ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८७ म अंक ०१ अक्टूबर २०१५ (वर्ष ८ मास ९४ अंक १८७) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.पूनम मण्डल रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- २ टा लघु कथा २.३.आशीष अनचिन्हार- मेक इन मिथिला भाग-२ (व्यंग्य निबंध) २.४.योगेन्द्र पाठक "वियोगी"-२ टा विहनि कथा ३. पद्य ३.१.संजय झा "नागदह" ३.२.ओम प्रकाश ३.३.महेश डखरामी ३.४.गणेश मैथिल Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह) लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश) क मैथिली अनुवाद लेल। Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.पूनम मण्डल रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- २ टा लघु कथा २.३.आशीष अनचिन्हार- मेक इन मिथिला भाग-२ (व्यंग्य निबंध) २.४.योगेन्द्र पाठक "वियोगी"-२ टा विहनि कथा पूनम मण्डल रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल निर्मली, दिनांक 19 सितम्बर 2015 : सगर राति दीप जरय समिति- निर्मलीक प्रस्तुतिमे शहरक विशालकाय विवाह भवन- श्यामा रेसिडेन्सी- सभागार-मे सगर राति दीप जरय केर 87म गोष्ठी ‘कथा तिलजुगा’क शुभारम्भ 6:30 बजे भेल। जेकर उद्घाटन सम्मिलित रूपे केलैन, नेतरहाट उच्चतर माध्यमिक विद्यालयक पूर्व प्राचार्य डॉ. दुर्गा प्रसाद साहू, हरि प्रसाद साह महाविद्यालयक पूर्व एवं वर्तमान प्राचार्य द्वय डॉ राम अशीष सिंह, डॉ. विमल कुमार राय, प्रखण्ड विकास पदाधिकारी श्री सुशील कुमार, जिला पार्षदक पूर्व सदस्या श्रीमती आशा देवी, श्यामा रेसिडेन्सीक निर्माणकर्ता श्री सत्य नारायण प्रसाद साहु तथा सी.एम.बी. कॉलेजक हिन्दी विभागाध्यक्ष सह मैथिली साहित्यक चर्चित साहित्यकार प्रो. धीरेन्द्र कुमार। अवसरपर श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ स्व रचित गीत- “करू स्वागत स्वीकार हे प्रियवर, हम नै अपनेक योग्य...।”सँ स्वागत केलैन, तथा धन्यवाद ज्ञापनक संग स्वागत-भाषण केलैन, प्रोफेसर द्वय डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. श्रीमोहन झा। ऐ तरहें उद्घाटन सत्रसँ पोथी लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल। सत्रक मुख्य अतिथि, बिहार अति पिछड़ा प्रकोष्ठक सदस्य मो. शरफराज अहमद संगे विशिष्ठ अतिथि रहैथ- डॉ श्यामानन्द चौधरी, डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सिंह, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्री शंभु सौरभ, श्री दुर्गानन्द मण्डल, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री श्रीकृष्ण राम, श्री अजय कुमार दास, श्री नागेश्वर कामत, श्रीमती विभा कुमारी, श्रीमती अनुपम कुमारी, श्री मनोज कुमार साह उर्फ चन्दनजी, श्री जे. के. आनन्द, श्री रतन कुमार रवि, श्री विनोद कुमार गोप, श्री राम प्रवेश मण्डल तथा श्री रामलखन भण्डारी, तथा सत्रक अध्यक्षता केलैन- समर्पणक चेअरमेन श्री दुर्गानन्द मण्डल, मध्य विद्यालयक शिक्षक मो. ए.के. मंजूर, सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुरेन्द्र प्रसाद यादव, श्री विनोद कुमार तथा मध्य विद्यालयक प्राचार्य श्री नारायण प्रसाद सिंह। पॉंच गोट पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे टैगोर साहित्य पुरस्कारसँ पुरस्कृत एवं विदेह भाषा सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल रचित चारि गोट पोथी- ‘गुड़ा-खुद्दीक रोटी’, ‘फलहार’, ‘लजबिजी’ आ ‘गामक शकल-सूरत’ लघुकथा संग्रहक छल आ पॉंचम- ‘विदेह’ आ ‘वैदेह’ द्वय सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार श्री राजदेव मण्डल रचित पोथी- ‘जाल’ (पटकथा) रहए। पाँचू पोथी भरि सभागारमे वितरणो भेल। भाड़ी संख्यामे विद्वत-श्रोतागणक उपस्थिति सेहो छल। जेना- इतिहासक विभागाध्यक्ष प्रो. जय प्रकाश साहु, अधिवक्ता सह पत्रकार श्री रौशन कुमार गुप्ता, श्री सागर कुमार साहु, श्री विष्णु कुमार गुप्ता, श्री टुनटुन कामत, श्री राम नरेश यादव, श्री अजय कुमार गुप्ता, श्री आलोक कुमार ‘नाहर’, श्री राम विलास सिंह, श्री बिहारी मण्डल, श्री राज कुमार यादव, श्री बद्रीलाल यादव, श्री राम नारायण कामत, श्री रामकृष्ण ठाकुर, श्री राजदेव मण्डल, श्री अरविन्द कुमार मण्डल, श्री राजेश पासवान, श्री संजीव कुमार, ई. आशुतोष कुमार, श्रीमती आराधना मिस्टी, श्री चन्द्र भूषण झा ‘राधव’, श्री मनोज कुमार झा, श्री राजकुमार मिश्र, श्री अरविन्द यादव, श्री विनय कुमार रूद्र, श्री बिलट मण्डल, श्री रामबाबू कामत, श्री दशरथ प्रसाद यादव, श्री राम अशीष मण्डल, श्री लक्ष्मी मण्डल, डॉ. विष्णुदेव ठाकुर, श्री गोपाल गिरि, श्री राजाराम यादव, संतोष कुमार पाण्डेय, श्री सत्य नारायण महतो, सुश्री काजोक कुमारी, श्री मदन महतो, श्री शम्भु कमार साह, श्री योगीलाल कामत, श्री हजारी प्रसाद साहु, तथा अवकाश प्राप्त शिक्षक श्री अशर्फी साहु इत्यादि-इत्यादि। क्रमश: आगू बढ़ैत कथा सत्रमे प्रवेश कएल...। ऐ सत्रक अध्यक्षता केलैन ‘सखारी-पेटारी’ कथा संग्रहक कथाकार श्री नन्द विलास राय, ‘रथक चक्का उलैट चलै बाट’क कवि श्री राम विलास साहु, ‘उलहन’ कथा संग्रहक कथाकार श्री कपिलेश्वर राउत तथा अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला महाविद्यालय- निर्मली केर मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. हेम नारायण साहु। सात पालीमे विभक्त पच्चीस गोट कथा पाठ भेल, समीक्षा भेल। ऐ तरहें तीनू सत्रक समापन भेल। जेकर संचालक छला- श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री भारत भूषण झा, श्री दुर्गानन्द मण्डल तथा श्री उमेश मण्डल। अन्तिम सत्र ‘अगिला गोष्ठी केतए’मे प्रवेश भेल। चारि गोट प्रस्ताव आएल, पहिल- श्री रोहित कुमार सिंहक दरभंगा लेल मार्च 2016. श्री दुखन प्रसाद यादवक ‘धबही’ लेल जून 2016 तथा दिसम्बर 2015क गोष्ठी लेल दूटा, प्रथम- श्री कमलेश झाक ‘डखराम’ लेल तथा श्री राजदेव मण्डलक ‘रतनसारा-मुसहरनियॉं’ लेल। सभामे बैसल समस्तक विचारपर अध्यक्ष मण्डल द्वारा निर्णय भेलैन- डखराम। अत: अगिला गोष्ठी श्री कमलेश झाक संजोजकत्वमे दरभंगा जिलाक बेनीपुर अनुमण्डल अन्तर्गत ‘डखराम’ गाममे होएत। भावी संयोजक श्री कमलेश झाकेँ वर्तमान संयोजक श्री उमेश मण्डल दीप तथा पंजी समर्पित केलैन। अन्तमे, धन्यवाद ज्ञापनमे, बाहरसँ आएल साहित्यकार, स्थानीय साहित्यकार एंव सहयोगी तथा विशेष सहयोगीकेँ संयोजक धन्यवाद-नमन केलैन। ऐ तरहें सगर रातिक कथा शेष भेल। निम्न अछि- क्रमानुसार पठित कथाक नओं, कथाकारक नाओं, तथा समीक्षकक सुची, संगे सगर राति दीप जरय समिति- निर्मली केर सक्रिय कार्यकर्ता, संचालक तथा विशेष सहयोगीक सेहो। कथा पाठ एवं समीक्षा : पहिल पाली- १. फ्रेण्ड : पल्लवी कुमारी २. सभसँ कठिन जातिक अपमान : रतन कुमार ‘रवि’ ३. अवाक् : राजदेव मण्डल समीक्षा : डॉ. विमल कुमार राय, डॉ. श्यामानन्द चौधरी, डॉ. राम अशीष सिंह। दोसर पाली- ४. अवसरवाद : अजय कुमार दास ५. ऊपर फरकी मामीक सराध : लक्ष्मी दास ६. हाथी आ मूस : जगदीश प्रसाद मण्डल समीक्षा : श्री कमलेश झा, श्री दुर्गानन्द मण्डल (बनरझूला) श्री दुर्गानन्द मण्डल। तेसर पाली- ७. बबाजीक मकड़जाल : संजीव कुमार ‘शमा’ ८. शैतान आ भगवान : दुर्गानन्द मण्डल ९. सहोदरा नै बना पेलौं : उमेश मण्डल समीक्षा : डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. विमल कुमार राय, डॉ. श्यामानन्द चौधरी, डॉ. राम अशीष सिंह। चारिम पाली- १०. समाजक हाल : रोहित कुमार सिंह ११. इज्जतक सवाल : राम विलास साहु १२. हैवानक संग सधमुहोँ : दुखन प्रसाद यादव १३. बाल बोध : शम्भु सौरभ १४. एक दिन हमरो : शारदा नन्द सिंह समीक्षा : श्री फागु लाल साहु, श्री सुशील कुमार साह, श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’। पॉंचिम पाली- १५. सिद्धि साध्ये : उमेश नारायण कर्ण ‘कल्पकवि’ १६. श्रोता : अशोक कुमार मिश्र १७. फ्रॉडिज्म : शिव कुमार मिश्र १८. कर्मक फल : फागु लाल साहु समीक्षा : श्री राजदेव मण्डल, श्री रतन कुमार ‘रवि’, श्री कमलेश झा। छठम पाली- १९. आब कहू : नन्द विलास राय २०. हमर समाज : कौशल झा २१. खुशी : पंकज कुमार ‘प्रभाकर’ २२. मौखिक : राधाकान्त मण्डल २३. मनुखक मोल : सुशील कुमार समीक्षा : श्री राम विलास साहु, श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री उमेश मण्डल। सातम पाली- २४. एकटा आर : शारदानन्द सिंह २५. बरियातीमे गारि : लक्ष्मी दास समीक्षा : डॉ श्यामानन्द चौधरी, श्री कमलेश झा। ....................... श्री संजय कुमार मण्डल, श्री सत्रुघ्न कुमार मण्डल, श्री विनोद ठाकुर, श्री सुजीत कुमार साहु, श्री अखिलेश कुमार मण्डल, श्री शशि भूषण कुमार, श्री संतोष कुमार राय आदि। श्री सुरेश महतो, श्री मुकुल प्रसाद साहु, श्री सुरेन्द्र प्रसाद यादव, श्री विनोद कुमार तथा उमेश मण्डल। श्री सत्य नारायण प्रसाद साहु, श्री नारायण प्रसाद सिंह, श्री पिंकु पंसारी, श्री राम प्रकाश साहु, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री प्रभाष कुमार कामत, श्री मनोज कुमार शर्मा, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री रामनाथ गुप्ता, श्री राम लखन भण्डारी, श्री अखिलेश चौधरी, श्री राम सुन्द्रर साहु, प्रो. धीरेन्द्र कुमार तथा डॉ. विमल कुमार राय...। 86म दीप सरग राति जरल मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमण्डलक ‘लकसेना’ गाममे 20 जून 2015 केँ 86म ‘सगर राति दीप जरय’ (कथा-साहित्य गोष्ठी) क आयोजन ‘उन्मुक्त’क सौजन्यसँ श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’क संयोजकत्वमे आयोजित भऽ सफल भेल। ऐ अवसरिपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा पोथी क्रमश: ‘पसेनाक धरम’ आ ‘मधुमाछी’ (लघु कथा संग्रह)क लोकार्पणक संग वितरण भेल। संगे हालहिमे प्रकाशित डॉ. रंगनाथ दिवाकार (मूल नाम- रंगनाथ चौधरी)क लधु कथा संग्रह ''भखरैत नील रंग'' किछु कथाकारकेँ देल गेलनि। अगिला गोष्ठी सुपौल जिला अन्तर्गत ‘निर्मली’मे हएत से सर्वसम्मतिसँ निर्णए भेल। फोटोक संग ब्रेकिंग न्यूज निम्न अछि- संयोजक- श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’ आयोजक- उन्मुक्त उद्घाटन- डॉ. खुशीलाल मण्डल, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’, श्री कमलेश झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, डॉ. शिव कुमार प्रसाद। दू शब्द- श्री कमलेश झा, श्री नन्द विलास राय, श्री बाल गोविन्द यादव ‘गोविन्दाचार्य’ अध्यक्ष मण्डल- श्री दुर्गानन्द मण्डल (बनरझूला), श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’ (अवकाश प्राप्त शिक्षक), डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’,श्री जगदीश प्रसाद मण्डल आ श्री कमलेश झा। संचालन समिति- श्री दुर्गानन्द मण्डल आ उमेश मण्डल पोथी लोकार्पण- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघु कथा संग्रह क्रमश: (1) पसेनाक धरम, (2) मधुमाछी। पहिल पोथीक लोकार्पण कर्ता- प्रो. खुशीलाल मण्डल, प्रो. राम विलास राय आ डॉ.योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’। दोसर पोथीक लोकार्पण कर्ता- श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’, श्री रतन कुमार ‘रवि’ आ श्री कमलेश झा। कथा पाठ- पहिल सत्र- (1) चोरविद्या- पल्लवी कुमारी (2) केतौ किछु होउ- लक्ष्मी दास (3) टोन- दीन बन्धु झा समीक्षा- श्री कमलेश झा, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री राजदवे मण्डल, बाल गोविन्द यादव ‘गोविन्दाचार्य’ दोसर सत्र- (4) भगवनान भरोष- ललन कुमार कामत (5) सपनेमे बीति गेल जिनगी- संजीव कुमार ‘शमा’ (6) शबनम- उमेश नारायण कर्ण (7) मुड़नक मुर- उमेश मण्डल समीक्षा- श्री राम विलास साहु, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री शम्भु ‘सौरभ’, दुर्गा नन्द मण्डल (बनरझूला) तेसर सत्र- (8) सस्ता रोबे वार-वार- डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ (9) गंगा सुखा गेल- डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ (10) गंगा नहाएब- राम विलास साहु (11) टुटैसँ बँचि गेल- दुर्गानन्द मण्डल समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री भोगेन्द्र यादव ‘भाष्कर’, श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री राजदेव मण्डल आ उमेश मण्डल। चारिम सत्र- (12) शिक्षाक अन्तिम उद्देश्य- नन्द विलास राय (13) वेस्तता- बेचन ठाकुर (14) छोटू- शम्भु सौरभ समीक्षा- श्री शारदा नन्द सिंह, श्री कमलेश झा, श्री अजय कुमार ‘पिण्टू’ पाँचम सत्र- (15) तितल बिलाड़ि- शिवकुमार मिश्र (16) आब कहिया चेतब- कपिलेश्वर राउत (17) लाचारी- गौड़ी शंकर साह समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री नन्द विलास राय। छठम सत्र- (18) पहपटि- जगदीश प्रसाद मण्डल (19) इजोरिया राति- जगदीश प्रसाद मण्डल (20) खलिया बन्दूक भटाभटि- शारदा नन्द सिंह समीक्षा- श्री कमलेश झा, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, डॉ. शिवकुमार प्रसाद, श्री बाल गोविन्द ‘गोविन्दाचार्य’, श्री दुर्गा नन्द मण्डल (बनरझूला) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल २ टा लघु कथा- १ सीरक गाछ जेठ मास। भिनसुरका उखड़ाहाक दू घण्टाक काज पुरबैत रही कि सुर्ज दिस तकलौं। दू घण्टाक माने खेतक काजक दू घण्टा, नइ कि दिनक दू घण्टा। रौदाएल हवा झँटियबैत-झड़कबैत रहए। अन्दाजमे आएल जे एगारह बजि गेल हएत। दू घण्टाक हिसावसँ काजक समए पुरैत रहए। काज उसारि खुरपी-हँसुआ समेटि जखन गमछा तरक मोबाइल उठेलौं कि एगारह बजैमे पाँच मिनट पछुआएल देखलिऐ। काजक समए नष्ट केना करब मुदा उसारल काजकेँपसारबोमे तँ पॉंच मिनट समए लगिये जाएत। अग-दिगमे पड़ि गेलौं। मनमे उठल- काजोक की कमी छै जे एकटा उसरि गेल तँ दोसर नइए। दुनियॉंमे ने खेतक कमी छै आ ने बाड़ीक, ने बाड़ीक कमी छै आ ने फुलवाड़ीक, नेफुलवाड़ीक कमी छै आ ने फलवाड़ीक, तहूमे फलवाड़ीओ कि कोनो एके रंगक अछि, तीन-मसुआसँ बरह-बरखा धरि अछि। की करी की नइ करी, बिच्चेमे त्रिशंकु जकॉं मन लसैक गेल। काजक पतराइत विचार समए दिस देखैक जोर मनमे मारलक। जेठ मास। केहेन जेठ? जेठो तँजेठ होइत-होइत जहिना जठिया जाइए तहिना ने छोट होइत-होइत छोटियाइत माटि-बालुमे दबैत दबिया जाइए? जेठो कि कोनो एके रंगक होइए, पाछूसँअबैत गाड़ी सवार जकॉं तेहेन रूप बना रंगमंचपर नचैत आबि रहल अछि, जेकरा परेखब बाल-बोधक खेल नइ। पाछूसँ जँ रौदियाएल समए अबैत रहल तँआरो बेसी रौदिया जाएत, आ जँ से नहि कहीं पाछू बढ़ियाएल पानि जेहेन पीने रहल तेहेन हरियाएल रहबे करत किने। मुदा जँ ने बाढ़िक पानि पीने हुअए आने रौदियाएल हवा पीने हुअए, तेहनो जेठ तँ होइते अछि। सएह जेठ। ओना काजक हिसावसँ जेठ घटियाएल रहए मुदा लम्बाइ-चौड़ाइक हिसावसँ मिसियो भरि कमी नहि। काजक समए काजक दौड़मे ठेकान-बेठेकान भऽजाइ छै, मुदा अकाजक समए तँ विरहाएल जकॉं बेर-बेर घड़ीक सुइआ दिस तकबे करैए। सएह भेल। फेर मोबाइल उठा समए देखलौं तँ दू मिनट बढ़ल, तीन मिनट बॉंकी अछि। माने नहाइक बेर अबैमे तीन मिनट बॉंकी अछि। आगूक रस्ता बाड़ीक बीचे-बीचअछि, जेतए काज करैत रही तेतएसँ आगूक बाड़ीमे वामा भाग पॉंच गाछ लताम आ दहिना भाग सात गाछ नेबो पड़ैत अछि। नहेबोक कि कोनो समए अछि, जेकरा जखन गर लगै छै से अपना गरे नहाइक समए बना अपन काज चलबैए। तखन तँ भेल अपन जिनगीक संकल्पितबान्हकेँ निमाहब। मुदा ओहो तँ कोसिकन्हाक बहुआहा बाध जकॉं मनुखो आ समाजोमे तँ अछिए। जेकरामे ने कोनो आड़ि-मेड़ छै आ ने खेतक शकल-सूरत, जेम्हरे मन फुरए तेम्हरे हिया कऽ देख लिअ आ सोझहे विदा भऽ जाउ। मुदा से थोड़े अछि, तीन बजे भोरसँ नहाइक घाट शुरू होइए आ तीन बजेराति तक चलैत रहैए। बीचमे केतौ आड़ि छै जे बुझब कखन उसरैए आ कखन शुरू होइए? वामा भाग दिस लतामक गाछ फड़सँ लदल, जेठ रहितो जेहने हरिअर पात तेहने हरिअर फड़सँ सजल-धजल अछि। तरकारीवाड़ीसँ आगू एक दिस फलकझाड़ी तँ दोसर दिस फलक तरूवाड़ी। दुनू फल जहिना नेबोक झड़झाड़ी तहिना लतामक तरूवाड़ी। दुनू दिस दुनू अपन मस्ती भरल जुआनीसँ लदल। आगू डेग उठिते दुनू फल- माने झाड़ीक नेबो आ तरूवरक लताम- पर नजरि गेल। एकटा मीठ दोसर खट्टा, एकटा गुदगर दोसर रसगर, तहूमे दुनूक पेटमेबीआ सेहो अछिए। किछु छी तैयो तँ छी दुनू जिनगीक सिरसजमनियेँ। ने लताम दिस डेग उठए आ ने नेबो दिस। केकरा कहबै जेठुआ जेठ आ केकरा कहबै तहूसँ जेठ। खिस्सा जकॉं नइ ने होइए जे एकटा रहबे करै, एकटापहिनेसँ रहै आ एकटा तबेसँ रहै आ एकटा सभदिने रहै...। मुदा से भेल नहि सीरबला गाछक एकटा लताम अपन पूर्ण जिनगी जीब पूर्ण स्वस्थता पाबि अन्तिम भेँट चढ़ैले अकास तियागि धरतीक कोरामे आबिखसल, जीव-जन्तुक रक्षा लेल अपन वलिवेदीपर पहुँच गेल। धरतीपर खसल फलक अवाज सुनि हमरो नजरि ओम्हरे बढ़ल। फरिक्केसँ फल देख मन मोहिया मोहित हुअ लगल। आगू बढ़ि हाथसँ उठा अंत-प्रत्यंगनिहारए लगलौं, ने केतौ कोदवाक दाग आ ने केतौ तिलबा। सजल-धजल गुण-सम्पन्न गुदासँ भरल सिनुराएल लताम। लतामकेँ नीक जकॉं निहारियो ने पेने रही कि झाड़ीमे झड़झड़ाइत एकटा पाकल नेबो सेहो खसल। नेबो खसैसँ पहिने- माने जा नेबो नइ खसल छल- मनमेउठल रहए जे लतामक हाल-चाल, समए-सालक समाचार पूछि लेब। मुदा से भेल नइ, जेना दू गोरेक बीच अपन लीला देखबैक उपरौंज हुअ लगैए तहिनाबूझि पड़ल। जखन नेबोओ अपन वलिदानक लेल वलिवेदीपर आबिए गेल तखन किए ने दुनूकेँ एकेठाम परीछा करी। लतामकेँ हाथमे नेने नेबो लग जाइ आकि हँसुआ-खुरपी-मोबाइल आ गमछाकेँ गाछक जड़िमे रखि नेबोएकेँ उठा आनी? सएह केलौं- गाछ तरसँ नेबोकेँ उठाहाथमे लइते रही कि ओ चहैक गेल। रससँ भरल रूप मुदा चहकलो पछाति ऑंखिक नोर अपन ठौर धेने! एको बून नोरक दरस नहि! अही टराटकमे रही किचहकैत नेबो बाजल- “दू रूपैआ दामक हम छी, मधुबनीक टीसन-कातक होटलमे दस टुकड़ी कटि दस गोरेक भोजनकेँ सुवादिष्ट करै छी मुदा तैयो लोक हमरा दुसिते रहैए जेतूँ कॉंटक फड़ छेँ तोहर कोन मोजर!” एक तँ ओहुना नेबो, दारीम, बेल कँटाएल गाछक फल छी, तहूमे बेल तँ ऊपर उठि झाड़ीसँ निकलि जाइए, जँ अपनामे झाड़ी बनबितो अछि तँ जेना-जेनाअकास दिस उठैत गेल तेना-तेना झाड़ीकेँ झड़ियबैत डारिकेँ सुमझबैत आगू बढ़ि बढ़ैत जाइए, मुदा नेबो तँ से नइ छी! ओकरा कँटाएल वंशक कहि बगूरो तँनहियेँ कहल जा सकैए। जँ कोनो फल-फूलमे अमृत वरिसबैक शक्ति अछि तँ ओ नेबोओमे अछिए। गाछक जड़िमे नेबोकेँ खसल रहने, ओरिया कऽ देह समटैत हाथ बढ़ा जड़ि लगसँ नेबो निकालने रही। कॉंटक झाड़ीक फल हाथमे अबिते मनमे खुशी जगलेरहए। मुदा चहकल दू फॉंक जकॉं भेल नेबोकेँ देखि मनमे भेल जे जँ फटबो कएल अछि तँ ओकरा ओरिया कऽ उपयोग केलासँ कोनो फरक नै, किएक तँऊपरसँ खोंइचा ने फटलै, रसक बखारी तँ ओहिना समटल छै। अपन विचारमे विचरण करैत विचारैत रही तँए नेबोक चहकबपर धियान नइ अँटैक ओकर गुणक उपयोगक विचारमे पहुँच गेल। मुदा तँए कि नेबोक तमतमीकमल रहै, मने-मन तमतमाइते रहए। ओना मनमे ईहो बात उठैत रहए जे दू-चारि ठोप रस जँ अमृते रहत तइसँ की लोकक दिन गुदस जेतै? असल अमृत तँअन्न-पानि होइए। मुदा किछु बाजी नै चुपे रही, तमतमीओं तँ तखन तमतमाइ छै जखन ओकरा संग खट-समाद होइ छै। नेबोकेँ नेने लतामक गाछक छाहरिमे बैसि लतामक संग सजबए लगलौं कि बिच्चेमे नेबो टभकि गेल- “हम आगूमे बैसब, नइ तँ अगिलाक गप-सप्प सुनैमे समए ससरि नहाइबेर भऽ जाएत आ हमरा बेरमे खेले उसरि जाएत।” अखन धरि लताम अपन मुँह समेटने सभ किछु देख-सुनि रहल छल। ओना नेबोक फटफटी सुनि लतामकेँ तामसो उठै मुदा अपन दरबज्जापर देख बरदासकरैत रहए। खाली मंचपर वक्ता जहिना भरि पोख बजै छथि, आ श्रोता भरि कान सुनै छथि तहिना एकतर्फा नेबो अपन भाषण-पर-भाषण ठाढ़ करैत रहए।मुँह कखनो सापुट नै लइ, खाली मंच देखि नेबो फेर बाजल- “भाय साहैब, अमरीत बरसा करैबला फल हम छी, अपन दियादवाद झाड़ीक फड़ कहि हमरा बोकियबैत रहैए आ आन-आन अपनाकेँ तरवर कहि मोजरे नेदइए।” लतामक नजरिसँ बूझि पड़ल जे तामसे जरल जाइए मुदा बीचमे हमरा देखि अपन मुँह बने केने छल। ओना तरे-तरे ओकर टीक तामसे ठाढ़ भेल जाइत रहै,मुदा लाजक पछे दरबज्जापर किछु ने बजैत रहए। कोनो कि औझुका दरबज्जा छी, सभ दिनसँ एहेन होइत आबि रहल अछि जे कोनो दरबज्जापर अमृत-पान भेटैए तँ कोनोपर विष-पान। मुदा अमृत-विषक सीमेपर ने नेबो सेहो ठाढ़ अछि। ऑंखि उठा लतामपर देलिऐ तँ बूझि पड़ल जे किछु बाजए चाहैए। आँखिक टुसकी देलिऐ। टुसकी पबिते बमछैत नेबोकेँ कहलक- “तखनिसँ तोरा देखै छियौ जे बड़े फट-फट बजै छेँ जे हमरा मोजरे ने दइए।” लतामक बातकेँ बिच्चेमे रोकि, जहिना एक सेना दोसर सेनाकेँ अकास-पताल धरिक सभ रस्ताकेँ रोकि बजैए तहिना नेबो बाजल- “कोन बेजए बात बजलौं जे तोरा एना तामस उठै छह? तोहीं मोजर दइ छह?” लतामक भक्क जेना खुजि गेल रहै तहिना कनी पाछू हटैत नेबोकेँ कहलक- “हम तरूवरक फल छी से ते मोजरे ने अछि आ तूँ ते सहजे झाड़ीक फड़ छिऍं।” ‘झाड़ीक फड़’ सुनि नेबोकेँ मने-मन होइ जे मरि जाएब तँ मरि जाएब मुदा एहेन बातकेँ आगू नइ बढ़ऽ देब। बाजल- “पहिने तूँ अपन अधखड़ुआ बात पुरा करह, पछाति जँ कोनो बात छूटि जाएत तखन हम बजबह।” नेबोक मनमे होइ जे गाछक फल रहनौं लताम देखैमे तँ हमरे जकॉं अछि। साइजक हिसावे एके रंगक छी, मुदा लताम तँ गुदगर होइए, अपने रसगर छी। संगेओकर बीआ मात्र सृष्टिकर्तेटा नहि अमृत वरसक सेहो अछि, तैठाम अपने तँ कनाहे छी। तेतबे किए, ओकरा लोक हबैक कऽ चाहैए आ जँ हमरा हबकत तँसे हेतइ! नेबो सहमि गेल। नेबोकेँ समहल देखि लताम कहलकै- “भाय नेबो, तोरा कि कोनो हम आन बुझै छिअ जे कानमे झड़ पड़ेबह, कहै छहक जे हमरा मोजरे ने अए। हमरे कोन मोजर अछि। जहिना तोहूँ फूलेसँ फड़ैछह तहिना हमहूँ फूलेसँ ने फड़ै छी, तूँ फड़ भेलह हम फल भेलौं सहए ने। आम जकॉं थोड़े मोजरै छी अपना सभ जे मोजर हेतह।” बैसल-बैसल दुनूक बकठॉंइ सुनि किछु फुरबे ने करए। कनी कम कि कनी बेसी कहै तँ दुनू नीके बात। यएह ने होइ जे खटाएल मुहेँ नेबो कनी बेसी खटगरबजइ। दुनूकेँ बीच बँचाउ करैत कहलिऐ- “भाय जेहने लताम भेलह तेहने नेबो भेलह। दुनूक मुहोँ-कान आ रंगो-रूप मिलै छह, तँए ‘आगू बैसब कि पाछू बैसब’ एकरा छोड़ह। दुनू अमृत छिअ, तँएअपन-अपन अमृतत्वक गुणकेँ बुझह।” मुड़ी डोला नेबो मानि गेल जे खाइकाल सभ अगुआएल बनल रहैए हम पछुआएल बनै छी सएह ने, मुदा पहिल कौरमे तँ हमहूँ साझी रहबे करै छी किने। सुनि कऽ मानि तँ दुनू लेलक मुदा बजैसँ परहेज करैत मुहेँ बन्न कऽ लेलक। अपन मन रहए जे किए ने दुनू अपन विचारकेँ अपनेमे समेटि लिअए। मुदा आगूबढ़ि बजैले कियो तैयारे ने अछि! जखनि कि अखने दुनू रक्का-टोकी करै छल! फेर मनमे उठल, तामसे ठोर बन्न केने ने मुँह बन्न छै, मुदा मनमे तँ ओहिना तामस पजरले हेतै…। तँए कनी खोंरना चला दिऐ। खोरियबैत बजलौं- “भाय नेबो-लताम, दुनू भैयारी भेलह मुदा अपन-अपन वंश तँ दुनूक अलग-अलग छह, से पहिने फरिया लाए।” राम दरबारमे जहिना छोट-छोट बानर किछु सुनि एक-दोसरक मुँह ताकऽ लगै छल तहिना लतामो आ नेबोओ एक-दोसरक मुँह ताकऽ लगल। मुहोँ केना नेतकैत, कोनो कि ओकरा टिपनि माए-बाप देने रहइ। बानर जकॉं करहर उखाड़ि माथपर रखैत गेल, डुमैत गेल, भँसियाइत गेलइ...! दुनू दुनूक मुँह तकैत मुदा बजैत कियो ने किछु। फेर दोसर खोरनि चलेलौं- “भाय, घरक चारमे खोंसल टिपनि नइ छह तँ नइ छह, मुदा ई तँ बुझल छह किने जे धरतीपर केना एलौं?” लतामक चुपी देखि नेबोकेँ तामस उठल, बाजल- “हम पनियाह छी मुदा तूँ ते थलियाह छह किने, तखन पहिने तूँ ने बजबह। हमरा ते पानियेँमे घोरि कऽ लोक पीब जाएत मगर तोरा जँ पानि सेने कियो पीतह,तेकरा तूँ बिना कफ-ठेँर, सरदी-बोखार उतारने छोड़बहक, बाजह।” नोवोक बोकिएलो पछाति जेना लतामकेँ सस नइ ससरइ। हिया कऽ देखै तँ बूझि पड़ै जे बोनो-झाड़क नेबो हमरासँ छोट कहॉं अछि। देखै छिऐ जे कनियेँठरिया कऽ गछिया टाभ नेबो तेहेन होइए जे हमरा वंशमे अखनि तक ओहन भेबो ने कएल हेन। लतामक चुप्पी देखि नेबोकेँ बूझि पड़लै जे भरिसक हमर विचारक असरि लतामोकेँ भेल। असरि पाबि नेबोक मनमे भेल जे जखने केकरो आइन-पीड़ा, दुख-बेथाक असरि होइ छै तखने ने ओकर मुँह खुलै छै। तँए आब देखिऐ जे लताम की बजैए। मुदा जेना लतामकेँ किछु फुरबे ने करइ। दुनूमे देखिऐ जे नेबो तँ किछु बजितो अछि मुदा लताम तँ सोलहन्नी गुमकी लाधि देलक। कहलिऐ- “भाय, एना नइ हेतह पहिने ई कहह जे तूँ ऐ धरतीपर केना एलह?” सातो गाछ नेबो एकठाम बैसि अपन परिचए-पात कऽ नेने रहए, तँए सबहक बात सभकेँ बुझल रहइ। सीरक गाछक सिरगर फल दइबला सीरजन फलजहिना लताम तहिना नेबोओ। दुनू अपन बुढ़ाड़ीक रंगमे रमल-रंगल। जिनगीक सभ तीत-मीठक अनुभवी दुनू...। नेबो बाजल- “हमर तीन वंश अछि, बीआसँ गाछ होइ छी, डारिमे कलम लगौलासँ होइ छी आ गाछक सीर कटलासँ सेहो होइ छी। हम अही वंशक सीरक गाछ छी।” नेबोक सुगंध भरल रस पीबिते मन वौआ गेल। मुहसँ खसि पड़ल- “आमकेँ मोजर होइए, तँए कि तोरा फूलक मोजर नइ भेल, से तँ भेबे कएल, तइले अनेरे ने तामसे फटै छह।” ‘अनेरे तामसे फटै छह’ सुनि आकि की, जहॉं मुँह बन भेल कि नेबो झपाटा मारलक- “जहिना आम अपनाकेँ मोजर दइए तहिना हमहूँ अपन फूलकेँ मोजर बुझै छी, ककोड़बो बिआन ओकरो छै जे घोदा घोदे फड़ैए आ हमरो तँ से अछिए।तखन जे आम बढ़ि-चढ़ि कऽ बाजत से मानबै।” अपना ताले-वेताल भेल नेबो। की बजैए नइ बजैए से किछु बुझबे ने करिऐ। एतबे अन्दाज आबए जे रसिया कऽ कसिया गेल अछि। कहलिऐ- “सुनै जाह, एना जे एकहरफी तामस झाड़ै जेबह से नीक नइ हेतह। तँए फुटा-फुटा कऽ बाजह। तोराले हम किए झूठ बाजी।” ‘झूठ किए बाजी’ सुनि नेबोक मन शान्त भेल। मुदा तैयो मन उझैक गेलै। आम दिस इशारा करैत बाजल- “भाय साहैब, हम सीर-वंशक छी, ओ बिनु सीरक अछि। बीआसँ कहियौ आकि ऑंठीसँ से होइए, चाहे कलम लगा कऽ होइए जे दुनू तँ हमरो होइते अछि।मुदा तेसर रंगक जे सीरसँ गाछ होइ छै जे हमरा तँ होइए मुदा आमकेँ से कहॉं होइ छइ?” नेबोक विचारमे तेना बोहिया गेलौं जे बजा गेल- “हँ, से तँ होइते अछि।” शतरंजक सह जकॉं नेबोकेँ सह भेटल। एके-बेर तीन घर टपि बाजल- “आमकेँ हम बिनु सीरक गाछ बुझै छी, तँए ओ बिनु माथक भेल, जखन माथे ने छै तखन ओ समाजक तीत-मीठ केना बुझत।” नेबोक सन-सनीसँ बूझि पड़ए जेना भोजनक सभ विन्यासमे सनाएल हुअए! कहलिऐ- “देखह भाय नेबो, एकटा तोरे फटफटेने तँ नइ ने हएत, लतामोक वंश ने बुझबहक?” मने-मने लताम सेहो अपन वंश-वृक्ष गुनि नेने रहए। अत्मामे बिसवास बनि बसि गेल रहै जे हमरो वंश तीनपुरिया तँ अछिए। जहिना नेबो बीओसँ, डारियोसँआ सीरोसँ वंश सिरजैए तहिना तँ हमरो वंश अछि। आमकेँ छै कि नइ छै से ओ अपन बुझत, तइले हमर छाती किए फटत। डँटैत नेबोकेँ लताम कहलक- “तोरा ढेरीए छौ तइसँ अनका की, ओ अपन बाँहिक बुते कमा खाइए आकि तोरे ढेरीए जीबैए। तइले तोहर छाती किए चहकै छौ?” लतामक बात सुनि बूझि पड़ल जे नेबो किछु बजैले लुसफुसा रहल अछि। एकरा सबहक लपौड़ीमे अपन नहाइयोक बेर उनहि रहल अछि। मुदा एकरासभकेँ छोड़ि नहाइयो-खाइले केना जाएब। दुनू दुनूपर तमसाएल अछि। बीचसँ उठि कऽ चलि जाएब आ जँ कहीं दुनू अपनामे पटका-पटकी करए लगएतखन ते खेनाइयो ने गरगट हएत। तइसँ नीक जे कनी नीक आकि कनी अधला, टटके फरिछौट कऽ दिऐ। टटका फरिछौट बेसी नीक होइतो अछि।कहलिऐ- “दुनू भैयारी सुनह, दुनू गोरे शिवलिंग जकॉं बीचमे आड़ि दऽ दहक जे अपन-अपन दुनूक सीमा भेलह आ ओइ सीमाक भीतर अपन दुनियॉं भेलह।” बिच्चेमे नेबो बाजि उठल- “हमरा दिससँ कोनो इतराज नइ मुदा लतामोसँ से पूछि लियौ।” हाथक इशारा दैत नेबोकेँ कहलिऐ- “भाय नेबो, जखन दुनू गोरेकेँ एक्के ऑंगनक धरतीपर रहि दिवस गुदस करैक छह तखन अनेरे लड़ैत-झगड़ैत किए रहबह, मेले-मिलानसँ किए ने रहबह।” नेबोकेँ जेना अपन जिनगीक किछु कटु अनुभव रहै तहिना मनमे धकमकाइत रहइ। ओना धकमकीक दोसरो कारण रहै जे सीमा कातमे- माने जैठामसँ एकदिस नेबोक बगान रहै आ दोसर दिस लतामक, तैठाम आड़िक कातमे लतामक गाछ नेबो गाछकेँ कोनो कर्म बॉंकी नइ रहऽ देने रहइ- से देखल-भोगल रहबेकरइ। नेबोक मनक गम्भीरता आ लतामक चुप्पी देखि मनमे उठल- नहाइयो-खाइक बेर हूसल जा रहल अछि आ कोनो काज ससरिये ने रहल अछि, अनेरे समएउनहि जाएत...। ओह! अनेरे सभ दम तोड़ै छी। नेबोकेँ कहलिऐ- “नेबो भाय, एना रग्गर केने नइ हेतह, सभकेँ सभपर बिसवास करए पड़तह, तखन ने काल्हि दिन निचेनसँ रहबह।” नेबोक मनक तामस दोसरे रंगक रहइ। जेना होइ जे जखन सभ जाने मारै आ जिनगीए लइ पाछू लगल अछि तखन किए ने हमहूँ मुहेँपर कहिऐ...। नेबो बाजल- “भाय साहैब, अहॉं पुरुख भेलौं आ हम जड़ि भेलौं। अहॉं हमरा जिनगीसँ प्रेम करै छी तँए हमहूँ जिनगी देने छी। मुदा जहॉं-धरि बिसवास करैक बात अछितइमे हम मनुखेपर नइ बिसवास करै छी।” नेबोक बात सुनि मनमे भेल जे जाबे एहेन विचार दुनूक नइ रहत ताबे दुनूकेँ दुनूपर सँ अबिसवास नइ हटतै आ जाबे एक-दोसरपर बिसवास नइ जगतै ताबेनेबोक मन असथिर नइ हेतइ। एकरा के नकारि सकैए जे मिथि-मालिनीक सेवा कएल वन-उपवन झाड़ी-फुलवाड़ीक देश हमर मिथिला छी। जैठाम एक दिसधारक कटानसँ फल-फलहरीक खेती उपैट रहल अछि आ दोसर दिस तइसँ कनियोँ कम गामसँ उपटनिहारक कमी सेहो नइ छन्हि...! सामंजस्य करैत लताम-नेबो दुनूकेँ कहलिऐ- “जे दिन बीत गेल ओ धरतीसँ उड़ि मनाकासमे बसि गेल मुदा काल्हि दिन-ले तँ सभकेँ अपना-अपनी सोचए पड़तह किने?” नेबोक मन जेना समटा कऽ गाढ़ रस बनि गेल होइ तहिना बूझि पड़ल। ओना बूझि पड़ल जे खटरसमे मीठरसक प्रवेश भऽ रहल छै। तैसंग ईहो बूझि पड़ल जेजँ मुहसँ किछु खसि पड़ल तँ नेबो जहिना कटाएलपर छनछना कऽ लगैए तहिना फेर ने कहीं लगि जाए। मुदा जाबे नजरि-नजरिक मिलानी नइ हएत ताबेप्रेमसँ काल्हि दिन चलब तँ कठिन अछिए...। कनडेरीए ऑंखिसँ नेबोओ दिस ताकी आ लतामो दिस। नेबोक मन जेना-जेना शान्त होइत जाइत देखिऐ तेना-तेना लतामक मन संताप दिस बढ़ल जाइत देखिऐ। असथिरसँ जखन नजरि उठा लतामपर देलिऐ किनजरि मीलिते लताम बोम फाड़ि कानए लगल। ठोर बिजका-बिजका तेना ने कानि-कानि अपन बेथा-कथा कहए लगल जे किछु-किछु बुझबो करिऐ आ किछुनहियोँ बुझिऐ। तैबीच नेबोक मुँह बजैले लुसफुसए लगलै। नेबोकेँ लुसफुसाइत बजैक मुँह देखि मनमे खुशी उपकल। खुशी ई उपकल जे भने प्रति-उत्तरमे लतामो किछुबजबे करत, तहूमे कनैए। जँ हँसैत रहैत तँ पहाड़ो तोड़ैक झगड़ा होइत मुदा कननीमे तँ अपनो जान भौर भेल रहै छै। नेबो बाजल- “भाय, जहिना तूँ तहिना तँ हमहूँ छीहे, तखन तूँ कनै किए छह?” मनमे भेल जे भने एक जिनगी जीनिहार दुनू अछि आ दोसर संगजीवी वा सहजीवी जीनिहार सेहो अछिए तँए ओकर दोस्ती बेसी गाढ़ हेतइ। तही बीचहुचकैत-हुचकैत लताम बाजल- “देव, दानव, मानव सब बेपीरित भऽ गेल! रहब केतऽ!” लतामक बात नेबोकेँ जँचल मुदा उत्तर फुराइते ने रहइ। नीक जकॉं बेथाक कथा बुझबे ने करइ। पाछू हटैत नेबो बाजल- “भाय, एना नइ बुझबह, जखन तोरे जकॉं हमहूँ छी तखन केतऽ गड़बड़ छह से फरिछा कऽ बाजह?” लताम बाजल- “भाय, पहिल आफत तँ ई आएल अछि जे कोसी-कमला धारक बाढ़ि जेमहर जाइए तेमहर खाइए, दोसर बसबैबला अपने बहरवास भेल जा रहल अछि तखनतोहीं कहह जे अदौसँ आएल बाप-दादक वंश केना बँचत?” बिच्चेमे नेबो बाजल- “ई सभ ते हमरो भाइए रहल अछि तइले तूँ कनै किए छह? जँ औरुदा लऽ कऽ आएल हएब तँ केकरो मेटेने मेटेबै।” लताम बाजल- “भाय, तूँ ऊपरे- घारे मुँह तकै छह, तइसँ नइ ने काज चलतह।” ‘ऊपरे-घारे’ सुनि नेबोक मन कनी पिनपिनेवो कएल मुदा लगले भेलै जे जखन परिवारोमे रंग-रंगक समस्या अबै छै, तैठाम तँ हम दोसर समाजक भेलौं, भऽसकैए जे ओकर बात नइ बुझल हुअए। बाजल- “भाय, कनी फरिछा कऽ बाजह। नजरि ओमहर नइ जाइए।” लताम बाजल- “जहिना मिथिलांचलक फल लताम छी सेव नहि! मुदा?” लतामक प्रश्न सुनि मन ठमैक गेल। नजरि उठा जखन नेबो दिस देलौं तँ बूझि पड़ल जे भरिसक ओहो अपन जिनगीक रागमे विराग भऽ रहल अछि। नेबो दिससँ नजरि उठा जखन लतामपर देलिऐ तखन बूझि पड़ल जे लतामक धौना जेना टुटि गेल होइ तहिना मुँहक बिजकी देखै छी। मुदा एहनो तँ दुनियॉंमेअछिए जे लोक अपन शीलक गुणे धो-पोछि कऽ चाटि लइए। लताम अपन बेथा ऐ दुआरे ने बजै जे मनुख लग बाजी आ ओ आरो विसविसा कऽ धऽ लिअए। तखन तँ जेहो दू-चारि साल जीबै छी जीबै छी। अनेरे किएपरान गमाएब। मुदा लतामक मन कलैप-कलैप विवेककेँ कहै- “पुश्तैनी फल सभ गुण-सम्पन्न छी, मुदा परदेशी सेव केना हमरा समदिया बौहु जकाँ धकेल कऽ निकालि रहल अछि। संस्कार कहिया अण्डा देत।”¦¦ २ ‘कनी हमरो सुनू’ धुरिया अखाढ़, अदरा नक्षत्र रहितो बर्खाक कोन बात जे झीसीओ-झासीक दरस नै, आ ने मेघमे केतौ मेघेक दरस अछि। ओना बूझि पड़ैए जहिना उनैस सएसरसठि-अरसठि इस्वीक अखाढ़केँ रंग चढ़ि गेल रहै तहिना अहूबेर अछि। मुदा ओहन तँ नहियेँ अछि। सरसठि-अरसठिक जे अखाढ़ रहै ओ ओहन रहै जइमे पानि पड़ा कऽ पताल चलि गेल, जइसँ तीन साल बरखे ने भेल! तहिना माघक जाड़ जिद्द धऽ कऽ जेरहबो कएल तँ ओकरो कोनो दशा बॉंकी नहियेँ रहलै। माने ई जे सिरक-सलगी अलगनीए आ ऊनी कपड़ा सभ बक्शे-बुक्सी धेने रहि गेल। ऐबेरक धुरिया अखाढ़ हथियामे जे पानि पीलक ओ अखनि तक पियासले अछि। एकर माने ईहो नइ जेना पौरुकॉं चैतो बरिसल, बैशाखो बरिसल, जेठोबरिसल आ सप्ताह भरिक रौद भेने रस्ता-पेरामे धुरा सेहो उड़ऽ लगल। वृद्धा पेन्शनक फारम भरऽ ब्लौकपर जाएब। गामसँ डेढ़े कोसपर ब्लौक रहने गाड़ी-सवारीक खगतो नहियेँ अछि तँए पएरे जाएब। अहॉं कहब जे कोनोसमान कीनऽ जे लोक गामोक दोकान जाइए तैयो साइकिलपर चढ़ि कऽ जाइए आ अहॉं एक तँ ब्लौक जाएब जैठाम हाकिम-हुक्काम रहै छथि, गमैया रस्ताटपि धुराएल बगए-बानि लऽ कऽ केना जाएब। आ दोसर डेढ़ कोस पाँचो किलोमीटरसँ बेसीए भेल तेतौ जे पएरे आएब-जाएब तखन गाड़ी-सवारीक खगते कीरहल। मुदा एहेन शुरूहेसँ अभ्यास रहल। जखन मध्यमामे पढ़ैत रही, गामसँ अढ़ाइ कोस विद्यालय रहए, तखन पएरे सभ दिन आबी-जाय, आ...। एक तँ ओहुनादेखै छी जे आमक जे ऑंठी होइए, शुरूमे कोइली रहैए, कोइलियोमे खिच्चा कोइली, चिड़ैक गेल्ह जकॉं, जे जुआइत-सकताइत मजगूत ऑंठी बनि जाइए। तहिना विद्यार्थी जीवनमे जे पएरे चलैक अभ्यास बनल ओ अखनो अछिए। ऐसँ मनो खुशी रहैए जे अपने हाथे-पएरे अपन काज चला लइ छी। ओना, जहिनाभगवान सभकेँ करैले हाथ, सोचै-विचारैले बुधि, खाइ-पीबै आ बजै-भुकैले मुँह दइ छथिन तहिना तँ चलैयोले पएर देनइ छथि। ब्लौकक काज सबेर-सकाल भऽ गेल, माने दस-सवा दस बजे काज भऽ गेल। बजारक कोनो दोसर काज रहए नइ तँए साढ़े दसे बजे करीब ब्लौकक हाताछोड़ि घरमुहॉं भऽ पौने बारह बजे घरपर आपस आबि गेल रही। ओना जेबेकाल नहा नेने रही मुदा रौदो आ रस्तोक झमारसँ मनो तबधि गेल आ पियासोलगिये गेल रहए। रौदाएलमे पानि पीब नीक नहि तँए पानिक तरासकेँ दाबि देलौं। खाइयो बेर भाइए गेल, मुदा तबधलमे अन्नो रूचिगर नहियेँ जकॉं लगै छै,तहूमे पियासक जोर अछि, जँ कहीं पानियेँ बेसी पिया गेल तखन तँ अन्नक रूचि आरो मरि जाएत। तँए विचार केलौं जे पहिने नहा ली। कोनो कि माघ मासछी, गरमी मास छी। एकबेरक कोन बात जे तीनियोँ बेर नहाएब अधला नहियेँ हएत। संगे देह भीजने पानियोँक तरास कमबे करत। जेते पानिक तरास कमततेते अन्नक तरास बढ़त। तँए नहा लेलौं। नहा कऽ दरबज्जापर अबिते रही आकि अँगनाक ओसारपर पीढ़ियाक अवाज सुनलौं। नीक संजोग देखि मन खुशी भेल। खुशीओ केना ने होइत, संजोगे नेकर्मो जोग, ज्ञानो जोग आ भक्तिओ जोग छी। नीक कर्मक नीक फल आ अधला कर्मक अधला फल सभ दिनसँ होइत आबि रहल अछि, आगूओ होइतरहत। दरबज्जाक ढाठपर भीजल कपड़ा पसारि सोझे ओसारक पीढ़ीपर पहुँच गेलौं। पहुँचिते पत्नी परोसल थारी आगूमे रखि, कनी कात दबि कऽ ठाढ़ भऽ गेली।थारीकेँ निच्चॉं-ऊपर हियासि देखलौं तँ बूझि पड़ल जे जहिना झोराएल तीमन केराक तहिना तड़ुओ केरेक छी! कनी नजरि घुसकेलौं तँ केरेक लटपटतरकारीओ आ सन्नो केरेक देखलौं। फेर कनी नजरि दौगेलौं तँ केरे-खोंइचाक चटनीओं बूझि पड़ल। नीचॉं-ऊपर केराक विन्यास देखि मन झुझुआ गेल। एक तँ जेठोसँ बेसी जुआएल गर्म समए चलि रहल अछि। कॉंच केराक गुण अछि जे पेटक बान्ह करैए।एक तँ ओहिना समैक चपेटमे देहक अन्नो-पानि सुखा जाइए तैपर आरो सुखबैक भोजन तँ प्राण भक्षके भऽ सकैए। ऑंखि उठा पत्नी दिस बढ़ेलौं तँ बूझि पड़लजे एकटा ऑंखिपर साड़ीक छोर पसारने कनडेरीए ऑंखिये अपन प्रशंसो सुनैक खियालसँ आ बाहरसँ कमा कऽ आएल रही सेहो खुशनामा सुनैलेमुस्कुराइत देखि रहली अछि। जखन कि अपने तामसे जरल रही आ ओ[1] चौअनियॉं मुस्की दऽ रहल छेली। मुस्कीओ केना ने दितथि, आने दिन जकॉंपॉंच तरहक विन्याससँ सजल थारी जे पतिक सोझमे रखि खाइत देखती! आखिर पत्नीक सौभाग्य तँ...। ओना दुनू परानीक बीच विचारोमे कमी-बेसी रहने खटपट-लटपट होइते रहैए। मनमे उठैत रहए- गरमक समैमे केराक विन्यास! मुदा पत्नी पाकल केरा आकॉंच केराक गुणक भेदे ने बुझैत। यएह सभ सोचै-विचारैमे कनी हाथ वगा गेल। कनडेरिये ऑंखिये देखैत पत्नी पुछि देली- “हाथ किए वगने छी?” विचित्र स्थितिमे फँसि गेलौं। पत्नी अपने ताले बेताल रहथि जे जहिया कोनो तीमन-तरकारी नहियोँ रहल तहियो मिरचाइयोक पॉंच तरहक विन्यास-फोड़नाएल मिरचाइ, तड़ल मिरचाइ, निमकी मिरचाइ, कॉंच मिरचाइ आ नोन मिलौल कॉंच मिरचाइ- बना थारी सॉंठि अपन पॉंचो विन्यासक संकल्पपुड़बिते रहलौं अछि। जखन विधेमे कोनो विधान नइ रहत तखन पतिक सोझ मुँह निच्चोँ उतारब तँ उचित नहियेँ भेल। ओना हमर कड़ुआएल मन देखि पत्नीओंकेँ मन जेना कड़ुएलनि। की कड़ुएलनि से तँ ओ जानथि मुदा चेहरासँ बूझि पड़ल जे ओ मने-मन धिक्कारि रहल छथि- “ईह! दू सए रूपैआ महिना वृद्धा पेन्शन-ले जे रेठान केने आएल छथि! होइ छन्हि जे बड़का पहाड़ ढाहि कऽ आएल छी। तीन सए रूपैआ महिना चाहकखर्च छन्हि आ दू सए भेट गेने सभ दिन बुढ़ाड़ीमे मुरगी अण्डा आ दूध पीता। करनी अपाहिजक आ भरनी कमासुतक!” विचारणीय बात अछि, जे जँ हमरा हाथे काज नइ हएत, माने हमर हाथक काजे हेरा जाएत, तखन उत्पादन केना हएत। आ जखन उत्पादने ने हएत तखनसमाज आगू ससरत केना। खाली बाजब ‘भाषण’ भेल मुदा काजक संग बाजब ने ‘बाजब’ भेल। अही गुन-धुनमे थारीपर बैसल हाथ वागने रही, तही बीच थारीमे परसल केराक तड़ुआ टोकलक- “हमर वलिदानकेँ अहॉं बूझि नइ पाबि रहल छी, तँए हाथ वागने छी।” पुछलिऐ- “अहॉंक की वलिदान?” जेना केरोकेँ बूझि पड़लै जे एतेटा जिनगीमे कहियो कियो एहेन बात नइ पुछने छल। जखन पुछलक तँ हमहूँ किए ने अपन छाती खोलि उघारि कहिऐ।बाजल- “हमर दिन अदिन भऽ गेल! नइ ते हमहीं जइ गाछ सभकेँ ठाढ़ केलौं सएह बेइज्जत कऽ रहल अछि।” मनमे उठल- मनुखकेँ इज्जत-आवरूक ठेकाने ने छै आ तीमन-तरकारी एहेन बात किए बजैए? पुछलिऐ- “की गाछ सभकेँ ठाढ़ केलहक आ की बेइज्जत कऽ रहलह अछि?” फनैक कऽ झोड़ाएल केरा बाजल- “तोहीं कहह जे फल रहैत तरकारी बनल छी, से उचित भेल?” जेते विचारकेँ सोझरबऽ चाहै छी, तेते रंग-बिरंगक ओझरीए लगि जाइए। तखन? मनकेँ थीर करैत कहलिऐ- “जखन तूँ थारीमे आबि गेल छह, दुनियॉं छुटि रहल छह तखन पहिने तोरे बात सुनि लेब, पछाति खाएब।” हमर बात सुनि थारीएमे गल-गुल हुअ लगल। निच्चासँ झोराएल केरा कहै- पहिने हम अपन दुखनामा बाजब, तँ तड़ुआ कहै- हम ऊपरमे छी, पहिने अपनदुखनामा हम बाजब। मुदा लगले लटपट केरा कहै- हमहूँ तँ ऊपरेमे छी तखन पहिने हम किए ने बाजब। तहिना कातसँ पीसाएल चटनी कहै- हमरासँ मेहीं के छेँ जे पहिने बजमेँ, तँए पहिने हम बजबौ। तँ बगलमे बैसल सन्ना कहै- जहिना छोट दाना भेने मरूआकुअन भेल अछि, तहिना तोहर कोनो मद्दी नइ। देह-हाथ मोटगर-डटगर अछि हम्मर आ बजमेँ तूँ। तोरासँ पहिने हम बाजब। दुनू हाथ उठा ‘शान्त-शान्त’ कहैत-कहैत सभ शान्त भेल। पुछलिऐ- “सभ ते कोनो ने कोनो रूपे केरे भेलह किने?” जेना कोनो झगड़ाक पछाति आकि किछु बजला उत्तर कनी टिफीन करैक मन होइए तहिना सभ केरोकेँ भेल। सभ सबहक मुँह ताकऽ लगल जे के कीबजैए। जखन सभ एके छी तखन जँ फुटा कऽ कोइ अपना-ले बाजत तखन ने कहबै- तूँ स्वार्थी छेँ, लोभी छेँ जे सबहक बात नहि बाजि, अपन बात फुटा कऽबजै छेँ। मुहेँ तका-तकीमे सभ चुप भऽ गेल। अपनो भूखो लगल रहए आ पियासो रहबे करए, ओना पियास तँ तरसाइत तरसा गेल रहए मुदा थारीमे पड़ल वलिवेदीकेँरोकलो तँ नहियेँ जा सकैए। ओ तँ कण्ठे लग अँटैक कऽ गरगट मचा देत। जखन केरा दिससँ कोनो प्रश्न नहि उठल तखन कहलिऐ- “देखह भाय, तूँ सभ एकमुहरी भऽ अपन विचार राखह।” मुहसँ प्रश्न खसिते बीचमे एकटा टभकल- “पहिने ई कहू जे देवस्थानमे चढ़ैबला परसाद थारीक कँचका सन्ना बनल छी, से उचित भेल?” उचित की भेल, अनुचित की भेल ई तँ पछाति बूझल जाएत मुदा एना भेल किए? ऐ प्रश्नमे ओझराएले रही कि आरो प्रश्न मनमे उठि गेल- जेतए मालदह आकिपाकल बम्बै आम आगूक थारीमे रहत तेतए पाकल केराकेँ के पूछत? मुदा आमोकेँ बलउमकी तँ नहियेँ छै। वेचाराक मास-डेढ़ मासक औरुदामे धार जकॉं उजैहिया चढ़ल छै, फेर सालो भरि हेराएल रहत। मुदा केराकेँ तँ से नहिअछि। बारहो मासक औरुदा छै...! किछु फुरबे ने करए जे की जबाव दिऐ। मुदा ओकरा सबहक जे मुँहक रोहणि देखलिऐ तइसँ बूझि पड़ल जे हाथ वागने देखि जनु ओकरो सभकेँ झौंक उठिगेलइ, तँए एना बजैए। कहलिऐ- “भाय, तोँ सभ ते अपने बरहबट्टू भऽ गेल छह, ठौर-ठेकान छहे ने जे कोन मास बच्चा जनमाबी जे माघक जाड़ खेप सकए, सालो भरि कच्चे-बच्चे वृद्धिकरैत रहै छह, जइसँ भरण-पोषणमे कोताही हेबे करतह। अखनि हमहूँ भुखाएल छी, तोरा सभसँ समए लइ छिअ, खेला-पीला पछाति निचेनसँ गप करब।” मुदा से सभ मानि गेल। पत्नीकेँ कहलियनि- “तीमनक रस आ चटनी रहऽ दियौ बॉंकी सभ चीज थारीसँ हटा लिअ। दालि जकॉं झोर आ तरकारी जकॉं चटनी तँ भाइए गेल।” पत्नीक मनमे यकायक जेना कोनो झटका लगलनि तहिना झटैक बजली- “की करितौं, बाड़ीमे जुआएल केरा देखलिऐ, आमक मास एकरा के पुछैत। अपने आम खाएब आकि केरा, तहूमे छोट-छीन घौउरौ नहियेँ छल तँए ओकरेकाटि कऽ आनि तीमन-तरकारी, तरूआ-चटनी सभ किछु बनेलौं।” बजैत-बजैत पत्नीक मन चनकऽ लगलनि। चनकबो केना ने करितनि। एक दिस पतिव्रत धर्मक हनन होइत देखथि तँ दोसर दिस भूखल पतिकेँ थारीपरसँउठैत...। केतए गेल दिन भरिक श्रम, जखन कोनो ओकर उपयोगे नहि! मुदा एना भेल किए से बुझिए ने पाबि रहल छेली। बुझबो केना करितथि। अपनो तँ कहियो मौसमक अनुकूल केराक उपयोग नहियेँ कहने छेलियनि...? ...कहबो केना करितियनि, कोनो कि बुझल छेलए जे एना हएत। एना भऽ आमो कहॉं कहियो फड़ल देखलिऐ। जेना 1962 इस्वीमे फड़ल छल तहिना फड़िगेल। ओना अखनि तक जे थारीमे हाथ वागि तीमन-तरकारीसँ गप करै छेलौं से पत्नी नइ सुनली। नइ सुनैक कारण छेलनि जे मन घुरिया गेल छेलनि जेभरिसक गिरगिट-तिरगिट ने तीमनमे पड़ि गेल छन्हि, आकि मकड़े-तकड़ा ने तड़ुआ संगे तड़ा गेल। मुदा किम्हरो ते एके भाग ने भेल हएत, या तँ तीमनमेगिरगिट पड़ल हएत या तड़ुआमे मकड़ा, तइले बॉंकी विन्यासक की दोख भेल जे हाथ वगने छथि? भूखल-पियासल मनुखकेँ देख केकर मन नइ चहकतै,तहूमे जे परिवारक कर्ता-धर्ता छी। ऑंखिपर सँ साड़ीक कोर सरका पत्नी ओइ अपराधी जकॉं याचना करए लगली जे निर्दोष अछि। बजली- “हमरासँ की कसूर भेल?” यकायक जेना घरक सीकपर सँ कोनो वौस खसने छहोंछित भऽ छिड़िया जाइए तहिना मन छिड़िया गेल। बजलौं- “सचार लागल थारी आगूमे अछि, अहॉंक चूक केतौ ने अछि। अहीं की करितौं, केराकेँ जँ काटि तरकारी बना नइ खा लेब तँ ओकर जिनगी गलिये-पचिये नेजाएत।” जेना हमर बात सुनि पत्नी साँस छोड़लनि। अपना बूझि पड़ल जे कितावक एक पराग्राफ भरिसक पढ़ि लेली तँए किछु विचार छुलकनि अछि। आस्तेसँसहटैत कनी आगू बढ़ि लगमे आबि अपन सुखाएल धारक रूप साजि ऑंखि मिड़मिड़ेली। बूझि पड़ल जे मोती झहरि रहल छन्हि। ओ मोती नोरक छियनिआकि मतिक से तँ ओ जानथि, मुदा अपना बूझि पड़ल जे किछु बुझैक, सुनैक आ जनैक जिज्ञासा मनमे उठि रहल छन्हि। हिया कऽ चारू दिस देखलौं तँ मौसम अनुकूल बूझि पड़ल। अनुकूल ई जे एहेन गर्म समए- जइमे पतालोक पानि थस लऽ लइए, तखन साढ़े तीन हाथकमनुखक हीरकेँ सोंखब तँ अनुकूले अछि, तैठाम ब्लॉटिंग पेपर जकॉं कॉंच केराक विन्यास तँ अनेरे पथसँ कुपथ भेल! किछु फुरबे ने करए। एके वस्तु एकठाम पथक काज करैए तँ दोसरठाम कुपथ भऽ जाइए। पत्नीकेँ कहलियनि- “ओना अखन जँ थारीमे देखाइयो-देखाइयो गुण-अवगुण कहब,से अहॉं थोड़े देखबै। तँए अखनि जे मन मानैए खाए दिअ। खेला-पीला पछातिओछाइनपर दुनू गोरे बतिया लेब।” मुदा तैयो पत्नीक मन झुझुआइते रहलनि। झुझुआइत ई रहलनि जे एते हरानसँ जइ पति-ले सेवा-श्रम केलौं, तैयो जखन हुनका पइठ नइ भेलनि तखन हमरधरम की भेल? पत्नीक मनक चढ़ा-ऊतरी देखि कहलियनि- “अहॉं अनेरे आइन-पीड़ा मनमे अनै छी, जेते थारीमे आन दिन भात सॉंठि कऽ अनै छेलौं, तेते ते अननहि छी किने, से जखन हम सठाइये लेब तखन भूखलकेना रहलौं, तइले अनेरे मन अनोन-विसनोन केने छी।” जेना अखाढ़मे रंग-रंगक बीआ-बाइल नैहरसँ सासुरक आबा-जाही शुरू करैए तहिना पत्नीओंक मनमे विचारक आबा-जाही शुरू भऽ गेलनि। बजली- “अखन जे मन मानैए से खा लिअ। मुदा खेला पछाति बिसरब नइ, बुझा देब। अखन अहॉं संग हमहूँ सभ विन्यास वागि लेब, सएह ने?” हँसैत बजलौं- “हँ तँ सहए नै ते और की।”¦¦ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार व्यंग निबंध मेक इन मिथिला भाग-२ अपना महान मिथिलामे समर्थन खुलल भेटत। नामक साथ। नै जरूरति रहत तैयो भेटत, शुभकमाना आ बधाइ तँ ओकरा संग फ्रीमे छै। ओहो शुद्ध, आसटीक तारजूपर तौलल। मुदा एहन गप्प विरोध लेल नै छै। आन देशमे जँ समर्थन खुलल भेटत तँ विरोध सेहो। मुदा जा हे महान मिथिला------ अपन मिथिलामे विरोध मूँहपर नूआ धऽ कऽ होइत छै। ओका नूआ तँ जनानीक पहिचान थिक मुदा विरोधक कालमे मैथिलकेँ जनानीसँ कम नै बुझू। एकटाउदाहरण लिअ। एकटा फेसबुकिया क्रांतिवीर अपन विरोध केना व्यक्त करै छथि-- "ओकरा सनक लोक मिथिलामे बिहारक एजेंट छै आ मैथिलीमें हिन्दीक। अहाँ जेना 'बिहारी'कें जीयबै छियै, जेना हिन्दीकें जीयबै छियै, जे सभ बनाबटीअछि। कनेक दिन मिथिला-मैथिलीकें जीबिक' देखियौ। एहि सभ ढोंगसँ तत्काल भने किछु वाहवाही भेटि जाएत। मुदा ई समाधान नै छै। बिहार आबिहारीक पक्षमे फोकला तर्क नै चलत। कनेक तैयारी करू एहि विषयक" आब देखू ऐ भाषाकेँ। ई भाषा अपना आपमे दोगला भाषा अछि जे लिखनिहारक मानसिकताकेँ देखार कऽ रहल अछि। ऐ भाषामे केकरो नाम नै छै मने"तेसर पुरुष" के अवधारणा। आ मैथिल तँ ने मर्द होइत छथि ने माउग। ओ तँ बस तेसर "पुरुष" होइ छथि। ने चुप्पे रहता ने खुलि कऽ बजता। ई देखावटीक्रांतिक संग वास्तविक रूपमे खाली इंटरनेटपर भेटता। ई गुण मैथिलक अपन गुण छै। जँ विश्वक आन कोनो ठाम ई गुण भेटऽ तँ बुझू जे ई मिथिलेसँ एक्सपोर्ट कएल गेल छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। योगेन्द्र पाठक "वियोगी" २ टा विहनि कथा १ जमाना जमानाक स्टाइल मोहन बाबू अपना जमाना मे ओवर्सियर छलाह। खूब पाइ कमेलनि। गाम मे जमीन जाल कीनबे केलनि, पटना आदरभंगा मे सेहो नीक टुकड़ी सब कीनलनि। गाम मे पोखरा पाटन घर तs छलनिहे, दरभंगो मे बढ़ियाँ तीन मंजिलाघर बनौलनि जाहि मे नीचा आ उपर भाड़ा रहैत छलनि आ बीचक तल्ला पर अपने रहैत छलाह। मोहन बाबू भागमन्त लोक आ नियोजित परिवार। जेठ पुत्र आ छोट पुत्री। दूनू कें नीक शिक्षा दियौलनि। समय परपुत्री सासुर बसलखिन। पुत्र नेतरहाट सॅं पढ़ि आइआइटी कानपुर सॅं इंजीनयर भेलाह आ दश साल अमेरिका मेविभिन्न कम्पनी मे नौकरी करैत स्वदेश एलाह। हुनकर विचार जे अपनहि व्यवसाय करी आ सेहो दरभंगे मे। एकहिसाबें ई क्रान्तिकारी विचार छलैक जकरा सब स्वागत केलक। मोहन बाबू बेटा कें सलाह देलखिन दरभंगा मे तीन तल्ला मकान अछिए, खाली करबा लिअs आ कोनो दू तल्ला मेऑफिस भैए जाएत। बाकी एक तल्ला मे अपने रहब। हम सब तs आब गामहिं रहब। बेटा छलखिन तs आज्ञाकारी आ बात कटनिहार नहि। तथापि जमाना बदलि गेल छलैक। पुरना डेरा मे जेबा लेलरस्ता बेसी चाकर नहि जे आजुक पैघ कार जा सकए। बात बुझबैत बेटा कहलखिन जे चालीस साल पुरान घरअपने लेल ठीक छल आ अछियो। मुदा हमरा आधुनिक तरीका सॅं रहबाक अछि आ बिजनेस करबाक अछि। हमरविचार अछि जे एहि जमीन कें घर समेत बेचि दियौक, पटना बला जमीन सेहो बेच दियौक आ एनएचक बगल मेएक बीघा जमीन कीन लिअs, से कने हटियो कए हेतैक तs कोनो बात नहि। ओहि एक बीघा मे कोना मकानरहतैक कोना सड़क आ पार्किंग आ कोन तरहक बाग बगीचा लगाएल जेतैक तकर ब्लूप्रिंट हम तैयार केने आएलछी। आ एकटा पैघ नक्शा बापक आगू ओ पसारि देलक। ओवर्सियर मोहन बाबू नक्शा तs बुझिते छलखिन मुदा ओकर विस्तृत विवरण जानि कने कालक लेल चकचोन्हीजरूर लागि गेलनि। दरभंगा मे एहि स्टाइलक घरक कल्पना कियो नहिए केने छल। मोहन बाबू कें ओ तीनतल्लाघर बनेबा मे जे पसेना बहल छलनि तकर स्मरण एला पर ओकरा बेचब की तोरब कोनो तरहें उचित नहि लागिरहल छलनि। बेटा मधुर स्वरें बुझेलखिन “पापा, नवका जमानाक नवका व्यवसायक लेल नव घर चाहबे करी ने।अहीं ने सिखेने रही पुरान घर खसे तखन ने नव घर उठे”। मोहन बाबू निरुत्तर भs गेलाह। २ उचित जगह नन्दू भाइ साधारण गृहस्थ। गाम मे किछु घर जजमनिका। आब सब जजमान दिल्ली पंजाब चल गेलनि तs ओहो जेमास मे गोटेक दिन कतहु पूजा आदि भs जाइत छलैक सेहो बन्द भs गेलनि। सोचलनि आमदनी बढ़बै लेल किछुदोसर काज करी। ब्रह्मस्थान लग एक टुकड़ी गैरमजरुआ जमीन मे एकटा खोपड़ी ठाढ़ केलनि। साँझ कए ओहि मे प्याजू आ तरुआबना कए मुरहीक संग बेचs लगला। चाह सेहो बनाबथि। खोपड़ी रस्ताक कात मे छलैक जाहि बाटें हाट दिन आनोगामक लोकक अबरजात रहैत छलैक। ओहि दिन नीक बिक्री भs जाइत छलनि। बाकी दिन मामूली। मिलाजुलाकए हप्ता मे सौ सवा सौ कमा लैत छलाह। किछु दिनक बाद हुनक सार गाम एलखिन। ओ एकटा आइडिया देलखिन। नन्दू भाइ दोकान उठा कए गामकदोसर कात बैसा लेलनि। हम जखन गाम गेलहुँ तखन ब्रह्मस्थान बला जगह खाली देखि नन्दू भाइ कें पुछलिअनि “दोकान करब छोड़ि देलियैकी?” ओ हमरा बुझेलनि जे जगह बदलि देलियैक। आब नीक बिक्री होइत अछि। उसनल अंडा आ तरल माछसेहो रखैत छी। ओहि जगह पर पाँच सौ रुपैया महिना भाड़ा लगैत अछि मुदा तैयो हप्ता मे हजार बारह सौ कमालैत छी। हमरा बड़ आश्चर्य लागल। हमरा जिज्ञासा कें शान्त करैत ओ बुझा देलनि जे दोकान पसीखानाक बगल मे छैक। आब हम बुझलियैक जेउचित जगह पकड़ा गेलनि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.संजय झा "नागदह" ३.२.ओम प्रकाश ३.३.महेश डखरामी ३.४.गणेश मैथिल संजय झा "नागदह" १ छी कोन अपने जाति विशेष ? ------------------------------- सब सँ पहिने हम मन्नुख छी त'हन कोनो जाति भने मन्नुखक गुण हो वा नहि किन्चिद् नहि परजाति। एक मनुष्य में सब जाति समाहित तखनहि जीवन धन्य एक जाति के मात्र जौं गुण अछि जीवन भ' जाएत शून्य। ब्राम्हण सँ पांडित्यक गुण ली शूद्र सँ सिखु सेवा भाव क्षत्रिय बनि करू निज रक्षा वैश्यक गुण सँ हाट - बाजार। स्वह्रिदय झाँकि क' देखु कोन गुण अछि अपनेक विशेष मोने - मोने अपने सोचि लेब छी कोन अपने जाति विशेष ? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश गजल १ अप्पन गाम बिसरल छी गाछक आम बिसरल छी नित नब खेलमे बाझल माटिक दाम बिसरल छी ठीकेदार हम धर्मक रामक नाम बिसरल छी गाँधी हम उचारै छी हुनकर राम बिसरल छी छाहरि "ओम" बाजल किछु ककरो घाम बिसरल छी २ हमर करेजक जान तिरंगा भारत-भूमिक शान तिरंगा शोषित लोकक आस बनल छै आमजनक अरमान तिरंगा नजरि उठेतै दुश्मन जखने बनत हमर ई बाण तिरंगा मोल मनुक्खक होइत की छै गाबि कहै छै गान तिरंगा राम-रहीमक बातसँ आगू "ओम"क अछि सम्मान तिरंगा मात्राक्रम दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ दू बेर प्रत्येक पाँतिमे। ३ हमर बात कियो बुझलक कहाँ हमर मोन कियो तकलक कहाँ चमकि गेल छलै बिजुरी कतौ हमर अन्हार कियो हरलक कहाँ बात सुनल सभक नमहर सदति हमर छोट कियो सुनलक कहाँ राखि हाथ मे बम आ पिस्तौल हमर नाच कियो नचलक कहाँ ओम जपि हरक नाम सदिखन हमर नाम कियो जपलक कहाँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। महेश डखरामी कविता १ कोनादइन------ ------------------- पीयर ऑचर पीयर पात , पियरे वसन तन पीत गात । पित्ते आमिल प्रतिपद प्रपंच, ठामे मुश्की मन संच मंच । मोनक मान ककरा कहबै , कान तूर हम चुप्पे रहबै । बाटे बाट लागल टाट , घर बेसाहक देखू ठाठ । जेब नै ढौउआ बातक काट , बाहर फुटानी बापे खाट । मोनक मान ककरा कहबै , कान तूर हम चुप्पे रहबै । -------------------- २ --महेश मञ्जरी ------ --------------------- ☆ कारी बादर घन अम्बर पसरल, पवन गमन बरजोर । पुहुप सर मन उर वेधन , दर्शन मन विभोर । ☆ आध नयन पुनि आधे आनन , आधे लोचन लाज । आधे ऑचर कमलमुख झाँपल , आधे पुष्पक साज । ☆ आधे चानक पुनि पुनि दर्शन , उदिप्त ताप तरंग । दामिनि दमकि उर दल अर्पण , ललना ललित लवंग । ☆ भाव भुजंग सिर ऊपर धारण , कण्ठे सुकपिक वास । युगल कदलि पर केहरि नाचय , दर्शन समन पियास । ☆ राधा माधव छवि अनादि अनूपा, दास चरण अनुराग । कृपा दयानिधि दर्शन पुनि पुनि , जागल महेशक भाग । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गणेश मैथिल १ हे ! हे!! हे!!! एहन की पाप करै छी जीबते जी बेटा बेचै छी दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! पुतहुओ चाही लिखल-पढल ताहु पर छी कैंचा लेल अड़ल दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! जँ अपन कमाइ सँ नहि घर बनल त की बेटा बेच पीटब कोठा ?? दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! यौ महाशय एक गप कहु की आहाँक बेटा घी मे नहाएल हमर बेटी पानिए पर पोशल ?? दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! यौ जँ हमरा बेटीक लेल चाही वर त अहूँ बेटाक लेल चाही कनिञां तोड़ि विधाताक बनाएल विधी बेटा बेच किएक बनै छी बनियां ?? दुर...छीं ! छीं !! छीं !!! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 2 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८७ म अंक ०१ अक्टूबर २०१५ (वर्ष ८ मास ९४ अंक १८७) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA