ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८६ म अंक १५ सितम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९३ अंक १८६) ऐ अंकमे अछि:- फलहार लघु कथा सग्रह जगदीश प्रसाद मण्डल अनुक्रम जाम/ 10 गण्डा/ 29 हाथी आ मूस/ 41 मुसरी आ घोड़ा/ 57 फलहार/ 74 भोरक झगड़ा/ 87 कथा लेखन क्रम/ 100 जाम छह मास पूर्व गुणेसर काका महाविद्यालसँ सेवा-निवृत भेला पछाति थैली नेने आबि जेठ बेटाकेँ फोनसँ कहलखिन- “बौआ, महाविद्यालयसँ छुट्टी पाबि गेलौं, जे धएल-धरल छल सभ आनि लेलौं। अपना-ले पेन्शन राखब बॉंकी दुनू भॉंइ आबि कऽ अपन लऽ लिअ।” पिताक विचार सुनि सुधीर बाजल- “बाबू, अहाँ हमरा इंजीनियर बनेलौं, तइ कर्जक अदायगी अहॉंकेँ तखन ने हएत जखन हमहूँ इंजीनियर पोता सोझहामे ठाढ़ कऽ देब। एक तँ ओहिना अहॉंक कर्ज ऊपरमे लादल अछि तैपर सँ धएल-उसारल सेहो हमहीं लेब, ई मन नइ मानैए। अहॉंक कमाइ छी जे मन फुरए से अपन करू।” जेठ बेटाक उत्तर सुनि गुणेसर काका अवाक् भऽ गेला। फेर मनमे भेलैन जे छोटको बेटासँ किए ने पुछि लिऐ। नम्बर लगा मोबाइलसँ कहलखिन- “बौआ, जिनगी भरिक जे धएल-उसारल छल से थैली आनि लेलौं। अहॉं दुनू भॉंइ अपन लऽ लिअ।” इंजीनियर रणधीर जबाव देलकैन- “बाबू, हमरा लिए जहिना अहॉं तहिना भैया छैथ, तँए दुनू गोरे पहिने विचारि लिअ। हम मानि लेब।” रणधीरक उत्तर सुनि गुणेसर कक्काक मनमे पिनपिनी जगलैन। पिनपिनाइत बुदबुदेला- “सभ देह छीपैए। हमरा बुते एते रूपैआ राखल हएत। घरमे राखब, चोर चोरा लेत। बैंकमे हिसावे-वाड़ी गड़बड़ाइत रहत। के अनेरे भरि बुढ़ाड़ी पाइयेक मगजमारीमे लागल रहत।” मन दुनू बेटापर गेलैन। अपन कएल कृत्य आगूमे अबिते मन कलैश गेलैन। कलैश ई गेलैन जे अपने जे कमेलौं, तहीसँ परिवारकेँ ने ठाढ़ रखलौं। दूटा बेटा दुनू इंजीनियर। अपने सभ दिन समाजक बीच गाममे रहलौं, अखनो छी। कहियो केकरोसँ मुहॉं-ठुठी नइ भेल। यएह ने जे बुढ़ाड़ी केना खेपब। बुढ़ाड़ी तँ मन रोग छी। जिनगी जहिना खेपैत एलौं हेन, तहिना खेपैक ओरियान बात करैत रहब, बुढ़ाड़ीकेँ ठेलैत रहब...। गुणेसर काका संस्कृत महाविद्यालयसँ आचार्य केला पछाति गामसँ तीन कोस हटल संस्कृत महाविद्यालयक नोकरीसँ जिनगी शुरू केलैन। ताधैर माइयो-बाबू जीविते रहैन। पनरह-बीस बर्खक पछाति मुइलैन। चारि बीघा अपन जोतक संग चारि बीघा बटाइयो खेती पिता करैत आबि रहल छेलखिन। जे हुनका परोछ भेला पछाति गुणेसर काका ओइ खेतकेँ आपस करैत अपनो खेत बटाइ लगा लेलैन। पढ़ै-लिखै दिस रूचि बेसी रहने दुनू बेटाकेँ इंजीनियरिंग तकक शिक्षा दियौलखिन। आइ दुनू बेटा एकटा सरकारी दोसर प्राइवेट नोकरी पाबि जीवन-बसर कऽ रहल छैन। दुनू बेटाकेँ जहिना दरमाहा तहिना उलफियो आमदनी आ जहिना नियमित ड्यूटी तहिना उलफी ड्यूटियो। काजक बोझक संग आमदनियोँक बोझ तर दुनू दबले। तँए विचारमे फुहरपन। जही महाविद्यालयमे गुणेसर काका पढ़लैन तही महाविद्यालयमे नोकरियो भेलैन। ओना जखन गुणेसर काका गामेक स्कूलमे पढ़ैत रहैथ तखन गाछक पात जकॉं पढ़ैयो-लिखै दिस विचार डोलबे करैत रहैन। जहिना पात डोलबो बुझैत आ असथिरो रहब बुझैए, मुदा जइ गाछक छी ओइ गाछोकेँ ई बात बुझैमे थोड़े अबै छै। एबो केना करतै, पात जकॉं गाछ थोड़े असथिरो रहैए आ डोलबो करैए। ओ तँ शील-गुणसँ भरल अछि, तँए पात जकॉं डोलबे किए करत। आने बाल-बोध जकॉं गुणेसरो कक्काक मन उमैड़ जाइन, हमहूँ डाक्टर बनब। तँ कहियो नाटक मण्डलीक कलाकारकेँ देख कलाकार बनैले। तहिना आनो-आन चढ़ल-बढ़ल-ले। मुदा से सभ गुणेसर काकाकेँ हाथ नै लगलैन। साधारण जिनगी जीनिहार पिता गामक स्कूल पास केला पछाति मुँह फोड़ि गुणेसर काकाकेँ कहलकैन- “जेतए तूँ पढ़ऽ चाहह, स्वेच्छासँ पढ़ि सकै छह मुदा अपन परिवारोक ऑंट-पेट देख लहक। पॉंच बर्खक बीच एक-दूटा रौदी आ नइ तँ एक-दूटा दाही होइते अछि, तेकरे पुरबैत-पुरबैत बेदम रहै छी। गामपर सँ जँ आबि-जा कऽ पढ़बह, तेते सम्हैर सकै छह।” मिडिल स्कूलसँ निकलल गुणेसर कक्काक मनमे यएह उजैहिया उठल जे आगूओ नाओं लिखा कऽ पढ़ब। गामसँ तीन कोस हटल संस्कृत विद्यालय, महाविद्यालय। संयोग बैसि गेलैन। गुणेसर काका संस्कृत विद्यालयमे दाखिल भऽ गेला। परिवारसँ लऽ कऽ विद्यालय, महाविद्यालय तक सात्विकतासँ भरल। जेहने किसान परिवार तेहने शिक्षण संस्थान। लिखै-पढ़ैक सामग्रीक अतिरिक्त मात्र देहक वस्त्र आ पेटक भोजन दैत गुणेसर काका एके गतिये शिष्य-गुरु होइत गुरु-शिष्य बनि जिनगी जीबए लगला। ताधैर कोनो व्यसन औझका पढ़ुआ जकॉं नै। मुदा विद्यालयो-महाविद्यालयमे तमाकुल आ भॉंगक चलैन देखैथ। परिवारोमे पिता सॉंझे-साँझ देहक थकान भगबैले भॉंगक गोली खाइ छेलैन। संगे तमाकुलो खाइत रहथिन। ओना दुनू बाड़ी-झाड़ीक उपजा छी, तँए समस्यो नहियेँ। मास दिन तक गुणेसर काका गुन-धुनमे पड़ल रहि गेला मुदा ई नइ सोचि पेला जे ऐ थैलीकेँ की करब। अपना बेटी नै तँए बेटी बिआहक खर्च नइ बुझल रहैन। समाजोक बेटी बिआहक काजमे कहियो अगुआइ नै केने जे तहूसँ बुझल रहितैन। घर बेटे बना नेने छेलैन। खेतोक उपजा ओते भाइए जाइ छेलैन जइसँ अन्न-पानिक कहियो असुविधा नै भेलैन। कपड़ा-लत्ताक खर्च सेहो नापल-जोखल रहैन। माने एकदम समटल। स्पष्ट सोच रहैन जे जैठाम एको वस्त्रसँ काज चैल सकैए तैठाम गाहीक-गाही आकि दर्जनक-दर्जन वस्त्रक कोन खगता। अनेरे पाइकेँ दुरुपयोग करब भेल। देखा-देखी पत्नियोँ तहिना रहैन। तैपर सँ दुनू बेटो आ दुनू पुतोहुओ अपना-अपनी हथियबैले सेहो सभ मौसमक सभ कपड़ा ओते दाइए दइ छैन जे देख-देख दुनू परानीक मनमे सवुर बनले रहै छैन। ऐ जनमसँ ओइ जनम धरि केतबो धाङ्गि कऽ पहिरब तैयो ने फटत-सठत। अखन धरि पाइक जानकारी तेना भऽ कऽ गुणेसर काका पत्नीकेँ नै कहलखिन जे अढ़ाइ लाख टाका पैछला धएल-धरल भेटल। एतबे कहने रहथिन जे नोकरी छूटि गेल मुदा जाबे जीब ताबे दरमाहा भेटैत रहत। जइपर पत्नी अह्लादित होइत कहलखिन- “भरि दिन बोनाएल रहै छी, कखनो एतबो सोचै छिऐ जे जेकर हाथ पकैड़ घरमे रखने छी, तेकरा की भेल।” फुलतीक बात गुणेसर काका बूझि गेला मुदा मन तँ थैलीमे घुरियाएल रहैन। उतारा देलखिन- “अहींले भरि दिन रने-बने वौआइ छी आ तैपर सँ अहीं उपरागो दइ छी। ” पतिक बात सुनि फुलतीक मन फुला गेलैन। भकरार फूलक पत्ती जकॉं ऑंखि निराड़ि सूरमाक सुगंधसँ अरियातैत ऑंखि पतिक पावन वनमे अँटैक गेलैन जइसँ मुँहक बोलीए ठमैक गेलैन। जेकर लाभ गुणेसर काका उठौलैन। लाभ ई उठौलैन जे भने बक्-झकसँ नीक जे अपन काजक बात विचारब। मुदा से भेलैन नै। आगूसँ पत्नीक नजैर तेना नजैरमे गड़ल रहैन जे अजगर सॉंप जकॉं नजैर काते ने हुअए देलकैन। मनमे उठलैन- पत्नियोँ केँ किए ने पुछि लिऐन जे पाइकेँ की करब। अखन तँ नजैरक सोझ वएह छैथ। फेर भेलैन जे पाइक काज अपना हाथे ओ कहियो केलैन कहॉं। दोकानक काज, बजारक काज, तीर्थो-बर्थक काज, सभ दिन तँ सभठाम अपने हाथे केलौं। कहियो एको पाइ छुलैन कहॉं, तखन हुनका केना कहबैन जे पाइकेँ की करब? संयोग भेल ओही रस्ते हमहूँ जाइत रही, जखन हुनका घरक सोझे गेलौं कि मन पड़ल जे गुणेसर काका सेवा निवृति भऽ गेला, तँए भेँट कऽ लिऐन। रस्ता छोड़ि दरबज्जा दिस बढ़लौं कि देखलयैन जे दुनू बेकती ऑंगनमे किछु विचारि रहल छैथ। मनमे भेल से नइ तँ कनी विलैम जाइ। मुदा से भेल नै। डराएल खढ़िया जकाँ गुणेसर काका चारू दिस सेहो चौकन्ना होइत रहैथ। ओना हम ऑंखिक सूत निच्चॉं उतारि नेने रही, तैयो अँगनेसँ देख लेलैन। बजला- “आबह-आबह बौआ जोगू आब ते तोरा सबहक बीच एलौं, तोहीं सभ ने खोजो-खबैर लेबह आ जेना रखबह तेना रहब।” एक-हरफी गुणेसर काकाकेँ बजैत देख बिच्चेमे रोकि कहलयैन- “काका गोड़ लगै छी।” अपन मनक विचार रोकि गुणेसर काका असीरवाद दैत पुछलैन- “बौआ, सभ आनन्द छह किने?” कहि पत्नीकेँ कहलखिन- “जुग बदैल गेल, आब जे तकै छिऐ बदामक पनिसल्ला, गुड़क गोली आ पानिसँ अभ्यागत आकि गौंउए-घरूआक सुआगत करब, से आदैत छोड़ि दियौ। जाबे जुआन छेलौं ताबे जे मन फुरल से केलौं। आब एक उमेरपर आबि गेलौं, तँए समए देख संग चलू। पहिने चाह बनाउ। चुल्हिये लग सभ बैसि गपो-सप्प करब आ चाहो पीब।” सएह भेल। ओसारेक चुल्हिपर फुलती काकी चाहो बनबए लगली आ दुनू गोरे माने हमहूँ आ गुणेसरो काका पीढ़ियापर बैसि गप-सप्प शुरू केलौं। पुछलयैन- “काका, सोल्होअना चैल एलौं आकि नाङैर-ताङैर लसकले अछि।” अकचका कऽ गुणेसर काका बजला- “से की कहलह, बौआ?” कहलयैन- “सेवा-निवृतिक पछाति जे किछु जमा-जिगिर भेटैए, तेकर कागजे ऑफिसमे तेना ओझरा जाइ छै जे जेते भेटैए तइसँ बेसी चैले जाइए। दौड़-बरहा तेते होइए जे सभ ठेही मेटा जाइए। यएह भेल लसकब। जेकरा ऑफिसबला सभ लुक्खीक नाङैर जकॉं तेना सुरैर लइए जे पछाति बुझिए ने पड़ैए जे लुक्खीक नाङैर छी आकि...।” नमहर सॉंस छोड़ैत गुणेसर काका बजला- “से सभ सगुन नीक रहल। कौलेजक एकटा किरानी सभ काज कऽ देलैन। सेवा-निवृतिक तेसरे दिन सोलहन्नी फारकती पाबि चैल एलौं।” पुछलयैन- “केते जमा भेटल?” ‘केते’ सुनि गुणेसर काका सकपकेला। सकपकेला ई जे पाइ-कौड़ीक बात छी। केते राजा-महराजा माटिमे गड़ल मुदा चोरी-चपाती होइते आबि रहल अछि। तँए पाइ-कौड़ीक बात अनका लग बाजब खतरासँ खाली नइ अछि। परिवारमे अखन धरि जे पाइक मोल, बेटासँ लऽ कऽ पत्नी धरिक रहलैन ओ गुणेसर कक्काक मनमे लगल जामकेँ किछु कम केलकैन। संग-संग अपन वृत्ति जे रहलैन ओ कहियो झूठ-फूस, लाथ-कुलाथक नै रहलैन तँए मनमे शक्ति-शिरोमणिक अंकुर रहबे करैन। बजला- “बौआ, अढ़ाइ लाख जमा भेटल।” कहलयैन- “बहुत रास भेटल, भगवान बेटो तेहेन देलैन जे पाइक धार फोरबे करता।” हमर बात सुनि जेना गुणेसर कक्काक ऑंखिक धारमे शुभ्रता एलैन। ओना अखन धरि अशुभ्रतो नहियेँ आएल छेलैन, मुदा ओहन शुभ्रता एलैन जइमे फरिचपन बेसी रहैन। तहूमे पाइक धार सुनि गुणेसर काका पाइयेक धारमे भँसि गेला। भँसैत-भँसैत बजला- “बौआ, पाइकेँ की करब से किछु फुरबे ने करैए।” गुणेसर कक्काक बात सुनि अचम्भामे पड़ि गेलौं जे ई की कहि देलैन। पाइयेक पाछू लोक पागल भेल अछि। एको बीत जगह आकि एकोटा एहेन काज बॉंकी नइ अछि, जैठाम पाइक झीका-झीकी नइ भऽ रहल अछि। तैठाम गुणेसर काका एहेन बात कहलैन जे पाइकेँ की करब! जँ एहेन प्रश्न उठैए तेकर माने तँ यएह ने हएत जे कोनो सामाजिक काजमे खर्च करए चाहै छैथ, जँ अपन व्यक्तिगत काज रहतैन तँ की अनका देहक नापसँ कुरता आकि पैरक नापसँ जूता कीनैक विचार करितैथ? ओना गुणेसर कक्काक जीवन पठने-पाठनक रहलैन, जइसँ जिनगीमे मीठास आबि गेल छेलैन। मीठास ई जे कटु शब्दक जगहपर मधुआएल ओहन शब्दक प्रयोग करै छैथ जे कटुओ मधुर जकॉं बूझि पड़ैए। तैठाम हमरा सन छौड़ा-माड़ए विचारक होइन, ई केते उचित हएत? मुदा जँ पुछलैन तखन जँ किछु नहियोँ कहबैन तैयो तँ मनमे शंका हेबे करतैन। तेतबे नइ, पाइ-कौड़ीमे चुप्पी लाधब षडयंत्रो भऽ सकैए, जे खतरनाक भेल तँए...। मुदा किछु फुरबे ने करए जे की कहिऐन। फेर मनमे भेल जे दूटा बेटो छैन, दूटा पुतोहुओ भेलैन, तैपर सँ पत्नियोँ छैन, हमरा-हिनका बीच समाजी-परिवारी सम्बन्धो अछि, तैबीच हमरो परिवारजन छैथ आ हिनको छैन। कहलयैन- “काका, जे पाइ सेवा-निवृतिक पछाति भेटल ओ तँ परिवारक भेल, तैबीच काकियो छैथ, तँए हुनकेसँ पहिने विचार किए ने लेल जाए।” परिवार सुनि गुणेसर कक्काक मन विचलित भऽ गेलैन, बजला- “विचार ते अपनो सएह छल मुदा दुनू बेटा ऐ पाइसँ देह छीप लेलक।” ‘बेटा देह छीप लेलकैन’ सुनि छगुन्तामे पड़ि गेलौं। छगुन्ता ई जे अही पाइ दुआरे बाप-बेटामे कपर-फोरौवैलसँ लऽ कऽ केस-मोकदमाक संग अनुकम्पाक नोकरी दुआरे जहर-माहूर तक बेटा-पुतोहु दइले तैयार भऽ जाइए, आ तैठाम एहेन बात! छुब्द भऽ गेलौं। लगले मनमे उठल जे ई तँ परोछा-परोछीक बात भेल किने। मुदा पत्नी तँ लगमे छथिन किए ने अपने मुहेँ पुछिऐन। पुछलयैन- “काकी, काका थैली लऽ कऽ एला से की करब?” जिनगी भरि ओहन संगी जकॉं फुलती काकी रहली जे पतिसँ कहियो परिवारक आमद-खर्चक बात नै पुछने रहैन, तैठाम थैली सुनि...। बजली- “थैली थैलीबलाक छिऐन आकि हमर छी। अपन थैली धरममे लगबैथ आकि कुधरममे, ई तँ ओ जानैथ जे पूजामे लगाएब आकि रण्डी नचाएब। हुनका पाछू हम वौआइले जाएब। जहिना सभ दिन पदमिनी भेल घरमे रहलौं, तहिना रहब।” काकी बाजि कऽ चुप भऽ गेली। मुदा ‘पदमिनी’ सुनि हमरो मन विहुँसल आ गुणेसरो काका ठोर पटपटबए लगला- “भवति कमल नेत्रा...।” जेना अपन विचारकेँ प्रश्न बना गुणेसर काकाकेँ पुछने होथि। तेहने स्थिति बनि गेल। एक तँ ओहिना गुणेसर काका अपने बेथे बेथाएल रहैथ तैपर एकटा बेथा आरो चढ़ने मन झूकि गेलैन। एक बेर हमरा दिस तकैथ आ दोसर बेर पत्नी दिस। चकोना होइत देख कहलयैन- “काका, अपना जीविते दुनू परानी अपन श्राद्ध ऐ पाइसँ कऽ लिअ।” जहिना धारक मुहकेँ नवका पेट वा नवका मुँह भेटने ओम्हरे धारा तेज भऽ जाइए तहिना गुणेसर काकाकेँ भेलैन। बजला- “बौआ, जिनगीक अन्तिम चरणमे आबि गेलौं, बहुत लोकक श्राद्ध देखलिऐ। केकरो जशो भेल, केकरो अजशो भेल, मुदा दुनूक फल की भेल से अखनो धरि नइ बूझि पेलौं हेन। तैपर तूँ तेहेन विकट बात कहि देलह जे...।” कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला मुदा ‘तूँ विकट बात कहि देलह’ सुनि हमरो गर भेटल। पुछलयैन- “की विकट बात, काका?” गुणेसर काका बजला- “बौआ, जिनगी भरि व्याकरणे आ साहिते पढ़बो केलौं आ पढ़ेबो केलौं, मुदा...।” प्रश्नसँ हटैत गुणेसर काकाकेँ देख पुछलयैन- “एकरा के काटत, काका?” हमरा बातसँ गुणेसर काकाकेँ जेना सह भेटलैन तहिना आगू बढ़ैत बजला- “बौआ, अपन श्राद्ध अपने केना करब?” कहलयैन- “जहिना आन-आन जे जीवितेमे भोज कऽ लइ छैथ तहिना अहूँ अपन करब।” वामी-दहिनी मुड़ी डोलबैत गुणेसर काका बजला- “देखहक, जेकरा श्राद्ध बुझै छहक, ओइमे दूटा काज अछि। एकटा अछि भोज आ दोसर अछि कर्म। जे कर्म मुइला पछातिक अछि ओ जीवितमे केना हएत?” गुणेसर कक्काक विचार बूझिए ने पाबि रहल छेलौं। गाममे केतेको गोरे अपना जीविते श्राद्धक भोज कऽ नेने छला, जे बुझल छल, तइ हिसावसँ कहने छेलिऐन। बजलौं- “कनी अपना बातकेँ सोझरा कऽ कहियौ।” कहलैन- “देखहक, श्राद्धक कर्म प्राण छुटला पछातिसँ शुरू होइए। कियो-कियो श्रद्धा-पूर्वक नत-मस्तको होइ छैथ। मुदा प्राण निकलला पछाति कन्ना-रोहटसँ प्रकिया प्रारम्भ भऽ जाइए। बॉंस काटल जाइए, कपड़ा बजारसँ आनल जाइए, बॉंसक चचरी बनौल जाइए इत्यादि...; चचरीपर उठा असमसान घाट गेला पछाति लहास जरबैक प्रक्रिया शुरू होइए। से केना जीवितेमे हएत?” गुणेसरे कक्काक विचारक धारमे हमहूँ बोहि गेलौं। कहलयैन- “से केना हएत।” गुणेसर कक्काक मन अपन विचारक सफलता देख उत्साहित होइत रहैन। कनी अँटैक बजला- “आब लए भोजक।” कहि फेर चुप भऽ गेला। मने-मन जेना किछु विचारए लगला तहिना बूझि पड़ल। मुदा कनियेँकाल जखन ऑंखि-पर-आँखि देलिऐन कि जेना किछु मन पड़लैन। बजला- “बौआ, साहितक विद्यार्थियो रहलौं आ विद्यार्थीकेँ पढ़ेबो केलौं। से कोनो साल-दू-सालक समाजक साहित्य नै, हजारो-हजार बर्खक। सभ दिन समाजकेँ एक नजैरसँ देखैत एलौंहेँ, मुदा...।” ‘मुदा’ कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला। जेना बीचक कोनो बात बिसैर गेल होथि। टोकारा दैत कहलयैन- “काका, एना जे मुड़ी छोपि कऽ तम्मासँ सिदहा लगाएब तखन तँ भेल।” हमर बात गुणेसर कक्काक मनक विचारकेँ जेना खोंचारि देलकैन तहिना खोंरनी नेनहि विचार जगलैन। बजला- “बौआ, समाजकेँ जे भोजो खुएबैन, से समाजो की समाज रहल। रंग-रंगक समाज बनि गेल अछि। ई जाति, उ जाति! ई दियाद, उ दियाद! ई टोल, उ टोल! ई गाम, उ गाम...! केते कहबह।” जेना हमरो भक् खुजल। कहलयैन- “हँ, से ते ठीके।” ‘ठीके’ सुनि जेना गुणेसर कक्काक विचारमे सकताहट एलैन तहिना बूझि पड़ल। बजला- “बौआ, नाङैर-बिनु-नाङैरक, पूछ-बिनु-पूछक, पुछड़ी-बिनु-पुछड़ीक..., तेते रंगक ने लोक भऽ गेल अछि जेकरा समटब असाध अछि। जेकर पुछड़ी छोट तेकर दैछना नमहर! आब तोहीं कहह जे एक तँ भोज खाइमे बिहंगरा ठाढ़ करत, जे कियो कहत भत-भोज करू, तँ कियो कहत भाते ने खाएब। तैपर सँ ई कहत जे खेबो करब आ दैछनो लेब। एक गोरेकेँ दैछना देबै आ दोसर गोरेकेँ नइ देबै से मन मानत?” कहलयैन- “बड़ ओझरी बूझि पड़ैए, काका। तखन अपने मुहेँ बाजू जे अपन अभ्यंतर की कहैए?” ‘अपन अभ्यंतर’ सुनि गुणेसर काका ओहिना जिनगीक पोखैरमे डुमकी मारलैन जहिना कियो पोखैरक जाठि लग डुमकी लगा माटि उखारि ऊपर उठि जाठिक टोइयापर लगा अपनाकेँ धन्य बुझैए। अभ्यंतरक आत्माराम रूपमे बजला- “बौआ, ऐ दुनियॉंमे मनुखक जँ कोनो सम्पैत अछि तँ ओ छी साहित, मुदा एतबे बुझल अछि।” कहि गुणेसर काका दुनियॉंक बोनमे हेरा गेला। जहिना हजारो-लाखो रंगक नीक-सँ-नीक फल दइबला बोनक गाछ जे फलसँ लदल किए ने रहौ, मुदा अनाड़ीले ओ बोनफड़ भेल जे लोक नइ खाइए, तहिना दुनियॉंक सघन बोनमे गुणेसर काका मात्र एकटा साहित्यिक बात बुझै छैथ। सेहो किताबक। समाजमे माने मनुखक बीच साहित्य कोन रूपे जोड़ल अछि वा जोड़ल जा सकैए, ई बात काका नइ बूझि पाबि रहल छैथ। ओना व्याकरणक सन्धि-विच्छेद आ समास सेहो मनमे नचैत रहैन जे एकटा टुकड़ी करैबला आ दोसर टुकड़ीकेँ जोड़ैबला छी, मुदा तेकरा ओ व्याकरणक मात्र अंग बूझि-मानि बुझैत एला अछि। मुदा ओ तँ अक्षरक विन्यास भेल, मनुखक विन्यास तँ ओइसँ भिन्न छै, तैठाम गुणेसर काका हेरा जाइ छला। लूटमे चरखा नफा। विचारक दुनियॉंमे जँ कियो बानर जकॉं चढ़ल होथि तखन जे गाछपर चढ़ल बानर जकॉं निच्चासँ खोंचार देबइ तँ नइ मनुख जकॉं तँ बानरो जकॉं तँ खबखबेबे करता...। कहलयैन- “काका, अहॉं कनारि असुल रहल छी?” ‘कनारि’ सुनि चकोना होइत गुणेसर काका बजला- “से की, से किए उपराग दइ छह- बौआ?” कहलयैन- “काका, अहॉंक विद्यालयमे हम नइ पढ़लौं तँए अहॉं अपन विद्यार्थी नै बूझि छिपबै छी।” गुणेसर काका ठमैक गेला। ऑंखि उठा हमरोपर दैथ आ निच्चो खसा लथि। मने-मन सोचए लगला जे जइ विद्यार्थीकेँ पढ़ेलिऐन ओतबे ने हमर गुण लेबो केलैन आ पेबो केलैन, मुदा जे ऐसँ बाहर रहला, हुनका हम की देलिऐन आ ओ हमरा किए चिन्हता? पढ़ल-लिखल रहितो हम कोन काजमे हुनकर सहयोगी भेलिऐन? जखन सहयोगी बनबे ने केलौं, तखन सहयोगक केते आसा कएल जाए...? ...आखिर एना भेल किए? साहित्य तँ सबहक छी, सभ-ले अछि। हम साहित्यक उपदेश करैबलाक जिम्मामे छी, तखन किए ने बूझि पाबि रहल छी जे जेतबे लोक विद्यालय-महाविद्यालय देखलक तेतबे लोकक छी आ बॉंकी लोकक नइ छी। तखन? जरूर केतौ साहित्य आ समाजमे खाधि अछि जइमे ई दूरी बनि गेल अछि। मुदा आब काइए की सकै छी। आब तँ ने ओ देवी रहल आ ने ओ कराह! हारल सिपाही जकॉं गुणेसर काका बजला- “बौआ, लोक उमेरे नइ जेठ होइए, बुधिये जेठ होइए। एकटा विचार पुछै छिअ।” ‘पुछै छिअ’ कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला। हमरो कोनो गरे ने लगए जे किछु पुछितिऐन। की पुछता की नइ पुछता से पेटक बात केना बुझब? जँ बाते ने बुझब तखन कहबैन की! नजैर उठा ऑंखिपर देलिऐन तँ बूझि पड़ल जे मनमे किछु खुर-खुरा रहलैन हेन। नजैर निच्चॉं करिते रही कि बिच्चेमे गुणेसर काका बजला- “बौआ, पाछू उनैट तकै छी ते बूझि पड़ैए, दुनियॉंमे केतौ कियो ने अछि। पत्नीकेँ देखै छिऐन तँ बूझि पड़ैए जे सोल्होअना देह ऊपरमे खसौने छैथ। बेटा सभ सहजे देह छिप फुह खेलाइए। समाजमे केकरो कोनो एकटा बोलोसँ, उपकार नइ केलिऐ तँ किए ऐ बुढ़ाड़ीक भार अपना कपार लेत।” गुणेसर कक्काक विचार सुनि बूझि पड़ल जे संयासीक अवस्थामे पहुँच रहला अछि। कहलयैन- “काका, अहॉं तँ संयासीक ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल छी जेतए लोक दुनियॉं-ले जानो-परान दइए आ दुनियॉंकेँ गरियेबो करैए जे दुनियॉं झूठ छी।” हमर बात गुणेसर काकाकेँ नीक लगलैन। जिज्ञासु बनि बजला- “बौआ, आब आगू की करी से कनी तोहीं कहह?” पानिक धार निच्चॉं मुहेँ ने तेज गतिये चलैए, हवा तँ नइ छी जे जेमहर मन फुरतै तेम्हरे दौड़ो जाएत आ असथिरोसँ चलत। मनमे उठल, सभ दिन गुणेसर काका शिक्षकक रूपमे रहला, आइ अपने शिक्षकक खगता भऽ गेलैन! चेतन अवस्थामे नइ छैथ सेहो बात ने अछि। मनक आगूमे विचारक पट बन्न छैन जे खुलि नै रहलैन हेन, तँए खटखटबै तँ छैथ मुदा...! कहलयैन- “काका, अपने साहित्यसँ तँ जिनगी भरि सटल रहलौं, मुदा समाजसँ हटि गेल छी, यएह बीचमे...।” हमर बात सुनि गुणेसर काका चौंकैत बजला- “ठीके कहै छह, बौआ। सभ दिन किताबकेँ साहित्य बुझैत एलिऐ मुदा समाजे साहित्य छी।” हलसैत-कलशैत गुणेसर काकाकेँ देख कहलयैन- “काका, पाइकेँ अही काजमे लगा दियौ।” विचारक धारमे गुणेसर काका बोहिते रहैथ, बजला- “बेस कहलह, बौआ।” पॉंचम मास। गुणेसर कक्काक मन असथिरसँ मानि गेलैन जे अपन जिनगी भरिक जे धएल-धरल अछि ओ समाजक हितमे लगा देब। जइसँ पाइयोक कल्याण हएत। जँ नीक काजमे नइ लगत तँ अनेरे गलि-पचि कऽ नष्ट हएत। पॉंच मास पूर्वक गुणेसर काका आब ओ नइ रहला जे छला। खोज करैत-करैत एला, हमहूँ हुनके ऐठाम जाइले तैयार होइत रही। कहलैन- “बौआ, आइ सभ काजक अन्तिम विचार कऽ लइक अछि।” कहलयैन- “लिखा-पढ़ीक काज अछि, ऐठाम असुविधा हएत।” दुनू गोरे विदा भेलौं। फुलती काकी पहिनेसँ चाहक ओरियान केने रहैथ। पहुँचिते तीनू गोरे चाह पीलौं। चाह पीला पछाति कहलयैन- “काका, अपने ते सब दिन समाजकेँ एक नजैरे देखलिऐ।” कहलैन- “हँ।” कहलयैन- “गामक जन-जनक मन-मनक विचार मंचपर आबए, ऐ ढंगसँ कार्यक्रमक तैयारी हेबा चाही। बेटा सभ की कहलैन?” हँसैत गुणेसर काका बजला- “दुनू भॉंइ कहलक हेन जे अहॉं नीक कार्यक्रमक योजना बनाउ। सात दिन पहिने हम सभ आबि जाएब।” सोचैत-विचारैत सात दिनक कार्यक्रम बनल। गामक एक-एक जनकेँ सुनबो-ले आ बजबो-ले सभकेँ समए भेटैन। जइमे छह दिनक बारह बैसार हएत। अड़ोस-पड़ोसक जे साहित्य प्रेमी छैथ, हुनको आमंत्रित कएल जाइन। आ अन्तमे दिल्लीक डाक्टर त्रिलोकी चरणक साहित्य पाठसँ सातम दिन समापन कएल जाए। सएह भेल। काल्हि छह दिनक बारहो बैसार समाप्त भऽ गेल। आइ अन्तिम सातम दिन त्रिलोकी चरणक कार्यक्रम छैन। दिल्लीसँ पटना हवाइ जहाजसँ औता आ पटनासँ चरिचकिया गाड़ीसँ दू बजेक कार्यक्रममे पहुँचता। कार्यक्रम शुरू भेल। गामसँ अड़ोस-पड़ोसक सभ साहित्य प्रेमीक जुटान रहबे करए। मंच गनगनाइत। डा. त्रिलोकी चरण पटनासँ गामक रस्ताक जाममे फँसि गेला। मोबाइलसँ बेर-बेर खबैर होइत रहए जे जाममे त्रिलोकी बाबू फँसल छैथ। जाममे फँसल त्रिलोकी बाबू मने-मन सोचैत रहैथ जे केतौ भाषाक जाम, केतौ विचारक जाम, केतौ बेवहारक जाम अछि। समाज तँ जाममे फँसि गेल अछि। कथीक जाम छी, मनमे उठिते त्रिलोकी बाबू एक गोरेकेँ पुछलखिन- “कथीक जाम छी?” ओ कहलकैन- “एकटा पाथरक मुरती उखरल जे दूधो पीबैए आ बजबो करैए। तेकरे देखैले परोपट्टाक लोक उनैट कऽ जा रहल अछि। तेकरे जाम छी।” जहिना थोपड़ीक गड़गड़ीसँ मंच सजल तहिना थोपड़ीक गड़गड़ीसँ उसैरो गेल। आठ बजे रातिमे डा. त्रिलोकी चरण पहुँचला। पहुँच तँ गेला मुदा एलहो बाधित भऽ गेलैन आ आपसीक सभ कार्यक्रम सेहो बाधित भऽ गेलैन। शब्द संख्या- 3355, 29 जुलाई 2015 गण्डा तीन सालक पछाति करिया भायसँ भेँट भेल। ओना सालमे मास दिनक खातिर एक बेर साले-साल गाम अबिते छैथ मुदा संजोग एहेन भेल जे पैछला दुनू बेर भेँट नै भऽ सकला। तेकर कारण भेल जे एक बेर रामेश्वरम् चैल गेल रही। जइमे डेढ़ मास लगल, तइ बिच्चेमे एला आ गेला, तँए नै भेँट भेल छला आ दोसर बेर सासुक ऑपरेशनमे लहेरियासरायक अस्पतालमे बझि गेल रही, तँए नै भेँट भऽ सकल छला। मुदा ऐ बेर से सभ नै भेल, गामेमे रही। भेँट होइते करिया भायकेँ पुछलयैन- “भाय साहैब, अण्डा सबहक की हाल-चाल अछि?” जेना मनमे विचारले रहैन कि की, तहिना मुहसँ खसिते करिया भाय जबाव देलैन- “की हाल-चाल रहत, सभ गण्डा भेल जाइए!” ‘सभ गण्डा भेल जाइए’ सुनि मनमे ठहकल- एना किए करिया भाय जबाव देलैन? मुदा प्रश्नोत्तर तँ संगी-साथीक बीचमे ने चलैए, ऐठाम तँ से नइ अछि। उमेरोमे करिया भाय दस साल जेठ छैथ आ सभ दिन आदरक नजैरसँ सेहो देखैत एलिऐन अछि तँए धॉंइ दऽ प्रश्न दोहराएब उचित नै बुझलौं। मुदा अण्डा गण्डा भेल जाइए, उत्तरो तँ साधारण नहियेँ अछि। साधारण ई जे सोझा-सोझी विपरीत उत्तर भेल। कियो कोनो प्रश्न ओहिना तँ नइ उठबैए। कियो गपक सहमे पड़ि सहे-सह सन्हिया उठबैए, आ कियो मन-मरदनसँ उठबैए। हमर कारण दोसर नम्बरक अछि। मनमे उठल दिल्ली सन शहरमे, जैठाम सभ कथूक सुविधा छै। नीक स्कूल, नीक कौलेज, नीक समाज। नीक बेवस्थाक बीच लोक बास करै छैथ, जइसँ बच्चा सभकेँ नीक सुविधा भेटने नीक पढ़ाइ-लिखाइ होइते हेतैन। अपनो नीक आमदनीबला नोकरी छैन्हेँ। तेहेन कम्पनीमे काज करै छैथ, माने कम्पनी मालिकक गाड़ीक ड्राइवर छैथ, जे सभ सुविधा छैन्हेँ। तखन एना किए उटपटॉंग बात कहलैन? पुछलयैन- “की गण्डा कहलिऐ, भाय?” प्रश्न सुनि करिया भाय ठमैक गेला। ठमैक ई गेला जे गारजन तँ परिवारक अपने छी। तखन बाल-बच्चा जँ बिगड़ियो गेल आकि बिगड़लो जा रहल अछि, आ अपने मुँह तकै छी, तैठाम सोल्होअना दोख पत्नीए आ बाले-बच्चाकेँ लगा अपने पल्ला झाड़ि निकैल जाएब सेहो तँ उचित नहियेँ भेल। तहूमे बाल-बच्चा बाले-बोध भेल, ओ कियॉं-ने गेल जे नीक केना हएत आकि अधले केना भेल? ओना करिया भाय सेठक बिसवासू ड्राइवर। ड्राइवरे नै, बिसवासू समाङ्ग जकॉं सेहो। परिवारक खेबा-पीबाक वस्तु-जात सेहो करिये भाइक हथौटी होइ छैन। ओना कारखानासँ डेराक ऑफिस धरि अनेको नोकर अछि मुदा जुग-जमाना सेहो ने किछु छी। जेतए-केतौ सेठ वा सेठानी जाइ छैथ, ओ करिये भाइक ड्राइवरीमे जाइ छैथ। ओना चेहरा-मोहरा एहेन छैन जे जँ ओहन गाड़ी-ड्राइवर रहए तँ बड्डी-गार्डक जरूरत नै। दुनू काज एके गोरेसँ चैल जाइए तँए जँ एहेन नोकर डेढ़ियो दरमाहापर भेटए तैयो नफ्फे भेल। करियो भायकेँ मनलग्गु नोकरी भाइए गेल छैन, तँए बीस-बर्खक नोकरीक जीवनमे कहियो मुहॉं-ठुठी मालिक संग नै भेलैन। बरहमसिया फल कहियौ आकि बरहमसिया तीमन-तरकारी जकाँ करियो भायकेँ बरहमसिया आमदनी छैन्हेँ। दरमाहाक संग-संग हाट-बजारक कारोबार केने सदिकाल किछु-ने-किछु आमदनी होइते रहै छैन। करिया भाइक हिसाबे भौजी नइ छथिन, मुदा परिवारिक जिनगीमे कहियो कोनो बाधा उपस्थित नहियेँ होइ छैन। सुधंग महिला। छह-पॉंच किछु ने बुझैत, मुदा भानसो-भात आ घर-अँगनाक काज करैमे जेहने सचरगर तेहने बोली-चालीमे मनकनियॉं तँ छैथे। करिया भाय बजला- “बौआ, चिड़ैक अण्डा जहिना गण्डा भऽ सड़ि जाइए तहिना भेल।” जहिना पहिने करिया भाय बाजल छला जे अण्डा गण्डा भेलो जाइए आ भेलो अछि, तहिना फेर छछारीए कटैत बजला। माने जहिना जाड़क मासमे पैखाना केला पछाति पनिछू नै कऽ पानिक डरे छछारीए काटि लइए, तहिना करिया भाय बजला। घर-परिवारक बात छी, केना अँकराएल-पथराएल कोनो बात बीचमे बाजब। जखने एकोरती करिया भाय दिस टगि कऽ बाजब तँ धिया-पुता बुझत जे पिताकेँ कानमे पाथर घोंसिया बाप-बेटाक सम्बन्ध घटबै छैथ। तहिना जँ धिये-पुते दिस टगि कऽ बाजब तँ करिया भाइक मनमे हेतैन जे लोक अनका धिया-पुताकेँ अहिना चढ़ा-बढ़ा अनकर पानि उतारि बेइज्जत करैए। की बाजी की नइ बाजी से किछु फुरबे ने करए। मुदा बातक जँ नइ नाङैर पकड़ाएल तँ नइ पकड़ाएल मुदा चिड़ैक पॉंखि जकॉं तँ पकड़ेबे कएल। किएक तँ अण्डासँ बच्चा होइत लोक चिड़ैएटा केँ देखैए। भलें जानवरो आकि मनुखोकेँ किएक ने होइत हौउ। फेर लगले मनमे भेल जे करियो भाय दिल्लीक चौकपर बैसि कऽ चाह पीबैबला लोक छैथ, जैठाम रंग-रंगक उड़ॉंत लोक सभ बैसबे करैए। हो-न-हो कहीं नल-नील जकॉं ने कोनो मंत्र बूझि गेल होथि जे पानिमे पाथर नइ डुमै छै। फेर मनमे उठल शरीरोमे तँ चिड़ै जकॉं किछु ऐछे, जे ऑंखिक इशारापर उड़ि जाइए। आन जेते अंग अछि शरीरक, ओ सभ तँ अथवले अछि। अनका मुहेँ सुनत आ अनका पएरे चलत मुदा मन-चिड़ै तँ से नै अछि। ओ तँ ओइसँ हटलो अछि आ सटलो अछि। मुदा अछि तेहेन पीच्छर जे शरीरकेँ पकड़ैए ने दइ छै। तखन करिया भायकेँ पकड़ब असानो तँ नहियेँ अछि। फेर युक्ति फुरल। फुरल ई जे केकरो प्रतिकूल बात पुछला आकि कहलासँ ने मनमे खोंच-खरोंच लगत, जँ अनुकूल बात पुछबैन तखन किए खोंच-खरोंच लगतैन। पुछलयैन- “भाय, बच्चा सभकेँ नीक स्कूलमे देने छिऐन किने?” ‘नीक स्कूल’ सुनि करिया भाय ठमैक गेला। ठमैक ई गेला जे ओहन स्कूलमे दुनू भाए-बहिनकेँ देनहि छी जइमे सेठजीक धिया-पुता पढ़ै छै। खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ पढ़ै-लिखै, रहै-सहैले सेहो। संगे टी.भी., कम्प्यूटर आ मोबाइलो देनहि छिऐ, तखन बॉंकीए कथी रहल। जेना खुशी मने कियो अधला बात बजैए तहिना करिया भाय बजला- “बौआ सुशील, तोरासँ लाथ की, मुदा...!” ‘मुदा’ कहि आरो अस्सी मन भार मनमे लादि लेलैन। अपना घरक बात आकि धिया-पुताक बात बजैसँ किए कतिया रहल छैथ? ओना कतियाइक अवस्था तँ दुनू होइए। किछु एहनो होइए जइमे अपन भूलकेँ सुधारैक समए भेटै छै, आ किछु एहनो होइए जइमे मनक क्रोध सेहो जगै छै। मुदा फेर भेल जे अनेरे फुलबॉंस जकॉं आकि बेंत जकॉं खोंइचा केते सोहैत रहब, किए ने बातक पुछरीए पकैड़ पुछि ली। कहलयैन- “भाय, एना जे पथराएल केरौउक फुटहा जकॉं मने-मन फुटैत रहब तइसँ हम थोड़े बुझब। गमैया लोक छी, चिक्कारी-तिक्कारी थोड़े बुझै छी।” करिया भाइक छाती दहैल रहल छेलैन। जइसँ बकार फुटिये ने रहल छेलैन। तैपर सँ पिताक अपन दायित्वसँ खसल देख रहल छला। मुदा प्रश्नक उत्तर किछु कहि देब नै होइए। ओ तँ कोनो शिकारपर फेकल वाण जकाँ होइए। तैसंग मनमे ईहो होइत रहैन, जे धैनवाद सुशीलेकेँ दी जे वेचारा परिवारक बात बुझए चाहि रहल अछि। गामक लोक तँ चाह-बिस्कुट-पान खेलक आ कुशल-वर्ता केलक...। पाछू घुसकैत हारल नटुआ जकॉं करिया भाय बजला- “बौआ सुशील, अपने किरदानीक फल आइ...।” मुड़ी छोपल तम्माक चाउर जकॉं करिया भाइक विचार सोझड़ेबे ने करैन जे केते घटबी अछि, से बुझब। मुदा किरदानी तँ बाजि गेल छला। पुछलयैन- “की अपन किरदानी कहलिऐ, भाय?” बेवस होइत करिया भाय मुँह खोललैन- “सुशील, अपना जनैत कोनो अभाव दुनू बच्चाकेँ आइ धरि कहियो ने हुअ देलिऐ, मुदा...।” फेर करिया भाय मनक बात दाबि लेलैन। मनमे भेल- की अभाव दुनू भाए-बहिनकेँ कहियो ने हुअ देलखिन आकि पुड़ेबे केलखिन, से तँ बजबे ने केला। सोझहे कहि देलैन जे कोनो अभाव दुनू भाए-बहिनकेँ कहियो ने हुअ देलिऐ। जँ अभावक पुरती करैत रहितैथ तँ भाव ने जनमितैन, से किए ने जनमलैन, जे अभावे-अभाव भऽ गेलैन? कहलयैन- “भाय साहैब, परिवार कहियौ आकि मनुखकेँ कहियौ, जिनगीमे जँ कोनो काजक महत अछि तँ ओ अछि बाल-बच्चाकेँ बाल-सुर्ज जकॉं बाल-भव देब।” हमर बात जेना करिया भायकेँ ठिकिया कऽ छातीमे लगलैन, तहिना छिलमिलाइत बजला- “बौआ, बड़ इच्छा छल जे बाल-बच्चा पाबि जिनगीक यात्रा नीक जकॉं दुनू परानी कऽ लेब, मुदा से बूझि पड़ैए जे मनक अण्डा मनेमे गण्डा भऽ जाएत।” करिया भाइक बात सुनि अनेको रंगक विचार मनमे उठए लगल। किए करिया भाइक आसा अखने टुटि रहल छैन, तहूमे अखन तँ जुआन-जहान सेहो छैथ आ जीबैक बाट सेहो पकड़नहि छैथ? मुदा प्रश्न तँ जिनगीक छी जे एक धारामे बहैत आबि रहल अछि। मुदा तैयो करिया भाइक बोली तँ ओहन पीच्छराह बुझिए पड़ैए, जे अपन बात खोइले ने रहल छैथ आ हमरे अगुआबए चाहि रहला अछि। निष्पक्ष जकॉं जखन परिवारक बात पुछबैन तखन केतबो पीच्छराह किए ने होथि, पेटक सभ विकार, बकार बनि निकलबे करतैन। पुछलयैन- “भाय, गामोमे रहै छी आ दिल्लीयोमे?” आगूक बात मुहेँमे रहए कि बिच्चेमे करिया भाय धड़फड़ा कऽ बजला- “हँ से तँ रहिते छी।” मुदा उत्तर भरि देलैन, ने आगूक मुँह जोड़लैन आ ने पाछूक नाङैर। पुछलयैन- “जखन गाममे रहै छी, तखन गाम केहेन बूझि पड़ैए?” करिया भाय ठमैक गेला। आइ धरि कहियो करिया भाय ऐ प्रश्न दिस तकबे ने केने छला। कुच्ची चलबै काल रंगकर्मी रंगक अभावमे जँ रंग जोड़ियबए लगत तँ कुच्ची केना चलतै। तहिना करियो भायकेँ भेलैन। कोनो उत्तरे ने फुरलैन। हमरो गर बैसल। गर ई बैसल जे भुतलग्गुकेँ जहिना भगत झोंट पकैड़ बकबैए, तेहने अनुकूल समए बूझि पड़ल। पुछलयैन- “भाय, जेकरा जेरक-जेर धिया-पुता रहल तेकरा कनी-मनी एनी-ओनी हएब सोभाविक छै। जेकर कारणो केते छै, मुदा अहॉंकेँ तँ दुइएटा अछि, तखन एना किए बजै छी?” जेना मनक बात पुछने होइऐन तहिना करिया भाय पतालक पानि जकॉं शान्त-शीतल होइत मिठौंस बोलीमे बजला- “बौआ सुशील, अट्ठारह बर्खक बेटा जहिना अछि, कौलेजमे पढ़ैए, तहिना सोलह बर्खक बेटियो अछि, ओहो कौलेजमे पढ़ैए, मुदा...!” कहि करिया भाइक बोल बन्न भऽ गेलैन। बोली बन्न देख मनमे भेल, यएह छी जिनगी। डारि चूकल बानरक जे गति होइए सएह तँ विचार चूकने भऽ गेलैन अछि। मुदा उपाइए की? जखन धरतीपर ठाढ़ छी, अन्न-पानि खाइ-पीबै छी, देखैले ऑंखि सुनैले कान आ भोगैले दुनियॉं ऐछे तखन कोनो-ने-कोनो रूपे तँ जिनगी चलबे करत किने। चाहे हँसैत चलए आकि कनैत चलए...। अपन बेथाक कथा दोसर सुनि सकैए आ सुधरैक विचारो दऽ सकैए मुदा चलऽ तँ लोककेँ अपने पड़ै छै। केकरो साती कियो खा लेत, आकि पीब लेत तइसँ दोसराक भूख-पियास थोड़े मेटेतै...। पुछलयैन- “भाय, दुनू बेटा-बेटीकेँ कौलेजमे पढ़बै छी, ई तँ माइए-बाप आकि परिवारे नै, ई तँ समाजो आ देशोक पैघ उपलब्धि भेल, तखन एना मिड़मिड़ा कऽ किए बजै छी?” सीकपर राखल दहीक मटकूरमे जहिना कोनो धिया-पुता निच्चासँ गोला मारि फोरि दइए, जइसँ फुटल मटकूरक दही धरतीपर खसए लगैए, तहिना करिया भायकेँ भेलैन। बजला- “बौआ, शहर-बजारक पढ़ाइक की खर्च अछि, खान-पान आ रहै-सहैमे की खर्च अछि, ओ तँ अपन बात अपने बुझै छी, तों तँ नइ बुझैत हेबह।” गर देख कहलयैन- “से केना बुझब?” अपन गुरुत्वक बोध करिया भायकेँ भेलैन। मुदा छाती तँ छहोँ-छित रहैन, मुदा तैयो समैट-समैट बजला- “बौआ, एते दिन बच्चा जानि, ओकर काज अपन दैनंदिनक काज बूझि सम्हारि दइ छेलिऐ, आब ओ नोकर जकॉं अढ़ा-अढ़ा करबए चाहैए!” करिया भाइक बात नीक जकॉं नै बूझि पाबि रहल छेलौं, मुदा बेथाक जे धार बहि रहल छेलैन, ओकरा रोकबो उचित नै बूझि बीचमे बजैसँ परहेज केने रही। दोहरबैत बजला- “बौआ, आब बिआह-दान करै जोकर दुनू भेल जाइए, अपन घर-परिवार हेतइ, केना आगू चलतै, से सभ किछु ने बूझि रहल अछि आ खर्चाक अम्बोह लगा रहल अछि। एते दिनक नोकरीमे ने अपन आगूक जिनगी जीबैक विचार केलौं हेन आ ने धिये-पुते जीबैक ठौर पकैड़ रहल अछि।” पुछलयैन- “से केना बुझै छिऐ?” अकासमे उड़ैत चिड़ै जकॉं करिया भाइक मनक चिड़ै छहोँ-छित भऽ गेल छेलैन। अकासमे उड़ैत लाखो-करोड़ो-अरबो चिड़ै-चुनमुनी अपन-अपन जगह बना हँसैत-खेलैत-गबैत उड़ैत रहैए, मुदा अकासो तँ अकास छी, बिनु ओर-छोरक तँ ऐछे। तैठाम सोझे अकास कहने तँ नइ हएत। जेते दूर ऑंखिक इजोत जाइए तइमे सभसँ ऊपर गीध स्वछन्द रूपे उड़ैत कोठली जकॉं सिरौर काटि-काटि देखबो करैए आ धरतीपर अपन चहरो भँजियबैत रहैए। हवा ओकर संवाहक रहै छै आ धरतीक गंध पत्र...। तइसँ निच्चॉं चिल्होरि रहैए, जे गीध जकॉं ऊपर तँ नै मुदा आन चिड़ैसँ ऊपर गीधे जकॉं अकासमे सिरौर काटि-काटि जोतबो करैए आ धरतियो देखैत रहैए। ओना जोतैए गीधो मुदा चिल्होरिमे एते तँ गुण छइहे जे ठहकबो तँ करिते अछि। तेतबे किए गीध जकॉं थोड़े सड़ल-पाकल खाइए। ओ तँ जलभक्षी, फलभक्षी छी। सेहो ओहन जलभक्षी, जे जीवित पबैए मुइल नै। मुदा तँए की कहबै जे एतबेटा अकास अछि। कौआ, मेना, सुग्गा, बगड़ा, चुनियॉं-मुनियॉंकेँ की छोड़ि देबै? भलें ओ ऐ घरसँ ओइ घरक चारोपर उड़ि-उड़ि बैसबो करैए आ घर-अँगना, बाड़ी-फुलवाड़ीसँ अपन गुजरो-बसर करैत रहैए...। करिया भाय तहिना अकाससँ धरती देख रहल छैथ। अकाससँ धरती देखिते चौन्ह अबै छैन। देहमे जेना मिसियो भरि शक्ति नै बूझि पड़ै छैन। होइ छैन जेना निरबल निसहाय भऽ रहल छी। निसहाय होइत करिया भायकेँ देख हमर मन बरसि गेल। कहलयैन- “भाय, जाबे नीक जकॉं कोनो बातकेँ नै बाजब, ताबे अनठेकानीए जँ किछु उतारा देबो करब से ठेकनगर थोड़े हएत, ओना भैयो सकैए। तँए कनी फरिछा कऽ तहे-तह जखन बजबै तखने ने किछु अँटकारो लगौल जा सकैए?” फरिछा कऽ बाजब सुनि आकि की, करिया भाइकेँ जेना मनमे आस लगलैन। आस पबिते आस मारि मचकी झूलैत करिया भाय बजला- “बौआ, केतबो धिया-पुता वौरु जाएत ते वौरु जाह, मुदा जाबे ऐ हाथ-मुट्ठीमे दम अछि ताबे तँ कहुना चैले लेब।” करिया भाइक आस भरल बात सुनि अपनो मनक बिसवास बढ़ल जे भरिसक करिया भाइक जिनगी कोनो मोड़पर मुरिया कऽ घुरिया गेल छैन, तँए किछु आगू नै देख पाबि रहल छैथ। मुदा मोड़ो तँ मोड़ छी, सोझ-मोड़ सेहो होइए आ भक-मोड़ सेहो। सोझ मोड़पर तँ पछिले रस्तासँ आगूक दिशा-बोध भऽ जाइए, मुदा भक-मोड़ तँ से नइ छी, ऐमे अगिला रस्ता अन्हराएल रहै छै। मुदा जिनगीक मोड़क तँ दोसरो कारण अछि, जे छिपल अछि जिनगीक उठैत आ खसैत शक्तिमे। जँ ऊपर दिस उठि रहल अछि तैयो, आ जँ निच्चॉं दिस खसि रहल अछि तैयो। मुदा अन्हारो तँ अन्हार छी, गामो-घर आ गाम-घरक खेतो-पथार, पोखैरो-झॉंखैर आ नदियो-नालामे पसरल रहैए आ शहरो-बजारक गली-कुच्चीमे पसरल रहैए। एहने मोड़पर ने बुधि-विवेकक अग्नि-परीछा कहियौ आकि शक्ति-परीछा, होइए...। अहीठाम करिया भाय वौआ रहल छैथ। आगू दिस दुनियॉंक एक छोरसँ दोसर छोर तक अन्हारो-अन्हार देखै छैथ आ इजोतो-इजोत...। अन्हार-इजोतक झल-फलीमे झलफली आबि रहल छैन, जइसँ अगिला झलफलाइत झलफला रहल छैन। पुछलयैन- “भाय, हाथ-मुट्ठी की कहलिऐ?” धारमे बहैत, जेना कोनो फुलवाड़ीक फूल टुटि-टुटि दहलाइत बढ़ैत रहैए, जे एकपर नजैर पड़िते दोसर चैल अबैए आ जैपर पहिल नजैर पड़ल छल ओ भँसि कऽ आगू बैढ़ लहैरमे झलफलए लगैए तहिना करियो भायकेँ भेलैन। हमरा बातकेँ भँसिया करिया भाय अपन मनक बात बजैत कहलैन- “बौआ सुशील, जिनगीक पाशा दुनू संग चलैए, एक बाजी लगबैए आ दोसर पाजी होइए।” करिया भाइक बात सुनि मने मन्हुआ गेल। की पुछलयैन आ की उत्तर देलैन! अपने मनमे शङ्का उठल, करिया भायकेँ बजैमे धोखा भेलैन आकि हमरा सुनैमे धोखा भेल? किछु फुरबे ने करए। मुदा पुछबो की करबैन। जँ दोहरा कऽ पुछबैन आ कहीं जँ अपन परिवारक तामस हमरेपर झाड़ि दैथ, तखन तँ अनेरे दूध-घीक बनल दही खटाएत! खटाइत अपन जिनगीए बदैल लेत। कखनो नूनक संग चैल जाएत तँ कखनो चीनीक संग! से नै तँ नीक हएत जे मुहसँ किछु ने कहिऐन, खाली ऑंखिक इशारासँ कनी टुसकी मारि उसका दिऐन। अनेरे तँ बोमियए लगता। सएह केलौं। ऑंखि-मे-ऑंखि आ नजैर-मे-नजैर मिलते करिया भाय बजला- “बौआ सुशील, बाजीए पाजी भेल आ पाजीए बाजी अही आसापर ठाढ़ छी।” शब्द संख्या- 2304, 5 अगस्त 2015 हाथी आ मूस फागुन उतारपर आबि गेल, मुदा फगुआ अखन आठ दिन आगू अछि। कनी-मनी फगुआक लहकी लहैक रहल छै मुदा जोर नइ पकड़ने अछि। ओना आठ दिन पहिनहि शिवराति भऽ गेल, थालो-पानि छुब चलैनमे आबि गेल, मुदा जाड़क रंग अखनो सघने अछि। कहैले तँ मास दिन पहिनहि वसन्तक आगमन भऽ गेल मुदा ओ तँ वैचारिक मन-मनतरक धारे-धार बहाएल अछि ने, प्रत्यक्षमे तँ धरती ओहिना जाड़-पालासँ कँपैए, गाछ-बिरीछ ओहिना जाड़-ठाढ़सँ ठिठुरल अछि। जइसँ ने कलशेक आगमन भेल आ ने कोढ़ीए-बातीक। मुदा हवो आ रौदोमे तीखपन एने रंग बदलैक सूर-सार तँ भाइए रहल अछि। जइसँ आमोक मोजर फलैके रहल अछि आ आनो-आन लत्ता-बिरीछमे बदलैक सम्भावना सेहो भाइए रहल छै। रवि दिन, बारह बैज गेल छल। खेतक अपन घरमे खा-पी कऽ मूस अपन कोठी-भरली, ढक-ठेक, बखारी-मुनहैर देख चैनसँ रस्ता परहक पीपरक गाछ लग अराम करैले आबि कऽ बैसल। गाछक दोसर भागमे एकटा बोनैया हाथी सेहो बोनसँ चरौर कऽ पहिनेसँ आबि बैसल छल। एक दिस हाथी दोसर दिस मूस बैसल। ओना दुनू एक-दोसरकेँ देखबो करैत आ मने-मन गौरो रहए। बोनैया हाथीकेँ देख मूसकेँ दया अबैत रहइ। दया ई अबैत रहै जे वेचाराकेँ सौंसे देहे फलेरिया पकैड़ नेने छै, गाम-घरमे जँ रहैत तँ पोसिन्दा दवाइयो-दारू दइतै, मुदा रहै तँ अछि बोनमे, तखन दवाइयो के करौतै! कहू जे जँ वेचाराकेँ माथे आकि देहे-हाथ टटेतै, तँ केना कऽ माथे ससारत आकि देहे-हाथ, पटपटेबे करत किने...। मुदा लगले मूसक मन बदैल गेलइ। बदैल ई गेलै जे सभकेँ अपन केलहा भेटै छै। कोइ करैए आपले माएले ने बापले...। जहिना दुनियॉंमे अरबक-अरब लोक अछि तहिना कण-कणमे विरजैत अरबो-खरबो भगवानो तँ छैथे। अपना कणे आ अपना मने ने कियो भगवानक कण पकैड़ कन्हेठ-कन्हेठ जिनगीक भार उठा चलैए। आकि ओकर साती कियो आन चलतै? सोच-विचार करैमे मूसक ब्लडपेसर तेज भऽ जाइ आकि खींझ उठि जाइ। मुदा जखने हाथीक देहक दशा देखै तँ दया आबि जाइ। अही सोच-विचारमे मूस कखनो सिरमापर मुड़ी दऽ पड़ि रहए तँ कखनो उठि कऽ मुड़ी अलगा-अलगा हाथियो दिस देखए। दोसर दिस हाथियो मूसेटा केँ देखए, दोसर-तेसर गाछ तर रहबे ने करइ। मुदा दृष्टि-दोष भेने हाथी अपन देह देखबे ने करए आ मूसकेँ देखै तँ बिलाइयोसँ छोट बूझि पड़इ, जइसँ होइ जे एकरासँ नमहर बिलाइ होइए से तँ ऑंखिक मटक-मे बिला जाइए आ ई तँ सहजे ओकरोसँ छोट अछि, बिलाएले अछि। तँए झुझुआइत रहए। झुझुएबो केना ने करैत, फल गुण गाछ आ गाछ गुण फल होइते छै किने। मनुखक फल तँ मुहेँमे ने फड़ै छै। अही धोखामे कहियौ आकि दृष्टि-दोषे हाथी कखनो काल मूसो दिस देख लिअए आ लगले नजैरो खसा लिअए। मुदा मूसक उठी-बैसी देख हाथीक मनमे ईहो छगुन्ता लगै जे लगले सिरमापर मुड़ी रैख अरामो करए लगैए आ लगले उठि-बैस कऽ हमरो दिस देख लइए आ बजैए किछु ने! एना किए…? ओना मूसक मन लुसफुसाइ जे जखन दुइए गोरे गाछ तर छी, तखन तेसरकेँ गप-सप्प करए बजबए जाएब आकि जे लगमे अछि तेकरेसँ ने गप-सप्प करब। जाबे गप-सप्प नइ हएत ताबे केना हाल-चाल बुझब जे हम केना जीबै छी आ ओ केना जीबैए। ने हम कोनो खुट्टा गाड़ि कऽ जीबैले एलौं हेन आ ने ओ आएल अछि, भेल तँ दू दिनक जिनगी आ ई दुनियॉं अछि, तखन जँ बुधि-विवेकी गणेश जीक वाहन रहैत एतबो नइ बूझि पएब तखन गणेशजीकेँ समाचार की सुनेबैन। हुनकर संवाहक तँ हमहीं ने छिऐन, अपन तँ तेहेन सीक-लीख छैन जे सौंसे दुनियॉंकेँ पेटेमे समैट कऽ रखने छैथ, तखन कोन दोसर दुनियॉं टहलैयो-बुलैले जेता। मुदा लगले मूसक मन आगू बढ़लै। जखन भगवान मुँह देलैन, तखन जँ ओकरा सीब कऽ राखब, सेहो केहेन हएत। हुनके गलतीसँ ने सौंसे देह बन्न रहल आ मुहकेँ खोलि कऽ रैख देलैन। तइसँ नीक ओकरो सीबिए दितैथ, किए लोक खेबे-पीबे करत आकि ओकर गुणे-सुआद बुझत। मुदा लगले मूसक मन फेर आगू बैढ़ गेलइ। आगू बैढ़ते मन संयासी जकॉं दुनियॉंपर थूक फेकैत विचारए लगल। अनेरे गप-सप्पक कोन लपौड़ीमे पड़ब, तइसँ नीक जे एक तँ ओहन गाछ-तर छीहे जेकर चिक्कन पात कमलोसँ पातर डण्टीमे सुशोभित भऽ सदिकाल बिनु हवोक पवित्र हवा पसारि रहल अछि, तैपर गाछक छाहैर सेहो ऐछे, तखन चैनसँ अराम करैत गढ़गर नीन किए ने पीब जे अनेरे बोनैया हाथीक फेरिमे पड़ब...। मुदा हाथीक दशा देख मूसक प्रेम तेते बैढ़ गेल रहै जे मनसँ हटबे ने करइ। उठि कऽ बैसि मूस पहिने हाथीकेँ हिया कऽ देखलक, तँ बूझि पड़लै जे वेचाराकेँ कोनो ठौरे-ठेकान ने छै। तेहेन बोनमे रहैए जे जँ कहियो धोप-चटमे आगि लगतै, तखन आन-आन तँ देह झाड़ि पड़ा जाएत, मुदा एहेन रोगी-टट्टी केतऽ भागत। अछैते औरुदे मरत की नइ! फेर मूसक मनक विचार बदललै। बदैलते उठलै। किछु छी तँ छी, मुदा जीबै तँ छी किने, आखिर जीबैएले ने कियो आएल अछि। तखन किए ने अपन मोनक बात हाथीसँ बूझि ली। ओना हाथीक नजैर सेहो मूसेपर रहइ। मूसक मन-मनतर तँ नै बूझि पबैत रहए, मुदा अनुमानसँ ई बूझि पड़ैत रहै जे हमरे देख-देख हमरे विचार करैए। नीक करैए आकि अधला करैए से तँ ओ जानए, मुदा हमहीं किए शंका करबै जे मने-मने गाइरे पढ़ैए...। मूसकेँ सोर पाड़ि हाथी बाजल- “हौ मूस बौआ, जखन दुइए गोरे गाछ तर छी, तहूमे पीपरक गाछ-तर, दुपहरियाक समए अछि। तेतबे नइ, जखन माघोक दुपहरिया नाच करैत रहैए, तखन ई तँ सहजे फागुनक छी, तहूमे फगुआ सिरचढ़ अछि। तँए जँ दुनू गोरे एकठाम रहितो मुँह बन्न केने चुप-चाप भेल सकदम रहब से नीक नहियेँ अछि, तोरा केहेन लगै छह?” हाथीक बात सुनि, मूस बाजल- “अँइ यौ बौआ भाय, अहॉंसँ जेहने देह-दशा हमर छोट अछि, हाथ-पएर छोट अछि, तेहने बुइधो-अकील छोट अछि किने, तखन तँ अहॉं ने अपन विचार हमरो कहब, जइसँ अहीं जकॉं किए, अहूँसँ नमहर किए ने जे अहूँकेँ चाङुरमे लऽ उड़ैबला शदूल जकॉं अपन सीख-लीख बना लेब।” कहि मूस सहटैत हाथीक सूढ़ लग आबि बैसल। लगमे अबिते- हाथी अपन दरबज्जा देख- मूसकेँ कहलक- “बौआ, नीकसँ रहै छह किने?” ‘नीक’ सुनि मूसकेँ सुरसुरी जकॉं लागल। सुरसुरी ई लागल जे नीके नइ छी, अधला छी, से ई केना बुझलक? मूसक मनमे जेना उड़ी-बीड़ी लागऽ लगलै। कहू जे मुनहर-बखारी, ढक-ठेक, कोठी-भरली धन-धानसँ भरल-सजल पोखरा-पाटन घर हमरा अछि, ने खाइक-कमी अछि आ ने पीबैक...। तेतबे किए, जहिना खाइले एतेटा दुनियॉं भरिक धरती अछि, तहिना ने पीबैले अहूसँ नमहर पतालक पानि अछि, घुमै-फीड़ैले तहूसँ नमहर अकास अछि। आ जेकरा एते भारी देह छै, गाछक-गाछ दिनमे खाइए, ने अपना घर बनबैक लूरि छै आ ने राशन-पानी जोड़ियबैक। तखन एना किए बाजल? मुदा लगले मूसक मन विचारसँ समझौता केलक। बाजल- “बौआ भाय, अखन केना दिन-राति चलैए?” मूसक प्रश्न सुनि हाथीक मन ठमकल। ठमकल ई जे केना एकरा कहबै जे भाय, जमीन्दारी गेने बड़का मुनहरो चैल गेल। किछु छी तँ हथिसारमे रहैबला छी किने। ‘टुटलो अछि तैयो नअ घरकेँ बसौत’, तहूमे अखन अपना दरबज्जापर अछि, किए अपन रोब-रूआब कम करब। बाजल- “भाय, घीओसँ चिक्कन दिन-राति चलैए। आ अपना दिसक कहह?” हाथीक बात सुनि मूसक जी जरऽ लगल, मने-मन सोचलक- कहू जे सौंसे देह टेटरे जकॉं बूझि पड़ै छै आ केहेन रूआब झाड़ैए!! जखन कि अपना बुते ने अपन रहैक घर बनौल हेतै आ ने खाइक ओरियान अपना बुते कएल हेतइ। भलें बोनमे रहैए, कोन गाछ तर सुतैत हएत, आ बोन-झाड़क डारि तोड़ि-तोड़ि खाइत हएत, से ते ओ जानए। मुदा बीत भरिक नढ़िया जँ बैसले-बैसलमे पाछूसँ नाङैर काटि-काटि खाए लगै तँ एकरा बुते की कएल हेतइ। फेर मनमे एलै जे दुनियाँमे कियो अपन भगवान मालिक अछि। बाजल- “बौआ भाय, भगवान सभकेँ नीक रखथुन। सभकेँ एके नजैरसँ देखैत रहथुन। अच्छा! भाय साहैब, ई कहू जे परिवारो अछि की असगरे छी?” ‘परिवार’ सुनि हाथीक मनमे भेल, ई की पुछि देलक? परिवार केकरा कहै छै...? हाथीकेँ किछु फुरबे ने करइ। फेर मनमे एलै जे पुछिनिहारेसँ ने किए पुछि लिऐ। बाजल- “बौआ, परिवार केकरा कहै छहक?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे भेल जे आइ तेहेन अकलहूथ मरदसँ पल्ला पड़ल जे के मरद हएत जे एकरा बुझाएत, ‘मुरख हृदए न चेत, जँ गुरु मिलहि विरंचि सन...।’ मुदा लगले मनमे एलै, जखन दू गोरेमे बातक विवाद हएत तखन तँ यएह ने हएत जे ने अहॉंक बात हम मानब आ ने हमर बात अहॉं मानू। यएह ने भेल अदहा-अदही पनचैती। यएह सोचि मूस बाजल- “वाह! बौआ भाय, तखन ते अहॉंक वंश संयासीक वंश भेल किने? मुदा हम सभ ते सभ दिन परिवारी रहलौं, बिनु परिवारे एको क्षण रहि हएत...।” अपन विचारकेँ तर पड़ैत देख हाथी बाजल- “बौआ, तूँ ते जुइतिक ने छोट छह मुदा जथाक मोट छह। तँए हिसाव-बारी जोड़ैमे वौआ जाइ छहक।” अपन गुरुत्व देख मूस सहैम गेल। बाजल- “बौआ भाय, जखन घरसँ विदा भेलौं, तखन घरनी तेहेन ने करैलाक तड़ुआ खुऔने छेली जे ओहिना ढेकार होइए।” एक तँ हाथीकेँ ‘परिवार’ सुनि मन ओझराएले रहइ, तैपर दोहरौआ गीरह जकॉं ‘घरनी’ आबि गेने, मने घुरिया गेलइ! घुरिया ई गेलै जे दुनूमे- माने परिवार आ घरनीमे- कोन बात दोहरा कऽ बाजी। जँ से नइ बाजब तँ ई- मूस- अनेरे अपनो वौआ रहल अछि आ हमरो वौआएत। बाजल- “बौआ! पहिलुका बात- ‘परिवारक’ बात बिसैर गेलहक?” हाथीक बात सुनि मूस साकांच भेल। साकांच होइत बाजल- “बौआ भाय, कोनो ने बिसरै छिऐ, मुदा तेना ने मनमे लट्टा-पट्टी होइत रहैए जे कखनो तरका-ऊपर चैल अबैए आ ऊपरका तर पड़ि जाइए। आगूसँ अहीं कनी मन पाड़ैत चलू।” सह पाबि सहटैत हाथी बाजल- “परिवार की भेल?” मूस कहलकै- “परिवारे ने जिनगीक सम्पैत भेल। जिनगीक सच्चाइ छी, जे एक जगहपर बसैत, एक पीढ़ीक विदाइ करैए तँ दोसर पीढ़ीकेँ सृजन करैत ठाढ़ अछि। तैसंग परिवारेमे मनुख ठाढ़ो होइए आ दुनियोँ अही परिवारक समूहो छी आ ठाढ़ो अछि।” मूसक जबाव सुनि हाथी नमहर सॉंस छोड़लक। सॉंस छोड़िते जेना मन हल्लुक भेलइ। हल्लुक होइते मनमे उठलै- चरि-टङ्गा रहितो मूस अपन परिवारक संग जीबैए आ...। हाथी बाजल- “बौआ, परिवार बनै केना छै?” हाथीक प्रश्न सुनि मूसक मनमे भेल, कहू जे देह-दशा एहेन रखने अछि आ परिवार केना बनै छै से बुझले ने छै! मनकेँ थीर करैत मूस बाजल- “बौआ भाय, अहॉंकेँ अपन जिराते ने बुझल अछि तँए बोनमे वौआइ छी। एकरा अहॉं अधला नइ मानबै, हमर दुनियॉं नमहर अछि, आ अहॉंक दुनियॉं छोट। हम परिवारबला वंशक सभ दिन रहलौं, अखनो छी। अपने घर बनबैयो, बसबैयोक लूरि अछि आ परिवारक संग दुनियोँ देखै-सुनैक लूरि अछि।” मूसक बात सुनि हाथी सकपका कऽ सकदम भऽ गेल। सकदम होइते दम सधाए लगलै। किछु समैक पछाति नमहर साँस छोड़ैत बाजल- “बौआ, परिवार केना बनै छै?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे उठलै, भरिसक ई वेचारा हाथी स्कूल नइ देखने अछि, से जँ देखने रहितए तँ शुरूहेक व्याकरणमे ने पढ़ने रहैत जे घरनीए घर आ घरे परिवार। जखन से बुझनहि ने अछि तखन किए ने भूमिकामे ‘घरनी’ आ व्याख्यामे ‘परिवार’ बुझा दिऐ। तैबीच हाथियो तगेदा करैत बाजल- “बौआ, जखन एकठाम दुनू गोरे गप-सप्प करैले बैसल छी, तैबीच जँ मुहेँ चुप कऽ लेब तखन आगूक गप-सप्प केना हएत?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे भेल, जे भरिसक एकरो परिवारमे रहैक मन होइ छै। मुदा रहत केना? छौड़ा-माड़ेक खेती परिवार थोड़े छी। रहत बोनमे जेतए सदिकाल अपनो जाति-वेरादर आ आनो-सभसँ लड़ाइए-झगड़ा करैत रहत आ जखन केकरो ऐठाम सवारी बनि रहत तँ या तँ मरदा-मरदी दू-चारिटा रहत, नइ तँ असगरे रहत! तखन परिवार केना बनतै आ अपना परिवारमे रहत केना...? मूसकेँ किछु फुरबे ने करइ। मुदा लगले मनक जुगतीनाथ मुकतीनाथक बाट-बिटिया सुझा देलकै। सुझिते मनमे एलै- एकर बात हमरा नइ बुझल अछि। बुझलो केना रहत। ने एक जाति आ ने एक बास, आ ने एक भोजन अछि। तहूमे तेहेन ओझराएल-पोझराएल छै जे सुढ़ियाएबो-सोझराएब भारी अछि। मुदा अपन जिनगीक तँ अनुभव ऐछे। अपने जिनगीक बात किए ने कहबै। जिनगी केकरो हौउ मुदा ओहो तँ जिनगीए छी। नीक लगतै, सम्भव हेतै तँ मानि लेत, नइ हेतै तँ अपने भोगि-भोगि सीखत। मूस बाजल- “बौआ भाय, हम सभ दू रंगक घरनीसँ घर बनबै छी जे ‘परिवार’ कहबैए। एकटा अछि कटबी आ दोसर अछि सौंस।” ‘कटबी’ आ ‘सौंस’ सुनि हाथी वौआ गेल। वौआएल ई जे सौंसक माने भेल पूर्ण, मासक पूरनिमा जकॉं। आ कटबीक माने भेल काटल। माने पनरह दिनक पखमे परीवसँ चतुरदसी तक। मुदा इजोरियाक परीव अन्हारे भेल आ चतुरदसी पूरनिमे। बाजल- “बौआ मुसाइ, कटबी आ सौंस एक केना भेल?” हाथीक जिज्ञासा देख मूसकेँ भेल, सतो तँ सत छी। एकर माने ई नइ ने जे सतो एके छी आ एके रंगक अछि। सभ जगहपर सभ-रंग अछि। अपन सत बातसँ केना हाथीक सूढ़ि सुढ़ियाएत, तेना जँ नइ कहबै तँ बोनैया छीहे, जे अनेरे बमछल घुरैए आ जँ अधकटुआ भऽ जाएत तखन तँ आरो अनेरे बमछत! बाजल- “बौआ भाय, हमर वंश सभ दिन ऐ धरतीकेँ जनमभूमि मातृभमि बुझैए, ओना हमरा जातिक मातृभूमि सौंसे दुनियॉं छी, सभठाम बास अछि। मुदा अपनामे सभ कर्मभूमि बना-बना अपन कर्ममे दिन-राति लगल रहै छी।” ‘सभठाम बास’ सुनि हाथीक मन विचलित भऽ गेल। मनमे एलै- शहर-बजार दिससँ गाड़ी-सवारी भगा देलक, बोन-झाड़ रहै जोकर नइ अछि, तखन आगू दिन जीब केना? आगूक बात सुनैले हाथी कान ठाढ़ केलक। जखने कान ठाढ़ केलक आकि ऑंखि उठलै। ऑंखि उठिते बाजल- “बौआ, तोरो ऐ दुनियॉंमे हिस्सा छह?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे भेल जे वेचारा कहियो अपन जनम-भूमि, मतर-भूमि आ करम-भूमि बुझबे ने केने अछि। बुझबो केना करत, करम-भूमि तँ धरम-भूमिक आगू अछि, मुदा तहूसँ पाछूक सीढ़ीपर मरम-भूमि बैसल अछि जेकरा टपने बिना केना पहुँच सकैए। मुदा मरमो-भूमि तँ मरमभूमि छी, बिना नजर-भूमि सोझ-साझ भेने केना हएत...? तँए पहिने परिवार केना बनै छै, से बुझा देब जरूरी अछि। बाजल- “बौआ भाय, दुनियॉं बड़ीटा छै अनेरे कोन मगजमारीक भॉंजमे पड़ि डायविटीज आ ब्लडपेसर बढ़ाएब, अपन देश-दुनियॉं राज-काजसँ मतलब राखू।” मूसक विचार हाथीकेँ नीक लगलै। बाजल- “बौआ, पहिने कटबी आ सौंस घरनीक बात बुझा दाए। जखन घरनीक बात बूझि जाएब तखन परिवारक बुझल जेतइ।” मूस बाजल- “बौआ भाय, सौंस घरनी ओ भेल जे सए बरख संगबे बनल, ओ भेल शती। आ कटबी ओ भेल, जे सालक कहा-बधी कऽ रहैए, धिया-पुता बॉंटि लइए आ चैल जाइए। अहिना जिनगी भरि दुनू- मूस-मूसनी- अपन जिनगी बितबैत हँसैत-खेलैत मौज-मस्तीमे जिनगी बिता लइए।” मूसक बात सुनिते मातर हाथीक दम फुलऽ लगलै। साँस असथिर करैत बाजल- “बौआ, जखन अपन सभ किछु छह तखन हिसारस्ती केते छह?” मूस बाजल- “छहअना ते रेडियो-अखबार बजैए मुदा तइसँ बेसी अछि। ई किए ने बुझै छिऐ जे खेतसँ खरिहॉंन, खरिहॉंनसँ ऑंगन, ऑंगनसँ कोठी-भरली, ढक-बखारी, मुनहरसँ लऽ कऽ सरकारी गोदाम धरिक बासो अछि आ हिस्सो अछि।” मूसक बात सुनि हाथीक मन पीघैल गेलै। पिघैलते मनक पिघलैत विचार व्यक्त केलक- “बौआ, हमरो सभकेँ केना हएत?” हाथीक असिआस देख मूसोक मन पीघैल गेल। पिघलल विचार दैत बाजल- “बौआ भाय, जाबे अपनेसँ जीबैक लूरि नइ सीख लेब, ताबे अहिना केतौ सवारी बनि सवार हएब तँ केतौ बोनैया कहाएब। तँए...।” मूसक बात सुनि हाथीक मनमे उठल, लूरि केना सीखब। लूरि सीखैले तँ पहिने बुधि चाही। तइले सिखौनिहारो चाही, सीखैक जगहो चाही, तैसंग लूरिले बासो आ वस्तुओ-जातक बेगरता पड़बे करत। बुधि ने केकरो तरे-तर घोंसिया जाइ छै मुदा लूरि केना तरेतर घोंसियाएत। ओकरा घोंसियबैले तँ हाथ-पैरसँ लऽ कऽ ऑंखि-कान सभ साकांच रखऽ पड़त। तहूमे मूस माटि तरमे रहैए, ओना ऊपरोमे नुका कऽ रहैए। एकरा पतालक पानि तक देखल छै, मुदा हम तँ माटिपर रहैबला छी, हम केना शत बनि सतबर्खा भऽ सकै छी? बाजल- “बौआ, बिनु लुरिये-बुधिये सए बरख जे जीब से एतेटा पेट केना भरत?” हाथीक बात सुनि मूस मने-मन हँसल। मुदा हँसीकेँ नै खोलि मसीकेँ खोलैत मूस बाजल- “बौआ भाय, अहॉं चिन्ता किए करै छी, जे विधाता एहेन देह-दशा रचलैन ओ खेनाइ-पीनाइ रचब छोड़ि थोड़े देने हेता। तहूमे एक हाथक जे मुँह चीरलैन से ओहने भोजनो ने रचने हेता।” हूँहकारी दैत हाथी सुनैत रहल मुदा मन मन्हुआ गेलै। मन्हुआ ई गेलै जे एक बीतक मूस अछि, गणेशजीक संग रहैए! शास्त्र-पुराणक सभ पेंच-पॉंच जनैए! मुदा हमर वंश तँ सभ दिन राजा-रजबारसँ महंथाना धरि सवारी बनि राजो-दरबारक आ महंथानोक सिंगार बनल रहल। आब ने ओ समए रहल आ ने ओ रूतबा, तखन तँ वंशो कहुना बँचल रहए...। मने-मन हाथी बेथासँ बेथित होइत बेथा व्यक्त करैत बाजल- “मूस बौआ, हमरा वंशसँ तोहर वंश बेसी लूरिगरो छह आ बुधिगरो, तँए सए बर्ख शतीक सेहन्ता देखै छह। मुदा हम ते लड़ाइयो-झगड़ाक मैदानमे जाइ छी ते सहीसे लड़ाइ करैए आ हम दुनू दिससँ खतरामे पड़ल रहै छी। तैठाम सए बर्ख जीबैक विचार मनमे केना रोपब।” लड़ाइ सुनि मूसकेँ जना मने-मन खींज उठलै, मुदा खिसियाएल विचारकेँ दबैत बाजल- “बौआ भाय, जेना अहॉं रणभूमिक बात कहलौं, तइसँ की कम दुर्गम भूमि हमरो अछि। बाधो-बोन जे एकान्त रहैए, तहूठाम कोदारिसँ खुनि-खुनि जानो लइए आ धनो लुटैए।” मूसक बात सुनि हाथी वामी-दहिनी मुड़ी डोलबैत रहए, जइसँ मूसकेँ होइ जे भरिसक हमर जिनगीक बात हाथियोक मनमे गड़ि रहल अछि। तँए धारक पुलक खुट्टा जकॉं जेते ऊपरसँ धुमसुर चलेबै तेते मजगुती औतै। बाजल- “बौआ भाय, जीबैले बड़ गंजन सहऽ पड़ै छै, ई तँ चर-चॉंचरक बात कहलौं। घरमे, बॉंसक पोरमे तारक कमानी लगा फुसला-फुसला मुसकारीमे तेना फँसा लाठीक हूरसँ कुटि-कुटि फेकैए जे जँ ओकरा फेकेने फेकैतिऐ ते फेका कऽ केतए-कहॉं चैल गेल रहितौं।” कनीकाल चुप भऽ फेर मूस बाजल- “भाय साहैब, हम ते पतालसँ धरती आ धरतीसँ अकास धरि रहैबला छी, मुदा अहॉं ते ऊपरमे रहैबला भेलौं, तँए अहॉंकेँ अपनो ने विचारए पड़त जे शती-साधवी बनि केना जीब?” मूसक बात सुनि हाथीक मन घुमल। घुमिते बाजल- “बौआ, एहेन देहमे शती केना बनि हएत?” मूसकेँ जेना ठोरेपर रहै तहिना बाजल- “बौआ भाय, जिनगीक लोक आसा करैए, भरोसे थोड़े रहैए, तँए जेतबे भरोस तेतबे...।” मूसक बात हाथी नै बूझि पौलक। मुदा अखन धरि जेते गप-सप्प केने छल से नीक जकॉं बूझि गेल रहए। तँए मन उधुक्का मारि विचारकेँ जगौलकै। जैगते विचारसँ हाथी बाजल- “बौआ, आसा भरोस आ आसा बिसवासकेँ कनी दोहरा कऽ बुझा दाए।” हाथीक बात सुनि मूसकेँ हँसी लागल। मने-मन भेलै जे सोझे एतेटा देहे रखने अछि, मुदा चुट्टियो सन विचार बुझिते ने अछि। जाबे चुट्टी ओकरा मगजमे पैसि नइ कटतै ताबे ई नइ बुझत। लगेमे चुट्टी सेहो टहलैत रहइ। ओकरा शोर पाड़ि हाथीकेँ देखबैत कहलक- “बौआ भाय, देखियौ ऐ चुट्टीकेँ। कखनो केतौ सन्यासी जकॉं अँटकैए। जेते संगी भेटै छै सभसँ मुँह-मिलानी करैत आगू बढ़ैत अपन दुख-धंधाकेँ अपना संगे नेने चलैत, चलैत रहैए, चलैत रहैए। आ दोसर दिस अहॉं छी, जे अनके भरोसे सोल्होअना रहै छी। चुट्टियोकेँ देखै छिऐ जे अपन घर बना हमरोसँ जेरगर परिवारमे शती बनि-बनि जीबैत चलैत रहैए। आ अहॉंकेँ अबूह लगैए।” हाथीकेँ मने-मन होइत रहै जे मूस जान दइक विचार दइए आकि लइक, से केना दुइए गोरेमे बुझब? शंका जगलै। बाजल- “बौआ, तूँ जे कहै छह तैपर ते भरोसो कएल जा सकैए आ ना-भरोसो ने कएल जा सकैए।” हाथीक विचार सुनि मूस महसूस केलक जे हाथियोक शंका-निर्मूल नहियेँ छै, मुदा जेते असो अछि तेतबे ने नीअसो अछि। तखन तँ जेकरा निआसकेँ आस बनबैक लूरि छै ओ आसावान भेल, जे आसावान भेल सएह ने अपन आसक-बिसवासक संग बढ़ैए। बाजल- “भाय, दुनियॉंमे केतौ किछु ने छै आ सभ किछु छै। देह गुण ऑंखि जखन हेतह तखन अपनो बुझह लगबहक। मुदा तइमे तोहर दोख थोड़े छह, ओ ते गढ़निहारक भेल।” मुस्की दैत हाथी बाजल- “बौआ, अहिना सभ दिन एकठाम बैसि दुनू गोरे गप-सप्प करैत रहब। अखन तहूँ जा आ हमहूँ जाइ छी।” शब्द संख्या- 3016, 11 अगस्त 2015 मुसरी आ घोड़ा गिरिजानाथक पुरान घोड़सार। जहिना केहनो ईंटा, सीमटी, लोहा किए ने पड़ौ मुदा बनला पछाति घर दिनो-दिन पुराने होइत जाइए, तेहने पुरान घोड़सार। ओइ गिरिजानाथक पुरबजक समए छेलैन जे नीक हथिसार, नीक घोड़सारक संग गाइयो-महींसिक नीक बथान छेलैन। समैयो छल, घोड़ा पोसब घरेलू पशुपलित उद्योग सेहो छल जे पोसबेटा नै, लेनो-देन चलै छल। मुदा आब तँ घोड़ा पोसबेक समए नइ रहल। गाए जकॉं ने भोजन-ले दूध दइए आ ने इंजिन गाड़ीक दौड़मे सकैए, तँए बिसरजनक बेर घोड़-जातिक जिनगीकेँ भाइए गेल अछि। ओना ओहन पुरान गिरिजानाथक घोड़सार नहियेँ छैन जे हथिया झटकमे आकि समुद्रक हूद-हूदीमे खसि पड़त। मुदा ओहनो तँ नहियेँ छैन जेहेन पिताक चढ़ैबला घोड़ाक घोड़सार छेलैन। मालो-जाल आ घरो-घोड़सार केहनो हएत तँ नीके हएत। किछु छी तँ पशुएधन छी, चाहे दूध दिअए आकि सवारी बनए। तीन नम्बर ईंटाक देवाल सुरखी-चूनपर जोड़ल, ऊपरसँ खढ़-बॉंसक ठाठपर लोहाक चदरा, फलिगर मुँह, पूब मुहेँक रूखि जइसँ पुबरिया रौद अबैक रस्ता बनल। मुदा पछबरिया रौद पैछला खिड़कीएटा सँ अबैत। अढ़ाइ ईंटाक देवालक बीचमे जे जोड़क सुरखी-चून रहै ओकरा काटि-काटि फेकि, मुसरी सेहो अपन घर-परिवार ओही घोड़सारक उत्तरवरिया देवालमे बना, गाम-घर छोड़ि शहरमे रहए लगल छल। माने ई जे खेत-पथार भेल गाम जइमे सेहो मूस-मुसरीक चास-बास छइहे, मुदा से नइ पहिलुका जमीन्दार परिवारक आ अखुनका रईस परिवारक घोड़सार छी। किछु छी तँ घोड़सार छी। जेहने घर तेहने भोजन। घोड़ाकेँ खाइले जे भारक भरल अँकुरीक चँगेरा जकॉं भरल चँगेरामे दिनो दइ आ रातियो दइ, तइमे सँ घोड़ाक तेजगर साँससँ जे बदाम उड़ि-उड़ि निच्चॉंमे खसै ओ घोड़ा थोड़े ओकरा बीछि-बीछि खाइ आकि ओ ओहिना रहि जाइ। दयालु मुसरीक परिवारकेँ सहीसपर दया लगै जे वेचाराकेँ अहू झाड़ैले झाड़ू चलबए पड़तै। ओना दुनू सॉंझ सभ दिन चलबए पड़िते छै, मुदा अदहा-अदही उपकार भाइए जेतइ। तेते बदाम निच्चॉंमे खसै-छिड़िआइ जे पॉंचो तूर मुसरी परिवारकेँ भरि पोख भऽ जाइ, जइसँ किए गमैया जिनगी पसिन करत। पानिक वर्तनमे सदिकाल पानि रहिते छै, खाइले बदाम भेटे जाइ छै, रहैले पक्का-मकान छइहे, तखन किए ने भरि पेट खेबो-पीबो करत आ संतोखी माइक पूजो करत, गीतो गौत आ अपन नचारी-विचारी सेहो सुनौतैन। ओना ओ मुसरी केतेको सालसँ ऐ घरमे रहैत आबि रहल अछि मुदा कहियो पान-सातटा सँ बेसी नै रहैत। मुसरीक जिनगी छी सालमे बीसो-पचीस जँ परिवार नइ बढ़ौत तखन एतेटा दुनियॉंमे जे एते जोड़-घटाउ करैक मशीन सभ कमा रहल अछि ओ के खाएत। ओइले तँ मुसरीए वंशक बेगरता अछि किने। लोहाक घर हौउ, आकि ईंटा-सिमटीक, अनका जे हौउ मुदा मुसरीक तँ बसोबास छीहे। कागजक घर हौउ आकि अन्न-पानिक, रहैक अनुकूल परिस्थिति तँ ऐछे। तँए जखन एतेटा दुनियॉं अछि तखन जिनगीमे दुखे कथीक? तहूमे कोनो कि हाथी-घोड़ाक वंशक छी जे सालमे गोटे वंश बढ़त कि नइ बढ़त। जखने मुसरीक बाल-बच्चा टेल्हुक भऽ जाइ कि माए-बापकेँ ई कहि घर छोड़ि बहरा जाए- “आगू दिन अहॉंक बुढ़ाड़ीक अछि तइले जे हाथ-मुट्ठी गरमा कऽ नै राखब, तखन बुढ़ाड़ी कटत केना। तँए दुनियॉं कमाइले जाइ छी, मासे-मास ए.टी.एम.मे पाइ पठबैत रहब, जे अहॉं दुनू गोरेक- माइयो आ अहूँक- खातामे जमा होइत जाएत।” टेल्हुक बेटा-बेटीक बात सुनि असीरवाद दैत दुनू परानी-मुसरी संगे कहैत- “दुनियॉंमे केतौ रही, हँसैत-खेलैत रही। यएह छी माता-पिताक असीरवाद।” ई असीरवाद तँ दऽ दइ मुदा पछाति दुनू परानी-मुसरीकेँ मन पड़ै जे अबै-जाइक असीरवाद तँ देबे ने केलिऐ। अधखड़ुआ असीरवाद पाबि टेल्हुक मुसरी घरसँ बहराए। जेतए रहए तेतइ बिआह-दान करैत बसि जाइ। बिसैर जाइ माइयो-बापकेँ आ माए-बापक देल असीरवादोकेँ। पैछला साल गिरिजानाथ हरिहर क्षेत्रक मेलासँ घोड़ा कीनि अनने छला। डाकपर खरीद केलैन, तँए दू लाख लगलैन। ओना ओइसँ जे पहिलुका घोड़ा रहैन ओहो तेहने तड़गर रहैन। मुदा पाइबलाक सवारी साल-दू-सालपर बदलेबे करैए, तँए बदलने छला। इंजनबला सवारीक जहिना तेल-मोबिलक टंकी भरल रहैत तहिना गिरिजानाथ घोड़ोक खेनाइ-पीनाइक जोगाड़ केनहि रहैथ। एकटा नोकर- सहीस-केँ घोड़ेक सेवा-ले रखने छैथ। दुनू सॉंझ सहीस घरसँ थैर धरि बहारबो करैए आ घोड़ाकेँ घरो-बहार करैत आ खुएला-पीएला पछाति सवारी सेहो कसैत। घोड़ाक घर- माने घोड़सार- दिन भरि खालीए रहैत, आ रातिके घोड़ा रहने भरल रहैत। भरि दिन खाली रहने पॉंचो तूर मुसरी घोड़सारमे मन भरि खेलबो-धुपबो करैत आ गीतो-नाद गबैत। ओना घरक जे मुँह-पुरुख गारजन- मुसरी- अछि ओ धिया-पुताक खेलमे शामिल नइ होइत कातमे बैसि परिवारक संग माने पत्नीक संग धिया-पुताक खेल देख मने-मन खुशियो होइत आ खुशी रहैले विचारबो करैत। अपन आ अपना परिवारक तँ खुशीए-खुशी मुसरी देखैत मुदा जेकर घर छिऐ, माने घोड़ाक; ओकरा खुशी नै देख दुनू परानी मुसरीक छाती छँहों-छीत होइत रहइ। छँहों-छीत ई होइ जे एक तँ वेचारा घोड़ा भरि दिन रौद-वसात किछु नै बूझि लफरैत रहैए, दौगैत रहैए। तइपर मुहोँ सीअल रहै छै आ पएरो बान्हल। जखन खुट्टापर सँ निकलैए, तखन पैरक बान्ह खुजै छै आ मुँहक लगै छै आ घुमि कऽ जखन अबैए तखन मुँहक लगाम खुजि पैरक बान्ह लैग जाइ छै। जेठ मास, सुर्ज अपन सोल्होअना हिस्साक उपयोग कऽ रहला अछि। जइ डरसँ हवो गरमाएल रहैए आ पानियोँ पतलमुहॉं भेल रहैए। बर्खाक तँ बाते की, गर्भेमे रहैए। आ जाड़ तँ सहजे अमेरिकाक हिस्सामे पड़ि जाइए। चारि बजे भोरे गिरिजानाथकेँ केतौ काजे जेबाक छेलैन। तँए सहीसकेँ रातिये खाइबेर कहि देने रहथिन जे चारि बजे भोरे जेबाक अछि। गिरिजानाथक बात सहीस बूझि गेल जे अहिना समैक चर्च आनो दिन करिते छैथ। तँए हँ-हूँ किछु ने बाजल। हँओं-हूँ तँ तखन ने बजाएत जखन कोनो नाकर-नुकर रहत, जे परिवारोमे आकि गामोमे रहिते अछि। मुदा जइ गाममे नाकर-नुकर रहैए तहीठाम ने कोनो काज पहाड़ बनि आगूमे अवरोध ठाढ़ करैए, जैठाम नइ रहैए वा कम रहैए तैठाम ओही हिसावे ने किछु हेबो करैए आकि नहियोँ होइए। मुदा ऐठाम तँ जेहने बिसबासू नोकर तेहने बिसबासू घोड़ाक सवारी आ तेहने बिसबासू मलकार कहियौ आकि मालिक गिरिजानाथ। कहलो जाइ छै- ‘गाए-गोड़ूक मिलान तँ ठेहुनो पानि दूहान...।’ जहिना गिरिजानाथ चारि बजेक समए बान्हि सहीसकेँ कहने रहथिन, तहिना अपनो जिम्माक काजक जोड़-घटाउ कऽ नेने रहैथ। आन दिन आठ बजेमे उठनिहार आइ चारिये बजे घरसँ निकैल जेता, तँए हिसावमे जोड़-घटाउ करए पड़लैन। जहिना चलैले सवारी टंच चाही, तहिना ने काज केनिहार सवारोकेँ टंच रहऽ पड़तैन। माने ई जे घरसँ निकलैसँ पहिने अपन जे व्यक्तिगत दैनंदिनक क्रिया अछि, ओइसँ निवृत होइत अपनाकेँ रणक सिपाही जकॉं तैयार करि कऽ निकलए पड़त। तैयारी करए गिरिजानाथ तीन बजे भोरे उठि गेला। उठिते लगले पत्नियोँ उठि कऽ पतिक तैयारीमे जुटि गेली, तहिना सवारीक तैयारीमे सहीसो तीन बजे भोरे घोड़सार खड़ैर-बड़ैर चिक्कन-चुनमुन ओइ रूपे केलक जे मालिकक पहिल सगुनियाँ जगह तँ यएह भेल। घरक भीतर घरे भेल, मुदा बहराक मुँह तँ यएह भेल। सहीसक चहल-पहल आ पैरक आहैटसँ घोड़ोक नीन टुटि गेल। टुटिते बूझि गेल जे केतौ रणक्षेत्रमे जाए पड़त। ताबे सहीस घोड़ा आगू अँकुराएल बदाम आनि ओगारि देलक। घोड़ाक टीप-टापसँ माने पैरक दमससँ मुसरियो सभ तूर जैग गेल। कले-कुशल ओछाइनपर रहत केना। बिना उरखुरेने-तुरखुरेने दुनू परानी बुढ़िया-बुढ़बा रहि सकैए मुदा धिया-पुता, टेल-टेल्हुक केना रहत। मुदा अखन घरसँ निकलबो केना करत। तोहूमे घोड़ाक घर छी, गाइक रहैत तँ एकटा बातो, ओकर खूर फाटल रहै छै, बीच फाटोमे जान बँचि सकै छै मुदा घोड़ाकेँ तँ टाप होइ छै। सौंसे सरदर रहै छै। पीचरा-पीचरा भऽ जाएब। लहासक चिन्हो-पहचीन मेटा जाएत। कोन हड्डी मरदनमा छी आ कोन मौगियाही, से तेना भऽ कऽ फेंट-फाँट भऽ जाएत जे परेखोमे नै आएत। तँए अखन घरेमे रहब नीक। मुदा खुरलुच्ची धिया-पुता मानबे ने करइ। अन्तमे तामसे पिता-मुसरी धिया-पुताकेँ कहलकै- “अखुनका समए की अछि से बुझहै छीही?” सभसँ छोटका जे रहै, ओ बाजल- “हँ।” “की बुझहै छीही?” “अखन उत्तमचन नाचक ओ समए छी जखन थानामे केस लिखबए गेल आ बाजल- क्या कहू दरोगाजी अकिल ने देता काम, यह औरत भी लेत है उस औरत का नाम।” मुदा ओइसँ नमहरका मुसरी जे रहै ओकरा नीक नइ लगलै। छोटकाकेँ फटकारैत बाजल- “अखनुक बेर छी अल्हा-रूदलक ओ गीतक जइमे कहै छै- रनमे मरे दोख नइ लागे।” धिया-पुताक घघौंज देख पिता-मुसरी बाजल- “अनेरे तूँ सभ नाच-तमाशा ठाढ़ केने घघौंज करै छेँ, अखुनका बेर छी प्रभातीक।” तैपर छोटकी बेटी पुछलकैन- “प्रभाती क्या हुआ, पापा?” पिता उत्तर देलखिन- “मॉरनिंग सॉंग।” चारि बैजते गिरिजानाथ ऑंगनसँ निकैल घोड़सार दिस बढ़ला। बैढ़ते देखलैन जे सहीस घोड़ाक पीठपर रंगर चद्दरिक गद्दा लगौने अछि, मुँहमे लगाम लगौने अछि। पहुँचिते लगाम पकड़ा देत। मुदा बिच्चेमे गिरिजानाथक मनमे उठलैन, लोहाक बनल गाड़ी-सवारी तेज होइतो लोकेक बनौल छी, तँए लोकक काबूमे बेसी रहैए। ओना केतौ-केतौ हूसितो अछि। मुदा घोड़ा तँ से नइ छी। जीव छी, अपन सभ किछु छै। माने ऑंखि छै, मुँह छै, कान छै, बुधि छै। असथिरो रहि सकैए आ बदमाशियो कऽ सकैए। मुदा छी तँ ओहो सवारीए। लगाम पकड़ैसँ पहिने गिरिजानाथ घोड़ाकेँ प्रणाम करैत बजला- “चलह हे संगी, कर्मभूमिमे।” जहिना विचारक घोड़ाक संग देह दौड़ए लगैए तहिना दौड़ैले गिरिजानाथ घरसँ निकलला। घोड़ाकेँ घरसँ निकैलते घर खाली भेल। खाली होइते पॉंचो तूर मुसरी अपना घरसँ निकलल। निकैलते बुढ़बा-बुढ़िया ऑंखि उठा बाल-बच्चा लेल भोजन ताकए लगल तँ देखलक आने दिन जकॉं बदाम छिड़ियाएल अछि। तहूमे दिन भरिक फुला कऽ अँकुराएल, पेटमे पड़िते ओंकरी दिअ लगत, माने अँकुराए लगत! पछाति दुनू परानी धिया-पुता दिस नजैर देलक। तीनू बच्चा तीनू दिस चौकन्ना होइत रहए। ने माइक मुँह दिस एकोटा तकैत रहए आ ने बापक मुँह दिस, जेना पेटक कोनो फिकिरे ने रहइ। हरदरे बुढ़बा मुसरी बाजल- “बाउ, अहॉं सभ की देखै छी?” सभसँ छोटकी बेटी कहलकैन- “पापा, टी.भी.मे क्रिकेट देख रहा हूँ।” छोटकी बेटीक बात सुनि, ने बाप किछु बाजल आ ने माए। मनमे नाचए लगलै अपन कुल-खनदानक पुरुखाक इतिहास जानियेँ नइ रहल अछि आ अनका पाछू बेहाल अछि। ओकरे बाप-दादाक नामक माला बना जपैत रहह...। पत्नी दिस ताकि नजैर निच्चॉं करैत मुसरी दोसरकेँ पुछलक- “बाउ, अहॉं की देखै छी?” गम्भीर होइत दोसर बच्चा मुसरीकेँ कहलकैन- “बाबूजी, अपने जनम देने छी तँए संग मिलि दुख-सुख कटैत मृत्युक पछाति श्रद्धापूर्वक बिसरजन केला पछाइते ने अपनाकेँ उद्धार बुझब, आकि स्वतंत्र बुझब। ई तँ नइ जे माए-बाप जनम देनिहार पालनकर्ता छैथे, तँए हमरा खगते की अछि आकि हमर खगते की छै।” बच्चाक बात सुनि पिताक मन जेना थीर भेलैन। थीर होइते पत्नीकेँ कहलखिन- “माए गुन धी...?” पतिक बात सुनिते बुढ़िया-मुसरी बजली- “कोन पुरना-धुरना गपक खोर-चाल करै छी। अनेरे खोड़नीसँ खोंचारै छी।” आगू बैढ़ पॉंचो गोरे थैरक पॉंचू भागसँ बैसि बदाम बीछि-बीछि खेलक। पानि पीब बुढ़बा-मुसरी तीनू बच्चाकेँ कहलक- “बौआ, खेला-पीला पछाति जे कनी अराम नइ कऽ लेब, तखन पार लागत। दिनुका खेलहा राति आ रतुके खेलहा ने दिनमे खाइ छी।” तीनू ‘बड़बढ़ियॉं’ कहि आगू बैढ़ गेल। दुनू बुढ़बा-बुढ़िया घोड़ाक थैरेमे अराम करए लगल। मुदा मन चहाएले रहइ। चहाएल ई रहै जे भरल पेटक नीन छी, जँ कहीं मोटगर होइत गेल आ तइ बिच्चेमे जँ घोड़ा आबि गेल तखन तँ अनेरे जान चैल जाएत। मुदा लगले मनमे उठलै- अपने दुनू परानी ने ऑंखि मूनि अराम करब, बच्चा सभ तँ जगले रहत, ओकरे किए ने चेतौनी भार दऽ दिऐ। एक तँ अराम करब भेल, तहूमे जँ छगाएले मन रहत तखन, नीने केना हएत। मीठगर नीन तँ तखन ने अबै छै, जखन मीठगर मन मीठगर भोजन केने रहल, जँ से नइ रहल तँ मीठगर नीन कहियौ आकि गढ़गर नीन, से थोड़े हएत। मुदा गाढ़ो जँ गाढ़े रहि जाए, आ प्रगाढ़ नै हुअए तखन ओइ गाढ़क महत्ते की? पति पत्नीसँ पुछलक- “गाढ़ नीनमे नैन केना रहैए?” पतिक बात सुनि पत्नीक मनमे भेल, जखन समिलात धियो-पुतो अछि, सामिल परिवारो अछि, तखन तँ समिलात विचारो ने हेबा चाही? तँए जँ पति आदेश केलैन जे ‘गाढ़ नीनमे नैन केना रहैए।’ तँ बड़बढ़ियॉं केलैन। अपन हक-हिस्साक उपयोग केलैन। मुदा हमहूँ किछु निवेदित नइ करयैन, तखन दुनूक बीच मन-मिलन केना हएत? जँ मन-बुधिसँ भेँटे नै हएत तखन बुधि-मनक मिलाने केना हएत? आ जखन बुधिये-मनक मिलान नइ हएत तखन दुनूक बीच मेल-मिलाप केना हएत? जखन दुनूमे मेले-मिलाप नइ हएत तखन एक-दोसरक बीच विलाप केना हएत? आ जँ विलापे नइ तँ संगे चलबे ने करब आ जखन संगे चलबे ने करब, तखन दुनू संगबे केना हएब? सीता जकॉं एक गोरे रावणक पुष्प वाटिकामे रहब आ दोसर बोने-बोन वौआइत-वौड़ाइत केतौ रत्नाकर सन मुनि आश्रम पहुँचत तँ केतौ सबरीक आश्रम, तैसंग केतौ तीर-धनुषक संग शिकारी बनत तँ केतौ मेघनादक गर्जन-मर्जनक शिकार सेहो बनबे करत किने? ओना एक-दोसरक प्रश्न सुनि दुनू परानी मुसरी मने-मन तेना उत्तर ताकऽ लगल जे चेतसँ चेतन बनए लगल मुदा चिन्तनक क्षण जहिना ऑंखिक दुनू पट-पटा ऑंखिकेँ बन्न कऽ दैत अछि, तहिना दुनूक ऑंखिक पीपनी एक-दोसरमे सटि कऽ ओझरा गेल, जइसँ बाहरी दुनियॉंक रस्ते भीतरी दुनियॉंसँ कटि गेल। एक-दोसराक पीपनी सटिते नीनक आशंका दुनूक मनमे भेल; आशंका होइते एक-दोसरकेँ चैन रूप देख बाजब बन्न कऽ लेलक। एम्हर तीनू बच्चा बाहरी दुनियॉंक खेलमे लगल रहबे करइ। तीन बजैक समए, टहटहौआ रौद। घोड़सार लग आबि गिरिजानाथ सहीसकेँ घोड़ाक लगाम पकड़ा अपने आँगन गेला। रौदाएल घोड़ाक दशा देख सहीस घरेमे घोड़ाकेँ बान्हब नीक बुझलक। बाहरक थैरमे नै बान्हि सहीस घोड़सारेमे घोड़ाकेँ लगाम खोलि, पैरमे घोड़छान लगा खुट्टामे बान्हि देलक। तैबीच घोड़ाक आहैट देख पॉंचू मुसरी अपन घरक बाट पकैड़ भीतर चैल गेल, मुदा सभकेँ अगुअबैत बुढ़बा-मुसरी पाछूसँ अपना घरक मुँहपर पाछू मुहेँ घुमि रौदाएल घोड़ाक दशा देखए लगल। पियासल घोड़ाकेँ बूझि सहीस पहिने पानिक वर्तन आगूमे देलक। मुदा घोड़ा पानि देखिते मुँह छीपि लेकक। मुँह ई सोचि छीपलक जे सरद-गरम एहने समैमे होइ छै। पानिक वर्तन हटा नोकर खाइले आगूमे देलक, ठेह उतरल घोड़ा खेनाइकेँ सुँघबोने केलक। नोकर बूझि गेल जे पहिने ई अराम चाहैए। अखन नहेबो केना करबै। रोदाएल अछि। झूसियाइत नोकर घोड़सारसँ निकैल अपन बास दिस बैढ़ गेल। अपना घरक मुहथैरपर सँ बुढ़बा-मुसरी देखलक जे वेचारा घोड़ा दरदे ने खेलक आ ने पीलक, ओ ते सभटा अपने बेसाहलक। मुदा हमरा तँ केता दिन केता रातिक खेनाइक जोगाड़ एके बेर भऽ गेल। मुदा लगले मनमे भेलै, एते लऽ कऽ राखब केतए? बड़ करब तँ पेटेमे ने खा कऽ राखब। अपना तँ ओहन घर नइ अछि जे कोशल करि कौशलिया करब? दोसर, पानि तँ सहजे पानियेँ छी, जे अकाससँ पताल धरि पसरल अछि। मुसरीक मन घुमलै, घुमि कऽ ओतै चैल गेले- जखन पेट छोड़ि अपन कोनो पथार-खेत ऐछे नइ, रखनहि ने छी आ पेटो भरले अछि, तखन अनेरे मनकेँ कोन अर्थहीन काजमे वोआबै छी। मुसरीकेँ जेना एक प्रकरणक पूर्ण भाव भेट गेल होइ तहिना भावपूर्ण विचार मनमे नाचि गेलइ। नचिते नजैर घोड़ाक छानक दुनू अगिला पैरपर पड़लै। नोकरकेँ घरसँ निकैलते थाकल घोड़ा बैसैत असुआ कऽ मसुआ गेल। घोड़ाक मुहसँ खसैत लाड़-झागकेँ देख मुसरीक मन सिहैर गेलइ। सिहैरते घोड़ाक ऑंखिपर नजैर बढ़ौलक तँ पल खसल दुनू ऑंखि, मुहसँ खसैत बाटक पीड़ाकेँ देखलक। मनमे एलै- वेचारा कहबो केकरा करत? ऐठाम के अछि? आ जँ रहबो करैत तँ की ओकर वेदनाक पीड़ाकेँ थोड़े पीब लइत। मुदा एकठाम संग रहने एते तँ हेबे करैए जे जेतइ समूह तेतइ समाज बनैए। मनमे उठलै, कहू जे वेचाराकेँ साढ़े तीन देवालक बीचक खुट्टामे बान्हि, दुनू पएर लोहाक कड़ीसँ छाइन देने अछि आ अपने सभ अपन-अपन खोबहार पकैड़ नेने अछि। के वेचाराक वेदना सुनत! अपना दिस मुसरी हिया कऽ देखलक तँ बूझि पड़लै जे वेचाराक पएरो बरबैर आकि ओकर नाको-कान बरबैर ने छी, तखन हम काइए की सकै छी। मन ठमैक गेलइ। ठमकिते लगले मन ठनकलै, ठनकिते जगलै, हमरा बुते ओकर राशन-पानि जुटौल थोड़े हएत। घरो बनबैक लूरि अछि तँ अपने सनककेँ बास भरिक; तैठाम ओकर रहैक घरो नइ बना सकै छी। किछु कहौ चाहबै तँ ओकर कान तेते ऊपर छै जे सुनबे ने करत। तखन हम काइए की सकै छिऐ। अपना भागे वेचाराक जे दशा लिखल छै से तँ भोगइ पड़तै...। मुदा लगले मुसरीकेँ अपनापर ग्लानि जगलै। जगलै ई जे ई तँ केकरो भलाइ करबसँ अपन देह छीपब भेल! जखन अनकर दुख-पीड़ा अपना मनमे नइ बॉंटि लेब, ताबे ओकर दुख घटतै केना? बदलल विचारे जखन मुसरी ऑंखि उठा कऽ देखलक तँ बूझि पड़लै जे बैसल घोड़ा मुड़ी खसौने एकटा कान धरतीपर देने अछि आ दोसर मुँहक ऊपरमे छै। देखिते सवुर भेलै, सवुर ई भैलै जे ऊपरका कान ने ऊपरमे छै, मुदा माटि परहक कान तँ निच्चेँमे छै, ओइ बरबैर तँ छीहे। मुँह जँ ऊपरो छै तँ कनी जोरसँ बजबे करत; अवाज ऊपर जाइ कि नइ, मुदा निच्चॉं तँ खसबे करत, तँए सुनैमे कोनो असोकर्ज नहियेँ हएत; निच्चासँ सुनियेँ लेब। अपन बात तँ लगेसँ कहबै, ओहो सुनबे करत। अपन घरक मुहथैरसँ निकैल बुढ़बा-मुसरी घोड़ाक थैरमे पहुँचल। हिया कऽ देखलक तँ बूझि पड़लै जे वेचारा घोड़ाक जान सदिकाल फॉंसेमे फँसल रहै छै! पैरक छुटल तँ मुँहक लागल आ मुँहक छुटल तँ पैरक लागल! अवग्रहमे वेचारा पड़ल रहैए। अपना दिस हिया कऽ मुसरी देखलक जे हमरा बुते कोन भलाइ वेचाराक भऽ सकै छै। चारूकात नजैर दौड़बैत जखन पैरक छानकेँ देखलक तँ बूझि पड़लै खुट्टामे बान्हल जौरकेँ जँ दुनू दिस माने खुट्टो दिस आ पएरो दिससँ काटि देल जाए तँ वेचाराक जान हल्लुक भऽ जेतइ! फेर जँ सहीस आबि दोसरछान लगा दइ, ई दीगर भेल। मुदा अखन जेतबे काल तेतबे काल अवग्रह कटि ग्रह तँ बनतै। जखने ग्रह बनतै तखने ने तरेगनक इजोतमे अपनाकेँ भुकभुकौत। ससैर कऽ मुसरी घोड़ाक कान लग पहुँच गर लगा कऽ बैसल। घोड़ाक ऑंखि बन्न रहै तँए मुसरीकेँ देखबो ने केलक, तहूमे कुत्ता जकॉं नाको नहियेँ छै जे गन्धोसँ परेख ऑंखि खोलैत। कानक जड़ि लग बैसल मुसरी जोरसँ बाजल- “घोड़ा भाय, हम मुसरी छी। जीव-जगतक दुनियॉंमे हमहीं-तोहींटा एकठाम छह, तेसर कियो ने अछि जे भगवानक दरबारमे दोखी बनत। लगमे हमहींटा छी। तँए जँ तोहर दुख-पीड़ा हम नइ देखबह तँ के देखतह। कान खोलह, ऑंखि उठाबह।” अपना मने मुसरी बाजि कऽ चुप ऐ दुआरे भऽ गेल जे, घोड़ा हँ-हूँ की बजैए से पहिने सुनी। मुदा घोड़ा तँ घोड़े छी, मुसरीक चुनचुनी केते बुझत। एना जँ माछी-मच्छरक घनघनैनी हाथी-घोड़ा बुझए लगल तखन तँ भेल! किए घोड़ा कान पटपटाएत आकि ऑंखि खोलत। मुसरीक मनमे भेल, एक डाकैनसँ नइ सुनलक; दोसर डाकैन दिऐ। अपन परिचए दैत मुसरी फेर बाजल- “भाय घोड़ा, हमर गिनती ने मनुखमे अछि आ ने जानवरमे आ ने जड़िये-जगतमे, तँए तोरासँ कोनो दुश्मनी साधैक अछि से नइ बुझह। तोहर दीन-दशा देख दया लैग गेल। ओना तोहर नोर पोछल तँ हमरा बुते नहियेँ हएत, मुदा संग मिलि नोर बहौल तँ हएत। ऑंखि खोलह, कान उठाबह।” मुसरीक बात जेना घोड़ा सुनलक। सुनिते ऑंखि खोललक। ऑंखि खुजिते मनमे उठलै, बाजल- “मुसरी भाय, पहिने ई कहह जे नीके-ना जीबै छह किने?” घोड़ाक बात सुनि मुसरीक मन घोराए लगल। घोराए ई लगल जे हम नीके नै छी तँ अधला कहिया भेलौं जे नीके नइ जीब। मुदा लगले मनमे उठलै जे जँ वेचाराकेँ खाइयोक लूरि रहितै तँ हमर पॉंच परानीक गुजर चलैत। ओना दुनियॉं बड़ीटा छै तहूमे मूस-मुसरीक। अन्नक घर, मनक घर, कागजक घर, खेतक घर, पथारक घर, हाथीक घर आ सद्य: घोड़ाक घर सेहो...। जेतए मन फुरत तेतए रहब। मुदा ऐ वेचाराकेँ तँ से नइ छै, जँ से रहितै तँ अहिना एजेन्सीक एजेन्ट जकॉं चारि बजे भोरसँ दस बजे राति धरि सड़कपर सवारी-गाड़ी जकॉं दौड़ैत रहैत! एक तँ पड़ोसीपनक धर्म दोसर एकरे हिस्सा अन्नो खाइ छी, एकरे घरे कोठाक घरोमे रहै छी। तँए अपन बिसवास जगबैत मुसरी बाजल- “भाय घोड़ा, अपन कण्ठी छूबि कहै छिअ जे आइ धरि कहियो अन्न छोड़ि कोनो अघट भोजन कण्ठसँ निच्चाँ उतरल हुअए...।” मुसरीक बात समाप्तो ने भेल छल कि बिच्चेमे घोड़ा बाजल- “हमरा बुझबैले तूँ किए अनेरे कण्ठी छूबि कऽ सप्पत खाइ छह।” घोड़ाक बात सुनिते मुसरीक मनमे बिसवास जगल जे भरिसक घोड़ा अपनो बात किछु कहए चाहैए। पहिने मुँह खोलि कऽ बाजह, तखन ने सुनला पछाति किछु कहबै। तैबीच बुढ़िया-मुसरी, जे घरमुहॉं भऽ गेल छल- पाछू उनैट तकलक तँ घोड़ाक कान लग अपना पतिकेँ बैसल देखलक। ओना पतिक सतीत्वपर मिसियो भरि शंका नै जगलै जे घोड़ा फुसिया लेत, मुदा एते तँ मनमे जगबे केलै जे घोड़े छी जँ कहीं कान उठा कऽ पटपटौत तँ वेचाराक जान बँचब कठिन भऽ जेतइ, आ जखन परिवारमे सृजन नइ रहत, सृजके खतम भऽ जाएत तखन कोनो उपैत केना हएत! जइ परिवारमे उपैत नै रहत तइमे विपैत नै औत तँ औत केतए? आगि तँ ओतै ने पजरत जेतए सुखल जारन रहत; आकि पनियाएल पानिक जारनमे पजरत। से नइ तँ हमहूँ किए ने पतिक नाङैर पकैड़ लगमे बैसि दुनूक देह-दशा देखी...। अपना घरसँ- माने देवालक बोहैरसँ- निकैल बुढ़िया-मुसरी घोड़ाक थैर दिस बढ़ल। माएकेँ दू डेग आगू बढ़ैत देख तीनू बच्चो-मुसरी पाछू-पाछू विदा भेल। ऑंखि तकैत बुढ़बो-मुसरी आ घोड़ो चारू मुसरीकेँ देखलक। देखिते घोड़ाक मनमे भेल जे हमरासँ बेसी समंगर मुसरी अछि। घोड़ा अपन देह-दशा बिसैर गेल। हिसावोक तँ केतेक नजैर अछि। जइ नजैरे घोड़ा बुझलक, ओहो अकाट्य रहइ। लोकतंत्रमे गिनतीए महत रखै छै। मुदा ई बुझबे ने केलक जे तंत्रक पाछू मंत्र चलै छै आ ओ मंत्र एक तंत्रसँ दस तंत्र धरि अछि जे लोकतंत्रक संगी छी। समंगर मुसरीकेँ देख घोड़ा बाजल- “मुसरी भाय, ई सभ तोरे टुसरी छिअ?” घोड़ाक बातसँ मुसरीकेँ मिसियो भरि मनमे दुख नइ भेल, जे हमरे सोझामे हमर वंशजकेँ ‘टुसरी’ कहलक। मनमे एलै- जे एकसिरा गाछ जखन कनियेँ ऊपर उठैए आकि टुस्सा रूपमे दोसर-तेसर चारिम निकलए लगैए, जइसँ डारि-पातक संग शीलोक शोभा बढ़बैए। तँए जँ ‘टुसरीए’ कहलक तँ कहलक। मुस्की दैत मुसरी बाजल- “भाय घोड़ा, एते तँ अछि जे तोरा घरमे घर बना रहै छी, आ तोरे छिड़ियौलहा बदाम खा कऽ मस्तीसँ जीवन-गुदस करै छी। मुदा पैछला जेते परिवार बढ़ल ओ तँ देश-विदेश चैल गेल। कहियोकाल मोबाइलसँ समाद सुनबैत रहैए जे विदेशमे अपन रहैक मकान बना लेलौं, आ एहेन कारोबार ठाढ़ कऽ लेलौं जे आब कहियो अपन बाप-दादाक दुखबास देखैक अवसरो ने भेटत।” कहि मुसरीक बोलती बन्न भऽ गेल। बन्न होइक कारण मनमे ई उठि गेलै जे ‘ओ सभ’ कोन जनमभूमि आ मतरभूमिक गीत गौत? आ कोन देवी-दुर्गाक गीत गाबि केकरा सुनौत? मुसरीक बोलती बन्न देख घोड़ा चरियबैत पुछलकै- “मुसरी भाय, जखन तोहर बात सुनैले कान खोलि ठाढ़ केने छी तखन तूँ बिच्चेमे किए अँटैक गेलह?” घोड़ाक बात सुनि मुसरीक असिआस बैढ़ मन अलिसए लगलै। हाफी करैत बाजल- “भाय घोड़ा, तोरा सभले ई दुनियॉं बॉंटल छह, ई जलवायु- उ वातावरण, ई मौसम- उ मौसममे। सौंसे दुनियॉं हमराले एके रंग अछि आ समाङ्गो आ जातियो-वेरादर तेते अछि, जे सगतैर बसल छी। अपन जाति-वेरादरक हाल-चाल कहह?” मुसरीक बात सुनि घोड़ा ठमैक गेल। ठमैक ई गेल जे महजाल जकॉं तेहेन जाल मुसरी फेकलक जे हमरा ओते बुझलो ने अछि। मुदा दरबज्जापर आएल अतिथिकेँ जँ नइ भरि पेट तँ अदहो पेट भोजन नइ करबयैन तँ ओ दरबज्जे की...। मने-मन विचारैत घोड़ा बाजल- “मुसरी भाय, दुनियॉंक पाछू जे अनेरे माथ लगाएब से कथीले। हमरासँ नमहर हाथीक माथ छै, पहिने ओ ने लगाबह। मुसरी भाय, आइ पहिले दिन तोरा मुहेँ अपन जाति-वेरादरक चाल-चुलक बात सुनलौं।” बजैत-बजैत घोड़ा ठमैक गेल। कनीकाल ठमकल आ ऑंखि पोछैत फेर बाजल- “भाय जेहने जातिक गति अछि तेहने वेरादरीक सेहो अछि। तखन तँ गाए नइ छी जे पोसिन्दारकेँ अमृत पीएबै। बड़ बेसी करबै तँ केकरो मकै-गहुमक वेपार पॉंच कोस-दस कोसक बीच सवारी बनि उपकार करबै, चाहे अन्न-पानिक बदला सवारी गाड़ी जकॉं सवारीक उपकार करबै, सएह ने?” अपन बात जेना घोड़ा छाती खोलि मुसरीकेँ कहि ठोरे-ठोरे चुचुआएल। घोड़ाक चुचुआएब सुनि मुसरी बाजल- “भाय घोड़ा, मनसँ सोग-पीड़ा हटाबह, जेतऽ रही मस्तान बनि मस्ताना गीत गबैत रही, रस्ता बढ़ैत चली।” शब्द संख्या- 3625, 17 अगस्त 2015 फलहार चारि बजेक समए। सुर्ज अपन प्रखर प्रतिभा समटैक ओरियानमे लैग गेला। जइसँ कटुतामे कनी-मनी कमी आबि रहल छेलैन आ मधुताक सिरजन हुअ लगल छेलैन। उष्णता सहिष्णुता दिस बढ़ए लगल छेलैन। जहिना कोनो फल फूलसँ निकैल कलीसँ कलियाइत अपन पूर्ण जुआनीक बाट पकैड़ अन्तिम सीढ़ीपर पएर रैखते मधु-मधु मधुर बनि जाइए तहिना बाल सुर्ज डेगे-डेग बढ़ैत ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल छैथ जेतए उष्णसँ सहिष्णुक ढलान ढुलकैत शीतपनमे प्रवेश पबैए। दिन भरिक उपासल रूक्मिणी अपन पूर्ण होइत उपास देख फलहार-ले माएकेँ कहलक- “माए, फलहारक बेर लैगचाएल अबैए…?” ओना रूक्मिणीक मनमे संगी-साथीक मुँहक सुनल अनेको रंगक फलहार-वस्तुक बात छल जे मनो छेलै। माने ई जे टोलक आठ बर्खसँ ऊपर आ चौदह-पनरह बर्खक बीचक जे बारहो-चौदहो विवाहित-अ-विवाहित बाल कन्यासँ चिष्टाएल कन्या धरि संगे-संग काजो-उदेम, मेलो-ठेला देखब-सुनब आ धारो-पोखैर नहाइले जाइ-अबै छलि। तैसंग अपन-अपन खिस्सो-पिहानी सुनबो-सुनैबितो छलि। जइसँ समयानुसार किछु विचार जगबो करै छल आ मेटबो करै छल। सुगीताक मुहेँ पैछला मासक उपासक फलहार सुनि चुकल छलि जे भरि दिनक उपासक पछाति सॉंझमे गाइक दूध आ केदली वनक फलसँ फलहार केने रही। पछुलका मासक उपास। नइ हमर तँ ऐ मासक पहिल उपास औझका छी। दस बर्खक रूक्मिणीक मनमे उपैक गेल। जिनगीक पहिल उपास रूक्मिणीक छल। ऐसँ पहिने संगी सबहक मुँहक बात रूक्मिणी शास्त्र–पुराणक कथा जकॉं बुझै छलि। मुदा आइ तँ रूक्मिणी अपना आसे-आस चाहि रहल अछि। लगले रूक्मिणीक मनमे दोसर संगीक उपासक फलहार जैग गेलइ। जगलै ई जे कलिया बहिन सेव-अंगुरसँ फलहार केने रहैथ। बजारसँ सत्तैर रूपैए किलो अनने रहैथ, जेकर फलहार केने रहैथ। फेर लगले रूक्मिणीक मनमे उठल जे ओहो फलहारकेँ तँ आइ छह माससँ ऊपर कलिया बहिनकेँ केला भऽ गेलैन। फलहारक अपन-अपन विहीत अछि। से खाली उपासेक नै मॉं दुर्गाक चारू पूजा- माने आसिनक, माघक, चैतक आ अखाढ़क- एक रहितो विहीतमे भेद ऐछे। रूक्मिणीक मनमे भेल। हमर उपास तँ औझका छी, ने पैछला छी आ ने अगुलका हएत। आगूले आगू हएत आ पाछू तँ सहजे तर पड़ि गेल। बेटीक बात सुनि अनुराधा विस्मित भऽ गेली। जिनगीक पहिल उपास बेटीकेँ करैत देख मने-मन मन-मन्दिरमे विचड़ए लगली। किए ने जिनगीक आराधनाकेँ उपाससँ अराधि-अराधि लेत आ दिनक विसरजनक पछाति फलहार करत...। परिवारमे एक नव शक्ति अबैत देख अनुराधा रूक्मिणीकेँ अपन परदादीक कहल बात सुनबए लगली- “बुच्ची, उपासक फल दुखहाल नइ सुखहाल भेल, तैबीच विश्राम भेल फलहार। तेकर पछातिक समए जिनगीक सामान्य भेल जे अनवरत चलैए। चलैत आबि रहल अछि आ चलैत रहत।” जहिना रूक्मिणीक विचार सोझ-साझ नै तहिना अनुराधाकेँ सेहो भऽ गेल रहैन। मुदा तैयो जेना रूक्मिणीक मन मानि गेल जे फलहारक बेरमे ने फलहार करब। अखन तँ महादेव बाबाक पूजाक बेर अछि, संगी सभ संग करैले अबैत हएत। अनेरे हमहूँ नहा-फुलडालीमे फूल लऽ पहिने फलहारेक बात माएकेँ कहलयैन। ओ की कोनो बाल-बोध छैथ जे भरि दिनक अन्न-पानिक तियाग नइ देखलैन। किछु भेली तँ माए भेली। माए कखनो बेजाए थोड़े करती। तैबीच अँगनाक पछुआरक बाटपर सँ सुनन्दा जोरसँ हाक दैत बाजलि- “केते सिंगार-पेटारमे रूक्मिणी लगल छेँ, आकि जल्दी बाबा दरबार चलमेँ।” अपन लाड़-झाड़ बढ़बैत रूक्मिणी अँगनासँ निकलैत बाजलि- “केते कालसँ तोहर बाटा-बाटी तकैत अँगनामे ठाढ़ छेलौं, तोहीं सभ पछुआएल छेलेँ।” कहैत-कहैत सखी-बहिनपाक बीच रूक्मिणी मिझिरा गेलि। बाबा दरबारक सेन बनि बोल-बम, बोल-बम करैत विदा भेलि। सखी-सहेलीक बीच रूक्मिणी फलहारक बात बिसैर शिवदानक कथा बहिन- सुफली-क मुहेँ सुनए लागलि। जहिना भगवान रामक दरबारमे हनुमान सन वीर आ जामबन्त सन प्रेरक छला तहिना तँ दूध-मुँह, बाल-मुँह बानरोक समूह तँ छेलैहे। जहिना शिवसेनाक बीच आठ बर्खक अबोध-बोध कन्या रमणी-रैमणी छलि आ तहिना साढ़े चौदह बर्खक सुफली सेहो छेलीहे आ रूक्मिणी दस बर्खक। ओना रूक्मिणी सेहो अपन आने-आने संगी जकॉं मुँह बन्न केने सुफली बहिनक बात- शिवदानक कथा- सुनि रहल छलि। बीच-बीचमे कखनो-कखनो मनमे आनो-आनो बात उपैक जाइते रहइ। मुदा तेकरा रूक्मिणी समैट-समैट पँजिया-पँजिया अगहन मासक धानक पॉंज जकॉं बगलमे रैख-रैख सुफली बहिनक बात सुनए लगैत रहए। सुफली बहिनक बिआह पैछला सालक अही मासमे भेल रहैन। साल लैग दोसर सालक पहिल मास छी, मुदा तैबीच एक पनरैहिया सासुरोसँ भऽ आएल अछि। माता-पिताक परिवारसँ सासु-ससुर-पतिक परिवार सेहो देख चुकल अछि। ओना उमेरोक हिसावे आ विचारोक हिसावे सुफली सभसँ ऊपर ऐछे। तहूमे अपनो किछु खास गुण देहमे झलैकिते छै। एक तँ विधाता अपन सोल्होकलाक उपयोग सुफलीकेँ सिरजैमे लगा देने छैथ, जइसँ जेहने देहक गढ़ैन माने सुचिन्त शरीर, तेहने चेहराक शकल-सूरत आ जेहने शकल-सूरत तेहने बोली-वाणी आ तेहने विचारो। तहूमे शिवपथक यात्रीक बीच शिव दर्शनक दर्पण सभकेँ वाणीक ऐनामे देखा रहल अछि। सभ, माने बारहो-चौदहो देव कन्या बताहि जकॉं विभोर भेल, रमैत शिव-दरबारक सीमान लग पहुँच महादेव बाबाक त्रिशुलकेँ प्रणाम केलकैन। तखने शिव कथामे विश्राम दैत सुफली बाजलि- “जेतए जइ कामनासँ चलल छेलौं, तेतऽ पहुँच गेलौं। आब अपन-अपन सभ पूजक ओरियान करै जाउ।” रूक्मिणीकेँ सखी-सहेलीक बीच प्रवेश करैत देख अनुराधा ऑंगनक मुहथैरपर सँ ताधैर देखैत रहली जाधैर ओ सभ ऑंखिक परोछ नइ भेलैन। परोछ होइते अनुराधा ऑंगन घुमि ऐबे केली आकि ओसारक ओछाइनपर पड़ल रोगग्रस्त पति-दीनानाथ कहलकैन- “बच्चीक पहिल उपास छी किने?” पतिक बात अनुराधाक करेजमे तेना लगलैन, जे कटि-कटि निच्चॉं खसऽ लगलैन। मुदा अखन तँ दुनू भारक बीच छैथ। एक दिस पति ओछाइन पकड़ने छह माससँ रोगाएल ओहन किसान जकॉं छैथ जिनकर छह मासक उपजा या तँ रौदी खा गेल होइ चाहे बाढ़ि आबि चाटि गेल होइ...। आ दोसर दिस सुकुमारि सुशील रूक्मिणी भरि दिनक उपासल बाल कन्या...। अनुराधाक मन तिलमिला गेलैन। जेना देहसँ शक्ति पड़ा गेलैन, हूब-टूटू जकॉं देह भारी बूझि पड़ए लगलैन। भेलैन जे खसि पड़ब। एको क्षण ठाढ़ रहब भारी...। दीनानाथक ओछानिक बगलेक खुट्टामे ओङैठ बैसि अनुराधा पतिक मुँहक बातकेँ तहियबैत बजली- “दवाइक बेर भऽ गेल, पानि लगमे अछि आकि आनि देब।” पत्नीक बात सुनिते दीनानाथ उठि कऽ बैसैत, सिरमा तरक गोटी निकालि बगलक लोटा उठा पानिक संग खेलैन। पतिकेँ दवाइ खाइत देख अनुराधाक मनमे औझका एक प्रकरण काज भेल देख खुशी उपकलैन। खुशी अबिते जेना देहक शक्तियो सबल भेलैन। ओछाइनपर बैसल दीनानाथ अनुराधाक ओइ जबावक ताक-हेर करए लगला जे पहिने पुछने छेलखिन। प्रश्न-पर-प्रश्न उठबैत चलू, ने केकरो जड़ि भेटत आ ने छीप, से दीनानाथ बुझै छैथ, तँए आगू बजैसँ परहेज केने छला। पतिक प्रश्न ऑंखिक सोझमे अनुराधाकेँ नचै छेलैन। एक दिस पतिक उचिती-विनती बाल कन्या-रूक्मिणीक पहिल उपासक, तेकर फलहारक ओरियानक बेर आबि रहल छेलैन। आ दोसर, बेटी शिवघाटसँ औतैन, ताबे मेघमे तरेगनो अपन मुँह उठा लेत। मुदा लगले मनकेँ आरो नचा देलकैन- फलहार की? फलहार केहेन? नचैत मन अनुराधाक असथिर भेलैन- जँ मैट्रिक-कुलेशनक विद्यार्थी हरिवासय सन महान उपास काइए किए ने लिअए, तँए कि ओकरा एम.बी.बी.एस.क; इन्जिनियरिंगक आकि एम.ए.क उपाधि तँ नहियेँ भेट सकै छै। भेटतै तँ ओतबे जेतेमे ठाढ़ अछि। अनुराधाक मातृत्व-मन माए-दादी होइत परदादीपर पहुँचलैन। जइ समए कनी-मनी चेष्टगर भेल रहैथ, तहियाक तहियाएल बात मन पड़लैन। पड़िते मन जेना फुड़फुड़ेलैन। मनमे फुड़फुड़ाइत परदादीक ओ आसिरवचन उड़ि कऽ एलैन जेकरा देखिते अनुराधाक मन विहुँसि गेलैन। दीनानाथक टकटकी-नजैर अनुराधाक विहुँसैत-नजैर देख मधुएलैन। मधुआइते मनमे भेलैन जे भरिसक हमरे उचिती पुरबैले बोने-बोन ओ ओइ खोजी जकॉं खोजैले चैल गेल गेली! लगैए भरिसक केतौ भेटलैन अछि। ओतएसँ अबैमे जेते समए लगतैन तेते समए तँ रस्ता निङ्गहारए पड़त। अनुराधाक मनमे एलैन- जखन दस-बारह बर्खक रही तखन परदादी अस्सी बरख टपि चुकल छेली। गामक उपास केनिहारिमे हुनको गिनती छेलैन। पुछने रहिऐन- “दादी, एते जे उपास करै छिऐ से फलहार केना पुरबै छिऐ?” हमर बात सुनि परदादी पहिने तँ दिल खोलि कऽ हँसल छेली। ओहिना मन पड़ैए- सभटा दॉंत झलकैत रहैन। ओहनो अवस्थामे एकोटा दॉंत नै टुटल छेलैन जे कनी शंको होइत। शास्त्रीय संगीतक धुनक धुन जकॉं जखन उड़ैत अकास गेली तखन ताल टुटलैन। ताल टुटिते कहने रहैथ- “दाय, हमरा बापकेँ बेसी खेत-पथार नइ रहैन, मुदा ई बुझल रहैन जे खेतमे केते उपजा होइ छै। तइ हिसावक फसिल उपजा अपन साल-माल लगबै छला। तही दिनक बात छी।” हम धियानसँ सुनि रहल छेलौं। हमर जिज्ञासा देख झमैर कऽ परदादी कहलैन- “अहिना धियानसँ सुनिले। धड़फड़ेने सभ बात नै बुझबीही। संच-मंचसँ बैसि। केकरा-ले राखब तोरे सभकेँ ने देने जेबो।” संच-मंच भऽ बैसिते दादी पुन: बजली- “बुच्ची, सासुर अबैसँ सात-आठ बरख पहिने नैहरेमे उपास करैक आदैत पकैड़ लेलक। ता नइ बुझिऐ। बाबूकेँ पुछलयैन जे फलहार की करब? ओ कहलैन जहिना अपन उपास छी तहिना ने खेतोक उपज फलहार छी, तइले चिन्ता किए करै छह।” मुदा खुजला नइ जे कथीक फलहार करब। दोहरा कऽ जखन पुछलयैन तँ कहलैन- “बुच्ची तीन कट्ठा अल्हुआ-सुथनीक खेती कऽ लइ छी, जइसँ सालक छह मास परिवारक खोरिस पुरि जाइए। माटिक उपज छी, मीठपन छइहे तखन ओहो ने फले भेल। सएह करब शुरू केलौं।” अनुराधाक मनमे पतालक पानिक स्वच्छतापर बिसवास जगलैन। केना ने जैगतैन मेघमे केतबो शुद्ध पानि किए ने हौउ मुदा अकासक बाट गुजरने दूषित भाइए जाइए, मुदा पतालक पानि धरती सन छन्नासँ छानलो रहैए आ समुद्री लहैरसँ फरिछाइतो रहैए। जहिना कोनो नटुआ नचैत-नचैत केकरो कोरामे बैसि लाड़-झाड़ करए लगैए तहिना अनुराधोक मनमे एलैन। मनमे अबिते चारीमपनक परदादी जेना आगूमे आबि ठाढ़ भऽ नाचए लगलैन। चाकर-चौरस देह, हाथ-पैरमे ओहिना फुनफुनी जेना बाल-बोधक हाथ-पएर होइए। ने एकोटा दॉंत टुटल आ ने देहक कोनो अंग भंग भेल। जेहने देहक पानि, तेहने ऑंखिक संग नजैरो पनियाएल। मुदा लगले दादीक बात मनमे तहे-तहे तहियाइत तहिया गेलैन। आ नजैर सोझमे बैसल पतिपर आबि गेलैन। अबिते बजली- “आब केहेन मन लगैए?” ओना अखन धरि दीनानाथ, रूक्मिणीक उपासक जबाव पबैक रस्ता-बाट तकै छला मुदा अनुराधाक प्रश्न पाबि बजला- “आब बूझि पड़ैए जे रोग दबि गेल। भुखोक तृष्णा बेसियाएल बूझि पड़ैए आ हाथो-पएर लाड़ै-चाड़ैक मन होइए।” पतिक आस भरल बात सुनि अनुराधाक मनमे खुशीक लहैर लहैर गेलैन। आगूक कोनो बात नै पुछि अनुराधा पैरसँ चाइन धरि पतिकेँ निहारए लगली। जाड़-पालासँ दबल जहिना बोन-झाड़ आकि जंगल-झाड़ सुर्जक उष्मा पैबतो तिरपीत हुअ लगैत तहिना अनुराधोक मन फुड़फुड़ेलैन- “बेटीक पहिल उपास छी, अपने तँ जिनगीमे कहियो जानि कऽ उपास नहियेँ केलौं मुदा...?” ‘उपास नहियेँ केलौं’ मुहसँ निकैलते अनुराधोक नजैर निच्चॉं उतैर गेलैन आ दीनानाथोक। नजैर निच्चॉं उतरिते अनुराधाक मनमे उठलैन- की एहेन हमहींटा छी आकि हमरा सन औरो सभ छैथ जे जानि कऽ उपास नै केने हेती। ई दीगर भेल जे गाम-समाजमे महिलासँ बेसी बुझनिहार पुरुख, उपासक बेर कम पड़ि जाइ छैथ। जइसँ महिले बेसी हिस्सा नेने अछि। कहॉं कहियो मन गवाही देलक जे केकरोसँ कम उपास केने छी। सालक सए दिन ओहन बितबे करैए जइ दिन पानि छोड़ि अन्नाहारो भेल हुअए। मुदा तेकर फल की भेटल? जहिना पत्नी अनुराधा अपन विचारक दुनियॉंमे निच्चॉं मुहेँ विचरण करै छलि तहिना दीनानाथक मन छह मासक रोगसँ दबाएल निकैल ऊपर मुहेँ उधिआइ छल। आइ छह माससँ जइ परिवारक बोझ बनल छेलिऐ, काल्हिसँ अपन बोझ अपने उठबैक शक्ति शरीरमे आबि गेल। आब रूक्मिणियोँ दिन भरि सहि कऽ दीनानाथक आराधना करै जोकर भऽ गेलि। अखन ओकर भविसक कोन भरोस छै। मुदा वर्तमान तँ आगूएमे छै। परिवारक भरण-पूरनक बाट देखिते जहिना परिवारक सिरजनक आशा-बाट मनमे दौगए लगै छै, तहिना दीनानाथोकेँ मनमे भेलैन। विहुँसैत पत्नीकेँ कहलखिन- “बेर लहैस गेल! बैसने काज चलत?” पतिक बात सुनिते अनुराधा चौंक गेली। चौंकते मनमे उठलैन, केतेक जतनसँ बेटी उपास केलक अछि। की सभ मनमे उपकल छै से तँ भोला बाबा जनता मुदा हमहूँ तँ ओकर माइए छिऐ। भरि दिनक भूखल-पियासल दस बर्खक बेटी लहालोट भेल औत, तखन जँ ओकरा फलहार नइ हेतै से केहेन हएत? ओना अनुराधाक मनमे बिसवास जमले रहैन। बिसवास ई जमल रहैन जे दादी बच्चासँ बुढ़ धरि अल्हुआ-सुथनीक फलहार कऽ उपास निमाहि लेलैन तखन रूक्मिणी ने किए निमाहत। मुदा समाजक रंग-रंगक फलहार देख एते तँ मनमे उठिते रहैन जे हमरो बेटीकेँ नीक फलहार हुअए। छिड़ियाइत मने अनुराधा पतिकेँ पुछलखिन- “बुच्ची-ले फलहारक ओरियान की करब?” एक तँ छह मासक रोगाएल दीनानाथक मन, जे जिनगीक आसक कलशसँ कनखियाएले रहैन, तैपर सँ तेहेन बोझ माथपर पड़ि गेलैन जे दरदे माथ दुखाए लगलैन। माथमे दर्द उठैक कारण भेलैन, अनुराधाक संग अपनो ने कहियो उपासक भीड़ गेल रही आ ने फलहारक बात बुझने छी...। झखैत पतिक नजैर देख अनुराधा बूझि गेली। बुझिते मनमे झमार उठलैन। झमार ई जे दर्दपर जेते दर्द देल जाएत ओ अपना अकारे पैघ होइत जाएत...। ई तँ अनेरे पतिकेँ कष्ट देब हएत! विहुँसैत बजली- “एके दहारमे जे परान बहार भऽ जाएत तखन सालक साल दहार केना बुझबै?” ओना कोनो एहेन स्पष्ट विचार स्पष्ट भाषामे अनुराधाक नै रहैन, मुदा कोन काग-भाषासँ दीनानाथ की बूझि गेला से तँ ओ जानैथ। मुदा मन विहुँसैत-विहुँसैत कलशए लगलैन। कलशैत फूलक मुँह देख मालिनि जहिना मने-मन माला बनबैत कलशए लगैए, तहिना अनुराधो कलशैत बजली- “अपन नैहरक समाद कहै छी।” ‘नैहरक समाद’ सुनि दीनानाथक मनमे भेलैन जे, मर्र ई की भेल! अखन फलहारक ओरियानक काज अछि, तखन ई की बीचमे सुनबै छैथ! दीनानाथक मनमे किछु फुरबे ने केलैन जे किछु बैजतैथ। बकर-बकर पत्नीक मुँह दिस ताकए लगला। मुदा अनुराधाकेँ अपन परदीदीक समाद मनकेँ तेहेन समदिया बना देलकैन जे हुअ लगलैन कखन एहेन झमटगर समाद सुना दिऐन। जहिना शिक्षक ऑंखिक इशारासँ अगिला पन्नाक प्रश्न चटियासँ पुछै छथिन तहिना अनुराधा ऑंखिक टुस्कीसँ दीनानाथकेँ टुस्कियाबए लगली। जहिना लहनाक लहनदार आगूमे ठाढ़ भऽ तगेदा करए चाहैत तहिना अनुराधा, दीनानाथकेँ बूझि पड़ए लगलैन। मुदा दीनानाथक मनमे ईहो एलैन- तगेदाक उत्तर तगदार किछु-ने-किछु देबे करैए। चाहे ‘हँ’ कहह कि ‘नइ’ आकि ‘अखन नै आगू।’ किछु-ने-किछु तँ कहिते अछि मुदा ओहन तगेदा केनिहारि पत्नी तँ नै हेती। बड़ बेसी हेती तँ परिवारक कोनो तगेदा करती जे सझिये छी। तइले मत्था-पच्ची करैक जरूरते की। दुनू गोरे मिलि विचारि आगि-पानिमे जाइले तैयार भऽ जाएब। दीनानाथक मनक गाछमे जेना फुनगीपर पोनगी देलकैन तहिना डम्हाएल फूलक कली जकॉं विहुँसैत बजला- “किदैन जे कहने छेलिऐ, ‘नैहरक समाद..’ से अधेपर छोड़ि देलिऐ?” पतिक बात सुनि जिज्ञासु अनुराधाकेँ आरो जिज्ञासुपन बढ़लैन। मने-मन अख्हिासए लगली। माइयो दादियेक उतारा छेली, दादियो परदादियेक उतारा छेली। जेना-जेना हुनको अवस्था चढ़ैत गेलैन तेना-तेना अपनो सियान होइत सासुर एलौं। एला पछाति ओ मुइली...। परदादीक मृत्यु मनमे अबिते अनुराधाक नजैर बाड़ीक सुथनीपर गेलैन। बजली- “ताबे शिवधामसँ बुच्चियो अबैए। अदहा घण्टा समैयो बँचल अछि, तैबीच सुथनी उखारि अनै छी, संगे-संग रातिमे सुथनियेँ खेबो करब।” पत्नीक बात सुनि दीनानाथक मन खटाइन-खटाइन भऽ गेलैन, मुदा लगले मन आगू बढ़ैसँ रोकि देलकैन। अखन फलहारक शुभ घड़ी अछि, तैबीच किछु बात बाजि बाधक नै बनब। की बेटी नै देख रहल अछि जे पिता ओछाइनपर अपने दिन गनि रहल छैथ। तहूमे बेटीक दुख जेते माइक हिस्सामे अछि तेते बापक हिस्सामे थोड़े अछि। मनकेँ आगूसँ घेरि दीनानाथ थीर केलैन। अस्ताचलगामी सुर्ज अपन पतालक घाटपर पएर दऽ देने छला मुदा बोन-झाड़ आ पहाड़पर ओहिना झलकै छला। संगीक संग रूक्मिणी अपना घर लग अबिते फुटि कऽ ऑंगन पहुँचलि। ऑंगन पहुँचिते पहिने हिया कऽ ओसार दिस तकलक। मुदा केतौ किछु ने देख रूक्मिणीक नजैर ओछाइनपर बैसल पितापर गेल। दीनानाथो ओहिना रूक्मिणी बेटीपर ऑंखि गड़ौने देखै छला जेना किछु सनेस लऽ कऽ बेटी आएल होइन। तैबीच अनुराधा वाड़ीसँ सुथनी उखारि कलपर चिक्कनसँ धो-धा खुरपीक संग ऑंगन पहुँचली। रूक्मिणीकेँ देखिते कहलखिन- “बेटी, अहींक फलहारक ओरियानमे लागल छी। मनमे भेल जे बेटिये संग किए ने सभ परानी फलहारे करब।” मिथिलांगना होइक नाते रूक्मिणी बाजलि किछु ने मुदा मन झुझुआइत रहलैन। शब्द संख्या- 2350, 25 अगस्त 2015 भोरक झगड़ा सौन मासक भोर। पॉंच बजै छल। चाह पीब पान खा दरबज्जापर सँ निकलैएपर रही कि लाल कक्काक अँगनामे हल्ला जकाँ बूझि पड़ल। ठमैक कऽ अकानए लगलौं- की बात छिऐ? जहिना लाल काका जोर-जोरसँ बजैथ तहिना करिया काकी सेहो ललैक-ललैक बजैत रहथिन। अकानैकाल अकानमे नीक जकॉं एबे ने करए। कखनो एक पक्षक गोटे शब्द अबै तँ कखनो दोसर पक्षक। तैसंग कखनो दुनू पक्षक संगे अबइ। माने एकटा बात लाल कक्काक आबए कि बिच्चेमे करिया काकीक सेहो आबि जाए। ने बैसैक मन हुअए आ ने आगूए डेग उठए। ओना दुनू परानीक भिनसुरका झगड़ा कोनो एकदिना नै, सबदिना छिऐन। जे सोभाविको ऐछे। दुनियॉंक भोर छी किने। जिनगीक सभ कथुक भोर। ओना आन दिनक हल्ला लगले बर्खाक बुलबुला जकॉं फुटि कऽ पानिमे मिलि शान्त भऽ जाइन। मुदा आइ से नै, किछु बेसी बूझि पड़ए। मनमे हुअए जे बिनु किछु बुझने जाइ आ चामेक मुँह छी, जँ किछु किम्हरोसँ बजा जाएत तँ अनेरे लब्बर भऽ जाएब किने। तैसंग मनमे आरो केते रंगक बातक संग विचारो उठैत रहए, मुदा बिच्चेमे करिया काकीक अवाज आएल- “अहॉं भोर-भोर रट लगौने छी!” करिया काकीक सुपुट शब्द कानमे पड़ल। ओना बीचमे एकटा आरो बात अछि, बात ई अछि जे लाल कक्काक पत्नी लाल काकी हेती किने, तैठाम करिया काकी केना भेली? एक चलैन ईहो अछि जे कक्काक नाओंपर काकीक नाओं पड़ितैन, मुदा से नइ भेल। ओना एके रंगक काज-ले चालैन, गुड़चल्ला आ चिक्कस चालैक चालैन सेहो होइते अछि। दोसर, चलैनक अनुसार माने देहक रंगक अनुसार सेहो नामकरण होइए। तइ अनुसार भेल अछि। लाल काका लाल भुभुका गोर छैथ जखन कि करिया काकी कारी खटखट, कारी झामर छैथ। मुदा तइ बिच्चेमे पिण्डश्याम माने पिरसियाम सेहो तँ ऐछे। तहूमे पिरसियामक सेहो आड़ि-धुर नै अछि। ओना ने गोरेक अछि आ ने कारियेक अछि। करिया काकीक बात सुनि अकानए लगलौं जे लाल कक्काक उत्तर की होइ छैन। मुदा से सुनैमे सुपुट एबे ने करए। मनमे हुअए जे जखन चौरीक माटिक तरक केशौर हुअए आकि पोखैरक सौरखी-करहर, खाली एकटा पन्ना भेटने तँ उखारनिहार भँजिया कऽ ओकरा उखारि लइए तखन हम किए ने दुनूक बीचक बात बूझि सकै छी। जे काकी-मुहेँ सुनलौं सएह बात पुछि कऽ भँजिया सकै छी। ओना दुनू गोरेसँ सेहो पुछल जा सकैए। जहिना लाल काकाकेँ पुछबैन- ‘काका, काकी किए भोरे-भोर भोरका पाठ पढ़बै छैथ।’ तहिना काकीसँ सेहो तँ पुछले जा सकैए- ‘काकी, भोरे-भोर काकाकेँ कोन पाठ पढ़बै छिऐन।’ गर अँटिते आगू डेग उठेलौं। दू डेग आगू बैढ़ते मनमे उठि गेल जे जखन तेहल्ला बनि जाएब आ जँ दुनू गोरे पंच मानि अपन बात सुमझा दैथ, तखन निर्णए की सुनेबैन? तहूमे जँ दू जातिक आकि दू परिवारक आकि दू गामक झगड़ा रहैत तँ कनी कम-बेसी करि मुँहमिलानी करौलो जा सकैए, मुदा ऐठाम तँ से बात नै अछि, दू परानीक बीचक बात अछि। जँ कनिको काका दिससँ बजा जाएत तँ काकी कहती जे जैठाम बजौआ पंचक मोजरे ने अछि तैठाम बिनु बजौआक केते मोजर। मुहेँ छी, तहूमे तेतबे पर चुप भऽ जाथि तखन ने, आ जँ तइ लागल ईहो कहि दैथ जे कियो बजा कऽ अनेने अछि जे कोनो बात मानब। अपना मने जहिना अहॉं बजलौं तहिना अपना मने हमहूँ सुनि लेलौं। मनमे भेल हाइ-रे-बा, तखन पहुँचला फल की भेटत? डेग रूकि गेल। ओसारक निच्चॉं आ अँगनाक ओल्तीमे अँटकल रही। ने आगू बढ़ैक साहस हुअए आ ने नइ जाएब उचित बुझी। ऑंखि तँ टकटक आगू तकैत रहए मुदा कानमे धानक झड़ जकॉं पड़ैत रहए। ओल्तीमे ठाढ़ मन असोथकित जकॉं हुअ लगल। मुदा लगले जैग गेल- ‘भोर’ ले झगड़ा होइए, काकीक बात तेहने बूझि पड़ल। मुदा ‘भोर’ की? चौबीस घण्टाक दिन-रातिमे ‘भोर’ ताकए लगलौं। भोरका स्नान नीक होइए तँए नहाइबेर ‘भोर’ भेल। नहेले-धोला पछाति ने कियो जिनगीक लीलामे डेग उठबै छैथ तँए ओ डेग भोरक भेल। मुदा लगले फेर मनमे उठि गेल, आत्माराम बजनिहार सुग्गो-तोता ने मुनि-महात्माक संग तीन बजे भोरक नहान नहाइते अछि, यएह भेल ‘भोर’। भोर तँ भेट गेल, मुदा भोरक जड़िक पन्ना भेटबे ने कएल। ओना जड़ि भेटने मनमे कनी खुशी उपकल, मुदा पन्ना...। पन्ना ई जे तीन बजेकेँ ‘भोर’ जँ मानि लइ छी, तखन तीन बजे राति की भेल? आ तीन-बजिया गाड़ीकेँ की कहबै? आत्माराम तोता-सुग्गाक संग मुनि-महात्माक घाट दिस तकलौं तँ बूझि पड़ल जे घटवारि-ले जनु घेरा-घेरी होइए। हम पहिने स्नान करब तँ हम पहिने करब। जे पहिने करत तेकर ने घाट भेल। बुधियार ने घेरा-घेरी छोड़ि अपन घाट अपना सनक बना लेत मुदा बुधियार घेँट-कटो तँ होइते अछि, जँ ओकरा घाट नइ रहतै तँ घेँटि काटि घटवारि केतए लेत। ओना लाल कक्काक अँगनामे बोल-चाल बन्न भाइए गेल रहैन, मुदा तैयो मनमे भेल भोरका पहिल डेग जखन लाल कक्काक ऑंगन दिस उठल तखन पहिने हुनकेसँ भेँट करबैन। बड़ हएत तँ यएह ने हएत जे झगड़ा बेरक किछु उपराग देता जे बेर परक नै छह। मुदा भिनसुरका समए छी, कियो निन्द्रासलमे धियान लगौने रहैए तँ कियो नीनवासलमे धियान लगौने रहैए आ कियो अपन सिद्धान्तक अनुसार भोरका सभ किछु नीक हुअए, तइ अनुसारे दुनियॉं-दारीसँ राग-विराग छोड़ि धरतीसँ सुतले-सुतल उठि जाइ छैथ...। किछु फुरबे ने करए। जेना बस-ट्रकक ड्राइवर भोरेसँ गारि-गरौवैल करैत जिनगीक लीला शुरू करैत तहिना लालो काका अँगनासँ खुरपी नेने बहरा गेल छला। हमहूँ ससैर कऽ आगू बैढ़ गेल छेलौं। देखते कहलयैन- “काका, भोरे-भोर हाथमे खुरपी देखै छी?” कहैक बेगमे तँ कहि देलिऐन मुदा धोखा ई भेल जे हुनकर ई सबदिना रूटिंगक अनुसार काज छिऐन, तइ दिस अखन धरि हुनकापर नजैर नइ पड़ल छल। मुदा हमरा बातकेँ जेना लाल काका अनसुनी कऽ देलैन तहिना बूझि पड़ल। पुछलैन- “केम्हर-केम्हर चललह अछि?” लाल कक्काक प्रश्नक जबावे ने फुरए। ई तँ केकरदिनक पइर भऽ गेल। ‘हहाएल-फुहाएल सासुर गेलौं आ कनियॉं माए पुछलैन केतए एलौं।’ कहू जे भोरसँ दुनू परानी झगड़ा करै छला, लोकक सुतब पहाड़ बना देने छेलखिन, आ बजै बेर जेना सभटा बिसैर गेला। मुदा फेर भेल जे जखन उदेस बना चलल छी तखन रस्तोसँ घुमि जाएब केहेन हएत। मुदा जेहेन शान्त-चित् लाल काकाकेँ देखै छिऐन तइसँ अकासक उड़ैत चिड़ैयोकेँ भँजियाएब तँ कठिन ऐछे। ओना लाल कक्काक मन ऐ दुआरे असथिर भऽ गेल रहैन जे ओ अपन सबदिना वृति बूझि अपन एक खल काज सम्पन होइत देखलैन। एक खल काज भेला पछाति जहिना सबहक मन दोसर खलक काजक गरकेँ अँटकारए लगैए। तहिना लालो कक्काकेँ भऽ गेल रहैन। ओना पैछला काजक समीक्षा सेहो मने-मन कऽ नेने रहैथ, जइमे केतौ केनो ऑंकर-पाथर नइ भेटल रहैन, तइसँ मनमे आरो बेसी परपन भऽ गेल रहैन। समीक्षामे मन मानि गेल रहैन जे कोनो नमहर काज किए ने हौउ, ओ तँ खले-खल ने हएत। खले-खल काज करैबला सेहो होइए। जे गर चढ़ा-चढ़ा करैए। परिवारोमे अहिना होइ छै। कियो बाहरसँ उपैत करि कऽ अनलैन तँ कियो ओकरा जीवनोपयोगी बनबैले घरमे खले-खल तोड़ि खिलखिलबै छैथ। जखने खिल-खिल खिलखिला जाइए तखने ने काजक खिलखिलीसँ मनो खिलखिलाइ छै। से अपन खलक काजसँ लाल कक्काक मन खिलखिलाइत रहैन। माने ई जे परिवारक श्रेष्ठजनक वृति यएह ने हएत जे अपन लुरि-बुधिक विचारसँ सदिकाल परिवारजनकेँ नव काज दिस आगू बढ़बैत चली। जइसँ परिवार गतिशील रहत। से तँ लाल काका सुति-उठि जे शुरू करै छैथ, से भरि दिने नइ, सबदिना सेहो छैन, तँए मनक खुशीमे कनियोँ घटबी किए हेतैन। जहिना पीछराह रस्ता होइए तहिना ने पीछराह चलैनिहारो होइए। एहेन ठाम पीछराहकेँ पकड़ैमे अपनो पीछरैक तँ डर रहिते छै, से डर मने-मन होइते रहए। मुदा फेर भेल जे एना जँ पीच्छर दुआरे रस्ता छोड़ि देब तखन घरसँ निकैल जाएब केमहर? आ जँ नइ जाएब तँ की घरेमे मड़ुआ ढेरी जकॉं ढेरीएमे गुम्सैर कऽ रंगे बदैल लेब? एक दिस मन धिकारैत रहए तँ दोसर दिस पीच्छरे-पीच्छर सगरो बूझि पड़ए। मुदा दुनू हाथक मुट्ठी बान्हि बॉंहिमे समैट छातीमे सटबैत, छातीकेँ असथिरसँ दबलौं, जे कहीं धड़-धड़ाए ने लगए। कहलयैन- “लाल काका, धरमागती पुछी तँ अहींसँ किछु जिगेसा करए चलल छेलौं, मुदा अहॉं तँ खुरपी लऽ निकैल सड़कपर आबि गेल छी...।” हमर बात लाल काकाकेँ नीक लगलैन। आगूक किछु बात मुहेँमे रहए कि बिच्चेमे हूँहकारी भरैत बजला- “बौआ सुधीर, अपना-ले ते भरि दिन लगले रहै छी, मुदा दोसरक जिज्ञासाक महत ओइसँ बेसी अछि, तँए चलह दरबज्जेपर चाहो पीब आ गपो-सप्प करब।” जेना लाल काका पेटक बात छीन अपना पेटक बना बाजला तहिना बूझि पड़ल। दुनू गोरे चोटे आगू बढ़लौं। दरबज्जापर पएर रैखते करिया काकी देख लेलैन। देखते ठमैक गेली। हुनका मनमे जे भेल होइन मुदा ससैर कऽ आगू बैढ़ लगमे आबि जोरसँ पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियॉं चाह बनाउ।” ओना ऑंगनमे दुनू पुतोहुओ आ धियो-पुतो सभ ओछाइन धेने अपना-अपनीकेँ सभ बेटो-पुतोहु आ पोते-पोती लाल काका आ करिया काकीक टिप्पणी पसारने। टिप्पणी ई पसारने जे कियो पतिसँ जोरसँ बाजबकेँ अधला बुझैत तँ कियो अपन टुटैत नीनसँ कड़ुआएल। जेठकी पुतोहु- “कहू जे निन्द्रासलमे धियान लगौने छेलौं से तेहेन उपए केलैन जे सभटा भगन भऽ गेल। झगड़ा करैत-करैत आब चाहेक तरास लगलैन।” छोटकी पुतोहु- “अबेर धरि रातिमे जगलौं, निन्द्रासल छी, तैबीच हिनका चाहे पीबैक बेगरता बेसी भऽ गेल छैन!” कहि जेठकी बेटीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “बुच्ची, चाहक ओरियान करहक।” बेटी जबाव देलकैन- “अखैन तँ केटलियो ने मँजलौं, चुल्हो ने निपल गेल अछि, पहिने ओ धुअब-मॉंजब, नीपब आकि पहिने चाहे बनाएब!” दरबज्जापर सँ तीनू गोरे- माने हमहूँ, लालो काका आ करियो काकी- अँगनाक बात सुनैत रही। ओना आनक अँगनाक बात सुनैमे कठाइन लगिते अछि मुदा तैयो चुपे रहब ने नीक हएत। कमसँ कम एते बजैक गर तँ रहबे करत जे सुनबे ने केलौं। बेटी-पुतोहुक बात सुनि करियो काकीक मनमे दुख भेलैन जे तेहल्लाक आगूमे एना मुँह झाड़ि जँ बेटी-पुतोहु बाजल तँ सासु होथि आकि दादी, जहिना मिथिलाक धरती योद्धा पैदा करैत रहल अछि तहिना मधुमे मिला जीहपर चाटि बिसैर जेबा चाही। जँ से नै जे पालो खेने छी आ बिनु पालोक छी, तखन सम्बन्ध सूत्र कमजोर बनबे करत। करिया काकीकेँ पतिक संग भेल भोरक झगड़ाक संग पुतोहु-पोतीक शब्दवाण छातीकेँ डोला देलकैन मुदा...। ओना करिया काकीक मन ईहो कहैन जे कोन बड़का पहाड़क घेरा लैग गेल जे आगू नै बैढ़ सकै छी, मुदा केकरा संग, केकरा-ले? जँ दुनियॉंमे माया-मोह छै तँ ओकरो सीमावन्दी तँ कएले जा सकैए। मुदा से सभ बात धियानमे करिया काकीकेँ नै एलैन, एलैन ई जे समाजक संग पति बैसल छैथ, जँ कनियोँ ऊँच-नीच आकि ले-ऊँचमे पएर पड़त तँ हुनकर पाग सरकतैन। मुदा अँगनाक प्रश्न छी, प्रश्न छी बेटी-पुतोहुक बेवहारक। लाल कक्काक मुँह दिस करिया काकी मुँह उठा कऽ देलैन, देलैन ऐ दुआरे जे मुँहक बात मुहसँ बाजल जाएत, मुदा जैठाम काजक प्रश्न अछि आकि जैठाम परिवारक गति-विधि प्रभावित हएत, तैठाम तँ परिवारक सिरिसजनकेँ विचारए पड़तैन। आजुक कालखण्डक जबावदेही तँ हुनके ऊपर छैन। मुदा करिया काकीक मनक विचार जेना लाल कक्काक मनमे गड़बे ने केलैन। तहिना निरविकार भेल मने-मन लाल काका विचारैथ जे जे बेटा अपन देहक कपड़ा अपने नइ खींच साफ करैए ओ बाप-माइक खींचत, एहेन धोखामे माए-बापकेँ रहबेक नै चाही। जँ रहत तँ अपने भोगत। तइले तँ अपने ने सोचि-विचारि चलए पड़त। से लाल काकामे छैन्हेँ, अपन देहक वस्त्र अपने हाथे, भोरका घाटपर खींच लइ छैथ, तँए पत्नियोँक खगता नहियेँ बूझि पड़ै छैन। भाय, नारीकेँ घेरा-बन्दीसँ जाबे आगू नइ बढ़ौल जाएत ताबे विचारेक धारमे मात्र बहैत रहत किने। जिनगीक जरूरतक लेल काजोक सीमा तँ बनबए पड़त। आगूमे करिया काकीकेँ देख लाल कक्काक मन सेहो सियाह होइत रहैन। होइत ई रहैन जे कहू आइए हमर कोन दोख छल। भोरमे जँ नइ ओछाइनसँ उठौल जाएत तँ ओ समैकेँ केना पकैड़ चैल सकैए। ओना काजक दौड़मे समैयोक रूप बदलत जइसँ जिनगियोक रूप बदैल रहल अछि। माने ई जे जैठाम चौबीस घण्टा चलैबला मशीन अछि, आदमी आठ घण्टा खटत, तइ हिसावे तीन आदमीक जिनगीक रूटिंग बनत किने, जे तीन रंगक, समयानुसार हेबे करत। जे से एक-दोसराक कार्य-प्रणालीमे अन्तर एबे करत। मुदा से नइ ऐठाम किसानी जिनगीक कथा छी। करिया काकीक मुँह नै देखैक विचार लाल कक्काक मनमे उठैत रहैन। जहिना केकरो लगक लोक जखन सम्बन्धसँ हटै छै तखन किछु-ने-किछु जिनगीक गति प्रभावित होइते छै, मुदा समटल जिनगीक अपन गति-विधि स्वच्छन्द रूपे अपना गतिये सेहो चलबे करैए। जँ हम अपन गति-विधिकेँ अपना विचारे चलबए चाहै छी तँ अपन रस्ता धड़ैत जिनगीकेँ धड़ाउ जकॉं सजबैत चलबऽ पड़त। जँ से नै तँ गाछक एके फलक ओहन रूप अछि, जे एकटामे अमृत तुल्य बीज अछि तँ दोसर बिच्चेमे फोंक! मुदा तैयो लाल कक्काक मनमे अहौड़ मारैत रहैन जइसँ पत्नीक विचार मनमे अहूरिया कटिते रहैन। ओना मुहसँ लाल काका किछु ने बाजि रहल छला। मुदा मनक विचार तँ मनमे उठिते रहैन। उठैत ई रहैन जे पत्नीक तँ अनेको रूपो अछि आ रंगो ऐछे। जखने रंग रहत तखने ढंग धड़बे करत। मुदा पतिक जिनगीक भोजन बनाएब पत्नीक महतपूर्ण खलक काज भेल, मुदा विचारोक झगड़ा बिना झगड़ने तँ बँचाइयो नै सकै छी। जैठाम एक विचार जिनगीक लेल श्रमक महत बुझैत तैठाम जँ दोसर विचार बाटक बाधा बनत तखन तँ परिवारोमे रण-भूमि बनबे करत। ओना दुनियेँ रण-क्षेत्र छी। जैठाम अपना लगसँ दुनियॉंक अन्तिम छोर तक कॉंट-कुश सजले अछि। तँए मने-मन लाल काका ईहो विचारैथ जे मरदक तँ मरदगानी छिऐ अरारि। जखन जिनगीक आइ धरिक इतिहास चलैत रहल अछि जे एक घण्टा चुल्हि तर बैसैत एलौं, तखन एक घण्टा समए, आजुक विकसित युगमे चौबीस घण्टाक जिनगीक लेल चुल्हिक समए कम नै भेल, तइले जँ भनसिया ऑंखि देखौत, से मानै जोकर थोड़े भेल। करिया काकी पतिक किछु विचार नै सुनि अपन विचारकेँ सोझरबै छेली। जहिना खसैत घरमे सोंगर लगौल जाइए तहिना सोंगर लगबैत पोतीकेँ दोहरबैत ऑंगन दिस घुमि बजली- “बुच्ची, बबो छथुन आ सुधीरो बौआ छैथ, एक गोरे हॉंइ-हॉंइ कऽ चुल्हिक ओरियान करू, दोसर गोरे बरतन-बासन मॉंजि लिअ, तेसर गोरे अँगना-घर बहारि लिअ। जइसँ एके समए संग सभ काजो हएत।” करिया काकीकेँ सह लगबैत कहलयैन- “कहुना छी तँ सौनक भोर छी ने काकी। जहिना जेठुआ पीपरक गाछ तहिना सौनिया भोर।” सह पाबि करिया काकीक हूबा कनी बढ़लैन। मुदा जहिना पहियाक धुरी टुटने गाड़ीक गति प्रभावित होइत तहिना तँ भाइए गेल रहैन। हेबो केना ने करैत? कोनो गल्ती बजैमे होइए, ओकर शाब्दिक सुधार भेने कोनो अवघात नै होइए, मुदा जे वाणी काजक गतिये चलत, ओ तँ काजक रूप छी, जइसँ काज प्रभावित हेबे करत किने। जखने काज प्रभावित हएत तखने ओकर दोसर पाशापर बैसल जिनगी प्रभावित हेबे करत। जखने जिनगी प्रभावित हएत तखने गैत-कुगैतक बीच रणभूमि बनबे करत किने। तीनू गोरे एक-दोसरक मुँह देखैत मुदा बजैत कियो ने किछु। जहिना अखड़ुआ आमक गाछक निच्चॉं लोक पकलाहा आमपर नजैर देने गाछक निच्चासँ ऊपर मुँह तकैत, जे आब खसत, तब खसत। तहिना तीनू गोरे तीनूक मुँहक आशामे बैसल रही। मुदा से भेल नै तइ बीच जसमैत तीन गिलास चाह थारीमे नेने दरबज्जापर पहुँचल। आगूमे चाहक थारी अबिते तीनूक चाह दोसर दिस बढ़ल। हमरो हाथमे आ लालो कक्काक हाथमे जसमैत चाह दैत, तेसर गिलास करिया काकीक हाथमे दइले गिलास उठौलक। मुदा हाय रे मिथिला, पति आगू पत्नी चाह केना पीती! सत्तैर बर्खक करिया काकीक विचार मनकेँ खोरि देलकैन। ललैक कऽ पोतीकेँ कहलखिन- “एतबो विचार अखैन तक नइ भेलौ हेन?” करिया काकीक विचार सुनि लाल काका ओइ गुड़ जकॉं पीघैल गेला जे गरमी मासमे अपने पिघलए लगैए। मुदा पिघलने वेचाराकेँ दुनू गति होइ छै। कखनो गुड़ोक भाव चैल जाइए आ कखनो छुआ संग बदैल सेहो तँ जाइते अछि। जसमैतपर करिया काकीकेँ बिगड़ैत देख कहलयैन- “काकी, कोन जुग-जमानाक गप करै छी। आब समए बहुत आगू बैढ़ गेल, आब तँ अपनो समाजमे बिआहक मण्डपपर, सरियाती-बरियातीक बीच बर-कनियॉं नाचो करैए आ दारूओ पीबैए, तैठाम अहॉं चाहोसँ लजाइ छी।” पत्नीक पत्नित्वमे करिया काकीकेँ देख लाल कक्काक मन जाड़क सकताएल गुड़ जेना गरमीमे आबि पिघलए लगैए तहिना मन पीघैल गेलैन। पीघैल ई गेलैन जे लाजेक गहनासँ ने विवेककेँ सजौल जाइए किने। मने-मन लाल काका पत्नी-ऊपर सभ तामसकेँ एकेबेर उतारि करिया काकीकेँ कहलखिन- “भोरसँ बतकटौवैल कऽ रहलौं अछि मुदा अखनो तक मन थीर नै भेल। ऐठाम बैसू, हम सुधीर गप करै छी। अहॉं चुपचाप सुनि लिअ, आ जखन दुनू गोरे चुप हएब तखन कि सभ बुझलिऐ से अहॉं बाजब।” लाल कक्काक रूखि करिया काकी बूझि गेली, अपनाकेँ परहेज करैत पाछू घुसकैत बजली- “लब्बर-पुरुख जकॉं जे भरि दिन लबरपनी करैत रहब, तइसँ हमर दिन-गुदस जाएत; जाइ छी अपन काज करए।” कहि काकी चैल गेली। लाल काकाकेँ पुछलयैन- “काका, भोरमे गल्ल-गुल सुनने रही?” बिसरल बात जेना लाल काकाकेँ मन पड़लैन। जहिना हेराएल वस्तु भेटने खुशीमे लोक कनी जोरसँ बजैए तहिना लाल काका बजला- “बौआ सुधीर, घरसँ बाहर धरि मकड़ाक जाल जकॉं जालमे ऐठामक विचार ओझरा गेल अछि। जइसँ अर्थक अनर्थ भऽ रहल अछि।” कहि काका चुप भऽ गेला। मुदा आगूओ तँ किछु एहेन बात ऐछे जइसँ पाछूए लाल काका अपनाकेँ रैख लेलैन। जहिना नवका पनिवट देने पानि बहबैमे बेर-बेर चिक्कन करए पड़ैए तहिना आगू चिकनबैत पुछलयैन- “काका, फूले तकक विचार कहलिऐ, फल तँ छुटले अछि?” लाल काका विहुँसैत बजला- “बौआ, भोरेसँ जिनगीक भोरपन उठैए। तैठाम जँ ई नै बुझत जे भोर ओहन समए छी, जैठाम जिनगीक भोर शुरू होइ छै। सभकेँ अपन-अपन जिनगीक लकीर बनबैत चलऽ पड़तै, जँ से नइ चलत तँ आरो बद-सँ-बदतर लोको आ समाजो बनबे करत किने।” लाल कक्काक बात सुनि मनक बखार भरि गेल। कहलयैन- “काका, अखन छुट्टी दिअ, केते काज अछि। आगू दिन अगिला गप हेतै।” शब्द संख्या- 2701, 31 अगस्त 2015 कथा-लेखन-क्रम 1. भैंटक लावा- (3105) 2. बिसाँढ़- (2499) 3. पीरारक फड़- (2024) 4. अनेरुआ बेटा- (3339) 5. दूटा पाइ- (3279) 6. बोनिहारिन मरनी- (3396) 7. हारि-जीत- (2343) 8. ठेलाबला- (2562) 9. जीविका- (3642) 10. रिक्साबला- (3945) 11. चुनवाली- (2445) 12. डीहक बटबारा- (4724) 13. भैयारी- (4041) 14. बहिन- (2692) 15. घरदेखिया- (4018) 16. पछताबा- (2665) 17. डाक्टर हेमन्त- (4398) 18. बाबी- (2163) 19. कामिनी- (2285. 20. स्रष्टाक समग्र रचना- (137) 21. प्रतिभा- (154) 22. मर्म- (142) 23. अधखरूआ- (255) 24. समैक बेरबादी- (213) 25. पहिने तप तखनि ढलिहेँ- (084) 26. खलीफा उमरक सिनेह- (165) 27. जखने जागी तखने परात- (103) 28. अस्तित्वक समाप्ति- (218) 29. खजाना- (388) 30. उग्रघारा- (328) 31 बेवहारिक- (218) 32. समर्पण- (149) 33 उत्थान-पतन- (138) 34. देवता- (232) 35. पाप आ पुण्य- (218) 36. परख- (129) 37. आलसी- (136) 38. प्रेम- (293) 39. हैरियट स्टो- (137) 40. बुझैक ढंग- (142) 41. श्रमिकक इज्जत- (093) 42. वंश- (074) 43. तियाग- (145) 44. सद्विचार- (184) 45. साहस- (103) 46. बरदास- (133) 47. भूल- (139) 48. धैर्य- (099) 49. मनुखक मूल्य- (099) 50. मदति नै चाही- (209) 51. मेहनतिक दरद- (281) 52. मैक्सिम गोर्की- (146) 53. मूलधन- (174) 54. कपटी मित- (281) 55. भीख- (118) 56. भगवान- (098) 57. एकाग्रचित- (261) 58. सीखैक जिज्ञासा- (101) 59. अनुभव- (092) 60. आसिरवादक विरोध- (088) 61. धर्मक असल रूप- (197) 62. सौन्दर्य- (138) 63. स्तब्ध- (257) 64. एकता- (236) 65. विधवा बिआह- (176) 66. देश सेवाक व्रत- (134) 67. आत्मबल- (1- (110) 68. स्वाभिमान- (121) 69. कलंक- (429) 70. बुलकी- (211) 71. भद्रपुरुष- (173) 72. झूठ नै बाजब- (103) 73. आर्दश माए- (097) 74. नारी सम्मान- (100) 75. अनुशासन- (190) 76. सादा जिनगी- (127) 77. विचारक उदय- (072) 78. पुष्ट इकाइसँ समर्थराष्ट बनैत- (102) 79. डर नै करी- (119) 80. आसिरवाद उलटि गेल- (223) 81. रत्न गमेवाक दुख- (226) 82. निसाँ- (194) 83. सामना- (124) 84. शिष्टाचार- (171) 85. ठक- (115) 86. पत्नीक अधिकार- (128) 87. शिनीची सिनेह- (211) 88. सिखबैक उपए- (171) 89. कर्तव्यपरायन सुगा- (171) 90. तस्वीर- (134) 91. मितक प्रयोजन- (359) 92. स्वार्थपूर्ण विचार- (121) 93. संगीक महत- (130) 94. उपहास- (196) 95. महादान- (176) 96. भाग्यवाद- (171) 97. सद्वृति- (150) 98. आश्रम नै सोबहाव बदली- (281) 99. पुरुषार्थ- (255) 100. नैष्ठिक सुधन्वा- (274) 101. सद्गृहस्त- (195) 102. सद्भाव- (134) 103. आलस्य वनाम पिशाच- (302) 104. स्वर्ग आ नर्क- (265) 105. यथार्थक बोध- (115) 106. विद्वताक मद- (165) 107. अनंत- (128) 108. हँसैत लहास- (184) 109. अनगढ़ चेतना- (162) 110. सत्य विद्या- (108) 111. समता- (165) 112. जेते चोट तेते सक्कत- (116) 113. परिष्कार- (198) 114. कथनी नै करनी- (176) 115. शालीनता- (157) 116. मजूरी- (140) 117. जीवन यात्रा- (145) 118. ज्योति- (081) 119. पवनक विवेक- (180) 120. आत्मबल-2- (105) 121. खुदीराम बोस- (172) 122. शिष्यकेँ शिक्षेटा नै परीक्षो- (187) 123. लौह पुरुष- (124) 124. जंग लगल- (150) 125. जीवकक परीछा- (117) 126. तप- (162) 127. उल्टा अर्थ- (203) 128. जाति नै पानि- (142) 129. ऊँच-नीच- (206) 130. पागलखाना- (223. 131. दोहरी मारि- (1357) 132. केना जीब?- (1031) 133. नवान- (2282) 134. तिलासंक्रान्तिक लाइ- (2034) 135. भाइक सिनेह- (1166) 136. प्रेमी- (2520) 137. बपौती सम्पति- (2352) 138. डंका- (2422) 139. संगी- (1858) 140. ठकहरबा- (2351) 141. अतहतह- (2477) 142. अर्द्धांगिनी- (3045) 143. ऑपरेशन- (1605) 144. धर्मनाथ- (1983) 145. सरोजनी- (1816) 146. सुभद्रा- (1910) 147. सोनमाकाका- (1537) 148. दोती बिआह- (1816) 149. पड़ाइन- (1988) 150. केतौ नै- (1211. 151. बिहरन- (3174) 152. मायराम- (2037) 153. गोहिक शिकार- (2113) 154. मातृभूमि- (1036) 155. भबडाह- (2053) 156. परिवारक प्रतिष्ठा- (1888) 157. फागु- (2096) 158. लफक साग- (1192) 159. तिलकोरक तरुआ- (1826) 160. एकोटा ने- (1071) 161. धोतीक मान- (472) 162. साझी- (989) 163. सतभैंया पोखरि- (2990) 164. न्याय चाही- (1308) 165. पनियाहा दूध- (2114) (166. कर्ज- (2860) 167. परदेशी बेटी- (2451) 168. मान- (631) 169. मनोरथ- (1151. 170. कियो ने- (3699) 171. सूदि भरना- (904) 172. जन्मतिथि- (2356) 173. इमानदार घूसखोर- (2204) 174. पटियाबला- (2356) 175. सनेस- (1248) 176. उलबा चाउर- (2588) 177. बलजोर- (2320) 178. बेटी) हम अपराधी छी- (3240) 179. बगबारि- (1847) 180. मुइलो बिसेबनि- (4244) 181. सड़ल दारीम- (2442) 182. चुप्पा पाल- (2517. 183. एक धाप जमीन- (2522) 184. ओझरी- (1963) 185. मुसहनि- (2277) 186. केलवाड़ी- (2628) 187. स्वरोजगार- (2338) 188. घूर- (2749) 189. कनियाँ-पुतरा- (2340) 190. वारंट- (1601) 191. गामक मुँह फेर देखब- (2897. 192. कचोट- (313) 193. काँच सूत- (390) 194. बुधनी दादी- (267) 195. खिलतोड़- (396) 196. मुँह-कान- (234 197. अनदिना- (312) 198. अपन काज- (366) 199. दूरी- (264) 200. पुरनी भौजी- (116) 201. छूटि गेल- (111) 202. काल्हि दिन- (151) 203. अप्पन हारि- (283) 204. कनफुसकी- (137) 205. मुँहक बात मुहेँमे- (135) 206. कनीटा बात- (098) 207. गति-गुद्दा- (250) 208. बिसवास- (316) 209. कचहरिया-भाय- (270) 210. गुहारि- (432) 211. शिवजीक डाक-बाक्- (089) 212. सोग- (341) 213. पनचैती- (197) 214. कनमन- (313) 215. अजाति- (085) 216. पटोर- (412) 217. फुसियाह- (308) 218. गति-मुक्ति- (241) 219. चौकीदारी- (437) 220. झगड़ाउ-झोटैला- (256) 221. घबाह ट्यूशन- (246) 222. दादी-माँ- (408) 223. पटोटन- (349) 224. मुसाइ पंडित- (567) 225. भरमे-सरम- (231) 226. देखल दिन- (434) 227. फज्झति- (403) 228. अकास दीप- (233) 229. बुधि-बधिया- (268) 230. पहाड़क बेथा- (216) 231. उमकी- (324) 232. बजन्ता-बुझन्ता- (147) 233. चर्मरोग- (578) 234. शंका- (325) 235. ओसार- (213) 236. छोटका काका- (394) 237. सीमा-सड़हद- (195) 238. रमैत जोगी बोहैत पानि- (253) 239. गंजन- (172) 240. सजए- (089) 241. घटक बाबा- (335) 242. आने जकाँ- (048) 243. दान-दछिना- (150) 244. उड़हड़ि- (503) 245. मत्हानि- (260) 246. मेकचो- (221) 247. झूटका विदाइ- (350) 248. मुँहक खतियान- (278) 249. कोसलिया- (234) 250. हूसि गेल- (204) 251. पोखला कटहर- (153) 252. सरही सौबजा- (267) 253. तेरहो करम- (322) 254. डुमैत जिनगी- (295) 255. चोर-सिपाही- (197) 256. दूधबला- (271) 257. टाइपिस्ट- (263) 258. समदाही- (300) 259. बुढ़िया दादी- (331) 260. पाइक मोल- (2412) - (22 दिसम्बर 2013 261. चोरूक्का झगड़ा- (538) 24 दिसम्बर 2013 262. अपसोच- (548) 26 दिसम्बर 2013 263. पतझाड़- (2587) 31 दिसम्बर 2013 264. झीसीक मजा- (453) 1 जनवरी 2014 265. मति-गति- (1807) 07 जनवरी 2014 266. अपन सन मुँह- (5696) 25 जनवरी 2014 267. रिजल्ट- (2343) 16 जनवरी 2014 268. सुमति- (3052) 30 जनवरी 2014 269. फेर पुछबनि- (346) 31 जनवरी 2014 270. माघक घूर- (1683) 06 फरवरी 2014 271. खर्च- (330) 07 फरवरी 2014 272. अखरा-दोखरा- (342) 10 फरवरी 2014 273. पेटगनाह- (593) 14 फरवरी 2014 274. बड़की माता- (1224) 18 फरवरी 2014 275. धरती-अकास- (184) 19 फरवरी 2014 276. बकठाँइ- (883) 24 फरवरी 2014 277. चैन-बेचैन- (936) 09 मार्च 2014 278. हथियाएल खुरपी- (650) 11 मार्च 2014 279. अलपुरिया बरी- (287) 12 मार्च 2014 280. नीक बोल- (570) 13 मार्च 2014 281. सुआद- (624) 14 मार्च 2014 282. गंगा नहेलौं- (686) 19 मार्च 2014 283. भोँटक गहमी- (508) 24 मार्च 2014 284. भँसैत नाह- (592) 26 मार्च 2014 285. पान पराग- (1704) 29 मार्च 2014 286. सिरमा- (760) 31 मार्च 2014 287. नौमीक हकार- (1116) 03 अप्रैल 2014 288. फोंक मकड़- (1)755) 10 अप्रैल 2014 289. केते लग केते दूर-(1255) 14 अप्रैल 2014 290. अभिनव अनुभव- (326) 16 अप्रैल 2014 291. खोंटकर्मा- (1184) 19 अप्रैल 2014 292. किछु ने- (501) 22 अप्रैल 2014 293. झकास- (1589) 26 अप्रैल 2014 294. अप्पन-बीरान- (2)894) 01 मई 2014 295. सजमनियाँ आम- (611) 04 मई 2014 296. अर्जुन रोग- (1003) 7 मई 2014 297. गरदनि कट्टा बेटा- (575) 10 मई 2014 298. नैहराक धाड़- (881) 14 मई 2014 299. अवाक- (1041) 17 मई 2014 300. पोखरिक सैरात- (923) 20 मई 2014 301. दनियाँ डाबा- (409) 22 मई 2014 302. धरम काँट- (399) 23 मई 2014 303. पलभरि- (1116) 24 मई 2014 304. किरदानी- (5296) 14 जुन 2014 305. सगहा- (2867) 22 जुन 2014 306. अकाल- (1238) 24 जुन 2014 307. उझट बात- (1152) 26 जुन 2014 308. कर्जखौक- (1175) 2 जुलाई 2014 309. उनटन- (1187) 6 जुलाई 2014 310. रेहना चाची- (1307) 9 जुलाई 2014 311. बुधनी दादी- (1256) 11 जुलाई 2014 312. अउतरित प्रश्न- (1229) 14 जुलाई 2014 313. हारि- (1240) 16 जुलाई 2014 313. सोनाक सुइत- (1135) 17 जुलाई 2014 314. मरूभूमि- (1214) 20 जुलाई 2014 315. असगरे- (1557) 24 जुलाई 2014 316. पुरनी नानी- (1304) 27 जुलाई 2014 317. कटा-कटी- (1140) 30 जुलाई 2014 318. केते लग केते दूर-(1206) 3 अगस्त 2014 319. गलती अपने भेल-(3386) 06 अगस्त 2014 320. चोरक चोरबती- (884) 6 अगस्त 2014 321. घर तोड़ि देलिऐ- (1527) 10 अगस्त 2014 322. सजल स्मृति- (2363) 14 अगस्त 2014 323. सनेस- (2654) 16 अगस्त 2014 324. सए कच्छे- (488) 19 अगस्त 2014 325. एक मुठी घास- (411) 21 अगस्त 2014 326. करिछौंह मुँह- (318) 24 अगस्त 2014 327. पुरस्कार- (2414) 24 अगस्त 2014 328. गावीस मोइस- (687) 29 अगस्त 2014 329. मनकमना- (6118) 19 सितम्बर 2014 330. घरवास- (4884) 26 सितम्बर 2014 331. समधीन- (6096) 04 अक्टुबर 2014 332. चापाकलक पाइप- (1616) 7 अक्टुबर 2014 333. कलम हानि कऽ-(2226) 10 अक्टुबर 2014 334. लतियाएल जिनगी-(1184) 14 अक्टुबर 2014 335. गामक शकल-सूरत-(2596)20अक्टुबर 2014 336. जितिया पावनि- (3706) 24 अक्टुबर 2014 337. सुखाएल सूरत- (3690) 30 अक्टुबर 2014 338. भैयारी हक- (3131) 4 नवम्बर 2014 339. ठकुआएल भुसवा- (3356) 13 नवम्बर 2014 340. खुदियाएल- (2894) 17 नवम्बर 2014 341. खटहा आम- (3528) 22 नवम्बर 2014 342. ढकरपेँच- (3740) 30 नवम्बर 2014 343. असहाज- (2853) 04 दिसम्बर 2014 344. समरथाइक भूत- (3832) 07 दिसम्बर 2014 345. विदाइ-(5103) 17 दिसम्बर 2014 346. खलओदार- (731) 19 दिसम्बर 2014 347. मनुखदेवा (1016) 22 दिसम्बर 2014 348. उमेद- (3643) 31 दिसम्बर 2014 349. गलगर भैंस- (3392) 4 जनवरी 2015 350. जाड़ फाटि गेल- (3328) 9 जनवरी 2015 351. सुरता- (3304) 15 जनवरी 2015 352. असुध मन- (2353) 19 जनवरी 2015 353. धरमूदासक अखड़ाहा- (1410) 21 जनवरी 2015 354. ठोररंगू- (1531) 23 जनवरी 2015 355. लगबे ने कएल- (1449) 25 जनवरी 2015 356. उकड़ू समय- (1467) 27 जनवरी 2015 357. चास-बास दुनू गेल- (1615) 29 जनवरी 2015 358. नहरकन्हा- (1209) 11 मार्च 2015 359. बटखौक- (1272) 14 मार्च 2015 360. पसेनाक धरम- (1263) 16 मार्च 2015 361. जेठुआ गरदा- (1103) 18 मार्च 2015 362. हँसीएमे उड़ि गेलौं- (1243) 20 मार्च 2015 363. बुड़िबकहा बुड़िबक बनौलक- (1234) 23 मार्च 2015 364. हमर बाइनिक विचार- (1207) 26 मार्च 2015 365. नोकरिहारा- (1146) 26 मार्च 2015 366. घसवाहि- (1213) 28 मार्च 2015 367. तेतर भाइक कविता- (1319) 1 अप्रैल 2015 368. छूआ- (1223) 6 अप्रैल 2015 369. दोसराइत- (1270) 9 अप्रैल 2015 370. लछनमान- (1173) 13 अप्रैल 2015 371. हमर कोन दोख- (1527) 17 अप्रैल 2015 372. मौसी- (1393) 21 अप्रैल 2015 373. नटकिया गति- (1313) 24 अप्रैल 2015 374. खाए चाहैए- (1223) 27 अप्रैल 2015 375. मधुमाछी- (1892) 07 मई 2015 376. दनगर घास- (2775) 13 मई 2015 377. सझिया खेती- (3135) 23 मई 2015 378. मुफतिया माल- (3231) 29 मई 2015 379. मथाहाथ- (2923) 02 जून 2015 380. पहपटि- (1369) 05 जून 2015 381. इजोरिया राति- (1512) 07 जून 2015 382. तीन जुगिया भाय- (2010) 12 जून 2015 383. अँगनेमे हेरा गेलौं- (605) 14 जून 2015 384. डकरा हाल- (2529) 17 जून 2015 385. जेतए जे हौउ- (2062) 21 जून 2015 386. गठूलाक गारि- (1532) 25 जून 2015 387. कनी हमरो सुनू- (1983) 29 जून 2015 388. गामक बान्ह- (2437) 03 जुलाई 2015 389. गुड़ा-खुद्दीक रोटी- (2443) 08 जुलाई 2015 390. सीरक गाछ- (3071) 13 जुलाई 2015 391. हरदीक हरदा- (2924) 19 जुलाई 2015 392. जाम- (3355) 29 जुलाई 2015 393. गण्डा- (2304) 5 अगस्त 2015 394. हाथी आ मूस- (3016) 11 अगस्त 2015 395. मुसरी आ घोड़ा- (3625) 17 अगस्त 2015 396. फलहार- (2350) 25 अगस्त 2015 397. भोरक झगड़ा- (2697) 31 अगस्त 2015 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 3 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८६ म अंक १५ सितम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९३ अंक १८६) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA