ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १९१ म अंक ०१ दिसम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९६ अंक १९१) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. २.१.आत्मकथा- संस्मरण खण्ड-१.आत्मकथासँ पहिने किछु दुटप्पी- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २. हमर तीर्थयात्रा-गीतसं गजल धरि -जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ३. आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्म कथा)- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल ४. एकटा छलाह ननू कका- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २.२.[एक]- विदेहक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक लेल मुन्नाजी द्वारा अनिल जी सं लेल ई-साक्षात्कार [दू]- समालोचना १. गीत-गंगा- कामिनी २. गजल गंगा- जगदानन्द झा 'मनु' ३. मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’ -डॉ. अजीत मिश्र ४. धारक "अइ" पार- आशीष अनचिन्हार ५.कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा- परमानन्द प्रभाकर ६.‘गीत-गंगा’मे सब किछु अछि- छत्रानंद सिंह झा ७.गीतगंगामे अनिल-केदार कानन ८.‘गीत-गंगा’क प्रवाह- डा.अमर नाथ ठाकुर २.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” २. गंगा नन्द झा २.४.१.बाल मुकुंद पाठक- मैथिलीक गजलक सशक्त हस्ताक्षर 'अनिल' २.अरविन्द ठाकुर-अरविन्द ठाकुर- ’गीत-गंगा’ के बहाने किछु बतकही ३. ३.१.समीक्षा/ एकांकी- १.प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३,एकांकी- कोरांटी ३.२.गीत, कविता, दोहा, चतुष्पदी आ गजल खंड- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३.३.की भेटल आ की हेरा गेल - जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३.४.पत्राचार खंड—जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ४.बालानां कृते- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ - किछु बाल कविता 5.VIDEHA FOR NON RESIDENTS Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ क पोथी सभक लिंक धारक ओइ पार (दीर्घ कविता) गीत गंगा (गीत संग्रह) गजल गंगा (गजल संग्रह) तोरा अंगना मे (गीत संग्रह) जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ जी मूलतः कवि छथि, ओना गद्य समालोचनापर सेहो हिनकर लिखना लिखाएल अछि/ पद्यक पद्यमय हेबाक् गप, गीत हेबाक गप किछु कविक मुंहसं बहराइत रहैत अछि/ ओ पद्यक गीतमय, गेयमय नै हेबापर कन्नारोहट करै छथि/ फेर आगां जा कऽ पद्यक गेय नै हेबा लेल नव खाढ़ीकें दोष दैत एकरा पुरान आ नवक बीच संघर्ष बना दै छथि/ तं की पद्यक गेयता ओकर पुरान शैलीक हेबाक परिचय दैए? एतऽ किछु नव खाढ़ीक लोक ऐ झपासामे आबियो जाइ छथि आ पद्यमे गेयता भेने भाव कम भऽ जाइए, इत्यादि बाजि-लिखि कऽ पुरान पीढ़ीक किछु गोटेक तर्ककें काटबाक बदला दृढ़ करै छथि/ मूल गप जे झांपल जाइए से अछि पुरान पीढ़ीक किछु कविक गेय मुदा भावहीन रचनाकें समालोचक द्वारा दबाड़लापर ओ एकरा नव आ पुरानक संघर्ष कहि दै छथि आ अपन रचना लेल अपने स्थान निर्धारित करबाक चेष्टा करै छथि/ एतऽ जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’क रचना जे गीत हुअए बा गजल बा कविता, एकटा उदाहरण बनि सोझां अबैत अछि, जतऽ तुकमिलानी मात्र पद्य हेबाक माणदण्ड नै अछि/ जतऽ पद्यक गेयता एकर अवगुण नै बनैत अछि/ जतऽ अकवितामे सेहो तारतम्य अछि/ जतऽ नव आ पुरानक कृत्रिम भेद मेटा जाइत अछि आ दोषकें गुण कहेबा लेल नव आ पुरानक सोंगरक खगता नै पड़ैए/ २ भगवानक अस्तित्वक उत्तर उपनिवेशवादी रचनाकार लेल एकटा बुझौअलि अछि/ जं भगवानक अस्तित्व मानल जाए तं समस्या आ नै मानल जाए तं विश्वरूपी फोटोक फ्रेमे खतम, नाटकक मंचे निपत्ता/ ई सुरुज, ई चान, ई कोटि तरेगन, अकास, सांझ-प्रात, रौद-बसात, गाछक फड़नाइ, पानिक तपब, भाप उड़ब, मेघ बनब-बरसब, गहूम धान उपजब, फलक फूलब, सागर-पर्वत, ई सभ ककरा लेल? हमरे लेल ने/ आ हमरा लेल ई सभ कियो तं बनेनहिये हएत/ आ साइंस हमरा सभक मगजमे ढुकल अछि, से बिनु बनेने किछु बनि जाएत से सोचबो कठिन/ आ जं ई बनेनहार देखाइत अछि तं फलनां-चिलनां नाम दै छी/ आ जं बनेनहार नै देखाइत अछि तं ओ बना कऽ नुका गेल/ आ से भेल भगवान/ सभटा हमरहि लेल बना कऽ नुका गेल भगवान/ ३ नारी चेतनाक स्वरमे सेहो कन्नारोहटक अभाव अछि/ मुदा ई आशा सेहो समाजमे बालिकाका आगमनपर भऽ रहल शोकक परिचायक अछि, नै तं बालक लेलई पद्य किए नै लिखाएल, जखनकि बालकक बेरोजगारी सेहो पैघ समस्या अछि/ मुदा कन्नारोहट नै अछि, आ वास्तविकतासं लड़बाक लेल रस्ता अछि; हमरा चिन्ता कथी के/ कारण बुच्ची बढ़ती, पढ़ती-लिखती/ दहेज दानवक विरुद्ध खड्ग उठेती/ साइंसक संपैत अर्जित करती/ संगी अप्पन अपने चुनती/ अपन बाट अपने श्रमसं बनेती आ दुखसं लड़ती/ ४ हमरा चिन्ता कथी के, कऽ बाद मम्मी तों चिन्ता जुनि कर, मे बच्चा मम्मीकें चिन्ता नै करबाक अनुरोध करैए आ ई बच्चा बुच्ची छी सेहो स्पष्ट भऽ जाइए, कारण ओ दहेज लैबला सं बिआह नै करत/ ओना मिथिलामे लड़कीबला सेहो पहिने दहेज लै छला, मुदा तखनो से स्त्रीक श्रेष्ठताक प्रमाण नै छल वरन् तखन बूढ़ वरक विवाह छोट बचियासं पाइ दऽ कऽ भऽ जाइ छलै/ आ से आर भयंकर छल/ आत्मविश्वासपर बल देल गेल अछि, कारण जं बुच्चीमे आत्मविश्वास रहतन्हि, आ से रहतन्हि तं सभटा समस्या खतम/ ५ पद्यक मूल गुण गेय हएब आ लयमे हएब, माने निअमबद्ध/ पद्यक ई जे तथाकथित पुरान अवधारणाक मूल विशेषता बतौनिहार छथि, आ ओइ सोंगरसं अपन पद्यक स्थान-निर्धारण कनेक ऊंच ठाम करऽ चाहै छथि, तिनका लेल गजलक नव-जागरण, जइमे बहरपर बेस घमर्थनक बाद निअम निर्धारण भेल, सेहो मारकेश जकां आएल/ कारण ऐ गजल सभमे तारतम्य आएल, लय आएल, तीक्ष्णता आएल/ जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ऐ नवजागरणमे गजल लिखनाइ शुरु केलनि आ सिद्ध केलनि जे प्रतिभावान लोक नीक गेययुक्त-भावयुक्त गीत-गजल, किछु निअमपर ध्यान दऽ कऽ, आर नीक जकां लिखि सकै छथि/ रदीफ आ काफियाक जे प्रयोग अनिलजी केने छथि से लौलवश लिखल गजल नै वरन् झोंकमे लिखल गजल अछि/ ६ धीरेन्द्र प्रेमर्षिकें देल वीडियो इण्टरव्यूमे सियाराम झा सरस कहै छथि जे मंचस्थ रचनाक फेरमे अनिल जी रचनाक गुणपर ध्यान देब बिसरि गेला, आ एक तरहें हुनकर रचनाकें साहित्यिक कसौटीपर ओ खारिज करै छथि/ किछु रचनाक विषयमे ई सही सेहो लागैत अछि/ मुदा अनिल जीक दोसर इनिंगमे बहरयुक्त गजल आएल, आ अनिल जी पुरान अनिलसं फराक देखाइ पड़ऽ लगला/ चेतना समितिक मंचक आब नीक जकां पतन भऽ चुकल छल, नव-पुरान भूप एकरा नीक जकां मैरेज (बैंकट) होल बना देने रहथि/ से मंचस्थ रचना पड़सबाक जोगारो खतमे छल/ आरम्भमे ओ बहरक विरुद्ध बुझना गेलथि- बहरक झंझटिसं हमरा आजाद करू हम गजल छी हमरा नै बरबाद करू मुदा प्रतिभाकें ललकारा दियौ तं ओ ललकारा स्वीकार करै छी, मैदान छोड़ि भागै नै छै/ आ जखन अनिलजीक गजल गंगा आएल तं ओकर सभटा गजल अरबी बहर/ सरल वार्णिक बहरमे छल/ आ जइ गजलक पहिल शेर उपराका शेर छल ओइ गजलकें सेहो सरल वार्णिक बहरमे पुनर्लेखन भेल छल आ नीचांमे लिखल छल- (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७) आ बहरक झंझटिमे पड़लाक बाद जे कविताक/ बाल कविताक पद्यमय रूप आएल, नारी-स्वरक तीक्ष्णता आएलसे कविक क्रमिक गुणात्मक विकास छल, ऐमे सं किछु कविताक चर्चा हम ऊपरमे केने छी/ मुदा रदीफ आ काफिया जे नूतनता, विचारक जे तीक्ष्णता गजल सभमे आएल तकर कोनो जोड़ नै/ आ मात्र यएह गजल सभ हुनकर स्थान मैथिली साहित्यमे उच्चतम स्थानपर रखबा लेल पर्याप्त सिद्ध भेल/ ७ पढ़ब आ लिखब की भेल/ ई भेल सिखब- निरन्तर सिखैतरहब/ जकरा लिखबाक आ पढ़बाक मोन होइ छै तकरा बुझु जे सिखबाक हिस्सक छै/ अनिल जी द्वारा रदीफ सभक जे प्रयोग भेल अछि से अद्भुत/ किछु उदाहरण देखू- मोन होइए अछि छी की बाटपर जहां-तहां कतेक बेर गेलहुं नीक लागल बहुत अछि गेल अछि राम-राम कऽ राखू करू बुझैए कोना-कोना कहां चाही करैए आदमी अहां छी थिक गजल अहिना मे कोना भेलै छी हम लियऽ अहां देखलौं जीवनमे हम छी जखन-तखन रहल छी जीवनमे मे छी छी हम-अहां सभठां सभ गाम आ शहरमे मे बेर-बेर देखै छी हम सभठां अछि रहल अछि की करियौ बनौने बैसल छी रहलौं अहां की करबै हमर गामक चौकपर रहल अछि भरि गामक हमर गाम बहुत अछि छै की करबै कऽ देखू करै छी जाइए रहल कऽ हम बाबा दुनिया बुझलियै छै ने पूछू एलौं छी तंइ गजल कहै छी बुझै छी तकै छी जाइए छी अहां बदलल राखू जरूरी छै छी भोरे-भोरे रहल छी गेल छी नै छै की करबै देखै छी जीवन भरि कियो नै छै भेलौं अहां आ तें बहरकें झंझट माननिहार आगां जा कऽ कहै छथि- खिड़की, केबार किछु नै, महल कोना भेलै ने रदीफ आ ने काफिया, गजल कोना भेलै विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह) लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश) क मैथिली अनुवाद लेल। विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 ११) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. २.१.आत्मकथा- संस्मरण खण्ड-१.आत्मकथासँ पहिने किछु दुटप्पी- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २. हमर तीर्थयात्रा-गीतसं गजल धरि -जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ३. आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्म कथा)- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल ४. एकटा छलाह ननू कका- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २.२.[एक]- विदेहक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक लेल मुन्नाजी द्वारा अनिल जी सं लेल ई-साक्षात्कार [दू]- समालोचना १. गीत-गंगा- कामिनी २. गजल गंगा- जगदानन्द झा 'मनु' ३. मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’ -डॉ. अजीत मिश्र ४. धारक "अइ" पार- आशीष अनचिन्हार ५.कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा- परमानन्द प्रभाकर ६.‘गीत-गंगा’मे सब किछु अछि -----छत्रानंद सिंह झा७.गीत गंगामे अनिल-केदार कानन ८.‘गीत-गंगा’क प्रवाह- डा.अमर नाथ ठाकुर २.३.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” २. गंगा नन्द झा २.४.१.बाल मुकुंद पाठक- मैथिलीक गजलक सशक्त हस्ताक्षर 'अनिल' २.अरविन्द ठाकुर-अरविन्द ठाकुर- ’गीत-गंगा’ के बहाने किछु बतकही आत्मकथा- संस्मरण खण्ड-१.आत्मकथासँ पहिने किछु दुटप्पी- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ २. हमर तीर्थयात्रा-गीतसं गजल धरि -जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ३. आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्म कथा)- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल ४. एकटा छलाह ननू कका-ी- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ १. आत्मकथासँ पहिने किछु दुटप्पी- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ किए लिखै छी ? नेनहिसं स्वभाव प्रगट हुअ’ लागल | हमरा खेल-कूदमे मोन नै लागल, फटक्का फ़ोड़ैमे मोन नै लागल | खेती-पथारीमे मोन नै लागल | कोनो व्यवसाय दिस ध्यान नै गेल | दोसर कोनो व्यसनसं आकर्षित नै भेलहु | ताम-झाम आ तडक-भड़कसं प्रभावित नै भेलहु | पढ़बामे मोन लागल,लिखबामे मोन लागल | अनका पढैत-पढैत अपनहुँ लिखबाक सिहंता भेल | तकर कामना केलहुँ | लीखब शुरू केलहुँ | लिखबाक अभ्यास केलहुँ | पढैत गेलहुँ |लिखैत गेलहुँ | लीखब आदति बनल | लीखब संस्कार बनल | लीखब हमर संस्कारमे शामिल अछि | लीखब हमर मजबूरी नै अछि | लीखब हमर पेशा नै अछि | लिखबामे आनंद अबैए, तें लीखै छी | जे स्वयं लिखैत छथि, हुनका एहि आनंदक अनुभव हेतनि | दोसर लेल ई आनंद महत्वहीन भ’ सकैए | लीखब जीवनमे छोट-छोट वस्तुमे आनंदक अनुभव करबैत अछि | लिखबा काल आनंद, लीखब पूरा भेल त आनंद, कतहु छपि गेल त आनंद,कियो पढ़िक’ प्रशंसा केलक त आनंद,आकाशवाणी बजौलक त आनंद, दूरदर्शन बजौलक त आनंद,कोनो मंच पर गेलहुँ त आनंद, लोक थपरी बजौलक त आनंद, पारिश्रमिक भेटल त आनंद, अपन लीखल दोसरक मूहें सुनलहुँ त आनंद | लीखब हमरा लेल सत्य अछि | सत्य वएह थीक जे काल्हियो छल, आइयो अछि आ काल्हियो रहत | किशोरावस्थामे लिखलहुँ, युबावस्थामे लिखलहुँ, एखनहुँ लीखि रहल छी, आगाँ सेहो लिखैत रहब | छात्र छलहुँ, तखनो लिखलहुँ | बेरोजगार रहलहुँ, तखनो लिखलहुँ | नोकरीमे रहलहुँ तखनो लिखलहुँ, सेवानिवृतिक बादो लीखि रहल छी | लीखब हमर सत्य अछि | हमर लीखब हमर घोषणा थीक | घोषणा जे हम प्रेमक पक्षमे छी, हिंसाक विरोधमे छी | घोषणा जे हम इजोतक पक्षमे छी, अन्हारक विरोधमे छी | गीत किए लिखै छी ? एक लयमे चलैत अछिे जीवन | जीवनमे लय नीक लगैत अछि | लेखनमे सेहो लय नीक लगैत अछि | ओकर सस्वर पाठ क’ सकैत छी | गीत गाबि सकैत छी | आनो कियो अहाँक लिखल गाबि सकैए | ओकरा संगीतबद्ध कएल जा सकैए | गीत स्मरण राखब आसान होइत अछि | नेनहिसं स्त्रीगणक मूहें विभिन्न अवसर पर विभिन्न प्रकारक गीत सुनैत आएल छी | कोनो काज प्रारम्भ होइत अछि गीतसं आ ओकर समापन सेहो गीतसं होइत अछि | गीत नीक लागल | गीत लिखबाक सौख भेल | लिखब शुरू केलहु | गीत सुनैत रहलहुँ | गुनैत रहलहुँ | अभ्यास करैत रहलहुँ | गीत लिखाइत गेल | गजल किए ? रदीफ़, काफिया आ बहरक आकर्षणक कारणें गजलक संरचना अधिक आकर्षक होइत अछि | हिन्दीमे दुष्यंत कुमारक ‘साये में धूप’ पढलाक बाद मैथिलीमे गजल लिखबाक धुन सबार भेल | अभ्यास कर’ लगलहुँ | मैथिलीमे लिखलहुँ, हिंदीमे लिखलहुँ | लिखैत गेलहुँ | पत्रिका सभमे छपबो कएल | मैथिलीमे गजलक लेल विशिष्ट साइट ‘अनचिन्हार आखर’पर गजलक व्याकरणसं तीन साल पहिने परिचित भेलहुँ | हमर अधिकाँश गजल एहेन अछि जकरा गाबि सकैत छी | गजलक सस्वर पाठ हमरा नीक लगैए | २ हमर तीर्थयात्रा-गीतसं गजल धरि -जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ हम गीत लिखलहुँ |बहुत बेशी नै लिखलहुँ |किछुए कथा लिखलहुँ |एकटा एकांकी लिखलहुँ | एकटा नाटक लिखलहुँ | किछु कविता लिखलहुँ |किछु दोहा लिखलहुँ | अंतमे किछु गजल लिखलहुँ | हमर एकटा गजलक एकटा शेर अछि : प्रेमक दीप जरै छल जै ठाँ सभकें तीर्थस्थान बुझलियै | गीतसँ गजल धरिक यात्रामे हम जाहि-जाहि तीर्थसँ होइत आएल छी तकर संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करबामे हमरा हर्ष भ’ रहल अछि | (१) हमर बाबा – बाबाक नाम छलनि अनंत लाल ठाकुर |हुनका औपचारिक शिक्षा नै छलनि |मुदा, संस्कृतक बहुत रास श्लोक याद छलनि | रामायण, महाभारतक खिस्सा सभ याद छलनि | हमरा यदा-कदा सुनबैत छलाह | रातिमे सुतबासं पहिने हुनकासं ई गीत कतेक बेर सुनने छलहुँ : ---आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागत हे | ---ब्याह चलल शिव शंकर---- अहिना भोरमे पराती----- सखिरी,तीन देखन जात, अरुण नयन विशाल मूरत, सुंदरी एक साथ | (२)दाइ --- दाइ बात-बातमे लोकोक्तिक प्रयोग करैत छलीह,से हमरा बहुत नीक लगैत छल |ओ समूहमे जे गीत गबैत छलीह तकर शब्द बुझबामे नै अबैत छल मुदा, सुनबामे नीक लगैत छल | (३)माए—माएकें गीतक संस्कार नैहरसं भेटल छलनि |विभिन्न अवसरपर स्त्रीगणक संग गीत गबैत छलीह | सपता –विपताक कथा कहैत-कहैत आखिसं नोर बह’ लगैत छलनि | (४)पिता—पिता प्रेसमे कम्पोजीटरक काज केने छलाह | किताब पढ़ब,कविता रटब,कोनो विषय पर चर्चा करबाक लेल प्रेरित करैत छलाह | हमरा बच्चामे सिखौने छलाह : ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय औरन को शीतल करे, आपुहि शीतल होय | ओ जे चिट्ठी लिखैत छलाह, ओहिमे साहित्यक पुट रहैत छल | (५)हमर आँगन,हमर टोल, हमर गाम : आंगनमे चारि घरबासी छलाह |आंगन आ टोल मिलाक’ ककरो ओत’ कोनो ने कोनो काज रहिते छलैक |तें अवसरक अनुसार स्त्रीगण सभ मिलि क’ सोहर, लगनी,बटगवनी, खेलौना,डहकन,बारहमासा,विद्यापतिक गीत,महेशवाणी,उदासी,समदाउन आदि गबैत रहैत छलीह |विना कोनो वाद्य-यंत्र के एहि गीत सभमे अद्भुद आकर्षण रहैत छलैक |जमाए वा समधिक भोजन काल गीत होइ छल |गीत ख़तम भेल त भोजन करैवलाक हाथ रुकि जाइत छलनि | फेर गीत शुरू भेल त भोजन शुरू | टोलमे कीर्तन होइत छल | ओहिमे स्नेहलताक गीत गबैत जाइ छलहुँ : ‘अपन किशोरीजीकें चरण दबेबै हे मिथिलेमे रह्बै, घरेमे हमरा चारू धाम हे मिथिलेमे रह्बै |’ ‘जखन राघव लला छथि सहाय, तखन परबाहे की’ टोलमे भैयाजीक कीर्तन कए बेर भेल | भैयाजी डबहारीक छलाह | ओ कीर्तनयुक्त कथा कहैत छलाह | कथा बहुत रोचक ढंगसं प्रस्तुत करैत छलाह |हुनका कथामे ककरो औंघी नै लगैत छलैक | बाबू शिव नंदन सिंह ओत’ राम नवमी आ कृष्णाष्टमीक अवसर पर दरबारी दास आ नेबति दास अबैत छलाह | ई लोकनि बहुत नीक जकां विद्यापति, दिनकर,नेपाली आ मधुपजीक गीत गबैत छलाह | ‘के पतिया लय जायत रे मोरा प्रियतम पास’ ‘मोरा रे अंगनमा चाननक गछिया, ताहि चढि कुड़रय काग रे’ ‘मानिनि, आब उचित नहि मान’ ‘माधव, ई नहि उचित विचार’ ‘बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे’ आदि गीत हिनका लोकनिक मूहें सुनबाक मधुर स्मृति अछि | (६)मामा गाम : मामा गाममे रवि दिनक’ सांझमे रामचरित मानसक कीर्तनक रूपमे पाठ होइत छल | अष्टियाम अधिक काल होइत रहैत छल |तकर बाद विवाह कीर्तन होइत छल |हमर बड़का मामा जे मिडिल स्कूलमे प्रधानाध्यापक छलाह,विवाह कीर्तन कहैत छलाह | हमर ममियौत सभ आ टोलक लोक सभ पाछू-पाछू संग दैत छलखिन |मझिला मामा सेहो संग दैत छलखिन | छोटका मामा पढबामे तेज छलाह आ किछु भक्ति गीत सेहो लिखने छलाह जकरा अंतमे ‘दास महेंद्र’ लिखैत छलाह |हुनका देखि क’ हमरो होइत छल जे लोककें पढ़ाइक संग-संग गीत सेहो लीखक चाही | (७)मधुपजी :हाई स्कूलमे पढल मधुपजीक कविता ‘घसल अठन्नी’बहुत प्रभावकारी छल | ‘ओ घसल अठन्नी बाजि उठल हम कत’ जाउ’ जखन-तखन मोन पड़ि जाइत छल |एखनो मोन पड़ैत अछि | मधुपजीक गीत नटुआ सबहक मूहें सुनबामे नीक लगैत छल | ओ फ़िल्मी धुनपर गीत सभ लीखि क’ ‘टटका जिलेबी’ आ ‘अपूर्व रसगुल्ला’नामक अठपेजी पुस्तिकामे कनिएँ पाइमे लोककें उपलब्ध करा दैत छलथिन |हुनकर प्रभाव पडल | हमहूँ अपन नाममे ‘अनिल’ उपनाम जोड़लहुँ |किछु गीत फ़िल्मी धुन पर लिखलहुँ | (८)रवीन्द्रजी : यमसममे दुर्गापूजामे सभ साल तीन-चारि राति नाटक होइत छलैक |महेंद्र झाक घर यमसम छलनि | ओ दुर्गापूजामे अवश्य गाम अबैत छलाह |ओ नाटकक बीच-बीचमे आबि एक बेरमे रवी न्द्रजीक चारि-पांचटा गीत गाबिक’ लोक कें आनंदित क’ दैत छलाह |रवीन्द्रजीक आकर्षक शब्द आ महेन्द्रजीक सुन्दर स्वर श्रोताकें आनंद-विभोर क’ दैत छल | दूनू गोटे जखन संगे गबैत छलाह तखन जे आनंदक वर्षा होइत छल तकर वर्णन जतेक करब से कमे हएत | रवीन्द्रजीक बहुत रास गीत बहुत लोकप्रिय भेलनि | ओ मैथिली अकादमीमे छलाह त एकटा गोष्ठीमे राधा कृष्ण प्रकाशनक प्रतिनिधिसं परिचय करौलनि | ओ हमर टटका प्रकाशित पोथी ‘तोरा अंगनामे’क २५ टा पोथीक आदेश पठा देलनि आ ओकर भुगतान सेहो आसानीसं प्राप्त भ’ गेल | हुनक निम्नलिखित गीत सभ हमरा बहुत नीक लगैत अछि : ‘चारि पांती सुनू राम के नामसं पत्र लिखलनि जे सीता धरा धामसं’ ‘कियो लिखि दे दू पांती सिपहिया के नाम’ ‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’ और कतेक गीत | हमर किछु रचना पर रवीन्द्रजीक गीतक प्रभाव देखल जा सकैछ, जेना – १.पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’| २.बुढ़बा मारल जेतै बेटाके बियाहमे | ३.अलख निरंजन भोला बाबू जेबीमे छूरी, मुंह सियाराम अरे राम राम राम | (९) आर के रमण : ‘रमण’जीकें आर के कॉलेज, मधुबनीमे विद्यापति पर्वमे सुनने छलहुँ |हुनक एकटा रचना बादमे सुनलहुँ ‘अहाँ केर इजोरिया कहाँ हम मँगै छी, अन्हारोमे हमरो जीब’ त दीय’ | एहिसं प्रभावित भेलहुँ | हमर एकटा गीतक अंतिम पांती रहय ‘दुःख केर ई राति बौआ बीतत अबस्से, असरा गरीबक भगवान रे ...’ एहि पांती पर रमणजी टिप्पणी देलनि : ‘असरा गरीबक भगवान रे’ के बदला ‘ जहिया तों हेबही जुआन रे ...’ हमरा नीक लगैत | ओ एक दिन दरभंगामे भेटलाह |कतहु जाइत रहथि | कहलनि, अहाँ हमरा ‘मिथिला टाइम्स’लेल एकटा कविता लीखि क’ केबारक नीचां द’क’ रूममे खसा देब,तखन जाएब | हमरा कठिन लागल | हमरा संग छलाह कलिगामक मनोजजी | ओ कहलनि, आब त कहुना क’ लीख’क देबाक कोशिश कर’ पडत लहेरियासरायक एकटा रेस्टोरेंटमे बैसि क’ चाहक चुस्कीक संग कविता लिखबाक सलाह देलनि | से संभव भेल | ‘जकरे घाम तकरे रोटी’ कविता ‘मिथिला टाइम्स’मे प्रकाशित भेल | हम जखन अपन ई गीत देखैत छी त ‘रमण’जी मोन पड़ि जाइत छथि : ‘से फगुआ खेलायत कोना क’ जकरा आंगन वसंत नहि आयल |’ (१०)हरिमोहन बाबू : ‘चर्चरी’क कथा सभ पढ़ि क’ कथा लिखबाक प्रेरणा भेटल | किछु कथा लिखलहुँ | हमर लिखल विनोद कथा ‘मोने अछि एखन धरि सासुरक यात्रा’ आकाशवाणी, पटनासं प्रसारित भेल | हरिमोहन बाबूक कथा पढलासं ई भेल जे मैथिली साहित्यसं सटि गेलहुँ |’मिथिला मिहिर’क नियमित पाठक भ’ गेलहुँ | हमर गीतक पहिल पोथी ‘तोरा अंगनामे’ छपल रहय त हुनक आशीर्वचन प्राप्त भेल |ओ कहने रहथि, अखबार देखैत रहब, लाइब्रेरी सभमे सप्लाइ हेतु स्वीकृतिक लेल पोथीक दू प्रतिक संग आवेदन पठा देबै | सएह केलहुँ | राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी संस्थान सिन्हा लाइब्रेरीक माध्यमसं ३४० पोथी ल’ लेलक |पोथी छपयबामे जे खर्च भेल छल तकर अधिकांश भाग प्राप्त भ’ गेल, से उत्साहवर्धक भेल | (११)मनोज बाबू : मनोज बाबू कलिगामक छलाह |फिल्ममे काज करक हेतु बम्बईमे संघर्षरत छलाह |दूनू गोटेक सासुर एके गाममे छल | हुनकासं ओतहि भेंट भेल छल | हम मैथिलीमे लिखै छी, से हुनका नीक लगलनि | ओ हमरा कहलनि जे मैथिलीमे एहेन गीत लीखि सकैत छी त लिखू जेहेन मुकेश गबैत छथि आ जेहेन मो. रफी आ लता संगे गबैत छथि | हम निम्नलिखित गीतक रचना हुनके इच्छानुसार केलहुँ : (१) कल्पनाक गगनमे मधुवन सजा रहल छी दुनियामे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी | (२) ---- अहाँ नीलगगनकेर चंदा, हम मृत्युभुवनक चकोर | ----- हम विरह्क राति अन्हरिया,पिया अहाँ वसंतक भोर | (३)----लग आउ ने, हम नेहोरा करै छी | ----दूर जाउ ने, हम नेहोरा करै छी | (३) चल हम बनि जाइ छी किसुन कन्हैया,तों बनि जो राधा | (१२)शशिकांत-सुधाकांत : हिनका सभसं सकरीमे विद्यापति पर्वक अवसर पर भेंट भेल |हम एकटा रचनाक सस्वर पाठ केलहुँ : ‘तीन कोटि मैथिल ताल ठोकि क’ कहैए ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए |’ हम जखन मंचसं बाहर एलहुँ त ई लोकनि सोझां एलाह, अपन परिचय देलनि | ओ सभ रवीन्द्रजीक लीखल गीत गबैत छलाह, कहलनि, ई गीत हमरा सभकें लीखि क’ द दीय’, हम सभ अभ्यास क’क’ चेतना समितिक मंचपर और आनो मंच सभ पर एकर उपयोग करब |हम लीखि क’ द’ देलियनि |ओ सभ अभ्यास क’क’ मंच सभ पर एकरा प्रस्तुत केलनि | प्रशंसा भेटलनि |फेर हमरा सं संपर्क केलनि | हम दूटा और रचना देलियनि : (क) पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’| (ख) कक्का मारल गेला सौराठक मैदानमे, पहिले कन्यादानमे | इहो दूनू गीत हिनका सभकें उपयुक्त लगलनि | हिनका सभसं संपर्क बढ़ैत गेल |हिनका सबहक मूहें कयटा हमर गीत लोकप्रिय भेल : --------तोरा अंगनामे वसंत नेने आएब सजना | --------बौआ दूनू हाथ जोड़ि करू ऐ माटिकें प्रणाम | --------फगुआ आएल,फगुआ गेल,फगुआ चलिए गेल | --------बौआ जुनि कान रे | --------आएल केहेन समैया,यौ बाबू यौ भैया | --------समधि एला बनि-ठनि क’ धोती-कुरता पहिरि क’ एला डहकन सून’ बेटाके बियाहमे | --------आँखिमे चित्र हो मैथिली केर हृदयमे हो माटिक ममता माएक सेवामे जीवन बिता दी अछि बस इएह एकटा सिहंता | ----------मोन होइए अहाँकें देखिते रही किछु बाजी अहाँ,हम सुनिते रही | (१३)जीवकान्तजी : जीवकान्तजीक रचना मिथिला-मिहिरक लगभग सभ अंकमे रहैत छल | से कविता सभ शुरूमे हमरा आकर्षित नै करैत छल | ‘वस्तु’क कथा सभ हम दू दिनमे पढ़ि गेलहुँ | नीक लागल | आकृष्ट केलक | सबसँ बेशी नीक लागल ‘नानी’|बादमे जखन ‘तकैत अछि चिड़ै’ प्रकाशित भेलनि त पढलहुँ |बहुत कविता नीक लागल | ओ हमर दीर्घ कविताक पांडुलिपि पढ़ि क’ उत्साहवर्द्धक टिप्पणी सेहो पठौलनि | पत्राचार करबामे अद्वितीय छलाह |पत्रक माध्यमसं अपन सुझाव आ मैथिली जगतक सूचना प्रेषित करैत रहैत छलाह | हम नोकरीमे बिहारसं दूर गेलहुँ, मैथिलीक गतिविधिसं दूर भेलहुँ | हमर हिन्दीमे रचना बेशी हुअ’ लागल, मैथिलीमे कम |मुदा जीवकान्तजी पत्रक माध्यमसं मैथिली दिस आकृष्ट करैत रहलाह, जाहिसं हम ‘भारती-मंडन’,’कणामृत’ आ ‘आरम्भ’सं जुड़ल रहलहुँ आ एहि पत्रिका सभमे हमर रचनो छपल | वापस पटना एलापर सुझाव देने छलाह : गोष्ठी सभमे भाग लीय’| कियो बजाबय त जाउ, नहियों बजाबय तैयो जाउ | (१४) यात्री-नागार्जुन : हाई स्कूलमे यात्रीजीक कविता पढने छलहुँ |बादमे हिनक उपन्यास ‘पारो’ पढ़लहुँ |एहिसं प्रभावित भेलहुँ | आकाशवाणी,पटनाक मैथिली कार्यक्रममे आ विद्यापति-पर्वक मंच पर हिनकासं कविता सुनलहुँ | हिनक बहुत हिंदी रचना सभ सेहो पढ़लहुँ |हिनक कवितामे विविधता आ नव-नव प्रयोग आकृष्ट केलक | (१५)डा. गंगेश गुंजन :कॉलेजमे गेलाक बाद आकाशवाणी, पटनासं प्रसारित होइवला मैथिली कार्यक्रम ‘ भारती’सून’ लगलहुँ |बहुत नीक लगैत छल |रवि दिन आ मंगल क’ एहि कार्यक्रमक प्रतीक्षा करैत छलहुँ |गुंजनजी संचालित करैत छलाह |कार्यक्रम सुनैत-सुनैत मोनमे सपना सजौलहुँ, हमहूँ किछु एहेन लिखी जे आकाशवाणीसं प्रसारित भ’ सकय | गद्य लिखबाक अभ्यास केलहुँ | तेसर प्रयासमे सफल भेलहुँ |नीक लागल |और लिखबाक लेल प्रोत्साहित भेलहुँ | दू सालक बाद फेर एकटा रचना ‘भारती’कें प्रेषित केलहुँ | स्वीकृति आएल | हम कृषि महाविद्यालय, ढोलीमे पढैत रही |हमरा बजाओल नै गेल रहय | ओ कथा हमर छात्रावासक जीवनसं सम्बंधित रहै, तें हमर किछु मित्र जोर केलनि जे हम अपने जा क’ ई कथा पढ़ी | हमरो ई सलाह नीक लागल | जहिया प्रसारित होम’वला रहै, हम चल गेलहुँ पटना |गुंजनजी सं भेंट केलहुँ |हुनका कहलियनि जे हम अपने कथाक पाठ कर’ चाहैत छी | ओ एक बेर पढ़’ कहलनि | कथा लेल दस मिनट समय निर्धारित छलैक |हम हबर-हबर पढ़’ लगलहु त गुंजनजी कहलनि, हड़बड़ी करबाक काज नै छै, अहाँ स्थिरसं पढू, एक-आध मिनट बेशीयो भ’ जेतै त कोनो बात नै |हम तहिना पढलहुँ, ओ संतुष्ट भेलाह |कहलनि, कॉन्ट्रैक्टमे यात्रा-खर्च स्वीकृत नै अछि, तें, से त नै भेटत,मुदा आबि गेल छी त अहाँ पढ़ि सकैत छी, कार्यक्रमसं आधा घंटा पहिने आबि जाउ |हम पांच बजे पहुचलहुँ| हमर कथा प्रेम लता मिश्र ‘प्रेम’क हाथमे छल |ओहो तखन ‘भारती’मे योगदान करैत छलीह |प्रसारणक बाद जे टिप्पणी दूनू गोटे केलखिन से हमरा बड़ नीक लागल |एकटा नवविवाहित नवयुवकक मनोदशाक चित्रण छलैक ओहि कथामे |ई घटना हमरा लेल महत्वपूर्ण भेल | हम कथाक नाम रखने छलहु ‘इंटरवल’| एकर अतिरिक्त कय ठाम अंग्रेजी शब्द सभ रहै |गुंजनजी सुधारि क’ उपयुक्त मैथिली शब्द सभ लीखि देने छलखिन |कथाक शीर्षक ‘धारक ओइ पार’ क’ देने छलखिन जे एकदम कथाक अनुकूल छलै |मतलब ई जे कथाकें प्रसारण योग्य बनेबाक लेल मेहनति कएल गेल छलै |से अनुभव करैत हमरा गुंजनजीक प्रति श्रद्धा बढल | हम भविष्यमे एहेन त्रुटिसं बचबाक लेल मोनमे निश्चय केलहुँ | गुंजनजीक उपन्यास ‘पहिल लोक’ हमरा बहुत नीक लागल | हुनकर गीत ‘हमरा नहि सोर करू, हमर हाथ बाझल अछि, गामक सीमान जकां हमर मोन बाँटल अछि’ हमरा बहुत नीक लगैए | (१६)छत्रानंद सिंह झा (बटुक भाइ): आकाशवाणी,पटनाक चौपाल कार्यक्रमक बटुक भाइक चहटगर गप सभकें नीक लगैत छलैक | ओ व्यस्त रहितो नव रचनाकारक लेल सहज आ सुलभ छलाह, सभकें हिनक स्नेह आ सहयोग भेटैत छलैक, से हमरो भेटैत आएल अछि | गीत-संग्रह ‘तोरा अंगनामे’ प्रकाशनक समय एकर भूमिका लिखबाक हमर अनुरोध ओ सहजतासं स्वीकार क’क’ हमरा प्रोत्साहित केलनि | हिनक लीखल ‘सुनू जानकी’ हमरा बहुत नीक लागल | (१७)डा.भीम नाथ झा : भीम भाइसं पहिल बेर राँटीमे एकटा गोष्ठीमे कविता सुनने छलहुँ जे नीक लागल छल |हिनकासं कविता सुनबाक आनंद हमरो प्रभावित केलक | भाइ मिथिला मिहिर’मे छलाह | हमर पोथी ‘तोरा अंगनामे’ छपि रहल छल |हम प्रूफ देखयबाक लेल मुसल्लहपुरसं अबैत छलहुँ | भाइ बहुत व्यस्त रहितो हमरा सहयोग दैत रहलाह,से हमरा आनंदित केलक | हिनक पोथी ‘मन आंगनमे ठाढ़’ बहुत नीक लागल | (१८)उदय चन्द्र झा ‘विनोद’जी : विनोदजीक गीत ‘ लोक एक्के छै सभ ठाँ, अनेक छैक गाम, अहाँ करबै जँ नीक त अबस्स लेत नाम’ आ बहुत रास कविता हमरा नीक लगैत अछि | ओ ‘माटि-पानि’मे सम्पादक रहथि त हमर कएटा रचना छपलनि | हमर दीर्घ कविताक पांडुलिपि देखि क’ विनोदजी महत्वपूर्ण टिप्पणी देलनि आ हम हिनक सुझावक अनुसार आवश्यक संशोधन करबाक निर्णय केलहुँ, से नीक भेल | (१९)प्रो. गंगानंद झा : हमर पोथी ‘तोरा अंगनामे’ छपि गेल रहय आ हमर स्थानान्तरण सीवान भेल | ओत’ हिनकासं भेंट भेल |कॉलेजमे बॉटनीक प्राध्यापक छलाह | बंगला साहित्यक बहुत अध्ययन केने छलाह | गप-शपमे सेहो बंगलाक कोनो-ने-कोनो साहित्यिक कृतिक कोनो अंशक चर्चा अवश्य करैत छलाह |से हमरा आकृष्ट करैत छल |हुनकेसं जानिक’ बंगलाक साहित्यकार विमल मित्र,आशापूर्णा देवी,शंकर आ रवीन्द्र नाथ ठाकुरक कृति सभ पढ़लहुँ |ओ ‘गीतांजलि’क गीत सभकें देवनागरीमे लिखि दैत छलाह आ मैथिली/ हिन्दीमे ओकर अर्थ कहैत छलाह | रवीन्द्रनाथक गीत : ‘जगते आनंद यज्ञे आमार निमंत्रण धन्य हलो धन्य हलो मानव जीवन |’ हमरा बहुत प्रभावित केलक |ई गीत हमरा और रचना करबाक लेल प्रेरित करैत रहल | हम मध्य प्रदेश चल गेलहुँ, ओतहु पत्र द्वारा संपर्क रखैत रचना-कर्म लेल जगौने रहलाह |ओ मैथिली पत्रिका विदेह-ईक सूचना देलनि आ २०१०मे हमर सेवा-निवृतिसं पहिने हमरा कहलनि जे आब ‘विदेह’मे अहाँक नाम, अहाँक रचना देख’ चाहैत छी | (२०)गजेन्द्र ठाकुर :इन्टरनेट पर पाक्षिक मैथिली पत्रिका ‘विदेह-ई’ देखि क’बहुत आनंदित भेलहुँ | गजेंद्रजीसं हमरा भेंट नै अछि | मोने-मोन हुनका एहि लेल धन्यवाद देलियनि | ओ अपनो खूब लिखलनि आ एकटा विशाल लेखक-पाठक वर्ग तैयार केलनि | हम अवकाश प्राप्तिक बाद फरवरी २०११ मे पटना एलहुँ |पत्रिका नियमित रूपसं निकलि रहल छल | हम एहिमे नियमित रूपसं लीख’ लगलहुँ : गीत, गजल | लिखबाक गति बढल |हमर अधिकांश गजल विदेहमे छपल | विदेहकें सदेह सेहो देखल | (२१)आशीष अनचिन्हार :नेट पर मैथिलीमे गजल लेखनक लेल एकटा स्वतंत्र वेबसाईट बना क’, ओहि पर गजल शास्त्र प्रस्तुत क’क’, बहुत लोककें गजल लेखन लेल प्रेरित करब, मार्ग-दर्शन देब, पुरस्कारक योजना चलायब,बाल-गजल, भक्ति-गजल आदि विशेषांक प्रस्तुत करब,गजलकारक परिचय-श्रृंखला प्रस्तुत करब आदि काज कठिन छल से आशीषजी केलनि आ हमरा सबहक आलोचनाक पात्र बनलाह | कएटा हिंदी,मैथिली पत्रिकामे गजल छपि चुकल छल | कतहु कियो एना आंगुर नहि उठौने छल |साठि बरखक उमेरमे जहिया ई सुनल जे व्याकरणक दृष्टिसं कएटा गजल दोखपूर्ण अछि त अहंकारकें चोट लागल |बहुत दिन धरि एहि बात पर कान देब आवश्यक नहि बुझलहुँ |मुदा, जखन-तखन ई बात ध्यानमे आबि जाइत छल |अंततः अहंकार पराजित भेल | जे नै जान’ चाहैत छलहुँ, से जनबाक इच्छा भेल, जे नै पढ़’ चाहैत छलहुँ, से पढ़बाक मोन भेल | ‘अनचिन्हार आखर’क साइट पर गजलक व्याकरणक एतेक सामग्री देखि हर्ष भेल | मैथिलीक लेल गौरवक बात बुझाएल | हम सभ रदीफ़ आ काफिया पर ध्यान दैत छलहुँ, एकटा वस्तु छुटि रहल छल | ओ अछि बहर | हम सभ बहरक झंझटिसँ मुक्ति चाहैत छी, किएक त ओकर अभ्यास नै अछि | जिनका ई बूझल भ’ गेलनि जे बहरक की भूमिका छै शेरमे, हुनका लगैत छनि जे बहरक बिना गजल कोना हेतै |स्वीकार आ विरोधक बीच बहरयुक्त बहुत रास गजल लिखा रहल अछि | आउ, नीक भविष्यक लेल तकर स्वागत करी | (२२)प्रेम लता मिश्र ‘प्रेम’ : प्रेमलताजी २००८मे सेवा निवृतिक बाद मासे-मासे एकटा साहित्यिक गोष्ठीक आयोजन अपन आवास पर करैत आबि रहल छथि आ सालमे एकटा पत्रिका सेहो प्रकाशित करैत छथि ‘सांध्य गोष्ठी’| सभ मासक अंतिम शनि दिन ई गोष्ठी होइत छैक |हम २०१२ मे एहि गोष्ठीसं जुड़लहुँ | गोष्ठीमे नियमित रूपसं भाग लैत आबि रहल छी | एहि गोष्ठीक लेल सभ मास कम-स-कम दूटा नव गीत अथवा गजल लिखबाक कोशिश करैत छी |गोष्ठीमे बहुत साहित्यकारसँ भेंट भ’ जाइत अछि आ हुनको सबहक रचनासँ लाभान्वित होइत छी |हम जे अनुभव करैत छी से हमर एहि दोहामे प्रगट भेल अछि : मनकें आनंदित करय, दिअए शान्ति, विश्राम गीत, गजल, कविता,कथा हमर इ चारू धाम | ३. आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्म कथा)- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल जन्म-स्थान : मधुबनीसं चारि किलोमीटर दक्षिण आ पंडौलसं पांच किलोमीटर उत्तर | गामक नाम सलेमपुर | लोक सलमपुर कहैत छलै | सलमपुर नामक गाम और छलै, तें स्पष्ट करबा लेल भिट्ठी सलमपुर कहल जाइत छलै | भिट्ठी हमर पडोसी गामक नाम अछि, तें भेल भिट्ठी सलमपुर | बहुत बादमे पता चलल जे जमीनक नक्शाक अनुसार हमर गाम अछि शम्भुआड | सलमपुर हमर पडोसी गाम भेल | अही गाममे करीब चारि सय बर्ष पहिने भेल छलाह बेनी ठाकुर | बेनी ठाकुरक पुत्र भेलथिन हरिहर ठाकुर | हरिहर ठाकुरकें चारि पुत्र भेलथिन : मेबा लाल ठाकुर, जय कृष्ण ठाकुर, जयमंत ठाकुर आ भगलू ठाकुर | मेबा लाल ठाकुरकें दू पुत्र भेलथिन : अनंत लाल ठाकुर आ अशर्फी लाल ठाकुर | अनंत लाल ठाकुरकें दू पुत्र भेलथिन : राम नारायण ठाकुर आ दोसर पञ्च लाल ठाकुर जे अविवाहिते मरि गेलाह | जय कृष्ण ठाकुरक एकमात्र पुत्र छलथिन महावीर ठाकुर| जयमंत ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : मोतीलाल ठाकुर, अलीक लाल ठाकुर आ भोगी लाल ठाकुर | भोगीलाल ठाकुरकें दू पुत्र भेलथिन आ ओ अपने कमे बयसमे मरि गेलाह | भगलू ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : राम रूप ठाकुर, गंगा दत्त ठाकुर आ राम स्वरुप ठाकुर | राम रूप ठाकुरक पुत्र भेलथिन महेंद्र नारायण ठाकुर | हिनक अलग घरारी छलनि | गंगा दत्त ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : राज नारायण ठाकुर, सुबुध नारायण ठाकुर आ ईश्वर नारायण ठाकुर | तीनू भाइक परिवार एक घरारी पर एक आंगनमे रहैत छल | राम स्वरुप ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : देव नारायण ठाकुर, हीरा लाल ठाकुर आ लक्ष्मी नारायण ठाकुर | तीनू परिवार एक आंगनमे रहैत छल |एक घरारी पर | मेबा लाल ठाकुर आ जयमंत ठाकुरक परिवार एक आंगनमे एक घरारी पर रहैत छल | अही आँगनमे अनंत लाल ठाकुरक पौत्र आ राम नारायण ठाकुरक पहिल संतानक रूपमे हमर जन्म भेल |ओहि दिन विजयादशमी रहै |भोरे हमर जन्म भेल गाममे | बाबा सीमान्त कृषक छलाह |खुट्टा पर एक जोड़ा बरद आ एकटा महिंस छल | खेतमे धान, मडुआ, अल्हुआ, राहरि,मसूरी, खेसारी आ कुसियार होइत छल | बहुत बादमे गहूम आ मकई सेहो हुअ’ लगलै | घर-आंगन : परिवारमे माए, बाबू (पिता), दाइ (पितामही), बाबा(पितामह) छलाह | हमरा बाद घरमे तीन बहिन आ दू भाए एलाह | आंगनमे दोसर घर छलनि अशर्फी लाल ठाकुरक जे हमर बाबाक छोट भाए छलाह | हुनका दोकान बला बाबा सेहो लोक कहैत छलनि | ओ खेतीक अतिरिक्त किरानाके दोकान सेहो करैत छलाह | जाडक मासमे दरबज्जा पर कल्हुआर सेहो चलैत छलै |कुसियारकें पेड़ क’ गुड़ बनाओल जाइत छल | तेसर घर छलनि मोतीलाल ठाकुरक आ भोगीलाल ठाकुरक| भोगीलाल ठाकुरक दू बालक छलथिन | चारिम घर छलनि अलीक लाल ठाकुरक | आंगनमे उत्तर कात मोतीलाल ठाकुर आ भोगी लाल ठाकुर,दच्छिन कात अनंत लाल ठाकुर (हमर पितामह) पूब दिस दच्छिनसं अलीक लाल ठाकुरक घर छलनि,उत्तरमे एकटा छोट घर अशर्फी लाल ठाकुरक हिस्सामे छलनि | एहि दुनूक बीच चारि फीटक रास्ता छलै जाहि द’ क’ लोक आँगनसं दरबज्जा आ दरबज्जासं आँगन अबैत छल | पच्छिम दिस उत्तरसं अशर्फी लाल ठाकुरक घर छलनि आ दच्छिनमे अनंत लाल ठाकुरक हिस्सामे एकटा छोट-छीन घर छलनि जाहिमे भगवतीक घर आ भनसा-घर दुनू छल | आँगनमे एकेटा घर छल जे नीचांमे ईंटा आ उपर खपड़ा छलै | ई अशर्फी लाल ठाकुर बनबौने छलाह | शेष सभक घर फूसक छल | चारु घरबासीक लेल एकटा सझिया दरबज्जा छल जे खूब नमहर छल | दरबज्जा पर सभ घरक चौकी कि खाट रहैत छल |अशर्फी लाल ठाकुरक एकटा संदूक सेहो छलनि | दुपहरियामे आ रातिमे दरबज्जा भरल रहैत छल | दुपहरमे ताशक खेल होइत छल | दुर्गा पूजासं दीयाबाती तक पचीसी सेहो लोक खेलैत छल | भरि गाममे पांचे-छओ टा घर ईंटाक छल, और सभ फूसक | फूसक घर लकड़ी, बांस, खढ, खरही, पतोइ आ साबेक जौडसं बनैत छल | जखन हवा चलैत छलै,लोक अगिलगीक आशंकासं डेराएल रहैत छल | एक शुभ दिनमे हम सभ अगिलगीक दुःख कोना भोगलहु, से आगू कहब | आंगनक पच्छिम एकटा इनार छल | टोल भरिक लोक एकर उपयोग करैत छल | इनारक पानिक उपयोग पीबा लेल, नहेबा लेल आ कपडा खिचबाक लेल कएल जाइत छल | नवकनिया सभ लेल घरक पाछू टाट सं घेरक’ बाल्टीमे पानि राखि देल जाइत छल | टोलक दच्छिन एकटा पोखरि छलै | हेलि क’ जाइठतक जाएब आ ओत’ सं हेलि क’ आएब नीक लगैत छलै | बूढ़ लोक सभकें पोखरिमे नहाएब नीक लगैत छलनि | लोक माल-जालकें सेहो पोखरिमे नह्बैत छल | पनिभरनी डोलसं घैलमे पानि इनारसं भरि क’ अंगने-अंगने द’ अबैत छलीह | ओकरा सभ घरसं अन्न देल जाइत छलै आ पावनि-तिहार अथवा मूडन, उपनयन,विवाह आदि अवसरपर कपडा सेहो | पैखाना जेबाक लेल बसबिटटी अथवा खेत दिस लोक जाइत छल | नवकनियाँ सबहक लेल बाड़ीमे खाधि खुनि क’ तात्कालिक व्यवस्था कएल जाइत छल | हाथ माइटसं धोल जाइत छल | परंपरा पुत्र जन्म लेल लोक देवी-देवताक कबुला करैत छल | पुत्र भेला पर बड ख़ुशी मनबैत छल | बच्चा एक-दू सालक होइत छल त नीक दिन तका क’ बड विधि-विधानसं मूडन कराओल जाइत छल | सभ सम्बन्धीकें नोत-हकार देल जाइत छल | पाहुन सभ अबैत छलाह | गामक लोककें भोज खुआएल जाइत छल | स्त्रीगण सभ गीत गबैत छलीह | हजाम कैंचीसं बच्चाक माथक केश कटइत छल | हजामकें पारिश्रमिक आ कपडा देल जाइत छल | परंपराक अनुसार हमरहु मूडन भेल | ई उत्सव बेटीक लेल नै कएल जाइत छलै | बच्चा आठ बरखक होइत छल त उपनयनक बात शुरू भ’ जाइत छल | नीक दिन तकाएल जाइत छल | एक दिन उद्योग-मरबठटठी होइत छल | बांस काटल जाइत छल आ मरबा बन्हाइत छल | भराइत छल | नीपल-पोतल जाइत छल | गीत-नाद होइत छलैक |भोज होइत छलैक | उपनयनक दोसर चरण होइत छल कुमरम |सर-कुटुंब सब अबैत छलाह | बच्चाक विवाहित बहिन,दीदी,मामी,नानी,मौसी आदि विदागरी भ’क’ अबैत छलीह | पंडितजी अबैत छलाह |पूजा-पाठ होइत चल |गीत-नाद होइत छल | भोज होइत छल | तेसर चरण होइत छल उपनयन | छागर कटाइत छल |गीत-नाद होइत छल | पूजा-पाठ होइत छल |एक आदमी गुरु बनैत छलाह | एक आदमी ब्रह्मा बनैत छलाह | बालकक माथक केश अस्थुरा ल’क’ हजाम द्वारा काटल जाइत छल | बालककें गायत्री मन्त्र पढ़ाओल जाइत छल | जनउ धारण कराओल जाइत छल | पानि ल’क’ लघुशंका करब सिखाओल जाइत छल |छुआछूत मानब सिखाओल जाइत छल | लघुशंका आ दीर्घशंका करैत काल जनउ कान पर राखब सिखाओल जाइत छल |रातिमे फेर भोज होइत छल | चारिम चरण होइत छल रातिम जे उपनयनक चारिम दिन होइत छल | एकर संग सत्य नारायण भगवानक पूजा होइत छल | पाहुन सभ जे कुमरम दिन अबैत छलाह से रातिमक बादे मुक्त भ’ पबैत छलाह | बिदागरीवाली सभ सेहो रातिम अथवा पूजाक बादे वापस होइत छलीह | पाहुन सभ बरुआक लेल कपडा आ आशीर्वादक रूपमे किछु टाका खर्च करैत छलाह | जाइत काल हुनका विदाईमे धोती, जनउ-सुपाड़ी देल जाइत छलनि | स्त्रीगण सभ सेहो बरुआ लेल, बरुआक माए लेल कपडा आ पाइ अनैत छलीह | हुनको सभकें जाय काल साडी,साया,ब्लाउज आदि देल जाइत छलनि | उपनयनक प्रक्रियामे घरवारीकें १५ दिन सं २५ दिन समय लागि जाइत छलनि आ बहुत अन्न-पानि आ टाका खर्च होइत छलनि |मुदा बहुत उत्साहसं ई खर्च लोक करैत छल | जिनका अपना घरमे अन्न-पानि आ टाका नहि रहैत छलनि ओ कर्जा ल’क’, खेत भरना ध’ क’ व्यवस्था करैत छलाह | परम्पराक अनुसार हमरहु उपनयन भेल | बेटीक लेल ई सभ नै होइत छल | बेटीकें लोक स्कूल नै पठबैत छल |लोक चाहैत छल जे बेटीकें अक्षरक ज्ञान भ’ जाइ, घरवलाकें चिट्ठी लिखैक अवगति भ’ जाइ |बेटी दस-बारह बरखक भेलै त कतहु ओकर विवाह करा क’ लोक निश्चिन्त होइत छल | बेटाकें लोक स्कूल पठबैत छल | गाममे पुबाई टोलमे छलै स्कूल, पाँचमा तक पढाइ होइत छलैक | कोनो-कोनो शिक्षक सभ विद्यार्थीक संग बहुत कठोर व्यवहार करैत छलाह | उद्देश्य नीक छलनि | जे छात्र सबक याद क’क’ नै जाइत छलाह हुनका मारि खाए पडैत छलनि | मारबाक लेल बांसक करची अथवा खजूरक छड़ी अथवा रोलक उपयोग कएल जाइत छल | जकरा पर मास्टर साहेब खिसियाइत छलाह, ओकरा मारैत-मारैत ओध-बाध क’ दै छलथिन | पीठ पर दाग भ’ जाइत छलै | विद्यार्थी स्कूल जेबासं छीह काट’ लगैत छल |ओकरा और कठोर दंड भेटैत छलै | शिक्षक बुझैत छलाह जे मारिक डरसं विद्यार्थी पढ़त, पाठ याद क’ क’ आएत मुदा परिणाम होइत छल जे बहुत विद्यार्थी स्कूल एनाइ बंद क’ दैत छल | माए-बाबू सेहो सोच’ लगैत छलाह जे जीतै त बीस टा उपाए हेतै |एहन बच्चा खुरपी-कोदारि ध’ लैत छल | प्राइमरी पाठशाला घरसं एक किलोमीटर पर छल स्कूल | बाल मुकुंद बाबू छलाह प्रधानाध्यापक |दूटा और शिक्षक छलाह | बाल मुकुंद बाबूक डर बहुत होइ छलै विद्यार्थी सभकें | जे हुनका डरसं पाठ याद क’क’ गेल से बांचल, जे नै याद केलक ओकरा छड़ी अथवा रोलसं बड मारि खाए पडैत छलैक | भरिसके कियो हुनकासं मारि नै खेने हएत | मारि नै खाए पडय, ताही डरसं पाठ याद क’ क’ जाइत छलहुँ | तकर लाभ भेल | हमर संगी छलाह राजेंद्र ठाकुर | हुनकर बाबू हुनका गायक बनब’ चाहैत छलथिन | ओ सांझ क’कैटोला स्थानपर एकटा गबैयाजीसं गायन सीख’ जाइत छलाह | हुनका संगे एकदिन हमहूँ गेलहुँ | हरमुनियाँ पर ‘सा रे ग म प ध नी सा,सा नी ध प म ग रे सा’ क अभ्यास करब आकर्षित केलक | बाबूकें नीक नै लगलनि | ओ हमरा बुझौलनि जे बी ए पास केलाक बाद और जे किछु करबाक हुअ’ से करिह’, एखन नै | ओ स्कूलमे मास्टर साहेबकें सेहो कहि देलखिन | मास्टर साहेब तेहेन छौंकी लगेलनि जे हमर गायन सिखबाक लेल उत्साह ख़तम भ’ गेल | स्कूलमे एकटा सज्जन मास्टर साहेब एलाह | ओ ककरो नै मारैत छलखिन | ओ साइकिलसं गामसं अबैत छलाह | साइकिलसं अबैत काल हुनका लोक बेर-बेर पुछैत रहै छलनि, मास्टर साहेब कते बजलैए ? ओ खौंझाइत छलाह | लोक दौड़ि क’ लग जा क’ पूछि दैत छल | ओ कहैत छलखिन ‘दस’, चाहे कतबो बाजल होइ | स्कूलमे प्रार्थना होइत छलै, से हमरा सबसँ बेशी नीक लगैत छल | सरस्वतीक पूजाक अवसर पर स्कूलक आगाँ नाटक होइ छलै,सेहो देखब नीक लगैत छल |नाटक ओही टोलक नवयुवक सभ करैत छलाह | न’हमे दूरदर्शन दाइक सुइत हेरा गेलनि |वियाहमे भेटल रहनि | चानीक छलै | धन्हारीक खोधलीमे रखने छलीह |बहुत खोज भेल | नै भेटलनि | आठ बरख के भीतरक दू टा बच्चाकें ल’क’ दाइ भौड़ा पहुँचलीह | एकटा हम रही |दोसर छलाह बाबू नारायण | ओ हमरासं दू बरखक नम्हर छलाह | हमरा सभक दहिना औंठामे काजर लगाक’ मौलबी साहेब मोने-मोने किछु पढ़लनि आ कनी कालक बाद हमरा औंठाकें सोझां राखि पुछ्लनि देखियौ त किछु देखाइए | हम किछु नै देखलियै | बाबू नारायण कहलखिन, हं,हम त देखै छियै, ई त कैला छै | दाइ कहलखिन, हे, ठीकसं देखही, कैला नै हेतै, दोसर कियो हेतै | बाबू नारायण कहलखिन, हम ठीकसं देखै छियै, ई कैले छै | मौलबी साहेब फेर आँखि मूनि क’ किछु मोने-मोने पढ़ि क’ कहलखिन, आब देखियौ त की सभ ओ करै छै | बाबू नारायण बाजय लगलाह : ओ घरमे गेलैए .....धनहारीमे हाथ देलकैए ......ओइमे स’ किछु निकालिक’ फाँड़मे रखलकैए .....आब घरसँ निकलि गेलै....आब आँगनसं बाहर आबि गेलै.....कतौ जाइ छै .........एक ठाम पोखरि खुनाइ छै....ओत’ ठाढ़ भ’क’ ककरोसं गप्प करै छै.....जकरासं गप्प करै छै ओकरा नै चिन्है छियै......आब बिदा भेलै.....जा रहल छै....आब घर सभ छै.....एकटा आंगनमे एलै......एकटा मौगीकें गोर लगै छै ....ओकरा संगे एकटा घरमे गेलैए....किछु देलकैए ओकरा ...आब घरसं बाहर आबि गेलै....फेर ककरो गोर लगैछै, हम नै चिन्है छियै..... मौलबी साहेब पुछलखिन, ई कैला के अछि ? दाइ कहलखिन, नै मौलबी साहेब, कैला हमर वस्तु नै चोरा सकैए | मौलबी साहेब कहलखिन, वएह लेलक-ए, ओकरे पुछिऔ | घर अबै गेलहु |घरमे ककरो मोन नै मानै जे कैला चोरौने हेतै | कैला सबहक विश्वास पात्र छल |महींसक चरबाही करैत छल | कियो पुछलखिन त कैला सोझे नठि गेल | बाबा चिराकी चाउरक प्रयोगक घोषणा केलनि | चोर पकड़बा लेल चिराकी चाउरक प्रयोग : चिराकी चाउरक नाम सुनिते कैला बाज’ लागल, हम त एक किलो चाउर चिबा जेबै, हमरा कोनो डर अछि, हम चोरेने छियैहे ने त हमरा कथीक डर | सांझमे टोलक बहुत लोक सभ जमा भेल | एकटा थारीमे अरबा चाउर आएल | बाबा किछु मन्त्र पढ़िक’ कनी-कनी क’ सभकें देलखिन चिबाब’| सभ कनिएँ कालमे चिबाक’ घोंटि गेल, कैलाकें घोंटल हेबे नै करै | कतेक काल धरि चिबबैत रहल कैला, एक मुट्ठी चाउर नै भेलै चिबाएल | पक्का भ’ गेलै जे कैले चोर अछि | बाबाक आँखिमे नोर भरि एलनि |कैला दिस तकलनि | कैला बाबाक पएर पर खसल, हमरा माफ़ क’ दिय’ गिरहत, हमही चोर छी | कैला चोर नै छल | घरमे बेगरता छलै | तें एहेन केलक | ओ गछलक जे हम त ओकरा बेचि लेलहुँ, मुदा हम ओकर पाइ सधा देब |कैलाकें कोनो दंड नै देल गेलै | ओकरा फ़ज्झति नै कएल गेलै | ओकरासं घृणा नै कएल गेलै | कैला दू-तीन सालमे कर्जसं मुक्त भ’ गेल | बादमे ओ नोकरी कर’ आसाम चल गेल | ओत’ सं सालमे एक बेर अपन गाम अबैत छल त हमरो गाम आबि बाबा-दाइक भेंट कर’ अवश्य अबैत छल | कैला हमरो नीक लगैत छल | गहना रखबाक एहेन उपाय, एहेन चोरी, चोर पकड़बाक एहेन उपाय, चोरक प्रति एहेन भाव आ पकड़ा गेलाक बाद चोरक संग एहेन व्यवहार हमरा प्रभावित केलक | हमर व्यक्तित्वक निर्माणमे एकर महत्व अछि |हम मानैत्त छी जे जीवनमे ककरोसं कोनो क्षति भ’ जाइ त ओकरा दंड देबाक बात नै सोचबाक चाही, ओकर स्थितिक अनुमान करक चाही,ओकरा प्रति करुणाक भाव रखैत क्षति कम करबाक प्रयास करबा पर ध्यान देबाक चाही, क्षति और ने भ’ जाए से होश राखब जरुरी होइत छैक |भ’ सकैछै जकरा अहाँ अपराधी बुझैत छी से अपराधी नै हो, ओ मात्र एकटा उपकरण हो आ अहाँक क्षति अहीं द्वारा निर्मित एकटा परिस्थितिक परिणाम हो | तें अपराधक जड़ि तकबाक प्रयास करब आ ओकर निदान ताकब बेशी उपयुक्त भ’ सकैत अछि | अधिक काल एना होइत छैक जे कोनो दुर्घटना भेला पर लोक अपनाकें निर्दोष आ शेष सभकें अपराधी बुझैत अछि, जकर परिणाम शुभ नहि होइत अछि | मिडिल स्कूल पाँचमा पास केलाक बाद मिडिल स्कूल,भिट्ठीमे हमर नाम लिखाएल गेल | ई स्कूल घरसं दू किलोमीटर पर छल | ओइ स्कूलमे सोहरायके हमर पीसा सेहो शिक्षक छलाह | पीसाक सुझावक अनुसार हम गाम परसं चारि एक्सरसाइज हिंदीसं अंग्रेजी ट्रांसलेशन बना क’ ल’ जाइत छलहुँ | दुपहरमे टिफिन टाइममे हुनका लग ल’ जाइ छलहुँ | ओ सही क’ दै छलाह | गलती दोबारा नै हो से ध्यान रखैत छलहुँ | गणित आ अंग्रेजी पढबामे नीक लगैत छल |अन्य विषयमे कम मोन लगैत छल | स्कूलमे प्रतियोगिताक वातावरण नै छलै | नेतरहाटमे नाम लिखेबाक लेल परीक्षामे सम्मिलित भेलहुँ | सफल नै भेलहुँ | मुदा,सातमामे कक्षामे सबसँ बेशी प्राप्तांक आएल | शान्तिक खोजमे अशांति : आंगनमे चारि घरवासी रहबाक कारण सदिखन टोना-मेनी होइत रहै छलै |जखन-तखन हल्ला-गुल्ला होइत रहब सामान्य बात भ’ गेलै | हमर पिता घरारी अलग करबाक विकल्प चुनि लेलनि | एहि निर्णयसं लाभ ई भेलै जे हम सभ हल्ला-गुल्लासं अलग भ’ गेलहुँ | हानि ई भेल जे रहबा लेल कहुना घर त ठाढ़ भ’ गेल मुदा तीन साल तक भराइ चलैत रहल |ओ खेत छलै, गहींर छलै |बहलमान बड़द जोति क’कटही गाड़ी टोलसं दक्षिण बाध ल’ जाइ छल | ओत’ कोदारिसं माटि काटि क’गाडी पर लादि क’ घर अबैत छल | बाबा गाड़ीक संग जाइ छलाह, अबै छलाह | खेतमेसं माटि उठाक’ गाडी पर रखैत छलाह | कहियो क’ बाबाक संग हमहूँ जाइत छलहुँ | घर बनयबामे जतेक खर्चक अनुमान कएल गेल छलै ताहिसं बहुत बेशी खर्च भेलै | दू टा घर बनल | पछबारी कात एकटा भनसा घर जाहिमे पूब दक्षिण कोनमे भगवती रहलीह, पूब दिस चिनुआर भेल | घरमे किछु कोठी बनाक’ राखल गेल | बीच घरमे सेहो भोजन करबा लेल जगह छल |दुआरि पर सेहो भोजन कएल जाइत छल | दुआरि पर घैलची बनल जाहिमे पीय’वला पानिक दूटा घैल रखबाक जगह छल | दक्षिण कात घर बनल जाहिमे किछु कोठी सभ राखल गेल, एकटा पलंग राखल गेल | ओकर दुआरिपर जाँत छल | उत्तरसं एकटा दरबज्जा बनल | ताहिमे पच्छिम दिससं एकटा छोट-छीन कोठली निकालल गेल जाहिमे लकड़ीक एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी राखल गेल |पूब उत्तर कोनमे एकटा चक्का बनाओल गेल | आँगनमे एकटा ढेकी गराएल |आँगन नमहर बनल |घर सभ बांस, लकड़ी, खढ आ साबेक जौडसं बनल |समय बहुत लगलै | खर्च बहुत लगलै | एकर प्रभाव जीवन-यापन पर पडलै | एहि बीच हमर पढ़ाइ-लिखाइ जेना-तेना चलैत रहल | कान त सोन नहि : जे कर्पूरा एकटा बच्चाक बाट १२ बरख तकलनि, हुनका ६ टा बच्चा भेलनि, तीन टा बेटा, तीन टा बेटी | मुदा आब घरक आर्थिक स्थिति एहेन भ’ गेलनि जे पहिलो बेटीक बियाहक लेल सक्षम नहि रहलीह | पहिल बेटी शान्तिक पढाई ओतबे भेलनि जते अपन छलनि | १२ बरख पुरैत-पुरैत शांतिक लेल बरक तलाश शुरू भेल | सभकें चिंता भेलनि |सासुकें सेहो पोतीक विवाह देखबाक तेहेन अभिलाषा जागृत भ’ गेलनि जे एकटा अशिक्षित द्वितीय बरमे सेहो सभ गुण देखाय लगलनि | किछु लोको सभ प्रशंसा केलकनि, माथपर दू बीघा खेत छै, खुट्टापर महींस-बरद छै, पोखरि छै, पोखरिमे माँछ खूब होइछै | हमर पिता कलकत्तामे प्रेसमे काज केने छलाह, दरभंगामे नोकरी केने छलाह |हमरा विवाहक लेल बहुत दिन धरि अडल रहलाह मुदा बेटीक विवाह लेल किए एतेक धडफडा गेलाह, हमरा बहुत दिन धरि नहि बुझाएल | ओना जे कियो बाहर नहि गेल छलाह, हुनका सभ लेल ई सामान्य बात छलै | ओइ समयमे लोक बेटीकें पढ़ाएब ठीक नै बुझैत छल | लगमे स्कूल नै छलै |पढ़बा लेल बेटीकें दूर पठाएब अनुचित मानल जाइत छलै |बेटीक बियाहक लेल उपयुक्त वयस १२ वर्ष धरि मानल जाइत छलै |कोनो शाश्त्रमे लिखल छलै(हम नै पढ़ने छी ) जे बेटीक विवाह १२ वर्षसं पहिने करा देबाक चाही ने त पिता पापक भागी हेताह | लोक शाश्त्रक एहि आदेशक पालन करब कर्तव्य बुझैत छल | मान्यता ई छलै जे बेटी पराया धन थीक, कहुना सकुशल अपन सासुर चल जाए से लोकक लक्ष्य होइत छलै | बियाहक विधि-व्यवहार महत्वपूर्ण होइत छलै | विधि-व्यवहार आसान नै छलै | विवाहमे वरियाती एतै | वरियातीक भोजनक व्यवस्था करब सबसँ महत्वपूर्ण काज होइत छलै |रंग-विरंगक २१ टा कि ३१ टा तरकारी बनतै |तौलाक तौला दही पौडल जेतै |रसगुल्ला जबरदस्ती पचास-पचास टा खुआएल जेतै |चारि-पांच दिन पर चतुर्थी हेतै |बीचमे सभ दिन मौह्क हेतै |गीत-नाद होइत रह्तै | चतुर्थीक बाद नीक दिनमे जमाएकें बिदाई द’क’ विदा कएल जेतनि | जमाए १० दिन कि १५ दिन पर अबैत रहताह | हुनका सासुरमे जबरदस्ती १०-१०, २०-२० दिन राखल जेतनि | ओकर बाद पंचमी हेतै | तखन मधुश्रावनी हेतै | मधुश्रावनीमे १५ दिन धरि बेटी फूल लोढ़तीह |कथा-पूजा हेतै |गीत-नाद होइत रह्तै |लड़कावला नोत पूरय एताह |चारि-पांच दिन रहताह |हुनका ओहिना भोजन कराओल जेतनि जेना वरियातीकें कराओल जाइत छनि |हुनका नीक बिदाईक संग विदा कएल जेतनि | तकर बाद कोजगरा हेतै | कोजगरामे लड़कीवला मखान,दही,केरा,चूडाक भारक संग लड़काक ओत’ एताह |हुनको चारि दिन राखल जेतनि |तकर बाद गंजी,धोती,कुरता,डोपटा, पाग आदि द’ क’ विदा कएल जेतनि | तकर बाद जराउर हएत | सभ पावनिमे दुनू दिससं भार-चंगेराक आदान-प्रदान होइत रहत | तीन अथवा पांच साल पर द्विरागमन हएत | एहि बीच लड़का अपन सासुर अबैत-जाइत रहताह | विवाहक सम्पूर्ण कार्यक्रममे एहि तरहें तीन सं पांच साल लागि जाइत छलै | ई छलै परम्परा | एकरा संग छलै बहुत रास विधि-व्यवहार जकरा आगाँ बेटीक इच्छा-आकांक्षाकें कोनो महत्व नै देल जाइत छलै | कोनो बेटी अपन इच्छा-आकांक्षाकें कहियो प्रगट नै करैत छलीह |दू-तीन टा बच्चा भेलाक बादे बेटी किछु बजबाक साहस जुटा पबैत छलीह | पन्द्रहम बरख पुरैत-पुरैत शान्ति अपन सासुरक परिवारमे शामिल भ’ गेलीह | राम नारायण ठाकुर एक बेटीक विवाहसं निश्चिंत भेलाह | बाल-मण्डली : हमर संगी छलाह राजेंद्र ठाकुर,आशानन्द ठाकुर,बैद्यनाथ ठाकुर, खेलानन्द ठाकुर ( बाबू नारायण ),राम परीक्षण झा, फ़क़ीर चन्द्र दास, नगेन्द्र भूषण मल्लिक आ किछु और गोटे | एहिमे किछु गोटे हमरासँ एक किलास आगू छलाह | सभ गोटे सांझक’ फुट-बौल खेलाइत छलहुँ | बादमे सभ गोटेक निर्णय भेल जे हम सभ गाममे स्वच्छता अभियान चलाएब | टोलमे पोखरिकें साफ़ करबाक काज शुरू भेल | पोखरिक भीड़ पर भरि टोलक लोक छठि पूजा करैत छल | छठि पूजाक बाद एकर चिंता लोक नै करैत छल | से पोखरिमे कुम्भी बड़ भ’ गेल रहै |बाल मंडली एकर सफाइमे लागि गेल | दस-बारह दिनमे पोखरि साफ़ भ’ गेल | आब पोखरिक भीड़ पर एकटा पुस्तकालय बनेबाक काज शुरू भेल | भूषणजीक अक्षर बहुत सुन्दर होइत छलनि | पुस्तका लयक लेल ओ एकटा नियामावली बनौलनि, लोक सभसं एकटा-दूटा क’ बांस मांगल गेल |हम सभ अपनेसं बांस काटि क’ अनैत छलहुँ | पोखरिक दछिनबरिया भीड़ पर जमा कर’ लगलहुँ | लोक सभसं चंदा मागल गेल | जन राखल गेल | अपनो सभ भिडलहुँ |माटिक देबाल ठाढ़ हुअ’ लागल | हमर सबहक पढ़ाइ बाधित भ’ रहल छल | हमरा सभमे एक गोटे तमाकुल खाइत छलाह | हमर पिता एकदिन हमरा कहलनि जे जाहि मंडलीक सदस्य तमाकुल खाइत छथि ओ मण्डली समाज-सुधार की करत | ई बात हमरा ठीक लागल | हम मण्डलीक सदस्यकें नहि बदलि सकैत छलहुँ | हम इएह कारण लिखैत मण्डलीसं अलग भ’ गेलहुँ | मण्डली किछु दिनक बाद भंग भ’ गेल आ पुस्तकालयक काज पूरा नै भेल |मण्डलीसं अलग भेला पर हम अपन ध्यान अपन पढाइ पर केन्द्रित केलहुँ | शेष सदस्य सभ सेहो अपन-अपन पढाइमे लागि गेलाह | हमरा फुट-बौल सेहो पसंद नै आएल | हमरा एक बेर गेंदसं जांघमे तेहेन चोट लागल जे सभ दिन लेल खेलसं विरक्ति भ’ गेल | पिता कागजसं खेल केनाइ सिखौलनि | कागज़सं खेल ! कागजक दुआति बनौनाइ, कागज़क नाओ बनेनाइ | हमरा ई खेल सुरक्षित लागल | गाममे हमर कक्का आ हुनक समवयस्की सभ नाटक खेलाइत छलाह, से हमरा नीक लगैत छल | पुबाइ टोलमे जगदीश बाबू ओत’ कोनो अवसर पर बेलाहीवला नौटंकी एलै |सत्य हरिश्चंद्र, वनदेवी और कोनो-कोनो नौटंकी देखैत खूब नीक लगैत छल |एक बेर सांझ तक पता छल जे नै हेतै, त हमसब खा क’ सूति रहलहुँ | बहुत रातिमे निन्न टूटल त नगाराक आवाज सुनाइ पडल | हमरा नै रहल भेल | हम चुपचाप एसगर ओते रातिमे गाछी द’ क’ चल गेलहुँ नौटंकी देख’ आ ख़तम भेलै त और लोक सभ संगे चल एलहुँ | अथ महराजजी कथा : नारायणपट्टीमे हमर पिताक एकटा बहिन छलथिन |हुनका एकमात्र पुत्र रहथिन शंकर | शंकरक उपनयन भ’ गेल रहैक | दुर्योगसं एक राति घरमे सुतलमे शंकरकें सांप काटि लेलकनि | ओ नहि जीबि सकलाह |बडका शोकमे दीदीक परिवार डूबि गेल | सभ सम्बन्धी लोकनि दुःखमे पड़ि गेलाह |हमर पिता सेहो बहुत चिंतित भेलाह |घरमे सभ बहुत दुखी रहथि |एहि दुर्घटनासं पहिने एक बच्चाक जन्मक समय दीदीक ई स्थिति भ’ गेलनि जे देहमे खून बहुत कम बचलनि, खून चढ़ाबक आवश्यकता भ’ गेलै |बाबू अपन खून देलखिन | जान बँचलनि | आब ई पुत्र-शोक | बाबूकें भेलनि घरक जगहकें कोनो गुनी-महात्मासं जांच करबियैक | एकटा महात्माजी कतहु भेटलखिन | हुनका ओ घरारी देखब’ लेल अनलनि | नारायणपट्टी जेबासं पहिने चारि-पांच दिन महात्माजी हमरा सबहक पाहुन भेलाह |ओ अपन किछु करतब देखौलनि |एकदिन ओ कहलखिन हम कागज़सं रुपैया बना देब | लोक अचंभित भेल | लोक जमा भ’ गेल | महात्माजी एकटा कागजक पन्ना लेलनि, एक लोटा पानि लेलनि |कागजपर किछु लीखि क’ सभकें देखाक’ ओकरा टुकड़ी-टुकड़ी क’ देलनि | ओकरा मुंहमे ध’ लेलनि | चिबाक’ लोटामे रखलनि | हाथ लोटामे ध’ क’ बाहर निकाललनि त ओहिमेसं एकटा दसटकही रुपैया निकललनि | ओइ पर ओहिना सभ चित्र आ चेन्ह सभ रहै जेना आन रुपैया सभमे रहै छै |सभ आश्चर्यचकित भ’ गेल | महात्माजी कहलखिन जे किछु घंटाक बाद ई रुपैया पुनः कागज भ’ जाएत, तें जतेक शीघ्र हो एकर उपयोग क’ लिय’ |एक आदमी सायकिलसं गेल पंडौल ओ रुपैया ल’क’ आ ओकर मोतीचूरके लड्डू किनने आएल | सभ कियो लड्डू खेलक | सभ हुनका महाराजजी कह’ लगलनि | महाराजजी कहलखिन, जे कियो सिमरिया जाए चाहैछी से तैयार होउ, हम सांझमे गाछ पर चढ़ा क’ ल’ चलब, ओत’ स्नान क’क’ सभ गोटे घूरि आएब |दिनमे त’ कए गोटे तैयार भेलाह, मुदा सांझ होइते सभ डेरा गेलाह, कियो नै तैयार भेलाह | बाबू हमरा सिखौलनि जे महाराजजी जौं पुछथि ‘की चाही ?’ त कहबनि जे कोट-पेंट चाही | दोसर दिन महाराजजी पुछ्लनि, ‘की चाही ?’ हमरा नै कहल भेल जे कोट-पेंट चाही |हम किछु नै मांगि सकलहुँ |ई हमर स्वभाव छल |बाबू बहुत दिन तक हमर एहि स्वभावकें हमर कमजोरी मानैत रहलाह | मुदा,हमर ई स्वभाव हमर शक्ति छल,से बहुत बादमे पता चलल | महाराजजी और लोक सभकें पुछलखिन, की चाही त नवयुवक सभ कहलखिन हमरा सभ गोटेकें सिनेमा देखा दिय’| महाराजजी सभकें ल’क’ मधुबनी गेलाह |रस्तामे कागजसं एकटा नमरी बना क’ द’ देलखिन | सभ गोटे रातिमे घुरलाह त उदास रहथि | बजै गेलाह जे सिनेमा हॉलसं निकलैत काल महाराजजी कत’ बिला गेलखिन जे सभ गोटे तकैत-तकैत रहि गेलाह, नै भेटलखिन | हमर हाई स्कूलक शिक्षा : १९६१ मे आठमाँमे हमर नाम पंडौल हाई स्कूलमे लिखाएल गेल | हमरा गणितमे नीक लगैत छल |तें विज्ञान लेलहु |फिजिक्स,केमिस्ट्री आ मैथमेटिक्स | प्रधानाध्यापक छलाह श्री अशर्फी सिंह | गणित पढ़बैत छलाह महावीर बाबू | गुप्तेश्वर बाबू अलजेब्रा आ बैद्यनाथ बाबू ज्यामिति पढ़बैत छलाह | बच्चा बाबू मैथिली पढबैत छलाह |ओ हमरा मामा गामक छलाह | हुनका हाथमे ‘मिथिला मिहिर’ रहिते CHHALANIEE छलनि |बादमे हुनक पुत्र राम सेवक बाबू सेहो मैथिली पढ़ौलनि | बमबम मास्टर साहेब केमिस्ट्री पढ़ौलनि | पढाइ बड सुंदर होइत छलैक |खूब मोनसं मास्टर साहेब सभ पढबैत छलाह | हम बहुत कुशाग्र बुद्धिक बालक नै छलहुँ जे कोनो विषय एक बेर पढलासं याद भ’ जाए |हम अभ्यास खूब करैत छलहुँ | क्लासमे जे पढ़ाइ होइत छलै, तकरा घुरती काल रस्तामे याद करैत अबैत छलहु |गामपर सांझमे फेर एक बेर याद करैत छलहुँ | गणित आ विज्ञानमे काल्हि जे पढाइ हेतै तकरा एक बेर पढ़ि जाइत छलहुँ |अइसं लाभ ई होइत छल जे क्लासमे जखन पढाइ होइत छलै त ठीकसं बुझि जाइत छलिऐक | जौं कतहु नै बुझाएल त ठाढ़ भ’क’ पुछि लैत छलियनि |मास्टर साहेब बुझा दैत छलाह, फेर कोनो दिक्कत नै रहि जाइत छल | पढाइक ई तरीका बाबू सिखौने छलाह |एहिसं बहुत लाभ भेल | स्कूलमे प्रतियोगिताक वातावरण नै छलैक | आठमा-नौमामे हमर संगी छलाह राजेंद्र झा, मुनीन्द्र नारायण दास,मोद नारायण झा, शमीम अहमद आदि | आठमाक अर्ध-वार्षिक परीक्षामे एडवांस्ड मैथमेटिक्समे चारिटा सवाल रहै, तीनटाक जवाब देबाक छलैक | महावीर बाबू नंबर सुनौलथिन ---जगदीश चन्द्र ठाकुर –९९ हाईएस्ट | ओ हमर बचपनक सभसं बेशी आनंद दायक दिन छल | एलीमेंट्री मैथमेटिक्समे सेहो बहुत नीक अंक आएल |फिजिक्स आ केमिस्ट्रीमे बहुत नीक नै रहय | सब विषय मिलाक’ क्लासमे हमर स्थान प्रथम रहल | पाठ्य-पुस्तकमे मैथिली कथा-कविता सभ पढ़ब नीक लगैत छल, तथापि, गणित हमर सभसं प्रिय विषय भ’ गेल छल | कोनो भारी सवाल जखन बनि जाइत छल त बडड आनंद अबैत छल | हमर सबसं छोट मामा सेहो ओही स्कूलमे पढैत छलाह, हमरासं दू क्लास आगाँ | मामा बहुत तेज छलाह, क्लासमे प्रथम अबैत छलाह | मामा दसम कक्षामे प्रथम एलाह, हम आठम कक्षामे | गर्मीक अवकाशमे मामा गाम जाइत छलहुँ आ जे सवाल सब अपना कठिन लगैत छल से हुनकासं बुझि लैत छलहुँ | नवम कक्षामे सेहो हमर स्थान प्रथम रहल | दसम कक्षामे कोनो दोसर स्कूलसं एलाह नागेन्द्रजी | हुनकासं हमर प्रतियोगिता भेल | हम अपन स्थान प्रथम रखबा लेल बहुत प्रयास केलहुँ |हमरा लाज होइत छल इ सोचि क’ जे क्लासमे हमर स्थान छिना ने जाए | हमरा जतेक गणितमे मोन लगैत छल ततेक फिजिक्स आ केमिस्ट्रीमे नहि | दसमीक अर्द्ध-वार्षिक परीक्षाक समय हमरा अबोग्राडोक परिकल्पना याद नै होइत छल आ ओ प्रश्न एबे करतै से लगैत छल | हम एकटा चलाकी केलहुँ | घरे पर एकटा पन्नापर संभावित प्रश्नक जबाब लीखिक’ ओहि विषयक परीक्षाक दिन संगे नेने गेलहुँ आ और प्रश्नक जबाब लीखिक’ एहि पन्नाकें प्राप्त कॉपीमे नाथि देलिऐ |परीक्षा द’ क’ चल एलहुँ |दूनू कागजक रंग भिन्न छलै तें चोरी पकड़ाएब निश्चित छल |एकदिन राम सेवक बाबू मास्टर साहेब हमरा फूटमे बजाक’ पुछलनि, हुनका बमबम मास्टर साहेब कहने छलखिन |हम अपन गलती स्वीकार करैत हुनका कहलियनि जे जीवनमे फेर कहियो एहेन गलती नै करब | कॉपी बमबम मास्टर साहेब देखने रहथिन | ओ आ राम सेवक बाबू लगभग एके समय स्कूलमे आएल छलाह | राम सेवक बाबू हमर मामा गामक छलाह | बमबम मास्टर साहेब नागेन्द्रजीक गामक छलाह |दूनू गोटे आपसमे गप केलनि आ बमबम मास्टर साहेब राम सेवक बाबूक माध्यमसं हमरा समझा देलनि, से हमरा नीक लागल | हमरा क्लासमे सबहक सोझाँ नै कहल गेल, से हमरा लेल बहुत पैघ बात छल |एहि घटनाक सकारात्मक प्रभाव हमरा पर पडल | अपन दूनू शिक्षक महोदयक प्रति हमर श्रद्धा बढि गेल | हम एसगरमे कनलहुँ | मोनसं पाश्चाताप केलहुँ आ फेर एहेन गलती कहियो जीवनमे नै करबाक संकल्प लेलहुँ | हम आइयो श्रद्धासं दूनू मास्टर साहेबकें स्मरण करैत सोचैत छी जे विद्यार्थीकें कोनो गलतीपर ओकरा बिना अपमानित केने, एसगरमे बजाक’ ओकरासं मित्रवत बात क’क’ गलतीक निराकरणक विधि कतेक कारगर भ’ सकैत अछि | एहि घटनाक बाद हमर मोन हल्लुक भ’ गेल | आब दोसर स्थान पर रहब सरल भ’ गेल | नागेन्द्रजीक लेल मोनमे मित्रता आ सहयोगक भाव उत्पन्न भेल | ओ स्वयं बहुत सरल आ नीक स्वभावक छलाह | हमरा जतेक अंक भेटब उचित छल, से भेटल | नागेन्द्रजी प्रथम एलाह, हम दोसर स्थानपर रहलहुँ |दसमी-एगारहमीमे इएह स्थिति रहल | १९६५ मे मैट्रिकक परीक्षामे हमरा ६४८ अंक आएल, नागेन्द्रजीकें ६६५, हमरासं १७ अंक बेशी | गणितमे दू पेपर छलै | हमरा दुनूमे ९९-९९ आएल | हुनका एकमे १०० मे १०० एलनि | फिजिक्स, केमिस्ट्रीमे हमरासं बेशी अंक रहनि | कॉलेज नागेन्द्रजी सी एम कालेज, दरभंगामे नाम लिखौलनि | हमहूँ ओतहि नाम लिखाब’ चाहैत रही,मुदा बाबू नै तैयार भेलाह |हमर नाम आर के कालेज, मधुबनीमे लिखाएल |हमर मोन छोट भ’ गेल | आर्थिक कारण छलैक | दरभंगामे नाम लिखयबाक मतलब छलै ओत’ डेरा राखब |मेसक खर्च | समय-समय पर गामसं जेबा-एबाक खर्च | मधुबनीमे नाम लिखयबाक मतलब भेल घरसं खा’क’ साइकिलसं जाएब-आएब |बहुत खर्चसं मुक्ति | बाबू नोकरीमे नै छलाह | खेतीसं ओते लाभ नै होइत छलै | जाहि सेक्शनमे हम छलहुँ ओकर क्लास ६ बजे सं शुरू होइत छलैक | घरसं भुखले कोना जाएब, तें माए अन्हरोखे भानस चढ़ा दैत छलीह | हम सवेरे जागिक’ स्नान-भोजन क’क’ साइकिल ल’क’ विदा होइत छलहुँ | घरसं ६- ७ किलोमीटरक दूरी तय करैत-करैत पहिल क्लास ख़तम हेबाक बादे पहुँचि पबैत छलहुँ |दुखी भ’ जाइत छलहुँ | गणित आ केमिस्ट्रीक पढाइसं संतुष्ट नहि होइत छलहुँ | प्री-साइंसमे हमर तैयारी नीक नहि भेल | हम सेकेण्ड डिवीज़नमे उत्तीर्ण भेलहुँ | गणितमे नीक अंक नै आएल | अही साल परिवारमे अशुभ घटना भेलै |दाइक हाथमे दर्द भेलनि | किछु दिन गर्म पानिसं सेकलनि | कनी काल दर्द नै बुझाइन त होइन जे ठीक भ’ गेल | फेर कखनो दर्द उठनि त वएह इलाज | ककरो पूछि क’ कोनो गोटी खेलनि ओहूसं जखन हारि गेलीह आ दर्द बर्दाश्त नै भेलनि त हमरा संगे मधुबनी गेलीह | डा.शिवानीसं देखौलनि त पुछलकनि, कतहु खसल छलहुँ की ? दाइकें मोन पडलनि | किछु मास पहिने बेटीक ओत’ गेल छलीह नारायणपट्टी | पानि भेल रहै | आंगनमे पिच्छड़ भ’ गेल छलै |अइ घरसं ओइ घर जेबामे पिछड़ि क’ खसि पडलीह | हाथ रोपलनि से हाथमे किछु भ’ गेलनि जे दर्द कर’ लगलनि | एत’ एलीह ककरो लग ई बात नै बजलीह | कखनो-कखनो दर्द उठनि त पानि गर्म क’क’ सेक लैत छलीह |सभ बात डाक्टरनीकें कहलखिन त ओ कहलखिन, बहुत देरी क’ देलियै,हमरा होइए जे सेप्टिक भ’ गेल अछि, जतेक जल्दी हो दरभंगा हॉस्पिटलमे देखाउ | बाबू डी एम सी एच ल’ गेलखिन |डाक्टर कहलकनि सेप्टिक भ’ गेलनि, जान बचाबक लेल हाथ काटब जरूरी छनि | बामा हाथ काटल गेलनि | अस्पतालमे दाइकें देख’ गेलहुँ त दाइ ह्बोढेकार भ’क’ कान’ लगलीह | हमरो कना गेल | ओइ दिन हमरा तीन चारि साल पहिनेक एकटा घटना मोन पड़ि गेल | दाइ संगे कलम गेल गेलहुँ | कलकतिया आमक जे गाछ छलै ताहिमे हमरा सबहक हिस्सा वलामे कम फड़ल छलै, कक्का वलामे बेशी छलै फड़ल | दाइकें की फुड़लनि, हबर-हबर चारि-पांचटा आम हुनका गाछमेसं तोड़ि लेलखिन | हमरा ओ दृश्य मोन पड़ि गेल जखन हुनकर ओ हाथ अस्पतालमे नै देखलियनि | एहि घटनाक प्रभाव हमरा पर पडल | जीवनमे कय बेर ई दूनू घटना मोन पड़ल | अस्पतालसं घर एलीह दाइ त जीवनसं मोह भंग भ’ गेल छलनि | जिजीविषा नै रहलनि | मृत्युक कामना कर’ लगलीह | एकटा पोतीक वियाह देखि लेबाक एखनहु कामना करय लगलीह |हुनकर ई कामना पूरा भेलनि | हमर छोट बहिनकें हमर मामा गाममे लड़काक पिता देखि क’ अपन पुत्रक विवाह करयबाक बात शुरू केलनि | ककरो लग चर्च केलखिन | हुनकर बहिनक विवाह छलनि ओत’ | बात आगू बढ़लै | लड़का सभकें पसंद एलखिन | विवाह भ’ गेलै | दाइक कामना पूर्ण भेलनि | मधुश्रावणीक बाद दाइक देहांत भ’ गेलंनि | मरबासं किछु दिन पूर्व मोहिनारायण कक्का देख’ एलखिन त दाइ कानि क’ कहलखिन, बौआ, देखबै कनी, राम नारायण उजड़ि ने जाए | कक्का भरोस देलखिन, अहाँ चिंता नै करू | दाइकें आब एतबे चिंता छलनि जे अस्पतालमे खर्च भेलैए, बेटीक वियाहमे खर्चा भेलैए, आब क्रिया-कर्ममे खर्च हेतै, बाहरी आमदनीक कोनो स्रोत छै नै | खेत बेचतै कि भरना रखतै | भरना रखतै त जेहो उपजा होइछै सेहो नै हेतै त नओ आदमीक गुजर कोना हेतै | दाइक चिंता स्वाभाविक छलनि | इएह होइत एलैए |इएह भ’ रहल छै |इएह भरिसक होइत रहतै | सरल चीजकें कतेक कठिन बना देल गेल छैक | कर्मकांडमे भोजक परंपरा : एकादशा, द्वादशा,माछ-मासु,फेर मासे-मासे ब्राह्मण-भोजन | श्राद्धक बाद ओहि तिथिक’ पाँच साल तक बरखी | केश कटाउ,ब्राह्मण भोजन कराउ | श्राद्धक समय त लोक कहैत छैक, जीवन भरि त ओ अहीं सभ लेल सभ किछु केलनि, आब अहाँ सबहक कर्तव्य होइत अछि जे नीक जकां श्राद्ध क’ दियनु जाहिसं हुनका सद्गति होइन, आब ओ अहाँ सभसं किछु लेब’ थोड़े एताह |बिना भोज-भातके क्रिया-कर्मक कोनो मोजर लोक नै दै छै | जकरा गरदनिमे उतरी रहैत छैक ओ भावनामे बहि जाइत अछि, होइछै जे आब जे हेतै देखल जेतै, करब त नीके जकां | बी.एस.सी. पार्ट-१ मे स्थिति और ख़राब भेल | कॉलेजमे पढाईक स्थिति ख़राब भेल | परीक्षाक फॉर्म भरलहु | परीक्षा देब’ लगलहुँ |गणितक परीक्षा दिन बुझाएल जे ६५ सं बेशी अंक नै आएत | गणितक परीक्षामे नीक अंक नै आएत माने प्रथम श्रेणीक अंक नै आएत | एकर मतलब छलै जे नीक टेक्निकल कॉलेजमे एडमिशनमे कठिनाइ | हम परीक्षा ड्राप केलहुँ, शेष विषयक परीक्षा नै देलहुँ | हमर लक्ष्य भेल बी.एस.सी.पार्ट-१ मे प्रथम श्रेणीक अंक प्राप्त करब | (2) सांस्कृतिक परिवेश टोलमे मूडन, मरबठटठी, कुमरम,उपनयन,विवाह,मधुश्रावनी,कोजागरा,जराउर,द्विरागमन आदि अवसर पर कोनो-ने-कोनो आंगनसं स्त्रीगनक मूहें गीत सूनब आकर्षित करैत छल | फगुआ,रामनवमी,कृष्णाष्टमी,दुर्गा पूजा,दीयाबाती, छठि आदि अवसर पर राम-कथा, कृष्ण-कथा,सुदामाक कथा,महाभारतक कथा सुनबाक अवसर भेटैत छल | गाममे कैटोला स्थानपर आ शिवनंदन बाबूक ओत’ सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलै | बाबा संगे जाइत छलहुँ | नेवत दास आ दरबारी दासक मूहें दिनकर,नेपाली,विद्यापतिक आ मधुपजीक गीत सुनबाक अवसर भेटल | दुर्गा पूजा,दीयाबाती, आदि अवसर पर गाममे नौटंकी आ नाटक देखबाक अवसर भेटल |एहि मंच सभ पर नटुआ सबहक मूहें मधुपजी आ रवीन्द्रजीक गीत सुनलहुँ | डबहारीक भैयाजीक मूहें विवाह कीर्तन सूनब बहुत आनंददायक होइत छल | ओ कोनो प्रसंगकें बहुत रोचक बना दैत छलाह | कोनो खुशीक अवसर पर हुनका बजाओल जाइत छल | दुर्गास्थानमे मास-मास दिन धरि राम-लीला होइत छल | पोखरिशामक महंथजीक राम-लीला पार्टी छल | गाममे ई सभ मनोरंजनक साधन छलै | कैटोला स्थानपर, शिव नंदन सिंहजीक ओत’, पुबाई टोलमे जगदीश बाबू ओत’ राम चरित मानसक समूह-गायन,समय-समय पर अष्टियाम आ नवाह सेहो होइत छल |हमरो टोलमे ई सभ होइत छल | कोनो गीतक टुकड़ीक संग रामचरितमानसक गायन नीक लागैत छल | कीर्तनमे स्नेहलताक गीत : जखन राघव लला छथि सहाय तखन परवाहे की, अपन किशोरीजीके चरण दबेबै हे मिथिलेमे रह्बै आदि बहुत प्रेमसँ लोक गबैत छल | अहिना बिंदुजीक हिंदी गीत सभ सेहो खूब लोकप्रिय छल : जीवन का मैंने सौप दिया सब भार तुम्हारे हाथों में, प्रवल प्रेम के पाले पड कर प्रभु का नियम बदलते देखा | मामा गाम जाइत छलहुँ त ओतहु रवि दिन सांझमे रामचरितमानसक समूह-गायन देखैत-सुनैत छलहुँ |समय-समय पर अष्टियाम आ नवाह सेहो होइत छल | हमर बड़का मामा मिडिल स्कूल मे प्रधानाध्यापक छलाह आ विवाह कीर्तन सेहो करैत छलाह | मास्टर साहेब बच्चा बाबू पंडौल हाई स्कूलमे सहायक प्रधानाध्यापक छलाह, ओहो विवाह कीर्तन करैत छलाह | हिनका सबहक विवाह कीर्तनमे गंभीरता बेशी रहैत छल | प्री-साइंसमे एक पेपर मैथिली रखने छलहुँ | प्रो.बुद्धि धारी सिंह ‘रमाकर’ बहुत नीक पढबैत छलाह | मैथिली पढ़ब नीक लगैत्त छल | कॉलेजमे विद्यापति पर्व मनाओल गेलै | ओहिमे रमानाथ बाबू आएल छलाह | भाषण भेलै, कविता पाठ भेलै, गीत-नाद भेलै | रामपट्टीक आर के ‘रमण’ बहुत सुन्दर गीत रचना सस्वर प्रस्तुत केलनि | बहुत नीक लागल | सपना भेल जे हमहूँ एहन रचना लिखी आ मंच पर प्रस्तुत करी | बाबाक मूहें महादेवक गीत, विद्यापतिक गीत आ पराती सुनैत छलहुँ | दाइक मूहें रंग-विरंगक फकरा सुनैत छलहुँ | किताबक कविता सभ पढ़ब आ ओकरा याद करब नीक लगैत छल | इएह सभ देखैत-सुनैत हमहूँ तुकबंदी कर’ लगलहुँ आ ओकर उपयोग दरबज्जा पर साप्ताहिक रामचरितमानसक समूह-गायनमे कर’ लगलहुँ | पारंपरिक धुनमे किछु गीत लिखलहुँ जकर पहिल पाती ई सभ अछि – ------भरल सभामे आबि जनकजी प्रण केने छथि भारी हे | ------गौरी लीलाविहारी तोहर भंगिया | ------कन्हैया यौ अहाँ आएब कहिया | मधुपजीक ‘अपूर्व रसगुल्ला’ आ ‘टटका जिलेबी’ देखलहुँ | नीक लागल | हुनक अनुकरण केलहुँ | ‘अनिल’ उपनाम रखलहुँ | फ़िल्मी गीतक धुनपर किछु गीत लिखलहुँ | -------यार कहू की बियाह केने हम सदिखन पछताय रहल छी, आब होयत की माहुर खेने कहुना जीवन बिताय रहल छी | ------वाइफ बैजन्ती माला अपने राजेंद्र कुमार महमूद हम्मर चेला, जानीवाकर हमर भजार | ------प्रीतम छोड़ि गेला परदेश हमरा होइए कते कलेश ककरा कह्बै जखन विधिए भेल बाम | ------देखिते अमत बर सखी सभ पड़ेली कहिते बाप रे बाप बरकें सोहरै सगरो देहियामे साप रे साप | अहिना और किछु | प्रो. बुद्धिधारी सिंह ‘रमाकर’जीकें देख’ देलियनि | हुनकर शुभकामना लैत ओकरा छपा क’ जहां-तहां बेचबाक योजनामे लागि गेलहुँ | बाबूजीकें जखन पता चललनि त बहुत दुखी भेलाह | हुनका हमर कैरियरक चिंता भेलनि |ओ हमरा अपन पाठ्य-पुस्तक सं प्रेम करबाक सलाह देलनि | हम हुनक चिंता पर विचार केलहुँ | साहित्य-प्रेमसं जीविकोपार्जन असंभव छल | घरक आर्थिक स्थिति चिंताजनक होइत गेल | हमरासं छोट तीनू बहिन आ दूनू भाए छलाह | निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ | साहित्यकें शौखक रूपमे राखब |इंजीनियरिंग अथवा एग्रीकल्चर पढ़ब | ताहि लेल बी.एस.सी.पार्ट-१ मे नीक अंक आनक लेल पूरा प्रयास करब | मोने मोन निर्णय केलहुँ जे आब दू साल धरि ने त साहित्यक कोनो वस्तु पढ़ब ने लीखब | मुदा हम अपन निर्णय पर बहुत दिन धरि अटल नहि रहि सकलहुँ | बाबूजीक नजरि बचा क’ मैथिली पत्रिका ‘मिथिला मिहिर’ पढ़ि लैत छलहुँ ,नीक लगैत्त छल | अपनो लिखबाक मोन होइत छल | अपन लिखल मिथिला मिहिरमे छपल देखबाक सिहंता होइत छल | आकाशवाणी,पटनासं प्रसारित मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ कतहु सुनि लैत छलहुँ |गंगेश गुंजन जी द्वारा प्रस्तुत भारती कार्यक्रम बहुत नीक लगैत छल | रवि आ मंगल दिन नियमित रूपसं सुनैत छलहुँ | अपन लीखल रचना आकाशवाणीसं प्रसारण हेबाक कल्पना करय लगलहुँ | मैथिली पढ़ब आ सूनब हमरा लेल सबसँ बेशी आनंद दायक भ’ गेल छल.| एहि बीच हरिमोहन बाबूक ‘चर्चरी’ मामा गामक लाइब्रेरीसं आनि क’ पढ़ि गेलहुँ | एहि सबहक असरि ई भेल जे जखन रातिमे सभ क्यो सूति रहै छल, हम किछु ने किछु लीख’ लगैत छलहुँ | किछु कथा लिखलहुँ |’मिथिला मिहिर’ मे पठौलियैक | एकटा कथा आकाशवाणीकें पठौलियैक | घूरि आएल | दू-तीन दिन धरि उदास रहलहुँ | फेर दोसर पठौलियैक | एक मासक बाद ओहो घुरि आएल | किछु दिनक बाद एकटा हास्य-कथा लिखलहुँ |’रमाकर’जीकें देख’ देलियनि | हुनकासं सुधार कराक’ फेर ओकरा फेयर क’क’ आकाशवाणी पठौलियैक | एहि बेर स्वीकृतिक सूचना भेटल | स्वीकृतिक सूचना पाबि एतेक ख़ुशी भेल जे बाबूकें सेहो कहि देलियनि | ओ नाराज त भेलाह मुदा, हुनका ख़ुशी सेहो भेलनि, से हम अनुभव केलहुँ | १९६८ मे हमर रचना / विनोद वार्ता ‘मोने अछि एखन धरि सासुरक यात्रा’आकाशवाणी,पटनासं मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’मे प्रसारित भेल | कार्यक्रमक संचालन गुंजनजी करैत छलाह | बटुक भाइ बहुत नीक जकां पढ़लनि | हम सभ गामपर रेडियोसं सुनलहुँ | बाबाकें हर्ष भेलनि | हमरा पच्चीस टाका भेटैत | छात्रवृत्तिक अतिरिक्त हमर ई पहिल कमाइ होइत | बाबा कें पुछलियनि ‘अहाँ ले’ की नेने आएब ?’ बाबा कहलनि ‘दू आना के सुपारी नेने अबिह’ | बाबा सुपारी ले’ नहि रुकलाह | जहिया पच्चीस टाकाक चेक आएल, बाबाक एकादशा रहनि | (3) घरक आर्थिक स्थिति कमजोर भ’ गेलै | दू टा कन्यादानक बाद ६५ मे दाइक अस्पतालक खर्च आ तकर बाद हुनक देहांत | ६५ मे हुनक श्राद्ध | ६६ मे पहिल बरखी | ६७ मे दोसर बरखी | फेर बाबाक क्रिया-कर्मक खर्च | खेतीसं साल भरिके खर्चक लेल अन्न नै भ’ पबैत छलैक | आवश्यकतानुसार जमीन भरना राख’ पडैत छलनि आ पाई सेहो कर्ज लेब’ पडैत छलनि | बाबूक स्वभावमे तामस बेशी प्रगट हुअ लगलनि | हमरा गाममे नीक नै लागय | जेना-तेना बी.एस सी.पार्ट१ के परीक्षा भेल | परीक्षा बहुत सुंदर त’ नहि भेल, मुदा अनुमान केलहुँ जे साठि प्रतिशतसं बेशी अंक आबि जेबाक चाही जे एग्रीकल्चर कॉलेजमे एडमिशन लेल आवश्यक बुझाइत छल | हम गाम पर असहज होमय लगलहुँ | आ एक दिन कलकत्ता जेबाक निश्चय क’ लेलहुँ | हमरा एकटा कुटुंबक पता छल | ओ एक बेर कहने छलाह जे अहाँकें मैट्रिकमे तेहेन सुंदर नम्बर अछि जे कतहु नोकरी भेट जाएत | हम मोने मोन निश्चय केलहुँ जे नोकरी भेटत त करब | एकटा पिसिऔत भाए सेहो ओत’ छलाह | हुनको पता छल | हम दीदी ओत’ नारायणपटटी जाइछी, से कहि क’ घरसं विदा भेलहुँ | दीदी ओत’ गेलहुँ | हुनका अपन विचार कहलियनि| हुनका ख़राब नै लगलनि | पढल-लिखल लोक नोकरी कर’ कलकत्ता जाइत छल | ओ हमरा संगमे तीन-चारि किलो चाउर आ किछु चूड़ा आ गुड द’ देलनि | किछु पाइ हमरा लग छल | ओइ समय आरक्षण जरुरी नै होइत छलै | हम राजनगर स्टेशनसं गाडी पकडलहु समस्तीपुरक लेल | प्लेटफार्म पर बेंच पर बैसल एकटा सज्जनकें देखलियनि | ओ बहुत सुंदर मैथिली बजैत छलाह | बीच- बीच मे अंग्रेजीमे सेहो बजैत छलाह | हुनक अंग्रेजी बाजब सेहो आकृष्ट केलक | हमहूँ ठाढ़ भ’ क’ हुनक बात सून’ लगलहुँ | ओ देशक स्थिति पर बात करैत छलाह | बेरोजगारी पर बात करैत छलाह | एक –दू आदमी कखनो क’ किछु टोक दैत छलनि , ओ ओइ पर बाज’ लगैत छलाह | एतेक सुंदर मैथिली आ अंग्रेजी हम एहिसं पहिने नहि सुनने छलहुँ | हमरा नीक लगैत छल | थोड़े काल बाद एक आदमी उठलाह त’ हम ओत’ बैसि गेलहुँ | एकटा ट्रेन एलै त और दू टा व्यक्ति चल गेलाह | ओ हमरा दिस तकलनि | .विद्यार्थी, अहाँ हावड़ा चलब ? हं | हम कहलियनि | ओत’ कोनो काज करै छी की ? फेर वैह पुछलनि ‘ पहिले बेर जा रहल छी ? हं | हम कहलियनि | गप्प हुअ’ लागल | ओइ ठाम के रहैत छथि ? पिसिऔत भाए छथि | और एकटा कुटुंब छथि | भाइ साहेब कत’ रहै छथि ? शाम बाजार लग | की करै छथि ? ट्यूशन करैत छलाह | एखन और किछु करैत छथि की नहि से नै बुझल अछि | हुनका बूझल छनि जे अहाँ आबि रहल छी ? एखन त नै कहने छियनि | दोसर कुटुंब कत’ रहै छथि ? हम हुनकर पता देख’ देलियनि | हुनको पता नै हेतनि जे अहाँ आबि रहल छी ? हुनको नै कहने छियनि | एखन अहाँ घूम’ जा रहल छी पांच-दस दिन लेल कि और किछु उद्देश्य अछि ? हम चाहै छी कोनो नोकरी अथवा ट्यूशन भेट जाए | मैट्रिकमे कतेक प्राप्तांक छल ? ६४८ माने ७२ % ? हं | साइंस सब्जेक्टमे ? ७७ % प्री-साइंसमे ? सेकंड डिवीज़न | ५५ % | बी एस सी पार्ट १ मे की उमीद अछि ? आशा अछि ६० % सं उपर नंबर आबि जाय | आगू पढ़बाक विचार नै अछि ? बी एस सी (ए जी )मे नाम लिखा जाइत तखन पढ़ितहुँ | मुदा ६०% सं बेशी अंक आएत तखने संभव अछि | ओ अपन परिचय देलनि | हम डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग केने छी | एक सालसं कलकत्तामे ट्यूशन क’ रहल छी | हम ट्यूशन एही लेल क’ रहल छी जे अप्लाइ करबालेल आ कतहु जेबा-एबा लेल गार्जियनसं मांग’ नै पडय | हमरा विचारसं अहाँकें नीक होइत जे पोलिटेकनिकमे सिविल ब्रांचमे जाक’ एडमिशन ल’ लितहुँ, बी.एस.सी. पार्ट १ के रिजल्ट भेलापर बी.एस.सी.(एजी)मे अप्लाइ क’ दितियै, भ’ गेला पर पालीटेकनिक छोड़ि दितियै आ नै भेल त पोलीटेकनिक जारी रखितहुँ | सिविलमे स्कोप छै | हम दुविधामे पड़ि गेलहुँ | ओ सुझाव देलनि जे अहाँ एकटा काज क’ सकैत छी |कलकत्ता विदा भ’ गेल छी त चलू, किछु दिन घुमि-फिरि क’ सोचि लिय’ जे अहाँ एत’ रहि सकै छी कि नै | अहाँ अपने निर्णय लेब त ठीक रहत | हुनकर ई बात हमरा बेशी नीक लागल | हवड़ा जंक्शन पर उतरि ई बता देलनि जे अपेक्षित जगह पर पहुँचबा लेल कोन बस कि ट्राम पकड़ब ठीक रहत | एहि संगे इहो कहलनि जे चारिम दिन रवि छै, हम दू बजे तक गिरीश पार्क पहुँचब |अहाँ आबि सकी त ओहि दिन ओत’ आउ, अहाँक निर्णय सुनबामे नीक लागत | ओ इहो कहलनि जे जौं अहाँ इएह तय करब जे एतहि रहब त हम तत्काल एक-दूटा ट्यूशन पकड़यबामे मदति करबाक कोशिश करब | जाहि दू गोटेक पता हमरा लग छल, हुनका लोकनिसं भेंट भेल | हुनका सबहक आवास देखलाक बाद हमर दुविधा समाप्त भ’ गेल |हम रविदिन गिरीश पार्क पहुंचि हुनका अपन निर्णय कहलियनि जे हम तुरत गाम वापस जाएब, पोलिटेकनिकमे एडमिशन लेब, बी.एस.सी.पार्ट १ के रिजल्ट निकललापर जौं हमरा एग्रीकल्चरमे एडमिशन भ’ जाएत त पोलिटेकनिक छोड़ि क’ एग्रीकल्चरमे एडमिशन ल’ लेब | ओ बहुत प्रसन्न भेलाह | गिरीश पार्क लग कोनो होटल रहै ओत’ दूटा रसगुल्ला आ एकटा समोसा खुआक’ हमरा विदा क’ देलनि |हमरा पाइ नै देब’ देलनि |कहलनि एखन अहाँ नै कमाइ छी, हम त कमाइ छी | (४) हम दरभंगा पोलिटेकनिकमे सिविलमे एडमिशन ल’ एलहुँ | गामसँ बससँ जाए-आब’ लगलहुँ | एत’ किछु क्लास एकटा हॉलमे होइ छलै जे सड़क के बगलेमे छहरदेबालीक अंदर छलै |दू कात खूजल | ओकर देख-रेख ठीकसं नै होइत छलै | डेस्क पर चिड़ै सभक चट्टक देखि लागल जे हम एतहु नहि रहि सकैत छी | पढ़ाइ सेहो नीक नै लागल | हम मनब’ लगलहुँ जे एग्रीकल्चरमे एडमिशन भ’ जाए आ एहि ठामसँ मुक्ति भेटय | २८ दिन क्लास केलहुँ | बी.एस.सी.पार्ट १ के रिजल्ट निकललै | हमरा ६१.२ % अंक आएल | एग्रीकल्चरमे अप्लाइ क’ देलियै | एडमिशन भ’ गेल | ६० % सं उपर अंक वला हमही रही | ई हमरा लेल चिंताक विषय भ’ गेल | हम सोचय लगलहुँ जे ६० % सं उपर अंक वला और लोक सभ किए ने अप्लाइ केलकै | हम विचलित भेलहुँ | किछु लोक कहलनि अहाँकें नीक होइत जे एक साल सिंगल सब्जेक्ट बायोलॉजी पढ़ितहुँ, साठियो नंबर आबि जाए, त मेडिकलमे एडमिशन भ’ जाएत | हम लोभमे पड़ि गेलहुँ | निश्चितकें छोड़ि अनिश्चित दिस दौड़ि गेलहुँ | हम तिरहुत कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर,ढोली,मुजफ्फरपुर सँ अपन नाम कटाय पुनः आर.के.कॉलेज, मधुबनी आबि गेलहुँ | ओत’बी.एस.सी.पार्ट २ मे नाम लिखाओल आ सिंगल सब्जेक्ट बायोलॉजीक तैयारी करबामे लागि गेलहुँ |हमरा प्री-साइंसमे बायोलॉजीमे कम सं कम पास मार्क्स आनब जरूरी छल मुदा बी.एस.सी.पार्ट १ मे बायोलॉजीमे कमसं कम साठि अंक आनब जरूरी छल | एके विषयक परीक्षा देबाक छल |हमरा आसान लगैत छल | मुदा जे आसान लगैत छल, कठिन साबित भेल | हमर शिक्षक हमरा ट्यूशन पढबाक सलाह देलनि | एखन धरि ट्यूशन नहि पढने छलहुँ | ट्यूशन पढब ख़राब बुझैत छलहुँ |हम नै बुझैत छलिऐक जे ट्यूशन पढलासं प्रैक्टिकलमे नीक अंक आनब आसान भ’जाइत छैक | हमर एहि अज्ञानतासँ हानि भेल | बायोलॉजी हमरा लेल एकदम नव विषय छल | ओकरा शुरूसं पढ़क छल | हमरा बायोलॉजीक प्रैक्टिकल क्लासमे दिक्कत भेल | चालीकें,झींगुरकें, बेंगकें चीरिक’ ओकर अध्ययन करबामे दिक्कत भेल | फोटो बनाएब, लेबलिंग करबामे दिक्कत भेल | शिक्षक हमरा दिक्कतकें हल करबामे रुचि नै लैत छलाह | हम प्राचार्य महोदय लग शिकायत केलहुँ | प्राचार्य महोदय हुनका बजा क’ किछु कहलथिन | ओ भीतर सं नाराज भ’ गेलाह |हमर कठिनाई बढि गेल | हम बाबूकें कहलियनि | बाबू ओकील साहेबकें कहलखिन | ओकील साहेब ओहि कॉलेजक छात्र रहल छलाह | हुनकर धाख छलनि | ओ हमरा सोझेमे हुनका कहलखिन | ओ यथासंभव मदति करबाक आश्वासन देलनि |मुदा व्यवहारमे हमरा तकर अनुभव नहि भेल | हम अपन तैयारी करैत रहलहुँ | चित्र बनेबाक अभ्यास,लेबेलिंग करबाक अभ्यास करैत रहलहुँ | एके विषयक परीक्षा देबाक छल | मुदा विषय एकदम नव छल | आ कॉलेजक पढ़ाइक भरोसे नै रहि सकै छलहुँ | शिक्षक हमर शिकायतसं अपमानित अनुभव केलनि |परिणाम ओही दिन निर्धारित भ’चुकल छल | प्री-साइंसक परीक्षासं चारि दिन पहिने बोखार लागि गेल | डा.सं संपर्क केलहुँ |कहलियनि एहेन दबाई दिय’ जे हमर परीक्षा नहि छूटय | बोखार उतरि गेल | हम परीक्षा देलहुँ |मुदा,ओही राति हमर आबाज बंद भ’ गेल | मुंहमे कांट जकां गरय लागल | हमरा लादि क’ मधुबनी अस्पताल ल’ गेलाह बाबू | हम कागत पर लीखिक’ देलियंनि जे हम बोखार उतारक लेल अमुक दबाई सभ खेने छलहुँ | तीन दिन तक कोनो सुधार नहि भेल |डा.कहलखिन जे ड्रग रिएक्शन भेल छनि, ठीक हेबामे समय लगतनि | पांच दिनक बाद एक सप्ताह तक खाली दालिके पानि पर रहलहुँ |करीब सत्रह दिन अस्पतालमे भर्ती रहय पडल | नीक बात ई भेल जे बी.एस.सी.पार्ट-१ के परीक्षा हेबासं पहिने हम ठीक भ’ गेलहुँ | अस्वस्थ हेबाक परिणाम परीक्षा-फल पर पडल | बी.एस.सी.पार्ट-१ के परीक्षाक परिणाम ई भेल जे १% माने ५ अंक कम रहबाक कारण मेडिकलमे हमर नामांकन नहि भ’ सकल |हमरा फेर मोन पडल ‘तिरहुत कृषि महाविद्यालय,ढोली,मुजफ्फरपुर’| एहि बेर मेधा सूचीमे हमर स्थान सोलहम छल |५० टा सीट छलै | हम तय केलहुँ जे आब अन्यत्र कतहु नहि जाएब | हॉस्टलमे हमरा संग भेलाह सहरसाक बनगामक नारायण मिश्र | पहिल दिन सबेरे ७ बजे प्रैक्टिकल क्लासमे सभकें कोदारि पकड़ा देल गेलै |१ धुर खेतमे गहूमक खेतीक लेल माटि तैयार करबाक छलै | प्रैक्टिकल ९० मिनट चललै | नीक नै लागल | मुदा आब आन कोनो विकल्प नै छल | आब नीक-अधलाह सोचबाक समय सेहो नै रहल | ७ सं ८.३० तक प्रैक्टिकल |१ घंटामे स्नान, जलपान क’क’ ९.३० पर क्लास शूरू |१.३० बजेसं २.३० बजेक बीच भोजन क’क’ पुनः क्लासमे जाउ | ५ बजे फाइल हॉस्टलमे ध’क’ १ घंटा घुमि-फिरिक’ आउ, ८.३० बजे तक पढू-लिखू | ओकर बाद भोजन मेसमे जा क’ करू |ओकर बाद किछु काल आपसमे गप-सप करै जाउ | दोसर कि तेसर दिन छलै | भोजनक बाद हम सभ अपन-अपन कोठलीमे सूत’ गेलहुँ | पहिल निन्न छलै सबहक | हल्ला उठलै |सभ रुमक केबार बाहरसं बंद क’क’ बेरा-बेरी केबार पीट-पीट क’केबार खोलब’ लगलै | एक रूम खोलाक’ ओहिमे जे दू छात्र छलाह,हुनका पर प्रश्नक बौछार होम’ लगैत छल, २०-२५ के संख्यामे छलाह आक्रमणकारी |लगैत छल जेना डकैती भ’ रहल हो | एक रूममे ५-७ मिनट समय दैत छलाह | निकल’ लगैत छलाह त रूम कें बाहरसं बंद क’ दैत छलाह | हमरो सबहक नंबर आयल | केबार पीट’ लगलाह | हनुमानजी मोन पडलाह | केबार खोललहुँ | आक्रमण ! किछु हमरा लग एलाह, किछु मिसरजीकें घेरलनि | क्या नाम है ? कहाँ घर है ? कितना मार्क्स था ? एग्रीकल्चर पढ़कर क्या करोगे ? सीनियर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना है ? ये टीकी क्यों रक्खा है ? कौन सी हिरोइन अच्छी लगती है ? क्या अच्छी लगती है ? और बहुत रास ऊंटपटांग सवाल | हमर टीक नै भेटलनि | मिसरजीक टीकपर आक्रमण केलनि | मिसरजी बहुत नेहोरा क’क’ टीकक रक्षा केलनि | हमरा आज्ञाकारी बालक जकां सबहक पएर छूब’ पडल | सीनियरक समक्ष शिष्टाचारक पालन करबाक सलाह आ प्रतिक्रियामे किछु नै करबाक चेतावनी दैत ओ सभ रूमकें बाहरसं बंद कय दोसर रूम दिस जाइ गेलाह |पच्चीसटा रूम करीब एक घंटामे निपटबैत गेलाह | हम सभ बड़ी काल धरि गुमसुम बैसल रहलहुँ |बेर-बेर इएह सोचै छलहुँ, आब कत’ जाएब ? एना फेर नै हो से के कहत ? किछु कालक बाद कियो एकटा रूम बाहरसं खोलि देलकै | बस सब रूम खुजि गेल | लोक जेना जेलसं निकलल हो तेना उत्साहमे हो हल्ला करैत एकठाम जमा भ’ क’ अपन-अपन रूमक घटनाक वर्णन करय लागल | बड़ी काल आलोचना होइत रहल | रातिमे निन्न नै भेल | बहुत दिनक बाद किछु लिखबाक मोन भेल | एहि घटनाकें रचनामे अनबाक प्रयास केलहुँ | तैयार भेल एकटा रचना जकर किछु पाँती प्रस्तुत अछि : सुनो यार मैं करता हूँ रैगिंग का भंडाफोड़ रात अचानक आये जाने- पहचाने चोर | आए वो ऐसे जैसे लुटेरा तोड़के हॉस्टल का नादर्ण घेरा, कुछ नीचे कुछ उपर जाकर लगे मचाने शोर रात अचानक आये जाने-पहचाने चोर | रात अँधेरी, हम सोये हुए थे मीठे-मीठे ख्वाबों में खोए हुए थे तभी सुनाई पड़ी कानमें, खोल कोठरी खोल रात अचानक आये जाने-पहचाने चोर | मिश्रजी देखलनि, किछु और गोटे देखलनि | दोसर दिन खूब एहिपर गाना-बजाना भेल | एहिसं किछु कलाकार सभ प्रगट भेलाह | एहि कांडसं लाभ ई भेलै जे नव छात्र सभ जल्दी एक दोसरसं परिचित भेलाह | गडबड ई भेलै जे सेकेण्ड इयरक हॉस्टलमे ई बात पता चललै जे हुनके सभकें लक्ष्य क’ क’ ई गाना-बजाना भ’ रहल छै | सेकेण्ड इयरक हॉस्टलमे बजाओल गेल | अनिष्टक आशंका भेल | नै जाएब त आदेशक अपमान मानल जाएत | सोचलहुँ जे देखबनि नाराज त माफ़ी मांगि लेबनि | कहने रहय झाजी बुलाये हैं,से नीको लागल | विदा भेलहुँ | मिश्रजी सेहो संग भेलाह | ‘सुना है तुमने हमलोगों पर कोई गाना-उना लिखा है ? जरा सुनाओ तो |’ हम गाबि क’ सुना देलियनि | ‘फ़िल्मी गीत कोई गाते हो ? कोई सुनाओ तो |’ हमरा मुकेशक गाओल गीत ‘आप से हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया’ अबैत छल, सुना देलियनि | ‘ओ एक पाँती गुनगुनाक’ कहलनि ‘इसको ऐसे गानेसे और अच्छा लगेगा |’हुनक स्वर नीक लागल | ओतहि बैसल एक गोटे पुछ्लनि ‘अहाँ मैथिलीमे नै लिखै छी ?’ आब हम आनंदित भेलहुँ | हमरा भेल भरिसक इहो लिखैत हेताह, तें पुछ्लनि अछि |ओ पुछलनि ‘जीवकांतजीकें जनै छियनि ?’ ‘आ हा हा, हुनका कोना ने जनबनि ? मिथिला मिहिरक सभ अंकमे हुनकर रचना रहिते छनि |मुदा अहाँ कोना ....?’ ‘हमर जेठ भाइ साहेब छथि |’ हम आनंदमे ड़ुबि गेलहुँ | बड़ी काल गप भेल | घुरैत काल प्रसन्न रही | चलैत काल ओ आश्वस्त केलनि जे आब कोनो समस्या नै हैत, हुअए त कहब | मोन हल्लुक भेल |डर ख़तम भेल | परंपराक अनुसार रैगिंगक पश्चात् एकदिन सीनियर द्वारा वेलकम पार्टी देल गेलै जाहिमे किछु प्राध्यापक लोकनि सेहो आमंत्रित भेलाह | भाषण-भूषण भेलै | सांस्कृतिक कार्यक्रम भेल जाहिमे हमरासं रैगिंगवला ओ गीत सेहो सुनल गेल | सीनियर द्वारा जूनियर छात्रसं अनुशासनमे रहबाक आ परम्पराक पालन करबाक अपेक्षा कयल गेल आ बदलामे जूनियरकें सभ तरहें सुरक्षा आ सहायता देबाक आश्वासन देल गेल | थोड़े दिन त ई कठिन लगैत छल जे रस्तामे जते सीनियर भेटथि तिनका झुकि क’ ‘प्रणाम सर’ कही,मुदा किछु दिनक बाद हम सभ अभ्यस्त भ’ गेलहुँ आ ई आदति बनि गेल | सीनियर सभसं पता चलल जे हम परुका कॉलेज नै छोड़ने रहितहुँ त हमरा आई सी एस ए आर सं १०० रु.मासिकक स्कालरशिप भेटैत आ हॉस्टलमे रहबा लेल सिंगल सीटवला रूम जे मेरिट लिस्टक अनुसार दू टा छात्रकें भेटैत छलै |ई हानि भेल मुदा लाभ ई भेल जे एक साल जे बायोलॉजी पढलहुँ से काज देलक | स्कालरशिपक एकटा अवसर छल कॉलेज दिससं जे एडमिशन भेलाक एक मासक बाद एकटा परीक्षाक परिणामक अनुसार चारिटा छात्रकें कॉलेज दिससं देल जाइत छलैक | हम एहि परीक्षामे दोसर स्थान पर रहलहुँ | पहिल स्थान पर छलाह दुलार चन्द्र मिस्त्री |बोटनीक प्राध्यापक श्रीवास्तवजी मिस्त्रीजीक वर्णन आ हमर बनाओल चित्र आ ओकर आकर्षक लेबेलिंगक प्रशंसा केलनि |एक साल जे बायोलॉजी पढ़लहुँ, तकरे परिणाम छल ई |हमर अनुभव केलहुँ जे कएल श्रम जँ एक ठाम काज नै आयल त एकर मतलब ई नै जे ओ व्यर्थ भ’ गेल, ओ कोनो दोसर ठाम काज आबि जाएत | एहि परीक्षाक आधार पर ५० रु. मासिकके स्कालरशिप भेटल | मिस्त्रीजीकें बादमे मेडिकलमे एडमिशन भ’ गेलनि, तें ओ कॉलेजसं चलि गेलाह |आब एहि परीक्षाक परिणामक अनुसारे यदि हमर तैयारी चलैत रहैत त हम कॉलेजक टॉपर रहितहुँ, मुदा एकटा विचलन सभटा गडबडा देलक |एहि विचलनक कथा आगाँ कहब | कॉलेजमे खूब मोन लाग’ लागल | कॉलेजक भवन नीक | रंग-विरंगक फूल सभ नीक | हॉस्टलक व्यवस्था नीक, भोजन-जलपानक व्यस्था नीक, शिक्षक सबहक व्यवहार नीक, पढ़ाई नीक | शिक्षक सभ ठीक समय पर अबैत छलाह, एकोटा क्लास खाली नै जाइत छल | ओहि समय अधिकतर सामान्य कॉलेजमे पढाइक स्थिति बहुत नीक नै रहि गेल छलैक | हमरा विषय सेहो नीक लगैत छल | गाम पर बाबा आ बाबू खेतीमे नै भिड़बैत छलाह ई सोचिक’ जे पढाइमे बाधा हेतनि मुदा आब खेतीए हमर पढ़ाइक विषय भ’ गेल छल | खेतीक वैज्ञानिक पक्षसं परिचित भ’ रहल छलहुँ | माटिमे की सभ छै जे पौधा सभक लेल भोजनक काज अबैत छै, कोन फसिल ले’ केहन माटि काज अबैत छै,पौधा सबहक विकासमे कोन तत्वक की भूमिका छै,कोन तत्वक कमीसं पौधा सभ पर की प्रभाव पड़ैत छै, नाइट्रोजन-फॉसफोरस-पोटाशक की उपयोगिता छै,कोन फसिल ले’ खेतक तैयारी केहेन हेबाक चाही,कोन खाद कखन आ कतेक मात्रामे आ कोना देबाक चाही | पानि कतेक आ कखन-कखन देबाक चाही, कोन कीड़ा कोन फसिलकें कोना क्षति पहुँचबैत छै, ओइसं कोना फसिलक रक्षा करबाक चाही आदि कतेक वस्तुक ज्ञान प्राप्त कराओल जा रहल छल | जखन गाम जाइ छलहुँ त दरभंगामे ‘मिथिला मिहिर’ कीनि क’ नेने अबैत छलहुँ | पढाइक संग-संग ‘मिथिला मिहिर’पढ़ब सेहो दिनचर्यामे आबि गेल छल | भाषाक आ स्वभावमे अधिक समन्वक कारण तीन गोटे सं बेशी अपनत्वक अनुभव करय लगलहुँ |नारायण मिश्र जे हमर रूमक संगी छलाह, बनगाम (सहरसा)क छलाह आ हुकर जेठ भाइ साहेब एल एस कॉलेजमे फिजिक्सक प्राध्यापक छलथिन |मिश्राजी समय निकालिक’ गीताक पाठ सेहो क’ लैत छलाह | जखन-तखन ओ बुझबैत छलाह जे गीतामे कृष्ण भगवान अर्जुनकें की कहलखिन आ किए कहलखिन |नन्द कुमार झा मोहना (झंझारपुर)क छलाह, हुनक बाबूजी रेलवेमे समस्तीपुरमे काज करैत छलथिन आ जेठ भाइजी इंजिनियर छलथिन |अशोक कुमार ठाकुर पूर्णियांक छलाह, हुनक जेठ भाइजी हुनका पढ़ाइक लेल बहुत परिश्रम करैत छलथिन | हम सभ संगे टहल’ जाइ छलहुँ |गप सप करैत छलहुँ | विवाहक गप सेहो होइत छल |सभ कियो कहैत छलहुँ जे अविवाहित छी |हमरा सभमे अपेक्षाकृत सभसं नीक कपड़ा नन्द कुमार झाजी पहिरैत छलाह |ओहो कहैत छलाह जे विवाह नै भेल अछि |हम सब इएह बुझैत छलहुँ | एक दिन ई झूठ साबित भेल | ओहि दिन हम भोजन क’क’ पहिने हॉस्टल आबि गेलहुँ | झाजी नै आएल छलाह |पोस्टमैन हुनकर चिट्ठी ल’क’ हुनकर नाम बाजल | हम कहलियै, हमरा द’ दैह हम द’ देबनि | पोस्ट कार्ड रहै | हमरा द’ देलक |हमर नजरि अटकि गेल ‘प्रिय ओझाजी’ | हम अपनाकें रोकि नै सकलहुँ अनकर चिट्ठी नै पढबाक चाही, से ध्यान नै रहल | चिट्ठीसं पता चलि गेल जे हिनक विवाह कोन गाम भेल छनि |हमरा लेल ओ चिट्ठी मनोरंजनक लेल महत्वपूर्ण भ’ गेल | चिट्ठीमे एहेन कोनो बात नै रहै जे तत्काल नै भेटलासं हुनका कोनो क्षति होइतनि | तें हम चिट्ठीकें चोराक’ राखि लेलहुँ | मिश्राजीकें देख’ देलियनि |फेर ठाकुरजीकें देख’ देलियनि | हम सभ और ककरो ई बात नै कहलियै |घुमा-फिरा क’ झाजीकें पुछै गेलियनि | हुनका संदेह भेलनि | हमरा एसगरमे पुछ्लनि,’हमर कोनो चिट्ठी आयल अछि ठाकुरजी ?’ हमरा हंसी लागि गेल | ‘अहाँ परेशान किए होइछी ?’ ‘नै ठाकुरजी, हम नेहोरा करैछी, और ककरो नै कह्बै |’ हमरामे बैसल कलाकार बाजि उठल ‘अहाँ एसगर थोड़े छी ? विवाह त हमरो भ’ गेल अछि |ऐमे डरबाक की प्रयोजन ?’ हमरो विवाह भ’ गेल अछि से जानि हुनका जानमे जान एलनि | ‘सभ बूझत त मजाक कर’ लागत, पूछि-पूछि क’ परेशान क’ देत |’ ‘अच्छा अहूँ हमरा विषयमे नै ककरो कह्बै |’ ‘ठीक छै |’ हम दूनू तय केलहुँ जे चारि के अतिरिक्त ककरो ई सूचना नै भेटबाक चाही | हम त तीन गोटेकें कहने छलियनि | बात तीनसं तेरह तक पहुंचि गेलै | किछु लोक घुमा-फिरा क’ आ बादमे सोझे मजाक कर’ लगलनि जाहिसं झाजी एकरा ब्रीच ऑफ़ कॉन्ट्रैक्ट मानलंनि आ प्रतिक्रियामे ओहो हमर विवाहक (?) पोल खोलि देलनि मिश्राजी आ ठाकुरजी लग | हम हिनका सभकें कहलियनि जे ई बात झूठ छै मुदा ई दूनू गोटे नहि मानलनि | अंतमे हमही मौन भ’ गेलहुँ | आब हिनका सबहक संदेह पक्का भ’ गेलनि | शुरू भेल एकटा नाटक |हम पर्दाक पाछू भ’ गेलहुँ |नटकिया अनिलजी प्रगट भेलाह | गाममे नाटकमे भाग नेने रही | फैसला नाटकमे नायकक भूमिका आ उगना नाटकमे विद्यापतिक भूमिकाक निर्वाह क’ चुकल छलहुँ |से अनिलजी नवविवाहित नवयुवकक भूमिकामे आबि गेलाह |अपनहि लिखलनि अपन पटकथा |विवाह भेल छनि |लोकक दवाबमे विवाह कर’ पडलनि |कनियाँसं मतान्तर रहैत छनि | घरक आनो लोक सबहक व्यवहार पसंद नै छनि |ककरोसं पत्राचार नै होइत छनि | सासुर नै जाइत छथि |आरो बहुत रास बात | परिणाम ई भेलै जे हम सबहक सहानुभूतिक पात्र भ’ गेलहुँ | मिश्राजी हमरा सुनब’ लगलाह जे गीतामे कृष्ण भगवान अर्जुन कें की सभ कहलखिन |हम पढ़ाइक संग-संग गीता सेहो बुझ’ लगलहुँ |कृष्ण भगवान अर्जुनकें बुझेलखिन | मिश्राजी हमरा बुझबै छलाह |ओ हमर कथाकें ध्यानपूर्वक सूनिक’ ओकरा पर गंभीरतासं विचार करैत छलाह आ बुझबैत छलाह जे हमरा की करबाक चाही | हमहूँ अपन कल्पनाक संग आगू बढ़ल जा रहल छलहुँ |सभ संगी सभ सेहो अपन-अपन अनुभवक आधार पर उचित सुझाव दैत जा रहल छलाह |सभक ह्रदयमे हमर पत्नी(?)क लेल करुणा उमरि रहल छलैक:’ ओइ बेचारीक कोन दोख ?’ सुनै छियै जे रामक जन्मसं पहिने रामायण लिखा गेल छल अर्थात जे वाल्मीकि लिखि देलखिन ओएह रामक जीवनमे घटित भ’ गेलनि | रामक कथाक संग-संग वाल्मीकिजी अपनो भविष्यक कथा लिखलनि | हमहूँ सभ जे सोचैत छी, जे बजैत छी, जकर अभ्यास करैत छी, वएह हमर भविष्य नहि बनि जाइत अछि ? ओहि समय हमहूँ कहाँ सोचै छलहुँ जे हम जे नाटक क’ रहल छी सएह हमर वास्तविक जीवनक कथा बनय जा रहल अछि | ४ संस्मरण खंड एकटा छलाह ननू कका -ी- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ तैतालिस बरख पहिलुक बात थिक | हम ओहि समय एग्रीकल्चर कॉलेजमे अंतिम वर्षमे पढैत रही | हमर तेसर आ सबसँ छोट बहिनक विवाहक बात घरमे चलैत रहै | माए एकटा कथाक प्रसंगमे चर्च केलनि- ‘होइतै त बहुत सुंदर होइतै |’ ‘ओ नै हएत |’ बाबू कहलथिन | ‘से किए ?’ हम पूछलियनि | बाबू कहलनि जे हुनका सात हजार द’ जाइ छनि से त ओ करैले’ तैयारे नै भेलथिन, आ हम सभ ओतबो कत’ सं देबै ? हम कनी काल गुम्म रहलहु | हम लड़काकें जनैत छलियनि | हमर दोसर बहिनक विवाह जिनकासं भेल छलनि हुनकर पितिऔत भाए छलथिन | हिनक माए नै छलथिन | बहुत दिन भ’ गेलनि | पिता दोसर विवाह नै केलथिन | दूनू भाइ पढैत छलाह | आंगनमे एकटा दोसर पितिऔत छलथिन हुनके आश्रममे ई दूनू भाई रहैत छलाह | हुनक पत्नी हिनका सभकें अपने पुत्र जकां मानैत छलथिन | हिनक पिता विराटनगर लग मोरंगमे रहैत छलथिन | ओत’ पटुआक खेती बहुत दिनसं करैत आबि रहल छलथिन |हुनकासं हमरा बेशी भेंट-घांट नै छल किन्तु लड़का जे छथि हुनका नीक जकां जनैत छलियनि | हुनक पढाई-लिखाइ आ बुद्धि-विचार हमरा नीक लगैत छल, तें हम मोने-मोन तय केलहुं जे हमरा सभकें ऐ कथापर जोर देबाक चाही | बाबू कें कहलियनि, ‘हम एक बेर प्रयास कर’ चाहैत छी,मुदा एक विन्दुपर विचार कर’ पडत |’ ‘की ?’ बाबू पुछलनि | हम कहलियनि जे पाइ लेथीन त ओकर हिस्सा खेत बेचि क’ द’ देबै, भाए रहैत त ओकरो हिस्सा त हेबे करितै | बाबू किछु सोच’ लगलाह | फेर कहलनि ‘जखन तोरे ई विचार छ’ त जाह-देखहक़ |’ हम विदा भेलहु | हमर मझिली बहिन ओतहि छलि |ओकरो विचार नीक लगलइ | पहिने लड़कासं भेंट केलियनि | हुनका पुछलियनि ‘यदि अहांक पिता हमरा ओत’ विवाह तय क’ लेथि त अहाँकें कोनो आपत्ति त ने हएत ?’ ओ कहलनि, ‘ननू कक्का (बाबूजी)क बात हम नै काटि सकैत छियनि, मुदा ओ त’ चारिए दिन पहिने गेलाहे’ गामसं,अइ साल विवाह नै हेतै, इएह निर्णय क’क’ गेलाहे’ |’ हम कहलियनि, ‘हम हुनकासं भेंट कर’ चाहैत छी एक बेर, निर्णय त जे हेतनि, हुनके हेतनि |’ ओ विराटनगर लग मोरंगमे रहैत छलाह | सकरी जंक्शनसं निर्मली, निर्मलीसं जोगबनी आ ओत’सं तीनटा धार टपि क’ चारि-पांच कोस पएरे जाय पडैत छलैक | हुनका गामक किछु आदमी हमरा एकांतमे कहलनि, ‘ओ पाइ नै छोड़ताह | ओ त बीमारो पडैत छथि त दबाइमे खर्च नै करैत छथि |एत’ कयटा कथा एलनि, सात हजार तक द’ गेलनि मुदा नाकपर मांछी नै बैस’ देलखिन, से सोचि लिय’ |’ हम सबहक बात सुनियो क’ विदा भ’ गेलहु | मनीगाछी स्टेशन लग लड़काक मामाक घर छलनि | हुनकासँ भेंट केलहु | ओहो मना केलनि | कहलनि, ‘अहाँ बेकार हरान होइ छी | हम ओते सुंदर कथा ल’ गेल छलहु से त सुनबे नै केलनि जखन कि कन्यागत सात हजार देब’ ले’ तैयार छलथिन | अहाँ खेत बेचि क’ की पाइ देबनि, की बरियातीक सम्मान करबै आ की विदाई देबनि ? अहाँ घुरि जाउ| एसगर जाइ छी | अहाँ एखन विद्यार्थी छी | रस्तामे तीन टा धार छै | चारि कोस पएरे जाए पडै छै | बेकार हरान हएब | ओना अइ साल त विवाह हेबे नै करतै, ओ इएह तय क’क’ एखन गेलाहे |’ हम तैयो चल गेलहु | पहिने अपन बहिनो कें भेंट केलियनि | ओ नेपाल सरकारक स्वास्थ्य विभागमे काज करैत छलाह | एकटा फूसक घरमे ननू ककासं अलग जेठ भाएक संग रहैत छलाह | ओ सभ कहलनि- ‘ननू कक्काकें अहाँ अपने कहियनु |’ ननू कक्का ओत’ पहुंचलापर हुनका प्रणाम क’क’ अपन अभिप्राय कहलियनि |ओ सभटा बात ध्यानपूर्वक सुनि क’ कहलनि जे एकर जबाब हम परसू सांझमे देब | हुनके सबहक ओत’ रहलहु | हुनके अनुसार दू दिन एहि विषयपर कोनो बात नै केलहु | तेसर दिन नियत समयपर जखन पूजा क’क’ उठलाह त पुछलियनि | ओ कहलनि जे हम तय केलहु जे विवाह अहींक ओत’ हेतै मुदा हमर एकटा बड़का शर्त अछि तकर पालन करबाक वचन दिय’ | हम कहलियनि, ‘अपने स्पष्ट करियौ | हम जे तय क’क’ आयल छी से कहिये देने छी | अहांक मांग हमरा सामर्थ्य सीमा धरि हयत त हम अवश्य पूरा करब |’ ओ कहलनि, ‘हमर मांग अहांक सामर्थ्य सीमाक अनुकूले अछि मुदा हमरा भरोस नै अछि जे अहाँ पूरा करब, तें अहाँ हमरा वचन दिय’ जे अवश्य पूरा करब |’ हम कनेक भयभीत होइत कहलियनि-‘ठीक छै, हम अवश्य पूरा करब |’ ओ तखन कहलनि, ‘हमर शर्त ई अछि जे विवाह ताहि रूपें हुअए जे विवाहसं द्विरागमन धरिक खर्चले’ अहाँकें ने एको धुर खेत बेच’ पडय ने भरना राख’ पडय, ने ककरोसं कर्ज लेब’ पडय |इएह हमर शर्त अछि | अहाँ वचन देलहु अछि,आब अहाँकें एकर पालन कर’ पडत |’ हमरा अपना कानपर विश्वास नै भ’ रहल छल | ख़ुशीसं हम कान’ लगलहु | हम सोचै छलहु हिनका द’ लोक सभ की की कहने छल आ ई की कहि रहल छथि | एकदम साधारण बगएमे रह’वला लोकक भीतर एहेन श्रेष्ट पुरुष विद्यमान भ’ सकैत छथि, एकर हम कल्पना नै क’ सकैत छलहु | हमरा गुम्म देखि ओ कहलनि, ‘अहाँकें खेत बेचबा क’, कर्जाक त’रमे द’ क’, अहाँक ओत’ कुटमैती करब ? राम-राम |’ फेर ओ अपन जीवन,दिन-चर्या, मनोरथ सबहक चर्च विस्तारसं केलनि | कहलनि हमर एकेटा मनोरथ छल जे नीक लोकक संग होइन, से हमरा नै भेटैत छल, पाइवला त बहुत अबैत छलाह मुदा कतहु हमर मोन नै मानलक, तें गाममे कहलियै जे अइ साल नै करब | ओत’ एक बीघामे पटुआक खेती करैत छलाह आ संगहि पंडित-पुरोहितक काज सेहो | कहलनि जे पाइ त दुनू भाइले’ एते छनि जे मनुक्ख जकां खर्च करताह त कोनो चीजक अभाव नै हेतनि आ हमरो क्रिया-कर्मले’ सोच’ नै पडतनि, जखन एते पाइसं नै काज चलतनि आ अपन पुरुषार्थसं नै हेतनि त अहाँकें कंगाल बनाक’हेतनि ? ओ अपने दिन तकलनि | करीब डेढ मॉस आगांक दिन | दूटा छोट-छोट चिट्ठी लिखलनि, एकटा पुत्रक नामे आ दोसर अपन जेठ भाएक नामे | पुत्रकें लिखलथिन-हम हिनका ओत’ एकदम आदर्श विवाह तय क’ लेलियनि |फलां तारीख क’ नीक दिन छै | आशा अछि अहाँकें हमर निर्णय पसंद हएत | शेष भेंट भेला पर | हम चारि दिन पहिने एबाक कोशिश करब | जेठ भाएकें लिखलथिन—हिनका ओत’ हम एकदम आदर्श विवाह तय क’ लेलियनि |फलां तारीख क’ नीक दिन छै | ओही दिन विवाह हेतै | हम एबे करब | यदि कोनो कारणसं ओइ दिन धरि नै पहुचि पाबी त हम अहाँकें ई अधिकार दै छी जे अहाँ जा क’ विवाहक काज संपन्न करा देबनि जाहिसं विवाहमे कोनो बाधा नै होइन | दूनू चिट्ठी हमरा हाथमे द’ देलनि | चलै काल पुनः शर्तक स्मरण करौलनि | हम कहलियनि ‘मात्र एते आजादी दिय’ जे प्रसन्नतापूर्वक जे क’ सकी से करी |’ कहलनि –नै,ककरोसं कर्ज ल’क’ वा खेत-पथार भरना राखिक’ वा बेचिक’ नै, ने त हमरा आत्माकें चोट पहुंचत | हुनक चरण स्पर्श करैत विदा भेलहु | हम बहिनो आ हुनक जेठ भाएकें कहलियनि त हुनको सभकें आश्चर्य भेलनि आ प्रसन्नता सेहो | ओ लोकनि सुझाव देलनि जे जखन एतेक उदारता देखौलनिहें त विदाई आदिक ध्यान राखब जरुरी हएत | मोनमे ततेक आनंद भरल छल जे होइत छल जे कतेक जल्दी गाम पहुचि जाइ आ सभकें ई समाद कहि दियै | रस्तामे हुनकर कहल रामचरितमानसक इ दोहा बेर-बेर मोन पडैत रहल : ‘ तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला एक अंग तूल न ताही सकल मिली, जो सुख लव सत्संग |’ हम शिशवा पहुँचलहु आ दूनूकें पत्र द’ देलियनि | बात तुरंत भरि टोलमे पसरि गेलै आ सभ लोक हमरासं तरह-तरहक सवाल कर’ लागल | ककरो विश्वास नै होइ |सभ क्यो अपना-अपना ढंगसं चिट्ठीक अर्थ लगब’ लगलाह | हम भोजन क’क’ थोड़े काल पडलहु कि कियो जगा देलक | देखलहु लड़काक मामा ( जे जाइत काल मनीगाछीमे भेटल छलाह )पहुंचल छलाह |हुनको कोना-ने-कोना खबरि भ’ गेलनि | ओ साइकिलसं एलाह |तारमतोर हमरासं सवाल कर’ लगलाह : ‘अहाँ अबैत काल हमर भेंट किए ने केलहु?’ ‘अहाँ हुनका की सभ कहलियनि ?’ ‘ओ अहाँकें और की कहलनि ?’ ‘हमरा त कहलनि जे अइ साल करबे नै करब तखन कोना अहाकें गछि लेलनि ?’ ‘भाएकें किए लिखलखिनहें जे हम नै आबि सकी त अहाँ जा क’ विवाह करा’ देबै ?’ हम सविनय हुनक प्रश्नक उत्तर देत गेलियनि मुदा ओ हमर उत्तर सुन’ नै चाहैत छलाह | हुनक तामस बढल जा रहल छलनि | हमरा ओ रामलीलाक परसुराम जकां लगैत छलाह | हम चुप्प भ’ गेलहु | ओ बजलाह ‘हुनकर माथा ख़राब भ’ गेलनिहें |’ क्यो किछु नै बजलै | ओ भागिनकें बजा क’ कहलथिन, ‘तोरा बापक माथा ख़राब भ’ गेलनि | हमरा संग चलह आ साफ-साफ़ कहुन जे हम एत’ विवाह नै करब |’ ओ कहलखिन –‘मामा,इ त जाए काल हमरासं पूछि नेने छलाह जे ननूकका यदि स्वीकार क’ लेथि त अहाँकें कोनो एतराज त ने हएत,हम हिनका कहने छलियनि जे ननूककाक बात हम नै काइट सकै छी |एहेन स्थितिमे हम ओत’ जा क’ कहियनि जे हम एत’ विवाह नै करब, अइसं त हिनको अपमान हेतनि आ ननू ककाक सेहो |हम एहेन काज नै क’ सकैत छी |’ हम कहलियनि –‘ यदि अहाँ इ सोचैत होइ जे अहाँक पिताक निर्णय सही नै छनि आ अहाँक इच्छाक विरुद्ध अछि ई निर्णय त ओते दूर जेबाक कोन काज, ई त हमरे कहलासं भ’ जाएत | अहाँक इच्छाक विरुद्ध विवाहक कोनो अर्थ नै छै |’ मुदा ओ मामाजीक सुझावकें साफ अस्वीकार करैत कहलथिन- ‘मामा हम नै जाएब, अहाँ जाए चाही त जाउ, अहाँक कहलासं यदि ननू कका हमरा दोसर आदेश देताह त हम ओकरे पालन करब |’ मामाजी कहलथिन –‘तोरो माथा ख़राब भ’ गेलह |’ मामाजी स्वयं मोरंग जेबाक निर्णय सुनबैत साइकिल ल’क’ विदा भ’ गेलाह | एम्हर हमरा किछु लोक कह’ लगलाह-‘विद्यार्थी, अहाँ किए हल्ला क’ देलियै ? बुझै नै छियै ? आब ई की जा क’ कहथिन की ने आ भेलो काज गडबडा सकैए |’ हमर उत्साह ठंडा भ’ गेल | फेर ई विचार मोनमे आएल जे नहिये हेतै त की हेतै, दोसर ठाम प्रयास करब | मामाजीक बात मोन पडैत छल त निराश होइत छलहु आ ननू ककाक बात मोन पडैत छल त प्रसन्न भ’ जाइत छलहु |अही उहापोहक स्थितिमे ओत’सं अपन गाम आबि गेलहु | गाममे आबिक’ फेर वएह केलियै |लोक जे पुछलक तकरा मोरंगसं शिशवा धरिक बात साफ़-साफ़ कहि देलियै | एतहु लोक हंस’ लागल –‘तोरा हल्ला करबाक कोन काज छलह ? आब हुनकर मामा जेथिन त ओ बात बदलियो सकैत छथि |’ हमर पडोसी पुछलनि जे जत’ लडकाक पितासं गप भेल’ तत’ और कियो रहै ? हम कहलियनि –‘ओत’ त कियो नै रहै |’ लोक बाजय—‘अही दुआरे ने चारि आदमीक बीच बात कयल जाइ छै जे कोनो हेर-फेर होइ त चारि आदमी पूछि सकै छनि, मुदा जखन कियो रहबे नै करै त काल्हि कहत’ जे हम नै कहने रहियनि त की क’ लेबहक ?’ हमरा एकर जबाब किछु नै फुरय | मुदा, हमरा मोनमे ई विश्वास रहय जे ओ निर्णय बदल’वला लोक नै छथि | माए पुछ्लनि, ‘तोरा मोनमे भरोस छ’?’ हम कहलियनि ‘ हं |’ ओ कहलनि –‘तखन हेबे करतै, तखन चिंता नै करह |’ माए-बाबूकें हुनकासं भेल सभटा बात जखन सुनौलियनि तखन हमरा पिताकें सेहो भरोस भेलनि, ओना हमरा पिताकें पढाई-लिखाईक अतिरिक्त आन कोनो काजमे हमरा सफल हेबाक संभावना क्षीण बुझाइत छलनि | विना पाई के एहेन ठाम विवाह ठीक हएब घरमे एकटा तेहेन आनंदक वातावरण बना देलकै जे सभकें ख़ुशीसं होइ जे की करी की ने | तय भेलै जे विवाहसं पहिने घडी, ट्रांजिस्टर, एकटा औंठी, पांचो टूक कपडा आ जूता लड़काकें द’ देल जाए, तें ई सभ पहिने कीनि क’ राखि लेल जाए | बाबू प्रसन्न मोनसं कोनो खेत भरना रखबाक विचार केलनि | हम रोकि देलियनि | हम कहलियनि-‘ओ हमरा सोझां ठाढ़ छथि | कहै छथि हमरा आत्माकें चोट पहुँचत |हमरा हुनक शर्तक पालन कर’क अछि |’ ‘तखन कोना हेतै ?’ बाबू पुछ्लनि | हम कहलियनि ‘हमरा सासुरसं आब’ दिय’|’ हमर विवाह एक साल पहिने भेल छल | द्विरागमन नै भेल छल |हमर ध्यान कनियाँक गहनापर गेल | हम सासुकें विस्तारपूर्वक सभ बात कहि देलियनि |ओ कहलनि-‘गहना-गुडिया एहने समयले’ रहै छै, ओहो त हिनके छनि |भरना राखि क’ एखन काज चलि जेतनि | बादमे नोकरी हेतनि त छोड़ा लिहथि |’ सएह केलियै | सभटा सामान कीनि क’ घरमे राखि लेल गेल | वरियातीक खर्चक व्यवस्था ले’ सेहो निश्चिन्त भ’ गेलहु | हम हुनका एकटा चिट्ठी लिखि क’ पठा देलियनि | हुनका गामपर जे-जे प्रतिक्रिया भेलै, से सभटा लिखैत इहो लीखि देलियनि जे मामाजी गेल हेताह, ओ किछु सुझाव देने हेताह | ओना हमरा पूरा विश्वास अछि, मुदा यदि अपनेकें लागय जे गलतीसं निर्णय लिया गेल अछि त अपने एखनो स्वतंत्र छी निर्णय बदलक लेल, हमर एतबे अनुरोध जे यदि कोनो कारणसं अपनेकें परिवर्तन आवश्यक बुझाए त जल्दीए हमरा सूचित करबाक कष्ट करब जाहिसं हमरा अन्यत्र कतौ प्रयास करबा ले’ समय भेट सकय | चिट्ठीक जबाब नै आएल |ओत’ चिट्ठी बहुत-बहुत दिन पर पहुचैत छलै |फोनक सुविधा त छलैहे नै | जे दिन तय रहै ओइसं चारि दिन पहिने सबेरे-सबेरे एक व्यक्ति साइकिलसं एलाह आ कहलनि –‘ननू कका काल्हि गाम एलाह,अहाँकें बजबैत छथि |’ ओ रुकलाह नै | हम तुरंते तैयार भेलहु | बैगमे सभ किनल सामान लेलहु | रिक्शासं विदा भेलहु | दरबज्जापर एकदम प्रसन्न मुद्रामे भेटलाह | प्रणाम केलियनि | ‘एकदम प्रसन्न रहू |’ ख़ुशीसं बजलाह | हम पुछलियनि-‘हमर चिट्ठी भेटल रहय ?’ ‘हं |’ ओ कहलनि | ‘हम उताराक बाट तकैत छलहु |’ ‘किए ? हमरा बातपर भरोस नै छल ?’ ओ हंसैत कहलनि | ‘भरोस त छल, मुदा कखनो-कखनो ई होइत छल जे मामाजीक कारण अपनेकें निर्णय बदलबाक लेल बाध्य ने हुअ पडल हुअए|’ ओ कहलनि-‘ गेल रहथि | कहलनि, अहांक माथा खराब भ’गेल अछि |कहलियनि अहाँ निश्चिन्त रहू,सेहो हएत त अहाँकें कोनो कष्ट नै देब | हमरा समझाब’ लगलाह | पुछलियनि अहाँ हमरासं जेठ छी कि छोट, कहलनि से त छोटे छी |त कहलियनि जे हम अहाँकें समझाएब कि अहाँ हमरा समझाब’ आएल छी | रहू, भोजन करू,हमरा ख़ुशीमे शामिल होउ | कहलनि जे हमर बात नै मानब त हम वरियातियोमे नै जाएब |हम कहलियनि जे हमरा ख़ुशीमे अहाँकें दुःख हुअए त दुखी मोनसं वरियाती जेबो नै करू | भगला ओत’सं, ओ नै जेताह वरियाती | हम एतहु लोक सभकें कहि देलियनिहें, जे ख़ुशी मोनसं चलि सकथि सएह वरियाती चलथि ने त नै जाथि | जे मनुक्ख जकां भोजन करथि से चलथि, जिनका राक्षस जकां भोजन करबाक होइन से नै जाथि |’ भरल दलान लोक आ एतेक स्पष्ट रुपें बात करब-हमरा लेल एकदम अप्रत्याशित छल | ओ हमरा कहलनि-‘पंद्रह आदमी रहब |अहाँ तरकारी दूटासं बेशी नै करब, दू तौला दही पौरबा लिय’,मात्र एकटा मिठाई राखब, और किछु नै करक अछि |परेशान हेबाक काज नै करब, जएह रहत ताहीमे यश-यश भ’ जाएत |’ हम कहलियनि –‘ अपनेक शर्तक पालन करैत हम सभ आनंदपूर्वक किछु चीजक इन्तिजाम क’क’ अनने छी से ग्रहण करबाक आज्ञा देबनि ?’ हम बैगमे राखल सामान सभ निकाललहु त ओ नाराज होइत कहलनि-‘ई आदर्श भेलै ? जखन एते चीज अहाँसं लैए लेताह तखन कोन आदर्श ?’ हम कतेक तरहें विश्वास दियौलियनि जे एहिमे हमर परिवारक आनंद आ उल्लास अछि, एहि लेल ने खेत भरना राख’ पडल अछि ने ककरोसं कर्ज लेब’ पडल अछि | ओ बालककें बजाक’ कहलथिन –‘ई विद्यार्थी जे किछु ल’ अनने छथि तकरा हिनक आशीर्वाद आ भगवानक प्रसाद बूझि सहर्ष ग्रहण क’ लिय’|’ हम बरजोरी हुनका सभ सामान द’ देलियनि | तेहेन हर्ष आ उल्लासक वातावरण ओ बनौने रहलखिन जे विवाहसं द्विरागमन धरि आनंदपूर्वक सभटा काज संपन्न भ’ गेलै| दुसबाक कोन कथा, साधारण-सं-साधारण चीजक प्रशंसा तेना करैत छलथिन जे सबहक मोन हर्षसं भरि जाइत छलैक | हुनक पुत्र सेहो हुनके लीखपर चलैत कहियो कोनो समस्या नै उत्पन्न होम’ देलथिन | ओ मित्र जकां सदैब रहलाह | हमरा पिताकें अपने पिता समान प्रेम आ आदर दैत रहलथिन |हमर पिता अपन अंतिम दू बरख हमरा लग छलाह परन्तु ओइसं पहिने किछु साल दिल्लीमे हिनके संग आनंदपूर्वक स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त केलनि |दिल्लीमे हमर अनुज लोकनि सेहो हिनक सानिध्य आ प्रेम प्राप्त क’ चुकल छथि | २००३ मे ननू कका ओछाइन ध’ नेने छलाह | २ मार्च क’ भेंट कर’ गेलियनि | कहलियनि –‘आशीर्वाद दियौ, ७ मार्च क’ कन्यादान करक अछि |’ कहलनि-‘सहर्ष आशीर्वाद दै छी, निर्विघ्न सभ काज पूर्ण हएत |’ ननू कका अंतिम समयमे सेहो अपन बात पर अडिग रहलाह | विवाह भेलै, चतुर्थी भेलै, जमाएकें विदा केलियनि | ओकर प्रात ननू कका देह त्यागि देलनि | ननू कका अइ संसारसं विदा भ’ गेलाह, मुदा हम जाधरि जीब, हमरा मोनसं कहियो नै विदा भ’ सकैत छथि ननू कका | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। [एक]- विदेहक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक लेल मुन्नाजी द्वारा अनिल जी सं लेल ई-साक्षात्कार [दू]- समालोचना १. गीत-गंगा-कामिनी २. गजल गंगा- जगदानन्द झा 'मनु' ३. मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’ -डॉ. अजीत मिश्र ४. धारक "अइ" पार- आशीष अनचिन्हार ५.कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा- परमानन्द प्रभाकर ६.‘गीत-गंगा’मे सब किछु अछि -----छत्रानंद सिंह ७.गीत गंगामे अनिल-केदार कानन ८.‘गीत-गंगा’क प्रवाह- डा.अमर नाथ ठाकुर एक विदेहक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक लेल मुन्नाजी द्वारा अनिल जी सं लेल ई-साक्षात्कार- 1) पद्यक उपविधा गजलमे नीक काज अछि अहाँक। एकर प्रेरणा कतऽसँ आ कोना भेटल। वर्तमान गजल कोन दिशामे अछि? हम गीत लिखैत्त छलहु | दुष्यंत कुमारक ‘साये में धूप’ पढलहु त नीक लागल | ओहिसं प्रभावित भेलहु आ हमहू गजल लेखनक अभ्यास कर’ लगलहु | एकटा मित्र श्री रामजी लाल दास जे आरम्भमे गजलकें बुझबामे मदति केने छलाह | बादमे बशीर बद्र, निदा फाजली,विज्ञान व्रत,ज्ञान प्रकाश विवेक,अशोक अंजुम,डा.उर्मिलेश आदि शायरक रचना पढ़ि क’आ कतेक मंचसं कतेक शायरकें सूनि क’ प्रेरित भेलहु | विदेह-ई सं जुडलाक बाद मैथिलीमे गजल लिखबाक लेल पर्याप्त अवसर भेटल |’अनचिन्हार आखर’ सं जुडलाक बाद श्री गजेन्द्र ठाकुरजी आ आशीष अनचिन्हारजी द्वारा प्रस्तुत व्याकरणसं लाभान्वित भेलहु|अरबी बहरमे गजल लिखबामे आशीषजी व्यावहारिक रुपसं मदति केलनि | गजल लेखनसं बहुत लोक जुडल छथि | सरल वार्णिक बहर बेशी लोकप्रिय भेल अछि |अरबी बहरमे लिखबाक लेल बेशी अभ्यासक आवश्यकता होइत छैक | पुरान लोक सभ कतराइत छथि |नव लोक सभ व्याकरणक अनुसार चलैत छथि, मुदा भाव पक्ष आकर्षक नहि भ’ पबैत छनि | मैथिलीमे गजलक लेल एकटा स्वतंत्र प्लेटफार्म ‘अनचिन्हार आखर’ उपलब्ध अछि, ई शुभ संकेत अछि प्रगतिक लेल | 2) बहुत दिन धरि अहाँ साहित्यिक रूपें कात रहलहुँ। एकर की कारण? हम सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडियाक सेवामे अठारह बरख धरि मध्य प्रदेश आ छत्तीसगढ़क विभिन्न भागमे रहलहु आ मैथिली साहित्यक गतिविधिमे हमर उपस्थिति नगण्य भ’ गेल | 3) ओना पुरस्कार तँ प्रोत्साहन लेल होइत छै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति रुकि जाइत छै। एना किएक? सामान्य दिन-चर्याक लेल जतेक उर्जाक आवश्यकता होइत छैक ताहिसं बहुत बेशी उर्जा चाही रचना-कर्म लेल |वयस बढ़ला पर अतिरिक्त ऊर्जा कमैत अछि | एकर प्रभाव रचना-कर्म पर पडब स्वाभाविके कहक चाही | तथापि बहुत साहित्यकार एखनो सक्रिय छथि जेना आदरणीय श्री गोविन्द झा, श्रीमती उषा किरण खान, डा.गंगेश गुंजन, डा. शेफालिका वर्मा, श्री उदय चन्द्र झा ‘विनोद’, श्री तारानंद वियोगी,श्री जगदीश प्रसाद मंडल आदि | स्व.जीवकांतजी सब दिन लिखिते रहलाह | 4) वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक की हाल छै? दैनिक पत्र मिथिला आवाज आ समाद त बंद भ’ चुकल अछि | ई-पत्रिका विदेह, पत्रिका मिथिला दर्शन, मिथिला दर्पण,पूर्वोत्तर मैथिल, घर-बाहर,कर्नामृत आ आंजुर निकलि रहल अछि | समय-साल स्थगित अछि | आकांक्षा अनियमित भेल अछि | ‘अनचिन्हार आखर’ सेहो देखैत छी | 5) चेतना समीतिमे एखनो दलित वर्गक प्रवेश निषेध छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? चेतना समितिमे दलित वर्गक प्रवेश निषेध नै छै | चेतना समिति सब वर्गक लोकक स्वागत करैत अछि | जिनका रूचि छनि ओ छथि |श्री रघुवीर मोचीजी संयुक्त सचिव छथि | श्री बिलट पासवान ‘विहंगम’ उपाध्यक्ष रहि चुकल छथि | अधिक लोककें जोड़बाक प्रयास हेबाक चाही | 6) अहाँ गद्य बहुत कम्मे सन लिखलहुँ। एकर किछु कारण? कोनो विचारकें पद्यमे किछुए पांतिमे व्यक्त करब संभव होइत अछि |अपन रचना गुनगुनायब आ दोसरक मूहें सुनबाक आनंद गद्यमे नहि भेटैत छैक |तें शुरूमे पद्यमे लिखबाक जे अभ्यास लागल से लागल रहि गेल | 7) बहुत दिन धरि मैथिलीमे दलित लेखक केर प्रवेश नै छल। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? एखनुक केहन अवस्था छै? दलित वर्गमे शिक्षाक कमीसं लेखनसं लोक आकर्षित नै भ’ पबैत छलाह |स्थिति बदललैए | एखनो स्थितिमे सुधारक आवश्यकता छैक | शिक्षाक प्रसारसं भविष्यमे अपेक्षित परिणामक आशा कयल जा सकैत अछि | मैथिलीक विकास-यात्रामे दलित लेखकक योगदान महत्वपूर्ण रहत | 8) अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्व प्रेरक आ कोन तत्व बाधक रहल? प्रेरक तत्व : आदरणीय जीवकांतजी आ प्रो. गंगानन्द झाजी सं पत्राचार | बाधक तत्व : नोकरीमे अधिक काल बहुत व्यस्तता | 9) वर्तमान साहित्यकारक मूल्याकंन अहाँ कोना करबै? वर्तमान साहित्यकारक मूल्यांकन हम एहि आधार पर कर’ चाहब जे ओ अपन रचना आ अपन आचरणसं कतेक लोककें साहित्यसं आकर्षित क’ पबैत छथि | 10) अहाँक प्रिय साहित्यकारकेँ छथि? श्री काशी कान्त मिश्र ‘मधुप’,बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’, हरिमोहन झा, जीवकांत, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, जगदीश प्रसाद मंडल, तारानंद वियोगी आ गजेन्द्र ठाकुर | 11) मैथिली गजलमे व्याकरण बारल रहल। अहाँ एकरा कोन रूपमे देखै छिऐ। जखन की बिना व्याकरणक गजल होइते नै छै। मैथिलीमे गजलक व्याकरणक व्यवस्थित रूपक अभाव छलैक | लोक रदीफ़ आ काफिया मात्र बुझैत छलाह आ अधिक लोक ओकरे पालन करैत छलाह | काज कहुना चलि रहल छलैक | शायर सभकें सूनि क’ आ पत्रिका, पोथी आदिमे गजल पढ़ि क’ लोक अभ्यास करैत छल | ‘अनचिन्हार आखर’ गजलक लेल स्वतंत्र प्लेटफार्म प्रदान कयलक | पर्याप्त खोज-बीन क’ क’ गजेन्द्र ठाकुरजी आ आशीष अनचिन्हारजी मैथिली गजलक लेल व्याकरण प्रस्तुत केलनि | बहुत लोककें जोड़लनि | सरल वार्णिक बहरक नव कांसेप्ट देलनि | अरबी बहरमे गजल लिखबाक लेल लोककें प्रोत्साहित केलनि | बहर मुक्त गजलकें आज़ाद गजलक नाम देलनि | बाल गजल आ भक्ति गजलक लेखन करबौलनि | सालमे सर्वश्रेष्ठ गजलकें पुरस्कार देबाक आयोजन केलनि | नव लोक सभ बहुत उत्साहित भेलाह | आब व्याकरणसं लोक परिचित भेल अछि आ आब गजल लेखनमे व्याकरण पर ध्यान देल जा रहल अछि | 12) सरसजी अपना-आपकेँ "साहिर" ओ अरविन्द ठाकुरजी अपनाकेँ "अमीर खुसरो" कहै छथि। अहाँ एकरा कोन रूपमे देखै छिऐ ? हम ने साहिरकें पढ़ने छी ने अमीर खुसरोकें | हम सरसजीकें पढ़ने छी, हम अरविन्द ठाकुरजीकें पढ़ने छी | तें हम एतबे कहब जे सरस जी सरस जी छथि, अरविन्द ठाकुरजी अरविन्द ठाकुरजी छथि | दूनूक अपन-अपन विशिष्टता छनि | 13) मैथिल साहित्यकार बहु विधावादी होइत छथि। मुदा जँ अहाँ एकै विधामे रहितहुँ तँ ओ कोन विधा होइतै ? गीत 14) अधिकांश साहित्य अकादेमी पुरस्कार खाली सवर्णे टा के भेटै छै। ऐपर अपनेक की चिंतन अछि? साहित्य अकादेमी पुरस्कार त कृति पर भेटैत छैक | साहित्य अकादेमीक नियमावली अथवा ओकर क्रियान्वयनमे यदि कतहु कमी होइ, ओइ पर संवाद हेबाक चाही, स्थिति बेहतर हेबाक चाही | 15) अहाँ अपन साहित्यक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रूपें देखै छिऐ? माएक सेवामे जीवन बिता दी अछि बस इएह एकटा सिहंता | 16) पारिवारिक परिचय जनबाक इच्छा अछि। पितामही स्व. दैयो देवी नान्हिए टा रही तखनेसं हिनका मूहें मैथिलीक बहुत रास लोकोक्ति सब सुनने छलहु जे हमरा आकर्षित करैत रहल पितामह स्व.अनंत लाल ठाकुर हिनकासं सूनल महादेवक गीत आ पराती आ बहुत खिस्सा-पिहानी हमरा मैथिलीक प्रति आकर्षण प्रदान केने छल | माए स्व.कर्पूरा देवी गीत आ कीर्तनक प्रति रूचिक संस्कार नैहर रुचौलसं ल’क’ आएल छलीह |सपता-विपताक कथा कहैत-कहैत आँखि नोरा जाइत छलनि | हमर लीखल गीत सूनि आनंदित होइत छलीह | पिता स्व.राम नारायण ठाकुर हाई स्कूलमे पढ़ने छलाह |प्रेसमे कम्पोजीटरक काज कोलकाता आ दरभंगामे केलनि |बादमे सीमांत कृषक भेलाह | अपनो साहित्यमे रूचि छलनि |हमरासं नीक नोकरी आ साहित्य सृजन दूनूक अपेक्षा करैत छलाह | छोट बहिन १ शांती साक्षर मात्र छथि |पति देवेन्द्र झाक संग सासुर लखनपटीमे रहैत छथि | घरमे सभ मैथिलीमे गप करैत छथि | छोट बहिन २ बच्ची साक्षर मात्र छथि | पति चन्द्र कान्त झाक संग शिशवामे रहैत छथि |घरमे सभ मैथिलीमे गप करैत छथि | छोट बहिन ३ सच्ची साक्षर मात्र छथि | पति कृष्ण कान्त झा, दू पुत्र आ एक पुत्रीक संग दिल्लीमे रहैत छथि |घरमे सभ मैथिलीमे गप करैत छथि | अनुज १ सतीश चन्द्र ठाकुर(ललनजी) शिक्षा-बी.एस.सी.,एम.बी.ए.|दिल्लीमे नोकरी करैत छथि आ पत्नी आ दू बच्चाक संग रहैत छथि | घरमे सभसं मैथिलीएमे गप करैत छथि |मिथिला मिहिरमे एकबेर एक रचना छपल रहनि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब ओहि पर विचार करब नीक लगैत छनि | अनुज २ रतीश चन्द्र ठाकुर(रतनजी) शिक्षा-एम.एस.सी.(फ़िजिक्स),बी.एड.-माध्यमिक विद्यालयमे शिक्षक छथि | गामहिमे पत्नी आ दू बालकक संग रहैत छथि |घरमे सभक संग मैथिलीएमे गप करैत्त छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पत्नी बच्ची देवी स्कूल कहियो नहि गेलीह | मैथिलीक पारंपरिक गीत सभ गेबाक संस्कार नैहर लदारीए सं अनने छलीह |हरिमोहन बाबूक रंगशाला पढ़ि क’ मैथिली साहित्यसं रूचि जगलनि | साहित्य पढ़ब, जे बात साहित्यमे कहल जाइत छैक ओहि पर विचार करब, मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब ओहि पर विचार करब नीक लगैत छनि | पुत्री १ वंदना शिक्षा-एम.ए.(अर्थशास्त्र, लाइब्रेरी साइंस), गृहिणीक रूपमे पति आ दू बच्चाक संग मुंबईमे रहैत छथि आ घरमे सभसं मैथिलीएमे गप करैत छथि |घरमे मिथिला दर्पण मनबैत छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पुत्री २ मैथिली शिक्षा—बी.एस.सी.,बी.एड.,एम.बी.ए.,सम्प्रति गृहिणीक रूपमे पतिक संग दिल्लीमे रहैत छथि | घरमे मैथिलीएमे बजैत छथि |मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पुत्र विवेक आनंद शिक्षा-एम.टेक.(कम्पुटर साइंस)| मुंबईमे प्राइवेट इंजिनीयरिंग कॉलेजमे पढ़बैत छथि | घरमे आ मैथिल संगी/ सम्बन्धी सभक संग मैथिलीमे गप करैत छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पुतोहु प्रीति शेखर शिक्षा-एम.ए.(राजनीति विज्ञान)|मैथिलीक साहित्यकार,संपादक आ प्रकाशक श्री शरदिंदु चौधरीजीक सुपुत्री छथि | सम्प्रति गृहिणीक रुपमे मुंबईमे पतिक संग रहैत छथि | घरमे आ मैथिल संगी/ सम्बन्धी सभक संग मैथिलीमे गप करैत छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | दू आलोचना, समीक्षा, समालोचना खंड 1 गीत-गंगा (कामिनी) मैथिलीक सुपरिचित गीतकार श्री अनिलजीक नाम आइ के नहि जनैत अछि |एकर एकमात्र कारण अछि अनिलजीक सौम्यतासं पूर्ण भाषा, जकरा ल’क’ ओ पैघ सं पैघ बातकें बड सहजतासं राखि पाठकक हृदय धरि प्रवेश क’ जाइत छथि | पाठक अनिलजीक विचार, भाव, समर्थन,विरोधसं अपनाकें अलग नहि क’ पबैत अछि |पानिमे घुलल चीनी जकां पाठक आ गीतकार एकाकार भ’जाइत अछि |अनिलजीक भाषा सहज रहितहु संवेदनासं परिपूर्ण अछि जे हृदयकें स्पर्श करैत दूर धरि ल’ जाइत अछि जतय पाठक सोचबाक लेल विवश भ’ जाइत अछि |ओ अपन सम्पूर्ण जीवनक सार कें एहि रूपमे अभिव्यक्त करैत छथि : ई देह अतिथि ई प्राण अतिथि सम्मान अतिथि अपमान अतिथि अछि लोभ मोह आ माया केर अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि | जीवनक नश्वरता आ लोभ-मोहक विराटता दुनूकें अनिलजी अतिथि कहि लोककें धैर्यवान हेबाक सन्देश देलनि अछि |ओ कहैत छथि जीवनमे कोनो बात शाश्वत सत्य नहि |परिवर्तन जीवनक नियम थीक |समय-चक्र बदलिते रहैत अछि |अतिथि जकां सुख-दुःख दुनू अल्पायु होइत अछि |अतिथि शब्द अपना आपमे यायावरी अछि |अर्थात कोनो परिस्थितिमे मनुक्खकें अपन धैर्य नहि गमेबाक चाही |ओ कहैत छथि : ‘हम सोचि रहल छी जीवनमे, की भेटल आ की हेरा गेल |’ आत्मगीतक माध्यमसं ओ अपन सम्पूर्ण जीवनक मूल्यांकन करबाक प्रयास केलनि अछि | अनिलजीक दृष्टिकोण एकटा स्त्री,एकटा बेटीक लेल सेहो आत्म गौरवसं परिपूर्ण अछि |ओ बड निश्चिन्तता आ सहजतासं कहैत छथि : ‘बुच्ची बढती पढ़ती लिखती हमरा चिंता कथी के’ ओहि समाजमे जतय भ्रूण हत्या सन पाप करैमे लोक संकोच नहि करैत अछि, पेटमे बेटीकें मारबासं डेराइत नहि अछि,ओतय बेटीकें दुर्गा रूपमे प्रतिष्ठापित कय महिषासुर सन दानव के संहार करबामे सक्षम बतौलनि अछि |स्त्री-शक्ति एतय सर्वोपरि रूपमे आयल अछि | ई स्त्री कखनो बेटी,कखनो पत्नी,कखनो माय बनि बनि पुरुषक जीवनकें परिपूर्ण करैत अछि | अनिलजीक ‘गीत गंगा’मे ई स्त्री परिपूर्ण रुपमे सर्वत्र विद्यमान अछि | ओ कहैत छथि : ‘ माइक कोरा सिनेहक सरोवर अही सरोवरमे जी भरि नहाउ ....’ सरिपहु मायक कोरा सिनेहक सरोवरे होइत अछि जाहिमे डूब देलाक बादे ओ स्वाद भेटैत अछि जे कतहु आरो नहि भेटैत अछि |मायक छत्रछाया, ओकर आँचर बच्चाक लेल छितवनक छाँह जकां शीतल आ सुखद ओइत अछि |शायद दुनियामे कोनो आरो एहन सम्बन्ध होइत होइ जे मायक कोराक बराबरी करैत हो | अनिलजी सब संबंधक महत्व जनैत छथि | ओ जनैत छथि मायक ममताक बेगरता | ओ जनैत छथि ओकर त्याग,तपस्याक महिमा | अनिलजीक ‘गीत गंगा’ सामाजिक विषमता पर सेहो प्रहार करैत अछि |ओ कहैत छथि : ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें एना रे बिलटू कतेक दिन रह्बें’ ? सरिपहु बिलटू करजेमे जन्म लइत अछि आ करजेमे मरियो जाइत अछि | ई बिलटूक व्यक्तिगत त्रासदी नहि | बिलटू ओहि निम्न वर्गक प्रतिनिधिक रूपमे उपस्थित अछि जे जीवन भरि अथक प्रयास केलाक बादो भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र लेल तडपैत अछि, तरसैत अछि | जकर परिश्रमसं देशक सब उन्नति होइत अछि ओ जीवन भरि विकासक एको सीढ़ी नहि चइढ़ पबैत अछि |ई बिडम्बने कहल जा सकैत अछि जे आइ धरि समाजक सबसँ निचला वर्ग तक विकासक एको बूंद गंगाजल नहि पहुँचल अछि ,जे दुःख भोगबाक लेल विवश अछि,जकर जीवन कचरेसं शुरू होइत अछि आ कचरेमे मिलियो जाइत अछि, जकर नेना शर्दी-गर्मी जीवनक सब तापकें भोगबाक लेल अभिशप्त अछि | भलेही हम चान पर जेबाक दाबा करैत होइ,ओतय घर बनेबाक लेल सोचैत होइ, आम आदमीक लेल भरि पेट अन्न आ भरि माथ छाहरि आइयो सपने बनल अछि | एक दिस हमर बखारीमे अन्न सडबाक दाबा होइत अछि, दोसर दिस एहि देशक किसान हताश भ’,प्रकृतिक समक्ष निराश भ’, पारिवारिक पैघ बेगड़ताक समक्ष नग्न आ लाचार भ’आत्महत्या करैत अछि | ई बिडम्बना नहि त और की थीक ? अनिलजी एहि बिडम्बनासं बाहर निकलबाक लेल ओहि आम वर्गक प्रतिनिधि बिलटूकें जगबैत छथि,ललकारैत छथि | भारतीय समाजमे आइ जाति-व्यवस्था एकटा घोर समस्याक रूपमे उपस्थित भेल अछि | जतय देखू एके झुनझुना लोक बजबैत अछि, हम हिन्दू छी,हम मुसलमान छी,हम सिख छी, हम ईसाई |लोक एक-दोसराकें नोचि लेबा पर आतुर अछि |जाति के नाम पर सब किछु गमा देबाक लेल ब्याकुल अछि |ई जाति की थिक ? सजमनि, कदीमा, भाटा सन अलग-अलग तरकारी त नहि जकर स्वाद अलग-अलग होइत अछि |रूप-रंग अलग-अलग होइत अछि | एना त किन्नहु नहि |फेर एहि जातिकें चीन्हबाक कोन आधार ? टीक कटयलासं, दाढ़ी बढयलासं, पगडी बन्हलासं की नस महक खूनक रंगो बदलि जाइत अछि ? अगर नहि त’ ई जाति-पांतिक मारा-मारी किए’? अनिलजी कहैत छथि : ‘की हिन्दू आ की मुसलमान एके शोणित एके परान....’ सरिपहुं एके शोणित,एके परान रहैत अछि सबहक देहमे | फेर ई अलग-अलग खेमा तैयार करबाक कोन प्रयोजन ? की हम एक देशमे एक भ’ क’ नहि रहि सकैत छी ?हमर जाति मात्र भारतीय नहि भ’ सकैत अछि ?अगर एना नहि त मानव हेबापर हमरा शर्म महसूस करक चाही | मानवीय संवेदना मनुक्खक प्रथम जाति हेबाक चाही, वैमनस्यता नहि | अनिलजीक ‘गीत गंगा’ मैथिल जीवनक आधार एतुक्का पर्व-त्यौहार दिस सेहो ध्यान आकर्षित करैत अछि |ओ कहैत छथि : ‘पथिया लीय’ बासन लीय’ कूरा कोसिया ढकन लीय’ चलू-चलू पोखरि मोहार दिनकर दुःख हरता .....’ दिनकरकें समांगक देवता कहल गेल अछि | शारीरिक कष्टसं मुक्तिक खातिर लोक छठि पावनि मनबैत अछि | सूर्यकें अर्घ्य दैत अछि | परिवारक सुख-शांतिक खातिर लोक प्रार्थना करैत अछि |पोखरिक घाट पर छठि पुजैत अछि | मैथिल समाजक विविधतामे एकता एतय सम्पूर्ण रूपमे उजागर होइत अछि | ‘गीत गंगा’ स्त्री-पुरुखक नोक-झोंक दिस सेहो ध्यान आकृष्ट करैत अछि |पारिवारिक जीवनक आधार बनैत अछि स्त्री-पुरुखक आपसी सम्बन्ध | पति-पत्नीक लाड-दुलार | दुनूक बीच कखनो मुंहो फुला-फूली होइत अछि, कखनो मानो-मनौवल जे जीवनक सरसता, जीवन्तताकें बड सहजतासं अभिव्यक्त करैत अछि | ओ कहैत छथि : ‘जखन घरेवला छथि कसाइ तखन सुख की बुझबै ?...’ एतय कसाइ शब्द उलहनक अर्थमे आयल अछि, हत्याराक लेल नहि | जकरासं लोककें नेह रहैत छै ओकरापर ओ अपन विशेष अधिकार बुझैत अछि आ ओकरा लेल ओ कोनहु शब्दक प्रयोग करैसं हिचकिचाइत नहि अछि |इएह कारण अछि जे मानवती पत्नी अपना पतिकें कसाइ कहि अपना दुःखक लेल जिम्मेवार ठहरौलनि अछि | माँ कालीसं गोहारि लगौलनि अछि |लोककें जखन अपन शक्तिपरसं विश्वास उठि जाइत छै तखन ईश्वरीय शक्तिकें आह्वान करैत अछि |सुख-दुःखक सागरसं पार उतरबाक लेल मनबैत अछि | एक दिस जतय स्त्री पुरुषसं शिकायत करैत छथि जे ओ हुनक इच्छा-आकांक्षाक पूर्ति नहि क’ हुनक उपेक्षा करैत छथिन, दोसर दिस वएह स्त्री पुरुषकें अपना जीवनक आधार बनाक’ कहैत छथि : ‘हम एके निन्नक दू सपना हम आगि थिकहु अहाँ धूमन छी |’ एतय पति-पत्नी एक-दोसराक परिपूरक रूपमे आयल अछि जतय एक के बिना दोसर आधा अछि |सरिपहु स्त्री-पुरुषक सम्बन्धे एहिना होइत अछि जतय कोनो लाग-लपेट नहि | कोनो परदा नहि |सुच्चा सम्बन्धक महकैत फुलवारी जतय विविध रंगी फूल दमकइत अछि,चमकैत अछि | आजुक विकसित युगमे विकटतम समस्याक रूपमे जे किछु उभरल अछि ओ थीक आतंकवाद | ई कोनो शर्दी-खांसी नहि,ज्वर-वात नहि जाहिसं एक मनुक्ख पीड़ित होइत अछि, प्रभावित रहैत अछि | ई एहन रोग अछि जे महामारी जकां एके बेरमे गाम-गाम, नगर-नगर के सुडडाह क’ दैत अछि, बम-बारूदसं उड़ा दैत अछि, जतय विनाशे-विनाश देखाइत अछि,आहे-आह सुनाइत अछि | ई एहन ह्रदय-विदारक घटना घटबैत अछि जतय शायद पत्थरो पसीझ जाएत | ई आतंकवाद आदिम युगक राक्षसी हमला नहि, आधुनिक युगक दुष्प्रवृत्ति जतय आदमीक विरुद्ध आदमी षड्यंत्र रचैत अछि,अमानवीय व्यवहार कें अंजाम दैत अछि, जे देखि क’ समाजक सब वर्गक लोक क्षुब्ध होइत अछि, शोक मनबैत अछि | साहित्यकारो एकटा सामाजिक जीव होइत अछि, ओकरो लोकक सुख-दुःख माजैत अछि,तोडैत अछि | ‘गीत गंगा’क रचयिता अनिलजी सेहो क्षुब्ध छथि, कहैत छथि : ‘गोली-बारूदक मौसममे हम कविता केहेन सुनाबी हाल देखि बेहाल भेल छी, गीत कोना क’ गाबी |’ सरिपहु एहन भयावह समयमे ककरो मुंहसं गीत कोना निकलत |जखन कि गीतक सम्बन्ध मोनक उमंग- तरंगसं अछि, ख़ुशी-उल्लासक संग अछि | अगर हम एहन स्थितिमे गीत गेबो करैत छी, कविता लिखबो करैत छी त ई अनर्गल प्रयास सन मात्र हास्यास्पद हएत | एतेक के बावजूदो अगर कवि कविता लिखैत छथि, साहित्यकार गीत रचैत छथि त मात्र ‘स्वान्तः सुखाय’| जे लोक ककरो कहि नहि पबैत अछि,ककरो बुझा नहि पबैत अछि, ओ लिखि लैत अछि, शब्दक माध्यमसं दुःख बांइट लैत अछि |एकटा रचनाकारक हाथमे मात्र एकटा कलम टा रहैत अछि जे आदिसं अंत धरि ओकर संग दैत अछि, संग निभबैत अछि | ‘गीत-गंगा’क रूपमे स्वयं अनिलजी मानवीय संवेदनाक संग हमरा अहाँक समक्ष उपस्थित भेलाह अछि, जतय एकटा साहित्यकारक ह्रदय सब सुख-दुःखक अनुभव करैत अछि, गहराइसं सोचैत अछि,भावपूर्ण भाषामे लिखैत अछि | ई ‘गीत-गंगा’ सरिपहु गंगेक भांति निर्मल अछि,पवित्र अछि जाहिमे डुबकी लगेलाक बादे ओकर महत्त्व बूझल जा सकैत अछि, गूनल जा सकैत अछि | 2 "गजल गंगा" (जगदानन्द झा 'मनु')
सभसँ पहिने अनिल जीकेँ ई गजल संग्रह लिखबाक लेल बहुत बहुत बधाइ आ शुभकामना । मैथिली गजलक आकाश गंगामे एकटा आओर नव गजल संग्रह "गजल गंगा"क आगमन मैथिली गजलक दशा आ दिशा लेल बहुत शुभ संकेत अछि । एक बेर फेरसँ अनिलजी सहित आन सभ गजल प्रेमी मैथिलकेँ बधाइ। हमर अपने गजल ज्ञान बेसी नहि अछि तथापि एहि संग्रहक मादे हम किछु नीक बेजए कहैक चेष्टा कए रहल छी । कुल 81 टा गजल अपना भितर समेटने ई संग्रह बहुते नीक-नीक गजलक सुन्दर गजल गंगा बनल अछि। आब एहि गंगामे असनान कतएसँ शुरू करी अर्थात हम अप्पन गप्पक शुरूआत कतएसँ आरम्भ करी । तँ हम शुरूआत करैत छी; गजलक व्याकरण पक्षसँ :- आ गजलक व्याकरणक अ आ अछि मतला, काफिया, रदीफ, बहर आ मकता। सभसँ पहिने मतला, मतला अर्थात गजलक पहिल शेर जे कि काफिया आ रदीफक निर्धारण करैत अछि। एहि संग्रहक सभ गजलमे अनिलजी मतलाक पालन बहुते सुन्दरसँ केने छथि । आब, काफिया आ रदीफ : संग्रहक शुरूआतेमे अनिलजी संग्रहकेँ बहरक भिन्नताकेँ आधारपर दू भागमे बँटैत ई लिखने छथि जे काफिया आ रदीफक पालन भेल अछि । आ ठीके रदीफक पालन एहि संग्रहक सभ गजलमे बड़ नीकसँ भेल अछि । सगरो संग्रहकेँ पढ़ला बाद बुझलौं जे बहुतो गजलमे काफियाक पालन सेहो नीकसँ भेल अछि । ओतए 37% गजलक काफियाकेँ ठीक करैक गुँजाइश अछि । चूँकि ई संग्रह एखन अप्रकाशित अछि तेँ जँ सम्भव होइ तँ अनिलजी किछु संशोधित कएला बाद एकरा आओर बेसी उत्कृष्ट बना सकैत छथि । जेना कि संग्रहक प्रथमे गजलक मतला- "पढ़बाक मोन होइए “लिखबाक” मोन होइए किछु ने किछु सदिखन “सिखबाक” मोन होइए" एहिठाम काफिया भेल "ि0खबाक" मुदा गजलक आन आन शेर सबहक काफिया अछि बिछबाक, झिकबाक, निपबाक, “चिखबाक”, छ्टबाक, छिनबाक । एहिठाम चिखबाक छोरि कए बाद बाँकी ???? एकबेर भाग पहिलकेँ गजल संख्या 5 केर मतला देखू- "काँट फूस अछि “भरल” बाटपर जहाँ-तहाँ नढ़िया कूकुर “मरल” बाटपर जहाँ-तहाँ" आब एहि मतलाक रदीफ भेल "बाटपर जहाँ-तहाँ" जे की दुनू पाँतिमे एकसमान अछि । आब काफिया भरल आ मरलसँ भेल "रल" । मुदा आन शेर सबहक काफिया अछि दखल, पड़ल, जड़ल, महल, उड़ल, गड़ल । एहिमे पड़ल, जड़ल, उड़ल, गड़ल तँ ठीक मुदा दखल आ महल ????? आगू बढ़ैत गजल 14 केर मतला- "बहरक झंझटिसँ हमरा आजाद करु हम गजल छी हमरा नै बरबाद करु" एहि मतलाक काफिया भेल आकार बाद द (ाद) मुदा एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेल गेल अछि याद, फरियाद, अनुवाद, लाज, काज, बात । याद, फरियाद, अनुवाद ठीक तँ लाज, काज, बात ??? एक बेर गजल 16 केर मतला देखल जेए - "कानहापर गंगाजल ल' क' “बढ़लौं”कोना-कोना मोन पड़ैए ऐ पहाड़पर “चढ़लौं”कोना-कोना" एहिठाम काफिया भेल बढ़लौं, चढ़लौंसँ "ढ़लौं" मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया अछि; खसलौं, बचलौं, कटलौं, रखलौं आब ई सबटा कतेक ठीक ???? कनेक आओर आगू बढ़ैत गजल 27 केर मतला- "जुनि पूछू की “करै”छी हम नित्य स्वयंसँ “लड़ै” छी हम" एहि मतलाक काफिया भेल "0रै" वा "0ड़ै" । आब एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया जे लेल गेल अछि- डरै, बुझै, जगै, कनै, बजै, नचै, जनै, तकै । एहिमे "ड़रै"केँ छोरि बाद बाँकी सबटाकेँ की ठीक कहल जेए ?????? गजल संख्या 29 केर मतला- "एतेक बाझल किएक रहै छी “अपनामे” अहाँ अबै छी बड़ी बड़ी राति क' “सपनामे” अहाँ" एहिठाम काफिया भेल अकार संग "पनामे" । मुदा शाइर एहि गजलक आगाँक शेर सभमे काफिया लेने छथि; पटनामे, सतनामे, घटनामे, अयनामे, बधनामे, गहनामे । मतलाक हिसाबे आन आन शेरक काफिया मेल नहि क' रहल अछि । कनिक आगू जा कए गजल संख्या 40 केर मतला- "चिन्ता तनकेँ “दागि” रहल अछि की करियौ मोन कतौ नै “लागि”रहल अछि की करियौ" एहि मतलासँ जँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल, "0ागि" । मुदा शाइर एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया देने छथि; भागि, ताकि, मांगि, कानि, आबि, काटि, कहब बेजए नहि जे " भागि"केँ छोरि आन कोनो मतलासँ मेल खाइत नहि अछि । एहि तरहे कम बेसी एहि संग्रहक भाग 1 केर गजल संख्या 6,9,13,30,33,35,37,51,53,54,55 केर काफिया ठीक नहि अछि । आब एहि भागक अन्तिम गजल, गजल 61 केर मतला एक बेर देखल जेए- " नदी छोड़ि क' “नहरमे”एलौं गाम छोड़ि क' “शहरमे”एलौं" आब एहि मतलासँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल "हरमे" मुदा शाइर एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेने छथि- कहलमे, जहलमे, महलमे, जूड़शितलमे, सहलमे, गजलमे । मतला आ आन-आन शेरक बिचमे काफियाक कोनो मिलान नहि । आब आबी संग्रहक भाग दूमे । पहिल भाग जकाँ एहि भागमे सेहो शाइर मतला आ रदीफक पालन नीकसँ केने छथि । आब देखी काफिया तँ सबसँ पहिले भाग दू केर गजल संख्या 4 केर मतला- "खेल सभटा “उसरि” जाइए लोक सभटा “बिसरि” जाइए" आब एहि मतलासँ काफिया भेल "सरि", मुदा आगाँक शेर सबहक काफिया अछि झखडि, ससरि, पिछरि, बिगरि, कुतरि, नचरि । मतलासँ मेल खाति एकौटा शेरक काफिया नहि । भाग 2, गजल 6 केर मतला- "जीवनकेँ “आशा” बदलल प्रेमक “परिभाषा” बदलल" एहिठाम काफिया भेल आकार बादक शा, षा अथवा सा । आशा, परिभाषा, बारहमासा, भाषा, अभिलाषा, तक तँ ठीक मुदा अन्तिम दूटा शेरक काफिया मौसा आ पाछाँ । आब एकबेर देखी भाग 2, गजल 17 केर मतला- "सभ जिवइत अछि सुबिधामे हम रहइत छी दुबिधामे" एहिठाम काफिया भेल उकारकेँ बाद "बिधामे" । सुबिधामे, दुबिधामे केँ बाद आगाँक शेरक काफिया अछि, कवितामे, अनकामे, अपनामे, पटनामे, बसुधामे । एहिमे सँ एक्कोटा काफिया मतलासँ ठीक मेल नहि कए रहल अछि । किछु एहने-सन भाग 2 केँ गजल 9,12,18 आ 20 केर काफिया सेहो ठीक नहि अछि । एहि संग्रहक अन्तिम गजलक मतला एकबेर देख लेल जेए- "नीक बात किछु “कहू” अहाँ गीत गजलमे “रहू” अहाँ" कहू/रहूमे समान भेल "हू" । मुदा शाइर आन आन शेरक काफिया लेने छथि; चलू, धरू, करू, बड़ू । खाली ू ू ू ू तँ बिना "ह"केँ ू ू ू ू के की कहल जेए ??? कतेक रास गजल एहनो अछि जाहिठाम काफिया तँ ठीक बनिरहल अछि मुदा काफियामे एक्के आखरक प्रयोग एकसँ बेसी बेर कएल गेल अछि । जेना भाग एकक गजल 9,20,36,42 आ भाग दू केर गजल 10 मे । मतला, रदीफ, काफियाक बाद गजल व्याकरणक एकटा मुख अंग अछि मकता । मकता, अर्थात गजलक अन्तिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम वा उप नामक प्रयोग केने होथि । एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकता़क प्रयोग नहि कएल गेल अछि । आब आबी गजलक बहरपर । तँ जेना स्वयं शाइर स्वीकार केने छथि जे भाग 1 केर 61 टा गजलमे ओ सरल वार्णिक बहरक प्रयोग केने छथि । आ जेकर निर्वाह ओ बहुते नीकसँ केने छथि । आब भाग दू जाहिमे कुल 20 टा गजल अछि, कोनो निर्धारित अरबी बहरक प्रयोग तँ नहि कएल गेल अछि, हाँ एहि गप्पक धियान जरूर राखल गेल अछि जे सब पाँतिमे समान मात्रा क्रम रहेए । अर्थात समान मात्रा क्रमक प्रयोग करैक सफल प्रयास केएने छथि । किछु ठाम छोरि दी तँ । सबसँ पहिने तँ चन्द्रविन्दूकेँ जगह विन्दूक (अनुस्वार) प्रयोग कएल गेल अछि । ई शाइद टाइपिंग ग़लती हुए मुदा एहि कारणे बहुतो जगह मात्रा क्रम बिगैड़ गेल अछि । दोसर जतअ जतअ संयुक्ताक्षरक प्रयोग कएल गेल अछि ओतअ ओतअ मात्रा क्रम केर गलती भ गेल अछि । जेना गजल संख्या 5 केर अन्तिम शेरक प्रथम पाँति- "मोन केर प्रश्न अछि कते" 21 21 21 - 2 12 (शाइर द्वारा मानल) 21 22 21 - 2 12 (वास्तविक) एकटा आओर उदाहरण गजल 11 केर तेसर शेर देखल जेए- "देश हमर अछि प्राण भाइजी" 21 12 - 2 21- 212 ( शाइर द्वारा मानल) 21 12- 1 2 21 - 212 (वास्तविक) एहने तरहक दोख गजल 12 केँ दोसर शेरमे आ 18 म' गजलकेँ दोसर शेरमे अछि । भाषा आ भाव पक्ष ; भाषापर जबरदस्त पकड़ लेने सम्पूर्ण संग्रहमे भाषाक एकरूपताक दर्शन होइत अछि । संग-संग नव रचनाकार सभ लेल सिखबाक लेल नीक प्लेटफार्म थिक अनिलजीक ई गजल संग्रह। अनिलजी बिना कोनो बेसाहल शव्दक प्रयोग केने एतेक सरल व्यबहारिक मैथिलीक शव्द सबकेँ गूँथि कए एकता नव शुरूआत केने छथि । समान्यसँ समान्य लोक, एक-एकटा गजलक एक-एकटा शेरक आनन्द ओहि छन अर्थात पढ़ैत वा सुनैत मातर ल' सकैत अछि । भाषा शिल्पक गप्प करी तँ एक-एकटा छोट-छोट शेरमे एतेक बेशी गप्प नुकेएल अछि जे सुनि आ सोचि कए मनक भितर ख़ुशिक लाबा फुटै लगै छैक । एकटा उदाहरण एहि संग्रहक पहिल गजलक एकटा शेर- "दुइ ठोर थिक अथवा तिलकोर केर तडुआ होइए तँ लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए" मिथिलाक भोजनक पाक-कलाक श्रेष्ठताक प्रतिक तिलकोरक तडुआ । जेकर स्वाद, कुड़कूड़ेनाइक जवाव नै, सुनिते मातर मुँहमे पानि एनाइ स्वभाविक । स्वादिष्ट, पातर, कड़कड़ तिलकोरक तुलना पातर ठोरसँ । जबरदस्त उपमेय आ उपमानक प्रयोग । ओकर बादो, लाज होइतो चिखबाक मोन ।एहेन एहेन सरल व पारम्परिक शव्द चयन हिनक गजल कौशलमे चारि चान लगा रहल अछि । सम सामयिक मिथिला मैथिलीक समाजमे जतेक कोनो समस्या वा वाद विवाद अछि सभपर अपन कलम चलबैत सुन्दर-सुन्दर शेरक द्वारा अनिलजी लोकक आ समाजक धियान ओहि दिस दियाबैमे सफल भेल छथि । समाजक अव्यवस्थाकेँ देख संघर्ष आ छिनबाक गप्प एक्के संगे कोना, देखू एहि शेरमे- "आजादीक लेल एखनहुँ संघर्ष अछि जरूरी व्यर्थ गेल सभ मांगब छिनबाक मोन होइए" संग्रहक नामे अनुरूपे एहि "गजल गंगा"मे अनिलजी सभ किछु समेटने एकरा सुन्दर रूप देबैमे सफल भेल छथि । 3 मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’ (डॉ. अजीत मिश्र) “सुस्वरं सरस चैव सरागं मधुराक्षरम्। सालकारं प्रमाणं व षडविधलक्षणम्।।” अमरकोशमे गीतक छओ गोट उक्त लक्षण उद्धृत कएल गेल अछि, जकरहि मूल मानि विभिन्न विचारक - आलोचक लोकनि गीत विधाकेँ छान-पगहामे बान्हल करैत अएलाह अछि। यद्यपि गीत विधा सम्बन्धी उल्लेख सामवेदमे सर्वप्रथम दृष्टिगोचर होइछ। पछाति एक स्पष्ट अवधारणा अमरकोश एवं नाट्यशास्त्रमे कएल गेल। विभिन्न समयमे विभिन्न विचारक द्वारा एहि सन्दर्भमे आएल विचारमे भिन्नता दृष्टिगोचर भए सकैत अछि, मुदा ओहि बीच जाहि एक तत्वपर सभ गोटए एक मत देखबामे अबैत छथि ओ थिक गीतक सम्बन्ध गेयतासँ अछि, गीत काव्य एक स्वतन्त्र विधा थिक, जे काव्य आ सङीतक सुन्दर-संयोगसँ उत्पन्न होइछ। एहि गीत विधाक प्रधान तत्वक प्रतिपादन एहि प्रकारेँ कएल जाए सकैत अछि- · संगीतात्मकता · कल्पनाक प्रभावकेर सौन्दर्यपूर्ण ओ कलापूर्ण चित्रण · रागात्मकता · अन्तर्दर्शन आ आत्मनिष्ठ, जनिक आधार थिक सुख-दुख, राग, द्वेष, आशा-निराशा · लयात्मक अनुभूति, आओर · समाहित प्रभाव। जँ उपर्युक्त तत्वक माध्यमे कोनो गीत विधाक पोथीक मूल्याङन कएल जाए तँ ओएह होएत ओहि पोथीक उचित मूल्याङन। आइ हमहु एकरहि आधार बनाए आदरणीय श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क गीत विधाक पोथी ‘तोरा अंगनामे’ पर किछु विचार करबाक प्रयास कए रहल छी। रमणीयताक कारणेँ सङीत जीवनक अभिन्न अङ थिक आओर थिक हृदयक भाषा आ मनक प्रकाश। गीत प्रथमत: आ अन्तत: अपन स्त्रष्टाक मानस-मुकुट थिक, हुनक व्यक्तित्वक दर्शन थिक। रागात्मक अनुभूति जखन आवेशक क्षणमे रहरहाँ उमड़ि कोनो मधुर सङीतक माध्यममे व्यक्त होएबाक लेल प्रस्तुत होइत अछि, तखन मधुर लयमे कविक आंतरिक सहजानुभूति अपन रूप धारण करए लगैछ आ कवि स्वत: प्रेरित भए अपन भावनाक अनुरूप शब्दाभिव्यक्ति कए बैसैत छथि। ठीके, ‘तोरा अंगनामे’मे संगृहीत प्रत्येक पद कविक आंतरिक सहजानुभूतिक स्पष्ट दर्शन करबैत अछि। एको पाइ सन्देह नहि जे गीतकार बिनु प्रयासहिँ अन्तर्मनसँ आएल अभिव्यक्तिकेँ रूप धारण करौलनि अछि। उदाहरण देखबासँ पूर्व दर्शनीय-पठनीय अछि गीतकारक पोथीमध्य उद्धृत हुनक अभिव्यक्ति- ने कवि छी हम ने गीतकार ने आलोचक ने लेखक छी मानी त मानू अपनहि सन माँ मैथिलीक पद-सेवक छी। एहि उपर्युक्त पदमे नहि तँ कोनो अकृत्रिमता अछि आ नहि अछि प्रगल्भ विचार, ई तँ थिक अन्तर्मनक एकटा स्वरमात्र। आ तेँ ने कहल जाइत छैक जे अन्तर्मनसँ निकलल शब्दमे, विचारमे कोनो लाइ-लपट नहि होइत छैक, कोनो राग-द्वेष नहि होइत छैक, आ ने होइत छैक कोनो लिप्सा। तेँ गीतकार अपनाकेँ मात्र मैथिलीक सेवक घोषित कएने छथि, नहि कि ओकर नियंता। एहि प्रकारेँ उपर्युक्त पोथीक अन्तर्गत देखबामे अबैत अछि जे गीतकार मात्र ओहि विचारकेँ व्यक्त कएलनि जे अन्तर्मनसँ निकलल छनि आ सेहो कोन रूपमे? तँ, लोक-जीवनक सङ बढ़ैत सम्पृक्तिक रूपमे, गीतक स्वरूपपर राजनीतिक चेतनाक प्रभावक रूपमे, चोखगर यथार्थ बोधक स्वरमे, गहन निराशामे मानवीय संबलक रूपमे गीत परिकल्पनाक माध्यमे। ओहूना देखल जाइत छैक जे कोनो गम्भीरसँ गम्भीर विषय जँ मधुमे बोरि व्यक्त होइछ तँ ओ अपन प्रभाव तँ देखबैते अछि, मुदा प्रारम्भिक किछु क्षणमे निश्चये अपूर्व आनन्द अबैत छैक। ठीक, तहिना गीतकार ‘अनिल’ बाबू गम्भीरो विषयकेँ एहन-ने लय-तालमे बद्ध कए व्यक्त कएलनि जे श्रोतापर ओकर प्रारम्भिक प्रभाव अत्यन्त रमनगर होइत छनि, मुदा बादमे ओ अपन प्रभाव सेहो खूब देखबैत अछि। द्रष्टव्य थिक किछु ओहने पाँती- “छथि उदासे बहिन मैथिली आइ जागृतिक भोरमे स्नेह ने पाबि रहलि बेचारी अपनो माइक कोरमे देखि मलिन आकृति निज जनकक डूबल सदिखन नोरमे हो पौरुश तं एहि फन्दासं मिथिलाकें स्वच्छन्द करू चाही जं उद्धार मैथिलीक, तिलक प्रथाकेँ बन्द करू।” के एहन कठोर हृदय होएत जे एहि पदकेँ सुनि-पढ़ि अपन हाथ हृदयपर नहि लए जाएत? के एहन विचारहीन होएत जे एहि पदकेँ सुनि-पढ़ि किछुओ कालक हेतु एहि उचित बाटपर चलबाक दिशामे नहि सोचत? बस, साहित्यक तँ इएह काज थिकैक जे पाठककेँ उचित बाट धराबए, ओहि दिशामे सोचबाक हेतु बाध्य करए। एहि दिशामे उपर्युक्त पोथी पूर्ण रूपेण सफलता प्राप्त कएलक अछि। गीत तँ ओ थिक जे एक कण्ठसँ दोसर कण्ठ होइत जगभरि पाटि जाए। मिथिलाक प्राय: केओ एहन व्यक्ति नहि होएताह जे एहि गीत-संग्रहक कोनो-ने-कोनो गीतक किछु पाँती कखनो-कतहु सुनाए नहि पाबथि। किछु गीत तँ मैथिलीक प्रत्येक मञ्चपर अदौसँ अपन स्थान छेकि चुकल अछि। देखल जाए किछु ओहने पाँती- “हम मुग्ध भेलौं, धरतीक श्रृंगार देखि क’ नव कलष नव मज्जर आ पात देखि क’ बुझि पड़ैछ आबि गेल नव दुनियां जेना आइ धरतीयो लगैछ नव कनियां जेना।” आ “मोन होइए अहांकें देखिते रही, किछु बाजी अहां हम सुनिते रही। आइ आयल मिलन केर मधुर यामिनी बनि बैसलौं अहां मानिनी-कामिनी।” आदि एतावता, कहल जाए सकैत अछि जे ‘तोरा आंगनमे’ एकटा एहन गीत संग्रह भए पैंतीस-चालीस वर्ष पूर्व मैथिली साहित्यिक संसारमध्य पएर रोपने छल, जे शीघ्रहि अपन प्रभाव मिथिलामध्य पसारि बहु प्रशंसित भेल। एक दिस जतए ई अपन व्यङ्यक माध्यमे समाजकेँ शिक्षित करबाक प्रयास कएलक ओतहि दोसर दिस अपन लोक-विचारसँ समाजकेँ जागृति। एतबे नहि, एहि संग्रहक एकटा अपूर्व विलक्षणता ई अछि जे एहिमे व्यवहृत विचार गहन निराशामे मानवीय संबल बनि ठाढ़ भए जाइछ। इएह तँ थिकैक साहित्यक कार्य, इएह तँ थिकैक साहित्य प्रभाव। एहि सभमे ‘तोरा अंगनामे’ मैथिलक प्रत्येक अङनामे ठाढ़ भए एहन-ने विचार, एहन-ने प्रभाव पसारलक जे चहु दिस एकर स्वर कर्णगोचर होअए लगलैक, चहु दिस एकर जाल पसरए लगलैक। हँ, जखन चन्द्रमामे सेहो करिआ दाग छनि तखन ई तँ मात्र एकटा पोथीमात्र थिक। एहिमे व्यवहृत किछु शब्द अपन मूल रूपसँ मेल नहि रखैत अछि। एकर पाछाँ कारण कोन? एकर जिज्ञासा बनले रहल अछि, मुदा ओहि किछु शब्दकेँ देखि अपनहुँ सभसँ विचार प्राप्त भए सकैत अछि। द्रष्टव्य थिक किछु ओहने शब्द- देष, षंकर, सुभाशो, विष्व, आषा, ष्यामल, सृश्टि आदि। एतए ध्यातव्य अछि जे छन्द-ताल आदिक ज्ञान नहि रहबाक कारणेँ भए सकैछ जे उक्त विषय हमर माथक उपरे दनेँ चल गेल हो। ओना इहो सुनल अछि जे कवि लोकनिकेँ विभिन्न क्रममे शब्दकेँ तोड़बाक-जोड़बाक सामर्थ्य प्रदान कएल गेल छनि, तेँ भए सकैछ जे एहि शब्द सभक पाछाँ ओएह कारण हो। मुदा, एहिमे कोनो भाङट नहि जे ‘अनिल’ बाबू अपन पोथी ‘तोरा अंगनामे’क माध्यमे एहन-ने अनिल बहौलनि जे ओकर बिड़ड़ोमे सम्पूर्ण मैथिली गीत विधाक आङन सज्जित-चमत्कृत भए उठल अछि। सम्पर्क- 9620069487 4 धारक "अइ" पार (आशीष अनचिन्हार) सीमान जे शब्द थिक तकर मतलब होइ छै एखन रेखा जाहिसँ अपन-आनक बोध हो। ऐ सीमानक नाम वस्तु बदलिते बदलि जाइत छै। जेना खेतक सीमानकेँ आरि तँ गाछी केर सीमान हत्था भेल। तेनाहिते घर-घड़ारीक सीमान टाट-फरकी भेल। टोलक सीमान "ऐ टोल-ओइ टोल" होइत अछि। तेनाहिते नदी-धार-पोखरि लेल सेहो " ऐ पार- ओइ पार" केर प्रयोग कएल जाइत छै। जखन कियो कहै छै जे "धारक ओइ पार" तँ एकर अर्थ कहनिहारक उल्टा बला दिशाकेँ लेल जाइ छै। मानि लिअ कियो पछबारि पारमे ढ़ाठ भऽ कऽ कहै जे "धारक ओइ पार" तँ एकर मतलब जे कहनिहार "धारक" पुबारि पार बला दिस इशारा कऽ रहल छथि। आब चली असल उद्येश्यपर। मानि लिअ जे हम कहलहुँ- जे "धारक ओइ पार" नीक लोक सभ छथि तँ एकर मतलब मात्र एतबे नै रहै छै जे "धारक ओइ पार" नीक लोक सभ छथि, एकर मतलब ईहो होइ छै जे "धारक" ऐ पार खराप लोक सभ छथि। तेनाहिते मानि लिअ जे हम कहलहुँ- जे "धारक ओइ पार" खराप लोक सभ छथि तँ एकर मतलब मात्र एतबे नै रहै छै जे "धारक ओइ पार" खराप लोक सभ छथि, एकर मतलब ईहो होइ छै जे "धारक" ऐ पार नीक लोक सभ छथि। एकटा आर रोचक प्रसंग बूझि लिअ जे ई सीमान मात्र लोकेँ लेल नै छै बल्कि लोक, प्रकृति आ आन वस्तुसँ सेहो छै। मने ओइ पारक जमीन उपजाउ छै मने ऐ पारक जमीन उस्सर छै। आलोचकक काज मात्र गदगदी आलोचना करब या पूरा किताबक सारांश प्रस्तुत करब नै छै। आलोचकक काज तँ सैद्धांतिक पक्षक सही विवेचनाक संगे ईहो छै जे रचनामे जे किछु अघटित रहि गेल छै तकरा पाठकक सोंझा आनि ओकर रस-स्वादकेँ आर बेसी नीक करब। आब कने विस्तारमे चली--- मानि लिअ एकटा कवि एलाह आ लिखलाह जे "धारक ओइ पार" तँ एकर की मतलब हेतै। एकर मतलब ई छै जे कवि "ओइ" पारक संगे-संग समानांतर रूपें "अइ" पारक सेहो वर्णन कऽ रहल छथि। किछु उदाहरण देखू— "हम बिसरि जाए चाहलहुँ अपन देखल सपना............. मुदा बिसरि ने सकलहुँ" कवि धारक "ओइ" पार लेल ई प्रयुक्त केने छथि मुदा ई कटु सत्य जे धारक "अइ" पार ओ देखल सपना बिसरिए नै गेला बल्कि ऐ दुनियाँसँ ओसपने बिला गेलै। 1947 केर बाद भारत दू बेर आजादीक सपना देखलक। पहिल बेर जयप्रकाशजीक संगे आ दोसर बेर अन्ना हजारेक संग मुदा आश्चर्य जे ओ सपना अजादीक नै रहै सीढ़ी बनेबाक लेल रहै। पहिल बेरमे लालू-नितीश-रामविलास तँ दोसर बेरमे अरविंद केजरीवाल। "जठरानलक दर्दसँ आहत भेल हम थुस्स दऽ बैसि जाइत छी" कवि धारक "ओइ" पार लेल कहै छथि मुदा धारक "अइ" पार बिजनेस सम्राट अनिल अंबानीक बेटा थुल-थुल, मोटापासँ ग्रसित भऽ थुस्ससँ बैसि जाइत अछि। "ओइ" पार लोक भुखले मरै छै तँ "अइ" पार बेसी खा कऽ। "अरे रे रे ई की बहुत रास मूँह तँ चिन्हारे जकाँ लगैत अछि.......... भेल रहय परिचय" कवि धारक "ओइ" पार लेल ई कहने छथि मुदा धारक "अइ" पार तँ भाए-भाएमे झगड़ा छै। बुढ़ारीमे बेटा अनचिन्हार बनि जाइ छै तँ जवानीमे लोक पाइ कमा लेल अपने परिवारसँ अनचिन्हार बनि जाइत अछि। क्यो हमर उपस्थितिक मान्यता नहि दैत अछि ----------- सभहँक मौन स्वीकृति ई धारक "ओइ" पारक कथा अछि मुदा धारक "अइ" पार तँ सभ एक-दोसरकेँ मान्यता दैत अछि। तों महान तँ तों महान। बिना एककेँ मान्यता देने अइ पारमे दोसरक मान्यता भैए ने सकैए। तँए "अइ" पार सभ एक दोसरकेँ मान्यता दैत अछि। आइसँ करीब 5 बर्ख पहिने हम मैथिलीक महान व्यंगकार रूपकांत ठाकुरजीक आलोचना "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि " शीर्षकसँ केने रही तकर ई अंश देखू-- "आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "मैथिली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि-- 1) मोमक नाक (व्यंग संग्रह) 2) धूकल केरा (व्यंग संग्रह) 3) लगाम (नाटक) 4) वचन वैष्णव (नाटक) 5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक। आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । ई शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मने रूपकांत ठाकुरजी अपन भविष्यक बात लीखि गेल छलाह।" तहिना "धार ओइ पार" केर कवि सेहो लीखिए देने छथि- "क्यो हमर उपस्थितिक मान्यता नहि दैत अछि" एकरा मात्र संयोग नै मानल जा सकैए जे आलोचनामे मात्र ओहने लेखक स्थान पबैत छथि जे नाना प्रकारक तिड़कम भिड़बैत छथि। "-----आम जामुन लतामसँ भरल गाछी बिरछी छै बाड़ी झाड़ी छै फूल-फुलवारी छै मंदिर-मस्जिद छै..." ई धारक "ओइ" पार छै मुदा "अइ" पारमे तँ भागलपुर, गोधरा, मुजफ्फरनगर आ दादरी सभ छै। उपरका पाँतिसभ "ओइ" पारसँ बेसी "अइ" पारक बात अछि। "-- गाँधी सुभाष भगत सिंहक खिस्सा" लगैए धारक "ओइ" पारमे ई खिस्सा सभ मोनसँ सूनल जाइत हेतै। धारक "अइ" पार तँ आब नाथूराम गोडसे शहीदक दर्जा पाबि गेल। ओकर मूर्ति आब गाँधीक बराबरमे लागि गेलै। ने तँ हम ऐ जीवनमे धारक "ओइ" पार जा सकै छी आ ने हम धारक "अइ" पारक पूरा व्याख्यान कहि सकै छी। भऽ सकैए जे धारक "ओइ" पार देखाबए लेल जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक बदला आकर कियो आबि जाथि आ धारक "अइ" पारक पूरा व्याख्यान कहबा लेल हमरा बदला कियो आर आबि जाथि मुदा एतेक तँ सत्य जे धारक "ओइ" पारक हाल-चाल बुझलासँ धारक "अइ" पारक हाल-चाल सेहो बुझा जाएत। ई साहित्य केर बड़का गुण छै जे ओ अपना समयसँ आगू हुअए मुदा........................ जे रचना पढ़लापर आगुओकेँ बुझाए आ पाछुओकेँ तखन ओकरा की कहबै। "धारक ओइ पार" नामक रचना आपना समयसँ बहुत आगू समय केर कविता अछि मुदा ओकर आवृत आ पाठक करैत काल ई बहुत नीक जकाँ फड़िच्छ हएत जे ओ अपना समयसँ पाछुओकेँ रचना अछि। जखन अहाँ रमायण की महाभारत पढ़बै तँ ई बेसी स्पष्ट हएत जे ई दूनू ग्रंथ आगू आ पाछू दूनू समयक रचना छै। ई दूनू ग्रंथक जे दृष्टि आ विजन छै से आगू समय केर छै मुदा पाठ ओ आवृति पाछू समयक। हम एतए ई नै कहए चाहै छी जे जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक दीर्घ कविता संग्रह "धारक ओइ पार" रमायण की महाभारते जकाँ अछि मुदा एतेक तँ सत्य जे ई दीर्घ कविता मैथिली साहित्य केर 90 प्रतिशत कवितासँ नीक आ प्रभावी अछि। 5 कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा (परमानन्द प्रभाकर ) जहिना पहाड़क आंतरिक विह्वलता झरनाक रूपमे, नदी आ समुद्रक विह्वलता तरंगक रूपमे, मेघक विह्वलता जल-बूंदक रूपमे आ फूलक विह्वलता सुगंधक रूपमे आकार ग्रहण करैत अछि तहिना कोनो संवेदना संपृक्त व्यक्तिक आंतरिक रागात्मक विह्वलता साहित्यक विविध विधाक रूपमे प्रस्फुटित होइत अछि जकरा कविता,गीत,गजल,कथा,लघु कथा,निबंध इत्यादि नामसँ अभिहित कयल जाइत छैक आ तकर मुखर प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक पोथी ‘गीत गंगा’| अनिलजीसं हमरा सदेह त भेंट नै अछि मुदा हुनक एहि पोथीक कविता सभसं हमरा हुनक यथार्थ परिचय भेटल अछि | किएक त हमर ऐकांतिक विश्वास अछि जे कोनो रचना अपन रचनाकारक नैसर्गिक संरचनाक प्रतिविम्ब होइत अछि |एहि अर्थें हमरा ई बुझबामे भांगठ नहि भेल जे अनिलजी संवेदना संपृक्त, सहज ओ सरल व्यक्तित्वक आगार छथि | हुनक ह्रदय-भूमि रेगिस्तानक भूमि नै छनि अपितु हुनक ह्रदय-भूमि सरैसाक उर्बर भूमि छनि | पोथीक कविता सभ सरल ओ खांटी मैथिली भाषामे रहबाक कारण आ छन्दाश्रित होयबाक कारण जेहने आकर्षक अछि तेहने गेय | सामाजिक विभिन्न आ ज्वलंत समस्या सभपर केन्द्रित कविक ई पोथी पाठकक ह्रदयमे स्थिर श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर आदि रसक स्थायी भावक नदीकें तरंगायित करैत अछि | कविकें बूझल छनि जे ---- सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ना ब्रूयात् सत्यमप्रियं | प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एषः धर्मः सनातनः -मनुस्मृतिः (सत्य बाजक चाही, प्रिय बाजक चाही,अप्रिय सत्य नहि बजबाक चाही, संगहि संग प्रिय असत्य सेहो नहि बजबाक चाही) मुदा कविकें सत्यो बजबाक छनि आ अप्रिय सत्य नहि बाजी अहूसं बचबाक छलनि तें ओ नवका बाट धेलनि, सामाजिक वर्तमान सत्यकें कविताक रूपमे रागात्मक (प्रिय) बनाक’ पाठकक सोझाँ रखलनि अछि | हुनका बूझल छनि जे लोक जीवन पर कविताक असरि चिर काल धरि रहैत छैक तें ओ कवितेकें अपन वक्तव्यक वा अभिव्यक्तिक माध्यम बनौलनि | कवि द्वारा कयल गेल छांदिक प्रयोग एहि विश्वासकें मजगूत केलक अछि जे कवि नीक छ्न्दज्ञ टा नहि नीक छंद-प्रयोक्ता सेहो छथि |अपन कवित्वक प्रदर्शनक लौलमे कवि कतौ भसिआएल नै बुझि पडैत छथि |बौद्धिक अराजकताक परिचिति कतौ नै भेटल अछि एहि कृतिमे | कविकें अपन बात रागात्मिका विधामे रखबाक सिद्धहस्तता प्राप्त छनि | ‘नोरे के जिनगी कतेक दिन उघबें ?’ ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?’ ‘पटना घुमलौं दिल्ली घुमलौं’ ‘सभ लोक आकुल’ आदि शीर्षक कवितामे कवि देश ओ समाजक वर्तमान दशाक चित्रण मार्मिक रूपसं केने छथि |‘नब्बे टा बरियाती एलै’ शीर्षक कविता आजुक बरियातीमे पसरल नवका संस्कृति पर चोट करैत अछि | ‘पाथरकें भगवान् बुझै छी’ एहि शीर्षक कविताक ई पांति --- ‘ब्रह्म थिका ओ जे आतुर छथि सुंदर सृष्टि रचैले’ और मनुक्खक जीवनमे आनंदक वृष्टि करैले’ हमरा दिनकरजीक ‘जनतंत्र का जन्म’ कविताक ओ पांति मोन पाfM देलक जाहिमे ओ कहलनि अछि ---- ‘आरती लिए तू किसे ढूंढता है मूरख मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानो में देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में’ कवि, विलोपित होइत भारतीय संस्कृतिक लेल चिंतित बुझि पडैत छथि मुदा निराश त कथमपि नहि छथि | हुनका भावनात्मक विश्वास छनि जे हमरा भारतीय संस्कृति पर क्यो कोनो प्रकारक आघात नहि क’ सकत |हमर भारतीय संस्कृति कथमपि नष्ट नहि होयत | तें सविश्वास आ सगर्व कहैत छथि ------ ‘हमर संस्कृतिकें कियो सोखि ने सकैए |’ मुदा एहि ठाम हम कविसं कह’ चाहैत छियनि ---- ‘घर तो अपना जल गया घर के चिराग से |’ पोथीक आरम्भ ‘आत्म-गीत’सं भेल अछि जकरा गीतात्मक आत्मकथ्य कहल जा सकैत अछि | एहिमे कवि अपना द्वारा देखल, सूनल,पढ़ल आ भोगल यथार्थकें रेखांकित केलनि अछि, से बडड नीक लागल | पोथीक अधिकांश कविता भावुकता ओ वैचारिकतामे संतुलन बनाक’ रखबामे सक्रिय त अछिए, अपन सकारात्मक भूमिकाक निर्वाह सेहो करैत अछि | हं, एहि ठाम प्रसंगवश एकटा बात कहि देब आवश्यक बुझैत छी --- ‘नोरेके जिनगी कतेक दिन उघबें ?’ आ ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?’ एहि दूनू शीर्षक कवितामे किछु पांतिक पुनरावृत्ति भ’ गेल छैक, यदि प्रेसक दोष हो त किछु कहबाक प्रयोजन नहि, यदि से नहि त एकरा लोक पुनरावृत्तिक दोष कहत आ पाठक लोकनि सेहो मानता | जे-से, पोथी व्यक्तिगत रूपसं हमरा सर्वात्मना खूब अरघल अछि, तें हम अपन सीमा आ मर्यादाक ध्यान करैत कविकें धन्यवाद त नहि देबनि मुदा अपन अधिकारो त नहिये छोड़बनि | तें एहि सुंदर आ प्रेरणाप्रद कृतिक लेल भूरि-भूरि प्रशंसा करैत नमन करैत छियनि 6 ‘गीत-गंगा’मे सब किछु अछि -----छत्रानंद सिंह झा ‘गीत-गंगा’ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क एक एहन काव्य-संग्रह अछि जकर एक-एक कवितामे विविध मानवीय संस्कृतिक आधारभूत एकताकें कवि परेखबाक चेष्टा करैत अछि | मनुष्यक प्रति व्यापक रागात्मक चेतनाक अभिव्यक्ति स्पष्ट रूपसँ हिनक कविताक विशेषता थिक | कविता सामाजिक यथार्थक बेसी निकट अछि | हिनक रचनामे प्रेम,ओ प्रेम चाहे प्रेयसीक प्रति हो आ कि सर्वहाराक प्रति – परिलक्षित होइत अछि |अधिकांश कवितामे रोमांटिक बेचैनी भेटैत अछि |सौन्दर्यानुभूतिक कोनो गहन क्षणक स्मरण पबैत छी हिनक कवितामे | ‘अनिल’क कविता सुकोमल आ मानवीय चेतनासं संवाद स्थापित करैत बुझाइत अछि |हिनक कविताक चमत्कृत करय बला प्रभाव तखन देखबामे अबैत अछि जखन ओ कविताक पाठ करैत छथि | हिनक कवितामे मानवीय प्रेमक नदी मंद-मंद बहैत प्रतीत होइत अछि | विचारक आडम्बर ठाढ करबाक अपेक्षा ‘अनिल’जीवनक विस्मृत होइत जा रहल स्वाद,गंध,स्पर्शक दिशामे उन्मुख करैत बुझि पडैत छथि | ‘अनिल’क कविता जे किछु कहैत अछि, से बिना लाग-लपेटक - साफ़-साफ़ | हिनक रचना कल्याणकारी होइत अछि |लोक-आस्थाक प्रवलता हिनकर कवितामे ठाम-ठाम भेटैत अछि – ‘भ्रष्टाचारक तिमिर नष्ट हो जन-मनमे सूर्योदय हो कांट-कूशसं मुक्त बाट हो सभ सज्जन-मन निर्भय हो|’ उत्तम कविताक लेल संवेदनाक गहनता,विचारक प्रवलता आ आत्मान्वेषनक जेहन आवश्यकता होइत अछि : प्रेम,सौन्दर्य आ गीतात्मक संवेदना –सब किछु हिनक कवितामे भेटैत अछि | 7 गीत गंगामे अनिल (केदार कानन) जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" कवि गीतकार छथि। कविता ई लिखैत रहलाह अछि मुदा हिनक गीतकारे बला रूप बेसी प्रखर आ मुग्धकारी अछि।अपन गीत सभमे कोमल भाव चित्र विन्यस्त करबामे हिनक जोड़ नहि अछि। सूक्ष्म आ सांकेतिक अर्थ ग्रहण करयबामे हिनक गीत समर्थ अछि। मैथिलीमे गीत कारकजे श्रृखंला अछि ताहिमे अनिल विशिष्ट छथि। खाहे ओ अभिव्यक्ति कौशल हो वा सहज-सरल ढ़ंगे अपन मनक बातकेँ कहि देबाक आतुरता अनिल निश्चये अपन लक्ष्य प्राप्त करैत देखाइत छथि। 1973 मे हिनक एक गीत संग्रह "तोरा अंगना मे" आ १९९९मे दीर्घ कविता संग्रह "धारक ओइ पार" एलनि आ २०१३मे गीत संग्रह "गीत गंगा"। पहिलसँ दोसर संग्रहमे एक्कैस बर्खक तँ दोसरसँ तेसर संग्रहमे चौदह बर्खक अंतराल। बहुत नमहर अंतराल की हुनक भितरक रचनाकारकेँ सुषुप्तावस्थामे रखने रहल? एतऽ हम कहब नै। पाठकेँ प्रायः बूझल हेतनि जे अनिल हिंदीमे सेहो निरंतर लिखैत छपैत रहलाह अछि। अपन मनक आवामे हुनक शब्द संसार, भाव-संपदा पकैत रहल आ बाहर एबा लेल छटपटाइत रहल। तकरे प्रतिफल थिक "गीत-गंगा", जे हिनक श्रेष्ठ आ मानक गीत संग्रह थिक। एहि संग्रहमे जे गीत सभ अछि से संपूर्ण मिथिलाक तीत-मीठकेँ बहुत सहजता संग कहैत अछि। कतहु हिनक दृष्टि परंपरागत शोषणक औजार दिस जाइत अछि आ आवश्यक परिवर्तन नै देखि गीतकार झूर-झमान होइत छथि आ एक नव बाट देखबैत छथि। आ बाट देखेबाक जे हिनक कुशलता छनि से हमरा विभोर करैत अछि। "दिल्लीसँ दरभंगा धरि अछि "निर्भयाक चित्कार कृष्ण आबि कऽ लाज बचेता से सोचब बेकार" प्रकृतिक समीप जाइत गीतकार प्रकृतिसँ एकमेक होइत जे जयजयकार करै छथि से चित्रमनकेँ मोहैत अछि- जंगल झाड़ पहाड़क जय हो पोखरि धार इनारक जय हो जय हो झरना नदी समुद्रक हरियर खेत खम्हारक जय हो शहरक जय हो गामक जय हो जामुन आम लतामक जय हो जय हो मकइ गहूम आ धानक भूसा नार पुआरक जय हो एहि गीतमे हुक दृष्टिमे जे किछु अबैत अछि से ई सिद्ध करैत अछि जे जीवनक जे आधारभूमि थिक, अस्तित्व बचेबाक वा दैनंन्दिक जीवनमे जकर जकर बेगरता मनुक्खक जीवनमे अछि करा संग हिनक अद्भुत तादात्यम्य अछि। आ एहि सभहँक बहुत सार्थक आ अर्थगर्भ अभिव्यक्ति हिनक गीतमे भेल अछि। गीत गंगामे संकलित हुनक आत्मगीत (जे विषय सूचीमे सम्मिलित नै अछि आ ओ अपन बाबाक समृतिकेँ नमन करैत लिखलनि अछि) एहि संग्रहक श्रेष्ठ गीत मानल जेबाक चाही। आत्मगीतमे स्वभावतः ओ अपन जीवन, जिवनक संपूर्ण परिस्थिति आ परिवेशकेँ चित्रित केलनि अछि आ अतीतक पुनरावलोकन करैत देखाइ छथि। किछु पाँतिकेँ एतऽ उद्धृत करबाक लोभ संवरण नहि कऽ पबैत छी— सपना पाहुन बनि कऽ आयल तन्नुक सन निन्नक आँगनमे हम देखलहुँ दुन्नू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल नागर्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल छल जहाँ जतऽ जे चिड़ै कतहुँ आकाश छोड़ि कऽ पड़ा गेल सभ बाट अहिल्या सन शापित नित बाटे राम केर तकै छली कयटा पिच्छर छल बा जतय खसवासँ हमरा बचा गेल माइक हाथक पाड़ल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल क्षमा करु हे मित्र हमर नहि आँखि मूनि कऽ चलब हम उपरोक्त पाँति सभ गीतकारक जीवनमे घटित अतीत, हुनक संकल्प आ हुनक प्रतिबद्धता आदिकेँ रेखांकित करैत एक विस्तृत फलक अवश्य तैयार करैत देखाइत अछि। मुदा जतऽ ओ कहै छथि जे -नागर्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल- से हिनक गीत सभमे विरल देखाइत अछि। एतऽ मोन पड़ै छथि हिंदीक गोरख पांडेय। हमरा लगैए गीतकार अनिल लग शब्द संपदा आ विपुल अभिव्यक्ति कौशल छनि। जव ओ जीवनक वास्तविक गीत लिखथि, समाजक अंतिम आदमीक गीत लिखथि, निराला आ नागर्जुनक वैचारिक प्रतिबद्धताक गीत लिखथि तँ ओ निश्चये हिनक गीतकारक व्यक्तित्वकेँ आरो ऊँचाइ आ व्यापकता देतनि आ हुनक गीतकारक एकटा प्रखर रूप मैथिलीकेँ भेटत। उद्बोधन गीत, प्रेरणा गीत, प्रकृतिसँ संबंध गीत, अपन छोट-छोट सुख आ दुखक गीतक जमाना लदि गेल अछि। एहन गीत सभ भारतक सभ भाषा-साहित्यमे ततेक लिखल गेल हछि जे पाठक अपनासँ ओहि गीत सभहँक संग तादात्म्य स्थापित नहि कऽ पबैत अछि। हम व्यक्तिगत रूपें गीतकार अनिलसँ बहुत रास अपेक्षा रखैत छी, जे ओ ओही पंथकेँ चुनथि जे पंथ हुनका बहुत-बहुत ऊँचाइपर लऽ जानि आ हम सभ गौरव बोधसँ भरि उठी। 8 ‘गीत-गंगा’क प्रवाह (डा.अमर नाथ ठाकुर) विचित्र विरोधाभासक कवि छथि जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’| ह्रदयसं काव्यक धारा स्वतः प्रसृत होइत रहनि आ मोन लगा क’ पढ़ैत रहथि विज्ञान |किन्तु, पूर्वजन्मार्जित कविताक गुनगुनाहटि हिनका ‘बोटनी’ दिस ल’ अनलक |प्रकृतिक प्रति अनुराग,सस्य श्यामला मातरम्’ के प्रति सहज उद्वेग हिनक ह्रदय आ मोनकें एकीकृत क’ कृषि वैज्ञानिक बना देलक | विज्ञान हिनका बैंकमे चाकरी देलकनि आ रिक्त समयमे ह्दयतोषक कविता कामिनीक सेवाक हेतु प्रभूत समय | कवित्वक सतत उद्रेक हिनका अपन उपनाम ताकक हेतु बाध्य क’ देलक | अपन आत्म-गीतमे एहि उच्छ्वासक उल्लेख करैत गुनगुनाइत छथि : चलिते-चलिते भेटलाह रमण आ भेटि गेला श्री सोमदेव कोइलख विद्यापति पावनिमे भेटल आशीष मधुप,किरणक सस्वर दू रचनाक पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल | यात्री,हरिमोहन,जीवकान्त, शेखर,रवीन्द्र, मणिपद्म,अमर बाबू, कक्का आ भैया सन छल नाम कतेको जोड़ा गेल | एहि कविक संदर्भमे इहो अपन नाम ‘अनिल’ तय कएलनि |अनिल, जकर शाश्वत सम्बन्ध अनलक संग छै |पवन जगावत आग को , एकटा पांती पहिने पढने रही | अपने कविवर की सोचि ई उपनाम चुनलनि| किन्तु, भारतक अध्यात्मक कथन छै जे मोन रूप वायु (अनिल) कायाग्नि रूप अनल पर जखन भावनाक उत्थानसं प्रहार करैत अछि तँ इच्छा कविता भ’क’ निकलै छै |हवाक अर्थे छै जे सतत बहैत रहय आ हिनक कविता ध्वनि अपन प्रथम उद्रेकक क्षणसं सतत प्रवाहमान छनि |सुबोध्य भाषा,ह्रदयावर्जक विषय वस्तु,जीवनक हास-अश्रुक चिंतन,अपन शैली, तुकांत पद संयोजन,गेय पद | जहिना कविता लिखबाक सौख तहिना मधुर स्वरमे गएबाक कला हिनक कवित्वक भास्वर पक्ष अछि अपने कहने रहथि, मैथिली अकादमीक अध्यक्ष व्यासजीक उद्गत भाव | हिनक कविताकें पढि ओ जिज्ञासा प्रकट केलखिन, ई सभ अहाँ गाबि लै छियै ? ई मनोरम स्वरमे मुरलीधर प्रेसमे गाबि उपेन्द्र नाथ झा’व्यास’जी कें अपन स्वर माधुयॅ सं मंत्रमुग्ध क’ देलखिन |ओ प्रहर्षित होइत कहलथिन , तखन त अहाँ अखवारोकें गाबि देबै |ई नैसर्गिक स्वर हिनका जन्मजात प्राप्त छनि | एक बेर सिवानमे फगुआक उपलक्ष्यमे ‘भांगक भोज’क आयोजन भेलै | किन्तु, आयोजनक मुख्य लक्ष्य रहै फगुआमे ठाकुरजीक मादक स्वर आ फगुआक हेतु अभिनव पद-विन्यासक श्रवण |कविवर श्रोता आ आयोजक्क मनोभाव कोना नइ बुझितथिई | इहो एक टा टटका रचना ल’क’ उपस्थित छलाह | भांग पीबाक प्रक्रिया हास-परिहासक संग समाप्त भेल | सब अपन गप्पक खजानासं गोष्ठीकें गेय वातावरणक हेतु तैयार कएलक |आ ‘मधुरेण समापयेत’क अनुरूप ठाकुरजीकें आग्रह केलकनि | ककरो अनुमान नै रहै एहन नूतन पदबंधक स्वर लहरीक : चाह चाही आ पान चाही कलाकारकें कने भांग चाही | घोरि नीक जकां चिन्नी मिला क’ देखि लिय’ रसगुल्ला खुआ क’ मोन पंछी बनय, कतौ उड़ि-उड़ि चलय ...... हाय रे आबि गेल रंगदार फगुआ देखू मौसम बनल अछि अगुआ धरती कनियाँ बनल,कोहबर दुनियां बनल आसमान चाही आ चान चाही से देखै ले’ मोन जुआन चाही | सभ झूमि उठल | भाव-विभोर भेल | अपनाकें बिसरि गेल |ई छनि अनिलजीक काव्य माधुर्य | बरखोसं बैसल मैथिली साहित्य परिषद्, सिवानमे हिनक कविता नवजीवन फूकि देने रहै |अपन एहि अतीव मधुर क्षणक वर्णन करैत आत्मगीतमे स्वयं लिखने छथि : ‘लिखबा आ पढबा केर नशा सूनब आ सुनयबा केर नशा शब्दक सोना,हीरा,मोती देखब आ देखयबा केर नशा सदिखन आनंदित रहबा ले’ जीवनक अर्थ छल बुझा गेल |’ विगत शताब्दीक अष्टम दशकक मध्यमे ‘तोरा अंगनामे वसंत नेने आएब सजना’ क वासंती स्वर नेने कविवर मैथिली साहित्यक क्षितिज पर अवतीर्ण भेल छलाह |युवावस्था, रंगीन दुनिया,चह्कैत वातावरण, श्रृंगार रसक अनुपम समय होइछ |सिवान प्रवासमे श्रृंगार प्रधान गीतक बाहुल्य रहनि | ‘मोन होएए अहाँकें देखिते रही, किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही|’ ‘अहाँ नील गगन केर चंदा,हम मृत्यु भुवनक चकोर हम विरहक राति अन्हरिया,पिया अहाँ वसंतक भोर |’ मैथिलीक विकास क हेतु पल-पल प्रतिबद्ध | अजब ऊर्जा हिनक युवावस्थामे देखने छियनि| गोष्ठीक आयोजन,विद्यापति पर्वक आयोजन,कवि सम्मेलन, कवि सबहक समायोजन हिनक प्रिय विषय रहनि | किन्तु इ त पर्वत केर शिखर पर बैसि ,प्रकृतिक नग्न रूपक अवलोकन करैत मध्यप्रदेशक मध्यमे मैथिलीक स्वर मुखरित करबाक लेल छटपटा इत रहथि, तखने ने मिथिलाक मनोनुकूल विरह व्यथासं छटपटाइत गीत गंगामे लिखैत छथि : ‘कोना कहू जे कोन हालमे जीबि रहल छी |’ “हम पहाड़ पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी’क रचना करैत ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान’ के चरितार्थ करैत ‘मा निषाद प्रतिष्ठां रूप अचिंतित, अतर्कित पादवद्धः अक्षरसम तंत्रीस्वर समन्वितः’ स्वरक अन्वेषणमे मध्य भारतक उत्तुंग शिखरपर जीवनक उत्तरार्ध व्यतीत करब स्वीकार कयलनि | मैथिलीक भक्तिक प्रवलता त एहिसं स्पष्ट होइछ जे ई अपन दोसर पुत्रीक नामकरनणे ‘मैथिली’क’ देलखिन |गीत गंगामे अनेक स्थान पर मिथिला मैथिलीक प्रति उदगार उच्छलित भेल अछि : ‘आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर, ह्रदयमे हो माटिक ममता माएक सेवामे जीवन बितादी, अछि बस एएह एकटा सिहंता’ ‘मैथिलीक प्रतिमा सजाउ’ ‘आजुक राति कथी ले’ ‘तीन कोटि मैथिल’ ‘ मैथिलीले’ अहाँ की करै छी’ ‘मैथिल केर परिभाषा’ ‘पत्रिका नै किनै छी’ ‘बजबाक समय आएल अछि’ ‘हमरा गाममे’ ‘मिथिलामे’ ‘भूख,अशिक्षा आ अन्हार अछि मिथिलामे’ आदि शीर्षक रचनामे मिथिलाक दशा आ मैथिलीक दुर्गति जीवंत रूपें वर्णित अछि | मैथिलीक विकासक केहन प्रदीप्त आगि हिनका हृदयमे छनि से एही संस्मरणसं स्पष्ट अछि : ‘माटि-पानि’ पटनासं प्रकाशित होइत रहै |’समय-साल’ स्तम्भमे हमर एकटा लेख प्रकाशित भेल छल ‘सूतल नहि अछि सिवान’|मोन गदगद छल |प्रकाशनसं लिखबाक गति तीब्रतर भेल छल |ताबत अगिला शीर्षक पढलौं ‘जगैत जयनगर’| मोनमे प्रतिक्रया उठल, जयनगर पर लेख त वासोपट्टी पर किएक नहि | हम डेरा आबि ओही तर्जपर ‘बैसल वासोपट्टी’ एकहि बैसकीमे लीखि गेलहुँ |किन्तु दोसर दिन विचित्र द्वन्द्वमे ई आलेख पड़ि गेल |एहनो लेख होइत छै ? हम ओकरा संजोगि क’ राखि देलहुँ |तीन मास बीति गेल |एक दिन सांध्यवेलामे ठाकुरजीसं भेंट भेल दरबार परिसरमे |कतहु आवश्यक काजसं जाइत रहथि |अपन आलेख खराब अछि की नीक से निर्णायक द्वंद्व सं तंग आबि गेल रही | हम मंदे स्वरें कहलियनि ,एखन एक घंटा समय अछि? ओ कार्यक जिज्ञासा प्रगट केलानि | अपन हृदयगत द्वंद्व कहलियनि | ठाकुरजी प्रहर्षित होइत कहलनि, एहिसं मुख्य काज की हएत ? चलू पहिने आलेखे पर विमर्श करी | डेरा आबि हम हिनका आलेख सुनाओल | अंतिम पैराग्राफ प्रारम्भे केने रही की ई आलेख हाथसँ झपटि लेलथि | कहलनि अहाँ राति भरिमे अपने फेयर क’लेब त ठीक नै त हमरा द’ दिय’, काल्हि हम पटना जा रहल छी,स्वयं फेयर क’क’हम द’देबै ‘माटि पानि’क कार्यालयमे |ई भोरे-भोर तैयार भेटला | हम आलेख द’ देलियनि |ह्रदयक भार हल्लुक भेल |अगिला अंक प्रकाशित भेलै|सम्पादक शीर्षक बदलिक’ ’पायाक कातमे गाड़ल वासोपट्टी’क’ देलखिन |प्रकाशित अंक ठाकुरेजी कें पहिने भेटल नि |भेटितहि हमरा डेरा पर एलाह सरप्राइज दैत—‘मैथिलीक परिचित युवा लेखक’ संबोधन करैत | हम किछु बुझलियै नहि |तखन ई अंक दैत्त्त सभ कहलनिई सम्पादक आलेख मंताव्यमे ई बात लिखने रहथिन पढि कए रोम-रोम पुलकित भ’ उठल | सब काज छोड़ आलेखकें सूनब,कार्यालय तक पहुँचायब आ प्रकाशित अंक डेरा पर पहुंचा लेखकक अमित आनंदमे सहभागिता करब कतेक व्यक्ति करैत छथि ? मैथिलीक प्रति ई समर्पण सोचि आइयो मोन विह्वल भ’ जाइत अछि |गीत-गंगाक साठि टा कवितामे बारहटा मिथिला-मैथिलीए पर लिखल भेटल | राष्ट्र भक्तिक सेहो प्रभूत-प्रमाण ‘गीत-गंगा’में मुखरित भेल अछि |’हम भारत केर पूत’ शीर्षक रचनामे केहन सुन्दर कहल गेल अछि ----- ‘पुजै छी भारतीकें हम,जपैछी बन्दे मातरम्’ ‘जय जवान, जय जय किसान नारा लगबै छी हम,जपै छी बन्दे मातरम्’ ताल ठोकैए हमर हिमालय,ललकि कहै छथि जमुना गंगा,फहराइते इ रहत अमर भए लाल किला पर हमर तिरंगा,अपन स्वतंत्रता गमा एको क्षण रहि ने सकै छी हम,कही तें वन्दे मातरम्’ ‘जय भारत जय भारती’में भारतकें एकटा गाम कहल गेल अछि |लिखै छथि — हम कल्पना करी एकटा भारतवर्षक गामके ,जै मे हो बस जाति एकटा मात्र भारतीय नामकेर | पुराण साहित्यमे एक पुरुष के रूपमे भारतक वर्णन करैत कहल गेल अछि, भारतक दू टा आँखि छै -दक्षिणक कांची आ उत्तरक काशी | एक पुराणकार आँगनके रूपमे भारतक स्वरुप दृढ़ करैत कहने छथि : तपस्या नर्मदा तट पर, दान गयामे शरीर त्याग गंगाक तट वाराणसीमे करबाक चाही| महर्षिगण त –समुद्र वसने देवि पर्वत स्तन मंडले,विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्षं क्षमस्व मे’ पढैत भारत भूमिक एकत्व प्रदर्शित कैने छथि | एकटा विशाल गामक रूपमे कथन सर्वथा उपयुक्त अछि | ‘स्वतंत्र भारत अमर रहय’ मे कवि कहैत छथि—भारतहु सं प्रियगर भारतवर्षक स्वतन्त्रता,तें हम हुलासि-हुलासि क’ बाजी स्वतंत्र भारत अमर रहय |’ ‘भारतक स्वतंत्रता केर खातिर हम लड़िते टा नै,मरितो छी,तें हम ताल ठोकि क’ बाजी स्वतंत्र भारत अमर रहय |’ ‘जय जय हिन्दुस्तान’ शीर्षक रचनामे केहन नीक पद्य रचल गेल अछि : ‘एकहि मंदिर एकहि पूजा आ एकहिटा ध्यान, एकहि मंत्र जपब जीवन भरि जय जय हिन्दुस्तान |’ राष्ट्रक निर्माता पुरुषक संस्मरण ‘गीत –गंगा’क प्रवल विशेषता अछि | ‘सत्य अहिंसा केर पुजारी मे’ महात्मा गांधीक स्वतंत्रता अभियानक वर्णन करैत कहैत छथि : ‘सत्याग्रह केर केलनि केहन प्रचार इंगलैंडोमे मचि गेल हाहाकार भागल भुल्ला लत्ते-पत्ते सात समुद्रक पार ब्रह्मा,विष्णु और त्रिपुरारी छला महात्मा गांधी | बूझि पड़ैए भव-भय हारी छला महात्मा गांधी | आठम रचनामे कहल गेल अछि : कह जय गांधी जय जय प्रकाश जय जय सुभाष, जय भगत सिंह ओ नै रहला लेकिन अछिए ओइ कर्मवीर केर चरण-चिन्ह | .’की हिन्दू आ की मुसलमान’ शीर्षक रचनामे कहल गेल अछि : ‘एक्के शोणित,एक्के परान’ ‘मंदिर पूजी,मस्जिद पूजी, प्रार्थना करी आ नवाज पढ़ी गीता पढ़ि ली आ कुरान पढ़ी अल्लाह कही, सियाराम कही पोथी अनेक, अछि सूत्र एक, बस एक मन्त्र हम जानै छी |’ एहि प्रकारें भारतक विविधतामे एकताक सूत्रक अन्वेषण, धर्म समरसता दृढीकरण हिनक लेखनक समाधानात्मक आ उत्साहवर्धक पक्ष अछि | विषय-वस्तुक दृष्टिसं विचार कएला पर ‘गीत-गंगा’ शीर्षक अत्यंत उपयुक्त लगैछ | गीतक अर्थ अछि ह्रदयगत भावक उच्छलन | एक कवि ह्रदय वैयक्तिक, सामाजिक,राष्ट्रीय,वैश्विक परिदृश्य पर सतत चिंतन करैत अछि |खराबक यथावत चित्रण क’ समाज आ राष्ट्रक नग्न चित्रक लेखनक समाज के दर्पणभूत साहित्यमे ओकर यथार्थ स्वरुप देखबैत अछि | एकर अनुरूप बेटीक बियाह,पुत्रक गुणवत्ताक प्रयास सन अनेक समस्यासं सीदित समाजक जीवंत चित्र एत’ प्राप्त अछि | ‘बुच्ची बढ़ती,लिखती पढती ‘ शीर्षक रचना नारी शिक्षाक विकास क’ विवाहकें दहेज़ रूप अवसादसं मुक्तिक मार्ग प्रदर्शित करैत अछि |कवि कहैत छथि : भाग्य अपन अपनेसं गढ़ती, हमरा चिंता कथीके रेप,दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि भारतमे महिषासुर ले’ दुर्गा बनती, हमरा चिंता कथीके नव सुरुज आ चान बनेती/संगी अप्पन अपने चुनती/किरण,सुनीता,मीरा बनती | एक मात्र शिक्षाकें अंगीकार कैने संभव होइछ |एहि प्रकारें मुखर समस्याक समाधानक चेष्टा एहि लघुकाय पोथीक प्रबल हुंकार अछि | जेना सभ नदी गंगामे एकाकार भ’ समुद्र पहुँचैत अछि तहिना राष्ट्रक व मानव जातिक समुद्रमे ई गीत-गंगा उच्छलित होइत पहुँचैत अछि | कविकें यथार्थ वक्ता कहल गेल अछि |तें साहित्यमे स्वभावोक्ति एकटा प्रशंसित अलंकार मानल गेल अछि |एहि यथावत वर्णनसं गीत-गंगा व हिनक अन्य काव्यात्मक पोथी आद्यंत व्याप्त अछि |हिनक लेखनक विषय अछि दुर्दिनमे जीवन व्यतीत करैत विपन्न लोक | कतहु बेटीक विवाह्सं चिंतित व्यथित पात्र त’ कतहु कर्जामें डूबल कृषक | कतहु तीसीक तेलमे छानल जिलेबी,झिल्ली खाइत दुर्गापूजा देखैत तरुण,तरुणी | कतहु कन्याक पिताकें व्यथित करैत बरियातीक वाहुल्य | एकटा उद्यमी रहितो विपन्न किसान आ घोटालामे रत संपन्न तथाकथित नेताक साम्य वैषम्य जीवनक केहन जीवंत वर्णन अछि : करजेमें जीबे आ करजेमें मरबे एना रे बिलटू कतेक दिन रहबें ? तोरे पसेनासं हरियर ई भारत ई राकेट ई प्लेन ई उँचका इमारत तों नारे पुआर पर कतेक दिन सूतबें ? तोरा ले’ एखनो ने लोटा ने थारी ओम्हर घोटाला महल हावागाड़ी दोस और दुश्मनके कहिया तों चिन्हबे ? बाट कोनो गांधीक कतेक दिन तकबें ? करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ? आदि पांती सामाजिक विषमताक जीवंत चित्र ल’ प्रस्तुत कएल गेल अछि | ‘चोर कहू ककरा’ शीर्षक रचनामे कविक व्यथा-द्वंद्व केहन जीवंत अछि : ‘भरि गाम चोरे त चोर कहू ककरा कोतवालो सएह तखन सोर करू ककरा ?’ भ्रष्ट्राचार सं त्रस्त भारतवर्षक नग्न चित्र प्रस्तुत करैत अछि | संवेदनहीन समाजक अंतसमे लोभक सफल चित्रण भेल अछि : ‘नब्बे टा वरियाती एलै’ शीर्षक रचना देखू : दस हजार रसगुल्ला बनलै नब्बे टा वरियाती ले’ आ पचास टा छागर कटलै हल्ला भेलै गाममे | दारू पीने टंच रहै सभ छौंडा मोटरसाइकिल पर खाधिमे खसलै, टंगले एलै, हल्ला भेलै गाममे |’ दहेज़क पाईसं टंच भेल लड्काक पिताक उज्ज्वल वर्णन प्रस्तुत करैछ : ‘समधि एला बनि-ठनि क’ कवितामे : लाजो ने भेल जे टाका गनेलिऐ ,बेटाकें बेचि क’ खेतो किनलिऐ | समस्याग्रस्त, विपदापूर्ण परिवेशसं त्रस्त कविकें सम-समाधानक रस्ता जखन अवरुद्ध भेटैत छनि त लोकेकें पूछै छथिन : ‘कहू भागि क’ जाएब कहाँ ?’ गीत-गंगामे कविवर समाजक, राज्यक,राष्ट्रक व्यथाक चित्र आ समाधान प्रस्तुत करबाक स्तुत्य प्रयास कएलनि अछि | भाषा सरल,गेय,हृदयसं उच्छलित अछि | हृदयसं उच्छलित भावेकें गीत कहल जाइत अछि |एहि हृदयगत भावक यथावत चित्रणसं पोथी आद्यांत व्याप्त अछि |जेना समुद्र वा गंगामे अनेक प्रकारक झड़ना, जलश्रोत,नद,नदीक संगम होइछ तहिना एहि पोथी रूप गंगामे अव्यक्त माधुर्यसं पाठककें आनंद प्राप्त करबैत,सोचबाक लेल वाध्य करैत, समाजक कुरीतिक दर्शन करबैत,नव,पुरान व्यक्तित्व दर्शन करबैत साठि कविताक संग्रह प्रकाशित भ’ पाठकक हाथमे आएल अछि |कविक वर्णन क्षमता,लेखन सरलता अभिव्यक्त भेल अछि | उक्त गुणगण के आलोकमे अनलपूर्ण अंतसवला ‘अनिल’जीक ई कविता संग्रह गंगा जकां कल-कल निनाद करैत उच्छलित होइत समुद्र दिस बढैत रुचिरा,पवित्र,वेगवान,औषधिभूत कविता रूप जलधारासं व्याप्त अछि | ----------डा.अमर नाथ ठाकुर प्रोफेसर, पी.जी.संस्कृत विभाग,जे.पी.यू.,छपरा-८४१३०१ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-१.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” २. गंगा नन्द झा 1 डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, अनिलजी – व्यक्तित्त्व आ कृतित्त्व परिचय - छोटे मोटे टूटल मड़ैया मे गौरी कोना कऽ रहती हे ? गौरी हमर छथि बड़ सहलोला । कोना कऽ पिसती भाङक गोला । हाथो मे पड़तनि लोढ़ीक ठेला, कोना कऽ सहती हे ? एक समय छल जखन ई गीत हमरा गामक हर बेटीक बिदागरी काल किनको ने किनको मूँहेँ अवश्य सुनबामे अबैत छल । ओहि समय हम बहुत छोट रही । सम्भवतः L.K.G. मे पढ़ैत रही । बाद मे आनो गाम-गमाइतमे सुनबामे आयल । एखनहु अबैत अछि । एहिना एकटा डहकन सेहो – सऽमधि (सऽमैध) एला बनि – ठनि कऽ । धोती कुरता पहीरि कऽ । एला डहकन सुनऽ बेटा के(र) बियाहमे ।। हम सब कऽरै छी पुछारि (पुछाइर), बाजू गीत सुनब कि गारि (गाइर), आ कि उलहन सूनब बेटा के(र) बियाहमे । आ कि डहकन सूनब बेटा के(र) बियाह मे ।। एहि डहकनक पहिल दू – चारि पाँती तऽ एहिना रहैत अछि पर अगिला पाँतीसभ गायिका लोकनिक सुविधानुसारेँ घटैत – बढ़ैत रहैत अछि । परञ्च पुरान नञि भेल अछि, एखनो जतऽ - ततऽ सुनबा मे अबैत अछि । एहिना एकटा गीत अछि - कक्का मारल गेला सौराठक मैदान मे । पहिले कन्यादान मे (ना) ।। सौराठक मैदान मरनासन्न भऽ गेल पर ई गीत एखनहु अपन किशोरावस्थहिमे अछि । ई सभ गीत हम अपन नेनपनेसँ सुनैत आबि रहल छी । एखनहु विविध बिधि – बेबहार काल सुनबामे अबैत अछि ई गीत सभ । ओहि समय हम एहि गीत सभकेँ पारम्परिक गीत बुझैत रही, हमरा नञि पता छल कि एकर लेखक के छथि । किछु बादमे बुझबामे आयल कि ई सभ गीत अनिलजीक लेखनीसँ निकलल अछि । अनिलजी माने कि श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ““अनिल”” । छायाचित्र ०१ – श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जी (सन् १९९६-९७ ई॰क छायाचित्र) प्रारम्भिक जीवन आ गीत लेखन - अनिलजीक जन्म २७ नवम्बर १९५० ई॰ कऽ मधुबनी जिलाक सलमपुर (शंभुआर, भिट्ठी – सलमपुर, कैंटोला चौकक लगीच) नामक गाममे एक टा वत्स गोत्रिय ब्राह्मण परिवारमे भेलन्हि । हुनक माएक नाँव स्व॰ कर्पूरा देवी आ बाबूजीक नाँव स्व॰ राम नारायण ठाकुर छलन्हि । अनिलजी ३ भाए आ ३ बहीन छलाह आ तीनू भाएमे अनिलजी सभसँ पैघ रहथि । छायाचित्र ०२ – श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक पिता स्व॰ राम नारायण ठाकुरजी छायाचित्र ०३ – श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक माता स्व॰ कर्पुरा देवी (कुर्सी पर बायाँ कात), मौसी (कुर्सी पर दायाँ कात) आ मामी लोकनि (ठाढ़ भेल) । अनिलजी नेनपनहि सँ बहुत मेधावी छात्र रहथि । हुनक प्रारम्भिक शिक्षा गामहि केर प्राथमिक विद्यालयमे भेलन्हि । तत्पश्चात माध्यमिक विद्यालय - भिट्ठी आ उच्च विद्यालय – पण्डौलक छात्र रहलाह । एहि समय धरि ओ अपन छोटका मामा श्री महेन्द्र कुमरजीसँ शिक्षाक क्षेत्रमे विशेष प्रभावित रहलाह । कहबाक लेल दुनु माम आ भागिन रहथि पर समवयस होयबाक कारण संगी रहथि । मामा पढ़ाईमे एक वा दू बरष सिनियर रहथिन्ह । ओहि समय अनिलजीक छोटका मामा मैथिलीमे किर्तन शैलीक एक – आध दर्जन गीतक रचना कएने रहथिन्ह । मामाक इएह गीत सभ अनिलजीकेँ पहिले – पहिल गीत लिखबा दिशि आकर्षित कएलकन्हि आ किर्तन शैलीक बहुत रास गीतक रचना कएलन्हि । जेना कि, भरल सभामे आबि जनकजी, प्रण कएने छथि भारी हे । जे केओ धनुष उठा कऽ तोड़ता, तनिके देबनि कुमारी हे ।। आओर, गौरी लीला बिहारी तोहर भंगिया । तोहर भंगिया हे, तोहर भंगिया ।। एहि बीच स्व॰ काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’जीक गीत सभ सेहो हुनिका प्रभावित कएलकन्हि । हुनक छोटका मामा आ मधुपजी – दुहु गोटे भनिता मे अप्पन नाँव दैत छलाह तेँ ओ मधुपजीक सदृश अपन एकटा काव्य नाँव ““अनिल”” केर सृजन कएलन्हि । ओहो अप्पन शुरुआती गीत सभक भनितामे अप्पन नाँव जोड़ए लगलाह । कहथि ‘अनिल’, सुनु-सुनु हे मनाइनि । धीया अहाँकेर, छथि जगतारणि । भनहि ‘अनिल’ धनि धरू प्रिय धीर । खट् - मधु लागत विरहक पीड़ । मधुपजीक काव्यसँ प्रेरित भऽ अनिलजी सेहो हिन्दी फिल्मक धुनि पर किछु गीतक रचना कएलन्हि पर से स्वयंकेँ बेस रूचलन्हि नञि । एहि बीच माम – भागिनक जोड़ी सेहो टूटि गेलन्हि । छोटका मामा सी॰ एम॰ साईन्स कॉलेज, दरिभंगा छलि गेलाह जतऽ हुनक काव्य प्रतिभाक अन्त भऽ गेलन्हि । भागिन अर्थात् अनिलजी आर॰ के॰ कॉलेज, मधुबनी चलि गेलाह जाहि ठामसँ ओ प्री-युनिवर्सीटी आ बी॰एस॰सी॰-प्रथम भागक पढ़ाई पुर्ण कएलन्हि । एहि ठामक विद्यापति स्मृति पर्व समारोह हुनिका विशेष आकर्षित कएलकन्हि आ मोनमे मञ्च पर स्वयंकेँ देखबाक लालसा प्रबल होमए लगलन्हि । छायाचित्र ०४ – बायाँसँ दायाँ – श्री रतीश चन्द्र ठाकुर ‘रतनजी’ (अनिलजीक सभसँ छोट भाए), श्री सतीश चन्द्र ठाकुर ‘लल्लनजी’ (अनिलजीक माँझिल भाए), श्री कृष्णकान्त झाजी (अनिलजीक छोटका बहिनोइ), स्वयं ‘अनिल’जी आ पवनजी (अनिलजीक भागिन) । छायाचित्र ०५ – बायाँसँ दहिना – श्रीमति बच्ची देवी (अनिलजीक धर्मपत्नी), श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, श्रीमति सुष्मा देवी (अनिलजीक छोटकी मामी), श्री महेन्द्र कुमर (अनिलजीक छोटका मामा) – सन् १९९६-९७ ई॰क छायाचित्र छायाचित्र ०६ – श्री अनिलजी – अपन छोटका मामा ‘श्री महेन्द्र कुमर’जीक संग (सन् १९९६-९७ ई॰क छायाचित्र) एहि बीच श्री (डॉ॰) राधाकान्त ‘रमण’जीक गीत संग्रह “एक आँखि गंगा” पढ़बाक अवसरि हाथ लगलन्हि (डॉ॰ रमणजी बादमे दरिभंगा आयुर्वेद महाविद्यालयमे लेक्चरर भेलाह) । एहि संग्रहक निम्न गीतक शब्द अनिलजीकेँ बहुत प्रभावित कएलकन्हि – अहाँ केर इजोरिया कहाँ हम मँगै छी । अन्हारहुमे हमरो जिबऽ तऽ दियऽ ।। एहि बीच मामा गाम रुचौलक (दुलारपुर-रुचौल) पुस्तकालयमे स्व॰ हरिमोहन झाजीक “चर्चरी” पढ़बा लेल भेटलन्हि । एहि किताबक भाषा ओ प्रस्तुति अनिलजीकेँ बड्ड आकर्षक लगलन्हि । ई युग छल श्री रबिन्द्रनाथ ठाकुरजीक । संयोगसँ जमसममे (महेन्द्रजीक पैत्रिक गाम) स्व॰ महेन्द्र झाजीक स्वरमे श्री रबीन्द्रजीक लीखल गीत अनिलजीकेँ सुनबाक मौका भेटलन्हि । ई गीत सभ मधुपजीक गीत सभसँ सर्वथा भिन्न छल, स्वतन्त्र छल आ आत्मनिर्भर छल । मतलब कि कोनहु फिल्मी धुनि पर आधारित नञि छल । तकरा बादो गीतसभ अत्यन्त प्रभावशाली आ आकर्षक छल । ओ निश्चय कएलन्हि जे गीत फिल्मी धुनि पर नञि लिखब । आभास भेलन्हि जे मैथिली मात्र श्रृंगार रसमे लिखबाक भाषा वा किर्तनिञा गीतक भाषा नञि छी । आ अनिलजी शिंगारक अतिरिक्त आन बहुत रास विषयसभ पर लिखए लगलाह । युग कहैत अछि, हम ने कहैत छी अपना जिनगीक अहीं छी मालिक चाहे अपने जेना रही ।। दू – तीन बाउ सँ घर बसाउ बेशी ले मन नञि ललचाउ अपने हाथ लगाम अहाँक अछि, चाहे अपने जेना उड़ी ।। श्रृंगारिक गीत तऽ लिखबे कएलन्हि, संगहि लिखलन्हि मिथिलाक दुरावस्था पर, समाजक कुव्यवस्था पर आ देशक अव्यवस्था पर । मातृभक्ति गीत लिखलन्हि, देशभक्ति गीत लिखलन्हि – आँखि मे चित्र हो मैथिली केर, आ हृदय मे माटिक ममता । माएक सेवा मे जीवन बिता दी, बस इएह एकटा होइए सिहन्ता ।। भूख सभसँ पैघ श्राप (अभिषाप) थिक । ओ मनुक्खकेँ बहुत किछु एहनो करबा पर मजबूर कऽ दैत अछि, जे ओ नञि करए चाहैत अछि । जकर खेत सभ भरना लागल हो, रहबाक लेल माथ पर खढ़ नञि हो, काटए जोग भेल जजाति खेतहिमे लागल बिका जाइत हो, घऽरक जिम्मेदारी मूँह बओने ठाढ़ हो – तकर आदर्शक मुल्य की आ की ओकर अभिलाषा ??? भूखक आगाँ मनुक्खक बहुतो आदर्श दम तोड़ि दैत अछि । आ तेँ अपना बियाहक बाद कतेको साल फेर नञि लिखि सकलाह – हे मिथिला केर भाग्य विधाता, नारा आइ बुलन्द करू । चाही जँ उद्धार मैथिलिक, तिलक-प्रथा केँ बन्द करू ।। कहुखन–कहुखन, किनको–किनको बुझि पड़ैत छन्हि कि अनिलजीक गीतसभ कोनो विशिष्ट राजनैतिक विचारधाराक सम्वाहक वा सम्पोषक थिक । से पाठकक अपन सोच । अनिलजी राजनैतिक गतिविधिसभसँ प्रायः दूरे रहै बला लोक । हाँ बहुतो ठाम हुनक गीत हुनक जिनगीक संघर्षकेँ जरूर रेखांकित करैत अछि । यथार्थमे गरीबी ककरो जाति आ धर्म देखि कऽ नञि अबैत अछि । बाबूजी विशुद्ध कृषक ओ भुतपुर्व स्वतन्त्रता सेनानी (पेन्शनरहित) आ तेँ घरक प्रारम्भिक आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय । खेत सभ भरना लागल आ मूँह पर जाबी । एहेनमे लेखनी तऽ इएह लिखत – छै जेबी जकर खाली – खाली, आ खरची घरक लटपटायल, से फगुआ खेलायत कोना कऽ । जकरा आङन वसन्त नहि आयल, से फगुआ खेलायत कोना कऽ ।। या फेर, काल्हि केर भारत मे चाही ई घोषणा, ई धरती हो तकरे, चुआबय जे घाम । बौआ दुनु हाथ जोड़ि करू , अइ माटि केँ प्रणाम ।। रामकृष्ण महाविद्यालयक मञ्च पर गाबि तऽ नञि सकलाह, कारण साजक संग गएबामे असुविधा होन्हि परञ्च हिनक गीत गाम-घरक विधि-बेबहारसँ लऽ कऽ मैथिलीक समस्त मञ्च पर सुशोभित भेल आ श्रोतालोकनिक प्रशंसा पओलक । मञ्च पर हिनक गीतसभकेँ पहुँचएबाक मुख्य श्रेय श्री शशिकान्तजी आ श्री सुधाकान्तजीक जोड़ीकेँ छन्हि । एकर अतिरिक्त श्री महादेव ठाकुरजी, श्री सुरेश पंकजजी, श्री सुरेन्द्र यादवजी, श्रीमति पुष्पाजी आ स्व॰ नूतनजी आदि आन बहुत रास समकालीन आ बादक गायक–गायिका लोकनिक स्वर हिनक गीतसभकेँ भेटलन्हि । मैथिलीमे लिखबाक लेल अनिलजीकेँ हुनक मँझिला मामा श्री देवेन्द्र कुमरजी (अध्यापक आ बादमे प्रधानाध्यापक, रहिका उच्च विद्यालयसँ सेवानिवृत्त) आ हुनक बाबा स्व॰ अनन्तलाल ठाकुरजीसँ सेहो बेस प्रोत्साहन भेटलन्हि । कथा लेखन आ रेडियो स्टेशन – अकाशवाणी अर्थात् रेडियो – ओहि समयक एकटा अति सशक्त प्रसारण माध्यम छल – दूरदर्शनसँ सेहो बड्ड सशक्त । हर रचनाकार आ गायक – गायिका केर हृदयमे ई इच्छा अवश्य रहैत छल जे कम सँ कम एक बेर रेडियो स्टेशन पर मौका भेटओ । अनिलजीक मोनमे सेहो ई उत्कण्ठा होयब स्वभाविके । चर्चरी पढ़लाक बाद कथा लेखनक इच्छा जागृत भेले रहन्हि, कथा लीखि डाक द्वारा रेडियो स्टेशन पठाए देलन्हि । मुदा कथा आपिस आबि गेल । फेर दोसर कथा पठओलन्हि, पर ई की – ओहो आपिस आबि गेल (दुर्भाग्यसँ ई दुहु कथा आब नहिञे अनिलजी लग छन्हि आ नहिञे कथाक नाँव याद छन्हि) । पर ई हुनिका हतोत्साहित नञि कएलक अपितु आओरो नीक लिखबाक लेल प्रेरित कएलक । फेरो एकटा कथा लिखलन्हि । लिखलाक बाद ई कथा आर॰ के॰ कॉलेजमे श्री बुद्धिधारी सिंह“रमाकर”जीकेँ देखओलन्हि आ हुनक बताओल किछु संशोधन कएलाक बाद डाकसँ पठाए देलन्हि । ई कथा स्वीकार कऽ लेल गेल । स्विकृति पत्रक संग २५ रू॰ केर चेक सेहो डाकसँ भेटलन्हि । कथा वाचन लेल हुनिका रेडियो स्टेशन बजाओल नञि गेल पर श्री छत्रानन्द सिंह झा“बटुक भाई”जीक स्वरमे हुनक कथा प्रसारित आ पुनर्प्रसारित भेल । ई बात १९६८ ई॰क अछि । कथाक नाँव छल “मोन अछि एखन धरि सासुरक यात्रा” । छायाचित्र ०७ – काश्मीरक डल झीलक सोझाँ ‘अनिलजी’ - १९७० ई॰ मे तिरहुत कृषि महाविद्यालयक दिशिसँ आयोजित शैक्षणिक भ्रमण मे तत्पश्चात बी॰एस॰सी॰-कृषिक पढ़ाई केर लेल अनिलजी आर॰के॰कॉलेज सँ तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोली आबि गेलाह । फेर एक गोट कथा रेडियो स्टेशनकेँ प्रेषित कएलन्हि, स्विकृतो भेलन्हि पर वाचन हेतु आमण्त्रन नञि अएलन्हि । बात १९७० ई॰ केर अछि । एक दिन बिनु बजओनहि अनिलजी पटना रेडियो स्टेशन पहुँचि गेलाह आ ओहि ठाम हुनक भेंट श्री गंगेश गुञ्जनजी आ श्रीमति प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’जीसँ भेलन्हि । श्री गंगेश गुञ्जनजीकेँ कथा देखओलन्हि । कथाक नाँव छल “इण्टरभल” । गंगेश गुञ्जनजी कथाक अंग्रेजी शब्दसभकेँ उपयुक्त मैथिली शब्दसभसँ बदलि देलन्हि आ कथाक शिर्षक सुझओलन्हि “धारक ओइ पार” । कथा इएह नाँवसँ लेखकक अप्पन आवाजमे प्रसारित भेल । ओना बहुत बादमे एहि नाँवसँ हुनक एक गोट दीर्घ-कविता सेहो प्रकाशित भेल पर तकर एहि कथासँ कोनहु सम्बन्ध नञि अछि । बादमे हिनक एकटा आओर कथा “प्रश्नवाचक चिन्ह” मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल । परञ्च गीतक लोकप्रियता आ काजक व्यस्तता हिनका कथा-लेखनसँ दूर कऽ देलक । छायाचित्र ०८ – ‘धारक ओइ पार’ नामक पोथीक (मैथिली दीर्घ कविता) मुखपृष्ठ नौकरी-चाकरी आ मैथिली-हिन्दी - जाहि समय अनिलजी बी॰एस॰सी॰-कृषिक पढ़ाई लेल गेल रहथि ताहि दिनमे एहि डिग्रीकेँ सरकारी नओकरीक गारण्टी मानल जाइत छल । पर पढ़ाई पुरा करैत-करैत समय बदलि गेल रहै । किछु दिन बेरोजगारीक मजा लेबए पड़लन्हि आ गाबए पड़लन्हि – मोटका मोटका पोथी पढ़लौं पोथी केर सभ पन्ना रटलौं से सभ रटिकऽ किछु नै भेल । पहिने जोड़ी जोड़ दशमलव आब जोड़ै छी नून आ तेल ।। छायाचित्र ०९ – अपन धर्मपत्नी श्रीमति बच्ची देवीक संग ‘अनिलजी’ (सन् १९८७ ई॰क आस-पासक छायाचित्र); पाछाँमे अनिलजीक सभसँ छोट भाए श्री रतीश चन्द्र ठाकुर ‘रतनजी’ एहि बीच २ जुलाई १९७१ ई॰ कऽ अनिलजीक बियाह लदारी गामक श्री चुल्हाई ठाकुरक सुपुत्री श्रीमति बच्ची देवीक संग भऽ गेलन्हि । ओहि समय ओ स्नातक-कृषि द्वितीय वर्षक छात्र रहथि । स्त्रीगणक समवेत स्वर कर्णगोचर होमए लगलन्हि – नहुँ नहुँ चलियौ दुल्हा जोर सँ ने चलियौ एखने सँ कनियाँ केर हाथ ने छोड़ियौ धरा दियनु हे ससुर अङना मे । घुमा दियनु हे ससुर अङना मे ।। बियाहक प्रसंग अछि तऽ हुनक एक गोट गीत फेर याद आयल । गीतक कोनो सम्बन्ध ओना हुनक बियाह सँ नञि छन्हि । पर प्रसंगवश ई चहटगर गीत मोन पड़ल । ई गीत वास्तवमे गामक सलमपुरक गबैयाजीक (श्री राजेन्द्र ठाकुरजी) टोलीक एक गोट नटुआ(श्री राजकुमारजी) आ जोकर (नाँव-?) विशेष आग्रह पर लिखल गेल छल । अनिलजीसँ हुनक शिकायत छलन्हि जे बाँकी लोकसभक लेल तँऽ ओ बहुत रास लिखए छथि, किछु गीत हुनको सभ लेल लिखल जाए । आ ताही फरमाइशकेँ ध्यानमे राखि ई गीत लिखल गेल छल – वाईफ बैजन्तीमाला, हम अपने राजेन्द्र कुमार । महमुदबा हम्मर चेला, जॉनी वाकर हमर भजार ।। मोहम्मद रफीकेँ हमहीं, सा-रे-ग-म सिखओने छी । मुकेशकेँ हमहीं, भट्ठा धरओने छी । आगाँ – पाछा करैए, नन्दा केर फिएट कार । महमुदबा हम्मर चेला, जॉनी वाकर हमर भजार ।। १० दिसम्बर १९७५ ई॰ कऽ सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डियामे कार्यभार ग्रहण कएलन्हि तथा नवम्बर २०१० मे अग्रणी जिला प्रबन्धकक पदसँ सेवानिवृत्त भेलाह । एहि क्रममे ओ बिहार, छत्तीसगढ़ आ मध्य प्रदेशक विभिन्न स्थान पर विभिन्न पद पर काज कएलन्हि । बिहारमे बसन्तपुर, अदापुर आ सीवान मे रहलाह आ प्रायः मैथिलीएमे साहित्य सृजन कएलन्हि । सीवानमे २-३ वर्ष विद्यापति पर्व समारोहक आयोजन सेहो कएलन्हि जाहिमे डॉ॰ बी॰ एल॰ दासजीक सहयोग उल्लेखनीय रहलन्हि । छायाचित्र १० – सन् १९७५ ई॰क आस-पासक समय आ ‘अनिलजी’ छत्तीसगढ़मे बिलासपुर, डोमन हिल कॉलियरी, चिरमिरी आ कोतमामे तथा मध्य प्रदेशमे जबलपुरमे काज कएलन्हि । एहि सभ स्थान पर हिनक मैथिली साहित्य सृजन बहुत शिथिल रहल । हिन्दीक वातावरण छल आ अनिलजी ओकरहि धारमे भँसियाइत रहलाह । मैथिलीकेँ निश्चित रूपेँ क्षति भेल । एतहि हिनक हिन्दी गजल संग्रह “तिरंगे के लिए” (सन् १९९७ ई॰मे) आ मैथिली दीर्घ कविता“धारक ओइ पार” (सन् १९९९ ई॰मे) प्रकाशित भेलन्हि । अन्तर्जाल युग आ गजल लेखन - सेवानिवृत्तिक पश्चात अनिलजीक प्रवेश इण्टरनेट युगक मैथिली साहित्यकारक टोलीमे भेलन्हि । जालवृत्त पर ओ “विदेह”नामक मैथिली ई पत्रिकाक सम्पर्क मे अएलाह । एहि ठाम हुनक परिचय मैथिलीक प्रशिद्ध गजल लेखक श्री आशीष अनचिन्हारजीसँ भेलन्हि । हुनकहि सम्पर्कमे ओ गजल दिशि अग्रसर भेलाह आ आइ-काल्हि बेसी गजले लीखि रहल छथि । “गजल गंगा” नामक हुनक अप्रकाशित गजल संग्रह (जे कि “अनचिन्हार आखर” ब्लॉग पर उपलब्ध अछि) मे हुनक कुल ८१ टा गजल संग्रहित अछि जाहिमेसँ पहिल ६१ टा गजल सरल वार्णिक बहरमे (भाग - १) अछि आ शेष २० गोट गजल अरबी बहरमे (भाग - २) अछि । एहि गजल संग्रहक पृष्ठ ८ पर स्वयं अनिलजीक उक्ति छन्हि जे पहिल भागक अधिकांश गजल सभ मिथिला मिहिर ……………….. विदेह-ई पत्रिका मे प्रकाशित गजल सबहकसंशोधित रूप अछि । एहिसँ ई भ्रम उत्पन्न होइत अछि कि अनिलजी बहुत पहिनेसँ गजल लिखैत छथि । पर वास्तवमे ई संशोधित रूप की छी – ताहि पर विचार करब परमावश्यक । गजल गंगाक भाग - १ मे संकलित अधिकांश तथाकथित गजलसभ पहिने विभिन्न पत्र – पत्रिकासभमे गीत वा कविताक रूपमे प्रकाशित भेल अछि । एतबहि नञि बहुत रचनासभ तऽ गीतक रूपमे कतोक मञ्चसभसँ बहुतो बेर गाओल गेल अछि । आइ ओएह गीत आ कविता सभकेँ मात्रादि मे कतिपय एम्हर – ओम्हर कऽ कऽ छन्द-बहर बना गजलक फ्रेममे कसि पुनर्सङ्कलित कयल गेल अछि । होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो । बन जाओ मीत मेरे, मेरा प्रीत अमर कर दो ।। श्री इन्दीवरजीक लिखल आ श्री जगजीत सिंहजी द्वारा हिन्दी फिल्ममे गाओल उपरोक्त गजल कतेक गीत छल आ कतेक गजल से तऽ ओएह लोकनि जानथि । पर किछु बात निर्विवाद रूपेँ सभकेँ बूझल अछि – पहिल ई जे इन्दीवरजी गीतकार रहथि आ दोसर जे जगजीत सिंहजी गजल गायक । जँ उपरोक्त पद्य गजल अछि तऽ ओहिमे ई “गीत” शब्द की कऽ रहल अछि । हमर व्यक्तिगत मानब अछि (जरूरी नञि जे बाँकी लोक एहिसँ सहमति होथि) जे साहित्यमे दुइए टा समूह अछि – गद्य आ पद्य । जँ पद्य गाओल जा सकैत अछि तऽ ओ गीत भेल । आ इएह गीतक एक विशिष्ट प्रकार गजल थिक । जँ अनिलजीक उपरोक्त तथाकथित गीत सभकेँ गजल कहल जाइत अछि तऽ हमर एहि अवधारणाकेँ पुर्ण रूपसँ समर्थन भेटैछ । मैथिलीमे हुनिका द्वारा बादमे लिखल आ सद्यः लिखल गजल निश्चित रूपसँ गजल अछि । ओना हिन्दी मे गजल ओ बहुत पहिनहिसँ लिखैत छथि आ एक गोट हिन्दी गजल संग्रह “तिरंगे के लिए” सन् १९९७ ई॰ मे प्रकाशित भेल छल । ओहि समयक नवोदित हिन्दी गजलकार श्री दुष्यन्त कुमारजीक गजल अनिलजीकेँ विशेष रूचिकर लगैत छलन्हि आ सम्भवतः हुनकहि गजलसभ अनिलजीकेँ गजल लिखबाक हेतु प्रेरित कएलकन्हि । ताहि समयक अपन परिवेशक अनुसारेँ प्रारम्भिक बेशी गजल ओ हिन्दीएमे लिखलन्हि आ छिट-पुट मैथिलीमे लिखलाह । पर बाद मे “विदेह – मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” आ श्री आशीष अनचिन्हारजीक संगति मैथिलीमे हिनक गजल लेखनकेँ गति प्रदान कएलकन्हि । हम गजलकार नञि छी, आ हमरा गजलक सम्बन्धमे बेशी नञि बुझल अछि पर गजलक सम्बन्धमे अनिलजीक निम्न वक्तव्य (जे पुर्वोत्तर मैथिल, जुलाई-सितम्बर २०१४, अंक-३१ मे छपल छल) अवश्य विचारनीय अछि – बहरक झंझटि सँ, हमरा आजाद करू । हम गजल छी, हमरा नञि बर्बाद करू ।। पोथी प्रकाशन - अनिलजीक पहिल प्रकाशित पोथी मैथिली गीत संग्रह “तोरा अङना मे” छल । ई २२ नवम्बर १९७८ ई॰ कऽ मुरलीधर प्रेस पटनासँ प्रकाशित भेल । एहिमे कुल ३१ टा गीत छल आ पछिला मुखपृष्ठ पर आशिर्वचन स्व॰ हरिमोहन झाजीक छल । एहि संग्रहक प्रायः सभ गीत अति लोकप्रिय भेल । एकर दोसर पुनर्मुद्रण ३ नवम्बर १९८७ ई॰ कऽ उर्वशी प्रकाशन पटनासँ भेल । एहि बीच मुरलीधर प्रेस सँ एक गोट गीत संग्रह “गीतक फुलबारी” प्रकाशित भेल जाहिमे “तोरा अङना मे” गीत संग्रहसँ २४ टा गीत लेल गेल छल । बादमे गीतक फुलबारीक सेहो दोसर संस्करण बहार भेल । जेना कि ऊपर लीखि चुकल छी जे सन् १९९७ ई॰मे हिन्दी गजल संग्रह “तिरंगे के लिए” आ सन् १९९९ ई॰मे मैथिली दीर्घ कविता “धारक ओइ पार” प्रकाशित भेलन्हि । एहि बीच चारि टा गीत संग्रह केर पाण्डुलिपि उर्वशी प्रकाशनक स्व॰ गोपीकान्त बाबूकेँ प्रकाशनार्थ देल गेलन्हि । एहि गीत संग्रह सभक नाँव छल - (१) मैथिलीक प्रतिमा सजाउ, (२) आँखि मे चित्र हो मैथिली केर, (३) हमर गामक चौक पर आ (४) होटल के मजा लियऽ । प्रत्येकमे प्रायः ३१ – ३६ टा गीत छल । पर किछु कारणवश ई सभ प्रकाशित नञि भऽ सकल । बादमे एहि चारू पोथीमेसँ किछु गीतकेँ “गीत अनिलक” नाँव सँ प्रकाशित करएबाक योजना भेल पर नौकरी मे भऽ रहल अत्यधिक स्थानान्तरणक कारण आ माए – बाबूक क्रमशः खराब स्वास्थ्यक कारण से सम्भव नञि भऽ सकल । पाण्डुलिपि आपिस लऽ लेल गेल पर स्थानान्तरण आ प्रवासक क्रममे क्षतिग्रस्त भऽ गेल । बादमे एहि गीत सभकेँ स्मृतिक आधार पर आ आन विभिन्न श्रोतसभसँ पुनः प्राप्त कएल गेल । ताहि कारणेँ कतिपय स्थान पर पुर्वलिखित आखर सभ किछु परिवर्तित भऽ गेल । उपरोक्त चारू अप्रकाशित गीत संग्रहसभक किछु गीत आ किछु नऽव गीतकेँ संग लऽ एक गोट नऽव गीत संग्रह “गीत गंगा” सन् २०१३ ई॰मे शेखर प्रकाशन, पटनासँ प्रकाशित भेल । एहिमे ८० गोट गीत आ “आत्मगीत” नामक एक गोट अति दीर्घ गीत संकलित अछि । ई “आत्मगीत” वास्तवमे ४-५ अनुच्छेदक एक गीत छल जकरा बहुत बादमे एतेक बृहत स्वरूप देल गेल । “आत्मगीत” गीत गंगामे छपबासँ पहिने धारवाहिक रूपमे “अंतिका” नामक मैथिली पत्रिकामे छपब शुरू भेल छल पर एक-दू धारावाहिक छपि कऽ रुकि गेल । तत्पश्चात “विदेह” नामक मैथिली ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूप मे छपल । उपरोक्त चारू अप्रकाशित गीत संग्रहसभक किछु गीत “गजल गंगा” नामक अप्रकाशित मैथिली गजल संग्रहमे (जकर चर्च हम पहिने कऽ चुकल छी) सेहो देखबा मे आयल अछि । ई आत्मगीत वस्तुतः लेखकक अप्पन जिनगीक तीत आ मीठ अनुभवसभ पर आधारित अछि । एहिमे हुनक अपन सोच आ विचारधारा सेहो स्पष्ट रूपेँ ईंगित अछि । अनिलजी एखन किछु पुरणा (विभिन्न पत्र पत्रिकामे प्रकाशित कविता सभ) आ किछु नवका अप्रकाशित कविता सभकेँ मिला-जुला एक गोट नऽव काव्य संग्रह “काव्य गंगा” सेहो छपएबाक उपक्रममे लागल छथि । हिनक मैथिली रचना सभ वैदेही, मिथिला टाइम्स, मिथिला मिहिर, भारती मण्डन, समय साल, पुर्वोत्तर मैथिल, अंतिका, देशज, घर बाहर, सांध्य गोष्ठी, माटि पानि आ विदेह ई पत्रिकाक अतिरिक्त आन समकालीन मैथिली पत्र – पत्रिका सभमे छिड़आएल अछि । हिनक हिन्दी रचनासभ दैनिक भास्कर (बिलासपुर ), नव भारत ( बिलासपुर ), शुभतारिका ( अम्बाला छावनी ), नवनीत, हंस, वीणा, अक्षरा, समान्तर, सानुबंध, समकालीन भारतीय साहित्य, प्रयास, जर्जर कश्ती आदिमे प्रकाशित अछि । अनिलजीक एक गोट एकांकी “कोराँटी”, एक गोट नाटक “अधपहरा” आ एकटा संस्मरण “एकटा छलाह नोनू कक्का”अद्यावधि अप्रकाशित अछि । सम्प्रति ओ पटनामे रहि स्वतन्त्र लेखनमे संलग्न छथि । हुनक मैथिली ब्लॉग “आँखि मे चित्र हो मैथिली केर” आ हिन्दी ब्लॉग “तिरंगे के लिए” अन्तर्जाल पर उपलब्ध अछि । अन्तमे हुनक उक्ति जे ओ “तोरा अङना मे” गीत संग्रहक प्रथम संस्करणक भूमिका मे स्वयम् केर परिचय दैत लिखने रहथि – ने कवि छी हम ने गीतकार ने आलोचक ने लेखक छी । मानी तँऽ मानू, अपनहि सन माँ मैथिलीक पद-सेवक छी ।। आशा अछि अनिलजीक आन बहुत रास गीत–गजल, कथा–पिहानी, नाटक–एकांकी आ संस्मरण–डायरी हमरा आ हमरा सन आन पाठक ओ श्रोतालोकनिकेँ भविष्यमे हुनक लेखनीसँ भेटतन्हि । आइ एतबहि ।। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल (दुलारपुर-रुचौल) , पो॰ – मकरमपुर, जिला – दरभंगा, पिन – ८४७२३४, videha19@yahoo.com 2 जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गंगा नन्द झा ठाकुरजीक विषयमे लिखब शुरू करैत जे बात सामने अबैत अछि ओ ई अछि जे हमरा सन reluctant मैथिल कें मैथिली भाषामे लिखब,मैथिल समाज आ संस्कृतिक विषयमे जिज्ञासा प्रेरित करबामे हिनक निर्णायक भूमिका | हम वैद्यनाथ धाम देवघरक पंडा समाजसं अबैत छी |मिथिला आ मैथिलीसं हमर परिचय मिथिलाक तीर्थयात्री सभक आइनासं भेल छल | हम मैथिलक रूपमे अपन पह्चानक लेल कतेक प्रश्न सभक जबाब तकैत छलहु | सोझाँवाला व्यक्तिकें सम्मान द’ क’ अपना संग ल’ चलब आ अपन लो प्रोफाइल बनौने रहब ठाकुरजीकें प्रभावकारी बना दैत छलनि | ठाकुरजी हमरा भरोसा दिऔलनि जे हम मैथिलीमे बाजियेटा नहि, लिखियो सकैत छी |हिनके प्रेरणासं हम अपन पहिचानक सम्बन्धमे आलेख ‘वैद्यनाथ धामक पंडा ----प्रवासी मैथिल’ शीर्षकसं लिखने छलहु जकरा ई मैथिलीक मासिक पत्रिका ‘माटि पानि’मे प्रकाशित करबौने छलाह | अहिना आकाशवाणी, पटनासं मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’मे हमरा एकटा वार्ता प्रसारित करबाक अनुरोध भेटल | विषय छल ‘मिथिलामे दीयावातीक परंपरा’ | हमरा आश्चर्य भेल मुदा बुझबामे दिक्कत नहि भेल जे हिनके पहलपर ई अनुरोध आयल हैत | हिनका पुछलापर हमर अनुमानक पुष्टि भेल | हमर वाध्यता भ’ गेल जे मिथिलाक जनजीवनक पड़ताल करी आ मैथिलीमे प्रस्तुतिक लेल अपनाकें प्रस्तुत करी | अपना उपर हिनक आस्था हमरा उर्जा प्रदान केलक आ हम सफलतापूर्वक पहिल बेर आकाशवाणीपर लाइव वार्तामे भाग लेलहुँ | हम ठाकुरजीकें अनेक आन मैथिली अनुरागी सभ जकाँ मिथिला और मैथिलीक प्रति स्पर्शकातर नहि पौलहुँ, तें मिथिला आ मैथिलक कमजोर पक्षक सम्बन्धमे सेहो बेवाक विमर्श करब संभव होइत रहल | श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क संग हमर परिचय सिवानक मैथिली साहित्य परिषद्क नियमित मासिक गोष्ठीमे सन १९८०ई. मे भेल | लजकोटर युवकक मधुर स्वरमे स्वरचित गीत सभ मैथिली साहित्य परिषदक गद्यात्मक अड्डाकें प्राणवंत क’ देने छल | सूचना भ’ गेल छलै जे आब नव आयाम उभड़त | ठाकुरजीक गीतमे मधुरताक संग पारिवारिक आ सामाजिक विसंगति, व्यक्तिगत व्यथा-कथाक जोरदार अभिव्यक्ति होइत छल | सिवानमे लोकप्रिय चिकित्सक डा. बी. एल. दास एवं हुनक पत्नी श्रीमती आशा दास सज्जनता, सदाशयता आ मिथिला, मैथिली प्रेमक लेल अलग पहचान रखैत छलाह | ओइ भोजपुरी भाषी अंचलमे हुनकर सानिध्य मैथिली भाषीक लेल घरसं बाहर घरक आश्वासन छल | जगदीश चन्द्र जी आ हिनक दूटा सहकर्मी श्री मोद नारायण झा आ श्री अरुण कुमार झा सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडियाक स्थानीय शाखामे पदस्थापित छलाह | ओइ समय हमरा कॉलेजमे सेहो श्री विमलेन्दु शेखर झा, डा. अमर नाथ ठाकुर,श्री गिरीन्द्र मोहन झा योगदान केने छलाह |हिनका सभक अतिरिक्त स्थानीय समाहरणालयमे वरीय सहायकक पदपर श्री अच्युतानंद कंठ आ श्री नरेश दत्त छलाह | हमर कॉलेजक वरीयतम प्राध्यापक प्रो.सिया शरण सिंह और प्रो. कमलोद्भव शर्मा अपन मैथिली प्रेम आ मैथिली जुमलाक लेल विशिष्ट बनल छलाह | जगदीशजीक गीत सभ गोष्ठीक चरित्रकें बदलि देलक | हिनक गीत संग्रह ‘तोरा अंगनामे’ प्रकाशित भ’ चुकल छलनि | हिनक गीत ख़ास क’ ‘ फगुआ आयल, फगुआ गेल’, ‘तोरा अंगनामे.....’, ‘छोटे-मोटे टूटलि मडैयामे गौरी कोनाक रहती हे’ सूचित करबामे कामयाब भेल जे आब एहि संस्थामे विविधताक सौन्दर्य प्रचुरतामे रहल करत | गोष्ठी जे एखन तक विना कोनो एजेंडाके बस गपशप और डा.दासक मधुर आतिथ्य लाभ तक सीमित रहै छल, आब निर्धारित विषयपर विमर्शसं समृद्ध होम’ लागल | सन १९८१ आ १९८२ मे लगातार विद्यापति पर्व आयोजित कयल गेल जाहिमे रविन्द्र-महेंद्र आ शशिकांत-सुधाकांतक जोड़ी स्थानीय भोजपुरी सुधी जनकें मैथिलीक माधुर्य आ संगीतसं आप्लावित क’ देलक |जट्ट-जट्टीनक गीत-कथाक रसास्वादन करबाक अवसर भेटल | कहबाक प्रयोजन नहि जे एहि आयोजनमे विशिष्ट कलाकार आ विद्वान सबहक भागीदारी जगदीशजीक संपर्कक कारण संभव भ’ सकल छल | मध्य प्रदेशमे स्थानांतरण भ’ गेलाक बादो जगदीशजीक सक्रियता कम नहि भेल | नवीन परिवेशक संग अनुकूलन स्थापित करैत ई मुख्यतः हिंदीमे लीखब जारी रखलनि तथापि मैथिलीयोमे लिखनाइ छुटलनि नहि | अन्य रचना सबहक अतिरिक्त हिंदीमे गजल संग्रह ‘तिरंगे के लिए’ आ मैथिलीमे दीर्घ कविता ‘धारक ओइ पार’ ओही प्रवास अवधिक सृष्टि अछि | नोकरीसं सेवा निवृतिक पश्चात् पटना आबि क’ मैथिली साहित्य एवं संस्कृतिक मुख्य-धारामे सहजहि आबि गेल छथि | हमरा विश्वास अछि जे ई मैथिली साहित्य, संस्कृति आ समाजकें समृद्ध करबामे सकारात्मक योगदान करैत रहताह | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.बाल मुकुंद पाठक- मैथिलीक गजलक सशक्त हस्ताक्षर 'अनिल' २.अरविन्द ठाकुर-अरविन्द ठाकुर- ’गीत-गंगा’ के बहाने किछु बतकही १ बाल मुकुंद पाठक करियन समस्तीपुर मैथिलीक गजलक सशक्त हस्ताक्षर 'अनिल' अरबी-फारसीसँ आरंभ भेल गजल कहबाक परंपरा उर्दू केर माध्यमसँ हिन्दुस्तानमे आयल आ हिन्दी सहित नेपाली, बंगाली, गुजराती, बुन्देली, मैथिली, मराठी आदि-आदि क्षेत्रीय भाषामे सेहो पसरि गेल आ ओहि भाषाकेँ पद्य साहित्यमे एकटा सशक्त विधाकेँ रूपमे अपनाकेँ स्थापित क' लेलक. मैथिलीमे सर्वप्रथम गजल कहबाक श्रेय पंडित जीवन झा केँ जाइत छनि. हिन्दी पत्रिका अंजुमनमे प्रकाशित आलेख 'मैथिली गजल के बारे में' मे मैथिली गजलक जानकार आशीष अनचिन्हार लिखैत छथि कि 800 ई. सँ- 1905 ई. धरि मैथिली नाटकमे गीत गयबाक प्रचलन छल मुदा 1905 ई. मे नाटक 'सुंदर संयोग' मे पंडित जीवन झा द्वारा पहिल बेर गीत केर स्थान पर गजल प्रयोगमे आयल. मुदा 2008 ई. मे 'अनचिन्हार आखर' केर स्थापनाक उपरांत मैथिली गजल प्रकाशमे आयल आ तकरे प्रभावसँ आइ मैथिलीमे लगभग दू दर्जनसँ बेसी गजलकार एक संगे गजलक माध्यमे अपन बात कहबामे लागल छथि. यैह ओ समय छल जखन मैथिली गजल हमरा सेहो अपना दिस आकृष्ट केने छल. एहि क्रममे विदेह ई-पत्रिकामे छपल गजलक एकटा शेर पर नजरि पड़ल- 'जै खातिर मारा मारी अछि भात दालि तरकारी अछि' शाइर रहथि जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' ई शेर ततेक ने प्रभावित केलक कि तकरा बाद ई नाम हेर-हेर केँ पढ़ लगलहुँ- 'जंगल आ पहाड़ देखलौं जीवनमे गुजगुज राति अन्हार देखलौं जीवनमे' 'जुनि पूछू की करै छी हम नित स्वयंसँ लड़ै छी हम' अनिल जीक गजलक सबसँ पैघ विशेषता ई छैक कि ओ एकदम्म सहज आ सरल भाषाशैलीमे पैघसँ-पैघ बात पाठककेँ मोनमे बहुत सरलतासँ उतारि दैत छथि. मैथिली साहित्यसँ मिथिलाक आमजनकेँ कटबाक एकटा कारण ईहो रहल अछि कि मैथिलीमे अधिकांश लेखक आलोचककेँ ध्यानमे राखि संयुक्ताक्षर बला शब्द भरल रचना करैत रहलाह अछि एहिठाम अनिल जीक रचना सभ आमजनकेँ मैथिलीसँ जोड़बाक एकटा प्रयत्न बुझा पड़ैत अछि. 'अपने छी एत्त आ मोन कतहु टांगल अछि जानि नहि देखबा ले' की की सभ बाँचल अछि' 'ईष्या घृणा कपट आ निन्दा सीखि रहल छी देखू अप्पन भाग्य अपने लीखि रहल छी' मैथिलीमे बिना बहरक गजल कहबाक बहुत पुरान परंपरा रहल अछि आ आइयो बिन बहर गजल कहनाहर गजलकारक एकटा पैघ लिस्ट अछि. एगो समय एहनो छल जखन अनिल जी सेहो एहि बहरक झंझटिसँ अकछि गेल छलाह, अपन शेरक माध्यमसँ ओ स्वयं कहैत छथि- 'बहरक झंझटसँ हमरा आजाद करू हम गजल छी हमरा नहि बरबाद करू' ओतहि बादमे गजलमे बहरक महत्ता बुझलाक बाद कहैत छथि- 'खिड़की केबाड़ किछु नै महल कोना भेलै नै रदीफ आ ने काफिया गजल कोना भेलै' अओर सच तँ ई अछि जे मनुखमे सीखबाक प्रवृति रहबाक चाही, जाहि मनुखमे ई प्रवृति बनल रहतैक ओ अबस्से एक-ने-एक दिन सफलता हासिल करतैक आ से अनिलजी सीखबाक एहि भूखसँ अरबी बहर आधारित गजल कहबामे सेहो सक्षम भेलनि, शाइत एहने स्थितिमे अनिल जी द्वारा ई शेर कहल गेल छल- 'पढ़बाक मोन होइए लिखबाक मोन होइए सदिखन किछु ने किछु सीखबाक मोन होइए' जगदीश चन्द्र ठाकुर जीक जन्म २७.११.१९५० केँ शंभुआर, मधुबनीमे भेलनि. एखनधरि तोरा अङनामे -गीत संग्रह, धारक ओइ पार-दीर्घ कविता आ गीत गंगा-गीत संग्रह प्रकाशित छनि ओतहि गजलक गजल गंगा पहिल पोथी गूगल बूक स्टोर पर ई-बुक मे उपलब्ध छनि. तिरंगे के लिए नामसँ हिनक एकटा गजल संग्रह हिन्दीमे सेहो बहरायल छनि. श्री अनिल वृतिसँ सेवानिवृत बैंक अधिकारी छथि आ मैथिली गजलमे शेर कहबाक एकटा विशिष्ट आ अपन अलग ढंग लेल जानल जाइत छथि. सबूतकेँ रूपमे दू टा शेर उद्धृत अछि- 'अहाँ पूब कहब ओ पश्चिम जाएत अहाँ की करबै अहींकेँ खाएत आ अहींकेँ गरियाएत अहाँ की करबै' नीक वक्ता बनबासँ पहिने नीक श्रोता बनब जरूरी अन्यथा अहाँके देखिकेँ लोक पड़ायत अहाँ की करबै आइ मैथिलीमे युवा गजलकारक एकटा पैघ लिस्ट अछि मुदा ओहि गजलकारक शेर सभमे ओ शेरियत नहि झलकैत अछि जाहि कारण हल्लुक आ झुझुआन शेर सब बेसी सोझाँ आबि रहल अछि. कतेक गजलकारक शेर पढ़लाक बाद तँ एना प्रतीत होइत अछि जे बेकारमे शब्द आ समय बेरबाद कयल जा रहल अछि आ गजलक गर्दनि घोंटल जा रहल अछि. एहनमे अनिल जीक मैथिली गजल एकटा नव ढ़गसँ मैथिली गजलकेँ परिभाषित करैत अछि. हुनका गजलमे एकटा खास चमक अछि, टटकापन अछि आ संगहि खांटी मैथिली शब्दसँ सजाओल सहज कथन- 'भय कुंठा आ संत्रास निराशा जीवनमे तैयो अछि जीवन केर आशा जीवनमे' 'जिनगीकेँ अखबार बनौने बैसल छी हम घरकेँ बाजार बनौने बैसल छी' सत्ताधारी वर्ग द्वारा लगातार उपेक्षित मिथिलामे बंद भेल सभटा कल-कारखाना आ दिनानुदिन बढ़ैत पलायन पर चिन्ताग्रस्त भ' अनिल जी कहैत छथि- 'चिन्ता तनकेँ दागि रहल अछि की करियै मोन कतौ नै लागि रहल अछि की करियै कतौ नै रहल कल कारखाना मिथिलामे लोग गामसं भागि रहल अछि की करियै' मैथिली गजलक मध्ययुगमे जन्मलेनिहार एहि गजलकारकेँ पढ़लाक उपरांत मोनमे कतेको तरहक प्रश्न उठैत अछि. शेर कहबाक अपन अलग ढ़ग ओ शैलीक कारणे जत' कत्तो मैथिली गजलक चर्च होएत जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल जीक चर्चा अबस्स टा कयल जाएत.. मैथिलीक एहि सशक्त गजलकारसँ मैथिली गजलकेँ बहुत रास उमेद छैक, हुनका एखन बहुत पैघ यात्रा करबाक छनि जाहिसँ हम-अहाँ एहिना गजल गंगा मे डुबकी लगबैत रही.. अंतमे अनिल जीक एहि दुनू मतलाक संग आलेख समाप्त क' रहल छी- 'अपने छाँहसँ हम डेरा गेल छी अपने घरमे हम हेरा गेल छी' 'किछु बात सोचि-सोचि क' कना जाइए अहिनामे कौखन मोन औना जाइए' २. अरविन्द ठाकुर- ’गीत-गंगा’ के बहाने किछु बतकही राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर अपन आलेखमे पूर्वमे प्रचलित एहि कहावतकेँ उद्धृत केने छथि-- बिना कोक जो रति करे, बिन गीता भख ज्ञान बिन पिंगल कविता रचै, तीनों पशु समान एहि कहावतक संग दिनकर उल्लेख केने छथि जखन ओ सभ काव्यक क्षेत्रमे आएल छला तँ कवि लोकनिमेपिंगल पढ़बाक रिवाज छल मुदा आब कोय पिंगल नै पढ़ैछ, ने कोय प्रसतार साधैत अछि। ओ क्षोभ व्यक्तकरैत कहैत छथि जे जखन छंदहि बिदा भऽ गेल तखन पिंगल के बेगरता की रहि गेल।ओ व्यंग्य करै छथि पुरना परंपरा सभकेँ टुटलाक बाद जे नवका परंपरा सभ कायम भेल अछि ओहिमेसँ सभसँ प्रमुख परंपरा ई अछि जे स्वतंत्रता कोनो नियमकेँ नै जानैछ आ तैं ओकरा कोनो टा पापक ज्ञान ने अछि। वर्तमानमे "समकालीन", प्रगतिशील आदि शबद्क आग्रह साहित्यमे बढ़ल अछि आ अनेको साहित्य गुरू लोकनि ई फतवा दऽ चुकल छथि जे छंदमुक्त कविते समकाली आ प्रगतिशील अछि किए तँ एहिमे भाव आ विचारकेँ बेसी स्वतंत्रतासँ प्रगट कएल जा सकैत अछि। गीत-गजल-दोहादि आब बाबा आदमक जमानाक वस्तु भेल आ तेँ आउट-आफ-डेट विधा भेल। एहि मान्यतासँ प्रायः प्रत्येक भाषा साहित्य प्रभावित भेल अछि। हिंदीक प्रसंगमे बुद्धिनाथ मिश्र एक ठाम लिखए छथि-"शंभूनाथ सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रमेश रंजक, शिवबहादुर सिंह भदौरिया सन अनेक गीतकारक गीत संग्रह आयल मुदा साहित्य अकादेमी ओहि दिस आँखि मुनने रहल"। मैथिली भाषा मुदा एहि मामिलामे अपवाद जकाँ रहल। आन भाषाक तुलनामे मैथिलि अखनियों परंपरावादी कवि सभहँक बहुमतसँ संपन्न अछि आ मुक्तछंदी कवि सभक तुलनामे बेसी तगतगर आ संगठनबल बद्ध सेहो रहल अछि। मुदा मैथिलीक ई कवि कर्म संख्या बलमे, मात्राबलमे प्रबल होइतो स्तरबलमे बहुत फोंक रहल अछि। विषय-वस्तु, प्रस्तुतिकरण आदिमे समाजिक चेतनाक कोनो ध्यान रखने बिना मात्र तुकबंदीक बलपर जखनि रचनाक पथार लहाए देल गेल हुअए आ ओकरा गुरू-महंथ-आचार्य सभक सुरक्षा-प्रशंसा-सम्मानक त्रयीकेँ कवच सेहो बेट गेल हुअए तखनि एहन साहित्यक अकादेमीक भगवाने मालिक। तखनि ई मेदनी साफे वीर विहीन तँ कहियो ने रहल अछि। हम जहिया स्वान्तः सुखाय लिखैत रही तँ तेकर माध्यम गीत आ गजल रहए। प्रभाव रहए बाबूजी ( पिता स्वॅ बलेन्द्र नारायण ठाकुर "विप्लव")केँ। मैथिली-प्रवेश आ लेखकनक नियमितताक शुरुआती दौरमे हम जाहि मित्र समाजक बीच उठैत-बैसैत रही तकर प्रभावमे मुक्त छंद कविताकेँ अपन अभिव्यक्तिक माध्यम बना लेने रही। तहिया गीत- गजल आदिक विधा दोयम दर्जाक बुझाए लागल रहए। प्रयास रहए जे मंचीय कवि नहि बनी। दर्शक श्रोता वा वातावरणक कतबो दबाब रहए अपन कविताकेँ हेय नहि हुअए दी। एक तँ एहन आयोजनमे जाइ नहि आ जाइ तँ अपन कविता गंभीरताक संग पाठ कऽ दी, कोनो ताली-थपड़ीक अपेक्षा नहि करी। एकर नतीजा ई भेल जे हम एहन आयोजनमे अपन कविता पाठक क्रममे दर्शक-श्रोताक साँती मंचपर उपस्थित कवि लोकनिक दिस बेसी उन्मुख रहल आएल छी। मुदा हमरा ई बात सकारएमे कनियों दुविधा नै जे एहन आयोजनसँ घुरलाक बाद कतेको दिन धरि जे किछु दू-चारिटा पाँति मोन आ स्मृतिमे बेर-बेर आबि घुरिआइत रहल अछि ओ कोनो गीतकार वा गजलकारक गाएल पाँतिए रहल अछि। एहि क्रममे मोन पड़ैत अछि लक्ष्मी नारायण सुधांशुक एकटा लेखक ई अंश---" जतए पदकेँ पहुँच नै होइ छै ओतहि स्वरकेँ कार्य आरंभ होइछ। अज्ञेय आ सूक्ष्म भावकेँ विशद आ तीव्र रूपमे प्रगट करैक शक्ति गानमे पाएल जाइ छै। पद सभहँक साधारण अर्थकेँ विशेष रूपसँ प्रभावशाली बनाबैक लेल स्वरकेँ अतिरिक्त आन कोनो दोसर साधन नहि अछि। काव्यगत प्रभावकेँ विशेष क्षमताशाली बनाबैक अभिप्रायसँ छंदक विधान कएल गेल अछि। धनुषपर चढ़ि कऽ जेना वाण बेसी शक्ति संपन्न आ तीव्र भऽ जाइत छै तहिना राग द्वारा पद विचित्र आकर्षण आ शक्ति प्राप्त करैत अछि। अपन सामर्थ्यक बलपर जतऽ तक पद नहि पहुँचि सकैत अछि रागक सहायतासँ ओ ओहि अज्ञात स्थान तक सेहो पहुँचि जाइत अछि। रागमे मीलि कऽ पद अपन वास्तविक अर्थक प्रतिपादन करए लागैत अछि। ध्वनि सामंजस्यक कारण छंदबद्ध पद सभसँ एक प्रकारक विद्युत प्रकाशित हुअए लागैत अछि जे हृद्यकेँ विमुग्ध कऽ दैत अछि। प्रायः तें वाचिक परंपरामे गीत काव्य महत्वपूर्ण आ अनिवार्य स्थान रहै। चंद विधानसँ परिपूरित हेबाक चलते एकरा स्मरण राखब सहज रहै। लेखन आ मुद्रणक युगमे आबि कऽ मुक्त छंदी रचना सभहँक विकास संभव रहै आ भेलै। मुद्रणक सुविधाक बाद पढ़ब आ पढ़ि कऽ कोनो रचनाक स्वाद लेब सहज भेल अछि। एहन स्थितिमे गेय रचनाक उपयोगिता वा प्रासंगिकता नै रहलै वा नै रहतै से कहब तँ कठिन अछि मुदा अधिकतर गेय रचना सुनयमे जतेक मनोहारी लागैत अछि ततेक पढ़एमे नहि। मंचीय आयोजनमे श्रोता दर्शक उत्सवी माहौलमे रहैत अछि आ तखनि ओ हल्लुक आ मनलग्गू बातक अभिलाषी रहैत अछि। मुदा पढ़ऽ बेरमे ओएह व्यक्ति पाठक बनिते रचनामे गंभीरता आ उपादेयता ताकऽ लागैत अछि। अज्ञेय एकरा एना कहैत छथि--" गजल परफोर्मेंस छै, बज्मकेँ वस्तु छै, बैसल प्रत्यक्ष समाजिक माँगै छै। नज्म यात्रा छै खुलल देशक वस्तु छै धैर्यवान सहयात्रीक अपेक्षा राखै छै"। एतए गजलकेँ छंदयुक्त काव्य आ नज्मकेँ छंदमुक्त काव्यक प्रतिनिधि मानि एहि कथनक आशय बुझल जा सकैत अछि। अज्ञेयक चर्चा आएल तव मन पड़ल जे ओ आ दिनकर दूनू गोटे कविताक लेल पाठक श्रोता अथवा ग्राहककेँ अनिवार्य मानै छथि। दिनकर कहै छथि--जाहि कविकेँ श्रोता वा पाठक नहि भेटै छै ओ असमय मौन भऽ जाइत छै। एकर प्रतिकूल जेकरा नीक पाठक भेटि जाइत छै ओकर उत्साह दूना भऽ जाइत छै आ एहि उमंगमे ओकर भीतरक दबलसँ दबल अनुभूति सभ अभरि कऽ बाहर आबि जाइत छै। बहीर लोकक बीच बैसि कऽ साहित्यिक रचना करएसँ बढ़ि कऽ आर अप्रिय काजक कल्पना हम नहि कऽ सकैत छी"। एहिना अज्ञेयक कथन छनि--" हम स्वानतः सुखाय नहि लिखैत छी। कोनो टा कवि मात्र स्वानतः सुखाय लिखैत अछि वा लीखि सकैत अछि एकरा स्वीकार करऽमे हम स्वयंकेँ सदैव असमर्थ पाबै छी----तें अभिव्यक्तिमे एकटा ग्राहक वा पाठक वा श्रोता हम अनिवार्य मानै छी। एहि कथन सभहँक आलोकमे देखल जाए तँ गीत विधा बेसी लोकप्रिय विधा अछि आ आन (विशेष कऽ मुक्तछंद कविता) विधाक तुलनामे ओकर ग्राहक वा पाठक वा श्रोताक संख्या बेसी अछि। मैथिलीमे विद्यापति पर्वक जे तामझामी अनुष्ठान ठाम-ठाम अफरात मात्रामे आयोजित होइत अछि ताहिसँ मैथिली गीत विधाकँ बल भेटैत रहलैक अछि। ई अलग बात जे एकर एक परिणाम ईहो बेल अछि जे थपड़ी-पिहकारीक लिलसाम रचनाक स्तरीयताक तुलनामे रचनाक लोक-लुभावनतापर बेसी जोर देल जाइत रहल अछि। मुदा दिनकर आ अज्ञेयक कहल एहि तीनू माध्यममे कमसँ कम एक "श्रोता" माध्यमे तँ एहन रचना सभकेँ भेटिए जाइत अछि पाठक वा ग्राहक भेटए नहि भेटए। तें जा धरि मैथिलीकेँ मंचक सरंजाम भेटैत रहतै गीत विधाकेँ उत्साह तँ भेटिते रहतै। एहि सभ बातक किछु निष्कर्षमे पहिल ई जे काव्यक छंदयुक्त विधा गित वाचिक वा श्रुत परंपरासँ प्राप्त विधा अछि। दोसर ई जे अपन गेयताक कारण ई आन विधाक तुलनामे बेसी लोकप्रिय विधा अछि। तेसर ई जे परंपरासँ ई विधा लोक-मनोरंजनक लेल वांछित कोमल-कमनीय (बेसी तर) भावक अभिवयक्ति लेल बेसी उपयुक्त विधा अछि। ई निष्कर्ष एक नहि अनेको जिज्ञासाक समाधान मँगैत अछि। अजुका जीवन जगतमे लोककलेल जतेक भौतिक सुविधा बढ़लैक अछि ततबे असुविधा-असुरक्षाक जंगल घनगर भेल अछि। समाजिक जीवनमे असहजता-जटिलता-कुंठा आदिक नकारात्मक भाव निरंतर घनीभूत भेल जा रहल अछि। लोक समाज प्रत्येक आबए बला दिनमे नित-नित, नव-नव चुनौतीकेँ साक्षात कए रहल अछि। आन-ान जीच सभक संग अभिव्यक्तिक संप्रेषण लेल नव-नव तकनीक, नव-नव पद्धति आ नव-नव औजार सभ सरंजाम भेल अछि। श्रुत वा वाचिक परंपराक तुलनामे आइ अनेकों मूलभूत अंतर आबि गेल अछि। वाचिक परंपराक कविता अखनियो एकटा वस्तु नहि होइछ। छपल कविता वस्तु होइत अछि। वाचिक परंपरामे संप्रेषण स्वंय सहकर्म छलै। छपल कविताक संग पहिने सहयोगक स्थिति उत्पन्न करबाक प्रयोजन होइ छै जाहिसँ संप्रेषभ भऽ सकए। अजुका रचना जगतमे एहनो विरोधाभास समक्षमे ढ़ाठ छै। तँ प्रश्न ई अनिवार्य रूपसँ उठैत अछि जे अजुका कोनो रचना जँ लोकलुभावन अछि तँ की लोकधर्मी सेहो अछि? वर्तमानक कठोर उभर-खाबड़ आ कंटकाकीर्ण लोक जीवनक यथार्थक यथार्थकेँ इमानदार रचनाधर्मिताक संग अभिव्यक्ति करैत अछि की? अपन चौतरफा पसरल-छिड़िआएल परिवेशक मारुक कुहेससँ पलायन कए वायवीयताक शरणमे तँ नहि चलि गेल अछि? दिनकर एतेक सक्षम कलाकार छला जे अपन रचनाधर्मकेँ व्याकरणमे बान्हियो कऽ भाव-विचारक उन्मुक्त उड़ान लऽ सकैत छला। आ साहित्यिक कोनो विधामे अपन विराटक प्रदर्शन कऽ सकैत छला। हुनक पिंगल आ छंदक पैरिकारीक अढ़मे कोनो अजुका कवि मात्र अपन सौख आ देखांउस लेल साहित्यकेँ अपन उपकरण बनाए स्वार्थ साधि रहल अछि की? जँ एहि प्रश्न सभक उत्तर नकारात्मकता लेने अछि तखनि आधुनिक युगमे एहन रचना सभक उपादेयता की? अजुका विकालमे जे किछु जनहितमे नै अछि से सभ जनविरोधी अछि। एहनमे एहन रचना सभक प्रासंगिकता की? अज्ञेय जँ अभिव्यक्तिक लेल एकटा ग्राहक वा श्रोता वा पाठकक अनिवार्यता मानै छथि तँ एहिसँ भ्रमित भए जेबाक कोनो दोग नै छोड़लनि अछि। अपन डायरीमे एक ठाम ओ लिखय छथि " नव काल बोध----कालसँ नव संबंधक बोध--लयः काल प्रत्यय के एक प्रकार --- मात्रपर नहि, तनावपर आधारित लय---कालः तनावकेँ एक प्रणाली---आधुनिक कालः ने निर्झर, ने आवर्त, ने कसल कमानीपर एक दिससँ पड़ैत बल--- पारंपरिक छंदकेँ ढ़ाँचामे आधुनिक काल बोधक अभिव्यक्तिक संभवाना नहि भए सकैत छल"। एतए ई ध्यातव्य जे आधुनिक युगमे जनमियो कए कोय आधुनिक नहि होइछ। आधुनिक हएब ओकर काल बोध आ ग्रह शक्तिपर निर्भर अछि। अजुका युगमे किछु ( मैथिलीमे मारिते रास) नव लेखक छथि जे पुरान छथि जेना कि प्राचीनहु कालमे किछु लेखक छला जे नव लागथि। आइयो किछु तेहन लेखक-कलाकार छथि जे अखनियो संदर्भहिमे जिबैत छथि। परिवेशक हुनक संकल्पना ओही अर्थमे स्थितिशील अछि, गतिशील नहि। मैथिलीमे आइयो एहन तथाकथित साहित्कार लोकनिक आधिक्य अछि जिनकर काल चेतना नष्टप्रायः छनि आ जिनका एतबो भास नै छनि जे अपन मूल्यवान संपतिक संग तिजौरीमे स्वयं बंद भऽ जाएब ने बुद्धिक मार्ग अछि ने जीवनक। एहन संदर्भजीवीक कोनो उत्पाद वर्तनमान समाजक लेल कोन काज के? हमर मान्यता अछि जे टटका रहलापर रोटी सन समान्य वस्तुओ स्वास्थ्यकर आ सुअदगर होइत अछि। जखनि की पायस सन विशिष्ट वस्तुओ बसिया भेला, फुफड़ी पड़लाक बाद जहर अछि, अस्वस्थ्यकर अछि, त्याज्य अछि। सपना कतबो सुंदर हुअए अनुपयोगी अछि। यथार्थ कतबो कठोर वा अप्रिय हुअए जीबाक तँ अछि ओकरे संग। जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक गीत संग्रह "गीत गंगा" मे नहेबाक प्रयास करैत हमरा मोनमे अनेक रास विचार सभहँक आविर्भाव भेल जाहिमे किछुकेँ हम उपर उद्धृत कएल अछि। जतेक आएल से सभ लिखाए गेल वा जे सभ आएल से किए आएल तकर विश्लेषण अखनि आवश्यक नै बुझै छी। साठिक संख्याबला एहि संग्रहक रचना सभमे अपन धरती, गाम घर, आदिक मोह छै मुदा कोनो भाषायी वा क्षेत्रीयताक संकीर्ण क्षुद्र भाव नै छै। हिंदीकेँ बाढ़निसँ झाँटबाक, एकटा मिथकीय राज्यकेँ बकिया देशसँ काटि कऽ रखबाक आ अपन जातीय श्रेष्ठताकेँ बेर-बेर घोसबाक जे एकटा मैथिल दृष्टि बला परिपाटी चलनमे रहल अछि तेकर एहि संग्रहमे अभाव छै। एहि पूर्वाग्रहहीनताक स्वागत अछि। ई मैथिल दृष्टि मैथिलजनकेँ गैर-मैथिल समूहक मोनमे खलनायक जकाँ स्थापित कएलक अछि आ एकर बहुत रास नकारात्मक, तीव्र आ आक्रोशित प्रतिक्रिया भेल अछि, भए रहल अछि। समस्तीपुरक पत्रकार-साहित्यकार गंगाप्रसाद आजाद सतलमपुरी अपन पुस्तकक नामें " मिथिला भारत का अंग नहीं है" राखै छथि आ एहि संदर्भमे अनेकों प्रमाण आ विवरण दै छथि। बिहार राज्य हरिजन आदिवासी विकास मंचक अध्यक्ष डा. बिंदेश्वर राम एकरा पुरहित वर्ग द्वारा पुनः अपन वर्चस्व स्थापित करबाक षड्यंत्रकारी प्रयासक रूपमे देखै छथि। ई तँ भेल समाजिक पक्ष। साहित्यिक पक्ष सेहो एहि बकथोथी आ नाराबाजीसँ क्षतिग्रस्त होइत अछि आ एकर परिणाम स्वरूप "मैथिल आँखि"क पैरोकारी कवि सभहँक रचनामे कवित्व नगण्य आ मैथिलत्व बेसी होइत अछि। अनिलजी एहि मैथिल दृष्टिक प्रकोपसँ शत-प्रतिशत बाँचल छथि से कहब तँ कठिन ( ने हम व्यक्तिगत रूसँ जानै छी आ ने हुनक संपूर्ण रचनाकर्मसँ हम परिचित छी) मुदा गीत गंगाकेँ अनेक रचनामे अनेक ठाम ओ स्वयंकेँ राष्ट्र समाजक संग अखंडतापूर्वक जोड़ै छथि आ गर्वक अनुभव करै छथि। अपन कतिपय रचनामे गाम-घर आ जनपदक प्रति प्रेमक प्रदर्शनक बादो क्षुद्र संकीर्णतासँ दूर रहब एहि संग्रहक विशिष्टता मानल जा सकैछ। "कह गाँधी कह जयप्रकाश", "सत्य अहिंसाक पुजारी", "आकाशक चन्ना आ तारा", "हम भारत के पूत", "की हिंदू आ की मुसलमान", आदि गीत एकर प्रमाण अछि। एहिना "जय भारत भारती"मे मिथिला-भारत आ मैथिली-भारतीक परस्परताक लेल "गाउ जय मिथिला जयति मैथिली / जय भारत, जय भारती" आ " राष्ट्रक सर्वोच्चताक प्रदर्शन लेल " हम कल्पना करी एकटा भारतवर्षक गाम केर / जैमे हो बस जाति एकटा मात्र भारतीय नाम केर" सन पाँति संकुचित "मैथिल आँखि"सँ देखल जाइत दृश्यक लघुतासँ विपरीत दृश्य प्रस्तुत करैत अछि आ एक तरहें मैथिल कट्टरता लेल चुनौती प्रस्तुत करैत अछि। एतऽ ई स्मरण दिआएब विषयांतर नै हएत जे एकटा साहित्यकार नेता अपन कपोल-कल्पित राज्य लेल अलग झंडा बनबा लेने रहथि। "उठ-उठ बौआ भेल परात"मे एकटा मसोमातक हपूर्व भाव चित्रित भेल अछि। पतिक मृत्यु, असहायावस्थोमे अपन आत्मगौरवक रक्षा, पुत्रक प्रति असमीम प्रेम आ ओकर देशक लेल सीमापर लड़बाक मनोकामना बहुत कारुणिक आ रोमांचक अछि। "चिट्ठी लीखि रहल छी" मैथिल परिवेशसँ इतर एकमात्र रचना अछि। ई आधुनिक भाव-बोधक अशेष संभावनासँ भरल-पुरलल रचना बनिस कैत छल मुदा हाय रे मैथिल-मन, एतहुँ गीतकारकेँ पहाड़ी क्षेत्रक संकट-दारिद्रय-संघर्षक दर्शन नहि भऽ सकलनि आ चूड़ा दही अचारक लिलसा जागि उठलनि।"करेजमे जीबें---" गीतमे श्रम आ साहसक प्रति विश्वास प्रगट करैत एकटा आह्वान अछि।"नब्बे टा बरियाती"मे वैवाहिक अवसरपर बरियाती सभहक अराजक व्यवहार, आयोजनमे व्यर्थक देखाँउस, आ फिजूलखर्चीपर समधानल व्यंग अछि। किछु और गीत सभमे व्यंगक खूब धरगर समावेश भेल अछि आ समाजिक विसंगतिकेँ देखार कएल गेल अछि।"मैथिली प्रतिमा सजाउ", "तीन कोटि मैथिल" आ "हमरा गाममे" वायवीयतासँ बरल पारंपरिक आ अतीत मोह केर गीत अछि मुदा "मिथिलामे" आ "दरूक दोकान"मे वर्तमान यथार्थ अछि। "आत्मगीत"मे "क्षमा करू हे पिता हमर / बरखी ओहिना नहि करब हम / नहि केश कटायब बेर-बेर / नहि भोज भातमे पड़ब हम" आ "जय-जय हिंदुस्तान"मे --"चानन ठोप पाग आ डोपटा / जप तप योग धियान / सभ ध्यानमे सुंदर लागय / देश भक्ति केर ध्यान" सन पाँति व्यर्थ आ निरर्थक भेल परंपराक अस्वीकारक घोषणा जकाँ अछि। छप्पन भोगक बीच चटनिएक मात्रामे सही अनिलजीक ई तेवर आ दुस्साहस प्रशंसा जोगर अछि। "मैथिली ले अहाँ की करै छी", "अरे राम-राम-राम", "मैथिल केर परिभाषा", "पाथरकेँ भगवान बुझै छी", " चोर कहू ककरा", आ "हम चालनिमे पानि भरै छी" आदिमे मैथिल दुचित्तापन आ अतीत-मोहकेँ देखार करैत विरोधी स्वर अछि जे मैथिलीमे मंद आ दुष्प्राप्य जकाँ अछि।"गीत-गंगा"क सर्वाधिक आकर्षण अछि "हम आँगन छी हम अरिपन छी" शीर्षक गीत। अपन विषय-वस्तुक संग प्रायः प्रत्येक मापदंड आ दृष्टिकोणसँ न्याय करैत ई अद्भुत मोहक रचना अछि। ई गीत अपन बाह्य आ अभयंतर दूनू संरचनामे एतेक सुडौल आ पूर्ण अछि जे मात्र इएह टा गीत लेल एहि संग्रहकेँ मोन राखल जा सकैत अछि। एहि संग्रहक किछु शब्द संयोग, किछु उपमा सभ बहुत नीक अछि आ अतिरिक्त रूपसँ ध्यान आकृष्ट करैत अछि। "सपना पाहुन बनि कऽ आयल / तन्नुक सन निन्नक आँगनमे", "हिमगिरि समान किछु पुरुष छला / किछु भेटला गंगाजल समान", "एक विपटा कते मदारी छल / सभहँक सभ भैयारी छल / गाड़ी छल ऊपरमे चितंग / नीँचा कुहरैत सवारी छल" , "सभ बाट अहिल्या सन शापित-नित बाट राम केर तकै छली", "हम देखलहुँ सभहँक सोंझामे / बकरीसँ खुट्टा बान्हल अछि / सौंसे अकासक बदलामे / कागत एक टुकड़ी तानल अछि", छल हहरि गेल सभ गाछ मुदा / लत्ती-फत्ती सभ मोटा गेल", छल पथराएल संबंध शेष / कछु वैचारिक अनुबंध शेष" आदि टुकडी एक उदाहरण स्वरूप देखल जा सकैत अछि। गीत-गंगाक शिशु गीत सभ बहुत सहज,सरल आ मनोहर अछि। ई सहजता, सरलता आ मनोहरता अनिलजीक प्रायः प्रत्येक गीतमे अछि आ जँ एक-दूटा गीतकेँ बारि देल जाए तँ एहि संग्रहकेँ बाल साहित्यक कोटिमे राखबोमे कोनो हर्ज नहि। राष्ट्रकवि दिनकर अपन एकटा आलेखमे जयप्रकाश नारायणकेँ ई कहैत देखाबय छथि --"प्रत्येक कलाकार बेसीसँ बेसी लोकक हृद्यकेँ छुबए चाहैत अछि आ बेसीसँ बेसी हृद्य छूबाक लेल ई आवश्यक अछि जे ओ अपन खानगीसँ खानगी अनुभूतियोकेँ समान्य अनुभूतिक स्तरपर उतारि कऽ लिखए।"अपन गीत संग्रहमे अनिलजी एहि स्तरपर उतरि जेबाक संकेत दै छथि आ हुनक रचना सभ हृद्यकेँ छुबैत अछि। गीत-गंगासँ बीछि-बीछि कऽ ओ ओकर सकारात्मक पक्ष सभकेँ सोझाँ अनबाक प्रयासक अछैत ई विचित्र बात अछि जे एहिसँ प्राप्त अनुभूति मुट्ठीक फुक्का जकाँ लगैत अछि। संग्रहमे ठाम-ठाम क्रांतिकारी स्वर, परंपरा विरोधी तेवर, नीक शब्द-संयोग, स्पष्ट व्यंग्य आदि आदिक आंशिकताक छौंकक बादो संपूर्ण व्यंजन संतोष प्रदान नहि कऽ पाबैत अछि। संपूर्ण संग्रह एहन आभास दैत अछि जे पढ़ले चीजकेँ फेरसँ पढ़ि रहल छी। नव काल बोध, लोकधर्मिता, आधुनिक चेतनादिक दूरहुँसँ आबैत हल्लुको सन ध्वनि-प्रतिध्वनि जे संवेदनाक अनुभूतिसँ आपादमस्तक आप्लावित कऽ दिअए से नहि। जे अनिलजी अपन गजल ( जे थोड़-बहुत पत्रिकादिमे पढ़ल भेल)मे आधुनिकता आ समकालीनताक बोधसँ भरल लागै छथि प्रगतिशीलताक पक्षधर बुझाइ छथि जे अनिल एहि गीतसंग्रहमे अनुपस्थित जकाँ छथि। एकैसम शताब्दीक २०१३ ई.मे छपि प्रस्तुत भेल अछि ई पोथी आ एकर रचना बीसम शताब्दियोक गीत रचनासँ प्रतियोगिता किए नै कऽ पाबि रहल अछि? नीरज केर "कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे", वा नेपालीक " दिन गए बरस गए यातना गयी नहीं, रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रही", वा गोपी वल्लभ सहायक " जाने किस साँप ने डँसा है, नस-नस मे जहर का नसा है" आदिक टक्करकेँ कोनो एकौटा गीत संग्रहमे किएक नै अछि। समकालीन गीतकारहुमे बुद्धिनाथ मिश्रक "एक बार जाल और डाल रे मछेरे, जाने किस मछलीमे बंधन की प्यास हो" वा एकटा अत्यंत पिछड़ल गाममे रहिनहार भगवान प्रलयक "मत बिखेरना कोई सुमन मेरे मजार पर " सन गीतक अभाव एहि संग्रहमे किए अछि। कहल जा सकैछ जे हिंदी गीतक उदाहरण एतए अभीष्ट आ प्रासंगिक नै अछि। यात्री-नागार्जुने जकाँ बुद्धिनाथ मिश्र सेहो मैथिलीकेँ अपन दोयम दर्जाक रचनाक आश्रय-स्थल मानै छथि। तखनो हुनक " चारू कात बसल अछि विषधर पोरे-पोर डँसल छी / एहि बिखाह जंगलमे हमहीँ चानन गाछ बनल छी" सन गीतक उद्धरण देल जा सकैत अछि। आरो उदाहरण लेल मार्कण्डेय प्रवासी, शांति सुमन, सियाराम झा सरस, नरेश कुमार विकल सन कतिपय नाम मैथिलीमे उपस्थित अछि। ई अद्भुत संयोग जे अनिलजी समेत उपरोक्त चारू गीतकारक जन्म बीसम सदीक पाँचम दशकहिमे भेल अछि। संभव छै जे गीत-गंगाक गीत सभ सुनि कए ग्रहण करबाक बाद बेसी प्रभावि लागए मुदा मुद्रणक युगमे ने हमरा ई सुविधा प्राप्त भऽ सकैए आ ने आन पाठककेँ। कोय कहि सकैत अछि जे गीत साहित्यक एहन विधा छै जकर कोमल तंतुकेँ कर्कशता, कठोरता आदि नकारसँ बचबैएमे एकर कल्याण छै। मुदा गीतकेँ कोमल विधा कहि यथार्थसँ पलायनक तर्क अजुका युगमे स्वीकार्य नहि अछि। एहि विधामे बहुतों प्रतिष्ठित लोक समकालीन यथार्थक चित्रण बहुत सफलतापूर्वक केलनि अछि। तहिना कोनो कलाकार स्वानतः सुखायकेँ तर्क दऽ कऽ समाजक प्रति अपन लेखकीय दायित्वसँ मुकरि नहि सकैत अछि। प्रश्न उठत जे तखनि एकरा मुद्रित कऽ पुस्तकाकार किए केलहुँ? जीवन-जगतक विराट पसार, विविधता, विभिन्नता आ विरोधाभासकेँ लक्ष्य कैए कऽ पूर्वज विद्वान लोकनि अभिव्यक्ति लेल विभिन्न विधाक सृजन कए ओकर आश्रय लेलनि। आवश्यक नहि जे जीवन जगतक विविध रूपाकारक चित्रण लेल कोनो एकैटा विधापर सभटा छार-भार राखि देल जाए। स्वंय अनिलजी एकटा रचनाकारक रूपमे ई काज केनहि छथि आ तकर उदाहरण लेल हुनक गजल सभमे अभिव्यक्त भाव सभकेँ देखल जा सकैए। जखनि विकल्प मौजूद हुअए तखनि अनेरे लकीर के फकीर बनल रहब आन क्षेत्रक लोक लेल भने स्वीकार्य आ क्षम्य हुअए साहित्यमे एना दिन काटब बुद्धिमताक लक्षण नहि मानल जा सकैए। तखनि जाहि वर्गक घोषित नीति ई हुअए जे ओकरा द्वारा ग्राह्य हेबाक लेल कोनो वस्तु वा रचना दू-चारि सए बर्खक पुरान तँ हेबाके चाही वा नवरचित हुअए तखनो एतबे पुरान जकाँ लागए, ओहि वर्गसँ अजुका कविता वा सहित्यपर बहस वा विमर्शक कोनो अर्थ नहि रहि जाइत अछि आ तखनि कहए-लिखए लेल बैसिते कि अछि। ओना असहमति-आलोचनाक प्रति एहि असहिष्णु मैथिल समाजमे समालोचककेँ "अरसिक" कहि गारि पढ़बाक भाँज तँ सुरक्षित संरक्षित अछिए-- अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शरिरषि मा लिख मा लिख मा लिख। [युगानुसार नियति-- आ युगानुसार दुः शंका सभ। कालिदासक दुःस्वपन छलनि जे कहीं अरसिक सभकेँ कवित्व निवेदन करए ने पड़ि जाए। केशवदास चिन्तित छला जे चंद्रवदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि ने चलि जाए, अज्ञेक संकट अछि जे हम की जानए छलहुँ जे ई गति हएत जे विश्वविद्यालय सभमे हिंदी प्राध्यापक लोकनि द्वारा पढ़ाए जाएब] पाठक आ समालोचक द्वारा हर्षपूर्वक स्वीकार नहि करबाक स्थितिमे बचि जाइत अछि रंगमंचीय आयोजन आ ओकर श्रोता-दर्शक। तँ मैथिली कवि सम्मेलनक रंगमंचपर वएह कवि अधिकार आ रंग जमा सकैत अछि जकरा गलामे मिठास छै, स्वरमे करुणा आ हास्य रसक प्रवाह छै। जे सभाकेँ जतेक करुणासँ गला देत, जतेक हास्यसँ हिला देत ओकर ओतबे गंभीर करतल ध्वनि आ पिहकारिसँ स्वागत कएल जाएत। नतीजा कविताक स्थान गौण आ फकरा-संगीतक प्रधान। जिनका सभमे ई रंगमंचीय मोह-व्याधि जतेक मात्रामे अछि तिनकर रचना ततबे यथार्थसँ दूर आ हल्लुक होइत चलि जाइत अछि। तखनि मैथिलीए छिऐ। एकर की? गोस्वामी तुलसीदास तीर्थवादिक महात्म्य वर्णन करैत काल लिखने छला जे एहिमे स्नान कऽ कऽ काक पिक भऽ जाएल करैत अछि आ बक मयूर भऽ जाइत अछि। मैथिलीओ कोनो तीर्थसँ कम थोड़े अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. ३.१.समीक्षा/ एकांकी- १.प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३,एकांकी- कोरांटी ३.२.गीत, कविता, दोहा, चतुष्पदी आ गजल खंड- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३.३.की भेटल आ की हेरा गेल - जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३.४.पत्राचार खंड—जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ समीक्षा/ एकांकी- १.प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ३,एकांकी- कोरांटी १ प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ‘थोडे आगि थोडे पानि’2008 मे प्रकाशित प्रसिद्ध गीतकार भाइ सियाराम झा ‘सरस’क 80 टा गजल संकलन थीक।सरसजी गजलक पोथीक भूमिकामे कविता,कथा,निबन्ध आदि विधामे आबि रहल रचना सभक स्तरपर सवाल उठौलनि अछि। लेखक,कवि,नाटककार कें की की पढबाक चाही,से सलाह देल गेल अछि.लेखक लोकनिमे प्रतिबद्धताक अभाव पर आक्रोश व्यक्त कएल गेल अछि। अपन समाज,अपन भाषाक प्रति अपन लेखकीय प्रतिबद्धताक वर्णन सरसजी जाहि तरहें केलनि अछि से बेर-बेर पढबाक आ मोनहि मोन हुनक चरण स्पर्श करबाक लेल बाध्य क’ देत। मुदा जँ अहाँ ताकब जे गजलकारकें की की पढबाक अथवा कथीक अभ्यास करबाक चाही से एहिमे नहि भेटत। गजलकार स्वयं गजलक सम्बन्धमे की-की पढने छथि तकर उल्लेख नहि कएल गेल अछि। गजलक व्याकरणक कतहु चर्च नहि अछि.गजलकारकें मोन पडैत छनि दक्षिण अफ्रीकाक कवि मोलाइशक क्रान्तिगीत आ फिलीस्तीनी कविक कविता,कोनो शायरक कोनो महत्वपूर्ण शेरक उल्लेख नहि केलनि अछि। एहिसँ गजल लेखनक लेल आवश्यक प्रतिबद्धताक आभास नहि होइत अछि। पोथीक 80 टा गजलमे 62 टा गजलमे रदीफ आ काफियाक प्रयोग कएल गेल अछि जाहिमे 5 टा गजलमे रदीफ अथवा काफिया अथवा दूनूक निर्वाह सभ शेरमे नहि भ’ सकल अछि।16 टा गजलमे काफिया अछि, रदीफ नहि। 2टामे रदीफ अछि,काफिया नहि। अहूमे एकटामे सभ शेरमे रदीफक निर्वाह नहि भ’ सकल अछि। कोनो गजल एहन नहि अछि जकर सभ शेरमे वर्ण अथवा मात्राक एकरूपता हो।तें बहरमे त्रुटि साफ दृष्टिगोचर होइत अछि। एहि दिस गजलकारक ध्यान किएक नहि गेलनि से नहि जानि। सरसजीसँ लोककें बहुत अपेक्षा रहैत छैक, मुदा एहि सम्बन्धमे हुनक कोनहु स्पष्टीकरण सेहो कतहु नहि अछि। आशा अछि गजलकारक अगिला गजल-संग्रहमे आवश्यक औपचारिकताक निर्वाह होयत। ई पढि क’ नीक लगैत अछि जे ‘.....धीरू भाइ तं एते धरि कहने रहथि जे खैयाम कें मैथिलीमे सुनबाक हो तं सरस कें सूनल जा सकैछ...’ तें सरसजीसँ अपेक्षा आर बढि जाइत अछि। सरसजी कहैत छथि,‘एहि संकलनक गजल सभ तं सहजहिं अपन लोकवेदक,माटि-पानिक,भाशा-साहित्यक आ संस्कार-संस्कृतिक प्रतिबिम्ब तं थिके,संगहि अनेक ठाम अनेक तरहें तकरा नब सं परिभाषित आ व्याख्यायित सेहो करैछ । नब-नब संस्कारक स्थापना सेहो करैछ ।.......’ सरसजीक उक्तिकें तकैत विभिन्न गजलक एहि शेर सभ पर विचार करू- जै पाइने पैनछूआ कैरतै ने लोक, छीः छीः छीः सेहो पाइन घटर-घटर घटघटा रहल,ई मैथिल छौ जौं-जौं अहंक खसैए पिपनी,धप-धप तेना खसै छी हम रसे-रसे उठबी तं सरिपहुं, होइए देव-उठान हमर थप्पा समधिन देल समधि केर अंगा मे उजरो मोंछ पिजाएल,फागुनक दिन आयल अइ समुद्रक किन्हेरमे बड चक्रवातक जोर रहलै बालु पर तैयो अपन हम नाम तकने जा रहल छी बिज्झो कराओल बैसले रहि गेल नोथारी गलियाक’ कियो खाइत आ उगलि रहल छलै हम मरब,बेटा लडत,बेटा मरत-पोता लडत कटब-काटब,जे बुझी-सदभावना-दुर्भावना हवा-पानिक बिना एमहर भेलैए दूभि सब पीयर ओम्हर बोडामे कसि-कसि,स्विस खातामे ढुकाबै छै व्याकरण पक्षकें जँ उपेक्षित क’ देल जाए तँ कएटा गजलमे किछु शेर महत्वपूर्ण अछि जे पाठकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि किछु शेर जे पढबामे नीक नहि लगैत अछि, भ’ सकैए जे हुनका स्वरमे सुनबामे नीक लागय. मैथिली गजलक भण्डारकें भरबामे सरसजीक योगदानकें महत्वपूर्ण मानैत हम गीतकार सरसजीक प्रशंसक, मैथिलीक सुधी पाठक आ नव-पुरान गजलकार सभसँ अनुरोध करबनि जे कम-सँ-कम तीन बेर अवश्य पढि जाथि सरसजीक ‘थोडे आगि थोडे पानि’। नीक लगतनि। २ अरविन्दजीक आजाद गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ मैथिलीयोमे गजल पर खूब काज भेल अछि आ एखनो भ’ रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर गजलक व्याकरण विस्तार सँ प्रस्तुत केलनि आ अपनो बहुत गजल लिखलनि. आशीष अनचिन्हार मैथिली गजल ले’ स्वतंत्र साइट बनाक’ व्याकरण कें स्थापित करबामे अपनो योगदान करैत अपनो बहुत गजल लिखलनि आ आओर बहुत गोटे सँ गजल लिखबौलनि आ से काज एखनो क’ रहल छथि हिनका दूनू गोटेक अतिरिक्त आर बहुत गोटे मैथिली गजलकें समृद्ध करबामे योगदान क’ रहल छथि।ई प्रसन्नताक बात थिक। हमरा जनैत गजलकारक मुख्य तीनटा वर्ग अछि। एक वर्ग ओ अछि जाहिमे रचनाकार पहिने गजलक व्याकरण पढलनि आ तकरा बाद ओही अनुसारे गजल लिख’ लगलाह. दोसर वर्गमे ओ गजलकार सभ छथि जे पहिने गजल लिख’ लगलाह , बादमे गजलक व्याकरण दिस घ्यान गेलनि आ ओहि अनुसारे लिखबाक प्रयास कर’ लगलाह. तेसर वर्गमे ओ लोकनि छथि जे गजल सूनि क’, पढि क’ लीख’ लगलाह आ लीखैत चल गेलाह, पाछां उनटि क’ नहि तकलनि.ओ मात्रा अथवा वर्ण गनि क’ षेर लिखबाक-कहबाक चक्करमे नहि पडि अपन बातकें केंन्द्रमे राखि धडाधड लिखैत चल गेलाह आ लिखैत जा रहल छथि। ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’ मात्र 24 दिनमे लीखल गेल 66टा गजलक संग्रह थीक जाहिमे गजलकार अरविन्द ठाकुरजीक कथन पर ध्यान देल जाए: ‘हम जे कहय चाहैत छी से महत्वपूर्ण छैक,ताहि लेल व्याकरण टूटय कि विधा विशेषक मापदंड,तकर हमरा परवाहि नहि अछि। ओकरा भल चाही त’हमर सहायक हुअए,बाधा ठाढ नहि करए ।’ गजलकारक एहि कथनकें ध्यानमे राखि जँ हिनक गजल पढब त नीक लागत। 66 टा गजलमे 10टा गजल एहेन अछि जाहिमे रदीफ अछि,काफिया नहि. 16 टा एहेन अछि जाहिमे काफिया अछि,रदीफ नहि. 40 टा गजलमे रदीफ आ काफिया दूनू अछि. किछुए गजल एहेन हएत जाहिमे बहरसँ सम्बन्धित दोष नहि हो.मुदा,बहुत रास शेर सभमे जे बात कहल गेल अछि से व्याकरणक त्रुटिकें झांपन देबामे बहुत समर्थ लगैत अछि.सभ गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक नामक प्रयोगक प्राचीन परंपराक निर्वाह नीक जकाँ कएल गेल अछि जे बहुत गजलकार नहि क’ पबैत छथि. गजलकारक समक्ष सामाजिक,राजनीतिक आ सांस्कृतिक चेतनाक अवमूल्यनक विषाल क्षेत्रक अनुभवक संपदा छनि जे जहां-तहां विभिन्न गजलक विभिन्न शेर सभमे प्रगट भेल छनि।एकर बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि निम्नलिखित किछु शेर: दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोस करत नै जखन गाममे मालक बथान रहत एहि समाजक रूढि भेल अछि घोडनक ओछाओन सन प्रेममे भीजल बतहबा ताहिपर ओंघरा रहल अछि गाममे डिबिया जरल अछि रातिसं लडबाक लेल मेट्रोपॉलिटन टाउनमे अछि राति दुपहरिया बनल पात बिछैबाक बेर लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठेबाक बेर रातिक जे एकबाल बढल दुर्लभ सगर इजोरिया भेल संसद केर फोटोमे किछुओ नहि हेर-फेर सांपनाथ, नागनाथ,इएह दुनू बेर-बेर कार खोजै छै एम्हर फूटपाथ पर सूतल षिकार यम अबै छथि एहि नगर विभिन्न वाहन पर सवार संसदमे घुसिआयल जे सात जनम लेल केलक जोगार गजलकारक भयंकर आत्मविष्वास एहि षेर सभमे देखू: धन्य ‘अरबिन’तों एलह गजलक जगतमे फेर केओ ‘खुसरो’की तोहर बाद हेताह नै पाठक के चिन्ता अरबिन नीक गजल के पढबे करतै एहने आर बहुत रास नीक-नीक शेर वला गजल पढबाक लेल देखू श्री अरविन्द ठाकुरक रचल आ ‘नवारंभ’ द्वारा 2011 मे प्रकाशित आ बहुत सुंदर कागतपर ‘प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स’, नई दिल्ली द्वारा बहुत सुंदर मुद्रित गजल संग्रह ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’। अन्तमे हम गजलकारक उक्तिक उल्लेख कर’ चाहब: ‘.......हाथक जेना सभ बान्ह टूटि गेल । एहन धारा-प्रवाह जे गजलक मिसरा,शेर,रदीफ,काफिया,बहर,गिरह सभकें सम्हारब कठिन....’ भरिसक, इएह कारण थीक जे गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा हिनक गजल सभकें आजाद गजल कहल गेल अछि। हम एहि विचारसँ सहमत छी। ३ एकांकी खंड- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ कोरांटी पहिल दृष्य ; साँझक समय, घूरतर चारि गोटे बैसल छथि पहिल: राधे ! कथीक हल्ला होइ छलै जोतखीजी ओत’ ? दोसर: वएह, मसोमतियावला बात छलै । तेसर: की ? कोनो नव बात भेलैए ? चारिम: ईह ! बाप रे, भरि गाममे हल्ला भ’ गेलै आ तोरा पता नै ?तों कि इंगलैण्ड गेल छल’ हए ? तेसर: हम त एखने बजारसं आबि रहल छी, हम की जाने गेलिऐ की भेलैए ? की भेलैए राधे ? दोसर: जोतखीजी आमिल पीने छलाह । भरि टोलक छौंडाकें गरियबै’ छलथिन जे हमरा आंगन किए अबै जाइए ? तेसर: से पुतोहुकें नै हंटि होइ छनि ? पुतोहु हुनका सक्कमे छथिन जे अनका दोख दै छथिन ? चारिम : पुतोहु त कहांदन कहै छथिन जे हम ताहि दिनका विधवा नै छी जे मोने मोन कुहरैत रहब, कोठलीमे बन्द भ’ क’ रहब आ जिनगी भरि फज्जति सहैत रहब । पहिल: आ जोतखीजीक आंगनसं की बजैत छथिन ? दोसर: ओ त बेटाक सोगें गलल जाइत छथि ।की बाजथि ? ककरापर बाजथि ? तेसर: ई घर गेले छथि । हमर बात सुनि लएह । ई मसोमात जोतखीजीकें नाके सूतें पानि पिया देतनि । हुनका चानिपर खापडि नै फोडनि त हमरा नामे कुकुर पोसि लीह’ा पहिल: ;दोसरकें -राधे, तों नै जोतखीजीकें बुझौलहुन ? दोसर : हम की कहितियनि ? हमरा कोन मतलब अछि ? पहिल : त तों खाली तमाशा देख’ गेल छलह ? दोसर : त की हम हुनकासं मारि करितहुं ? पहिल : हम पुछैत छियह, जोतखीजीक घरमे आगि लागि जेतनि त तों नै मिझब’ले’ जेबहक ? दोसर : ओ दोसर गप्प भेलै । अहां त सभ गप्पमे अहिना रेड दै छिऐ । पहिल : हमहीं रेड दै छिऐ ? दोसर: त अहीं किए ने बुझा द’ अबै छियनि ? अहांक त नंगौटिया छथि । पहिल: आ तों सभ खाली वरियातीए जाइले’ आ रसगुल्ले चोभैले’ अवतार नेने छह ? एकरे कुसंस्कार कहैत छैक । ; किछु काल धरि क्यो किछु नै बजैत अछि तेसर : ;तमाकुल चुनबैत आ थपडी मारैत कहथिन लाल कक्का जे जाहि घरमे मसोमात भ’ जाए ओकर सत्यानाश निश्चित । देखिहक ई घर आइने काल्हि ... चारिम: ठीके कहै छिऐ । भगवान एहेन लोककें जन्मे बेकार दै छथिन । पहिल : ;बात कटैत आ ई किए ने सोचै छह जे भगवान एहेन लोककें किए जन्म दै छथिन जे भरि जिनगी खाली लोकक कौचर्ये टा करैत रहैए ?.... ;किछु थमि क’ ई किए ने सोचैत छह जे ई बात जं ककरो घरमे ... अपने कपारपर बिसा जाह त की करक चाही ? ; सभ चुप्प कहै छियह जे बिना बुझने ककरो कलंक नै देबाक चाही ....सत्यानाश त भरि गामेक भ’ रहल अछि ; उत्तेजित होइत के अछि पागवला ? चारिम : ;उठैत, अंगैठी मोड करैत बैसै जाइ जाउ । हम पोखरि दिससं अबै छी । दोसर: ;उठैत ओह, हमरो महींस दूहक अछि । आगि कोढि होइए । ; दोसर आ चारिम फुसफुसाइत चलि जाइत अछि पहिल : ;एक कोन दिस तकैत के छिया ? गोपालजी ? आउ, आउ । ; युवक प्रवेश करैत अछि । घूर लग ठाढ अछि । बैसबाक उपक्रम करैत अछि युवक : कक्का, आइ जाड बढि गेल अछि । तेसर : अहां बैसू । हम बडी कालसं छी । ; तेसर उठैत अछि । युवक ओकरा स्थानपर बूढाक सोझां बैसि जाइत अछि युवक : कक्का, घूर धुंआइए, धधरा क’ दिऐ ? पहिल : क’ दियौ धधरा । अहां सभ जुआन छी । अहां सभ धधरा क’ सकैत छी । आब हम सभ देखब । नीक लागत । ; युवक फुकैत अछि । धधरा होइत अछि । दूनू एक दोसर दिस तकैत छथि दृश्य2 ;ज्योतिषीजी चैकीपर बैसल छथि । सोझांमे कुर्सीपर गोपाल गम्भीर मुद्रामे बैसल किछु सोचि रहल छथि ज्योतिषीजी: गोपाल ! ;गोपाल ओहिना गम्भीर बनल रहैत छथि ज्योतिषीजी: आइ भोला कहैत छलाह, चालीस तक दैले’ छथि ओ सभ । फगुआक प्रात अबै जेताह गप्प कर’। हमरा होइए जे ई कथा क’ लितहुं । ; गोपाल ओहिना गम्भीर बनल रहैत छथि ज्योतिषीजी: कन्या सेहो सुनै छी पवित्र छथिन । कहै छला पांचमा पास छथिन । हमहूं कहलियनि हमरा सबहक घरमे बेषी पढलि-लिखलि कनियां एक बेर केलहुं, नै धारलक । ; गोपाल ओहिना गम्भीर बनल रहैत छथि ज्योतिषीजी: अहां किछु बजैत नहि छी । की सोचि रहल छी ? ; गोपाल पिता दिस तकैत छथि ज्योतिषीजी: की सोचि रहल छी ? बाजू ने । गोपाल : बाबूजी, सोचै छी लोकक हृदय कोना पाथर भ’ जाइत छैक । ज्योतिषीजी: से की ? गोपाल : इएह जे भैयाकें गेना दू बरख भ’ गेलनि । हमरा सभकें पहिने बुझाए जे भैयाक बिना जीबे नै करब, हमहूं सभ सोगसं मरि जाएब । आइ हम सभ एना भ’ गेल छी जेना अइ घरमे किछु भेले नै होइ । ठीके, बाबू हम सभ पाथर नै भ’ गेल छी ? ज्योतिषीजी: की करबैक ? करेजकें पाथर बनब’ पडैत छैक । समय सभ घाओ कें मलहम जकां ठीक क’ दैत छैक । गोपाल : अहांक घाओ ठीक भ’ गेल हएत, हमरा सोझां भैयाक छोडल किछु प्रश्न नचैत रहैत अछि ।हम सदिखन सोचैत रहैत छी । लगैए जेना भैया सोझांमे ठाढ होथि आ कहैत होथि ‘देखै जइहक, हुनका कष्ट नै होइन ।’ ज्योतिषीजी: हुनकर चर्च नै करू ।ओ अलच्छ छथि । हुनकर चर्च होइते देहमे आगि लेसि दैत अछि । गोपाल : आगि लेसि दैत अछि अही दुआरे ने जे आइ भैया नै छथि, भौजी अनाथ छथि .... ज्योतिषीजी: उत्तेजित होइत गोपाल ! गोपाल : हं बाबूजी, आइ भैया रहितथि, मासे-मासे पाइ अबैत रहैत त भौजी पूज्या बनल रहितथि । आइ भौजी छुतहर भ’ गेलीह । ज्योतिषीजी: अहां आखिर की कह’ चाहैत छी ? हम की क’ सकैत छियनि ? गोपाल : अहां सोचि त सकैत छी । ज्योतिषीजी: की ? गोपाल : इएह जे भौजीयो एकटा युवती छथि, सुन्नरि छथि, पढलि-लिखलि छथि, आंखिक आगां अन्हार छनि पसरल । हुनको एकटा जीवन जीबाक अधिकार छनि । ज्योतिषीजी: त अहां की कह’ चाहैत छी ? गोपाल :हम अहांसं पूछ’ चाहैत छी । ज्योतिषीजी: की ? गोपाल : भैयाक असामयिक मृत्युक लेल भौजी दण्डक भागी छथि ? ज्योतिषीजी: ओ पूर्व जन्ममे कोनो पाप केने हेतीह, तकर दण्ड त भोगहि पडतनि । गोपाल : हम जनैत छलहुं, एखन अहांक उत्तर इएह हएत । आइ भौजीकें किछु भेल रहितनि त अहांक तर्क दोसर होइत । ज्योतिषीजी: अहांकें शास्त्रक ज्ञान नै अछि ,ताहि दिनक समाज बकलेल नै छलै जे एहेन-एहेन नियम बनौलकैक । गोपाल : बाबूजी, ताहि दिनक परिस्थिति भिन्न छलैक । स्त्री पुरुषक लेल उपयोगक लेल एकटा वस्तु मात्र होइत छलैक । आजुक परिस्थिति भिन्न छैक । ज्योतिषीजी: त एकर मतलब जे अहां भौजीकें नचाब’ चाहैत दियनि ? गोपाल : नै--नै । जीबाक अधिकार दियाब’ चाहैत छियनि । ज्योतिषीजी: कोना ? अहां की कर’ चाहैत छी ? गोपाल : जे अहां नै सुन’ चाहैत छी । ज्योतिषीजी: मतलब ? गोपाल : बाबूजी, हम भौजीसं विवाह कर’ चाहैत छी । ; ज्योतिषीजी सन्न रहि जाइत छथि । बेटा दिस एकटक तकैत रहि जाइत छथि । तेसर दृश्य ;दरबज्जाक दृश्य। ज्योतिषीजी चैकीपर चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि । गोपालक संगी संभू सेहो एकटा कुर्सीपर बैसल छथि । पहिनेसं किछु गप्प भ’रहल छै । संभू: कक्का । भौजीक जीवन, भरि गाम आ सौंसे समाजक सोझां प्रश्नचिन्ह बनि क’ ठाढ अछि ।ई एकटा स्त्री नहि, कतोक स्त्रीक वर्तमान आ भविश्यक समस्याक प्रश्नअछि । एकर समाधान आवश्यक छैक । ;ज्योतिषीजीकें औल लगैत छनि । कुरता आ गंजी क्रमशः बाहर करैत छथि । गंजीकें बीयनि जकां घुमाक’ हवा करैत छथि ज्योतिषीजी: ;नेपथ्य दिस तकैत हे यै सुनै छी, कने बीयनि नेने आउ त । संभू : काकी नै छथि आंगनमे । थम्हू, हमहीं नेने अबै छी । ;उठिक’ नेपथ्य दिस जाइत छथि आ बीयनि ल’क’ अबैत छथि आ ज्योतिषीजीकें हौंक’ लगैत छथि । ज्योतिषीजी: आ काकी कत’ गेल छथुन ? कहब’ ? संभू : पंडितजीक आंगनमे भरि टोलक स्त्रीगण जमा छथि । इएह गप्प होइ छै । ज्योतिषीजी: एकर मतलब जे हुनको विचार छनि ? संभू : कक्का, स्त्रीगणक समर्थनक बिना कोनो डेग निस्सन नहि भ’ सकै छै । स्त्रीगणक तरबामे गरल ई कोरांटी निकलि जाइ, से सभ चाहैए । ओना ककरो नहियो चाहने कोनो अन्तर नै हेतै । बात बहुत आगां बढि गेल छै । ज्योतिषीजी: ;तामसे थर-थर कपैत भाग’ हमरा लगसं । हमरा लग एलाहे भाषण देब’ ।समाजक ठीकेदार बन’ चललाहे’ ! हमरे घरसं शुरू करताह क्रान्ति ! संभू : हम त जाइते छी । बेकारे बैसि गेलहुँ । हम त खाली सूचना देब’ आएल छलहुं जे परसू विवाह हेतै । ; प्रस्थान ज्योतिषीजी: विवाह हेतै ? परसू ? नहि, नहि, हम ई बर्दास्त नहि क’ सकै छी । हम आब एक क्षण अइ घरमे नै रहि सकै छी । सभ मिलिक’ हमरा बताह बना देत ।सत्यानाश क’ देत । हे भगवान ! हे भगवान ! अइ बुढारीमे नै जानि की-की देख’ पडत ! ; कतहु जेबाले’ तैयार तैयार होम’ लगैत छथि । गंजी, कुरता पहिरैत छथि । ; मंचपर आस्ते-आस्ते पहिल बूढ गोपी बाबूक आगमन गोपी बाबू : जोतखी भाइ ! कतहु निकलै छी की ? हडबडाएल देखै छी ? ज्योतिषीजी: गोपी बाबू, हम आब अइ घरमे एक क्षण नै रहि सकै छी । गोपी बाबू : कत’ जाएब पडाक’ ? ज्योतिषीजी: बडकी टा दुनियां छै । काशी चल जाएब । मथुरा चल जाएब । वृन्दावन चल जाएब । कतहु चल जाएब । एहि कुपात्र सभ लग नै रहब । बाप रे ...अहांकें बूझल अछि जे हमरा घरमे की सभ...... गोपी बाबू : ; बात कटैत सभटा बूझल अछि । प्रसन्न छी । जोतखी भाइ ! एकरा हम, अहां कियो रोकि नै सकै छियै । रोकबाको नै चाही । ;ज्योतिषीजी बकर-बकर गोपी बाबू क मुंह तकैत छथि । ज्योतिषीजी: गोपी बाबू, अहूं ?.. गोपी बाबू : हं जोतखी भाइ ! अहांक बालक ज्ञानी छथि । सभसं विचार केलनिहें । हुनक विचारमे दम छनि । की करबै ? भागि जाएब ? भागि जाउ । के रोक’ अबैए ? हमरा-अहांकें भागियो गेलासं आब कोनो पहाड नै टूट’वला छै । जे बन्धन कमजोर छै, से टुटि जेतै । जोतखी भाइ ! समाजेक हितक लेल षास्त्र बनल छलै । समाजेक कल्याण लेल संविधान बनलै । षास्त्र बहुत घोखलहुं । आब संविधान पढू । ; दूनू गोटे एक-दोसर दिस तकैत छथि धीरे-धीरे पर्दा खसैत अछि रचना: सीवान /11.02.1984 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गीत, कविता, दोहा, चतुष्पदी आ गजल खंड- जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गीत 1.भरल सभामे भरल सभामे आबि जनकजी प्रण केने छथि भारी हे जे क्यो धनुश उठा कय तोरता तिनके देबनि कुमारी हे । रावण,वाणासुर-सन योद्धा षक्ति अपन अजमाय एला एक संग सय गोट फांर बान्हि क’ इष्ट सुमिरि कत बेर धेला किन्तु भेल नहि टस-सं-मस ओ भए गेल अजगुतभारी हे रंग सभाकेर उखडि गेल जनु रहती सिया कुमारी हे । भए अति खिन्न जनकजी बजला सबहक आइ गुमान ढहल हे राजागण जाउ घूरि घर कए प्रण छी पछताय रहल विधि विपरीत भेल कन्याकेर रहती इहो कुमारी हे वीर विहीना धरती भए गेल, भए गेल अजगुत भारी हे । वीर विहीना शब्द बेर-बेर रामानुज नहि सहि सकला चिचिया कए मंचहिसं कुदि कए भरल सभाके बीच एला बजला षत जोजन धरि फेकब तोडि धनुशकें गेंद जकां षब्द ‘अनिल’सं आयल जुडबए सभकें स्वाती बूंद जकां । 2 मैले कुरता मैल पैजामा मैले कुरता मैल पैजामा तैपर मैलका बंडी चढाक’ पैरमे एकटा टूटल चट्टी बनि गेल नेता दाढी बढाक’।.बौआ बनि गेल ....... चाहक कोनो दोकानपर बैसला भेटलनि कोनो मुल्ला पान कचरि सिगरेट धराक’ षुरू करौलनि हल्ला जोर-जोरसं नारा लगाबथि सीओ साहेबकें सुना-सुनाक’। बौआ बनि गेल... मौज उडौलनि एतबा दिन लए गांधीजीकेर नाम..... बेचि रहल छथि आइ बुझू जेपी बाबा केर नोम कथीले’ जेता घाम चुआबय कथीले’ खेता कमा-खटाक’। बौआ ....... लोक बेगरतामे अछि आन्हर भेटि जाइत छनि आसन कतहु ठाढ भए दैत रहै छथि उसिनल-उसिनल भाषण खाली हाथें लोक घुरैए माथ अपन सभ मुडा-मुडाक’। बौआ बनि गेल ........... 3. आब की हेतै जे भेलैक से भेलैक आब की हेतै अछि पुछैत चन्द्रमा आब की हेतै । छैक ई अभाग जे सोहाग चल गेलै मुदा कि अन्न-पानिसं सिनेह टुटि जेतै । मोनकें सम्हारि क’त’ राखि सकै छल देह कोन कोनमे नुकाक’ ध’ एतै । भरि गाम गहुमन सह-सह करैछ जानि ने कखन के कोनाक’ डसि लेतै । छै आंखिकेर आगां अन्हारे अन्हार एहि अन्हारमे आब संग के देतै । चन्द्रमा मंगैत अछि निसाफ स’भसं मूनि लेब आंखि से उचित त नै हेतै । 4. यार कहू की यार कहू की बियाह केने, हम सदिखन पछताय रहल छी हाय करू की माहुर खेने,कहुना जीवन बिताय रहल छी । आठ बजे धरि सुतल रहै छथि, वाइफ हमर बेहरावाली पिक्चर देखबा खातिर बन्हकी राखि लेलनि कानक बाली हाय करू की जारनि नेने,अपनहि आंच पजारि रहल छी । काल्हि कहलियनि झोल पडल अछि देखू त घरमे सगरो चट द’ ओ हमरा कहि देलनि, हम नै छी नोकर ककरो हाय करू की बाढनि नेने,अपनहि घ’र बहारि रहल छी । भानस नै करबाक दुआरे, दर्दक लाथें खाट धेलनि दूधले’ कानल चिल्हका तकरो,मारि पीटिक’ कात केलनि हाय करू की कोरा नेने,अपनहि दूध पिआय रहल छी । 5. चल हम बनि जाइ छी किसुन कन्हैया चल हम बनि जाइ छी किसुन-कन्हैया, तों बनि जो राधा आयल मस्त मास फागुनके, चल खेली ग’ फगुआ गे फगुआ । हम बनि जाइ छी ....... हम मानि लेब पोखरिक मोहार यमुना-तट थिक, यमुना-तट थिक हम मानि लेब आमक गाछी वृन्दावन छी, वृन्दावन छी हम तोरा संग रास रचायब, तों हमरा संग रचबिहें हम बसुरी तोरा सुनेबौ, तों हमरा नाच देखबिहें । चल हम बनि जाइ छी ....... गाए नहि अछि त की हेतै तों मोन छोट नै करिहें हम महिसे अपन चरायब तों बकरी अपन चरबिहें हम तोरा देखि हंसबौ, तों हमरा देखि हंसिहें हम पूआ तोरा खुएबौ, तों हमरा खीर खुअबिहें । चल हम बनि जाइ छी .. निहुरल आमक डारिमे रस्सी बान्हि बनायब हिरला ओइ हिरलापर तोरा बैसाक’ हम झुलाएब झूला हम तोरा आस लगेबौ, तों हमरा आस लगबिहें हम तोरा गीत सुनेबौ, तों हमरा गीत सुनबिहें । चल हम बनि जाइ छी .. ओहि रंगमे बोरब तोरा जे कहियो नै छूटय ओइ डोरीमे बान्हब तोरा जे कहियो नै टूटय हम तोरा अबीर लगेबौ, तों हमरा रंग लगबिहें हम तोरा पान खुएबौ, तों हमरा भांग पिअबिहें । चल हम बनि जाइ छी .. हम जिनगीकेर एक-एक पलकें पावनि जकां मनायब ने तोंही गाल फुलबिहें ने हमहीं गाल फुलायब हम तोहर बाट तकबौ, तों हम्मर बाट तकिहें हम तोहर मान रखबौ, तों हम्मर मान रखिहें । चल हम बनि जाइ छी 6.सीता जं जंगलेमे रहली सौंसे रामायण पढि गेलौं, लेकिन सभटा पढने की सीता जं जंगलेमे रहली , त हनुमानकें फनने की ? चानन, ठोप, पाग आ डोपटा,माला,जप-तप केने की माएक भाशा दबल रहल त चारि कोटिकें रहने की ? हे मैथिल ! सुनु हे मिथिलानी ! सभ संग मिलि चलै चलू फुसुर-फुसुर आ गुदुर-गुदुर किछु बात घूर तर दबने की ? माइक खातिर, माटिक खातिर प्राण जाय त गेने की हम त लंका-दहनक खातिर एसगर डेग उठौने छी 7. मन लगा रहल छी कल्पनाक गगनमे मधुवन सजा रहल छी दुनियामे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी । अछि आइ ने कोनो सपना अछि आइ ने कोनो धारा मोनो हृदयक प्रष्नक नहि दैत अछि उतारा उमडल जे बात मनमे, कहितो लजा रहल छी दुनियामे जीबाक अछि, तें मन लगा रहल छी । चोट अछि हृदयमे लागल नहि नोर टा बहैए मरियो क’हम जिबै छी हंसि ठोर टा कहैए रूसल जे भाव मनमे तकरे मना रहल छी दुनियामे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी । जिनगीसं सीख भेटल हंसिक’ समय बितायब सुखमे ने मुंह खसायब दर्दमे ने छटपटायब बाजल जे तार तनमे, तकरे बजा रहल छी दुनियांमे जीबाक अछि,तें मन लगा रहल छी । 8. विकास हो कि नै हो, परचार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । ओम्हर आर्यभट्ट आ एम्हर बैलगाडी भुखलोमे अहिना ढेकार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । एम्हर रौदी-दाही ओम्हर टेलीविजन नंगटोमे सोलहो श्रृंगार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । परजीवी लोककें चीन्हू आ पकडू सभकेर खुट्टाउपार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । सामंती कुचक्र आ समाजवादी ढोल एहेन व्यवस्थाकें नमस्कार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । 9. गौरी लीला विहारी तोहर भंगिया । देहोमे कनियों तेलो ने लेलक खाली रमौलक तोहर भंगिया । धोती आ कुरता पहिरबो ने केलक बघछाल लपटौलक तोहर भंगिया । फूलक माला पहिरबो ने केलक सर्पमाल लटकौलक तोहर भंगिया । सासु-ससुरकेर लाजो ने केलक नाचि डमरू बजौलक तोहर भंगिया । कहथि अनिल बड भाग इहो गौरी जे बनला दिगंबर तोहर रसिया । 10 चाह चाही आ पान चाही कलाकारकें कनी भांग चाही । घोरि नीक जकां चिन्नी मिलाक’ देखि लिय’ रसगुल्ला खुआक’ मोन पंछी बनय कतौ उडि-उडि चलय आसमान चाही आ चान चाही से देखैले’ मोन जुआन चाही । हे यौ हम,अहां सभ क्यो छी पाहुन जेना होइए लताम,आम,जामुन झडि जाएब एकदिन उडि जाएब एकदिन से ध्यान चाही आ ज्ञान चाही आ जिनगीक धनकेर गुमान चाही । 11.युगल-गीत ---ल’ग आउ ने हम नेहोरा करैछी ---दूर जाउ ने हम नेहोरा करैछी ---अहांक हृदयक छितिज पर उडलौं पकडि प्रेम केर डोरी ---हमरो होइए जे जीवन भरि संग अहांक ने छोडी ---खतम करु ई कथा-पिहानी,आउ हमर हे मोनक रानी एते लजाउ ने,हम नेहोरा करै छी । ----दूर जाउ ने, हम नेहोरा करै छी । ----कतेक दिनसं अहांके मनाबी किन्तु अहां नहि मानी ----अहां पुरुख छी,हमर हृदयकेर बात अहां नहि जानी ---ई त हमरे हृदय जनैए, कोना हमर दिन-राति बितैए एते सताउ ने, हम नेहोरा करै छी । ....दूर जाउ ने, हम नेहोरा करै छी । कविता खंड 1 सभ्यता आ संस्कृति हम कहलियनि हमरा नोकरी भेटि गेल बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि हम अपन विवाह सेहो ठीक क' लेलहुँ बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि विवाहमे दस लाख भेटत बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि रुपैया कनियाँक नाम पर बैकमे जमा रहत बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो नोकरी करैत छथि बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो संगे आबि गेल छथि बाबूजी सन्न रहि गेलाह ! 2 गाम आ दिल्ली एकेटा घर आ सत्रह टा लोक कहैत छलाह बुच्चुन भाइ गेल छलाह दिल्ली, सात-सात टा घर आ दुइए टा लोक कहैत छलाह एन झा गेल छलाह गाम | (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 3 हमर संसार बेड पर पडल छी अस्पताल अछि सुई अछि, सिरिंज अछि टेबलेट आ कैप्सूल अछि एंजाइम अछि, टॉनिक अछि कतेक असहाय छी हम कतेक दुखद अछि ई क्षण ! हमरा देखै ले’ आबि गेल अछि कतेक लोक बेटी-जमाय बेटा-पुतोहु नाति-नातिन पौत्र-पौत्री मित्र,पडोसी कतेक सामर्थ्यवान छी हम कतेक सुखद अछि ई क्षण ! (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 4 महाभारत आ हम भोरे जागि सभ दिन करैत छी संकल्प विदुर जकां जीबाक अपन जीवन आ दस बजैत-बजैत शुरू भ’ जाइत अछि महाभारत टूटी जाइत अछि हमर संकल्प बिसरि जाइत छी अपन कर्त्तव्य बन्न भ’ जाइत छी हम एकटा छहरदेबालीमे अपनहि कोनो पाखण्डक भ’ जाइत छी दास आ पांच बजैत-बजैत पबैत छी अपनाकें कुरुक्षेत्रक कातमे पडल शरशय्यापर बेचारा भीष्म पितामह सन | (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 5 डिबिया बंगला अछि गाडी अछि टी व्ही अछि फ्रिज अछि कूलर अछि फोन अछि लाकर अछि एफ़ ड़ी अछि कतेक धनीक छी हम सभ, मुदा जीबि नहि सकैत छी बिना घूसक क’ नहि सकैत छी बेटाक बियाह बिना दहेजक कतेक गरीब छी हम सभ ! (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 6 जंगल (१) फूल दाइकें जखन-तखन मोन पड़ि अबैत छनि अपन संगी सुजाता परुकें त भेल छलै बियाह गनल गेल छलै दू लाख नोकरी करैत छलै बर बियाहक बाद करैत छलै हल्ला मंगेत छलै दहेजक बहुत रास चीज कलर टी व्ही, वाशिंग मशीन मोटर साइकिल आ फ्रीज, एक मास पहिने पढ़लनि अखवारमे सासुरमे एक राति मारल गेलि सुजाता | तें जखन-जखन घरमे होइत छैक बियाहक चर्च फूल दाइ भ’ जाइत छथि उदास फेर मोन पड़ि अबैत छनि अपन संगी सुजाता | जंगल (२) स्कूलक हातामे दस बजे दिनमे जुमि गेलै छौंडा सभ पीचि देलकै मोटरसं बेचारी प्रीतिकें ओतेक लोकक बीचमे, खबरि ई जहिया निकललै अखबारमे तहियेसं फूल दाइ रहैत छथि चिंतित तें जखन-जखन बिदा होइत छथि कॉलेज फूल दाइ भ’ जाइत छथि उदास मोन पड़ि अबैत छनि प्रीति श्रीवास्तव | ( प्रकाशित –आरम्भ २०/ जून १९९९ ) 7 लत्ती माए करैत छलीह शनि-रवि पावनि बन्हैत छलीह डोरा सुनैत छलीह सपता-विपताक कथा चौठचन्द्रकें उठबैत छलीह हाथ करैत छलीह जितियाक उपास कतेक नियम-निष्ठासं करैत छलीह छठि करैत छलीह कबुला लुरिगरि पुतोहुले’ बेटाक नोकरीले’ पोताले’ कोठाले’ बेटीक बियाहले’| माएक अभिलाषा जखनहि भेलनि पूर भ’ गेलनि अपन सृष्टि सोझाँसं दूर-बहुत दूर सबहक छै अपन-अपन संसार अपन-अपन सपना सपनामे नहि छैक कतहु गाम-घर खेत-पथार | एसगरि आंगनमे माए एखनहु करैत छथि व्रत पोसने छथि कतेक सपना मुदा, कथी ले’? ककरा ले’ ? 9 भोज भोज आंगनमे भोज टोलमे भोज गाममे भोज शहरमे भोज छठिहारक भोज जन्मदिनक भोज मूड़नक भोज उद्योग, मरबठट्ठी- कुमरमक आ उपनयनक भोज विवाह-चतुर्थी-मधुश्रावणी-कोजगरा आ द्विरागमनक भोज नोकरीक भोज प्रोमोशनक भोज रिटायरमेंटक भोज श्राद्धक भोज बरखीक भोज बोफोर्सक भोज चाराक भोज कॉमनवेल्थ गेम्सक भोज टू-जी स्पेक्ट्रमक भोज चूड़ा-दही-चीनीक भोज पूड़ी-जिलेबीक भोज रसगुल्ला-पनितोवाक भोज भात-दालि-तरकारीक भोज माछ-मांस-मदिराक भोज सदाचारक भोज आचार-विचार-शिष्टाचारक भोज मौज-मस्तीक भोज हंसी-ख़ुशीक भोज परंपराक निर्वाह ले’ भोज अपन-अपन देवी-देवताकें खुश करबा ले’ भोज खून-पसेनाक कमाइ पर भोज घूसखोरी आ चोरीक पाइ पर भोज भोजसं आदमीक घटि गेल ओज भोजसं आदमीक बढि गेल रोग भोज खा गेल बच्चाक वर्तमान आ भविष्य जवानक चिंतन आ विवेक बूढक सपना आ सन्देश भोज जे बनबैत अछि लोककें असहाय भोज जे बनबैत अछि लोककें बौक, बहीर आ आन्हर निर्लज्ज, निष्ठुर आ नपुंसक भोज जे करैत अछि लोकक शीलहरण आ चीरहरण, हम घोषणा करैत छी पाप थिक भोज खाएब पाप थिक भोज खुआएब एहि पापसं मुक्तिक विचार करक चाही आ भोजकें दूरेसं नमस्कार करक चाही | (प्रकाशित- ‘अंतिका’/अक्टूबर ११-मार्च २०१२ ) 10 नरक आब एहि घरमे नहि करैछ क्यो ककरोसं प्रेमसं गप सभ गरजैत अछि एक दोसरपर आक्रमण करैत अछि एक दोसरकें अपन शत्रु बुझैत अछि एक दोसरपर संदेह करैत अछि एक दोसरसं प्रश्न पुछैत अछि क्यो ककरो दुलार नहि करैत अछि | आब ई घर घर नहि रहल आब एतय मनुक्ख नहि रहैत अछि एतय रहैत अछि क्रोध,ईर्ष्या,घृणा,कपट आ निंदा आब एहि घरमे रहैत अछि कुकुर-बानर सांप- बिच्छू बाघ-चीता आब ई घर घर नहि रहल ई घर आब भ’ गेल अछि जंगल आ जंगल मात्र | 11 विवाह विवाह थिक बड़का यज्ञ यज्ञमे अबैत अछि राक्षस राक्षसक अछि अनेक नाम राक्षसक अछि अनेक रूप राक्षस अबैत अछि अनेक रस्तासं राक्षस करैत अछि उपद्रव राक्षस भरैत अछि लोकक मोनमे लोभ आ अहंकार करबैत अछि क्षुद्रताक प्रतिस्पर्धा ठाढ़ करबैत अछि अनेक देबाल बढबैत अछि लोकक बीचक दूरी अहाँ राक्षसक सामना नै करय चाहैत छी त अहाँकें विवाह नै करबाक चाही | अहाँ राक्षसक सामना क’सकैत छी अपन बुद्धिसं, विवेकसं त्यागसं, तपस्यासं ज्ञानसं, विज्ञानसं योगसं, धियानसं समर्पणसं, सम्मानसं हृदयमे प्रेम आ ठोरपर मुस्कानसं, अहाँ राक्षसक सामना कर’ चाहैत छी त अहाँ विवाह क’ सकैत छी | विवाह थिक उत्सव एकटा विशिष्ट आयोजन बड़प्पनक प्रतियोगितामे भाग लेबाक अवसर माटि-पानि, देश-कोसक प्रति व्यक्त करबाक लेल कृतज्ञता जीवनकें देबाक लेल प्रेमक सनेश दुनियाकें और सुंदर बनयबामे देबाक लेल अपन योगदान, अहाँ एहि उत्सवमे उपस्थित होम’ चाहैत छी त अहाँकें बधाई ! अहाँ विवाह अवश्य करू | 12 गजेन्द्रजी उपस्थित भेलाह एकटा नव मुदा विशाल लेखक-पाठकवर्ग नेने सह्श्त्रो रचना नेने अनेक विधाक अनेक पोथी नेने नव उर्जासं सराबोर गारि देलनि झंडा हं, मैथिलीक झंडा विश्व-पटलपर | आब कनाडामे बैसल अहांक पुत्र सेहो घरमे बैसल-बैसल ल’ सकैत छथि अपन माटि-पानि आ देश-कोसक सुगंध | भाइ, नहि छैक आसान बनब गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक अर्थ भेल एकटा अभियान एकटा संकल्प एकटा आश्वासन जे आब मैथिली नै मरतीह कहियो नै जाधरि रहता सूर्य जाधरि रहती ई पृथ्वी ताधरि रहती मैथिली | दोहा १ सभ क्यो दुनियामे अपन, कतहु कियो नहि आन इएह सोचि सदिखन करी, हम सबहक सम्मान | २ स्नेह-सुधा, शुभकामना, सम्मति सबहक लेब मोन, बचन आ कर्मसं, दुःख ककरो नहि देब | ३ सभटा अपनहि कर्म केर, सोझाँ अछि परिणाम स्वर्ग,नरक, परमातमा , सभटा अछि एहि ठाम | ४ प्राप्त करू पुरुषार्थसं अनुचित-उचितक ज्ञान लेखक अपना भाग्यकेर और कियो नहि आन | ५ स्वर्ण-मृगक पाछाँ अहाँ, नहि दौडू सदिकाल हरण करत सुख-शान्तिकेर दशकंधर तत्काल | ६ हम के छी से जानि ली, राखी सदिखन ध्यान परमानंदक रूपमे, आबि जेता भगवान | ७ नहि ओझा, नहि ज्योतिषी अथवा कोनो यंत्र मनकें आनंदित करय क्षमा थीक ओ मन्त्र | ८ सबहक दुखमे संग हो,राखय सबहक लाज सबहक हित-चिन्तन करय,तकरे नाम समाज | ९ जहिना सगरो विश्वकें ज्योति देथि आदित्य चिंतन सबहक हो जतय, सएह थीक साहित्य | १० जे नहि पोसथि मोनमे कखनहु तुच्छ विचार अनिल एहि संसारमे वएह थिका बुधियार | ११ दुःख नै लेब, देब नै ककरो,जे राखथि ई ध्यान अनिल एहि संसारमे, हुनकें कहब महान | १२ अहाँ आत्मा अविनाशी छी सुख आ शांतिक खान एतबे जानब ज्ञान थिक, नहि जानब अज्ञान | १३ भ’ जायत आसान ओ, करब जकर अभ्यास जीवनमे सुख-शान्तिले’ सदिखन करू प्रयास | १४ सुख-दुःख जीवनमे अबैत अछि,दिन आ राति समान ज्ञानी-जन एहि सत्यकें , राखथि सदिखन ध्यान | १५ थिक कविता केर लक्ष्य की, उल्लासक संसार सबहक जीवनमे बहय, आनंदक रसधार | १६ जीवनमे सुख-शान्ति ले’ सबहक रकटल प्राण गीत,गजल,कविता सुनू, हएत सभक कल्याण | १७ तन मन धन सभ स्वस्थ हो, कविता राखथि ध्यान कविता सूनब थीक करब, गंगामे असनान | १८ कविता त गंगा थिकी, सबहक हरथि कलेश कविक मोनमे बास करथि ब्रह्मा,विष्णु,महेश | १९ कवितामे सामर्थ्य अछि, करय मनक उपचार श्रोता केर मनमे करय, आनंदक संचार | २० भूमि,भवन,लाकर तथा अन्न,जलक भण्डार कविता छथि त ठीक सभ,नै त सभ बेकार | २१ मिथ्या शान-गुमानसं, करै जाउ परहेज कन्यादानक यज्ञमे, राक्षस थीक दहेज़ | २२ हो व्यभिचारक अंत आ सदाचारके जीत सभ मनमे उल्लास आ स’भ ठोर पर गीत | २३ दुखमे,सुखमे,हानि-लाभमे, सभमे एक समान कतहु कियो भेटथि बुझू, इएह थिका भगवान | 24 कहना क’ धन जमा करु, कीनू बंगला, कार भोज खाउ आ अहूँ खुअबियौ,इएह ठीक संसार ? २५ बूझब की थिक परंपरा, पूजा, जप, तप, पर्व ‘खट्टर कक्काक तरंग’ पढू,जिबितहि पहुँचब स्वर्ग | २६ की थिक रामायण आ गीता,की थिक वेड पुराण खट्टर कक्कासं सुनू, रावण कते महान | २७ मनमे हुअए तनाव वा तनमे रहय बोखार अहाँ रंगशाला पढू, होयत सभ दुःख पार | २८ उपन्यास,कविता,कथा,अनुपम पत्राचार जीवकान्तजी छोड़ि गेला,मनमोहक संसार | २९ ओ सुंदर सपना देखू,जे कहि गेला कलाम इएह हमर श्रद्धा-सुमन, ओहि सपूतक नाम | ३० रक्त-चापसँ पीड़ित छी त, मानू हम्मर बात गीत रवीन्द्रक सुनू अहाँ,किछु दिन साँझ-परात | ३१ क’ सकैत छी अहूँ अपन, नव संसारक सृष्टि अहाँ ‘अशोक’क कथा पढू, पायब नूतन दृष्टि | ३२ छली, बली, कामी, कुटिल, सज्जन आ डरपोक अनिल एहि संसारमे, रंग विरंगक लोक | ३३ ककरहुसँ तुलना करब, अनुचित थिक ई बात सबहक अप्पन साँझ छै, सबहक अप्पन प्रात | ३४ अपन दुखक जननी अहीं, नहि अनकर किछु दोख भोगू जे अछि सामने, करइत बस संतोख | ३५ मनकें आनंदित करय, दिअए शान्ति, विश्राम गीत, गजल, कविता, कथा हमर ई चारू धाम | चतुष्पदी १ अपनहि कर्मक सुफल मानि क’ जे आबय सभ दुःख सहि ली, मोन, वचनसं, अपन क्रियासं कखनहु ककरो दुःख नहि दी | २ आवश्यक की अछि की नहि अछि तैपर सतत विचार करू, आनंदित सदिखन रहबा ले’ अपनाकें तैयार करू | ३ जहिना घ’र बहारी सभ दिन तहिना मन निर्मल राखू, रहय प्रदूषण मुक्त चित्त ई से धियान पल-पल राखू | ४ अहाँ कहैछी दुनिया बदलय पहिने अपनाकें बदलू, भांग पीबि खत्त्तामे खसलौं खत्त्तासं बाहर निकलू | ५ माँ दुर्गे संहार केलनि महिषासुरकेर निरभयाक अपमान एखन धरि कमल कहाँ, धू-धू क’ जरि गेल रावण गांधी मैदानक हमरा मोनक रावण एखनो जरल कहाँ ? गजल खंड 1 टूटल छी तँइ गजल कहै छी भूखल छी तँइ गजल कहै छी ऑफिस सबहक कथा कहू की लूटल छी तँइ गजल कहै छी घरमे बैसल मगन रही सभ गूगल छी तँइ गजल कहै छी खापड़ि लारनि कते कनौलक भूजल छी तँइ गजल कहै छी उक्खड़ि केलक मदति समाठक कूटल छी तँइ गजल कहै छी बाबूजीकें कहाँ बुझलियनि चूकल छी तँइ गजल कहै छी पुरबा पछबा कते जगौलक सूतल छी तँइ गजल कहै छी मात्रा क्रम 2222 +12 + 122 2 सभ जनकें मतिमान बुझै छी कण कणमे भगवान बुझै छी संकटमे ऐ ठाम पहुँचलह तोरे हम हनुमान बुझै छी छै जकरा सम्पत्ति विवेकक हम तकरे धनवान बुझै छी दोसरकें अपमान करबकें हम अपने अपमान बुझै छी देलक जे सुख शान्ति धरा पर हम तकरे गुणवान बुझै छी हमरा ले उपहार धरणि ई जीवनकें अभियान बुझै छी मात्रा क्रम 222 + 221 + 122 3 हम नै ककरो बाट तकै छी हम सूतै ले खाट तकै छी बकरी संगे बाघ नहेतै ओ निरमल हम घाट तकै छी हमरा मॉलक बाट धरेलौं हम गामक ओ हाट तकै छी होटल नवका बिहुँसि रहल अछि हम ओ टूटल टाट तकै छी जे जीवनकें नीक बनेलक हम ओ सुन्दर चाट तकै छी मात्रा क्रम 2222+ 21 + 122 4 खेल सभटा उसरि जाइए लोक सभटा बिसरि जाइए गाछ कहियो मजरि जाइए फेर कहियो झखड़ि जाइए पाइ राखू अहाँ बैंकमे पाइ हाथसँ ससरि जाइए थालमे नित चलय दौड़ि ओ माटिपर जे पिछड़ि जाइए बाट कतबो कतौ नीक हो बाट लोकक बिगड़ि जाइए मूनि राखब कथी कोनठाँ मूस सभटा कुतरि जाइए लोक कतबो हुए जोरगर अन्तमे सभ नचरि जाइए मात्रा क्रम 2122+ 12 +212 5 दूभि और धान छी अहाँ पान आ मखान छी अहाँ दौड़ि दौड़ि थाकि गेल छी दूर आसमान छी अहाँ बेर बेर गाबि देखलौं वेद आ कुरान छी अहाँ काँट भरल छैक बाटपर फूलके समान छी अहाँ मोन केर प्रश्न अछि कते एकटा निदान छी अहाँ मात्रा क्रम 212121 + 212 6 जीवनके आशा बदलल प्रेमक परिभाषा बदलल बदलल समदाउन सोहर अछि बारहमासा बदलल किछुए दिन दिल्ली रहलै छै आँखिक भाषा बदलल पैकेजे मूलो बूझू सबहक अभिलाषा बदलल अंकल अंटी भरि दुनिया मौसी आ मौसा बदलल अपनामे सोचै छी हम की बदलल की नै बदलल मात्रा क्रम 2222222 7 कविता गीत गजल राखू सदिखन मोन विमल राखू चारू धाम रहत सटले सदिखन नयन सजल राखू शान्तिक धार बहय भीतर बाहर चहल पहल राखू आँखिक खेल बुझू सभटा कानो अपन कुशल राखू सत्यक लेल लड़ू सभदिन जीवन अपन सुफल राखू मात्रा क्रम 22 +2112 + 22 8 रातिकें राति कहब जरूरी छै भोरकें भोर बनब जरूरी छै जीत की लेब अहाँ सुनामीमे मोनके संग लड़ब जरूरी छै माथपर बोझ किए अनेरे ई अपन बस ध्यान करब जरूरी छै छोड़ि कय गाम नगर घुमै छी हम गामके हाल बुझब जरूरी छै प्राणमे गीत रहय भरल सदिखन सत्यके संग चलब जरूरी छै मात्रा क्रम 212 + 2112 + 1222 9 सदिखन शुभ चिन्तनमे छी हम प्रेमक बन्धनमे छी जीवन आ यौवनमे छी कण कणमे जन जनमे छी अमरितके खगता हमरा तें सागर मन्थनमे छी नै छी मन्दिर मसजिदमे अन्नाके अनशनमे छी छी चूड़ी आ कंगनमे पुरहरमे अरिपनमे छी मात्रा क्रम 2222222 10 नित्य उठै छी भोरे भोरे घूमि अबै छी भोरे भोरे नीक लगै छथि हरियर धरती देखि अबै छी भोरे भोरे आम लतामक गाछी देखी गीत सुनै छी भोरे भोरे पूज्य हमर छथि माँ आ बाबू चरण छुबै छी भोरे भोरे सभक खुशी ले तन मन जीवन मनन करै छी भोरे भोरे मात्रा क्रम 21 + 122 + 2222 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। की भेटल आ की हेरा गेल - जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ आत्म गीत 1. एक दिन बीतल कय दिन बीतल मासहु बीतल,सालहु बीतल एक युग बीतल,कय युग बीतल कयटा वसन्त भादो बनि क’ अछि समय-सिन्धुमे समा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 2. सपना पाहुन बनि क’ आयल तन्नुक-सन निन्नक आंगनमे ओ फूल जे माला बनि ने सकल छिडिआएल स्मृति केर काननमे से टीस हृदयमे अछि एखनहु किछु तप्पत-सन किछु सेरा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 3. जीवनकेर आंगनमे वसंत आयल कहियो हंसिते-हंसिते किछु कोंढी छल से फूल बनल झडि गेल मुदा छुबिते-छुबिते गुन-धुन करइत मोनक भमरा कांटेक दोगमे घेरा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ 4. बाबा छलाह खिस्सा कहइत सुनि-सुनि क’छल अजगुत लगइत इ झूठ छलै कि सत्ये छल रहि गेल मोन गुन-धुन करइत ओइ बाल-कन्हैया केर हाथें छल नाग कोनाक’ नथा गेल हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ 5. मोने अछि एखनहुं ओ बिहाडि मोने अछि ओ फूही-पाथर मोने अछि ओ रौदी-दाही मोने अछि एखनहुं भनसा-घर चुल्हा लग मायक चुप्पी पर कए बेर आंखि छल नोरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 6. अंगनामे पमरिया नचइत छल सभ कबुला-पाती करइत छल ओ भोज-भात आ भार-दौड पाहुन वरियाती चलइत छल मूडन- उपनयन- बियाहेमे छल सभक चेतना खिया गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 7. मोटका-मोटका पोथी पढलौं पोथी केर सभ पन्ना रटलौं छल प्रष्न कतेको सोझांमे नहि तकर निदान कतहु देखलौं हम पौलहुं एकदिन अपनाकें सय-सय बिर्रोमे घेरा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 8. हमरा सोझांमे छल पर्वत हमरा सोझांमे छल इनार हम कत’ जाउ हम कोम्हर जाउ चहुंदिस पसरल टा छल अन्हार छल अनचिन्हार रस्ता सभटा छल पएर आगि पर धरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ 9. छल सुप्त हिमालय बरकि उठल अन्तरमे धधरा धधकि उठल सय-सय कोसी,सय-सय कमला कत घाव मोनमे टहकि उठल हम देखलहुं दूनू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 10 हम थाकि गेलहुं चलइत-चलइत हम कानि गेलहुं हंसइत-हंसइत अनवरत अभावक दुर्दिनसं हम हारि गेलहुं लडइत-लडइत नहि जानि कखन के सूतलमे कविता केर अमृत चटा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 11 च्लिते-चलिते भेटलाह रमण आ भेटि गेला श्री सोमदेव कोइलख विद्यापति पावनिमे भेटल आषीश मधुप,किरणक सस्वर दू रचना केर पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 12 कविता अयली जहिया घरमे भ’ गेल पैघ परिवार हमर यात्री,हरिमोहन,जीवकान्त षेखर,रवीन्द्र,मणिपद्म,अमर बाबू,कक्का आ भैया-सन छल नाम कतेको जोडा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 13 कविता संग हम जीबय लगलहुं बूलय लगलहुं,झूलय लगलहुं जीवनकें उत्सव मानि सतत नाचय लगलहुं,झूमय लगलहुं कवितासं प्रेमक बात हमर छल गाम-गाम गनगना गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 14 ‘पारो’कें पढिक’ कना गेल ‘खट्टर कक्कासं हंसा गेल ‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’ चिंतित मनकें गुदगुदा गेल ‘वस्तु’केर पिहानी‘नानी’ पढि नहि जानि कते की सोचा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 15 लिखबा आ पढबा केर नषा सूनब आ सुनयबा केर नषा षब्दक सोना,हीरा,मोती देखब आ देखयबा केर नषा सदिखन आनन्दित रहबा ले’ जीवनक अर्थ छल बुझा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 16. ळम गाम-गाम घूमय लगलहुं सभठां सभ किछु देखय लगलहुं ‘नवतुरिया’कें ताकय लगलहुं ‘दुखमोचन’कें चीन्हय लगलहुं ‘मरनी’, ‘बिलटू’ केर देखि बगय छल अप्पन सभ दुख पडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 17. कवितामे देखलहुं हिमगिरिकें कवितामे देखलहुं गंगाकें कवितामे देखलहुं अपनहि-सन नहि जानि कते भिखमंगाकें छल नाम,मूल आ गोत्र सभक कवितामे सभटा बुझा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 18. हम आंखि खोलि चलइत रहलहुं घुमइत रहलहुं,देखइत रहलहुं पढइत रहलहुं,सुनइत रहलहुं गुनइत रहलहुं,धुनइत रहलहुं अहिनामे क्रमषः हमरहुसं ‘तोरा अंगनामे’ लिखा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 19. षषिकान्त-सुधाकान्तक जोडी हमरा षब्दहुकें पांखि देलनि उडि गेल षब्द सभ गाम-गाम पटना,दिल्ली आ कोलकाता गुरुजन,प्रियजनक प्रषंसासं छल हमर आतमा जुडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 20. सत नारायणक कथा सुनलहुं सपता-विपताक व्यथा सुनलहुं चैरचनमे खीर आ पूरी तं छठिमे ठकुआ-भुसबा खेलहुं दुर्गापूजामे बलिप्रदान छल प्रष्न मोनमे उठा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 21 चहुंदिस धधरा धधकैत छलै सभहक छाती धडकैत छलै सभ चिडै खेतमे छल कनइत सभहक खोंता उजडैत छलै भ’ जाउ तृप्त हे अग्निदेव कनितो-कनितो छल बजा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 22. बच्चीकेर अएबासं पहिनहि जरि गेल घ’र जे फूसक छल छल हमर चाकरी केर चिन्ता तैपर कर्जा भरि टोलक छल परिवर्तन केर सुख छलनि बुझू भेटबासं पहिनहि छिना गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 23. छल अति संघर्शक दिन घरमे ओ खटै छली, चुप रहै छली कहबा केर जे किछु रहै छलनि नोरेसं सभटा कहै छली खगताक बाढिमे छलनि अपन गहनो-गुडिया सभ दहा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 24. घूमि गाम-गाम आ षहर-षहर किछु मांगि-चांगि क’ जे अनलहुं फाटल अंगा, फाटल जेबी की कत’खसल से नहि बुझलहुं आगां तकलहुं, पाछां तकलहुं छल जांत पएरमे बन्हा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल 25. अपनहि हाथें हम पत्र लीखि अपनहिकें कयलहुं सम्बोधन अपनहि अर्जुन,अपनहि केषव अपनहि बनि गेलहुं दुर्योधन अपनहि अन्तरमे महाभारत अपनहि लोभें छल ठना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 26. संघर्श सत्य,थिक क्रान्ति सत्य सत्ये होइ छथि षिव आ सुन्दर जे भेटि गेल से अछि सुन्दर जे नहि भेटल से अति सुन्दर सुन्दरतम तं थिक ओ घृत जे अछि हवन-अग्निमे ढरा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 27. हमरहि खातिर उनहत्तरिमे छल बैंकक राष्ट्रियकरण भेल भेल तपस्या फलीभूत आ लागल जे नव जनम भेल सभ रातिक होइए भोर अपन अस्तित्व पाठ ई पढा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 28. एक दिस चाकरीक सुख-दुख छल दोसर दिस साहित्यक धारा तेसर दिस छूटल गाम-घर छल उडल-उडल मन बेचारा सपनामे छल हरियर धरती आ फूल कते नव फुला गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 29 ओ मूल गोत्र आ गाम हमर बाबाक धएल ओ नाम हमर ओइ माइक शीतल छाहरि केर आठो पल आठो याम हमर कर्तव्यक पावन धारामे क्रमशः सभ किछु छल बिला गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 30. पढलहुं बच्चन आ दिनकरकें नजरूल,विमल आ शंकरकें आशापूर्णा,तसलीमा आ गुरुदेव रवीन्द्रक आखरकें नागार्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 31. मिथिलाकें देखल मिथिलामे देखल मिथिला सीवानोमे पावनि-तिहार आ भोज-भात भेटल समता परिधानोमे छल एतहु दषानन केर लंका रहिते-रहिते से बुझा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 32. हिमगिरि समान किछु पुरुश छला किछु भेटला गंगाजल समान दुविधामे जखन-जखन पडलहुं हुनकहि चरित्रकें कएल ध्यान हुनकहि सिनेह केर छाहरिमे मोनक सभ दुविधा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 33. आतंकक छाया छल पसरल चहुंदिस अन्हार टा छल लतरल उत्पात मचैने छल दानव पीडा केर पर्वत छल अकडल सरस्वती कुहरैत छली हाथक वीणा छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 34. अपहरण जतय उद्योग बनल चंदाक वसूली रोग बनल मारि-पीट, दंगा-फसाद छल लोकक खातिर भोग बनल छल जहां जत’ जे चिडै कतहु आकाष छोडि क’ पडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 35. एक बिपटा, कते मदारी छल सबहक सभसं भैयारी छल गाडी छल उपरमे चितंग नीचां कुहरैत सबारी छल हम थहाथही देखइत रहलहुं छल कण्ठ कतेको मोका गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 36. हे मित्र ! बंधु ! परिवार हमर ! हे आंगन आ चिनुआर हमर जीबा केर,बजबा केर देखू क्यो छीनि लेलक अधिकार हमर सोझांमे माइक छाती पर पाथर छल क्यो खसा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 37. मा मिथिले क्षमा करू हमरा संकल्प अपन हम बिसरि गेलहुं हमरहु मुट्ठीमे छल अकाष नहि जानि कत’ हम पिछडि गेलहुं हमरहि चुप्पी केर कारण क्यो अछि आंखि अहांकें देखा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 38. की होयत ई जीवन ल’ क’ की होयत तन-मन-धन ल’ क’ की हएत जोगाक’ आंखि अपन आ की अरण्य-क्रन्दन क’क’ कहइत अछि हमरा पंचबटी मैथिलीक काया सुखा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 39 बिजली कखनहु क’ अबै छली किछु हंसै छली,किछु कनै छली सभ बाट अहिल्या सन षापित नित बाट रामकेर तकै छली निषिचरक उपद्रवसं सभठां छल यज्ञस्थल सभ घिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 40 हम थहाथही करइत रहलहुं अन्हड-बिहाडि भोगइत रहलहुं कूकुर,हाथी आ गहुमनसं डरइत रहलहुं,भगइत रहलहुं बतहा हाथी केर तरबातर चुट्टी अनगिनती पिचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 41. हम देखलहुं सभहक सोझांमे बकरीमे खुट्टा बान्हल अछि सौंसे आकाषक बदलामे कागत एक टुकडी तानल अछि निर्वासित रहबाकेर दुख छल मैथिलीक भाग्यमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 42. देखलहुं हम नवगछुलीकें देखलहुं हम पुरना गाछीकें देखलहुं हम गाछक धोधरिकें देखलहुं हम गाछक बांझीकें छल हहरि गेल सभ गाछ,मुदा लत्ती-फत्ती सभ मोटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 43. मनकें जे आलोकित केलक से छल इजोत‘मिथिला मिहिर’क ‘मिथिला दर्षन’आ ‘माटि पानि’ ‘भारती’ आ विद्यापति पर्वक ‘जय जय भैरवि’ केर षंखनाद चेतना-भूमिमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 44. यात्री, हरिमोहन जगा गेला नित न’व पराती सुना गेला आंगन-आंगन आ घर-घरमे मैथिलीक पूजा सिखा गेला ‘जय मैथिली’ कहइत-कहइत छल आंखि हुनक डबडबा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 45 हम गाम,षहर घुमइत रहलहुं भारतक भूमि चुमइत रहलहुं सभ जलकें गंगाजल समान देखइत रहलहुं छुबइत रहलहुं छत्तीसगढक ओइ धरती पर मिथिलाकेर धूआ देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 46 बस नाव-नदी संयोग कहू पूर्वक किछु कर्मक भोग कहू पाप-पुण्यकेर योग कहू अथवा नुकाइले’ दोग कहू सतपुडाक ओ हरियर जंगल हमरहु अदिश्टमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 47 रामक वन-गमन जरूरी छल राजाकेर ओ मजबूरी छल सीताक हरणकेर पाछां तं रावणकेर दसटा मूडी छल केकइक माथ पर इ कलंक मन्थराक हाथें लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 48. छल धोन्हि बहुत लागल ओत्तहु छल लोक बहुत बांटल ओत्तहु देखलहुं स’भठां जंगलमे छल लोक बहुत जागल ओत्तहु नवकलष बहुत देखलहुं लेकिन छल गाछ कतेको सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 49. माएसं भेटल जे षीतलता ओ निर्मलता आ भावुकता पाथेय बनल से हमराले’ ओ लोचकता आ व्यापकता कएटा पिच्छर छल बाट जतय खसबासं हमरा बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 50. संततिक बिछोहक दारूण दुख भरिसक जननी नहि सहि सकली चिंतासं जर्जर कायामे नहि सालो भरि ओ रहि सकली नहि जानि कोन नव दुनियामे प्राणक पंछी उडि पडा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 51 बाबूकें रहै छलनि हमरा बुधियार बनयबाकेर चिंता ओ देखथि लौकिक क्रिया-कर्म आ काज पडल सोझां सभटा पोथीसं हम्मर प्रेम देखि ओ छला बहुत किछु डेरा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 52 से पिता पुत्रसं हारि गेला आ जीत गेल पोथी-पतरा की गाम-घर, की क्रिया-कर्म ओ बिसरि गेला चिंता सभटा, की जन्मभूमि, की सर-कुटुंब सभ दुनियादारी बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 53 हमरहि सोझांमे एक राति बाबूजी अंतिम सांस लेलनि तजि जीर्ण-षीर्ण एहि कायाकें नव कायाले’ प्रस्थान केलनि चलितो-चलितो एहि दुनियासं ओ छला बहुत किछु सिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 54 घुरलहुं कए मासक बाद गाम उजडल उपटल बिलटल देखलहुं जै घरकें बाबू बना गेला ओइ घरकें खसल-पडल देखलहुं सभटा लताम, सभटा नेबो सभटा गुलाब छल सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 55 छल पथरायल संबंध षेश किछु वैचारिक अनुबंध षेश मनकें आनन्दित करबाले’ एखनहुंधरि छल किछु गंध षेश माइक हाथक पारल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 56 हम देखलहुं उल्कापात कते हम सहलहुं झंझाबात कते परिजन-प्रियजनसं बिछुडनकेर संताप कते, आघात कते सुख-दुख केर नष्वरताक पाठ अस्तित्व गुरू बनि पढा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 57 हमरहु जीवनकेर उत्सवमे छल श्रीरामक अवतरण भेल हमरहु अन्तरकेर सीताकेर जंगलमे छल अपहरण भेल आ हमरहु हाथें रावणकेर दसटा मूडी छल कटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 58 सोचै छी पिता, पितामह सब हमरा संग एखनहु छथि जिबइत हम देखि रहल छी अपनामे सभकें चलइत, हंसइत-गबइत आइ,काल्हि,परसू सभटा अपनहि अन्तरमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 59 जीवनकें पढलहुं बेर-बेर जीवनकें गुनलहुं बेर-बेर जीवनकें देखलहुं बेर-बेर जीवनकें भोगलहुं बेर-बेर स्वर्ग,नर्क जिबितहिं सभटा अपनहि जीवनमे देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 60 नहि बूझी जीवनकेर मतलब ओहिना जीने चल जाइत छी नहि जानि पियास हटत कहिया ओहिना पीने चल जाइत छी सभ विश षिवषंकर के समान जे जखन जत’ अछि देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 61 हम जाहि सुखक कामना करी से दुखमे होइछ परिवर्तित मुष्किल अछि झंझाबातहुमे राखब अपनाकें आनन्दित अपनहि अन्तरमे बैसल क्यो गीताक पाठ अछि पढा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 62 अपनहि हाथें हम छी लिखइत सौभाग्य अपन,दुर्भाग्य अपन अपनहि हस्ताक्षर देखै छी पाछां तकइत छी जखन-जखन हं,किछु हस्ताक्षर एहनो अछि जे अछि लेभरल वा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 63 जे सुख भेटल, जे षांति भेटल अघ्ययन,मनन आ चिन्तनमे दुख-सुखकेर परिभाशा जानल की सफल,सुफल की जीवनमे एक दृश्टि नव,एक सृश्टि नव अपनहु अन्तरमे समा गेल हम सोचि रहन छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 64 सपना छल जे छी देखि चुकल सपना अछि जे छी देखि रहल सपने संगी अछि बनल हमर सपनेसं हम छी सीखि रहल सपनेमे अहिना पडल-पडल हंसिते-हंसिते अछि कना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 65 जीवनक अर्थ तं हर्श भेल दोसर मतलब संघर्श भेल हम ताकि रहल छी अपनामे की बांचल आ की व्यर्थ गेल अछि वएह सुफल दुनियामे जे अपनाकें कहुना बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 66 हम के छी,कत’सं आयल छी अछि अएबाकेर प्रयोजन की सुख-दुखक चक्रमे घूमि रहल अनवरत हमर ई जीवन की हमरा अन्तरमे बैसल क्यो अछि प्रष्न कैकटा उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 67 ई देह अतिथि, ई प्राण अतिथि सम्मान अतिथि,अपमान अतिथि अछि लोभ,मोह आ मायाकेर अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि हम अहिना रहब स्थिर तहियो जहिया देखब सब बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 68 ई हाथ हमर, ई पएर हमर ई आंखि हमर,ई कान हमर ई देह हमर, ई मोन हमर ई प्राण हमर, ई ध्यान हमर हम छी स्वामी एहि कायाकेर अछि ई रहस्य क्यो बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 69 झंकार उठल, टंकार उठल ओंकार उठल, जयकार उठल जनकक आंगनसं दिल्ली धरि ‘जै मैथिली’ हुंकार उठल प्राप्त कएल अधिकार अपन जे मंगनीमे छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 70 नहि द्रोण थिका आदर्ष हमर नहि ष्लोक रटल हम गीताकेर हमरा अन्तस्थलमे एखनहुं अछि नाम एकटा सीताकेर जे स्वयं समाक’ धरतीमे दुनियाभरिकें छथि जगा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 71 जतबाधरि जीवनमे षुभ अछि से अछि प्रसाद सतसंगतिकेर आहार-विहारक नियमितता षुभ चिन्तनकेर आ सदमतिकेर गुरूजन आ प्रियजन आषीशक अनमोल रत्न छथि लुटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 72 नहि दौडी हम काषी-प्रयाग नहि केलहुं हम कबुला-पाती कयलनि जीवनभरि व्रत-उपव्रत दादी आ माए सबहक साती हुनकहि आषीशक गंगामे भरि पोख मोन अछि नहा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 73 क्षमा करू हे पिता हमर बरखी ओहिना नहि करब ह’म नहि केष कटायब बेर-बेर नहि भोज-भातमे पडब ह’म हम मानब ओकरहि क्रिया-कर्म जे दिनचर्यामे समा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 74 क्षमा करू हे मित्र हमर ! नहि आंखि मूनिक’चलब ह’म जे सहज,सरल आ सुन्दर हो ओही रस्तापर बढब ह’म अपनहि इतिहासक पन्ना किछु आंगुर हमरा पर उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । -------------------------------------- ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पत्राचार खंड—जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ प्राप्त पत्र क्र. नाम पत्र दिनांक १ जीवकान्त १६.१०.८३ २ जीवकान्त १५.०२.८४ ३ शशिकान्त, सुधाकान्त ०७.०३.८४ ४ जीवकान्त १६.०९.८४ ५ जीवकान्त ३०.०९.८४ ६ जीवकान्त ०७.१०.८४ ७ जीवकान्त १४.०१.८५ ८ जीवकान्त ०५.०२.८५ ९ जीवकान्त ३०.०३.८५ १० प्रो.गंगा नन्द झा ३०.०४.८७ ११ जीवकान्त २३.०३.९७ १२ आशा नन्द ठाकुर २३.११.९७ १३ राजमोहन झा २४.०८.९८ १४ जीवकान्त २४.११.९८ १५ बैद्यनाथ सिंह ०५.१२.९८ १६ जीवकान्त १३.०१.९९ १७ जीवकान्त १३.०४.९९ १८ तारानंद झा ‘तरुण’ २०.०५.९९ १९ तारानंद ‘वियोगी’ २२.०५.९९ २० नारायणजी १४.०६.९९ २१ जीवकान्त २५.०८.९९ २२ तारानंद ‘वियोगी’ ०३.०३.२००० २३ अमरजी ३०.०६.२००० २४ अजित आजाद ०६.०७.२००० २५ जीवकान्त २६.०२.२००१ २६ जीवकान्त २९.०४.२००१ २७ जीवकान्त १३.०१.२००४ २८ जीवकान्त २८.०६.२००५ ( १) डेओढ, यात्रा,१६-१०-१९८३ प्रिय अनिलजी, अहाँक पठाओल पांडुलिपि हम मनोयोगसं दू-तीन खेप पढि गेलहुं | नीक लागल | छपबाक योग्य अछि | पटनामे एकरा नीक कागतपर छपाउ | पोथीक आवरण नीक दिऐक | (१)अहाँ एकरा आधुनिक खंड काव्य कहैत छिऐक, से नहि कहि एकरा दीर्घ कविता कहू | (२) औद्योगिक क्रान्तिसं शहर बनल छैक, एकर आधार थिकैक पाइ आ मौद्रिक लाभ |तें ई हृदय-हीन,मानवता-विहीन, ममत्व-शून्य अछि | गामक आधार छल स्नेह | गाम गरीब भेल गेल अछि, शहर धनिक भेल गेल अछि |एक दिन गाम मरि जाएत, |एक-आध शताब्दीक पछाति शहरटा बांचत, स्वाभाविक अछि जे मनुक्ख आ मनुक्खक बीच औपचारिक सम्बन्ध, निष्करुण आ पथरायल सम्बन्ध बांचि जाएत | अहाँ अपन एहि ‘एकालाप’मे औद्योगीकरणक एहि निष्ठुरीकरणक प्रक्रियाकें हृदयक स्तरपर रेखांकित क’ एक पैघ काज कयलहुँ अछि जे मैथिलीमे एखन धरि नहि भेल छल | जीवकान्त १६.१०.१९८३ (२) प्रिय अनिलजी, अपनेक पत्र भेटल |प्रकाशनक लेल नीक सुविधा शहरेटामे छैक | हम देहातमे छी,हमरा असुविधा होयब स्वाभाविक अछि | ताहि अर्थमे अहूँ कुडोरिमे छी | प्रकाशन,पुरस्कार आ आर आनो वस्तुमे थोड़ेक गोलैसी,थोड़ेक प्रयासक गुंजाइश छैक | हमरा सभ ताहूमे बड पछुआयल छी | गामपर रहलासं समय बड़ा ‘अन्प्लैंड वे’मे बीति जाइत छैक |कोनो काज करबा लेल एक गोट रूटीन चाही,से लाभ हमरा नहि अछि | ई लाभ थोड़ेक खजौलीमे छल | ओना खजौली प्रवासक उत्तरार्द्धमे ई लाभ कम होब’लागल छल | अहाँ लेखन लेल कोनो रूटीन बनाउ | थोड़ेक जमि क’ लिखू |साहित्यमे नाम करबा लेल बड मेहनति कर’ पडैत छैक |मैथिलीमे थोड़ेक गद्यो लिखू | ओना लेखककें जे नीक लगैक,सैह लिखबाक चाही | जाहिमे मोन रमि जायत,से रचना नीक अबस्स होयत | नीक लिखबाक लेल नीक लेखक सभक रचनाकें पढ़ब आ ओकरा विचारब बड आवश्यक होइत छैक | कोनो पोथी छपयबाक इच्छा करू | कोनो अगुताइमे किछु नहि छपाउ | मुदा, पोथी छापब अपन लक्ष्य बनाउ | -----जीवकान्त /१५.०२.८४ (३) लहेरियासराय, ०७.०३.८४ प्रिय अनिलजी, जय मैथिली | कुशल छी एवं कुशलापेक्षी | अहाँक पत्र भेटल |पढ़ि बड़ प्रसन्नता भेल जे अहाँ लहेरियासराय आबि रहल छी |आशा अछि जे शीघ्रे भगवतीक कृपासँ अहाँ एहि ठाम आयब |कारण आब एतेक पियास लागल अछि जे जुनि पूछू |पूरा संकल्प लोक परिवार प्रतीक्षामे अछि | आशा अछि अहाँ सपरिवार प्रसन्न होयब | नव-नव गीत एवं लयक संग हम सभ आशा करैत छी जे अहाँ आबि रहल छी अहाँक शशिकान्त,सुधाकान्त,उमाकान्त,कमलाकान्त (४) डेओढ,१६.०९.१९८४ प्रिय ठाकुरजी, ओहि दिन आकाशवाणी,दरभंगामे मैथिलीमे बालगीत,देशभक्ति गीत, प्रेम गीत रचबा लेल आ संगीत बद्ध करबा लेल संगीत विभागक कार्यक्रम प्रभारी जवाहर झाजी सँ गप भेल | अहाँक चर्चा हम कयल | अपने थोड़ेक गीत तीन अंतराक मैथिली गीत विभाग,आकाशवाणी,दरभंगाक पता पर पठा क’ देखू जे ओकरा सभमे एलिमेंट छैक वा की बात छैक ? असलमे हम चाहैत छी जे मैथिलीमे नव-नव गीतक रचना होअए आ ओकरा संगीत-बद्ध कयल जाय | आशा जे अपने नीकें होयब | ---------जीवकान्त (५) डेओढ बेलनौती, ३०.०९.१९८४ भाइ अनिलजी, अहाँक २५.०९. वला चिट्ठी एत’ २९.०९ क’ प्राप्त भेल | अरुण बाबूक १४.०९ वला पोस्टकार्ड २२.०९ क’ प्राप्त भेल, दोसर २०.०९ वला पत्रक बाट देखिये रहल छी | अहाँक पत्रसं आश्वस्त भेल छी आ आब हुनक अयबाक प्रतीक्षा करैत छी | थोड़ेक सौन्दर्य-गीत लिखू | विद्यापति राधाक वयः संधिक गीत लिखलनि आ अमर भेलाह | ई विषय बासि नहि भेल छैक | गीतक सनातन विषय थिक सौन्दर्य आ प्रेम | बाप, भाए, बहिन, पत्नी आ बेटीकें संबोधित थोड़ेक गीत सेहो लिखू | बालगीतक सेहो बड अभाव अछि |अहाँ देश भक्ति गीतमे भारतक संग मिथिलाक चर्चा करैत छी, पुरनो गीतमे, से सजगता बनौने रही | फिराक गोरखपुरीक नज्म आ रुबाइ पढ़ि जाउ | पढैत काल गौर करू जे कोन विषय आ ओहि विषयक कोन प्रकारक उपस्थापन फ़िराककें भीड़सं फराक करैत छैक आ ओकरा कालजयी बनबैत छैक | तहिना विद्यापतिक गीतकें सृजेताक सजगतासं पढू | रवीन्द्र नाथ ठाकुर (मैथिलीवला) आ रवीन्द्र नाथ ठाकुर (बंगलावला)क गीत सभकें सजगताक संग अवलोकन आ मनन करू | थोड़ेक बालगीत,प्रेमगीत,देशगीत पटना आकाशवाणीकें मैथिली कार्यक्रम अधिकारीकें सेहो पठाउ | नीकें छी | चिट्ठीक बाट ताकब | -----जीवकान्त (६). भोला उच्च विद्यालय,ड्योढ़ ०७.१०.१९८४ प्रिय अनिलजी, अहाँक छओटा गीत भेटल |एकरा अपन पत्रक संग डाकसं आकाशवाणी,दरभंगाक पता पर पठा देल अछि | एहिसं पूर्व एक गोट आर पत्र पठा देने छी से भेटल होयत |हमरा विचारकें एक गोट साधारण सलाह बूझब, बहुत गंभीरतासं नहि लेब |गंभीरतासं लेब त अहाँक स्वाभाविक विकासमे ओ बाधक भ’ सकैत अछि | ई गीत सभ बुझायल जे अभ्यस्त लेखनीसं लिखायल अछि, आत्माक अनिवार्य वाध्यतासं स्रवित नहि भेल अछि | चिट्ठी लिखब | चि.अरुण बाबूकें डाक्टरसं देखा लेबा लेल आ भोजन,भोज्यक प्रति सजग होयबा लेल हमरा आग्रहक रक्षा लेल चरिअबियनि | ------जीवकान्त (७). ड्योढ़ १४ जनवरी १९८५ प्रिय भाइ, अहाँक सात जनवरीक लिखल अंतर्देशीय पत्र आइ भेटल अछि | हमर स्वास्थ्यक प्रति जिज्ञासा क’ अहाँ हमरा अनुगृहित बना नेने छी | सदाशयताक हेतु धन्यवाद | परहेज क’ रहल छी |मरबाक डरसं पैघ अछि पेटमे उठैत पीड़ा आ तकरा कारण विकलता | आब ठीक छी |दबाइ खायब छोड़ने छी | दू दिनसं एक सांझ भातो खा रहल छी |लगभग ठीके छी, मुदा अपन अनुभवसं बुझैत छी जे परहेज करैत रहक चाही, कखनो एकर दर्द उठि सकैत अछि | पछिला खेप जखन ई रोग भेल छल, राति-राति भरि बैसिक’ लिखैत रही |एहि खेप लिखब छुटले सं अछि |अख़बार सभ लेल कहियो काल एक-दू पेज खरड़ि लैत छी | सैह | नोकरीक अलाबे अहाँ आर की सभ क’ पबैत छी ? ------जीवकान्त (८). ड्योढ़ ०५.०२.८५ प्रिय अनिलजी, आँक पत्र बेशी आत्मीयतासं भरल अछि |संयोग जे दूनू पत्र भेटल | हेरायल कोनो नहि | जखन ई पत्र भेटल, संयोग जे हम फेर दुखित पड़ि गेल रही |३० जनवरी कें सपत्नीक नवकांत बाबूक डेरा पर लहेरियासराय गेलहु |पहुनाइमे खान-पानमे अनट-बिनट भैये जाइत छैक |से थोड़ेक भेलैक | एक फरवरी कें ड्योढ़ घुरलापर दर्द (पेट दर्द),ज्वर,दस्त सभटा प्रकोप भेल | आइ धरि काज पर नहि जा भेल अछि | ओना आशा करैत छी जे काल्हिसं नोकरी ध’ लेब | अरुण बाबू गाममे बाजल छलाह जे फरवरीमे बम्बइ जायब | से हुनक पत्र बरमहल नहिये भेटल अछि |तें ओहो सूचना दी | हम केहेन सुधंग छी,तकर एक उदाहरण | आँखि देखायब लहेरियासराय यात्राक एक मुख्य उद्देश्य छल |एकटा चश्मा-विक्रेता ढ़ीप-ढ़ाप द’क’रोकि लेलक | ओकरेसं आखि जँचा, चश्मा बनबा क’ आबि गेल छी | स्वस्थ नीक जकां होइत छी, त फेरसं अहाँक पत्रक उत्तर देब | -------जीवकान्त (९). ड्योढ़, रामनवमी, ३०.०३.८५ प्रिय अनिलजी, पत्र भेटल छल | अरुण बाबू पछिला सप्ताह एत’ आयल छलाह | गीत सभ दरभंगा केंद्र घुरा देलक, ई बूझि बड तकलीफ भेल | दरभंगा केन्द्रसं हमरा सभ रारि ठननहि छी | तकरो किछु नहि भ’ रहल अछि | कलानंद भट्टहुक गीत हम आकाशवाणी, दरभंगा केंद्रकें पठौने छिऐक | कलानंदजी बदलि क’ किशनगंज गेल छथि |ओत’सं खोज करैत छथि जे गीत सभक की भेल ? आकाशवाणीक कार्यक्रम सभक बहिष्कार कयने छी, तें ओत’ नहि जाइत छी | हिनका सभकें पत्र लिखैत छियनि, त तकर उत्तरो देबाक आवश्यकता ओ लोकनि नहि बुझैत छथि | पत्रिका सभमे एहि सभक चर्चा करबाक अतिरिक्त आर कोन उपाय अछि | आर एम्हर अहाँ की सभ लिखलहु अछि ? पढैत छी की सभ ? --------जीवकान्त (१०). सीवान ३०-०४-८७ प्रिय ठाकुरजी, नमस्कार |पत्र भेटल | पत्र नहियो भेटला पर अहाँ स्मृतिसं बिच्छिन्न नहि होइत छी | हमरा लोकनिक इच्छा रहैत अछि जे अहाँ डीविजनल ऑफिस एबाक प्रत्येक अवसरक उपयोग अवश्य करी. उपर्युक्त पंक्ति स्पष्ट क’ देने हएत जे अहाँ किएक महत्व रखैत छी.गंगानंद झा बिना ककरो आग्रहें, निस्संकोच मैथिलीमे लिखबाक प्रयास क’ रहल छथि, इ संभव भ’ गेल, जकर प्रमाण ई पत्र स्वयं अछि. अपन एहि लगनशील व्यक्तित्वक रक्षा अहाँ निश्चय करैत रहब जाहिसं परिवेश प्रभावित हुअए सकारात्मक तरीकासं. ई बात प्रायः अहाँकें आकर्षित नहि करत जे एहि पत्रक पहिनो हम एक कथाक प्रसंगमे मैथिलीमे पत्राचार कयलहुँ और हास्यास्पद स्थिति हमर नहि भेल.हमरा मोन पडैत अछि जे पृथ्वीराज कपूर अपना सम्बन्धमे कहैत छलाह जे हम हिंदी नहि पढ़ल रही, किन्तु तुलसी जयंतीक अवसर पर हमरा अध्यक्ष बना देल गेल.ओहि अवसर पर हमरा लागल जेना तुलसीदासक तस्वीर हमरा कहैत अछि जे अहाँ हिंदी सीखू. तस्वीरसं, किताबसं सिखनाइ अपेक्षाकृत सोझ छैक, किएक त अहम पर चोट नहि लगैत छैक.ई नहि बुझि पडैत छैक जे कियो हमरा पर अपनाकें स्थापित करबाक प्रयास क’ रहल अछि. जीवित मनुष्य सेहो अपनासं उमरमे छोट एहेन लोकसं सिखलापर अहमकें चोट लागैत छैक. तें लोक लोकसं नहि सीखि पबैत अछि.अहाँ एकरो संभव क’ देलिऐ. हमर अहमकें बिना आहत केने, अहाँ हमरा एक उपलब्धिसं युक्त करबामे सफल भेलहु. आब हमरा मैथिलीमे लिखै काल इ संकोच बाधा नहि दैत अछि जे भाषा-व्याकरणक भूलसं भरल अभिव्यक्ति हयत. हमर साधुवाद और धन्यवाद दुनू ग्रहण करब. पुस्तक प्रकाशनक संभावना समाचार स्वाभाविके हमरा प्रसन्न केलक. प्रगतिक सूचनाक प्रतीक्षा रहत. अहाँ जीवन संग्रामक आह्वानकें स्वीकार और अंगीकार करैत रहब परन्तु अपन व्यक्तिगत विशिष्टतासं साहित्यक माध्यमसं जीवन देवताकें आहुति दैत रही, एकरो प्रति सजग रही, से हमर अनुरोध और आकांक्षा. संसारमे क्षुद्रता अहुना बहुत छैक और क्षुद्रताक वृद्धिक लेल अनुकूल परिवेशो बराबर भेटैत रहैत छैक, तें अपनामे यदि किछु उच्चता आ विशिष्टता पबैत छी त ओकरा जिएबाक भरिसक कोशिश अवश्य करी. हमरा लोकनि ठीक-ठाक छी. कन्यादानक प्रयास एखनधरि सफलता मंडित नहि भेल अछि, हम जुटल छी. अप्पू पटनेमे छथि. एहि सालक पटना प्रगतिशील लेखक संघक सम्मेलन कयने छलाह. पूर्ण रिपोर्ट एखन हमरो उपलब्ध नहि भेल अछि. बब्बू-बेबी स्वस्थानमे छथि. बसंती, मैथिली और बौआ नीकें छथि ने ? हुनका सभकें तथा हुनका सभक मायकें हमरा दूनूक आशीर्वाद कह्बनि. आब अहाँ खुश छी ने ? हमर ई मैथिलीक पत्र अहाँक अंदर की प्रतिक्रिया उत्पन्न कयलक, जान’ चाहब. पत्र देब. शुभेच्छु गंगानन्द झा (११). डेओढ २३.०३.९७ भाइ अनिलजी, ‘हंस’मे अहाँक लघुकथा ‘संसार’ देखल अछि | ख़ुशी भेल | अहाँ स्वस्थ-सानंद होयब | जीवकान्त (१२) संघ भवन,मधुबनी २३.११.९७ प्रिय जगदीश भाई, अकस्मात् आई बैद्यनाथ बाबू नवनीतक नवम्बर अंक ( दीपावली विशेषांक )क पृष्ठ सं.६० पर तोहर लिखल गीतक अवलोकन करौलनि |ओहि सारगर्भित गीतकें पढ़ि अति प्रसन्नता भेल, संगहि वर्ष ९५ के फगुआक ओ राति मोन पड़ि गेल जखन हम भगवान बाबूक आंगनमे तोरा एकटा गीत सुनेबाक बड़ जिद्द केलियह आ तूँ अगिला साल फगुआमे गीत सुनेबाक बचन देलह |अगिला सालक कोन कथा जे १९९८ के फगुआमे ई आश पूरत की नहि से नहि जानि किन्तु तोहर लिखल गीत पढ़ि ओहि बचनकें पूर्ण मानि लेलहुँ आ एहि हेतु तोरा बहुत-बहुत धन्यवाद | गाम-घरक समाचार ठीक आ पूर्ववत छैक | मिथिलेशक विवाह १४ जुलाई क’ भ’ गेलैक आ हेमक विवाह ५ दिसम्बर क’ हेतैक | हमर गुणा दिल्ली गेल छल | ओहि ठाम ललनजी,रतनजी एवं सच्ची सभ सपरिवार कुशलपूर्वक अछि | अपन समाचार आ चाचाक समाचार लिखबाक कष्ट करिह’| चाचाकें प्रणाम आ कनियाँ तथा तीनू भाइ-बहिनकें हमर आशीष कहि दिहक | ------आशा बाबू /२३.११.९७ (१३) . द्वारा-डा.प्रेमनाथ सावित्री कुटीर,घग्घा घाट रोड, महेन्द्रू,पटना, २४.०८.९८ प्रिय अनिलजी आशा जे सकुशल सानंद होयब |’आरम्भ’क प्रति प्रायः नियमित भेटैत होयत |एखन धरि पांचटा अंक भेटल होयत आ छठम अर्थात आरम्भ-१८ शीघ्र भेटत |ई लगा क’ अहाँक छौ टा अंक पूरि जाइत अछि | तकरा बाद आगाक अंक लेल ७५ टाका एम.ओ.सं पठा देब त आगांक पांच अंक फेर एहिना पठबैत रहब, मुदा से आरम्भ-१८ भेटलाक बाद | बहुत दिन पूर्व अहाँ दूटा कविता पठौने रही से जखन काज भेलापर ताक’ लगलहुँ त नहि भेटल |असलमे डेरा शिफ्ट करबामे बहुत रास वस्तु एम्हर-ओम्हर भ’ गेल | कृपया ओहि कविता सभक दोसर प्रति शीघ्रे पठा दी | नवका पता उपर लीखल अछि | आरंभ-१८ प्रेसमे अछि |कविता शीघ्र चाही | अहाँक ---राजमोहन झा (१४) . २४.११.९८ प्रिय अनिलजी, अहाँक १८.११.९८ क पत्र आयल | नीक लागल | कही त स्मरण रखबा लेल आभारी भेल छी | आरम्भ-१८ मे अहाँक कविता देखल | आर्यावर्तक रविवारी साहित्य पृष्ठ पर नागार्जुनकें श्रद्धांजलिमे अहाँक रचना देखने छलहु | अहाँक लेखकीय सक्रियतासं प्रसन्नता भेल | हम सभ नीकें छी |चि. वरुण बाबू झंझारपुरमे आ चि.अरुण बाबू पूसा रोड (समस्तीपुर)मे पदस्थापित छथि | हम अगिला वर्षक आरम्भमे अवकाश ग्रहण करैत छी | यात्रामे बहरायब आब दुखदायी लगैत अछि | लिखबाक काज घटाओल अछि | सप्रेम, जीवकान्त (१५) . शम्भुआड़ / ५.१२.९८ परम स्नेही जगदीशजी, सप्रेम प्रणाम | कुशलोपरान्त कुशलक कामना | अहाँक गीत नवनीतक दीपावली विशेषांकमे आओर तदुपरांत नवम्बर ९८ मे देखि अतीव प्रसन्नता भेल |गीतक भाव जे हम समझि-बुझि सकलहुँ ताहिसं गदगद भ’ गेलहुँ | मंदिर-मस्जिद अओर धर्मशास्त्रक शाश्वत सत्यक साक्षात्कार किंबा स्वीकार करबाक (धार्मिक ढोंगक निरंतर बढ़ि रहल प्रचार-प्रसार मध्य )सराहनीय एवं अनुकरणीय अछि | गाम-घर ‘नव घर उठे,पुरान घर खसे’ उक्तिकें चरितार्थ करैत नंगराइत-घिसटैत चलि रहल अछि | आशा अछि अहाँ सपरिवार सानंद होयब | अपनेक -------- बैद्यनाथ (१६) १३.०१.९९ प्रिय मित्र, शुभकामना कार्ड भेटल | अहाँक प्रसन्नतासँ अहाँक आत्मीयताक अनुभव केलहुँ | अहाँ गौरव उपलब्ध करी | सादर, जीवकान्त (१७ ) . भाइ, अहाँक पत्र आयल अछि | अहाँक पोथी लेल भूमिका हम केदार काननकें पठा देलियनि अछि | अहाँकें नीक नहि लागत, ओहिमे निम्न मध्यम वर्गीय लेखक सभक लेखनक निंदा भेल अछि | ओकर फोटो मँगा कए देखू | पसिन्न नहि होअए त ओकरा पोथीक संग नहि छापू | जीवकान्त ड़ेयोढ, १३.०४.९९ (१८) . पत्रांक २५४४/२३५ मलाढ़ २०.०५. ९९ आदरणीय भाई,सादर नमस्कार | आगा अपनेक ०५.०५.९९ क’ पठाओल १२०० टाकाक ड्राफ्ट आ पत्र आ १०.०५.९९ क’ लिखल पोस्टकार्ड सेहो प्राप्त भेल अछि | सर्वप्रथम हम अपनेक आभारी छी जे अपने हमरा आग्रह पर भारती-मंडनक सहयोगार्थ विशिष्ट संरक्षक सदस्य बनबाक स्वीकृतिक संग तत्काल सहयोग राशिक ड्राफ्ट पठाओल अछि | भारती-मंडनक पाचम अंक अपनेकें प्राप्त भेल आ अंक बड्ड नीक लागल से जानि श्रम सार्थक बुझना गेल | अपने अपन बिस्तृत प्रतिक्रिया आ अपन फोटो आ बायोडाटा यथाशीघ्र पठाबी से आग्रह | अपनेक सद्यः प्रकाशित दीर्घ कविताक पोथी ‘धारक ओइ पार’ देखबाक आ पढबाक सौभाग्य प्राप्त भेल | वस्तुतः अपनेक ई पोथी एकटा उत्कृष्ट प्रयोग अछि जे पूर्णतः वैचारिक परिपक्वताक परिचय प्रस्तुत करैत अछि | अपने अपन प्रतिभाकें पुनर्जागृत करबाक जे प्रक्रिया प्रारम्भ कयल अछि ई मैथिली साहित्यक सृजनमे उपादेय भूमिकाक निर्वाह करत से हमर विश्वास अछि | भा.म. छठम अंकक प्रकाशनक काजक शुभारम्भ भ’ चुकल अछि | आगामी अंकक कतबा प्रति अपनेकें पठाओल जाय, से सूचना पठाबी, से आग्रह | पत्र दी | अपनेक तारानंद झा ‘तरुण’ (१९) . डा.तारानंद वियोगी रामा पाण्डेय निवास निकट मस्जिद भवानीपुर जिरात मोतिहारी-८४५४०१ २२.०५.९९ प्रिय भाइ, नमस्कार | ‘देशज’ नामसं मैथिली कविताक एक पत्रिका बहार करए जा रहल छी| लोकोन्मुखी स्वभावक पत्रिका हेतै | एकर प्रवेशांकमे अहाँक किछु जनपक्षीय गीत छापबाक अभिलाषा अछि |प्रवेशांक शीघ्रे तैयार होयबा लेल अछि | अनुरोध अछि जे यथाशीघ्र अपन पांच टा गीत हमर उपर्युक्त पता पर पठा कए अनुगृहीत करी | आशा करैत छी जे अहाँ स्वस्थ आ प्रसन्न हेबै | सप्रेम तारानंद ‘वियोगी’ (२०) . १४.०६.९९ मान्यवर, ‘धारक ओइ पार’ पढल | पोथी आकृष्ट कयलक अछि | अहांक कविता मैथिली कवितामे दीर्घ-कविताक परम्पराक स्थापना करैत अछि | अहाँक कविता गामक कविता थिक | ओहि गामक जकर लोप भ’ रहल अछि | आ जे उजडि शहर दिस जा रहल अछि | शहर हृदयहीन अछि | आ मनुक्खकें मशीन बना अनेक तरहें ओकर शोषण क’ रहल अछि |आ से कुरूप शहर गाममे सेहो उगि रहल अछि | आ एकटा सम्पूर्ण आ जीवंत गाम शहरमे विलीन भ’ रहल अछि | एहि पीड़ाकें अहाँक कविता पर्याप्त धैर्यक संग कहैत अछि | बधाइ | --------नारायणजी (२१) . डेओढ २५.०८.९९ भाइ, दहेज़ हत्या पर मैथिलीमे किताब अयबाक चाही | तत्काल अहाँक कविता ‘जंगल’ ( आरम्भ-२० ) एहि प्रसंगमे उल्लेखनीय अछि | एकर प्रसंगक चर्चा हम असमिया मित्रकें पत्रमे कयल अछि | ओ एकर चर्चा हारवार्डमे आयोजित एक सभामे करताह | ------जीवकान्त (२२) . मोतिहारी, ०३.०३.२००० प्रिय भाइ, नमस्कार | अहाँक एक पत्र भेटल अछि,जाहिमे अहाँ ‘तुमि चिर सारथि’ पढलाक बाद अपन प्रतिक्रिया पठौलहुँ अछि | अनुगृहीत छी | हम अपन लघुकथावला पोथी आ किछु आनो पोथी शीघ्रे अहाँकें पठायब | ठीके अहाँ कहै छी जे लिखबाक आ पढबाक सौभाग्य फिफ्टी-फिफ्टी हेबाक चाही | सप्रेम, तारानन्द वियोगी (२३) . आदित्य सदन,मिश्र टोला,दरभंगा दिनांक ३०.०६.२००० स्वस्ति श्री अनिलजी, ‘आरम्भ’ जून २००० अंक २४ मे नान्हि-नान्हिटा चारिटा अहांक कविता पढ़लहु | एतनीटामे एतेक बेशी बात कहि देबाक विशेषता हमरा आनंदान्दोलित क’ देलक आ संवर्द्धना पत्र लिखबाक हेतु उत्प्रेरित सेहो | हमर हार्दिक शुभकामना स्वीकार करी | कल्या.kkकांक्षी श्री अमर (२४) . पटना/०६.०७.२००० आदरणीय विद्याश्रेष्ठ प्रणाम | बहुत दिनक उपरान्त अहांक चारि गोट प्रभावी कविता आरम्भ-२४मे पढबाक अवसर भेटल | नीक लागल अहाँक सभ कविता | ‘गाम आ दिल्ली’ अपन छोट कलेवरमे रहितहु बडकीटा गप कहैत अछि | तहिना ‘डिबिया’ सेहो हमरा प्रभावित करैत अछि | कविता सभक हेतु बधाइ आ धन्यवाद | आब समय आबि गेल छैक जे अपने अपन एक गोट संग्रह प्रकाशित करियैक-विशेष क’ गीतक | अहाँक गीत हमरा अत्यधिक पसिन्न पडैत अछि | तें, अहू दिशामे अहाँ अवश्य विचार करियौक | शेष शुभ | अहींक अजित कुमार आजाद (२५) डेओढ,२६.०२.२००१ प्रिय अनिलजी, अहाँक पत्र आयल अछि | एहि बीच किसुन संकल्प लोक,सुपौलसँ एक संग अनेक पोथी अयबा लेल अछि | भारती मंडनक एक अंक प्रेसमे अछि |एहि अंकमे हमर किछु कविता आबि रहल अछि | एखन मात्र कविते टा लिखैत छी |ओकर हिंदी अनुवाद किछु हिंदी पत्रिकामे प्रकाशनार्थ पठा देल करैत छी | स्वास्थ्य जर्जर भेल जाइत अछि | भोपालक एक हिंदी गोष्ठीमे निमंत्रित भेल छी | ----------जीवकान्त (२६) डेओढ,२९ .०४ .२००१ प्रिय अनिलजी, पहल सम्मान भोपालमे आयोजित छल,१४-१५ अप्रैल कें| एहिमे सम्मिलित भेलहुँ | पहिल बेर मध्य प्रदेशक बंजर भूमि आ जनहीन भूभाग सभकें देखल | अहाँ ओहि क्षेत्रमे छी, से बहुत अर्थमे नीक छी | -------जीवकान्त (२७) जनवरी १३,२००४ जगदीशजी, नव वर्षक पहिल दिनक अहाँक लिखल पत्र काल्हि प्राप्त भेल अछि | नव वर्षमे अहाँ किछु करबा लेल छी, से उत्साह पत्रमे झलकैत अछि | मैथिलीमे पद्य लिखब शुरू कयल २००३ ई.क वसन्तमे | ओहिमे सँ ५७ गोट टुकड़ा संकलित कय प्रकाशनार्थ देल अछि |एहि साल फरवरीक अंत धरि पोथी आबि जायत | मैथिलीसं हिंदी अनुवादमे आयल अछि ‘निशांत की चिड़िया’|प्रकाशक थीक-साहित्य अकादेमी, दिल्ली | पछिला पुस्तक मेला,पटनामे जनता मैथिली पोथी किनबा लेल तकैत छल, से बात शरदूजी(समय साल,पटना)लिखलनि अछि |मैथिली पोथी-पत्रिका संग्रह करू |रायपुरमे मैथिल संस्था अछि |ताहिमे सम्मिलित होउ | -------जीवकान्त (२८) डेओढ,२८.०६ .२००५ अहाँक पत्र भेटल | हमर पठाओल सामग्री अहाँक टेबुल धरि पहुँचि गेल, से जानि हर्ख भेल | राम लोचन ठाकुरकें भाषा भारती सम्मान (बंगलोर भारतीय भाषा परिषद) भेटलनि अछि | ‘समय साल’ ( मनोरमा प्रकाशन,राजीवनगर (दक्षिण)रोड न.६,पटना-२४)क दस-बीस प्रति मँगा कए रायपुरमे वितरण करू |पोथी,पत्रिका बेचने थोड़ेक संगठन मजबूत होइत छैक | मैथिली नाटकक मंचन लेल क्लब बनाउ | ---------जीवकान्त ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ - किछु बाल कविता १ हमरहि खातिर सुरुज उगइ छथि हमरहि खातिर चान हमरहि खातिर कोटि तरेगन हमरहि ले आसमान। हमरहि खातिर साँझ पड़इए राति सँ होइए प्रात हमरहि खातिर रौद अबैए हमरहि लेल बसात हमरहि खातिर गाछ फड़इए जामुन, आम, लताम। पानि तपैए, भाफ बनैए भाफ उड़इए, मेघ बनैए सेहो हमरे ले ऊपरसँ धरती पर रिमझिम बरसैए हमरहि खातिर धरती मैया देथि गहूम आ धान। हमरहि खातिर फूल फुलाइछ उज्जर- पीयर- लाल कतहु असीमित सागर अछि तँ पर्वत कतहु विशाल सभटा हमरहि लेल बनाकऽ नुका गेला भगवान। २ बुच्ची बढ़ती, लिखती-पढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। तिलक-दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि मिथिलामे, तै लए बुच्ची खडग उठौती हमरा चिन्ता कथी के। ज्ञान आर विज्ञानक संपति अर्जित करती जीवनमे, नव सुरुज आ चान बनौती हमरा चिन्ता कथी के। लोकक मोल बुझै छै एखनहुँ लोक बहुत छै दुनियामे, संगी अप्पन अपनहि चुनती हमरा चिन्ता कथी के। अपनहि श्रम सँ बाट बनौती एहि बबूर केर जंगलमे, दुख सँ लड़ती आगाँ बढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। ३ मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर, तोँ तँ हमरा पढ़ा-लिखा दे कर नहि कनियोँ कथूक डर। तिलक-दहेजक बल पर किन्नहु हम कतहु नहि करब बियाह, अज्ञानी, ढोंगी, पाखंडीक संग नहि जीवन करब तबाह अपन पएर पर ठाढ़ होएब हम होएब अपनहि पर निर्भर, मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर। संपति अर्जित करब सतत हम ज्ञान आर विज्ञान केर नाम बढ़ाएब हम दुनियामे सगरो हिन्दुस्तान केर हमर स्वप्नमे ‘किरण’, ‘कल्पना’ सतत कानमे हुनकहि स्वर, मम्मी, ताँे चिंता जुनि कर। हम्मर गहना होएत मम्मी हमर आत्म-विश्वास टा विजय अंध-विश्वासक ऊपर सत्यक दिव्य प्रकाश टा जीयब स्वामिभमान केर संगहि एतबहि अछि अभिलाष हमर, मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 131 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १९१ म अंक ०१ दिसम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९६ अंक १९१)) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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