33 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८८ म अंक १५ अक्टूबर २०१५ (वर्ष ८ मास ९४ अंक १८८) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.उमेश मण्डल रिपोर्ट- सगर राति दीप जरल २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघु कथा- जाम २.३.विन्देश्वर ठाकुर- बेलहाबालीके जितिया (विहनि कथा) २.४.अब्दुर रज्जाक- गामक चौबटिया पर/ रौदी परल अछि ३. पद्य ३.१.संतोष कुमार झा- सिक्की शिल्प-कला ३.२.प्रणव झा- अकांड तांडव ३.३.संजय कुमार झा "नागदह"- खैर, छोड़ू/ भेटल ? ३.४.१.सुकोसुत शिशिर- मोन विकल २,आशीष अनचिन्हार- गजल ४.बालानां कृते-प्रणव झा- बोर्ड परीक्षा (बाल कविता) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह) लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश) क मैथिली अनुवाद लेल। Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.उमेश मण्डल रिपोर्ट- सगर राति दीप जरल २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघु कथा- जाम २.३.विन्देश्वर ठाकुर- बेलहाबालीके जितिया (विहनि कथा) २.४.अब्दुर रज्जाक- गामक चौबटिया पर/ रौदी परल अछि उमेश मण्डल रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल ‘कथा गंगा’मे सगर राति दीप जरल- ‘सगर राति दीप जरय’ एक ओहन मंचक नाओं छी, जइ मंचपर सभ वर्गक साहित्यकार भाग लइ छथि, जाइ-अबै छथि तथा भाषा-साहित्यक विकासक लेल विचार-विमर्श करै छथि। तँए ई ‘सगर राति दीप जरय’ मैथिली भाषा-साहित्यक सभसँ श्रेष्ठ मंच कहबैत अछि। एकर आयोजन जगह-जगह प्राय: तीन मासक अन्तरालपर १९९० ई.सँ होइत आबि रहल अछि। ८५म गोष्ठी श्री ओम प्रकाश झाक संयोजकत्व आ मिथिला परिषद केर प्रस्तुतिमे भागलपुरक द्वारिकापुरी स्थित ‘श्याम कुंज’मे आयोजित भेल जेकर उद्धघाटन वरिष्ठ समालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंह, ‘विदेह’ एवं टैगोर सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल,तिलकामाझी विश्वविद्यालयक मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ. केष्कर ठाकुर, डॉ. शिव प्रसाद यादव एवं अवकाश प्राप्त शिक्षक दुखमोचन झा संयुक्त रूपे दीप नेसि केलनि। पछाति एक विशिष्ठ अध्यक्ष मण्डल एवं संचालन समितिक निर्माण करि गोसाउनिक गीत, स्वागत गान एवं स्वस्ति वाचनसँ साँझक छह बजे गोष्ठीक शुभारम्भ भेल, रातिक १२:३० बजे घण्टा भरिक भोजनावकाश भेल, जइ शुन्यकालमे, भोजनक पछाति, संयोजक- सह गजलकार ओम प्रकाशजी अपन नव रचित दूटा गजल सुना कथाकार सभ साहित्यकार-साहित्य प्रेमीकेँ साहित्य-रसमे बोरि देलनि। पुन: कथा पाठ आ समीक्षाक क्रमकेँ आगू बढ़ौल गेल। जे चलैत-चलैत भिनसर छह बजेमे आबि अध्यक्षीय उद्बोधनक संग संयोजकक धन्यवाद ज्ञापन तथा दीप-पंजीक हस्तांतरणक पछाति इति भेल। ऐ गोष्ठीमे दूर-दूरसँ आएल साहित्यकार-कथाकार-समीक्षक एवं श्रोताक तथा स्थानीय साहित्यकार-कथाकारक संग कथा प्रेमीक बेस जमघट ताधरि बनल रहल जाधरि अगिला गोष्ठीक निर्णयक संग आयोजित गोष्ठीक समापनक घोषणा नहि कएल गेल। ८६म आयोजन मधुबनी जिला अन्तर्गत फुलपरास प्रखण्डक महिन्दवार पंचायतक ‘लकसेना’ गाममे होएत, जइमे पहुँचैक हकार दैत भावी संयोजक श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’जी कहलनि- ‘अधिक-सँ-अधिक कथाकार-साहित्यकार-समीक्षक सभकेँ लकसेना गामक ८६म कथा गोष्ठीमे सुआगत छन्हि।’ ८५म गोष्ठीक अध्यक्ष मण्डल, संचालन समिति, कथायात्राक मादे दू शब्द, पोथी लोकार्पण, कथा पाठ एवं समीक्षा-टिप्पणीक विवरण निच्चाँमे देल जा रहल अछि- अध्यक्ष मण्डल- डॉ. प्रेम शंकर सिंह, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, डॉ. केष्कर ठाकुर, श्री विवेकानन्द झा ‘बीनू’ श्री राजदेव मण्डल, श्री श्यामानन्द चौधरी। संचालन समिति- श्री दुगानन्द मण्डल, श्री पंकज कुमार झा एवं उमेश मण्डल। कथायात्राक मादे दू शब्द- प्रो. केष्कर ठाकुर, पो. प्रेम शंकर सिंह, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री विवेकानन्द झा ‘बीनू’ गोसाउनिक गीत- श्रीमती निक्की प्रियदर्शनी आ स्वीटी कुमारी। स्वस्ति वाचन- श्री शिव कुमार मिश्र। पोथी लोकापर्ण- अपन मन अपन धन (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक उकड़ू समय (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक लोकार्पण कर्ता- डॉ. केष्कर ठाकुर डा. प्रेम शंकर सिंह पहिल सत्रमे कथा पाठ- (१) लगक दूरी- निक्की प्रियदर्शनी (२) गहींर आँखिक बेथा- ओम प्रकाश झा (३) डोमक आगि- रामविलास साहु (४) शिवनाथ कक्काक डायरी- अखिलेश मण्डल। समीक्षा-टिप्पणी, पहिल सत्रक- डॉ. शिव कुमार प्रसाद, उमेश मण्डल, डॉ. शिव प्रसाद यादव एवं श्री नन्द विलास राय। दोसर सत्रमे कथा पाठ- (५) हमर बाइनिक विचार- जगदीश प्रसाद मण्डल (६) प्राश्चित- गौड़ी शंकर साह (७) मजाकेमे चलि गेलौं- लक्ष्मी दास। समीक्षा- श्री राम सेवक सिंह, प्रो. केष्कर ठाकुर, श्री श्यामानान्द चौधरी, डॉ. प्रमोद पाण्डेय। तेसर सत्रमे कथा पाठ- (८) जीन्स पेन्ट- नन्द विलास राय (९) लाल नुआँ- शम्भु सौरभ (१०) धोइते-धोइते भगवान बना देबइ- उमेश मण्डल (११) धर्म आ धार्मिक- दुख मोचन झा समीक्षा- श्री ओम प्रकाश झा, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, डा. शिव प्रसाद यादव, श्री राजदवे मण्डल। चारिम सत्रमे कथा पाठ- (१२) अनमेल बिआह- शिव प्रसाद यादव (१३) मुरझाएल फूल- कपिलेश्वर राउत (१४) पुत्रक कर्तव्य- नारायण झा (१५) भूख- पंकज कुमार झा (१६) बेसी भऽ गेल आब नहि- हेम नारयण साहु। समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री विनोदानन्द झा ‘बीनू’, डॉ. शिव कुमार प्रसाद। पाँचिम सत्रमे कथा पाठ- (१७) भीखमंगा- प्रकाश कुमार झा (१८) भोला- ललन कुमार कामत (१९) विधवा बिआह- बेचन ठाकुर (२०) होटलमे पुकार- दुखन प्रसाद यादव (२१) चोंचाक खोंता- उमेश नारायण कर्ण समीक्षा- श्री श्यामानन्द चौधरी, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, राजदेव मण्डल ‘रमण’ छठिम सत्रमे कथा पाठ- (२२) अपन घर- राजदेव मण्डल (२३) चीफ गेष्ट- शिव कुमार मिश्र (२४) मायाक तागत- राजदेव मण्डल ‘रमण’ (२५) आमक ठाढ़ि- शिव कुमार प्रसाद (२६) हेराएल कोदारि- शिव कुमार प्रसाद (२७) डिजाइनवाली कनियाँ- शारदा नन्द सिंह समीक्षा- उमेश मण्डल, नन्द विलास राय, श्यामानन्द चौधरी एवं हेम नारायण साहु। ८४म सगर राति दीप जरय २० दिसम्बरक साँझमे शुरू भ' २१ दिसम्बर २०१४क भिनसरमे सम्पन्न भेल। ८५म आयोजन भागलपुरमे श्री ओम प्रकाश झा केर संयोजकत्वमे मार्च २०१५क अन्तिम शनिकेँ होएत। ई निर्णए अध्यक्ष मण्डल एवं संचालन समिति तथा गोष्ठीमे उपस्थित सबहक विचारसँ भेल। ओना प्रस्ताव श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’ जीक सेहो रहनि जे लकसेना (मधुबनी)मे हुअए। मुदा सर्वसम्मति भागलपुरेक रहल। अत: दीप आ पंजी वर्तमान गोष्ठीक संयोजक भावी संयोजककेँ देलखिन। संचालन समितिमे दुर्गानन्द मण्डल, ओम प्रकाश झा तथा उमेश मण्डल छला आ अध्यक्ष मण्डलमे शिव कुमार प्रसाद, श्यामानन्द चौधरी तथा सच्चिदानन्द ‘सचिद’। मो. गुल हसन एवं फिरोज आलम स्वागत गीत गौलनि, एवं स्वतीवाचन शिवकुमार मिश्र। तीन सत्रमे निम्न कार्यक्रमानुसार ऐ गोष्ठीक भरि रातिक यात्रा भेल- उद्घाटन सत्र- परिचए-पात तथा दू शब्द- उद्घाटनकर्ता- श्यामानन्द चौधरी जगदीश प्रसाद मण्डल पं. सच्चिदानन्द मिश्र ‘सचिद’ मिहिर झा महादेव ओम प्रकाश झा शिव कुमार प्रसाद राजदेव मण्डल ‘रमण’ पोथी लोकार्पण सत्र- (१) डीहक जमीन (विहनि/लघु कथा संग्रह) ओम प्रकाश झाजी केर लोकार्पणकर्ता- जगदीश प्रसाद मण्डल, उमेश नारायण कर्ण, राम विलास साहु। (२) समरथाइक भूत (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा सच्चिदानन्द ‘सचिद’ शम्भु सौरभ (३) गामक शकल-सूरत (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- श्यामानन्द चौधरी अनुप कुमार कश्यप राजदेव मण्डल ‘रमण’ उमेश नारायण कर्ण (४) अप्पन-बीरान (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- बेचन ठाकुर फागुलाल साहु मिहिर झा महादेव रामाकान्त मिश्र (५) बाल-गोपाल (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- संजय कुमार मण्डल सूर्य नारायण कामत (सूरज कामत) शम्भु सौरभ शिव कुमार प्रसाद (६) लजबिजी (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- बमभोली झा दुर्गानन्द मण्डल शिव कुमार प्रसाद गांधी प्रसाद (सरपंच) (७) पतझाड़ (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा श्यामानन्द चौधरी राम विलास साहु नन्द विलास राय (८) रटनी खढ़ (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- अरविन्द चौधरी अनुप कुमार कश्यप कपिलेश्वर राउत मो. गुल हसन (९) शिव दर्शन (पद्य) पं. सच्चिदानन्द मिश्र लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा शम्भु सौरभ शिव कुमार प्रसाद कपिलेश्वर राउत (१०) अभिलाषा (मैथिली भजनमाला) पं. सच्चिदानन्द मिश्र लोकार्पणकर्ता- श्यामानन्द चौधरी बेचन ठाकुर (सरिसव पाही) (११) सीडी लोकार्पण- (१) मैथिली गजल: आगमन ओ प्रस्थान बिंदु (आलोचना संकलन) सं.सं- गजेन्द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्हारजी केर (२) सखुआवाली (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्डलक (३) निर्मल सनेस (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्डलक (४) देवघरक प्रसाद (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्डलक (५) कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा- (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- विदेह- सम्मिलित रूपे लोकार्पण- जगदीश प्रसाद मण्डल शिव कुमार प्रसाद ओम प्रकाश झा राजदेव मण्डल ‘रमण’ कपिलेश्वर राउत। कथा सत्र- कथा पाठ एवं समीक्षा- पहिल पालीमे- लोकतंत्रक माने- ओम प्रकाश झा- टेटरा हीरा- नन्द विलास राय- समीक्षा- श्यामानन्द चौधरी फागुलाल साह शिव कुमार प्रसाद अनुप कुमार कश्यप। दोसर पाली- पवित्र पापी- उमेश नारायण कर्ण- जाति-पाति- दुर्गानन्द मण्डल समीक्षा- राम विलास साहु राजदेव मण्डल ‘रमण’ संयज कुमार मण्डल मिहिर झा महादेव तेसर पाली- एकर उत्तरदायी के?- शम्भु सौरभ कमतिया हवेली- राम विलास साहु समीक्षा- उमेश मण्डल फागुलाल साहु सच्चिदा नन्द झा ‘सचिद’ बेचन ठाकुर (नाटकार) चारिम पाली- खेती-वाड़ी- बेचन ठाकुर डीहक जमीन- ओम प्रकाश झा समीक्षा- शिव कुमार प्रसाद मिहिर कुमार झा बमभोली झा शम्भु सौरभ पाँचिम पाली- बिआह- गौड़ी शंकर साह इन्फेक्शन- फागुलाल साहु समीक्षा- कपिलेश्वर राउत राम विलास साहु शशिकान्त झा उमेश नारायण कर्ण छठिम पाली- पाँच भूत- उमेश नारायण कर्ण जरि गेल माइक आस- विपिन कुमार कर्ण समीक्षा- कपिलेश्वर राउत नन्द विलास राय ओम प्रकाश झा अनुप कुमार कश्यप सातिम पाली- शिव विद्यापति- सच्चिदानन्द ‘सचिद’ भरम- लक्ष्मी दास कलयुगक निर्णए- कपिलेश्वर राउत समीक्षा- शम्भु सौरभ जगदीश प्रसाद मण्डल श्यामानन्द चौधरी। अंतमे अध्यक्षीय भाषण तथा धन्यवाद ज्ञापन। समाद- उमेश मण्डल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल लघु कथा- 'जाम' छह मास पूर्व गुणेसर काका महाविद्यालसँ सेवा-निवृत भेला पछाति थैली नेने आबि जेठ बेटाकेँ फोनसँ कहलखिन- “बौआ, महाविद्यालयसँ छुट्टी पाबि गेलौं, जे धएल-धरल छल सभ आनि लेलौं। अपना-ले पेन्शन राखब बॉंकी दुनू भॉंइ आबि कऽ अपन लऽ लिअ।” पिताक विचार सुनि सुधीर बाजल- “बाबू, अहाँ हमरा इंजीनियर बनेलौं, तइ कर्जक अदायगी अहॉंकेँ तखन ने हएत जखन हमहूँ इंजीनियर पोता सोझहामे ठाढ़ कऽ देब। एक तँ ओहिना अहॉंक कर्ज ऊपरमे लादल अछि तैपर सँ धएल-उसारल सेहो हमहीं लेब, ई मन नइ मानैए। अहॉंक कमाइ छी जे मन फुरए से अपन करू।” जेठ बेटाक उत्तर सुनि गुणेसर काका अवाक् भऽ गेला। फेर मनमे भेलनि जे छोटको बेटासँ किए ने पुछि लिऐ। नम्बर लगा मोबाइलसँ कहलखिन- “बौआ, जिनगी भरिक जे धएल-उसारल छल से थैली आनि लेलौं। अहॉं दुनू भॉंइ अपन लऽ लिअ।” इंजीनियर रणधीर जबाव देलकनि- “बाबू, हमरा लिए जहिना अहॉं तहिना भैया छथि, तँए दुनू गोरे पहिने विचारि लिअ। हम मानि लेब।” रणधीरक उत्तर सुनि गुणेसर कक्काक मनमे पिनपिनी जगलनि। पिनपिनाइत बुदबुदेला- “सभ देह छीपैए। हमरा बुते एते रूपैआ राखल हएत। घरमे राखब, चोर चोरा लेत। बैंकमे हिसावे-वाड़ी गड़बड़ाइत रहत। के अनेरे भरि बुढ़ाड़ी पाइयेक मगजमारीमे लागल रहत।” मन दुनू बेटापर गेलनि। अपन कएल कृत्य आगूमे अबिते मन कलशि गेलनि। कलशि ई गेलनि जे अपने जे कमेलौं, तहीसँ परिवारकेँ ने ठाढ़ रखलौं। दूटा बेटा दुनू इंजीनियर। अपने सभ दिन समाजक बीच गाममे रहलौं, अखनो छी। कहियो केकरोसँ मुहॉं-ठुठी नइ भेल। यएह ने जे बुढ़ाड़ी केना खेपब। बुढ़ाड़ी तँ मन रोग छी। जिनगी जहिना खेपैत एलौं हेन, तहिना खेपैक ओरियान बात करैत रहब, बुढ़ाड़ीकेँ ठेलैत रहब...। गुणेसर काका संस्कृत महाविद्यालयसँ आचार्य केला पछाति गामसँ तीन कोस हटल संस्कृत महाविद्यालयक नोकरीसँ जिनगी शुरू केलनि। ताधरि माइयो-बाबू जीविते रहनि। पनरह-बीस बर्खक पछाति मुइलनि। चारि बीघा अपन जोतत संग चारि बीघा बटाइयो खेती पिता करैत आबि रहल छेलखिन। जे हुनका परोछ भेला पछाति गुणेसर काका ओइ खेतकेँ आपस करैत अपनो खेत बटाइ लगा लेलनि। पढ़ै-लिखै दिस रूचि बेसी रहने दुनू बेटाकेँ इंजीनियरिंग तकक शिक्षा दियौलखिन। आइ दुनू बेटा एकटा सरकारी दोसर प्राइवेट नोकरी पाबि जीवन-बसर कऽ रहल छन्हि। दुनू बेटाकेँ जहिना दरमाहा तहिना उलफीओ आमदनी आ जहिना नियमित ड्यूटी तहिना उलफी ड्यूटीओ। काजक बोझक संग आमदनीओंक बोझ तर दुनू दबले। तँए विचारमे फुहरपन। जही महाविद्यालयमे गुणेसर काका पढ़लनि तही महाविद्यालयमे नोकरीओ भेलनि। ओना जखन गुणेसर काका गामेक स्कूलमे पढ़ैत रहथि तखन गाछक पात जकॉं पढ़ैइयो-लिखै दिस विचार डोलबे करैत रहनि। जहिना पात डोलबो बुझैत आ असथिरो रहब, मुदा तँए कि जइ गाछक छी ओ गाछोकेँ ई बात बुझैमे थोड़े अबै छै। एबो केना करतै, पात जकॉं गाछ थोड़े असथिरो रहैए आ डोलबो करैए। ओ तँ शील-गुणसँ भरल अछि, तँए पात जकॉं डोलबे किए करत। आने बाल-बोध जकॉं गुणेसरो कक्काक मन उमड़ि जान्हि, हमहूँ डाक्टर बनब। तँ कहियो नाटक मण्डलीक कलाकारकेँ देख कलाकार बनैले। तहिना आनो-आन चढ़ल-बढ़ल-ले। मुदा से सभ गुणेसर काकाकेँ हाथ नहि लगलनि। साधारण जिनगी जीनीहार पिता गामक स्कूल पास केला पछाति मुँह फोड़ि गुणेसर काकाकेँ कहलकनि- “जेतए तूँ पढ़ऽ चाहह, स्वेच्छासँ पढ़ि सकै छह मुदा अपन परिवारोक ऑंट-पेट देख लहक। पॉंच बर्खक बीच एक-दूटा रौदी आ नइ तँ एक-दूटा दाही होइते अछि, तेकरे पुरबैत-पुरबैत बेदम रहै छी। गामपर सँ जँ आबि-जा कऽ पढ़बह, तेते सम्हरि सकै छह।” मिडिल स्कूलसँ निकलल गुणेसर कक्काक मनमे यएह उजैहिया उठल जे आगूओ नाओं लिखा कऽ पढ़ब। गामसँ तीन कोस हटल संस्कृत विद्यालय, महाविद्यालय। संयोग बैसि गेलनि। गुणेसर काका संस्कृत विद्यालयमे दाखिल भऽ गेला। परिवारसँ लऽ कऽ विद्यालय, महाविद्यालय तक सात्विकतासँ भरल। जेहने किसान परिवार तेहने शिक्षण संस्थान। लिखै-पढ़ैक सामग्रीक अतिरिक्त मात्र देहक वस्त्र आ पेटक भोजन दैत गुणेसर काका एके गतियो शिष्य-गुरु होइत गुरु-शिष्य बनि जिनगी जीबए लगला। ताधरि कोनो व्यसन औझुका पढ़ुआ जकॉं नहि। मुदा विद्यालयो-महाविद्यालयमे तमाकुल आ भॉंगक चलनि देखथि। परिवारोमे पिता सॉंझे-साँझ देहक थकान भगबैले भॉंगक गोली खाइ छेलनि। संगे तमाकुलो खाइत रहथिन। ओना दुनू बाड़ी-झाड़ीक उपजा छी, तँए समस्यो नहियेँ। मास दिन तक गुणेसर काका गुन-धुनमे पड़ल रहि गेला मुदा ई नइ सोचि पेला जे ऐ थैलीकेँ की करब। अपना बेटी नहि तँए बेटी बिआहक खर्च नइ बुझल रहनि। समाजोक बेटी बिआहक काजमे कहियो अगुआइ नै केने जे तहूसँ बुझल रहितनि। घर बेटे बना नेने छेलनि। खेतोक उपजा ओते भाइए जाइ छेलनि जइसँ अन्न-पानिक कहियो असुविधा नहि भेलनि। कपड़ा-लत्ताक खर्च सेहो नापल-जोखल रहनि। माने एकदम समटल। स्पष्ट सोच रहनि जे जैठाम एको वस्त्रसँ काज चलि सकैए तैठाम गाहीक-गाही आकि दर्जनक-दर्जन वस्त्रक कोन खगता। अनेरे पाइकेँ दुरुपयोग करब भेल। देखा-देखी पत्नीओं तहिना रहनि। तैपर सँ दुनू बेटो आ दुनू पुतोहुओ अपना-अपनी हथियबैले सेहो सभ मौसमक सभ कपड़ा ओते दाइए दइ छन्हि जे देख-देख दुनू परानीक मनमे सवुर बनले रहै छन्हि जे ऐ जनमसँ ओइ जनम धरि केतबो धाङ्गि कऽ पहिरब तैयो ने फटत-सठत। अखन धरि पाइक जानकारी तेना भऽ कऽ गुणेसर काका पत्नीकेँ नहि कहलखिन जे अढ़ाइ लाख टाका पछिला धएल-धरल भेटल। एतबे कहने रहथिन जे नोकरी छूटि गेल मुदा जाबे जीब ताबे दरमाहा भेटैत रहत। जइपर पत्नी अह्लादित होइत कहलखिन- “भरि दिन बोनाएल रहै छी, कखनो एतबो सोचै छिऐ जे जेकर हाथ पकड़ि घरमे रखने छी, तेकरा की भेल।” फुलतीक बात गुणेसर काका बूझि गेला मुदा मन तँ थैलीमे घुरियाएल रहनि। उतारा देलखिन- “अहींले भरि दिन रने-बने वौआइ छी आ तैपर सँ अहीं उपरागो दइ छी। ” पतिक बात सुनि फुलतीक मन फुला गेलनि। भकरार फूलक पत्ती जकॉं ऑंखि निराड़ि सूरमाक सुगंधसँ अरियातैत ऑंखि पतिक पावन वनमे अँटैक गेलनि जइसँ मुँहक बोली ठमैक गेलनि। जेकर लाभ गुणेसर काका उठौलनि। लाभ ई उठौलनि जे भने बक्-झकसँ नीक जे अपन काजक बात विचारब। मुदा से भेलनि नहि। आगूसँ पत्नीक नजरि तेना नजरिमे गड़ल रहनि जे अजगर सॉंप जकॉं नजरि काते ने हुअए देलकनि। मनमे उठलनि- पत्नीकेँ किए ने पूछि लियनि जे पाइकेँ की करब। अखन तँ नजरिक सोझ वएह छथि। फेर भेलनि जे पाइक काज अपना हाथे ओ कहियो केलनि कहॉं। दोकानक काज, बजारक काज, तीर्थो-बीर्थक काज, सभ दिन तँ सभठाम अपने हाथे केलौं। कहियो एको पाइ छुलनि कहॉं, तखन हुनका केना कहबनि जे पाइकेँ की करब? संयोग भेल ओही रस्ते हमहूँ जाइत रही, जखन हुनका घरक सोझे गेलौं कि मन पड़ल जे गुणेसर काका सेवा निवृति भऽ गाम आबि गेला,तँए भेँट कऽ लियनि। रस्ता छोड़ि दरबज्जा दिस बढ़लौं कि देखलियनि जे दुनू बेकती ऑंगनमे किछु विचारि रहल छथि। मनमे भेल से नइ तँ कनी विलमि जाइ। मुदा से भेल नहि। डराएल खढ़िया जकाँ गुणेसर काका चारू दिस सेहो चौकन्ना होइत रहथि। ओना हम ऑंखिक सूत निच्चा उतारि नेने रही,तैयो अँगनेसँ देख लेलनि। बजला- “आबह-आबह बौआ जोगू आब ते तोरा सबहक बीच एलौं, तोहीं सभ ने खोजो-खबरि लेबह आ जेना रखबह तेना रहब।” एक-हरफी गुणेसर काकाकेँ बजैत देखि बिच्चेमे रोकि कहलियनि- “काका गोड़ लगै छी।” अपन मनक विचार रोकि गुणेसर काका असीरवाद दैत पुछलनि- “बौआ, सभ आनन्द छह किने?” कहि पत्नीकेँ कहलखिन- “जुग बदलि गेल, आब जे तकै छिऐ बदामक पनिसल्ला, गुड़क गोली आ पानिसँ अभ्यागतक आकि गौओं-घरूआक सुआगत करब, से आदति छोड़ि दियौ। जाबे जुआन छेलौं ताबे जे मन फुरल से केलौं। आब एक उमेरपर आबि गेलौं, तँए समए देखि संग चलू। पहिने चाह बनाउ। चुल्हिये लग सभ बैसि गपो-सप्प करब आ चाहो पीब।” सएह भेल। ओसारेक चुल्हिपर फुलती काकी चाहो बनबए लगली आ दुनू गोरे माने हमहूँ आ गुणेसरो काका पीढ़ियापर बैसि गप-सप्प शुरू केलौं। पुछलियनि- “काका, सोल्होअना चलि एलौं आकि नाङ्गरि-ताङ्गरि लसकले अछि।” अकचका कऽ गुणेसर काका बजला- “से की कहलह, बौआ?” कहलियनि- “सेवा-निवृतिक पछाति जे किछु जमा-जिगिर भेटैए, तेकर कागजे ऑफिसमे तेना ओझरा जाइ छै जे जेते भेटैए तइसँ बेसी चलिए जाइए। दौड़-बरहा तेते होइए जे सभ ठेही मेटा जाइए। यएह भेल लसकब। जेकरा ऑफिसबला सभ लुक्खीक नाङ्गरि जकॉं तेना सुररि लइए जे पछाति बुझिए ने पड़ैए जे लुक्खीक नाङ्गरि छी।” नमहर सॉंस छोड़ैत गुणेसर काका बजला- “से सभ सगुन नीक रहल। कौलेजक एकटा किरानी सभ काज कऽ देलनि। सेवा-निवृतिक तेसरे दिन सोलहन्नी फारकती पाबि चलि एलौं।” पुछलियनि- “केते जमा भेटल?” ‘केते’ सुनि गुणेसर काका सकपकेला। सकपकेला ई जे पाइ-कौड़ीक बात छी। केते राजा-महराजा माटिमे गड़ल मुदा चोरी-चपाती होइते आबि रहल अछि। तँए पाइ-कौड़ीक बात अनका लग बाजब खतरासँ खाली नइ अछि। परिवारमे अखन धरि जे पाइक मोल, बेटासँ लऽ कऽ पत्नी धरिक रहलनि ओ गुणेसर कक्काक मनमे लगल जामकेँ किछु कम केलकनि। संग-संग अपन वृत्ति जे रहलनि ओ कहियो झूठ-फूस, लाथ-कुलाथक नहि रहलनि तँए मनमे शक्ति-शिरोमणिक अंकुर रहबे करनि। बजला- “बौआ, अढ़ाइ लाख जमा भेटल।” कहलियनि- “बहुत रास भेटल, भगवान बेटो तेहेन देलनि जे पाइक धार फोरबे करता।” हमर बात सुनि जेना गुणेसर कक्काक ऑंखिक धारमे शुभ्रता एलनि। ओना अखन धरि अशुभ्रतो नहियेँ आएल छेलनि, मुदा ओहन शुभ्रता एलनि जइमे फरिचपन बेसी होइ। तहूमे पाइक धार सुनि गुणेसर काका पाइयेक धारमे भँसि गेला। भँसैत-भँसैत बजला- “बौआ, पाइकेँ की करब से किछु फुरबे ने करैए।” गुणेसर कक्काक बात सुनि अचम्भामे पड़ि गेलौं जे ई की कहि देलनि। पाइयेक पाछू लोक पागल भेल अछि। एको बीत जगह आकि एकोटा एहेन काज बॉंकी नइ अछि, जैठाम पाइक झीका-झीकी नइ भऽ रहल अछि। तैठाम गुणेसर काका एहेन बात कहलनि जे पाइकेँ की करब! जँ एहेन प्रश्न उठैए तेकर माने तँ यएह ने हएत जे कोनो सामाजिक काजमे खर्च करए चाहै छथि, जँ अपन व्यक्तिगत काज रहतनि तँ की अनका देहक नापसँ कुरता आ पएरक नापसँ जूता कीनैक करितथि। ओना गुणेसर कक्काक जिनगी पठने-पाठनक रहलनि, जइसँ जिनगीमे मीठास आबि गेल छेलनि। मीठास ई जे कटु शब्दक जगहपर मधुआएल ओहन शब्दक प्रयोग करै छथि जे कटुओ मधुर जकॉं बूझि पड़ैए। तैठाम हमरा सन छौड़ा-माड़रिक विचारक होन्हि, ई केते उचित हएत। मुदा जँ पुछलनि तखन जँ किछु नहियोँ कहबनि तैयो तँ मनमे शंका हेबे करतनि जे पाइ-कौड़ीमे चुप्पी लाधब षडयंत्रो भऽ सकैए, जे खतरनाक भेल। किछु फुरबे ने करए जे की कहियनि। फेर मनमे भेल जे दूटा बेटो छन्हि, दूटा पुतोहुओ भेलनि, तैपर सँ पत्नीओं छन्हि, हमरा-हिनका बीच समाजी-पारिवारीक सम्बन्धो अछि, तैबीच हमरो परिवारजन छथि आ हिनको छन्हि। कहलियनि- “काका, जे पाइ सेवा-निवृतिक पछाति भेटल ओ तँ परिवारक भेल, तैबीच काकीओ छथि, तँए हुनका सभसँ पहिने विचार किए ने लेल जाए।” परिवार सुनि गुणेसर कक्काक मन विचलित भऽ गेलनि, बजला- “विचार ते अपनो सएह छल मुदा दुनू बेटा ऐ पाइसँ देह छीप लेलक।” ‘बेटा देह छीप लेलकनि’ सुनि छगुन्तामे पड़ि गेलौं। छगुन्ता ई जे अही पाइ दुआरे बाप-बेटामे कपर-फोरौबलिसँ लऽ कऽ केस-मोकदमाक संग अनुकम्पाक नोकरी दुआरे जहर-माहूर तक बेटा-पुतोहु दइले तैयार भऽ जाइए, आ तैठाम एहेन बात! छुब्द भऽ गेलौं। मुदा लगले मनमे भेल जे ई परोछा-परोछीक बात भेल। मुदा पत्नी तँ लगमे छथिन किए ने अपने मुहेँ पुछियनि। फुलती काकी लगेमे रहथि। पुछलियनि- “काकी, काका थैली लऽ कऽ एला, से की करब?” जिनगी भरि ओहन संगी जकॉं फुलती काकी रहली जे पतिसँ कहियो परिवारक आमद-खर्चक बात नहि पुछने तैठाम...। थैली सुनि बजली- “थैली थैलीबलाक छियनि आकि हमर छी। अपन थैली धरममे लगबथि आकि कुधरममे, ई तँ ओ जानथि जे पूजामे लगाएब आकि रण्डी नचाएब। हुनका पाछू हम वौआइले जाएब। जहिना सभ दिन पदमिनी भेल घरमे रहलौं, तहिना रहब।” ओना पदमिनी सुनि हमरो मन विहुँसल मुदा गुणेसर काका ठोर पटपटबए लगला- “भवति कमल नेत्रा...।” काकी बाजि चुप भऽ गेली। जेना अपन विचारकेँ प्रश्न बना गुणेसर काकाकेँ पुछने होथि। एक तँ ओहिना गुणेसर काका अपने बेथे बेथाएल रहथि तैपर एकटा बेथा आरो चढ़ने मन झूकि गेलनि। एक बेर हमरा दिस तकथि आ दोसर बेर पत्नी दिस। चकोना होइत देखि कहलियनि- “काका, अपना जीविते दुनू परानी अपन श्राद्ध, ऐ पाइसँ कऽ लिअ।” जहिना धारक मुँहकेँ नवका पेट वा मुँह भेटने ओम्हरे धारा तेज भऽ जाइए तहिना गुणेसर काकाकेँ भेलनि। बजला- “बौआ, जिनगीक अन्तिम चरणमे आबि गेलौं, बहुत लोकक श्राद्ध देखलिऐ। केकरो जशो भेल, केकरो अजशो भेल, मुदा दुनूक फल की भेल से अखनो धरि नइ बूझि पेलौं हेन। तैपरमे तूँ तेहेन विकट बात कहि देलह जे...।” कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला मुदा ‘तूँ विकट बात कहि देलह’ सुनि हमरो गर भेटल। पुछलियनि- “की विकट बात, काका?” गुणेसर काका बजला- “बौआ, जिनगी भरि व्याकरणे आ साहिते पढ़बो केलौं आ पढ़ेबो केलौं, मुदा...।” प्रश्नसँ हटैत गुणेसर काकाकेँ देखि पुछलियनि- “एकरा के काटत, काका?” हमरा बातसँ गुणेसर काकाकेँ जेना सह भेटलनि तहिना आगू बढ़ैत बजला- “बौआ, अपन श्राद्ध अपने केना करब?” कहलियनि- “जहिना आन-आन जे जीवितेमे भोज कऽ लइ छथि तहिना अहूँ अपन करब।” वामी-दहिनी मुड़ी डोलबैत गुणेसर काका बजला- “देखहक, जेकरा श्राद्ध बुझै छहक, ओइमे दूटा काज अछि एकटा अछि भोज दोसर अछि कर्म। जे कर्म मुइला पछातिक अछि ओ जीवितमे केना हएत?” गुणेसर कक्काक विचार बूझिए ने पाबि रहल छेलौं। गाममे केतेको गोरे अपना जीविते श्राद्धक भोज कऽ नेने छला, जे बुझल छल, तइ हिसावसँ कहने छेलियनि। बजलौं- “कनी अपना बातकेँ सोझरा कऽ कहियौ।” कहलनि- “देखहक, श्राद्धक कर्म प्राण छुटला पछाति शुरू होइए। कियो-कियो श्रद्धा-पूर्वक नत-मस्तको होइ छथि। मुदा प्राण निकलला पछाति कन्ना-रोहटसँ प्रकिया प्रारम्भ भऽ जाइए। बॉंस काटल जाएत, कपड़ा बजारसँ आनल जाइए, बॉंसक चचरी बनौल जाइए इत्यादि चचरीपर उठा असमसान घाट गेला पछाति लहास जरबैक प्रक्रिया शुरू होइए। से केना जीवितेमे हएत?” गुणेसरे कक्काक विचारक धारमे हमहूँ बोहि गेलौं। कहलियनि- “से केना हएत।” गुणेसर कक्काक मन अपन विचारक सफलता देखि उत्साहित होइत रहनि। कनी अँटैक बजला- “आब लए भोजक।” कहि फेर चुप भऽ गेला। मने-मन जेना किछु विचारए लगला तहिना बूझि पड़ल। मुदा कनियेँ काल जखन ऑंखि-पर-आँखि देलियनि कि जेना मन पड़लनि। बजला- “बौआ, साहितक विद्यार्थियो रहलौं आ विद्यार्थीकेँ पढ़ेबो केलौं। से कोनो साल-दू-सालक समाज साहित्य नहि, हजारो-हजार बर्खक। सभ दिन समाजकेँ एक नजरिसँ देखैत एलौंहेँ, मुदा...।” ‘मुदा’ कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला। जेना बीचक कोनो बात बिसरि गेल होथि। टोकारा दैत कहलियनि- “काका, एना जे मुड़ी छोपि कऽ तम्मासँ सिदहा लगाएब तखन तँ भेल।” हमर बात गुणेसर कक्काक मनक विचारकेँ जेना खोंचारि देलकनि तहिना खोंरनी नेनहि विचार जगलनि। बजला- “बौआ, समाजकेँ जे भोजो खुएबनि, से समाजो की समाज रहल। रंग-रंगक समाज बनि गेल अछि। ई जाति, उ जाति! ई दियाद, उ दियाद! ई टोल, उ टोल! ई गाम, उ गाम...! केते कहबह।” जेना हमरो भक् खुजल। कहलियनि- “हँ, से ते ठीके।” ‘ठीके’ सुनि जेना गुणेसर कक्काक विचारमे सकताहट एलनि तहिना बूझि पड़ल। बजला- “बौआ, नाङ्गरि-बिनु-नाङ्गरिक, पूछ-बिनु-पूछक, पुछड़ी-बिनु-पुछड़ीक..., तेते रंगक ने लोक भऽ गेल अछि जेकरा समेटब असाध अछि। जेकर पुछड़ी छोट तेकर दैछना नमहर! आब तोहीं कहह जे एक तँ भोज खाइमे बिहंगरा ठाढ़ करत, जे कियो कहत भत-भोज करू, तँ कियो कहत भाते ने खाएब। तैपर सँ ई कहत जे खेबो करब आ दैछनो लेब। एक गोरेकेँ दैछना देबै आ दोसर गोरेकेँ नइ देबै से मन मानत?” कहलियनि- “बड़ ओझरी बूझि पड़ैए, काका। तखन अपने मुहेँ बाजू जे अपन अभ्यंतर की कहैए?” ‘अपन अभ्यंतर’ सुनि गुणेसर काका ओहिना जिनगीक पोखरिमे डुमकी मारलनि जहिना कियो पोखरिक जाठि लग डुमकी लगा माटि उखारि ऊपर उठि जाठिक रोइयापर लगा अपनाकेँ धन्य बुझैए। अभ्यंतरक आत्माराम रूपमे बजला- “बौआ, ऐ दुनियॉंमे मनुखक जँ कोनो सम्पति अछि तँ ओ छी साहित, मुदा एतबे बुझल अछि।” कहि गुणेसर काका दुनियॉंक बोनमे हेरा गेला। जहिना हजारो-लाखो रंगक नीक-सँ-नीक फल दइबला बोनक गाछ जे फलसँ लदल किए ने रहौ, मुदा अनाड़ीले ओ बोनफड़ भेल जे लोक नइ खाइए, तहिना दुनियॉंक सघन बोनमे गुणेसर काका मात्र एकटा साहित्यिक बात बुझै छथि। सेहो किताबक। समाजमे माने मनुखक बीच साहित्य कोन रूपे जोड़ल अछि वा जोड़ल जा सकैए, ई बात काका नइ बूझि पाबि रहल छथि। ओना व्याकरणक सन्धि-विच्छेद आ समास सेहो मनमे नचैत रहनि जे एकटा टुकड़ी करैबला आ दोसर टुकड़ीकेँ जोड़ैबला छी, मुदा तेकरा ओ व्याकरणक मात्र अंग बूझि-मानि बुझैत एला अछि। मुदा ओ तँ अक्षरक विन्यास भेल, मनुखक विन्यास तँ ओइसँ भिन्न छै, तैठाम गुणेसर काका हेरा जाइ छला। लूटमे चरखा नफा। विचारक दुनियॉंमे जँ कियो बानर जकॉं चढ़ल होथि तखन जे गाछपर चढ़ल बानर जकॉं निच्चासँ खोंचार देबइ तँ नइ मनुख जकॉं तँ बानरो जकॉं तँ खब-खबा कऽ बजबे करता। कहलियनि- “काका, अहॉं कनारि असुल रहल छी?” ‘कनारि’ सुनि चकोना होइत गुणेसर काका बजला- “से की, से किए उपराग दइ छह- बौआ?” कहलियनि- “काका, अहॉंक विद्यालयमे हम नइ पढ़लौं तँए अहॉं अपन विद्यार्थी नहि बूझि छिपबै छी।” गुणेसर काका ठमैक गेला। ऑंखि उठा हमरोपर दथि आ निच्चो खसा लथि। मने-मन सोचए लगला जे जइ विद्यार्थीरकेँ पढ़ेलियनि ओतबे ने हमर गुण लेबो केलनि आ पेबो केलनि, मुदा जे ऐसँ बाहर रहला, हुनका हम की देलियनि आ ओ हमरा किए चिन्हता? पढ़ल-लिखल रहितो हम कोन काजमे हुनकर सहयोगी भेलियनि? जखन सहयोगी बनबे ने केलौं, तखन सहयोगक केते आशा कएल जाए...? ...आखिर एना भेल किए? साहित्य तँ सबहक छी, सभ-ले अछि। हम साहित्यक उपदेश करैबलाक जिम्मामे छी, तखन किए ने बूझि पाबि रहल छी जे जेतबे लोक विद्यालय-महाविद्यालय देखलक तेतबे लोकक छी आ बॉंकी लोकक नइ छी। तखन? जरूर केतौ साहित्य आ समाजमे खाधि अछि जइमे ई दूरी बनि गेल अछि। मुदा आब काइए की सकै छी। आब तँ ने ओ देवी रहल आ ने ओ कराह! हारल सिपाही जकॉं गुणेसर काका बजला- “बौआ, लोक उमेरे नइ जेठ होइए, बुधिये जेठ होइए। एकटा विचार पुछै छिअ।” ‘पुछै छिअ’ कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला। हमरो कोनो गरे ने लगए जे किछु पुछितियनि। की पुछता की नइ पुछता से पेटक बात केना बुझब? जँ बाते ने बुझब तखन कहबनि की? नजरि उठा ऑंखिपर देलियनि तँ बूझि पड़ल जे मनमे किछु खुर-खुरा रहलनि हेन। नजरि निच्चॉं करिते रही कि बिच्चेमे गुणेसर काका बजला- “बौआ, पाछू उनटि तकै छी ते बूझि पड़ैए, दुनियॉंमे केतौ कियो ने अछि। पत्नीकेँ देखै छियनि तँ बूझि पड़ैए जे सोल्होअना देह ऊपरमे खसौने छथि। बेटा सभ सहजे देह छिप फुह खेलाइए। समाजमे केकरो कोनो एकटा बोलोसँ, उपकार नइ केलिऐ तँ किए ऐ बुढ़ाड़ीक भार अपना कपार लेत।” गुणेसर कक्काक विचार सुनि बूझि पड़ल जे संयासीक अवस्थामे पहुँच रहला अछि। कहलियनि- “काका, अहॉं तँ संयासीक ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल छी जेतए लोक दुनियॉं-ले जानो-परान दइए आ दुनियॉंकेँ गरियेबो करैए, जे दुनियॉं झूठ छी।” हमर बात गुणेसर काकाकेँ नीक लगलनि। जिज्ञासु बनि बजला- “बौआ, आब आगू की करी से कनी तोहीं कहह?” पानिक धार निच्चॉं मुहेँ ने तेज गतिये चलैए, हवा तँ नइ छी जे जेमहर मन फुरतै तेम्हरे दौड़ो जाएत आ असथिरोसँ चलत। मनमे उठल,सभ दिन गुणेसर काका शिक्षकक रूपमे रहला, आइ अपने शिक्षकक खगता भऽ गेलनि! चेतन अवस्थामे नइ छथि सेहो बात नइ अछि। मनक आगूमे विचारक पट बन्न छन्हि जे खुलि नै रहलनि अछि, तँए खटखटबै छथि मुदा पट बन्ने भऽ नहि रहलनि हेन। कहलियनि- “काका, अपने तँ साहित्यसँ जिनगी भरि सटल रहलौं, मुदा तखन समाजसँ हटि गेल छी, यएह बीचमे...।” हमर बात सुनि गुणेसर काका चौंकैत बजला- “ठीके कहै छह, बौआ। सभ दिन किताबकेँ साहित्य बुझैत एलिऐ मुदा समाजे साहित्य छी।” हलसैत-कलशैत गुणेसर काकाकेँ देखि कहलियनि- “काका, पाइकेँ अही काजमे लगा दियौ।” विचारक धारमे गुणेसर काका बोहिते रहथि, बजला- “बेस कहलह, बौआ।” पॉंचम मास। गुणेसर कक्काक मन असथिरसँ मानि गेलनि जे अपन जिनगी भरिक जे धएल-धरल अछि ओ समाजक हितमे लगा देब। जइसँ पाइयोक कल्याण हएत। जँ नीक काजमे नइ लगत तँ अनेरे गलि-पचि कऽ नष्ट हएत। पॉंच मास पूर्वक गुणेसर काका आब ओ नइ रहला जे छला। खोज करैत-करैत एला, हमहूँ हुनके ऐठाम जाइले तैयार होइत रही। कहलनि- “बौआ, आइ सभ काजक अन्तिम विचार कऽ लइक अछि।” कहलियनि- “लिखा-पढ़ीक काज अछि, ऐठाम असुविधा हएत।” दुनू गोरे विदा भेलौं। फुलती काकी पहिनेसँ चाहक ओरियान केने रहथि। पहुँचिते तीनू गोरे चाह पीलौं। चाह पीला पछाति कहलियनि- “काका, अपने ते सब दिन समाजकेँ एक नजरिये देखलिऐ।” कहलनि- “हँ।” कहलियनि- “गामक जन-जनक मन-मनक विचार मंचपर आबए, ऐ ढंगसँ कार्यक्रमक तैयारी हेबा चाही। बेटा सभ की कहलनि?” हँसैत गुणेसर काका बजला- “दुनू भॉंइ कहलक हेन जे अहॉं नीक कार्यक्रमक योजना बनाउ। सात दिन पहिने हम सभ आबि जाएब।” सोचैत-विचारैत सात दिनक कार्यक्रम बनल। गामक एक-एक जनकेँ सुनबो-ले आ बजबो-ले सभकेँ समए भेटनि। जइमे छह दिनक बारह बैसार भेल। अड़ोस-पड़ोसक जे साहित्य प्रेमी छथि, हुनको आमंत्रित कएल जान्हि। आ अन्तमे दिल्लीक डाक्टर त्रिलोकी चरणक साहित्य पाठसँ सातम दिन समापन कएल जाए। सएह भेल। काल्हि छह दिनक बारहो बैसार समाप्त भऽ गेल। आइ अन्तिम सातम दिन त्रिलोकी चरणक कार्यक्रम छन्हि। दिल्लीसँ पटना हवाइ जहाससँ औता आ पटनासँ चरिचकिया गाड़ीसँ दू बजेक कार्यक्रममे पहुँचता। कार्यक्रम शुरू भेल। गामसँ अड़ोस-पड़ोसक सभ साहित्य प्रेमीक जुटान रहबे करए। मंच गनगनाइत। डा. त्रिलोकी चरण पटनासँ गामक रस्ताक जाममे फँसि गेला। मोबाइलसँ बेर-बेर खबरि होइत रहए जे जाममे त्रिलोकी बाबू फँसल छथि। जाममे फँसल त्रिलोकी बाबू मने-मन सोचैत रहथि जे केतौ भाषाक जाम, केतौ विचारक जाम, केतौ बेवहारक जाम अछि। समाज तँ जाममे फँसि गेल अछि। कथीक जाम छी, मनमे उठिते त्रिलोकी बाबू एक गोरेकेँ पुछलखिन- “कथीक जाम छी?” ओ कहलकनि- “एकटा पाथरक मुरती उखरल जे दूधो पीबैए आ बजबो करैए। तेकरे देखैले परोपट्टाक लोक उनटि कऽ जा रहल अछि। तेकरे जाम छी।” जहिना थोपड़ीक गड़गड़ीसँ मंच सजल तहिना थोपड़ीक गड़गड़ीसँ उसरियो गेल। आठ बजे रातिमे डा. त्रिलोकी चरण पहुँचला। पहुँच तँ गेला मुदा एहलो बाधित भऽ गेलनि आ आपसीक सभ कार्यक्रम सेहो बाधित भऽ गेलनि।¦¦ शब्द संख्या- 3357, 29 जुलाई 2015 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विन्देश्वर ठाकुर बेलहाबालीके जितिया (विहनि कथा) आइ आसिन महिना, कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथि । सब मिथिलानीसब जितिया पावनिमे अस्त-व्यस्त । जमुनिया गाम सेहो जितियासँ जगमगा' उठल । करिब २ दिन पहिनेसँ जितिया पावनिके ल'क देखल उत्साह आइ सार्थक भ' रहल अछि हुनकासबके । पहिल दिन माछ-मरुवा बारल, तकरा बाद नहा-खाएल आ आइ निराहार व्रत रहि जितबाहनके पूजा करबाक परम्परा अछि । एहि क्रममे आइए भिन्सरमे उठली परबत्ताबाली काकी,तेजनगरबाली भौजी,कारो बुढीया, सबैलाबाली दाइ आदि-आदि । सबहक घरमे नेना-बुटका काहु-किक्चर क' रहल छै । चुरा-दही पहिने हम खैबौ त हम खैबौ कहिक सब बच्चासब आपसमे लडि रहल छै । सब माए-दाएसब अपना-अपना बौवा-बुचीसबके चुरा-दही खिया' रहल छै आ भीतरी मोनसँ संतुष्ट भ' रहल छै । मुदा सबैलेबाली दाइके ठीक बगलमे घर छै -" बेल्हाबाली काकीके ।" ओकरा घरमे तेहन किछु उत्साह नै छै । ओ बस निन्न्सँ सुत्बाक प्रयत्न करैछै मुदा असम्भव । ओकरा निन्न भेलै कहाँ ? होएबो करतै कोना ? दुखक पहाड जे खसल छै जिनगीमे । एक त कनैत -कनैत आँखिक नोर सुखा' गेल छलै पहिनहि । आओर जे बाँकियो छलै से बुझाय आइए सुखि जेतै । सबगोटेके घरमे बौवा-बुचीसबके चुरा-दही खाइत देखि ओकर छाति फा'ट लगलैए । आँखिसँ नोरक धार ब' ह लगलैए । कारण पछिला सालक जितियामे ओकरो घरे अहिना धुमधाम भेल रहै ।मुदा दैवा कसैया एहिबेर सब सुख छीन लेलकै । बेलहाबाली काकी आ बुझौना कक्काके एक मात्र सुपुत्र छलै-"निकु यादव " मुदा दूर्भाग्य ज्र ओहो मारल गेलै अहि बेरक मधेश आन्दोलनमे । आब के खैतै ओकर चुरा-दही आ ककरा लेल करती काकी जितिया ? कोना उठेतै ओ अपन निन्नसँ सूतल बौवाके -" आऊ बाबू चुरा-दही खाउ? इएह सोचि-सोचि काकि हक्कनलोरे कानि रहल छै । बस यादक तौरप' सिरमामे राखल निकुके तस्बीर देखि-देखि काकी छाति पिटि रहल छै, श्रवण नोर झहरा' रहल छै आ अपन निकुके आत्माक शान्ति लेल जितमहान् भगवानसंग कामना क' रहल छै । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अब्दुर रज्जाक गामक चौबटिया पर/ रौदी परल अछि १ गामक चौबटिया पर सोचलौ की हमरा गामक बीचमे अखैन धूमगजर मचौने बिकासक काजपर किछु चर्चा करी, पढ़ूई बात हमर जे किछु ख़ास नै मुदा खास लगत~ बिचगाममे अखैन सड़क के तोरफार जोरजार संगे धनुषा जिल्ला क भ्रष्टाचार सेहो किछ नेता किछ कर्मचारी सभक टिकी पर चढ़ि अर्राहैट कएने अछि। राशि अछि ११ करोड़ के जेकर लीपा पोता तऽ की खन जोत सेहो धीरे धीरे भऽ रहल अछि। जेना लोकल मुर्गी बजारक भरम रखने अछि ओनही गाम घरक बिकास भरम चाहे जेना बुझू येहे लोकल चालूपुर्जा नेता सब रखने अछि। गामक अबस्था बिकासक बिहाड़िसं उधियाइल अछि। कतौ टेक्टर धरधराउने अछि तऽ कतौ डोज़र मरमरौने अछि, कतौ स्काइभेटर भरभराउने अछि जेना गामक सब काज अहिबेर झाइर झपैट कऽ कैएटा देता/ ककरो किछ ककरो किछ ढहैत अछि। लोको भल होइ तब तऽ सब किछ माईन सऽ लऽ कऽ पदाऐंन तक सड़के पर छोड़ै छथि। जब बिकास-बात भेल तऽछिग्रो तान भेल रहल काज आ होहल्ला करबे टा करत जे मधेश कऽ एगो सांस्कृतिक के रूपमे जेना रहल अछि। जौ गाममे जाउ निक बात वा बिकाशक बात पर लोहा लड़ाई छिन्न झपट कुर्ता के बाहि समेटा-समेटी हेबे टा करै अछि। एहन कुसस्कारक बात हमरा सबहक़ गामो के नै छूट ता? गामक सड़क अखैन मानू जे पहलमानक अखड़ा रहल अछि जेना। जै पर नै अखनै बस, जीप,मोटरसाइकल, साइकल आरो एहन किछ साधन सब चलऽ मे असमर्थ अछि। बिकाशक योजना अपना सबहक़ देशमे ख़ास कऽ अखारक मॉस के सुरुबातमे शुरु कैल जाइ अछि एना कैला ? जे केनाहु कऽआरो सड़क बैह जाइ पाइन संग फेन जेहने के तेहने रहिए जाइ की ? ई बात किछ घुमाइल फिराइल जेखा ऐछ किए नै कार्तिक अगहनमे बिकाश काज शुरु कैल जाइ अछि ? बिकासक पलान बिन पूर्ब सूचना के संगे ठोस ढंग सऽ बिकास के किछो काज नै होइत रहै अछि। अगर धनुषा जिल्ला बिकासक बात करी तऽ हरेक साल समाजक ढीला सुस्ती सऽ बजेटक पाइ फ्रिज भऽ जाइ अछि। लोग कहलक से सरकारक ढीला सुस्ती अछि मुदा अपना सबहक जे कमजोरी अछि तेकर कहियो चर्चा परिचर्चा नै किए? अंतमे कहऽ चाहबै जे अपन गाम समाज सबहक़ बिकास के जिम्मेदार सब गोरे छी, अपना जगह सऽ सब गोरे किछ नै किछ पहल सहयोग करबाक जरूरी अछि। ख़ास कऽ कृषि प्रधान देशमे कृषक सब पीडितो भऽ कऽ अपना खेतके सिचाई के लेल किछ सामाजिक मेलमिलाप केनाइ बहुत आवश्यक अछि। अगर अपना सब किछो निक काज अपना गाम ठाम के लेल करबै तऽ फाएदा अपने और के हेतै, दोसर के नै। तब फेन अपनामे एकता किए नै ? २ रौदी परल अछि विदेह नेपाल भारतक मैथिली भाषाक क्षेत्र मे एकटा नब आधुनिक साझा चौराहा के काज करै अछि/ भाषा संस्कृतिक प्रचार हेतु एकटा ससक्त गामक दलान वा चाइके दोकान हटिया कऽ समाद बारी पर जोर दऽ कऽ आधुनिक युगक पैघ काज करै अछि विदेह नेट पत्रिका। मिथिलाक भाषा पर पाठक लोकैन के भावनामे उभरल बिचारकें समैट के समाजक समाद बारी के सेतु पुल अछि। रौदी परल अछि भाषाक बिकास मे। संगे जेहो किछ किसान लोकैन भाषाक खेतीकरै अछि उनको बजार अगर नै मिलतै तऽ कोना उनका सबहक गुजर गुज्राउन हेतै, सम्स्या हेतै,तैं जे विदेह ओइ भाषाक किसान सबहक पैघ बजार दीयाबैत अछि। खास कऽ मिथिलाक गाम घरमे चुल्ही पछा मे जे किछ राजनैतिक घोंहाउज सब जे दलान कऽ कुर्सी चौकी सोफा पिढ़िया सऽ छुटैत घुसकुन कटैत हलुक-बुलुक दैत देखाउत तेकरो किछ कहियो काल अहि पत्रिका माध्येम सऽ प्रकाशन हेतु किछ पाठक लोकैन के इच्छा जरुर हेतै, मुदा येहन लेख रचना पठाबी सेहो निक हेतै की केना ? से प्रकाशन समुह सऽ आग्रह करबैन। ओना मिथिलाक राजनैतिक चाहे नेपाल हुअए वा भारतक, ओहाने अछि जेना सौना मेशमा सन,कहियो बहुत मिठ लागत तऽ कहियो नुनगर रहत तऽ कहियो तेलगर तऽ कहियो नुनछड़ाइन तऽकहियो अनुने/ तै हेतु १४ कोष अलगे लोग रहबाक प्रयासमे बहुत रहबेटा करता। किछ कारण सब तऽहमरा मिथिलाक सब कुछ के पछा करऽ मे अगा अछि जेना हम महसूस करबेटा करै छी मुदा अपने सबके केना महसुस होइते हैत से अपने कहबै। (१) खास क किछ निक कहाबऽ बाला नेता लोकैन अछिउनका सबहक अहमता बिशेष अछि (२) बुधियार होइतो समाजक दिलमे नै अछि ई नेता लोकैन(३)राज्य द्वारा मूर्ख लोकैन के शासनमे लाउल गेल अछि (४) समाजक सोझापन अति आ अज्ञानता सेहो अति अछि (५) मिथिलामे खास क आपसी भाइचारा के कमी कलह सऽ भारल समाज (६) राज्यद्वारा मिथिलाञ्चल के हेय नजर सेहो (७) शिक्षा-बेबहरतामे अति कमजोरी (८) अशिक्षा भौ-सागरमे मिथिलाक डुबल समाज/ अब्दुल रजाक ( धनुषाधाम ६ हरिपुर ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.संतोष कुमार झा- सिक्की शिल्प-कला ३.२.प्रणव झा- अकांड तांडव ३.३.संजय कुमार झा "नागदह"- खैर, छोड़ू/ भेटल ? ३.४.१.सुकोसुत शिशिर- मोन विकल २,आशीष अनचिन्हार- गजल संतोष कुमार झा सिक्की शिल्प-कला आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! एहि मिथिला कें धरा-भूमि पर जनमलजे शिल्प-कला, नाम भेल तकर ‘सिक्की’शिल्प-कला। जे नारी जनमली-सिंचली मानव-संसार, सेहजनमली-सिंचली ‘सिक्की’शिल्प-कला। जे अखिल विश्व मे मिथिला कें नाम उजागर केलक, देलक मिथिला कें विशिष्ठपहचान। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! ‘सिक्की’ एकटा, घास होइछ जे बरखा ऋतु कें बाद नदी,पोखरि, खत्ता कें कात भेटइछ। एहि काल होइछ ई सर्वोत्तम रूप-यौवन संपन्न, तखनहि काटि आनय नारी-संकाय। पातर-पातर काटि फेर एकरा आँगन-चार पर सुखाओल जाय, एहि बिधिए बारहो मास काज ई आय। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! माँ प्रकृति भरलीचमकौआ स्वर्ण रंग एहिमे, जाहिमे लाल, पीयर सब रंग भरई छथि शिल्प-कार्य केनिहारि। टकुआ सौं ताना-बाना एहेन बनय जे, शृजित करय नूतन वस्तु-संसार। सुंदरता सौं ओत-प्रोतमौनी,सूप, कोनिया आदि… घर-गृहस्थी कें नित्य सामान। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! आदि-काल कें शिल्प-कला ई, मैथिल-सभ्यता कें शुभ-श्रेष्ठ उत्कृष्ट पहिचान बनि गेल। विवाह,द्विरागमन, मधु:श्रावणी जे किछु पावन कर्म हुए, एहि शिल्प कें बिना ओ मिथिला मे अधूरा-अपूर्ण रहय। मिथिला कें घर-घर मे बुच्ची कें ई शिल्प सिखाओल जाइत छै, अपन विवाह कें लेल स्वयं कला-कल्पना मिश्रित ई शिल्प बनाओल जाइत छै। आउ कथा करि एहि शिल्प-कलाभूमि कें आई, आउ कथा करि पावन मिथिला भूमि केंआई! संतोष कुमार झा वरिष्ठ संकाय, चर्म वस्तु एवं उपवस्तु विद्यालय, फूटवियर डिज़ाइन एवं डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, नोएडा (उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय, भारत सरकार) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड नई दिल्ली अकांड तांडव हे महादेव इ केहन अन्हेर ! अकांड तांडव प्रत्यक्ष भेल भूमि डोलल अछि बेर बेर दुखिया सब के आब लियौ टेर अछि हाहाकर उठल चंहुओर भ अनाथ, बालक मारे किल्कोर अछि भवन मंदिर सब खाक भेल जनै कतेक के प्राण गेल ? अभिनव मानव हम ब्रह्मा क कृति हारि मानव नै अछि अपन वृत्ति बढा क सकल हाथ आब त्राण करब मिल-जुलि क नव निर्माण करब छि मनुज, मनुजता जानै छी मानवता के मूल्य पहचानै छी बस एतेक गुहार सुनु बाबा आब और प्रहार नै चुनु बाबा पीडीत सब के कनटेर लियौ दु:ख काटि सकै ओ धैर्य दियौ दु:ख क पहाड के पार करैथ नवद्वीप प्रशन्नता में पहूंचैथ क सकैथ फ़ेर आनंदघोष हर हर महादेव के उद्घोष - ०४.०५.२०१५ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। संजय कुमार झा "नागदह"- खैर, छोड़ू/ भेटल ? दिनांक : २९/०७/ २०१४ १ खैर, छोड़ू ========= पूजा, पाठ, विवाह, जनेऊ जनम - मरण सब में होइत छैक कुशक प्रयोजन एखनो होइत छैक खैर, छोरु पहिले बेसी काल लोक गरिया दैत छल तोरा कुश उखाडय बाला कियो नहि रहतौ मुदा आब त' रहितो नै उखाडय छै खैर, छोरु एखनो पुरना लोक नहि जाए चाहैत छथि मिथिला के छोइर क' कोनो देश आ विदेश कियाक ? सब दिन सेबलहुँ मिथिला आब जाउ परदेश जौं धोखाधड़ी में छुटि जायत प्राण गंगा स्नान त' कात बिजली पर जरायत कि बबूर आ अक्कट सँ से कहि नहि खैर, छोड़ू सब गोटा के याद होएत पावनि - तिहार निपल आँगन आ घर आँगन अविते सुन्दर सुगंध बुझाइत छल आई कोनो खास दिन नवका चूल्हा आ दाय - माय व्यस्त आजुक दिन बुझा रहल मस्त आबो बुझाइया ? खैर, छोड़ू गामक दुर्गा पूजा में दू मॉस पहिने सँ नाटकक तैयारी सब साल उभरि रहल नवका - नवका कलाकार कि, एखनो होइया ? पहिल पूजा सँ यात्राक दिन तक बच्चा जवान स मरवा लेल व्यग्र तक मंदिर के प्रांगण में क ' रहलाह पूजा आ पाठ साँझ परिते बच्चा आ जवान के कहियो काल भ' जाइत छल दू - दू हाथ हमहू एकरे कारन छी एखन धरि पिताजीक आज्ञाक पालन में पूजा में गाम जाय सँ निष्काषित कि एखनो होइया ? खैर , छोड़ू एकसर विद्यापति मिथिलाक पताका विश्व में फहरा देलाह कतेको व्यक्ति के विद्वत बना देलाह मिथिलिका झंडा वीना डंडे फहरा देलाह नहि कोनो विधायक नहि संसद में ठाढ़ भेलाह नहि कहियो अनसन नहि रैली में भाग लेलाह लोकक त बात छोड़ू महादेव स्वयं उगना बनि विद्यापति के पैर धेलाह कि मिथिला के आब दुर्दिन नहि ? खैर, छोड़ू २ भेटल ? धुमसुरिक चोट सन आखर लिखल मनुक्ख, कुक्कुड़, बेंग, भाषा ओ संस्कृति समेटल आंदोलनकारी पर कए प्रहाड़ बाजू अपने की सब भेटल ? जेहने बुझू तेहने उगल भलें स्वार्थ सँ हो डूबल विद्वत् जनक आभाव कहियो नहि की तैयो सब मैथिल मिलि क' अष्टम सूची लेल एक भ' जुटल ? भने भोजन कए बैसल अनशन पर ध्यान दियौ मात्र ओकर कर्म पर नहि अपने सन पड़ल घर मे कनिया संग अछि पलंग पर सुतल घर सुतल सपनहि घुमि आबथि दिल्ली,मुंबई ओ कलकत्ता नहि जाएब हम कोनो दल संग भलें लोक हो कतबो जुटल अछि जौं दाबा अपना के बड्ड हम छी सब सँ होशगर सिद्ध करू मैथिल जन मे हम छी सब सँ बुद्धिगर मन क्रम वचन सँ टांग नहि खिचु जोड़ लागू पाछा सँ नहि त' कहियो अपनों सोचब एहि अदखोई - बदखोई सँ की भेटल ? नाम : संजय कुमार झा पिताक नाम : श्री हेम चन्द्र झा (थल सेना सँ सेवा निवृत )/ ग्राम : नागदह / जिला : मधुबनी शैक्षणिक योग्यता : बी. कॉम (प्रतिष्ठा), एम. कॉम, सी. ए. इंटर (फाइनल), कार्यरत : लेखा प्रबंधक मैथिली के प्रति रूचि आ मैथिल सँ अत्यधिक लगाव स्वतंत्र रूप सँ लेखन कार्य में रुचि (हमर आलेख ,कविता , लघु कथा मैथिली में , मिथिला मिरर - समाचार पोर्टल , मैथिली लोक रंग, अप्पन मिथिला,मिथिलांचल टुडे, मिरानिसे के वेब साइट , मैथिली दर्पण , मिथिलांगन इत्यादि में प्रकाशित आ हिंदी में आर्यावर्त -समाचार पोर्टल , पूर्वांचल एकता पत्रिकाइत्यादि में प्रकाशित) सामाजिक कार्य में विशेष रुचि आ कय गोट सामाजिक संस्थाक संस्थापक ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सुकोसुत शिशिर- मोन विकल २,आशीष अनचिन्हार- गजल 1 सुकोसुत शिशिर २३-०८-२०१५. मोन विकल एहि जग मे अछि ज्ञान भरल, जे किछु संभव,धरि आइ पढ़ल, ताहु मे बहुते कम बुझल, गुणल कर्म मे न ओतबो ढालि सकल। माँ,अछि सुत अहाँ के आइ विकल दिअ आशीष जे , हो जीवन सफल। कण्ठ मे हरदम बसै छी ने कियैक, पथभ्रष्ट होइतहि डँटै छी ने कियैक, विमुख भʼ, हे माँ , अहाँ सँ के साधना अछि कʼ सकल। माँ, अछि सुत अहाँके आइ विकल दिअ आशीष जे, हो जीवन सफल। ज्ञान-गौरव, अहमक वहम बाट रोकैछ भʼ ठाढ़ जखन, हे माँ, करु तखनहि कृपा जे भʼ सकए मोन, विमल-निर्मल। माँ, अछि सुत अहाँके आइ विकल दिअ आशीष जे, हो जीवन सफल। एक नहिं, गुरू छथि अनेक, कोना उतारब ऋण ओतेक, कर्मक बाती सँ ज्ञान-दीप बरल तव कृपा हरत मम दोष सकल। माँ, अछि सुत अहाँके आइ विकल दिअ आशीष जे, हो जीवन सफल। 2. आशीष अनचिन्हार गजल हम बड़का वामपंथी छी जोगाड़ी दामपंथी छी किछु चिखना चीखि बोतल संग नालीकेँ जामपंथी छी नित हमरा स्त्री प्रसंगक चाह हम असली कामपंथी छी गाँधीकेँ मारि बैसल जे से हमहीं रामपंथी छी करतै ओ काज भरि भरि दिन हम खाली नामपंथी छी सभ पाँतिमे 222+2122+2 मात्राक्रम अछि दोसर आ तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड नई दिल्ली बोर्ड परीक्षा (बाल कविता) बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया एक्जाम नजदीक एलौ रे पढ़ाई के घडी छौ सब एतबे कहतो रे पढ़ाई सब से पैघ छै परीक्षा में बोर्ड परीक्षा बाँकी अपन इक्षा... आबै एहि बात पर करै छी पढ़ैया बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया महावीर गोहरैला से आब काज नै चलतौ कबुलो केला से नै मार्ग सुधरतौ परीक्षा में नक़ल के आस, सेहो हेतौ बलैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया ... बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया एटम बम सेहो बस पासे करेतौ गेस पेपर सब सेहो बस नम्बरे दिएतौ ज्ञानक लेल करही टेक्स्ट बुक के पढ़ैया... पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया ... बौआ के काज छै पढ़ाई आ नै की घुमैया पढ़ाई काल में नहीं बाबू ने भैया ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 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2229-547X VIDEHA