VIDEHA — Issue 189 / अंक १८९

Publication: VIDEHA · Issue: 189
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183 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १८९ म अंक ०१ नवम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९५ अंक १८९) अरविन्द ठाकुर विशेषांक ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.अरविन्द ठाकुरजी संग साक्षात्कार मुन्नाजी द्वारा २.अरविन्द ठाकुरजीक नामसँ किछु पत्र २.२.आलोचना खंड--१.बहुरूपिया रचनामे- ओमप्रकाश झा २.अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर- आशीष चमन ३.अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि -डा योगानन्द झा ४. बहुरुपिया प्रदेश मे : एक दृष्टि- राम चैतन्य धीरज ५. अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चंद्र ठाकुर"अनिल" ६.अन्हारक रखवार -योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ ७.अरविन्द ठाकुर : व्यक्तित्व आ कृतित्व- अरविन्द मिश्र नीरज ८. स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे- परमानन्द प्रभाकर ९. सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि- अरविंद श्रीवास्तव १०. परती टूटि गेलै- मुन्नाजी २.३.संस्मरण खण्ड- १.अद्वितीय छथि हमर अरविन्द बाबा- रजनीश कुमार तिवारी (मुन्ना) २. हाली-हाली बहथु कोसी- शैलेन्द्र आनंद ३.अरविन्द ठाकुरःअन्हारक विरोधी व्यक्तित्व -मिथिलेश कुमार राय ४. अरविंद ठाकुरः हमरामे अहाँ, अहाँमे हम- अजित आजाद ५. जेहने खोजलऽ हौ कुटुम्ब- लक्ष्मणझा सागर २.४.आत्मकथा खंड- १. बुल्लियाँ की जाणां मैं कौन (अपनाकें खोजैत किछु अप्पन बात)- अरविन्द ठाकुर  २.बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल ( एकटा बहु-अर्थी निरर्थक चलभाष–वार्ता सुकांत सोमजीक संग )- अरविन्द ठाकुर ३.संस्मरण- बाबा सँ पहिल आ अंतिम भेंट:बाबाक विराट स्मृति-पटल - अरविन्द ठाकुर ४.जीवकान्त : किछु स्मृति, किछु टिप्पणी- अरविन्द ठाकुर ३. ३.१.लेख, आलोचना ओ समीक्षा- १.मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु अरविन्द ठाकुर २. मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य- अरविन्द ठाकुर ३. लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव- अरविन्द ठाकुर ४. एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब ( सन्दर्भ : हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “ )- अरविन्द ठाकुर ३.२.किछु विहनि कथा- अरविन्द ठाकुर ३.३.पद्य-१. किछु कविता- अरविन्द ठाकुर २. किछु आजाद गजल- अरविन्द ठाकुर ३.४.१.संस्मरण-चन्द्र मोहन झा ’पड़बा’ ४.बालानां कृते- अरविन्द ठाकुर- टिमटिम Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय 'विदेह' १८९ म अंक ०१ नवम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९५ अंक १८९) अरविन्द ठाकुर विशेषांक अरविन्द ठाकुरक मैथिली पोथी सभक लिंक परती टूटि रहल अछि (कविता संग्रह) अन्हारक विरोध मे (लघु कथा संग्रह) बहुरुपिया प्रदेश मे (गजल संग्रह) अन्हारक विरोध मे: अरविन्द ठाकुर (गजेन्द्र ठाकुर) अरविन्द ठाकुर -अन्हारक विरोध मे -क समर्पण काल- अपन कुलदेवी काली बन्नीक स्मरण करै छथि। गोरैया बहिन बन्दी (बन्नी) क पूजा केने रहथि, बन्नी वाकदेवी छथि, सुवर्णमय छथि, पुरुषोचित खड़ाम पहिरै छथि, छड़ी राखै छथि (खड़ाम आ छड़ी दुनू सोनाक)। हिनकर जनम रविकेँ भेल छलनि, तेँ छठिहारी शुक्रकेँ भेलन्हि। ओ काली जकाँ कखनो काल रक्त स्नान सेहो करै छथि तेँ हुनका काली बन्नी सेहो कहल जाइ छन्हि। अरविन्द ठाकुर ऐ लघुकथा संग्रहक आरम्भमे जाँ जेने [Jean Genet (1910–1986)] आ अंतोन चेखव [Anton Chekhov (1860-1904)] क एक-एकटा उद्धरण रखै छथि। जाँ जेने एकटा वैश्याक पुत्र रहथि, एक सालक जखन ओ रहथि तँ एकटा काष्ठकार परिवार हुनका गोद लऽ लेलकन्हि। शुरूमे ओ घरसँ भागि गेल करथि आ छोट-मोट चोरि करथि, फेर ओ लिखनाइ शुरू केलन्हि आ निबन्ध, कविता, उपन्यास, नाटक आदि लिखलन्हि। ओ अपन उपन्यासमे समलैंगिक सम्बन्धक संग, कुरूपतामे सौन्दर्य, अपराधीक चरित्रगत विशेषताक चर्च करै छथि, संगे ओ अपन नाटकमे सभ तरहक बहिष्कृत वर्ग आ ओकर शोषकक विश्लेषण करै छथि। जाँ जेनेक रचनाक जाँ पौल सार्त्र अस्तित्ववादी समीक्षा आ जेक्स देरीदा विखण्डनात्मक विधिसँ समीक्षा केलन्हि। अंतोन चेखवक लेखनी हुनका मरलाक बाद अभूतपूर्व रूपमे प्रसिद्ध भेल, तकर ओ जिबैत जी अनुमान नै लगा सकला। हुनका लागै छलन्हि जे हुनकर रचना हुनका मरलाक एकाध बर्खे धरि पढ़ल जाएत। जाँ जेनेक अरविन्द ठाकुर द्वारा उद्घृत कथन- “हम अपन भाषामे एतेक विविध रूपाकारक सृजन ऐ लेल कऽ सकलौं जे हमरा अपन भाषासँ घृणा छल।” -एकटा यायावरक उक्ति अछि। हुनकर अपराधक क्षमा याचना, जे फ्रेंच राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत भेल, पाब्लो पिकासो आ सार्त्र सहित बहुत गोटे द्वारा देल गेल छल। जाँ जेने अपन आत्म चरित्रमे अपन नेनपनक दुखद स्थितिक चर्च करै छथि, मुदा ई ओ अपन अपराधी चरित्रक रक्षार्थ करै छथि, ओ रक्षात्मक ढाल हुनकर ऐ कथनमे सेहो अबै छन्हि। अत्यधिक घृणा प्रेमक दोसर रूप तँ नै अछि जे धैन सन सँ विपरीत अछि, आ अरविन्द ठाकुर अन्हारक विरोध मे क विरोध ओइ अतिशय घृणा जे प्रेमक दोसर रूप अछि आ धैन सन सँ विपरीत अछि, क प्रतीक तँ नै अछि!- से आगाँ देखब। अंतोन चेखवक अरविन्द ठाकुर द्वारा उद्घृत कथन- “हमरा ओइ सगर लोकसभसँ बेसी भय लगैत अछि जे हमर कथा सभकेँ लोकप्रिय आ प्रचलित मान्यताक कसबट्टीपर परखबाक प्रयास करै छथि वा ओइमे कोनो प्रकारक सैद्धान्तिकता खोजबाक प्रयास करै छथि। ने तँ हम रुढ़िवादी छी, ने उदारवादी आ ने विकासवादी। हम कोनो पादरी, उपदेशक वा निरपेक्ष व्यक्ति हेबाक स्वांग सेहो नै भरि सकै छी। हम एकटा स्वतंत्र लेखक छी आ स्वतंत्र लेखक बनल रहब टा हमर अभिलाषा अछि। हमरा लेल मनुष्यक देह, ओकर बुद्धि, ओकर ज्ञान, ओकर आशा-निराशा, ओकर प्रेम, सभ किछु पवित्र अछि मुदा ऐ सभसँ बेशी आदरणीय अछि ओकर स्वतंत्रता, जे झूठ, अहंकार, ढोंग आ क्रूरतासँ मुक्त अछि।” -आ तेँ ओ अपन भाए द्वारा अपन पत्नी संग कएल क्रूरताक विरोध करै छथि कारण से हुनका अपन पिता द्वारा (जे एकटा किरानाक दोकान चलबै छला) अपन माता (जे भरि रूस घूमि कऽ कपड़ा बेचैबला व्यापारीक पुत्री छली आ बड़का खिस्सा कहबैका छली) पर कएल क्रूरताक स्मरण करबै छल। से अरविन्द ठाकुर अपन लघुकथा सभकेँ लोकप्रिय आ प्रचलित मान्यताक कसबट्टीपर नै कसल जेबाक पक्षमे छथि। जाँ जेने आ अंतोन चेखव ऐ तरहेँ परस्पर विरोधी मान्यताक अनुगामी छथि! आ अरविन्द ठाकुर ऐ दुनू प्रतिगामी मान्यताक अनुगामी बनि लघुकथा रचै छथि। खिस्सा सियार यार क समर्थक, विरोधी आ मनबढ़ू शब्दावली लोकतांत्रिक राजनीतिक यथार्थक विवरण दैत अछि, एक्के व्यक्ति कोना क्रमसँ पूजित, घृणित आ हास्यरसिक भऽ जाइ छथि। प्लेटो लिखने छथि जे पढ़ल लिखल लोक राजनीतिसँ दूर रहै छथि, एकर सजा हुनका यएह छन्हि जे ओ मूर्ख द्वारा शासित होथि। नीक, अधलाक बीच रामसोगारथ मण्डलक आदर्श अडिग अछि। पियासल पानि: नारायणपुरवाली क्षणिक आवेशमे सूत्रधारक चुम्बन करै छथि। कथामे ट्विस्ट छै, लगैए ओकरे दोख छै, ओकर पति लखनाक नै। ओकरा बच्चा नै होइ छै, भगतैक बाद ओ भागि जाइ छै। मुदा लखनाक दोसर बियाह ओकर बाप रामचरण करा दै छै, ओकरा होनिहारी छै, लखना बाहर गेल छै, घुरतै तँ बताह भऽ जेतै। मुदा घुरलै तँ ओ सत्ते बताह भऽ गेलै, ओ कहै छै जे ओकर ई बच्चा नै छिऐ। तँ नारायणपुरवाली… सूत्रधार आ रामचरन दुनूकेँ आब बुझेलै जे ओ बेकसूर छलै। भाव, प्रेम आ चरित्रक मान्य शब्दावलीकेँ तोड़ैत अछि ई कथा। चारित्रिक अवधारणा कखनो काल सापेक्ष भऽ जाइ छै, खास कऽ तखन जखन चरित्र महिलाक हुअए। अन्हारक विरोध मे : टाइटल कथा। अलीमुद्दीन अपन टोलमे अपन हिन्दू यारक भाइकेँ मारल जेबापर लज्जित अछि, हबोढकार भऽ कानऽ लगैत अछि। शाहबाज हुसैन, जे सुपौलसँ छथि आ आइ काल्हि भागलपुरसँ सांसद छथि, क एकटा भाषण सुनने रही, ओ कहैत रहथि जे सुपौले एकटा एहेन शहर अछि जतऽ गाइ केर वध नै कएल जाइ छै कारण मुस्लिम समुदाय ओतऽ कहियो कसाइखाना नै खुगऽ देलकै। अरविन्द ठाकुरक ई लघुकथा पढ़ि अनायास ओ गप मोन पड़ि गेल जे ऐ लघुकथाक सफलता सिद्ध करैए। ढाँचा-१९९२- पत्र-शैलीमे लिखल ई लघुकथा। अग्निपुष्पक पत्रिकामे गुजरात दंगापर लिखबापर वर्माजीकेँ कबिलपुरक (जे आब साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य छथि) जातिवादी लेखकक गारियुक्त पत्र प्राप्त भेलन्हि, ऐ वातावरणमे अरविन्द ठाकुर, समधानि कऽ, ई लघुकथा लिखने छथि। ढेर रास एम्हर-ओम्हरक गपक बाद क्लाइमेक्समे ढाँचा-१९९२ खसबाक खबरि टी.वी.सँ बहराइत अछि। मूस: मूस मारबाक दवाइ भरि महाराष्ट्रमे अहाँकेँ नै भेटत, जखन प्लेग आएल रहै तहियो नै भेटैत रहै। ओतऽ गणपति बप्पाक ई वाहन पूजनीय अछि। मुदा ऐ कथाक “ओ” महाराष्ट्रमे नै रहैए। आइ साँझमे ओ मूस मारबाक दवाइ आनत। मूसक बहन्ने मनोविश्लेषण करैत ई कथा आगाँ बढ़ैए। प्रजातंत्र परिकथा: एकटा हत्या भेलै। ई छपलै। ओ डॉक्टर छलै, ओकर हत्या भेलै, ओ डॉक्टर बड्ड मामूली फीस लै छलै, गरीबक डॉक्टर नामसँ ओ ख्यात छलै, से किए नै छपलै? ओइ पत्रकारक असली रूप बुझल छै कमलकेँ। फणीश्वर नाथ रेणुक परती परिकथा क तर्जपर प्रजातंत्र परिकथा बहुत रास प्रजातांत्रिक (!!) कथाक कथा सोझाँ अनैए। ई ऐ संग्रहक सभसँ पैघ लघुकथा अछि, जइमे कोनो घटनाक राजनैतिक लाभ उठेबाक मानसिकताक सूक्ष्म विवरण भेल अछि। तइयो बात खतम नै भेलै, शुरुहो नै भेलै। अथ गिरगिट कथा: गिरगिट रङ बदलबा लेल ख्यात अछि, मुदा जखन मनुक्ख रङ बदलैए तँ गिरगिटो लजा जाइए। पोद्दारजी आ जयसवाल जीक गैंग वार कोना एक दोसराक कम्यूनिटीक वोट बैंक राजनीति बनि गेल, तकर कथा अछि ई, एक गोटे चेयरमैन आ दोसर वाइस चेयरमैन बनि गेला आ नग्रमे पूर्ण शान्ति अछि। कारण अशान्ति हिनके दुनुक कारण छल!! अय्यासी: सूत्रधार “ओ” छथि, ओ घर घुरला, पत्रिका, सिकरेटमे पाइ खर्च केलन्हि मुदा घरक लेल तरकारी आ बेटाक किताब कॉपी नै कीनि सकला। अय्यासीक अनुभव आ परिभाषा ताकि रहल अछि ई कथा। बैकबा-फोड़बा: बैकवर्ड आ फॉर्वर्डक राजनीतिक कथा अछि ई। जखन एकटा बभना उधारी ओसूलीले जाइए तँ से स्वार्थवश बैकवर्ड आ फॉर्वर्डक राजनीति बनि जाइए। मूल समाचार, घटना आ झलकी (दृश्य एक-चारि) मे बँटल ई लघुकथा मैथिली लघुकथाक शिल्प आ कथाक संघर्ष सेहो देखबैत अछि। झलकी दृश्य चारिमे बाल नाटकक बहन्ने कथाकार पूर्ण घटनाक दऽ दै छथि, ई बच्चा सभक बैकबा-फोड़बा खेला बनि गेल अछि। विष-पान: कचहरीक विवरण आ न्यायपालिकाक क्रिया-प्रक्रियाक विश्लेषण अछि ई कथा। तारीख, मेडिकल एक्स-रे गाएब हएब, मोकदमाक सुनबाइ, दोसर कोर्टमे केसक ट्रांसफर… आ सभ किछु। अन्हारक विरोध मे लघु कथा संग्रह अपन विषय-वस्तु, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण आ शिल्पगत प्रयोग लेल मोन राखल जाएत। चाहे ई खिस्सा सियार यारक तीन तरहक शब्दावली हुअए बा बैकबा-फोड़बाक तीन भागमे कथाकेँ बाँटब आ तेसर भागकेँ चारि भागमे बाँटब, आ चारिम भागकेँ लोक सभटा बुझैए, ऐ तरहेँ बुझेबाले बाल नाटक-खेलामे परिवर्तित करब। चाहे ई ढाँचा-१९९२ क पत्रात्मक शैली हुअए बा मूसक मनोविश्लेषणात्मक पद्धति। आकि प्रजातंत्र परिकथाक एकटा न्यूजपेपर रिपोर्ट आधारित कथा। शिल्प आ कथ्यक मेलक ई प्रयोग, नव विषय-वस्तु आन लघुकथा लेखककेँ सेहो प्रयोग करबाक चाही। अन्हारक विरोधमे अरविन्द ठाकुर अरविन्द ठाकुर(१९५४- ) एहन कथाकार छथि जे कनियाँ काकी आ बुच्ची दाइसँ हटि कऽ मैथिलीमे लघुकथा लिखै छथि। अरविन्द ठाकुरक सशक्त पक्ष छन्हि राजनैतिक-आर्थिक लघुकथा सभ। मैथिली कथाक जड़ता कम होइत अछि। सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक कथा तत्वकेँ जोड़ि कऽ लिखल ई मैथिली लघुकथा सभ ढेर रास रिक्तताक पूर्ति करैत अछि। समाज-राजनीति, ब्यूरोक्रेसी-जूडिसियरी सभक साङोपाङ विवेचन भेल अछि। अन्हारक विरोधमे खिस्सा सियार-यार- रामनारायण महराज-एक्स एम.एल.ए. आ भूतपूर्व चेयरमैन सरकारी प्रकाशन कमिटी, तहिया कोनो घोटालामे मुख्यमंत्रीक भाइ रामाधार पांडे, एम.एल.ए. हिनका बचेने रहथिन्ह। गरीबदास आजाद जिला कमिटीक महामंत्री, अनेक बर्ख धरि सोशलिस्ट आ आब महासभा पार्टीमे, बेटा सेहो ट्रेनमे डकैती धरि करऽ लागल छन्हि। शालिगराम राय आ लखन यादव- मनबढ़ू सभ। मीटिंग। राजनाथ झा आ जीबछ मंडलक मुँहे राजनीतिपर किछु पैराग्राफ अबैत अछि। सदानन्द विद्रोही महासभापार्टीक विरोधी दलक स्वयंभू नेता तोफान सिंहक शागिर्द आ हुनका संग एकटा बम विस्फोटमे दहिना हाथ गमेने एकटा जुआन। हुनकर अफसोच करब, रघुबंश मंडलक जिला कमिटीक भाइस प्रेसिडेन्ट बनबामे पांडेजीक दाँव- बैकवार्डकेँ जगह भेटबाक चाही, आ चौधरीजीक प्रतिष्ठाकेँ देखि हुनकर चुप भऽ जाएब! राजमंगल श्रीवास्तव आ सतीश सिंह परमार (छत्तीस बाबू छत्री- मनबढ़ू शब्दावली)। एकावन गोट मेम्बरबला संस्था धेला कमिटीक सर्वेसर्वा परमारजी। श्रीवास्तव आ परमारक जोड़ी कुख्यात- अलग-अलग रहलापर दुनू गोटे एक दोसराकेँ गारि पढ़ै छथि मुदा रहै छथि संगे। पूर्व प्रखण्ड अध्यक्ष शनिचर “शनि” गाजा आदिक अनवरत सेवी आ वर्तमान युवा अध्यक्ष गणेश गुरमैता पेटीशनबाज। चटर्जी दा- पटनासँ फोनपर रहै छथि- चौधरीजी आ पांडेजीक विरोधमे चौबेजीक संगे फ्रंटक नियार छन्हि। शनि-गुरमैताकेँ परमार गपमे ओझरा लै छन्हि तँ क्यो गोटे दुनू गोटेकेँ फुसियाहीं कऽ सोर करै छन्हि आ त्राण दियाबै छन्हि। जटाशंकर मलिक प्रसिद्ध माखन बाबू (सभ नट वोल्टपर फिट हुअएबला सलाइ-रिंच- मनबढ़ू शब्दावली)। अपनापर ध्यान आकर्षित करबा लेल पारसमणि चौधरीकेँ सोर करै छथि आ हुनकर प्रणामक उत्तर तीन प्रणामसँ दै छथि। हुनकर कार बेटा बौका बाबू (सम्प्रदायवादी पार्टीक मेम्बर) लऽ गेल छन्हि आ जीप खराप छन्हि, दुसधटोली बलाक पंचैती करबाक छलन्हि से रिक्शा मँगबाबऽ पड़लन्हि। च्यवनप्राश खाइते रहै छथि- राघोपुरसँ होमियोपैथिक इलाज करेने छथि। सीता बाबू महासभा पार्टीक प्रखण्ड अध्यक्ष (माखन बाबूक बहु- मनबढ़ू शब्दावली)।सुबोधनारायण सिंह प्रसिद्ध सुबोधजी। एक्स.एम.एल.ए. आ एक्स अध्यक्ष जिला महासभा पार्टी (समर्थक शब्दावली- जिलाक गाँधी, विरोधी शब्दावली- नटवरलाल आ मनबढ़ू शब्दावली- मुँहदुबरा)। सादगी रहन-सहन, विनम्र। रामाधार पांडेजीक भाए मुख्यमंत्री शिवाधार पांडेक प्रति समर्पित। मुदा चौधरीजीसँ बेसी सटबाक सजा शिवाधारजी हिनका पार्टीक उम्मीदबारी वापस लेबा लेल कहि कऽ देलखिन्ह। राजीव शर्मा-गलतफहमीक शिकार- जे छल-प्रपंच, फूसि आ विश्वासघातक बिना सेहो राजनीति कएल जा सकैत अछि। ठाँइ-पठाँइ बजै छथि आ से मनबढ़ू सभ कटाह कहै छन्हि। सुबोधजीक कहलापर जे शिवाधार बाबूक फोन एलन्हि तेँ हुनका नाम आपिस करऽ पड़लन्हि, ओ कहै छथि जे ऐ लुच्चा-लफंगा सभक सरदरबाक गोल्हड़ी झाड़ि देबनि हमरा सभ। ओतै रामसोगारथ मंडल सेहो छथि, स्वतंत्रता सेनानी मुदा सम्मान-पेंशन अस्वीकार कऽ चुकल छथि। कियो कहै छन्हि तँ कहै छथिन्ह जे जाउ बाउ जाउ, ई गप सुन्नर ठाकुरकेँ सिखेबन्हि जे मुनिस्टर सभक केश-दाढ़ी बनबैत सुराजी पेंशन हथिआ नेने-ए। आ तखने अनघोल, फेर बाजी मारि लेलन्हि चमोक्कनि! आ माखन बाबू बड़का गाड़ीसँ उतरैत रामाधार पांडेक गरामे माला पहिरा दै छथि। फेर एकाएकी माला पहिरेबाक चलन आ फेर एकाएकी भाषण-भाख। आ ओम्हर रामसोगारथ मंडलक सपनामे कारी-कारी भयावह आकृति सोनहुला सपनाकेँ चारू कातसँ घेरि लै छन्हि। पियासल पानि- रामचरनक खेती करब, आब हरबाही मुदा ओकर बेटा लखनाक माथपर छै आ तखने ओकर गौना होइ छै आ अबैए नारायणपुरवाली। लेखक वा कथाक सूत्रधार कनियाँक मुँहदेखाइ लेल जाइ छथि आ देखै छथि ओकर अपार रूप-राशि। लखनाक काकी बेरियाबाली ठट्ठा करै छन्हि आ ओ बहार भऽ जाइ छथि। नारायणपुरबाली एक दिन सूत्रधारक पएर जाँतऽ लगै छथि। रोपनी, डोभनी, कटनी आ कमौनी, कोनो काजमे नारायणपुरवालीक जोड़ नै। एक दिन अन्हरगरे सूत्रधार खेतमे कटनी करबऽ बिदा होइ छथि तँ आमक कलम लग नारायणपुरवालीक आतुर ठोर हुनकर गाल, माथ आ कंठपर निशान छोड़ि दै छन्हि। मुदा तखने घरैया नोकर सरजुगबाक अबाज अन्हारसँ अबै अछि आ बज्जर खसाबथुन भगवान ऐ दुसमनमापर- कहैत निराशा, लालसा आ घृणासँ कुंडाबोर नारायणपुरबाली आगाँ बढ़ि जाइ छथि। ओम्हर नारायणपुरवालीपर डाकनी सवार छै से घोल होइए, देहपरक कपड़ा-बस्तर ओ फेकि लैए। मोतिया दुसाध दारू पिबैए, बरहम बाबाक परसादी आ फेर भगता बनि सात टा काँच करची नारायणपुरवालीक देहपर तोड़ि दैत अछि। आ डाकनीकेँ हरदुआरक श्मशान पीपर गाछपर भगा दैत अछि! भागि जाइए नारायणपुरवाली। दोसर बेर लखनाक बियाह होइ छै मुदा ऐबेर सूत्रधार एगारह गो टका अनका दिया पठा दै छथि। कनियाँक होनहारिक खबरि सुनि रामचरन प्रसन्न भेल मुदा लखना अपन कपार फोड़ि लैत अछि, कारण ओ नामरद अछि। नारायणपुरवाली... लछमी छलै, बेकसूर, बेचारी, अभागलि। अन्हारक विरोधमे- हो हल्ला। कथाकार वा सूत्रधार बहराइ छथि आ पहुँचै छथि अलाउद्दीन लग। कहै छन्हि अलाउद्दीन, मुसलमान कुजड़ा। जनारदन चौधरी ओकर यार। ओकरे टोलमे बिकुआ ओकर ऐ यारक भाइकेँ गारि पढ़लकै। ओकर बेहुदपनीक शिकाइत लऽ कऽ जनारदनक भाइक आएब, भैया कहि सोर पारब, मुदा तखने बिकुआक मारब आ तखने ओकर घरक मौगी सभक ओकरा गारि पढ़ब शुरू भेलै। आ उनटे हिन्दू-मुसलमानक शगूफा सेहो छोड़ै रहै। कोन इज्जति रहि गेलै ऐ टोलक। आकि तखने, चारू दिस अपन डराओन छाँह पसारने अन्हारक छातीकेँ चीरैत बिजलीक जगमग इजोत दूर-दूर धरि पसरि गेल। ढाँचा-१९९२- कथाक सूत्रधारक चिट्ठी। स्वीकारोक्ति जे, जे किछु लिखा गेल छन्हि से वातावरणक दवाबमे। हालेमे जॉन्डिस भेल छलन्हि, जीहकेँ रास लगा कऽ पड़ल छला। रौद, गरदा आ धुँआसँ अकच्छ छथि। एकटा आर विचित्र बेमारी, देहमे तेज हउहटि आ चमरापर नहुँ-नहुँ चकत्ता उभरऽ लगै छन्हि। एक दिन सहरसासँ घुरै छला आकि स्कूटर खराप भऽ गेलन्हि। मिस्त्री आधा घंटामे स्कूटर ठीक करबाक गप कहलकन्हि मुदा पाट-पुरजा खोलि कऽ छिड़िया देलकन्हि आ चारि घंटा लगलन्हि। सुपौल घुरि डॉ. दासक क्लिनिक गेला, होमियोपैथिक दवाइक बुन्न असरि केलकन्हि मुदा घंटा लागि गेलन्हि। एक बेर सासुरसँ घुरै काल सेहो एहिना भेलन्हि। एक तँ पत्नीसँ बिछोह आ दोसर हाड़ कंपकपाबय बला ठार आ सिहकैत हबा! गोष्ठी, प्रो. राजेन्द्र, डॉ मुखर्जी आ के.के.इन्स्टीट्यूट ऑफ मैडोलॉजीक प्रिंसिपल झा। प्रो. राजेन्द्रक डॉ मुखर्जीसँ कहलापर जे इलाजक फीस पाँच टका तँ दऽ देब मुदा दबाइ देबऽ पड़त मुफ्तिया, फिजिशियन सैम्पल। तइपर मुखर्जीक कहब जे मेडिकल रिप्रेसेन्टेटिव सभ हुनका घासो नै दै छन्हि आ ऐ लेल तँ डॉ. दास लग जाए पड़त। फेर अयोध्यामे बाबरी मस्जिदक ढाँचाक ध्वस्त हएब। सूत्रधारक देहक कँपकँपी, हउहटि, चकता आ सूजन फेरसँ। कोनो प्रत्यक्ष कारण नै रहए एकर, मुदा तैयो हुनकर देह एकरा भोगने छलन्हि। मूस- ओ आ ओकर दवाइक दोकान। नवका ड्रग इंस्पेक्टर ऐ दुर्गा पूजामे पाँच सए टाका सलामी लऽ गेलै। दोकान थसे जकाँ लेने छै। अनुज बैसै छै दोकानपर। भुमिहार पेंच भिड़ाओत आकि दोकान करत! बैंकक पुरना लोन, घरक पाँच सालक बिजलीक बिल।.. जेठका सार नागपुरमे एकाउन्टेन्ट छै, सनगर नोकरी आ सेहन्तगर कनियाँ छै। जे ओ जादूगर रहैत आ तखन गिली-गिली फू आ अलाउद्दीनक चिराग जे रहितै ओकरा हाथमे तखन! मुसबा तँ परेशान केने छै, खाइतो काल, मुदा एखन ओकरा एक्को रत्ती तामस नै उठै छै। ई शहर अनुमण्डलसँ जिला मुख्यालय भऽ गेल छै, जमीनक दाम बढ़ि गेल छै। जमीन बेचि सभटा कर्जा-बर्जा सधा देत। निन्नक बदलामे पारदर्शी बुनबुना आ विभिन्न आकृतिक आ रूपक मूस, कुतरैत, लड़ैत, नचैत, प्रेम करैत, पोथी पढ़ैत आ रम्मी खेलाइत मूस। दोसर बेर बड़का टा बुनबुन्ना, मूसक कारणसँ प्लेग। मेहनतकश मूस बिहरि बनबैत अछि मुदा साँप ओइमे रहैत अछि। अचकचा कऽ ओ उठि गेल। स्वर्गीय पिताक चित्र देखैत अछि। पूर्वजक अर्जित सम्पत्तिक उपयोग साँपे जकाँ करत? केआरीमे अनेरुआ घास-पात खुरपीसँ साफ करऽ लागल। प्रजातंत्र परिकथा- एकटा हत्या आ दू टा घरमे डकैती। कमल कुमार शर्मा ऐ खबरिकेँ देखैत अछि, सेन्सर्ड सन खबरि। ऐ गपक चर्चा नै जे ओ डॉक्टर के.पी.भगत सेवानिवृत्त छल आ मामूली फीस लै छल। ओकर घरमे डकैत सभ गरीब मरीज आ ओकर परिजन बनि पैसल छल। ओइ पत्रकारपर कालाबाजारी आ मिलावटक केस अखनो लटकल अछि से ओ कोना लिखितए जे ओइ घरसँ पुलिस थाना अगबे एक सए डेगपर आ आरक्षी महोदयक निवास अगबे साठि-सत्तरि डेगक दूरीपर छलै। फेर डॉक्टर ओइठामसँ ओ सभ, राष्ट्रपति पदक प्राप्त हालेमे रिटायर भेल शिक्षक विक्रम प्रसाद वर्माक घर पहुँचि गेल, डकैती सेहो केलक आ खेनाइ बनबाकऽ सेहो खेलक। विक्रम बाबूक भाइ गजानन बाबू आरक्षी अधीक्षकक ओइठाम नजरि बचा कऽ पहुँचि गेला। मुदा तैयो किछु नै भेल। अस्पतालक हाताक मुख्यद्वारपर लोक सभ जुटि गेल। मधुरेश किशोर द्विवेदीक केमिस्ट आ ड्रगिस्ट एसोसियेशन एकरा नेतृत्व दऽ रहल छलै। स्कूलसँ घुरैत बेदरा सभकेँ किछु भऽ जाए..। वक्ता सभ शुरू- दलाल ईश्वर चौधरी, भड़ुआ मुरलीधर अग्रवाल, मटिया तेल फेंटि कऽ पेट्रोल बेचनिहार पत्रकार, चोरिक माल खरीद-बिक्री केनिहार नगरपालिका चेयरमैन बुचनू बाबू, मुनीमक कृपासँ चारिटा संतानक बाप पचीस वर्षीय सेठानीक साठि वर्षीय पति कालाबजरिया सेठ कनकधारीमल- ध्वनि विस्तारक यंत्रपर ओकर हँफसबाक स्वर छोट-मोट अन्हड़क भ्रम दै छल। बार एशोसिएशनक अध्यक्ष ज्ञाननाथ सिंह जे खूनी आ डकैत सभक पैरवी करै छथि, बाढ़ि प्रभावित इलाकाकेँ डिजनीलैण्डमे परिवर्तित करबाक मुफ्त योजना प्रस्तुत करएबला गंजेड़ी छुटभैया कृष्णानन्द तिवारी.. गोरका डाक्टर धरमचन्द सहाय जकरा बुझनुक लोक सभ डी.सी.एस. माने दारू, छौड़ी, सार-बहानचो कहै छथि.. ओकर धीपल-तबधल शब्द सभ। फेर भीड़क नेतृत्वहीन हएब, प्रतिनिधिमंडल नै जन-समूह द्वारा डाइरेक्ट वार्ता करबाक गप, आ एनामे टैरेसपर ओल्ड फॉक्सक अन्तर्राष्ट्रिय समस्या सभपर बकथोथी। तखने मोटरसाइकिलक एकटा सवार भीड़केँ नियंत्रणमे लेमऽ चाहैत अछि, ओ बंदा एकटा संप्रदायवादी दलक नव्यतम रंगरूट छल। मधुरेशजी सावधानी बरतै छथि। एकटा धग्गर आ टटका जनमल नारा कमल आ अनकर ध्यान आकृष्ट करै छन्हि। फेर अबै छथि प्रदीप क्रान्तिकारी जे समाजसेवाक वशीभूत अभियन्त्रणक पढ़ाइ छोड़ने छथि वा निशाबाजी आ बलात्कारक कारण निष्कासित कएल गेल छथि। अनुमंडलाधिकारीक जीपपर आक्रमण होइत अछि। प्रदीप क्रांतिकारी कहैत अछि- कोयला लाइसेंसमे सात हजार टका चाही हरामजदाकेँ। देखलहक तूफान। मधुरेशजी किछु आर गोटेकेँ संगमे लऽ लेने छला जेना गजेन्द्रजी- स्थानीय कॉलेजक व्याख्याता आ व्यापारी संगठनक माधवजी आ कृष्णमोहनजी। बिना अप्रिय घटनाक भीड़ गाँधी चौक आ जयप्रकाश चौक पहुँचल। तखने मिठाइ दोकानपर बैसऽबला गोल्डिया जे क्रिकेट सेहो खेलाइ छल आ तहूमे बॉलक सुविधाक ध्यान रखै छल- बैटपर आबि गेलै तँ छक्का आ नै तँ क्लीन बोल्ड- से सरकारी गाड़ीकेँ देखि मार..आगि लगा दे.. बाजि उठल। किछु लोक गाड़ी दिस दरबर मारलक, मुदा गाड़ीक चालक गाड़ी भगौलक। न्याय चौक वा नबाब चौक पर विश्व हिन्दू सेनाक सेनानी सभ बजरंगबलीक स्थापना कऽ देने छल कारण तराजू आ आँखिपर पट्टी बला मूर्ति नै लागि सकल रहए। बजरंग चौकक बोर्ड लागि गेल रहए। प्रशासनमे ओइ समए दलित अधिकारी सभक बाहुल्य छलै आ ओ सभ चौकक नाम अम्बेदकर चौक करऽ चाहै छला से ओ सभ बजरंगबलीकेँ गिरफ्तार कऽ थाना लऽ गेला जतऽ सुनै छिऐ आइयो हुनकर पूजा कएल जाइ छन्हि। से ई चौक नगरपालिकाक पार्श्वमे रहलासँ आब नगरपालिका चौक कहाइत अछि। अनुमंडलाधिकारी फोर्स लऽ कऽ एतऽ आबि गेल आ सभ मिलि लाठी भाँजऽ लागल। पुलिसबला सभ दूर धरि दरबर मारि रहल छल। मुदा फेर लोक सभ गर धऽ कऽ रोड़ा फेकब प्रारम्भ केलक। पुलिस असबार भऽ भागल.. एकटा हिटलर कट मोँछबला इंस्पेक्टर आएल.. बरगाँही सभ ओकर गाड़ी लऽ भागल रहै! अनुमंडलाधिकारी आ दोसर सभ हाँइ-हाँइ जीपमे बैसि कऽ पतनुकान लऽ लेने छल। कमल नजरि खिरओने छल। गोल्डी ओकरासँ बहस केलकै तँ अमजद अली कमलक बाँहि गसिअयने ... क्रुद्ध चीता आ कूढ़मगज महिषक बीच दर्जन भरि लोक..। राजनैतिक आ सामाजिक गुटबन्दीसँ बाहरक लोक ठकुरसोहाती नै जनै छला। ने छल.. कथी लेल एकर सभक मुँह लागै छी। दू गोट गिरफ्तार संगीक रिहा करबाक माँग.. मुदा अधिकारी सभ अपन रक्षार्थ तइ लेल तैयार नै छला। लोफरकट डी.एस.पी.क मबालीकट अशिष्ट बोली..। मधुरेशजी बजला- अहाँ सभकेँ निखत्तर जेबाक सिहन्ता हुअए आकि निछक्क जयपंथीए घेरने हुअए तँ..। बन्हककेँ छोड़बापर सहमति भेल। मनुक्खक कोन कथा कोनो कागपंछी नै देखाइ छलै.. महाभारत समाप्त भेलापर की कुरुक्षेत्रो एहिना निसबध भेल हेतै। बेदरा सभक एकटा गोल क्रिकेट खेलेबाक लेल मैदानमे प्रवेश कऽ रहल छल। अथ गिरगिट कथा- मुक्कन बाबू माने मुकुन्द जायसवाल- जनवितरण प्रणालीक दोकानक एकटा डीलर। ऐ नामक एकटा दरोगा सेहो आएल छल आ खूब हँसोथि कऽ गेल छल। रामलखन पोद्दार, बी.एस.सी. ऑनर्स, वल्द किशन पोद्दार, चाह-पान बेचऽबला, टॉपर मुदा नोकरी लेल जुत्ता खिआ गेलै। नगर-हबाक नापबाक यंत्र- कायराना भद्रताक पचहत्तरि प्रतिशत, स्वार्थाना यारीक बीस प्रतिशत आर मिसलेनियस वाइरस पाँच प्रतिशत अनुपातमे उपस्थित रहत। एकटा गोदाम सन मकानमे अछि पुलिस फाँड़ी आ तकरे सटल दारूक भट्ठी! एक दिन अनायासे दुनूक अहं सोझाँ-सोझी होइ छन्हि जखन मुकुन्द पुलिस फाँड़ीसँ फराकैत भऽ निकलै छथि आ रामलखन भट्ठीसँ। झगड़ाक बाद पुलिसबला सभक सहानुभूति मुकुन्दक प्रति रहए आ भट्ठासँ बहराइबला सभक पोद्दारक पक्षमे। रामलखन पोद्दार गिरफ्तार भऽ गेल आ भोरमे ओकर बाप पुलिसबलाकेँ फूल-पत्ती चढ़ा कऽ ओकरा छोड़ओलक। फेर मुक्कन बाबू एक सोड़ह लोक लऽ नशा विरोधी नागरिक मंच बनेलन्हि आ भट्ठीपर धरना देलन्हि। ई सोलह गोटे छला सात गोट पितिऔत-ममिऔत-पिसिऔत-मसिऔत, दू टा हरबाहा, धनकुट्टा मशीनक आपरेटर, तीन कुख्यात मित्र आ कुलपुरोहितक दू टा लफंगा पुत्र। मुदा एम्हर पोद्दारजी अधिकार सुरक्षा हेतु ३६ गोटेक संगे आबि गेला। नशा विरोधी नागरिक मंचक सेनापति लंक लऽ पड़ेला तँ शेषकेँ धरपटांग उठा देलकन्हि। फेर मारि-पीटक क्रम शुरू भेल। रंगबाजी स्पेशलिस्ट सुब्रत मुखर्जी एकरा गैंगवार कहै छथि। मुदा तखने नगरपालिकाक चुनावक घोषणा भेल। स्वार्थाना यारीक वाइरस शीवाज रीगलक सोझाँ रंग धेलक। मुक्कन बाबू चेयरमैन छथि, पोद्दारजी वाइस-चेयरमैन। नगरमे शान्ति अछि। अय्यासी- दोसराक संग बैसलमे मौज मुदा पत्नीक बोल- तरकारी लेल दसटकही.. किराना समान काल्हियो-परसू जे आबि जाए। दोसक ओतऽ बिदा भेल, बेटाक गप नै सुनऽ चाहलक। पटेल चौक.... महात्मा गाँधी चौक पहुँचल। संगमे बिसटकही। रिक्शाबला अपन टोपर तानि कऽ सुस्ताइत रहए। रिक्शापर बैसल, रस्तामे दोस लेल दू टाकाक सिकरेट लेलक, अपन फेवरिट पत्रिका मोर बारह टाकामे, आ चारि टाका रिक्शाबलाकेँ देलक। दोसक घरमे पंखाक हबासँ किछु आफियत अनुभव भेलै। बचल दू टाका ओकरा मुँह दुसलकै, घरक तरकारी आ बेटाक किताब-कापी.. घर घुरल देह घामसँ कुंडाबोर। पत्नीक फुलल-लाल आँखि देखि लगलै जे अय्यासी कऽ घुरल हुअए। बैकबा-फोड़बा- मूल समाचार- मतायल हवाक पेट्रोलकेँ स्वार्थक सलाइ देखौने छल। घटना- प्रकाश अगरवालक फर्म “वृद्धिचन्द भँवरलाल वस्त्र भंडार”- उधारीक रकम लाख ठेकि गेलै तँ स्वरगीय रघुनाथ झाक पुत्र अठमा फेल मातृविहीन अबंड सिकन्दर झाकेँ वसूली लेल राखलक। ऐ क्रममे ओ पहुँचल एक दिन रामचन्द मड़र लग, ओकर बेटा कालेश्वर मड़र जे आब नाममे यादव लिखै छल चारि बरख पहिने तीन हजारक थ्री-पीस सूट बनबेने छल। मुदा बाप ओकर ऋणक मादेँ मना कऽ देलकै। रस्तेमे पान खेबाक क्रममे मुन्ना ठाकुरक दोकानपर कालेश्वर यादवसँ ओकरा भेँट भेलै, कालेश्वर संगे परिवारक लोक आ कुटुम्ब सेहो छलै। पहिने सिकन्दर जे फिरंटगिरी करै छल सएह आइ काल्हि कालेश्वर करै छल से तगेदापर मारि बजड़ि गेल। सिकन्दर ओकरा छातीपर चढ़ि गेल। सिकन्दरक पुरनका संगी सभ जुटि गेल आ कालेश्वरक कुटुम्ब सभकेँ धोपलक। फेर दोसर दिन पिछड़ा एकताक जुलुस निकलल आ वस्त्र भंडारक शीसा फोड़लक। मुदा लठैत सभ आबि लाठी बरसाबऽ लागल। जकर जेने सिंग अंटलै, ओम्हरे पड़ाएल। लूट, अराजकता..पसरि गेल। झलकी- दृश्य एक: जिलाध्यक्ष पुऋषोत्तम मंडलक स्वर, अठारह कोठली आ दू टा बड़का-बड़का हॉलबला राजनीतिक दलक कार्यालयमे। सद्भावना जुलुस निकलत.. शिष्य चिरंजीव सिंह, पार्टीक युवा मंचक अध्यक्ष आ मंडलजीक घोर समर्थक। मुदा ओ तामसे घोर भऽ जाइत अछि- अहाँ सेहो छोट जातिक छी से ओकरा सभक पक्ष लेबे करबै। बहरा जाइत अछि। दृश्य दू: फूसक घर। धनीलाल, रामनारायण। बैकबा-फोड़बा की होइ छै। मटरू की जानय। किछु काल चुप रहलाक बाद आल्हा टेर देने अछि। दृश्य तीन: कामरेड रामसेवक साहुक चाह-नाश्ताक दोकान। बहस.. विद्यानिवासजीक भाषण, जाति नामक कोनो वस्तु नै। हुनका पागल कहि क्यो छौड़ा बहरा जाइत अछि। दृश्य चारि: टिफिनमे बच्चा सभक खेल: घास-फूस बला घर हमर आ हम बनब जादब। दोकान बिरजूक आ ओ बनत बाभन। दुनूमे झगड़ा हएत आ लल्लू, मोहन, नरेन आ बबलू आएत आ हमर घरमे आगि लगा देत। तखन सुरेश बनत नेता आ विनोद बनत दरोगा। सुरेश दरोगाकेँ कहत जे एकरा दुनूक घर-दोकान बनबा दियौ आ पकड़ि कऽ लाउ। सुरेश दुनुक हाथ मिलबाकऽ दोस्ती कराएत। बैकबा-फोड़बा खेल भरि टिफिन चलैत रहल। विष-पान- वकालतखानाक कुर्सीपर बैसल गोपालजी कछमछाइ छथि। कचहरीक द्वारपर सुग्गाबला जोतखी बैसल छथि। ओतै एकटा बैनर सेहो अछि, आँखिक रोशनी बढ़बऽ बला ममीरा सुरमा। अदालतिक बरंडापरसँ अर्दली रामेसर मंडल वल्द जागेसर मंडलकेँ चिकड़ैत अछि, मोकील वकीलकेँ अगिला तारीखपर बाँकी-बकियौता देबाक गप कहै छन्हि मुदा ओ कलमक उनटा छोरसँ कान खोदैत रहै छथि। गोपाल सुनै छथि। गोपाल, एक दिन पानबला दोकानपर चतुरानन लाठी लेने आएल आ बरसाबऽ लागल। ओ खसि पड़ला। बाबूजीक पुरान नोकर नेनिया आबि चतुराननकेँ बजाड़ि दैत अछि मुदा ओ मौका देखि भागि जाइत अछि। रामप्रसादक साठि वर्षीय माय मरौनावाली सभसँ पहिने गोपालक सुधि लेलक। फेर गोपाल अस्पताल आनल गेल। चतुरानन सेहो ओतऽ आएल रहए इलाज आ इन्जरी रिपोर्ट लेल, मुदा क्यो चीन्हि गेलै आ जरनाक चेरासँ ओकरा मारि कऽ भगा देलकै। चतुराननकेँ सभ आदि अपराधी कहै छल मुदा गोपाल ओकरा सुधारै लेल प्रयासरत छला। से आब ओ भस्मासुर बनि गेल। पुलिस चतुराननसँ पाइ असूललक आ ओ घरेमे रहै छल। प्रगतिक तारीख केसमे पड़ैत रहलन्हि आ हुनकर एक्स-रे प्लेट सेहो अस्पतालसँ निपत्ता भऽ गेल। तीन बर्खक बाद गबाही शुरू भेल आ फेर शुरू भेल जिरह, ओइ दिन भरि बाँहुक कमीज पहिरने छला, कालर आ जेबी रहै वा नै, रंग..। जे लाठी बजरलन्हि तकर लम्बाइ, बनावटि..। वकील मित्र.. मुदा एक दिन स्वरक तुर्शी नुकाएल नै रहलै, देखै छिऐ मोकील सभकेँ आखिर पाइ देने अछि तँ ओकर सभक काजकेँ प्राथमिकता तँ देबहि पड़त। आ ओइ दिन गवाही नै गुजरि सकल.. फाइलपर हाकिम विपरीत टिप्पणी कऽ देलन्हि। चतुरानन तीन हजारमे गप फिट केलक जे ओइसँ बेशी अहाँ दऽ सकी तँ..। एंटी-पार्टीक वकीलक मार्फत वकील-मित्र लग ऑफर सेहो आएल छलन्हि। मुदा गोपालक कहलापर कोर्ट ट्रांसफर करेबाक प्रक्रिया शुरू भेल। मुदा कोर्ट ट्रांसफर भेल शीलभद्र झाक कुटमैतीमे जे गोपालजीक राजनैतिक प्रतिद्वन्दी छला आ चतुरानन आइ-काल्हि हुनके छत्र-छायामे छल। मेल पेटीशनपर गोपाल दसखत कऽ दै छथि, आत्मसमर्पण जेना भारत-पाक युद्धमे एक लाख सेनाक संग जनरल नियाजी कएने छल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह) लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश) क मैथिली अनुवाद लेल। विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.१.अरविन्द ठाकुरजी संग साक्षात्कार मुन्नाजी द्वारा २.अरविन्द ठाकुरजीक नामसँ किछु पत्र २.२.आलोचना खंड--१.बहुरूपिया रचनामे- ओमप्रकाश झा २.अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर- आशीष चमन ३.अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि -डा योगानन्द झा ४. बहुरुपिया प्रदेश मे : एक दृष्टि- राम चैतन्य धीरज ५. अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चंद्र ठाकुर"अनिल" ६.अन्हारक रखवार -योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ ७.अरविन्द ठाकुर : व्यक्तित्व आ कृतित्व- अरविन्द मिश्र नीरज ८. स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे- परमानन्द प्रभाकर ९. सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि- अरविंद श्रीवास्तव १०. परती टूटि गेलै- मुन्नाजी २.३.संस्मरण खण्ड- १.अद्वितीय छथि हमर अरविन्द बाबा- रजनीश कुमार तिवारी (मुन्ना) २. हाली-हाली बहथु कोसी- शैलेन्द्र आनंद ३.अरविन्द ठाकुरःअन्हारक विरोधी व्यक्तित्व -मिथिलेश कुमार राय ४. अरविंद ठाकुरः हमरामे अहाँ, अहाँमे हम- अजित आजाद ५. जेहने खोजलऽ हौ कुटुम्ब- लक्ष्मणझा सागर २.४.आत्मकथा खंड- १. बुल्लियाँ की जाणां मैं कौन (अपनाकें खोजैत किछु अप्पन बात)- अरविन्द ठाकुर  २.बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल ( एकटा बहु-अर्थी निरर्थक चलभाष–वार्ता सुकांत सोमजीक संग )- अरविन्द ठाकुर ३.संस्मरण- बाबा सँ पहिल आ अंतिम भेंट:बाबाक विराट स्मृति-पटल - अरविन्द ठाकुर ४.जीवकान्त : किछु स्मृति, किछु टिप्पणी- अरविन्द ठाकुर १.अरविन्द ठाकुरजी संग साक्षात्कार मुन्नाजी द्वारा २.अरविन्द ठाकुरजीक नामसँ किछु पत्र १ अरविन्द ठाकुरजी संग साक्षात्कार जे  मुन्नाजी आन-लाइन लेने छथि-- # 1 # वर्तमान गज़ल कोन दिशा मे अछि ? वर्तमान गज़लक दिशा हमरा बहुत स्पष्ट आ सोझराएल नहि बुझाइत अछि। कने भुतलाएल आ भ्रमित जकाँ अछि। हमर अपन गज़ल ( जेकरा किछु गोटे आजाद गज़ल वा गज़लनुमा कहए छथि ) मे जोर विचार आ विषय पर रहल  अछि, बात कहबा पर रहल अछि आ एहिमे कनेक हद तक व्याकरणक सभ अंगक खेयाल नहि राखल गेल अछि। ई व्याकरणक अनदेखी सप्रयास नहि, संशयसँ त्रान पएबाक लेल अछि। “संशयात्मा विनश्यति” हमर ध्यानमे रहए आ जखनि व्याकरण बाधा बनि संशय उत्पन्न करए, हमर अवचेतनक अनायास प्रयासक परिणामस्वरुप कात होइत चलि गेल अछि। व्याकरणक बन्धनसँ भागब आ ओकर समझक कमी सेहो हमर सीमा भए सकैत अछि किन्तु ओ बात अलग। एक बातमे हमरा कनिकहु संशय नहि अछि जे मुकुट पहिर लेब मथदुख्खीक उपचार नहि अछि आ अपन घड़ीसँ संसारभरिक घड़ी मिलाएब उचित नहि अछि। अन्य बहुतरास गजलगोसभक जोर गज़लक व्याकरणपर छनि किन्तु हुनकासभक नाराजगीक संभावनाक बादो हमरा ई कहएमे संकोच नहि जे एहि बेसीतर गज़लसभमे “ क्या बात है !” बला बात नहि आबए छै , कहनमे डंक नहि बुझाइ छै। एतय हमरा महर्षि अरविन्दक कथन “ मात्र ब्रेन-माइण्डसँ जुनि लिखू। भावना आ विजनक आत्माक भीतर पहुँचिकए लिखब कविता लिखबाक सही ढंग अछि…“ आ दिनकरक कथन “ किछु कवि एहनहु अवश्य होइ छथि जे मात्र काफ़िआ आ अन्त्यानुप्रासक संकेतपर अनुकूल भाव जुटाकए पूरा गज़लक-गज़ल लिखि जाइ छथि, किन्तु काव्य-रचनाक सामान्य पद्धति ई नहि अछि। कविता त प्राय: एहि लेल रचल जाइत अछि जे कविक हृदयमे पहिने भाव आबैत अछि आ तखनि ओ ओकर अनुकूल छंद, रीति आ तुकक चयन करैत अछि अथवा आवश्यकता पड़लापर छंदोबद्धहिकें तोड़ि दैत अछि……“ उद्धृत करबाक बेगरता बुझाइत अछि। कतओ हम पहिने लिखि वा कहि चुकल छी जे मैथिलीक मिजाज गज़लक बहुत नजदीक नहि छै। ई अलग बात जे मैथिलीमे गज़ल लिखब असंभव नहि छै किन्तु कठिन त  छैहे। जखनि साहित्य अकादमीसँ विधिवत स-राशि प्रमाणपत्र प्राप्त माया बाबू सन दिग्गज एहि मामलामे थस मारि सकए छथि आ एहि थस मारएकेँ सकारि सकए छथि त किछु ने किछु गड़बड़ त कतहु छै ! तेँ हमरा लागैए जे साहित्यकार लोकनि गज़ल कहैत रहबाक दुस्साहस त करिते रहता किन्तु गज़लक स्थान मैथिलीमे बहुत सम्मानप्रद रहत आ एकरा महत्वक विधा मानल जएतैक ,से संभावना कम जकाँ छै। # 2 # अहाँसभ हिन्दीक दुष्यन्त कुमार, अदम गोंडवी आदिकेँ अपन आदर्श मानै छिऐ मुदा हुनकर सभहक गज़ल पूरा-पूरी बहर-ओ-व्याकरण मे अछि, तखन मैथिली गज़ल मे अहाँ व्याकरण नै मानै छिऐ तकर की कारण ? साहित्य लेखन कोनो आइसँ प्रारम्भ भेल काज नहि छै। ई आदिकालसँ अनवरत चलि रहल अछि आ एकदमसँ विभिन्न आ विरोधाभाषी दौरसभसँ गुजरल अछि। कहिओ वन आ ओतय निर्मित आश्रमक एकान्तमे एकर साधना होइ छल आ कहिओ महल-राजमहलक प्रश्रयमे एकरा बुनल-गुनल जाइत रहल अछि। आश्रमक लिखल साहित्य प्रकृतिक बुनल सांसारिक संरचना आ स्वयंकें बुझबाक प्रयासक प्रतिफल छलै जखनिकि राज्याश्रयक साहित्य अपन मालिक-मलिकारक आमोद-प्रमोद आ हुनक कृपा प्राप्त करबाक लेल होइत छलै। अजुका युग ताहिसभसँ बेलगट अलग युग अछि आ एकर साहित्यक उद्देश्य बदलि गेल अछि आ तें वर्तमान साहित्यक ओजन आ तरजू-बटिखरा वएह नहि भए सकैत अछि जे पहिनुका युगक छल। जखनि मम्मटक कहब छनि जे काव्यक लेल सम्मितत्रयीक कान्तासम्मितक उपयोग हएबाक चाही त एकर पाछू ई उद्देश्य आ अभिप्राय रहल हएत जे काव्यमे भावक अभिव्यक्ति पत्नीक लेल निर्धारित हाव-भावसँ कएल जाय जाहिसँ पति-परमेश्वर,राज-राजेश्वर आदि सत्ता-प्रतिष्ठान कें नीक लागनि, रोष नहि होइनि। आइ लोकतंत्र अछि आ साहित्यकारकें अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता प्राप्त अछि, पत्नीक भुमिका सेहो बदलल अछि आ साहित्यकार कोनो प्रजापालकक अधीनक पेटपोसुआ नहि अछि। ओकरा लग चुनौती छै जे ओ वाजिब बात कहए, ठोकिकए कहए आ लोकक रोष-निन्दाक परवाह नहि करए। तखनि कोनो कवि अपन अभिव्यक्ति लेल कान्तासम्मितक ठामपर प्रभुसम्मित या सुहृदसम्मित विधिसँ कविता करत त ओकरा शास्त्रविरोधी कहब उचित हेतए की ?  रामधारी सिंह दिनकर कहै छथि जे हुनका समयमे कविता करएसँ पहिने पिंगल पढब अनिवार्य छल। आब कतेक कविकें पिंगलक परिभाषाहु बुझल छनि, पढबाक गप जाए दिअ। पिंगलक अवहेलनाक संग प्रस्तार साधबाक काज आ गण, मगण, भगण, नगण आदिक ग्रंथक आदि छंदक प्रथम गण अशुभ नहि शुभ राखबाक परिपाटीसभ सेहो भूतकालक वस्तु भए गेल अछि। अनेक प्रतिष्ठित आधुनिक कवि अपन कविताकें छंदक बंधनसँ मुक्त कए लेलनि अछि। एहिना गद्यलेखनक लेल सेहो मारिते रास नियमसभ बनल छल। साहित्य दर्पणमे कहल गेल अछि जे “ कथामे सरस वस्तु गद्यमे कहल जाएत आ ओहिमे कतहु आर्या छंद सेहो हएत, कतहु वक्त्र आ अपवक्त्र सेहो हएत। प्रारम्भमे पद्यबद्ध नमस्कार हएत आ फेर साधु-प्रशंसा आ दुर्जन-निन्दा हएत।“ आब कतेक कथाकार एकरा जानए छथि,मानि दए छथि आ ओकर पालन करए छथि ? आब एकर कोनो आवश्यकता-उपयोगिता नहि रहल आ तें कोनो कथाकार एकर पालन नहि करए छथि आ जँ केओ करता त पुरातनपंथी आ परम-बुड़ि मानल जएता। हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरना युगक चर्चा करैत कहए छथि जे “ परवर्ती गद्य-काव्यमे नाना-भांतिसँ अलंकृत कए सुललित गद्यमे कथा लिखबहि प्रधान भए गेल छल। एहिमे कविकें कथा कहबाक धड़फड़ी नहि अछि। ओ रूपक आ दीपक आ श्लेष आदिकें अपन प्रधान कृतित्व मानि लैत अछि………ओ कोनो एहन अवसरक उपेक्षा नहि करत जतय ओकरा एकटा उत्प्रेक्षा, दीपक या रूपक या विरोधाभाष या श्लेष करैक अवसर भेटि जाए।“ दण्डी, सुबंधु आ बाणभट्ट एहि देशक तीन नमहर गद्यकार मानल जाइ छथि। सुबंधु त अपन ग्रन्थक आरम्भहिमे प्रतिज्ञा कए लेने छला जे आदिसँ अंत तक श्लेषक निर्वाह करता। बाणभट्टक कथन छनि – “ सुस्पष्ट मधुरालापसँ आ हाव-भावसँ नितान्त मनोहर तथा अनुरागवश स्वयमेव शय्यापर उपस्थित अभिनवा वधु जकाँ सुगम कलाविद्या संबंधी वाक्य-विन्यासक कारण सुश्राव्य आ रसक अनुकरणक कारण बिन प्रयास शब्द गुंफकें प्राप्त करएबला कथा केकर हृदयमे कौतुका-युक्त प्रेम नहि जनमाबैछ ? सहजबोध्य दीपक आ उपमा-अलंकारसँ सम्पन्न अपुर्व पदार्थक समावेशसँ विरचित आ अनवरत श्लेषालंकारसँ किंचित दुर्बोध्य कथा-काव्य, उज्ज्वल प्रदीप जकाँ उपादेय चंपक-पुष्पक कलीसँ गूथल आ बीच-बीचमे चमेलीक पुष्पसँ अलंकृत घन-सन्निविष्ट मोहनमालाक भाँति केकरा आकृष्ट नहि करैछ ?” उपरोक्त तीनू श्रेष्ट गद्यकार जाहि गुणाढ्य पण्डितक वृहत्कथा ( वस्तुत: ‘ बड्डकहा’ ) के ॠणी मानल जाइ छथि ताहि गुणाढ्य पण्डितक कथासभमे भाषागत अलंकरणक दिस ओतेक ध्यान नहि अछि जतेक कथाक वक्तव्य वस्तु दिस। हिनकर कथासभमे ‘कहानीपन’ ततेक प्रचूर मात्रामे अछि जे आन कोनो अलंकरणक बेगरते नहि बुझाइत अछि आ तें ई ग्रन्थ प्राय: दू हजार वर्षसँ भारतीय कल्पना्कें अभिभूत कएने रहल अछि। ई मूलरूपसँ प्राकृतमे लिखल गेल छल आ प्राकृतहु की त जार्ज ग्रियर्सनक अनुसार पैशाची प्राकृतमे। नियम-कानून, सिद्धान्त आ व्याकरणक दुरूहता त संस्कृत भाषाक उत्पत्ति अछि आ संस्कृत साहित्यमे विद्रोहक परम्परा नहि रहल अछि। एहि देशमे विद्रोहक पहिल बीया गौतम बुद्ध खसैलनि, ओ अंकुरित चाहे जहिआ भेल हुअए, पल्लवित आ पुष्पित ओ तखनि भेल, जखनि सिद्ध-संतसभक समय आएल। विद्रोहक तेवरहिक संग सिद्ध लोकनिक प्राकृतमे लिखल साहित्य आधुनिकताक वाहक बनल आ एतहिसँ परम्परासभकें चुनौती भेटए लागल। पुरान परम्परासभक टुटलाक बाद जे नव परम्परासभ काएम भेल ओहि मे सभसँ प्रमुख परम्परा ई अछि जे साहित्यिक अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता कोनो नियमकें नहि मानैत अछि। साहित्य आ समाजक एहि स्वतंत्रता, आधुनिकताक युगमे सेहो अनावश्यक बंधनसभकें यथावत मानल जाय से आग्रह-दुराग्रह किऐ राखल जाय ? एहिना नाटकक लेल आचार्य भरतमुनि सन-सन विद्वानक बनाएल कतेको विधान अछि जे समयक संग अनुपयुक्त होइत प्रचलनसँ बहराए गेल अछि। जयशंकर प्रसादक पहिल चारिटा नाटक पुरनका रुढिक अनुसार नांदी, सूत्रधार, स्वगत, विष्कंभक आदि नाटक शास्त्रक नियमसँ जकड़ल अछि किन्तु बादक नाटकसभमे एहि प्राचीनताक बहिष्कार देखाइ पड़ैत अछि। तें ओहिमे मंगलाचरण, आकाशभासित नांदी, सूत्रधार आ भरतवाक्य नहि अछि। एतेक तक जे हत्या, युद्ध आदि जे बात नाट्यशास्त्रक अनुसार वर्जित अछि, नाटकमे ओकरहु बेरोक-टोक प्रयोग भेल अछि। नाटककारक कवि हएब अनिवार्य नहि रहल आ परम्परागत नौ अंकक वाध्यता टुटि पांच अंकसँ उतरैत एकांकी पर पहुँचि गेल। एहिसभ उद्धरणक परिपेक्ष्यमे ई बेधड़क कहल जाए सकैत अछि जे सभक सभ प्राचीनहि अर्वाचीन आ शाश्वत नहि भए सकैछ आ तें व्याकरण आ विधान अपन ठामपर रहओ, जिनका अरघए छनि से एकर उपयोग-प्रयोग करथु किन्तु एकर अनुकरणक कोनो वाध्यता वर्तमान आधुनिक युगक साहित्यकारपर लागू करब बहुत समयानुकूल नहि बुझाइछ। पाछू घुरि जएबाक प्रयत्नमे बहादुरी आ उद्भटता जतेक हुअए बुद्धिमानी एकदम्मे नहि अछि। अजुका वर्तमान संघर्षमय, संकटमय अछि। सौंसे पृथ्वी जेना ब्रह्माण्डक कड़ाहीक अदृश्य तप्त-रसमे खौल रहल अछि। प्रतिक्षण दुनियाक बाहरी आ भीतरी  नक्शा बदलि रहल अछि। कालि तक जे ध्रुव-सत्य छल, आइ ओ अस्थिर आ डमाडोल प्रमाणित भए रहल अछि। आइ जखनि हमरासभक सोझाँ नव-नव ओझराएल समस्यासभ सुरसा जकाँ मुँह बउने उपस्थित अछि तखनि पुरनका कलासभक लेल हाय-हाय करब फिजूल अछि। पुरनका ग्रन्थसभक संस्कृतमे जतए व्याकरणक विरोध भेटैछ ओतय पाठककें मन राखबाक लेल कहल जाइत अछि -  ‘ आर्षवाक्यं प्रमाणम ‘ अर्थात जुनि देखू व्याकरण, देखू जे ॠषिक वाक्यक आत्मा की अछि। अहाँ त बस ओहि आत्मस्फुर्तिकें लए लिअ, शेषकें ओकरहि चिन्तापर छोड़ि दिअ। मम्मट, भामह, राजशेखर, आनन्दवर्धन, कुन्तक आदि अनेक आचार्यक प्रदत्त शास्त्रीय नियमक बावजूद शास्त्र स्वयं साहित्यक स्वायत्तताक पैरोकारी करैत अछि। कहल गेल अछि जे कविता स्वत:प्रमाण अछि, ओकरा अपन प्रमाणीकरणक लेल अपनासँ इतर कोनो प्रमाणक अपेक्षा नहि। अनुभववैशिष्ट्यक कारणें कविताक उपकरण लौकिक उपकरणसँ भिन्न भए जाइत अछि, ओकर भाषा सेहो लौकिक सामान्य भाषासँ अलग भए सकैत अछि। अज्ञेय कतहु लिखलनि अछि जे लेखक अग्निगर्भा होइत अछि – लीक तोड़ैत अछि, नव-नव प्रयोग करैत अछि आ प्रयोगसँ नव जीवन-सत्य पाबैत अछि। अपन गज़ल-संग्रह “बहुरूपिया प्रदेशमे” के अपन बातमे हम एहि दिआ थोड़ेक-किछु कहने छी। आन बहुत गोटे जकाँ हमरो लग बहुत रास अवगुणसभ अछि, धैर्य-धनक कमी सेहो अछि। विश्वविख्यात शायर सभ सम्पुर्ण जीवनमे जतेक रचलनि तेकर बराबरी हमसभ कम समयमे ओतबे लिखिकए करए चाहए छी त ओकर परिणाम इएह होनाइ छै। परिमाण(quantity) त पुरि गेल एकर स्तर (quality) केहन भेल से फैसला त आब भविष्यहिक हाथमे अछि। दुष्यंत कुमार आ अदम गोंडवी प्रिय छथि किन्तु हम हुनकासभक पासंगहुमे नहि छी से हमरा बुझल ए। हम “समान-विद्या-वयोऽलंकारै: अखिल-कला-कलापालोचन-कठोरमतिभि:, अतिप्रगल्भै: अग्राम्य-परिहास-कुशलै:, काव्य-नाटकाख्यानकाख्यायिका-लेख्य-व्याख्यानादि-क्रिया-निपुणै:, विनय-व्यवहाराभि:, आत्मन:प्रतिविम्बैरिव राजकुमारै:सह रममाण “ नहि छी, अरविन्द ठाकुर छी आ अपन सीमासभक संग अभिन्न जकाँ अरविन्द ठाकुरहि रहए चाहए छी। # 3 # ओना पुरस्कार त प्रोत्साहन लेल होइछै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति रुकि जाइ छै। एना किऐक ? पुरस्कार जँ प्रोत्साहन लेल देल जाइछै त ई आन कोनो भाषा आ संसारक गप भेल। सएह जँ मैथिलीओमे होइतए त से मैथिली केना भेल। मैथिलीक पुरस्कारक सूचीसभ अपन व्यथा-कथा अपनहि कहि रहल अछि , सुनएबला कान चाही ,देखएबला आँखि चाही , सिहरएबला आत्मा चाही। बाल गंगाधर तिलक केर गप मन पड़ैत अछि जे कहने छला जे महान उप्लब्धि सरलतासँ नहि भेटैत अछि आ सरलतासँ भेटल उप्लब्धि महान नहि होइत अछि। एहि कथनक परिपेक्ष्यमे मैथिली पुरस्कार आ पुरस्कृत लोकक मुल्यांकन सरलतासँ कएल जाए सकैत अछि। ओना पुरस्कार भेटलाक बाद साहित्यकारक गति रुकि जेबाक प्रश्न बहुआयामी अछि। ई बहुत बातपर निर्भर अछि – साहित्यकारक व्यक्तित्वपर, हुनक कृतित्व पर , पुरस्कारक प्रति हुनक दृष्टिकोणपर , पुरस्कारक राशिपर ,पुरस्कार-विशेषक विधान आ वितरण-प्रणालीपर आदि-आदि। जीवकान्तक खिस्सा मन पड़ैए। अनेक वर्षसँ कतारमे लागल रहथि आ नम्बर अएबे नहि करनि। जाहि बेर पुरस्कार भेटबाक पुर्वाभास आ संभावना रहए, ताहि बेर हुनक पोथीकेँ फेरसँ नवका गत्ता पहिराएल गेल आ हुनका एलन गिन्सबर्ग आ राजकमल चौधरीक मिलल-जुलल अवतारबला कवि घोषित करएबला अग्निपुष्पक भंगिआएल टिप्पणिक संग पुनर्प्रस्तुतिकरण भेल छल। ओहि पुरस्कारसँ किन्तु जीवकान्तक मन नही अघएलनि आ शिशु-काव्यपर पुरस्कारक घोषणा होइतहि ओ शिशु-काव्यक पथार लगाबएमे भिड़ि गेला आ अन्तत: ओहो पुरस्कार ओ लैए लेलनि। युवा पुरस्कार लेल ओ घुरिकए युवा भैए नहि सकैत छला आ जीवन जँ दगा नहि देने रहतिअनि त अनुवादहुक पुरस्कार ओ लैए कए मानितथि। मैथिलीक अधिकतर पुरस्कार प्रोत्साहन लेल नहि अपन लोककेँ उपकृत करबाक लेल देल गेल अछि। जँ वाध्यतावश कोनो सुपात्रकेँ भेटलहु अछि त से हुनक प्रतिनिधि आ श्रेष्ट संग्रहपर नहि, बेरपर भेटि गेल जएह-सएहपर। भीमनाथ झाकेँ जहि पोथीपर अकादमी पुरस्कार भेटल ताहिसँ बेसी श्रेष्ट आ उत्तम पोथीसभ हुनका हाथें आकार लेने अछि आ एकबेर की, चारि बेर पुरस्कार लेबाक पात्रता ओहि पोथीसभक अछि। ई त एक तरहे भीमनाथ झाक संग अन्याय भए गेल। हुनक पुरस्कृत पोथीकें हुनक प्रतिनिधि रचना मानि आन भाषाक पाठक हुनका प्रति तेहने धारणा बनाएत जे वस्तुत: हुनक छनि नहि। भगत सिंह कहने छला जे “ कोनो समाज अथवा देशकें चिन्हबा लेल ओहि समाज अथवा देशक साहित्यसँ परिचित हएबाक परम आवश्यकता होइत अछि किएक त समाजक प्राणक चेतना ओहि समाजक साहित्यमे विद्यमान रहैत अछि।“ अखनि जे हालत अछि ताहिमे पुरस्कृत अधिकांश मैथिली पोथीसँ एहि क्षेत्रक जे पहिचान बनैत अछि से अत्यन्त पिछड़ल, अतीतजीवी आ आधुनिकताविरोधीक अछि। पुरस्कार भेटएसँ पहिने राजमोहन झाक ‘भनहि विद्यापति’ आ ‘टिप्पणित्यादि’ छपल रहनि त ओ मजाकमे कहैत छला जे कहीं एहि दुनूमेसँ कोनो पोथीपर ने अकादमी हमरा पुरस्कार दए दिअए आ हम लाजे मरि ने जाइ।  ओना गति रुकबाक मामला विशेषतया ओहने लोकक संग भेल अछि जिनका पुरस्कार देबाकहि लेल साहित्यकार बनाएल गेल वा मानल गेल। पुरस्कार-केन्द्रित लेखन छुतहर-लेखन अछि। ई ओहेन लोकक काज अछि जेकरा लेल सफलता प्रमुख छै आ सार्थकता गौण। एहन मानसिकताबला लेखक भस्मासुर अछि आ पहिने अपनहि निजताक हत्या करैत अछि। एहन लेखकक लेखन निरर्थक अछि, साहित्यक दृष्टिकोणसँ निकृष्ट आ समाज लेल अहितकर अछि। एहन लेखन दीर्घजीवी नहि भए सकैछ आ अधिकतर मामलामे एहन लेखन पुरस्कारक खैरात भेटितहि विस्मृत भए जाइत अछि, मरि जाइत अछि। अपन लेखक आ लेखनक सार्थकताक पवित्र उद्देश्य आ कामनासँ लिखनिहार जे शुद्ध साहित्यकार छथि से पुरस्कार भेटलाक बादो लिखैत रहला अछि , लिखबाक गति भनहि कने कम भए गेल हुअए। # 4 # वर्तमान समयमे मैथिलीक पत्र-पत्रिकाक की हाल छै ? वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक हालपर हिन्दीक प्रसिद्ध जुमला कहल जाए सकैत अछि – “वही चाल बेढंगी !”  बहुत दिनसँ नियमित प्रकाशित होइत तीन टा मैथिली पत्रिका हमरा देखाइत अछि – ‘मिथिला दर्शन’ , ‘घर बाहर’ आ ‘समय साल’। एकटा ‘पुर्वोत्तर मैथिल’ सेहो एमहर निरन्तर उप्लब्ध भए रहल अछि। एहि सभमे ‘पुर्वोत्तर मैथिल’ मे कखनिओ कए सम्पादकक ओरिआओन आ विवाद मोल लेबाक साहस देखाइ दैत अछि किन्तु एकरा छोड़ि दोसर कोनो पत्रिका लग सम्पादकीय दृष्टि ( vision ) के अभाव जकाँ बुझाइत अछि। जे अलाए-बकच भेटल से छापने गलहुँ। अपन दृष्टिकोणक अनुसार कोनो योजना नहि, कोनो परिकल्पना नहि, कोनो मापदण्ड नहि, कोनो स्तर नहि। मिथिला दर्शन पहिने रचनाकारसभसँ विशेष रचनाक लेल आग्रह करैत छल, से बेगरता आब प्राय: हुनकासभकेँ नहि बुझाइ छनि। ‘घर बाहर’ त ओहि चेतना समितिक प्रकाशन अछि जे राजनीतिक थाल-कादोमे आपादमस्तक लेपित आ ताहिमे मुदित अछि। संस्थाकेँ येन-केन-प्रकारेन अपन चांगुरमे बकोटिकए राखब आ अपन फोटोक संग अपन विज्ञापन आ अभिनन्दन कराएब, एतबे उद्देश्यसँ ओकर मालिक-मलिकारसभ ओहि पत्रिकाकेँ नियमित कए कए राखने छथि। कहबाक लेल एमहर ओहिमे साहित्यिक सामग्री बढल अछि किन्तु छापता ओ सभ ओएह जे हुनक अनुकूल छनि , प्रतिकूल नहि। स्थिति ई अछि जे समीक्षाक नामपर सेहो कोनो आलोचना अपेक्षित नहि , मात्र मुँह पोछबाक लेल प्रशंसा लिखू वा बातकें गोलिआकए निष्कर्षहीन बतकुट्टन कए ससरि जाउ। ‘समय साल’ त बुझू जे ‘सिंगल मैन प्रोडक्ट’ अछि। एकहि व्यक्ति द्वारा विभिन्न नामसँ सौंसे पत्रिकाक सभटा आर्टिकिल आ पत्रिका पुर्ण। ई पत्रिका प्रमाणित करैत अछि जे मैथिली बिकट, प्रचण्ड आ धुरन्धर लिक्खाड़सभसँ परिपूरित आ मातबर अछि। ओना ई अपन संपुर्ण कलेवरमे राजनीतीक पत्रिका अछि आ एहिमे साहित्यिक रचना मात्र विध पुरैबाक लेल अचार-चटनी जकाँ देल जाइत अछि आ तें एकरासँ एहिसँ बेसी अपेक्षा करब उव्हितहु नहि। आब अनियतकालीन भेल ‘अंतिका’ एहन एकमात्र शुद्ध साहित्यिक पत्रिका अछि जेकरा लग एकटा फरिच्छ आ स्पष्ट सम्पादकीय दृष्टि छै आ जे योजनाबद्ध तरीकासँ काज करैत रहल अछि। अपवादस्वरूप पुर्वप्रकाशित रचनासभक माध्यमसँ  खानापुरीक रूपमे बहराएल एकर किरण-प्रसंग सन अंक सेहो अछि किन्तु एकरा हम सम्पादकक असफलता नहि, हुनक भरोसाक असफलता मानए छी। एहि पत्रिकाक निरन्तरतामे आएल बाधा जे कोनो कारणसँ हुअए, दुखी करैत अछि। # 5 # चेतना समितीमे अखनो दलितवर्गक प्रवेश निषेध छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ ? मिथिला, मैथिलीक नामपर संकीर्णता, पाखण्ड, प्रपंच आ विभिन्न प्रकारक धुर्ततासभ संस्थाबद्ध भेल अछि। सार्वजनिनता - सामाजिक-एकताक नारा पर बनल आन अनेक संस्था-संगठन जकाँ चेतना समिति सेहो स्वयंकें मैथिल-महासभाक क्षुद्र-संकीर्णताक खतियानी उत्तराधिकारी प्रमाणित करबाक लेल जान-परान अरोपने अछि आ एकरा लेल निरन्तर एकटा मुर्दा-संस्कृतिक गौरवगानक अष्टयाम आयोजित करैत रहैत अछि। एकर कर्ता-धर्तालोकनि कें एतबहु ज्ञान नहि छनि जे मुर्दा-संस्कृतिक गौरवगान प्राय: शत-प्रतिशत अवस्थामे जिन्दा-संस्कृतिक उपेक्षा-अवहेलनाक बुद्धि-विहीन प्रयासक क्रममे होइत अछि। क्षुद्र व्यक्तिगत राजनीतीक-आर्थिक लाभक आकांक्षासँ करिआएल-गन्हाएल हाथक उपकरण भए चेतना समिति अपन संपुर्ण संरचनामे  साहित्य-संस्कृतिक कब्रिस्तान बनि गेल अछि। एतय जीवन्त लोकक हृदय कलपैत अछि आ दिवंगत यात्री जीक आत्मा हबोढकार कानैत अछि जे एकर स्थापनाक गप भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक विकासक पवित्र उद्देश्यसँ सोचने छला। चेतना समितिक हम सपत्नीक आजीवन सदस्य छी किन्तु तेकर प्रमाण लेल हमरा लग मात्र एकटा रसीद अछि जे हमर कोनो फाइलमे कतहु घोसिआएल हएत। सदस्यता-प्राप्तिक बादहिसँ एकर कोनो गतिविधि दिआ कहिओ हमरा विधिवत कोनो सूचना नहि भेटल अछि आ तेँ एकर संगठन आ संचालनमे हमर कोनो भागीदारी नहि रहल अछि। एकर कर्ता-धर्तासभक अगुऐत-पछुऐत धरनिहारसभकेँ छोड़ि आनसभक हाल हमरहि सन हएत, से अनुमान करब कठिन नहि अछि। एकमात्र इएह तथ्यसँ एहि संस्थाक सार्वजनिकता आ दशा-दिशाक स्थितिक थाह लगले भेटि जाएत। एहि संस्थामे दलित वर्गक प्रवेश-निषेधक गप छोड़ू, गैर मैथिलहिक कोनो मानि नहि छै। गैर मैथिलसँ हमर आशय गैर मैथिल ब्राह्मणसँ अछि आ जँ केओ दलित विधायक सह साहित्यकार विलट पासवान विहंगम सन सन किछु उदाहरण दए कए हमर बातकेँ काटबाक ब्योंत करता त तेकरो लेल हमरा लग यथेष्ट तर्क अछि। अंगुरीपर गिनाइत जे गैर-मैथिल अगड़ा, दलित वा पिछड़ा-अतिपिछड़ा कोनो ब्रह्मबाबाक धरिया-ढेका पकड़ि असगरहि पुरस्कार-सम्मान-निमंत्रणक भवसागर तरि गेल त तरि गेल किन्तु से सभ लोक  अपन समाजक प्रतिनिधि किन्नहु नहि अछि , किन्नहु नहि अछि। लटकनियां-कीटसभक एकटा अलगे नसल होइ छै। एकरा कोनो वर्ग आ जातिमे नहि गिनल जएबाक चाही। उदाहरणक रूपमे सांख्यिकीक एकटा अंकमात्र बनल ई लोकसभ केकर धरिया आ केकर ढेका पकड़ि अपन उद्धार कएलनि अछि से नुकाएल गप नहि अछि। ओना दोष मात्र लोहारहिटाक नहि अछि, लोहाक सेहो अछि। आरक्षण, सामाजिक न्याय आ सुशासनक दू दशकक बादहु जँ चेतनाक हनुमान चेतना समितिक लंकामे घुसि ओकर दहन नहि कए सकल त एहि अचेतावस्थाक दोष केकरापर ? चेतना समिति आर्थिक रूपसँ संपन्न अछि आ एतयसँ सत्ताक डगर सेहो बनैत अछि आ तें एहिपर कोनो राजनीतीक व्यक्तिक गिद्ध-दृष्टि लागल रहए से स्वाभाविक, सत्तालिप्सासँ बेचैन आत्मा एकरापर अपन आधिपत्य चाहए-करए सेहो स्वाभाविक। स्थिति विकट आ चिन्ताजनक तखनि भए जाइत अछि जखनि एकरासभकें मखमली बुद्धिजीवी, अचूक अवसरपरस्त, यथार्थ-विरहित यथार्थ स्रष्टा आ साहित्यक सत्ताखोरसभक खलीफ़ावादी गिरोहक स्वार्थपरक सहयोग सेहो भेटि जाइत अछि। किन्तु इहो सत्य अपन ठामपर अछि जे कायर त ओहो अछि जे अपन अधिकार स्थापित नहि कए पाबए। भरि जिनगी ब्रह्म-बाबाक वर्तनीपर चलि अंतिम चला-चलीक बेरामे पचपनियां वर्तनी सूझए, एहन चेतनाक कोन काज ? कोनो नीक आ हितकर बात जँ  व्यक्तिगत विज्ञापनक उद्देश्यसँ हएत त ओ निरर्थक अछि। भीख, दछिना आ भाभटक चलनसँ प्रवेशाधिकार नहि भेटै छै, ई भेटै छै संघर्षसँ, ई भेटै छै क्रियात्मक आन्दोलनसँ, जेकर दीप्त उदाहरण महाराष्ट्र प्रस्तुत कएने अछि। # 6 # दरभंगे पीठ जकाँ आब सहरसा पीठ बनि रहल छै। ई मैथिली लेल नीक की खराप ? मैथिलीमे छातीबला मरद कम छै तेँ एतय ठामहि ठाम पीठहि-पीठ देखाइ पड़त, पीठक बलें अगराइत लोक देखाइ पड़त। सहवासक क्रममे जँ विपरीत-रति नहि हुअए त स्त्री पीठभरें सुतैत अछि, रोगी आ कमजोर लोक सहारा लेल पीठभरें सूतल या ओंगठल रहैत अछि, युद्ध आ संघर्षसँ भागनिहार पीठ देखबैत अछि आ पीठाधीश-मठाधीश अगिला जनममे कुकुर बनैत अछि से कथा वाल्मिकी रामायणमे वर्णित अछिए। हम व्यक्तिगतरूपसँ ‘एकला चलो’ आ ‘चरैवेति-चरैवेति’माननिहार छी आ पीठबला एहि मौगियाही, नपुंसक खेलमे हमरा कोनो अभिरुचि नहि अछि। दरभंगहि जकाँ सहरसामे कोनो पीठ बनल छै वा बनि रहल छै तेकर कोनो जानकारी हमरा नहि अछि। हम लेखक छी आ लेखनकेँ अपन कर्तव्य मानए छी। मन पड़ै छथि मराठी साहित्यकार कुसुमाग्रज। नासिकमे हुनक आवासपर हुनकासँ भेंटक क्रममे दीर्घवार्ता भेल छल। चलएकाल हम हुनकासँ लिखित-संदेश मांगलियनि त ओ अपन हस्तलिपिमे हिन्दीमे लिखलनि – “लिखो, लिखते रहो, लिखने से ही कोई भाषा समृद्ध होती है।“ हुनक ई संदेश हमरा लेल पाथेय बनल अछि। साहित्यक सहकर्मासभ यदा-कदा कतहु एकत्रित भए एक-दोसराक हाल-चाल ली , एक-दोसराक रचना सुनि ओहिसँ ऊर्जस्वित आ आनन्दित होइ ,से मनोकामना रहैत अछि। किन्तु नकार-भावसँ स्वार्थवश कोनो गुट-गिरोह बनैत अछि त ताहिसँ हमरा घिन आबए ए आ एकरा हम कोनो क्षेत्रक क्रियाकलाप लेल अहितकर मानए छी ,साहित्यक लेल त आओर बेसी। पीठ-मठ के किछु लघु-रूप हमरा देखल-भोगल अछि। जेकरा पीठ आ मठ बनैबाक औकाति नहि छै से संपुर्ण भोजनक अनुप्लब्धताक स्थितिमे जुट्ठा खाइए या थूक चाटैए आ एहि क्रममे ‘तू हमर प्रशंसा करह, हम तोहर प्रशंसा करबह’ बला क्षुद्रता करैए। एकर परिणामस्वरूप छोटका-छोटका गुट-गिरोह बनैए आ ई पीठ आ मठक तुलनामे कोनो कम खतरनाक आ हानिकारक किरदानी नहि अछि। ई सिलसिला, ई तौर तरीका छोट-नम्हर साहित्यिक माफ़िआ बनबैत अछि, पाठककें भ्रमित करैत अछि। एहन गिरोहसभसँ धोखाधड़ीक चलन बढैत अछि, केकरो निकृष्ट रचनाकें गुम्बद चढाए अप्रत्यक्ष रूपसँ नीक रचनाक संग अनदेखी आ अन्याय करैत अछि। छोट हुअए कि नमहर, एहि पीठ-मठक स्थापनसँ कठगुरु आ झोलटंगबाक क्षुद्र परिपाटी बनैत अछि आ एकर दुष्परिणामस्वरूप अनेक एकलव्यक अऊंठा कटैत अछि आ कतेको शम्बूक मारल जाइत अछि। दू टा डेनिश कहावत मन पड़ैत अछि। पहिल कहैत अछि जे दरबार(एतय एकर अर्थ मठ या पीठ लए सकै छी) शरीफ आ मशहूर भिखमंगा सभक जमात होइत अछि। दोसर कहैत अछि जे कोनो ईमानदार आदमी हड्डीक लेल स्वयंकें कुकुर नहि बनबैछ। एहि दुनू कहावतक पूरक बनैत अछि एकटा पुर्तगाली कहावत जेकर भाव अछि जे कुकुर अहाँक लेल नहि, रोटीक लेल नांगड़ि हिलबैत अछि। बुझनुक लेल एहि तीनू कहावतक विश्लेषण करब या ओकर आशय बताएब एतय आवश्यक नहि अछि। दुर्भाग्य जे मठ-पीठक छ्द्मक चकचोनहीसँ चोन्हाएल महंथ आ चटिया – दुनूमेसँ केकरहु ई ज्ञान नहि अछि जे जखनि पंडुकी आ कौआक संयोग होइत अछि त ओकर पाँखि त श्वेतहि रहैत अछि किन्तु ओकर कलेजी कारी भए जाइत अछि। ओना जँ ज्ञान रहितए त ई काजहि किए करैत। खच्चरसभकें गुमान रहै छै जे ओकर पुरखा घोड़ा रहै। एकर कोन इलाज ? केओ सोंगर लगाकए पछिलका दरबज्जा वा खिड़कीसँ भनहि स्वर्गमे पैसि जाइ, मानल त जाएत ओ चोरहि। साहित्य तत्कालिक लाभक वस्तु नहि , दूरगामी प्रभावबला शक्ति अछि। जेकरा लग छाती हेतए, छातीमे दम हेतए तेकरे सन्तति (रचना) दीर्घायु हेतए। साहित्य सहितक भाव अछि। एहि सहितसँ रहित कोनो स्वार्थ वा नकार भाव सुपात्रक अहित करैत अछि आ तेँ ई कतहु बनओ, अस्वीकार्य अछि। साहित्यक पावन क्षेत्रमे कोनो अपावन विचार या क्रियाक कोनो स्थान नहि हएबाक चाही। # 7 # अंतिका आब मृतप्राय पत्रिका अछि मुदा ओकर हरेक अंकमे अधिकांशत: सहरसाबला लेखक रहैत अछि। ई कतेक उचित ? ई प्रश्न हमरा कनेक विरोधाभाषी लागैत अछि। जखनि अंक बहराए रहल छै त ई मृतप्राय केना भेल ? ई अवश्य जे ई नियमित नहि रहि सकल अछि। तखनि मैथिलीमे एहन अभागल कोनो पहिल पत्रिका त नहि अछि अंतिका। रहल बात एहिमे अधिकांशत: सहरसाबला लेखकक छपब त हम एकरा एहि दृष्टिसँ नहि देखि पाबि रहल छी। हम सुपौलक छी आ अंतिकामे हमरहु रचना छपैत रहल अछि आ मधुबनीअहु-दरभंगा आ अन्य ठामक लेखकसभक रचना हम एहिमे देखैत-पढैत रहल छी। गौरीनाथ पहिनेक तुलनामे बहुत बदललाह अछि – व्यक्ति, साहित्यकार आ सम्पादकक रूपमे, जे समय-काल, परिस्थिति आ माहौलक प्रभावमे स्वाभाविक अछि किन्तु हुनक संघर्ष, क्षमता, योग्यता आदिकेँ नकारब कठिन अछि। अपन अनेक सीमाक बादो गौरीनाथ/अनलकान्त मठ-मठाधीशक प्रति विद्रोह आ आक्रोशक स्वरकेँ अक्ष्क्षूण्ण राखने रहल छथि आ अपन लेखन आ अंतिकाक माध्यमसँ ओ एकरा निरन्तर प्रकट करैत रहल छथि। ई विद्रोह आ आक्रोशक स्वर अलग-अलग लोकक लेल प्रिय-अप्रिय भए सकैत अछि किन्तु एकरा नहि सकारब कठिन अछि। क्षेपकमे एकटा गप कहबाक मन होइए। से ई जे सुपौल-सहरसा आ दरभंगा-मधुबनीमे प्रकृतिगत अन्तर अछि। एकटा कोशी नदीक उद्द्याम तेवरक क्रीड़ाक्षेत्र आ दोसर कमलाक लचगर खेलौरक क्षेत्र अछि। कोशी संघर्ष आ पुरुषार्थ सिखबैत अछि त कमला कोमल सुविधाक पाठ दैत अछि। संभव अछि जे अनलकान्त/गौरीनाथकें कोशीक लेखन बेसी धरगर आ समकालीन बुझाबैत होइनि। # 8 # बहुत दिनधरि मैथिलीमे दलित लेखक केर प्रवेश नै छल। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ ? एखनुक केहन अवस्था छै ? साहित्यकें दलित-लेखन, स्त्री-लेखन आदिक कूड़ीमे बाँटिकए देखब हमरा कनेक अनसोहांत जकाँ  लागैत अछि किन्तु यथार्थ त अपन ठामपर अछि आ एकरा नकारब सेहो ने संभव अछि आ ने उचित। ई स्थिति आन अनेक भाषामे सेहो रहल अछि। मैथिलीपर पुरोहितवर्गक वर्चस्व मलिकाना-अधिकारक सीमा तक रहल अछि तेँ एतए ई कनेक बेसीए मात्रामे रहल अछि आ एतए मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक किछु चुनिन्दा घराना छोड़ि आन सभगोटेक हालत दलितहि जकाँ अछि, से बात अलग। प्रोत्साहनक बदौलत संभव छल जे बहुतो गोटे प्रकाशमे अबितथि आ इहो संभव जे एकर अभावमे अनेक गोटे दुखीभए मोहभंगक अवस्थामे लेखनसँ विरत भए गेल होथि किन्तु कोनो प्रतिभाकें आगू आबएसँ बलात रोकल जाए सकैत अछि से बात सकारब कनेक कठिन अछि। संख्याबल कनेक कमजोर भए सकैत अछि किन्तु आन-आन क्षेत्र आ भाषासँ बाबा साहेब अम्बेदकर, डा तुलसीराम, शरण कुमार लिंबाले, नामदेव ढसाल, दया पवार, आदि अनेक नाम उदाहरणक रूपमे देले जाए सकैत अछि। इहो बात अपन जगह जे दलित साहित्यक पोषण दलित आन्दोलनसँ भेल जेकर अभाव मैथिली-भाषी क्षेत्रमे रहल अछि। मैथिल महासभाक माध्यमसँ भाषा-संस्कृतिपर आधिपत्यक जे षडयंत्र खुल्लमखुल्ला भेल तेकर आशय आ नीयत बुझि ओकर विरोधमे दलित की, दू जातिसँ इतर आनो आन जाति दिससँ विरोधक कोनो स्वर नहि बहराएल त एकर कुफल त एहि सकल आ शेष समाजकें भोगहि पड़तए। अलबत्ता एतए एहन मरौसीबला वातावरण रहल अछि आ जतिआरेसँ दियाद-बाद होइत भाय-भतीजावाद आ परिवारवादक तेहन घिनाओन कठखेल होइत रहल अछि जे अगड़ा वर्गक अनेक लोक सेहो कुंठित भए लेखन-विरत होइत रहलाह अछि। संघर्ष करैत आगाँ बढी, एहि किलर-ईंस्टिंक्टक अभाव त रहले अछि जे हजारो वर्षक मानसिक गुलामीक परिणाम अछि। संघर्ष आ विद्रोहक कठिन डगर छोड़ि, नकल आ देखांओसमे एहि समाजक विभिन्नवर्ग सुविधाभोगक डगर चुनैत रहलाह अछि आ मंचादिपर कनेक जगह पाबि तिरपित होइत रहलाह अछि त एकर दोष कनिके सही, हुनकहुसभपर त आबितहि छै। ओना  अनेक गोटे एहि विपरीत परिस्थितिसँ लड़ि अपन व्यक्तिगत क्षमतासँ आगू आएल छथि। जे तीव्रता आ गति वांछित अछि से भनहि नहि हो किन्तु विदेहक माध्यमसँ प्रतिकारक एकटा मजबूत वातावरण बनल अछि आ अनेक गंभीर लेखकलोकनि प्रकाशमे अएलाह अछि आ से वर्तमानक प्रति संतुष्ट आ भविष्यक प्रति आश्वस्त आ आशान्वित करैत अछि। साहित्यमे संख्याँबल महत्वपुर्ण नहि होइत अछि, महत्वपुर्ण होइत अछि बौद्धिक आ रचनात्मक क्षमता। चुट्टीक घर लेल एक बूंद ओसहि तूफान आ सैकड़ो कौआक लेल एकहि टा ढेला यथेष्ट होइत अछि। ओना उचित ई होइतए आ समयक मांग सेहो अछि जे एक हाथ दोसर हाथकें धोअए, अन्यथा दुनू मैलहि रहि जाएत। # 9 # अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्व प्रेरक आ कोन तत्व बाधक रहल ? हमर पुर्वजलोकनि शुद्धरूपसँ खेतिहर रहथि। खाता-खतियान आ केवाला आदि छोड़ि आन कोनो चीज पढबामे हुनकासभक कोनो अभिरुचि नहि रहनि। एहि किसानी-वंशमे एकटा अवतारी-पुरुषजकाँ हमर पिता बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ केर आविर्भाव भेल आ ओ खेती-किसानीसँ अविछिन्न प्रेम राखितहु स्वतंत्रता-संग्रामक अग्रिम-पंक्तिक योद्धा भेला आ बादमे समाज-सेवा, साहित्य, पत्रकारिता आदिक विविध क्षेत्रमे अपन हस्ताक्षर दर्ज कएलनि। पुत्र हएबाक कारणें कम-बेसी मात्रामे हुनक प्राय: सभटा गुण हमरहुमे आएल। राजनीतिमे अपन प्रतिभाक समुचित सदुपयोगक संभावना नहि देखि हम साहित्य-लेखनक अपन पुर्व-प्रेमकें गति देल आ तेकरहि परिणामस्वरूप हम आइ एतए छी। एहिमे उत्प्रेरकक काज कएलक 90-92क आसपास डा नवीन कुमार दास, केदार कानन, डा शिवेन्द्र दास आदिक संगति। हमर एकटा मैथिली कथा बहुत पहिने ‘मिथिला मिहिर’मे छपि चुकल छल किन्तु हमर छिटपुट लेखन हिन्दीमे होइत रहए। हम हिन्दी जगतमे एक सुपरिचित नाम भए गेल रही आ हिन्दीक अनेक पत्र-पत्रिकामे हमर रचनासभ छपितहु रहए। सुपौलक एहि त्रिमुर्तिक संगतमे अएलहुँ त एकर द्विपक्षीय लाभ भेल। हमरासभक नियमित बैसार हुअए लागल आ एकर सकारात्मक प्रभाव प्राय: सभगोटेक लेखन पर पड़ल। सभगोटे किछु ने किछु लिखिकए आनी आ ताहिपर घमर्थन हुअए आ तहिसँ रचनासभ परिष्कृत हुअए। एहि बैसारमे कहिओ काल महाप्रकाश, सुभाषचन्द्र यादव आबथि। मायानन्द मिश्र, जीवकान्तहुक आबरजात रहनि आ एकाध बेर राजमोहन झाक आगमन सेहो मोन अछि। एहि दौरान बंग्लाक कवि कालीपद कोनार सेहो अएलाह आ मैथिलीक लेल ऐतिहासिक काज कए गेला। सुपौलक अनियतकालीन पत्रिका ‘संकल्प’क एक अंकक प्रकाशन आ आन अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक घटनासभ भेल। हम रसे-रसे मैथिलीमे लिखए लागल छलहुँ आ ओ सभ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे छपि हमरा चिन्हार करए लागल छल आ जखनि हमर प्रथम संग्रह ( परती टुटि रहल अछि ) मैथिलीएमे आबि गेल आ ताहिपर अनेकानेक उत्साहवर्धक टिप्पणीसभ आएल त हम जेना मैथिलीएक भए कए रहि गेलहुँ। ई सभटा गतिविधि तीनहि-चारि वर्षक अन्तरालमे भेल। प्रथम संग्रहक बाद प्राय: दस वर्षक अन्तराल तक हम एकदमसँ गुम्मी लाधि लेल। किछु गोटेकें हमर ई अनुपस्थिति हमर मोहभंगसँ उपजल बुझाइ छनि त एहिमे आंशिक सत्य अछि। सुपौलक साहित्यिक वातावरणमे आएल एकटा अप्रियसन खतियानवाद एकर जड़िमे छल किन्तु हम कहिओ कोनो बाधाकें गुदानल नहि त ओकरासँ हारबाक त कल्पनहि नहि कएल जाए सकैत अछि। एहि ‘बाधा’ पर हमरा भर्तृहरि मन पड़ि गेला। ओ कहलनि अछि – “ संसारमे तीन प्रकारक मनुष्य अछि- नीच, मध्यम आ उत्तम। नीच मनुष्य बाधाक डरसँ काम शुरुए नहि करैछ ; मध्यम मनुष्य काम शुरु त कए लैछ, किन्तु बाधा पड़लापर ओकरा बीचहिमे छोड़ि दैछ ; मात्र उत्तम मनुष्य जाहि काजकें शुरु करैछ, हजार बाधा पड़लहु पर ओकरा पूरा कए कए छोड़ैत अछि”। हमरा उत्तम मनुष्य हएबाक कोनो भ्रम वा गुमान नहि अछि, किन्तु हम अपन नाम मध्यम मनुष्यमे नहि देखए चाहए छी आ नीचमे त किन्नहु नहि। तें हम सदति ई बात मन राखए छी जे जँ अहाँ चाहए छी जे मरितहि आ चितामे सुड्डाह होइतहि अहाँ बिसराए नहि देल जाइ त या त पढबा योग्य चीज लिखू या लिखबा योग्य काज करू। हमर लेखनमे ई अन्तराल कोनो बाधा वा बाधाजनित मोहभंगसँ नहि, एहि कारण आएल जे ओहि कालविशेषमे हमर पुत्रसभक शिक्षा अपन निर्णायककालमे छल आ तें साहित्यिक चुनौतीकें तात्कालिक रूपसँ विश्राम दए हम अपन समग्र चेतना-क्षमता-समयकें अपन सन्ततिक भविष्य-निर्माणक प्रयास दिस मोड़ि देल। हमरा दुबारा सक्रिय करबाक श्रेय हिन्दीक साहित्यकार-सम्पादक महेन्द्र नारायण पंकज आ मैथिलीक ओजस्वी-युवा अजित आजादकें छनि। पंकज जी हमरा प्रगतिशील लेखक संघक सुपौल जिलाक अध्यक्ष बनाए साहित्य-समाजसँ हमर संपर्ककें पुनर्जीवित कएलनि आ अजित आजादक चहेटब हमर कलमक गतिकें प्रवाह देलक। अजित आजाद आ गौरीनाथक सहयोगसँ हमर दोसर संग्रह ( अन्हारक विरोधमे ) सोझाँ आएल आ हम पुन: मैथिलीक मुख्यधारासँ जुड़ि सकलहुँ। हिनकहिसभक उर्जा पाबि हमरा लग ई सत्य उद्घाटित भेल जे प्रत्येक मनुष्य एक नन्दनकानन-च्युत परमात्मा अछि। ओहि कालमे हिन्दीक पत्रकार महाशंकरसँ सुपौलहिमे सुसंयोगसँ भेंट भए गेल आ ओ हमरा अपन पत्रिका लेल कालम लिखबाक वचन लए लेलनि। तखनि ओ विकास कुमार झाक सम्पादनमे बहराइत ‘राष्ट्रीय प्रसंग’ पत्रिकासँ  जुड़ल छला। कोनो अपरिहार्य कारणवश महाशंकर ओहि पत्रिकासँ अलग भए गेला आ हमर आलेख ओहि पत्रिकामे नहि छपि सकल। एन अवसरपर महाशंकर श्यामाकान्त झाक सम्पादनमे नवप्रकाशित ‘लोक प्रसंग’ मासिक पत्रिकासँ जुड़ि गेला आ ओकर प्रथम अंकमे हमर कालम छापि ओ हमरा खबर कएलनि आ ओतहिसँ हमर कालम-लेखनक सिलसिला चलि निकलल। ‘ठाकुर का ठाँव’ नामसँ हमर ई कालम बहुत लोकप्रिय भेल आ “मिथिला आवाज”क सम्पादनक जिम्मेवारी लेबासँ पहिने लगातार तीन वर्ष तक हम ई लिखैत रहलहुँ। बादमे जँ हम “ मिथिला आवाज “क सम्पादक पद लेल अजित आजाद आ डा0 चन्द्रमोहन झाक पहिल पसन्द भेलहुँ त हमर मानब अछि जे तेकर आधारमे हमर ओ कालम-लेखन महत्वपुर्ण कारक रहल  अछि। तें कहि सकए छी जे अपन साहित्यिक यात्रामे प्रेरक तत्व त हमरा बहुत भेटल आ बाधा सन कोनो चीजकें हम अपन आगू आबि टिकैए नहि देलिअए। कनेक दम धरबाक लेल, कनेक पाथेय जुटएबाक लेल, कनेक अगिलका बाटकें चिक्कन-चुनमुन करबाक लेल कतहु कनेक ठहरि गेल होइ, से बात अलग। # 10 # अहाँ अपनाकें मैथिली गज़लक ‘अमीर खुसरो’ कहै छिऐ आ सरस जी अपनाकें ‘साहिर’ कहै छथि। ई आत्मविश्वास छै या आर किछु ? हमर काँइत एकदम अलग अछि तें सरस जीसँ हमर कोनो तुलना नहि अछि। ओ अपनाकें साहिर केना आ किऐ कहए छथि से ओएह जानथु। हम अपन एकटा गज़लक मकतामे ‘अमीर खुसरो’क नाम लेल अछि,से बहुत सायास नहि अछि। ई प्रयोग हमर अवचेतनक प्रतिफलन भए सकैत अछि। अहाँक प्रश्नक बाद एहिपर हमर ध्यान गेल अछि। आब सोचलापर लागैए जे हमर जे जीवनानुभव अछि से मैथिलीक प्राय: आनसभ लेखकलोकनिसँ एकदम अलग अछि आ एकरा हम बहुत गंभीरतासँ रेखांकित कएने छी। अपन एकदम (Exclusive) हएब (स्तर एकर जे हुअए) आ तेकरा साहित्य-समाजक बीच प्रकट करबाक हमर अवचेतनक ई प्रयास भए सकैत अछि। मिल्टन कहने छथि जे “ यशैषणा श्रेष्ट मनुष्यक आखिरी कमजोरी अछि” आ युनानी दार्शनिक सिसरोक कहब छनि जे “ जाहि ग्रंथसभमे दर्शनाचार्य यशैषणासँ बचबाक उपदेश दए छथि, ओही ग्रंथमे ओसभ अपन नाम छोड़ि जाइ छथि; जाहि पृष्टसभपर ओ बतबए छथि जे यशैषणा बेजाय चीज अछि, ओही पृष्टसभपर हुनक कीर्ति-वैजयन्ती फहराबए लागैत अछि”। भवभूति त चुनौतीक स्वरमे घोषणा करए छथि – “ उत्पत्स्यते च मम कोऽपि समानधर्मा”। गज़लक जे परम्परा रहल अछि ताहिमे एहि तरहक अत्युक्तिक अनेक रास उदाहरण सेहो अछि। “कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और” त प्रसिद्ध रहल अछि आ एकरहुसभक प्रभाव हमर अवचेतन ग्रहण कएने हुअए, सेहो संभव। समाजक क्षुद्रता कलाकारक स्वाभिमानपर आगि राखि दैत अछि, तेँ ई कोनो संचित आक्रोशक परिणाम सेहो भए सकैत अछि। अज्ञेय कहैत छला – ‘ अजुका साहित्य अधिकांशमे अतृप्तिक, या कही, लालसाक, इच्छित विश्वास (Wishful Thinking) केर साहित्य अछि। ‘अमीर खुसरो’ मामलामे इहो कथन सत्य भए सकैत अछि। प्रभाकर माचवेसँ पैंच लएत कहए चाहए छी – ‘ केना कही जे लिखैत काल हम वर्ण्य विषयक संग तन्मय-तल्लीन अवश्य होइ छी, किन्तु मनपर अन्यान्य रचनासभकें पढलासँ जे शैलीगत संस्कार अछि, ओकरसभक अप्रत्यक्ष प्रभावसँ अपनाकें विलग नहि राखि पाबए छी। ई दुर्गुण हुअए कि सद्गुण, तथ्य अवश्य अछि।‘ # 11 # वर्तमान साहित्यकारक मुल्यांकन अहाँ कोना करबै ? ओकर लेखन आत्मरतिसँ बाहर आबि समष्टिक चेतनासँ कतेक तादात्म्य स्थापित करए छै, ताहिसँ। ओकर लेखनमे कलाक वैयक्तिक पक्षक संग-संग सामाजिक पक्षक संतुलित तालमेल छै कि नहि, ताहिसँ। अपन समयक पहिचान करैत अपन युगक मूल्यक रक्षा आ वांछित परिवर्तनक लेल प्रयास करएमे ओकर लेखक आ लेखन कतेक प्रयत्नशील रहल अछि, ताहिसँ। ओना वर्तमानक निर्वैयक्तिक आ पुर्वाग्रहरहित मुल्यांकन वर्तमानक बुत्ते असंभव केर हद तक कठिन छै आ तें एकरा भविष्य लेल छोड़ि देबाक चाही। # 12 # अहाँक प्रिय साहित्यकार के छथि ? स्वाभाविक अछि जे प्रश्न मैथिलीएक सन्दर्भमे अछि। एकर स्पष्ट उत्तर उकटा-पैंचीक वाहक बनि सकैत अछि। संक्षिप्तमे एतबे जे हमर बादक पीढीक सभ साहित्यकार हमर प्रिय छथि। ओना अप्रिय साहित्यकारक एकटा नमहर सूची अछि हमरा लग ! # 13 # साहित्यकारक लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचार एक हेबाक चाही की अलग-अलग ? जँ एक हेबाक चाही तँ बैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक वैचारिक विचलनकें अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ ? आ जँ अलग-अलग हेबाक चाही तँ ओहन साहित्य ओ साहित्यकारक मूल्य की ? मैथिलीकें तोड़बामे दरभंगा मठाधीश सभहंक कतेक योगदान छै ? साहित्यकार कोनो आन ग्रहसँ आएल जीव नहि होइत अछि। प्रथमत: ओ मनुष्य अछि आ ओकरासँ मनुष्यक लेल तै सभटा आचार-संहिताक पालन हमरा बुझने अनिवार्य अछि। मनुष्य एकटा इकाइ अछि आ रसे-रसे अपनासँ बढि परिवार, समाज, राज्य, देश, विश्व आ ब्रह्माण्डक गतिशील हिस्सा बनैत अछि आ एहि क्रममे अपना लेल विविध क्षेत्रक चयन कए ओहिमे सक्रिय होइत अछि। हमर माननाइ अछि जे जे मनुष्य स्वयं अपना लेल, अपन परिवार आ समाज लेल ईमानदार नहि अछि से अपन गतिविधिक कोनो क्षेत्रमे ईमानदार नहि भए सकैत अछि। तें कोनो सामान्य व्यक्तिसँ अपेक्षित व्यक्तिगत या समाजगत ईमानदारीक अपेक्षा साहित्यकारहुसँ कएल जाएब सर्वथा उचित अछि। लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचारमे जँ एकरुपता या साम्य नहि अछि त ई ओहि व्यक्तित्वक छद्मक द्योतक अछि। एहि सर्वकालिक सिद्धान्तक कसबट्टीपर बैद्यनाथ मिश्र यात्रीएटा किए सभकें कसल जएबाक चाही। किन्तु एतय एकटा ‘किन्तु’ सेहो अछि। एहि ‘किन्तु’क व्याख्या लेल हमरा गोस्वामी तुलसीदासक शरणमे जाए पड़त। ओ भगवान रामसँ कहबएलनि अछि जे जीव जाहि क्षण हमर सम्मुख होइत अछि त हम ओहि क्षण ओकर कोटि-कोटि जनमक पाप नष्ट कए दए छी – सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जनम कोटि अघ नासौं तबहीं॥ जे केओ अपन समस्त कमजोरी आ त्रुटिक संग महा अज्ञात अन्तर्यामीक सम्मुख उपस्थित भए जाइत अछि, ओकर समस्त त्रुटि विच्युतिसभ समाप्त भए जाइत अछि, फेर त्रुटि त्रुटि नहि रहि जाइछ, ओ पूजाक नैवेद्य बनि जाइत अछि। तुलसीदास एकठाम आओर तीर्थवादिक माहात्म्य वर्णन करैत लिखैत छथि जे एहिमे स्नान कए काक पिक भए जाइत अछि आ बक मयूर भए जाइत अछि। एहि परिपेक्ष्यमे जँ साहित्यकें अन्तर्यामी तत्व आ तीर्थस्नान मानि ली आ से ओ छहिओ त बैद्यनाथ मिश्र यात्रीकें एहि कथनक लाभ दैत बा-इज्जत बरी कएल जाए सकैत अछि। ओना साहित्यकारक रूपमे यात्री जी जतेक कतबहु सम्मान पाबि लेथि, एकटा मनुष्यक रूपमे त ओ अपन पारिवारिक-सामाजिक कर्तव्यसँ च्युत मानलहि जएता। (प्रश्नक अंतिम भागक उत्तर सायास की अनायास छोड़लगेल अछि- संपादक) # 14 # मैथिल साहित्यकार बहुविधावादी होइत छथि। मुदा जँ अहाँ एके विधामे रहितहुँ तँ ओ कोन विधा होइतै ? नि:सन्देह गद्य मे। “गद्यं कविनां निकषं वदन्ति” हमरा लेल मात्र एकटा उक्ति नहि, साहित्यिक मंत्र जकाँ अछि। ई हमर प्रिय विधा अछि आ एहिपर हम अपन पकड़ सेहो नीक मानए छी। देखौंस वा शार्टकटक परिणामस्वरूप हम अखनि धरि जे कएने होइ, हमरापर गद्यक कर्जा बांकी अछि। अखनि हमर साहित्यिक पेटारीमे बहुत माल बचल आ संचित अछि आ से आब पाठकक सोझाँ अएबाक लेल व्यग्र भेल अछि। # 15 # अहाँ अपन साहित्यिक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रुपें देखै छिऐ ? कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “एकला चलो” आ शास्त्रीय वचन “चरैवेति-चरैवेति” स्मरणमे रहैत अछि आ तत्काल कोनो अवरोधहु नहि बुझाइत अछि, तें ई यात्रा अनवरत चलत से आशा आ भरोस अछि। # 16 # पारिवारिक परिचय जानबाक इच्छा अछि। हम अपन पारिवारिक परिचय छिटपुट रूपमे अपन आत्मकथ्य आ आन ठाम देने छी। संक्षेपमे ई जे हमर पिता ( हमसभ हुनका ‘बाबूजी’ कहि सम्बोधित करैत रहिअनि ) बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ स्वतंत्रता-सेनानी, साहित्यकार, पत्रकार आ समाजसेवी छला। हुनकर प्रथम विवाह अकबरनगर, भागलपुरक सुभद्रा देवीसँ भेलनि जिनका हमसभ भाय-बहिन ‘बड़की मा’ कहैत रहियनि। हुनकासँ कोनो सन्तान नहि भेने बाबूजी शेरपुर, मुजफ्फरपुरक गायत्री देवीसँ विवाह कएलनि जिनकासँ हमसभ पांच भाय-बहिन भएलहुँ – तीन बहिन आ दू भाय। एक बहिन हमरासँ जेठ, हमरा बाद दू बहिन आ सभसँ छोट भाय। हमरासभकें दुनू माक ममतामे कहिओ कोनो अन्तर नहि बुझाएल। सभदिन दुनू माकें एकहि थारीमे संग-संग खाइत देखलिअयनि जेकर सिलसिला बड़की माक मृत्युक उपरान्तहि भंग भेल। हमर विवाह 21 जून, 1972 ईं0 ( अद्भुत संयोग अछि जे इएह तिथिकें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनैबाक निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2016 ईं0मे लेल गेल अछि) मे मानदा, बेगुसराय ( आब समस्तीपुर ) के बीना देवीसँ भेल जिनकासँ हमरा त्रिदेवक प्राप्ति भेल अछि – तीन पुत्र – अभिनय, किसलय आ अनुनय। घरक नाम बाबू, मिट्ठू आ राजा। ज्येष्ट पुत्र दवाक स्टाकिस्टशिपक काज करए छथि, मांझिल पुत्र चार्टर्ड अकाउण्टेन्ट छथि आ कनिष्ट पुत्र वकालतक पेशामे छथि। ज्येष्ट आ कनिष्ट सुपौलमे हमरा संगहि रहए छथि आ मांझिल मुम्बईमे। वर्तमान तिथि तक तीनू पुत्र- पुत्रवधुसँ संयुक्त उपहारक रूपमे तेसर पीढीक जे चारिटा पुष्प हमरा प्राप्त भेल अछि ताहिमे तीन पौत्री आ एक पौत्र अछि। अपन इलाकाक जे चलन अछि ताहिमे परिचय पुछबाक आशय जाति आ गोत्र जानबसँ बेसी रहैत अछि। त सामाजिक संरचनाक आधारपर हम ब्राह्मण छी – भुमिहार ब्राह्मण। गोत्र अछि – पराशर आ गोत्र-प्रवर छथि – वशिष्ठ, शक्ति आ पराशर। गोत्र-प्रवरक संख्याँ तीन अछि तें जनेउमे तीन गाँठ लागैत अछि। पुर्वजलोकनि कर्णाटकक मैसूरसँ आएल छला आ तें कर्णाटवंशी कहाइ छी आ मूल अछि मैसूरिया। दुसाध आ मियांसभक संगति आ ओकरसभक छुअल खएबाक-पीबाक चलते देशक स्वतंत्रतासँ पुर्व बाबूजीपर कतेको बेर समाजक पंचैती बैसल किन्तु ओ अपन सामाजिक समताक स्वभाव नहि तजलनि। हमर नानाक घरमे पीर-बाबाक मजार बनल रहय आ ओ नियमित रूपसँ नमाज पढैत छला। ई सभटा संस्कार हमर जीनमे अछि आ हम मोटा-मोटी जाति-सम्प्रदायक पुर्वाग्रहसँ मुक्त रहल छी। एहि बातक चर्चा कए देब एहि कारणसँ आवश्यक बुझाएल जे पारिवारिक परिचयक क्रममे देल हमर विवरणसँ हमरा प्रति कोनो गलत धारणा नहि बनए। हम जे छी, जाहि जाति-गोत्र-सम्प्रदायसँ छी से हमर चुनल नहि अछि, तखनिओ हमरा एहिपर गर्व अछि आ एहिसँ आन जाति-गोत्र-सम्प्रदायक लोकक प्रति हमर सम्मान-भावनापर कोनो फर्क नहि पड़ैत अछि। २ अरविन्द ठाकुरजीक नामसँ किछु पत्र परती टूटि रहल अछि (कविता संग्रहपर पत्रक माध्यमसँ प्राप्त प्रारंभिक तीनटा टिप्पणी) प्रथम : श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ स्वस्ति                     आदित्य सदन, मिश्र टोला, दरभंगा, 20-1-95 आयुष्मान श्री अरविन्द ठाकुर, शतश: शुभाशी: । अहाँ द्वारा रचित आ प्रेषित “ परती टूटि रहल अछि “ कविता संग्रह परसू भेटल। आइ पढि कऽ सम्पन्न कयल। ई जानि हर्ष भेल जे अहाँ विप्लव जीक आत्मज थिकिएनि। पहिने किशुन जीक स्नेह सँ हम सुपौल बराबरि जाइत छलहुँ तेँ विप्लव जीक संग पूर्ण परिचय छल। अहाँ आ श्री केदार अपन अपन पिताक मैत्री भाव केँ संयोगि रखने छी तदर्थ साधुवाद। अहाँ केँ ज्ञात होयत जे हम कने मने जे पढलहुँ से संस्कृत। आब 75 वर्षक भेलहुँ आब हमर मान्यता बदलत तकर संभावना नहि। छन्द, अलंकार, अन्त्यानुप्रास नहिओ रहौक, यति अर्थात लयात्मकता केँ हम कविताक हेतु अनिवार्य तत्त्व बुझैत आयल छिऐक जे गद्य सँ एकरा फराक करैत छैक। सम्प्रति जे कविता लिखाइत छैक ताहि मे रसात्मकताक अभाव बहुत खटकैत अछि। पोथीक नाम सँ जतेक प्रभावित भेलहुँ, श्री केदारक भुमिका पढला सँ जे धारणा बनल, तदनुरूप वस्तु सन्तुष्ट नहि कऽ सकल। सामान्यत: सम्मति मे लोक प्रशंसात्मक वाक्य लिखि दैत छैक। उदीयमान प्रतिभाक हेतु हम तकरा श्रेयस्कर नहि मानैत छिऐक। एही कारणेँ बहुतो गोटे हमरा सँ क्षुब्ध आ क्रुद्ध रहैत छथि। जेना ‘गूंथल गेल आटा’ सदृश प्रयोग सँ बाँचक चाही। उदारताक नाम पर हम ओहन शब्द सँ परहेजक पक्षधर छी जे शब्द हमरा अपने भाषा मे प्राप्त अछि। भावभूमि अहाँक विस्तृत अछि दृष्टि मे कविक सूक्ष्मता अछि। आब युग अहीं सभक थिक, मैथिलीक भविष्य अहीं सब पर निर्भर छैक। हमर शत शत शुभकामना स्वीकार करी। इति शुभम्। स्नेहाधीन – श्री अमर # द्वितीय : श्री नारायण जी प्रति, श्री केदार कानन, किशुन कुटीर, सुपौल Ghoghardiha, 15-11-93 प्रियवर, ‘परती टूटि रहल अछि’ काल्हि भेटल। हमरासभक बीच बहुआयामी चेतना-सम्पन्न कवि (साहित्यकार) भाइ अरविन्द ठाकुरक उदय हमरासभ लेल आ समकालीन मैथिली साहित्य लेल अनेक संभावनाक अनेक दुआरि फोलैत अछि। एहि संग्रहक कवितासभक अहलटटका शब्द आ कथ्य आ चेतना जतऽ समकालीन मैथिली कविताक क्षितिजकेँ अपेक्षित विस्तार दैत अछि, ओतहि ‘सामा-चकेबा खेलाइत स्त्रीगण’ हमरा लोक-परम्पराकेँ बचबैत अछि। अद्भुत उर्वर-समर्थ कवि भाइ अरविन्द जी केँ हमरा दिस सँ हमर आत्मीय शुभकामना, संग्रह लेल।          नारायण जी # तृतीय : प्रमोद कुमार झा, कार्यक्रम अधिशाषी, दूरदर्शन केन्द्र, पटना - 800001 अरविन्द ठाकुर जाहि परिवेश मे रहि कऽ अपन रचना कऽ रहलाह अछि ई अति प्रशंसनीय अछि। जेनाकि मैथिलीक सामान्य रचनाकार ई दावा करैत छथि जे ओ माटि-पानि सँ जुड़ल छथि तऽ ई कहल जा सकैछ जे अरविन्दक कविता सँ ई बात स्थापित होइछ। मैथिली साहित्य मे व्याप्त प्रचंड गर्मी आ चिपचिपाएल पसीना आ कष्टप्रद भादोक बाद जे एकदम प्रात: दुबिक ऊपर खाली पएर चलबाक आनन्द कातिक मे भेटैत छैक [ तकरा अहाँ एहन संवेदनशील रचनाकार खूब नीक जकाँ ‘फील’ केने होएब ] अरविन्दक कविता सभ हमरा उएह आनन्द देलक। नब-नब स्वाभाविक भोगल बिंब सब एहि संग्रहक विशेष उप्लब्धि मानल जाएत ई ‘तारीख’ सँ हमरा उमेद अछि। बहुत दिन बाद हम पूरा संग्रह पढि सकलहुँ एक सिटींग मे। दू चारिटा कविता एहि संग्रह केँ आन संग्रह सब सँ अलग ठाढ कऽ दैछ। जौं अरविन्द जी आत्मसंतुष्टि आ आचार्यत्वबोध सँ ग्रसित भेने बिना अपन इन्द्रिय सब केँ एहिना सक्रिय राखथि तऽ काल्हुक मैथिली साहित्य केँ आशावान हेबाक चाही एहन-एहन प्रतिभा सब सँ। ( केदार काननक नामेँ प्रेषित दिनांक-4 दिसम्बर, 1993क पत्रक अंश) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आलोचना खंड--१.बहुरूपिया रचनामे- ओमप्रकाश झा २.अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर- आशीष चमन ३.अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि -डा योगानन्द झा ४. बहुरुपिया प्रदेश मे : एक दृष्टि- राम चैतन्य धीरज ५. अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चंद्र ठाकुर"अनिल" ६.अन्हारक रखवार -योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ ७.अरविन्द ठाकुर : व्यक्तित्व आ कृतित्व- अरविन्द मिश्र नीरज ८. स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे- परमानन्द प्रभाकर ९. सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि- अरविंद श्रीवास्तव १०. परती टूटि गेलै- मुन्नाजी १. बहुरूपिया रचनामे -ओमप्रकाश झा गजलमे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिलीमे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थितिमे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेशमे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथीकेँ आद्योपान्त पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजीकेँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि। पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छैन्हि। गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधार पर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि। भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत। २ अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर -आशीष चमन यदि अपन प्रथम काव्य संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि प्रकाशन वर्ष - 1993 के बाद श्री अरविन्द ठाकुर एतेक बरख धरि चुप रहलाह त हुनका प्रति हमर धरणा यैह बनैत छल जे ओ बहुत दिन घरि मोह भंगक स्थिति मे रहल होयताह मैथिली साहित्यक प्रति, जे जेबीक पाइ अकारथ गेल...। मुदा परमात्माक लीला देखल जाउ, ओ पुनः अवतरित भेलाह खूब चमकैत दमकैत संग्रह ‘अन्हारक विरोध् मे’ ल क...। हम स्पष्टीकरण दऽ दी जे हमर धरणा भौतिक उपलब्धिकेँ शून्यता पर छल मुदा जखनि आदरणीय भाइ श्री अजित कुमार आजादक ओहि लिपिबद्ध टिप्पणी पर नजरि गेल जाहि मे ओ लिखित गारन्टी सन देने छथि जे एक बेरि अहाँ मात्र एकटा कथा पढि़ क त देखू, अहाँक पाछाँ पोथी आ पोथीक पाछाँ अहाँ फेभीकोल जेकाँ खरकटि जाएब त सहज उत्सुकता जागि गेल...। जागि गेल ओहि व्यक्तिक प्रति जे सदति हमर नजरि के सोझाँ रहल छथि। जे किसान, दोकानदार आ परिवारिक कर्ता पुरूष रूपें अपन जय-पराजय दुनु के देखैत भोगैत रहल छथि आ चाबस्सी त देखियौक ओहि मर्दे के जे अपन समस्त कार्य व्यापार ओ व्यवहार केँ कोठीक ताक पर राखि अपना केँ खेतिहर कहबाक सामर्थ रखैत छथि जाहि में केवल पराजयक पीड़ा, जीवनक वर्तमान ओ भविष्य अन्ध्कारमय रहैत छैक...। हम बिना आओर बेशी भूमिकाक कहि सकैत छी जे अजित आजाद गँहिकी नजरिबला छथि तेँ ओ एहि कथा संग्रहक एहन तीव्र प्रशंसा कयलनि अछि। एहि संग्रहक पहिल कथा अछि ‘खिस्सा सियार यार। ई कथा, बिहार मे आइ सँ किछु दिन पूर्व धरि जे लालटेन युग छलैक ओहि स्थितिक अयबाक पूर्व सँध्या केँ इंगित क रहल अछि...। व्यंग्यात्मक शैली में लिखल ई कथा मूलतः हमर लोकतांत्रिक परम्परा केँ मरणासन्न अवस्था मे दर्शाबैत अछि, जाहि मे नेतृत्वशून्यताक स्थिति छैक..., सत्ता, संगठन मे गुटबाजी छैक, भ्रष्टाचार केँ आम सहमति भेटल छैक..., पुरान नीति सिद्धान्त केँ माननिहार आइ परिदृश्य मे नहि छथि त सिद्धान्तहीन व्यक्ति सेहो कारूणिक स्थिति में रहि रहि क अबैत अछि...। एहि दुनू प्रकारक व्यक्तिक चरित्र चित्रण करबा मे रचनाकार तखनि सफल भेलाह जखनि नबका छओड़ा रामसोगारथ मंडल केँ कहैत अछि जे ‘नबका जमानाक नारा लगाबू...।’ माने सत्ता प्रतिष्ठानक अध्ष्ठिाताक जयकार करू त बूढ़ असोथकित मंडलजी उपेक्षा सँ प्रतिकार करैत छथि। आइ लुच्चा लफाँडि़ अपराधी तत्व सभ निर्णायक आ नियन्ता बनल अछि आ सुच्चा जनसेवक सभ करोट लागल छथि...। एहि कथाक मूल तत्व यैह अछि, कथावस्तु प्रायः नवीन नहि अछि..., ई समस्या समान्यतः सभ केओ अवधारि नेने छथि तथापि प्रायः एक्कहि साँस में ई कथा लिखल गेल अछि एकदम निस्पृह ओ असम्पृक्त भ’ क’ तेँ कथा बहु रूचिगर। कथाकार अपन क्षमता आ अनुभव संग न्याय क लेलनि अछि। ‘‘पिआसल पानि’’ कथाकारक ओ रचना अछि जाहि मे हम अपन परिवेश, जाहि में रचल-बसल छी तकरा प्रति एकटा हीनता बोध होअए लगैत अछि...। एहि कथा मे कुल जमा तीन गोट पात्र छैक, प्रधानतः जाहि मे ‘‘नारायणपुरवाली’ ’ केन्द्रीय अछि...। कथा मुख्यतः नारायणपुरवालीक चारूकात घुमैत अछि आ अपना सभक सामाजिक पाखण्ड पर सेहो फोकश दैत अछि...। हमर समाज स्त्रीक मामिला में बड्ड कोनादन रहलैक अछि, एकसरि पयला पर चीड़-फाडि़ क काँचे खा जयबा लेल उताहुल...। एहिठाम स्त्रीक दुइये गति होइत अछि, ओकरा संग बलात्कार करू जेना किछु मास पूर्वहि आ एखनि किछु दिन पहिने एक गोट स्त्री ससुर पर्यन्त सँ बलत्कृत भेलैक अछि, आ नहि त ओकरा विभिन्न कारण सँ व्याभिचारिणी घोषित क दिऔक...। नारायणपुरवाली बलत्कृत त नहि भेलि मुदा ओ हत्भागिनी छलि जे ओकर स्वामी ओकरा भरि पेट अन्न नहि द सकल त ओ गिरहथ ओतऽ कमाब जा लागलि ओ संगहि अपन पति सँ दैहिक सुखो सँ वंचित छलि। विडम्बना त देखू जे प्रारम्भिक अवस्था में नारायणपुरवालीक प्रति एकटा वितृष्णाक भाव जगैत छनि गिरहथ राजा बाबू केँ, जे ई स्त्री की थिक त चरित्राहीना..., पाठकगणपर्यन्त नहि बूझि पबैत छथि आ अन्त में ओ स्त्री निराश भ पड़ा जाइत अछि, त ओकर स्वामी लखना दोसर बिआह करैत अछि। ओकर दोसरकी स्त्री केँ बच्चा होनहारी छैक ई सूनि लखना अपन कप्पाड़ पफोडि़ लैत अछि जे ई हमर जनमल नहि अछि। आ प्रथमतः पर्दापफाश होइत अछि जे लखना नपुंसक अछि त अचानक नारायणपुरवालीक प्रति सभक करूणा जागि जाइत छैक जे ओ बेकसूर छलि...। ओकरा प्रति समाजक ई बदलल धरणा रामचरण केँ प्रवक्ता बना स्थापित कयल गेल छैक...। एहिठाम कतेको प्रश्न उठैत अछि जे हमर सामाजिक मान्यता सेँ ढ़ाही लैत अछि जे एहि स्थितिक जिम्मेदार के ? स्वभाविक रूप सेँ पुरूष प्रधन ई समाज। जे पुरूष अपन पत्नी केँ कमा क खुआ नहि सकैत अछि, ओकर दैहिक आवश्यकता केँ पूरा नहि क सकैत अछि, तकर पत्नी केँ चरित्राहीन घोषित करू आ पुनः ओहि व्यक्ति केँ पाग, दोपटा, मौर पहिरा दोसर स्त्रीक वध करू वा कराबू...। मुदा हमरा नारायणपुरवाली कायर लगैत अछि..., ओ कियैक पड़ाइलि ? गिरहथ नहि त, आन दोसरे केकरो पकडि़त भागैत नहि, वरन् ओहिठाम स्थापित भ रहैत आ साँयक कमजोरी क ओकर पाखण्ड क जगजियार करैत जे लखनाक दोसर बहु क सकबा में सफल भेलि...। त ई कथा नीक सुतरलनि अछि रचनाकार केँ आ सत्तहि अन्हारक विरोध मे ठाढ़ छथि ओ पेट्रोमैक्स ल ‘क’....। कथा पाठ केरि क्रम मे जखनि हम कथा ‘अन्हारक विरोध मे’ क देखैत छी त हमरा स्वाभाविक रूपे ई भान होइत अछि जे कथा कखनहु काल क बनाओल सेहो जा सकैत अछि...। कथाक केन्द्रीय पात्रा सूत्रधारक रूप में स्वयम् रचनाकार छथि...। ओ जे घटनाक भूगोल केँ दर्शोलनि अछि ताहि सँ ज्ञात होइछ जे ओ कुजड़टोलीक कातहि मे बसल छथि, संगहि इहो ओ देखबैत छथि जे ओहि समाजक जनानी सभ भरि दिनुक मामिला क नून तेल सानि क देर राति मे घुरैत अपन-अपन साँय क सुनबैत अछि...। तकर बाद कचका ताड़ी पीने कुजड़ा सभ अपना मे गारि-गंजन, मारि-पीट करैत रहैत अछि आ रातिक नीरवता भंग होइत रहैत अछि प्रायः। मुदा हमरा जनैत कथा लिखबाक हड़बड़ी में रचनाकार कतहु-कतहु चुकि गेलाह अछि कियैक त ओ कहैत छथि ‘सभ राति स्त्री पुरूष सभ मारि-पीट करैत झौहरि करैत रहैत अछि आ तकरा ओ सामान्य रोजनमचा सन मानने छथि, माने अपन स्वीकृति द देने छथि मुदा ओहि राति ओ कियैक बहरेलथि ? जखनि की ओ हंगामा सभ केँ सामान्य सन मानैत छथि...। पुरूषवर्ग लड़ैत छैक अपना मे त जनानी सभ ओहिना चिकरैत छैक- ‘हौ बचाब..., मारि देलकैक..., लूटि लेलकै...।’ ई कथाक मादे सामान्य सन गप्प भेल मुदा एकर दोसरो पक्ष अछि जे एकर उपादेयता केँ रखैत अछि। लेखक एहि कथाक माध्यमे सामाजिक भाइचारा जाहि मे सभ एक दोसराक भाइ बहिन, माम, पित्ती अछि, धर्मिक, आर्थिक देवाल केँ तोडि़ क , तकरा दर्शोलनि अछि आ ताहि मे कमोबेश सफल रहलाह अछि...। ई कथा प्रायः हुनक उन्मेषकाल केँ दर्शाबैत अछि...। अध्ययन यात्राक क्रम मे हमरा जाहि चीज सभ स बेसी अखरल ओ अछि तारतम्यताक अभाव... एहि संग्रह मे ‘‘मूस’’ पहिने आयल अछि ‘‘अय्यासी’’ बाद मे....। हमरा विचार सँ ‘‘अय्यासी’’ के ‘‘मूस’’ स पहिने राखल जयतैक त दुनू कथा अपन अनिवार्यता केँ आओर बेसी सुसंगत बना सकैत छल...। कथा आब उद्देश्यपरक ओ उपदेशपरक भ गेल अछि तेँ...। चूँकि हमर अप्पन मान्यता अछि त हम ‘‘अय्यासी’’ के ‘‘मूस’’ स आ ‘‘मूस’’ के ‘‘अय्यासी’’ संग गेठजोड़बा क रहल छी...। अय्यासीक प्रधानपात्र अपन घरक कर्ता-धर्ता छथि, पत्नी छनि, पुत्र छनि, स्वयं अपने छथि, घरक खर्च छनि..., पत्नी केँ आवश्यकता छनि गैस चुल्हा के, पुत्र के चाही काँपी, पढ़ब लेल, अपनो मनोरथ छनि, मैगजीन पढ़ताह, दोस्तक संग सिकरेट पीताह..., घर मे तीमन तरकारीक खगता छनि ताहि पर ओ तेना ने लहोछि के बजताह जे श्रीमतीजी अपरतीव भ जाइत छनि, बच्चा सेहो आतंकित छनि हुनक मुख मुद्रा सँ...। मुदा अपना टाका ल’ क’ पत्रिका कीनैत छथि, सिकरेट कीनैत छथि, रिक्शा यात्रा करैत छथि...। वस्तुतः हम सभ एखनहुँ अपन आदिम भावना केँ प्रायः प्रकट करैत रहैत छी... जाहि मे हम अपना सँ दुर्बल मातहत केँ दबोचि क रखैत छी..., मुदा रचनाकार संवेदनशील छथि तेँ ओ मुख्यपात्र केँ अन्ततः विगलित देखबैत छथि...। ओ केन्द्रीय पात्रा के अन्ततः ई भान करबा देबा मे पूर्णतः सपफल होइत छथि जे ई समस्त कार्य-कलाप जाहि मे ओ अपना आप केँ खर्च कयलक अछि अन्ततः अर्थहीन अछि ओ हितगर नहि, सर्वथा गैर जिम्मेदार छथि...। एहि कथा अय्यासीक पूर्णता हमर दृष्टि मे ‘‘मूस’’ पर जा क होइत अछि...। दुनू कथा मादे पता नहि कियैक हमरा लगैत अछि जे दुनू केन्द्रीय पात्रा आ ओकर परिवेश दुनू परस्पर मिज्झड़ सन छैक...., एक पढ़ू आ दोसर केँ पढ़बैक त लागत जे - ‘अरे! इ मूस कथा त अय्यासीक उत्तर कथा अछि..., ठीक ‘‘गतांक से आगे’’ के स्टाइल मे...। देखल जाइ त अय्यासीक मुख्य पात्रा मूसो मे ओहिना ‘‘वर्कलेस’’ छथि, हाँ आब ओ सोझ हुड़दंगी नहि अछि... ई जरूर जे ओ जमीन बेचि क स्कूटर लेलक अछि मुदा पेट्रोल खर्चक चिन्ता जरूर ओकरा मे छैक, ओकरा रोजी रोजगार के चिन्ता छैक, व्यवसाय कर्ज ल’ क’ कयने छलैक से मूलधन आब सूदि जोडि़ क पँचगुन्ना भ गेलैक अछि, लोक हँसैत छैक अलग, भाइ जे छैक सेहो एकदम्म गैर जिम्मेदार.... ओ पफटोपफट्ट मे अछि कोना जीवन जीअत ? खन ओ मार्केटिंग काँम्प्लेक्स, खन सिनेमाहाल त खन हालसेल दबाइ विक्रेता बनबाक लेल विचारमग्न अछि...। कुल्लम ई जे आब अय्यास व्यक्ति सद्गृहस्थ बनबाक प्रक्रिया मे अछि..., मुदा बाट नहि भेट रहल छैक...। कथा अपन ऊँचाइ पर तखनि सांकेतिक दृष्टि सँ अबैत अछि जखनि ओ अपन बुनल काल्पनिक संसार मे देखैत अछि कर्मठ मूस सभक बनाओल बिहरि मे एकटा अजोध विषधर अबैत अछि आ बलात् ओहि मे पैसि जेबाक यत्न क रहल अछि...। ओ विषधर अछि, ओकरा विशालकाया छैक, ताकतवर अछि, मुदा ओ की नहि अछि त पुरूषार्थी..। ओकर तुलना मे वएह हीन, स्वेदकणयुक्त मूस बेसी आकर्षक छैक, कियैक त ओकर जीवन बेश जीवन्त छैक... आ नायक के नजरि अपन पिताक फोटो पर जाइत छैक त ओकरा होइत छैक जे ओहो वएह मूस छलाह जे अपन अध्यवसाय सँ धनार्जन कयलनि हमरा लेल..., एकटा हम छी जे साँप जेकाँ सभ साधन सँ युक्त भेलाक बादहु रचनात्मकता सँ हीन छी, एना कियैक ? हम कियैक एहन छी जे पिताक सम्पत्ति केँ बेचि क गाड़ी लैत छी, त बैंक कर्ज अदाए करैत छी..., दोकान नहि चला पबैत छी, हम कर्महीन छी कर्महीन....। एकटा ग्लानि ओकरा आब चोट द रहलैक अछि आ ओ आब उठैत अछि संकल्पक संग आ केवाड़ फोलैत अछि, अपन खुरपी लैत अछि, तखनि जे नव आ टटका हवा छैक से बन्न कोठली केँ ऊर्जा स भरैत छैक...। वस्तुतः ओ हवा अछि कर्मशक्ति सँ भरल जे एकटा कर्महीन केँ कर्मठ बना दैत अछि...। ई कथा मनुक्खक स्वभाव केँ चित्रित करैत अछि। ई कथा मनुक्खक नैसर्गिकता केँ अद्वितीय रूप सँ चित्रित करैत अछि जे मानव दर्शन मे अछि चरैवेति - चरैवेति...। ई कथा सवोत्कृष्ट अछि आ रचनाकार केरि प्रखर अनुभूति, प्रतिभाक संगहि जीवनक प्रति हुनक प्रचण्ड आस केँ इंगित करैत अछि...। संकलन यात्राक मध्य मे दुइटा कथा आगाँ अबैत अछि-प्रथम ‘‘ढ़ाँचा 1992’’ आ दोसर अछि ‘‘प्रजातन्त्र परिकथा’’। दुनू दुइ अलग-अलग कलेवर सेँ युक्त...। एकर विस्तार पर चर्चा बाद मे, पहिने एहि कथा संकलनक एक गोट मोहक आकर्षण पर हमर संक्षिप्त टिप्पणी ई जे ई संग्रह ‘‘आल इन वन’’ सन लगैत छैक...। प्रथम कथा ‘‘खिस्सा सियार यार’’ शुद्धतम रूप सेँ व्यंग्य मिश्रित हास्यक श्रेणी मे अवैछ, स्मरणीय अछि जे एहि विधा मे मैथिली मे बहुत कम रचना भेल अछि, कथा पढ़बैक त बहुतो काल धरि बिसबिस्सी सन लागत। आगाँ बढ़ू, त ‘‘पिआसलि पानि’’ सन विचारोत्तेजक रचना सेँ भेंट होइत अछि। पुनः आगाँ बढ़ला पर ‘‘मूस’’ आ ‘‘अय्यासी’’ सँ भेंट होइत अछि। एकर विषय मे आर विशेष की कहू, हमरा लगैत छल जे कथाकार संकलन मे श्रेष्ठ द‘ चुकल छथि मुदा हुनक झोरा मे बहुतो रास माल छनि...। ‘‘ढाँचा 1992’’ शिल्पक दृष्टि सँ आकर्षक अछि। पत्र लेखनक एकटा विद्या छैक जेकरा मैथिली मे बहुत कम्म स्थान भेटलैक। मुदा हम तीनटा पत्रक शैली मे लिखल रचना देखि चुकल छी आ सेहो मैथिलीक दुइ जाज्वल्यमान नक्षत्रा डा. हरिमोहन झा ओ स्व0 मणीन्द्र नारायण चौधरी उर्फ राजकमल द्वारा रचित...। जतऽ डा0 झा ‘‘पाँच पत्र’’ ओ ‘‘रसमयीक ग्राहक’’ मे अपन बात केँ विनोदक शैली मे लिखलनि अछि ओतहि राजकमल अपन ‘‘पाँच पत्र’’ मे ममता, दारिद्रय, अभाव बिछोह केँ चित्रित कयलनि अछि। भ सकैत अछि जे आनो रचना एहि शैली मे आओल होइक मुदा से हमर सोझाँ नहि आबि सकल अछि, मुदा ई दुनू रचनाकार अपन रचना बलेँ माइल स्टोन छथि...। एहि शैली मे ‘ढ़ाँचा 1992’ लिखल गेल अछि जाहि मे समष्टि रूपेँ एकटा राष्ट्र, एक राष्ट्रीय उपराष्ट्रवादक पीड़ा, ओकर जय, पराजय, ओकर इतिहास केँ अपन-अपन दृष्टि सेँ देखबाक प्रयत्न कयल गेल अछि। एहि कथा मे राष्ट्रीय पीड़ा केँ व्यक्तिगत पीड़ाक रूप मे अभिव्यक्त कयल गेल अछि...। अफसोच एहि बात के अछि जे स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी आ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक बाद केओ एहि समष्टि पीड़ा केँ वैयक्तिक पीड़ा मे बदलि सकबाक सामरथ नहि प्रदर्शित कयलनि....। एहि राष्ट्ररूपी शरीर जाहि मे अनेकानेक व्याधि ; अबैत रहैत छैक, मारिते रास चाक-चौबन्द सुरक्षाक बादो तकरा हल करबा लेल कोनहुटा सर्वमान्य ओ सर्वग्राह्य उपचार नहि निकलि सकल अछि आ हमर सामाजिक ढाँचा भीतरे-भीतर घुनाइत अन्ततः माटि मे मीलि जाइत अछि आ हम सभ मात्रा ओहि विडम्बना पर अपन कप्पार पीटि क रहि जाइत छी....। मुदा कने विलमि जाउ। लेखक केर वैचारिक श्रृंखला भंग नहि भेलनि अछि। जतय ‘‘ढाँचा 1992’’ मे लेखक सामाजिक चेतना केँ लुप्तप्राय देखौलनि अछि ओतहि एहि भकोभन्न अन्हार मे एकटा छोट छीन डिबिया ल’ क’ ठाढ़ छथि ‘‘प्रजातंत्र परिकथा’’ मे। स्थिति प्रायः समाने छैक दुनू कथा मे, मुदा ओकर अन्वेषण ओकर हल करबाक शैली अलग-अलग अछि...। जतय ‘ढाँचा’ कथा मे उन्मादी भीड़ कुटिल नेतृत्व द्वारा संचालित भ आदमखोर बनल अछि, जत राजसत्ता तूर तेल ल’ क’ सूतल अछि आ एक गोट सांस्कृतिक ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह मेटाओल जा रहल अछि, ओकर ठीक विपरीत ‘प्रजातंत्र परिकथा’’ मे एकटा संवेदनशील प्राणी द्वारा भीड़ संचालित भ रहल अछि...। एहू कथा मे उन्मत राजसत्ता छैक, कुटिल नेतृत्व वर्ग छैक, मुदा एकर विरोध मे ठाढ़ अछि एकटा सजग प्रहरी जे ओहि समस्त वर्ग पर भारी आ हावी रहैत छैक। ई व्यक्ति ‘‘ढाँचा 1992’’ मे निपत्ता अछि...। ‘‘ढाँचा 1992’’ के संवेदना, आत्मचिन्तन, आमोद-प्रमोद मे लीन आत्मरतिक शिकार एक निवीर्य बौद्धिकक हाथ मे छैक त ढाँचा खसि जाइत अछि, मुदा जखनि ओ व्यक्ति उठि जाइत अछि त हमर प्रजातांत्रिक मूल्यक संरक्षणे टा नहि ओकर विकास सेहो होइत अछि...। दुनू कथा बहुत सशक्त बनल अछि अपना आप मे....। कथा संग्रह अपना आप मे लगैत अछि जे ई कथा एवं उपकथा मे विभाजित अछि...। आदरणीय स्व0 प्रभाष कुमार चैध्री ‘‘अप्पन लोक’’ मे लिखैत छथि जे हम आ बैजू भैया परस्पर अभिन्न छलहुँ। आगाँ ओ अप्पन आ भाइक तुलना क्रमशः इंजन आ डिब्बा सेँ करैत छथि...। तहिना लगैत अछि जे एहि कथा-संग्रहक लेखक जे गप्प कह चाहैत छथि से ओ दृष्टिपफलक केर व्यापकता ओ संवेदनशीलताक कारणे एक गोट कथा मे नहि कहि पबैत छथि...। हुनक कथा यात्रा बहुत इत्मीनान संग आगाँ बढ़ैत अछि। ओ अप्पन बात केँ एक कथा ‘‘अथ गिरगिट गाथा’ सँ शुरू करैत छथि आ तकर समापन ‘‘बैकबा फोड़बा’’ मे करैत छथि, एकदम अलिपफ लैला सन...। ‘‘अथ गिरगिट गाथा’’ मे हमर महान ओ पुरान गणतांत्रिक व्यवस्था के कुरूप आनन केँ सार्वजनिक करबाक चेष्टा कयल गेल अछि। ओ व्यवस्था जेकर स्थापना नीक उद्देश्य सँ कयल गेल छलैक से आब पटरी पर सेँ हँटि गेल अछि...। त्याग तपस्याक क्षेत्रा मानल जाइबला राजनीति, शासन ओ समाज नीतिक नियन्ता पहिने नीचा खसल त अपराधी आ गुण्डावर्गक हाथ मे आइलि...। एकरा कमोबेश बर्दाश्त कयल जा सकैत छलैक मुदा आब त एहि बदनाम वर्गक बीच मे ‘स्पाइल्ड जीनियस’ सेहो सभ आबि गेल अछि। वएह ‘स्पाइल्ड जीनियस’ रामलखन पोद्दार दरोगा सँ ल’ क’ दारूबाज, रंगबाज रामलखन पोद्दार अछि। मुक्कन बाबू छथि पुरान आउटडेटेड, आ अपन अस्तित्वक लेल संघर्षरत सुब्रत मुखर्जी सेहो अछि...। इ लोक प्रकटतः सैद्धान्तिक रूपेँ एक दोसराक विरोधी छथि किन्तु तरे तर एक दोसराक हितचिंतक सेहो छथि...। हिनका सभक कुचक्र मे पडि़ नीक नारा हास्यास्पद भ जाइत अछि, लोक सभ मरैत कटैत रहैत अछि। वस्तुतः ई मात्रा एक नगरक टा नहि वरन् सम्पूर्ण देशक गाथा अछि...। कथाकार आगाँ बढ़ैत छथि आ ‘‘बैकबा पफोड़वा’’ नामक कथाक लाथेँ सार्वजनिन चिन्ता केँ व्यक्त करैत छथि। एतहु वएह ‘स्पाइल्ड जीनियस’ सिकन्दर अछि त रामचन्दर मड़रक बेटा कालेश्वर छथि...। एत जत सिकन्दर अपन अतीत सेँ भागि श्रमसाध्य काज कर’ लेल उताहुल छथि ओतहि ओकरा बिनु जानकारी देने ओकर बाहुबल केँ अपन लाभ लेल दोहन करयबला ‘‘भंवरलाल वस्त्र भंडार’’ के मालिक प्रकाश अगरवाल छथि। नतीजा कालेश्वर आ सिकंदर के बीच पाइ असूलीक तगादा दुइगोट रंगबाजक लपफड़ा मे तब्दील होइत-होइत अगड़ा-पिछड़ाक लड़ाइ मे बदलि सम्पूर्ण नगर मे लूटपाट मचा दैत छैक...। ई दंगा वैचारिक समानता केँ सेहो झमाडै़त अछि जखनि पिछड़ा वर्ग सेँ आएल सर्वमान्य सर्वप्रतिष्ठित एक राजनैतिक दलक जिलाध्यक्ष पुरूषोत्तम मंडल मात्रा एहि आकस्मिक घटनाक चलैत अपनहि दलक अगड़ावर्ग सँ आइल कार्यकत्र्ता चिरंजीव सिंह स अपमानित होइत छथि...। लेखक केर चिन्ता आगाँ बढ़ैत अछि आ ओ देखबैत छथि जे वैचारिक दृष्टि सँ दृढ़ व्यक्ति एहि तात्कालिक उन्माद मे तहिना अप्रासंगिक होइत छथि जेना बिहाड़ि मे बगुला.। एहि सभसँ लेखक तीव्र वेदनाक अनुभव करैत छथि, मुदा ओ पुनः आशाक एक किरण देखबैत छथि जे समाजक पैघ वर्ग एखनहुँ एहि वितंडा सेँ दूर अछि आ उत्साहक गप्प ई जे एकर संख्या बेसी छैक...। ई अछि एकटा विशाल श्रमिक वर्ग जेकरा लेल भरि दिनुक मेहनतिक बाद केवल ‘‘नून रोटी आ तानि कमरिया’’ सुतबाक अभिलाषा रहैत छैक। एहि वितण्डा केँ मनोरंजन ओ खेलक रूप देनिहार नव मुकुलित सभ जाति ओ वर्ग सँ आइल बच्चा सभ सेहो अछि...। एहि प्रकार सँ एहि दुनू कथा समेत सम्पूर्ण कथा-संग्रहक विषय मे यैह कहल जा सकैत अछि जे ई नीक ओ बेजाएक परीधिसँ बहुत दूर भ गेल अछि। अनन्य!!! अतुलनीय !!! अद्भुत !!! अद्वितीय !!! ३ अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि -डा योगानन्द झा श्री अरविन्द ठाकुर आधुनिक मैथिली साहित्यमे निविष्ट रचनाकारक रूपमे परिचिति बनौने छथि। हिनक एक गोट कविता संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि’, एक गोट कथा संग्रह ‘अन्हारक विरोधमे’ आ एक गोट गज़ल संग्रह ‘बहुरुपिया प्रदेशमे’ प्रकाशित छनि। राजनीतिक चेतनासँ ओतप्रोत हिनक लेखन रचनाकारक ओहि प्रतिबद्धताकें इंगित करैत देखि पड़ैत अछि जकर निर्वाह कोनो रचनाकारकें मानव जीवन, समाज, राष्ट्र ओ सम्पुर्णतामे मानवताक हितैषी, मानवीय गरिमाक उन्नायकक रूपमे प्रतिनिधित्व प्रदान करैत अछि। ‘अन्हारक विरोधमे’ कथा संग्रह हिनक दस गोट कथाक संग्रह थिक। कथा सभक शीर्षक थिक क्रमश: खिस्सा सियार यार, पियासल पानि, अन्हारक विरोध मे, ढाँचा-1992, मूस, प्रजातंत्र परिकथा, अथ गिरगिट गाथा, अय्यासी, बैकबा-फोड़बा आ विष-पान। एहि कथा सभक माध्यमे कथाकार आधुनिक परिवेश मे व्याप्त राजनीतिक, सामाजिक ओ प्रशासनिक विद्रुपताक खण्ड चित्र प्रस्तुत कऽ ओकरा प्रति असन्तोष, विरोध ओ विद्रोहक चित्रण मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपुर्वक कयलनि अछि। ‘पियासल पानि’ नारी जीवनक करुण कथा थिक। पुरुष प्रधान समाजमे नारी-शोषणक अविशृंखल परम्परा रहल अछि। अन्धविश्वास सँ जकड़ल समाज नारीक मनोभाव केँ कहियो विशेष प्रश्रय नहि दैत रहल अछि आ अपन संस्कारक कारणे नारी निरन्तर उत्पीड़नक शिकार होइत अयलीह अछि। एहि कथाक नायिका नारायणपुरवाली सेहो उत्पीड़नक शिकार छथि। ओ अपन क्लीव पतिक कारणे अपन कामवासनाक परितृप्ति नहि कऽ पबैत छथि आ ओकर आलम्बनक दिस उन्मुख होइत देखि पड़ैत छथि। तथापि सामाजिक व्यवस्थाक कारणे ओ सीदित जीवन जीवैत छथि आ मानसिक रूपें रुग्ण भऽ जाइत छथि। हुनक एहि रुग्णता कें हुनका पर डाकनी सवार होयब बुझल जाइछ आ हुनक झाड़-फूक शुरु कयल जाइछ। भगैत हुनका झोंटा पकड़ि लिरयअबैत अछि, मरचाइक झोंक दैत अछि आ सौंसे पीठक चाम काँच करची सँ पीटि उधेसि दैत अछि। परिणामत: ओ घर छोड़ि पड़ा जाइत छथि आ कुलकलंकिनीक उपाधिसँ विभुषित होइत छथि, अपवाद मे पड़ि जाइत छथि। मुदा हुनक पति लखना कें केओ क्लीव कहि प्रताड़ित नहि करैत अछि। बात तखन फुजैत अछि जखन लखना दोसर विवाह करैत अछि आ एहि दोसर विवाहसँ ओकरा पुत्ररत्नक प्राप्ति होइत छैक। क्लीव लखना ओहि पुत्र कें अनजनुञा जानि अपन दोसर पत्नीक चरित्र पर आक्षेप करैत ओकरा जान सँ मारि देबाक प्रयास करैत अछि। एहि तरहें कथाकार पुरुष प्रधान समाज मे नारी मात्र कें दोषी मानबाक रूढ विचारक प्रतिरोध कय समाज मे नारी-स्वातंत्र्यक स्थापनाक आग्रही देखि पड़ैत छथि। नारी मनोविज्ञानक क्रमिक विकासक दृष्टिञे ई कथा कथाकारक सिद्धहस्तताक परिचय दैत अछि। पोथीक शीर्षक रूप मे व्यवहृत कथा ‘अन्हारक विरोध मे’ स्वातंत्र्योत्तर भारत मे विकासमान सम्प्रदायवाद सँ सम्बद्ध अछि। अनेकता मे एकता भारतीय जीवन-पद्धतिक अन्यतम विशिष्टता थिक। एहि ठाम अनेक धर्म-सम्प्रदायक लोककें आन सम्प्रदायक लोकक संग अपने सम्प्रदायक लोक जकाँ सम्बन्ध रहैत अछि। विभिन्न सम्प्रदायक लोक एक दोसराक दु:ख-सुख, हानि-लाभ, जीवन-मरण मे संग देखि पड़ैत छथि। यैह भावनात्मक समन्वय एहिठामक राष्ट्रीय समन्वयक कारक तत्व थिक। मुदा आधुनिक राजनीति जे वोटक राजनीति थिक, संख्याबलक राजनीति थिक क्रमश: सामाजिक समरसता मे विष घोरि देलक अछि। ई समाज कें छिन्न-भिन्न कऽ रहल अछि। हिन्दू आ मुसलमान कें दू खीमा मे बाँटि देलक अछि। परिणामत: राष्ट्रीय ओ सामाजिक एकता नष्ट भऽ रहल अछि। कथाकार एहि राजनीतिक विद्रुपताक प्रतिरोध करैत छथि। अन्हारक विरोध मे कथाक नायक रंजनक हिन्दू होइतो मुसलमानक बस्तीमे निशाभाग राति मे जायब, ओहिठामक लोक सभक ओकरा प्रति सम्बन्धिक जकाँ व्यवहार तथा अलीमुद्दीनक उक्ति ‘कक्का ! ओहि हरमजादाक खूने गरम भेल रहै त` हमरा मारितय, हम सहि लेतौं। खुदा कसम, हम सहि लेतौं मगर अप्पन टोल मे हमर यारक भाइ…… हमर भाइ कें………आ सभ सँ बढि एक गोट हिन्दू केँ ओ मारलक। बाप-दादाक देल मोहब्बतक तालीम कें माती मे मिला देलक ई हरमजादा। कोन इज्जत रहि गेलै एहि टोलक आ हमरा सभक……।‘मे सामाजिक समरसताक आह्लादकारी आस्वाद भेटैत अछि। दोसर दिस खलनायक बिकुआक कृत्य जे हिन्दू कें नहि केवल मारैत अछि अपितु हिन्दू-मुसलमानक शगुफा छोड़ि दंगा करबय चाहैत अछि, सम्प्रदायवादी घृणाक अभिव्यक्ति थिक। एहि कथाक माध्यमे लेखक ओही सम्प्रदायवादी घृणाक प्रतिकारक संदेश देलनि अछि जे हुनक राष्ट्रवादिताक प्रतीक थिक आ सम्प्रदायवादी राजनीतिक विद्रुपताक प्रति विद्रोही प्रवृतिक निदर्शन सेहो। श्री अरविन्द ठाकुर लोकजगतक अत्यन्त गंभीर पारखी छथि। हिनक कथा ‘विष-पान’ हिनक एहि प्रवृति कें जगजियार कयन्र अछि। साम्प्रतिक न्याय-व्यवस्था कोना अर्थबलक वशीभूत भऽ गेल अछि आ अर्थहीनक हेतु अर्थहीन भऽ गेल अछि तकरा ई एहि कथा मे अभिव्यक्ति प्रदान कयलनि अछि। समाज मे जे गुण्डा तत्व अछि से खुलेआम अपराध करैत अछि आ न्यायप्रणाली ओकर किछु बिगाड़ि नहि पबैत छैक। दोसर दिस पीड़ित व्यक्ति अर्थाभाव मे न्यायालयक प्रक्रिया मे झुरझमान होइत अपन अर्जितो सम्पत्ति बोहाबैत रहैत अछि आ सीदित भेल रहैत अछि। अन्तत: विजय गुंडे तत्वक होइत छैक जे अर्थबल सँ प्रशासन ओ न्यायतंत्रहु कें किनबा मे समर्थ रहैत अछि। ‘विष-पान’क गोपाल जी चतुरानन द्वारा पिटलो जाइत छथि, न्यायालय मे जयबाक कारणे अपन व्यक्तित्वक अवमुल्यन सेहो अनुभव करैत छथि, वकीलक फज्झति सेहो सुनैत छथि मुदा न्याय हुनका सँ दूरे रहैत छनि। जखन कि चतुरानन पाइक बलें ने तं पुलिसक द्वारा पकड़ले जाइत अछि, ने ओकरा विरुद्ध गवाहिये भऽ पबैत छैक आ अन्तत: विभिन्न छल-छद्म द्वारा ओ गोपाल जी कें सुलहनामाक हेतु बाध्यो कऽ दैत छनि। एतावता कथाकार न्यायपालिकाक विद्रुपता पर एहि कथाक माध्यमे कशाघात कयने छथि। ‘अय्यासी’ कथा मे निम्नमध्यवर्गीय जीवनक मनोविश्लेषण कयल गेल अछि। ई कथा समकालीन आर्थिक परिवेश मे जीबैत मानवक संक्रान्त मन:स्थिति कें उजागर करैत अछि। व्यक्ति सापेक्ष ई कथा निम्नमध्यवर्गीय मनुष्यक आर्थिक विडम्बनाक यथार्थ सँ अवगत करबैत अछि। एक दिस ओकरा घर मे दैनन्दिन आवश्यकतोक वस्तुक अभाव छैक तं दोसर दिस बच्चाक शिक्षा हेतु किताब-कापी सेहो ने जुटि पाबि रहल छैक। तथापि ओ अपन शौकक वस्तु सिकरेट, पत्रिका कीनब ओ रिक्शाक सवारी करब नहि छोड़ि पबैत अछि आ आत्मवंचना सँ प्रतारित होइत रहैत अछि। ‘मूस’ कथा सेहो यथार्थक अन्वेषण थिक। एकर पात्र खने पेट्रोलक बढैत दाम सँ खिन्न अछि तँ खने पत्नीक हेतु गैस चुल्हा नहि कीनि सकबाक कारणे चिन्तित। खनहि ओ ड्रग इन्सपेक्टरक भ्रष्टाचारी प्रवृति पर विचार करैत अछि तँ खनहि अपन आर्थिक दु:स्थिति पर जकर कारणे ओकर कतोक मनोरथ पूर होयबा सँ रहि जाइत छैक। अन्तत: ओ अपन सकल दैन्य सँ पार होयबाक एकमात्र उपाय अपन पुरखाक अरजल जमीन कें बेचि पाइ एकट्ठा करबा मे तकैत अछि। मुदा जेँ लऽ कऽ ई ओकर अकर्मण्यताक प्रतीक होइतैक, ओ ओहि जमीन कें जोत-कोड़ कऽ उत्पादन करबाक विचार करैत अछि। एहि तरहें ई कथा वर्तमान कालक युवा लोकनि मे कर्मयोगक प्रति निष्ठाक सिद्धान्त कें प्रतिपादित करैत अछि। एहि कथा मे मूस कर्मशील मानव समुदायक प्रतीक थिक जे सर्वहारा वर्ग जकाँ निरन्तर कर्मठतापुर्वक श्रम कय बीहरि बनबैत अछि आ साप सुविधाभोगी वर्गक प्रतीक थिक जे सर्वहाराक श्रम सँ अर्जित सम्पदा पर छल-बल द्वारा कब्जा कऽ लैत अछि आ ओकर श्रमक शोषण करैत अछि। कथाकार श्रमजीवी मानव समुदायक प्रति एतय संवेदनशील छथि। ‘ढाँचा-1992’ कथा ओहि त्रासद घटना सँ सम्बद्ध अछि जे भारतीय हिन्दू आ मुसलमानक भावनात्मक एकता पर एकटा प्रहार सदृश छल। ई घटना छल बाबरी मस्जिदक विध्वंशक घटना जाहि सँ समस्त भारतीय समुदाय जेना मानसिक रूपें बीमार ओ स्तब्ध रहि गेल छल। एहि कथा मे कथानक सँ बेसी सामयिक यथार्थ कें नूतन शैली मे प्रकट कयल गेल अछि जे पाठककें सहजहिं प्रभावित कऽ दैत अछि। राजनीति व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रक प्रगति एवं चतुर्दिक विकासक हेतु अत्यावश्यक तत्व थिक्। मुदा वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अत्यन्त विकृत देखि पड़ैत अछि। जे राजनीतिक चिन्तन सामुहिकता ओ एकताक प्रतीक होइत छल से सामाजिक वैमनस्य, अलगाव ओ पारस्परिक संघर्षकें प्राथमिकता दैत देखि पड़ैत अछि। विभिन्न सामाजिक असमानता कें आधार बना कऽ व्यक्ति-व्यक्ति ओ जातिगत समूहक बीच राजनीति द्वारा जे रेखा खींचल जा रहल अछि से ततेक गहींर भऽ गेल अछि जे परस्पर दुर्भावना, विद्वेष ओ विनाशक प्रवृतिक कारक भऽ गेल अछि। जाति, धर्म ओ सम्प्रदायक नाम पर समाज कें खण्डित कऽ वोटक संख्या स्थिर ओ पर्याप्त करब  आधुनिक राजनीतिक धर्म भऽ गेल अछि। जाहि राजनेता कें शासन, सत्ता ओ अधिकारक उपयोग जनताक भलाइ आ कल्याणक हेतु करबाक चाहियनि से अपन क्षुद्र स्वार्थ ओ अहंकारक हेतु व्यक्तिक भावना कें भड़का कऽ सामाजिक ढाँचा कें क्षतिग्रस्त करबापर तुलल छथि। कथाकारक ‘बैकबा-फोड़बा’, ‘खिस्सा सियार यार’, ‘प्रजातंत्र परिकथा’ आ ‘अथ गिरगिट गाथा’ मे आधुनिक राजनीतिक यैह यथार्थ अंकित-टंकित भेल अछि। ‘बैकबा-फोड़बा’ मे सिकन्दर अगड़ा जातिक अछि आ कालेश्वर पिछड़ा जातिक। कालेश्वर एकटा कपड़ाक दोकान सँ उधारी लेने छैक आ सिकन्दर ओहि दोकानक उधारी ओसुलबाक काज करैत अछि। मुदा सिकन्दर जखन कालेश्वर सँ तगादा करैत छैक तँ ओ एकरा अगड़ा जाति द्वारा पिछड़ा जाति कें अवमानित करबाक हवा दैत छैक। परिणामत: कालेश्वर ओ सिकन्दरक बक-झक दुनू जातिक बीच वैमनस्यक कारण भऽ जाइत छैक आ दुनू समूह ओझरा जाइत अछि। वर्तमान राजनीति कोन तरहें जातीय विभेद कें प्रश्रय दऽ समाज कें तोड़ने जा रहल अछि तकर यथार्थपरक दृश्य उपस्थापित करब एहि कथाक उद्देश्य अछि। एहिना ‘खिस्सा सियार यार’ मे निजी स्वार्थक हेतु निरन्तर विभिन्न क्रियाकलाप मे लागल आधुनिक राजनेता सभक चरित्र कें उद्घाटित कयल गेल अछि। एकर पात्र गरीबदास एकटा एहन राजनेताक चरित्रक प्रतिनिधि अछि जे पार्टीक कोनो पैघ नेताक चमचागिरी कऽ कऽ नीक पद प्राप्त कऽ लेने अछि आ चुनावी टिकट प्राप्त करबामे सफल होइत अछि। ओ लायसेंस, परमिट आ चंदा-कमीशनक धंधा कऽ कऽ येन-केन-प्रकारेण जनप्रतिनिधि बनबाक लेल उताहुल अछि। दोसर पात्र राजनाथ झा निरन्तर पार्टीक काजमे लागल रहलोपर अपन पुत्रक हेतु नोंकरी प्राप्त करबामे पार्टी-नेताक अभिरुचि नहि देखि मोहभंग कें अङेजि लैत छथि। तेसर पात्र सदानन्द विद्रोही पार्टीक वाइस प्रेसिडेन्ट बनबाक लेल छात्र संगठन ओ युवा मंच कें हथकण्डा बनौने छथि। चारिम ओ पाँचम पात्र क्रमश: राजमंगल श्रीवास्तव ओ सतीश सिंह परमार अपन स्वार्थसाधन करबाक हेतु फुसिक सहारा लैत छथि। छठम ओ सातम पात्र क्रमश: शनिचर ‘शनि’ आ गणेश गुरमैता आत्मप्रशंसी छथि आ अपन कद बढयबाक हेतु विभिन्न उच्चपदस्थ राजनेता सँ अपन सम्पर्क होयबाक फुसि कथन द्वारा लोक कें मुड़बाक व्यापारमे लागल रहैत छथि। आठम पात्र माखन बाबू एम एल सी बनबाक सपना पोसने छथि आ अपन पुत्रो कें नेता बनयबाक हेतु प्रयत्नशील छथि। एहि तरहें कथाकार अनेकानेक स्वार्थी राजनेता सभक चरित्र प्रस्तुत कयलनि अछि जे सभ पार्टी कार्यालयक कार्यक्रममे समुपस्थित भेल छथि। हिनका लोकनिक चरित्रक अंकन कऽ कथाकार आधुनिक राजनीतिक विद्रूप चेहरा कें समक्ष अनबाक प्रयास कयलनि अछि। स्वार्थपुर्ण राजनीतिक ई यथार्थ व्यक्ति, समाज ओ राष्ट्रक उन्नति, समृद्धि ओ विकासक हेतु उपयुक्त नहि भऽ सकैछ। मुदा कथाकार एकटा एहनो राजनेताक उपस्थापन कयलनि अछि जे स्वतंत्रता सेनानीक रूपमे राष्ट्रक हेतु बलेदान देलाक बादो पेंशन एहि आधारपर अस्वीकार कऽ चुकल छथि जे ओ स्वतंत्रताक युद्ध सम्मानक हेतु नहि अपितु राष्ट्रसेवाक भावना सँ लड़ने छलाह। एतावता कथाकार साम्प्रतिक स्वार्थपुर्ण राजनीति ओ स्वतंत्रता सँ पूर्वक राष्ट्रहितक हेतु राजनीतिक वर्णन कऽ हेय ओ प्रेय दिस पाठकक ध्यान आकृष्ट कयलनि अछि। हेय राजनीतिज्ञ लोकनिक समूहक तुलना ई सियारक समूह सँ कयलनि अछि जे अपन स्वार्थ मात्र मे तल्लीन अछि आ समाज, राष्ट्र कें खखोरि कऽ चिबा जयबाक हेतु यत्नशील अछि। ‘ प्रजातंत्र परिकथा ‘ सेहो राजनीतिक कथा थिक। एहिमे प्रजातंत्रक दुरुपयोगक चित्रांकन भेल अछि। शहरमे अपराधी लोकनि दू टा परिवारक सम्पत्ति लूटि लैत छथि आ एकटा गृहस्वामीक हत्या कऽ दैत छथि। जनिक हत्या कयल जाइत छनि से डाक्टर छलाह आ गरीब सभ कें मुफ्त आ सस्त इलाज करबाक कारणें डाक्टरी व्यवसायमे लागल एहन लोकक हेतु बाधा छलाह जे रोगीक अधिकाधिक शोषण करबाक हेतु कुख्यात छलाह। दोसर गृहस्वामी जनिका ओहिठाम केवल लूटपाट भेल छलनि से राष्ट्रपति पदक प्राप्त सम्मान्य शिक्षक छलाह। एहि हत्या ओ लूटकाण्डक सूचना पाबि पुलिस प्रशासन अपन खानापुर्ति कऽ चुकल छल्। तत:पर केमिस्ट एण्ड ड्रगिस्ट एसोशिएसन एहि हत्याक विरुद्ध जुलूस निकालैत अछि जाहिमे शहरक अधिकांश भ्रष्टेलोकनि सम्मिलित होइत छथि। परिणामत: जुलूसक लोकसभ अनुमंडलाधिकारीक जीप कें क्षतिग्रस्त कऽ दैत अछि आ अनुमंडलाधिकारी कें सेहो कूहि दैत अछि। क्रमश: अनुमंडलाधिकारीक आदेश सँ जुलूसपर लाठी चार्ज होइत छैक आ अनेक एहने लोक प्रताडित होइत अछि जे कानूनकें अपना हाथमे लेबाक दुस्साहस नहि कऽ सकैत छल। पछाति गुंडा तत्व सभक द्वारा पुलिस पर सेहो रोड़ाबाजी होइत छैक। किछु गोटे गिरफ्तार होइत छथि। ओहि गिरफ्तार लोकसभ कें छोड़यबाक हेतु प्रशासनक संग वार्ता कयल जाइत छैक आ प्रशासन ओकरा सभ कें छोड़ि कऽ जुलूस आ नारेबाजी सँ त्राण पबैत अछि। एहि तरहें ई कथा प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे सामाजिक-सार्वजनिक हितक हेतु कयल गेल प्रयास कें नेतागिरीक धंधा किंवा निजी उद्देश्यक हेतु कयल गेल अनुशासनहीनताजन्य अराजकता ओ भटकावक चित्र प्रस्तुत करैत अछि जे साम्प्रतिक राजनीतिक यथार्थ थिक। ‘ अथ गिरगिट गाथा ‘ सेहो राजनेतालोकनिक अपन स्वार्थपुर्तिक हेतु भ्रष्टाचरणक अतिरेक कें उद्घाटित करैत अछि। एहि कथाक पात्र मुकुन्द जायसवाल आ रामलखन पोद्दार परस्पर विरोधी छथि आ हिनका दुनूक समूहक बीच निरन्तर मारि-पीट होइत रहैत छनि जाहि सँ शहर अशांत रहैत छैक। मुदा जखन नगरपालिकाक चुनावक अवसर अबैत छैक तँ ई दुनू परस्पर यारी कऽ लैत छथि आ जाहि वार्डमे जनिक समर्थकक संख्या अल्प रहैत छनि ताहि वार्डमे अपन प्रतिद्वन्दीक समर्थन कऽ दैत छथि आ दुनू गोटे नगरपालिकाक क्रमश: चेयरमैन आ वाइसचेयरमैन बनि जाइत छथि। एतावता संकलनक कथा सभकें पढला उत्तर ई स्पष्ट होइत अछि जे श्री अरविन्द ठाकुर कथालेखन मे वस्तुवादी ओ वास्तविकतावादी छथि। ई यथार्थकें यथावत प्रस्तुत कऽ ओकर विरूपताकें पाठकीय संवेदना सँ जोड़ि लोकजगत मे व्याप्त विसंगति सभ पर कशाघात करैत छथि। वस्तु, पात्र, परिवेश ओ घटनाक निर्माण मे अपन कुशलता द्वारा ई कथाक मूल कथ्य कें सहृदयजनसंवेद्य बना दैत छथि आ सामाजिक- राजनीतिक जगत मे व्याप्त विसंगति सभहिक पोल खोलि ओहिमे सुधारक हेतु सुझाव किंवा चिन्तन प्रस्तुत करैत छथि। ४ बहुरुपिया प्रदेश मे : एक दृष्टि -राम चैतन्य धीरज ‘एकोऽहं बहुस्याम‘ क अवधारणा ई अछि जे आत्मा एकहिटा होइत अछि, मुदा प्रवृतिभेदक कारणेँ ओ बहुतो रूप मे देखार पड़ैत अछि। वस्तुत: जे भिन्नता अछि ओ भिन्नता प्रकृति वा प्रवृतिक थिकै, आत्मा वा चेतनाक नहि। प्राय: प्रवृतिए भोग आ युद्ध मे लिप्त होइत अछि मुदा जखन प्रवृति आत्मस्थ होइत अछि तँ ओ निर्द्वन्द्व अवस्था केँ प्राप्त क` लैत अछि। वर्गहीन भ` जाइछ। अर्थात प्रवृति अपन अज्ञानता सँ मुक्त भ` जाइत अछि ; तखने व्यक्ति केँ वास्तविक मुक्ति वा स्वाधीनता भेटैत छैक। संयोग सँ एम्हर तीन-चारिटा मैथिली कार्यक्रम मे भाग लेबाक अवसर भेटल। प्राय: देखबा मे आएल जे हमर उपस्थिति नगण्य अछि। जहिना राजनीति मे विचार आ व्यवहारक द्वैधता छैक, तहिना प्राय: साहित्यकारो मे विचार आ व्यवहारक द्वैधता छैक। जहिना राजनेताक लेल जनताक भूख, गरीबी आ ओकर रोजगार समस्या राजनीतिक लेल गरमागरम मुद्दा होइत अछि, तहिना प्राय: साहित्यकारोक लेल यैह सभ कथ्य वस्तु होइत छैक। कोनो वैचारिक क्रांति नहि, कोनो व्यवहारिक आन्दोलन नहि। लगैत अछि सभ किछु थम्हि जकाँ गेल अछि। टोली-टोली आ व्यक्ति-व्यक्ति मे बँटल साहित्यकारक लेल अपन-अपन मथनियाँ छनि, जाहि मथनियाँ सँ ओ साहित्यिक सृजन आ क्रिया-प्रतिक्रिया करैत छथि। सुन`बला, पढ`बला आ बूझ`बलाक सर्वथा अभाव। लगैए जे साहित्य साहित्यकारेक लेल रहि गेल अछि। हमर उपस्थिति नगण्य अछि माने – दर्शन-दृष्टि सँ सृजन करैबला साहित्यकार नगण्य छथि। दर्शनक एकहिटा दिशा छैक, जे विश्वशांतिक ताना-बाना बुनैत अछि आ प्रेम तथा संघर्षक भाव मे सहयोग आ सहानुभूतिक विवेक प्रस्तुत करैत अछि – ओ थिक वेदांत। वेदांत चेतनाक अखण्डता मे ‘ सर्वे भवन्तु सुखिन:। सर्वे सन्तु निरामया’क आकाश सजबैत अछि आ ओहि आकाश मे सभक सुखक कामना ओहिना करैत अछि, जेना तारा अपन प्रकाश सँ प्रकाशित हो। कविता हो, गीत वा गजल जे हो सगरे उत्साह आ उत्सवक अभाव बुझना जाइत अछि। सगरे प्रभाहीन तारा देखार दैत अछि। मुदा प्रतिरोध आ यथास्थितिक वर्णन, चित्रन सगरे देखार दैत अछि। की कविता वा साहित्य कलात्मक रेचन मात्र थिक, जे बिना व्यवहारिक सोच-विचारक अभिव्यक्त होइत अछि ? एखनो साहित्यकारक लग संस्कृति चुनौती बनल अछि आ साहित्यकार सहित अन्य सभ वर्गक लोक हजारो-हजार वर्ष पूर्वक संस्कार मे बन्हाएल छथि – ई प्रश्न गंभीर बनल अछि। एक मात्र सर्वहाराक पक्षधरता मे लिखब साहित्यक उद्देश्य नहि होएबाक चाही, अपितु एकरा संगहि व्यवहार मे ओहि रुढिवादी जड़ता केँ तोड़ब सेहो उद्देश्य होएबाक चाही, जे आत्मोत्कर्ष मे बाधा बनल अछि। तेँ आत्म खोज आवश्यक अछि, जकर सर्वथा अभाव सन लगैत अछि। एही सँ भोगवाद आ अंधविश्वासक परिधि नष्ट होएत, जाहि मे लोक सभ घेराएल अछि। मित्र अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो सर्वहारे प्रेमक अभिव्यक्ति थिक, जे हमरा समाजक अंतिम आदमी आ ओकर आर्थिक मुक्ति तक ल` जाइत अछि। ई बात सत्य छैक जे आत्मवत भाव मे वर्गभेद नहि होइत छैक, मुदा प्रवृतिगत भाव मे वर्गभेद छैक। उपभोग आ संतुष्टिक बाजार गर्म छैक, एहि स्थिति मे वैचारिक दृष्टिक उपयोगिता प्रश्नांकित अछि। अधिकाधिक उपभोग आ अधिकाधिक संतुष्टि क्रय-शक्ति, बाजार आ वस्तु पर निर्भर होइछ। वैचारिक दृष्टि मे तँ आवश्यकता निर्धारित अछि, मुदा अधिकाधिक उपभोग आ अधिकाधिक संतुष्टि जीवनक मापदण्ड भ` जाइक तँ नैतिक पाठ पढाबएबला साहित्य क्षणभंगूर आ मनोरंजनक दृष्टि बनि जाएत आ कि नहि ? भोग आ युद्ध मे सभक मन स्थिर भ` गेल अछि, ओहि स्थिति मे दर्शन आ विचारक की हेतैक? मनुष्य केँ की चाही – बाजार, वस्तु आ क्रयशक्ति – तखन विचार ल` क` की हेतैक? यैह कारण छैक जे राजनीतिक दृष्टि असफल भ` रहल अछि। क्रयशक्तिक वृद्धि होअए तेँ राजनीति मे अनीति आ पाप बढि रहल अछि। अपराध प्रवृति वा हिंसात्मक मनोभावक पाछू एकमात्र कारण क्रयशक्तिक होड़ अछि ; प्रतिस्पर्धा अछि आ अन्तत: अनैतिकता अछि – जे कोनो वर्ग केँ छोड़ि नहि रहल अछि। तेँ ओ साहित्यकार आइ प्रभावी छथि जे साहित्यक व्यवसाय करै छथि। यैह अज्ञानता थिकै, तेँ दर्शन-दृष्टिक आवश्यकता स्पष्ट भ` गेल अछि ; जाहि सँ प्रवृति आत्मस्थ भ` सकय। वस्तुत: एहि अज्ञानता केँ भेदरहित ज्ञाने समाप्त क` सकैत अछि। जाधरि मानव मे ज्ञानक संबर्द्धन नहि होएत, बौद्धिक निष्ठा नहि होएत आ निश्चयात्मक चेतनाक व्यवहार नहि होएत, ता धरि मुक्ति संभव छै की? मित्र अरविन्द ठाकुरक गजल संग्रह ‘ बहुरुपिया प्रदेश मे’ जे कह` लेल चाहैत अछि, ओकर चित्र एहि गजल-संग्रहक नामकरणेँ सँ स्पष्ट भ` जाइछ जे कोनो एहन ज्ञान नहि छैक, जे मानव मे एकात्मकता आनि सकय। एकहि राजनेता बहुरुपियाक भूमिका मे स्वयं केँ प्रदर्शित करै छथि आ एकर प्रभाव मे जनसामान्यक बाध्यता सेहो छैक। तेँ ओ सर्वहारा हो वा अन्य वर्ग सभ मे क्रयशक्तिक होड़ मचल अछि। बौद्धिक रुप सँ जे पिछड़ि रहल छथि, आजुक परिवेश मे वैहटा पछुआएल छथि, नहि तँ प्रतिस्पर्धा मे सभ लागल अछि। श्री ठाकुर स्वयं साहित्य मे द्वैध चरित्रक स्थिति केँ स्वीकार करैत एहि पोथीक भूमिका ( अर्ज करक अछि जे………) मे लिखलनि अछि जे –“ बहुत रास रचनाकार कलाक अनेकानेक आवरण मे स्वयं केँ प्रस्तुत क` अपन रचना मे अपन वास्तविक जीवन सँ भिन्न जकाँ व्यक्त होएबाक बाजीगरी करैत छथि।“ विचार आ व्यवहारक सामंजस्य जखन टुटि जाइत छैक तँ एहीठाम सँ वैचारिक स्खलन प्रारंभ होइत अछि आ संवेदनशीलताक समस्या उत्पन्न होएत छैक। हमर ई अनुभव अछि जे कविता मे, गीत वा गजल मे जे भाव व्यक्त होइत अछि ओहि मे प्रतिरोध तँ अवश्य होइत छैक, मुदा व्यवहार मे ओहो क्रयशक्तिक बढोतरीक लेल अपस्याँत होइत छथि। चारित्रिक द्वैधता मे वैचारिक समस्याक जन्म होएब स्वाभाविक अछि। जे विचार व्यक्त करै छथि वैह जखन प्रोफेशनल छथि तँ फेर हुनक विचारक प्रभाव जनसामान्यपर जतेक होइ। तेँ साहित्य नहि तँ अंधविश्वास सँ लड़ि सकैत अछि आ नहि भोगवाद वा अधिकाधिक संतुष्टिवाद सँ। विज्ञानक कारणेँ जे परिवर्तन भ` रहल अछि आ ओकर प्रभाव जे समाज पर पड़ि रहल छैक आ ओहि सँ जे खतरा उत्पन्न हेतैक तकर भविष्यवाणी करैत श्री ठाकुर अपन गजलक पाँति केँ सजबैत छथि, देखबाक थिक – नइ पूजीक आन-बान, नहि ओकर शान बचत नइ जखन खेतिहरक ठोर परहक गान बचत दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोश करत नइ जखन गाम मे मालक बथान बचत यूरो आ डालर सँ पेट भरैक भांज करू जँ खेतक आरि नइ आ ने मचान बचत आयातित बीया आ पटौनी अकास सँ दैव आ विदेश बलेँ कोना किसान बचत हरदी नइ हर्रे नइ बनियाँ सरकार मे ‘अरबिन’ पेटेन्ट सँ की बासमती धान बचत समाजक अंतिम आदमी कथी लए अंतिम आदमी अछि? वस्तुत: शारीरिक सेवा लए अंतिम आदमी होइत अछि। जाहि ठाम बौद्धिक चालाकी छैक वा तकनीकी ज्ञान छैक, ओहि ठाम पूंजीवादी क्रयशक्ति होइत छैक आ जाहि ठाम नहि छैक, ओहि ठाम शारीरिक सेवा होइत छैक। आइयो समाज मे शारीरिक श्रम करयबलाक विपन्नता छैक, किएक तँ ओ तकनीकी ज्ञान नहि राखैत अछि। एहि वर्गक क्रयशक्ति सभ सँ कमजोर होइत छैक। ई सत्य छैक जे पूंजीपति वा मालिक वर्गक शान खेतिहर मजदूर होइत अछि, मुदा ओकर महत्व सामाजिको दृष्टि सँ कमजोर अछि – श्री ठाकुर एकर पक्षधरता मे अधिकाधिक गजलक भाव केँ प्रस्तुत कयलनि अछि। हिनक चिन्ता भारतक ओहि अवस्था सँ अछि, जाहि अवस्था मे भारत साम्राज्यवादी शक्तिक उपनिवेश बनल जा रहल अछि। देश आ गामक चिन्ता हिनक गजल मे प्रमुखता सँ आयल अछि आ सभ सँ बेसी प्रभाव ओहि चिन्ता मे अछि जाहि मे भारतीयता नष्ट भ` रहल अछि। व्यक्तिक इच्छा आ ओकर संतुष्टिक प्रश्न पर हिनक लेखनी बहुत किछु कहैत अछि, मुदा अज्ञानता सँ मुक्तिक बाट नहि देखा पबैत अछि। तेँ सामाजिक यथार्थक चित्रन आ वर्णन होइतो कुण्ठा, संत्रास, निराशा आ प्रतिरोधक स्वर हिनक गजलक मूल राग बनल अछि। संगहि वर्तमान समाजक बदलैत चित्र आ पूंजीवादी मानसिकता मे उबडुब करैत व्यक्ति-व्यक्तिक इच्छा आ ओकर कार्यरुप तथा प्राचीन उत्पादन-व्यवस्थाक टूटैत स्थिति हिनक अभिव्यक्तिक प्रतिमान बनल अछि, संगहि हथियारक होड़ आ विश्वस्तर पर शान्तिक समस्या सेहो हिनका प्रभावित करैत छनि। तथापि हिनक चेतना अन्तत: साम्राज्यवादी खतरे सँ आहत होइत अछि। वस्तुत: ई प्रभावन ओहि वर्गक प्रति वैचारिक प्रेमक आख्यान थिक, जे मानवीय रुप सँ उपेक्षित अछि। परमात्माक इच्छा थिकै संसार, तेँ द्वन्द्वक स्थिति बनिते अछि। मुदा सत्यक प्रत्यक्षणक संगहि द्वन्द्व निवृत भ` जाइत अछि – तेँ सत्यक अनुभव मे परमात्माक अस्तित्व इच्छा रहित भ` जाइत अछि, कामना रहित भ` जाइत अछि। अर्थात इच्छा आ कामना सँ मुक्ति। वास्तविक मुक्ति यैह थिकै, एहि मे क्रयशक्तिक चाहना आवश्यकतानुकूल उपभोग आ क्षमतानुसार कार्य मे सीमित भ` जाइत अछि। तेँ राग-द्वेषक प्रवृत्यात्मक परिधिक बन्हन टूटि जाइत छैक आ लोक परम्परागत कर्मकाण्डो सँ मुक्त भ` जाइत अछि। ई बात सत्य छैक जे वेदांत आत्माक अस्तित्व सँ अभेद केँ स्वीकार करैत अछि ; मुदा लोक ई नहि बुझैत अछि जे आत्मा प्रवृति कारण सँ भेदात्मक जगत मे होइत अछि। तेँ आत्माक अभेद होइतो प्रवृतिक भेद भ` जाइत अछि आ एही लेल प्रवृतिक दोष सँ उतपन्न आक्रामकता आ अराजकताक प्रतिकार वा प्रतिवाद अवश्य भ` जाइत अछि। अस्तु, ई नहि मानबाक चाही जे आत्मोत्कर्ष मे शांतिक लेल प्रयत्न एवं मानव मात्र मे समान भावक चेतना वेदांतेक थिक। यैह चेतना विश्व मानवताक स्थापना करैत अछि। गजलकार श्री ठाकुर वस्तुत: वेदांत केँ एहि विचार सँ नहि देखलनि अछि, तेँ लिखैत छथि – निगमागम-पुराण सम्मत छै- जीव अंश परमात्मा के मच्छर लेल कछुआ सुनगाबी, ई केहन दन गप लगैए ओना वेदांत सभहक रक्षक अछि आ विवेक सम्मत विचारक प्रधानता दैत अछि, तेँ दोसरा केँ उत्पीड़ित करबा एहन प्रवृतिक विरोध करैत अछि। आजुक रिश्ता-नाता वस्तुत: विवेक वा ज्ञान सँ नहि अछि, अपितु अर्थप्राप्ति आ भूख सँ अछि। एहि अर्थ मे मनुष्य सेहो वस्तुए मानल जाइछ, तेँ भेद-भाव सामान्य गप थिक। जा धरि इच्छा वा भूख ज्ञान वा विवेक सँ नियंत्रित नहि होएत ता धरि की वर्गहीन आत्मा वा चेतनाक समाज भ` सकैछ ; ई प्रश्न हमरा सभक समक्ष मुँह बौने ठाढ अछि। श्री ठाकुर वर्तमानक बास्तुक-विद्रुपता केँ रेखांकित करैत लिखैत छथि – मारू, मारू, मारि भगाबू – सगर टोल मे एक्के बोल तखन करी रक्षक के दाबी, ई केहन दन गप लगैए पेट बनाबैछ अपन ढंग सँ सभटा रिश्ता-नाता, तेँ हम बिहारी, तू पनिजाबी, ई केहन दन गप लगैए वस्तुत: ठाकुर जी अपन गजल मे सामाजिक यथार्थ केँ आ व्यवसायिक विद्रुपता केँ सूक्ष्म रुप सँ रेखांकित कयलनि अछि। महत्वपुर्ण तथ्य ई अछि जे गजलक व्याकरण केँ ई ओतेक स्थान नहि देलनि जतेक शब्द आ भावात्मकता केँ। तेँ भावक क्षोभ हिनकर गजल मे नहि अछि। प्रतीक, बिम्ब आ नव उपमानक सृजनशीलता एवं कलात्मकता हिनक गजल मे महत्वपुर्ण रुपेँ व्यक्त भेल अछि, जाहि सँ व्यंजनाक मार्मिकता सिद्ध भ` जाइत अछि। अस्तु, मित्र श्री ठाकुरक दृष्टिक पैनापन मे वेदांतक समीचीन बोध अयबाक चाही, एही विश्वासक संग हिनक सारगर्भित भावक प्रति संवेदनशील छी – एही बातक संग हिनका बहुत-बहुत साधुवाद ! मानस नगर, हटियागाछी सहरसा, बिहार ५ अरविन्दजीक आजाद गजल -जगदीश चंद्र ठाकुर"अनिल" मैथिलीयोमे गजल पर खूब काज भेल अछि आ एखनो भ’ रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर गजलक व्याकरण  विस्तार सँ प्रस्तुत केलनि आ अपनो बहुत गजल लिखलनि. आशीष अनचिन्हार मैथिली गजल ले’ स्वतंत्र साइट बनाक’ व्याकरण कें स्थापित करबामे अपनो योगदान करैत अपनो बहुत गजल लिखलनि आ आओर बहुत गोटे सँ गजल लिखबौलनि आ से काज एखनो क’ रहल छथि हिनका दूनू गोटेक अतिरिक्त आर बहुत गोटे मैथिली गजलकें समृद्ध करबामे योगदान क’ रहल छथि।ई प्रसन्नताक बात थिक। हमरा जनैत गजलकारक  मुख्य तीनटा वर्ग अछि। एक वर्ग ओ अछि जाहिमे रचनाकार पहिने गजलक व्याकरण पढलनि आ तकरा बाद ओही अनुसारे गजल लिख’ लगलाह. दोसर वर्गमे ओ गजलकार सभ छथि जे पहिने गजल लिख’ लगलाह , बादमे गजलक व्याकरण दिस घ्यान गेलनि आ ओहि अनुसारे लिखबाक प्रयास कर’ लगलाह. तेसर वर्गमे ओ लोकनि छथि जे गजल सूनि क’, पढि क’ लीख’ लगलाह आ लीखैत चल गेलाह, पाछां उनटि क’ नहि तकलनि.ओ मात्रा अथवा वर्ण गनि क’ षेर  लिखबाक-कहबाक चक्करमे नहि पडि अपन बातकें केंन्द्रमे राखि धडाधड लिखैत चल गेलाह आ लिखैत जा रहल छथि। ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’ मात्र 24 दिनमे लीखल गेल 66टा गजलक संग्रह थीक जाहिमे गजलकार अरविन्द ठाकुरजीक कथन पर ध्यान देल जाए: ‘हम जे कहय चाहैत छी से महत्वपूर्ण छैक,ताहि लेल व्याकरण टूटय कि विधा विशेषक मापदंड,तकर हमरा परवाहि नहि अछि। ओकरा भल चाही त’हमर सहायक हुअए,बाधा ठाढ नहि करए ।’ गजलकारक एहि कथनकें ध्यानमे राखि जँ हिनक गजल पढब त नीक लागत। 66 टा गजलमे 10टा गजल एहेन अछि जाहिमे रदीफ अछि,काफिया नहि. 16 टा एहेन अछि जाहिमे काफिया अछि,रदीफ नहि. 40 टा गजलमे रदीफ आ काफिया दूनू अछि. किछुए गजल एहेन हएत जाहिमे बहरसँ सम्बन्धित दोष नहि हो.मुदा,बहुत रास शेर सभमे जे बात कहल गेल अछि से व्याकरणक त्रुटिकें झांपन देबामे बहुत समर्थ लगैत अछि.सभ गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक  नामक प्रयोगक प्राचीन परंपराक निर्वाह  नीक जकाँ कएल गेल अछि जे बहुत गजलकार नहि क’ पबैत छथि. गजलकारक  समक्ष  सामाजिक,राजनीतिक आ सांस्कृतिक चेतनाक अवमूल्यनक विषाल क्षेत्रक अनुभवक संपदा छनि जे जहां-तहां विभिन्न गजलक विभिन्न शेर सभमे प्रगट भेल छनि।एकर बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि निम्नलिखित  किछु  शेर: दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोस करत नै जखन गाममे मालक बथान रहत एहि समाजक रूढि भेल अछि घोडनक ओछाओन सन प्रेममे भीजल बतहबा ताहिपर ओंघरा रहल अछि गाममे डिबिया जरल अछि रातिसं लडबाक लेल मेट्रोपॉलिटन टाउनमे अछि राति दुपहरिया बनल पात बिछैबाक बेर लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठेबाक बेर रातिक जे एकबाल बढल दुर्लभ सगर इजोरिया भेल संसद केर फोटोमे किछुओ नहि हेर-फेर सांपनाथ, नागनाथ,इएह दुनू बेर-बेर कार खोजै छै एम्हर फूटपाथ पर सूतल षिकार यम अबै छथि एहि नगर विभिन्न वाहन पर सवार संसदमे घुसिआयल जे सात जनम लेल केलक जोगार गजलकारक  भयंकर आत्मविष्वास एहि षेर सभमे देखू: धन्य ‘अरबिन’तों एलह गजलक जगतमे फेर केओ ‘खुसरो’की तोहर बाद हेताह नै पाठक के चिन्ता अरबिन नीक गजल के पढबे करतै एहने आर बहुत रास नीक-नीक शेर वला  गजल पढबाक लेल देखू  श्री अरविन्द ठाकुरक रचल आ ‘नवारंभ’ द्वारा 2011 मे प्रकाशित  आ  बहुत सुंदर कागतपर ‘प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स’, नई दिल्ली द्वारा बहुत सुंदर मुद्रित गजल संग्रह ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’। अन्तमे हम गजलकारक उक्तिक उल्लेख कर’ चाहब: ‘.......हाथक जेना सभ बान्ह टूटि गेल । एहन धारा-प्रवाह जे गजलक मिसरा,शेर,रदीफ,काफिया,बहर,गिरह सभकें सम्हारब कठिन....’ भरिसक, इएह कारण थीक जे गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा हिनक गजल सभकें आजाद गजल कहल गेल अछि। हम एहि विचारसँ सहमत छी। ६ अन्हारक रखवार -योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ प्राकृतिक नियम छैक अन्हार स्थायी नहि होइत छैक। अन्हार आ इजोतक चक्र चलैत रहैत छैक। मुदा समाज मे पसरल अन्हार लगैत अछि प्रकृतिक एहि नियम कें नहि मानैत अछि। अन्हार मात्र रातिए टा कें नहि होइत छैक। जखन प्रशासन तंत्र कानून व्यवस्थाक प्रति उदासीन भs जाइत छैक अथवा पक्षपातपूर्ण आचरण मे लागि जाइत छैक तखन दिन देखार अन्हार पसरि जाइत छैक। तखन लगैत छैक जे प्रशासन तंत्र समाजक अबांछित तत्वक संग मिल कए अन्हारक रखवार भs गेल। आ तें अरविन्द ठाकुरजी अन्हारक विरोध करबा लेल फाँड़ कसलनि। अन्हारक एहि विरोध मे हुनका भेटैत छनि नायक अलीमुद्दीन “…कक्का, ओहि हरामजादाक खूने गरम भेल रहै तs हमरा मारितए, हम सहि लैतौं। खुदा कसम, हम सहि लैतौं मगर अप्पन टोल मे हम्र यार भाइ कें …. हम्मर यार भाइ कें … आ सब सॅं बढ़ि कए एक गोट हिन्दू कें ओ मारलक। बाप दादाक देल मोहब्बतक तालीम कें माटि मे मिला देलक ई हरामजादा। कोन इज्जति रहि गेलै एहि टोलक आ हमरा सबहक ?” नायक अलीमुद्दीन ताड़ी दाड़ू पीबि मारि पीट झगड़ा झाँटी केनिहार एकटा हाड़ मांसक मनुक्ख नहि अपितु एकटा संस्कार, एकटा विचारधाराक द्योतक भेल अछि। समाज मे अलीमुद्दीन बहुत छैक, गाम गाम मे छैक जतए हिन्दू मुसलमान सैकड़ो साल सॅं एक ठाम रहि रहल अछि। कोनो हिन्दू किसानक हरवाह आ कि जन मजदूर मुसलमान भेनाइ कहियो ककरो अखरलै नहि, आ ने मुसलमाने नबाबक राज मे हिन्दू रैयत कें सुख सॅं रहबा मे बाधा एलैक। मुदा जकरा फूटक दोकान चलेबाक छैक आ ओही मे राजनीतिक रोटी पकेबाक छैक तकरा लेल अलीमुद्दीन नहि, बिकुआ सॅं काज छैक। ओहने लोक बिकुआ कें आगाँ बढ़ेबा लेल सहायता सेहो करैत छैक। एही सम्बन्ध मे एकटा घटना मोन परैत अछि। हमरा गाम मे पैघ मुसलमान टोल छैक जाहि मे गरीब धनीक सब तरहक लोक छैक। ओही मे कियो जेठरैयत सेहो कहबै बला भेलाह, मुखिया सरपंचक पद सेहो सुशोभित केलनि। एहने टोलक एकटा गरीब नवयुवक कें देखल हाट पर लोक कें ‘जय रामजी’ कहि अभिवादन करैत। शहर मे बहुत दिन रहलहुँ से गामक लोकक बीचक आपसी सौहार्दक बात बहुत किछु बिसरिये गेल छलियैक। कने कालक लेल हम अकचका गेलहुँ – रहमतबा बताह तs ने भs गेलैक ? जय रामजी बाजि रहल छैक। सुनलियै ओकरा मसजिद मे एक दिन अजानक बेर मुल्ला टोकि देलकै जे ई ठीक नहि करैत अछि। ओ एकदम मुहँफट जकाँ जबाब देलकै “हौ तों अपन अजान सॅं मतलब राखs, हमरा नहि पढ़ाबs जे हम कोना बाजी। जय रामजी बजला सॅं मुँह मे घाव भs जेतै की ओतबे सॅं हमर धरम चलि गेलै की ?” आ से रहितै तs की बाबा अमरनाथक सेवक कोनो मुसलमान होइतए ? छोट बात मुदा गम्भीर विचारक मसाला। बहुत बेसी तीरब एहि लेख कें तs साम्प्रदायिकताक आरोप लागि जाएत। मुदा सत्य ई जे दूनू पक्षक जनसाधारण्क लेल नित्यक्रिया मे धर्मक देवाल कहाँ ठाढ़ होइत छैक ? अन्हार पसारनिहार आ देवाल ठाढ़ केनिहार तेहल्ले होइत छैक। अन्हारक स्वरूप किछुओ भs सकैत छैक। गोपालजी कें आशा छनि “…ई साँच अछि जे भ्रष्टाचारक अन्हार बेस तेजी सॅं पसरल अछि मुदा एहि घटाटोप अन्हार मे न्यायपालिकाक प्रज्ज्वलित दीप भ्रष्टाचार लेल चुनौतीक रूप मे मौजूद अछि आ देखबै अहाँ सब जे एक दिन ई प्रज्ज्वलित दीप भ्रष्टाचारक पसरल गुज्ज अन्हार कें समूल नष्ट कs कए छोड़त।” मुदा गोपालजीक आशा टुटि जाइत छनि। कारण न्यापालिकाक हाथ पैर फेर प्रशासन तंत्रे होइत छैक आ कि बदनाम वकील समुदाय। जज की करतैक यदि दरोगा ठीक सॅं केस एन्ट्री नहि केने रहतैक अथवा गवाह कें रस्ता सॅं हटा देल गेलैक? अनेको उदाहरण छैक जे साक्ष्यक अभाव मे पैघ पैघ अपराध मे सजा नहि भs पबैत छैक। अन्हार सॅं मुक्तिक शपथ लैयो कए बेचारा जज असहाय भs जाइत अछि। अन्हारक रखवारक रूप मे अरविन्दजी कें ओ पत्रकारो भेटैत छथिन जे समाचार कें मोड़ि तोरि कए पस्तुत करैत छथि। जतए लोक पत्रकारिताक चोला ओढ़त मात्र अपना कें बचबैक लेल ओतए अन्हार कें पसरैत रहबा सॅं के रोकतैक ? इएह कारण छैक जे सब प्रमुख राजनीतिक दलक अपन अखबार रहैत छैक, जाहि मे ओहने खबरि छापल जाइत छैक जे ओहि दलक मुखिया कें सूट करतैक। फल छैक अन्हारे अन्हार। “प्रजातंत्र परिकथा” अन्हारक रखवार सब सॅं भरल अछि आ ओकर विभिन्न खेला देखबैत अछि। अन्हारक रखवार सब अपना मे एकटा मजगूत किन्तु अदृश्य सूत्र सॅं जोड़ल अछि। ओहि सूत्र कें चिन्हिओ कए हम सब ओकरा काटि नहि सकैत छी। ओ एकटा जेलीफिस जकाँ अथवा सहस्र मुँह बला राक्षस जकाँ अछि। ओकरा पर कोना प्रहार करबैक से बूझल नहि अछि। जेना कमल कुमार शर्मा कें बूझि पड़ैत छैक “…शहरक डगर सब पर एकाध घंटाक अन्तराल पर गुजरैत पुलिसक जीप सब वातावरण मे पसरल भकोभन्न आ लोक सबहक मनोमस्तिष्क मे गतानल अन्हार कें कने काल लेल चिरीचोंत करैत निकलि जाइत छलै आ फेर फेर ओएह अन्हार आ भकोभन्न अपन अतिक्रमित ठाम पर घुरि अबैत छलै।” अन्हार कें भगेबा लेल प्रयास होइत रहलैक अछि, मुदा असंगठित समाजक बीच फेर रखवारे सबहक तत्व हमरा सबहक बीच घुसिया कए सब प्रयास विफल कs दैत अछि। तैयो किछु होइत छैक जरूर। अन्त मे लेखकक आशा “ई तs चलैत रहैत अछि, चलिते रहत, अनवरत”। हारि नहि मानबाक अछि। बेर बेर अन्हारक विरोध मे स्वर उठबाक चाही। साहित्यकारक काज इएह ने। एहि मे जरूर अरविन्द ठाकुरजी किछु सफल भेलाह अछि। ७ अरविन्द ठाकुर : व्यक्तित्व आ कृतित्व अरविन्द मिश्र नीरज व्यक्ति-व्यक्तिक अपन व्यक्तित्व होइत छैक आ एहि मे कोनो व्यक्ति अपन कृतित्व ल` क` व्यक्तिक जेर मे पंक्ति सँ फराक अपन पहिचान बना लैत छथि। जेहन व्यक्तित्व आ तेहने हुनक कृतित्व। ओ सभ संस्कारजन्य संस्कृति केँ अपना लैत छथि। सहजा, जेकर दोसर नाम संस्कार थिक, ओ जन्म-जन्मान्तर सँ संचित होइत अछि। संस्कृति होइत अछि ओहि सहजा प्रतिभाजन्य व्यक्तिक वंश, परिवार, पितृत्व प्रभाव आदि। समाज, संगी आ अध्ययन आदिक सहयोग जकरा उत्पाध्या कहल जाइत अछि आ जकर दोसर नाम थिक अभ्यास, तँ सहजा आ उत्पाध्या दुनू परस्पर मिलि व्यक्ति केँ एक सृजनकर्ता बना दैत अछि आ हुनका द्वारा ‘क्रिएशन’ यथार्थ होइत अछि – वर्तमान मे प्रशंसनीय जे भविष्य मे कालजयी भ` जाइत अछि। एतेक बात कहबाक अभिप्राय ई जे हमर जे एखन आलोच्य थिक से एक एहने काव्य-प्रतिभा सँ प्रभावी रचनाधर्मक पालन मे प्रतिबद्ध एवं प्रसिद्ध व्यक्तित्व एवं कृतित्व। हम कह` चाहब जे मात्राक दृष्टिकोण सँ ओ कतेक लिखने छथि आ ओ किताबक रुप मे छपि क` पाठकक सोझाँ कतेक आयल अछि, से तँ बुझल नहि अछि। मुदा जे दू-चारि पोथी हमरा कोनो ने कोनो रुप मे प्राप्त भेल अछि तकर आधार लैत स्थालीपुलाक न्याय सँ रचनाकारकक व्यक्तित्व पर पहिने दृष्टिपात होइत अछि। रचना पढैत-पढैत जखन आगू बढैत छी तँ रचनाकारकक व्यक्तित्वक परिचय मानसपटल पर सिनेमाक रील जकाँ उभर` लगैत अछि आ कोनो कविक पांति मनहि मन गुनगुना उठैत छी – “ जिनकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा ”। तेँ रचनाक आधार पर व्यक्तित्वक परिचय सुनिश्चित भ` जाइत अछि। आगू बढैत छी तँ बरबस पता लगैत अछि कि कोना नहि ! कोसी अंचलक एक कस्वानुमा गाम सुपौलक चकला निर्मली नामक एक टोल जे आइ नगर परिषदक वार्ड मे अछि, ताहि टोल परक एक रचनाधर्मिताक पालन करैत बहुआयामी व्यक्तित्वक धनी महान समाजसेवी, प्रगतिक नव-नव बाटक अन्वेषी कोसीक शलाका-पुरुष स्वनामधन्य महनीय बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ जीक जिनक आत्मज इएह अरविन्द ठाकुर थिकाह तँ अरविन्द जीक यथार्थक पता लागि जाइत अछि। विप्लव जी केँ जनैत छलहुँ। हुनकर लेखनी मे समाजवाद की राष्ट्रवाद आ जे से मुदा अरविन्द हुनक रचनाक स्वरुप थिकाह से नहि बुझल छल। विप्लव जीक एक परिचय हुनक “ उद्बोधन गीत “ शीर्षक सँ – साथियो, तुम रो रहे क्यों ? कौन है उसका सहारा कर्म को जिसने बिसारा सत्य है संसार ही यह तुम अकर्मठ हो रहे क्यों ? साथियो, तुम रो रहे क्यों ? हम विषयान्तर नहि छी। हम रचनाक कारण पर चलि गेल छलहुँ। आउ, कनी अरविन्द जीक व्यक्तित्व केँ देखी, स्वरुप आ स्वभाव केँ परखी। गौर वर्ण, प्रसन्न मुद्रा पर चश्माक तर मे गंभीर आँखि, प्रत्यक्षहु मे परोक्ष होइत, अत: केर भाव, लगहु रहैत किछु क्षणक लेल दूर चलि जाइत स्वभाव। आ जाहिठाम छथि ताहिठाम ठेकानल वस्तुजात। चारू कात रैक पर सैंतल पुस्तकक बीच मे कुर्सी आ टेबुल। टेबुल पर पिताक परम्परा केँ प्रतिष्ठित करैत अरविन्द जी। परिष्कृत परिसर, कण-कण मे आकर्षण आ ओहि सँ टपकैत सहितस्य केर भावना मे साहित्य साधना अरविन्द जीक व्यक्तित्व केँ आकर्षित करैत अछि। बेटा-पुतहु आ अंगना मे डेगा-डेगी दैत पोता-पोती केँ देखि हिनक सहज मन साहित्य साधना दिस खिंचा जाइत अछि। अपन साधना कक्ष ( स्टडीरुम ) मे आसन जमा लैत छथि साधक जकाँ आ बिसरि जाइत छथि अपन संसार केँ। बरबस लेखनी सँ नि:सरित होम` लागैत अछि – “ बहुरुपिया प्रदेश मे”। आ तेँ ने भुमिका मे कहि उठैत छथि अपन पौत्री आर्या, क्षिति आ पौत्र दिव्यांशु केँ शुभकामना दैत जे ओ सभ एहि बहुरुपिया प्रदेश केँ नीक जकाँ चिन्हथु आ चिन्हि केँ अपना लेल सुन्दर आ सुगम मार्ग प्रशस्त करथु। आ इएह भाव मे आगू बढैत गजल संग्रह केर एक एक गजल कि शेर यथार्थहि वर्तमान मे भविष्यक द्रष्टा बनि आब`बला स्थिति सँ चेतैबाक प्रयास करैत छथि – नइ पूजीक आन-बान नहि ओकर शान बचत नइ जखन खेतिहरक ठोर परहक गान बचत हरदी  नइ,  हर्रे नइ, बनियाँ  सरकार  मे ‘अरबिन’ पेटेन्ट सँ की बासमती धान बचत कहू, कतेक चेतनायुक्त संकेत देलनि कवि। एहिठाम कविक/शायरक दृष्टि भारतक भविष्यक हेतु कतेक चिन्तित अछि। किताबक पहिले गजल मे गजलक परिभाषा परिपुर्ण होइत अछि। गजल मे दर्द होइत अछि, वर्तमान मे भविष्यक चिन्ता होइत अछि। यथार्थ समवाद होइत अछि। जाहिठाम किछु कल्पने टा नहि, किछु आधार होइत अछि। पुन: देखू एकटा एहि गजलक पांति मे कविक उक्ति-वैचित्र्य जकरा काकोक्ति कहल जाइत अछि, प्रकारान्तर सँ यथार्थक भाव – छोड़िक` सत्यक डगर बइमान बनबह हओ कोना केँ आब तों बलमान बनबह पुन:- आब अयोध्या मे पुजाबय छथि दशानन जान नहि बचतह जँ तों हनुमान बनबह केहन कटगर लोकोक्ति सन गजल भेल अछि ! कवि अरविन्द जीक गजल मे सहज शब्दक संगति एकर सुन्दरता केँ कोना बढा रहल अछि, बानगीक रुप मे देखू – कलयुग असवार अछि ‘अरबिन’ कपार पर जे हमर ठोंठ धरत, तकरे भगवान कहब दोसर उदाहरण देखू – दिन मे पाकेट मारै छै राति मे जे छै पहरेदार बेचिक` घोड़ा सुतल बुड़ि सिरहौना सँ तकिया पार केहन सहज शब्दक सहज यथार्थ ! कियो-कियो कहैत रहलाह अछि जे मैथिली मे गजल की, ओ तँ अरबी, तुर्की, उर्दूक आ कनी-कनी हिन्दीक थिकै। मुदा अरविन्द जी एहि अनरगल प्रलाप केँ निराधार क` गजल केर जे यथार्थ परिभाषा थिक तकरा अक्षरश: समेटैत एहि चुनौती केँ स्वीकार केने छथि, से देखू – चान पर बस्ती बसाओल जा सकै छै मैथिली मे गजल लिखल जा सकै छै असीमित विस्तारक आकास छल सपना हमर आसक ताग मे ओ बान्हल जा सकै छै आ तखने ई गजल संग्रह “ बहुरुपिया प्रदेश मे “ पोथीक रुप मे प्रकट भ` सकल। एहि गजल संग्रह “ बहुरुपिया प्रदेश मे “ सँ पहिने कथाकारक रुप मे अरविन्द जीक परिचय भेटैत अछि। हुनक कथा संग्रहक नाम अछि – “ अन्हारक विरोध मे “। ‘खिस्सा सियार यार’ शीर्षक सँ ‘विष-पान’ शीर्षक धरि दस गोट कथा एहि पोथी मे गुथल गेल अछि। कथा मे कथानकक भाषा मे प्रांजल्यता शीर्षकक अनुकूले अछि। कथा मे जिज्ञासा कथाक महत्ता बढा दैत अछि। सभ सँ बढि क` बात ई जे कथाक पहिल पांति बिना थकानक कथाक अंतिम पांति तक यात्रा करा दैत अछि। कथाकार केँ अपन माटि-पानि संग, आत्मीयताक संग समाजक हर वर्गक गतिविधि सँ परिचय कथाक विशेषता प्रकट करैत अछि। अभिजात वर्गक संग रचल-पचल लेखकक सर्वहारा समाजक प्रति संवेदना कोना साकार भ` उठल अछि, कथासभमे तेकर यथार्थ परिचय अछि। “ अन्हारक विरोध मे “ कथा-संग्रह नामक पोथी सँ पहिने लेखक कविक रुप मे प्रस्तुत भेला – “ परती टूटि रहल अछि “ नामक कविता संग्रह ल` क`, जाहि पोथी मे कविक आध शतक सँ उपर ‘यात्रा’ शीर्षक सँ प्रारम्भ होइत ‘बुलबुल’ शीर्षक सँ अंत होइत कविता सभ अछि। मुक्त रचना मे उन्मुक्त भावधारा कविताक विशेषता मे कविक सहज स्वभावक परिचय होइत अछि। जतय धरि हम एहि संग्रहक कविता पढि सकलहुँ ताहि मे कोनो वादक प्रभाव नहि, कविक व्यापक यथार्थभाव परिलक्षित होइत अछि। एतबा धरि अवश्य जे यथास्थिति बनल नहि रहय, ओ टूटय। तखने जड़ता सँ त्राण होयत, गति प्राप्त करैत दुर्गति सँ दूर करत, तेँ परती टुटबाक चाही। ‘यात्रा’ कविताक ‘मा’ शब्दक संबोधन मे कवि आत्मभावक यथार्थता देखै चाहै छथि। ओ कहैत छथि – ‘हम’ केर रुप मे के ‘हम’, सांसारिक मकड़जाल मे ओझराओल हमर आचरण आकि आचरण मे आत्मबोध? ‘सुखि गेल गाछ’ कविता मे पुरखा द्वारा लगाओल गाछ पर कविक झुलैत नेन्हपन आ ओ गाछ सुखैलाक बाद घरक बनल उपकरण मे कविक संवेदना, जखन ओ उपकरणक रुप मे सुखाओल गाछ सँ बनल चौकी पर कविक जुआनीक थकान केँ मेटाबैत अछि, पुरखाक लगाओल आ पुन: सुखाओल गाछक बनल उपकरणक उपभोग करैत कविक संवेदना देखू – ‘कहियो नेन्हपन मे एहि ठारि सभ पर झुलैत हँसैत-गबैत चिबौने छलहुँ टिकुला लाल-पीअर-सनहुला फलमे गड़ौने छलहुँ दांत पओने छलहुँ अमृत-रस तृप्त भऽ गेल छल मोन-प्राण…………’ आ ओ गाछ जखन सुखा जाइत अछि तखन कविक ओहि गाछ सँ आत्मिक भाव आत्मसंतुष्टि प्रदान क` रहल अछि। यथा – ‘……… दिन भरिक भागमभागसँ थाकल आ निस्तेज पड़ैत छी अपन चौकी पर आ जखन अबैत नहि अछि निन्न तखन थपकी दैत आ लोरी सुनबैत अछि पुरखाक ममत्वसँ लबालब ओ सुखि गेल गाछ’ अन्तत: इएह जे कवि-कथाकार श्री अरविन्द ठाकुरक साहित्य-साधना सहितस्यक भावना केँ पल्लवित आ पुष्पित करैत अछि। जखन पल्लवित आ पुष्पित होइत अछि ओ साहित्य-साधना रुपी वृक्ष, तखन तकर जे फल अबैत अछि, ओ अमरत्व प्रदान करैत अछि अर्थात कालजयी होइत अछि। एहन कालजयी रचनाकार अरविन्द ठाकुरक प्रति हमर शतश: साधुवाद। बदला मे समर्पित हमर अभावक भाव। ८ स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे परमानन्द प्रभाकर आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे जाहि कथाकार सभपर गर्वसँ निघोख माथ उठाओल जा सकैछ ताही पाँतिमे मन्द-मन्द मुस्कैत उन्नत ग्रीव ठाढ़ छथि श्री अरविन्द ठाकुर । मनुखक सभ्यताक विकास कालहि सँ अन्हारक विरोध होइत आयल अछि । वेद मे अही बातकेँ किछु दोसर तरहेँ कहल गेल छै जे द्रष्टव्य अछि - ‘‘असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ।’’ सभ्यताक विकास काल सँ पूर्व प्रकृतिमे पसरल अन्हारकेँ दूर करबाक लेल, ओहि सँ सुरक्षाक लेल मशालक आविष्कार भेल छल । हिन्दी साहित्यक कथाकार बेनीपुरी जीक एहि माँदे कहब छनि - ‘‘जिस दिन मशाल बनी, दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति उसी दिन हुई’’ मशाल भौतिको छै आ आत्मिको । आत्मिक मशाल ज्ञानक प्रतीक छै, जकरा माध्यमे अज्ञानताक अन्हारकेँ मिटाओल जा सकैत अछि । आजुक वर्त्तमान परिस्थिति मे प्रकृतिक सभटा अन्हार मनुखक चेतना मे समाहित भ’ गेल छै आ तैं चारूकात उत्पीड़न, मारि-काट, खून-खराबी, झूठ-पफरेब, छटपटाहटि, शोषणक त्रासद स्थिति पसरल छै । मनुख एहि स्थिति सँ अपना केँ उबारि सकत तकर ज्ञान सेहो ओकरा मे छै। ओ सभ किछु जनैत अछि, तखने त राष्ट्रकवि दिनकर कहै छथि ‘कुरूक्षेत्राक’ षष्ठम् सर्ग मे - ‘‘यह मनुज विज्ञान मे निष्णात ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार ।’’ तथापि मनुख छटपटा रहल अछि आ उपर्युक्त त्रासदक स्थिति सँ त्राणक दिशि ओकर प्रवृति नइँ भ’ रहल छै। दुर्योधनक उक्ति छै - ‘‘धर्म को जानता हूँ प्रवृत्ति नहीं है। अधर्म को जानता हूँ निवृत्ति नहीं है।’’ एहि मानसिकताक कारणें मनुखक दशा ओ दिशा दिनानुदिन खरापे भेल जा रहल छै । मनुख सभ्यताक विकास काल सँ पूर्व जतेक आतंकित नइँ छल ओहि सँ बेसी आतंकित एखन अछि । तै त हिन्दी साहित्य मे ‘कलम के जादूगर’ नाम ख्यात बेनीपुरी जी कहै छथि । ‘‘अब जहाँ अन्ध्कार है, वहाँ पहले से भी ज्यादा भयानक और वीभत्स है ।’’ बेनीपुरी जीक इशारा मनुखक हृदय मे व्याप्त अज्ञानता रूपी अन्हारेक दिशि छनि। समाज मे पसरल बहुत रास जे चारित्रिक स्खलन, सामाजिक विद्रुपता रूपी अन्हार छै तकरे विरोध मे श्री अरविन्द ठाकुर ठाढ़ छथि, अपन पोथी ‘अन्हारक विरोधमे’ हाथ मे नेने । मुदा ओ जे बाट पकडि़ क’ चलि रहल छथि आ जाहि क्राँतिकारी तेवर मे बढि़ चुकल छथि, ताहि लेल त हम एतबे कहबनि- ‘‘शीशे का महल आपने बनवा तो लिया है पत्थर का जमाना है मगर ये नहीं सोचा’’ सम्पूर्ण पोथी केँ पढ़ला सन्ताँ ज्ञात भेल जे ठाकुरजी एकटा कुशल शब्द शिल्पीए नहि अपितु एक गोट मसिजीवी क्रांतिकारी व्यक्ति छथि । हम एहि बातक लेल पूर्ण आश्वस्तो छी जे जै अरविन्द ठाकुर जी कलम सँ क्रांति करबाक लेल निकलि चुकल छथि त’ क्रांति हेतै आ खूब नीक जकाँ हेतै । किऐक त कलम मे बड्ड तागति छै । तखने त हिन्दी साहित्य मे ‘नेपाली’ नाम सँ प्रख्यात कवि कहै छथि - ‘‘हम धरती क्या आकाश बदलने वाले हैं हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं हर क्राँति कलम से शुरू हुई सम्पूर्ण हुई चट्टान जुल्म की, कलम चली, तो चुर्ण हुई’’ प्रस्तुत पोथी मे दसटा कथा संकलित अछि । एहि कथा सभ मे कथाकार समाज मे परिव्याप्त सभतरहक समस्याकेँ उठौलनि अछि । जिनगीक सभटा पक्ष अभरिक’ आयल अछि । हम एतय उदाहरणक लेल खिस्सा-सियार यार, पियासल पानि, अन्हारक विरोध् मे, ‘मूस’, विषपान कथाक किछु प्रसंगक मादे समाजक वर्त्तमान दशाक दिग्दर्शन करा सकैत छी । पोथीक पहिल कथा ‘खिस्सा-सियार यार’ वर्त्तमान राजनीति सँ जुड़ल अछि । एहि मे जनता आ राजनेताक बीच उपजल नवका संस्कृतिकेँपफरिछाक’ राखल गेल अछि । राजनाथक ई कथन ‘‘हमर अहाँक महत्व ओकरा सभक नेता लेल तखने घरि अछि जा घरि हमरा सभक नसमे खून अछि । खून खतम-सम्बन्ध खतम’’ राजनेताक सौंसे चरित्रा उघारि क’ राखि दैत अछि । एहि ठाम हमरा मोन पड़ैत अछि  एक गोठ ढ़ीठ नेताक उक्ति जे उपर्युक्त बातक पूष्टिए करैत बुझि पड़ैत अछि  - ‘‘रूसवा करो जलील करो, सब कबूल है। बन्दा तो उम्मीदवार है, चरणों की धूल है। लेकिन रहे यह याद कि चुनाव जीतकर, मुड़कर न देखना मेरा पहला वसूल है।। ’’ अही कथा मे सदानन्दक चरित्रा ठाढ़ क’ क’ लेखक महोदय ई कहबा मे सार्थकता प्राप्त केलनि अछि जे प्रजातान्त्रिाक व्यवस्था मात्रा कहबाक लेल छै, ओना ई व्यवस्था छै शक्ति तंत्राक । अथवा एकरा अहुना कहि सकैत छी जे ‘‘जक्कर लाठी तकरे भैंस ।’’ ई कथा राजनीति मे पसरल भाइ-भतीजा वादक नीति केँ सेहो उघार करैत अछि । कथा कृतिक दोसर कथा ‘पियासल पानि’ नारी शोषण पर आधरित अछि । एहि मे नारायण पुरवालीकेँजाहि रूप मे प्रस्तुत कैल गेल छै ओहि सँ नारीक दशा-दिशा ओ पुरूष वर्गक किरदानी जगजियार भेल अछि । एतबे नइँ ई कथा अन्ध्विश्वास सँ जकड़ल सामाजिक सोचकेँनाघ्ट करैत अछि । तेसर कथा अछि ‘अन्हारक विरोध् मे’ । ई कथा हिन्दु-मुस्लिमक टकराहटिक समस्या केँ जगजिआर करैत अछि । सामाजिक एकता केँ खण्डित कर’ वाली प्रवृति पर ई कथा सोझे प्रहार करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे ई कथा जिनगीक सान्ध्य बेला मे लेखक महोदय सँ किछु आओर चिन्तन आ समयक लेल लेखक दिश टुकुर-टुकुर ताकि रहल अछि । ‘मूस’ नामक कथा वंश परम्परा पर आधरित रहितो प्रकारान्तर सँ राजनीति मे उपजल वंश परम्पराक नबका संस्कृति पर चोट करैत अछि । गहन चिन्तन केला पर स्पष्ट होइत अछि जे एखनो राजतंत्रा व्याप्त अछि । तखने त’ बहिनोई, सार, बाप-बेटा, बेटी-पुतोहु सभक जमावरा छैक राजनीति मे । अहिना ‘विषपान’ नामक कथा न्यायालय मे पसरल भ्रष्टाचारकेँनाँगट करैत अछि । ओकीलक छुद्रता केँ उघार करैत अछि । एहि तरहेँ एहि कथा संग्रह मे सामाजिक सभ तरहक समस्याकेँ उठाक’ लेखक महोदय अपन खोजी प्रवृतिक तथा क्रांतिकारी व्यक्तित्वकेँ जगजिआर केलनि अछि । एहि ठाम बच्चन जीक पाँती लेखक महोदय पर सटीक बैसैत अछि ‘‘बूँद के उच्छ्वास का भी अनसुनी करता नही वह’’ अर्थात् लेखक कोनो वर्गक छोट आ पैघ सामाजिक समस्या सँ मुँह पेफरि क’ नइँ चलैत छथि। आ ने एहि कथाकृतिक कथाकार चलला अछि । एक गोट मैथिलीक अध्येता हेबाक कारणे हम एहि कथाकृतिक स्वागत अभिनन्दन करै छी आ लेखक महोदयक लेल किछु अपन शुभकामना हम अपन एहि पाँती मे दैत विराम लैत छी - ‘‘ सृजन-शीलता राति-दिन अहिना चलै अमन्द कहियो पड़ै बेराम नइँ कविता जीवन छन्द तन-मन पौरूष मे रहै ऊर्जस्वित नव हर्ष रचना मे सभदिन रहै भरल सौम्य उत्कर्ष ।।’’ परमानन्द प्रभाकर द्वारा - संत पॉल्स हाई स्कूल बंगाली टोला, समस्तीपुर पिन - 848101 ९ सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि -अरविंद श्रीवास्तव लगतार तेज होइत संगीतक कारणें लोक बहीर भऽ रहल अछि मुदा ओ सभ बहीर छथि तँइ आर बेसी जोरसँ संगीत बजाबऽ पड़ि रहल छै- मिलान कुंदेरा अरविंद ठाकुरक रचनात्मक धमक साहित्यिक क्षेत्रमे एहानिते सुनाइ पड़ि रहल अछि। अरविंद अपन रचनाकालमे संवेदनहीन उत्तर आधुनिकता संगे-संग साम्यवादी सत्ता के खंडित होइत देखने अछि। ई साम्यवादी सत्ता जे पूरा संसारमे अपन बात छाती ठोकि कहबाक तागति राखै छल। ई साम्यवादी सत्ता जे धरतीपर सह-अस्तित्व केर भावना आ ओकर पक्षमे ठाढ़ छल। ई साम्यवादी सत्ता जे जनताक संग ठाढ़ छल सएह साम्यवादी सत्ता आइ अपन घर तोड़ि लेलक।आ आब जखन की केबाड़ खोलिते हाट-बजार चौअनियाँ मुस्कानक संग वेलकम करैए हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे अरविंद ठाकुरक रचनात्मक दुनियाँ एही परिस्थिति सभहँक उपजा अछि। हम ऐ उपजा के नव नै कहि सकै छिऐ किएक तँ ई रचनाक्रम कोनो एक काल खंडमे नै अबैए आ ने ई रचनाक्रम कोनो एकटा सत्ता, विधा वा विचारधारापर अछि। अरविंदक बहुरंगी लेखनक सभसँ बड़का विशेषता अछि -सच लिखबाक साहस। अरविंद ठाकुरकेँ पहिल बेर हम करीब पचीस बर्ख पहिने पूर्णियासँ प्रकाशित "कला" पत्रिकामे पढ़ने छलहुँ। आ ओही दिनक आस-पास ओ हमर साहित्यिक परिचयमे एला। मधेपुरामे पुलिस कप्तान मनमोहन सिंहक पोथी "मेरे में चांदनी" केर लोकार्पण आ कवि सम्मेलन आयोजित करबाक क्रममे अरविंदकेँ आमंत्रित करबाक अवसर भेटल छल। ऐ सम्मेलनमे पटनासँ गीतकार गोपीवल्लभ सहाय, सिद्धेश्वर आ पंजाब किछु शाइर सहित कोसी इलाकाक अधिकांश कवि-रचनाकारक भागीदारी छल। अरविंदसँ एही आयोजनमे पहिल भेंट भेल आ अपन पत्रिका "सिलसिला"मे हुनक गजल प्रमुखतासँ प्रकाशित केलहुँ। अरविंदक संग विरासतक गहींर संबंधक चर्चा हम अपन पिता हरिशंकर श्रीवास्त "शलभ"सँ कतेको बेर सुनैत रहलहुँ। अरविंदक पिता बलेन्द्र नारायण ठाकुर "विप्लव"जीक कतेको खिस्सामे हुनक समाजवादी विचारधारा, समाजिक समरसता, नैतिकता आ आत्मसम्मानक विचार भरल छल। अरविंद अपन लेखनमे एही विरासतकेँ बचा कऽ रखलक अछि। परती टूटि रहल अछि नामक पोथीसँ --- "मान्यवर हम अहाँक नै दोसर पार्टीक कूकुर छी" ऐ अढ़ाइ पाँतिमे कतेक दर्द कतेक आत्मसम्मान छै तकरा शब्दमे कहनाइ मोश्किल छै। अरविंद अपन कवितासँ समाजिक बदलावक जरूरतिकेँ सोझाँ-सोझी जोड़ैए। ओकर कविता सामंती मोहफिलसँ निकलि जनताक पक्षमे ठाढ़ होइत अछि आ ओकरा संघर्षक हिस्सा बनबासँ आपत्ति नै छै।अरविंदक लेखकीय सक्रियता साहित्यिक आ समाजिक सरोकारसँ प्रेरित रहल अछि इएह कारण अछि जे साहित्यिक सृजनक संग-संग ओ समाजिक प्रतिबद्धताकेँ सेहो अपन सजगताक हिस्सा मानलक। अरविंद पटनासँ प्रकाशित "प्रवक्ता"मे "ठाकुर का ठाँव" नामक शीर्षकसँ समसामयिक राजनीतिक घटनाक्रमकेँ बहुत बेबाकी आ बेखौफ भऽ कऽ पाठक सामने आनैत रहल। दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "मिथिला आवाज" मे बतौर संपादक अरविंद साहित्य आ समाजक प्रति अपन दायित्वक निर्वाहमे कनिको पाछू नै हटल। बिहार प्रगतिशील लेखक संघक प्रति ओकर समर्पण देखैत ओकरा उपाध्यक्ष पदक जिम्मेवारी देल गेलै। मूलतः कवि अरविंद ठाकुरक व्यक्तित्व हिंदीक कवि राजेश जोशीक एक पाँतिमे समेटल जा सकैए-- "हम कविक ब्रहमांडक एकटा नुकाएल अकासगंगा छी"। १० परती टूटि गेलै -मुन्नाजी सनातनी रचना प्रकियामे आबि रमि गेला। अगिला पाँतिक पछिला सेवक जकाँ नै। अपन लूरि-बुद्धिसँ बनाओल लीख धऽ लेलनि। आगाँ बढ़ि संगोरभेटलनि। मुदा ओइ संगोरसँ उत्साहित रहितो चौबटिया तकैत रहलाह। जतै गर लगलनि अपनाकेँ कतिया अपन सोच-विचारसँ अड्डा जमा लैत छलाह।संगबैया सभकेँ लागनि कठाइन। तखन ओ सभ शुरू कऽ दै छलाह हुनक अदगोइ-बदगोइ। अपन आन-बान-शानक रक्षार्थ सोचि आगाँ बढ़बाक चेष्टाकरैत  रहैत छलाह। मुदा फेर वएह रामा वएह कठोलबा। किएक तऽ अपनाकेँ कतिया कऽ रखबामे हानि होइन। कियो अहंकारी तँ कियो निरंकारी कहनि।मुदा हम हुनकर सोचें हुनका चमत्कारी बुझै छी। अपन नव आँखि-पाँखिसँ ओ उत्कृष्ट रचनाकारक रूपें देखार भेला। अरविन्दजी जखन कविता लिखब शुरू केलनि तखन ओ खेत उपजाउ नै छलै। उस्सरछलै, परती पड़ल छलै। अपने नित नव रचनासँ ओकरा जोति कोड़ि दूनू पक्षकेँ चित्रित करबाक सफल-असफल प्रयास करैत रहलाह। एक दिस वंशानुगतवा परंपरानुगत अपन सनातनी सोचकेँ रखलनि तँ दोसर दिस सामंती सोचसँ पीड़ित समाजक ओइ वर्गकेँ चिन्हित कऽ रचनात्मक रूपें चरियबैत रहलाह।हुनक रचनामे उच्च वर्गक संग निम्न वर्गक समाजिक दशा-दिशा एकै संग अभरि कऽ सोंझा अबैत रहल।कतौ अहंकारक समावेश नै। सगरो अपन सोचकचिरहारा खेलैत सब रचना समाजक सब वर्गसँ उखड़ि सोंझा आएल अछि। एक कविक मानसिकता जे झाँपल चीजकेँ उघारि सोंझा आनए तकर माँजलकलाकार छथि अरविन्द जी। एखनो अपन उत्कृष्ट समाजिक आ गमैया परिवेशकेँ सहेजि कऽ रखने छथि। समाजक सब पक्ष जाहिमे अपन समवेत स्वरउभारबाक प्रयासमे सफल देखाइ छथि। गाममे रहि कऽ अरविन्दजी गमैया सोचकेँ उभारबाक पूर्ण प्रयास करैत रहलाह। ओ जमींदार मात्र नै एकटा गिरहथक भूमिकाक निर्वाह करैत रहलाहअछि। तें हिनकर रचनामे गमैया जीवन आ गामक आचार-विचार संस्कार प्रस्फुटित भऽ सकलनि। किछु गोटे अपनाकेँ गाममे रहि गमैया रचनाकारकदंभ भरैत छथि मुदा अरविन्दजी गामसँ शहर, महानगरक जीवनक सुख-दुख भोगियो कऽ गमैया जीवनक उत्कृष्टता अपन रचनामे देखबै छथि। गमैयाशब्दक ठाम-ठीम प्रयोग जगदीश प्रसाद मंडलजीक पछाति हिनक रचनामे सहजहिं अभरत। 2011 मे विहनि कथापर किछु गोटे जहन झौहरि शुरू केलथितखन अरविन्दजी ओहि शब्दक पुरान प्रयोगी रहथि। बात विहनि शब्द दऽ उठलै तँ अरविन्दजी कहलखिन जे झौहरि करऽ बला सभ गिरहत नै हेता।बटैयापर खेती करबैत हेता। हम अपने खेतपर रहि सभ दिनसँ "विहनि" केर उपभोगी छी। आगाँ कहलनि जे हमर कविता आ गजलमे विहनि शब्द आओकर अभिप्राय बहुत पहिने अभरि सोझा आबि चुकल अछि। हमरा कहबाक जे अरविन्दजी गमैया शब्दवलीपर सेहो मजगूत पकड़ बनौने छथि। कविताक पछाति अपन कथामे सेहो ई गमैया परिवेशकेँ देखौने छथि। गामक समाजिक रूपरेखाके उजागर करैत रहलाह अछि। हिनक कथा समाजक सभवर्गक प्रतिनिधित्व करैए। कविते जकाँ उच्चा आ निम्न वर्गीय सोचक बीच पुल जकाँ काज करैए हिनक रचना। कविता संग्रह "परती टूटि रहल अछि" केरहिन्दी (अनुवाद अजित अजाद)सँ हिंदी जगतमे सेहो हिनक रचना पसरल। ऐ सभहँक पछाति आएल "बहुरुपिया प्रदेशमे"। ई गजल संग्रह हिनकारचनात्मक रूपें आरो सक्कत केलक अछि। ओना तँ ऐमे प्रकाशित गजल सनातनी गजल वा संगोर जकाँ बहरहीन, छंद मुक्त अछि। मुदा बहरनुक्तोहोइत हिनक गजल सभमे गमैया सोच, गमैया शब्दक समावेश अछि जै कारणसँ हिनक गजलमे प्रवाह जकाँ आबि गेल अछि। ऐ तरहें अरविन्दजीरचनारत रहि गमैया शब्द आ एकर चित्रणसँ परती पड़ल रचनाक जमीनकेँ तोड़बाक सफल प्रयास केलनि। तँइ हिनका गामक कथाकार वा कवि कहबामेहमरा कोनो संकोच नै। विशेष कऽ गाम-समाजक आ ओकर शब्दक कोनो घटनाकेँ देखार करबाक नीयत हिनका अपन समकालीन रचनाकार सभसँ बेसीआगू बढ़ा दैत अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। संस्मरण खण्ड- १.अद्वितीय छथि हमर अरविन्द बाबा- रजनीश कुमार तिवारी (मुन्ना) २. हाली-हाली बहथु कोसी- शैलेन्द्र आनंद ३. अरविन्द ठाकुरः अन्हारक विरोधी व्यक्तित्व -मिथिलेश कुमार राय ४. अरविंद ठाकुरः हमरामे अहाँ, अहाँमे हम- अजित आजाद ५. जेहने खोजलऽ हौकुटुम्ब- लक्ष्मण झा सागर १ अद्वितीय छथि हमर अरविन्द बाबा रजनीश कुमार तिवारी (मुन्ना) बाबा (अरविन्द ठाकुर) सँ हमर पारिवारिक रिश्ता त छलैहे, आब ई बहुत रास सीमा सँ पार भए गेल अछि। नेना रही त हिनक आ हिनक माता-पिता-परिवारक चर्चा हमर घर ( गाम-फेंट, मधुबनी ) मे उठौना जकाँ होइत रहै। कनेक चेतन भेलाक बाद जखन-तखन सुपौल अबैत रहलहुँ त साक्षाते हिनकर गतिविधिसभकेँ देखल आ तकरा बाद निरन्तरता मे ई हमर ध्यान अपना दिस खिंचैत रहला। हिनक राजनीतिक, पारिवारिक गतिविधिक चर्चा सुनी, देखी आ मुग्ध होइ। हिनक बोलब, चलब, पहिरब सभटा एकदम विलक्षण लागै आ हमरा प्रभावित करै। आइ कहि सकै छी जे हमर घरपर होइत हिनक घनघोर चर्चा हिनक व्यक्तित्व-क्षमताक तृणांशहु नहि रहए। हमर अपन बाबा रामप्रताप तिवारी सुपौलक भगिनमान छला आ अरविन्द बाबा हुनक भैयारीक सम्बन्धमे अबै छथिन तेँ हिनको हम ‘बाबा’ कहि सम्बोधित करैत छियनि। हमर अपन बाबाक सम्बन्ध एहि परिवार सँ एकदम सीधा नहि, बहुत घुमाकए अछि। प्रेम किन्तु एहन वस्तु छै जे केकरा केकर लगीच आ प्रिय कए देतए से पुर्वानुमान करब कठिन। हमर अपन बाबा सुपौल अबैत-जाइत छला आ अरविन्द बाबाक पिता स्व बलेन्द्र नारायण ठाकुरक संग अभिन्न होइत चलि गेला। बलेन्द्र बाबाक विराट-प्रभुताक खिस्सासभ हमर परिवार मे किंवदन्ति जकाँ चलैत छल। हमर अपन बाबाक समय बनल ई प्रेमिल सम्बन्ध रसे-रसे एहन प्रगाढ होइत चलि गेल जे हमर पिता आ हमर पीढी तक एकर उष्मता काएम अछि। हमर परिवारक किनकहु कहिओ ई आभास नहि भेल जे दुनू एकहि परिवार नहि अछि। जँ हम स्वयं अपन गप करी तँ अरविन्द बाबाक संग हमर ई सम्बन्ध हमर छ्ब्बीस वर्षक वयस धरि मात्र पारिवारिक रहल। हम हिनकासँ ततेक धखाइत रही जे ता धरि साइते हम कहिओ हिनक पएर छूलाक बाद ई पुछबाक साहस कए सकल हएब – ‘केहन छी बाबा’। अपन उच्च-शिक्षाक पुर्णता आ निरन्तरताक क्रममे हम रसे-रसे बाबासँ हिलैत-मिलैत गेलहुँ आ कखन हुनकर प्रियपात्र भए गेलहुँ से समय आ तेकर प्रविधि एकदम ठेकानि कए कहब आब कठिन अछि। दुनू बाबा-पोताक सम्बन्ध मे एकटा दिलचस्प मोड़ एबाक एक महत्वपुर्ण अवसर आ घटना मन पड़ैत अछि। हिनक ज्येष्ट पुत्र अभिनयक विवाह तै भए गेल रहनि। बराती कें सुपौल सँ शिवहर लए जेबाक दायित्व हमरा भेटल। एकटा बड़का बस आ एकटा जीप सँ चलि बराती विवाहक दिन पुर्वान्ह दस बजे शिवहर पहुँचि गेल। लड़की पक्ष शिवहर-दरबार कहल जाइत रहै आ ओ सभ अपन प्रतिष्ठानुकूल स्वागत केलक। शेष भरिदिन विश्राम केलाक उपरान्त सात बजे सांझ मे बराती विवाह-स्थल दिस चलल आ एकरे संग शुरू भेल धमाल। आतिशबाजीक आकाशी चकमक आ बीच-बीचमे कानफाड़ू धमाकाक संग हम सभ गोटे डांस करब शुरू केलहुँ। हमर सभक जुआन पार्टीक नाचब शुरू होइते सब नाचब शुरू कए देलक – की सयान, की बूढ। बाबाक पहिल संतानक विवाह रहै आ ओ अतीव प्रसन्न छला। हुनक उल्लास हमरा सभ केँ शह देलक आ हमरा सभक साहस एतेक बढि गेल जे जिनका आगाँ हमरसभक ठाढ हेबाक साहस नहि छल तिनको हाथ पकड़ि हम सभ नाचबाक लेल बाध्य कए देलियनि। मन अछि जे बाद मे अपन मित्रलोकनिक संग दैत बाबा सेहो एहि मे सम्मिलित भेला आ हुनक डांस-स्टेप देखि हमरासभ केँ चकबिदोर लागि गेल छल। ओहि दिन ई भान भेल जे लिहाज चलए, हुनक मान-सम्मान मे कमी नहि राखी किन्तु बाबा सँ डरबाक आ धकैबाक कोनो टा औचित्य नहि अछि। वर्ष 2006 मे जखन हम एक तरहे स्थायी रुप सँ सुपौल रहए लागलहुँ त बाबाक बेसी निकट एबाक आ हुनका आओर नीक जकाँ बुझबाक अवसर भेटल। ओ ताधरि दलीय राजनीति सँ कात भए गेल छला किन्तु रेड क्रासक मानद सचिवक रुपमे हुनक सक्रियता बनल छल। कुसहा तटबन्ध टुटलाक बाद कोसी नदी द्वारा मचाएल हाहाकारक बीच बाबाक प्रबन्धन-क्षमताक जे विस्तार हम देखलहुँ से अद्भुत अछि। जिलाधिकारी सँ लए कए जिला, अनुमण्डल आ प्रखण्डक विभिन्न पदाधिकारीसभ सँ बाढिपीड़ितसभक समस्याक निदान वा ओकरा रिलीफ पहुँचएबामे ओकरासभ सँ मनोनुकूल काज लेबाक हुनक तौर-तरीका एतेक प्रभावकारी छल जे कोनो मामलमे कोनो असफलताक कोनो गुंजाइश नहि बचैत छल। ओही बेर हम जिला भरि मे पसरल बाबाक विशाल व्यक्तिगत संपर्कक साक्षी सेहो भेलहुँ। बाबा हमरो रेड क्रासक सदस्य बना देने छला आ ओहि अभियान मे ओ हमरा निरन्तर संग राखने रहथि। हमरा हुनक निर्देश छल जे सहायता लेल आएल कोनो वस्तु गलत हाथ मे नहि जाय से हम ध्यान राखी। ओहि क्रम मे बाबाक प्रभुत्व, सार्वजनिक जीवनक इमानदारी आ हमरा प्रति हुनक विश्वास तीनू चीजक अनुभूति हमरा भेल। किन्तु सुपौल एलाक बाद ओहि बेर जे सभ सँ महत्वपुर्ण चीज दिस हमर ध्यान गेल, ओ ई जे बाबा किताब-कागज मे डूबल जकाँ रहथि। हुनक लिखब-पढब गति पकड़ने छल। युपीएससीक तैयारी करैबला विद्यार्थिओ की ओतेक मनोयोग सँ पढत ! हुअए जे हमसभ जँ एतेक मनोयोग सँ पढने रहितहुँ त आइ कतहु कलक्टर त अवश्य रहितहुँ। प्राय: ओहि काल बाबाक संयोजकत्व मे सुपौल मे ‘सगर राति दीप जरय’ के आयोजन ‘कथा-विप्लव’ नामे भेल। बाबा हमरा कहलनि जे एहि गोष्ठी लेल कथा लिखि पढबाको अछि, आनक कथा सुनबाको अछि आ ओहिसभ पर अपन टिप्पणिओ देबाक अछि। साहित्यक एकटा अनुरागी पाठक कें बाबा दिस सँ एक नव भुमिका भेटल। हमरा पहिने लागल जे कतय फँसि गेलौं किन्तु हुनका दिस सँ ततेक तगादा आ उत्साहवर्द्धन भेटल जे हमहुँ लिखि बैसलहुँ। ओहि गोष्ठी मे अपन भुमिकाक यथासंभव निर्वहनक उपरान्त हमर साहस आ दिलचस्पी दुनू बढल आ ई बाबाक आशीष अछि जे किछु गोटे आब हमरा साहित्यकारो मानैत छथि। एकरे परिणाम छल जे पछाति सहरसाक गोष्ठीमे प्राय: प्रत्येक सत्रक प्रत्येक कथा पर हम निधोख भए अपन विचार राखि सकलौं आ ताहि पर सराहना सेहो भेटल। बाबा तहिया मात्र सत्ताइस वर्षक छला जहिया हुनक पिता ( बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ ) के दीर्घ बीमारी सँ मृत्यु भेल छलनि। बाबा पटना मे सात-आठ मास तक रहि हुनक चिकित्सा करबैलनि किन्तु एक सुपुत्रक कएल अथक प्रयास आ सेवा काज नहि आएल आ पिता असमय संग छोड़ि गेलथिन। ता धरि बाबाक छवि एकटा राजकुमारक छल जेकरा पर कोनो जिम्मेदारी नहि, कोनो बंधन नहि। बाबाक दियाद-बाद आ हमरो परिवार मे ई आशंका व्यक्त कएल जाइत छल जे अनायास माथपर आबि गेल जिम्मेदारी सँ ओ लड़खड़ा जेता। किन्तु समस्त आशंका केँ ध्वस्त करैत अरविन्द बाबा अपन पिताक श्राद्धकर्म पिताक प्रतिष्ठाक अनुकूल केलनि। अपन एकटा अविवाहित बहिनक विवाह एकटा संभ्रांत आ सुखी परिवार मे केलनि। फेर छोट भाइक विवाह आ अपन पुत्र सभक शिक्षा-दीक्षा सफलतापुर्वक सम्पन्न केलनि। ई सभ करैत अपन सामाजिक-राजनीतिक दायित्व केँ सेहो नहि बिसरला आ इहो क्षेत्र मे स्वयं कें अपन पिताक सुयोग्य उत्तराधिकारी साबित केलनि। अचरजक गप जे एतेक दवाबक बादो हुनक निर्भयता आ जनपक्षधरता पर कनिको आँच नहि आएल। सुपौल सँ पटना होइत दिल्ली तक हिनक व्यक्तित्वक दबदबा रहनि किन्तु जातिगत समीकरण विपरीत रहने बाबा केँ दलीय राजनीति मे ओ हक नहि भेटि सकल जेकर ओ सही माने मे हकदार छला। बाबा अपन राजनीतिक जीवनक चर्चा नहिए जकाँ करै छथि। कहिओ कोनो जिज्ञासा कएलहुँ त एकदम निर्पेक्ष जकाँ मात्र तथ्यात्मक सूचना दए देता, जेना ओहि जीवन सँ कोनो मोह नहि, कोनो संलिप्तता नहि। हुनक सामाजिक-राजनीतिक जीवनक समकालीन सहयोगी सभ सँ जखन हुनकर अतीतक ओहि अध्याय दिआ सुनै छी त रोमांच सँ भरि उठै छी आ छाती गर्व सँ फुलि जाइत अछि। अपन जीवनक कर्म-विस्तारक क्रम मे हम जे जे नव द्वार खोलै छी ताहि मे कतहु ने कतहु बाबा पहिने सँ उपस्थित भेटै छथि – हमरा चकित-विस्मित करैत। विधि-स्नातक भेलाक बाद जखन हम सुपौल बार-एसोशिएसन ज्वाइन कएलहुँ त ओतहु हमरा बाबाक सम्बन्धक नाते तुरत परिचिति भेटल। अनेको वरिष्ट अधिवक्ता एहन भेटला जे बाबाक चर्चा करिते कहलनि – अरे! अरबिन बाबू त हमर मित्र छथि। कतेको एहन अधिवक्ता भेटला जे अपन अधिवक्ता हेबाक श्रेय बाबा केँ देलखिन। तखन जा कए ई खिस्सा ज्ञात भेल जे 90 के दशक मे बाबा अपन स्वर्गीय पिताक स्मृति मे ‘बलेन्द्र नारायण ठाकुर मेमोरियल ला कालेज’ के स्थापना केने रहथि। ओकर नियमित वर्ग चलय आ सुपौलक प्रतिष्ठित अधिवक्ता सभ ओहि मे शिक्षक छला। विश्वविद्यालय आ कुलपति स्तर पर बाबा अपन व्यक्तिगत क्षमता आ दम पर ओकरा अग्रगामी बनैने रहला। बाद मे सचिवालयक घूस-पैरबीक कुसंस्कृति सँ आजिज आबि ओ ओकरा तीन वर्षक बाद बंद कए देलथिन किन्तु ता तक प्राय: पचास सँ बेसी छात्र केँ ओ अधिवक्ता बनबाक डगर पर आगू बढाए चुकल छला। आब ई घटना इतिहास बनल अछि आ बेर-बेर मन पाड़ल जाइत अछि। सुपौल मे अनेको एहन लोक हमरा भेटलनि जे बाबा केँ “वन मैन आर्मी” कहै छथि आ स्वयं हमरो ई अनुभव बेर-बेर भेल अछि। ई अतिशयोक्ति लागि सकैत अछि किन्तु सत्य अछि जे एहि टोल आ शहर मे बाबाक संपर्क मे रहल अनेको एहन व्यक्ति हमरा भेटला जे बाबाक विविध खासियतसभ मे सँ कोनो एक या दू या अनेक चीजक नकल करैत देखाइ छथि। केओ हुनकर परिधानक, केओ हुनकर वक्तृत्व कलाक आ एतेक धरि जे केओ-केओ हुनका सन चलबाक नकल सेहो करै छथि। ओ सभ प्रत्यक्षत: भने एकरा स्वीकार नहि करथु किन्तु हुनक अन्तरात्मा एकरा अवश्य बुझैत अछि। ओना एहि मे हुनका सभक कोनो दोष सेहो नहि छनि। बाबाक व्यक्तित्वे एहन सुदर्शन आ प्रभावशाली अछि जे केकरो मन मे हुनका सन बनबाक, देखाइ देबाक लोभ आबि सकैत अछि। बाबा कुर्ता-पैजामा पहिरथि, कुर्ता-धोती पहिरथि, पैन्ट-शर्ट पहिरथि वा जाढक बेर मे बण्डी, प्रिंस सूट, स्वेटर, इंगलिश सूट पहिरथि, सब मे दिव्य लगै छथि। कपड़ा पहिरैक समझ आ तहजीब केओ हुनका सँ सीखय। अमिताभ बच्चनक ड्रेस-डिजाइन आ मिलिन्द सोमनक रैम्प पर ड्रेसिंग – बाबाक आगू सब फेल। ई हमर अनुभव अछि जे बाबा जखन अपन घर सँ बहराइत छथि त की आंटी, की भौजी, हमरा सन पोताक सारिअहु सभ हुनक बजार जेबाक आ ओमहर सँ घुरबाक प्रतीक्षा करैत अछि – हुनका भरि पोख देखबाक लेल। एक बेर हमर पीढीक एकटा बौद्धिक हिनक “लार्ड बायरन” नामकरण केने छल किन्तु हमरा लगैत अछि जे बाबा “सिंगल-विमेन मजनू” छथि। हिनक किशोरावस्थहि मे माता-पिता द्वारा चुनल हिनक धर्मपत्नी बीणा ठाकुरहि हिनक गोपिका छथि, राधा छथि आ रुक्मिणी सेहो। बाबाक एकटा आओर रुप हमरा सोझाँ आएल जखन हुनक मा केँ कैन्सरग्रस्त घोषित कएल गेल। माक उपचार मे हुनक समर्पण-भाव हमर शब्द-सामर्थ्य सँ बाहर अछि। जेबा लेल हमहु मुम्बई गेलहुँ, टाटा मेमोरियल मे अपन ब्लड डोनेट सेहो कएलहुँ किन्तु अपन प्रौढावस्था मे जाहि युवकोचित सक्रियता आ तत्परताक संग ओ अपन माक समर्पित सेवा कएलन्हि से संसारक सब पुत्रक लेल अनुकरणीय अछि। तीन-तीन पुत्र आ हमरा सन पौत्रक रहितहु ओ ओहिकाज केँ एकदम व्यक्तिगत जिम्मेदारीक रुप मे लेलनि आ मुम्बई सँ पटना तक ताहि लेल सदति मुस्तैद रहला। माक मृत्योपरान्त हुनक शिशु जकाँ कानबाक स्मृति हमरा अखनो दलमलित कए दैत अछि। बाबा दिआ एक पंक्ति मे कहल जा सकैत अछि जे ओ प्रबल व्यक्तित्वक असीम प्रतिभाशाली पुरुष छथि। हुनकर स्वभाव तेजस्वी आ दोसर पर हावी भए जाइबला अछि। एहन जेकरा पश्चिमी मोहावरा मे “डायनैमिक पर्सनैलिटी” कहल जाइत अछि आ भारतीय भाषामे प्राय: “राजसिक वृत्ति” कहल जा सकैत अछि। एहन हमर अरविन्द बाबा जखन ‘मिथिला आवाज’ के सम्पादक बनि दरभंगाक डगर धएलनि त हमर असहजता शीर्ष धए लेलक। हुनक योग्यता-क्षमता कोनो प्रश्नक दायरा सँ बाहरक चीज अछि किन्तु हुनक जे लाइफ-स्टाइल छल से हमरा मन मे अनेको प्रश्न आनि ठाढ कए देलक। अपन सुख-सुविधाक दुनिया छोड़ि बाबा दरभंगाक अनभुआर वातावरण मे कोना रहि सकता? अपन सुतय-जागैक, खेबा-पीबाक क्रमबद्ध जीवन मे कोनो व्यतिक्रम कोना सहि सकता? कहिओ केकरो अधीनस्थ नहि रहनिहार बाबा अपन भुमिकाक स्वतंत्र आ निर्बाध निर्वहन कोना करता? स्वान्त: सुखाय लिखनिहार बाबा दवाब मे कोना लिखता? अपन स्टडी-रुमक रैक आ टेबुलक चारू कात पसरल पोथी सभक विशाल भण्डारक बिना सून-बिसून जकाँ नहि लगतनि? महादेवक गण सभ सन अपन मित्रमण्डलीक बीच रहबाक उन्मुक्तता नहि खगतनि? किन्तु दू-तीन बेर दरभंगा गेला पर बाबा केँ जाहि स्फुर्ति आ आनन्द सँ अपन काज मे समर्पित देखलियनि से हमरा आह्लाद सँ भरि देलक। संपुर्ण मिथिला आवाज परिवार आ परिसर हुनके आभा सँ दपदप करैत जकाँ लागल। ओ स्वयं कोनो आन प्रभाव वा छाँह सँ मुक्त आ निर्भार। एकटा पुरान कहावत मन पड़ि गेल – “ शहंशाह जहाँ बैठ जाते हैं, दरबार वहीं लग जाता है।“ अपन जीवन-संघर्षक व्यापार सँ फुरसत निकालि हम बाबा ओहिठाम जाइत रहै छी आ हुनका संग बैसि बेसीकाल भोरका चाहक चुस्की लैत साहित्य आ आन-आन विषय सभ पर बतियाइ छी। पछिला अनेक वर्ष सँ बाबा हमर सभसँ नीक मित्र छथि, अभिभावक आ मनोचिकित्सक सेहो। हमरा सभक गपक कोनो निर्धारित विषय नहि रहैत अछि। बात पसरैत अछि त साहित्यक सीमा पार करैत लालू-नीतिश, मोदी-अडवाणी, मोहम्मद रफ़ी-बलराज साहनी, शाहरुख-अक्षय कुमार, धोनी-गावस्कर, फेडरर-अमृतराज आ केदन-कीदन-कहाँदन-कोनदन तक चलि जाइत अछि। बाबाक विविध विषयक अध्ययन आ सूचना हमरा आश्चर्यमिश्रित आनन्द मे डुबबैत रहैत अछि आ हम हुनका लग सँ बहुत-बहुत मातबर भए कए घुरए छी। हमरा लगैत अछि जे बाबाक लेल डिक्शनरी, एनसाइक्लोपीडिया वा गुग्गल सन नामकरणहु यथेष्ट नहि अछि। लागैए जे बाबाक लेल कोनो जानकारी दुर्लभ नही छनि, बाबा लेल कोनो चीज असंभव नहि छनि आ बाबाक संगति कोनो माटिओ केँ सोना बना सकैत अछि। २ हाली-हाली बहथु कोसी -शैलेन्द्र आनंद 14 दिसम्बर 2012 ई- । वागमतीक जबकल साहित्यिक-सांस्कृतिक जल वेगमयी भऽ बहय लागल । ओहि समय लागल छल जेना मोनक कल्पना साकार भऽ उठल अछि । मैथिलीमे ढंगक समाचार पत्रक शुभारंभ मोनकेँ आन्दोलित कऽ देने छल । आब मैथिलीक बढ़ैत डेगकेँ क्यो छेकि नहि सकत । नव ऊर्जा सम्पन्न ओहि टीमकेँ देखि, अनेरो विश्वाससँ भरि गेल छलहुँ । टीम लीडर अजित कुमार ‘आजाद’ प्रभारी सम्पादक- अरविंद ठाकुर, फीचर सम्पादक- नरेन्द्र एवं नगर सम्पादक- कुमार शैलेन्द्र । पहिल दिन जखन ‘मिथिला आवाज’ कार्यालय पहुँचलौं, तऽ आँखि सम्पादकक केबिन दिस छल । कारण प्रभारी सम्पादकक कुर्सी पर ओ छथि जिनका सँ पत्र-व्यवहारक अतिरिक्त साक्षात्कार नहि भेल छल । एक तरहेँ हमरा लेल ई अजगुत गप्प छल । पूर्व परिचित रहलो उत्तर, ने हम हुनका देखने छियनि आने ओ हमरा देखने छथि । रचनाकारक एहेन मैत्री, वस्तुतः बहुत उत्सुकतासँ भरल रहैत छैक । हमरो लग वएह उत्साह छल । अरविंद ठाकुर अर्थात  ‘परती टुटि रहल अछि’ केर कवि । जनिक प्रतिभा सँ एहि पोथीक माध्यमे पूर्वहि परिचित रही । ‘अन्हारक विरोधमे’ कथा-संग्रह पढ़ि चुकल रही । मुदा परिचितो रहैत, अपरिचित रही सदेह । गौरांग, दोहारा शरीरक ई नवयुवक, हमरा देखि मुस्कियाएल । लागल जेना ई हमरा पूर्व देखि चुकल अछि । हम आगू बढ़ि बजलहुँ- शैलेन्द्र आनंद । कुर्सीसँ उठि, ओ हाथ बढ़बैत कहलनि- ‘मिथिला दर्शनमे फोटो देखि चुकल छी, तेँ पहिने अनुमान लगा चुकल रही । दर्शन देबाक लेल कोटिशः धन्यवाद । कुर्सी पर बैसौलनि, चाहक आदेश देलखिन आ साहित्यिक गति-विधिक चर्चा होमय लागल । गप्पमे आठ बाजि गेल । हम हड़बड़ेलहुँ, मुदा ओ निश्चिन्त । एकटा संक्षिप्त वाक्य- अरे जेबे करब । अखन कोन हड़बड़ी छैक । पन्द्रह दिनुक बादहि अखबार निकलबाक संभावना, तावत एतेक दिनुका बाँकी-बकियौता पूरा कऽ लेबाक छै । मुद्रा ओहिना सौम्य । सौम्य मुद्रामे ठाँहि-पठाँहि बजबाक अद्भुत सामर्थ्य छनि हिनकामे । साहित्यकारक असली फकराना अंदाज । ‘परती टूटि रहल अछि’ केदार कानन पठौने रहथि । कानन हिनके जकाँ परिचित छथि । हुनकोसँ सदेह भेंट नहि अछि । मुदा लगैए जेना हमरा लोकनि पुरान परिचित रही । एहने भेंट कुणालसँ भेल छल । कुणाल, लोहना आएल रहय, राज आ शैल सँ  भेंट करबाक लेल । रस्तामे एकाएक रोकलक आ कहलक- की हमरा समक्ष शैल ठाढ़ अछि ? हम सकपकाएल ‘हँ’ कहने रही कि कहैत अछि- हम कुणाल । हम छातीसँ ओकरा साटि लेने रहियै, आइयो हमरा ओहिना मोन अछि । से अरविंद ठाकुरक ओहि दिनुका भेंट ओहिना मनमोहक लागल छल । एहि आत्मीयताक तारकेँ मात्र साहित्य जोड़ने अछि । कोसिकाक पानिमे जेना प्रतिभाक वरदान छै । उग्रताराक आशीष जेना ओतुक्का एक-एक साहित्यकारकेँ प्राप्त होइक । सुभाष भाइ होथि कि कानन, नवीन होथि कि अरविंद सभ चर्चित, सभ कलमक तेज । साहित्यसर्जक लोकनिक गाम, कत्तौ ने कत्तौ अपनत्वसँ भरि दैत अछि । महिषी आ उग्रताराक नाम मात्रहिसँ हमर हृततंत्री झंकृत भऽ उठैत अछि । कारण स्पष्ट अछि- महिषी हमर पुरखाक गाम थिक, हमर मूल ग्राम । महिषी, सहरसा आ सुपौलक लोक भरिसक अही कारणसँ अपन समाघ सन लगैत छथि । जाह, हमहूँ की-की कहऽ लगलहुँ ? हम अरविंद ठाकुर पर केन्द्रित छी आ बोहियाइत पहुँच गेलौं सहरसा । ओना सहरसा आ अरविंदक अटूट सम्बंध अछि, जेना हमर आ अरविंदक मैत्रीक प्रगाढ़ता । कहबाक लेल ओ अनुज रचनाकार किएक ने होथि, मुदा मैत्री सभ छान-पगहाकेँ तोड़ि दैत छैक । अरविंदजी खूजल लोक छथि । ठाँहि-पठाँहि गप्प लिखताह आ बजताह । नीक लागय तऽ बेस, नहि नीक लागय तँ बेस । हुनक मोनमे जे उपचरतनि ओ प्रकट कऽ देताह । छल-छद्मसँ दूर, निर्विकार भावसँ । तेँ वर्तमान समयमे जे स्थान हिनका भेटबाक चाही, से अखनि धरि क्यो नहि दऽ सकल अछि । एहेन रचनाकारक प्रति, आलोचक लोकनिक दृष्टि नहि जाएब, कोनो प्रतिभा सम्पन्न रचनाकारक अवहेलना थिक । अरविंदजी बहुत जिदियाह लोक । जे सोचताह ओकर कार्यान्वयन कोना हएत से संगहि सोचि लैत छथि । एक दिनुक गप्प सुना रहल छी । हम डेरापर पएर रोपनहि हएब कि फोन रिंग देलक । फोन उठौलहुँ । अरविंदजी छलाह । कहलनि- भाइ, महाप्रकाश नहि रहलाह । हुनक निधनसँ मर्माहत छी । तेँ अहाँसँ विशेष आग्रह जे 6 बजे धरि एक संस्मरण लिखि पठाबी । मात्र डेढ़ घंटाक समय । हम अपन विवशता कहितियनि, मुदा ओ एकर बिना अवसर देने कहलनि- लियऽ अजितजी बात करऽ चाहैत छथि । हम तखनहि बूझि गेलहुँ जे आब बिना लिखने कोनो उपाय नहि । आजाद, अपन पुरान अंदाजमे बजलाह- हँ सर ! कल्हुका अखबारक एक पृष्ठ महाप्रकाशक लेल रहतनि । संस्मरण अपनेक हिस्सामे छै । 6 बजे आबि जैयौ । प्रणाम  आ फोन डिस्कनेक्ट भऽ गेल । भारी आफत । एतेक जल्दीमे केहने संस्मरण लीखि सकबै । मुदा नै लिखबै तऽ आजाद आ अरविंद दुनूक मोन टूटि जेतै । जेना-तेना हुनका लोकनिक फरमाइश पूरा कऽ, मिथिला आवाज कार्यालय पहुँच गेल रही । अरविंदजी दूरहिसँ स्वागत कएने रहथि- आएल जाउ, आएल जाउ । हम बुझैत छलियै जे एहि कठिन समयमे हमर आवश्यकताक पूर्ति के कए सकैत छथि आ पुनः हिन्दीमे- आज की शाम महाप्रकाश के नाम । अरविंदजी अपन कर्मचारीसँ अत्यधिक स्नेह करैत छलाह । ककरो आवश्यकता पड़ि गेला पर, हुनक बटुवा तुरत्त खुजि जाइत छल । कनिएँ दिनमे ओ सम्पूर्ण स्टाफकेँ अपना दिस मोड़ि लेलनि । ई हुनक मिलनसार स्वभावक परिणाम छल । आ हुनक इएह लोकप्रियता हुनक मार्गक काँट भऽ गेल । पत्रकारिताक लौल केनिहार एकटा ईर्ष्यालु व्यक्तिक आँखिमे ओ गड़य लगलाह । शकुनी स्वरूप ओ व्यक्ति पाशा पर पाशा फेकय लागल । अरविंदजीक लेल धैन सन । मुदा सिंह, सिंह होइत छैक ओ गीदर कथमपि नहि भऽ सकैछ । परिणामतः एक दिन मनोवेगमे ओ इस्तीफा दऽ डेरा चल अयलाह । बहुतो मनयबाक प्रक्रिया भेल, मुदा पुनः घूरि नहि तकलनि । एहिसँ पूर्व आजादकेँ उछन्नर दऽ हटयबामे ओ सफल भऽ गेल छल आ ओकर ई दोसरो दाव सुतरि गेलै । अरविंदजी संवेदनशील लोक छथि । ओ संवेदनेक कारण अपन पदसँ इस्तीफा देलनि । मुदा देखा गेलाह अपन अस्तित्व, अपन ऊर्जा, अपन लोकप्रियता ओहि नीच व्यक्तिकेँ जे कुकूर सदृश अइँठ खयबा लेल सदरि काल मालिकक आगू नाघरि डोलबैत छल । प्रपंच करैत छल, मैथिलीक संग, स्टाफसँ गारि-फज्जति सुनैत रहैत छल, मुदा जाहि आशासँ ओ एहेन कुकर्म कएलक, से पूरा नहि भऽ सकलै । अजित आजाद सन तेज-तर्रार, कर्मठ मैथिलीक समर्पित कार्यकर्त्ताक संग प्रपंच- सी-ओ-पद पएबाक लेल, अरविंद ठाकुर सन प्रतिभाशाली रचनाकार संग प्रपंच प्रभारी संपादक पद पएबाक लेल । कुमार शैलेन्द्र आ नरेन्द्रक संग प्रपंच-फीचर सम्पादक बनबाक लेल, मुदा ‘मिथिला आवाज’क मालिक लग कोनो दालि नहि गलि सकल । कुकूर, अँइठ खयबाक लेल नाघरि डोलबैत रहि गेल । अरविंद ठाकुरक सम्पादकक पदसँ इस्तीफा देलाक बाद किवा आजादक त्याग पत्रसँ मैथिलक सपना टूटि गेलैक । भहरि गेलैक समर्पित कार्यकर्त्ताक आसाक देबाल । कियो गेलै हाँजीपुर, कियो गेलै पटना । अंततः ‘मिथिला आवाज’ बंद भऽ गेल । मैथिलीक आकाशमे उद्दीप्त आसाक तरेगन, धूमकेतु बनि विलीन भऽ गेल । मुदा विलीन नहि भेलाह- अरविंद । ओ तऽ आओर भकरार भऽ फुलएलाह । मकरंदक संग, महमहाइत, मैथिली वाङ्मय सुरभित करैत, अपन कलामधुसँ आकर्षित करैत, कहियो नहि बिसरयवला भाषा स्नेहक लेल दू-आखर नित्तो लिखैत छथि । ‘अन्हारक विरोधमे’ लड़ैत छथि जड़ताक परती तोड़ैत छथि । ओ लड़ैत रहताह, अन्हारक विरोध करितै रहताह । परती टूटत, फसिल लहलहाएत, सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय । हमर अनुज थिकाह, मुदा मित्रवत् छथि । हाली-हाली बहैत रहथु कोसी, अपन वेगमे घृणा अहंकार, तिरस्कार, चापलूसी सभेँ बहाकए ल’ चल जाथु । साहित्यक धरती शस्य-श्यामला होइत रहथु । वागमतीक वेग पुनः अवरुद्ध भऽ गेल अछि । ओकर किन्हेर बोन-झांखुरसँ भरल जा रहल अछि । मऽर खएबा लेल नढ़ियाक जमाति, हुलुक-बुलुक कऽ रहल अछि । कुकूर दोसर मालिकक दरबारमे नाघरि डोला रहल अछि । मालिककेँ भड़का रहल अछि, विभिन्न लोकक मादेँ । कोनो-कोनो दाव सुतरि जाइत छै ओकरा एक कौर बेसी भेटि जाइत छै । भरिसक एहने स्थितिकेँ देखैत, भाइ उदयचन्द्र झा ‘विनोद’ लिखलनि अछि- ‘‘सत्य कथा उपराग भऽ गेलै झूठक माथा पाग भऽ गेलै पक्षीराजा काग भऽ गेलै धाजा पर तऽ दाग भऽ गेलै । मौलिक लक्ष्य विवाद भऽ गेलै दुष्टक परिसवांद भऽ गेलै खास लोक आबाद भऽ गेलै आम लोक बर्बाद भऽ गेलै ।।’’        (अमलतास, प्रवेशांक 2013) शाइत मैथिली भाषाक इएह परिणति लिखल छैक । दोयम दर्जाक लोक, गोटी सुतारबाक लेल, मातृभाषाक अनुरागके बिसरि, ओकर मानमर्दन करबा पर तुलल अछि आ दोसरा दिस मातृभाषा अनुरागी विभिन्न प्रताड़ना सहैत, मातृमंदिरमे रचनाक फूल समर्पित कऽ आत्मसंतोष कऽ रहल अछि । बरु कोसी हाली-हाली बहथु, मुदा ओ नहि, नहि-नहि कथमपि नहि । अरविंद भकरार हएताह, हुनक सुरभिसँ सुरभित सम्पूर्ण मैथिली वाघ्मय एक दिन महमहा उठत । ३ अरविन्द ठाकुरः अन्हारक विरोधी व्यक्तित्व -मिथिलेश कुमार राय आइ-काल्हि फेसबुकपर व्यक्तित्व नहमर की कृतित्व तैपर विचार पोस्ट कएल जाइत अछि। सभहँक अपन-अपन विचार छनि मुदा हम ओहन लोककविचारसँ बेसी प्रभावित होइत छी जे व्यक्तित्वसँ बेसी कृतित्वकेँ मानै छथि। हमर अपन मानब अछि जे व्यक्तित्व समाजक बड़का वर्गकेँ प्रभावित करै छैआ कृतित्वपर सेहो ओकर छाप पड़ैत छै। एकर पाछू हमर हमर अपन अनुभव अछि। खराप समयमे एक आदमी हमरा अन्हारसँ लड़बाक तागति देला। हम ओना दिल्लीमे छलहुँ मुदा कुसहा त्रादसीमे सभ जकाँ हमहूँ पिसाएल छलहुँ आ ओही पिसाएल समयमे अरविंद ठाकुरजीसँ हमर पहिल भेंट भेल।गामसँ माए-बाबू जान बचा कऽ भागल छला तँ दिल्ली विश्वविद्यालय पढ़ाइ छोड़ि हम भागि आएल रही। फरवरी २०१०केँ शुरूआतमे जा धरि हम प्रभातखबर, सहरसा नै ज्वाइन केलहुँ ता धरि अरविंदजी हमर दुर्दिनकेँ सम्हारबामे नीक योगदान केला। कोसी बाढिक बाद बेरोजगारीक दिनमे हमरा एकटाआइडिया आएल छल जे हम कोसीपर लिखल गेल पद्य रचना सभहँक संकलन करी। आ ऐ लेल हम सूची बनेबाक क्रममे अरविंदजीसँ भेंट भेल। हमताहि समयसँ हिनकर दृष्टिकोणक प्रशंसक छी। ओना ओहि समयमे हम जौंडिससँ ग्रस्त रही मुदा स्थिति ओहन छल जे ओहू समयमे हम काज ताकिरहल रही। आ ऐ सभहँक अछैत हम रचनाकरक सूची बनाबैत रही। अरविंदजीकेँ भेंटक क्रमेमे पता लागि गेलनि जे हमर तबीयत खराप अछि तँ जौंडिसआ एकर बचावपर बहुत रास चर्चा भेल आ तै संग कोसी क्षेत्र, क्षेत्रक पानिपर चर्चा भेल संगे संग बेरोजगारीक भयावहतापर सेहो। कनी-मनी साहित्यपरसेहो चर्चा भेलै। खेला-पीलाक बाद चलबा कालमे बाढ़िपर लिखल हिनक दूटा गजल भेटल। हिनक सुलेख देखि नीक लागल। हिनक चेहरे जकाँ उज्जरकागजपर मोति जकाँ अलगसँ चमकैत। भेंट स्वरूप हिनक कथा संग्रह "अन्हारक विरोधमे" सेहो भेटल। पूरा रस्ता हम ऐ शीर्षकेँपर सोचैत रहि गेलहुँ,रातिमे निंद नै भेल। आ भोरे लागए लागल जे हम ठीक भेल जा रहल छी...... अन्हारक विरुद्ध बडढ़ल डेग आब किछु आतेज भऽ गेल छल। बहुत आत्मविश्वासक संग प्रभात खबरमे पएर रोपबाक जमीन भेटल तँ हमर बेरोजगारीकपरती टूटि गेल छल। कनी-मनी हरियरी आबि गेल छल हमरा उपर। जहिया कहियो पात पीयर होबऽ लागैत छल "अन्हारक विरोधमे" फूँही जकाँ बरसऽलागैत छल। फोनपर तँ बात-चीत होइते रहल। सगर राति दीप जरए कार्यक्रमक दौरान हिनक बजबाक क्षमता आ समीक्षीय दृष्टिकोणक हमरा फेरसँ चकित केलक। हमरा सभहँक सामने बाजऽमेदिक्कत होइत छल मुदा सुनबाक धैर्य छल हम अरविंदजीकेँ पूरा धेआनसँ सनलहुँ। तेसर भेंट लिच्ची पकबाक समयमे भेल छल। एकटा फरेबी अफसरसँभेंट कऽ कऽ आएल रही आ दुनियाँसँ आक्रांत रही मुदा अरविंदजीक घर "विपल्व भवन"मे पएर रखिते मोन शांत होमए लागल। कनी दुनियाँदारीक गप्पभेल, स्वास्थ्यक गप्प भेल। गप्प भेलाक बाद ओ बाहर गेला आ भीतर अबैत काल हुनका हाथमे लिच्ची भरल पथिया छल। लिच्ची तँ मिट्ठ होइते छैताहूमे हुनक आग्रह एहन जे हम मना नै कऽ सकलहुँ। आबऽसँ पहिने हम किछु कविताक जन्म-कथाक संबंधमे गप्प भेल आ ओहन लोकक गप्प भेल जेरचना प्रक्रिया लेल जमीन तैयार करै छै। हम ई मानलहुँ जे अन्हारक विरोधमे संघर्ष कऽ रहल लोके हमरा भाव ओ शक्ति दै छथि, हम तँ खाली शब्दकेँक्रम राखब जानै छी। ४ अरविंद ठाकुरः हमरामे अहाँ, अहाँमे हम - अजित आजाद वर्ख २०१२। "मिथिला आवाज" दैनिकक प्रकाशनक हेतु हम टीम तैयार कऽ रहल रही। मूल संकट छल संपादकक। मैथिली अखबारक लेल जेहन संपादकहम चाहैत रही, चारू भर नजरि खिरओलाबक बादो कियो सक्षम आ समर्पित पत्रकार एहि लेल अभरि नै रहल छल। किछु मैथिली भाषी संपादक अवश्यरहथि सोंझामे जिनक हिंदी अखबारक संपादकक रूपमे ख्याति रहनि मुदा हुनका सभ लग असमंजसक स्थिति रहनि। एहनमे एक दिन हम अनचोकेमेअरविंद ठाकुरजीकेँ फोनेपर आधिकारिक मुद्रामे कहि बैसलियनि- "सर अहाँकेँ मिथिला आवाजक संपादनक दायित्व लेबाक अछि। कोनो अगर-मगर नै"। ठाकुरजी हतप्रभ रहि गेल रहथि मुदा हमर जिद कहू अथवा हमरा प्रति हुनक विशेष अनुराग ओ तात्काल गछि लेने रहथि। किछुए दिनक उपरांत ओ हमरपटना आवासपर अएलाह, प्रायः चारि-पाँच दिन रहलाह। एहि क्रममे ओ अपन गजल संग्रह "बहुरुपिया प्रदेशमे" केर मादे मारिते रास बात विचार केलनिमुदा रहि-रहि कऽ मैथिलि अभबार निकालबाक आ ओकर संपादन-पक्षपर विमर्श करब ओ नै बिसरथि। किछु दिनक उपरांत हम हुनका डा. चंद्रमोहनझाजीसँ मधुबनीमे भेंट करबेलियनि। डा. चंद्रमोहन झा मिथिला आवाजक मालिक रहथि। अखबार निकालबाक बाद ओ एहि अखबारक प्रधान संपादकसेहो बनलाह। अरविन्दजी प्रभारी संपादकक काज करब शुरू केलनि। प्रायः जुलाइ २०१२सँ। हुनक कुंडलीमे नौकरी करब नै छलनि। ओ ऐसँ पहिने कहियोव्यावहारिक रूपें चाकरी नै केने रहथि. पत्रकारिता जरूर करथि। ई गुण ओ अपन पितासँ अर्जित केने रहथि। हुनक पिता प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी आकुशल पत्रकार रहथिन। शुरुआतमे ठाकुरजीकेँ मिथिला आवाजक कार्यालयमे किछु-किछु दिक्कत होइन मुदा लगले ओ आदती भऽ गेला। अखबारकपहिल अंक १४ दिसम्बर २०१२केँ बहरेलै मुदा डमी अंक जुलाइयेसँ तैयार होइत रहैक। एहि क्रममे हमर दायित्व छलकेँ सभकेँ तकनीकी रूपसँ नीकबनाएब। ठाकुरजीक तत्परताक संग  कमप्यूटर ओ अखबारी साफ्टवेयरमे दक्षता प्राप्त केलनि। अखबारक तनाव भरल वातावरणकेँ ओ अपना तरहेंतनावरहित बनेबामे कोनो कोर-कसरि नै छोड़थि। हमर चारू कात ईर्ष्या-द्वेषक एकटा नमहर आ मजगूत छहर देवाली बनए लागल छल। एहि छहरदेवालीकेँ अपन हास्य बोध अथवा एना कही जे भाष्यबोधसँ  तोड़ि देबाक ओ चेष्टा करथि। बहुत दूर धरि ओ सफलो भेला मुदा पूर्णतः नै। परिणामतः हम३० जनवरी २०१३केँ अखबार छोड़ि देल। ठाकुरजी मुदा जमल रहलाह। बदमे पता लागल जे जाहि छहर देवालीमे हम घेराएल रही, सएह छहरदेवालीहुनका घेरि लेलकनि अछि। फोनपर ओ अपन पीड़ा कहथि मुदा हमर एकैटा तर्क रहए- "जा धरि अहाँ छी ता धरि अखबार अछि। अहाँ निकलबै अखबारबंद भऽ जेतै"। आ लगभग सएह भेलै। ठाकुरजी एक दिन जय मैथिली कहि निकलि गेला। तकर बाद किछु दिन नरेंद्र सर प्रभारी संपादकक रूपमे अखबारसम्हारबाक चेष्टा कयलनि आ किचु दिन कुमार शैलेन्द्रजी, बादमे अमलेंदु शेखर पाठकजी सेहो मुदा अखबार नै चलि सकलै आ २२ अप्रैल २०१४केँ बंदभऽ गेलै। एतेक दिन अखबार जे चलल तकर एकटा मजगूत पाया रहथि अरविंद ठाकुरजी। हुनक संपादकीय चार्चामे आबि गेल छल। हमरा बहुत गोटेप्रत्यक्ष अथवा फोनपर एकर प्रशंसा करथि। ओहि समय हिंदी अखबारक संपादकीय आ ठाकुरजीक मैथिलीमे लिखल संपादकीय केर जव तुलना करबैक तँठाकुरजी बीस नै एक्कैस पड़ताह। हमर तँ इच्छा अछि जे हुनक संपादकीय केर पोथी भऽ जाइक। मिथिला आवाजमे एक समय एहनो छल जाहिमे किछु दिनक लेल हमरा आ ठाकुरजी बीच मतांतर भऽ गेल छल। बाजा-भुक्की सेहो बंद। हम अपना तरहेंस्थितिकेँ सम्हारबाक बहुत यत्न करी मुदा सफल नै भऽ पबैत रही। एक दिन नरेन्द्र सर एकर फरिछौट कएलनि ताहूमे ठाकुरेजीकेँ धन्यवाद जे ओ हमराप्रति सभटा कटुताकेँ एकहि क्षणमे बिसरि गेल रहथि। अरविंद ठाकुरजीसँ पहिल भेंट कहिया आ कोन स्थितिमे भेल से ठीक-ठीक नै कहि सकैत छी मुदा१९९३ केर गप्प थिक प्रायः। हुनक पहिल पोथी "परती टूटि रहल अछि" कविता संग्रह आबि गेल रहनि। हम केदार काननजीसँ भेंट करबा लेल मासे-माससुपौल जाइत रही ओहि समयमे। हमर गाम हटनी सँ सुपौल मात्र १८ कीलोमीटर दूर छै। बीचमे मुदा कोसीक धार। नाहपर चढ़ी आ ओइ पार सुपौल।लगभग चारि घंटाक रस्ता आ खर्च पड़ैक अधिकतम दस टका। तहिया मैथिली साहित्यमक एकटा प्रमुख केंद्र रहैक सुपौल। एहि केंद्रक धुरी रहथि केदारकाननजी। हुनक मित्र मंडलीमे डा. शिवेन्द्र दास, डा. नवीन कुमार दास, अरविन्द ठाकुरजी सभ रहथिन। ओही गोष्ठी सभमे कहियो हिनक विद्वता आठहक्कासँ प्रभावित भेल हएब हम। ठाकुरजीक जिंदादिली आ उन्मुक्त भाव हमरा विशेष प्रभावित केलक जे हम एकक्हि श्वासमे उक्त संग्रहक हिंदीअनुवाद कऽ गेल रही। मुदा अनुमति तँ लेने नै रही आ डर सेहो रहए मोनमे जे यदि आनुवाद पसिन्न नै पड़लनि तँ अपन अयोग्यता सेहो देखार होयत।अनुवाद केलाक  बहुत दिन धरि हम एही गुन-धुनमे रही जे अनुवादक ई काँपी दियन कि नै। अंततः राजविराजमे सगर राति कता गोष्ठीमे हम हुनका ईकाँपी देखेबाक साहस जुटा लेलहुँ। ओ मुग्धभावसँ हमर अनुवाद कार्यकेँ देखलनि आ प्रशंसा केलनि। गोष्ठीमे उपस्थित अनेको साहित्यकारकेँ ओ एहिसंदर्भमे कहलखिन्ह। मैथिलीमे लेखकसँ बेसी प्रकाशक छथि एकर अछैत पोथी प्रकाशनक स्थिति बहुत बेसी दयनीय अछि। बिक्री व्यवस्था एहिस्थितिकेँ आर संकटमय बनबैत अछि। एहनमे अनुवाद कएल एहि कृतिकेँ छपबामे दिक्कत आएल जे की स्वाभाविक छल। बहुत बर्ख धरि ई अनुवादअन्हारेंमे रहल। लगभग १७-१८ बर्ख। बर्ख २००८मे हम "नवारंभ" नामक प्रकाशनक स्थापन केलहुँ। पोथी छपबाक किछु हुनर सेहो अर्जित केलहुँ।प्रकाशित पोथी सभहँक चर्चा होमय लागल। तँ एक दिन हम ठाकुर सरकेँ उक्त अनुवाद संदर्भमे जिज्ञासा केलियनि। ओ छपेबाक लेल तैयार भेला। एहिबेर ओ अपने गंभीर छला छपेबाक लेल। हमर काज असान भऽ गेल। "परती टूट रही है" सोंझा आबि गेल। खूबे चर्चा भेल। मैथिली कविताक किसानीसंस्कृति आ प्रतिरोधक आभाकेँ हिंदी जगतमे प्रशंसा भेटलैक। हमरामे कतबा अरविंद ठाकुर छथि आ हुनकामे कते हम छी एकर पड़ताल या प्रमाणदेबाक खगता नै अछि मुदा ई बात पूरा सत्य अछि। हमरामे जतबा ओज, जतबामे , जतबा जिद अछि से हुनके थिक। अरविंद ठाकुरजी कतबा हमर मित्र,कता जेठ भाए अथवा हथवा हमर अभिवाभक छथि सेहो एखन प्रमाण देब उचित नै मुदा ईहो बात शत-प्रतिशत सत्य अछि। हुनक कथा संग्रह "अन्हारकविरोधमे" यद्यपि हमर प्रकाशनसँ नै छपल मुदा एकर सभटा काज-ब्योंत हमरे धराओल अछि। भूमिका सेहो हमरेसँ लिखबेलनि। हद तँ ई जे लोकार्पणसेहो हमहीं सेहो कएल सुपौल कथा गोष्ठीमे। हुनक जिद जे नव लोक आगू आबए। नवतुरिया लेखककेँ आगू बढ़ेबामे सभ तरहँक मदति करबामेठाकुरजीक जोड़ नै अछि। प्रायः इएह कारण अछि जे मैथिलीमे सर्वाधिक नवतुरिया लेखक हुनकेसँ जुड़ल अछि। नवतुरियाकेँ अपन संगतुरिया बनेबाककला कियो हुनकेसँ सीखि सकैत अछि। संघर्ष आ दरिद्रा हमर संगी रहल अछि। एक समय तँ एहनो छल जे हम "मिस्ड काल" केर मास्टर रही।आ एकरशिकार मैथिलीक अनेक साहित्यकार भेल हेता मुदा सर्वाधिक "मिस्ड काल"  हम ठाकुरजिकेँ कएल करी। ओ तात्काल "काल-बैक" करथि आ बड़ी देर धरिबतियाइथ। आब ओना हमर ई आदति बंद भऽ गेल अछि मुदा बड़ देर धरि बात करबाक ठाकुरजीक आदतिमे कोनो बदलाव नै भेलनि अछि।भरि पोखगप ओ जा धरि नै करताह ता धरि हुनका संतोष नै होइत छनि। हमरा तँ केखनो कऽ होइत अछि जे ई अपन छह मासक मोबाइल बिलकेँ बचा लेथि तँहिनक दू पोथी अरामसँ छपि सकैत अछि मुदा बात कहबाक अर्थ भेल हुनक संतोषक मार्गकेँ अवरुद्ध करब।हमर मिस्ड कालक चर्च ओ अपन गजलसंग्रह "बहुरुपिया प्रदेशमे" केर भूमिकामे विस्तारसँ केने छथि सेहो सार्थक अर्थमे। एहि संग्रह दूटा शेर हमरे लेल लिखने छथि। उक्त दूनू शेरमे हम कतबाफिट छी कतबा अनफिट से हमरा जानए बला कहताह मुदा हमरा लेल ओ एकटा मार्क अछि जतऽसँ हम निच्चा नै जाए चाहब।हमरा ऐ बातक गौरब अछिजे ओ हमरा आग्रहपर गजल दिस प्रवृत भेला आ मैथिलीक श्रेष्ठ गजलगो प्रमाणित भेला। हुनक गजल संग्रह मैथिलीक एकटा माडल गजल संग्रह थिकई बात समीक्षक लोकनि सेहो मानैत छथि। हिनक किछु आर गजल संग्रहक अपेक्षा अछि। मैथिलीमे गजल विधा आइ स्थापित भऽ गेल अछि मुदा एकरगाड़ आर गँहीर हेबाक खगता छै। ताहि संदर्भमे ठाकुरजीक भूमिका महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि।अरविन्द ठाकुरजी आइ-काल्हि गद्य लेखनमे अपनाकेँरमौने छथि। समीक्षा आ निबंध हिनका बेस रुचि रहल छनि। कालमनिष्ट रूपमे ओ अपन झंडा ई फहिनहि गाड़ि चुकल छथि। हिंदी पाक्षिक "लोकप्रसंग"मे हिनक काम बस चर्चित भेल।आक्रमाकता हिनक लेखनक मूल पूँजी थिक। विचारमे धार आनब आ सही जगहपर एकर उपयोग करब हिनक नैसर्गिक गुण थिकनि। बर्ख २००९मे नवारम्भ पत्रिका निकालबा पाछू हिनके उत्प्रेरण काज केलक। पत्रिका कोना लोक धरि पहुँचैक तकर ब्योंत धरेबाकचिन्तामे सदिखन ओ लागल रहथि।ओही क्रममे हमरा ईहो लागल जे हिनकामे श्रेय लेबाक प्रवृति नाममात्रक लेल छनि। अपनाकेँ पाछू राखि लोकेँ आगूबढ़ेबाक उद्दाम लिलसा हिनक एकटा खास विशेषता थिक। मैथिली लेखक संघक स्थापना २००८मे भेलापर ओ एकर आजीवन सदस्य बनला मुदा एहिसंस्थाक क्रियाकलापसँ असंतुष्ट भेलापर ओ एकर विरोध करब नै छोड़लनि। अध्यक्ष आ महासचिवसँ हुनक तकरारक चर्च हमरा लोकनि मींटिग धरिमेकरी। प्रायः एहि सभहँक कारणें संस्थामे किछु गुणात्मक सुधार सेहो भेलै। मैथिली लिटरेचर फेस्टिभल २०१४मे कविक रूपमे ओ पटना आमंत्रित रहथिमुदा आयोजक संस्था मैथिली लेखक संघसँ किछु मुद्दापर हुनक नाराजगी बनले रहल। प्रतिरोधमे ओ कविता पाठ नै केलनि। हमरा हुनक प्रतिरोधीस्वभाव प्रभावित करैत रहल अछि। हमरा भीतर जे किछु आगि अछि से असलमे हुनक अगिन ताप थिक जे हमरा सिमसिमाह हेबासँ बचबैत अछि। हमराअसगर नै होबए दैत अछि ठाकुरजी। एही बर्ख हमर कंपनीसँ संदर्भित एकटा मामिलामे हमरा जहल जाए पड़ल छल। जहलमे बहुत रास बात सभ जानल-सीखल। ओतऽ एकटा चर्चा बहुत होइक-- "अस्पतालक बेडपर आ जेलक गेटपर जे भेंट करऽ आबए सएह भेल अपन"। अरविन्द ठाकुरजीक एक दिनअनचोके जेलक गेटपर भेटलाह। हमरा बल भेटल। हमरा प्रति हिनक विश्वास एक बेर आर परिलक्ज़ित भेल। असलमे जहलक गेटपर हुनक आगमनहमरा लेल क्लीन चिट सेहो छल। ओ हमर रिहाइ केर दिन सेहो आबऽ बला रहथि मुदा हमहीं मना कऽ देने रहियनि। आइ सुपौलमे केदार भाइ सक्रिय नैछथि मुदा सुपौलकेँ एकटा साहित्यिक केंद्र बना कऽ ठाकुरजी रखने छथि। आइ सुपौलक अर्थ अरविन्द ठाकुर होइत छै। सुपौलक आपस-पासक क्षेत्र यथात्रिवेणीगंज, मधेपुरा, पूर्णिया आदिकेँ सेहो साहित्यिक रूपें सक्रिय बनेबामे हिनक योगदानकेँ नकारल नै जा सकैए। प्रलेसकेँ कोसीमे विस्तार आ अर्थदेबामे सेहो हिनक महती भूमिका रहलनि अछि। पुरस्कार आ चाटूकारसँ कोसो दूर अरविन्द ठाकुरजीक संपूर्ण प्रतिभाक सार्थक उपयोग यद्यपि आइ धरिनै भऽ सकल अछि मुदा जतबा ओ देलनि अछि ताहिसँ आर किछु भेल होइक की नै मुदा प्रतिरोधी तेवरकेँ धार अवश्य भेटलैक अछि।हिनक उर्जा आआगि, दृष्टि आ सृष्टि, कथनी आ करनी एवं जीवन आ लेखनमे कतहुँ विसंगति नै भेटत। सभ ठाम एक रूप एक रंग। लेखककेँ जँ अपन रीढ़ नै तँ फेर ओकेहन लेखक? अरविन्द ठाकुर ने सिर्फ अपन रीढ़पर छथि अपितु मैथिली साहित्यिक रीढ़ बनल छथि तँ एहिमे हुनक मेहनति आ जीबटपनक योगदानछनि।आ "विदेह" जँ हुनकापर केंद्रित अंक निकालि रहल अछि तँ हमरा लगैए जे किछुए लोक सही मुदा छथि तँ जे अरविन्द ठाकुरजी सन समकालीनसाहित्यकारक परिवर्तनकामी लेखकन "नोटिस" लैत छथि। एतऽ तँ ई हाल अछि जे जिबैतमे के कहए मरलोपर लेखकक नोटिस लेनिहार कियो नै।धन्यवाद विदेह। ५ जेहने खोजलऽ हौ कुटुम्ब - लक्ष्मण झा सागर डा वीरेन्द्र मल्लिक हमर कविता संग्रहक भूमिका लिखबाक क्रम मे हमरा फोन केलनि जे हमर समकालीन साहित्यकार के सभ छथि ? हम अवग्रहमे पड़िगेल रही। तत्क्षण  हुनका कहलियनि जे जहन हम मैथिली मे लिखनाइ शुरु केने रही तहन हमरा संगे सर्वश्री हितनाथ झा ‘हितेश’, विनोद भारती,कालीकान्त झा ‘बुच’ आ स्व फुलेश्वर सिंह ‘नौशाद’ छपैत छलाह। ‘बुच’ जीक कोनो रचना किछु बर्ख पूर्व कत्तहु अभरल छल। बांकी गोटेक कोनो किछुकहां भेटइए पढबाक लेल। साहित्य मे हमरा बैच केँ ग्रहण लागि गेलैक। हम टुग्गर भऽ गेल छी। हमरा लोकनिक बाद जे लोकनि लिखय लगलाह से आइ कतय सं कहां पहुंचि गेलाह अछि। हुनका लोकनिक नाम लेब अप्रासंगिक नहि हैत।ओ लोकनि छथि सर्वश्री प्रदीप बिहारी, विभूति आनन्द, रमेश, नारायण जी, नवीन चौधरी, कुणाल, शिवशंकर श्रीनिवास, मधुकान्त झा, विभा रानी,शरदिन्दु चौधरी प्रभृति। व्यक्तिगत हम जिनका लोकनि कें अपन साहित्यिक गुरु मानैत छियनि। हमरा एहि बात कें स्वीकार करबा मे ने कोनो संकोचआ ने ग्लानिबोध भऽ रहल अछि। सत्य यैह छैक। आदरणीय वीरेन्द्र मल्लिक जी कें हमर बात नीक लगलनि। हमरा लोकनिक बहुत बाद सर्वश्री केदारकानन, तारानन्द वियोगी, श्याम दरिहरे, अजित आजाद आ अरविन्द ठाकुर सभ लिखय लगलाह। हम हिनको लोकनिक लेखनक लोहा मानैत छी।हिनका सभक रचना जखन कत्तहु पढैत छी तं अपन लिखलाहा झूस लगैत अछि। साहित्य समीक्षक किंवा पाठक जहन कोनो रचना पढैत छथि तं ओ ईकिएक विचार करताह जे अमुक गोटे निठल्ला बैसल छथि किंवा सरकारी सेवा मे छथि वा निजी कंपनी मे बहुत व्यस्त जिनगी सं पलखति निकालि केंलिखैत छथि। हुनका पढबा मे नीक लगैत छनि। यैह ओहि साहित्यकारक लेखनक सार्थकता भेल। हमरो मन्तव्य एही दृष्टिकोण सं प्रभावित अछि। यैह ईमानदारी भेल। हमर विषय आइ ‘अरविन्द ठाकुर’ छथि। एहि सं पूर्व हम ज्योतिरीश्वर ठाकुर,विद्यापति ठाकुर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रुपकान्त ठाकुर, रामलोचन ठाकुर, लुटन ठाकुर, बच्चा ठाकुर, केष्कर ठाकुर, श्यामानन्द ठाकुर, विवेकानन्दठाकुर, जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, गजेन्द्र ठाकुर, वीणा ठाकुर आ विनयभूषण ठाकुरक नाम सं परिचित रही। मैथिलीक कोनो पत्रिका मे अरविन्दठाकुरक गजल पढबाक सुयोग भेटल छल। अन्तिम पांतीक ‘अरबिन’ हमरा मोन कें मोहि लेलक। हम स्व कलानन्द भट्ट, गंगेश गुंजन, जगदीशचन्द्रठाकुर ‘अनिल’ आ विभूति आनन्दक गजल पढने रही। ई अरविन्द ठाकुर के ? हित-अपेक्षित सं हिनक खोज-खबरि लेनाइ शुरु कऽ देलहुं। सुपौल घरछनि। जमींदार परिवारक वंशज छथि। पटना में दबाईक कारोबार छनि। बाल-बच्चा सैंतल सम्पन्न छनि। बड़का लोक छथि। मैथिली सं प्रेम छनि। बड़बेसी प्रभावित भेल रही। लऽग सं देखबाक उत्कंठा जागल। श्री मधुकान्त झा जीक अमल मे चेतना समिति, पटनाक ‘विद्यापति पर्व समारोह’ मे काव्य-गोष्ठीक लेल कोलकाता सं डा वीरेन्द्र मल्लिक, श्री रामलोचन ठाकुर जीक संग हमहूं आमंत्रित रही। मंच पर अरविन्द ठाकुर सेहो रहथि से तखनबुझलियैक जहन ओ अपन कविता पाठ कऽ कें पुन: मंचासीन भेलाह। लग जाए कें परिचय करबाक साधंस नहि भेल। स्वभाव सं कने घमण्डी सनबुझेलाह। मुदा, हुनक कविता हमरा बेस प्रभावित केलक। हम हुनका प्रति यैह धारणा बनेने रही जे ओ भीड़ सं अलग हटि स्वतंत्र व्यक्तित्वक लोक छथि।बहिर कें बहिरा कहनिहार आ बौक कें बौका कहनिहार श्रेणीक लोक छथि। तकरा बाद एहन भेलैक जे अपन पहिल काव्यसंग्रह श्री केदार कानन कें पठेबाकक्रम मे एक प्रति डा सुभाषचन्द्र यादव आ श्री अरविन्द ठाकुरक लेल सेहो पठा देने रहियनि। किछुए दिनका बाद मोती सन आखर मे श्री अरविन्द ठाकुरकपोस्टकार्ड आयल। पोथी पूरा पढि गेल छलाह। पत्र पाबि कने हूबा भेल। फोन केलियनि। लागल जेना दुनूं गोटे कतेक दिन सं परिचित रही। हुनका प्रतिधारणा आइ नीक बनि गेल। मुदा, लऽग मे बैसि कें भरि पोख गप करबाक लालसा लागले रहल। से पूर भेल अगस्त, 2013 मे। भोजपुरी-मैथिलीअकादमी, दिल्ली सब साल जेकां ओहू साल राजधानी दिल्ली मे काव्य-संध्याक आयोजन केने छल। ओहिमे अरविन्द ठाकुर, अजित आजाद, सदरे आलम गौहर आ स्वातिशाकम्भरीक संग हमहूं बाहर सं गेल रही। ‘बाबा बादशाह होटल’ मे सभक जुटान भेल। अरविन्द ठाकुर अजित आजादक संग एक्के कोठली मे ठहरलछलाह। दुनूं गोटे मे खूब अपेक्षितारय देखलियनि। ‘मिथिला आबाज’, दरभंगा मे अजिते, अरविन्द ठाकुरकें संपादक बना कें अनने छलाह से बूझल छल।हमरा लोकनि सभ गोटे ( जे जुटल रही ) अरविन्दे जी वला कोठलीमे बैसल करी। ‘मिथिला आबाज’क अवसानक खेरहा सुनैत रही। गौहर आ स्वातिओंघाय जाथि आ अपना-अपना कोठली मे सुतऽ चलि जाथि। मुदा, हम अजित आ अरविन्द जीक संग रातिजगा कऽ व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनीतिकआ साहित्यिक परिचर्चा करी। नीक लागय। बहुत रास जानकारी भेटल। बहुत किछु सीखलहुं। अरविन्द ठाकुरकें, हुनक स्वभाव कें आ हुनक साहित्यिकप्रतिभा कें लऽग सं जानबाक,चिन्हबाक आ परखबाक अवसर भेटल। दुनूं गोटे भजार बनि गेलहुं। शर्बती सम्बन्ध बनि गेल। जिनगी जीबाक लेल एकटाएहन मीता चाही जकरा सं सुख-दुख बांटि सकी से हमरा लेल आइ ‘अरविन्द ठाकुर’ छथि। दिल्ली सं बिछुरबाक काल उपहार स्वरूप अरविन्द ठाकुर हमरा अपन प्रकाशित दू टा पोथी देलनि– अन्हारक विरोध मे (कथा-संग्रह) आ बहुरुपिया प्रदेश मे (गजल-संग्रह)। दुनूं पोथी पढलाक बाद अरविन्द ठाकुरक प्रति मोन मे कए तरहक चित्र उभरैतअछि। गजल-संग्रह पढबा काल ई अनुभूति भेल जे ओ उर्दू साहित्यक गहन अध्ययन केलाक बादे मैथिली मे गजल लिखलनि अछि। ई ईमानदारीक काजभेल। ‘अन्हारक विरोध मे’ मे जे कथा सभ ओ गढलनि अछि से पढलाक बाद लागल जेना ओ एकटा मुखर समाजवादी आ प्रखर राजनीतिक चिंतकहोथि। हमर अभीष्ट एखन हुनक पोथी सभक समीक्षा करब नहि अछि। जाहि अरविन्द ठाकुर सं पटना मे परिचय करबाक साहस नहि भेल छल ताहिअरविन्द ठाकुर सं दिल्ली मे ठेहुन-छावा वला सम्बन्ध बनि गेल। जहिना कोनो साहित्यिक रचना पढलाक बाद ओहि साहित्यकारक प्रति लोक कें धारणाबनैत छैक तहिना कोनो व्यक्ति सं भरि पोख गप केलाक बादे ओहि व्यक्ति सं लगाव बढैत छैक। सम्बन्धमे मीठास अबैत छैक। प्रयोजन छैक ईमानदारी सं प्रयास करबाक। मैथिली साहित्यक जगत मे आइ एकर घोर अभाव भऽ गेल अछि जे एकटा चिंतनीयविषय थीक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आत्मकथा खंड- १. बुल्लियाँ की जाणां मैं कौन (अपनाकें खोजैत किछु अप्पन बात)- अरविन्द ठाकुर  २.बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल ( एकटा बहु-अर्थी निरर्थक चलभाष–वार्ता सुकांत सोमजीक संग )- अरविन्द ठाकुर ३.संस्मरण- बाबा सँ पहिल आ अंतिम भेंट:बाबाक विराट स्मृति-पटल - अरविन्द ठाकुर ४.जीवकान्त : किछु स्मृति, किछु टिप्पणी- अरविन्द ठाकुर १ बुल्लियाँ की जाणां मैं कौन (अपनाकें खोजैत किछु अप्पन बात) - अरविन्द ठाकुर एकबेर एकटा जिज्ञासु एकटा दार्शनिकसँ चारिटा प्रश्न पुछलक। एहि संसारमे सभसँ नमहर के अछि ? उत्तर भेटल – आकाश। संसारमे सभसँ हल्लुक काज की अछि ? उत्तर भेटल – बिन मांगल सलाह देब। दुनियाँमे सभसँ कठिन काज की अछि ? उत्तर भेटल – स्वयंकें चिन्हब। आ अन्तिम प्रश्न छल – दुनियाँमे सभसँ गतिशील की अछि ? उत्तर भेटल – विचार। अखनि हमरा आगू-पाछू जीवनक आकाशक नमहर पसार पसरल अछि आ स्वयंकें चिन्हबाक सभसँ कठिन काजक लेल स्वयंहिकें बिन मांगल सलाह दैत सभसँ गतिशील विचारक शरणमे छी। अखनि जिज्ञासु हमहि छी आ दार्शनिकक भुमिकाक निर्वाह सेहो हमरहि करबाक अछि। जिज्ञासु लग विचारल प्रश्न रहए आ दार्शनिक त प्रत्येक क्षण मनन-चिन्तनमे रहैत जीवन आ प्रकृतिक अन्वेषण-अनुसंधानहि करैत रहैत अछि। हमरा लग ने ई दुनू स्थिति अछि आ ने सुविधा। एकहिटा रस्ता अछि जे अपन जीवनक पछिलका किछु अध्यायसभकें उनटाबी आ देखी जे ओहिसँ किछु बहराएत अछि कि नहि ! आठ वर्ष तक सुपौल जिला रेड क्रास सोसायटीक मानद सचिवक रूप मे एकर विधिवत स्थापना आ लोकोपकारक अनेक रास काज कएलाक बाद जेना एकरसतासँ उबिया गेल रही। हमर मान्यता रहल अछि जे एकरसता जीवनक धर्म नहि अछि आ तें हम एहि पदक जिम्मेदारीसँ मुक्त हुअए चाहैत रही किन्तु कोनो जिलाधिकारी (जिला रेड क्रास सोसायटीक पदेन अध्यक्ष) हमरा छोड़ए नहि चाहैत छला। हमरा होइत रहए जे एहि पद पर रहि हम अपन हिस्साक काज कए चुकल छी आ आब हमरा अपन साहित्यिक काज दिस बेसी समर्पणक संग लागैक चाही। अन्तत: हमरा एकटा अवसर भेटल। अकस्मात डा एन0 सरवण कुमार , भाप्रसेक स्थानान्तरणक आदेश आबि गेल रहए आ हम झट द अपन त्यागपत्र लिखि हुनका हाथमे थमा देने रहियनि आ हुनका ठामपर पदस्थापित भेल जिलाधिकारी कुमार रवि पर दबाव बनाए रेड क्रास, सुपौलक नव कमिटीक चयन हेतु चुनावक आयोजन सुनिश्चित करबाए लेने रही। एकटा सम्मानित पदसँ स्वेच्छापुर्वक एना भागब बहुतो गोटेकें अजगुत जकाँ लागल छलनि। हमर अनुजतुल्य आ रेड क्रासमे हमर संयुक्त सचिव रहल मिथिलेश दत्त तहिया लोकक जिज्ञासाक उत्तर दैत कहने रहथिन — “ भैया वैरागी लोक छथि। कोनो पद-सम्मानकें पकड़िकए अपन चांगुरमे राखब हुनकर फ़ितरतमे नहि छनि।“ एहिसँ कुछेक वर्ष पहिने तत्कालीन जिलाधिकारी संजीव हंस द्वारा हमरा मादे जिज्ञासाक उत्तरमे एकटा एडवोकेट मित्र बच्चन जी हुनका कहने रहथिन— “अरविन्द ठाकुर क्षमतावान लोक छथि , सर्वगुणसम्पन्न छथि किन्तु मिजाजमे कनेक टेढी छनि, घमण्डी लोक छथि।“ एहिना मन पड़ैए जे एकबेर हमर एक राजनीतिक प्रतिद्वन्दी खिसिआकए हमरा पर टिप्पणी कएने छला— “ई अरबिन ठाकुर अपनाकें बड्ड काबिल बुझए छथिन। ओ केकरो पोस माननिहार नहि छथि आ तें परम अविश्वसनीय छथि।“ बिहार केमिस्ट एण्ड ड्रगिस्ट एसोशिएसनसँ सोलह वर्ष तक जुड़ल रहलाक बाद हमरा लागल जे एतय हमर योग्यता-क्षमताक सही-सही उपयोग नहि भए पाबि रहल अछि आ हम जतेक पात्रता राखए छी तेकर प्रतिदान हमरा नहि भेटि रहल अछि। एहि संगठनक सर्वेसर्वा परसन कुमार सिंह( जे बादमे एहि संगठनक अखिल भारतीय महासचिव सेहो भेला) हमर बहुत घनिष्ट छला किन्तु हम अपन पक्षक प्रदर्शन लेल हुनक विरोधमे झण्डा उठाए लेने रही। परसन जी ओहि चुनावमे विजयी भेला त हम हुनका बधाइ देबए लेल मंचपर गेलहुँ। ओहि विजयोल्लासक वातावरणहुमे हमर बधाइ स्वीकार करैत परसन जीक आँखि नोराए गेलनि आ ओ बाजल छला – ‘ हम त संगठनक राजनीति करै छी आ हमरा संख्याबलक ध्यान राखए पड़ैत अछि तें हम अहाँक योग्यता संग न्याय नहि कए सकलहुँ। किन्तु इहो तथ्य अपन ठामपर अछि जे ई जगह(व्यावसायिक संगठन) अहाँसन बौद्धिक लोकक लायक नहि अछि।‘ सामाजिक सक्रियताक क्रममे कोनो चुनौती भेटितहि हम जिम्मेवारी सम्हारि लैत रही आ एहि क्रममे अनेक संगठनक हम संस्थापना कएल आ ओकर संचालन सेहो खूब सफलतापुर्वक कएलहुँ किन्तु ई सभ हमरा आत्मिक संतुष्टि नहि दए सकल। लागए जे एतय ठमकल जकाँ छी, बेसी पसारक कोनो गुंजाइश नहि। डा नवीन कुमार दास कखनिओकए कहथि जे हम एहिसभ लेल नहि बनल छी। जखनिकि ठीक एकर विपरीत एकबेर सुपौलक विधायक( वर्तमानमे बिहार सरकारक मंत्री) वीजेन्द्र प्रसाद यादवक हमरापर ई मन्तव्य अएलनि जे हमरासन लोक राजनीति लेल एसेट/पुजी होइत अछि। हमर पत्नीक त उठौनापर ई नियमित आ शाश्वत टिप्पणी होइत रहै छनि — “हमर भायसभ केना नौकरी करै छै आ अपन परिवार कें केना सुखसँ राखए छै, से अहाँ बुत्ते कहिओ भेल! कीदन-कहांदन करैत रहलौं अहाँ……अहाँसँ हमरा कहिओ सुख नहि भेल !!!” ओ की चाहए छथि आ हुनक सुखक की परिभाषा छै , से आइ धरि हम नहि बुझि सकलहुँ। हँ, एतेक बुझएमे आबै ए जे ओ प्रकारान्तरसँ हमर कमौआ आ पत्नीभक्त नहि हएबाक ओलहन दए रहल होइत छथि। विषयान्तर नहि हएत जँ ई चर्चा करैत चली जे ओ सभसँ बेसी प्रसन्न आ गौरवान्वित रहलीह ओहि दस मासमे, जखनि हम “मिथिला आवाज”क सम्पादक पदपर काज करए लेल दरभंगामे रही आ हमर पारिश्रमिकक राशि व्यय करएमे ओ स्वच्छन्द छली। हमर मा आ बाबुजी (माता-पिता) हमर युवावस्थाक कुछेक कुटैब आ अल्हड़पनाक जानकार होइतहु सभदिन हमरा प्रति आश्वस्त रहलथि आ हुनका दुनूगोटेक नजरिमे हम सपूत छलहुँ। हमर तीनू पुत्र हमरा प्रति अत्यन्त आदर आ भक्तिक भाव राखए छथि आ हिनकासभक दिससँ कहिओ कोनो नकारात्मक टिप्पणीक जानकारी हमरा नहि अछि। हमर एकटा वरिष्ट मित्र सुखाय साहु किताबी शिक्षासँ त दूर छथि किन्तु दुनियाबी अनुभव आ ज्ञानसँ खूब भरल-पूरल आ समृद्ध छथि। हुनकासँ हमरा अपन लेखन लेल मारितेरास अमुल्य खोराकसभ भेटल अछि। बेसीकाल ओ हमर विचार आ किरदानीक छिलके उतारएमे लागल रहै छथि किन्तु जखनि हुनकर भाओ जागए छनि त ओ कहता—“ हओ अरबिन बाबू , तोरा सन राजा कोय नै। जे करबहक से अपन मर्जी आ मूड सए। कहियो केकरो पाछू जाइत, केकरो नकल करैत आकि धन-परतिष्ठापर भागैत तोरा नै देखलियह। तू वैह करबह जे तोरा रुचतह, चाहे बहिन्चो… ई दुनिया एन्ने सए ओन्ने किए नै चलि जाय।“ एकदिन एकटा पुत्रवत युवा रणधीर बाजल छल —“काल्हि अपन मीटींगमे तोहर चर्चा करलियह , चचा। ओतए सभगोटे मुंहदेखौंसी गप करैत रहै। हमरा तामस उठल आ हम कहलिअए जे एहि गोल-गोल गपसभसँ पार्टी संगठनक कल्याण नै हेतै। फ़ेर तोहर उदाहरण दैत कहलिअए जे हुनके सन ठाहिं-पठाहिं आ राफ़-साफ़ बाजनिहारक बेगरता छै जे स्पष्टरूपसँ रोगक जड़िकें देखार करए आ तखनिए ओकर उपचार सम्भव छै। तैपर जे ताली पड़लह से की कहियह।“ एकर ठीक विपरीत , हमर बुढिया भौजीसभक उपराग रहैत रहनि—“ एह! एहन मौनी बाबा नै देखलौं। मुंहमे बोल नै आ हाथ-गोरक खचरपनीक सीमा नै। गओ माय !” मैथिली लेखक संघक छठम स्थापना दिवस(12 जुलाइ,2013,पटना) के अवसरपर ललितक लेखनदृष्टिपर धाराप्रवाह 65(पैंसठ) मिनट, जवाहर नवोदय   विद्यालय, सुपौलक छात्रसभक बीच रचनात्मक लेखनपर 75(पचहत्तर) मिनट आ राष्ट्रीय नाट्य अकादमीक प्रशिक्षण कार्यशालाक समापन समारोहमे 90(नब्बे) मिनटक हमर अभिभाषणक चर्चा विभिन्न महफ़िलसभमे होइत रहल अछि। आनहु अवसरपर हमर दीर्घ, मध्यम वा लघु आकारक भाषण बहुत पसन्द कएल जाइत रहल अछि। जखनिकि पत्नी कहैत रहए छथिन— “अहाँ लग मुँह भुकाबएसँ कोनो फ़ैदा नहि। कुच्छो आ केतबो पुछैत जाउ , अहाँ कुछ बाजबे नै करबै !” मैथिलीक योद्धा-युवा रचनाकार कुमार शैलेन्द्र कहैत छला—“ अहाँ सन सनेही लोकसँ हमरा आइ धरि जीवन मे भेंट नहि भेल छल। निरन्तर कलुषतासँ दहाबोर होइत एहि विकाल-काल मे अपन हृदयमे प्रेमक एतेक अथाह सागर अटाए कए अहाँ कोना राखने छी , सर !” लगातार तीन वर्ष तक ‘लोक प्रसंग’(हिन्दी मासिक पत्रिका) मे हम ‘ठाकुर का ठाँव’ कालम लिखने रही जे बहुत लोकप्रिय भेल छल। ओ पत्रिका आइओ बहराइत अछि आ ओकर सम्पादक आइओ आग्रह करै छथि जे हम ओहि कालम कें फ़ेरसँ कन्टीन्यू करी किन्तु समयाभावमे हम चाहिओकए हुनकासभक आग्रहक मान नहि राखि पाबि रहल छी। ओहि कालमक एकटा नियमित पाठक एक बेर दूरभाषपर कहलनि जे हम ओहि कालममे नकारात्मक दृष्टिकोण राखए छी आ हमर शब्दसभ घृणाक प्रचार करैत अछि। हमर साहित्यिक लेखनकें विक्षोभ, असन्तोष आ आक्रोशक साहित्य कहनिहारलोकनिक कमी सेहो मैथिली साहित्य-जगतमे कम नहि अछि। तें जखनि हम अपना प्रति लोकसभक टिप्पणी आ नजरियाक ध्यान राखैत स्वयं अपनहिसँ अपन आत्मावलोकन, आत्मनिरीक्षण करै छी त सन्त बुल्लेशाहक ई शब्द बेर-बेर उभरिकए हमर चेतनासँ टकराबैत अछि —“ बुल्लिआ, की जाणां मैं कौन ?” बुल्लेशाह त प्राय: अपना-आपकें चिन्ह गेल छला, हम अपना-आपकें चिन्हि सकलहुँ कि नहि, चिन्हि सकब कि नहि, कहब कठिन अछि। अलबत्ता हम एहि प्रश्नक उत्तर लेल निरन्तर अपनासँ जवाबतलबी करैत रहब, ताहिमे हमरा कोनो संशय नहि अछि। हमर ई मानब अछि जे साहित्यकार सृष्टि-संरचना आ जन-जीवनक गंभीर पर्यवेक्षक त होइते अछि, ओकरा अपनहु अन्तसमे बेर-बेर हुलकी मारि अपन थाह सेहो लैत रहबाक चाही। एहिसँ ओकरा अपन मुल्यांकन करएमे सहुलियत होइ छै आ ओ बेसी सन्तुलन साधि पबैत अछि , आत्मानुशासनक तमीज जागए छै , से अलग। स्वयंकें अन्डरस्टीमेट करब जं ओकरा अपना लेल घातक छै त ओवरस्टीमेट करब ओकर लेखन आ पाठक-समाज लेल घातक छै आ आत्मानुशासन नहि रहने त सभटा खेले चौपट। जे अपनाकें सही-सही नहि तौललक से अपन लेखन वा आन कोनो सामाजिक गतिविधि लेल इमानदार नहि रहि पबैत अछि। तें हम समाजक विभिन्न क्षेत्र आ ओकर क्रियाकलापकें जं अपन पर्यवेक्षणक दायरामे राखए छी त स्वयं अपनहु कें एहिसं नहि बकसए छी। ई आत्मावलोकनक प्रक्रिया आ ओकर फ़लाफ़ल  ततेक जटिल छै जे कएक बेर हम एहिमे ओझराए जाइ छी , कखनिओ स्पष्ट इजोत देखाइत अछि आ कखनिओकए एहि ओझरीक बीचसँ कोनो महीन सन एकपेरिआ डगर सेहो देखाइ पड़ैत अछि। जँ भारतीय पंचांग केँ मानी त हमर जन्म फ़ागुनक दुआर चढि ओकर दरबज्जा खटखटाबैत माघक पुर्णिमा केँ भेल जाहि दिन देशभरिमे संत रविदासक जयन्ती आ उड़ीसा मे अग्नि उत्सव मनाएल जाइत अछि। ओहिदिन स्नान-दान-व्रतक महिमा सेहो मानल गेल अछि। अंगरेजी कैलेन्डरक अनुसार हमर जन्मतिथि 14(चौदह) फ़रवरी केँ पड़ैत अछि जहिया विश्वभरिमे प्रेमक मसीहा मानल जाइत संत वेलेन्टाइनकेँ स्मरण करैत वेलेन्टाइन-डे मनाएल जाइत अछि आ इएह ओ तिथि अछि जहिआ स्वामी दयानंद सरस्वतीक जयन्ती सेहो पड़ैत अछि। तेँ प्राय: संत रविदासक फ़कीरी मौज, स्वामी दयानंद सरस्वतीक मूर्तिपूजा आ कर्मकाण्डक प्रति विरोधी तेवर आ संत वेलेन्टाइनक प्रेममयता हमर मन-मिजाजमे रचल-बसल अछि। स्नानक शुचिता, दानक पवित्र उदारता आ कोनो काजकेँ व्रत जकाँ मानि ओकरा मिशन बनाए लेब हमरा सोहाइत अछि। जाति भारतीय समाज-संरचनाक एकटा अप्रिय किन्तु अपरिहार्य(अखनि तक) वास्तविकता अछि आ ताहि तल पर हम ब्राह्मण छी – भुमिहार ब्राह्मण-कर्णाटवंशी। पुर्वजसभ कोनो जमानामे मैसूरसँ आएल रहथि, तेँ मूल अछि-मैसूरिया , गोत्र – पराशर आ गोत्र प्रवर छथि – वशिष्ठ,शक्ति आ पराशर। नवका सर्वेसँ पहिनुका पुरनका खतियान देखए छी त ओहिमे एक-एक खतियानमे सैकड़ाक- सैकड़ा बीघा जमीन पुर्वजसभक नामपर देखाइत अछि। बटाइत-बटाइत हमर हिस्सा कट्ठापर चलि अबितए जँ पिताजीक कीनल-अरजल कुछ बीघा नहि रहितए। खेतिहर कहाएब गौरवक गप बुझाइ ए। ई अलग बात जे समयान्तरसँ “उत्तम खेती” आब निषिद्धक कोटिमे आबि गेल अछि। किन्तु रौदी-दाहीसँ अप्रभावित रहि श्रमक मान राखैत दाताक पवित्र-भावसँ अन्न उपजाबैत रहबाक जनहितैषी किसानी संस्कार हमर रग-रगमे, गत्र-गत्रमे घाम जकाँ बसल अछि, देहक धमनी आ मनक गह्वरमे खून आ विचार जकाँ दौगैत अछि। केकरो कुछ दएमे सुख आ आत्मिक संतोष भेटैत अछि। से अपन जीवनक प्रत्येक गतिविधिक प्राय: हर क्षेत्रमे हम अपन एहि प्रवृतिकेँ सदैव उत्साहित कएल अछि आ विपरीतहु परिणाम अएलापर तेकर कोनो अफ़सोच कहिओ नहि भेल। केकरोसँ कुछ लएमे सदैव संकोच भेल अछि आ एहि संकोचकेँ हम जिदियाह इनकार तक पहुँचाएल अछि। हमरा ओतबे चाही जेकर आ जतेक हम पात्रता राखए छी। से नही भेटए ए त दुख होइए, से सकारैओमे हमरा कोनो संकोच नहि अछि। बेदरेसँ दुआरिपर विभिन्न क्षेत्रक विशिष्ट व्यक्तित्वसभक आगमनक साक्षी रहल छी आ अपन मानस आ व्यक्तित्व निर्माणमे हम ओहि व्यक्तित्वसभक योगदान मानए छी। ललित नारायण मिश्रसँ फ़णीश्वरनाथ ‘रेणु’ आ रामधारी सिंह ‘दिनकर’सँ ललितेश्वर प्रसाद शाही सन विलक्षण अतिथिसभक अपनत्वमय उपस्थिति आ हुनकासभक स्वागतमे माला पहिराबए लेल बड़की दीदीक संग ‘पहिने हम त पहिने हम’बला नोंक-झोंक कल्हुका घटना जकाँ स्मृतिपटलपर अंकित अछि। हुनकासभसँ प्राप्त प्रेम आ स्नेह पकठोस भेल एहि वयसहुमे हमरा ललायित करैत अछि आ हमर अमुल्य धन जकाँ अछि। एहि विभिन्न क्षेत्रक व्यक्तित्वसभक परस्पर विरोधाभासी वैविध्य आ समन्वय दुनू हमर व्यक्तित्वमे साफ़-साफ़ देखल जाए सकैत अछि। हिनकासभक व्यक्तित्वक तेजोमय आभाक प्रभावसँ जे औत्सुक्य आ जिज्ञासाक प्रादुर्भाव हमरामे भेल से निरंतर अपन चरम दिस अग्रसर रहल अछि। हमर ई जिज्ञासा ता तक हमरा चैनसँ नहि बैसए दैत अछि जा तक कि हम कोनो ‘किए’क ‘किए’क आखरी ‘किए’ नहि जानि लए छी। दोसर दिस ई हाल रहैत अछि जे जेकरा जानए-बुझएक जरुरत वा जिज्ञासा नहि बुझाबए त ओ आनक लेल केतबो महत्वपुर्ण हुअए, हम ओकरा दिस हुलकी तक नहि दए छी। पढनाइ हमरा लेल सांस लेनाइ जकाँ अछि। लेखनक विविध विधाक पोथीसभ धुरझार पढए छी आ विभिन्न पोथीसभक पथार हमर स्टडी-रूममे अलमारीसँ टेबुल आ रैकसँ चौकी तक देखल जाए सकैत अछि। स्वाद-परिवर्तन लेल धार्मिक पोथीसभ त पढिते छी, सिनेमा आदि आन-आन कोनो विधाक कोनो पोथी-पत्रिका सेहो बिना कोनो पुर्वाग्रहक ओतबे रुचिसँ पढए छी जेतेक रुचिसँ साहित्यक कोनो विधाक कोनो पोथी-पत्रिका। माथाकेँ विश्राम देबाक लेल पढनाइ बंद नहि करए छी, विषय बदलि दए छी। जीवनक शुरुआती दौरमे आचार्य चतुरसेन , कृश्न चन्दर , बच्चन , शरतचन्द्र , बंकिमचन्द्र , टैगोर आदिकेँ हिन्द पाकेट बुक्सक माध्यमसँ पढलहुँ-चिन्हलहुँ त दोसर दिस गुलशन नंदा, प्रेम वाजपेयी, प्यारेलाल आवारा आ कुशवाहा कान्त आदि सेहो हमर पढबाक परिधिसँ नहि छिटकि सकला। जासूसी आ थ्रिलर सेहो हमर पाठान्तर्गत रहल आ ताहि क्रममे ओमप्रकाश शर्मासँ शुरु सूची कर्नल रंजीत , वेदप्रकाश काम्बोज, इब्ने शफ़ी बीए, एस एन कंवल आदि तक गेल।बादमे एहि सूचीमे सुरेन्द्र मोहन पाठक, चन्दर आ राजहंस सन-सन नाम जुड़ल आ अनुवादक माध्यमसँ जेम्स हेडली चेज आ डान पेन्डलटोन(जैक द बास्टर्ड बोलन सीरिज) आदि सेहो। तेकर बाद स्वाद परिवर्तन लेल सीधे मूल अंगरेजी दिस गेलापर मामला अगाथा क्रिस्टी, चार्ल्स डिकेन्स, इ एम फ़ोस्टर सँ होइत हेराल्ड राबिन्स, इर्विंग वैलेस, सिडनी सेल्डन, राबिन कुक, खुशवन्त सिंह, आर के नारायण , मनोहर मालगोंकार, डिक फ़्रांसिस, जेफ़री आर्चर, डी एच लारेन्स, विल्बर स्मिथ, आर्थर हेली, डान ब्राउन, राब कीन, एलिस्टेयर मैक्लीन आ मारियाना कोल सन-सन नाम आ चेतन भगत तक पहुँचल अछि। हिन्दीक कोनो विधाक कोनो साहित्यकार एहन नहि छथि जिनकर कोनो ने कोनो पोथी वा अंश हमर पढनाइक बतहपनीसँ वंचित रहि गेल हुअए। सुपौलक पब्लिक लाइब्रेरीक ध्वंस होइसँ पहिने अंगरेजीक अनेक अमुल्य पोथी पढैक सौभाग्य भेटल जाहिमे एडगर राइस बरोक टारजन सीरिजक दुर्लभ पोथी सेहो छल। कृषि, समाज-सेवा आ साहित्यक त्रिमुर्ति-संस्कार हमरा अपन पितासँ भेटल अछि। हमर पितासँ उपरका अर्थात बाबा, परबाबा बला पीढी शुद्धरूपसँ खेतिहर छल। हमर सम्पुर्ण गोतिया-दायादीमे खेतीएक प्राधान्य, पढब-लिखब प्राथमिकतामे नहि। विशाल आकारक दायादीमे हमर पिता एकटा विलक्षण व्यक्तित्वक रूपमे उदित भेला आ अनेक विघ्न-बाधाकेँ पार करैत अटूट लगन आ साहसक संग शिक्षा प्राप्त कए साहित्य, पत्रकारिता आ समाजसेवाक क्षेत्रमे अपन पएर दए एकटा अलग डगर बनएलनि – शायर, सिंह आ सपूत जकाँ। स्वतंत्रता संग्राममे पड़ि अपन राष्ट्रीय जिम्मेवारीक निर्वहन सेहो कएलनि। जीवनक विभिन्न गतिविधिमे अपन योगदान देबाक क्रमहुमे ओ सभदिन खेती-किसानीक प्रति अपन जातीय-पारिवारिक परम्परागत संस्कारकेँ अंगेजने रहला। सैकड़ाक सैकड़ा जन-मजूर आ अनगिनत बोझाक बोझा धान, गहुम, मकै, मूंगक टाल हम अपन खरिहानमे देखने छी। दू दर्जनसँ बेसी बड़द, महींस आ गाय अपन गोहालमे देखने छी। खेती-किसानीक प्रति हुनक समर्पण आ दीवानगी बिहार सरकारकेँ हुनका ‘कृषि-पंडित’ के उपाधि-सम्मान देबाक लेल वाध्य कए देने छलनि। कृषि विभागक पदाधिकारी लोकनि हमर दुआर आ खेतकेँ धंगने रहैत छला। हमर खेतक धत्तापर तत्कालीन कतेको मंत्री, सांसद आ विधायकलोकनि खेतीक सौंदर्य-संस्कृतिसँ मुग्ध आ आनन्दित हएबाक लेल आबैत रहैत छला। सुतरीक सीधमे होइत रोपनी आ पिताजीक उत्साहवर्द्धन (मुट्ठाक मुट्ठा बीड़ी एहिमे उत्प्रेरकक काज करैत छल) सँ बहराएल बोनिहारिनसभक समवेत गानक आनन्ददायक अनुभूतिक स्मृतिसभ हमरा लग अछि। हरित-भरित खेतसभक बीच बनल दू कोठरीक फार्महाउस आ ओतय लागल बाबूजीक लम्ब्रेटा मोटरसाइकिल हमर स्मृतिक आँखिमे सजीव आ स्थायी चित्र जकाँ अखनिओ उपस्थित अछि। अनेक बेर काँग्रेस कमिटीक बैठक तक ओहि धत्ता पर भेल। हाँड़ीमे बनल चाह पीबैत आ मकैक भुट्टा खाइत पार्टी आ चुनावक गपबला अभिनव बैठक। ई सभटा पैतृक संस्कार हमर जीनमे अवतरित भेल अछि। एकतरहें हम डेनियल बेब्स्टरक ओहि प्रसिद्ध उक्तिक सत्यता-शास्वतताक साक्षात प्रमाण छी जाहिमे ओ कहने छला जे जखनि खेती होइत अछि, तखनिए आन-आन कलासभ पुनकैत अछि आ तें खेतिहरहि लोकनि मानव-सभ्यताक निर्माता छथि। बाबूजीक असीम सामर्थ्य आ पुरुषार्थक शतांशहु हमरामे नहि अछि आ ने ओहिसभक लेल सकारात्मक समय-समाजहि रहि गेल किन्तु हम ओहिसभक आभासीए प्रतिरूप सही , छी। समाज-सेवा हमरा आनन्द दैए, साहित्य त ब्रह्मानन्द-सहोदरहि अछि , किन्तु परमानन्दक अनुभूति हमरा माटिएक संगतिमे होइए। पहिने घंटाक घंटा कोदारि पारि लैत रही, से आब हाड़मे बोन-मैरोक कमीक चलते पार नहि लागैए। खेतिओ-बाड़ी आब बहुत हद तक समटाइए गेल अछि। तेँ एकर विकल्प आब हमरा लेल हमर घरक(विप्लव भवन) आगूक फुलबाड़ी अछि। एकरा चिक्कन-चुनमुन आ सुन्दर बनाए कए राखएमे हमर शारीरिक बर्जिशहु होइत अछि आ ओहि दौरान हम कोनो अव्यक्त, अदृश्य परमात्माक सानिध्यमे सेहो रहए छी। साहित्यक बेसीतर रा मैटेरियल हमर मनो-मस्तिष्कमे ओहि दौरान आबैत रहल अछि। हमर फ़ितरत विपक्षी अछि। भावनात्मक वा क्रियात्मक स्तरपर जेकरा संग दए छी, अपन पुर्ण क्षमताक संग दए छी। किन्तु जखनिए ओ सत्तात्मक रूप धारण करैत अछि, हमर मन रसे-रसे ओकरा प्रति वितृष्णा आ आक्रोशसँ भरए लागैत अछि आ ओकरासँ हमरा अरुचि हुअए लागैत अछि। सत्ता-प्रतिष्ठान यथास्थितिक पोषक होइत अछि, ओहिमे गत्यात्मकता नहि रहि जाइ छै। केतबो प्रगतिशील विद्रोह हुअए, सत्तामे आबितहि लकीरक फकीर भए जाइत अछि, नव प्रयोगसँ हड़कए लागैत अछि, अपन जीवन्तताकेँ समेटि काछु-चरित्र ओढि लएत अछि। तेँ सत्ता-प्रतिष्ठानसभ हमरा कब्रिस्तान जकाँ लागैत अछि – मरल मुर्दासभक विश्रामस्थली। आ तेँ सदैव हमर समर्थन विपक्षकेँ भेटि जाइत अछि – भाव आ क्रिया दुनू रूपमे। हमर एहि फ़ितरती नियमक एकमात्र अपवाद लालू-राबड़ी आन्दोलनहि टा रहल अछि। राजसी, तामसी आ सात्विकमेसँ हम कोन वृतिक लोक छी, से हम आइ तक नहि तै कए सकलहुँ। समय-समय आ ठाम-कुठाम तीनू गुण जोर मारैत रहल अछि हमर जीवनमे। एकर अलग-अलग मात्राकेँ फरिआएब जहिना असंभव लागैत अछि तहिना एकर क्रमबद्धताक विवरण देब सेहो। एकटा विराट चण्डी-यज्ञक यजमान बनि अग्नि, आहुति, मंत्र पाठ आदि-आदिक पवित्र आध्यात्मिक वातावरणक साक्षी बनि अनेक दिन तक सौंसे दुनियां केँ बिसरि तपस्वी जकाँ रहल छी। अनेक सतसंग आ रामकथाक आयोजक बनि ओकर समर्पित श्रोताक रूपमे आनन्दविभोर भेल आकण्ठ डूबल रहल छी आ उच्चस्तरीय गायक-कथावाचक संग ओकर भजन-कीर्तनमे सहभागीए टा नहि बनल छी बरन स्वयं भजन गाबि हुनकासभक संग-संग अपनहु मित्रमण्डलीकेँ भौचक्क कए देने छी। धार्मिक ग्रंथ पढबाक सूर चढल त रामचरितमानस, रामायण, महाभारत, भागवत-पुराण, दैवी-पुराण आदिक संग-संग अनेक उप्लब्ध उपनिषद आ संहिताक हजारो हजार पन्ना चाटि गेल छी। एतबे किए, पवित्र बाइबिल आ कुरान सेहो हमर पढैक जनूनसँ नहि बचि सकल अछि। अवसर अएलापर अपन धार्मिक मित्रमण्डली आ परिवारीजनक बीचमे प्रवचन सेहो कैए चुकल छी आ मानसक सस्वर पाठ त कतेक बेर। किन्तु एकरा अपन जीवनक अनिवार्यतामे हम कहिओ सम्मिलित नहि कए सकलहुँ आ ई जीवनक एकटा पुरान अध्याय मात्र बनिकए रहि गेल अछि। अल्पावधिएक लेल सही, एकटा अलग टाइपक मित्रमण्डलीक संग सुरा-पानक महफ़िलसभकेँ सेहो गुलजार कएने छी आ से खूब धमगज्जर रूपमे। बोलबम-यात्राक क्रममे भांगक सेवन आ गांजाक सोंटक स्वाद सेहो बुझल अछि। एकबेर एकटा गरीब मित्रक जन्मदिनपर देसी दारू पीबि हुल्लड़बाजी सेहो कएल अछि। युवावस्थामे होली आ बरातीक अवसरकेँ एहि काजक लेल नियामति मानैत रही आ एकर अनेक रास खिस्सासभ हमर स्मरणमे संचित अछि। ई अलग बात जे प्राय: पछिला 30-35 वर्षसँ एकदम हम विशुद्ध टी-टोटलर बनल छी आ पीबैक नामपर पानि, चाह आ यदा-कदा कोनो शरबत मात्र लएत रहल छी। सांख्यिकीमे जेबाक प्रयोजन एतय नहि अछि किन्तु यथेष्ट मात्रामे प्रेम आ भोगक सुखद-दुखद अनुभवसँ मातवर सेहो भेल छी। स्वकीया-परकीयाक विवरणमे जएबाक प्रयोजन सेहो अखनि नहि अछि आ ने वांछित। खेतीक प्रति अपन प्रेमक चर्चा हम पुर्वहुमे कए चुकल छी। एहिमे जे श्रम अपेक्षित अछि से दान करब आनन्द दए ए। एहि क्रममे खुरपी, कोदारि ,दबिया, कचिया आदि औजारक प्रयोग यथेष्ट आ निरन्तरतामे करए छी आ एहिमे आत्मिक-अध्यात्मिक सुख भेटए ए, किछु मित्र(?) द्वारा एकरा सोल्हकनक काज नामकरण कएलाक बादहु। एहि मामलामे भगवान परशुराम हमर इष्ट छथि जिनका लग शास्त्र आ शर दुनूक अद्भुत समन्वित वितान भेटैत अछि। शास्त्रक अर्थ वा व्याख्या जेना सभ करैत अछि तहिना हमहु एकर माने पुस्तक-पोथीएक रूपमे लए छी किन्तु शर वा शस्त्रक हमर अर्थ वा व्याख्या खेती-बागबानी आ लेखनक लेल उपादेय औजारसभ अछि। पारम्परिक अर्थमे हम कतहुसँ धार्मिक नहि छी। पुर्वमे वर्णित हमर धार्मिक गतिविधिसभकेँ हमर जीवनक एकटा अस्थायी फेज कहल जाए सकैत अछि। पूजाक पांच प्रकार (अभिगमन, उपादान, योग, इन्या आ स्वाध्याय) मे हम मात्र स्वाध्यायकेँ स्वीकार कएने छी। संयमक चारि प्रकार (इन्द्रिय,समय,ध्यान आ विचार) मे सँ कोनो प्रकारसँ हम स्वयंकेँ नहि बान्हि सकल छी। कोनो प्रतिबंध जे हमर आत्माकेँ रुचैत नहि हुअए, हमरा स्वीकार्य नहि रहल अछि। एहि संयमकेँ हम अपन विवेकपर छोड़ने छी आ ओ अपन काज अवसर अएलापर खूब नीक जकाँ कएलक अछि। संसारक तीन गति (उत्पत्ति, स्थिति आ प्रलय) मे हम स्वयंकेँ मात्र स्थितिमे स्थित कएने-राखने छी आ बकिया दूटापर सोचब, चिन्तन करब हमरा फिजूल आ मुर्खतापुर्ण लागैत अछि। ई अवश्य ध्यान राखैक प्रयास कएल अछि, करए छी जे हमर अजुका कोनो कर्मसँ अगिला पीढी वा अगिला दिनपर कोनो नकारात्मक प्रभाव नहि पड़ए। भावी पीढीक चिन्ता कएने बिना सभकिछु भोगि ली वा भोगैक चक्करमे नाश कए दी, एहिसँ बढिकए आन कोनो पापकर्म हमरा नहि बुझाइत अछि। हमर ई मानब अछि जे एकटा इकाइक रूपमे हमर जन्म, जन्मसँ प्राप्त काया आ एहि कायामे स्थित मन-प्राण, बुद्धि-विवेक, श्रमशक्ति आदि निरुद्देश्य नहि भए सकैत अछि। प्रकृतिमे कोनो काज अनावश्यक नहि छै, ने भेल छै। एहि मेदिनीपर हमर उपस्थितिक मूल उद्देश्य की अछि, तेकर अण्वेषण हमरा कोनो एक काजपर स्थिर नहि रहए, हुअए देलक अछि। जतय कतहु हमर आवश्यकता वा प्रयोजन जकाँ हमरा बुझाएल, ओतय-ओतय हम अपन योगदान लेल बढैत आएल छी आ ताहिमे सदैव हमर सहयात्री रहल अछि हमर विवेक जेकरा हम यत्नपुर्वक सदति जगएने राखए छी। बहुतो लोककेँ हमर ई विविध गतिविधि हमर निरर्थक भटकाव जकाँ लागि सकैत अछि, लागलहु अछि किन्तु अपन गतिशीलताक ई विविधता हमरा पुर्ण अर्थवान आ औचित्यपुर्ण बुझाइत अछि। अपन निजता आ सार्थकताक मोलपर केतबहु बेशकीमती सफलता हमरा स्वीकार्य नहि रहल अछि। ला ब्रुयेरक मान्यता अछि जे संसारमे सफलता प्राप्त करबाक आ उन्नत हएबाक मात्र दूटा मार्ग अछि। एक त स्वयं अपन श्रम द्वारा आ दोसर दोसराक मुर्खतासँ लाभ उठाकए। अपन श्रम पर हमरा भरोस अछि, अपन प्रवृति आ बुद्धिक अनुकूल मार्गपर हम प्रशस्त छी आ अपन कर्मसँ संतुष्ट छी, स्वयंकें मानसिकतामे उन्नत पाबए छी। एहिसँ इतर सफलताक कोनो परिभाषा हम नहि जानए चाहए छी। ब्रुयेरक बताएल दोसर मार्ग धड़ब ने हमर आत्माकें कबूल अछि आ ने तेकर लुरि अछि। संगठित आ परस्पर सहयोगी समाज हमर प्रिय कामना रहल अछि आ एहि कामनाकेँ मात्र वैचारिक स्तर तक सीमित नहि राखि एकरा लेल अपना बुत्ते जतेक पार लागि सकल, से कएलहुँ अछि। हमर विभिन्न सांगठनिक गतिविधिसभ हमर अपन एहि स्वप्न आ कामनाकेँ धरातलपर उतारैत रहबाक प्रयासक प्रतिफलन अछि। एहिमे कतेको बेर किछु गोटेक क्षुद्र-क्षणिक स्वार्थक कारण भेल क्षतिसँ हमर आशा-आकांक्षापर तुषारापात सेहो भेल अछि, ताहिसँ दुखी आ क्षुब्ध सेहो भेल छी किन्तु एहिसँ हमर गति कखनिओ-कखनिओ कने कम भने भेल हुअए, बाधित नहि भेल अछि। अपन एहि फ़ितरतक चलते तेँ कतेक बेर अपना लेल ‘जिदियाह’ शब्दक प्रयोग सेहो सुनने छी आ सुनि-सुनि अनठिअएने छी। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यमे अपन उपयोग करबाक लोभपर हम आइओ कोनो तरहेँ नियंत्रण नहि राखि सकल छी। आलस्य हमर एकटा अभिन्न अवगुण अछि आ एहिसभक समवेत कारणक चलते हम स्वयंसँ साहित्य-सृजन लेल जे अपेक्षा राखने रही तेकर बहुलांश अखनिओ लिखल जाएब बचलहि अछि। साहित्यकेँ अपन सर्वस्व देनिहारसभसँ तेँ डाह सेहो होइत अछि। मैथिलीक एकटा प्रबल संभावनायुक्त कथाकारक ओलहन रहनि जे सम्पादक गौरीनाथ हुनकर कथाकेँ कपचिकए ‘अंतिका’ मे छापलनि। ई चर्चा गौरीनाथसँ कएलिअनि त एहि मादे वार्तालापक क्रममे गौरीनाथ कहलनि जे मैथिलीमे जे चारि अच्छर लिखि लेलक से अपनाकेँ वेदव्यास बुझए लागैत अछि। गौरीनाथक ई टिप्पणी ओहि कथाकारक मादे भनहि उचित नहि हुअए किन्तु हमर अपन अनुभव कहैत अछि जे गौरीनाथ अपन ठामपर वाजिब कहए छथि आ एकर प्रमाण सेहो हमरा कएक बेर भेटि चुकल अछि। एक त जातीय श्रेष्टताबोध आ ताहिपर साहित्यकार हएबाक गुमान – मैथिलीमे सक्रिय अधिकतर लेखककेँ हम एहि मनोविकारसँ पीड़ित-सीदित देखने छी। एहन अनेक खटमिट्ठी अनुभवबला खिस्सासभ हमरा लग अछि किन्तु तेकर चर्चा फेर कहिओ। एकर आलोकमे जखनि हम स्वयं केँ देखए छी त हमरा संतोषपुर्ण गौरव होइए जे ई व्यास-विकार हमरामे नहि अछि। हम अपन सभसँ बड़का खासियत कि खूबी ई बुझए छी जे हमरा अपन औकाति बुझल अछि। “औकाति” शब्दक प्रयोग हम एतय जानि-बुझिकए कएने छी। एहि शब्दक ध्वनि ‘सीमा’, ‘हैसीयत’, ‘बिसात’, ‘बुत्ता’, ‘हद’ आदिक तुलनामे हमरा बेसी संप्रेषणीय आ भावानुकूल बुझाइत अछि, भद्रताक दुराग्रह तक जाएबला लोकसभकेँ ई भने नहि अघरए। तें हम निष्कपटतासँ इ बात कहि सकए छी जे कविता हमरा अपनेटा लिखल नीकसँ बुझाइ ए। दोसर कविक कविता पढैत कतेक ठाम कतेको बात हमर माथपरसँ ससरि जाइ ए।(ओना एकर अपवाद सेहो अछि) तेँ अभिधा, व्यंजना, लक्षणा आदिक व्याकरण वा भामह, मम्मट, राजशेखर आदि आचार्यलोकनिक सैद्धान्तिकीक परवाहि हम कहिओ नहि कएल। एकरा हमर आत्मरक्षाक तर्क बुझल जाए सकैत अछि किन्तु तखनि जखनि हम अपन रचनाक श्रेष्टता, महानता वा विलक्षणताक दाबी करी आ तेकर एवजमे स्वयंकेँ पुरस्कार-सम्मान-पारितोषिकादि लेल सर्वोत्तम प्रत्याशी मानी। हमरा लेखे ईसभ धनि सन ! ई निर्लिप्तता कतहु ने कतहु हमरा सत्याग्रही आ दुस्साहसी बनएलक अछि। एकर प्रदर्शन हम साहित्यसँ इतर आनहु क्षेत्रसभमे अनेकानेक बेर कए चुकल छी आ तेकर परिणामस्वरूप अपना लेल ‘अभिमानी’, ‘घमण्डी’ आदिक अतिपवित्र सम्बोधनसभसँ धन्य भए चुकल छी। हमरा किन्तु एहि लेल कोनो पश्चाताप अखनि तक त नहि अछि। हम एकरा आत्मसम्मान आ अभिव्यक्ति-अधिकार-सम्पन्नता मानए छी आ एकरा अपन व्यक्तित्वक आभा आ सौन्दर्य मानि गौरवान्वित होइ छी आ तेँ दुनियांदारीक आकांक्षा वा दबावक गरजे स्वयंमे कोनो संशोधन-परिवर्तनक बेगरता नहि बुझए छी। हमरा एहि बातक गुमान अछि जे हमर आँखि शुद्धरूपसँ आँखि अछि , मैथिल आँखि नहि। एहि पुर्वाग्रहमुक्त आँखिसँ हम दुनियाँकेँ, दुनियाँक कोनो वस्तुकेँ ठीक ओहि रूपमे देखए छी जाहि रूपमे ओ वास्तवमे छै। दक्षिणा, लाभ, पुरस्कारक सम्मोहिनी गागल्स चढल आँखि हमर आँखि नहि अछि आ तेँ हमरा सत्य आ यथार्थकेँ साफ-साफ देखि सकएमे कहिओ कोनो दिक नहि लागल अछि। एहि आँखिसँ हम स्रृष्टिक असीम विस्तार देखए छी त आरि-धूर आ चौहद्दी सेहो खूब नीक जकाँ अकानल पार लागल अछि। कोनो व्यक्तिक प्रति प्रेम, स्नेह वा आन मानवोचित वा संबंधगत कमजोरीक चलते भनहि ओकरा अनेरो उघार वा देखार-चिन्हार नहि करैत होइ किन्तु केओ केतबो बहुरूप धरिकए, विविध मुखओटा लगाकए आबओ, देर-सवेर ओकर वस्तुगत मूल्यांकनमे हमरा कहिओ कोनो भांगठ नहि भेल। एकरा हम कोनो अदृश्य शक्तिक वरदान बुझए छी जे जीवनानुभवक क्रममे यदा-कदा शाप सेहो साबित भेल अछि। किन्तु ताहि लेल की ? हम जे छी से छी। हमरामे जे ए से ए। या अल्लाह ! हमरा महसूद बनाबह, हासिद नहि बनाबह !!! [ “ ई केना संभव अछि जे केओ अपन रस्ता चुनए, आ ओहिपर असगरहु नहि हुअए ? राजमार्गपर चलनिहारसभ रस्ता नहि चुनैछ ; रस्ता ओकरा चुनैत अछि।“ – अज्ञेय ] (निरन्तर जारी………………………) २. बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल ( एकटा बहु-अर्थी निरर्थक चलभाष–वार्ता सुकांत सोमजीक संग )- अरविन्द ठाकुर “ मैथिली समाज कृतघ्न समाज अछि। एतय काज सभक मोजर के दै छै यौ। हमर प्रयास सँ कतेको हिन्दी समाचारपत्र मे मैथिलीक रचना आ आलेखादि छपल किन्तु मैथिली पत्रकारिताक इतिहास मे एकर कतौ कोनो चर्चा नहि। ‘जनशक्ति’ मे यात्री जीक मैथिली कविता छपल रहै, ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ मे मैथिलीक पहिल पेज निकलल रहै …………… …… …………” – सुकांत सोम बाजैत चलि जाइत छला। [ नदीक एक किनारा नि:श्वास लए कए कहैत अछि – ‘सम्पूर्ण सुख सोझाक किनारा पर अछि!” नदीक दोसर किनारा आह भरिकए कहैत अछि – ‘दुनियाँ मे जतेक सुख अछि ओ सब पहिलुके किनारा पर अछि!’ -: रवीन्द्रनाथ ठाकुर :- ] दिन रहै सोम, तिथि रहै 13 जुलाइ, 2015 आ हम “प्रभात खबर” मे सुकांत भाइक लिखल मैथिली कालम ‘मैथिली माटी के हाल’ देखि-पढि हुनका बधाइ देबा लेल फोन केने रहियनि। हम कहने रहियनि जे एहि आलेख मे प्रुफक अनेकानेक गलती अछि आ ताहि सँ अर्थबाधित होइत अछि, तखनहुँ ई महत्वपुर्ण शुरुआत अछि आ स्वागतयोग्य अछि। ओ कहलनि जे ओ एकर शीर्षक ‘खोद-बेद’ वा ‘देसकोस’ प्रस्तावित केने रहथिन, किन्तु अखबारबला एकरा ठीक सँ बुझि नहि सकल आ कीदन ने कए देलक। हम कहलियनि जे ई सभ त आगू ठीक भए सकैत अछि आ अखनि एहि लेल हमरा दिस सँ बधाइ अछि। हमर बधाइक उपरांत हुनक व्यथा प्रकट करैत ई हताश-निराश सन लागैत टिप्पणी हमरा भेटल। “ से ई मैथिलीक लेल कोनो नव बात त नै छै, सुकांत भाइ। एतय त कोनो तरहक अवदान केँ अनठिऐबाक आ क्षणे मे बिसारि देबाक दीर्घ इतिहास आ परिपाटी रहल छै। ई कोनो हमरे-अहाँ लग सँ त शुरु नै भेल अछि। हमर-अहाँक काज अछि लिखब आ तेँ लिखैत जाउ आ बस। अहाँ लग एहि सँ संबंधित अपन अनुभव आ एकर डाटा ए त अहाँ एकरा लिपिबद्ध किऐ नै करै छी ?” – हम कहलियनि। “ हम अपने अवदानक चर्चा अपने करी? हमरा आत्म-विज्ञापनक सख नै ए। ततेक बेर हमर नाम छपि चुकल अछि जे एहन सौभाग्य मैथिलीक कमे गोटे केँ भेटल हेतनि जाहि मे एकटा हमर बाप सेहो छला। अहाँ पत्रकारिताक क्षेत्र सँ जुड़ल छी, ‘मिथिला आवाज’क सम्पादक रहि चुकल छी। ई अहाँ केँ लिखना चाही। अहाँ लिखू। ई कोनो विभुति आनन्द कि तारानन वियोगी सँ त नै हेतनि।“ “ हमरा लग एहि सँ संबंधित जानकारी रहितय तखन ने हम लिखतहुँ। बहुतो गोटे जकाँ हमरो एकर विस्तृत जानकारी नहि अछि। ई नीक भेल जे अहाँ सँ एहि विषय पर चरचा भेल आ हमर संज्ञान मे ई बात आएल। एकर दस्तावेजीकरण हमरा भविष्यक लेल आवश्यक बुझाइ ए। फोन पर त एतेक गप संभव नहि अछि, अगिला बेर हम पटना आएब त अहाँ संग बैसि एकर डाटा लेब आ ओकरा एकटा आलेखक रुप देबाक प्रयास हम करब।“- सुकांत भाइक गप मे कने क्षोभ, कने व्यंग्य आदिक विरोधाभासी-मिश्रणक आभास जकाँ हमरा बुझाएल किन्तु तेकरा अनठिआबैत हम ईमानदारी सँ अपन एहि विषयगत अज्ञानता केँ सकारैत कहलियनि। कने काल तक एहि विषय पर गप होइत ओकर प्रवाह दोसर दिस मुड़ि गेल। सुकांत भाइ आन्तरिक उद्वेलन सँ उधिआएल जकाँ छला आ हुनका लग कहबाक लेल मारिते रास गप रहनि, से बुझाएल। कहलनि – “ एमहर सुभाष (सुभाष चन्द्र यादव) केँ पचपनियाँ मैथिलीक खप्त सवार भेलनि अछि। की माने अछि एकर? ई त जाति-पाति पर उतरब भेल। एकरा हम प्रतिक्रियावादी काज मानै छिऐ।“ [ ई जाति-पाति त ब्राह्मणे संस्कृतिक उत्पादन अछि। वएहसभ एकर बीजारोपण केलनि, एकर खेती केँ सिंचित-संवर्धित केलनि, एकर फसिल काटि अपन भंडार भरैत रहला आ समाजक एकक्षत्र नियन्ता बनल रहला। अजुका समय मे आब जँ गैर-ब्राह्मण लार-पुआरक आँटी आ खुद्दी-खखरी के खैरात पर असंतोष प्रकट करैत अपन हक-हिस्सा-अधिकार मांगैत अछि त एकरा भंडारणक क्रियाक अस्वीकार मानल जेबाक चाही, लोकतंत्रीकरण, सम-वितरण आ समता-सम्मानक आकांक्षाक द्योतक मानल जेबाक चाही। भंडारण अपना-आप मे एकाधिकारवादक प्रतीक अछि आ इएह अपन रुप बदलि-बदलि पुरोहितवाद, अधिनायकवाद, साम्राज्यवाद आ पुंजीवाद आदिक वेश मे प्रकट होइत रहैत अछि। जँ कोय एहि वर्चस्वक विधान केँ चुनौती दए रहल छै, सड़ल-गलल व्यवस्थाक प्रति विद्रोह कए रहल छै त एकर स्वागत हेबाक चाही। ई त पुर्वक क्रिया-अतिक्रिया-कुक्रियाक स्वाभाविक प्रतिक्रिया अछि। प्रत्येक प्रगतिशील-चेतना संपन्न लोक केँ एहि परिवर्तनकामी चेतनाक पैरोकारी करबाक चाही। परिवर्तनक कामना प्रतिक्रियावाद नहि होइछ, वर्तमान मे परिवर्तनक एहि स्वर केँ नकारब प्रतिक्रियावाद अछि। -: स्वगत :- ] “ सुभाष भाइ त अहींक मित्र-मण्डलीक लोक छथि त अहाँ हुनके सँ ई प्रश्न किए नै करै छियनि? ओना पचपनियाँ-काण्डक एहि मामला मे हमर आपत्ति दोसर विन्दु पर अछि। हमर प्रश्न ई अछि जे सुभाष भाई भरि जिनगी बाभनबला मैथिली लिखलनि त आब चला-चलीक बेरा मे हुनका पचपनियाँ मैथिली किऐ सुझि रहल छनि? आ जँ ओ पात्रानुकूल भाषा चुनि अपन रचना केलनि त ओकर पैरोकारी-एडवोकेसी हुनका स्वयं किऐ करए पड़ि रहल छनि। ई गप त पाठक आ समीक्षक लोकनिक विवेक-विचार पर छोड़ल जेबाक चाही छल। हमरा बुझने सुभाष भाइ एकटा विवाद ठाढ कए अपन आ अपन रचनाक विज्ञापन कए रहल छथि।“ – हम बाजलहुँ। “ हँ, से दोसर गप। हमर कहब अछि जे सुभाषक ‘घरदेखिया’ कि ‘बनैत-बिगड़ैत’ केँ लोक स्वीकार केलक की नै। केलक। तखन ई गप उखारबाक कोन प्रयोजन? ओ एकरा पुरबी मैथिली कहने रहितथि त एकटा गप होइतए। सहरसा-सुपौलक मैथिली कने अलग छै। ओमहर कहै छै – ‘बाबू हओ’ आ से ब्राह्मण आ गैर-ब्राह्मण दुनू कहै छै। दरभंगा-मधुबनी मे कहै छै – ‘बाबू यौ’ आ से गैर-ब्राह्मणो कहै छै। ई त बोली भेल, एहि मे जाति-पाति कतय सँ एलै? ई त कुंठा भेल। हम मानै छी जे जखन लेखकक लेखन-क्षमता चुकि जाइ छै तखन ओ ई सब गप करए लागै ए। एहन प्रतिक्रियावादी गप नै हेबाक चाही।“ – सुकांत भाइ बजला। हम कहलियनि जे एहि पर दू-चारि पांतिक टिप्पणी हम विदेहक लेल लिखल एकटा आलेख/प्रश्नोत्तरी मे कए चुकल छी आ अहूँ अपन विचार कतौ लिखि कए व्यक्त करिऔ। लेखक केँ अपन भावनाक प्रकटीकरण लिखिए कए करबाक चाही –  प्रिय-अप्रिय जेहन हुअए। एहि पर सुकांत भाइ किछु नहि बाजला। तेकर बाद अपन विशिष्ट आ अलग दृष्टिकोणक उल्लेख करबाक निमित्त सुकांत भाइ एक-दू दिन पहिने संपन्न भेल मैथिली लेखक संघक वार्षिकीक अवसर पर धूमकेतु-केन्द्रित आयोजनक चर्चा पर चलि गेला। कहलनि – “ मैथिली मे त बनले लीक पर हु-ले-ले-ले चलैत रहै छै। हमर सोच आ दृष्टि आन सभ सं  कनेक अलग रहै ए। धुमकेतु पर चर्चा करैत हम कहलिऐ जे ओ अपन कथा मे जे बात कहै छथि से बहुत पहिने ‘सुरमा सगुन विचारै नै’ मे आबि चुकल अछि, बल्कि ओहि मे धुमकेतु सँ आगूक बात कहि देल गेल अछि।“ धूमकेतु व्यक्ति आ रचनाकार दुनू रुप मे हमरा लेल श्रद्धेय रहल छथि आ ई श्रद्धा हमरा हुनक डीह तक लए कए गेल अछि। मैथिलीक ओ एकदम एक्सक्लुसिव आ अमुल्य निधि छथि। संपुर्ण आधुनिक विश्व-साहित्य पर मार्क्स आ फ्रायडक अत्यधिक प्रभाव रहल अछि आ हमरा बुझने जतय एहि दुनू मे सँ कोनो एक व्यक्तिक प्रभाव नहि अछि से आधुनिक कहैबाक योग्यता नहि राखैत अछि। मैथिली मे मार्क्सक हुलकी कतहु-कतहु अपन नगण्यता मे अन्चोक्के अपन आभास जकाँ दैत लगैत अछि किन्तु छथि ओ प्राय: निपत्ते जकाँ। फ्रायड अएला अछि आ एकदम सहज आ स्वाभाविक रुप मे ओ धूमकेतु लग उपस्थित छथि। राजकमल लग ओ पहुँचै छथि किन्तु विकृत रुप मे। धूमकेतु केँ जे कथा-सम्मान भेटल छल तेकर ओ सर्वथा योग्य छला। हमरा गुमान आ हर्ष अछि जे हुनका भेटल एहि सम्मानक प्रक्रियाक केन्द्रीय सूत्र नचिकेता छला किन्तु एहि मे हमर महत्वपूर्ण आ निर्णायक योगदान रहल छल। एहन धूमकेतुक प्रति सुकांत भाइक टिप्पणी मे नुकाएल उपहास आ अवमुल्यनक भाव सँ हमरा कचोट भेल। हमरा ई सुकांत भाईक आदत जकाँ लागैत अछि जे ओ एहन अवसर सभ पर अखबार मे कोट करबाक लेल एकटा कोनो मारूक टिप्पणी कए दैत छथि किन्तु ओकर विवरण मे जाएब आ तर्क सँ ओकरा पुष्ट करबाक बेगरता नहि बुझै छथि। ललित पर केन्द्रित मैलेसं के एकटा आयोजन मे एहिना ओ बिना कोनो समुचित तर्क देने राधाकृष्ण झा ‘बहेड़’ कें ललित सँ बेसी आधुनिक आ आगू हेबाक टिप्पणी कए चुकल छला आ तहिओ हुनक बात हमरा नहि पचल छल, आइओ नहि पचल। किन्तु ई विगत भेल एकटा आयोजनक गप छल, एहि पर कोनो प्रतिक्रियाक अपेक्षा नहि छल आ ने तेकर ई अवसरे रहै। तेँ हम एहिपर चुपे रहि गेलहुँ। [ ‘अपना सँ भिन्न एक व्यक्तिक व्यक्तित्वक क्रमिक शोध आ अनुसंधान – एहि सँ बेसी सुन्दर, प्रीतिकर आ तृप्तिदायक अनुभूति की भए सकैत अछि? ई शोध अत्यंत कठिन अछि, तेँ ओ एतेक तृप्ति दैत अछि। किन्तु ई शोध अहेर नहि अछि, ‘पाबए’ सँ ओकर कोनो संबंध नहि अछि। अहेरीक भावना लए कए पुरुष अथवा स्त्रीक ‘पाछाँ’ धरब ओहि अनुसंधान आ शोध केँ शुरुए सँ दूषित कए देब अछि, किऐक त ओ वास्तव मे खोज नहि अछि, ओ त मात्र पुर्वग्रह अछि किऐक त ओ उपलब्धिक रुप पहिने सँ निर्धारित कए कए चलैत अछि।‘ –: अज्ञेय :- ] मैथिली लेखक संघक चर्चा चलल त हुनका हम ततसंबंधी अपन टिप्पणी सँ अवगत करैलियनि जे हम ओकर गतिविधि दिआ चारि-पांच दिन पहिने एसएमएस के माध्यम सँ संगठनक महासचिव विनोद कुमार झाजी केँ पठैने रहियनि। एहि संगठन द्वारा पूर्व मे आयोजित मैथिली लिटरेचर फेस्टिवलक हमर अनुभव बहुत खराब रहल छल। महासचिव आ संयोजक दुनू दिस सँ एकदम पूर्वनियोजित ढंग सँ प्रयासपूर्वक हमरा कात-करोट राखल गेल छल, छलपूर्वक हमरा सँ आयोजनक सबटा प्रस्तावित-संभावित सूचना नुकाएल गेल छल, बदनीयति सँ  सदस्य रहितो सबटा बैसार मे हमरा अनामंत्रित राखल गेल छल, फोनक माध्यम सँ हमरा बेर-बेर पत्र द्वारा सूचना पठैबाक ठकैती-गप कहल जाइत रहल छल, प्रतिरोधक आशंका वा कोनो आन मजबूरीबश हमर नाम पचास सँ बेसी कवि सभक सूची मे बिना हमर सहमतिक घोसिआए देल गेल छल आ इएह आयोजन मे हम पहिल बेर जातिक सोइत एकटा तथाकथित महान सहकारी लेखकक मुँह सँ ‘छोटबभना’ शब्दक क्षुद्र प्रयोग सुनने रही आ ई संपुर्ण आयोजन हमरा ब्राह्मणक एहि दुनू वर्गक बीचक वर्चस्वक घिसटा-घिसटी जकाँ बुझाएल रहय। हमर एहि गपक चर्चा करितहि सुकांत भाईक टोन जेना बदलि गेल – “ एकरा अहाँ बाभनक आयोजन कोना कहि देलिऐ? ई त एकदम गलत बात भेल।“ “ हम एकरा बाभनक आयोजन नै, बाभनक दू वर्गक बीचक घिच्चातिरी कहलिऐ। ओना एहि पर कहिओ बैसि कए गप हेतै त हम सबटा खेरहा कहब। ई दीर्घ कथा छै, बहसक विषय भए सकै छै आ से फोन पर करब संभव नहि छै। ओहुना दुनू गोटेक बीच भरि पोख गप भइए गेल अछि आ फोन सटैने-सटैने हमर कानो गरम भए गेल ए। त शेष कोनो दोसर दिन……………“ – गप करैत प्राय: बीस मिनट सँ बेसी भए गेल रहए आ हम गपक समापन चाहैत रही। फोनक बिलक चिन्ता सेहो हुअए लागल रहए। “ नै, से कोना हेतै। अहाँ आरोप लगा कए भागि जेबै त से त नै हएत।“ “ कहलौं जे ई गप नमहर छै, फोन पर……………………………” हमर गप केँ बिच्चे मे काटैत सुकांत भाइक रोषयुक्त स्वर आएल – “ नै यौ अरबिन्द जी। हम अहाँ केँ आरोप लगाकए भागए नै देब। अहाँ केँ बतबए पड़त जे ई गलत आरोप अहाँ कोन आधार पर लगैलिऐ।“ सुकांत भाइक ई जिद हमरा अनावश्यक आ अवांछित जकाँ लागल। ‘बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ जकाँ। हुनका द्वारा गप सुनै सँ पहिने हमर अनुभव केँ आरोप कहब, ओकरा दिआ कोनो तथ्य सुनै सँ पहिने ‘गलत’ घोषित कए देबाक जजमेन्टी-मुद्रा मे आएब आ ताहि पर आक्रामक तेवरक प्रदर्शन – हमरा अप्रिय-अनसोहाँत बुझाएल। सामान्यतया एहन आक्रामक तेवर हमरा बर्दाश्त नहि होइए आ एहन स्थिति मे हम अपन अवचेतनक निर्देश पर सभटा शालीनता केँ भाँड़ मे झोंकि सामनेबलाक धज्जी-धज्जी उड़ाबैत आएल छी चाहे ओ केतबो बड़का तोप कि पोप किऐ ने हुअए। किन्तु ‘सहितस्य भाव साहित्यम्’ बला साहित्य जगत मे आबि हम प्रयासपुर्वक अपन एहि स्वभावगत प्रवृति पर अंकुश लगैने छी आ एहि मान्यताक पक्षधर भेल छी जे साहित्यक कोनो विषयक मामला पर लेखक केँ अपन कोनो टिप्पणी लिखित रुप मे करबाक चाही। हमर दृढ मान्यता रहल अछि जे सियासती-सियार जकाँ कखनिओ-कत्तहु किछु बाजि देब, बोकरि देब आ फेर क्षणे मे पलटि जाएब रचनाधर्मी सभक लेल एकदम अनुचित आ अनैतिक अछि। जे किछु लिखित रहत वएह दस्तावेजक काज करत आ एहि सँ पलटि जेबाक गुँजाइशो नहि रहत। अकादमी पुरस्कार भेटलाक बाद गोविन्द झा जीक ‘देसकोस’ बला साक्षात्कार आ भीम भाइकेँ लिखल हुनक पत्र एकर गबाही दैत अछि। किन्तु सुकांत भाइ गप केँ एहन मोकाम पर लए आनने छला जे आब पाछू हटब संभव नहि छल। हुनक एटिच्यूड जे होइनि किन्तु हमरा बातक सौहार्द बिगाड़ए सँ परहेज करैत किन्तु सत्य केँ संग राखि समुचित उत्तर त देबाके छल। तेँ हम हुनका किछु प्रारंभिक गप सब कहलियनि आ संगे इहो कहलियनि जे सभा-संगठनक क्षुद्रता दिआ बाबा (यात्री-नागार्जुन) लिखित रुप सँ उन्नैस सय बत्तीसे-छत्तीस मे मैथिल समाज केँ चेतौनी दए चुकल छलाह आ हुनक चेतौनीबला एहि आलेखक पुनर्प्रकाशन सेहो मिथिला दर्शन हालहि मे केने छल, किन्तु हुनका सन प्रगतिशील विचारबला लोकक गप कोय नै सुनलक आ आब जे कोनो सभा-संगठन बनि रहल अछि ओसभ अपना केँ मैथिल-महासभाक मिनिएचर-कापी बनैबाक लेल अपस्यांत रहैत अछि। “ जातरी जीक गप छोड़ू, अरविन्द ठाकुर जी। ई बताउ जे अहाँ केँ सूचना उप्लब्ध नै कराओल गेल कि बैसार मे नै बजाओल गेल तै सँ ई बाभनक आयोजन कोना भए गेलै? हम ओहिठाँ रहिए नै सकै छी जतय ब्राह्मणवाद हुअए। तखन अहाँ केँ बुझल नै ए जे एहि आयोजनक पाछू हमर कतेक हाथ रहल। “- सुकांत भाइ बाजला। हुनक ‘अरविद जी’ सँ ‘अरविन्द ठाकुर जी’ पर आएब खूब धरगर जकाँ हमर संज्ञान मे आएल। अकस्मात हमरा दिव्य-ज्ञान भेल। जँ लिटरेचर फेस्टिवलक आयोजन मे हिनकर एतेक महत्वपूर्ण योगदान रहल अछि जेकर दाबी ओ अखनि कए रहल छथि तखनि निश्चित रुप सँ बिनोद जी केँ प्रेषित हमर समाद सुकांत भाइ केँ पहिने सँ संज्ञान मे छनि, ताहि पर हुनक मण्डली मे बहस-घमर्थन भए चुकल अछि आ ओहि एसएमएस-बाण सँ ओ बिद्ध सेहो छथि। [ धैर्य ! धैर्य ! –: स्वगत :- ] “ हम त जाहि संगठनक आयोजन रहै तेकर महासचिव-अध्यक्ष आ आयोजनक संयोजक केँ जिम्मेदार मानै छी। एहि मे अहुँक कोनो सलाह वा सहमति रहै सेहो हमरा जानकारी मे नै ए आ ओहुना तै सँ सदस्यक हैसीयत सँ हमरा कोन मतलब। हँ, ई बात अवश्य हमरा कहल गेल छल जे सुभाष भाईक कथा संग्रह पर चर्चाक सत्रक निर्धारणक पाछू अहाँक व्यक्तिगत आग्रह रहै।“ – हम बिच्चे मे टोकलियनि। “ नै, से नै चलत। ई बिनोद झा-नरेन्दर झाक गप छोड़ू, हमर योगदान ओहि फेस्टिवल मे कहबा लेल संयोजक अशोक छला किन्तु हुनकहु सँ बेसी रहल अछि। असल बात ई छै जे मैथिलीक अछरकट्टू साहित्यकार सभ केँ अहम् बहुत होइ छै।“ [ अछरकट्टू ! ई सुकांत भाइ केकरा लेल कहि रहल छथि ! हमरा लेल त नहि ? अकस्मात स्मृति मे कौंध गेला मुक्तिबोध। ‘ब्रह्मराक्षस’ आ ‘ओ काव्यात्मन् फणिधर’ लिखनिहार कवि मुक्तिबोध। कवि मुक्तिबोध जन्मना ॠग्वेदी कुलकर्णी ब्राह्मण छला किन्तु विचार सँ अत्यंत आधुनिक आ प्रगतिशील। जातिकुल आ सामाजिक वैषम्यक अवरोध केँ एक कात ठेलि कए ओ प्रेम विवाह कएलनि। अपन जीवन आ लेखन दुनू मे परम-साहसिकताक पर्याय बनल आ मानव सँ इतर कोनो अदृश्य-शक्तिक अस्तित्व केँ नकारनिहार मुक्तिबोध अपन बीमारीक क्रम मे कोमा मे चलि गेल रहथि आ ताहि काल अवचेतन मे ओ कखनो चिकरथि आ कखनो बुदबुदाबथि …… राम राम राम राम……राधे-कृष्ण………। की जन्मना संस्कार एतेक गहींर धसल रहै छै मनुष्यक अन्तस मे जे अपन संपुर्ण चेतना मे ओ जाहि वस्तुक बहिष्कार करैत अछि, त्याज्य मानैत अछि से ओकर अचेतन-अवचेतन पर तक्षक जकाँ फण काढि कए बैसल रहैत अछि ? सुकांत भाइक सुवचन(!), मुक्तिबोधक स्मृति आ ई लह-लह करैत प्रश्न एक-दोसराक पीठियाठोक आएल आ हमरा सन्न कए देलक। एक बेर फेर सँ मन पड़ला बाबा यात्री। युवावस्था-प्रौढावस्था मे सौंसे जग के तिरपेच्छन करनिहार बाबा वृद्धावस्था मे घर घुरि गेल रहथि – सदा सर्वदाक लेल। बैद्यनाथ मिश्र सनातन धर्मक पुरोहितवादक विरुद्ध ठाढ भेल बौद्ध धर्म ग्रहण कए मैथिली तजि हिन्दी मे गेला, नागार्जुन भेला, मैथिली मे यात्रीक रुप मे मैथिले रहि गेला आ अथबल होइते ठक्कन बनि घर-वापसी कएलनि। किए? जरावस्था सभटा क्रांतिकारिता केँ धुरखेल खेलाए दैत अछि की? सुकांत भाइक मामला मे इतिहास फेर सँ अपना केँ दोहराए रहल अछि की? हमरा बुझने  मैथिली दू तरहक लोक सँ समृद्ध अछि। एक त व्यास-स्तरीय सकल-ज्ञान-विद्या-विशारद सह परम-गुण-निधान लोकनि सँ आ दोसर एहिसभ उच्चस्तरीय महानताक विभुषण सँ बारल शेष-श्रेणीक संघर्षरत जन सँ। हम अपन भ्रम मे अपना केँ परम-अभागल बीच-बीचबला लोक अर्थात मीडियोकर मानैत आएल छी – ने एहन परम सौभाग्यशाली जे पहिल श्रेणी मे स्थान पाबि सकी आ ने एहन सामान्य सौभाग्यशाली जे दोसर श्रेणी मे अंटि सकी। मैथिलीक एकटा स्वयंभू विद्वत-समुदाय एकरा अदौं सँ दू श्रेणी मे बाँटने अछि – एकटा मैथिल महासभाक पंजी सँ संरक्षित जातिक भद्र आ सुसंस्कारी वर्ग आ दोसर पंजीक संरक्षण सँ वंचित शेष-समाजक सोल्हकन वर्ग। सुकांत भाइ प्राय: दोसर श्रेणीक लेल ‘अछरकट्टू’ शब्दक प्रयोग कए रहल छला आ प्राय: हमरो ओहि मे ठेलि कए घोसिआए रहल छला – मैथिल महासभा द्वारा निर्धारित मानदण्डक आधार पर। ईहो संभव जे संपूर्ण मैथिली लेखक समाज मे असगरे हमरे टा अछरकट्टू मानि ओ एहि शब्दक प्रयोग केने होथि। ‘ब्राह्मणे मुखे अमृतो अमृतम्’। हुनक ब्राह्मणत्व आ वरीयताक संज्ञान लैत हम एकरो हुनक कृपा आ अपन सौभाग्य मानि लेल – चलह, अछरकट्टूओ कहि साहित्यकार त मानलनि। -: स्वगत :- ] “ अहाँ, सुकांत भाइ, स्वयं अपना केँ कठघरा मे ठाढ कए रहल छी त एहि पर हमरा किछु कहबाक नै ए। आ जँ अहाँ एहि आयोजनक पाछू रही आ एकरो सूचना हमरा नै छल त ई त आओर आपत्तिजनक छै।“ “ अहाँ पटना अबै छिऐ त केकरा-कहाँ संग रहै छिऐ, हमरा संग रहितौं तखन ने अहाँ केँ सभटा सूचना रहितए।“ सुकांत भाइक कोनो गुट छनि आ हुनका मे श्रेष्टताबोधक व्यास-विकार सेहो छनि से कल्पना हमरा कहिओ सपनो मे नहि आएल छल। किन्तु अखनि किए ने किए हमरा लागल जे सुकांत भाइ प्रकारांतर सँ ई त नै कहि रहल छथि जे हम हुनक गुट मे रहबनि तखने हमरा कोनो स्थान कि सूचनादि भेटत। ई विचार आबिते जेना हमरा एकटा शाक जकाँ लागल। मन तिलमिलाए कए तिताइन जकाँ भए गेल। [ हम सब उपदेश सुनै छी मन-भरि, दै छी टन-भरि ; किन्तु ग्रहण करै छी कन-भरि। :- अलजर -: ] “ हम अहाँ केँ पहिने कहने रही सुकांत भाई जे ई गप फोन पर फरिआबए बला नै छै। अहाँक जिद पर हम जतेक बात कहलौं से त मात्र ट्रेलर रहै, फिलिम त पूरा बाँकिए छै। आब कहिओ पटना आबै छी त नीक जकाँ बैसिकए एहि विषयपर गप हेतै आ अहाँ सँ पूर्व मे भेल गपक विषयगत विवरणी सेहो अहाँ सँ लेब। अपन जजमेन्ट बचा कए राखू आ अखनि हमरा डेट दिअ।“- हम मजाकक पुट दैत बात केँ खतम करबाक आभास हुनका देबाक प्रयास केलौं। “ ठीक छै, पटना आउ त आब एहि पर गप हेतै किन्तु अहाँ गलत आरोप लगा कए भागि नै…………………………” गप खतम करबाक प्रति हुनक अनिच्छा आ बहस केँ आगू बढैबाक ललकार साफ-साफ हमर कान तक सम्प्रेषित होइत रहय। हमरा लागल जे बात फेर ने पसरि जाइ आ जँ पसरल त अखनि तक हमरा दिस सँ प्रयासपूर्वक बचा कए राखल सौहार्दक महीन कपड़ाक चेथरी ने उड़ि जाइ। ओहुना जखन सुकांत भाइ स्वयं आबि कठघरा मे ठाढ भए गेल छला त आब हुनका दिस सँ पूर्वाग्रह-मुक्त तर्क-वितर्क आ निष्पक्ष सुनबाइक कोनो गुंजाइस कहाँ रहि गेल रहै। आब गप केँ आगू बढाएब कोनो दिशा सँ अनुचिते-अनर्गले जकाँ लागल आ हम सुकांत भाइ केँ नमस्कार कहि फोन काटि देल। मोबाइलक डिटेल देखलौं – हमरा दुनू गोटेक गपक अवधि चौआलिस मिनट आ उन्चास सेकेण्ड रहल छल। आ से गप केहन? त एकदम फलहीन नग्न गाछ !!! अपन एकटा शेर मन पड़ल – “ खास सँ चलि कए आम तक पहुँचल / बात निकलल, कुठाम तक पहुँचल “। फरक एतबे जे एतय बात आम सँ चलि कए खास तक पहुँचल छल किन्तु पहुँचल छल कुठामे पर। [ जँ कोय मात्र अनुभवहि सँ बुद्धिमान भए जइतै त लंदनक अजायबघरक पत्थरसभ एतेक समयक बाद संसारक बड़का सँ बड़का बुद्धिमानहुँ सँ बेसी बुद्धिमान होइतै। :- जार्ज बर्नार्ड शा -: ] ३ संस्मरण -बाबा सँ पहिल आ अंतिम भेंट:बाबाक विराट स्मृति-पटल - अरविन्द ठाकुर बाबा यात्री-नागार्जुन सं हुनक रचनाक माध्यमे हजारो बेर भेंट भेल छल,मुदा साक्षात भेलहुं दुनू गोटे मात्र एक बेर-रांटी,मधुबनी मे|अवसर छल-साहित्य अकादमी,दिल्ली आ लीलावती तंत्र भवन,रांटी,मधुबनीक संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय मैथिली कवि सम्मेलन|वर्ष छल-1995|2 दिसम्बर सँ 4 दिसम्बर धरि भेल ओ आयोजन हमरा बुझने मैथिली साहित्यकारक महाकुंभ छल-न भूतो,न भविष्यति|तहिया साहित्य अकादमी मे मैथिलीक प्रतिनिधि छलाह-सुरेश्वर झा|जबर्दस्त जमावड़ा भेल छलय-वरिष्टतम सं युवतम पीढीक साहित्यकार लोकनिक|सम्पुर्ण कार्यक्रम कविता,गीत ,गजल आदि विधानुसार प्रायः छह सत्र मे बांटल| हम ओहि काल सामाजिक-राजनीतीक गतिविधि मे बहुत सक्रिय छलहुं|लिखैत त छलहुं पचीस वर्ष पहिने सं,मुदा साहित्यकार-समाज आ विशेषतया मैथिली साहित्यकार- समाज सँ बेसी परिचिति नहि छल|स्वांतःसुखाय लेखन सँ सक्रिय लेखन मे हमर एनाइ दूए-चारि वर्ष भेल छल| दू वर्ष पहिने 1993 मे हमर मैथिली कविताक संग्रह “परती टूटि रहल अछि” प्रकाशित भए चुकल छल आ तकर खूब स्वागत आ प्रशंसा भेल छल-मैथिली जगत मे|मैथिली कथा गोष्ठी’सगर राति दीप जरय’केर पटना, सुपौल आ राजबिराजक आयोजन मे सहभागी भए कथा-पाठ कए चुकल छलहुं|साहित्य अकादमी,दिल्ली द्वारा पटना मे आयोजित अनुवाद कार्यशालाक सहभागी 18 अनुवादक साहित्यकार मे एकटा नाम हमरो छल|साहित्य अकादमीक ‘ट्रेवल ग्रांट टू आथर’योजनान्तर्गत हमरा महाराष्ट्र भ्रमणक स्वीकृति सेहो भेटि चुकल छल|चेतना समिति,पटना द्वारा माहेश्वरी सिंह’महेश’ ग्रंथ पुरस्कार सेहो भेट गेल छल आ ओहि संस्था द्वारा आयोजित विद्यापति पर्व समारोह मे कविता –पाठ सेहो कए चुकल छलहुं|जतय धरि हमरा मोन पड़ैत अछि,रांटी कवि सम्मेलन सँ पुर्व हमर एतबेटा परिचय छल-मैथिली साहित्यकार-समाजक बीच| हम एक दिन पहिनहि पहुंच गेल छलहुं|पहिल दिनका सम्पुर्ण सत्रक समर्पित श्रोता आ दर्शक रहलहुं|एहि दिनक दुनू सत्र छल-वरिष्टतम आ वरिष्ट कवि लोकनिक|सत्र समापनोपरान्त एकटा कमरा में हम सभ गोलिआकए बैसल छलहुं-महाप्रकाश,सुकान्त सोम,अग्निपुष्प,विभुति आनन्द,तारानन्द वियोगी आदि|ज्योत्सना चन्द्रम एक कात में बैसल छलि|गोल मे प्रायः किशोर केशव सेहो छलाह|हम अग्निपुष्प द्वारा ओहि दिन पठित एकटा कविताक पैरोडी बनयने छलहुं आ तकर पाठ कए रहल छलहुं|पैरोडीक केन्द्र में छलाह-विभुति आनन्द दुनू परानी|हमर पाठ आ श्रोता सभक समवेत ठहक्का-महो महो भए रहल छल|आकि तखने बाहर मे खूब जोर सँ हल्ला भेलय|हम सभ उत्सुक भेलहुं त ज्ञात भेल जे बाबा एलाहे|महाप्रकाश सुकान्त भाइ कें केहुनी मारैत बजलाह-‘जाही ने,फ़टकार सुनिकए चलि आबिहें’|ओहि हुलिमाल मे के जयतए,हम सभ अपन महफ़िल सजयने रहलहुं|कनिके काल बाद देखय छी जे बाबा हमरे सभक कमरा मे उपस्थित छथि आ संग मे छथि शोभा भाइ|सभ गोटे अकचकाए कए ठाढ भेलहुं,प्रणाम-पाती भेल|संग एनिहार मे सँ केओ बाबा कें कहलकनि-‘ताबत एतहि आराम करिअओ’| बाबा हमरे सभक बीच बैसि गेलाह|जखन सभ गोटे सरियाकए बैसलाह,तखन हम अपन दुनू हाथ जोरि बाबाक अभिवादन केलियनि|केओ हमर परिचय दैत बाजल-‘बाबा!ई अरविन्द ठाकुर छथि,सुपौल सँ|’बाबा अपन आंखि गोलियाबैत कने काल हमरा दिस ताकलनि आ बिहुंसैत बजलाह-‘परती तोड़निहार अरविन्द ठाकुर’!हम चुप|हमर त जेना बाके हरण भए गेल छल|एत्ते बड़का कवि!बाबा हमरे दिस ताकि रहल छलाह,फेर बजलाह-‘एहि संग्रहक कविता सभ मे अहाँ एकदम एक्सक्लुसिभ तौर पर अपन विशुद्ध भाव मे छी|धंधेबाज साहित्यकारक शब्दीय बाजीगरी सँ अहाँक कविता सभ एखन धरि बाँचल अछि|आगाँ जे होअय|’एकर बाद बाबाक आँखि हमरा पर सँ हटि गेल आ जेना हमरा सँ कोनो मतलबे नहि होअय,तेना ओ सभ कें हियासलनि आ बजलाह-‘आर अहाँ सभक की हाल-चाल?बाजय जाउ|’ तकर बाद विभिन्न गपक डलना(मिक्स्ड भेजिटेबुल)परसल जाय लागल आ सभ गोटे तकरा सुआदए लगलाह|हम मुदा सातम आसमान पर छलहुँ,हमरा सुनाइ त सभ गप पड़ैत रहय मुदा एकहुटा मगज मे नहि घुसैत छल|ओहि त्रिदिवसीय आयोजनक तीनो दिन हम बाबाक टिप्पणीक निसा मे मातल रहलहुँ|अनेक प्रश्न मोन मे आबय-‘बाबा कखन हमर पोथी पढने हेताह,सभ दिन त बौआबिते रहैत छथि|पढलनि त मोन कोना राखलनि,एतेक रास चीज पढैत हेताह|आदि-आदि|’मुदा कोनोटा प्रश्न हमर निसा नहि तोड़ि सकल छल|आब ई बात सोच मेअबैत अछि जे अनेक रास नदी कें स्वयं मे समाहित कईयेकए केओ समुद्र बनि सकैत अछि| ४ जीवकान्त : किछु स्मृति, किछु टिप्पणी - अरविन्द ठाकुर जीवकान्त जीक ज्येष्ट पुत्र अरुण झा सुपौल स्टेट बैंक मे पोस्टेड रहथि। डा नवीन कुमार दासक क्लिनीक सह निवास पर हमरा सभक प्रतिदिनक बैसार मे ओ यदा-कदा आबैत छला तेँ परिचय छल। संयोगवश अरुण जीक डेरा सेहो हमरे मोहल्ला मे छल। एकदिन नवीन जीक ओहिठाम पहुँलहुँ त ज्ञात भेल जे जीवकान्त सुपौल आएल छथि आ अपन पुत्रक डेरा पर छथि। ओ प्राय: 1992 क कोनो मास छल। हम, केदार आ नवीन जी दू टा स्कूटर पर सवार भए अरुण जीक डेरा पर अएलहुँ। स्कूटर रोकैत-रोकैत ओकर हेडलाइट मे एकटा प्रौढ व्यक्ति केँ बाहरे मे कुर्सी पर बैसल देखलिअनि। अन्दाज कयलहुँ जे जीवकान्ते हेताह। स्कूटर सँ उतरि कए प्रणाम-पाती भेल, अतिरिक्त कुर्सी आएल आ हमहुँ सभ अपन-अपन स्थान धएलहुँ। केदार हमर परिचय दैत बजला – ‘” ई अरविन्द भाइ छथि, साहित्यानुरागी त छथिए , लिखबा सँ सेहो प्रेम छनि।“ “ अच्छा ! अरविन्द बाबू ! की हाल-चाल छै अओ? वकालत केहन चलैए?”- जीवकान्त हमरा दिस तकैत पुछलनि। हम अकचकयलहुँ। हमरा व्यवहारिक वकालत सँ कोन वास्ता ? एलएलबी त हम  सख सँ कएलहुँ आ सेहो डिग्रीए मात्र लेल। कचहरी जाए कए प्रैक्टिस करैक अभिलाषा कहिओ नहि भेल आ ने कएल। हम विधि स्नातक छी से मात्र हमर जीवन-वृतक शोभाक वस्तु अछि। ओहि दिन केदारे स्थिति केँ स्पष्ट कएलनि – “ वकील त दोसर अरविन्द छथि – अरविन्द कुमार दास। ई छथि अरविन्द ठाकुर।“ ओ हमरा दुनू गोटेक पहिल भेंट छल। तेकर बाद ओहि दिन वार्तालापक नमहर दौर चलल आ हमरा सभक बीच विभिन्न विषयपर वार्ता भेल। एहि बीच की लिखलहुँ? की सभ पढलहुँ? फल्लाँ पोथी अवश्य पढू, आदि-आदि सेहो। 1972 ई मे हम इन्टरमीडिएट कएने रही आ ताहि मे मैथिलीओ हमर एकटा विषय रहय। शिक्षक छला – बालगोविन्द झा व्यथित। किन्तु हमरा ओहि क्लास मे मन नहि लागय आ बेसी हम फाँकीबाजीए करी। परीक्षा भेल, पास कएलहुँ आ तेकर बाद मैथिली सँ बहुत काल तक कोनो वास्ता नहि रहल छल। बीच मे एकटा कथा लिखि केदारकेँ देने रहिअनि आ तेकरा ओ मिथिला मिहिर मे पठा देने रहथि आ ओ छपिओ गेल छल, किन्तु पारिवारिक आ सामाजिक गतिविधिक गहमागहमीक बीच ई हमरा लेल धनि सन। केदार-नवीन-शिवेन्द्रक संगतिमे आबिओ कए कोनो बाहरी मैथिली साहित्यकारक कोनो पुर्वनिर्धारित छवि नहि छल। जँ कोनो रहबो करल हएत तँ जीवकान्त सँ भेल प्रथम भेंट ओकरा खण्डित-विखण्डित जँ नहिओ कएने रहए तँ कोनो नव या आकर्षक छविओ नहि बनैलक। प्रथम दृष्टि मे ने ओ हमरा कतहु सँ साहित्यकार जकाँ लागला आ ने कोनो शिक्षक जकाँ। जँ हुनक कोनो छवि हमर मन मे बनल त ओ छल एक सामान्य गृहस्थक जे कनी-मनी किताबक आ पढै-लिखैक गप करैत हुअए। 7 अक्टूबर,1992 केँ पटना मे भाइ साहेबक संयोजकत्व मे ‘भरि राति भोर’ कथा-गोष्ठीक आयोजन छल। भाइ साहेबो सँ हमरा कोनो पूर्व परिचय नहि छल किन्तु ओहि गोष्ठीक लेल हमरा निमंत्रण (प्राय: केदारक कारणे) भेटल छल आ अपन पहिल प्रस्तुतिकरणक लेल हम बहुत उत्साहित रही। मैथिली मे हम सर्वथा एक अन्चिन्हार लोक रही आ प्राय: तेँ ओहि गोष्ठी मे एकदम नवतूरसभक संगे प्रथमहि सत्र मे हमरा सँ कथा पाठ कराएल गेल। ओहि सत्रक समीक्षा लेल निर्धारित समीक्षक छला – प्रभास कुमार चौधरी, उपेन्द्र नाथ झा व्यास, मोहन भारद्वाज, रामदेव झा आ जीवकान्त। हम अपन ‘मूस’ कथा पढने रही आ ओहिपर विद्वान लोकनिक विचार आ प्रतिक्रिया जानबाक लेल समीक्षा काल भारी उत्कंठा सँ अपन कान पाथने रही। प्रभास भाइ आ मोहन भारद्वाज ओहि कथाक भुरि-भुरि प्रशंसा कएलनि आ व्यास जी सहित रामदेव झाक प्रतिक्रिया सेहो सकारात्मक आ स्वागतात्मक रहै। एहि पांचू गोटे मे मात्र जीवकान्ते सँ हम पूर्व परिचित रही आ तें हमरा भरोस छल जे ओ पुर्ण गंभीरता सँ हमर कथाक नीक-बेजाय दिआ कहता। किन्तु हमरा भयंकर निराशा भेल। जीवकान्तक बेर अएलनि त ओ बाजला जे ध्वनियंत्रक गड़बड़ीक कारणे ओ हमर कथा ठीक सँ नहि सुनि सकला। गोष्ठीक समापन पर मोहन भारद्वाज आ भाइ साहेब हमर कथाक उत्तम हएबाक गप कहैत हमरा बधाइ देलनि। जीवकान्त किन्तु बादहु मे किछु टिप्पणी नहि कएलनि। हमरा दुख भेल रहै। 1993 क प्रारंभिक कोनो मास। जीवकान्त सुपौल आएल छला। डा शिवेन्द्र ओहिठाम बैसार भेल – संध्या काल मे। पहिने जीवकान्त अपन किछु कविताक पाठ कएलनि आ हुनक शुभचिन्तक लोकनिक ई चिन्ता जे जीवकान्त अपन पाठ करबाक स्टाइल सँ अपन कविताक संपुर्ण संप्रेषण केँ नष्ट कए दैत छथि, हमरा बाजिब लागल। हुनका बाद हम, केदार, नवीन जी आ शिवेन्द्र जी सेहो कविता पाठ कएलहुँ। दोसर दिन हुनक भोजन हमरा एहिठाम आयोजित छल। सभ गोटे छला – डा नवीन, केदार, अरुण झा। भोजन आ गप। गप आ भोजन। बीच मे जीवकान्त बजला – ‘ हमरा अहाँक आत्म-परिचयात्मक पत्र भेटल छल। अपन चेहरा-मोहरा आ शारीरिक गठन सँ अहाँ नवीन जी वा केदार सँ जेठ नहि बुझाइ छी।“ आ फेर हमर जीवनक आन-आन पक्षक जानकारी लेलनि। जीवकान्त ओहि बेर दू-चारि दिन सुपौल रहला आ हुनका संगे खूब नीक कटल। पत्राचार त चलिते रहय। देसकोस पत्रिकाक फरवरी ’94 अंक आएल। ओहि मे जीवकान्तक साक्षात्कार छपल रहै जे हमरे नाम पर जा कए समाप्त भेल छल। हुनका सँ संभावना सँ भरल मैथिलीक किछु नवका कविसभक नाम पुछल गेल रहनि आ ओ अन्य किछु कविक संग हमरो नाम लेने रहथि। हमरा कनी विस्मय जकाँ भेल छल। कोनो भेंट वा कोनो पत्र मे ओ एहि तरहक कोनो संकेत नहि देने छला जे ओ हमरा रचनाकारो मानैत छथि, संभावना सँ भरल हएबाक बात त दूर। ओना तावत हमर प्रथम कविता संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि’ प्रकाशित भए चुकल छल आ मैथिलीक नव-पुरान दुनू पीढीक प्रशंसा प्राप्त कए रहल छल। किन्तु जीवकान्तक प्रतिक्रिया पुरान पीढी द्वारा सार्वजनिक रुप सँ घोषित प्रथम प्रतिक्रिया छल आ ताहि काल हमरा बहुत बहुमूल्य लागल छल। पत्र लेखनक क्षेत्र मे जँ मैथिली मे कोनो प्रतियोगिता हुअए त ओकर निर्विवाद विजेता हएता – पुरान पीढी सँ जीवकान्त आ तेकर बादक पीढी मे केदार कानन। जीवकान्त सँ पत्र व्यवहार निरन्तर जारी छल। साहित्य अकादमीक पुरस्कार घोषित भए चुकल छल। जीवकान्त फेर पछड़ि गेल छला। ओहि बेरक पुरस्कार गोविन्द झा केँ भेटल छलनि जेकर श्रेय ओ अपन पुस्तक केँ नहि दए ओकरा उग्रवादक परिणाम कहने छला। देसकोस पत्रिकाक विभिन्न अंक मे एहि अवसर पर गोविन्द झाक विवादित साक्षात्कारक परिणामस्वरुप खुब्बे साहित्यिक गारा-गारी भेल आ एहि क्रम मे जीवकान्तक पत्र-टिप्पणी सेहो आएल छल। प्राय: ई पुरस्कारे जनित निराशा आ कुण्ठा छल जे हुनक पत्र सभ मे यदा-कदा तल्खी झलकी दैत छल आ जून मास मे जखनि सुपौल आगमन पर हुनका सँ भेंट भेल त लागल जे तल्खी हुनक व्यक्तित्वे केँ परिवर्तित कए देने रहनि। अंतरंगता एकटा सामान्य शिष्टाचार मे बदलि गेल छल आ हुनक बात-व्यवहार मे जेना एकटा यांत्रिकता आबि गेल छल। ओहिबेर ओ पुरनका जे जे घटना सुनैलनि से बेसी तल्खीए सँ जुड़ल। अगिला खेप। संयोग वा दुर्योगहि हुनका सँ ई भेंट भेल। जीवकान्त अपन कोनो दायादक कन्या लेल मैथिली साहित्यकार आ ‘कथ्य रुप’ क मैथिली अंकक सम्पादक गौरीनाथ केँ तिलक चढैबाक लेल लछमिनियां आएल छला। ओतय सँ फुरसत पाबि ओ सुपौल अएला आ तेकर लाभ लैत केदार हुनका सँ मंत्रेश्वर झाक पाइ सँ छपल आ मंत्रेश्वरे झा पर केन्द्रित ‘धार’ पत्रिकाक चारिजना विमोचन करबैलनि। केदार केँ प्राय: हमर स्वभाव बुझल रहनि वा हमरा ओहि विमोचनक पात्र नहि बुझने हएता तेँ हम ओहिमे बजाएल नहि गेल रही। हम प्राय: कोनो चिकित्सकीय सलाह लेल डा नवीन ओहिठाम पहुँचलहुँ त ओ अपन चैम्बर मे नहि छला। स्टाफसभ बाजल जे ओ छत पर छथि। अपन अभिन्नताक बल पर हम धड़धड़ाएल डा नवीनक घरक सीढी चढैत छत पर चढि गेलहुँ। ओतय सभगोटेक बीच जीवकान्तहु केँ देखि हम अचंभित त भेबे कएलहुँ, स्वयं कें एतय आनबाक लेल पश्चातापहु मे पड़ि प्रवेशहि पर ठमकि गेलहुँ। प्राय: इएह स्थिति दोसरो पक्षक भेल छल आ तेकर परिणामस्वरुप ओतय अकस्मात एकटा निस्तब्धता पसरि गेल रहै। पहिने हमरे अपन कर्तव्यक चेत आएल आ हम सामान्य शिष्टाचारक पालन करैत सभ केँ टोका-नमस्कार कएलिअनि आ कनी काल ओतय रहि चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त कए घुरि आएल रही। डा नवीनक सीढी उतरैत काल ओहि दिन हमरा मन मे जीवकान्तक पुरनका स्मृतिसभ घुरिआ-घुरिआकए आबए आ कतेको जिज्ञासाक बिड़रो हमरा घेरए। सीढीक अंतिम पौदान पर पएर राखिते हमरा सभक समाधान भेट गेल। हमरा बुझाए गेल जे जीवकान्तक लेल अपन लेखनक सार्थकताक तुलना मे सफलता आ प्रसिद्धिक भौतिकता बेसी महत्वपुर्ण छनि। या त एकर वासना हुनका बदलि देलकनि अछि या ओ मौलिकता मे सएह छथि। ( वर्ष 1995 मे लिखल लेख यथावत रुप मे ) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. ३.१.लेख, आलोचना ओ समीक्षा- १.मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु अरविन्द ठाकुर २. मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य- अरविन्द ठाकुर ३. लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव- अरविन्द ठाकुर ४. एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब ( सन्दर्भ : हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “ )- अरविन्द ठाकुर ३.२.किछु विहनि कथा- अरविन्द ठाकुर ३.३.पद्य-१. किछु कविता- अरविन्द ठाकुर २. किछु आजाद गजल- अरविन्द ठाकुर ३.४.१.संस्मरण-चन्द्र मोहन झा ’पड़बा’ लेख, आलोचना ओ समीक्षा- १.मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु अरविन्द ठाकुर २. मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य- अरविन्द ठाकुर ३. लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव- अरविन्द ठाकुर ४. एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब ( सन्दर्भ : हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “ )- अरविन्द ठाकुर १ मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु अरविन्द ठाकुर मिथिला वर्तमान मे एकटा मिथक मात्र अछि|आइ ने एकर कोनो भुगोल अछि आ ने कोनो संवैधानिक अस्तित्व|अत्योक्ति नहि होयत,जँ कही जे मिथिले जकाँ मिथिलाक संस्कृति सेहो एकटा मिथके अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन द्वारा लिखल आ शिक्षा-व्यवसाय सँ जुड़ल पंडितजन द्वारा बेर-बेर दोहरायल गेल ओहि तथाकथित स्वर्णिमकालक गौरवशाली अध्याय सभक वर्तमान मे कोनो अवशेष-प्रमाण नहि देखाइत अछि|एकांगीए सही,भूत मे जँ आगि रहय त वर्तमान मे छाउर देखाइ पड़बाक चाही ने? विदेह माधवक आगमन आ हुनक पुरोहित गोतम रहुगण द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित कए भूमिक पवित्रीकरण सँ एहि आलोच्य क्षेत्र मे आर्यसंस्कृतिक सूत्रपात मानल जाइत अछि|एहि सँ पूर्व एकरा द्रविड़-किरातक मिश्रित संस्कृतिक स्थल अथवा व्रात्यलोकनिक निवास-स्थल मानल जाइत रहल अछि|व्रात्यलोकनिकेँ आर्य मानबाक आग्रह सेहो किछु इतिहासकारक छनि|एहि आर्यीकरणक पश्चात वर्ण-व्यवस्थासँ जाति-व्यवस्था,समाजसत्ताक प्रभुत्वसँ व्यक्तिसत्ताक प्रभुत्व,परिवर्तनशीलतासँ जड़ता आ उदारतासँ कट्टरता धरि पहुँचैत एहि क्षेत्रक समाज इतिहासक कोन-कोन अन्हार-इजोतक खोह सभमे ढुकैत-बहराइत वर्तमान धरि पहुँचल अछि,ताहिपरसँ एखनो बहुत रास आवरण सभ हटब बांकिए अछि|इतिहास जँ रस्ता देखबैत अछि तँ रस्ता भोतियाबितो अछि|ओहुना इतिहास पर शासक-समाजक वर्चस्व रहल अछि आ कोनो कालमे आम-अवामक की स्थिति छलय ताहिपर इतिहास सभ आन्हरे सदृश्य रहल अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन केँ जनसमाजक स्थिति-चित्रणक ने बेगरता रहनि आ ने पलखति|तेँ इतिहासक भूल-भुलैयामे घुसलाक बादो आ बेर-बेर ‘खुल जा सिमसिम’कहलाक बादो कएकटा चोरदरबज्जा अदृश्य आ कएकटा दरबज्जा बन्द भेटैत अछि आ तेँ हमरासभक सोच-विचार एकटा अनिश्चितताक बिरड़ोमे पताबय लागैत अछि,स्थिर नहि भए पबैत अछि|जनसमाजक दुख-सुखक महासागरमे जा डुबकी नहि मारल जाएत,संस्कृतिक मोती कि पाथर कोना भेटत?ओम्हर हमर सभक शिक्षातन्त्र सेहो इतिहासक पाठ्य-पुस्तक आ अपन बनायल विचार-परिधिसँ बाहर जयबाक अनुमति नहि दैत अछि|सृजनात्मक लेखन यथास्थितिक बैरी मानल जाइत अछि आ तेँ जखन-जखन एहन प्रयास होइत अछि त विरोधीक रुपमे शिक्षातंत्रक संग-संग लाठी-फ़रसा लएकए तैयार मिथिलाक रुढिवादी आ यथास्थितिवादी तत्व ठाड़ भेटाइत अछि|किन्तु सृजनात्मक लेखनक प्रतिनिधि सुच्चा साहित्यकार प्रतिरोध आ असहमतिक संस्कृतिक संवाहक होइत अछि आ तेँ ओकरा शिक्षाव्यवसायी-पन्डितलोकनिक बिरादरीसँ फ़राक अपन सोच आ लेखन दुनूमे रचनात्मक दुस्साहस करैए पड़तै आ मिथिलाकेँ आइ एहने दुस्साहसी सभक बेगरता छै| बेगरता छै जे परम्परा आ लीकसँ हटि इतिहास आ संस्कृतिक अज्ञात-अबूझ पक्षसभक ईमानदार उत्खनन कएल जाय|बेगरता छै जे यथास्थितिक बिषायल सस्सरफ़ानीमे फ़ँसल संस्कृतिक व्यापकताकेँ बाहर आनल जाय आ अभिव्यक्तिक सभटा खतरा मोल लेल जाय|जँ कोशीक रत्न साहित्य-संस्कृतिक अग्रदूत संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसाइकेँ राज्याश्रयजीवी सम्पादक-संकलक मैथिली कवि नहि मानैत छथि त बेगरता छै जे एकर विरोधमे बगावत हेबाक चाही-मठ,मठाधीश आ मठसैन्यकेँ धराशायी करबाक हद धरि|बेगरता छै जे संस्कृतिक नव इतिहास लिखल जाय|मिथिलाक महान विभूति राष्ट्रकवि दिनकरक कहब छनि-“साहित्यक ताजगी आ बेधकता जतेक शौखिया लेखकमे होइत अछि,ओतेक पेशेवरमे नहि|कृतिमे प्राण ढारैक दृष्टान्त बरोबरि शौखिया लेखके दैत छथि|थरथराहटि,पुलक आ प्रकम्प,ई गुण शौखिएक रचनामे होइछ|पेशेवर लेखक अपन पेशाक चक्करमे एना महो रहैत छथि जे क्रान्तिकारी विचारकेँ ओ खुलिकए खेलय नहि दैत छथि|मतभेद भेलहु पर ओ हुकुम,अंतत:,परम्परेक मानैत छथि|संस्कृतिक इतिहास शौकिये शैलीमे लिखल जाए सकैत अछि|इतिहासकार,अक्सर,एक वा दू शाखाक प्रमाणिक विद्वान होइत छथि|एहन अनेक रास विद्वानक कृति सभमे पैसिकए घटना आ विचार सभक बीच सम्बन्ध बैसयबाक काज वएह कए सकैत अछि ,जे विशेषज्ञ नहि अछि,जे सिक्का,ठीकरा आ ईंटाक गवाहीक बिना नहि बाजबाक आदतक कारणें मौन नहि रहैछ|सांस्कृतिक इतिहास लिखबाक, हमरा बुझने दूएटा मार्ग अछि|या त वएह बात धरि महदूद रही,जे बीसो बेर कहल जाए चुकल अछि आ,एना,अपनो बोर होउ आ आनोकें बोर करू;अथवा आगामी सत्यक पुर्वाभास दिअओ,ओकर खुलिकए घोषणा करू आ समाजमे नीम-हकीम कहाउ,मूर्ख आ अधकपारीक उपाधि प्राप्त करु|” ई दू-टूक कहल जयबाक चाही जे कोनो क्षेत्रक संस्कृति ओहि क्षेत्रक राजा अथवा शासकक बपौती नहि होइछ|संस्कृति होइछै समाजक,जाहिमे शासक-शासित,राजा-प्रजा सभ सन्निहित छै|दोसर शब्दमे संस्कृतिक मात्र आ एकमात्र श्रोत वा केन्द्र मनुष्य आ ओकर जीवन अछि| मनुष्यक समाज ,ओकर सामाजिक संरचना,ओकर खान-पान,रीति-रिवाज आदिक सम्मिलित स्वरूप एहि संस्कृतिक निर्माण करैत अछि|एकरे पसारसँ एकटा क्षेत्र-विशेष अपन एकटा अलग पहचान विकसित करैत अछि जे ओहि क्षेत्र-विशेषक संस्कृति कहल जाइछ|तेँ कोनो क्षेत्रक संस्कृतिक उत्स ओहि क्षेत्रमे रहनिहार मनुष्य,ओकर समाज आ ओकर सामाजिक संरचनामे खोजल जयबाक चाही| देशक अन्य भूभाग जकाँ एतहु आर्यलोकनि आर्येतर जाति संग मिलि जाहि समाजक रचना कयलनि सएह आर्य अथवा हिन्दूलोकनिक बुनियादी समाज भेल आ आर्य-आर्येतर संस्कृतिक मिलनसँ जे संस्कृति जनमल से एतहुका बुनियादी संस्कृति भेल|ई जे बुनियादी समाज भेल,तकर सुसंचालन लेल वर्णाश्रम-व्यवस्था बनल जे कालान्तरमे जाति-व्यवस्थामे परिणत भेल|तेँ मिथिलाक संस्कृतिक यथार्थकेँ बुझबाक लेल देवालय,पोखरि,माछ,मखान,पान आ पाग आदि-इत्यादिक बाइस्कोप देखयसँ पहिने एहि वर्ण-वर्ग-जाति व्यवस्थाक व्रणकेँ फ़ोड़ब आ निर्ममतासँ एकर खैंटी उतारब बहुत आवश्यक अछि|ई पीड़ा देत,दुर्गन्ध पसारत,मुदा एकरा निर्मूल करबाक लेल अथवा वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितिक आवश्यकतानुसार नवीकृत (renewal)करबाक लेल ई जोखिम लेबहि पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक प्राचीन निरन्तरताक खूबी-खामीकेँ बुझबाक लेल आ वर्तमान चुनौती सभसँ जुझैत भावी उत्कर्ष पर लए जएबाक लेल एहि व्यवस्थाक संकल्पना,एकर बीजारोपण व सिंचन सँ लएकए एकर पुष्पित-पल्लवित होइत,मौलाइत,क्षरण दिस जाइत आ रोग-दोषसँ ग्रसित भए वर्त्तमानक निकृष्टतम रूप धरि पहुँचैक सम्पुर्ण प्रक्रियाक वैचारिक शल्य-चिकित्सा(चीड़-फाड़) बहुत अनिवार्य भए गेल अछि|एहि समुद्रमन्थनसँ विष बहरयबाक संभावना सेहो अछि किन्तु सामाजिक सत्यक अमृत प्राप्त करबाक लेल ई जोखिम लेबए पड़त|जाधरि एहि सामाजिक संरचनाक रोग-दोषकेँ नीकसँ बूझल नहि जेतैक ताधरि ने एकर कायाक सम्मानजनक नाश सम्भव छै आ ने एकर कायाकल्पक कोनो सम्भावना छै|मिथिले नहि,सम्पूर्ण भारतीय समाजक सांस्कृतिक उत्थान-पतनक जड़िआठमे इएह वर्ण सँ रुपान्तरित जाति-व्यवस्था अछि| विदेह माधव एलाह,हुनक पुरोहित गोतम रहुगण अग्नि प्रज्ज्वलित कएलनि,आवश्यकतानुसार जंगल-झाड़ जराओल गेल,खेती योग्य समतल भूमि बनाओल गेल,समाज सभ्यता आ विकास दिस अग्रसर भेल|आर्य-अनार्यक सम्मिलन सँ बनल मिनजुमला संस्कृति विकसित भेल|कालक्रममे एकीकृत आ व्यवस्थित समाजक रचनाक्रममे परिवर्तनीय वर्णाश्रम-व्यवस्था विकसित भेल|ई वर्णव्यवस्था अपन समयक सर्वाधिक वैज्ञानिक आ व्यावहारिक समाजव्यवस्था छल जखनकि विश्वक अनेकानेक भूभाग तखनो अविकसित आदिम अवस्थामे पड़ल छल|ई व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक चारि खाम्हबला सशक्त अधिरचना छल|एहि वर्णसमाजमे सामाजिक श्रम,सामाजिक रक्त-सम्बन्ध एवम सामाजिक विचारक नियम परिवर्तनीय छल|सामाजिक व्यक्ति अपन योग्यता,क्षमता आ अभिरुचिक अनुसार सामाजिक श्रमकेँ अंगीकार कए अपन जीवनयापन लेल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रक रोजगारमूलक चक्रसँ अपन वर्ण आ श्रम-प्रकार चुनि ओहिमे अपन प्रतिभा आ सामर्थ्यक सदुपयोग आ प्रदर्शन करबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ अपन रागात्मक आकर्षणक आधार पर रक्त-सम्बन्ध स्थापित कए सामाजिक व्यक्ति बनबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ प्रत्येक सामाजिक पहलू पर निर्भीकतापुर्वक अपन विचार व्यक्त करबाक लेल स्वतन्त्र छल|अपन प्रकृतिमे पूर्ण समाजवादी वर्ण-समाज प्राकृतिक सन्साधन पर बेसी आ सामाजिक श्रमसँ अर्जित साधन पर कम निर्भर छल|प्रत्येक व्यक्तिक रोटी आ आजादीक गारन्टी छल|सृजनात्मक संस्कृतिसँ आलोकित ओ काल ताधरि रहल जाधरि ओहि व्यवस्थामे परिवर्तनशीलता रहलै|जँ देखल जाय त सामासिक संस्कृतिक बीजारोपण आ ओकर तीव्र विकासक ओएह कालावधि छल|एहिकालमे सामाजिक श्रम-संस्कृतिक महत्ता त स्थापित भेबे कएल;महासागर,वनप्रदेश,गिरिप्रदेश,मरुप्रदेश,हिमप्रदेश,आकाश आदि पर विजय प्राप्त कए ओकरा अपन अधीन करबाक घातक प्रवृतिक जगह पर ओकरा अपन मित्र बनाए ओकर संरक्षण करबाक संस्कार सेहो जन-जनमे विकसित भेल|देहक नश्वरता आ आत्माक अमरताक सिद्धान्त मनुष्यकेँ अपन भावी पीढीक भविष्यसँ जोड़लक|ई ओ समय छलै जखन विद्यानुरागी आ विद्वानकेँ ब्राह्मणत्व भेटैत छलै,अजुका जँका नहि जे ब्राह्मण वन्शमे जन्म लेलहु त विद्वान होयबे करब|ई ओ समय छलै जखन रणकौशलमे निपुणता क्षत्रियत्वक पैमाना होइत रहय,अजुका जकाँ नहि जे ओहि कुलमे जनमलहुँ त वीर होयबे करब| एकरा जनसंख्याक दबाव कही,वा तत्कालीन समाजक समयगत बाध्यता जे वर्णाश्रम अधिरचनाक परिवर्तनशीलता अपन निरन्तरता कयम नहि राखि सकल आ तकर परिणामस्वरूप अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था अस्तित्व मे आयल|समाज-सत्ताक क्षरणस्वरूप व्यक्ति-सत्ताक बढैत वर्चस्व सेहो एकटा कारण भए सकैत अछि|इएह जन्मना जातीय समाज हमरा सभक वैभवशाली मानवीय संस्कृतिक क्षरणक महत्वपूर्ण कारक भए गेल अछि| जाहि मिथिक नाम पर मिथिला बनल आ जनक वंशक स्थापना भेल,जाहि विदेहकेँ मनु महराज ‘वैश्य द्वारा ब्राह्मणीक गर्भसँ उत्पन्न सन्तान ‘ कहय छथि आ जेकर वर्गीकरण व्रात्यक रुपमे सेहो होइत अछि,ताहि वंशक सीरध्वज जनकक सभामे ‘जनक(वैदेह)वस्तुतः जनक(पिता)छथि’कहैत आ’जनक-जनक‘ उच्चरित करैत ब्रह्मविद्याक ज्ञान लेबाक लेल विद्वतजन सभ दौगैत छलाह|विश्वामित्रक श्रेणी क्षत्रियक छलनि मुदा हुनक प्रबल विद्यालोलुपता अंततः हुनका ब्रह्मर्षिपद उपलब्ध करबैलकनि|अऊँठा कटबाइओकए एकलव्य प्रमाणित कयलनि जे धनुर्विद्यामे पारंगत होएबाक लेल क्षत्रिय होयब त कात जाय दिअ,गुरू आ ब्राह्मणक सदेह उपस्थिति अथवा शिक्षा कतहुसँ आवश्यक वा अनिवार्य नहि अछि|शंबूक अपन घेंट कटबयसँ पहिने विद्वान होएबाक लेल ब्राह्मण होएबाक अनिवार्यताकेँ आधारहीन प्रमाणित कए चुकल छलाह| अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था धरि अबैत-अबैत हमरा सभक समाज कवचमे बन्द घोंघा सदृश्य भए गेल|ई कवच छल पुर्वाग्रहक|जाति-प्रथासँ उपजल एहि स्थितिक मादे समाजविज्ञानी जवाहरलाल नेहरूक कहब छनि जे’भारतमे दुनू बात एके संग बढल|एकदिस त विचार आ सिद्धान्त मे हम सभ बेसी सँ बेसी उदार आ सहिष्णु होएबाक दाबी कएलहुँ|दोसरदिस,हमरसभक सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होइत गेल|ई फाटल व्यक्तित्व,सिद्धांत आ आचरणक ई विरोध,आइधरि हमरासभक संग अछि आ आइओ हमसभ ओकर विरुद्ध संघर्ष कए रहल छी|कतेक विचित्र बात अछि जे अपन दृष्टिक संकीर्णता,आदत आ रिवाज आदिक कमजोरीकेँ हमसभ ई कहि अनठिआए देबए चाहैत छी जे हमरासभक पुरखा बड़का लोग छलाह आ हुनकर बड़का-बड़का विचार हमरासभकेँ विरासतमे भेटल अछि|किन्तु,पुरखासभसँ भेटल ज्ञान आ हमरासभक आचरणमे भारी विरोध अछि आ जाधरि हमसभ एहि विरोधक स्थितिकेँ दूर नहि करब,हमरासभक व्यक्तित्व फाटल के फाटले रहि जाएत|’नेहरूक ई कथन मिथिलो पर अक्षरसः लागू होइत अछि|अपरिवर्तनीयता आ जन्मना-एहि दुनू सुरक्षा-कवचसँ संरक्षित मिथिलाक मार्गदर्शक वर्ग आत्ममुग्धता,आलस्य आ मुफ्तखोरीकेँ अपन हक मानि लेलक|श्रेष्टताबोधक पाखंड मिथिलाक ग्रहणशक्तिकेँ गीलि गेल|’जे हम छी,हमरा लग अछि,सएह सर्वश्रेष्ट अछि’क डपोड़शंखी मानसिकता बाहरसँ उत्कृष्टतम चीजहुँकेँ लेब अस्वीकार करए लागल|विदेशी आक्रांतासभक शासनाधीन नहि रहितय त अनेकरास कला,शिल्प,तकनीक,विधा जे विदेशीसभक संग आयल छल,मिथिला समाज तकरोसँ वंचित रहि जैतय|ई मजबूरीमे ग्रहण कएल गुणसभ छल जे हमरासभक गंग-जमुनी संस्कृतिकेँ समृद्ध कयलक,जकरापर आइ हमसभ गर्व करय छी| कोशी नदी मिथिलाक नम्हर भूभागक भाग्यनियंता रहल अछि|एकदिस ई हमरासभक धार्मिक-सांस्कृतिक भौतिक धरोहरसभकेँ नष्ट-भ्रष्ट कयलक अछि त दोसरदिस एकरे चलतबे अपरिग्रह आ संघर्षक संस्कृति निर्मित आ विकसित भेल जेकर सीधा लाभ सामान्य जन-समाजकेँ भेटल|विशिष्ट जन-समाज एहि संस्कृतिसँ अलगे-थलग रहबामे कुशल मानलनि|जँ संघर्ष-संस्कृतिकेँ सर्वस्वीकृति भेटल रहितय त क्षत-विक्षत लोकजीवनक जीजीविषाक परिणामस्वरूप शासनमे आयल खेतिहरसमाजक प्रतिनिधि गोपाल आ सत्ताक निरंकुशताक विरुद्ध जनांदोलन कए शासनमे आयल भीम केवट निर्विवाद नायकक सूचीमे होयतथि| हमसभ जाहि आर्य-आर्येतर सभ्यता-संस्कृतिक संवाहक मानल जाइत छी ओ समन्वयवादी,सामासिक,समावेशी संस्कृति छल|आर्य मनीषी लोकनि हमरासभकेँ ’वसुधैव-कुटुम्बकम’क मंत्रसँ सिक्त कएने छलाह|इएह संस्कृति छल जे सनातन धर्मकेँ एतेक विस्तार देलक|एहि सनातन-सागरमे आबि विदेशी आक्रांतासभक सैकड़ो रक्त-समूह भारतीय भए गेल|सनातन धर्मक विस्तार हमरसभक संस्कृतिओकेँ निरन्तर समृद्ध कयने गेल|सम्पूर्ण मिथिलाकेँ प्रमुखतः सनातनी मानल जाइत अछि|किन्तु,आइ हमसभ ई स्वीकार करी जे हमसभ अपन पूर्वजक नीक,इमानदार आ सुयोग्य उत्तराधिकारी प्रमाणित नहि भए सकलहुँ आ ओहि सनातन-सामासिक संस्कृतिकेँ अक्ष्क्षुण्ण नहि राखि सकलहुँ|जे समाज अपन धूर विरोधी बुद्धकेँ अपन अवतार घोषित करबाक उदारता देखयलक,वएह समाज मैथिल-महासभाक आयोजक भेल|जाहि बौद्धिक वर्ग पर वर्ण-जाति संरचना-संरक्षणक भार छलय सएह वर्ग परम स्वार्थी बनि अपन रक्त-शुद्धताकेँ रेकर्डेड करयबाक उताहुलतामे पंजी-प्रवन्धक व्यवस्था कए लेल|वेदव्यास एतेक ध्यान राखलनि जे’चातुर्वर्ण्य मया सृज्यते’कृष्णावतार-मुखसँ कहबएलनि,मुदा सत्ता-संरक्षणक आत्ममुग्धतामे पंजी-प्रवन्धक औचित्य लेल कोनो लोकलाजक पालन नहि कएल गेल|”मिथिला”आ”मैथिल”शब्दक प्रयोगकेँ हमसभ जतेक विराट आ व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करिऔक,एहि दुनू शब्दक अर्थ आम-अवाममे की लगाओल जाइ छै,से ककरोसँ नुकायल नहि अछि|एतय मिथिलाक सामाजिक बुनावटक रग-रग चिन्हयबला साधु-जनकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक एकटा लेखक अंश देब समीचीन बुझाइत अछि-“मैथिल महासभाक सिद्धान्तानुसार मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थ(!)मात्र सुच्चा मैथिल थिकाह|मिथिलाक सीमाक भीतर बसैत,मिथिलाक अन्न-जलसँ निर्वाह करैत,विशुद्ध मैथिली बजैत भूमिहार-क्षत्रिय आदि अन्य जातीय यदि क्यो अपनाकें मैथिल कहताह तँ जातीय महासभा नांगरि ठाढ क क हुनका दिस बधुआएत,मुँह विजकौत|परिणामस्वरूप हुनका लोकनि अपना घर-आंगनमे व्यवहृत भाषा-ठेठ मैथिलीकें मैथिली कहबामे अपन हेठी बुझै लागल छथि|’हम मैथिल नहि,बिहारी थिकहुँ’-ई भावना हमरा लोकनिमे जाहि तेजीसँ पसरि रहल अछि,से देखि एहन कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ रहल हो?मिथिलेश-सुधारक मिथिलेश(?)जाहि संस्थाक कर्णधार होथि,तकर एहि प्रकारक संकुचित सिद्धांत देखि मिथिलाक लाख-लाख अधिवासी-जे मैथिल होइतहुँ मैथिल नहि,क्षुब्ध अछि|चिरकालसँ अपनहि घरमे,अपनहि बन्धु-वर्गक द्वारा ठोंठिऔल गेल मिथिलाक सन्तान आइ यदि आजिज आबि अपनाकें बिहारी कहब आरंभ कैलक अछि तँ एहिमे केकर दोष?’महासभा’क कतोक सदस्यक मनमे घुरि-फिरि ई बात अबैत हेतैन्हि जे मिथिलाक सकल अधिवासीकें मैथिल मानि लेला सँ मैथिलत्वक अग्रगण्य अंगमे धार्मिक वा समाजिक धक्का लगवाक सम्भव|” यात्री जीक ई विचार आइ सँ 73वर्ष पहिने विभूति,फरवरी 1938 अंकमे छपल छल|एहि स्थितिमे आइओ कोनो सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल अछि,उन्टे बिगड़ले अछि| वर्ण-व्यवस्थाक बिगड़ल निकृष्ट रूप जाति-व्यवस्थाक औचित्य-अनौचित्य पर घमर्थन होइत रहल छै,होइत रहतै,मुदा एहि यथार्थसँ मुँह नहि मोड़ल जाय सकैत अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थान-पतनमे ई व्यवस्था अनिवार्य आ महत्वपूर्ण कारक रहल अछि आ रहत|आल्हा-रुदल,नैका-बनिजारा,लोरिकायण,भगैत आदिक जे लोकगायनक संस्कृतिक परम्परा रहय अथवा छै,तकर निर्वहनमे आइ धरि केओ द्विज किऐक नहि एलाह?ई ठेकेदारी की मात्र सोल्हकनक छिअय?मैथिली मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा छै आ एहिसँ सम्बन्धित सभटा संस्था-पुरस्कार पर इएह दुनू जातिक आधिपत्य छै-एहि आरोपक कोनो प्रायोगिक खण्डन आइ धरि किऐक नहि भए सकल?भाषा सेहो संस्कृतिक आवश्यक आ अविभाज्य अंग छै|जँ भाषा समावेशी नहि हएत त समावेशी संस्कृति कोना विकसित हएत? ई प्रसन्नताक गप अछि जे जँ राजनीतीक क्षेत्रकेँ छोड़ि दी त सामाजिक जीवनमे जाति-पातिक महत्ता समाप्त प्रायः छै|एकर कारण खुलल अर्थव्यवस्थाक नीती होअय,भौतिकवादी होड़ होअय वा एहि दुनूक चलतबे बढल जीवन-संघर्ष,किन्तु जाति-पाति अजुका लोकक विचार-सूचीमे बहुत नीचाँ छै आ मात्र चुनावेक बेरमे शीर्ष पर आबय छै|तेँ समरसताक संस्कृतिकेँ फिलबक्त सतह पर कोनो खतरा नहि देखाइत अछि|एहि क्षेत्रक ऊर्वर माटि-पानिमे सामासिक संस्कृतिक बीआ तेहन सघन छीटल छै जे बेमुरव्वत मौसम आ लापरवाह किसानक अछैतहुँ ई पनुकैत रहय छै,फसिल दैत रहय छै आ एतहुका वासीकेँ जीवित आ गतिवान बनेने रहैत छै|किन्तु कतहु गहींरमे आगि भए सकैत छै|तेँ समयक तगादा छै जे वर्त्तमानमे जातीय-व्यवस्थाकेँ कोनो तार्किक आ वैज्ञानिक निष्कर्ष धरि आनल जाय,अन्यथा सांस्कृतिक उत्कर्षक लक्ष्य पायब सन्देहास्पद अछि|जवाहरलाल नेहरु कहने छलाह-“आइ हमरासभक समक्ष जे प्रश्न अछि,ओ मात्र सैद्धांतिक नहि अछि,ओकर सम्बन्ध हमरसभक जीवनक सम्पूर्ण प्रक्रियासँ अछि आ ओकर समुचित समाधान आ निदाने पर हमरसभक भविष्य निर्भर करैत अछि|साधारणतः,एहन समस्यासभकेँ सोझराबयमे नेतृत्व देबाक काज मनीषी लोकनि करैत छथि|किन्तु ओसभ काज नहि एलाह| ओहिमे सँ किछु त एहन छथि,जे एहि समस्याक स्वरुपहिकेँ नहि बूझि पाबि रहल छथि|बकियासभ हारि मानि लेने छथि|ओ सभ बिफलता-बोधसँ पीड़ित आ आत्माक संकटसँ ग्रस्त छथि आ बुझिए नहि पाबि रहल छथि जे जीवनकेँ कोन दिशा दिस मोड़ब उचित होयत|”नेहरुक एहि निराश टिप्पणीक बाद वैश्विक समाजवादी चिन्तक एंजेल्सक ई वक्तव्य विचारणीय अछि-“कोनो खास आर्थिक संरचनाक समस्याक समाधान ओही संरचनाक नियम के अनुसार कएल जायब अनिवार्य अछि,जँ कोनो दोसर संरचनाक नियमसँ ओकर समस्याक समाधान कएल जायत त ओ बेजाय ढंगसँ विद्रूप भए जायत|”एंजेल्सक एहि कथनमे हमरासभक जातीय(आर्थिक)संरचनाक समस्याक समाधानक कुंजी नुकायल अछि|मिथिला आ भारतक लेल सांस्कृतिक संकटक कारण बनल जातिप्रथाक वर्त्तमान संकटक समाधान एहि जातिप्रथाक संरचनाक भीतरे अछि|एकरे नियमसँ एकरा युगानुरूप उपयोगी बनायल जाए सकैत अछि आ ई काज हमरेसभकेँ करए पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक इएह तगादा अछि|मिथिला आ एकर संस्कृतिक उत्कर्षक इएह टा मार्ग अछि| २ मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य अरविन्द ठाकुर एक बेर मैथिलीक एकटा नामी-गिरामी चर्चित कवि मित्रा अपन नवप्रकाशित कविता पोथी पठएलनि आ ओहि पर किछु लिखबाक आग्रह सेहो कएलनि। आलोचक-समालोचक हेबाक लूरि नहि रहितो हम हुनक आग्रहक सम्मान करैत पोथीक पाठ कएलाक उपरान्त एकटा पत्राक माध्यम सँ ओहि पोथी पर हुनका किछु टिप्पणी लिखि पठएलियनि। ओहि पत्रा मे अनेक रास बातक संग हम इहो लिखलियनि जे ‘‘मैथिल समाजक कहियो कोनो आन्दोलनी चरित्र नहि रहलैक अछि तथापि अहाँक आक्रोश अहाँक कविता सभ मे खूब नीक जकाँ खपि जाइत अछि आ सर्वाधिक विलक्षण बात ई जे कविता मे जतय कतौ आन्दोलनी तेवर आएल अछि से कतौ सँ ओढ़ल नहि लगैत अछि।’’ हमर एहि तात्कालिक पाठकीय टिप्पणीक ओहि अंश पर कवि मित्रा दिस सँ प्रतिवाद आएल जाहि मे मैथिल समाजक आन्दोलनी चरित्रा नहि रहबाक बात कहल गेल छल। हमरा दुनू गोटे मे दीर्घ-वार्ता भेल, दुनू गोटे बहसा-बहसी कएलहुँ आ दुनू गोटे अपन-अपन गप पर अटल रहि गेलहुँ। हुनक अपन तर्क छलनि आ हमर अपन। ओ अपन तर्क पर अखनिओ अटल छथि की नहि से हमरा नहि बुझल अछि। किन्तु हम आइयो अपन विचार, पक्ष आ तत्सम्बन्धी तर्क पर दृढ़ छी, बल्कि बाद मे भेटल प्रमाण आ अनुभव सभ सँ ओ विचार आओरो दृढ़तर भेल जाइत गेल अछि। तेँ हम आइयो एहि बातकेँ मानय छी आ तेकरा व्यक्त करए मे हमरा कोनो संकोच नहि अछि जे मैथिल समाजक आन्दोलनी चरित्र नहि अछि, नहि रहल अछि आ जाहि प्रपंची आ कपटी जीवन शैलीकेँ ई समाज आइयो अपनैने अछि, तेकरा देखैत भविष्यो मे एकर आन्दोलनी होइक कोनो संभावना हमरा कतहुँ सँ नजरि नहि आबैत अछि। जहिया राजतंत्रा रहै, राजा-महाराजा-नबाब-जमीन्दारक युग रहै, तहियो आ आइ लोकतंत्र छै, सांसद-विधायक-मुखिया आदि जनप्रतिनिधिक युग छै, आइयो, मैथिल समाज सत्तामुखी, सत्तापेक्षी आ सत्तापोषित रहल अछि। जहिया राजतंत्रा रहै, राजा-महाराजा-नबाब-जमीन्दारक युग रहै, तहिया वर्ण वा जाति व्यवस्थाक आधर पर ई समाज राज-संपोषित बनल रहल। आइ जखनि लोकतंत्र छै, सांसद-विधायक-मुखिया आदि जनप्रतिनिधिक युग छै, तखनि अपनावेफँ बुद्धिजीवी वर्ग कहि ई समाज राजपोषणक विशेषाधिकारक आकांक्षी बनल अछि। ई भिन्न बात जे पछिला दू-तीन दशक सँ जे सामाजिक-न्यायक दौर चलल अछि ताहि मे एहि समाजकेँ राजपोषण सुतरि नहि रहल अछि। किन्तु अहू सँ ई समाज कोनो शिक्षा वा सीख हासिल केने हुअए, से देखाइत नहि अछि। दिग्भ्रमित भेल ई समाज आब एहि पोषण-प्राप्तिक लेल नव औजार सभ खोजि रहल अछि। एहि खोजक प्रथम चरण मे ई भेल अछि जे जेना भुखल रहला पर शरीर अपन पोषण लेल शरीर मे संचित वसाक उपयोग करैत अछि, तहिना ई समाज, जेकरा वर्ग कहब बेसी उपयुक्त बुझाइत अछि, पोषण लेल बाह्य उपकरणक अभाव मे अपन भाषा रूपी वसाक भक्षण कए अपन दिन काटब शुरू केलक आ ताहि सँ संतुष्ट नहि भेला पर आब मिथिला राज्यक डुगडुग्गी पीट कए अपन पोषणक नव खोराककेँ आनबाक जोगार मे लागि गेल अछि। भाषाक महंथ आ घरानाक संग संग मिथिला राज आन्दोलनक अघक्की छुटभैया कर्त्ता-धर्ता सभक नामावली, कार्यावली देखू, महीनी सँ देखू आ अहाँकेँ सभटा कठखेल अयना जकाँ झलकए लागत। अनेक रास विरोधभास, पूर्वाग्रह-दुराग्रह सँ ग्रसित एहि वर्गकेँ अखनि भनहि ई लागओ जे ओ कोनो आन्दोलन कए रहल अछि, किन्तु जँ एहिना चलैत रहल तँ भविष्य मे ई प्रमाणित हएब सुनिश्चित मानू जे एहि हु-ले-ले-ले सँ ऊर्वरताक संभावना सँ भरल एहि धरतीकेँ उसट्ठ करबाक ई एकटा भूल मात्रा अछि। तर्क-वितर्क आ शास्त्रार्थक निरर्थक आ परिणामहीन उद्योगक ई क्षेत्र रहल अछि आ तेँ शास्त्रार्थ लेल उताहुल बहुत गोटे तर्कस्वरूप मारिते रास आन्दोलन आ आन्दोलनकारी लोकनिक नाम गिनबाए दए सकै छथि। किन्तु ई आवरण आ मुखौटाकेँ वास्तविकताक रूप मे प्रस्तुत करबाक प्रयास मात्रा रहै, छै आ रहतै। आन्दोलन कोनो शारीरिक बाहरी प्रक्रिया नहि छै जेकरा कोनो नामकरण कए आ मुक्का देखबैत फोटो खिचबा कए हुलेलेले कएल जाए। ई चरित्रा, मन आ आन्तरिक व्यक्तित्व सँ नाभि-नाल जकाँ जुड़ल प्रक्रिया अछि आ तरे-तर निरन्तर प्रवहमान रहैबला परिवर्तनकामी प्रवृति अछि। मैथिल समाज मे एहि प्रवृतिक प्रवाहक गप जाए दिअ, एकर उत्पत्तिक श्रोतेकेँ भोथल गेल अछि आ भोथबाक ओ प्रक्रिया निरन्तर जारी अछि आ एकर प्रमुख कारक रहल अछि एहि क्षेत्राक बौद्धिक नियन्ता वर्गक द्वैध आ द्वैधीकरण। अपन एहि व्यक्त भावना आ मान्यताक पुष्टि लेल हम किछु उदाहरणक खोज मे पुनः घुरि कए ओहि कवि मित्रा आ हुनक काव्य संग्रह पर आबए चाहए छी जिनकर उल्लेख हम एहि आलेखक प्रारंभ मे कएने छी। एहि पोथीक प्रारंभ होइत अछि कवि द्वारा व्यक्त आभार सँ। एहि मे कवि प्रायः एक दर्जन गोटेक नामक चर्चा कएने छथि जे सभ पोथीक सामग्री जुटयबा मे सहयोग आ पांडुलिपि अवलोकन एवं परिमार्जन मे मूल्यवान परामर्श कवि मित्राकेँ देलथिन। दोसर दिस हमरा पठाएल पोथीक प्रति मे कवि मित्रा अपन हस्तलिपि मे जे लिखने छथि, से अविकल रूप मे एना अछि - ‘मैथिलीक समर्थ रचनाकार प्रिय भाइ अरविन्द जीक लेल जे सभ सँ पहिने एहि पोथीकेँ छापबाक प्रस्ताव कयने रहथि।’ ई कवि मित्रा स्वयं आ जाहि एक दर्जन लोकक अपन पोथी मे मुद्रित रूप सँ आभार प्रकट कएने छथि से सभ मैथिल महासभा सँ संरक्षित आ पंजीकृत जाति सँ छथि आ जिनकर स्मरण अपन हस्तलिपि मे ;अमुद्रित रूप मे कवि करै छथि अर्थात् हम, तेकरा मैथिल महासभा गैर-मैथिल घोषित कए पंजीयनक महापुण्य सँ वंचित कएने अछि। एकर की माने ? ई स्थिति तखनि आओर विचारणीय छै जखनि कि कवि मित्र स्वयंकेँ वामपंथी मानय छथि, गर्व सँ एहि बातक घोषणा करय छथि, कएकटा वामपंथी आन्दोलन सँ जुड़ल रहबाक दाबी करय छथि आ कतिपय लोक एकरा सकारितो छथि। दुनियाक सम्पूर्ण तर्कशास्त्राक कोनो टा तर्क सँ की ई प्रमाणित कएल जाए सकैत अछि जे सभ सँ पहिने पोथी छापबाक प्रस्ताव देनिहार व्यक्तिक महत्व पोथीक लेल सामग्री जुटएबाक सहयोगी वा पांडुलिपि अवलोकन-परिमार्जन मे मूल्यवान परामर्श देनिहार सँ कम होइ छै। मूल्यांकनक ई विभेदी बटिखरा राजनीति वा कूटनीतिक अहितभाव सँ दूषित माहौल मे त चलिओ सकैत अछि, किन्तु साहित्य त सहित-भावक द्योतक अछि। एहि उदाहरणकेँ हमर व्यक्तिगत मामला मानि टारल वा अनठिआएल जाए सकैत अछि किन्तु एकरा हमरा सभक द्वैध भावनाक उदाहरण त मानले जाए सकैत अछि। भौतिक आ मानसिक द्वैध। व्यक्तित्वक द्वैध। आ, ई द्वैध मैथिल समाज मे अदौं सँ रहल अछि। मैथिल महासभाक विघटनकारी आ आत्मघाती आयोजनक काल घरि आबैत-आबैत ई द्वैध अपन चरम परिणति पर, पराकाष्ठा पर, पारावार पर पहुँचैत अछि आ एतहि सँ द्वैधीकरणक प्रक्रियाक दस्तावेजी अध्यायक प्रारंभ भए जाइत अछि। एतय सँ शुरू भेल विध्वंशक पंजीकृत खेल आइयो मैथिल समाजकेँ भुतलहरी खेलाए रहल अछि। कर्मकाण्ड, पाखण्ड आ आडम्बर सन-सन रोग सँ मैथिल समाज पहिनो ग्रसित छल, मैथिल महासभाक जहरी मदिराक प्रभाव सँ ओहि मे श्रेष्ठताबोध सँ भरल छल, छद्म आ छुआछुतक महामारी सेहो पसरि गेल। मिथिला-मैथिली सँ अखण्ड रूप सँ जुडि़ एकर पर्याय बनल समुदाय एहि मैथिल महासभाक माध्यम सँ स्वयंकेँ समाज सँ काटि लेलक, अपनाकेँ मैथिल घोषित कए देलक आ आन सभ समुदायकेँ दस्तावेजी रूप सँ गैर-मैथिलक श्रेणी मे पेफकि  देलक। एहि प्रयासमे ई समुदाय एकटा समन्वयवादी समाजकेँवर्ग, वर्ण, जातिक टुकड़ी-टुकड़ी मे, कूड़ी-कूड़ी मे, खल-खलमे पेफर सँ बांटि देलक आ सेहो एकटा केन्द्रीय सत्ताक दलाल शासकक छत्राछाया मे एक तरहे विध्वित रूप मे। एकर भयंकर दुष्परिणाम सभ आइ नग्न आ निर्लज्ज रूप मे एहि भूभागक कण-कण मे अपन उपस्थिति दर्ज कए रहल अछि। भाषा आ संस्कृतिक नाभि-नाल सम्बन्ध अछि। आइ एहि भूभागक भाषा मैथिली पर मैथिल महासभाइ सभक वर्चस्व बनल अछि। साहित्य अकादमीक मैथिली पुरस्कार 44 मे सँ 42 बेर मैथिल महासभाइकेँ देल गेल अछि त वर्चस्वक  आओर कोने प्रमाण देब आवश्यक नहि रहि जाइत अछि। साहित्य अकादमीक अनुवाद आदि अन्य पुरस्कारोक इएह स्थिति अछि। मिथिला-मैथिलीक नाम पर बनल पंजीकृत वा गैर-पंजीकृत सभटा संस्था मैथिल महासभा द्वारा पंजीकृत जातिक लोक सभक अधिकार मे छै आ मिथिला-मैथिलीक नाम पर आयोजित अधिकांश आयोजन मे सम्मानित, प्रशंसित, पुरस्कृत भेनिहार सभ मे महासभाइए सभक वर्चस्व छै। द्वैधीकरणक एहि प्रक्रियाक चलते गैर-मैथिल घोषित भेल आन सभ समुदाय एहि भाषाकेँ अपन बुझिते नहि अछि त एकरा संग ओ अपन तादात्म्य कोना स्थापित करत आ जखनि तादात्म्य स्थापिते नहि हएत त एकरा लेल लड़बाक, संघर्ष करबाक, आन्दोलित हेबाक प्रश्न कहाँ उठै छै ? मैथिल महासभाक आयोजनक अनेक दुष्परिणाम मे सँ एकटा इहो अछि जे किछु खास जातिक रिवाजकेँ सम्पूर्ण समाजक संस्कृतिक रूप मे परिभाषित आ क्रियान्वित करबाक प्रयास भए रहल अछि आ एहि प्रयास सँ शेष समाजक आक्रोशक आगि मे घी पडि़ रहल अछि। पाग-दोपटाकेँएकर उदाहरणक रूप मे देखल जाए सकैत अछि। द्वैधीकरणक चरम स्थिति ई अछि जे मिथिला राज्यक तथाकथित आन्दोलनी सभ दरभंगा जिला सँ बाहर अपन कार्यक्षेत्र मानिते नहि छथि। बहुत भेल त कनी मधुबनीक पीठ हँसोथि देलौं । कोशी नदी सँ पूरब दिशाक भूभाग हुनका अपन नहि लागय छनि । ई प्रायः एहि कारण अछि जे हुनका सभक परिकल्पना मे मिथिला राज्य ने जनक के मिथिला अछि आ ने लोकतंत्रात्मक  मिथिला । ओ सभ मैथिल महासभाक आयोजक दरभंगा महराजक राजक परिकल्पना आ कामना सँ क्रियाशीलताक छद्म ओढ़ने छथि । ओ सभ जनक वंशक श्रम आ कृषि-संस्कृतिक नहि, वर्त्तमानक लोकतंत्री संस्कृतिक नहि, दरभंगा महराजक बिचौलिया आ खैराती संस्कृतिक अभिलाषी छथि । मैथिली भाषाक स्थिति सेहो एहि द्वैधीकरण सँ सुरक्षित नहि रहल अछि। गैर मैथिलक गप जाए दिअ, दरभंगा-मधुबनीक मैथिली घराना, मठ आ महंथक नजरिमे कोशी जनपदक मैथिल सभ सेहो मैथिली लेखक नहि छथि, अछोप छथि । द्वैधीकरणक एहि विस्तार सँ जातिवाद, कुटुम्ब-गोधियावाद, गुट-गिरोहवादक झाड़-झंखाड़ उगायल जाए सकैत अछि, समतावादी समाजक पफसिल नहि उपजाएल जाए सकैत अछि । आ कोनो आन्दोलनक प्रथम आ अनिवार्य शर्त्त होइ छै जे ओहिमे सम्पूर्ण समाजक अखण्ड सहभागिता हुअए । कोनो आन्दोलन तखनिएँ आन्दोलनक श्रेणी मे आबि अपन लक्ष्यकेँ प्राप्त करए मे सफल भए सकैत अछि जखनि ओहि मे जाति-सम्प्रदाय, गुट-गिरोह सँ अलग हटि सर्वहाराक भागीदारी हुअए। आन्दोलन ओहि अखण्ड समाजक औजार होइ छै जे भविष्य दिस देखैत अछि आ जेकर सोच आधुनिक आ वैज्ञानिक होइ छै। एकर विपरीत हम सभ मानसिकताक बहुमत मे अतीतजीवी, पुरातनपंथी आ जड़ समाजक उत्तराधिकारी छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे परिवर्त्तनकामी होइ छै। एकर विपरीत हम सभ यथास्थितिवादक पोषक बनल छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे अपन समूल संसाधन पर समग्र समाजक अधिकार मानै छै । एकर विपरीत हम सभ जमाखोरीक मानसिकता बला लोक बनल छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे समतामूलक विचार सँ सम्पन्न आ आत्मविश्वासी होइ छै । एकर विपरीत हम सभ विभेदकारी श्रेष्ठताबोध सँ ग्रसित आ परमुखापेक्षी चरित्र राखय छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे जोड़बाक नीति पर चलैत समन्वयवादी दृष्टिकोण राखैत अछि । एकर विपरीत हम सभ मैथिल महासभाक विखण्डनवादी नीति आ क्षेत्राीयतावादक रोगाणुक वाहक बनल छी । आइ ई अत्यन्त दुखद स्थिति अछि जे जाहि मिथिलाक हम सभ बेर-बेर दोहाइ दै छी से भूगोलहीन मिथकीय क्षेत्रा मात्रा अछि आ हमर सभक भाषा मैथिली किछु खास घरानाक खतियानी वस्तु बनल अछि । डीह अछिए नहि आ भाषा-संस्कृति पर धूल-धुसरित भेल एकटा राजतंत्राक प्रेत-छाया चकभाउर दए रहल अछि । एहि भाषा आ संस्कृतिकेँ व्यापकता आ सर्वस्वीकार्यता देबाक बदला किछु सीमित लोक द्वारा अपन भरण-पोषण आ अहं-पोषणक लेल दुरूपयोग कएल जेबाक परम्परा जकाँ बनि गेल अछि । मैथिल महासभाक पंजी सँ बहरूका आन बड़का जाति, छोटका जाति, दलित, आदिवासी आदि जेकरा राड़-रोहिया, सोल्हकन, वर्णसंकर आदिक कलंकित उपमासँ घिनाएल जाए रहल अछि,केँमिथिला, मैथिलीक मुख्य धरा सँ काटि-बारि देल गेल अछि । जखनि समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तानी-भरनीकेँदस्तावेजी रूप सँ राइछित्ती कए देल गेल हुअए, तखनि एतय कोनो सांस्कृतिक आन्दोलनक कोनो भविष्य कोना भए सकैछ ? जाघरि हम सभ भूतक ऐतिहासिक भूलकेँ चिन्हित कए सकारब नहि, ओहि भूल सभक परिमार्जन कए वर्त्तमानकेँ पवित्र आ उदार मानसिकताक संग निष्कंटक नहि करब, त्रुटिकेँ किन्नहु नहि दोहरयबाक सप्पथ नहि लेब, सप्पथ पर दृढ़ नहि रहब, नीक आ सकारात्मक भविष्यक कामना पफलीभूत नहि हएत । ३ लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव अरविन्द ठाकुर भक्ति आन्दोलनक साहित्य आ गोसांइजी जाहि काल एहि देशक भक्ति साहित्य बनब शुरू भेल ओ काल एकटा युग संधिक काल छल। प्रथम बेर भारतीय समाज केँ एकटा एहन परिस्थितिक सामना करए पडि़ रहल छल जे ओकर चिन्हल बुझल नहि छल। अखनि तक वर्णाश्रम व्यवस्थाक कोनो प्रतिद्वन्द्वी नहि छल। आचार भ्रष्ट लोक समाज सेँ अलग कए देल जाइत छला आ ओ सभ एकटा नव जातिक रचना कए लैत जाइत छला। एहि तरहेँ यद्यपि सैकड़ों जाति या उपजाति सभ बनैत जाए रहल छल, तथापि वर्णाश्रम व्यवस्था कोनो ने कोनो तरहेँ चलैत जाए रहल छल। आब एकर मुकाबला मे एकटा एहन सुसंगठित समाज छल जे प्रत्येक व्यक्ति आ प्रत्येक जाति केँ अपना भीतर समान आसन देबाक प्रतिज्ञा कए चुकल छल। एक बेर कोनो व्यक्ति ओकर विशेष धर्म-मत केँ जँ स्वीकार कए लेलक तँ इस्लाम समस्त भेद-भाव केँ बिसरि जाइत छल। ओ राजा सँ रंक आ ब्राह्मण सँ चाण्डाल तक सभ केँ धर्मोपासनाक समान अधिकार देबाक लेल राजी छल। एहने समय मे दक्षिण सँ भक्तिक आगमन भेल जे बिजलीक चमक जकाँ एहि विशाल देशक एहि कोना सँ ओहि कोना तक पसरि गेल। भारतक जातीय तथा धर्मजीवनक एक महान संधिक्षण मे शंकराचार्यक अभ्युदय भेल। ता तक बौद्ध धर्म भारत मे लगभग 1200 वर्ष तक उन्नति-अवनतिक विविध स्तरक अतिक्रमण कए एक एहन परिस्थिति मे पहुँचि गेल छल जे भारतीय धर्म आ संस्कृतिक लेल मात्र अप्रयोजनीय नहि, हानिकारक दबाव सँ सनातन हिन्दू धर्म बलहीन, विध्वस्त आ विछिन्न भए गेल छल। एकदम अस्त-व्यस्त भेल एहि भारतीय समाज मे एक दिश चिल्लरक चउ निकालनिहार कट्टर कर्मकाण्डी सभ छला जे शास्त्रादिक अन्तर्निहित भावक उपेक्षा कए एक-एक शब्द पर कपार पफोड़बाक लेल उताहुल रहैत छलाह त दोसर दिश शून्यवादी, नास्तिक आ रूढि़भंजक लोक छला जे ओहि सभ केँ जडि़-मूल सँ उखाडि़ पफेकबाक लेल पफांड़ा बान्हने छला जे किछो पूज्य, पवित्र आ प्राचीन छल। दार्शनिक मत-मतान्तरक बीच प्रचण्ड संघर्ष छिड़ल छल आ विभिन्न धर्मिक सम्प्रदायक बीच शत्रुता विद्यमान छल। एहने विकाल मे शंकराचार्यक उद्भव भेल। शंकराचार्यक उद्भव केँ प्रचलित शब्द या अर्थ मे व्यक्त करब असंभव अछि। एकटा श्लोक मे हुनका दिआ कहल गेल अछि जे आठ वर्षक अवस्था मे ओ चारू वेदक अध्ययन कए लेलनि, बारह वर्षक अवस्था मे ओ सकल शास्त्र मे पारंगत भए गेला, सोलह वर्षक अवस्था मे ओ अपन भाष्य लिखिकए पूर्ण कए देने छला आ बत्तीस वर्षक अवस्था मे एहि संसार सँ विदा भए गेला। इएह बात शंकराचार्यक जीवन आ कर्म केँ ईश्वरीय अर्थात अलौकिक स्वरूप प्रदान कए देने अछि। शंकराचार्य सम्पूर्ण विश्वक इतिहास मे एहन एकमात्रा विजेता छथि जे ज्ञानबल केँ युद्धक औजार बनैलनि आ एकटा विशाल साम्राज्य स्थापित कए लेलनि। हुनक चलायल भक्तिक धरा दू रूप मे स्वयं केँ प्रकाशित केलक। इएह ओ दू धरा अछि जेकरा निर्गुण धरा आ सगुण धरा नाम दए देल गेल अछि आ जेकर प्रभाव भक्ति साहित्य पर हजारो वर्ष सँ पडि़ रहल अछि आ आगुओ पड़ैत रहत। साहित्यक इतिहास मे जाहि कालावधिकेँ भक्तिकालक संज्ञा देल गेल अछि ओ एहि देशक समाज आ साहित्य दुनूक लेल महान परिवर्तनकारी युग रहल अछि। कर्मकाण्ड आ जाति पातिक भ्रमजाल मे फंसल सनातन धर्मक विरूद्ध परिवर्तनवादी स्वर दएबला बौद्ध धर्म वामाचारादि घृणित कर्म सँ स्वयं पथभ्रष्ट भए गेल छल आ ओकर उच्छिष्ट सँ भारतीय चिन्तनधरा केँ परिशुद्ध करैत मुस्लिम धर्मक आक्रामक प्रभाव सँ सफलतापूर्वक लड़ैत शंकराचार्यक बनाएल पथ निरन्तर प्रशस्त भेल गेल आ ओहि पर चलनिहारक संख्या मे निरन्तर वृद्धि होइत गेल। ई अद्भुत संयोग अछि जे आसाम मे शंकरदेव, बंगाल मे जयदेव आ चण्डीदास, बिहारक तिरहुत मे विद्यापति, मध्यदेश  मे कबीर, सूर, तुलसी आ जायसी, राजस्थान मे मीरा, गुजरात मे नरसी मेहता, महाराष्ट्र मे तुकाराम आदि अनेक सन्त भक्तक आविर्भाव किछुए दिनक अभ्यन्तर भेल। भक्तिसाहित्यक ई परम्परा अनेक धरा मे विभाजित होइतो अग्रगामी रहल। कबीर, रैदास, नानक, दादू, मलूकदास आदि सँ निर्गुण परम्पराक ज्ञानाश्रयी शाखा समृद्ध भेल त मुसलमान कवि कुतबन, मंझन, जायसी, शेख नबी आदि सँ निर्गुणक प्रेममार्गी सूफी धरा प्रवाहित भेल। रामानुज आ तुलसी आदि सँ राममार्गी सगुण परम्परा आ वल्लभाचार्य आ सूरदास आदि सँ कृष्णमार्गी सगुण परम्परा केँ बल भेटैत गेल। एहि भक्तिकालक समापन आ रीतिकालक प्रारंभक सन्धिस्थल पर कोशी नदीक लीला क्षेत्रा मे सन्त लक्ष्मीनाथ गोसांईक आविर्भाव होइत अछि। गोसांई जीक जन्म आ रचनाकाल केँ दुनू कालक सन्धिस्थल नहि कहि रीतिकालक परिपक्वताक काल कहब बेसी उपयुक्त कहि सकै छी आ एकर असर केँ गोसांई जीक रचनासभ मे बहुत स्पष्ट रूप सँ देखल जाए सकैत अछि जाहिमे सिद्ध साहित्य, नाथपंथी साहित्य, भक्तिक ज्ञानाश्रयी आ प्रेममार्गी सूपफीधरा, सगुण परम्पराक राममार्गी आ कृष्णमार्गी धराक संग-संग कोशी-कमला-बलान अंचलक व्रात्य-किरात संस्कृति सँ प्राप्त शिव आ दुर्गा अराध्ना परम्पराक मिश्रित प्रभाव अछि। एतय काल-विभाजनक आधर भारतीय भाषा साहित्य, विशेषतया हिन्दी केँ मानि ई बात कहल जा रहल अछि। तिरहुता वा मैथिली मे एहि भक्ति आन्दोलनक कोनो विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर नहि होइत अछि। मैथिलीक तथाकथित इतिहासकार लोकनि प्राकृत केँ अपन पुर्वज भाषा कहि यत्रा-तत्रा ओहि सँ लाभ लेबाक अवसरवादिता त देखबै छथि किन्तु प्राकृत मे लिखल सिद्ध लोकनिक भक्ति साहित्य केँ अपन कहबा मे हुनका सभ केँ असोकर्य होई छनि किएक त ओ निम्न जातिक लोक द्वारा लिखल गेल अछि आ पुरोहितवादक विरूद्ध जाइत अछि। एकटा विद्यापति जिनकर चर्चा विभिन्न भारतीय भाषा साहित्य मे होइत अछि, हुनकरो रचना मे भक्ति आन्दोलन सन कोनो तत्व नहि अछि। ओ मूलतः दरबारी कवि छला आ हुनक रचनासभ जनमुखापेक्षी नहि शासक मुखापेक्षी अछि आ ओहि मे अपन पालनकर्ताक मनोरंजनार्थ श्रृंगार-राग भरल अछि। लक्ष्मीनाथ गोसांई एहि मामला मे बेछप एहि रूप मे छथि जे भक्तिकालक समापन आ रीतिकालक यौवनकाल मे ओ एला आ अपन रचना सभ केँ लोक हितार्थ, लोक मनोरंजनार्थ लिखलनि, संगीत सँ बान्हलनि आ ओकरा गाबि-गाबि आमजन धरि पहुँचलाह। एतय ई कहबा मे कनिको संदेह नहि अछि जे गोसांई जी पर तिरहुता भाषाक रचनासभक प्रभाव नगण्य आ हिन्दीक साहित्य संसारक प्रभाव तीव्र आ प्रचूर मात्रा मे पड़ल अछि। गोसांई जीक शिक्षा संस्कृतक माध्यम सँ भेल छल आ ओ अपन संस्कृत ज्ञानक उपयोग शंकराचार्यक रचनाक अनुवाद लेल सेहो केलनि। भाषा तत्व बोध नाम सँ शंकराचार्य विरचित तत्व बोधक भाषानुवाद आ शंकराचार्येक विवेक रत्नावलीक भाषानुवाद अद्वैतवाद आ वेदान्तदर्शनक प्रति गोसांईजीक आस्था केँ प्रगट करैत अछि। ई आस्था भाव गोसांईजीक अपन रचना सभ मे बहुत मुखर नहि भए सकल अछि त एकर पाछाँ ओ समाज अछि जेकर ओ एक इकाइ छला आ साध्ुकर्म अपनएलाक बादो जेकर बन्धन सँ ओ स्वयं केँ मुक्त नहि कए सकला। ‘गंगा को नहाये कहो को नर तरिगे, मछरी न तरी जाको पानी में घर है’ - एक निर्गुणपंथी संतक ई बात गोसांई जी पर नीक जकाँ लागू होइत अछि। तिरहुता आकि मैथिलीक गंगा मे के के महासभाइ नहि तरि गेल, किन्तु माछ जकाँ गोसांईए जी तरे सँ वंचित रहि गेला। आब गोसांई जी केँ मैथिलीक रचनाकार मानि हुनका पर परिसंवाद आदिक आयोजन भए रहल अछि से स्वागत योग्य किन्तु एहि मे जे आपराधिक बिलम्ब भेल अछि तेकर दोषी केँ चिन्हित करब सेहो अपेक्षित अछि। गोसांईजीक रचना भाषा आ मैथिली हिन्दी साहित्यक इतिहास लेखन एहि मामला मे इमानदार कहल जाए सकैत अछि जे ओ स्वीकार करैत अछि जे प्राकृतक अंतिम अपभ्रंश अवस्थे सँ हिन्दी साहित्यक आविर्भाव मानल जा सकैत अछि। मैथिली केँ एहन स्पष्ट धरणा निर्धरित करबाक सौभाग्य अखनि धरि प्राप्त नहि भेल अछि। मिथिला आ मैथिलीक अखनि धरि लिखल इतिहास पोथी सभ फूसि, भ्रम आ विरोधभासक पुलिन्दा ;गठरीबद्ध बनि कए रहि गेल अछि। हमरा सभ केँ बंगाल बतबैत अछि जे विद्यापति हमर छला आ तखनि हम सभ धड़फड़ा कए अपन भंगिआएल निन्न तोड़ैत विद्यापति केँ भरि-भरि पांज पकड़ै छी। ई त भेल क्षेपक, एतेक धरि जे हमर सभक भाषाक की नाम अछि सेहो हमरा सभकेँ अंग्रेजीक तथाकथित विद्वान/भाषाविज्ञानी कोलबु्रक आ जार्ज ग्रियर्सन सन लोक बतबैत अछि। किछु पाश्चात्य विद्वान एहि भाषाक लेल तिरहुतिया शब्दक प्रयोग केलनि। 1771 ई0 मे वेलिगत्तीक लिखल पोथी मे एकर एहि रूपेँ उल्लेख भेटैत अछि। हाल-हाल तक एहि भाषाक लेल तिरहुतिया आ एकर लिपिक लेल तिरहुता शब्दक उपयोग होइत रहल अछि आ अखनिओ जनसाधरणक बीच ई शब्द लोकप्रिय अछि। ठाम-ठाम एकरा लेल विदेह भाषाक प्रयोग सेहो भेल अछि। एहि भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग 1801 ई0 मे कोलबू्रक केलनि। एहि भाषाक प्रथम उपयोग वा उल्लेख वर्णरत्नाकर आ विद्यापतिक कीर्तिलताक प्रारंभिक पद मे भेटैत अछि जेकरा विद्यापति देसिल वयना एवं अवहट्ट कहने छथि। ई देसिल वयना वा अवहट्ट मैथिलीक ओ रूप नहि अछि जेकर प्रयोग हमसभ आइ वर्तमान मे कए रहल छी। सुभद्र झाक अनुसार अवहट्ट कहला सँ ताहि जमाना मे भद्रलोकक भाषा बुझल जएबाक चाही। ई भद्रलोकक भाषा आ आम लोकक भाषा दू तरहक छल की ? सुभद्रे झाक कहब छनि जे मैथिली अपन निजी क्षेत्रा मे मुंडा आ संथाली एहि दू अनार्य भाषा सँ मिलैत अछि। दोसर शब्द मे एकरा मुंडा आ संथाली सँ बहरायल आ विकसित भेल किऐक नहि मानल जाए ? भाषाविद पंडित गोविन्द झा एकर विकासक क्रम अवहट्ट सँ प्राचीन मैथिली, मध्य मैथिली, नवीन मैथिली आ समसामयिक मैथिली क संज्ञा दैत बतबै छथि। आधुनिक काल तक आबिओ कए मैथिलीक कोनो सर्वमान्य वर्तनीक निर्धरण नहि भए सकल अछि। एहि भाषा पर सभसँ बड़का एहसान जार्ज गियर्सन केने छथि आ हुनके सँ मैथिली शब्द केँ व्यापकता भेटल। 1910 ई0 मे जखनि मिथिलेश महाराज कामेश्वर सिंहक आजीवन सभापतित्व मे मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक जातीय संस्था ‘मैथिल महासभा’ के स्थापना भेल त एहि भाषाक लेल मैथिली शब्दक आग्रह बढ़ल। एकर आर जे कोनो अन्य परिणाम भेल हुअय किन्तु एकर बादे सँ मिथिला, मैथिल आ मैथिली शब्द भ्रम सँ आप्लावित भए व्यापकता सँ दूर हटि गेल आ ‘तिरहुता’ सँ ‘मैथिली’ होइते ई भाषा सर्वहाराक खाता सँ खारिज भए मैथिल महासभाक खतिआन मे दाखिल भए मात्रा दू जातिक जमाबन्दीक वस्तु भए गेल। एकर परिपेक्ष्य मे जखनि लक्ष्मीनाथ गोसांईक रचना भाषाक अवलोकन करै छी त अत्यन्त असन्तोषजनक आ दुखद तथ्य सभ सोझाँ आबैत अछि आ ई समझ आ बुद्धि मे नहि आबैत अछि जे ओ मैथिली मे स्वीकार्य किऐ नहि छथि। सिद्ध साहित्यक किछु उदाहरण द्रष्टव्य अछि। सरहपा कहै छथि - ‘पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ। देहहि रू( बसंत न जाणई। अमणागमण ण तेन विखंडिअ। तोवि णिलज्ज भणई हउँ पंडिअ।।’ विरूपा कहै छथि - ‘सहजे थिर करि वारूणी साध। अजरामर होइ दिट काँध। दशमि दुआरत चिह्न देखइया। आइल गराहक अपणे बहिआ। चउशठि घडि़ए देट पसारा। पइठल गराहक नाहि निसारा।’ तहिना कण्हपाक ई पांति - ‘एक्क पा किज्जइ मंत्रा ण तंत। णिअ धरणी लइ केलि करंत। णिअ घर घरणी जाब ण मज्जइ। ताब कि पंचवर्ण बिहरिज्जइ।’ कुक्कुरिपा - ‘ससुरी निंद गेल, बहुड़ी जागअ। कानेट चोर निलका गइ मागअ। दिवसइ बहुणी काढ़इ डरे भाअ। रति भइले कामरू जाअ।’ लुहिपा कहै छथि - ‘भाव न होइ, अभाव ण जाई। अइस संबोहे को पतिआइ ?’ बौद्ध सिद्ध सभक एहि उदाहरण सभक भाषाक तुलना विद्यापतिक कीर्तिलताक पांति ‘बालचंद बिज्जावइ भासा, दुहुहु न लग्गइ दुज्जन हासा। सो परमेसर सेहर सोहइ, इ णिच्चउ णाअर मन मोहइ।।’ सँ करी त दुनू मे कोनो बहुत अन्तर नहि अछि। तखनि प्रश्न ई अवश्य उठबाक चाही जे हम सभ स्तरचयनक कोन दोहरापन राखने छी जे विद्यापति मैथिली लेखक मानल जाई छथि आ सिद्ध सभ एहि सौभाग्य सँ बारल जाइ छथि। सिद्ध सभक एहि रचना सभक भाषा देशभाषामिश्रित अपभ्रंश अछि। ओ सभ भरिसक ओहि सर्वमान्य व्यापक काव्यभाषा मे लिखलनि जे ओहि काल गुजरात, राजपुताना आ ब्रजमंडल सँ लए कए बिहार तक लिखै - पढ़ैक शिष्ट भाषा छल। ओहि सभ मे स्थान विशेषक भेदक कारण किछु स्थानीय प्रयोग आ शब्द सभ आबि गेल अछि। एहि सिद्ध लोकनिक साहित्य जेकरा चर्या पद कहल जाइत अछि तेकरा मैथिली मे सम्मिलित करबाक डा0 जयकान्त मिश्र विरोधी छला, जखनि कि डा0 दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ एकरा सम्मिलित करबाक पक्ष मे छला। तार्किकता सँ एकदम अलग भए कए एहने आग्रह-दुराग्रह मैथिलीक भाग्य तै करैत रहल अछि। मैथिली अकादमी, पटना द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ;प्रथम संस्करण 1977द्ध मे सरहपा ;690 ई0 केँ सम्मिलित करबाक साहस देखाएल गेल अछि आ एकरा आगाँ बढ़बैत चैरासियो सिद्ध केँ मैथिलीक रचनाकार मानल जेबाक चाही। एतबे किए, कतिपय जैन आचार्य आ नागपंथी सभक अनेक रचनाक एहने भाषा अछि आ हुनको सभक स्वागत एहि टोल मे हेबाक चाही। हँ, जातिगत रूढि़ सँ ग्रसित एहि समाज केँ ई बात अखरि सकैत अछि जे अधिकांश सिद्ध लोकनि निचलका जाति अर्थात सोल्हन वर्ग सँ आबैत छथि। किन्तु मैथिली केँ पुरोहिती संस्कार आ मैथिल महासभाक समाजतोड़क व्यवस्था सँ बाहर निकालि विस्तृत आ विराट आकास देबाक समय नहि आबि गेल अछि की ? अमीर खुसरोक एकटा प्रसिद्ध गजलक किछु पांति द्रष्टव्य अछि - ‘जे हाल मिसकी मकुन तगापफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ। कि ताबे हिज्राँ न दारम, ऐ जाँ! न लेहु काहे लगाय छतियाँ।। शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्पफ व रोजे वसलत चूँ उम्र कोतह। सखी! पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ।। एहि गजल मे फारसी आ ठेठ खड़ी बोलीक समिश्रणक ठाठ अछि आ एकर बादो खुसरो हिन्दीक लेल तहिना स्वीकार्य छथि जेना विद्यापति। एहि सभ उदाहरणक परिप्रेक्ष्य मे जखनि लक्ष्मीनाथ गोसांई क रचना भाषा पर दृष्टि जाइत अछि, तखनि मैथिलीक पुरोध-महंथ सभक असमंजस बुधिमे घुसिआबय सँ परहेज करए लगैत अछि। तखनि त आओर जखनि मैथिली आ हिन्दी दुनू केँ सजातीय मानै मे कोनो भाषाविद्, कोनो पंडित केँ कोनो उजूर नहि छनि। पंडित छेदी झा ‘द्विजवर’ गोसांई जीक रचना भाषा केँ बिकृत ब्रजभाषा कहै छथि अर्थात मैथिली मिश्रित ब्रजभाषा। किन्तु ई बात बहुत गंभीरता सँ कहल गेल नहि बुझाइत अछि। ई सत्य अछि जे भारतीय साहित्य मे एकटा दीर्घ अवधि तक काव्य-लेखन लेल ब्रजभाषा मात्रा केँ उत्तम मानल जाइत रहल। किन्तु गोसांई जीक रचना भाषा केँ कोनो स्थापित श्रेणी वा व्याकरण मे बान्हब कठिन अछि। एकरा बबजिया वा सधुक्कड़ी भाषा कहब बेसी उपयुक्त बुझाइत अछि। घुमक्कड़ीक चक्कर मे बाबाजी सभ विभिन्न पंथक, विभिन्न क्षेत्राक, विभिन्न संस्कारक साधु समाज आ जन समाजक संपर्क मे आबैत अछि आ ओकर भाषा एहि सभक मिश्रणक प्रभाव सँ एकदम विलक्षण भए जाइत अछि। एहि विलक्षण आ अपरिभाषेय तत्वक असरि गोसांई जीक भाषे टा पर नहि हुनक रचना संसारक अंतर्वस्तु मे सेहो देखाइत अछि। सुभद्र झा Journal of the Bihar  University  मे प्रकाशित  अपन एकटा आलेख मे कबीर केँ मैथिल सिद्ध करबाक प्रयास कएने छथि। कबीरक तुलना मे गोसांई जीक रचना-भाषा केँ मैथिलीक बेसी करीब त दाबी सँ कहले जाए सकैत अछि। बनगाँवक संत लक्ष्मीनाथ परमहंस राष्ट्रीय समिति द्वारा प्रकाशित ‘भजनावली’ केँ गोसांई जीक सर्वाधिक विश्वसनीय संग्रह एहि कारणें मानल जेबाक चाही जे ई हुनक भक्त सभक निष्कलुष आ समर्पित प्रयासक फल अछि आ एहि पर मैथिली साहित्यक राजनीति, पुर्वाग्रह आ निहित स्वार्थी षड्यंत्राक कोनो प्रभाव दृष्टिगोचर नहि होइत अछि। एहि संग्रह मे मात्रा पांच-छह टा नचारी एहन अछि जेकर भाषा केँ वर्तमान प्रचलित मानकक अनुसार मैथिलीक कहि सकै छी। अन्य सात-सवा सात सय रचनासभ मे ओएह मिश्रित बबजिया भाषा अछि, जाहि मे सँ किछु मे मैथिलीक कम-बेसी पुट उपस्थित अछि। एतय ई चर्चा कए देव समीचीन बुझाइत अछि जे कबीरदासक हिन्दू होइ मे सन्देह छलै, रैदास चमार छला, नानक केँ क्षत्री आ दादू केँ मोची वा धुनिया मानल गेलै आ हिनका सभक रचना भाषा मे सेहो कोनो भाषिक व वैयाकरणीक साम्य नहि छलै तखनिओ हिनका लोकनिक रचना केँ पंजाबी समुदाय गुरूग्रंथ साहिब सन पूज्य ग्रंथ मे श्रद्धापूर्वक सम्मिलित केलक। तेँ लक्ष्मीनाथ गोसांईक रचना सभक मैथिलीकरण करबाक अनैतिक आ आपराधिक कृत्य करबाक बदला ओकरा अपन मौलिकता मे मैथिली साहित्यक सम्पत्ति मानल जएबाक चाही। कहल गेल अछि- ‘यत्रापि कुत्रापि भवति हंसाः, हंसा महीमंडलमण्डनानि। हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैः सह विप्रयोगः।।’ अर्थात हंस जतए कतओ रहए, ओतहि पृथ्वीक भूषण भए कए रहत, हानि त ओहि सरोवर सभक हेतै जेकर ओकरा सँ वियोग भए जेतै। गोसांई जीक रचना मे निर्गुण भाव देश मे सगुण आ निर्गुण नामक भक्तिकाव्यक दू धरा विक्रम पन्द्रहम शताब्दीक अंतिम भाग सेँ लए कए सतरहम शताब्दीक अंत तक समानान्तर चलैत रहल। ई कालावधि भक्तिकाल केँ इंगित करैत अछि किन्तु एकर बादो भक्ति काव्य रचल जाइत रहल, रचल जाइत रहल अछि। एहि मे निर्गुणधराक तत्परता आ व्यवस्थित रूप मे प्रवर्तन केलनि कबीरदास जिनका लेल नाथपंथी जोगीसभ आ वज्रयानी सिद्ध सभ अर्थशून्य बाहरी विधि विधान, तीर्थाटन, पर्वस्नान आदिक निस्सारताक संस्कार पसारबाक काज कए बहुत किछु मार्ग प्रशस्त कए चुकल छला। कबीरदास स्वामी रामानन्द जीक शिष्य बनि भारतीय अद्वैतवादक किछु स्थूल तत्व ग्रहण केलनि आ दोसर दिस नाथपंथी जोगी आ सूफी फकीर सभक संस्कार सेहो ग्रहण केलनि। वैष्णव लोकनि सँ ओ अहिंसावाद आ प्रपत्तिवाद लेलनि। तेँ हुनकर तथा निगुर्णवादी अन्य दोसर संत सभक वचन मे कतओ शंकराचार्यक अद्वैतवादक झलक भेटैत अछि, कतओ नाथपंथी सभक नाड़ीचक्रक, कतओ सूफी सभक प्रेमतत्वक, कतओ पैगम्बरी कट्टर खुदावादक आ कतओ अहिंसावादक। एहि परिप्रेक्ष्य मे जँ देखी त लक्ष्मीनाथ गोसांई केँ शुद्ध निर्गुणपंथी कहब त कठिन अछि किन्तु ओ कने प्रकारान्तर सँ कबीरपंथी कहल जाए सकैत छथि। प्रकारान्तर ई जे गोसांई जीक साहित्य साधना आ भक्ति भावना पर हुनक अपन समाजक पुरोहिती संस्कार सेहो हावी रहल अछि आ से हुनक रचनासभ मे खूब देखार अछि। गोसांईजीक एकटा भजन ‘कौन कहे प्रभु कैसा मुरति, कदही कोउ न देखा है’ सँ शुरू होइत अछि आ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदि त्रिदेवक चर्चा करैत ‘कर्ता, कर्म सबनि से न्यारा, साक्षी होके देखता है। ‘लक्ष्मीनाथ’ अनाथ के स्वामी, पवन रूप मन भाता है।’ पर समाप्त होइत अछि। निर्गुण भावक सर्वाधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति एहि भजन मे भेटैत अछि। गोसांई जी एहि भजन मे सगुण साकार केँ नकारैत निर्गुण-निराकारक पैरोकारी करैत देखाइ छथि। हुनका सरूप नहि ब्रह्मक पवन रूप भाबए छनि। पवन रूप अर्थात जेकरा अनुभव कएल जाए सकैत अछि किन्तु जे दृष्टिक परिधिसँ बाहर अछि। सगुणोपासनाक मजाक उड़बैत गोसांई जी एहि भजन मे सगुणोपासक केँ आन्हरक संज्ञा दै छथि - ‘अन्धे के पुर हाथी जैसे अकिल सरूप बताता है’। एहि भजन मे शंकराचार्यक पंक्ति उपालभ्यते हि मायाहस्ती हस्तीव, हस्तिनमिवमात्र समाचरन्ति बन्धनारोहणादि हस्ति संबंधिभिर्धर्मै:, हस्तीति चोच्यते असन्नपि यथा ....’ क प्रभाव स्पष्ट देखाइत अछि। एहिना ‘है तो स्वामी सबके भीतर लेकिन लखा न होता है। जैसे रंग रहे मेहदी में वैसे मालूम होता है’’ सँ प्रारंभ भेल एकटा भजन ‘जैसे बुद-बुद जल से होता, जलही माह समाता है। ‘लक्ष्मीपति’ झूठी यह माया, ब्रहम सत्य मन भाता है।’ पर समाप्त होइत अछि। एहि मे गोसांई कहै छथि जे जेना मेहदी मे रंग नुकाएल रहैत अछि तहिना अदृश्य स्वामी अर्थात ब्रह्म सभक भीतर अछि। एहि भजन मे ‘ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या’ क भावना आएल अछि। एकर बीचक पद मे गोसांई संसारक तुलना मकड़ाक जाल सँ करै छथि जेकर भीतर खोजला पर कोनो सूत नहि भेटैत अछि। फेर ओ कहै छथि जे जगत इन्द्रजाल अछि आ मानवरूपी पुतली केँ ओकर भीतर बैसल कोनो दोसर अर्थात ब्रह्म नाच नचबैत अछि। अंतिम पद मे ओ जल सँ बनल बुलबुलाक पुनः जलहिक भीतर समाए जेबाक गप कहैत ब्रह्महिटा केँ सत्य मानैत ओकरे भावैक गप कहै छथि। लक्ष्मीनाथ गोसांई पर विभिन्न संत कविक संग-संग शंकराचार्यक प्रभाव सेहो यथेष्ट मात्रा मे छनि। एकर एकटा प्रमाण इहो अछि जे ओ शंकराचार्यक तत्व बोध् आ विवेक रत्नावलीक भाषानुवाद सेहो कएलनि। ई प्रभाव कतओ-कतओ हुनक अपन रचना मे तेना कए आएल अछि जे ओ प्रायः अनुवादहि जकाँ लागैत अछि। आचार्य शंकरक माण्डूक्यकारिकाभाष्यम् क एकटा श्लोक अछि -‘यथा च प्रसारित पण्यापण गृहप्रसाद श्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्य मानमेव सत् अकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असदु्रपे, तथा विश्वमिदं द्वैतमसद् दृष्टम्।’ गोसांई जीक एकटा भजन मे एहि भावना केँ ‘खामिन्द खासे शहर बसाये’ सँ शुरू कए ‘नगर, बाजार, दुकान विचारे, सौदा नाना हाट लगायेः तीन चैदवीं, चार महाजन, दश बनियां व्यापार चलाये’ आदिक रूप में व्यक्त कएल गेल अछि। गोसांई जी एकटा भजनमे ‘निर्गुण महिमा सुनो रे कोई’ क माध्यम सँ निर्गुणक महिमा बतबैत कहै छथि जे निर्गुणहि अपन नानारूप धरि सगुण बनि आबैत अछि। अनेक विध सँ विविध होइत ई स्वयंहि मे समाहित भए जाइत अछि। ब्रह्म भुइयां, हवा, आगि, पानि आ आकाश मे परिणत अछि, वएह चित्त आ बुद्धि अछि आ वएह विषय-विहार सेहो करैत अदि। वएह जीव, वएह देवता अछि आ भोगनिहारो वएह अछि। वएह बन्धनो अछि, वएह मोक्षो अछि आ अनहद नाद सेहो वएह अछि आ जे कोय ब्रह्मक निर्गुण तत्व केँ जानि जाइत अछि वएह सभ चीजक रसास्वादन कए सकैत अछि। निर्गुणक एहन स्पष्ट अभिव्यक्तिबला गोसांई जीक भजन मात्राक दृष्टिकोण सँ कमे अछि। किछु भजन मे त भावक तीव्र विरोधभास सेहो अछि। ई मानल जाइत अछि जे वज्रयानक अनुयायीसभ अधिकत निम्नजातिक छला आ तेँ जाति-पातिक व्यवस्थासँ हुनक सभक असंतोष स्वाभाविक छल। नाथ सम्प्रदाय मे सेहो शास्त्राज्ञ विद्वान सभ नहि छलाह। तेँ एहि दुनूक बनाएल लीक पर अग्रसर भेल निर्गुण पंथ दिस जाइबला जे पहिल प्रवृति लक्षित भेल से ऊंच-नीच आ जाति-पातिक भावक त्याग आ ईश्वरक भक्ति लेल मनुष्यमात्राक समान अधिकारक स्वीकार छल। किन्तु गोसांई जी अनेक जगह एहि व्यवस्थाक पोषक वा पैरोकारक रूप मे देखाई पड़ै छथि। ‘सदा एक रामनाम सत सार... ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शुद्र के कर्म किन्ह परचार’, ‘ब्रह्मा वेद चारि के मालिक जाति, वरन बिलगाया है’ आदि पंक्ति एहि दिश संकेत करैत अछि। तेँ ई कहै मे कोनो संकोच नहि जे गोसांई जीक रचना मे जतय जतय निर्गुण भाव अछि से सप्रयास वा हुनक आस्थाक प्रतिपफल नहि, कबीर आ हुनक निर्गुणपंथक देखाउंस मे आएल अछि। एकर एकटा महत्वपूर्ण कारण अछि गोसांई जीक समाज, हुनक जाति आ ओ जाहि भूभागक निवासी छला तेकर संस्कार। कोशीक ई भूभाग अनेक मामला मे कमला बलानक भूभागक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परम्परा सँ एकदम अलग रहल अछि। इतिहासक एकटा विराट कालावधिमे ई भूभाग बड़का-बड़का साम्राज्यक अधीनता सँ मुक्त अपन स्वतंत्राताक आनन्द लैत रहल अछि। मिथिलाक नक्शा बनबैत काल पुरातन आ आधुनिक दुनू आधर पर मनमाना सीमा रेखा खींचल जेबाक हास्यास्पद प्रयास निरन्तर भए रहल अछि किन्तु कोशी अंचलक एहि सुपौलक राजधानी कहियो जनकपुर, दरभंगा वा पाटलिपुत्र नहि रहल। एतहुका शासन कर्णाटवंशी गन्हवरिया, गढ़बनौली स्टेटक द्रोणवार आ स्थानीय निचलका जातिक विभिन्न मानिजन शासकक हाथ मे समय-समय पर रहल अछि आ तखनो एकर राष्ट्रीय चेतना विकसित रहल अछि। गोसांई जीक रचना भाषा एकरे प्रतिपफल अछि। किन्तु धर्मिक आधर पर ई भूभाग कर्मकाण्डी पुरोहित समाजक प्रभाव मे रहल अछि। ई पुरोहित वर्ग प्रायः वैदिक संस्कृति सेँ च्युत व्रात्य आ विदेह छला जे एहि क्षेत्राक पुरान बासिन्दा किरात, कोल-भील-मछुआरा आदि आ विभिन्न वनवासी जाति समाजक संगतिक प्रभाव मे आबि मूर्ति पूजाक पालक, भूत-प्रेत-डाइन-जोगिनक अस्तित्व माननिहार, टोना-टोटका, झाड़-फूक मे विश्वास राखनिहार आ माछ माउसक भक्षक भए गेला। निर्गुणधराक कवि सुंदरदास भिन्न-भिन्न प्रदेशक आचार पर अत्यन्त विनोदपुर्ण उक्तिसभ कहने छथि। कोशी-कमला-बलानक क्षेत्रा पर हुनक उक्ति छनि ‘ब्राह्मण क्षत्रिय बैसरू सूदर चारोइ बर्न के मच्छ बधरत’। एहि पुरोहित वर्ग द्वारा एहि भूभागक बहुजन समाजक संस्कार ग्रहण कए लेब बहुमतक प्रभाव सँ त भेबे कएल, अपन भरण-पोषणहुक लेल एना करब हुनका सभ केँ लाभकारी बुझैलनि। मिथिला-मैथिलीक विद्वान इतिहासकार लोकनि एहि समाजक सनातनी हेबाक बात केँ बेर-बेर घोसलनि अछि किन्तु ई सत्य नहि अछि आ जँ सत्य अछि त एकर बहुलांश केँ जानि बुझि कए झांपल गेल अछि। सनातनी समाज अपन सर्वांग मे उदारचेता होइत अछि जे ई नहि अछि। एतय कर्मकांडक कट्टरता अछि, मूर्ति-पूजा, भूत-प्रेत-डाइन-जोगिनक उपचार हेतु टोना-टोटका-झाड़-पफूंकक अंधविश्वास अछि, श्राद्धक नाम पर प्रेत-मुक्तिक भ्रमजाल अछि, वर्णाश्रम-व्यवस्थाक पतित रूप जाति व्यवस्थाक अढ़ मे श्रेष्ठता बोधक पाखण्ड अछि। एहि सभक वाहक जे पुरोहित वर्ग अछि तेकरे एकटा अंश लक्ष्मीनाथ गोसांई छला आ तेँ हुनक जे जातिगत आ जन्मजात संस्कार छल से हुनक ज्ञान, बुद्धि, विवेक आ ताहि सँ प्रसूत हुनक साहित्य पर तात्विक रूप सँ हावी रहल। ई मानल तथ्य अछि जे सगुणोपासक भक्त भगवानक सगुण आ निर्गुण दुनू रूप केँ मानैत अछि किन्तु भक्ति आ उपासनाक लेल सगुणहि रूप केँ स्वीकार करैत अछि आ निर्गुण रूप ज्ञानमार्गी सभक लेल छोडि़ दैत अछि। खास तौर सँ उपासनाक क्षेत्रा मे ब्रह्म निर्गुण नहि बनल रहि सकैछ। तेँ सभ सगुणमार्गी भक्त भगवानक व्यक्त रूपक संग-संग हुनक अव्यक्त आ निर्विशेष रूपक सेहो निर्देश करैत आएल छथि जे बोध्गम्य नहि अछि। ओ अव्यक्त दिस संकेत मात्रा करै छथि, ओकर विवरण मे प्रवृत नहि होइ छथि। ओहुना निर्गुणपंथक प्रभाव शिष्ट आ शिक्षित वर्गक लोक पर नहि पड़ल, किऐक त ओकरा सभक लेल ने त एहि पंथ मे कोनो नव बात छल आ ने नव आकर्षण। किन्तु अशिक्षित आ निम्न श्रेणीक लोक पर निर्गुणपंथक एकटा बड़का उपकार अछि। एहि पंथक संतलोकनि अपन रचना मे किछु उच्च विषयक अबूझ सन आभास दए, आचरणक शुद्धता पर जोर दए, पाखण्ड, आडम्बर आ कर्मकाण्डक तिरस्कार कए एहि अशिक्षित निम्नवर्ग मे आत्मगौरवक भाव उत्पन्न कएलनि आ एकरा सभ केँ उपर उठएबाक स्तुत्य प्रयास कएलनि। लक्ष्मीनाथ गोसांईक संकट ई छलनि जे ओ जाहि पुरोहित वर्गक जन्मजात अंश छला तेकरा ई चीज नहि रूचैत छल आ ने रूचैत अछि। एहि दुनू पंथ पर चर्चा करैत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहै छथि जे सगुण भावक भक्त सभक महिमा हुनक असीम धैर्य आ अध्यवसाय मे अछि किन्तु निर्गुण श्रेणीक भक्त सभक महिमा हुनक उत्कट साहस मे अछि। एकरा ध्यान मे राखैत ई बात निस्संकोच कहल जा सकैत अछि जे यथास्थितिवादक खिलापफत मे कबीर दुस्साहसक जाहि सीमा धरि गेला से हुनक बादक निर्गुणपंथक अनेक भक्त मे दुर्लभ अछि। निर्गुण भावक कतिपय भजनक रचनाक बादो तहिना लक्ष्मीनाथ गोसांई सेहो एकरा अपन मुख्य स्वर बनैबाक साहस नहि देखाए सकला। गोसांई जीक संपुर्ण रचना-साहित्यक अवलोकन सँ जे बात अभरिकए सोझाँ आबैत अछि से ई जे हुनका पर भक्तिक विभिन्न मार्ग, विभिन्न पंथ आ विभिन्न धरासभक मिश्रित प्रभाव अछि। संख्याक दृष्टिकोण सँ राम आ कृष्णक भजन सभ पर भारी अछि। प्रभावक प्रकार सँ हुनका कर्मकाण्डी-कबीरपंथी कहि सकै छी किन्तु जँ हुनका शुद्ध कीर्तनियां आ भक्त मानल जाए तखनिए हुनक रचना संसारक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन भए सकैत अछि। हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ कोशी अंचलक अन्वेषक साहित्यकार छथि आ ओ लक्ष्मीनाथ गोसांई केँ वाग्येकार भक्त कवि कहै छथि। वाग्येकार अर्थात् एहन कवि जे स्वयं पद के रचना करैत अछि आ ओकरा संगीत मे आबद्ध कए विभिन्न राग-रागिनी मे गाबैत अछि। जेना कोनो कीर्तनियाँ सँ मौलिकताक अपेक्षा करब ओकरा संग न्याय नहि अछि, तहिना गोसांईजीक रचना-संसार सँ सेहो ई अपेक्षा नहि कएल जएबाक चाही। हुनक अलौकिकताक कल्पित-प्रचलित कथा, गोरखनाथ सँ भेल काल-विरोधभासी तथ्य, नौ तरहक सिद्धिक प्राप्ति सन-सन गप हुनक भक्त सभ पर छोडि़ देबाक चाही। हुनक रचना-संसारक रसास्वादन करबाक लेल एतबे यथेष्ठ अछि जे हुनका भक्त आ हुनक रचना केँ शुद्ध भजन-कीर्तन मानि लेल जाए। ४ एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब ( सन्दर्भ : हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “ ) -अरविन्द ठाकुर ई मानल जाइत अछि जे साहित्य मे कोनो चीज बेमतलब नहि होइत अछि, शब्द त शब्द, अर्धविराम, विराम वा विस्मयाधिबोधक चिन्ह तक, आ तेँ जखनि कोनो कथाकार अपन संग्रहक प्रस्तुतिकरण करबा लेल कथा-क्रम सँ पहिने कोनो वरिष्ट लेखकक लिखल भुमिका संग-संग अपनहुँ दिस सँ किछु बात कहैत अछि त ई मानल जएबाक चाही जे ई साभिप्राय अछि आ ओ एहि दुनूक संग अपन कथा-जगत केँ बुझबाक लेल पाठक लोकनिक सहायता हेतु कुंजी प्रदान कए रहल अछि, एकटा औजार दए रहल अछि जे एकरे माध्यम सँ हुनकर रचना-भंडारक ताला खोलल जाय, ओकर कपाट खोलल जाय। ई परम्परा वेद-काल सँ आबि रहल अछि, जेकर वाचिक परम्परा मे अंगुरीक माध्यम सँ उदात्त, अनुदात्त आ त्वरितक संकेत कएल जाइत रहै आ तेकरे अनुसार बाजल गेल शब्द वा वाक्यक अर्थ ग्रहण कएल जाइत रहै। आजुक लिखित वा मुद्रित परम्परा मे ई काज भुमिका आ लेखकीय वक्तव्यक माध्यम सँ होइत अछि। एहि प्रक्रिया मे किन्तु कएकटा खतरा अछि। कोनो रचनाकार लग ओकर जन्म सँ अद्यावधि तक के अनेक अनुभव संचित रहैत अछि जे ओकर चेतनाक अर्ध वा अव अवस्था मे रहल भए सकैत अछि। ई आवश्यक नहि जे रचनाकार सचेतन रुप मे स्वयं अपन रचना केँ आपादमस्तक बुझि लिअए। तखनि भुमिका लेखक वा प्रस्तुतकर्ता ओकर गत्र-गत्र केँ ओकरहु सँ नीक जकाँ बुझि लेता से मानब त आओर कठिन अछि। आ जँ हुनक ( प्रस्तोताक ) उदात्त, अनुदात्त वा त्वरितक संकेत मे कनिओ एने-ओने भेल कि अर्थक अनर्थ निकलए लागत, प्रस्तुत रचनाक अन्तर्वस्तुक माने ओझराबए लागत। आधुनिक युग तक आबैत-आबैत साहित्य विकासक विभिन्न सोपान सँ गुजरल अछि आ तेँ अजुका साहित्यक नाप-तौलक लेल आदिकालीन बटिखरा उपयोगी हएत कि नहि से विचारणीय। कविता आ कथाक विधाक जे अंतर अछि से अलग, आ अजुका साहित्य वेद सेहो नहि अछि से त आओर अलग। हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ट्रान्सफर्मर“ के प्रस्तुतिकरण लेल दू-दू टा अकादमी-पुरस्कृत साहित्यकारक टिप्पणी, भुमिका आ स्वयं कथाकारक अपन पक्ष राखबाक काज कएल गेल अछि। तेँ पारम्परिक मान्यतानुसार हिनक संग्रहक कथा सभ मे पैसबाक लेल ई तीनू वस्तु प्रमुख उपकरण भए जाइत अछि। एतय एकरहि आधार मानि एहि संग्रहक अन्तर्वस्तु दिआ किछु कहबाक प्रयास कएल जाए रहल अछि। एहि संग्रह मे तेरह टा कथा संग्रहित अछि जाहि मे पाँच कथा विध्यार्थी जीवन मे लिखल बासी आ आठ कथा साहित्यकार जीवनक लिखल टटका बताएल गेल अछि। टटका कथा मे पहिल “परिचिति” नैहर मे सुधाक विवाहपूर्व आ विवाहोपरांत बदलल स्थिति दिआ अछि। कथाक लेल ने ई विषय नव अछि आ ने एकर प्रस्तुतिकरण मे कोनो नवीनता अछि। अपना सभक जे समाज अछि ताहि मे ई एकदम सामान्य गप अछि आ प्राय: सभ संबंधित पक्ष एकर अभ्यस्त अछि। दोसर कथा “सोन त कान नहि” सामाजिक-साम्प्रदायिक सौहार्द्य पर एक नीक कथाक संभावना तक सिमटि कए रहि गेल अछि। कथावाचकक ममिऔत द्वारा हुनका घर नहि लए जाए कए गामक पीपरक गाछ लग छोड़ि झाड़ा फिरए चलि जाएब व्यवहारिक शिष्टाचारक विरुद्ध त अछिए, अतार्किक आ असहज सेहो अछि। कथा केँ आगू बढैबाक लेल एहन बेतुक प्रयोग कथाकारक विश्वसनीयता कम करैत अछि। कोनो केन्द्र नहि बनला सँ ई कथा अपेक्षित प्रभाव नहि छोड़ैत अछि। “आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:” सोल्हकन आ द्विज पात्रक तुलनात्मक कथा कहैत अछि। आदर्शवादिताक छौंक संग समताक संदेश देबाक कथाकारक प्रयास बनावटीपनाक चलते कारगर नहि भए सकल अछि। “धनात धर्मम्” वनक्षेत्रक जनवास मे बदलब, कंक्रीटक जंगल सँ प्रकृतिक पलायन आ धर्मक नाम पर क्षुद्र स्वार्थी तत्वसभक कठखेल सन महत्वपूर्ण विषय पर लिखल कथा अछि। कथाकारक चेतनाक विभिन्न स्तर पर बहुत रास स्मृतिसभ छनि आ से एहि कथा मे प्रचूर मात्रा मे आएल अछि किन्तु तारतम्य आ मात्रा-संतुलनक अभाव मे बनल मिश्रण पाठकोचित वांछित स्वाद सँ वंचित रहि गेल अछि। ”उभयचर” दीर्घ-कथा बला विस्तार लेने ग्रामीण आ शहरी मानसिकताक विरोधाभास आ द्वन्द्वक कथा अछि। एहि कथाक अनावश्यक विस्तार अपन औचित्य सिद्ध करबा मे विफल भेल अछि आ अंत मे नायक द्वारा अनिताक कन्हा पर हाथ राखि ठंढा पीबाक प्रस्ताव देब त एकदम फिल्मी भए जाइत अछि। “ट्रान्सफर्मर” राजनीतिक लम्पटपना आ प्रशासनिक लरगुजपना पर एकटा उत्तम कथा बनैत-बनैत रहि गेल अछि। एहि कथा मे किन्तु पठनीयता छै आ एहि कथा तक आबैत-आबैत कथाकार अपन विस्तारणक फार्मूला पर नियंत्रण साधैत परिपक्व होइत देखाइ छथि। “कम्प्रोमाइज” मे एकटा स्त्रीक भावना व्यक्त करबाक प्रयास भेल अछि जेकर विवाह लेल ओकर इच्छा-अनिच्छा नहि पुछल गेल अछि। ई कथा पुरुष लेखक द्वारा नारी-मनोविज्ञानक गलत आ असफल विश्लेषणक साक्ष्य अछि। कथाक असफलताक मूल कारण अछि नायिका पुतुलक चरित्रक विकास मे कथाकारक अक्षमता। ओकर चरित्र एकदम लरगुज सन लगैत अछि, संघर्षक लेशमात्र नहि अछि एहि पात्र मे। एहि कथा मे एकटा अपचनीय गप ई छै जे कालेज मे पुतुलक एगारह बजे घुरबाक बात ओकर भाइ केँ कहल गेलनि, तखनि पुतुल मार्निंग शो सिनेमा देखए केना गेलीह? “भीआरएस” मे गज्जू बाबूक रहन-सहन, हुनक सम्पत्ति, नौकर-चाकरक विस्तारित विवरण औपन्यासिक संरचना जकाँ आ कथा लेल अनावश्यक बुझाइत अछि किन्तु ओकर युक्तिसंगतता बाद मे बुझाइत अछि। मशीनीकरण सँ मानव आ ओकर श्रमक घटैत महत्व पर ई बहुत योजनाबद्ध, सुविचारित आ सोंटल कथा अछि। बासी आ खिच्चा घोषित कएल गेल एहि संग्रहक अन्य पाँच टा कथा अपन कथ्य आ संरचनाक दृष्टि सँ कथा-तत्व आ विषय-वैविध्य सँ बेसी भरल-पूरल रचना अछि। “रोगही” नैतिकता-अनैतिकताक झमेल सँ मुक्त एकटा अतिनिम्नवर्गीय परिवारक कथा अछि जे बहुत नापल-जोखल आ पठनीय अछि। “असमंजसक अंत” एकटा हास्य कथा अछि आ एहि मे हास्य छै। “डाइरीक एक पन्ना सँ” एकटा घटनाक विवरण अछि जे कथा नहि बनि सकल अछि किन्तु एहि मे जे भावनात्मक तत्व छै से पाठक केँ छुबै छै। एहि कथा मे ई बात नहि पचैत अछि जे घर मे पीसी छथिन आ ओ नायक केँ राखी बान्हि लेबाक लेल कहै छथिन, तखनि नायक कोठरी मे ताला लगाए कए होटल मे खाइ लेल किऐ जाइत अछि। “भोट” चोराकए आनल गेल लीची आ लुटिकए आनल गेल जिलेबी खाइत बेदरा सभक खेलौरक बीच वोटक गपक विवरण अछि जाहि मे ओ सभ वोटक खरीद-बिक्री आ दलबदलक चर्चा करैत अछि। राजनीतिक चरित्रहीन दोगलपनी आ लोकक विरोधाभासी चेतनाक झलक संकेत रुप मे, किन्तु बहुत स्पष्टताक संग एहि कथा मे आएल अछि। एहि कथा पर ललितक “प्रतिनिधि” कथा के विषय आ शैलीक प्रभाव देखाइ दैत अछि। “भसान” एकटा मानव शरीर आ पूजाक निमित्त बनल प्रतिमाक माध्यम सँ अनश्वरताक कथा कहैत अछि। आलोच्य संग्रहक कथाकार हीरेन्द्र कुमार झा घोषित करै छथि जे ओ पाठक छथि, पाठके रहै चाहै छथि आ इहो जे ओ वस्तुत: जीवन केँ पढै छथि। हुनक ई घोषणा महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बेसी लेखक केँ पढै सँ परहेज रहै छनि। बेसी लेखक मैथिली मे चारि पंक्ति लिखलाक बादे स्वयं केँ वेदव्यास मानै लागै छथि। एतय पाठक लेल कम गुरू-आचार्य-महंथ-पीठाधीश आदि-इत्यादि सँ परिचिति, प्रमाण-पत्र, सम्मान आ पुरस्कारक आकांक्षा-लिलसाक वशीभूत भए बेसी लेखन भेल अछि। आ से स्तरीय लेखन सँ नहि साहित्य लेल वर्जित आन-आन तरीका सँ भेटि जाएब मैथिलीक दस्तावेज मे दर्ज अछि आ तेँ मैथिली साहित्यक बहुलांश पोखरि-माछ-मखान, भांग, सामा-पौती, अरिपन, तिलकौर, अरिकंचन आदि मे घुरिआइत रहैत अछि। तेँ हीरेन्द्र जीक पाठक हएबाक घोषणा स्वागत योग्य। आलोच्य संग्रह एकर लेखकक पाठक हएबाक संकेत दैत अछि किन्तु कने दोसर तरहेँ। ओ पाठक छथि किन्तु मैथिलीक प्राय: किछु खास अंशक। अन्तर्राष्ट्रीय वा अन्य भारतीय भाषा साहित्यक गप अलग, मैथिलिओ मे हुनका प्राय: शैलेन्द्र कुमार झा, रमेश, नारायण जी, अरविन्द अक्कू, शैलेन्द्र आनन्द, कुमार पवन, श्याम दरिहरे, अजित आजाद, विभा रानी आ आशीष चमन सन-सन अनेको नीक किस्सागो सभक कथा साहित्य नहि पढल बुझाइ छनि। सुभाष चन्द्र यादव आ जगदीश मंडलक कथा त ………। जँ पढल छनि त हुनक ई संग्रह तेकर प्रमाण नहि दैत अछि। एहि लेल किन्तु हीरेन्द्र जी केँ असगरे दोषी नहि ठहराएल जाए सकैत अछि। मैथिली मे लेखक त लेखक, कथा साहित्य पर समीक्षा लिखनिहार, सम्पादक-संग्रहकर्ता मे अनेक एहेन नामवर विद्वान सभ छथि जिनकर दृष्टि अपन टोल, गाम, आ लगपासक कथाकारक कथा सँ बाहर नहि जाए पाबैत अछि। किछु ज्ञानी महानुभाव एकरे प्राय: “मैथिल आँखि” कहै छथि। एहि तथाकथित विद्वान आलोचक-प्रवर सभक आलोचना पोथी सभ मे घुमाए-फिराए कए ओतबे कथा आ कथाकारक चर्चा भेटैत अछि जेकरा संग हुनक ऊठ-बैठ छनि वा जे सभ हुनक लगुआ-भिरुआ छथि, अनचोक्के कोनो आन नाम चलि आएल त से अलग बात। मैथिलीक इएह चलनक प्रताप अछि जे ललित केँ हुनक मृत्यूक बाद चिन्हल गेलनि आ शैलेन्द्र कुमार झा (आरोह-अवरोह) सन महत्वपूर्ण कथाकार अपरिचित रहि मुख्यधारा सँ कटि गेला। पुस्तक प्रकाशन आ वितरणक संग-संग पाठक तक पहुँचबाक समस्या सेहो मैथिली लेल कोंढ जकाँ भए गेल अछि किन्तु कोनो समीक्षक एकरा बहाना बनाए अपन अज्ञानक लेल एकरा अपन अढ बनाबथि, सेहो स्वीकार्य आ क्षम्य नहि अछि। “ट्रान्सफर्मर” के उदाहरण लिअ जे अखनि तक हमरा अप्राप्य छल आ कमल मोहन चुन्नू जीक माध्यम सँ समीक्षार्थ हमरा उप्लब्ध कराएल गेल। हमर अपन व्यक्तिगत पुस्तकालय मे पोथीसभक प्रचूरताक अछैतहु जँ हमरा मैथिलीक समग्र  कथा-साहित्य पर लिखबाक रहितए त की हमर कर्तव्य नहि बनैत छल जे हम अपन प्रयास सँ ई आ अपना लग अनुप्लब्ध आन-आन कथा-संग्रह एकठ्ठा करितहुँ आ तखनिए ओहि विषय पर अपन कलम चलैतहुँ? आलोच्य पोथीक अध्ययन सँ हीरेन्द्र कुमार झाक पाठक होएबाक घोषणाक पुष्टि हएब कने कठिनाह बुझाइत अछि। खबर केँ अखबार बुझि लेब एकटा अलग गप अछि। ओना “ट्रान्सफर्मर”क कथा-जगत सँ गुजरैत ई कहल जाए सकैत अछि जे एहि संग्रहक माध्यम सँ हीरेन्द्र कुमार झा मैथिलीक बहुत रास प्रायोजित कथाकार सभ सँ बहुत आगू गेल छथि। हीरेन्द्र जीक आग्रह छनि जे हुनक कथासभ केँ मैथिली कथा-साहित्यक धारा केँ ध्यान मे नहि राखि, सामाजिक परिवेश आ ओहि मे जीबैत उपभोक्तावादी मनुष्य केँ ध्यान मे राखि पढल जाय। हुनक एहि आग्रह मे जँ किनको गर्वोक्ति जकाँ बुझाबए त हमरा कोनो अचरज नहि हएत। ओ एकर माध्यम सँ अपन कथाक विराट फ़लक दिआ संकेत करैत बुझाइ छथि किन्तु हुनक पोथीक अन्तर्वस्तु एहि बातक कनिको टा समर्थन करैत नहि देखाइत अछि। हुनक कथासभ निस्सन्देह सामान्य सँ उपर अछि किन्तु मैथिलीक वायवीय आलोचना-समीक्षाक पटल पर अखनि तक अचर्चित आ अनठिआएल अनेक रास प्रतिभावान कथाकार जाहि मे किछु गोटेक चर्चा उपर कएल गेल अछि, तक पहुँचबा मे अखनि हुनका समय लगतनि, अपन घोषणाक प्रवृत्ति पर नियंत्रण राखि प्रयासरत रहए पड़तनि। ई ध्यान राखल जएबाक प्रयोजन अछि जे सामान्य पाठक आ रचनाकार पाठक मे मौलिक अंतर होइत छै। सामान्य पाठक जे पढैत अछि तेकरा ओ स्थूल रूप मे ग्रहण करबा लेल, स्मरण राखबा लेल स्वतंत्र अछि, स्वच्छन्द अछि। रचनाकार पाठक जँ एना करत त ओकरा मे भटकाव एतै। रचनाकार पाठक कोनो पोथी पढओ कि जीवन केँ पढओ, ओकरा लेल ओ सभ कच्चा माल जकाँ अछि आ ओकरा सँ ई अपेक्षा रहैत अछि जे ओ एकरा सभ केँ शुद्धता सँ ग्रहण कए अपना भीतर मथि कए, पचा कए अपन काज जोगर सूक्ष्म-तत्व केँ निकालि लिअए। आलोच्य संग्रह ई संकेत दैत अछि जे हीरेन्द्र जी एहि प्रक्रिया केँ अखनि तक साधि नहि सकल छथि आ तेँ ओ अखनि भटकावक शिकार होइ छथि। ई भटकाव हुनक कथा सभ मे विभिन्न रूप मे आबैत अछि जाहि मे अनावश्यक आ अनौचित्यपूर्ण विस्तार एकटा कारक अछि। साहित्यक कोनो विधा मे कोनो वाक्य, कोनो शब्द फाजिल नहि होइ छै आ जँ भेलै त ओ पाठक केँ वा त भ्रमित करैत अछि वा बोर। रचनाकारक काज पाठकक धैर्य वा समझदारीक परीक्षा लेब नहि होइ छै, से ध्यान राखल जएबाक चाही। पाठक हएबाक घोषणाक बाद त हीरेन्द्र जी सँ किछु बेसीए अपेक्षा हएबाक चाही। “सोन त कान नहि”, “धनात धर्मम्”, “उभयचर”, “भीआरएस”, आदि एहि संग्रहक कथा सभ एहि विस्तारजनित भटकावक शिकार भेल अछि। एहि संग्रहक अनेक कथा एहि महत्वपूर्ण तथ्य दिस सेहो संकेत करैत अछि जे कथाकार शीर्षकक महत्व केँ गंभीरता सँ नहि लेलनि अछि। ई ध्यान राखल जएबाक चाही जे कथाक शीर्षक कथाक ताला केँ खोलबाक सटीक कुंजी होइत अछि, संग्रहक भुमिका नहि। एकटा सटीक शीर्षकक उपयोग कोनो कथाक अर्थ केँ व्यापकता, रूप केँ वास्तविकता आ अन्तर्वस्तु केँ समग्रता सँ भरि दैत अछि। कखनिओ-कखनिओ त जे बात संपूर्ण कथा मे प्रत्यक्षत: कतहु नहि देखाइत अछि से ओकर शीर्षक जगजियार कए दैत अछि। उदाहरण लेल शैलेन्द्र कुमार झाक “आरोह-अवरोह”, शैलेन्द्र आनन्दक “घरमुहाँ”, अरविन्द ठाकुरक “अन्हारक विरोध मे” (अपन पोथीक चर्चा लेल क्षमासहित), श्याम दरिहरेक “बड़की काकी एट हाटमेल डाट काम”, विभा रानीक “खोह सँ निकसैत”, रमेशक “दखल” आ “समानान्तर” आदि संग्रहक कथा आ नारायण जी, अरविन्द अक्कू, कुमार पवन, अजित आजाद, आशीष चमन आदिक विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित कथा सभ केँ देखल जएबाक चाही। पुरनका पीढी मे ई खासियत आ सजगता ललित, धूमकेतु, राजकमल चौधरी, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी आदिक कथा मे देखाइ पड़ैत अछि। हीरेन्द्र जीक “सोन त कान नहि”, “कम्प्रोमाइज” सन कथा सटीक शीर्षकक अभाव सँ ग्रसित भेल अछि। “कम्प्रोमाइज” शीर्षक केँ जस्टिफाइ (न्यायोचित सिद्ध) करबाक लेल त कथाकार एहि कथाक दशे-दिशा बिगाड़ि देने छथि। एना लागैत अछि जे शीर्षक पहिने देल गेल आ कथा बाद मे लिखल गेल अछि। एहि मे कथाकार पुतुलक मानसिक उहापोहक (जेकर कोनो तर्कसंगत औचित्य नहि बुझाइत अछि) वर्णन करैत-करैत, नारीवादक अनेरुआ पैरोकार बनैत-बनैत एकदम सँ पुरुषक पक्ष मे चलि जाइ छथि। बिगड़ल केँ सम्हारए आ स्वयं केँ आधुनिक आ नारीवादी देखैबाक चक्कर मे कथाकार एकटा प्रेम-मनुहारक कथा केँ गलत शीर्षक दए आ फेर ओहि शीर्षक केँ जस्टिफाइ करबाक लेल कथाक अंत मे पुतुल सँ कम्प्रोमाइज बला गप कहबा कए अनेरे भ्रमित होइतहु छथि, करितहु छथि। कथाक समापन जाहि भावनात्मक ढंग सँ होइत अछि ताहि मे कम्प्रोमाइज सन गप कतय सँ अएलै से पाठक सोचितहि रहि जाइत अछि। कथाकारे जँ अपन कथाक कथ्यक प्रति भ्रमित रहत त ओ मूल रूप मे पाठक केँ केना पचतै? हीरेन्द्र जीक दुराग्रहक हद तक जाइत एकटा आओर आग्रह अंगरेजी शीर्षकक प्रति एहि संग्रह मे देखाइत अछि। जँ एकरासभ केँ लोक-वेदक बीच प्रचलित हएबाक तर्क केँ सोझाँ राखिओ ली त एकर भ्रष्ट प्रयोगक की औचित्य? ट्रान्सफार्मर, वोट, क्वार्टर, रिजर्वेशन,वीआरएस शुद्ध प्रयोग हेतै, ट्रान्सफर्मर, भोट, क्वाटर, रिजर्भेशन, भीआरएस नहि, जेनाकि लेखक कएने छथि। ओना त मैथिली मे प्रचण्ड-शुद्ध रामराज छै। जेकरा जेना मन होइ छै तहिना लिखै ए, अपन वर्तनी अपने बनबै ए। मैथिलीक पुरोधा साहित्यकार-व्याकरणाचार्य लोकनि वर्तनीक एकरूपताक नाम पर फाइव-स्टारी मौज लैत लाखक-लाख यात्रा-भत्ता उठाए रहल छथि आ फेर अपन कबीला मे घुरि अपनहि धुन-ताल पर गाबले गीत गाबि रहल छथि। तेँ असगरे हीरेन्द्र जी पर दोष किऐ देल जाए? हीरेन्द्र कुमार झा जन-जीवनक नीक पर्यवेक्षक छथि आ से बात हुनक घोषणाक अनुसार हुनक एहि संग्रह मे परिलक्षित सेहो होइत अछि। किन्तु एतहि हुनक एकटा कमजोरी सेहो अभरि कए सोझाँ आबैत अछि। रचनाकारक चहुतरफ बहुत रास चीज अपन बहुआयामी रूप मे उपस्थित अछि आ बहुत रास उथल-पुथलक संग अनेक रास घटना घटैत रहैत अछि। स्रृष्टिक ई विविधता आ व्यापकता जे छै से रचनाकारक लेल रा-मैटेरियल अछि आ तेकरा मे सँ रचनाकार अपन रचनात्मक बुद्धि-विवेक सँ अपन काजक  वस्तु चुनि समुचित मात्रा मे रचनाक विभिन्न विधाक बेगरतानुसार ओकर उपयोग करैत अछि। क्वालिटी आ क्वान्टिटी (गुण आ मात्रा) के सटीक समिश्रणे सँ कोनो नीक आ अमोल रचना बनि कए बहराइत अछि। से नहि भेने रचना धड़ाम! रचनाकारक आब्जर्वेशन (पर्यवेक्षण) के क्रम मे जे किछु पकड़ाएल ताहिसभ केँ एकहि ठाम जेना-तेना ठुसने जाइ त ओ साहित्य नहि भए कए किदन-कहाँदन त भैए जाएत, रचनाकारक चयन-ग्रहण-विवेक पर प्रश्न सेहो ठाढ करत। कथाकार हीरेन्द्र जीक पर्यवेक्षण क्षमताक गवाही त आलोच्य संग्रह दैत अछि किन्तु गुण आ मात्राक तालमेलक समझ अखनि तक हुनक सम्हार मे आएल नहि बुझाइत अछि। एकर नतीजा ई भेल अछि जे ओ कथा कहबाक सत्ती कथा बनबै मे लागल बुझाइ छथि आ ओकर विश्लेषण आ निष्कर्षक काज सेहो संगे-संग करैत चलै छथि। संभव अछि जे ई प्रयासपूर्वक नहि, अपन अवचेतनक निर्देश पर करैत होथि, किन्तु एहि प्रवृत्ति पर नियंत्रण साधबाक लुरि त हुनका अपने विकसित करै पड़तनि। किऐक त एहि सँ कथाक रोचकता आ पठनीयता पर नकारात्मक असर पड़ैत अछि। हीरेन्द्र कहै छथि जे हुनक कथा मे “एकटा ढंगक चरित्र निर्माण नहि भए पबैत अछि”। जँ ओ अपन एहि कमजोरी केँ चिन्है छथि त हुनका “कम्प्रोमाइज” सन कथा लिखए सँ परहेज करबाक चाही। शीर्षक आ कथाकारक मंशाक अनुसार एहि कथा मे नायिकाक सक्कत आ संघर्षशील चरित्र अभरि कए अएबाक चाही छल किन्तु तेकर विपरीत ओ एकदम सँ लरगुज भए गेल अछि। तखनि, संग्रहक भुमिका मे भीमनाथ झा लिखै छथि जे हीरेन्द्र जी केँ विकासक आर आवश्यकता छनि, कथा केँ कसब सीखथु, मर्म केँ स्पर्श त करैत अछि मुदा प्रभाव केँ आर तीव्र बनयबाक चेष्टा करथु, भाषा केँ आर माजथु ; आ ओतहि विभुति आनन्दक मन मे ओ एकटा खिच्चा सपना बनि कए डिभिआएल छथि ; आ आओर त आओर स्वयं कथाकार अपन एहि संग्रह केँ कथा-संग्रह नहि कहि, कथाक मोटरी वा बोझ सनक कोनो वस्तु कहब केँ बेसी उपयुक्त बुझै छथि ; तखनि कोनो पाठक वा समीक्षक लेल आओर किछु विशेष कहबाक जोगर बचैत की अछि – शुभकामनाक अतिरिक्त। 1995 मे मराठीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार कुसुमाग्रज (वि वा शिरवाडकर) सँ नासिक(महाराष्ट्र) मे भेंट आ दीर्घवार्ताक सौभाग्य भेटल छल। ओ एकटा मंत्रवाक्य कहने छला – “ लिखू, खूब लिखू, लिखले सँ भाषा समृद्ध होइत अछि”। कुसुमाग्रजक ओहि मंत्रवाक्यक परिपेक्ष्य मे ई त कहले जाए सकैत अछि जे हीरेन्द्र कुमार झाक “ट्रान्सफर्मर” सँ मैथिली साहित्य समृद्ध भेल अछि – श्रीवृद्धि करओ नहि करओ, मात्रावृद्धि त भेबे कएल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। किछु विहनि कथा- अरविन्द ठाकुर १ सत्ता-चरित अत्याधुनिक तकनीकबला एहि युग मे ई मकान कनी अजीब सन रहय। एकदम गोलाकार। एनमेन त नहि, किन्तु कनी-मनी संसद भवनहि जकाँ पुरान स्थापत्यक नमूना। अही मकानक एकटा भाग मे भाड़ा पर रहैत छला हमर मित्र। हम सभ मित्रक कोठली मे रही। जेना-तेना बहुत भाँजक बाद ई अवसर भेटल रहय। कोठली भीतर सँ बन्द रहय आ हम सभ प्रतिबन्धित फिल्म देखैत रही। गैरकानूनी आ असामाजिक करतूतक अपन एकटा अलगहि रोमांचक आनन्द होइ छै। सम्पूर्ण कोठली हमर सभक अभद्र-कामुक टिप्पणी, उत्तेजक सिसकारी आ गरम-गरम उसांस सँ भरल रहय। हँ , हम सभ अहि लेल अवश्य अतिरिक्त रूप सँ चौकस रही जे स्वर कनी दबले रहय आ हमर सभक किरदानीक भनक कोठली सँ बाहर नहि जाय, सार्वजनिक नहि हुअय। पहिलका सीडी मे देशी पात्र सभ रहय। ओकर बाद दोसर सीडी लगाएल गेलय जाहि मे विदेशी पात्र सभ रहय। एह ! जिनगीक खुलस्ता मजा बहि ई विदेशीए सभ लैए ! सीडी खतम भेल त हम सभ निर्वाक भेल रही – इस्स ! एहन एहन खेल !! खट ! खट ! खट ! केबाड़ी पर चोट पड़ल। चोटक प्रभाव कोठलीक निस्तब्धता कें आतंकवादी विस्फोट जकाँ चिर्रिचोथ कएने चलि गेल। हम सभ गोटे आतंक सं भरि गेलहुं। केकरहु बकार नहि फुटलय। कनी देर तक अपन-अपन आँखि मे बड़का-बड़का प्रश्नवाचक चिन्ह लेने एक-दोसराक दिस बकर-बकर ताकैत रहि गेल रही – बस। टीवी बन्द कएल गेल। सीडी कें बिछौना तर नुकाएल गेल। सभ गोटे अपन-अपन चेहरा पर भद्रताक आवरण ओढि जन-प्रतिनिधि जकाँ अपन-अपन आसन पर संच-मंच बैसि गेलहुं। आ तखनि जाए कए हमर मित्र आगू बढि केबाड़ी खोललक। बाहर मे मकान मालिकक समदाही (दोसर पत्नी) ठाढ रहय। केश छिड़िआएल, आँखि लाल टेस, अंचरा जेना-तेना देह पर फेकल आ लाल भेल चेहरा आगि सँ लह-लह करैत। ओकर अवस्था कें क्रोधाधिक्यक परिणाम बुझि  हमर सभक प्राण सुखि गेल। ओ मित्र कें धकिआबैत कोठली मे घुसि अएलीह। फेर पलटि कए खुललाहा केबाड़ी कें भिड़यलनि, छिटकी लगयलनि आ हमरा सभक दिस घुरि कए बोलीक गोली दागलनि – ‘इएह सभ करय छी अहाँ सभ बन्द कोठली मे ?’ हम सभ गोटे समवेत स्वर मे “ कहाँ किछु…कहाँ किछु “ कहैत लटपटाइत बोली मे सफाइ दिअय चाहलियनि। ओ फनफनाइत बाजलीह – “ झूठ नहि बाजय जाउ। अहाँ सभक सभटा किरदानी, सभटा देशी-विदेशी खेला हम देखलहुं। अप्पन आँखि सँ – ओहि भुरकी दके।“ हम सभ गोटे अपराधी मुद्रा मे एकदम सँ सकदम। हुनक स्वर मे आवेश रहनि। स्वर पहिनहुं मद्धिम रहय, जेकरा ओ और मद्धिम कयलनि आ फुसफुसाइत जकाँ बाजलीह – “ तेसरो ए की ?” २ स्वयंभू जेना कोय अपन बापक जमीन्दारी मे टहलान मारय लेल बहरायल हुअय, तहिना ओ बहुत अगरायल-मगरायल जकाँ हमर कैम्पस मे घुसल। हम कनडेरिए ओकरा दिस ताकलहुं। ओकर सुडौल देहयष्टि पर मलमलक गेरुआ वस्त्र छलमलाइत रहय। माथ पर घटाटोप रक्त-चन्दनक लेप। ओकर अवलोकनक क्रम मे हमर दृष्टि ओकर चरण दिस गेल। एह ! बेस दामी ब्रैण्डेड चप्पल। वयस प्राय: तीस-पैंतीसक लपेट मे। गोर दपदप मुखड़ा पर कारी-कारी दाढी-मोंछ – एकदम मान-मनोहर। अकस्मात मन पड़ि गेला जीवनेश्वर बाबू। कहैत रहथिन जे दाढी चारि तरहक होइ छै – चिलम-चूतिया, लहसून-गांड़ी, मान-मनोहर आ दालम-दाला। एकरा ओ ततेक तेज गति सँ बाजैत रहथिन जे सभटा प्रकार एक-दोसरा मे ओझराए-मिझराए कए एकमएक भए जाइत रहय – चिलमचूतियालहसूनगांड़ीमानमनोहरदालमदाला। से खिस्सा अलग। जखनि ई मान-मनोहर दाढी-मोंछबला मलमलक गेरुआ-वस्त्रधारीक शुभागमन हमर कैम्पस मे भेल रहय तखनि हम अपन हाथ मे खुरपी लेने दूटा छोटकी करोटनक पौधा रोपैक नियार मे कियारी लग बैसल रही। एहन नौटंकीबाज पुरहितिया समुदायक प्रति हमरा मन मे कोमलता लेशमात्रहु नहि रहैत अछि। आ आब त अहि बिना पूजीक करगर मोनाफाबला धंधा मे विभिन्न जातिक लोक सेहो खुबे आबि रहल अछि। आब अहि मे पुरहित-वर्गक एकाधिकार नहि रहलय। से अहि देशक विभिन्न प्रदेश मे ठाम-ठाम उगल छोट-नमहर मंदिर आ आश्रमसभ अपन कथा अपनहि कहय ए। तखनि, दुआरि पर आयल मांगनिहार कें किछु भेट जाय, ओ खाली हाथ नहि जाय, तहि पारिवारिक परम्पराक अनुपालन त भरिसक करिते छी। ओ कोनो शहंशाह जकाँ हमर निवास-भवन आ फुलबाड़ी कें हियासैत हमरा दिस ताकैत बाजल – “ मकान आ फुलबाड़ी त राधा बाबूक सेहो बड़ भव्य अछि किन्तु ओ अहाँक पासंगहु मे नहि। अहा हा, अतिसुन्दर, अतिरमणीक।“ खड़ी बोली मे बाजल ओकर गप सुनि हमर कान ठाढ भेल। हमरा लागल जेना ओ कोनो रेफरी जकाँ हमरा राधा बाबूक प्रतिद्वन्द्विता मे सोझा-सोझी ठाढ करबाक प्रयास मे हमर चापलूसी करैत हुअय। ओना हमरा लेल ई कोनो नव बात नहि रहय। हमर शहर मे हमर आ राधा बाबूक राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता जगजाहिर छै आ कखनिओ काल हमरा चिढाबैक लेल या हमर चापलूसी करबाक लेल अनेक लोकसभ एहन टिप्पणी करैत रहैत छथि। अखनि किन्तु एकटा साधुवेशधारीक मुँह सँ एहन वचन सुनि अचरज भेल, अनकठ्ठल सन लागल। अहि सँ और किछु हुअय ने हुअय, हमरा अहि अनामंत्रित आगन्तुकक औकाति आ चरित्र बुझाए गेल। हम अपना दिस सँ एकहु टा शब्द नहि बाजलिअय। हम अपन काज करैत बीच-बीच मे ओकरा दिस ताकि टा लैत रहिअय, बस। हमर चुप्पी सँ असहज भेल ओकर मुँह सँ ओकर अभीष्ट बहरयलय – “ किछु भेट जाय अहि दरबार सँ।“ ता हम दुनू करोटन रोपि चुकल रही। उठिकए बरण्डा लग आबि, खुरपी राखि बाड़ीबला नल पर आराम आ सहजता सँ अपन हाथ धोलहुं। बरण्डा पर चढि घरक भीतर अएलहुं। ओ बाहरहि मे ठाढ रहल। खुट्टी पर टांगल अपन कपड़ाक जेबी मे हाथ देलिअय त दू टा सिक्का हाथ मे आएल – एकटा पँचटकिया आ एकटा दूटकिया। क्षण भरिक असमंजसक बाद पँचटकिया कें जेबी मे वापस राखि दूटकिया लेने बाहर अएलहुं आ ओकरा दिस ओ सिक्का बढाए देलिअय। ओ एक बेर सिक्का दिस आ फेर हमरा दिस ताकलक। ओकर आँखि मे हमरा प्रति सौंसे सृष्टिक घृणा लपलप करैत धधरा मारैत रहय। हम ओहि धधरा सँ एकदम अप्रभावित भेल दोबारा ओकरा सिक्का लए लेबाक इशारा केलिअय। “ ई की दए छिअय ! एतेक बड़का दरबार……” – ओ ठोढ टेढ करैत बाजल। हम मौन त रहबे करी, ओकर औकाति तौललाक बाद दृढ सेहो रही आ बिना एक शब्द बाजने फेर ओकरा दिस सिक्का बढैलिअय। “ ई त भिखमंगाक रेट छिअय। हम त संत छी। “- कहैत ओ घृणा आ धिक्कारक दृष्टिए हमरा दिस ताकलक आ हमरा दिस अपन पीठ कयने बरण्डा सँ नीचां उतरि गेल। हम अहि अध्याय कें समाप्त मानी कि नहि मानी से सोचैत कोठली दिस घुरबाक उपक्रम करितहि रही कि ओ बरण्डा सँ उतरलाक बाद अकस्मात फेर हमरा दिस घुरल। “लाउ, दए दिअ। अहाँक एतबेक श्रद्धा अछि त…” अहि बेर ओ खड़ी बोली बिसरि गेल आ शुद्ध मैथिली मे बाजल । हम बरण्डाक कोर पर आबि ओकर पसरल हाथ पर दूटकियाक सिक्का राखि देलिअय। सिक्का ग्रहण करितहि ओ पलटि कए कैम्पसक गेट दिस बढि गेल। जाइ बेर किन्तु ओकर पएर हल्लुक आ तेज रहय, जेना देह पर सँ जमीन्दारीक बड़का भारी बोझ उतरि गेल हुअय। एक बेर फेर मन पड़लाह जीवनेश्वर बाबू आ हुनक कहल दाढीक प्रकार। किऐ ने किऐ, हमरा भक भेल जे जाइत काल साधुवेशधारीक दाढीक प्रकार सेहो प्रथमबला भए गेल हुअय। ३ दुर्गन्ध ई हमर सौभाग्य जे देवनारायण बाबू हमरा अहिठाम आबैत रहैत छथि। हुनक व्यक्तित्वक आभा सँ हम सदैव चोन्हिआयल रहल छी। मोटका खादीक बिन कलफक धोती-कुर्ता-बण्डी, मुँह पर खुटिआयल खिचड़ी दाढी आ कन्हा पर सदैव लटकल सर्वोदयी झोरा हुनक समाजवादी कलेवर कें जगजियार कयने रहैत अछि। तीस वर्ष सँ बेसीक हुनक राजनीतिक जीवन घोर संघर्षमय रहल अछि। अछुतोद्धार सँ प्रारम्भ हुनक सामाजिक जीवन धर्म-निर्पेक्षता, सम्पूर्ण क्रान्ति आ सामाजिक न्याय सन-सन अनेको सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता सँ लैस रहल अछि। लोहियाक आह्वान पर एक जमाना मे ओ अपन जनेउ तोड़ि फेकि देने छलाह जेकरा चलते बभनटोली हुनका बारि देने छलनि आ कोनो यज्ञ-प्रयोजन मे हुनका निमंत्रणादि देब प्रतिबन्धित भए गेल छल। देवनारायण बाबूक लेल किन्तु धनि सन। ओ अपन घर सँ लागले जकाँ बसल धनुकटोली, चमरटोली आ दुसधटोली कें अपन समाज बनाए लेने छलाह आ ओकरे सभक जागरण मे रमि गेल छला। मंच सँ नेहरू-गांधी कें ट्रेटर, कांग्रेसीसभ कें अंग्रेजक उत्तराधिकारी आ पुरहित-वर्ग कें सामाजिक विखण्डनक जिम्मेदार कहब हुनक ट्रेडमार्क जकाँ बनि गेल छल। किछु दिन पहिने कोय कहने छल जे एम्हर देवनारायण बाबूक सम्पर्क सरकारी खेमा सँ खूब बढल अछि। फेर सुनय मे आयल जे ओ सत्ता-पार्टी ज्वाइन सेहो कए लेलनि। बीच-बीच मे आनो-आन नीक-बेजाय बातसभ हुनका दिआ सुनय मे आबैत रहैत रहय आ हम ओकरा एक कान सँ सुनि दोसर सँ बाहर कए दैत रही। सार्वजनिक जीवन मे रहनिहार लोक चर्चा मे रहितहि अछि आ लोकसभ अपन सुविधानुसार ओकरा दिआ खिस्सासभ बनबैत रहैत अछि। तें सत्ता-प्रतिष्ठानक विरुद्ध सतत ठाढ रहल देवनारायण बाबू दिआ कहल गेल ईहो टटका गप हमरा कोनो अफवाहे जकाँ बुझायल रहय – राजनीतिक विद्वेष सँ भरल गपैती जेकर कोनो गोड़-मूड़ी नहि होइ छै। पछिला बेर आएल रहथि तखनिओ एकटा सनसनीखेज खबर वातावरण मे पसरल रहय हुनका दिआ। की त हुनक बेटी एकटा हरिजन संग भागि गेलनि। किन्तु चाय पिबैत काल हुनके मुँह सँ यथार्थ गपक जनतब भेल रहय। हुनकर गाछ छाप समाजवादी पार्टीक एकटा मित्र रहथिन महावीर राम जे कालान्तर मे कांग्रेस पार्टी मे सम्मिलित भए विधायक भेला आ बाद मे मंत्री सेहो। पार्टी बदललाक बादहु दुनू गोटेक मैत्री बनल रहल छलनि। देवनारायण बाबू जाति-पाति मानितहि नहि छलाह आ महावीर राम सेहो हुनके विचारधाराक लोक। देवनारायण बाबूएक अनुसार दुनू मित्र अपन आपुसी सहमति सँ परस्पर मैत्री कें विधिवत सम्बन्ध मे बदलबाक निर्णय कयलनि आ महावीर बाबू हुनक पुत्री कें अपन पुत्रवधू स्वीकार कए मित्र सँ समधि भए गेलाह। लोकक मुंह कें के रोकत। कहैत रहओ लोक अंट-बंट। तें हम लोकक गप मे नहि पड़ैत रही। देवनारायण बाबू हमरा अहिठाम आबय छथि हमरा अपन लोक बुझिए कए ने आ से हमरा लेल यथेष्ट रहय। देवनारायण बाबू हमरा अहिठाम आबथि, चाय पीबथि आ अपन गपक क्रम मे एकदम स्वाभाविक तौर पर अपना दिआ पसरल कुप्रचारक खण्डन कए जाथि। हमरा कोनो अतिरिक्त जिज्ञासा हुअय त से हम पुछि लैत रहियनि आ ओ बिना लाग-लपेट के तेकर उत्तर दए हमरा संतुष्ट कए देथि। दू-तीन मासक अन्तराल पर अहि बेर ओ अएलाह त स्वाभाविक तौर पर हमर मन अनेक रास जिज्ञासु प्रश्नसभ सँ भरल छल। किन्तु अहि बेर किछु एहन सन भेल जे सभटा प्रश्न मनहि मे रहि गेल, पुछबाक अवसरहि नहि भेटल। आन बेर असगर आबैत छलाह आ केतबो देर बैसथि त चायक अलावा कोनो चीज नहि लेथि। एकाध बेर जलखैक कोनो सामग्री मंगैलियनि त ओ बिगड़ि गेल छलाह – ‘ई सभ सामन्तवादी ढकोसला छै। समाजक हाशिया पर बौक भेल ठाढ अन्तिम आदमी जा तक भुखल छै हम सभ ई अय्यासी केना कए सकय छी !’ अहि बेर हुनका संग चारि गोटेक जमात रहनि। सभ गोटे कें बैसाबिते रही कि ओ खूब अधिकार भाव सँ किछु चाय-जलखै के फरमाइस ठोकि देलनि। हुनकर बदलल बग्गय-बानी हमरा चकित कए देने रहय। चेहरा एकदम क्लीन-शेव्ड आ नील-टिनोपाल सँ चकचक कलफदार धोती-कुर्ता मे ओ जेना ओ नहि छलाह। सदति बेमाय फाटल पैरक सहोदर बनल ओ हवाइ चप्पल अहि बेर अलोपित भए गेल छल आ ओतय चढल छल चेरी ब्लासम सँ चमचमाइत काफ लेदरक दामी हाफ शू। हमर बाहरी कमरा हुनक आबितहि आन बेर जकाँ घामक फोकराइन गंध सँ नहि हुनक देह सँ आबैत रजनीगंधाक अत्तर सँ सुगंधित भए गमगमाए उठल। हम हुनक हाल-चाल पुछबाक नियार करितहि रही कि हुनक तुरछल टिप्पणी आयल – ‘ एह ! अहाँ दिस अएबाक डगर बड़ घिनायल अछि।‘ टिप्पणी यथार्थ होइतहु अप्रत्याशित रहय तें हमरा धक्का जकाँ लागल आ हमर अकबकी टुटि गेल। हुनक दिव्यताक आभा सँ घकुचल-थकुचल हमर बाह्याभ्यंतर अपराधबोध आ हीनताबोध सँ एकहि संग ग्रसित होइत हमर थरथराइत ठोढ सँ अपन स्पष्टीकरण देबय लागल – ‘ अहाँ कें त बुझलहि ए जे बगलहि मे दलित सभक टोल छै। ओकरासभ कें कतय शौचालय आ सेफ्टी टैंकक सुविधा-सुभीता ! वर्षा-बुन्नीक समय से छै। खेत कि बंसबारि कि गाछी सभठाम पनिए-पानि। कतय जएतै ? तें डगरेक कात मे निबटैत अछि। तें।‘ ओ तमतमायल बाजलाह – ‘ ईह दलित ! टोलक छौड़ा सभ जिन्स ढांठने रहय ए, मौगीसभ रंग-बिरंगक साड़ी आ तर मे ब्रा-पैन्टी पहिरने रहय ए आ हगत लोकक कपार पर ! एह ! दुर्गन्ध सँ नाक फाटि गेल। ‘ देवनारायण बाबू भनभनाइतहि रहथि ता अंगना सँ चाय-बिस्कुट-निमकी आबि गेल रहय। सभ गोटेक ध्यान ओनहि चलि गेलय। देवनारायण बाबू आ हम एकहि संग चायक कप उठैलहुं। देवनारायण बाबू निमकी-बिस्कुट संग चायक चुस्की लैत आगू की-की बाजलाह से ग्रहण करय सँ हमर श्रवणेन्द्रीय मुकरि गेल। हमर घ्राणेन्द्रीय संवेदनशीलताक हद पार कए एकटा असहनीय दुर्गन्धक अनुभूति करय लागल। हम शिष्टाचारवश चाय पीबय मे देवनारायण बाबूक संग दिअय चाहैत छलहुं किन्तु ओ अज्ञात दुर्गन्ध हमरा सहल नहि गेल आ हम चायक भरल कप नीचा राखि देल। हमर एहि अशिष्टता दिस देवनारायण बाबूक दृष्टि गेल रहनि कि नहि से हमरा नहि बुझल अछि। ४ यूटोपिया राजनीति सँ मोहभंग की भेलनि, शंकरदेव सौंसे दुनियाँ सँ अपना केँ काटि लेलनि। विध करय लेल कखनिओ केँ कोनो गैरराजनीतिक स्वयंसेवी संगठनक कोनो-कोनो आयोजन मे चलि जाथि, कहिओ काल अपनहि कोनो साहित्यिक गोष्ठी-तोष्ठीक आयोजन कए लेथि, बस। हुनक सार्वजनिक जीवन एतबेटा रहि गेल छलनि। अहिसभ सँ जे अफरात समय भेटलनि, तेकर प्रतिफल छल हुनक घरक आगूक फुलबाड़ी। एक सँ एक दुर्लभ प्रजातिक फूल,सजावटी पौधा आ औषधीय वनस्पति सँ सजल ओहि फुलबाड़ीक सौंसे परोपट्टा मे प्रशंसा होइ। शंकरदेव प्राय: भरिदिन ओही मे लागल रहैत छलाह। कियारी मे खुरपी आ खाली जगह पर झाड़ू – सभ अपने सँ। एकर नियमितता सँ कोनो समझौता नहि। सौंसे दुआरि आ फुलबाड़ी विलक्षण रूप सँ चिक्कन-चुनमुन रहैत छल। राजनीतिक जीवन मे जेहेन दुनियाँ-जहानक कामना आ परिकल्पना ओ करैत छलाह से प्रकारान्तर सँ हुनक फुलबाड़ी मे सजीव भेल छल। एम्हर चारि-पाँच दिन सँ शंकरदेवक दिनचर्या मे ठमकी लागि गेल छलनि। अहि बीच ओ जेना अपनहि आप सँ गप्प करथि आ निष्क्रिय ओझरी मे ओझरायल बुझाथि। गुमशुम रहथि। कत्तय खुरपी, कत्तय झाड़ू ! सौंसे फुलबाड़ी आ कैम्पस मे खढ-पातक पथार लागल। कत्तहु सँ उड़िया कए आयल एकटा पोलिथिनक झोड़ा मुस्टण्डाक गाछ मे लटकल। गुटखाक दू-तीन टा खलिया पाउच से इसरगतक जड़ि लग फेकल। पीयरका गुलाब पर पान वा गुटखाक पिरकी आ कामिनी लग सिगरेटक दू टा जरलहा टोंटी। लिलीक कतार लतमर्दन सँ रायछित्ती भेल। पुत्र केँ चिन्ता भेलनि – बाबूजी ई सभ त बर्दास्त नहि करय छथि ? पाँचम दिन ओ गप्प करबाक नियार कएने अपन हाथ मे दू कप चाय लेने आयल। शंकरदेव अपन स्टडी-रूम मे अनमना भेल, देबाल पर टहलान मारैत गिरगिट दिस ताकि रहल छलाह। पुत्र एकटा कप हुनक आ एक कप अपन आगू राखि हुनक सोझाँबला कुर्सी पर बैसि गेल। पुछलकनि - ‘बाबूजी, मन नीक ए ने ?’ ‘हँ, ठीके-ठाक अछि। से की ?’ ‘ नै, बड़ गुमसुम देखय छी।‘ ‘से कोनो तेहेन बात नै।‘ ‘ चारि-पाँच दिन सँ अहाँ फुलबाड़ी सँ विमुख जकाँ भेल छी। ओ त अहाँ लेल काज नै, अहाँक सख अछि। आ फुलबाड़िए किऐ, पोतो-पोती सँ अहाँक टोक-चाल बन्द अछि। हमरासभ केँ केनादन ने लागि रहल अछि।‘ शंकरदेव बड़ी काल तक चुप रहलाह। चाय केँ रसे-रसे घोंटे-घोंट पीलनि। तमाकुल लटयलनि। पुत्र हुनक मुँह दिस ताकैत रहल। तामाकुल झाड़ि, ठोर तर राखि शंकरदेव पुत्र दिस उन्मुख भेलाह – ‘हओ ! मंत्री भेल अपन अहिठामक विधायक राजनीति मे हमरा सँ बहुत कनिष्ट छल। प्राय: पन्द्रह वर्ष पर अपना अहिठाम आयल। फेर चुनाव छै आ अहि बेर स्थिति डगमग छै तेँ आयल, किन्तु आयल। खूब तरक्की कयलक ए पट्ठा। ओकर गाड़ी देखलहक ? दस-एगारह लाख सँ कम के नै हेतय। सौंसे दुआरि पर ओहि गाड़ीक चक्का के चेन्ह पड़ल छै। झाड़ू दए कए ओहि चेन्हसभ केँ मेटयबाक मने नै होइ ए।‘ एतेक कहि शंकरदेव बड़ी जोर सँ निसास छोड़लनि आ फेर भनभनाइत जकाँ बाजलाह – ‘अजीब बेहुदा बात छै ! एकदम बेहुदा बात ! तखनि मन के की .………’ अपन गप केँ आधा-छिधा छोड़ि ओ एक बेर फेर दीर्घ निसास छोड़लनि आ असुरता मे सठि गेल चायबला कप फेर सँ उठाकए पीबाक उपक्रम करय लगलाह। ५ आदान-प्रदान “ हे रओ, माय करय कुटाओन-पिसाओन आ बेटाक नाओं दुर्गादत्त रओ !” “ हँ रे, बाप पढय पतरा आ बेटा जेबकतरा, तें ने रे ! “ “ ठहरह, सार ! “ “ आबह, सार ! “ अहिंसा ( कथा-6)                                    अरविन्द ठाकुर “ हमरो दे। “ “ ………………” “ कनी दे। “ “………………” “ रे ! कनिए दे ने। “ “………………” “ ठीक छै ! आइ सँ कट्टिस। “ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पद्य-१. किछु कविता- अरविन्द ठाकुर २. किछु आजाद गजल- अरविन्द ठाकुर १ किछु कविता- अरविन्द ठाकुर सुनू जयद्रथ !  (कविता-1) एकरा काठी जुनि देखायब कि हमर कविताक अनगिनत पृष्टक बीच अखनि सुतल पड़ल अछि बारूद एकर मुँहथरि पर जुनि आयब कि हमरा भीतर मथल जाए रहल विचार घुटैत-धधकैत बेचैनी सुख-दुख के पानि-आगि किछु और-और वस्तु सँ मिलि लए रहल अछि रूप तरहि-तर खौलैत ज्वालामुखी के अहि सँ भ्रमित जुनि हएब कि आइ बृहन्नला बनय पड़ल अछि अर्जुन कें ई भावी समर के पूर्व तैयारी थिक ओ जखनि आएत धनुर्धारी जकाँ आएत देखैत-बेधैत चिड़ैक आँखिक अपन लक्ष्य सुनू जयद्रथ ! अहि बेर कृष्णक मायाक मुँह नहि जोहल जाएत शुरू करब अहाँ जँ समर सूर्यास्त तक प्रतीक्षा नहि करब हम दू मित्र  (कविता-2) ओ छलाह ओ सेहो छलाह एक सँ एक मुमताज हस्तीसभ मंच पर मौजूद छल उड़ि रहल छल भाषणक दूधिया उज्जर हंस भीड़ सँ दलमलित छल शहरक मैदान नारा…………लफ्फाजी………किदन-कहाँ अहिसभ सँ अलग अपन घरक एकान्त मे देर तक उजास सँ दुलार करैत रहल ओ फेर कलम राखि अपन अंगुरी सोहरएलक कोठली सँ बहराकए एकटा नेना कें चुमलक अपन नील आँखि सँ आकाश कें पीलक सुरुज दिस ताकि ओ मुसुकायल – हओ मित्र ! तों असगर हमहुं असगर तोरा लग प्रकाश हमरा लग कविता हम हत्या करए चाहए छी ( कविता-3) ओकर झोरा मे बहुत रास वस्तु अछि जेकर ओ बेर-बेगरते अप्पन आ मात्र अप्पन हक मे इस्तेमाल करैत अछि नीक लोकक आँखि लेल गरदा अछि ओकरा लग टेढसभक लेल चमचै कायरसभक लेल धमकी सत्तासीन आ सत्तातुर लेल वोटक ठेका अफसर लेल रैजकी आ विशिष्ट लोकक विशिष्ट अंग लेल पुष्ट मात्रा मे तेल अछि ओकरा लग ओ सभदिन भोरहि उठि महादेव नामक कोनो भगवानक लिंग पुजैत अछि आ अहि तरहें अपन सौभाग्यक लेल दिनक प्रारम्भ करैत अछि ओकर लोल नहि देखाइछ ओ कठफोड़बा जकाँ समाजक काठ कें खोधैत-फोड़ैत रहैत अछि ओकर ठकठकी सुनि नहि पाबैछ लोक ओ हँसैत अछि हरमजदगी के हँसी जेना कैक्टस मे फड़ल हो फूल आ कानैत अछि हबोढकार गरा मे कण्ठी बान्हने सोंसि जकाँ ओ नियमित रूप सँ नित्तह ईसा, गांधी आ लूथर किंग केर नाम जपैत अछि आ अहि तरहें स्वयं कें विज्ञापित करबाक खर्चा बचाए लैत अछि ओ नियत तिथि कें प्रति वर्ष गांधीक समाधि पर जाइत अछि भिजायल आँखिए फूल चढबैत काल थर्र-थर्र काँपैत अछि बापूक पुनर्जीवित भए जएबाक आशंका सँ सलाइ जकाँ अपन एकहि टा काठी सँ हम जराबए चाहय छी ओकर मायामहल हमर कामना अछि जे हम पढी ओकर बदहवाश चेहराक भूगोल डगर पर अकस्मात आएल सांप जकाँ हम डंसय चाहय छी ओकरा हमर कामना अछि जे हम सुनी ओकर निरन्तर नील पड़ैत चेहराक आर्त्तनाद हम कोनो दिन ओकर हत्या कए घुरए चाहय छी अपन घर अपन प्रियाक वक्ष पर हाथ राखि ओकर ठोर पर उष्म चुंबन अंकित कए कहए चाहय छी – अहाँ सुरक्षित छी,प्रिये आब अहाँ सुरक्षित छी हलफनामा ( कविता-4) हँ हम राजनीति करए छी कविताक राजनीति आ से करब आवश्यक बुझय छी कान्तासम्मितयोपदेशयुजे – कहए छथि मम्मट काव्यप्रयोजनक विषय मे हम हुनका नकारए नहि छी ओहि सँ आगू बढय चाहए छी अजुका विकाल मे जखनि प्रजा नपुंसक आ शासक निरंकुश भेल छै भेलहि चलि जाय रहल छै के सुनत कान्तासम्मित उपदेश केकरा परवाह छै हम कवि छी असीम छी हमर कविता प्रभुसम्मित आदेश बनत सत्ताक भाल पर कील ठोकबाक लेल राजकविक जीह मे तीर भोंकबाक लेल हम सत्ताक नहि प्रवक्ता बनब कोनो ठप्पामार विचारधारा-विशेषक नहि अधिवक्ता बनब सत्ता आ विचारधारा-विशेषक विरोध मे चलाएब कविताक निर्णायक हथौड़ी हम प्रभुसम्मित कविता करब हम कविताक राजनीति करए छी करब मानवताक ऐतिहासिक संघर्ष मे ओकर संग देब मनुष्यक हेरायल जाइत पहचान कें धुमिल होइ सँ बचयबा मे ओकर मदति करब आश्रम, कुटी, मठ, अखाड़ा, गुट-गिरोहक विरोध मे कविता कें हथियार बनैने कवितेक सैन्यदलक संग युद्धोन्मुख हम कविताक राजनीति करए छी करब करिते रहब स्मृति मित्र अछि (कविता-5) कोनो शापित मनुष्य जकाँ पाथर भए जएबाक भय सँ घुरि कए नहि ताकबाक किरिया-सप्पथ सँ स्वयं कें मुक्त करू, वन्धु स्मृति मे हमसभ बीतल घड़ी कें फेर सँ जीबैत छी बेर-बेर जीबैत छी जतय सुख-दुखक गप नहि अनुभूतिसभ अछि, बस समयक अनेक रंग अछि, बस अनुभूति सँ डरिकए कट्टिस नहि कएल जाइत अछि स्मृति सँ बढाएल जाइत अछि हाथ स्मृति सँ मैत्रीक लेल स्मृति मे हमसभ बीतल घड़ी कें फेर सँ जीबैत छी बेर-बेर जीबैत छी २. किछु आजाद गजल- अरविन्द ठाकुर 1 छाती तँ तानल छल शस्त्र उठयबाक बेर कोंढ़ किए काँपि रहल लास उठयबाक बेर पात बिछयबाक बे लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठयबाक बेर आयातित महारानी फाहा बुझाइत छल घोल किए परमाणुक भार उठयबाक बेर दाउन बेर धानक तँ मारिते महाजन छल एक्को टा जन नहि नार उठयबाक बेर प्रवचन मे घौसय छथि धैरज केर महिमा ओ सभ टा बिसरि जाइ छथि कष्ट उठयबाक बेर अरबिन उतारा किछु विध्वंसक होइत अछि नीक जकाँ सोचै छल प्रश्न उठयबाक बेर 2 जनपथ छोड़ि राजपथ जायब से हमरा की नीक लगैए उखरि मे मूड़ी घोसिआयब से हमरा की नीक लगैए बक सँ कौआ बनल ठाढ़ छी काजर घर मे तहि पर चानन ठोप लगायब से हमरा की नीक लगैए चोरि करब हम मुदा शान सँ चौकीदारक संग रहब लाज-शरम ताखा पर राखब से हमरा की नीक लगैए भ्रष्ट दुपहरा केर एहन बहसल बसात मे लंक-दहन लेल आगि पजारब से हमरा की नीक लगैए छमा करू अरबिन उचित किन्नहुँ नहि बाजब सुधिजन आगाँ गाल बजायब से हमरा की नीक लगैए 3 छिछिआइछ उत्कंठा हमर खन आर लग, खन पार लग हमर लिखल उजास सभक मोल की संसार लग जाल मुँहमे बोल नञि, छपय बहेलिया के बयान चिड़ैक बोली बुझत से नञि लूरि छै अखबार लग रंगबिरही जिनीससँ ठाँसल रहै सभटा दोकान किन्तु जन-बेचैनी के औषधि नञि रहै बजार लग एक समझौता सँ शासन वामनक सरकस बनल नञि छलै पट्ठा कोनो दमगर बचल दरबार लग बुन्न मे सागर भरल, अणु मे भरल ऊर्जा अपार बिन्दु सरिपहुँ लम्बवत भए ठाढ़ होइछ आधार लग लोक-लादल नाह बाढ़िक पानि मे अब-तब मे छै ओ घिंचाबय छथि फोटो बान्ह पर पतवार लग नफा के वनतंत्र मे पग-पग बिचौलिया रक्तबीज अकिल गुम्म अछि, केकर मारफत अर्जी दी सरकार लग उपरचन्ती माल के चस्का चढ़ल “अरबिन” एतेक बनल छी लगुआ कि भिरुआ, जायब नञि अधिकार लग 4 क्लस्टर बम,प्रक्षेपास्त्र टामहाक हमरे छल जीवित लहास बनल जे इराक हमरे छल भारत,सोनार बंग आकि पाक हमरे छल “एकोहंबहुस्याम”-ई मजाक हमरे छल एखन भने परमाणु कचरा केर याचक छी ‘विश्वगुरु हम छी’-से वेदवाक् हमरे छल गांधी छलहुँ जखन हमरे सुराज छल दागी पर खादी केर झक पोशाक हमरे छल हमरे ओ मुण्ड छल कटि गेल जे रैजकी सँ बाजारक बीच पड़ल कान-नाक हमरे छल हमरे छल डिडिर जे बाँटलक सहोदर केँ अधरतिया आजादीक ढोल-ढाक हमरे छल ‘अबिरन’रहबैया छी रोगहा समाजक हम लसनि जेकर लागल अछि से सुजाक हमरे छल 5 जीवनक जे अगिन-पथ के पार एताह जीजिविषा मे से अजित,आजाद हेताह बूड़ि,जे निष्ठाकेँ सदिखन मोन रखताह ओ सियासी खेल मे बरबाद हेताह माथ अछि जिनकर सिंहासन के चरण पर आम-जन के माटि मे ओ खाद हेताह ओ वैधानिक अनुकम्पा के प्रावधानसँ मूल भए सकलाह नहि,अनुवाद हेताह अछि हुनक निर्माण मे कोनो खराबी उच्छिष्ट छथि ओ,तेँ कोना उत्पाद हेताह धन्य!’अरबिन’ तों एलह मैथिल गजलमे फेर केओ खुसरो की तोहर बाद हेताह 6 संसद केर फोटो मे किछुओ नहि हेर-फेर नागनाथ,साँपनाथ,इएह दुनू बेर-बेर लागैत अछि अजुका ई दिनो अन्हार रहत सुरूज मलान छथि एखनहुं उबेर बेर एकबाली लोक सभक दागल सभ साँढ छै तोड़ि रहल जहिपतार करचीक सभ घेर-बेर मातल आर्केस्ट्रा मे आजुक सभ गोपिका राधिकोक टेर नहि मुरली के टेर बेर घामक टघार बहैछ श्रीमंतक माथ पर उमकल सीमान पर जन-गण के जेर-बेर गाम भेल नन्दिग्राम,घर-घर सिंगूर भेल "अरबिन"सभ संग रहू एहन अन्हेर बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। चंद्र मोहन झा पड़वा -अरविन्द ठाकुर आ मिथिला आवाज गौर वर्ण नमगर धुआ, चौड़गर छाती आ पैघ-पैघ आँखि लेने मौजूद छला, अरविन्द ठाकुर। हम ठाकुरजीसँ परिचित नै छलहुँ। मानस पटलपरई नाम नाँचि रहल छल। डा. दीलीप कुमार झा "गौतम होटल", तात्कालीन समयमे आगत-अतिथिक लेल विश्रामालय निर्धारित छल। दरभंगासन शहरमे एकटा पैघ अखवारी प्रेसक स्थापना लेल अहर्निस कार्यरत छला अजित अजाद। उत्पादनक लेल संपूर्ण आवश्यक तत्वक क्रय केर भार दऽ चुकल छला डा. सी.एम. झा, जिनका मिथिला निर्माता "निमि" केर कोटिमे राखल जा सकैछ। जहिना निमि महराजपर इंद्रक कुचक्र प्रभावी बेल तहिना सी.एम.झाक मिथिला आवाजपर सेहो।मिथिला आवाजक प्रमुख पदाधिकारीगणमे "अ" वर्ण प्रभावी छला- अजित, अरविन्द, अशोक, अमरनाथ, अमलेन्दु आ अमिताभ। हमरा अरविन्द ठाकुरजीसँ पहिल भेंट गौतम होटलमे भेल से एकटा संपादकक रूपमे। अग्रज-पूर्वजक मिथिला-मैथिलीक आंदोलनकारीक सपना साकार भऽ रहल छल, अपन माटि-पानिक भाषामे रंगीन अखवार। ठाकुरजीक पहिल दर्शनमे तीनू गुण ओज, माधुर्य आ प्रसादसँ अवगत भेलहुँ। हुनक पैघ-पैघ आँखिमे ओज छल तँ वाणीमे माधुर्य आ साहित्यमे प्रसाद। हम हुनकासँ प्रश्न कएने रही -अपने अरविन्द ठाकुर?" ओ कहलनि हँ आ अपने?, हम-चंद्रमोहन झा पड़वा। अच्छा, अच्छा, आएल जाउ। अपनेक नामसँ परिचित छी। ठाकुरजीक विहंगम दृष्टि देखबामे आएल। हम कंप्यूटरक की-बोर्डपर कहियो आँगुर तक नै देने रही आरो बात तँ दूर। तँइ हमर नियुक्ति आनुवादकक रूपमे भेल छल। ओना स्वयं डा.सी.एम.झा बादमे विचार करबाक भावना स्वयं तत्क्षण व्यक्त केने रहथि। तहिया ठाकुरजीक दरभंगा आगमन नै भेल छलनि। हमरा कोनो स्थान नै भेटि रहल छल। सूपक भाँटा जकाँ गुरकैत रही। मुदा अजित आजादक "दुत्कार" आ माँ जानकी जीक कृपासँ की-बोर्डपर दसो आँगुर काज करब शुरू कऽ देने छल।कंप्यूटरपर पेज बनब शुरू भऽ गेल छलै मुदा हमर काजक कोनो उपयोग नै। ठाकुरजीक कंप्यूटरक विशेषता छलनि, ओ केकरो कंप्यूटरपर कएल गेल विषय-वस्तुकेँ देखि सकैत छला। एक राति ओ भरल हाउसमे घोषणा केलनि- हमरा लोकनि पड़वा जीक उचित उपयोग नै कऽ रहल छी।ठाकुरजी हमरा स्वतंत्र कंप्यूटरपर स्थापित केलनि आ हम कुमार शैलेन्द्रजी जेनरल डेस्कसँ जोड़ल गेलहुँ। अरविन्द ठाकुरजी गंभीरताक संगे हास्य विनोदक प्रेमी रहाल। ओ केकरो काजसँ उबय नै देथि। जखन हुनका बुझबामे आबि जानि जे सहयोगीगण उबि गेल छथि तँ कोनो चुटुक्का की केकरोपर व्यंग कऽ हास्य रसक धार बहा देथि आ सभ हँसि कऽ अपन थकान दूर कऽ लैत छल। एक दिन हम एकटा पत्रिका "श्यामा सन्देश" देलियनि। ओहिमे एकटा भगवती गीत छल- हे अम्बे हम अहिंक शरणमे आयल छी। ठाकुरजी कहल करथि- हे पड़वे हम अँहिंक शरणमे आयल छी, एहिठाम अहाँकेँ कोटि-कोटि प्रणाम।अरविन्द ठाकुरक मात्र धुए टा जमीन्दारक नै छलनि, अपितु हुनक क्रिया-कलाप सेहो जमीन्दारक स्वरूपकेँ देखार करैत रहल। एहन कोनो स्पताह नै जाहिमे पैघ वा छोट पार्टीक आयोजन नै होइत रहल। जाहिमे सभ विभागक सहयोगी सहभागी होइत रहला। एक बेर कोनो कारणवश कर्मचारी लोकनिक वेतन काटल जेबाक विचार आएल। तकर कारण ठाकुरजीक उपर देल गेलनि। अरविन्द ठाकुर एहि बातपर सहमति नै देलनि। ओ अपन खातासँ बीस हजार टाका कर्मचारी लोकनिक वेतन लेल दऽ देलनि। अरविन्द ठाकुरजी अनुशासन प्रिय रहथि, स्वयं अनुशासित रहथि आ अपन अधीनस्थ सहयोगीकेँ तकर शिक्षा देबाकमे नै चुकथि। हुनका समयमे ओ कहावत चरितार्थ होइत छल- बाघ आ बकरी एक घाटपर पानि पिबैए। ओ व्यर्थक गलथोथीमे समय नै बर्बाद करथि मुदा हुनक वाग्पटुता कोनो विशेष अवसरपर सुनबा योग्य होइत छल। साम-दाम-दंड-भेदक प्रयोग समयानुकूल करबामे मिसियो भरि पाछू नै रहैत छला।मुदा कहल गेल छै -सीता जन्म वियोगे गेल, दुख छोड़ि सुख कहियो ने भेल। सीताकेँ मैथिली सेहो कहल गेल अछि तँइ हुनक भाषा मैथिलीक संग वएह स्थिति रहल। नान्हिटा रही तँ माए एकटा खिस्सा कहथि-"आधा चान गढ़ि कऽ घर आएल, सातो भाँइ विदेश चलि गेल, आँजुरकेँ दुख दइये गेल। इएह स्थिति मिथिला आवाजक संग रहल।सत्य बात तँ कटु होइते छै। अरविन्द ठाकुर मैथिलीक नामपर समझौता केलनि से निश्चय रूपें हुनक गलती साबित भेलनि। गौलौसीक अभियोगकेँ जनितहुँ, हम रही की नै रही "आवाज" रहै तकर आकांक्षामे भीष्म पितामह बनल रहल। "आवाजकेँ केंसर रोग धऽ लेलक। प्राण ताधरि नहि छुटैत छैक जा धरि माया ग्रसित केने रहैत छै। जखन अपन लोकक मूँह टेढ़ होबऽ लगैत छै, हृद्य आ ठोरक स्वरमे भिन्नता आबि जाइत छै तँ प्रतिष्ठताक रक्षार्थ प्रस्थान कऽ दैछ अपन धरा धामसँ।हमरा जनैत अरविन्द ठाकुरकेँ सेहो एहने मार्गसँ गुजरऽ पड़लनि आ अंततः कऽ लेलनि अंतिम प्रयाण। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक अरविन्द ठाकुर टिमटिम टिमटिम ! टिमटिम ! माने एकटा अनवरत प्रकाश टिमटिम ! टिमटिम ! माने एकटा अनवरत संघर्ष टिमटिम ! टिमटिम ! माने एकटा अपराजेय जिजीविषा एक-एक क्षणक हजारक हजार टिमटिम सँ जरैत रहैत अछि दीप टिमटिमाइत रहैत अछि सावधान –सतर्क रहैत अछि दीप लड़ैत रहैत अछि दीप तेज हवा आ अन्हर सँ बुताइतहु अछि त शहीद जकाँ असावधान-आश्वस्त रहैत अछि दीप सुविधा, षडयंत्र आ ईर्ष्या भरल फूंक सँ आ बेमौत मारल जाइत अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १८९ म अंक ०१ नवम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९५ अंक १८९) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA