकेँ काजक पछातिक बात कहलयैन?” जेना अपन हृदए खोलि प्रोफेसर साहैब बजला- “अहाँसँ लाथ कोन राघोपुरवाली। पान-सौ हजार बेर-बेगरता लेल हाथमे रखै छी, जँ अहाँकेँ दू सौ दाइए दइ छी तैयो तीन सौ बँचैए। मुदा पाँचो गोरेक नै पुड़ैत तँए बजलौं।” प्रोफेसर साहैबक बात सुनिते बुधनी बहिनक मन मानि गेल जे हमरासँ कोनो कलछपन नै केलैन। बाजलि- “भाय साहैब, दोकानदार सभ हमरा ओहेन गहिंकी नै बुझै छैथ जे खैयो लइए आ दसटा गाइरो पढ़ि दइए। जखने दोकानपर जाइ छी तखने आन गहिंकीकेँ छोड़ि पहिने समान दइ छैथ।” बुधनी बहिनक बात सुनि जूही टिपलैन- “ई उचित भेल?” जूहीक प्रश्न सुनि मुस्की दैत बुधनी बहिन बाजलि- “यएह तँ चलाकी छी। दोकानमे पचासो गहिंकी अछि, रंग-रंगक जिनगीक बीच चैल रहल अछि, जेकरा दोकानदार नै चिन्है-जनै छै, मुदा ओहेन चिन्हारकेँ तँ जनिते अछि जेकर बन्हौटा जिनगी छै। अहाँ ऐठामसँ छूटब दोकानपर जाएब, रातिसँ काल्हि दिन धरिक खर्च होइबला चीज-बौस कीनब, दू कोस जैयो पड़त, गामपर जाएब तखन मुरही-कचड़ी पतिदेवकेँ जलखै करए देबैन। अपने चुल्हि-चिनवारक काजमे जुटि जाएब। जँ सबेर-सकाल खा-पी सूतब नै तँ दिनका ठेही केना कमत।” एके साँसमे बुधनी बहिनक गप सुनि प्रोफेसर साहैब सहैम गेला। बजला- “केते दिनसँ ई काज करै छी?” बुधनी बहिन- “आठ बर्खसँ।” प्रोफेसर साहैब- “तइसँ पहिने?” “घर-अँगनाक काजो सम्हारै छेलौं आ खेत-पथारमे बोइनो-बुत्ता करै छेलौं।” “पति की करै छला?” “तइसँ पहिने ओ बजारेमे रिक्शा चलबै छला। साँझू पहर दोकान-दौरीक काज केने घरपर पहुँचै छला। मुदा जइ दिन जीपक ठोकर रिक्शामे लगल आ जाँघ टुटलैन, तइ दिनसँ जीबै तँ छैथ मुदा चलै-फिड़ैक तागैत नै छैन।” “बाल-बच्चा कएटा अछि?” “तीन भाए-बहिन अछि। दुनू बहिन सासुर बसैए आ बेटा लगमे रहैए।” “बेटा-पुतोहु भीन अछि?” “अपने भीन भऽ गेलौं।” “किए?” “पुतोहुक ओ बात अखनो मन पड़ैए तँ ओहिना रीश उठैए। पुतोहु बाजल जे सासुक लछने ने छैन। बाजल-तँ-बाजल। अपन बेटा-बेटी जकाँ थोड़े बाजल। मुदा बेटा ओकरा किछु ने कहलकै, तेकर आनि-पीड़ा बरदाश नै भेल। ओही दिनसँ बजारक काज पकड़लौं।” “अपना खेत-पथार नै अछि?” “नै।” 26 जुन 2014, शब्द संख्या- 1152 कर्जखौक आइ भोरे चाह पीला पछाति करियाकाकाकेँ लालकाकीक संग तेहेन टक्कर भेलैन जे भेला पछाति दुनूक मन हरदा बाजि निर्णयक सीमापर पहुँच गेलैन, भोरे-भोर एना टक्कर हएब नीक नै! भेल ई जे करियोकाका आ लालोकाकी दुनू गोरे चाह पीविते रहैथ तखैने तरकारीवाली पहुँचल। दुनू परानी मिलि तरकारी कीनलैन। महगक समए तीनियेँ किलोक दाम अस्सी रूपैआ भऽ गेलैन। पाइ देबाकाल करियाकाका बजला- “सात तारीककेँ दरमाहा उठैए। आठ तारीककेँ तोरा पाइ भेट जेतह।” तरकारीवाली चुपे रहलि। नगद-उधार गाममे चैलते अछि। वेपारो तँ वेपारे छी नगदो चलैए उधारो चलैए। मुदा पतिक बात लालकाकीकेँ नीक नै लगलैन। नीक नै लगैक कारण भेल जे जे तरकारीवाली मन भरि तरकारी माथपर नेने गाममे भोरेसँ बेचब शुरू करैए आ तेकर समान उधारी लैग जाए तखन ओकर कारोबार केना चलत। तखन तँ यएह ने जे या तँ ओहो वेपारी वा गिरहतसँ उधार लिअए, वा तेना कऽ दाम लिअए जे सूदिखोर महाजनक सुइद चुकबए। ओना नफ्फा ओइठाम नै होइ छै जैठाम अछि। जैठाम नै अछि तैठाम दोसरो विचार सम्भव अछि। लोहैछ कऽ करियाकाकाकेँ लालकाकी कहलखिन- “सभ दिन अहाँ कर्जखौके रहि गेलौं! आबो चलन-पियारा भेलौं, तैयो चालि नै छूटल?” दुनू परानीक बीच विवाद बढ़ैत देखि तरकारीवाली अपन छिट्टा उठा विदा भऽ गेलि। मनमे एलै अनेरे कोन झमेलमे बरदाएल रहब। तहूमे दुनू बेक्तिक झमेल छी। आइ नै पाइ देलैन तँ की हेतै, परसुए तँ सात तारीक छी चारिम दिन दइए देता। तरकारीवाली चैल गेलि, मुदा जहिना करिया-काकाकेँ तहिना लालोकाकीकेँ बघजर लैग गेलैन। तरकारी बीचमे राखल दुनू दिस दुनू परानी एक-दोसरापर नजैरो खिड़बैत आ नजैर नीचो करैत। दुनू अपन-अपन सीमामे घेराएल। लालकाकीक मनमे उठैत रहैन- अनेरे तेहल्ला बीच नीच-ऊँच बात बजलौं। जँ कहबे छल तँ परोछमे कहितिऐन अपन परिवारक नीक-अधला काज अपने नै सम्हारब तँ आन केकरा के सम्हारत, सभकेँ तँ परिवारो छइहे आ किछु ने किछु बक-झक होइते अछि। मुदा लगले मन पाछू दिस घुसैक विचारक दुनियाँ- भव मण्डल- पहुँच गेलैन। पहुँच गेलैन ओइठाम जैठाम अपनो आर्थिक स्थिति देखैथ आ तरकारीवालीक सेहो। जेकरा हजारोसँ कम पूजी छै, भरि दिनक श्रमक मूल्य सेहो ओहीमे ने राखत, जँ दाम चढ़ा कऽ लेत तँ सौदोबला तँ बुझबे करत जे फल्लाँ तरकारीक दर ई छै। तही हिसाबसँ ओहो दाम लेत। दुनू दिससँ तरकारीवालीक गरदैन फँसल रहैए...। अपन ओहेन दब स्थिति नै अछि जे खाइ पीबैक बौस उधार ली। किए लेब? जिनगीमे लोक कमाइ-खटाइ किए अछि, किए कियो केकरो कर्जखौक हएत...। मुदा लगले लालकाकीक मन घूमि गेलैन। घुमलैन ई जे जेकरा हाथमे पाइ नै छै दिनका खेनाइक सवाल छै, तैठाम की कएल जाए! कएल की जाए, यएह ने भेल समाजिकता; जे सबहक दुख-सुख सभ बूझि सभकेँ सभ संग दथि। मुदा हमर अपने कोन जोगदान समाजमे रहल? जँ किछु देलिऐ नै तँ लेबोक अधिकार तँ नहियेँ अछि! मन तरंगलैन। तरैंगते पैछला जिनगी दिस बढ़लैन- पैंतीस सालक नोकरीमे दरमाहाक संग उलफियो आमदनी छेलैन। तहूमे किरानीक नोकरी। मुदा कहियो एहेन नै रहल जे दूधवालीक उधार आकि तरकारीवालीक उधार, किराना दोकानक उधार नै रहल! जखन कि दरमहे ओते छेलैन जे मासो भरिक खर्चसँ किछु बेसीए भऽ जाइ छेलैन। मुदा जेकरासँ हम उधार लइ छी, जँ नगदे लेब, आकि अगुरवारे ओकरे लग जमा रैख ली जे मासो भरि तरकारी चलत, तहिना दूधोवालीक भऽ सकैए। तैबीच अपनाकेँ कर्जखौक बना जिनगी चलबैत रहलौं! हथ-उठाइ केकरा के दइ छै, बड़ दइ छै तँ एक कप चाह आ एक खिल्ली पान खुआ दइ छै। जँ लेबालक अगुरवार पाइ वेपारी हाथ पहुँच जाए तँ ओकरा पूजीमे बढ़ोत्तरी हएत। जइसँ अहाँक अपन काज भेल आ दोसर परिवारकेँ जीबैक आशा भेटलै। समाजक माने दस टोलक लोकेा सोझहे नै ने छी, ओ छी जिनगीक संगी आ कारोबारक संगी, विचारोक संगी...। फेर लालकाकीक मन कड़कड़ेलैन। कड़कड़ेलैन ई जे कहू केहेन भुच्चरपना चालि जिनगी भरि पकड़ने रहि गेला जे सभ दिन अभावेमे रहि गेला। कहियो भाव बुझबे ने केलैन। नचनियाँ सभ ठीके गबै छै- “दुख ही जनम लेल, दुख ही गमौल सुख कहियो ने भेल...।” हँ! समाजमे अखनो एहेन अछि जे केतेकेँ भरि पेट अहारो ने भेटै छै, उचित अहारक तँ चरचे बेसी। मुदा अपना तँ से नै अछि। जिनगीक पैंतीस बरख धरि पति सरकारी सेवामे रहला। तैपर सँ उलफियो कमाइ भेलैन। जँ से नै भेलैन तँ तीनू बेटीक बिआह, ओतेत धुम-धामसँ केना भेल? दुनू बेटाकेँ पढ़ैमे जेते खर्च भेल, ओते गाममे केते गोरे कऽ पबै छैथ? तैपर सँ नीक मकान, पानिक नीक बेवस्था, सभ किछु केना भेल? जेते दरमाहामे कटौती भेलैन तइसँ बेसी बैंकसँ सूइद अबिते अछि...। मन घुमलैन, जइ काजे आइ हम हिनका लोहैछ कऽ कहलयैन ओ चालि तँ शुरूहोमे छोड़ौल जा सकै छल, मुदा अपनो नीक लागल। बिनु पाइयोक कोनो चीजक अभाव कहियो ने भेल। ओह! गलती अपनो भेल। पति-पत्नीक बीचक जे सम्बन्ध अछि तइमे कमी जरूर भेल। मुदा जे दिन पाछू ससैर गेल, तेकरा केना मोड़ि सकब? जे आगू अछि ओकरा तँ मोड़ल जा सकैए। मुदा कोनो धार जे धारा रूममे प्रवाहित भऽ रहल अछि, ओइ धाराकेँ रोकैकाल तँ संघर्ष हेबे करत। लक्कड़-झक्कड़ हुअए आकि रस्सा-कस्सी, किछु-ने-किछु तँ हेबे करत। मुदा एहनो तँ नीक नहियेँ हएत जे धारक मुहेँ भोथिया जाए आकि धारे मरना भऽ जाए। फेर मन घुमलैन, जे भेल से भेल, दिनक दोख छल, भेल। मुदा दिनोक दोख तँ एकरा नहियेँ कहल जाएत, भोरे-भोर भेल, तँए भोरुका दोख मानल जा सकैए। भोरुका माने बाल-बोधक, बाल-बोधक गलती गलती थोड़े होइ छै, तहूमे बारह बर्खक निच्चाँक...। लालकाकीक मन पुलकलैन। पुलैकते पति दिस तकली। मुँह बीजकेने करियाकाका अपने छगुन्तामे पड़ल रहैथ। करियाकक्काक छगुन्ता ई रहैन, जे जहियासँ मन अछि तहियोसँ कहिया नै केकरोसँ उधार लेलौं। दरमाहा भेटै छल सबहक चुकती करै छेलौं, कियो मुँहपर कहि दिअए तँ जे एको पाइ बेइमानी केलिऐ...। ऑफिसेमे जेकरासँ पाइ लेलिऐ ओकर काज केकरो बाँकी रखलिऐ...। जे काज नै होइबला रहै छेलै, तेकरासँ थोड़े एकोटा पाइ लेलिऐ। ओना परिवारे छी, शासनसँ सत्ता धरि तँ चैलते अछि। एक दिस परिवारक अनिवार्य काज, जइसँ परिवार आगू मुहेँ ससरत, दोसर दिस परिवारक श्रम-शक्तिक संग बौसक खाँहिस। लगले लालकाकीक मन आगू घुसकलैन। आगू घुसैकते अपन सेवा निवृति दिस बढ़लैन। पाइक आमदनी तँ ठीके-ठाक अछि, मुदा हाथक काज छीना गेल, भरिसक अकाजक तँ ने पत्नी बूझि रहली अछि? भऽ सकैए, अपन काज ने हाथसँ ससैर गेल, मुदा हुनकर काज तँ ठामक-ठामे छैन, भरिसक तँए ने ओ शासन करए चाहै छैथ। ईहो तँ भऽ सकैए जे ओ नोकरीक अवस्थामे अपनाकेँ अक्षम बूझि पौने हेती तँए नै रोकलैन। मुदा आब तँ ओ सोल्हो-अना घरक कर्ता-धर्ता भऽ गेली। जँ कहीं हमर आदैत हुनका नीक नै लगैत होइन, तखन जँ कहली तँ उचिते कहली। करियाकाकीक मन ठमकलैन! ठमैकते नजैर अपन चालिपर पड़लैन, जखन महिनाक दरमाहा उठा दोकानदारसँ, दूधवाली, तरकारीवाली तककेँ चुकती काइए दइ छेलिऐ, तखन जँ दरमाहाकेँ उनटा कऽ चलितौं तँ ओही पाइसँ ओकरो बाल-बच्चाकेँ चहरा भेटितै, से चुकती तँ भेबे कएल। मुदा उपए? उपए यएह ने जे तरकारीवालीक सोझहामे पत्नी उझट बात कहि देलैन, मुदा तरकारियोवाली कियो आन तँ नहियेँ अछि, जहिना केतौ पत्नी गुरु बनती केतौ शिष्या, तहिना ने हमहूँ जखन ओ गुरु बनती तखन शिष्य आ जखन शिष्या बनती तखन गुरु बनैत हँसैत-खेलैत चलैत रहब...। चलू, मामला फड़िया गेल। घुड़छीक भत्ता खुजि गेल। मुस्की दैत करियाकाका लालकाकीकेँ कहलखिन- “कान पकैड़ मानियोँ लेलौं आ कानेपर कन्हेट कऽ रखनौं रहब जे ओहन काज सदिखन करब जे केकरो कर्ज अपना ऊपर नै आबए?” पतिक सुमैत सुनि लालकाकी बजली- “अहाँक चालि शुरूहेसँ रहल जे जेबीमे पाइ रहितो अनके खाइक ताकमे रहै छी। मुदा मरैयो बेर जँ बुझलौं तँ अगिला जिनगीक बात बुझलौं तँए खुशी अछि।” 2 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1175 उनटन अधरतियामे करियाकाकीक नीन टुटलैन। भकुआएले मने लालकाकाकेँ उठबैत बजली- “नीन छी की जागल। कनी उठू ते।” ओना लालकाका जगले रहैथ। कौल्हका काज मनमे घुड़ियाइत रहैन। काल्हि बोरिंग गड़ाएब, मिस्त्री सबेरे सात बजे पहुँचैक समए देने अछि। तैबीच आरो जोगाड़ करैक अछि। काज करैबला, चीज-बौस, सभ किछु जगहपर जेतए बोरिंग गाड़ल जाएत ओतए पहुँचबैक अछि; जँ से नै मुसतैदी रखब तँ अनेरे काजमे लटपटी लगैत रहत, जेते लटपटी लगत तेते काज पछुआइत रहत। तहूमे आब कि दादाबला समए रहल जे काज करैबला बोनिहार मरल आकि जीबैए सेहो पुछिनिहार नै। आब तँ सत-सत बेर खुशामद करियौ, हार्ड लीकरबला चाह पीअबियौ, पान सौ नम्बर जर्दा पत्ती देल पान खुअबियौ, तैपर सँ चारिटा पुड़िया शिखरक दऽ दियौ, तखन ओकर आशा करियौ। मुदा से अपन लोक नै छैथ। एक जुआनक लोक तँ छैथे। ओ अपन भरि दिनक बोनियेँटा नै बुझै छैथ ओइ काजमे अपन भविसो देखै छैथ। एकटा बोरिंग जँ दस बीघा खेत पटबैक पानि दइक क्षमता रखैए तँ जैठाम बोरिंग हएत, तैठाम दसो बीघा खेतबलाकेँ आशा जगबे कएल। मुदा फेर नजैर दोसर दिस बढ़लैन, पान सौ बीघाक गाम अछि, सए बीघासँ ऊपरे ओहेन जमीन अछि जे पानियेँमे सोलहन्नी डुमल रहैए। अन्नक उपजाकेँ पानि खा जाइए आ पानिकेँ केना उपजा कऽ खाएब से लूरिये ने अछि। तँए गामक चौथाइ ओहिना गेल। तेकर अतिरिक्त घर-घराड़ी, पोखरि-परती, गाछी-कलम सेहो भेल। अदहोसँ कम उपजाउ बँचल। बारहो मासक खेती लेल बारहो मास पानिक खगता होइ छै। भलें ओ केतौ पटौनी, तँ केतौ सिंचाय, केतौ छीचा तँ केतौ उपछे किए ने हौउ! करियाकाकीक बात सुनि लालकाका ऐ दुआरे अनठा देलैन जे भरिसक सिरमा तर सिंगहारक पात नै छैन तँए सपनए गेली अछि। जँ जागि कऽ बाजल हेती तँ फेर दौहरौती; नै जँ सपनाएल हेती तँ अनेरे ने भकुआ जेती...। मुदा से भेल नै। जहिना कोनो कोनो विद्यार्थीकेँ पढ़ैक कीड़ी माथमे कटैत रहै छै तहिना करियो-काकीक मनमे कटैत रहैन। कटैत ई रहैन जे किरिण डुमैबेर रस्तापर ठाढ़ छेली तँ एकटा अनठिया साइकिलपर चढ़ल बजैत जाइत रहए- “तेते ने लोक लोहा पाइप धरतीमे गाड़ि-गाड़ि पतालक पानि सोंखने जाइए जे पताले सूखि जाएत। जखने पताल सूखत आकि जहिना सीता धरतीमे समा गेली तहिना धरती धँसि पतालमे समा जाएत। जखने से भेल कि उनटन हएत। उनटनमे के उनैट कऽ सुनैट जाएत आकि पुनैट जाएत, तेकर कोनो ठीक अछि। लोक तँ अपने तेहेन अगिमुतु भऽ गेल अछि जे जानि कऽ अँठि-अँठि मुतैए; तँ पड़तै केकरा देहपर!” बीखक पुड़िया छिटैत ओ साइकिलबला चैल गेल। जहिना गाम-गामक चापाकलमे प्वाइजनक प्रयोग हुअ लगल अछि तइसँ जिनगी एहेन दुभर दिशा दिस बढ़ि जाएत, जे मनुखक शकले-सुरत बिगैड़ जाएत...। करियाकाकीक मनकेँ तेना साइकिलबलाक बात पकैड़ लेलकैन जे चैने ने हुअ दनि। दोहरबैत करियाकाकी बजली- “नीन छी, कनी जागू!” करियाकाकीक बात सुनि लालकाका ऊँह-ऊँह करैत बजला- “एतबो ने बुझै छिऐ जे काल्हि भरि दिन नमहर खटनी अछि। अखन जे नीक जकाँ नीन नै पुरा लेब तखन काल्हि अनेरे काजे बखतमे ओंघी लागत। झूकि-झूकि खसब, काजेमे बाधा हएत।” लालकक्काक बात जेना करियाकाकीक कानमे पैसबे ने केलैन। ओ अपने ताले घुनघुनाइत रहली- “परिवार तँ अपने छी ऐ परिवारमे जँ अधला हुअ लगतै आ अपने नै रोकब तँ की कियो आन आबि पुरा देत। एते दिन लोक बोरिंग नै करौने छल तँ उपजा होइ छेलै आकि नै। लोक अन्न खाइ छेलै आकि नै। जहियासँ लोक खाद-पानि खेतमे दिअ लगल, तहियेसँ एते बर-बेमारी गाम-गाममे पसैर गेल अछि।” घुनघुनीपर पतिक धियान नै जाइत देखि अपना विचारमे जोर लगबैत करियाकाकी बजली- “अहाँ जेते जरूरी अपन सूतब बुझहै छिऐ ओते हम अपनाकेँ जागब। कियो घरकेँ मानैए, कियो जानैए आ कियो सुनबेटा करैए, तँए कहै छी।” करियाकाकीक उझट बात सुनि लालकाका बजला- “अखन सुतै बेर अछि। काजक बेर जखन काज औत तखन बूझल जेतै।” लालकक्काक बात सठलो ने छल आकि बिच्चेमे करियाकाकी ललैक बजली- “बूझल जेतै कपार! जेहने कपार रहत तेहने ने बुइधो हएत।” अखन तक जे बात करियाकाकी बाजि कऽ काज रोकए चाहै छेली से बाते ने खुजल। तँए लालोकक्काक मन करियाकाकीक बातपर ओते नै पड़ैन जइ हिसाबे पड़क चाहिऐन। नै पड़ैक कारण रहैन जे संकल्पित मन चौकीदार जकाँ ओगरवाहि करैत रहैन। करैत ई रहैन जे जखन कोनो नव काजक शुरूआत करी तँ मनकेँ सोलहन्नी पकैड़ एकाग्र बना ओइ पाछू लगा दिऐ। जँ से नै आ काजक बिच्चेमे वौआ जाएब तखन तँ काज बिगड़ियो सकैए। जखने काज बिगड़त तखने ओ बेकावू भऽ जाएत। मन घुमलैन पत्नी दिस। कोन एहेन ताहीरी एते रातिमे बजैर गेल छैन जे एना कच्छर कटै छैथ? मुदा किछु बाजबो नीक नहियेँ हएत। भूतलग्गू जकाँ एकटा गपमे तीन दिन लगौती। तइसँ नीक चुपे रहब। मुदा एते रातिमे एना बजैले कछमछा किए रहली अछि...? ओह! भरिसक बाध-बोनमे केतौ सारा-गाड़ा नङ्हेलैन अछि। जँ घरक बात रहैत तँ एते चौहद्दी बन्हैक कोन जरूरी अछि, टुकड़ी-टुकड़ी काज छिड़ियाएल अछि, कोनो टुकड़ीक बात बैजतैथ। सेहो नै। लालकक्काक मन पछुएलैन। परसुका बात मन पड़लैन। केहेन बढ़ियाँ परसू जखन गाड़ीपर सँ बोरिंगक पाइप आ आरो समान दरबज्जापर अनलौं तखन वएह ने रस्तेपर रोकि कहने छेली- “अखन गाड़ीपर सँ नै उतारू, पहिने एक लोटा जल आ दूबि-धानसँ जगह शुद्ध करए दिअ, तखन चीज-बौस उतारब।” मानि तँ नेनहि छेलिऐन। कहाँ कोनो अशुभ बात मनमे छेलैन। चीज-बौस उतारैसँ पहिने जगहकेँ पवित्र केलैन, उतरला पछाति सिनुर-पीठार लगौने रहैथ। तखन बीचमे कोन अनहोनी बात आबि गेलैन? जँ अनठाएब तँ आरो झमाड़ि-झमाड़ि बजती तइसँ नीक जे किए ने पुछिये लिऐन जे की बात छिऐ। बजला- “अनेरे किए नीनक पाछू पड़ल छी। अहाँ नै बुझै छिऐ जे कौल्हुका केहेन खटनी अछि।” लालकक्काक विचारकेँ आगूएसँ खोंटि करियाकाकी बजली- “सएह तँ हमहूँ कहै छी।” करियाकाकीक बात सुनि लालकक्काक मन ठमकलैन। ठमकलैन ई जे एकटा होइए कोनो काजकेँ करब आकि नै करब आ दोसर होइए काज करैक तरीकामे। दुनूक दू कारण छै। ऐठाम दोसर कारण रहने काज विचारधारासँ जुड़ल अछि। लालकाका बजला- “की सएह कहै छी?” करियाकाकी- “बोरिंग नै गड़ाएब।” लालकाका- “बोरिंग हम गड़बै छी आकि अहाँ जे नै गड़ाएब!” लालकक्काक बात तीतहा मीठ छेलैन आकि मीठहा मीठ से तँ नै जानि मुदा बोरिंग गड़ौनाइ बदान बनि गेल। भोरगरे उठि लालकाका ओही खेत दिस विदा भेला, रस्तामे जे भेटैन संग कऽ लथि जे एकटा नव काज समाजमे ठाढ़ भऽ रहल अछि, एकर लाभ गाममे होइ। एहेन नै जे दियादी ताउ खेतेमे झाड़ि दिअए जे चारि भाँइक भैयारीक हिस्साक जे कोण होइ तहीमे चारू भाँइ बोरिंग गाड़ि ली। आ तेतबे किए, ई इलेक्शन जे ने करए। पछिला बेर तेहेन भेल जे गामक पानियेँ रोका गेल। सभ बोरिंगक नाला रूकि गेल। अपनो खेत पटाएब मोसकिल भऽ गेल। सभ भाँज-भूँज लगा लालकाका बोरिंग गाड़ैक सामान घरपरसँ आनए दू गोरेकेँ पठौलखिन। दुनू गोरेकेँ करियाकाकी समान नै उठबए देलकैन। सोझे डारिये कहलखिन- “बोरिंग गड़ा हमहीं उनटनक दोखी नै हएब।” करियाकाकीक बात दुनू गोरे नै बुझलक। चोटे घूमि कऽ आबि लालकाकाकेँ कहलकैन। पत्नीक रोकब सुनि लालकक्काक मन तरैंग गेलैन। जहिना नङ्गेराक संग डिगरी आगिक ताउ पबिते तरैंग तड़तड़ए लगैए तहिना भेलैन। बजला किछु ने। अपने घरपर विदा होइत काज केनिहारकेँ कहलखिन- “ताबे अहाँ सभ खादि खुनि पानि भरू।” दुनू गोरेकेँ संग केने लालकाका घरपर पहुँच पत्नीकेँ पुछलखिन- “दुनू गोरेकेँ घुमा किए देलिऐ?” पतिक विचारक बीच दृढ़ता देखि करियाकाकी सहैम गेली। बजली किछु ने। मने-मन खूनक घोंट पीबए लगली आकि दूधक से तँ ओ जानैथ। मुदा लालकक्काक मनमे एते जरूर उठलैन जे परिवारक काजकेँ जँ दृढ़ बनि दृढ़तासँ नै पकैड़ चलब तँ हवा-विहाड़िमे कखन कोन झाँटसँ झटा कऽ घर खस्सू भऽ जाएब तेकर ठेकाने ने रहत! 6 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1187 रेहना चाची दिन लहसैत किशुन भाय लौफा हाटसँ घुमती बेर जखन दीप पहुँचला तँ बाटपर ठाढ़ रेहना चाचीपर नजैर पड़लैन। कोराक बच्चा-प्रपौत्रकेँ रेहना चाची बाजि-बाजि खेलबैत रहथिन। रेहना चाचीक ‘अवाज’ सुनिते किशुन भायकेँ सात-आठ बरख पहिलुका बूझि पड़लैन मुदा सत्तैर बर्खक झूर-झूर भेल शरीर, धँसल आँखि, आमक चोकर जकाँ मुँहक सुरखी देखि शंको भेलैन। ओना सात-आठ बर्खसँ किशुन भाय रेहना चाचीकेँ नै देखने रहैथ तँए हँ-नै दुनूमे मन फँसल रहैन। फँसबो उचिते छेलैन। एक दिनमे तँ राज-पाट उनैट जाइए, सात-आठ बरख तँ सहजे सात-आठ बरख भेल। मुदा तैयो मन तरसैत रहैन, तरंगी होइत रहैन जे रेहना चाचीक अवाज छी। लग्गा भरि हटि बाटेपर साइकिल दहिना पैरक भरे ठाढ़ केने, रेहना चाचीपर आँखि गड़ौने मने-मन विचारिते छला आकि अनायास मुँह फुटलैन- “रेहना चाची।” ‘रेहना चाची’ सुनि चाची बच्चापर सँ नजैर उठा चारू दिस खिरौलैन। दछिनवारि भाग साइकिलपर ठाढ़ भेलपर नजैर पड़लैन। चेहरासँ चिन्ह नै सकली। मुदा कानमे किशुनक अवाज ठहकलैन। अवाज ठहैकते बोल फुटलैन- “बौआ, किशुन।” ‘बौआ किशुन’ सुनि किशुन भायकेँ जीहमे जान एलैन। जान अबिते जीहपर राखल तीस बरख पहिलुका रेहना चाचीक रूप-रंग आ बोल ठहकलैन। वएह रेहना चाची जिनकर जिनगीक दुनियाँ दछिन भाग लखनौर, उत्तरमे बेरमा, पूबमे कछुबी आ पछिम सुखेत भरि छेलैन। यएह छेलैन हुनकर कर्मभूमि आ दीप छेलैन पतिभूमि। एक तँ अहुना दीप ओहन गाम अछि जइमे छोट घराड़ीक परिवार बेसी अछि। जइसँ बरो-बाट घराड़ीए बनि सुखसँ रहैए। पहिने घराड़ीपर घर तखन ने जाइ अबैले आकि चलै-फिड़ैले बर-बाटक खगता होइए। बाटक काज तँ एक पेड़ियो, खुरपेड़ियो आ धुरपेड़ियोसँ चैल सकैए मुदा घराड़ी बिना ‘घर’ बाँसक धूजा बनि थोड़े फहराएत...। घराड़ी भरि जमीनमे बास करैवाली रेहना चाचीक जीविकाक बेवसाय छेलैन, भोरे अपन जवाबदेहीक अँगना-घरक काज सम्हारि, पथियामे अपन सौदा-बारी सैंति, चारू दिसक गामक पारक हिसाबसँ निकैल एक अनिया अलता, पैयाही डोरा, पैयाही सुइयाक संग आनो-आन बौस लऽ गामक सीमान टपि आन सीमानमे भरि दिन गमा साँझ पड़ैत फेर अपन सीमानमे पहुँच जाइ छेली। मिथिलाक जे गौरव-गाथा अछि- दुआरपर आएल बाट-बटोही, भूखल-दूखल जँ खाइबेर पहुँचैत वा जलखैए बेर पहुँचैत आकि जखन जे समए रहल, पहिने हुनकर आग्रह करयैन। ओना खाधुरोक अपन राज-पाट छै। जँ से नै छै तँ ओइठामक भोजैतक कोटा हजार रसगुल्ला आ बीस किलो माछक ओरियानक पछाति किए नतहारी ताकब छै। ओहन नतहारी जकाँ तँ नै मुदा हिस्सामे बखरा तँ लोक निमाहिते अछि। कोनो गाम अबैसँ पहिने रेहना चाची बिसैर जाइ छेली जे भरि दिन खाएब की आ रहब केतए। परिवार परिवारक बीच खाली कारेबारक सम्बन्ध नै। घण्टा-घण्टा बैसि रेहना चाची अपनो जिनगी आ परिवारो-समाजोक जिनगीक खिस्सा-पिहानी सुनैत अपन कारोबार करैत आएल छेली। साइकिलपर सँ उतैर किशुन भाय, स्टेण्डपर साइकिल ठाढ़ कऽ बजला- “चाची गोड़ लगै छी?” किशुन भाइक गोड़ लागब रेहना चाची सुनबे ने केली जे असीरवाद दितथिन, ले बलैया उनटा कऽ पूछि देलखिन- “बौआ, माए नीके छह किने। जहियासँ गाम छूटल, कारोबार गेल तहियासँ चीन्हो-पहचीन गेल! के केतए जीबैए आ केतए मरि गेल...! मरि गेल मनक सभ सखी-बहिनपा...!” रेहना चाचीक बात सुनि किशुन भाइक माथ चकरेलैन। जहिना एक-जनिया, दू-जनिया, बहु-जनिया ओछाइनो-बिछाइन चकराइत जाइए तहिना बुधिओ-बुधियारी आ चासो-बास तँ चकराइते अछि। तहिना किशुन भाइक मन चकरा गेलैन। चकरा ई गेलैन जे गाम छूटल! गाम किए छूटल? गुम-सुम भेल किशुन भाय रेहना चाचीक झूर-झूर भेल चेहरा देखए लगला, जेना खेसारी-बदामक बीड़िया झूर-झूर भेलो पछाति गरदी तरकारीक रूप पकैड़ भोज्य भोग पबैक सुख पबैत अपन जिनगी चैनसँ गमबए चाहैए, तहिना चाचीक मन सेहो पुलकैत रहैन। मुदा बिनु बुझनौं तँ नइने लोक बुझैत। कोनो बात सूनब आ बूझब, दू भेल। बुझैले बेसी सुनए पड़ै छै, सुनै तँ लोक एकहरफियो अछि। भाय पुछलखिन- “चाची, गाम केना छूटल?” किशुन भाइक प्रश्न सुनि रेहना चाचीकेँ एको मिसिया बिसबिसी नै लगलैन। जेना नीक जिनगी पाबि कियो नीक सिरासँ अपन जिनगीक बाट पबिते खुशी होइए तहिना भगिन-जमाए पाबि रेहना चाची खुशी छैथ। मुदा पेटमे पेटेले झगड़ा उठि गेलैन। झगड़ा ई उठलैन जे बीतल जिनगीमे जे घटल सत बात अछि ओ बाजल जा सकैए की नै? ओना आब ओइ बातक खगतो नहियेँ जकाँ अछि मुदा इतिहास तँ काल-खण्ड विहीन भाइए जाएत? रेहना चाचीक मन बेकाबू भऽ गेलैन! मुदा बिसवास देलकैन। बिसवास ई देलकैन जे अबैया दिन सुखैया तँ ऐछे, तखन किए ने अपन जिनगीक बात भाइयो-भातीजकेँ कहि दिऐ। आब कियो जिनगी लूटि लेत। बजली- “बौआ, सात-आठ बर्खसँ गाम सभ छोड़लौं, ओना खटनी छुटने देहो हर-हरा गेल, मुदा मन अखनो कहैए जे जानि कऽ रोगा गेलौं...। गामे-गामे तेना ने छीना-झपटी हुअ लगल, जे आन गामक लोकक कारेबारेटा नै, चलैक रस्तो कटि-खोंटि गेल।” एक संग किशुन भाइक मनमे रंग-बिरंगक अनेको प्रश्न उठि गेलैन, मुदा जहिना मुड़ी आ टाँग कटल लहासकेँ परखब कठिन भऽ जाइए तहिना चाचीक बात सुनि भेलैन। छीना-झपटी आकि झपटी-झपटा, वएह ने जे जहिना प्रखर वक्ता लोकैन अपन मेहिका चाउरमे मोटका चाउर फेँटि काज ससारि लइ छैथ आकि मोटके चाउरमे मेहिका फेँटि दइ छथिन...? मुदा अनेरे मन वौअबै छी। मनकेँ थीर करैत बजला- “चाची, जहिया जे भेल, से भेल। आब नीके छी किने?” किशुन भाइक बात सुनि रेहना चाची विस्मित भऽ गेली। ‘विस्मित’ ई भऽ गेली जे यएह देह छी, अपन गाम लगा पाँच गामक लोकसँ हबो-गब करै छेलौं आ खेबो-पीबो करै छेलौं, कमाइयो-खटा लइ छेलौं, से तँ छिनाइए गेल! ओना आब अपन उमेरो ने रहल जे माथपर पथिया लऽ चारि गाम घूमि कारोबार करब। रेहना चाची बजली- “अपन बेटा-पोता अल्ला हेरि लेलैन, मुदा फेर वएह ने देबो केलैन।” रेहना चाचीक उत्तर किशुन भाय नीक जकाँ नै बूझि सकला। तेकर कारण भेलैन जे लगले सुनला जे ‘बेटा-पोता हेरि लेलैन’ आ लगले सुनला जे ‘प्रपौत्र बच्चा छी’ आ भगिन-जमाइक परिवारमे रहै छी...। मनकेँ सोझरबैत किशुन भाय बजला- “चाची, हमरा ओहिना मन अछि, जखन माइयो आ अहूँ एकेठीन बैसि खेबो करी आ नीक-अधला गपो करी।” किशुन भाइक बात सुनि रेहना चाचीक अपन सत्तैर बर्खक जिनगी बिजलोका जकाँ मनमे चमकलैन। करियाएल मेघ, बदरियाएल मौसम, सरदियाएल रातिमे जखन बिजलोका चमकै छै तखन ओ अपन इजोतक संग अवाज करैत कहै छै जे हम लाली इजोत छी नै कि पीड़ी। पीड़ी दूर-देशक होइ छै लाली लगक। प्रमाण असतक होइ छै आकि सतक? सत तँ अपने सत भऽ सौंसे फल फड़ जकाँ अछि। रेहना चाचीक आगूमे ठाढ़ किशुन भाइकेँ ने ‘अक’ चलैन आ ने ‘बक’। दिन सेहो लुक-झुका गेल। सुरूज तँ डूमि गेल मुदा लाली ओहिना पसरल छल। किशुन भाय बजला- “चाची, अखन तँ दिन निसचित नै भेल मुदा अखने कहि दइ छी जे अहाँकेँ लिऔन करै छी।” किशुन भाइक ‘लिऔन’ सुनि रेहना चाचीक मन ठहकलैन। मन ठहकलैन ई जे आब वएह जुग-जमाना रहल आकि ओइसँ नीको-अधला भेल? नीक-अधलाक बीच रेहना चाची चपा गेली। जइसँ बोथिया गेली। बोथिया ई गेली जे की सम्बन्ध छल! कोरा-काँख तर केते दिन किशुनलालकेँ नेने छी, पावैनमे पवनौट खुएलौं आ अपने केते खेलौं, तेकर कोन हिसाब। जिनगीए ओही भरोसे बीतल किने...। आइ ओइ किशुनलालक बेटाक बिआह छी, की आब ओतए पहुँच पाइब सकै छी? केना पाबि सकै छी? जैठाम लोक अधला काज करै छल तैठाम गंगाजलसँ सिक्त कऽ नीक बनौल जाइ छल, आ अखनो बनौल जाइए। मुदा ओहन तँ जगहे खिया गेल। मुदा जैठाम गंगेजल अधला बनि जाएत, तैठाम की उपए...। रेहना चाचीक मन ओझरा गेलैन। मुदा सौंझका तारा जकाँ जेना मनमे भुक दनि उगलैन- जँ कहीं काजेक चर्च पाछू पड़ि जाएत आ अनेरूए गप साँझ पड़ा देत, तइसँ नीक जे काजक नाङैर पकैड़ धार पार होइ। बजली- “बौआ, ढौओ-कौड़ी लेलहक हेन?” ढौआ-कौड़ीक बात सुनि किशुन भाइक मन पुलकलैन। बजला- “चाची, बिआहक अखन गपे-सप उठल हेन, ओ सभ गप पछुआएले अछि, जखन बिआहमे एबे करब तखन सभ गप बुझा देब।” किशुन भाइक झाँपल-तोपल बात सुनि रेहनो चाचीक मनमे उठलैन, जेते अल्ला-मियाँ परिवार सभकेँ झाँपन-तोपन दैत रहथिन तेते नीक। भगवान सभकेँ नीक करथुन। बजली- “किशुन बौआ, देखिते छह जे अथबल भेलौं। चलै-फिड़ै जोकर नै रहलौं, मुदा पोताक बिआह देखैक मन तँ होइते अछि, से...।” रेहना चाचीक बात सुनि किशुन भाय गुम भऽ गेला। गुम ई भऽ गेला जे की रेहना चाचीकेँ यज्ञ-काजमे लियनु करा लऽ जा पाएब? की समाज एकरा पसिन करत? जे दुरकाल समए बनल जा रहल अछि ओ भरियाएल जरूर अछि। मुदा जात तर पड़ल ओंगरी जँ निकालि नै लेब, तँ जातक काज केना चलत। कोनो एकेटा ने हएत या तँ पीसिया हएत वा ओंगरी पिसाएत। मुदा भविस...। 9 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1307 बुधनी दादी बारह-चौदह-अना बढ़ला पछाति जहिना गाछ-बिरीछक रूपकेँ देखि अनुमानित हुअ लगैत जे फूल-फल लगै जोकर भऽ गेल। जेहने गाछ तेहने ने डाइरो-पात आ फूलो-फल हएत। ओना बुधियार बाबाक उमेर बेरानबेरम बरख टपि गेलैन, मुदा बुधनी दादीक नब्बे पुरि एकानबेमे प्रवेश करबे केलकैन, तइ बिच्चेक कथा छी। मुदा जहिना बारह-चौदह-अना पूर भेने आशाक फल फड़ै छै तहिना बारह-चौदह-अना नै भेने तँ निआशे कहल जेतै। खैर जे से। पचीसम दिन बुधियार बाबाकेँ जेठका बेटाक फोन अबिते मने चमैक गेलैन। मन चमैक गेलैन ई जे जेठ जन कहलकैन- “बाबूजी, मझिलो, सझिलो आ छोटो जनक विचार अछि जे आब सभ कियो गामेमे रहब। सबहक बीच विचार उठल जे काल्हिये चलू, मुदा रहैक घरक बेवस्था पहिने करए पड़त। चारू भाँइक रहै जोकर घर तँ बनबए पड़त।” जेठ जनक बात सुनि बुधियार बाबाक मनमे उठलैन जे ई गप पत्नीकेँ कहिऐन आकि नै कहिऐन? अखन मोबाइलेक गप छी, राता-राती लोक राखी काटि-काटि करोड़ोक वेपार ठाढ़ कऽ लेलक। भाय, मोबाइलेक कोन दोख छै, दोख तँ छै मोबाइल केनिहारक। मुदा ओकरे कोन दोख छै, जेना-जेना मन उनटै-पुनटै छै तेना-तेना अपनो उनैट-पुनैट गेल। तत्-मत्-मे पड़ल बुधियार बाबा बुधनी दादीकेँ ऐ दुआरे नै कहथिन जे स्त्रीगणेक मुँह छी, एके धुनमे रामो आ राक्षसो कहैए। जँ कहीं गपेक लहकीमे ओहो अनधुन किछुसँ किछु बाजि जाथि तँ अनेरे एकटा झमेल ठाढ़ हएत, तइसँ नीक ने जे जे बेटा हमरा कहलक ओ माएकेँ किए ने कहत जे अनेरे हम भार उघू। मुदा जहिना रसे-रसे राही, बाते-बात बतही, घाटे-घाट घटवार आ धारे-धार धारा चलैए तहिना बुधियार बाबाक विचार चैलते रहैन आकि बुधनी दादीकेँ सेहो जेठकी पुतोहु उपराग दैत फोन केलकैन। पुतोहुक उपरागक भारसँ दबाइत बुधनी दादी पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियाँ, कनी थम्हू। बुड़हाकेँ सेहो सुना दइ छिऐन।” मोबाइल नेने बुधनी दादी बुधियार बाबाकेँ हाथमे देलखिन। मुदा पुतोहुकेँ बूझल बात रहबे करैन जे हिनका तँ बुझले छैन तँए मोबाइलक स्वीच ऑफ कऽ देलखिन। कोनो गप-सप्प नै सुनि बुधनी दादी जेठुआ टुकली जकाँ अकासमे उड़ए लगली। अपने मुहेँ अपने कानकेँ गीतो सुनबए लगली- “कहू जे ई केहेन भेल। ससुरक हाथमे फोन देलिऐन, जे किछु कहैक छेलैन से हुनका ने कहितथिन। हम के ऐ घरक भेलौं, जे हमरा किछु कहती!” जहिना बुधियार बाबा चुपचाप बैसल रहैथ तेकर विपरीत बुधनी दादी बिढ़नी जकाँ नचैत रहैथ। मुदा कएले की जाएत। नअ हाथक घर आ नअ हाथक अँगनामे जँ एक दिस तीत गीत हुअए आ दोसर दिस मीठ, तखन अँगना-घरक सुननिहार की सुनत। अँगनो-घर तँ छोटे अछि, हल्ला छोड़ि सुनबे की करब। रमरौआ आ रमझौआ थोड़े बेरा कऽ सुनल हएत। मुदा लगले दुनूक मन फरिच भेलैन। फरिचो की ओहिना भेलैन, जखन माझिल बेटाक फोन बुधियार बाबाकेँ एलैन तखन बुधनियोँ दादी अपन मुँह बन्न कऽ कान खोलि देलखिन। बेटा फोनमे कहलकैन- “पिताजी, दस लाख रूपैआक मकान बनबैक विचार चारू भाँइमे भेल, तइमे हम बारह लाख पठा देलौं। अपना विचारे, जेते जल्दी सम्भव हुअए बना लिअ, काजक भार अहींपर रहल।” मोबाइल रैखते बुधनी दादी चमैक उठली। चमैक ई उठली जे मरैयो बेर तँ फेर वएह बेटा-पुतोहु ने लग औत। मुदा बुधियार बाबा गुमे रहला। बेरानबे बर्खक उमेर भेल, गुण अछि जे अपन ताक-हेर अपने रखने छी तँए आँखि तकै छी, मुदा जहियासँ चारू बेटा आँखि-पाँखि झाड़लक तहियासँ बिसैर गेल आकि मनमे रखलक? जखन मनेमे नै तखन...? मुदा जँ आबो सुबुधि एलै तँ नीक बात। अहू उमेरमे अपन चारू बेटाक बीच प्राण छोड़ब बेसी नीक हएत किने। आखिर हमर जे परिवारक प्रति प्रण छल ओ भार जँ उठा लेत तँ परिवारक इतिहासक पन्ना खाली नै ने रहतै। मन पछिला सीमा दिस बढ़लैन, बढ़ैत पहुँच गेलैन ओइ चरिखेता आड़िपर, जेतएसँ चारू बेटाक प्रति बुधियार बाबाकेँ आड़ि पड़लैन। एकतुरिये चारू भाँइ, पैंतीस बरख पूर्व बिआह-दान भेला पछाति, नोकरी करए जखन पत्नीक संग निकलल आ हमरा खर्चक हिस्सेदारी लगबए लगल, कहू जे हम बाप छेलिऐ, अपन खर्चक दुआरे कोनो बेटाकेँ कोनो बेटा लग मुड़ी झूकबए दैतिऐ। कहू! की हम नै बुझै छिऐ जे एकटा हाकिम अछि दोसर किरानी, की दुनूक दरमाहा एके हेतै? जँ हम हिस्सा लगा लैतिऐ तखन कम दरमाहाबला बेटाकेँ परिवार चलबैमे कट-मटी होइतै की नै? आइक जे पढ़ाइ-लिखाइक खर्च भऽ गेलैए तइमे अपन बाल-बच्चाकेँ पढ़ा-लिखा पबैत आकि बिआह-दान कऽ पबैत? मुदा आइ खुशी अछि जे बेटाक पीढ़ी तेना तर-ऊपर भऽ गेल जे बेराएब कठिन भऽ गेल अछि। खुशी ओहू दिन होइत जँ चारू बेटा, मास-मासक वा साल-सालक हिस्सा लगैबतैथ। ई बात सत जे जे बेसी कमाइ छल ओ बेसी दैत आ जे कम कमाइ छल ओ कम दैत। मुदा कमोबलाक बाप तँ हमहीं ने छिऐ, नै बेसी तँ एते तँ कहैक अधिकारी छेलिऐ जे बौआ, अहाँ आन भायसँ पछुआएल छी, हमहीं दइ छी। अपन पेट अपने चला, ओइ बेटाकेँ दोसर बेटाक देल दऽ दीतिऐ आ ऊपर दिस थोड़े बढ़ा दैतिऐ। से तँ नै केलक। खैर जे केलक ओ अपन केलक, खुशी अछि जे आबो चारूक विचार एक भेल। जाबे बुधियार बाबा विचारिते रहैथ आकि तइ बिच्चेमे बुधनी दादी एक लपकन गाम बान्हि एली। दोहरा कऽ गाम बान्हए विदा भेली। गाम बान्हए ई जे चारिटा बेटा चारिटा पुतोहु, लग औथिन, केना नै ढोल पीटि गामक लोककेँ बुझौथिन। गामक लोक तँ गामेक लोक छी, ने नाङैर छै आ ने सींग, तँए ने जानवरो भगौलकै। कियो दुधमुहोँ बाल-बच्चाकेँ सड़कपर छोड़ि दोसर स्त्रीक संग रमि जाइए, तँ कियो बेटो-पुतोहु ओछाइनपर पड़ल बेवस भेल बापो-माएकेँ तँ छोड़िते अछि। बुधनी दादीक घरक बगलेमे रधियो दीदीक घर। पड़ोसिया जकाँ नै अपने अँगना जकाँ सभ बात बजै छैथ। ओना उमेरमे दुनूक बीच बहुत दूरी छैन मुदा जेना हरबाह दू दाँतक बच्छाकेँ बुढ़बा दूटा दाँतबलाक संग जोति अपन काज सम्हारि लइए तहिना बुधनी दादी रधिया दीदीक संग निमाहि रहल छैथ। संगी भेने दुनू गोरे सदिकाल नफ्फेमे रहै छैथ। अँगनासँ निकैलते बुधनी दादी टाँहि देलखिन- “रधिया छेँ गइ, गै रधिया?” रधिया दीदी हाँइ-हाँइ सिलौट-लोढ़ीक काज करै छलि। अकलबेराक टाँहि ओहोमे बुधनी दादीक। सुनिते रधिया दीदीक मनमे भेल जे भरिसक मरैबेर जहिना लोकक बोल डिबिया जकाँ टनगर भऽ जाइ छै सएह तँ ने बुधनियोँ दादीक टनक छिऐन। रधिया दीदीक मन नचिते रहै आकि बिच्चेमे बुधनी दादी लगमे आबि गेली। दादीक मन हलचल देखि रधिया दीदी बाजलि- “दादी, मन बड़ हलचल देखै छी, केतो चलचलउ ने तँ छिऐ?” रधिया दीदीक बात बुधनी दादीकेँ नीक लगलैन। नीक लगैक कारण दुनूकेँ अपन-अपन विचार मनमे नचैत रहैन। बजली- “धुर बताहि, की बजै छेँ। एकटा नीक बात सुनबए एलियौ अछि?” ‘नीक बात’ सुनि रधिया दीदी सिहैर गेली। जहिना नहेला पछाति चिड़ै-चुनमुनी पाँखि झाड़ि मन हल्लुक करैए तहिना रधिया दीदी झाड़लैन- “की नीक बात दादी। निक्कोकेँ एतेकाल नुकौने छैथ?” विस्मित होइत बुधनी दादी बजली- “बुच्ची, चारू बेटा-पुतोहु एकठाम भऽ गाम औत।” बुधनी दादीकेँ बधाइ दैत रधिया दीदी बाजलि- “दादी, भरि रातिक हेराएल लोक जँ भोरमे डेरापर पहुँच जाए तँ ओ हेराएब नै भेल। मुदा दादी, अपन हाथो-मुट्ठी बदलि दोसरक हाथ चैल जेतैन!” अखन धरि बुधियार बाबा ई नै बूझि सकला जे जखन सभ अपन-अपन शेष जिनगीक बेवस्था काइए नेने अछि तखन एना एकमुहरी विचार केना भेलै? नीक हएत जे छोटका बेटासँ सभ बात पूछि लिऐ। मोबाइल लगौलैन। बजला- “गौड़ी?” गौड़ी- “हँ, गोड़ लगै छी बाबूजी।” “चारू भाँइक बीच एहेन सहमत केना बनलह, घर बनबैक खर्च केना जुटेलह?” “बाबूजी, तीर्थस्थलक नओंपर घरक चन्दा भेल, हिस्सा-बखरा नै भेल।” “बड़ बढ़ियाँ। मुदा सहमति?” अचरजित होइत कहलकैन- “बाबूजी, अहाँकेँ सभ बात तँ बुझले अछि जे कोन धरानी बेटा-बेटीकेँ पढ़ेबो-लिखेबो केलौं आ बिआहो-दान केलौं। जिनगी भाड़ा घरमे बितेलौं, आगुओ बिताएब। मुदा जखन सबहक बेटा-पुतोहु छोड़ि-छोड़ि पड़ेलैन, आ सेवा-टहलक कोन बात जे कियो भरि मुँह बोलो सुननिहार नै रहलैन तखन मन पड़लैन भाए-भैयारी, माए-बाप आ सर-समाज।” गौड़ीक बात सुनि बुधियार बाबा चुपी लाधि देलैन। मुदा बुधनी दादी थोड़े से मानलखिन। पजेबा, सीमेन्ट खसा चारि बजे साँझमे घरक न्योँ लेबे करती। भोरेसँ कखनो किछु तँ कखनो किछु जोगाड़मे लगले रहती। भाय! दुइए दिनक ने जिनगी भेल अगिला आ पछिला। जइमे पछिला कटिये गेल अगिला बनबे करत किने। 11 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1256 अउतरित प्रश्न अधकैतका समए जकाँ मासक रोहानी भऽ गेल। ओना संक्राँतिक हिसाबसँ अदहासँ बेसी टपि गेल, मुदा पूर्णिमाक हिसाबे अदहासँ पछुआएल, तँए दियावाती पावैन परसू हएत। हँसौना-खेलौना समए देखि दरबज्जापर बैसल किशुन भाय मने-मन छगुन्तामे पड़ल रहैथ। जे एहेन समैकेँ कोन समए कहबै, सालक अगता बरखा बेसी भेल, कम दिनुका आ कतिका धान तँ अदहा-छिदहा सुतरल मुदा अगहनी धान- सतरिया, तुलसीफूल, कनकजीर, वासमती, बाँसफूल इत्यादि पानिक अभावमे बौक भऽ गेल। भने नीक भेल, जानए जओ आ जानए जत्ता। बैसिले-बैसल समतल मन किशुन भाइक गामक चिमनीपर गेलैन। ओना गामेमे चिमनी अछि आ चिमनी मालिकसँ नीक लाटो-घाट अछि, मुदा बाढ़िक हिलकोरमे जहिना हलुकाहा वौस सभ ऊपर फेका जाइए तहिना फेका गेल छी। ओना दुनू गोरेक बीच परिवारिक नीक सम्बन्ध छैन्हें। गाममे उद्योग लागत, ओकातिक हिसाबे जे सहयोग हेबा चाही से परिवारसँ केनौं रहथिन, तँए जन्मौटी सम्बन्ध जकाँ सम्बन्ध बनल छैन्हें। पचता बरखा नै भेल जइसँ रौदियाहक लक्षण समए पकैड़ लेलक। कोन घर कानए कोन घर गीत। अगता किसान गीत गबै छैथ, पचता पावैनो-ले हाक्रोश करै छैथ। समैक नारी पकैड़ चिमनी मालिक- फूलबाबू- गोटी सुतारलैन। अगते उत्तर प्रदेशक मजदूरकेँ बजा लेलैन। मिथिलांचलक श्रम-शक्ति तँ तेना चूड़ा-दहीमे सना गेल अछि जे नीन कहिया पतरेतै तेकर ठेकाने ने। मनसूबा रहबे करैन जे अगते कातिकसँ कारोबार करब। कातिकक अन्त होइत जँ दू बेर भट्ठा फुका गेल तँ गोटी लाल हेबे करत। भाय तीनफुके तँ माइटो सोना भऽ जाइ छै, चिमनीक तँ पाकल माटि छै। मेहनती श्रमिक पाबि फूलबाबूक मन चपचपाइते रहैन, काजो तेज हएत आ नीक चीजो बनत। कातिकक दियावाती लछमी दिन छी, ओना कालियो दिन छीहे, मुदा लछमी दिन मानि फूलबाबू चिमनी फूकता। पहिल फूक तँए शंखा जकाँ फुकैमे आ किछु कण्ठो सर्ड़ास करैमे जेबे करतैन। काँच पजेबाक पथार, पथेरी लगौने। तैबीच तेहेन बरखा भेल जे बलुआहा महादेव जकाँ पजेबा ढहि-ढूहि गेल...। किशुन भाय चिमनीक जिगेसा जरूरी बूझि पत्नीकेँ कहलखिन- “भिनसुरका समए छी, चाहक बेर अछि, तँए चाह पीयाउ। फूलबाबूक चिमनी देखए जाएब। काज अगते शुरू केने छला, की भेलैन की नै।” छोट गाम। टोलक काते-कात गामक सीमान चौबगली अछि। गामक सीमानेपर चिमनियोँ अछि। गाम आ चिमनीक बीच मुइल-माइल कोसी नहर सेहो अछि, तैसंग नहरेक भितापर स्टेट बोरिंग सेहो अछि, सबहक दर्शन काइए लेब। चिमनीक बगले सड़कपर सँ किशुन भाय आँखि उठा चिमनी दिस तकलैन तँ बूझि पड़लैन जे जेना फौती आबि गेल होइ! जहिना कोनो गाममे जखन फौती अबै छै तखन सभ अपन-अपन घर पकैड़ लइए, तहिना डेरे-डेरे सभ- लेबर-मिस्त्री- पेटकान लधने। फूलबाबू सेहो डेरामे सिरमा पेटतर नेने पेटकान लधने। केतौ कोनो रोके-राक नै, तँए किशुन भाय डेराक केबाड़ लग पहुँच फूलबाबूकेँ पुछलखिन- “की हाल-चाल अछि?” जहिना कम शब्दमे पैघ बातकेँ बान्हि बाजल जाइ छै तहिना फूलबाबू बजला- “की कहब, नीनक गोली खाइ छी तखन नीनो होइए, नै तँ बताह भऽ गेल रहितौं।” कटाएलपर नून छीटब नीक नै बूझि किशुन भाय बजला- “कनी टहैल-बुलि कऽ देख लइ छिऐ।” कहि चोटे घूमि पजेबाक पथार दिस विदा भेला। ओना जेठुआ रौदमे जेते जल्दी पजेबा सुखैए, तइसँ बेसी दिन तँ जाड़क पजेबा सुखैमे लगिते छै। तहूमे टाँट करि कऽ सुखबैमे तँ आरो बेसी रौदक खगता पड़ै छै। हलाँकी समानो तँ नीके बनै छै। पथारक एकोटा पजेबाकेँ अपना शकल-सुरतमे नै देखि किशुन भाइक मनमे उठलैन फेर सभटाकेँ समेट-समेट दोहरा कऽ बनबए पड़तै! सभ पथेरीक पथारक एके दशा। तँए जेते बेसी देखब ओते बेसी सोगे-पीड़ा बढ़त, तँए अँटैक गेला। कँचका ईटाक ठाढ़ भेल एकटा घर। तैपर सिमटीक चदरा ऊपरमे। तीन हाथ ठाढ़ घर। घरक आगूमे किशुन भायकेँ ठाढ़ होइते, घरमे बैसल दुनू परानी भोजपुरी भाषामे गप-सप्प करै छल, किशुन भायकेँ देखिते घरसँ बहराएल। ओना भोजपुरी, मगही आ मैथिलीक बीच एतेक सानिध्य अछि, जइसँ छेहा जे गाम-घरमे रहैबला छैथ ओहो बेसी नै भुतियेता। बासाक आगूमे जा किशुन भाय पुछलखिन- “अहाँ सबहक घर केतए छी?” घरक नाओं सुनि ओना फतिमा बाजए चाहली मुदा आँखिक इशारासँ दबैत रसुल कहलकैन- “उत्तर परदेश।” रसुलक जबाव सुनि किशुन भाइक मनमे एक संग अनेको प्रश्न उठि गेलैन। प्रश्न उठिते मन तमतमेलैन। चुल्हिपर चढ़ल इन्होर पानि जकाँ पेनीसँ खौल उठए लगलैन। एक तँ आइ धरिक किसानक उजरल-उपटल गाम, कहियो दाही तँ कहियो रौदीक मारि खाइत रहल अछि। गामक युवक गामसँ बाहर जा-जा अपन श्रम-शक्ति बेचि रहल छैथ। जइसँ दिनो-दिन गाम बीरान भेल जा रहल अछि। एकर माने ई नै जे गाममे ने काज अछि आ ने काजक सम्भावना। अखनो गामक बीच फीक्स चिमनी बनबए बंगालक मालदह जिलाक हजारो कारीगर, कपड़ा, प्लाष्टिक, स्टील, दवाइ इत्यादिक लाखो रोजगारी बाहरसँ आबि जीवकोपार्जन काइए रहला अछि। पजेबा सन, साधारण लूरिक बौस जे माटि-पानिसँ बनौल जाइए, तेतबो नै कऽ गाम छोड़ि-छोड़ि पड़ा रहला अछि। माटि-पानिसँ वंचित युवक भागि रहला अछि...। किशुन भाइक नजैर आगू बढ़लैन, तँ पचास-साठि बर्खक उमेर दुनू-बेकती रसुलक बूझि पड़लैन। ओना पहिने मन झुझुएलैन। झुझुएलैन ई जे गरीब लोक, तहूमे जेकरा बेसी खटनी होइ छै, ओ तँ पचासेकेँ सए बूझि अपन औरुदा कबुल कऽ लइए। नै जँ कनियोँ होश करैत तँ सए बर्खक बात सोचैत। केतौ-केतौ बुइधो ने वियाधि होइ छै। गप-सप्पक क्रममे जखन फतिमा बजली जे बेटा अरबमे रहैए, पुतोहु गाममे तीन बच्चाक संग रहैए, तखन जोड़-घटाउ करैत किशुन भाय मानि लेलैन जे पचपनक करीबक दुनू बेकती छैथ। खिचड़ी केस दुनूक। बीस बरख पुरान भीत घर जकाँ केतौ बिढ़नी छत्ता, तँ केतौ मकड़ा जाल, तँ केतौ मूसक बीहैर जकाँ देहक रूप-रंग। किसुन भाय रसुलकेँ पुछलखिन- “दुनू परानी चिमनीमे काज करै छी आकि हमरे ऐठाम जकाँ एक परानी खटलौं बाँकी सभ पहुनाइ केलौं। देखै छी मेमो साहैब संगेमे छैथ।” दुनू बेक्तिक छातीक सिरखार अपन बगेओ-वाणि आ जिनगीक ऐना सेहो देखबैत। ‘मेम साहैब’ सुनि फतिमा बाजलि- “पुरुखसँ की जनाना कमजोर होइए।” फतिमाक बातमे किशुन भायकेँ विचार भेटलैन। बजला- “केना ने होइए?” जेना फतिमाकेँ जिनगीक अनुभव सीखा देने होइ तहिना बाजलि- “पुरुख-जनाना मनुख नै मनुखक विचार छी। जेकरामे पुरुखपना रहतै, ओ मर्द हुअए आकि औरत, किछु करैक लीलसा रैखते अछि।” फतिमाक साधल बात सुनि किशुन भाय सहमला। सहमैत बजला- “कोन-कोन काज दुनू बेकती संगे करै छी आ कोन फूट-फूट?” किशुन भाइक प्रश्न सुनि रसुल फतिमापर नजैर देलैन। अपना मुहेँ अपन बात बजैमे कनी-मनी कम बेसी भाइए जाइ छै। उत्साहित रहलौं तँ बेसी बजा गेल आ सोगाएल रहलौं तँ कमि गेल। फतिमाक मन जागल। जागल ई जे जखन घर छोड़ि बहार भेलौं तखन जँ मुँहकेँ दाबि राखब तँ काज चलत। गाम-घरमे जैठाम सभ सम्बन्धीए रहैए तैठाम तँ दिन-राति छह-पाँच होइ छै आ जैठाम असगर-दुसगर रहब तैठाम की हएत तेकर कोन ठेकान। घरसँ बहराइते लोक साढ़े तीन हाथक भऽ जाइए। देह छोड़ि किछु रहि नै जाइ छै। फतिमाकेँ बूझि पड़लैन जे किशुनक उमेर बीस-पचीस बर्खक हएत। बजली- “बौआ, पजेबाक माटिसँ लऽ कऽ गढ़ै धरि दुनू परानी संगे करै छी आ जखन पथारमे ओ सूखि जाइए तेकर बाद काज बँटा जाइए। हम माथापर उघै छी आ अपने ईटा सेरिआ भट्ठा लगबै छैथ।” किशुन- “केते दिनसँ चिमनी भट्ठामे काज करै छी?” “अपना खेत-पथार नै अछि, गामो सबहक ओहेन दशा दिशा नइए जे कोनो रोजगारो-बात करब। तखन दोसर उपऐ की? जहियेसँ सासुर एलौं, तहिएसँ करै छी।” ओना फतिमाक बात किशुन भायकेँ कण्ठसँ निच्चॉं नै उतरलैन। किएक तँ मन ठमैक गेलैन। गाम बनौनिहारे जँ गाम छोड़ि दिअए तँ गाम केना बनत। मुदा जिनकर बात सुनै छी, ओ तँ सुनए पड़त। बजला- “परिवारमे के सभ छैथ?” “बेटी सासुर बसैए, अपने दुनू परानी भेलौं आ बेटा-पुतोहुक संग दूटा पोता-पोती अछि।” “बेटा की करै छैथ?” “ओ अरबमे नोकरी करैए। आठ बर्खक करार छै, पछाति गाम औत।” “कते महिना कमाइए?” “अपन रूपैआ अस्सी-पचासी हजार।” ‘अस्सी-पचासी हजार’ सुनि किशुन भाइक मन तड़ैप गेलैन। बजला किछु ने, विदा भऽ गेला। सड़कपर अबिते मनमे अनेको प्रश्न उठि गेलैन- जाबे परिवार असथिर भऽ बास नै करत ताबे परिवारक सुरक्षो आ बालो-बच्चाकेँ सम्हारि पाएब अकास कुसुम सदृश आइक समाजिक परिवेशमे जिनगी चुनौती बनि गेल अछि! 14 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1229 हारि बीस माघ। सालक बारहम मासमे दस दिन कम। ओना वसन्तक प्रभातक संग सरस्वती पूजा सेहो। आइ तक सरोसतिया दादी यएह बुझै छेली जे दिनक फल भोजन आ सालक फल उपजा होइ छै। जेहेन नीक तेहेन नीक आ जेहेन अधला तेहेन अधला भेल। मुदा आइ माघक जाड़ दादीक हाड़केँ कँपकँपा रहल छैन, अखन तकक अपन जिनगीक अनुभव अपने धिक्कारि रहल छैन जे जिनगी हारि गेलौं। मुदा, हारि-जीत तँ जीता-जिनगी होइ छै मुइला पछाति केकरा के देखए अबै छै। ठिठुरैत देह, सिहरैत मन अपन देहक वस्त्र लऽ बाँकी सभ किछुकेँ छोड़ि सरोसतिया दादी घरसँ ओइ समए बहरेली, जखन शुरूहे अगहनसँ लाधल कुहेस पलाइत-पलाइत आइ बर्खाक बुन्न जकाँ टप-टप खसि रहल अछि। एक तँ दिनो अन्हरोखे जकाँ, मुदा साँझ पड़िते अन्हारक मोट चद्दरि पसैर गेल। दोसैर साँझ करीब सात बजैत, सरोसतिया दादी घरसँ बहरा मनोहर ऐठाम पहुँचली। मनोहरक घर आ सरोसतिया दादीक घर अगले-बगल। ओना समाजिक सम्बन्धसँ मनोहर आ सरोसतिया दादीक बीच परिवारिक सम्बन्ध बहुत लग नै तँ बहुत हटलो नहियेँ छैन। घर-गामक सम्बन्ध मनोहर आ सरोसतिया दादीक जे रहल होन्हि मुदा अपनो बनौल सम्बन्ध तँ छैन्हें, तँए दादी अपन अधिकार बूझि मनोहर ऐठाम पहुँचली। गोरहाक धधकैत घूर लग मनोहर बैसल। घूरेक धधड़ाक ईजोतमे किछु देखि पड़ैत बाँकी अन्हारे-अन्हार। हाथ-हाथ नै सुझैत। दू मास ऊपरेसँ ओस-पालाक प्रकोप उग्र रूप धेने अछि। दरबज्जाक ओसारपर अबिते सरोसतिया दादी बजली- “बौआ मनोहर, जान बँचाबऽ आब नै जीब।” सरोसतिया दादीक बात सुनि मनोहर चौंकैत बाजल- “दादी, एना अशुभ बात मुहसँ किए निकालै छी।” कहि उठि कऽ मनोहर सरोसतिया दादीकेँ बाँहि पकैड़ धूर लग आनि बैसौलैन। आगिक ताव लगिते सरोसतिया दादीक अंग-प्रत्यंग जेना सर्ड़ास हुअ लगलैन। बोलो टनमनेलैन। मनोहर सरोसतिया दादीसँ गीते-संगीत नै चित्रकारिता सेहो सीखने। पत्नीकेँ सोर पाड़ि मनोहर बाजल- “घूरसँ दादीक देह ने गरमेलैन, मुदा पेट पटुआएल रहने मन मन्हुआएले छैन जे खेले-पीले पछाति पुलकतैन। जेते पुलकतैन तेते फुदकतैन तँए गिलासमे दूध नेने आउ, एतै घूरपर गरमा लइ छी।” अपन आगत-भागत देखि सरोसतिया दादीक मन मानि गेलैन जे जहिना अपन बूझि मनोहरकेँ केलिऐ तहिना अन्तिम घड़ीमे वेचारा ठाढ़ो भेल। तैबीच सुचिता गिलासमे करीब पाभरि दूध नेने दरबज्जापर आबि पतिक हाथमे दऽ अपने सरोसतिया दादी लग पजरामे घूरे लग बैसली। सरोसतिया दादी अपन जिनगीक देखल-भोगल शीतलहरीक खिस्सा सुचिताकेँ सुनबए लगली। जेहने समए अढ़ाइ-तीन मासक शीतलहरीक ऐबेर भेल अछि तेहेन-तेहेन केते बेर भेल अछि, मुदा अपना शरीरोमे शक्ति छल आ शीतलहरीसँ बँचैक इलमो छल। कहियो नै गुदानलिऐ। मुदा आब ने ओ देहमे शक्ति अछि जे शमन करब आ ने हाथ-पैरमे ओते बुते अछि जे जीबैक ओरियान करब। साल जहिना बारहो मास होइ छै तहिना साल-सालक मासक समैयो होइ छै। कहैले तीनटा मौसम होइ छै, जाड़, गरमी आ बरसात। मुदा तेतबे नै होइ छै। तेतबेक माने भेल जे सभ सालक मास एके रंग हएत। कोनो साल गरूगर शीतलहरी भेल तँ कोनो साल ओइसँ कम। कोनो साल ओहूसँ कम, कोनो साल ओहूसँ कम आ कोनो साल सामान्य जे छिऐ तहिना भेल, तहिना गरमियोँक अछि, कोनो साल बरखा नै भेने प्रचण्ड भेल, तँ कोनो साल ओइसँ कम भेल, कोनो साल ओइहोसँ कम भेल। जेना-जेना पानि-हवाक प्रभाव भेल तेना-तेना मौसमो बनैत रहल। तहिना बरसातो अछि। एक तँ अपन इलाका पहाड़ी नदीक तलहटीक इलाका छी तँए ढालनुमा अछि। जँ एको रंग बरखा भेल तैयो सिराक पानि निच्चाँ मुहेँ ससैर-ससैर बेसियबैत जैठाम चपगर अछि तैठाम जलमग्न कऽ दइए। समैक यएह लीला अछि, तही बीचमे ने अपना सभकेँ हँसैत-मलड़ैत जिनगीक बाट टपैक अछि। मुदा मनोहरक नजैर दादीक ओझराएल जिनगीपर गेलैन। जहिना जालमे ओझराएल माछ ने छटपटा सकैत आ ने निकैल पबैत तहिना सरोसतिया दादी सेहो बेवस भेल छैथ। आगूक शेष जिनगीक प्रश्न अछि। जहिना सभकेँ अपन घर-दुआर, खेत-पथार, गाछी-कलम होइ छै जइमे अपना विचारे लोककेँ जे मन फुड़ै छै से करैए, तहिना ने मनुखोक सम्बन्ध मनुखसँ सर-समांगसँ लऽ कऽ सर-समाज धरि होइए। मनुखोक बान्ह तँ साधारण बान्ह नैहियेँ अछि। जेकरा तोड़ब आकि काटब धिया-पुताक खेल हएत। ई बात सत् जे दादीक चारि पीढ़ी ऊपरका सम्बन्ध हमरा पीढ़ीसँ रहल। बीचमे तीन पीढ़ी आगू बढ़ल। जहिना एक बीटक बाँस रहितो कोँपराइत आगू बढ़ि एको दिस बढ़ैत आ दोसरो दिस बढ़ैत, तहिना बाँस हुअए आकि केरा, खरही हुअए आकि शर्पत, जहिना चारू दिस कोँपराइत आगू बढ़ैए, तहिना ने मनुखोमे छै। दू भाए-भैयारी चारिम पीढ़ीमे छल, एक पीढ़ीक चारिम सीढ़ीपर मनोहर आ दोसर पीढ़ीक तेसर सीढ़ीपर सरोसतिया दादी। सर-सम्बन्धीक हिसाबसँ दूर छैथ, दादीकेँ अपनो तीनटा बेटी छैन, तीनू तीन गामक सासुरमे बसै छैन। तैसंग गामोमे दोसर पीढ़ीक सम्बन्धी छैन, तेकरा ऐठाम नै पहुँच दादी हमरा ऐठाम पहुँचली। बाट-घाट दुनू बन्न जकाँ अछि। तैठाम की कएल जाए? तहूमे छुच्छे देहेक बात रहैत तैयो नीक रहैत, मुदा सेहो ने छैन। कहुना तँ दस कट्ठा खेत छैन्हें। जाबे दादी आँखि तकै छैथ, ताबे लगक सभ सम्बन्धी आँखि मुनने छैन आ जखन आँखि मुनती तब जा कऽ चारू दिससँ सभ आँखि तकतैन। खेत-पथारक प्रश्न अछि। जैठाम धूर-कट्ठाले लोक जानो गमबैए आ जानो लइए तैठाम प्रश्न तँ ओझराएल अछि। मुदा लगले मनोहरक मन घुसैक अपना दिस एलै। बूढ़ दादी केते दिन जीती। ओना सम्भव अछि जे सालक तेहेन शीतलहरी अछि जे टपब मोसकिल छैन, मुदा मनुखोक औरुदा कि केकरो हाथमे अछि। सालक भीतरो मरि सकै छैथ आ पाँच-दस बरख आगुओ जा सकै छैथ। जेते दादीक सम्बन्धमे मनोहर सोचैत तेते रंग-रंगक बाट-घाट बनैत देखए। कजराएल मेघमे जहिना जहिना बिजलोका चमकै छै तहिना तहिना मनोहरक मन चमकल। चमकल ई जे दादी तँ कामधेनु गाए सदृश छैथ, असीम सम्पैत पेटमे रखने छैथ। अनेरे अपनो बौआइ छेलौं आ मनो बौआइ छल। दादी हमर जननी छैथ जे पैघ-पैघ कलात्मक बात जनौलैन। हुनके पाबि गीतकार, संगीतकार आ चित्रकार सेहो बनल छी। नमहर छी आकि छोट ई तँ अपन मनक ओकातिपर अछि, मुदा छी तँ जरूर। अनेरे दादीक खेत-पथारमे नजैर घोंसियेने छी। असल चास-बास दादीक गुरुत्वमे छैन। जे अखनो सैयो गीत-भजन पेटमे रखने छैथ, दुनियाँक चित्रकारी रखने छैथ, भगवान करथु जे दादीक औरुदा असीम भऽ जानु जइसँ अपनेटा किए परिवारक बालो-बच्चा अवाद होइत रहत। सरोसतिया दादीक जनम शिक्षक परिवारमे भेल छेलैन। माता-पिताक संयोग एहेन जे दुनूक चालिओ-ढालि आ गुणो-सोभाव एहेन मिलल-जुलल जे अगिला पीढ़ी लेल अनुकूल मनसुन बनल। इस्कूली शिक्षा तँ दादीक ओते नै भेलैन, मुदा परिवारिक अनुकूल तँ शिक्षाक दिशा देलकैन। पढ़ै-लिखैक लूरि, साज-अवाज साधैक लूरि, चित्र काढ़ैक अनुकूल स्थिति पाबि दादी एकटा कुशल गृहणिक रूपमे अपनाकेँ दुनियाँक बीच रखलैन। पिता शिक्षक रहितो सरोसतिया दादीक बिआह करैमे चुकला। चुकला ई जे अपन परिवारक कुल-मुलक अनुकूल कुल-मुलक जातिमे बिआह केलैन। मुदा परिवारक ढाँचा दुनूक दू रंग। सरोसतिया दादीक सासुरक परिवार एक कुल-मुल रहितो एकटा किसान परिवार आ दोसर शिक्षासँ जुड़ल शिक्षकक परिवार। पैंतीस बर्खक अवस्थामे सरोसतिया दादीक पति, जे एकटा किसान छला, बेमारीक पकड़मे आबि मरि गेला। तैबीच तीनटा बेटी भऽ गेल छेलैन। बेटा नै भेल छेलैन। पति विहीन जीवनक बीच सरोसतिया दादी अपन जिनगीक संग तीनू बेटीक पार-घाट सेहो लगौलैन। पार-घाट ई जे तरा-ऊपरी तीनू छोट-छोट बेटीकेँ पालि-पोसि घर-परिवारक लूरि सीखा-पढ़ा, बिआह-दान करैत तीनूकेँ सासुर बसौलैन। ओना अखन तीनू बेटीक बीच सातटा नाइत-नातिन छैन, मुदा जइ अवस्थामे दोसरातिक जरूरत पड़ै छै तइमे एकोटा ने ठाढ़ भेलैन। मनोहरक मन फरिच भऽ गेलैन। तैबीच अपन जिनगीक केतेको खिस्सा-पिहानी सरोसतिया दादी सुचिताकेँ सेहो सुना चुकल छेली। दादीक बोलक टनकसँ मनोहरक मनमे बिसवास बढ़लै जे कौल्हुका बिसवास केकरा छै जे हमरा रहत। मुदा आइ दादी टनकि गेली। काल्हि दिनले काल्हि अछि। समगम होइत मनोहर दादीकेँ पुछलकैन- “दादी, मन नीक लगैए किने?” दिलाशा पाबि सरोसतिया दादी बजली- “बौआ मनोहर, जँ ऐठाम नै आएल रहितौं तँ रातियेमे ठिठुरि कऽ मरि जइतौं।” मनोहर चुपे रहल, बिच्चेमे सुचिता बाजलि- “दादी, लोकेक आशा लोककेँ होइ छै, मुदा लोको-लोकक बात छै, एहनो लोक तँ ऐछे जे लोककेँ लोक बूझि जानो दइए आ एहनो तँ ऐछे जे कुलोक बूझि जान लइतो अछि।” सुचिताक बात सुनि सरोसतिया दादी ठमैक गेली। अपन जिनगीक सभ किछु हेराएल देखि हारि कबुलैपर आबि गेली। 16 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1240 सोनाक सुइत जेना-जेना सुचित्राक बिआहक दिन लगिचाएल जाइ तेना-तेना निर्मला काकीक मनमे धएल विचारक टनकक टहकी सेहो बढ़ए लगलैन। जहिना गुड़ घाक टनक रसे-रसे रसिआ शरीरमे टहकी बढ़ा दइए, जेकरा खिल रूपमे निकालला पछाति टनको कमैए आ धाओ छूटबाक आशा जगबैए, तहिना निर्मला काकीक मनक टहकी सेहो बढ़ि कऽ निकलैक मोड़पर आबि मन कबुल लेलकैन जे अनेरे मनक बात मनमे सड़बै छी, एकरा निकालबे नीक। करियाएल मने निर्मला काकी बेटीक मनोरथक आशा निकालि निराल-निराश होइत अपन हृदैक हारिक संग मनक हारि कबुल करैत सुचित्राकेँ बुझबैत बजली- “बुच्ची, तूँ बेटी छिअ। मनक बात तोरा नै कहबऽ तँ केकरा कहब। तहूमे तोरे धनक क्षय भेल अछि। किछु छिअ तँ कोखिक सन्तान तँ तोहीं छिअ। पुश्तैनी सोनाक सुइत...?” सोनाक सुइत तँ निर्मला काकीक मुहसँ निकैल गेलैन मुदा धसनाक तर पड़िते कोनो धार जहिना रूकि जाइ छै तहिना निर्मलो काकीकेँ भेलैन। अनायास मुँहक बोल ठमैक कऽ रूकि गेलैन। माइक अधखिजू बात सुनि सुचित्राक मनमे उठल जे चाउर कुटैकाल धानो अधखिजू होइए, मुदा एहनो तँ होइते छै जे अधखिजुओ मारिक चोट नीजा जीवनो-जान लऽ लइ छै। आखिर माइक मनमे कोन एहेन आँकर-पाथर पड़ि गेलैन जे कण्ठसँ ऊपर बकार नै आबि रहल छैन। पताएल आगिकेँ जहिना खोरनीसँ खोड़िते जीताएल आगि ऊपर चैल अबैत तहिना खोड़ैत सुचित्रा बाजलि- “माए, मनक बौस आ हृदैक ऋृषा दुनू दू सीमानक भीतर रहैए, छातीक दूध पीअल सन्तान हम छियौ, तखन लाथ किए करै छेँ। जखने गरीब माए-बापक घर कियो जनम लइए तखने छाती मुक्का मारि बुझैए जे जिनगी भरि कजराएल आँखिक नोरक धार बहबे करत, तइले चिन्ते की? साँझे जेकर मृत्यु भेल तेकराले की लोक भरि राति कनिते रहत। बाज माए, बाजि कऽ हमरो बाजूगर बना दे। बाज माए बाज, तूँ माए छँह, तोरा नै कहबौ तँ अनका कहनौं की हएत।” अपन हृदैक धाराक धार बेटीक हृदैमे ओहिना प्रवाहित होइत देखि निर्मला काकीक मन धिक्कारि देलकैन। धिक्कारि ई देलकैन जे अपन मनक बातकेँ मनमे मारि राखब नीक नै। कुसमैमे भलें ओ मटियामेट धुरा बनि पैरक तर किए ने रहए, मुदा इतिहास ने केकरो बिसरल आ ने बिसरत। ओ तेतबे धरि बिसराएल अछि जेते तक जन्मदाता विहीन अछि। जखने खोजी खोजए निकलै छै तखने खज-खजाना भेटिते छै। विशाल खजाना मटियामेट भऽ नुकाएल अछि...। निर्मला काकीक विचार मोड़ लेलकैन। मोड़ लइते उठलैन हमरा तँ ओहेन माए ने बनक चाही जे भुखाएल बच्चाक भूख बूझि कनै वा बजैसँ पहिने खेनाइ दऽ दिऐ। जहिना चिड़ै-चुनमुनी लोलमे लोल सटा बोलो आ घोलो घोरैए तहिना घोरैत निर्मला काकी बजली- “बुच्ची, तोराले सोनाक सुइत एकटा रखने छेलौं, बिआहक दिन माए देने छलि। मुदा...।” माइक अधखड़ू बोल सुनि सुचित्रा बाजलि- “बाज माए, पुरा करि कऽ बाज।” सुचित्राक मनक झमार तेना निर्मला काकीकेँ झमारि देलकैन जे झूर-झमान होइत बजली- “बेटी, बकार नै फुटैए। तोरा देख-देख आरो मन कलहन्तमे पड़ि लाजे कठुआ मन कँपैए।” निर्मला काकीक बात सुनि सुचित्राकेँ सुनैक जिज्ञासा आरो बढ़ल। दोहरी झमार दैत बाजलि- “माए, तूँ जननी छीएँ, किए जनितो अन्जनी बनए चाहै छेँ। जहिना अपन देहक सभ किछु दऽ ठाढ़ केलेँ तहिना अपन मनक बात सेहो मथि कऽ किए ने खुआबए चाहै छेँ। जनाएबे ने जननीत्व भेल।” सुचित्राक आँखिमे आँखि गाड़ि निर्मला काकी बेटीक लीलकेँ कलील करैत बजली- “सुचित्रा, जे बूझल-जानल अछि से सुनि लएह। माए कहने रहए जे ई सुइत हमरो माइए देने छलि। जेकरा जोगा कऽ तोराले रखने छेलिअ। मुदा बिच्चेमे तेहेन भुमकम भेल जे विरहा गेल।” सोनाक सुइत विरहाएब सुनि सुचित्रा ठमैक गेलि। ठमैक ई गेल जे एक तँ बिआहक बात पक्का भऽ गेल अछि, तैबीच सोनाक सुइतक गप अछि। किछु बाजब माइक माथपर बोझ देब हएत। बी.ए. पास सुचित्रा ओहेन नै जे घरसँ बाहरक कौलेजमे हजारो रूपैआ महिना खर्च कऽ पढ़लक, ओहेन सुचित्रा जे गामसँ पाँच किलोमीटर पएरे चैल गमैआ कौलेजमे पढ़ने छलि। पढ़ने छलि समाजशास्त्र आ समाजशास्त्रक अर्थशास्त्र आ अर्थशास्त्रक इतिहास। निष्कलंक, निष्कपट सुचित्राक मन अपन कौलेजमे पढ़ल विषयमे पहुँचल। केना समाजक ढाँचाक संग लूट-पाट भेल, केना अर्थक लूट-पाट भेल आ केना इतिहास लूटाएल। मुदा प्रश्न नान्हिटा नै। सुचित्राक मन ठमैक कऽ ठहैर गेल। कोन जरूरी वेचारीकेँ छेलै जे समाजक ढाँचाकेँ तोड़ि-मरोड़ि बुधियार अपन भोग-विलास केलक? कोन जरूरी छै जे केना छोट वेपारीकेँ, माछ जकाँ बड़का वेपारी ढप-ढप गिड़ैए। कोन जरूरी छै जे समाजकेँ शराबी, जुआरी, अपराधी बना समाजक नक्शे विगाड़ि दी...? विचारक दुनियाँमे अपना मनकेँ हेराएल-भोथियाएल देखि सुचित्राक ममत्व जागल। बाजलि- “माए, हमर चिन्ता तोरा एतबे धरि करक चाहिऐ जेते धरि अवोध बच्चासँ नव दुनियाँक मनुख बना बिआहि नव सृजनक दुनियाँक सीमानपर पहुँचा रहल छेँ। अनेरे कोन सोनाक हँसुलीक चर्च करै छेँ।” सुचित्राक विचार निर्मला काकीक विचारमे ओहेन धक्का मारलक जे जिन्जीर खोलने बिना केबाड़ खुलि गेल। बजली- “बेटी सुचित्रे, चीज गेल तँ गेल। मुदा मनमे रोपल जे मनोरथ छल, ओहो आइ चैल गेल। बाल-बच्चाक सुख-दुख माए-बाप नै बुझहै, माए-बापक सुख-दुख बेटा-बेटी नै बुझहै, तखन अनेरे किए इतिहासो आ समाजोशास्त्र परिवारक परिभाषा करैए। ओकरा कोन दरकार छै जे अनेरे अपन किताबक पन्ना दुरि केने अछि?” निर्मला काकीकेँ हेराइत देखि सुचित्रा भरि पाँज समेट बाजलि- “माए, चीजक चर्च नै, अपन सोग की छौ से कहि दे। आगू दिन काज देत।” सुचित्राक मधुआएल विचार सुनि निर्मला काकीक मन उमैड़ गेलैन! बजली- “बुच्ची, बिच्चेमे बात हेरा-ढेरा जाइए तँए तीनटा बात कहबह। सएह पहिने कहि दइ छिअ, मन पाड़ि-पाड़ि दिहऽ।” अपन हेराएल-भँसियाएल जिनगीक बात जहिना लोक बिसैर जाइए तहिना भरिसक माइयोकेँ भऽ रहल छेलैन। सुचित्रा मने-मन विचारए लागलि, जहिना घाकेँ खील, पीज, खून निकालि साफ कएल जाइए तहिना बनौला पछाति माइक विचार बूझि सकब। बातक जड़ि पकैड़ सुचित्रा बाजलि- “माए, अनेरे कोन सोग-पीड़ामे पीड़ाएल छेँ। तीनटा कोन बात छौ, से कहि दे।” जहिना गुरुआइन अपन शिष्याकेँ छातीक हाड़ पहिरा असीरवाद दैत, तहिना निर्मला काकी बजली- “बुच्ची, अखन धरिक पुश्तैनी परम्परामे बेटीक बिआहमे सोनक महत रहल अछि। तँए मनोरथ छल।” माइक बात सुनि सुचित्राक मन मिसियो भरि विचित्र नै भेल। घा बहबैकाल माइयो जहिना बच्चाक भविस देखि पाथर जकाँ छाती बना लइ छैथ, तहिना माइक बेथाक कथा सुनैले सुचित्रा छातीपर पाथर रैख बाजलि- “एतबेटा बातले तूँ एते बेथाएल छेँ? तूँ हमरा पढ़ल-लिखल आदमी बना दुनियाँक बीच ठाढ़ कऽ रहल छेँ, जेतए बनियोँ-वेकाल बजैए जे ‘सए भरि सोना नै नीक एकरती बुधि नीक।” सुचित्राक तोष भरल बात सुनि निर्मला काकी बजली- “बुच्ची, जे सुइत तोराले रखने छेलौं, ओ माए देने छलि, माइयोकेँ माइए देने छेलखिन। धरोहर छल। अनका जकाँ अखन तक चोर-डकैतसँ भेँट नै हुअ देने छेलिऐ, मुदा वन्हकीदारक भाँजमे चीज चैल गेल।” माइक विचारक तड़ी देखि सुचित्रा आरो तरसँ बमकोला दैत बाजलि- “माए, इतिहास बजैए, आइए नै सभ दिनसँ धनक बैमानी-शैतानी होइत रहल अछि, तोरो भेलौ। हमरे दइतेँ किने, मन मानि गेल जे तूँ देलेँ, हम लेलौं।” सुचित्राक विचार सुनि निर्मला काकीक मन चौदहो भुवनक सातम सीढ़ी पार कऽ गेली। आठम सीढ़ीपर पएर रैख बजली- “बुच्ची, भुमकममे बुड़हाक देहपर घर खसि पड़लैन। ओही इलाज करबैमे सुइत बन्हकी लगेलौं। अही आशापर लगौने रही जे जहिया सुचित्रा बिआह करै जोकर हएत तहिया ने काज हएत, ताबे बेगरता सम्हारि लइ छी। मुदा डकैती कहि सुइत बेइमानी कऽ लेलक।” माइक बात सुनि सुचित्रा बाजलि- “अहीले एते सोग करै छेँ, चोर-बैमान चोरे-बैमान रहत, साउध-साउधे रहत।” 17 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1135 मरूभूमि जहिना मनुखक तीन अवस्था- सूतल, जागल आ सपनाएल- होइए, तहिना भूमिक सेहो होइ छै। कौलेजक छात्रा गीता जेहने जागल तेहने रीता मरियाएल, मुदा दुनूक दियादी परिवार तँए घनिष्ठता बेसी। बेसी घनिष्ठताक आरो-आरो कारण छै, एकठाम घर सेहो छै, बच्चेसँ, जहियेसँ इस्कूल जाए-आबए लगल आ एक्के किलासमे नाओं लिखा पढ़ए लगल, तहियेसँ दुनू इस्कूलक संगी बनि आरो घनिष्ठताक घनत्वकेँ बढ़ौलक। ओना दियादीक डाह सेहो होइ छै। माने कटा-कटी, मारा-मारी, गारा-गारी, मुदा से रीता-गीताक परिवारक बीच कहियो ने रहल, तँए दुनू बहिन रीता-गीताक बीच किए हएत। एक तँ ओहुना गामो-समाजमे बेटाक अपेक्षा बेटीक बीच घनिष्ठता बेसी होइए, तहूमे दुनू पढ़बो-लिखबो करिते अछि। ओना एकरंगाह वेपारियो आ गिरहस्तोक बीच जिनगीक दौड़मे मुँह फुल्ला-फुल्ली होइए जे से एक-दोसरसँ आगू बढ़ैले किछु उचित अनुचित भाइए जाइ छै, मुदा तैयो आगूक दिलाशामे प्रतियोगिक रूप पकैड़े लइ छै। से एके दिस नै, दुनू दिस पकड़ै छै। उचितो दिस पकड़ै छै आ अनुचितो दिस। दुनूक अपन-अपन लक्ष्य सेहो छै। तँए कि सभ वेपारियो आकि सभ गिरहस्तोमे अहिना रहै छै? नै! एना रहबो केना ने करत? सभ दिनसँ होइत आएल अछि जे फनिगाकेँ चुट्टी बीछि-बीछि खाइ छै, चुट्टीकेँ बीछि-बीछि बेंग, बेंगकेँ बीछि-बीछि साँप आ साँपकेँ गरूड़, तँए ने पर्यावरण नियंत्रणमे अछि। तहिना जँ छोट वेपारीकेँ आकि गिरहस्तेकेँ मझोलका नै बीछि-बीछि खाए, मझोलकाकेँ पुरलाहा नै खाए, पुरलाहाकेँ परपुरलाहा नै खाएत, तखन पर्यावरण नियंत्रणमे रहत केना! बच्चेसँ दुनू दियादी बहिनक बीच रहल जे जखन जे काज करै छी तखन तहीपर नजैर गड़ा करब, जइसँ दीन दिन दिनो-दिन नीक बनैत जाएत। नीक आकि अधला केतौ एकेबेर हड़-हड़ा कऽ थोड़े भऽ जाइए, ओ तँ होइत-होइत होइए। दुनू दुनूक बीच सम्बन्ध बच्चेमे एहेन बनि गेल जे बिना संग केने इस्कूलो ने जाइत। भलें तैयार भेलो पछाति किए ने एक-आध घण्टा बिलमए पड़इ। मुदा से कोनो अधला नै। निरर्थक घोड़-दौड़मे समैक महते की रहैए, जे अनेरे कियो समैक नाङैर पकैड़ दौड़ा-दौड़ीमे हकमैत रहत। घरसँ बहराइते दुनूक बीच एहेन बनि गेल छै जे बाटमे जेकरे नजैर कोनो नव वस्तुपर पड़तै तँ ओ ओकरे जिनगीक खेलौना बूझि एक-दोसरकेँ पूछि, बक-झक करैत एक सीमापर अँटैक एक राय बना सीमान दऽ दइए। जेना-जेना विद्यालय घुसकैत गेल तहिना-तहिना रीता-गीताक जिनगी आ जिनगीक विचार सेहो घुसकैत गेल। आब, दुनू कौलेजमे पढ़ैए। घरेक गोसाउनिक गीतटा नै भूगोल पढ़ि दुनियोँक गप-सप्प करए लगल अछि। जहिना घरसँ इस्कूलक रस्तामे निकैलते कोनो वस्तुकेँ ज्ञान बूझि धियानक करखानामे दुनू औंट-पौर दूधकेँ दही जनमबैत। ओना बच्चेक विद्यालयसँ दुनू भूगोल पढ़ने, मरूभूमिक चर्च किताबोमे देखने आ कानोसँ सुनने। मुदा भूगोलमे दुनू ओही दिनसँ भरैम गेल जइ दिन किताबमे पढ़लक जे दुनियाँ गोल छै, आँखिक सोझमे उतरे-दछिने आकि पूबे-पछिमे खूब नमती धरती छै। ऊपर अकास छै तँ ने ओकरे ठेकान छै जे केते ऊपरमे अछि आ ने तरे दिस पताल छै तँ केते तरमे अछि। एक भग्गू नाप, मानि दुनू एक राय बना नेने छल जे किताबक बात दोसर होइ छै आ आँखिक सोझक बात दोसर। तँए मरूभूमिकेँ किताबक बात मानि दुनू गोरे ओइ कौंपीक पन्नामे लिखि कऽ रैख लेलक जे भूगोलक छेलै। दुनू आइ कौलेजक किलासमे नव सिरासँ मरूभूमि सुनलक। ओना किलासक मरूभूमिक चर्च पहिल दिन भेल तँए प्रोफेसर साहैब मरूभूमिक भूमिके बान्हि वर्ग-विसर्जन केलैन। सेहो भूमिका साहित्यक भूमिका जकाँ नै, भूगोलक भूमिके की हएत। मुदा भूमिकेमे रीतो आ गीतो मरूभूमिक अगिले आखरमे चोन्हिया गेल, तँए नीक जकाँ दुनूमे सँ कियो ने बुझलक। मुदा तैयो मनमे सबूर बन्हलक जे आइ भूमिके ने छल, असल तँ आगू औत तँ अनेरे मनहूस किए करब। अखन हूसबे केते कएल हेन। पहिने प्रोफेसर साहैब भूमिके देलखिन, आगू आरो कहथिन जे बुझैमे नै औत से पूछि लेबैन, पछाति ने अन्तिम सीढ़ीपर पहुँचब। छुट्टी होइसँ पहिने दुनू दुनूक ताक ताकि आँखि-मिलौनी कऽ मनमे प्रश्न रोपि-गाड़ि लेलक। एक्केक नाओं रोपब आ गाड़ब दुनू छी। एकटा भेल कोनो गाछकेँ माटिमे गाड़ब, आ वएह भेल रोपब। छुट्टीक घण्टी बाजल। दुनू किलाससँ निकलल। विद्यार्थीक जेरक बीचसँ जहिना रीता एकबाहि होइत गीता दिस बढ़ल तहिना दोसर दिससँ गीतो कनछियाइत रीता दिस भेल। एकठाम होइते दुनू एकांत बूझि गप-सप्प करैक स्थान चुनलक। एकान्ते स्थलमे ने जोगियो दुनियाँ देखैए आ भोगियो। मुदा से नै रीता-गीता दुनू सांसारिक मनुख, तँए अपन जीवनक लेल सुनल प्रश्नक उत्तर तकै दिसक विचार करैत रहए। प्रश्नक उत्तर तकैमे बाट-घाट सेहो ताकए पड़ै छै, जे कोनो चिकनो होइ छै आ कोनो उबरो-खावड़बला। ओना, जहिना रीता गीताक चेहरा देख-देख परखैत जे बात सुनै जोकर मन खनहन छै आकि नै, तहिना गीतो रीताकेँ परैख लेलक। दुनूक अपन-अपन बात मनमे उज-मारि करै जे पहिने हम आगू हएब तँ पहिने हम। बात रहै जे रीताक मनमे ‘भूमिका’ शब्द ओझराएल आ गीताक मनमे ‘मरूभूमि’ शब्द। ओना प्रश्नोक दू सोभाव होइ छै, एक होइ छै जानैक खियालसँ आ दोसर होइ छै जँचैक खियालसँ। मुदा से जहिना कोनो थलकमल गाछक डारि एके दिन जनैम संगे बढ़ैत संगे फुलाइए तहिना दुनू गोरेक बीचक सम्बन्ध, तँए दोसर कोनो मलिनता नहियेँ। दुनू अपन-अपन बजैक सूर मिला सुनिनिहार दिस देखि आँखि उठा-उठा एक-दोसरकेँ देखलक। तानी-भरनी मिलते रीता बाजल- “बहिन गीता, हम-तूँ तँ ओहिना ने छी जेना रीतक संग गीत चलैए आ गीतक संग रीत।” रीताक बातमे गीता हूँहकारी भरलक। किएक तँ मन इशारा कऽ देलकै जे एके-हूँहकारीमे रीता गदगदा जाएत जइसँ अपन प्रश्न अगुआ लेब। गरो सुतरलै। हूँहकारीक हिल-हिली खतमो ने भेल छेलै तइ बिच्चेमे गीता बाजि उठल- “मरूभूमि की?” अपन पछुआइत प्रश्नक समए देखि रीता बाजल- “बहिन, जहिना तोहर प्रश्न तहिना हमरो मनमे एकटा उचड़ैए।” जखने प्रश्नपर-प्रश्न लधाएत तखने कोन केहेन रहत आकि सभटा बेदरंग भऽ जाएत तेकर कोन ठेकान छै। मुदा प्रश्नक उत्तर होइत जँ प्रश्न चलत तँ ओ चलन्त प्रश्न भेल जे उचितो छै। अपन प्रश्नपर दोहरी जोर दैत गीता बाजल- “बहिन, समए केतौ पड़ाएल नै जाइ छै, अखन कौलेजसँ निकलबे केलौं अछि, प्रश्ने केतेटा अछि जे घर तक पहुँचैमे नै फड़िछाएत।” रीताक मनमे होइ जे पहिने भूमिकाक चर्च जँ नै हएत तब तँ गड़बड़ाएत, मरूभूमि तँ अगिला भेल। पहिने कोनो चीज जनमत तखन ने मरत। जँ मरले जनमत तँ मरले-जनम ने भेल। तँए अपन प्रश्नकेँ अगुआएब नीक बुझैत। गीताकेँ नै चाहितो रीता अपन प्रश्न रखलक- “भूमिका की?” प्रश्न सुनि गीता समगम होइत बाजल- “बहिन, जेहने प्रश्न अहाँक तेहने हमरो। जहिना अहाँ सुनलौं तहिना हमहूँ सुनलौं। भरि बाट अहूँ औंटू आ हमहूँ औंटै छी, जेते औंट लागत तेते रस गढ़ाएत।” समुचित बात सुनि रीता विचार मानि बाजल- “बड़ बढ़ियाँ।” कहि चुप होइत मरूभूमि दिस नजैर देलक। एक भेल जीवित भूमि, दोसर भेल मरूभूमि। मुदा अपन प्रश्न अछि भूमिका। पहिने भूमिक चर्च हएत तखन ने ओकर मरन-जिअनक। जहिना रीता चुपी लाधि देलक तहिना गीतो लाधि लेलक। धिया-पुताक खेल जकाँ चुप्पा-चुप, धुप्पा-धुप पसैर गेल। मुदा मन औना गेलै। साँपक बीख झाड़निहार मनतरिया घरसँ निकैलते अपन देहकेँ भूमि मानि बान्हि बजैए, ‘जल बान्हो, थल बान्हो, बान्हो अपन काया...।’ आब ऐठाम की बूझब। दोसर दिस देखै छी जे भूमिके बान्हि घटक सभ दिन-राति गरदैनकट्टी करैए। कौलेजसँ घर दुनू पहुँच गेल मुदा केकरो उत्तर भेटबे ने कएल। अँगनाक रस्ता जैठाम फुटै छै तैठाम आबि गीता बाजल- “बहिन, उत्तर नै भेटल तँ नै भेटल, कौल्हुका समैयो तँ पछुआएले अछि। तइले विद्यालयकेँ थोड़े अबलट जोड़ब जे केकर मुँह देखि विदा भेलौं जे जतरे खराप भऽ गेल। घरसँ विद्यालय गेलौं विद्यालयसँ घर एलौं, जँ अहिना जिनगी चलैत रहए, तँ ऐसँ आगू की चाही।” गीताक विचार सुनि रीता हूँहकारी तँ भरि देलक मुदा मन झुरझुराइते रहलै। मनो केना नै झुरझुरइतै? पहिने जी आकि पहिने दाँत? देखलो पछाति तँ लोक बजिते अछि जे जी-दाँत देखि पसिन करू। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत रीता बाजल- “बहिन, खुरपी लेमे आकि बेंट?” रीता- “हमरा-तोरा काल्हि कौलेजमे प्रोफेसर साहैबक सोझहामे अपन-अपन प्रश्नक हएत भेँट।” मुस्कियाइत दुनू गोरे मुहथैरसँ आगू बढ़ल। 20 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1214 असगरे साइठम बर्खक अन्तिम दिन आ एकसठम बर्खक पहिल दिनक सीमानपर बैसि अभया दीदी असगरे अपन कोठरीमे सालक जन्म-मृत्युक उपलक्षमे साल गिरह मना रहल छैथ। साठि सालक बीतल जिनगीमे दोसर परिवारकेँ अपना सन नै देखि, मने-मन कुहसि रहल छैथ। जइसँ अपनापर क्षोभ भऽ रहल छैन जे जिनगीक चारिमपनमे पएर रोपि रहल छी, मुदा एतेटा जिनगीमे की पेलौं? तँ किछु ने। की केलौं? ‘तँ सभ कुछ।’ किए ने पेलौं? ‘सएह ने बुझहै छी!’ अपन जिनगीक बीच अपन काज मनमे औंढ़ मारि रहल छैन। समाजक पहिल महिला छी, जे बी.ए. पास कऽ सरकारी कार्यालय सम्हारि चुकल छी, अपन अध्ययन-मनन एहेन रहल जे एक नै हजारो-लाखो परिवारकेँ बाट-घाट देखा बटोही बना भवसागर टपा सकै छी, मुदा भेल की? भरिसक ई ने तँ भेल जे चरित्रवानसँ आचारवान आ विचारकसँ विचारवान होइत एते ने कियो अगुआ जाइए जे असगरे गाछक फुनगी जकाँ सभसँ अलग भऽ टपि जाइए। मुदा सेहो तँ ओइ दिन ने विचारितौं जइ दिन समाजक बीच एकटा नव जिनगीक सूत्र-पात केलौं? मुदा पढ़ल-लिखल रहितो समैक गतिकेँ किए ने बूझि पेलौं? भऽ सकैए जे जइ सूक्ष्म दृष्टिसँ समैक गतिकेँ पकड़ल जाइए, भरिसक से दृष्टिए ने खुजल। विचारसँ बिसबिसाएल अभया दीदीक मन घोर-मट्ठा भऽ गेलैन। मनमे किछु एबे ने करैन जे हारल जिनगीकेँ आब केना सम्हारब। तैबीच मनमे ईहो होइत रहैन जे फुटा कऽ घोर आकि मट्ठा पीबैसँ नीक दूधे पीब ली। मुदा बिनु बूझलमे हूसल तँ ओकरा माफो कएल जा सकैए। जानल-मानलमे हूसब तँ कायरता भेल। जेना-जेना कुशियारक रस पानिसँ गुड़ वा राब बनैए, गुड़सँ चीनी बनि सकताइत जाइए आ मिसरी बनैत-बनैत पाथर जकाँ सक्कत भऽ जाइए, तहिना ने अपनो लूरि-बूधि अछि। दोसर संग पुरैबला नै होइक कारण केतौ एहेनठाम ने तँ नुकाएल अछि जे नुकाएले-नुकाएल फगुआ जकाँ समाजोक संग धूर-खेल करैए। अभया दीदीक विचार ललकलैन- “जीता जिनगी हारि मानि हटब रणभूमिसँ भागब भेल। जँ जिनगी रणभूमि नै पहुँच कर्मभूमिसँ हटि चलत तँ वीरभूमि केना पहुँचत? नै! पाछू नै हटब, सुचालि छोड़ि कुचालि नै चलब।” छोट-छीन गाम अभयपुरमे अभया दीदीक जनम भेल। माता-पिता एहेन जे परिवारक जे कोनो काज करथि, दुनू परानी विचारि कऽ करथि। ओना एहेन कोनो दिन आकि कोनो नव काज नै होइत जइमे माता-पिताक बीच रस्सा-कस्सी नै होइन। जे से परिवारक गाड़ीक धुरी पटरी पकैड़ चलैत। पाँच बर्खक जखन अभया दीदी रहैथ तखन माता-पिताक बीच एके दिन नै महिनो दिन फरिछाइमे लैग गेल रहैन जे अभयकेँ इस्कूलमे नाओं लिखौल जाए की नै? दुनू बेक्तिक अपन-अपन सोचक हिसाबसँ धारणा बनल। पिताक धारणा ई जे समाजिक परिवेश एहेन बनि गेल अछि, जे ज्ञानक कोनो मूल्य नै रहि गेल अछि। तँए बेटी-जातिकेँ अनेरे पढ़ाएब हएत। ऐना जकाँ विचार झलकैत रहैन। विचारकेँ ई झलकबैत रहैन जे जे पिता पनरह-बीस लाख रूपैआ खर्च कऽ बेटीकेँ डाक्टर बना दुनियाँक बीच ठाढ़ करै छैथ, की हुनका तीस लाख रूपैआ बिआहमे नै खर्च करए पड़ै छैन? तखन तँ अनेरे ने पढ़ाएब भेल। मुदा माइक धारणा अलग रहैन। हुनकर धारणा रहैन जे जहिना पढ़ल-लिखल पुरुख बिनु पढ़ल-लिखल महिलाकेँ अपन मनोनुकूल बना परिवारकेँ आगू बढ़ा सकै छैथ तँ महिलो किए ने कऽ सकै छैथ। मुदा महिनो रस्सा-कस्सीक पछाति फरिछा गेलैन जे अभयकेँ इस्कूलमे नाओं लिखौल जाएत। बच्चेसँ अभया दीदी पढ़ैमे चन्सगर। पढ़ैक प्रति आन विद्यार्थीसँ दीदीक बेसी झुकाउ। अठारह बर्खक अवस्थामे बी.ए. पास केलक। बी.ए. पास केला पछाति माता-पिताक बीच फेर विचारक रस्सा-कस्सी शुरू भेलैन। रस्सा-कस्सी समयानुकूल रहैन तँए जड़ि सक्कत छल। हल्लुक-फल्लुक जड़िबला गाछ बिनु ओजारोक उखाड़ब असान होइए मुदा डभियाएल खेतक लजबिजीक गाछ उखारब तँ असान नहियेँ अछि। खड़ौआ जौर जकाँ दु-गुनियाँ बानि तँए दूटा प्रश्न दुनूक बीच लटपटाएल वा ऐंढ़ाएल छल। पहिल प्रश्न बिआहक उमेरक रहैन, दोसर नोकरीक। अभया दीदीक बिआहक गप जखन उठल तँ पिताक विचार पुरान पद्धति दिस दौगल रहैन। जहिना कन्याँक उमेर दस बर्खसँ ऊपर तहिना तँ बरोक अछि। ई प्रश्न चारि-पाँच साल पहिने उठि गेल रहैन, मुदा पढ़ाइक कारणसँ प्रश्न टरा गेल रहैन। आब तँ अभया दीदी जिनगीक एक सीमापर पहुँच गेल छैथ, तँए अगिला-पैछला सभ विचार उठबे करत। उमेरक हिसाबमे माइक विचार अधुनातन छैन। अधुनातन ई छैन जे पढ़ै-लिखैक जिनगी पहिल भेल, मुदा पढ़ला-लिखला पछातिक सीमा की हएत। जिनगी एक मोड़पर आबि जाइए। आइक समाजिक परिवेशमे कियो ई थोड़े बुझए चाहैए जे पढ़ै-लिखैक माने भेल, हम ओहेन मनुख बनि सकै छी जे दुनियाँक कोनो कोणमे रहि जीवन बसर कऽ सकै छी। मुदा नोकरी पाछू दौगनिहारक नजैर थोड़े एतै अँटकै छै। माइक विचार रहैन जे बेटा-बेटी जहिया अपन-अपन पैरपर ठाढ़ भऽ जाए से बिआहक सीमा भेल। जँ ऐसँ पहिने सीमा देब तँ पढ़ौला-लिखौला पछाति बिआह कऽ देब, कमाइक गर नै लगने, जिनगी भरि माए-बाप गारि सुनैत रहह। जे बच्चासँ पोसि-पालि, पढ़ा-लिखा जवान बना दुनियाँक अखराहापर पहुँचा देलैन, से किछु ने केलैन आ दहेजुआ गारि जिनगी भरि सुनैत रहथु। बिआहक प्रश्नपर दुनू गोरे राजी भेला जे बिआहक लगन अगिला साल फागुनमे अछि, अखन सरकारी शिक्षा विभागमे जिला स्तरक अफसरक बहाली भऽ रहल अछि, महिला आरक्षण अछि। ओ खालीए किए रहत तँए अभयाकेँ नोकरी करए कहियौ। माता-पिताक विचार सुनि अभया दीदीकेँ हृदैमे चोट लगलैन। ओहेन चोट लगलैन जेहेन चोटक पछाति वृन्दावनक कदमक गाछ डोलि जाइए। मन-मन्दिरक भगवान अभया दीदीक कलैप उठलैन। कलैप ई उठलैन जे जँ हम स्वतंत्र जिनगी जीबए चाहैत होइ तखन? मुदा जइ धरतीपर बिनु पढ़लो-लिखल बेटी-जाति माए-बापक विचारक पालन आँखि मूनि करैत आएल अछि तैठाम बी.ए. पास छी। नै मानने पढ़ल-लिखल समाज कलंकित हएत। अभया दीदी नोकरी करैले राजी भऽ गेली। जिला पदाधिकारिणी रूपमे अभया दीदी नोकरी शुरू केलैन। मुदा मन-मन्दिरक ज्योति अवसरक ताकमे लैग गेलैन। नोकरी भेला पछाति अभया दीदीक बिआहक गप उठल। अखन धरि माए-बाप तँ ई नै बूझि पेलखिन जे अभयाक गरदैनमे फँसरी लैग रहल छै। फँसरी ई जे जिला शिक्षा पदाधिकारिणीक बिआह केहेन बरसँ हौउ। तहूमे तेहेन-तेहेन तितम्हा अछि जे महिलाक नोकरीक विरोधी सेहो अछि, ओ केना अपन नोकरनीकेँ सरकारी नोकरनी बनए दिअ चाहत। खैर जे से। प्रोफेसरक संग अभया दीदीक बिआह भेलैन। अभया दीदी आठ बरख नोकरी कऽ चुकल छैथ। समैक संग उठा-पटक करैत अभया दीदीक माइयो-बाप बिआहक पछाति बीरान जकाँ भऽ गेलैन। एकटा तीन बर्खक बेटा सेहो छैन। युनिभरसिटीक काजसँ घुमैकाल गाड़ी एक्सीडेन्टमे प्रोफेसर पतिक मृत्यु भऽ गेलैन। ऑफिसमे बैसल अभया दीदी निर्णए केलैन जे आइ नोकरी छोड़ि देब। मुदा जाएब केतए आ रहब केतए। एकांगी परिवार भेने वैधव्य जीवनक दशा समाजमे की अछि, ओ तँ वएह बुझै छैथ। आनकेँ फिकिरे की? माए-बापक परिवारमे बेटीक की गति भऽ रहल अछि, ऐ बातकेँ अभया दीदी नीक जकाँ बुझै छैथ। कारण, केते शास्त्र-पुरान भीतरे-भीतर खिस्सा-पीहानी गाबि रहल अछि। बुझै ई छैथ जे दिन-रातिक सीमानपर साँझ-भोर अवाज निकलैए जे ‘धी-जमाए भगिना ई तीनू ने अपना।’ ‘धी’ नाओं मनमे उठिते अभया दीदी अभयदानी जकाँ ‘धी’केँ ‘घी’ बनौलैन। बनौलैन ई जे सासुरक बास अनुचित हएत। अनुचित ई हएत जे तीन भाँइक परिवारमे सासुर अछि। जमीन-जत्थाबला परिवार। अपन जमीन-जत्थाक माश्चर्य ऐछे नै आ अनेरे सासुरक भैयारीमे फसाद ठाढ़ करब नीक नै। जइ परिवारक जीवन-संगी हेरा गेला, ओइ परिवारक सम्पैत परिवारेकेँ भेलैन। हमरा कोनो मतलब नै। फेर मन अपन जन्मभूमिमे माए-बापपर एलैन। जे कलंक बेटी-जातिकेँ नैहरक परिवार लगा चुकल ओकरो तँ नै बिसरल जा सकैए। तखन? एक तँ ओहुना माता-पिताक परोछ भेने नैहरक सम्बन्धमे कमी अबिते छै। तहूमे तेहेन-तेहेन नवका-नवका कानून सभ बनि गेल अछि, जे अनेरे भाय-भौजाइक मनमे हेतैन जे कनूनिया एने कनसार बनबे करत जइसँ बलुआएल भूजाक दर्शन तँ हेबे करत, मुदा परिवारक सम्पैतमे उड़ी-बीड़ी लैग जाएत। अनेरे किए ओइ परिवारकेँ जे स्नातक बना अगुऔलक, तेकरा कोनो तरहक अवघात करिऐ। ओना, जे धारणा समाजक बनल अछि ओ धारणा भाए-बहिनक बीच सम्बन्ध बिगाड़ैबला अछि, जेकरा कोनो रूपमे नीक नहियेँ कहल जाएत। एक तँ ओहुना मनुख वंशक छी तैठाम सहोदर भाए-बहिनक बीच मलिनताक गाछ बीच बाटपर होइ तँ ओकरा हटा कात करबे नीक हएत। मन तुरुछलैन। तुरुछलैन ई जे बहिनक बास जँ अधले होइत हौउ, तँ कुलपूज बना किए बसौलो जाइए? अनेरे समुद्र उपछै पाछू मन बौआइए। अपन माए-बापक परिवारकेँ जेते लोक अधजरूआ खोंरनीसँ खोंचारत ओ खोंचारह, मुदा हम से नै करब। परिवारे नै समाजो तँ नैहरेक छी, समाजक बीच थोड़े कोनो सम्बन्धक विभेद अछि जे समाजमे रहैसँ मनाही करत। नैहरक परिवार, भाए, बहिन, बाप-पित्ती, दाद-दादीक सम्बन्ध स्थापित करैत, जखन कि सासुरक परिवार पत्नी-पुतोहु इत्यादिक। एक जेतए हास्य-विनोद स्थल अछि, दोसर तेतए हास-परिहासक। दुनियाँ बड़ीटा छै, बहुत रंगक माथा टेकने छै, अपन माथ किए ने सोझ-साझ रैख चली। मन थीर भेलैन। आगू जिनगीक नक्शा बनबए लगली। मानि लइ छी आइ नोकरी छोड़ि देलौं। मनक लिलसा जे अछि ओकरा पुरबैले समाज दिस बढ़ए चाहै छी। नोकरी जाएत आमदनी जाएत। मुदा पतिक एक्सीडेन्टक जे सरकारी अनुदान भेटल ओ तँ अप्पन भेल। हँ, भेल। गामक बिच्चेमे पाहीपट्टीक झगड़ौआ कचहरीबला जमीन अछि, सस्तेमे पैटो जाएत आ मुराममे चासो बास भऽ जाएत। कम्पन्न जेते कमैत जान्हि तेते मन थीर होइत जान्हि। अढ़ाइ-तीन बीघा जमीन भेने, तँ बहुत किछु आगू बढ़ि कएल जा सकैए। चारि बजे अभया दीदी नोकरी छोड़ैक कागत ऑफिसमे दैत सड़कपर एली। सड़कपर अबिते जेना नमहर साँस छुटलैन। दलालीक जुग छी, किछु लेन-देनमे हेरा-फेरी हएत, मुदा काजो तँ कम्प्यूटरेसँ होइ छै। सएह भेलैन। तीन बीघा जमीन अभया दीदी कीनि लेलैन। जमीन कीनला पछाति अभया दीदीक नजैर खेत दिस बढ़लैन। बेटाकेँ किसानी जिनगी जीबैक लूरिक पाठ पढ़ौलैन। एग्रीकल्चर ग्रेजुएटक रूपमे बेटाकेँ देखए चाहली जइमे असीम सम्भवना भेटलैन। मुदा ओइ सम्भावना लेल तँ केतौ-ने-केतौ क्रियाक रूप धड़ए पड़ै छै। जेते खेत छैन तेतेकेँ ओ समुचित बेवस्था करती। अपनासँ लऽ कऽ खेत-पटबैक ओरियान करती, नीक बीआ, नीक खाद आनि खेती करती। मुदा केते करती काजेमे हरा जेती। जाबे धरि अभया दीदी अपन सभ बेवस्था गाममे ठीक केलैन ताबे धरि भाड़ाक घरमे रहली, पछाति नैहरक समाजमे आबि बसि गेली। आइ अपन जिनगीकेँ नियमित बनबैत अभया दीदी अपना बले गाए पोसि पचास किलो दूध प्रतिदिन पैदा कऽ रहली अछि, मुदा तेहेन अड़ोस-पड़ोसमे कहाँ कियो छैन। निठाही असगरे...। गाछक फुनगी जकाँ असगरे...। 24 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1557 पुरनी नानी तीन माससँ पुरनी नानी ओछाइन पकड़ने छैथ। अपने तँ नै बूझि पाबि रहली अछि जे आब ऐ दुनियाँ सँ ‘चलचलौ’ भेल जा रहल छी। मुदा गाममे सबहक बीच चर्च होइत जे ‘पुरनी नानी आब जे दिन छैथ से दिन छैथ।’ अपने ऐ दुआरे नै बूझि पाबि रहल छैथ जे बुझिनिहार तँ ओ ने जिनका अपन जनम कुण्डली आकि जनम दिनक कोनो लिखल सबूत होइ। से तँ पुरनी नानीकेँ छैन नै। भऽ सकैए जनम पतरी होइन। ओना सबूतो सभटा पकिये होइए सेहो बात नै छै। सबूतो कचिया होइए। कोनो केसक ‘कचिया नकल’ थानामे भेटैए। ओना थानोकेँ दोख लगाएब बेइमानी भेल, जेकरा पकियाक अधिकारे ने छै ओकर तँ कचिये ने पकिया भेल। असल कचिया-पकिया तँ ओइठाम होइए जैठाम नोकरी दुआरे कियो, बिआह करै दुआरे कियो आकि अपन अरुदा छिपबै दुआरे कियो जनम कुण्डलीक तिथि आ विद्यालयक तिथिमे घटी-बढ़ी कऽ लइए। मुदा सेहो नै, असलमे पुरनी नानीकेँ उमेरक ठेकाने ने रहलैन। रहबो केना करितैन बेवहारक इतिहासक तारीक घटनाक हिसाबे लिखल जाइए, मुदा वैदिक विधि-बेवहारक तारीकक पता केना लागत। जहिना अधला बढ़ैत-बढ़ैत ढेर लैग जाइए तहिना ने नीकोक छै। नीक तँ नीके भेल, तँए बेवहारो नीक बनैत जाइए। पुरनियोँ नानीकेँ सएह भेलैन। तँए कि ओ अपन जन्मक आड़ि-धूर नै देने छैथ सेहो बात नहियेँ कहल जा सकैए। केतौ नापि कऽ किलोमीटरक पाथर गाड़ल जाइए, केतौ ठेकानियेँ कऽ बूझल जाइए, ठेकानोसँ तँ बुझले जाइए। पुरनी नानीक आड़ि-धूरक ठेकान ई छैन जे पछिला ‘भुमकम’ मन छैन जइमे नअ बर्खक रहैथ जे माए कहने रहैन। कहने ऐ दुआरे रहैन जे जखन भुमकममे घर खसि अँगना-वाड़ी सभ एकबट्ट भऽ गेल रहैन, आ माएकेँ सोगाएल बैसल देखि पुरनी भुमकमक उथल-पुथल देखि हँसैत आबि बाजल- “माए, आब की हेतै?” जेना माथपर मोटरी रहितो, दोसर-तेसर-चारिम मोटरी चढ़ए लगैत आ उठौनिहारकेँ जे गति होइत हौउ, तही गतिमे माए पड़ैत गेली। जेना-जेना ‘पड़ैत’ गेली तेना-तेना आँखिक सोझमे रौतुका तरेगन बेसियाइत गेलैन। बेसियेबो तँ उचिते छेलैन, जँ तृतीया अन्हारसँ चौठक अन्हार बेसी नै हुअए तँ तृतीया चौठ केना हएत। माएक मन पुरनीक मुँहपर पड़लैन। पड़िते दुनू ठोर विदैक गेलैन। जहिना नचारी, वेवसीमे केकरो होइ छै। ‘विदैक’ ई गेलैन जे सभ किछु प्रकृति प्रदत्त चलैत रहत तखने पर्यावरण अनुकूल रहत, नै तँ जहिना कहियो भुमकम हएत, तँ कहियो अकाल पड़त। जखन बच्चा जनम लइए तखन ओकर उचित देख-भाल हौउ, बच्चाक संग जच्चाकेँ होइन, तहिना विद्यालय जाइ जोकर जखन बच्चा भऽ जाए, तखन ओकरा विद्यालयमे दाखिल करौल जाए। इत्यादि-इत्यादि। भवलोकमे उमड़ैत-घुमड़ैत माइक मन पुरनीपर एलैन। पुरनी नअ बर्खक भऽ गेल, भुमकम सभ कुछ खसा-पड़ा, ढाहि-ढनमना देलक अछि। तीन मास पछाति पुरनीकेँ दसम बरख चढ़तै। दसम बर्खक पछाति बालामे सियानापनक शक्तिक उदए होइ छै। केना पुरनीक बिआह करब पार लागत। भुमकममे जेते नोकसान भेल ओकरे पुरबैमे केते दिन लागत, बिना पुड़ेनौं जिनगीक गाड़ी आगू मुहेँ ससरत केना? तैबीच माइक दुनू ठोर विदकैत मसैक गेलैन। मसैकते मुँहक पट खुजलैन। पट खुजिते अपन मनक मोटरी मोनेमे रैख बजली- “दाइ पुरनि, तोहूँ आब नअ बर्खक भेलह।” माइक कहल वएह ‘भुमकमक दिनक नअ बरख’ जोड़ि पुरनी नानी अपन औरुदाक ठेकान केने छैथ। मनमे अस्सी बरख अबितैन तखन ने बूझि पड़ितैन जे अस्सीक पछाति खस्सीक जान जाइते छै, हमरो जाएत। मुदा से तँ खुदरा-खुदरी हिसाब रहैन; 1934 ईस्वीमे भुमकम भेल..., तइ दिनमे नअ बर्खक रही..., अखन 2014 छी...। उमेरक थाहे ने रहैन, तँए रोग-सजिया नै बूझि अरम-सजियाक समए बढ़बए लगली। ओना अरम-सजिया देहक संग-संग मनोकेँ अरमबैत रहैन। करनीक धरनी रहै वा नै रहै मुदा अरमान तँ असमान दिस बढ़बे करत। जहिना सभ तहिना पुरनियोँ नानी ने छैथ तँए हुनको मनमे हुअ लगलैन। मुदा जेना-जेना बैसारी बढ़ैत गेलैन तेना-तेना काजक दुनियाँ ‘घटबी’ होइत गेलैन। मुदा चिन्तो अनेरे किए करितैथ, आब कि कोनो मनोरथ रहलैन जेकरा सवारी बना चढ़ितैथ। आब तँ मात्र पाँच कौर ‘अन्न’ आ पाँच हाथ ‘वस्त्र’ भेट जाए, भऽ गेल जिनगी। मुदा जिनगियो तँ धराह ऐछे। दुनू दिस बहैए। एक दिस ‘देवगण’ गनगनाइए तँ दोसर दिस ‘दानवगण’। बीचमे पड़ल मानव ‘दानव दल’मे नाओं लिखौत आकि ‘देवन दल’मे। दल तँ दले छी कखन हवा-विहाड़िमे उधिया कऽ उनट-पुनट भऽ जाएत तेकरो ठेकान नहियेँ अछि। जेना-जेना पूर्णिमा पबैले पनरहो दिनक तिथि नमैर-नमैर ठेंगी जकाँ बढ़ैत रहैए तहिना पुरनियोँ नानीक मन अपन जिनगीक खिस्सा-पिहानी सुनबै दिस बढ़लैन। मुदा अमावसक अन्हार जकाँ नानीक ‘समए’ बदलए लगलैन। बदलए ई लगलैन जे मनक जे ‘मनियाँ’ रहैन ओ कमैत गेलैन। जहिना सभ लीलाधारी अन्तिम समैमे ‘राम नाम’पर पहुँच जाइत तहिना पुरनियोँ नानीक मन मानि गेलैन जे अनेरे एतेटा जिनगीमे समुद्र उपछलौं, जखन कियो ने किछु लऽ कऽ आएल आ ने लऽ कऽ जाएत, तखन अनेरे ने ‘हाइ-हाइ’ केलौं। दू मास ओछाइन धेला पछाति जखन पुरनी नानीक गिरह-गाँठ जकड़ए लगलैन तखन अपनो मन कनी-मनी मानए लगलैन जे भरिसक ‘बूढ़’ भऽ गेलौं। बूढ़केँ तँ एकेटा काज बाँकी रहैए, ओ छी ‘मरब’। जखन सभ मानिते अछि तँ हमहूँ मानि गेलौं, जे बूढ़ भऽ गेलौं, राजा दशरथकेँ कानक ऊपर, माथक पजरवाहिमे, एकटा केश पकिते तुलसी बाबा बूढ़ घोषित कऽ देलखिन आ हमर तँ सौंसे माथे पटुआक सोन जकाँ झलकैए। दरभंगा अस्पताल ताबे नै ने बनल रहै जे पाँच बर्खक धिया-पुताकेँ पाकल केश तुलसी बाबा देखितैथ। दू मास बीतैत-बीतैत पुरनी नानी अदहासँ बेसी जिनगीक खिस्सा-पिहानी बिसैर गेली। ओना अहू दुनू मासमे, जहियेसँ पुरनी नानी ओछाइन दिस बढ़लथि, गाम-समाजक लोक अपन-अपन असीरवाद लिअ पहुँचए लगली। जइसँ जेते बात मनमे रहैन ओइमे बँटैत-बँटैत घटबियो भेलैन। होइते छै किने खुरपी-टेंगारी तँ ओतबेकाल तक ने भेल जेतेकाल ओकरा धार रहै छै आ काजक रहैए। नै तँ कबारखानाक बौस भेल। आइ पुरनी नानीक तेसर मासक उनतीसम दिन छिऐन। भोरेसँ जिज्ञासा केनिहारिक भीड़ उमड़ए लगल। जे पहिने जिज्ञासा करैत घुमली, ओ भगवानक परसाद बँटिते गेली, ‘पुरनी नानी आब जे क्षण छैथ से क्षण छैथ।’ आरो जिज्ञासुकेँ नौत पड़ैत गेल। पुरनी नानीक ओछाइनिक चारू भाग जिज्ञासु बैसल। भाय! जिज्ञासु तँ जिज्ञासु छी अनके बातमे अपन बात घोइड़ो दइए आ छानि कऽ निकाइलो लइए। गामक बेटी सुलक्षणी, कौलेजमे पढ़ैत। गाम आएले छल। लोकक संग ओहो पुरनी नानी लग पहुँचल। ‘चुपा-चुप, धुपा-धुप’ देखि सुलक्षणी पुरनी नानीक लगमे पहुँच बाजल- “नानी, नीनक की हालति अछि?” सुलक्षणीक अपन ढंगक प्रश्न। नीनो निरोगक लक्षण छिऐ। मुदा पुरनी नानी आब ओइ अवस्थामे नै, जे सुलक्षणीक प्रश्नक उत्तर दितैथ। कानो बन्न भऽ गेल छैन, सोझे ठोर पटपटबैत सुलक्षणीकेँ देखलखिन, सुनलखिन किछु ने। मुदा अपन मनक बात मनमे उबियाइते रहैन बजली- “बुच्ची, जे नीक कि बेजए केलौं से लिअ दुनियाँमे रहनिहार, मुदा अखनो एकटा बात नै बुइझ पेलौं?” ओना पुरनी नानी जिनगीक सभ बात बिसैर गेल छेली। मुदा जेना मनक जड़िमे, जनेरक खुट्टी जकाँ रहबे करैन। मरै बखतमे कियो नीक ‘मिठाइ’, तँ कियो नीक ‘फल’, तँ कियो किछु तँ कियो किछु लऽ जिज्ञासा करए जाइते अछि। जँ से नै तँ मरैसँ घण्टा दू घण्टा पहिने एते दान-पुन किए होइए। पुरनी नानीक कानमे मुँह सटा सुलक्षणी पुछलकैन- “की नै अखन तक बूझि पेलौं नानी?” ओना कानमे मुँह सटा सुलक्षणी बाजल छल मुदा बहिराएल कान पुरनी नानीक, किछु ने सुनि पेली। अपन मनक मणि फुटलैन- “बुच्ची, पैछलो भुमकम मन अछि, आ किछु दिन पहिने सेहो भेल। जँ एके रंग भुमकम होइ, मुदा ओकर मास अलग-अलग होइ जेना अपना ऐठाम जाड़क समए माटि नमी युक्त रहैए, बरसातमे गील रहैए, आ गरमीमे नमी विहीन रहैए तखुनका, तँ एके रंग क्षति करत।” एहनो तँ होइते अछि ‘जे बात’ लोक नै बुझैए ओकरा गोपलखतामे दऽ दइए। तहिना पुरनी नानीक बातकेँ जिज्ञासा करैवाली गोपलखतामे फेक, बाजलि- “बुढ़ाड़ीमे अहिना लोकक मन भऽ जाइ छै, जे अनेरो किम्हरोसँ किम्हरो मन छिड़ियए लगै छै। नानीक माया छूटि रहल छैन। आब हिनकर बात असीरवाद बूझि सिर चढ़ा लिअ।” मुदा नानीक नै बूझल बातकेँ प्रश्न बूझि सुलक्षणी ‘बारहो मास’ दिस तकलक। तीन सए पैंसैठ दिनक बरख होइए मुदा तँए कि ‘दूटा दिन’ एक रंग होइए आकि दू रंग। तही बीच पछुआएल जिगेसा केनिहारि सभ पहुँच गेली। बैसल जमात नानीक पएर छूबि-छूबि विदा भेली। मुदा सुलक्षणीक मन ठमैक गेल। ठमकला पछाति मन कबुला करा लेलक जे बिनु प्रण-पणक जिनगी, केरा, अनरनेबाक फल जे उच्च कोटिक फल तँ छी मुदा आमक गाछ सन छाती थोड़े हेतइ? तखने मनमे उचरलै गोबरे गोइठा बनि आगिक रक्षा करैए! आकि मुहसँ हँसी फुटलै। मने-मन संकल्प केलक, ‘अगिला पाठ कौलेजमे पढ़ब।’ 27 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1304 कटा-कटी चैत मासक बेरुका समए। आने दिन आ आने जकाँ कामिनी काकी अँगना-घरक काज सम्हारि घासक बेर होइत जाइत देखि धड़फड़ाएल छैथ। जाइक समए भेल जा रहल छैन। बेटी कबुतरी दिस तकलैन, तकलैन ई जे आन दिन ओसाराक छाहैर देखि अपने रस्तापर पहुँच धूरा-गरदाकेँ बहारि चिक्कन बना, टोलक आनो-आन बच्चाक संग सभ दिन खेलाइए। आइ किए ने ससैर रहल अछि? मुँह फुलौने बैसल अछि! लगमे पहुँच कामिनी काकी बजली- “कानिनी दायकेँ, आइ किए ने अँगनासँ आसन टुटै छैन। कखन आसन-बासनक ओरियान करती।” धनियाँ-मिरचाइक संग पीसल मसाला जहिना चुल्हिक तौपर लोहियामे पड़िते आँखिमे कुट-कुटा कऽ लगैत तहिना बाल-बोध कबुतरीकेँ माइक बात कुट-कुटा कऽ धेलक। बाजल- “खेलाइले नइ जाएब। कटा-कटी कऽ देलक।” ‘कटा-कटी’ बजिते जेना कबुतरीक वृन्दावन दहैल उठल। ठुनकए लगल। जेना केते भारी राज-पाट कबुतरीक छीना गेल होइ तहिना ठुनकी भरैत गेल। दुदिसिया माए कामिनी, आब की करती। बच्चा जखन घरसँ निकैल खेलाइले चैल जाइए आ टोलक बच्चाक संग साँझ धरि किशुन-कन्हैया जकाँ खेलाइत रहैए, तखने हमरो बाध-बोन जाइक समए भेटैए। बाध-बोन नै जाएब से बनत, बाध-बोन जिनगी देने अछि तेकरा केना छोड़ि देब। मुदा जखन हँसैत बच्चा अँगनासँ निकैल रस्तापर खेलाइले जाइए तखन ई कहाँ बुझैए जे माए आँगनमे नै अछि। तँए बच्चाकेँ बिना बौसने कामिनी काकी केना निकलती। बजली- “दाइकेँ की भेलैन जे एना फुफुआइ छथिन?” माइक मुँहक बोल छीनि फुफुआ कऽ कबुतरी बाजल- “हमरा कटा-कटी भऽ गेल। उ सब नइ खेलाय देत। हमर घर उजारि कऽ फेक देलक। आब केतए घर बनाएब?” एके साँसमे कबुतरी अपन मनक सभ बेथा उगैल देलक। सुकुमारि बेटी कबुतरीक बोल जेना कामिनी काकीक ब्रज मण्डलकेँ हिला देलकैन। हिला ई देलकैन जे नान्हिटा बच्चा तहूमे अपन कोखिक, तेकरा जँ नै कखिया राखब तँ घरक जात-ढेकी केना चलत। मुदा कबुतरीक प्रश्न तँ तकलीक एकटा सूत नै जे खुस दनि टूटि जाएत। ओ तँ मशीन लागल चरखाक सूत जकाँ अछि जे एकेबेर महजाले तैयार कऽ लइए। टोलक सभ धिया-पुता घर उजारि देलकै। तेहेन-तेहेन हरम-जिद्दी धिया-पुता सभ भऽ गेल अछि जे केकर बात के सुनत। बात नै सूनत, कबुतरीकेँ खेलौ नै देतै, ओकर खेलाइक समए छिऐ केना ओ खेलेनाइ बिसैर जाएत। तखन तँ अपने खेलबियौ, अपने जँ खेलै जोकर बच्चाकेँ खेलाएब तँ बाध-बोन केना चलत। नै बाध-बोन चलत तँ अन्नसँ लऽ कऽ जारैन धरि केतएसँ औत। कबुतरीक दोसर-तेसर बात तँ कामिनी काकीक मनमे पछुआएले रहैन जे पहिलुके प्रश्न तेहेन ओझरी लगा देलकैन जे सर्कसक बाघ जकाँ पिजरामे फँसि गेली। ‘फँसि’ ई गेली जे अखन हमरेटा नै गामक सभकेँ बाध-बोन जाइक समए छी, बिना माए-बापे कोनो बच्चा केकरो बात सुनत, जखन बाते नै सुनत तखन अपने बाध-बोन केना जा हएत। मुदा आन बच्चा हमरा बच्चाकेँ रस्तापर नै खेलए देत, एकरा तँ कियो उचित नै कहि सकैए। मुदा ईहो तँ ऐछे जे जँ सभ बच्चाक माए-बापकेँ संगोर करि कऽ निवारण करब तखन तँ एकक चलैत सबहक समए लूटा जाएत। विचित्र द्वन्दमे कामिनी काकी उलैझ गेली। हँ-निहँस करैत कामिनी काकी पड़ोसिनीकेँ डेढ़ियापर सँ सोर पाड़ि कहलखिन- “ऐ पड़ोसिनी, अहाँक बेटी हमरा बेटीक घर-अँगना उजारि कटा-कटी कऽ लेलक। बाध-बोनक समए भऽ गेल, अहूँ नै बरदाउ आ हमहूँ नै बरदाएब। अखन चैल कऽ दुनू गोरे दुनूकेँ बहिना लगा दियौ जे एके अँगना-घरकेँ कनी नमहरसँ घेरि दुनू खेलत।” कामिनी काकीक विचारमे अपन विचार सटबैत पड़ोसिनी बजली- “बाल-बोधक झगड़े की! तइले चेतनक समए नष्ट हुअए से नीक नै।” ओना पड़ोसिनीक उत्तर पबैमे कामिनी काकीक मन ठहकलैन। ‘ठहकलैन’ ई जे कोन गाम आ कोन समाज एहेन नै अछि जैठाम बाले-बोधक झगड़ामे सभ नै लागल रहैए...। पड़ोसिनीक सुनटा बानि देखि कामिनी काकीक मन खुशियेलैन। दुनू पड़ोसिनी कामिनी काकी अपन-अपन बच्चाक बीच बहीना लगा एके स्वरे कहलखिन- “बुच्ची, अहाँ दुनू बहीना भेलौं, दुनू गोरेक सुख-दुख सझिया भऽ गेल तँए एक्के अँगना-घर बना दुनू गोरे खेलू।” दुनू माइक दुनू बच्चा मुँहक बोल छिनैत एके सुरे बाजल- “दुनू बहीना ओही अँगना-घरकेँ नहमर बना खेलाएब।” दुनू बच्चासँ दुनू माएकेँ अपन जान हल्लुक होइत देखि खुशी भेलैन। खुशी होइत कामिनी काकी पड़ोसिनीकेँ कहलखिन- “कोन बाध दिस जाएब?” कामिनी काकीक बोल सुनि पड़ोसिनीक मनमे उठलैन जहिना दुनू बच्चा बहीना लगा एके अँगना-घर बना खेलत, तहिना जँ चेतनो-सियान जिनगीक खेल खेलए तँ केहेन वृन्दावनक रास लीला हएत। बाल-बोधक झगड़ा सभ बच्चा बिसैर गेल। बिसरबो वाजिबिए ने भेल। आखिर बाल-बोधक मन ओते मलिन थोड़े अछि जे पचास-साठि बरख धरि सियान जकाँ रग्गड़ धेने रहत। ओ सभ धरबो केना नै करता, तेहेन बाँसक खुट्टामे खुटेसल छैथ जे हजारकेँ के कहए जे पाँचो हजारक उमेर जेना हाथेमे छैन तहिना...। टोलक एगारहो बच्चा अपन-अपन हटवार जकाँ अपन-अपन अँगना पकैड़ हाथेसँ गरदा बढ़बैत अपन-अपन अँगनाक टाट छहरदेबाली जकाँ लगबए लगल। अपने-अपने तेहेन-तेहेन राज-पाट छै जे सभ अपने-अपने अँगनामे घेरा गेल। कबुतरीक डीह खालीए रहल। कबुतरीकेँ काल्हिये सभ मिलि घर-आँगन उजारि समाजसँ भगा देने रहै तँए ओइ समाजमे आब कबुतरी रहए नै चाहैत जे अपन पुरना-घर-घराड़ी काल्हि छोड़ि देने छल। मुदा दखलो केनिहार नहियेँ रहल। रहबो केना करैत जेते काज दिल्ली सरकारकेँ छै तइसँ की कम काज एक-एक परिवारकेँ छै, तँए सभ अपने-घर अँगनामे ओझरा गेल, जइसँ दुनू बहीना कबुतरी मिलि दुनू अँगनाकेँ जोड़ि एक बना लेलक। चारूकात सँ टाट लगबिते एगारहो अपन-अपन जिनगीक गाड़ी ठाढ़ करए लगल। कियो खेत-पथार, तँ कियो चूल्हि-चौका, कियो माल-जालक तँ कियो आनो-आनमे गथा गेल। दू अँगनाकेँ एक भेने समाजमे जल्लाक जनम होइए। तेकरे उछाहीमे दुनू बहीना कबुतरी समाजकेँ आइ भोज खुऔत। जखन भोज खुऔत तखन सभसँ जरूरी काज समाजकेँ नौतब भेलै। जरूरी अइले भेलै जे आब कि भोजक कमी अछि आब तँ खेनिहारक कमी भऽ गेल अछि। सभ अपने बेथे तेहेन बेथाएल अछि जे कियो कोनो रोग तँ कियो कोनो, तेहेन-तेहेन सालतनी रोग पोसि नेने अछि जे लोक अपन जान बँचौत आकि भोज खाएत। मुदा से बात कबुतरीक दुनू बहीनाक संग नै भेल। दुनू बहीना विचारि कऽ काज बाँटि लेलक। सुगिया नौत दैत बजै- “घरवारी छी यौ, यौ घरवारी, औझुका निमंत्रण अछि।” जँ कियो पुछै जे ‘कथीक भोज?’ तँ अकासमे उड़ैत सुगिया बाजए- “बहीनदुतिया भोज।” एक तँ ओहुना बेक्तिगतो बात आ समुहिको बातमे अन्तर होइ छै। बेक्तिगत मुद्दा तखन सामुहिक दिस बढ़ै छै, जखन सामुहिकताक सम्बन्ध रहल। मुदा ने फड़िछौट भेल आ ने आरो-आरो बात सोझा आएल। समए लहसल। भरि दिनक मेहनतिसँ दुनू बहीना कबुतरियो आ सुगियो समाजक भोजक ओरियान केलक। पुरना नवका अँगनाक बीचक खरिहाँनमे गञ्च सबहक बैसैक ओरियान भेल। भोजक सभ विन्यास पञ्चेक अनुकूल, अनुकूलो किए ने जखन सभ सामग्री माटियेक। पञ्चकेँ बैसिते सुगिया बाजल- “हे पञ्च परमेसर, भोजनक सभ ओरियान अछि तँए धड़फड़ेबै नै।” कहि चुटकीसँ बालु उठा पहिने पञ्चक आगू पवित्र केलक। भातक चङैरा नेने कबुतरी आँजुरसँ दैत बाजल- “भाय-बोन, भात की आब कबीर दासक परसाद रहलैन आकि सोमनी दादीक बसिया भात, आब तँ ओ चाबल भऽ गेल तँए हम परसै छी अहाँ जे बुझिऐ।” कबुतरीक बात सुनि एकटा पञ्च टोनलक- “कहू भला एक कबुतर दोसर सुग्गा, तखन केतौ भोज अधला हुअए।” माटियेक भात-दालि-तरकारी हाथसँ उठा-उठा नीचका दाढ़ीमे भिरा-भिरा निच्चेमे रैख भोजक जश दैत सभ पञ्च एक्के मुहेँ बाजल- “घरबैयाकेँ धैनवाद।” दिन खसल। कामिनी काकी बाधसँ आबि घूर पजारि रहल छेली, तखने कबुतरी लगमे पहुँच कहलकैन- “माए, भोजमे खूब जश भेल।” कबुतरीक खुशियाएल मन देखि कामिनियोँ काकीक मन खुशियेलैन। 30 जुलाई 2014, शब्द संख्या- 1140 केते लग केते दूर जहलक भीतरो आ बाहरो मेला जकाँ लोकक करमान लागल। करमानो केना नै लगितै, बेटा-बेटीक पढ़ाइ जे मङ्गनीए सभकेँ भेटतै। राजक सभ राजनीतिक पार्टी आन्दोलन केलक, तहीमे सभ चौअनियाँ नेतासँ लऽ कऽ नमरी, असरफी धरि जहलमे अछि। भाय! चौअनियाँ माने ई जे अंगरेजिया जुगमे बड़को नेता चौअनीए सदस्य होइ छला। जखन मन मिठाएल रहै छै तखन मीठे नै तीतो मीठ लगै छै आ जखन मन तीताएल रहै छै तखन तीतक के कहए जे मीठो तीते लगै छै। मुदा से नै, सबहक मन मिठाएल तँए जहल जाएब उपलब्धि भेल नै कि प्रतिष्ठाक हनन बूझि गाम-गामक लोक जहल जाइले तैयार भऽ नारो देलैन आ जहलो गेला। ओना अखन धरि जहल जाएबकेँ लोक प्रतिष्ठाक हनने बुझैए। सबहक बाल बच्चाकेँ शिक्षाक जन्मसिद्ध अधिकार भेटतै। जहिना कलयुग अबैकाल शदूल हाथीकेँ कहलक- “भाय, समए दुरकाल आबि रहल अछि। साढ़े तीनियेँ हाथक मनुख, जेकर देह अदहा चीरले रहतै, अदहे सौंस रहतै मुदा रहत तेहने अगिया-बताल जे तोरो साधि कऽ रखतह।” शदूलक बातसँ हाथी घबड़ाएल नै, अपन शक्तिक बोध रहै, उत्तर देलकै- “तूँ केना बुझलहक? जँ कियो झूठे कहने हुअ तखन? अपन बाप-दादाक घर-घराड़ी छोड़ि पड़ाएब, जीनगानी नै मरगानी भेल। तँए जेहीठाम छी, तेहीठाम नीक जकाँ केना रहब, एतबे तँ काज भेल, सएह करब अछि। मुदा तोरा जकाँ एहेन देह-दशा राखियो कऽ पड़ाएब नै।” हाथियेक शक्ति जकाँ गाम-गामक देशभक्तकेँ शक्ति जगल। रावणक बान्हल सरस्वतीकेँ लंकासँ निकालैक विचार जगल। सबहक बेटा डाक्टर बनतै, इंजीनियर बनतै, प्रोफेसर बनतै, शिक्षक बनतै, हाकिम बनतै...। सबहक मनमुराद मनोरथपर चढ़ि रणभूमिक लेल विदा भेल, जहल गेल। जहल गेने गाम-गाममे कचहरिया लोक फँसि गेल तँए दुनू गोरे असियो आ आशा पतिसँ भेँट करए, जहलक गेटपर बाहरक भीड़मे हराएल। मुलाकातीसँ भरल जगह। दछिनवारि भाग असिया आ उत्तरवारि भाग आशा करीब पाँच लग्गाक दूरीपर। जहिना हजारोक भीड़मे असियाक नजैर छिछलैत आशापर पड़ल तहिना आशाक नजैर सेहो असियापर पड़ल। दशको पछाति दुनूक नजैर दुनूपर पड़ल। ओना चेहरामे दुनूकेँ कमी-बेसी आबि गेल छल मुदा चिन्हल मुँह कहीं अनचिन्हार भेलैए। हँ होइतो छै, बहुरूपिया नाच की छी? रंगे-रूप बदलब छी किने। दुनूक नजैर दुनूपर पड़ला पछाति मनमे वैचारिक रग्गर उठि गेल। एक विचार कहै जे जोरसँ सोर पाड़ि छाती लगाएब, तँ दोसर कहै- अपन दू गोरेक बात छी, ऐठाम हजारोक भीड़ अछि, जखने बोलीमे ओज औत तखने लोकक कान ठाढ़ हेतै। मुदा विषय की रहत तँ दू संगीक बीचक बात, तँए चिकड़ब उचित नै। मुदा मनक मणि फूटि ठोरक फाटक तोड़ि दुनूक निकलए चाहलक। पहिने असियाक ठोर पटपटाएल- “भरिसक आशा छी।” असियाक ठोरक सिरखार पकैड़ आशाक मुँह फुटल- “भरिसक असिया बहीन छी।” दुनूमे सँ कियो केकरो बात नै सुनि पौलक। मुदा गरु-जनक ठोर पटपटाइक कारण जरूर होइ छै? ई बात दुनूक मनमे घर कऽ नेने छल। गाड़ल आँखि असियापर, आशाकेँ ओ दिन मन पड़ि गेल, जइ दिन गंगामे पैसि दुनू बहिन सप्पत खेने रही जे जिनगी भरि सम्बन्ध बना कऽ राखब मुदा से भेल कहाँ? भेल ई रहै जे जहिया असियो आ आशो महिला कौलेजमे पढ़ैत रहए, तहिये चारू धामक यात्राक प्रोग्राम महाविद्यालय दिससँ बनल जइमे ईहो दुनू गेल रहए। घुमतीकाल सिमरिया घाट उतैर सभ गंगो स्नान केलक आ जेकरा जे मनमे रहै सेहो ठनलक। तहीमे असिया आशाक बीच बहिना लागल। तहिना असियाक नजैर ओइ दिनपर पड़ल जइ दिन दुनू एक होस्टलक कोठरीमे चारि बरख संगे रहल रही। दुनू मिलि खेनाइयो-पीनाइ बनावी आ पढ़बो-लिखबो करी आ संगे कौलेजो जाइ-आबी। केतए गेल ओ दिन? केतए गेल गंगाक संकल्प? तही बीच जहलक भीतर जोरसँ हल्ला भेल। भीतरक अवाज बाहरो आएल। सभ मुलाकातीक कान ठाढ़ भेल। मुदा मुलाकातियो तँ रंग-रंगक, कियो पतिक, तँ कियो भाइक, कियो कुटुमक तँ कियो गताइतिक। भीतरक हल्ला छी, किछु बात हेतै। बात ई रहै जे जहलक भीतर सैयो ग्रुपमे आन्दोलनी बँटल। सबहक अपन-अपन जिनगी तँए अपन-अपन सबहक देश भक्तिक फर्मूला। देशो भक्ति की देश भक्ति छी, रंग-रंगक भक्ति अछि। कियो कोट-कचहरीकेँ जिन्दावाद करैत, तँ कियो तरुआरिक सानपर चलबकेँ जिन्दावाद करैत। जहलक भीतरक हल्ला रहै जे कियो कुरसी, तँ कियो ठीकेदारी, तँ कियो जिनगीक मूल समस्याक चर्चमे उलझल। जइसँ कहा-कही हुअ लगलै, सएह हल्ला जहलक भीतुरका छेलै। ओना सभ आन्दोलनी जन-मानसकेँ आँखि फोड़ैक जिज्ञासासँ शिक्षाकेँ जन्मसिद्ध अधिकार बूझि आन्दोलन केलैन, मुदा विचारो तँ जिनगियेक अनुकूल रहै छै, तँए जे जेहेन परिवारक तेकर तेहेन बुधि-अकील। ओना मनुख ओ शक्ति लऽ कऽ जनम नेने अछि जे अधलासँ अधला वृतिसँ अपन निवारण करैत नीक बनि सकैए। तँए जे सबहक कल्याणक विचार होइ से सवोपरि भेल। मुलाकातियो सबहक बीच तहिना रंग-रंगक विचार गनगनए लगल। गनगनेबो केना ने करैत। कियो जिज्ञासा करए आएल, तँ कियो मुँहछोहैन, कियो जहलसँ आन्दोलनकर्ताकेँ निकालैले आएल, तँ कियो फाटक तोड़ि संग दइले तनतनाएल। मुदा जहिना असियाक मन पतिपर लटकल तहिना आशोक। दुनूक मन दू-दिसिया भऽ गेल, एक दिस जहलक पति तँ दोसर दिस बालपनक हराएल बहिना। मध्य वर्गीए परिवारमे दुनूक जनम भेल। बाल-बच्चाक पढ़ाएबकेँ नीक बूझि माए-बाप बी.ए. तक पढ़ाइक बेवस्था केलखिन। ओही समए दुनू गोरे गंगामे पैसि संकल्प केने जे जीवन भरि सम्बन्ध बना कऽ राखब। ताधैर दुनूक अपनो मन कहै जे शिक्षिका बनि धरतीपर पएर रोपब। मुदा से भेल नै, ऐ दुआरे नै भेल जे बिआहक पछाति जइ घर एली ओ परिवार महिला नोकरीक विरोधी, तँए गृहिणी बनि गेली। गृहिणी तँ बनि गेली मुदा परिवारक जाल तँ विचारमे लागिये गेलैन। परिवारक जाल ई जे कोनो परिवारक सम्बन्ध चाहे समाजक हौउ आकि आन समाजक सभ सम्बन्धक अपन-अपन निअम छै, जे निअम प्रतिकूल भेने दुनूक सम्बन्ध छूटि गेल। एकरा टुटब नै कहल जा सकै छै, टुटब ओ भेल जइमे विचारक भिन्नता कारण होइ छै। खैर जे भेल, रहबो तँ नहियेँ कएल। ऐ दुआरे नै रहल जे अठारह बर्खक बाल-बोध जिनगीमे समैक संयोगसँ चारि बरख संगे रहल। दुनूक विचारधारामे समरूपता रहने निर्णयो भेल। मुदा परिवारिक बन्धन तँ किछु आरो होइ छै। तीस बर्खक पछाति आइ असियो आ आशोक भेँट भेल, भेँट नै भेल, एक-दोसरपर नजैर पड़ल। जहलक मुलाकाती-फाटकक मुँह छोट रहने एका-एकी समए भेटै। समैयो बान्हल नै, घण्टा-घण्टा भरि एक-एक मुलाकाती समए लगबै। सिपाहियो भीड़क दुआरे थरथराइत, तँए जोरसँ बजबो ने करए। साँझ पड़ि गेल। किछु मुलाकाती चैलो गेल, मुदा जेते गेल तइसँ बेसी एबो कएल। आशाक मनमे उठल- सोझाक रसिया परदेशी जकाँ बसिया भेल छैथ। हो-हा करैत सभ मुलाकाती विचारलक जे बिना भेँट-घाँट केने जाएब अन्याय हएत। अन्याय ई हएत जे समांग जहलमे अछि आ बाहरसँ हम तोषो-भरोष नै दिऐ, ई केहेन भेल। ओना अपन-अपन मननुकूल विचारो होइ छै। मुदा जे हौउ, जहिना असिया तहिना आशा राति बितबैक निर्णए केलक। भरि दिन मरद-औरत सभ मुलाकातीक रूपमे संगे छल से आब फुट-फुट भेल। गर पाबि असिया-आशा एकाठाम भेल। असिया- “बहिन, परिवारमे दोसराइत नै अछि जे अपने एलौं?” ओना मनमे ईहो ठहकै जे अपनो तँ सएह छी, एकठाम भेने किछु लाड़-चाड़ तँ हेबे करत। सएह भेल। मुदा आशा असियापर नजैर रैख बाजलि- “बहीन, दोसराइत तँ छैथ बुड़हा मुदा परिवारमे रहितो परिवारसँ अलग छैथ।” आशाक नव बात सुनि असिया, पिआसल चिड़ै जकाँ बाजलि- “से की, बहिन?” आशा- “जखन बुड़हाकेँ कहलयैन जे जहलक गेटपर जा बेटाकेँ भेँटो कऽ अबथुन आ ओकीलसँ जमानतो बात पुइछ लिहथिन।” बिच्चेमे असिया- “बात तँ असलीए कहलयैन।” आशा- “सबहक असली की सभले असलीए होइए। ठोहि फाड़ि कहलैन जे आब ऐ दुनियाँमे मरबेटा बाँकी रहल अछि, तँए पाँच कौर अन्न आ पाँच हाथ वस्त्रे टाक जरूरत रहि गेल अछि। परिवार अहाँक छी, दुनियाँ अहाँक छी, जेना करब से करू।” असिया- “बात तँ बड़ नीक भेल, मुदा जइ दिन सासुर एलौं, जँ तइ दिनमे ई छूट भेट गेल रहैत तँ की अपन मनक बात नै मेटाएल रहितए। मुदा...।” 3 अगस्त 2014, शब्द संख्या- 1206 घर तोड़ि देलिऐ पति-पुत्रक दुरघटनाक तीन मास पछाति प्रमिला कोठरीमे असगरे बैसल अपन भवितब दिस देखि रहल छैथ। ओना अखन तक प्रमिलाकेँ एहेन विचार मनमे कहियो ने उठल छेलैन। नव-नव विचार मनमे उठलैन। ओना ईहो कहि सकै छी जे जहिना दुनियाँमे हजारो रोग-वियाधि (दैहिक, मानसिक) पसरल अछि, मुदा भेँट तँ तहिये ने होइए जइ दिन ओकर आक्रमण होइ छै। डाक्टर तँ बेवसायी भेला, तँए ओ अपन पूजी बढ़बै दुआरे अनको रोग-वियाधिक आ ओकर दवाइ-औषधिक अध्ययन करै छैथ, मुदा रोगीकेँ ओइसँ आकि जेकरा ओइसँ भेँट नै, तेकरा कोन मतलब छै जे अनेरे पेनक्रियाजक कैंसरक इलाज कथीसँ हएत, से बूझत। ओना बूझब जरूरी छै कि नै छै ई अलग बात भेल। दुनू छै। बूझब ऐ दुआरे अछि जे रोग-वियाधिक कोनो ठेकान अछि, केकरो भऽ सकै छै तँए बूझब जरूरियो अछि, मुदा नहियोँ बुझने हाइनो तँ नहियेँ अछि। हानि ऐ दुआरे नै अछि जे जँ ओइसँ भेँटे नै हुअए। ओना, जिनगी अमरलत्ती जकाँ जहिना बिनु जड़ि-मुड़ीक होइए तहिना दुनियोँ अछि। तखन तँ भेल जे ओतबे अध्ययनक ने जरूरैत अछि जेतेकक जरूरत जिनगी चलैक क्रियामे होइए। अखन तक जे प्रमिलाक जिनगी रहल ओ सपाट रहल। सपाट ई जे बिआहसँ पहिने माता-पिताक आश्रयमे रहली, आ सासुर बासक दौड़ान सरकारी भवनमे रहली, तँए घर बनबैक ने जरूररैत पड़ल आ ने मन वौएलैन। मोने वौएला पछाति ने लोक बाड़ी-झाड़ीमे रंग-रंगक साग तोड़ि पेटक आगि दबैए। जँ से नै तँ अनेरे किए कियो अल्लू-परोड़ छोड़ि, की-कहाँक साग खाएत। भलें पौष्टिक दृष्टिए सागो अपन ओहेन कुबत बनौने हुअए जइमे अल्लुओ-परोड़सँ बेसी सुआदो आ शक्तियो देहमे दाबि कऽ रखने हुअए। परसू जखन प्रमिला सरकारी भवनसँ निकालि देल गेली आ भाड़ाक घरमे एली तखन मनक अन्हरियाक एकादशी दिन विचार उठलैन। अनायास मुहसँ निकललैन- “परिवार तेना राँइ-वाँइ भऽ गेल जे केतए रहब। भाड़ा घर अपन थोड़े भेल चारि दिन चान फेर अन्हरिया राति। मुदा नहियोँ भेने की हएत, केतौ तँ रहए पड़त।” आठ बीधाबला किसान जयकान्त छला। गामे नै आनो गामक किसान जयकान्तकेँ सचरगर किसान मानै छैथ। ओना आठ बीघा जमीनबला गाम छोड़ि दिल्ली-कलकत्ता ओगरने छैथ, मुदा से जयकान्तकेँ ने कहियो मनमे उठलैन आ ने ओइ दिस तकला। आठ बीघामे एक बीघा गाछी-कलमसँ लऽ कऽ घर-घराड़ीमे बाझल छेलैन, बाँकी सात बीघा जोतसीम छेलैन। सातो बीघा एकठाम रहने एकेटा बोरिंगसँ काज चैल जाइ छेलैन। चौमाससँ लऽ कऽ धनहर धरिक खेतक आकार छेलैन। जइसँ नगदीसँ लऽ कऽ जीवन-यापनक सभ फसिल उपजबै छला। अपन घरमे अबिते प्रमिलाक विचार जगलैन। अपन घर अछि केतए? नैहर तँ ओही दिन छूटि गेल जइ दिन माए-बाप दान-दछिना दऽ डोलीमे बैसा अरियाइत गामक सीमान टपा देलैन। सासुरकेँ अपने आगि लगा जरा देलिऐ। भेल ई जे ससुरक अमलदारीमे आठे बीघा जमीनक उपजासँ जयकान्त अपन सम्पन्न परिवार बनौने छला। सम्पन्न ई जे स्तरक हिसाबसँ खेनाइ-पीनाइ, लत्ता-कपड़ा, घर तँ स्थायी रूपे बनौनै छला जे अस्थायी रूपे बेमारीक इलाजो आ बाल-बच्चाकेँ पढ़ेबाएबो-लिखाएबक सम्पन्नता बनौने छला। तीनटा बेटा- गिरिधर, मुरलीधर आ श्रीधर। जेठ बेटा गिरिधरकेँ पढ़ब दिस बेसी झुकाउ। एक तँ अनुकूल परिवार (अनुकूल ई जे परिवारकेँ कौलेज धरि पढ़बैक ओकाइत) दोसर अपन लगन। गिरिधर ग्रेजुएशन कऽ प्रतियोगिता परीछा पास कए प्रशासनिक अफसर बनला। ओना अपना हिसाबे गिरिधरकेँ पढ़ल-लिखल कन्याक संग बिआह नै भेल छेलैन। मुदा चिट्ठी-पतरी तँ प्रमिलाकेँ पढ़ऽ अबिते छेलैन। बच्चेसँ मुरलीधरक झुकाउ परिवारक काज दिस बेसी रहने जयकान्त अपने संग बेसीकाल रैख खेती-पथारीक लूरि सीखा देलखिन। तेसर श्रीधर। ओना पढ़ै-लिखै दिस श्रीधरोक झुकाउ बेसी, मुदा दुनियाँ-दारीक विषयसँ कम आ भक्ति-भजनक बेसी तँए गीत-संगीतसँ बेसी सिनेह। जेकरा ने जयकान्ते आ ने मुरलीधरे अधला बुझै छला। अधला ऐ दुआरे नै बुझै छला जे जँ दरबज्जापर दस गोरे बैसि कीर्तन-भजन करए ओ तँ साक्षात् देवालयक धरमशाला भेल। गिरिधरकेँ बी.डी.ओ. भेला पछाति प्रमिलाक जिनगीमे एकाएक समुद्री लहैर जकाँ उछाल आएल। बदलल बदलल जिनगी। सौंझका चाह दुनू परानी प्रमिला-गिरिधर कुरसीपर बैसि पीबैत अप्पन गप-सप्प उठौलैन। अपन गप-सप्पक माने ई जे अपन जिनगी अपन परिवार। प्रमिला बजली- “गाममे जे अपन हिस्साक खेत-पथार अछि, ओइसँ जे उपजा-वाड़ी होइए तइसँ अपना की भेटैए।” पैसा पाबि गिरिधर खाइ-पीऐ दिस ससैर गेल छला। भरि पेट खेला पछाति जहिना आरामक आवश्यकता बूझि पड़ैत तहिना ने सुरा संग सुन्दरीक सुन्दर बोलो। विहुँसैत गिरिधर बजला- “अहाँक जे विचार हएत सएह ने हमरो हएत। आकि अपनसँ हटल बुझै छी।” बंसी खेलिनिहार जकाँ तड़ेराक खोंटी बूझि प्रमिला बजली- “ई तँ देखिते छी जे सात गोरेक परिवार माझिलकेँ आ छ गोरेक परिवार छोटकाकेँ छैन। ओही खेत-पथारक उपजासँ ने दुनूक गुजर होइ छैन। अपने एते दरमाहा उठबै छी, महिना जाइत-जाइत केतए चैल जाइए? तखन तँ ई ने भेल जे अपन जे हिस्सा अछि, से वएह सभ खाइ छैथ।” जहिना एकिक निअम आ त्रैराशिक निअम अछि जे एके बातकेँ एकटा घुमा-फिरा जोड़ैत आ दोसर सोझहे जोड़ैत, तहिना प्रमिलाक जोड़ गिरिधरकेँ बूझि पड़लैन। हूँहकारी भरैत बजला- “हँ से ते खाइते छैथ।” “ई उचित भेल?” ‘उचित’ सुनि गिरिधर थकमकेला। थकमकेला ई जे ओ तँ खानदानी परिवारक चास-बास छी, चलैत आएल चलैत रहत। अखनो अपन परिवार छी आ आगुओ रहत। मुदा निशाएल मन, पत्नीक बातमे हूँहकारी भरलैन- “उचित तँ नहियेँ भेल।” प्रमिला- “जखन उचित नै भेल, तखन उनुचितकेँ अंगेज रखब नीक भेल?” गिरिधर- “नै।” बातक धारमे गिरिधर तँ भँसि गेला मुदा विचार जखन जगलैन तखन भाए-भैयारी, कुटुम-परिवार, सर-समाज सभ सिनेमाक रील जकाँ मनमे चलए लगलैन। मुदा मनो तँ दुनू दिशामे, विकार रहितोमे आ विकार सहितोमे चैलते अछि। पतिक गम्भीरता देखि प्रमिलाकेँ मनमे संशय जगलैन। संशय ई जगलैन जे हो-ने-हो कहीं अपन गलती कबुल कऽ विचार ने बदलि लथि। तँए अवसरकेँ गमाएब पछाति पछताबाकेँ नौत देब हएत। तँए अवसरकेँ ओत्ते आगू ससारि ली, जे पाछू हटब पाछू उकड़ू हेतैन। बजली- “ऑफिसमे छुट्टी लऽ लिअ आ गाम जा अपन हिस्सा बखरा कऽ लिअ।” जहिना अधला वृत्ति कमबैत-कमबैत कियो खेतक घास जकाँ फसिलकेँ साफ बना लैत तहिना ने नीक वृत्तिकेँ कमबैत-कमबैत कियो घासेक खेत बना लइए। जहियासँ गिरिधर नोकरीक मोटा-मोटी दरमाहा आ ऊपरफटकी आमदनी पाबए लगला तहियासँ अपनो आ परिवारोक खर्चमे बढ़ोत्तरी हुअ लगलैन। दबसँ नीक दिस बढए लगला। मनो तँ मने छी, धारक पानि जकाँ केतौ पेटे-पेट चलैत तँ केतौ महार तोड़ि दोसर मुँह बना शकले बदलि लैत तँ केतौ पछिला आमदनी (धारक पछिला पानिक बेग जकाँ जे बरखो आ बरफोक रहैत) पर उछलि धारे जकाँ खेतो-पथारकेँ बना अपन शकले छिपा लैत। मुदा तइसँ फराक गिरिधरक मन चललैन। मन चललैन ई जे ‘साँपो मरि जाए आ लाठियो ने टुटए।’ परिवारक भैयारी अपन ने भेल, पत्नीक की भेलैन। मुदा तँए कि ओ हिस्सेदारिनी नै छैथ, सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। काजक गर देखि गिरिधर बजला- “अखन चुनावक समए आबि गेल अछि। तीनियेँ मास रहलैए। शासनक रूप-रेखा बदैल गेल अछि, एको दिन के कहए जे एको क्षण छुट्टी भेटब कठिन भऽ गेल अछि। तँए अहीं जा कऽ अपन भैयारी हिस्सा बाँटि लिअ।” अवसर पाबि प्रमिला मने-मन खुशी भेली। खुशियो केना ने होइतैथ, राहड़िक दालि आ दियाद जेते गलै छै तेते ने लोककेँ नीक लगै छै। लोको तँ लोके ने जे लगले गदहा बनि जात लाधि लइए तँ लगले हँस बनि दूध-पानि बिलगा दइए। पतिक बात सुनि प्रमिला मानि गेली। शनिकेँ पछिम मुहेँक यात्रा नीक होइ छै तँए परसू गाम जेबाक विचार पतिसँ मना लेलैन। ओना गिरिधरक मन गामक सम्पैतसँ हटि ऑफिसक काज दिस बढ़ि गेलैन, मुदा प्रमिलाकेँ जेना देवस्थानक डोर डोरिया लैत तहिना भैयारीक सम्पैत डोरिया लेलकैन। मनमे रंग-बिरंगक विचारक तरंग तरंगित हुअ लगलैन। सभ बेचि-बिकिन बैंकमे जका कऽ लेब, सुइदिक नीक आमदनी हएत। जँ से नै तँ खेतक उपजासँ अन्नक बेसाहे खतम हएत। तैयो भेल। ओना बेसाहमे पाइक खर्च नहियेँ छेलैन, डीलरे सभ उपहार पढ़बै छेलैन। तेसर दिन, शनि दिन, प्रमिला सासुर पहुँचली। जेठ दियादिनी होइक नाते परिवारक पूज्य छेलीहे। दुनू भाँइ मुरलीधर आ श्रीधर दिअरे आ दुनू छोटकी दियादिनी। परिवारक सीढ़ियो तँ रूआबी होइते अछि। तहूमे आब माता-पिता परोछे भऽ गेलैन। खेला-पीला पछाति प्रमिला दुनू दिअरकेँ कहलखिन- “हम केतए एलौं, से अखन धरि कियो पुछलौं?” संगतिया श्रीधर बजैमे फरकोर रहबे करथि। बजला- “ई थिक मिथिला रीत, ई थिक मिथिला गीत, सुनियौ यौ मीत, आगूसँ पुछैक नै छी रीत।” श्रीधरक लयात्मक बोल जेना प्रमिलाकेँ छूबि देलकैन। तरेगन जकाँ आँखि तरंगलैन। मुदा दबने रहली। बजली- “अखन कोनो बिआह दान आकि मूड़न नै छी जे गीत-नाद हएत। अपन हिस्सा बाँटए आएल छी।” ‘अपन हिस्सा’ सुनि श्रीधर बौआ गेला। बौआ ई गेला जे मनुखकेँ तँ अपन-अपन हिस्सा अपन-अपन गुण होइ छै ओ केना बँटाएत। केकरो देल जा सकैए। मुदा मुरलीधर सम्पैतक बात बुझलैन। अदौसँ परिवारमे बँटबारा होइत आएल अछि, सुहरदे मने किए ने बाँटि देबैन। किए अनकर देखौंस करब जे एक हाथ- आध हाथ खेत-ले कपर-फोरौबलि करब। बजला- “परिवारमे आठ बीगहा जमीन अछि। दू बीगहा तेरह कट्ठा छ धूर दू पौआ, दू कनमा दस कनइ हिस्सा भेल, कागतपर नक्शा बना कऽ लऽ लिअ। कोनो मन-मलान नै अछि।” अखन धरि मुरलीधरक मनमे यएह रहैन जे गिरिधर भैया थोड़े खेत-पथारक आड़िपर औता, तखन तँ कागजी बँटबारा भेल रहत। मुदा से भेलैन नै। प्रमिला अपन सभ किछु अलग देखए चाहै छेली। बजली- “हमर सभ किछु अलग करि दिअ।” घरसँ लऽ कऽ वाड़ी-झाड़ी खेत-पथार सभ किछु प्रमिला अपन खँतिया लेली। खँतेला पछाति छोटकी दियादिनी कहलकैन- “दीदी, सब किछु तँ बँटाइए गेल। आन जे आबि घराड़ीपर भाँटा रोपत आ अनेरो साँझ-भोर आबि जे गरिऔत से केहेन हएत। मनहुण्डे सब खेतक उपजा साले-साल दइत रहबैन, अनका नै देथुन।” जेना कोनो लाभ पौने लोककेँ खुशीए टा नै उत्साहो उमकै छै तहिना प्रमिला उमकैत बजली- “बाँटल भाए पड़ोसिया दाखिल। अपना हिस्साक घरमे जेकरा मन फूड़त तेकरा बसाएब, तइले अहाँकेँ किए छाती फटैए।” जेठ दियादिनी, मातृ तुल्य प्रमिलाक बात सुनि सबरी आँखि निच्चाँ कऽ लेलैन। मन कहलकैन- ‘एहेन लोकक मुँह देखब पाप छी।’ 10 अगस्त 2014, शब्द संख्या- 1527 सजल स्मृति एक जनवरीक दिन। मासक अन्तिम दिन डाक्टर सोनी देवी इंगलैंडक अस्पतालसँ सेवा निवृति हेती। रबि दिन, अस्पताल नै जेबासँ निचेन रहने ओछाइनो छौड़ैमे किछु बिलम भेलैन आ परिवारक काजोमे ढील-ढाल रहबे करैन। सुति उठि, बिनु मुँह धोने दू कुर्ड़ा पानि फेकि, बिजलीक चुल्हि पजारि डाक्टर सोनी देवी कॉफी बनौलैन। ठण्ढ मुल्क रहने चाह सोलहन्नी भरपाइ नै कऽ पबैए। आन दिन जकाँ दू गिलास बनबैक जरूरतो नहियेँ भेलैन। एक तँ ओहुना मन असकताएल तैपर काजक सुभिता भेने अनुकूलता अबिते अछि। जे डाक्टर सोनी देवीकेँ सेहो भेलैन। आन दिन तँ अस्पतालक काज मनकेँ अपना दिस बहटारने रहै छेलैन से नै रहने मन अपन परिवार दिस घुमौलकैन। घुमिते मन पतिपर गेलैन। पति डाक्टर मनमोहन सेहो सर्जन पदसँ एकतीस दिसम्बरकेँ सेवा निवृति भेला जेकरे हिसाब-किताब दइले तीन दिन पहिने अस्पताल गेला, अखन धरि किए ने एला। काल्हिये तक तँ नोकरी छेलैन। भरिसक केतौ हिसाब-किताबमे ने तँ लटपट भेलैन। पतिक काजक लटपटसँ सोनी देवीक मन गहियेलैन। गहियेलैन ई जे ऐ अबस्थामे काजक लटपट भेने काजो भरिया जाइ छै। हाथोक काज अनका हाथ गेने जुति-भाँति बदलिए जाइ छै। जँ से भेल हेतैन तँ पेन्शन जे लटपटेतैन से तँ लटपटेबे करतैन जे जिनगी भरिक सभ केलहा-धेलहा सेहो पानिमे चैल जेतैन। पानिमे ई जेतैन जे जइ कुरसीपर बैसि आनक काज करै छेलौं, तैठाम आन बनि अपन काज हएत। तँए अपन किरदानी लोककेँ अपने बिसाइ छै। तहूमे सेवामे रहैत तँ किछु बँचितो छै जे सेवा निवृतिक पछाति तँ ओहो धुआ जाइ छै। मुदा उपए? ‘उपए’ लग अबिते सोनी देवीक मन ओहिना अड़ियेलैन जहिना कोनो बोहैत धारक आगू बान्ह पड़ने अड़ियाइ छै। मुदा जहिना धाराक पानि पाछूसँ अबैत धाराकेँ रोकैत ठमकैत फुलऽ लगै छै तहिना सोनी देवीक मन फुलेलैन। फुलाइते नजैर अपना दिस बढ़लैन। बुदबुदेली- “एकतीसम दिन अपनो यएह गति हएत!” मुहसँ अपन गति फुटिते सोनी देवीक मन जिनगीक स्मृतिमे डूमि गेलैन। हृदैक पुरना डायरीक पन्ना उनटए लगलैन। केतए गेल ओ गामक सखी-बहिनपा, पावैन-तिहार, मेला-ठेला, खेनाइ-पीनाइ आ ओढ़ब-पहिरब? पाछू दिस बढ़िते डाक्टर सोनी देवीक मनक डायरीक पहिल पन्ना उनटलैन। जहिना किताब उनटिते पहिल पृष्ठ सोझहा अबैत तहिना सोनी देवीक सोझ स्मृतिक डायरीक पन्ना उनटलैन। उनटिते जन्मक कथा भेटलैन। मात्रिकमे जनम भेल छल जे डेढ़-सालक पछाति अपन गाम (माए-बापक) एलौं। ओना दोसरो-तेसरो धी-बेटीक सन्तानक परम्परा नैहरक रहल, मुदा पहिल सन्तान तँ अनिवार्य रूपे रहबक परम्परा अदौसँ अबिते अछि। जनम मन पड़िते, अपन नाना-नानी, मामा-मामी, भाए-बहिन, सर-समाज चौबगली घेरि लेलकैन। अनायास हाथक ओंगरी घुसैक दोसर पृष्ठपर पहुँचिते उनैट गेलैन। पृष्ठ उनटिते डाक्टर सोनी देवीक नजैर बाप-माएपर पड़लैन। मन पड़लैन डाक्टर सोनी देवीकेँ, जखन दू बर्खक रही आ चुल्हितर माए भानसो करै छेली आ हमरा खुआ-पीआ कऽ, अपने बीच (माने एक भाग सोनी देवी, दोसर भाग आगिक चुल्हि, तैबीच)मे आगूमे जहिना चिड़ै-चुनमुनी चहरा आनि अपना बच्चाक आगूमे छिड़िया दइ छै (ओना पहिने लोलसँ लोलमे दइ छै) जेकरा बीछि-बीछि बच्चाकेँ खाइत देखि माइक हृदैक धार बहए लगैत तहिना ने हमरो आगूमे धानक, रमदानाक, भैंटक, मलकोकाक आ खुभीक लाबा छीटि दइ छेली आ बीछि-बीछि खाइत देखि मने-मन गंगा स्नान करैत रहै छेली। तही बीचमे ने भात, रोटी, तीनम, तरकारी सेहो सभ सीखबै छेली। कोनो कि अनाड़ी माए रहैथ जे सुतैकालक ओछाइन-बिछाइनिक नाओं नै सीखा खेबा-पीबा कालक सिखैबतैथ। चुल्हिये लग ने पहिने भात सिखौलैन पछाति अरबा-उसना भात सिखौलैन। तइ पछाति ने मोटका-मेहीका, बसिया-तेबसिया इत्यादि सिखौलैन। ओना सीखेबे नै केलैन, मुहसँ बोलो फोड़लैन। भलें ताबे कण्ठ, जीह, मसुहैर, दाँत इत्यादि नीक जकाँ सर्ड़ास नै भेल रहए तँए अधखड़ुए बोल मुहसँ निकलए। दाँतो अदहे-छिदहे भेल रहए। अगिला पृष्ठ उनटिते डाक्टर सोनी देवी ओ दिन देखलैन, जइ दिन पिताक संगे जा इस्कूलमे नाओं लिखौलैन। चारि-पाँच बर्खक भऽ गेल रही। चारि बरख पुरि, पाँचम चढ़ि गेल रहए, मुदा पुरल नै रहए। गामेक इस्कूल गामेक चटिया। सेहो टोले-पड़ोसेक। किए मिसियो भरि अनभुआर लगितए। अनभुआर तँ ओतए चटियाकेँ लगै छै जेतए देशक कोण-कोणसँ आएल पाँच बर्खक बच्चाक बीच रंग-रंगक बोली, रंग-रंगक चालि-ढालि, रंग-रंगक खेनाइ-पीनाइ रहै छै। जैठाम से नै तैठाम अनभुआरे की हएत। दुर्गापूजाक समए सखी-बहिनपाक संग केना चारि बजे भोरे उठि, फुलडाली लऽ सिंगहारक, अरहुलक, चम्पाक फूल लोढ़ि पूजा लेल दुर्गास्थान पहुँचबै छेलौं। पहिने फूल लोढ़ि फुलडाली आँगनमे रैख लइ छेलौं, पछाति चिक्कनि माटिसँ सबहक संग दुर्गास्थान नीपै छेलौं आ तेकर बाद आँगन आबि-आबि नहाइ छेलौं, नव वस्त्र पहीरि फूलक फुलडाली देवालय पहुँचबै छेलौं। भीतरे-भीतर डाक्टर सोनी देवी स्मृतिक डायरीक पन्ना पढ़ि-पढ़ि विस्मित होइत गेली। मन पड़लैन पावैनक उपास। रामनवमी-कृष्णाष्टमी, देवोत्थान, हरिवासए, नर्क निवारण चतुर्दशी। सभ छूटि गेल। छुटिते मन उमकलैन। जहिना गाए-महींस उमैकते बोलियो दैत आ मलकबो करैत तहिना सोनी देवीक मन उमकैत बोली देलकैन। की नै छूटल? गामक परिवार छूटल, समाज छूटल, पावैन-तिहार छूटल। उपास-व्रत छूटल, देवी-देवता छूटल, देववाणी छूटल! छूटि गेल अपन खान-पान, अपन ओढ़न-पहिरन! जैठाम छी तैठाम जे पावैन-तिहार आ देवी-देवता छैथ, ओ भिन्न छैथ तइसँ नै जाइ छी। पावैन नै करै छी। जहिना गामो-घरमे किछु पावैन एहनो होइए जे सभ करै छैथ। आ एहनो होइए जे किछु गोरे करबो करै छैथ आ किछु गोरे नहियोँ करै छैथ। एहनो तँ हेबे करैए जे जँ साल दू-साल तीन-साल छुइटो जाइए तैयो फेर जान-पराण दऽ लोक जीआइए लइए। जँ से नै जीअबैए तँ तीनसला-चरिसला रौदी-दाहीक कहात् समए भेने नवान छुटि फेर कुशियारक गोभ जकाँ पनैप केना जाइए? लगले सोनी देवीक मन अगहनक नवान (ओना कातिकोमे नवान होइ छै।) सँ पाछू डेगे ससरली तँ छैठ पावैन कूदि कऽ आगूमे एलैन। छैठपर नजैर पड़िते मन चकोना भेलैन। चकोना होइते एकटा कोणमे देखलैन छैठक सुरूजक अर्घ। मुदा वएह सजल कोनियाँ पहिलो दिन आ दोसरो दिन निवेदित होइत। ओकरे नवेद्य पड़ैत। ओना मिथिलांचलक पावैनक पद्धति छी, पटनियाँ भलें सौंझका कोनियाँ साँझेमे उसारि रैख भोरुका कोनियाँ अलगसँ किए ने सजबैत। खैर जे से। अदौसँ उदए-अस्त वा अस्त-उदएक नमस्कार निवेदित करबाक परम्परा रहल अछि, अखनो अछि। अखनो दुआरपर पहुँचैत पाहुनकेँ अबितो आ जाइतो हाथ जोड़ि नमस्कार निवेदन निवेदित होइते अछि। लगले मन फेर घुसैक चौमुखी दीप सजल कुड़पर गेलैन। केना बाँहिसँ पकैड़ आँगनसँ छैठक घाटपर लऽ जाइ छेलों आ घाटपर सँ जरैत दीपक कुड़ आँगन नेने अबै छेलौं। भलें ओ दुनू कुड़ो आ दीपो माइटेक बनल किए ने रहौ, मुदा आगिमे पकौल रहला पछाइतो तँ माटिपर खसने फुटबे करैत। केते होशियारीसँ काँखतर दबने जाइ छेलौं आ अबै छेलौं। लगले मन मुरैछ गेलैन। मुरछलैन ई जे अखन देखै छी जे एक घण्टा दारू पीबैमे बिलम भेने लोक पगला कऽ पगलपनी करब शुरू कऽ दइए आ केना सतरहे-अठारहे बर्खमे हरिवासए उपास, अन्न-पानि छोड़ि कऽ लइ छेलौं। (हरिवासए उपास अढ़ाइ दिनक होइ छै।) सभ छूटि गेल। छूटि गेल मात्रिक, छूटि गेल नैहर, छूटि गेल सासुर (जे अपन घर होइत) छूटि गेल सभ समाज। एकाएक जेना मनमे तरसँ बमगोला छुटलैन। बमगोला छुटिते अवाज निकलल- “जखन सभ किछु छूटि गेल तखन रहल की। यएह ने मृत्यु छी जे जड़-चेतनक विछोह भेल।” जीवन-मृत्युक बीच झुलैत डाक्टर सोनीक मन कदमक गाछक ओइ झूलापर गेलैन, जेतए आस मारि झूलल रहैथ। तही बीच स्मृतिक डायरीक ओ पन्ना उनैट गेलैन जइमे मेडिकल कौलेजमे प्रवेशक चर्च छल। केना हाइए इस्कूलमे डाक्टर बनैक मनकामना केने रही। जँ से नै केने रही तँ दसमेसँ किए बायोलौजी पढ़ब शुरू केने रही। जिनका इंजीनियर बनैक रहैन ओ गणित पढ़ै छला। त्रिवेणी जकाँ केते नीक संयोग छल, एक तँ महिला आरक्षित सीट, तैपर नीक नम्बरक संग कौलेजक सम्बन्धित प्रोफेसर। एकाएक प्रवेश दिनक राखल पत्रपर नजैर पड़लैन। एक थाक पत्र एकटा ललका झोरामे थकियाएल परिवार, समाज, कुटुमक संग विभागक राज्ये नै देशोक आशा तँ हमर भविसपर छइहे...। अपनो जखन कौलेजमे पढ़ैत रही तँ झण्डा उठौने रही जे जन-जन तक चिकित्सा भेटौ। मुदा भेल की? केतए गेल अपन संकल्प केतए गेल अपन व्रत। मुदा तइ समए कहाँ बुझै छेलौं जे एना देश छोड़ि आन देशमे जीवन बीतत। हमरासँ समाजकेँ कथी उपकार भेलइ। जइ दिन मेडिकल कौलेजमे नाओं लिखौने रही तही दिन केते गोरे डाक्टरक माला पहिरा असीरवाद देलैन। केतए गेल ओ असीरवाद। ओ अपन कर्तव्य पुरबैत असीरवाद देलैन। मुदा असीरवादक उत्तर हम कथी देलिऐन। केना समाजशास्त्री मनुखकेँ समाजिक जीव मानलैन। मुदा भेल एना किए? नव प्रश्न उठिते डाक्टर सोनीक दहिना हाथ सेहो डायरीक अगिला पृष्ठ उनटौलकैन। डाक्टरी डिग्री लेला पछाति बिआहक गप-सप्प उठल। साल भरि पहिने डाक्टर मनमोहन कौलेजसँ निकलल छला। छह मास धरि जहाँ-तहाँ नोकरीक लेल बौएला, मुदा केतौ गर नै लगलैन। तखन देश छोड़ि बाहर जेबाक विचार केलैन। इंगलैंडमे भेकेन्सी रहै, आवेदन केलैन नोकरी भऽ गेलैन। गामो-घरमे नव-नौतुक डाक्टरकेँ पहिलुका डाक्टर थोड़े बास हुअ दिअ चाहैए। तैसंग अपनो काजक प्रसार नहियेँ भेल रहए जे काज कूदि कऽ आगू आबि गवाही दैतै। तँ अहुना जहिना सभ अपना बेटाकेँ इंजीनियरे-डाक्टर बनबए चाहैए तहिना ने नोकरियो अमेरिका, इंगलैंड देतै। जाइले सभ चाहैए। एक तँ अहुना डाक्टर बनि मनमोहन जेता, परोपट्टामे चर्चक विषय बनि गेल छल। पितोकेँ बिआहैक रहैन। जुआक पाशा जकाँ अपन सम्पैत अरोपि बिआह कऽ देलैन। इंगलैंड एलौं। अपनो नोकरी भेल। तीनटा बालो-बच्चा भेल जेकरा पढ़ेलौं-लिखेलौं। मुदा बिआह केलक अपना विचारे। ओना सभ नोकरिहारा, तँए परिवार चलैक गर पकड़िए लइ छैथ। मुदा अपना किछु रहल कहाँ लगमे। (लगक माने अनुकूल जीवन। अनुकूल जीवन माने मिथिलाक जीवन-दर्शन।) आँखि जखन डायरीक नीचला पाँतिपर गेलैन तखन देखलैन जे केना सृष्टिक विकासमे पुरुष-नारीक योगदान होइ छै। केना सन्तानोत्पति होइ छै। की प्रसव पीड़ाकेँ बहलैत मनक सुख बूझि नारीक नारित्वकेँ निमुआँग कएल जाए? केना अपन जनम मात्रिकमे भेल, माएसँ माए जोड़ल छेली। दुनू परानी अनुभवी शिकारी छला। (नाना-नानी सन्तानोत्पतिक) सम्बन्ध सूत्र तेना बनल अछि जे बाँस-केरा जकाँ ओधिसँ ओधि जुड़ल अछि। मुदा ऐठाम तँ सभ टुइटो गेल आ जे बँचल से छुइटो गेल। टुटल अपन परिवार-समाज आ छुटल ऐठामक नोकरीक जिनगी। जैठाम लोक कमाइ-ले जाइए आ समाज बनै छै, ओ भेल नोकरिहारा कमौआक समाज। मुदा सेवा-निवृतिक पछाति ओ अनेको कारणे छुटए लगै छै। छुटए की लगै छै जे जहिना दिन बढ़ने काज बढ़ै छै आ दिन घटने काज घटै छै। तँए ने गरीबीकेँ दिन घटब आ अमीरीकेँ दिन बढ़ल कहल जाइ छै। मेलाक यात्री जकाँ धक्कम-धुक्का खाइत डाक्टर सोनीक मन ठेहियेलैन। मुदा लगले ठेही उतैर गेलैन। उतैर ई गेलैन जे डाक्टर छी, भेल तँ दस-बीस बरख आरो जीब, कहुना पेन्शनोपर कटिये जाएत, तखन भेल मरैबेर। अपनो बुझै छिऐ आ आनो सभ बुझिते छैथ जे मरैबेर एहेन पीड़ा होइ छै जे लोक मरिये जाइए। मुदा युगोक तँ अपन धरम होइ छै, जखन लोकक मन मानि लइ जे दू-तीन दिनमे मरि जाएब तखने किए ने मतबैबला निशाँक सुइया लऽ लेत जे पीड़ा हेबो करतै तँ बुझबे ने करत। जइसँ सुखेसँ मरब हेतइ। सभ तँ सएह ने चाहै छैथ। कनैत तँ सभ अबैए, हँसैत जाएब ने मुकद्दरक सिकन्दर भेल। नअ बैज गेल। अखन तक डाक्टर सोनी ने मुँह-कानमे पानि नेने छेली आ ने अपन नित्यकर्मसँ निवृत भेल छेली। घड़ीपर नजैर पड़िते मन हरहरेलैन। जलखै बेर भऽ गेल, मुदा लगले मन बदलि गेलैन। छुट्टीक दिन छीहे, अनेरे किए चुल्हिमे हाथ घोंसियाएब, तइसँ नीक जे बिस्कुट संग चाहे पीब लेब। जहिना अगम पानिमे हेलिनिहारक सभ किछु अगम भऽ अगमा जाइ छै, तहिना सुगम पानिमे हेलिनिहारकेँ सेहो सभ किछु सुगमा जाइ छै। डाक्टर सोनियोँकेँ सहए भेलैन। चाह-बिस्कुट आगूमे डाक्टर सोनी रैखते रहैथ आकि डाक्टर मनमोहन पहुँचलखिन। सुखाएल मुँह, हदास उड़ल चेहरा। पतिकेँ देखि डाक्टर सोनीक मनमे एकाएक जोड़क धक्का लगलैन। धक्का ई लगलैन जे जखन काजसँ अवकाश भेटलैन, तखन जान हल्लुक भेलैन की भारीए। जखन जान हल्लुक भेलैन तँ मनमे खुशी हेबा चाही किने, से किए ने छैन। मुदा किछु छी तँ परिवार छी किने, परिवारक सभकेँ अनुकूल बनि चलबे ने परिवार चलब भेल। कुशल-समाचार पुछब छोड़ि डाक्टर सोनी पतिकेँ कहलखिन- “रस्ताक मारल आएल छी, भूख-पियास लागल हएत, पहिने किछु खा-पीब कण्ठ सर्ड़ास करि लिअ तखन कुशल-समाचार हेतइ।” कहि अपने-ले आनल चाह-बिस्कुटमे सँ बाँटि दुनू गोरे, बिस्कुट तोड़ि मुँहमे लेलैन। मुदा जेना चिराकी चाउर खेने मुँह लठिआइ छै, तहिना डाक्टर मनमोहनकेँ होइन, मुदा गिलासक पानि पीब कण्ठ सर्ड़ास करैत बजला- “पाँच साल आरो नोकरी करैक आवेदन देलिऐ। मुदा दोसर, जेकर परमोशन हेतइ, एहेन विरोध केलक, जे नै भेल।” जेना डाक्टर सोनीकेँ बुझले रहैन तहिना टपकि पड़ली- “तीनियेँ साल-ले दैतिऐ।” मुदा डाक्टर मनमोहनकेँ थाहल-नापल काज तँए गम्भीर होइत बजला- “तीनियोँ साल-ले देने काज थोड़े होइत। जे विरोध केलक ओकरा अढ़ाइए बरख नोकरी बँचल छै।” डाक्टर सोनी- “जखन ओ जुनियरे भऽ काज करै छला तखन हुनके किए ने बुझा-सुझा देलिऐन।” पत्नीक विचार सुनि डाक्टर मनमोहनक मन मड़कलैन। मड़कलैन ई जे सभ अपन पद, प्रतिष्ठा आ धन चाहैए, तैठाम कहब उचित होएत। मास दिनक पछाति जखन डाक्टर सोनियोँ सेवा निवृत भेली तखन दुनू परानी अपन कपार मिलौलैन। साल भरि दुनू परहेज केने रहला। परहेज ई जे बिनु कमौआ पुतकेँ कमौआ घरवालीक आगू विधवे बूझल जाइए। तँए दुनूक बीच-सधवा-विधवाक सम्बन्ध बनि गेल छेलैन। भिनसुरका कॉफी पीब दुनू परानी मनमोहन-सोनी गद्दीबला आराम कुरसीपर मलड़ैत चीत गरे ओंगठि (जेना अखड़ाहापर खलीफा चीत होइए, तहिना) भविसवाणी करए लगला। भविसवाणीक जरूरतो तँ रस्तेक मोड़पर ने होइत। नोकरी जिनगीसँ दुनू बेकती सेवा-मुक्ति भेल छला। जिनगी जीबैले सेवा आवश्यक ऐछे। जँ सेवे नै तँ मेवा केतए फड़त। सेवाक विचार मनसँ हटिते अपन जिनगीक योग-क्रिया आ भोग-क्रिया टपैकते अछि। मुस्की मारि डाक्टर मनमोहन बजला- “मन होइए जहिना पहिलुका लोक ढाका-बङ्गालमे कमाइतो छल आ मिथिलाक भूमिकेँ पकैड़ घरो बनौने छल, तहिना ऐठामक सभ किछु बेचि-बिकीन गामे चैल जाइतौं।” पतिक विचारमे बिठू कटैत डाक्टर सोनी बजली- “गामक लोक पूछत?” मजाके-मजाकमे दुनू बेकती विचार-मणि दिस विदा भेला। रस्ताक मोड़ टपिते जेना डाक्टर मनमोहनकेँ फुरलैन, बुदबुदेलथि- “जेना गामक सुरता मनकेँ पकैड़ रहल अछि।” पतिक मनक सुरता सुनि डाक्टर सोनी जिनगीक बाटमे हरा गेली। सिनेमाक रील जकाँ मातृकक जनमसँ पटना हवाइ अड्डा तकक जीवन-यात्रा आगूमे ठाढ़ भऽ गेलैन। बजली- “आब की करब?” पत्नीक विचारकेँ डाक्टर मनमोहन जीवन संगीक प्रश्न बूझि गम्भीरतासँ लेलैन। बजला- “अबैकाल किछु परिस्थितिवश आ किछु लोकोक मुँहक बोलसँ प्रभावित भऽ केलौं, अपनो जीबठ बान्हि अपने गाम-समाजमे अपन जिनगी ठाढ़ करितौं। मुदा से भेल नै। मिथिला सन धरती जे त्रिगुण मौसमक बीच अपन अजर-अमर देह धारण केने छैथ, तइ धरतीकेँ छोड़ि ऐठाम एलौं। पैंतीस सालक जिनगी गामक जिनगीसँ अलग जिनगी बना अपनाकेँ ठाढ़ केलौं।” कहि चुप भऽ गेला। पतिकेँ चुप होइत देखि डाक्टर सोनी बजली- “चुप किए भेलौं? अपनो अनुभव कऽ रहल छी जे परिवारिक जिनगीसँ समाजिके जिनगीटा सँ नै हटलौं, शरीर जलवायु अनुकूल अपनाकेँ अंगेज बना लइए। तेतबे नै, देहक क्रियासँ आगू समाजिक क्रिया सेहो अछि।” पत्नीक विचार सुनि डाक्टर मनमोहन ठमैक गेला। ठमैक ई गेला जे रहैक घरसँ लऽ कऽ खेनाइ-पीनाइ, बजनाइ-भुकनाइ सभ किछु बदलि गेल। गाम जेबाक मनकेँ तँ बुझबए ने पड़त, जे जेठक रौदा, भादवक पानि, माघक जाड़केँ पचबैक शक्ति अछि किने। बजला- “जँ मन गाम जाइक अनुकूलो हएत तँ शरीर नै गछत।” “तखन?” “तखन एतैसँ गामकेँ गोड़ लगैत रहू जे अहाँ बड़ सुन्नर छी, मिथिलामे बास करै छी। जेतए जनक सन राजा भेला सीता सन जगतजननी भेली। जामंतो रंगक फुलक फुलवारीसँ सजल फुलवारी छेलैन। गुरुक संग राम एला, धनुष तोड़ि चारू बहिन सीताक संग चारू भाँइक बिआह भेलैन। वएह मिथिला छी।” 14 अगस्त 2014, शब्द संख्या- 2363 सए कच्छे अबेर तक ओछाइनेपर पड़ल रही। भारी बरखा तँ नै मुदा हल्लुक मझोलका बरखा होइत रहै। दुपहर आकि बेरूपहर जेहेन बर्खाक मद्दी लोक नै दइए, अपन काज-उदम करिते रहैए, मुदा ओहेन बरखा भिनसरू पहरकेँ गरूगर लगैए, सएह भेल रहै। छह बजेक समाचारक समए भेने रेडियो खोललौं। खोलिते समाचार आएल जे कमलाक छहर टूटि गेल, केते गाममे बाढ़िक पानि पसैर गेल। अगिला समाचार की भेल से सुनबो ने केलौं, काने जेना भथा गेल। भथा ई गेल जे दस दिन पहिने तक रौदी-रौदीक घोल यएह रेडियो करै छल, जे आन सालसँ कम बरखा हएत। कम ऐ मानेमे जे बरसाती खेतीले जेते पानिक खगता होइ छै तइसँ कम बरखा हएत, तँए समए रौदियाह हएत। नमहर किसान तँ नै मुदा छोट-मोट किसान तँ छीहे। वैज्ञानिकक विचार केना नै मानितौं। मानैक माने ई भेल जे जे जेतै काज करै छैथ ओ ओतै ने अपन योजनाक कार्यक्रम ओइ हिसाबे बनौता, तहिना हमहूँ केलौं। बरसातमे जे खेत धानक होइए वएह खेत कम बरखा भेने तरकारीक वा कम पानिक खगताबला अन्नोक खेतीले अनुकूल भऽ जाइए। कियो अपन योजना अनुकूलते हिसाबे बनबै छैथ। यएह सोचि धानक खेती कम केलौं। नहियेँ जकाँ भेल। नवका धानक बीआ कीनि कऽ अनने छेलौं, जे बीस-पचीस दिनमे रोपल जाइए ओ बीरारे ने बुड़हा गेल। बुड़हेबो केना ने करैत, अगता सौनक रोपक खियालसँ बागु केने छेलौं। धुरिया सौन भऽ गेल। अपना बोरिंग नै, आँड़ि-पाटिमे जे बोरिंगो अछि ओ पछिला भोँटसँ कटा-कटी भऽ गेल। कटा-कटी होइक कारण भेल जे भोँटक गरमा-गरमीक बहसमे झंझट भऽ गेल, जइसँ कोट-कचहरीक पेँचमे पड़ि गेलौं। टटका दुश्मनी तँए खेती नै भेल तँ नै भेल मुदा मुँह खोलि खुशामद केना करितिऐ। जखन अन्न खाइ छी, पानि पीबै छी तखन जँ आइन-अपगराइन मनमे नै रहत तँ अनेरे किए दुनू (अन्न-पानि) केँ दुख दइ छिऐ। मनमे सएह रहए तँए धानक खेती नै भेल। मुदा अन्तिम भादोमे डूमा बरखा आ बाढ़ि एने मन सिहरैत रहए। सिहरैत ई रहए जे जहिना कोनो मनुखोकेँ आ मालो-जालकेँ, आ गाछो-बिरीछकेँ होइ छै जे शुरूमे बाँझ जकाँ रहैए आ पछाति ढेनुआर भऽ जाइए तहिना मेघोकेँ भेल अछि। हथिया तक बरिसत आकि चितरा तक बरिसत तेकर कोनो ठेकान छै, तहूमे तेहेन-तेहेन गोलगर बुन्नक बरखा होइए जे जँ आगूओ तक धेने रहल तँ अगिलो खेती खेबे करत। मन बिसाइन-बिसाइन होइत रहए। चाह नेने माए आबि बाजलि- “किए अखन तक मुहोँ-कानमे पानि नै लेलह।” भोरे-भोरे केना दुखाएल बात बैजतौं, बात बदलैत कहलिऐ- “कौल्हुका तेहेन चालि भेल रहए जे देह-हाथ दुखाइए।” बेटाक बातक बिसवास माए नै करथि, सेहो तँ नहियेँ। चौकीक कोनपर चाहक गिलास रैख बाजलि- “अच्छा सूतले रहह, देह-हाथ दाबि दइ छिअ।” अपना केनादन लागल। झूठ बाजि माएसँ जँताएब उचित नै बूझि, उठि कऽ बैसि झूठकेँ सत् बनबैत कहलिऐ- “माए, कौल्हुका चालिक माने तूँ बीतलाहा काल्हि बुइझ गेलही। ओते तँ सभ दिन चैलते छी, तइसँ की देह-हाथ दुखाएत। आगूक काल्हिक चालिक बात कहलियौ।” जेना पहिनेसँ माएकेँ जवाब तैयारे रहै तहिना धाँइ दऽ बाजलि- “रौदीसँ दाही सए कछे नीक होइ छै।” माइक बात सुनि मन आरो औना गेल। चुपचाप चाहक गिलास उठा चाह पीबए लगलौं। 19 अगस्त 2014, शब्द संख्या- 488 एक मुठी घास छुब्द भऽ छगुन्तामे पड़ि गेलौं जखन नअ बर्खक भतीजी आबि कहलक- “काका, हँसुओ आ पथियो छीनि लेलक आ गाइरो पढ़लक।” बाध दिससँ टहैल कऽ आएले रही, एक तँ पानिक झमार दोसर भदबरिया रौद लगल रहए। मन पीताएल रहबे करए, पियास सेहो लगल रहए, रौदाएल दुआरे कलसँ कनी हटि लतामक गाछक छाहैरमे बैसल ठण्ढाइत रही जे ठण्ढेला पछाति पानि पीब। तही बीच भतीजी आबि बाजल। पुछलिऐ- “के छिनलकौ?” रेखा बाजलि- “जुगेसर काका।” ‘जुगेसर’ नाओं सुनि आरो चकित भऽ गेलौं। मन पड़ि गेल पहिलुका घटना। बीस बरख पूर्व जुगेसरक घरवालीकेँ अहिना खुरपी-पथिया मोहन बाबूक कमतिया छीनि नेने रहै। जेकरा चलैत गारि-गरौबलिसँ लऽ कऽ मारि-पीट भऽ गेल। मारि-पीटक पछाति मुकदमो भऽ गेल, जइमे मुद्दालह बनि हमहूँ आठ बरख कोट-कचहरीक चक्कर लगौने रही। पुछलिऐ- “की केने रही जे हँसुओ-पथिया छिनलकौ, आ गाइरो पढ़लकौ?” सुनिते रेखा हुचैक-हुचैक कानए लगल। जहिना कोनो निरदोस फँसौल आदमी जहल जाइकाल कनैए तहिना कनैत बाजलि- “घासले गेल छेलौं, सौंसे बाधक आड़ि-धुर डुमल देखलिऐ। खाली गाछी कातक खेत सूखल देखि घास कटैले बैसलौं। एके मुठी कटने रही आकि जुगेसर काका आबि कहलक जे घास किए कटै छेँ?” थोड़-थाड़ घासोक खेती गाममे हुअ लगल अछि। पुछलिऐ- “बगहा घास छेलै आकि अनेरूआ?” रेखा बाजलि- “अनेरूआ।” ‘अनेरूआ’ सुनि मन तरैंग गेल जे अखने जा कऽ पुछिऐ आ बलउमकी झाड़ि दिऐ। ताबे ठण्ढाइयो गेल रही, कल चला कऽ पानि पीलौं। पानि पीबिते मन आरो ठण्ढाएल। ठण्ढाइते मनमे उठल, एना जुगेसर केलक किए? आगू-पाछू उनैट-उनैट सोचलौं तँ किछु देखबे ने करिऐ। एकाएक नजैर पछिला भोँटपर गेल, शुरूहेसँ जइ पाटीमे भोँट दैत एलिऐ, तेकरे अहूबेर देलिऐ। मुदा सपनौर जकाँ जुगेसर चालि बदलि लेलक। अखन तक गमैया बात-विचारसँ लऽ कऽ पटना-दिल्लीक भोँटमे संगे रहैत आएल मुदा ऐबेर ओ ससैर कऽ दोसर पाटीमे चैल गेल। एक तँ नहाइ बेर रहए दोसर जलखैयो ने केने रही। दू-दिसिया काज भऽ गेल रहए। दू-दिसिया ई जे नहाएब-खाएब आकि हाँसू-पथियाक बात बुझए जाएब। बर-बेमारी जकाँ हलतलबी नै बूझि पड़ल। भतीजीकेँ कहलिऐ- “बुची, अखन नहा-खा लइ छी, बेरूपहर तोहूँ चलिहेँ, जा कऽ पुछबै जे किए हाँसू-पथिया छीनलहक।” रेखा मानि कऽ आँगन चैल गेल, मुदा मन गदमिशान करए लगल। गदमिशान ई करए लगल जे एना जे जहिना लोक रस्ताक मोड़पर आबि मोरा जाइए भरिसक तहिना जुगेसरो तँ ने भकमोड़मे फँसि, जाति-सम्प्रदाइक जालमे ओझरा एना केलक। मन ठमैक गेल। ठमैकते कबुल लेलक जे काजक जवाब काज छिऐ, तँए ओकरो काजेसँ जवाब देब नीक हएत। जहिना हाँसू पुरान तहिना पथियो हेतै, की एक मुठी घास के प्रतिष्ठाक प्रश्न बनाएब उचित हएत? तोहूमे जैठाम जाति-मजहबक भूत मगज छूबि नेने छै। 21 अगस्त 2014, शब्द संख्या- 411 करिछौंह मुँह बरखा मौसम अबैसँ पहिने हल्ला भऽ गेल जे ऐ बेरक समए रौदियाह हएत। माने भेल जे उचितसँ कम बरखा हएत। केते कम हएत से तँ समैए कहत। ओना पतराबला सबहक विचार अलग छैन। हुनका सबहक विचारे अस्सी बिसबा पानि हएत। जइसँ धनमण्डल हएत। मुदा रेडियो टी.बी.सँ तेते हल्ला भेल जे पतराबला सबहक विचार दबि गेलैन। दबबो केना ने करितैन, एक तँ एक-आध पतरा देखिनिहार गामे-गाम छैथ, तैपर मुँहक बोल मशीनक आगू केना बढ़त। पनरह दिनक बरखा गामे उजाड़ि कऽ देलक। बाधक-बाध डूमि गेल। तहूमे भादोक डूमल। अहुना कहबी छै जे भादव धोइ किछ-किछ होय। सेहो पानिसँ ऊपर हएत तखन ने। जँ पानिक तरमे रहत तँ गलबे करत किने। बाध दिस टहलैले पनरह दिनसँ नै गेल छेलौं। जेबो केना करितौं टहलैए बेर बरखा हुअ लगै छेलै। मुदा सोलहम दिन उगरास केलक। रौद भेल। रौद देख दछिनबरिया बाध दिस विदा भेलौं। अपना टोलसँ निकैलते दोसर टोलक मुहेँपर गेलौं आकि सुवधी काकीक घर टगल देखलिऐ। चोंगरा सभ लागल रहै। ओसाराक टाट खसल रहै। रस्तेपर सँ हिया कऽ देखैत रही आकि सुवधी काकीपर नजैर पड़ल। आगू दिस ओहो बढ़ली आ हमहूँ बढ़लौं। घरक कोनचर लग पहुँचिते सुबधी काकीक चेहरापर आँखि पड़ल। करिछौन मुँह देखि पुछलयैन- “काकी, कहिया घरक ओसारी खसल?” ‘ओसारी खसब’ सुनि सुबधी काकीकेँ बुकौर लैग गेलैन। बजली- “बौआ, अपन जान तँ बँचि गेल मुदा तीन मासक छागरक टाँग टूटि गेल। मनमे छेलए जे दसमीमे कहुना तँ दू हजारक चीज हएत। से बिलैट गेल।” हम पुछलयैन- “काकी, बिलैट केना गेल, देखै छी छागर जीविते अछि।” काकी बजली- “ओसारीक टाट तेना खसल जे छागरक टाँगे टूटि गेल। अवाह छागर थोड़े कियो चढ़बैले लेत।” ई गप सुनि अपनो बुझाएल जे ठीके कहै छैथ...। मुदा किछु तँ बैजतौं, कहलयैन- “अपन जान आ बकरीक जान बँचल तँ आगू केते छागर हएत, तइले दुख किए करै छी।” काकी बजली- “एकेटा दुख नै ने अछि, आमद चैल गेल, आ खरचा बढ़ि गेल। घर दुरूश ओहिना हएत। बिना बोइनक के घर मरम्मत करि देत।” 24 अगस्त 2014, शब्द संख्या- 318 कथा-लेखन-क्रम... 1. भैंटक लावा- (3105) 2. बिसाँढ़- (2499) 3. पीरारक फड़- (2024) 4. अनेरुआ बेटा- (3339) 5. दूटा पाइ- (3279) 6. बोनिहारिन मरनी- (3396) 7. हारि-जीत- (2343) 8. ठेलाबला- (2562) 9. जीविका- (3642) 10. रिक्साबला- (3945) 11. चुनवाली- (2445) 12. डीहक बटबारा- (4724) 13. भैयारी- (4041) 14. बहिन- (2692) 15. घरदेखिया- (4018) 16. पछताबा- (2665) 17. डाक्टर हेमन्त- (4398) 18. बाबी- (2163) 19. कामिनी- (2285) 20. स्रष्टाक समग्र रचना- (137) 21. प्रतिभा- (154) 22. मर्म- (142) 23. अधखरूआ- (255) 24. समैक बेरबादी- (213) 25. पहिने तप तखनि ढलिहेँ- (084) 26. खलीफा उमरक सिनेह- (165) 27. जखने जागी तखने परात- (103) 28. अस्तित्वक समाप्ति- (218) 29. खजाना- (388) 30. उग्रघारा- (328) 31 बेवहारिक- (218) 32. समर्पण- (149) 33 उत्थान-पतन- (138) 34. देवता- (232) 35. पाप आ पुण्य- (218) 36. परख- (129) 37. आलसी- (136) 38. प्रेम- (293) 39. हैरियट स्टो- (137) 40. बुझैक ढंग- (142) 41. श्रमिकक इज्जत- (093) 42. वंश- (074) 43. तियाग- (145) 44. सद्विचार- (184) 45. साहस- (103) 46. बरदास- (133) 47. भूल- (139) 48. धैर्य- (099) 49. मनुखक मूल्य- (099) 50. मदति नै चाही- (209) 51. मेहनतिक दरद- (281) 52. मैक्सिम गोर्की- (146) 53. मूलधन- (174) 54. कपटी मित- (281) 55. भीख- (118) 56. भगवान- (098) 57. एकाग्रचित- (261) 58. सीखैक जिज्ञासा- (101) 59. अनुभव- (092) 60. आसिरवादक विरोध- (088) 61. धर्मक असल रूप- (197) 62. सौन्दर्य- (138) 63. स्तब्ध- (257) 64. एकता- (236) 65. विधवा बिआह- (176) 66. देश सेवाक व्रत- (134) 67. आत्मबल- (1- (110) 68. स्वाभिमान- (121) 69. कलंक- (429) 70. बुलकी- (211) 71. भद्रपुरुष- (173) 72. झूठ नै बाजब- (103) 73. आर्दश माए- (097) 74. नारी सम्मान- (100) 75. अनुशासन- (190) 76. सादा जिनगी- (127) 77. विचारक उदय- (072) 78. पुष्ट इकाइसँ समर्थराष्ट बनैत- (102) 79. डर नै करी- (119) 80. आसिरवाद उलटि गेल- (223) 81. रत्न गमेवाक दुख- (226) 82. निसाँ- (194) 83. सामना- (124) 84. शिष्टाचार- (171) 85. ठक- (115) 86. पत्नीक अधिकार- (128) 87. शिनीची सिनेह- (211) 88. सिखबैक उपए- (171) 89. कर्तव्यपरायन सुगा- (171) 90. तस्वीर- (134) 91. मितक प्रयोजन- (359) 92. स्वार्थपूर्ण विचार- (121) 93. संगीक महत- (130) 94. उपहास- (196) 95. महादान- (176) 96. भाग्यवाद- (171) 97. सद्वृति- (150) 98. आश्रम नै सोबहाव बदली- (281) 99. पुरुषार्थ- (255) 100. नैष्ठिक सुधन्वा- (274) 101. सद्गृहस्त- (195) 102. सद्भाव- (134) 103. आलस्य वनाम पिशाच- (302) 104. स्वर्ग आ नर्क- (265) 105. यथार्थक बोध- (115) 106. विद्वताक मद- (165) 107. अनंत- (128) 108. हँसैत लहास- (184) 109. अनगढ़ चेतना- (162) 110. सत्य विद्या- (108) 111. समता- (165) 112. जेते चोट तेते सक्कत- (116) 113. परिष्कार- (198) 114. कथनी नै करनी- (176) 115. शालीनता- (157) 116. मजूरी- (140) 117. जीवन यात्रा- (145) 118. ज्योति- (081) 119. पवनक विवेक- (180) 120. आत्मबल-2- (105) 121. खुदीराम बोस- (172) 122. शिष्यकेँ शिक्षेटा नै परीक्षो- (187) 123. लौह पुरुष- (124) 124. जंग लगल- (150) 125. जीवकक परीछा- (117) 126. तप- (162) 127. उल्टा अर्थ- (203) 128. जाति नै पानि- (142) 129. ऊँच-नीच- (206) 130. पागलखाना- (223. 131. दोहरी मारि- (1357) 132. केना जीब?- (1031) 133. नवान- (2282) 134. तिलासंक्रान्तिक लाइ- (2034) 135. भाइक सिनेह- (1166) 136. प्रेमी- (2520) 137. बपौती सम्पति- (2352) 138. डंका- (2422) 139. संगी- (1858) 140. ठकहरबा- (2351) 141. अतहतह- (2477) 142. अर्द्धांगिनी- (3045) 143. ऑपरेशन- (1605) 144. धर्मनाथ- (1983) 145. सरोजनी- (1816) 146. सुभद्रा- (1910) 147. सोनमाकाका- (1537) 148. दोती बिआह- (1816) 149. पड़ाइन- (1988) 150. केतौ नै- (1211. 151. बिहरन- (3174) 152. मायराम- (2037) 153. गोहिक शिकार- (2113) 154. मातृभूमि- (1036) 155. भबडाह- (2053) 156. परिवारक प्रतिष्ठा- (1888) 157. फागु- (2096) 158. लफक साग- (1192) 159. तिलकोरक तरुआ- (1826) 160. एकोटा ने- (1071) 161. धोतीक मान- (472) 162. साझी- (989) 163. सतभैंया पोखरि- (2990) 164. न्याय चाही- (1308) 165. पनियाहा दूध- (2114) (166. कर्ज- (2860) 167. परदेशी बेटी- (2451) 168. मान- (631) 169. मनोरथ- (1151. 170. कियो ने- (3699) 171. सूदि भरना- (904) 172. जन्मतिथि- (2356) 173. इमानदार घूसखोर- (2204) 174. पटियाबला- (2356) 175. सनेस- (1248) 176. उलबा चाउर- (2588) 177. बलजोर- (2320) 178. बेटी) हम अपराधी छी- (3240) 179. बगबारि- (1847) 180. मुइलो बिसेबनि- (4244) 181. सड़ल दारीम- (2442) 182. चुप्पा पाल- (2517. 183. एक धाप जमीन- (2522) 184. ओझरी- (1963) 185. मुसहनि- (2277) 186. केलवाड़ी- (2628) 187. स्वरोजगार- (2338) 188. घूर- (2749) 189. कनियाँ-पुतरा- (2340) 190. वारंट- (1601) 191. गामक मुँह फेर देखब- (2897. 192. कचोट- (313) 193. काँच सूत- (390) 194. बुधनी दादी- (267) 195. खिलतोड़- (396) 196. मुँह-कान- (234 197. अनदिना- (312) 198. अपन काज- (366) 199. दूरी- (264) 200. पुरनी भौजी- (116) 201. छूटि गेल- (111) 202. काल्हि दिन- (151) 203. अप्पन हारि- (283) 204. कनफुसकी- (137) 205. मुँहक बात मुहेँमे- (135) 206. कनीटा बात- (098) 207. गति-गुद्दा- (250) 208. बिसवास- (316) 209. कचहरिया-भाय- (270) 210. गुहारि- (432) 211. शिवजीक डाक-बाक्- (089) 212. सोग- (341) 213. पनचैती- (197) 214. कनमन- (313) 215. अजाति- (085) 216. पटोर- (412) 217. फुसियाह- (308) 218. गति-मुक्ति- (241) 219. चौकीदारी- (437) 220. झगड़ाउ-झोटैला- (256) 221. घबाह ट्यूशन- (246) 222. दादी-माँ- (408) 223. पटोटन- (349) 224. मुसाइ पंडित- (567) 225. भरमे-सरम- (231) 226. देखल दिन- (434) 227. फज्झति- (403) 228. अकास दीप- (233) 229. बुधि-बधिया- (268) 230. पहाड़क बेथा- (216) 231. उमकी- (324) 232. बजन्ता-बुझन्ता- (147) 233. चर्मरोग- (578) 234. शंका- (325) 235. ओसार- (213) 236. छोटका काका- (394) 237. सीमा-सड़हद- (195) 238. रमैत जोगी बोहैत पानि- (253) 239. गंजन- (172) 240. सजए- (089) 241. घटक बाबा- (335) 242. आने जकाँ- (048) 243. दान-दछिना- (150) 244. उड़हड़ि- (503) 245. मत्हानि- (260) 246. मेकचो- (221) 247. झूटका विदाइ- (350) 248. मुँहक खतियान- (278) 249. कोसलिया- (234) 250. हूसि गेल- (204) 251. पोखला कटहर- (153) 252. सरही सौबजा- (267) 253. तेरहो करम- (322) 254. डुमैत जिनगी- (295) 255. चोर-सिपाही- (197) 256. दूधबला- (271) 257. टाइपिस्ट- (263) 258. समदाही- (300) 259. बुढ़िया दादी- (331) 260. पाइक मोल- (2412) - (22 दिसम्बर 2013 261. चोरूक्का झगड़ा- (538) 24 दिसम्बर 2013 262. अपसोच- (548) 26 दिसम्बर 2013 263. पतझाड़- (2587) 31 दिसम्बर 2013 264. झीसीक मजा- (453) 1 जनवरी 2014 265. मति-गति- (1807) 07 जनवरी 2014 266. अपन सन मुँह- (5696) 25 जनवरी 2014 267. रिजल्ट- (2343) 16 जनवरी 2014 268. सुमति- (3052) 30 जनवरी 2014 269. फेर पुछबनि- (346) 31 जनवरी 2014 270. माघक घूर- (1683) 06 फरवरी 2014 271. खर्च- (330) 07 फरवरी 2014 272. अखरा-दोखरा- (342) 10 फरवरी 2014 273. पेटगनाह- (593) 14 फरवरी 2014 274. बड़की माता- (1224) 18 फरवरी 2014 275. धरती-अकास- (184) 19 फरवरी 2014 276. बकठाँइ- (883) 24 फरवरी 2014 277. चैन-बेचैन- (936) 09 मार्च 2014 278. हथियाएल खुरपी- (650) 11 मार्च 2014 279. अलपुरिया बरी- (287) 12 मार्च 2014 280. नीक बोल- (570) 13 मार्च 2014 281. सुआद- (624) 14 मार्च 2014 282. गंगा नहेलौं- (686) 19 मार्च 2014 283. भोँटक गहमी- (508) 24 मार्च 2014 284. भँसैत नाह- (592) 26 मार्च 2014 285. पान पराग- (1704) 29 मार्च 2014 286. सिरमा- (760) 31 मार्च 2014 287. नौमीक हकार- (1116) 03 अप्रैल 2014 288. फोंक मकड़- (1)755) 10 अप्रैल 2014 289. केते लग केते दूर-(1255) 14 अप्रैल 2014 290. अभिनव अनुभव- (326) 16 अप्रैल 2014 291. खोंटकर्मा- (1184) 19 अप्रैल 2014 292. किछु ने- (501) 22 अप्रैल 2014 293. झकास- (1589) 26 अप्रैल 2014 294. अप्पन-बीरान- (2)894) 01 मई 2014 295. सजमनियाँ आम- (611) 04 मई 2014 296. अर्जुन रोग- (1003) 7 मई 2014 297. गरदनि कट्टा बेटा- (575) 10 मई 2014 298. नैहराक धाड़- (881) 14 मई 2014 299. अवाक- (1041) 17 मई 2014 300. पोखरिक सैरात- (923) 20 मई 2014 301. दनियाँ डाबा- (409) 22 मई 2014 302. धरम काँट- (399) 23 मई 2014 303. पलभरि- (1116) 24 मई 2014 304. किरदानी- (5296) 14 जुन 2014 305. सगहा- (2867) 22 जुन 2014 306. अकाल- (1238) 24 जुन 2014 307. उझट बात- (1152) 26 जुन 2014 308. कर्जखौक- (1175) 2 जुलाई 2014 309. उनटन- (1187) 6 जुलाई 2014 310. रेहना चाची- (1307) 9 जुलाई 2014 311. बुधनी दादी- (1256) 11 जुलाई 2014 312. अउतरित प्रश्न- (1229) 14 जुलाई 2014 313. हारि- (1240) 16 जुलाई 2014 313. सोनाक सुइत- (1135) 17 जुलाई 2014 314. मरूभूमि- (1214) 20 जुलाई 2014 315. असगरे- (1557) 24 जुलाई 2014 316. पुरनी नानी- (1304) 27 जुलाई 2014 317. कटा-कटी- (1140) 30 जुलाई 2014 318. केते लग केते दूर-(1206) 3 अगस्त 2014 319. गलती अपने भेल-(3386) 06 अगस्त 2014 320. चोरक चोरबती- (884) 6 अगस्त 2014 321. घर तोड़ि देलिऐ- (1527) 10 अगस्त 2014 322. सजल स्मृति- (2363) 14 अगस्त 2014 323. सनेस- (2654) 16 अगस्त 2014 324. सए कच्छे- (488) 19 अगस्त 2014 325. एक मुठी घास- (411) 21 अगस्त 2014 326. करिछौंह मुँह- (318) 24 अगस्त 2014 327. पुरस्कार- (2414) 24 अगस्त 2014 328. गावीस मोइस- (687) 29 अगस्त 2014 329. मनकमना- (6118) 19 सितम्बर 2014 330. घरवास- (4884) 26 सितम्बर 2014 331. समधीन- (6096) 04 अक्टुबर 2014 332. चापाकलक पाइप- (1616) 7 अक्टुबर 2014 333. कलम हानि कऽ-(2226) 10 अक्टुबर 2014 334. लतियाएल जिनगी-(1184) 14 अक्टुबर 2014 335. गामक शकल-सूरत-(2596)20अक्टुबर 2014 336. जितिया पावनि- (3706) 24 अक्टुबर 2014 337. सुखाएल सूरत- (3690) 30 अक्टुबर 2014 338. भैयारी हक- (3131) 4 नवम्बर 2014 339. ठकुआएल भुसवा- (3356) 13 नवम्बर 2014 340. खुदियाएल- (2894) 17 नवम्बर 2014 341. खटहा आम- (3528) 22 नवम्बर 2014 342. ढकरपेँच- (3740) 30 नवम्बर 2014 343. असहाज- (2853) 04 दिसम्बर 2014 344. समरथाइक भूत- (3832) 07 दिसम्बर 2014 345. विदाइ-(5103) 17 दिसम्बर 2014 346. खलओदार- (731) 19 दिसम्बर 2014 347. मनुखदेवा (1016) 22 दिसम्बर 2014 348. उमेद- (3643) 31 दिसम्बर 2014 349. गलगर भैंस- (3392) 4 जनवरी 2015 350. जाड़ फाटि गेल- (3328) 9 जनवरी 2015 351. सुरता- (3304) 15 जनवरी 2015 352. असुध मन- (2353) 19 जनवरी 2015 353. धरमूदासक अखड़ाहा- (1410) 21 जनवरी 2015 354. ठोररंगू- (1531) 23 जनवरी 2015 355. लगबे ने कएल- (1449) 25 जनवरी 2015 356. उकड़ू समय- (1467) 27 जनवरी 2015 357. चास-बास दुनू गेल- (1615) 29 जनवरी 2015 358. नहरकन्हा- (1209) 11 मार्च 2015 359. बटखौक- (1272) 14 मार्च 2015 360. पसेनाक धरम- (1263) 16 मार्च 2015 361. जेठुआ गरदा- (1103) 18 मार्च 2015 362. हँसीएमे उड़ि गेलौं- (1243) 20 मार्च 2015 363. बुड़िबकहा बुड़िबक बनौलक- (1234) 23 मार्च 2015 364. हमर बाइनिक विचार- (1207) 26 मार्च 2015 365. नोकरिहारा- (1146) 26 मार्च 2015 366. घसवाहि- (1213) 28 मार्च 2015 367. तेतर भाइक कविता- (1319) 1 अप्रैल 2015 368. छूआ- (1223) 6 अप्रैल 2015 369. दोसराइत- (1270) 9 अप्रैल 2015 370. लछनमान- (1173) 13 अप्रैल 2015 371. हमर कोन दोख- (1527) 17 अप्रैल 2015 372. मौसी- (1393) 21 अप्रैल 2015 373. नटकिया गति- (1313) 24 अप्रैल 2015 374. खाए चाहैए- (1223) 27 अप्रैल 2015 375. मधुमाछी- (1892) 07 मई 2015 376. दनगर घास- (2775) 13 मई 2015 377. सझिया खेती- (3135) 23 मई 2015 378. मुफतिया माल- (3231) 29 मई 2015 379. मथाहाथ- (2923) 02 जून 2015 380. पहपटि- (1369) 05 जून 2015 381. इजोरिया राति- (1512) 07 जून 2015 382. तीन जुगिया भाय- (2010) 12 जून 2015 383. अँगनेमे हेरा गेलौं- (605) 14 जून 2015 384. डकरा हाल- (2529) 17 जून 2015 385. जेतए जे हौउ- (2062) 21 जून 2015 386. गठूलाक गारि- (1532) 25 जून 2015 387. कनी हमरो सुनू- (1983) 29 जून 2015 388. गामक बान्ह- (2437) 03 जुलाई 2015 389. गुड़ा-खुद्दीक रोटी- (2443) 08 जुलाई 2015 390. सीरक गाछ- (3071) 13 जुलाई 2015 391. हरदीक हरदा- (2924) 19 जुलाई 2015 392. जाम- (3355) 29 जुलाई 2015 393. गण्डा- (2304) 5 अगस्त 2015 394. हाथी आ मूस- (3016) 11 अगस्त 2015 395. मुसरी आ घोड़ा- (3625) 17 अगस्त 2015 396. फलहार- (2350) 25 अगस्त 2015 397. भोरक झगड़ा- (2697) 31 अगस्त 2015 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ 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www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८४ म अंक १५ अगस्त २०१५ (वर्ष ८ मास ९२ अंक १८४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA