ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८५ म अंक ०१ सितम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९३ अंक १८५) ऐ अंकमे अछि:- गामक शकल-सूरत लघु कथा संग्रह जगदीश प्रसाद मण्डल कथाक सत्तैर- ठकुआएल भुसवा / 10 चापाकलक पाइप / 25 कलम हानि कऽ / 34 लतियाएल जिनगी / 47 गामक शकल-सूरत / 53 जितिया पावैन / 66 सुखाएल सूरत / 84 भैयारी हक / 102 ठकुआएल भुसवा छैठ-परमेशरीक घाटपर सुर्जक आगमन भऽ गेल। घाटपर छिड़ियाएल बाल-बोधसँ लऽ कऽ सियान-चेतन तकक मनमे पावैनक पाबन परसाद पेबाक आशा जगल। जगबो केना ने करैत, एक तँ सरदीक सुर्जक अर्घ्य दोसर कुश-उपारसँ लऽ कऽ जल-अर्पण मतर-पितर भोजन दानक संग नवमी-दशमी, कोजगरा-दियारी, भरदुतियाक पतियानीक सजल छैठ-परमेशरीक सतमीक सुर्जक दर्शन ने छी। एते दिन कुश अर्पणक प्रक्रिया छल मुदा आब कुशियारक ने चलत। पोखैरक चारू भीरक गाछ-बिरीछ, तलावक जलक जाइठक संग जलकर ऊपर चमचमाइत सुर्जक चमकी पसैर गेल। पसैर गेल घाटपर सजल छैठक डालीक ऊपर। एकसँ एकैस सूप, डगरा, डगरी, कोनियाँ, सुपती सजल घाटपर ठकुआएल भुसवा मने-मन छगुन्तामे पड़ल अछि। कनकनाइत मन पटपटेलै- “कहू, एहेन हेबा चाही?” अपने फुरने भुसवा बड़बड़ाइत, मुदा कियो डालमे सुनिनिहार नै। ओना रंग-रंगक वस्तुसँ सजल डाल। जहिना बरखा-जाड़क बीच संगमक चान-सुरूज शीतसँ शीताएल तहिना घाटपर पसरल सूप, डगरा आ कोनियाँ-सुपती सेहो। भिनसुरका अर्घ्यक सुर्ज जकाँ उगैत आदी, हरदी, अरूआ, खमहरूआ, सुथनी माटिक तरक आ माटिक ऊपरक पसरल खीरा, सजमैन, नारिकेल, केरा इत्यादि, तहिना धरतीसँ अकास धरिक सजल आगन्तु कुशियारक संग भुसवा-ठकुआ पँचमुखी दीपक आगू। मुदा छैठक सौंझका अर्घ्य जकाँ ठकुआक गहुमक संग तेलक सेरसोकेँ तँ जेबाक सेहो छइहे। तेतबे किए औंकरैत औंकरी सेहो ऊपरेसँ अपन बलिदान करैले तनफनाइते अछि। कुशियारो कौल्हमे पेराइले तैयारे अछि। जँ से नै रहत तँ मिसरी केना बनत। असगरे भुसवा बुदबुदाएल मुदा कियो ने कान देलक आ ने बेथा बुझलक। फेर ठोर पटपटबैत भुसवाक मुहसँ निकलल- “कहू! जे आगूक जनमल ठकुआ छी, तखन केहेन कड़ुआएल बात बजैए जे जहिना सभ दिन गुड़कैत रहलेँ तहिना गुड़कैत रहमेँ। हमरा जकाँ तोरा आसन-बासन हेतौ।” बुदबुदाइक वेगमे भुसवा बुदबुदा तँ गेल मुदा लगले मन घुमलै। घुमिते उठलै, मनोक तँ यएह ने चालि छै, जखन खुशी रहैए तखन नचबो करैए, गेबो करैए। नाचियो-नाचि आ गाबियो-गाबि दुनियोँकेँ देखबैए आ दुनियोँकेँ देखैए। मुदा वएह मन जखन कोनो बाएबे दुबराए लगै छै तखन अपनो दुबराइत रहैए आ दोसरोकेँ दुबरैबते छै। भरिसक तहिना ठकुआकेँ भऽ गेलै। आकि धन-बुबकी पकैड़ लेलकै। मुदा जहिना बिनु गाड़लो बाँसक खुट्टाकेँ जँ दुनू भाग डोर पकैड़ खींचल जाइ छै तखन असथिरसँ ठाढ़ भऽ जाइ छै...। असथिर होइत भुसवा अपन पुरखा दिस तकलक तँ बूझि पड़लै जे हुनकर सिरजनमे केतौ भेद-कुभेद नै भेल छैन। पृथ्वी जकाँ गोल-मोल बना गुड़काउ बनौने छैथ किए केकरो ऊपर अपन पसरल भार देब, तँए कि ओकरासँ कम भारी छी। नै दौड़ कऽ चलल हएत मुदा नहियोँ तँ नहियेँ चलल हएत। नै डेगे-डेग मुदा गुड़कुनियाँ कटैत नै चलल हएत से केकरो कहने थोड़े हेतै, एते तँ अपनो अपन परिचए ऐछे। जखन बिनु पएरे ठाढ़ होइते छी, गुड़कैत चैलते छी तखन किए केकरो आँखि गुरेड़ब आँखि दबि दाबि लेब। मनक उष्मा जगलै। आगू तकलक तँ केतौ किछु ने नजैर पड़लै। जखन कि फूल-पात, तीमन-तरकारीसँ लऽ कऽ फल-फलहरी धरिसँ सजल डाली अछि। होइतो अहिना छै जे हजारो-लाखोक भीड़मे जहिना प्रेमी अपन प्रेमिका छोड़ि किछु ने देखैए तहिना भुसवाकेँ ठकुआ छोड़ि किछु ने नजैरपर एलै। खसल आँखि जहिना उठि कऽ आगू देखए चाहैए तहिना भुसवोक नजैर उठल। उठिते हिया कऽ ठकुआ दिस तकलक। तकिते देखलक जे जहिना नजैर दाबि ठकुआ बाजल छल तहिना किछु अगों बाजए चाहैए। जखन अगों बजैले मन लुसफुसाइते छै तखन किए ने कनीकाल बिलैम देखिये लिऐ जे की बजैए। जेहेन मुँह तेहेन बोल, आकि जेहेन मुँह तेहेन थापर, दुनूक बीच तँ समगम ऐछे। जिज्ञासु नजैर भुसवा ठकुआ दिस नजरेलक। अपना ताले बेहाल ठकुआ, जे बाल-बोध रही आकि चेतन जखने डालीक उत्सर्ग हएत तखने पहिल हाथ हमरे दिस ने बढ़त। ई प्रतिष्ठा केकरा छै। कियो बाँटि लेत। तँए कियो हमर मुँहक बात छीन लेत। केहेन गबदी मारि भुसवा बजै छल, जेना बूझि पड़लै जे कियो सुनबे ने केलक। जेकर असार-पसार एते छै तेकर कान हाथी जकाँ नै तँ बिज्जी जकाँ हेतइ। जेना-जेना ठकुआक मनमे भुसवा गुड़कैत रहै तेना-तेना ठकुआक रीश बढ़ल जाइ। रीशसँ रीशिया ठकुआ बाजल- “केतबो बानर जकाँ नाङैर पटैक कऽ रहि गेलेँ कहाँ एको धूर जमीन-जत्था अपनो पएर रोपैले भेलौं, जहिना बाप-दादा गुड़कैत एलौ तहिना गुड़कैत रहमेँ।” ठकुआक बात सुनि भुसवा मने-मन कोशाएल, बाजल किछु ने। मनमे उठलै, क्रोधमे किछु बाजब आकि करब, दुनू अनुचित हएत। मुदा लगले फेर भेलै जे एकर माने ई नै ने जे ने किछु बाजी आ ने किछु करी। फेर भेलै जे अखन तामसमे छी अखन ने किछु बाजब आ ने करब। जखन मन असथिर हएत तखन ठकुआक विदाइक विचार करब। लगले मनमे उठलै, कहू जे केहेन हरामी अछि जे जेते गुरुत्व हमरा अछि तेकर अदहो हेतै कि नै हेतइ। मुदा हाथीक सिकड़ी डोलैबते अछि। आब कि कोनो ओ जुग-जमाना रहल जे पौआही भुसवा आ पौआही ठकुआ लोक बनौत। आब तँ ग्रामक हिसाबसँ लोक बनबैए। मुदा ई बुझबे ने करैए जे रोट रोटी कहि देने रोट रोटी भऽ जाइ छै, रोटक अपन सभ किछु छै ओहिना नै ने घड़ी पावैनक परसाद छी। तेतबे किए, सबा सेर चिक्कसक ओहन भोज्य भक्ष बनौल जाइए जे पावैनक पाबन छी। फेर मन बदललै। बदैलते उठलै, जहिना पृथ्वी गोल तहिना सूर्य-चान गोल, तही देखि कऽ ने विधाता हमरो गढ़ि गुड़का धरती दिस धकेल देलैन। अनेरे ठकुआक बातकेँ बतंगर बना मनकेँ ओझरौने छी। मुदा जहिना ठकुआ हमरा आँखि देखबैए तहिना तँ अनको देखौतै, एका-एकी आकि एकेबेर देखा तँ सभकेँ सकैए। मुदा से देखेबो केना करत, जेते जगह ठकुआ पकड़ने अछि तइसँ बेसी माइटो तरक छी तैयो अरूआ तँ पकड़नहि अछि। तहिना सजमैनो आकि नारिकेलो कम छेकने अछि। मुदा अपनो दादा तँ धरतीसँ अकास धरि पकड़नहि अछि, तँए अपन बेथा अपने घर किए ने राखब जे अनेरे चौगामा बान्हब। चाउरक संगी विधाता गुड़केँ मिला पठौलखिन तहिना ने ठकुओकेँ गहुमक चिक्कसक संग गुड़ो आ चिकनइकेँ सेहो मिला देलखिन। ऐमे ठकुआक अपन गलती नै विधाताक चाकक दोख भेल। तइले अनेरे किए मन मर्दन करब। मुदा चुपचाप सहियो लेब नीक हएत? सहबो तँ लोक ओइ पावैनमे करैए जइमे फल-फलहरी पबैए। तखन? तखन यएह नीक जे डालीक सभकेँ अनेरे किए बुझारतमे बरदेबै, अपन वंशक कुशियार भेला, किए ने ओहए ठकुओकेँ आ हमरो बुझा-सुझा कऽ मेल-मिलान करा देता। कोनो एक दिनक नै ने छी, जे झगड़ा कैर कऽ चाहे तँ गामे छोड़ि देब आकि गामे छोड़ा देबै। तइसँ तँ पावैनेक नोकसान हएत। साले-साल संग मिलि रहैक अछि, जखन केकरो कमाएल कियो ने खाइए तखन किए केकरो कियो आँखि बरदास करत। किए ने अपना आँखिये अपन रस्ता देखैत डेग उठौत। नीक सएह हएत, कुशियारो दादा की कम बुझनुक छैथ, हुनका कि नै बुझल छैन जे केना नेना-भुटकाक स्कूलमे, आ तिला संक्रान्तिमे चाउरक संग बँटेला। जखन पिसाएलो ने छेलौं, तहियेसँ संगी छैथ। आब तँ सहजे तेना मिलि गेल छैथ जे विलगाएबो कठिन अछि। फेर ललका चीनी बनैत, गुड़क सुआद कम करैत उजरा चीनी बनि, रंग-रंगक मिठाइ बनैत मिसरी गोला बनि देवालय पहुँच गेला, आब तँ सहजे जुग बदलल, जमाना बदलल, जइसँ वेचारा मिसरियो गोलासँ टूटि मोटका चीनी-दाना जकाँ सुपारी-टुक भऽ पान-फूल भऽ गेला। मुदा तँए कि छैठ-परमेशरीक घाटपर ओधिक सिर सहित फुनगीक गोभ धरि धाट नै धड़ै छैथ? धड़िते छैथ। अखनो गंगा-घाटमे साइयो बोझ कुशियार तँ छैठक घाट छेकते अछि। ई दीगर भेल जे गुड़ बनि जखन ठकुआक संग रहए लगला तखन फेँट-फाँट शुरू भऽ गेल। कियो गुड़ घाउ दुआरे गुड़ छोड़लैन तँ कियो डोमीन कहि-कहि छोड़ि उजरा चीनीसँ चिनराबए लगला। मुदा तँए कि मिसरीक उसरन भऽ गेल? भलें कतरा सुपारी जकाँ किए ने बनि गेल होथु। छैठ पावैनक प्रेमी मनमोहन कौलेजक छुट्टी पेब गाम आएल। ओना गाम ई अजमा कऽ आएल जे नीक जकाँ छैठक सौंझका-भोरूका अर्घ्य दानक दर्शन करब। धड़फड़ीमे एक दिन पहिने आबि खरना दिनक रबाइस-फटाकाक अवाज सुनि मन बहैम गेलै। मुदा दिल्लीक लड्डू जकाँ ने छोड़ने बनत आ ने खेने बनत। जेते पोखैर-झाँखैर चिक्कन करै छी तइसँ बेसी हवामे भोक्कन सेहो करिते छी। छैठक अर्घ्य उठैसँ घण्टा भरि पहिने मनमोहन घाटपर उपस्थिति दर्ज करबैले तैयार भऽ दरबज्जापर बैसल। रबाइस-फटाकाक अवाजसँ मन दलमलित भऽ गेलै, आँखि बन्न कऽ साहोर-साहोर करए लगल। लोको तँ लोके छी एकटा बीत भरिक ठण्का डरे तँ गाम-गाम लोक साहोर-साहोर करैए आ जैठाम ठण्केक बाढ़ि आबि रहल छै तैठाम जँ ओछाइन धएल बुढ़-बुढ़ानुस पावैन बिगाड़िये देता तँ तइमे हुनकर कोन दोख। मुदा तैयो गारि-फज्झैत तँ सुनबे करता जे ढंश कऽ देलक। ओही अवाजमे मनमोहन अकानए लगल जे अखन तक कोनो घाटक ढोलक ई कहाँ कहै छै जे ‘ठकर-ठकर ठकुआ द दे।’ ओ तँ अर्घ्य दानसँ पहर भरि पहिने अवाज दिअ लगै छल। ओह! भरिसक अखन देरी अछि। मने-मन विचारिते रहए कि अंग्रेजी बाजाक अवाज एकटा घाट दिससँ उठल। ओना जेबीए-जेबी मोबाइलोक उठिते छल। ढोलियाक केतौ दरस नै पाबि मन आगू बढ़लै, बढ़िते उठलै छैठ-सतमीक सुर्जक अर्घ्य। आइ डुमैत सुर्जक अर्घ्य दान हएत आ काल्हि उगैत सुर्जक। मुदा की सतमीए सुर्जक अर्घ्य छैठक साँझमे पड़ल आकि एक दिन पहिलुका? छैठ-सतमीक बीचक बोनमे मनमोहनक मन उमड़ए-घुमड़ए लगल। उमड़ैत-घुमड़ैत एकटा गाछ तर पहुँचिते देखलक जे अदौसँ मिथिलाक चलैन रहल जे दरबज्जापर आएल पाहुनकेँ अबितो आ जाइतो मधुर मुस्कानसँ काजक महिमाक संग नमस्कार-पाती होइत आबि रहल अछि। जनमो सोहर मरनो सोहर। मुदा पहिने एबाकाल अबैक सोहर होइ छै पछाति जेबाकालक। तैसंग ईहो तँ ऐछे जे छैठैक सतमी होइ छै। भूते-वीर्तमान आ वर्तमाने भविस। विचारमे डुमल मनमोहनक भक्क तखन खुजल जखन घाटसँ घुमल डाली आँगन पहुँच गेल। सेहो कि ओहिना खुजलै? नै! जखन अँगनाक धिया-पुता ठकुआ-केरा-ले काँइ-किच्चैर करए लगल। भक्क टुटिते हरेलहा लोक जकाँ मनमोहन उठि कऽ लगले आँगन दिस जाए तँ लगले दरबज्जापर आबए, बाजए किछु ने। अपन हारल के बजैए जे मनमोहन बाजत। मुदा मनमे कचोट तँ उठिते रहै जे केतए एलौं तँ केतौ ने। मुइला पछाति जहिना लोक बुझैए। से जहिएसँ ज्ञान-परान भेल तहिएसँ मनमे छल जे छैठ-परमेशरीक घाटक अर्घ्यक दर्शन करब। फेर मनमे भेलै जे दुनू साँझक अर्घ्यक अपन-अपन महत आ महिमा छै। कूर चढ़ल चौमुखी, पँचमुखी दीपक रोशनीक रोसनाइ जेहेन छैठक घाटक हएत तेहेन सतमी-घाटक थोड़े हएत। कियो भरि दिन हेराएल साँझमे पहुँच गृह विश्राम करैए तँ कियो भरि राति हेरा भोरमे पहुँच गृह विश्राम करैए। भेल तँ एके स्वर, एकटा भेल भरि राति आ एकटा भेल भरि दिन। तैसंग पहुँचबो एके भेल, मुदा भेल संधिस्थलपर। हारि-जीतक बीच संधियो तँ दोहरी ऐछे, एकटा अछि भिनसुरका आ दोसर अछि सौंझका। ओना भलें किछु काज भिनसुरकामे वरजित अछि तँ किछु सौंझकोमे तँ ऐछे। तँए एकनाम संधिभूमि रहितो दुनू एक्के रंग घटकेँ घटवार बना घाट थोड़े पार करत। एकटा असीम इजोत तँ दोसर असीम अन्हार...। अन्हार-इजोतक बीच अबिते मनमोहनक मन हटैक गेल। ने आगू डेग उठै आने पाछू। एक दिस अकास ठेकल पहाड़ तँ दोसर दिस पताल टुटल समुद्रमे वौअए लगल। मुदा मनुखो तँ मनुखे छी जेहने ओकरा-ले पहाड़ तेहने पहाड़ो आ पहाड़क किनछैक बोनो। तहिना समतल भूइमो आ डोहो-डावरक संग पोखैरो-झील, सरोवर, नाला, नाली, मुइल-जीत धार-धुरक संग पताल टुटल समुद्रो! मनमोहनक मन ठमैक गेल। ठमैकते मन ठनकलै। ठनकलै ई जे औझुका नीक-बेजए केलहा काजो तँ भुताइए जाएत, मुदा जाइके तँ अछि काल्हि दिस। फेर मन भोथियेलै। भोथियेलै ई जे हमहींटा एहेन भोथियेनिहार छी कि आरो लोक अछि? ओना केकरो अपन दिन-रातिक काज-भार थोपल छै मुदा भोथियेलहोक बोन तँ छोट-छीन नहियेँ अछि। भोथियाएबो कि एक्के रंगक अछि। एक रंगक रहैत तँ मौसमक अनुकूल ओ उपैटो सकै छल माने ई जे अपना ऐठामक मालदह आम साइवेरियामे थोड़े हएत, मुदा एकर माने ई नै ने जे साइवेरियाबलाकेँ आम सन फल नै भेटैत होइ। मनमोहनक मन फेर भटकल। भटकलेपर ने कियो हेराइतो आ भोथियाइतो अछि। फेर भेलै जे अनेरे दुनियाँ दिस तकै छी। अपन घर इजोते ने, आनक इजोत करब। ई बात जरूर जे बोनमे हमरा सन बहुत भोथियाएल हेराएल अछि, जखने डेग उठाएब आकि भोथियेलहा भेटए लगत। अनेरे तँ दुनू गोरे संगी हएब। जखने संगी हएब तखने दू-दूटा हाथ-पएर, आँखि, कान, नाक भेटत। मुँह ने एकेटा भेटत, तइले की हेतै, बेरा-बेरी दुनू गोरे बाजब। बेरा-बेरीक माने ई थोड़े हएत जे ओ किछु बाजत आ अपने किछु बाजब। कोनो चीजकेँ ओकरो आँखि देखतै, कान सुनतै आ अपनो तँ देखबे-सुनबे करब। ओकरे जड़ि पकैड़ दुनू गोरे गप-सप्प करब। जखने दुनू गोरे अपन-अपन विचार व्यक्त करब तखने ने दुनू गोरेमे मेदहा भऽ जाएत। मनमोहनक मन फेर ठमकलै। ठमकलै ई जे एक गोरे ओहेन होइए जे काजक भीरे ने जाइए, मुदा अपना तँ से नै भेल। कौलेजमे अही निविते छुट्टी भेल, हमरेटा-ले नइ, सभले भेल। मुदा भेटलै तँ ओकरेटा जे छैठ-परमेशरीक सौंझका अर्घ्यक दर्शन केलक। मुदा हम तँ निआरिते रहि गेलौं, देख नै पेलौं। आखिर एना भेल किए? उपासककेँ अपन उपासक संग संकल्पो करए पड़ै छै। संकल्पे व्रती बनबै छै, जइसँ व्रत उपास करैए। हम तँ ओहन हेरेनिहार भऽ गेलौं जे जखन हाथमे घड़ी, मोबाइलमे घड़ी, रेडियोमे घड़ी, टाबरक ऊपर घड़ी छल मुदा तखनो समए ससैर गेल आ बूझि नै पेलौं! किछु हएत तँ दीयाक ज्योति जे सौंझका घाटकेँ ज्योतिर्मय करत ओ भिनसुरका थोड़े करत! करबो केना करत? कोनो वस्तुक आनन्द ओकरा बेसी भेटै छै जेकरा अभाव छै। मुदा हूसल-बीतल कालपर बेसी अपसोचो करब आकि कानबो-खिजबो करब सेहो तँ बेसी नीक नहियेँ हएत, मुदा घड़ी-पहर देखि कऽ घाटपर पहुँचब अछि, जँ आनक आशा-बाट देखए लगब तँ अपनो आशक-बाट भटैक जाएत। हारि-थाकि मनमोहन अन्तिम विचार कऽ लेलक जे नियत समैपर घाटपर पहुँचब अछि, ओना जे पहिने गेनिहार रहत ओ तँ रहबे करत, पछुएलहा ने पाछू जाएत मुदा अपने उजगुजेलहा जकाँ पहिने नै पहुँचल रहब तँ तइसँ की हेतै, समैपर पहुँचला जकाँ सभ कथुक दर्शन तँ हेबे करत। सुतैबेर रातिमे जखन मनमोहन सिरमापर मुड़ी रखलक आकि भुक दऽ भोरका काज मनमे उचड़लै। उचैड़ते ठेकनबए लगल जे तीन बजे भोरमे घाटपर पहुँचब अछि। जाबे पहुँचब नै ताबे कौलेजसँ एलहाक फल की भेटत। मुदा तीन बजेमे नीन टुटत? ओ तँ असली सुतै बेर छी! ओहीकालमे ने वसन्ती राग चलै छै, विराग चलै छै, अनुराग चलै छै, चिराग चलै छै, नै जानि आरो की सभ चलै छै। फेर मन ठमकलै। ठमकलै ई जे अनेरे अखन मन-मर्दन करब तँ मने उजगुजा जाएत जइसँ नीने ने औत, जँ कनी-मनी भको लगत तँ चहाएल मन चहा-चहा उठत। जखने से भेल तखने आाँखि कड़ुआ जाएत, भोरमे जे घाटपर पहुँचबो करब तँ यएह ने हएत जे कड़ुआएल नजैर नजरा करिया सियाही पकड़ा देत। ओह! तइसँ नीक जे मन मारि अखन आँखि मूनि ली। अन्नक निशाँ चढ़बे करत, नीन एबे करत। मुदा अधनीनाकेँ कहि देबै जे भाय, तीन बजे घाटपर जाइक अछि, कनी-काल अङ्गोछो-मङ्गोछोमे लगत, तँए अढ़ाइ बजे तूँ हटि जाइहऽ। जान छोड़ि दीहऽ। कौलेजसँ छुट्टी अही दुआरे भेल अछि। ओना मनमोहन घड़ियोमे आ मोबाइलोमे एलार्म भरि देलक, मुदा अढ़ाइ बजेमे जखन घड़ियो आ मोबाइलोमे घड़ी-मिनट बाँकीए रहै आकि नीनियाँ देवी अपने ससैर गेलखिन। ससैरते घड़ियो बाजल आ मोबाइलो बाजल। एक तँ मनक घड़ी-घण्ट दोसर घड़ीक घोल आ तेसर मोबाइलिक घोल। मनसँ मशीन तक अनघोल कऽ उठल। समए पेब मनमोहन फुड़-फुड़ा कऽ उठल। काजक रूटिंग दिस तकलक तँ बूझि पड़लै जे नीन हटला पछाति पहिने लेटरीन जाइ छी, हाथमे ब्रश नेने जीह-दाँत मजैत चारि डेग टहैल अबै छी, तखन कुर्ड़ा-आचमन कऽ लोटा भरि पानि पीबै छी, चाह पीबै छी, पान खाइ छी, तखन ने कोनो काज दिस तकै छी। मुदा आइ तँ काज दिस ताकब नै, दर्शन करब अछि। तँए रूटिंग बदलब जरूरी अछि, दरसनियाँ घाटपर बिना मुँह धोने केना जाएब। लेटरीन समैमे चारि घण्टा देरियो ऐछे। सहए केलक। चारि मज्जन कऽ मुँह-हाथ धोइ कऽ असगरे घाट दिस मनमोहन विदा भेल। दरबज्जासँ उतैरते कानमे ढोलक अवाज एलै। ढोल छी आकि ढोलक? जँ ढोल हएत तँ छैठक घाटक हएत नै जँ ढोलकक हएत तँ केतौ नाच-तमाशाक हएत। ओना छैठोक घाटपर नाच-तमाशा होइते अछि। जे दरसनियाँ छल से देखनियाँ भऽ गेल। मुदा जेतए जे भेल से हौउ, अनेरे मनकेँ मरूअबै छी। कानक पाछू हाथ रैख मनमोहन देव स्थानक अवाज अकानलक तँ बूझि पड़लै जे ढोलेक अवाज छी। एक लय एक सूर, अष्टयामक राम-धुन जकाँ अछि। ‘ठकर-ठकर ठकुआ दे।’ ठकुआ मगैए पुड़ी नै। तहूमे पुड़ी तँ आरो गजपट भऽ गेल अछि, केतौ चीनियाँ पुड़ी, तँ केतौ गुड़िया पुड़ी, तँ केतौ दलिया संग नोनपुरिया बनि गेल अछि, मुदा ठकुआ अखनो अनोना रवि जकाँ नोनसँ परहेज केने अछि। ओ ठकुआ। वएह-वएह पौआही, जे झँप्पासँ नापल रहैए। मनमोहनक मन मानि गेलै जे घाटक ढोल बाजि रहल अछि। तखने बड़का रबासिक अवाज उठलै। एक-घाट, दू-घाट, पोखैरक चौबगली घाट परहक दूषित घुआँ गाम भरिमे अपन महक पसारि रहल छल। छैठक डाली पसरल परसादक सुगंध नै, बारूदक गंध। मनमोहनक मनमे रमल नै। रमबो केना करैत, जखन एक रसक रसिक रसिया रास करत तँ ओ वृन्दावन छोड़ि जाएत केतए? जेतए वृन्दावनेश्वरी छोड़ि दोसरक बास नै होइ। घाटपर पहुँचिते मनमोहन महारसँ ससैर पानिक किनछैरमे डाला-डाली सजल देखि सहैट गेल। चौमुखी-पँचमुखी दीया-कूरपर अनहरिया पखक तिरोदसीक चान सन मलिन होइत दीयाकेँ देखि अपनो मलिन हुअ लगल। सुपती-कोनियाँ बदैल, पित्तैरबला कोनियाँ घाट पकैड़ रहल अछि, भलें अगहनक धानसँ भेँट हुअए कि नै मुदा सूप-कोनियाँ तँ नीक भाइए गेल अछि, जइसँ जिनगी भरि चलैक आशा तँ ऐछे। हाथियो जेना हहैर गेल। ओ तँ राजा-रजबारकेँ हहरने भरिसक हहरल। मुदा केराक घौर आ कुशियारक मन, मुस्की मारिये रहल अछि। केना ने मुस्की मारत, जहियासँ छैठ आएल तहियाक संगी दुनू अपन साम्राज्य सेहो भकराड़ बनौनहि अछि, तँए दुनूक मन खुशी। जे केरा एक-एक छीमी कऽ कुरबा-कोशियामे परसाएल रहै छल से अपन साम्राज्य बढ़ा छीमीक संग सौंसे घौरे पकैड़ लेलक। तहिना कुशियारो अपन गृहवासू जकाँ टोनीक संग अपनो अकास पकड़ने ठाढ़ अछि। तैसंग गुड़ बनि भुसवा-ठकुआ पकैड़ चीनीक खाजा, लड्डू धरि पकड़नहि अछि तँए खुशी ऐछे। भुसवापर नजैर पड़िते देखलक जे रूष्ट भेल भुसवा चुपचाप एकवाहि भेल गुड़कि कऽ कतवाहि धेने अछि। मुदा मन तम-तमाइते छै। ओना कुशियारकेँ पञ्च मानि ठकुआपर पनचैती बैसेबे करत। एक टकसँ मनमोहन भुसवाकेँ देखि औंकरी सभ दिस नजैर बढ़ौलक तँ बूझि पड़लै जे अपने मोने सभ मगन अछि, कियो केकरोसँ लागि-भागि नै रखने अछि, सभ शरणागैक अवस्थामे पवनियाँ-मनकमना पुरबै पाछू लगल अछि, केकरा एते छुट्टी छै जे गामे-गाम पनचैती केने घुरत। एक दिस बेटीकेँ बापक सम्पैतमे हिस्सेदारी छै, तँ दोसर दिस सासुरक दहेज बाधित छै! केना ओझरी छूटत। कियो पिता अपना बेटीकेँ जेते अधिक पढ़बै पाछू समए आ पाइ खरच करै छैथ तेते ओ नै बुझै छथिन जे दहेजो ओते बेसी दिअ पड़त। जइ जमाएकेँ पढ़ल-लिखल कन्या भेटल, तैसंग ओकातिक हिसाबसँ दान-दहेज भेटल, शुरूसँ अन्तिम समए-बिआह धरि जेकर सेवा पाछू माता-पिता अपन शक्ति लगौलैन तइ बेटी-जमाएसँ माता-पिताकेँ की भेटलैन? लगले मनमोहनक मन हटकल। हटैकते भुसवापर नजैर गड़ौलक। वेचारा किए रूष्ट अछि? सूपमे राखल सीम जकाँ नै, गोलका भाँटिन जकाँ भुसवा गुड़ैक कऽ सूप-कोनियाँमे कोणसँ कनखियाइत डालीमे रखल कुशियारक टोनीकेँ पकड़लक। पकैड़ते बाजल- “भाय, तोरे खनदानक हमहूँ छी आ ठकुओ अछि...।” बिच्चेमे कुशियारक टोनी समर्थन दैत बाजल- “एकरा के काटत, सभकेँ बूझल छै।” कुशियारक सह पाबि भुसवाक मनमे जगल, नीक संगी भेटल। अपन नचारी सुनबैत भुसवा कुशियारक टोनीकेँ कहलक- “भाय, अपनैती बात छी, बदना हाल बदनियाँ जानए आ बदनियाँ हाल बदना जानए।” फेर सह दैत कुशियार बाजल- “तेहेन समए-साल भऽ गेल अछि जे अपनामे मीलि कऽ नै रहब तँ दोसर भगाइए देत।” कुशियारक तोष-तुष्टि देखि भुसवाक सम्बन्ध आरो बढ़ल। प्रेमी प्रेमिकाक पहिने जहिना मनक टोबनियाँ करैत, तहिना आसे-आसे मन घुसकबैत भुसवा बाजल- “भाय की कहबह, अपन मारि खाएल केकरा कहबै, आ जँ नै कहबै तँ मनक रोग छी, मनरोग भेल। जँ कहीं मृत्यु भेल तँ नरक छोड़ि सरग जा हएत?” भुसवाक बातक भाँज कुशियार बुझबे ने केलक। बिनु बूझल-गमल बातक उत्तर देब अनुचित छी। मुदा ईहो जँ खोलि कऽ बाजब जे भाय, तोहर बात नीक नहाँति नै बुझलिअ, कनी नीक जकाँ बुझा दैह। मुदा एते सुनै आ बुझैक पलखैत अछि, कनीकालमे घाट उसरत। सबहक अपन-अपन दुनियाँ छै, अपन-अपन संगी छै। पान-सात बर्खक धिया-पुता भुसवा-ठकुआ पकड़त आकि नमहर देखि कुशियारक टोनी पकड़त। मुदा बेरादरीक बात छी, केना मुँह फोड़ि कहबै जे तूँ कष्टमे पड़ल रहऽ। बाजल- “भुसवा भाय, अहाँ कनै किए छी, बड़का भैया ठाढ़े छैथ, हुनका अखन कियो छुतैन, जखन डालीक सभ सधि जाएत तखन हुनकर भाँज औतैन। तँए हुनका बेसी पलखैतो छैन, चलू हुनकासँ भेँट करा हमहूँ अहाँ दिससँ समर्थन कऽ देब। ओ निवटा देता।” भुसवाक मन दस-आना-छह-आना हुअ लगलै। तेहेन समाजमे पड़ि गेल छी जे के केकर सुनत। सभ अपने बेथे बेथाएल अछि। मुदा तँए कि हमर हक-हिस्सा नै अछि। छैठमे ठकुआ भलें आँखि देखबए मुदा दुरगमनियाँ कनियाँक संग महिना-दू-महिना हमरा छोड़ि कऽ कियो थोड़े जीवि सकैए। फेर मनमे भेलै जे अपनापर नै नितराइ। ई कि कोनो झूठ छिऐ जे आब दुरागमने ने अछि तँ तेकर साँठ-उसार कथी हएत। मनमे उठिते भुसवा ठकुआ गेल। ठकुआइते नजैर ठकुआपर पड़लै। मनमे खुशी भेलै, जे जेहने गति हमर भेल जाइए तेहने तँ ओकरो भेल जाइ छै, तखन रूआबे केते दिन चलतै। मुदा लगले मनमे उठलै, जहिना हम तहिना ठकुआ लोकक हाथक बनौल छी। विचार बदलतै, हाथ बदलतै, हाथक बौस बदलतै। मुदा हमरे सन गुणगर वेचारा शरीफा किए घाट छोड़ि देलक? छैठक घाटक डालीक तँ फल छी शरीफा? भुसवाक मन शरीफाक दुर्दिनपर गेल। जँ छैठक घाटक फलक अधिकार केकरो छै तँ शरीफोकेँ छै। जेठक तपल कलशक फूलक फल छी शरीफा। बच्चामे जे रौद तपल बरसातक झाँट-पानि सहल, शरद पबिते सरदिया अपन जुआनी निखारि रंग-रूप सुआद सभ किछुसँ भरि लेलक। ओ केतए चल गेल? की शरीफा सन फल धरोहर नै छी? छैठ-परमेशरीक कथा भेल। औंकरी छीटान भेल। बिसर्जनक छिट्टा सजल। सभ घरमुहाँ भेल। 13 नवम्बर 2014, शब्द संख्या- 3335 चापाकलक पाइप नअ बर्खपर ऐबेर गाम आएल छेलौं। रस्तेमे रही तखने मनमे भेल जे एगारहो दिनक छुट्टी सुति कऽ नै बिताएब, काजमे बिताएब। काज अबिते नाहक गुनी जकाँ मन गुनगुनाएल। मंत्र तँ भीतरे रहल मुदा ठोर पटपटाएल। पटपटाएल ई जे काजो तँ काज छी अधलो काज होइ आ नीको काज होइए। हल्लुको काज होइए आ भारियो होइए तैसंग हल्लुक-भारी सेहो होइए। तखन नीक आ अधलाकेँ बेराएब कठिन अछि। नीक-अधला, ओह! अनेरे ऐ भाँजमे पड़ि काजुल नै अकाजुल बनि जाएब। लिअ भाय, सबहक दुनियाँ छी, अपन जेकरा जेते हिस्सा हएत से लिअ। जानए जअ आ जानए जत्ता। अनेरे दोख केकरो आ बिसा केकरो जाइ छै। केकर दोख केकरा बिसा जाइ छै तेकर कोनो ठेकान छै। जँ से ठेकान रहिते तँ जइ साल बरखामे देरी भेल आकि नै भेल तेकर दोखी मानसून भेल आकि डबराक बेंग, जेकरा सिनूर-काजर लगा, जहिना अधला वृत्ति केला पछाति समाजमे होइत तहिना गहिंरगर उक्खैरमे दऽ सातो बहिन सातो दिससँ समाठ पकैड़ गीत गाबि-गाबि कुटनी कुटैए! अनेरे कोन मगजमारीमे बौआइ छी, जहिना सबहक दुनियाँ छी तहिना हमरो छी। अपन दुख-दुनियाँक काजमे अपनाकेँ लगबैक अछि। मन बदलल, मनक रंग बदलल, मुदा जेते बदलल तेते ओझरियो लैग गेल। ओझरी लगल जे एक-दोसर रंग मिलौलासँ तेसर रंग बनैए आ तेसर तरहक रंगो तँ होइते छै। मुदा से नै भेल, अपने एगारहो दिनक विचार करए लगलौं। विचारो तँ दु-मुहाँ होइते अछि। चाहे तँ छीप दिससँ विचार करू आकि जड़ि दिससँ। छीप दिससँ विचार करब शुरू केलौं। डायरी निकालि तारीख पकड़लौं। घरपर पहुँच पहिने आराम करब, जखन टहलै-बुलै जोकर भऽ जाएब तखन सभसँ पहिने सबुरिया बाबाक भेँट करबैन। बाबापर नजैर पड़िते डण्डी-तराजू जकाँ मनमे उगि गेल। उगि ई गेल जे जहिना पिताक बेटा बनि हम सेवा केलिऐन तहिना सबुरिया बाबा सेहो बेटाक सुख पौलैन? खैर जे पौलैन, हमर बाबू मुरूख रहैथ मुदा ओ तँ सहजे हाइ स्कूलक हेड मास्टर भऽ रिटायर भेल छैथ। मुदा जे छैथ, दियादीमे सभसँ उमेरगर छैथ, आरो समांग तँ खेत-पथारक काजो करै छथिन मुदा अपने सबुरिया बाबा पठने-पाठनमे जिनगी गुदस केलैन। सबुरिया बाबाक मनमे रहैन जे सेवा-निवृत्ति धरि अबैत-अबैत परिवारक भार बेटापर चैल गेल रहत जइसँ सभ दिन जहिना पठन-पाठनमे लगल एलौं तहिना जीवन विश्रास करब। मुदा से नोकरीक चारिमपन अबैत-अबैत बेटा-पुतोहु, बेटी-जमाएकेँ सात समुद्र पार देखए लगलथि! खैर जे देखलथि, पितातुल्य गुरु, साठि बर्खक जिनगीक अनुभव, दियादीसँ लऽ कऽ समाज धरि लोक हुनके सात्विक शिक्षक बुझैत आबि रहल छैन। घरपर पहुँचला पछाति परिवारमे पसिते भाइक मन तुरुछल बूझि पड़ल, मुदा बकलेलो-ढहलेल भाए तँ भाइए छी, ओना पानि-ओछाइन, चाह-ताहक ओरियानमे दुनू परानियोँ आ जेठकी बेटियो भीर गेल। मने-मन विचारलौं- जेते दिन रहब तेते दिनक खर्चक रूपैआ निकालि ओकरा (छोट भाए) हाथमे थम्हा देबे नीक रहत। रूपैआ देखा बजलौं- “बौआ, जे खर्चा हएत से हएत जे रहि जाएत ओ जाइकाल देने जेबह।” मुदा रूपैआक असैर भेल। लगले बाल्टीन-लोटा आनि आगूमे रैख दुखन बाजल- “पहिने नहा लिअ, नहेलासँ चालिक ठेही कमै छै। पछाति हब-गब हेबे करतै। पहिने किछु खा कऽ भरि पोख सुतू। पछाति बूझल जेतै।” ओना डायरीमे एगारहो दिनक रूटिंग नै बनेने छेलौं, तेकर कारण भेल जे पहिल दिनक भेँट सबुरिया बाबाक नाओं लिखिते रही आकि मनमे उठि गेल जे आन बेर जकाँ थोड़े अन्ना-गाहींस रहब, जइसँ किछु जरूरियो काज छूटि जाइ छेलए आ आलतू-फालतू काजमे ओझरा समए सेहो गमा लइ छेलौं। तँए नीक हएत जे पहिल काज लिखिये नेने छी, तैठामसँ काजकेँ शुरू करब आ एकक बाद दोसरक विचार करैत आगू बढ़ब। जौं से नै करब तँ काजक प्रवाह भंग भऽ जाएत। बाल्टी-लोटा नेने भाए कलपर पहुँच पानि भरए लगल। बैगसँ साबुन, तौलिया, लूंगी निकालि कन्हापर लेलौं आ कल दिस विदा भेलौं। कलपर रैख बाल्टीन लग पहुँचिते दुखन बाल्टी भरि, पुछलक- “कपड़ा महक साबुन नै अछि।” कहलिऐ- “हँ अछि।” चोटे घूमि बैगसँ साबुन निकालि कलपर आबि बजलौं- “काल्हि निचेनसँ सभ कपड़ा साफ करब।” आगूक बात पछुआएले रहल आकि ओ बिच्चेमे बाजल- “अहाँ नहा कऽ चैल जाउ। फेड़लाहा कपड़ाकेँ साबुन लगा खीच दइ छी।” भाइक बात सुनि मन मौन भऽ गेल। छोट भाए छी, ओकरा अधिकार छै जे खीचए, मुदा अपनो सोझ तँ प्रश्न ऐछे जे जखन कोनो रोग-पीड़ासँ ग्रसित नै छी तखन अपन दैहीक काज किए दोसरकेँ दिऐ। मुदा, ओकरा ई बात बुझए कहाँ अबै छै जे सभकेँ अपना भरि श्रम करक चाहीए। ओ तँ सोलहन्नी लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नकेँ रामक छोट भाए बूझि सेवाक अनुकरण केने अछि। कहनौं ओ मानत थोड़े! चुपेचाप नहा कऽ कपड़ा बदैल ओछाइनपर जाइते आँखिमे झूकनी चैल आएल। बूझि पड़ल जे खाइसँ पहिने सुतिये रही। मुदा भावो रोटी-तरकारी नेने बैसकीएपर थारी आनि आगूमे रैख देलैन। जहिना नीन तबाही मचौने रहए तहिना भूखो तँ रहबे करए, गरम-गरम भोजन भरि मन खेलौं। खाइते ओङ्हीसँ जेना बूझि पड़ल जे हाथ धोइले जँ बहराएब तँ रस्तेमे खसि पड़ब, बाल्टीनेमे हाथ धोइ ओंघरा गेलौं। जे नीन अढ़ाइ-तीन, साढ़े-तीन, चारि घण्टा बीतैत-बीतैत चहा कऽ टूटि जाइ छेलए से एके बेर नअ घण्टापर टुटल। उठि कऽ नित्य कर्मसँ निवृत्त होइत खुट्टा गरे ओंगठि बैसलौं। मनमे भेल जे पहिने घरक भगवतीकेँ गोर लागब तखन ने बाहरक। दुखनकेँ सोर पाड़लौं। सोरक कम्पन्न समाप्तो ने भेल तइसँ पहिने दुखन लगमे आबि ठाढ़ भऽ गेल। यएह छी भैयारीक सम्बन्धक पानिक प्रतिष्ठा। मनमे खुशी भेल, हाथक इशारासँ बैसैले कहलिऐ, मुदा ओ नै बैसल पच्चीसो तरहक काज घरक देखा देलक। मन मानि गेल जे सरकारी नोकरी थोड़े करैए जे हाजिरियेटा पुड़ौत। ओ तँ मिथिलाक किसान परिवार छी जैठाम झूठ-फूस बजैक खगते ने छै। काजक चिन्ता देखि मनमे भेल जे जेतेकाल खटैए तेकर अधहो जँ ज्ञान-धियानमे लगबैत तँ घरक रूखिये बदलल रहैत। मुदा किछु छी तँ सहोदर भाए छी, अनकासँ लगक सम्बन्ध अछि। बजलौं- “बौआ, हमरासँ तूँ सात कछे नीक छह, हमरो तीनटा बेटा-बेटी अछि, तोरो देखै छिअ। सभ अपन दुख-धन्धामे लगल रहै छह, हमरा एते दरमहे अछि तैयो महिनामे घैट जाइए।” बूझि पड़ल जेना घरक देवी खुश भऽ गेली, आब देवता बनबे करती। मुदा तइ बिच्चेमे दुखन बाजल- “केना-केना खर्च करै छिऐ जे खरचा घैट जाइए?” हारे-जीतक तँ दुनियाँ छी। जँ भैयारीमे अपन हारि कबूल कऽ लेब तँ भाए थोड़े गलहत्था दऽ कऽ भगा देत। बजलौं- “बौआ, की कहबह अपन हारल कियो केतौ बजैए, मुदा तूँ तँ भाए छिअ, जँ कोनो बात तोरासँ छिपाएब तँ अस्सी कोस नरकोमे बास हएत।” जेना बात काटए लगलै तहिना छटपटाइत दुखन बाजल- “एते सोखर सुनैक छुट्टी अछि, देखै नै छिऐ गाए-डिरिआइए। भरिसक ओकरा कोनो खगता छै।” भाएकेँ छटपटाइत देखि बजलौं- “बौआ, जेहने मोटा कऽ ढेंग तोहर भौजी भऽ गेल छथुन, तेहने धियो-पुतो भेल जाइए। एक दिस खेनाइक खर्च बढ़ल अछि दोसर दिस दवाइक। सबेरे सबुरिया बाबासँ भेँट करए जाएब, कनी सबेरगरे उठा दीहऽ।” भिनसुरका आठ बजै छल। अपन जीवनक अन्तिम क्षणमे भिनसर पहुँच गेल छल। रौदमे तीखपन आबि गेल छेलै। ओना ई भाँज लगले रहए जे सबुरिया बाबा असगरे दुनू परानी गाममे रहै छैथ। दुनू बेटो आ बेटियो-जमाए सभ बाहरे रहै छैन। एहेन परिस्थितिमे अपन प्रश्न राखब उचित नै, हुनके बेथा-कथा सुनि, सहयोगी बनब उचित हएत। भेँट करए विदा भेलौं। दरबज्जापर पहुँचिते देखलयैन जे चापाकलक समान सभ- पाइप, सौकेट, हेड, नट-बोल्ट, इत्यादि पुरजीसँ मिलबै छैथ। आगू बढ़ि पएर छूबि प्रणाम केलिऐन। प्रणाम करिते आँखि उठा कऽ बजला- “घरपर समान उतारैत-उतारैत काल्हि दोसर साँझ भऽ गेल। तँए ओहिना उतारि अखन कागतसँ मिलबै छी।” कहि उठि कऽ बैसकीपर आबि बैसबैत अपनो बैसला। बैसिते बाजए लगला- “परसू कल खराब भऽ गेल। मिस्त्रीकेँ अनलौं। ओ पुछलक जे केते दिनक कल छी। कहलिऐ तीस बर्खक। कहलक- एकरा छोड़ि दियौ, दोसर गड़ा लिअ। अपनो पेन्शन भेटिते अछि, दबाइ-दारूक खर्च ऐछे नै, परिवारमे जखन दुइए बेकती भेलौं तखन तँ समस्यो ने छोट भेल। कहलिऐ, कोन कल नीक हएत। कहलक, अपना हिसाबसँ लऽ लिअ। नीकसँ नीक आ अधलासँ अधला समान बजारमे भेटै छै, जेहेन लेब तेहेन दोकानपर चैल जाएब।” तही बीच रूक्मिणी दादी छिपलीमे दू कप चाह आ दू गिलास पानि नेने पहुँचली। चाह देखि सबुरिया बाबा बजला- “बौआ, तूँ सभ तँ हाइ लेभेलक चाह पीबैत हेबह, तँए नीक नहियेँ लगतह। एकरा फौरमेल्टीए बुझिहक।” ओना बहुत हद तक बाबाक विचार सत् रहैन, मुदा भरथरीक चालि नै धड़ब तँ केकरा पुछबै आ के पूछत। भरथरीक चालिक माने, जोगी-भोगीक बीचक जिनगी। वैरागक जिनगी। बजलौं- “बाबा, चाह पीबैक मन नै छेलए, लगले घरपर पीने छेलौं, तखन अपनेक बात रखै छी।” चाहक लटारम समाप्त भेल। पुछलयैन- “बाबा, अपने तँ साठि बरख टपि गेलिऐ, हम तँ गाममे कहियो रहलौं नै, की सभ अनुभव गामक अखन तकक अछि?” जेना बाबाकेँ मनमे झमार लगलैन। झमारक कारण भेलैन, घरसँ स्कूल जेबोकाल गाम-गामक खेती-पथारी, घर-घरहट, दाही-रौदी, अगिलग्गी, चोरी-डकैती इत्यादि, आ एबोकाल देखैत रहलौं। अपनो गाममे आ जैठाम रहै छेलौं तहूठाम सभ किछु देखितो कहियो केकरोसँ किछु पुछलिऐ नै आ ने ओ कहलक। तखन कथी गाम-समाजक अपन अनुभव कहबै। हारल सन विचार सबुरिया बाबाक बूझि पड़ल। बजलौं- “बाबा, कोनो नमहर रोग पकड़ैसँ पहिने छोट-छोट रोग बनि आक्रमण करैए आ पछाति समत्व रूप पकैड़ अजोध बनि जाइए, तहिना अपनो जिनगीमे अनुभव केने हेबइ।” बजला- “ऐ प्रश्नक उत्तर ऐ दुआरे देबह जे देखल-भोगल अछि। नोकरीक शुरूक दिनमे विचारने रही जे अपन जिनगी पठन-पाठनक जिनगी बना अन्त करब। तीस सालक नोकरी तक मनमाफित काजो रहल। मुदा तेकर बाद चोट शुरू भेल। पहिल, बेटा परिवार लऽ कऽ घरसँ विदेश चैल गेल। कहबियो छै- ‘जे पूत हरवाहि गेल देव-पितर सभसँ गेल।’ आशा धकियाएल। पछाति एका-एकी बेटियो-जमाए निकैल विदेश चैल गेल। हम केतए जाँउ। जइ माटि-पानिपर सभ दिन रहलौं...। दोसर माटि-पानि अनुकूल हएत।” पाशा बदलैत पुछलयैन- “कलक समानमे ठकलक ने ते?” मुस्की दैत सवुरिया बाबा बजला- “बौआ, दोकानदार अपन पढ़ौल विद्यार्थी छी, देखिते बाँहि पकैड़ गद्दीएपर बैसौलक। चाहो-पान करौलक। ताबे गहिंकियोक भीड़ छँटलै। कहलक, अहाँ गुरु छी, झूठ नै बाजब। झूठ बाजि ठकै-फुसियबैले बड़ीटा दुनियाँ अछि। औरिजनल आ डुपलीकेट दुनू वस्तु अछि, जे कहब से देब। कहलिऐ- आब हमरा तीस बरख जीबैक अछि तइमे नै गड़बड़ हुअए। कहलक- सरजी, औरिजनलोकेँ डुपलीकेट बना टैक्स दुआरे बेचै छिऐ। वएह पाइपो आ आरो समान दऽ दइ छी। सएह छी।” बजलौं- “गड़ेबै कहिया?” बजला- “आइए गड़ेबै। ई सभ जिनगीक मूल समस्या छी। अपनो भरिक परिवार बना नै रहब तँ अनका भरोसे जीब पाएब।” उठैत कहलयैन- “चारि बजे करीबमे आबि नवका कलक पाइन पीब।” 7 अक्टुबर 2014, शब्द संख्या- 1616 कलम हानि कऽ ओछाइनपर मरु अवस्थामे पड़ल देवानन्दक मुहसँ एतबे निकैल रहल छैन- “सुचितलाल छूटि कऽ आएल? सुचित... ?” गामोक आ कुटमो परिवारक जिज्ञासु लोकक आबाजाहीक ढवाहि लागल। कखनो दुआर-दरबज्जा खाली नै। घर-बाहर सभतैर देवेनन्दक बातक चर्च। चर्च ई जे जेना देवानन्द सभ किछु बिसैर गेला आकि हेरा गेलैन तहिना भऽ गेल छैन। अही बीचक ओझरीमे घरसँ बाहर धरि सभ अपना-अपना बुधिये-विवेके ओझरी सोझड़बैए। मुदा करीनक पानि जकाँ पहिने छीप उठत तखन ने करीन पानि पकड़त आकि बिना छीप उठने करीन पानि पकैड़ लेत। जिनका हुनका घर दिससँ अबैत देखिऐन आ पुछिऐन जे की हालत देवानन्द बाबाक छैन? तँ सबहक एक्के उत्तर जे सुधि-बुधि हेरा गेलैन, एकेटा रट छैन जे ‘सुचितलाल छूटि कऽ आएल?’ सुनि-सुनि मुँह बन्न केने रही जे जँ ऐसँ बेसी किछु खोद-वेद करब तँ गपेक ओझरीमे तेना ओझरा जाएब जे अपन सभ काज चौपट भऽ जाएत। जेते मुँह तेते रंगक गरहैन, कियो नोन-मिरचाइ मिला सुअदगर बनबैत तँ कियो तेतैर मिला खट-मिट्ठी बनबैत, एहेन जालमे नहियेँ पड़ब नीक। मुदा समाजक बीचक प्रश्न छी जे छोइरो कऽ भागब तँ काल्हिक समाज जे गरिऔत तेकर भागी नै हेबै? मुँह चुप राखब कायरपनो हएत। जिज्ञासा जगल, देवानन्द बाबा लग पहुँचलौं। पहुँचिते गोड़ लागि पुछलयैन- “बाबा, हमरा चिन्हलौं। हम फल्लाँ।” समाधिमे लीन देवानन्द बाबा, हँ-हूँ किछु ने बजला। ओना हमर तुरिया ‘बाबा’ कहै छैन तइसँ अगिला पीढ़ी ‘काका’ कहै छैन आ तहूसँ अगिला ‘देवभाय’ कहै छैन। अपनो परिवारक सएह हिसाब-किताब छैन। बाबा तँ बनियेँ गेल छैथ। जहिना तपस्यामे लीन योगीक मुहसँ फुटैत- “श्रीराम, श्रीकृष्ण, राधे-राधे, सीते-सीते, सीता-राम, राधे-कृष्ण।” तहिना फुटैन- “सुचितलाल छूटि कऽ आएल।” चुपचाप सुनि कान ठाढ़ केलौं जे आरो किछु बजता। मुदा किछु ने। अचेत अवस्थामे। मुदा अचेतकेँ चेतक अवस्था देखिये कऽ ने जगह छोड़ब, ओना तैबीच बेराबेरी केते गोरे एबो केला आ गेबो केला। देवानन्दक मुहसँ ओ बात निकैलते रहैन- “सुचितलाल छूटि कऽ आएल? सुचित...?” उठि कऽ विदा हुअए चाहलौं। मन कहलक- “केतए एलौं तँ केतौ ने।” देवानन्द बाबाक ओछानिक आगू नमहर ओछाइन बिछाएल आ अपन समांगक चौखरी कनी हटि कऽ रहैन। सहैट कऽ आगू बढ़ि बैसलौं। ओत्तो बाबेक गप चलैत। कान ठाढ़ केलौं तँ सुनलौं- “चौबीसो घण्टा सीता-रामक रट लगेनौं बिना रामायण पढ़ने आ सुनने सीता-रामकेँ नै जनबैन, मुदा जखन जानि लेब तखन जे सीताराम मुहसँ निकलत ओ दोसर रूपमे निकलत। वएह असल रूप भेल। भरिसक तहिना देवानन्दो काका कोनो रचित रचनाक मंत्र पढ़ि रहला अछि।” -देवानन्द बाबाक भातीज व्याख्या करैत बजैत रहैथ। झाँपल-तोपल पढ़ल-लिखलक भाखा, चुपचाप सुनि लेलौं। बजबो केना करितौं। हम कि कोनो धरमराज छी जे केकरो जीवन-मरणक हिसाब जोड़ब। फेर मन भेल जे खिस्सा-पीहानी सुनौनिहारकेँ जँ हूँहकारी नै पड़ल तँ बेरस जकाँ भऽ जाइए। मुदा लगले मनमे भेल जे हूँहकारियो बिनु बुझने केहेन भरब। पढ़ल-लिखल लोकक बीचमे छी जँ कहीं उनटा हूँहकारी पड़ि जेतैन तँ करेजमे दर्द हेतैन! एक दर्द देखए एलौं, दोसर देने जइऐन, ई नीक नै। मुदा बैसलो नीक नै लगल। जेतेकाल बैसि कऽ जिज्ञासा करैक छल तेकर अदहो समए नै खटियाएल छल तखन चैलो केना अबितौं। मुदा मनमे भेल जे कहि दिऐन अखन कनी धड़फड़ीमे छी, निचेनसँ फेर आएब। फेर आएबो तँ ऐछे अखन जीवित-मृत्युक जिज्ञासा भेल, दू दिनमे मरबे करता तखन ने मुइल-जीवितक भाँज लागत। ठाढ़ होइत बजलौं- “कक्काजी, अखन कनी दोसर ठाम जाएब, ओमहरसँ एला पछाति फेर आएब।” विदा भेलौं, दस लग्गा आगू बढ़लौं आकि पाछूसँ सोने काका कहलैन- “कनी रूकह। संगे चलब।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि रूकि गेलौं। लगमे अबिते कहलैन- “सभटा केलहा बिसाइ छैन।” सोने कक्काक बातक कोनो अरथे ने लगल जे की कहलैन। तहूमे जँ कनेक कड़ैक कऽ कहितैथ तँ अनुमानो करितौं जे भरिसक कोनो कारणे रीशियाएल छैथ, तँए अहू अवस्थामे देवानन्द बाबापर अपन रीश झाड़ै छथिन। सेहो नै बूझि पड़ल। असथिरसँ मुँह दाबि तेना बजला जे दू गोरे छोड़ि तेसर कान तक नै पहुँचल...। ...गर भेटल। गर ई भेटल जे ताबे दस डेग आरो आगू बढ़ि गेल छेलौं। ओना मनमे उदासी छल तँए ने दोसर काज दिस नजैर उठए आ ने रस्ते चलैमे नीक लगए। आगूमे बामा भाग एकटा किसुनभोग आमक गाछ। सघन छाहैरो आ निच्चाँमे चिक्कनो। कहलयैन- “काका, अहाँ ते तेहेन शिकारी जकाँ बजलौं जे बुइझे ने पेलौं जे खिखिरक बोली देलिऐ कि हरिणक आकि कोइलीक।” हमर बात सोने काकाकेँ नीक लगलैन। नीक ई लगलैन जे जहिना शरीरक चमड़ाक घाओ, माँस सड़बैत हड्डी छूबि पीजुआ जाइए मुदा जखन ओकरा निकालल जाइ छै तखन पीज निकैलते सुआस पड़ए लगै छै तहिना सोने काकाकेँ नीक लगलैन। बजला- “बौआ, जखन तोरा नीक जकाँ बुझैक मन छह, तखन ऐठाम बैसह। खरिआरि कऽ कहै छिअ।” अपनो मनमे रहए जे आएल छेलौं देव बाबाक जिज्ञासा करए बुझलौं किछु ने, तखन अगर किछु नीक आकि अधला रस्तो-पेरा भेटि जाइए तँ ओहो शुभे भेल। दोसर ईहो भेल जे भने दुइए गोरे छीहो। तेहल्ला रहने ने बेसी हो-हल्ला होइए मुदा दू गोरेमे से तँ नै हएत। जँ कोनो तीत-मीठ बात बजाइयो जाएत तँ अदहा-फूसि, अदहा सत्-क जगह तँ भेबे कएल। माने ई जे कोनो बात सोने काका बजता जे तेहल्लाक अभावमे सतो फूसि भऽ सकैए तँ फुइसो सत्। तहिना ने अपनो बाजब हएत। हुनको गवाहीक अभावमे सतो फूसि आ फुइसो सत् हेबे करतैन। नीक जगह पाबि बजलौं- “काका, एक तँ अहाँ दुनू गोरे एक जाति एक दियादीक छी, हम तेसर भेलौं, केना आन परिवारक कोनो अधला बात बाजब। नीक बजैक अधिकार तँ अछि, मुदा...।” हमर बात सुनिते जेना सोने कक्काक मन सुगबुगेलैन। जहिना कोनो पनचैतीमे कियो एहनो पञ्च तँ होइते छैथ जे मुदै-मुदालहक बात बिनु सुननौं-बुझनौं उड़न्तीए सुनलपर अपन फैसला सुना दइ छथिन, तहिना सोने काका बजला- “बौआ, कहने छेलिअ जे सबटा केलहे बिसाइ छैन, से कोनो फूसि कहलियऽ।” सोने कक्काक झाँपल-तोपल बात, फेर नै बुझलौं। मुदा सोने कक्काक मुँहक रूखिसँ बूझि पड़ल जे देवालयसँ घूमल पुजेगरी जकाँ अखन किछु बाँटि सकै छैथ। टोनलयैन- “काका, कनी मुड़ी सुढ़िया कऽ बजियौ ने?” सोने कक्काक छातीमे जेना हमर बात घोंसिया गेलैन। तहिना बजला- “बौआ, तोहूँ कोनो आन थोड़े छह, समाजेक ने बेटा-भातीज छिअ। जेहने अपन बेटा-भातिज तेहने समाजक। बतीस दाँतक तरमे पड़ल छी तँए जी-जाँति कऽ रखने छी। मुड़ी सुढ़िया कऽ बजैमे उकड़ू होइए। मुदा ऐठाम दुइए गोरे छह तँए जी खोलि बाजब।” सोने कक्काक कोयला-पानिक बनल स्ट्रीम देखि बूझि पड़ल जे ऐसँ नीक समए बोलीक गतिक नै होइ छै। पुछलयैन- “की उकड़ू कहलिऐ, काका?” बकर-बकर मुँह दिस ओहिना ताकए लगला जेना अपन तपल अग्नि परीछा दिअ चाहै छैथ। क्षण भरि गुम रहि बजला- “बौआ, अपन जे पत्नी छैथ ओ देवेबाबूक साइर छथिन। दुनूमे सढ़ुआरे अछि। मुदा की कहबह...।” ‘की कहबह’ सुनि आरो जिज्ञासा बढ़ल। पुछलयैन- “काका, एना किए ठेहुनपर ठाढ़ होइ छी। सोझ-साझ भऽ कऽ ने ठाढ़ हेबै।” जहिना केकरो चानिपर उरकुसीक फूल झाड़ि देने सौंसे देह एकेबेर चुलचुलए लगै छै तहिना हमर बात सुनि सोने कक्काक मनमे भेलैन। बजला- “कहैले पत्नी छैथ मुदा जेठ बहिनक चालि-ढालि पकैड़ ओहो टीके पकैड़ रखऽ चाहै छैथ। मुदा से केना हएत। भाय! जखन अहाँक जूट हम नै पकड़ै छी तखन अहाँ किए हमर टीक पकड़ब। अपन-अपन आड़ि-पाटिमे अहूँ रहू, हमहूँ रहब। जँ से नै तँ अपन टीकक रकछा अपने नै करब तँ आनक आशा थोड़बे करब।” मुहसँ अपने निकैल गेल- “अजीब बात!” ‘अजीब’ सुनिते अजनवी जकाँ दोहरबैत काका बजला- “बौआ, घरेवालीक दोख की देब। बेटो सएह भऽ गेल।” बेटाक नाओं सुनिते जेना आरो मन उड़ि गेल। जइ परिवारमे मिलानक जगह गरमिलाने बेसी रहत तँ ओइ परिवारक नीक केते हएत? झमाएल पजेबाक देवाल केहेन हएत? कहलयैन- “की बेटा?” ‘की बेटा’ सुनिते सोने काका झमान भऽ खसला। चोट खाएल साँपक मुहकेँ जहिना फण जोड़ैक शक्ति समाप्त भऽ जाइ छै तहिना कक्को भेलैन। मुँह दाबि बजला- “बौआ, एकेटा बेटा अछि। देखिते छहक जे अपन जथा-पथा केहेन अछि। मुदा माइयक किरदानीसँ ओहो घर छोड़ि किरानीक नोकरी करैए।” सोने कक्काक बातक पाछू वौआ गेल छेलौं। जे बुझैक छल से छुटले छल। बातकेँ मोड़ैत बजलौं- “काका, देवबाबा अपन साढ़ूए छैथ। तखन तँ गलती भेल जे अहाँकेँ काका कहै छी आ हुनका बाबा कहै छिअनि?” बाबासँ काकाकेँ लगिच पाबि खिल-खिला कऽ हँसैत बजला- “नै बौआ, हमरा तूँ कक्के कहह, हुनकर भागी हम नै हेबह।” ‘भागी’ सुनि किछु सुराक बूझि पड़ल। पुछलयैन- “अपन साढ़ूओक भागी नै हेबै?” दुनू हाथक पाँचो ओंगरी छिटका, तरहत्थी नचबैत बजला- “ओहेन-ओहेन लोकक भागी बनने अपनो भाग नै ने बिगाड़ि लेब। सरकारक जे नोकरी अछि ओकर दरमाहा तँ ओइ स्तरकेँ मानि ने बनल छै, तखन एते झकझकौआ केतएसँ आएल! जे अपनो जीवन-मरण नै बूझि सकल ओ अनकर की बूझत?” पुछलयैन- “से की?” “नजैरपर नै चढ़ै छह। हमरासँ दुइए बरख जेठ छैथ, देखैमे ने बूझि पड़ै छथुन जे मोटाएल छैथ मुदा से नै सड़ि कऽ फूलल छैथ! दुनियाँमे जे बर-बेमारी अछि सबटा देहमे छैन!” सोने कक्काक वाचा शक्ति चैढ़ गेल छेलैन। केतौसँ केतौ मुड़ी-नाङैर पकैड़ नचबए लगला। पुछलयैन- “काका, देवबाबा सुचितलालक की चर्च करै छथिन?” ‘सुचितलाल’ सुनिते सोने कक्काक आँखिक रंग सिनुरए लगलैन। मनमे जेना उफान उठए लगलैन। चेहराक रंग चढ़ए लगलैन...। बजला- “बौआ, अखन एतबे कहबह जे केते दिनसँ सुचितलाल जहलमे अछि, ओकरेसँ जा कऽ भेँट कऽ आबह, पछाति तीनू मुँह-मिलानी दुनू गोरे कऽ लेब। किए तोरा मनमे हेतह जे सोने कक्काक चालि-चलैन नीक नै छैन आ अपनो मनमे किए खुट-खुटी रहत जे फल्लाँकेँ टिटकारी दऽ टिटकारि देलिऐ।” सोने कक्काक दबल शक्तिक सरिता पाबि मन दहैल गेल। दहलाइत मन बाजल- “काका, अखन तक अहाँकेँ नै चिन्है छेलौं, मुदा आइ बूझि पड़ैए जे अहाँक पेटमे गामक इतिहास अछि।” ‘गामक इतिहास’ सुनि डराएल हरिणक बच्चा जकाँ कानो ठाढ़ केलैन आ चारूकात चकोनो भेला। बूझि पड़ल सोने कक्काक पेटमे कोनो गहींरगर बात औंकड़ैले जोर मारि रहल छैन, मुदा डराएल मन ईहो कहै छैन जे अपने बात बजने लोक फाँसियोपर चैढ़ जाइए, गोबरखत्तोमे खसैए आ इन्द्रासनो हिलबैए! मुदा से भेल नै, जहिना कोनो घाकेँ मुँह फोरि बहौल जाइ छै आ कोनो अपन मुँह अपने बना फुटि कऽ निकैल जाइए, तहिना सोने कक्काक घा अपने फुटि कऽ बहऽ लगलैन- “बौआ, तूँ अखन बाल-बोध छह, नै चिन्हलह तइले दोखी हम थोड़बे कहबह। मुदा सभ तँ बाले-बोध नै अछि, ई बात सत् जे अपन-अपन रस्ता चलने सबहक बुइधो आ विचारोमे कनी दूरी बनियेँ जाइए। तेकर तँ एकेटा उपए अछि, जेते गोरेक बीचक काज रहल तइमे विचारि करक चाही।” सोने कक्काक बात नीक जकाँ नै बूझि सकलौं। कहलयैन- “काका, तेना ने बाजि देलिऐ जे बूझिये ने पेलौं?” हमर बात सुनिते जेना मन कोदारि भाँजए लगलैन। चारि छह पारिते मन नचलैन। नचिते बजला- “बौआ, तोहूँ बुझै छह जे दुनू गोरे एक-उमेरियाक संग एक दियादीक सेहो छी। हुनका नोकरी करैक छेलैन तँए बेसी पढ़लैन आ हमरा अपने बाप-दादाक घराड़ी पुजैक छल तँए हम एके विहित पढ़लौं। एकर माने ई नै ने भेल जे अहाँ बड़ होशियार भऽ गेलौं आ हम ओहिना रहि गेलौं।” काकाकेँ भँसियाइत देखि बिच्चेमे रोकि देलिऐन- “काका, बड़ बेर भऽ गेल आब छुट्टी दिअ।” जहिना कोनो रचनाकार समयाभावमे हाँइ-हाँइ रचैत अपन रचनाक विसरजन करै छैथ तहिना अपन हूसैत विचारकेँ सम्हारैत काका बजला- “बौआ, जखन एते लगीचक सम्बन्ध अछि, एके परिवारमे जेठ-छोट बहिनसँ बिआह भेल। ओना दू-तीन साल उमेरोमे बेसी छैथ। तखन किए हमरा बेटाकेँ तीनू गोरे मिलि बिना पुछने नोकरी लगा अपन नोकर बना लेलैन!” सोने कक्काक बातक कोनो अरथे ने लगल जे किए सभकेँ एके सिरहौने सुतबै छथिन। पुछलयैन- “काका, नीक जकाँ नै बुझलौं?” जहिना कियो अपन बेथा-कथा छाती खोलि दुनू बाँहिसँ जकैड़ छातीमे साटि बजैए तहिना सोने काका साटि बजला- “बौआ, जँ ओ देवानन्द बड़ हितैसी छला तँ अपना ढंगक शिक्षा दिआ अपना स्तरक बना दुनियाँमे ठाढ़ करितैथ तखन ने भेल पुरुखपना, जँ ओते शक्ति नै छेलैन आ नोकरीकेँ नीक बूझि उपकार करए चाहलैन तँ एकबेर पुछैयोसँ गेलौं।” सोने कक्काक मनक मनकी-फनकी नीक जकाँ नै बूझि पेलौं। कहलयैन- “काका, दूबिक फूल जहिना अपने उड़ि अकासमे चैल जाइए, तहिना तेना कऽ बजै छी जे बुझबे ने करै छी। अबेरो भेल जाइए।” ‘अबेर’ सुनि अपन विचारक बिछानिकेँ हाँइ-हाँइ समैट, बजला- “बौआ, बातक बात छी तँए तोरो मनमे किछु बात हेतह। आब तोहीं पुछह। मुदा दूटा बात हमर बाँकी अछि ओ सुनियेँ कऽ जइहऽ।” सोने काकाकेँ सीमावद्ध होइत देखि पुछलयैन- “काका, अपन समांग सभ बजै छथिन जे जहिना तुलसीबाबा रामरूपकेँ राम बना ठाढ़ कऽ देलखिन तहिना हिनको अपन किछु रचित रचना छैन जे प्रकाशित नै भऽ सकलैन, वएह मंत्र जप कऽ रहल छैथ।” हमर बात सुनिते सोने कक्काक मन चकभौड़ लेलकैन। चिलहोरि जकाँ टाँहि देलैन- “बौआ, अहिना लोक अपन पापकेँ दाबि-दाबि रखैए। बड़ भारी बात अछि बौआ!” अदहा बात बाजि सोने काका आरो जिज्ञासा बढ़ा देलैन। ‘बड़ भारी बात अछि’, की भारी बात अछि? पुछलयैन- “तेना ने बातकेँ महजाल जकाँ ओझरा दइ छिऐ जे नीक जकाँ बुझिये ने पबै छी। कनी ओझरी सोझरा कऽ बजियौ ने।” एकटक भऽ सोने काका आँखिपर आँखि गाड़लैन। गाड़ले-गाड़ल मन खिल उठलैन। खिलते खिलखिलेला- “बौआ, जिला न्यायालयमे नोकरी करै छला। सुचितलालक बाबाक संग देवानन्दक बाबाकेँ कोनो बाते झगड़ा भेल, तइसँ दुश्मनी ठाढ़ भऽ गेल। सुचितलालक परिवार मुर्ख, दोसर पीढ़ी अबैत-अबैत बिसैर गेल। मुदा देवानन्दक परिवार ओकरा मन रखलक...।” जहिना कोनो कटल रस्ता देखि राही आगू-पाछू तजबीज करए लगैए तहिना सोने काका चुप भऽ तजबीज करए लगला। मुदा मन जेना धिक्कारी दिअ लगलैन तहिना मुँहक सुरखी भेल जाइत रहैन। बिच्चेमे पुछि देलिऐन- “काका, लोक कहै छै जे धोती जखन पहिरै जोकर होइ छै तखन फाटिये जाइ छै, तहिना सुनैबला बात दाबिये लेलिऐ।” बजला- “बौआ, सुचितलाल नाँहक जेलमे अछि। नहरक पाइनिक झगड़ा गाममे भेल। पनरह गोरेपर केस भऽ गेल ओही केसक सुनबाइ देवानन्दकेँ हाथ लगलैन। बाबाक कनाड़ि असुलि लेलैन। तेना कऽ हानि कलम चलौलैन जे वेचारा जहलमे अछि। ओकरे परिवारक कनैत मनमा जी खींच डिरियबै छैन!” जहिना काज करैत-करैत देह-हाथ दुखा जाइ छै तहिना सोने कक्काक बात सुनि मन दुखा गेल। आगूक किछु नीके ने लगए, कहलयैन- “काका, दोसर दिन निचेनसँ आबि आरो सुनब। अखन छुट्टी दिअ।” जेना ठोरेपर रहैन तहिना बजला- “केकरो कियो बान्हि कऽ राखत तँ रहतै, कियो अपना विचारसँ केतौ रहैए। जा-जाह हमरो बड़ समए लैग गेल।” 10 अक्टुबर 2014, शब्द संख्या- 2226 लतियाएल जिनगी किरिण फुटिते श्याम दरबज्जाक पाछू सड़कपर एयर कंडीशन गाड़ी लगौलक। गाड़ीक अवाज मनोहरो काका आ मोहनियोँ काकी सुनलैन, सड़क छिऐ, सबहक छिऐ, मुदा गाड़ी रूकल किए? ने मनोहर काकाकेँ आ ने मोहनीए काकीकेँ मनमे भेलैन जे श्यामक गाड़ी छिऐ। सड़कपर ठाढ़ श्याम दरबज्जा दिस देखैत जे कियो बहराइ छैथ की नै। अनठिया गाड़ी बूझि मनोहर काका सड़क दिस बढ़ला। मनमे किए कोनो मलाल हेतैन जे श्यामे हएत। जँ हेबे करत तँ की ओकर घर नै छिऐ। जहिना हमर घर छी तहिना ने ओकरो छिऐ, अपनो आँगन-घर अबै-जाइमे पूर्व सूचनाक जरूरत अछि। हँ बेसीसँ बेसी संकोची दुआरे खखास कएल जा सकैए। ओना श्यामो दस बरख पूर्बे जे देखने-सीखने छल ओ मनमे जीविते छै। ऊहो बुझैए जे घरक लोक लेल राति-दिन घरक मुँह खुगले रहै छै। मुदा नव तकनीकक लोक तँए अपन ई तकनीक लगा ठाढ़ भेल जे दू-चारि बेर हौरन देबै अपने घरवारी सभ निकलबे करता। आँगन गेला पछाति अग्नेय रूप भऽ जाइए मुदा घरसँ निकलला पछाति बहरबैये रहै छै, तँए केहेन नजैरसँ देखै छैथ, ई तँ तखने हएत जखन घर-हँसी आ बाहर हँसीक रूप देखब। ताधैर मनोहर काका श्यामसँ लग्गी भरि हटल लग अबै छला। बेटा-बापक सम्बन्ध केना अनका जकाँ पचास हाथ पहिने नमस्कार-पाती हएत। पएर छूबि गोड़ लगने बिनु मुँह केना खोलि सकैए, मुदा से श्याममे जीवैत तँए श्यामो किछु आगू बैढ़े रहल छल। पएर छूबि गोड़ लगैत श्याम बाजल- “बाबू, समए ओते नै अछि तँए जेते जल्दी भऽ सकए तैयारीमे जुटि जाउ।” श्यामक अमेरिकन भाषा मनोहर काका सुनि लेलैन। बजला किछु ने। बजबो उचित नहियेँ बुझलैन। परिवार छी परिवारमे भाए छैन, भावो छथिन आकि हमहींटा छी। मुदा लगले मन बदैल गेलैन। बदैल ई गेलैन जे ई जे कहलक जे समए नै अछि, जल्दी तैयार भऽ जाउ, ई की कहलक। समए जखन बेठेकान छै तखन केकर छिऐ जे ओकर रहतै आकि हमरे रहत। ओ तँ सोभाविके अछि। आ आगू कहलक जे तैयारीमे जुटि जाउ। की ओकरा बूझि पड़ै सुतले रहै छी। मन तमतमए लगलैन। मुदा तमतमीकेँ थाम्हि पत्नीकेँ कहलैन- “अहींक खुऔल-पीऔल ने बेटा छी। खाइ-पीबैक ओरियान करू। पुतोहुओकेँ कहिअनु, झबदे पहिने चाह बनौती। हम नै पीब, लगले पीलौंहेँ। राधे केतए अछि।” सोलहन्नी अपन भार उतारि मनोहर काका वाड़ी दिस विदा भेला। अँगनासँ निकैलते मनमे उठलैन। ई की बाजल श्याम जे समए नै अछि? कमसँ कम दस बर्खक पछातिये सोझामे पड़ल अछि, आ तैयो कहैए समए नै अछि? ओकरा नै समए छै तँ आने केकरा समए छै। सभकेँ अपन जिनगीक संग चलैक रहै छै। मनमे प्रश्न उठिते-बैसिते रहैन आकि खेतक आड़िपर पहुँच गेला। खेतक कोनेपर सँ हिया कऽ देखलैन तँ बूझि पड़लैन जे पहिल हलतलबी काज ओ भेल जे लतियाएल लत्ती अछि, ओकरा जँ मुँहक संग सीरो नै छोड़ा देबै तँ काल्हि होइत-होइत सीरबेधू भऽ जाएत! तँए ओकर पहिने जुइत लगा, तरकारी तोड़ि-काटि आँगन ने जाएब। सभ दिन तँ अनके खेतक खाइत हएत आइयो तँ अपना खेतक खा लिअ। मनमे अबिते खुशी भेलैन। खुशी होइते मनसँ हटि गेलैन जे श्याम बाजल छल- ‘समए कम अछि।’ समए कम रहौ आकि बेसी रहौ, सभकेँ अपन-अपन समैकेँ अपने विचारे लऽ जाए पड़ै छै...। भिनसुरका समए छी जँ खेतक कोने-कानी घूमि सबहक दर्शन नै कऽ लेब तँ शुभ्र प्रभात केना भेल। जँ प्रभाते नै शुभ भेल तँ दिन केहेन बीतत? पाँचो कट्ठा वाड़ीमे रंग-रंगक तरकारियो आ फलो-फलहरी। ओना बीघा-बीघे गाछ रहितो गाछी-कलम भेल मुदा से नै, जहिना सजमैन, कदीमा, रामझिमनी, झिमनी, करैला, पालक-ठरिया साग तहिना खीरा-बतिया सेहो। जे सीमानपर अछि, तरकारियो बनैए आ लत्तीदार फलो छी। तहिना केरो, अनरनेवा जे फलो छी आ तरकारियो छी। मनोहर काका सुतिहार किसान शुरूहेसँ रहला। ओना परिवारक असगरे करताइतो रहैथ, मुदा आब से नै छैन। छोटका बेटा राधे सेहो पीठपोहू भऽ गेलैन। तँए अन्न-पानिक खेती आ माल-जालक ताक-हेर राधेकेँ सुमझा अपने पाँच कट्ठा वाड़ीमे अपन जिनगी समैट लेलैन। खेतक रकबा भलें कम हुअए मुदा मनोहर काका ओकरा कामधेनु बनौने छैथ। पाँचो कट्ठाकेँ चारूकात अड़िया, पतियानी लगा नेबो-दारीम, लताम केरा अनरनेवा, अम्रपाली आम इत्यादि फल चारू दिस लगौने छैथ आ बीचमे मौसमक हिसाबसँ तरकारी करै छैथ। किसानकेँ जहिना तरकारी खेती तहिना पानक खेती सेहो कारखाने छी। मुदा अन्तर दुनूमे तँ ऐछे। तरकारी पातसँ लऽ कऽ फूल-फल धरि दइए मुदा पान एकभग्गू अछि। ओना ई प्रतिष्ठा पानकेँ जरूर छइहे जे आन पातकेँ आगिपर चढ़ौला पछाति खाएल जाइए जखन कि पान बिनु आगि चढ़ने पवित्र अछि। तेसर ईहो अछि जे पान साल-सालक खेती अछि जखन कि तरकारी मौसम-मौसमक, ओना पानि-पाथर, शीत-ओसक असैर दुनू दिस होइए। मात्रा भरि हितकर, कुमात्रा अहितकर होइते अछि। करैला, सजमैनकेँ लतियाएल देखलैन। देखिते मन कहलकैन जँ एकरा आइ नै सोझरा लेब तँ काल्हि नमैर कऽ सीरा जाएत, तखन ओइ सीरक घुरछी छोड़बैमे मुड़ियो टूटि सकैए। जे अखन नै हएत। खेत पैसि सबहक मुड़ी सोझ केलैन। फेर सजमैन, रामझिमनी, खीरा तोड़ि, एक मुट्ठी ललको ठरिया आ एक मुट्ठी भुल्लो काटि पालकक डम्हाएल पात आँगुरेसँ खोंटि गमछामे बन्हिते हियौलैन तँ बूझि पड़लैन जे एतबे तरकारीक तँ तेते ने विन्यास बनि सकैए जे जहिना भनसिया अकछा जाएत तहिना खेनिहरो। मनमे खुशी भेलैन। बारहो मासक बाटिका, केरा आ अनरनेवा ओहन फलो आ तरकारियो छी जे बारहो मासक कामधेनु छी। तहिना मौसम अनुकूल नेबो, लताम, दारीम, धात्री, इत्यादि सेहो छी, जे सालो भरि गारा-जोरी करैत फलक धार बहबैए। फेर मन घुमलैन। घुमिते फुटलैन, जानथि भोला बाबा। भोला बाबा मनमे अबिते जेना शिव-पार्वतीक ताण्डव नाच मनमे पहुँच गेलैन। बकार फुटलैन- “हद छी यौ शिवदानी महादेव। एक-सँ पचास, एकसँ एक सए, एकसँ एक हजार जुटि-जुटि एके संग पान-परसाद पबै छी, जानी अहाँ।” गमछामे सभ तरकारी बान्हि, हाथमे सजमैन लऽ आँगन दिस विदा भेला। आँगनमे श्याम मैयो, छोट भाएओ आ चुल्हितर बैसल भावोओकेँ सुना-सुना बजै छल। बजै छल अमेरिकाक जिनगी। जहिना नव वा पुरानो ओहन खिस्सा मनकेँ मोहिते छै जइ दिशामे मन रहै छै। अपना ऐठामक स्वर्ग-नर्कक खिस्सा सभ बुझिते अछि। स्वर्गेक सुख निरमोही काकीकेँ बूझि पड़लैन। मनोहर काकाकेँ देखिते हलसैत निरमोही काकी बजली- “बौआ कहैए दुनू परानीकेँ अमेरिके चलैले?” पत्नीक बात सुनि मनोहर काकाकेँ मन लहरए लगलैन। मनकेँ लहरैत देखि बजला- “एक गिलास टटका पानि पिआउ। बात केतौ पराएल जाइ छै। पानि पीब चाह पीब तखन गप करब।” पानि पीब चाह पीब पान खा मनोहर काका काकीकेँ पुछलखिन- “ओइठाँ जे जेबै से बाजा-भुक्की केकरासँ करबै। बोआ दुनू परानी भरि दिन निपत्ता रहत सेहो कहलक?” पिताक विचार सुनि श्याम ठमकल। मुदा रस्ता चालिक बोध नै रहने, धड़फड़ा कऽ बाजल- “बाबू, दुनू धिया-पुता ओतुका नागरिक भऽ गेल।” श्यमाक बात, मनोहर कक्काक विचारकेँ जेना झूका देलकैन। मुदा मन कहलकैन, केकरो झूकौने कियो झूकैए। ओ तँ अपन मनक उपज छिऐ। सभ तमतमीकेँ समैट मनोहर काका पत्नीकेँ इशारा करैत बजला- “अँए, ओइठाँक अन्नो-तीमन पचत, ऐ उमेरमे जे मन बौआइए।” अन्न-तीमन नै पचत सुनि बेटा दिस मुखातीव होइत मोहनी काकी बजली- “एहनो केतौ भेल जे अन्न-तीमन नै पचत।” पत्नीक बात सुनि मनोहर काका बजला- “श्याम, ई नै कहलह जे ओइठाँ की सभ खाइ छहक?” जेना श्यामक मनमे कचोट भेल, पिता छोड़ि रहला अछि। बाजल- “बाबूजी, किछु दिन रहि कऽ ओतै देखितिऐ, नै मन लगैत तँ चैल अबितौं।” धाना खसबैत मनोहर काका बजला- “बौआ, कियो केतौ रहह, मुदा रहत अही दुनियाँमे। जीब-मरब, अही दू शब्दमे दुनियाँ रचल-बसल अछि। तँए जेतए रही वएह सुन्दर देश भेल, आ जेकर अपना लूरिये-बूधिये जिनगी प्रवाहित होएत वएह नरेश भेला। बड़ बढ़ियाँ बड़ीटा दुनियाँ छै, जेतए मन फूड़ऽ तेतए रहऽ। धारक बीच जिनगी अछि तँए ओतए जा अपन धाराकेँ नै तोड़ब।” 14 अक्टुबर 2014, शब्द संख्या- 1184 गामक शकल-सूरत एक तँ ओहिना श्यामलाल बाबू पनरह मिनट बिलम भेने धड़फड़ाएल छला तैपर अपन उपस्थिति दर्ज करौने बिना किलासमे केना जइतैथ। ओना मनमे ईहो होइन जे अखन धरिक तँ यएह परम्परा अछि जे कोनो शिक्षक विद्यालय पहुँच उपस्थिति बोहीमे हस्ताक्षर कऽ अपन उपस्थिति दर्ज करबैत आबि रहल छैथ मुदा उपस्थिति केकर? कार्यालयक मुँहपर ठाढ़ श्यामलाल बाबूक मनमे ईहो होइन जे किलासक पनरह मिनट कटिये गेल अदहा समए शेष अछि तँए पहिने किलासेक काज पुरा ली, पछाति उपस्थिति पञ्जीमे नाओं चढ़ा लेब। तलब पढ़बैक लइ छिऐ। मुदा लगले मन उनैट ओतए चैल जानि जे एक तँ परम्परा मानि नेने छी दोसर जँ कियो ऊपरका पदाधिकारी आबि जेता तँ अनुपस्थितियो बुझता। बेर-बेर घड़ीपर आँखि जानि। घड़ीक सुइया क्षण-पल-मिनट आगू ससरल जाइत। श्यामलाल बाबू ओइ ओझरीमे फँसि गेला जे पढ़बैक समए निर्धारित अछि। आगू दोसर घण्टीक पढ़ाइ बढ़त, काजमे कटौती भेने फलमे कटौती हएत, उत्पादनमे कटौती हएत। जइसँ नोकसान चाहे जेकर होइ मुदा नोकसान तँ हेबे करत। देव-मन्दिरक ऊपरक धुजा जेतएसँ देखि पड़ैत तेतए तक ओइ स्थानक महत भेल, तैठाम अखन तँ सहजे विद्यामन्दिरक मुँहपर छी! मनमे अबिते बजा गेलैन- “अपन पढ़बैक समैक भरपाइ भलें अतिरिक्त समैसँ व्यय करब मुदा हमहूँ तँ ओही वर्गक शिक्षक छिऐ। जहिना कोनो ऑफिसक जबावदेह अफसर होथि आकि विद्यालयक प्रधानाध्यापक, तेकर पछातिये आन कियो कोनो-ने-कोनो किलासक वर्ग-शिक्षक हेबे करै छैथ। आबक महगीमे तँ एक-एक गोरे एके वर्गक किए सौंसे विद्यालैये-महाविद्यालयक किलासक भार कान्हपर लऽ चलै छैथ।” ओना बजैकाल श्यामलाल बाबूकेँ बजा तँ गेलैन मुदा बिनु विचारल बात बजेलैन। बजाइते कान पकैड़ मन कहलकैन- “अहूँ तँ अही विद्यालयक शिक्षक आ नवम् वर्गक वर्ग शिक्षक छिऐ। ई भेल जबावदेही, मुदा जबावदेहीक पाछू जे बेवहारिक पक्ष बाधक अछि, ओकर साधक के बनत? जहिना सरकारक गृहमंत्री तहिना ने परिवारक बीच, परिवार चलौनिहारो।” लगले मन अपन जबाव पात पकैड़ मखान वा भेँट-मलकोकाक पनिपत पकैड़, बीज लग पहुँचलैन। विद्यालयक सहायक शिक्षक तँ हमहूँ छीहे। जइ विद्यालयक बीच शिक्षककेँ रहैक बेवस्था नै छैन गाम-घरसँ अबै छैथ, परिवारिक-समाजिक लोक भेने बाट-घाटमे किछु विलम हेबे करतैन। तैबीच पहिने अपन उपस्थिति रजिष्टरमे दर्ज कराएब जरूरी भेल आकि नियत समैमे काजपर जाएब भेल? श्यामलाल बाबू समस्याक जड़ि तँ पकैड़ लेलैन मुदा हौहैट-कलकैल जकाँ समस्या विचिया गेलैन। विचियाइते उरकुसी लगल जकाँ मन चुलचुलए लगलैन। एक दिस देखैथ जे काजक दुआरे हाथ खाली अछि आ दोसर दिस देखैथ जे हाथक दुआरे काज खाली अछि। कियो मासक दरमाहा एक दिन बैसि मासो दिनक उपस्थिति दर्ज कऽ मासो दिनक कमाइ पबिते अछि। तैठाम उपस्थितिक कोन महत रहल। खैर ई जेकर भेल ओ तेकर भेल, अपन बुझह, अपन जानह। मुदा अपनो तँ किछु एहेन प्रश्न ऐछे। आब कहू जे विद्यालय अबै छेलौं बाटमे मोहन भाय बजारक एकटा टटका घटना सुनबैत कहलैन- “श्याम भाय, बिसैर जैतौं तँए अहाँकेँ कहब जरूरी अछि। अहाँ ठेकान करबै आ फेर साँझमे दरबज्जेपर बैसि दुनू भाँइ बतिआ लेब।” जेकर चलैत पनरह मिनट विलम भऽ गेल। फेर मन घूमि कारखाना दिस गेलैन जैठाम मिनट-घड़ी जोड़ि आवाजाहीक हाजिरी होइए। मुदा तँए कि ओहन नै अछि जे कोनोमे आइती आ कोनोमे जाइतीक हाजिरी नै होइए? सेहो तँ ऐछे! मुदा हम तँ विद्या मन्दिरक पुजेगरी छिऐ। विचार तँ करए पड़त। मुदा विचारो करब तँ असान नहियेँ अछि। हँ से तँ नै अछि मुदा अपनो भरि जँ नै करब तँ कोन मुहेँ धरमराज लग ठाढ़ भऽ स्वर्गक फाटक खोलबाएब। मुदा बाटो तँ तेहेन अछि जे भोथिआइए जाइ छी। तखन? चोटे मन उनैट अपन पिताक चलौल परिवारपर गेलैन। घरसँ बाहर धरिक अपन समए बनौने छला जे भिनसुरका उखराहामे काजक जेते समए बाधित हएत ओकर भरपाइ बेरूका उखराहामे कऽ लेब। मुदा विद्यालय तँ से जगह नै छी दस बजेसँ चारि बजे धरिक छी। जहिना बदाम-केराउक भूजा पथरा कऽ आरो बेसी सक्कत भऽ जाइए तहिना श्यामलाल बाबूक मन सेहो पथरा गेलैन। पथराइते मनमे फुरलैन, अपन मुँह तखने ऊपर उठत जखन नीक फल गाछक डारि पकैड़ उठाएब। जँ से नै उठाएब तँ काटल गाछ वा डारिक अशे केते। मन जेना थीर भेलैन। थीर होइते विचार ई भेलैन जे अखन बच्चा सभकेँ पढ़बैक समए छी, जँ ओकर समए ओहिना जाइ छै तँ दोखी हएब। सोचै-विचारैक सेहो अपन-अपन समए होइ छै। एकटा ओहन होइ छै जे आगूमे काज रहल ओकरा कोन जुतिये-भाँतिये करब आ दोसर होइ छै जे काज आगू औत आकि जे काज बेठेकनाएल रहत, तेकर विचार पहिने करब। ऐठाम दुनू अछि। मुदा एते तँ ऐछे जे एकटा नै केने नोकसान हएत दोसर किछु पछाइतो केने नोकसान नै हएत। मन मानि गेलैन जे पहिने पढ़बैले किलास जेबा चाही। अपन उपस्थिति बोहीमे उपस्थिति दर्ज केने बिना विद्यार्थी सबहक उपस्थिति बोही ऑफिसक टेबुलपर सँ उठा श्यामलाल बाबू किलास विदा भेला। विदा होइते मनमे उठलैन अखन जँ कियो ऊपरका पदाधिकारी आबि जाथि तँ ओ बोही देखि अनुपस्थिते ने बुझता? तखन हुनका लग केना अपन उपस्थ्िाति दर्ज कराएब? समैयो सहए भेल अछि जे एक दिस पैघ-पैघ योजना नष्ट भेल जा रहल अछि आ दोसर दिस, हरसीकार-दिरघीकार छुटने लोक जुरमाना भरि रहल अछि। बिना पाइ-कौड़ीक कोनो काज नै ससैर रहल अछि। काज करै छी दरमाहा पबै छी, परिवार चलैए। मुदा जँ अखन सए-सैकड़ाक पेंचमे पड़ि जाएब तँ ओते परिवारेक बाल-बच्चापर ने पड़त? आन कियो कहैथ आकि नै कहैथ आ कहबे के करता, कोन गर्ज छैन। मुदा पत्नी थोड़े मानती। ओ तँ दुसैत कहबे करती जे तेहेन कोढ़ि छैथ जे जेतबो उचित कमाइ हेतैन सेहो दण्डे-जुरमानामे गमबै छैथ। ओना दण्ड-जुरमानाक जगहो बदैल गेल। तइसँ जे जेते जुर्माना भरनिहार से तेते लब्धप्रतिष्ठ भऽ गेल छैथ। जेतबो ऑफिससँ बोही लऽ किलास विदा होइकाल श्यामलाल बाबूक मन खनहन छेलैन सेहो जेना खरहरा गेलैन। खरहराइते बकार फुटलैन- “हाथक कंगना जँ ऐनासँ देखल जाए तँ ओ आँखिक देखब भेल आकि ऐनाक?” कोठरीक मुँह लग पहुँचिते छात्र सभ ठाढ़ भेल। टेबुल लग अबिते दुनू हाथ उठा सभकेँ बैसबैत श्यामलाल बाबू बजला- “बाउ, रस्ता-बाटक घुच्चीमे घुचिया गेलौं तँए थोड़ समए घुचिया गेल। तइले तोँ सभ दुख नै करिहऽ। दू घण्टीक बीच जे समए बँचत तइमे तोरा सबहक हाजिरी बनेबऽ। आइ तँ सोम दिन छिऐ, पहिल घण्टी चित्रकले हेतह किने?” एक स्वरमे छात्र दिससँ उठल- “हँ।” मुदा पैछला बेंचपर सँ अवाज आएल- “नीके भेल नै तँ औझुका हाजिरी कटिये जइतए।” कुरसीपर नीक जकाँ श्यामलाल बाबू बैसलो ने छला कि अगिला बेंचक पहिल छात्र अपन ड्रॉईंग-कॉपी नेने पहुँचल। कमल फूलक चित्र बनेने छल। ओना श्यामलाल बाबूक मन चौचंग रहबे करैन। चौचंगक कारण रहैन जे एक दिस समए कम देखैथ, दोसर दिस छात्रक संख्या बेसी देखैथ, तैपर पैछला काज सेहो बेसियाएल देखैथ। मुदा मनमे एकटा युक्ति फुरलैन। फुरलैन ई जे सांगोपांग निरीक्षण-परीक्षण नै कऽ देखि-देखि कऽ खाली टीक लगा देबै। मुदा लगले भेलैन जे नीक-बेजए दुनूमे टीक लगाएब तँ आरो भयंकर गलती हएत। किछु करैत किछु नै बनैत देखि विचारलैन जे नीक हएत ओहिना एक-एक नजैर देखि आगूक सवक संगमे जोड़ि देब। तखन एतबे ने हएत जे काज दोबरा जाएत। मुदा उपैए की? ओहुना तँ लोक करिते अछि जे काज बेसी रहने देहमे पानि चढ़ा सम्हारैक कोशिश करिते अछि। जँ से नै सम्हरत तँ अगुएलहा काजकेँ सम्हारैत पछुएलहाकेँ खण्ड काटि आगू दिस बढ़बैत जाएब, जइसँ एक दिनक बदला दू-तीन दिनमे काज पुड़िये जाएत। मनमे सबुर भेलैन। नीक जकाँ श्यामलाल बाबू असथिरो ने भेल छला तखने अभिराम अपन ड्रॉईंग-कॉपी आगू बढ़ौलक। हाथमे कॉपी लैत श्यामलाल बाबू निहारए लगला। चित्रक बगलमे ‘कमल फूल’ लिखल। मुदा चित्र देखि मन नाचि उठलैन। नाचि ई उठलैन जे कमलो फूल तँ रंग-रंगक होइए। एकटा ओहन होइए जइमे पंखुरी-दल कम होइए, दोसर एहनो तँ होइते अछि जे कोनो शत कमल तँ कोनो सहस्र कमल सेहो होइत अछि। तैसंग ईहो तँ होइते अछि जे कोनो शुभ्र कमल तँ कोनो लाल कमल तँ कोनो नीलो कमल तँ होइते अछि। तेतबे किए! कमला धारो तँ बहिते अछि। पानिक कमल एकरंगा होइए मुदा ऐठाम तँ से नै बेराएल अछि। सोझहे ‘कमल फूल’ लिखि देने अछि। ई तँ फुटौने नै अछि जे जलकमल छी आकि थलकमल छी? दुनू कमल रहितो चालि-प्रकृतिमे अन्तर छइहे। अन्तर ई छै जे जलकमल जँ एकरंगा होइए चाहे उज्जर, लाल नीले किए ने हुअए, मुदा थल कमल तँ तीनरंगो होइते अछि। ओना तीने रंग किए कहबै, बहुरंगो तँ कहले जेतै। बहुरंगा ई जे जखन भोरमे थलकमल कलीसँ कलियए लगैए तखन उज्जर रंग धारण केने रहैए मुदा जेना-जेना सुर्जक किरिण आगू मुहेँ ससरैए तेना-तेना ओकर उज्जरपनोमे लाली आबए लगै छै। बाल-किरिण जकाँ बाल-रंग अबैत गढ़ियए लगैए। हल्लुक लाल, गुलाब लाल अड़हुल लाल आ आल लाल होइत लाल कमल भाइए जाइए...। एक तँ ओहुना कोनो ओझरीमे पड़ने मनक रस्ता ओझरा जाइ छै तैपर तँ आरो श्यामलाल बाबूक मन ओझराइते रहलैन। कॉपी देखि किछु बजला नै। बजैक पाछू दोसर-तेसर सवाल उठैक डर भेलैन। डरो केना ने होइतैन, कम समैमे अधिक काजक तँ सूत्रे बदैल जाइ छै। अभिरामकेँ कॉपी बढ़बैत कहलखिन- “बौआ, चित्रकारी तँ नीक केने छह, मुदा जइ ढंगे केने छह, ओकर बारीकी देखैक अखन समए नै अछि, तँए एकरा राखह। निचेनमे देखबह।” कॉपी लैत अभिराम अपना जगहपर आबि बैसल। दोसर कॉपी शरबनक, हाथमे लैत श्यामलाल बाबू निहारए लगला। ‘अपराजित फूल’ बगलमे लिखल। फूल देखिते मन नचलैन। नचलैन ई जे अपराजितो तँ केते तरहक होइए। एकमुखी, तीनमुखी, पँचमुखी। तैसंग उजरो होइए आ कारियो होइते छै। जहिना अभिरामक कॉपी देखि श्यामलाल बाबू बाजल छला तहिना शरबनोकेँ कहलखिन- “बौआ, चित्रक तँ नीक चित्रण केने छह मुदा ओते परखैक अखन समए नै अछि, अखन राखह दोसर दिन देखबह।” कॉपी लऽ शरबन अपन जगहपर बैसलो ने छल आकि तेसर- गिरधरक कॉपी श्यामलाल बाबूक हाथ पड़लैन। विचित्र रूप बनल चित्र। पँजरामे लिखल ‘गामक शकल सूरत।’ शीर्षक पढ़ैथ आ देखैथ तँ कोनो ताले-मात्रा ने मिलैन। शीर्षककेँ नीक मानि लेलैन मुदा वेदरंग वेदचित्र देखि मनमे उठलैन जे जहिना कोनो गरीब लोक अपना बेटीक नाओं ‘लछमी’ आ बिनु पढ़ल-लिखल लोक अपन बेटीक नाओं ‘सरस्वती’ रैख लइए, तहिना अछि। घड़ी दिस नजैर देलैन तँ समए ससरल देखलैन। मुदा जाबे घण्टी नै बजल ताबे तक तँ समए ऐछे। नजैर खिड़ा देखलैन तँ बूझि पड़लैन जे केतौ ढिमका-ढिमकी अछि तँ केतौ चौरस, केतौ खादि जकाँ अछि तँ केतौ डाँरि खींचल। खेतक आड़ि-धुर छी आकि कोनो धार-धुर? घुड़छीमे श्यामलाल बाबूक मन घुड़िछिआ गेलैन। फेर लगले मनमे भेलैन जे आन गोरे फूल, पात, फल इत्यादिक चित्र बनबैए आ ई किए एहेन गामेक शकल-सूरतक चित्र बनौलक! अपनो तँ कहियो एहेन बात बजलो ने छेलौं तखन किए बनौलक? पुछलखिन- “बौआ, एहेन चित्र बनाएब केना सीखलह?” जेना गिरधरक ठोरेपर रहै तहिना बाजल- “सरजी, परसू रातिमे बाबा कहलैन।” बाबाक नाओं सुनि श्यामलाल बाबू तरतम्य करए लगला। तरतम्य ई करए लगला जे ने कोनो संगी-साथीक नाओं बाजल आ ने दोसर-तेसर शिक्षकक। बाबाक नाओं कहैए! तैबीच घण्टी बजल। हाँइ-हाँइ कऽ रजिष्टर खोलि हाजिरी लिअ लगला। साढ़े चारि बजे जखन विद्यालयसँ श्यामलाल बाबू घर दिस विदा भेला तखने मनमे गिरधरक बात एलैन। मनमे अबिते सोचलैन जे जँ पहिने अपना घरपर चैल जाएब तखन दोसरो-तेसरो एहेन काज उपस्थित भऽ जाएत जे फेर ई काज पछुआ जाएत। तइसँ नीक जे पहिने गिरधरेक घरपर पहुँच बूझि लेब नीक हएत। घरक रस्ता छोड़ि गिरधरेक संग विदा भेला। गिरधरक बाबा- सुबल लाल- दरबज्जेपर रहथिन। श्यामलाल बाबूकेँ देखिते गिरधरकेँ कहलखिन- “बौआ, पहिने आँगन जा माएकेँ चाह बनबए कहुन आ अपने लोटा-गिलास अखारि कलक टटका पानि नेने आबह।” अपन आगत-भागत देखि श्यामलाल बाबूक मनमे उठलैन जे धड़फड़ा कऽ पहिने अपन प्रश्ने नै राखब। कुशल क्षेम हेबे करत, ताबे गिरधरो निचेन भेल रहत। ओकरे अगुआ किए ने प्रश्न उठाएब। दू गिलास पानि एक गिलास चाह पीला पछाति श्यामलाल बाबू गिरधरकेँ कहलखिन- “बौआ, कनी अपन ड्रॉईंग-कॉपी लाबह ते।” अपन ड्रॉईंग-कॉपी गिरधर आनि आगूमे रैख देलकैन। ऊपरका पन्ना उल्टा, सुबल लालक आगूमे रखैत श्यामलाल बजला- “बच्चा एहेन चित्र बनौने अछि जे नीक जकाँ अपनो ने बूझि पाबि रहल छी।” पोताकेँ अपन कहल बात सुबल लालकेँ मन पड़लैन। कॉपी उठा देखलैन तँ बूझि पड़लैन जे जहिना कहने छेलिऐ तहिना हू-बहू चित्र बनौने अछि! मन खिललैन। खिलते विहुँसलैन। विहुँसिते बजला- “मास्सैव, केहेन बढ़ियाँ तँ चित्र सचित्र बनले अछि तखन विचित्र की?” एक तँ ओहिना श्यामलाल बाबूक मन चित्र देखि चितराएल रहैन तैपर सुबल लालक समर्थन देखि आरो चितिर-बितिर भऽ गेलैन। मनमे घमर्थन जगलैन। घमर्थन ई जे सुबल लाल साधारण पढ़ल-लिखल गिरहस्थ छैथ, मुदा अपने तँ से नै छी, एक तँ बी.ए. पास केने छी तैपर दिनचर्यो तँ पढ़ले-लिखलक अछि, केना बाजब जे नीक जकाँ नै बुझलौं। अपनाकेँ समगम करैत श्यामलाल बजला- “किछु तँ नजैरपर चैढ़ रहल अछि, मुदा किछु चैढ़े ने रहल अछि।” बजैक वेगमे श्यामलालक विचार भँसियाइत जहिना कोनो वस्तु धारामे भँसि जाइए तहिना आगू बढ़ि गेलैन मुदा लगले बाजबक प्रवाहकेँ मनक छोड़सँ खिंचलैन। छोर खिंचैक कारण भेलैन जे जँ कहीं सुबल लाल पुछि दथि जे की सभ नजैरपर चढ़ल आ की सभ नै चढ़ल। तखन तँ आरो जड़ि-तड़ि मुसरा नेने उखैर जाएब! मनमे अबिते जेना मुँहक सुरखी विधुआ गेलैन। मुदा संयोग नीक रहलैन जे सुबल लाल से नै पुछि, बजला- “मास्सैव, पहाड़, समुद्र, धरती, पताल, अकास सभ मिलि जे एकटा विराट सूरत बनल अछि, सएह तँ छी।” जहिना पोखैर वा धारक अथाह पानिमे खेलाड़ी उगी-डुमी खेल खेलैए, आ जखन उगि पकड़ा जाइए आ डुमबए लगै छै तखन डुमैसँ नीक हरदा बाजि अपने चोर बनि जाइए तहिना श्यामलालक मनमे भेलैन। मुदा लगले मन कहलकैन अनेरे मनकेँ हारि मनबा रहल छी। ई विचारक दोख छी। नान्हिटा बात अछि जे सुबल लाल हमरासँ जहिना उमेरमे बेसी छैथ, तहिना जिनगियोक भिन्न आनन-कानन तँ छैन्हे। जेहेन जिनगी रहत तहने ने नन-नन्दन बोन-झाड़ हएत। जे सोभाविको ऐछे। तहूमे ऐठाम कियो तेसर थोड़े अछि जे अनका देखि संकोचो हएत। बजला- “चाचाजी, हम भलें शिक्षक छी, वृत्तिये शिक्षा-दीक्षासँ जुड़ल छी, मुदा कहलो तँ जाइते छै जे जेतए ने जाए रवि, तेतए जाए कवि आ जेतए ने जाए कवि, तेतए जाए अनुभवी। जहिना गिरधरकेँ कथारूपमे गामक शकल-सूरत बुझा देलिऐ, तहिना एकबेर आरो दोहरा दियौ।” श्यामलाल बाबूक जिज्ञासा देखि सुबल लालक मनमे उठलैन, जे जिज्ञासा श्यामबाबूक छैन ओकरा मुहोँमुह पुराएब कठिन अछि। दू मुँहक बात आ दू मनक विचार छी। एके जिज्ञासाक भिन्न-भिन्न रूप होइ छै। एक भूख ओहन होइ छै जखन जठराग्नि आत्मा जरबए लगै छै, आ दोसर एहनो तँ होइते छै जैठाम खानापुरी होइए। मुदा लगले मनमे उपकलैन जे एक-एक रेखा आ रेखासँ रेखाएल शकल-सूरतक चर्च करैत चलब, जेतए बुझैमे नै औतैन तेतए प्रश्न उठौता, जँ से नै उठौता तँ बूझब जे जिज्ञासाक अनुकूल मन मन्दिर भऽ रहल छैन। चित्रकलाक कॉपी दुनू गोरेक बीचमे पसारि आँगुरसँ देखबैत सुबल लाल बजला- “ई समुद्र भेल, समाज रूपी समुद्र। अथाह जलराशिक भण्डार। अहूमे जुआर उठै छै, जे हवा-पानिकेँ अपना पेटसँ निकालि अकासमे पसारैए, जइसँ बर्खाक संग तूफानो उठै छै। जइसँ पानि आ हवासँ धरती भरि जाइ छै।” आगूक बात सुबल लालक पेटेमे रहैन आकि बिच्चेमे श्यामलाल बाबू दोसर रेखापर आँगुर रखैत पुछलखिन- “ई?” पहिने सुबल लाल रेखाक सूरत देखलैन फेर श्यामलालक सूरत मिलौलैन, अपन सूरत मिलबैत बजला- “ई धार भेल। जेकरा जीवनो-धार कहि सकै छिऐ, जे वैदिक धार कहियो कल-कल हँसैत, प्रवाहित होइ छल ओ आब मरण भऽ गेल। तँए पानिक जगह बाउल उड़ैए।” ‘पानि-बाउल’ सुनि श्यामलाल बाबूक मन सुमैर-धुमैर कऽ घुमड़लैन। कॉपीपर सँ नजैर उठा सुबल लालक नजैरपर फेकलैन। विहुँसैत मन खिलैत रंगाएल चेहरा देखि बजला- “पानियेँ सँ बाउल आ बाउलेसँ ने पाइनो होइए।” श्यामलाल बाबूक प्रश्न सुनि सुबल लालक मन एक डेग आगू बढ़लैन। बढ़िते बजला- “यएह तँ दुनियाँक चकरचालि छी जे एक दिस वएह बाउल पानिक सतह बनि ऊपर जल बरसन करैए जइसँ धरतीक कोखि जुड़ाइ छै आ दोसर दिस धरतीकेँ मरू बना मरूआ उपजबैए।” सुबल लालक बात सुनि श्यामलाल बाबू ठहाका लगा हँसला। जहिना कनितोकाल मन बजैए, तहिना ने हँसितोकाल बजैए। श्यामलाल बाबूक हँसी बाजल- “ई तँ भेल धरती, समुद्र। मुदा दुनूक जे जोड़ अछि से...?” श्यामलाल बाबूक बात पकड़ैत सुबल लाल बजला- “जहिना अकासमे चन्द्रमुखी, सुर्जमुखी फूल फुलाइए तहिना धरतियोमे ज्वालामुखीक लावो-फूल तँ फुलाइते अछि। जेहेन फूल फुलाएत तेहने ने गामक शकल-सूरत बनत।” जहिना पेट भरलापर ढकार बनि हवा निकलैए, श्यामलाल बाबूक मन तहिना भरि मन ढकरलैन। बजला किछु ने, सूर्यास्तक समए सेहो भऽ गेल छल। मुदा जहिना अर्द्ध-लघुक अवस्था, अर्द्ध-कथाक अवस्था आ अर्द्ध-गीतक विरह अवस्था होइए तहिना श्यामलालो बाबूकेँ भेलैन। मुदा घरोपर, परिवारोमे तँ आन दिनक अपेक्षा अनदेशा होइते हेतैन। मनमे अबिते बजला- “अबेर भऽ गेल, दोसर दिन फेर गप-सप्प हेतइ।” अपन मर्यादा निमाहैत सुबल लाल बजला- “आब तँ बाट-बटोहीकेँ ठौर पकड़बा बेर भऽ गेल, तखन जाएब केना?” मुस्की दैत श्यामलाल बाबू बजला- “केतौ अनतए जाएब जे हराइ-भोथियाइक सम्भावना रहत। अपन घर छी, कनी अबेर-सबेर पहुँचब सएह ने।” 20 अक्टुबर 2014, शब्द संख्या- 2596 जितिया पावैन ओछाइनपर जीतलाल बाबा पड़ले-पड़ल अपन दिन-दुनियाँक रेखागणित मने-मन बनबैत रहैथ, तखने बारह बर्खक पोता ‘भागीरथ’ जे हाई स्कूलक नअम वर्गमे पढ़ैत, देहपर दहिना हाथ रैख आस्तेसँ हिलबैत बाजल- “बाबा! बाबा!! उठू ने आइ पावैनक दिन छी, किए एते अबेर तक सूतल छी!” ननमुँह बच्चा भागीरथ नै बूझि पेने छल जे जितिया पावैन बबोकेँ बूझल हेतैन। ओ आने बच्चा जकाँ बुझैत जे हमरेटा बूझल अछि तँए दोसरोकेँ कहि बुझा दिऐ। बिना कोनो करोट फेड़ने पड़ले-पड़ल जीतलाल बाबा बजला- “पावैन! कोन पावैन छी हौ बौआ?” जहिना गुरु पेला पछाति गुरुआइ बढ़ै छै तहिना भागीरथोक मनमे कौल्हुके पावैनक छुट्टी गुरुजीक मुहेँ सुनि जगल रहइ। टटके ज्ञान तँए स्वादिष्ट हेबे करत। जखने जीहपर सुआद औत तखने ने मन हरखित हएत। भलें तेतरीक खटमिठी सुआद पाबि मन तल-बीचल किए ने हुअए, आकि अमरा पाबि सोलहन्नी खट्टे! चाहे पाकल आम पाबि सोलहन्नी मीठे किए ने हुअए। मुदा जीतलाल बाबाक मनमे से सभ नै भेलैन, भेलैन ई जे दुधमुँह बच्चा पावैनक खुशीमे अछि। मुदा ई कहाँ देखियो कऽ बूझि पबैए जे पाबन दिन छी। किछु पबैक अछि। चारि-आठ आनाक दबाइ-गोटी खैरातमे बँटबारा हौउ आकि दू-चारि किलो चाउर-गहुम, आकि बाढ़िक समए सेर-आध-सेर चूड़ा आ कनमा भरि गुड़, लेबालक ढबाहि लैग जाइए, तहिना ने धर्मक पावैनो होइए। धर्मस्थलक रूपमे गामक खेत बनत, खेतक सुअदगर अन्न-पानि, फल-फूल इत्यादि बनत, धर्मक विचार बिलहाएत। जहिना भोजैत भरि मन परसत तहिना भोजी सेहो भरि मन खेबो करत किने, से दिन छी। मुदा से थोड़े बुझैए। तहूमे केना ऐ बच्चाकेँ नाकारात्मक बात कहबै। तेरह-चौदह बर्खक बच्चाकेँ केना शुभ-अशुभ दुनू बात कहबै जे बौआ बाढ़िक पनरह दिन ओहन भेल जे मनक बिसवास समापते जकाँ भऽ गेल रहए जे बाढ़िक उगरासक पछाति परिवारक सभ जीवित बँचल रहब की नै? केना कहबै जे भुमकममे घरे देहपर खसि पड़ल रहए। अपन सोग-पीड़ा किए अनेरे पोताकेँ पावैनक दिन कहबै। मुदा लगले मन हूमरलैन, हूमरलैन ई जे जँ अपन सोग-पीड़ा नै कहबै, तखन ओ वंशक वंशावलीक जे सोझ रस्ता बनल आबि रहल अछि ओइमे कटारियो बनत किने! देहसँ श्रम करैबला वंश श्रमक चोरि जान-अनजानमे काइए रहल अछि जइसँ जिनगीक धारा बदैल रहल छै, तेहेन स्थितिमे ओहनो तँ असंख्य लोक छैथे जे अपन पुरुखाक जीवन-धारक बीच अपन धार मिलबैत अगिला पीढ़ी लेल सत्यम् शिवम् सुन्दरम्-क धार फोड़ि आगू धकेले रहल छैथ। मुदा कोनो बातो विचारैक तँ जगहो होइते छै, ऐठाम दूधमुहाँ बच्चाकेँ की कहबै, केते कहबै? पोखैर-इनारक पानि जकाँ जीतलाल बाबाक मन रसे-रसे थीर हुअए लगलैन। नीक जकाँ मनकेँ थीर करैत थारी-बाटीक पानि जकाँ जखन थीर बूझि पड़लैन तखन बजला- “बौआ, पावैनक ओरियानक की सभ विचार करै छह?” जहिना कोनो चोरनुकबा पिता अपना अवोध बच्चाकेँ सिखबैत जे सोर पाड़निहारकेँ बाटपर जा कहुन जे बाबू नै छैथ, आ ओ बच्चो ओहिना जा कऽ कहैत जे बाबूजी कहलैन हेँ कहुन आँगनमे नै छथिन। तखन केकर गलती भेल? के केकर गलती पकड़त? बाप पकड़त बच्चाक आकि बच्चा पकड़त बापक! मुदा से जगहे नै बनल। अबोध बच्चाकेँ सबोधैत बेवहार नै करब तँ ओकरामे सबोध-शक्तिक विचार केना उठत आ बिनु विचार उठने जिनगीक बाट भोथियेबे करत किने। ओहुना पनियाएलसँ पनियाएल लोहाक औजार माटिपर किछु दिन रहने भोथिया जाइ छै मुदा ईहो तँ होइते छै किने जे मुँह मारि खाइत-खाइत पनिगरो-धरगर भोथा जाइ छै, खैर जे से...। बबेक प्रश्नकेँ उनटबैत भागीरथ बाजल- “बाबा, अहाँ अखन तक ओछाइनेपर छी, अहीं ने कहब जे की सभ हेतै?” पोताक जिज्ञासा पाबि, किछु विचार करैक समए बनबै दुआरे अपने कनी पाछू घुसकैत जीतलाल बाबा बजला- “बौआ, अखन ओछाइनेपर छिअ, मूड फ्रेश नै भेलह हेन, उठै छी मुँह-हाथ धोइ कऽ चाह-ताह पीब पान खेबह, तखन ने चालैनमे चालल तीसी जकाँ मन चिकनेतह। जखने मन चिकनेतह तखने तोहर प्रश्नक उत्तर देबह।” कहि, देह परहक चद्दरि उतारि दू झाड़नि चद्दरिमे लगा अलगनीपर रैख नित्यक्रिया दिस बढ़ैक उपक्रम जीतलाल बाबा करए लगला। मुदा जहिना विपैत एलापर देह छिनगि जाइ छै तहिना मनोमे एने तँ मन छिनगिते छै, तहिना जीतलालो बाबाक मन छिनगलैन। छिनगलैन ई जे आमक मासमे आमोक ओगरवाहि आ जेठ मासक रौदोक जरौनसँ बँचैले गाछमे मचकी लगा जहिना वृन्दावनमे गोपी-कृष्ण कदमक सघन छाहैरक गाछ, जेकर फूलो घुंघरू पहिरने रहैए आ पत्तोक नमगर-चौड़गर मुँह-कान रहै छै, तैपर झूलै छला, तहिना ने बारहो मासक बारहो बहिनियाँ गड़ाजोड़ी कऽ बरहमासा झूलि-मिलि गबै छेलौं- ‘आसिन हे सखी आस लगाओल...।’ मन ठमकलैन, एक तँ ओहिना आसिनमे कुमहरो कुम्हराए लगैत अछि, धानो कुम्हराए लगैत अछि जेकरा देखि-देखि अनेरो लोकोक मन कुम्हराए लगै छै! तैपर सँ जितिया सन पावैन? एक तँ ओहुना बाल-बोधक पिपाशु पंछीक पिपाशु मन, तैपर ओकर आँइखो तँ हमरे आँखिपर ने हेतइ। जँ एकोरत्ती ढिली-सिली करब तँ तेकरा देखि बीचमे किछु बाजि ने दिअए। तँए जइ काजमे जेते समए आन दिन लगै छल तइमे तइसँ कनियोँ बेसी नै लगए। जखने घटी-बढ़ी हएत तखने कमलाएल डण्टी डोलबे करत। तँए ओही गतिये निवृत भेला। अपन क्रियासँ निवृत बाबाकेँ देखि भागीरथ सेहो अपन काज-भारक गति-विधिक परीछा दइते अपनो बिसवासू रूप देखैत तँए मनो बुलंद। होइतो अहिना छै जे शिकारक खेतपर जहिना सभ शिकारीक बुलंद नजैर अँटकल रहैत तहिना भागीरथोक मन बुलंद। जीतलालो बाबाकेँ चाह-पान चढ़िते चेहरा चहचहेलैन। बजला- “बौआ, पावैनक दिन छी! पावैनक विधि भोरहरबेसँ अँगना-घर नीपैक प्रक्रियासँ शुरू भऽ जाइ छै, तखन काजक बीच सोचै-विचारैक समए नै होइ छै, काजक अपन गति-विधि होइ छै। जेकरा पकैड़ लोक चलैत आबि रहल अछि।” जीतलाल बाबाकेँ आगू बजैक बात पेटेमे रहैन आकि बिच्चेमे भागीरथकेँ भेलै जे पावैन शुरू भऽ गेल, हम तँ बाबाक बोल सुनै पाछू पछुआएल छी! सबहक पावैन छिऐ, सभ मिलि करत, खाएत, खुशी मनाएत, आकि एक गोरे करै पाछू बेहाल, दोसर खाइ पाछू बेहाल आ तेसर कुम्हारक चाकपर बात गढ़ैक पाछू बेहाल रहत तखन केना भेल। भागीरथक हाव-भावसँ जीतलाल बाबाकेँ बूझि पड़लैन जे अपन उपस्थिति भागीरथो दर्ज करबए चाहैए। मुदा करत की से बूझल छै? जखन बूझल नै छै तखन तँ बाल-बोध जकाँ देखौंस करैमे अनकर काजे बरदौत। मनमे नचिते रहैन आकि बिच्चेमे भागीरथ टोकलकैन- “बाबा, गप-सरक्का छोड़ि दियौ, साँझू पहर निचेनसँ बुझा देब।” भागीरथकेँ काजक धड़फड़ी देखि बाबाकेँ बूझि पड़लैन जे गेल महींस पानिमे छोर-तोर नेने! अखन सम्हरै-सम्हारैक समए अछि, अखन जँ नै सीखत तँ जिनगी भरि अन्ट-सन्ट करिते रहत। मुदा ओकरा बौस कऽ बुझाएबो तँ कठिन अछि। अपन दादी-नानीक वौसैक गीत मन पड़लैन। मन पड़लैन दुनियाँक ओ स्वरूप जे समैक संग चलैत अपन रंगो-रूप परिमार्जित करैत अछि। कहलखिन- “बौआ, जखन उठि कऽ विदा हुअ लगिहऽ, तखन एकटा काजक विधि तोरो देखा देबह ओ अनिहऽ।” पावैनमे अपन सहभागता पाबि भागीरथक मन कनी ठहरल। मुदा औगुताएल रहबे करए। सोभाविको छै सभ चाहैए, नीक काजमे बेसी भागीदारी निमाही। पड़ाइक बाट पकैड़ भागीरथ बाजल- “बाबा, अखन फूल लोढ़ै-बेर छै, अखन जे बरदाएब तँ फूले विला जाएत।” भागीरथक विचार जेते हल्लुक तेते भारियो। हल्लुक ई जे बाबा अपने तँ जानदार दइबला देवी-देवताक फूलक रंग-रूपक अन्तर बुझै छैथ मुदा बाल-बोध ‘भागीरथ’ तँ से नै बुझैए सहरगंजा फूल बुझैए, जे मौसमी भेटै छै, लोढ़ि-बीछि कऽ आनि पूजा करए चाहैए। बाबाकेँ सुतरलैन, बजला- “सएह ने हमहूँ कहै छिअ।” बाबाक बातसँ, जहिना बच्चाक ‘म्याँउ-म्याँउ’ सुनि बिलाइयो-बच्चा लगमे आबि बैसि जाइए, तहिना भागीरथो नुरसुराए लगल। बबोकेँ बौसब जरूरी बूझि पड़लैन। कहलखिन- “दहिना हाथ लाबह।” बाल-बोधक जेहने कानब तेहने हँसब। एक पाँती सीता विलाप दोसर राक्षसिनीक किरदानी। मुदा से तँ तुलसी बाबा ने बुझै छथिन, बाल-बोध थोड़े बूझत। हाथपर हाथ रैख जीतलाल बाबा मंत्र जकाँ चाटपर चाट झाड़ैत दादी-नानीक दुहाइ दैत बजला- “अट्टा-पट्टा बौआकेँ सातगो बेटा। एकटा जेतै घास छीलए, एकटा जेतै भैंस चरबए, एकटा जेतै पोखैर नहबैले, एकटा जेतै खेनाइ दइले, एकटा जेतै दूध दूहए, एकटा जेतै दही पौड़ए, एतए-से चलिहो बाबा, बौआ मँहमे घुटुर-घुटुर।” ओना बाबा भागीरथकेँ बुझबै दुआरे पढ़ि देलखिन, मुदा पछाति अपने भेलैन जे ई पढ़ब तँ दादी-नानीक छिऐन। मुदा फेर भेलैन जे जे दादी-नानीसँ छूटि गेल होइन तेकर भरपाइ तँ पुरुखे ने करत। मुदा ई तँ बाल-बोधक बात भेल जे भागीरथ तँ मध्यमे कोटिक अछि। तँए मार-सम्हार तँ करैए पड़त। तैबीच भागीरथ दोहरबैत बाजल- “बाबा, सिंगहारक सभटा फूल लोक बीछि नेने हएत। गुलाब आब केकरा के तोड़ए दइ छै, सभ कहै छै हजार-रूपैआ पूजी लगा तोरेले रोपने छियौ।” जहिना बाढ़िक पानिसँ दाबल ओ धरती जे सदीओसँ पानिक तरमे सड़ैत रहल आ संयोग पाबि ओ पानिसँ ऊपर भेल, ओहेन धरतीक फूल- कुमहरक फूल-सँ ऐ पूजाक पावैन हएत! विहुँसैत बाबा बजला- “औझुका जे पावैन छी ओ कुमहरक फूलसँ हएत। तइले एते धड़फड़ किए करै छह। अपने चारपर कुमहरक लत्ती फुलाएल अछि।” आँखि उठा भागीरथ छानिपर कुमहरक फूलो आ फुलबतियो आँगुर देखा-देखा गनि लेलक। जीतलालो बाबा देखैत रहैथ। आँगनमे दादीकेँ आँगुरसँ कुमहरक फुलबतिया देखबैत भागीरथ बाजल- “दादी, कुमहर फड़ल!” जहिना शुभ काजमे ‘राम-राम’ कहब अशुभ बूझल जाइ छै तहिना आँगुरसँ बतिया देखाएबकेँ सेहो बूझल जाइ छै। भागीरथक बातो आ काजोकेँ देखि दादी जरि कऽ कोयला-कोइली भऽ गेली मुदा बजली किछु ने। जी-दाँत-ठोर कुटि-पीसि कऽ रैख लेली। रखबो केना ने करितैथ एक तँ जितिया सन पावैनक दिन, तैपर जागरणक समए, अपन कोखिक सन्तानकेँ जइ सीमा तक कहि-सुनि सकै छिऐ, तैबीच बेटा-बेटीक सीमानक बीच तँ किछु आड़ि पड़िये जाइ छै। मुदा से सभ दादीकेँ मनमे नै एलैन। एलैन एतबे जे जहिना अपने ठोराहि छी तइसँ कि कम पुतोहुओ-जनी छैथ! जँ अखन अशुभ बात मुहसँ निकालब तँ ओहो थोड़े चुपेचाप बरदाश करती। तहूमे बुड़हा सोझहेमे छथिन, दोखी बनि जाएब। दादीक संकल्प तँ ओही बेटा-पुतोहु आ पोता-पोती ले ने छैन। भलें तइमे भुमकमित सामाजिक परिवेशमे बौआइत-ढहनाइत समाजिक-परिवारिक जिनगीक सड़लोसँ सड़ल मन कहाँ कहै छै जे हमरा पेटसँ कमल नै फूलए-फलकए। मुदा दादीक बिढ़नी सदृश चालि देखि जीतलाल बाबा बूझि गेला जे हो-ने-हो भोजेकालमे ने कहीं दियादी लड़ाइ उठि पटका-पटकी शुरू भऽ जाए आ नौतल पञ्चक चुल्हिमे पानि उझला जाए! भागीरथकेँ सोर पाड़ि जीतलाल बाबा पुछलखिन- “बौआ, एकटा बात नै बूझि पेलिअ जे की कहने छेलह जे अखन फूल नै लोढ़ि लेब तँ विला जाएत?” नव लत्तीक मुड़ी सदृश भागीरथक मन खिलल- “बाबा, कनी थमहू, दादीक मुहेँ सुनने रही।” एक तँ ओहिना दादीक मन खापरिक पनिमरू बदाम जकाँ खरहर रहबे करैन तैपर पोताक मुहेँ ओ बोल सुनि छाती जुड़ि गेलैन। जे पोताक आत्मामे जीवै छी! ओना मुहाँ-मुहीं भागीरथ आ दादीक बीच संवाद नै भेल छल मुदा भागीरथक अवाज तँ दादीक कानमे पड़िये गेल रहैन, भागीरथक मधुआएल अवाजक झलक दादीक हृदए तँ पकैड़े नेने छेलैन। अँगनेसँ बजली- “गज-गज करे गजनती फूल, नअ सए हाथी करे कबुल, तैयो ने भेटै गजनती फूल।” जहिना दूरो-स्थानमे रामधुन भेने साधु अपन धून मिला गबैत बाट चलैत रहैए तहिना भागीरथो दादीक बोलक संग अपन बोल मिलबैत बाबाकेँ सुना देलकैन। मुदा दादियो कि दादी छैथ ओहिना रगड़ी थोड़े गामक लोक कहै छैन। अपन बात जोरसँ दादी बाजि कौआ जकाँ टोहियबैत कनसोह लैत दरबज्जा दिस बढ़ली जे हमर बात बाबा तक पहुँचल की नै? जहिना पोखैर-इनारमे पानिक सोह फुटैत तहिना ने कानोक सोह अछि। ओहीमे ने देखए पड़ै छै जे सोहक पानि केहेन अछि। नीक अछि कि अधला। एकान्त भऽ सुनब तँ दूरोक सुनब आ जँ चौचंग भऽ सुनब तँ लगोक हेरा जाइ छै। तैबीच जीतलाल बाबा भागीरथकेँ पुछि देलखिन- “गजनती फूल की भेल भागीरथ जे विला जाइए?” जहिना अपने बनौने परिवेश बनैए तहिना दादियोकेँ परिवेश बनबैक लूरि छैन्हे। चिलहोरि जकाँ झपैट बजली- “गुलैरक फूल एहेन फड़नमा फूल अछि जे गाछमे फूल रहितो नै भँजियाइए।” भागीरथकेँ जे बात जीतलाल बाबा कहए चाहै छेलखिन तइ बीचमे दादीक विचार बाधक बनि-बनि ठाढ़ होइ छेलैन। ओना भागीरथ लेल बाधक नै साधके छेलै। मुदा बजनिहारकेँ रोकनिहार के, एक तँ पावैनक दिन, तहूमे भिनसुरका जागरणक समए। बात फेकैत जीतलाल बाबा भागीरथकेँ कहलखिन- “बौआ, दादी की ओरियान पावैनक केलखुन हेँ।” जीतलाल बाबाक मुहसँ खसिते सुधिया दादी अधडरेड़ेपर लपकि बजली- “राम-धनीकेँ कोन कमी, जे पावैन नइ हएत। मरूआ चिक्कस घरेमे अछि बाड़ीमे गेनहारी चतलरे अछि तखन पावैन किए ने हएत? ओरियान करब आकि ऐछे!” सुधिया दादी अपन विचारकेँ सरोवर रूपी परिवारमे पानिक ऊपर हिलकोरक उतार-चढ़ावमे दहलाइत देखि सुधि-बुधि बिसैर गेल छेली। होइन जे नाचि-नाचि लोककेँ कहिऐ जे ‘जितिया पावैन बड़ भारी, बाल-बच्चाकेँ ठोकि सुता, अपने पाबी भरि थारी।’ ई तँ अदौसँ लत्ती जकाँ बढ़ैत आबि रहल अछि!! मुदा परिवारमे जखन अपनो छैथ तखन वएह ने जे कहता से करब। तैबीच बलाए टारै दुआरे जीतलाल बाबा बजला- “देखू, अखन गेनहारी सागकेँ जुआनीक लहकी देने हेतै, से कनी ओकरा बेरा-बेरा काटब। जुआनीक लहकीक माने फूल-बीआ। अच्छा एकटा कहू ते साग खोंटै छिऐ आकि हँसुआसँ काटै छिऐ?” जीतलाल बाबाक गोटी सुतरलैन। सुधिया दादी ससैर कऽ अपन काजपर आबि गेली। बजली- “देखियौ, गेनहारीए एहेन साग अछि जे काटलो जाइए आ खोंटलो जाइए।” दुनू बात सुनि बिच्चेमे भागीरथ टभकल- “दादी, दुनू केना हएत? जे काज हाथेसँ हएत तइमे हँसुआ चलबैक की खगता?” ओना जीतलाल बाबाकेँ पत्नीक समए लेब अनुचित बूझि पड़नि। अनुचित ई जे किछु मूल बात भागीरथकेँ बुझा देने आगू नीक हेतै, तैठाम जँ उलफीए बातमे समए चैल जाए सेहो नीक नै। मुदा अपनो मन कहैन ई तँ हमर विचार ने कहैए मुदा ओहो कोन एहेन अनुचित बात बाजि रहली अछि जेकर खगता भागीरथकेँ नै छै? अखुनके संकलित संकल्प ने भागीरथक जिनगीक प्रवाहकेँ गंगा जल सदृश पवित्र बनि धार फोड़त। आकि बुढ़ाड़ीमे मरैकाल जे हाँइ-हाँइ कऽ गोदाने करा बाछी उसरगि देत आकि कण्ठमे कण्ठीए बान्हि देतै तइसँ की हेतइ। देखिनिहार-सुनिनिहार-बजनिहार काते रहथु मुदा जे मरनासन्न छैथ हुनके आत्मा ने दर्दक पीड़ा-बीच एहेन बात कबुल कऽ सकै छैन। मुँहमे जाबी लगा जीतलाल बाबा पोता-दादीक बीचक संवाद सुनए लगला। भागीरथक शब्दक सवाल तँ समाप्त भऽ गेल छल मुदा पूर्ण विराम बाँकीए छल तइ बिच्चेमे सुधिया दादी बजली- “बौआ, तोरा अखन नेनमैत छह, तँए हँसुआ-खुरपीक बात आकि ठोकि कऽ सुतेनाइक माने कथीले सुनबह, अखन कलम-कागजक बात सुनैक समए छह।” ओना दादीक नजैर साग काटैपर चैल गेल रहैन तँए गप-सप्पकेँ बहटारए चाहै छेली मुदा भागीरथो तँ बाले-बोध अछि। बाल-बोधकेँ बौसला पछातिये ने काज करब नीक हएत। नै तँ अनेरे ओसारपर ठुनकैत रहत। जीतलाल बाबा भागीरथक प्रश्न सुनि अपने मगन रहैथ जे बड़-बढ़ियाँ पावैनक जागरणक समए संवाद चैल रहल अछि। सुधिया दादी कनडेरीए आँखिये जीतलाल बाबाक चेहराकेँ देखै छेली जे जँ कनियोँ सह काज करैक भेटत तँ बहाना बना निकैल जाएब। जँ पोता बड़ जोर करत तँ कहबै बौआ, साग काटि अबै छी, तखन ओसारपर बैसि झाड़बो करब आ तोरा कहबो करबह। नै जँ तहूसँ बेसी जोर करत तँ कहबै जे तोहीं सगतोरा पथिया आ हँसुआ ले, मुहसँ कथीले सुनमेँ संगे चल, साग देखा देबौ, काटि लिहेँ। ओना जीतलाल बाबाक मनमे ईहो घुरियाइत रहैन जे पहिने गजनती फूलक चर्च होइ, मुदा तीन मनक बात छी। जहिना बरियाती तीन मन होइए तहिना। तहूमे दू मन एक-भगाह भऽ गेल अछि। दादीक बात सुनि भागीरथ बाजल- “मास्सैव काल्हिए छुट्टी दइकाल कहने रहथिन जे हँसी-खुशीसँ सभ पावैन मनबिहऽ।” पोताक गछारमे पड़ि दादी गछैर गेली जे जेहने जेकर कुल-खनदान रगड़ी रहत तेहने ने तेकर छुओ-पुओ हेतइ। मुदा दादीक मन तेहेन चौचंग भऽ गेल छैन जे अपनो होइन जे बजैमे काज एहेन ने हुअए जे केतौक पजेबा केतौ जोड़ा घरक देवाले बिगाड़ि दिअए। मनकेँ ओरिया कऽ असथिर करैत-करैत असथिर होइत बजली- “बौआ, बेस कहलह, पावैनक तँ दिने वएह होइए जे चौबीसो घण्टा हँसी-खुशी मनाबी। ओना बत-बनौनक कमी अछि ओ तँ कहबे करत जे सुतैकालकेँ जे हँसी-खुशीमे बिताएब तँ नीन कखन औत। मुदा से नै, सुतैक हँसी-खुशी गाढ़ नीन भेल।” एक तँ पावैनक दिन, जइ दिन नियमित परिवारमे सेहो अतिरिक्त बहुत रास नव-नूतन काज आबिये जाइ छै, तैपर बाता-बातीमे समए गमौने पावैनक विहित बाधित हएत। ओहो दिन तँ पावैनक पूर्ण विहितक दिन छी। विचारो तँ ओही विहितक बीच अबैए। मुदा विचारक धाराक पाछू भूमिधारा सेहो फुटै छै आ भूमिधाराक बीच बहैत धाराकेँ सेहो विचारधारा अनुकूल बनबैए। दादीक दहलाइत विचारकेँ जीतलाल बाबा अपना हाथसँ पानिक धफार दैत एकवाहि करए चाहै छला, मुदा बिच्चेमे भागीरथ तेहेन खोंरनासँ खोरि दइ जे दादी अनेरे दहलाए लगथि। भागीरथकेँ इशारा करैत जीतलाल बाबा बजला- “बौआ, दादी अखन ढेनुआर जकाँ सुधरल छथुन, मुदा पहिलुका साग कटैबला बात पछुआ गेलह।” भागीरथ मने-मन विचारिते छल आकि बिच्चेमे दादी चिलहोरि जकाँ अकासेसँ टाँहि देलैन- “बौआ, गेनहारी अदौक साग छी, ठरियाक पूर्वज छी। अपने धरतीपर चतैर जिनगी बितबैत ठरिया बनि ठाढ़ भेल। सभ मासक सागकेँ अपन-अपन नीक-अधलाक गुण होइते छै, मुदा जहिना गेनहारी रानी छी, तहिना मरूओ ने राजा भेल।” जहिना धारमे भँसियाइत नाहकेँ सभ यात्री नै बूझि पबैत जे नाह भँसिया गेल, केतए डुमत तेकर ठेकान नै। मुदा खेबिनिहार तँ बुझिये जाइए, तहिना जीतलाल बाबा बुझलैन जे फेर दुनू भँसिया गेल। जहिना भागीरथ विचारमे दहलाए लगल तहिना दादी पोताकेँ छाती लगौने अथाह समुद्रक जुआरिमे तर-ऊपर करैत खेलए लगली। मने-मन जीतलाल बाबा सोचथि जे ई तँ बानरक करहर उखारब भेल। बानरक करहर ई जे बानर करहर उखारि माथपर रैख दोसर उखारए डुमै छै आकि बिच्चेमे पानिक धफारमे करहर भँसिया जाइ छै। प्रश्नक नागड़ि पकैड़ पाछू मुहेँ धकेलि जीतलाल बाबा बजला- “एना जे सुग्गा जकाँ भरि दुनियाँक बात एकेबेर पोताकेँ सीखाएब तइसँ ओ थोड़े सीखत। पहिने गेनहारी रानीक सोखैर बुझा दियौ।” पतिक बात सुनि सुधनी दादीकेँ अपनो मनमे भेलैन जे अनेरे एक ढकिया बरतन-बासन पसारि अँगना अजवारि लेलौं! गेनहारी रानीक नख-सिख पकड़बे ने केलौं आ मरूआ राजाक सिख-नख पकैड़ लेलौं। पावैने छी जेकरा जे जुड़त से तइसँ करत। तइले केकरो कियो बान्ह-छान करै छै। मुदा विचारेमे दादी फेरि भँसियाइत बजली- “जेकरा जुड़तै ओ माछ-मरूआ करत जेकरा से नै जुड़तै ओ साग-मरूआ करत आ जेकरा सेहो ने जुड़तै ओ जितियाक उपास करत।” जीतलाल बाबाक मन पाछू हटैत विचार देलकैन जे बौराएलकेँ पहिने भरि मन बड़बड़ाइए देब नीक हएत, तँए चुप भऽ गेला। मुदा भागीरथ दादीक भँसियाइत बोल पकैड़ दोहरौलक- “दादी, पहिने सागक संविधान सम्पन्न कर तखन खट्टर कक्काक गैंचीक चर्च करिहेँ। मुदा जितिया पावैनक महत कहनाइ नै बिसरिहेँ।” अपन ऊँचगर आसन देखि सुधनी दादी बताहि भऽ गेली। होशे ने रहलैन जे पावैनक मुड़ी केमहर छै आ नागड़ि केमहर छै। ई तँ अमरलत्ती जकाँ सगतैर मुहेँ-मुँह छै, नागड़ि केतौ छइहे नै। सुतिया कऽ साग लग पहुँच दादी बजली- “बौआ, अखारक फुहार पड़िते गेनहारी अपने उगए लगैए, ओना प्रकृतिकेँ अथाह परकित छै, थाह नै छै, मुदा नमी पाबि गेनहारी धरतीसँ उठैए। बरसात भरिक साग छी। शुरूमे ओ ओते कोमल रहैए जे नहसँ खोंटल जाइ छै, मुदा रसे-रसे जेना-जेना रसाइए तेना-तेना ओकर डारि-पात सेहो सकताइ छै, तखन ओ नहक काजसँ भारी भऽ जाइ छै, तँए हाँसूक खगता होइ छै।” दादीक बात अन्तो ने भेल छेलैन, बिच्चेमे भागीरथ बाजल- “दादी, लगले माछ-मरूआ आ लगले साग-मरूआ कहलीही...? पावैन तँ पावैन छी। एक-चलिया हएत किने।” जहिना आनोकेँ होइ छै जे पचास किसिमक आमक ढेरीमे जइ आमपर जीह गरल रहल, नजैर ओहीपर जाए चाहै छै। भलें ओ ढेरीक तरेमे किए ने हुअए। तहिना सुधनियोँ दादीकेँ भेलैन। नजैरसँ साग बहैट गेलैन आ माछे आगुआ गेलैन। मुदा पैछला सालक जितिया पावैन सेहो बीचमे आबि ठाढ़ भऽ गेलैन। आगूमे ठाढ़ होइते जीहसँ ठोर चाटए लगली कखनो माछक सुआद तँ कखनो सागक कँचका मिरचाइक कड़ू मन पड़ए लगलैन। मुँह चटपटबए लगली। मुदा भागीरथकेँ ठोर चाटब नीक नै लगल। मन तरंगलै, बाजल- “दादी, एना जे बजैकाल ठोर चटमेँ तब तोहर बात नै सुनबौ?” सुधनी दादीकेँ पोताक बात कनी खरछाइन जरूर लगलैन, मुदा सुतली रातिमे उठि कऽ जँ बच्चा माए-बापक मुँहमे लघीए कऽ देत तँ कि ओ माए-बाप ओकरा कण्ठ दाबि मारतै जे एना किए केलेँ। अपनो तँ माए-बापकेँ बुझए पड़तैन जे जे बच्चा अखन थलियाएल-पनियाएल अछि, सकताएल नै अछि, तखन ओकर दोख की भेल। दादियो अपन खरछाएल मनकेँ नीक बना बजली- “बौआ, लोक जखन एकरस भऽ काज करए लगैए तखन अहिना कखनो-कखनो मन टहलए लगै छै। सएह भरिसक भेल।” दादी तँ सामंजस्य करैत बजली मुदा बाल-बोधक उग्र मन तङ्गल रहबे करै, बाजल- “बजैकाल मुँह चटपटेमेँ आकि ठोर चटमेँ तँ बूझि जेबौ जे झूठ बजैक ओरियान करै छेँ।” जहिना अपन अनुचित काज भेलापर मन भिन-भिनाए लगै छै तहिना दादीओकेँ भेलैन। बजली- “बौआ, बूढ़ भेलौं, आब जे तोरा सभ जकाँ मनकेँ छान-पगहा लगाएब से पार लगत, जे लगैत-लगैत खरकटि कऽ पकैड़ लेलक, ओ अपन चालि लगले छोड़त। हँ तँ कहै छेलिअ जे कातिकक गैंची! कातिकमे थाल-पानिमे जनमल गैंची अण्डाए जाइए। तँए ओकर सुआदो बदैल जाइ छै, मुदा जितियामे तँ वएह गैंची जीरिआएल रहैए, तेकर बराबरी थोड़े कातिकक करत। जखन जीर-मरीचक मसल्ला देला पछाति सागो सागवान भऽ जाइए तखन जितियाक गैंची तँ सहजे गैंचीए भेल!” सुधनी दादी आ भागीरथ पोताक बीचक संवादसँ जीतलाल बाबाकेँ बूझि पड़लैन जे पावैनक दिन रीब-रीबेमे जाएत। कहू जे अखन पावैनक समए बीता रहल छी, ने खाइक ठेकान आ ने पीबैक ठेकान अछि तखन पावैन की भेल? अकछाइत बजला- “बौआ, ने तोहर दादी केतौ पड़ेथुन आ ने तूँ पड़ेबह, मुदा पावैनक दिन तँ पड़ाएल जाइए। नहाइक बेर भेल। आइ पावैन छी, जँ आइयो चयन स्नान नै करब, तखन पाबने की भेल?” पतिक सूढ़मे सूढ़ मिला सुधनी दादी पुतोहुकेँ जोरसँ दरबज्जेपर सँ कहलखिन- “कनियाँ, आब कि हम ऐ घरक घरनी बनि रहए चाहब से नीक हएत। जाउ, अपन साग काटि कऽ आनि लिअ। ताबे हम बौआकेँ वौसै छी।” पत्नीक विचारो आ आढ़ैतोकेँ देखि जीतलाला बाबाक मनमे खुशी भेलैन। खुशी ई भेलैन जे पत्नी काजुले टा नै काजक जोगाड़ियो छैथ। बजला- “बौआकेँ राजा मरूआक चौमासा झब दे सुना दियौ।” पतिक गुरुवचन सुनि गुरुआइ करैत सुधनी दादी बजली- “बौआ, मरूआकेँ अन्नमे नै गनल जाइए। अन्नमे सूरा-फारा इत्यादिक सृजन शक्ति होइ छै, मुरूआकेँ से नै छै तँए मरूआमे सूरा नै फड़ै छै।” ऊपरका बातकेँ झमारि भागीरथ निच्चाँ आनि बाजल- “दादी, जखन मरूआ अन्न नै भेल तखन पावैनक पकवान केना भेल?” दादी आँगुरक पोरपर हिसाब जोड़ैत बजली- “बौआ, भादो-आसिन मरूआ तैयारीक समए छी, टटका कुअन्नो तँ बसिया सुअन्नसँ नीक होइते छै। तहूमे मरूआ एक राजक राजा छीहे।” एक राजक राजाक नाओं सुनि भागीरथक मनमे शंका भेल जे अन्न केना राजा भेल। मुदा जे दादी एते सत् बात बजै छैथ ओ बीचमे एकटा फूसि किए बजती। फेर मनमे उठलै अनेरे मने-मन घमर्थन करै छी, दादी जखन सोझहेमे छैथ, तखन पुछिए किए ने लिऐन। पुछलक- “दादी, मरूआ कोन राजक राजा छी?” भागीरथक प्रश्न सुनि दादीक मन जुड़ैत-जुड़ैत जुड़ा गेलैन। हृदए हलसि गेलैन। हलसैत बजली- “बौआ, माटिक उस्सर-खासर एक किसिम अछि। जे उपजाउ माटिक रोग छी। जेते अधिक मात्रामे रहत ओ ओते नमहर रोगी भेल। मुदा से नै, मरूआ ओही रोगाएल माटिक राजा छी। ओहनो उस्सर होइए जइमे कुशो ने उपजैए। आ ओहनो होइए जइमे कुश उपजैए। तहिना कम अंश रहने सुअन्नो उपजि जाइए मुदा बीचक एक अवस्था छै उस्सरक मात्राक हिसाबसँ जइमे आन कोनो अन्न नै लगैए, तइमे मरूआ लैग जाइए! वएह ओकर राज-पाट भेल।” बजैत-बजैत सुधनी दादी ईहो बाजि गेली- “आब बड़ बेर भऽ गेल। बाँकी आगू बूझल जेतइ।” मुदा जीतलाल बाबा पावैनकेँ हाथसँ गमबए नै चाहैथ, बजला- “जखन सौंसे रामायण पोताकेँ पढ़ाइए देलिऐ तखन जग-जननीक चर्च किए छोड़ि देलिऐ।” ओना जीतलाल बाबा चिक्कारीमे बाजल छला, जे भागीरथ नै बूझि पेलक। मुदा मोबाइलिक टाबर जकाँ सुधनी दादी पकैड़ लेलैन। अपनो मन गवाही देलकैन जे जखन रामायण बाचिए गेलौं तखन सीतोक दर्शन कराइए दिऐ। बजली- “बौआ, हमर सोझ-साझ बात बुझिहऽ। जितिया पावैन जहिना मनुखकेँ जीहमे शक्ति परदान करै छै जइसँ ओकरा रसक बोध होइ छै, तहिना धानमे सेहो शीशक गोभ जीह रूपमे अबै छै...।” दादीकेँ आगू बजैले मन लुसफुसाइते रहैन आकि बिच्चेमे भागीरथ टोकलकैन- “दादी, नीक जहानि नै बुझै छी।” जेना तान साधैकाल कोनो ऊँच अवाज आबि टकरा जाइत तहिना दादीओकेँ भेलैन। खिसिया कऽ बजली- “भूखलमे भजनो ने नीक लगै छै। अखन चलह पावैन करए साँझमे बाँकी सभ गायित्री जप कऽ लेब।” 24 अक्टुबर 2014, शब्द संख्या- 3706 सुखाएल सूरत कातिक मासक भरदुतिया दिन। नअ-दस बजेक बीचक समए। प्रोफेसर कालीचरण अपना बहिन ऐठाम नै पहुँच प्रोफेसर शिवचरणे बाबू ऐठाम पहुँचला। पहुँचिते दरबज्जापर बैसल प्रोफेसर शिवचरण, पत्नी संग भरदुतियेक गप-सप्प करैत रहैथ। आगूमे आबि प्रोफेसर कालीचरण बजला- “नमस्कार!” ‘नमस्कार’ सुनि शिवचरण बाबू तारतम्य करए लगला जे नमस्कारक उत्तर केहेन नमस्कारसँ दिऐन। नमस्कारोक तँ भिन्न-भिन्न रूप छै। अपनासँ पैघक नमस्कारी, अपन बराबरीक आ अपनासँ छोटक। तैसंग ईहो तँ ऐछे जे चिन्हरबो नमस्कार होइए आ अनचिन्हरबो। शकल-सूरत ने मनुखेक छिऐन मुदा चीन्हिमे आबि नै रहला अछि। दरबज्जापर आएल अभ्यागतकेँ जँ कहिऐन जे नै चिन्हलौं, तखन ओहन घीक काजे की जे गोबरमे हराएल जाए। कालीकरण बाबू बूझि गेलखिन जे भरिसक चीन्हिमे नै एलिऐन तँए नमस्कारक उतारा नै देलैन। दोसर कोनो बात मनमे नै उपकलैन। उपकबो केना करितैन, जे शिवचरण बाबू छोट भाए जकाँ जिनगीक तीस बरख संगे रहला हुनकर केहेन बेवहार रहलैन, की ओकरा झूठला देब? एहेन नै भऽ सकैए। उमेर पाबि नजैरमे चढ़ा-उतरी आबि गेल होइन से सम्भव अछि। तँए बिना मान-रोख रखने कालीचरण बाबू दोहरबैत बजला- “हम कालीचरण...।” ‘कालीचरण’ सुनिते शिवचरण बाबू पत्नीकेँ कहलखिन- “घरैया पाहुन छैथ, पहिने पएर धुआउ तखन कुशल-छेम करब!” चौकी तरेमे लोटामे पानि राखल, उठि कऽ कुमुदिनी लोटा उठा आगू बढ़ौलकैन। कुमुदिनीक हाथसँ लोटा पकड़ैत कालीचरण बजला- “आइ भरदुतिया छी। पुरुख-नारीक ओहन पावैन छी जइमे भाए घर औथिन आ अपने घर छोड़ि बहिन ऐठाम जेता। तैबीच पएर धोइक पानियेँक कोन प्रयोजन छै। भाइयो-बहिनक बीच असीम सम्बन्ध-सूत्र सेहो ऐछे। जहिना सहोदर भाए तहिना सहोदर बहिन, जहिना पितियौत भाए तहिना पितियौत बहिन, जहिना ममियौत, पिसियौत, मसियौत भाए तहिना ममियौत, पिसियौत, मसियौत बहिनक संग सामाजिक भाए-बहिन होइत अछि।” शिवचरण बाबू मने-मन विचार करए लगला जे तेहेन तेकठ जगहमे कालीचरण प्रश्न पटकलैन जे आगन्तु-अभ्यागतक यज्ञे ढंश भऽ जाएत। भरदुतिया सन पावैन, तहूमे कालीचरण अपना बहिन ऐठाम पहुँचबो ने केला, पहिने भैयारीए निमाहैत ऐठाम एला। बिना किछु सोचने-विचारने शिवचरण बाबू कालीचरणकेँ कहलखिन- “जे मन फुरत से करब मुदा कुशल-छेम पछुआएल अछि।” पुन: पत्नी दिस ताकि बजला- “पहिने चाह-पानक ओरियान करबे ने केलौं, डाली सजेबे ने केलौं, भाउ खेलाए लगलौं।” मुदा दुनू गोरे ‘कुमुदिनियोँ आ कालीचरणो’ चेतलैन। पएर तँ कालीचरण नै धोलैन मुदा मुँहक पान फेकि दू बेर कुर्ड़ा फेकि लोटो भरि पानि पीब लेलैन। तैबीच आँगनमे पोती चाह बना नेने छलि। बूझि गेल छलि जे दरबज्जा भारी भऽ गेल तँए अपन काज अगुआ ली। छोटकी छिपलीमे चाहक गिलास नेने कुमुदिनीक संग पोती पहुँचलि। दुनू गोरे चाहक घोँट घोँटिते घुटकैक ओरियान करए लगला। पहिल घुट शिवचरण बाबू घुटला- “उमेर पेब नजैरो किछु तर-ऊपर भऽ गेल अछि, मुदा ठूठ गाछ जकाँ चेहरा बूझि पड़ैए?” शिवचरण बाबूक बात सुनि कालीचरण बाबूक मनमे भेलैन, जाबे कौलेजमे दुनू गोरे संगे नोकरी करै छेलौं, ताबे भैयारी जकाँ हब-गब करै छेलौं। मुदा अखन तँ दू गामक दूरीक बीच छी, तहूमे अपन गाम नै कुटुमक गाममे। केना अपन समाजक हीनताइ बाजि समाजकेँ हीन बनाएब। चौताला हँसी हँसि कालीचरण बाबू बजला- “आब जे कहबै जे जुआन छौड़ाक चेहरा भऽ जाए से थोड़े हएत। मनुख तँ चालिसे बर्खक पछाति ने घपचालीस हुअ लगैए। तैठाम तिरसैठ बर्खमे कौलेजसँ रिटाइरो केना केते दिन भऽ गेल।” बजैक सूढ़िमे कालीचरण बाजि गेला मुदा पछाति अपने मन हाँटए-दबाड़ए लगलैन जे जे आदमी कौलेजमे जीविका दिऔलैन, हुनके लग अपनाकेँ चोरा रहल छी, छिपा रहल छी। शिवचरण बाबू कौलेजक फाउण्डर शिक्षक, तँए विभागाध्यक्ष सेहो रहैथ। चारि सालक पछाति जखन कौलेज आगू मुहेँ ससरल तखन दोहरी शिक्षकक खगता भेल। बहालीक वएह प्रक्रिया रहै जे एक सदस्य युनिवर्सिटिक, एक सदस्य स्थापित आ एक सदस्य विभागीय शिक्षक। कौलेजक पढ़ाइ-लिखाइक नीक बेवस्था भेने कौलेज आगू मुहेँ ससरल। जे सफलता संस्थापित सदस्य देखि अपनो अधिकार शिक्षकेकेँ ई सोचि देलखिन जे जहिना किसानक परीछा उपज छी तहिना ने शिक्षकोक परीछा छात्रक रिजल्ट छी। जे सफल देखलैन। ओही बहालीमे शिवचरणबाबू कालीचरणकेँ संग देने रहथिन। पैछला ओ चमक दुनूक आँखिमे चमकलैन। चमैकते जेना कालीचरण बाबूक नजैर नीचाँ झूकलैन। मुदा शिवचरण बाबूक नजैर ओहिना रहलैन, ने ऊपर गेलैन आ ने नीचाँ भेलैन। बजला- “जाबे दुनू भाँइ कौलेजमे एकठाम छेलौं ताबे जहिना मन्दिरक आगू सदैत रामधुन होइत रहैए तहिना दुनू गोरे जनम दिन भजै छेलौं। साले-साल मासे मास। मासे-मास ई जे केते मास नोकरीमे कमल आ केते घटबी बढ़ल। मुदा आब तँ उमेरो भेल आ दस-पनरह बरख रिटाइरो केना भऽ गेल, बिसैर गेलौं जे दुनू गोरेमे उमेरक केते कमी-बेसी अछि।” शिवचरण बाबूक प्रश्नक उत्तर दइमे कालीचरण थकथका गेला। थकथका ई गेला जे अपनो चेहरा जखन अपना ऐनामे देखै छी तखन ठीके पनरह-बीस बरख आगूक झखड़ल चेहरा बूझि पड़ैए! तैठाम जँ शिवचरण बाबू कहलैन तँ कोनो अनुचितो तँ नहियेँ कहलैन। जखन भैयारी जकाँ किछु दिन पूर्व तक एकठाम खेनाइ-पीनाइ सभ किछु संगे छल तैठाम अपन बात नुकबैक कोन प्रयोजन अछि। मुदा जीता-जी हाइरो मानब नीक हएत? केना बाजी जे, जहिना कोनो गाछ डारि कटिते ठूठ भऽ जाइए तहिना भऽ गेल छी! ठूठो गाछक हिसाब फलन्ती-फुलन्तीमे हएत? फलन्ती-फुलन्ती मनमे अबिते गनगुआरि जकाँ कालीचरण गेरुली मारैक ओरियान करए लगला। गेरुली ई जे जहिना माटि परहक साँप हौउ आकि गाछ परहक गनगुआरि, गेरुली जोड़िते नाङैर-मुँहक दूरी कम भऽ जाइ छै, ओना जखन चलंत बेर रहै छै आकि चलंतक सूर-सार रहै छै, तखन मुँह आ नाङैर दुनूक दू ध्रुव दू दिशामे रहै छै, मुदा साँझ-भोर हौउ आकि निसभेर राति, गायित्री मंत्र जकाँ तँ बन्धन करिते अछि! मनमे अबिते जेना कालीचरणक मन भनभनेलैन। भनभनेलैन ई जे गाछो-बिरीछ मरै उमेरकेँ के कहए जे ठूठ सीलो जँ जीवित रहै छै तँ तहूमे मोजर निकैल फड़ि जाइ छै! तखन ओकरा ठूठ केना कहबै? हँ! तखन बेसीसँ बेसी यएह ने कहल जाएत जे डारि-पात कियो काटि देलकै, या तँ रोग-पीड़ासँ डारि सुखि गेलै? मन ठमकलैन। ठमकलैन ई जे हम तँ सेहो ने छी। दुनू परानी तेहेन अथबल भऽ गेल छी जे जेतबोसँ अपनो ठाढ़ रहब तेतबोमे, करै दुआरे कटौती केने छी, तैपर आगू बढ़ि परिवार आकि समाजमे डेग उठा किछु करब से पार लगत? हीय-हीन हृदैमे हिहियाइत दिआरीक इजोत जकाँ जोति निकललैन। निकललैन ई जे मनुख कि गाछो-बिरीछसँ निठल्ला भऽ सकैए? प्रश्न मनमे अबिते विचार-बिन्दुक बीच तूफान उठलैन। एक मन कहैन जे पढ़लो-लिखल मनुख भऽ कऽ ऐ बातकेँ नै बूझि पेलौं जे मनुखक कर्तव्यक समए भगवान सभकेँ एहेन शक्ति संचार करै छथिन जे धरतीक सभ सर्जक बनल रहए, मुदा से भेल कहाँ? कारणो तँ सोझहेमे अछि जे चारिटा बेटा-पुतोहु आ पाँचटा पोता-पोतीक ओहन परिवार रूपी फुलवारी रहैत जइमे बारहो मास फूल फुलाइत रहैत। तैठाम सात बेटा रामकेँ, एको ने कामकेँ भऽ गेल अछि! मनमे अबैत-अबैत विचार थकथका गेलैन। थकथकाइते जेना थाकल बटोही भूख-पियाससँ तृषित रहितो, मुहमांगसँ परहेज रखए चाहैए मुदा शरीरक ताप मनकेँ तपा विचारोकेँ मोड़ए लगै छै, तहिना कालीचरण बाबूकेँ भेलैन। मुदा लगले मन फुदकलैन, फुदकलैन ई जे बाल-बच्चाकेँ जनमसँ पढ़बै-लिखबैसँ बिआह-दान करै तक दुनू गोरे- शिवचरण बाबू आ कालीचरण बाबू-क विचार एके रंग छल। रहबो केना ने करैत, जखन दुनू गोरेकेँ एके रंग दरमाहा भेटै छल, तखन परिवारक विचार-विनिमय नै करितौं, से केहेन होइतए? मनक सह पाबि कालीचरण बाबू बजला- “भाय, समैयो तेहेन दुरकाल भऽ गेल अछि जे जेतबो जीब लेलौं तेकरो धन्य बुझै छी, ने अपने जीबैक मन होइए आ ने परिवारे-समाजे जीबए दिअ चाहैए!” टुटल मनक कँप-कँपीक बीच कालीचरण बाबू पड़िते विचारक बेठेकान भऽ गेला। जे कालीचरण बाबू कौलेजक पढ़ौनीमे क्रमबद्धता रखै छला ओ अपनो बुझलैन, मुदा एक संग अनेको प्रश्न मनमे उठिते शिवचरण बाबू ओझरा गेला। कहू जे ई केहेन भेल, जे एक दिस समए दोखी, दोसर दिस अपन जिनगीक विरक्तता, तँए नै रहैक इच्छा, तेसर परिवारो आ समाजो दोखी जइसँ अपन दोख केतौ ने। दोख तँ अपन केतौ ने मुदा दोखीक दुख केकरा भोगए पड़ै छै! जेकरा हाथे-पएर ने छै ओ हमर की करत, एतबे ने करत जे जिनगी देत जिनगी जीबैक शक्ति देत? हँसैत-खेलैत जहिना संग नेने आएल तहिना पार-घाट लगबैत गंगा सागर टपा देत, तेतबे ने करत। कालीचरणक बौड़ाएल मनक वौआएल विचार सुनि शिवचरण बाबू बूझि गेला जे कालीचरण धक्कासँ धकियाइत जिनगीक फेड़मे पड़ि गेल छैथ तँए मन डोल-पत्ता कऽ रहलैन अछि। विचारकेँ सुतियबैत कहलखिन- “कालीबाबू, आब अपना सभ केते दिन ऐ धरतीक अन्न-पानि खा-पी गंदा करैत रहब, तइसँ नीक...?” कहि शिवचरण बाबू कालीचरणक विचार जानए चाहलैन जे जिनगीक भारसँ केते दबल छैथ। ओना शिवचरण बाबू अपने मुहेँ अपन बात कालीचरणक सुनए चाहै छला मुदा खसैत जिनगीक चालि गैंचियाह भाइए जाइ छै। मुदा तैयो अपन बात-विचार सोझ करैत कालीचरण कहलकैन- “भाय, समरथाइमे की मनोरथ छल आ केतए आबि लसैक गेलौं, से थाहे-पता ने चैल रहल अछि!” कालीचरणक सुतियाएल मनक सूत पकैड़ शिवचरण बाबू बजला- “जेठका बचबाकेँ तँ आब नोकरी लैगचा गेल हएत किने?” ओना शिवचरण बाबू बातकेँ झाँपि-तोपि बजला मुदा कालीचरणक धक्का खाएल मन, परोसैकाल थारीक धक्कासँ जहिना भाते आकि दालियेक बटलोही ओंघरा, छिड़िया जाइ छै तहिना भेलैन। निधोक बजला- “बाल-बच्चाकेँ पढ़ाएबे अनुचित भेल, जे बुढ़ाड़ीमे आहि अबैए।” जिनगीक धकियाएल मन कालीचरणक, जखन कौलेजमे शिक्षक छला, तखन हित-अपेछितक बीच भोज-भातक एहेन चसक लैग गेल छेलैन जे पाँच किलो माछ आकि दू सए रसगुल्लाकेँ एको बेर पेटमे सगबगैयो ने दइ छेलखिन। हँसी-खुशीक जिनगी, बेटो-बेटीकेँ नीक शिक्षा देलखिन। आइ ओ सभ विदेशमे छैन। गाममे मात्र दू परानी रहि गेल छैथ। एक सम्पन्न परिवारक ई गति...! कालीचरणक भँसियाइत विचारकेँ शिवचरण बाबू जेते सुढ़िया कऽ पकड़ए चाहै छला तइमे झोली-आगिक लुत्ती जकाँ उड़ि जाइ छेलैन। असथिरसँ कालीचरणक मनकेँ शिवचरण बाबू पकैड़ बजला- “ऐ गाम तँ बहुत दिनक बादे एलौं हेँ?” गामक नाओं सुनि कालीचरण बाबूक मन थीर भेलैन। थीर होइते बजला- “बहुत दिन पिसिऔतो बहिनसँ भेँट भेना भऽ गेल छेलए, दुनू भाए-बहिन बच्चामे संगे बहुत दिन रहलौं, आ अहूँ दे जिज्ञासा छल जे केना कि चैल रहल छैथ।” कालीचरण बाबूक बात सुनि शिवचरण बाबू, हँ हूँ किछु ने बजला। नै बजैक कारण भेलैन जे जइ दशा-दिशासँ अपने धकिया कऽ खसि पड़ल छैथ, तइ खसबक चर्च टारि विचारकेँ बहटारि रहल छैथ। ओना दू गोरेक बीच बाता-बाती सेहो होइए। बाता-बाती ई जे जेना-जेना मनमे बात उठैत गेल तेना-तेना बजैत गेलौं, जेकर ने ओर-छोर अछि आ ने ठौर-ठेकान। लगले गाम-घरक चर्च लगले देश-दुनियाँक चर्च चलए लगैए। मुदा जखन समाजक प्रबुद्ध दू गोरे एकठाम बैसि विचार कऽ रहल छी तखन जँ जिनगीक सच्चाइ रूपक विचार नै करब तखन विचारक महते की? नजैर पाछू दिस ससरलैन। ससरैत प्रोफेसरी जिनगीक शुरूक समए लग जा अँटैक गेलैन। अँटैकते मनमे उठलैन, शुरूमे जँ अपने नै चेतल रहितौं तँ आइ हिनके जकाँ ने अपनो गति रहैत। जहिना जिनगीक पहिल पक्षक नीक काज, राजवेला सदृश जहिना सघन फूल तहिना सुगंधो, पछाति जिनगीमे महमही अनैए आ अधला काज अधला, तहिना ने दुनू गोरेक बीच भऽ गेल अछि। शिवचरण बाबू चेतल ई रहैथ जे जखन गामक किसान परिवारसँ उठि पढ़ल-लिखल समाजक बीच पहुँचला तखन परिवारक संग समाज सेहो बदललैन। जहिना छैठ पावैनमे डाली सरोवर, झील, सरिता-समुद्रक घाटपर चौमुखी-पँचमुखी दियारीक प्रकाशमे पसरल रहैए आ हाथ उठौनिहारि एका-एकी डाली उठा-उठा सुर्जक अर्घ दइ छैथ, तहिना ने नीक-अधला दुनियाँक घाटपर परसल जिनगियो अछि। जेकरा जइ रूपमे जे जेहेन अर्घ दान करैए ओ ओहेन फलो पबैए। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी, जहिना सभ किछु नीके छै तहिना सभ किछु अधलो तँ छइहे। जँ से नै छै तँ केकरो नीक केकरो अधला किए लगै छै। तेतबे किए, एके वस्तु एककेँ नीक दोसरकेँ अधलो तँ लैगते अछि। नोकरीक शुरूमे शिवचरण बाबू सेहो नव समाजमे रंगि नव जिनगीक रूप-रेखा बनबए लगला, जइसँ मासो दिन केतौ-ने-केतौ भोजे-भात आकि चाहे-पार्टीमे शामिल होइत रहला। समाजो नमहर, नमहर ई जे एक दिस संगी-साथी- कौलेजक शिक्षकगण-क ऐठाम कोनो-ने-कोनो परिवारिक काज जेना मुड़न, बिआह इत्यादि-इत्यादि होइते अछि तहिना पावैन-तिहारक संग पारम्परिक काज-उदेम सेहो होइते अछि, जइमे खाइ-पीबैक संग-संग समैयोक छैत होइते अछि। हाथसँ समए ससरने जिनगीक क्रिया-कलापमे धक्का लैगते अछि। धक्को केना ने लगत, मनुख बनैले चौदहो भुवन भ्रमण करैक अछि, जे काजेक दौरमे भ्रमित होइत अछि। जइ धक्काक अनुभव शिवचरण बाबूकेँ शुरूहेमे भऽ गेलैन आ कालीचरण बाबूकेँ नै भेलैन। कोदारिक छबे-छबे जहिना खेत बढ़ैए तहिना कोरे-कोरे पेट बढ़ैए। जे कालीचरण बाबूकेँ बेसम्हार भऽ गेलैन। ओना सम्बन्ध बनैकाल शिवचरणो बाबू नै बूझि पेला, बुझबो केना करितैथ, नव समाजक नव बेवहार तँ बनबए पड़ै छै। दोसर, आकर्षणो होइते छै। रंग-रंगक बोली-चालीक संग नव सम्बन्धो। तहूमे पढ़ल-लिखल समाजसँ जँ हैट कऽ रहब सेहो नीक नहियेँ भेल। अनेरे ने मुँह फुला-फुलीक वातावरण बनैए। मुदा जखन अपना दिस पाछू उनैट कऽ तकलैन तँ बूझि पड़लैन जे अपन जिनगी तँ अपने ठाढ़ केने ठाढ़ो हएत आ अपने गतिये चालियो चलबे करत। तखन जँ पानि जकाँ समैकेँ बहा देब, तखन तँ जिनगियो बहि जाएत। जखने जिनगीक पूर्व पक्ष बहि जाएत तखने पछातिक माल गाड़ी डिब्बा जकाँ ढकर-ढकर करैत इंजिन पाछू दौगैत रहत! यएह सोचि अपन जिनगीकेँ शिवचरण बाबू बन्हलथि। ओना बन्हैमे बाधा भेबे केलैन। बाधा ई भेलैन जे जँ कियो आग्रह करै छैथ तँ ओकरा छोड़बो नीक हएत? मुदा एहेन विषम परिस्थितिकेँ सम केना बनाएल जाए, ईहो तँ प्रश्न ऐछे। युक्ति फुरलैन। युक्ति ई फुरलैन जे दिन भरि तँ घरसँ कौलेज धरिक काजमे ओझराएल रहै छी, तँए दिन खटि जाइए। मुदा रातिकेँ बँचा जँ अपन जिनगीक दिशा-दशा सुधारि चलब तँ जिनगीक दिशा जरूर सुधरत। यएह सोचि बहाना ठाढ़ केलैन। बहाना ई ठाढ़ केलैन जे जे कियो आग्रही आग्रह करता तँ कहबैन जे यौ भाय, डेरामे असगरे पत्नी रातिकेँ रहए नै चाहै छैथ। ओ कहै छैथ जे तेहेन भुताहि जगहपर डेरा रखने छी जे साँझ पड़िते भुतो-प्रेत आ चोरो-डकैत उपद्रव करैए। मुदा से सुतरलैन। सुतरलैन ई जे रसे-रसे भोज-भातक समाजसँ अपनाकेँ अलग कऽ लेलैन। जे अपनो किरिया-कलाप आ परिवारोक भरण-पोषणमे सहयोगी बनलैन। जे खर्च डाली-पातीमे होइ छेलैन से अपना खर्चक सहयोगी बनलैन तँए ने पाँचो किरिया-कलापसँ बिनु ऋृणक उऋीण भेला। तीन बेटा दू बेटीक पढ़ाइ-लिखाइक संग बिआह-दान नीक जकाँ मनोनुकूल पार लगलैन। ओना जीवन-संगिनी जकाँ पत्नीओं कर्तव्य निमाहलैन। शिवचरण बाबू आ कालीचरण बेवसाइयोसँ एक छला, आ आमदनी सेहो एक छेलैन। एके रंगक पुश्तैनी परिवारक सेहो छला, मुदा जहिना शिवचरण बाबूक पत्नी जिनगीमे संयुक्त रूपे संग देलकैन तहिना कालीचरण बाबूक पत्नी सेहो देलकैन। मुदा दुनूक पत्नीक चालि-ढालि नैहरेसँ बदलल। शिवचरण बाबूक सासुरक गाममे ने एकोटा ताड़-खजूरक गाछ आ ने तेतैर-अमराक। जँ अनेरूआ गोरे जनैमो जाइ तँ जेतए जनमै तेतै ओकरा तोड़ि देल जाइ छेलै। मुदा कालीचरण बाबूक सासुरक गाम से नै छल। एक तँ गाममे ताड़-खजूरक बोन तैसंग तेतैरो-अमराक गाछक कमी नै। लोक ओकरा भोजनक विन्यास बूझि सेवा भक्ति करिते अछि। कालीचरण बाबूक पत्नी जेहने तेतैरिक प्रेमी तेहने अमराक। एके घरमे पाँचटा लोक रहने पाँच रंगक मनोवृतियो होइते छै। कालीचरण बाबूक पत्नी ‘सिनेही’ जेहने पढ़ै-लिखैक सिनेही तेहने विन्यास बना ओकर रस चुसैक सिनेही। तँए जहिना तेतैर-अमराक अध्ययन नीक जकाँ केने, तहिना विन्यास बनबैक विशेषज्ञता नैहरेसँ हाँशिल केने आएल रहैन। सासुर आबि पतिकेँ चारिम दिनक शास्त्रार्थमे भोज-विन्यास बनबैक कलामे परास्त कऽ चुकल छेली। जहिना तेतैरिक चटनी, नोन देल बनबैमे माहिर तहिना चीनी दऽ बनबैमे सेहो। जखन की तेतैर-अमरा तरकारीकेँ बनबै-बिगाड़ैमे सेहो तेहने सहयोगी। कोनो वस्तुक सुआद बढ़ा दैत तँ कोनोकेँ घटा दैत। जहिना दहीक मटकूरमे होइत। अमौट घौरैक लूरि सेहो भरपूर रहबे करैन। तँए कि परास्त भेलो पछाति कालीचरण बाबूक जीवन-संगिनीमे कमी थोड़बे रहलैन। अर्जुनक तीर जकाँ एके वाणमे समुद्रमे पुल बनबैक शक्तिक आभास तँ कालीचरण बाबूकेँ भाइए गेल रहैन। जेकर जरूरतो बूझि पड़लैन आ अपन वर्चस्व बनबैक आभास सेहो भेलैन। वर्चस्वक ई आभास जे केतौ पत्नी लगा अपने बाजि पत्नीक गवाह बनि, मुहसँ कहबा दइ छेलखिन जे तेतैरिक खट-मट्ठी नीक नै बनल। भात-दालिक अजश तँ गाम समाजकेँ घिना दइ छै, मुदा चटनी-अचार तँ चटनीए-अचार भेल। जे साहित्यकारक बीच सेहो होइए। वएह आग्रह जेहने मनही पेट कालीचरणकेँ बनौलकैन सएह सिनेहीकेँ सेहो बना पैंसइठ बर्खक अवस्थामे ठाढ़ कऽ देने छैन। आब जखन समुद्रमे विवेकानन्द स्थान पहुँच तकै छैथ तँ बूझि पाबि रहल छैथ जे भरिसक डुमनाइ छोड़ि दोसर बाट नै अछि। जइसँ बुधि-विवेक सेहो विचलित भऽ गेल छैन! जे बात शिवचरण बाबू आँकि लेलैन। मुदा जिनगीक बाल-शखा जँ बौरा जाए तँ ओहेन शखाकेँ बौराइत छोड़बो तँ उचित नहियेँ। मुदा बौरेनिहारो तँ ओते बौरा गेल छैथ, जे सम्हारमे आबि नै पौत। मुदा दरबज्जापर ओहन शखाकेँ कनाएबो उचित नहियेँ। मुदा हँसाएबो तँ बाल-बच्चाक खेल नहियेँ छी। घुनी लग बैसल वस्त्रहीन बबाजी माघक जाड़केँ जहिना घूर लग बैसि आगिकेँ चुट्टासँ आ जारनिकेँ हाथसँ घुमा हथियार बना रणभूमिमे डटि बजैए, तहिना शिवचरण बाबू बजला- “भाय, समए ने केकरो संग छोड़बैए आ ने संग दइए। अपन चाइले लोक समैक चालि संग चलियाइए।” कहि कुमुदिनीकेँ कहलखिन- “ओना कातिकक उतार मास छी, मुदा तेना भऽ कऽ जरकल्ला नै आएल अछि, दिनक रौद तँ तीख ऐछे। कागजी नेबो देल एक गिलास मीठ आ एक गिलास नमकीन, शर्बत पिआ दियनु। बहुत दिनक गप-सप्प दुनू भैयारीक छूटल अछि। कनी निचेनसँ गप करब।” शिवचरण बाबूक बात सुनिते, जेना माघमे नहाएब मनमे उठिते देह भुटकए लगैए तहिना कालीचरण बाबूक मन सेहो भुटकलैन! बजला- “भाय, जखन अपनो सभ जिनगीकेँ नै पकैड़ सकलौं तखन दुनियाँमे के पकड़त? सुबुध-प्रबुध तँ अपने सभ ने भेलिऐ।” कालीचरण बाबूक बात सुनि शिवचरण बाबूक मन मिसियो भरि मलिन नै भेलैन। एको मिसिया ऐपर नजैर नै देलैन जे ‘अपनो सभ’ किए कहलैन। बजबोक एहेन आदैत तँ लोककेँ होइते छै जे अपना संग अनको लपेटि लइए। मन गवाही दैते रहैन जे पोसपूतो तँ पूते ने होइ छै जे अपना अछि हिनका छूटि गेलैन। केते सुन्नर परिवार आ जिनगी अछि जे जहिना बच्चामे अधिक समए पठने-पाठनमे लगेलौं जे फड़ैत-फुलाइत पैंतीस साल शिक्षक रूपमे जुआनी गुजरल...। ...अखनो कौलेजमे जिनगी जकाँ रेडियो सुनिते छी, अखवार पढ़िते छी। तैसंग जहिना तीन-चारि घण्टा कौलेजमे पढ़बै छेलौं तहिना कौलेजेक पोता-पोतीकेँ पढ़ैबितो छी। जहिना सभ दिनसँ खाइत-पीबैत एलौं, तहिना खाइतो-पीबितो छीहे, तखन...? मुदा मन ईहो कहलकैन जे जिनगीक डारिक चुकल बानर सदृश कालीचरण भऽ गेल छैथ। जेकरा खसैकाल चारू चांगुरो समटा कऽ पेटमे सटि जाइ छै, जइसँ बिना कोनो डारिपर लसकने-फसकने धरतीपर धाँइ दे खसैए, तहिना भेल छैन। तही बीच कुमुदिनी लोटा-गिलास नेने पहुँचली। मुदा मन तँ कालीचरण बाबूक चढ़ले रहैन, बजला- “पहिने नोनगर नीक आकि मिठगर?” शिवचरण बाबू बूझि गेला जे शर्बतक सिरसिरीसँ मन शान्त नै भेल छैन। हाथमे कालीचरणकेँ गिलास पकैड़ते शिवचरण बाबू बजला- “भाय, शर्बत जे अहाँ पत्नीक हाथक होइ छैन, ओ लूरि हिनका सभकेँ जिनगियो भरिमे कहाँ भेलैन, ओहेन पत्नी तँ अहीं सन भागशाली सभकेँ हाथ लगै छैन।” शिवचरण बाबूक बात अन्तो ने भेल छेलैन आकि बिच्चेमे कालीचरण बाबू बजला- “भाय, आन जे भेल, मुदा पत्नी तँ पत्नीए छैथ।” कालीचरणक मुहसँ पत्नीक बराइ सुनि शिवचरण बाबूकेँ पत्नीपर झटहा फेकैक गर भेटलैन। गर ई भेटलैन जे अपन पत्नीकेँ झटहा बना फेकब। बजला- “भाय, से कि कोनो नै बूझल अछि जे केना तीस-तीस, चालीस-चालीस कटोरीक पथार खाइकाल लगबै छैथ। पत्नी छैथ हमर जे थारीमे साँठि कऽ नेने औती, आगूमे रैख बजती जे कनी एकटा काज उसकौने अबै छी।” आन पत्नी जकाँ कुमुदिनीक जिनगी नै, जे बमैक उठितैथ। असथिर मने विचारए लगली। ओना किछु दिन पूर्व तक लगसँ कुमुदिनी सिनेहीकेँ देखने, मुदा जहिना निरोगो देहमे बीमारी नुकाएल रहै छै आ लोक नै बूझि पबैए, तहिना तँ ने सिनेहीकेँ सेहो भेलैन। मुदा लगले भेलैन जे जहिना बोन राखए सिंह आ सिंह राखए बोन, जे अनीति देखि अपन माइयो-बाप आ धियो-पुतोसँ लड़ि या तँ अपने भगैए चाहे मरैए, तहिना ने परिवारो-समाजमे जरूरत छै। मुदा ओ के करत? अपने बेथे-बेथाएल कुमुदिनी मलिन भेल बगलमे बैसल कखनो पति दिस देखैथ तँ कखनो कालीचरण दिस। जहिना ऐना घुसकौने चेहराक रूपो घुसकि जाइए तहिना तीनूक तीनू चेहरा घुसक-फुसक करए लगल। कालीचरणक लटकल मुँह देखि शिवचरण बाबू बजला- “भाय, दुनियाँ दिस तकैसँ पहिने नीक हएत जे अपना दुनू गोरे उमेरक मिलानी कऽ ली। जँ से नै कए नेने रहब तँ भैंसुर-भावोक ठेकान नै रहत।” उतरल जिनगीक संग उतरल कालीचरणक मन, अकास-पतालक बीच बसल धरतीपर पएर रोपि बजला- “भाय, लिखल-पढ़ल सभ किछु हेरा गेल, तखन ठेकना कऽ कहै छी। पैंतीस बरख पहिने एम.ए. केने रही।” ‘पैंतीस बरख’ सुनिते अपन मिलानी करैत शिवचरण बाबू बजला- “हमरो मन पड़ल। चालीस बरख पहिने हमहूँ एम.ए. पास केने रही। हँ, भरिसक पाँच बर्खक जेठाइ-छोटाइ दुनू गोरेक भेल।” कालीचरण बजला- “पाँच बर्खक पछातिये ने हमरो नोकरी भेल। जइमे अपने जे संगी बनि उपकार केलौं, ओ जिनगीमे थोड़े बिसरब। मुदा भाय! बाल-बच्चाकेँ पढ़ाबैयो-लिखबैमे आ आ बिआहो-दान करैमे तँ दुनू गोरे एकेठाम विचार केने रही, तखन...?” कालीचरणक बात सुनि शिवचरण ठमकला। ठमकला ई जे मिसियो भरि असत् नै बजला अछि। मनमे ईहो भेलैन जे भरिसक विचार जगहपर आबि गेल छैन, तँए विचारक चोर पकड़ैक अनुकूल समए अछि। मुदा कृष्णोलीला तँ लीले भेल, तहूमे जखन चित्तचोर बनि चोरि करै छैथ। आगूमे कालीचरण बाबूक सिहरैत चेहरा देखि शिवचरण बाबू बजला- “भाय, बाल-बच्चा सबहक नजैर केहेन अछि?” माथ ठोकि कालीचरण बजला- “भाय, जखने प्रोफेसरक बेटा इंजीनियर भेल आकि इंजीनियरक बेटा प्रोफेसर, तखने छोर-तोर नेने महींस पानिमे गेल!” दलकैत कालीचरणक मन देखि शिवचरण बाबू पुछलखिन- “बेटा सभ अपना लग रखैयो नै चाहै छैथ?” बेटाक नाओं सुनि कालीचरणकेँ झड़कल चिड़ै जकाँ मन चुनचुनेलैन। अपन बेटा-पुतोहुक खिधांस केना करब? किछु छी तँ मिथिलाक माटि-पानिपर जीबै छी। मुदा लगले मन उनटलैन। उनटलैन ई जे अपने ने ऐठामक माटिपर पएर रोपने छी, मुदा ओ तँ ऐठाम नै अछि जे लाज-संकोच हएत। ओ तँ दूर देश, पर-देशमे अछि। तखन किए ने मुँह झाड़ि बाजब। बजला- “भाय, की कहब! अपन हारल के बजैए, मुदा अपन बेथा जे कहबो ने करब, सेहो नीक हएत। जेते ऐ धरतीपर केलिऐ आ भोगलिऐ से तँ सबहक सोझहेमे अछि। जँ सभटा खाइए-पीब गेलिऐ तँ एते ऊपर धरि परिवारकेँ पहुँचौलिऐ केना, मुदा...?” ‘मुदा’ लग अँटैकते शिवचरण बाबू बूझि गेला जे भरिसक बाटपर धारक मोइन जकाँ आगूमे किछु पड़ि गेलैन। टोकारा दैत शिवचरण बाबू बजला- “भाय, कियो तेसर थोड़े अछि जे सुनत तँ ओंगरी बतौत। बाल-बच्चाकेँ पढ़ाइ-लिखाइसँ लऽ कऽ बिआह-दान करैत परिवार ठाढ़ केलौं, मुदा तइ परिवारमे एहेन गंजन हुअए जे पुतोहुक मुहेँ ओ बात ‘बड़ खाधुर छैथ’ सुनि मुँह दाबि जीबी। जँ ओहन परिवारक लगसँ हटले रही सएह ने नीक।” ठमकल मन कालीचरणक ठमकले रहलैन, बजला किछु ने। चुपचाप उठि कऽ चलैक उपक्रम केलैन। मुदा लगले मन रोकलकैन। रोकलकैन ई जे अखन तक शिवचरण बाबूक परिवारक हाल-चाल तँ बुझबे ने केलौं! पुन: दोहरा कऽ कुरसीपर बैसैत कालीचरण बजला- “ओ बच्चियाकेँ नै चिन्ह सकलौं?” शिवचरण बाबू कहलखिन- “पोती छी। पोता-पोती दुनू एतै रहैए। चारि गोरेक परिवार अछि, निचेनसँ परिवारमे जहिना सभ दिन रहलौं तहिना छी।” शिवचरण बाबूक बात सुनि कालीचरणक मन सुकपाक करए लगलैन। मुदा मन ईहो कहैन जे एना दुनू गोरेक दू-दिसिया जिनगी बनि केना गेल! बजला- “भाय, जहियासँ बेटा-पुतोहु घर छोड़ि बहराएल तहियासँ खोजो-पुछाड़ि छोड़ि देलक। जाबे नोकरी करै छेलौं, ताबे काजक अनमेनामे लगल छेलौं, नीक दरमहो छल जइसँ ओते नै बूझि पड़ै छल, बान्हल जिनगी बन्हाएल गति छल। मुदा नोकरी छूटला पछाति सोलहन्नी निठल्लो बनि गेल छी आ रोगो-वियाधिक घर बनि गेल छी।” आगू बजैले कालीचरणकेँ रहबे करैन आकि बिच्चेमे कुमुदिनी टोकलकैन- “किए ने बेटाकेँ कहै छिऐन जे जाबे जीबै छी ताबे मनुख जकाँ केना जीब?” कुमुदिनीक बात सुनि कालीचरणक मन जेना चहैक गेलैन। जइसँ आगू बजेक साहसे ने होइन। कालीचरणक बेथाएल मन देखि शिवचरण बाबूक मनमे भेलैन, जँ आगूक जिनगीक कोनो बात उठाएब तँ आरो चिरक्का लैग-लैग टुटि-टुटि टुकड़ी-टुकड़ी भऽ छिड़िया जेता। तइसँ नीक जे ओ पन्ने उनटा दिऐन। बजला- “भाय, आब तँ सहजे पाकल आम भेलौं। जे दिन छी से दिन छी। तइले अनेरे सोग-पीड़ा करब नीक नै।” शिवचरणक बातमे कालीचरणकेँ गर भेटलैन, गर भेटिते बजला- “भाय, अखन जाइ छी, घुमैबेर भेँट करैत जाएब।” विदा करैत शिवचरण बाबू बजला- “जरूर, जरूर भेँट केने जाएब।” 30 अक्टुबर 2014, शब्द संख्या- 3690 भैयारी हक आने दिन जकाँ मनमोही काकी कदीमा, पीरार, इन्द्रकमलक फूल, ओलक गोभ, अड़िकंच आ तिलकोरक पात, सतंजा दालि आ सामा चाउर ओड़िया, हाँइ-हाँइ चाह बनबए लगली जे पति जाबे कलपर सँ मुँह-हाथ धोइ औता तइसँ पहिने चाह पहुँचा देब ने अपन करतब-परायण भेल। पुतोहुक आशा केते करब, हुनका तँ अपने बेड-टी चाही। मनमोही काकी केतलीमे चाह-पत्ती दइले डिब्बासँ निकालिते रहैथ तखने मनमे उपकलैन जे अनेरे लोक बेटा-पुतोहुक भरोसे अपनाकेँ ओंगठा दइए। कहू जे जखन जनम लेनिहारकेँ मृत्यु अनिवार्य छै जे सभ बुझै छी। मुदा तइ बीचमे बर-बेमारी, गाड़ी एक्सिडेन्ट, आकि गाछपर सँ खसैक आकि धार-धुरमे डुमैक चर्च-बर्च कहाँ अछि। जखन से चर्च नै अछि तखन एना होइ किए छै? जँ होइए तँ बीचमे केतौ-ने-केतौ अपन दोख तँ लोकक छइहे। केतलीक चाह उधियेलैन। हाँइ-हाँइ मुहसँ फूकि भाफ निकाललैन। भाफ निकैलते खौलल चाह असथिर भेल। चीनी गिलासमे दऽ चाह छनलैन। दुनू गिलास चाह नेने मनमोही काकी पति लग पहुँचली। दुनू गिलास चाह देखि सदानन काका बजला- “एतै बैसि कऽ अहूँ चाह पीबू, एकटा विचार करब अछि।” मनमोही काकीकेँ अपन विचार रहैन, अपन जिनगी रहैन, अपन किरिया-कलाप रहैन। ओ आन केना आ किए बूझत। गुल्ली-डण्टा जकाँ जिनगीक किरियाक एहेन मिलान जे आगू फेकल जाएत। दू गिलास चाह पतिक सोझमे आनब ऐ दुआरे कर्तव्य बुझै छैथ जे अपना हाथमे चाह जेबाकाल मनमे बिसवास जैग जानि जे जिनकर हाथ पकड़ने छी हुनको हाथ चाह जेतैन तखन ने मन मानतैन जे पति-पत्नीक प्रेमिल जिनगी भेल। हम चाह पीलौं की नै, तैबीच जँ कोनो बौस नै अछि तँ पतिक कानमे देब अछि, की समस्या हुनका छैन से तँ ओ बजता। तइले दुनू गोरे विचारि लेब जे हँ तँ हँ आ नै तँ नै। सएह ने हएत। एते बात मनमे अबिते मनमोही काकीकेँ सुफाँटि विचार जगलैन। जगिते बजली- “ई तँ ओहने भेल जे गाए मारि कऽ जूता दान कियो करैए।” असीम श्रद्धा सदानन काकाकेँ मनमोही काकीपर छैन। तँए मनमे किए उठतैन जे भोरे-भोर तेहेन बात बजली जे बिना दसटा गारि पढ़ने घरसँ निकलब कठिन अछि। बजला- “जिलेबी-अमीरती जकाँ घुरछी लगा कऽ की बाजि देलिऐ। नै बुझलौं? पेरा जकाँ चापट बनेबै तखन ने बुझबै।” अपन गुरुत्व देखि मनमोही काकीक मनमे शक्ति जगलैन। शक्ति जगिते मन सुरखुरेलैन। सुरखुराइते मुहसँ बोल फुटलैन- “केहेन बढ़ियाँ बात बजलौं जे लगेमे बैसि चाह पीबू, एकटा विचार करब अछि।” मनमोही काकीक सोझ-साझ बात सुनि सदानन काकाकेँ केतौ भौक-भाक नै बूझि पड़लैन। नजैरमे ऐबे ने केलैन जे कोनो ‘बात’ हौउ आकि ‘विचार’ पहिने गुचियाइए, तखन कटियाइए-टुटियाइए। अह्लादित होइत बजला- “एना किए बियौहती लाबा जकाँ छिड़िआइ छी, सोझ मुहेँ बाजू।” पतिक राग देखि मनमोही काकीकेँ पहिने अनुराग उमरलैन। अनुराग उमैरते विराग जगलैन। विराग ई जगलैन जे पति-पत्नीक बियौहती बान्ह तँ पाछू बनल, पहिने दुनू मनुख भेलौं। बजली- “ई जे कहलिऐ जे लगेमे बैसि चाह पीबू से विचार हमरा विचारकेँ तोड़त की नै? अहाँ काजक औगातइमे भलें बजलौं से अपनो मन गवाही दइए। मुदा कहिया सोझहामे चाह आकि पानियेँ अखन धरिक जिनगीमे बैसि पीलौं? अहाँकेँ आगू बैसि खुअबैमे खुशी होइए तेहीसँ ने अपनो हीय जुड़ाइए। खेबामे हमरो कोनो कोताही किए हएत। तैसंग अपन चोरूका धएल-धरल खाइक छूट सेहो तँ दाइए दइ छी।” सदानन काकाकेँ मनमे ओहिना जगलैन जेना रस्ता–बाट चलैत राही-बटोहीकेँ केतौ योगियो सँ भेँट होइए आ केतौ भोगियोसँ। तेतबे किए तैसंग भरथरी सन रजो ने रजोरज बिलैहते छैथ। सदानन काकाकेँ मनमे जगिते मनुआँ ओलैर कऽ पलैर गेलैन। बजला- “तीन दिन नोकरी छोड़ि गाम एला भऽ गेल। अखन धरि जे कमेलौं, घरकेँ अपन बूझि चलेलौं। किए ने अपनो दुनू परानी पेन्शन पकैड़ अगिला जिनगी ससारब आ जे खेत-पथार अछि आकि नोकरियेक जमा-जिगिर अछि, तीनू भाँइकेँ सुमझा दिऐ।” मनमोही काकीकेँ जेना ठोरेपर रहैन तहिना हूँहकारी भरैत बजली- “नीक हएत। देखै छी जे जेहने चेतन तेहने धिया-पुता, तेहेन-तेहेन ऐंठल भऽ गेल अछि जे कखनो मनकेँ थीर रहए देत? तइसँ नीक हएत जे भने तीनू भाँइकेँ अपन-अपन परिवार सुमझा देबै। जानए जअ जानए जत्ता।” अपन थाह थाहैत सदानन काका बजला- “गमैया जिनगीमे बहुत ऊपर रहब।” पतिक बात मनमोही काकी नीक जकाँ नै बूझि पेली तँए मन कनी आगू-पाछू घुरियए लगलैन। मुदा किछु बाजि नै रहल छेली। सदानन काका काकीकेँ नीचाँ-ऊपर देखैत रहथिन जे परिवारक थाह पेब रहली अछि की नै। मुदा लगले मनमोही काकीक मनमे उठलैन- केतौ आनठाम छी जे बजैमे लाज-संकोच करब। अपना परिवारमे छी। अपने दुनू परानीए छी, तखन जे धखाइ छी ओ अनेरे। मन फुड़फुड़ेलैन, बजली- “कनी बिलगा कऽ कहियौ ने, जे केते रूपैआ महिना भेटत। तखन ने हमहूँ घरक खर्चा-वाड़ी जोड़ब। दुनूक मिलानसँ ने आगूक गाड़ी ससरत।” पत्नीक विचारसँ सहमैत सदानन काका बजला- “पेन्शनक हिसाबसँ परिवारक एक विभागक खर्च पकड़ाएत मुदा दोसर-तेसर तँ तैयो छूटिये जाएत। जखन सोलहन्नी घरक भार बेटा सभकेँ देबै तखन तँ ईहो ने सुमझा देबै जे जहिया हमरा कान्हापर घरक भार आएल तहिया परिवार केहेन रहै, आ आइ केहेन अछि, अगुरबारे ईहो पुछि लेबै जे बौआ कोन मुहेँ केते दूर धरि माने केते आगू धरि परिवारकेँ ससारबह।” बजैक बेगमे तँ काका बाजि गेला मुदा पाछू उनैट तकिते मन पड़लैन गामक एकटा दू-भैयाँ भैयारीक परिवार। जइमे पनचैती करए गेल छेलौं। भेल ई जे दुनू भाँइक उमेरक दूरी पनरह-बीस बर्खक बीच। दोसर भाइक जनम भेला तीन बर्खक पछाति पिताक मृत्यु भऽ गेलैन। घरक भार जेठ भायपर चैल एलैन। अपने तँ पिताक अमलदारीमे मैट्रिके पास केलक जे घरक भार पड़ने ओतै ठमैको गेलै, मुदा पितातुल्य बनि छोट भाएकेँ बी.ए. धरि पढ़ेलक। बिआह-दान केला पछाति जखन भिनौजी हुअ लगल तखन वएह छोट भाए जेठ भायकेँ कहलक- “तूँ हमरा ले की केलह?” छोट भाइक अनसोहाँत बोल जेठ भायकेँ बरदाश नै भेलै। पञ्चनमेमे बमैक कऽ बाजल- “मुइलहा बापक बेटाकेँ जीतहा बेटा बना ठाढ़ केलिऔ, आ तोहीं हमरा कहै छेँ...?” ले बलैया! दोसरे झगड़ा उठि गेल जे ऐठाम मुइलहा बाप की करए एला। मुदा जेठो भाइक तँ अपन कर्तव्यक शक्ति जगलै, तँए ओहो पाछू केना हटैत। तहिना जँ बेटो पुछि दिअए जे अहाँ हमरो-ले की केलौं? तइले जँ अपन तैयारी कैर कऽ नै रैख लेब तँ विधान सभाक मंत्री जकाँ ने बाजए पड़त जे ‘बुझले ने अछि।’ तखन तँ यएह ने जे दुनू परानी अपन-अपन बेटाक प्रति केलहा काजक हिसाबक खतियान बना रैख ली...। बिच्चेमे मनमोही काकी बजली- “कोनो बेटाकेँ जे अपन हिसाब देबै से ओहो अपन हिसाब देत तखन ने! जहियासँ कमाइबला भेल अपन घरवाली आ धिया-पुता लऽ कऽ अन्तै रहैए, हमरे की करैए?” पत्नीक विचार सुनि सदानन काका अपन पैरुखपनक परिचए दैत बजला- “कियो नहियेँ देलक तँ हमरा खगबे की कएल। अपनो तँ काल्हि धरि दरमाहा उठेबे केलौं, ओहीमे सँ ने तीनू भाँइकेँ पढ़ा-लिखा बिआहो-दान केलिऐ आ दुनू परानी गुजरो केलौं। सएह ने कहबै। अहाँ की कहबै से तँ अहीं ने बाजब?” सदानन काकाकेँ मनमोही काकीसँ पुछैक कारण रहैन जे जँ दुनू परानी मिलि ठाढ़ होइ तँ परिवारकेँ के कहए जे दुनियोँकेँ अपन लीला देखा सकैए, ई तँ परिवारे भेल। मुदा पतिक विचार मनमोही काकीकेँ तीनू बेटाक बीच आनि ठाढ़ कऽ देलकैन। मनमे उठलैन माइयक सेवे की? माए तँ सहजे माइए भेली। तीनू बेटाक बीच कएल अपन सेवाकेँ जखन काकी निहारए लगली तँ बूझि पड़लैन जे जइ हिसाबे जेठका-छोटकाकेँ छातीक दूध पिऔलिऐ तइसँ कम मझिलाकेँ नसीब भेल। मुदा ओइमे हमर कोन दोख। रोगा गेल रही, डाक्टरे मना कऽ देलैन जे बच्चाकेँ दूध पिऔलासँ बच्चो बेमरयाह भऽ जाएत। एक बीमारी भगबैमे दोसरकेँ बजाएब नीक थोड़े होइत। तहीसँ ने मझिला दूधकटू भऽ गेल। जेकरा बच्चेमे खिदखिदैनी पकैड़ लेलकै ओकरा जोड़बो साध थोड़े छल, मुदा तैयो जान तँ बँचाइए लेलिऐ। किछु अवधात जरूर भेलै। जइसँ दूधक फूल नै अन्न-पानिक फूल बनि ठाढ़ भेल। जे से बुधिमे कनी-मनी कमी आबिये गेलै। जेठका-छोटका नीक माने अधिक दरमाहाबला नोकरी करैए आ मझिला गामेक स्कूलमे मास्टरी करैए। मुदा ओहो तँ पितासँ कम नहियेँ भेल। जही स्कूलमे पिता नोकरी केलखिन तही स्कूलमे ने ओहो नोकरी करैए...। मनमोही काकी बजली- “परिवारकेँ जे बूझि अखन तक केलिऐ से ऊपरबला जनै छैथ।” पत्नीक बात सुनि सदानन कक्काक मनमे भेलैन, अनेरे सप्पत खाइ छैथ। ऊपरबला तँ सभ किछु जनिते छथिन तखन फेर गवाही रखैक कोन काज। मुदा मनमे ईहो होइन जे जखन परिवारक सभ किछु बेटा सभकेँ सुमझा देबै, तखन तँ एहनो भऽ सकैए जे, जहिना ऑफिसक पैघसँ पैघ ऑफिसरपर सेवा-निवृतक पछाति चोट खेलहा चपरासियो मोँछ ऐंठैत आँखि गुर्ड़ैत रहैए। जँ कहीं तहिना भेल आ उसरागा गाछ जकाँ बूझि परिवारक सभ कियो छोड़ि दिअए तखन? मुदा जँ दुनू परानियोँ एक विचारमे नै रहब तखन तँ अनेरे बाटमे बटमारि खाइत पहपैटमे पड़ब। जइसँ डेग-डेगपर पहपैट ठाढ़ होइत रहत। से पहपैट मेटबैले संगीक काज पड़बे करत। मुदा संगियोँ तँ संगीए होइए, नीकक बेरमे चुप्पी लाधि देत आ अधला बेरमे सोलहन्नी दोख लगा देत। मुदा लगले मनमे उठलैन जे संगियोँ तँ रंग-रंगक होइए किने, कियो गंगामे पैसि संगी बनैए तँ कियो कनगुरिया आँगुरसँ खून निकालि सिनेही बनैए। ओना रस्तो-पेरा, चाहोक दोकान, गाड़ियो-सवारी आ पसीखनोमे संगी भेटिते अछि। ओ तँ निर्भर करैए संगीक संगपना निमाहैक नजैरमे। मुदा से सभ बात सदानन काकाकेँ मनमे नै अँटकलैन। तेसरे विचार उठि गेलैन जे दुनू परानी-बीचक अधिक भार अपने ऊपर अछि, ओही भार बँटैले ने पत्नी सहयोगी भेली। जँ से सहयोगी नै होइतैथ तँ वंश बढ़बैयोमे एते कष्ट-पीड़ा सहि सहयोगी किए बनितैथ? तखन तँ भेल जे अपने पढ़ल-लिखल समाजमे बैसि देश-दुनियाँक नीक गपो-सप्प करै छी, आ ओ घरमे असगरे घरैया काजमे सटल रहै छैथ। तखन जँ अपनो ई नै विचारब जे जेते रतिचोर अछि ओते बेसी शत्रुओ तँ पुरुखसँ बेसी नारीकेँ होइते छैन। जँ जिनगीमे किच्छो परहित नै केलौं तँ ओ जिनगीए की? तँए जँ तामस-पीड़ितमे किछु बाजिये जाइ छैथ तँ ओइपर ओतबे धियान देबा चाही जेते दइ जोकर अछि। मन ठमकलैन। ठमैकते सदानन काका बजला- “एकटा बात तँ छुटले रहि गेल। जँ ईहो नै विचारि लेब, सेहो तँ नीक नहियेँ हएत?” अपनाकेँ विचारी बूझि मनमोही काकीक मन मोहिया गेलैन। विचारी तँ असल तखने ने जे जेकर विचार करी ओकर जड़िसँ छीप धरि आकि मुहसँ नाङैर धरिक करी। जँ से नै करब तखन तँ सूरदासक दालिक घी भऽ जाएत। तखन? तखन तँ यएह ने नीक हएत जे विचार करैसँ पहिने विषयकेँ नीक जकाँ बूझि अपन विचार पुछि लिऐन। जँ सुफाँटि विचार छैन तँ बड़बढ़ियाँ, नै जँ उफाँटि छैन तँ ओकरा सुफाँटि बना बाजब। ओना करैबला कर्ता तँ वएह भेला। हम तँ संग पुरैबला संगी भेलिऐन। ओना काज करबाकाल तँ काज अपन नैना-जोगीनकेँ संग रैखते अछि। बजली- “कोन एहेन बात पाछूसँ मन पड़ैए।” मनमोही काकीक बात सुनि सदानन कक्काक मन मधुआ गेलैन। जहिना कड़ू लगलापर मुँहक ठोर-जीह सुसुआइए, खट्टा लगलापर चटपटाइए, तहिना भेलैन। खट-मधुर मुस्कान लाबा जकाँ भरभरा-भरभरा निकलए लगलैन! बजला- “जहिना कोनो संस्थानमे पैछला पीढ़ी अगिला पीढ़ीकेँ भार सुमझबै-काल कुरसी-टेबुलसँ लऽ कऽ खतिआन, बोही, तिजोरी तकक भार ने सुमझबए पड़ै छै। तइ सुमझबैमे एकटा छूटि रहल अछि।” जिज्ञासासँ जगैत मनमोही काकी बजली- “से कथी छूटि रहल अछि?” मनमोही काकीक जिज्ञासा देखि सदानन कक्काक मन हटकलैन। हटैकते पाछू हटलैन। पाछू ई हटलैन जे परिवारक बात छी, सभ कियो- तीनू बेटो-पुतोहु आ अपनो दुनू परानी- तँ अपने भेलौं। मुदा परिवारो तँ समाजेक बीच अछि। जहिना नीक-अधलाक विचार परिवारमे होइए तहिना तँ समाजोमे होइते अछि, तखन औगुता कऽ किछु करब आकि विचारब से नीक नै हएत। तैबीच पत्नी तगेदा केलकैन- “की कहए लगलौं आ चुप किए भऽ गेलौं?” सदानन काका बजला- “जे कहए लगलौं तइमे किछु विघिन-बाधा मनमे उठि रहल अछि।” ‘विघिन-बाधा’ सुनिते मनमोही काकी बजली- “केहनो विघनेस हौउ, ओ ते अपन मनेसँ ने पार लगौने ने पार लगत।” “हँ, से ते हएत। जे अपन धरिक रहत ओ ने अपने पार लगौने पार लगत मुदा जे तइसँ आगूक रहत से केना हएत?” सदानन कक्काक गोल-मोल बात मनमोही काकी नीक जकाँ नै बूझि पेली। मुदा मनमे विचारीक सरूप तँ चमैकते रहैन। बजली- “अखन परिवारमे दू परानी भेलौं, आ दूटा बाल-बोध पोता-पोती भेल, जेकरा विचारी नहियेँ मानल जाएत, मुदा बेटा-पुतोहु तँ चेतन ऐछे, ओकरोसँ विचारि लेब नीक हएत।” काकीक बात काकाकेँ नीक लगलैन। नीक ई लगलैन जे जेते बेसी लोक एकमत भऽ काज करब तेते ने ओ बेसी चमकबो करत आ झलकबो करत जइसँ सिझबो करत आ पकबो करत। तहूमे जखन जिनगीमे अपना जनैत कहियो, खेतमे काज करैबला खेतिहर जकाँ छह-पाँचक भीर नै गेलौं, भलें हाइ स्कूलक शिक्षक बनि जिनगी किए ने बितेलौं, तखन साँचमे आँच की। बजला- “अहाँक विचार मानि गेलौं। अखन तँ कृष्णानन विद्यालय जाइक तैयारीमे हएत, साँझू पहरक नाओं कहि दियौ, जे एकटा विचार करैक अछि।” “बड़बढ़ियाँ।” कहि मनमोही काकी चुप भऽ गेली। जिनगी भरि सदानन काका अपने पंचायतक हाइ स्कूलमे शिक्षक रहला। ओना तीस सालक विद्यालयक जिनगीमे आन-आन शिक्षक सभसँ भिन्न चालि-ढालि रहलैन। जहिना गाए-महींसक बच्चाकेँ शुरूहेसँ सिङ्गहानी लैत-लैत मलकारे मरखाह बना दैत तहिना सदाननो काकाकेँ भेलैन। नमहर ग्राम पंचायतमे जहिया हाइ स्कूल खुजए लगल तहिया सदानन काका संस्कृत विद्यालयमे आचार्यक परीछा दऽ देने रहैथ, रिजल्ट पछुआएल रहैन। एक तँ पंचायतमे हाइ स्कूल बनि रहल अछि जइमे हमरो खगता छै। सदाननक मनमे जगल, संस्कृत-मैथिली पढ़ाएब? उचित-उपकारक दुनू बाट मन देखलकैन। परीछासँ निचेन रहबे करैथ, दिन-राति एकबट्ट कऽ विद्यालय बनबैमे बलिदान केलैन। नमहर पंचायत, अखुनका जकाँ दू हजरिया नै, तेरह-चौदहटा गाम मिला पंचायत। अखन ओ चारि पंचायत भऽ गेल अछि। गामोक लोक बुझैत जे सदानन शिक्षक बनै जोकर छैथे। तहूमे गाममे एहेन तीने गोरे छैथ जे शिक्षक बनै जोकर छैथ। स्कूल बनल, साल भरि तँ जहिना विद्यार्थी तहिना शिक्षक रहला मुदा साल भरिक पछाति, जहिया दूर-दराज गाममे देवस्थान बनने देखिनिहारक भीड़ लगैए तहिना विद्यालयक सेहो भेल। साल भरिक पछाति विद्यार्थीक संख्या बढ़ल। लगमे स्कूल बनने किए कियो पएरे बेसी दूर जा कऽ पढ़त। तहूमे मैट्रिकक परीछा सौंसे बिहारक एकरंग होइ छै। पढ़निहार केतौ पढ़ि सकैए। फीस बढ़ल, गौआँक सहयोग बढ़ल, सरकारी अनुदान भेटल। वेतन निर्धारित भेल। सातटा शिक्षक भेला। सदानन काकाकेँ साल भरि दरमहे बनबैमे लैग गेलैन। संस्कृत विद्यालयक सर्टिफिकेट रहैन। मुदा जखन सरकारीए मनता भेट गेल तखन गामक विद्यालय किए ने मानत। सभ शिक्षकसँ पाछू वेतन निर्धारित भेलैन। तहूमे केते मेलक वेतन भेल। प्रधानाचार्यकेँ पढ़बैसँ आँफिस सम्हारै धरिक भार तँए आनसँ दोबर दरमाहा भेलैन। सदानन काकाकेँ सबुर ऐ दुआरे रहैन जे अपन गाम-घरक बच्चाकेँ पढ़बै छी, दोसर समाजक संस्था छी, ओकरा पढ़ल-लिखल लोक नीक जकाँ जँ नै चलौत तँ संस्था ओहिना ने उपैट जाएत जहिना गाम-गामक पुस्तकालय, वाचनालय उपैट गेल। तैसंग मनमे ईहो होइन जे डेढ़े कोस ने, मुदा आएब-जाएत तँ परिवारेसँ अछि, डेराक भाड़ा आ मेसक खर्चो तँ नहियेँ अछि। तँए सबुर रहबे करैन। मुदा तैयो मनमे कखनोकाल हेबे करैन जे आन जकाँ थोड़े पतित हएब जे दरमहो लेबै आ खानगियो फीस लेबै। घरसँ-विद्यालय जाइ-अबैमे जे घण्टा भरि समए लगैए तैबीच मुँह सीने रहै छी आकि जइ बच्चा-संग रहै छी ओकरा किछु सिखैबितो जाइ छिऐ। अपन काज देखि संतोष भेलैन। सबुरक गाछमे सबुरदाना फड़लैन। मुदा लगले एकटा असंतोष सेहो जगलैन। जगलैन ई जे जखन एके विद्यालयमे छी तखन विज्ञान आ अंग्रेजी पढ़ौनिहार किए निच्चाँ नजैरे देखैए? की ओ घटिया बुझैए आकि नीक-अधला कमाइक बुबकी छै? फेर मनमे भेलैन जे अनेरे मन वौअबै छी। भाय, दुनियाँ बेकता-बेक्तीक छी, जे जेहेन नजैरे देखत तेकरा हमहूँ तेहने नजैरे देखब। घरसँ बाहर धरि बाल-बोध तँ पसरले अछि, काजक कमी अछि, कमी अछि केनिहारक। जखन करते नै तखन धरता केतएसँ औत। जखन करते-धरता नै तखन दुनियाँ कुन्ज केना बनत। ओ तँ सभ दिन उजड़ले-उपटल रहत किने! सदानन काकाकेँ जिनगीक बीच कएल अपन काज इतिहासक पन्नामे उनटलैन। उनैटते देखलैन जे बाल-बच्चाक सेवामे पिताक कोन काज बाँकी रहल, मन बमैक गेलैन। बजला- “एकटा बात कहू ते कृष्णक माए, बेटा-बेटीक सेवामे अपना जीबैत की बाँकी रखलिऐ जे बेटा-बेटीक कर्जखौक बनब।” पतिक बात सुनि मनमोही काकीक मन बेटा दिस भँसि कऽ चैल गेलैन। दुनू परानी सोझहा-सोझही रणभूमिमे ठाढ़ भऽ गेली। बेटाक गोली पकैड़ गुलेती चढ़ा छोड़लैन- “से अहाँकेँ के कहलक जे बेटाक कलंक जोड़ै छिऐ।” पत्नीक विचार मनकेँ झमका देलकैन। कहली तँ नीके बात। आइ तक जखन बेटा-पुतोहु मुहेँ कोनो अवाच कथा नै सुनलौं तखन अछाहे भुकब, तँ कुत्ताक भुकब भऽ जाएत। विचार तँ सोझराएले अछि मुदा पत्नी जे अपना दिससँ ससैर बेटा दिस चैल गेली ओ केना अपना दिस औती? जँ नै औती तखन जे काज करए चाहै छी से केना हएत। कखनो बेटा दिससँ तँ कखनो पुतोहु दिससँ कखनो पोता दिससँ तँ कखनो पोती दिससँ आगूमे ठाढ़ हेबे करती। जखने से भेल तखने झंझ-मंझ हेबे करत, जखने झंझ-मंझ हएत, तखने झंझट ठाढ़ हएत, जखने झंझट ठाढ़ हएत तखने कोट-कचहरीक ममिला हएत! कोट-कचहरीकेँ एतबो होश नै छै जे जइ बच्चाकेँ काल्हि कौलेजमे फीस दिअ पड़तै, जइ उतरीधारीकेँ तेरह दिनक बीच उतरी हेट करए पड़तै, ओकरा केना तीस-तीस बरिस, चालिस-चालिस बरिस विषयकेँ बुझैएमे लैग जाइए? पाशा बदलैत सदानन काका बजला- “हम ते घरसँ बहार धरि, दिन-राति बच्चाकेँ छोड़ि बोनाएल रहै छेलौं, असल तँ अहींक ने लगौल फुलवाड़ी छी।” ‘फुलवाड़ी’ सुनि मनमोही काकीक मन मोहिया गेलैन। मोहिया कऽ ओइ पीड़ा लग पहुँच गेली, जइ दिन बच्चाकेँ जनम देने रहथिन। मुदा थाल-कीचमे पड़ल कमलक बीआ जनैम पानिक तरे-तर आगू उठैत जहिना ऊपर आबि कमलासन्न पहुँचैत तहिना मनमोही काकीक मनमे भेलैन, बजली- “भने साँझू पहर चारू गोरे बैसि कऽ विचारि लेब। अखन काजो-उदेमक बेर अछि।” अपन पिण्ड छुटैत देखि सदानन काका बजला- “काजकेँ काज जकाँ बुझबै, ई नै कहब जे बिसैर गेलिऐ। अखुनका कहल रहत तँ भरि दिन मने-मन विचारबो करब।” पत्नीकेँ लगसँ हटिते सदानन कक्काक मनमे उठलैन, जेते पिता हमरा पढ़ैमे खरच केलैन, खरच की केलैन जे बच्चामे घरक काज नै करौलैन, किताबेक संग खैयो-पीबै आ रहैयोक बेवस्था विद्यालैयेमे रहए, तइसँ केते बेसी खरच बेटाक पढ़ैमे केलौं? जँ से नै केलौं तँ बिहार सरकारक उच्च कोटिक पदाधिकारी केना भेल। एकटा नै दू-दू टा। तेसरो तँ अपना लग तक पहुँचले अछि। जेठ बेटा रमानन जखन कौलेजमे पहुँचल, ओही समए हमरो दरमाहामे संशोधन भेल, जइसँ आमदनीमे उछाल आएल। अपन गमैआ जिनगी रहए, अठवारे धोती-कुर्ता-गंजी साफ करैत रहलौं, अमल-मे-अमल तमाकुल अछि, सेहो वाड़ीमे उबजैबते छी। बच्चेसँ कृष्णानन मन्द बुधिक रहल। दूधकटू भेने अहिना होइ छै। मुदा ओहो तँ कौलेजसँ एम.ए. पास कैर कऽ ओही हाइ स्कूलमे शिक्षक अछि, जे अपने छेलौं। तेसर श्यामानन वित्त विभागमे पदाधिकारी अछि। तीनूक बीच बँटवारा करब। जहिना परिवारमे नव काज उठने, बच्चाकेँ स्कूलक नीक रिजल्ट पेने, आगूक जिज्ञासा जगै छै तहिना कृष्णानन दुनू परानीक बीच जगल। अपन नैहरसँ सासुर धरिक अनुभव कृष्णाननक पत्नीकेँ। गामो तँ जीवन-विज्ञानक विद्यालैये छी। मुदा कृष्णाननक जिनगी बन्हौटा जकाँ, तँए बेवहारिक समटल काजक अनुभव रहैन। तहूमे माए-बापक बीच बेटा जेहेन सहलोल होइए, तहिना। चाह-पीला पछाति चारू गोरे- सदानन, मनमोही, कृष्णानन आ हुनक पत्नी- सुशीला- एकठाम बैसि पहिल विचार केलैन जे बेटा-पुतोहुकेँ जे किछु बजैक हएत ओ माएकेँ कहथिन। पिता सुनिनिहार हेता। माइक विचारक पाछू अपन विचार रखता...। सदानन बजला- “परिवारक सभ छी, ओ दुनू भाँइ ऐठाम नै अछि, मुदा ओकरो हक-हिस्सा तँ छइहे। तँए जँ अपना चारू गोरे नै विचारि लेब तँ पाछू झंझट हएत। जँ एकरंगाह काज तीनू भाँइक बीच रहैत तँ किछु संतोखो होइतए मुदा ओ दुनू सरकारी मशीन जकाँ घटबीए हिसाब जोड़ैए। तैठाम घटाउकेँ केना बढ़ौउ बनौल जाएत?” सुशीलाकेँ नैहर-सँ-सासुर धरिक अपन माए-बापसँ लऽ कऽ पतिक माए-बापक सेवा धरिक सेवाधर्म मनमे जगले रहैन, सासुकेँ कहलखिन- “माए, हिनकर तीनू बेटा एक कोखिक छैन, मुदा भैयारीमे समाज माझिल-साझिल बेटाकेँ जेठ-छोटसँ किरिया-कलापमे हटा देने छै जइसँ जेठौंस-छोठौंस केते रोग परिवारमे पकैड़ नेने अछि। मुदा तीनू भैयारीमे जे सेवा करैत रहलयैन, ओहो तँ नजैरमे रैख कऽ बजथिन किने?” मनमोही बुझबे ने केलैन जे पुतोहु की बजली। बिनु बुझनहि बाजि उठली- “हमरा लिऐ तीनू बेटा एकेरंग अछि।” सदानन कक्काक मनमे जोड़क झमार लगलैन। सहैम गेला। तखन? तखन तँ यएह ने नीक जे अखन अहिना जक-थक रही। मुदा जिनगियोक तँ ठेकान नै अछि, जँ तीनूकेँ मन-माफित विचार बना नै देबै तखन तँ पछाति परिवार रणभूमि बनि जाएत! कृष्णाननकेँ कहलखिन- “बौआ, जेठ-छोट भैयारी परिवारमे किए बाधा उपस्थित करत, किए ने सबहक राय-विचारसँ निर्णए कऽ ली।” 4 नवम्बर 2014, शब्द संख्या- 3131 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 1 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८५ म अंक ०१ सितम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९३ अंक १८५) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA