VIDEHA — Issue 190 / अंक १९०

Publication: VIDEHA · Issue: 190
Open original PDF at Internet Archive

ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १९० म अंक १५ नवम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९५ अंक १९०) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”,  गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा २.२.प्रणव झा- लघुकथा- अंबर २.३.“रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु लघुकथा ३. पद्य ३.१.डा.ज़ियाउर रहमान जाफ़री- गजल ३.२.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- किछु कविता ३.४.गौरीशंकर साह- क्षणिका ४.बालानां कृते- १.शशिधर कुमर “विदेह”- मैथिली वर्णमाला (कविता) २. आशीष अनचिन्हार- बाल गजल 5.VIDEHA FOR NON RESIDENTS Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ क पोथी सभक लिंक (विदेहक १९१ म अंक हिनकापर केन्द्रित रहत) धारक ओइ पार (दीर्घ कविता) गीत गंगा (गीत संग्रह) गजल गंगा (गजल संग्रह) तोरा अंगना मे (गीत संग्रह) ई-पत्र गंगेश गुंजन सर्वप्रथम विदेह सम्पादक गजेन्द्र जी केँ एहि अंकक (१८९ म) वास्ते हार्दिक बधाइ। बहुत सराहनीय डेग अछि ई। स्वागत हैत। कोनो कम्प्यूटरनहि, गाम मे संग। ई मोबाइल फोन टा अछि। ताही सीमित उपाय मे ई सब टिप्पणी कर' लागब जोखिम वला काज से बुझैत लिखि रहल छी। भावनावश। ग़ज़ल कवि अरविन्द जीक ग़ज़ल संग्रह पर ओमप्रकाश जीक समीक्षकीय लेखक सिद्धान्त पक्ष पर टिप्पणी खूब नीक संतुलित अछि। मुदा सदा जकाँ एतहु 'ग़जल'क कन्टेन्ट/ कविता' पर किछु ख़ास नहि कहल गेलैक। ई समझ /प्रवृत्ति हमरा सब दिन अस्वीकार्य रहल। एतहु सैह भेटल। ग़ज़ल सेहो तँ विधायी दृष्टिएँ ने फराक होइछ परन्तु थीक तँ अन्तत: कविते। किञ्चित छन्द दोष रहितहुँ कोनो कविता नीक कविता भ'सकैछ। नहि जानि किएक आ कोन भावना सँ, 'बर्तन'क चर्चा आलोचना तँ पर्याप्त मनोयोग सँ होइछ,मुदा बेसी ठाम ओहि मे राखल 'वस्तु' पर कोनो ध्याने ने देल जाइतछि। समीक्षक द्वारा पाठ (टेक्स्ट)क ई उपेक्षा कोनहुँ नीक ग़ज़ल में निहित 'कविता' कें उठल्लू बना देल जाइछ। छुच्छे शास्त्रीय, नियम,सिद्धांत आ व्याकरणक पटु निर्वाहे मात्र ग़ज़ल हो बा किछु अन्य, तकरा उल्लेखनीय नहि बना सकैत अछि। °°° धीरज जीक टिप्पणी पढ़ब हमरा लेल कतोक बर्ख पर नव अनुभव बनल। आब हम हुनक लिखल पढ़बा लेल उत्सुक रहब। कह' चाहैत छी जे  हुनका सँ नियमित लिखबाओल जयबाक चाही। अन्तत: कोनो  काल जी उत्कृष्ट रचनाक निष्पत्ति आध्यात्मिके (धर्मा ध्यात्मिक नहिं ) मैथिली आलोचना कें एखन ई दरकार। धीरजक लेखन मे एकर स्पष्ट आश्वासन देखाएलए हमरा। बधाइ। °°° जगदीशचन्द्र ठाकुर जीक लेख सेहो नीक । मुदा फेर बहर काफ़िया रदीफ़े त्रुटि केन्द्रित।एतेक मोन मेहनति सँ लीखल बुझाइछ लेख जेना खूब किछु नहि कहि पौलक।  माफ़ी दी। बेसी नहिएं संभव भेल। नेट सेहो तँ गाम मे भाग्यहि सँ भेटैछ। जेना एखन। अरविन्द ठाकुर जी, सम्पादक विदेह आशीष जी समेत अंकक समस्त लेखक कें पुन: बधाई ! सस्नेह विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह) लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश) क मैथिली अनुवाद लेल। विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”,  गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा २.२.प्रणव झा- लघुकथा- अंबर २.३.“रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु लघुकथा डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ग्राम – रुचौल, पो॰ – मकरमपुर, जिला – दरभंगा, पिन – ८४७२३४ गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा “गामक जिनगीक” बाद “गामक शकल सूरत” .......... नञि ....... नञि ....... तकर बाद नञि, तकर बहुते बाद । पर जे हो, गामक परिवेश आ गामक विषय वस्तु तँऽ अछिए । बदलल की ? ....... बदलल बस कथावस्तु वा सम्पुर्ण कथा । हमरासभक लेल जे एक गोट मामूली दैनन्दिनक घटना थिक से एक गोट सुविज्ञ लेखकक लेल कथा - पिहानीक विषय वस्तु । आ सएह योग्यता श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लेखनी मे छन्हि । लेखकक एहि लघुकथा संग्रहमे हुनिका द्वारा रचित ८ गोट लघुकथा संकलित अछि । कथासभक परिवेश पोथीक नामानुरूपेँ अवश्य ग्रामिण अछि पर पढ़बाक लाभ हरेक पाठकवर्गक लोक उठाए सकैत छथि । परिवेश ग्रामिण रहितहुँ कथावस्तु अत्यन्त सम-सामयिक अछि । जे पाठकवृन्द गामहिमे रहैत छथि हुनिका लेल तँऽ ई रोजक गप्प पर जे बाहरो रहैत छथि आ कहियो-कहियो गाम अबैत छथि हुनिका सेहो एहि कथाक प्रसंगसभसँ जिनगीमे जरूर साक्षात्कार भेल होएतन्हि । साहित्यमे कएक बेर जिनगीक कटु सत्यक चित्रण प्रत्यक्ष व्यक्ति विशेषकेँ पात्र बना कऽ नञि कएल जाइत अछि अपितु ओहि पात्र विशेषसँ मिलैत जुलैत गुणबला आन सांसारिक वस्तुसभकेँ पात्र बना कहाओल जाइत अछि । साहित्यमे ई विधा बहुत पुराण अछि पर मैथिलीमे एहि विधाक उपयोग अत्यल्प भेल अछि । एहि विधाक उपयोगसँ कथाक विषय वस्तुक रोचकता बढ़ैत अछि, कथामे उल्लिखित कोनहु अप्रिय प्रसंग कोनहु विशेष पाठकवर्ग दिशि प्रक्षेपित नञि बुझाइत अछि आ कथा सुग्राह्य भऽ जाइत अछि । एतबहि नञि तखनि कथाक विषय बस्तु हर-पाठकवर्गकेँ अपनासँ मिलैत-जुलैत बुझना पड़ैत छन्हि आ तेँ कृति सर्वपाठकग्राह्य बनि जाइत अछि । वास्तवमे एहि तरहक प्रस्तुति एकटा कला थिक जे हर लेखकमे नञि विकसित होइछ । वास्तवमे, एहि तरहक प्रस्तुति अप्पन सभ बात पाठकक सोझाँ राखि जाइत अछि आ साहित्यक मर्यादा सेहो बनल रहैत अछि । एहने प्रयोग एहि बेर पाठकलोकनिकेँ श्री मण्डलजीक कलमसँ देखबाक लेल भेंटत; यथा :- रीशसँ रीशिया ठकुआ बाजल - “केतबो बानर जकाँ नांगरि पटैक कऽ रहि गेलेँ, कहाँ एको धूर जमीन-जत्था अपनो पएर रोपैले भेलौ; जहिना बाप-दादा गुड़कैत एलौ तहिना गुड़कैत रहमेँ ।” ....................... फेर ठोर पटपटबैत भुसवा बाजल - “कहू ! जे आगूक जनमल ठकुआ छी, तखन केहेन कड़ुआएल बात छै जे जहिना सभ दिन गुड़कैत रहलेँ तहिना गुड़कैत रहमेँ । हमरा जेकाँ की तोरा आसन बासन हेतौ ?” छठि पावनिक डालाक विभिन्न बस्तु सभकेँ पात्र बना बहुत सुन्नर रूपसँ अपना समाजक एहि तरहक प्रसंगकेँ चित्रित कएल गेल अछि । एहि तरहक प्रसंग कोनहु वर्गविशेषक नञि अपितु अपना समाजक हरेक वर्गक पिहानी अछि ।  किछ-किछु एहने प्रयोग संस्कृत साहित्यक पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, सिंहासन बत्तिसी आ वैताल पच्चीसी आदिमे देखबामे आबैछ; हलाँकि ई बात अलग जे ओ सभ प्रायः बाल साहित्यक रूपमे लीखल गेल अछि । कतहु शिवचरण बाबू आ कालीचरण बाबूक यारी भेटत तँऽ कतहु भैयारी हक फरिछबैत सदानन कक्काक संग मनमोही काकी भेटतीह । कहुखन पोताक संग जितिया पावनिक करैत जीतलाल बाबा भेटताह तँऽ कहुखन अपन पुर्वकृत्य पर पश्चाताप करैत देवानन्द भेटताह । आ बीचमे चटकार लैत भेटताह सोने कक्का आ सुचितलाल । “काका, अहाँ ते तेहेन शिकारी जेकाँ बजलौं जे बुइझे ने पेलौं जे खिखिरक बोली देलिऐ कि हरिणक आकि कोइलीक । …………….. …………… बौआ, तोहूँ कोनो आन थोड़े छह, समाजेक ने बेटा-भातिज छिअ । जेहने अपन बेटा-भातिज तेहने समाजक । बतीस दाँतक तरमे पड़ल छी, तँए जी-जाँति कऽ रखने छी । मुड़ी सुढ़िया कऽ बजैमे उकड़ू होइए । मुदा ऐठाम दुइए गोरे छह तँए जी खोलि बाजब ।” “गाम” - ई शब्द प्रायः हर नऽव पीढ़ीक लेल एकटा सुन्नर, शान्त आ उन्मुक्त सनि स्थान होइत अछि । हर पुरान पीढ़ी किछु बयस बीतलाक बात कहैत अछि जे गाम आब ओहेन नञि रहल (जेहेन ओ अपन नेनपनमे देखने रहथि) - गाम बदलि गेल अछि । एहि तरहक विचारभिन्नताक प्रक्रिया निरन्तर चलैत रहल अछि आ चलैत रहत; पर गाम तँऽ गामहि थिक । अन्तर अछि मात्र दृष्टिकोण (VIEW / ANGLE OF PERCEPTION / REFERENCE FRAME) केर - गाम तँऽ गामहि अछि । कतबहु बदलैत अछि तइयो हर पीढ़ीविशेषक लेल गाम ओ शहरक अन्तर ओतबहि अछि, हर व्यक्तिविशेषक नेनपन ओ वयस्क वा वृद्धावस्थाक लेल गामक परिवर्तन ओतबहि अछि आ से नियत (CONSTANT) अछि । नेना - भुटकाक आँखिमे बसल गामक चित्र अनुभवक आगिमे पाकल वयस्कक चित्रसँ प्रायः हमेशा भिन्न होइत अछि आ होइत रहत । ओकर बनाओल चित्रकेँ बुझबाक हेतु ओकरहि भावक संसारमे डुम्मी काटए पड़त । तेँ मास्टर साहेब (मास्सैव - श्यामलाल) गिरधरक बनाओल समाजक चित्रकेँ नञि बुझि पाबैत छथि जखनिकि सुबललाल ओकर अर्थ पढ़ि लैत छथि । मास्टर साहेब अनुभवक चश्मासँ चित्रकेँ देखबाक प्रयत्न करैत छथि । जखनिकि सुबललाल पोताक (गिरधरक) बालस्वभावमे उतरि चित्रक अर्थ पढ़ैत छथि - “मास्सैव, केहेन बढ़ियाँ तँ सचित्र बनले अछि तखनि विचित्र की ? ……………… पहाड़, समुद्र धरती, पताल, अकास सभ मिलि जे एकटा विराट सूरत बनल अछि, सएह तँऽ अछि। …………………. ई समुद्र भेल, समाजरुपी समुद्र । अथाह जलराशिक भण्डार । अहूमे जुआर उठै छै, जे हवा, पानिकेँ अपना पेटसँ निकालि अकासमे पसारैए, बर्खाक संग तूफानो उठै छै । जइसँ पानि, हवासँ धरती भरि जाइ छै । आगूक बात सुबललालक पेटमे रहनि आकि बिच्चेमे श्यामलाल बाबू दोसर रेखा पर आँगुर रखैत बजलाह - ई ? ई धार भेल । जेकरा जीवनो-धार कहि सकै छिऐ, जे वैदिक धार कहियो कल-कल हँसैत, प्रवाहित होइ छल ओ आब मरण भऽ गेल । तँए पानिक जगह बालु उड़ैए ।” हर प्रसंगक प्रायः एकाधिक पक्ष होइत अछि । किछु पक्ष नीको होइत अछि आ किछु अधलाहो । कएक बेर कोनहु प्रसंगक पक्ष व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर निर्भर करैत अछि । जे जाहि दृष्टिकोणसँ देखैत अछि ओहि प्रसंगक पक्ष ओकरा ओहने नीक वा अधलाह बुझि पड़ैत अछि । प्रवास एकटा एहने प्रसंग थिक । प्रवास जे कि एक समय मिथिलासँ बाहर जायब आ तकर बाद देशसँ बाहर जायब केर अर्थ रखैत अछि ।  प्रवासकेँ — खास कऽ विदेशमे रहबाक प्रवासकेँ — मैथिली साहित्य हमेशा किछु तेसरे दृष्टि वा अधलाहे दृष्टिसँ देखलक अछि । किछु एहने सनि पिहानीक मजा भेटत मनोहर कक्का आ श्यामक संग । हाँ, संगमे सजमनि, कदीमा, रामझिमनी, झिमनी, करैल, पालक, ठरिया — आ पता नञि आओर की-की भेटत । आ अन्तमे भेटत “बौआ, कियो केतौ रहह मुदा रहत एही दुनियाँमे । जीब-मरब, अही दू शब्दमे दुनियाँ रचल-बसल अछि । .............................. बड़ बढ़ियाँ बड़ीटा दुनियाँ छै, जेतए मन फूड़ऽ तेतए रहऽ । धारक बीच जिनगी अछि तँए ओतए जा अपन धाराकेँ नञि तोड़ब । विदेशक चर्च भेल तँऽ किछु बात हमरहु याद आयल । इङ्गलैण्डक अंग्रेजीमे (BRITISH ENGLISH) मुंगेर, रंग, बाघ, श्वेत रक्त कोशिका / कण, रक्त वर्णक आदिक लेल प्रयुक्त शब्दक स्पेलिङ्ग क्रमशः MONGHYER, COLOUR, TIGRE, LEUCOCYTE, HAEMOGLOBIN लिखल जाइत छल आ एखनहु लीखल जाइत अछि । ई सामान्य अंग्रेजी जननिहारक लेल किछु कठिनाह छल । तेँ अमेरिकामे एकर सरलीकरणक प्रयास कएल गेल । उपरोक्त शब्दसभ अमेरिकी अंग्रेजीमे (AMERICAN / SAM ENGLISH) क्रमशः - MUNGER, COLOR, TIGER, LEUKOCYTE , HEMOGLOBIN - एहि प्रकारेँ लिखल जाए लागल । एहि प्रकारक स्पेलिङ्ग सर्वसामान्य द्वारा कएल जा रहल उच्चारणक बेस नजदीक छल आ तेँ सुग्राह्य सेहो । प्रारम्भमे अंग्रेजीक विद्वान ओ साहित्यकार लोकनिक दिशिसँ एहि प्रयासकेँ अतिशय दमण ओ असहयोगक सामना करए पड़ल । एहि नऽव लेखनशैलीकेँ साहित्यिक मञ्चसभ पर हीन दृष्टिसँ देखल जाइत छल । बादमे दुहु देशक सरकार दिशिसँ समन्वयक प्रयास भेल । अंग्रेजी साहित्यक विभिन्न देशक नियामक संस्थासभक बैसार भेल आ निर्णय लेल गेल जे दुहु प्रकारक अंग्रेजी लेखनशैलीक मान्यता एक समान होयत तथा कोनहु लेखन शैलीकेँ आगाँसँ उत्कृष्ट वा कनिष्ठ नञि कहल जाएत । आइ दुहु लेखनशैली समान रूपेँ प्रतिष्ठित अछि । दुहु लेखन-पद्धति प्रचलनमे अछि पर नऽव शैली उच्चारणानुरूप होयबाक कारण बेसी सुविधाजनक अछि आ ग्रेट-ब्रिटेन छाड़ि विश्व भरिमे तेजीसँ पसरि चुकल अछि । मुख्य विषयसँ थोड़ेक कात-करओट भागि गेलहुँ, पर भोतिआएल नञि छी, कात-करओट भागब सर्वथा आवश्यक बुझना गेल तेँ गेलहुँ । जहिना अंग्रेजीक नऽव शैली छल तहिना मैथिलीमे सेहो नऽव शैली स्वतः आयल जे उच्चारणानुरूप लीखल जाइत अछि । मैथिलीक एहि नऽव शैलीक अन्तर्गत बहुत रास नऽव रचनाकार (अपन रचनाकालक अनुसार नऽव नञि कि वयसक अनुसार) आबैत छथि, जाहिमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो छथि । अंग्रेजी जेकाँ मैथिलीमे कोनहु उच्च सर्वमान्य नियामक संस्था नञि होयबाक कारणेँ बहुधा एहि नऽव लेखन-शैलीकेँ हीन बुझल जाइत अछि जे कि हमरा नजरिमे सर्वथा अनर्गल थिक । मैथिली साहित्यिक संस्थासभकेँ अंग्रेजी जेकाँ समन्वयात्मक रस्ता अपनेबाक चाही । मैथिलीक प्राचीन आ नऽव दुनु शैली समान रूपेँ प्रतिष्ठित होयबाक चाही । रचनाक स्तरीयता देखल जयबाक चाही नञि कि शैलीक आधार पर स्तर गढ़ल जयबाक चाही । मैथिलीक नऽव लेखन पद्धति - जे कि उच्चारणानुरूप अछि - ताहिमे रचना होयबाक कारणेँ सामान्य वा सामान्यसँ कम मैथिलि जननिहारकेँ सेहो कोनहु असुविधा नञि होयतन्हि । “गामक शकल सूरत” नामक एहि लघुकथा संग्रहमे सर्वत्र सरल मैथिलीक प्रयोग भेल अछि । यथा - पावनि केर बदला पावैन, पएने केर बदला पेने, कहलन्हि केर बदला कहलैन, बजलहुँ केर स्थान पर बजलौं,फोलब केर स्थान पर खोलब, जिउब केर स्थान पर जीब, आदि । एहि प्रकारेँ ई लघुकथा संग्रह अपन कथावस्तु आ लेखनशैलीक बल पर पाठकलोकनिक बीच अपन उत्कृष्ट स्थान सुनिश्चित करत से आशा , बाकी पाठकवृन्द पढ़लाक बादे बतओताह । पोथीक नाँव – गामक शकल सूरत लेखक – श्री जगदीश प्रसाद मण्डल प्रकाशक – श्रीमति प्रेमकला देवी, ग्राम व पो॰-बेरमा (मधुबनी) प्राप्ति स्थान - पल्लवी डिस्ट्रिब्युटर, वार्ड नं॰-06, निर्मली (सुपौल), पिन कोड - 847452 दाम (अजिल्द / साधारण संस्करण‍)   -  भारतीय रु॰ 151/ मात्र ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड नई दिल्ली एकटा लघुकथा अंबर “Mr. Jha, your leave has been sanctioned. You can proceed for leave. Have a great journey.” ई ई-मेल पढैते सुमनजी के मोन खुशी से मयुर सन नाच लागल । सुमनजी नोयडा क एकटा इंजिनियरिंग कालेज मे बीटेक(ईसीई) प्रथम सेमेस्टर के छात्र छलाह । दुइए मास पहिने त हिनकर एडमिशन एत भेल छलैन, किंतु ओ अपन क्षेत्र सं पहिल बेर बाहर आयल छलैथ आ इंजिनियरिंग मे प्रवेश के बाद इ पहिल दूर्गापूजा ! गाम कोना नै जायब ! आ गामों मे त मां-बाबू-बहिन, दोस्त-महिम सेहो सब त आंखि पाथने अछि हिनका देख लेल । ई सब सोचैत-सोचैत सुमनजी के पुरना गप्प सब मोन पर लगलैन । बचपने सं ओ एकटा औशत मेधा के छात्र छलाह । साधारण परिवार के बालक, आ घर मे पढ मे सभसं बेस होसगर । स्वाइत परिवार आ सर-कुटुमैति मे लोक सब हिनका मे बाबू-इंजिनियर आदि बन के आश लगाब लागल । जखन इ मैट्रीक क परीक्षा प्रथम श्रेणी मे निक नंबर सं उत्तीर्ण केलैथ त ओ आश के बल भेटल आ हिनका सीएम साईंस कालेज मे इंटर(गाणित) संकाय मे प्रवेश भेट गेलैन । इंटर क पढाई के दौरान हिनका मे इंजिनियरिंग कर के महत्वाकांक्षा बलवंत होइत गेल । ओ दरिभंगा मे एकटा कोचिंग सेहो पकैर लेलैथ आ १२वी के परीक्षा संगे जेईई(मेन) के परीक्षा मे सेहो बैसलाह । किंतु औशत छात्र के विडंबना होई अछि कि ओ नै आरे होइ अछि आ नै पारे ! जेईई(मेन) मे ठीक ठाक कहल जाइ बला रैंक भेटक छलैन्ह किन्तु एतेको निक नै जे जेईई(एड्वांस) के लेल उत्तीर्ण कहल जाय अथवा एन.आई.टी अथवा कोनो अन्य टाप इंजिनियरिंग कालेज मे प्रवेश भेटैन्ह । अत: हिनको लग वैह विकल्प छल जे बहुत पाछां रैंक बला सब के लेल सेहो खुजल छल, अर्थात अन्य प्राईवेट इंजिनियरिंग कालेज । यद्यपि हिनका इहो देखना गेलैन जे हिनका सं बहुत पाछु रह बला एसी/एसटी कोटा के क्षात्र सब के एन.आईटी मे प्रवेश भेट रहल छल। इ बात हिनका दूध मे मांछी सन बुझना गेल छल । हिनकर मोन कुंठित होमय लागल छल । ताहिपर सं परिवार-समाज क प्रश्नवाचक द×ष्टी हिनका आर बेसी विचलित करय लगलैन । किछु गोटे राय देलखिन जे एहि बेर छोड़ आ पटना/दिल्ली जा क तैयारी कर ग, अगिला बेर आईआईटी/एन.आईटी मे एडमिशन भैये जेत । सुमनजी के मोन एहि उहापोह मे छल ताहि बीच हुनका यार कक्का सं भेट भ गेलैन जे छुट्टी मे गाम आयल छलैथ । ओ हिनका बुझेलखिन जे हौ, तोहर जे स्थिति छ: ताहि मे कोन गारंटी जे अगिला बेर तोरा आईआईटी/एन.आईटी मे एडमिशन भैये जेत ? आ जौं नै भेटल त इंजिनियरिंग कर के सपनो पर कुठाराघात भ सकै छ: । ताहि सं निक अछि जे तोहर रैंक निक छ: आ कोनो नीक प्राईवेट इंजिनियरिंग कालेज मे ईसीई/सीएस आदि संकाय मे प्रवेश भेट जेत। आ एहन ठाम प्रवेश भेला पर एजुकेशन लोन भेटबा मे कोनो भांगट नै रहत। आ ओहि सलाह के परिणामस्वरूप आई सुमनजी एत बीटेक क रहल छैथ । इ सब सोचैत सोचैत सुमनजी के पता नै कखन आंखि लागि गेलैन । नियत समय पर सुमनजी गाम पहूंचला । गाम मे यार-दोस्त, मां-बाबू-बहिन-पितियाइन सभ सं भेंट कय क मोन हर्षित भेलैन । यार दोस्त मे कनि हवा-पाईन सेहो छोड़लैथ किंतु एन.आई.टी मे प्रवेश नै भेटै के कुंठा अखनों धरि कहीं हिनका मोन मे अटकल छल जे कखनो क हिनका मोन के विचलित क देइत छलैन । सतमी के सांझ मे ओ दुर्गास्थान मेला मे गेलैथ त अचानक हिनकर नजैर एकटा श्यामवर्णीय ६ फ़िट के छौंरा पर गेल जे फ़ुकना-पिपही बेच रहल छल । ’अंबर’ यैह नाम छल ओकर । अचानक ओकरा एहि अवस्था मे देख सुमनजी के ह×दय द्रवित आ ग्लानित होमय लागल । ओ ओकरा सं नजैर चोरा क एम्हर आम्हर घुमय लगला किन्तु ध्यान हिनकर ओकरे पर टांगल छल । पुन: किछु पुरान गप्प मोन पड़ लगलैन । ओ स्कूल मे हिनके संगे पढै छल, किन्तु १०वी के बाद कहियो भेंट नै भेल छल । भगवान जनैथ मैट्रीक पासो केने छल कि नै ! ओ बचपने सं लंबा छल, पैघ-पैघ केस राखै छल, श्यामवर्णीय छल आ देख मे खास नै छल, किन्तु तैयो स्कूल मे ओ अपना के अमिताभ बच्चन कहै छल, आ स्वाईत आनो बच्चा सब ओकरा व्यंगात्मक रूप सं या डरे अमिताभ बच्चन कहै छल । ओहो Schedule Cast छल आ पढै मे बज्र भुसकौल (शायद अपन परिवेश के कारण अथवा शायद भगवान ओकरा ओहने बनेने छलखिन) । तथापि ओकरा stipend भेटनाई ओहि समय मे हिनका समझ मे नै आबै छल । आइ ओकरा ऐ स्थिति मे देख क सुमनजी के मोन मे होमय लागल जे कदाचित एकर कोनो मजबूरिए हेतै जे इ पढ के बयस मे इ छोट छिन धंधा क क जीविका कमेबाक प्रयास क रहल अछि ! दू-चारि दिन बाद बाजार जैबा क क्रम मे ओ फ़ेर सुमनजी सं टकरा गेल । सुमनजी कन्नी काटि क निकैल जाय चाहय छलखिन किन्तु अंबरे हिनका टोकलक : - “की दोस कि हाल चाल?” फ़ेर कुशल-क्षेम के बाद गप्प क क्रम मे ओ बतेलक जे “कि बताबियौ दोस, पढ मे त हम कहियो ठीक छलियौ नै। कहुना थर्ड डीविजन से मैट्रीक पास केलौं तै के बाद बाबू सुशील डाक्टर साहब लग काज पर लगा देलकौ ओत्तै साफ़-सफ़ाई के काज करै छी आ कंपाउंडरी सेहो सीख रहल छी । तों त आब मस्त इंजीनियरिंग क रहल छैं, आ करौ किए नै, बचपने सं पढै बला बच्चा छलैं” इत्यादि । गप्पक क्रम मे सुमनजी के मन:स्थिति सामान्य होइत गेलैन आ अंतत: ओ ओकरा सं फ़ुकना बेचै बाली बात पुछिए लेलैथ। ओ उत्तर देलक: “देखही दोस, हम भेलौं मुर्ख गरीबहा लोक, ई मेले-ठेले मे त दू टा उपरी आमदनी कमाय के मौका होई अछि से मौका कोना क गंवाबी । आ बात जहां धरि इन्जोय कर के अछी त मेला मे उपस्थितिए इन्जोय के गवाही बनि जाय अछि । किछु लोक मेला मे खरीद क इन्जोय करै अछि, हमरा सन लोक बेच क । अंबर सं बात केला उत्तर आ ओकर खुशगवार मिजाज देख के पश्चात सुमनजी के आत्मग्लानी समाप्त भ गेल छल । ओ सोचै लागल जे अंबरा के परिस्थिति जे भी देलकै अछि ओकरा ओ अपन मौका बुझि सहर्ष स्वीकार केलक अछि आ आनंदपूर्वक अपन कर्म क रहल अछि । त परिस्थिति हमरा त एकरा सं बड्ड निक मौका देने अछि अपन कर्म कर लेल आ अपना आ समाज के बहुत किछु देब लेल । आब सुमनजी के आत्मा सं आईआईटी/एन.आई.टी मे प्रवेश नै भेट के बोझ सेहो उतरि गेल छल । ओ प्रण केलैथ जे ओ बीटेक के पढाई परम लगन सं करता आ अपना के पैघ सं पैघ मुकाम पर स्थापित कर के प्रयत्न मे कोनो भांगट नै रह देथिन । संगहि एससी/एसटी के प्रति वैमनस्य के भावनों समाप्त भ गेल छल । सुमनजी के आब इ एहसास भ गेल छल जे ’अंबर’ सन कतेको अछि जे परिवेश के मारल अछि आ एहन लोक के किछु विशेष सुविधा भेट मे कोनो अतिस्योक्ति नै अछि । आब हिनकर मोन ओहिना शांत आ ताजा भ गेल छल जेना बवंडर के बाद मेघ पड़ला उत्तर सब साफ़ आ ताजा भ जाई अछि । ०४.०५.२०१५ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। “रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) श्री काशीनाथ सिंह: जन्म:०१ जनवरी १९३७, कथा संग्रह: कहनी उपखान , उपन्यास- अपना मोर्चा , काशी का अस्सी,  रेहन पर रग्घू । संस्मरण:  घर का जोगी जोगड़ा , याद हो कि न याद हो , नाटक: घोआस विनीत उत्पल:विनीत उत्पल (जन्म: 7 अप्रैल, 1978, ननिहाल पूर्णिया जिलाक सुखसेना गाममे)। पैतृक घर: आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर जिला अंतर्गत रणग्राम आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर सँ गणित विषय मे बी.एस.सी. (आनर्स), मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क हिंदी विभाग सँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखन मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ अंग्रेजी पत्रकारिता मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार सँ जनसंचार मे मास्टर डिग्री। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कानफ्लीक्ट रिजोल्यूलशन क पहिल बैचक छात्र आ सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ फ्रेंच भाषाक शिक्षा। छात्र जीवनमे रोट्रेक्ट क्लब, भागलपुर (रोटरी इंटरनेशनलक युवा शाखा) सँ जुड़ल, कएकटा संबद्ध पत्र-पत्रिकाक संपादन। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक हिन्दी विभागमे अध्ययनक दौरान 'हमारी पहचान" नामक पाक्षिक समाचार पत्रक संपादक मंडलक सदस्य। दिल्लीसँ प्रकाशित कएकटा राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रमे ग्रामीण विकासक खबरिक विश्लेषण, हिन्दीक प्रचार-प्रसारमे केंद्रीय वित्त मंत्रालयकेँ योगदानक अलावा गुजरात दंगामे अंग्रेजी आ गुजराती मीडियाक भूमिकापर लघुशोध। हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी भाषामे विपुल लेखन आ सुनीता नारायण, शशि थरूर, महेश रंगराजन आदिक लेख सभक अंग्रेजीसँ हिन्दीमे अनुवाद। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन द्वारा संपादित 'लोकतंत्र का नया लोक" मे उपलब्ध द्वैपायन भट्टाचार्य, जी.कोटेश्वर प्रसाद आ नलिनी रंजन मोहंतीक अंग्रेजी लेख सभक अनुवाद आ पुनर्लेखन। अनियमितकालीन कला पत्रिका 'कैनवास" मे समन्वय संपादक।मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी" प्रकाशित। साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/ उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत रहथि। रेहनपर रग्घू रेहनपर रग्घू १ जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा रहए दुपहरिया। कनी काल पहिने रौदे छल। ओ खेनाइ खेने छल आ खा कऽ अखन अप्पन कोठलीमे पटायले छल आकि एकबैग बिर्रो ऐल। घरक सभटा खुजल खिड़की-दरबज्जा धाँइ-धाँइ करैत अपनेसँ बन्द हुअए लागल आ खुजए लागल। किल्ली उड़ि कऽ कतौ खसल आ भट-भट की-की केना-केना खसऽ लागल, लागल जेना धरती थरथरा रहल अछि आ भीत हीलि रहल अछि। अकास कारी खटखट भऽ गेल छल आ चारू दिस अन्हार गुज्ज छल। ओ उठि कऽ बैसि रहल। अंगना आ दरबज्जा बड़का-बड़का ओला आ बरफक पाथरसँ छरा गेल, दलानक रेलिंग टूटि कऽ दू लग्गा दूर जा कऽ धड़ामसँ खसल। एकर बाद जे निराउ  बर्खा बरिखब शुरू भेल तँ ओ पाइनक बुन्नी नै छल, लागए जेना पाइनक बड़हा छल, जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहए तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतऽ सँ ओ छोड़ल आकि खसाएल जा रहल छल। मेघ लगातार गरजि रहल छल, दूर नै, लगेमे माथक ऊपर जेना बिजलौका लौकि रहल छल, दूर नै, खिड़कीसँ भीतर आँखिमे।एकहत्तरि बर्खक बूढ़ रघुनाथ अवाक! ई एकाएक की भऽ गेल? की भऽ रहल छै? ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, देहपर पड़ल सीरक हटेलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला अड़काक टेकसँ खुजल छल आ बाहर दिस देखि रहल छल। घरक आगुए कदम्बक बड़का गाछ छल मुदा ओकर पता नै चलि रहल छल, अन्हारक कारण, आ बर्खाक कारण जे धऽ कऽ तोपने छल, पथियाक पथिया उझील रहल छल। छातक डाउन-पाइपसँ पाइनक धार खसि रहल छल आ ओकर हहारो अलगेसँ सुना दऽ रहल छल। एहेन मौसम, एहेन पाइन आ एहेन हवा ओ कहिया देखने छल? दिमागपर जोर देलापर मोन पड़ल- साठि-बासठि बर्ख पहिने! ओ स्कूल जाए लागल छल, गामसँ दू माइल दूर। मौसम खराप देखि कऽ मास्टर समयसँ पहिने छुट्टी दऽ देने छल। ओ सभ नेना-भुटकाक संगे गाछी पहुँचले छल आकि आन्ही-बिर्रो-पाइन आबि गेल आ अन्हार पसरि गेल। सभ कियो आमक गाछक अढ़ लेबऽ चाहलक मुदा बिर्रो ओकरा सभकेँ जेना लऽ कऽ उड़ि गेलै आ गाछीसँ बाहर धानक बाधमे लऽ जा कऽ पटकलकै। ककरो झोराक आ किताब-पत्तरक कोनो पता नै छलै। पाइनक बुन्नी ओकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छलै आ ओ मारे चिचिया रहल छल। बिर्रो थम्हलाक बाद जखन पाइन-बुन्नी कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ डिबिया लऽ कऽ बहार भेल छल ताकै लेल। ई एकटा अनहोनी छल आ अनहोनी जँ नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा अनहोनीये छल जे बाहर एहेम मौसम छै आ ओ कोठलीमे अछि। कत्ते दिन भऽ गेल बर्खामे भिजना? कत्ते दिन भऽ गेल गरमी मासक दुपहरियाक बहैत लूमे घुमना? कत्ते दिन भऽ गेल जेठक गुमारमे झरकनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे बौएनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल ठारमे ठिठुरि दाँत कटकटेनाइ? की ई अही लेल होइत अछि जे हम एकरासँ कोना बचि कऽ रही? बचि-बचि कऽ चली? आ अही लेल की एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्तियारी करी, गप करी, माथपर बैसाबी? हम एकरासँ एना व्यवहार कऽ रहल छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए कऽ रहल छी एहेन? एम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लगैत छलन्हि जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, एकर ऐश्वर्य, एकर सौन्दर्य- ई मेघ, ई रौद, ई गाछ-बृच्छ, ई फसिल, ई धार, कछार, जंगल, पहाड़ आ ई सभ किछु एतऽ घुरि जाएत। ओ ई सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैक चाहैत अछि जेना ओ जँ चलियो जाएत तँ ओकर आँखि अतै रहि जेतै। चमड़ीपर सभ चीजक थाप सोखि लै लऽ चाहैत अछि जेना चमड़ी केंचुल जकाँ एतऽ घुरि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका लग पहुँचैत रहत। हुनका लागैत छल जे बेसी दिन आब हुनका नै अछि जाइमे। भऽ सकैए जे ओ दिन काल्हि हुअए, जहिया हुनका लेल सुरुज नै उगै। उगत तँ अबस्से मुदा से दोसर लोक सभ देखत, ओ नै। की ई सम्भव नै अछि जे ओ सुरुजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए, ने ओ रहत, ने ओ उगत आ नहिये कियो आर ओकरा देखत! मुदा एकटा सुरुजे सौंसे धरती तँ नै, ओ कोन-कोनक बौस्तुकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखबासँ रोकत? हुनकर हाथ एतेक नम्हर किए नै भऽ जाइ छन्हि जे ओइमे सभटा धरतीकेँ समेटि लिऐ आ मरै वा जिअए तँ सभक संग! मुदा एकटा मोन आर छल, रघुनाथक जे हुनका धिक्कारि रहल छल, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम? धरतीसँ प्रेमक ई आतुरताइ? ई अहलदिली? काल्हि सेहो ई धरती छल। यएह मेघ, अकास, तरेगण, सुरुज, चन्द्रमा छल। धार, निर्झर, सागर, जंगल, पहाड़ छल। यएह गली, मकान, चौबटिया छल। कतऽ छल ई अहलदिली? फुरसति छल हुनका ई सभ देखै कऽ? आइ जखन मृत्यु बिलाड़ि जकाँ आस्तेसँ कोठलीमे ढुकि रहल अछि तखन बाहरक जिनगीक अबाज सुनाइ दऽ रहल अछि? सत-सत बाजू रघुनाथ। अहाँकेँ जे भेटल अछि ओकरा लऽ कऽ कहियो सोचने रही? कहियो सोचने रही जे एकटा छोट सन गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब? ओसारपर पिरहीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नून खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैसि कऽ लंच आ डिनर करब? मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अबाज बाहरक गड़गराहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अप्पन सकमे नै छल। ओकर नजरि कोनमे राखल लाठी आ छत्तापर गेल। जाड़क ठंढ़ी ओहिने भयंकर छल आ ऊपरसँ ई ओला आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। किल्ली खोलि कऽ ओ ठाढ़ भेल तँ दरबज्जा अपने खुजि गेल। सिहकैत बसात सनसना कऽ भीतर पैसि गेल आ ओ डरा कऽ पाछाँ हटि गेल। फेरसँ ओ साहस केलक आ बाहर जेबाक तैयारी शुरू कऽ देलक। पूरा बाँहिबला गरम गंजी पहिरलक, ओइपरसँ सूती अंगा, ओइपरसँ स्वीटर आ ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट ओ पहिनहिये पहीर लेने छल। यएह ओकर जाड़क मासमे भोरमे टहलबाक वस्त्र छल। मोफलर सेहो छलै मुदा ओइसँ बेसी जरूरी छलै गमछा। बर्खाकेँ देखैत जेना-जेना कपड़ा भिजैत जेतै ओ एकाएकी उतारैत जाएत आ फेकैत जाएत आ अन्तिममे रहि जेतै मात्र ई टा गमछा। ओ अप्पन पहिराबा-ओढ़ाबासँ आब सभ तरहेँ निश्चिन्त छल मुदा खाली माथकेँ लऽ कऽ ओ ततमतमे छल, कनटोप ठीक रहतै आकि माथमे गमछा बान्हि लए। ओला जतेक खसबाक रहै से खसि गेल छलै। आब ओकरा कोनो अन्दाज नै छलै। ओ गमछाकेँ गरदनिक चारू दिस लपेटि लेलक, खालिये माथ बहरा गेल। आब ने कियो रोकैबला छलै आ ने टोकैबला। ओ कहलक- “रौ मोन! घुरि कऽ आबि जेमेँ तँ वाह-वाह आ नै घुरि कऽ आबि सकमे तँ वाह-वाह।” बर्फ सन पाइनक अन्हार बीहरिमे उतरबासँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भार संग एक्को डेग बढ़ैब ओकरा लेल मोश्किल हेतै। ओ कोठलीसँ तँ बहरा गेल मुदा गेटसँ बाहर नै जा सकल। छत्ता खुजलासँ पहिने जे पहिलुक बुन्न ओकर बिन झाँपल केशहीन चानिपर पड़लै तँ ओ तुरत्ते बूझि नै सकल जे ई बिजलौका खसल छलै आकि लोहाक किल्ली खसल छलै जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतर तरबा धरि पहुँचि गेलै। ओकर सम्पूर्ण शरीर झनझना गेलै। ओ पानिक अछारसँ डरा कऽ बैसि गेल मुदा भिजबासँ नै बचि सकल। जाधरि छत्ता खुजितै ताधरि ओ पूरा भीजि गेल छल। आब ओ ओझरीमे पड़ि गेल छल, बर्फ सन बसात आ अछारक बीच। हबा टूटल दूभि सन हुनका उड़ा रहल छल आ अछार धरतीपर पटकि रहल छल। भीजल कपड़ाक भार हुनका उड़ऽ नै दै छल आ हबा हुनका घिसिया रहल छल। हुनका एतबेटा मोन छन्हि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसला आ ई बेर-बेर तखन धरि भेल जखन छत्ताक कमची टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बहार जा कऽ बिला गेल। आब ओकरा एना लगै छल जेना बसात ठामे-ठाम नोचि रहल होइक आ पाइन धीपल लोहसँ दागि रहल होइक। बेहोश भऽ कऽ खसबासँ पहिने ओकरा लग दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे एलै। ओ दू बेर आत्महत्या करबाक विचार केने छल- पहिल बेर लोहता स्टेशनक रेलक पटरीपर गाम-घरसँ दूर निर्जनमे, जतऽ कियो आबै जाइ नै छल। तइ काल ओ सामान्य पैसेंजर वा मालगाड़ीकेँ नै, एक्सप्रेस वा मेलकेँ चुनने छल, किएक तँ जे हुअए से हुअए खट दऽ, एक्के निशाँसमे, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल आकि मेल अबैत देखा पड़लै। पता नै किए ओकरामे जीवनसँ मोह उत्पन्न भऽ गेलै आ ओ उठि कऽ भगबापर छल आकि ठेहुन लगक एकटा पएर खचाक। ई तँ मरैसँ बेसी खराप भेलै। बैशाखीक आश आ घरक लोकक गाइर आ धुत्कारी। एक बेर फेर आत्महत्या करबाक धुनि सवार भेलै ओकरापर। ऐबेर ओ चुनकक सिमानपरबला इनार। ओ अप्पन बैशाखी फेकि कऽ ओइमे फांगि गेल छपाकसँ आकि एकटा बरहा पकड़िमे आबि गेलै। तीन दिन बिन खेने पीने भूखल सोर पाड़ैत रहल ओ इनारमे आ निकलल तँ दोसर पएर तोड़बा कऽ। आइ वएह ज्ञानदत्त - बिन पएरक ज्ञानदत्त- चौबटियापर भीख मंगैत अछि। मरबाक ओकर इच्छा ओकरा कतौ कऽ नै छोड़लकै। मुदा ई हरमजदा ज्ञानदत्त ओकरा मोनमे एलै किए नै? ओ मरबाक लेल तँ नै निकलल छल? निकलल तँ छल ओ पाइनक ठोपक लेल, ओला सभक लेल, बसात लेल। ओ ऐ बातपर आबि गेल जे जीवनक अनुभवसँ पैघ अछि जीवन। जखन जीवने नै तँ अनुभव केकरा लेल। २ पहाड़पुरमे रघुनाथ एक्केटा छल। ओना कहैक लेल रामनाथ, शोभानाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ सेहो सभ छल मुदा ओ रघुनाथ नै छल। आ रघुनाथक ई भाग्य छल जे जतऽ कतौ ओ देखा पड़ै छल, गाम घरक लोक बिख-सबिख भऽ जाइ छल आ पैघ साँस लैत कहै छल- बाह! की भाग्य पेलक अछि ई बिरनल! रघुनाथ पहाड़पुर गाममे असगरे पढ़ल लिखल लोक छल। डिग्री कॉलेजक अध्यापक। दुब्बर-पातर नमगर-छरगर देहबला। शुरुहक दस बरख धरि साइकिलसँ अबैत जाइत छल, बादमे स्कूटरसँ। पछिला सीटपर पहिने बेटी बैसै छलै, बादमे बेटा बैसऽ लगलै। कहियो एकटा, कहियो दुनू। मोटा-मोटी पाँच-छह माइलक दूरी रहै। सभ सुखी आ सफल लोक सन रघुनाथ सेहो अपना जीबा लेल, आगाँ बढ़बा लेल आ अकास छूबा लेल किछु ईलम ताकि लेने छल। सत्य पूछू तँ ओ तकने नै छल, ओकरा प्रकृतिमे छलै। ओ खाली बूझि गेल छल आ ओकरा ओ नित्य व्यवहारक संग बनौने छल। ओ पातर आ नमगर छल आ तइसँ कने लीब कऽ चलै छल। कतौ अबैत-जाइत काल, केकरोसँ भेँट-घाँट करैत काल, बाजैत काल ओ कनी लीबल रहै छल। पहिल बेर ओ अप्पन बारेमे केकरो दोसरासँ गप्प करैत प्रिन्सिपल साहेबक मुँहसँ “विनम्रता” शब्द सुनलक। एहेन हुनकर प्रशंसामे कहल गेल छल। जइ लीबल रहैमे ओ लाजक अनुभव करै छल, ओकर वएह खूबी छल, ई नव बोध ओकरा भेलै। ऐमे ओ आगू जा कऽ दूटा खूबी आर जोड़ि देलक, मुस्कियेनाइ, आ सहमति देनाइ। कियो किछु कहितिऐ ओ मुस्कियाइत रहितिऐ आ समर्थनमे मूड़ी हिलाबैत रहितिऐ। ई तखने सम्भव छलै जखन अहाँ अपना दिससँ कम बाजी। ऐ तरहेँ रघुनाथ विनम्रता, कम बाजाभूकी आ मुस्की संगे जीवनक यात्राक प्रारम्भ केने छल। आ एकरा संयोगे कहियौ जे ओ कहियो असफल नै भेल। ऐ संयोगकेँ दोसर लोक सभ “भाग्य” कहैत छल। आ ऐपर रघुनाथ सेहो विश्वास कऽ लेने छल। भेल ई जे एक बेर ओ जखन कॉलेजसँ साइकिलसँ घर घुरि रहल छल तखन ओ देखलक जे ओकर साइकिलक चेन टूटि गेल छै। ओ साइकिलकेँ कॉलेजमे छोड़ि देलक आ बुलि कऽ आबऽ लागल। गर्मी मास, रौद खूब, हवा कतौ नै, देह घामसँ भीजल। बाटमे कतौ गाछो-पात नै। अकासमे मेघ छलै मुदा दुरस्तमे। हुनकर मोन बाजल- “ओह! ई मेघ जँ रहितए माथक ऊपर छत्ता सन।” आ देखू, एक फर्लांग एबे कएल रहए आकि मेघ सत्ते ओकर माथक ऊपर आबि गेलै। आ एतबेटा नै, ओ मेघ हुनका संगे छाह करैत गाम धरि आएल। अगिला दिन ई सिद्ध भऽ गेल जे ई मात्र भ्रम नै छल। ओ वर्गमे पढ़ेबा लेल जहिना बिदा भेल, तहिना ध्यान गेलै जे कलम नै छै। चाहे तँ ओ घरेमे छूटि गेलै आकि बाटमे खसि पड़लै। ओ एखन क्लासमे पहुँचलो नै छल आकि आगू हॉलमे ओकरा एकटा कलम खसल लखा देलकै, रौदमे चमकैत। एहेन गप आन लोकक संग सेहो होइत अछि मुदा नै जानि किए हुनका लगै छल जे दीनदयालु परमपिताक हुनकापर विशेष कृपा छन्हि। ओ हुनकर सभ सुविधा-असुविधाक ध्यान रखैत अछि। ऐसँ जे ओ चाहैत छथि ओ देर सबेर भऽ जाइत अछि।आ देखू जे ओ जखैन-जखैन चाहलक, जे जे चाहलक से भेल गेल। हुनका किछु करऽ नै पड़ल, अपने मोने भऽ गेल। पढ़ाइ खतम केलाक बाद ओ शोध कऽ रहल रहथि आ हुनकर मोन नै लागि रहल छलन्हि। आब कहिया धरि ओ करैत रहितिऐ शोध? कतौ नोकरी भेटि जेतिऐ तँ जान बचितिऐ। आ बेसी दिन नै बितलै आ हुनका नोकरी भेटि गेलन्हि। एकर श्रेय ओ हालेमे जन्मल अपन बेटीकेँ देलक। बेटी लक्ष्मी होइत अछि। वएह अप्पन संगे आ अपना लेल हुनकर नोकरी लऽ कऽ आएल छल। मुदा आब एकर बाद एकटा बेटा चाही। ई ओ नै, हुनकर हृदय बाजल। आ देखू, चारि बर्खक बाद बेटा सेहो आबि गेल। एकर बाद एकटा आर बेटा- बस! ऐ तरहेँ एकटा बेटी, दूटा बेटा, शीला आ रघुनाथ, सभ कियो मिला कऽ पाँच लोकक परिवार। छोट परिवार, सुखी परिवार। परिवार सुखी रहल हुअए वा नै, रघुनाथ सुखी नै छल। जिनगी हुनका लेल पहाड़पुरक धूल-धक्कर आ हँसी खेल नै छल। जन्मले छल तँ स्वयं कीड़ा-मकोड़ाक योनिमे किए नै जन्म लेलक? ओ ओतऽ जनमि सकै छल मुदा नै, भगवान जँ हुनका ऋषि-मुनिक लेल दुर्लभ योनिमे जनम देने अछि तँ एकर पाछाँ हुनकर कोनो उद्देश्य रहल हेतन्हि। जे जाउ, साठि-सत्तरि बरखक मौका दैत छी अहाँकेँ, जाउ धरतीकेँ सुन्नर आ सुखी बनाउ। धरती सुन्नर आ सुखी तखैन हएत जखैन अहाँक बाल-बच्चा सुखी, सुन्नर आ सम्पन्न हएत। अहाँकेँ जे बनबाक अछि ओ तँ अहाँ बनि गेलौं, आब बच्चा अछि जिनकर आगू पूरा जिनगी आ दुनियाँ राखल छै। यएह अहाँक भविष्य अछि। जीबू तँ हुनकर जिनगी, मरू तँ हुनकरे जिनगी। आ रघुनाथ से केलक। हुनकर सभटा शक्ति आ सभटा बुद्धि आ सभटा पूँजी हुनका सभकेँ बनबैमे लागल रहल। ओ चाहलक- सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करितिऐ। सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करऽ लागल। ओ चाहलक- संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियर बनितिऐ। संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियरटा नै बनल, अमेरिका तक पहुँचि गेल। ओ चाहलक- मैनेजर समधी हुअए। संजय ई नै चाहलक। ओ से केलक जे ओ चाहलक। रघुनाथक आस रहि गेल। दयानिधान किछु मदति नै कऽ सकल हुनकर। हुनका दुख ऐ गपक छल जे मैनेजर एकरा बाप-बेटाक मेलपेंच बुझलक। ओ बड़ मानसिक तनावमे चलि रहल छल, मुदा कॉलेजक हुनकर सहयोगी हुनका बधाइ दऽ कऽ भरोस देलक जे एकटा अन्हार खधाइमे खसबासँ ओ बचि गेला। ऐमे प्रिन्सपलक भूमिका आर नीक छल। ओ मोटामोटी तीस साल पहिने रघुनाथक संग कॉलेज पकड़ने छल। दुनुक दोस्तियारी छलै। जखैन भेटितिऐ हँसी मजाक, हाहा हूहू करितिऐ। ओ एक दिन आस्तेसँ कहलक- “यौ रघुनाथ, हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे एतबेटा गप अहाँकेँ बुझैमे किए नै आएल? ओ अहाँक बेटीक बदलामे अहाँक बेटाकेँ खरीद रहल छल।” ऐ तरहेँ रघुनाथ सहज भऽ रहल छल जे एक दिन घरपर हुनका प्रिन्सपलक दसखतबला नोटिस भेटल। आरोप दूटा छल- “नेग्लिजेन्स ऑफ ड्यूटी”(काजमे ढिलाइ) आ “इनसबऑर्डिनेशन”(उच्च अधिकारीक गप नै मानब)। एहेन कोनो संकेत अपन गपमे नै देने छल ओ पहिने कहियो। ई दुनूटा आरोप छल निराधार। एकरा रघुनाथेटा नै, सहयोगी सभ सेहो जानैत छल आ प्रिन्सपल सेहो। सबहक सहानुभूति ओकरा संगे छलै, मुदा संग देबा लेल कियो तैयार नै छल। ओ उत्तर दऽ देलक मुदा ओ ई जानैत छल जे एकरासँ कोनो लाभ नै अछि। ओ फेंफियाइत एतऽ सँ ओतऽ दौगैत गेल। आजिज आबि कऽ प्रिन्सपलसँ भेँट केलक आ हुनकासँ सलाह मांगलक। ओ कहलक- “देखू रघुनाथ, अहाँ जतेको दौड़-धूप करू, निलम्बनक मोन बना लेने अछि मैनेजर। हुनकर शक्ति आ पहुँचकेँ अहाँ जनिते छी। एकर बाद अहाँ कचहरी जाएब, फौदारी लड़ब, ई कहिया धरि चलत, कियो नै जनैत अछि। भऽ सकैत अछि जे फैसला होइसँ पहिने अहाँ मरियो जाइ। हँ, जाधरि मुकदमा चलत, ताधरि पेंशन रुकल रहत। ई सभ देखि कऽ हमर तँ सलाह अछि जे अहाँ वी.आर.एस. (वॉलन्टरी रिटायरमेन्ट स्कीम, स्वेच्छासँ सेवानिवृत्ति सुविधा) लऽ लिअ। रघुनाथ बड़ी काल धरि चुप रहल। हुनकासँ किछु बाजल नै गेल। “ठीक अछि, मुदा एकटा अहाँ मदति करू।” “कहू, की कऽ सकैत छी हम?” “निलम्बनकेँ अहाँ ताधरि लटकेने राखू जाधरि बेटीक बियाह नै भऽ जाए। फेर हम सएह करब जे अहाँ कहने छी।” मनुष्यताक लेल ई करबाके छल। प्रिन्सपल चिन्तित भऽ कऽ बाजल- “जाउ, कोशिश करै छी, मुदा ई गप अहाँ कतौ नै बाजी, से।” आ प्रिन्सपल कहिया धरि बाट तकितिऐ। एहेन मुसीबतमे रघुनाथकेँ किओ आन नै हुनकर अप्पन बेटे धऽ देने छल। बेटोमे संजय! संजय टा! आ ई नम्हर खिस्सा अछि- राँचीसँ कैलिफोर्निया धरि पसरल। संजय प्रेम केने छल सोनलसँ! ई प्रेम कोनो चौौबटियापर घुमैत लफुआ छौड़ाक अनगढ़ प्रेम नै छलै, ऐमे गुणा-भाग सेहो रहै आ जोड़-घटा सेहो! जतेक गहींर छल ततबे व्यापक। संजयक सोनल प्रोफेसर सक्सेनाक बेटी छल। सदिखन प्रथम श्रेणी, व्याख्याताक योग्यता परीक्षा पास आ दर्शनशास्त्रसँ पी.एच.डी.। नौकरी तँ पक्का छल, बनारसक विश्वविद्यालयमे, जतय ओकर माय कुलपति छल, मुदा ओइमे अखन देरी छलै, तखनि धरि बियाहक बाट तकबाक छल! बियाहमे बाधा भऽ रहल छल, ओकर ठोढ़सँ बाहर आएल दाँत आ सटल नाक जकर क्षतिपूर्ति ओ अप्पन सर्टिफिकेटसँ करैत छल। छूटल-बढ़ल कसरि पूरा कऽ रहल छल सक्सेनाक पसारल ई फूस कि हुनका एकटा एहेन कलामी सॉफ्टवेअर अभियन्ताक आवश्यकता छन्हि जे अमेरिकाक एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनीक तीन बर्खक कान्ट्रेक्टपर कैलीफोर्निया जा सकए। ऐ आवश्यकताक अनुभव सम्पूर्ण इन्स्टीट्यूट बुझैत छल। संजय अन्तिम परीक्षा दऽ देने छल, रिजल्टक घोषणा बाकी छल! एम्हर कतेक बेर माँ-बापक संदेश आएल छल जे आबू, लड़कीकेँ देखि लियौ। लड़कीकेँ की देखब, ओ तँ देखले छल! रघुनाथ जइ कॉलेजमे पढ़बैत छल, पूर्व विधायकक बेटी तकर मैनेजर छल। गोर, नमछुरुक, सुन्नर आ आकर्षक। एम.ए.। नीक गृहणी। मैनेजर पुरान जमानाक जमीन्दार, अथाह सम्पत्तिक मालिक। रघुनाथक कोनो हैसियत नै छलै ओकर आगू। नहिये नीक सन घर दुआर, नहिये जमीन-जत्था। आठ बिगहा खेत आ हरक जोत। नेनपन आ युवावस्था बड्ड तंगीमे बितलै। बच्चा सभकेँ पढ़ेलक तँ खेतकेँ बन्हकी लगा कऽ आ कॉलेजसँ ऋण लऽ कऽ। स्पष्ट छल, मैनेजर “सॉफ्टवेअर अभियन्ता” केँ देखने छल, अप्पन कॉलेजक मास्टर रघुनाथकेँ नै। ई सम्बन्ध रघुनाथक लेल सपनासँ आगूक चीज छल । फाएदे-फाएदा छल ऐसँ! जिलामे पहिचान आ प्रतिष्ठा जे भेटतिऐ, से अलग। ओ कीसँ की भेल जा रहल छल। तँ गाम आबैसँ पहिने सक्सेना सर सँ बिदा लै लेल गेल छल संजय। एकरा अहिनो कहि सकैत छी जे ओकरा सक्सेना सर डिनरपर बजेने छल। गर्मीक साँझ। अप्पन लॉनमे सक्सेना बेंतक कुर्सीपर चुपचाप बैसल छल। माली गमलामे पाइन दऽ रहल छल। बंगलाक भीतरक बत्ती जड़ि रहल छल। कोनो कोठलीसँ संगीतक धुन आबि रहल छल। अवकाश प्राप्तिक करीब, हृदयक मरीज प्रो. सक्सेना संजयक एबासँ अनजान चुपचाप बैसल छला आ आगू देखि रहल छला। बड़ी कालक बाद ओ पुछलक, “कोन इन्स्ट्रूमेन्ट अछि”। संजय बिना बुझने माथ हिलेलक। “आ राग? कोन राग अछि?” संजय निरुत्तर, फेर माथ हिलेलक। ओ ससरि गेल आ ऊँच अबाजमे बजेलक- “सोनू”। जीन्सक पेंट आ टी-शर्टमे कूदैत सोनू आएल- “हँ पापा”। संजय ठाढ़ भऽ गेल। सक्सेना मुस्की देलक, पहिने संजयकेँ देखलक, फेर सोनलकेँ। सोनल सेहो मुस्की देलक। संजय सोनलसँ भेँट तँ कते बेर केने छल मुदा देखने पहिलुके बेर छल। ओकरा लगलै जे कोनो छौड़ीकेँ टुकड़ीमे नै “सम्पूर्णता”मे देखबाक चाही। कतेक फर्क पड़ि जाइत छै। संगे संग छौड़ी आ कनियाँकेँ एक तरहेँ नै देखबाक चाही। रूप-रंग, ढीब-ढाब, मान-मनौअलि छौड़ीमे देखल जाइत अछि, कनियाँमे नै! ई सभटा पुरान धारणा अछि, हमर पापा-मम्मीक जमानाक, हमर नै। सक्सेना गुम्मी तोड़लक- “ई अछि सोनम, जइमे हमर प्राण बसैत अछि। सितार, सरोद, संतूर माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस एकरा पसिन्न नै। फिल्मी गीतकेँ ई गीत नै मानैत अछि। किएक तँ ई अपने कथक नृत्यांगना रहल अछि। तँ की खुआ रहल छी हमरा सभकेँ आइ?” “ओ तँ तखने पता लागत जखन खाएब।” सोनल लजा कऽ भागि गेल। “बैसू संजय।” ई कहैत सक्सेना सेहो मूड़ी झुका कऽ बैसि गेल। किछु सोचैत। टूटल स्वरमे बाजल- “कोना रहब एकर बिना, रहब कोना से नै बुझि पड़ैत अछि। ई चौदहे बर्खक छल जखन एकर माय गुजरि गेलै।” तकर बाद ओकर आँखिसँ नोर खसऽ लगलै- “तीन चारि बरखसँ लगातार आबैत रहल अछि लड़का। एकसँ एक। अहाँक सीनियर सेहो, क्लासफेलो सेहो। मुदा बेटा भारी संकटमे छी, अहीं उबारि सकै छी ऐ संकटसँ। पछिला बरख ई बाजल छल जे बियाह करब तँ संजयसँ, नै तँ नै करब बियाह। अपना भीतर नुकेने रहलौं ऐ गपकेँ। आइ बाजि रहल छी, सेहो ऐ दुआरे जे फैसलाक घड़ी आबि गेल अछि। तीन-चारि मास आर अछि कैलिफोर्निया जेबामे। ऐ बीच बियाह अछि, हवाइ टिकट अछि, पासपोर्ट अछि, वीजा अछि, सभटा तैयारी अछि। सोनल अमेरिका आ हनीमूनकेँ लऽ कऽ उत्साहित अछि।” ओ आँखि पोछलक आ संजयकेँ देखलक। “सभ बापक सपना होइ छै आ हमरो अछि। नै हेतिऐ तँ सेंट्रो कार किए लैतिऐ? अपना लेल फिएट तँ छेबे करल। नव घर गृहस्तीक समान किए जुटैबितिऐ? अहाँक नग्रमे एकटा कॉलोनी अछि अशोक विहार। ओइमे एकटा छोट सन बंगला बनबैले छी। सभ किछु कम्प्लीट अछि। बस फिनिशिंग टा बाकी अछि। सोचले रही जे एतऽसँ रिटायर करब तँ काशीवास करब। सभ लोक यएह चाहै छै। अहाँक पापा-मम्मी सेहो चहैत होएत। मुदा सोचैत छी जे काल्हि सोनल विश्वविद्यालयमे ज्वाइन करत तँ कतए रहत? हमर तँ सभटा जीवन राँचीमे बीतल, सभटा दोस्त-मित्र, सर-सम्बन्धी एतए अछि। ओतऽ जा कऽ की करब? तइसँ बंगला ओकरे नाम कऽ रहल छी।” संजय चिन्तित भेल। ओकर आँखिमे पापा-मम्मीक चेहरा घूमि रहल छलै। ओकरा लागि रहल छलै जे ओ हुनका हँ करैमे जल्दी कऽ देने छल। बाजल “बड देर कऽ देलौं सर सोनलक बात बताबैमे।” “देर सबेर किछु नै होइत अछि संजू, सभ चीजक बेर होइ छै। आब यएह देखू, हमर साढ़ू प्रोफेसर अस्थानाकेँ बनारस मे एहने घड़ीपर कुलपति किए हाँकि देने छल जखन सोनल थीसिस जमा कऽ रहल छलि?” ओ सिगरेट जरेलक- “ओना तँ सिगरेट मना अछि मुदा कहियो काल एकाध सोंटा लऽ लैत छी। तँ अहाँक पापा। हुनकर परेशानी बुझि सकैत छी। कहैत रहल छी हुनका लऽ कऽ। छोट भाइ अछि अहींक। पछिला तीन-चारि बर्खसँ कैट-मैट परीक्षा दऽ रहल अछि। लोक सेवा आयोगक परीक्षा दऽ रहल अछि। आ कोनोमे नै आबि रहल अछि- ओकर परेशानी। गप आएल बीचमे तैं, परेशान भऽ कऽ किछु कऽ नै लिअए तेँ ओइसँ पहिने कोनो मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूटमे नामांकन करा दियौ। एना नै तँ डोनेशन दऽ कऽ। ऐं यौ, कत्ते लागत? डेढ़ लाख, दू लाख, आर की? अहाँ बतेने छलौं जे अहाँक पढ़ाइ लेल ऋण लेल गेल छल आ खेत सेहो भरनापर राखल अछि। ऐ सभ परेशानीसँ बहार होइले कतेक जरूरति हएत हुनका? हुनकासँ गप कऽ कए तँ देखू। की चाहैत छथिन ओ। देखू, बरियाती, धूम-धरक्का, गाजा-बाजा ई सभ फुसियाहींक बखेरा छी। कोनो जरूरति नै अछि देखावटी व्यवहार आ तमाशाक। बियाह लेल कोर्ट अछि आ दोस महीम लेल एकटा स्वागत समारोह राखि देबै। ई हम कऽ देब, फेर? ओना एकटा गप बता दै छी, जेहेन कम्पनी आ जेहेन शर्तपर अमेरिका जेबाक अछि ओइसँ तीन बरखमे कियो एते कमा लेत जे जौँ ओकर बाप चाहै तँ गामक गाम कीनि लेत। बुझलौं?” “प्रश्न ई नै अछि सर। पिताजी कने लोक-लाज आ जाति-पातिमे विश्वास करऽबला पुरान ढङक लोक छथिन।” सक्सेना गम्भीर भऽ गेला। कनी काल धरि चुप रहलखिन। ऐ बीच सोनल साड़ीमे आएल। खाइक लेल बजाबैक लेल। “देखू संजू। लॉ ऑफ ग्रेविटेशनक निअम गाछ आ फड़ धरि लेल मात्र लागू नै होइत अछि। मनुक्खक सम्बन्धपर सेहो लागू होइत अछि। सभ बेटा-बेटीक माँ-बाप पृथ्वी अछि। बेटा ऊपर जाइले चाहैत अछि आर ऊपर, कनिक आर ऊपर तँ माँ-बाप अपन आकर्षणसँ ओकरा घिचैत अछि। आकर्षण संस्कार भऽ सकैत अछि आ प्रेम सेहो, माया-मोह सेहो। मंशा गिराबैक नै होइत अछि। मुदा खसा दैत अछि। जँ हम अपन बापक सुनने हेतिऐ तँ हेतमपुरमे पटवारी बनि गेल हेतिऐ। तँ ई अछि। हमरा जे कहबाक रहए, से कहि देलौं। अहाँकेँ जे नीक लगैत अछि से करू। हँ, जाइसँ पहिने सोनलसँ गप कऽ लेब।” ४ जुलाइमे बियाह भऽ गेल चिरंजीवी संजय आ सोनलक कोर्टमे। नहिये बरियाती आ नहिये बाजा-गाजा। प्रीतिभोजक लेल नोत आएल छल, रघुनाथक नामसँ सेहो। मुदा ओ नै गेला। एहेन चोट लागल छल रघुनाथ आ शीलाकेँ जे ओ दोसरकेँ नै देखा सकैत छल आ नहिये ककरोसँ नुका सकै छल। एहेन ठामपर जाएब ओ बन्द कऽ देने छल जतऽ दू-चारि गोटे जुमैत होथि। ओ मानि लेने छल जे दू बेटामे एकटा बेटा मरि गेल। जखन माए-बापक प्रतिष्ठाक ओकरा चिन्ते नै तँ मरले बुझू।सितम्बरमे ओ अमेरिका जाए आकि नर्क, ऐसँ ओकरा कोनो सरोकार नै। ऐ घड़ी लेल ओ ओकरा पालने-पोसने छल, पढ़ेने-लिखेने छल, गाछ कटने छल, कर्ज लेने छल, भरनापर खेत देने छल, आ दुनिया भरिक तगेदा सुनने छल? हुनकर लाख मना केलाक बादो राजू गेल छल, रामू माने संजयक भाए धनंजय, घुरल तँ ओकरा हाथमे एकटा ब्रीफकेश छल जे रघुनाथ लेल सक्सेना पठेने छल। रघुनाथ कॉलेजक तैयारी कऽ रहल छल। कुमोनसँ ब्रीफकेश दिश देखलक आ बाजल- “राखि दियौ।” “ऐं, एना कोना राखि दी। अप्पन संदूकमे राखू।” बाबा जमानाक सन्दूकमे की कहाँ राखै छल रघुनाथ आ ओकर चाभी ओ ककरो नै दै छल। बिना किछु बजने ओ चाभी ओकरा दिश फेकि देलक।राजू ब्रीफकेशकेँ संदूकमे राखि चाभी घुरा देलक आ बाजल, “आर किछु नै पुछब?” शीला उदास मोनसँ दरबज्जापर ठाढ़ि छल, भीतर चलि गेलि। “अहाँ सभ तँ एना गुम्म छी जेना कोनो बिपति आबि गेल”, राजू हँसैत माँक पाछाँ भीतर चलि गेल। “कनियाँ एहेन जे लाखमे एक। माँ अहाँ चिन्ता नै करू। सभ किछु करत ओ जे संजय बाजैत छल। हाथ-पएर जाँतत, मुँह दबाएत, बर्तन माँजत, बाढ़नि लगाएत, खेनाइ बनाएत, जे जे चाहत से सभ किछु करत। कनी अमेरिकासँ घुरिकऽ आबऽ तँ दियौ। अखन हनीमूनपर जा रहल अछि दार्जिलिंग, ओतएसँ दमदम हवाइ अड्डा, फेर ओतएसँ अमेरिका। बचि गेलौं अहाँ, जँ गेल रहितिऐ तँ मुँह देखाइ देबऽ पड़ितिऐ। ई लिअ, अहाँले फोटो पठेलक अछि स्वागत समारोहक…।” राजू नै जानि की-की बजैत रहल, ओ सुनितो रहल, नहियो सुनैत रहल। दुनू गोटेक फोटो ओतए पड़ल रहल जतऽ ओ बैसल छल। एकटा मन कहि रहल छल, “देखी”, दोसर कहि रहल छल, “छोड़ू, जाए दियौ”। सभटा सख धरले रहि गेल। राति भऽ गेल छल। गाममे सनाटा पसरि गेल छल। एक दिन पहिनहिये खूब बरखा बुन्नी भेल छल। हरियरी पसरि गेल छल। झिंगुरक अबाज गामकेँ गनगनेने छल। मेघ घटाटोप केने छल। दूर अकाशमे बिजलौका लौकै छल। ओम्हर कतौ पानि पड़ल हेतै, एम्हर नै भेल। रघुनाथक घर दुआर गामक बाहरी इलाकामे छल। घरक अगुलका हिस्सा दुआर पछुलका घर। दुआरक माने दलान आ बरण्डा। ऐ बरण्डामे सुतै छल रघुनाथ आ राजू। राजूक सुतलाक बाद रघुनाथ आध रातिमे नुका कऽ भीतर गेल, ढिबरी लेसलक आ सन्दूकसँ ब्रीफकेश निकाललक। जखन ओ ढिबरी आ ब्रीफकेश लऽ कऽ शीलाक बगलबला कोठली गेल तँ ओकरा मोन पड़लै जे ब्रीफकेशक चाभी तँ राजू देबे नै केलक। ओ रकमसँ राजूकेँ जगेलक। राजू बतेलक जे ब्रीफकेश चाभीसँ नै नम्बरसँ खुजत, ऐ नम्बरसँ। आ बड़-बड़ करैत ब्रीफकेश खुजि गेल। रघुनाथ ब्रीफकेशकेँ खोललक तँ भाव-विभोर। बेटा संजयकेँ लऽ कऽ जत्ते तामस रहै सभ टा बिला गेलै। टाकाक एतेक गड्डी अपन आँखिक सोझाँ एकटा ब्रीफकेशमे ओ पहिल बेर देखि रहल छल। आ ई कोनो सिनेमा नै वास्तविकता छलै। गामक लोक रघुनाथकेँ झगड़ा-झंझटिसँ दूर रहैबला मुदा कंजूसक श्रेणीमे गनती करै छल जे टाकामे अठन्नी भजबैत अछि। लोक ईहो कहै छल जे बड्ड लोभ नै केने रहितिऐ तँ ई दिन नै देखऽ पड़ितिऐ। रघुनाथ ब्रिन्चकेँ अपना दिस घिचलक। पहिने सए-सएक गड्डी गननाइ शुरू केलक। ओ एक-एक बण्डलक संख्या सेहो लिखि रहल छल। फेर ओ पाँच-पाँच सएक नोटक गड्डी उठा कऽ गनब आ लिखब शुरू केलक। गनैत-गनैत राति बेशी भऽ गेल आ सभटा रुपैयाक जोड़ भेल चारि लाख साठि हजार। हुनकर हअदय काँपल, जँ गनैयोमे गलती भेल हएत तँ एतेक टाका कोना? ओ उठि गेल आ सन्दूकमे झोंकि फेर आनि लेलक। घुरतीमे भंसाघरसँ कटोरामे पानि लऽ रहल छल तँ शीला जागि गेल। अंगुर भिजा-भिजा कऽ फेरसँ टका गनलक मुदा फेर वएह चारि आ साठि। ओ माथ पकड़ि बैसि गेल। “कोन गप अछि?”, शीला पुछलक। “पाँच लाखमे कम अछि चालीस हजार, कियो सन्दूक तँ नै खोलने छल?” “चाभी तँ अहीं लग छल, खोलत के?” “कियो आर तँ नै आएल छल घरमे?” “अहाँ आ राजू आएल छलौं, आर तँ कियो नै।” कनी कालक बाद ओ नै जानि की सोचि कऽ उठल आ राजूकेँ जगा कऽ लऽ अनलक। राजू आँखि मिड़ैत आएल। “ब्रीफकेश के देने छल अहाँकेँ, संजू आकि सक्सेना?” “किए? की गप अछि?” “बताउ, कम अछि पाँच लाखमे?” राजू हँसल, “मंगनीक बाछीक दाँत नै गानल जाइ छै। संतोष करू, जत्ते भेटि गेल से मंगनीमे, सएह बुझू।” ओ एकटक राजूकेँ देखैत रहल, “अहाँ तँ किछु एम्हर-ओम्हर नै केने छी?” “हम जनै छलौं जे यएह शक करब अहाँ, अहाँ स्वभावेसँ शक्की छी।” “चुप्प”, शीला बाजलि, “अहिना बापसँ गप्प कएल जाइ छै?” “बुझि गेलौं, यएह चोरेलक अछि। बतेलक नै।” “पहिने बुझि जेबाक चाही। चोरा कतौ बतबै छै जे चोरि वएह केने अछि”, राजू बाजल। रघुनाथ आश्चर्यसँ देखलक ओकरादिस, “की भऽ गेल छै ऐ छौड़ाकेँ। एकर भाए कम्प्यूटर अभियन्ता। ओ ऐ तरहेँ कहियो गप नै केने अछि बापसँ।” “गप्प नै केलक, तेँ अस्थिरेसँ चुपचाप बियाह कऽ लेलक आ बापकेँ खबरि धरि नै केलक।” झनझना उठल गुस्सा सं रघुनाथ। मन भेल-ओकरा घर सं निकलि जायैक कहियै मुदा नै जानि की सोचहि के ओतय सं उठल आ आंगन मे आबि गेल। कोना मे बंसखट पड़ल छल, ओहि पर बैसि गेल। ओ भगवानक लेल माथ उठैलक आसमान दिस। 'देखू मां, हम डेढ़ बरख सं कहि रहल छलहुं हिनका सं जे मोटरबाइक दऽ दियौ। घरानाक सभ छौड़ा लग अछि, एकटा हमहीं छी जकरा लग नै अछि। हिनकर कहब छल जे हाथ-पाइर तोड़बाक अछि की? माथ फोड़बाक अछि की? चोरी-चकारी आ लफंगई करबाक अछि की? डाका डलबाक अछि की? केकर हाथ-पइर टूटल अछि, कहू ते? ते संजू हमरा सं पुछलक-'अहां के की चाहि? जखैन हम ओतय सं घुरहि लागलहुं। हम कहलहुं-'हां, मोटरबाइक। ओ हमरा टका थमा देलक। ओ ब्राीफकेस मे सं देलक या कतय सं देलक हमरा नै पता।" 'सरासर झूठ। ई जानैत अछि जे संजय आब नै आबय बला अछि। हम नै पूछि सकब ओकरा सं।" रघुनाथ के ई झूठ बर्दाश्त नै भेल। शीला ठाढ़-ठाढ़ डिबरीक मद्धिम रोशनी मे कानि रहल छलि। ओ अप्पन बेटाक अहि रूप सं अनजान छलि। 'आैर कहू। हमर बापजानक दूटा बेटा-संजू आ हम। ई एक्को आंखि सं हमरा देखलक तक नै। सभटा मेहनत आ सभटा पाय ई ओकरे पर खर्च करलखिन। पढ़ैलक, लिखैलक, कंप्यूटर इंजीनियर बनैलक आ हमरा लेल। कामर्स पढ़ू। जकरा पढ़हि मे नै ते मदद कऽ सकैत छल, नै हमरा मन लागैत छल। कोनो तरहे बीकाम करलहुं ते कोचिंग करू, ई टेस्ट दियौ, ओ टेस्ट दियौ। हम थाकि गेल छी टेस्ट दैत-दैत। हिनका सं कहियौ, ई टका कत्तौ इमढ़-उमढ़ खर्च नै करैथ, डोनेशन लेल राख्ौथ। बिना डोनेशन कत्तौ एडमिशन नै हय बला छै। परछा के बता दैत छी।" 'जौं डोनेशनक टका नै देब तऽ?" 'ते कहियौ नै पूछब जे ई की कऽ रहल छी?"'कियअ कऽ रहल छी?" 'की करब? डाका डालब? तस्करी करब? गांजा हेरोइन बेचब? कत्ल करब?" की बक-बक कऽ रहल छी अहां? फालतू? झमाइर के शीला बाजल, 'आओर अहां चुप रहू। अनाप-शनाप कहि रहल छी बाप सें।" राजू कमरा सं बाहर निकलैत पिता सं बाजल, 'बस कहि देलहुं।" 'सुनू-सुनू। भागू नै। अपना लऽ कऽ सोचैत छी आ कहियौ अप्पन बहिन कऽ लऽ कऽ सोचने छी? जखैन होयत अछि तखन जाइत छी हजार पांच सौ मारि के आबि जायत छी ओकरा सं? ओकर ब्याह कऽ लऽ कऽ कखनो सोचैत छी?" 'देखि रहल छी हिनकर?" ओ मां दिस मुड़ल, 'जकरा सं कहबाक छल, ओकरा सं नै कहलल, कहि हमरा सं रहल अछि, जे एखन पढ़ि रहल अछि। डोनेशनक गप आयल ते दीदीक ख्याल आबि रहल अछि। पहिले हिनका सं कहियौक जे कंजूसी आ दरिद्रता छोड़ैक आब। हंसी उड़ाबैत अछि लोक। ई ढिबरी आ लालटेन छोड़य आ आन जना तार खींचवांके-कम से कम आंगन आ दरवाजा पर लट्टू ते लगवाय लियै। इजोत हुयै घर मे। एकर संगे फोन लगा रहल अछि लोक। घर मे फोन होयत ते संजू जखन चाहत, गप कऽ लेत। अहां सरला दीदी सं गप कऽ लेब। दीदी से टा किया भौजी सं सेहो।" माथा फोड़ैत फेर सं बैस गेल रघुनाथ-'यहि छी भाग्य। जकरा लेल कंजूसी करलहुं, ैओकरे मुंह से ई सुनबाक छल।" 'आओर एकटा गप कहि दैत छी अहां से आओर हिनको सं। फेर एहन बेवकूफी नै करैथ जेहन संजूक काल मे कइलय अछि। दीदी से परछा के गप कऽ लहुं चे ओ हिनकर तय करल सं ब्याह करत या नै। ई ते दौड़-भाग कऽ कत्तौ तय कऽ अइथिन आ ओ कहि दियै जे हमरा ब्याह नै करबाक अछि। फेर भद पिटत हिनकर।" 'ई अहां कोनो कहि सकैत छी।" 'कियैकि हम एकटा आदमी के अकसर हुनका संग देखनी छी। के छी ओ, नै जानैत छी।" 'देखलियै नै? एकरा शरम धरि टा नै अछि बहिन कऽ लऽ के अहि तरहे गप करैत?" रघुनाथ दांत पीसैत ओतय सं बाजल। ५ सरला दुविधा मे छल-ब्याह करि आ नै करि? पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नै करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत। कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे! आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नै छूटहि छल। अहिना मे नै जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल। कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नै युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नै छल। नै कोनो खतरा, नै कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नै छल। कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नै सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ। सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नै। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नै छल, जतय हुनका कियो नै जानैत हुयै। निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ। प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नै अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन! सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो। जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नै सकल नीक सं। नींद नै आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नै बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि... एखन नै जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नै, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल? कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नै, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नै, विद्वान अछि। कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नै हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नै बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नै हुयै ओहि दिन! अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नै, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नै! मनु श्रद्धा सं देखलक! श्रद्धा मनु के देखलक! दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नै, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल। ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।" स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी! ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नै!" ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल। अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक। चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!" कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक! 'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे! 9 सरला चलि गेलि, मुदा रघुनाथक सुख-शान्ति लऽ गेलि। रघुनाथ कतेक राति सुति नै सकल। हुनका नीन नै आबि रहल छल। कोन जन्मक पाप छल जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। बच्चा सभकेँ एहन संस्कार कतऽसँ भेटल छलै जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। संजयकेँ कियो नै भेटलै- नहिये ठाकुर, नहिये बाभन, नहिये भूमिहार; भेटलै तँ लालाक लड़की। तकर बादो ओ ओइ लाएक छल जे मुँह देखा सकए, मुदा ई सरला। ओ ककरा मुँह देखाएत। कतऽ मुँह देखाएत। लड़कीक अप्पन तर्क छलै, जे ओ जाइत-जाइत सुना गेल छल। जे भी गलत काज करैए, ओ ओकर पक्षमे तर्क गढ़ि लैए। उहो ई तर्क गढ़ले छल- अहाँ दोसराक शर्तपर बियाह कऽ रहल छी, एतऽ हम बियाह करब मुदा अप्पन शर्तपर, अहाँ हमर स्वाधीनता दोसराक हाथमे बेचि रहल छी, एतऽ हमर स्वाधीनता सुरक्षित अछि, अहाँ अतीत आ वर्तमानसँ आगू नै देखि रहल छी, हँ, हम भविष्य देखि रहल छी, जतऽ स्पेसे-स्पेस अछि। स्पेसे-स्पेस, ऊहूँ। स्पेस माने की। आरक्षण आ कोटाक अलाबे एकर कोनो मतलब अछि? एतबे नै, आरक्षण नै हेतियै तऽ भारती केकरो ने केकरो दुआरि जाइत हेतियै आ पढ़य-लिखय कऽ बादो नग्रमे रिक्शा खींचैत हेतियै। अहीं कहैत रही जे एकदम गधा अछि, किछु नै बुझैत अछि। आइ पी.सी.एस. भऽ गेल तँ ओकरा जेहन कियो नै। ओ अप्पन मनक बोझ निकाललाक बाद हल्लुक अनुभव कऽ रहल छल कि पाछाँसँ कोनो हल्ला सुनाइ देलकै- यौ मास्टर साहेब। जमायक की हाल अछि? आ कनी-कनी हुनका लागै छल जे ई हल्ला पाछाँ टा सँ नै, आगूसँ सेहो- बाम-दहिनसँ सेहो, ऊपर-नीचाँसँ सेहो आबि रहल छलै। चारू दिससँ। गाम-घर, आस-पड़ोस, जान-पहिचानक सभ कियो हुनकर जमायकेँ लऽ कऽ चिंतित छलनि मुदा हुनकासँ हँसी कऽ रहल छलनि। ऐ बीच नै जानि किम्हरसँ कोनो बच्चाक किलकारी सुना पड़ल आ ओ हुमचैत हुनका दिस अप्पन नान्हि-नान्हि बाँहि पसारि देलक- नाना, ई देखू की अछि। ओ ओकर हाथसँ एकटा कागज लेलथि, जे हुनकर परोक्षमे चमटोलसँ झूरी देने गेल छल। ई निमंत्रण पत्र छल झूरीक पोतीक। तँ आब यएह हुनकर दियाद आ लगीचक अछि। नोत-हकार आ खानपीन आब हुनके संग हेबाक अछि, गेल अप्पन दियादबाद। रघुनाथ निश्चय केलक जे आब ओ वालण्टरी रिटायरमेंट लऽ लेत। ओ शीलासँ अप्पन ई इच्छा बतौलक जे आब ओकरा नोकरीक जरूरत नै छै। ई नै बतौलक जे ओकरा वी.आर.एस. आ सस्पेंशनमे सँ एकटा चुनबाक छै आ ऐमे यएह ठीक छै जे ओ करबाक लेल सोचि रहल अछि। चन्द्रमाक रोशनी पसरल छल, अगहनक। अकास साफ छल। आध आंगैन इजोरिया छल, आधमे छाह। चन्द्रमा सोझे रघुनाथक चेहरा देखि-देखि मुस्करा रहल छल। ओ ओकर जल्दीसँ हटबाक आसमे छल मुदा ओ अप्पन ठामसँ हटबाक नाम नै लऽ रहल छल। ओ हुनका नजरि गारि कऽ देखैत रहल आ हुनका लागऽ लगलनि-जेना चांद ऐना अछि आ ओकरामे लखाह पड़ऽ बला दाग हुनकर मुँहक झाइ। गामक सिमानक पारसँ शुरू भऽ जाइत अछि कुसियार आ राहरिक खेत, जतऽसँ नरहिया एक्के संग हुआँ-हुआँ शुरू केलक। गामसँ कुकुड़ सेहो ओही भावसँ उतारा देलक आ जना देलक जे ओ सभ सेहो सुतल नै अछि। शीलाक खाट रघुनाथक कातेमे छलै आ ओ सुतलि छलि। पछिला कतेक दिनसँ रातिमे यएह भऽ रहल छल। रघुनाथ रतजग्गा कऽ रहल छल आ शीला गप करैत सुति जाइत छलि। रघुनाथ उठि कऽ बैस गेल। इजोरियामे ओकर मुँह देखलक। भरल-भरल गोल गोर चेहरा आ नाकक लोलपर चमकैत चन्द्रमाक किरिण। एकरासँ पहिने ओ हुनका सदिखन पटायल देखने छल, सुतल नै। ओ एकटकसँ निहारैत रहल हुनका। ओ करौट लेने छल आ ओकर चेहरा रघुनाथे दिस छल। ओकरासँ सात बरख छोट, मुदा उमेर ओकरो नै छोड़ने छल। ओकरा भीतर प्रेम घुमरऽ लागल- हँ, आबो सुन्नरि छल हुनकर स्त्री। ओकरा लागल, ओ कहियो ठीकसँ प्रेम नै केलक हुनका। ओ हाथ बढ़ा कऽ हुनकर ब्लाउजक एकटा बटन खोलि देलक, चुप्पे दोसर, फेर तेसर। सुतल छाती जेहन नीनसँ जागि गेल, कुनमुनेलक आ फेर घुरऽ लागल। बिछौनपर झुकल-झुकल। ओइमे जान बाकी छल। ओ उठल आ हुनकर बगलमे पटा रहल। शीला ठाम बनौलक हुनका लेल आ आँखि बन्द केले-केले अपनाकेँ हुनकर आश्रित कऽ देलक। आँखिकेँ खोलबाक प्रयोजन नै छलै, हुनकर ओंगरी देहक सभटा कोन-अंतरासँ परिचित छल। ओ बड़ काल धरि एक-दोसराक देहक भीतर ओइ चीजकेँ ताकैत रहल, जे नै जानि कहिया अप्पन ठाम छोड़ि कऽ चलि गेल छल। रघुनाथकेँ लागि रहल छल- नै, कत्तौ नै अछि, कत्तौ ने कत्तौ ऐ बा ओइ देहमे अछि सत्ते मुदा जौँ सच्चे हेतिऐ तँ कतऽ जैतिऐ। परेशान भऽ थाकि-हारिे ओ अप्पन मुँह शीलाक छातीक बीचमे धँसा देलक आ शांत पड़ि गेल। मन नै कऽ रहल अछि, तँ छोड़ू।- शील आस्तेसँ बाजल। कनी काल धरि रघुनाथ किछु नै बाजल, फेर एक बेर हिचकी लेलक। शीलाकेँ लगलै जे ओकर छातीक बाम दिससँ जे गरम चीज बिछौनपर टघरि रहल अछि, ओ नोर थिक। रघुनाथक नोर। ओ हुनकर उघारल पीठ ससारलक- आस्तेसँ। मन तँ कऽ रहल अछि, देहे संग नै दऽ रहल अछि।- टूटल सांसे रघुनाथ बाजल। -तँ ऐमे दुखी हेबाक की गप अछि? होइत छै एना कखनो-कखनो। -नै, ई आब कखनो कालक गप नै लागि रहल अछि, शीला। -बड़ तनावमे रहि रहल रही ऐ बीच। तइसँ एना अछि। -नै, नै, फुसिये मोन नै बहटारू। हम ओइ लीखकेँ चीन्हि गेलौं, जइ बाटे चलि कऽ ई देहमे पैसैत अछि। -के ऊ। -बुढ़ापा। रघुनाथ बाजल आ कूही भऽ कानऽ लागल। शीला ओकरा पकड़िकेँ बैसौलक आ सांत्वना दैत बाजलि- एहन किछु नै अछि। दिमागी भूत खाली। बिना काजक सोचैत रहै छी, राति-दिन। हम कोनो शिकाइत केने छी कहियो? आर की चाहै छी। सदिखन जवाने रहब की? ओना, ई सभ बेटी-बेटा लेल छोड़ि दियौ। हमर-अहाँक उमेर थोड़े अछि ई सभ करबाक। अगला चारिम आ पाँचम दिन साँझमे जखन रघुनाथ कॉलेजसँ घुरल तँ शीला ओकरा खबरि केलक जे टेस्ट दऽ कऽ धनंजय आबि गेल अछि। ओना जौं ओ खबरि नै करितिऐ तखनो ओसारपर बाइकेँ ठाढ़ देखि कऽ ओ बुझि गेल छल। कपड़ा बदलि कऽ जखन ओ बाहर आएल तँ धनंजयकेँ देखलक। पुछलक- ऐबेर केहन भेल पर्चा। -बड़ नीक। निकालि लेब ऐबेर। -पाँच बरखसँ यएह गप सुनि रहल छी। सभ बेर निकालि लै छी। -एस.सी., एस.टी. कोटा आ घटल सीटपर हमर सक नै अछि। ओकरा लेल हम की करी? रघुनाथ ओकर कोना उतारा नै देलक। ऐ बीच शीला बाप-बेटा लेल चाह लऽ कऽ आएल। चुपचाप चाह पिबैत रहल। चुप्पी राजू तोड़लक- सुनने छी, अहाँ समएसँ पहिने रिटायरमेंट लैबला छी। -लैबला नै, लऽ लेने छी। आइ चिट्ठी देलौं। -एना किए केलौं अहाँ। -ई हमरासँ नै, अप्पन भाइ संजयसँ पुछू। शीला दिस देखैत रघुनाथ बाजल। -संजय तँ अछि नै, हम छी। कोनो निर्णय लेबासँ पहिने अहाँकेँ हमरा बताबैक तँ चाही छल। -बतैतिऐ तँ अहाँ की करतिऐ। हुनकर चेहरा कनी काललेल खिचा गेल, एक केर हँ देखलौं, दोसर केर नै, नै सुनऽ चाहैत रही। आ अखन ओ दिन नै आएल अछि जे हम अहाँ सलाह पर चली। धनंजय हुनका दैखैत रहल। फेर माँ दिस देखलक। शीला माथ झुकेने बैसल रहल, किछु नै बाजल। -अहाँकेँ निर्णय लैत काल हमरा लऽ कऽ सोचबाक चाही। अखन अनिश्चिते अछि हमर भविष्य। -ई सोचैत-सोचैत हम बूढ़ भऽ गेल छी। अहाँ बालिग छी आब। अप्पन अपने देखू।- रघुनाथ खिसियाइत बाजल। ऐ उत्तरसँ धनंजय मसोसि कऽ रहि गेल। ओ आससँ माँ दिस देखलक जे ओ किछु बाजए। -अहाँकेँ ई बुधि दीदी आ संजयक कालमे किए नै आएल छल, हमरे कालमे किए आबि रहल अछि। शीलाकेँ खराब लगलै। ओ टोकलक- चुप रह राजू, कखैन की बाजबाक चाही, बुझैत नै छिहीं की। -सभ बुझै छी माँ, एत्ते बुरबक नै छी। पता नै किए, हमरोसँ ईर्ष्या करै छथिन ई। अहाँ तँ बुझिते छी जे टेस्टक कोनो भरोस नै अछि, यएह सोचि हम नोएडाक एकटा मैनेजमेंट इंस्टीट्यूटक पता केने छी। इंस्टटीट्यूट तँ आरो छै, मुदा रेट बड्ड छै। यएह छै जे नीक अछि आ अप्पन सीमाक सेहो। दोसरासँ डोनेशन तीन लाख मुदा हमरासँ अढ़ाइ लाख लऽ रहल अछि। सभटा मिला कऽ एक बरखक खर्च छह लाख टका पड़ि रहल अछि। आ आब। जखन हमर बेर आएल तँ ई रिटायर भऽ कऽ घर बैसि गेल छथि। अपनाकेँ हमर ठामपर राखि कऽ सोचियौ ने। रघुनाथ सुनैत चुपचाप बैसल रहल। शीला हुनका देखलक आ ओ शीलाकेँ। कियो ककरोसँ नै बाजल। रघुनाथ उठि कऽ भीतर गेल आ कनी कालक बाद नोटक गड्डी संग आएल। -ई लिअ साढ़े चारि लाख। बाकी बचल छऽ मासमे लऽ जाएब। ओ गड्डी ओकर आगू फेक देलक आ ओतऽसँ हटि गेल। 2 1 बड़ समए लागि गेलै रघुनाथकेँ घरपर रहबाक आदति पकड़ैमे। ओ रहल तँ गाममे मुदा गामक नै रहल। गाममे ओ नै रहल तँ ओ गाममे की करितिऐ। पहाड़पुर जाए लऽ चाहैत छल, अप्पन गाछी, बसबिट्टी आ पाखैरक कारण- जतऽ चिड़ैक बोली आ गाय-महीसक डिरिएनाइ आ बड़दक घंटीक टनटनसँ गाम गनगनाइत छल, मुदा आब गाछ कटि गेल छल। बसबिट्टी साफ भऽ गेल छल आ पोखरि धानक खेत बनि गेल छल। गाछीक बीचसँ एकटा नहरि गेल छल, जकर कातमे प्राइमरी स्कूल खुजि गेल छल। ओकरे बगलमे दवाइक दोकानक लेल जमीन घेर लेल गेल छल। आम्बेडकरक गाम भेलाक बाद पहाड़पुर तेजीसँ बदलि रहल छल। गाममे बिजली आबि गेल। केबलक लाइन बिछा गेल छल। अखबार लऽ कऽ हॉकर आबऽ लागल छल। किछु घरमे टीवी, पंखा आ फोन लागि गेल छल। सड़कपर खडंजा बिछा गेल छल। खपरैलक किछु मकान रहि गेल छल, बाकी सभ पक्का छल। जे पक्का नै छल, तकर आगू ईंटा खसल नजरि आबि रहल छल। रघुनाथ अपनाकेँ टी.वी. आ अखबारमे व्यस्त राखऽ लागल। शौक तँ उपन्यास पढ़ैक छलै मुदा उपन्यास कॉलेजक पुस्तकालयमे छलै जतऽ जाएब ओ बंद कऽ देने छल। हँ, ओ वएह उपन्यास दोबारा पढ़ि रहल छल, जकरा कहियो ओ पढ़ि गेल छल। मासमे एकाध बेर नगरक पेंशन ऑफिसक चक्कर ओ जरूर लगा लै छल। गाममे ओ नहिये ककरो कतय जाइ छल, नहिये हुनका कतय कियो आबै छल। ओ लड़का-बच्चाक लिखाइ-पढ़ाइकेँ काज बुझै छल, बाकी काज तँ फालतुए। सम्मान सभ करै छलै, छोट-पैघ सभ, मुदा अगुआएल वर्गसँ बेसी पिछड़ल आ दलित। तइसँ रघुनाथ हुनकर किताब-कॉपीसँ लऽ कऽ नाम लिखेबाक फीस आ फीसक माफी लेल जे कऽ सकै छल, करै छल। ओ गामक प्रपंच आ राजनीतिसँ निर्लिप्त बड़ सोझ-सरल आ सज्जन लोकक रूपमे सबहक प्रिय छल। मुदा ओ सबहक प्रिय नै छल। ठकुरानक, जकरा ओ अप्पन दियाद-बाद कहै छल, ओकर लड़का ओकरा पसंद नै करै छल आ तकर कारण छलै एक तँ जखन मंडल आयोग लागू कएल गेल तँ तकर स्वागत करैबलामे कॉलेजमे असगरे अगुआएल वर्गक अध्यापक रघुनाथ छल। दोसर जखन-तखन चमटोलक हरवाह हड़तालक धमकी दै छल, ओ मानै छल जे से वाजिब अछि आ हुनकर सभक हक अछि। -उपाए की अछि, से तँ बताउ? -उपाए अछि। चाहे तँ हुनकर मांगपर सहानुभूति संग विचार करू बा फेर एकटा ट्रैक्टर कीनू। आ किएक तँ अपनामे सँ कियो ऐ औकातिक नै छी, जे असगरे कीन सकी, तइ दुआरे हरक पाछाँ दाम बान्हि दियौ, जे सभ लोक मिल कऽ कीनी। ई गप्प भेल छल बब्बन कक्काक दरवाजा पर जखन दियाद-बादक सभ बड़-छोट जुमल छल। चलाएत के? ड्राइवरक संग हेल्पर चाही, खलासी चाही। अप्पन ई छौड़ा सभ जे पछिला सात-आठ बरखसँ कंपीटिशनक नामपर गामसँ नग्र आ नग्रसँ गाम मोटरसाइकिलपर घूम-फीर कऽ रहल अछि, जखन नोकरीक कोनो आस नै तँ यएह करए। रघुनाथ बाजि तँ गेल मुदा ओकरा लगले लगलै जे गलती भऽ गेलै। छौड़ा सभ बिख-सबिख भऽ गेलै, आँखि लाल भऽ गेलै। मुदा आगू बुढ़-पुरान छलै, से मसोसि कऽ रहि जाइ गेल। ओइमे सँ किछु रिसर्च कऽ रहल छल, किछु कोचिंग कऽ रहल छल, किछु केर अंतिम चांस छलै कंपीटिशनक, किछु कंपीटिशनक इंटरव्यूक तैयारी करै जाइ छल आ ओइ बीचमे कोनो तरहक बाधा नै चाहै छल। एहन तरहक प्रस्ताव अपमानजनक छलै ओकरा लेल। ई तँ कियो नै जानै छल जे ककर भाग्यमे की लिखल छै? आ की कहतै लोक, यएह जे ट्रैक्टर चलाबैक लेल केने छल एम.ए., एम.एस.सी. आ पी.एच.डी.।  ओकरा सभकेँ जे कहतै से तँ कहबे करतै- अहाँ की कहबै? अहाँ तँ बाप छी। सभटा लाज-धाख घोरि कऽ पी गेल छी की? मुदा ओकरामेसँ कियो बाजितिऐ, ओकरासँ पहिने आहत स्वरमे बब्बन कक्का बाजल- रग्घू। जाए दियौ। की कहियौ तोरासँ? तोहर बेटा एकर हालत मे हेतिऐ तँ आइ एना नै बाजितिऐ। रघुनाथ उठि कऽ घर घुरि आएल, चुपचाप। ओकरा दुख छलै जे ओ ओतऽ जे गप कहने छल, ओइ छौड़ा सबहक बाप ओकरा सभसँ कहै छल-कोढ़िया, अबारा। ई गप केकरोसँ नुकाएल नै अछि जे कोचिंग, फार्म, टेस्ट ओकरामे सँ कतेक लेल नग्रक दोस्तसँ मिलै-जुलैक बहन्ना छलै। ई रघुनाथे टा नै, ओकर सभक गार्जियन सेहो बुझै छलै जे ओकरा सभ लेल कोटा बा आरक्षण एकटा सहज कवच बनि गेल छै, जकर प्रयोग ओ सभ अप्पन असफलताकेँ नुकेबा लेल करैत अछि। मुदा ऐ समस्याक जे हल सुझौलक तइसँ बेटे सभ टा नै बाप सभ सेहो खराब मानि गेलै। एकर बादसँ नहिये कहियो कियो रघुनाथकेँ बजौलकै, नहिये ओकरासँ पुछलकै आ नहिये ओ कोनो सलाह देलक। हँ, ओकरा कतय एकमात्र आबऽ बला रहि गेल छलै छब्बू पहलवान। ओ किए आबै छलै आ सेहो शुरूहेसँ- तकर उत्तर नहिये छब्बू लग छलै, नहिये रघुनाथ लग। ककरो पुछलापर एतबे टा कहतिऐ- नीक लागैए। शांति भेटैए। ओ जखन आबै छल तँ गाँजा, भीजल साफी, चिलम, डोरक टुकड़ा आ सलाइ-काठी संग आबै छल। असगरे निश्चिंतीसँ दम लगैतिऐ। आ खाटपर पटा रहै छल। एम्हर किछु सधुआ गेल छल। जखन-तखन बाजि उठतिऐ- मास्टर कक्का, पता नै किए आब जीयैक मन नै करैए। एक बेर हुनका चुप आ उदास देखि कऽ रघुनाथ पुछलक- की गप अछि छब्बू। ऐ तरहे किए पटायल छी? छब्बू आँखिकेँ बंद कऽ बाजल- कक्का, आइ भोरमे बजरंग बलीक सपना आएल छल। बाजल, छब्बू। अहाँ जे पाप कऽ रहल छी, ओकर प्रायश्चित सेहो अहींकेँ करऽ पड़त, दोसराकेँ नै। -जखन अहाँ जानै छी जे पाप अछि, तँ किए करै छी? -हम देखिते बेबस भऽ जाइ छी मास्टर कक्का, की बताबी अहाँसँ? रघुनाथ दिसा-फरागत लेल जैबाक तैयारी कऽ रहल छल, बाजल- मुदा छब्बू, हम एकटा गप अहाँसँ कहि रहल छी, ख्याल राखब। जखैन धरि हुनकर हड़ताल चलि रहल अछि, ताधरि बिसैरियो कऽ चमटोल दिस पएर नै राखब। कोनो भरोस नै अछि ककरो। -गप तँ ठीके कहि रहल छी कक्का, मुदा एकटा हमर गप अहूँ सुनि लिअ। जौं ढोल बजाएत, तँ पाथर पड़ै बा बज्जर खसए, हम नै सुनब, नहिये देखब- चलि देब। जखन अहाँकेँ ककरो गप मानबाके नै अछि, तँ जे इच्छा अछि, से करू। रघुनाथ बड़बड़ाइत सिमान दिस चलि गेल, जिम्हर बब्बन सिंहक पंपिंग सेट छल। ई हड़तालक सातम दिन छल। अषाढ़ शुरू भऽ गेल छल आ ऐबेर पानि खूब बरिसल छल। हरवाहा एहन कालमे हड़ताल केने छल- खेतक जोत, बोनि आ केराकेँ लऽ कऽ। हरवाही आ खेतकेँ लऽ कऽ। बाबा आदमक जमानासँ चलि आबैत रेटपर काज करबासँ मना कऽ देने छल हरवाहा सभ। बीच-बीचमे हड़ताल केने छल ओ सभ, मुदा ठाकुर सभ बोनि कनी बेसी बढ़ा देने छलै आ ओकरा सभकेँ बुझा-सुझा कऽ ठीक कऽ देने छलै। मुदा ऐबेर आर-पारक लड़ाइ छल। ऐमे गोबर पाथैबाली ओकर छौंड़ी आ स्त्री  सभ सेहो छलै। परिणाम ई भेलै जे खेतमे लागल पानि सुखाए लागल छल, चरनीपर बान्हल माल-जाल लगही-गोबरमे उठि-बैस रहल छल आ पूरा ठकुरपट्टी गंदगीसँ भरि गेल छल। ऐबेर हड़ताल बुझैमे ठाकुर सभ चूकि गेल छल। हरवाहा थाकि-हार कऽ नै आएल आ नहिये खेखनिया केलक, नहिये ओकर चूल्हि मिझेलै। जरूरी पड़लै तँ अहिरपट्टी गेल, एम्हर नै आएल। पूरा इलाकाक चमटोलीक भविष्य पहाड़पुरक हड़तालपर आश्रित छलै- ओ सभ से बुझि जाइ गेल छल। ठाकुर सभ राति भरि बब्बन सिंहक द्वारपर पंचायत करैत छल आ मुंसफ, जज, मजिस्ट्रेट, कलक्टर, एस.पी., इंजीनियर, डॉक्टर नै भऽ सकैबला हुनकर छौड़ा सभ हुनकर पंपिंग सेटपर बैसकी। ओ सभ दिन साँझ आठ बजे धरि ओतऽ जुमै छल, कहियो गाँजाक दम लगाबैत छल, कहियो दारूक बोतल खोलैत छल आ चमटोलीकेँ सदिखन सैंतबाक योजना बनाबैत छल। कोना सैंतल जाए, कखैन सैंतल जाए, सैंतबाक लेल तरीका की हुअए- ई सभटा समस्या छलै जइ लऽ कऽ ओ सभ गंभीरतासँ विचार करतिऐ आ तेसर गिलास धरि पहुँचैत ओ सभ कोरस गाबऽ लागै छल। गाबैत चलू, गाबैत चलू, एक दिन अहूँक जमाना आएत। जहिना ई खत्म हेतिऐ तहिना इंटरनेशनल लुक भऽ जाइ जाइत छलै- मनमे अछि विश्वास। हो हो मनमे अछि विश्वास हम हएब कामयाब, एक दिन। ओइ काल रामभरोस दुबे, जे पड़ोसी गामक छल आ भंगेड़ी छल आ ओकरा छोड़ि ऐ मंडलीक निअमित सदस्य बनि गेल छल- पतरा खोलि कऽ दिन देखैत रहतिऐ जे सैंतबाक तिथि कोन हुअए? ओ मुहुर्त तँ बता देने छल- कृष्णपक्षक अमावस्याक राति, मुदा कोन मासक अमावस्या हुअए, ऐ लऽ कऽ आश्वस्त नै भऽ पाबि रहल छल। ओम्हर हड़ताल खिचैत जा रहल छल आ गद्दरि फसिलक आस खतम भऽ रहल छलै। ओइ काल एक दिन नहरक रस्ते एकटा ट्रैक्टर धड़-धड़ करैत आएल छल आ अहिरपट्टीमे दशरथ राउतक दरबज्जापर ठाढ़ भऽ गेल। ओकरा लऽ कऽ आबऽबला आन कियो नै जसवंत छल- दशरथक बेटा। दशरथकेँ चारि टा बेटा छल- दूटा गाममे आ दूटा मध्यप्रदेशक कोरबामे। गामबला दूध आ खोआक व्यवसाय करैत छल आ कोरबाबला बलवंत कोलियरीमे ठेकापर लेबर सप्लाइ करैत छल। आ जसवंत देसी दारूक भट्टी चलाबैत छल। जसवंत जाधरि गामपर छल लुच्चा, लफंगा आ लतखोर मानल जाइ छल। भागलो छल तँ बापसँ मारापीटी केलाक बाद। शुरू-शुरूमे मध्यप्रदेशसँ पुलिस आएल छल, एक-दू बेर तकैत, मुदा बादमे सुधरि गेल कनी-मनी। एम्हर जखैन गाम आबै छल- भैया, बाबू, कक्कासँ नीचाँ ककरो नै कहै छल। कहै छल जे परदेसमे सभ किछु अछि, इज्जत नै अछि। चाही जतेक कमा लिअ, रहब दूइये नंबरक आदमी।  दू नंबर माने दू कौड़ी। आब ओ सभ किछु छोड़ि-छाड़ि कऽ गाम-जबारक सेवा करऽ चाहै छल। संजोगे छलै जे ओ पछिला एक-दू बेर जखन-जखन गाम आएल, गाम हड़तालक चपेटमे छल। ओ नै एम्हर छल, नै ओम्हर। ओकर उठब-बैसब दुनू दिस छल-ठाकुर दिस सेहो, हरवाहा सभ दिस सेहो। ओ अप्पन दिससँ दुनूक बीच सुलह-समझौताक पूरा कोशिश केलक, मुदा नजदीक एबाक बदला दुनू एक-दोसराक आर विरुद्ध होइत गेल। जयवंत ओइ दुनूकेँ जवाब देलक ट्रैक्टर आनि कऽ, जे सभ किचकिचबैत रहैत छलै जे अहीरक बुधि ओकर ठेहुनमे होइत अछि (तइसँ कारण ओ सभ ठेहुनक बीच बाल्टी दबा कऽ गाय आ महीस दुहैत अछि)। ट्रैक्टर खेतमे ठाढ़ छल- ट्रॉली, कल्टिवेटर, हार्वेस्टर आ थ्रेशरक संग, गेंदाक माला पहिरने। ओकर कातमे खाट पर डंटा लऽ कऽ दशरथ बैसल छल। गामक नेना सभ ओकरा घेरने छल- कियो छू कऽ देखऽ चाहै छल, किछु ट्रॉलीपर चढ़ऽ चाहैत छल। दशरथ तमसा रहल छल आ डंटा पटकि कऽ ओकरा सभकेँ भगा रहल छल। जाधरि कथा आ हवन नै भऽ जाइ छल ताधरि लोकक नजरिसँ बचा कऽ राखैक छलै ओकरा। भगवंत उर्फ भग्गूक जिम्मा दोसर काज छलै। ओ कॉपी आ कलमक संग इम्हरसँ उम्हर भाग-दौड़ कऽ रहल छल। किसानक लेल सभसँ मुश्किल आ परेशानीक छल ई मास। अगहनक खेत तैयार छल, खेती पछता भऽ रहल छल, जल्दीसँ जल्दी जोताइ आ रोपनी करबाक छलै, तकर बाद रबीक नंबर छल। बड़ मौकापर आएल छलै ट्रैक्टर। तारीख लेल लूटि मचल छलै, भाड़ा चाहे जे लिअ, बीघाक हिसाबे। आर भाड़ा सेहो की लेबाक छलै-वएह जे रेट बान्हि देने छल, दू कोस दूरक इकबालपुरक काशी सिंह अप्पन ट्रैक्टरक। कथा लेल अखन तीन दिन बाकी छलै आ इम्हर अगिला तीन मासक सभटा तारीख बुक। दशरथ जकरा ककरो पुछै छल, तकर तँ बुझू भाग्ये। हुनका पुछैबला वएह छल जे नव घर-दुआर बनबा रहल छल, माटि आ खपरैलक घर खसा कऽ। जखन बिजली आबि गेल छल तँ ओइ स्टैंडरक घर चाही। दीया बाती आ लालटेन बला नै। एहन लोकसभ पहाड़पुरेटा मे नै, पास-पड़ोसमे सेहो छल। ककरो पजेबा चाही, ककरो सीमेंट, ककरो बालु, ककरो गिट्टी, ककरो लोहा-लक्कड़। केतारी सेहो तैयार भऽ रहल छल, सुगर मिलक लेल। जखन ट्रॉली छल, तखन सौ टा काज। दशरथ सबहक सुनतिऐ आ धैर्य राखैक लेल कहैत छल- सभ भऽ जाएत। कनी-कनी हएत। मुदा सबहक काज हएत। ठाकुर सभ सर्द छल। ओ सभ ओकरा सभकेँ सदिखन अपनासँ नीचाँ बुझैत छल मुदा आब हुनकर सभक चिरौरीक दिन आबि गेल। हुनका सभकेँ आब अफसोच भऽ रहल छलनि जे ई गप जखन रघुनाथ कहले छल तँ हुनकर किऐ नै सुनलौं। 2 राति भऽ गेल छलै। गाममे शान्ति पसरल छलै। कनी-कनी झिस्सी पड़ि रहल छलै। ढाबुस बेंगक टर्र-टर्र आ सनकिरबाक झन्न-झन्नसँ दिगंत गूंजि रहल छल। ट्रैक्टरक काज शुरू कऽ देलाक बादो ठाकुर हारल सन अनुभव कऽ रहल छल किएकि चमटोलमे कोनो तरहक बेचैनी नै छलै। अन्तर एतबे टा आएल छलै जे हरवाहा सभ आब गाममे आ गामक रस्तासँ आबऽ-जाए लागल छल- मूड़ी झुकैले, आरामसँ, बिना बाजले बा दुआ-सलाम केले। ठाकुर सभकेँ लागैत छलै जे ओ छाती उतानि कऽ हुनका सभपर हँसैत आबि रहल अछि- जा रहल अछि। रघुनाथ सुतएसँ पहिने बत्ती मिझाबैले जा रहल छल आकि माथपर बोरा राखने पानिमे भिजैत गनपत बरण्डापर आएल। गनपत हुनकर हरवाहा छल, हरवाहीक अलाबे घर-दुआरक काज सेहो देखैत छल। रघुनाथ ओकर बेटाकेँ अप्पन कॉलेजसँ बी.ए. करौने छल, ओकर बाद ओकरासँ एकटा फार्म भरबौने छल, जइ कारणसँ ओ बटिखरा-नाप इंस्पेक्टर बनल छल। ऐ अनुभवकेँ गनपत कहियो नै बिसरल। ऐ काल हुनकर ओ बेटा एम. राम मिर्जापुरमे पोस्टेड छल। -ऐँ गनपत, तूँ? कियो देखलकौ तँ नै? -नै मास्टर साहेब। ओ बोरा खाम लग राखि मचिया खिचलक। -एकटा गप बता दी। हम अहाँकेँ नै छोड़ब, भले अहाँ छोड़ि दियौ। हँ, ई काल कनी खराप अछि। -जानै छी। अइलौं कोना, से कहू। -गेल छलौं मगरूरक हिंया मिर्जापुर। सोमारू सेहो ओत्ते छै ने। मगरू ओकरा आटा-चक्कीपर ओतऽ काज पकड़ा देने छै आ ओ पक्का भऽ गेल अछि ओइ काज मे। -तँ? -तँ मगरू कहलक जे जाँत, ओखली, मूसरा, ढेकी, चक्की तँ कियो चलाबैत नै अछि आइ-काल्हि आ आटा पिसाबै लेल जाइ छै लोक एक-डेढ़ कोस दूर- डेढ़गावां बा कमालपुर। एनामे जौं गामपर आटा-चक्की बैसाइल जाए तँ केहन रहत? सोमारू सम्हारै लेल काफी अछि। -बैसेबै कतऽ? -सरकार, चमटोल आ गामक बीचमे जे ऊपर जमीन छै, ओइपर। आन कोनो काजक तँ ओ छै नै। रघुनाथ किछु काल धरि सोचैत रहल। -पुछबाक ईहो छल जे ठाकुरे लेल धुत्… रोटी आ भात छै, आटा आ चाउर तँ नै छै। रघुनाथ हँसल- ई सभ नै सोचू। शुरूमे भले अनसोहाँत सन करत, देर-सबेर सभ जाएत आ पिसाएत। एतबे टा नै, आस-पड़ोसक गामसँ सेहो आएत। जखन चक्की गाममे रहत तँ ओत्ते दूर के जाएत? बस देर नै करू। आर बताउ, कत्ते दिन रहलौं मिर्जापुरमे। -रहलिऐ दस दिन। एक दिन तँ पुछैत-पाछैत गुड़िया बेटीक इस्कूल चलि गेलिऐ। बड़ खुशी भेल। घर लऽ गेल। अप्पन हाथसँ खाना पकेलक, खुएलक, अहाँक आ मलकाइनक हाल-चाल पुछलक। चलऽ लागलौं तँ बीस टा टका जबर्दस्ती पकड़ा देलक। एक्को रत्ती नै बदलल छै। -ढेर दिन रहि गेलौं मगरू लग। -नै मास्टर साहेब, सभ दिन ओतऽ नै रहलौं। तीन दिन तँ पीसीक हियाँ रहलौं। पीसीक जँ सभसँ छोट बेटा अछि, ओ उहाँक डिप्टी मजिस्टे्रट छै- यसडीयम। बड़ पैघ कोठी छै, ओकर आगू कलम सेहो बड़ पैघ छै। जीप छै, पुलिस छै, ड्राइवर छै, नोकर-चाकर छै। ऊ साधारण लोक थोड़े छै। इजलास लागै छै। सभ कियो भेंट नै कऽ सकै छै। पीसीसँ कतेक-कतेक दिन भेंट नै होइ छै। हम तँ देखबे नै केने छलौं ओत्ते पैघ लोक। ओत्ते रहि गेलौं तीन दिन। पीसी रोकि लेलक। रघुनाथ कनी गंभीर भऽ गेल- नाम की छै ओकर। -हम सभ तँ सिद्धू-सिद्धू बाजै छी मुदा नाम छै सुदेश भारती। राम नै लिखैत अछि। रघुनाथकेँ काटू तँ खून नै। ई वएह सुदेश भारत छल जेकर जिक्र सरला केने छल। ओकरासँ ओ बियाहक गप केने छल। जौं ओ सच्चेमे कअ लेतिऐ तँ गनपत जे हर जोतैत छल आ ओकर आगू ठाढ़ रहैत छल आ मचियापर बैसैत छल, ओकर रिश्तेदार हेतिऐ। खरपत जे गनपतक बाप अछि, हुनकर समधी हेतिऐ आ गर मिलतिऐ। हुनकर संग खाटपर बैसतिऐ आ जमायक बापक हैसियतसँ ऊँच हेतिऐ हुनकासँ। हुनकर मन भेल जे शीलाकेँ अबाज दऽ कऽ बजाबै आ कहै जे सुनू, गनपत की कहि रहल अछि। -बाकी सबहक अप्पन दुख छै मास्टर साहेब। ओकर बियाह नेन्नेमे भऽ गेल छलै। ओ अप्पन मेहरकेँ छोड़ि देने अछि। ओकर झमेला चलि रहल छै आइ-काल्हि एकटा मास्टरनीसँ। ओ ऊँच जाइतक छै। कहियो कहै छै जे बियाह करब अहींसँ, कहियो कहै छै- नै करब। माँ-बाप नै चाहैए। ऐसँ ओकरा लटकेने चलि रहल छै। पीसा बड़ दुखमे रहै छै। -तूँ जो, देर भऽ रहल छौ। ऊ मास्टरनीक संग इहाँ-उहाँ जाइ छै, होटल सेहो जाइ छै, दोसर शहर सेहो घूमै छै, खूब मौज करै छै, मुदा पीसीसँ नै मिलाबै छै। पीसी बाजल जे हमरा देखा दे, एक बेर हम बतेबे ओकरा जे किए नै कऽ रहल छी बियाह। मुदा, भेँट कराएब तखैन ने। -कहलियौ ने, नीन आबि रहल अछि। ओ बत्ती बुझा दहीं। -अच्छा साहेब। गनपत ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा साहेब, एक बेर बुझा देतिऐ जे मेहरकेँ छोड़ि कऽ किए एना कऽ रहल छी। मेहरिया तँ कत्तौ चलि जाएत आ ककरो ने ककरो राखि लेत, मुदा बदनामी ककर हएत। ओकरे ने। -तूँ जेमे कि नै, दिमाग नै चाट। -अहाँ नै जाएले चाहब तँ कहियो कोनो काजक बहाना कऽ हमहीं ओकरा आनि लेब। रघुनाथ तमसा कऽ थरथराए लागल। ओ उठि कऽ झमारि कऽ बत्ती मिझा देलक। ओ ओकरा ठेल कऽ बाहर कऽ देलक। गनपत माथपर बोरा राखि कऽ बाजल- साहेब, जे कहै लेल आएल रहि, से तँ बिसरिए गेलौं। एकबैग ओकर अबाज फुसफुसाहटिमे बदलि गेलै, देखिये रहल छी हवा खराब छै। नै, एकटा गप कहि रहल रही। एहन कोनो गप नै अछि मुदा पहलमानकेँ बुझा देबै जे जखन धरि हवा खराब छै, चमटोल दिस नै देखए। आ देखत की, उम्हर नै जाए। रघुनाथक ध्यान नै छल ओकर फुसफुसाहटि दिस। ओकर चिंता आ बेचैनीक कारण दोसर छल- कि कत्तौ एकरा सरला आ भारतीक संबंधक जानकारी नै हुअए। जखन संबंधी अछि तँ कहियो ने कहियो मगरू जरूर भेंट करैत हएत, भऽ सकैत अछि जे भारती सेहो चर्चा केने हएत। आ नै हुअए तँ मगरू दुनूकेँ कहियो संगमे देखने हएत। जखन एक्के नग्रमे अछि तँ कोना संभव अछि जे ओकरा पता नै चलल हेतै अखन धरि। -शीला। आखिर ओकरा रहल नै गेलै आ ओ दोसर बेर शोर पाड़लक- तामसेमे। 3 पहलमान माने छब्बू पहलमान। पहाड़पुरक दक्खिन हिस्सामे घर छल बजरंगी सिंहक। ओ इलाकामे छब्बू पहलवानक नामे जानल जाइ छल। गामक नाम दूर-दूर धरि पसारने छल। दंगलमे जतऽ–जतऽ गेल, जीत कऽ घुरल इनामक संग। टंगड़ी आ धोबियापाट ओकर प्रिय दांव छल। लंबाइ कम नै, जुलुम तागति आ फुर्ती छलै ओकरामे। ककरो पकड़ि लिअए तँ छोड़ाएब मुश्किल, दाबि दिअए तँ उठब मुश्किल, पट पड़ि कऽ माटि पकड़ि लिअए तँ चित्त करब मुश्किल। भैंसक केहुनीसँ मारि दिअए तँ पसरि जाए आ उठि नै सकए। मुदा हुनकर पैघ भाए- जकर चलिते ओ पहलवानी करै छल, जखन असमय एकाएक गुजरि गेल तँ ओ लंगोट खुट्टापर टांगि देलक आ घरक जिम्मेदारी संभालि लेलक। छब्बूक बियाह नै भेल छलै। जखन उमेर छलै तखन केलक नै अखाड़ाक जोशमे आ जखन करए चाहलक तँ उमेर नै रहलै। कियो अइबो नै केलै। ऐ तरहेँ परिवारक नामपर हुनकर दस बरखक भातिज छल आ मसोमात भौजी। भौजी दिन-राति पूजा-पाठ आ धरम-करममे लागल रहै छलि आ भातिज स्कूल जाइ छल। खेती-बारी छब्बू सम्हारै छल आ सम्हारत की- झूरी हरवाहाक जिम्मा छोड़ि कऽ निश्चिंत रहै छल। मुदा ई निश्चिन्ती ओकर भाग्यमे नै छलै। एक दिन ओकर नजरि पड़ि गेलै झूरीक स्त्री ठोलापर। दू बच्चाक माए मुदा कहैक लेल। ऊ कलवा लऽ कऽ आएल छली, अप्पन मरदक लेल। छब्बू ओकरा पहिनो देखले छल-नै जानि कतेक बेर। मुदा ऐबेर नजरि नै पड़लै, गड़ि गेलै। ओ ओकरा आबैत देखलक, बैसैत देखलक, चलैत देखलक- की छड़ी सन शरीर, की लचक, की गस्सल बाँहि। गड़ि गेल आँखिमे। कतऽ ई अक्खर झूरी आ कतऽ ई गांजाक कली। बस सुट्टा लगि जाए तँ उड़ि जाउ आसमानमे आ फेर उड़ैत रहू। जमीनपर घुरैक नौबति नै आबए। आर फेर तकर बाद शुरू भेल छब्बू पहलमानक सुट्टा मारैक खिस्सा। मुदा खिस्सा रफ्तार पकड़तिऐ एकरासँ पहिने भौजीकेँ अंदाजा भऽ गेलै। भातिज मुन्ना माँकेँ बतेलक जे ओ कक्का आ ठोलाक दलानमे ओकरा नुक्का-छुप्पी खेलैत देखने छल। भौजी कानए लागल। ओ छब्बूसँ बाजल- छब्बू, हमर एकटा विनती अछि। भैया तँ रोकै-टोकैक लेल नै अछि, अहाँ करब अप्पन मनक। मुदा चाहे जे करी, करू घरसँ बाहर। एकरा साफ-सुथरा रहऽ दियौ। इशारा बुझि गेल छब्बू। एकर बादसँ छब्बूक चमटोलीमे आवाजाही बढ़ल। हरवाहा लेल हुअए बा रोपनी-कटिया लेल बजेबाक लेल। चमटोलीमे जाएब ठाकुर अप्पन बेइज्जती बुझै छल। जरूरी काज भेल तँ ओ बच्चा सभकेँ पठबै छल।  मुदा छब्बू एहन मान-सम्मानसँ दूरे छल। जँ ओ गाममे लखाह नै दैतिऐ, कलम बा नहरपर सेहो नै लखाह दैतिऐ, आरि-खेतपर सेहो नै लखाह दैतिऐ तँ लोक ई मानि लै छल जे ओ चमटोल गेल हएत, ठोलाक संग। ई चमटोल सेहो जानैत छल आ गाम सेहो। तमसाह एत्ते जे ओकरासँ सोझाँ-सोंझी कहैक हिम्मत ककरो नै छलै। सभ अगुएलहा बेर-बेर मिल कऽ घरेनक सभसँ प्रतिष्ठित बब्बन कक्कापर दवाब बनेलक जे ओ अप्पन सकसँ जे किछु कऽ सकए, करए। बुझाबियौ बा धमकाबियौ बा जातिसँ बाहर करू। एहन कहएबला अगल-बगलक गामक लोक सेहो छल। शिकाइतसँ तंग आबि कऽ कक्का छब्बूकेँ बजैले छल। छब्बू हुनकर गप बड़ ध्यानसँ सुनलक आ अंतमे बाजल- गप तँ ई ठीक अछि कक्का मुदा ककरा-ककरा जातिसँ बाड़ब। ककरो-ककरो झाँपल अछि आ ककरो-ककरो उघार। मुदा बचल तँ कियो नै अछि हमर नजरिमे। रहल गप हमर तँ अहाँसँ नै नुकाएब। हम सभ किछु करै छी मुदा मुँहसँ मुँह नै सटबै छी। अप्पन धरम आ जातिकेँ नै बिसरै छी। कक्का माथ झुका कऽ बैसल रहल, किछु नै बाजल। छब्बू कनी काल बाद उठि कऽ चलि गेल। लोक मजाकमे कहै छल जे चऽरमे झूरी पहलमानक खेत जोतैत अछि आ पहलमान चमटोलमे ओकर खेत। हिसाब बराबर। आ झूरीकेँ ई छलै जे जखन ओ खेत जोति कऽ घुरै छल तँ छब्बू घरमे रोपनी कऽ कए आबैत छल। जखन छब्बू घरमे बजारसँ घुरतिऐ तखन छब्बू घरमे। ओ ओकर हेबाक आहट भेटिते तुरत्ते आपस भऽ जाइ छल। ओ एक बेर हिम्मत केने छल। हाथ जोड़ि कऽ कहलक- मालिक, हमर नै तँ कमसँ कम अप्पन इज्जतक ख्याल करू। लोक की-की कहैत अछि अहाँकेँ लऽ कऽ। एकर नतीजा ई भेलै जे ओ चौदह दिन भरि देह हरैद-प्याज देहपर पाति कऽ घरमे पड़ल रहल। असहाय ठोला।  जीअब कठिन भऽ गेलै। नरक भऽ गेलै ओकर जिनगी। राति भरि झूरीकेँ छातीसँ लगा कऽ कानैत रहल आ तामससँ फनफनाइत रहल। सभसँ पैघ गप ई छल जे ग्राम सेवक चमटोलक, ओकरे जाइतक, पहलमानक संग गांजाक सुट्टा लगाबैत छल आ जखन कहियो कहतिऐ- कलेजा कड़ा राखू, खाली कनी बाट ताकू। -कहिया धरि बाट ताकू। सावन शुरू भऽ गेलै। ऐ मासमे पचैयां (नागपंचमी) पड़ैत छल। पहाड़पुरमे पचैयां छब्बू पहलमानक पर्व छल। ओइ दिन तीनटा बाल्टीमे भीजल चना आनल जाइ छल, परात भरि मिठाइ आबैत छल, बताशा आबैत छल, बजरंग बलीक पूजा कएल जाइत छल, छब्बू पहलमान लंगोट पहिर कऽ अखाड़ाक मोहारपर बैसैत छल आ अप्पन चेलाक गट्टापर रक्षा बान्हैत छल। ओ सभ उस्तादक आशीर्वाद संगे अखाड़ामे उतरैत छल। ओकर सभक कतेक जोड़ी होइत छल आ दुपहरिया बाद धरि पट्ठा सभ अखाड़ामे जोर-आजमाइश करैत रहतिऐ। सभसँ आखिरीमे छब्बू उतरितिऐ- पैघक पएर छुबि कऽ आ छोट सबहक हाथ जोड़ि कऽ। ई प्रदर्शनी-कुश्ती होइ छल। ओ अप्पन दांव आ करतब देखाबै छल- पहलमानी छोड़ि देलाक बादो। ऐ काल चमटोलसँ डफली आ नगाड़ाबला सेहो आबै छल आ झूमि कऽ बजाबै छल। अहिरटोलीक बनेठीबला सेहो रहैत छल आ एक-दोसरासँ खेलाइत पसीना-पसीना भऽ जाइ छल। दोसर गाममे पचैंया पर्व रहि गेल मुदा पहाड़पुरमे ई अखनो चलि रहल छल- चलनिक रूपमे सएह। मुदा ई गप सभ जानैत छल जे ई तहिये धरि अछि जाधरि छब्बू अछि। कोनो ठाकुरक नव पीढ़ीक लेल देह बनाएब, कशरत आ अभ्यास करब, कुश्ती लड़ब फालतू चीज छल। एकदम मूर्खताइ। बन्दूकक आगू मजगूतसँ मजगूत शरीरक की मतलब? तइसँ ओकर चेलामे बंसी अहीर,कहार, लोहार, गड़ेरिया छल, ठाकुर बाभन नै। मुदा ऐबेर खराप छल पचैयांक। पानि भोरसँ पड़ि रहल छलै- कहियो मद्धिम, कहियो तेज। अखाड़ा एक दिन पहिने तैयार केने छल अपनेसँ छब्बू। ई काज चेलामे सँ ककरो नै करऽ देने छल। मुदा ऊ थालम थाल भऽ गेल छल- धानक खेत सन। मिठाइ आ बताशा आबि गेल छल। बदाम फुलि कऽ अँखुआ गेल छल। इंतजारी छल बरखा थम्हैक। छब्बू कहि गेल छल जे अहाँ सभ तैयारी राखब, जहिना मौसम ठीक हएत, हम आबि जाएब। मुदा नहिये मौसम ठीक भेल, नहिये छब्बू आएल। पानि तखने थमकल जखन साँझ झलफलाएल। अकास साफ भेल आ जतऽ–ततऽ एकाधटा तारा नजरि आबऽ लागल। ओइ काल पुलिसक जीप आएल गाममे आ पता चलल जे छब्बूक हत्या भऽ गेल अछि। जनपदक सभसँ करेजाबला आ दमगर लोकक हत्या। ई खबर नै, बिजली छल, जे बदरी छटलाक बाद तरतड़ा कऽ ठाकुर टोलपर आबि खसल छल। ओ चाहे जे छल, जेहन छल- ठाकुर छल। आ ओकरा रहिते ककरोमे ऐ टोल दिस आँखि उठा कऽ देखबाक तागति नै छलै। आ आब? आब, चमटोलक बाहरी हिस्सामे, एकटा झोपड़ीक आगू थालमे चितंग पड़ल छल। मरल। उघार अकासक नीचाँ। एकटा लालटेन ओकर माथ लग छल, दोसर पएर दिस, दुनू ईंटापर। जेना लाशपर नजरि राखल जा सकए। लाश सेहो थाल आ माटिमे लेभराएल पड़ल छल। पएर ऐ तरहेँ छितराएल पड़़ल छल जेना बीचसँ चीर देल गेल छल। जननांग काटि देल गेल छल आ ओइ ठाम खूनक थक्का छलै, जइपर माछी झबरल छलै, उड़ि आ भिनभिना रहल छल। पुलिस परेशान छल, ओइ जननांगक लेल। कटल तँ गेल कतए? ऐ लाश लग कत्तौ नै छल। ओ लालटेन आ टॉर्चक रोशनीमे ओकरा ताकि रहल छल। जमीन समरस नै छलै- खधाइ बहुते छलै आ सभमे पानि भरल छल। ओकरा जतऽ कत्तौ संदेह होइ छलै, लाठीसँ हूड़ि कऽ देखि लै छल, भले ओ माटिक ढेला हुअए। एक डर सेहो छल कत्तौ भीतर, जे एहन नै हुअए जे कुक्कुर आएल हुअए आ मांसक लोथ बुझि कोनो दोसर ठाम लऽ गेल हुअए बा खा गेल हुअए। ई खोज देर राति धरि चलैत रहल। पुलिस अप्पन दिससँ सभटा तैयारीक संग आएल छल मुदा जइ आशंकाक संग आएल छल, ओहेन किछु नै भेलै- नहिये कोनो दंगा भेलै, नहिये चमटोल फूकल गेल, नहिये बदलाक कार्रवाई भेल। झूरीक झोपड़ीक बाहर ताला लटकि रहल छलै आ चमटोलमे सुन-सन्नाटा छल। एक्कोटा मर्द नै। सभटा मर्द बस्ती छोड़ि कऽ नै जानि कतऽ चलि गेल छल। पुलिस एबासँ पहिलेसँ। मौगी आ नेना छल, ओ सभ अप्पन घरमे बंद छल। हत्या एकटा एहन लोकक भेल छलै जकर घरमे कियो एफ.आई.आर. दर्ज करैबला नै छलै। हत्या के करलक, कखैन करलक, कोना करलक, किऐ करलक- एकर कोनो गवाह नै छलै। अंदाज जरूर लगाएल जा रहल छल मुदा ओ अंदाजे भरि छल जे छब्बू भोरे-भोरे अप्पन देहक आगि मिझाबै लेल झूरीक घर पहुँचल। आहट लागिते झूरी दोसर कोठरीमे नुका गेल। दोसर ढोला चांचर खोलि कऽ ओकरा भीतर लऽ गेल। अनधैर्य छब्बू लुंगी खोलि कऽ जहिना ओकरा संग सुतै लेल भेल आकि ओ ओकर फोता पकड़िये कऽ झुलि गेल। ओ ओकरा मारैत-पीटैत चिचियाबैत बेहोश भऽ कऽ खसि पड़ल। ओइ काल झूरी हसुआ लऽ कऽ आएल आ ओकर जननांग काटि कऽ फेक देलक। दुनू बाहर आबि गेल कोठरी बंद कऽ कए आ ओकरा तड़पैत, छटपटाइत आ मरबाक इंतजार करैत छोड़ि कऽ। बादमे दुनू घिसिया कऽ ओकरा बाहर कऽ देलक। आकि ओ धानक बीआ छीटऽ बीअड़िमे गेल छल ओइ दुनूक संग। मारलक ओतहिये, मुदा बलात्कारक केस बनाबै लेल ओकरा दरबज्जाक आगू आनि कऽ पटकलक। आकि नि:शस्त्र भेलाक बादो पहलमान दू-चारि टा केँ तँ काँचे चबा जाइत। दू-चारि मनक नै छल ओ। चमटोलकेँ पता छलै जे ओ किम्हर दिसा-फरागत हैक लेल जाइत अछि। पूरा चमटोल उम्हरे घेर कऽ राहरिक खेतमे मारलक जेना ओ सुग्गरकेँ चारू दिससँ घेर कऽ मारैत अछि आ झूरीक घरक आगू आनि कऽ फेंकि देलक। चऽरमे कतबो चिचिऐब तइयो केकरा सुना पड़त मेघक गड़गड़ाहटिमे। ऐ तरहक चर्चा छल। अलग-अलग अंदाज, अलग-अलग लोकक। सच गप केकरो नै पता। लाश लग कियो एबे नै कएल तँ कोना पता लागितिऐ? पुलिस ककरो आबैए नै देलक। मुदा एकटा गप कनी-कनी साफ भेल जे, जे किछु भेल, अचानक आ संजोगे नै भेल छल। एकर पाछाँ मास भरिसँ तैयारी छल। ऐ तैयारीमे असगरे पहाड़पुर चमटोल नै, आस-पड़ोसक बीस-पच्चीस गामक चमटोल मिलल छल। पहिने आ बादमे खर्चे-खर्च छल- थानाक सीओकेँ चाही, मुंशीकेँ चाही, पोस्टमार्टम बला डॉक्टरकेँ चाही, पैरवीकारकेँ चाही, वकीलकेँ सभ तारीखपर चाही, गवाहकेँ चाही- ढेर रास खर्च। ई कतऽ सँ करत झूरी? तइसँ सभ चमटोलक हरवाहा चंदा जुटैलक। दोसर, हुनका सभकेँ इंतजार छल अप्पन जाइतक कोनो पुलिस अधिकारीक, जे धानापुर थाना सम्हारए आ से आबि गेल छल, दू मास पहिने। भगेलू माने बी.राम। संगे अक्टूबरमे चुनाव छल विधानसभाक आ कोनो एहन पार्टी नै जकरा अनुसूचित जातिक वोटक दरकार नै हुअए। तेसर, चमटोल जानै छल जे छब्बूक मामिलामे ठाकुर घरेन बँटि जाएत, कहियो एक नै हएत। आ जल्दिये ई साबित भऽ गेल। 4 छब्बूक मारल जेबाक आदंक जकरा सभसँ बेसी छल ओ रघुनाथ छल। नै जानि की छल जे छब्बू जहिया कहियो कलम दिस औतिऐ, नहर आ अखाड़ा दिस औतिऐ आ अप्पन महीसक संग उत्तर दिसक चऽरमे औतिऐ -रघुनाथक दुआरकेँ जरूर देखतिऐ- मास्टर साहेब अछि कि नै। अछि तँ खाली बैसल अछि बा काज कऽ रहल अछि। जौँ रघुनाथ खाली रहै छल तँ छब्बू आबि कऽ बैस जाइ छल। बाजैत किछु नै, बस बैसल रहतिऐ। पुछलेपर बाजै छल जे कोनो काज नै, बस अहाँ लग किछु काल रहब नीक लागैए हमरा। नीक लोकक संगति भेटैत कहाँ अछि। ओ जाइ छल सभ ठाम मुदा बैसै नै छल। ओ रघुनाथक कहले बिना हुनकर हित-अहितक अपने आप ध्यान राखै छल। ई हुनकर भावना छल जकर पाछाँ कोनो कारण नै छल। ई गप रघुनाथ दोसरासँ सुनै छल, छब्बूसँ नै। अखन साल भरि पहिलुक्का गप अछि- रघुनाथक पछुआरमे हुनकर पितयौत भाइक घर-दुआर अछि जकर आगू तीन बिगहाक करीब हुनकर जमीन अछि। हुनकर माने रघुनाथक। भाइ धरि तँ ठीक छल। ओ बाँट-बखराक सम्मान करै छल मुदा भातिज सबहक नेत खराब हुअए लागल। हुनकर घरक आगू दोसराक जमीन। ओ सभ चारि भाँय छल आ सभ समर्थ। पैघकेँ रघुनाथ पढ़ेने छल आ बिजली विभागमे नोकरी दिएने छल। ओ समए-समएपर कब्जा करैक तरकीब आ बहन्ना खोजैत रहै छल। ओ एक बेर राति भरिमे रघुनाथक पछुआरमे एकटा ईंटाक देवाल ठाढ़ कऽ देलक आ हुनकर बाट बंद कऽ देलक। रघुनाथकेँ तखैन पता चललै जखन हो-हल्ला सुना पड़लै। ओ पहुँचल तँ देखलक जे छब्बू लाठी लऽ कऽ देवाल खसा रहल छल आ धुरझाड़ गारि पढ़ैत नरेशकेँ ललकारा दऽ रहल छल- घरघुस्सा, बाहर निकल आ हिम्मत होउ तँ ठाढ़ कर देवाल। हमहूँ देखिऐ। मास्टरकेँ असगर बुझले छीहीं की? खसरा-खतौनी कोनो चीज अछि कि नै? नरेश आ ओकर भाइ घरमे घुसल रहल। ओकरामे सँ ककरो हिम्मत नै भेलै जे बाहर आबए आ छब्बूसँ भिड़ए। सत्य गप तँ ई छलै जे रघुनाथकेँ नोकरी जाइक जते दुख छलै, ओइसँ एक्कोरत्ती कम छब्बूक जाइक नै छलै। किएकि छब्बू छल तँ रघुनाथ सेहो छल आ हुनका लेल पहाड़पुर सेहो। आब ककरा बुत्ते ओ रहत। छब्बूक मारल जेबासँ पहिने गनपत रघुनाथकेँ इशारामे बता देने छल जे पहलमान जँ अहाँ कतऽ आबए तँ बुझा देबै- चमटोलसँ दूर रहए। ई हमरा दुनूक गप तेसराकेँ पता नै चलए। खाली दूर रहए। रघुनाथ एकटा बहन्ना ताकि कहलो छल जे छब्बू, आब बहुत भऽ गेल, जाए दिऔ। छब्बू बाजल छल- मास्टर साहेब। छोड़ि तँ दिऐ, मुदा जाउ कतऽ? गाममे तँ सभ बेटी अछि, पुतोहु अछि। आर कतऽ जाएब। रघुनाथ ओकरा तरह-तरहसँ बुझाबैक प्रयास केलक, मुदा सभ बेकार। ओनाहूँ ओ सोचले छल जे बेसीसँ बेसी की हएत- यएह ने जे छब्बू बेइज्जत कएल जाएत आ झूरी ढोलाक संबंध सभ दिन लेल खत्म भऽ जाएत।  मुदा ई तँ छब्बूक दुश्मन सेहो नै जानै छल जे एहन हएत। ओ ई कहैत घुमैत रहल जे ई एकटा ठाकुरक हत्या नै, पूरा दियादक समर्थाइकेँ चुनौती अछि, ओकरा ललकारा देल गेल अछि- मुदा ऐ घटनाकेँ बिसरब आ एकर चर्चा नै करब नीक बुझलक सभ। कनी काल लागल ठाकुर टोलाकेँ बदलैत समएकेँ बुझबामे आ ओकर हिसाबसँ अपनाकेँ ढालबामे। कतेक दिन धरि दुआर कूड़ा आ कचराक ढेर बनल रहल, कतेक दिन धरि लादिक लग गोबर बजबजाइत रहल, कतेक दिन धरि बड़द खुट्टासँ बान्हल उठैत-बैसैत रहल, गाइ-महीस डिरियाइ छल आ पगुराइत रहल। पटायल-पटायल खटिया तौड़ैबला ठाकुर कखनो कोन भरे पड़ल कोदारि दिस ताकितिऐ, कखनो फरसा दिस, कखनो बाढ़नि दिस आ थाकि कऽ अंतमे ओइ छाउर दिस जिम्हरसँ हरवाह आबैत छल। मुदा हरवाहा जे चमटोलसँ भागल, से नै घुरल। एक हफ्ता बीतल। फेर दोसर हफ्ता बीतल। फेर तेसर हफ्ता बीतल। ओकर जेबाक बाद ठाकुर जतेक परेशान छल, दशरथ यादव ततेक खुश। ओकर बेटा जसवंत ऐ कालमे ठाकुरकेँ सम्हारि लेने छल। ओ हुनका सभकेँ हरवाहाक कमी नै हुअए देलक। ओ सबहक खेत भाड़ापर जोतलक। एक्को दिन ओकर ट्रैक्टर नै बैसल। सभक हर कामै रहि गेल। ओ सभकेँ बुझा देलक जे बड़द मथदुक्खी आ बोझ अछि, फालतू अछि। दुआर गंदा करैत अछि, ओकरा हटाउ। ओकर गोबर कोन काजक? ओकरासँ उपजाउ तँ यूरिया अछि। किछु गप बादमे पता चलल, ओइ काल नै। जेना ओ जइ तरहेँ ठाकुरकेँ सम्हारलक, तहिना ओ चमटोलकेँ सेहो सम्हारलक। किछु हरवाहा तँ शहर चलि गेल- रिक्शा चलेबा लेल सोचिए कऽ बा बोनिपर काज करै लेल मुदा बर रास लोक कोरबा गेल- जसवंतक छोट भाइ बलवंत लग, जे बोनि मजूरक ठिकेदार छल। ओ सभकेँ खदानमे काज दिएलक। आर ईहो जे गामक घर होइसँ ओ दोसरासँ जतेक लै छल, ओइसँ कम लेलक। एतबे टा नै, जसवंत ओकरो मदद केलक जे चमटोलमे रहि गेल छल, खास कऽ मौगी सबहक। राशन-पाइनक गरजसँ अनाजक लेल ओ ठकुरटोलीमे जाएब बंद कऽ देलक आ सूदपर जसवंतसँ या अहिरटोलीसँ टका लिअए लागल। ओ आब सोझे गज्जन साव केर दोकानपर जाइ छल। नगद पाइ दै छल आ किराना समान लै छल। गाम कनी-कनी पहिलुक्के जकाँ घुरए लागल छल- नव बदलाव आ नव व्यवस्थाक संग। अन्तर एतबे टा आएल जे हरवाहा बाहर नोकरी करै छल। आ ओ जखन गाम घुरै छल तँ ठकुरटोलीमे नै जा कऽ अहिरटोलीमे जाएब, उठब-बैसब बेसी पसीन करै छल। शाइत हुनका ओतऽ बराबरीक अनुभव होइ छल। रिटायरमेंटक बाद लोकक देखा-देखी रघुनाथ सेहो अप्पन खेत-बारीक दोसर व्यवस्था केलक। ओ अप्पन खेत सनेहीकेँ अधियापर दऽ देलक। सनेही हुनकर कॉलेजक चपरासी छल आ सात मील दूर अप्पन गामसँ कॉलेज आबै जाइ छल। जाइतक कोइरी। ओकर समस्या ओकर औरत आ बाल-बच्चा छल। रघुनाथ ओकर परिवारक लेल ओसारक एकटा हिस्सा आ बाहरक खोपड़ी दऽ देलक। ऐ तरहेँ ओ खेतीक झंझटसँ निश्चिन्त भऽ कऽ कत्तौ आबै जाइ जोग भऽ गेल। आर कत्तऽ आएत-जाएत, मैनेजर आ प्रिंसिपल पेंशन लटकेने छल आ ओ अहीमे लागल छल। ओ ओइ चक्करमे दू-तीन दिन लेल नग्र गेल छल तखने हुनकर भातिज नरेश घरक पछुआरक जमीन दोबारा घेर लेलक- ऐ बेर काँट बला तारसँ। एतबे टा नै, नरेश पुरना लादि ओइ जमीनपर गाड़लक आ महीस बान्हि देलक। चारू दिस गोबर आ गोइठा फेकबा देलक, जतऽ-ततऽ सण्ठी आ पुआरक बोझ रखबा कऽ ई सिद्ध करैक प्रयास केलक जे पछिला कएक बरखसँ ई ओकरे कब्जामे अछि। गाममे घुसैत रघुनाथ एकरा देखलक आ सोझे ओतऽ पहुँचल जतऽ नरेश महीसकेँ सानी दऽ रहल छल। ओ हाथ पोछि कऽ कक्काक पएर छूलक। ई सभ की छै? नरेश हुनका आश्चर्यसँ देखलक- किछु तँ नै, की अछि? तामस मे थरथरा उठल रघुनाथ- बदमाशी करै छी आ सेहो अप्पन कक्कासँ। -कनियो टा लाज नै एलौ तोरा? हटा ई सभ खुट्टा-तुट्टा, तार-फार। नरेशक तीन भाइ सेहो घरक भीतरसँ बाहर आबि गेल। पड़ोसीमे कियो नै आएल। सभ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल सुनि रहल छल। -ई तँ नै हटत कक्का। हमर घर-दुआरिक आगूक जमीन साबिकक अछि आम जमीन आ फालतूमे अहाँ फँसेने छी। अहाँक ई छेबे नै करी, ई तँ गाम-समाजक अछि। एतबै सुनैक छल आकि रघुनाथक देहमे जना आगि लागि गेल। ओ फनफना उठल आ एक लात मारलक लादिपर। तोहर साती कऽ, आ गाम समाजक। अखन माटि काँच छल लाइदक, ओ एक दिस भसकि गेल। ऐ बीच तामससँ आगि-पानि होइत आ गारि पढ़ैत नरेशक छोट भाइ देवेश दौगल आ धक्का दऽ कऽ रघुनाथकेँ खसा देलक। ओ सम्हरितिऐ, तइसँ पहिले ओ हुनकर छातीपर बैस कऽ गरजल- साढ़ बुढ़बा, गरदनि पकड़ि कऽ अखने दबा दिऐ तँ मरिए जाएत। हम जतेक नीक लोक जकाँ गप कऽ रहल छी, ओतेक शेर बनि रहल अछि। जा, जे करैक अछि, कऽ लिअ। उठैत ओ हुनकर डाँरपर एड़ी मारलक- साढ़ बुढ़बा हरमजदा। रघुनाथ उठबाक प्रयास केलक मुदा उठि नै सकल। लाइदक कातमे पड़ल-पड़ल ओ चारू दिस ताकलक। दियाद-बाद देखि रहल छलै आ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल छलै। कनी कालक बाद नरेश ओकरा ठाढ़ केलक आ घर दिस ठेल देलक। पीस कऽ लगाबै लेल हरदि-पियाज नै हुअए तँ पठबा देब।- देवेश चिकड़ल। -की भऽ गेल अछि गाम केँ? -एतऽ जनम लेलौं, पोसेलौं, बढ़लौं, पढ़ेलौं, सबहक मदति केलौं- कखनो किताब-कॉपीसँ, कखनो फीस माफीसँ, कखनो टका-पैसासँ, कतेक सर-संबंधी अछि आ रहत। आइ-काल्हि की भऽ गेल अछि गामकेँ? की अहीसँ जे ओ दियाद-बादक ऐ बा ओइ पार्टीमे नै अछि? की अहीसँ जे ओ रिटायर भऽ गेल आ कोनो काजक नै रहल? की अहीसँ जे ओ कहियो कोनो झगड़ा बा झमेलामे नै पड़ल? की अहीसँ जे ओ बेटा जातिक बियाह बाहर केलक? की अहीसँ जे ओकर बेटा अमेरिका मे डॉलर कमा रहल अछि? की अहीसँ जे ओकर दोसर बेटा सेहो नोएडामे एम.बी.ए. कऽ रहल अछि? की अहीसँ जे ओ बटाइपर खेती सनेहीकेँ देलक- बाहरी लोककेँ, हिनका सभकेँ नै? की भऽ गेल अप्पन दियाद-बादकेँ? रघुनाथ बुझबामे असमर्थ रहल। 5 रघुनाथ दलानपर करट भऽ कऽ पटायल छल। नै, नै करैक बादो शीला डाँड़पर फुलल हड्डी लग हरैद, पियाउज आ चूनक घोर लगा रहल छलि। आ मुँहक भितरे-भीतर किछु बड़बड़ कऽ रहल छलि, नाककेँ सुड़कैत। दू-दू टा मुस्टंड बेटा मुदा दुनू परदेशमे। एक्को टा एतऽ नै जे बापक बगलमे ठाढ़ हेतिऐ। रघुनाथ जइ अंडाकेँ पैघ केलक, ओ कोइलीक नै कौआक छल। आ ओ अपने कौआ छल, नै तँ ई गप बुझिये गेल हेतिऐ। ओ आइ धरि घरमे रहैत आएल छल, जे खपरैलक छल, माइटक मोट-मोट देवारक। साबिकी घर। पाछाँबला जमीन जानि-बूझि कऽ बँटवारामे लेने छल ओ, कि जखन पाइ आ समए हएत तँ पक्काक घर बनाएब-छोट सन। ई जरूरी छल- हुनका लेल नै, बेटा लेल। घरे नै रहत तँ ओ आएत किए? आएत तँ रहत कतऽ? आ जखन एबे नै करत, रहबे नै करत तँ गाम-घरकेँ बूझत-गमत की? फेर बाप-दादाक जमीन-जत्थाक की हएत? के देखत जा कऽ? खपरैलक घर तँ ढहि रहल अछि। कखन बैसि जाएत, कियो नै जानैत अछि? तेँ किछु दिन पहिने जखन प्राविडेण्ट फंडक पाइ भेटल तखने नव घरमे हाथ लगाबैक फैसला कऽ लेने छल। आब ई नव आफत। हुनका छब्बूक कमीक अनुभव भऽ रहल छल- लगातार। ई नव खाढ़ी पैदा भेल छल गाममे- तहियासँ जखनसँ गाममे बिजलीक खाम, केबुल, ट्यूबवेल, पम्पिंग सेट आ दवाइ दोकान आएल छल। जातिक पार्टी आएल छल, हराहरी तेसर घरसँ फौजमे कियो ने कियो भर्ती भेल छल। सवर्णमे एकटा वर्ग रिसर्च आ कोचिंग करैबला छौड़ा सबहक छल, जे शहरसँ बा कोनो फौजीक घरसँ बोतल लै छल आ राति पम्पिंग सेटपर बिताबैत छल। दोसर वर्ग नरेश आ ओकर भाइक छल। नरेश बिजली मैकेनिक छल। सरकारी कर्मचारी छल। मुदा खुट्टासँ तार खीच कऽ घरमे अवैध कनेक्शन दै छल आ चिक्कन कमाइ छलै। ओकर तीनू भाँइकेँ पॉलिटिक्समे मोन लागै छलै। देवेश सपा केर कार्यकर्ता छल, रमेश बसपा केर आ महेश भाजपा केर। ई पार्टी पछिला बीस बरखसँ सत्तामे आबि-जा रहल छल आ क्षेत्रक विधायक आ सांसद सेहो अही पार्टीक भऽ रहल छल। तीनू बड़ बुधियारीसँ कोनो ने कोनो नेताकेँ पकड़ने छल। ओ अप्पन-अप्पन नेताक संग रहितिऐ, घुमितिऐ, खेतिऐ-पितिऐ आ जनताक सेवा करैतिऐ- माने ट्रांसफर करबाबैक आ रोकबाबैक काज। छोट-मोट नोकरीसँ ई पैघ आ सम्मानजनक धंधा छल। लोकपर रोबदाब सेहो रहै छलै आ रुआब सेहो। हुनकर सभक मंत्री संग उठबाक-बैसबाक आ खाइ-पीयैक खिस्सा रहै छल। ओ जहिया कहियो चारि-पाँच दिनक लेल गामसँ निपत्ता रहतिऐ तँ सोझे लखनऊसँ या कोनो महारैलीसँ या हल्ला-बोलसँ आबैत छल। ई भाइ सबहक पहुँच आ पाइ केर तागतिक बोध रघुनाथकेँ तहिया भेलै जहिया हुनका दस-बारह दिन दौड़ऽ पड़लै- कखनो लेखपाल लग, कखनो थानापर, कखनो एस.डी.एम.क ऑफिसमे। कुर्सी सभ देलक, सम्मान सभ केलक, ध्यानसँ सुनलक हुनकर गप आ अंतमे बाजल- मास्साब। अहाँ विद्वान छी, शरीफ छी, अहाँक सभटा गप सत्य अछि मुदा कोन झमेलामे अपनाकेँ दऽ रहल छी? ओ सभ नीक लोक अछि की? मुँह फोड़ि कऽ किछु नै कहलक, इशारासँ जरूर बुझा देलक जे कऽ सकैत अछि तँ किछु नै, मुदा खाली गपे कऽ सकैत अछि। ओइ काल हुनका ईहो पता चलल जे दियाद-बादक आठो परिवारमे सँ सभ परिवारकेँ चुप रहै लेल नरेश दू-दू हजार टका देने छल। रघुनाथ दौड़ैत-दौड़ैत थाकि गेल। ई उमर सेहो एहन काज लेल नै रहि गेल छल। आब पहिलुक जेहन शक्ति सेहो नै रहि गेल छलै। ठेहुनमे दर्द रहै छलै आ गरदनिमे सेहो। शीला अलगे मरीज छल दमाक आ गैसक। जखैन रघुनाथ लग आबैत छल, डकार लेने आबैत छल। आ पछिला दिनक घटना आ पतिक परेशानी ओकरा आरो नर्वस आ निराश कऽ देने छल। रघुनाथ दुपहरियाक खेनाइक बाद नीमक नीचाँ पटायल छल आ सोचिये रहल छल जे आब की करी। एकमात्र रस्ता हुनका लखाह दऽ रहल छल- कचहरी। मुदा ओ रस्ता बड़ नम्हर छल। ओ जानै छलि जे तारीखपर तारीख पड़ैत जाएत। ऐ तरहेँ एक दिन आइत-जाइत मरि जाएब आ फैसला नै हएत। ऐ बीच शीला आएल। ओ बाजल- अजीब लोक छी अहाँ। असगरे चिंतामे मरल जा रहल छी, जकरा ई सभटा सम्हारैक अछि, ओकरासँ सलाह किए नै लऽ रहल छी? पुछियौ तँ ओकरासँ। -ककरासँ- बेटासँ। -हँ, मानलौं जे एकटा दूर अछि, मुदा दोसर तँ लग अछि। -एकदम सत्य कहि रहल छी अहाँ। ओ निसाँस लेलक- कहू तँ! ऐ दिस तँ हमर ध्यान गेबे नै कएल। ओ उठल आ शीलाक संग फोनमे भिड़ि गेल। शीला हुनका बेर-बेर बुझबैत रहल जे बल-धकेलक, पटकैक, मारि-पीटक गपक चर्च नै करबाक अछि नै तँ ओ परेशान भऽ जाएत आ पढ़ब छोड़ि कऽ बीचेमे चलि देत। लाइन भेटल रातिक दस बजेक बाद। स्वरपर संयम राखैत रघुनाथ विस्तारसँ सभटा गप कहैत हुनकासँ विचार पुछलक। ईहो बाजल जे एतऽसँ कैलिफोर्नियाक लाइन नै लागै छै, संजूसँ सेहो सलाह लऽ कऽ बताएब। राजू बीचमे टोकलक- किए मरल जा रहल छी जमीन लऽ कऽ। छोड़ू ओकरा आ सुनू, भौजी बनारस आबि गेल अछि अशोक विहारमे। ज्वाइन कऽ लेने अछि यूनिवर्सिटीमे। अहाँ माँकेँ लऽ कऽ चलि जाउ आ ओत्ते रहू आ सुनू। सुनैसँ पहिने फोन राखि देलक रघुनाथ। ओ माथ पकड़ि कऽ बैसि गेल। -की-की भेल? -शीला पुछलक। -भेल की? आब सम्हारू ओकरा। उड़ि कऽ आबि रहल अछि हवाइ-जहाजसँ। आबैते गोली मारि देत नरेशकेँ। ओ सभ बर्दाश्त कऽ लेत, बापक बेइज्जती बर्दाश्त नै करत। -अरे रोकू, रोकू ओकरा। -ओकरा तँ रोकि देब, संजयकेँ कोना रोकब? ओ तँ ओतऽसँ मिसाइलसँ सोझे घरमे आएत। शीलाकेँ संदेह भेलै अप्पन बुधिपर आ ओ चुप भऽ कऽ हुनका देखऽ लागल। -साढ़। कहैत-कहैत ओ माथ उठा कऽ शीलाकेँ देखलक। -हमरा डर छल ताइसँ हम गप नै कऽ रहल रही, मुदा अहाँक कहलासँ केलौं। हम एत्ते बुरबक नै छी जे हमर दिमाग मे नै आएल। मुदा अहाँक जिदपर केलौं। नै जानि कतऽसँ एहेन बेकाजक आ कोढ़िया छौड़ा जनम लऽ लेलक- साढ़। पछिला जन्मक पाप। हम तीस-पैंतीस बरख नोकरी केलौं, लाखक लाख कमाइ केलौं आ हाथमे एकटा पाइ नै। ऐ हाथ आएल, ओइ हाथ गेल। पुछू तँ कतऽ गेल, से बता नै सकब। आ ई जमीन। आइयो ओतै कऽ ओतै छी। मिसियो भरि टससँ मस नै भेल अप्पन ठामसँ। ई अहाँक दादा-परदादा-बापकेँ खुएलक, अहाँकेँ खुएलक, एतबे टा नै बेटा आ नाती-पोताकेँ खुआएत। अहाँ करोड़ो कमाएब मुदा टका आ डॉलर नै खाएब। भगवान ने करए जे ओ दिन आबए जखन बैंक चाउर-दालिक दाना बाँटत। ओ जांघपर मुक्का मारलक आ शीला दिस ताकैत बाजल- साढ़, तूँ सभ पैघ भलहि भेल हुँअए अप्पन माँक दूध पी कऽ, मुदा तोहर माँक माए अछि ई जमीन। चाउर, दालि, गहूम, तेल, पानि, नून यएह जमीन देने अछि। आ बाजै छी जे हटाबू ओकरा। -छोड़ू ओकरा। तामसमे रघुनाथ की सभ बाजैत रहल, हुनका अपनो नै पता। कोन तरहे शीला हुनका सम्हारैत पकड़ि कऽ आंगनमे लऽ गेल- जाउ, सूति जाउ। सोचू नै। 6 ऐ काल रघुनाथकेँ एकटा बोध भेलै। ई जे नीक लोकक मतलब अछि निरर्थक लोक, आ भला आदमीक अर्थ अछि डरपोक लोक। जखन कियो अहाँकेँ विद्वान कहए तँ ओकर अर्थ मूर्ख बुझू आ जखन कियो सम्मानित कहए तँ तकर अर्थ दयनीय बुझू। हुनका सभ ठाम यएह कहल गेल आ हुनकर कोनो काज नै कएल गेल। हुनका सभ ठाम हट-हट आ दुर-दुर कएल गेल। ओ ओइ बकरी आ गाए जेना अछि जे में-में आ बाँ-बाँ कऽ सकैत अछि, मारि नै सकैत अछि। यएह ओकर छवि, सबहक आगू मिमियाबै आ घिसियारी काटैबला मास्टरक। ई हुनकर छवि नै अछि, यएह छथिन ओ। ओ ओइ छविकेँ तोड़ै लेल सोचि रहल छल, बब्बन सिंह ओ अवसर दऽ देलक। ओइ काल रघुनाथ अपन खेतमे छल। ओ मचियापर बैसल छल आ आगू सनेही अप्पन आ हुनकर हिस्साक गहूम नपबा रहल छल। बगलसँ जा रहल बब्बन ठाढ़ भऽ गेल। गामक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला। गामे टा नै, पास-पड़ोसमे कत्तौ विवाद होइ छल तँ एक पंचक रूपमे कोनो ने कोनो पार्टी दिससँ ओ सेहो रहै छल। ई अलग गप अछि जे ओ मामला सुलझाबैक बदला आर ओझरा दै छल। ई हुनका नीक नै लागै छल जे रघुनाथ नै जानि कतऽ–कतऽ दौड़ल, हुनका लग नै आएल। रघुनाथ हुनका देखलक मुदा कोनो भाव नै देलक। -मास्टर।- ओ शोर पाड़लक। रघुनाथ लग गेल आ गोर लागलक। -जमीन अहाँक अछि, गाम-समाज या नरेशकेँ ओकरासँ की लेब-देब? दोसर कियो कोना कब्जा कऽ लेत? -एतबे टा हमहूँ जानै छी। -जानै छी तँ विधायकजी सँ किए ने भेँट करै छी? -कोन विधायकसँ? -अरे वएह, अप्पन कॉलेजक मैनेजर। माथ ठनकलै रघुनाथक। एकर मतलब जे ऐ पूरा मामिलाक तार ओत्तेसँ जुड़ल अछि। संजयक बियाहसँ। ओकरा हुनका रिटायर करबेलेसँ आ पेंशन रोकबेलेटा सँ संतोष नै भेलै- आ ई अछि दियाद-बादक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला लोक, जे नरेशकेँ नै बुझा कऽ हमरा बुझा रहल छल। आ बुझा की रहल छल, ओइमे रस लऽ रहल छल। ओइ काल रघुनाथक दिमागमे एकटा खुराफाती विचार आएल। -कक्का।- ओ बब्बनक हाथ पकड़ि कऽ कनी फराक लऽ गेल। अहाँसँ एकटा विचार लैक चाहैत रही, कतेक दिनसँ। जखन अहाँ भेटिये गेलिऐ तँ कहू तँ एत्ते पूछि लै छी। -बाजू, बाजू। मन तँ नै बनेने छी मुदा कखनो-कखनो सोचै छी जे ओइ जमीनकेँ बेच दी। बब्बन हुनका आश्चर्यसँ देखैत रहल। -अहाँकेँ पता अछि, कतेक महंग अछि ओ जमीन। आबादीक भीतर। कतेक काजक अछि। ओकरा बेचब सोना बेचै सन अछि। आ बेचब किए? -मथदुक्खी राखैसँ की फाएदा? -यएह तँ चाहै अछि नरेश। मुदा ओकरा नै बेचबाक अछि। ओ जे केलक, तकरा कोना बिसरि सकै छी? -तँ फेर? -फेर की? अखन तँ यएह सोचने छी जे ओकरा नै देबाक अछि, बाकी तँ घर अछि, गाम अछि, अहाँ चाहब तँ अहीं छी। देखल जाएत, कोनो जल्दी थोड़े अछि। बब्बन कनी गंभीर भेल- आ ओकर कब्जाक की करब? -कब्जाक की, खुट्टा अछि। आर किछु नै तँ जे उखाड़ि कऽ फेक देत ओकरो दऽ सकै छी। मैनेजर साहब सेहो खोलऽ चाहैए बच्चा सबहक अंग्रेजी स्कूल ऐ इलाकामे कत्तौ। एतऽ खोलि लिअए। -अरे गामक लोक मरि गेल अछि जे बाहरी लोककेँ देब? -नै, एकटा गप कहि रहल छी। अखन किछु तय-तफसिला थोड़े अछि। रघुनाथ धीरेसँ बाजल- हम दान तँ नै दऽ रहल छी ककरो। जखन वाजिब आ सही भेटत तखने ने। -अहाँ तँ गाममे फौजदारी करा देब मास्टर।- चिंतित भेल बब्बन बाजल। -हम की करब? जखन ओ अपने करैपर बिर्त अछि तँ कियो की कऽ सकैत अछि। रघुनाथ हुनकर कान लग मुँह लऽ जा कऽ बाजल- मुदा ई गप अपने धरि राखब। दुनिया भरिक लोक आबैत रहैत अछि अहाँ लग। की फाएदा कहएसँ? छै कि नै? तँ चली। रघुनाथ खेत दिस घुरि गेल। सनेही दोसर बेर पुछने छल जे गहूमकेँ बखारीमे आइये राखि दिऐ या काल्हि लेल छोड़ि दिऐ। शीलाक कहब छल जे राहैर आ तोड़ी सेहो बँटि जाए तँ सभकेँ बेरा-बेरी राखि देल जाए। रघुनाथ ई निर्णय शीलापर छोड़लक आ ओसारपर आबि कऽ बैसि गेल। शीला सेहो पाछाँ-पाछाँ आएल। -किए भरि-ठेहुन भरि-छाबा कऽ रहल रही हुनकासँ? सभटा खुराफातक जड़ि तँ वएह छथि। -अहाँ चुप रहि कऽ तमाशा देखू। हम बड़ रास मसाला दಽ देलौं हुनका। आब काल्हिसँ एतऽ बैसकी लगाएब शुरू कऽ देत लोक। रघुनाथक चेहरापर राहत आ संतोषक चमक छल। शीला उखड़ल मनसँ पुछलक- अहाँ जमीन बेचैक गप कऽ रहल रही हुनकासँ? रघुनाथ हँसल- गपे तँ कऽ रहल रही, बेच नै रहल रही। बेचबाक नै अछि हमरा। हमर अप्पन कमाएल चीज छेबो नै करए जे हम बेची। बाप-दादा लग हुनकर पुरखासँ कोना आएल हएत, वएह जानैत हएत। मुदा ई लोक नहिये अपने चैनसँ रहत, नहिये रहऽ चाहैए, नहिये रहैले देत। आब यएह देखू, हमर दोष कतऽ अछि? संजय बियाह केलक। ओतऽ केलक जतऽ चाहलक, जतऽ ओकरा अप्पन हित देखा पड़लै। भविष्य देखलक। हमरो नीक नै लागल मुदा ओकर अप्पन पसीन आ जिनगी रहै। हम की कऽ सकैत रही? मुदा तकर सजा मैनेजर हमरा देलक। फालतूमे। हमहूँ कहलौं- ठीक अछि। गामपर रहब- सुख आ शांतिसँ। नहिये ऊधोक लेब, नहिये माधोकेँ देब। एक समए छल जखन खेत-पथारक अतिरिक्त किछु नै छल एतऽ- नहिये अखबार छल, नहिये बिजली छल, नहिये फोन, नहिये टीवी छल। आइ सभटा अछि आ फसिल एतेक जे हम दूटा लोक लेल ककरो आगू हाथ नै पसारै जरूरति। रहल गप्प दोसर जरूरतक लेल तँ आइ ने काल्हि पेंशन भेटबे करत। फेर कोन गप्पक चिन्ता। की। रघुनाथ मुसकुराबैत शीला दिस देखलक। आ सभ सुख-दुखमे सदिखन संग दैबाली स्त्री अखन जीवित छलि। ओ हुनका खिचलक आ अपना लग बैसा लेलक। ओ लजाइत हुनका लग बैसल रहलि आ ओ हुनका एकटकसँ देखैत रहल। -शील, ऐ सभ चीजक सहारे जिनगी तँ काटल जा सकैत अछि, जिअल नै जा सकैत अछि। एकाएक हुनकर आवाज भारी आ उदास भऽ गेल। -शीला। अप्पन तीनटा बच्चा अछि, मुदा पता नै किए, कखनो-कखनो हमर भीतर एहन हूक उठैत अछि जेना लागैत अछि- हमर स्त्री बाँझ अछि आ हम निपुत्तर छी। माँ आ बाप होइक सुख नै जानलौं हम। हम सभ नहिये बेटाक बियाह देखलौं, नहिये बेटीक। नहिये पुतोहु देखलौं, नहिये होएबला जमाएकेँ। हम एहन अभागल माँ-बाप छी जकरा ओकर बेटा अप्पन बियाहक सूचना दैत अछि आ बेटी कहैत अछि जे जँ अनुमति नै देब तँ नोत नै देब। आ आब अहाँक नजरि अछि राजूपर जे ओ सभ साध पूर कऽ देत। -नेहाल कऽ देत अहाँकेँ, एहन भ्रम हुअए तँ निकालि दियौ अप्पन दिमागसँ। हमरा पता अछि जे ओ एकरोसँ आगू जा रहल छै। ओ एकटा एहन विधवा लड़कीकेँ ताकि लेने अछि जकरा दू बरखाक बच्चा छै। एतबे नै, ओ कोनो नीक सर्विस सेहो करै छै। ओकर पाइसँ ओ दिल्लीमे मौज कऽ रहल अछि। मोटरबाइक लऽ गेल अछि मस्ती करबाक लेल। बच्चा पोसब आ मौज करब दू टा काज अछि ओकर। गेल छल डोनेशनक पाइ लऽ कऽ, आइ धरि पता नै चलल जे एडमिशन लेलक आकि नै। -अहाँ एतेक गप जानैत रही तँ कहियो बतौलिऐ किए नै। -की कऽ लेती अहाँ? की करितिऐ बता कऽ। शीला, हम जानै छी ओकरा। पढ़ैमे कहियो रुचि नै रहलै ओकरा। अप्पन बापसँ कोन स्वरमे गप करैत अछि। एकरा अहाँ देखने छी। ओ शॉर्टकर्टसँ पैघ लोक बनैले चाहैत अछि। ओकरा लेल पैघ लोकक मतलब अछि धनी लोक। आ सेहो खून-पसीन बहा, बिन मेहनतिक। ओ महत्वाकांक्षी लड़का अछि मुदा लालच आ महत्वाकांक्षा बुझैत अछि। ओ बड़ रास चीज हासिल करए चाहैत अछि- अनचोक्के बिना पढ़ले-लिखले, बिना नीक नंबर आनले डिवीजन आनलक, बिन प्रतियोगिता देले, बिना खटले आ नौकरी करले। हमरा नै पता जे ओ लड़की ओकरा कोना भेटल। कतऽसँ भेटल। भऽ सकैत अछि जे ओकरा कोनो मर्दक खोज हुअए। एतबै जरूर अछि जे डेढ़ बरख पहिने कोनो सड़क दुर्घटनामे ओकर पति मरि गेल। ओइ लड़कीक अप्पन फ्लैट अछि, कार अछि, ऑफिसक काजसँ सिंगापुर, बैंकाक आबैत-जाइत रहैत अछि आ ई ओकर बच्चा सम्हारैत अछि आ घर जोगैत अछि। जेना हम नै जानै छी, तहिना ओ नै जानै छै जे ओकर मनमे की छै, की विचार छै। -अहाँ ई सभ कोना जानलिऐ। -ई नै पुछू। नोएडामे हमरो लोक अछि, जे आबैत-जाइत रहैत अछि। शीला चिंतित भऽ उठल- सभटा दुख अही बुढ़ापामे देखब लिखल छल की? एकटा बेटा परदेसमे, पता नै कहिया आएत। दोसर एतऽ मुदा ओकरो वएह हाल। मुदा ओकरोसँ खराप। आ इम्हर बापक दोसर मुसीबत। गाम छोड़ब तँ जानि जाएत, नै तँ मारल जाएब। नहिये कियो देखएबला अछि, नहिये सुनएबला, नै जानि ककर नजरि लागि गेल अछि घरकेँ। रघुनाथकेँ ओतಽ असगरे छोड़ि कऽ चुपचाप ओ अंदर गेल आ पटा रहल। 7 घरमे फोन आब जीक जंजाल भऽ गेल छल। जखन रघुनाथ कनेक्शन लेने छल तँ राजूक जिदपर जे संजू अमेरिकासँ जखन गप करऽ चाहत तँ केना करत। कोनो संदेश देबाक हुअए तँ। भौजीकेँ जौं मम्मीसँ किछु बाजबाक बा पुछबाक हुअए तखन। हमरे कोनो सलाह लेबाक हुअए तखन। चिट्ठी-पत्री आब के लिखैत अछि, ककरा लग एत्ते समए अछि। आ सरला दीदी सेहो तँ अछि शहरमे, हुनकासँ गप नै करबाक अछि की अहाँकेँ आ मम्मीकेँ। तँ कोनो हालमे जरूरी अछि ई। गाममे सेहो बेमतलब थोड़ लेने अछि लोक। फोन लागल तँ राजूक लेल। जखन कखनो घरमे रहैत छल, लागल रहैत छल ओइपर, कखनो ऐ दोस्तक, कखनो ओइ दोस्तक। संजूकेँ तँ लाइने नै भेटै छलै। हँ, कखनो-कखनो सरला जरूर भेट जाइ छल। आब जखन राजू बाहर अछि तँ फोन ओहिना बेकार पड़ल रहै छै जना नादि आ खुट्टा बा हर आ ठेंगा। तइसँ रातिमे जखन फोनक घंटी बाजल तँ रघुनाथ आ शीला डरि कऽ एक-दोसराकेँ ताकलक। घंटी बजब तँ बन्न भऽ गेल, ओइमे सँ कियो उत्साह नै देखेलक। जखन दोसर बेर बाजल तँ रघुनाथ उठल आ रिसीवर उठेलक। -हैलो। दोसर दिससँ आवाज आएल। चिन्हलक ओकरा। देर धरि सुनैत रहल, फेर शीलाकेँ रिसीवर पकड़ा देलक। आ माथपर हाथ राखि चुपचाप बैस गेल। कनी काल बाद दोसरದೊ दिससँ कानैक आवाज सुना पड़ल। ओ उठल आ अप्पन बिछौनपर आबि गेल। रिसीवर राखि कऽ शीला सेहो आएल आ अप्पन बिछौनपर बैसि गेल। ओ काल्हि आबि रहल छथि अपना सभकेँ लऽ जाइ लेल। -अहाँकेँ जेबाक अछि तँ जाउ, हमरा नै जेबाक अछि। बड़ कानि रहल छल। पुछि रहल छल जे हमर कोन एहन गलती अछि जे देखै लेल तँ दूर, अहाँ सभ फोन धरि नै केलौं। ओ केलक कहियो फोन। हम सपना देखि रहल रही जे महारानी घुरि आएल अछि अप्पन देश। आकाशवाणी भेल छल हुनकर आगमनक लेल। -ई तँ नै बाजू। राजू बतौले छल। -हम कोनो राजू-ताजूकेँ नै जानै छी। ओ किए नै कहलक। बापकेँ कऽ सकैत छल ससुरक संगे। ओकरा बजौलक, ज्वाइन करौलक, अशोक विहार आएल। एत्ते दिनसँ रहि रहल छथि, बीचमे पापा-मम्मी मोन नै पड़लै, आइ मोन पड़लै। ओहिना तँ मोन नै पड़ल हेतै, आएल हएत, कोनो गप हएत जरूर। कानि-कानि कऽ कहि रहल छल जे हम मम्मी-पापाक बिना नै रहि सकैत छी। -झूठ बाजैए। बहटरा रहल छल अहाँकेँ। जानैए कत्ते अपना सभकेँ। नहिये कहियो देखने अछि, नहिये भेंट अछि तँ ओ किजाने गेलए पापा-मम्मीकेँ। हम तँ जानै नै छी जे हमरो कोनो पुतोहु अछि। -पूतोहु नै सही, बेटा तँ अछि। नै जानि की सोचत। -कोन मतलब अछि बेटा-बेटी बहु दुनिया। सबहक चिंता करै लेल हमहीं छी। रघुनाथ तमसा गेल। ओकरा तँ चिंता छै जे लोक की कहतै। सासु-ससुर गाममे पड़ल अछि आ पुतोहु नग्रमे मजा कऽ रहल छै। -ई अहाँ कहि रहल छी, अप्पन मोनसँ। बुझलिऐ। किछु बजाउ नै हमरासँ। रघुनाथ उठल आ आंगनमे टहलऽ लागल। नीन भागि गेल छल हुनकर। ओ कोनो निर्णय नै कऽ पाबि रहल छल। ओ गामसँ सेहो तंग भऽ गेल छल मुदा ओकरा छोड़ऽ नै चाहै छल। मन नग्र आ कॉलोनी दिस लागल छलै- जीवनक नव दिस, नव जिनगी दिस, साफ-सुन्दर पक्का मकान आ अलकतरा छारल सड़क दिस, गंगाक घाट दिस, अनचिन्हार नव संबंध दिस। ई आकर्षण छल मनक मुदा उम्हर जाइमे भऽ रहल छलै जे कत्तौ एना नै हुअए जे पछुआरक जमीन हाथसँ निकलि जाए, बिन देख-रेखक मकान ढहि जाए, सनेही चोरी आ बेइमानी शुरू नै कऽ दिऐ, कत्तौ लोक सदा लेल गामसँ गेल नै मानि लिअए। आ एहन कहएबला तँ कम नै हएत जे गाम छोड़ि कऽ भागि गेल। एकरासँ पैघ जगहंसाइ आर की भऽ सकैत अछि। ओ आंगनक चक्कर काटैत ओतऽसँ ठाढ़ भऽ गेल जतऽसँ खपरैलसँ ऊपर उठैत चन्द्रमा लखाह दऽ रहल छल। ओ ओकरा देखऽ लागल जेना गाम छोड़लापर फेर नै लखाह देत- बा ओकरेसँ पुछि रहल अछि- आ तखन की करबाक चाही। ई चैत मासक राति छल। दशरथ यादव अप्पन दरवाजाक आगू नव शिव मंदिर बनौने छल। पछिला दस घंटासँ ओतऽ अखंड हरिकीर्तन चलि रहल छल। कीर्तनिया मंदिरक बगलमे ठाढ़ नीमक गाछपर लाउडस्पीकर बान्हि देने छल आ समूचा गाम हरे राम, हरे राम सँ दलमलित छल। ई एकरस गूंज ओकर मनकेँ भारी कऽ रहल छलै। -अहाँ जाउ, हम एतऽ रहब, अप्पन घरमे। सुनलिऐ। ओ ऊँच आवाजमे शीलासँ बाजल। -अहाँकेँ असगरे छोड़ि कऽ। नै बाबा नै, पता नै की भऽ जइतए। शीला ओतऽसँ बाजल- आ ऊ घर तँ सेहो अहाँक छी। संजू की कहैत छल। हम चाहैत छी जे मम्मी-पापाक अंतिम दिन काशीमे बितए। चैनसँ बितए। जखन समए आएल अछि तँ ना-नुकुर कऽ रहल छी। सोनल दोसर नै अछि, पुतोहु अछि अपन। -अहाँ, बुझै किए नै छी। सोनल पुतोहु अछि, घर पुतोहुक अछि, अपन नै। कोन औकातिसँ जाएब हम। पाहुन बनि कऽ। किराएदार बनि कऽ। कोन औकातिसँ। ओइ दिस ध्यान नै गेलै शीलाक। ओ कनी काल अचकचाएल, फेर बाजल- ठीक अछि, हुनकर घर तँ अछि मुदा संजू तँ अछि नै। ओ हम्मर बेटा अछि। देर-सबेर तँ आबए पड़त ओकरा। राजूकेँ वएह नै कहै छल जे पापा-मम्मीकेँ पठा दियौ। आ सोचू जे पुतोहुक घर की हमर नै अछि? रघुनाथ चुप रहल। किछु नै बाजल। -देखू, अपना सभ चलू। एहन नै जे घरकेँ छोड़ि कऽ जा रहल छी। कहियो घुरि आएब ऐमे। जखन परेशानी हएत तँ आबि जाएब। खेतीक जिम्मा तँ स्नेहीकेँ देने छी। रहि गेल घर तँ दस बिस्सा खेत आर दऽ दै छी गनपतकेँ। कमरा बंद कऽ दरवाजाक ताला ओकरा दऽ दियौ। साफ-सफैयत आ देखभाल करैत रहत। शीलाक गपमे दम लखाह देलक रघुनाथकेँ। हुनका चारि दिन बाद जेबाक छल पेंशनक काजसँ। दिक्कत केवल ई छल जे गनपत मिर्जापुर गेल छल अपन बेटा लग। तँ एहन करू शीला, अहाँ तँ सोनल लग काल्हि चलि जाउ। हम एतुक्का व्यवस्था कऽ पाँचम दिन पहुँचब। पेंशन ऑफिसमे अप्पन काज निंघटा कऽ सोझे अशोक नगर आबि जाएत। कोनो जरूरी गप हुअए तँ फोनपर खबर कऽ देब। अरे हँ, फोनक कनेक्शन सेहो तँ कटाबए पड़त। छोड़ू, अहाँ अपन तैयार करू, गहूम, चाउर, दालि, घी, अचार। कनी-बेसी जे लऽ जा सकब, लऽ लेब। 8 रघुनाथ बाजल पाँच दिन मुदा लागि गेल पचास दिन। ओइमे ओकर कोनो दोष नै छल। सोचने छल जे जखैन जेबाके अछि तँ एतुक्का सभटा समस्या सुनझा कऽ गेल जाए, ई नै हुअए जे रही ओतऽ आ मन लागल रहए एतए। बड़ रास सोचि-विचार कऽ ओ फैसला लेलक जे रूकल पेंशन हुअए बा आबादीक जमीन, जखन अही दुनूक जड़िमे मैनेजर अछि तँ हुनकासँ एक बेर भेँट कऽ लैमे की हर्ज अछि। जौँ एतबे टा सँ हुनकर ईगो तुष्ट हएत तँ कहएमे की खरापी अछि। आइ जे किछु छी, अहींक कारण छी, नोकरी नै देने हेतिऐ तँ जानि कतऽ हेतिऐ। जखन बनैले छिऐ तँ बिगाड़ि नै करियौ। आब स्थिति सेहो बदलि गेल छल। मैनेजरक बेटाक बियाह भऽ गेल छल वनमंत्रीक ठिकेदारक बेटासँ। ओ पड़़ोसी जिलाक छल। मैनेजरसँ ऊँच स्टेटसबला। आब रघुनाथसँ शिकाइतक कोनो कारण सेहो नै रहि गेल छल। ओ मिठाइक पैकेट आ सेब, संतोला आ अंगूरक संग पहुँचल तँ मैनेजर, जकरा लोक सरकार बाजैत छल, नीक मूडमे छल। रघुनाथकेँ देखैत ओ चुहुल करैत बाजल- मास्टर। अहाँक स्वास्थ्य देखि कऽ लागैत अछि, जे शुरूसँ दरमाहा नै लऽ कऽ पेंशन लेबाक चाही छल। जवानी तँ आब आएल अछि अहाँपर। -सरकार।- रघुनाथक मुँहसँ निकलल आ ओ कानऽ लागलखिन। -की। की भेल? आइ धरि नो-ड्यूज क्लियर तक नै भेल की? मैनेजर चौंकि कऽ पुछलक आ प्रिंसिपलकेँ फोन केलक। फेर बाजल- जाउ, चिंता नै करू। भऽ जाएत। आर किछु? रघुनाथ नरेश आ बब्बन सिंहक सभटा किस्सा बतौलक। ओ चुपचाप सुनैत रहल। कनी काल बाद ओ बाजल- जखन ई अहाँक घरक छल तँ बटाइ किए देलिऐ। गलती तँ अहूँक अछि। रघुनाथ किछु नै बाजल। हुनका ई बताएब ठीक नै लागल जे बाहरक लोककेँ तँ कखनो हटाएल बा भगाएल जा सकैत अछि मुदा हुनका मुश्किल हएत। ओ एतबे टा बाजल- हँ, गलती तँ भऽ गेल। आब किछु केलो नै जा सकैत अछि। -अहाँ समस्या ठाढ़ करैत रहू आ हम निपटारा करैत रही, यएह ने। मैनेजर एस.डी.एम.केँ फोन केलक आ इशारासँ किछु बुझेलक। रघुनाथ ओइ काल माथ झुकेने बैसल रहल। -आब कोन सोचमे छी। जाउ आ बब्बन सिंहकेँ पठा देब। ओ उठल आ बाथरूममे चलि गेल। जाइत-जाइत कहलक- भऽ सकैत अछि एस.डी.एम. ऑफिस दौड़ए पड़ए एकाध बेर। दौड़ाएब आ अहाँसँ किछु बाजए तँ हुनका आगू बड़ सिद्धांतवादी बनैक जरूरत नै अछि। सबहक किछु ने किछु मजबूरी होइत अछि। ठीक। बीस-पच्चीस दिनक दौड़-धूपक बाद एक दिन एस.डी.एम. दूटा सिपाही आ लेखपालक संग आएल- जरीब आ गामक नक्शा लऽ कऽ आ सबहक आगू जमीनक पैमाइश केलक। ऐबेर जमीनक ओ हिस्सा सेहो रघुनाथक हकमे निकलल जे नरेशक घर-दुआर छल। एकर मतलब ई भेल जे रघुनाथ चाहए तँ नरेशक घर-दुआर गिरा दिअए बा रहए दिअए आ ओत्ते जमीनक दाम वसूलि लिअ। ओकरा रघुनाथक भलमनसाहत पर छोड़ि देल गेल। ई हुनकर बड़ पैघ सफलता छल- निश्चिंती सेहो। पापड़ तँ बड़ बेलने छल मुदा सम्मान घुरि एलै। आब ओ बनारस जा सकैत छल मास- दू मासक लेल। मुदा जौँ मन लागि गेलै तँ संदेश आ फोना-फोनीसँ काज चलि जेतै। ओ जाइक तैयारी शुरू कऽ देलक आ तैयारी की करबाक छल। राशन लेलक। दू टा छोट-छोट बोरामे अलग-अलग अल्लू आ पियाजु छलै। चारि बजेक बस लेल तैयारी कऽ रहल छल जखन बाहरमे डाँट डपटिक आवाज सुनाइ देलकै। निकलल तँ देखलक- जयनारायण माने जग्गन। बड़ उखड़ल छल आ रूसल। हुनकर एक हाथमे कल्लूक कान छल आ दोसरमे दू टा अधपक्कू आम। डरल कल्लूकेँ पकड़ि कऽ सनेहीक झोपड़ाक आगू ठाढ़ छल- सनेही, सनेहिया रे। भीतरसँ सनेहीक स्त्री निकलल- की अछि मालिक? ओ झपटि कऽ कल्लूकेँ खिंचलक, दू थापड़ फेर मुक्का मारैत आ धकियाबैत भीतर ठेल देलक। ओ कानैत भीतर चलि गेल। मामला बुझैत देर नै लगलै रघुनाथकेँ। घरेनमे सबहक दरवाजाक आगू नीमक गाछ अछि, असगरे वएह टा अछि जकर दरवाजाक आगू आमक गाछ अछि। टिकुला लागैसँ लऽ कऽ ओकरा पाकै धरि, जकर नौबति शाइते कहियो आबैत छल। घरानाक छौड़ा सभ हाथमे ढेला नुका ओकर चरू दिस घुमैत रहै छल आ जग्गन ताधरि ओकर नीचाँ खाट राखि कऽ पड़ल रहैत छल जाधरि गर्मी बर्दाश्त होइ जोग रहैत छल। दर-दियाद भरि केँ कऽ चटनी, अचारक काज हुनकर लाख प्रयासक बादो ओकरेसँ चलैत छल। इन्हरसँ ढेला चलैत छल, उम्हर जग्गन पकड़ैक घातमे रहैत छल। एक कऽ पकड़ैत अछि, तीन टाक मौका भेट जाइत अछि। हुनकर आ छौड़ा सबहक व्यस्तता कहियो-कहियो डेढ़-दू मास धरि चलि जाइ छल। -आउ, आउ जगन। हमरासँ कहू की गप अछि। -काकी अछि आकि नै, आबए तँ आबी अहाँ कतए। -आउ, बैसू तँ सही। ओ जग्गनक आगू खटियापर बैसै लेल इशारा केलक आ शोर पाड़लक झोपड़ीक आगू ठाढ़ सनेहीक स्त्रीकेँ। -जग्गनकेँ सतुए घोरि कऽ पियाबियौ। सुराहीक पानिमे बनाएब। जग्गन कनी स्थिर भेल आ बैसि गेल। फेर अप्पन लुंगीक फाँड़सँ तमाकुलक डिब्बा बहार केलक आ मिड़ए लागल। बाजल- मास्टर कक्का, अहाँ ई बड़ पैघ गलती कऽ देलौं। कोइरी-कहारकेँ अप्पन बीचमे बसा कऽ अहाँ बड़ पैघ गलती केलौं। -ऐमे गलती की अछि? -अरे, अहाँकेँ लखाह नै दैत अछि। अही बाट देने हम दिन-राति आबै-जाइ छी। ई बैसल तँ बैसल अछि, पटायल अछि तँ पटायल अछि। पैघ लोगक बीच रहैक सउर नै छै। आ हिनकर बेटा। बीचे मे रघुनाथ टोकि देलक- देखू जग्गन, फालतूक गप अछि ई। समै-काल बड़ बदलि गेल अछि। आइ मानसिक रूपसँ विकलांगे एहन गप करैत अछि। कोन गपक पैघ छी अहाँ। पुरखा, जमीन आ जातिक भरोस। छब्बूक हत्याक बादो ई भ्रम अछि तँ राखने रहू। पछिला दिन अहूँ अप्पन खेत बेचलिऐ। ठाकुरमे सँ कियो किए नै किनलक। किनलक तँ आखिर जसवंते। आइयो हम्मर अहाँक खेती ओकरे भरोसे होइत अछि, ट्रैक्टर ओकरे लग अछि, टका ओकरे लग अछि। विधायक ओकरे अछि, सांसद ओकरे अछि, सरकार ओकरे अछि, ओकाइतो ओकरे लग अछि, कोनो काजक लेल पैरवी करबाक होइत अछि तँ अहाँ ओकरे लग जाइ छी, तकर बादो पैघ लोक छी अहाँ। एहन गलतफहमी पोसबाक अछि तँ पोसने रहू। हँ, ई जरूर अछि जे ओ दोसर गामक अछि, पराया अछि, अधिया देबाके अछि तँ ओकर बदला कोनो अप्पनकेँ देबाक चाही छल। आब अहीं बताबियौ, के अप्पन अछि जकरा दैतिऐ। जग्गन गुम्म रहि गेल। रघुनाथ सभसँ लगक पड़ोसी छल। नरेश ओकरे भाइक बेटा, जकर नजरि बराबर पछुआरबला जमीनपर छलै। कनी काल इंतजारीक बाद रघुनाथ बाजल- देखू जगन, परायामे अप्पन भेट जाइत अछि मुदा अप्पनमे अप्पन नै भेटैए। एहन नै छल जे अप्पन नै छल। छल मुदा तखैन जखैन समाज छल, परिवार छल, सर-समाज छल, जखन भावना छल। भावना यएह छल जे ई भाइ छी, ई भातिज छी, भतीजी छी, ई कक्का छी, ई काकी छी, ई पीसी छी, भौजी छी। भावनामे कमी होइ छल तँ ओकरा पूरा कऽ दैत छल लोक लाजक कारणे। नै तँ एनामे लोक की कहत। मात्र भावना छल, गणित नै, लेन-देन नै। ऐबीच सत्तूक घोर दऽ कऽ गेल सनेहीक स्त्री, रघुनाथ चुप भऽ गेल। ओकर गेलाक बाद फेर शुरू केलक- आब अहीं कहू, नरेशसँ बेसी के अप्पन छल। सोचने छल, ओकरा दऽ कऽ निश्चिंत भऽ जाएब। मुदा ओकर नेतपर शक छल, बड़ी काल पहिनेसँ। आ ओकरा नै दऽ कऽ नीक करलिऐ। नै तँ से दिन सेहो अइतिऐ जखन अप्पन खेत की, गाममे ओ घुसै नै दैतिऐ। आ कहैक जरूरत नै जे ओइ काल अहूँ हमर नै, ओकर संग दैतिऐ। हँ, सनेहीकेँ हम जानै छी। ओ अप्पन काजसँ काज राखएबला लोक अछि। अहाँ आर ककरो शिकाइत हुअए तँ बताएब। मौके नै देत, बताएब की? 3 1 ओ घर, जकरा राँचीक प्रोफेसर राजीव सक्सेना रिटायर भेलाक बाद अपना रहै लेल बनारसमे बनबैने छल आ जकरा अप्पन बेटी सोनलक नाम कऽ देने छल, ओ अशोक विहारमे छल। बनारसमे मोहल्ला छल, विहार आ कॉलोनी नै। एकर निर्माण शुरू भेल १९८०-९० क आसपास जखैन पूर्वांचल आ बिहारक भू-माफिया आ बाहुबलीक उदय भेल। ओ नग्रक दक्खिन, पच्छिम आ उत्तर दिस बसल गामकेँ किनलक आ ओकर प्लाटिंग कऽ बेचब शुरू कऽ देलक। देखैत-देखैत १५-२० बरखक भीतर गामक अस्तित्व खतम भऽ गेल आ ओइ ठाम नव-नव नामक संग नगर, कॉलोनी आ विहार बसि गेल। ई नव बनारस छल- महानगर सन। मोहल्लामे रहएबला मोहल्लेमे रहल। अप्पन पुरखाक काज-धंधा, दोकान, रोजगार आ घाटक संग। मुदा ऐ कॉलोनीमे बसऽबला बेसी लोक नव नागरिक छल। ओ बाहरसँ आएल छल। अगल-बगलक जिलासँ। सौ-पचास कि.मी. दूरसँ। हुनकर लगेमे गाम छल, थोड़-बेस जमीन छल, खेती-बारी छल। हुनका समए-समएपर बनारस आबऽ पड़ैत छल-कहियो कोर्ट कचहरीक काजसँ, कहियो अस्पतालक काजसँ, कहियो तीर्थ-बर्त लेल, कहियो शादी-बियाहक खरीदारी लेल, कहियो नेना सबहक एडमिशन आ पढ़ाइ करैक लेल। बेर-बेर आबि कऽ घुरएसँ नीक छल जे एतऽ ठहरैक आ रुकैक एकटा स्थाई ठाम हुअए, एकटा डेरा हुअए। मुदा ई ओकरा सभ लेल संभव छल जकरा लग अप्पन कोनो छोट-मोट नोकरी अछि, आ ओकरा लेल जकर बेटा सभमे सँ कमसँ कम एकटा बाहर कमा रहल हुअए। जकर नेना सभ गाममे बोर होइत हुअए आ ओतऽ नै रहए चाहैत हुअए, नग्रक आदति लागि गेल होइ आ अप्पन हित उम्हरे देखऽ चाहैत हुअए। मुदा गाममे ओइमे सँ किछु पहुँचि रहल छल कनी-कनी, जे नग्रमे छल- बिजली सेहो, नल सेहो, फ्रिज सेहो, फोन सेहो, टीवी सेहो, अखबार सेहो। मुदा ओ मजा नै छल जे नग्रमे छल। मजा छल तँ ओकरा लेल जकरा लग ट्रैक्टर छल, थ्रेशर छल, पंपिंग सेट छल, बोलेरो आ सफारी छल, जे खेतीक पेटक लेल नै, व्यवसाय लेल कऽ रहल छल, जे एक नै, एक्के संग सभ राजनीतिक पार्टीक हितैशी आ मदति केनहार छल। एहन लोकक कॉलोनी सेहो दोसर छल- नम्हर-चौड़गर प्लाटबला। मुदा अशोक विहार हुनकर कॉलोनी छल जे अध्यापक छल, बाबू छल, दोसर श्रेणीक सरकारी, गैर-सरकारी कर्मचारी छल आ एकरोसँ खास गप ई छलै जे या तँ रिटायर भऽ चुकल छल या निकट भविष्यमे रिटायर होइबला छल। नै तँ अखबारमे कोनो विज्ञापन, नै कोनो चौकपर ऐ लऽ कऽ कोनो होर्डिंग जे ऐ कॉलोनीक प्लाट हुनके बेचल जाएत जे पचास-पचपनक ऊपर हएत आ जल्दिये रिटायर हएत। मुदा जानि ने कोना भेल जे जखन कॉलोनी तैयार भेल तँ भेल जे ई बूढ़क कॉलोनी छी। एहन बूढ़-बूढ़ीक जिनकर बेटा-बेटी अप्पन स्त्री आ नेना सबहक संग परदेसमे नोकरी कऽ रहल अछि-कियो कोलकातामे अछि, तँ कियो दिल्ली, कियो मुंबई तँ कियो बेंगलौर तँ कतेक रास तँ विदेशमे। हुनकर दुख अपरम्पार छल। ओ बेटा-बेटी लेल अप्पन गाम छोड़ि देने छल, अप्पन जन्मभूमिकेँ। ई अपना लेल तँ ठीक, चाहे जना रहि लिअए, मुदा हुनका लेल नै। नहिये बिजली, नहिये पानि, नहिये लिखाइ-पढ़ाइ, नहिये आबै-जाइक सुविधा। घर हुअए तँ एहन ठाम जतऽसँ खेती-बारीपर सेहो नजरि राखल जा सकए आ बेटा-बेटीकेँ सेहो असुविधा नै हुअए। ओ अप्पन ठाम जमीन, संबंध, संगी-साथी, बाग-बगेचा, ड्बरा-पोखरि छोड़ि कऽ जइ संतान लेल आएल, वएह बाहर अछि। एतऽ धरि तँ ठीक छल, मुदा आब हलात ई अछि जे जतऽ सर्विस कऽ रहल अछि, ओ ओइ नग्रमे रमि गेल अछि आ ओतऽसँ घुरि कऽ एतऽ नै आबऽ चाहैत अछि। जौं ओ आबए चाहैत छल तँ हुनकर बच्चा सभ नै आबए चाहैत अछि। लिअ, ई नव आफत। जकरा लेल घर छोड़लौं ओकरे अप्पन अलग घर। ई नव आफत हुनका जिअ नै दऽ रहल अछि, नहिये मरैये दऽ रहल अछि। गामपर दादा-पुरखाक जमीन-जेदाद। बाप-दादाक धरोहर नै देखू तँ कखैन दोसर कब्जा कऽ लेत कहब मुश्किल। पुरखा सभ तँ एक-एक कौड़ी बचा कऽ, पेट काटि कऽ, जोड़ि-जोड़ि कऽ जेना-तेना जमीन बढ़ेने छल। चारि कऽ पाँच केने छल, तीन नै हुअए देलक आ तँए ई हाल अछि। कनीटा इम्हर-उम्हर भेल तँ आड़ि गाएब। महीना-दू महीनामे कमसँ कम एक बेर गामक चक्कर लगाबैत छल। देख लिअ लोक, जे नै अछि। ध्यान राखए। हाल चाल लैत छेम-कुशल-मंगल पुछैत। दुख-सुखमे जाइत, सभसँ बना कऽ राखू। अधिया या बँटाइपर खेती तखने करू। दियाबाती बा घर दुआरक देख-रेख लेल कोनो नौकर-चाकर राखू तखनो। हुनकर बेटाक नेनपन गाममे बीतल छल। नग्रमे पढ़ैत काल सेहो ओ आइत-जाइत रहल छल गाममे। ओ खेती भले नै केले हुअए मुदा हुनका ई पता छल जे हुनकर खेत-पथार कोन छै, धानक, गहूमक, दलिहनक। हुनका थोड़-बहुत जानकारी छल। खेला-धूपी बा कौतुहुलमे बाप-कक्का संग रहि कऽ ओ अगोर केने छल, रोपनी-कटौनी सेहो देखने छल। लोक सेहो जानैत छल जे ई फलानाक बेटा या भातिज अछि। गाम घरसँ माया-मोह लेल एतबे कम नै छल मुदा हुनकर बच्चा। ओ तँ दादा-दादीकेँ छोड़ि कऽ चिन्है ककरा छल? आ दादा-दादीकेँ सेहो चिन्है कतऽ छल। चिंता ओकरा होइ छै जकरासँ मोह होइ छै, प्रेम होइ छै। परिचए आ संबंध नै तकर की चिंता। खेत सेहो ओकरे चिन्हैत अछि जे ओकरा संग जियैत-मरैत अछि। ओ खेतकेँ की चिन्हत, खेते हुनका चिन्हएसँ मना कऽ दैत अछि। ई सभटा गप बेटा सबहक नजरिमे बूढ़क भाँसब छल। अहाँ माटिमे पैदा भेलौं आ एक दिन ओइ माटिमे मिलि जाएब। कहियो ओइसँ छूटैक बा ऊपर उठैक बा आगू बढ़ैक गप अहाँक दिमागमे नै आएल, किएकि ओइमे गोबर नै माटि छल। की कऽ लेलौं खेती कऽ कए अहाँ। कोन युद्ध जीत लेलौं। खाद महग, बीज महग, नहरमे पानि नै, मौसमक भरोस नै, बड़द नै रहल, भाड़ापर ट्रैक्टर समएपर भेटए नै। हरवाह आ मजूर रहल नै। ककर भरोसे खेती करू आ खेती सेहो तखन करू जखन हाथमे बाहरसँ चारि पइसा आबए। की फाएदा एहन खेतीसँ। असल चीज पइसा अछि। जौँ हाथमे पइसा हुअए तँ ओ सभटा जिन्स बिना किछु केने बजारमे भेट जाइत अछि, जकरा लेल अहाँ राति-दिन खून-पसीना एक करैत छी। बिना किछु केले, बिना किछु करेले। सभटा गप आ सभटा झगड़ा बेटासँ चलि रहल छल, गामकेँ लऽ कऽ। मुदा आब नव आफत। अशोक विहारक मकानक की हएत। ओ जतऽ अछि, ओतऽसँ आबऽ नै चाहैत अछि। अछि तँ ई जे हुनकासँ गाम तँ छूटिये रहल अछि, अशोक विहार सेहो ने छूटि जाए। 2 अशोक विहारक लेन नंबर ४ क डी.१ मे अमेरिकासँ आएल सोनल सक्सेना रघुवंशी, तीन बरख बाद। हुनकर डैडी आएल छल सोनलकेँ सैंट्रोसँ पहुँचाबै आ विश्वविद्यालय ज्वाइन कराबै लेल। एतबे टा नै, हफ्ता भरि रहि कऽ सभ चीज ठीक-ठाक केलक, ओकरा सजेलक-धजेलक, भोर-साँझ बेटीकेँ चाह पिएलक, ओकर दिनचर्या निर्धारित केलक आ विदा होइसँ पहिने ओकरा सलाह देलक। संजूक मम्मी-पापाकेँ बजा लिअ, ओ काज आएत। घर सेहो देखत आ अहाँकेँ मदति सेहो करत। यएह बाजल छल संजय सेहो अमेरिकासँ विदा करैत काल। -हम दुनू भाँय बाहरे छी, मम्मी-पापा गाममे असगरे अछि। ऐ उमेरमे हुनका सहाराक जरूरत अछि, हुनका संगे राखब। ई पहिलुक राति छल जखन ओ घरमे असगरे छल। देर राति धरि घर आ अप्पन बेडरूममे संगीत सुनैत रहल। एक कैसेटक बाद दोसर कैसेट। शास्त्रीयसँ मोन भरितिऐ तँ अर्धशास्त्रीय, ओइसँ मोन भरितिऐ तँ फिल्मी गाना। पढ़ैत रहितिऐ, सुनैत रहतिऐ। बत्ती मिझा कऽ सुतबाक आदति छलै। बेडरूमकेँ छोड़ि कऽ आन कोठलीक बत्ती बरैत छोड़ि देलक आ पटा गेल। सुन-सन्नाटाक सेहो आवाज होइत अछि आ से नीक कम, भयौन बेसी होइत अछि। एतबे टा नै। ई आवाज सुनाइये टा नै, लखाह सेहो दऽ रहल छल। हुनकर घरक आगू पार्क छल- बड़ पैघ। पूरा मोहल्ला या कहियौ कॉलोनीक। जखनसँ आएल छल, तखनेसँ भोर-साँझ देखि रहल छल। ओ तीन बरखसँ एहन दुनियामे रहि कऽ आएल छल जतऽ अन्हार नै होइ छल। जतऽ बूढ़ नै रहै छल। जतऽ सभटा चीज दौड़ैत-भागैत उछलैत-कूदैत नजरि आबैत छल। जइमे पानि छलै, तेजी छलै। जतऽ जवान आ जवानी आ तरह-तरहक रंग छलै। जतऽ कोनो चीज अप्पन ठाम ठाढ़ आ स्थिर नै लखाह दै छल- आ आब ई पार्क आ ई कॉलोनी। बूढ़, अपंग आ विकलांग ई विहार। फरवरीक ऐ मासमे खिड़की आ दरवाजापर थाप दैत बसंती हवा आ पार्कमे घिसियाइत, उड़ैत सूखल, झड़ल मृत सन पातक चरमर शब्द। मानि लियौ ककरो घरमे कोनो चोर पैसि जाए। ककरो की, हमरे घरमे चोर पैसि आबए आ सेहो असगरे। बिना कोनो संगीक, औजारक, डाकू पैसि आबए बिना राइफल-बंदूकक असगरे। राति-बिराति तँ छोड़ू, बीच दुपहरियामे। कोनो बलात्कारी पैसि आबए दिनेमे आ हमरा उठा कऽ चलि जाए पार्कमे, आ हम चिकड़ी जे बचाउ-बचाउ तँ के सुनत (बेसी बूढ़ या तँ बहीर अछि या ऊँच सुनैत अछि)। के दौड़त (बेसी बूढ़ ठेहुन या जोड़क दर्दसँ परेशान अछि)। के देखत (बेसी बूढ़ तँ मोतियाबंदक आपरेशन करा कऽ आँखिपर हरियर पट्टी बान्हले छल), ई सभ नै कऽ सकए तँ ठाढ़ भऽ कऽ चिकरए तँ सही (बेसी कऽ डाँड़ झुकल अछि आ मुँहमे दाँत नै, ओ घिघिआ तँ सकैत अछि, मुदा चिकड़ि नै सकैत अछि)। ऐ सोचसँ सोनलक भोँआ ठाढ़ भऽ गेलै। ओ कोनो अनजान डरसँ सिहरि उठल। फेर एकाएक ध्यान गेलै कुक्कुर दिस। कुक्कुर बड़ रास छल कॉलोनीमे- सभ सड़कपर, सभ गेटक बाहर बैसल या घुमैत लखाह दैत छल मुदा एतऽ एक्के टा ‘मुदा’ छल। एत्ते दिनसँ ओ ककरो भूकैत नै सुनले छल। ओकरे मकान डी-१ क गेटपर एकटा भूरा बैसल रहैत छल मुदा जखन जाउ, कत्तौसँ जाउ- गेटसँ चुपचाप हटि जाइ छल आ दोसर ठाम कनी हटि कऽ बैसि जाइ छल। कॉलोनीक बशिंदाक अलाबे किराएदार सेहो अछि- सभ घरमे। नीचाँ मालिक, ऊपर किराएदार। किछुमे देसी, किछुमे विदेशी- ओइमे बेसी जापानी, कोरियाई बा थाई। विद्यार्थी बा टूरिस्ट अप्पन काजसँ काज राखैत छल। ओकर अलाबे ओ कर्मचारी अछि जकर कोनो समए बदली भऽ सकैत अछि। यानी ओ जिनकर दिमागमे मकान कब्जा करबाक गप नै आबए। एहन लोकक मोहल्ला, लोकसँ की लेब-देब, हुनका सभकेँ अपनेसँ फुर्सत नै छनि। एहन तरहक जे ओकरे घर की, कॉलोनीक कोनो घर- एतए धरि जे कॉलोनीक कॉलोनी दिनमे लूटि कऽ लऽ जाए, रोकै-टोकैबला कियो नै भेटत। सोचैत-सोचैत लागल जे ई खाली एकटा सोच नै अछि- एकटा हॉरर फिल्म अछि, जे ओकर आँखि देखि रहल अछि। ओ पार्कमे फाटैत, चिर्री-चोथ होइत जा रहल साड़ी-ब्लाउजमे इम्हर-उम्हर भागि रहल रहए- जोरसँ गरजि रहल रहए, मुदा कियो अप्पन घरसँ निकलिये नै रहल अछि। ककरो सुनाइ नै दऽ रहल अछि तँ निकलत कतऽसँ। उठि कऽ झटकि कऽ ओ बत्ती जरेलक आ फिल्म खत्म। साँसमे साँस एलै। कैसेट लगेलक। दुर्भाग्यसँ कैसेट तेहेन निकललै जकरा ओ नै सुनऽ चाहैत छल, नै सुनने रहऽ चाहैत छल- वक्त ने किया, क्या हँसी सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम। ई कैसेट सोनलकेँ समीर देने छल- तीन बरख पहिने, बियाहक रिसेप्शनक दिन। तखैन ओकरा नै तँ एकरा देखैक खगता भेलै आ नहिये सुनैक। ओकरा सदिखन अपना लग राखलक मुदा कहियो नै सुनलक। आइ ई सुनैत ओकरा लागि रहल छलै जे कत्ते बदलि गेल ओइ गीतक अर्थ आइ। ओ संजयक कोनो चर्चा नै केलक अप्पन डैडीसँ, जानि-बूझि कऽ। ओ हृदएक मरीज अछि, हुनका ठेस लागितिऐ। जौँ विश्वविद्यालयक सर्विस नै भेटल हेतिऐ आ ओ अमेरिकामे रहि गेल हेतिऐ तँ की हेतिऐ। गलती कतऽ भेल आ ककरासँ भेल- ओ बुझि नै सकल। आरती गुर्जर ओकर लैंडलार्डक बेटी। ओइ कॉल सेंटरमे काज करैत छल जइमे संजय करैत छल। संग आएब-जाएब ओकरे कारसँ होइ छलै। दिन-रातिक संग। आश्चर्य ई छल जे आरतीक माए-बाप हुनका एक-दोसराक करीब आबैत देखि रहल छल, तकर बादो चुपचाप छल। आश्चर्य ई छल जे ओकर सभक आँखिक आगू ओ हँसी करैत छल- निर्लज्जताक सीमा धरि आ टोकलापर हँसऽ लागैत छल। आ एकरोसँ पैघ आश्चर्य ई छल जे आरतीक पति जखन कहियो न्यूयार्कसँ आबै छल तँ ओ अप्पन पतिसँ ओकर ब्वायफ्रेंडकेँ लऽ कऽ गप करैत छल आ ओकरा डिनरपर लऽ जाइ छल। जाए तँ संगमे ओ सेहो, मुदा ओकरा सदिखन लागैत छलै जे नै जइतिऐ तँ बेसी नीक रहतिऐ। ओ एकटा एहन समाजमे आबि गेल छल जइमे डॉलरकेँ छोड़ि कऽ कोनो आन चीज जना प्रेमक लेल ईर्ष्या करब पछुएबाक निशानी छल। ओ जखन संजयसँ ओकर किरदानीक शिकाइत करै छल, ओ तमसा जाइ छल। -अहाँ देश आ कालक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैलऽ सीखू, चलैलऽ सीखू। नै चलि सकी तँ चुपचाप बैसल रहू बा घुरि जाउ। -घुरब तँ असगरे किए? अहाँकेँ संग लऽ कऽ। -हम तँ डिअर परदेसकेँ अप्पन देस बनाबैक सोचि रहल छी। मुस्कुराइत ओ आँखि मारि कऽ बाजल- अहाँ किए नै खोजि लै छी एकटा ब्वायफ्रेंड। -नीक लागैत अहाँकेँ? ओ सीधा संजयक आँखिमे देखलक। -नीक, की कहै छी। निश्चित भऽ जाएब सर्वदा लेल। हा, हा, हा। सोनल संजयक आँखिमे गौरसँ देखलक। ओ आँखि छल या दिल। ई गप ओ जबानसँ बाजल छल या दिलसँ। ओ कत्तौ सच्चेमे सोनलसँ मुक्ति तँ नै चाहैत छल। ओ देखि रहल छल जे अमेरिका एलाक बाद हुनकामे तेजीसँ अन्तर आएल छल। एक-दू बरखक भीतर। ई ओकर तेसर नौकरी छल। ओ एकटा शुरू करैत अछि, दोसराक खोजमे लागि जाइत अछि। पहिनेसँ नीक, पाइकेँ लऽ कऽ। हुनकामे इन्तजारी नामक चीज नै अछि। ओ जल्दीसँ जल्दी ऊँचसँ ऊँच स्थान छुअ‍ चाहैत छल। जहिना एकटा ऊँच स्थानपर पहुँचै छल, कनी दिनमे से नीचाँ लागऽ लागै छल। एकरा ओ महत्वाकांक्षा कहै छल। जँ ई महत्वाकांक्षा अछि तँ फेर लालच की अछि। लालच। आरती गुर्जरक संग संजयक दोस्तीक पाछाँ खाली आरती गुर्जर अछि बा ओकर एन.आर.आइ. माए-बाप, जकर गुजराती हस्तशिल्पक चमकैत व्यवसाय अछि। जकर ओ एकमात्र संतान अछि। आरतीसँ संजयक सम्बन्ध ओकरा बुधिसँ बाहर छल। एतऽ रहि कऽ सोनल सेहो कमा सकैत छल। कोना विश्वविद्यालयमे, कॉलेजमे, लाइब्रेरीमे, कत्तौ सेहो। कंप्यूटरमे सेहो नीक गति छल। मुदा संजय जखैन सोचलक, अपना लऽ कऽ सोचलक। सोनलकेँ लऽ कऽ सोचैक फुरसति नै छलै। ओ सोनलकेँ हाउस वाइफसँ बेसी हइले नै देलक आ ओ सेहो बनारसक इंतजारीमे आइ-काल्हि-परसू करैत रहि गेल। सोनलक आँखि भरि गेलै। ओइ काल ओ निर्णय लेलक जे ओ आब एतऽ नै रूकत। ओ बहन्ना ताकि रहल छल जे राँचीसँ पापाक ई-मेल आएल जे तुरंत आबि जाउ। १५ केँ अहाँक इंटरव्यू अछि। ओकर खुशीक सीमा नै रहलै। ई ओकर आत्माक पुकार छल जे विश्वविद्यालय धरि पहुंचल छल। आइ भोरक प्रकाशमे खिड़कीसँ फेर गरजि रहल छल सोनलक आत्मा। -संजयकेँ नै, समीरकेँ सुनू आ चलि आउ। 3 बेसी नै, हफ्ता-दस दिन लगलै सोनलकेँ ऐ घरक एकांत आ सुन-सन्नाटक हिसाबसँ अपनाकेँ उतारऽ मे। आ जखन उतरि गेल तखन मजा आबऽ लगलै। अप्पन ‘असगरे’ केँ इंज्वाय करऽ लागल। ओ डेढ़-दू बिसवाक रियासतक रानी छल- मालकिन। जखन चाहे सुतु, जखन चाहे उठू, जतऽ चाहे बैसू, जना चाहे ओहिना घरमे रहू। ब्रा बा गंजीमे, लुंगीमे, गाउनमे। नंगटे नहाबी, कूदी-फांगी। नै कियो देखैबला नै कियो सुनएबला। जखन चाही, जेहन चाही खेनाइ रान्ही। नै रान्ही, उपास करी, ओकर मोन। जौं संगमे ई सासु-ससुर हुअए तँ ई करू, ऊ करू, एना करू, ओना नै करू। दुनिया भरिक झमेला, टोका-टाकी। टेपरेकॉर्डर छै, टी.वी. छै, कंप्यूटर छै, मोबाइल छै, फोन छै जइसँ अपनाकेँ व्यस्त रखबाक चाही। एकर अलाबे किताब छै, क्लासक तैयारी छै, कार छै। बेसी नै, साँझकेँ फ्रेश भेलाक बाद आध घंटाक ड्राइवपर बहरा जाउ आ घुरि कऽ बीअरक एकटा पैग आ सिगरेट (ई कैलिफोर्नियाक आदति छल जकरा देर-सबेर छोड़ैये पड़तै, ऐ सड़ल-गलल नग्रमे से ओ जानैत छल)। -मुदा समीर कतऽ अछि। ओ पापाकेँ फोन केलक। कोनो खास गप लेल नै, बस ओहिने। जखन ओ रिसर्च कऽ रहल छल इतिहासमे, तखने समीरसँ परिचए भेल छलै। एकटा तेज आकर्षक युवक छल। नीक खाइत-पिबैत घरक। ओकरासँ दू बरख सीनियर आ राजनीतिमे पी.एच.डी.। नौकरी भेटि रहल छल मुदा ओ अप्पन हितकेँ नै देखि कऽ किसान-मजदूरक हितकेँ देखलक। ओकरामे देश आ दुनिया आ समाजक सभटा मुद्दापर नम्हर बहस करबाक आ विश्लेषण करबाक दक्षता छलै। ओकरा राजनीतिक ऐक्टिविस्ट हएब पसीन छल। ओइ समएमे बिहारमे एहन कतेक ग्रुप छल आ ओ ओइमे सँ एकटा ग्रुपसँ जुड़ि गेल आ सक्रिय भऽ गेल। ओ हफ्तामे एक बेर पटना आबैत छल आ पूरा दिन सोनल संग बिताबै छल। ओकर सपना छल जे बियाह करब आ अप्पन जीवन किसानक खुशहालीक लेल समर्पित कऽ देब संगे-संग। सोनल जखन डैडीकेँ बतौलक तँ ओ बुझाबैत बाजल जे ई आतुर दिमागक सोच अछि। कनियाँक कमाइ आ नोकरिहाराक चंदापर क्रांति करऽबला एहन युवकक कमी नै अछि बिहारमे। ओ जल्दीसँ जलखै आ चाह-पानिक लेल दोसराकेँ ताकैत सड़कपर लखाह पड़ैत रहैत अछि। एहन सनकीमे नै आबू। आ हुनके समझेला-बुझेलापर ओ संजयसँ बियाह तँ कऽ लेलक मुदा समीरकेँ हृदएसँ नै निकालि सकल। एतऽ धरि जे अमेरिकामे जखन संजय ओकरासँ ब्वायफ्रेंडक गप केलक तँ ओ डरि गेल जे कत्तौ ओकरा समीरक दोस्तीक खबरि तँ नै अछि। हुनका समीरक बड़ सोच लागल छन्हि, ओकरा एतऽ एलाक बादसँ। ओ भोर कऽ छतपर टहलि रहल छल जे डी-४ क आगू सड़कपर पुलिस वैन लखाह देलकै। ओकर नजरि जाइसँ पहिनेसँ ठाढ़ छलै ओ वैन। किछु लोक छल जे भीतर-बाहर आबि जा रहल छल। लेनक एकटा कोनपर ओकर डी-१ आ दोसर कोनपर डी-४। ओकर दुइये मकानक बाद। बरतन माँजै आ झाडू पोछा करैबाली दाइ ओइ कॉलोनीक छल। जहिना ओ आएल, ओ पुछलक। दाइ गीता जे किछु बतौलक से भयौन छल। ई ओइ कॉलोनीक तेसर घटना छल। ऐ बरखक तेसर। डी-४ राय साहबक बंगला छल। राय साहब बागवानीक खूब शौकीन। हुनकर लॉनमे मखमल सन घास छल, जेना हरियर रंगक गद्दा। ओइमे जुत्ता-चप्पल पहीर कऽ ने ओ अपने जाइ छल, नहिये दोसराकेँ जाए दै छल। घासक गद्दाक चारू दिस फूल आ रंग-बिरंगक पातबला गमला छल। ओ दिन भरि कैंची संग लॉनमे नजरि आबैत छल- काटैत-छाँटैत। हरियर रंगक पाछाँ एहन बताह जे बंगलापर सेहो हरके डिस्टेंपर। एतऽ हरियरी हुनकर झुर्रीबला मुँहपर रहै छलै सदिखन। एक दिन एकटा फोन एलै राय साहेबक नामे। -एत्ते जल्दी की अछि मकान बेचबाक। कनी रुकि जैतिऐ। राय साहेब हेलो, हेलो करैत रहि गेल, मुदा फोन कटि गेल छलै। ओइ दिन हुनका आश्चर्य भेलै, हँसी सेहो एलै। फेर सभ तेसर-चारिम दिन रोज या तँ कोनो ने कोन फोन आबै छलै या कियो ने कियो मकानकेँ लऽ कऽ जानकारी करैक लेल आबै छलै। फोन करऽबला की अछि, कतऽसँ कऽ रहल अछि, मकान बिकेबाक गप के बतौलक, राय साहेबकेँ किछु पता नै चलि सकलै। आबऽबला केँ ओ बिगड़ि कऽ भगा दै छला, फाटकक भीतर पैसऽ लेल नै दै छला। ओ कहैत-कहैत थाकि गेला जे ई खबर गलत अछि, हुनका बेचबाक नै अछि। तकर बादो ई खेरहा खतम नै भेल। ओ परेशान भऽ गेल। लागैत रहए जे ओ पागल भऽ जाएत। ओ सुतै लेल छटपटा कऽ रहि जाइ छल आ नीन नै आबैत छलै। दोस्त मित्रक सलाहपर ओ पुलिसकेँ रिपोर्ट केलक जे हुनका लग केहन-केहन फोन आबैत अछि, केहन-केहन लफंगा आबैत अछि, आ केहन-केहन गप करैत अछि। चारिम दिन जे लोक मकानकेँ लऽ कऽ पुछैले एलै, तकर गपसँ राय साहेबकेँ लागि गेलै जे पुलिस रिपोर्टक जानकारी हुनका अछि मुदा एकर नहिये डर छै, नहिये आदंक। जइ मानसिक तनाव आ बेचैनीसँ ओ जीबि रहल छल, ओइसँ हुनका ओइ दिन मुक्ति भेटल जइ दिन एकाएक हुनकर नेनाक मित्र राजराम पांडे उर्फ भुटले गुरु आएल। भुटले गुरु आब तँ नगरक प्रसिद्ध रईस छल मुदा छल हुनकर पड़ोसी गामक। हाईस्कूल धरि हुनकर संग गाममे पढ़ि चुकल छल। कतेक मोहल्लामे कतेक रास मकान छलै। ओ इम्हरसँ जा रहल छल तँ हुनका राय साहेब मोन पड़ल आ पुछैत-पाछैत डी-४ मे चलि आएल। -भजार। बड़ नीक घर अछि सुरेश। ओ गेटमे पैसैत बाजल। राय साहब बड़ उत्साहसँ हुनका घर देखेलक। ओ पहिल बेर आएल छल। ओ घर-आंगनक प्रशंसा करैत बतेलक जे ओइ समएमे भले ने भेंट भेल हुअए, दुनू बेटीक बियाह आ भाभीक स्वर्गवासक खबरि हुनका भेटल छल। ड्राइंग रूममे पैसैत हुनका पुछलक। -सुरेश। अहाँक बेटा कतऽ अछि आइ-काल्हि जकर इलाज करा रहल छलौं। भुटले गुरु सोफापर बैसल, राय साहेब हुनका आगू बैसि कऽ कूही भऽ कानऽ लागल। भुटले गुरु सेहो सोफासँ नीचाँ आबि गेल आ सुरेश रायकेँ बाँहिमे भरि आगू दीवान दिस ताकैत रहल। दीवानपर मोटरी जकाँ एकटा छौड़ा पटायल छल। ओ टुकुर-टुकुर उत्सुक भऽ हुनका ताकि रहल छल। दाढ़ी-मोंछ बेहिसाब बढ़ल छलै। खाली मुँह खुजल छलै। देह झाँपल छलै। एकटा सुखाएल लकड़ी सन बिछौनपर पड़ल छल। लागै नै छलै जे डाँड़क नीचाँ किछु छै। ई बाजैत तँ तहियो नै छल। मुदा ई ख्याल नै जे किछु बुझैत अछि बा नै। भुटले गुरु पुछलक। राय साहेब बिना किछु बाजले हिचकी लिअए लागल। भुटले गुरु सांत्वना दैत हुनका उठैलक आ सोफापर अप्पन बगलमे बैसेलक। कनी काल बाद राय साहेब आएल आ अंदर चलि गेल। जखन ओ चाहक संग घुरल तँ सामान्य छल। चाह पीयैत ओ बतौलखिन जे कोना पेट काटि कऽ, गामक जमीन बेचि कऽ, बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ कोन तरहेँ ई घर ठाढ़ केलक, दू बरख पहिने रिटायर भेलाक बाद ओइमे आएल। हम कहियो नै सोचलौं जे केकरा लेल घर। बस ई छल जे अपना लेल एकटा घर हुअए। एकरा ठाढ़ हेते-हेते स्त्री सेहो चलि गेल। मुदा लागल रहलौं बिना सोचले-बुझले जे घर हुअए तँ केकरा लेल। देखि रहल छी ऐ बेटाकेँ। नै चलि सकैत अछि, नहिये सुनि सकैत अछि, नहिये बाजि सकैत अछि। की हएत एकर जखन हम नै रहब। नै जानि कोन जन्मक पापक सजा दऽ रहल अछि भगवान। -हम छी ने, चिंता किए करै छी? -भुटले गुरु हुनकर कान्हपर हाथ राखलक। -चिंता तँ ई अछि भुटले गुरु जे छऽ-सात माससँ सुतल नै छी। नै जानि कतऽसँ केहन-केहन लोकक राति-बिराति फोन आबैत रहैत अछि, धमकी दैत। पता नै के उड़ा देलक जे सुरेश राय अप्पन घर बेचि रहल अछि। परिणाम र्ई अछि जे गुंडा-बदमाश धरि घरक भीतर घुसल चलि आबैत अछि आ सलाह दऽ रहल अछि, जे जतेकमे बेचब ओतबेमे दू टा कमराक फ्लैट आबि सकैत अछि आ बाकी सूदसँ बीस-पच्चीस बरख निश्चिन्तीसँ काटि लेब। पुछलौं जे अहाँ के? तँ बाजैत अछि- प्रापर्टी डीलर, प्रापर्टी डील अहाँ कऽ रहल छी, बिना पुछले जे अहाँ बेच रहल छी आकि नै? दलाल साढ़। हिम्मत तँ देखू ओकर। जौँ आइ नरेश नीक रहितिऐ तँ ई नौबति नै ऐतिऐ। भुटले गुरु गंभीरतासँ ई सभ किछु सुनैत रहल आ सोचै-विचारैक बाद बाजल। -एना अछि सुरेश। हम दू-तीन दिनमे एकटा दरबान बा लोककेँ भेज देब। बड़ भरोसक लोक। ओ अहाँक सभटा समस्या दूर कऽ देत। ठीक। तेसर दिन सत्तेमे एक लोक आएल आ राय साहेबक फिकिर खतम भऽ गेल। नहिये कहियो फोन आएल, नहिये गुंडा-बदमाश सभकेँ साहस भेलै जे लगमे कत्तौ लखाह दैतिऐ। मुदा जे हेबाक छल, भऽ कऽ रहल। तीन मास बाद। राति दिन पूरा घरक देखभाल करैबला दरबान राति भरक छुट्टी लऽ कऽ भतीजीक बियाहमे अप्पन गाम गेल छल आ इम्हर ओइ राति ई दुर्घटना भऽ गेल। ओइ पलंगपर पटायल राय साहेबक बेटा टुकुर-टुकुर ताकैत रहल आ ओकर हत्या भऽ गेलै। भुटले गुरु ऐ दुर्घटनाक दू दिन पहिनेसँ अस्पतालमे छल। रूटीन चेकअप लेल। दरबान हुनका ई खबरि देलक। ओ अस्पतालसँ सोझे अप्पन गाड़ीमे आएल। दरबज्जापर ठाढ़ भीड़केँ ओतऽसँ हटैलक, बढ़ैलक, डाँटलक, डपटलक आ भीतर जा कऽ पुलिससँ जनतब लेलक। फेर ओइ कमरामे गेल जतऽ बिछौनपर राय साहेब पटायल छल। ओतऽ बगलमे एकटा तख्तापर हुनकर बेटा सेहो छल, जे निश्चल पड़ल छल। मूकदर्शक। दुर्घटनाकेँ आँखिसँ देखैबला गवाह। ओ पुलिसक संग भीतर गेल, ओकरे संग घुरि आएल। बाहर अंदाजी गप आ कनफुसकी चलि रहल छल- या तँ मुँह या नाकपर गेरुआ दबा कऽ मारल गेल या गला दबा कऽ। देहपर कत्तौ चोटक चिन्हासी नै छल। हाथ उठेबाक कोनो चिन्हासी नै। बिछौन मोचड़ाएल नै। गेरुआपर शोनितक छोट-मोट चिन्हासी छल जेना ओ मुँहसँ निकलल हुअए। लहाश जखन पोस्टमार्टम लेल आनल जा रहल छल, सोनल अप्पन गेटपर ठाढ छल। सोनल अप्पन गेठपर ठाढ़ ओकरा जाइत देखि रहल छल। कॉलोनीमे मकान कब्जा करैक तेसर घटना छल। घरमे ओ सेहो असगरे छल। विश्वविद्यालय आबै-जाइक समए अनिश्चित। कोनो दिन दुपहरियासँ पहिने क्लास, कोनो दिन दुपहरियाक बाद। घरमे कियो नै। दिनमे तँ चोरी भऽ सकैत अछि मुदा रातिमे तँ हत्या धरि संभव अछि। ऐ कल्पनासँ ओकरा थरथरी छूटि गेलै। आँखिमे उतरैबला सिहरी सगरे देहमे पसरि गेलै। ओ ऐ गुनधुनीमे पूरा दिन पड़ल रहल। नोकर नै भेटि रहल छलै, नहिये नोकर राखब मुनासिब छल। नोकरनी झाड़ू-पोछासँ आगू लेल तैयार नै छल। बेर-बेर ओकर ध्यान जा रहल छल सासुरपर। रातिमे ओ पहाड़पुरक कोड खोजलक आ फोन केलक- पापा, हम सोनल। आबि रहल छी काल्हि, अहाँ दुनूकेँ लैक लेल। तैयार रहऽ। नै, किछु नै सुनब। मम्मीकेँ फोन दियौ..। 4 शीलाकेँ सोनल ओ मान-सम्मान देलक जे कोनो पुतोहु की देत अप्पन सासुकेँ। भोर-साँझ मम्मी, बीच राति मम्मी, घरमे मम्मी, बाहर मम्मी- बस सभ दिस मम्मीये मम्मी। जखन कि शीला सोनलक संग आएल लोक लाजक कारण, तइसँ जे नै जाएब तँ बेटा की सोचत हुनका लऽ कऽ। की जे बेटाक सहारा बुढ़ापा काटै लेल अछि तँ ओकर स्त्रीक कोना नै सुनी? ओ नै सुनत तँ ओ हुनकर किए सुनत? लोक अप्पन बच्चाक भविष्य किए सिटैत अछि। तइसँ किएकि हुनकर भविष्यमे हुनका अप्पन भविष्य लखाह दैत अछि। काएदासँ देखल जाए तँ ओ हुनकर नै, अप्पन भविष्य सिटैत अछि। ऐ सीटल भविष्यमे डेग राखने छल शीला आ प्रसन्न छल। जइ लड़कीसँ कोनो पूर्व परिचय नै, कोनो सम्बन्ध नै, एतऽ धरि जे नहिये अप्पन जातिक, नहिये अप्पन कुलक। नहिये संस्कार। ओ शीलाक पाछाँ मरल जा रहल छल- मम्मी, चाह पीब। मम्मी जलखै करब, मम्मी नहा लेलखिन। मम्मी खाना खा लेलखिन, मम्मी कोनो जरूरति। एत्ते खयाल तँ हुनकर बेटी सरला सेहो नै राखैत छल। सोनल पहिने हुनका घर देखैलक- ड्राइंग रूम, ओइसँ सटल कोठली, आंगन, फेर ओ कोठली जइमे मम्मी-पापा रहत, फेर किचेन आ स्टोर, फेर पछुआरक हीस जइमे नोकर-चाकर लेल टीनक खुजल शेडबला कोठली। फेर ओ ऊपर लऽ गेल, छतपर आ देर धरि मम्मीकेँ टहलाबैत रहल जे लोक देखए आ जानए जे ओ घरमे असगरे नै रहैत अछि। ऐ घरमे ओ सभ किछु छल जकरा लऽ कऽ शीला सोचलो नै छल। हुनका राति भरि नीन नै आएल- कारण जे हुअए। कारण नव ठाम सेहो भऽ सकैत अछि, चौड़गर डबल बेड सेहो, गदगर बिछौन सेहो। आ सुख छल जे अनचोक्के हुनकर जीवनमे आबि गेल छल। ओ घरमे आएल नै छल, गृह प्रवेश केने छल। यएह कहने छल सोनल आ नीकसँ नीक डिश बना कऽ खुएले छल। शीलाक खुशी बेर-बेर ओकर आँखिमे नोरा रहल छल। आ ई नोर आर किछु नै, पहाड़पुरक खपरैलबला घर छल, हुनकर बेटा-बेटी छल आ दुख छल जे ओ अप्पन जीवनक भरि सहल छल। एकाएक हुनका मोन पड़ल संजयकेँ लऽ कऽ, नहिये ओ किछु पुछलक, नहिये सोनल अपनासँ किछु बतौलक। दोसर-दोसर गप होइत रहल आइ धरि। अगला दू-तीन दिनसँ शीला अप्पन दिनचर्या निश्चित कऽ देने छल। खाना बनाबैवाली महाराजिन आइ धरि नै भेटल छल आ ओ बैसल-बैसल की करितिऐ दिन भरि। भोर कऽ चाह, आ बीच रातिक खेनाइ ओ अप्पन जिम्मा लऽ लेलक। कष्ट मात्र एतबे छलै जे गप करैबला अखन धरि कियो नै भेटल छलै। डी-पॉकेटक घटनासँ सभ कॉलोनीबला अपनाकेँ घरमे रोकि राखने छल। ओ सभ डरल छल जे कत्तौ एहन नै हुअए जे ओ मकान छोड़ए आ घरमे घुसब मुश्किल भऽ जाए। ऐसँ पार्क सेहो खाली पड़ल छल- नहिये कोनो औरत, नहिये कोनो मर्द। तीन-चारि दिन धरि कियो अप्पन घरसँ बाहर नै निकलल- सर्विस करैबलाकेँ छोड़ि कऽ। शीला झाड़ू-पोछा करैवालीक पाछाँ-पाछाँ घुमैत रहैत छल आ गप करैत रहैत छल जे कएटा छौड़ा छै, कएटा छौड़ी छै। कतऽ बियाह भेलै। जमाए की करैत अछि। कएटा पुतोहु अछि। ककरा संग रहै छी। स्वभाव केहन अछि। सेवा करैत अछि आकि नै। बेटा ध्यान दैत अछि कि नै। अखन कोनो पोता-पोती अछि कि नै। किछु सुनैत, किछु अप्पन सुनाबैत छलि। ओइ काल सोनल अप्पन काज करितिऐ, पढ़ितिऐ, लिखितिऐ आ नै तँ कंप्यूटर माउससँ खेलैतिऐ या टाइप करितिऐ। ऐ बीच शीला दू बेर पुतोहुसँ दुखी भेल छल। ओ भोरमे चारि बजे जागि जाइ छल आ सोनल सुतल रहै छल आठ बजे भोर धरि। ओ ओकरा जगबैक एकटा तरीका निकालक। ओ भोर चारि बजे चाह तैयार करलक आ हुनका जगेलक। सोनल सुतल रहल आ उठलापर चाह सिंकमे फेंक देलक। फेर अप्पन अलगसँ नेबोक चाह बनेलक। शीला देखैत रहल। दोसर दिन ओ नेबोक चाह बनेलक कनी देरीसँ। माने सात बजे। ओइ दिन सेहो यएह भेल। सोनल बाजल- मम्मी, हमर चाह रहऽ देल करथिन अहाँ। जखन उठब, तखन बना लेब। हुनका नीक नै लागल। अप्पन आदतिक अलग ओ कोनो तरहे चुप रहि गेल। एतऽ धरि तँ चलि जैतिऐ मुदा एक दोसर प्रसंगमे तँ जेना हुनकर मन उचटि गेल। होइत ई छल जे शीला भोरमे रातिक बचल रोटी बा परोठा आ सब्जी जलखै कऽ लैत रहथिन। सोनल देखलक तँ बिगड़ल- नै मम्मी, ई नै चलत। अहाँ ऊ खायब जे हम खाएब। टोस्ट बटर, दलिया, दूध, फल। ऊ सभ नै। ठीक। शीलाक दिमागमे सवाल उठल जे रोज-रोज जे बैसका रोटी या परोठा बचि जाइत अछि, ओकर की हएत। ओकरा दाइ गीताक ख्याल आएल। ओ सेहो आबैत शीलाकेँ माताजी-माताजी कहैत छलि। काज-धंधा खतम कऽ जखन गीता जाइ छल तँ ओकरा रोकि कऽ खुआ दैत छल। तरकारी नै रहलै मुदा नै रहलापर कखनो चाह दैत छल, कखनो अचार। सोनलकेँ पता चलल। पता की चलल ओ गीताकेँ एक कोनमे बैसल खाइत देखि लेलक। -मम्मी। -गीताकेँ जाइक बाद सोनल बाजल। -अहाँ किए ओकर आदति बिगाड़ि रहल छी मम्मी। शीला बुझैक ख्यालसँ पुतोहु दिस ताकलक। -ओकर नोकरीक शर्तमे चाह-नाश्ता नै छल। पाँच सौ महीना आ सालमे दू बेर साड़ी, बस। -मुदा, हम चाह-नाश्ता कतऽ दै छी। जे किछु बचल-खुचल रहै छै, सधा दै छी। -फेकैसँ बा कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआबैसँ नीक अछि जे ककरो स्वार्थ सिद्ध होइ। -यएह तँ। कुक्कुर-बिलाइकेँ भले खुआ देथिन, ओकरा नै देथिन- यएह कहब अछि हमर। -आँए। ई केहन गप कऽ रहल छी अहाँ। फाटल आँखिसँ पुतोहु दिस ताकलक शीला। -नै, खराप नै मानब। एकरा एना बुझथिन। मानि लिअ काल्हि अहाँ कत्तौ चलि जाइ छी बा एतऽ नै रहब। ओ हमरोसँ आशा करत आ हम नै दऽ सकब तँ खराप लागत, ठीकसँ काज नै करत। छै कि नै। -सभ ठीक। मुदा ई गप हमर गरामे नै उतरि रहल अछि जे कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआ देब, मुदा ओकरा नै खुआएब। -मम्मी, ओ अहाँक परजा नै अछि, नोकरनी अछि- प्रोफेशनल। ओकर पेट रोटी-परोठासँ नै, पैसासँ भरत। एतबेटा नै, अहाँ ओकरासँ गप करब आ ओ अहाँक माथ चढ़ि जाएत। -काल्हि जखन कोनो गपपर ओकरा टोकब तँ ओ लड़ऽ लागत। ओकरा अहाँ वएह रहए दियौ जे ओ छी। आबए, अपन काज करए आ बाट नापए। शीला माथ झुका कऽ चुपचाप सुनैत रहल आ ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा हम अन्नक अपमान नै हुअए देब। ओकरा नै खुआएब तँ अपने खाएब। -अहाँ अधला मानि गेलौं। नै बुझलौं हमर गप। -बुझि गेलौं, कोनो अनपढ़ नै छी। हमहूँ बी.ए. छी अप्पन कालक। -ठीक अछि। मुदा हम तँ हिनका बैस कऽ खाए लेल नै देब। काल्हि ई कहथिन जे हमरा बैसा कऽ खुआबए छल। -तँ हमरो सुनि लिअ, हम अन्नकेँ एना फेकै लेल नै देब। ई बहस तखने खतम भऽ सकैत छल जखन ओइ दुनूमे सँ कियो चुप भऽ जाए आ ओतऽ सँ हटि जाए। आखिरीमे सोनल कोनो काजक बहन्ने ओतऽसँ चलि गेल। शीला किछु काल धरि बैसल रहल। ओकरा लागल जे बहू नकचढ़ीये टा नै, मथचढ़ी सेहो अछि। पैदा करितिऐ तखन ने अनाजक मोल पता चलितिऐ। माँ-बापक एकेटा औलादि, जातिक लाला- खेत-पथारसँ मतलब नै, ओकरा की बुझल छै अप्पन फसलक सुख-दुख। ओ घरक पछुआरमे गेल जतऽ रघुनाथ बाहरसँ घुमि कऽ आएल छल आ नहाइ लेल जा रहल छल। ओ जहिना शुरू केलक तहिना रघुनाथ टोकलक- सही बाजलक ओ। पुतोहुकेँ सुनै आ हुनका संग रहैक आदत डालू। -की? अहाँक ई सभ कहब अछि। -नै। हमर ई कहब नै अछि। हमरा ई कहब अछि जे जकर घरमे रहै छी, खाइ छी, पहिरै छी, ओकर गपपर कान-बात दियौ। वएह करू, जे ओ चाहैत अछि। -राशन हम आनलौं, चाह-नाश्ता हम बनबै छी, खाना हम पकाबै छी। जे कियो आबैत अछि, हुनका उठाबैत-बैसाबैत छी- आ हमर कोनो पूछि नै। -अच्छा जाउ अहाँ एतऽसँ। जे करबाक अछि करू। खिसिया कऽ रघुनाथ बाजल आ बाथरूममे चलि गेल। -हम नै रहब एतऽ। हमरा गाम पहुँचा दिअ आ नै पहुँचाएब तँ अपने चलि जाएब। बाथरूमक भीतर रघुनाथ हँसैत बाजल- अरे। पुतोहुसँ तँ पुछि लियौ। अपने सँ नै एलौं अछि अहाँ, वएह आनले अछि। कोना अछि ओ गीत। ओ नल खोलि देलक आ गाएब शुरू केलक- अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं। अभी अभी तो आई हो, बहार बन के छाई हो अभी जरा नहा तो लूँ, अभी जरा ... न... नम... न... नू... साँझक चारि बजेक आसपास सरलाक फोन आएल- बड़ दिन बाद। बड़ दुखी आ शिकाइतक स्वरमे। उठैलक शीला। सोनल कॉलेज गेल छल, घरपर वएह छल। एकरासँ पहिने दू-तीन बेर ओ गामपर फोन केने छल। ओकर खराप भाग्य जे रिसीवर उठैने छल रघुनाथ आ ओकर नाम बिन सुनले, बिन पुछले आ बिन बाजले फोन राखि देने छल। एकर चर्चा सेहो शीलासँ नै केले छल। -माँ आब तँ आबि सकैत छी हमरा कतए। -एना किए बाजि रहल छी सरला। शीला कननमुँह भऽ उठल। -हम बियाह नै केने छी माँ, पापाकेँ कहि देब। चाहे तँ उहो आबि सकैत अछि। -हुनकर हम नै जानैत छी मुदा हम तँ तैयारे छी। जखन कही तखन आबि जाएब। -ठीक अछि, अगला पंद्रह दिनक भीतर कोनो व्यवस्था करैत छी। -मुदा अहाँ बियाह किए नै करलौं। हम तँ मानि लेने छलौं जे भऽ गेल हएत। -माँ, हम सोचि लेने छी। भगवान आ बियाहक बिना जिअल जा सकैत अछि, रहल जा सकैत अछि। कोनो गपक फिकिर नै करब। ठीक। सरला रिसीवर राखि देने छल। शीला जतऽ छल तत्तै ठाढ़ रहल। ओकरा बुझैमे नै एलै जे ई नीक भेल कि अधला। ओ रघुनाथकेँ बतौलक। रघुनाथ मात्र एतबे टा कहलक जे ऐसँ नीक हेतिऐ जे ओ बियाह कऽ लेतिऐ। 5 शीला सोनलक आग्रहपर ताधरि रुकल रहल जाधरि खेनाइ बनाबैवाली दाइक व्यवस्था नै भऽ गेलै। जइ दिन शीला गेल, ओइ दिन सोनल गेट आ घरक चाबीक डुप्लिेकेट बनबैलक आ ओकरा रघुनाथकेँ दऽ देलक। दुपहरियाक एक-डेढ़ घंटा छोड़ि कऽ ओ जखैन चाहे तखन, जतऽ चाहे ओतऽ आ-जा सकैत छल, घूमि सकैत छल, भेँट-घाँट कऽ सकैत छल, कियो पूछै-ताकैबला नै छलै। ओहिनो रघुनाथ घरमे रहैत एक तरहेँ घरक बाहर छल। पछुआरक बाउंडरीवालसँ लागल एक ईंटाक दूटा देवाल छल, जइपर अस्बस्टर पड़ल छल। सोचल गेल छल जे जौँ नोकर-चाकर बा ड्राइवर भेल तँ ओइमे रहत। रघुनाथक व्यवस्था शीलाक संग ओइ कोठलीमे छलै। ऐसँ बेसी ओ अपन कनियाँ संग सुतलो नै छल। आबै कऽ दिनसँ हुनका ई ठाम जँचि गेल छल। ओकर बगलमे नल सेहो छल आ शौचालय सेहो। आर की चाही। नाश्ता-खाना घरमे, बाकी सभ बाहर। शीला संग रघुनाथक संबंध दाम्पत्यक रहलै मुदा प्रेमक नै भऽ सकलै। ईहो कहि सकै छी जे ओ शीला संग सुति जाइ छल  मुदा प्रेम नै करै छल। आ मानै छल जे ऐलेल शीला जिम्मेदार छथि। ओ एहन स्त्री छल जकरा सभ दिन प्रेमक प्रमाण चाही। एतबे टा नै, एक बेर या दू बेर या तीन बेर अहाँ हुनका आश्वस्त कऽ देलौं जे अहूँ ककरो आनसँ नै हुनकेसँ प्रेम करै छी तँ ओ मानि जाएत। फेर ओ अगिला दिन परीक्षा लैले चाहत जे ओ कोनो ओहिना तँ नै छल। एतबे टा नै, ओ अप्पन प्रेमकेँ लऽ कऽ मात्र शिकाइत कऽ सकै छल। एकर अतिरिक्त ओकरा लग कोनो आन भाषा नै छलै। ई सभ स्थिति रघुनाथमे मात्र खिसियैनी टा नै आनलक, ओकरा दिससँ अवहेलना सेहो आनलक। शीला कहियो हुनकर रुचि आ पसीनक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैक प्रयत्न नै केलक। जेना शीला चाहै छलि जे घरमे कोनो गप हुअए जइसँ ओ खुश हुअए, उल्लसित हुअए, ओकरामे उत्साह आ जोश लखाह दिअए, हँसए, गाबए, आर किछु करए। मुदा तैयो हुनकर चेहरापर कोनो तरहक कोमल भाव नै आबै छल। एतऽ धरि जे रघुनाथ जखन खुशीसँ मारे कूद-फान करए आ बेचैन हुअए लागैत छल तखनो ओ हुनकर उपहास करैत निर्विकार ठाढ़ रहैत छलि। खुशी हुनकर चेहरापर अबैत छल तँ जबरदस्तीक दाग सन फेर गाएब भऽ जाइ छल। एकर अलाबे हुनकामे खूबीये खूबी छल। ओ अपन पति आ बेटाक पद आ प्रतिष्ठाकेँ हरदम फराक राखै छलि। दोसरा लग बड़ रास एहन बौस्तु होइ छल जे हुनका लग नै छल मुदा हुनकामे कखनो ईर्ष्या नै होइ छल। समभाव हुनकर स्वभाव छल। ओ तखने विचलित होइ छल जखन ओ कोनो गरीब गुरबाकेँ लल्ल आ विवश देखै छलि। ओ सभ किछु सहि सकैत छलि मुदा ककरो जबर्दस्ती नै। शीलाक गेलाक बाद रघुनाथ निसाँस लेलक। ओ हुनकासँ पुतोहु लऽ कऽ किछु नै बाजै छलि, मुदा एकर बादो ओ तनावमे रहैत छल। ऐ तनावसँ ओ आब मुक्त भऽ गेल छलि। शुरू-शुरूमे रघुनाथकेँ अशोक विहार पसीन नै एलै। ओ ततबे उजाड़ आ उदास इलाका देखने नै छल। देखब तँ दूर, सोचलो नै छल। हुनका कियो बतौने छल जे ई पूरा इलाका कहियो पूरा श्मशान होइ छल। यएह ओजह भऽ सकैए जे हुनका सभ गली आ सभ मकानक सभटा खिड़कीसँ आबैबला हवा मृत्युगंध फेंटल लागै छल। मने इम्हरसँ जाउ या उम्हरसँ जाउ नाक दबा कऽ या फेर ओइपर रुमाल राखि कऽ। आँखि बन्द कऽ देखू तँ पूरा बस्ती ओइ बंदरगाहक सन छल जतऽ सभटा यात्री महाप्रयाण पर निकलै या ओइ पार जाइक तैयारीमे लागल छल। मुदा एक भोर- एहन भोर रोज आबै छल- आ ऐ आँखिसँ रघुनाथ देखै छल। ओइ भोर ध्यान गेलै पार्क दिसनसँ आबैत एकटा बुढ़ दिस- लकवा मारल, मुँह टेढ़, गरदनि झुलैत, वाम हाथ झुलैत, घिसिआइत असक्क पएर, दोसर गलीसँ निकलल एकटा दोसर बूढ जकर एकटा आँखि खुजल छलै आ दोसरपर हरियरका पट्टी छलै, आ तकर पाछाँ एकटा दोसर बूढ़ जकर गरमे कालर माने स्पांडिलाइटिसक पट्टा छलै। तेसर गलीसँ सेहो एकटा बूढ़ आबि रहल छल, पार्कक गेटक दिस आस्ते-आस्ते। हुनकर एकटा हाथमे बोतल छल आ ट्यूब लुंगीक भीतर। सूर्य जना-जना ऊपर उठल जाइ छल, ओना-ओना सभटा कोनासँ खराम खटखटबैत आबैबला एहन बूढ़क संख्या बढ़ैत जाइत छल। रघुनाथकेँ लागल जे ई बूढ़ नै अछि- जिनगीक भूख अछि, जीवनक प्यास अछि, स्वयं जीवन अछि- जे ठोपे-ठोपे एकटा खधाइमे जमा भऽ रहल अछि ओहिना जेना कोनो पहाड़ीक कतेक रास दरारिसँ पानिक एकटा डरीड़ चलैत अछि आ कोनो आन स्रोतसँ मिलिकऽ कहियो नै सूखैबला, मील धरि फूही उड़ाबै बला, शोर मचाबै बला अजस्र धार बनि जाइत अछि। जीवनक झरना सभ भोर रघुनाथकेँ अपना दिस खीचैत अछि- रग्घू, आबू, सुनू, भीजू। मुदा रघुनाथ फुहीमे भीजैसँ बराबर बचैत अछि। किए बचैत अछि रघुनाथ- ओकरा ओ बुझि नै सकल छल। जखन सभ बूढ़ अप्पन मुत्युक विरोधमे बड़ मन आ जतनसँ बाबा रामदेव बनैत अछि, रघुनाथ मूड़ी निहुरेने चुपचाप पार्कसँ बहरा जाइत अछि। हुनकर पसीनक ठाम ई नै, नहरि छल। अशोक विहारसँ डेढ़ किलोमीटर दूर। नहरक पार ओकरासँ सटल बगेचा छल आ तकर आगू संजय कॉलोनी। ई कहियो घनगर छल, जइमे छल-धातरीम, बेल आ लतामक गाछ। रघुनाथ नहरक पुलपर ताधरि बैसल रहैत छल जाधरि रौद सहि सकै जोग रहै छल ओकर गाछीमे। ऐ पुलपर हुनकर भेँट भेल छल एल. एन. बापटसँ। बापट बनारसक महाराष्ट्रीयन छल। एतऽ पढ़लक लिखलक, एतैसँ नोकरी शुरू केलक आ जौनपुरसँ डिप्टी जेलर भऽ रिटायर भेल। बड़ मस्तमौला आदमी छल- पुरना फिल्मी गानाक शौकीन। हुनकर दूटा शौक छल- पीअब आ गीत गायब। गाबै तखने टा छल जखन पीबै लेल बैसै छल। हुनका कोनो संतान नै छलन्हि- नहिये बेटा, नहिये बेटी। स्त्री छल जकरा सभ बुढ़िया कहै जाइ छल। ओ संजयनगरमे एकटा छोट सन फ्लैट लेने छल आ जइमे कहियो-कहियो जबर्दस्ती रघुनाथकेँ लऽ जाइ छल। आ जखैन लऽ जाइ छल, किताबी कीड़ा ऐ मास्टरकेँ गरियाबैत कनी टा चिखा दै छल। सूर्य हुनकर शत्रु छल। ओ निअमसँ पाँच बजे साँझ कऽ पुलापर आबि जाइ छल आ हुनका गारि देब शुरू करैत छल- रघुनाथ, कनी देखू साढ़केँ। जानि-बूझि कऽ अबेर कऽ रहल अछि। ओ साँझ हैक संग बेचैन हुअए लागैत छल आ घर दिस एना भागैत छल जेना पुलिसक चांगुरसँ छुटैत चोर। हफ्तासँ ऊपर भऽ गेल छल जखन बापट रघुनाथसँ भेंट नै केने छल- नहिये पुलपर, नहिये ओइ गाछीमे। ओ सभ दिन जाइ छल आ घुरि आबै छल। ओ ओइ दिन जल्दी घुरि आएल छल किएकि गुमार बड़ छल आ पानि बरसैक आस छल। कालोनीक मुहथरिपर मकान छल मन्ना सरदारक। बिन पलस्तरक, ईंटाक। पैघ दरबज्जा, जइमे एक दिस नम्हर सन खटाल, ओतऽ बान्हल चारिटा महीस, तीनटा गाए। एतऽ भोर आ साँझ दूधक बर्तनक क्यू लगाबै छल बूढ़। ई कारोबार मन्ना सरदारक नैत देखै छल, हुनकासँ एकर कोनो मतलब नै छल। कहैत अछि जे ई कालोनी हुनकर जमीनपर बसल अछि। पचहत्तर-अस्सी बरखक मन्ना सरदार अप्पन जमानाक पहलमान। कारि, मोट, गस्सल शरीर। पेट कनी निकलल। आइयो लाल लंगोट आ छीटबला गमछामे उघार देह रहैत अछि आ निअमसँ पच्छिम मुँह कऽ कए पचास डंड-बैसकी करैत अछि। हुनका बस एक्केटा शौक अछि आ एक्के टा रोग। शौक अपन हाथसँ भांग घोटब, गोला जमाएब, ऊपरसँ मलाइ-रबड़ी खाएब आ रोग- गठिया। हुनकासँ डॉक्टर बाजल छल जे जौं चाहै छी गठिया ठीक हुअए तँ भांग छोड़ि दिअ। ओ जवाब देने छल- औ डॉक्टर साहेब, अहाँ कहब तँ दुनिया छोड़ि देब, बाकी भांग नै। ओ जवानी धरि शहर जाइ छल आ जे कियो पकड़िमे आबि जाइ छल ओकरा ओइ दिनक खिस्सा सुनाबै छल। रघुनाथ हुनकर पहुँचिमे आबि गेल छल ओइ दिन। ओ जहिना मुड़ल, तहिना सरदार पुछलक- जै रामजी मास्टर साहेब। कुम्हर कऽ रहै बला छी अहाँ। की बतौने छलौं ओइ दिन। -धानापुर साइडक। -अरे, अहाँ बतैलिऐ किए नै, ओइ साइडक तँ गुरु छल। -गुरु के? -छक्कन गुरु। अहाँ केना नै हुनका चिन्है छी? ई तँ आश्चर्यक गप अछि। आबू, बैसू तँ। पानि नै बरसत, चिन्ता नै करू। देखू पुरबा शुरू भऽ गेल अछि। पीताम्बरी आ खड़ाम- बस यएह धुआ-धजा छल हुनकर, चाहे जतऽ रहए। की नम्हर छलथि, की छुरी सन देह। परबा पोसने छल ओ। बस एकटा परबा- सेहो सोन सन। ओ अप्पन हाथसँ किसमिस, बदाम, छोहाड़ा खुआबै छल। एक बेर ओ गाएब भेल छल, हफ्ता भरि लेल। गुरु चिंतित। साढ़ बिना बतेले कतऽ चलि गेल। आठम दिन घुरल तँ लोल एकदम लाल। हाँफि रहल छल। गुरु बाजल- सूर्य देवताकेँ ठोर मारि कऽ आएल अछि, जीह आ लोल जरि रहल अछि ओकर, लखाह नै दैत अछि। पहिने पानि पिआ। तँ एहन छल गुरु। एक बेर साँझ कऽ भांग घोटि कऽ ओइ पार गेल, साफा पानि देलक, चंदनक तिलकपर ठोप लगैलक, गट्टापर गजरा लपेटलक आ दालिक मंडी दालमंडीमे पैसल। मुन्नी बाइ अप्पन घरसँ देखि रहल छल जे गुरु आबि रहल अछि। जहिना गुरु ओकर कोठा लग पहुँचल ओ अपनाकेँ सम्हारि नै सकल। वाह रे गुरु। गुरु ओकरा अपन कन्हा आ कोहनीक बीचक ठामपर रोकि लेलक। गुरु बाजल- मुन्नी, आइ ऐपर मुजरा होइतए मुदा ऐ गलीमे नै, चौकपर। असगरे हम टा नै, सगर नग्र देखत। आ गुरु ओकरा ठीके चौकपर आनि लेलक। आ फेर जे मुजरा भेल से नै पूछू तँ सएह नीक। आ अहाँकेँ पते नै जे गुरु के छल? जखन ओ उठल तँ अकास साफ भऽ गेल छल आ जतऽ–ततऽ छिरिआएल तारा लखाह पड़ि रहल छल। 6 रघुनाथ जखैन साँझमे घूमै, टहलै लऽ या मिलै-जुलैलऽ बाहर जाइ छल, तँ कोशिश करै छल जे नौ बजे धरि घुरि आबए। रातिक खाना ओ सदिखन सोनल संग खाइ छल। ई सोनलक जिद छल। दुपहरियाकऽ एना तखने संभव भऽ सकै छल जहिया ओकर छुट्टी रहए। नै तँ दाइ खाना पका कऽ चलि जाइ छलि आ ओ अपनेसँ खाना निकालि कऽ खा लै छल। नाश्ता हिनकर अलग छल आ सोनलक अलग। हिनका अँखुआएल बदाम आ दूधसँ खाली मतलब छल। शीलाक गलतीसँ ओ बड़ रास गप सिखने छल। ओ अप्पन हिसाबसँ हुनका नै चलबै छल, हुनकर हिसाबसँ ओ अपने चलैत छल। हुनका ससुर बनैक बदला बाप बनि कऽ चलब बेसी सुविधाजनक लागै छल। आ तामसक कोनो गप नै हुऐलऽ दियौ आ हेबो करए तँ बर्दास्त कऽ लिअ आ टारि दियौ। दुनू साँझक खेनाइ आ सुतबासँ मतलब छल- बाकी अहाँ जानू, अहाँक काज जानए। खर्ची गामसँ, तर-तरकारी पेंशनसँ। आ पेंशन एतबे भेट जाइ छल जे अपनेटा नै, दोसरोक छोट-मोट जरूरत पूरा भऽ जाए। बेटा पुतोहुक संग जीयैक यएह तरीका हेबाक चाही जे सभकेँ एक-दोसराक दोस्त बना देले छल। भऽ सकैए जे एकर पाछाँ कत्तौ ने कत्तौ हुनकर अप्पन असगरुआ प्रवृत्ति हुअए बा हुनकर अकछाएब। जखन सोनलक आग्रहपर पहिल बेर सरला आएल छल अशोक विहार तँ ओ सोनलक दीदीक संग ननदि सेहो छल। विदा करै काल ओ सोनाक चेन आ अउँठी संग दूटा साड़ी हुनका लेल आ दूटा मम्मी लेल देने छल। तकरा बादो सरला कतेक बेर आएल आ सभ घड़ी सोनल जे कऽ सकै छल, करैत रहल- माने घरक जे चीज सरलाकेँ पसिन्न आबै ओ सरलाक। ई कहियो नै सोचने छल जे सरला पैघ अछि- दैक कर्तव्य ओकर छै। शीलाकेँ सेहो अप्पन गलतीक अनुभव भऽ गेल छलै जे ओ अप्पन पुतोहुकेँ बुझैयेमे गलती केने छल। एतबे टा नै, सोनल अपना दिससँ बाप आ बेटा- रघुनाथ आ धनंजय- क बीचक दूरी सेहो कम करैक कोशिश केलक। ई अलग गप अछि जे दूरी घटैक बदला बढ़ैत गेल- मुदा ऐमे ओकर दोष कतऽ छल। ओ धनंजयकेँ फोन कऽ कहलक जे भैया, अहाँ तँ जुलुम करै छी। अमेरिकासँ पैसा मंगाबैक होइ छल तँ की-की नै बाजै छलौं। कतेक रास गप करै छलौं जे ई जरूरत अछि, ऊ जरूरत अछि। आ एतऽ एतेक दिनसँ हम आएल छी आ एक बेर देखैले नै एलौं जे भौजी कोना अछि। पापाकेँ सेहो ठीकसँ नै मालूम अछि जे अहाँ एम.बी.ए. केलौं कि नै आ कऽ लेलौं तँ आब की कऽ रहल छी। अहाँक बियाह लेल लोक आबि रहल अछि। पापा मम्मी परेशान अछि। की चाहै छी, बताउ तँ? एक दू दिनक लेले सही, आबि तँ जाउ। ऐ फोनक नतीजा छल जे ओ आएल मुदा रूकल घरमे नै, डायमंड होटलमे। तइसँ जे ओ असगरे नै छल, संगमे एकटा महिला छल अप्पन टिटहरबीक संग। सोनल हुनका सभकेँ रातिमे खेनाइक नोत देने छल। जखन रघुनाथकेँ ई खबर भेटल छल तँ ओ उठल आ चुप्पे पहाड़पुर चलि गेल। धनंजयकेँ आबैमे कनी देर भऽ गेल छल। ओ टैक्सीसँ आएल छल। संगमे आबैवाली स्त्री नै, लड़की छल- के. विजया। सोनलक उमेर की छल। नाकमे हीराक चमकैत कील, कानमे झूलैत रिंग, जूड़ामे बेलक फूल। एकदम दक्षिण भारतीय मुदा गोर आ सुन्नर। गपसँ पता चलल जे ओ दक्खिन दिल्लीमे कोनो कारपोरेट कंपनीमे नोकरी करैत अछि। ओइ कंपनीमे ओकर पति सेहो काज करैत छल, पहिनेसँ। ओकरासँ नीक पद आ वेतन छल। ओ बिन-बियाहल छल। दुनू बियाह केलक आ नोएडामे डूप्लेक्स फ्लैट लेने छल। बच्चीक पैदा हैक किछु दिन बाद एकटा सड़क दुर्घटनामे हुनकर मृत्यु भऽ गेल छल। घर, गाड़ी, नोकरी, बचिया, सभ किछु मुदा छल बेसहारा। भावनात्मक रूपसँ टूटि चुकल छल ओ। एनामे धनंजयसँ भेंट भेल छलै। बच्चीक नाम रत्ना डी. छल। ओ धनंजयकेँ पापा कहैत छल। सोनल सुनि कऽ असमंजसमे पड़ल रहल, किछु काल धरि। फेर एतबे बाजल- अहाँ सभकेँ सोझे घर एबाक चाही। धनंजय बहन्ना केलक जे विजयकेँ समए नै छलै। ओकरा बाबा विश्वनाथक दर्शन करैक छल, गंगा नहाबैक छलै, घाट देखबाक छलै, सारनाथ जेबाक छलै- समए कतऽ अछि। जइ काल अमेरिकाक अलबम देखै-देखाबैक कार्यक्रम चलि रहल छल, ओइ काल डिनरक तैयारीक बहन्ने सोनल किचेनमे आएल आ सहायता लेल धनंजयकेँ बजेलक। -राजू, एतेक पैघ गप। ने अहाँ पापाकेँ बतेलिऐ, ने मम्मीकेँ आ नहिये हमरा। ई की देखि रहल छी? -कोन गप? -ऐँ, यएह जे अहाँ बियाह कऽ लेलौं आ ककरो खबरि धरि नै देलौं। -के बाजल जे हम बियाह कऽ लेलौं। सोनल आश्चर्यसँ धनंजय दिस ताकलक- अहाँ दुनू एक्के छतक नीचाँ रहि रहल छी नै जानि कहियासँ, आ बच्ची पापा कहि रहल छी अहाँकेँ आ बियाह सेहो नै? मामिला की अछि? धनंजय मुस्किएलक- भौजी, मामिला किछु नै अछि। गप एतबे टा अछि जे ओकरा हमर जरूरत अछि आ हमरा ओकर- जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -की ओकरा ऐ गपक आभास अछि जे ओ ओकरा संग ताधरि अछि जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -ई हम नै जानैत छी। -अहाँ ओकरा संग रहि रहल छी, ओकर खा रहल छी, पी रहल छी, पहीर रहल छी, ओकर गाड़़ी आ पेट्रोलसँ घूमि रहल छी, ओकर बचिया अहाँकेँ पापा मानैत अछि, अहाँक भरोसे घर आ बच्चीकेँ छोड़ि़ नोकरी करैत अछि। अहाँ ओकर संबंधी बा नोकर सेहो नै छी- फेर कोन संबंध अछि अहाँ आ ओकर बीच। अपरतीब भऽ धनंजय बाजल- भौजी, छोड़ियौ ई सभ। चलू खाइ छी। -ऐँ, एना कोना छोड़ि देब। अहाँ ओकरा धोखा दऽ रहल छी आ बेवकूफ बना रहल छी। आकि फेर हमरासँ झूठि बाजि रहल छी बा नुका रहल छी। -दिल्लीक लड़कीकेँ नै जानै छी अहाँ। भऽ सकैत अछि, काल्हि बच्ची स्कूल जाए लागए तँ कान पकड़ि कऽ बाहर कऽ दिअए। -एकदम कऽ देबाक चाही, अहाँक चालि देखि कऽ। सोनल ओकर टोह लैत पुछलक- एकटा गप कहू, अहाँक नजरि ओकर घर-घरारी आ सुख-सुविधा पर तँ नै अछि? -अच्छा, रहऽ दियौ। अहूँ हद करै छी। -हम ऐ द्वारे कहि रहल छी, जौं हुअए, अहाँकेँ कऽ लेबाक चाही। सुन्दर अछि, बुझनुक अछि, जॉबमे अछि, अहाँकेँ जॉब नै भेटए तखनो कोनो हर्ज नै। हम संग छी अहाँक। बुझलौं। चलू आब। सोनल विजयकेँ आवाज देलक। सभटा किचेनसँ कटोरी, प्लेट आ थाड़ी डाइनिंग रूममे लऽ गेल, एक-एक कऽ कए। सोनल रत्ना डी. केँ कोरामे बैसेलक, खैलक आ खुअएलक आ साढ़े एगारह बजे विदा केलक। विदा होइसँ पहिने धनंजय भौजीकेँ असगरे लऽ गेल। -भौजी, की ई सत्य अछि जे भैया ओतऽ बियाह केले अछि? सोनल ओकर मुँह देखऽ लागल। -आरती कऽ कए कोनो छौड़ी अछि की ओतऽ? सोनल बिना हुनका सभकेँ विदा केने घर भागि गेल। 7 रघुनाथ गामसँ घुरल मुदा स्वार्थी आ कृतघ्न बेटाक जाइक बाद। ई हुनकर विचार छल, अप्पन छोट बेटा धनंजयकेँ लऽ कऽ। ओकरा पता छलै जे ऐ नगरक अशोक विहारमे ओकर भौजीक संग बाप सेहो रहैत अछि, मुदा ठहरल होटलमे। मानलिऐ जे औरत संग छलै- काशी दर्शन लेल आएल छल जे ई लड़काक घर अछि, आसान हएत। करबाक ई चाही जे हुनका होटलमे ठहरा कऽ अहाँ अप्पन घर आबि जैतिऐ, एतऽ रुकतिऐ मुदा नै। रघुनाथ नाराज हुअए, हुनका दुख सेहो भेल। ई गप ओ पुतोहुसँ नै कहि सकैत छल। दोसर गप छल बापक ईगो। देखऽ चाहै छल जे जे बेटा दिल्लीसँ बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेँट करै लेल बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेंट करै लेल बनारससँ डेढ़ दू घंटा दूर पहाड़पुर आबि सकैत अछि बा नै। शिकाइत तँ हुनका अप्पन बड़ बेटा संजयसँ सेहो छल मुदा परदेसक दूरी आ ओकर असगरे पड़ि जाइक कल्पना हुनकर कड़ापनकेँ कम कऽ कए राखने छल। ओ एहन देशमे छल जतऽ माँ नै, बाप नै, स्त्री नै। ओकर ओतऽ की हालत होइत हेतै, एनामे जखन ओकरा लेल हुक उठैत छल। ओ बिसुरल नै छल जे अप्पन बियाह करबाक बादो ओ अप्पन पिताक जरूरतक ध्यान राखलक। एतबे टा नै, ओ जे डी-१ अशोक विहारमे एत्ते दिनसँ निस्फिकिर अछि आ खाट तोड़ि रहल अछि- ओकरे चलते। हुनका ओकर एक आ एकमात्र इच्छाक जानकारी अछि- एक तरहे पिताक अंतिम इच्छा जे ओ अप्पन अन्तिम साँस पहाड़पुरमे बनल नव घरमे छोड़ए। ओ गामक पी.सी.ओ. सँ शुरूमे दू-चारि फोन कऽ मोन सेहो पाड़ने छल जे किछु भेजू, जतबे बनि सकए ओतबिये टा, कमसँ कम ढाँचा तँ अपना रहिते ठाढ़ कऽ दैतिऐ। ओ शुरूमे उत्साह देखेबो केलक मुदा आखिरीमे ओ खौंझा कऽ कहलक जे टका किए बरबाद करैपर लागल छी, ओकर सदुपयोग करबा लेल सोचू। एकर बादसँ रघुनाथ रूसि गेल छल। नहिये ओ फेर फोन केलक, नहिये ओ गप्पे केलक। सोनल जरूर गप करैत छल-कंप्यूटरक आगू बैसि कऽ, कानमे ईयर फोन लगा कऽ। मासमे कहियो एक बेर, कहियो दू बेर। रघुनाथसँ कहैत छल जे पापा, आबि जैतिऐ। अहाँ गप कऽ लियौ। मुदा संजय नै कहैत छल तेँ सोनलकेँ कहै आ चाहैसँ की। ऐ तरहेँ हुनकर रूसब चलैत रहल- वएह बापक ईगो। एतबै जरूर छल जे जखन कखनो फोन आबैत छल, ओ अपनाकेँ बजाबैक इंतजार करैत छल, जे कहियो नै भेल। संजय एक बेर बाजि गेल- अनचोक्के। तखन ओकर भाइ ओकरा संग छल। ओ राँचीमे पढ़ि रहल छल ओइ काल। रघुनाथ मास्टर- आदमी कोनो प्रसंगमे कृतज्ञताक मतलब बुझि रहल छल जे कियो अहाँ लेल कनियो टा किछु करैत अछि तँ ओकरा बिसुरी नै, मोन राखू आ मौका भेटए तँ जे किछु कऽ सकैत छी, करू। ऐ जन्ममे उऋण भऽ जाउ। एकरासँ पैघ सुख दोसर नै। जखन रघुनाथ चुप भऽ गेल तँ संजय बाजल- पापा, एकर मतलब तँ अहाँ जतऽ रहू, ओतै ठाढ़ रहू। बेर-बेर घुरि कऽ देखब तँ आगू कहिया बढ़ब। अहाँ कृतज्ञ हइ लेल कहि रहल छी आकि पएरमे बेड़ी पहिरै लेल। ई गप ऐल-गेल मुदा रघुनाथक दिमागसँ गेल नै छल। रघुनाथ सेहो चाहै छल जे बेटा आगू बढ़ए। ओ खेत आ मकान नै अछि जे अप्पन ठाम नै छोड़ए। मुदा ईहो चाहै छल जे एहनो मौका आबए जखन सभ कियो एक संग हुअए, एक ठाम हुअए। अपनामे हँसैए, गाबैए, लड़ैए, झगड़ा करैए, हा-हा खी-खी करैए, खाइए पिबैए, घरक सुन-सन्नाटा टूटैए। मुदा कतेक बरख भऽ रहल अछि- कियो कत्तौ अछि, कियो कत्तौ। आ बेटा आगू बढ़ैत एत्ते आगू बढ़ि गेल छल जे ओतऽ सँ पाछाँ देखए तँ नहिये बाप नजरि आबै नहिये माँ। कखनो कखनो हुनका लागै छल जे ओ बापट जना बिनु सन्तान हेतिऐ तँ बेसी नीक होइतए। ओ सेहो हुनके सन दारू छानि कऽ गओतिऐ आ मस्त  रहतिऐ। गामसँ घुरलाक बाद ओ अप्पन पुतोहुसँ घनंजयकेँ लऽ कऽ किछु नै पुछलक। पुतोहु अपने उदास आ बेमार लागि रहल छल। ई सोचि कऽ जे औरतकेँ बहुत रास एहन बीमारी होइत अछि जइ लऽ कऽ पूछब ठीक नै। ओ चुप्पा लगा गेल। हुनकर बीच गप होइत छल रातिमे, खेनाइक टेबलपर। रघुनाथ गामक सोचमे जीयैत रहैत छल, ओ वएह गप करैत छल, पुतोहुक विश्वविद्यालयक, अप्पन विभागक, लड़का-लड़कीक, प्रशासनक। हुनका अनमुनाह सन देखि कऽ रघुनाथ शुरू केलक, पहाड़पुरमे हइबला ग्रामसभा चुनाव कऽ लऽ कऽ- बुझू, एहन कालपर गेल छी जखन चुनावक माहौल छै। पहाड़पुरक ग्रामसभा अछि आरक्षित कोटाक। लड़ैत अछि दलित आ निर्णायक होइत अछि ठाकुर वोट, जकर संख्या अछि साठि। ई साठि वोट जकरा चाहे सभापति बना दिअए आ जकरा चाहे प्रधान बना दिअए। ठाढ़ अछि सोमारू राम आ मगरू राम- हम जइ दिन पहुँचलौं, ओइ दिन साँझकेँ ठाकुरक सभक बैठकी छल बब्बन काका कतय। तय भेल जे यएह मौका अछि जखन ओ पकड़िमे आएल आ यएह मौका अछि बदला लेबाक। जेतबा ऐंठैक अछि, ऐंठ लिअ, नै तँ फेर हाथ नै आबएबला। विचार भेल जे दुनिया आ देश एक्कैसम शताब्दीमे चलि गेल अछि आ पहाड़पुरमे मंदिर नै, जल चढ़ाबै लेल खाली महादेव स्थान अछि। कहल जाए तँ जे एक लाख देत, वोट ओकरे देल जाएत। जौं एकरा लेल दुनू तैयार भऽ जाए, तखन? कियो बीचेमे टोकलक। ऐपर दू टा विचार आगू आएल। एक ग्रुपक कहब छल जे एहन हालतमे बोली बढ़ाबैत रहू। एक कऽ डेढ़, डेढ़ कऽ दू- एना। जे बेसी दिअए, वोट ओकरे देल जाए। दोसर ग्रुपक कहब छल जे नै, ई मोल भाव अछि, नीलामी सन चीज अछि, अप्पन जबानसँ पलटब अप्पन प्रतिष्ठाक आ मर्यादाक अनुकूल नै अछि। दुनूसँ एक-एक लाख लऽ लेल जाए आ वोट आध-आध बाँटि लेल जाए। तीस एक कऽ, तीस दोसर कऽ। बताएल दुनूकेँ नै जाए। ओ मानि कऽ चलए जे साठियो हमरे जा रहल अछि। नव पीढ़ी ऐ दुनूसँ असहमत छल। हुनकर कहब छल जे अहाँ सभ अप्पन मंदिर आ महादेवकेँ लऽ कऽ चाटू, हमरा हमर दारू आ मुर्गा चाही। रघुनाथकेँ ई सभ सुनाबैत मजा आबि रहल छलै मुदा ओ देखि रहल छल जे सोनल नहिये सुनि रहल छल आ नहिये रस लऽ रहल छल। हुनकर मन कत्तौ आन ठाम छल। खाना खाइ लेलाक बाद जखन ओ हाथ धोइले आएल तँ देखलक जे सोनल अप्पन बिछौनपर चितांग पड़ल छल आ कानि रहल छल। रघुनाथ हुनकर कोठलीमे ठाढ़ भऽ कऽ किछु काल धरि बुझाबैक कोशिश करैत रहल- बेटा सोनल, की गप अछि? सोनल आर कानऽ लागल। -बेटा, बाज तँ की गप अछि। रघुनाथ अपनाकेँ सम्हारैत पुछलक। -संजय दोसर बियाह कऽ लेलक। सोनल हिचकीक संग बाजल- हम काल्हि फोनपर गप केलौं। तखन बाजल- कमसँ कम हमरासँ पूछि तँ लैतिऐ। 8 भ्रम आ भरोस- यएह अछि जिनगीक स्रोत। ऐ स्रोतसँ फूटैत अछि जिनगी आ फेर बहैत निकलैत अछि- निर्मल-कलकल। कखनो-कखनो लागैत छल जे ई अलग-अलग चीज होइत अछि। स्रोत एक्के होइत अछि-ओकरा भ्रम कहू आकि भरोस। ई नै हुअए तँ जीअब सेहो नै हुअए। यएह स्रोत रघुनाथक जिनगी छल। जखन अमेरिकासँ घुरलाक बाद सोनल बाजल छल जे पापा, हमरा लागि रहल अछि जे संजय ओतऽ बसि जाए चाहैत अछि। इंडिया आएत जरूर मुदा रहै लेल नै, विजिट करै लेल। तँ रघुनाथ हुनकापर व्यंग्यसँ मुस्की देने छल- कतेक जानै छी संजयकेँ। बाप एतऽ, माँ एतऽ, भाए एतऽ, बहिन एतऽ। आर तँ आर स्त्री सेहो एतऽ। ओ कहलक किछु नै, खाली मुस्की देने छल जे ओ अप्पन बापक दीनता आ दरिद्रता देखने अछि। ओ दुखी आ परेशान भऽ कऽ कहियो-कहियो बाजै छल जे चिंता नै करू, एतबे कमाएब-एतबे कमाएब जे घरमे राखैक जगह नै हएत। मुदा कमाबैक ई रहस्य नहिये ओ बुझि सकल आ नहिये सक्सेना। आइ हुनका लागै छल जे ओ सोनलसँ बियाह सोनल लेल नै, अमेरिका जाइ लेल केने छल। रघुनाथ, तँ जिनगी अहाँकेँ जे जियैक छल, ओ जी चुकलौं। आब अहाँ अप्पन बेइज्जती लेल जीबि रहल छी। ई कियो नै कहि रहल छल मुदा हुनकर कान सुनि रहल छल आ ई मूक स्वर हुनकर हृदए धरि पहुँचि रहल छल। ओइ साँझ ओ भोजन केलाक बाद घरक पछुआरमे अप्पन डेरा नै गेल। ड्राइंग रूममे बैसल रहि गेल। ओ पूरा राति ओहिना काटि देलक- बैसल-बैसल। नीन नै एलै। तरह-तरहक आशंका आबि-जा रहल छलै जइमे सभसँ प्रबल छल जे कत्तौ ई लड़की आवेशमे आबि कऽ किछु कऽ नै लिअए। ई कहैक जरूरत नै आ एकरामे दू राय नै जे ऐ समाचारसँ हुनका एक तरहे खाली सुख भेटल छल जे ओकरासँ बियाह करैक पहिने की ओ हमरासँ पुछने छल। अहाँक बाप तँ गप करबाक जरूरतो नै बुझलक। एतऽ धरि जे नोत सेहो ऊपर मोने देने छल। आब बुझू। जे केलौं तकर दंड भेटल। आब कानि किए रहल छी। हम आकि कियो आन की करत। मुदा ई सुख कनी काल धरिक छल। एना सोचब ओकर निष्ठुरता आ अमानवीयता हेतिऐ। ओइ हालतमे तँ आरो जखन ओ अप्पन व्यवहारसँ हुनकर हृदए जीत लेने छल। एहन विचार अपनामे निचताइ अछि। एहन कालमे सहृदएता आ प्रेम चाही। बिजली ड्राइंग रूम सेहो जरि रहल छल आ सोनलक कमरा सेहो। रघुनाथकेँ कनियो टा आहटि भेटै तँ आस्तेसँ जाइ छल आ ओकर कोठलीमे हुलकी दै छल जे सभ किछु ठीक-ठाक तँ अछि। रातिक डेढ़-दू बजेक आसपास सोनल हँसैत ड्राइंग रूममे आएल- पापा, आत्महत्या नै करब, निश्चिंत रहू। जाउ, सुति जाउ। मम्मीक कोठलीमे बा डेरामे। रघुनाथ लजा गेलथि। हम ऐ डरसँ थोड़े बैसल छी भाइ। हमरा नीन नै आबि रहल अछि। सोनलक ध्यान ड्राइंग रूमक ओइ पैघ फोटोपर गेल जे ओकर बियाहक छल। शाइत रिसेप्शनक छल। संजय-सोनल दूटा ऊँच मखमलक फूलसँ सजल कुर्सीपर बैसल छल आ दुनूक माथपर हाथ राखने सक्सेना साहेब पाछाँ ठाढ़ छल। -पापा एकटा प्रार्थना अहाँसँ। -कहू। -ई गप घरमे रहए। अहाँ, मम्मी आ सरला दीदीक बीच। हमर पापाकेँ नै पता चलए। -किए? -ओ बर्दाश्त नै कऽ सकथिन। दू बेर अटैक भऽ चुकल छन्हि। रघुनाथ किछु कहऽ चाहैत छल मुदा चुप भऽ गेल। ओ सोनलकेँ बाजऽ दै चाहै छल जइसँ जे ओकर मनमे अछि, निकालि कऽ हल्लुक भऽ जाए। ई नीक अछि जे ओ खाली सुनए। -पापा हम चाही तँ हुनका कोर्टमे नमाड़ि सकै छी, पेमाल होइत रहता। हम भागि कऽ नै आएल छी, हुनक छोड़ि कऽ नै आएल छी। आएल छी लियौन भऽ कऽ। हमही टा नै, ओ सेहो चाहैत रहथिन जे हम हाउस वाइफ बनि कऽ नै रही। नोकरी करी आ सेहो अप्पन देशमे। आर एतऽ एलाक बादो अहाँ मीठ-मीठ गप करैत रही। एक बेर नै बतौलखिन जे हुनकर मनमे की अछि? एहनो नै जे हमरा बजौलखिन नै आ हम आबऽ सँ मना कऽ देने होइ। -जुलुम अछि। सोनल बिख-सबिख होइत बाजल। -अहां की बुझै छी हमरा। ऐँ, अहाँ डायवोर्सक लेल पुछले तँ रहितिऐ हमरा, हँ कऽ दैतिऐ। अहाँ नै दैतिऐ, कहतिऐ तँ हम दऽ दैतिऐ। पुछबो टा नै केलक, इशारा सेहो नै केलक। बिना डाइवोर्स बियाह कऽ रहल छी। अपमानित कऽ कए। बिना कोनो गलतीक, कसूरक। आ निर्लज्जता ई अछि जे पुछलापर मुस्कुराबैत कहै छी जे हँ भाइ, कऽ लेलौं। करऽ पड़ल। मूर्ख बुझै छी हमरा। जेना हम अहाँकेँ जानिते नै छी। जेना हमरा अहाँक किरदानी नै बुझल अछि। हम तँ बाबू अहाँक खाट ठाढ़ कऽ दैतौं, मुदा की बताबी। लोक यएह बुझत जे हम ई सभ गुजार लेल कऽ रहल छी, जखैन कि हम थूक फेकै छी अहाँक कमाइपर। की समय भऽ रहल अछि पापा। चारि, साढ़े चारि। रूकू, अहाँकेँ चाह पियाबै छी। ओ उठल आ किचेनमे चलि गेल। ठंडी बेसी छल। रघुनाथ पएरकेँ सीरकमे लपेट कऽ सोफापर पड़ल छल। हुनका नीक लागि रहल छलनि जे सोनलक मूड बदलि गेल छै। मुदा ई नीक नै लागि रहल छलनि जे ओ हुनकासँ ओना गप करए जेना ओ संजय अछि। गलती हुनकर बेटा केने छल मुदा अपराधबोधसँ ग्रस्त ओ छल। ओ भीतरसँ डरल आ घबराएल छल। ओ कहै तँ ककरोसँ नै छल मुदा गाम हुनका लेल सुरक्षित नै रहि गेल छलनि। बेटा सभकेँ गाम गेना कतेक बरख भऽ गेल छल। हुनका कोनो सरोकार नै रहि गेल छलनि गामसँ। घरेनक लोक सनेहीकेँ ठीकसँ काज नै करऽ दै छल। तारीक पहिने बुक करलाक बादो जसवंत हुनकर खेत तखैन जोतै छल जखन सबहक जोताइ भऽ जाइ छल आ रोकलाक बादो हुनकर नाली बंद कऽ पानि पहिने अप्पन खेतमे लऽ जाइ छल लोक सभ। बाहरी लोक सभसँ झगड़ा मोल लऽ कऽ एक दिन टिकब मुश्किल छल। रघुनाथ अपने कहै छल- सभ बेर चुप भऽ जाउ, सहि लिअ, मुदा झंझटि नै करू। दियादक नजरि हुनकर खेतपर लागल रहैत छल- ई गप ककरोसँ नुकाएल नै अछि। गाम गेलापर हुनकर सम्मान सभ कियो करै छल मुदा ई सम्मान हुनका रहस्यपूर्ण लागैत छल। नरेश अप्पन घरक आगू हुनकर जमीनपर खुट्टा गाड़ि कऽ महींस बान्हब फेर शुरू कऽ देने छल। रघुनाथ देखियो कऽ अनठा कऽ चलि दै छल। के रोज-रोज किचकिच करए। ऐ बेर तँ सनेही जे सूचना देने छल, ओइसँ ओ आरो हदैस गेल रहथिन। एक दिन हुनकर गाम जाइसँ तीन दिन पहिलुका गप अछि जे मोटरसाइकिलसँ दूटा छौड़ा आएल छल हुनकर दरबज्जापर। पैंट-शर्टमे। ओ उतरल आ बरण्डापर पड़ल खाटपर पटा रहल। सनेहीकेँ बजौलक, पुछलक जे मास्टर साहबक यएह घर छिऐ? फेर पुछलक जे ओ कहिया-कहिया आबै छथिन। कतेक दिन रहै छथिन। कहिया जाइ छथिन। शहरमे कतऽ बसोबास छनि- तरह तरहक प्रश्न। जाइत-जाइत ईहो बाजल जे हुनकर दिमाग ठेकानमे तँ अछि आकि नै। सनेही बाजल जे ओ नीक छौड़ा सभ नै अछि। कोनो भरोस नै अछि एहन छौड़ा सबहक। जखन दिनोमे एतऽ आबि सकैत अछि तँ नग्र बनारस कते दूरे अछि। एकरासँ पहिने कहियो देखने नै छल ओकरा। जे चुपचाप पटायल छल ओकर शर्टक नीचाँ पेस्तौल बा रिवाल्वर जेहन चीज छल। सनेहीक रिपोर्टक असर ई भेल जे ओ झलफल होइते घरसँ बाहर निकलब बन्न कऽ देने छल। ओ कारण बुझैक कोशिश करै छल मुदा किछु बुझि नै सकल। शीले सन रघुनाथक सेहो अजीब स्थिति छल। ओ एतऽ रहितिऐ तँ गामक लेल चिंतित रहै छल, ओतुक्का गप करै छल आ घुरैक बहन्ना खोजैत रहै छल मुदा ऐबेर जेहन संकेत भेट रहल छलै से ओतऽ घुरैक सोचेमे डर लागै छलै। ऐबेर ओ तय कऽ लेने छल जे बेसी जरूरी हुअए तँ दोसर गप अछि, मुदा अशोक विहारक डेरा अछिये। ओ बनल रहए, हुनका आर किछु नै चाही। मुदा एतऽ? एतऽ संजय हुनका आगू दोसर समस्या ठाढ़ कऽ देने छल। आब ओ पूर्ण रूपसँ सोनलक मर्जीपर छल। ओ चाहे तँ रहऽ दिअए, चाहे तँ निकालि कऽ बाहर कऽ दिअए। भाइ, अहाँ ताधरि हमर ससुर छी जाधरि अहाँक बेटा हमर साँए छल। जखन ओ पति नै, तँ अहाँ ससुर केहन, कोन गपक? ई कोनो सराय आ धर्मशाला अछि नै जे पड़ल-पड़ल रोटी तोड़ि रहल छी, मुफ्तियाक। चलू एतऽसँ, अप्पन बाट नापू। हुनका नीक गप यएह लागि रहल छलनि जे ओ किछु कहए, ओइसँ पहिने ओ कहि दिअए, बेटी, बड्ड भऽ गेल, आब आज्ञा दिअ। (ई ओ बुझै छल जे ई कहैसँ लाभ हुनका भेटत। भऽ सकैए ओ पघिल जाए आ मना कऽ दिअए।) सोनल चाह लऽ कऽ आबि गेल- दूटा पैघ मगमे। एकटा मग हुनकर आगू राखैत बाजल-पापा, अहाँ एहन बेटा किए जनमेलौं। जे ओ नै देखै छल जे ओकरा लग छै, सदिखन उम्हरे देखैए, जे दोसराक लग छै- लेर चुअबैत। पता अछि, ओ आरती गुर्जरसँ बियाह केने अछि। रघुनाथ चाह सुड़कलक। ओ कोनो सोचमे डूमल छल। -ऐ दुआरे जे ओ असगर संतान अछि- करोड़पति एन.आर.आइ. व्यवसायीक। एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी आरती इंटरप्राइजेजक मालिकक। -बेटा, हम सभ ई नै सुनऽ चाहै छी। हम खाली एतबे चाहै छी जे अप्पन पापाकेँ जा कहियौ आ आब हमर छुट्टी करू। -की। की कहलौं अहाँ? कनी फेर तँ सुनी। सोनलक अबाज अनचोक्के ऊँच भऽ गेलै। रघुनाथ बिना ओकरा दिस ताकने चाह सुड़कैत रहल। सोनल हुनकर हाथसँ मग छीन लेलक। -एकदम्म नै। कान पकड़ू आ कहू जे एहन गप फेर नै करब। रघुनाथ असहाय आ निराश आँखिसँ हुनका ताकलक। ओ कानैत रघुनाथक कोरामे गुरकि गेल- पापा, संजय छोड़ि देलक, कोनो गप नै, अहाँ तँ हमरा नै छोड़ू। 9 रघुनाथ अप्पन जिनगीक समए नापैत छल, अप्पन पएरसँ, ओकर चालि आ तागतिसँ, फेफड़ासँ आबैत जाइत साँससँ। एक समए छल जखन ओ पंद्रह सोलह मील जाइ छल मामागाम। रौदमे। बिन थाकल, बिन कत्तौ बैसल- आ प्रसन्न रहै छल। फेर ई समए घटब शुरू भेल- आठ मील, फेर छऽ मील, फेर चारि मील, फेर एक मील। आ ओ आब डेरामे आबि कऽ घोकचि गेल छल। जौँ कत्तौ निकलबाक होइत अछि तँ आब दूटा पएर बेसी नै होइ छै, एकटा तेसर पएर सेहो लगाबऽ पड़ैत अछि आ ओ तेसर पएर छल- छड़ी। आब ओ तिपहिया मनुख छल। संतोष ई छलै जे हुनकर सन चौपाया मनुखसँ कॉलोनी भरल छल। जीयैक आस यएह छलै जे ओ असगरे नै अछि। हुनकर सन बड़ रास लोक अछि। कतेक लोक तँ हुनकोसँ खराप स्थितिमे अछि। जे हिस्सा ओ किरायापर देने अछि आ अपना रहै लेल एकमहला चुनने अछि, ओ ओतै अटकल रहैत अछि। कोनो तरहे बालकनीमे आबैत अछि आ ओतऽ बैसल-बैसल पूरा दिन लोककेँ आबैत-जाइत देखि कऽ अप्पन जीवित होइक अहसास करैत अछि। रघुनाथ कोनो तरहेँ पार्क आ नहर तक आबि जाइ छल, गाम नै जा सकै छल। एतऽसँ थ्री-व्हीलर बा टेम्पो लेब, बस अड्डा जाएब, बसमे धक्का-मुक्कीक बीच चारि घंटा बैसल रहब, नहरपर उतरब, फेर ओतऽसँ पाँव-पैदल डेढ़-दू किलोमीटर गाम जाएब मुश्किल भऽ जाइ छल। जोड़मे दर्द सेहो रहऽ लागल छल। मुदा जेना-जेना गाम जाएब कम होइत गेल, तेना-तेना ओतुक्का जमीन-जालक चिंता बढ़ल गेल। सोनल हुनका डेरासँ हटा कऽ घरक गेस्ट-रूममे राखि देने छल। ओ ठंडीसँ बचि गेल छल मुदा खिड़की लग बैस कऽ राति भरि अप्पन गाम आ खेतमे घुमैत रहैत छल आ सलाह दैत रहै छल। थाकि जाइ छल तँ बाकी समए ऐ सोचमे लगाबै छल जे सोनल हुनकर के अछि। ने पुतोहु, ने बेटी- की ओ ओकर घरमे बैसल अछि? जे हुनकर अछि, ओ नै जानि कतऽ–कतऽ अछि। हुनका तँ फिकिरे नै छनि। पूरा दियाद-बाद- जकर एक-एकटा पजेबा ओ जोड़ने छल- छिड़िया गेल छल। एतऽ धरि जे शीलाकेँ सेहो अप्पन बेटीक घर बैस कऽ बाढ़नि लगाएब आ खेनाइ बनाएब स्वीकार छल, मुदा पुतोहु कतऽ रहब स्वीकार नै। आ आब तँ पुतोहु सेहो कहाँ रहि गेल अछि। शीला या जकरा ककरो पता चलत, दस बात हुनके सुनाएत, उन्टे जे कोन सरोकारसँ ओतऽ छी अहाँ। ई हलदली एक भोर हुनका कॉलोनीक शर्मा पी.सी.ओ. धरि लऽ गेल। हुनका सर्दी-बोखार छलनि। कतेक दिनसँ बाहर नै निकलि रहल छल। सोनल नै निकलऽ दै छल। मुदा अप्पन दुनू बेटासँ फाइनल गप करैक उद्देश्यसँ ससरि आएल- चुपचाप। सभसँ पहिने संजयकेँ फोन केलक- यएह साढ़े आठ बजेक समए होइत अछि, जखन सोनल कंप्यूटरपर बैसै छल। -हलो, हम बनारससँ रघुनाथ। -संजय। अपना लग राखू ई चरण-स्पर्श। लाज आबैए अपनाकेँ अहाँक बाप कहैत हमरा। जे नीचता अहाँ देखेने छी अहाँ, ओइसँ हमरा गप नै करबाक चाही, मुदा... -अनर्गल गप बंद करू। -सुनू, हम अशक्त भऽ गेल छी। जिनगीक कोनो ठेकान नै, कखैन की हुअए। आब खेती नै हएत हमरासँ। या तँ आबि कऽ सम्हारू या बताउ की करी। गामक जमीन-जालक। संजय। धनंजयसँ तँ पुछबे करब, मुदा अहाँ पैघ छी। मालिक छी। अहाँ की कहै छी? संजय-०००० -नै, नै, हम वएह सभ करब जे अहाँ कहब। कहियौ तँ। विचार दिअ अपन। -संजय-०००० -हँ। तँ सभ बेचि दिऐ। ओइ पाइसँ एक-डेढ़ कोठलीक बनारसमे फ्लैट लऽ लिऐ। बाकी जमा कऽ दिऐ आ ओकर सूदसँ दुनू परानी जीबी-खाइ। -संजय-०००० -हँ, हँ। पेंशन तँ रहबे करत। मुदा सुनू, ई काज अप्पन माँ-बापक लेल अहीं करू। ई हमरासँ नै हएत। -संजय-०००० -ऐ दुआरे जे ई पाप अपना हाथसँ नै करब। ऐ दुआरे जे ओ पुरखा सबहक चीज छी, हुनकर धरोहर छी। दोसराक चीज बेचबाक अधिकार हमरा नै अछि। -संजय-०००० -नै, हम एकदम्मे भावुक नै छी। मुदा हमर खेत नै छी। एकरा हम जिन्स आकि माल मानै लेल तैयार नै छी। आ सुनू, अप्पन सलाह अपना लग राखू। साढ़। नमकहराम। ओ फोन राखि देलक। किछु काल धरि सोचैत रहल जे फोन करी आकि नै करी। आखिरमे लगा देलक नंबर। -हलो, धनंजय अछि की? -महिला स्वर-०००० -हम रघुनाथ। हुनकर पिता। -धनंजय-०००० -हलो राजू। अहाँ बनारस एलौं मुदा गाम नै एलौं। हम इंतजार करैत रहि गेलौं। -धनंजय-०००० मौका नै भेटल तँ नै भेटल। जाए दियौ। एहन अछि बेटा जे हम आब कोनो काजक लेल नै रहलौं। काज-धाज नै होइए। समस्या अछि खेतक। ओकर की करी? -धनंजय-०००० -नै, ओ तँ ठीक अछि मुदा सनेही कहिया धरि देखत। ओकरा लोक करैएले नै दैत अछि। ओकर सबहक आँखि लागल अछि अप्पन खेतपर। -धनंजय-०००० -तँ अखैन रूकि जाइ छी। मानि लिअ रूकि जाइ। मुदा ओकरासँ पहिने हम चलि जाइ तँ। संजय सेहो बाहर, अहूँ बाहर। फेर के? -धनंजय-०००० -ठीक अछि, बेच दै छी मुदा ओतबे पाइक किछु करए पड़त ने। की करी ओकर? -धनंजय-०००० -आध-आध बाँटि देब अहाँ दुनू भाइमे। फेर हमर आ अहाँक माँक की हएत? हम की खाएब? अच्छा सुनू, ई बताउ जे अहाँ की कऽ रहल छी आइ-काल्हि। -धनंजय-०००० -आइ धरि नै भेटल अछि नोकरी। कतेक दिन लागत अखन। अहीं किए नै आबि जाइ छी। मैनेजमेंटक ज्ञानक उपयोग खेतीक बिजनेसमे नै भऽ सकैत अछि? धनंजय फोन काटि देलक। -हरामखोर। रघुनाथ पी.सी.ओ.सँ बाहर आबि गेल। साढ़, डोनेशनसँ पढ़ब तँ पूछत के? ने काबिलती अछि नहिये पैरवी- चलल अछि मैनेजर बनै लऽ। ओ घर नै जा कऽ सोझे पार्क गेल आ लकड़ीक बैंचपर बैसि गेल। पार्कक बगलबला लेनमे घर छल पारसनाथ शर्माक आ तीन-चारिटा दाइ हुनकासँ झगड़ा कऽ रहल छल। हफ्तामे एक-दू बेर कालोनीक कोनो ने कोनो घरक आगू एहन सीन भऽ जाइ छल। किए होइ छल एहन सीन, एकरा सभ कियो जानै छल तइसँ महत्व नै दै छल। -छल ई जे सभ घरमे बांग्लादेशी दाइ छल। सोलह-सत्रहक उमेरसँ पैंतीस-चालीस सालक। बूढ़मे सँ ककरो ने ककरो बुढ़िया अप्पन बेटा-पुतोहु लग बाहर चलि जाइ छल किछु मासक लेल। रहै छल तँ राग-द्वेषसँ मुक्त भऽ आ बुढ़बाकेँ एतबे छूट देने। बूढ़मे शाइते कोनो बूढ़ छल जकरा अप्पन जवान हेबाक भ्रम नै हएत आ ओ समए-समएपर परीक्षण नै करऽ चाहैत जे हुनकामे किछु बचल अछि आकि नै। तृष्णाक मारल सभ बूढ़ प्रेम, दुलारक नामपर एहन छूट लऽ लै छल आ दाइ सभ सेहो साबुन, तेल, नेलपॉलिश, लिपिस्टिक बा पंद्रह-बीस टका बख्शीस पाबि संतोष कऽ लै छल। ओ हुनका कतऽ काज करैत सुरक्षित अनुभव करैत छल। समस्या ओतऽ ठाढ़ होइ छल जतऽ बूढ़ अप्पन दाइकेँ सेवाक मुताबिक बख्शीस दैमे ना-नुकुड़ करै छल। ई प्रणय कलह जेहन मामला होइत छल जइमे तेसराक दखल दैक जरूरत नै पड़ैत छल। (बेसी जानकारी लेल पत्रकार सुशील त्रिपाठीक स्टोरी पढ़ू- आखिर अशोक विहारक प्रवेश-द्वारपर मर्दाना कमजोरी आ सिसनोत्थानक समस्याक निवारणक जड़ी-बूटी वनौषधिसँ शर्तिया इलाजक पीअर तम्बू साल भरि किए तनल रहैत अछि।) ऐ कलह-कोलाहलसँ निरपेक्ष रघुनाथ बेंचपर धूप सेवन कऽ रहल छल तखने हुनका ताकैत पुरना मित्र जीवनाथ वर्मा पहुँचल। ओ हुनके संग रिटायर भेल छल आ रसायन शास्त्रक अध्यापक छल। नग्रमे बेटा-पुतोहुक संग साकेत विहारमे रहैत छल। कार्यकालक दिनमे किछु लोक हुनका पागल बुझै छल आ किछु जीनियस। चना-चबेनापर जीवित रहैवाली भारतक अस्सी प्रतिशत जनता हुनकर चिंताक विषय छल। ओ सेहो शौकीन छल भूजाक (भुजनाठीसँ भुजल चना, मटर, लाइ, चूड़ा, बालि) क। भारी मोश्किल छल सामान्य लोकक। कड़ाही जुटाउ, बालु आ नीमकक बंदोबस्त करू, चुल्हा जराउ, ओकर गरम होइक आ धधकैक इंतजार करू, तखन जा कऽ भुज्जा तैयार होइत अछि। एहन नै भऽ सकैत अछि जे ई सभ झंझटि नै पोसऽ पड़ए। कतेक रास बरखक चिंतन मननक बाद ओ एकटा प्रयोग केने छल। किएक तँ ई राष्ट्रीय स्तरक समस्या छल जकर समाधान खोजि कऽ निकालने छल तइसँ हुनकर हार्दिक इच्छा छल जे एकर उद्घाटन वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम करथि। मुदा झिटुकी लगेने छल रघुनाथे। ओ कहने छल जे प्रयोग अखन प्रक्रियामे अछि तइसँ आयोजन स्थानीय स्तरपर हुअए। बड़ खर्च केने छल वर्मा। घरक आगू तम्बू लगेलक, तीस अध्यापक लेल कुर्सी मंगबैले छल, कैटररसँ चालीसटा थारी मंगबैलक, माइक लगबैलक। सभ अध्यापकक थारीमे चारिटा चना राखलक आ प्रिंसिपल, जकरा उद्घाटन करबाक छलै, हुनकर थारीमे पाँचटा। थपड़ीक गड़गड़ाहटिक बीच प्रिंसिपल मुँहमे पाँचो दाना खसेलक आ दकड़ैत थुकड़ि देलक। माइकपर एक वाक्य बाजल- ई चना लोहाक अछि आ जहर अछि। सभ अध्यापक चिखने बिना प्लेट फेक देलक आ चलि गेल। हुनका मोताबिक वर्मा हुनकर अपमान केलक आ वर्माक मोताबिक ओ वर्माक। प्रयोग ओना तँ गोपनीय छल, ओकरा लऽ कऽ बताओल सेहो नै जा सकै छल मुदा रघुनाथकेँ जे जानकारी छलै से ई जे वर्मा झाड़ि पोछि कऽ जमीनपर एक किलो चना पसारलक, ओइपर स्पिरिट छिड़कलक,काठी जरैलक, धधरा उठल आ चना भुजा गेल। (खोंइचा जड़ि गेल, गुद्दा ओहिना काँचे रहि गेल।) यएह भुज्जा फेमबला वर्मा किछु काल हुनका देखैत रहल आ आस्तेसँ कहलक- रघुनाथ। रघुनाथ जखन माथ उठेलक तँ ओ लपकल-ऐँ। ई सत्ये अहीं छिऐ। भजार, की भऽ गेल अहाँकेँ। कल्ला बैसि गेल छै, गाल धँसि गेल छै, दाँत झड़ि गेल छै, आँखि भीतर चलि गेल छै- एना केना भऽ गेल। चिन्हैमे नै आबि रहल छी अहाँ। रघुनाथ हँसल, ठाढ़ भेल, हुनका बाँहिमे लेलक आ अपना संग बैसाबैत बाजल- कनी इम्हर। किछु नै भजार, गेल छलौं काल्हि पेंशन ऑफिस। जखन घुरऽ लगलौं तँ बड़ा बाबू पुछलक- रघुनाथ जिबिते अछि आकि गुजरि गेल। हम पुछलौं- एना केना बाजि रहल छी। ओ कहलक- फाइल बंद पड़ल अछि हुनकर। मइसँ पेंशन नै चढ़ल अछि। किए? ओ बाजल जे लाइव सर्टिफिकेट नै देने अछि। तँ हम यदि देखैये लेल एलौं जे मामिला की अछि? -बड़ नीक केलौं, ऐ बहन्ने अहाँसँ भेंट भऽ गेल। ओकरामे किछु करबाक तँ अछि नै। फारम भरि कऽ रजिस्ट्रारकेँ देबाक अछि। ओ दस टका लेत आ प्रमाणित कऽ देत। फेर बरख भरिक चिन्ता खत्म। रघुनाथ बड़ मिझाएल मोनसँ बाजल- जीवनाथ। हमरा चौअनिया जीवनमे कोनो रुचि नै अछि। वर्मा बड़ दुखी भऽ कऽ रघुनाथकेँ देखलक- भजार, की बात अछि। अहाँ एहन तँ नै रहिऐ। चलू घर। जाइक हुअए तँ साँझकेँ जाएब। रघुनाथ एकटा हाथमे लाठी आ दोसरमे वर्माक कन्हा धेने घुरल। 10 जीवनाथ वर्मा जाइत-जाइत एकटा नव आफत ठाढ़ कऽ कए गेल छल, ई कहैत जे अपना सबहक लेल बडु जीलौं रग्घू मुदा अपना लेल जीबू। यएह ओ गप छल जे कहियो हुनका अप्पन दिमागमे नै आएल। अपनासँ अलग सेहो किछु होइत अछि की? की बेटा अप्पन नै छल? बेटी अप्पन नै छल। स्त्री अप्पन नै छल। खेत-खलिहान अप्पन नै छल। ई जरूर अछि जे सभ कियो अपना लेल जीवन चाहै छल। ककरो ऐ गपक चिन्ता नै छलै जे ओ जी रहल अछि आकि मरि रहल अछि। ओकर अप्पन खगता सभसँ बेसी रहै छलै आ ओ नै चाहै छल जे कियो ओकरापर कोनो सवाल उठाबै। अहाँ ओकरा अप्पन बाट जाए दियौ आ जाए दइमे मदति करू तँ अहाँसँ नीक कियो नै। मुदा की हुनकर जिनगी रघुनाथक जिनगी छल। नै, हेबाक चाही छलै अप्पन अलगसँ। जे भेलै नै। आ जीवनाथ वर्मा ई सभ तखैन कहि रहल छल जखन कान सुनि नै सकैत छल, आँखि देखि नै सकैत छल। कल्ला चबा नै सकै छलै, डाँड़ सोझ नै भऽ सकै छलै। आ ई सभ किछो अपन प्रति आ पतिक कर्तव्यक भेँट चढ़ि गेलै। ओ ई मानै लेल एकदम्मे तैयार नै छल जे अप्पनक भेषमे ओ दोसर छल। ओ कत्तौसँ खसल नै छल, अनेरुआ नै छल। रघुनाथ स्वयं कृतज्ञ भावसँ शीलाकेँ दोसराक घरसँ आनले छल, यएह हुनकर हुनका सभपर उपकार छल जे हुनका नै जानैत-पहचानैत हुनका संग आएल छल आ एक नव दुनिया रचएमे हुनकर संग देने छल। आखिर कोन उम्मेदसँ रघुनाथ शीलासँ मिलि कऽ रचने छल ई दुनियाँ। ओ एतबे नि:स्पृह आ निस्वार्थ तँ नै छल आ हुनकर आशा सेहो हुनकासँ अलग नै छल, जे गाम-घरक छल। की जे ओ अशक्त भऽ जाए तँ बच्चे हुनकर आँखि बनत, हुनकर हाथ-पएर बनत। ओ दुखित हएत तँ यएह बच्चा हुनकर सेवा करत, दवा-दारू करत, अस्पतालमे भर्ती कराएत। मरऽ लागत तँ मुँहमे गंगाजल-तुलसी देत, अर्थी सजाएत, श्मशान लऽ जाएत, क्रिया-कर्म करत। मुदा देखू तँ एकरासँ बेसी मूर्खता की भऽ सकैत अछि। अरे, मरलाक बाद सड़य-गलय, कौआ-चील खाए बा कुकुर- की फर्क पड़ै छै। मुदा यदि दुनियाक आ दुनियाक चलैत रहैक कायदा ई रहैत अछि कि की पैदा हुअए बा जिअए। जीअब अहाँक कर्तव्य अछि। कर्तव्य माने की? अशक्क। कियो ई नै पुछलक अपनासँ- ककरा लेल जी रहल छी? ओ जन्मैक बाद जाधरि जी रहल अछि, जी रहल अछि। मरय कऽ दिन धरि। मरय कऽ दिन बाप-बेटाक हाथ ओ सभ किछु सौंपि कऽ जाइत अछि जे ओकरा संग रहैत अछि। लिअ, सम्हारू आब। हम चललौं। रघुनाथ लग गामक जमीनक अलाबे किछु नै छल आ ओइ जमीनकेँ ओ अनमोल बुझैत छल। बेटा हुनका कैशमे भजोखा देखैत छल आ कहि रहल छल जे एकरासँ बेसी तँ हमर एक मासक इनकम अछि। संजयक टिप्पणी रघुनाथक भीतरक सभटा जीवनक रस चूसि लेने छल। ओ अप्पन कोठलीक खिड़की लग बैसल कदम्बक पातक पार आसमान देखि रहल छल जे सूर्यास्तक बाद मलिछौंह छल। ओतऽ हुनकर आँखिक आगू एकटा मद्धिम तारा छल जे हिलैत पातक अढ़मे कखनो नुका जाइ छल, कखनो हुलकऽ लागै छल। ई तारा नै छल। हुनकर पिता छल जे हुनकापर हँसैत छल आ नुका जाइ छल। -हौ जीवनाथ सुनह। अप्पन दिन तँ बचल नै जीबाक लेल मुदा जीअल छी अपना लेल। ओ अचानके चिकड़ि उठल जेना जीवनाथ सद्यः गेटक बाहर ठाढ़ अछि। ताराक तुकमिलानी लारा। तारा हुनका लाराक मोन पाड़ि देने छल, ओइ लाराक जे हुनकर नितांत अप्पन जिनगीक गुप्त हीस छल। जइ दिन रघुनाथ अप्पन किशोरावस्था पार कऽ रहल छल ओइ काल हुनकासँ टक्कर लेने छल लारा चड्ढा। एकटा अल्हड़ आ सोझ सन लड़की। अंडाकार मुँहवाली सुन्दर लड़की। सपनाएल आँखि। नाकक नोकपर बदमासी। ठोढ़क कोनपर हँसी। छड़ीसन देह जना हवामे थरथराइत बुलबुल्ला। कमी छल तँ बस दूटा पाँखिक, जकर सहायतासँ ओ जखैन चाहए तखन उड़ि सकए। रघुनाथ मामक घर रहि कऽ पढ़ाइ केने छल आ ओ आगू रहै छल बंगलामे। पैघ बहिन हॉस्टलमे छल आ ओ माँ-बापक संग। रघुनाथसँ एक क्लास ऊपर छल। ओ जखैन-तखैन साँझक बल्बक रोशनीमे पापाक संग बैडमिंटन खेलाइ छल तँ रघुनाथ अप्पन दरवाजापर ठाढ़ भऽ कऽ देखैत छल। एक दिन जखन लाराक माए-बाप कोनो समारोहमे बाहर गेल छल, ओ इशारासँ रघुनाथकेँ बजैले छल। ओ घरक ड्रेसमे छल- स्कर्ट आ ब्लाउजमे। ओ रघुनाथक संग कैरम खेलाइ लेल बैस गेल आ किछु काल धरि खेलाइत रहल। फेर अचानके उठल, दौड़ कऽ लॉनमे गेल, पीअर गुलाबक फूल संग घुरल आ केसमे लगा कऽ ठाढ़ भऽ गेल- आब कहू, केहन लागै छी। अपरतीब भऽ रघुनाथ देखैत रहल आ आस्तेसँ बाजल- नीक। -ऐँ, खाली नीके? लाराक आँखि फाटल रहि गेलै। रघुनाथकेँ बुझैमे नै एलै जे आगू की बाजी। लारा पएरसँ ठेल कऽ बोर्डकेँ एक दिस केलक आ हाथ पकड़ि कऽ ठाढ़ कऽ देलक रघुनाथकेँ। ओकर आँखि नोरा गेलै, बाजल- गोबर। मोनेमोन चाहै छी जे नीके-नीक बाजी, अहाँक आँखि ठोढ़, आंगुर, बाँहि, आ पूरा देह नीक बाजी। आ... ओ एक-एक कऽ ओकर अंगा आ पैंट खोलैत गेल। -अप्पन सेहो हम खोली आकि अहूँ किछु करब। ओ लजाइत कनफुसकी केलक। जना-जना वस्त्र ओकर देहसँ अलग होइत गेल, ओना-ओना एकटा अज्ञात, अनदेखल, अकल्पित दुनियाँ खुजैत गेलै ओकर आगाँ कनी-कनी। मुदा ई कनी-कनी असह्य भऽ गेलै रघुनाथ लेल। ओ बेसब्र आ जंगली भऽ उठल। ओ लाराक संयमपर चकित सेहो छल आ मुग्ध सेहो। ओ हुनका आस्तेसँ बैसैलक आ हुनकेपर नमड़ि गेल- फूलसँ बनल गाछ सन। हुनका भीतर लैसँ पहिने हुनकर कानमे फुसफुसैलक- बुद्धूराम। कहियो मेटाएब नै। आ हुनकर झाँपल जीहक नोकसँ दहिना दिस लिखलक- एल.ए.। जखन बाम छातीपर आर. लिख रहल छल ओइ काल कॉलबेल बाजल। ओ तरपि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। बाजल- पहिरू आ भागू पाछाँसँ। फेर तँ मास भरिक बादे चड्ढा साहेबक बदली भऽ गेल आ ओ चलि गेल। ऐ गपकेँ या तँ रघुनाथ जानैत छल या लारा- तेसर कियो नै। एहन बहुत रास गप अछि हुनकर जिनगीमे जे वएह टा जानैत अछि। की ई नै छल अपना लेल जिअब। ककरो नै पता जे शुरूसँ रघुनाथ एकटा चोरक जिनगी जिअल अछि जे हुनका नजरि आबैबला जिनगीसँ बेसी असली आ अप्पन रहल अछि। नहिये माँ-बापकेँ पता, नहिये स्त्रीकेँ, नहिये बेटा-बेटीकेँ। ऐ जिनगीक भीतर एकटा दोसर जिनगी। जकरा लोक देखैत छल आ बुझैत छल ओ दोसराक लेल आ दोसराक काजक लेल भले रहल हुअए- हुनकर अप्पन जिनगी नै छल। मजा आ झमेला ऐ जिनगीमे छलै जे हुनकर निजी छल आ जे प्रेमक खोजमे गुजरि गेल। जमानासँ बचा कऽ, लोकक आँखिसँ चोरा कऽ, अपना आँखिमे गर्दा झोंकि कऽ, हुनका धोखा दऽ कऽ। जे हुनकर अलाबे, ओकरा पता छलै, ऐ गपक भनक भले भेटल होइ ककरो, पूर्ण जानकारी ककरो नै। पूरा जानकारी तँ अहाँक बदमाशीक सेहो नै अछि ककरो रघुनाथ। ओहो चोरीक जीवन छल अहाँक। अहाँ हॉस्टलमे छलौं ओइ काल। अहाँक भजार श्रीराम तिवारी, भेँट करए लेल आएल छल अहाँसँ। आएल छल तँ अस्पताल अप्पन माँकेँ लऽ कऽ, हुनकर हालत सीरियस छल। माँकेँ अप्पन भाइक जिम्मा छोड़ि कऽ अहाँसँ भेँट करऽ लेल आएल छल। जखन ओ जाए लागल तँ ओकर जेबीसँ खसल तागसँ बान्हल नोट अहाँ देखने छलौं आ चुप रहलौं। बादमे गानलौं तँ एक सए तीन टका छल। माँकेँ देखा कऽ घंटा भरि बाद फेर आएल- चिन्तित, परेशान आ घबड़ाएल। अइते ओ जतऽ बैसल छल ओतऽ फेर चौकीक नीचाँ टेबुलपर आ ओकर नीचाँ कोठलीमे चारू दिस देखैत रहल। बुझलाक बादो अहाँ ओकरा पुछले छलौं- की गप अछि? किछु टका छलै दवाइ लेल, भेट नै रहल अछि। आन ठाम कत्तौ तँ गेलौं नै। अहाँ देखलौं तँ नै। आ अहाँ उत्तर की देलौं- अस्पतालक भीड़-भाड़मे कनी सम्हरि कऽ रहबाक छल। ओतऽ जतेक पेशेण्ट आबैत अछि ओत्ते चोर आ पाकिटमार सेहो। ई सभक शिकाइत अछि। नै भजार। आर कत्तौ गेले नै छी। खसल हएत तँ एत्ते कत्तौ, जेबी कटबाक तँ सवाले नै अछि। -तँ देखू ने, कतऽ अछि एतऽ। अछि कत्तौ? -तँ रघुनाथ ईहो अहीं छलौं। वएह अहाँक निजी जिनगी। जौं ई जिनगी लोककेँ पता चलल हेतिऐ तँ अहाँ की एतेक आदरणीय आ गण्यमान रहि गेल हेतिऐ या नै, अपने सोचू। रघुनाथ सोचलक आ वर्माकेँ अपना लेल जिबूबला सलाहपर अविचलित रहल। ऐ दगाबाज आदर आ प्रतिष्ठाक बदला आत्माक ई नंगटपनी बेसी नीक छल। अपना लेल सेहो आ समाज लेल सेहो। ई आदमी टाक नै समाजक विसंगतिक सेहो चेहरा अछि, जे झाँपल-मुनाएल अछि। समाज जानए जे जँ हम बदमाश छी तँ ऐ बदमाशीक कारण असगरे हम नै छी, ओ सेहो अछि। आ सही कहियौ तँ ओकरे कारण हम एहन छी। -पापा। सोनल दरवाजासँ आवाज देलक। -अहाँ अखैन धरि अन्हारमे पटायल छी। ओ स्विच ऑन केलक आ कमरामे रोशनी भऽ गेल। रघुनाथक आँखि चोन्हैल, फेर पसरि गेल। पहिल बेर सोनलक संग एकटा युवा। नम्हर, सुन्दर, आँखिपर नै माथपर चश्मा, कन्हापर झोरा, खादीक कुर्ता आ जीन्सक पैंट। एक हाथमे लपेटल अखबार। रघुनाथ उठि कऽ बिछौनपर आएल। -पापा। यएह अछि समीर। दैनिक भारतक उप-संपादक। रघुनाथक पएर छुलक समीर। -हमर कजिन अछि। हम बतौले रही। ई बिसरि गेल हेथिन। जइ काल हम पटनामे रिसर्च कऽ रहल रही, ओइ काल ई सेहो ओत्तै छल। आइ अचानक सेमिनारमे भेट गेल। लऽ कऽ आबि गेलौं अपना संग। -कतऽ रहै छी बेटा। -एत्तै, लगेमे। संजय नगरमे। -ऐँ। ओतऽ तँ हम गेल छी। अप्पन दोस्त बापट कतय। -हम हुनके फ्लैटक नीचाँ रहै छी। आब तँ हुनकर फ्लैटमे हुनकर बेटा आबि गेल अछि, स्त्री बच्चाक संग। चौंकल रघुनाथ- हुनकर बेटा? बेटा कहाँ छल हुनका। समीर सोनलकेँ ताकलक। सोनल बतैलक जे ओइ काल अहाँ गाम गेल छलौं। हुनका किछु नै पता। समीर बाजल- पापा। की अहाँकेँ खबर अछि जे बापटक मर्डर भऽ गेल अछि पछिला दिन। नहरमे हुनकर लाश भेटल छल। आ अहाँ आश्चर्य करब जे एफ.आइ.आर. अही बेटाक नामे अछि। पेपरमे आएल छल ई समाचार। अही बेटाकेँ ओ अनाथालयसँ अडाप्ट केने छल, जखन ओ बच्चा छल। पढ़ैलक, लिखैलक, कोनो नोकरी सेहो दिआ देने छल ओकरा। चालि-चलन नीक नै छलै तइसँ निकालि देने छल ओकरा घरसँ। ई चाहै छल जे अपना रहिते फ्लैट ओकर नाम लिखि दिअए। शायद लिखबाइओ लेने छल ओ, ऐ शर्तपर जे ओ ऐमे तहिये आएत जखन ओ नै रहत। कहब मुश्किल अछि जे की कोना भेल। रघुनाथ काठ सन बैसल रहल- बिना हिल-डुल। कनी कालमे चश्मा उतारलक, गरमे लपेटल मफलरसँ पोछलक, फेर लगा लेलक। जना ओ बापटकेँ देखऽ चाहै छल। ऐ नगरमे एलाक बाद जे लोक असगरे हुनकर दोस्त हैत छल हुनकर ओ बापट छल। हुनकर मुँहसँ आश्चर्य सन नै, एकटा आह सन निकलल ई वाक्य- ई की हैत जा रहल अछि लोककेँ। ई केहन हैत जा रहल अछि दुनियाँ। हम बड़ नीक नै रही मुदा एत्ते खराब सेहो नै छलौं। -पापा, समीरसँ कहि रहल छी जे ऐ नगरमे जखन अप्पन घर अछि तँ ओत्तऽ किए। उपरो तँ एकटा कमरा खाली पड़ल अछि। रघुनाथ कातर भऽ कऽ हाथ जोड़लक- जे करबाक अछि करू, हमरा असगरे छोड़ि दिअ। प्लीज। रघुनाथ बिना खेले-पिले राति गुजारि देलक। नीन नै एलै। ओ कोठलीमे बत्ती मिझा कऽ सुतैत छल मुदा आइ जड़ैत छोड़ि देलक। एक बजे राति हुनकर आँखिक आगू बापटक चेहरा घुमैत रहल आ कानमे ओकर गीत- हाए हाए ये जालिम जमाना। मुदा एकर बाद हुनकर हृदएक अबाज कानमे धक-धकक बदला मारलक-मारलक कहि धड़कब शुरू कऽ देलक। रोशनीक रंग पीअरसँ लाल हुअए लागल। फेर तँ ओ जिम्हर नजरि घुमाबै छल, उम्हरसँ कोदारि, कुड़हरि, हाँसू, चक्कू, पघरिया, ईंटा, पाथर, पेस्तौल कूदैत-फांगैत ललकारा दैत लखाह दै छल। कनी कालमे रोशनी नै, जना शोनितक फूही उड़ए लागल आ चारू दिस दीवार लाल भऽ गेल। ओ उठि कऽ बैस गेल आ अपनासँ बाजल- ऐ दुनियाँमे कहियो हरियरका रंग होइत छलै भाइ, ओ कतऽ गेलै? 11 जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा छल दुपहरिया। कनी काल पहिने रौद छल। ओ खाना खैले छल आ खा कऽ अखन अपना कोठलीमे पटायल छल, आकि अन्हर-बिहाड़ि। घरक सभटा खिड़की दरबज्जा भड़-भड़ करैत अपने-आप बन्द-खुलय लागल। छिटकिन्ने छिड़िया कऽ कत्तौ खसल, सभ बौस्त उघड़ा-भाँड़ हुअए लागल, जेना धरती हिलि गेल हुअए। देवार थरथराए लागल। अकास कारी भऽ गेल आ चारू दिस घोर अन्हार। ओ उठि कऽ बैसि गेल। आंगन आ लॉन पैघ-पैघ बर्फक पाथरक पथार लागि गेल आ रेलिंग टूटि कऽ खसल-धड़ाम। ओकर बाद जे मूसलाधार बर्खा शुरू भेल तँ ओ पानिक ठोप नै छल, लागल जेना ओ पानिक रस्सी हुअए जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहे तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतएसँ ई छोड़ल बा खसाएल जा रहल अछि। मेघ लगातार गड़गड़ा रहल छल- दूर नै, माथपर बिजली कड़कि रहल छल, दूर नै खिड़कीसँ भीतर आँखिमे। एकहत्तरि बरखक बूढ़ रघुनाथ आश्चर्यचकित। ई अचानके की भऽ गेल। किए भऽ रहल अछि। ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, शरीरसँ सीरक अलग केलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला गिट्टीक मदतिसँ खुजल छल आ ओ बाहर देखि रहल छल। घरक बाहर कदम्बक बड़ पैघ गाछ छल मुदा ओकरा पता नै चलि रहल छलै ऐ अन्हारक कारण, घनघोर बर्खाक कारण। छतक डाउन पाइपसँ जलधारा खसि रहल छल आ ओकर अबाज अलगसँ सुनाइ पड़ि रहल छल। एहन मौसम, एहन बर्खा आ एहन हवा ओ देखने नै छल। दिमागपर जोर देलाक बाद मोन पड़लै-साठि-बासठि बरख पहिने। ओ स्कूल जाए लागल छल- गामसँ दू मील दूर। मौसम खराब देखि कऽ मास्टर साहेब समएसँ पहिने छुट्टी देने छल। ओ सभटा बच्चा संग गाछीमे पहुँचले छल आकि बिहारि, बर्खा आ अन्हार। सभ आमक गाछक अढ़ लैले चाहलक मुदा बिर्रो हुनका घास सन उड़ेलक आ गाछीसँ बाहर धानक खेतमे जा कऽ पटकि देलक। ककरो झोरा-झपटा आ किताब-कापीक पता नै। बर्खाक बुन्नी हुनकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छल, ओ कानऽ बाजऽ लागल। बिर्रो थमलाक बाद जखन बर्खा कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ टॉर्च लऽ कऽ निकलल छल खोज लेल। ई एकटा दुर्घटना छल आ दुर्घटना नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा दुर्घटने छल जे बाहर एहन मौसम अछि आ ओ कोठलीमे अछि। कतेक दिन भऽ गेलै बर्खामे भिजला। कतेक दिन भऽ गेलै लू केर झोकसी झोकेला। कतेक दिन भऽ गेलै जेठक घाममे डुमना। कतेक दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे घुमना। कतेक दिन भऽ गेलै जाड़मे ठिठुरना, दाँत कटकटेना। की ई तइसँ होइए जे हम एकरासँ बचल रही। बचि कऽ चली। या तइसँ जे एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्ती करी, गप करी, माथपर बैसाबी। हम एकरासँ ओना व्यवहार करै छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए करै छी एना। इम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लागै छल जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य- ई मेघ, रौद, गाछ-बृच्छ, फसिल, धार-नाला, कछार, जंगल-पहाड़ आ ई सभ किछु एत्तै छूटि जाएत। ओ  सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैलऽ चाहै छल जेना ओ भले चलि जाएत, आँखि रहि जेतै, चामपर सभ चीजक थाप सोखऽ चाहैए जेना चाम केचुली सन एतऽ छूटि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका धरि पहुँचैत रहत। हुनका लागै छल जे बेसी दिन नै बचल अछि हुनका जाइमे। सम्भव अछि जे ओ दिन काल्हि हुअए जखन हुनका लेल सूर्य नै उगए। उगत जरूर, मुदा ओकरा दोसर देखत- ओ नै। की ई संभव अछि जे ओ सूरजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए- नहिये ओ रहए, नहिये उगए आ नहिये देखए। मुदा एकटा सूरज पूरा धरती तँ नै, ओ कोन-कोन चीजकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखैसँ रोकत। हुनकर बाँहि एतेक नम्हर भऽ जाइए जे ओ ओइमे पूरा धरती समेट लिअए आ मरए बा जिअए तँ सभक संग। मुदा एकटा कचोट आर छलै रघुनाथकेँ जे ओकरा कचोटि रहल छलै, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम। धरतीसँ प्रेमक। ई व्यग्रता। काल्हि सेहो ई धरती छल। ई मेघ, अकास, तारा, सूर्य आ चन्द्रमा। धार, झरना, सागर, जंगल, पहाड़। ई गली, मकान, चौबटिया। कतऽ छल ई उद्वेग। फुर्सति नै छलै एकरा सभकेँ देखबाक। आइ जखन मृत्यु बिलाइ जना आस्तेसँ कोठलीमे आबि रहल अछि तँ बाहरक जिनगी सुनाइ दऽ रहल अछि। -सत सत बताउ रघुनाथ, अहाँकेँ भेटल जकरा लऽ कऽ कहियो सोचने छलौं। कहियो सोचने छलौं जे एकटा छोट गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब। पीढ्चीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नीमक खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैस कऽ लंच आ डिनर करब। मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अवाज बाहरक गड़गड़ाहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अपना वशमे नै छल। हुनकर नजरि गेल कोनमे ठाढ़ लाठी आ छत्ता दिस। जाड़क ठंढी ओहिनो भयानक छल ऊपरसँ पाथर आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। खोललक की, ओ ओत्तै ठाढ़ छल आ अपने-आप खुजि गेलै। भीजल हवा सनसनाइत अंदर आएल आ ओ डरि कऽ पाछाँ हटि गेल। फेर साहस केलक आ बाहर निकलैक तैयारी शुरू केलक। पूरा बाँहिमे थर्मोकोट पहिरलक, ओइपर सूती अंगा, फेर ओइपर स्वेटर, ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट पहिने पहीर लेने छल। ई जाड़क भोरमे पहिर कऽ टहलैक कपड़ा छलै। छलै तँ मफलर सेहो मुदा ओकरासँ बेसी जरूरी छलै- गमछा। बर्खाकेँ देखैत। जना-जना कपड़ा भिजतै, ओ एक-एक कऽ उतारैत आ फेकैत जाएत आ अंतमे रहि जेतै ई गमछा। ओ अप्पन साज-बाजक संग अखनो पूरा आश्वस्त नै छल। उघार, बिना केसक माथकेँ लऽ कऽ ओ दुविधामे छल- कनटोप ठीक रहत बा गमछा बान्हि लिअए। पाथर जे खसबाक छल, शुरूहेमे खसि गेल छल आ आब ओकरा कोनो अंदेशा सेहो नै छलै। ओ गमछाकेँ गरमे चारू दिससँ लपेटलक आ उघारे माथे बाहर आबि गेल। आब नहिये कियो रोकैबला आ नहिये टोकैबला। ओ बाजल- हे मन। चलू। घुरि कऽ एलौं तँ वाह-वाह। नै एलौं तँ वाह-वाह। पाथरबला बर्खाक अन्हार सुरंगमे उतरैसँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भारक संग एक ठेग बढ़ब हुनका लेल मुश्किल हएत। ओ अप्पन कमरासँ निकलि आएल मुदा गेटक बाहर नै जा सकल। छत्त खुजैसँ पहिने जे पहिलुक ठोप ओकर उघार, खल्वाट माथपर खसल, ओ एतेक पलखति नै देलक जे ओ बुझि सकए जे ई बिजली कड़कल अछि आकि लोहाक किल्ली अछि जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतरे तड़बा धरि पैसि गेल अछि। ओकर पूरा शरीर झनझना उठल। ओ निराउ बर्खामे बैस गेल मुदा भीजैसँ नै बचि सकल। जखन धरि छत्ता खुजल, ताधरि ओ पूरा भीज गेल छल। आब ओ फँसि गेल छल- बर्फबला हवा आ बर्खाक बीच। हवा घास सन ओकरा ऊपर उड़ा रहल छलै आ बर्खा जमीनपर पटकि रहल छलै। भीजल कपड़ाक भार उड़ऽ नै दऽ रहल छलै आ हवा घिसियेने जा रहल छलै। हुनका एतबे टा मोन छलनि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसल आ ई तखन धरि चलल जखन छत्ताक कमानी टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बाहर गाएब भऽ गेल। आब हुनका एहन लागि रहल छल जे हवा ठाम-ठामसँ नोचि रहल अछि आ पानि दागि रहल अछि- जरैत छोलनीसँ। अचेत हैकऽ खसैसँ पहिने हुनकर दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे आएल- हुनकर मित्र। ओ दू बेर आत्महत्या करैक प्रयास केने छल- पहिलुक बेर लोहता स्टेशनक लग रेल पटरीपर नग्रसँ दूर निर्जन स्थलपर, जतऽ ककरो आएब-जाएब नै छल। समय ओ पैसेंजर बा मालगाड़ीक नै, एक्सप्रेस आकि मेलक चुनने छल। जे हैक अछि खटसँ हुअए, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल जे मेल आबैत देखलक। जाने की, ओहि सं जीवनक मोह पैदा भेल आ उठि केर भागहि मे भेल जे घुटनाक लग पइर खचाक। ई मरहि से बेसी खराब भेल। बैसाखीक सहारा आ घर बला केर गाइर अ दुत्कार। एक बेर फेर आत्महत्याक जुनून सवार भेल ओहि पर। अहि बेर सिवानक इनार। ओ बैसाखी फेंक छलांग लगैलक आ पइन मे छपाक कि बरोह पकड़ि मे आबि गेल। तीन दिन बिना खायल पियल भूखल चिल्लाबैत रहल इनार मे-आओर निकलल ते दोसर टूटल पइरक संग। आइ वएह ज्ञानदत्त बिना पएरक ज्ञानदत्त चौराहापर भीख मांगैए। मरैक आस ओकरा कतौकऽ नै छोड़लकै। मुदा ई साढ़ ज्ञानदत्त ओकर दिमागमे किए नै आएल। ओ मरै लेल निकलल नै छल। निकलल छल बुन्नी लेल, पाथर लेल, हवा लेल। ओ परिणाम निकाललक जे जीवनक अनुभवसँ जीवन पैघ अछि। जखन जीवने नै, तँ अनुभव ककरा लेल। 12 रघुनाथकेँ किछु पता नै जे ओ अप्पन कोठलीमे केना पहुँचल। के लऽ गेल। कखैन लऽ गेल। केना लऽ गेल। कपड़ा के उतारलक? देह के पोछलक आ तीस बरखक पुरना खादी आश्रमबला ओ गाउन आ ओवरकोट के पहिरलक जकर रोइयाँ झड़ि गेल छल आ जे जलफाँफीटा रहि गेल छल। ओ नीचाँसँ उघार छल आ गर्भमे पड़ल नेना सन बुक्की मारने बिछौनपर पड़ल छल। हुनका ऊपर कंबलक संग सीरक पड़ल छल जकर नीचाँ ओ दबल छल। हीटरसँ कमराकेँ गर्म कऽ देल गेल छल। हुनकर पएरक तरबामे समीर तेल रगड़ि रहल छल आ दोसर तरबामे सोनल। गरम तेलसँ अजमाइनक गंध आबि रहल छल। रघुनाथक गरसँ निकलैबला फोंफ बता रहल छल जे चिंताक कोनो गप नै अछि। ओ बेहोशीमे लागि रहल छल- नीनमे बेसी, जागलमे कम। परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल सोनल हुनका दू-तीन बेर अवाज देलक। देहमे कनी हिलडोल भेल मुदा आँखि नै खोललक। राति आधसँ बेसी बीत गेल छल। बत्ती मिझा दिअ?- समीर पुछलक। सोनल बाजल- मिझा दियौ। रघुनाथक मनमे भेल जे मना कऽ दिऐ। तरबा लग बैसैत समीर पुछलक- काल्हि कए बजे अछि अहाँक क्लास। -काल्हि नै, आइ कहू। नऽ बजेसँ। मुदा छुट्टी लिअ पड़ि सकैत अछि। -अरे नै, नीक भऽ जाएत भोर धरि। टनाटन। ठार लागि गेल अछि। ओ तँ कहू जे हम समएसँ पहुँचि गेलौं। जेना गेट लग किछु खसैक आवाज भेल, हम दौड़लौं आ देखलौं तँ पापा। (देखू ई झुट्ठाकेँ। कत्तौ नै दौड़ल। पोर्टिकोसँ डंटा कोंचि-कोंचि कऽ देखलक। अपने डरल छल जे नै जानि की भेल। कुकुड़, बिलाइ जानि कऽ।) ओइ दुनूक अवाज रतजग्गी सन छल- खस-खस आ फुस-फुस। ओ आस्तेसँ फुसफुसा रहल छल, तइसँ रघुनाथक नीन उचटै नै। ओ अपन नीचाँ कंबल ओछा कऽ राखने छल आ शाल ओढ़ने छल। -एक गप कहू जे पापा शुरूसँ एहन लोक छल? झक्की आ जिद्दी। अपना मोनक।- समीर बाजल। -पहने ई हाथ हटाउ। -केहन हाथ। -यार, सेंसेशन भऽ रहल अछि। गुदगुदी। बुझै नै छी की? -बगलमे बैसै छी तँ कखनो सुनै छी हमर। (रघुनाथकेँ बत्ती मिझाबैक रहस्य आब बुझैमे आएल। ओ सीरकक भीतर घोकचि बंद आँखिये सभ किछु देखि-सुनि रहल छल आ मारे लाजक नहिये करौट लिअ सकैत छल, नहिये हिलि रहल छल।) -सोचै छी मम्मी आ दीदीकेँ खबर दऽ दी। -जेहन अहाँ चाही, ओना जरूरत नै अछि एकर। -सोचू जौँ अहाँ नै हेतिऐ तँ की हेतिऐ? असगरे की करतिऐ हम? एइयू! अनचोक्के चिहुँकि उठल ओ। की करै छी ई? धैर्य नै अछि? -केना हएत? ठंढी तँ देखू। समीर ओकरा आर लग-आरो लग आबैत कानमे बाजल-रोकबाक अछि तँ मौसमकेँ रोकू। सुनि रहल छी- फेर टिप टिप। ई बुन्नी किछु कहि रहल छल। की कहि रहल छल? आवाज समीरक गरमे कत्तौ फँसि गेल छल आ टूटि रहल छल। -सम्मी। प्लीज।- सोनल बेचैनीमे अप्पन माथ रघुनाथक ओइ पएरपर राखलक जकर तरबा ओकर तरहत्थीपर छलै। ओकर गर्म साँस हुनकर आंगुरपर हवा कऽ रहल छल। -दोस। उठू तँ। पापा सुति गेल अछि, हुनका सुतऽ दियौ। समीर जना गिड़गिड़ाइत बाजल। सोनल ठेहुन भरे बैसल रहल आ रघुनाथक तरबापर माथ रखने सोनल बीच-बीचमे सिहरि उठए। ओ भारी टूटैत अबाजमे कहलक- बुझै किए नै छी? ऐ हालमे कोना छोड़ि दिअ हिनका? कखैन केकर जरूरत पड़ि जाए। मुदा ओकर एक नै सुनलक समीर। ओ बैसल सोनलकेँ लगभग अप्पन कोरामे उठैलक आ लेने-देने कोठलीसँ बाहर भऽ गेल। रघुनाथकेँ खराप नै लगलै। ओकर तरबामे पड़ल ओकर माथ जेना पहिने क्षमा मांगि लेने छल। अखन उमेर छेबे की करए। रघुनाथ मन बनैलक जे जौं ओ समीरकेँ प्रेम करैए आ ओकरा संग घर बसाबऽ चाहैए तँ ओ पापाक हैसियतसँ कन्यादान करबामे पाछू नै हटत। रघुनाथकेँ पूरा तरहे स्वस्थ हेबामे एक सप्ताह लागि गेलै। ओ सीरक ओछा कऽ लॉनमे पटा कऽ रौद सेकि रहल छल- दुपहरियामे। सोनल आ समीर अप्पन काजपर चलि गेल छल। सभ दिन सन अपनामे हँसी मजाक करैत। गाड़ीमे सोनलक बगलमे बैसैत समीर हाथ हिलेलक-बाइ-बाइ पापा, हैव अ गुड डे। जवाबमे रघुनाथ सेहो हाथ हिलैलक- पटायल-पटायल। के जानए, हाथ हिलल बा नै। घंटा भरि बाद हुनकर आँखि मिचमिचाएल, आकास दिस देखलक आ उठि बैसल। बैसल एहन लागि रहल छल जना लॉनमे कोनो सुखाएल बोन्साइ हुअए। आब खाली देवार छल आ ओ छल आ रौद छल।  कनी काल लागल हुनका सामान्य होइमे। -गुड डे।- ओ आस्तेसँ बाजल। -गुड डे।- ओ मुस्की देलक। -गुड्डे।- हुनकर आँखि नोरा गेल। ओ चौंकि कऽ झटपट आँखि पोछलक आ खुशीसँ हँसल। आब ओ पूर्ण रूपेँ सुस्थिर चित्त छल। मुदा के कहए पूरा तरहेँ। किएकि मास भऽ गेल छल आ कत्तौसँ कोनो खबरि नै छल- नहिये मिर्जापुरसँ, नहिये नोएडासँ, नहिये अमेरिकासँ, नहिये पहाड़पुरसँ। शाइत सभकेँ बूझल भऽ गेल छलै जे रघुनाथ हुनका सदा लेल बिसुरि गेल अछि, बिसुरि नै गेल, मरल मानि लेने अछि। माया-मोह त्यागि कऽ। कॉलोनी ओहिना निर्जन आ उदास अप्पन घरमे पैसल छल। अहिनामे हुनकर दरवाजापर एकटा बोलेरो जीप ठाढ़ भऽ गेल आ ओइसँ दूटा युवा बहार भेल। ओ वएह छल जकर चर्चा केने छल गामक सनेही। अखने किछु दिन पहिने। ओ पएर छूबि कऽ हुनकर अगल-बगलमे बैस गेल। रघुनाथ ध्यानसँ देखलक- ओ विश्वविद्यालयक लड़का सन जीन्स आ स्वेटर पहिरने छल। एकदम टीप-टॉप। भला आ सभ्य घरक। पुछलापर नाम नै बतौलक ओ। ओ सभ चौकन्ना छल आ हड़बड़ीमे लागि रहल छल। रघुनाथ चाह पानि लेल पुछलक मुदा ओकरा सभकेँ एत्ते फुर्सति नै छलै। -सर, ऐपर सिग्नेचर कऽ दियौ। एक गोटे एकटा कागज बढ़ौलक जइपर पहिनेसँ किछु लिखल छल। रघुनाथ चश्मा लगा कऽ पढ़ब शुरू केने छल जे दोसर छीन लेलक- हमरासँ पूछू ने। हम बता दै छी। पहिने सिग्नेचर करू। रघुनाथ ओकरा नीक जकाँ देखलक। ओ रिवाल्वर निकालि कऽ दरीपर हुनकर आगू राखि देलक। -कतेक देने अछि नरेश। अस्सी हजार। एक लाख। ऐसँ बेसी दाम तँ नै अछि जमीनक।- पुछलक रघुनाथ। -सिग्नेचर करै छी आकि नै। -ओ तँ कऽ देब मुदा हम दू लाख दिआए दी तँ? -दू लाख? कतऽसँ दिआएब? -एकरासँ अहाँकेँ मतलब। दिआए दी तँ? दुनू एक-दोसरा दिस ताकलक- तँ जे कही से कऽ देब। -मारि देब नरेशकेँ? -सेहो कऽ देब। -मुदा हम ओकरा मारै लेल नै कहब। काज वएह करी जइमे खतरा कम हुअए, पाइ भेटए। जतेक मामूली रकम लेल अहाँ दौड़ल आएल छी ओतेपर तँ लगही करैत अछि हमर एकटा बेटा। -तइसँ एतेक गन्ध मारि रहल छी, ओइमे नहाबै छी की। नम्हरबला लड़का हँसी केलक। -की कहलौं? रघुनाथ अप्पन हाथ कानपर लऽ गेल-कनी ऊँच बाजू। -किछु नै, बताउ तँ की करबाक अछि? पहिने पेस्तौल जेबीमे राखू आ ओ कागज हमरा दिअ बा फाड़ि दिअ। -हँ, कहू।- रिवाल्वर जेबीमे राखैत दोसर बाजल। -हमरा लेने चलू। अपहरण करू हमर आ मांगू दू लाख। -के देत अहाँ सन सड़ल-गलल बुढ़बाकेँ दू लाख। -खाली दू लाख, तइसँ जे ई पाइ दैमे कनियो नै अखरतै। भेट जाएत आ हत्यासँ सेहो बचि जाएब। -अरे के देत ऐ सड़ल-गलल केर। -सड़ल गलल छी अहाँ लेल, बेटा लेल तँ नै, बेटी लेल तँ नै। -मानि लिअ एकरामे सँ किओ पाइ दै लेल नै आएत, तखन? -से देखबाक अछि जे कियो आबैए की नै? -हमहूँ तँ सैह कहि रहल छी जे कियो नै आबए तखन? रघुनाथ क्षण भरि सोचलक- तैयो चिंता नै। एतेक गेल-गुजरल हम नै छी। एतेक तँ हमरा लग अछि जे अपनाकेँ छोड़ा लेब। -बैसल रहू हिलब नै। दुनू उठल, कनी दूर जा कऽ आपसमे खुसुर-फुसुर केलक, फेर ओत्तैसँ आवाज देलक- ठीक अछि चलू। -तँ आउ, समेटू सीरक। रघुनाथ ठेहुनपर हाथ राखि कऽ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। दुनू चकित भऽ देखलक- सीरकक की करब? -ओढ़ब, ओछाएब, सिरमा बनाएब- जरूरत पड़त तँ लुंगी बना लेब आर की? रिवाल्वरबला लड़का सीरक समेटैत पुछलक- किछु खास अछि ऐ सीरकमे? -अछि ने। बेटा पठेने अछि कैलिफोर्नियासँ। मुदा ई सीरक सन तँ नै लागैए।- दोसर संदेह केलक। -लागए नै लागए, हम तँ से कहै छी।- कहैत रघुनाथ बिदा भेल। -रौ बूढ़, जाए कतऽ छी? कमसँ कम पैसा तँ राखि लिअ। दस दिनक फोन-फान, राशन-पानी, पेट्रोल सभक। खाएब की? -सभ हमहीं करब तँ अहाँ सभ की करब? बैस कऽ नोट गानब की? रघुनाथक भौंह तनि गेलै। हुनकर भीतरक मास्टर फनफना उठल- आ सुनू, अहाँ सन लौंडाकेँ पढ़ाबैत उमर गुजरल अछि हमर, तइसँ आदरसँ गप करू। हमर जरूरत अहाँकेँ अछि, हमरा कोनो जरूरत नै अछि अहाँक। बुझलौं। रिवाल्वरबला लड़का आस्तेसँ बाजल- आस्तेसँ-चलू तँ पहिने। ओत्तै बतबै छी जे ककरा ककर जरूरत छै। -किछु कहलौं?- रघुनाथ थकमका गेल। -किछु नै, चलू। रघुनाथ जखन डंटाक सहारे बाहर आएल तखन ओकर मुँह बानरटोपीक भीतर छल आ सीरक लड़काक कन्हापर। ओ आगू जा रहल छल, दूनू अपहर्ता लड़का पाछाँ-पाछाँ- जेना ओ बेटाक संग मगन तीर्थपर जा रहल छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल किछु लघुकथा जाम छह मास पूर्व गुणेसर काका महाविद्यालसँ सेवा-निवृत भेला पछाति थैली नेने आबि जेठ बेटाकेँ फोनसँ कहलखिन- “बौआ, महाविद्यालयसँ छुट्टी पाबि गेलौं, जे धएल-धरल छल सभ आनि लेलौं। अपना-ले पेन्‍शन राखब बॉंकी दुनू भॉंइ आबि कऽ अपन लऽ लिअ।” पिताक विचार सुनि सुधीर बाजल- “बाबू, अहाँ हमरा इंजीनियर बनेलौं, तइ कर्जक अदायगी अहॉंकेँ तखन ने हएत जखन हमहूँ इंजीनियर पोता सोझहामे ठाढ़ कऽ देब। एक तँ ओहिना अहॉंक कर्ज ऊपरमे लादल अछि तैपर सँ धएल-उसारल सेहो हमहीं लेब, ई मन नइ मानैए। अहॉंक कमाइ छी जे मन फुरए से अपन करू।” जेठ बेटाक उत्तर सुनि गुणेसर काका अवाक् भऽ गेला। फेर मनमे भेलैन जे छोटको बेटासँ किए ने पुछि लिऐ। नम्‍बर लगा मोबाइलसँ कहलखिन- “बौआ, जिनगी भरिक जे धएल-उसारल छल से थैली आनि लेलौं। अहॉं दुनू भॉंइ अपन लऽ लिअ।” इंजीनियर रणधीर जबाव देलकैन- “बाबू, हमरा लिए जहिना अहॉं तहिना भैया छैथ, तँए दुनू गोरे पहिने विचारि लिअ। हम मानि लेब।” रणधीरक उत्तर सुनि गुणेसर कक्काक मनमे पिनपिनी जगलैन। पिनपिनाइत बुदबुदेला- “सभ देह छीपैए। हमरा बुते एते रूपैआ राखल हएत। घरमे राखब, चोर चोरा लेत। बैंकमे हिसावे-वाड़ी गड़बड़ाइत रहत। के अनेरे भरि बुढ़ाड़ी पाइयेक मगजमारीमे लागल रहत।” मन दुनू बेटापर गेलैन। अपन कएल कृत्‍य आगूमे अबिते मन कलैश गेलैन। कलैश ई गेलैन जे अपने जे कमेलौं, तहीसँ परिवारकेँ ने ठाढ़ रखलौं। दूटा बेटा दुनू इंजीनियर। अपने सभ दिन समाजक बीच गाममे रहलौं, अखनो छी। कहियो केकरोसँ मुहॉं-ठुठी नइ भेल। यएह ने जे बुढ़ाड़ी केना खेपब। बुढ़ाड़ी तँ मन रोग छी। जिनगी जहिना खेपैत एलौं हेन, तहिना खेपैक ओरियान बात करैत रहब, बुढ़ाड़ीकेँ ठेलैत रहब...। गुणेसर काका संस्‍कृत महाविद्यालयसँ आचार्य केला पछाति गामसँ तीन कोस हटल संस्‍कृत महाविद्यालयक नोकरीसँ जिनगी शुरू केलैन। ताधैर माइयो-बाबू जीविते रहैन। पनरह-बीस बर्खक पछाति मुइलैन। चारि बीघा अपन जोतक संग चारि बीघा बटाइयो खेती पिता करैत आबि रहल छेलखिन। जे हुनका परोछ भेला पछाति गुणेसर काका ओइ खेतकेँ आपस करैत अपनो खेत बटाइ लगा लेलैन। पढ़ै-लिखै दिस रूचि बेसी रहने दुनू बेटाकेँ इंजीनियरिंग तकक शिक्षा दियौलखिन। आइ दुनू बेटा एकटा सरकारी दोसर प्राइवेट नोकरी पाबि जीवन-बसर कऽ रहल छैन। दुनू बेटाकेँ जहिना दरमाहा तहिना उलफियो आमदनी आ जहिना नियमित ड्यूटी तहिना उलफी ड्यूटियो। काजक बोझक संग आमदनियोँक बोझ तर दुनू दबले। तँए विचारमे फुहरपन। जही महाविद्यालयमे गुणेसर काका पढ़लैन तही महाविद्यालयमे नोकरियो भेलैन। ओना जखन गुणेसर काका गामेक स्‍कूलमे पढ़ैत रहैथ तखन गाछक पात जकॉं पढ़ैयो-लिखै दिस विचार डोलबे करैत रहैन। जहिना पात डोलबो बुझैत आ असथिरो रहब बुझैए, मुदा जइ गाछक छी ओइ गाछोकेँ ई बात बुझैमे थोड़े अबै छै। एबो केना करतै, पात जकॉं गाछ थोड़े असथिरो रहैए आ डोलबो करैए। ओ तँ शील-गुणसँ भरल अछि, तँए पात जकॉं डोलबे किए करत। आने बाल-बोध जकॉं गुणेसरो कक्काक मन उमैड़ जाइन, हमहूँ डाक्‍टर बनब। तँ कहियो नाटक मण्‍डलीक कलाकारकेँ देख कलाकार बनैले। तहिना आनो-आन चढ़ल-बढ़ल-ले। मुदा से सभ गुणेसर काकाकेँ हाथ नै लगलैन। साधारण जिनगी जीनिहार पिता गामक स्‍कूल पास केला पछाति मुँह फोड़ि गुणेसर काकाकेँ कहलकैन- “जेतए तूँ पढ़ऽ चाहह, स्‍वेच्‍छासँ पढ़ि सकै छह मुदा अपन परिवारोक ऑंट-पेट देख लहक। पॉंच बर्खक बीच एक-दूटा रौदी आ नइ तँ एक-दूटा दाही होइते अछि, तेकरे पुरबैत-पुरबैत बेदम रहै छी। गामपर सँ जँ आबि-जा कऽ पढ़बह, तेते सम्‍हैर सकै छह।” मिडिल स्‍कूलसँ निकलल गुणेसर कक्काक मनमे यएह उजैहिया उठल जे आगूओ नाओं लिखा कऽ पढ़ब। गामसँ तीन कोस हटल संस्‍कृत विद्यालय, महाविद्यालय। संयोग बैसि गेलैन। गुणेसर काका संस्‍कृत विद्यालयमे दाखिल भऽ गेला। परिवारसँ लऽ कऽ विद्यालय, महाविद्यालय तक सात्‍विकतासँ भरल। जेहने किसान परिवार तेहने शिक्षण संस्‍थान। लिखै-पढ़ैक सामग्रीक अतिरिक्‍त मात्र देहक वस्‍त्र आ पेटक भोजन दैत गुणेसर काका एके गतिये शिष्‍य-गुरु होइत गुरु-शिष्‍य बनि जिनगी जीबए लगला। ताधैर कोनो व्‍यसन औझका पढ़ुआ जकॉं नै। मुदा विद्यालयो-महाविद्यालयमे तमाकुल आ भॉंगक चलैन देखैथ। परिवारोमे पिता सॉंझे-साँझ देहक थकान भगबैले भॉंगक गोली खाइ छेलैन। संगे तमाकुलो खाइत रहथिन। ओना दुनू बाड़ी-झाड़ीक उपजा छी, तँए समस्‍यो नहियेँ। मास दिन तक गुणेसर काका गुन-धुनमे पड़ल रहि गेला मुदा ई नइ सोचि पेला जे ऐ थैलीकेँ की करब। अपना बेटी नै तँए बेटी बिआहक खर्च नइ बुझल रहैन। समाजोक बेटी बिआहक काजमे कहियो अगुआइ नै केने जे तहूसँ बुझल रहितैन। घर बेटे बना नेने छेलैन। खेतोक उपजा ओते भाइए जाइ छेलैन जइसँ अन्न-पानिक कहियो असुविधा नै भेलैन। कपड़ा-लत्ताक खर्च सेहो नापल-जोखल रहैन। माने एकदम समटल। स्‍पष्‍ट सोच रहैन जे जैठाम एको वस्‍त्रसँ काज चैल सकैए तैठाम गाहीक-गाही आकि दर्जनक-दर्जन वस्‍त्रक कोन खगता। अनेरे पाइकेँ दुरुपयोग करब भेल। देखा-देखी पत्‍नियोँ तहिना रहैन। तैपर सँ दुनू बेटो आ दुनू पुतोहुओ अपना-अपनी हथियबैले सेहो सभ मौसमक सभ कपड़ा ओते दाइए दइ छैन जे देख-देख दुनू परानीक मनमे सवुर बनले रहै छैन। ऐ जनमसँ ओइ जनम धरि केतबो धाङ्गि कऽ पहिरब तैयो ने फटत-सठत। अखन धरि पाइक जानकारी तेना भऽ कऽ गुणेसर काका पत्‍नीकेँ नै कहलखिन जे अढ़ाइ लाख टाका पैछला धएल-धरल भेटल। एतबे कहने रहथिन जे नोकरी छूटि गेल मुदा जाबे जीब ताबे दरमाहा भेटैत रहत। जइपर पत्‍नी अह्लादित होइत कहलखिन- “भरि दिन बोनाएल रहै छी, कखनो एतबो सोचै छिऐ जे जेकर हाथ पकैड़ घरमे रखने छी, तेकरा की भेल।” फुलतीक बात गुणेसर काका बूझि गेला मुदा मन तँ थैलीमे घुरियाएल रहैन। उतारा देलखिन- “अहींले भरि दिन रने-बने वौआइ छी आ तैपर सँ अहीं उपरागो दइ छी। ” पतिक बात सुनि फुलतीक मन फुला गेलैन। भकरार फूलक पत्ती जकॉं ऑंखि निराड़ि सूरमाक सुगंधसँ अरियातैत ऑंखि पतिक पावन वनमे अँटैक गेलैन जइसँ मुँहक बोलीए ठमैक गेलैन। जेकर लाभ गुणेसर काका उठौलैन। लाभ ई उठौलैन जे भने बक्-झकसँ नीक जे अपन काजक बात विचारब। मुदा से भेलैन नै। आगूसँ पत्‍नीक नजैर तेना नजैरमे गड़ल रहैन जे अजगर सॉंप जकॉं नजैर काते ने हुअए देलकैन। मनमे उठलैन- पत्‍नियोँ केँ किए ने पुछि लिऐन जे पाइकेँ की करब। अखन तँ नजैरक सोझ वएह छैथ। फेर भेलैन जे पाइक काज अपना हाथे ओ कहियो केलैन कहॉं। दोकानक काज, बजारक काज, तीर्थो-बर्थक काज, सभ दिन तँ सभठाम अपने हाथे केलौं। कहियो एको पाइ छुलैन कहॉं, तखन हुनका केना कहबैन जे पाइकेँ की करब? संयोग भेल ओही रस्‍ते हमहूँ जाइत रही, जखन हुनका घरक सोझे गेलौं कि मन पड़ल जे गुणेसर काका सेवा निवृति भऽ गेला, तँए भेँट कऽ लिऐन। रस्‍ता छोड़ि दरबज्‍जा दिस बढ़लौं कि देखलयैन जे दुनू बेकती ऑंगनमे किछु विचारि रहल छैथ। मनमे भेल से नइ तँ कनी विलैम जाइ। मुदा से भेल नै। डराएल खढ़िया जकाँ गुणेसर काका चारू दिस सेहो चौकन्ना होइत रहैथ। ओना हम ऑंखिक सूत निच्‍चॉं उतारि नेने रही, तैयो अँगनेसँ देख लेलैन। बजला- “आबह-आबह बौआ जोगू आब ते तोरा सबहक बीच एलौं, तोहीं सभ ने खोजो-खबैर लेबह आ जेना रखबह तेना रहब।” एक-हरफी गुणेसर काकाकेँ बजैत देख बिच्‍चेमे रोकि कहलयैन- “काका गोड़ लगै छी।” अपन मनक विचार रोकि गुणेसर काका असीरवाद दैत पुछलैन- “बौआ, सभ आनन्‍द छह किने?” कहि पत्‍नीकेँ कहलखिन- “जुग बदैल गेल, आब जे तकै छिऐ बदामक पनिसल्‍ला, गुड़क गोली आ पानिसँ अभ्‍यागत आकि गौंउए-घरूआक सुआगत करब, से आदैत छोड़ि दियौ। जाबे जुआन छेलौं ताबे जे मन फुरल से केलौं। आब एक उमेरपर आबि गेलौं, तँए समए देख संग चलू। पहिने चाह बनाउ। चुल्हिये लग सभ बैसि गपो-सप्‍प करब आ चाहो पीब।” सएह भेल। ओसारेक चुल्हिपर फुलती काकी चाहो बनबए लगली आ दुनू गोरे माने हमहूँ आ गुणेसरो काका पीढ़ियापर बैसि गप-सप्‍प शुरू केलौं। पुछलयैन- “काका, सोल्‍होअना चैल एलौं आकि नाङैर-ताङैर लसकले अछि।” अकचका कऽ गुणेसर काका बजला- “से की कहलह, बौआ?” कहलयैन- “सेवा-निवृतिक पछाति जे किछु जमा-जिगिर भेटैए, तेकर कागजे ऑफिसमे तेना ओझरा जाइ छै जे जेते भेटैए तइसँ बेसी चैले जाइए। दौड़-बरहा तेते होइए जे सभ ठेही मेटा जाइए। यएह भेल लसकब। जेकरा ऑफिसबला सभ लुक्‍खीक नाङैर जकॉं तेना सुरैर लइए जे पछाति बुझिए ने पड़ैए जे लुक्‍खीक नाङैर छी आकि...।” नमहर सॉंस छोड़ैत गुणेसर काका बजला- “से सभ सगुन नीक रहल। कौलेजक एकटा किरानी सभ काज कऽ देलैन। सेवा-निवृतिक तेसरे दिन सोलहन्नी फारकती पाबि चैल एलौं।” पुछलयैन- “केते जमा भेटल?” ‘केते’ सुनि गुणेसर काका सकपकेला। सकपकेला ई जे पाइ-कौड़ीक बात छी। केते राजा-महराजा माटिमे गड़ल मुदा चोरी-चपाती होइते आबि रहल अछि। तँए पाइ-कौड़ीक बात अनका लग बाजब खतरासँ खाली नइ अछि। परिवारमे अखन धरि जे पाइक मोल, बेटासँ लऽ कऽ पत्‍नी धरिक रहलैन ओ गुणेसर कक्काक मनमे लगल जामकेँ किछु कम केलकैन। संग-संग अपन वृत्ति जे रहलैन ओ कहियो झूठ-फूस, लाथ-कुलाथक नै रहलैन तँए मनमे शक्‍ति-शिरोमणिक अंकुर रहबे करैन। बजला- “बौआ, अढ़ाइ लाख जमा भेटल।” कहलयैन- “बहुत रास भेटल, भगवान बेटो तेहेन देलैन जे पाइक धार फोरबे करता।” हमर बात सुनि जेना गुणेसर कक्काक ऑंखिक धारमे शुभ्रता एलैन। ओना अखन धरि अशुभ्रतो नहियेँ आएल छेलैन, मुदा ओहन शुभ्रता एलैन जइमे फरिचपन बेसी रहैन। तहूमे पाइक धार सुनि गुणेसर काका पाइयेक धारमे भँसि गेला। भँसैत-भँसैत बजला- “बौआ, पाइकेँ की करब से किछु फुरबे ने करैए।” गुणेसर कक्काक बात सुनि अचम्‍भामे पड़ि गेलौं जे ई की कहि देलैन। पाइयेक पाछू लोक पागल भेल अछि। एको बीत जगह आकि एकोटा एहेन काज बॉंकी नइ अछि, जैठाम पाइक झीका-झीकी नइ भऽ रहल अछि। तैठाम गुणेसर काका एहेन बात कहलैन जे पाइकेँ की करब! जँ एहेन प्रश्‍न उठैए तेकर माने तँ यएह ने हएत जे कोनो सामाजिक काजमे खर्च करए चाहै छैथ, जँ अपन व्‍यक्‍तिगत काज रहतैन तँ की अनका देहक नापसँ कुरता आकि पैरक नापसँ जूता कीनैक विचार करितैथ? ओना गुणेसर कक्काक जीवन पठने-पाठनक रहलैन, जइसँ जिनगीमे मीठास आबि गेल छेलैन। मीठास ई जे कटु शब्‍दक जगहपर मधुआएल ओहन शब्‍दक प्रयोग करै छैथ जे कटुओ मधुर जकॉं बूझि पड़ैए। तैठाम हमरा सन छौड़ा-माड़ए विचारक होइन, ई केते उचित हएत? मुदा जँ पुछलैन तखन जँ किछु नहियोँ कहबैन तैयो तँ मनमे शंका हेबे करतैन। तेतबे नइ, पाइ-कौड़ीमे चुप्‍पी लाधब षडयंत्रो भऽ सकैए, जे खतरनाक भेल तँए...। मुदा किछु फुरबे ने करए जे की कहिऐन। फेर मनमे भेल जे दूटा बेटो छैन, दूटा पुतोहुओ भेलैन, तैपर सँ पत्‍नियोँ छैन, हमरा-हिनका बीच समाजी-परिवारी सम्‍बन्‍धो अछि, तैबीच हमरो परिवारजन छैथ आ हिनको छैन। कहलयैन- “काका, जे पाइ सेवा-निवृतिक पछाति भेटल ओ तँ परिवारक भेल, तैबीच काकियो छैथ, तँए हुनकेसँ पहिने विचार किए ने लेल जाए।” परिवार सुनि गुणेसर कक्काक मन विचलित भऽ गेलैन, बजला- “विचार ते अपनो सएह छल मुदा दुनू बेटा ऐ पाइसँ देह छीप लेलक।” ‘बेटा देह छीप लेलकैन’ सुनि छगुन्‍तामे पड़ि गेलौं। छगुन्‍ता ई जे अही पाइ दुआरे बाप-बेटामे कपर-फोरौवैलसँ लऽ कऽ केस-मोकदमाक संग अनुकम्‍पाक नोकरी दुआरे जहर-माहूर तक बेटा-पुतोहु दइले तैयार भऽ जाइए, आ तैठाम एहेन बात! छुब्‍द भऽ गेलौं। लगले मनमे उठल जे ई तँ परोछा-परोछीक बात भेल किने। मुदा पत्‍नी तँ लगमे छथिन किए ने अपने मुहेँ पुछिऐन। पुछलयैन- “काकी, काका थैली लऽ कऽ एला से की करब?” जिनगी भरि ओहन संगी जकॉं फुलती काकी रहली जे पतिसँ कहियो परिवारक आमद-खर्चक बात नै पुछने रहैन, तैठाम थैली सुनि...। बजली- “थैली थैलीबलाक छिऐन आकि हमर छी। अपन थैली धरममे लगबैथ आकि कुधरममे, ई तँ ओ जानैथ जे पूजामे लगाएब आकि रण्‍डी नचाएब। हुनका पाछू हम वौआइले जाएब। जहिना सभ दिन पदमिनी भेल घरमे रहलौं, तहिना रहब।” काकी बाजि कऽ चुप भऽ गेली। मुदा ‘पदमिनी’ सुनि हमरो मन विहुँसल आ गुणेसरो काका ठोर पटपटबए लगला- “भवति कमल नेत्रा...।” जेना अपन विचारकेँ प्रश्‍न बना गुणेसर काकाकेँ पुछने होथि। तेहने स्‍थिति बनि गेल। एक तँ ओहिना गुणेसर काका अपने बेथे बेथाएल रहैथ तैपर एकटा बेथा आरो चढ़ने मन झूकि गेलैन। एक बेर हमरा दिस तकैथ आ दोसर बेर पत्‍नी दिस। चकोना होइत देख कहलयैन- “काका, अपना जीविते दुनू परानी अपन श्राद्ध ऐ पाइसँ कऽ लिअ।” जहिना धारक मुहकेँ नवका पेट वा नवका मुँह भेटने ओम्‍हरे धारा तेज भऽ जाइए तहिना गुणेसर काकाकेँ भेलैन। बजला- “बौआ, जिनगीक अन्‍तिम चरणमे आबि गेलौं, बहुत लोकक श्राद्ध देखलिऐ। केकरो जशो भेल, केकरो अजशो भेल, मुदा दुनूक फल की भेल से अखनो धरि नइ बूझि पेलौं हेन। तैपर तूँ तेहेन विकट बात कहि देलह जे...।” कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला मुदा ‘तूँ विकट बात कहि देलह’ सुनि हमरो गर भेटल। पुछलयैन- “की विकट बात, काका?” गुणेसर काका बजला- “बौआ, जिनगी भरि व्‍याकरणे आ साहिते पढ़बो केलौं आ पढ़ेबो केलौं, मुदा...।” प्रश्‍नसँ हटैत गुणेसर काकाकेँ देख पुछलयैन- “एकरा के काटत, काका?” हमरा बातसँ गुणेसर काकाकेँ जेना सह भेटलैन तहिना आगू बढ़ैत बजला- “बौआ, अपन श्राद्ध अपने केना करब?” कहलयैन- “जहिना आन-आन जे जीवितेमे भोज कऽ लइ छैथ तहिना अहूँ अपन करब।” वामी-दहिनी मुड़ी डोलबैत गुणेसर काका बजला- “देखहक, जेकरा श्राद्ध बुझै छहक, ओइमे दूटा काज अछि। एकटा अछि भोज आ दोसर अछि कर्म। जे कर्म मुइला पछातिक अछि ओ जीवितमे केना हएत?” गुणेसर कक्काक विचार बूझिए ने पाबि रहल छेलौं। गाममे केतेको गोरे अपना जीविते श्राद्धक भोज कऽ नेने छला, जे बुझल छल, तइ हिसावसँ कहने छेलिऐन। बजलौं- “कनी अपना बातकेँ सोझरा कऽ कहियौ।” कहलैन- “देखहक, श्राद्धक कर्म प्राण छुटला पछातिसँ शुरू होइए। कियो-कियो श्रद्धा-पूर्वक नत-मस्‍तको होइ छैथ। मुदा प्राण निकलला पछाति कन्ना-रोहटसँ प्रकिया प्रारम्‍भ भऽ जाइए। बॉंस काटल जाइए, कपड़ा बजारसँ आनल जाइए, बॉंसक चचरी बनौल जाइए इत्‍यादि...; चचरीपर उठा असमसान घाट गेला पछाति लहास जरबैक प्रक्रिया शुरू होइए। से केना जीवितेमे हएत?” गुणेसरे कक्काक विचारक धारमे हमहूँ बोहि गेलौं। कहलयैन- “से केना हएत।” गुणेसर कक्काक मन अपन विचारक सफलता देख उत्‍साहित होइत रहैन। कनी अँटैक बजला- “आब लए भोजक।” कहि फेर चुप भऽ गेला। मने-मन जेना किछु विचारए लगला तहिना बूझि पड़ल। मुदा कनियेँकाल जखन ऑंखि-पर-आँखि देलिऐन कि जेना किछु मन पड़लैन। बजला- “बौआ, साहितक विद्यार्थियो रहलौं आ विद्यार्थीकेँ पढ़ेबो केलौं। से कोनो साल-दू-सालक समाजक साहित्‍य नै, हजारो-हजार बर्खक। सभ दिन समाजकेँ एक नजैरसँ देखैत एलौंहेँ, मुदा...।” ‘मुदा’ कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला। जेना बीचक कोनो बात बिसैर गेल होथि। टोकारा दैत कहलयैन- “काका, एना जे मुड़ी छोपि कऽ तम्‍मासँ सिदहा लगाएब तखन तँ भेल।” हमर बात गुणेसर कक्काक मनक विचारकेँ जेना खोंचारि देलकैन तहिना खोंरनी नेनहि विचार जगलैन। बजला- “बौआ, समाजकेँ जे भोजो खुएबैन, से समाजो की समाज रहल। रंग-रंगक समाज बनि गेल अछि। ई जाति, उ जाति! ई दियाद, उ दियाद! ई टोल, उ टोल! ई गाम, उ गाम...! केते कहबह।” जेना हमरो भक् खुजल। कहलयैन- “हँ, से ते ठीके।” ‘ठीके’ सुनि जेना गुणेसर कक्काक विचारमे सकताहट एलैन तहिना बूझि पड़ल। बजला- “बौआ, नाङैर-बिनु-नाङैरक, पूछ-बिनु-पूछक, पुछड़ी-बिनु-पुछड़ीक..., तेते रंगक ने लोक भऽ गेल अछि जेकरा समटब असाध अछि। जेकर पुछड़ी छोट तेकर दैछना नमहर! आब तोहीं कहह जे एक तँ भोज खाइमे बिहंगरा ठाढ़ करत, जे कियो कहत भत-भोज करू, तँ कियो कहत भाते ने खाएब। तैपर सँ ई कहत जे खेबो करब आ दैछनो लेब। एक गोरेकेँ दैछना देबै आ दोसर गोरेकेँ नइ देबै से मन मानत?” कहलयैन- “बड़ ओझरी बूझि पड़ैए, काका। तखन अपने मुहेँ बाजू जे अपन अभ्‍यंतर की कहैए?” ‘अपन अभ्‍यंतर’ सुनि गुणेसर काका ओहिना जिनगीक पोखैरमे डुमकी मारलैन जहिना कियो पोखैरक जाठि लग डुमकी लगा माटि उखारि ऊपर उठि जाठिक टोइयापर लगा अपनाकेँ धन्‍य बुझैए। अभ्‍यंतरक आत्‍माराम रूपमे बजला- “बौआ, ऐ दुनियॉंमे मनुखक जँ कोनो सम्‍पैत अछि तँ ओ छी साहित, मुदा एतबे बुझल अछि।” कहि गुणेसर काका दुनियॉंक बोनमे हेरा गेला। जहिना हजारो-लाखो रंगक नीक-सँ-नीक फल दइबला बोनक गाछ जे फलसँ लदल किए ने रहौ, मुदा अनाड़ीले ओ बोनफड़ भेल जे लोक नइ खाइए, तहिना दुनियॉंक सघन बोनमे गुणेसर काका मात्र एकटा साहित्‍यिक बात बुझै छैथ। सेहो किताबक। समाजमे माने मनुखक बीच साहित्‍य कोन रूपे जोड़ल अछि वा जोड़ल जा सकैए, ई बात काका नइ बूझि पाबि रहल छैथ। ओना व्‍याकरणक सन्‍धि-विच्‍छेद आ समास सेहो मनमे नचैत रहैन जे एकटा टुकड़ी करैबला आ दोसर टुकड़ीकेँ जोड़ैबला छी, मुदा तेकरा ओ व्‍याकरणक मात्र अंग बूझि-मानि बुझैत एला अछि। मुदा ओ तँ अक्षरक विन्‍यास भेल, मनुखक विन्‍यास तँ ओइसँ भिन्न छै, तैठाम गुणेसर काका हेरा जाइ छला। लूटमे चरखा नफा। विचारक दुनियॉंमे जँ कियो बानर जकॉं चढ़ल होथि तखन जे गाछपर चढ़ल बानर जकॉं निच्‍चासँ खोंचार देबइ तँ नइ मनुख जकॉं तँ बानरो जकॉं तँ खबखबेबे करता...। कहलयैन- “काका, अहॉं कनारि असुल रहल छी?” ‘कनारि’ सुनि चकोना होइत गुणेसर काका बजला- “से की, से किए उपराग दइ छह- बौआ?” कहलयैन- “काका, अहॉंक विद्यालयमे हम नइ पढ़लौं तँए अहॉं अपन विद्यार्थी नै बूझि छिपबै छी।” गुणेसर काका ठमैक गेला। ऑंखि उठा हमरोपर दैथ आ निच्‍चो खसा लथि। मने-मन सोचए लगला जे जइ विद्यार्थीकेँ पढ़ेलिऐन ओतबे ने हमर गुण लेबो केलैन आ पेबो केलैन, मुदा जे ऐसँ बाहर रहला, हुनका हम की देलिऐन आ ओ हमरा किए चिन्‍हता? पढ़ल-लिखल रहितो हम कोन काजमे हुनकर सहयोगी भेलिऐन? जखन सहयोगी बनबे ने केलौं, तखन सहयोगक केते आसा कएल जाए...? ...आखिर एना भेल किए? साहित्‍य तँ सबहक छी, सभ-ले अछि। हम साहित्‍यक उपदेश करैबलाक जिम्‍मामे छी, तखन किए ने बूझि पाबि रहल छी जे जेतबे लोक विद्यालय-महाविद्यालय देखलक तेतबे लोकक छी आ बॉंकी लोकक नइ छी। तखन? जरूर केतौ साहित्‍य आ समाजमे खाधि अछि जइमे ई दूरी बनि गेल अछि। मुदा आब काइए की सकै छी। आब तँ ने ओ देवी रहल आ ने ओ कराह! हारल सिपाही जकॉं गुणेसर काका बजला- “बौआ, लोक उमेरे नइ जेठ होइए, बुधिये जेठ होइए। एकटा विचार पुछै छिअ।” ‘पुछै छिअ’ कहि गुणेसर काका चुप भऽ गेला। हमरो कोनो गरे ने लगए जे किछु पुछितिऐन। की पुछता की नइ पुछता से पेटक बात केना बुझब? जँ बाते ने बुझब तखन कहबैन की! नजैर उठा ऑंखिपर देलिऐन तँ बूझि पड़ल जे मनमे किछु खुर-खुरा रहलैन हेन। नजैर निच्‍चॉं करिते रही कि बिच्‍चेमे गुणेसर काका बजला- “बौआ, पाछू उनैट तकै छी ते बूझि पड़ैए, दुनियॉंमे केतौ कियो ने अछि। पत्‍नीकेँ देखै छिऐन तँ बूझि पड़ैए जे सोल्‍होअना देह ऊपरमे खसौने छैथ। बेटा सभ सहजे देह छिप फुह खेलाइए। समाजमे केकरो कोनो एकटा बोलोसँ, उपकार नइ केलिऐ तँ किए ऐ बुढ़ाड़ीक भार अपना कपार लेत।” गुणेसर कक्काक विचार सुनि बूझि पड़ल जे संयासीक अवस्‍थामे पहुँच रहला अछि। कहलयैन- “काका, अहॉं तँ संयासीक ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल छी जेतए लोक दुनियॉं-ले जानो-परान दइए आ दुनियॉंकेँ गरियेबो करैए जे दुनियॉं झूठ छी।” हमर बात गुणेसर काकाकेँ नीक लगलैन। जिज्ञासु बनि बजला- “बौआ, आब आगू की करी से कनी तोहीं कहह?” पानिक धार निच्‍चॉं मुहेँ ने तेज गतिये चलैए, हवा तँ नइ छी जे जेमहर मन फुरतै तेम्‍हरे दौड़ो जाएत आ असथिरोसँ चलत। मनमे उठल, सभ दिन गुणेसर काका शिक्षकक रूपमे रहला, आइ अपने शिक्षकक खगता भऽ गेलैन! चेतन अवस्‍थामे नइ छैथ सेहो बात ने अछि। मनक आगूमे विचारक पट बन्न छैन जे खुलि नै रहलैन हेन, तँए खटखटबै तँ छैथ मुदा...! कहलयैन- “काका, अपने साहित्‍यसँ तँ जिनगी भरि सटल रहलौं, मुदा समाजसँ हटि गेल छी, यएह बीचमे...।” हमर बात सुनि गुणेसर काका चौंकैत बजला- “ठीके कहै छह, बौआ। सभ दिन किताबकेँ साहित्‍य बुझैत एलिऐ मुदा समाजे साहित्‍य छी।” हलसैत-कलशैत गुणेसर काकाकेँ देख कहलयैन- “काका, पाइकेँ अही काजमे लगा दियौ।” विचारक धारमे गुणेसर काका बोहिते रहैथ, बजला- “बेस कहलह, बौआ।” पॉंचम मास। गुणेसर कक्काक मन असथिरसँ मानि गेलैन जे अपन जिनगी भरिक जे धएल-धरल अछि ओ समाजक हितमे लगा देब। जइसँ पाइयोक कल्‍याण हएत। जँ नीक काजमे नइ लगत तँ अनेरे गलि-पचि कऽ नष्‍ट हएत। पॉंच मास पूर्वक गुणेसर काका आब ओ नइ रहला जे छला। खोज करैत-करैत एला, हमहूँ हुनके ऐठाम जाइले तैयार होइत रही। कहलैन- “बौआ, आइ सभ काजक अन्‍तिम विचार कऽ लइक अछि।” कहलयैन- “लिखा-पढ़ीक काज अछि, ऐठाम असुविधा हएत।” दुनू गोरे विदा भेलौं। फुलती काकी पहिनेसँ चाहक ओरियान केने रहैथ। पहुँचिते तीनू गोरे चाह पीलौं। चाह पीला पछाति कहलयैन- “काका, अपने ते सब दिन समाजकेँ एक नजैरे देखलिऐ।” कहलैन- “हँ।” कहलयैन- “गामक जन-जनक मन-मनक विचार मंचपर आबए, ऐ ढंगसँ कार्यक्रमक तैयारी हेबा चाही। बेटा सभ की कहलैन?” हँसैत गुणेसर काका बजला- “दुनू भॉंइ कहलक हेन जे अहॉं नीक कार्यक्रमक योजना बनाउ। सात दिन पहिने हम सभ आबि जाएब।” सोचैत-विचारैत सात दिनक कार्यक्रम बनल। गामक एक-एक जनकेँ सुनबो-ले आ बजबो-ले सभकेँ समए भेटैन। जइमे छह दिनक बारह बैसार हएत। अड़ोस-पड़ोसक जे साहित्‍य प्रेमी छैथ, हुनको आमंत्रित कएल जाइन। आ अन्‍तमे दिल्‍लीक डाक्‍टर त्रिलोकी चरणक साहित्‍य पाठसँ सातम दिन समापन कएल जाए। सएह भेल। काल्‍हि छह दिनक बारहो बैसार समाप्‍त भऽ गेल। आइ अन्‍तिम सातम दिन त्रिलोकी चरणक कार्यक्रम छैन। दिल्‍लीसँ पटना हवाइ जहाजसँ औता आ पटनासँ चरिचकिया गाड़ीसँ दू बजेक कार्यक्रममे पहुँचता। कार्यक्रम शुरू भेल। गामसँ अड़ोस-पड़ोसक सभ साहित्‍य प्रेमीक जुटान रहबे करए। मंच गनगनाइत। डा. त्रिलोकी चरण पटनासँ गामक रस्‍ताक जाममे फँसि गेला। मोबाइलसँ बेर-बेर खबैर होइत रहए जे जाममे त्रिलोकी बाबू फँसल छैथ। जाममे फँसल त्रिलोकी बाबू मने-मन सोचैत रहैथ जे केतौ भाषाक जाम, केतौ विचारक जाम, केतौ बेवहारक जाम अछि। समाज तँ जाममे फँसि गेल अछि। कथीक जाम छी, मनमे उठिते त्रिलोकी बाबू एक गोरेकेँ पुछलखिन- “कथीक जाम छी?” ओ कहलकैन- “एकटा पाथरक मुरती उखरल जे दूधो पीबैए आ बजबो करैए। तेकरे देखैले परोपट्टाक लोक उनैट कऽ जा रहल अछि। तेकरे जाम छी।” जहिना थोपड़ीक गड़गड़ीसँ मंच सजल तहिना थोपड़ीक गड़गड़ीसँ उसैरो गेल। आठ बजे रातिमे डा. त्रिलोकी चरण पहुँचला। पहुँच तँ गेला मुदा एलहो बाधित भऽ गेलैन आ आपसीक सभ कार्यक्रम सेहो बाधित भऽ गेलैन। शब्‍द संख्‍या- 3355, 29 जुलाई 2015 गण्‍डा तीन सालक पछाति करिया भायसँ भेँट भेल। ओना सालमे मास दिनक खातिर एक बेर साले-साल गाम अबिते छैथ मुदा संजोग एहेन भेल जे पैछला दुनू बेर भेँट नै भऽ सकला। तेकर कारण भेल जे एक बेर रामेश्वरम् चैल गेल रही। जइमे डेढ़ मास लगल, तइ बिच्‍चेमे एला आ गेला, तँए नै भेँट भेल छला आ दोसर बेर सासुक ऑपरेशनमे लहेरियासरायक अस्‍पतालमे बझि गेल रही, तँए नै भेँट भऽ सकल छला। मुदा ऐ बेर से सभ नै भेल, गामेमे रही। भेँट होइते करिया भायकेँ पुछलयैन- “भाय साहैब, अण्‍डा सबहक की हाल-चाल अछि?” जेना मनमे विचारले रहैन कि की, तहिना मुहसँ खसिते करिया भाय जबाव देलैन- “की हाल-चाल रहत, सभ गण्‍डा भेल जाइए!” ‘सभ गण्‍डा भेल जाइए’ सुनि मनमे ठहकल- एना किए करिया भाय जबाव देलैन? मुदा प्रश्‍नोत्तर तँ संगी-साथीक बीचमे ने चलैए, ऐठाम तँ से नइ अछि। उमेरोमे करिया भाय दस साल जेठ छैथ आ सभ दिन आदरक नजैरसँ सेहो देखैत एलिऐन अछि तँए धॉंइ दऽ प्रश्‍न दोहराएब उचित नै बुझलौं। मुदा अण्‍डा गण्‍डा भेल जाइए, उत्तरो तँ साधारण नहियेँ अछि। साधारण ई जे सोझा-सोझी विपरीत उत्तर भेल। कियो कोनो प्रश्‍न ओहिना तँ नइ उठबैए। कियो गपक सहमे पड़ि सहे-सह सन्‍हिया उठबैए, आ कियो मन-मरदनसँ उठबैए। हमर कारण दोसर नम्‍बरक अछि। मनमे उठल दिल्‍ली सन शहरमे, जैठाम सभ कथूक सुविधा छै। नीक स्‍कूल, नीक कौलेज, नीक समाज। नीक बेवस्‍थाक बीच लोक बास करै छैथ, जइसँ बच्‍चा सभकेँ नीक सुविधा भेटने नीक पढ़ाइ-लिखाइ होइते हेतैन। अपनो नीक आमदनीबला नोकरी छैन्‍हेँ। तेहेन कम्‍पनीमे काज करै छैथ, माने कम्‍पनी मालिकक गाड़ीक ड्राइवर छैथ, जे सभ सुविधा छैन्‍हेँ। तखन एना किए उटपटॉंग बात कहलैन? पुछलयैन- “की गण्‍डा कहलिऐ, भाय?” प्रश्‍न सुनि करिया भाय ठमैक गेला। ठमैक ई गेला जे गारजन तँ परिवारक अपने छी। तखन बाल-बच्‍चा जँ बिगड़ियो गेल आकि बिगड़लो जा रहल अछि, आ अपने मुँह तकै छी, तैठाम सोल्‍होअना दोख पत्‍नीए आ बाले-बच्‍चाकेँ लगा अपने पल्‍ला झाड़ि निकैल जाएब सेहो तँ उचित नहियेँ भेल। तहूमे बाल-बच्‍चा बाले-बोध भेल, ओ कियॉं-ने गेल जे नीक केना हएत आकि अधले केना भेल? ओना करिया भाय सेठक बिसवासू ड्राइवर। ड्राइवरे नै, बिसवासू समाङ्ग जकॉं सेहो। परिवारक खेबा-पीबाक वस्‍तु-जात सेहो करिये भाइक हथौटी होइ छैन। ओना कारखानासँ डेराक ऑफिस धरि अनेको नोकर अछि मुदा जुग-जमाना सेहो ने किछु छी। जेतए-केतौ सेठ वा सेठानी जाइ छैथ, ओ करिये भाइक ड्राइवरीमे जाइ छैथ। ओना चेहरा-मोहरा एहेन छैन जे जँ ओहन गाड़ी-ड्राइवर रहए तँ बड्डी-गार्डक जरूरत नै। दुनू काज एके गोरेसँ चैल जाइए तँए जँ एहेन नोकर डेढ़ियो दरमाहापर भेटए तैयो नफ्फे भेल। करियो भायकेँ मनलग्‍गु नोकरी भाइए गेल छैन, तँए बीस-बर्खक नोकरीक जीवनमे कहियो मुहॉं-ठुठी मालिक संग नै भेलैन। बरहमसिया फल कहियौ आकि बरहमसिया तीमन-तरकारी जकाँ करियो भायकेँ बरहमसिया आमदनी छैन्‍हेँ। दरमाहाक संग-संग हाट-बजारक कारोबार केने सदिकाल किछु-ने-किछु आमदनी होइते रहै छैन। करिया भाइक हिसाबे भौजी नइ छथिन, मुदा परिवारिक जिनगीमे कहियो कोनो बाधा उपस्‍थित नहियेँ होइ छैन। सुधंग महिला। छह-पॉंच किछु ने बुझैत, मुदा भानसो-भात आ घर-अँगनाक काज करैमे जेहने सचरगर तेहने बोली-चालीमे मनकनियॉं तँ छैथे। करिया भाय बजला- “बौआ, चिड़ैक अण्‍डा जहिना गण्‍डा भऽ सड़ि जाइए तहिना भेल।” जहिना पहिने करिया भाय बाजल छला जे अण्‍डा गण्‍डा भेलो जाइए आ भेलो अछि, तहिना फेर छछारीए कटैत बजला। माने जहिना जाड़क मासमे पैखाना केला पछाति पनिछू नै कऽ पानिक डरे छछारीए काटि लइए, तहिना करिया भाय बजला। घर-परिवारक बात छी, केना अँकराएल-पथराएल कोनो बात बीचमे बाजब। जखने एकोरती करिया भाय दिस टगि कऽ बाजब तँ धिया-पुता बुझत जे पिताकेँ कानमे पाथर घोंसिया बाप-बेटाक सम्‍बन्‍ध घटबै छैथ। तहिना जँ धिये-पुते दिस टगि कऽ बाजब तँ करिया भाइक मनमे हेतैन जे लोक अनका धिया-पुताकेँ अहिना चढ़ा-बढ़ा अनकर पानि उतारि बेइज्‍जत करैए। की बाजी की नइ बाजी से किछु फुरबे ने करए। मुदा बातक जँ नइ नाङैर पकड़ाएल तँ नइ पकड़ाएल मुदा चिड़ैक पॉंखि जकॉं तँ पकड़ेबे कएल। किएक तँ अण्‍डासँ बच्‍चा होइत लोक चिड़ैएटा केँ देखैए। भलें जानवरो आकि मनुखोकेँ किएक ने होइत हौउ। फेर लगले मनमे भेल जे करियो भाय दिल्‍लीक चौकपर बैसि कऽ चाह पीबैबला लोक छैथ, जैठाम रंग-रंगक उड़ॉंत लोक सभ बैसबे करैए। हो-न-हो कहीं नल-नील जकॉं ने कोनो मंत्र बूझि गेल होथि जे पानिमे पाथर नइ डुमै छै। फेर मनमे उठल शरीरोमे तँ चिड़ै जकॉं किछु ऐछे, जे ऑंखिक इशारापर उड़ि जाइए। आन जेते अंग अछि शरीरक, ओ सभ तँ अथवले अछि। अनका मुहेँ सुनत आ अनका पएरे चलत मुदा मन-चिड़ै तँ से नै अछि। ओ तँ ओइसँ हटलो अछि आ सटलो अछि। मुदा अछि तेहेन पीच्‍छर जे शरीरकेँ पकड़ैए ने दइ छै। तखन करिया भायकेँ पकड़ब असानो तँ नहियेँ अछि। फेर युक्‍ति फुरल। फुरल ई जे केकरो प्रतिकूल बात पुछला आकि कहलासँ ने मनमे खोंच-खरोंच लगत, जँ अनुकूल बात पुछबैन तखन किए खोंच-खरोंच लगतैन। पुछलयैन- “भाय, बच्‍चा सभकेँ नीक स्‍कूलमे देने छिऐन किने?” ‘नीक स्‍कूल’ सुनि करिया भाय ठमैक गेला। ठमैक ई गेला जे ओहन स्‍कूलमे दुनू भाए-बहिनकेँ देनहि छी जइमे सेठजीक धिया-पुता पढ़ै छै। खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ पढ़ै-लिखै, रहै-सहैले सेहो। संगे टी.भी., कम्‍प्‍यूटर आ मोबाइलो देनहि छिऐ, तखन बॉंकीए कथी रहल। जेना खुशी मने कियो अधला बात बजैए तहिना करिया भाय बजला- “बौआ सुशील, तोरासँ लाथ की, मुदा...!” ‘मुदा’ कहि आरो अस्‍सी मन भार मनमे लादि लेलैन। अपना घरक बात आकि धिया-पुताक बात बजैसँ किए कतिया रहल छैथ? ओना कतियाइक अवस्‍था तँ दुनू होइए। किछु एहनो होइए जइमे अपन भूलकेँ सुधारैक समए भेटै छै, आ किछु एहनो होइए जइमे मनक क्रोध सेहो जगै छै। मुदा फेर भेल जे अनेरे फुलबॉंस जकॉं आकि बेंत जकॉं खोंइचा केते सोहैत रहब, किए ने बातक पुछरीए पकैड़ पुछि ली। कहलयैन- “भाय, एना जे पथराएल केरौउक फुटहा जकॉं मने-मन फुटैत रहब तइसँ हम थोड़े बुझब। गमैया लोक छी, चिक्कारी-तिक्कारी थोड़े बुझै छी।” करिया भाइक छाती दहैल रहल छेलैन। जइसँ बकार फुटिये ने रहल छेलैन। तैपर सँ पिताक अपन दायित्‍वसँ खसल देख रहल छला। मुदा प्रश्‍नक उत्तर किछु कहि देब नै होइए। ओ तँ कोनो शिकारपर फेकल वाण जकाँ होइए। तैसंग मनमे ईहो होइत रहैन, जे धैनवाद सुशीलेकेँ दी जे वेचारा परिवारक बात बुझए चाहि रहल अछि। गामक लोक तँ चाह-बिस्‍कुट-पान खेलक आ कुशल-वर्ता केलक...। पाछू घुसकैत हारल नटुआ जकॉं करिया भाय बजला- “बौआ सुशील, अपने किरदानीक फल आइ...।” मुड़ी छोपल तम्‍माक चाउर जकॉं करिया भाइक विचार सोझड़ेबे ने करैन जे केते घटबी अछि, से बुझब। मुदा किरदानी तँ बाजि गेल छला। पुछलयैन- “की अपन किरदानी कहलिऐ, भाय?” बेवस होइत करिया भाय मुँह खोललैन- “सुशील, अपना जनैत कोनो अभाव दुनू बच्‍चाकेँ आइ धरि कहियो ने हुअ देलिऐ, मुदा...।” फेर करिया भाय मनक बात दाबि लेलैन। मनमे भेल- की अभाव दुनू भाए-बहिनकेँ कहियो ने हुअ देलखिन आकि पुड़ेबे केलखिन, से तँ बजबे ने केला। सोझहे कहि देलैन जे कोनो अभाव दुनू भाए-बहिनकेँ कहियो ने हुअ देलिऐ। जँ अभावक पुरती करैत रहितैथ तँ भाव ने जनमितैन, से किए ने जनमलैन, जे अभावे-अभाव भऽ गेलैन? कहलयैन- “भाय साहैब, परिवार कहियौ आकि मनुखकेँ कहियौ, जिनगीमे जँ कोनो काजक महत अछि तँ ओ अछि बाल-बच्‍चाकेँ बाल-सुर्ज जकॉं बाल-भव देब।” हमर बात जेना करिया भायकेँ ठिकिया कऽ छातीमे लगलैन, तहिना छिलमिलाइत बजला- “बौआ, बड़ इच्‍छा छल जे बाल-बच्‍चा पाबि जिनगीक यात्रा नीक जकॉं दुनू परानी कऽ लेब, मुदा से बूझि पड़ैए जे मनक अण्‍डा मनेमे गण्‍डा भऽ जाएत।” करिया भाइक बात सुनि अनेको रंगक विचार मनमे उठए लगल। किए करिया भाइक आसा अखने टुटि रहल छैन, तहूमे अखन तँ जुआन-जहान सेहो छैथ आ जीबैक बाट सेहो पकड़नहि छैथ? मुदा प्रश्‍न तँ जिनगीक छी जे एक धारामे बहैत आबि रहल अछि। मुदा तैयो करिया भाइक बोली तँ ओहन पीच्‍छराह बुझिए पड़ैए, जे अपन बात खोइले ने रहल छैथ आ हमरे अगुआबए चाहि रहला अछि। निष्‍पक्ष जकॉं जखन परिवारक बात पुछबैन तखन केतबो पीच्‍छराह किए ने होथि, पेटक सभ विकार, बकार बनि निकलबे करतैन। पुछलयैन- “भाय, गामोमे रहै छी आ दिल्‍लीयोमे?” आगूक बात मुहेँमे रहए कि बिच्‍चेमे करिया भाय धड़फड़ा कऽ बजला- “हँ से तँ रहिते छी।” मुदा उत्तर भरि देलैन, ने आगूक मुँह जोड़लैन आ ने पाछूक नाङैर। पुछलयैन- “जखन गाममे रहै छी, तखन गाम केहेन बूझि पड़ैए?” करिया भाय ठमैक गेला। आइ धरि कहियो करिया भाय ऐ प्रश्‍न दिस तकबे ने केने छला। कुच्‍ची चलबै काल रंगकर्मी रंगक अभावमे जँ रंग जोड़ियबए लगत तँ कुच्‍ची केना चलतै। तहिना करियो भायकेँ भेलैन। कोनो उत्तरे ने फुरलैन। हमरो गर बैसल। गर ई बैसल जे भुतलग्‍गुकेँ जहिना भगत झोंट पकैड़ बकबैए, तेहने अनुकूल समए बूझि पड़ल। पुछलयैन- “भाय, जेकरा जेरक-जेर धिया-पुता रहल तेकरा कनी-मनी एनी-ओनी हएब सोभाविक छै। जेकर कारणो केते छै, मुदा अहॉंकेँ तँ दुइएटा अछि, तखन एना किए बजै छी?” जेना मनक बात पुछने होइऐन तहिना करिया भाय पतालक पानि जकॉं शान्‍त-शीतल होइत मिठौंस बोलीमे बजला- “बौआ सुशील, अट्ठारह बर्खक बेटा जहिना अछि, कौलेजमे पढ़ैए, तहिना सोलह बर्खक बेटियो अछि, ओहो कौलेजमे पढ़ैए, मुदा...!” कहि करिया भाइक बोल बन्न भऽ गेलैन। बोली बन्न देख मनमे भेल, यएह छी जिनगी। डारि चूकल बानरक जे गति होइए सएह तँ विचार चूकने भऽ गेलैन अछि। मुदा उपाइए की? जखन धरतीपर ठाढ़ छी, अन्न-पानि खाइ-पीबै छी, देखैले ऑंखि सुनैले कान आ भोगैले दुनियॉं ऐछे तखन कोनो-ने-कोनो रूपे तँ जिनगी चलबे करत किने। चाहे हँसैत चलए आकि कनैत चलए...। अपन बेथाक कथा दोसर सुनि सकैए आ सुधरैक विचारो दऽ सकैए मुदा चलऽ तँ लोककेँ अपने पड़ै छै। केकरो साती कियो खा लेत, आकि पीब लेत तइसँ दोसराक भूख-पियास थोड़े मेटेतै...। पुछलयैन- “भाय, दुनू बेटा-बेटीकेँ कौलेजमे पढ़बै छी, ई तँ माइए-बाप आकि परिवारे नै, ई तँ समाजो आ देशोक पैघ उपलब्‍धि भेल, तखन एना मिड़मिड़ा कऽ किए बजै छी?” सीकपर राखल दहीक मटकूरमे जहिना कोनो धिया-पुता निच्‍चासँ गोला मारि फोरि दइए, जइसँ फुटल मटकूरक दही धरतीपर खसए लगैए, तहिना करिया भायकेँ भेलैन। बजला- “बौआ, शहर-बजारक पढ़ाइक की खर्च अछि, खान-पान आ रहै-सहैमे की खर्च अछि, ओ तँ अपन बात अपने बुझै छी, तों तँ नइ बुझैत हेबह।” गर देख कहलयैन- “से केना बुझब?” अपन गुरुत्‍वक बोध करिया भायकेँ भेलैन। मुदा छाती तँ छहोँ-छित रहैन, मुदा तैयो समैट-समैट बजला- “बौआ, एते दिन बच्‍चा जानि, ओकर काज अपन दैनंदिनक काज बूझि सम्‍हारि दइ छेलिऐ, आब ओ नोकर जकॉं अढ़ा-अढ़ा करबए चाहैए!” करिया भाइक बात नीक जकॉं नै बूझि पाबि रहल छेलौं, मुदा बेथाक जे धार बहि रहल छेलैन, ओकरा रोकबो उचित नै बूझि बीचमे बजैसँ परहेज केने रही। दोहरबैत बजला- “बौआ, आब बिआह-दान करै जोकर दुनू भेल जाइए, अपन घर-परिवार हेतइ, केना आगू चलतै, से सभ किछु ने बूझि रहल अछि आ खर्चाक अम्‍बोह लगा रहल अछि। एते दिनक नोकरीमे ने अपन आगूक जिनगी जीबैक विचार केलौं हेन आ ने धिये-पुते जीबैक ठौर पकैड़ रहल अछि।” पुछलयैन- “से केना बुझै छिऐ?” अकासमे उड़ैत चिड़ै जकॉं करिया भाइक मनक चिड़ै छहोँ-छित भऽ गेल छेलैन। अकासमे उड़ैत लाखो-करोड़ो-अरबो चिड़ै-चुनमुनी अपन-अपन जगह बना हँसैत-खेलैत-गबैत उड़ैत रहैए, मुदा अकासो तँ अकास छी, बिनु ओर-छोरक तँ ऐछे। तैठाम सोझे अकास कहने तँ नइ हएत। जेते दूर ऑंखिक इजोत जाइए तइमे सभसँ ऊपर गीध स्‍वछन्‍द रूपे उड़ैत कोठली जकॉं सिरौर काटि-काटि देखबो करैए आ धरतीपर अपन चहरो भँजियबैत रहैए। हवा ओकर संवाहक रहै छै आ धरतीक गंध पत्र...। तइसँ निच्‍चॉं चिल्‍होरि रहैए, जे गीध जकॉं ऊपर तँ नै मुदा आन चिड़ैसँ ऊपर गीधे जकॉं अकासमे सिरौर काटि-काटि जोतबो करैए आ धरतियो देखैत रहैए। ओना जोतैए गीधो मुदा चिल्‍होरिमे एते तँ गुण छइहे जे ठहकबो तँ करिते अछि। तेतबे किए गीध जकॉं थोड़े सड़ल-पाकल खाइए। ओ तँ जलभक्षी, फलभक्षी छी। सेहो ओहन जलभक्षी, जे जीवित पबैए मुइल नै। मुदा तँए की कहबै जे एतबेटा अकास अछि। कौआ, मेना, सुग्‍गा, बगड़ा, चुनियॉं-मुनियॉंकेँ की छोड़ि देबै? भलें ओ ऐ घरसँ ओइ घरक चारोपर उड़ि-उड़ि बैसबो करैए आ घर-अँगना, बाड़ी-फुलवाड़ीसँ अपन गुजरो-बसर करैत रहैए...। करिया भाय तहिना अकाससँ धरती देख रहल छैथ। अकाससँ धरती देखिते चौन्‍ह अबै छैन। देहमे जेना मिसियो भरि शक्‍ति नै बूझि पड़ै छैन। होइ छैन जेना निरबल निसहाय भऽ रहल छी। निसहाय होइत करिया भायकेँ देख हमर मन बरसि गेल। कहलयैन- “भाय, जाबे नीक जकॉं कोनो बातकेँ नै बाजब, ताबे अनठेकानीए जँ किछु उतारा देबो करब से ठेकनगर थोड़े हएत, ओना भैयो सकैए। तँए कनी फरिछा कऽ तहे-तह जखन बजबै तखने ने किछु अँटकारो लगौल जा सकैए?” फरिछा कऽ बाजब सुनि आकि की, करिया भाइकेँ जेना मनमे आस लगलैन। आस पबिते आस मारि मचकी झूलैत करिया भाय बजला- “बौआ, केतबो धिया-पुता वौरु जाएत ते वौरु जाह, मुदा जाबे ऐ हाथ-मुट्ठीमे दम अछि ताबे तँ कहुना चैले लेब।” करिया भाइक आस भरल बात सुनि अपनो मनक बिसवास बढ़ल जे भरिसक करिया भाइक जिनगी कोनो मोड़पर मुरिया कऽ घुरिया गेल छैन, तँए किछु आगू नै देख पाबि रहल छैथ। मुदा मोड़ो तँ मोड़ छी, सोझ-मोड़ सेहो होइए आ भक-मोड़ सेहो। सोझ मोड़पर तँ पछिले रस्‍तासँ आगूक दिशा-बोध भऽ जाइए, मुदा भक-मोड़ तँ से नइ छी, ऐमे अगिला रस्‍ता अन्‍हराएल रहै छै। मुदा जिनगीक मोड़क तँ दोसरो कारण अछि, जे छिपल अछि जिनगीक उठैत आ खसैत शक्‍तिमे। जँ ऊपर दिस उठि रहल अछि तैयो, आ जँ निच्‍चॉं दिस खसि रहल अछि तैयो। मुदा अन्‍हारो तँ अन्‍हार छी, गामो-घर आ गाम-घरक खेतो-पथार, पोखैरो-झॉंखैर आ नदियो-नालामे पसरल रहैए आ शहरो-बजारक गली-कुच्‍चीमे पसरल रहैए। एहने मोड़पर ने बुधि-विवेकक अग्‍नि-परीछा कहियौ आकि शक्‍ति-परीछा, होइए...। अहीठाम करिया भाय वौआ रहल छैथ। आगू दिस दुनियॉंक एक छोरसँ दोसर छोर तक अन्‍हारो-अन्‍हार देखै छैथ आ इजोतो-इजोत...। अन्‍हार-इजोतक झल-फलीमे झलफली आबि रहल छैन, जइसँ अगिला झलफलाइत झलफला रहल छैन। पुछलयैन- “भाय, हाथ-मुट्ठी की कहलिऐ?” धारमे बहैत, जेना कोनो फुलवाड़ीक फूल टुटि-टुटि दहलाइत बढ़ैत रहैए, जे एकपर नजैर पड़िते दोसर चैल अबैए आ जैपर पहिल नजैर पड़ल छल ओ भँसि कऽ आगू बैढ़ लहैरमे झलफलए लगैए तहिना करियो भायकेँ भेलैन। हमरा बातकेँ भँसिया करिया भाय अपन मनक बात बजैत कहलैन- “बौआ सुशील, जिनगीक पाशा दुनू संग चलैए, एक बाजी लगबैए आ दोसर पाजी होइए।” करिया भाइक बात सुनि मने मन्‍हुआ गेल। की पुछलयैन आ की उत्तर देलैन! अपने मनमे शङ्का उठल, करिया भायकेँ बजैमे धोखा भेलैन आकि हमरा सुनैमे धोखा भेल? किछु फुरबे ने करए। मुदा पुछबो की करबैन। जँ दोहरा कऽ पुछबैन आ कहीं जँ अपन परिवारक तामस हमरेपर झाड़ि दैथ, तखन तँ अनेरे दूध-घीक बनल दही खटाएत! खटाइत अपन जिनगीए बदैल लेत। कखनो नूनक संग चैल जाएत तँ कखनो चीनीक संग! से नै तँ नीक हएत जे मुहसँ किछु ने कहिऐन, खाली ऑंखिक इशारासँ कनी टुसकी मारि उसका दिऐन। अनेरे तँ बोमियए लगता। सएह केलौं। ऑंखि-मे-ऑंखि आ नजैर-मे-नजैर मिलते करिया भाय बजला- “बौआ सुशील, बाजीए पाजी भेल आ पाजीए बाजी अही आसापर ठाढ़ छी।” शब्‍द संख्‍या- 2304, 5 अगस्‍त 2015 हाथी आ मूस फागुन उतारपर आबि गेल, मुदा फगुआ अखन आठ दिन आगू अछि। कनी-मनी फगुआक लहकी लहैक रहल छै मुदा जोर नइ पकड़ने अछि। ओना आठ दिन पहिनहि शिवराति भऽ गेल, थालो-पानि छुब चलैनमे आबि गेल, मुदा जाड़क रंग अखनो सघने अछि। कहैले तँ मास दिन पहिनहि वसन्‍तक आगमन भऽ गेल मुदा ओ तँ वैचारिक मन-मनतरक धारे-धार बहाएल अछि ने, प्रत्‍यक्षमे तँ धरती ओहिना जाड़-पालासँ कँपैए, गाछ-बिरीछ ओहिना जाड़-ठाढ़सँ ठिठुरल अछि। जइसँ ने कलशेक आगमन भेल आ ने कोढ़ीए-बातीक। मुदा हवो आ रौदोमे तीखपन एने रंग बदलैक सूर-सार तँ भाइए रहल अछि। जइसँ आमोक मोजर फलैके रहल अछि आ आनो-आन लत्ता-बिरीछमे बदलैक सम्‍भावना सेहो भाइए रहल छै। रवि दिन, बारह बैज गेल छल। खेतक अपन घरमे खा-पी कऽ मूस अपन कोठी-भरली, ढक-ठेक, बखारी-मुनहैर देख चैनसँ रस्‍ता परहक पीपरक गाछ लग अराम करैले आबि कऽ बैसल। गाछक दोसर भागमे एकटा बोनैया हाथी सेहो बोनसँ चरौर कऽ पहिनेसँ आबि बैसल छल। एक दिस हाथी दोसर दिस मूस बैसल। ओना दुनू एक-दोसरकेँ देखबो करैत आ मने-मन गौरो रहए। बोनैया हाथीकेँ देख मूसकेँ दया अबैत रहइ। दया ई अबैत रहै जे वेचाराकेँ सौंसे देहे फलेरिया पकैड़ नेने छै, गाम-घरमे जँ रहैत तँ पोसिन्‍दा दवाइयो-दारू दइतै, मुदा रहै तँ अछि बोनमे, तखन दवाइयो के करौतै! कहू जे जँ वेचाराकेँ माथे आकि देहे-हाथ टटेतै, तँ केना कऽ माथे ससारत आकि देहे-हाथ, पटपटेबे करत किने...। मुदा लगले मूसक मन बदैल गेलइ। बदैल ई गेलै जे सभकेँ अपन केलहा भेटै छै। कोइ करैए आपले माएले ने बापले...। जहिना दुनियॉंमे अरबक-अरब लोक अछि तहिना कण-कणमे विरजैत अरबो-खरबो भगवानो तँ छैथे। अपना कणे आ अपना मने ने कियो भगवानक कण पकैड़ कन्‍हेठ-कन्‍हेठ जिनगीक भार उठा चलैए। आकि ओकर साती कियो आन चलतै? सोच-विचार करैमे मूसक ब्‍लडपेसर तेज भऽ जाइ आकि खींझ उठि जाइ। मुदा जखने हाथीक देहक दशा देखै तँ दया आबि जाइ। अही सोच-विचारमे मूस कखनो सिरमापर मुड़ी दऽ पड़ि रहए तँ कखनो उठि कऽ मुड़ी अलगा-अलगा हाथियो दिस देखए। दोसर दिस हाथियो मूसेटा केँ देखए, दोसर-तेसर गाछ तर रहबे ने करइ। मुदा दृष्‍टि-दोष भेने हाथी अपन देह देखबे ने करए आ मूसकेँ देखै तँ बिलाइयोसँ छोट बूझि पड़इ, जइसँ होइ जे एकरासँ नमहर बिलाइ होइए से तँ ऑंखिक मटक-मे बिला जाइए आ ई तँ सहजे ओकरोसँ छोट अछि, बिलाएले अछि। तँए झुझुआइत रहए। झुझुएबो केना ने करैत, फल गुण गाछ आ गाछ गुण फल होइते छै किने। मनुखक फल तँ मुहेँमे ने फड़ै छै। अही धोखामे कहियौ आकि दृष्‍टि-दोषे हाथी कखनो काल मूसो दिस देख लिअए आ लगले नजैरो खसा लिअए। मुदा मूसक उठी-बैसी देख हाथीक मनमे ईहो छगुन्‍ता लगै जे लगले सिरमापर मुड़ी रैख अरामो करए लगैए आ लगले उठि-बैस कऽ हमरो दिस देख लइए आ बजैए किछु ने! एना किए…? ओना मूसक मन लुसफुसाइ जे जखन दुइए गोरे गाछ तर छी, तखन तेसरकेँ गप-सप्‍प करए बजबए जाएब आकि जे लगमे अछि तेकरेसँ ने गप-सप्‍प करब। जाबे गप-सप्‍प नइ हएत ताबे केना हाल-चाल बुझब जे हम केना जीबै छी आ ओ केना जीबैए। ने हम कोनो खुट्टा गाड़ि कऽ जीबैले एलौं हेन आ ने ओ आएल अछि, भेल तँ दू दिनक जिनगी आ ई दुनियॉं अछि, तखन जँ बुधि-विवेकी गणेश जीक वाहन रहैत एतबो नइ बूझि पएब तखन गणेशजीकेँ समाचार की सुनेबैन। हुनकर संवाहक तँ हमहीं ने छिऐन, अपन तँ तेहेन सीक-लीख छैन जे सौंसे दुनियॉंकेँ पेटेमे समैट कऽ रखने छैथ, तखन कोन दोसर दुनियॉं टहलैयो-बुलैले जेता। मुदा लगले मूसक मन आगू बढ़लै। जखन भगवान मुँह देलैन, तखन जँ ओकरा सीब कऽ राखब, सेहो केहेन हएत। हुनके गलतीसँ ने सौंसे देह बन्न रहल आ मुहकेँ खोलि कऽ रैख देलैन। तइसँ नीक ओकरो सीबिए दितैथ, किए लोक खेबे-पीबे करत आकि ओकर गुणे-सुआद बुझत। मुदा लगले मूसक मन फेर आगू बैढ़ गेलइ। आगू बैढ़ते मन संयासी जकॉं दुनियॉंपर थूक फेकैत विचारए लगल। अनेरे गप-सप्‍पक कोन लपौड़ीमे पड़ब, तइसँ नीक जे एक तँ ओहन गाछ-तर छीहे जेकर चिक्कन पात कमलोसँ पातर डण्‍टीमे सुशोभित भऽ सदिकाल बिनु हवोक पवित्र हवा पसारि रहल अछि, तैपर गाछक छाहैर सेहो ऐछे, तखन चैनसँ अराम करैत गढ़गर नीन किए ने पीब जे अनेरे बोनैया हाथीक फेरिमे पड़ब...। मुदा हाथीक दशा देख मूसक प्रेम तेते बैढ़ गेल रहै जे मनसँ हटबे ने करइ। उठि कऽ बैसि मूस पहिने हाथीकेँ हिया कऽ देखलक, तँ बूझि पड़लै जे वेचाराकेँ कोनो ठौरे-ठेकान ने छै। तेहेन बोनमे रहैए जे जँ कहियो धोप-चटमे आगि लगतै, तखन आन-आन तँ देह झाड़ि पड़ा जाएत, मुदा एहेन रोगी-टट्टी केतऽ भागत। अछैते औरुदे मरत की नइ! फेर मूसक मनक विचार बदललै। बदैलते उठलै। किछु छी तँ छी, मुदा जीबै तँ छी किने, आखिर जीबैएले ने कियो आएल अछि। तखन किए ने अपन मोनक बात हाथीसँ बूझि ली। ओना हाथीक नजैर सेहो मूसेपर रहइ। मूसक मन-मनतर तँ नै बूझि पबैत रहए, मुदा अनुमानसँ ई बूझि पड़ैत रहै जे हमरे देख-देख हमरे विचार करैए। नीक करैए आकि अधला करैए से तँ ओ जानए, मुदा हमहीं किए शंका करबै जे मने-मने गाइरे पढ़ैए...। मूसकेँ सोर पाड़ि हाथी बाजल- “हौ मूस बौआ, जखन दुइए गोरे गाछ तर छी, तहूमे पीपरक गाछ-तर, दुपहरियाक समए अछि। तेतबे नइ, जखन माघोक दुपहरिया नाच करैत रहैए, तखन ई तँ सहजे फागुनक छी, तहूमे फगुआ सिरचढ़ अछि। तँए जँ दुनू गोरे एकठाम रहितो मुँह बन्न केने चुप-चाप भेल सकदम रहब से नीक नहियेँ अछि, तोरा केहेन लगै छह?” हाथीक बात सुनि, मूस बाजल- “अँइ यौ बौआ भाय, अहॉंसँ जेहने देह-दशा हमर छोट अछि, हाथ-पएर छोट अछि, तेहने बुइधो-अकील छोट अछि किने, तखन तँ अहॉं ने अपन विचार हमरो कहब, जइसँ अहीं जकॉं किए, अहूँसँ नमहर किए ने जे अहूँकेँ चाङुरमे लऽ उड़ैबला शदूल जकॉं अपन सीख-लीख बना लेब।” कहि मूस सहटैत हाथीक सूढ़ लग आबि बैसल। लगमे अबिते- हाथी अपन दरबज्‍जा देख- मूसकेँ कहलक- “बौआ, नीकसँ रहै छह किने?” ‘नीक’ सुनि मूसकेँ सुरसुरी जकॉं लागल। सुरसुरी ई लागल जे नीके नइ छी, अधला छी, से ई केना बुझलक? मूसक मनमे जेना उड़ी-बीड़ी लागऽ लगलै। कहू जे मुनहर-बखारी, ढक-ठेक, कोठी-भरली धन-धानसँ भरल-सजल पोखरा-पाटन घर हमरा अछि, ने खाइक-कमी अछि आ ने पीबैक...। तेतबे किए, जहिना खाइले एतेटा दुनियॉं भरिक धरती अछि, तहिना ने पीबैले अहूसँ नमहर पतालक पानि अछि, घुमै-फीड़ैले तहूसँ नमहर अकास अछि। आ जेकरा एते भारी देह छै, गाछक-गाछ दिनमे खाइए, ने अपना घर बनबैक लूरि छै आ ने राशन-पानी जोड़ियबैक। तखन एना किए बाजल? मुदा लगले मूसक मन विचारसँ समझौता केलक। बाजल- “बौआ भाय, अखन केना दिन-राति चलैए?” मूसक प्रश्‍न सुनि हाथीक मन ठमकल। ठमकल ई जे केना एकरा कहबै जे भाय, जमीन्‍दारी गेने बड़का मुनहरो चैल गेल। किछु छी तँ हथिसारमे रहैबला छी किने। ‘टुटलो अछि तैयो नअ घरकेँ बसौत’, तहूमे अखन अपना दरबज्‍जापर अछि, किए अपन रोब-रूआब कम करब। बाजल- “भाय, घीओसँ चिक्कन दिन-राति चलैए। आ अपना दिसक कहह?” हाथीक बात सुनि मूसक जी जरऽ लगल, मने-मन सोचलक- कहू जे सौंसे देह टेटरे जकॉं बूझि पड़ै छै आ केहेन रूआब झाड़ैए!! जखन कि अपना बुते ने अपन रहैक घर बनौल हेतै आ ने खाइक ओरियान अपना बुते कएल हेतइ। भलें बोनमे रहैए, कोन गाछ तर सुतैत हएत, आ बोन-झाड़क डारि तोड़ि-तोड़ि खाइत हएत, से ते ओ जानए। मुदा बीत भरिक नढ़िया जँ बैसले-बैसलमे पाछूसँ नाङैर काटि-काटि खाए लगै तँ एकरा बुते की कएल हेतइ। फेर मनमे एलै जे दुनियाँमे कियो अपन भगवान मालिक अछि। बाजल- “बौआ भाय, भगवान सभकेँ नीक रखथुन। सभकेँ एके नजैरसँ देखैत रहथुन। अच्‍छा! भाय साहैब, ई कहू जे परिवारो अछि की असगरे छी?” ‘परिवार’ सुनि हाथीक मनमे भेल, ई की पुछि देलक? परिवार केकरा कहै छै...? हाथीकेँ किछु फुरबे ने करइ। फेर मनमे एलै जे पुछिनिहारेसँ ने किए पुछि लिऐ। बाजल- “बौआ, परिवार केकरा कहै छहक?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे भेल जे आइ तेहेन अकलहूथ मरदसँ पल्‍ला पड़ल जे के मरद हएत जे एकरा बुझाएत, ‘मुरख हृदए न चेत, जँ गुरु मिलहि विरंचि सन...।’ मुदा लगले मनमे एलै, जखन दू गोरेमे बातक विवाद हएत तखन तँ यएह ने हएत जे ने अहॉंक बात हम मानब आ ने हमर बात अहॉं मानू। यएह ने भेल अदहा-अदही पनचैती। यएह सोचि मूस बाजल- “वाह! बौआ भाय, तखन ते अहॉंक वंश संयासीक वंश भेल किने? मुदा हम सभ ते सभ दिन परिवारी रहलौं, बिनु परिवारे एको क्षण रहि हएत...।” अपन विचारकेँ तर पड़ैत देख हाथी बाजल- “बौआ, तूँ ते जुइतिक ने छोट छह मुदा जथाक मोट छह। तँए हिसाव-बारी जोड़ैमे वौआ जाइ छहक।” अपन गुरुत्‍व देख मूस सहैम गेल। बाजल- “बौआ भाय, जखन घरसँ विदा भेलौं, तखन घरनी तेहेन ने करैलाक तड़ुआ खुऔने छेली जे ओहिना ढेकार होइए।” एक तँ हाथीकेँ ‘परिवार’ सुनि मन ओझराएले रहइ, तैपर दोहरौआ गीरह जकॉं ‘घरनी’ आबि गेने, मने घुरिया गेलइ! घुरिया ई गेलै जे दुनूमे- माने परिवार आ घरनीमे- कोन बात दोहरा कऽ बाजी। जँ से नइ बाजब तँ ई- मूस- अनेरे अपनो वौआ रहल अछि आ हमरो वौआएत। बाजल- “बौआ! पहिलुका बात- ‘परिवारक’ बात बिसैर गेलहक?” हाथीक बात सुनि मूस साकांच भेल। साकांच होइत बाजल- “बौआ भाय, कोनो ने बिसरै छिऐ, मुदा तेना ने मनमे लट्टा-पट्टी होइत रहैए जे कखनो तरका-ऊपर चैल अबैए आ ऊपरका तर पड़ि जाइए। आगूसँ अहीं कनी मन पाड़ैत चलू।” सह पाबि सहटैत हाथी बाजल- “परिवार की भेल?” मूस कहलकै- “परिवारे ने जिनगीक सम्‍पैत भेल। जिनगीक सच्‍चाइ छी, जे एक जगहपर बसैत, एक पीढ़ीक विदाइ करैए तँ दोसर पीढ़ीकेँ सृजन करैत ठाढ़ अछि। तैसंग परिवारेमे मनुख ठाढ़ो होइए आ दुनियोँ अही परिवारक समूहो छी आ ठाढ़ो अछि।” मूसक जबाव सुनि हाथी नमहर सॉंस छोड़लक। सॉंस छोड़िते जेना मन हल्‍लुक भेलइ। हल्‍लुक होइते मनमे उठलै- चरि-टङ्गा रहितो मूस अपन परिवारक संग जीबैए आ...। हाथी बाजल- “बौआ, परिवार बनै केना छै?” हाथीक प्रश्‍न सुनि मूसक मनमे भेल, कहू जे देह-दशा एहेन रखने अछि आ परिवार केना बनै छै से बुझले ने छै! मनकेँ थीर करैत मूस बाजल- “बौआ भाय, अहॉंकेँ अपन जिराते ने बुझल अछि तँए बोनमे वौआइ छी। एकरा अहॉं अधला नइ मानबै, हमर दुनियॉं नमहर अछि, आ अहॉंक दुनियॉं छोट। हम परिवारबला वंशक सभ दिन रहलौं, अखनो छी। अपने घर बनबैयो, बसबैयोक लूरि अछि आ परिवारक संग दुनियोँ देखै-सुनैक लूरि अछि।” मूसक बात सुनि हाथी सकपका कऽ सकदम भऽ गेल। सकदम होइते दम सधाए लगलै। किछु समैक पछाति नमहर साँस छोड़ैत बाजल- “बौआ, परिवार केना बनै छै?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे उठलै, भरिसक ई वेचारा हाथी स्‍कूल नइ देखने अछि, से जँ देखने रहितए तँ शुरूहेक व्‍याकरणमे ने पढ़ने रहैत जे घरनीए घर आ घरे परिवार। जखन से बुझनहि ने अछि तखन किए ने भूमिकामे ‘घरनी’ आ व्‍याख्‍यामे ‘परिवार’ बुझा दिऐ। तैबीच हाथियो तगेदा करैत बाजल- “बौआ, जखन एकठाम दुनू गोरे गप-सप्‍प करैले बैसल छी, तैबीच जँ मुहेँ चुप कऽ लेब तखन आगूक गप-सप्‍प केना हएत?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे भेल, जे भरिसक एकरो परिवारमे रहैक मन होइ छै। मुदा रहत केना? छौड़ा-माड़ेक खेती परिवार थोड़े छी। रहत बोनमे जेतए सदिकाल अपनो जाति-वेरादर आ आनो-सभसँ लड़ाइए-झगड़ा करैत रहत आ जखन केकरो ऐठाम सवारी बनि रहत तँ या तँ मरदा-मरदी दू-चारिटा रहत, नइ तँ असगरे रहत! तखन परिवार केना बनतै आ अपना परिवारमे रहत केना...? मूसकेँ किछु फुरबे ने करइ। मुदा लगले मनक जुगतीनाथ मुकतीनाथक बाट-बिटिया सुझा देलकै। सुझिते मनमे एलै- एकर बात हमरा नइ बुझल अछि। बुझलो केना रहत। ने एक जाति आ ने एक बास, आ ने एक भोजन अछि। तहूमे तेहेन ओझराएल-पोझराएल छै जे सुढ़ियाएबो-सोझराएब भारी अछि। मुदा अपन जिनगीक तँ अनुभव ऐछे। अपने जिनगीक बात किए ने कहबै। जिनगी केकरो हौउ मुदा ओहो तँ जिनगीए छी। नीक लगतै, सम्‍भव हेतै तँ मानि लेत, नइ हेतै तँ अपने भोगि-भोगि सीखत। मूस बाजल- “बौआ भाय, हम सभ दू रंगक घरनीसँ घर बनबै छी जे ‘परिवार’ कहबैए। एकटा अछि कटबी आ दोसर अछि सौंस।” ‘कटबी’ आ ‘सौंस’ सुनि हाथी वौआ गेल। वौआएल ई जे सौंसक माने भेल पूर्ण, मासक पूरनिमा जकॉं। आ कटबीक माने भेल काटल। माने पनरह दिनक पखमे परीवसँ चतुरदसी तक। मुदा इजोरियाक परीव अन्‍हारे भेल आ चतुरदसी पूरनिमे। बाजल- “बौआ मुसाइ, कटबी आ सौंस एक केना भेल?” हाथीक जिज्ञासा देख मूसकेँ भेल, सतो तँ सत छी। एकर माने ई नइ ने जे सतो एके छी आ एके रंगक अछि। सभ जगहपर सभ-रंग अछि। अपन सत बातसँ केना हाथीक सूढ़ि सुढ़ियाएत, तेना जँ नइ कहबै तँ बोनैया छीहे, जे अनेरे बमछल घुरैए आ जँ अधकटुआ भऽ जाएत तखन तँ आरो अनेरे बमछत! बाजल- “बौआ भाय, हमर वंश सभ दिन ऐ धरतीकेँ जनमभूमि मातृभमि बुझैए, ओना हमरा जातिक मातृभूमि सौंसे दुनियॉं छी, सभठाम बास अछि। मुदा अपनामे सभ कर्मभूमि बना-बना अपन कर्ममे दिन-राति लगल रहै छी।” ‘सभठाम बास’ सुनि हाथीक मन विचलित भऽ गेल। मनमे एलै- शहर-बजार दिससँ गाड़ी-सवारी भगा देलक, बोन-झाड़ रहै जोकर नइ अछि, तखन आगू दिन जीब केना? आगूक बात सुनैले हाथी कान ठाढ़ केलक। जखने कान ठाढ़ केलक आकि ऑंखि उठलै। ऑंखि उठिते बाजल- “बौआ, तोरो ऐ दुनियॉंमे हिस्‍सा छह?” हाथीक बात सुनि मूसक मनमे भेल जे वेचारा कहियो अपन जनम-भूमि, मतर-भूमि आ करम-भूमि बुझबे ने केने अछि। बुझबो केना करत, करम-भूमि तँ धरम-भूमिक आगू अछि, मुदा तहूसँ पाछूक सीढ़ीपर मरम-भूमि बैसल अछि जेकरा टपने बिना केना पहुँच सकैए। मुदा मरमो-भूमि तँ मरमभूमि छी, बिना नजर-भूमि सोझ-साझ भेने केना हएत...? तँए पहिने परिवार केना बनै छै, से बुझा देब जरूरी अछि। बाजल- “बौआ भाय, दुनियॉं बड़ीटा छै अनेरे कोन मगजमारीक भॉंजमे पड़ि डायविटीज आ ब्‍लडपेसर बढ़ाएब, अपन देश-दुनियॉं राज-काजसँ मतलब राखू।” मूसक विचार हाथीकेँ नीक लगलै। बाजल- “बौआ, पहिने कटबी आ सौंस घरनीक बात बुझा दाए। जखन घरनीक बात बूझि जाएब तखन परिवारक बुझल जेतइ।” मूस बाजल- “बौआ भाय, सौंस घरनी ओ भेल जे सए बरख संगबे बनल, ओ भेल शती। आ कटबी ओ भेल, जे सालक कहा-बधी कऽ रहैए, धिया-पुता बॉंटि लइए आ चैल जाइए। अहिना जिनगी भरि दुनू- मूस-मूसनी- अपन जिनगी बितबैत हँसैत-खेलैत मौज-मस्‍तीमे जिनगी बिता लइए।” मूसक बात सुनिते मातर हाथीक दम फुलऽ लगलै। साँस असथिर करैत बाजल- “बौआ, जखन अपन सभ किछु छह तखन हिसारस्‍ती केते छह?” मूस बाजल- “छहअना ते रेडियो-अखबार बजैए मुदा तइसँ बेसी अछि। ई किए ने बुझै छिऐ जे खेतसँ खरिहॉंन, खरिहॉंनसँ ऑंगन, ऑंगनसँ कोठी-भरली, ढक-बखारी, मुनहरसँ लऽ कऽ सरकारी गोदाम धरिक बासो अछि आ हिस्‍सो अछि।” मूसक बात सुनि हाथीक मन पीघैल गेलै। पिघैलते मनक पिघलैत विचार व्‍यक्‍त केलक- “बौआ, हमरो सभकेँ केना हएत?” हाथीक असिआस देख मूसोक मन पीघैल गेल। पिघलल विचार दैत बाजल- “बौआ भाय, जाबे अपनेसँ जीबैक लूरि नइ सीख लेब, ताबे अहिना केतौ सवारी बनि सवार हएब तँ केतौ बोनैया कहाएब। तँए...।” मूसक बात सुनि हाथीक मनमे उठल, लूरि केना सीखब। लूरि सीखैले तँ पहिने बुधि चाही। तइले सिखौनिहारो चाही, सीखैक जगहो चाही, तैसंग लूरिले बासो आ वस्‍तुओ-जातक बेगरता पड़बे करत। बुधि ने केकरो तरे-तर घोंसिया जाइ छै मुदा लूरि केना तरेतर घोंसियाएत। ओकरा घोंसियबैले तँ हाथ-पैरसँ लऽ कऽ ऑंखि-कान सभ साकांच रखऽ पड़त। तहूमे मूस माटि तरमे रहैए, ओना ऊपरोमे नुका कऽ रहैए। एकरा पतालक पानि तक देखल छै, मुदा हम तँ माटिपर रहैबला छी, हम केना शत बनि सतबर्खा भऽ सकै छी? बाजल- “बौआ, बिनु लुरिये-बुधिये सए बरख जे जीब से एतेटा पेट केना भरत?” हाथीक बात सुनि मूस मने-मन हँसल। मुदा हँसीकेँ नै खोलि मसीकेँ खोलैत मूस बाजल- “बौआ भाय, अहॉं चिन्‍ता किए करै छी, जे विधाता एहेन देह-दशा रचलैन ओ खेनाइ-पीनाइ रचब छोड़ि थोड़े देने हेता। तहूमे एक हाथक जे मुँह चीरलैन से ओहने भोजनो ने रचने हेता।” हूँहकारी दैत हाथी सुनैत रहल मुदा मन मन्‍हुआ गेलै। मन्‍हुआ ई गेलै जे एक बीतक मूस अछि, गणेशजीक संग रहैए! शास्‍त्र-पुराणक सभ पेंच-पॉंच जनैए! मुदा हमर वंश तँ सभ दिन राजा-रजबारसँ महंथाना धरि सवारी बनि राजो-दरबारक आ महंथानोक सिंगार बनल रहल। आब ने ओ समए रहल आ ने ओ रूतबा, तखन तँ वंशो कहुना बँचल रहए...। मने-मन हाथी बेथासँ बेथित होइत बेथा व्‍यक्‍त करैत बाजल- “मूस बौआ, हमरा वंशसँ तोहर वंश बेसी लूरिगरो छह आ बुधिगरो, तँए सए बर्ख शतीक सेहन्‍ता देखै छह। मुदा हम ते लड़ाइयो-झगड़ाक मैदानमे जाइ छी ते सहीसे लड़ाइ करैए आ हम दुनू दिससँ खतरामे पड़ल रहै छी। तैठाम सए बर्ख जीबैक विचार मनमे केना रोपब।” लड़ाइ सुनि मूसकेँ जना मने-मन खींज उठलै, मुदा खिसियाएल विचारकेँ दबैत बाजल- “बौआ भाय, जेना अहॉं रणभूमिक बात कहलौं, तइसँ की कम दुर्गम भूमि हमरो अछि। बाधो-बोन जे एकान्‍त रहैए, तहूठाम कोदारिसँ खुनि-खुनि जानो लइए आ धनो लुटैए।” मूसक बात सुनि हाथी वामी-दहिनी मुड़ी डोलबैत रहए, जइसँ मूसकेँ होइ जे भरिसक हमर जिनगीक बात हाथियोक मनमे गड़ि रहल अछि। तँए धारक पुलक खुट्टा जकॉं जेते ऊपरसँ धुमसुर चलेबै तेते मजगुती औतै। बाजल- “बौआ भाय, जीबैले बड़ गंजन सहऽ पड़ै छै, ई तँ चर-चॉंचरक बात कहलौं। घरमे, बॉंसक पोरमे तारक कमानी लगा फुसला-फुसला मुसकारीमे तेना फँसा लाठीक हूरसँ कुटि-कुटि फेकैए जे जँ ओकरा फेकेने फेकैतिऐ ते फेका कऽ केतए-कहॉं चैल गेल रहितौं।” कनीकाल चुप भऽ फेर मूस बाजल- “भाय साहैब, हम ते पतालसँ धरती आ धरतीसँ अकास धरि रहैबला छी, मुदा अहॉं ते ऊपरमे रहैबला भेलौं, तँए अहॉंकेँ अपनो ने विचारए पड़त जे शती-साधवी बनि केना जीब?” मूसक बात सुनि हाथीक मन घुमल। घुमिते बाजल- “बौआ, एहेन देहमे शती केना बनि हएत?” मूसकेँ जेना ठोरेपर रहै तहिना बाजल- “बौआ भाय, जिनगीक लोक आसा करैए, भरोसे थोड़े रहैए, तँए जेतबे भरोस तेतबे...।” मूसक बात हाथी नै बूझि पौलक। मुदा अखन धरि जेते गप-सप्‍प केने छल से नीक जकॉं बूझि गेल रहए। तँए मन उधुक्का मारि विचारकेँ जगौलकै। जैगते विचारसँ हाथी बाजल- “बौआ, आसा भरोस आ आसा बिसवासकेँ कनी दोहरा कऽ बुझा दाए।” हाथीक बात सुनि मूसकेँ हँसी लागल। मने-मन भेलै जे सोझे एतेटा देहे रखने अछि, मुदा चुट्टियो सन विचार बुझिते ने अछि। जाबे चुट्टी ओकरा मगजमे पैसि नइ कटतै ताबे ई नइ बुझत। लगेमे चुट्टी सेहो टहलैत रहइ। ओकरा शोर पाड़ि हाथीकेँ देखबैत कहलक- “बौआ भाय, देखियौ ऐ चुट्टीकेँ। कखनो केतौ सन्‍यासी जकॉं अँटकैए। जेते संगी भेटै छै सभसँ मुँह-मिलानी करैत आगू बढ़ैत अपन दुख-धंधाकेँ अपना संगे नेने चलैत, चलैत रहैए, चलैत रहैए। आ दोसर दिस अहॉं छी, जे अनके भरोसे सोल्‍होअना रहै छी। चुट्टियोकेँ देखै छिऐ जे अपन घर बना हमरोसँ जेरगर परिवारमे शती बनि-बनि जीबैत चलैत रहैए। आ अहॉंकेँ अबूह लगैए।” हाथीकेँ मने-मन होइत रहै जे मूस जान दइक विचार दइए आकि लइक, से केना दुइए गोरेमे बुझब? शंका जगलै। बाजल- “बौआ, तूँ जे कहै छह तैपर ते भरोसो कएल जा सकैए आ ना-भरोसो ने कएल जा सकैए।” हाथीक विचार सुनि मूस महसूस केलक जे हाथियोक शंका-निर्मूल नहियेँ छै, मुदा जेते असो अछि तेतबे ने नीअसो अछि। तखन तँ जेकरा निआसकेँ आस बनबैक लूरि छै ओ आसावान भेल, जे आसावान भेल सएह ने अपन आसक-बिसवासक संग बढ़ैए। बाजल- “भाय, दुनियॉंमे केतौ किछु ने छै आ सभ किछु छै। देह गुण ऑंखि जखन हेतह तखन अपनो बुझह लगबहक। मुदा तइमे तोहर दोख थोड़े छह, ओ ते गढ़निहारक भेल।” मुस्‍की दैत हाथी बाजल- “बौआ, अहिना सभ दिन एकठाम बैसि दुनू गोरे गप-सप्‍प करैत रहब। अखन तहूँ जा आ हमहूँ जाइ छी।” शब्‍द संख्‍या- 3016, 11 अगस्‍त 2015 मुसरी आ घोड़ा गिरिजानाथक पुरान घोड़सार। जहिना केहनो ईंटा, सीमटी, लोहा किए ने पड़ौ मुदा बनला पछाति घर दिनो-दिन पुराने होइत जाइए, तेहने पुरान घोड़सार। ओइ गिरिजानाथक पुरबजक समए छेलैन जे नीक हथिसार, नीक घोड़सारक संग गाइयो-महींसिक नीक बथान छेलैन। समैयो छल, घोड़ा पोसब घरेलू पशुपलित उद्योग सेहो छल जे पोसबेटा नै, लेनो-देन चलै छल। मुदा आब तँ घोड़ा पोसबेक समए नइ रहल। गाए जकॉं ने भोजन-ले दूध दइए आ ने इंजिन गाड़ीक दौड़मे सकैए, तँए बिसरजनक बेर घोड़-जातिक जिनगीकेँ भाइए गेल अछि। ओना ओहन पुरान गिरिजानाथक घोड़सार नहियेँ छैन जे हथिया झटकमे आकि समुद्रक हूद-हूदीमे खसि पड़त। मुदा ओहनो तँ नहियेँ छैन जेहेन पिताक चढ़ैबला घोड़ाक घोड़सार छेलैन। मालो-जाल आ घरो-घोड़सार केहनो हएत तँ नीके हएत। किछु छी तँ पशुएधन छी, चाहे दूध दिअए आकि सवारी बनए। तीन नम्‍बर ईंटाक देवाल सुरखी-चूनपर जोड़ल, ऊपरसँ खढ़-बॉंसक ठाठपर लोहाक चदरा, फलिगर मुँह, पूब मुहेँक रूखि जइसँ पुबरिया रौद अबैक रस्‍ता बनल। मुदा पछबरिया रौद पैछला खिड़कीएटा सँ अबैत। अढ़ाइ ईंटाक देवालक बीचमे जे जोड़क सुरखी-चून रहै ओकरा काटि-काटि फेकि, मुसरी सेहो अपन घर-परिवार ओही घोड़सारक उत्तरवरिया देवालमे बना, गाम-घर छोड़ि शहरमे रहए लगल छल। माने ई जे खेत-पथार भेल गाम जइमे सेहो मूस-मुसरीक चास-बास छइहे, मुदा से नइ पहिलुका जमीन्‍दार परिवारक आ अखुनका रईस परिवारक घोड़सार छी। किछु छी तँ घोड़सार छी। जेहने घर तेहने भोजन। घोड़ाकेँ खाइले जे भारक भरल अँकुरीक चँगेरा जकॉं भरल चँगेरामे दिनो दइ आ रातियो दइ, तइमे सँ घोड़ाक तेजगर साँससँ जे बदाम उड़ि-उड़ि निच्‍चॉंमे खसै ओ घोड़ा थोड़े ओकरा बीछि-बीछि खाइ आकि ओ ओहिना रहि जाइ। दयालु मुसरीक परिवारकेँ सहीसपर दया लगै जे वेचाराकेँ अहू झाड़ैले झाड़ू चलबए पड़तै। ओना दुनू सॉंझ सभ दिन चलबए पड़िते छै, मुदा अदहा-अदही उपकार भाइए जेतइ। तेते बदाम निच्‍चॉंमे खसै-छिड़िआइ जे पॉंचो तूर मुसरी परिवारकेँ भरि पोख भऽ जाइ, जइसँ किए गमैया जिनगी पसिन करत। पानिक वर्तनमे सदिकाल पानि रहिते छै, खाइले बदाम भेटे जाइ छै, रहैले पक्का-मकान छइहे, तखन किए ने भरि पेट खेबो-पीबो करत आ संतोखी माइक पूजो करत, गीतो गौत आ अपन नचारी-विचारी सेहो सुनौतैन। ओना ओ मुसरी केतेको सालसँ ऐ घरमे रहैत आबि रहल अछि मुदा कहियो पान-सातटा सँ बेसी नै रहैत। मुसरीक जिनगी छी सालमे बीसो-पचीस जँ परिवार नइ बढ़ौत तखन एतेटा दुनियॉंमे जे एते जोड़-घटाउ करैक मशीन सभ कमा रहल अछि ओ के खाएत। ओइले तँ मुसरीए वंशक बेगरता अछि किने। लोहाक घर हौउ, आकि ईंटा-सिमटीक, अनका जे हौउ मुदा मुसरीक तँ बसोबास छीहे। कागजक घर हौउ आकि अन्न-पानिक, रहैक अनुकूल परिस्‍थिति तँ ऐछे। तँए जखन एतेटा दुनियॉं अछि तखन जिनगीमे दुखे कथीक? तहूमे कोनो कि हाथी-घोड़ाक वंशक छी जे सालमे गोटे वंश बढ़त कि नइ बढ़त। जखने मुसरीक बाल-बच्‍चा टेल्‍हुक भऽ जाइ कि माए-बापकेँ ई कहि घर छोड़ि बहरा जाए- “आगू दिन अहॉंक बुढ़ाड़ीक अछि तइले जे हाथ-मुट्ठी गरमा कऽ नै राखब, तखन बुढ़ाड़ी कटत केना। तँए दुनियॉं कमाइले जाइ छी, मासे-मास ए.टी.एम.मे पाइ पठबैत रहब, जे अहॉं दुनू गोरेक- माइयो आ अहूँक- खातामे जमा होइत जाएत।” टेल्‍हुक बेटा-बेटीक बात सुनि असीरवाद दैत दुनू परानी-मुसरी संगे कहैत- “दुनियॉंमे केतौ रही, हँसैत-खेलैत रही। यएह छी माता-पिताक असीरवाद।” ई असीरवाद तँ दऽ दइ मुदा पछाति दुनू परानी-मुसरीकेँ मन पड़ै जे अबै-जाइक असीरवाद तँ देबे ने केलिऐ। अधखड़ुआ असीरवाद पाबि टेल्‍हुक मुसरी घरसँ बहराए। जेतए रहए तेतइ बिआह-दान करैत बसि जाइ। बिसैर जाइ माइयो-बापकेँ आ माए-बापक देल असीरवादोकेँ। पैछला साल गिरिजानाथ हरिहर क्षेत्रक मेलासँ घोड़ा कीनि अनने छला। डाकपर खरीद केलैन, तँए दू लाख लगलैन। ओना ओइसँ जे पहिलुका घोड़ा रहैन ओहो तेहने तड़गर रहैन। मुदा पाइबलाक सवारी साल-दू-सालपर बदलेबे करैए, तँए बदलने छला। इंजनबला सवारीक जहिना तेल-मोबिलक टंकी भरल रहैत तहिना गिरिजानाथ घोड़ोक खेनाइ-पीनाइक जोगाड़ केनहि रहैथ। एकटा नोकर- सहीस-केँ घोड़ेक सेवा-ले रखने छैथ। दुनू सॉंझ सहीस घरसँ थैर धरि बहारबो करैए आ घोड़ाकेँ घरो-बहार करैत आ खुएला-पीएला पछाति सवारी सेहो कसैत। घोड़ाक घर- माने घोड़सार- दिन भरि खालीए रहैत, आ रातिके घोड़ा रहने भरल रहैत। भरि दिन खाली रहने पॉंचो तूर मुसरी घोड़सारमे मन भरि खेलबो-धुपबो करैत आ गीतो-नाद गबैत। ओना घरक जे मुँह-पुरुख गारजन- मुसरी- अछि ओ धिया-पुताक खेलमे शामिल नइ होइत कातमे बैसि परिवारक संग माने पत्‍नीक संग धिया-पुताक खेल देख मने-मन खुशियो होइत आ खुशी रहैले विचारबो करैत। अपन आ अपना परिवारक तँ खुशीए-खुशी मुसरी देखैत मुदा जेकर घर छिऐ, माने घोड़ाक; ओकरा खुशी नै देख दुनू परानी मुसरीक छाती छँहों-छीत होइत रहइ। छँहों-छीत ई होइ जे एक तँ वेचारा घोड़ा भरि दिन रौद-वसात किछु नै बूझि लफरैत रहैए, दौगैत रहैए। तइपर मुहोँ सीअल रहै छै आ पएरो बान्‍हल। जखन खुट्टापर सँ निकलैए, तखन पैरक बान्‍ह खुजै छै आ मुँहक लगै छै आ घुमि कऽ जखन अबैए तखन मुँहक लगाम खुजि पैरक बान्‍ह लैग जाइ छै। जेठ मास, सुर्ज अपन सोल्‍होअना हिस्‍साक उपयोग कऽ रहला अछि। जइ डरसँ हवो गरमाएल रहैए आ पानियोँ पतलमुहॉं भेल रहैए। बर्खाक तँ बाते की, गर्भेमे रहैए। आ जाड़ तँ सहजे अमेरिकाक हिस्‍सामे पड़ि जाइए। चारि बजे भोरे गिरिजानाथकेँ केतौ काजे जेबाक छेलैन। तँए सहीसकेँ रातिये खाइबेर कहि देने रहथिन जे चारि बजे भोरे जेबाक अछि। गिरिजानाथक बात सहीस बूझि गेल जे अहिना समैक चर्च आनो दिन करिते छैथ। तँए हँ-हूँ किछु ने बाजल। हँओं-हूँ तँ तखन ने बजाएत जखन कोनो नाकर-नुकर रहत, जे परिवारोमे आकि गामोमे रहिते अछि। मुदा जइ गाममे नाकर-नुकर रहैए तहीठाम ने कोनो काज पहाड़ बनि आगूमे अवरोध ठाढ़ करैए, जैठाम नइ रहैए वा कम रहैए तैठाम ओही हिसावे ने किछु हेबो करैए आकि नहियोँ होइए। मुदा ऐठाम तँ जेहने बिसबासू नोकर तेहने बिसबासू घोड़ाक सवारी आ तेहने बिसबासू मलकार कहियौ आकि मालिक गिरिजानाथ। कहलो जाइ छै- ‘गाए-गोड़ूक मिलान तँ ठेहुनो पानि दूहान...।’ जहिना गिरिजानाथ चारि बजेक समए बान्‍हि सहीसकेँ कहने रहथिन, तहिना अपनो जिम्‍माक काजक जोड़-घटाउ कऽ नेने रहैथ। आन दिन आठ बजेमे उठनिहार आइ चारिये बजे घरसँ निकैल जेता, तँए हिसावमे जोड़-घटाउ करए पड़लैन। जहिना चलैले सवारी टंच चाही, तहिना ने काज केनिहार सवारोकेँ टंच रहऽ पड़तैन। माने ई जे घरसँ निकलैसँ पहिने अपन जे व्‍यक्‍तिगत दैनंदिनक क्रिया अछि, ओइसँ निवृत होइत अपनाकेँ रणक सिपाही जकॉं तैयार करि कऽ निकलए पड़त। तैयारी करए गिरिजानाथ तीन बजे भोरे उठि गेला। उठिते लगले पत्‍नियोँ उठि कऽ पतिक तैयारीमे जुटि गेली, तहिना सवारीक तैयारीमे सहीसो तीन बजे भोरे घोड़सार खड़ैर-बड़ैर चिक्कन-चुनमुन ओइ रूपे केलक जे मालिकक पहिल सगुनियाँ जगह तँ यएह भेल। घरक भीतर घरे भेल, मुदा बहराक मुँह तँ यएह भेल। सहीसक चहल-पहल आ पैरक आहैटसँ घोड़ोक नीन टुटि गेल। टुटिते बूझि गेल जे केतौ रणक्षेत्रमे जाए पड़त। ताबे सहीस घोड़ा आगू अँकुराएल बदाम आनि ओगारि देलक। घोड़ाक टीप-टापसँ माने पैरक दमससँ मुसरियो सभ तूर जैग गेल। कले-कुशल ओछाइनपर रहत केना। बिना उरखुरेने-तुरखुरेने दुनू परानी बुढ़िया-बुढ़बा रहि सकैए मुदा धिया-पुता, टेल-टेल्‍हुक केना रहत। मुदा अखन घरसँ निकलबो केना करत। तोहूमे घोड़ाक घर छी, गाइक रहैत तँ एकटा बातो, ओकर खूर फाटल रहै छै, बीच फाटोमे जान बँचि सकै छै मुदा घोड़ाकेँ तँ टाप होइ छै। सौंसे सरदर रहै छै। पीचरा-पीचरा भऽ जाएब। लहासक चिन्‍हो-पहचीन मेटा जाएत। कोन हड्डी मरदनमा छी आ कोन मौगियाही, से तेना भऽ कऽ फेंट-फाँट भऽ जाएत जे परेखोमे नै आएत। तँए अखन घरेमे रहब नीक। मुदा खुरलुच्‍ची धिया-पुता मानबे ने करइ। अन्‍तमे तामसे पिता-मुसरी धिया-पुताकेँ कहलकै- “अखुनका समए की अछि से बुझहै छीही?” सभसँ छोटका जे रहै, ओ बाजल- “हँ।” “की बुझहै छीही?” “अखन उत्तमचन नाचक ओ समए छी जखन थानामे केस लिखबए गेल आ बाजल- क्‍या कहू दरोगाजी अकिल ने देता काम, यह औरत भी लेत है उस औरत का नाम।” मुदा ओइसँ नमहरका मुसरी जे रहै ओकरा नीक नइ लगलै। छोटकाकेँ फटकारैत बाजल- “अखनुक बेर छी अल्‍हा-रूदलक ओ गीतक जइमे कहै छै- रनमे मरे दोख नइ लागे।” धिया-पुताक घघौंज देख पिता-मुसरी बाजल- “अनेरे तूँ सभ नाच-तमाशा ठाढ़ केने घघौंज करै छेँ, अखुनका बेर छी प्रभातीक।” तैपर छोटकी बेटी पुछलकैन- “प्रभाती क्‍या हुआ, पापा?” पिता उत्तर देलखिन- “मॉरनिंग सॉंग।” चारि बैजते गिरिजानाथ ऑंगनसँ निकैल घोड़सार दिस बढ़ला। बैढ़ते देखलैन जे सहीस घोड़ाक पीठपर रंगर चद्दरिक गद्दा लगौने अछि, मुँहमे लगाम लगौने अछि। पहुँचिते लगाम पकड़ा देत। मुदा बिच्‍चेमे गिरिजानाथक मनमे उठलैन, लोहाक बनल गाड़ी-सवारी तेज होइतो लोकेक बनौल छी, तँए लोकक काबूमे बेसी रहैए। ओना केतौ-केतौ हूसितो अछि। मुदा घोड़ा तँ से नइ छी। जीव छी, अपन सभ किछु छै। माने ऑंखि छै, मुँह छै, कान छै, बुधि छै। असथिरो रहि सकैए आ बदमाशियो कऽ सकैए। मुदा छी तँ ओहो सवारीए। लगाम पकड़ैसँ पहिने गिरिजानाथ घोड़ाकेँ प्रणाम करैत बजला- “चलह हे संगी, कर्मभूमिमे।” जहिना विचारक घोड़ाक संग देह दौड़ए लगैए तहिना दौड़ैले गिरिजानाथ घरसँ निकलला। घोड़ाकेँ घरसँ निकैलते घर खाली भेल। खाली होइते पॉंचो तूर मुसरी अपना घरसँ निकलल। निकैलते बुढ़बा-बुढ़िया ऑंखि उठा बाल-बच्‍चा लेल भोजन ताकए लगल तँ देखलक आने दिन जकॉं बदाम छिड़ियाएल अछि। तहूमे दिन भरिक फुला कऽ अँकुराएल, पेटमे पड़िते ओंकरी दिअ लगत, माने अँकुराए लगत! पछाति दुनू परानी धिया-पुता दिस नजैर देलक। तीनू बच्‍चा तीनू दिस चौकन्ना होइत रहए। ने माइक मुँह दिस एकोटा तकैत रहए आ ने बापक मुँह दिस, जेना पेटक कोनो फिकिरे ने रहइ। हरदरे बुढ़बा मुसरी बाजल- “बाउ, अहॉं सभ की देखै छी?” सभसँ छोटकी बेटी कहलकैन- “पापा, टी.भी.मे क्रिकेट देख रहा हूँ।” छोटकी बेटीक बात सुनि, ने बाप किछु बाजल आ ने माए। मनमे नाचए लगलै अपन कुल-खनदानक पुरुखाक इतिहास जानियेँ नइ रहल अछि आ अनका पाछू बेहाल अछि। ओकरे बाप-दादाक नामक माला बना जपैत रहह...। पत्‍नी दिस ताकि नजैर निच्‍चॉं करैत मुसरी दोसरकेँ पुछलक- “बाउ, अहॉं की देखै छी?” गम्‍भीर होइत दोसर बच्‍चा मुसरीकेँ कहलकैन- “बाबूजी, अपने जनम देने छी तँए संग मिलि दुख-सुख कटैत मृत्‍युक पछाति श्रद्धापूर्वक बिसरजन केला पछाइते ने अपनाकेँ उद्धार बुझब, आकि स्‍वतंत्र बुझब। ई तँ नइ जे माए-बाप जनम देनिहार पालनकर्ता छैथे, तँए हमरा खगते की अछि आकि हमर खगते की छै।” बच्‍चाक बात सुनि पिताक मन जेना थीर भेलैन। थीर होइते पत्‍नीकेँ कहलखिन- “माए गुन धी...?” पतिक बात सुनिते बुढ़िया-मुसरी बजली- “कोन पुरना-धुरना गपक खोर-चाल करै छी। अनेरे खोड़नीसँ खोंचारै छी।” आगू बैढ़ पॉंचो गोरे थैरक पॉंचू भागसँ बैसि बदाम बीछि-बीछि खेलक। पानि पीब बुढ़बा-मुसरी तीनू बच्‍चाकेँ कहलक- “बौआ, खेला-पीला पछाति जे कनी अराम नइ कऽ लेब, तखन पार लागत। दिनुका खेलहा राति आ रतुके खेलहा ने दिनमे खाइ छी।” तीनू ‘बड़बढ़ियॉं’ कहि आगू बैढ़ गेल। दुनू बुढ़बा-बुढ़िया घोड़ाक थैरेमे अराम करए लगल। मुदा मन चहाएले रहइ। चहाएल ई रहै जे भरल पेटक नीन छी, जँ कहीं मोटगर होइत गेल आ तइ बिच्‍चेमे जँ घोड़ा आबि गेल तखन तँ अनेरे जान चैल जाएत। मुदा लगले मनमे उठलै- अपने दुनू परानी ने ऑंखि मूनि अराम करब, बच्‍चा सभ तँ जगले रहत, ओकरे किए ने चेतौनी भार दऽ दिऐ। एक तँ अराम करब भेल, तहूमे जँ छगाएले मन रहत तखन, नीने केना हएत। मीठगर नीन तँ तखन ने अबै छै, जखन मीठगर मन मीठगर भोजन केने रहल, जँ से नइ रहल तँ मीठगर नीन कहियौ आकि गढ़गर नीन, से थोड़े हएत। मुदा गाढ़ो जँ गाढ़े रहि जाए, आ प्रगाढ़ नै हुअए तखन ओइ गाढ़क महत्ते की? पति पत्‍नीसँ पुछलक- “गाढ़ नीनमे नैन केना रहैए?” पतिक बात सुनि पत्‍नीक मनमे भेल, जखन समिलात धियो-पुतो अछि, सामिल परिवारो अछि, तखन तँ समिलात विचारो ने हेबा चाही? तँए जँ पति आदेश केलैन जे ‘गाढ़ नीनमे नैन केना रहैए।’ तँ बड़बढ़ियॉं केलैन। अपन हक-हिस्‍साक उपयोग केलैन। मुदा हमहूँ किछु निवेदित नइ करयैन, तखन दुनूक बीच मन-मिलन केना हएत? जँ मन-बुधिसँ भेँटे नै हएत तखन बुधि-मनक मिलाने केना हएत? आ जखन बुधिये-मनक मिलान नइ हएत तखन दुनूक बीच मेल-मिलाप केना हएत? जखन दुनूमे मेले-मिलाप नइ हएत तखन एक-दोसरक बीच विलाप केना हएत? आ जँ विलापे नइ तँ संगे चलबे ने करब आ जखन संगे चलबे ने करब, तखन दुनू संगबे केना हएब? सीता जकॉं एक गोरे रावणक पुष्‍प वाटिकामे रहब आ दोसर बोने-बोन वौआइत-वौड़ाइत केतौ रत्नाकर सन मुनि आश्रम पहुँचत तँ केतौ सबरीक आश्रम, तैसंग केतौ तीर-धनुषक संग शिकारी बनत तँ केतौ मेघनादक गर्जन-मर्जनक शिकार सेहो बनबे करत किने? ओना एक-दोसरक प्रश्‍न सुनि दुनू परानी मुसरी मने-मन तेना उत्तर ताकऽ लगल जे चेतसँ चेतन बनए लगल मुदा चिन्‍तनक क्षण जहिना ऑंखिक दुनू पट-पटा ऑंखिकेँ बन्न कऽ दैत अछि, तहिना दुनूक ऑंखिक पीपनी एक-दोसरमे सटि कऽ ओझरा गेल, जइसँ बाहरी दुनियॉंक रस्‍ते भीतरी दुनियॉंसँ कटि गेल। एक-दोसराक पीपनी सटिते नीनक आशंका दुनूक मनमे भेल; आशंका होइते एक-दोसरकेँ चैन रूप देख बाजब बन्न कऽ लेलक। एम्‍हर तीनू बच्‍चा बाहरी दुनियॉंक खेलमे लगल रहबे करइ। तीन बजैक समए, टहटहौआ रौद। घोड़सार लग आबि गिरिजानाथ सहीसकेँ घोड़ाक लगाम पकड़ा अपने आँगन गेला। रौदाएल घोड़ाक दशा देख सहीस घरेमे घोड़ाकेँ बान्‍हब नीक बुझलक। बाहरक थैरमे नै बान्‍हि सहीस घोड़सारेमे घोड़ाकेँ लगाम खोलि, पैरमे घोड़छान लगा खुट्टामे बान्‍हि देलक। तैबीच घोड़ाक आहैट देख पॉंचू मुसरी अपन घरक बाट पकैड़ भीतर चैल गेल, मुदा सभकेँ अगुअबैत बुढ़बा-मुसरी पाछूसँ अपना घरक मुँहपर पाछू मुहेँ घुमि रौदाएल घोड़ाक दशा देखए लगल। पियासल घोड़ाकेँ बूझि सहीस पहिने पानिक वर्तन आगूमे देलक। मुदा घोड़ा पानि देखिते मुँह छीपि लेकक। मुँह ई सोचि छीपलक जे सरद-गरम एहने समैमे होइ छै। पानिक वर्तन हटा नोकर खाइले आगूमे देलक, ठेह उतरल घोड़ा खेनाइकेँ सुँघबोने केलक। नोकर बूझि गेल जे पहिने ई अराम चाहैए। अखन नहेबो केना करबै। रोदाएल अछि। झूसियाइत नोकर घोड़सारसँ निकैल अपन बास दिस बैढ़ गेल। अपना घरक मुहथैरपर सँ बुढ़बा-मुसरी देखलक जे वेचारा घोड़ा दरदे ने खेलक आ ने पीलक, ओ ते सभटा अपने बेसाहलक। मुदा हमरा तँ केता दिन केता रातिक खेनाइक जोगाड़ एके बेर भऽ गेल। मुदा लगले मनमे भेलै, एते लऽ कऽ राखब केतए? बड़ करब तँ पेटेमे ने खा कऽ राखब। अपना तँ ओहन घर नइ अछि जे कोशल करि कौशलिया करब? दोसर, पानि तँ सहजे पानियेँ छी, जे अकाससँ पताल धरि पसरल अछि। मुसरीक मन घुमलै, घुमि कऽ ओतै चैल गेले- जखन पेट छोड़ि अपन कोनो पथार-खेत ऐछे नइ, रखनहि ने छी आ पेटो भरले अछि, तखन अनेरे मनकेँ कोन अर्थहीन काजमे वोआबै छी। मुसरीकेँ जेना एक प्रकरणक पूर्ण भाव भेट गेल होइ तहिना भावपूर्ण विचार मनमे नाचि गेलइ। नचिते नजैर घोड़ाक छानक दुनू अगिला पैरपर पड़लै। नोकरकेँ घरसँ निकैलते थाकल घोड़ा बैसैत असुआ कऽ मसुआ गेल। घोड़ाक मुहसँ खसैत लाड़-झागकेँ देख मुसरीक मन सिहैर गेलइ। सिहैरते घोड़ाक ऑंखिपर नजैर बढ़ौलक तँ पल खसल दुनू ऑंखि, मुहसँ खसैत बाटक पीड़ाकेँ देखलक। मनमे एलै- वेचारा कहबो केकरा करत? ऐठाम के अछि? आ जँ रहबो करैत तँ की ओकर वेदनाक पीड़ाकेँ थोड़े पीब लइत। मुदा एकठाम संग रहने एते तँ हेबे करैए जे जेतइ समूह तेतइ समाज बनैए। मनमे उठलै, कहू जे वेचाराकेँ साढ़े तीन देवालक बीचक खुट्टामे बान्‍हि, दुनू पएर लोहाक कड़ीसँ छाइन देने अछि आ अपने सभ अपन-अपन खोबहार पकैड़ नेने अछि। के वेचाराक वेदना सुनत! अपना दिस मुसरी हिया कऽ देखलक तँ बूझि पड़लै जे वेचाराक पएरो बरबैर आकि ओकर नाको-कान बरबैर ने छी, तखन हम काइए की सकै छी। मन ठमैक गेलइ। ठमकिते लगले मन ठनकलै, ठनकिते जगलै, हमरा बुते ओकर राशन-पानि जुटौल थोड़े हएत। घरो बनबैक लूरि अछि तँ अपने सनककेँ बास भरिक; तैठाम ओकर रहैक घरो नइ बना सकै छी। किछु कहौ चाहबै तँ ओकर कान तेते ऊपर छै जे सुनबे ने करत। तखन हम काइए की सकै छिऐ। अपना भागे वेचाराक जे दशा लिखल छै से तँ भोगइ पड़तै...। मुदा लगले मुसरीकेँ अपनापर ग्‍लानि जगलै। जगलै ई जे ई तँ केकरो भलाइ करबसँ अपन देह छीपब भेल! जखन अनकर दुख-पीड़ा अपना मनमे नइ बॉंटि लेब, ताबे ओकर दुख घटतै केना? बदलल विचारे जखन मुसरी ऑंखि उठा कऽ देखलक तँ बूझि पड़लै जे बैसल घोड़ा मुड़ी खसौने एकटा कान धरतीपर देने अछि आ दोसर मुँहक ऊपरमे छै। देखिते सवुर भेलै, सवुर ई भैलै जे ऊपरका कान ने ऊपरमे छै, मुदा माटि परहक कान तँ निच्‍चेँमे छै, ओइ बरबैर तँ छीहे। मुँह जँ ऊपरो छै तँ कनी जोरसँ बजबे करत; अवाज ऊपर जाइ कि नइ, मुदा निच्‍चॉं तँ खसबे करत, तँए सुनैमे कोनो असोकर्ज नहियेँ हएत; निच्‍चासँ सुनियेँ लेब। अपन बात तँ लगेसँ कहबै, ओहो सुनबे करत। अपन घरक मुहथैरसँ निकैल बुढ़बा-मुसरी घोड़ाक थैरमे पहुँचल। हिया कऽ देखलक तँ बूझि पड़लै जे वेचारा घोड़ाक जान सदिकाल फॉंसेमे फँसल रहै छै! पैरक छुटल तँ मुँहक लागल आ मुँहक छुटल तँ पैरक लागल! अवग्रहमे वेचारा पड़ल रहैए। अपना दिस हिया कऽ मुसरी देखलक जे हमरा बुते कोन भलाइ वेचाराक भऽ सकै छै। चारूकात नजैर दौड़बैत जखन पैरक छानकेँ देखलक तँ बूझि पड़लै खुट्टामे बान्‍हल जौरकेँ जँ दुनू दिस माने खुट्टो दिस आ पएरो दिससँ काटि देल जाए तँ वेचाराक जान हल्‍लुक भऽ जेतइ! फेर जँ सहीस आबि दोसरछान लगा दइ, ई दीगर भेल। मुदा अखन जेतबे काल तेतबे काल अवग्रह कटि ग्रह तँ बनतै। जखने ग्रह बनतै तखने ने तरेगनक इजोतमे अपनाकेँ भुकभुकौत। ससैर कऽ मुसरी घोड़ाक कान लग पहुँच गर लगा कऽ बैसल। घोड़ाक ऑंखि बन्न रहै तँए मुसरीकेँ देखबो ने केलक, तहूमे कुत्ता जकॉं नाको नहियेँ छै जे गन्‍धोसँ परेख ऑंखि खोलैत। कानक जड़ि लग बैसल मुसरी जोरसँ बाजल- “घोड़ा भाय, हम मुसरी छी। जीव-जगतक दुनियॉंमे हमहीं-तोहींटा एकठाम छह, तेसर कियो ने अछि जे भगवानक दरबारमे दोखी बनत। लगमे हमहींटा छी। तँए जँ तोहर दुख-पीड़ा हम नइ देखबह तँ के देखतह। कान खोलह, ऑंखि उठाबह।” अपना मने मुसरी बाजि कऽ चुप ऐ दुआरे भऽ गेल जे, घोड़ा हँ-हूँ की बजैए से पहिने सुनी। मुदा घोड़ा तँ घोड़े छी, मुसरीक चुनचुनी केते बुझत। एना जँ माछी-मच्‍छरक घनघनैनी हाथी-घोड़ा बुझए लगल तखन तँ भेल! किए घोड़ा कान पटपटाएत आकि ऑंखि खोलत। मुसरीक मनमे भेल, एक डाकैनसँ नइ सुनलक; दोसर डाकैन दिऐ। अपन परिचए दैत मुसरी फेर बाजल- “भाय घोड़ा, हमर गिनती ने मनुखमे अछि आ ने जानवरमे आ ने जड़िये-जगतमे, तँए तोरासँ कोनो दुश्‍मनी साधैक अछि से नइ बुझह। तोहर दीन-दशा देख दया लैग गेल। ओना तोहर नोर पोछल तँ हमरा बुते नहियेँ हएत, मुदा संग मिलि नोर बहौल तँ हएत। ऑंखि खोलह, कान उठाबह।” मुसरीक बात जेना घोड़ा सुनलक। सुनिते ऑंखि खोललक। ऑंखि खुजिते मनमे उठलै, बाजल- “मुसरी भाय, पहिने ई कहह जे नीके-ना जीबै छह किने?” घोड़ाक बात सुनि मुसरीक मन घोराए लगल। घोराए ई लगल जे हम नीके नै छी तँ अधला कहिया भेलौं जे नीके नइ जीब। मुदा लगले मनमे उठलै जे जँ वेचाराकेँ खाइयोक लूरि रहितै तँ हमर पॉंच परानीक गुजर चलैत। ओना दुनियॉं बड़ीटा छै तहूमे मूस-मुसरीक। अन्नक घर, मनक घर, कागजक घर, खेतक घर, पथारक घर, हाथीक घर आ सद्य: घोड़ाक घर सेहो...। जेतए मन फुरत तेतए रहब। मुदा ऐ वेचाराकेँ तँ से नइ छै, जँ से रहितै तँ अहिना एजेन्‍सीक एजेन्‍ट जकॉं चारि बजे भोरसँ दस बजे राति धरि सड़कपर सवारी-गाड़ी जकॉं दौड़ैत रहैत! एक तँ पड़ोसीपनक धर्म दोसर एकरे हिस्‍सा अन्नो खाइ छी, एकरे घरे कोठाक घरोमे रहै छी। तँए अपन बिसवास जगबैत मुसरी बाजल- “भाय घोड़ा, अपन कण्‍ठी छूबि कहै छिअ जे आइ धरि कहियो अन्न छोड़ि कोनो अघट भोजन कण्‍ठसँ निच्‍चाँ उतरल हुअए...।” मुसरीक बात समाप्‍तो ने भेल छल कि बिच्‍चेमे घोड़ा बाजल- “हमरा बुझबैले तूँ किए अनेरे कण्‍ठी छूबि कऽ सप्‍पत खाइ छह।” घोड़ाक बात सुनिते मुसरीक मनमे बिसवास जगल जे भरिसक घोड़ा अपनो बात किछु कहए चाहैए। पहिने मुँह खोलि कऽ बाजह, तखन ने सुनला पछाति किछु कहबै। तैबीच बुढ़िया-मुसरी, जे घरमुहॉं भऽ गेल छल- पाछू उनैट तकलक तँ घोड़ाक कान लग अपना पतिकेँ बैसल देखलक। ओना पतिक सतीत्‍वपर मिसियो भरि शंका नै जगलै जे घोड़ा फुसिया लेत, मुदा एते तँ मनमे जगबे केलै जे घोड़े छी जँ कहीं कान उठा कऽ पटपटौत तँ वेचाराक जान बँचब कठिन भऽ जेतइ, आ जखन परिवारमे सृजन नइ रहत, सृजके खतम भऽ जाएत तखन कोनो उपैत केना हएत! जइ परिवारमे उपैत नै रहत तइमे विपैत नै औत तँ औत केतए? आगि तँ ओतै ने पजरत जेतए सुखल जारन रहत; आकि पनियाएल पानिक जारनमे पजरत। से नइ तँ हमहूँ किए ने पतिक नाङैर पकैड़ लगमे बैसि दुनूक देह-दशा देखी...। अपना घरसँ- माने देवालक बोहैरसँ- निकैल बुढ़िया-मुसरी घोड़ाक थैर दिस बढ़ल। माएकेँ दू डेग आगू बढ़ैत देख तीनू बच्‍चो-मुसरी पाछू-पाछू विदा भेल। ऑंखि तकैत बुढ़बो-मुसरी आ घोड़ो चारू मुसरीकेँ देखलक। देखिते घोड़ाक मनमे भेल जे हमरासँ बेसी समंगर मुसरी अछि। घोड़ा अपन देह-दशा बिसैर गेल। हिसावोक तँ केतेक नजैर अछि। जइ नजैरे घोड़ा बुझलक, ओहो अकाट्य रहइ। लोकतंत्रमे गिनतीए महत रखै छै। मुदा ई बुझबे ने केलक जे तंत्रक पाछू मंत्र चलै छै आ ओ मंत्र एक तंत्रसँ दस तंत्र धरि अछि जे लोकतंत्रक संगी छी। समंगर मुसरीकेँ देख घोड़ा बाजल- “मुसरी भाय, ई सभ तोरे टुसरी छिअ?” घोड़ाक बातसँ मुसरीकेँ मिसियो भरि मनमे दुख नइ भेल, जे हमरे सोझामे हमर वंशजकेँ ‘टुसरी’ कहलक। मनमे एलै- जे एकसिरा गाछ जखन कनियेँ ऊपर उठैए आकि टुस्‍सा रूपमे दोसर-तेसर चारिम निकलए लगैए, जइसँ डारि-पातक संग शीलोक शोभा बढ़बैए। तँए जँ ‘टुसरीए’ कहलक तँ कहलक। मुस्‍की दैत मुसरी बाजल- “भाय घोड़ा, एते तँ अछि जे तोरा घरमे घर बना रहै छी, आ तोरे छिड़ियौलहा बदाम खा कऽ मस्‍तीसँ जीवन-गुदस करै छी। मुदा पैछला जेते परिवार बढ़ल ओ तँ देश-विदेश चैल गेल। कहियोकाल मोबाइलसँ समाद सुनबैत रहैए जे विदेशमे अपन रहैक मकान बना लेलौं, आ एहेन कारोबार ठाढ़ कऽ लेलौं जे आब कहियो अपन बाप-दादाक दुखबास देखैक अवसरो ने भेटत।” कहि मुसरीक बोलती बन्न भऽ गेल। बन्न होइक कारण मनमे ई उठि गेलै जे ‘ओ सभ’ कोन जनमभूमि आ मतरभूमिक गीत गौत? आ कोन देवी-दुर्गाक गीत गाबि केकरा सुनौत? मुसरीक बोलती बन्न देख घोड़ा चरियबैत पुछलकै- “मुसरी भाय, जखन तोहर बात सुनैले कान खोलि ठाढ़ केने छी तखन तूँ बिच्‍चेमे किए अँटैक गेलह?” घोड़ाक बात सुनि मुसरीक असिआस बैढ़ मन अलिसए लगलै। हाफी करैत बाजल- “भाय घोड़ा, तोरा सभले ई दुनियॉं बॉंटल छह, ई जलवायु- उ वातावरण, ई मौसम- उ मौसममे। सौंसे दुनियॉं हमराले एके रंग अछि आ समाङ्गो आ जातियो-वेरादर तेते अछि, जे सगतैर बसल छी। अपन जाति-वेरादरक हाल-चाल कहह?” मुसरीक बात सुनि घोड़ा ठमैक गेल। ठमैक ई गेल जे महजाल जकॉं तेहेन जाल मुसरी फेकलक जे हमरा ओते बुझलो ने अछि। मुदा दरबज्‍जापर आएल अतिथिकेँ जँ नइ भरि पेट तँ अदहो पेट भोजन नइ करबयैन तँ ओ दरबज्‍जे की...। मने-मन विचारैत घोड़ा बाजल- “मुसरी भाय, दुनियॉंक पाछू जे अनेरे माथ लगाएब से कथीले। हमरासँ नमहर हाथीक माथ छै, पहिने ओ ने लगाबह। मुसरी भाय, आइ पहिले दिन तोरा मुहेँ अपन जाति-वेरादरक चाल-चुलक बात सुनलौं।” बजैत-बजैत घोड़ा ठमैक गेल। कनीकाल ठमकल आ ऑंखि पोछैत फेर बाजल- “भाय जेहने जातिक गति अछि तेहने वेरादरीक सेहो अछि। तखन तँ गाए नइ छी जे पोसिन्‍दारकेँ अमृत पीएबै। बड़ बेसी करबै तँ केकरो मकै-गहुमक वेपार पॉंच कोस-दस कोसक बीच सवारी बनि उपकार करबै, चाहे अन्न-पानिक बदला सवारी गाड़ी जकॉं सवारीक उपकार करबै, सएह ने?” अपन बात जेना घोड़ा छाती खोलि मुसरीकेँ कहि ठोरे-ठोरे चुचुआएल। घोड़ाक चुचुआएब सुनि मुसरी बाजल- “भाय घोड़ा, मनसँ सोग-पीड़ा हटाबह, जेतऽ रही मस्‍तान बनि मस्‍ताना गीत गबैत रही, रस्‍ता बढ़ैत चली।” शब्‍द संख्‍या- 3625, 17 अगस्‍त 2015 फलहार चारि बजेक समए। सुर्ज अपन प्रखर प्रतिभा समटैक ओरियानमे लैग गेला। जइसँ कटुतामे कनी-मनी कमी आबि रहल छेलैन आ मधुताक सिरजन हुअ लगल छेलैन। उष्णता सहिष्‍णुता दिस बढ़ए लगल छेलैन। जहिना कोनो फल फूलसँ निकैल कलीसँ कलियाइत अपन पूर्ण जुआनीक बाट पकैड़ अन्‍तिम सीढ़ीपर पएर रैखते मधु-मधु मधुर बनि जाइए तहिना बाल सुर्ज डेगे-डेग बढ़ैत ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल छैथ जेतए उष्‍णसँ सहिष्‍णुक ढलान ढुलकैत शीतपनमे प्रवेश पबैए। दिन भरिक उपासल रूक्‍मिणी अपन पूर्ण होइत उपास देख फलहार-ले माएकेँ कहलक- “माए, फलहारक बेर लैगचाएल अबैए…?” ओना रूक्‍मिणीक मनमे संगी-साथीक मुँहक सुनल अनेको रंगक फलहार-वस्‍तुक बात छल जे मनो छेलै। माने ई जे टोलक आठ बर्खसँ ऊपर आ चौदह-पनरह बर्खक बीचक जे बारहो-चौदहो विवाहित-अ-विवाहित बाल कन्‍यासँ चिष्‍टाएल कन्‍या धरि संगे-संग काजो-उदेम, मेलो-ठेला देखब-सुनब आ धारो-पोखैर नहाइले जाइ-अबै छलि। तैसंग अपन-अपन खिस्‍सो-पिहानी सुनबो-सुनैबितो छलि। जइसँ समयानुसार किछु विचार जगबो करै छल आ मेटबो करै छल। सुगीताक मुहेँ पैछला मासक उपासक फलहार सुनि चुकल छलि जे भरि दिनक उपासक पछाति सॉंझमे गाइक दूध आ केदली वनक फलसँ फलहार केने रही। पछुलका मासक उपास। नइ हमर तँ ऐ मासक पहिल उपास औझका छी। दस बर्खक रूक्‍मिणीक मनमे उपैक गेल। जिनगीक पहिल उपास रूक्‍मिणीक छल। ऐसँ पहिने संगी सबहक मुँहक बात रूक्‍मिणी शास्‍त्र–पुराणक कथा जकॉं बुझै छलि। मुदा आइ तँ रूक्‍मिणी अपना आसे-आस चाहि रहल अछि। लगले रूक्‍मिणीक मनमे दोसर संगीक उपासक फलहार जैग गेलइ। जगलै ई जे कलिया बहिन सेव-अंगुरसँ फलहार केने रहैथ। बजारसँ सत्तैर रूपैए किलो अनने रहैथ, जेकर फलहार केने रहैथ। फेर लगले रूक्‍मिणीक मनमे उठल जे ओहो फलहारकेँ तँ आइ छह माससँ ऊपर कलिया बहिनकेँ केला भऽ गेलैन। फलहारक अपन-अपन विहीत अछि। से खाली उपासेक नै मॉं दुर्गाक चारू पूजा- माने आसिनक, माघक, चैतक आ अखाढ़क- एक रहितो विहीतमे भेद ऐछे। रूक्‍मिणीक मनमे भेल। हमर उपास तँ औझका छी, ने पैछला छी आ ने अगुलका हएत। आगूले आगू हएत आ पाछू तँ सहजे तर पड़ि गेल। बेटीक बात सुनि अनुराधा विस्‍मित भऽ गेली। जिनगीक पहिल उपास बेटीकेँ करैत देख मने-मन मन-मन्‍दिरमे विचड़ए लगली। किए ने जिनगीक आराधनाकेँ उपाससँ अराधि-अराधि लेत आ दिनक विसरजनक पछाति फलहार करत...। परिवारमे एक नव शक्‍ति अबैत देख अनुराधा रूक्‍मिणीकेँ अपन परदादीक कहल बात सुनबए लगली- “बुच्‍ची, उपासक फल दुखहाल नइ सुखहाल भेल, तैबीच विश्राम भेल फलहार। तेकर पछातिक समए जिनगीक सामान्‍य भेल जे अनवरत चलैए। चलैत आबि रहल अछि आ चलैत रहत।” जहिना रूक्‍मिणीक विचार सोझ-साझ नै तहिना अनुराधाकेँ सेहो भऽ गेल रहैन। मुदा तैयो जेना रूक्‍मिणीक मन मानि गेल जे फलहारक बेरमे ने फलहार करब। अखन तँ महादेव बाबाक पूजाक बेर अछि, संगी सभ संग करैले अबैत हएत। अनेरे हमहूँ नहा-फुलडालीमे फूल लऽ पहिने फलहारेक बात माएकेँ कहलयैन। ओ की कोनो बाल-बोध छैथ जे भरि दिनक अन्न-पानिक तियाग नइ देखलैन। किछु भेली तँ माए भेली। माए कखनो बेजाए थोड़े करती। तैबीच अँगनाक पछुआरक बाटपर सँ सुनन्‍दा जोरसँ हाक दैत बाजलि- “केते सिंगार-पेटारमे रूक्‍मिणी लगल छेँ, आकि जल्‍दी बाबा दरबार चलमेँ।” अपन लाड़-झाड़ बढ़बैत रूक्‍मिणी अँगनासँ निकलैत बाजलि- “केते कालसँ तोहर बाटा-बाटी तकैत अँगनामे ठाढ़ छेलौं, तोहीं सभ पछुआएल छेलेँ।” कहैत-कहैत सखी-बहिनपाक बीच रूक्‍मिणी मिझिरा गेलि। बाबा दरबारक सेन बनि बोल-बम, बोल-बम करैत विदा भेलि। सखी-सहेलीक बीच रूक्‍मिणी फलहारक बात बिसैर शिवदानक कथा बहिन- सुफली-क मुहेँ सुनए लागलि। जहिना भगवान रामक दरबारमे हनुमान सन वीर आ जामबन्‍त सन प्रेरक छला तहिना तँ दूध-मुँह, बाल-मुँह बानरोक समूह तँ छेलैहे। जहिना शिवसेनाक बीच आठ बर्खक अबोध-बोध कन्‍या रमणी-रैमणी छलि आ तहिना साढ़े चौदह बर्खक सुफली सेहो छेलीहे आ रूक्‍मिणी दस बर्खक। ओना रूक्‍मिणी सेहो अपन आने-आने संगी जकॉं मुँह बन्न केने सुफली बहिनक बात- शिवदानक कथा- सुनि रहल छलि। बीच-बीचमे कखनो-कखनो मनमे आनो-आनो बात उपैक जाइते रहइ। मुदा तेकरा रूक्‍मिणी समैट-समैट पँजिया-पँजिया अगहन मासक धानक पॉंज जकॉं बगलमे रैख-रैख सुफली बहिनक बात सुनए लगैत रहए। सुफली बहिनक बिआह पैछला सालक अही मासमे भेल रहैन। साल लैग दोसर सालक पहिल मास छी, मुदा तैबीच एक पनरैहिया सासुरोसँ भऽ आएल अछि। माता-पिताक परिवारसँ सासु-ससुर-पतिक परिवार सेहो देख चुकल अछि। ओना उमेरोक हिसावे आ विचारोक हिसावे सुफली सभसँ ऊपर ऐछे। तहूमे अपनो किछु खास गुण देहमे झलैकिते छै। एक तँ विधाता अपन सोल्‍होकलाक उपयोग सुफलीकेँ सिरजैमे लगा देने छैथ, जइसँ जेहने देहक गढ़ैन माने सुचिन्‍त शरीर, तेहने चेहराक शकल-सूरत आ जेहने शकल-सूरत तेहने बोली-वाणी आ तेहने विचारो। तहूमे शिवपथक यात्रीक बीच शिव दर्शनक दर्पण सभकेँ वाणीक ऐनामे देखा रहल अछि। सभ, माने बारहो-चौदहो देव कन्‍या बताहि जकॉं विभोर भेल, रमैत शिव-दरबारक सीमान लग पहुँच महादेव बाबाक त्रिशुलकेँ प्रणाम केलकैन। तखने शिव कथामे विश्राम दैत सुफली बाजलि- “जेतए जइ कामनासँ चलल छेलौं, तेतऽ पहुँच गेलौं। आब अपन-अपन सभ पूजक ओरियान करै जाउ।” रूक्‍मिणीकेँ सखी-सहेलीक बीच प्रवेश करैत देख अनुराधा ऑंगनक मुहथैरपर सँ ताधैर देखैत रहली जाधैर ओ सभ ऑंखिक परोछ नइ भेलैन। परोछ होइते अनुराधा ऑंगन घुमि ऐबे केली आकि ओसारक ओछाइनपर पड़ल रोगग्रस्‍त पति-दीनानाथ कहलकैन- “बच्‍चीक पहिल उपास छी किने?” पतिक बात अनुराधाक करेजमे तेना लगलैन, जे कटि-कटि निच्‍चॉं खसऽ लगलैन। मुदा अखन तँ दुनू भारक बीच छैथ। एक दिस पति ओछाइन पकड़ने छह माससँ रोगाएल ओहन किसान जकॉं छैथ जिनकर छह मासक उपजा या तँ रौदी खा गेल होइ चाहे बाढ़ि आबि चाटि गेल होइ...। आ दोसर दिस सुकुमारि सुशील रूक्‍मिणी भरि दिनक उपासल बाल कन्‍या...। अनुराधाक मन तिलमिला गेलैन। जेना देहसँ शक्‍ति पड़ा गेलैन, हूब-टूटू जकॉं देह भारी बूझि पड़ए लगलैन। भेलैन जे खसि पड़ब। एको क्षण ठाढ़ रहब भारी...। दीनानाथक ओछानिक बगलेक खुट्टामे ओङैठ बैसि अनुराधा पतिक मुँहक बातकेँ तहियबैत बजली- “दवाइक बेर भऽ गेल, पानि लगमे अछि आकि आनि देब।” पत्‍नीक बात सुनिते दीनानाथ उठि कऽ बैसैत, सिरमा तरक गोटी निकालि बगलक लोटा उठा पानिक संग खेलैन। पतिकेँ दवाइ खाइत देख अनुराधाक मनमे औझका एक प्रकरण काज भेल देख खुशी उपकलैन। खुशी अबिते जेना देहक शक्‍तियो सबल भेलैन। ओछाइनपर बैसल दीनानाथ अनुराधाक ओइ जबावक ताक-हेर करए लगला जे पहिने पुछने छेलखिन। प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठबैत चलू, ने केकरो जड़ि भेटत आ ने छीप, से दीनानाथ बुझै छैथ, तँए आगू बजैसँ परहेज केने छला। पतिक प्रश्‍न ऑंखिक सोझमे अनुराधाकेँ नचै छेलैन। एक दिस पतिक उचिती-विनती बाल कन्‍या-रूक्‍मिणीक पहिल उपासक, तेकर फलहारक ओरियानक बेर आबि रहल छेलैन। आ दोसर, बेटी शिवघाटसँ औतैन, ताबे मेघमे तरेगनो अपन मुँह उठा लेत। मुदा लगले मनकेँ आरो नचा देलकैन- फलहार की? फलहार केहेन? नचैत मन अनुराधाक असथिर भेलैन- जँ मैट्रिक-कुलेशनक विद्यार्थी हरिवासय सन महान उपास काइए किए ने लिअए, तँए कि ओकरा एम.बी.बी.एस.क; इन्‍जिनियरिंगक आकि एम.ए.क उपाधि तँ नहियेँ भेट सकै छै। भेटतै तँ ओतबे जेतेमे ठाढ़ अछि। अनुराधाक मातृत्‍व-मन माए-दादी होइत परदादीपर पहुँचलैन। जइ समए कनी-मनी चेष्‍टगर भेल रहैथ, तहियाक तहियाएल बात मन पड़लैन। पड़िते मन जेना फुड़फुड़ेलैन। मनमे फुड़फुड़ाइत परदादीक ओ आसिरवचन उड़ि कऽ एलैन जेकरा देखिते अनुराधाक मन विहुँसि गेलैन। दीनानाथक टकटकी-नजैर अनुराधाक विहुँसैत-नजैर देख मधुएलैन। मधुआइते मनमे भेलैन जे भरिसक हमरे उचिती पुरबैले बोने-बोन ओ ओइ खोजी जकॉं खोजैले चैल गेल गेली! लगैए भरिसक केतौ भेटलैन अछि। ओतएसँ अबैमे जेते समए लगतैन तेते समए तँ रस्‍ता निङ्गहारए पड़त। अनुराधाक मनमे एलैन- जखन दस-बारह बर्खक रही तखन परदादी अस्‍सी बरख टपि चुकल छेली। गामक उपास केनिहारिमे हुनको गिनती छेलैन। पुछने रहिऐन- “दादी, एते जे उपास करै छिऐ से फलहार केना पुरबै छिऐ?” हमर बात सुनि परदादी पहिने तँ दिल खोलि कऽ हँसल छेली। ओहिना मन पड़ैए- सभटा दॉंत झलकैत रहैन। ओहनो अवस्‍थामे एकोटा दॉंत नै टुटल छेलैन जे कनी शंको होइत। शास्‍त्रीय संगीतक धुनक धुन जकॉं जखन उड़ैत अकास गेली तखन ताल टुटलैन। ताल टुटिते कहने रहैथ- “दाय, हमरा बापकेँ बेसी खेत-पथार नइ रहैन, मुदा ई बुझल रहैन जे खेतमे केते उपजा होइ छै। तइ हिसावक फसिल उपजा अपन साल-माल लगबै छला। तही दिनक बात छी।” हम धियानसँ सुनि रहल छेलौं। हमर जिज्ञासा देख झमैर कऽ परदादी कहलैन- “अहिना धियानसँ सुनिले। धड़फड़ेने सभ बात नै बुझबीही। संच-मंचसँ बैसि। केकरा-ले राखब तोरे सभकेँ ने देने जेबो।” संच-मंच भऽ बैसिते दादी पुन: बजली- “बुच्‍ची, सासुर अबैसँ सात-आठ बरख पहिने नैहरेमे उपास करैक आदैत पकैड़ लेलक। ता नइ बुझिऐ। बाबूकेँ पुछलयैन जे फलहार की करब? ओ कहलैन जहिना अपन उपास छी तहिना ने खेतोक उपज फलहार छी, तइले चिन्‍ता किए करै छह।” मुदा खुजला नइ जे कथीक फलहार करब। दोहरा कऽ जखन पुछलयैन तँ कहलैन- “बुच्‍ची तीन कट्ठा अल्‍हुआ-सुथनीक खेती कऽ लइ छी, जइसँ सालक छह मास परिवारक खोरिस पुरि जाइए। माटिक उपज छी, मीठपन छइहे तखन ओहो ने फले भेल। सएह करब शुरू केलौं।” अनुराधाक मनमे पतालक पानिक स्‍वच्‍छतापर बिसवास जगलैन। केना ने जैगतैन मेघमे केतबो शुद्ध पानि किए ने हौउ मुदा अकासक बाट गुजरने दूषित भाइए जाइए, मुदा पतालक पानि धरती सन छन्नासँ छानलो रहैए आ समुद्री लहैरसँ फरिछाइतो रहैए। जहिना कोनो नटुआ नचैत-नचैत केकरो कोरामे बैसि लाड़-झाड़ करए लगैए तहिना अनुराधोक मनमे एलैन। मनमे अबिते चारीमपनक परदादी जेना आगूमे आबि ठाढ़ भऽ नाचए लगलैन। चाकर-चौरस देह, हाथ-पैरमे ओहिना फुनफुनी जेना बाल-बोधक हाथ-पएर होइए। ने एकोटा दॉंत टुटल आ ने देहक कोनो अंग भंग भेल। जेहने देहक पानि, तेहने ऑंखिक संग नजैरो पनियाएल। मुदा लगले दादीक बात मनमे तहे-तहे तहियाइत तहिया गेलैन। आ नजैर सोझमे बैसल पतिपर आबि गेलैन। अबिते बजली- “आब केहेन मन लगैए?” ओना अखन धरि दीनानाथ, रूक्‍मिणीक उपासक जबाव पबैक रस्‍ता-बाट तकै छला मुदा अनुराधाक प्रश्‍न पाबि बजला- “आब बूझि पड़ैए जे रोग दबि गेल। भुखोक तृष्‍णा बेसियाएल बूझि पड़ैए आ हाथो-पएर लाड़ै-चाड़ैक मन होइए।” पतिक आस भरल बात सुनि अनुराधाक मनमे खुशीक लहैर लहैर गेलैन। आगूक कोनो बात नै पुछि अनुराधा पैरसँ चाइन धरि पतिकेँ निहारए लगली। जाड़-पालासँ दबल जहिना बोन-झाड़ आकि जंगल-झाड़ सुर्जक उष्‍मा पैबतो तिरपीत हुअ लगैत तहिना अनुराधोक मन फुड़फुड़ेलैन- “बेटीक पहिल उपास छी, अपने तँ जिनगीमे कहियो जानि कऽ उपास नहियेँ केलौं मुदा...?” ‘उपास नहियेँ केलौं’ मुहसँ निकैलते अनुराधोक नजैर निच्‍चॉं उतैर गेलैन आ दीनानाथोक। नजैर निच्‍चॉं उतरिते अनुराधाक मनमे उठलैन- की एहेन हमहींटा छी आकि हमरा सन औरो सभ छैथ जे जानि कऽ उपास नै केने हेती। ई दीगर भेल जे गाम-समाजमे महिलासँ बेसी बुझनिहार पुरुख, उपासक बेर कम पड़ि जाइ छैथ। जइसँ महिले बेसी हिस्‍सा नेने अछि। कहॉं कहियो मन गवाही देलक जे केकरोसँ कम उपास केने छी। सालक सए दिन ओहन बितबे करैए जइ दिन पानि छोड़ि अन्नाहारो भेल हुअए। मुदा तेकर फल की भेटल? जहिना पत्‍नी अनुराधा अपन विचारक दुनियॉंमे निच्‍चॉं मुहेँ विचरण करै छलि तहिना दीनानाथक मन छह मासक रोगसँ दबाएल निकैल ऊपर मुहेँ उधिआइ छल। आइ छह माससँ जइ परिवारक बोझ बनल छेलिऐ, काल्‍हिसँ अपन बोझ अपने उठबैक शक्‍ति शरीरमे आबि गेल। आब रूक्‍मिणियोँ दिन भरि सहि कऽ दीनानाथक आराधना करै जोकर भऽ गेलि। अखन ओकर भविसक कोन भरोस छै। मुदा वर्तमान तँ आगूएमे छै। परिवारक भरण-पूरनक बाट देखिते जहिना परिवारक सिरजनक आशा-बाट मनमे दौगए लगै छै, तहिना दीनानाथोकेँ मनमे भेलैन। विहुँसैत पत्‍नीकेँ कहलखिन- “बेर लहैस गेल! बैसने काज चलत?” पतिक बात सुनिते अनुराधा चौंक गेली। चौंकते मनमे उठलैन, केतेक जतनसँ बेटी उपास केलक अछि। की सभ मनमे उपकल छै से तँ भोला बाबा जनता मुदा हमहूँ तँ ओकर माइए छिऐ। भरि दिनक भूखल-पियासल दस बर्खक बेटी लहालोट भेल औत, तखन जँ ओकरा फलहार नइ हेतै से केहेन हएत? ओना अनुराधाक मनमे बिसवास जमले रहैन। बिसवास ई जमल रहैन जे दादी बच्‍चासँ बुढ़ धरि अल्‍हुआ-सुथनीक फलहार कऽ उपास निमाहि लेलैन तखन रूक्‍मिणी ने किए निमाहत। मुदा समाजक रंग-रंगक फलहार देख एते तँ मनमे उठिते रहैन जे हमरो बेटीकेँ नीक फलहार हुअए। छिड़ियाइत मने अनुराधा पतिकेँ पुछलखिन- “बुच्‍ची-ले फलहारक ओरियान की करब?” एक तँ छह मासक रोगाएल दीनानाथक मन, जे जिनगीक आसक कलशसँ कनखियाएले रहैन, तैपर सँ तेहेन बोझ माथपर पड़ि गेलैन जे दरदे माथ दुखाए लगलैन। माथमे दर्द उठैक कारण भेलैन, अनुराधाक संग अपनो ने कहियो उपासक भीड़ गेल रही आ ने फलहारक बात बुझने छी...। झखैत पतिक नजैर देख अनुराधा बूझि गेली। बुझिते मनमे झमार उठलैन। झमार ई जे दर्दपर जेते दर्द देल जाएत ओ अपना अकारे पैघ होइत जाएत...। ई तँ अनेरे पतिकेँ कष्‍ट देब हएत! विहुँसैत बजली- “एके दहारमे जे परान बहार भऽ जाएत तखन सालक साल दहार केना बुझबै?” ओना कोनो एहेन स्‍पष्‍ट विचार स्‍पष्‍ट भाषामे अनुराधाक नै रहैन, मुदा कोन काग-भाषासँ दीनानाथ की बूझि गेला से तँ ओ जानैथ। मुदा मन विहुँसैत-विहुँसैत कलशए लगलैन। कलशैत फूलक मुँह देख मालिनि जहिना मने-मन माला बनबैत कलशए लगैए, तहिना अनुराधो कलशैत बजली- “अपन नैहरक समाद कहै छी।” ‘नैहरक समाद’ सुनि दीनानाथक मनमे भेलैन जे, मर्र ई की भेल! अखन फलहारक ओरियानक काज अछि, तखन ई की बीचमे सुनबै छैथ! दीनानाथक मनमे किछु फुरबे ने केलैन जे किछु बैजतैथ। बकर-बकर पत्‍नीक मुँह दिस ताकए लगला। मुदा अनुराधाकेँ अपन परदीदीक समाद मनकेँ तेहेन समदिया बना देलकैन जे हुअ लगलैन कखन एहेन झमटगर समाद सुना दिऐन। जहिना शिक्षक ऑंखिक इशारासँ अगिला पन्‍नाक प्रश्‍न चटियासँ पुछै छथिन तहिना अनुराधा ऑंखिक टुस्‍कीसँ दीनानाथकेँ टुस्‍कियाबए लगली। जहिना लहनाक लहनदार आगूमे ठाढ़ भऽ तगेदा करए चाहैत तहिना अनुराधा, दीनानाथकेँ बूझि पड़ए लगलैन। मुदा दीनानाथक मनमे ईहो एलैन- तगेदाक उत्तर तगदार किछु-ने-किछु देबे करैए। चाहे ‘हँ’ कहह कि ‘नइ’ आकि ‘अखन नै आगू।’ किछु-ने-किछु तँ कहिते अछि मुदा ओहन तगेदा केनिहारि पत्‍नी तँ नै हेती। बड़ बेसी हेती तँ परिवारक कोनो तगेदा करती जे सझिये छी। तइले मत्‍था-पच्‍ची करैक जरूरते की। दुनू गोरे मिलि विचारि आगि-पानिमे जाइले तैयार भऽ जाएब। दीनानाथक मनक गाछमे जेना फुनगीपर पोनगी देलकैन तहिना डम्‍हाएल फूलक कली जकॉं विहुँसैत बजला- “किदैन जे कहने छेलिऐ, ‘नैहरक समाद..’ से अधेपर छोड़ि देलिऐ?” पतिक बात सुनि जिज्ञासु अनुराधाकेँ आरो जिज्ञासुपन बढ़लैन। मने-मन अख्‍हिासए लगली। माइयो दादियेक उतारा छेली, दादियो परदादियेक उतारा छेली। जेना-जेना हुनको अवस्‍था चढ़ैत गेलैन तेना-तेना अपनो सियान होइत सासुर एलौं। एला पछाति ओ मुइली...। परदादीक मृत्‍यु मनमे अबिते अनुराधाक नजैर बाड़ीक सुथनीपर गेलैन। बजली- “ताबे शिवधामसँ बुच्‍चियो अबैए। अदहा घण्‍टा समैयो बँचल अछि, तैबीच सुथनी उखारि अनै छी, संगे-संग रातिमे सुथनियेँ खेबो करब।” पत्‍नीक बात सुनि दीनानाथक मन खटाइन-खटाइन भऽ गेलैन, मुदा लगले मन आगू बढ़ैसँ रोकि देलकैन। अखन फलहारक शुभ घड़ी अछि, तैबीच किछु बात बाजि बाधक नै बनब। की बेटी नै देख रहल अछि जे पिता ओछाइनपर अपने दिन गनि रहल छैथ। तहूमे बेटीक दुख जेते माइक हिस्‍सामे अछि तेते बापक हिस्‍सामे थोड़े अछि। मनकेँ आगूसँ घेरि दीनानाथ थीर केलैन। अस्‍ताचलगामी सुर्ज अपन पतालक घाटपर पएर दऽ देने छला मुदा बोन-झाड़ आ पहाड़पर ओहिना झलकै छला। संगीक संग रूक्‍मिणी अपना घर लग अबिते फुटि कऽ ऑंगन पहुँचलि। ऑंगन पहुँचिते पहिने हिया कऽ ओसार दिस तकलक। मुदा केतौ किछु ने देख रूक्‍मिणीक नजैर ओछाइनपर बैसल पितापर गेल। दीनानाथो ओहिना रूक्‍मिणी बेटीपर ऑंखि गड़ौने देखै छला जेना किछु सनेस लऽ कऽ बेटी आएल होइन। तैबीच अनुराधा वाड़ीसँ सुथनी उखारि कलपर चिक्कनसँ धो-धा खुरपीक संग ऑंगन पहुँचली। रूक्‍मिणीकेँ देखिते कहलखिन- “बेटी, अहींक फलहारक ओरियानमे लागल छी। मनमे भेल जे बेटिये संग किए ने सभ परानी फलहारे करब।” मिथिलांगना होइक नाते रूक्‍मिणी बाजलि किछु ने मुदा मन झुझुआइत रहलैन। शब्‍द संख्‍या- 2350, 25 अगस्‍त 2015 भोरक झगड़ा सौन मासक भोर। पॉंच बजै छल। चाह पीब पान खा दरबज्‍जापर सँ निकलैएपर रही कि लाल कक्काक अँगनामे हल्‍ला जकाँ बूझि पड़ल। ठमैक कऽ अकानए लगलौं- की बात छिऐ? जहिना लाल काका जोर-जोरसँ बजैथ तहिना करिया काकी सेहो ललैक-ललैक बजैत रहथिन। अकानैकाल अकानमे नीक जकॉं एबे ने करए। कखनो एक पक्षक गोटे शब्‍द अबै तँ कखनो दोसर पक्षक। तैसंग कखनो दुनू पक्षक संगे अबइ। माने एकटा बात लाल कक्काक आबए कि बिच्‍चेमे करिया काकीक सेहो आबि जाए। ने बैसैक मन हुअए आ ने आगूए डेग उठए। ओना दुनू परानीक भिनसुरका झगड़ा कोनो एकदिना नै, सबदिना छिऐन। जे सोभाविको ऐछे। दुनियॉंक भोर छी किने। जिनगीक सभ कथुक भोर। ओना आन दिनक हल्‍ला लगले बर्खाक बुलबुला जकॉं फुटि कऽ पानिमे मिलि शान्‍त भऽ जाइन। मुदा आइ से नै, किछु बेसी बूझि पड़ए। मनमे हुअए जे बिनु किछु बुझने जाइ आ चामेक मुँह छी, जँ किछु किम्‍हरोसँ बजा जाएत तँ अनेरे लब्‍बर भऽ जाएब किने। तैसंग मनमे आरो केते रंगक बातक संग विचारो उठैत रहए, मुदा बिच्‍चेमे करिया काकीक अवाज आएल- “अहॉं भोर-भोर रट लगौने छी!” करिया काकीक सुपुट शब्‍द कानमे पड़ल। ओना बीचमे एकटा आरो बात अछि, बात ई अछि जे लाल कक्काक पत्नी लाल काकी हेती किने, तैठाम करिया काकी केना भेली? एक चलैन ईहो अछि जे कक्काक नाओंपर काकीक नाओं पड़ितैन, मुदा से नइ भेल। ओना एके रंगक काज-ले चालैन, गुड़चल्‍ला आ चिक्कस चालैक चालैन सेहो होइते अछि। दोसर, चलैनक अनुसार माने देहक रंगक अनुसार सेहो नामकरण होइए। तइ अनुसार भेल अछि। लाल काका लाल भुभुका गोर छैथ जखन कि करिया काकी कारी खटखट, कारी झामर छैथ। मुदा तइ बिच्‍चेमे पिण्‍डश्‍याम माने पिरसियाम सेहो तँ ऐछे। तहूमे पिरसियामक सेहो आड़ि-धुर नै अछि। ओना ने गोरेक अछि आ ने कारियेक अछि। करिया काकीक बात सुनि अकानए लगलौं जे लाल कक्काक उत्तर की होइ छैन। मुदा से सुनैमे सुपुट एबे ने करए। मनमे हुअए जे जखन चौरीक माटिक तरक केशौर हुअए आकि पोखैरक सौरखी-करहर, खाली एकटा पन्ना भेटने तँ उखारनिहार भँजिया कऽ ओकरा उखारि लइए तखन हम किए ने दुनूक बीचक बात बूझि सकै छी। जे काकी-मुहेँ सुनलौं सएह बात पुछि कऽ भँजिया सकै छी। ओना दुनू गोरेसँ सेहो पुछल जा सकैए। जहिना लाल काकाकेँ पुछबैन- ‘काका, काकी किए भोरे-भोर भोरका पाठ पढ़बै छैथ।’ तहिना काकीसँ सेहो तँ पुछले जा सकैए- ‘काकी, भोरे-भोर काकाकेँ कोन पाठ पढ़बै छिऐन।’ गर अँटिते आगू डेग उठेलौं। दू डेग आगू बैढ़ते मनमे उठि गेल जे जखन तेहल्‍ला बनि जाएब आ जँ दुनू गोरे पंच मानि अपन बात सुमझा दैथ, तखन निर्णए की सुनेबैन? तहूमे जँ दू जातिक आकि दू परिवारक आकि दू गामक झगड़ा रहैत तँ कनी कम-बेसी करि मुँहमिलानी करौलो जा सकैए, मुदा ऐठाम तँ से बात नै अछि, दू परानीक बीचक बात अछि। जँ कनिको काका दिससँ बजा जाएत तँ काकी कहती जे जैठाम बजौआ पंचक मोजरे ने अछि तैठाम बिनु बजौआक केते मोजर। मुहेँ छी, तहूमे तेतबे पर चुप भऽ जाथि तखन ने, आ जँ तइ लागल ईहो कहि दैथ जे कियो बजा कऽ अनेने अछि जे कोनो बात मानब। अपना मने जहिना अहॉं बजलौं तहिना अपना मने हमहूँ सुनि लेलौं। मनमे भेल हाइ-रे-बा, तखन पहुँचला फल की भेटत? डेग रूकि गेल। ओसारक निच्‍चॉं आ अँगनाक ओल्‍तीमे अँटकल रही। ने आगू बढ़ैक साहस हुअए आ ने नइ जाएब उचित बुझी। ऑंखि तँ टकटक आगू तकैत रहए मुदा कानमे धानक झड़ जकॉं पड़ैत रहए। ओल्‍तीमे ठाढ़ मन असोथकित जकॉं हुअ लगल। मुदा लगले जैग गेल- ‘भोर’ ले झगड़ा होइए, काकीक बात तेहने बूझि पड़ल। मुदा ‘भोर’ की? चौबीस घण्‍टाक दिन-रातिमे ‘भोर’ ताकए लगलौं। भोरका स्‍नान नीक होइए तँए नहाइबेर ‘भोर’ भेल। नहेले-धोला पछाति ने कियो जिनगीक लीलामे डेग उठबै छैथ तँए ओ डेग भोरक भेल। मुदा लगले फेर मनमे उठि गेल, आत्‍माराम बजनिहार सुग्‍गो-तोता ने मुनि-महात्‍माक संग तीन बजे भोरक नहान नहाइते अछि, यएह भेल ‘भोर’। भोर तँ भेट गेल, मुदा भोरक जड़िक पन्ना भेटबे ने कएल। ओना जड़ि भेटने मनमे कनी खुशी उपकल, मुदा पन्ना...। पन्ना ई जे तीन बजेकेँ ‘भोर’ जँ मानि लइ छी, तखन तीन बजे राति की भेल? आ तीन-बजिया गाड़ीकेँ की कहबै? आत्‍माराम तोता-सुग्‍गाक संग मुनि-महात्‍माक घाट दिस तकलौं तँ बूझि पड़ल जे घटवारि-ले जनु घेरा-घेरी होइए। हम पहिने स्‍नान करब तँ हम पहिने करब। जे पहिने करत तेकर ने घाट भेल। बुधियार ने घेरा-घेरी छोड़ि अपन घाट अपना सनक बना लेत मुदा बुधियार घेँट-कटो तँ होइते अछि, जँ ओकरा घाट नइ रहतै तँ घेँटि काटि घटवारि केतए लेत। ओना लाल कक्काक अँगनामे बोल-चाल बन्न भाइए गेल रहैन, मुदा तैयो मनमे भेल भोरका पहिल डेग जखन लाल कक्काक ऑंगन दिस उठल तखन पहिने हुनकेसँ भेँट करबैन। बड़ हएत तँ यएह ने हएत जे झगड़ा बेरक किछु उपराग देता जे बेर परक नै छह। मुदा भिनसुरका समए छी, कियो निन्‍द्रासलमे धियान लगौने रहैए तँ कियो नीनवासलमे धियान लगौने रहैए आ कियो अपन सिद्धान्‍तक अनुसार भोरका सभ किछु नीक हुअए, तइ अनुसारे दुनियॉं-दारीसँ राग-विराग छोड़ि धरतीसँ सुतले-सुतल उठि जाइ छैथ...। किछु फुरबे ने करए। जेना बस-ट्रकक ड्राइवर भोरेसँ गारि-गरौवैल करैत जिनगीक लीला शुरू करैत तहिना लालो काका अँगनासँ खुरपी नेने बहरा गेल छला। हमहूँ ससैर कऽ आगू बैढ़ गेल छेलौं। देखते कहलयैन- “काका, भोरे-भोर हाथमे खुरपी देखै छी?” कहैक बेगमे तँ कहि देलिऐन मुदा धोखा ई भेल जे हुनकर ई सबदिना रूटिंगक अनुसार काज छिऐन, तइ दिस अखन धरि हुनकापर नजैर नइ पड़ल छल। मुदा हमरा बातकेँ जेना लाल काका अनसुनी कऽ देलैन तहिना बूझि पड़ल। पुछलैन- “केम्‍हर-केम्‍हर चललह अछि?” लाल कक्काक प्रश्‍नक जबावे ने फुरए। ई तँ केकरदिनक पइर भऽ गेल। ‘हहाएल-फुहाएल सासुर गेलौं आ कनियॉं माए पुछलैन केतए एलौं।’ कहू जे भोरसँ दुनू परानी झगड़ा करै छला, लोकक सुतब पहाड़ बना देने छेलखिन, आ बजै बेर जेना सभटा बिसैर गेला। मुदा फेर भेल जे जखन उदेस बना चलल छी तखन रस्‍तोसँ घुमि जाएब केहेन हएत। मुदा जेहेन शान्‍त-चित् लाल काकाकेँ देखै छिऐन तइसँ अकासक उड़ैत चिड़ैयोकेँ भँजियाएब तँ कठिन ऐछे। ओना लाल कक्काक मन ऐ दुआरे असथिर भऽ गेल रहैन जे ओ अपन सबदिना वृति बूझि अपन एक खल काज सम्‍पन होइत देखलैन। एक खल काज भेला पछाति जहिना सबहक मन दोसर खलक काजक गरकेँ अँटकारए लगैए। तहिना लालो कक्काकेँ भऽ गेल रहैन। ओना पैछला काजक समीक्षा सेहो मने-मन कऽ नेने रहैथ, जइमे केतौ केनो ऑंकर-पाथर नइ भेटल रहैन, तइसँ मनमे आरो बेसी परपन भऽ गेल रहैन। समीक्षामे मन मानि गेल रहैन जे कोनो नमहर काज किए ने हौउ, ओ तँ खले-खल ने हएत। खले-खल काज करैबला सेहो होइए। जे गर चढ़ा-चढ़ा करैए। परिवारोमे अहिना होइ छै। कियो बाहरसँ उपैत करि कऽ अनलैन तँ कियो ओकरा जीवनोपयोगी बनबैले घरमे खले-खल तोड़ि खिलखिलबै छैथ। जखने खिल-खिल खिलखिला जाइए तखने ने काजक खिलखिलीसँ मनो खिलखिलाइ छै। से अपन खलक काजसँ लाल कक्काक मन खिलखिलाइत रहैन। माने ई जे परिवारक श्रेष्‍ठजनक वृति यएह ने हएत जे अपन लुरि-बुधिक विचारसँ सदिकाल परिवारजनकेँ नव काज दिस आगू बढ़बैत चली। जइसँ परिवार गतिशील रहत। से तँ लाल काका सुति-उठि जे शुरू करै छैथ, से भरि दिने नइ, सबदिना सेहो छैन, तँए मनक खुशीमे कनियोँ घटबी किए हेतैन। जहिना पीछराह रस्‍ता होइए तहिना ने पीछराह चलैनिहारो होइए। एहेन ठाम पीछराहकेँ पकड़ैमे अपनो पीछरैक तँ डर रहिते छै, से डर मने-मन होइते रहए। मुदा फेर भेल जे एना जँ पीच्‍छर दुआरे रस्‍ता छोड़ि देब तखन घरसँ निकैल जाएब केमहर? आ जँ नइ जाएब तँ की घरेमे मड़ुआ ढेरी जकॉं ढेरीएमे गुम्‍सैर कऽ रंगे बदैल लेब? एक दिस मन धिकारैत रहए तँ दोसर दिस पीच्‍छरे-पीच्‍छर सगरो बूझि पड़ए। मुदा दुनू हाथक मुट्ठी बान्‍हि बॉंहिमे समैट छातीमे सटबैत, छातीकेँ असथिरसँ दबलौं, जे कहीं धड़-धड़ाए ने लगए। कहलयैन- “लाल काका, धरमागती पुछी तँ अहींसँ किछु जिगेसा करए चलल छेलौं, मुदा अहॉं तँ खुरपी लऽ निकैल सड़कपर आबि गेल छी...।” हमर बात लाल काकाकेँ नीक लगलैन। आगूक किछु बात मुहेँमे रहए कि बिच्‍चेमे हूँहकारी भरैत बजला- “बौआ सुधीर, अपना-ले ते भरि दिन लगले रहै छी, मुदा दोसरक जिज्ञासाक महत ओइसँ बेसी अछि, तँए चलह दरबज्‍जेपर चाहो पीब आ गपो-सप्‍प करब।” जेना लाल काका पेटक बात छीन अपना पेटक बना बाजला तहिना बूझि पड़ल। दुनू गोरे चोटे आगू बढ़लौं। दरबज्‍जापर पएर रैखते करिया काकी देख लेलैन। देखते ठमैक गेली। हुनका मनमे जे भेल होइन मुदा ससैर कऽ आगू बैढ़ लगमे आबि जोरसँ पुतोहुकेँ कहलखिन- “कनियॉं चाह बनाउ।” ओना ऑंगनमे दुनू पुतोहुओ आ धियो-पुतो सभ ओछाइन धेने अपना-अपनीकेँ सभ बेटो-पुतोहु आ पोते-पोती लाल काका आ करिया काकीक टिप्‍पणी पसारने। टिप्‍पणी ई पसारने जे कियो पतिसँ जोरसँ बाजबकेँ अधला बुझैत तँ कियो अपन टुटैत नीनसँ कड़ुआएल। जेठकी पुतोहु- “कहू जे निन्‍द्रासलमे धियान लगौने छेलौं से तेहेन उपए केलैन जे सभटा भगन भऽ गेल। झगड़ा करैत-करैत आब चाहेक तरास लगलैन।” छोटकी पुतोहु- “अबेर धरि रातिमे जगलौं, निन्‍द्रासल छी, तैबीच हिनका चाहे पीबैक बेगरता बेसी भऽ गेल छैन!” कहि जेठकी बेटीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- “बुच्‍ची, चाहक ओरियान करहक।” बेटी जबाव देलकैन- “अखैन तँ केटलियो ने मँजलौं, चुल्‍हो ने निपल गेल अछि, पहिने ओ धुअब-मॉंजब, नीपब आकि पहिने चाहे बनाएब!” दरबज्‍जापर सँ तीनू गोरे- माने हमहूँ, लालो काका आ करियो काकी- अँगनाक बात सुनैत रही। ओना आनक अँगनाक बात सुनैमे कठाइन लगिते अछि मुदा तैयो चुपे रहब ने नीक हएत। कमसँ कम एते बजैक गर तँ रहबे करत जे सुनबे ने केलौं। बेटी-पुतोहुक बात सुनि करियो काकीक मनमे दुख भेलैन जे तेहल्‍लाक आगूमे एना मुँह झाड़ि जँ बेटी-पुतोहु बाजल तँ सासु होथि आकि दादी, जहिना मिथिलाक धरती योद्धा पैदा करैत रहल अछि तहिना मधुमे मिला जीहपर चाटि बिसैर जेबा चाही। जँ से नै जे पालो खेने छी आ बिनु पालोक छी, तखन सम्‍बन्‍ध सूत्र कमजोर बनबे करत। करिया काकीकेँ पतिक संग भेल भोरक झगड़ाक संग पुतोहु-पोतीक शब्‍दवाण छातीकेँ डोला देलकैन मुदा...। ओना करिया काकीक मन ईहो कहैन जे कोन बड़का पहाड़क घेरा लैग गेल जे आगू नै बैढ़ सकै छी, मुदा केकरा संग, केकरा-ले? जँ दुनियॉंमे माया-मोह छै तँ ओकरो सीमावन्‍दी तँ कएले जा सकैए। मुदा से सभ बात धियानमे करिया काकीकेँ नै एलैन, एलैन ई जे समाजक संग पति बैसल छैथ, जँ कनियोँ ऊँच-नीच आकि ले-ऊँचमे पएर पड़त तँ हुनकर पाग सरकतैन। मुदा अँगनाक प्रश्‍न छी, प्रश्‍न छी बेटी-पुतोहुक बेवहारक। लाल कक्काक मुँह दिस करिया काकी मुँह उठा कऽ देलैन, देलैन ऐ दुआरे जे मुँहक बात मुहसँ बाजल जाएत, मुदा जैठाम काजक प्रश्‍न अछि आकि जैठाम परिवारक गति-विधि प्रभावित हएत, तैठाम तँ परिवारक सिरिसजनकेँ विचारए पड़तैन। आजुक कालखण्‍डक जबावदेही तँ हुनके ऊपर छैन। मुदा करिया काकीक मनक विचार जेना लाल कक्काक मनमे गड़बे ने केलैन। तहिना निरविकार भेल मने-मन लाल काका विचारैथ जे जे बेटा अपन देहक कपड़ा अपने नइ खींच साफ करैए ओ बाप-माइक खींचत, एहेन धोखामे माए-बापकेँ रहबेक नै चाही। जँ रहत तँ अपने भोगत। तइले तँ अपने ने सोचि-विचारि चलए पड़त। से लाल काकामे छैन्‍हेँ, अपन देहक वस्‍त्र अपने हाथे, भोरका घाटपर खींच लइ छैथ, तँए पत्‍नियोँक खगता नहियेँ बूझि पड़ै छैन। भाय, नारीकेँ घेरा-बन्‍दीसँ जाबे आगू नइ बढ़ौल जाएत ताबे विचारेक धारमे मात्र बहैत रहत किने। जिनगीक जरूरतक लेल काजोक सीमा तँ बनबए पड़त। आगूमे करिया काकीकेँ देख लाल कक्काक मन सेहो सियाह होइत रहैन। होइत ई रहैन जे कहू आइए हमर कोन दोख छल। भोरमे जँ नइ ओछाइनसँ उठौल जाएत तँ ओ समैकेँ केना पकैड़ चैल सकैए। ओना काजक दौड़मे समैयोक रूप बदलत जइसँ जिनगियोक रूप बदैल रहल अछि। माने ई जे जैठाम चौबीस घण्‍टा चलैबला मशीन अछि, आदमी आठ घण्‍टा खटत, तइ हिसावे तीन आदमीक जिनगीक रूटिंग बनत किने, जे तीन रंगक, समयानुसार हेबे करत। जे से एक-दोसराक कार्य-प्रणालीमे अन्‍तर एबे करत। मुदा से नइ ऐठाम किसानी जिनगीक कथा छी। करिया काकीक मुँह नै देखैक विचार लाल कक्काक मनमे उठैत रहैन। जहिना केकरो लगक लोक जखन सम्‍बन्‍धसँ हटै छै तखन किछु-ने-किछु जिनगीक गति प्रभावित होइते छै, मुदा समटल जिनगीक अपन गति-विधि स्‍वच्‍छन्‍द रूपे अपना गतिये सेहो चलबे करैए। जँ हम अपन गति-विधिकेँ अपना विचारे चलबए चाहै छी तँ अपन रस्‍ता धड़ैत जिनगीकेँ धड़ाउ जकॉं सजबैत चलबऽ पड़त। जँ से नै तँ गाछक एके फलक ओहन रूप अछि, जे एकटामे अमृत तुल्‍य बीज अछि तँ दोसर बिच्‍चेमे फोंक! मुदा तैयो लाल कक्काक मनमे अहौड़ मारैत रहैन जइसँ पत्‍नीक विचार मनमे अहूरिया कटिते रहैन। ओना मुहसँ लाल काका किछु ने बाजि रहल छला। मुदा मनक विचार तँ मनमे उठिते रहैन। उठैत ई रहैन जे पत्‍नीक तँ अनेको रूपो अछि आ रंगो ऐछे। जखने रंग रहत तखने ढंग धड़बे करत। मुदा पतिक जिनगीक भोजन बनाएब पत्‍नीक महतपूर्ण खलक काज भेल, मुदा विचारोक झगड़ा बिना झगड़ने तँ बँचाइयो नै सकै छी। जैठाम एक विचार जिनगीक लेल श्रमक महत बुझैत तैठाम जँ दोसर विचार बाटक बाधा बनत तखन तँ परिवारोमे रण-भूमि बनबे करत। ओना दुनियेँ रण-क्षेत्र छी। जैठाम अपना लगसँ दुनियॉंक अन्‍तिम छोर तक कॉंट-कुश सजले अछि। तँए मने-मन लाल काका ईहो विचारैथ जे मरदक तँ मरदगानी छिऐ अरारि। जखन जिनगीक आइ धरिक इतिहास चलैत रहल अछि जे एक घण्‍टा चुल्‍हि तर बैसैत एलौं, तखन एक घण्‍टा समए, आजुक विकसित युगमे चौबीस घण्‍टाक जिनगीक लेल चुल्‍हिक समए कम नै भेल, तइले जँ भनसिया ऑंखि देखौत, से मानै जोकर थोड़े भेल। करिया काकी पतिक किछु विचार नै सुनि अपन विचारकेँ सोझरबै छेली। जहिना खसैत घरमे सोंगर लगौल जाइए तहिना सोंगर लगबैत पोतीकेँ दोहरबैत ऑंगन दिस घुमि बजली- “बुच्‍ची, बबो छथुन आ सुधीरो बौआ छैथ, एक गोरे हॉंइ-हॉंइ कऽ चुल्‍हिक ओरियान करू, दोसर गोरे बरतन-बासन मॉंजि लिअ, तेसर गोरे अँगना-घर बहारि लिअ। जइसँ एके समए संग सभ काजो हएत।” करिया काकीकेँ सह लगबैत कहलयैन- “कहुना छी तँ सौनक भोर छी ने काकी। जहिना जेठुआ पीपरक गाछ तहिना सौनिया भोर।” सह पाबि करिया काकीक हूबा कनी बढ़लैन। मुदा जहिना पहियाक धुरी टुटने गाड़ीक गति प्रभावित होइत तहिना तँ भाइए गेल रहैन। हेबो केना ने करैत? कोनो गल्‍ती बजैमे होइए, ओकर शाब्‍दिक सुधार भेने कोनो अवघात नै होइए, मुदा जे वाणी काजक गतिये चलत, ओ तँ काजक रूप छी, जइसँ काज प्रभावित हेबे करत किने। जखने काज प्रभावित हएत तखने ओकर दोसर पाशापर बैसल जिनगी प्रभावित हेबे करत। जखने जिनगी प्रभावित हएत तखने गैत-कुगैतक बीच रणभूमि बनबे करत किने। तीनू गोरे एक-दोसरक मुँह देखैत मुदा बजैत कियो ने किछु। जहिना अखड़ुआ आमक गाछक निच्‍चॉं लोक पकलाहा आमपर नजैर देने गाछक निच्‍चासँ ऊपर मुँह तकैत, जे आब खसत, तब खसत। तहिना तीनू गोरे तीनूक मुँहक आशामे बैसल रही। मुदा से भेल नै तइ बीच जसमैत तीन गिलास चाह थारीमे नेने दरबज्‍जापर पहुँचल। आगूमे चाहक थारी अबिते तीनूक चाह दोसर दिस बढ़ल। हमरो हाथमे आ लालो कक्काक हाथमे जसमैत चाह दैत, तेसर गिलास करिया काकीक हाथमे दइले गिलास उठौलक। मुदा हाय रे मिथिला, पति आगू पत्‍नी चाह केना पीती! सत्तैर बर्खक करिया काकीक विचार मनकेँ खोरि देलकैन। ललैक कऽ पोतीकेँ कहलखिन- “एतबो विचार अखैन तक नइ भेलौ हेन?” करिया काकीक विचार सुनि लाल काका ओइ गुड़ जकॉं पीघैल गेला जे गरमी मासमे अपने पिघलए लगैए। मुदा पिघलने वेचाराकेँ दुनू गति होइ छै। कखनो गुड़ोक भाव चैल जाइए आ कखनो छुआ संग बदैल सेहो तँ जाइते अछि। जसमैतपर करिया काकीकेँ बिगड़ैत देख कहलयैन- “काकी, कोन जुग-जमानाक गप करै छी। आब समए बहुत आगू बैढ़ गेल, आब तँ अपनो समाजमे बिआहक मण्‍डपपर, सरियाती-बरियातीक बीच बर-कनियॉं नाचो करैए आ दारूओ पीबैए, तैठाम अहॉं चाहोसँ लजाइ छी।” पत्‍नीक पत्‍नित्‍वमे करिया काकीकेँ देख लाल कक्काक मन जाड़क सकताएल गुड़ जेना गरमीमे आबि पिघलए लगैए तहिना मन पीघैल गेलैन। पीघैल ई गेलैन जे लाजेक गहनासँ ने विवेककेँ सजौल जाइए किने। मने-मन लाल काका पत्‍नी-ऊपर सभ तामसकेँ एकेबेर उतारि करिया काकीकेँ कहलखिन- “भोरसँ बतकटौवैल कऽ रहलौं अछि मुदा अखनो तक मन थीर नै भेल। ऐठाम बैसू, हम सुधीर गप करै छी। अहॉं चुपचाप सुनि लिअ, आ जखन दुनू गोरे चुप हएब तखन कि सभ बुझलिऐ से अहॉं बाजब।” लाल कक्काक रूखि करिया काकी बूझि गेली, अपनाकेँ परहेज करैत पाछू घुसकैत बजली- “लब्‍बर-पुरुख जकॉं जे भरि दिन लबरपनी करैत रहब, तइसँ हमर दिन-गुदस जाएत; जाइ छी अपन काज करए।” कहि काकी चैल गेली। लाल काकाकेँ पुछलयैन- “काका, भोरमे गल्‍ल-गुल सुनने रही?” बिसरल बात जेना लाल काकाकेँ मन पड़लैन। जहिना हेराएल वस्‍तु भेटने खुशीमे लोक कनी जोरसँ बजैए तहिना लाल काका बजला- “बौआ सुधीर, घरसँ बाहर धरि मकड़ाक जाल जकॉं जालमे ऐठामक विचार ओझरा गेल अछि। जइसँ अर्थक अनर्थ भऽ रहल अछि।” कहि काका चुप भऽ गेला। मुदा आगूओ तँ किछु एहेन बात ऐछे जइसँ पाछूए लाल काका अपनाकेँ रैख लेलैन। जहिना नवका पनिवट देने पानि बहबैमे बेर-बेर चिक्कन करए पड़ैए तहिना आगू चिकनबैत पुछलयैन- “काका, फूले तकक विचार कहलिऐ, फल तँ छुटले अछि?” लाल काका विहुँसैत बजला- “बौआ, भोरेसँ जिनगीक भोरपन उठैए। तैठाम जँ ई नै बुझत जे भोर ओहन समए छी, जैठाम जिनगीक भोर शुरू होइ छै। सभकेँ अपन-अपन जिनगीक लकीर बनबैत चलऽ पड़तै, जँ से नइ चलत तँ आरो बद-सँ-बदतर लोको आ समाजो बनबे करत किने।” लाल कक्काक बात सुनि मनक बखार भरि गेल। कहलयैन- “काका, अखन छुट्टी दिअ, केते काज अछि। आगू दिन अगिला गप हेतै।” शब्‍द संख्‍या- 2701, 31 अगस्‍त 2015 कथा-लेखन-क्रम 1. भैंटक लावा- (3105) 2. बिसाँढ़- (2499) 3. पीरारक फड़- (2024) 4. अनेरुआ बेटा- (3339) 5. दूटा पाइ- (3279) 6. बोनिहारिन मरनी- (3396) 7. हारि‍-जीत- (2343) 8. ठेलाबला- (2562) 9. जीविका- (3642) 10. रिक्साबला- (3945) 11. चुनवाली- (2445) 12. डीहक बटबारा- (4724) 13. भैयारी- (4041) 14. बहि‍न- (2692) 15. घरदेखिया- (4018) 16. पछताबा- (2665) 17. डाक्टर हेमन्त- (4398) 18. बाबी- (2163) 19. कामिनी- (2285. 20. स्रष्टाक समग्र रचना- (137) 21. प्रतिभा- (154) 22. मर्म- (142) 23. अधखरूआ- (255) 24. समैक बेरबादी- (213) 25. पहिने तप तखनि ढलिहेँ- (084) 26. खलीफा उमरक सि‍नेह- (165) 27. जखने जागी तखने परात- (103) 28. अस्तित्वक समाप्ति- (218) 29. खजाना- (388) 30. उग्रघारा- (328) 31 बेवहारिक- (218) 32. समर्पण- (149) 33 उत्थान-पतन- (138) 34. देवता- (232) 35. पाप आ पुण्य- (218) 36. परख- (129) 37. आलसी- (136) 38. प्रेम- (293) 39. हैरियट स्टो- (137) 40. बुझैक ढंग- (142) 41. श्रमिकक इज्जत- (093) 42. वंश- (074) 43. तियाग- (145) 44. सद्वि‍चार- (184) 45. साहस- (103) 46. बरदास- (133) 47. भूल- (139) 48. धैर्य- (099) 49. मनुखक मूल्य- (099) 50. मदति नै चाही- (209) 51. मेहनति‍क दरद- (281) 52. मैक्सिम गोर्की- (146) 53. मूलधन- (174) 54. कपटी मि‍त- (281) 55. भीख- (118) 56. भगवान- (098) 57. एकाग्रचित- (261) 58. सीखैक जिज्ञासा- (101) 59. अनुभव- (092) 60. आसिरवादक विरोध- (088) 61. धर्मक असल रूप- (197) 62. सौन्दर्य- (138) 63. स्तब्ध- (257) 64. एकता- (236) 65. विधवा बि‍आह- (176) 66. देश सेवाक व्रत- (134) 67. आत्मबल- (1- (110) 68. स्वाभिमान- (121) 69. कलंक- (429) 70. बुलकी- (211) 71. भद्रपुरुष- (173) 72. झूठ नै बाजब- (103) 73. आर्दश माए- (097) 74. नारी सम्मान- (100) 75. अनुशासन- (190) 76. सादा जि‍नगी- (127) 77. विचारक उदय- (072) 78. पुष्ट इकाइसँ समर्थराष्ट बनैत- (102) 79. डर नै करी- (119) 80. आसिरवाद उलटि गेल- (223) 81. रत्न गमेवाक दुख- (226) 82. निसाँ- (194) 83. सामना- (124) 84. शिष्टाचार- (171) 85. ठक- (115) 86. पत्नीक अधिकार- (128) 87. शिनीची सि‍नेह- (211) 88. सिखबैक उपए- (171) 89. कर्तव्यपरायन सुगा- (171) 90. तस्वीर- (134) 91. मि‍तक प्रयोजन- (359) 92. स्वार्थपूर्ण विचार- (121) 93. संगीक महत- (130) 94. उपहास- (196) 95. महादान- (176) 96. भाग्यवाद- (171) 97. सद्वृति‍- (150) 98. आश्रम नै सोबहाव बदली- (281) 99. पुरुषार्थ- (255) 100. नैष्ठिक सुधन्वा- (274) 101. सद्गृहस्त- (195) 102. सद्भाव- (134) 103. आलस्य वनाम पिशाच- (302) 104. स्वर्ग आ नर्क- (265) 105. यथार्थक बोध- (115) 106. विद्वताक मद- (165) 107. अनंत- (128) 108. हँसैत लहास- (184) 109. अनगढ़ चेतना- (162) 110. सत्‍य विद्या- (108) 111. समता- (165) 112. जेते चोट तेते सक्कत- (116) 113. परिष्कार- (198) 114. कथनी नै करनी- (176) 115. शालीनता- (157) 116. मजूरी- (140) 117. जीवन यात्रा- (145) 118. ज्योति‍- (081) 119. पवनक विवेक- (180) 120. आत्मबल-2- (105) 121. खुदीराम बोस- (172) 122. शिष्यकेँ शिक्षेटा नै परीक्षो- (187) 123. लौह पुरुष- (124) 124. जंग लगल- (150) 125. जीवकक परीछा- (117) 126. तप- (162) 127. उल्टा अर्थ- (203) 128. जाति नै पानि- (142) 129. ऊँच-नीच- (206) 130. पागलखाना- (223. 131. दोहरी मारि‍- (1357) 132. केना जीब?- (1031) 133. नवान- (2282) 134. तिलासंक्रान्तिक लाइ- (2034) 135. भाइक सिनेह- (1166) 136. प्रेमी- (2520) 137. बपौती सम्‍पति- (2352‍) 138. डंका- (2422) 139. संगी- (1858) 140. ठकहरबा- (2351) 141. अतहतह- (2477) 142. अर्द्धांगि‍नी- (3045) 143. ऑपरेशन- (1605) 144. धर्मनाथ- (1983) 145. सरोजनी- (1816) 146. सुभद्रा- (1910) 147. सोनमाकाका- (1537) 148. दोती बि‍आह- (1816) 149. पड़ाइन- (1988) 150. केतौ नै- (1211. 151. बि‍हरन- (3174) 152. मायराम- (2037) 153. गोहि‍क शि‍कार- (2113) 154. मातृभूमि- (1036) 155. भबडाह- (2053) 156. परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा- (1888) 157. फागु- (2096) 158. लफक साग- (1192) 159. ति‍लकोरक तरुआ- (1826) 160. एकोटा ने- (1071) 161. धोतीक मान- (472) 162. साझी- (989) 163. सतभैंया पोखरि- (2990) 164. न्‍याय चाही- (1308) 165. पनि‍याहा दूध- (2114) (166. कर्ज- (2860) 167. परदेशी बेटी- (2451) 168. मान- (631) 169. मनोरथ- (1151. 170. कि‍यो ने- (3699) 171. सूदि‍ भरना- (904) 172. जन्‍मति‍थि- (2356) 173. इमानदार घूसखोर- (2204) 174. पटि‍याबला- (2356) 175. सनेस- (1248) 176. उलबा चाउर- (2588) 177. बलजोर- (2320) 178. बेटी) हम अपराधी छी- (3240) 179. बगबारि‍‍- (1847) 180. मुइलो बि‍सेबनि- (4244) 181. सड़ल दारीम- (2442) 182. चुप्‍पा पाल- (2517. 183. एक धाप जमीन- (2522) 184. ओझरी- (1963) 185. मुसहनि- (2277) 186. केलवाड़ी- (2628) 187. स्‍वरोजगार- (2338) 188. घूर- (2749) 189. कनियाँ-पुतरा- (2340) 190. वारंट- (1601) 191. गामक मुँह फेर देखब- (2897. 192. कचोट- (313) 193. काँच सूत- (390) 194. बुधनी दादी- (267) 195. खि‍लतोड़- (396) 196. मुँह-कान- (234 197. अनदि‍ना- (312) 198. अपन काज- (366) 199. दूरी- (264) 200. पुरनी भौजी- (116) 201. छूटि‍ गेल- (111) 202. काल्हि‍ दि‍न- (151) 203. अप्‍पन हारि- (283) 204. कनफुसकी- (137) 205. मुँहक बात मुहेँमे- (135) 206. कनीटा बात- (098) 207. गति‍-गुद्दा- (250) 208. बि‍सवास- (316) 209. कचहरि‍या-भाय- (270) 210. गुहारि- (432) 211. शि‍वजीक डाक-बाक्- (089) 212. सोग- (341) 213. पनचैती- (197) 214. कनमन- (313) 215. अजाति- (085) 216. पटोर- (412) 217. फुसि‍याह- (308) 218. गति‍-मुक्‍ति- (241) 219. चौकीदारी- (437) 220. झगड़ाउ-झोटैला- (256) 221. घबाह ट्यूशन- (246) 222. दादी-माँ- (408) 223. पटोटन- (349) 224. मुसाइ पंडि‍त- (567) 225. भरमे-सरम- (231) 226. देखल दि‍न- (434) 227. फज्झति- (403) 228. अकास दीप- (233) 229. बुधि‍-बधि‍या- (268) 230. पहाड़क बेथा- (216) 231. उमकी- (324) 232. बजन्‍ता-बुझन्‍ता- (147) 233. चर्मरोग- (578) 234. शंका- (325) 235. ओसार- (213) 236. छोटका काका- (394) 237. सीमा-सड़हद- (195) 238. रमैत जोगी बोहैत पानि- (253) 239. गंजन- (172) 240. सजए- (089) 241. घटक बाबा- (335) 242. आने जकाँ- (048) 243. दान-दछि‍ना- (150) 244. उड़हड़ि- (503) 245. मत्हानि- (260) 246. मेकचो- (221) 247. झूटका वि‍दाइ- (350) 248. मुँहक खति‍यान- (278) 249. कोसलि‍या- (234) 250. हूसि‍ गेल- (204) 251. पोखला कटहर- (153) 252. सरही सौबजा- (267) 253. तेरहो करम- (322) 254. डुमैत जिनगी- (295) 255. चोर-सि‍पाही- (197) 256. दूधबला- (271) 257. टाइपि‍स्‍ट- (263) 258. समदाही- (300) 259. बुढ़ि‍या दादी- (331) 260. पाइक मोल- (2412) - (22 दिसम्‍बर 2013 261. चोरूक्का झगड़ा- (538) 24 दिसम्‍बर 2013 262. अपसोच- (548) 26 दिसम्‍बर 2013 263. पतझाड़- (2587) 31 दिसम्‍बर 2013 264. झीसीक मजा- (453) 1 जनवरी 2014 265. मति-गति- (1807) 07 जनवरी 2014 266. अपन सन मुँह- (5696) 25 जनवरी 2014 267. रिजल्‍ट- (2343) 16 जनवरी 2014 268. सुमति- (3052) 30 जनवरी 2014 269. फेर पुछबनि- (346) 31 जनवरी 2014 270. माघक घूर- (1683) 06 फरवरी 2014 271. खर्च- (330) 07 फरवरी 2014 272. अखरा-दोखरा- (342) 10 फरवरी 2014 273. पेटगनाह- (593) 14 फरवरी 2014 274. बड़की माता- (1224) 18 फरवरी 2014 275. धरती-अकास- (184) 19 फरवरी 2014 276. बकठाँइ- (883) 24 फरवरी 2014 277. चैन-बेचैन- (936) 09 मार्च 2014 278. हथि‍याएल खुरपी- (650) 11 मार्च 2014 279. अलपुरि‍या बरी- (287) 12 मार्च 2014 280. नीक बोल- (570) 13 मार्च 2014 281. सुआद- (624) 14 मार्च 2014 282. गंगा नहेलौं- (686) 19 मार्च 2014 283. भोँटक गहमी- (508) 24 मार्च 2014 284. भँसैत नाह- (592) 26 मार्च 2014 285. पान पराग- (1704) 29 मार्च 2014 286. सि‍रमा- (760) 31 मार्च 2014 287. नौमीक हकार- (1116) 03 अप्रैल 2014 288. फोंक मकड़- (1)755) 10 अप्रैल 2014 289. केते लग केते दूर-(1255) 14 अप्रैल 2014 290. अभि‍नव अनुभव- (326) 16 अप्रैल 2014 291. खोंटकर्मा- (1184) 19 अप्रैल 2014 292. कि‍छु ने- (501) 22 अप्रैल 2014 293. झकास- (1589) 26 अप्रैल 2014 294. अप्‍पन-बीरान- (2)894) 01 मई 2014 295. सजमनि‍याँ आम- (611) 04 मई 2014 296. अर्जुन रोग- (1003) 7 मई 2014 297. गरदनि‍ कट्टा बेटा- (575) 10 मई 2014 298. नैहराक धाड़- (881) 14 मई 2014 299. अवाक- (1041) 17 मई 2014 300. पोखरि‍क सैरात- (923) 20 मई 2014 301. दनि‍याँ डाबा- (409) 22 मई 2014 302. धरम काँट- (399) 23 मई 2014 303. पलभरि- (1116) 24 मई 2014 304. कि‍रदानी- (5296) 14 जुन 2014 305. सगहा- (2867) 22 जुन 2014 306. अकाल- (1238) 24 जुन 2014 307. उझट बात- (1152) 26 जुन 2014 308. कर्जखौक- (1175) 2 जुलाई 2014 309. उनटन- (1187) 6 जुलाई 2014 310. रेहना चाची- (1307) 9 जुलाई 2014 311. बुधनी दादी- (1256) 11 जुलाई 2014 312. अउतरि‍त प्रश्‍न- (1229) 14 जुलाई 2014 313. हारि- (1240) 16 जुलाई 2014 313. सोनाक सुइत- (1135) 17 जुलाई 2014 314. मरूभूमि‍- (1214) 20 जुलाई 2014 315. असगरे- (1557) 24 जुलाई 2014 316. पुरनी नानी- (1304) 27 जुलाई 2014 317. कटा-कटी- (1140) 30 जुलाई 2014 318. केते लग केते दूर-(1206) 3 अगस्‍त 2014 319. गलती अपने भेल-(3386) 06 अगस्‍त 2014 320. चोरक चोरबती- (884) 6 अगस्‍त 2014 321. घर तोड़ि‍ देलि‍ऐ- (1527) 10 अगस्‍त 2014 322. सजल स्‍मृति- (2363) 14 अगस्‍त 2014 323. सनेस- (2654) 16 अगस्‍त 2014 324. सए कच्‍छे- (488) 19 अगस्‍त 2014 325. एक मुठी घास- (411) 21 अगस्‍त 2014 326. करि‍छौंह मुँह- (318) 24 अगस्‍त 2014 327. पुरस्‍कार- (2414) 24 अगस्‍त 2014 328. गावीस मोइस- (687) 29 अगस्‍त 2014 329. मनकमना- (6118) 19 सि‍तम्‍बर 2014 330. घरवास- (4884) 26 सि‍तम्‍बर 2014 331. समधीन- (6096) 04 अक्‍टुबर 2014 332. चापाकलक पाइप- (1616) 7 अक्‍टुबर 2014 333. कलम हानि कऽ-(2226) 10 अक्‍टुबर 2014 334. लतियाएल जिनगी-(1184) 14 अक्‍टुबर 2014 335. गामक शकल-सूरत-(2596)20अक्‍टुबर 2014 336. जितिया पावनि- (3706) 24 अक्‍टुबर 2014 337. सुखाएल सूरत- (3690) 30 अक्‍टुबर 2014 338. भैयारी हक- (3131) 4 नवम्‍बर 2014 339. ठकुआएल भुसवा- (3356) 13 नवम्‍बर 2014 340. खुदियाएल- (2894) 17 नवम्‍बर 2014 341. खटहा आम- (3528) 22 नवम्‍बर 2014 342. ढकरपेँच- (3740) 30 नवम्‍बर 2014 343. असहाज- (2853) 04 दिसम्‍बर 2014 344. समरथाइक भूत- (3832) 07 दिसम्‍बर 2014 345. विदाइ-(5103) 17 दिसम्‍बर 2014 346. खलओदार- (731) 19 दिसम्‍बर 2014 347. मनुखदेवा (1016) 22 दिसम्‍बर 2014 348. उमेद- (3643) 31 दिसम्‍बर 2014 349. गलगर भैंस- (3392) 4 जनवरी 2015 350. जाड़ फाटि गेल- (3328) 9 जनवरी 2015 351. सुरता- (3304) 15 जनवरी 2015 352. असुध मन- (2353) 19 जनवरी 2015 353. धरमूदासक अखड़ाहा- (1410) 21 जनवरी 2015 354. ठोररंगू- (1531) 23 जनवरी 2015 355. लगबे ने कएल- (1449) 25 जनवरी 2015 356. उकड़ू समय- (1467) 27 जनवरी 2015 357. चास-बास दुनू गेल- (1615) 29 जनवरी 2015 358. नहरकन्‍हा- (1209) 11 मार्च 2015 359. बटखौक- (1272) 14 मार्च 2015 360. पसेनाक धरम- (1263) 16 मार्च 2015 361. जेठुआ गरदा- (1103) 18 मार्च 2015 362. हँसीएमे उड़ि गेलौं- (1243) 20 मार्च 2015 363. बुड़िबकहा बुड़िबक बनौलक- (1234) 23 मार्च 2015 364. हमर बाइनिक विचार- (1207) 26 मार्च 2015 365. नोकरिहारा- (1146) 26 मार्च 2015 366. घसवाहि- (1213) 28 मार्च 2015 367. तेतर भाइक कविता- (1319) 1 अप्रैल 2015 368. छूआ- (1223) 6 अप्रैल 2015 369. दोसराइत- (1270) 9 अप्रैल 2015 370. लछनमान- (1173) 13 अप्रैल 2015 371. हमर कोन दोख- (1527) 17 अप्रैल 2015 372. मौसी- (1393) 21 अप्रैल 2015 373. नटकिया गति- (1313) 24 अप्रैल 2015 374. खाए चाहैए- (1223) 27 अप्रैल 2015 375. मधुमाछी- (1892) 07 मई 2015 376. दनगर घास- (2775) 13 मई 2015 377. सझिया खेती- (3135) 23 मई 2015 378. मुफतिया माल- (3231) 29 मई 2015 379. मथाहाथ- (2923) 02 जून 2015 380. पहपटि- (1369) 05 जून 2015 381. इजोरिया राति- (1512) 07 जून 2015 382. तीन जुगिया भाय- (2010) 12 जून 2015 383. अँगनेमे हेरा गेलौं- (605) 14 जून 2015 384. डकरा हाल- (2529) 17 जून 2015 385. जेतए जे हौउ- (2062) 21 जून 2015 386. गठूलाक गारि- (1532) 25 जून 2015 387. कनी हमरो सुनू- (1983) 29 जून 2015 388. गामक बान्‍ह- (2437) 03 जुलाई 2015 389. गुड़ा-खुद्दीक रोटी- (2443) 08 जुलाई 2015 390. सीरक गाछ- (3071) 13 जुलाई 2015 391. हरदीक हरदा- (2924) 19 जुलाई 2015 392. जाम- (3355) 29 जुलाई 2015 393. गण्‍डा- (2304) 5 अगस्‍त 2015 394. हाथी आ मूस- (3016) 11 अगस्‍त 2015 395. मुसरी आ घोड़ा- (3625) 17 अगस्‍त 2015 396. फलहार- (2350) 25 अगस्‍त 2015 397. भोरक झगड़ा- (2697) 31 अगस्‍त 2015 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.डा.ज़ियाउर रहमान जाफ़री- गजल ३.२.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.३.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- किछु कविता ३.४.गौरीशंकर साह- क्षणिका डा.ज़ियाउर रहमान जाफ़री गजल रोटी हम पर भारी बाबा खायब की तरकारी बाबा बाहर बाहर हमहूँ हँसलहुँ आँखिक आँसू जारी बाबा अपने अपगुण नहि देखल हम ई बड़का  बीमारी  बाबा सुख के दिन एबे करतै कहि देलक दुख भारी बाबा दौड़ रहल छी मासे मास अफसर अछि सरकारी बाबा अनका पर विश्वास करत के हमही छी संहारी बाबा सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। डा.ज़ियाउर रहमान जाफ़री पीएच-डी हिंदी,एम-एड उच्च विद्यालय माफी,जिला नालंदा,बिहार,803107 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार २ टा गजल 1 जंगलराज दंगाबाज जी महराज जै महराज छै बेकूफ देशक लोक नेता लग ने कनियों लाज फरसा आनि गरजै खूब मंतर कटि मरै नेमाज नेता नीक बेटा नीक जनता सभकेँ अतबे काज अनचिन्हार गाबै खूब कुर्सी गीत सत्ता साज सभ पाँतिमे 2221+2221 मात्राक्रम अछि दोसर आ चारिम शेरक दोसर पाँतिमे एक-एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि सुझाव सादर आमंत्रित अछि 2 बहुत बेर हमरा देखने हेतै बहुत बेर हमरा चाहने हेतै अलोपित सगर दुख केकरो अबिते बहुत बाट ओकर जोहने हेतै इयादक रमनगर फील्डमे धीरे सँ गुड़कैत मुस्की रोकने हेतै छलै रौद बड़ कड़गर सिनेहक आइ अदौड़ी हँसीकेँ खोटने हेतै बहुत कानि अनचिन्हार बनलै ओ करेजा कियो बड़ तोड़ने हेतै चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि सभ पाँतिमे 122-1222-1222 मात्रक्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” किछु कविता १ हम आ मैथिली (कविता) लोक कहैतछि, छी ब्राह्मण अहाँ, तेँ  लीखि सकलहुँ  मैथिली । जएह बजैत छी, सएह लीखैत छी,  तेँ  लीखैत छी  मैथिली ।। सुनू यौ बाबू,  ब्राह्मण  भेने,  लीखि  ने  सकितहुँ  मैथिली । संस्कृत पढ़ितहुँ, हिन्दी छँटितहुँ, कोना कऽ लीखितहुँ मैथिली ।। घऽर  अहाँ  केर  दरिभंगा  अछि,  तेँ  लीखैत छी  मैथिली । दरिभंगा  रहितहुँ  छी प्रवासी,  बूझए ने  जाहि ठाँ  मैथिली ।। माए - बाप  घुमितहि  रहलाह,  भारत  सरकारक  नौकरी । बदली भऽ  जाहि ठाँ रहलाह,  पर बजलन्हि घरमे  मैथिली ।। पटनासँ मैट्रिक कएलहुँ,  लड़ि - झगड़ि कऽ  लेलहुँ मैथिली । नओमामे   नहिञे   भेंटल,   दसमामे  पढ़लहुँ   मैथिली ।। दसमोमे  ईस्कूल  प्रशासन,   कहलक  राख  ने  मैथिली । रखबेँ  तँऽ  नञि  केओ  पढ़एतौ,  अपने पढ़िहें  मैथिली ।। माए  मैथिलीक  इच्छा,  हमसभ  राखल तइयो  मैथिली । माए मैथिली बनि अध्यापिका,* शिक्षा  देलन्हि  मैथिली ।। अहाँ कहब  दरभंगिया बाभन,  शुद्ध  लीखी  तेँ मैथिली । हम जनैत छी,  जेँ पढ़लहुँ,  तेँ लीखि पाबैत छी मैथिली ।। लीखबामे   मिथिलाभाषा   आ   लीखलकेँ    पढ़बामे । ओहने  हमरो लेल कठिन छल,  डेग  पहिल  चलबामे ।। मैथिली जे हम बजैत रही  आ  छल साहित्यक अलगे । पढ़ल - गुनल - लीखब सीखल, की होयत रहि दरिभंगे ।। मोनमे  ई भ्रम्  जुनि राखू,  ई कपटी सभक  प्रपञ्च । अपन  माएसँ  दूर  करक  छी,  दुष्टक  ई  षडयण्त्र ।। जोधा अकबर केर पुत्र सलीमक, कथा सकल छी बूझले । डाहेँ सलीमकेँ हफीम खोआए, कएलक की रूकैया बूझले ।। जे ब्राह्मण दरिभंगे रहि कऽ,  पढ़ल ने कहियो मैथिली । लीखि ने सकत, बाँचत की लीखल, सीखू बौआ मैथिली ।। जाति धर्म ओ डेग - डेग पर,  जे किछु  अलग लगैए । से बूझू,  ओहि ठामक बोलीक,  मधुर सुगन्धि आनैए ।। जहिना हिन्दी अछि एक्के,  पर सभ ठाँ भिन्न लगैए । बंगाली - बिहारी - मराठी - दिल्ली   अलग  बजैए ।। तहिना मैथिली अछि एक्के, बेतियासँ लऽ कऽ बनैली । एक्के तिरहुत, तीरभुक्ति, मिथिला, विदेह आ बज्जी ।। नञि अनुचित जँ केओ व्यक्ति,  भाषा दू-चारि जनैए । पर अनुचित  ओ मैथिल जे,  मैथिलीसँ  मूँह  फेरैए ।। दोसरोक माए अपनहि छी माए, यौ हमहूँ सएह बूझै छी । पर अनुचित निज माएक बलि दऽ, अनका जँ जुड़बै छी ।। हम नञि छी भगवान - भगवती,  सांसारिक छी प्राणी । मैथिली  हम्मर माएक  भाषा,  बस एतबहि टा जानी ।। विश्वक  सभ भाषा  प्रिय हमरा,  पर निज भाषा नेह । एकर  अहित  जे केओ करैछ,  तकरासँ  हमरा द्वेष ।। * हमर विद्यालयमे २ सत्रमे (शिफ्टमे) पढ़ौनी छल । हम जाहि सेक्शनमे रही से प्रातः कालीन सत्रमे छल । ओहि विद्यालयमे मैट्रिकमे मैथिलीक लेल कोनहु शिक्षक/शिक्षिका नियुक्त नञि छलाह/छलीह । भरि नओमा संघर्ष कएलहुँ पर मैथिली नञि राखए देल गेल । दसमामे अएलाक बाद किछु सूत्रसभसँ पता चलल जे ओही विद्यालयमे अपरान्हकालीन सत्रमे +2 मे मैथिलीक पढ़ौनी लेल एक गोट शिक्षिका नियुक्त छथि, पर ओ भारतीय प्रशासनिक सेवाक परीक्षाक तैय्यारी लेल छुट्टी पर छथि । बहुत प्रयत्न कएलाक बाद हुनिकासँ भेंट भऽ सकल । ई भेंट आशातीत नञि अपितु आशासँ बेसी नीक रहल । मैथिलीक पढ़ौनी हेतु हुनक पुर्ण सहयोग भेटल, तत्कालीन विद्यालय प्रशासनक विरुद्ध जा ओ सहयोग कएलन्हि । ओहि सालक विभिन्न सेक्शनक आठ गोट विद्यार्थी (हमरा सहित) मैथिली रखलहुँ । हुनिक नाँव छलन्हि श्रीमति उषा ठाकुर (चौधरी) । बादमे ज्ञात भेल जे ओ भारतीय प्रशासनिक सेवामे चयनित भेलीह । बहुत बादमे ईहो पता चलल जे हुनिक सासुर “दुलारपुर” (हमरहि पञ्चायत) छलन्हि । पुनः भेंट करबाक इच्छा छल पर दुर्भाग्यवश से पूरा नञि भऽ सकल । हालहि मे जानकारी भेंटल जे कैन्सरक कारण अल्प वयसहिमे हुनिक देहावसान भऽ गेलन्हि । हुनिका सादर नमण । मैथिलीक सम्बन्धमे सम्पुर्ण विद्यालय यथाशक्ति असयोग कएलक । मात्र दू गोटे सहयोग कएलन्हि जनिक नाँव लेब उचित - पहिल श्रीमति गौरी गुप्ताजी (अर्थशास्त्रक शिक्षिका) आ दोसर श्रीमति वीणापानि“सुधांशु”जी (दसमाक अन्तिम किछु महिनाक समयमे हमर विद्यालयक प्रधानाध्यापिका) । हमर एहि विद्यालयक नाँव छल “शहीद दवीपद चौधरी स्मारक ईण्टर स्तरीय विद्यालय, अदालतगञ्ज, पटना” अथवा “मिलर हाई स्कूल, पटना” । २ खैनी पहिलुक अलाप खोआए देलक, हम खाइत कहाँ छी । बस चीखए छी, अभ्यस्त कहाँ छी । सबसबात  छल  दाँत,  तेँ  धएलहुँ, एतबामे  किछु  गलत  कहाँ  छी ?? बिचला प्रलाप एतेक बरख धरि केर आदति छी । छूटत  नञि,  छोड़ए  चाहैत छी । ओ तँऽ  कहियो  नहिञे  खएलक, तइयो काँकोड़ * केर आफत छी ।। अन्तिम विलाप हओ बौआ  !  नहिञे  छुटलै ई । चचरी  पर   संगहि  जड़तै  ई । जँऽ  पहिने  से  सब  बुझितियै, ठोर  कहाँ  धरितहुँ  हम  खैनी !! हम्मर सलाह अस्सी चुटकी  आ  नब्बे ताल । ठोर पर  खैनी  करैछ  कमाल । गीत - गीत  छै,  बात ने मानू; नञि तँऽ होयत जान - जपाल ।। संकल्पक उसास छोड़ू    बीड़ी - हुक्का - पीनी । हर  स्वरूपमे  नाशक   खैनी । संकल्पक  सम्बल  जँऽ ढीठगर, के  कहैछ - नञि छूटए खैनी ।। * काँकोड़ = कैन्सर नामक बेमारीक पर्याय (CANCER-DISEASE) = खैनी खएनिहार बहुत लोक सभ केर दलील रहैत छन्हि कि फलना तँऽ खैनी - बीड़ी - पीनी किछु सेवन नञि करैत छल पर तइयो ओकरा कैन्सर भऽ गेलै = मतलब कि ओ लोकनि किन्नहु खैनी नञि छोड़ताह । ३ लेखन कमजोर नञि जँ मैथिली लिखैत छी हऽम ! हँऽ यौ  बाबू - हऽम !! मैथिली   बजैत   छी, मैथिली  लिखैत  छी । मैथिली   पढ़ैत    छी, मैथिली   बुझैत  छी । मैथिली   गबैत   छी, मैथिली   नचैत  छी । मैथिली   सुनैत   छी, मैथिली   गुनैत  छी । ककरा सनि भूकए छी, से  नञि  जनैत छी । मैथिली  बजैत  छी,  मैथिली  लिखैत छी ।। नीक   बोल  लागइए, तेँ  हम  बजैत  छी । कर्णप्रिय  जेँ   हमरा, तेँ  हम  सुनैत  छी । माएक  सुबोल  बोल, तेँ  हम  गबैत  छी । सुन्नर सुगन्धि एकर, जग भरि बँटैत छी । लेखन कमजोर नञि, जँ मैथिली लिखैत छी । सोच  एहेन  जनिकर, से गलती करैत छी ।। कोन - कोन  खेमा छै, कोन - कोन  वाद छै । की - की   नियम  छै, आ  की  अपवाद छै । ककर कोन की प्रपञ्च, ककर की  विवाद छै । हम  तँऽ  बुझैत  छी, मैथिलीक  नाद  छै । एतबे बस बूझै छी,  मैथिली  बजैत  छी । मैथिली  बजैत  छी,  मैथिली  लिखैत छी ।। ककर छी हकार,  आ ककर छी निमण्त्रण । के उड़बए गुड्डी, आ ककर छी नियण्त्रण । हमरा लए सभटा बस, मैथिलीक    गर्जन । मैथिलीक     तर्जन, ओ मैथिलीक वर्षण ।। प्यासल छी  मैथिलीक,  घाट ने  देखैत छी । मैथिलीक   अमृतसँ,   प्यास  मेटबैत  छी ।। हम नञि  जनैत  छी, की  अहँ सोचैत छी । कोन  पक्ष-संघ-गुटमे, हमरा  रखैत   छी । कोन  बाद – पन्थसँ, हमरा  जोड़ैत  छी । हमर  लिखल  शब्द, कोन धारेँ बहबैत छी । अर्थ  अहाँ  की  बूझल,  अँहीं  जनैत  छी । हम तँऽ बस बूझल जे, मैथिली लिखैत छी ।। लिखबाक मोन अछि, तेँ हम लिखैत छी । मैथिलीक रंग प्रिय, ताहिमे रंगैत छी । हिन्दी आ अंग्रेजी, सेहो प्रशस्त छी । मोन मुदा मैथिलीक, नेहेँ आशक्त छी । हाथ  हमर  लेखनी,  मैथिली  लिखैत  छी । सभकिछु  पढ़ैत  छी,  मैथिली  लिखैत छी ।। ४ समाज आ विरोधाभास (कविता) अप्पन बेटी डान्स करैए, ई छी  गर्वक  बात । अनकर बेटी गीत गबैए, धुर पीटता ओ माथ !! अप्पन बेटी  मॉडेल छी तँऽ, मिथिलानी  केर  भाग । पढ़बा लए हॉस्टल दोसर जँऽ, उचित ने कनिञो बात ।। अप्पन बौआ  उड़बए कौआ, शार्प माइण्ड अछि रखने । दोसर पोथी बाँचि रहल जञो, सुग्गा  सनि  की रटने ?? टू-पीस, थ्री-पीस अपना घरमे, बड़-बड़   नबका  फैशन । ओकर पुतोहु केर पहिरन देखल, मुशहरीक  किछु कतड़न ।।१ इएह समाज छी कमोबेश, आ इएह  एकर छी ढर्रा । अपने ओकैजनल कहियो कऽ, आन  पिबैत’छि   ठर्रा ।।२ अपना घर जेकिछु ऊकड़ू अछि, परिवर्तन   छी   बौआ । अनका घर किछु नऽव भेल तँऽ, बाजि रहल अछि ढौआ ।। अपन बेढब जँ चालि – चलन, नव क्रान्तिक शंख बजैए । आनक गति जँ रुचल-पचल नञि, संस्कृति   नाश  करैए ।। अपने कनिञा धिया-पुता लग, आने  बोल  बजै  छी । तखन कोना मिथिलाभाषामे, अनका बाध्य करै छी ।। अप्पन टल्हा, सोना सिक्का, अनकर   हीरा  - सीसा । अनकर कएल कर्मसभ अनुचित, जीबितहि अपन चलीसा ।।३ अपने तालेँ नाचि रहल सभ, अपनहि–अपनहि   बात । ककरो आन केओ नञि सूनए, ई  छी  केहेन  समाज ।। १. मुशहरी = सुपर नेट या नेट बला साड़ी लेल गामक किछु वृद्ध वा वृद्धालोकनि द्वारा प्रयुक्त कटाक्ष भरल शब्द । २. हम व्यक्तिगत रूपेण मदिरापानक प्रचारक नञि छी आ नहिञे स्वयं पिबैत छी । पर जे करैत छथि तनिकहि शब्द अक्षरशः अछि । ३. चलीसा = अप्पन सवयं केर प्रशंसाक अतिशय प्रचारार्थ कएल गेल कोनहु प्रकारक कृत्य । ४. हम व्यक्तिगत रूपेण ऊपर वर्णित कोनहु फैशन वा जीवनशैलीक विरोध नञि करैत छी पर समाजमे पसरल किछु विरोधाभाषकेँ उजागर करबाक लेल ओकर चर्च एहि कवितामे कएल गेल अछि । ५ हे दैव ! किछु तोँहीं कहह (कविता) हे दैव किछु तोँहीं कहह,  छह भाग्य की लीखने हमर । कहियो रौदी, कहियो  दाही,  बीच  भूकम्पक  भँवर ।। एकसँ  उबरल  रही  नञि,   दोसरक  पछड़ा  पड़ल । साँस लेबा केर  ने पलखति,  ई केहेन  लफड़ा पड़ल ।। हे  विदेहक  पुत्र  तोँ,  विचलित किए छऽ भऽ रहल । आँखि फोलह आओर देखह,  विश्वमे की  भऽ रहल ।। तोरे सनि सब लग समस्या, मूँह बओने अछि विकट । एहि धरा पर कतहुटा नञि, शान्त सनि भेटत विवर ।। कतहु तापक  छै समस्या,  शीत  वा  धीपल  मरू । कतहु सागर केर लहरि, बनबए सुनामी  - की कहू ।। कतहु बिर्रो  आ  छै अन्हर,  काल केर  प्रतिरूपमे । कतहु  धरती - हिम  धँसए,  पतालभैरव   कूपमे ।। जँ समस्या  तँऽ तकर,  समाधान  हम देने छियह । अपन बुद्धि विवेक ताकह, निदान हम देने छियह ।। ६ बनल मधेश मसान छै (गीत) मारल  गेलै  लोक  कतेको,  बनल मधेश मसान छै । केहेन  छै  ई  प्रजातन्त्र  आ  केहेन  संविधान  छै !! राजतन्त्रमे  भेदभाव - ओहि ठामक लोक  कहए छल । सम अधिकारक लेल प्रजातन्त्रक ओ बाट ताकए छल । आइ दिवस ओ एलै मुदा, बखड़ा नञि एक समान छै । केहेन  छै  ई  प्रजातन्त्र  आ  केहेन  संविधान  छै !! अधिकारक जे माँग कएलक,  से गोलीक भेल शिकार । शोणितमय शुरुआत जकर, तक्कर भविष्य की आश ? दूमेसँ हर एक व्यक्ति, जक्कर दहीन नञि - बाम छै । केहेन  छै  ई  प्रजातन्त्र  आ  केहेन  संविधान  छै !! देश स्वतन्त्र ओ भिन्न  मुदा  भारतक सहोदर भाए । सएह सोचि  भारत कहलक,  करू संकट केर उपाए । भारत केर हित वचनकेँ उनटे, बूझए ओ अपमान छै । केहेन  छै  ई  प्रजातन्त्र  आ  केहेन  संविधान  छै !! एक  देशमे  दू - नागरिकता,  जखन - जतए भेलैए । साक्षी अछि इतिहासे - ओक्कर  अप्पन अहित भेलैए । देश माए आ माएक लेल तँऽ सुन्नर सभ सन्तान छै । केहेन  छै  ई  प्रजातन्त्र  आ  केहेन  संविधान  छै !! ७ उठाऊ लेखनी लीखू अहाँ उठाऊ लेखनी,  लीखू अहाँ,  जे किछु नञि लीखल गेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। गीत - गजल,  सभ किछु लीखू । नञि लीखलन्हि ओ, अपने लीखू । गीता - गुरुग्रण्थ - कुरान  लीखू । बाइबल - जातक  वा आन लीखू । ओ सभ लीखू, जे अछि इच्छा, लीखल - ने लीखल गेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। इतिहास लीखू,  भूगोल लीखू । विज्ञान लीखू,  खगोल लीखू । अनुवाद लीखू वा मूल लीखू । अपना भाषा लए खूब लीखू । अहँक हाथ  के अछि धएने - नञि हुनिका लीखल भेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। अहँ नञि लीखबै आ नञि पढ़बै । अनका फेर  दोष  किएक मढ़बै । पोथी आ पत्रिका  नञि  कीनबै । तँऽ  अपने  मूँह  कोना  बजबै । की भेल ?  अहाँ की सोचै छी ?  ई दुविधा केहेन भेल ? नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। ओतबहि करियौ  सामर्थ्य जतेक । जुनि सोचू अहँ कऽ सकब कतेक । घएला भरबा लए  बुन्न  जतेक । हर एक प्रयास केर मोल ओतेक । जुनि किछु सोचू,  झट लऽ बैसू,  लीखू जे  मनमे भेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। अहँक कथा केओ नञि लीखत । अहँक व्यथा केओ नञि लीखत । जञो लीखत तँऽ तुक्का लीखत । अपनहि लीखब, पक्का लीखब । अहँकेर अधिकार अहँक लीखब, से छीनि कोना केओ लेत । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। साहित्य - मैथिली सभकेर अछि । हर जाति - धरमसँ  ऊपर अछि । आनहु भाषी केर  स्वागत अछि । हमरहु  साहित्यमे  सागर अछि । हम अहँक पढ़ी, अहँ हमर पढ़ी, इएह सुसम्बन्ध आ मेल । नञि लीखब तँऽ ढोल ने पीटू - किछु नञि लीखल गेल ।। ८ ओ अहाँ लिखू जे नञि लिखलन्हि ई   नञि  लिखलन्हि । ओ  नञि  लिखलन्हि । की  नञि  लिखलन्हि ? के  नञि  लिखलन्हि ? एहि पर विचार तखनहि सार्थक, ओ अहाँ लिखू जे नञि लिखलन्हि ।। ई   बड़    अनुचित । अतिशय    अनुचित । ई    उचित    रहैत । ओ    उचित   रहैत । एहि पर मण्थन तखनहि फलप्रद, ओ अहाँ करू जे नञि कएलन्हि ।। मैथिलीक  साहित्य   एना । मैथिलीक  साहित्य  ओना । ओहि भाषामे एना - ओना । एहि भाषामे किदन - कहाँ । ई वक्तव्य कोना हुनिकर, जे मैथिली ने पढ़लन्हि - लिखलन्हि ।। मैथिलीमे  ई  बात   रहैत । मैथिलीमे  ओ  बात  रहैत । विज्ञान खगोल भूगोल रहैत । मैथिलीमे  इतिहास   रहैत । की एहेन हो इच्छा रखने जँ, अपने ओ किछु नञि लिखलन्हि ।। बुन्न - बुन्नसँ  घैल भरैछ । बेसी नञि किछुओ मँगैछ । जतबा होइए ततबा  लीखू । अपना संगहि आनोकेँ पढ़ू । बकथोथी - पाण्डित्य सफल जञो,  कागत पर  लीखि देल ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गौरीशंकर साह क्षणिका काइल फेरो दिवाली हेत, चारु दिस जरत दीपँ, घर घर मे खुशहाली हेत,अंगना अंगना घुमती मइया दूर सभक कंगाली हेत,काइल फेर दिवाली हेत। दिल सँ लिखने रही हम गीत,मुदा गाइब कियो आउर देलक,कपार जरल छल तइ न ,दिल सँ चाहने हम रही,मुदा पाइब कियो आउर लेलक। - (आजुक बियाह) -आब बियाह नइ बिबाद होइ छै,माछक मूड़ा पर सलाद होइ छै,समियाना नइ पंडाल होइ छै,डेग डेग पर बबाल होइ छै,खर्च करैत कन्यागत कंगाल होइ छै,समटैत समटैत बड़क बाप मालामाल होइ छै,पंडितो -ठाकूर जजमान सँ झोइर नेहाल होइ छै,बरातियो सब खाइत-खाइत बेहाल होइ छै,खस्सी बकरी संगे मुर्गो हलाल होइ छै,मनुख रहितो मनुख चंडाल होइ छै,बरक मुँह पर एकटा रुमाल होइ छै,ओकरो रुसनाइ कमाल होइ छै,इहो अपने आप मे एकटा सबाल होइ छै ,कि ,बियाह कियाक एतेक बदहाल होइ छै । उ भोज, भोज नइ जइह मे दही नइ पोरेल,उ आँइख आँइख नइ जइह मे कहियो पाइन नइ नोरेल,उ शरबत, शरबत नइ जइह मे चीनी नइ घोरेल,आ उ बियाह बियाह नइ जइह मे नीक जकाँ सम्बंध नइ जोरेल। - (पियाक) - दुनिया मे के नइ पियाक अछि,कियो गाजा पिबैत अछि,कियो गम पिबैत अछि,कियो पलोथिन त कियो रम पिबैत अछि,मुदा फर्क एतबे ,कियो कखनो कखनो त कियो हरदम पिबैत अछि। राइतक चान छि अहाँ,मधुर मुस्कान छी अहाँ,हँसैत रही सदखैन जिनगी में,केकरो जान छी अहाँ, अहाँके देख कतेको के बड कीछ फुड़ाइत अछि,कतेक के नैन त कतेक के आत्मा जुड़ाइत अछि,चंडाल सन गर्मी मे पवनक तुफान छी अहाँ, गौरी शंकरप शान छी अहाँ। (हमर मन) कोन टोना केलौ अहाँ,हमर गप हमरे मन नइ मानैत अछि,कहलौ जखैन मन के, वो अहाँक नइ ककरो आउर छि,केकरो आउर लेल एल अइछ वो दुनिया मे, बेचारा तखने सँ कानैत अइछ। बताह अइछ, बुरबक अइछ हमर मन, तइ न अनकरो चीज के वो अपन मानैत अइछ, मेंहदी जकाँ हाथ में लगा के राखब अहाँ के, सुरमा जकाँ आखिं मे लगा के राखब अहाँ के,एक बेर कइह त दिअ हमर छी अहाँ,भइर जिनगी करेजा सँ लगा के राखब अहाँ के। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक १.शशिधर कुमर “विदेह”- मैथिली वर्णमाला (कविता) २. आशीष अनचिन्हार- बाल गजल १ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”,  ग्राम – रुचौल, पो॰ – मकरमपुर, जिला – दरभंगा, पिन – ८४७२३४, मैथिली वर्णमाला (कविता) अ सँ अल्हुआ,   आ सँ आलू,   इ सँ भेलै  इजोत । ई ईनार  आ  उ सँ उल्लू,  ऊ केर  ऊन  छै मोट ।। ए सँ एक  आ  ऐ सँ ऐहब,   ओ सँ भेलै  ओसारा । औ प्रायः “अओ”  लीखल जाइए,  मैथिलीमे बेचारा ।। अं अंगूर आ अः विसर्ग केर  चिन्हमात्र  भऽ सूतल । ऋ सँ ऋषि आ ऋक्ष भालु छै,  ऋचा वेदकेर बूझल ।। ऋ केर दीर्घ रूप  बिनु मैथिली,  कऽ लैतछि संतोष । क कनैल,  ख - खाट  आ  ग सँ गदहा छै निर्दोष ।। घ सँ  घोड़ा घास आ घोड़न,  ङ  छै  खाली  हाथ ।१ च सँ चौकी,   छ सँ छौंकी,   ज सँ  भेलै जहाज ।। झ सँ  झब्बा या झाबा  कहू,  ञ  प्रारम्भ ने शब्द । ट सँ टमाटर,  ठ सँ ठेला,  ड  डम्फा  केर  शब्द ।। ढ  सँ  ढाकी – ढौआ – ढैंचा,  ढ़  फराक   उच्चार । तहिना ड आ ड़ मैथिलीमे,  अलग - अलग उच्चार ।। ढोलक केँ ढ़ोलक जुनि लीखू  आ  पढ़ुआ केँ पढुआ । ड सँ डमरू,  ड़ रब्बड़ मे,  हिन्दी  नञि छी बौआ ।। ढोढ़ी मे  दुहु संग - संग,  तहिना ढाढ़स मे देखियौ । पढ़ै छी मैथिली मैथिली बाजू, हिन्दी सनि ने बजियौ ।। ण सेहो निःशब्द  मुदा  उपयोग  बहुत अछि एकरो ।२ हण्डा - हण्डी, ठण्ढा - ठण्ढी, अण्डा - अण्डी सगरो ।। त सँ  तौला - तबला - तरुआ,  थ सँ थौका फूलक । थऽन गाए बकरी आ महीषक, थाल पएर मे लागल ।। द सँ दीप दूध आ दऽही, दूरा - दरबज्जा ओ दलान । ध सँ धरती धाप धरोहरि, धऽनी धोती धार आ धान ।। न पाँचम व्यञ्जन छै दुलारू, बहुत जकर बेबहार छै । नदी नाह नढ़िआ  आ नेबो,  नारिकेर ओ नाक छै ।। प सँ पानि आ फ सँ फूल - फर, ब सँ बकरी बुझले । भ सँ भारत देश अपन छी, म केर महिमा सुनि ले ।। न सनि म केर हिस्सामे सेहो, शब्दक  बहुत  पथार । म सँ मड़ुआ माछ मखान आ  माए मैथिलीक प्यार ।। य सँ  यमुना  कहबै  जमुना,  र – रस्सी  मजगूत । ल सँ  लावा  चन् – चन्  बाजय,  लाबा तकरे रूप ।। संस्कृतक जे  मूल शब्द,  ओहिमे  व  केर  बेबहार । मिथिलाभाषा व केर  बदला,  ब  केर  बड़  उच्चार ।। श सँ शंख - शरीफा - शलगम, ष केर मान छै अल्प । ष  बहुधा  मैथिली  भाषामे,   ख  केर  कायाकल्प ।। भाषाकेँ “भाषा” पढ़ैछ केओ,  आन कहैतछि “भाखा” । उच्चारण दुहु छी प्रशस्त, पर लिखना जाइछ “भाषा”।। ष केँ  बहुधा ख बजैत  छी,  भाषा  कहलहुँ  भाखा । षष्ठी – खष्ठी  सुनने  होएब,  अभिलाषा – अभिलाखा ।। स सँ सिन्दूर सिउँथ आ सपरी,  साबुन सेब  सेमार । ह सँ हाथी - हाथ - हृदय आ ह सँ  होइछ  हजार ।। क्ष – त्र – ज्ञ  संयुक्ताक्षर,  मानैत अछि पुरना भाषा । पर स्वतन्त्र सनि आखर तीनू, विचरए नवका भाषा ।। क्षत्रिय – रक्षक – भक्षक - रक्षा मे क्ष हुलकी मारए । त्र – त्रिशूल, त्रिभुवन, त्रिवेणी; त्रि तँऽ तीन कहाबए ।। ज्ञ सँ ज्ञान, आ ज्ञान सँ ज्ञानी, संज्ञा नाँओ कहाबए । विज्ञानक ई युग छी बौआ,  जिनगी सरल बनाबए ।। २ आशीष अनचिन्हार बाल गजल नीपल पोतल चिक्कन चुनमुन बेटी हम्मर गुनगुन गुनगुन ता थइ ता थइ थैया थैया पायल बाजै रुनझुन रुनझुन कानै खीजै रूसै फूलै फेरो नाचै छुनछुन छुनछुन दौड़ै सदिखन अँगने आँगन खसितो रहलै ढ़ुनमुन ढ़ुनमुन पढ़तै लिखतै करतै काज ऐमे नै किछु गुनधुन गुनधुन सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 185 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ  www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १९० म अंक १५ नवम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९५ अंक १९०) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA