VIDEHA — Issue 192 / अंक १९२

Publication: VIDEHA · Issue: 192
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ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १९२ म अंक १५ दिसम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९६ अंक १९२) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१. डॉ0 विद्यानाथ झा- डेंगू बीमारीक भयावह परिदृश्य २.ठूठ गाछ (उपन्‍यास)- जगदीश प्रसाद मण्डल २.२.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा लघु कथा- निनिया देवीक आराधना/ खसैत गाछ २. मैथिलीक किछु समकालीन उपन्‍यासक विविध स्‍वरूप- रतन झा २.३.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा-भागमंती २.ललन कुमार कामत- किछु विहनि आ लघु कथा २.४.१. राजदेव मण्‍डल- जल भँवर  (उपन्‍यास ) २.उमेश मण्‍डल- एकटा विहैन कथा-  मुड़नक मुर ३. आशीष अनचिन्हार- ब्रम्हपिशाच (व्यंग्य) ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ई की भेल !?!?!/ छठि गीत - ‍१/ छठि गीत - ‍२/ लेखकक जिनगीक छन्द/ लेखकक जिनगीक छन्द ३.३.१.असरफ राइन- परदेशी मनक भावना २.ओमप्रकाश झा- गजल ३.४.रवि भूषण पाठक ३.५. पल्लवी मण्डल- अपन नजैरिक दुनियाँ ४.बालानां कृते- १.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”,  तथा श्रीमति सुप्रिया / बेबी कुमारी भूकम्प (बाल विज्ञान कथा) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय ई-पत्र 'विशेषांक’क (१९१ म अंक) आयोजनक लेल समस्त विदेह परिवारकें धन्यवाद। हमर गजल-लेखन अन्हारसं इजोत दिस यात्रा अछि। अहाँक सम्पादकीयसँ लागल जे हमर यात्राक दिशा सही अछि। से नीक लागल| भाइ सरसजीक वकतव्यमे आत्मीयताक अनुभव भेल हमर रचनामे सुधार हो,से उद्देश्य रहल हेतनि। हमहूँ चाहैत छी जे सुधार हो। ओहि लेल प्रयास केलहुँ आ एखनो क' रहल छी। भाइ जगदानन्द झा 'मनु' जे त्रुटिक उल्लेख केलनि से नीक लागल। नीक लागल,तकर प्रमाण अछि जे हम त्रुटि सभकें दूर करबाक निर्णय केलहुँ। आशीष अनचिन्हार जी व्याकरण-सामग्री उपलब्ध करौलनि। 10 -12 दिन समय लगौलहुँ। दोष-मुक्ति हमर लक्ष्य अछि। ‘संशोधित गजल-गंगा’ उपलब्ध करा रहल छी। हम चाहब जे 'मनु'जी देखथि, और कियो देखथि। हमरा कहथि। हमरा नीक लागत| कतहु कोनो त्रुटि रहि गेल हेतै त हम फेर सुधार करब। डा.अजीत मिश्रजी जाहि दोख दिस ध्यान दियौलनि अछि से लगैत अछि जे नेट पर जे प्रति  (तोरा अंगनामे) उपलब्ध छै ताहिमे छै। मूल पोथीमे ओ दोख नै छै। भाइ केदार कानन 'गीत गंगा' पर चर्च करैत जे अपेक्षा केलनि अछि से किछु दूर धरि 'गजल गंगा'मे आएल अछि । भाइ अरविन्द ठाकुरक आलेख विस्तृत आ विद्वतापूर्ण छनि | हम देखि रहल छी आ ओहिपर विचार क’ रहल छी | दीर्घ कविता ‘धारक ओइ पार’पर आशीष अनचिन्हारजीक आलोचनामे नवीनता अछि | प्रो.गंगा नन्द झाक संस्मरण आ ‘गीत गंगा’पर आदरणीय श्री छ्त्रानंद सिंह झा आ डा.अमर नाथ ठाकुरक  समीक्षा/ आलोचनामे बेशी आत्मीयताक अनुभव भेल | ‘गीत गंगा’पर कामिनीजी आ परमानन्द प्रभाकरजीक समीक्षा-आलोचना आ ‘गजल गंगा’पर बाल मुकुंद पाठकजीक आलेखसँ आनंदित भेलहुँ | डा.शशिधर कुमरक आलेखमे उत्साह आ मैथिलीमे लेखनक प्रति प्रतिबद्धता झलकैत अछि, से प्रशंसनीय अछि| सभ रचनाकार सहित समस्त ‘विदेह’परिवारकें एहि आयोजनक लेल धन्यवाद ज्ञापित करैत हमरा हर्ष भ’ रहल अछि | -जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह) लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश) क मैथिली अनुवाद लेल। विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 ११) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.१. डॉ0 विद्यानाथ झा- डेंगू बीमारीक भयावह परिदृश्य २.ठूठ गाछ (उपन्‍यास)- जगदीश प्रसाद मण्डल २.२.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा लघु कथा- निनिया देवीक आराधना/ खसैत गाछ २. मैथिलीक किछु समकालीन उपन्‍यासक विविध स्‍वरूप- रतन झा २.३.१.कामिनी कामायनी- लघुकथा-भागमंती २.ललन कुमार कामत- किछु विहनि आ लघु कथा २.४.१. राजदेव मण्‍डल- जल भँवर  (उपन्‍यास ) २.उमेश मण्‍डल- एकटा विहैन कथा-  मुड़नक मुर ३. आशीष अनचिन्हार- ब्रम्हपिशाच (व्यंग्य) १. डॉ0 विद्यानाथ झा- डेंगू बीमारीक भयावह परिदृश्य २.ठूठ गाछ (उपन्‍यास)- जगदीश प्रसाद मण्डल १ डेंगू बीमारीक भयावह परिदृश्य डॉ0 विद्यानाथ झा प्रधानाचार्य, एम0आर0एम0 कॉलेज, दरभंगा

भारत मे डेंगू बीमारी एहि बेर वर्ष 2015 मे एक भयावह रूप ल’ लेलक अछि। दिल्ली मे अविनाष राउत नामक एक स्कूली बच्चाक एहि रोग सॅं आक्रान्त भ’ पॉंच-पॉंच अस्पताल मे भर्त्ती हेतु बौअयबाक वृत्तान्त अखबार सभ मे छपल। समय पर भर्त्ती नहि भ’ सकलाक कारणे अन्ततः ओकर मृत्यु भ’ गेल। बेटाक अन्तिम संस्कार भेलाक बाद ओकर माय-बाप बहुमंजिला भवन सॅं कूदि क’ अपन प्राणत्याग क’ देलनि किएक त’ पुत्रक मृत्यु असह्य भ’ गेलनि। आमजन केॅं स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहि रहबाक ई एक बानगी अछि। सम्प्रति हजारो हजार लोक दिल्ली सहित सम्पूर्ण देष मे एहि रोग सॅं आक्रान्त भ’ अस्पताल सभ मे पड़ल छथि। प्रायः पन्द्रह वर्ष पूर्व ई रोग पहिल बेर देष में सांघातिक रूप मे पसरल छल। एडिस एजिप्टाइ (Aedes aegypti)  नामक एक मच्छरक माध्यमे पसरयवला ई एक विषाणुजन्य रोग अछि जकर वैज्ञानिक नाम फ्लैवीवायरस (Flavivirus)  अछि। जन्तु जगत् मे सामान्यतः पाओल जायवला द्विसंस्तरीय नाभिकीय अम्लDouble stranded Deoxyribonucleic Acid)  केर बदला एहि विषाणु मे एकस्तरीय नाभिकीय अम्ल (Single stranded Ribonucleic Acid)होइछ। ई रोग विषाणु अपन चारि स्वरूप मे अवस्थित होइछ। एहिबेर एकर टाइप IV एतेक सांघातिक भेल अछि। प्रायः 15 सितम्बर सॅं 15 अक्टूबर केर मध्य एकर उत्पात बढि़ जाइछ। बरिसकालक ठीक बाद यत्र-तत्र जमकल पानि एहि विषाणुक वाहक मच्छर के आश्रय प्रदान कय ओकर जनन केन्द्र बनि जाइछ। अधिक तापक्रम ओ सापेक्ष आर्द्रता मच्छरक जनन हेतु अनुकूल परिस्थिति प्रदान करैछ। एक अनुमानक अनुसार सम्पूर्ण विष्व मे प्रायः 40 करोड़ लोक पर एकर आक्रमण होइछ। उष्ण ओ उपोष्ण कटिबन्धीय प्रायः 100 देषक 2.5 अरब लोक एहि सॅं प्रभावित होइत छथि। विष्व भरि मे प्रति वर्ष प्रायः 5 लाख लोक मे एहि रोगक लक्षण प्रकट होइछ आ प्रायः 25 हजार लोक एहि सॅं कालकवलित होइत छथि। ई मानल जाइछ जे डेंगू मूल रूपे अफ्रीका करे स्वाहीली भाषाक शब्द अछि। केन्या ओ तन्जानिया मे एकर उच्चारण ‘‘डिंगी पेपो’’ केर रूप मे कयल जाइछ। एहि रोगक आक्रमणक इतिहास 1780 ई0 मे एषिया, अफ्रीका ओ उत्तरी अमेरिका सॅं उपलब्ध अछि। डेंगू सॅं 2004 ई0 मे इन्डोनेषिया मे 800 लोक मुइलाह जतय प्रायः 80,000 लोक एहि सॅं प्रभावित भेल छलाह। एहि सॅं पूर्व 2002 ई0 मे ब्राजील में सेहो प्रायः 10 लाख लोक एहि सॅं प्रभावित भेल छलाह। 2006 ई0 में फिलीपिन्स मे 14 हजार लोक प्रभावित भेल छलाह। एही वर्ष पाकिस्तान मे सेहो प्रायः 5 हजार लोक प्रभावित भेलाह। सिंगापुर, आस्टेªलिया ओ चीन सेहो डेंगू सॅं प्रभावित रहल अछि।  पर्यावरण विषेषज्ञ लोकनिक मानब अछि जे डेंगूक ई महामारी कतहु ने कतहु जलवायु परिवर्त्तन सॅं सेहो जुटल अछि। वैष्विक तापवृद्धिक कारण मच्छरक प्रजनन हेतु वातावरण अधिक अनुकूल भेल जा रहल अछि। पानि मे देल मच्छरक अंडा सुखा गेला पर समुद्री मालक संग देष-विदेष पहुचि जाइछ जतय कतेको मास बाद पानिक सम्पर्क मे अयला पर मच्छर के जन्म दैछ। एहि तरहे विश्वक कतेको भाग मे पहॅुचि उत्पात मचबैछ। एहि बेर दिल्लीक आस-पास पहिने थोड़ेक-थोड़ेक अन्तराल पर वर्षा होइत रहल आ तकर बाद प्रचण्ड गर्मी पड़ल। मच्छर कटलाक पॉंच-छह दिनुका भीतर लक्षण प्रकट होमय लगैछ। ज्वर सात सॅं दस दिन धरि रहैछ। तीव्र ज्वर 103 डिग्री फारैनहाइट धरि पहचि जाइछ। माथ ओ ऑंखिक दर्द बढ़बाक संग मांसपेषी मे असह्य दर्द होइछ, उल्टी सेहो होइछ। मसकूर, नाक ओ कान सॅं रक्त स्त्राव होमय लगैछ ओ चकत्ता सेहो निकलैछ। अपन मिथिला क्षेत्र मे सेहो राज्यक बाहर सॅं आबि कतेको रोगी दरभंगा चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल में भर्त्ती भय चिकित्सा करबा रहल छथि। एकर जॉंच हेतु आवश्यक ELISA Test  केर सुविधा उपलब्ध नहि होयबाक खबरि बरोबरि समाचार पत्र सभ मे छपि रहल अछि। एहि रोग सॅं शोणित मे पाओल जायवला प्लेटलेट्स (Platelets)  केर संख्या मे कमी आबि जाइछ। प्लेटलेट्स वस्तुतः रक्त के जमबा (Blood Clotting)  मे मदति कय रक्तस्त्राव के रोकैछ। मनुष्यक रक्त मे सामान्यतः प्लेटलेट्सक संख्या प्रति माइक्रोलीटर डेढ़ लाख सॅं साढ़े चारि लाख धरि होइछ। ई संख्या कम भेला पर आन्तरिक रक्तस्त्राव होइछ जे अधिक भ’ गेला पर अन्ततः रोगीक मृत्युक कारण बनैछ। प्लेटलेट्सक संख्या डेढ़ लाख सॅं कम भेला पर रोग सॅं आक्रान्त व्यक्ति केंॅ प्रति दू दिन पर गिनती करयबाक चाही। एक लाख धरि भय गेला पर प्रतिदिन ओ साठि हजार सॅं कम Platelet Count  पर दिन मे दू बेर जॉंच करयबाक चाही आ पचास हजार सॅं कम भेला पर अस्पताल मे भर्त्ती भय चिकित्सा करयबाक चाही। इण्डियन मेडिकल एसोसियेसन केर कहब अछि जे स्थूलकाय लोकक संग उच्च रक्तचाप, मधुमेह ओ हृदय रोग सॅं ग्रस्त होमयवला लोक के अधिक सावधान रहबाक चाहियनि। डेंगूक कारणे रोगीक रक्तचाप कम भय जाइछ। मोट लोक मे रक्तनलिका (Capillary)  फाटि जयबाक संभावना बेसी होइछ। आपात् स्थिति मे डेंगूक रोगी के अस्पताल मे भर्त्ती करबा सॅं मना करयबला अस्पताल ओ नर्सिंग होम क विरूद्ध कार्रवाई करबाक निदेष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पूर्वहि केन्द्र ओ सरकार के देल गेल अछि। एम्हर राजधानी दिल्ली मे डेंगूक प्रसार सॅं चिन्तित भय भारतक नियन्त्रक ओ महालेखा परीक्षक (CAG)  मच्छर वाहित बीमारी सॅं लड़बाक दिल्ली सरकार ओ स्थानीय प्रषासनक तैयारीक ऑंडिट करबाक आदेष देलनि अछि। डेंगू रोग सॅं त्राण पयबाक लेल आवष्यक उपाय सम्बन्धी विज्ञापन सरकारी स्तर पर प्रकाषित कयल जा रहल अछि। एहि रोग सॅं मरयबला लोकक संख्या मात्र 0.3 प्रतिषत होइछ। 99.7 प्रतिषत रोगीक लेल ई आवष्यक नहि जे ओ अस्पताल मे भर्त्तीये होथि। चिकित्सकक सलाह केर अनुपालन कय डेंगूक रोगी शीध्र ठीक भय सकैत छथि। एहि रोग मे ई आवष्यक अछि जे शरीर मे जलक मात्रा मे कमी नहि होअय। एहि हेतु ORS घोल, नारियल पानि, फलक जूस आदि पर्याप्त मात्रा मे लेल जयबाक चाही। ज्वरक नियन्त्रण हेतु माथक संग शरीरक आन भाग पर ठंढा पानिक पट्टी लैत रहबाक चाही। दिनुका समय मे मच्छरक कटबा सॅं बचबाक हेतु सम्पूर्ण शरीर केॅं झॉंपयवला कपड़ा पहिरबाक चाही। घर ओ अस्पताल मे मच्छरदानीक उपयोग नितान्त आवष्यक अछि। घर मे कूलर रखनिहार लोक ओकरा खाली कय रगडि़क आ फेर सुखा कय ओहि मे पानि भरथि। पानिक वर्त्तन ओ टंकी आदि केॅं नीक जकॉं झॉंपि कय राखथि ओ आन अनुपयोगी डिब्बा, टायर, नारियलक खपरोइया आदि के नष्ट करथि किएक त’ ओहि सभ मे जमकल पानि मे डेंगूक मच्छर उत्पन्न होइछ। रोगग्रस्त व्यक्ति रोगक निदान हेतु प्राकृतिक उपचार सेहो करबैत छथि। अररनेबाक पातक रस गिलोय (गुरीच) क पात ओ लत्तीक रस, घृतकुमारीक इस, अनारक रस, बकरीक दूध आदि के गुणकारी पाओल गेल अछि। ई सभ औषधि गामघर मे आसानी सॅं उपलब्ध होमयवला अछि। परन्तु विषेषज्ञ लोकनिक कहब अछि जे एहि वैकल्पिक चिकित्सा के मानकीकृत कयल जयबाक आवष्यकता अछि जे एहि दिषा मे व्यापक शोधे सॅं सम्भव अछि। अखवार सभ मे ई खबरि छपल अछि जे कोना दिल्ली मे एहि बेर बकरीक दूध दू हजार रूपया लीटर ओ अररनेवा (पपीता) क पात पॉंच सय टाका प्रति पातक दर सॅं बिकायल। डेंगू ओ डेंगू सदृष आन मच्छर वाहित रोग सॅं बचबाक हेतु आवष्यक अछि जे घरक लगीच मे जतय कतहु पानि जमकय ताहि सॅं परहेज करी। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ क अन्तर्गत एहू काज के प्राथमिकता देल जयबाक चाही। राजधानी दिल्ली सहित देषक अधिकांष भाग मे एहि हेतु रासायनिक मारकनाषी ;(Chemical Insecticide)  क धूम्राच्छादन (Fogging)  कयल जाइछ। परन्तु ईहो ध्यान राखय पड़त जे किछु अन्तराल क वाद मच्छर एकरा प्रति रोधी (Resistant)  सेहो भय जाइछ। ओना केन्द्र सरकार द्वारा एहि दिषा मे जारी दिषा निर्देषक पालन सुनिष्चित करबाक दृष्टिये फॉंगिगंक क्रम मे निकलय वला धुऑंक मच्छर पर प्रभाविता ओ मनुक्ख सहित आन जीव पर एहि मे प्रयुक्त होमयवला इन्सेक्टीसाइड केर घातक प्रभाव के सेहो ध्यान मे राखल जाइछ। आने रोग जकॉं डेंगूक कारगर निदान तकबा मे विष्व भरि मे वैज्ञानिक अहर्निष लागल छथि। यद्यपि आजुक तिथि मे एकर कोनो सटीक टीका (Vaccine) बाजार मे नहि आबि सकल अछि परन्तु वैज्ञानिक लोकनि द्वारा एहि दिषा मे विकसित टीकाक परीक्षण विभिन्न चरण मे कयल जा रहल अछि। ‘‘हड्डी तोड़य वला रोग (Break bone Disease)”  क नामें जानल जाय वला डेंगू कें शहरीकरण सॅं जुटल रोग (Disease of urbanization)  सेहो कहल जा रहल अछि। वैज्ञानिक लोकनिक मानब अछि जे जौ उचित निदान नहि ताकल गेल त स्थिति आरो भयावह होइत जायत किएक त 2030 ई0 धरि विश्वक 70 प्रतिशत भागक शहरीकृत भय जयबाक अनुमान लगाओल गेल अछि। एहि बेर चीन मे सेहो डेंगूक भयावह आक्रमण भेल अछि जतय गुआंगडोंग (Guangdong)  राज्य मे 47,000 लोक एहि रोग सॅं ग्रस्त भेलाह अछि। ओतय डेंगूक वाहक मच्छर कें वोल्बाचिया (Wolbachia)  नामक एक जीवाणु (Bacterium)  सॅ संक्रमित करौला सॅं बनल नपुंसक नर मच्छर कें प्रकृति मे छोड़ल गेल अछि। एहि अभियान सॅं ई आषा कयल जाइछ जे मच्छरक संख्या नियन्त्रित कयल जा सकत। अफ्रीका, एशिया ओ लैटिन अमेरिका मे रहनिहार विश्वक प्रायः चालीस प्रतिषत जनसंख्या डेंगू रोग सॅं प्रभावित अछि। परन्तु पछिला 2012 ई0 मे अमेरिकाक फ्लोरिडा मे Madeira नामक स्थान पर दू हजार लोक एहि सॅं ग्रस्त भेलाह। ई मानल जा रहल अछि जे अमेरिका आ यूरोपक समृद्ध लोक मे पसरलाक वाद विकसित देष सभ एहि रोगक निदान तकबा दिस अग्रसर होयत। विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O)  एक नियन्त्रणक दिषा मे तीन वर्ष पूर्व प्रयास प्रारंभ कयलक आ 2020 ई0 धरि एहि सॅं आक्रान्त होमय वला लोक केर संख्या मे कम सॅं कम 25 प्रतिषत ओ मुइनिहारक संख्यामे 50 प्रतिशत कमी अनबाक लक्ष्य निर्धारित कयलक अछि।W.H.O.  केर तिरस्कृत उष्ण कटिबन्धीय रोग नियन्त्रण विभाग (Department of Control of Neglected Tropical Diseases) डेंगू रोग क समस्याक समाधान तकबा मे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रियाशील अछि। सनोफी पाश्चर (Sanofi Pasteur)  नामक दवाइ कम्पनी द्वारा बनाओल डेंगू टीका (Vaccine)  पर तेसर चरण (Phase Three)  केर परीक्षण सम्पन्न भय गेल अछि आ ई कम्पनी एशिया ओ लैटिन अमेरिकी देश सभ मे निबन्धन हेतु आवेदन कयलक अछि। ई आषा कयल जाइछ जे एहि वर्षक अन्त धरि एहि टीकाक पहिल खेप बाजार मे आबि जायत। बायोटेक्नोलोजीक एहि युग मे आनुवंषिक अभियांत्रिकी पद्धति सॅं मच्छर मे घातक जीन क समावेष कय वयस्क होयबा सॅं पूर्वहि मरि जयबाक स्थिति उत्पन्न करब संभव भेल अछि। एहि जैव तकनीकी के RIDL (Release of Insects carrying a Dominant Lethal)  टेक्नोलोजी कहल गेल अछि। इंगलैण्डक ऑंक्सफोर्ड स्थित बायोटेक्नोलोजी कम्पनी Oxitecक संग भारत GBIT (Gangabishan Bhikulal Investment and Trading Ltd) एक एहन सांघातिक मच्छर तैयार कयलक अछि। कम्बोडिया एंव लाओस मे डेंगूपर नियन्त्रण करबाक हेतु लार्बा के खायवला माछक प्रयोग कयल जा रहल अछि। सिंगापुर मे सेहो एक वैक्सीन बनाओल जा रहल अछि। मच्छर के दूर भगयबाक हेतु एक नवोन्मेषी उपाय केर रूपमे हाथ पर घड़ी जकॉं बान्हयवला विकर्षक Wrist band  क रूपमे कयल गेल अछि। एहि रिस्टबैन्ड मे सिट्रोनेला क तेल रहैछ जे बान्हयवला व्यक्ति कें कोनो हानि नहि पहुंचयबैछ। ई एक कार्ट्रिज मे रहैछ-जकरा दोबारा भरल जा सकैछ। चारि मास धरि असर करयवला एहि बैण्ड क दाम सम्प्रति दू सय टकाक आसपास अछि। स्टिकर ओ बॉंडी स्प्रे केर रूप मे सेहो ई सभ उपलब्ध अछि। कीटनाशी सॅं सम्पृक्तImpregnated Bed  सेहो उपलब्ध अछि। वैज्ञानिक लोकनिक कहब अछि जे पहिल डेंगू विषाणुक संक्रमण ओतेक मारूक नहि होइछ जखन कि दोसर बेरका संक्रमण प्राणघातक भय जाइछ। अनुसन्धानकर्त्ता लोकनि कहैत छथि जे संक्रमणक प्रत्युत्तर मे मनुष्यक शरीर मे प्रतिरक्षी उत्पन्न होइछ लेकिन एहि कारणेॅं किछु आन विषाणु सेहो चुपचाप कोषिका मे प्रवेष कय जाइछ जाहि सॅं हमर प्रतिरोधक प्रणाली अनभिज्ञ बनल रहैछ। अवसर भेटला पर बाद मे ई विषाणु सक्रिय भय उठैछ। एहि नव विषाणुक प्रति शरीर मे प्रतिरक्षी नहि बनि पवैछ आ रोग प्राणघातक बनि जाइछ।  डेंगू सदृष रोगक नियन्त्रण हेतु हमरा लोकनिक समक्ष सिंगापुरक उदाहरण अछि जे अपन बहुआयामी नीतिक अन्तर्गत निवारक निगरानी ओ नियन्त्रण सार्वजनिक स्तर पर जामरूकता ओ सामुदायिक सहयोग क संग शोध कं सम्मिलित कड कड प्राप्त कयलक गेल। ओतुक्का नेषनल इनवायरनमेन्ट एजेन्सीक निर्देषन मे वर्ष 2001 सॅं सिंगापुर सरकार स’ कन्सट्रक्षन साइट हेतु एक नियन्त्री पदाधिकारी केर नियुक्ति अनिवार्य कय देलक अछि जे कीट-मच्छर सभकॅं नियन्त्रित करय। २ ठूठ गाछ (उपन्‍यास) जगदीश प्रसाद मण्डल 1. साँझ पहरक बढ़ैत सियाही अन्‍हराए लगल, जेना-जेना सियाही करियाएल जाए तेना-तेना दिनक इजोत कमैत गेल। सड़कसँ बीघा पचासे हटि बाधमे एकटा गाछ। इजोतमे गाछक सभ सिरखार रस्‍तेपर सँ चलनिहार देखैत मुदा साँझक पछाति, माने जेना-जेना अन्‍हार पसरैत जाए तेना-तेना गाछोक रूप बदलऽ लगइ। पहिल साँझ सौंसे गाछक पात आँगनक बिछान जकाँ बिछाएल बूझि पड़ैत मुदा कनियेँ सियाही बढ़ने पातक पता नइ रहैत संगे गाछक डारियो अन्‍हारमे हेरा ठूठ जकाँ किछु समए देख पड़ैत पछाति ओहो हेरा जाइत। झंझारपुरसँ अबैत रही, रस्‍तासँ कनी हटि प्रोफेसर रामकृष्‍ण बाबूक घर छैन। घरक पछुऐतपर नजैर पड़िते नबे-एकानबे बर्खक रामकृष्‍ण बाबूपर गेल जे आइ ठूठ गाछ जकाँ भऽ गेला अछि। 1925 इस्‍वीमे रामकृष्‍ण बाबूक जन्‍म ओहन परिवारमे भेलैन जे परिवार राज-परिवारसँ जुड़ल जमीन्‍दार रूपमे छल। देशमे अजादीक लड़ाइ[1] पसैर धाराक रूपमे प्रवाहित हुअ लगल, किसानक देश, गामक देश भारत। भारतक मूल पूजी खेत, जैपर देश ठाढ़ अछि। गुलामीक हजारो बर्खक इतिहास ऐठामक गाम आ गामक पूजीकेँ पाछू धकेलैत पछुएने रहल। जइसँ गमैया जिनगी टुटैत-टुटैत एतेक टुटि गेल अछि जइसँ चीन-पहचीन मेटाएल जा रहल अछि। प्रगतिशील विचारक सभ मञ्चपर आबि चुकल छला। ओ सभ जमीनपर एला जे देशक मूल पूजी–माने किसानक देश, गामक देश–गाम छी तँए बिना गामक विकास भेने देशक विकास सम्‍भव नइ। गाम रज-रजबारसँ लऽ कऽ जर-जमीनदारक संग रूढ़िसँ सेहो जकैड़ गेल अछि, ओ सुधरने बिना गामक सुधार सम्‍भव नै। जमीनक प्रश्‍न उठने देशमे पसरल रज-रजबार आ जर-जमीनदारक बीच खलबली उठल। खरीद-बिकरी संग उधार भेटने जमीनदारक संख्‍यामे बढ़तियो भेल आ घटबियो भेल। ओना, गाम-गामक लोकक दशा एहेन भऽ गेल जे उपास करैले कोनो पावैनक प्रतीक्षा नै रहल। जँ कोनो गाम हजार घरक अछि तँ नअ सएसँ ऊपरे परिवारकेँ अपन घराड़ियो नै। मनुख तँ केतौ घरेमे रहत। ओना तइसँ किछु दिन पहिने रेण्‍ट-मुक्त बास भूमि भेट चुकल छल, मुदा हजारो बर्खक गुलामीक शिकार लोककेँ पड़ाइत-पड़ाइत कोनो कर्म बॉंकी नै रहि चुकल छल। केकरो कोनो गाममे घराड़ी छल, मुदा पेटक दुआरे पड़ा दोसर गाम बसल तँए ओ फेर बिनु घराड़ियेक होइत रहल। जखन अधिवेशन सभमे आजादीक वृहद आकारक अवाज उठल तखन रजो-रजबार आ जरो-जमीन्‍दारक पेटक पानि डोललैन। जइसँ पसरल खेतक लत्तीकेँ समटऽ लगला। ओना गामो-गामक लोकक आचार-विचारमे किछु-ने-किछु अन्‍तर होइते छै, जे सोभाविको अछि। बौद्धिक स्‍तरक हिसाबसँ विचारो आ काजोक स्‍तर बदलै छै। प्रोफेसर रामकृष्‍ण बाबूक पिता गोरख बाबू चारि भॉंइक बीच जेठ, तँए जहिना माता-पिताक सिनेह तहिना भाए सबहक आदर। जइसँ सुसम्‍पन्न परिवारक जे गुण-धर्म होइ छै तइसँ सम्‍पन्न परिवार। आगत-भागतसँ लऽ कऽ गीत-संगीत, साहित्‍यिक चर्चासँ मञ्च जकाँ सजल परिवार। संस्‍कारी परिवारमे आने काज[2] जकाँ पढ़ाइयो-लिखाइ। जइसँ स्‍कूल जाइ जोकर जखने रामकृष्‍ण भेला कि स्‍कूलक बाट पकैड़ लेलैन। गामक स्‍कूलसँ हाइ स्‍कूल तक रामकृष्‍णक जिनगीमे कोनो हवा-विहाड़ि नइ लगलैन। बच्‍चेसँ जे नीक रिजल्‍ट होइत आबि रहल छेलैन ओ मैट्रिक तक बरकरारे रहलैन। चालीस इस्‍वीक पछाति अजादीक लहैर जोर पकैड़ नेने छल। तेजीसँ उथल-पुथल हुअ लगल। जेना आसमान फाटि  जाइ छै तहिना रामकृष्‍णोक परिवारमे भेलैन। चारू भॉंइक बीच भिनौज भेने, परिवारक सम्‍पैत चारि भागमे बँटेने अखन धरिक रचल-बसल परिवार एकेबेर ढनमनाएल। खेत-पथारक बिकरी परिवारमे बढ़ल। ओना परिवारक अखन धरिक जे हित-अपेक्षित, कुटुम-परिवार, सर-समाजक जे सम्‍बन्‍ध रहलैन ओ खर्च तँ ओहिना रहलैन मुदा आमदनीमे धक्का लगबे केलैन। किछु दिनक पछाति, माने जखन रामकृष्‍णकेँ कौलेजमे प्रवेश केला साले भरि भेलैन कि पिता मरि गेलखिन। अपन भाए-बहिनक बीच रामकृष्‍ण सभसँ जेठ रहबे करैथ। पिताकेँ मुइने परिवारक बोझ माथपर आबि गेलैन। अपनासँ छोट पॉंचो भाए-बहिनक पढ़ौनाइ-लिखौनाइसँ लऽ कऽ विधवा माइक भार सेहो पड़लैन। कहुना-कहुना आई. ए. पास कऽ लेलैन। खेत-पथार रहितो रामकृष्‍णकेँ ने खेती करैक लूरि आ ने इच्‍छा। होइतो ऐहना छै जे नीक विद्यार्थीक मनमे सदैत यएह रहैए जे केतौ शिक्षक बनि जीवन-जापन करी। मुदा शिक्षकक खगता स्‍कूल-कौलेजमे रहत तखने ने हएत। से तँ गनल कुटिया आ नापल झोर जकाँ स्‍कूल-कौलेज! केतौ खाली नै! मुदा इलाको तँ सभ रंगक अछि। कोनो कोसीक उपद्रवी क्षेत्र अछि तँ कोनो भुतही-कमलाक। ओना जइ इलाकामे रामकृष्‍णक घर छैन ओ धारक उपद्रवसँ सुरक्षित अछि। अपन इलाका छोड़ि रामकृष्‍ण कोसी क्षेत्रक हाइ स्‍कूलमे शिक्षक बनि जिनगीक शुरूआत केलैन। हाइ स्‍कूलक शिक्षक सभकेँ ओहन दरमहो नहियेँ भेटै छेलैन। जे परिवारकेँ हाइ-फाइमे रखितैथ। ओना ई जरूर भेल जे टुटैत-टुटैत परिवार एक सीमापर आबि अँटैक गेलैन। जेकरा रामकृष्‍ण बुझलैन। जइसँ आमदनीक बीच परिवारकेँ चलबैक विचार सोचि लेलैन। बाहर रहने बाहरक खर्च हेबे करत, संगे गामोक परिवारक भार तँ ऐछे। श्रवण कुमार जकाँ रामकृष्‍ण परिवारक बेटा बनि भार अपन कन्‍हापर उठा लेलैन। रेलगाड़ीक सुविधा रहने चारि-पॉंच घण्‍टामे गाम पहुँच जाइ छला,जइसँ अठबारे शनि-रबिकेँ आबा-जाही स्‍कूल आ गामक बीच रखने छला। ओना शिक्षा-बेवस्‍थामे सेहो जुग परिवर्तन होइए मुदा केहेन परिवर्तन होइए ऐपर तँ सभकेँ नजैर रखऽ पड़तैन। नजैरक माने, कोन मुहेँ आकि केकरा दिस ओ लत भेल। मुदा से जइ जुगक उपज रामकृष्‍ण छला ओ समयानुकूल छेलैन। शिक्षा पद्धतिमे अखुनका विद्रूपता नइ आएल छल। ग्रामीण परिवेशमे चाहो-पानक चलैन अखुनका जकाँ नइ छल। ओना पानक प्रशस्‍ति मिथिलांचलमे अदौसँ रहल मुदा आम-जनक बीच समटा ओ विशेष माने खास-खास उत्‍सवमे अँटैक गेल छल। ओना एकटा प्रश्‍न तँ उठिते अछि जे आधुनिक वैज्ञानिक परिवेशमे पानक महत् की अछि। जेहेन परिवारक रामकृष्‍ण बाबू छला ओइ परिवारमे सभ कथुक चलैन छेलैन। मुदा परिवारसँ हटल रहने अपन जीवनकेँ साँचामे ढालैक तँ अवसर भेटबे केलैन। मौकाकेँ लाभमे बदैल रामकृष्‍ण अपन जिनगीकेँ अपना ढंगे निरमाएब शुरू केलैन। एक तँ ओहिना छोट-भाए बहिनक बीच एहेन विचार अखनो तँ गाम-परिवारमे ऐछे जे मते-पिता नइ अपनो भाए-बहिन आ समाजोका भाए-बोहिनक बीच बेवस्‍थित रूपमे सम्‍बन्‍ध ऐछे जे बेसीमे नइ तँ कमोमे जरूर चलि रहल अछि। तैसंग विधवा माइक जिनगी परिवारक जिनगीकेँ सात्‍विकता दिस बढ़बैत रहलैन। भूखे सहब आ कोनो संकल्‍प-व्रते सहब, दुनू सहबे भेल मुदा दुनूमे अन्‍तरो तँ ऐछे। एक सहब भेल भरलपर आ दोसर भेल जरलपर, जइसँ ईहो तँ हेबे करत जे भरलकेँ पाचक हएत आ जरलकेँ घातक! घातक ई हएत जे हाड़-मांसक संग हड्डियो सुखाएत! आने-आन मनुख जकाँ रामकृष्‍णक जिनगीकेँ कहियौन आकि दुनियाँकेँ, बीचमे आबि ठाढ़ भऽ गेल रहैथ। विचारक धारमे अपना बुधिये रामकृष्‍ण अपनाकेँ जुड़शीतलक माल-जाल जकाँ छोर पकैड़ हेलौलेन। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी, बहुरंगी। केतौ बालु भरल अछि तँ केतौ सोना, केतौ पाथर भरल अछि तँ केतौ बोन-झार,केतौ पानि भरल अछि तँ केतौ माटि...। माटियो तँ माइटे छी, कोनो उस्‍सर अछि तँ कोनो केशौर केसैर उपजबैक शक्‍ति रखने अछि। अथाह दुनियाँक थाह पकड़ब असम्‍भव नइ तँ कठिन तँ ऐछे। दसो दिशामे दुनियाँ बँटाइत बँटाएल अछि, तहूमे तेते कोण-काण बनि गेल अछि, जँ किछु डेग केम्‍हरो उठबौ चाहब तँ कोनो कोणेमे कोणिआ जाएब आ कोणियेला पछाति केमहर मुहेँ चलि जाएब, से ठेकान करब अथाह नइ तँ अगम तँ ऐछे। जहिना अगमो पानिमे हेलिनिहार सभ रंगक होइ छैथ, कियो एहनो होइ छैथ जे अगम बूझि माने माटिक ऊपर एते पानि अछि जइमे डुबि जाएब। पानिमे डूमने हवाक प्रवेश रूकै छै तँए बिनु हवे अपनो हवे जकाँ उड़ि जाएब! मुदा तँए कि एहेन हेलिनिहार नइ छैथ जे समुद्र सन पानिमे हेलै छैथ जइमे माटिक ठेकाने ने छै। दुनियाँक बीचमे ठाढ़ रामकृष्‍ण अप्‍पन दुनियाँ दिस नजैर देलैन। अपन दुनियाँ तँ वएह ने भेल जइमे रहैक अछि। एकरो ने दसो दिशा छै आ सैयो कोणो-काण छै। अपन जिनगीकेँ थाह पबिते रामकृष्‍णक मनमे तोष-संतोष जगलैन। जगलैन ई जे मनुखो तँ मनुखे छी जे कारखानाक आगिक चिमनियोँ लग जिनगी बितबैए आ साइबेरियाक काइ-लीचेन गाछो तर। तही बीचमे ने हमहूँ केतौ छी...। अपना जिनगीक आड़ि-धुरकेँ रामकृष्‍ण बिटिया लेलैन। बिटियैबते भक खुजलैन- सभ किछु अपने करए पड़त। अहीमे धरम-करम सभ नुकाएल अछि। जँ देह-हाथ नइ चलाएब, उपार्जन नइ करब तँ परिवारक खेबा-खर्चा केतएसँ औत, धिया-पुताकेँ पढ़ाएब-लिखाएब केना...। अपना जिनगी-ले लोककेँ अपने उपैत करए पड़ै छै, हमरो करैक अछि। दोहरी संकल्‍पक संग रामकृष्‍ण शिक्षकक जिनगी शुरू केलैन। पहिल संकल्‍प केलैन जे अपनो प्रोफेसर बनैक अछि आ परिवारमे छोट-भाए-बहिनक निमरजना ओते तँ करबे अछि जेते पिताजीक समैमे भेलैन। तइसँ जेते अगुआ करब वएह ने अपन सृजन हएत। ओना आर्थिक दृष्‍टिये दुनू-बापूतक जिनगीमे अकास-पतालक अन्‍तर आबि गेल छेलैन। पिताक जिनगी मझोलका जमीन्‍दारक रहलैन जखन कि रामकृष्‍णक जिनगी ओइसँ बदैल एक साधारण शिक्षकक भऽ गेलैन। संकल्‍पकेँ खण्‍डित करैत माने छोट-छोट टुकड़ी बना रामकृष्‍ण अपन मन असथिर केलैन जे पिताजी जेते पढ़ेलैन, तेते छोट-भाइक प्रति अपनो दायित्‍व बनैए, ओना तइसँ कम-बेसीमे पढ़निहारोक विचार तँ ऐबते छै। जँ नइ पढ़ऽ चाहत तँ परिवारक बीच, समाजक बीच,किए ने अपन प्रायश्चित करा लेब। जँ पढ़निहार रहत तँ अपन ओकाति भरि सहयोग करब दायित्‍वक संग कर्तव्‍यो तँ बनिते अछि। ऐठाम आबि रामकृष्‍णक विचार ठमैक गेलैन। किछु समए ठमकला पछाति रामकृष्‍णक नजैर अपनापर पड़लैन। परिवारक खर्चमे सिर्फ भोजने-वस्‍त्र आ अवासेटा नइ अछि। लिखब-पढ़ब आ बेर-कुबेरमे दवायो-दारूक जरूरत तँ पड़िते अछि। ओना विद्यालयक संग ट्यूशन करब, तइसँ किछु आमदनी बढ़त मुदा घटो तँ लगबे करत ने जे अपन पढ़ैक समए वेरबाद भऽ जाएत। जखन समैए ने बँचत तखन आगू बढ़ि केना सकब। बाल-बोधक खेल पढ़ब-लिखन नइ ने छी, ओ जिनगीक साधना छी जेकरा साधने बिना जिनगीकेँ आगू मुहेँ बढ़ाएब कठिन अछि। ओना साधनो केते रंगक होइए। मुदा से सभ नइ, जेते साधक जरूरत रहए आ साधैक साधन रहए, बस तेतबे। रामकृष्‍णकेँ जेना भक् खुजलैन। भक् खुजिते नजैर मान-इमान आ सम्‍मानपर गेलैन। ओहो तँ बीज-रूपमे अँकुर, गाछ बनि जिनगीकेँ गछाड़ैत फुनगी धरि पहुँच जाइए। ओतै जा कऽ ने गाछोक फूल फुला-फुला अकास दिस तकैत तरेगन, सप्‍तऋृर्षि गनैए आ तहिना ने मानो-इमान इज्‍जत बनि इजोरिया राति जकाँ भगवतीक आराधनाक मुहूर्त बनैए...। रामकृष्‍णक मन अपना दिस घुमलैन। घुमिते उपकलैन जे जैठाम जिनगीमे आबि अँटैक गेल छी तैठाम इज्‍जत-इमान की भेल आ तेकरा केना बँचा कऽ रखि सकै छी..? सौनक मेघ जकाँ मन गुम्‍हरलैन। गुम्‍हरलैन ई जे जइ काजक भार माथपर आएल अछि ओकरो जँ नीक जकाँ माने इमानदारी पूर्वक निमरजना करब, तखन तँ...। जखन कि तहीसँ ने इमानो-इज्‍जत चलत। जइ बच्‍चाकेँ पढ़बैक भार कन्‍हापर आएल अछि, तहूमे लोअर प्राइमरी स्‍कूल आकि मिडिल स्‍कूलमे नै छी, हाइ स्‍कूलमे छी, ऐठामसँ निकलला पछाति कियो आगूओ पढ़ैले कौलेज जाएत आ केते पढ़ाइ छोड़ि अपन जिनगी बनबैक किरियामे लागत। एहेन धरतीपर जँ अपना जिनगीमे जीवन्‍तता नइ रहत तखन केतौ-ने-केतौ किछु-ने-किछु कमी औत। मुदा ओ जीवन्‍तता औत केना? रामकृष्‍ण अपन आमदनी आ अपना काजकेँ समैमे बान्‍हि चलब मनमे रोपि लेलैन। समए निसचित अछि, आमदनी निसचित अछि जँ एकरा काजक निसचितता नइ देब तखन पछड़ैक सम्‍भावना बनियेँ जाइए। आमदनीक खर्च अपन जिनगीक संग परिवारक जिनगी चलाएब अछि। अपन जिनगीक खर्च जे अछि ओइमे भोजन प्रमुख अछि। जँ हम बजार दिस जाइ छी तँ निसचित रूपे अधिक खर्च हएत, मुदा जँ ओकरा अपन दिनचर्यामे लऽ आनब तँ अदहोसँ बेसीक बँचत हएत। रामकृष्‍णक मन मानि गेलैन। आगू पढ़ैपर नजैर गेलैन। भाइयो-बहिन परिवारमे रहि मैट्रिक तक तँ घरेपर सँ पढ़ि सकैए। अपन जे हिस्‍साक जमीन अछि, ओकरो उपजबैक परियास करब,नइ जँ तइ सभसँ खर्च नइ पुड़त तँ थोड़-थाड़ बेचियो लेब। मुदा जँ खर्चक दुआरे अपने आकि परिवारेक बाल-बोधकेँ जिनगी बाधिक केने रहब तखन तँ जिनगी कोणाह बनि जाएत। बी.ए.मे रामकृष्‍ण नाओं लिखा, छह मासक पछाति कौलेज छोड़ने रहैथ, किताब सभ कीनि नेने रहैथ। सोझे बैचमे फारम भरि बी.ए. कऽ लेलैन। बी.ए. केला पछाति विद्यालयमे स्‍तरो बढ़लैन आ दरमहोक बढ़ोत्तरी भेलैन। तैसंग नीक रिजल्‍ट पढ़ैक मन सेहो जगा देने रहैन। प्राइवेट विद्यार्थीकेँ युनिवर्सिटीसँ परीक्षा-ले परमीशन लिअ पड़ै छै। मनमे अराधि लेलैन जे जखने अवसर भेटत तखने एम.ए. कऽ लेब। मुदा ओइले अखनेसँ कनखड़ऽ पड़त। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1787, तिथि : 25 अक्‍टूबर 2015 2. विचार रूपमे रामकृष्‍णक मनमे रोपा गेल रहैन जे एम.ए. करब। मुदा घड़ी-मिनट दिन-मास गुजैर गेल, अखनो धरि रामकृष्‍णक मनमे काज रूपमे नइ रोपाएल छेलैन। ओना विद्यालयमे सेहो साहित्‍येसँ जुड़ल रहला मुदा ओ पूर्वपीठिका भेल। तेकर कारण रहै जे सभ दिन साहित्‍य विषय दिस रहला। ओना साहित्‍योमे गणित नइ अछि सेहो बात नइ, गणित तँ ओहूमे अछि मुदा ओ नमहर अछि, तँए छोट जिनगीमे ढीलढीला भऽ जाइए। जिनगीक लेल तँ जरूरत अछि अर्थशास्‍त्रक संग ओकर स्‍टैटिक्‍सकेँ बुझब, तइमे हजारो कोस दूर हटल रामकृष्‍ण, तँए समए बीतए लगलैन मुदा निर्णएपर पहुँचिये ने पाबि रहल छला। केतौ बाजब नीक नइ, एकर अनेको कारण अछि मुदा से नइ, रामकृष्‍णक मनमे उठलैन जे असम्‍भव काजकेँ सम्‍भव बनबैक प्रक्रिया छी, तँए काजक बिसवासू दू दिस बढ़त। एक दिस काजक लेल जिनगी भेल आ दोसर जिनगी-ले काज भेल। मुदा पुरुखकेँ तँ अपन पुरुषत्‍वोमे बिसवास करबाके चाही। मुदा नजैरमे जेना नचि गेलैन- ‘कंगनक लेल आरसी की आ पढ़निहार लेल फारसी की।’ रामकृष्‍णक मनमे जेना जेठुआ नमी जगलैन। जेठुआ नमीक माने भेल, जमीनमे ठण्‍ढपन आएब। मुदा से नै नमी तँ जमीनमे सभ दिन रहिते अछि, भलेँ कहियो जले-प्‍लावित भऽ जाए, कहियो कण्‍ठे सुखए लगए। मुदा सृजन शक्‍तिमे कमी-बेसी रहै छै। जइमे जेठुआ नमी जे समुद्र-धारसँ लऽ कऽ जमीन धरिमे बेसिया जाइए। माने समुद्रोमे माछ अण्‍डा छोड़ैए आ जमीनोमे रौदमे तपि बीआ आरो सक्कत भऽ हाल पबिते धरतीकेँ फाड़ि कलश उठौने दुनियाँक बीच अपन पहचान बनबैत अपना वंशो आ अपनो नामकरण करैए। जँ से नइ करैत तँ सभ धान धाने छी आ सभ मान माने छी जकाँ ने भऽ जाएत...। जेठुए हाल जकाँ रामकृष्‍णक मनमे अपन जिनगीक गणित जगलैन- साहित्‍यो गणितसँ आ अर्थशास्‍त्रो गणितसँ फड़कैत बूझि पड़लैन। जेना कानमे किछु भेने कुकुऐ लगैए, आँखि मिड़मीड़ए लगैए, पीपनी फड़कए लगैए तहिना रामकृष्‍णोक मन फड़फड़ेलैन। फड़फड़ाइते दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि कागज-कलम उठा जिनगीक केलकुलेशन करए लगला। एक दिस सोझ बाट देखैथ जे आठ सए नम्‍बरक आठ विषय एम.ए.क कोर्समे अछि जइमे छह सएक परीछा उतीर्ण भाइए गेल छी। मात्र दू सएक नम्‍बर दू विषयक झमेल अछि। मनमे चपचपी एलैन जे बढ़ि-बढ़ि ठमैक जाइन। ठमैक ऐ दुआरे जानि जे अपन बुझल बात माने ‘हाथी पियासल, घोड़ा पियासल, दल-दल पानि, थलथल वाणि पथपल मानि।’ रामकृष्‍णक आगूमे रकशाएल मन ऊकवाती नेने रस्‍तापर ठाढ़ भऽ दीवाली पावैनक ऊक जकाँ परीछा घड़ी..; परीछा घड़ी..; पढ़ैत रहैन। जइसँ रामकृष्‍ण ठमैक गेला। अही झीका-तीड़ीमे रामकृष्‍णक साल भरि समए निर्णए करैसँ पहिने चलि गेलैन। विद्यालयमे हेड मास्‍टर एम.ए. रहथिन, मुदा कुर्सियो तँ कुर्सी छी, ने धाके कहियो विचारैक बात सोचलैन आ ने कहियो उपकैरो कऽ हेडमास्‍टर साहैब जीवनक सम्‍बन्‍धमे पुछलकैन। ओना बेक्‍तिगत गुण आ पद प्रतिष्‍ठाक गुण दुनू दू भेल। नियमानुसार दुनूक पालन हेबा चाही मुदा ओकर तँ समए-स्‍थान निर्धारित अछि। खैर जे से...। सोचे रामकृष्‍ण हेडमास्‍टर साहैबसँ एम.ए. करैक गप नइ चलौलैन। पाछू उनैट तकैथ तँ सभ शिक्षक नव कि पुरान मुदा रहैथ तँ सभ आई.ए.-बी.ए. पासे। जैठाम आई. ए; बी.ए. पास तैठाम एम.ए. तँ भुताहि भेबे कएल। भुतही गाछीसँ आगू बढ़ि रामकृष्‍ण जखन विद्यार्थी दिस बढ़ैथ तँ देखैथ जे ई तँ भेल पूर्वपीठिका माने बच्‍चाक ज्ञानभूमि! ऐठामसँ आगू बढ़ैत ने कियो एम.ए.क चोटीपर पहुँचैए आकि पहुँचत। मुदा ऐमे तँ चुम्‍बकक सम्‍बन्‍ध छै जे एक सिरा दोसरकेँ नचबैए। तेसर साँझ। कोसीक किनछेर, माने भेल धारक लगक जमीनपर देने जे चलैक रस्‍ता रहैए ओ। ओही रस्‍ता होइत रामकृष्‍ण टहलैत बहुत दूर चलि गेला। अपने पढ़ैक विचार मनकेँ दबने रहैन, इजोरिया पख रहबे करइ, सुर्ज अपन बोरिया-विस्‍तर समैट सुतैले चलि गेला मुदा ठहाका मारि इजोरिया अन्‍हारकेँ घेरैए ने दइ, अही धोपचटमे रामकृष्‍ण तीन कोस आगू धरि टहलैत गेलापर मनमे होश एलैन जे सौंझका समए छी, केते दूर चलि एलौं! घुमि कऽ आबि अपन ओसारक कुरसीपर बैसिते मनमे उठलैन, पहिने हाथ-पएर धोइ चाह बना पीब ली। पछाति बैस विचारि लेब जे हमरा की करक चाही। विचारक दुइए पक्ष होइए। ‘हँ’ आ ‘नइ’। पछाति ‘हँ’ओमे हजारटा डारि छिटकैए आ ‘नहियोँ’मे। चाह पीला पछाति मनमे चेनियत ऐबते अपन विचार–संकल्‍पक विचार, जे आइ हँ-निहँस कैये लेब–जेना पूर्वाक लहकीमे भँसिया पछिम दिस डोलि गेने आ धारक पानि जकाँ विचारोक लाट धेने दोसर विचार सेहो बहैत रहैए, तहिना लाटे-लाट साहित्‍यक धारमे रामकृष्‍ण फँसि गेला। आऽ हाऽ हाऽ! केहेन सुन्नर सुन्‍दरी अछि जे एक घड़ी आधो घड़ी, आधोमे पुन आध! मने-मने रामकृष्‍ण विस्‍मृत भऽ गेला। विस्‍मृत एहेन भेला जे जहिना घड़ी-घण्‍ट बजैत देवालयक मुहथैरपर ठाढ़ भऽ पूजाक शंख फूकैत होइत। मनमे हलचल उठलैन। मुदा लगले दोसर धुन ससैर कऽ आबि सवार भऽ गेलैन। ओ धुन छल आध जनम हम नीन गमाओल! दुनियाँ केतेटा आ जिनगी केतेटा..? तइले लोक अनेरे हाय-हाय किए करत? ओना हाथोक घड़ी रामकृष्‍ण रखने छैथ मुदा देवालोमे घण्‍टीबला-घड़ी रखनहि छैथ। होइतो ऐहना छै जे केकरो घड़ी समए बतबै छै तँ कियो घड़ीकेँ समए बतबैए। यएह तँ भेल दुनियाँक खेल। कियो मिनट-पल समए पकैड़ नचैत तँ कियो कटल-खोंटल चान जकाँ जिनगी देख झुझुआइत! घड़ी बाजल, साढ़े आठ। रामकृष्‍णक भक् टुटलैन। भानसक समए भऽ गेल। हाथक घड़ीपर नजैर रखि पैछला समए (माने बैसैकालक समए) सँ मिलौलैन तँ डेढ़ घण्‍टा घण्‍टीए डोलबैमे चलि गेल। हाइ रे बा! नान्‍हिटा विचार करए बैसलौं, सेहो छुटिये गेल! आइक लेल जे काज अछि, आकि विचार अछि ओ औझुका भेल,काल्हि-ले काल्हि छै। तखन तँ काजे छुटि गेल। अच्‍छा! भानस करै बेर विचारि लेब। मुदा विचार आइये करैक अछि। सम्‍पन्न परिवारमे रामकृष्‍णक जन्‍म भेने गीत-नादक परिवार भेटले रहैन, जइसँ बच्‍चेसँ किछु-किछु साजोपर हाथ देने आ मीठ अवाज रहने अवाजोक साधना रहबे करैन। जे अखनो पछुऐबते छैन, जइसँ असगर रहने तबला-मजीराक हाथ तँ छुटि गेलैन मुदा हारमोनियम रखनहि छैथ। ओहो नियमित समए खाइते छैन। असगरे गौनिहार, असगरे बजौनिहार-सुनिनिहार, आन कियो ने! तखन..? चुल्हि लग बैसिते जेना मन फुड़फुड़ेलैन। फुड़फुड़ाइते पहिने निर्णैये कऽ लेलैन जे एम.ए. करब, प्रोफेसर बनब। काजक इच्‍छा तँ करैक शक्‍ति मंगै छै। से शक्‍ति रामकृष्‍ण संचित करैक दिशामे अखनेसँ भीड़ गेला। तेसर साल एम.ए.क परीछा दइक अछि। काल्हिये युनिवर्सिटीसँ सिलेवश आनि, आठो विषयक खण्‍डवाइज किताब सेहो कीनि लेब। किछु-किछु समैक कटौती सभ काजमे करैत दू घण्‍टा समए निकालि काजमे हाथ लगा देब। जिनगीक टपान टपैक दुर्ग बाटपर ठाढ़ भऽ रामकृष्‍ण चुल्हि लगसँ आगू देखऽ लगला। मनक संग देहोमे चुलबुली आबि गेलैन। समयानुकूल भोजन बना,भोजन करैत रामकृष्‍ण निर्णए केलैन जे ओछाइनपर निचेनसँ औरो नीक जकाँ विचारि लेब। ओछाइन सेरिया जखन ओछानिक सिरमापर मुड़ी खसौलैन कि धक्-दे विधवा माइक संग भाए-बहिनपर मन उड़ि गेलैन। दिनो-दिन माइक देहक दशा खसि रहल अछि! देहक दशा खसैक कारण दुइएटा भऽ सकैए। देह आ दैहिक। ओना उमेरो पचास टपि गेल मुदा सएक नापमे तँ अधडरेर भेल, अखन किए देह खसतैन। साठिक बाद ने खसैक सम्‍भावना जगैए। ओना खाइ-पीबैमे कोनो तेहेन अभाव तँ नहियेँ हुअ दइ छिऐ, जेहेन हजारो-लाखो परिवारमे छै। नइ! जरूर मानसिक पीड़ासँ पीड़ित अछि। की एहेन उमेरमे जँ पति-विहीन लोक भऽ जाए, बाल-बच्‍चा छोट रहै ओहन लोकक इज्‍जत-आवरू एहेन समाजमे बँचि सकैए जेहेन समाज बनि गेल अछि आकि बनि रहल अछि आकि बनौल गेल अछि। की माए-बापक धर्म बाल-बच्‍चाक सेवा करब नइ छी? बहिन बिआहे जोकर भऽ गेल अछि, ओ तँ माइयेक सोझमे अछि, की ओकरा मनमे सन्‍ताप नइ जगैत हेतइ? रामकृष्‍णक हँसी-खुशीक मनक नीन पड़ा कऽ दूर भागि गेलैन। कछ-मछ करैत ओछाइनपर पड़ल माएपरसँ भाए-बहिनपर नजैर उतड़लैन। दू-दूटा भाएकेँ कौलेजक खर्चा जुटाएब बाल-बोधक खेल नइ ने छी। मुदा ईहो तँ दायित्‍व बनियेँ जाइए किने जे जहुना अपने राम कृष्‍ण कौलेज मधुबनीमे पढ़लौं, तहुना तँ पढ़ा दिऐ। मुदा छोड़लो तँ नहियेँ जा सकैए। तखन तँ भेल अपन जिनगीक संग परिवारक जिनगीकेँ अपन कमाइमे अँटावेश करब। जे अँटावेश करए तँ अपने पड़त। ◌ [1] अंग्रेजक खिलाप [2] घरेलू काज ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा लघु कथा- निनिया देवीक आराधना/ खसैत गाछ २. मैथिलीक किछु समकालीन उपन्‍यासक विविध स्‍वरूप- रतन झा १ जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा लघु कथा- निनिया देवीक आराधना / खसैत गाछ निनिया देवीक आराधना बहुत दिनेटा नै बहुत बर्खक बाद गाम एलौं। आब तँ सहजे दिल्‍लीए-वासी भेलौं। घरो-दुआर दिल्‍लीए भेल। बाल-बच्‍चाकेँ पढ़ाएब-लिखाएबसँ लऽ कऽ बिआहो-दान ओम्‍हरे करै छी। मुदा पहिने से नै, पहिने ई कहै छी जे गामसँ पड़ेलौं किए। गाममे पहिने एकठाम दुर्गा-पूजा शुरू भेल। सौंसे गौऑंक सहयोगो रहैन। जिनका पूजा-पाठ करैक लूरि रहैन ओ अपन भार पूजा-पाठक लेलैन। नवतुरिया सभ नाच-तमाशाक भार उठा लेलैन आ बॉंकी गोरे खर्चा-बर्चाक। समाजोक रंग-रूप आ मुँह-कान एकरंगाहे रहैन तँए सबहक विचारेसँ बलि-प्रदानक प्रथा शुरू भेल। किछु दिनक पछाति पुजेगरी सबहक बीच फुला-फुली भेलैन। दोसरोठाम दुर्गापूजा प्रारम्‍भ भेल। ओना फुला-फुली दुर्गे-पूजाटा मे नइ आनो-आनो पावैनमे होइए जे एकदिनो पावैन दू-दिना भाइए जाइए। किछु सालक पछाति गाममे एकटा निर्गुण महंथ भेला, गामक वैष्‍णवजनकेँ खर्ड़ासँ खड़ैर एकठाम कऽ लेलैन। माने ई जे एकसूत्री कार्यक्रम बना बलि-प्रदानक विरोधमे पुक्की दऽ सौंसे गामक निर्गुणियाँक संग सगुणियोँ सभ एकजुट भेला।  ओना जीवपर दया करी…; ओकर हत्‍या नइ होइ...; सभ जीव जीवे छी इत्‍यादि...। एहेन विचारक संस्‍कार तँ सबहक मनमे रहबे करैन। ओ महंथजी जे अपना सम्‍प्रदायक मञ्च परहक वक्ता छैथ। एक घण्‍टाक भाषण कण्‍ठस्‍थ केने छैथ। जहिना सत्‍य नारायण भगवानक कथा एके सॉंसमे कथा-वाचक सुरैर कऽ बाचि लइ छैथ तहिना महंथोजीकेँ छैन्‍हे। इलाकामे तेतेक सेवकान रहैन जे महंथजीक छाती जमीन्‍दार जकॉं फुलले रहै छेलैन। मुदा गाम-समाज की छी, तइसँ ने कहियो भेँट भेलैन आ ने ओकर तरी-घटी बुझलैथ। बीचमे किछु दिन पहिने सुनने छेलौं जे एकटा एहेन थाना प्रभारी थानामे आबि गेल रहैथ जे महंथजीकेँ जहल पठा देने रहैन। कहॉंदन महंथजी सेवक संग सेवकाइमे फँसि गेला। जे मामला थाना पहुँच गेल। साल भरि जहलक हवा खेला पछाति महंथजी निकलला। तैबीच गुण रहल जे ओ थानो प्रभारी चलि गेल रहैथ। मुदा महंथजीक चला-चलती फेर ओहिना छैन। जहिना सौनमे सॉंप केचुआ छोड़ि नव-जौवनक संग जिनगी पाबि लइए, तहिना महंथोजी कनियेँ एकभगाह भऽ दोसर डारि लग पहुँचला कि होटलक चम्‍मच जकॉं पानि छुबिते शुद्ध भऽ गेल छैथ। मुदा जे से...। तइ दिनमे हम कौलेजमे पढैत रही, वैष्‍णव परिवारमे जन्‍म भेने वैष्‍णवी जिनगी तँ रहबे करए। गामक गुन-गुनी आ गप-सप्‍पक क्रमक संग बैसार- अपन विचारक बैसार- हुअ लगल रहए। कौलेजक जिनगी कारणे पीपाशु मन समाजिक भाइए गेल रहए। गामक तरी-घटी तँ किछु बुझैत ने रही, मनमे हरल-ने-फुड़ल, महंथजी ऐठाम पहुँचलौं। महंथजीक चपचपी देख बुझि पड़ल जे भरिसक विचारी सभ संग पकड़लकैन अछि। एक तँ महंथ, तैपर लोक महत्‍मो कहिते छैन। उमेरगरो छैथे। देखे-देखी ने दुनियॉं चलै छै, ओही देखा-देखीमे हमहूँ कहलयैन- “महात्‍माजी, गाममे अखन...?” जहिना जेठुआ बर्खाक बूनकेँ धरती ऊपरे लोकि पीब लइए तहिना ‘गाम’ सुनिते महात्‍माजी ऊपरे लोकैत पूछि देलैन- “गाम तँ समाज छी किने?” कहलयैन- “हँ।” फेर पुछलैन- “समाजकेँ एक रस्‍ते ने चलक चाही?” कहलयैन- “चलक्के चाही।” ‘चलक्के चाही’ सुनि जेना महंथजीकेँ हूबा जगलैन। हूबा पैबते मनसूबा जगलैन आ मनसूबा जगिते बुलबुला छोड़ैत बजला- “गाममे दूठाम दुर्गा-भगवती बनै छैथ, मुदा हमरा सबहक परिवारक ने कियो पूजा करए जाइए आ ने कुमारि भोजन करैए...!” महंथजीक बात सुनि किछु फुड़बे ने कएल। नइ फुड़ैक कारण भेल जे किछु बुझले ने रहए। एतबे देखिऐ जे गाममे दूठाम दुर्गा भगवतीक स्‍थान अछि। साले-साल आसिनमे दस दिनक पूजो होइए आ ओइ संग हाटो-बजार लगैए आ नाचो-तमाशा होइए, जइसँ दसो दिन के केम्‍हर मुहेँ ससैर जाइए से लोक बुझबे ने करए। बुझबो केना करत पूजा-पाठ करैबला पूजा-पाठमे लीन, बनियॉं-बेपारी अपन कारोबारमे लीन, गायक-वादक मनोरंजनक पाछू लीन। केकरो केकरोसँ गप करैक फुरसैतो तँ नहियेँ रहै जे एक क्षण एकठाम बैस आने समए जकॉं ताश भँजैत। मुदा लगले मनमे उठि गेल जे महंथजी बाहरोमे जखन मञ्च परहक महात्‍मा छैथ तखन ऐठाम तँ गामक सहजे जवाबदेह समाजो भेला। जहिना ओ समाजक छथिन तहिना ने हुनको समाज छिऐन। परिवारक लोक पूजा करए नइ जाइ छैन, जखन कि सौंसे समाजक स्‍थान छी। किए ने जाइ छैन आकि कियो नै जाए दइ छैन से तँ ओ ने बुझता-विचारता। हमरा ऐसँ कोन मतलब। मुदा समाजक बीच ओते मतलब तँ रखै पड़त ने जइसँ समाजक एकसूत्रतामे कमी नइ आबइ। कहलयैन- “परिवारक जे समस्‍या अछि ओ ते अपना परिवारमे ने मीलि कऽ समाधान करब।” एका-एकी लोकक आवाही बढ़ल। लोकक अवाहीसँ बूझि पड़ल जे गामक लोक भरिसक कनखैर गेल अछि। दुनू गोरे- हमरा आ महंथजी-क बीच गप-सप्‍प पॉंचो-सात मिनट नै भेल छल कि जहिना सॉंझ आकि भोरमे गोटे नढ़ियाक पुक्की सुनिते आनो-आन केतेको नढ़िया कात-करोटसँ आबि-आबि ओइ पुक्कीकेँ  पुपुअबैत आगूमे आबि झौं-झौं करए लगैए, तहिना भेल जाइत रहए। जे जेम्‍हरसँ अबैत ओ अपने ताले-बेताल भेल आबि बाजए लगए- “महंथजी, मञ्चपर अहॉं बजै छिऐ, कुमारि सभ जातिक बेटी कुमारिये भेली, अखन तँ अपना समाजमे छी, जैठामक सार्वजनिक दुर्गा स्‍थानमे हमरा बेटीकेँ सॉंझक दिआरी आ भोरक फुलडाली पहुँचबैक जगह नइ अछि!” महंथजी चुप-चाप भेल हाथक इशारासँ, नव-नव एनिहारकेँ बैसबैत रहैथ। मुदा सुनै तँ हमहूँ छेलौं। मन नाचए लगल। अखन धरि माने कौलेजक जिनगी तक ई बात बुझबे ने केने रही जे गामक बेवहारमे की सभ अछि। जे बात बुझले ने छल तइमे किछु बाजबकेँ नीक नइ बूझि बजबे ने करी। मुदा बुझैक जिज्ञासा तँ मनमे रहबे करए। ओना अपना बीच- माने नव-नव लोकक बीच- सेहो खूब घौचाल हुअ लगल मुदा एक मुँहक बात नीक जकॉं सुनबो ने करी आकि दोसर मुँहक बात चलि आबए- “जखन हमरा-सबहक पानियेँ छुबा जाइए तखन स्‍थानक नीपिया-पोतिया केना करब?” लोकक मुँहक बात सुनि मने-मन खौंझो उठए, मुदा फेर कही जे अखन जे ऐ खौंझक पाछू पड़ब तँ कौलेजक पढ़ाइयो छुटि जाएत। तँए मनकेँ गरगोटिया दऽ दऽ दाबी जे बोल बन्न केने रह। फेर तेसर अवाज आएल- “जखन हम सभ वैष्‍णव धर्म अपना नेने छी, तखन दसगरदा स्‍थानमे बलि प्रदान किए होइए?” रंग-रंगक लोकक बात सुनि दुनू कानमे ठेकी लगा लेलौं। ठेकियो लगाएब जरूरिये छल किने। समाजक समस्‍या जालेमे नइ महजालमे फँसल अछि। अखन तँ पोठियाहियो जाल चलबैक लूरि नइए। अखन धरि महंथजी ऐ ताकमे रहैथ जे हम की उत्तर दइ छिऐन। मुदा ओ बूझि गेला। दुनू हाथे हल्‍लाकेँ शान्‍त करैत बजला- “दुर्गास्‍थानक बलि-प्रदानक प्रभाव समाजोपर नै पड़ि रहल अछि से बात नै। जइ समाजमे वैष्‍णव सम्‍प्रदायक लोक रहता तैठाम विपरीत प्रभाव पड़बे करत। ओना, जइ गाममे आकि जइ धरतीपर मॉं-जगदम्‍बाक आराधना होइ छैन, ओ नीके नइ बहुत नीक होइए मुदा ओ जगदम्‍बा ते धरती रूपमे धरतिये ने छैथ। गाममे देवस्‍थान रहने ते गामे ने देवालय बनि जाइए, तखन अपन अँगनोमे तँ काइए सकै छी।” महंथजीक विचार सुनि हमरो विचार महंथजीक विचारमे मीलि गेल। जहिना कात-करोटक बर्खा-बुन्नीक पानि धरियाइत धार बनि धड़धड़ाइत धारा बनैत धारक धारामे मीलि जाइए तहिना भेल। कहलयैन- “महंथजी, हम अपनेक विचारसँ सहमत छी, संग देब। मुदा करबै की सभ से तँ हमरो जना देब किने?” हमर बात महंथजी केँ उकठाह नइ लगलैन। ओना बहुत महंथकेँ उकठाहो केना ने बूझि पड़तैन जे पहिने दीक्षे बॉंटि दइ छथिन आ शिक्षा-ले अनेर छोड़ि दइ छथिन...। बजला- “देखियौ बौआ, गामक समाज वैष्‍णव-सॉंकठ रूपमे बँटि गेल अछि, जखने दू दिशामे लोक चलत, तखने काजो सभ दू रंगाह हुअ लगत किने।” महंथजीक विचार जँचल। मुदा दू दिशामे चलितो समाज एक बनि केना चलत ई तँ मनमे खुटियाइते रहए। दोहरी रूपमे मनुखक जिनगी छै, एक वैचारिक दोसर शारीरिक। मुदा किछु थाहे ने पेब रहल छेलौं। जेम्‍हर देखी तेम्‍हर अथाहे बूझि पड़ए...। बजलौं- “महंथजी, एहेन काज नइ हुअए जे होत-सँ-होतांग भऽ जाए।” महंथजी बजला- “होतकेँ होतो आ होतांगो तँ लोके ने बनबैए। जेहेन लोक रहत तेहेन हएत!” महंथजीक विचार मनमे नीको लगए मुदा डरो हुअए जे लोको तँ लोके छी, कखनो अमरीत उगलैए आ कखनो बीख। फेर हुअए जे एहनो तँ लोक छैथ जे अमरीते टा उगलै छैथ। मुदा सभसँ गजपट ई अछि जे मौका देखि दुनू उगलैए...! ..एहेन बोन-झाड़क पहाड़मे सिर-सजमैन केना भेटत आ सुखेन वैदकेँ केना चिन्‍हबैन? तरे-तर जेना दम फूलए लगल। किछु फुड़बे ने करए जे की बाजी। फेर हुअए जे अनेरे कोन चक्करमे पड़ि गेलौं। भने गामक लोकसँ हटि कौलेजमे संगी-सबहक बीच रहै छी। मुदा फेर भेल जे साल-दू-साल बादो तँ अही गाम-समाजमे ने आबि रहब। पड़ेने काजो तँ नहियेँ चलत। अग-दीगमे पड़ि गेलौं। अक्-बक् दुनू बन्न भऽ गेल। नजैर उठा कऽ देखी तँ एको गोरे हाइ-स्‍कूलसँ आगू बढ़ल नइ बूझि पड़ए, तैठाम हुअए जे कौलेजमे पढ़ै छी केना पाछू हटि किछु बाजब। लोकक बीच- माने जेते गोरे ओइठाम रही- घौंचाल कमबे ने करए। मुदा ओ घौंचाल बदलैत समस्‍याक नइ समाधानक...। एके समस्‍या लोको-लोकक बीच आ परिवारो-परिवारमे बदैल जाइए। अपन जिनगीक रस्‍ता हम अपने ताकि लेब, बेसी मुहसँ सुनिऐ। लोको राक्षसे जकॉं जे बड़ छोट से उनचास हाथ...। मनमे कनी चैन आएल। चैन अबैक कारण ई भेल जे हम तँ छौड़ा-मारेड़ ऐ गामक अखन छी, जइ गामक साहित्‍यमे छै जे छौड़ा-मारेड़क कएल खेती आ नै उपजल तँ...। चलू जे हेतै से हेतै महंथजीकेँ गामक गाछ मानि लइ छिऐन। घौचाल दिस दमैस कऽ कहलिऐ- “अहॉं सभ महंथजीकेँ निर्णए किए ने सुनबऽ दइ छिऐन जे अनेरे अपनामे घोल-फचक्का करै छी।” मुदा हमरो बात जेना नीक लगलै। राम दरबारमे जहिना बानरक दल चुक्की-माली बैस दुनू हाथ दुनू कानपर नेने धियानसँ रामाज्ञा सुनै छल तहिना महंथजीक निर्णयक विचार सुनैले सभ कान ठाढ़ केलक। महंथजी अपन निर्णए सुनबैसँ पहिने समूहकेँ पुछलखिन- “किनको जँ कोनो प्रश्‍न मनमे घुरियाइत हुअए ओ पहिने बाजि जाउ। पाछू जे घंघौज करब से नीक नइ।” कियो कोनो प्रश्‍न नइ उठौलक। चुपा-चुपी देख हूथकारैत कहलिऐ- “अनेरे सभ मुँह बन्न किए केने छी?” एकटा हमरे सन नवछबड़िये छौड़ा जे रौदी भेने अही साल कण्‍ठी बान्‍हि बबाजी बनल, ओ कड़ैक उठल- “जीवन को मैंने सोंप दिया भगवान तुम्‍हारे हाथो में।” धरमागती पूछी तँ हम ओइ गीतक अरथे ने बुझलिऐ। मुदा आब बुझै छी जे सत-पथ चलैले लोक सभ दिन जीवन-दान दैत आएल अछि। ओकरा डपटैत कहलिऐ- “ऐठाम समाजक समस्‍याक समाधानक विचार भऽ रहल अछि आ तूँ बीचमे नाच ठाढ़ करै छह..; ..महंथजी अपन विचार सभकेँ सुनबयौन।” हमर चरियाएब महंथजीकेँ अधला नइ लगलैन। मने-मन किछु विचारए लगला। की विचारए लगला से तँ ओ जानैथ। थोड़ेकालक पछाति बजला- “दस मिलि करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज। समाजक बीचक काज छी तँए समाधान तँ एकर समाजे ने करत।” एकटा कनफूका बबाजी जे कण्‍ठी तँ नइ बन्‍हने रहै मुदा गुरुमंत्र कानमे लऽ नेने रहए। बिच्‍चेमे टभैक गेल- “चलै छै मलिनियाँ बेटी, धरती धमकबै छै।” मने-मन खीजो उठल आ हँसियो लगल। खीज ई उठए जे समाजक समस्‍याकेँ हँसी बूझि गीत गबैए आ हँसी ऐ दुआरे लगल जे हाइ रे कोसी पेटक लोक, भँसैत घरक छप्‍पड़पर बैस बंशियो खेलैए आ गीतो गबैए! मुदा महंथजी सम्‍हारैत बजला- “दस गोरेमे तँ अहिना रंग-रभस चलै छै। अगुतेलासँ काज नै...।” मन शान्‍त भेल। बजलौं- “महंथजी जे विचार रखता से हम मानि लेब।” मनमे रहए जे अपन कहि दोसरोक विचार बूझि ली मुदा से भेल नइ बिच्‍चेमे एक गोरे बाजल- “हम सभ मानने छी।” कोनो अरथे ने लगए जे की मानने छी, ने कानसँ सुनने रही आ ने कोनो तेहेन काजे देखिऐ। फेर भेल जे अनेरे मगज-झिक्कीमे लगल छी। जहिना सभ हरे-हरे हरिबोल कहि देलक तहिना किए ने हरिहरे कहि दिऐ। बजलौं- “महंथजी, अपना ऐठामक विचार रहल अछि जे सॉंपो मरि जाए आ लाठिओ ने टुटए।” महंथजी बजला- “एकरा अहॉं सभ सोझ डारिये ने देखै छी। जखने सॉंपपर लाठी लगतै तँ लाठियोकेँ तँ ओते चोट लगबे करतै, जइसँ टुटैक सम्‍भावना रहिये जाइ छै। मुदा ऐठाम रोग रूपी सॉंपक ओहन इलाज होइ जे दुनू होइ।” महंथजीक विचार जेना तरे-तर मन तक घोंसिया गेल। नजैर उठा कऽ लोक दिस देखी तँ बूझि पड़ए जे सभ झूमि रहल अछि। मन उबियए लगल...। बजलौं- “महंथजी एहेन विचार दियौ जे अखनेसँ समाजक बीच बीआ-बान भऽ जाए जइसँ जरूर समाज सोचि-विचारि उत्‍थान दिस बढ़त।” जेना हमर बात महंथोजी केँ जँचलैन। बजला- “जरूर!” बैसल-बैसल मनो उबियए लगल। निरर्थक बैसब बूझि पड़ए लगल। चरियबैत महंथजीकेँ फेर कहलयैन- “केतेकाल धरि मुँहक मूंगबा नुकेने रहब। काल्हि हमहूँ दरभंगा चलि जाएब। पछाति अहीं दोख लगबैत कहब जे ओ छौड़ा सभ पोखरी-घाटक छबड़ा सभ छी, आगूएमे लप-लप करत मुदा एकोटा पकड़ए नइ देत।” हमर बात जेना महंथजीक मनमे मेघ जकॉं गुम्‍हड़लैन। नजैर हमरापर तेना देलैन जेना हमर चाइन देख अपनोकेँ चैन महसूस केलैन। दुनू हाथक इशारा दैत महंथजी बजला- “दस गोरे जखन एकठाम बैसब तँ अहिना सासुरक रस्‍ते साइर-सरहोजिक गाम होइत मसिया-पिसिया होइत ददिया-ननिया तक पहुँच जाएब आ दोसर दिस...। तँए गामक एक-एक जनकेँ जीबैक बाट चाही।” ओना महंथजीक संग समाजक बीच तेसर भगवतीक स्‍थापनामे संगे-संग काज केने रही, जेकरा आइ तीस बर्खसँ ऊपर भेल हएत। बीचमे मोबाइलसँ पता लगल जे महंथजी एकटा झमेलमे फँसि साल भरि जहल खटि एला। मुदा जखन हुनकर विचार मन पड़ैए तँ सोझड़ाएल महंथजी रहैथ से मन पड़ि जाइए। आइयो ओहिना मन अछि...। महंथजीकेँ जखन चरियबैत कहलयैन तँ बजला- “जँ पूजाक स्‍थान भगवतीक बनबै छी तँ ओइमे सभकेँ पूजा करैक रास्‍ता खुजल रहइ। जँ से नइ तँ लोक घरे-घरे भगवतीक पूजा तँ करिते अछि।” तेसर वैष्‍णव भगवतीक स्‍थान बनि गेल। महंथेजी अगुआ भेला। सभकेँ समटैत बढ़ला। किछुए दिनक पछाति बूझि पड़ल जे जहिना भागवत कथा भेने भूतो-प्रेत आ राक्षसोक आवाही हुअ लगैए। तहिना रमलीला भेने रावणक वंश सेहो उपैक कऽ चलिये अबैए। आमक गाछीक बगवारि, बटाइ खेत छीनब, बाध-बोनमे परती-परॉंतपर गाए-महींसकेँ चरबैसँ रोकब शुरू भेल। बूझि पड़ल जे सौंसे गामे डोलि गेल। पचीसो बेर पचीसो रंगक बात कानमे पड़ए लगल। अन्‍तमे, चौराएल धान जकॉं रहितो डरे गामसँ पड़ा गेलौं।¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2099, तिथि : 01 नवम्‍वर 2015 खसैत गाछ जिनगीक अन्‍तिम सीढ़ीपर पहुँच पुरन ठाकुर ओइ गाछ सदृस भऽ गेल छैथ जे ने अकास दिस मुँह उठौने ठाढ़ अछि आ ने धरतीपर बिछाइन भेल पड़ल अछि। सौन मास, बादलसँ छाड़ल मेघ, सुर्जक केतौ पता नइ, उमड़ैत-घुमड़ैत ओहन हूंकार भरैत जे बरिस कऽ धरतीकेँ जलमग्‍न कऽ देत, रहि-रहि बिजलोका सेहो दिशा बदैल-बदैल कखनो अपन पीरौंछ रंगें तँ कखनो हल्‍लुक लाली नेने तँ कखनो आल लाल रंगें तड़तड़ेबो करैत आ गोटे-गोटे बेर ठनैक-ठनैक ठनका बनि खसबो करैत। ओना अदरे नक्षत्रसँ बर्खा अपन रूप पकैड़ नेने छल जइसँ पोखैर-झॉंखैरक संग धारो-धुर फुला अपन तेज गति पकैड़ लेलक। चर-चाँचरक संग ऊँचरस-नीचरस खेतो जल-प्‍लावित भेल। अस्‍सी-बिरासी बर्खक पुरन ठाकुर आबि दरबज्‍जाक मुहथैरपर ठाढ़ भऽ थर-थर कँपैत ने किछु बाजैथ आ ने कोनो चाले-चुल...। दरबज्‍जाक दछिनबरिया खिड़की टुटि गेल अछि, जइ होइत हवो आ झटको घरमे अबैए, ओकरे बन्न करैले प्‍लाष्‍टिकक बोराकेँ बॉंसक फट्ठीमे कॉंटीसँ ठोकि-ठोकि ठीक करैत रही। कखन पुरन ठाकुर दरबज्‍जापर आबि गेल रहैथ से तँ ठीक-ठीक नै बूझि पेलौं मुदा पनरह-बीस मिनट पहिने दरबज्‍जाक खिड़कीक काजमे लगल रही, तइसँ पहिने नइ आएल रहैथ। तइसँ अनुमान केलौं जे दस-पनरह मिनटक भीतरे आएल छैथ। थरथर कँपैत स्‍वरमे पुरन ठाकुर बजला- “बौआ!” ओना एकबेरक अवाजकेँ जहिना लोक अवाज नै मानैए तहिना हमरो भेल जे भरिसक अन्‍तुका अवाज छी। तँए कानक बातपर मन नइ उठल। जहिना अपन-काजमे लगल रही, तहिना लगले रहलौं। दोहरा कऽ पुरन ठाकुर बजला- “बौआ, बौआ राधेश्‍याम!” नाओं सुनिते घरेसँ कहलयैन- “के छिआ! अबै छी।” अवाज तँ सुनि नेने छेलौं, मुदा बोलीक अकान नइ भेल छल। जँ बोलीक आकन होइत तँ आरो किछु कैहतिऐन। मुदा से नइ भेल। जहिना खिड़कीक काज पसरल छल तहिना छोड़ि घरसँ निकललौं तँ पुरन काकाकेँ देखलयैन। नाट कद, गाढ कारी रंग, गोल मुँह पचकल, ऑंखि घँसल, धोती, गोलगला आ कान्‍हपर तौनी नेने ठाढ़। देखिते पुछलयैन- “पुरन काका, एहेन समैमे घरसँ किए निकललौं?” देहक वस्‍त्र भीजल, जइसँ टप-टप पानि धरतीपर खसैत। बजला- “बौआ, आइ हम मरि जाएब!” ओना मनमे भेल जे पहिने सुखल कपड़ा दिऐन मुदा पुरन कक्काक बात ‘आइ हम मरि जाएब’ मनकेँ ठनका देलक। ठनका ई देलक जे कोन थर्मामीटरसँ पुरन काका नापि लेलैन जे आइ मरि जेता? मरणक पीड़ा आ जन्‍मक पीड़ा तँ जिनगीमे लोककेँ एकेबेर होइ छै, ओ केना अनुमान कऽ लेलैन? फेर भेल जे भरिसक जाड़सँ देह ठिठुर गेल छैन तँए एहेन बात मुहसँ निकैल गेलैन। मुदा लगले भेल जे सौनक पानिमे ओहन ठिठुरन होइ कहॉं छै जेहेन माघक पानिमे होइ छै। तही बीच पुरन कक्काक परिवार दिस नजैर उठि गेल। उठिते भेल जे भरिसक घर ने खसि पड़लैन अछि, जइसँ एहेन बात बजला। घरपर नजैर पड़िते मन पड़ल- पुरन काकाकेँ परिवारे कहॉं छैन, घर ते खसले छैन। हाथ पकैड़ पुरन काकाकेँ घर लऽ जा चौकीपर सँ एकटा धोती दैत कहलयैन- “पहिने सुखल कपड़ा देहमे लगा लिअ। हमरो काज लगिचाएले अछि, पछाति दुनू गोरे चाहो पीब आ गपो-सप्‍प करब...।” मन बहटारै दुआरे कहलयैन- “ऐ बेर इन्‍द्र भगवान खुशी छैथ!” धोती पहिरैत पुरन काका बजला- “धु: कोन भाँजक बात बजै छह। अन्‍हराकेँ जेहने जगने तेहने सूतने।” पुरन कक्काक बातक कोनो अरथे ने लगल। अपना मनमे भेल जे भरिसक देहक वस्‍त्र ने सुखल पहिर लेलैन मुदा मन सिमसले छैन। पुछलयैन- “काका, अहॉंक बात नइ बुझलौं?” पूछ होइते जेना पुरन कक्काक मनमे पुछड़ी लगि गेलैन तहिना मन कलैश उठलैन, बजला- “बौआ! जागब आ सूतब भेल, जरूरतसँ कम-बेसी।” पुरन कक्काक बात फेर नै बुझलौं। ऐठाम इन्‍द्र भगवानक गप अछि तखन बीचमे ‘जागब आ सूतब’ केतएसँ आबि गेल? पुछलयैन- “की जागब आ सूतल कहलिऐ, काका?” विहुँसैत आसिन मासक सिंगहारक फूल जहिना सॉंझ पड़िते भकराड़ भऽ जाइए तहिना पुरन कक्काक मन फुला कऽ भकराड़ भऽ गेलैन। बजला- “जैबेर इन्‍द्र भगवान बरिसला तैबेर बाढ़ि चाटि-पोछि लैत आ जैबेर सूतला तैबेर रौदी सुखा-टटा दैत तैबीच मारल जाइए खेत आ खेतक बले जीवैबला लोक। मुदा खेतपर जीनिहार लोको की भगवानकेँ गुदानै छैन, मन खुशी रहलैन तँ कोहवरक गीत सुनबै छैन आ जँ खिशियाएल रहलैन तँ मरजादियो बेर मुहेँ-काने गारिसँ एकबाहि कऽ दइ छैन। भाय! घरबैयाकेँ सुननौं ओ गारि किए लागत, हुनके बहिन-माए ने बरियातीकेँ सोझा-सोझी गरियबै छैन। सएह छैथ खेतपर जीनिहार भगवान, जे अपने शक्‍तिये जीबै छैथ, समुद्रक डपौरे-शंख किए ने अनघोल करौ मुदा अनठौआ बहीर जकॉं कानमे या तँ ऑंगुर लऽ साहोर-साहोर करत आ नइ तँ तूर-तेल लऽ असुआ कऽ सुइत रहत।” हॉंइ-हॉंइ कऽ खिड़की लगा, हथौरी-कॉंटी, बैशला सभकेँ कातमे रखैत, बाहरब छोड़ि, जखन पुरन कक्काक ऑंखि-पर-ऑंखि देलिऐन तँ बूझि पड़ल जे चाह सुनि पुरन कक्काक मनमे तृप्‍ति नइ एलैन। जँ तृप्‍ति आबि गेल रहितैन तँ मन जरूर तिरपित जकॉं बुझाइत। मुदा से नइ, भरिसक पुरन काका अन्नक भूखल छैथ, तँए चाह सुनि तृप्‍ति नइ जगलैन। सोभाविको छै, अन्न आ पानि तत्‍काल भरि सम्‍हारि सकैए मुदा अन्नक सोलहन्नी भार पानि तँ नहियेँ सम्‍हारि सकैए। एहनो तँ भाइए सकैए जे तबधल वायुकेँ आरो तबधा मनकेँ बेपीड़ित कऽ दिऐ। मुदा पुरन कक्काक मन जहिना तन-मन भग्न भेल छैन, तइसँ कनियेँ नीक ने अपनो छी। एहेन समैमे चाहोक निवेदन कम नइ भेल। जैठाम बिजलीक चुल्‍हि वा गैसक चुल्‍हि नइए तैठाम भानसक चुल्‍हि माने गोड़हा-चेड़ा जरैबलापर चाह केना बनत। चाह तँ जेहने पीबैमे रसगर लगैए तइसँ की ओ कम रसिक अछि, गाछक सूखल ठौरही, सुखाएल कड़चीक टुकड़ी आकि सुखाएल बत्तीक टुकड़ीक चुल्‍हि छी। एहेन समैमे[1] ओहो चाहक चुल्‍हि नरमाएले रहैए। एतबो आग्रह कम नइ भेल। फेर भेल जे किए ने एकबेर पुरने काकाकेँ पूछि लिऐन। मुदा मनमे ईहो उठल जे बूढ़-पुरान लोक छैथ, जँ कहीं एहेन व्रती जिनगी रहल होनि जे की खाएबकेँ अधला बुझैत होथि आ कहि दैथ जे तूँ हमरा बड़ धड़खनाह बुझै छह! तखन तँ आरो पहपैट हएत। समए भिनसुरके रहै, जलखै नइ केने रही। मुदा चुल्‍हि पजैर गेल रहै से धुइयॉं-धुकुरसँ आगम भऽ गेल रहए। लगले मनमे बिचैड़ गेल। जखन चाहक आग्रह पुरन काकाकेँ केने छिऐन, ओना रोटीक संग चाहक चलैन तँ नइ अछि आ ऐछो तँ गाम-घरमे अखन नइ अछि मुदा शहर-बजारमे कम पाइ कमेनिहार चाहक संग चाहकेँ तीमन बना खाइते अछि। गाममे चाहक तीमन तीमनक मान्‍यता नइ पौलक अछि। सभ जिनगीक सब रंग भोजन होइए, ओइ भोजनक संग ओकर जिनगी चलै छै आ जिनगीक संग रहन-सहन सेहो चलै छै। तँए भोजन संस्‍कृत प्रभावित भाइए जाइए जेना चाहक आगमनक संग बिस्‍कुटो आबि गेल...। मन पड़ल, घरमे बिस्‍कुट ऐछे कनी अहगरसँ बिस्‍कुटो जँ आगूमे देबैन तँ जरूर मनमे तृप्‍ति औतैन। जखन मनमे तृप्‍ति औतैन तखन ने आइए जे मरैले तैयार भेल एला हेन, हुनको दस बर्ख जीबैक इच्‍छा जगतैन। लगले देहक भुलकल रूप आ जाड़सँ सिरसिराइतपर नजैर पड़ल। मन ठमैक गेल। तीन सालसँ जेते कपड़ा बदलने रही, ओ सभ ऐछे। किए ने मोटरीए सुमझा दिऐन जे जेतेसँ देह झँपाएत तेते लऽ लिअ। सैह केलौं। गंजी, अंगा आ चद्दैर देख पुरन कक्काक मनमे तृप्‍तिक संचार भेलैन। जिनगीक मूल आवश्‍यकता जे अछि ओइमे वस्‍त्रो तँ ऐछे। जँ मनसँ भोजन, रहैक घर,पहिरैक वस्‍त्र, बेर-बेगरतामे दवाइ-विड़ो भऽ जाए तँ के चाहत जे लगले अछियापर चलि जाइ। दुनियॉं तँ नन्‍दन कानन छी, जइमे के नइ बास करए चाहैए। सभ तँ चाहिते अछि। ओना मोटरीमे बहुत कपड़ा तँ नइ मुदा तीनटा गमछा, चारिटा लूँगी, दूटा धोती आ एकटा चद्दैर तँ छेलैहे। कपड़ा देख पुरन काका अपन जिनगीकेँ दरजी-नप्‍पासँ अपन जिनगी नपला तँ बूझि पड़लैन जे आब अपन औरुदे केते दिनक बॉंकी अछि, तहूमे तेहेन जिनगीमे जीब रहल छी जे होइए आइए मरि जाऊँ। मुदा जँ दसो बरिस आरो जीब तैयो वस्‍त्रक दुख नइ हएत। द्रोपदी जकॉं भगवान तेहेन वस्‍त्रक ढेरी आगूमे रखि देलैन जे जिनगीक कोन बात असमसानक अछियो धरि नइ घटत। लगले मन घुमि गेलैन। घुमिते उठि बैसला। बैसते मनमे एलैन राधेश्‍यामकेँ जे रखलाहा छल से सभटा आगूमे दऽ देलक। एकर माने ई नइ ने भेल जे मोटरीए दऽ देलक। जेतबे अखन खगता अछि तेतबे ने लेब, मुदा तइसँ ते साले दू साल ससरब...। पछाति फेर मनमे उपकलैन, राधेश्‍याम ईहो तँ नहियेँ बाजल जे ऐमे सँ एकटा निकालि लिअ आ बॉंकी हमर मोटरियेमे छोड़ि दिऔ। आगू-पाछू नजैर दौड़बैत पुरन काका गर अँटकारि कऽ बजला- “बौआ, अपने हाथे दाए।” ‘अपने हाथे दाए’ सुनि मन तड़ैप गेल। मन तड़ैप ई गेल जे जखन वेचारेकेँ मोटरीए सुमझा देलिऐन, तखन अपने हाथे दैक माने भेल जे किछु दिऐन आ किछु रखि ली। रखैक माने भेल- झिंगुर काटत चाहे पानिक चुवाठसँ भीज कऽ सड़त आकि मूस-मुसरी खाएत तेकर कोनो ठीक थोड़े अछि, तइसँ नीक ने जे एकटा वस्‍त्र-विहीनकेँ वस्‍त्र भेटत...। कहलयैन- “काका, अहॉं जड़ाएल छी, जेतेसँ देह गरमाए तेते पहीरि लिअ आ जे रहि जाएत ओहो लऽ लिअ।” हमर बात सुनि पुरन कक्काक मन ओहन इनार जकॉं भरि गेलैन जेकरा खुनैयेकाल खुननिहार कहि दैत जे ऐमे पॉंच हाथ आकि सात हाथ पानि रहत। तहिना ने अपनो जिनगीक हिसाबे सभ वस्‍त्र भाइए गेल। तइमे लूँगी तँ तेहेन अछि जे मुँह फाड़ि देबै कि एकटासँ तीनटा भऽ जाएत। ओइढ़ो लेब, बिछाइयो लेब आ पहीरो लेब। वस्‍त्र विहीन खसल पुरन कक्काक मन जेना बेपीड़ितसँ पीरित दिस बढ़लैन। पिरौंछक आगमन होइते मन मुस्‍कियेलैन। कहि कऽ चाह आनए ऑंगन गेलौं। अँगना-दरबज्‍जाक दू ऑंगन अछि, तँए ऑंगन टपैमे कनी देरी लागल। तैबीच पुरन काका देहमे गंजी, कुरता पहीरि माथमे तौनीक मुरेठा बान्‍हि चद्दैर ओढ़ि लेलैन। कागजेक टुकड़ीपर दूटा डिब्‍बा ट्वेन्‍टी-ट्वेन्‍टी बिस्‍कुट उझैल देलिऐन। बिस्‍कुट देखि पुरन काका बजला- “बौआ, हमरा कोनो बेसी भूख नइ लागल अछि, तहूमे भिनसुरका उखड़ाहा छी, हम कि कोनो करखन्नाक रौतुका ड्यूटी करि कऽ आएल छी जे नीनाएल-भुखाएल रहब। मुदा हम केना...।” पुरन कक्काक अधबोलिया बात सुनि मनमे भेल जखन पुरन कक्काक मुहसँ एहेन विचार खसल तँ मानि लइ छिऐन। मानैत कहलयैन- “काका, बीचमे रहऽ दियौ आ दुनू दिससँ दुनू गोरे उठा-उठा खाएब।” ओना मनमे रहए जे अपन खाएबकेँ सरकारी करमचारी जकॉं हाजरी पुड़ाएब आ भुखाएल पुरन काका छैथे तँए भूखक लहैरमे बेसी खेता। चाह-बिस्‍कुट खेला पछाति बूझि पड़ल पुरन काका आब पतालसँ ऊपर उठि धरतीपर आबि गेला। यएह तँ तीनू दुनियॉंक खेल छी, कियो अकासमे उड़ैए तँ कियो पतालक सात सीढ़ी-निच्‍चॉंमे दबाएल अछि। एकर माने ईहो नइ ने जे बीच बसल धरतीपर कियो ने अछि। सेहो तँ ऐछे, से कोनो आइए अछि सेहो बात नहियेँ अछि, अदौसँ रहल आ ताधैर रहत जाधैर अकास-पताल एकबट्ट भऽ धरतीपर आबि ठाढ़ नइ हएत। विचारोक दुनियॉं एहने अछि। खसल मन, टुटल जिनगीक विचार आ ऊपर उड़ैत जिनगी जाबे एकठाम आबि एक दिस नइ चलत ताबे एकरस भऽ केना सकैए। मुदा से नइ, चाह बिस्‍कुट खाइते-पीबते पुरन काका, चौमासी खेत जकॉं जोतल-चौकियाएल एक रसमे बूझि पड़ला। कहलयैन- “काका, एना किए टॉंहि देने छेलौं जे बौआ आइ हम मरि जाएब। अहीं कहू जे आइ धरि जे सुख-दुख गमेलौं ओ अपना घरमे आ मरैले चलि एलौं हमरा दरबाजापर?” जहिना विचार विचारकेँ छुबैत, प्रेम प्रेमकेँ छुबैत तहिना पुरन कक्काक मनकेँ छुलकैन। छुबाइते बजला- “बौआ, तोरे सबहक- माने समाजेक- मुँह देख अहू अवस्‍थामे ठाढ़ छी, नइ तँ अपन कहि के रहल। तखन तँ जइ समाजक मुँह देख जीबै छी, सेवा करै छिऐ,वएह समाज ने मुँहक चहरो अखैन तक दैत आएल अछि।” पुछलयैन- “से की?” ‘से की’ सुनि पुरन कक्काक मनमे मौलाएल गाछ जकॉं नव कलश जगलैन। जगिते मुँहक रंग बदललैन। रंग बदलैक कारण भेलैन जे भरिसक हमरो सन लोकक बेथा-कथा सुननिहार समाजमे कियो छैथ। मुस्‍की दैत बजला- “बौआ, शुरूमे जहिया ऐ गाममे आबि बसलौं, तहिया अखुनका जकॉं ने एते नमहर गाम छल आ ने एते लोके छल। पिताजीक संग दुनू भाइयो आ माइयो आबि बसल रही। अपन तँ ने खेत-पथार रहए आ ने घरे-घराड़ी, मुदा समाज मीलि रस्‍ते-कातमे घराड़ियो देलैन, खढ़-बॉंसक घरो बना-देलैन आ रोजगारक रूपमे केश-दाढ़ी कटैक काजो देलैन।” जिज्ञासा करैत पुछलयैन- “तइसँ पहिने गाममे नौआ नइ छला?” कहलैन- “नइ। पड़ोसी गामक नौआ आबि दाढ़ियो-केश आ बिआहो, मुड़नो आ सराधोक काज सम्‍हारै छल। मुदा संख्‍यामे कम रहने बेर-बेगरतामे काज खगिये जाइ छेलै। ओना गामो-समाजकेँ नौआक जरूरत छेलैन आ अपनो उजरल-उपटल जिनगीकेँ ठौर भेटल।” पुछलयैन- “जेकर रोजगार लेलिऐ ओ सभ किछु कहलक नइ?” बजला- “की कहितए। वेचारा सबहक अपने जान हल्‍लुक भेलै, तहूमे ओहो सभ की आन छला, बाबूक मसियौत भाइए छला।” “काजक बोइन केना भेटै छल?” ‘बोइन’ सुनि पुरन कक्काक मन विहुँसलैन। मुस्‍की दैत बजला- “दू रंगक कमाइल दइ छला। जिनका केश-दाढ़ी कटै छेलिऐन ओ एक धाड़ा माने एक पसेरी दाढ़ीक आ एक पसेरी केशक कमाइल दइ छला आ जिनका खाली केशेटा कटै छेलिऐन ओ एक पसेरी कमाइल दइ छला।” पुछलयैन- “एक धाड़ा केते भेल?” कहलैन- “बौआ, पहिने कच्‍ची सेर चलै छल। ओना पक्की सेहो छल मुदा कमाइल कच्‍ची सेरसँ दइ छला। पक्की पान सेरक पसेरी छल आ कच्‍ची छह सेरक।” पुछलयैन- “तैसंग आरो किछु दइ छला?” ‘आरो’ सुनि पुरन कक्काक मुहसँ हँसी निकललैन। हँसिते बजला- “समांगे जकॉं सभ बुझै छला। ओना कमाइल दइ छला अगहनमे। मुदा मुड़न-उपनैन, बिआह-सराधमे खैयोले दइ छला आ कमाइलक अतिरिक्‍त लतो-कपड़ा आ सिदहो भेटै छल। जइसँ कहियो गुजर-बातमे दिक्कत नइ हुअए।” पुछलयैन- “दुनू भाँइक परिवार केते दिन शामिल रहल?” कहलैन- “जाबे बाबू-माए जीबै छला, ताबे सभ शामिले छेलौं। शामिलेमे दुनू भॉंइक बिआहो-दान भेल। हम भैयारीमे छोट रही आ भैया जेठ छला। हुनका चारिटा बेटा आ दूटा बेटी भेलैन। हमरा दूटा बेटेटा भेल।” पुछलयैन- “अखन के सभ छैथ?” कहलैन- “भैयाक परिवार तँ दिनो-दिन बढ़िते गेलैन मुदा हमर एकटा बेटा दस-बारह बर्खमे मरि गेल आ दोसर तहेन चालि-चलैनक भऽ गेल- माने गांजा पीअ लगल- जे भरि-भरि दिन ओही पाछू तेना वौराएल रहै छल जे किछ कहि नै। एक दिन खिसिएलिऐ। दुनू परानी पड़ा कऽ सासुरेमे बसि गेल। तेकर किछु दिनक बाद घरोवाली मरि गेल। मुदा तैयो जाबे देहमे हूबा छल ताबे तँ केकरो ने गुदानलिऐ मुदा जेना-जेना हूबा घटैत गेल तेना-तेना सभ किछु बिलटैत गेल! सोल्‍होअना जजमैनको भातिजे सभकेँ दऽ देलिऐ। दऽ देलिऐ बड़बढ़ियॉं,  मुदा तेहेन-तेहेन जनीजाति सभ घरमे आबि गेल जे कियो देखैबला नइ रहल।” पुछलयैन- “आब की सोचै-विचारै छी?” कहलैन- “आब की सोचब-विचारब। तखन तँ...।” मनमे भेल, एक आदमीकेँ खुऔनाइ-पीऔनाइ कोन बड़ भारी काज भेल...। कहलयैन- “अहीठाम रहि जाउ।” ‘अहीठाम रहि जाउ’ सुनि पुरन कक्काकेँ जेना जान-मे-जान एलैन। मुदा बजला किछु ने, मुस्‍कियाए लगला। बूझि पड़ल जेना नव जिनगी भेट गेलैन तहिना खुशीसँ मुस्‍कुराइते रहला।¦¦ शब्‍द संख्‍या : 2234, तिथि : 22 अक्‍टूबर 2015 कथा लेखन क्रम 1. भैंटक लावा- (3105) 2. बिसाँढ़- (2499) 3. पीरारक फड़- (2024) 4. अनेरुआ बेटा- (3339) 5. दूटा पाइ- (3279) 6. बोनिहारिन मरनी- (3396) 7. हारि‍-जीत- (2343) 8. ठेलाबला- (2562) 9. जीविका- (3642) 10. रिक्साबला- (3945) 11. चुनवाली- (2445) 12. डीहक बटबारा- (4724) 13. भैयारी- (4041) 14. बहि‍न- (2692) 15. घरदेखिया- (4018) 16. पछताबा- (2665) 17. डाक्टर हेमन्त- (4398) 18. बाबी- (2163) 19. कामिनी- (2285. 20. स्रष्टाक समग्र रचना- (137) 21. प्रतिभा- (154) 22. मर्म- (142) 23. अधखरूआ- (255) 24. समैक बेरबादी- (213) 25. पहिने तप तखनि ढलिहेँ- (084) 26. खलीफा उमरक सि‍नेह- (165) 27. जखने जागी तखने परात- (103) 28. अस्तित्वक समाप्ति- (218) 29. खजाना- (388) 30. उग्रघारा- (328) 31 बेवहारिक- (218) 32. समर्पण- (149) 33 उत्थान-पतन- (138) 34. देवता- (232) 35. पाप आ पुण्य- (218) 36. परख- (129) 37. आलसी- (136) 38. प्रेम- (293) 39. हैरियट स्टो- (137) 40. बुझैक ढंग- (142) 41. श्रमिकक इज्जत- (093) 42. वंश- (074) 43. तियाग- (145) 44. सद्वि‍चार- (184) 45. साहस- (103) 46. बरदास- (133) 47. भूल- (139) 48. धैर्य- (099) 49. मनुखक मूल्य- (099) 50. मदति नै चाही- (209) 51. मेहनति‍क दरद- (281) 52. मैक्सिम गोर्की- (146) 53. मूलधन- (174) 54. कपटी मि‍त- (281) 55. भीख- (118) 56. भगवान- (098) 57. एकाग्रचित- (261) 58. सीखैक जिज्ञासा- (101) 59. अनुभव- (092) 60. आसिरवादक विरोध- (088) 61. धर्मक असल रूप- (197) 62. सौन्दर्य- (138) 63. स्तब्ध- (257) 64. एकता- (236) 65. विधवा बि‍आह- (176) 66. देश सेवाक व्रत- (134) 67. आत्मबल- (1- (110) 68. स्वाभिमान- (121) 69. कलंक- (429) 70. बुलकी- (211) 71. भद्रपुरुष- (173) 72. झूठ नै बाजब- (103) 73. आर्दश माए- (097) 74. नारी सम्मान- (100) 75. अनुशासन- (190) 76. सादा जि‍नगी- (127) 77. विचारक उदय- (072) 78. पुष्ट इकाइसँ समर्थराष्ट बनैत- (102) 79. डर नै करी- (119) 80. आसिरवाद उलटि गेल- (223) 81. रत्न गमेवाक दुख- (226) 82. निसाँ- (194) 83. सामना- (124) 84. शिष्टाचार- (171) 85. ठक- (115) 86. पत्नीक अधिकार- (128) 87. शिनीची सि‍नेह- (211) 88. सिखबैक उपए- (171) 89. कर्तव्यपरायन सुगा- (171) 90. तस्वीर- (134) 91. मि‍तक प्रयोजन- (359) 92. स्वार्थपूर्ण विचार- (121) 93. संगीक महत- (130) 94. उपहास- (196) 95. महादान- (176) 96. भाग्यवाद- (171) 97. सद्वृति‍- (150) 98. आश्रम नै सोभाव बदली- (281) 99. पुरुषार्थ- (255) 100. नैष्ठिक सुधन्वा- (274) 101. सद्गृहस्त- (195) 102. सद्भाव- (134) 103. आलस्य वनाम पिशाच- (302) 104. स्वर्ग आ नर्क- (265) 105. यथार्थक बोध- (115) 106. विद्वताक मद- (165) 107. अनन्‍त- (128) 108. हँसैत लहास- (184) 109. अनगढ़ चेतना- (162) 110. सत्‍य विद्या- (108) 111. समता- (165) 112. जेते चोट तेते सक्कत- (116) 113. परिष्कार- (198) 114. कथनी नै करनी- (176) 115. शालीनता- (157) 116. मजूरी- (140) 117. जीवन यात्रा- (145) 118. ज्योति‍- (081) 119. पवनक विवेक- (180) 120. आत्मबल-2- (105) 121. खुदीराम बोस- (172) 122. शिष्यकेँ शिक्षेटा नै परीक्षो- (187) 123. लौह पुरुष- (124) 124. जंग लगल- (150) 125. जीवकक परीछा- (117) 126. तप- (162) 127. उल्टा अर्थ- (203) 128. जाति नै पानि- (142) 129. ऊँच-नीच- (206) 130. पागलखाना- (223. 131. दोहरी मारि‍- (1357) 132. केना जीब? - (1031) 133. नवान- (2282) 134. तिलासंक्रान्तिक लाइ- (2034) 135. भाइक सिनेह- (1166) 136. प्रेमी- (2520) 137. बपौती सम्‍पति- (2352‍) 138. डंका- (2422) 139. संगी- (1858) 140. ठकहरबा- (2351) 141. अतहतह- (2477) 142. अर्द्धांगि‍नी- (3045) 143. ऑपरेशन- (1605) 144. धर्मनाथ- (1983) 145. सरोजनी- (1816) 146. सुभद्रा- (1910) 147. सोनमाकाका- (1537) 148. दोती बि‍आह- (1816) 149. पड़ाइन- (1988) 150. केतौ नै- (1211. 151. बि‍हरन- (3174) 152. मायराम- (2037) 153. गोहि‍क शि‍कार- (2113) 154. मातृभूमि- (1036) 155. भबडाह- (2053) 156. परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा- (1888) 157. फागु- (2096) 158. लफक साग- (1192) 159. ति‍लकोरक तरुआ- (1826) 160. एकोटा ने- (1071) 161. धोतीक मान- (472) 162. साझी- (989) 163. सतभैंया पोखरि- (2990) 164. न्‍याय चाही- (1308) 165. पनि‍याहा दूध- (2114) (166. कर्ज- (2860) 167. परदेशी बेटी- (2451) 168. मान- (631) 169. मनोरथ- (1151. 170. कि‍यो ने- (3699) 171. सूदि‍ भरना- (904) 172. जन्‍मति‍थि- (2356) 173. इमानदार घूसखोर- (2204) 174. पटि‍याबला- (2356) 175. सनेस- (1248) 176. उलबा चाउर- (2588) 177. बलजोर- (2320) 178. बेटी) हम अपराधी छी- (3240) 179. बगबारि‍‍- (1847) 180. मुइलो बि‍सेबनि- (4244) 181. सड़ल दारीम- (2442) 182. चुप्‍पा पाल- (2517. 183. एक धाप जमीन- (2522) 184. ओझरी- (1963) 185. मुसहनि- (2277) 186. केलवाड़ी- (2628) 187. स्‍वरोजगार- (2338) 188. घूर- (2749) 189. कनियाँ-पुतरा- (2340) 190. वारंट- (1601) 191. गामक मुँह फेर देखब- (2897. 192. कचोट- (313) 193. काँच सूत- (390) 194. बुधनी दादी- (267) 195. खि‍लतोड़- (396) 196. मुँह-कान- (234 197. अनदि‍ना- (312) 198. अपन काज- (366) 199. दूरी- (264) 200. पुरनी भौजी- (116) 201. छूटि‍ गेल- (111) 202. काल्हि‍ दि‍न- (151) 203. अप्‍पन हारि- (283) 204. कनफुसकी- (137) 205. मुँहक बात मुहेँमे- (135) 206. कनीटा बात- (098) 207. गति‍-गुद्दा- (250) 208. बि‍सवास- (316) 209. कचहरि‍या-भाय- (270) 210. गुहारि- (432) 211. शि‍वजीक डाक-बाक्- (089) 212. सोग- (341) 213. पनचैती- (197) 214. कनमन- (313) 215. अजाति- (085) 216. पटोर- (412) 217. फुसि‍याह- (308) 218. गति‍-मुक्‍ति- (241) 219. चौकीदारी- (437) 220. झगड़ाउ-झोटैला- (256) 221. घबाह ट्यूशन- (246) 222. दादी-माँ- (408) 223. पटोटन- (349) 224. मुसाइ पण्‍डित- (567) 225. भरमे-सरम- (231) 226. देखल दि‍न- (434) 227. फज्झति- (403) 228. अकास दीप- (233) 229. बुधि‍-बधि‍या- (268) 230. पहाड़क बेथा- (216) 231. उमकी- (324) 232. बजन्‍ता-बुझन्‍ता- (147) 233. चर्मरोग- (578) 234. शंका- (325) 235. ओसार- (213) 236. छोटका काका- (394) 237. सीमा-सड़हद- (195) 238. रमैत जोगी बोहैत पानि- (253) 239. गंजन- (172) 240. सजए- (089) 241. घटक बाबा- (335) 242. आने जकाँ- (048) 243. दान-दछि‍ना- (150) 244. उड़हड़ि- (503) 245. मत्हानि- (260) 246. मेकचो- (221) 247. झूटका वि‍दाइ- (350) 248. मुँहक खति‍यान- (278) 249. कोसलि‍या- (234) 250. हूसि‍ गेल- (204) 251. पोखला कटहर- (153) 252. सरही सौबजा- (267) 253. तेरहो करम- (322) 254. डुमैत जिनगी- (295) 255. चोर-सि‍पाही- (197) 256. दूधबला- (271) 257. टाइपि‍स्‍ट- (263) 258. समदाही- (300) 259. बुढ़ि‍या दादी- (331) 260. पाइक मोल- (2412) - (22 दिसम्‍बर 2013 261. चोरूक्का झगड़ा- (538) 24 दिसम्‍बर 2013 262. अपसोच- (548) 26 दिसम्‍बर 2013 263. पतझाड़- (2587) 31 दिसम्‍बर 2013 264. झीसीक मजा- (453) 1 जनवरी 2014 265. मति-गति- (1807) 07 जनवरी 2014 266. अपन सन मुँह- (5696) 25 जनवरी 2014 267. रिजल्‍ट- (2343) 16 जनवरी 2014 268. सुमति- (3052) 30 जनवरी 2014 269. फेर पुछबनि- (346) 31 जनवरी 2014 270. माघक घूर- (1683) 06 फरवरी 2014 271. खर्च- (330) 07 फरवरी 2014 272. अखरा-दोखरा- (342) 10 फरवरी 2014 273. पेटगनाह- (593) 14 फरवरी 2014 274. बड़की माता- (1224) 18 फरवरी 2014 275. धरती-अकास- (184) 19 फरवरी 2014 276. बकठाँइ- (883) 24 फरवरी 2014 277. चैन-बेचैन- (936) 09 मार्च 2014 278. हथि‍याएल खुरपी- (645) 11 मार्च 2014 279. अलपुरि‍या बरी- (287) 12 मार्च 2014 280. नीक बोल- (565) 13 मार्च 2014 281. सुआद- (624) 14 मार्च 2014 282. गंगा नहेलौं- (690) 19 मार्च 2014 283. भोँटक गहमी- (508) 24 मार्च 2014 284. भँसैत नाह- (597) 26 मार्च 2014 285. पान पराग- (1692) 29 मार्च 2014 286. सि‍रमा- (760) 31 मार्च 2014 287. नौमीक हकार- (1119) 03 अप्रैल 2014 288. फोंक मकड़- (1)744) 10 अप्रैल 2014 289. केते लग केते दूर-(1252) 14 अप्रैल 2014 290. अभि‍नव अनुभव- (326) 16 अप्रैल 2014 291. खोंटकर्मा- (1184) 19 अप्रैल 2014 292. कि‍छु ने- (503) 22 अप्रैल 2014 293. झकास- (1589) 26 अप्रैल 2014 294. अप्‍पन-बीरान- (2919) 01 मई 2014 295. सजमनि‍याँ आम- (611) 04 मई 2014 296. अर्जुन रोग- (1003) 7 मई 2014 297. गरदनि‍ कट्टा बेटा- (575) 10 मई 2014 298. नैहराक धाड़- (885) 14 मई 2014 299. अवाक- (1047) 17 मई 2014 300. पोखरि‍क सैरात- (923) 20 मई 2014 301. दनि‍याँ डाबा- (409) 22 मई 2014 302. धरम काँट- (395) 23 मई 2014 303. पलभरि- (1116) 24 मई 2014 304. कि‍रदानी- (5296) 14 जुन 2014 305. सगहा- (2867) 22 जुन 2014 306. अकाल- (1238) 24 जुन 2014 307. उझट बात- (1152) 26 जुन 2014 308. कर्जखौक- (1175) 2 जुलाई 2014 309. उनटन- (1187) 6 जुलाई 2014 310. रेहना चाची- (1307) 9 जुलाई 2014 311. बुधनी दादी- (1256) 11 जुलाई 2014 312. अउतरि‍त प्रश्‍न- (1229) 14 जुलाई 2014 313. हारि- (1240) 16 जुलाई 2014 313. सोनाक सुइत- (1135) 17 जुलाई 2014 314. मरूभूमि‍- (1214) 20 जुलाई 2014 315. असगरे- (1557) 24 जुलाई 2014 316. पुरनी नानी- (1304) 27 जुलाई 2014 317. कटा-कटी- (1140) 30 जुलाई 2014 318. केते लग केते दूर-(1206) 3 अगस्‍त 2014 319. गलती अपने भेल-(3386) 06 अगस्‍त 2014 320. चोरक चोरबती- (884) 6 अगस्‍त 2014 321. घर तोड़ि‍ देलि‍ऐ- (1527) 10 अगस्‍त 2014 322. सजल स्‍मृति- (2363) 14 अगस्‍त 2014 323. सनेस- (2654) 16 अगस्‍त 2014 324. सए कच्‍छे- (488) 19 अगस्‍त 2014 325. एक मुठी घास- (411) 21 अगस्‍त 2014 326. करि‍छौंह मुँह- (318) 24 अगस्‍त 2014 327. पुरस्‍कार- (2414) 24 अगस्‍त 2014 328. गावीस मोइस- (687) 29 अगस्‍त 2014 329. मनकमना- (6118) 19 सि‍तम्‍बर 2014 330. घरवास- (4884) 26 सि‍तम्‍बर 2014 331. समधीन- (6096) 04 अक्‍टुबर 2014 332. चापाकलक पाइप- (1616) 7 अक्‍टुबर 2014 333. कलम हानि कऽ-(2226) 10 अक्‍टुबर 2014 334. लतियाएल जिनगी-(1184)14 अक्‍टुबर 2014 335. गामक शकल-सूरत-(2596)20अक्‍टुबर 2014 336. जितिया पावनि- (3706) 24 अक्‍टुबर 2014 337. सुखाएल सूरत- (3690) 30 अक्‍टुबर 2014 338. भैयारी हक- (3131) 4 नवम्‍बर 2014 339. ठकुआएल भुसवा- (3356) 13 नवम्‍बर 2014 340. खुदियाएल- (2894) 17 नवम्‍बर 2014 341. खटहा आम- (3528) 22 नवम्‍बर 2014 342. ढकरपेँच- (3740) 30 नवम्‍बर 2014 343. असहाज- (2853) 04 दिसम्‍बर 2014 344. समरथाइक भूत- (3832) 07 दिसम्‍बर 2014 345. विदाइ-(5103) 17 दिसम्‍बर 2014 346. खलओदार- (731) 19 दिसम्‍बर 2014 347. मनुखदेवा (1016) 22 दिसम्‍बर 2014 348. उमेद- (3643) 31 दिसम्‍बर 2014 349. गलगर भैंस- (3392) 4 जनवरी 2015 350. जाड़ फाटि गेल- (3328) 9 जनवरी 2015 351. सुरता- (3304) 15 जनवरी 2015 352. असुध मन- (2353) 19 जनवरी 2015 353. धरमूदासक अखड़ाहा- (1410) 21 जनवरी 2015 354. ठोररंगू- (1531) 23 जनवरी 2015 355. लगबे ने कएल- (1449) 25 जनवरी 2015 356. उकड़ू समय- (1467) 27 जनवरी 2015 357. चास-बास दुनू गेल- (1615) 29 जनवरी 2015 358. नहरकन्‍हा- (1209) 11 मार्च 2015 359. बटखौक- (1272) 14 मार्च 2015 360. पसेनाक धरम- (1263) 16 मार्च 2015 361. जेठुआ गरदा- (1103) 18 मार्च 2015 362. हँसीएमे उड़ि गेलौं- (1243) 20 मार्च 2015 363. बुड़िबकहा बुड़िबक बनौलक- (1234) 23 मार्च 2015 364. हमर बाइनिक विचार- (1207) 26 मार्च 2015 365. नोकरिहारा- (1146) 26 मार्च 2015 366. घसवाहि- (1213) 28 मार्च 2015 367. तेतर भाइक कविता- (1319) 1 अप्रैल 2015 368. छूआ- (1223) 6 अप्रैल 2015 369. दोसराइत- (1270) 9 अप्रैल 2015 370. लछनमान- (1173) 13 अप्रैल 2015 371. हमर कोन दोख- (1527) 17 अप्रैल 2015 372. मौसी- (1393) 21 अप्रैल 2015 373. नटकिया गति- (1313) 24 अप्रैल 2015 374. खाए चाहैए- (1223) 27 अप्रैल 2015 375. मधुमाछी- (1892) 07 मई 2015 376. दनगर घास- (2775) 13 मई 2015 377. सझिया खेती- (3135) 23 मई 2015 378. मुफतिया माल- (3231) 29 मई 2015 379. मथाहाथ- (2923) 02 जून 2015 380. पहपटि- (1369) 05 जून 2015 381. इजोरिया राति- (1512) 07 जून 2015 382. तीन जुगिया भाय- (2010) 12 जून 2015 383. अँगनेमे हेरा गेलौं- (605) 14 जून 2015 384. डकरा हाल- (2529) 17 जून 2015 385. जेतए जे हौउ- (2062) 21 जून 2015 386. गठूलाक गारि- (1532) 25 जून 2015 387. कनी हमरो सुनू- (1983) 29 जून 2015 388. गामक बान्‍ह- (2437) 03 जुलाई 2015 389. गुड़ा खुद्दीक रोटी- (2443) 08 जुलाई 2015 390. सीरक गाछ- (3071) 13 जुलाई 2015 391. हरदीक हरदा- (2924) 19 जुलाई 2015 392. जाम- (3355) 29 जुलाई 2015 393. गण्‍डा- (2304) 5 अगस्‍त 2015 394. हाथी आ मूस- (3016) 11 अगस्‍त 2015 395. मुसरी आ घोड़ा- (3625) 17 अगस्‍त 2015 396. फलहार- (2350) 25 अगस्‍त 2015 397. भोरक झगड़ा-  (2697) 31 अगस्‍त 2015 398. क्रियाशील-  (3395) 13 सितम्‍बर 2015 399. आइ एम शॉरी- (2927) 23 सितम्‍बर 2015 400. ओऽ होऽ होऽ हूसि गेल- (1025) 29 सितम्‍बर 2015 401. मीनी भ्रष्‍टाचार- (825) 5 अक्‍टूबर 2015 402. गजपट खेती- (1171) 8 अक्‍टूबर 2015 403. समुद्री विद्या- (787) 11 अक्‍टूबर 2015 404. राकशे रहि गेलौं- (959) 12 अक्‍टूबर 2015 405. निनिया देवीक आराधना- (679) 13 अक्‍टूबर 2015 406. बताहे बताह बनौलक- (574) 15 अक्‍टूबर 2015 407. धोखा- (1172) 17 अक्‍टूबर 2015 408. खसैत गाछ- (2234) 22 अक्‍टूबर 2015 409. वैष्‍णवी भगवती- (2099) 01 नवम्‍वर 2015 ◌ ◌ ◌ ◌ ◌ ◌ [1] बरसातक समैमे २ मैथिलीक किछु समकालीन उपन्‍यासक विविध स्‍वरूप :: रतन झा समकालिन मैथिली उपन्‍यासक विषयमे चर्चासँ पहिने समकालिन शब्‍दक अर्थ स्‍पष्‍ट करब आवश्‍यक अछि। समकालीनक अर्थ होइत अछि ई-काल अथवा वर्तमान-काल। मुदा ई कालखण्‍ड तँ सवयं परिवर्तनशील अछि ई सतत् आगू दिस घुसकैत रहैत अछि। ई-कालखण्‍डक अन्‍तिम क्षणकेँ तँ अखुनका क्षण सेहो कहि सकै छी अर्थात कहबाक तात्‍पर्य ई जे आब अखन जे उपन्‍यास लिखल गेल अछि, मोटा-मोटी वएह समकालीन उपन्‍यास छी। मुदा प्रश्‍न उठैत अछि जे ऐसँ पहिने उपन्‍यास लिखल गेल, ओहो तँ ओइ समैयक समकालीन उपन्‍यास छल। अर्थात् प्रत्‍येक युगक उपन्‍यास ओइ युगक समकालीन उपन्‍यास छी। मैथिली साहित्‍यमे उपन्‍यास विधाकेँ समृद्ध करबामे अनेक उपन्‍यासकार शिल्‍प, शैली एवं कथानक व वातावरण आ तथा सामाजिक परिवेशक वर्णनमे सफल भेल छैथ। डा. विदित एकटा प्रयोगधर्मी उपन्‍यास ‘मानवकल्‍प’ 2008 ई.मे प्रकाशित करौलैन। मैथिली उपनरूास लेखनक पारम्‍परिक प्रवृतिसँ भिन्न ऐ उपन्‍यासमे एकटा गामकेँ पात्र बनौल गेल अछि। आन उपन्‍यासक नायकक उमेरसँ बहुत बेसी उमेर ऐ उपन्‍यासक नायक अछि। ऐ उपन्‍यासक नायकक उमेर तीन सए पचास बर्ख अछि। बनवासी जनजीवनपर लिखल मैथिलीक प्रथम उपन्‍यास ‘विप्‍लवी बसेरा’ छी तँए मिथिलाक द्रविड समुदायक उत्‍थानक कथा ‘कोसिलिया’ उपन्‍यासमे अछि। एकटा अनाथ कन्‍याक संघर्ष ओ ओकर आत्‍मबलक चित्रण ‘करपुरिया’ उपन्‍यासमे केने छैथ। संयोग आ चमत्‍कारक अपूर्व समन्‍वय विदितजी ‘विधकरी’ उपन्‍यासमे देखेने छैथ। साहित्‍य ओ समाजक बीच जे खाधि बनल अछि तेकरा भरबाक लेल एकटा समाधान प्रस्‍तुत केने छैथ ‘परिक्रमा’ उपन्‍यासमे माए-बापक पीड़ाकेँ नीक जकॉं उभारि ओकर एकटा समाधान प्रस्‍तुत केने छैथ- ‘केकरो कहबै नहि’ उपन्‍यासमे। वीणा ठाकुरक 2009 इस्‍वीमे प्रकाशित उपन्‍यास ‘भारती’ अछि। मंडन मिश्रक पत्‍नी ओ कुारिल भट्टक बहिन भारतीसँ सम्‍बद्ध अनेको किंवदति आइयो मिथिलामे सुनल जाइत अछि। वीणा ठाकुर ओइ विद्धान दम्‍पतिमे सुनल जाइत अछि। वीणा ठाकुर ओइ विद्वान दम्‍पतिक आधारपर बनल आलोच्‍च उपन्‍यासक लेखन केलैन अछि। ऐ उपन्‍यासमे ऐतिहासिक तथ्‍यकेँ गौण राखि अपन कल्‍पनाकेँ आधार बनौलैन अछि। मुदा उपन्‍यासक लेले जे तदनुकूल वातावरण चाही तेकर निर्माण दिस लेखिका सचेष्‍ट छैथ आ उपन्‍यासक भाषा,शब्‍दक चयन ओ ठाम-ठाम दार्शनिक मंथन युक्‍त व्‍याख्‍या सभ ऐमे सहायक भेल अछि। एकरा दार्शनिक दम्‍पतिपर केन्‍द्रित उपन्‍यासमे दर्शनक झॉंस रहब स्‍वभाविक अछि। मुरारि मधुसूदन ठाकुरक ‘देवव्रतक आत्‍मकथा’ 2010 इस्‍वीमे प्रकाशित भेल। ऐ उपन्‍यासक नायक भीष्‍म पितामह छैथ, जिनकर आदि देवव्रत छेलैन। आत्‍म कथात्‍कक शैलीमे लिखित ऐ उपन्‍याससँ एकर लेखकक गहन अध्‍ययन ओ विद्वत सहजे परिलक्षित भऽ जाइत अछि। महाभारतक गम्‍भीर अध्‍ययनक पश्चात लिखित ऐ उपन्‍यासमे लेखक वातावरणक निर्माण ओयुगक अनुकूल पत्रोचित भाषाक प्रयोगमे अत्‍यन्‍त सफल भेल छैथ। देवव्रत अर्थात द्वापरयुगीन महाभारतक एक आबाल ब्रह्मचारी जे अपन पितृ भक्तिमे आजीवन ब्रह्मचारी रहबाक तथा हस्‍तिनापुरक चक्रवर्ती सम्राटक पदपर नहि बैसबाक भीषण प्रतिज्ञा करबाक कारण महामना भीष्‍म नामसँ विख्‍यात भेला। अविवाहित रहबाक कारणें पुत्र प्राप्‍तिक सम्‍भावनो केना होइतैन। तथापि ओ भीष्‍म पितामह संज्ञासँ आइयो इतिहासमे प्रसिद्ध छैथ। ओहन भीषण प्रतिज्ञाक प्रतिफल की भेटलैन एक जन्‍मेसँ आन्‍हर, दोसर पुत्रक मोहमे विवेको ऑंखिसँ अन्‍ध अपन एक भातिजकेँ राजगदीपर बैसा ओकर अन्न खाइत रहलाक दुआरे उद्वण्‍ड दुर्योधन, दुश्‍शासन सदृस पौत्र सबहक द्वारा होइत अनीति-अत्‍याचारकेँ ऑंखि मुनि सहैत रहबाक लेल बाध्‍य होमए पड़लैन। की भीष्‍मक प्रतिज्ञा करब उचित छेलैन? की प्रतिज्ञा करबाक समए भविष्‍यक प्रति जे सुख-समृद्धि मानसिक शान्‍ति प्राप्‍तिक कल्‍पना छेलैन से फलीभूत भेलैन? मधुकान्‍त झाक ‘स्‍वेदजीवी’ 2008 इस्‍वीमे प्रकाशित भेल। स्‍वेदजीवी वस्‍तुत: मील मजदूर समुदायक जीवन,ओकर सामाजिक परिदृश्‍य, चिन्‍ता–समस्‍या,ओकर राग-विराग,ओकर अपेक्षा-उपेक्षाक कथा कहैत अछि। मार्क्‍स जइ श्रमिक वर्गक अधिकार लेल अबाज उठौने रहैथ आ तकर बाद ‘दुनियॉंक मजदूरएक हौउ’क जे विश्वव्‍यापी नारा पड़ल छल ताइ परिपेक्ष्‍यमे कार्य केनिहार प्रवासी मैथिल श्रमिक वर्गक जीवनक आरोह-अवरोहक तानी-भरनीसँई उपन्‍यास-कथा बूनल गेल अछि।  आ स्‍वेदक अमूल्‍यता स्‍थापित कएल गेल अछि। अपन विषय-वस्‍तु, विस्‍तृत फलक एवं संवेदनापूर्ण लेखकीय दृष्‍टिक संगे एकर भाषा, शिल्‍प, अभिव्‍क्‍ति कौशल प्रवाहपूर्ण गद्य और सम्‍प्रेषणीयता एकरा हृदयग्राही आ चिर स्‍मरणीय बना दइ छै। अन्‍तमे कहि सकै छी जे जहियासँ समकालीन इतिहास अस्‍तित्‍वमे आएल अछि तहियासँ प्रत्‍येक उपन्‍यासकेँ ऐतिहासिक उपन्‍यास कहल जा सकैत अछि। कारण कोनो नीक उपन्‍रूासमे सामाजिकता आ समकालीनता दुनू रहै छै। सन्‍दर्भ सूची :- 1.        झा विद्यानाथ ‘विदित’ मानव-कल्‍प, प्रस्‍तुति प्रकाशन दुमका- 2008 2.      झा विद्यानाथ ‘विदित’ विप्‍लवी बसेरा, दुमका- 2009 3.      झा विद्यानाथ ‘विदित’ करपुरिया, प्रस्‍तुति प्रकाशन दुमका- 2009 4.     ठाकुर वीणा, भारती, मिथिला रिसर्च सोसाइटी कविलपुर, दरभंगा- 2009 5.     ठाकुर मुरारि मधुसूदन, देवव्रतक आत्‍मकथा, नवरत्न गोष्‍ठी दरभंगा- 2010 सम्‍पर्क : पति- श्री विकास कुमार झा गाम : घोघरडीहा पत्रालय : घोघरडीहा जिला : मधुबनी ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कामिनी कामायनी- लघुकथा-भागमंती २.ललन कुमार कामत- किछु विहनि आ लघु कथा १ कामिनी कामायनी लघुकथा ॥  भागमंती ॥ बड़ दिनक बाद आइ ओइ घरक खुजल पुबरिया खिड़की दिस मानो दायके  धियान गेल । जाफरीसं घेरल, चुहचुही सं भरल , सुरूजक किरीनमे उमकैत, फूल पत्तीसं खिल खिलाइत एक तल्ला  घर । डबडबा गेलन्हि आंखि, हुलकय लागलै अतीत । तहिया ई इलाका एक्दम्मे सुन मसान छलै। राति के कोन गप्प ,दिन दहाड़ों ओमहर ज़ेबा क नाम प कोढ़ हहरि उठैक । रिक्शा वाला सेहो उमहर के यात्री के मूड़ी झूला क बरजै लगैक । महाराजी पूल के अहि पार पंचानाथ के पूजा करय बला लोक ,जनी जाति सेहो झुंडे में आबेथ,  आ पुल के ओहि पार कनी दूरस्थ  सती स्थान के पूजा करि क हाली हाली घूरि जाईथ। मुदा शहरीकरण के तीव्र आँधी बसात के चपेट मे एला के कारण इमहरका जमीन तहिए सं मोटगर पाय मे  बिकै लागल छल।आ लगिच क गाम के महेश बाबू दू कट्टा जमीन किनी क अहि ठाम चारि टा कोठरी,किचन आ बाथरूम बना क बाकी जमीन के जाफरी स घेर लेने छलैथ।कंपाउंड मे छहर द ,आम लताम,शरीफा , नेबो,केरा के गाछ संग जाफरी प  लतरल लत्ती सब में लुधकल  करेल ,सजमनि ,घेरा लगवा देलंहि। जे से तोड़ि क ल जाय,आ महेश बाबू खुश होथि,केकरो काज त भेल हमर परिश्रम । हुनक साबिकक पोखरा पाटन घर बड़ नीक खेती पथारी भरल पूरल पैलवार क दालान सेहो शहरक टुनमुनिया कोठरी  के ड्योढ़ स बेसिए छलेंह । तखन राति बिराति , कोर्ट मुकदमा ,डाक्टर अस्पताल क फेरि लगला प राति कटबा लेल एक टा अपन छत त भ गेल छल । ओहि घर क चौखटि प तहिया स नियमित दीप जरलै ,जखन महेश बाबू के बड़का पोता क विवाह दुरागमन भेल ।कनिया के सीथ में सिंदूर पड़ितै मातर महेश बाबू के कहिया कत्त स कतेको अटकल काज सुनैट गेलैन। पिपरौलिया वाला जमीन के केस जीत गेला ,छोटका बाबा विधानसभा के चुनाव मे भारी बहुमत स विजयी घोसीत भेला ,तेसर पोता के आर्मी में नौकरी लागि गेलेन्ह,सत्तरह साल स संतान के बाट तकैत ,सुरूज़ देव के अरघ प अरघ चढ़बैत बेटी के बेटा भेलैंह,गाय के बाछी भेलय ,सासुर में कन्या सुमंगली मानल गेली ।चतुर्थी के परते दुरागमन करि कनिया के ल आयल गेल । ददिया सौस पहिनहि स मुनादी करबा देलखिन जे सब गोटे हुनका भागमंती नाम स सोर पाड़ेथ । हुनका होयन्हि कि पोत्पुतौह के माथ प राखी कि हाथ मे राखी ,कि करेज चीर क ओहि मे स्थापित करी ली ।दाय नौड़ी सब सेहो भागमंती भौजी अथवा बौवासिन कहनाए प्रारम्भ करि देने छल । कनिया अपन गाम में इंटर में पढ़ैत छली,त हुनक नाम कालेज में लिखा क किछू दिन सासुओ अपन खबासिन,भनसीया  मुनेसरा  संग  आबी क रहलखीन । मुदा ओत्त गाम प राज काज में बड़ हर्ज होमय लागल छलै। बड़ सोचि विचरि क पैल वारक सबस अरामतलबी  प्राणी बूलन पीसी के गाम स उठा क शहरि मे राखि देल गेल । छोटका ककाक बेटा श्रीहर जे मैट्रिक के परीक्षा गाम के स्कूल स देने छले,मेडिकल के तैयारी केलेल आईएसी में नाम लिखा ओहो डेरा प जाकय रहय लागला । बड़का पोता कत्तों बाहर नौकरी करैत छल । एक गोट नब रिक्शा कीन क कनी दूरस्थ  पड़ोसी लकड़ी के दोकान बलाके भातिज बिपिन के अही शर्त प देल गेल जे कनिया के कत्तों जेबा एबा मे कोनो फिरिसानी नै होय ,तेकरा बाद मोन हो त भाड़ो कमा लै। किछू पाय महिनवारी सेहो बन्हि देल गेल ओकर । डेरा प के सब इंतजाम करि घरवैया निफीकीर भ गेल छला  । कनिया सुभासिनी अपन दियर संग कओलेज जाईथ,आ रिक्शा हुनका उतारि श्रीहरि के कओलेज छोड़ैत।घूरती काल में सुभासनी एसगरे रिक्शा स जाईथ ।श्री हरी उमहरे स ट्यूशन चलि जायथ ,कखनों कोनो सवारी नै भेटैय त हुनका पैरे डेरा प आबय पड़ेंह। श्री देखबा में सोरगर पोरगर गोर आकर्षक युवक भैयो क ततेक लजकोटर जे सदिखन धड़ खसौने ,धरती मे सटल ,गुम सुम गुमसुम,मुदा मेहनतिया बड़।आ राति दिनुक दिमागक  घिसाई स स्थानीय मेडिकल कओलेज में अपन स्थान निश्चित करवा लेलन्हि। बरस छौ मास लगलै मेडिकल कओलेजक परिमार्जित वातावरण श्री के व्यक्तित्व के धो मांजि क दर्पण सन चमका देलकेंन्ह। सीना तनि गेलय, पोशाक बदलि गेलय आ आब केकर नजरि एहेन छल जे हुनका प नहिं अटकै । लोकल भेला क कारने हॉस्टल नहिं नेने छलथि। सुहासिनी के खुशी के ठेकान नहिं ,कत्तो जाईथ त हुनका होन्हि श्री हुनका संग रहैथ।हुनको भरि माथक  सिंदूर घटि क आध आंगुरक भ गेलन्ह,केश स तेल उड़ि गेल, पार्लर के फेरी लगा केश छोट करबा ,भौं छिलबय लागल छली । एक दू बेर घरबला लग  जा बड़का शहरक  हाव डीव ल लेने छलिह । गामक धाख छुटबा संग  , अंगेजी के दू चारि शब्द सेहो बाजि लईत , आब ओ माथ झूका क नै,माथ उठा  क  निधोक भ चलैत फिरैथ ,त आर सुन्नर लगैथ। विषय सेहो कोनो तेहने सन छल जाहि में कोनो तरहक दिमाग नहि लगाओल जायछै।हुनका कोन नौकरी के बेगरता छल,ओ त ओहिना सख स पढ़ि रहल छली ,दुणु कुल में पहिल स्त्री ,जे कओलेजक मुंह देखलेंन । पति देव  दू तीन मास  प अबैत छला। आब  हिनक बीए के अंतिम बरख चलि रहल छल ,परीक्षा द  माघ फागुन में ई अपन घरवाला के डेरा प जाय वाली छलिह। इमहर  श्री कतेक बेर महिला कओलेज सुभासिनी संग जायत अबैत रहला ,मुदा आब हुनको  लाल दुपट्टा अपन गिरह मे बांधी नेने छल। एना बुझि पडलै जे कियो हुनक टिकी काटि के महिला विद्यालय के सोझा ठाढ़ नीमक गाछ क नीचा गाड़ि देने होय । कतेक बेर अपन किलास छोडिओ क ओ ओतय ठाढ़ रहैथ। सखी बहिनपा के टोंट सुनैत, मने मन मुसकेत सुहासिनी कखनों राज ,कखनों मनो कामना मंदिर, कखनों टावर घूमय जायथी,कखनों सिनेमा ।अपन पति के लिखल चिट्ठी हुनका पढ़ि पढ़ि क सुनाबैथ,आ  हुनक आंखि में उपजल ईरखा देखि अंतस करन धरि मुग्ध होईथ । गाम स नीत दिन किओ नै कियो,   मइयाँ क हाथ क बनल किछू विशेष पकवान ल क आबि जाय।पीसी के शहर में मोन औनाय त ओ इमहर उमहर के सखी बहिनपा स गप्प लड़ा क ,फेर बिपिन के रिक्शा स दु चारी दिन लेल गाम  घुरि आबेथ।मानो दाय स आगा खसि क गप्प करय बाली वएह स्नेहिल स्त्री छलिह।    एहने सुखक सुवासित मलयानिल सँग जिनगी कटि रहल छल। गोतिया नाता के बड़का लत्ती,आवा जाही , सेहो समय के सुगंधित बना रहल छल। भदवारि मास आबि गेल त बरखा बूनि,सँग कारी कचोर मेघ अपन लट छिटकौने ,आकाश मे छिरहरा खेलाय लागल।एक गोट एहने मनोरम साँझमे जखन ओ अपन बरंडा मे असगर  बैसल गर्जइत मेघ आ चमकैत बिजूरी के जुगल बंदी देख रहल छली,हठात ओ श्री के बजबय लेल हुनक कोठरी दिस बढ़ली। कुर्सी प बैसल ,दुनू टांग टेबुल प धेने  पेट प धैल कोनो किताब मे डूबल ओ  मुसैक रहल छल। हिनका देखि किछू घबडायल सन,किछू अनसोहात भावना के शिकार सन  झट दनी किताब बंद  करि देलथी। सुहासिनी झपटलखीन “,किएहेन पढ़े छलहू,जे हमारा देखि क बन्न करय पडल,एहेन बैरि हम भ गेलहू”।मुदा श्री हुनका किछू जबाव नै द क ,हुनक हाथ झिकैत कोठरी स बहरा गेल छलथी। ई सामान्य सन गप्प सुहासिनी के बड़ व्यथित करि देने छल ।दालि मे किछू कारी नजरि अयलन्ही। भरि राति मोन मे भांति भांति के गप्प बाईस्कोप मे देखाओल दृश्य  जका घूरियाति रहल ।  परात भेने श्री जलपान करि क कओलेज चलि गेला ,मुदा ओ बहन्ना करल ओछोन प पड़ल रहली ,अपन कॉलेज सेहो नहिं गेली । पीसी गाम गेल छली ,आ भनसिया के माछ आनय लेल पठा क ओ श्री के कोठरी पईसी टेबल प रखल ओकर एक एक किताब झाड़ली।इमहार सूंघली ओमहार कनखिएली ,कत्तों किछू नै हाथ अयलन्ही। दोसर तेसर दिन सेहो प्रयास कयल,मुदा अहू बेर निरर्थक । मोने मोन ठेकाने लगली कोनो फोटो जका अवश्य छल । मुदा केकर ? इमहर दुर्गा पूजा के लेल कओलेज मे तातील घोसित करि देल गेल ।घरवाला परसूँ आबि रहल छला।दू तीन दिन मे ओ हुनका संग हुनक डेरा प चलि जयति । गाम स जतरा करि डेरा अयली।भोरका ट्रेन छले। चीज वोस्त कोनो बेसि नै ,मात्र दस दिन लेल एक टा अटैची आ एयर बैग काफी छले । दुनू भाई गप्प करैत करैत कोनो समान आनय टाबर दिस गेला ,भनसिया भानस बनबय मे लिन तखन ओ एक बेर फेर हुलकी मारलैन श्री के कोठरी में। ताख प रखल एक टा मोटका किताब हाथ मे लेलथी ।सबूत भेट गेलन । चुप चाप सबूत सहित अपन कोठरी मे आपस आबी गेली । दस दिनक छुट्टी ,बड़ विलंब स बीतल । पति के हुनक मुरुझायाल ,मुंह देखि आश्चर्य होयन्ह कि भेल जा रहल अछि ? किछू त कहू,डाक्टर स गप्प करी।मुदा ओ कहैथ परीक्षा के डर गारा मोकि रहल अछि । “छोडु परीक्षा ,तरीक्षा अहा के कोण नोकरी करबा के अछि” ।पति के अहि गप्प प ओ सहमि क बजैथ “ अतेक मेहनत अकारज भ जायत,मात्र दू मास आर छैक बस”। छठी के परना के उपरांत ,नवंबर के कानी मोलायम मोलायम सान रौद में कओलेज खुजल त ,चारहू दिस किशोर ,युवा किल्लोल प्रस्फुटित होय लगलै।लाल पियर,परिधान ,कंधा प झुलैत पर्स ,पैर में ऊंचका एड़ी के सैंडील,सखी सहेली ठिठिया ठिठिया क अपन हिय के उल्लास प्रकट करि रहल छल।छात्र सभक संग शिक्षिका सब सेहो जेना प्रसन्नताक महाकाव्य बांचि रहल होयथू । एना बुझी पड़ेक जेना वसंत आबि क ओहि ठाम रमि रहल छल  । मुदा सुहासिनी के आंखिक नीचा क करि कारी गोला किछूआओर कहबा लेल व्यग्र छल । ओ गुमसुम ,मुरुझैल सन काकरो बड़ उद्विग्नता स प्रतीक्षा करि रहल छली। सखी सब ठिठौली करेन्ह। “जीजाजी मोंन  पड़ी रहल छथीन,तै हमार सखी अटेक उदास ,आ ‘के पतिया लय जायत रे मोरे प्रियतम पास” ।किओ कहे ‘कोन काज छल पढ़े के ,हम रहितौं त किन्नों नहि अबितौं ,प्रियतम के छोड़िक,पढ़ाई जाए चूल्हीमें”। सुहासिनी के किछू नै सुनाई पड़ल,व्याकुल हिरणी सन ओ ओहिना इमहर उमहर तकैत रहली । ओहि दिन ओ लाल नूआ लाल आंगी ,लाल चूड़ी ,आ लाल सैंडील पहिरने छलिह,। हठात हुनक नजरि लाल पियर बेलबौटम वाली कन्या प टिकल। “पुष्पा” मस्तिष्क में नाम अनुगुंजित होमय लगल । ओकर पछोर धेलथी। तबैत कओलेजक प्रथम घंटी बाजि चुकल छल ,सब कियो धड़ फड़ धड़ फड़ करैत अपन अपन कक्षा दिस बढ़ै लागल छल ।क्लास मे प्रवेश करय स पहिनहि ओ  पुष्पा के पाछा स हाथ खिंचलक “रुक तोरा स बड़ जरूरी गप्प करबक अछि”। प्रथम वर्षक छात्रा अपना सोझा अंतिम वर्ष के छात्रा के देखि घबड़ा गेल । ओ ओकरा खींचने खींचने बाथरूम दिस सुनसान मे ला आयल । ओकर लिखल चिट्ठी ,ओकर फोटो देखबैत बाजल “प्रेम करब के बड़ सख छलो, पूरा कओलेज के देखबिओ तोहर किरदानी”। आ अपन पैरक सैंडील उतारि ओकरा प पेशेवर अपराधी सन टूटि पडले । पहिने त पुष्पा सकपका गेल छली ,मुदा बादमे ओहो सीना तानि अड़ी गेली,की करबें। तखनेएक सेंडिल ओकर आंखि प लगले आ ओ बफारि कटैत नीचा खसि पदल ।“म्या गै म्या” एक त महा भयौन ध्वनि स सम्पूर्ण बाथरूम काँपि गेले । सुहासिनी प जेना अनेकों चुड़ैल असवार छल,ओ नीचा खसल पुष्पा प लात घुस्सा के बरसा करैत,भांति भांति के गारि पढ़ि रहल छल । ओकर पीठ प किओ डंडा मरलकै ‘राक्षसी” ओ मुंह उठौलक बड़का भीड़ संग गीता मैडम छलिह । बेसुध पुष्पा के उठा पुठा क बगल के क्लीनिक ल गेल ,जतय ओकरा मृत घोसीत करी डेल गेल छल । कनी काल मे पुलिस आबी क सुहासिनी के अपन जीप मे बैसा क ल जायत रहलै।कियो अनेरे घंटी टनटना देलके। चारहू कात सोर सराबा ,हो हल्ला होमय लागल छल ।कतेको प्रकारक नारा लगायल जाय लागल।आनन फानन मे सूचना बोर्ड प एक सप्ताह के छुट्टी के नोटिस चिपका देल गेल छल । मानो दाय हुनके द्लान प बैसल छलिह,जखन पुलिसक गाड़ी पिपियाती ,घिघियाति गर्द उड़बैत हुनका दरवज्जा प आयल छल।बरदी धारी पुलिस सब के देखिते मातर चारहू दिस जेना घनगर अनहार भ गेल छल ,सबहक  करेज बेतहासा धुकधुकै लागल ,हे विधाता ,ई किए आयल हमरा दुआरे । जीपक सोअर सुनी श्री कोठरी सा बहरैला । पुलिस के गप्प सुनी ओ तुरत ओकर जीप मे बइसी क जायत रहला । ओहि भम्म पडल सन्नाटा के चीरैत इमहर “दाय गै दाय  आब हम केकरा की मुंह देखेबै गे दाय’ घिघियाती ,अस्पस्ट स्वर स कलपैत बुलन पीसी  ओहि ठाम बेहोस भ क खसि पड़ल छलिह ।। २ ललन कुमार कामत सम्‍पर्क- ललमनियाँ, मरौना, सुपौल। गोल इंग्लिश गार्डेन निर्मली। किछु विहनि आ लघु कथा- अप्पन माए-बाप सुनील जीकेँ दूटा सन्‍तान। सौरभ दस सालक जे पाँचमा कक्षामे आ छोटका सुमन छह सालक जे पहलामे मेडोना स्‍कूल, कटहल वाड़ी दरभंगामे पढ़ैए। स्‍कूल घरेक बगलमे छै। सुनीलजी अकाशवाणी दरभंगामे नौकरी करै छैथ। हम सुनील जीक दुनू बच्‍चाकेँ घरपर जा ट्यूशन पढ़बै छी। हुनकर कनि‍याँ मंजू हरि‍दम बच्‍चाक कपड़ा-लत्ता, वर्तन-बासन आ आनो-आन घरक काम-काजमे ओझराएल रहै छथि‍न। सुनीलजी नौ बजे भोरे नि‍कलै छैथ अपना काजपर। दू बजे खेनाइ खाइले अबै छैथ। फेर राति‍मे दस बजे घर अबै छैथ। चारि‍ बजे बेरू पहरमे हम पढ़बैले सभ दि‍न जाइ छी। आइयो गेलौं। कनीएकालक पछाति‍ मंजू चाह लऽ कऽ हमरा लग एली। चाहक कप पकड़ा बच्‍चाक बदमाशीक उपराग कम मुदा काजक बेस्‍तताक पोथी खोलि‍ छनेमे संसारक परेशानीक पाठ पढ़ि‍ गेली। फेर काजमे एना लागि‍ गेली जेना टाँग-पर-टाँग नै पड़ैए। छुट्टीक समैमे सुनीलजी सेहो घरक काम-काजमे बेस्‍त रहै छैथ। दुनू गोटेक परि‍वारक प्रति‍ समरपन देखि‍ हमरा बुझाइत रहैए जे ऐ छोट परि‍वारक अलाबे हि‍नका सभकेँ ऐ संसारमे कि‍छु ने छैन‍। अचानक गामसँ हुनका फोन एलैन‍ जे हुनकर पि‍ताजी सि‍रि‍यस छथि‍न। सुनीलजी ऑफि‍समे छुट्टी लेल दरखास दऽ गाम बि‍दा भेला। गाम जा पि‍ता जीक संग माएकेँ सेहो संगे दरभंगा आनि‍ लेलैन‍। बाबूजीकेँ असपतालमे डाक्‍टरसँ जँचबौलैन‍। डाक्‍टर कहलकैन‍- “अहाँक पि‍ताजी केँ टी.बी. भऽ गेलैन‍ हेन।” “आब की उपए अछि‍ डाक्‍टर साहैब?” सुनीलजी पुछलखि‍न। “नौ मासक दबाइक कोर्स अछि‍। देख-रेखमे समैपर दबाइ चलबए पड़त।” सुनीलजी, ऑफि‍स जा अदहा दि‍नक छुट्टी छह मासक लेल दरखास लगा माए-बापक सेवामे लीन भऽ गेला। कटहल वाड़ी स्‍थि‍त नीज‍ अवासपर माए-बाबू रहए लगला। मुदा सप्‍ताहमे दू दि‍न असपतालमे जाए-आबए पड़ैन‍। आब मंजू पहि‍नेसँ बेसी परेशान रहए लगली। एक दि‍न मंजूक वार्ता हमरासँ भेल। बजली- “की कहूँ सर, एक्को-रती मन नै होइए जे ऐ घरमे रही।” हम पुछलयैन‍- “कि‍ए, की भेल?” “तेतबे घरक काज तेतबे धि‍या-पुताक काज आ तैपरसँ माए-बाबूजी माथक बोझ बनि‍ गेल छैथ। अपने जे छैथ ओ एकोटा काज नै सम्‍हारै छैथ।” हम कहलयैन‍- “अहि‍ना होइ छै, काम-धाम तँ सभ दि‍न लगले रहै छै। मुदा माए-बापक सेवा सेहो ऐ जीवनमे जरूरी छै।” मंजूकेँ जेना हमर उपदेश एक्को-रत्ती नै सोहेलैन‍। तमतमाइत बजली- “मास्‍टरजी, हमरा अहाँ नै सि‍खाउ। अहाँकेँ दुनियाँ-दारीक थाह नै चलल अछि‍ अखन।‍ सासु-ससुर हमर ओहेन अदरगर नै छैथ।” मंजूक ई बात सुनि‍ हम स्‍तब्‍ध रहि‍ गेलौं। मुँहक बात मुहेँमे रहि‍ गेल। संच-मंच बच्‍चा सभकेँ पढ़बए लगलौं। मुदा मंजू बड़बड़ाइत रहली- “चौबीस घण्‍टा काजे-काज। सभ अढ़बैए बला। ऐ घरमे रहैक मन एकोरती नै होइत अछि‍। जेतबे घरक काम-काजसँ माथा दुखाइत रहैए आ तैपर सँ बुढ़बा-बुढ़ि‍या माथ भुकबैत रहै छैथ।” तही बीच बुढ़हाक खौंखी जोर-जोरसँ सुनि‍ पड़ल। खौंखी करैत-करैत बदहाल भऽ कहैर‍-कहैर‍ कऽ बाजए लगला- “कनहौलीवाली, सुनीलक माए, केतए छी? ओहू बुढ़ि‍याकेँ जेना हमरा लग नीक नै लगै छै। जेना हम काटैले दौड़ै छि‍ऐ।” बुढ़हाक हफनीक अवाज फेर सुनि‍ पड़ल- “कनि‍याँ छी हे, लहानवाली, ऐ सौरभक माइ? बाप रे बाप! कोइ ने सुनैए।” मंजू बड़बड़ाइत घुमली- “मरबो ने करैए बुढ़ा जे हमर सि‍रक बोझ हटैत। जानि‍ ने कोन पापक फल छी।” सुनील जीक घरक ई कथा रोजक भऽ गेल। एक दि‍न अनायास हुनकर घरक हवा एकदम शान्‍त बुझना गेल। छतक चौकीपर जाजीम बि‍छौल छल। दुनू बच्‍चा ओइपर आबि‍ पढ़ैले बैसल। हम पलास्‍टि‍कक कुरसी खिंच बैसलौं। कनीए काल पछाति‍ मंजू पलेटमे जलपान आ कपमे चाह लऽ मीठ-मीठ चालि‍मे मुस्‍कियाइत एली। हमरा बुझाएल जे आइ मंजूजी ति‍रपि‍त छैथ। इच्‍छा भेल जे ऐ खुशीक कारण जानी। पुछलयैन‍- “भाभीजी, आइ अपने बड़ खुश नजैर‍ अबै छी, की बात छि‍ऐ?” “हँ, खुशी कि‍ए ने हएब। आइ हमर अपन माए-बाबू गामसँ एला अछि‍। खुशी तँ सोभावि‍क छै।” मंजुक ई बात सुनि‍ खुश तँ भेबे केलौं जे माए-बापक दर्शनसँ सोभावि‍क खुशी जे हेबक चाही से हि‍नको भेलैन‍। मुदा दुख सेहो भेल। दुख ई भेल जे आखि‍र सासु-ससुरक वि‍षयमे जे मि‍थि‍लाक दर्शनमे नारी लेल बतौल गेल छै जे अपन माए-बापसँ बढ़ि‍ कऽ सासु-ससुर होइ छै से हि‍नकामे कि‍ए नै छैन‍।¦¦¦ सम्‍पर्क- ललमनि‍याँ, सुपौल। स्‍कूलक फीस मानस तीन सालक छल तहि‍ये माइक देहावसान भऽ गेलैन‍। पि‍ताजी गामक मुखि‍या छथि‍न। समाजक कहलापर दोसर बि‍आह केलैन‍। लबकी कनि‍याँ थोड़-बहुत पढ़ल-लि‍खल, सोभावशील, वि‍चारू आ सुन्‍दर भेलैन‍। तीन सालमे मुखि‍या जीकेँ दूटा सन्‍तान और भेलैन‍। चन्‍दन आ नन्‍दन। नन्‍दनक जन्‍मक छह मासक पछाति‍ मुखि‍याजी स्‍वयं भगवानक प्रि‍य भ‍ऽ गेला। एकबेर फेर परि‍वारसँ लऽ कऽ गाम भरि‍मे शोकक लहैर‍ पसैर‍ गेल। मुदा मुखि‍यानि‍ शोकक सागरसँ बाहर आबि‍ तीनू बच्‍चाकेँ लालन-पालनक लेल फेरसँ अपन दि‍न-दुनि‍याँमे लीन भऽ गेली। अपना सुइध-बुइधसँ बच्‍चा सबहक बरबैर‍ लार-प्‍यारसँ पोसैमे कोनो कसैर‍ नै छोड़ै छथि‍न। मानस आब दस सालक भऽ गेल। प्राइवेट स्‍कूलक चारि‍म कक्षामे पढ़ैए। महि‍नाक पाँच तारीख तक सभ बच्‍चा अपन-अपन फीस जमा करैए। लेट-सेट छह तारीख धरि‍ वि‍लम शुल्‍कक संग जमा करब आवश्‍यक अछि‍। नै देने नाओं काटि‍ देल जाइ छै। मानस प्रत्‍येक महि‍ना अति‍रि‍क्‍त शुल्‍कक संग जमा करैत छल। मुदा ऐ मास सेहो नै भेलै। पीठपर पोथीक बैग टाँगि‍, अनजान चालि‍मे डेल उठबैत, एमहर-ओम्‍हर तकैत स्‍कूल दि‍स वि‍दा भेल। घरसँ लगभग एक कि‍लो मीटर भरि पूब स्‍कूल छै। बाटेमे मानसक मन फीपर गेलै। आइ तँ छह तारीख छी। मुदा फीस तँ अछि‍ नै। सरजी की कहता की नै। असमंजसमे पड़ल मानस स्‍कूलक हाता धरि‍ पहुँच गेल। हातासँ आगू नै बढ़ि‍ बाहरेमे ठाढ़ रहल। कि‍छु काल पछाति‍ आपस घूमि‍ गेल। अगल-बगलमे डबरा-डुबरीमे पहि‍ल मानसुनक बर्खासँ पानि‍क जमाव सभकेँ देखैत, बेंगक टरटरेनाइ आदि‍केँ देखैत-सुनैत लीन भऽ गेल। ओमहर स्‍कूलमे सरजी हाजली मि‍लौला पछाति‍ मानसक अनुपस्‍थि‍ति‍पर बजला- “मानस आइ नै एलौं?” एकटा बालक कहलकैन‍- “आएल तँ छल मानस, साइत बाहरमे हएत।” सरजी- “आइ फेर फीस नै अनने होएत।” फेर वएह बालक बाजल- “सरजी, अहाँ कहब तँ हम मानसकेँ बजा आनब।” सरजीक धि‍यान मुद्रापर गेल। बजला- “जो, आ कहि‍ दि‍हैन‍ जे आइ जँ फीस नै लऽ कऽ आएत तँ दोबर फीस लगतै।” बालकक नाओं सौरभ अछि‍। सौरभ स्‍थानीय बेवारीक बेटा छी। सौरभ केर घर स्‍कूलक बगलेमे छै। मानससँ मि‍त्रता छै। मानस केर प्रति‍ सहायताक भाव सेहो रहै छै। सौरभ वि‍दा भेल मानसकेँ तकैले। बाहर जा एमहर-ओम्‍हर नजैर‍ दौड़ौलक। मानसपर केतौ नजैर‍ नै पड़लै। कनी और आगू बढ़ल। देखलक एकटा गाछक छाँहमे ठाढ़ कि‍छु देखि‍ रहल अछि‍। देखि‍ते चि‍कैर‍ कऽ सोर पाड़लक- “मानस, की करै छी। एमहर आ।” मानस अवाज सुनि‍-ताकि‍ लग आबि‍ बाजल- “आइ हम स्‍कूल नै जेबौ। सरजीकेँ नै कहि‍हैन‍ जे मानस गाछ तर अछि‍।” सौरभ- “जौं तूँ स्‍कूल नै जेमेँ तँ एतए की करै छीही। घरेपर रहि‍तेँ।” मानस- “तूँ नै बुझै छीही। घरपर जँ रहब तँ माइक सैकड़ो प्रश्नक उत्तर दि‍अ पड़त। घरमे पाइ-कौड़ी नै छै। माए कहलक जे दू-चारि‍ दि‍नमे पाइ देबौ।” सौरभ स्‍कूलक नि‍अमसँ अवगत अछि‍। जौं छह तारीख तक फीस जमा नै हेतै तँ स्‍कूलसँ नि‍कालि‍ देल जाइ छै। ई सभ सोचि‍ मानसकेँ कहलकै- “स्‍कूलक नि‍अम नै बूझल छौ जे केते कड़ा छै। माएकेँ नै कहने छीही?” मानस कि‍छु बाजल नै, आ ने कि‍छु फुरेलै। चुप रहल। सौरभ घूमि‍ कऽ स्‍कूल चलि‍ गेल।।¦¦¦ सम्‍पर्क- ललमनि‍याँ, सुपौल। दस हजरिया नोट हम अपन इलाकामे जानल पहचानल पेन्टर छेलौं। पेन्टिंगमे बेदरेसँ लगाव रखैक कारण, भाड़ी-सँ-भाड़ी चित्र पल भरिमे बनेनाइ हमरा लेल असान छल। एकटा लङोटिया दोस्त छल धीरेन्द्र, किराना दुकानदार आ जातिक भूमिहार। बखत-कु-बखतपर हम एक दोसरकेँ मदैत‍ निस्वार्थ भावसँ करै छेलौं। एक दोसरकेँ विशुद्ध दोस्त मानै छेलौं। लोक सभ हमरा ऐ दोस्तीकेँ देखि हैरत रहै छल। हैरत ऐ खातिर रहै छल जे हमर दोस्त धीरेन्द्र भुमिहार जातिक छल। केते लोग कहैतो छल- “की रौ, भुमिहारसँ दोस्ती केलँह..., ठीकसँ रहिहेँ. कहीं भुमिहारी दाउमे फँसलह तँ बुझि‍यैहैन‍!” मुदा ऐ बातपर हम कोनो कान-बात नै दइ छेलौं। एकदिन जहिना हम रंग-ब्रशक झोरा लऽ कऽ केतौ काजपर वि‍दा भेल छेलौं आकि जनक काका दलानपर सँ चिकैर कऽ बजा‍ कहलथि‍- “रौ, सुन कहै छियौ तूँ जौं भुमिहारसँ दोस्ती केलँह तँ भुमिहारी दाउ एकोटा सिखलेँ आकि‍ नै?” हमरा जिज्ञासा भेल आ पुछलयैन- “काका, भुमिहारी दाउ केकरा कहै छै हौ?” “हम जँ बुझि‍तौं तँ हमहीं ने तोरा सिखा दैतिऔ? लोक बाजै छै जे भुमिहारी दाउ बड़ पेंचिदा होइ छै।” हम भरि बाट गुन-धुन करैत एलौं ‘मुदा ई कोन दाउ छी? जे लोक सभ दोसक संग देखि पुछैत रहैए? से नै तँ, आइ हम दोसेसँ ऐ बिषयमे पुछि कऽ रहब। दुपहरियाक रौदामे हम कोसी प्रोजेक्टक देवालपर एकटा विज्ञापन लिखैत रही संयोगसँ तखने पाछूसँ मोटर साइकिलक सीटीक अवाज पिपियाएल! हम रंगक डिजाइन बनबैमे मगन रही। मने-मन तामससँ देह बहिर भऽ गेल! ‘के एहेन दुष्ट छी जे डिस्टर्ब करैए?’ मुदा ताकब केना? जौं ताकब तँ डिजाइन खराप भऽ जाएत। लगल हाथ छोड़ि‍, ताकलौं। अवाक् रहि गेलौं! वएह भुमिहार दोस धीरेन्द्र छल। दोस्तीमे कनी-मनी शैतानी तँ चलिते रहैत छल। मन्‍द मुस्‍कान चेहरासँ सेहो छुटल। तैबीच धीरेन्द्रक नजैर पेन्टिंगपर पड़ल आ प्रशंसा करए लगल। मुदा हमर प्रशंसा, जे हमरे मुँहपर बाजल जाइत अछि! नीक नै लगल, अंग्रेजीक एकटा मुहावरा मन पड़ि गेल, ‘रेस्ट ऑन वन्स लॉरेल्स’ अर्थ अछि, ‘अप्पन ख्यातिसँ संतुष्ट नै रहक चाही,’ हम विनम्रतासँ कहलयैन- “दोस, अहाँक ऐ प्रशंसासँ हम खुश नै छी। हम मात्र एकटा छोटका कलाकार छी, खरचा-पानि चलेबा लेल ई काज करै छी।” तैबीच हमरा मन पड़ल ‘भुमिहारी दाउ’ पुछलयैन- “दोस, लोक कहैए जे भुमिहारी दाउ बड़ नीक होइ छै, हमरो सिखा दिअ।” धीरेन्द्र पहिले तँ हमरा बातपर धियान नै देलक मुदा बेर-बेर जिद्द केलापर सोचए लगल, कनीकाल सोचि कऽ बाजल- “दाउ तँ अहाँकेँ सिखा देब मुदा बदलामे किछु दिअ पड़त।” हम पुछलियहन- “कथी देबए पड़त? बाजू।” धीरेन्द्र फेर बजला- “अहाँकेँ एकटा दस-हजरिया नोटक पेन्टिंग बना कऽ हमरा दिअ पड़त।” हम बजलौं- “रूपैआक नोट! दस-हजरिया आ पँच-हजरिया की, जौं पेन्‍टिंगेसँ बनाएब तँ किए नै? जरूर बना देब। कनीए दिन रूकू फुरसति हुअ दिअ तँ छापि देब।” पेन्टिंग हमर ईश्‍वरीय देन छल, बेदरेसँ अनेक प्रकारक चित्र पाड़ै छेलौं, स्कूलमे सरजीकेँ यार-दोस्तक आ संग पढ़ैत लड़कियो सबहक। बाबूजी सधारण किसान छल,हमर पढाइ लेल पर्याप्त खर्चा नै रहैक कारण अध्ययनक संग उपार्जनक मार्ग अपनौने रहौं। अखन हम निर्मली आ आसपासक क्षेत्रमे जानल-पहचानल चित्रकार छी। कामक व्यस्तता हरिदम रहैए। ऐ व्यस्ततामे दोसक लेल दस-हजरिया नोट बनेनाइ हम साफे बिसैर गेलौं। एकदिन हम नगर सेठक दोकानक बगलमे साइन बोर्ड बनबैत रही, तखने धीरेन्द्रक अवाज सुनि‍ पड़ल। काम रोकि गद्दी लग हम ससैर कऽ एलौं, तही समैमे आउरो किछु जानल-पहचानल बेपारी सभ पहुँचल छल। धीरेन्द्र जोरसँ सभकेँ सुना कऽ हमरा कहैए- “की दोस, हमर काम नै हेतै?” हम चौंक गेलौं जे हमरा कोन काम कहने छैथ! पुछलयैन, “कोन काज?” “वएह दस हजारबला!” हमरा मन पड़ि गेल दस-हजरिया नोट! मुड़ी हिला स्वीकृति दैत कहलयैन- “ओऽ हाँ, हेतै, हेतै, किछुए दिन और रूकू।” सेठजी नोटक गड्डी गीनैत-गीनैत, चेश्‍माक भीतरे-भीतर, रूपैआक बात सुनि हमरा दिस ताकए लगल। हम चुपचाप, काम करए लगलौं। हमरा एला पछाति़, धीरेन्द्र सभ लग बाजल, जे ‘ई पेन्टर हमर दोस छी, हमरासँ दस हजार टाका लेने अछि, केतेक महिना भऽ गेल, मुदा टाका मांगलापर, आइ-काल्हि‍ करैत, समए काटैए।’ समए बीतैत गेल, छह महिना-साल भरिक बाद, फेरि दोसर बेपारीक दोकानपर दस हजारक तकेजा केलक। हम दस-हजरिया पेन्टिंगक नोट समझि‍ टाड़ि देलौं। मुदा हमरा गेलाक पछाति धीरेन्द्र सभ लग बाजल फिरै छल जे साँचेमे ई हमर रूपैआ लेने अछि। ऐ बातक दू बरख भऽ गेल। जेतए-तेतए लोक सभ हमरा कहए लागल- “धीरेन्द्रक रूपैआ किए ने फड़िया दइ छिही! दोस-बोनक पैसा एते-एते दिन रखनाइ नीक बात नै छै।” पहिले तँ हम असमंजसमे रहौं मुदा, जखन पता चलल जे धीरेन्द्र दस-हजरिया पेन्टींगक बदलामे दस हजार टाका लोक सभ लग बाजल फिड़ैए, हम अवाक् रहि गेलौ! केतेक गोटेकेँ समझेबाक परियासो केलौं ई बात, मुदा जेकरे कहि‍ऐ वएह, बुड़िबक बनबए लगल- ‘कलाकार भऽ कऽ एहेन नीयत तोहर नै हेबा चाही।’ हम चिंतित भऽ सोचए लगलौं, ‘ई दोस्त नै छी, दुश्‍मन छी, एते भाड़ी फेरामे पड़ा देलक! केतएसँ एते टाकाक ओरियान करब!’ हमर ओकाति हजार टाका जेना लाख टाकाक के बराबैर छल। बिना जमीन-जथा बेचने दोसर उपए नै छल। कनीए दिनक पछाति, पंचैती भेल, पंचक फैसला भेल, कटि-मारि कऽ दू हजार सुइदकक संग बारह हजारक देनदारी ठहरौल गेलौं। लोक सभ बाजए नै दैत छल। जीवनमे एहेन बेज्जती कहियो नै भेल रहए। दस दिनक समए देल गेल। टाकाक ओरियान नै भऽ रहल छल। कोनो गुंजाइश नै देखि, एकटा उपए सूझल, जमीन बेचु नै तँ, भरना लगाउ। एक बीघा जमीन भैयारीक फाँट पड़ल छल। बेचब तँ फेर कीनल नै हएत, से नै तँ भरने लगा देबाक चाही। हजार टाकाक दरसँ बारह कठ्ठा खेत भरना लगेलौं, रूपैआ लऽ कऽ दोसक घर पहुँचलौं। दलानपर कियो नै छल असगरे बैस गेलौं, दोस्तीनीकेँ खबैर गेल। कनीकालक पछाति, दोस्तिनी एक हाथमे पानिक लोटा आ दोसर हाथसँ घोघ तानि, अदहा मुँह झाँपल अदहा देखाइत, आगूमे पानि बढ़ा देली। तामससँ तँ हमर देह बहिर छल,सोचने छेलौं जे दोसकेँ किछु कहबनि, मुदा की करब! चोटपर दोस्तीनी पड़ि‍‍ गेली। भाड़ीए मनसँ कहलयैन- “दोसकेँ बजाउ आ कहियन जे अपन टाका लेता।” कनी काल पछाति धीरेन्द्र हँसैत-हँसैत दलानपर एला। ई हँसी, हमरा हरियाएल घापर, नूनक लहैर जकाँ लागल। चुप चाप रूपैआक गड्डी देलिऐन, गिनला पछाति फेरसँ हमरे हाथमे धराऽ देलैन। हम चुपे छेलौं मुदा धीरेन्द्र बाजल- “दोस, याद करू। अहाँ हमरा कहने छलिऐ ने भुमिहारी दाउ सिखबैले? यएह छिऐ भूमिहारी दाउ।” एकबेर फेर दोसक ऐ बर्तावसँ हम चकित रहि गेलौं।¦¦¦ (लोक कथाक पुनर्लेखन) लगन गोनर बेदरेसँ संगीतक प्रेमी अछि। दिवाली, दशहारा, सरोसती पूजा आ आनो-आन अवसैरपर गाममे नाटक होइक परचलन अछि‍। मुदा गोनरकेँ ओइ सभमे मौका कमे मिलैए। मौका ओकरे पहिल बेर मिलैए जे ओइमे चन्दा दइए। गोनरक पिता साधारण किसान छैथ। गोनरक पिताक दोस्त देबन पण्‍डित गाममे कीर्तनियाँमण्डली चलबै छैथ‍, तँए लोकसभ गबैया कहै छैन‍। गोनरकेँ संगीतसँ लगाउ देखि पिताजी केतेक बेर कहै छैन‍- “गोनर, दोसक ऐठाम जा कऽ घड़ी-घण्‍टा हैरमुनियाँ किए ने सीख अबै छँह?” आइ स्कूलमे शनिचराक पछाति सरजी गोनरसँ गीत गबौलैन‍ आ खुश भऽ खुब प्रसंशो केलैन। स्कूलसँ अबैतकाल बाट भरि‍ गोनर सोचैत आएल जे आइ देबन काकाक घर जा हैरमुनियाँ सीखनाइ शुरू करब। दुपहरियाक टहटहाइत रौदमे, सभ लोक घरे-घर सूतल-पड़ल, अराम करैत रहए मुदा गोनर, देबन पण्‍डितक घर बि‍दा भेल। देबन सभ दिन बेरूपहरमे अप्पन एकलौता पुत्र हरियाकेँ संग कऽ साज-बाजक संग रियाज करैत रहैथ‍। आब गोनरो संग दिअ लगलैन‍। सप्ताहे दिनमे गोनर हरि‍मुनियाँक रीढ़ आ पटरीकेँ नीक जकाँ परेख‍ लेलक आ सा रे गा मा पा पहिलुक धुन बजबए लगल। ई आकस्मिक आ तेज शुरूआत देखि देबन सोचमे पड़ि‍ गेल, ‘हमर हरिया बेदरेसँ साज-बाजक संग खेलैत आएल तैयो अखन धरि एतेक नै सीख सकल! देबनके डाहक संग पक्षपातक भावना सक्कत भऽ आ अगिले दिनसँ गोनरकेँ दुआरि पहुँचते, साज-बाज समेटि रखि दैत रहए। एक-दू दिन गोनर जाइते रहल मुदा ओहिना घुमि कऽ आबि‍ जाइत रहए। गोनर उदास तँ होइते रहए मुदा हताष आ निरास नै भेल, तँए संगीत सि‍खैक जीद्द मनसँ नै गेल। साँझ पड़ैत सभ दिन, देबन चाह-पान करैले बजार जाइ छल। ई बात गोनर जनैत रहए, तँए साँझ होइते देबनक घर पहुँच कऽ, हरियाकेँ फुसला कऽ साज-बाज पसारि सीखए लगल। मुदा ईहो सीखनाइ तीने-चारि दिनक पछाति स्थाइ रूपे बन्न भऽ गेल। जइ दि‍न देबन पण्डित दुनू छौड़ाकेँ साज-बाज निकालि सिखैत देखि‍ गेला। कड़गर फटकारो दुनूटाकेँ लगेलखि‍न आ सभटा साज-बाज समेटि‍ कऽ संदूकमे बन्न कऽ देलखि‍न। कहल जाइए जे समए आ लहैर‍ केकरो इंतजार नै करैए। ई बात साँच भेल। गोनर ऐ दसे दिनमे जे किछु सिखने रहए वएह रामवाण भऽ गेल आ सक्कत अधार बनि‍,तारक गाछ सन बढ़ए लगल। कहल जाइए जे कोनो तरहक बुधि आ हूनर सिखैले निर्धारित समए नै होइए। जेतै-तेतै, चलैत-फिरैत गोनर सुर आ तानकेँ साधैत,गुनगुनाइत धूनमे रमल रहै छल। मुदा साँझ-भोर संगीतक अभ्यास केनाइ अप्पन दिनचर्या सेहो बना लेलक। टोल-टपड़ा आ गाममे जखन केतौ भजन-कीर्तन आकि‍ नाच-गानक आयोजन होइत रहए तइमे गोनर बड़ी तत्परतासँ भाग लैत रहए। तइसँ गाम भरिमे लोकसभ गोनरकेँ गबैया कहए लगल। गामक सटले शहर अछि। शहर छोटे सन अछि सुखी सम्पन्न लोक आ पैग-पैग बेपारीसँ लक हाकिमो-अफसर सभ एतए रहै छैथ। गोनरकेँ शहरमे केकरोसँ जान-पहिचान नै अछि। एकटा डाक्‍टर सुरेन्द्र नारायण नामक गण्‍यमान बेकती छथिन जे महिला कौलेजमे हिन्दीक सरकारी प्रोफेसर आ संगै-संग महिला कल्याण संस्थानक अध्यक्ष सेहो छथिन। संगीतक प्रेमी रहैक कारण साले-साल सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन करबैत रहै छैथ। प्रोफेसर साहैबक एगो बेदरूकिया संगी जे दिल्लीमे नाट्य आ कला विभागक प्रोफेसर छैथ ओ रिटायर भऽ अपन पैतृक शहर पहिल बेर एला, तइसँ ऐबेरक आयोजन बड़ जोर सोरसँ भऽ रहल अछि। शहरक गण्‍यमान लोकसभ जे ऊँच-ऊँ पदपर कार्यरत छैथ‍, सभकेँ कार्यक्रममे शामील होइक बास्ते न्योँत पठाएल गेल। तइमे ऐबेर टी.वी सीरियलक जानल-मानल कलाकार जीतुराज जोहर सेहो हिस्सा लऽ रहल छथिन। कार्यक्रमक दिन लगि‍चाइत गेल। शहरमे जगह-जगह बैनर-पोस्टर लगाएल गेल जे अमुख तिथिकेँ सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन जानल-मानल संगीत प्रेमी सबहक सहयोगसँ भऽ रहल अछि‍। मुदा गोनरकेँ ऐ बातक कोनो खबैर‍ नै भेल छेलै। शहरमे स्टेशन चौकपर बबाजी पानबला अछि। हिनका दोकानपर गामक बेसी लोक पान खाइले साँझ-बिहान जाइत-अबैत रहैए। बबाजीकेँ बूझल छैन‍ जे गाम भरिमे गोनर सेहो नीक गबैया छी। मात्र दू दिन बँचल रहए, जब गोनर अनायास बबाजीक पानक दोकानपर गेल, बबाजीकेँ मनमे ठहकलैन‍ आ जनैक जि‍ज्ञासा भेलैन‍ जे गोनर ऐ कार्यक्रममे भाग लेने अछि की नै। पुछलखि‍न- “की रौ तूँ ऐ कार्यक्रममे हिस्सा लेने छेँ किने?” गोनर जिज्ञासु भऽ विनम्रतासँ पुछलक- “भैया हौ, के ई कार्यक्रम करबै छै हौ?” बबाजी बूझि गेला जे गोनर भाग नै लेने अछि तैयो आस्वासन दैत बजला- “अच्‍छा रूक, हम परोफेसर साहैबसँ बात करै छी।” बबाजी मोबाइल लऽ कऽ नम्‍बर मिलौलैन‍ आ बात करए लगला- “हेल्‍लो सरजी, परनाम! हम बबाजी पानबला बजै छी।” ओमहरसँ जे जबाव पुछने होन्‍हि‍, मुदा बबाजी फेर बजला- “एकटा नवजुबक बड़ नीक गबैया छैथ।” कनीए कालक पछाति फेरि बजला- “लड़का तँ लोकले छैथ मुदा एक नम्मर गबैया छैथ‍!” कनीए काल रूकि कऽ फेर आग्रहक स्वरमे बबाजी बजला- “सर! देखियौ कनीए, मौका देल जेबक चाही।” कनीकाल पछाति फोन डिसकनेक्ट भेल। गोनरकेँ बबाजी कहलखि‍न- संस्थापर चलि‍ जो, ओतए बजेलकौ हेँ। पहिने गीत गबबेतौ तब चुनाव हेतौ। अखने चलि‍ जो।” गोनरकेँ बसंती साइकिल रहबे करए, मुदा बूझल नै छल जे संस्थान छै केतए! तैयो पुछैत-पुछैत बिदा भेल। शहरक दच्छिन, बान्हक कछेरमे उजरा रंगक मकान,अगुआरे-पछुआरे नाना परकारक रंग-बिरंगक फूलक गाछसँ सजल-धजल फुलबाड़ी अछि। सड़कक कातमे साइनबोडपर लिखल अछि ‘महिला कल्याण संस्थान’। गोनर साइकिल नीचाँ धँसा संस्थानक प्राङगनमे पहुँचल, जैठाम दुचक्किया आ चरिचक्किया गाड़ीक पार्किंग लगल छल। बुझना गेल, एते सभकेँ-सभ भी.आई.पी. पहुँचल अछि। कातमे साइकिल लगा, एकटा हॉलमे लोक सबहक सुनगाम देखि भीतर घूसल। प्रोफेसर साहैबक नाओं पूछि गोनर लग गेल आ परिचए देलकैन। परि‍चए दइते बैसैक आदेश भेटलै। गीत गोनहार, नाच केनहार आ आनो आन कलाक प्रदर्शन केनहार सभ रहए आ रिहलसल होइत रहए। कनीए कालक पछाति गोनरसँ गीत गबबौल गेल, गोनरक सेलेक्सन नै हेबाक तँ कोनो सवाले नै रहए, आश्‍वासन भेट गेलै जे एकटा गीत गोनरो गौत। गीतक आयोजन शुरू भेल। एक-सँ-एक भी.आइ.पी. सभ पहुँचल छला। विशि‍ष्‍ठ अतिथि सभकेँ बैसैक बेवस्था मंचपर आ मंचक अगल-बगलमे कएल गेल रहए। ई आयोजन सार्वजनिक चंदा चिठ्ठासँ होइत रहए जइमे बड़का-सँ-बड़का पुजीबला लोकक धिया-पुता सभ भाग लेने रहए। सिवनाथ सहाय, जीतुराज जौहर आ स्थानीय सिविल अधिकारी सभ मुख अतिथिक रूपमे मंचपर आसीन भेल रहैथ‍। गायन, वादन आ नृत्य ई तीनु संगीत छी एकर प्रस्तुति रसे-रसे हुअ लगल। हर-एक आदमी जे बाजि‍ सकैए ओ गाइबो सकैए किएक तँ गायन बोलियेक एकटा उन्नत रूप छी। मुदा नव-सिखुआ गाबैया लेल समान रूपसँ निर्देशन आ निअमित रूपसँ अभ्यास जरूरी होइत अछि, जे बेसी-सँ-बेसी बच्चा सभमे ओतेक नै छैन‍। गायन एकटा एहेन काज छी जइमे स्वरक सहायतासँ संगीतमय ध्वनि‍ निकालल जाइत अछि। सुवेवस्थित ध्वनि‍ जे रस दैत अछि आ रसक अनुभूति करबैत अछि वएह संगीत कहबैत अछि‍। ऐ कलाक प्रदर्शन युद्ध, उत्सव, प्रार्थना आ भजनक समए मनुखक द्वारा गावन आ बजावनक माध्यमसँ कएल जाइत अछि। जे गाबैए ओकरा गबैया, जे नाचै ओकरा नचनियाँ आ जे बजबैए ओकरा बजनियाँ कहल जाइए। प्रोग्राम होइत-होइत अदहा राति बीति‍ गेल मुदा अखन धरि गोनरकेँ मौका नै भेटल। बखत केर पहिया बढ़ैत गेल आ राति दू बाजि‍ गेल। विशि‍ष्‍ठ अतिथि सभ घर दि‍स बिदा भेला, दर्शको सभ रसे-रसे जाए लगल, तब जा कऽ गोनरक नाओं एलोन्स कएल गेल। गोनर स्टेजपर आएल। गोनरक मुँहसँ राग लयात्मक रूपसँ बेवस्थित भऽ संगीतरूपी लहैर‍ समुद्रक ज्‍वारि‍ जकाँ पसरए लगल। जइ प्रस्तुतिमे कलाक प्रदर्शन हुअए आ जइ कलाकेँ संगीत या मनोरंजन कहल जाए, गोनरके कंठसँ वएह सुरीली कंठाध्वनि‍, ओहिना उत्पन्न हुट लगल जेना वाद्ययंत्रसँ सुसज्जित घ्वनि‍ निकलैए। जे सभ प्रोग्राम छोड़ि‍, घर दिस बिदा भेल रहए, ऊहो ओतै ठमैक‍ गेल, डेग पाछू खींचए लगलै, सभ आपस आबए लगल आ जेकरा घरपर अबाज जाइत रहए,ओकरो जिज्ञासा हुअ लगल जे के एहेन गवैया छी आ केतक छी? किछु वि‍शि‍ष्‍ठ मेहमान सभ सेहो घूमि आएल छला। गोनरक गौला पछाति सभ हिनका लग बजा परिचए-पात पुछए लगल आ प्रसंशा सेहो करए लगल। गोनरकेँ आशा जगल जे कियो हिनका मदैत‍ करैथ। जौं शुद्ध मनसँ भगवानकेँ यादि‍ कएल जाए तँ भगवानो कोनो रूपमे दर्शन देबे करै छथि‍न। वएह भेल, जीतुराज जौहर टी.वी कलाकार, गोनरकेँ आश्‍वासन देलकैन- “दू महिना बाद अहाँ दिल्ली आउ, ओतए संगीतक ऑडिसन छै।” गोनर हर्षित भऽ गेल आ जोर-सोरसँ ऑडिसनक तैयारीमे लगि‍ गेल।¦¦¦ बेटी सोमनाथजी म्युनसीपल आँफि‍समे पैंतीस बरख नोकरी केला पछाति रिटायर भेला। जीवनमे एक्को पाइ नजायज नै ग्रहन केलैन। सोनमनाथजी हृदैसँ पवित्र, शालि‍न,विनम्र आ दयाक भाव हिनका मुख-मण्डलसँ हरि‍दम झलकैत रहैए तँए हिनकर बिशेषता बेक्तिगत संज्ञा (उपनाम) मे बदैल‍ गेलैन आ घरसँ लऽ कऽ आँफिस धरि‍ लोक सभ हिनका सोनाजी कहि बोलबए लगलैन। सोनाजीकेँ तीनटा सन्‍तान, बड़ दुइटा लड़का, जेठ बबलू तैपर सँ डबलू आ सभसँ छोटकी बेटी उषा छैन‍। उषाक बि‍आह नीक घरमे, इंजीनि‍यर बड़सँ कऽ सम्पन्न केलखिन। जमाइबाबू मुजफरपुरमे नोकरी करै छथिन ओतै सरकारी अवास भेटल छैन‍, तइमे उषा सङ्गे रहै छथिन। जेठका बेटा बबलूक किरदानीसँ दुनू परानी सोनाजीक मन बेथित छैन‍। बबलू इंजीनि‍यरिंग करैले दिल्ली गेला मुदा हरियानाक एकटा लड़िकीक प्रेममे फँसि अपन जीवनक नैयाकेँ किनार कऽ लेलैन आ ओतै प्रेम-बि‍आह करि बसि गेला। डबलू नागपुरमे बैंक मनेजर छथिन। हिनकरो बि‍आह भेला पछाति पत्नी सङ्गे आतै रहै छनि‍न। सालमे एक-आध बेर कभी-कभार घर अबै छथिन। सोनाजी अपन जीवनसंगि‍नी ममताक सङ्ग बुढ़ाड़ीक पहिया जेना-तेना खिंचै छैथ। बेटा-पुतोहुक सुख हिनका नसीब नै होइ छैन‍ मुदा उषा, बेटी रहैतो, बेटा जकाँ देखभाल करैए। सप्ताहमे एकबेर आबि कऽ जरूरे देखि‍ जाइत अछि। उषाक सोभाव पिताजीसँ बिरासतमे प्राप्त भेल छैन‍ तँए मधुरो आ एक दोसरसँ अनुकूलो छैन‍। सोनाजीक ई पैंसैठम बरख चलि रहल छैन‍। नोकरीसँ रि‍टायर भेल रहैथ‍ तँ शरीरसँ स्वस्थ छला आ भरोसा छेलैन जे आगुओ नीके रहता, मुदा मनुख तँ मात्र इच्छा करैए, होइ तँ अछि वएह जे ऊपरबलाक मरजी रहै छैन‍। उषाक बि‍आहक पछाति दुनू बेटा दू जगह अपन-अपन घर बसा लेलकैन। सोनाजी दुनू परानीकेँ चिन्ता-फिकि‍र घरेड़ देलकैन। जीवन-शक्ति शि‍थि‍ल भऽ गेलैन। हाथ-पएर धीमा पड़ि‍ गेलैन। आँखिक रोशनी कमि गेलैन। कानोसँ कम सुनाइ दिअ लगलैन‍। पाचनतंत्र गड़बड़ा गेलैन आ दिल-दिमाग सेहो दुरूस नै रहलैन। मतलब बुढ़ापा हिनकर समस्या बनि गेलैन। बेटा सभ कभी-कभार फोन घुमा हालचाल करैत रहै छैन‍। दोस्त-यारकेँ- दबाइ दोकनदार आ मोहल्लाक डाक्टर- सभकेँ फोन घुमा कहैत रहैए जे माए-बाबूकेँ देखैत रहबै। सोनाजी दुनू गोटेकेँ ई परिपक्व अवस्था अछि जइमे ज्ञान, स्थिरता आ अनुभव छैन‍ आ तहिक सहारे दुनू बेकती जीवन रूपी नैयाकेँ आगू खिंच रहल छैथ। ओना तँ बुढ़ापा भार नै होइत अछि मुदा जब खाएल-पीअल काया जड़जड़ भऽ जाइए आ परि‍वारक सदस्‍यक संग तालमेल नै रहैए तँ परीवारमे अपन उपयोगितापर विराम लगि जाइत अछि। वृद्ध लोकैनकेँ ऐ अवस्थामे सहायता आ सहयोगक जरूरत पड़ि‍तै छै। जे बेटा-पुतोहु अपन वृद्ध माए-बापकेँ सेवा करैए वएह जीवनक उत्तम कर्म करैए। एहेन पूत जे माए-बापकेँ जीबि‍ते छोड़ि दइए आ अपनेमे मगन रहैए ओ ओहने काज करैए जेना धिया-पुता सभ बालुक रेतसँ महल बना लइए आ तैपर गाछक डारि-पात गाड़ि‍ कऽ बगीचा बना लइए आ खुशी मनबैत रहैए मुदा जेकरा ज्ञान अछि ओ अपन जीवनक उत्तम कर्म करैसँ पाछू नै हटैए। आजुक समाजमे बेकती अपन बाल-बच्चा संग परि‍वारमे रीझल रहैए। माए-बाप, बूढ़-पुरानक मान-मर्यादा, तेकर सेवा सत्कारकेँ साफे बिसैर जाइए। ओहेन मनुख हरिदम पाबैक पाछू बेहाल रहैए मुदा जे हिनका लग प्राप्त वस्तु अछि ओकर उपयोग करनाइ नै जानैए। बूढ़-पुरान अनुभवी होइ छैथ‍ तँए हिनका समाजमे विशिष्ट स्थान भेटबाक चाही। जे बेकती वृद्धक सेवा नै करैए, ओ कायर होइए आ कायर लोग काल्पनिक विचारक धनवान आ महा गप्पी होइत अछि। जाबे धरि वृद्धजनक आ जुबकक समाजमे तालमेल आ समानता नै बैसत ताबे धरि‍ समाजिक आ सांस्कृतिक काजमे स्थइरूपसँ बिकास सम्‍भव नै भऽ सकत। सोनाजी शरीरसँ कमजोर होइत गेला आ बेटा पुतोहुक सहायता आ सहानुभूति घटैत गेलैन‍। आब हिनका याद आबै छैन‍ ओ दिन, जइ दि‍न बेदरूकिया सभकेँ ठेहुनापर लऽ घौआ-छु मल्ले-छु करैत पढ़ैत रहैथ‍ ‘लब घर उठे आ पुरान घर खसे...। खैर जे ऐ हाथसँ करैए ओकरा ओइ हाथसँ भोगए पड़ैए। अहु अवस्थामे सोनाजीकेँ रोज-मर्ड़ाक समान कीनए बास्ते हाट-बजार जाइए पड़ै छैन‍। आइ सोनाजी सुति ऊठि कऽ शौचालय गेलखिन। होनीकेँ किछु भेनाइ रहैन‍, बाहर निकैल‍तै चक्कर आबि गेलैन‍ आ शौचालयक दरबाजासँ टकरा कऽ खसि‍ पड़ला। ममताकेँ गिरैक अभास भेलैन, भिरकाएल फाटककेँ ठेल देखलखि‍न सोनाजी ढनमनाएल असहाय अवस्थामे ओङ्गराएल आ कहैर रहल छैथ। ममता धबरा गेली आ उठबैक परि‍यास केलखिन, हिला-डोला कऽ पुछै छथिन- “बबलूक पपा! की भेल! केना खसलिऐ! बाजू ने?” मुदा कोनो जवाब नै भेटलैन। सोनाजीकेँ मुहसँ छर-छर लेहू बहै छेलैन। ई देखि‍ ममता हाय-बाप करए लगली, असगरि‍ हिनकासँ उठि नै सकल, दौगल-दौगल दरबज्‍जापर जा हरेरामकेँ सोर पाड़लक, हरेराम दुनू परानी दौगल आएल, सोनाजीक ई दशा देखि‍ हाँइ-हाँइ कऽ उठा-पुठा कऽ ओसार परहक खाटपर सुतेलकैन। सोनाजीक ई हलात देखि‍ ममताक देह जेना केराक भालरि जकाँ काँपए लगलैन‍। की करब! आ केना हएत! किछु नै फुड़ै छेलैन‍। हरेराम हड़बराइत बाजल- “काकी! डागडरकेँ फोन करू!” मुदा फोनक डायरी सोनेजी रखने छेलखिन। ममताकेँ भेटि‍ते ने रहैन‍। हरेरामक पत्नी मंजू बुझि गेलखि‍न जे बेगरतापर एहेन छोटसन चीज नै भेटैत छैन‍, डाक्टरकेँ बजबैले दौगल-दौगल गेली। मोहल्लेमे डाक्‍टर इकबालक घर छैन‍, एलखिन। सोनाजीक मुँहक ऊपरका दूटा दाँत नीचला ठोरमे भोंका गेल रहैन‍ तइसँ मुहसँ लेहूक टघार चलै छेलैन। उपचार शुरू भेल, कनीएकाल पछाति सोनाजीकेँ होश एलैन। ममतोकेँ जानमे जान एलैन। डाक्‍टर इकबाल ढाढ़स दैत कहलखि‍न- “अखन कोनो चिन्ता करैक बात नै छै, सोनाजीक ब्लडपेसर आ सूगर बढ़ि‍ गेल छैन‍ तइसँ, चक्कर एलैन मुदा समैसँ जाँच आ इलाज हेबाक चाही नै तँ हार्टएटेकक सम्भावना बाढ़ि‍ सकैए।” डाक्‍टर इकबाल पूर्जी लीखि‍ हरेरामकेँ हाथमे दैत कहलखि‍न- “ई दबाइ जल्दीए लऽ कऽ आउ, सोनाजीकेँ ठोरमे टाँका लगबए पड़त।” तत्कालीन उपचार भेल। सोनाजीक मन पहि‍नेसँ नीक भेल। ममताक जीक मन हल्‍लुक हुअ लगल आ बेटा सभकेँ फोन लगबए लगली। जेठका बेटा बबलुकेँ पहिने फोन लगा घटनाक जानकारी देलखि‍न मुदा बबलू ऐ बातकेँ गंभीरतासँ नै लैत कहलकैन‍- “केना खसि गेलौ? बाबूजी दबाइ खाइत रहौ की नै? तों केतए रही? दिन राति टेन्‍शन दइमे तूँ सब लगल रहै छँह।” ऐ घड़ीमे बेटासँ एहेन तरहक जवाब सुनि ममताक मोह भंग भऽ गेलैन‍। फेर छोटका बेटा डबलूकेँ फोन लगा स्थितिक जानकारी देलखि‍न। डबलू पिताक हाल सूनि अस्वासन दैत बाजल- “चिन्ता नै कर। डाक्टर साहेबसँ हम बात करै छी। दीपू दोस्तकेँ घरपर भेजै छियौ डाक्टरसँ देखा कऽ दबाइयो-दारू सभ लाबि देतौ। तूँ कान-खीज नै कर।” ममताकेँ बँचल-खोंचल आस नीरास भऽ गेलैन‍। खैर हिनका सभसँ ओते आसो नै लगेने छेलखि‍न। आब बेटी उषाकेँ फोन लगेलैन‍। आन दिन उषा माए-बाबूकेँ फोन करि‍ हालचाल जनैत रहए मुदा, आइ माइक फोन देखि‍ चौंकली आ उत्सुकता पूर्वक बाजलि‍- “हँ माय! हम सब नीके छी, मुदा बाबूजी केना छथिन?” ममता जनैत छेली जे साँच बात बतेलासँ उषा बेसी घबरा जाएत तँए बातकेँ छोट करैत बजली- “बाबूजीक तबीयत गड़बड़ा गेलौ आबि कऽ देखि जाही।” मुदा भारी मन आ अवाजक थड़-थड़ाहैट‍सँ उषा भाँपि गेली जे साइत बाबूजीकेँ तबीयत बेसी खराब भऽ गेल अछि। घबराहैट‍ तँ भेबे केलैन मुदा संयमसँ फोन रखि सोचए लगली जे की करी! फेर उठि कऽ बैग झारि, कपड़ा-लत्ता चोपतए लगली आ तुरंत नैहर अबैक ओरयान करए लगली। उषाकेँ एक सालक बेटी छेलैन तेकरो मुँह-कान पोछि तैयार कऽ एक काँखमे बच्चा आ दोसर हाथमे बैग उठा ओसारपर रखि घर दरबज्जामे ताला लगबए लगली। घरक चाभी बिसवासी पड़ोसीकेँ दैत पति‍ इंजीनि‍यर साहेबकेँ फोन लगेलकैन जे घण्‍टे भरि पहिले ड्यूटीपर नीकलले छेलखि‍न, इंजीनि‍यर साहैब फोन रीसीभ करैत बजला- “हँ बाजू, की बात अछि?” उषाक मन तँ हड़बड़ाएले रहैन‍ मुदा तैयो सम्हरि‍ कऽ बजली- “हम बाबूजीकेँ देखैले गाम जा रहल छी, माइक फोन आएल जे बाबूजी सि‍रि‍यस छथिन। अहूँ साँझ धरि बाबूजीकेँ देखैले आबि जाएब।” ई बात सुनि इंजीनि‍यर साहैब चौंक‍ गेला। पुछलखि‍न- “अखन! अचानक! किए गाम वि‍दा भेलौं?” ताबे धरि उषा रिक्सापर बैसि बस स्टैण्ड दिस बिदा भऽ गेल छेली। हड़बड़ाइत बजली- “अखन ओते गप हम नै करब, बूझि लियनु जे बाबूजीक हालत ठीक नै अछि।” उषाकेँ हड़बड़ाएल अवाजसँ इंजीनि‍यर साहैब बूझि गेला जे आब हिनका कोइ नै रोकि सकैए। भरोस दैत बजला- “जाएब तँ जाउ, मुदा मनके अस्थीर केने जाउ, आ बाजू जे पाइ-कौड़ी किछु संगमे अछि कि‍ने?” उषा- “अहाँ पाइक चिन्ता नै करू, हमरा संगमे ओते पाइ अछि जइसँ, हम गाम जा सकै छी।” इंजीनि‍यर साहैब बात टोहियबैत पूछि देलकखि‍न- “पाइ केतएसँ लाबलौं अहाँ? बजैत रहै छिऐ जे हमरा हाथमे एकोटा छिद्दियो ने रहैए।” उषा सकपका गेली। सकपकेबो केना ने करि‍तैथ‍? पति‍क जेबीसँ बँचल-खूचल पाइ रोजे निकालि‍ते रहै छेली। तैपर सँ ऊपरौसँ किछु ने किछु मांगि‍ जरूरति‍क समान कीनैबते रहै छेली आ सभसँ जरूरी काज माए-बाबूकेँ देखै बास्ते जाए पड़ै तइमे खर्चा-बर्चा तँ होइते रहै। ई बात इंजीनि‍यरो साहैब जनि‍ते रहैथ‍ तँए उषा बातकेँ खोलैत बजली- “अहाँक जेबी, जे रोज साफ होइत रहैए, वएह कोशलि‍या कऽ हम रखने रही, वि‍शेष पाइक ओरीयान अहाँ साँझ धरि केने आउ।” बेटा सभकेँ नै एलासँ ममता दुखी तँ छेली। मुदा ऊषाकेँ एलासँ निरासाक बादल छँटि‍ गेलैन‍। साँझ होइत-होइत उषाक पति इंजीनि‍यरो साहैब ऑफिससँ छुट्टी लऽ पहुँच गलखिन। वि‍हाने भने एम्बुलेन्ससँ सोनाजीकेँ दरभंगा लऽ गेलैन‍ आ डाक्‍टर यू.के बिश्वाससँ इलाज चलए लगलैन‍। तत्काल किछु दबाइ शुरू काएल गेल,ऑक्सिजनक खगता सेहो पड़लैन आ दिनमे तीन बेर एकर परयोग हुअ लगल। वि‍भिन्न तरहक जाँच करौल गेल। जाँचक किछु रि‍पोट तीन दिनक पछाति आएल आ किछु रि‍पोट हप्ता भरिक बाद आएत। जे रि‍पोर्ट आएल ओइमे बी.पी हाइ, सूगर बढ़ल आ संगे-संग हार्ट अटेकक सम्‍भावना बताएल गेल। सप्ताह भरि इलाज चलैत रहल, तबीयतमे उतार-चढ़ाव होइत रहल, कखनो नीक जकाँ गप-सप्‍प करैत रहैथ‍ तँ कखनो आँखि पथरा जान्‍हि‍, दम फुलए लगनि‍ आ बेहोस भऽ जाथि‍। कखनो बेसुधि अवस्थामे अपने-आपसँ बड़बड़ए लगथि‍- “बबलू! कखन एलँह आ आ बैठ! कनि‍याँ! घर जा। अहाँ पोती छी हमर? आब! आब! बिस्कूट एकटा हमरो दिए ने! ऐ डबलू चाह लाबह! माएकेँ कहक चाह देत! ईह छिनरीक साँए! जेते खाएत नै तेते छिड़याएत!” दुनू पजरामे बैसि‍ उषा आ उषाक माए- ममता- बेना होंकि रहल छैन‍। सोनाजीक ई बड़बड़ेनाइ रोकैक बास्ते उषा सोनाजीकेँ छातीपर हाथ रखि हिला-डोला कऽ कहैए- “बाबूजी! बाबूजी! केकरासँ गप करै छि‍ऐ?” सोनाजी चौंकैत बजला- “ऊँह! नै नै गप करै छी। तोहर माए केतए छौ?” सोनाजी किछुकाल ऊपर एकटकी नजैरसँ तकैत रहला। फेरि जेना कोनो आहैट चौंकैए तहि‍ना चौंकैत बजला- “डबलू गाड़ीसँ उतरि गेल जा अगुआ कऽ लाबि लहक! काल्हिए कहै छी तोहर माए किछु बुझि‍ते नै छँह।” सोनाजीक स्‍मरण शक्‍ति‍ छीन्न भऽ गेल रहैन‍। आँखिक रोशनी चलि गेल रहैन‍। रहि-रहि कऽ बिछौन होंथड़ए लगै छला। ई बेचैनीक अवस्था देखि उषा आ ममताकेँ जी-मन उड़ैत रहैन‍। मुदा उषा साहसी, कखनो अपन घबड़ाहैटकेँ दृष्टिगोचर नै हुअ दैत रहैन‍। मनकेँ थि‍र करैत उषा बाजलि‍- “बाबूजी! बाबूजी? एम्हर ताकू ने! हमरा चिन्है छि‍ऐ? हम के छी कहू ते?” सोनाजी आब देखि‍ नै पबैथ‍। मुदा जखन स्‍मरण लौटैत रहैन‍ तखन अवाज परेख नजैर घुमा-घुमा एम्हर-ओम्हर ताकि देखैक परि‍यास करैत रहैथ‍। कहलखि‍न- “हँ, चिन्है छी! उषा दाइ छी ने अहाँ? केतए छहक आगु आबह ने।” आइ अस्पतालमे नअ दिन भऽ गेल रहैन‍। एकटा जाँचक रिपोट आइ आएत। दस बजे डाक्‍टर बजौने छथिन। उषाक पति आ उषा रिपोटक जानकारीले क्लिनीकपर पहुँचला। कनीए कालक पछाति कम्पाउण्डर अवाज देलकैन- “सोनाजीक गारजियन डाक्‍टर साहैब से मिलिए।” उषा दुनू परानी वेटिंग हॉलमे बैसल रहैथ‍, बोलाहैट‍ सुनि‍ते डाक्‍टरक चेम्बरमे पहुँचला, सोफा-कुरसी लागल रहए, बैसैक संकेतक पछाति दुनू गोटे बैस गेला। डाक्‍टर दुनू गोटेसँ सोनाजीक संग जे सम्‍बन्‍ध छेलैन तेकर परिचए लऽ कहलखि‍न- “मरीजक हालत गम्‍भीर अछि, रीकौभरक सम्‍भावना नै बँचल, जाबै धरि छैथ‍, सेवा सत्कार करैत रहि‍यनु।” डाक्‍टरक ई बात सुनि, उषा बौक जकाँ भऽ गेल। मुँहपर रूमाल रखि सिसैक-सिसैक कानए लगली। उषाक पति सेहो अवाक् रहि गेला! तैयो जिज्ञासु भऽ डाक्‍टर साहैबसँ पुछलखि‍न- “डाक्‍टर साहैब! केना एना भऽ गेलैन‍?” डाक्‍टर कहलखि‍न- “फेंफड़ा हिनकर बिल्कुल खतम भऽ गेल छैन‍। ब्रेन ट्युमर सेहो बढ़ि‍ गेलैन‍ आ शरीरक आनो-आनो अंग सबहक कार्यक्षमता शि‍थि‍ल भऽ रहल छैन‍।” वि‍भिन्न तरहक वि‍मारी आ समस्याक वि‍षयमे वार्तालापक पछाति निष्‍कर्ष यएह भेलैन जे सोनाजीक बि‍मारी ठीक हेबाक कोनो गुंजाइश नै छैन‍। दुनू बेकती नीराश भऽ चेम्बरसँ बाहर एला, उषा बाहर निकैलते भोकारि पाड़ि-पाड़ि कानए लगली। पति साहस बढ़बैत कहलखि‍न- “अहाँ जौं एना कनब तँ माएकेँ की हएत? शान्‍त रहू, मनकेँ बुझाउ! जे हेबक छै से तँ भाइए कऽ रहत। सुझि-बुधि‍सँ काम लि‍अ! माएकेँ ऐ बातक जानकारी नै चलक चाही। हुनको सम्हारि कऽ आब अहींकेँ राखए पड़त ने। नै कानू। चूप रहू।” उषो सोचलैन‍ जे अखन हमरा कानबसँ नोकसान छोड़ि आर कि‍छु नै हएत। कहुना मनकेँ बुझबैत चुप भेली। सोनाजी कमरामे बेडपर पड़ल रहैथ‍, बगलमे ममता पंखा हौंकैत रहैन‍, तइ बगलमे पजरा लागि उषा बैस गेली आ सोनाजीकेँ मुँह निहारए लगली। बेटा सभ टाल-मटोल करैत तखन पि‍ताक पराण छुटैकाल गाम आएल जखन सोनाजी केकरो ने चिन्ह सकै छेलैन आ ने केकरो देखिए सकै छला।¦¦¦ भोला आम तरहसँ देखल जाइए जे सतमाइक खिधांश जोर-सोरसँ लोग करैए। अगर कोनो बच्‍चाकेँ सतमाए रहैए तँ ओकरा लोकक सहानुभुति रहैत अछि। मुदा कोनो सोतेला बापक जिकिर केतौ होइत नै देखल जाइए। जखन कि भेद-भाव दुनूठाम होइत अछि। भोला अपन माए दुखनीक दोसर बिआहमे पछिलगुआ बनि आएल रहए। करम बुड़ल छेलैन दुखनीकेँ जे बिआहक दसे दिनक पछाति बिअहुआ घरबलाक देहान्‍त हेजाक बेमारीसँ भऽ गेल छल। पतिक गुजरलासँ दुखनीक नाता ओइ घरसँ टुटि गेल। मुदा आशाक किरण नअ मास अन‍हरिया बीतला पछाति भोलाक जनम भेलासँ फेरि चमैक उठल। दुखनीकेँ लागल जेना बेटाक जनमसँ बिअहुआ घर चिकैर कऽ सोर पाड़लकैन मुदा ईहो इजोत गहनलगुआ भऽ गेल, चानपर दाग लगि गेल। सोसराक लोक दुखनीकेँ स्‍वीकार नै केलक, कियो कुलच्‍छनी तँ कियो कुलनासनी कहैत सदाक लेल ठोकर मारि देलक। तइ दिनमे समाज आकि विज्ञान ओते प्रगति नै केने छल जे डी.एन.ए आकि आरो जाँचसँ साबित करितै जे भोला दुखनीक जाइज सन्‍तान छी। समैक पहिया नाचैत गेल। दुखनी एकटा बेटा रूपी धनसँ सवुर केने जीनगीक सुख-दुखसँ तालमेल बैसबैत पाँच बरख काटि लेली। आब टोला-मोहल्‍ला आ समाजक लोक सभ दुखनीकेँ दोसर बिआहक गप-सप करए लगल। होइत-होइत खुर्शेला गामक मोहन दाससँ चुमौन सम्‍पन्न भेल, जेकर एकटा बेटी सोसरा बसै छेली आ एगो बेटा-पुतोहु भीन भऽ कऽ रहै छल। मोहनाक थोर-बहुत खेत आ चारिटा भैंस रहैन जेकर दूध बेचि गुजर-बसर करै छला। चुमौन भेलासँ दुखनी-मोहनाक जीवन हरिअरी तँ घुमि आएल मुदा भोला जे पिताक खातिर जनमसँ बेलल्‍ला छल, ओकरा पिताक सुख नसीब नै भऽ रहल छेलै जे मोहनासँ भेटबाक चाही। भोलाकेँ बालपनमे पिता भेटल, मुदा ऐ अबोध नेनाक जरूरतसँ हिनकर सतबाप साफ कऽ अनभिग छथिन। मोहनाक चुमौन करैत धरि दूटा कमौआ प्राणी घर आएल, दुखनी पत्‍नी बनि घर-आँगनक काम-काज सम्‍हारली आ भोला पोसल-पालल बेटा रूपमे भैंसक चरबाहि आ घासो भूसामे लगौल गेल। दुखनीक इच्‍छा छेलैन जे भोलाकेँ पढाबी-लिखाबी, तइ बास्‍ते गामक स्‍कूलमे नाओं लिखा देली। मुदा मोहनाक इच्‍छा नै छेलैन जे भोलाकेँ पढाबी। हिनक खिसियाएल रबैया भोलाक प्रति देखि दुखनीक सस-बस नै चलि सकल। ऐ खातिर बेर-बेर भोलाकेँ डाँट-फटकार मोहनासँ पड़ैत रहै। दुखनीकेँ तरे-तर टुसकेलापर भोला कहियो-काल नुका-छिपा कऽ स्‍कूल जाइत छल मुदा र्इ बेसी दिन नै चलि सकल। भोला एकदिन स्‍कूलसँ ऐबते धरि मोहनाक तामसपर चढ़ि गेल। मोहना तमसाएल दाँत पिसैत हूरकैत बजला- “बड़ नबाबक नाति छिही! केतौ बैस कऽ बाप-संगे कौड़ी खेलैत हेबही आ कहै छीही पढ़ैले गेल छेलिऐ! मरि किए नै गेलेँ ओतै? जब घास-ले जाइ छिही तँ तोरा घासे नै मिलै छौ। कहबी खुरपी भोँथ भऽ गेलै तँ बेँटे ढील्‍ला भऽ गेलै। पचासटा बहन्ना बनबै छँह। हट नजैरपर सँ झलमुहाँ!” पाइरक चप्‍पल निकालि कऽ झट-झट सिन पीठपर बरसाए देलखिन। भोला धम्‍म सिन ओतै बैसि गेल आ छट-पटाइत बोमी पाड़ि कानए लगल। मोहनाक अपन बेटा नै रहैन तँए ममत नै, मुदा माता कुमाता नै भऽ सकैए, दुखनी दौगल एली आ भोलाकेँ उठा-पुठा कऽ पजिऔने अँगना लऽ गेली। पुरुष प्रधान समाजमे स्‍त्री शब्‍द केतेक असुरक्षित होइत अछि से दुखनीक हालतसँ बूझल जाए सकैए। स्‍त्रीकेँ अपन अर्धाग्‍नी बनेलोपर हुनकर मति मोहि कऽ पुरुख अपना अनुकूल बना लैत अछि। रसे-रसे धरक वातावरण बदलैत गेल आ मोहनाक आकर्षन दुखनीपरसँ घटैत गेल। धरक काम-कजक अलाबे माल-जाल आ खेतियो-पथारी दुखनीक माथपर बजरि गेल। मोहना भिनसरे भैंस दूहि, दूधक डोल बजार लेने जाइए, अनुमण्‍डलक पजरेमे दुर्गा दासक होटल अछि, जइमे दूधक उठौना लगल अछि, एतए एला पछाति गप-सरक्का संगे गाजाक लत सेहो पुड़बैत एक्केबेर दुपरियामे होइत घर अबै छैथ। होटलक मालिक दुर्गा दास बेदरूकिया नोकरक खोजमे रहैथ जेकर जिकिर ओ मोहनासँ केलखिन- “आठ-दस बर्खक बेदरा काज करैबला गाममे जँ भेटत तँ नने अबिहऽ। तों तँ जानिते छहक होटलमे खेनाइ-पीनाइक कोनो कमी नहियेँ रहै छै। लूइरो-बूइध सीखतै आ पोसलो-पाललो तँ जेबे करतै?” मोहनो भरोस दैत कहलखिन- “अच्‍छा दैखै छिऐ, नजैरपर एतै तँ नेने एबऽ।” घर एलापर बेरमे मोहनक खियाल बेदरूकिया नोकरपर गेल, मने-मन सोचैत एला जे केकरा कहक चाही ऐ वास्‍ते? एकाएक मोहनाक धियान भोलपर गेल आ सोचए लगल। अन्‍तमे ई विचार केलैन जे भोलाकेँ होटलमे लगा देब सएह नीक रहत। घर ऐबते दुखनीकेँ गप-सप्‍पक झाँसा दैत कहलखिन- “भोलाकँ बजारमे नोकरी लगा दइ छिऐ। घरमे खाइ-पिबैक दिक्‍कत भऽ रहल छै। बजारमे रहतै तँ दूटा लूइरो-बुइध सिखतै, गाममे देखै छिऐ ने बौनाएल जाइए?” दुखनी ऐ बातसँ राजी नै छेली मुदा मोहनक जिद्दक आगू हारए पड़लैन। अगिले दिनसँ भोला दुर्गा दासक होटलमे काम करए लगल। ऐ अबोध बेदराक वोनबाससँ एकटा आरो नेनाक मौलिक अधिकारसँ रोकि देल गेल। सोतेला माइक खिद्धांश तँ होइत अछि मुदा सोतला बापोक हेबक चाही जेकर हकदार मोहन भेलखिन। स्‍कूली शिक्षा तँ बाल-बोधक मौलिक अधिकार होइत अछि जे आम लोककेँ समझमे नै आबि रहल अछि। परिणाम स्‍वरूप, अखनो बाल-श्रम अपना देशमे चरमपर अछि। गरीब घरक नेना-भुटका सभसँ बलपूर्वक आकि जोर-जबरदस्‍ती भारी-भरकम काज जेना स्‍टोर उत्‍पादनमे जूताक पौलिश, दोकानमे साफ-सफाइ, भोजनक ढाबा आ होटलमे जबरन बरतन-बासनक माजैक काज, चाह दोकानपर गिलास धोइक अलाबे आनो अनोपचारिक क्षेत्रमे काज कराएल जाइत अछि। घरेलु काज करैले सेठ-साहुकार सभ काम-काजी बेदराकेँ घरमे नुका कऽ राखैए, जइसँ सरकारी श्रम निरीक्षक आकि मीडिआक नजैरसँ बँचि सकए। ई सभटा काज न्‍यूनतम मजदूरीपर बेदरा सभसँ कराएल जाइए, बुझितो जे ई कानूनी जुलुम अछि। एकरा अनुचित आ शोषित मानल जाइए तैयो बहुत गरीब परिवार अछि जे अपन अबोध बेदराक मजुरीक सहारे भरन-पोषन करैए। कानूनो बनल अछि जे अठारह बर्खसँ कम उमेरक बालक मजूरी नै कऽ सकैए। मुदा कानूनक अनदेखी कएल जाइए आ भोला सनक नअ बर्खक बेदरासँ सतरह-सँ-बीस घण्‍टा काज कराएल जाइत अछि। दुर्गादासक होटलमे अनुमण्‍डल आ बेंकोक स्‍टाफ जेना हाकिम, किरानी, चपरासी आ आनो भी.आइ.पी सबहक चाह, नस्‍ता, कल्‍लौ बनैए। किछु महानुभावक डेरापर चाह, नस्‍ता, खेनाइ पठाएल जाइए। दुर्गा दास सोभावसँ एक नमरक पोल्‍टिसबाज छथिन जहिसँ कामकाजी बेदरा सभसँ गप मारि काज करबै छैथ। जरूरी पड़लापर डाँट-फटकार आ लप्‍पर-थप्‍परसँ सभकेँ सकपकेने रहै छैथ। होटलमे छहसँ दस बर्खक आरो चारिटा बाल-मजदूर काज करैत छल। भिनसरबाक चारि बजैत धरि सभटाकेँ हुरपेट कऽ जगाएल जाइए आ बरतन-बासन, चुल्‍हा-चौकीक माँज-मजबैल, निपा-पोतीसँ झार-पोछक काजमे लगाएल जाइए। कोइ चाह लऽ डेरे-डेरा पहुँचाबैए तँ कोइ जलखै, खेनाइ बनाबैमे लगि जाइए। कखनो-काल सभ बेदरामे कोनो-कोनो बातपर टोना-मानीसँ झगड़ा-झाँटी भऽ जाइत अछि, तइ घड़ीमे दुर्गाकेँ अपन सकत मियादि देखबऽ पड़ै छै, जारनि लऽ कऽ झँटियेबो करैए। खेनाइमे सभटाकेँ बसिया भात, टटाएल रोटी, महकौआ तीमन आ बँचल-खूचल तरकारी दैत बजै छथिन- “रै छौड़ा सभ अते नीक चीज तँ तोहर बापो-ददा नै खेने हेतौ। खाइ जाइ जो मन लगा कऽ।” दुर्गा दासक एकलौता बेटा- अमर- दरभंगामे पढ़ैत अछि। जहिया कहियो ओ गाम अबैत अछि तँ जाइ घड़ीमे टीसनपर पहुचबैक जिम्‍मा भोलेकेँ रहैत अछि। आइ अमर दरभंगा विदा भेल। दस-दस किलोक गहुम आ चाउरक मोटा भोलाक माथपर आ कन्‍हापर बैग लटकेने टीसन मुहेँ विदा भेल जे करीब कोस भरि हटि कऽ अछि। रस्‍तामे भारीसँ भोलक कन्‍हा-पजरा ऐंठने जाइत रहै मुदा गाड़ी छुटैक डरे केतौ जिराइयो नै सकल। टीसन पहुँचते रेलगाड़ी ससरऽ लगलै। अमर लपैक कऽ पौदान पकैड़ चढ़ल। भोला नीचासँ सभटा मोटा-चोटा आ बैगो जेना-तेना अमरकेँ पकड़ा आ अपन भाड़ उतारलक। भोलाक माथक बोझ उतरिते मन हल्‍लुक हुअ लगलै, मुदा घुरन्‍ती-डेग नै उठि रहल छै भोलाकेँ। मन भेलै किछुकाल जिरा ली। कन्‍हा आ गरदनि सेहो ऐंठने जाइत रहै। गाछक चबुतरापर धम्‍म दऽ बैस कऽ हाँफए लगल। किछुकाल बैसला पछाति आलस आबि गेलै आ ओतइ ओंघरा कऽ सुति रहल। साइत एते निचेनक नीन कहियो नै सुतल छल। ओ नीनक महासागरमे हेला मारऽ लगल। चारि घण्‍टाक कड़गर नीन खींचला पछाति जखन गाछक छाहैर घुसकि कऽ दूर हटि गेल आ देहपर दुपहरियाक रौद लागए लगलै तखन जा कऽ आँखि खुजलै। भूखो जोरसँ लगि गेल रहै, आँखि मिरैत होटल दिस विदा भेल। ओमहर दुर्गा दास तामससँ आगि अंगोरा होइ छला। भोलाकेँ देखिते मातर तरबामे लहैर दिअ लगल, गारि-बात दैत घौलाइत हूरकैत भोलाकेँ कहलखिन- “रे सार! गेलही तँ मरि गेल रही? की बाप पकैड़ लेने छेलौ? भुख लगलौ तँ दौगल एलही। नमक हरामी कहीं कऽ! मुलुर-मुलुर केना तकैए सार!” बगलसँ करमीलक छड़ी उठा आ भोलाक पीठपर सटाक-सटाक खिंचए लगलखिन। भोला ओतै तिलमिलाइत लूद सिन बैसि रहल आ बाप-माए चिचियाए लगल- “गै माएऽऽ... हौ बापऽऽ... मरि गेलियौ गैऽऽ... माए गै माएऽऽ...” खिसियाले मुहेँ दुर्गा दास फेरि बजला- “सार तूँ हमरा होटलमे टपि नै सकै छेँ। जो जइ बाप लग जेमे। देखै छियौ तोरा के रखै छौ आ के खेनाइ दइ छौ।” घण्‍टा भरि भोला ओतै कनैत रहल। रहि-‍रहि कऽ दुर्गा दास हूरैक-हूरैक मारैले छुटैत रहैथन आ बजैत रहथिन- “भगलेँ कि नै सरबा? एने की टक-टकी देने छीही? आब खाले? टपऽ तँ देबौ नै आ खेनाइ के देतौ? चलि जाइत रह जतए जेबाक छौ।” भोलाकेँ बुझना गेल आब निश्‍तुकी नै रहए देता आ ने खेनाइए भेटत। उठि-पुठि कऽ कोसी प्रोजेक्‍टबला खरंजा पकड़ने एस.डी.ओ साहैबक अवास दिस विदा भऽ गेल। मन्‍हुआलए-सन्‍हुआलए आँखिक नोर पोछैत भोला एस.डी.ओ.क अवासक आगूसँ जाइत छल तख‍‍ने भीम बहादुरक नजैर भोलापर गेलैन। भीमबहादुर एस.डी.ओ. साहैबक भनसिया, जे दयालु प्रवृतिक नेपाली पहाड़ी जातिक छैथ। बहादुर भोलकेँ जानिते रहैथ पुछलखिन जे की भेलौ, किए कनै छीही, केतए जाइ छेँ? भोला हिचैक-हिचैक कऽ सभटा बात बतेलक- “हमरा नै रखतै। मालिक कहलखिन भागि जो, नै रहए देबौ।” भीमबहादुरक उमेर पचास-पचपनसँ कम नै हेतैन मुदा खुश मिजाज आ दयालु प्रवृतिक लोक छैथ। भोलाकेँ केम्‍पसक भितर लऽ गेलखिन आ खाइले दूटा रोटी संग कनी तरकारी देलखिन जे बँचल छेलैन। भोला भोरुके खेलहा, भूखसँ लहालोट हरबे करए। मुदा ऐ रोटीक पैनठेगहासँ देहमे हूबा एलै। किछुकाल धरि ओतए बैसल रहल। एस.डी.ओ पाठक जीक दुनू सन्‍तान नन्‍दन सात बर्खक आ नेहा चारि बर्खक अछि जे केम्‍पसमे बैट-बौल खेलाइत रहए। भोलो दौग-दौग कऽ संग दिअ लगल। साँझ होइत धरि पाठक जीक जीप केम्‍पसमे प्रवेश केलक संग लगल किछु गाम-घरक नेता लोकैनक हुजुम सोहो जुटए लगल। गप-सरक्‍काक बीच सभ नेतागण अपन-अपन काज करा विदा होइत गेला। बीच-बीचमे पाठक जीक नजैर तीनु नेनापर सेहो जाइत रहैन जे प्रसन्‍नचित मुद्रामे खेलैमे मग्‍न अछि। भोला एस.डी.ओ साहैबक कार्यालयमे चाह पहुँचबैले जाइत रहैन तँए चिन्‍हतो रहथिन। मुदा भोलाकेँ एतए देख पाठकजी दुविधामे छला। पाठकजी बहादुरसँ पुछलखिन- “बहादुर, ई लड़का तँ दुर्गादास-होटलक लगैए, ई एतए केना आएल?” भीमबहादुर सभटा बातक जानकरी दैत आग्रह केलखिन- “साहैब, धिया-पुता जाइत छिऐ, भगा देने छै, राति-विराति केतए जेतै, आइ भरि एतै रहे दैतिऐ तँ नीक होइतै।” पाठकोजी नेक विचारक लोक, हँ भ‍रैत बजलखिन- “रहऽ दहक की हेतै? धिये-पुता तँ छिऐ।” बहादुर गरीबीक दिन देखने। तँए मनमे गरीब लोकक प्रति दजा आ सहानुभूति भरल छैन‍। बहादुरमे दूटा नीक गुण अछि, पहिल ई जे जब केतौ भूखलकेँ देखैत तँ खेनाइक आग्रह जरूर करैत, दोसर ई जे दोसरक बाल-बोधकेँ अपना जकाँ सिनेह दैत छथिन। एस.डी.ओ- पाठकोजी- तहिना मिलनसार आ दयालु प्रवृतिक लोक छथिन, तँए दुनू गोटेमे नीक जकाँ बनै छैन‍। भिनसर भने बहादुरक दैनिक काजमे भोला संग दिअ लगल। दस बजैत पाठकजी ऑफिस विदा भेला। बहादुर अपने संगे भोलोकेँ जलखै करबैत गप-सप्‍पमे पुछलखिन- “होटल धुमि कऽ जेमे की गाम? भोला सकपका गेल, किछु नै बाजल, मुदा बहादुर ऐ चुप्‍पीकेँ बुझै खातिर फेर पुछलखिन- “होटल जेबाक मन नै होइ छौ?” भोला मुँह लटकेने बाजल- “नै जेबै, दुर्गा मालिक बड़ मारै छै। खेनाइयो भरि पेट नै दइ छै आ भगाइयो देलक, कहलक आब तोरा नै रखबौ।” बहादुर- “तूँ अपना बापकेँ किए नै कहै छी?” भोला- “हमर बाबा एक बरखसँ दूध लऽ कऽ नै अबै छथिन। दुर्गा मालिक कहलखिन, बाबू सबटा भैंस बेचि लेलकौ।” बहादुर- “माइयो भेँट-घाँट करैले नै अबै छौ?” भोला- “भेँट नै केलकै। एकबेर खजुरी कका दिअए समाद पठेने रहै भेँट करि जाइले। मुदा दुर्गा मालिक नै जाए देलखिन आ हमरा गाम देखलो नै छै।” एकबेर फेरि बहादुरकेँ भोलापर दया लगलैन, जे कि मनुखक मूल सोभावो छी। ओना तँ सभ धर्मक पोथीमे बतौल गेल अछि, जे लोकैन कनैत-कल्‍पैत नेना-भुटका, भूखल, बेमार आ बूढ़-पुरानपर दया-दरेज नै करि सकैए, ओकर ई मनुखक जीनगी बेकार होइत अछि। मनुखक पुनरावृतिक लक्षण अछि, जनम भेनाइ, खेनाइ-पिनाइ, पलनाइ-बढ़नाइ, बिआह-दानसँ बंश-बृद्धि करैत परिवारकेँ आगू बरहेनाइ आ फेर मरि जेनाइ। ई जीवन तँ पशु आ पक्षियो जीबैए। तखन मनुख आ जानवरमे की फरक रहत? दया मनुखक सभ गुणमे श्रेष्‍ठ अछि जे मनुखमे रहबाक चाही। भीमबहादुरक मनमे विचार उठल, साहैबसँ गप करि भोलाकेँ अहीठामक काजमे रखि लेब तँ एकटा बेदराक उपकार भऽ जाइत! साँझ पड़ैत पाठकजी एलखिन। काजसँ फूर्सत भेला पछाति बहादुर पाठकजी सँ बिनती करैत भोलाक खातिर गप कहलखिन जेकरा पाठकजी स्‍वीकार केलकैन। भोला घरक काजमे संग-साथ दिअ लगल। मौका भेटलापर नन्‍दन-नेहा संगे पढ़ैओले बैसि जाइत रहए। कनी दिन बीतला पछाति बहादुर भोलाक माए-बाबूकेँ समाद पठेलखिन, भेँट करैले। डेढ सालसँ दुखनी बेटाक सोगमे चिन्‍तीत छेली। मुदा ई खबैर जे भोला एस.डी.ओ साहैबक घरमे काज करैत अछि, सुनि सुप सन कलेजा भेलै। अगिले दिन दुखनी दौगल एली। दू बरिसपर भोलाकेँ देखिते दुखनीकेँ खुशीक ठेकाना नै रहलै। गप-सपसँ पता लागल जे भोलाक सतबाप, मोहना भैंसपर सँ खसि पड़ल आ डाँर टुटि गेल। पछाति सभटा भैंसकेँ बेचए पड़लै। तहियासँ आइ तक मोहना बेमारे रहै छैथ, कोनो काज-राज हिनकासँ नै भऽ रहल छैन‍। भेँट-घाँट भेला पछाति दुखनी गाम दिस विदा हुअ लगल मुदा एस.डी.ओ साहैबसँ भेँट करैत निहोरा केली- “हूजूर, आइसँ अहीं ऐ निभोगाक माइ-बाप छिऐ। अहींक नून खा कऽ एकर भाग चमकतै।” पाठकजी भरोस दैत कहलखिन- “भोलासँ अहाँ निफिकिर रहू। खर्चा-पानीक दिक्‍कत हएत तँ हमरा खबैर करब।” पाठकजी भोलाक हाथे पाँच सए टका आ एक सेट कपड़ा दुखनीकेँ विदागरीमे देलखिन। दुखनी हँसी-खुशीसँ गाम दिस विदा भऽ गेली।¦¦¦ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १. राजदेव मण्‍डल- जल भँवर  (उपन्‍यास ) २.उमेश मण्‍डल- एकटा विहैन कथा-  मुड़नक मुर ३. आशीष अनचिन्हार- ब्रम्हपिशाच (व्यंग्य) १ राजदेव मण्‍डल जल भँवर उपन्‍यास 7 धारक कछेर। पसरल बाउल। केतौ-केतौ कास-पटेरक झाड़-झॉंखुड़। ओहीठाम राजेसर ठाढ़ भेल छल। बताह सन दशा। सोचि रहल छल। ‘सभ किछो अछि ओहिना, जहिना छल तहिना। मुदा ई की भेल, हमरा लेल, सभ किछु बदैल गेल...? संगे आएल गौऑं सभ जागेसरक लहाश ताकि-हेरि रहल छल। चारूभर अगाध बालुका-राशि। केतौ हरियरीक लेश नहि। जेना नदी उजरका साड़ी पहिरने होइ। कात-करोटमे केतौ किछु नै। जेना नदीक नोरसँ सभ किछु दहि-भँसि गेल होइ। चहुँओर पसरल सुन-मसान,  ने कोनो बोली ने कोनो गान। राजेसर सोचलक- एहने दशा आब हमरा भौजियोकेँ होएत। अहिना विधबा स्‍त्री जकॉं उजरा साड़ी पहीरि,ऑंखिसँ नोर बहबैत, पहाड़ सन जिनगीकेँ नपैत-जोखैत...। अकुलाएल मनकेँ बहटारैले कनी आगू बढ़ल मुदा फेर ठमैक गेल। यएह तँ ओ जगह छी। अहीठाम जागेसर भैया कहने रहैथ- “हौ बौआ, जागि-बेरागि कऽ सुतिहऽ। घरो काते-करोटमे आ रातियो अन्‍हरिये। बुझिते छहक गामक गेल आ निन्नक सूतल। हमरा बेसियो समए लगि सकैत अछि।” बेसी समए की लगतै ओ तँ सदा-सदाक लेल छोड़ि कऽ चलि गेला। जेना बोली, बानि, क्रियाकलाप द्वारा मृत्‍यु समैसँ पूर्वे सूचना दैत रहै छै। राजेसर डबडबाएल ऑंखिकेँ पोछि लेलक। छीटपर मुँह उठौने- नाहक भग्न अवशेष। लगै छेलै जेना गोहि शिकारकेँ पकड़ैले लक लगेने होइ। भविसक बोझ जेना राजेसरकेँ दबने जा रहल छेलै। मन तरे-तर काछुर काटि रहल छेलै। माथासँ घामक टघार चूबि रहल छेलै। ओ धड़फड़ाइत धारक पानि दिस बढ़ि गेल। “एना धड़फड़ीमे कोनो काज नै करी। आब तूँ जुआन भेलह।” जेना केतौसँ भाइक स्‍वर ओकरा कानसँ टकरेलै। आशासँ भरल ओ चारूभर चकोना भेल। मुदा केतौ किछु नै देखा रहल छेलै। जेना अन्‍तरमे किछु उधुक्का मारलकै। ओ हिया फाड़ि कऽ कानए लगल। भाइक संग बितौल एक-एक क्षण मन पड़ि रहल छेलै। जेकरा परतापे ओ ने डेराइत छल आ ने कखनो चिन्‍तित होइ छल। मुदा आइ ओकरा बुझाइ छेलै जे ओ असगर भऽ गेल अछि। विल्‍कुल बेसहारा। सभ किछु बदलल। मन खाली खाली सन। माथपर हाथ लेने ओहीठाम बैस गेल। भविसक भूत सभ आगूमे नाचए लगलै। केतबो ताक हेरि केलक मुदा लहासक केतौ अता-पता नै चललै। गौआँ सभ असोथकित भऽ कऽ राजेसर लग बैस रहल छेलै। भूख-पियाससँ सबहक मन ऑंटो-ऑंट भऽ गेल छल। कछमछी लगल छेलै मुदा जाएत केना। समाजिक भारसँ घेराएल छल। कालीकान्‍त कातेमे बैसल छल, एकगोरे पुछलकै- “यौ कालीकान्‍त बाबू, आब कोन उपाए लगतै? दाह संस्‍कार केना हेतै?” गमछासँ मुँह पोछैत कालीकान्‍त बजला- “आब मरलाहा संगे मरि जाएब से हएत। एते तका-हेरी केलौं मुदा लहाशक केतौ पता नै लगल। साइत धारक पेटमे चलि गेल।” “उपाए की हेतौ यौ?” “एहेन स्‍थितिमे तँ कुशपुतर बना कऽ दाह संस्‍कारक बेवस्‍था होइ छेलै। गामपर चलह। जाति-समाजसँ पूछि लिहक। जेना कहतह तेना करिहऽ।” “तँ आब चलबाक चाही।” “हँ, दुपहरिया बीतल जा रहल छै। आ बाट केहेन अछि से बुझिते छहक।” मुदा राजेसर किछो नै सुनलक। जेना ओ गप-सप्‍पसँ बहुत दूर छल। सोचक सागरमे निमग्न। मुँहपर पीड़ा नाचि रहल छेलै। चुपे-चाप अपनहि नोरकेँ पी रहल छल। कनीकाल तक कालीकान्‍त ओकरा मुँह दिस तकैत रहला। जेना अपना ऑंखिसँ राजेसरक हृदैक पीड़ाकेँ नापैत होइ। मुदा आनक पीड़ा आन नहि जान। दुखक पसरैत छॉंहकेँ कालीकान्‍त देख रहल छला। ओ राजेसरक बॉंहि पकैड़ हिलबैत बजला- “रौ राजेसर, एना वौराएल किए छीही। तोरेपर तँ आब पलिवारक सभटा भार छौ। एना जँ करबीही तँ पलिवारक आन लोकक की दशा हेतौ। मनकेँ थीर कर। ऐठामसँ उठ। चल गामपर।” राजेसर उठैक कोशिक केलक। मुदा टॉंग थरथराए लगलै। सौंसे शरीर केराक भालैड़ जकॉं डोलैत रहइ। ऑंखिक आगू अन्‍हार। ओइ अन्‍हारमे लाल-पीअर रेखा...। ओ लुद दऽ बैस रहल। कालीकान्‍त समझबऽ-बुझबऽ लगला- “रौ, संसारक चक्र अहिना चलै छै। जे ऐ मृत्‍युभुवनमे आएल अछि ओकरा एक दिन ऐठामसँ जाए पड़तै। जन्‍म आ मृत्‍यु होएब तँ लीला अछि। ऐ लीलामे मनुखकेँ अपन-अपन काज करए पड़ै छै। भागि कऽ केतए जेबही? लीला केकरा बुत्ते रूकत। राजा, रंक, फकीर कोय मृत्‍युसँ नहि बँचि सकैत अछि।” संत परभुदास  लगमे आबि कऽ बाजल- “यौ सदा न फूलै तोड़ी, सदा न सावन होय। सदा न जौवन थिर रहे, सदा न जीबे कोय। जे ऐ संसारसँ चलि गेल से आपस नै आबि सकैत अछि। सभगोटे मिलि कऽ कानब तैयो घूरि कऽ नै आउत।” राजेसर नोर पोछैत बाजल- “हे यौ, अहूँ सभ ठीके कहै छिऐ। मुदा सभ किछुकेँ एकटा समए होइ छै। समैसँ पहिने एहेन बेथा भऽ जाएत से कहियो मनमे नै आएल रहए। अहीं सभ सोचियौ, पलिवारक भार, धिया-पुताक भार आ भौजीक दशा देखै छिऐ तँ मोन होइए जे हमहीं मरि जैतौं से नीक होइत।” परभुदासकेँ बजए पड़लै- “जिय बिनु देह नदी बिनु वारि, वैसहिं नाथ पुरुष बिनु नारी। ओकरा तँ ठीके भारी विपैत पड़ि गेलै।” कालीकान्‍त सम्‍हारैत बजला- “से तँ हमहूँ सभ बुझै छिऐ जे जुआनीक मौत बड़ अधला। मुदा की करबहक। ऊपरबलाक जे इच्‍छा छेलै से भेलै। ओइ सर्वशक्‍तिमानक सोझा केकर वश चलतै। संतोष तँ करइ पड़त।” किछुकाल सभ कियो गुम पड़ि गेला। जेना एक-दोसरक पीड़ाकेँ नापि-जोखि रहल होथि। कालीकान्‍त ऊपर मुहेँ तकैत बजला- “चलह, बड़ बेर भऽ गेलै। आगूक गप्‍प गामपर सोचल जेतै।” परभुदास पॉंजमे पकैड़ राजेसरकेँ ठाढ़ केलक आ बाजल- “मनकेँ थिर करह आ डेग उठाबह।” “होहिं वही जो राम रचि राखा।” आगू राजेसर आ पाछूसँ गौआँ सभ मुँह लटकौने विदा भऽ गेल छल। मनुखक हृदैमे दुख सहबाक असीम क्षमता रहिते अछि। केहनो भारी दुखकेँ रसे-रसे सहि लैत अछि। राजेसर सोचि रहल छल आ उड़ैत धूराकेँ देख रहल छल। पता नै लगि रहल छेलै जे हवा संगे धूरा अछि आकि धूरा संगे हवा। मुदा धूराक मध्‍य बनैत आकृति तुरन्‍तेमे बिगैड़ जाइ छेलै। ओइ बनैत आकृतिक मध्‍य राजेसर अपनाकेँ तकैत-तकैत हेरा गेल छल।◌ 8. भोरेसँ चारूभर अनघोल भऽ रहल छल। पुरुखमे आपसी चरचा आ स्‍त्रीमे फुसराहैट। पूरे गाम दलमलित। लोक सभ गामपर सँ ससरल जा रहल छल। चुपेचाप, अनठौने। गाम-घरक कोनो घटना बड़्ड तेजीसँ पसरैत अछि। जेना आगिक कुकुआहा एक घरसँ दोसर घरकेँ अपना लपेटमे लैत बढ़ैत अछि। तहिना एक कानसँ बियाबान, सबहक पेटमे बात थोड़े पाचै छै। केते गोरेकेँ तँ पेटमे बात बसात जकाँ औनाए लगै छै। जँ जल्‍दी नहि निकलौ तँ...। कालीकान्‍त अपने दलानपर ओंगठल छला। धिया-पुता ओकरा देहपर लटकल छल। किन्‍तु ओकर धियान ओइ औरतियाक गपपर छेलै जे लगेमे बैसल छेलै। केतेको गप पंचकेँ एकान्‍तीमे कहल जाइ छै। खुशामद आ पैरवी केलापर पंचो न्‍याय-अन्‍याय करैले तैयार भऽ जाइ छै। जखैन पैरवी केनिहार पंचक मनोनुकूल हुअए तखैन तँ...। कालीकान्‍तकेँ किछु एहने सरस गप औरतिया सुना रहल छेली। तखैने सरपंच साहैब आबि गेला। कालीकान्‍तक आँखिक इशाराकेँ औरतिया बूझि गेल। ओ चट-दे नुका कऽ कोनटामे ठाढ़ भऽ गेल। कालीकान्‍त खखसैत कनी जोरसँ बजला- “यौ सरपंच साहैब, भोज-काजक इन्‍तिजामे राजेसरकेँ दिक्कत भऽ रहल छै। कनी ओम्‍हरो धियान दियौ।” सरपंच साहैब ठमकैत बजला- “यौ, ओनए गाम दलमलित भेल छै। अहाँकेँ भोज छूटि रहल अछि। अहाँकेँ तँ धियाने दोसर दिस अछि।” चकित होइत कालीकान्‍त बजला- “हमरा किछो पता नै अछि। की भेलै से?” “लरेनाक स्‍त्री बीख खा लेलकै, रातियेमे मरि गेलै। थाना खबैर पहुँच गेल छै। थोड़ेकाल मे दरोगा गामपर पहुँचत।” “नेता लरेना ऐठाम यौ?” “हँ यौ, अहीबेर तँ सभ नेतपनी घोंसड़तै।” “यौ नेता फनकबाज छै। केहेन-केहेन अफसरकेँ मुट्ठीमे रखने छै। देखै दिऐ जे बड़का लोकक गाड़ीकेँ हाथक इशारासँ रोकि दइ छै।” “धूर ई कोन बड़का बात छै। घूसखोरसँ काज करबौनाइ तँ सबसँ असान...।” “नइ यौ सरपंच साहैब। ओना जे कहियौ मुदा नेतबा छै बड़ा सोरसियल।” “जँ सोरसियल अछि तँ मुखिया जीक कथी लऽ पमोजी करैत अछि।” “की करतै अपना बुते नै सम्‍हरल हेतै।” “तब कोन सोरसियल भेलै?” “अखनी केतए अछि नेता?” “साइत डागदर संगे फदर-फदर कऽ रहल अछि।” “डागदरकेँ देखै छी पछिम मुहेँ जा रहल अछि।” “पूछताछसँ बचबाक लेल केतौ चलि देने हएत।” “यौ सरपंच साहैब, अहूँ तँ साइत ओही डरे ससरल जा रहल छी।” “नै यौ, हम तँ पूबरिया बाधक खेत देखैले जा रहल छी।” तीन-चारिटा जुबककेँ जाइत देख दुनू गोरेक धियान ओनए चलि गेल। पढ़ल-लिखल बेरोजगार युवक सभ छुट्टीमे गाम आएल छल। आपसमे गप लड़बैत चौक दिस जा रहल छल। “एकटा गप नै बुझलिऐ यौ। लरेनाक स्‍त्री बीख खा लेलकै आकि अन्न-पानिक संगे खुआ देलकै?” “खेलकै आकि खुआ देलकै, जे भेल होइ। मुदा मरि गेल से तँ साँच छै। एकर दोखी तँ लरेना आ ओकर पलिवारे भेलै।” “जँ अपने खेने होइ तब केना कऽ दोखी हेतै?” “परिवारमे तँ परोछ रूपसँ तेतेक दुख आ कष्‍ट दइ छै। बारम्‍बार प्रताड़ित करै छै जे महिलाकेँ बेवस भऽ कऽ आत्‍महत्‍या करए पड़ै छै। जँ एहेन परिस्‍थिति पैदा केने होइ तँ दोख केकर भेलै?” “ठीके, पुरान विचारक लोक सबहक नजैरमे महिलाक कोनो मोल नहि छै। ओहन लोक हरदम महिलापर दाब-चाप देखबैते रहै छै।” “ऐ शोषण आ अत्‍याचारक कारणे केतेक उपद्रव होइ छै आ समाजो पछुआ जाइ छै।” युवक सबहक गप सुनि कालीकान्‍त तमसाइत बजला- “अपना सभकेँ देख कऽ केहेन अँतड़ीमे लगैबला बात बजै छै। सुनै छिऐ आकि नहि?” सरपंचो साहैब तमसाइत बजला- “सुनबै की, ई सभ गाममे केकरो मनुख बुझै छै। ई छौड़ा सभ अपनाकेँ सभसँ बड़का काबिल बुझै छै। आ जाने छै ढोंढ़क मनतरो नहि।” मखना कम पढ़ल-लिखल रहितो देश-विदेशक बात बुझै छल। ओ बाटक कातमे ठाढ़ भेल सभ गप सुनि रहल छेलै। नै रहल गेलै तँ बाजल- “ई सभ किछो नहि बुझै छै तँ आइ.ए; बी.ए. पास केना केलकै यौ?” कालीकान्‍त नै बजला मुदा सरपंच चट-दे लोकैत बजला- “रौ, परीक्षा पास केनेसँ कियो काबिल नइ भऽ जाइ छै।” “तब कथी केलासँ होइ छै?” कालीकान्‍तकेँ बजऽ पड़लै- “बड़ काबिल छै तँ एना बौआएल किए घुरै छौ। कोनो नीक नोकरी करितौ ने।” “अहाँ नोकरी केनिहारकेँ काबिल बुझै छिऐ। ईह! ई कहियौ जे हमर बेटा नै पढ़लक तँए मने-मन जरै छी।” “हमरा सभ किए जरबै। कोय अपना बरदकेँ नाङैरेमे नाथत ओइसँ लोककेँ की बिगड़तै।” सरपंच साहैब बातकेँ आगू बढ़बैत बजला- “हे यौ,  दू साल जँ उपजा नै होइ तँ सभ नवावी घोंसैर जेतै। उपजा जँ होइत रहै तँ पढ़ौनाइ कोन बड़का बात छै।” मखना पट-दे बजल- “जँ एतेक सस्‍ता गप छै तँ अहूँ अपना बेटाकेँ पढ़ा लैतौं किने।” सरपंच साहैबकेँ जेना भीतर तक छूबि देलकैन तँए ओ गुम्‍हड़ैत बजला- “ई छौड़ा सभ अकासेपर चलता। हे रौ, तोरा कोइ बजेने छेलौ जे लबर-लबर करै छेँ?” कालीकान्‍त फटकारैत बजला- “हे रौ, तूँ ऐठामसँ जेबेँ की नहि।” “जाएब किए नै। साँच बात अहिना लगै छै।” “ई किएक जाएत हमहीं चलि जाइ छी।” कहैत सरपंच साहैब तेजीसँ बाध दिस विदा भऽ गेला। पदचापसँ निकलैत क्रोध! जोड़ लगैत परबा डेरा गेल आ फड़फड़ाइत उन्‍मुक्त अकास दिस उड़ि गेल। मुदा सरपंच साहैबक धियान ओमहर नै छेलैन। ओ अपना मनसँ लड़ैत बढ़ल जाइ छला।◌ 9. गाम कनी शान्‍त जकाँ भऽ गेल छल। तैयो लोक मने-मन डेराएले छल। भितरिया डर निकैल जेना असान थोड़े छै। ओ तँ भीतरे-भीतर कुही करैत रहै छै आ थकुचल जिनगी चलैत रहै छै। संगे हहास मारैत सभ किछकेँ झँपने बढ़ैत रहै छै,बहादूर सभ। ओना अही बीचमे तीन-चारि बेर थानेदार आएल छल। मुदा केकरोपकैड़ नै पौलक। घटनोक दिन सिपाहीक एलासँ पहिनहि लहास जरि गेल छेलै। मुदा जरलोहो हड्डी सिपाही सभ बीछि कऽ नेने गेल छल। डर तँ सभकेँ बनले छेलै जे केकर नाम दारोगाक डायरीमे नोट छै आ केकर नहि। एहने समैमे लोक सभ मनमे सैंतल दुसमनी सधबैत अछि। ऐ कारणे सभ मने-मन आतंकित। साँझ पड़ैमे किछु पल शेष छेलै। गोसाँइ डुमानी-बेर। राजेसरक दुआरिपर लोक सभ जमा भऽ गेल छल। आइए जागेसरक सराधी भोज छेलै। ओना राजेसरक स्‍थिति भोज करबाक जोग नै छल परन्‍तु सर-समाजक उड़न्‍ता गप सुनलकै। कोइ सोझहामे तँ कोइ परोछमे। वेवश भऽ कऽ भोज करए पड़लै। जाति-समाजसँ भागियो तँ नै सकै छल। लोक सभ लोटा लटकौने पैछला भोजक चरचा करैत आबि रहल छल। राजेसरक दुआरिकेँ खरड़ासँ साफ कएल गेल छेलै। एक गोरे कुकुर आ कौआकेँ लाठीसँ भगा रहल छल। किछु भोजक पंच सभ कोणटामे ठाढ़ भऽ कऽ गप लड़ा रहल छल। “दुआरि नीकसँ साफ नै केलकै। हौ, सकरता नहि छेलै तँ कथीले भोज केलकै।” “हे यौ, की कहब कण्‍ठ मोकि कऽ भोज लेलकै। किछ मुँहपुरुखा सबहक विचार भेलै जे ऐ भोजमे एकरा डाँड़ तोड़ि दहक। सभ नेतागीरी अपने छुइट जेतै। जन-मजदूर पाटी लऽ कऽ बड़ी जोरसँ गरजैत रहै छै। भोजमे करजकेँ बोझ पड़तै आ ओकरे सधबैत जिनगी बीत जेतै। मुखिया बनबाक सपना कहियो पुरा नहि हेतै।” दोसर गोरे बाजल- “हौ, जे भोज नै करए से दालि खौब सुड़कए। लोगक ऐठाम जे भोज खेने छै से करजा कहिया सधौते। भोज नहि करतै तँ उद्धार केना हेतै?” “हँ, हँ…। भोज तँ सभकेँ करबाके चाही। आखिर मुक्ति केना मिलतै।” “हँ यौ, समाजोक तँ एकटा निअम-काइदा छै तेकरा तोड़बाक नहि चाही।” “एना पुरान लकीरक फकीर बनल रहब तँ मरैत रहू ओही तरमे आ लदने रहू। बचबाक अछि तँ परिवर्तन करू।” “झगड़ा नै करू। बैसैले चले-चलू।” जातिक मानिजन हाथमे लोटा नेने पंच सबहक बीचमे आबि कऽ बाजल- “की यौ, सभ गोरे आबि गेलौं?” मलकेसर टाँहि दऽ बाजल- “हमरा सभ ठीकेदारी नेने छिऐ- सबहक। जे नहि आएल से पाछू खाएत।” “हँ, ठीके छै। सभ किछो तैयारे छै। बैसू पाँतिसँ।” सुनिते, सभ गोरे चटाचैट बैस गेला। लरेना नेता कातेमे ठाढ़ भऽ कऽ सरपंच साहैबसँ कनफुसकी कऽ रहल छल। गप सुनैले डाक्‍टर लगमे सहैट कऽ गेल।साधारण दुख-बेमारीक इलाज अंगरेजी जानै छल तँए गामक लोक ओकरा डाक्‍टरे साहैब कहै छेलै। लरेनाक स्‍त्री जखैन मरैत रहै तखैन डाक्‍टरोकेँ बजौल गेल रहइ। मनमे डर पैसल रहै जे कहीं मोकदमा मे नाम ने पड़ि गेल हुअए। शंका समाधान करैले लरेनासँ पुछलकै- “की यौ नेताजी, केशक की हाल छै?” डेराएल रहलाक कारणे नेता मिरमिराइत बाजल- “अखैन तँ ठीके छै। दरोगाजी किछ डिमण्‍ड केने छै।” “यौ, सौस-ससुरसँ मिलानक गप करू। ठीक रहत।” “देखियौ तँ आगू की होइ छै।” सरपंच साहैब बैसल लोक दिस नजैर उठबैत बजला- “यौ भात परसल जा रहल छै। कोनो नीकठाम अपनो सभ बैसू।” पंच सभ पाँतिमे बैस गेल छल। बारीक सभ भोज्‍य पदार्थ परसैत अपसियाँत। भात-दालि, तीमन-तरकारी, पापर-अँचार आ चटनी। लोक सभ भोजनक सुआद लऽ रहल छल। लरेना नेता किछ बाजए चाहलक तखैने मनधत्ता दौगैत आगूमे पहुँच गेल। मनधत्ता चौकपर साग-सब्‍जीक छोट-छीन दोकान करैए। ओ अपसियाँत होइत लरेनाकेँ कहलक- “यौ नेता, जल्‍दी भागू नहि तँ पकड़ा जाएब। दरोगाजी एक दरजन फौरसक संग आबि रहल अछि।” लरेना फानि कऽ ठाढ़ होइत पुछलक- “कोनेसँ रौ?” “पछिमसँ गाम लग आबि गेल अछि।” लरेना अँइठे हाथे नुआँ समटैत पूबमुहेँ भागल। कोइ कातसँ टाँहि दऽ बजल- “चाहे छुटए संग साथ, नहि छोड़ी आगूक भात।” लरेनाकेँ भागैत देख ओकर दियाद भेलवा आ पीअर बाबाक कान ठाढ़ भऽ गेलै। भेलवा अपना बगलमे बैसल पीअर बाबाकेँ पुछलकै- “हौ बाबा, नेतबा किए भागलै?” पीअर बाबा मुँहक भात घोंटैत बजल- “आबैत काल टीटही लगल रहइ। हमरा शंका होइ छौ। साइत पुलिस-दरोगा आबि रहल छै।” “साँचे हौ? अपनो सभकेँ पकड़तै?” “हँ रौ, लहास जरबैमे तँ अपनो सभकेँ संग केने रहइ। केशमे नाम हेबे करतौ। सुनै छिऐ- थानापर बड़ पिटान करै छै। जान नै बँचतौं। कोनो तरहेँ भाग ऐठामसँ।” भेलवा हरमुठाह लोक। आगू-पाछू सोचैबला कोनो बुधि नै। डरसँ आँखि नोरा गेलै। फनफनाइत ताकत घटि गेलै। किछु दिन पहिने ओही गामक सुपड़िया चोरकेँ पकैड़ थानापर लऽ गेल रहै। राति भरि नंगी मरचायक मसालासँ ओकरा सेवा कएल गेल रहइ। ई गप भेलवाकेँ बुझले छेलै। ओ मनेमे सोचलक-  चण्‍डलबा जँ आइ हमरा पकड़त तँ नै जानि जे कोन दशा करत। डरसँ ओकरा ऑंखिक आगू अन्‍हार भऽ गेल छेलै। कोने भागत बाट सुझबे ने करइ। ओ सोझे पाँते दिस पड़ाएल। केतेक गोरेक पातपर लात दैत,भातकेँ खिचाड़ैत मलकेसरक लग जा कऽ धाँइ-दे खसल। ओकर ठेहुन मलकेसरक मुहेँमे लगल। मलकेसर चितंगे खसल, मुँह पकैड़ बपराहैड़ काटए लगल। लोक सभ हो-हल्‍ला करए लगला। भेलवाकेँ बुझेलै- साइत दरोगाजीआबि गेल।ओ फुड़-फुड़ा कऽ उठल आ लरेनाक पछोड़ धेने भागल। मलकेसर कुहरैत उठल आ गरियबैत बाजल- “के छेलै रौ सार, हौ बाप, जान नहि बॉंचऽ दैत। किछ दिन पहिने तँ एकटा अगत्ती मखना डाँर सरकौने छल। आइ मुहोँ भंगठा देलक सार भेलवा।” गरदा झारैत फेर बजल- “हे रौ फतरिंगा सभ, सामरथी नै रहै छौ तँ बौहकेँ बीख खिया कऽ किए मारै छीही। हे रौ सार, रही घुरघुरा आ उखाड़ी बिचलाघर खाम्‍ह।” भारी घोल-फचक्का होए लगल। ओही हल्‍ला-फसादक मध्‍य केतेक गोरे ससरए लगल। जेकर केशमे नाम हेबाक शंका रहै ओ दोगे-दोग बिला गेल। पीअर बाबा पोखैर दिसक लाथ लगा विदा भऽ गेल। ओकरा पाछू डाक्‍टर साहैब गप लड़बैत चलि देलक। पाँतमे जगह-जगह स्‍थान रिक्त भऽ भऽ गेल छल। बँचल लोक सभ भोज खा रहल छल। मुदा बीच-बीचमे ओइ खाली जगहकेँ देखैत कुता सभ आपसमे गुम्‍हरए लगल। जाबे लोक ‘हॉं-हॉं’करै ताबे कुकुर सभ पाँतमे ढुकि गेल। नष्‍ट-नष्‍ट कहि सभ गोरे फानि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। धिया-पुता पातमे लात दैत भागि गेल। गधकिचन मचि गेल। किछसँ किछ बजैत लोक सभ घर दिस विदा भऽ गेल छल। राजेसर दुआरिक कातमे ठाढ़ भेल छल। वेचारा केतेक करजा-बरजा करैत भोजक ओरियान केने छल। सेहो समाजकँ पाइठ नहि भऽ सकलै। ओकरा आँखिसँ दहो-बहो नोर खसि रहल छल। मुदा ओइ नोरकेँ देखैबला कियो नहि छल। एक गोरेबाजल- “भोज की करत। जश नहि भेटलै।” दोसर गोरे टोनलक- “ऐमे केकर दोख?” रोजेसरक देह जेना काठ भऽ गेल छल। ओ शून्‍यमे निहारि रहल छल। ◌ २ उमेश मण्‍डल एकटा विहैन कथा- मुड़नक मुर गोसॉंइ अन्‍तिम कगनीपर पहुँच डुमैले तैयार रहैथ। मनाइ ठाकुर अपन दिनुका काज उसारि हाथ-पएर धोइ कऽ तमाकुल खा अपन सङ्गैतिया सभकेँ लऽ महावीरजीक स्‍थान पहुचैक विचारमे दरबज्‍जापर बैसि पत्नीक प्रतीक्षामे रहैथ जे जखने औती तखने अपन काम-धाम सुमझा विदा हएब। मनाइ ठाकुरक पिता चारि-पान साल पहिनहि ई देश-दुनियॉं छोड़ि अपन देश-दुनियॉंमे पहुँच गेला। वृद्ध माए जीवित छैन आ अपने दुनू परानीक संग तीन-चाइटा धियो-पुता परिवारमे छैन। ओना काज तँ बॉंटल छैन, मुदा एक परिवारक बीच रहै छैथ‍ तँए सभ दिन दुनू परानी मनाइ ठाकुर भरि-दिनुका काजक मुँह-मिलानी करैत, कौल्‍हुको काजक सूचीबद्ध सभ दिन क’ लइ छैथ। जहिना मनाइ ठाकुरक देश पुरुख-पात्र आ दुनियॉं होइ छैन हुनकर केश-दाढ़ी बनाएब, तहिना अलोधनियोँक देश होइए स्‍त्रीगण, हुनकर हाथ-पएरक नह काटब दुनियॉं। अर्थात् मनाइ ठाकुर अपना देश-दुनियॉंमे रमल रहै छैथ‍ आ अलोधनी अपना देश-दुनियॉंमे। मुदा एकेठाम, एके परिवारमे, संगे-संग दुनू परानीक काज-रोजगार रहल, खाली काजक देश-दुनियॉं अलग-अलग, तँए एक-दोसरक हिसाव-बाड़ीक मुँह-मिलानीक परोजने नहि पड़ै छैन। किएक तँ देखले आ फड़ियाएले हिसाव दुनू गोरेक बीच रहै छैन। मुदा औझुका काज बँटा गेल छेलैन। सराधक काजमे पुरुख-स्‍त्रीगण सभकेँ नौआक परोजन पड़ैत अछि, मुदा मुड़नमे तँ से नइ होइए। एकटा बाल-बोधक केश काटल जाइए। अलोधनियोँ आइ दोसरे काजे आनठाम गेल छेली। मनाइ ठाकुर अपन औझुका काजक हिसाव पत्नीकेँ सुमझेनाइ जरूरी बूझि डेढ़ियापर बैसल सोचैत रहैथ- जखैन महावीरजी-स्‍थानपर सङ्गैतिया सबहक संग कीर्तन-भजन करए जाएब, तखैन कोन ठेकान अछि, जँ कहीं वौराइए जाए,तखैन तँ औझुका हिसाव माथपर लगधले रहत..। पुरना साड़ीमे तीन-चारिटा मोटरी-चोंटरी बन्‍हने अलोधनी डेढ़ियापर पहुँचलो ने छेली कि मनाइ ठाकुर कहलखिन- “पहिने सुनि लिअ, तखैन अँगना जाएब।” भरि दिन अधोधनी पति विहीन बोनाएल-बोनाएल उबियाएले छेली। तँए मोटरी-चोंटरी ऑंगनमे राखब स्‍वत: बिसैर गेली। लगमे आबि बजली- “कोन एहेन धड़फड़ी भऽ गेल जे रस्‍तेसँ रस्‍ता घुमा लेलौं! कहू की कहै छी?” जहिना अपना धुनमे अलोधनी तहिना अपना धुनमे मनाइयो ठाकुर रहैथ। बजला- “आब अपन धर-अँगनाक हिसाव लेब आकि हम ओकरा कन्‍हेठने घुमैत रहब!” हाथक मोटरी-चोंटरीकेँ ओसारपर जा कऽ राखि अलोधनी लगमे आबि समान्‍य रूपे पतिकेँ पुछलकैन- “औझुका मुड़नक कमाइ की सभ भेल अछि।” मने मगन मनाइ ठाकुर रहबे करैथ, बजला- “मुर पलटे तँ नाचए साहु, औझुका कमाइ की तकै छिऐ। आइ तँ एकटा मुड़े बढ़ि गेल, तखैन अनेरे कोन सुइदक भॉंजमे रहितौं।” अपना मने अपना ढंगे जहिना मनाइ ठाकुर बजला तहिना अपना मने आ अपन ढंगे अलोधनियोँ बुझलैन,कनीकालक पछाति अलोधनीक मुहसँ निकलल- “एहनो करम जरूआ पुरुख हुअए!” ‘करम’ शब्‍दक अर्थ मनाइ ठाकुर अपना हिसावे बुझै छला। मनमे नचलैन जे बाल-बोधक जन्‍मौटी केश काटि एकटा सम्‍पतैक मुड़ पूजी बँचिये गेल तखैन अनेरे सूदिखौंक किए बनितौं! सङ्गैतिया लोक छी, राम भजन करै छी, तखैन अपनो मन की कहैत? मुस्‍कुराइत मनाइ ठाकुर बजला- “ऍंह! बड़ सुन्नर मुड़नी-भोज बनल छेलए। जेहने खीर बनल तेहने पुड़ी।” पतिक खीर-पुड़ी सुनि अलोधनीक मन मिठेलैन नइ बल्‍की जेना बाइस-तेबाइ खेने मन खटा जाइ छै तहिना खटा गेलैन। बजली- “सिदहा-समर की सभ अनलौं, से ने कहू?” मनाइ ठाकुर कहलखिन- “बॉंकी की रहल जे अनितौं। दिनके तेहेन खेलहा अछि जे मात्र लोटा पानि पीने रतियो कटि जाएत!” अलोधनीकेँ जेना एकेबेर झौं चढ़लैन तहिना पति मनाइ ठाकुरक गट्टा पकैड़, चौकीपर सँ उठबैत कहलखिन- “चलू अखने गिरहत ऐठाम। अपन बक्‍सीस केना छोड़ि देब।” असबीसमे पड़ल मनाइ ठाकुर कौल्हुका समए मंगैत बजला- “अखैन पहिल सॉंझ छी, हल्‍ला-फसाद नइ करू, हमहूँ कीर्तन-भजन करए जाइ छी, जतरा नइ भङ्गठाउ।” अलोधनी- “एहेन पुरुखक कोन ठेकान जे...।” दुनू हाथ जोड़ि मनाइ ठाकुर बजला- “हाथ जोड़ि कहै छी जे अखैन जाउ, अहूँ अपन घर-अँगना सम्‍हारू आ हमहूँ जाइ छी। काल्हि भोरे दुनू गोरे चलि कऽ फरिछा लेब।”◌ ३. आशीष अनचिन्हार ब्रम्हपिशाच (व्यंग्य) विद्वान सभ कहि गेल छथि-- रस तीन प्रकारक होइत छै। प्रमाद रस, विषय रस आ भागवत रस। नीककेँ खराप कहि छोड़ि देब आ खरापकेँ नीक कहि ग्रहण कऽ लेब भेल प्रमाद रस। नीककेँ ग्रहण कऽ लेब भेल विषय रस। आ नीककेँ ग्रहण कऽ दुनियाँ लग ओकर सही परिचय देनाइ भेल भागवत रस। मुदा मान्यता अछि जे नीककेँ ग्रहण कऽ ओहिपर अपन नाम लीखि अपन बना संसार लग अपन कहि  परिचय देब भागवत रस छै। बहुत पिशाच सभ आजुक समयमे ऐ तरीकासँ भागवत रस लेबामे सभसँ आगू रहैत अछि। जे भागवत रस केकरोसँ छूटि जाइत छै तै लेल दोसर पिशाच सभ बैसल छै। ऐ पिशाच सभ लेल किछु असंभव नै छै। अहाँक सामने अहींक देह निकालि कहत जे ई हमर देह अछि। आब अहाँ चिचिआइत रहू। ओकर संगी सभ सेहो ओइ देहकेँ ओकरे देह कहतै। आ से संगी सभ किए ने कहतै आखिर ओहो तँ ओही पिशाच सभहँक संतति छै ने। अच्छा पिशाचसँ मोन पड़ल ब्रम्हपिशाच आ ईहो मोन पड़ल जे पिशाचकेँ ब्रम्हपिशाचे सभ बेसी तागति दै छै। पिशाचक खुराक ब्रम्हपिशाचे लगसँ भेटै छै। खुराके नै ओकर तरीका, व्यवहार, अस्त्र-शस्त्र सभ किछुक आपूर्तिकर्ता ब्रम्हपिशाचे छै। ठीक अमेरीका आ अलकायदा जकाँ। अमृत लेल जेना देवता आ दानवमे संधि भेल रहै आ अमृत निकललाक बाद देवता सभ दानवकेँ धोखा देने रहै तेहने खेल पिशाच आ ब्रम्हपिशाचक बीचमे छै। जखन पिशाच सभ भगवत रसकेँ अपन कहि दै छै तखने ब्रम्हपिशाचक काज खत्म भऽ जाइत छै कारण ओकर जे उद्येश्य रहै छै पिशाचक बदनामी से पूरा भऽ जाइत छै आ तकर बाद ब्रम्हपिशाच ओइ पिशाचकेँ लात मारि कऽ भगा दै छै। फेर जरूरति पड़ै छै या पुरना पिशाच आँखि देखबै छै तँ दोसर पिशाच राखि लेल जाइत छै। ठीक मालिक- नौकर बला संबंध छै। इतिहास गवाह अछि जे काज भेलाक बाद पिशाच सभकेँ लात लगा भगेबे कएल गेलै आ बदनामी सेहो भेलै। इतिहासे किए वर्तमानो गवाह अछि एकर। आब फेर घुरि आबी रस केर चर्चापर। ई पिशाच-ब्रम्हपिशाच सभ तँ होइते रहलैए, होइते रहतै। एकरा रोकऽ बला कियो नै छै कारण जतऽ ब्रम्ह ततऽ ब्रम्हपिशाच आ पिशाचो तही ठाम।ठीक पिलुए जकाँ खदबद करैत पिशाच आ ब्रम्हपिशाच। तँइ हम कहलहुँ जे फेरसँ रस केर चर्चा आबी। ओना रस केर चर्चासँ पहिने एकटा आर गप्प दानवकेँ धोखासँ अमृत नै भेटलै ओ अमर नै भेलै मुदा भविष्यक हरेक लोककेँ पता चलैत रहलै जे देवता सभ धोखा दऽ कऽ अमृत पी गेलै तेनाहिते भले ही असली भागवत रस बलाकेँ नाम नै होइ मुदा भविष्यक हरेक लोककेँ ईहो पता चलैत रहतै जे पिशाच धोखा दऽ कऽ ओइ भगवत रसकेँ अपन बना लेलकै।जेना देवता सभ अभिशप्त छै जे मोने-मोन गारि सूनऽ लेल, उपराग सूनऽ लेल तेनाहिते पिशाचो सभ पूरा जिनगी अभिशप्त रहतै। संसारकेँ पता चलिते रहतै जे भागवत रसक असली धारा किम्हरसँ निकलै। ई तँ छल पिशाचक हाल ब्रम्हपिशाच सभ तँ सभ दिन जकाँ मौज करैत रहत कारण ओकर सभ काज पिशाचे करै छै। सभ मेहनति आ बदनामी पिशाचक आ मौज ब्रम्हपिशाचक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ई की भेल !?!?!/ छठि गीत - ‍१/ छठि गीत - ‍२/ लेखकक जिनगीक छन्द/ लेखकक जिनगीक छन्द ३.३.१.असरफ राइन- परदेशी मनक भावना २.ओमप्रकाश झा- गजल ३.४.रवि भूषण पाठक ३.५. पल्लवी मण्डल- अपन नजैरिक दुनियाँ आशीष अनचिन्हार २ टा गजल गजल १ ओकर रूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा रंग अनूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा पथिया डाला मौनी सुप्ती कनसुप्ती छिट्टा सूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा ऐ पूजा पाठक बदला जिनगी मंत्रक जापे जूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा ओ भेटै की नै भेटै तैयो ओकर छापे छूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा कहियो एतै अनचिन्हार हमर आँगन चुप्पे चूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा सभ पाँतिमे 222+222+222+22 मात्राक्रम अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि २ कनी अहीँसँ माँगब हम खुशी अहीँसँ माँगब हम गलत लगैत हो तैयो सही अहीँसँ माँगब हम भने कना कऽ दिअ लेकिन हँसी अहीँसँ मागब हम अपन मरण धरिक खाता बही अहीँसँ माँगब हम दियौ बहुत मुदा बाँचल कमी अहीँसँ माँगब हम अहाँ मना किया करबै जदी अहीँसँ माँगब हम सभ पाँतिमे 12-12-1222 मात्राक्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ई की भेल !?!?!/ छठि गीत - ‍१/ छठि गीत - ‍२/ लेखकक जिनगीक छन्द / लेखकक जिनगीक छन्द १ ई की भेल !?!?! अहँ कहैत छी,  ई  की  भेल !? ! हम कहैत छी, किछु नञि भेल ।। फलना   जीतल, चिलना  हारल । अपन अपन सभ, दुःख केर मारल । अपन    बेगरतेँ, सभकेओ भागल । दिन  सूतल  आ रातिमे  जागल । अहँकेँ अचरज लागि रहल अछि । हमरा लए किछु नव नहि भेल ।। ओएह   दिन  छै, ओएह  राति  छै । ओएह    लोकसभ, ओएह जजाति छै । देखले       पाथर, चिन्हले  खाधि छै । ओएह   हवा    छै, ओएह   आगि  छै । जन्मौटी बच्चा  भौंचक अछि । हम कहैत छी,  देखले  खेल ।। ओएह  सृष्टि छै, ओएह प्रलय छै । एक्कहि  गति छै, एक्कहि लय छै । ओएह  भाव  छै, ओएह हृदय छै । नीक−बेजाए, फेर ओएह समय छै । पहिल दृष्टिमे सभ किछु नूतन । दोसर  सभटा   खेलले  खेल ।। कतऽसँ   अयलहुँ, कतऽ कऽ जायब । तकनहुँ      पर उत्तर नहि पायब । भरि     जिनगी, कतबहु बौआएब । घुरि - फीरि  पुनि, एहि ठामे आएब । परमेश्वर केर सभ “खेला” छी । “शतक” अपन बूझी बकलेल ।। २ छठि गीत - ‍१ माँगैत छी वरदान,  कनेक अहाँ  होइयौ ने सहाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! महिमा अहँक बहुत छी सुनने । हमहूँ छी  किछु  आशा रखने । कातिक मास इजोरिया पखमे । षष्ठी तिथि  हमहूँ छी जपने । हमरो मोनक बात सुनू माँ, हरियौ सकल बलाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! अस्ताचल सह उदित भास्कर । अर्पण  अर्घ्य करै छी  सादर । तेजोमय  भास्वर  हे दिनकर ! क्षमा करब गलती सभ हम्मर । हमरो मोनक आश पुरबियौ, करियौ कोनो उपाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! हमहूँ  मनुख  साधारण  छी । आयल आइ किछु कारण छी । सभ ठाँ सँ  हम  हारल  छी । थाकल आओर  झमारल छी । खोंइछ हमर खाली जुनि रखियौ, करियौ ने बेजाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! ३ छठि गीत - ‍२ दीन - हीन पापी मुरूख हम, कएलहुँ बड़ अपराध । क्षमा करू  तइयो  हे सुरूजदेव दिनकर दिनानाथ !! ठाढ़ पानिमे  विनय  करै छी । निज अपराधक क्षमा मँगै छी । अरघ नेने छी ठाढ़,  करू स्वीकार  हे दीनानाथ । क्षमा करू गलती हे सुरूजदेव दिनकर दीनानाथ !! अपना लेल सौभाग्य मँगै छी । अपना खोंइछक लाज मँगै छी । हम  अज्ञानी,  देव अहाँ छी,  होइयौ ने सनाथ । क्षमा करू गलती हे सुरूजदेव दिनकर दीनानाथ !! सिंउथ सिनूरे लाल मँगै छी । कोरा सुन्नर  लाल मँगै छी । सिया-धिया अँगना खेलए आ खेलए बाल-गोपाल । क्षमा करू गलती हे सुरूजदेव दिनकर दीनानाथ !! ४ लेखकक जिनगीक छन्द गीत  कविता  ओ  निबन्ध । गजल खिस्सा  ओ  प्रबन्ध । लेखनीकेँ   लोक    बूझए, लेखकक  जिनगक  छन्द ।। बात  तँऽ  किछु  सत्य सेहो, बात  किछु  फूसियो रहै छै । बात  किछु   अपना  मनक, किछु आन केर सेहो कहै छै । बात किछु  अनुभव आधारित, आन  किछु   देखल−सुनल । बात  किछु  सहमति  मनक, आ बात किछु जे नञि पटल । तेँ कोनहु साहित्यकारक,  लेखनी−जिनगी  स्वतन्त्र । लेखनीकेँ जुनि बूझू अहँ,  लेखकक जिनगीक छन्द ।। लेखनी  नञि  बान्ह  मानए, की  परक  आ  की  अपन । लेखनी  नञि   भेद   बूझए, की  यथार्थ  आ  की सपन । लेखनी  हर   आढ़ि   धाँगए, की सुखक  आ  की दुःखक । लेखनी   तँऽ  सेन्ह   मारए, आन  आ   अप्पन  मनक । तेँ कोनहु लेखक केर जिनगीक,  लेखनी ने छी कलण । किछु तँऽ हुनि जिनगीक दर्पण, शेष स्वच्छन्दे फलन ।। अंगूर  केर  दाना  सुकोमल, कोमलहि   देखबामे   छी । नारिकेरक    भीतरी    ओ बाहरीक  तुलना   ने  छी । तेँ   कोनहु   लेखक   केर, जीवनवृत्तमे से ध्यान राखी । लेखनीमे   दर्प   जिनगीक, अछि कतेक अनुमान राखी । सएसँ  शुन्ना धरिक प्रतिशत,  केर रहैछ सम्बन्ध । आन  साक्ष्यक  ली  सहारा,  बूझि पड़ए जँ द्वन्द्व ।। ५ श्री गणपति वन्दना जय गणेश  गजवदन  विनायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। गौरीसुत हे  गिरिजानन्दन । प्रथमपुज्य हे सादर वन्दन । सकल  अमंगल विघ्न विनाशक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। भालचन्द्र   अहँ  एकदन्द । हे शंकरसुवन भवानीनन्दन । सकल कार्य  सिद्धी शुभ दायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। पीतवसन, आँजी कर शोभित । महाकाय, मूसहि पर राजित । मोदकप्रिय अँहीँ  सिद्धीविनायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। जय हे वक्रतुण्ड लम्बोदर । जय हे गणाध्यक्ष सुरेश्वर । रिद्धि-सिद्धि स्वामी सुखदायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.असरफ राइन- परदेशी मनक भावना २.ओमप्रकाश झा- गजल १ असरफ राइन परदेशी मनक भावना बिगत दू साल सऽ  सात समुन्दर पार  ई मरुभूमिक देश में  अपन श्रम बेच रहल हम  आइ हमरा घर जेबाक  समय पूरा भऽ गेल  मुदा - तैयो मोन पूर्ण सन्तुष्टि नै अछि  खटकैत रहैय हर छन  मन मस्तिष्क में बस  एकहिटा बात की कहीँ  ई दू साल के अंतराल में  हमरा सब केओ  बिसरा त नै गेल हेतै मोह माया हमरा सऽ तेज त नै लेने हेतै अपन प्रेम-स्नेह सँ  बन्चित त नै कऽ देने हेतै इएह सोचि-सोचि आइ-काल्हि  हमर ई मोन बहुते  निरास रहैय। ©असरफ राइन सिनुरजोडा,धनुषा  हॉल :कतार २ ओमप्रकाश झा गजल आँखिक मस्ती जे अपन ओ पिया देलक बिनु पीने हमरा शराबी बना देलक सम्हारल छल ई करेजा बहुत जतनसँ नैनक संकेतसँ गगनमे उड़ा देलक अनका नचबैमे छलौं मस्त एखन धरि ता ता थैया नाच हमरा करा देलक जे नै बुझतै बात तकरासँ आसे की बेदर्दी दर्दे करेजक बढ़ा देलक कोना भेंटत "ओम"केँ चैन एतय यौ पर्दा प्रेमक आबि अपने हटा देलक 2222-2122-1222 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक 1 अस्‍सी के लगभगेने  ऊ गाम मे छथिन कानक अस्थि-उपास्थि आ सुनइ वला तंत्रिका तंत्र सब बसिया गेलै आबैत-जाइत ध्‍वनि  सिगनल तोरैत अहां कैह सकै छियै कि जंग लागि गेलै बूरहा के कान मे आ ईहो कि बैटरीक समाप्‍त भ’ गेलै मिझाइत कानक दम कें सकारैत अहां कहि सकै छियै दू आ दू पांच आ ओ किछु नइ कहता अहां कहहबै करियनक पूब मे बागमत्‍ती आ ओ बूझता जे अहां सत्‍ते बाजैत होयब साहस एतबो कि जनक राजा भेला काशी के आ ओ मुसकियेता ऐ आत्‍मविश्‍वासक साथ कि अहां झूठ किएक बाजब मुदा बांचब तखने तक  जखन तक कि बूरहा थाहता नइ आ थाहैत-थाहैत  मुख-भंगिमा के परहैत-परहैत बूरहा यदि बूझि गेला अहांक खेल त’ओ रूकि के अहांक गणित दुरूस्‍त करता साफ करता अहांक दिशासूचक मानचित्र आ खोंखियाइत कंठ सँ कफ निकालैत क्रमबद्ध करता इतिहासक किछु पन्‍ना

2 समै भागि रहलै सत्‍ते  आ सत्‍ते कि भागि रहलै कालक चक्र चक्रक अवाज सब अपना-अपना दम सँ बूझैत गेलै अपना-अपना बूत्‍ता सँ सब चक्रक कोखि मे दैत गेलै मोबिल-तेल मुदा तेल चक्रक घर्षणात्‍मक शक्ति कें कम नइ क’ सकलै चक्र चारू कात बरहैत गेलै चारू कातक जमीन जेजाति पर परैत गेलै निशान अइ निशान के राम राम जेंका आ  रहीम रहीम जेंका परहलकै 3 एखन त’ इहो नइ निर्णय भेलै कि बूरहाक कान देखायल जाए एखन त’ इहो निर्णय नइ भेलै कि डाकडरक देखेला सँ किछू फैदा भ’ सकै छैक एखन त’ इहो नइ निर्णय नइ भेलै कि बूरहा कें कान सँ की फैदा आ ओइ कान सँ घर-परिवार कें की फैदा आ कहीं बूरहा बेशी सुन’ लागलखिन त’  आ कहीं बूरहाक कानक पावर बेशी तेज भ’ गेलै त’ आ एमहर सबहक कनियां के जोर सँ बजबाक आदत भ’ गेल छलै एमहर सबहक कनियां बात-बात पर मारै ठहक्‍का एमहर नइ रहलै कुनो ब्रेकर कुनो आडि़ त’ अइ मशीन सँ ओझरेतइ कि नइ आंगनक समीकरण से बूरहाक कानक मशीन के आनतै बेटा-बेटी या कि पोता-नातिन आ एहने सन बहुत रास प्रश्‍न रहै जेकर उत्‍तर सबके पासे मे रहै ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल- अपन नजैरिक दुनियाँ सभ देखैत छै अपन नज़रिये दुनियाँकेँ सभकेँ अपने नज़रिये दुनियाँ लगितो छै अपना सन कनी-कनी बुझि पड़ै छै जेते लोक तेते नज़ैर आ तेते रंगक दुनियाँ सभक लेल अहाँ नीक नहि भऽ सकै छी आ ने सबहक लेल बेजाए सज्जनता सस्ता छै लोक दूटा मीठ गप्प बाजि फुसला लइए मुदा असज्जनता ओतबे महग लाख नीक काज केलाक बादो स्नेह, प्रेम कियो नहि पाबि सकैए ओना तँ लोक अहाँक नीक काजकेँ झाँपैत अछि आओर अहाँक कमीकेँ उजागर किछु कमी तँ सभमे होइते छै मुदा एतए तँ मोटिवेट कम डिमोटिवेट ज्यादा कएल जाइ छइ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक १.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”,  तथा श्रीमति सुप्रिया / बेबी कुमारी भूकम्प (बाल विज्ञान कथा) १ आशीष अनचिन्हार बाल गजल बकरी आबै अर्रर कुक्कुर भागै हर्रर बगड़ा मैना बगुला कौआ बाजै कर्रर इम्हर ढन उम्हर ढुन बौआ पादै भर्रर भीजै अंगा पैन्टो बौआ मूतै छर्रर घिरनी नाचै घन घन गुड्डी उड़लै फर्रर सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”,  तथा श्रीमति सुप्रिया / बेबी कुमारी भूकम्प (बाल विज्ञान कथा) एहि बाल विज्ञान कथाक अधिकांश भाग 18 दिसम्बर 2014 ई॰ (वृहस्पतिदिन आ पूसक अन्हरिया पखक एकादशी तिथि) कऽ जे भूकम्प आयल छल तकर प्रात भने लीखल गेल छल । तेँ एहि कथाक परिप्रेक्ष्य ओही संदर्भ मे ली से पाठकगणसँ निवेदन । ई भूकम्प भारतीय मानक समय केर अनुसार रातिमे 09 बाजि कऽ 02 मिनट आ 10 सेकेण्ड पर आयल छल । एकर आकार रि॰ना॰ पर5.9 जनाओल गेल अछि तथा एकर मूल / केन्द्र नेपालक प्रशिद्ध नामचे बजार सँ  26 कि॰मी॰ उत्तर पच्छिममे आ 10 कि॰मी॰ गँहीर छल । भोरुका समय छल । कुहेस लागल रहै । मुदा धिया - पुतासभ कहाँ मानए बला छल । भोरे भोरे सूति-उठि कऽ लुरू-खुरू करए लागल छल । जिनगीमे शायद पहिलहि बेर एकटा विचित्र पर मजगर घटनासँ साक्षात्कार भेल छलै । —  गए प्रीती !  पता छौ, काल्हि रातिमे भूकम्प आएल रहै – प्रीतीकेँ अपना दिशि अबैत देखि सोनी बाजलि । —  हँ से तँऽ ठीके । काल्हि हमसभ खाएत रही कि अचानके चौकीसभ जोरसँ हिलए लगलै – सोनी उतारा देलक । —  अरे ! बुझलही की, हमरा तँऽ भेल जे भूत आबि गेल अछि, आ हमर चौकीकेँ जोरसँ झमारि रहल अछि । बब्बनक ई बात सुनितहि सभ धिया - पुता संगहि ओहि ठाम बैसल चेतन लोकनि सेहो भभा कऽ हँसि पड़लाह । —  तँऽ फेर की केलही ? सीरक सँ मुँह झाँपि हनुमान चलीसा पढ़ए लगलही की ? – रत्तन मुस्किआइत कटाक्ष करैत बाजल । —  तोरा तँऽ हमेशा मजाके बुझाइत छौ – बब्बन थोड़ेक खौंझायल मुद्रामे बाजल । सभहक सोझाँ ओकरा अप्पन मान-सम्मान पर बट्टा लगैत बुझि पड़लै । हऽम दलाने पर सुतले रही पर निन्नमे नञि छलहुँ । सीरक तऽरेसँ खरिहानमे भऽ रहल सभ बात सुनैत रही । मूरी उठाए कने जोरसँ कहलियै – बब्बन, तमसाए किए छेँ ? तोरे नहि, बहुतोकेँ से बुझाएल होएतन्हि । पुछहुन्ह गऽ लाल कक्काकेँ, डऽरेँ सुटिया गेल छलाह कि नहि ? लाल कक्का अपन नामक चर्च सुनि घूरे लगसँ चहकैत बजलाह – एँह, नञि पूछह हमरा तँऽ किछु बुझएबे नहि कएल । लागल जे कुकुर चौकी तऽर मे पैसि खड़बड़बैत अछि । एतबा सुनि उपस्थित सभ धिया-पुता हँसए लागल । —  अच्छा कहू तँऽ ई भुकम्प किएक अबैत’छि – प्रीती हमरा दिशि तकैत पुछलक । —  एतबो नञि बूझल छौ, काछु केर पीठ पर ई धरती टिकल छै । ओकरा जखन भारी लगै छै तँऽ ओ हिलए लगैत अछि आ भूकम्प आबि जाइत अछि – बब्बन तपाक सँ बाजल । —  का ……छु  ………….. माने की ? – सोनी हिचकिचाइत पुछलक । —  अरे काछु माने कछूआ………….टर्टल………….टॉर्ट्वाइज – बब्बन उतारा देलक । —  दादी तँऽ कहैत छलथिन्ह जे सीता माए धरतीमे समाए गेल छलीह । हुनक मोन अओनाइत छन्हि तँऽ भुकम्प अबैत अछि – रत्तन बाजल । —  अरे नञि । हम्मर बाबा कहैत छलाह जे समुद्रक ऊपर छाल्ही जेकाँ ई धरती अछि । जखन समुद्रक पानिमे हिलोर उठैछ तँऽ भूकम्प अबैछ – सोनी बाजलि । आब सबगोटे अप्पन-अप्पन मोनक बात बाजि चुकल छल । पर, ककरो बात सँ केओ सन्तुष्ट नहि छल वा सभ अपनहि बातकेँ सच मानि रहल छल । तेँ सभ एकाएक चुप भऽ हमरा दिशि ताकए लागल । आँखि मे प्रश्नक भाव आ मोनमे सही उत्तरक उत्कण्ठा नेने । हम कम्मल ओढ़ने उठि कऽ बैसि गेलहुँ । मोनमे कने पश्चाताप सेहो छल जे बेकारे टोकारा देलियै । ने टोकारा दितियै आ ने भोरे-भोरे फँसितहुँ । आब तँऽ भोरुका नित्यकर्म निश्चिते बिलमि गेल । फेर हिम्मत कऽ कऽ बजलहुँ – —  देखह ! जे-जे कारण तोँ सभ कहलह से सभ कहबी छै । अपना हिन्दु धर्म ग्रण्थसभमे एहि तरहक किछु खिस्सा भेटैत छै । हँ, जे अन्तिम बात – छाल्ही बला बात – छै, ताहि मे किछु यथार्थक छवि जरूर छै । —  से कोना ? – प्रीती जिज्ञासा भरल स्वरमे पुछलक । —  छाल्ही बला बात एखनुका विज्ञानसँ कोना मिलए छै – से बादमे कहबह । हम कहलियै । —  ठीक छै – प्रीती बाजलि । —  भूकम्पक कारण बुझबाक लेल आवश्यक छी जे पहिने अप्पन पृथिवीक आन्तरिक संरचनाक बारे मे किछु जानकारी लऽ लेल जाए । पृथिवीक अन्दरक संरचना आ ओकर गतिविधिक बारे मे बुझने बिना ओकर सतह वा पपड़ी पर महसूस होमए बला घटना अर्थात् भूकम्पक विषयमे जानब असम्भव – उपस्थित सभ धियापुताकेँ सम्बोधित करैत हम कहलियै । —  तऽ बताउ ने – प्रीती बाजलि । —  ओना तँऽ पृथिवी केर आन्तरिक संरचनाक बारे मे बहुत रास मत – मतान्तर छै, पर जे सभसँ नऽव मत छै ताहि अनुसारेँ सम्पुर्ण पृथिवीकेँ 3 भागमे बाँटल जा सकैत अछि । सभसँ उपरुका भाग भेल भूपर्पटी या पपड़ी (EARTH CRUST / CRUST) । ई भाग हमरा सभकेँ देखाइ दैत अछि आ एही भाग पर सातो महाद्वीप वा महादेश तथा पाँचो महासागर स्थित अछि । सागरक पेनी यानि कि सागरतल पर एकर मोटाई 6 सँ ‍10 किलोमीटर धरि आ महाद्वीपिय भाग मे 25 सँ 50 किलोमीटर तक होइछ । सभ धियापुता धेआन लगा कऽ सुनि रहल छल । —  सभसँ अन्दर केर भागकेँ भूकेन्द्र वा भूक्रोड (CORE / EARTH’S CORE) कहल जाइत अछि । ई पुनः 2 भागमे विभाजित अछि –अन्तः भूकेन्द्र (INNER CORE) आ बाह्य भूकेन्द्र (OUTER CORE) । सम्पुर्ण भूकेन्द्रक मोटाई पृथिवीक केन्द्रविन्दु सँ 3400 कि॰मि॰ धरि मानल गेल अछि । ई लोहा, निकेल आ सिलिकेट मिश्रित भारी धातुपिण्डसँ बनल अछि । एकर आयतन सम्पुर्ण पृथिवीक आयतनक मात्र ‍16 प्रतिशत पर भार 32 प्रतिशत अछि, अर्थात् भूकेन्द्रक घनत्त्व बहुत बेशी अछि । बाह्य भूकेन्द्रक संहति द्रव स्वरूपक पर अन्तः भूकेन्द्रक संहति ठोस स्वरूपक बूझि पड़ैत अछि । —  आ पृथिवीक बिचला भागकेँ की कहैत छियै – बब्बन पुछलक । —  भूपर्पटी आ भूकेन्द्रक बीच करीब 3000 कि॰मि॰ मोट भागकेँ भूमध्य वा मैण्टल (MANTLE) कहल जाइत छै । ई भाग पुनः 3उपविभाग मे विभाजित अछि । बाह्य भूकेन्द्र सँ सटल भाग अधोभूमध्य या अधोमैण्टल (LOWER MANTLE) कहबैत अछि जखनि कि भूपर्पटीसँ सटल भाग ऊर्ध्व भूमध्य वा ऊर्ध्व मैण्टल (UPPER MANTLE) कहबैत अछि । मैण्टलक एहि दुनु क्षेत्रक बीच एकटा पातर सनि संक्रमण क्षेत्र (TRANSITION ZONE / AREA) पाओल जाइत अछि । सम्पुर्ण मैण्टल क्षेत्रमे सीलीकेटक अधिकता पाओल जाइत अछि संगहि लोहा आ मैगनेशियम सेहो रहैछ । ऊर्ध्व मैण्टलक संहति अनियमित स्वरूपक रहैछ जखनि कि अधोमैण्टलक संहति द्रवस्वरूपक । —  यानि कि धरतीक त्रिज्या या अर्धव्यास (RADIUS / HALF DIAMETER) लगभग 6400 कि॰मि॰क भेलै – रत्तन किछु जोड़ैत - बिचारैत हमरा दिशि देखि कऽ बाजल । —  हाँ एकदम सही । आ पृथिवीक संहति केर बारे मे सेहो किछो ध्यान देलहक आ कि नञि ? —  अधोमैण्टल आ बाह्य भूकेन्द्र द्रव स्वरूपक अछि, ऊर्ध्वमैण्टल अनियमित संहतिक पर अन्तः भूकेन्द्र ठोस अछि । भूपर्पटी सेहो ठोस अछि पर ओहि परक जलमण्डल द्रव अछि – रत्तन उतारा देलक । —  मतलब कि अन्दरसँ द्रव मैण्टल पर पपड़ी या भूपर्पटी ठोस स्वरूपमे जमल अछि -  बजैत काल सोनीक ममुखमण्डल पर खुशी छलकि रहल छलै । ओकरा भूकम्पक बारेमे अप्पन बाबाक बताओल बातसँ साम्य प्रतीत भऽ रहल छलै । —  हूँऽऽ, बहुत किछु तहिना – हम कहलियै । —  से तँऽ ठीक पर द्रव भूमध्यक नीचाँमे ठोस भूकेन्द्र कोना ? --- बब्बन धीरेसँ किछु सोचैत बाजल । —  देखह ! भूपर्पटी पृथिवीक सभसँ बाहरी स्तर अछि तेँ अपेक्षाकृत सभसँ बेसी ठण्ढा अछि । जेना – जेना पृथिवी केर भीतर जाइत छी तेना-तेना दाब आ तापमान बढ़ैत जाइत अछि । इएह कारण अछि जे  भूमध्य आ बाहरी भूकेन्द्र द्रव स्वरूपमे अछि । भीतरी भूकेन्द्र सेहो द्रव होयबाक चाहैत छल पर आगाँ दाब एतेक बेशी बढ़ि जाइत अछि कि सर्वाधिक तापमान होयबाक बादो भीतरी भूकेन्द्र ठोस अछि । —  से कोना बुझै छियै – हमर बात खतमो नञि भेल छल कि रत्तन तपाकसँ बाजि उठल । —  सभटा आइए पूछि लेबह …………… काल्हि लए सेहो किछु रहऽ दहक ने – बब्बन रत्तनक हाथ झिकैत बाजल । —  हँ, ई सभ बात फेर कहियो कहबऽ, नञि तँऽ भूकम्पक खिस्सा आधे पर छुटि जएतह । एतऽ धरि बुझलहक किने ? ………… आ कि नञि ? — हँ बुझि गेलियै; आगू कहू – सभ धियापुता एक्कहि संगे बाजल । —  द्रव केर ऊपर स्थित कोनो चीज स्थिर नञि रहि सकैत अछि । ओ निरन्तर दहाइत रहैत अछि – जेना कि कोनो काठक टुकड़ी, ……… —  नाओ आ पनिया जहाज – प्रीती हमर उदाहरणक सुचीकेँ पुर्ण करबाक प्रयास कएलक । —  नञि ……… नाओ (नाह या नाव) केँ मनुक्ख करुआड़िसँ चलबैत अछि आ पनिया जहाजमे ई काज ओकर ईञ्जन करैत अछि । ई दुनु दहाइत नञि अछि अपितु हेलैत अछि । हेलब (SWIMMING) सचेष्ट क्रिया अछि, जखनि कि दहाएब (FLOATING) निष्चेष्ट क्रिया ।……… पानि पर काठक टुकड़ी वा कागजक नाओ दहाइत अछि, नञि कि हेलैत अछि । तहिना पृथिवीक सभ महाद्वीप दहाइत रहैत अछि । हमर ई कथन सुनि सभ धियापुता अवाक भऽ विश्मयसँ हमरा दिशि ताकए लागल । बब्बनक चेहरा पर चौअनिञा मुस्की (एकटा कुटिल मन्द हास) सेहो छलै – जेनाकि हमर बात पर ओकरा विश्वास नञि हो वा ओ हमरा मूर्ख बूझि रहल हो । मामिलाकेँ ताड़ैत हम बजलहुँ – की विश्वास नञि होइ छऽ ने ??? —  धियापुता पुनः किछु नञि बाजल । —  जखन पहिल बेर एहि तरहक बात कहल गेल तँऽ लोकसभकेँ एहिना विश्वास नञि भेलै । बात पर कोनो ध्यान नञि देल गेलै । परञ्चअल्फ्रेड वेगनर (ALFRED WAGNER) नामक जर्मन जलवायुविज्ञानवेत्ता जखन पूरा साक्ष्यक संग ई परिकल्पना छपबओलन्हि तँऽ वैज्ञानिकलोकनिक ध्यान आकर्षित भेलन्हि । सन् ‍1912 ई॰ मे ई जर्मन भाषामे मूल रूपसँ छपल छल जकर बाद ‍1924 ई॰ मे एकर अंग्रेजी अनुवाद छपल आ तकरा बादसँ एखन धरि ई पूरा विश्वमे चर्चाक विषय बनल रहल आ बनल अछि । एकरा “वेगनरक महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त” (WAGNER’S CONTINENTAL DRIFT THEORY) कहल जाइत अछि । —  पर से कोना सम्भव छै – प्रीती किछु सकुचाइत शब्देँ बाजलि । —  एकर समर्थनमे बहुत रास साक्ष्य वेगनर अपने देने रहथि आ बहुत रास आन प्रमाणसभ बादक भूवैज्ञानिक आ जीववैज्ञानिकलोकनि देलन्हि जकर विस्तृत चर्चा आन दिन फेर कहियो करब । —  ठीक छै । सभ धियापुता एक स्वरेँ बाजल । —  इएह महाद्वीपीय प्रवाह मुख्यरूपसँ भूकम्प आ ज्वालामुखी विस्फोट दुनु प्रकारक प्राकृतिक घटनाक लेल उत्तरदायी मानल जाइत अछि । —  भूकम्पक लेल सेहो !!!!! ……. प्रीती किछु विश्मय ओ जिज्ञासाक स्वरमे बाजलि । —  हाँ भुकम्पक लेल सेहो – हम आश्वस्त करैत हामी भरलहुँ । वास्तवमे पृथिवीक ऊपरुका भाग या पपड़ी या भूपर्पटी कएक टा छोट-पैघ अलग-अलग टुकड़ीसभक मिलबासँ बनल अछि । एहि टुकड़ीसभकेँ विवर्तन छज्जी या छज्जी या टेक्टोनिक प्लेट (TECTONIC PLATES / PLATES) कहल जाइत अछि । सतत प्रवाहमान होयबाक कारणेँ ई छज्जी सभ भिन्न-भिन्न दिशामे अलग-अलग वेगसँ गतिशील अछि । एहि गतिशीलताक कारण किछु छज्जी एक-दोसराक नजदीक अबैत अछि तँऽ किछु परस्पर दूर भागि रहल अछि । जे छज्जीसभ परस्पर नजदीक आबि रहल अछि तकरसभक किनारी या कोड़ी एक-दोसरासँ टकराइत रहैत अछि आ एक-दोसरा पर जोरगर दबाव आरोपित करैत अछि । —  अरे बाप रे ! – बब्बन किछु अकचकाइत बाजल । —  बब्बनक बात सुनि सभ हँसए लागल । बुझाइत अछि बब्बनक दिमाग दुखाए लगलै – रत्तन चुटकी लैत बाजल । —  नञि, से बात नञि । —  तँऽ फेर की ? – हम पुछलियै । —  हम सोचैत रही जे एतेक पैघ पैघ छज्जी सभक आपसी टकराहटि केहेन होइत हेतै – बब्बन उतारा देलक । —  सही बात । ई टकराहटि एतेक शक्तिशाली होइत अछि जे ओहि ठामक जमीनक पुर्ण स्वरूपहि बदलि जाइत अछि । एहने टकराहटि केर कारण हिमालय पहाड़क निर्माण भेल अछि । वास्तवमे एहि तरहक टकराहटि केर प्रक्रिया – जकरा कि भूवैज्ञानिक लोकनि भू विवर्तनिक प्रक्रिया (PLATE TECTONIC ACTIVITIES) कहैत छथि – भूकम्पक प्रमुख कारण अछि । एहि कारणसँ आयल भूकम्पकेँ विवर्तनिक भूकम्प (TECTONIC EARTHQUAKES) कहल जाइत अछि । एहि प्रकारक भूकम्पक मूल धरतीक भीतर धरातलसँ प्रायः 5 सँ 20कि॰मि॰ नीचाँ रहैत अछि; आ एकरा द्वारा प्रभावित क्षेत्र बहुत विस्तृत रहैत अछि । कोनहु दू-टा महाद्वपीय छज्जी जाहि ठाम एक-दोसरासँ सटैत अछि, धरती पर ओ एक-टा रेखाक रूपमे बुझना जाइत अछि । ई रेखा सरल रेखा नञि भऽ कऽ प्रायः कतेको स्थान पर वक्र या वलित (टेढ़-मेढ़) होइत अछि । एकरा भ्रंश रेखा/रेषा (FAULT LINE) कहल जाइत अछि । —  हमरासभकेँ इस्कूलमे बहिनजी कहैत छलथिन्ह जे भूकम्प ज्वालामुखी विस्फोटक कारणेँ अबैत अछि – सोनी हमर बातसँ असमञ्जसक स्वरमे बाजलि । —  अपन मिथिला क्षेत्रमे तँऽ दूर-दूर धरि कोनहु ज्वालामुखी पहाड़ नञि अछि तखन फेर भूकम्प किएक अबैत अछि ??? ……………….हम भरियऽबैत पुछलियै । सभ धियापुता चुप्प ! …………… फेर हमही चुप्पी तोड़ैत कहलियै – वास्तवमे मिथिला सहित सम्पुर्ण हिमालय आ हिमालयसँ सटल प्रदेशमे एहि प्रकारक माने कि ज्वालामुखीय विष्फोटक कारण भूकम्प नञि अबैत अछि । एहि क्षेत्रमे विवर्तनिके भूकम्प अबैत अछि । आ अपना एहि ठाँ भूकम्प भारतीय विवर्तन छज्जी ओ यूरेशीय विवर्तन छज्जीक परस्पर टकराहटिक परिणाम थिक । —  ओह ! – सोनी किछु पश्चातापक स्वरमे बाजलि – मोनमे ऊहापोहक स्थिति छलैक जे हमर बात मानए कि बहिनजीक । —  ज्वालामुखी विस्फोटक कारणेँ सेहो भूकम्प अबैत अछि जकरा ज्वालामुखीजन्य वा ज्वालामुखीय भूकम्प (VOLCANIC EARTHQUAKES) कहल जाइत अछि । एहि तरहक भूकम्प जपान, फिलिपिन्स, मलेशिया, सिंगापुर, इण्डोनेशिया, चिली और पेरू आदि देशसभमे बेसी अबैत अछि ।  वस्तुतः प्रशान्त महासागरक चारूकातक क्षेत्र भयंकर ज्वालामुखीय गतिविधिक क्षेत्र अछि आ तेँ एहि क्षेत्रकेँ “”अग्नि वलय या “आगिक औंठी (RING OF FIRE) सेहो कहल जाइत अछि । —  अरे बाप रे ! बब्बन फेर किछु अचंभित स्वरेँ बाजल । —  हाँ । पर एतबहि नञि ई क्षेत्र विभिन्न महादेशीय छज्जी सभक मिलन-स्थल होयबाक कारणेँ भीषण भूकम्पीय गतिविधिक क्षेत्र सेहो अछि आ तेँ तीव्र सुनामीक क्षेत्र सेहो । —  ई सुनामी की होइत छै - प्रीती सहज भावेँ पुछलक । —  अरे टी॰भी॰ पर समाचारमे नञि सुनने रही की ? - समुद्री तुफान होइत छै । बब्बन टीपलक । —  पर सभ टा इएह क्षेत्रमे किएक - रत्तन जिज्ञासा कएलक । —  हूँऽऽऽ । नीक प्रश्न छह - हम पैघ साँस छोड़ैत कहलिऐक । एखन तक भेल शोधकार्य ई दर्शाबैत अछि कि धरातल पर ज्वालामुखीय गतिविधि बहुत हद तक महादेशीय छज्जीसभक मिलान केर जगह होइत अछि - हँ, ई बात अलग कि ओ एहि तरहक सब मिलानस्थल पर नञि होइत अछि । समुद्रक पेनी पर या ओकर आस पास होमएबला भूकम्पक कारण समुद्रक ऊपरुका सतह पर पैघ-पैघ आ ऊँच-ऊँच लहरि केर उत्पत्ति होइत अछि । एहि तरंगसभक कारण समुद्रक सतह पर भयंकर तुफान आबि जाइत अछि, जकरा ‘सुनामी’ (TSUNAMI) कहल जाइत अछि । ‘सुनामी’ जपानी भाषाक शब्द अछि जकर अर्थ भेल ‘समुद्री तुफान’ ।  सन् 1883 ई॰मे समुद्रतल पर क्राकाटोआ ज्वालामुखीक गतिविधिक कारण आयल भूकम्पक परिणामस्वरूप  उठल सुनामीमे ओहि क्षेत्रक द्वीपसभ पर लगभग 36,000 लोक मारल गेल छलाह । —  ओह ! ई तँ बड्ड विनाशकारी छल । - सोनी किछु दुःखाएल स्वरेँ बाजलि । —  हँ से तँऽ अवश्ये । एकर अतिरिक्त भूकम्पक आन बहुत रास कारण अछि किछु प्राकृति  आ किछु मनुक्खक द्वारा सृजित । —  मनुक्खक द्वारा सृजित - माने ??? - प्रीतीक प्रश्नवाचक स्वर कानमे पड़ल । —  मनुक्खक द्वारा सृजित यानि कि मनुक्ख द्वारा बनाओल अर्थात् कृत्रिम कारण सभ; जेना कि - पारमाणु बमक विष्फोट, खदान (खाद्यान्न नञि) केर कारण भेल धँसना या धँसाव आदि । पर प्राकृतिक कारणसँ आबएबला भूकम्पक कारणसभमे सभसँ बेसी उपर कहल गेल कारणेसभसँ आबैत अछि आ ओकर विनाशक क्षमता सेहो आन कारणसभसँ आबएबला भूकम्पसभसँ प्रायः बेशी रहैत अछि । —  अच्छा, ई भूकम्पक केन्द्र की होइत अछि ? -  ई सोझ प्रश्न रत्तनक दिशिसँ छल । —  भूगर्भमे ओ स्थान या केन्द्र जाहि ठाँ चट्टानसभमे होमएबला विशेष परिवर्तनक क्रियासभसँ भूकम्पीय हलचलक प्रारम्भ होइछ ओकराभूकम्प मूल या भूकम्प केन्द्र (FOCUS / CENTRE) कहल जाइछ । एहि केन्द्र सँ लम्बवत, धरातलक (धरतीक उपरुका सतह पर)  जाहि विन्दु पर सभसँ पहिने भूकम्पक धक्काक अनुभव होइछ ओहि स्थानकेँ भूकम्पक अधिकेन्द्र (EPICENTRE) कहल जाइछ । जनसामान्यक भाषामे वा बहुधा समाचार पत्र, आकाशवाणी आ दूरदर्शन आदि मिडियासभमे अधिकेन्द्रहिकेँ भूकम्पक केन्द्र वा मूल कहि देल जाइत अछि आ से ……. —  आ से तँऽ भ्रम उत्पन्न करएबला भेल कि ने - हमर बातकेँ बीचहिमे लोकैत रत्तन बाजल । —  हँ आ ताहि द्वारे आइ-काल्हि भूकम्पविज्ञानी (SEISMOLOGISTS) द्वारा भूकम्प मूल या भूकम्प केन्द्र (FOCUS / CENTRE)हेतु एकटा नऽव शब्द अधोकेन्द्र (HYPOCENTRE) केर प्रयोग भऽ रहल अछि । अधोकेन्द्रसँ अधिकेन्द्र धरिक लम्बवत दूरीकेँ (सभसँ कम दूरीकेँ) भूकम्प मूलक या भूकम्प केन्द्रक गहराई (FOCAL DEPTH OR DEPTH OF FOCUS / CENTRE / HYPOCENTRE)कहल जाइत अछि । “अधि-” माने ऊपर अर्थात् धरतीक सतह पर आ “अधो-” माने नीचाँ माने कि धरातल वा धरतीक सतहसँ नीचाँ । —  कोनहु भूकम्पक मूल बेशी सँ बेशी कतेक गँहीर भऽ सकैत अछि - जिज्ञाशा रत्तन कएने छल । —  वस्तुतः भूकम्पक केन्द्र (अधोकेन्द्र) ओहि ठामक धरतीक सतहसँ कतेक गँहीर अछि, ताहि आधार पर भूकम्प केर 3 प्रकार कएल गेल अछि । जाहि भूकम्पक केन्द्र धरातलसँ 70 कि॰मि॰ धरिक गहराई पर रहैत अछि ओ उत्थर भूकम्प (SHALLOW EARTHQUAKES)कहल जाइछ । एहि तरहक भूकम्पमे सबसँ बेसी क्षति अधिकेन्द्रसँ किछु किलोमीटरक परीधि मे होइत अछि । एहि प्रकारक भूकम्प विवर्तनिक या आन बहुतो कारणसँ होइत अछि । धरातलसँ 70 सँ 300 कि॰मि॰ धरिक गहराई पर जाहि भूकम्पक केन्द्र वा मूल रहैत अछि से  मँझलुका भूकम्प (EARTHQUAKES OF MEDIUM DEPTH) कहबैत अछि । एहेन भूकम्प प्रायः विवर्तनिक भूकम्प होइछ । विवर्तनिक भूकम्पमे भूकम्पक अधिकेन्द्रसँ बेसी दूरक क्षेत्रसभक कमजोर शैल/चट्टानबला जगहमे अधिक नोकशान होइत अछि । अधिकेन्द्रसँ300 सँ 700 कि॰मि॰ गँहीर केन्द्र या मूल बला भूकम्प गँहीर/पताली/पतालीय भूकम्प (PLUTONIC EARTHQUAKES) कहबैत अछि । एहि तरहक भूकम्पक उत्पत्तिक कारण एखन धरि अज्ञात अछि । —  यौ ! टी॰भी॰सभमे जे भूकम्पक केन्द्रक - माने कि अधिकेन्द्रक - चारू कात गोल-गोल वृत्त जेकाँ देखबै छै, से किएक ? - ई प्रीतीक प्रश्न छल । —  भूकम्प मूलसँ जे ऊर्जा मुक्त होइत अछि (निकसैत / निकलैत अछि) से भूकम्पीय तरंग (SEISMIC WAVES) केर रूपमे हर सम्भावित दिशामे पसरैत अछि । ओकरा भूकम्प-केन्द्रक चारू कात धरतीक भीतर गोलाकार आ सतह पर वृत्ताकार घेरा (घेरेबा) केर रूपमे देखाओल जाइत अछि । एहि तरहक वृत्त या गोला तरंगाग्रक (WAVEFRONT) गमणक दिशामे काल्पनिक रूपेँ बनाओल जाइत अछि । मतलब कि ई वृत्त या गोला सभ आँखिसँ वा कोनहु यण्त्रसँ नञि देखाई दैत अछि, बुझबामे वा आँकलनमे सुविधाक लेल बनाओल जाइत अछि । ई घेरासभ भूकम्पसँ होमएबला हानि केर अनुमान लगएबा मे सहायक होइत अछि । भूकम्पसँ सभसँ बेसी नोकसान अधिकेन्द्रसँ (वृत्तक केन्द्रसँ) हटि कऽ बनए बला भीतरुका वृत्तसभक क्षेत्रसभमे होइत अछि ।  पृथिवीक सतहसँ नीचाँ ई त्रि-आयामी / त्रिविमीय(THREE DIMENSIONAL) होइत अछि, तेँ गोलाकार (SPHERICAL) बुझना जाइत अछि आ ओहि गोलाक केन्द्र भूकम्पक केन्द्र (अधोकेन्द्र) पर स्थित रहैत अछि । धरातल यानि पृथिवीक सतह पर ई भूकम्पीय तरंगसभ अधिकेन्द्रसँ निकलैत प्रतीत होइत अछि । धरातल चौरस होइत अछि अर्थात् ओकरा मात्र लम्बाई आ चौड़ाई होइत अछि मोटाई या गहराई या ऊँचाई नञि, तेँ ओ द्वि-आयामी/द्विविमीय (TWO DIMENSIONAL) संरचना थिक । धरातल पर गमण करैत काल भूकम्पीय तरंग द्वि-आयामी/द्विविमीय (TWO DIMENSIONAL) बुझि पड़ैत अछि आ तेँ वृत्ताकार (CIRCULAR) होइत अछि । एहि वृत्तसभक केन्द्र भूकम्पक अधिकेन्द्र पर होइत अछि । सामान्य भाषामे इएह वृत्तसभक केन्द्रकेँ भूकम्पक केन्द्र कहि देल जाइत अछि जे कि वास्तवमे भूकम्पक अधिकेन्द्र रहैत अछि । —  हूँऽऽऽ, तँऽ ई बात छै - रत्तन गँहीर साँस छोड़ैत बाजल । —  अच्छा ई कहह जे भूकम्पक अध्ययन कोन शास्त्रक अन्तर्गत होइत अछि …….. —  भूगोलमे - हमर बातकेँ बिच्चँहिमे लोकैत बब्बन बाजल । —  आंशिक रूपसँ सही छह । भूकम्पक अध्ययन “भूकम्प विज्ञान” केर अन्तर्गत कएल जाइत अछि जकरा अंग्रेजीमे सिस्मोलॉजी /साइस्मोलॉजी (SEISMOLOGY) कहैत छिऐ । हाँ, कोनहु भूकम्पक कारण धरतीक उपरुका सतह अर्थात धरातलक भौगोलिक संरचनादि पर जे किछु परिणाम घटित होइत अछि तकर अध्ययन भूगोलक एकटा शाखाक अन्तर्गत कएल जाइत अछि जकरा भौतिक भूगोल(PHYSICAL GEOGRAPHY) कहल जाइत अछि । भूकम्प विज्ञानक क्षेत्र भूगोल (GEOGRAPHY), भूगर्भ विज्ञान (GEOLOGY),भू-भौतिकी (GEOPHYSICS) आदि विभिन्न शास्त्रसभसँ सेहो सम्बद्ध अछि । ……………………….. आ भूकम्पक गतिविधिकेँ नपबाक हेतु कोन यण्त्रक प्रयोग होइत अछि ? - हम अपनहि उपरुका प्रश्नक उतारा दैत-दैत एकटा आओर प्रश्न जुमा कऽ धियापुता दिशि फेंकि देलियै । —  भूकम्पमापी - रत्तन तपाकसँ जवाब देलक, जेनाकि ओकरा पहिनहिसँ हमर एहि प्रश्नक प्रतिक्षा रहए । —  संगहि संग एकटा आओर जाँतल स्वर सुनाइ पड़ल - भूकम्पलेखी । ई स्वर सोनीक छल, शायद ओ पुर्णरूपेँ आश्वस्त नञि छल अपना उत्तरसँ । —  देखह हिन्दीमे जकरा “भूकम्पमापी यण्त्र” कहैत छियै से मैथिलीमे “भूकम्पनापी यण्त्र” भेल कारण “मापब वा माप” शब्द मैथिलीमे प्रयोग नञि होइत अछि । हर तरहक नापीक लेल मैथिलीमे “नापब वा नाप वा नापी” शब्द प्रयुक्त होइत अछि - चाहे ओ आयतन हो, लम्बाई हो अथवा आन कोनहु चीज । तेँ अंग्रेजीक “मेजरमेण्ट” (MEASUREMENT) केर लेल मैथिलीमे “नाप या नापी” शब्दक प्रयोगे उचित । तहिना अंग्रेजीक “स्केल” (SCALE) शब्दक लेल मैथिलीमे “नापनी या नप्पा” ग्राह्य थिक जखनि कि “मापनी” अग्राह्य ।भूकम्पनापी यण्त्रकेँ अंग्रेजीमे सिस्मोमीटर या साइस्मोमीटर (SEISMOMETER) कहल जाइत अछि । एहिना, “भूकम्पलेखी” नामक यण्त्रकेँ अंग्रेजीमे सिस्मोग्राफ या साइस्मोग्राफ (SEISMOGRAPH) कहल जाइछ । भूकम्पलेखी यण्त्र भूकम्पीय गतिविधिसँ उत्पन्न विभिन्न तरहक तरंगसभकेँ एकटा विशिष्ट प्रकारक अभिलेख पत्र (GRAPH PAPER) पर अभिलेखित वा अंकित (RECORD) करैत अछि । भूकम्पलेखी द्वारा जे किछु अभिलेख प्राप्त होइत अछि तकरा मैथिलीमे “भूकम्पाभिलेख” ओ अंग्रेजीमे “सिस्मोग्राम या साइस्मोग्राम”(SEISMOGRAM) कहल जाइत अछि आ एकरहि वैज्ञानिक अध्ययनसँ भूकम्पीय गतिविधिक विश्लेषण कएल जाइत अछि । यद्यपि भूकम्पमापी आ भूकम्पलेखीमे किछु सुक्ष्म अन्तर अछि तथापि दुहु शब्द पर्यायी रूपमे व्यवहृत होइत अछि । भूकम्पलेखी वा  सिस्मोग्राफ (SEISMOGRAPH) प्रायः पुरना यण्त्रसभक लेल प्रयुक्त होइत अछि जखनि कि नवका यण्त्रसभक लेल प्रायः भूकम्पनापी यासिस्मोमीटर (SEISMOMETER) शब्द प्रयुक्त होइत अछि । भूकम्प अध्ययन केन्द्रसभ पर एहि तरहक यण्त्र सालमे तीन सए पैंसठि दिन आ चौबीसो घण्टा सतत क्रियाशील रहैत अछि । एहि तरहक एकटा आओर यण्त्र अछि - भूकम्पदर्शी या सिस्मोस्कोप(SEISMOSCOPE) । ई यण्त्र धरतीक कम्पनक अभिलेखन सतत रूपमे लगातार नञि करैत अछि पर ई सूचना दैत अछि कि भूकम्प भेल छल आ भूकम्पक अकार केर बारेमे एकटा अपरिष्कृत (मोटा-मोटी) जानकारी दैत अछि । भूकम्पीय तरंगक वा धरतीक कम्पनक अभिलेखन ओ नापी कएनिहार भूकम्प-विज्ञानक ई उपशाखा भूकम्पमिति या सिस्मोमेट्री (SEISMOMETRY) कहबैछ तथा एहि तरहक समस्त यण्त्रसभकेँ भूकम्पमितिक यण्त्र या सिस्मोमेट्रिक इण्स्ट्रुमेण्ट्स (SEISMOMETRIC INSTRUMENTS) कहल जाइत अछि । —  कोनहु भूकम्पाभिलेख भूकम्पक बारेमे की सभ बतबैत अछि ? - रत्तनक जानबाक इच्छा आओर बढ़ि गेल रहैक । —  भूकम्पाभिलेखक वैज्ञानिक अध्ययनसँ पता चलैत अछि जे भूकम्पीय तरंगसभ मुख्यरूपसँ दू तरहक होइत अछि - पहिल कायिक तरंग आ दोसर सतही या धरातलीय तरंग । कायिक तरंग (BODY WAVES) भूकम्पक अधोकेन्द्रसँ चारू दिशामे पसरैत अछि, पृथिवीक भीतर सेहो । ई फेरो दू प्रकारक होइत अछि - पहिल “प्राथमिक या पी-तरंग” (PRIMARY / P - WAVES) आ दोसर द्वितीयक या एस-तरंग(SECONDARY / S - WAVES) । सतही या धरातलीय तरंग (SURFACE WAVES) भूकम्पक अधिकेन्द्रसँ निकलैत प्रतीत होइत अछि आ मात्र धरातल पर गमण करैछ, धरतीक भीतर नञि । ईहो पुनः मुख्यतः दू तरहक अछि - पहिल लव तरंग (LOVE WAVES)आ दोसर रेले तरंग (RAYLEIGH WAVES) । धरतीक कोनहु स्थान पर सभसँ पहिने प्राथमिक तरंग पहुँचैत अछि, तकरा बाद द्वितीयक आ तकर बादहि आन धरातलीय तरंगसभ । सतही तरंगसभक उत्पत्ति वस्तुतः कायिक तरंगसभसँ होइत अछि । रेले तरंग जलीयपारिस्थितिक तण्त्र (AQUATIC ECOSYSTEMS) आ लव तरंग भवनादि स्थापत्यक नेँओकेँ विशेष रूपसँ नोकशान पहुँचबैत अछि । —  अपना मिथिलामे एहेन कोनहु केन्द्र अछि की ? - बब्बनक प्रश्नवाचक स्वर छल । —  अछि तँऽ अवश्ये पर सुनबामे आयल अछि कि पछिला दसो बरखसँ ओकर गतिविधि मृतप्राय अछि । पछबारी चम्पारण जिलाक“वाल्मिकीनगर” नामक स्थान पर भारतीय मौसम विज्ञान विभागक ई  भूकम्प वेधशाला (SEISMOLOGICAL OBSERVATORY)अवस्थित अछि । एकर स्थापना सन 1960 ई॰मे भेल छल आ 2005 ई॰मे एकर भूकम्पलेखी यण्त्र खड़ाब भ गेल से अद्यावधि ठीक नञि भेल अछि । —  ओह ! ई तँऽ बड़ दुःखक गप्प अछि - रत्तन निराशा भरल भारी अवाजमे बाजल । —  वाल्मिकीयेनगरमे - महर्षि वाल्मिकीक आश्रम छलन्हि ने - प्रीती पुछलक । —  हाँ, ओत्तहि रहन्हि । ओना कानपुर लऽग एकटा स्थान अछि - उन्नाव । ओहि ठामक लोक सेहो एहि तरहक धारणाक दावा करैत अछि । पर सीता कौशल राज्यसँ निर्वासनक बाद वाल्मिकी आश्रममे लव आ कुशकेँ जन्म देने रहथि । आ चुँकि उन्नाव ओहि समय कौशल राज्यक अन्तर्गतहि अबैत छल जखनि कि वाल्मिकीनगर कौशलसँ बाहर मिथिलाक भाग छल, तेँ एहि बातकेँ बल भेटैछ कि वाल्मिकीयेनगरमे हुनक आश्रम छल । उल्लेख ईहो अछि कि शत्रुघ्नजी लवणासुरक वध हेतु अयोध्यासँ मथुरा जएबा काल लव आ कुश केर नामकरण कएलन्हि । ई बात वाल्मिकीनगरक विपक्षमे जाइत अछि । पर ईहो बात विदित होअए कि शत्रुघ्नजी लवणासुरक वध करबाक हेतु अयोध्यासँ मथुरा सोझ रस्तासँ नञि गेल रहथि । सर्वथा विपरीत मार्गक अनुसरण कएने रहथि जाहिसँ लवणासुरकेँ कनिकबहु शंका नञि हो । हुनक रस्ता बीहर जंगल आ पहाड़सँ भऽ कऽ जाइत छल जे कि बाल्मिकीनगर केर पक्षमे जाइत अछि नञि कि उन्नाव केर । बाल्मिकीनगर रेल्वे स्टेशनसँ (जे कि भारतमे अछि) करीब 6 - 7 कि॰मि॰ उत्तर भऽर बाल्मिकी आश्रम (एखन नेपालक चितवन राष्ट्रिय उद्यानमे पड़ैछ) अछि जे कि देखबा योग्य स्थान अछि । हम प्रीतीक बातकेँ फरिछबैत कहलियै । —  कोनहु भूकम्प कतेक शक्तिशाली छल से कोना बुझैत छिऐ ? - सोनी पुछलक । —  कोनहु भूकम्पक परिमाण अर्थात ओकर आकार बतबैत अछि कि भूकम्प कतेक शक्तिशाली छल । कोनहु भूकम्पक वास्तविक शक्ति वा ओहि भूकम्पसँ उत्पन्न कुल वास्तविक ऊर्जा जाहि युक्तिसँ नापल जाइत अछि तकरा भूकम्पक आकार या परिमाण नापनी(MAGNITUDE SCALE) कहल जाइत अछि । भूकम्पक परिमाण वा आकारक निर्धारणक लेल बहुत रास नापनी या स्केल बनाओल गेल अछि, पर जे सर्वाधिक प्रशिद्ध वा प्रचलित नापनी अछि से अछि “रिक्टर नापनी” या “रिक्टर स्केल (RICHTER SCALE / RICHTER MAGNITUDE SCALE) ।  अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर अपन सहयोगी गुटेनबर्गक सहायतासँ सन् ‍1934 ई॰मे एकरा विकसित कएलन्हि । एहि नापनी या स्केल पर ‍01 सँ ‍12 धरिक अंक होइत अछि जे कि भूकम्पक आकारकेँ बतबैत अछि । —  कतेक आकारक भूकम्प खतरनाक होइत अछि ? - बब्बनक सीधा प्रश्न छल । —  00 सँ 02 परिमाणक भूकम्पकेँ मात्र भूकम्पलेखी द्वारा बूझल जा सकैत अछि, मनुक्ख ओकर कम्पनक अनुभव नञि कऽ पाबैछ । 02सँ 03 परिमाणबला भूकम्पसँ जमीनमे बहुत हल्लुक कम्पन होइत अछि जे मात्र किछु अतिसंवेदनशील लोकसभ द्वारा अनुभव कएल जा सकैत अछि, जखनि कि बेशीतर लोक ओकर अनुभूतिसँ वञ्चितहि रहैत छथि । 03 सँ 04 धरिक आकारबला भूकम्पसँ किछु-किछु तहिना बुझाइत अछि जेना कोनो ट्रककेँ सोझाँसँ गेला पर कम्पन होइत अछि । 04 सँ 05 आकारक भूकम्पक कम्पनसँ खिड़कीक शीशा चनकि सकैत अछि या देबाल पर टाँगल फोटोफ्रेम आदि खसि सकैत अछि । 05 सँ 06 परिमाणबला भूकम्पसँ घरमे राखल चौकी - पलंग - कुर्सी आदि आन समानसभ हिलए लगैछ, 06 सँ 07 आकारबला भूकम्प घरक नेँओकेँ दड़का सकैत अछि तथा विशेष कऽ बहुमजिला भवनसभक उपरुका घरसभकेँ बेशी नोकशान करैछ । 07 सँ 08 तक आकारबला भूकम्प विनाशकारी होइछ तथा एहिसँ भवन वा आन स्थापत्यसभ ढहि सकैत अछि आओर जमीनक भीतर पाइपसभ फाटि सकैत अछि । 08 सँ 09 परिमाणबला भूकम्प अतिविनाशकारी होइत अछि आ पैघ पैघ दृढ़ स्थापत्यसभकेँ सेहो बेस नोकशान पहुँचा सकैछ, संगहि सामान्यरूपसँ बनल प्रायः सभ भवनादिकेँ सामान्यसँ लऽ कऽ गम्भीर क्षति पहुँचाबैत अछि । रिक्टर नापनी पर 09 सँ बेशी अकारक भूकम्प वस्तुतः प्रलयंकारी वा अतिप्रलयंकारीए (-अहि) बुझू; भूकम्पक अधिकेन्द्र आ ओकर आस-पासक प्रायः समग्र विनाश भऽ जाइत अछि । सामान्य भाषामे रिक्टर नापनी पर मात्र एक अंकक कमी-बेशी भेलासँ भूकम्पक विनाशकारी क्षमतामे क्रमशः दसगुणाक ह्रास या वृद्धि भऽ जाइत अछि । —  पर भूकम्पसँ क्षति सभ जगह एक सनि किएक ने होइत अछि ? - सोनीक एहि जिज्ञाशाक हमरा पहिनहिसँ अपेक्षा रहए । —  कोनहु स्थान पर भूकम्प द्वारा भेल विनाश भूकम्पक आकारक अतिरिक्त आन बहुत रास बातसभ पर निर्भर करैछ, जेना कि - भूकम्पक अधिकेन्द्रसँ ओहि स्थानक दूरी, ओहि स्थानक धरातलक आन्तरिक सतहक माटि ओ शैलखण्डक संरचना, स्थापत्य ओ निर्माणक मजगूती, जनसंख्या घनत्व आदि । एहि प्रकारेँ एक्कहि परिमाण वा आकारबला भूकम्पक तीव्रता आ तकर कारण होमएबला विनाशकारी प्रभाव भिन्न-भिन्न स्थान पर अलग-अलग होइत अछि, जकरा नपबाक लेल एकटा आन प्रकारक नापनीक प्रयोग होइत अछि । एहि नापनीकेँ भूकम्पक तीव्रता नापनी या सिस्मिक इण्टेन्सिटी स्केल (SEISMIC INTENSITY SCALE) कहल जाइत अछि । विभिन्न देशमे अलग-अलग तीव्रता नापनीक प्रयोग होइत अछि पर मान कमोबेश एकरंगाहे अछि आ प्रायः रोमण अंक पद्धतिमे(I,II,III,IV…….) लिखल जाइत अछि । बेशीतर तीव्रता-नापनीमे ‍एक सँ ‍बारह (I - XII) धरिक श्रेणी होइत अछि । भारतमे भूकम्पक तीव्रता नपबाक लेल पहिने मेद्वेदेव-स्पोनह्युवर-कार्निक नापनी (MEDVEDEV–SPONHEUER–KARNIK SCALE; MSK-64)प्रयुक्त होइत छल पर आइ-काल्हि यूरोपीय वृहत्भूकम्पीय तीव्रता नापनी (EUROPEAN MACROSEISMIC INTENSITY SCALE / EMS-98 ) केर प्रयोग बढ़ि रहल अछि । सं॰ रा॰ अमेरिकामे संशोधित मर्केली नापनी (MODIFIED MERCALLI SCALE) केर प्रयोग कएल जाइत अछि । —  अपना क्षेत्रमे ‍1934 ई॰मे सेहो एकटा बडका भूकम्प आयल रहए ने ? - प्रीती जानए चाहलक । —  आ ‍1988 ई॰मे सेहो - प्रीतीक बात पूरा होइते रहै कि बब्बन बाजि उठल । —  हाँ, ‍1988क भूकम्प विनाशकारी छल जखनि कि ‍1934क भूकम्प अतिविनाशकारी । 21 अगस्त ‍1988 कऽ जे भूकम्प आयल छल तकर आकार रिक्टर नापनी पर 6.9 बताओल गेल छल (किछु वेधशाला द्वारा 7.2) जखनि कि भूकम्पक केन्द्र नेपालक उदयपुर शहर लग धरातलसँ 62 कि॰मि॰ गँहीर छल । ‍15 जनबरी ‍1934 केर भूकम्पक आकार रि॰ना॰ पर 8.1 (किछु वेधशाला द्वारा 8.4) कहल संगहि भूकम्पक केन्द्र नेपालक सगरमाथा या माउण्ट एवरेस्ट (MOUNT EVEREST) पर्वत शिखरसँ 9.5 कि॰मी॰ दच्छिनमे धरतीक सतहसँ 33कि॰मी॰ गँहीर छल । एकर अतिरिक्त ‍18 सितम्बर 2011 कऽ सेहो एकटा भूकम्प आयल छल जकर आकार रि॰ना॰ पर 6.9 छल आ केन्द्र भारतक सिक्किम राज्यमे कञ्चनजङ्गा रिजर्व क्षेत्रमे छल जे धरातलसँ 19.7 कि॰मी॰ गँहीर अवस्थित छल । काल्हि (‍18 दिसम्बर 2014ई॰ कऽ) जे भूकम्प आयल छल तकर आकार रि॰ना॰ पर 5.9 जनाओल गेल अछि तथा एकर मूल नेपालक प्रशिद्ध नामचे बजार सँ  26कि॰मी॰ उत्तर पच्छिममे 10 कि॰मी॰ गँहीर छल । एहि भूकम्पसभक अधिकतम तीव्रता (विनाशक क्षमता) क्रमशः नओ, एगारह, सात ओ पाँच (IX, XI, VII आ V) छल । —  अरे, बाप रे ! …………… एगारह तीव्रता रहै …………… रत्तन अचम्भित स्वरेँ बाजल । —  हाँ । ई एतेक विनाशकारी छल कि सम्पुर्ण मिथिलाकेँ तहसि-नहसि कऽ देलक । संगहि मिथिलाक चारू कातक परिक्षेत्रमे सेहो भारी तबाही कएलक । निर्मली - भप्तियाहीक बीच रेलपुल टुटलासँ सीधा सम्पर्क टूटि गेल जे अद्यावधि बहाल नञि भऽ सकल अछि । दरभंगा-सहरसा रेल लाइन पुर्णतः टूटि गेल जे दोबारा आइ धरि नञि बनि सकल । राजनगरक नौलक्खा महल सही रूपेण बसबासँ पहिनहि उजड़ि गेल । नेपालक धरहरा स्तम्भ केर सभसँ उपरुका तीन टा तल्ला टूटि गेल जकरा बादमे फेरसँ बनाओल गेल । पच्छिम चम्पारणमे बगहा-छितौनीक बीच रेल पुल टुटलासँ करीब 60 वर्ष धरि रेल सम्पर्क बाधित रहल । कोशी (कोसी) नदीक रस्तामे स्थायी परिवर्तन भऽ गेल - ओ पूबसँ आओर पच्छिम दिशि घुसकि गेल । मिथिलामे प्रायः एहेन कोनहु मकान नञि छल जे क्षतिग्रस्त नञि भेल होअए आ एहि क्षेत्रक प्रायः सब कच्चा मकान ढहि गेल । जान मालक अपार क्षति भेल । एहि भूकम्पक धक्का (झटका) एतेक जोड़गर छल जे उत्तरमे तिब्बतक ल्हासासँ दच्छिनमे बम्बई धरि आ पूबमे बर्मासँ (आब म्यांमार) लऽ कऽ पच्छिममे अमृतसर तक ओकर नीक जेकाँ अनुभव कएल गेल । —  बाबा तँऽ कहैत रहथिन्ह जे कऽलसभमे अपने-आप पानि खसए लागल छल - बब्बन टीका कएलक । —  एहि भूकम्पक एकटा विशेषता छल कि बहुत विस्तृत भूभागमे धरतीक भीतरसँ पानि आ बालुक बमकल्ला (SAND & WATER VENTS) फूटल छल । धरतीमे बहुतो ठाम पैघ-पैघ दड़ारि (FISSURES) फाटि गेल रहए । ओहि समयक निर्मली रेल्वे स्टेशन भू-द्रावण/ भू-द्रवीभवनक (SOIL LIQUEFACTION) कारण करीब ‍3 मीटर (10 फीट)  नीचाँ जमीनमे धँसि गेल आ तकरा ऊपर बालु भरि गेल । बहुत रास ईनार आ पोखरिक पेनीमे बालु जमा भऽ गेल, बालुक कारण बहुत रास उपजाउ खेत बर्बाद भऽ गेल । बहुतो चापाकऽलसभ बालुक कारण खड़ाब भऽ गेल जखनि कि आन बहुतो ईनार आ चापाकऽल जे पहिनेसँ सुखाएल छल - पानिसँ भरि गेल । अधिकेन्द्रसँ करीब650 सँ 700 कि॰मी॰ धरिक परीधीमे भवनादि स्थापत्यसभ ढहबाक रेकॉर्ड उपलब्ध अछि । सरकारी आँकलनक अनुसार नेपालमे कुल 10800 सँ 12000 लोक आ बिहारमे 7253 लोक मारल गेलाह, पर आन सूत्रसभक अनुसार ई संख्या एहिसँ बहुत बेशी छल । कोनहु भूकम्पक पहिल शक्तिशाली कम्पन वा मुख्य संक्षोभ (MAIN SHOCK) केर बादहु किछु दिन/महिना/साल भरि तक भूकम्पक छोट-मोट झटका आबैत रहैत अछि, जकरा पराकम्पन या पश्च संक्षोभ (AFTER SHOCKS) कहल जाइत अछि । रेकॉर्ड बतबैत अछि कि उनैस सए चौंतीसक एहि भूकम्पक नओ महीना बाद तक (1934 ई॰क अक्टूबर महीना तक) मनुक्खकेँ अनुभव करबा योग्य पराकम्पन अबितहि रहल ।…………….. आ भविष्यमे ईहोसँ पैघ विनाशकारी भूकम्प आबि सकैत अछि  - हम कहलियै । हमर ई बात सुनि सभ अचानक शान्त भऽ गेल । सभ धियापुता चुपचाप हमर बातकेँ ध्यानसँ सुनि रहल छल । पुर्ण शान्ति छल । जँ एकटा सुइयो जमीन पर खसैत तँ ओकर अवाज सुनल जा सकैत छल - शुचिपात स्तब्धता। —  कहिया ? - सोनीक मन्द स्वर शान्त वातावरणक बीच बहरायल । —  से केओ नञि कहि सकैत अछि - भऽ सकैए एखने, आइए, चारि दिन बाद, चारि महीनाक बाद, चारि साल बाद, चारि दशकक बाद, या फेर …………… वास्तवमे एतेक वेज्ञानिक प्रगतिक बादो भूकम्पक समयक भविष्यवानी करब एखन धरि सम्भव नञि भेल अछि । —  अपना मिथिलामे एतेक भूकम्प किएक अबैत अछि ? - रत्तन हमरासँ उताराक अपेक्षा रखैत बाजल । —  एकर कारण अछि कि भारतीय विवर्तन छज्जी आ यूरेशीय विवर्तन छज्जीक टकराओ केर भ्रंश रेखा मिथिलाक क्षेत्रसँ जरैत अछि जाहि कारण ई भूकम्प सम्भाव्य क्षेत्र सं॰ 5 केर अन्तर्गत आबैत अछि । —  ई भूकम्प सम्भाव्य क्षेत्र सं॰ 5 की अछि ? - प्रीतीक सोझ प्रश्न छल । —  भारतक कोन क्षेत्रमे भूकम्प अएबाक कतेक सम्भावना अछि ताहि आधार पर समस्त भारतकेँ पाँच गोट क्षेत्रमे बाँटल गेल छल जकरा “भूकम्प क्षेत्र” या “भूकम्प सम्भाव्य क्षेत्र” (SEISMIC ZONES / SEISMOLOGICALLY PRONE AREAS) कहल जाइत अछि आ एकसँ लऽ कऽ पाँच धरिक संख्यासँ निर्देशित कएल जाइत अछि । भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍1 केँ भूकम्पक संभावनासँ रहित क्षेत्र मानल गेल,  भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍2 केँ अत्यल्प (न्यूनतम) सम्भावनाबला क्षेत्र आ भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍5 केँ सभसँ बेशी (महत्तम) सम्भावनाबला  क्षेत्र मानल गेल । बादमे बुझना गेल जे भारतीय प्रायद्वीप पर कोनहु क्षेत्रविशेषकेँ भूकम्परहित क्षेत्र मानब गलत अछि । वस्तुतः जखन भारतीय विवर्तन छज्जी आगाँ घुसकैत अछि तँऽ छज्जीक माँझ कतहु भ्रंश केर निर्माण भऽ सकैत अछि आ से बादमे भूकम्पक स्वतन्त्र कारण बनि सकैत अछि । एहि प्रकारक भूकम्पकेँ अन्तः-छज्जी / अन्तर्छज्जी भूकम्प (INTRA PLATE / INTRA TECTONIC EARTHQUAKE) कहल जाइत अछि । सन 2001 ई॰मे सूरतमे आयल भूकम्प एहने भूकम्पक उदाहरण छल । तेँ भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍1 केँ समाप्त कऽ देल गेल आ सम्पुर्ण भारतकेँ  भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍2, 3, 4 आ 5 मे बाँटि देल गेल जे आइ धरि मान्य अछि । अपन मिथिलाक केन्द्रीय भाग भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍5 मे आबैत अछि जखनि कि परीधीय मिथिला भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍4 मे आबैत अछि । —  तखन तँऽ मिथिलासँ पलायने उचित - बब्बन बाजल । —  नञि, हमरा जनैत कथमपि नञि । पलायन कएनिहार व्यक्ति कतहु सफल नञि होइत अछि । हमरालोकनिकेँ एही ठाम रहि विकाशक रास्ता तकबाक चाही । जँ पलायने रस्ता रहैत तँऽ जपानक लोकसभ कहिया ने पलायन कऽ गेल रहैत आ जपान विरान भऽ गेल रहैत । ओहुना हर जगह पर भूकम्प नञि तँऽ कोनहु आनहि प्राकृतिक आफदसभ अवश्य रहैत अछि, सृष्टिमे जीवन-यापन कतहु अतिसुगम नञि अछि । देशक राजधानी दिल्ली सेहो भू॰सं॰क्षे॰सं॰-‍4मे आबैत अछि । —  एहिनामे की करबाक चाही - प्रीतीक प्रश्न कानमे पड़ल पर ई प्रश्न सभ धियापुताक मोनमे चलि रहल छलै । —  एहिनामे धैर्य आ विवेकसँ काज लेबाक चाही । समकालीन वैज्ञानिक ज्ञानक यथासम्भव उपयोग करबाक चाही । —  ओहिमे तँऽ बेशी खर्च लगैत हेतैक ? - सोनी पुछलक । —  ‍जरूरी नञि छै कि हमेशा खर्च बेशीए लागए । 1934 ई॰क भूकम्पमे राजनगरक नौलक्खा महल, दरिभंगामे छत्र निवास महल (पैलेश) आदिकेँ ध्वस्त भेलाक बाद दरिभंगामे नरगओना महल (पैलेश)  केर निर्माण भेल जे तत्कालीन वैज्ञानिक ज्ञानक आधार पर बनाओल गेल । ओ एहि समस्त क्षेत्रक पहिल भूकम्परोधी भवन छल । ई महल बाहरसँ बहुत साधारण लगैत अछि, कोनहु तरहक अनावश्यक अलंकरणसँ रहित अछि पर ओहि समयक भूकम्परोधी स्थापत्य अभियान्त्रिक ज्ञानक पुर्ण प्रयोग कएल गेल अछि । नेँओ मजगूत देल गेल अछि, भवनक देबालक उपर देबाल अछि, देबालक या खम्भाकेँ नीचासँ उपर धरि एक सीधमे राखल गेल अछि, कतहु कोनहु बाह्यधऽरनि / बाहुधऽरनि(CANTILEVER) नञि देल गेल अछि, कोनो तरहक तोरण / चाप / मेहराब (ARCH) नञि देल गेल अछि ।  एकर निर्माणमे ईंटेबाक प्रयोग नञि कएल गेल अछि अपितु सम्पुर्ण महल केर देबाल आ खाम्ह मात्र कंक्रीटसँ बनल अछि । —  तहिना चीन तकनीक बल पर तिब्बतक भूकम्प प्रभावित क्षेत्रमे यार्लङ्ग साङ्ग्पो (YARLUNG TSANGPO) नदी (चीनमे ब्रह्मपुत्र नदीक नाँओ) पर एकटा अति महत्वाकांक्षी बान्ह केर निर्माण कएलक अछि । यद्यपि एकर विरोधमे सेहो बहुत स्वर उठल अछि पर एकटा बात विचारणीय अछि कि बिना खतरा मोल नेने सफलता नञि भेटैछ । हाँ आवश्यकता अछि ओहि खतरा वा सम्भावित दुर्घटनासँ बचाओ करबाक हेतु समुचित व्यवस्थाक । तेँ एहि क्षेत्रक समुचित विकाशक लेल दृढ़ ईच्छाशक्तिक संग सभसँ पहिने एहि ठामक लोकसभकेँ आ तकरा संगहि राज्य ओ केन्द्र सरकारकेँ सोझाँ आबए पड़तैक । अपनासभमे कहबीयो छैक कि “बऽडर बुड़िबक तँऽ दहेज के लेत” । एहि कहबीक अर्थ दहेजप्रथाकेँ समर्थन करब नञि थिक आ नहिञे हमरासभकेँ तकर समर्थन करबाक चाही । ओहुना कोनहु कहबीक शब्दार्थ नञि ग्रहण कऽ ओकर भावार्थ ग्रहण कएल जाइत अछि । तेँ एकर गूढ़ अर्थकेँ बुझबाक प्रयास करह ! जँ एहि ठामक लोके एहि ठामक समस्यासँ पलायन करैत रहत, ओकरा लेल अवाज नञि उठाओत, ओकर निराकरणक लेल काज नञि करए चाहत तँऽ राज्य ओ केन्द्र सरकार किएक ने कानमे तूर दऽ कऽ सूतल रहत । —  ठीके कहैत छी अहाँ - रत्तन बाजल । —  एकदम सही, हम सभ पलायनक बारेमे सोचबो नञि करब - बब्बनक सहमति भरल पाँती छल । —  चाहे पढ़बाक-लीखबाक लेल वा कमएबाक लेल जतऽ कतहु जाइ, पर आपिस आबि अपना मिथिला लेल काज करब - प्रीती बाजलि । —  हमहूँ - सोनी समर्थन स्वरमे बाजलि । —  तँऽ आजुक भूकम्प-कथा आब एत्तहि समाप्त करैत छी ।  बाकी काजसभ सेहो करबाक अछि ने । आ अहूँसभकेँ तैय्यार भऽ कऽ इस्कूल जएबाक अछि । - हम सीरककेँ कातमे टारैत कहलियै । —  हँ , ठीक छै - सभ धियापुता से कहि विदा भेल आङ्गन दिशि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१५. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-15 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु 111 वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' १९२ म अंक १५ दिसम्बर २०१५ (वर्ष ८ मास ९६ अंक १९२) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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