109 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १९३ म अंक ०१ जनवरी २०१६ (वर्ष ९ मास ९७ अंक १९३) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.राम विलास साहु-किछु बिहैन/ लघु कथा २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- ठूठ गाछ (उपन्यास) २.३.आशीष अनचिन्हार- जँ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि- (व्यंग्य निबंध) २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल-एगच्छा आमक गाछ (लघु कथा) ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-६ टा कविता ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- वञ्चित धार ३.४.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- - २ टा गजल २.विजयनाथ झा- तीन टा कविता ४.बालानां कृते-१.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ६ टा बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक विषयमे किछु कहनाइ अपन समए खराप केनाइ हएत। २०१५ मे एकटा बिर्रो उठल, जइमे सभ भाषामे किछु गोटे अकादेमी पुरस्कार घुरेलन्हि, आ जे नै घुरेलन्हि सेहो अकादेमीक किछु खास बिंदुपर गुमकी लाधलापर प्रश्न उठेलन्हि। मुदा ऐ बिर्रोमे जइ भाषाक विभाग साहित्य अकादेमीक सभसँ बेसी कृतज्ञ/ वफादार रहल से छल मैथिली विभाग। पुरस्कार घुरेनाइ तँ दूर, कोनो तरहक कोनो-प्रश्न, कोनो सिम्बोलिक विरोध धरि नै। आ ओइ कृतज्ञता/ वफादारी लेल ओकरा निर्लज्जतापूर्ण कार्य करबाक लाइसेंस, जे ओकरा लग पहिनहियेसँ रहै, केर पुनः नवीनीकरण भ’ गेलै, साहित्य अकादेमी तकर नवीनीकरण क’ देलकै। आब मात्र ‘सगर राति दीप जरय’ आ ‘समानांतर साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक विरुद्ध ठाढ़ अछि। ‘सगर राति दीप जरय’ पर साहित्य अकादेमीक ग्रहण क्षणिक रूपसँ लागिते रहैए, ओहुना ग्रहण क्षणिके होइ छै। भारतक साहित्य अकादेमीक उद्देशय की छै? जँ एकर मैथिली विभागक कार्यक हिसाबसँ कोनो छात्रकेँ एकर उत्तर देबा लेल कहल जाए तँ एकर उत्तर ओ एना देत- -साहित्यमे एकटा खास जातिक खास परिवार/ ग्रुपक प्रतिक्रियावादी आ मेडियोकर रचना/ रचनाकारकेँ पुरस्कृत करब -सेमीनार, अनुवाद आदि कार्यक्रम/ असाइनमेण्टमे अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिली लिखैबला तथाकथित लेखक सभकेँ मुख्यतया सम्मिलित करब -साहित्यमे एकटा खास जातिक किछु खास परिवारकेँ मुख्यतया ई पुरस्कार बाँटब -अनुवाद पुरस्कार आदि तकरा देब जे मात्र पुरस्कार लेल एकटा अनुवाद अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीमे केने होथि -दोसर जातिक किछु लेखककेँ आशा दिअबैत रहब जइसँ ओ ‘स्टेटस को’ मे बाधा नै बनथि -सुच्चा मैथिलीक उत्कृष्ट रचनाकेँ सरकारी तंत्रसँ दूर राखब आ अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीकेँ आगू बढ़ाएब -मैथिलीक सिलेबसमे जमींदार आदिक जीवनी अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीमे देब जइसँ जनसामान्य आ सुच्चा मैथिलीक उत्कृष्ट साहित्यक प्रशंसक अपन बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर करएबला अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीक पढ़ाइसँ दूर राखथि, आ जइसँ सरकारी तंत्रक मैथिलीपर हुनकर कब्जा काएम रहन्हि। एकर निम्नलिखित सुखद आ दुखद परिणाम भेलै:- -भारतीय संविधानक अष्टम सूचीमे गेलाक बादो प्राइमरी शिक्षा धरिमे मैथिलीक पढ़ाइ लेल कोनो तरहक इच्छा जनसामान्यमे नै एलै। एकर विपरीत किछु ठाम अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीक पढ़ाइक विरोध भेल, सिलेबसक विरोध भेल। -मैथिलीक समानांतर परम्पराक प्रारम्भ भेलै, जइसँ उत्कृष्ट कोटिक मैथिली साहित्यसँ संसारक परिचए भेलै। -साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागकेँ ओकर कृतज्ञता लेल निर्लज्जतापूर्ण कार्य करबाक लाइसेंसक साहित्य अकादेमी द्वारा नवीनीकरण कएल गेलै। -मूल धाराक साहित्यक स्तर निरंतर नूतन अधम स्तरकेँ प्राप्त करैत गेल। -स्कूल कॉलेजमे मैथिली विभाग छात्र विहीन भ’ गेल, ओतुक्का शिक्षककेँ एन.सी.सी., स्काउट गाइड, प्रोटोकॉल आदि कार्य लेल प्रयोग कएल जेबाक मजबूरी प्रशासन लेल भ’ गेलै। -साहित्य अकादेमी आदि द्वारा प्रकाशित पोथी कृत्रिम मैथिलीमे रहबाक कारणेँ गोदाममे सड़ि गेलै। -मूल धाराक कृत्रिम मैथिलीक पत्र-पत्रिका आ पोथी लोक अपने छापि पुरस्कार लेल अपने पढ़ए लगला। -‘सगर राति दीप जरय’ पर साहित्य अकादेमीक ग्रहण लाग’ लगलै। -सम्पूर्ण सरकारी संरक्षणक बादो मूल धाराक कृत्रिम मैथिली भाषा, ओकर सिलेबस आ ओकर एजेण्डा जनसामान्यसँ दूरे रहल आ ओकरा अपने मध्य कन्नारोहट बढ़ैत गेल। -मैथिली भारतक एकमात्र भाषा भेल जत’ सामानांतर धार फौदाइत रहल आ मूल धार घी-मलीदा खाइत रहलाक बादो मरनासन्न भ’ गेल। साहित्य अकादेमी संपोषित कृत्रिम मैथिली आ ओइमे देल जाएबला पुरस्कारक अवमूल्यनक पाछाँ मैथिलीकेँ मारबाक, आ मैथिलीक माध्यमसँ भेटैबला नोकरी-चाकरी, सुविधा, पुरस्कार आदिपर एकक्षत्र राज्य करबाक, सरकारी-एनजी.ओ.- संस्थाक पाइपर घुमैत-फिरैत खाइ-पिबैक आकांक्षाक पूर्ति करबाक साकांक्ष उद्देशय रहल। आ ई सभ मैथिलीक बदलामे भेल। श्रद्धांजलि: मैथिलीक प्रसिद्ध नाटककार श्री गुणनाथ झा स्वर्गीय भऽ गेला। मैथिली पत्रिका कर्णामृतक सम्पादक श्री राजनंदन लाल दासजीक पत्नी सेहो स्वर्गीय भऽ गेली । विदेह परिवार दिससँ श्रद्धांजलि। प्रबोध साहित्य सम्मान:श्री केदार नाथ चौधरीकेँ प्रबोध साहित्य सम्मान देल गेलन्हि। बधाइ। विदेहक २०० म अंक: १५ अप्रैल २०१६ केँ विदेहक २०० म अंक ई-प्रकाशित हएत। ऐ मे विदेह सम्मान/ समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मानसँ सम्मानित लेखक आ हुनकर कृतिपर समीक्षा/ निबन्ध प्रकाशित हएत। अहाँसँ रचना सादर आमंत्रित अछि। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 ११) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. 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होइ छै।” अभिभावक बजला- “से केना?” मास्टर सहाएब कहलखिन- “सहीमे प्राइवेट स्कूलक बच्चा सभ पढ़ि-लिखि हाकिम-हुकुम बनै छै। आ ईहो देखैत हेबै जे ओ सभ माए-बाप, गाम-समाजकेँ छोड़ि एवं मातृभूमिकेँ बिसरि जाइए, बूझू बौर जाइए। से तँ ऐ स्कूलक बच्चामे नै हाेइए।”¦¦¦ चोर-सिपाही माघ मास अन्हरिया राति। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चारि कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सिपाही गस्तीमे आबि रहल छल। चोर सिपाहीकेँ देखिते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सिपाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपटि कऽ पकड़लक सिपाही। पकड़ि हाजति लेने जाइ छल। चोरकेँ डंढ़ासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि कऽ देखल जे सड़कसँ हटि एकटा घूर रहै। आगि देखिते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बिड़ी नेसने अबै छी?” सिपाही कने सोचि कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जे तूँ भागि जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।”¦¦¦ इमानदारीक पाठ ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि तँ गामोक स्कूलमे बड़ सुविधा भेटै छै आ पढ़ाइओ होइ छै तैयो विद्याथी सभ शहरक स्कलमे किए पढ़ै छै?” कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।” “से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक। कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खियाबए। ई छिऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक इस्कूलमे विद्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि-िलखि रोजगार लेल आन-आन शहर चलि जाइ छै। अपन घर-परिवार आ समाज सेहो छुटि जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?” ¦¦¦ बौआ बाजल पढ़ल-लिखल बेरोजगार छी मुदा दिन केना कटै छल तकर कोनो सुधि-बुधि नै छल। ऊपरसँ परिवारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्छा रहितो किछु नै कऽ सकलौं। एक दिन मनमे फुराएल जे किछु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़िआएले छी औरो बुड़िया जाएब। एक दिन भोरमे बौआ-बुच्चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलिऐ। अहिना स्थितिमे बौआ पुछलक- “लोक एत्ते मेहनतसँ किए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दिन मरिऐ जाइए?” बौआकेँ हम समझबैत कहलिऐ- “जीवन-मरण तँ प्रकृतिक निअम छी। ओ निरंतर होइत रहैत अछि।” बौआ फेर पुछलक- “तखनो लोक किए पढ़ैए?” “मनुख पढ़ि-लिख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जिनगीकेँ सुलभ बना असली जिनगी जीबैए। लोक पढ़ि-लिखि डाक्टर-इंजिनियर, औफिसर, कवि लेखक आ उपदेशक इत्यादि बनैए। अच्छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?” बौआ बाजल- “हम पढ़ि-लिख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जिनगी बितबै छथि मुदा कवि-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्हि। अखबारमे पढ़लिऐ जे मरला बाद पुरस्कार भेटै छै।” ¦¦¦ घूसहा घर- मुखियाजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल डोल्हो दियौलनि। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचला। सभाकेँ संवोधित करैत मुखियाजी बजला- “ऐ बैसारमे सभ कियो मिल िनर्णए लिअए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जिनकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ छै। ओइ व्यक्तिक सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्दिरा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतनि।” वार्ड सदस्यक सहयोगसँ मुखियाजी लग इन्दिरा आवासबला सूची पहुँचल। बिहानेसँ मुखियाजीक दलाल सभ सूचीमे नामांकित व्यक्तिसँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि देलक जे फार्म भरि कऽ मुखियाजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दिअए पड़त। तखनि इन्दिरा आवास भेटै जाएत। बहुत गोटे तँ अपन गाए-महिंस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। किछु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचित रहि गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक। किछु दिनक बाद रघिया मसौमात इन्दिरा-आवास ले फार्म भरि मुखिया जी लग पहुँचलीह। मुखियाजी फार्म पढ़ि बजला- “पहिले इन्दिरा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालिस हजार भेटै छै मुदा आगू भेटैबला साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्चीसमे पाँच हजार आ अखनि चालिसमे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।” रधिया सुनिते कानि-कलपि कऽ अपन मजबूरी सुनौलकनि। मुखियाजी मुड़ी डोलबैत बजला- “यइ काकी, हमरे केनेे नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकिम-हुकुम बैसल छै। ओहो तँ कटिया सोन्हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतै। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे निमहै छिऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।” सुनि रधिया सभ बात सुनि परिस्थिति बूझि आपस आबि गेलीह। बुधनी बुढ़िया गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनियेमे घरबला बाढ़िमे डुमि मरि गेलखिन। दूटा बेटाक संग बुधनी कहियो हिम्मत नै हारलि। संघर्ष करैत आत्म-िनर्भरतापर धियो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छथि। हलाँकि आर्थिक रूपे कमजोरे छथि। एक दिन मुखियाजीक नजरि बुधनी बुढ़ियापर पड़लनि आ देखिते पुछलखिन- “गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन ओ दोसर इन्दिरा आवासक।” बधनी बजलीह- “ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?” मुखियाजी- “हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच सए आ इन्दिरा-आवासमे पनरह हजार।” बुधनी- “हम ई लाभ नै लेब।” मुखियाजी- “किए नै लेब?” बुधनी- “घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?” मुखियाजी आ बुधनी बुढ़ियाक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधिया मसोमात सुनैत छलीह अपना मनकेँ बुझबैत बजलीह- “इन्दिरा आवास किए घूसहा घर कहियो ने।”¦¦¦ जातिक भोज आइ फूलबाबूक बेटाक बिआहक भोज अछि। गौआँ सबहककेँ आशा छेलनि जे ई भोज हमरो सभकेँ खेबाक अवसरि भेटत। किएक तँ ऐ भोजकेँ सफल बनेबाक लेल बहुतो जाति-वर्गक लोकक सहयोग छेलनि। कियो जारनि फारए तँ कियो साफ-सुथरा करए। कियो बर्तन-बासन माजै छल। गामक डोम बाँससँ बनल छिट्टा-पथिया, ढकैस, डाल-दौरा, चङेरा बना देलक। मालि फूल आ फूलक माला, कुमहार वर्तन-वासन, महला पोखरिसँ माछ मारि मनक मन ढेर लगौलक। कतेको करीगर आ हलुआइ सभ भोजक समग्री बनबैमे भिरल छल। भोजमे सहयोग तँ सभ जातिक लोक द्वारा भेल। मुदा खाइक अवसर सभकेँ नै भेटलनि। ओतबे नै, किनको नगद टाका देल गेल तँ किनको उधार रहलै आ किनको सीदहा भेटलै। मुदा भोज खाइक नोत सभकेँ नै भेटलै। भोजक आयोजक भलहिं फूलबाबू छला मुदा करबारी तँ सभ जातिक लोक छेलखिन। किछु लोकक मनमे, जिनका सभकेँ नोत नै देल गेलनि। हुनका सबहक मनमे ईहो होन्हि जे काज जखनि नै छुआइ छै तँ पाँतिमे बैस खेलापर पाँति केना छुबा जेतै।¦¦¦ शिक्षाक महत जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि छलि। रधियाक पिताकेँ चारि बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जिनगी चलै छेलनि। सोझमतिया रहने कोनो क्षल-कपट नै रहनि। पितमरू छला। परिवारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहनि खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधियाक पिता जरूरति पड़लापर जखनि समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक निशान दइ छला। एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि-पानिसँ दहि गेलै। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलै। दोसर साल रौदी भऽ गेलै। एक तँ बाढ़िक मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलै। केतेको परिवार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा किछु दिन समए कटकल। मुदा ई सुविधा सबहक नशीव नै छेलै। गामक नम्हर जमीनदार, मालिक-गुमस्ता जे छला हुनका तँ पहुलके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलनि। हुनका सभकेँ कोनो चिन्ता नै छेलनि। रधियाक माए-बाप बूढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालिकसँ कहियो मरूआ तँ कहियो धान तँ कहियो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनिहार मालिक सभ विपतिक समैमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक निशान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखिन। गरीब अपन परान बँचाएत आकि छापक परबाह करत। कर्जा खेनिहार थोड़े बुझै छल कि छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्था चलि जेतै तक्खापर। एक दू साल समए बितलै। जीबछ अपन सौसुराइरिएमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। किछु समए पछाति सासु-ससुर मरि गेलखिन। श्राद्ध-कर्मसँ निवृत भेलै छल आकि गामक मालिक-गुमस्ता लोकनि अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहनि। ओ अवधि बीति गेल छल। कर्जा खेनिहार पहिले कागतपर छाप देने रहनि। ओइ कागतपर मालिक-जमीनदार लोकनि जमीनक खाता-खेसरा रकबा लिखि कऽ अपन नाओं कऽ लेलनि। गरीब सबहक जमीन मालिक-गुमस्ता हरपि लेलकनि। जइमे रधियाक जमीन सेहो चलि गेल। आब जीबछ-रधियाकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परिवारक भरन-पोषण करनाइ कठिन भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि गेल। बाहरमे पढ़ल-लिखल आदमीकेँ नोकरी जल्दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलै। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शिक्षाक महत जिनगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल। जीबछ ट-ब-ट काए कहुना कऽ चिट्ठी लिखि घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधियाकेँ प्रेरित करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धिया-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधियो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शिक्षाक बड़ महत छै। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालिक-गुमस्ता हरपि लेलनि। जखनि पढ़ल रहितौं तँ ई मुसिबत नै अबिताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धिया-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परिश्रम आ तियाग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दिन अपन धिया-पुताकेँ समैपर संगे जा स्कूल पहुँचाबए लगली। रधियाक टोलेमे बुच्ची बाबू छला। बुच्ची बाबू अंचलमे बाड़ाबाबू छथि। छुट्टीमे घर आएल छथि। हुनका काल्हि भोरे ट्रेन पकड़ि ड्यूटीपर जेबाक छेलनि से रधियाकेँ कहलखिन- “रधिया, किछु सामान अधिक अछि। गाममे कएक गोटेकेँ कहलिऐ जे काल्हि भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी सामान स्टेशनपर पहुँचा दिअ, मुदा कियो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।” रधिया बाजलि- “ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि दिअ हम समान पहुँचा देब।” बुच्ची बाबू बजला- “सात बजे भाेरेमे चलब। किएक तँ आठ बजेमे ट्रेन छै। तीन-चारि किलो मिटर स्टेशन दूरो छै।” रधिया भोरे उठि सभ काज कऽ जलखै बना धिया-पुताकेँ खाइले दऽ बजली- “तँू सभ जल्दीसँ खो, आइ कनी पहिनहिए तोरा सभकेँ स्कूल पहुँचा दइ छियौ, तखनि बुच्ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।” एम्हर बुच्ची बाबू तैयार भऽ रधियाक बाट तकै छला। पाँच मिनट पछाति रधिया पहुँचली। बुच्ची बाबू तमसाइत बजला- “रधिया, तोरा कहने छेलिओ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छूटि जाएत। तोरा कोनो चिन्ता नै।” रधिया बजली- “अपने तमसाउ नै। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पिट्ठेपर आबि रहल छी। कनी धिया-पुताकेँ स्कूल पहुँचबैमे देरी लागि गेल।” बुच्ची बाबू- “पहिले सामान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छूटि जाइत। एक दिन तोहर बेटा-बेटी स्कूल नै जेतौ तँ की हेतै। एक्के दिन कोनो पढ़ि कऽ कलक्टर बनि जेतौ?” रधिया मोने-मन सोचए लगली, कहै छियनि आगू बढ़ैले से उठिए ने होइ छन्हि। हम तँ लफरल हिनकासँ पहिनहि पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतनि। अपने बेगरते आन्हर छथि। अनेरे गछलौं।¦¦¦ ई छी हमर मजबूरी जमुना बाबाक दुआरिपर सतसंग-प्रवचन होइ छेलै। भीड़ देखि हमहूँ ससरि कऽ गेलौं आ बैस सुनए लगलौं। प्रवचनकर्ता सेहो ज्ञानी आ विद्वान बूझि पड़ला। ओ मनुखक जिनगीक समरूपता बतबै छला। कहब रहनि जे सभ मनुख एक समान छी। सभ एके ईश्वरक संतान छी आ सबहक अत्मामे एके परमात्माक अंश रमि रहल-ए। मुदा हम तँ बड़ अंतर देखै छी। सबहक क्रिया-कलाप, रहन-सहन आ खानो-पानमे बड़ पैघ भिन्नता अछि। केकरो बोरे-बोरे नून आ केकरो रोटीओपर ने नून। कोइ खाइते-खाइते मरैए आ कोइ खाइए बिनु मरैए। केकरो बीघा-बीघे कोठा-सोफा केकरो खोपड़ीओपर आफत। कोइ रौदे-वसाते जरि-मरि काज करैए तँ कोइ ए.सी.मे मौजु करैए। कियो उड़न जहाजसँ देश-विदेशक यात्रा करैए तँ कियो पएरे चलि-चलि सड़केपर पराण तियागैए। किनको बिमारीक इलाज करोड़ो रूपैआसँ विदेशमे होइए तँ किनको पराण साधारण इलाज बिनु चलि जाइए। ऐ सभ मुद्दापर सोच-विचार करैत जखनि प्रवचन खतम भेल तखनि हम हुनका लग जा कहलिऐ- “महराज, अपने प्रवचनमे सभ मनुखकेँ समरूप बतौलियनि। मुदा हम तँ बड़ अन्तर देखै छी। से कनी फड़िछा कऽ कहियौ।” प्रवचनकर्ता मधुर स्वरमे बजला- “से तँ ठीके अहूँ कहै छी। हम जे प्रवचनमे कहलौं सेहो ठीक आ अहाँ जे कहै छी सेहो ठीक। सत् ई छै प्राकृति द्वारा जे सुविधा मनुखक लेल उपलब्ध छै ओ समरूप छै। मुदा मनुखक बीचमे जे अन्तर छै से अन्तर बेवस्थामे कमीक कारणे छै। मनुखे मनुखक दुश्मन छिऐ। जे जेते सवल छै ओ ओते दोसराक हक मारि बेवस्थाकेँ दुरूपयोग करै छै। जहिना हाथीकेँ दूटा दाँत होइ छै एकटा खाइबला आ दोसर देखबैबला तहिना बेवस्था करैबलाकेँ दू नजरि होइ छै। कथनी आ करनीमे अन्तर रखने छै। ऐ सभ बातक विचार-अनुभव मनुखकेँ अपने करए पड़तै। ओकर समाधान लेल सघर्ष करए पड़तै। बिनु मांगने तँ भीखो नै मिलै छै। ई तँ अहाँ अधिकारक बात करै छी। जौं हम प्रवचनमे समरूपताक बात नै कहबै तँ बेवस्था हमरा नै ने जीबए देत। अहाँ जकाँ जौं हमहूँ प्रवचनमे बाजब तँ कहिया ने हमरा जमपुरी पहुँचा देने रहितए। यहए छी हमर मजबूरी।”¦¦¦ बाल-बोध दुखीलालकेँ दुखक पहाड़ माथसँ कहियो निच्चाँ नै भेल। बूढ़ माए-बापक सेवा टहल, तैपर सँ दूटा भलढ़ेरबा बेटी, छोट-छोट दूटा बेटा, पत्नी आ अपने कुल आठ बेक्तीक परिवार। पत्नी- फुलिया- परिवारक काजमे पिसाइत छेली। सासु-ससुरक टहल-टिकोरा आ सेवासँ पलखतिए नै। ऊपरसँ एकटा पोसिया गाए, एकटा भजैतिया बरद। मुदा दुनू बेटी चठेलगरि आ हुनरगरि छन्हि। घरक कमौआ दुखीलाल असकरे दिन-राति फिरिशान रहैए। घरक खर्चा पुग्बे ने करैए जे पलखति मारत। खेतीओ-पथारी कम्मे भेने जने-बुत्तापर घरक खर्चा चलैत अछि। जखनि खेनाइओ-पीनाइओमे ढनसने तखनि बेटा-बेटी पढ़त केना?बर्खक पेसतरे दुखीक माए लकबा रोगसँ मरि गेली। पछाति बूढ़ बाप सेहो रोगसँ रोगा-सोगा दम तोड़ि देलकनि। श्राध-कर्म आ भोज-भात कर्जे हाथे भेल। दुखीलालकेँ एक-सबा कट्ठा डीह, तीन कट्ठा चौमास आ छह-सात कट्ठा तीन-फसिला खेत छन्हि। जइसँ छह मास परिवारक गुजर चलै छन्हि। जन-मजदूरी कऽ शेष छह मास बितबैत अछि। मुदा अखनि तँ चौमास आ तीन-फसिला खेत दस हजारमे डेढ़ा सूदिपर भरना लगि गेल अछि। तैपर सँ दूटा बेटीक बिआहक अलगे। दुनू बेटा अखनि बाल-बोध! समस्या-पर-समस्या लदल जा रहल अछि। जँ चारि-पाँच साल खेत-भरना रूपैआ आ सूदि नै भरब तँ खेतो सूदिए तरे चलि जाएत। गाए बिकल चरबाहियेमे कहबी सन हएत। एक दिन दुखीलाल बैसारीए छल। किछु सोचैत छल आकि मनमे उपकलै खेतक भरना। जइ खेतसँ हमर बाप-दादा परिवार चलबै छला वएह खेत हमरो जीविका अछि। मुदा आब बूझि पड़ैए ओ खेत बिलटि जाएत। ऐ क्रममे सोचैत दुखीलाल टहलि मालिक प्रभूनाथजीक दरबज्जापर पहुँचल। प्रभूनाथजी दुखीकेँ देखिते कहलखिन- “आबह दुखी, एमकी बहू दिनपर भेँट करए एलह।” दुखीलाल- “मालिक, अहाँसँ कथी छुपल अछि। एतेक दिनसँ माए-बापक कहुना रीन उतारलौं मुदा अपनेक रीन केना चुकाएब से फुड़ेबे ने करैए।” प्रभूनाथजी- “केना चुकेबऽ से तँ तोहर काज छिअ। तइले हम किए मगजमारी करब। साले-साले हमरा रूपैआक डौरहा सूदि बढ़ैत जेतह। पाँच सालक कराड़ी छह, नै चुकेबहक तँ खेत छोड़ह पड़तऽ।” दुखीलाल- “मािलक, एना नै ने बाजू। खेतक नाओं सुनि हमर करेजा फाटि जाइए। ई खेत हमर खनदानक पूजी आ इज्जति छी। अपना जीबैत हम केना बिलटए देब।” प्रभूनाथजी- “से तँ तूँ ठीके कहै छह। रूपैआक सूदि जोड़ि चुकता कऽ दहक आ अपन खेत छोड़ा लैह।” दुखीलाल- “मालिक, अहींक दरबारमे जन-मजुरी कऽ जीब लेब। रहल अहाँक रूपैआक सूदि, तइ एबजमे हम अपन दुनू बेटाकेँ अहीं ऐठाम नोकरी राखि दइ छी। बँचलोहो बासि-बेरहट खा जीब लेत आ अहूँक काज चलत। जाधरि अहाँक रूपैआक सूद-मूर नै सधत ताधरि अहींक दरबारमे नोकर बनि खटि देत। रूपैओक चुकता भऽ जाएत आ हमरो खेत छुटि जाएत।” प्रभूनाथजी- “कहलह तँ बड़ नीक। युक्तिओ तोहर नीमन छह मुदा...।” दुखीलाल- “मािलक ‘मुदा’ किए कहलौं?” प्रभूनाथजी- “मुदा ऐ दुआरे बजलौं कि तोहर बेटा दुनूकेँ तँ देखने नै छी। अबोध अछि आकि बाल-बोध ” दुखीलाल- “बल-बोध अछि। ठेकनगरि, एकबेर सेरिया कऽ बता देबै तँ दोसर बेर अढ़बए नै पड़त। देखिते-देखिते फुर्र-फुर्र काज कऽ देत। एक्को मिसिया असकतिया नै अछि।” प्रभूनाथजी- “बेस काल्हिए दुनूकेँ बजौने आबह। नैनसँ देखियो लेब आ काज करै जोकर अछि कि नै सेहो ठेकानि लेब।” दुखीलाल- “बेस मालिक, जाइ छी काल्हिए दुनूकेँ संगे नेने अबै छी।” दुखीलाल अपन कर्तव्यकेँ हीन बूझि चिन्तामे डूमि गेल। हम केहेन बाप छी जे बाल-बोध बेटाकेँ भोजन-बस्त्र-शिक्षा इत्यादि पूर नै कऽ अपने बेगरते नोकरी लगबै छी। बेटा-बेटी राजाक हुअए आकि गरीबक सभकेँ अपन सन्तान दुलरूआ होइ छै। जखनि नमहर-बुधिगर-ठकनगर हएत तँ की कहत! हमर बाप केहेन निष्ठुर छथि जे हमरा संगे एहेन अन्याय केलनि। मुदा हमरा लग रस्ते कोन अछि। दोसर कोन उपए लगा सकब। मोनक बात मोनमे रखैत हृदैकेँ सक्कत कऽ बिहाने भने पनिपिआइ करा संगे नेने प्रभूनाथजीक दरबार पहुँचल। दुनू बाल-बोध भाए गांगी-जमुनी, देखैओमे बड़ नुनुआगर, उमेरो आठ-दस बर्खक। प्रभूनाथ जीकेँ मनमे भेलनि बड़ नीमन टहलू हएत। मुदा अनठबैत बजला- “दुखी दुनू बौआ तँ अखनि लेधुरिए अछि। हमरा ऐठाम कोन काज करत। ऐठाम तँ भीड़गर काज अछि।” दुखीलाल बूझि गेल जे मालिक हमरा टाड़ि रहल अछि। बाजल- “मालिक, छोट देखि झुझुआउ नै। घरक छोट-छोट सभ काज करत। गाए-बरदक कुट्टी-सानी, दरबज्जा, माल-जालक बथान आ गोहाल घरक झार-बहार करत। गोबर-करसी ढुल-ढालकेँ हटाएत। अहूँकेँ कियो टहल-टिकोरा करैबला नै अछि सेहो अपन समझि करत। अहूँ अपने पोता सन बेवहार करबै। घरे ने बदलि जेतै मुदा रहतै तँ गामेमे। अहाँ लग रहत तँ हम निफिकिर रहब। ओना हमहूँ तँ अबिते-जाइते रहब।” प्रभूनाथजी- “दुखी, तँू ने गाम-घरक बात करै छह। लोक तँ शहर जाइले जान गमौने अछि।” दुखीलाल- “मालिक की कहब, लोक तँ चिड़ै भऽ गेल अछि। जेतै पेट भरै छै ओतै खोंता बना रहैत अछि।” प्रभूनाथजी- “से ठीके। हमरे बेटाकेँ नै देखै छहक। गाम-समाज छोड़ि हैदराबादमे रहैए। पावनि-तिहार तँ हम जाबै जीबै छी ताबे कहुना कऽ दइ छिऐ, नै तँ घरक देवताकेँ एक चुरुक पानिओ के देत।” दुखीलाल- “मािलक, छोड़ू दुनियाँ-दारीक गप-सप्प। हमरो काजपर जाइक अछि। और गप-सप्प दोसरो दिन हेतै। दुनू बाल-बोधकेँ सम्हारू।” प्रभूनाथजी- “दुखी, कनी आर बैसह। ई दुनू बौआ अनचिन्हार अछि। कनी बतिया लइ छी। नाओं बूझल रहत तँ समैपर समझा-बुझा देबै। नै तँ पोसो नै मानत। तँू तँ बुझबे करै छहक जे हमरासँ दुनू बौआकेँ खटपट तँ नै हएत मुदा हमर बुढ़ियाक सोभाव आ बेवहारकेँ तँ तूँ नीकसँ जनै छह, ओ मक्कै लाबा जकाँ दिन भरि फटफटाइते रहै छथि। तेहेन झनकाहि अछि जे केकरोसँ पटरीए ने खाइ छै। दिन-भरि पूजे-पाठमे लगल रहैए, दिनक भोजन राति आ रतुका भोरमे पाड़न करैए। जँ कियो लागिओ-भीड़ीओ देतै तँ कहत जे हमर सभ किछु छुबा गेल। एकबेर के कहए जे तीन-तीन बेर नहाएत आ गंगाजलसँ शुद्ध करत। बेटो-पुतोहु आ पोता-पोती जखनि अबैए तँ देखिते बनरनी जकाँ लड़िते रहैए। तखनि हमर जिनगी केहेन अछि से बिनु कहने बूझि गेल हेबह।” दुखीलाल- “मालिक, ई तँ घरक बात छी। ओइमे हम किए दखल देब। मनुखो कोनो एक्के रंगक होइए। लोक अपन सुख-दुखक सृजन अपने करैए। अपजश दोसरकेँ लगबैए।” बात समटैत दुखी दुनू बाल-बोधक दिस इशारा केलक। प्रभूनाथजी पुछलखिन- “बौआ, नाओं की छिअ?” दुनू भाँइ एक्के स्वरमे अपन-अपन नाओं बाजल- “बुधन-बेचन।” प्रभूनाथ- “मुँह सूखल छह। किछु खेबह?” दुनू भाँइ बाजल- “नै, पनिपिआइ कऽ लेने छी।” प्रभूनाथजी- “तोहर बापक कहब अछि जे दुनू भाँइ अहीठाम काज करत से करबहक ने?” बुधन- “हँ।” प्रभूनाथजी- “अपन काज कहुना सभ करैए मुदा बीरानक काज कियो करैए आ कियो नै करए चाहैए।” बुधन- “हम अपन आ बीरानमे नै बुझै छी। काज करब।” दुखीलाल बूझि गेल जे बात बढ़ि जाएत। बातकेँ सम्हारैत बाजल- “मालिक गरीबक बेटाकेँ कथी परीक्षा लइ छिऐ। जे कहबै से करत।अबेर भऽ गेल काजपर जाइ छी।” प्रभूनाथजी- “कनी दरमाहा फरिआ लैह जे पछाति कोनो मुहाँ-ठुठी ने हुअए।” दुखीलाल- “मालिक, दरमाहा की हेतै। अहाँसँ रूपैआ दस हजार नेने छी। सालमे पनरह हजार हएत। पँच-पँच सए रूपैआ महिनाक हिसाबसँ दुनू भाँइक एक हजार भेल। पनरह महिनामे अहाँक रूपैआ फरिया जाएत, नै मानब तँ एक मास बेसीए खटि देत। हमरो खेत छूटि जाएत। ने अहाँकेँ दिअ पड़त आ ने हमरा। दुनू भाँइ अहींक दरबारमे खाएत-पीअत काज अहाँक अनुकूल करत।” प्रभूनाथजी- “ठीक छै मानि लेलिअ। तँू तँ हमरोसँ तेज निकललह। हम तँ बाल-बोधक फेरमे अबोध बनि गेलौं।”¦¦¦ अबिसवास काल्हिए नूनू बाबूक बेटीकेँ बिआह छी। नूनू बाबू बिआहक सरमजान सबहक ओरियानमे लगल छला। गिरहत आ सम्पन्न परिवार रहितो रूपैआक अभाव छेलनि। चारि लाख टाका, पाँच भरि सोना आ एकटा मोटर साइकिल देहेजपर बिआह फाइलन भेल छल। दुलहा इंजीनियरिंग कौलेजक छात्र। सुखी सम्पन्न परिवार। दुलहाक पिता मोहन बाबू एस.डी.ओ. औफिसक बाड़ाबाबू। नीक कमेने-खटेने छथि। तँए नूनू बाबू अपन बेटी सुचिताकेँ हुनके घरमे कुटमैती करैक निर्णए नेने छथि। नूनू बाबू बहुत परियास करैत तीन लाख रूपैआ मोटर साइकिल, दू भरि सोना तिलकक समैमे चुकता कऽ देलनि। शेष तीन भरि सोना बेटीक गहना स्वरूप बिआहे दिन देब आ एक लाख रूपैआ जे बँकियौता रहि गेल ओ बेटीक नामे एल.आइ.सी. बीमामे जमा अछि। जे दू तीन मास पछाति मिलत सेहो चुकता कऽ देब। तिलक भेला पछाति बिआहक दिन ठेकल गेल। मुदा दुलहाक पिता मोहन बाबू बड़ लोभी। ओ मोने-मोन सोचलनि, पुतोहु जखनि हमर हएत तँ एल.आइ.सी.क रूपैआ आइ ने काल्हि हमरे हएत। बँकियौता रूपैआ बिआहसँ पहिने लऽ लेब तँ लाभमे रहब। मोहन बाबू बिआहसँ एक दिन पहिने समाद नूनू बाबूक घर पठौलनि जे हमर एक लाख टाका बँकियाहा अछि ओ रूपैआ चुकता करि दिअ तखने बरियाती जाएत नै तँ अहाँ जानू। नूनू बाबू समाद सुनिते जेना देहपर बज्ज्र खसि पड़ल। ओ सेचमे पड़ि गेला। होश सम्हारि मोहन बाबूसँ भेँट कऽ बड़ विनती केलनि। अखनि ऐ लेल माफी दिअ। हम बेटीबला छी। बहुत चीज-बौसक ओरियान करए पड़त। तैपर सँ बरियातीक सुआगतमे सेहो बहुत खरच हएत। मुदा मोहन बाबू नूनू बाबूकेँ एकोटा बात नै सुनलकनि, आ ने आँखिक नोर पोछलकनि। तखने नूनू बाबू बजला- “खैर, नै मानब तँ अहाँ बरियाती लऽ कऽ आउ, हम दरबज्जेपर बिअाहसँ पहिने रूपैआ बरियातीए घरमे चुकता करि देब तखनि बिआह करब।” नूनू बाबू खेत भरना रखि रूपैआक ओरियान केलनि। बरियाती समैपर आएल। सबहक सुआगत भेल। दरबज्जेपर सबहक सोझहेमे एक लाख टाका दुलहाक पिता- मोहन बाबूकेँ चुकता कऽ देलनि। दुलहाक परिछन भेल, वरमालाक काज शुरू हएत तखने एकटा नव बातक चर्चा भेल जे दुलहा पहिने दुलहिनकेँ देखता। पसिन भेला पछाति ने बरमाला आ सेनूरदान हएत। ऐ बातसँ कन्याँ पक्षमे खलबली मचि गेल आ आक्रोश सेहो बढ़ि गेल। अन्तमे निर्णए भेल जे ठीक छै पहिने कन्याँ देख लेल जाउ। तखने आगूक काज हएत। दुलहिन चित्रा तँ पहिनेसँ वरमाला लेल सजले छलि। एकटा कोठलीमे दुलहाकेँ लोकनियाँ संगे बजौल गेल। ओही कोठलीमे दुलहिन चित्रा सहेलीक संगे आएल। चित्रा इण्टर पास पूर्णिमाक चान सन सुन्नरि। दुलहा देखि कऽ मोने-मोन खुश भेला। किछु गप-सप्प सेहो भेलै। तखने चित्रा बजली- “की यौ दुलहाजी, हम अपनेकेँ पसीन भेलौं?” दुलहा मुस्की मारि पीठे लागल बजला- “हँ, की हमहूँ अहाँकेँ...।” चित्रा तुरन्ते जवाब देलक- “नै अहाँ हमरा पसीन नै छी। तँए आब ई बिआह हम किन्नौं ने करब। चित्राक ई निर्णए सुनि सखी-बहिनपा, माए-बाप, समाजक बुजुर्ग इत्यादि बहुतो गोटे समझेलकनि मुदा एकेठाम चित्रा जिद्द धेने रहलि जे ऐ वरसँ हम बिआह नै करब।” दरबज्जा बरियाती-सरियातीसँ भरल छल। ई बात सुनिते लगले सनसना कऽ अगिलग्गी जकाँ चारू दिस सौंसे गाम पसरि गेल। बहुतो बुजुर्ग लोकनि दुलहिनक पिताकेँ बुझा-समझा कऽ कहलकनि मुदा चित्रा अपन दृढ़पर अरल रहलि। चित्रासँ कारण पूछल गेल। कहलक- “जखनि दुल्हाकेँ अपन माए-बाप आ सर-समाज किनकोपर बिसवास नै छन्हि तँ ओ हमरापर बिसवास केना करता आ हम केना हुनकापर बिसवास करब। दोसर बात जे हिनकर पिताजी दहेजक खातिर जमीन आइज्जत बेचबा सकै छथि तखनि ओ हमरो बेचि सकैत छथि किने। तँए हम बीख पीब मरि जाएब मुदा एहेन अविसवासी आ दहेज रूपी दानवक बेटा संगे बिआह नै करब। ऐसँ नीक तँ हम ओहेन दुल्हा जे गरीबे किएक ने हएत, तिनकासँ करब, जे अपन इज्जतक संगे दोसरोक इज्जत करत।” चित्रा सहेली संगे कोठलीसँ निकलि गेलि। दुल्हा आ लोकनियाँ सभकेँ ओही कोठलीमे बन्न कऽ ताला लगा आँगन आबि गेलि। बिआह नै भेल। ई खबरि रातिए भरिमे चौतरफा पसरि गेल। पंचैतीक बैसार भेल। पंच लोकनि बिआह हेबाक बहुत परियास केलनि मुदा चित्रा अपन संकल्पपर अडिग रहलि। अन्तमे जे दहेजक लेन-देन आ सुआगतक खर्च भेल रहै ओ सभटा आपस भऽ जाए। दुलहिनक पिता नूनू बाबू बजला- “चारि लाख टाका, दू भरि सोना, मोटर साइकिल संगे सुआगतमे दू लाख टाका खर्च भेल अछि से सभटा आपस कऽ दिअ तखने हिनका सभकेँ छुट्टी भेटतनि। नै तँ हम कानूनक शरण लेब आ दुनू बापूतकेँ जहल कटेबनि।” सभ पंचक विचार भेलनि। बात तँ उचिते ने नूनू बाबू कहै छथि। कोनो जबरन जुर्माना तँ नै...। दुल्हाक पिता मोहनबाबू छह लाख टाका, सोना, मोटर साइकिल घरसँ मंगबा नूनू बाबूकेँ पंचक बिच्चेमे आपस कऽ देलकनि। तखनि हुनक बेटाकेँ कोठलीसँ बाहर निकालि देल गेल। जहिना आन गामक चोटाएल कुकुर नांगरि दबौने दुलकी दैत अपन गामक बाट पकड़ि सोझहे-सोझ जाइत रहैए तहिना सभ कियो विदा भेला। चित्रा पिताक मुरझाएल मुँह देखि बाजलि- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह करब। पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नै। एही खातिर ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चिन्ता नै करू।”¦¦¦ डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि। सौंसे गाममे सोग पसरि गेल। गाममे दलमलित हुअ लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्त भेने एकटा युगक अन्त भऽ गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक मानैत तहिना आदरो करैत। मुइला पछाति समुच्चा गामक लोक दाह संस्कारमे पँचकठिया दइले पहुँचल छल। भीड़ बहुत मुदा अखनि धरि अछियामे अागि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ठाढ़, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्हरा बनि हे...।” “सभ दिन होत ने एक समाना...।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर...।” भिनसरसँ दुपहर भेल जाइत रहै। अखनि धरि लोक काेन आशामे समए बीतबै छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल। जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखसँ पेटमे बिलाइ कुदऽ लगलै। तखनि जा कऽ विलमक कारणक पता लगबऽ लगल। मलिकपनाबला बात, के हिम्मत करत जे आगू भऽ पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करैत रहए। तखने रौदी बाबा पहुँचला। पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने पड़ल। किए एते अबेर भेल। धिया-पुता सभ भूखे लहालोठ होइए!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “अहाँ बुढ़ो-पुरान छी आ गामक अनुभवी सेहो छी, से कनी झबदे पता करियनु जे...।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। ओइ ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल कुटुम सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल...। लगमे जा रौदी बाबा जोरसँ पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकेँ जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्द- कहलकनि- “दादा, सभ किछु तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्तजारमे छी।” रौदी बाबा पुछलखिन- “से किए?” रूपचन्द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकेँ जरौलासँ मौक्षक प्राप्ति होइ छै तँए कनी बौकू डोमक बाट तकै छी।” रौदी बाबा बजला- “अहीले एते अबैर होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो भोरसँ आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै।” रूपचन्द- “नइ हौ काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, खबरि भऽ गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि।” रूपचन्दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकेँ अनरगल लगलनि। तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि। जोरसँ बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके छथि की! जखनि एते बुझै छहक जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब तँ पहिने डोमकेँ बजा लइतह। पछाति लोक सभकेँ बजैबतह। भिनसरसँ दुपहर भऽ गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ भऽ रहल अछि आ बौकू डोमक अखनेा कोनो था-पता नइ छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून। जखनि जे मनमे फुड़ैए सहए करऽ लगैए! नव-नव जोगीकेँ भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग अबऽ लगल। सभकेँ होइ कखनि झबदे आगि पड़ै जे लोक पँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत। मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल। सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्द मालिक, कनीले एते लेट भऽ रहल छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल। जखनि बुझै छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककेँ मरलोमे मुक्ति नइ भेटै छै, तखन डोमकेँ एते निच्चा किए बुझै छिऐ...। जखनि कि जीबैतमे सभ डोमसँ छूबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै छी...। डोमो तँ अही समाजक लोक छी,मुदा गामसँ हटि कऽ वेचारा सभ गाममे बसैए। सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैसि खेनाइ तँ दूर जे बातो ने करैए। एक लग्गा फटिकेसँ पुछ-पाछ करैए...। ऐबेरमे कोन असोगरज लगि जाइए...। रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नचऽ लगलनि। मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर धियान गेलनि। जाइते मन जेना आरो चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्थाक जलियाएल रूप सभ सोझा अबऽ लगलनि। किछु बाजि नइ रहल छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू डोमसँ कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला तँ हमरो मालिक। हमरा कोनो लोभ-लालच नइ अछि मुदा दान-दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी दऽ दिअ।” रूपचन्द एकटा चानीक सिक्का दऽ आगि कीनऽ आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा आ सीताराम दास अपनामे विचार बजला- “ई उचित नइ भेलऽ रूपचन्द। जेकरा खातिर भोरसँ दुपहर भऽ गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ सधत। अपनो समांग बूझि बौकूकेँ जे देबै से दियौ, तखन ने बौकूओ अप्पन बूझत।” सएह भेल। मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल। निगुन गौनिहारकेँ जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि। पुन: गाबए लगला- “सभ दिन होत ने एक समाना....।”¦¦¦ गंगा नहाएब कातिक मासक पुर्णिमा लगिचाएल। सालक तेरहम मास, बेसी पावनि-तिहार भेने हाथो खालीए, मुदा गाममे दलमलित होइए- गंगा नहाइले सिमरिया घाट जाएब। ऐबेर पुरुखसँ बेसी जनानीए सभ गंगा नहाइ जाइले छाल छीलने। तीनू टोलक जनानी सभ गुदुर-फुसुर करैमे भरि-भरि दिन लगल। चनरदेव भोरे उठि गाए-बरदकेँ कुट्टी-सानी लगा धनखेती दिस विदा भेल कि बड़की भौजी आ सावित्री माए डेढ़ियापर आबि गेली। बड़की भौजी मुस्की मारि बजली- “बौआ चनरदेव, सुनै छी गामक लोक सभ गंगा नहाइले जा रहल अछि। अहाँ नइ जाएब। कहिया पुर्णिमा छिऐ।” चनरदेव दिन-तिथि गीनैत बाजल- “पुरसुए पुर्णिमा छी। हमर तँ हाथे खाली अछि, तहन छुच्छे हाथ जाएब केना। ऐबेर नइ जाएब। गंगा मैया जँ ऐ साल निके-सुखे रखलनि तँ पौरुकॉं अबस्स जाएब।” सावित्री माए बजली- “चनरदेव, एहनो बात लोक बजैए! गंगा नहाइले तँ बिना जतरो-के-जतरा बनबैए, अहाँ किए मुँह मोड़ै छी।” गंगा नहाइक चर्च सुनि एक्के-दुइए जनिजाति सभ ससरि-ससरि बहुतो आबि चनरदेवकेँ घेरि लेली। बड़की भौजी चौल करैत कहलखिन- “यौ अहॉं सभ दिनक बहन्नाबाज छी, से बहन्ना छोड़ू जे हाथ छुच्छे अछि। अपनो चलू आ हमरो सभकेँ नेने चलू। रहल खर्चाक बात, हम तँ खर्चा देखबे ने करै छी। घरेसँ खेनाइ-पीनाइक समान बना लऽ लेब। रेलगाड़ीमे मेलाक भीड़ रहबे करत, टिकट कोनो लगबे ने करत। एक गड़ीसँ रातिए-राति जाएब आ दोसर दिन घर घूमि चलि आएब। ने कोनो घरक काज पछुआएल आ मंगनीमे गंगा नहा लेब। जखन मेलामे कोनो चीज-वौस कीनबे ने करब तखन खर्च बेसी किए हएत। अहूँ तँ सियार गुँहकेँ परबत बनबै छी।” बड़की भौजी गपक बखाड़ी खोलि चारू दिससँ चनरदेवकेँ गछारि लेली। चनरदेव सकदम भऽ गेल। किछु उत्तर नइ देलक। जनिजाति सभ समझि गेली जे चलैले तैयार भऽ गेल। चनरदेव मने-मन सोचए लगल जे वेद-पुराणसँ लऽ कऽ साइयो पोथीमे गंगा स्नानक बड़ पैघ महत बतौने अछि। सतयुगसँ लऽ कऽ अखनि धरि अपन देशक लोक आ आनो देशक लोक गंगा नहाइए तँ चनरदेव किए पाछू रहत। हमहूँ किए ने लगले सूरमे बेड़ा पार भऽ जाइ। एमहर भरिए दिनमे जनिजाति सभ खेनाइ-पीनाइक ओरियानमे लगि गेली। कियो अरबा चारक रोटी, अल्लूक भुजिया बनौलक तँ कियो परोठा-भुजिया, तँ कियो चूड़ा-मुरही, सतुआ-नोन आ मिरचाइक मोटरी बान्हि चलैले तैयार भऽ गेल। पचीस-तीस गोटे सँझुके गड़ी पकड़ैले टिशन दिस विदा भेल। निरमलीसँ सकरी जाइत-जाइत भीड़क कारणे बुझू देहक मोलि छुटि गेल। मुदा कोनो धरानी भोरे-भोर सिमरिया टीशन पहुँच गेल। किछुकाल टिशनेपर अँटकै गेल आ अन्हरोखे गंगा घाट दिस सभ कियो विदा भेल। टिशनसँ घाट धरि चुटी जकॉं सत्तरि लगल लोक। केतौ कनीयोँ जगहे नइ जे ठाढ़ो भऽ लोक जीड़ाएत। ससरैत-ससरैत कहुना गंगा घाट पहुँच गेल। दिसा-मैदानसँ आबि चनरदेव दतमनि करए लगल। गामेसँ साहोरक दतमनि अनने छेलए। मुँह-हाथ धोय बेरा-बेरी गंगामे नहाइ गेल। चोर उचक्काक कोनो कमी नइ, जँ एकेबेर सभ कियो नहाइले जेइतए तँ झोड़ा-झंटी लऽ पार भऽ जइतए। लोक तँ गंगाइ नहाइत अछि पुन्य समझि कऽ मुदा पापो करैबला ओतइ बेसी होइए। सभ कोय नहा एक-एक डिब्बा गंगाजल भरि आनि ऊपर रखलक। पानि तेते घोर-मट्ठा भेल घिनाएल छेलै जे मुहोँमे नइ लइके मन होइत। घाटसँ हटि ऊपरमे एकटा मन्दिर छल। ओतइ एकटा चापाकल सेहो छल। सभ कियो धक्कम-धुक्का करैत कल लग पहुँचल। भूख-पियास सभकेँ लगल छेलै अपन-अपन खाएक निकाइल खा-खा पानि पीब, मोटरी-चोंटरी बान्हि लेलक। सबहक विचार भेल जे गड़ीमे बड़ देरी छै तँए हम सभ ताबे मेला घूमि देखब। घूमि-घूमि गंगा घाटक मनोरम छबिक आनन्द लेब। सभ कियो घुमैत दछिन-पूब दिस गेल। जेतए खाली मुरदे जरै छेलै। लाश अधजरू होइ कि पानिमे धफारि-धफारि कऽ भँसा दइ छेलै। तइ बगलेमे एतेक घिनाएल छेलै जे थुको फेकनाइ अपराधे बुझै छल। नाक-मुँह मुनि सभ कियो पड़ाएल। गंगा कातमे किछु दूर तक घाट बनल। नहाइक भीड़ ओरेबे नइ करैबला। तखन घुमैत सभ कियो राजेन्द्र पुल लग आबि गेल। जेना पुल कियो देखने नइ छल तहिना ऑंखि फारि-फारि पुलकेँ देखऽ लगल। घुमैत-फिड़ैत सभ थाकि-हारि गेल। कातिकक दुपहरियाक तिखर रौद भेने गरमी बढ़ि गेल। छाहरिक कोनो असे नइ। भिजलाहा वस्त्र माथपर राखि हाथसँ पकड़ि झॉंह बना-बना हाथसँ पकड़ि सभ घुरिया कऽ बैसल। बैसले-बैसल लोक सभ गंगा महात्मक चर्च करए लगल। जेकरा जे बुझल-सुनल आकि मनमे फुराइ से बजै छल। तखने बड़की भौजी आ कुपहावाली काकीकेँ रहि-रहि कऽ मन हौंरऽ लगलनि। बोकरि-बोकरि भरली। गंगामे कखनो मरलाहा जीव-जन्तुकेँ भँसैत जाइत देखै तँ कखनो मुरदाकेँ, तहिना चारूकात जे घिनाएल देखै से परपंचे ने होइ। चनरदेवक मनमे गंगाक प्रति श्रद्धा-भक्ति आ आस्था छल ओहो कमए लगलै। कथा-पुराण आ साधु-संतक प्रवचनमे गंगा-महात्म पढ़ने-सुनने रहए ओ सॉंच छी की झूठ तइ ओझरीमे ओझरा गेल। तैयो चनरदेव मनमे सवुर बान्हि सोचए- जेतए चारू जुगमे लोक गंगा-महात्मकेँ मानैत आएल छथि, तेतए हमरा मानने वा नइ मानने की हएत। एतेक लोक जे गंगा नहाइए, की ओइ पुण्य-प्रतापे सभ स्वर्ग जाइए? आ जे गंगा नइ नहा पबैए ओ की नरक जाइए? तखन तँ केहनो कुकर्म करि लिअ आ गंगा नहा स्वर्ग चलि जाउ, सुकर्मक कोनो जरूरते नइ! तही बिचमे सुगापट्टीवालीकेँ बड़बड़ैनी धेलकै। अकचकाइत वीरपुरवालीकेँ कहलक- “दीदी, एगो बात फरिछा कऽ बुझा दथु। जखन गंगा अपने एते घिनाएल अछि आ लोक सभ नहा कऽ अपन पाप धोइए तँ एतेक गंदकी आ पापकेँ गंगा मैया केतए जमा करैए?” वीरपुरवाली काकी सुगापट्टीवालीकेँ समझबैत कहलखिन- “देखै नइ छहक गंगा मैयाकेँ कोनो बखारी आकि गोदाम छै जे ओइमे जमा राखत।” सुगापट्टीवाली- “तखन गंगाजी अपना पेटमे सोन्हि–मोइन बना रखैत हेती।” तैपर वीरपुरवाली बजली- “हे हइ, एना अनरगल किए बजै छहक! गंगा मैया एहेन नइ छथि जे एतेक रास पाप आ गंदकीकेँ जमा करत। कथीले करत आ किए जमा करत। पाप आ गंदा तँ लोक करैए। जे करत से ने भोगत। ओ अपने ने पाप करैए आ ने गंदा। सभटा लोककेँ बॉंटि दइए।” सुगापट्टीवाली- “से केना दीदी। एतेकालसँ छी, कहॉं किछु बँटैत देखै छी गंगाजीकेँ।” वीरपुरवाली काकी बजली- “हइ सुगापट्टीवाली, तोरा सनक सोझमतिया जनानी अहू जुगमे अछि से हम नइ बुझने छेलौं। एक गाममे जनमलह आ दोसर गाममे गिरथाइन बनल छहक से ओहिना। देखहक गंगा केना पाप आ गंदगीकेँ बँटै छथिन। जेते लोक गंगा नहा कऽ पाप धोइए ओ अपना-अपना मनक भरम दूर करैए। जखनि ओ डुबकी मारि डिब्बामे जल घरक खातिर भरैए, जइ जलसँ लोक तन-मन शुद्ध करैए तखने जेकर जे पाप केलहा रहै छै, तेकरा गंगा बॉंटि दइ छै।” बिच्चेमे कुपहावाली काकी आ बड़की भौजीकेँ विषयसँ भँसियाइत देखि सावित्री माए बजली- “बौआ चनरदेव, हम तँ कान पकड़ै छी एहेन करम जिनगीमे फेर कहियो ने करब। ई तँ देखौंस केलौं। असल गंगा तँ सबहक मनेमे बसैए। जे कियो देखबे ने करैए। कहबीओ छै, मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा। रहल गंगा नहा कऽ पाप धोअब आ पुण्य लूटब। तँ जखन पाप करबै ने करब तँ पुण्यक कोन काज अछि। जखन करमकेँ धरम बूझि करब तखन अधरम किए हएत। जे जेहेन करत तेकर फलो तँ तेहने ओकरा भोगए पड़त। हमरा बुझने ई सभटा मनक भरम छिऐ।” गप-सप्पक बीच दुपहरिया बितल कि तखने घर जाइए गड़ी धुधुआइत आबि गेल। सभ कियो गड़ीपर चढ़ि विदा भेल। टिशनसँ चलि जखन गामक सीमा कात आएल तखने सभ कियो तीन-तीन बेर गंगाजी केँ गोड़ लागि बाजल जे एहेन दिन नइ करिहह जे दोसर बेर आब कहियो गंगा नहाइले जाए पड़ए। कान पकड़ि-पकड़ि जिनगी भरिक लेल गंगाजी सँ माफी मांगि लेकक। राम विलास साहु लक्ष्मिनियॉं, मधुबनी। डोमक आगि जेठरति कक्काक मृत्यु सए बर्खक ऊपरे उमेरमे भेलनि। सौंसे गाममे सोग पसरि गेल। गाममे दलमलित हुअ लगलै जे आइ गामक मालिकक अन्त भेने एकटा युगक अन्त भऽ गेल। जेठरति कक्काक धाक जहिना गामक मानैत तहिना आदरो करैत। मुइला पछाति समुच्चा गामक लोक दाह संस्कारमे पँचकठिया दइले पहुँचल छल। भीड़ बहुत मुदा अखनि धरि अछियामे अागि ने पड़ल छल। लोक सभ थाहा-थाही ठाढ़, कियो बैसल कनफुसकी करैत आ किछु लोक निगुन भजन गबैत रहए- “हंसा उड़ि गेलै भम्हरा बनि हे...।” “सभ दिन होत ने एक समाना...।” कियो ई गबैत- “आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर...।” भिनसरसँ दुपहर भेल जाइत रहै। अखनि धरि लोक काेन आशामे समए बीतबै छल, तेकर कोनो था-पता नहि छल। जखन बैसल-बैसल लोकक मन अगुताए लगलै, भूखसँ पेटमे बिलाइ कुदऽ लगलै। तखनि जा कऽ विलमक कारणक पता लगबऽ लगल। मलिकपनाबला बात, के हिम्मत करत जे आगू भऽ पुछैले जाएत। अपनामे गुदुर-फुसुर करैत रहए। कियो आगू जेबे ने करैत रहए। तखने रौदी बाबा पहुँचला। पहुँचिते बजला- “अखनि तक अछियामे आगियो ने पड़ल। किए एते अबेर भेल। धिया-पुता सभ भूखे लहालोठ होइए!” सभ कियो रौदी बाबाकेँ कहलकनि- “अहाँ बुढ़ो-पुरान छी आ गामक अनुभवी सेहो छी, से कनी झबदे पता करियनु जे...।” अगुताएल रौदी बाबा लोकक बीचे-बीच टाटीपर राखल मुर्दा लग पहुँचला। ओइ ठाम जेठरति कक्काक परिवारक सभ लोकक संग पहुँचल कुटुम सभ अपनामे कहा-सुनी करै छल...। लगमे जा रौदी बाबा जोरसँ पुछलखिन- “यौ, अहाँ सभ लाशकेँ जरबैले एलौं हेन आकि गंगा सेबैले?” जेठरति कक्काक जेठका बेटा- रूपचन्द- कहलकनि- “दादा, सभ किछु तैयार अए, मुदा बौकू डोमक इन्तजारमे छी।” रौदी बाबा पुछलखिन- “से किए?” रूपचन्द- “लोक सभ कहैए जे असमसान घाटपर डोमक हाथक आगि कीनि लाशकेँ जरौलासँ मौक्षक प्राप्ति होइ छै तँए कनी बौकू डोमक बाट तकै छी।” रौदी बाबा बजला- “अहीले एते अबैर होइए आकि आरो कोनो बात छह? गाममे डोम, सभ कियो भोरसँ आएल अछि ओकरा कानमे खबरियो ने छै।” रूपचन्द- “नइ हौ काका, काल्हिए बौकू समधियौना गेल रहए, खबरि भऽ गेल छै। ओ जखने-ने-तखने पहुँचैएबला अछि।” रूपचन्दक बात सुनिते लगमे बैसल शिवलाल काकाकेँ अनरगल लगलनि। तड़बाक लहरि मगज धरि पहुँच गेलनि। जोरसँ बाजए लगला- “गामक एतेक बड़-बुजुर्ग जे आएल छथि ओ बुड़िबके छथि की! जखनि एते बुझै छहक जे डोमक हाथक आगि कीनिके ओइ आगिसँ मुखागिनी करब तँ पहिने डोमकेँ बजा लइतह। पछाति लोक सभकेँ बजैबतह। भिनसरसँ दुपहर भऽ गेल, सभ लोक भूखे-पियासे लहालोठ भऽ रहल अछि आ बौकू डोमक अखनेा कोनो था-पता नइ छह!” कनीकाल रहि फेर बजला- “आइ-काल्हिक नव-नौतार सबहक नव-नव कानून। जखनि जे मनमे फुड़ैए सहए करऽ लगैए! नव-नव जोगीकेँ भरि देह टीक्का!” शिवलाल कक्काक तमसाइत बोल सुनिते लग अबऽ लगल। सभकेँ होइ कखनि झबदे आगि पड़ै जे लोक पँचकठिया फेकि नहा-सोनाइले चलि जाएत। मुदा अखनो धरि बौकू डोम नहि पहुँचल। सीताराम दास लग आबि बाजल- “हौ रूपचन्द मालिक, कनीले एते लेट भऽ रहल छै हौ?” बाजि सीताराम मने-मन सोचए लगल। जखनि बुझै छिऐ जे डोम समाजक लेल एते पैघ लोक छै, बिना डोमक आगिसँ लोककेँ मरलोमे मुक्ति नइ भेटै छै, तखन डोमकेँ एते निच्चा किए बुझै छिऐ...। जखनि कि जीबैतमे सभ डोमसँ छूबाइ छी, आ मुइलापर पैघ बुझै छी...। डोमो तँ अही समाजक लोक छी,मुदा गामसँ हटि कऽ वेचारा सभ गाममे बसैए। सभ कियो ओकरा अछोप बूझि आइ धरि लग बैसि खेनाइ तँ दूर जे बातो ने करैए। एक लग्गा फटिकेसँ पुछ-पाछ करैए...। ऐबेरमे कोन असोगरज लगि जाइए...। रंग-बिरंगक बात सीताराम कक्काक मनमे नचऽ लगलनि। मिथिलाक सामाजिक पद्धतिक बनाबटपर धियान गेलनि। जाइते मन जेना आरो चौरफ वौअए लगलनि। बेवस्थाक जलियाएल रूप सभ सोझा अबऽ लगलनि। किछु बाजि नइ रहल छला। तखने बौकू डोम हहाएल-फुहाएल आएल। बौकू डोमसँ कीनल जाएत तेकर मोल-जोल हुअ लगल। पुछलापर बौकू बाजल- “जेठरति काका गामेक मालिक छला तँ हमरो मालिक। हमरा कोनो लोभ-लालच नइ अछि मुदा दान-दछिनामे जे देब से खुशी-शुखी दऽ दिअ।” रूपचन्द एकटा चानीक सिक्का दऽ आगि कीनऽ आगू बढ़ला। तखने शिवलाल काका, रौदी बाबा आ सीताराम दास अपनामे विचार बजला- “ई उचित नइ भेलऽ रूपचन्द। जेकरा खातिर भोरसँ दुपहर भऽ गेल, असमसान घाटपर लाश पड़ल अछि, तेकरा अहाँ एगो चानीक सिक्का...! जेठरति काका गामक मालिक छला, ओ एते अरजि देने छथि जे तीनो पीढ़ीमे नइ सधत। अपनो समांग बूझि बौकूकेँ जे देबै से दियौ, तखन ने बौकूओ अप्पन बूझत।” सएह भेल। मुखागिनी भेला पछाति सभ काजक अन्त करैत सभ कियो आगूए तकैत विदा भेल। निगुन गौनिहारकेँ जेना बिसवास आरो बढ़ि गेलनि। पुन: गाबए लगला- “सभ दिन होत ने एक समाना....।” स्वर्गक सुख कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल। अगल-बगलमे मुसहर सभ सेहो काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल। कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजरि गेल। माघ मासक समए। वस्त्रक अभावसँ जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल। जखने घूरमे आगि जरेलक आकि बौकूक बेटा-बेटा सटि कऽ बैसि आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली खोपड़ीसँ बकड़ी निकालैत जोरिसँ बजली- “रातियोँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्चा की खाएत। भूखसँ तरपि की बाल-बच्चाक संगे कोसीमे डुमि मरब।” बौकू सदाय बाजल- “भोरे-भोर एहेन अशुभ बात नइ बाजू। शीतलहरी भरि कोनो तरहेँ परान बँचाउ। परान बँचत तँ लाखो उपए करब। कनीको समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगाड़ करब। एक तँ कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि।” शीतलहरीक कोनो ठेकान नइ अछि मुदा भूख तँ समैपर लगिए जाइए। बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक। भिनसर होइते जोर-जोरसँ खाइले मॉंगए लगल। बलबावाली पड़ोसीसँ दू सेर पँचि आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक। अपनो दुनू परानी खेलक। ऊपरसँ पानि पीब-पीब भूख मेटेलक। कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल। बलबावाली पतिकेँ कहलकनि- “दू दिनसँ सुखल रोटी आ अल्हुआ खा कऽ कोनो तरहेँ दिन कटलौं मुदा आइ भातक कोनो जोगाड़ करू।” बौकू जाड़क कोनो परवाह नइ करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल- “सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब।” साबीकेसँ परसा चौरी सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धानक नामी अछि। चौरी पहुँचिते बौकू बेटा-बेटीकेँ कहलक- “तूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी।” दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक। बेटा-बेटी घोंघी-डोका छिट्टामे उठौलक। जखन घर चलैले तैयार भेल तँ बौकूक पत्नी बजली- “सुतैले एकेटा गोनरि अछि। किछ नार सेहो नेने चलू। बिछौना मोटसँ देबै। ” नार बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक काछुकेँ देखलक। देखिते बौकू काछुकेँ उनटौलक। काछुकेँ उनटा देने भागल नइ होइ छै। उठा कऽ तौनीमे बान्हलक। धान आ नार पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घोंघी-काछु लऽ बेटा-बेटीकेँ संग केने विदा भेल। घर पहुँचिते धान रौदमे पसारक। पड़ासीसँ उखरि-समाठ आनि धान-कुटि कऽ चाउर तैयार केलक। कौछक मासु बना रान्हलक। दोसर बर्तनमे भात रान्हलक। सभ कोइ संगे खेनाइ खाइले बैसल। जाड़क समैमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल भात तेलगर आ स्वादिष्ट होइते अछि। तैपर सँ कौछक मासु अपने तेलसँ ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो तेलसँ तर-बतर भऽ गेल। बौकू बमरोटिया हाथसँ भात-मासु बँटबो करैत आ खेबो करए। खेनाइ अधपेटा भेल तँ पानि पीब पियास मिझा नहमर सॉंस लैत बाजल- “एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए। राजा-महराजाकेँ नशीव नइ होइ छै। ई खेनाइ देखिते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकेँ सेहो मन ललिचा जेतइ।” भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक। बलबावाली अरामसँ सुतैले ठेहुन भरि नार बिछौलक आ बाल-बच्चाक संग ओइपर सुतल। आ ऊपरसँ गोनरि ओढ़ि लेलक। कनीकालक पछाति सबहक देह गरमा गेलै। बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली- “औझका मेहनत साफल भेल। एहेन बिकट समैमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल।” नीक अवसर देख बौकू बाजल- “ई छी स्वर्ग सुख। एहेन सुख रजो-रजवारकेँ सुन्दर महल आ सजल पलंगपर नइ भेटैए। अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्द छै आ बीचमे बौकूक परिवार अरामसँ सुतल छै। नइ कोनो डर-भर छै आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़ै छै।” ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल- ठूठ गाछ (उपन्यास) 1. साँझक बढ़ैत सियाही अन्हराए लगल, जेना-जेना सियाही करियाएल जाइत तेना-तेना दिनक इजोत कमए लगल। सड़कसँ बीघा पचासे हटि बाधमे एकटा गाछ। इजोतमे गाछक सभ सिरखार रस्तेपर सँ चलनिहार देखैत मुदा साँझक पछाइत, माने जेना-जेना अन्हार पसरैत जाए तेना-तेना गाछोक रूप बदलऽ लगइ। पहिल साँझ सौंसे गाछक पात आँगनक बिछान जकाँ बिछाएल बूझि पड़ैत मुदा कनियेँ सियाही बढ़ने पातक पता नइ रहैत संगे गाछक डारियो अन्हारमे हेरा ठूठ जकाँ किछु समए देख पड़ैत पछाइत ओहो हेरा जाइत। झंझारपुरसँ धीरेन्द्र अबैत रहैथ, रस्तासँ कनी हटि प्रोफेसर रामकृष्ण बाबूक घर छैन। घरक पछुऐतपर नजैर पड़िते नबे-एकानबे बर्खक रामकृष्ण बाबूपर गेलैन जे आइ ठूठ गाछ जकाँ भऽ गेला अछि। 1925 इस्वीमे रामकृष्ण बाबूक जन्म ओहन परिवारमे भेलैन जे परिवार राज-परिवारसँ जुड़ल जमीन्दारक रूपमे छल। देशमे अजादीक लड़ाइ[1] पसैर धाराक रूपमे प्रवाहित हुअ लगल, किसानक देश, गामक देश भारत। भारतक मूल पूजी खेत, जैपर देश ठाढ़ अछि। गुलामीक हजारो बर्खक इतिहास ऐठामक गाम आ गामक पूजीकेँ पाछू धकेलैत पछुएने रहल। जइसँ गमैया जिनगी टुटैत-टुटैत एतेक टुटि गेल अछि जइसँ चीन-पहचीन मेटाएल जा रहल अछि। प्रगतिशील विचारक सभ मञ्चपर आबि चुकल छला। ओ सभ जमीनपर एला जे देशक मूल पूजी–माने किसानक देश, गामक देश–गाम छी तँए बिना गामक विकास भेने देशक विकास सम्भव नइ। गाम रज-रजबारसँ लऽ कऽ जर-जमीनदारक संग रूढ़िसँ सेहो जकैड़ गेल अछि, ओ सुधरने बिना गामक सुधार सम्भव नै। जमीनक प्रश्न उठने देशमे पसरल रज-रजबार आ जर-जमीनदारक बीच खलबली उठल। जमीन आ जमीन्दारीक खरीद-बिकरी संग उधार भेटने जमीनदारक संख्यामे बढ़तियो भेल आ घटबियो भेल। ओना, गाम-गामक लोकक दशा एहेन भऽ गेल जे उपास करैले कोनो पावैनक प्रतीक्षा नै रहल। जँ कोनो गाम हजार घरक अछि तँ नअ सएसँ ऊपरे परिवारकेँ अपन घराड़ियो नै। मनुख तँ केतौ घरेमे रहत। ओना तइसँ किछु दिन पहिने रेण्ट-मुक्त बास भूमि भऽ चुकल छल, मुदा हजारो बर्खक गुलामीक शिकार लोककेँ पड़ाइत-पड़ाइत कोनो कर्म बाँकी नै रहि चुकल छल। केकरो कोनो गाममे घराड़ी छल, मुदा पेटक दुआरे पड़ा दोसर गाम बसल तँए ओ फेर बिनु घराड़ियेक होइत रहल। जखन अधिवेशन सभमे आजादीक वृहद आकारक अवाज उठल तखन रजो-रजबार आ जरो-जमीन्दारक पेटक पानि डोललैन। जइसँ पसरल खेतक लत्तीकेँ समटऽ लगला। ओना गामो-गामक लोकक आचार-विचारमे किछु-ने-किछु अन्तर होइते छै, जे सोभाविको अछि। बौद्धिक स्तरक हिसाबसँ विचारो आ काजोक स्तर बदलै छै। प्रोफेसर रामकृष्ण बाबूक पिता गोरख बाबू चारि भॉंइक बीच जेठ, तँए जहिना माता-पिताक सिनेह तहिना भाए सबहक आदर। जइसँ सुसम्पन्न परिवारक जे गुण-धर्म होइ छै तइसँ सम्पन्न परिवार। आगत-भागतसँ लऽ कऽ गीत-संगीत, साहित्यिक चर्चासँ मञ्च जकाँ सजल परिवार। संस्कारी परिवारमे आने काज[2] जकाँ पढ़ाइयो-लिखाइ। जइसँ स्कूल जाइ जोकर जखने रामकृष्ण भेला कि स्कूलक बाट पकैड़ लेलैन। गामक स्कूलसँ हाइ स्कूल तक रामकृष्णक जिनगीमे कोनो हवा-विहाड़ि नइ लगलैन। बच्चेसँ जे नीक रिजल्ट होइत आबि रहल छेलैन ओ मैट्रिक तक बरकरारे रहलैन। चालीस इस्वीक पछाइत अजादीक लहैर जोर पकैड़ नेने छल। तेजीसँ उथल-पुथल हुअ लगल। जेना आसमान फाटि जाइ छै तहिना रामकृष्णोक परिवारमे भेलैन। चारू भॉंइक बीच भिनौज भेने, परिवारक सम्पैत चारि भागमे बँटेने अखन धरिक रचल-बसल परिवार एकेबेर ढनमनाएल। खेत-पथारक बिकरी परिवारमे बढ़ल। ओना परिवारक अखन धरिक जे हित-अपेक्षित, कुटुम-परिवार, सर-समाजक जे सम्बन्ध रहलैन ओ खर्च तँ ओहिना रहलैन मुदा आमदनीमे धक्का लगबे केलैन। किछु दिनक पछाइत, माने जखन रामकृष्णकेँ कौलेजमे प्रवेश केला साले भरि भेलैन कि पिता मरि गेलखिन। अपन भाए-बहिनक बीच रामकृष्ण सभसँ जेठ रहबे करैथ। पिताकेँ मुइने परिवारक बोझ माथपर आबि गेलैन। अपनासँ छोट पॉंचो भाए-बहिनक पढ़ौनाइ-लिखौनाइसँ लऽ कऽ विधवा माइक भार सेहो पड़लैन। कहुना-कहुना आई. ए. पास कऽ लेलैन। खेत-पथार रहितो रामकृष्णकेँ ने खेती करैक लूरि आ ने इच्छा। होइतो अहिना छै जे नीक विद्यार्थीक मनमे सदैत यएह रहैए जे केतौ शिक्षक बनि जीवन-जापन करी। मुदा शिक्षकक खगता स्कूल-कौलेजमे रहत तखने ने हएत। से तँ गनल कुटिया आ नापल झोर जकाँ स्कूल-कौलेज! केतौ खाली नै! मुदा इलाको तँ सभ रंगक अछि। कोनो कोसीक उपद्रवी क्षेत्र अछि तँ कोनो भुतही-कमलाक। ओना जइ इलाकामे रामकृष्णक घर छैन ओ धारक उपद्रवसँ सुरक्षित अछि। अपन इलाका छोड़ि रामकृष्ण कोसी क्षेत्रक हाइ स्कूलमे शिक्षक बनि जिनगीक शुरूआत केलैन। हाइ स्कूलक शिक्षक सभकेँ ओहन दरमहो नहियेँ भेटै छेलैन। जे परिवारकेँ हाइ-फाइमे रखितैथ। ओना ई जरूर भेल जे टुटैत-टुटैत परिवार एक सीमापर आबि अँटैक गेलैन। जेकरा रामकृष्ण बुझलैन। जइसँ आमदनीक बीच परिवारकेँ चलबैक विचार सोचि लेलैन। बाहर रहने बाहरक खर्च हेबे करत, संगे गामोक परिवारक भार तँ ऐछे। श्रवण कुमार जकाँ रामकृष्ण परिवारक बेटा बनि भार अपन कन्हापर उठा लेलैन। रेलगाड़ीक सुविधा रहने चारि-पॉंच घण्टामे गाम पहुँच जाइ छला,जइसँ अठबारे शनि-रबिकेँ आबा-जाही स्कूल आ गामक बीच रखने छला। ओना शिक्षा-बेवस्थामे सेहो जुग परिवर्तन होइए मुदा केहेन परिवर्तन होइए ऐपर तँ सभकेँ नजैर रखऽ पड़तैन। नजैरक माने, कोन मुहेँ आकि केकरा दिस ओ लत भेल। मुदा से जइ जुगक उपज रामकृष्ण छला ओ समयानुकूल छेलैन। शिक्षा पद्धतिमे अखुनका विद्रूपता नइ आएल छल। ग्रामीण परिवेशमे चाहो-पानक चलैन अखुनका जकाँ नइ छल। ओना पानक प्रशस्ति मिथिलांचलमे अदौसँ रहल मुदा आम-जनक बीच समटा ओ विशेष, माने खास-खास उत्सवमे अँटैक गेल छल। ओना एकटा प्रश्न तँ उठिते अछि जे आधुनिक वैज्ञानिक परिवेशमे पानक महत् की अछि। जेहेन परिवारक रामकृष्ण बाबू छला ओइ परिवारमे सभ कथुक चलैन छेलैन। मुदा परिवारसँ हटल रहने अपन जीवनकेँ साँचामे ढालैक तँ अवसर भेटबे केलैन। मौकाकेँ लाभमे बदैल रामकृष्ण अपन जिनगीकेँ अपना ढंगे निरमाएब शुरू केलैन। एक तँ ओहिना छोट-भाए बहिनक बीच एहेन विचार अखनो तँ गाम-परिवारमे ऐछे जे मते-पिता नइ अपनो भाए-बहिन आ समाजोक भाए-बहिनक बीच बेवस्थित रूपमे सम्बन्ध ऐछे जे बेसीमे नइ तँ कमोमे जरूर चलि रहल अछि। तैसंग विधवा माइक जिनगी परिवारक जिनगीकेँ सात्विकता दिस बढ़बैत रहलैन। भूखे सहब आ कोनो संकल्प-व्रते सहब, दुनू सहबे भेल मुदा दुनूमे अन्तरो तँ ऐछे। एक सहब भेल भरलपर आ दोसर भेल जरलपर, जइसँ ईहो तँ हेबे करत जे भरलकेँ पाचक हएत आ जरलकेँ घातक! घातक ई हएत जे हाड़-मांसक संग हड्डियो सुखाएत! आने-आन मनुख जकाँ रामकृष्णक जिनगीकेँ कहियौन आकि दुनियाँकेँ, बीचमे आबि ठाढ़ भऽ गेल रहैथ। विचारक धारमे अपना बुधिये रामकृष्ण अपनाकेँ जुड़शीतलक माल-जाल जकाँ छोर पकैड़ हेलौलेन। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी, बहुरंगी। केतौ बालु भरल अछि तँ केतौ सोना, केतौ पाथर भरल अछि तँ केतौ बोन-झार,केतौ पानि भरल अछि तँ केतौ माटि...। माटियो तँ माइटे छी, कोनो उस्सर अछि तँ कोनो केशौर केसैर उपजबैक शक्ति रखने अछि। अथाह दुनियाँक थाह पकड़ब असम्भव नइ तँ कठिन तँ ऐछे। दसो दिशामे दुनियाँ बँटाइत बँटाएल अछि, तहूमे तेते कोण-काण बनि गेल अछि, जँ किछु डेग केम्हरो उठबौ चाहब तँ कोनो कोणेमे कोणिआ जाएब आ कोणियेला पछाइत केमहर मुहेँ चलि जाएब, से ठेकान करब अथाह नइ तँ अगम तँ ऐछे। जहिना अगमो पानिमे हेलिनिहार सभ रंगक होइ छैथ, कियो एहनो होइ छैथ जे अगम बूझि, माने माटिक ऊपर एते पानि अछि जइमे डुबि जाएब। पानिमे डूमने हवाक प्रवेश रूकै छै तँए बिनु हवे अपनो हवे जकाँ उड़ि जाएब! मुदा तँए कि एहेन हेलिनिहार नइ छैथ जे समुद्र सन पानिमे हेलै छैथ जइमे माटिक ठेकाने ने छै। दुनियाँक बीचमे ठाढ़ रामकृष्ण अप्पन दुनियाँ दिस नजैर देलैन। अपन दुनियाँ तँ वएह ने भेल जइमे रहैक अछि। एकरो ने दसो दिशा छै आ सैयो कोणो-काण छै। अपन जिनगीकेँ थाह पबिते रामकृष्णक मनमे तोष-संतोष जगलैन। जगलैन ई जे मनुखो तँ मनुखे छी जे कारखानाक आगिक चिमनियोँ लग जिनगी बितबैए आ साइबेरियाक काइ-लीचेन गाछो तर। तही बीचमे ने हमहूँ केतौ छी...। अपना जिनगीक आड़ि-धुरकेँ रामकृष्ण बिटिया लेलैन। बिटियैबते भक खुजलैन- सभ किछु अपने करए पड़त। अहीमे धरम-करम सभ नुकाएल अछि। जँ देह-हाथ नइ चलाएब, उपार्जन नइ करब तँ परिवारक खेबा-खर्चा केतएसँ औत, धिया-पुताकेँ पढ़ाएब-लिखाएब केना...। अपना जिनगी-ले लोककेँ अपने उपैत करए पड़ै छै, हमरो करैक अछि। दोहरी संकल्पक संग रामकृष्ण शिक्षकक जिनगी शुरू केलैन। पहिल संकल्प केलैन जे अपनो प्रोफेसर बनैक अछि आ परिवारमे छोट-भाए-बहिनक निमरजना ओते तँ करबे अछि जेते पिताजीक समैमे भेलैन। तइसँ जेते अगुआ करब वएह ने अपन सृजन हएत। ओना आर्थिक दृष्टिये दुनू-बापूतक जिनगीमे अकास-पतालक अन्तर आबि गेल छेलैन। पिताक जिनगी मझोलका जमीन्दारक रहलैन जखन कि रामकृष्णक जिनगी ओइसँ बदैल एक साधारण शिक्षकक भऽ गेलैन। संकल्पकेँ खण्डित करैत, माने छोट-छोट टुकड़ी बना रामकृष्ण अपन मन असथिर केलैन जे पिताजी जेते पढ़ेलैन, तेते छोट-भाइक प्रति अपनो दायित्व बनैए, ओना तइसँ कम-बेसीमे पढ़निहारोक विचार तँ ऐबते छै। जँ नइ पढ़ऽ चाहत तँ परिवारक बीच, समाजक बीच,किए ने अपन प्रायश्चित करा लेब। जँ पढ़निहार रहत तँ अपन ओकाति भरि सहयोग करब दायित्वक संग कर्तव्यो तँ बनिते अछि। ऐठाम आबि रामकृष्णक विचार ठमैक गेलैन। किछु समए ठमकला पछाइत रामकृष्णक नजैर अपनापर पड़लैन। परिवारक खर्चमे सिर्फ भोजने-वस्त्र आ अवासेटा नइ अछि। लिखब-पढ़ब आ बेर-कुबेरमे दवायो-दारूक जरूरत तँ पड़िते अछि। ओना विद्यालयक संग ट्यूशन करब, तइसँ किछु आमदनी बढ़त मुदा घटो तँ लगबे करत ने जे अपन पढ़ैक समए वेरबाद भऽ जाएत। जखन समैए ने बँचत तखन आगू बढ़ि केना सकब। बाल-बोधक खेल पढ़ब-लिखन नइ ने छी, ओ जिनगीक साधना छी जेकरा साधने बिना जिनगीकेँ आगू मुहेँ बढ़ाएब कठिन अछि। ओना साधनो केते रंगक होइए। मुदा से सभ नइ, जेते साधक जरूरत रहए आ साधैक साधन रहए, बस तेतबे। रामकृष्णकेँ जेना भक् खुजलैन। भक् खुजिते नजैर मान-इमान आ सम्मानपर गेलैन। ओहो तँ बीज-रूपमे अँकुर, गाछ बनि जिनगीकेँ गछाड़ैत फुनगी धरि पहुँच जाइए। ओतै जा कऽ ने गाछोक फूल फुला-फुला अकास दिस तकैत तरेगन, सप्तऋृर्षि गनैए आ तहिना ने मानो-इमान इज्जत बनि इजोरिया राति जकाँ भगवतीक आराधनाक मुहूर्त बनैए...। रामकृष्णक मन अपना दिस घुमलैन। घुमिते उपकलैन जे जैठाम जिनगीमे आबि अँटैक गेल छी तैठाम इज्जत-इमान की भेल आ तेकरा केना बँचा कऽ रखि सकै छी..? सौनक मेघ जकाँ मन गुम्हरलैन। गुम्हरलैन ई जे जइ काजक भार माथपर आएल अछि ओकरो जँ नीक जकाँ, माने इमानदारी पूर्वक निमरजना करब, तखन तँ...। जखन कि तहीसँ ने इमानो-इज्जत चलत। जइ बच्चाकेँ पढ़बैक भार कन्हापर आएल अछि, तहूमे लोअर प्राइमरी स्कूल आकि मिडिल स्कूलमे नै छी, हाइ स्कूलमे छी, ऐठामसँ निकलला पछाइत कियो आगूओ पढ़ैले कौलेज जाएत आ केते पढ़ाइ छोड़ि अपन जिनगी बनबैक किरियामे लागत। एहेन धरतीपर जँ अपना जिनगीमे जीवन्तता नइ रहत तखन केतौ-ने-केतौ किछु-ने-किछु कमी औत। मुदा ओ जीवन्तता औत केना? रामकृष्ण अपन आमदनी आ अपना काजकेँ समैमे बान्हि चलब मनमे रोपि लेलैन। समए निसचित अछि, आमदनी निसचित अछि जँ एकरा काजक निसचितता नइ देब तखन पछड़ैक सम्भावना बनियेँ जाइए। आमदनीक खर्च अपन जिनगीक संग परिवारक जिनगी चलाएब अछि। अपन जिनगीक खर्च जे अछि ओइमे भोजन प्रमुख अछि। जँ हम बजार दिस जाइ छी तँ निसचित रूपे अधिक खर्च हएत, मुदा जँ ओकरा अपन दिनचर्यामे लऽ आनब तँ अदहोसँ बेसीक बँचत हएत। रामकृष्णक मन मानि गेलैन। आगू पढ़ैपर नजैर गेलैन। भाइयो-बहिन परिवारमे रहि मैट्रिक तक तँ घरेपर सँ पढ़ि सकैए। अपन जे हिस्साक जमीन अछि, ओकरो उपजबैक परियास करब,नइ जँ तइ सभसँ खर्च नइ पुड़त तँ थोड़-थाड़ बेचियो लेब। मुदा जँ खर्चक दुआरे अपने आकि परिवारेक बाल-बोधकेँ जिनगी बाधिक केने रहब तखन तँ जिनगी कोणाह बनि जाएत। बी.ए.मे रामकृष्ण नाओं लिखा, छह मासक पछाइत कौलेज छोड़ने रहैथ, किताब सभ कीनि नेने रहैथ। सोझे बैचमे फारम भरि बी.ए. कऽ लेलैन। बी.ए. केला पछाइत विद्यालयमे स्तरो बढ़लैन आ दरमहोक बढ़ोत्तरी भेलैन। तैसंग नीक रिजल्ट पढ़ैक मन सेहो जगा देने रहैन। प्राइवेट विद्यार्थीकेँ युनिवर्सिटीसँ परीक्षा-ले परमीशन लिअ पड़ै छै। मनमे अराधि लेलैन जे जखने अवसर भेटत तखने एम.ए. कऽ लेब। मुदा ओइले अखनेसँ कनखड़ऽ पड़त। ◌ शब्द संख्या : 1790, तिथि : 25 अक्टूबर 2015 2. विचार रूपमे रामकृष्णक मनमे रोपा गेल रहैन जे एम.ए. करब। मुदा घड़ी-मिनट दिन-मास गुजैर गेल, अखनो धरि रामकृष्णक मनमे काज रूपमे नइ रोपाएल छेलैन। ओना विद्यालयमे सेहो साहित्येसँ जुड़ल रहला मुदा ओ पूर्वपीठिका भेल। तेकर कारण रहै जे सभ दिन साहित्य विषय दिस रहला। ओना साहित्योमे गणित नइ अछि सेहो बात नइ, गणित तँ ओहूमे अछि मुदा ओ नमहर अछि, तँए छोट जिनगीमे ढीलढीला भऽ जाइए। जिनगीक लेल तँ जरूरत अछि अर्थशास्त्रक संग ओकर स्टैटिक्सकेँ बुझब, तइमे हजारो कोस दूर हटल रामकृष्ण, तँए समए बीतए लगलैन मुदा निर्णएपर पहुँचिये ने पाबि रहल छला। केतौ बाजब नीक नइ, एकर अनेको कारण अछि मुदा से नइ, रामकृष्णक मनमे उठलैन जे असम्भव काजकेँ सम्भव बनबैक प्रक्रिया छी, तँए काजक बिसवासू दू दिस बढ़त। एक दिस काजक लेल जिनगी भेल आ दोसर जिनगी-ले काज भेल। मुदा पुरुखकेँ तँ अपन पुरुषत्वोमे बिसवास करबाके चाही। मुदा नजैरमे जेना नचि गेलैन- ‘कंगनक लेल आरसी की आ पढ़निहार लेल फारसी की।’ रामकृष्णक मनमे जेना जेठुआ नमी जगलैन। जेठुआ नमीक माने भेल, जमीनमे ठण्ढपन आएब। मुदा से नै नमी तँ जमीनमे सभ दिन रहिते अछि, भलेँ कहियो जल-प्लाविते भऽ जाए, कहियो कण्ठे सुखए लगए। मुदा सृजन शक्तिमे कमी-बेसी रहै छै। जइमे जेठुआ नमी जे समुद्र-धारसँ लऽ कऽ जमीन धरिमे बेसिया जाइए। माने समुद्रोमे माछ अण्डा छोड़ैए आ जमीनोमे रौदमे तपि बीआ आरो सक्कत भऽ हाल पबिते धरतीकेँ फाड़ि कलश उठौने दुनियाँक बीच अपन पहचान बनबैत अपना वंशो आ अपनो नामकरण करैए। जँ से नइ करैत तँ सभ धान धाने छी आ सभ मान माने छी, जकाँ ने भऽ जाएत...। जेठुए हाल जकाँ रामकृष्णक मनमे अपन जिनगीक गणित जगलैन- साहित्यो गणितसँ आ अर्थशास्त्रो गणितसँ फड़कैत बूझि पड़लैन। जेना कानमे किछु भेने कुकुऐ लगैए, आँखि मिड़मीड़ए लगैए, पीपनी फड़कए लगैए तहिना रामकृष्णोक मन फड़फड़ेलैन। फड़फड़ाइते दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि कागज-कलम उठा जिनगीक केलकुलेशन करए लगला। एक दिस सोझ बाट देखैथ जे आठ सए नम्बरक आठ विषय एम.ए.क कोर्समे अछि जइमे छह सएक परीछा उतीर्ण भाइए गेल छी। मात्र दू सएक नम्बर दू विषयक झमेल अछि। मनमे चपचपी एलैन जे बढ़ि-बढ़ि ठमैक जाइन। ठमैक ऐ दुआरे जानि जे अपन बुझल बात माने ‘हाथी पियासल, घोड़ा पियासल, दल-दल पानि, थलथल वाणि पथपल मानि।’ रामकृष्णक आगूमे रकशाएल मन ऊकवाती नेने रस्तापर ठाढ़ भऽ दीवाली पावैनक ऊक जकाँ परीछा घड़ी..; परीछा घड़ी..; पढ़ैत रहैन। जइसँ रामकृष्ण ठमैक गेला। अही झीका-तीड़ीमे रामकृष्णक साल भरि समए निर्णए करैसँ पहिने चलि गेलैन। विद्यालयमे हेड मास्टर एम.ए. रहथिन, मुदा कुर्सियो तँ कुर्सी छी, ने धाके कहियो विचारैक बात सोचलैन आ ने कहियो उपकैरो कऽ हेडमास्टर साहैब जीवनक सम्बन्धमे पुछलकैन। ओना बेक्तिगत गुण आ पद प्रतिष्ठाक गुण दुनू दू भेल। नियमानुसार दुनूक पालन हेबा चाही मुदा ओकर तँ समए-स्थान निर्धारित अछि। खैर जे से...। सोचे रामकृष्ण हेडमास्टर साहैबसँ एम.ए. करैक गप नइ चलौलैन। पाछू उनैट तकैथ तँ सभ शिक्षक नव कि पुरान मुदा रहैथ तँ सभ आई.ए.-बी.ए. पासे। जैठाम आई. ए; बी.ए. पास तैठाम एम.ए. तँ भुताहि भेबे कएल। भुतही गाछीसँ आगू बढ़ि रामकृष्ण जखन विद्यार्थी दिस बढ़ैथ तँ देखैथ जे ई तँ भेल पूर्वपीठिका,माने बच्चाक ज्ञानभूमि! ऐठामसँ आगू बढ़ैत ने कियो एम.ए.क चोटीपर पहुँचैए आकि पहुँचत। मुदा ऐमे तँ चुम्बकक सम्बन्ध छै जे एक सिरा दोसरकेँ नचबैए। तेसर साँझ। कोसीक किनछेर, माने भेल धारक लगक जमीनपर देने जे चलैक रस्ता रहैए ओ। ओही रस्ता होइत रामकृष्ण टहलैत बहुत दूर चलि गेला। अपने पढ़ैक विचार मनकेँ दबने रहैन, इजोरिया पख रहबे करइ, सुर्ज अपन बोरिया-विस्तर समैट सुतैले चलि गेला मुदा ठहाका मारि इजोरिया अन्हारकेँ घेरैए ने दइ, अही धोपचटमे रामकृष्ण तीन कोस आगू धरि टहलैत गेलापर मनमे होश एलैन जे सौंझका समए छी, केते दूर चलि एलौं! घुमि कऽ आबि अपन ओसारक कुरसीपर बैसिते मनमे उठलैन, पहिने हाथ-पएर धोइ चाह बना पीब ली। पछाइत बैस विचारि लेब जे हमरा की करक चाही। विचारक दुइए पक्ष होइए। ‘हँ’ आ ‘नइ’। पछाइत‘हँ’ओमे हजारटा डारि छिटकैए आ ‘नहियोँ’मे। चाह पीला पछाइत मनमे चेनियत ऐबते अपन विचार–संकल्पक विचार, जे आइ हँ-निहँस कैये लेब–जेना पूर्वाक लहकीमे भँसिया पछिम दिस डोलि गेने आ धारक पानि जकाँ विचारोक लाट धेने दोसर विचार सेहो बहैत रहैए, तहिना लाटे-लाट साहित्यक धारमे रामकृष्ण फँसि गेला। आऽ हाऽ हाऽ! केहेन सुन्नर सुन्दरी अछि जे एक घड़ी आधो घड़ी, आधोमे पुन आध! मने-मने रामकृष्ण विस्मृत भऽ गेला। विस्मृत एहेन भेला जे जहिना घड़ी-घण्ट बजैत देवालयक मुहथैरपर ठाढ़ भऽ पूजाक शंख फूकैत होइत। मनमे हलचल उठलैन। मुदा लगले दोसर धुन ससैर कऽ आबि सवार भऽ गेलैन। ओ धुन छल- ‘आध जनम हम नीन गमाओल!’ दुनियाँ केतेटा आ जिनगी केतेटा..? तइले लोक अनेरे हाय-हाय किए करत? ओना हाथोक घड़ी रामकृष्ण रखने छैथ मुदा देवालोमे घण्टीबला-घड़ी रखनहि छैथ। होइतो अहिना छै जे केकरो घड़ी समए बतबै छै तँ कियो घड़ीकेँ समए बतबैए। यएह तँ भेल दुनियाँक खेल। कियो मिनट-पल समए पकैड़ नचैत तँ कियो कटल-खोंटल चान जकाँ जिनगी देख झुझुआइत! घड़ी बाजल, साढ़े आठ। रामकृष्णक भक् टुटलैन। भानसक समए भऽ गेल। हाथक घड़ीपर नजैर रखि पैछला समए (माने बैसैकालक समए) सँ मिलौलैन तँ डेढ़ घण्टा घण्टीए डोलबैमे चलि गेल। हाइ रे बा! नान्हिटा विचार करए बैसलौं, सेहो छुटिये गेल! आइक लेल जे काज अछि, आकि विचार अछि ओ औझुका भेल,काल्हि-ले काल्हि छै। तखन तँ काजे छुटि गेल। अच्छा! भानस करै बेर विचारि लेब। मुदा विचार आइये करैक अछि। सम्पन्न परिवारमे रामकृष्णक जन्म भेने गीत-नादक परिवार भेटले रहैन, जइसँ बच्चेसँ किछु-किछु साजोपर हाथ देने आ मीठ अवाज रहने अवाजोक साधना रहबे करैन। जे अखनो पछुऐबते छैन, जइसँ असगर रहने तबला-मजीराक हाथ तँ छुटि गेलैन मुदा हारमोनियम रखनहि छैथ। ओहो नियमित समए खाइते छैन। असगरे गौनिहार, असगरे बजौनिहार-सुनिनिहार, आन कियो ने! तखन..? चुल्हि लग बैसिते जेना मन फुड़फुड़ेलैन। फुड़फुड़ाइते पहिने निर्णैये कऽ लेलैन जे एम.ए. करब, प्रोफेसर बनब। काजक इच्छा तँ करैक शक्ति मंगै छै। से शक्ति रामकृष्ण संचित करैक दिशामे अखनेसँ भीड़ गेला। तेसर साल एम.ए.क परीछा दइक अछि। काल्हिये युनिवर्सिटीसँ सिलेवश आनि, आठो विषयक खण्डवाइज किताब सेहो कीनि लेब। किछु-किछु समैक कटौती सभ काजमे करैत दू घण्टा समए निकालि काजमे हाथ लगा देब। जिनगीक टपान टपैक दुर्ग बाटपर ठाढ़ भऽ रामकृष्ण चुल्हि लगसँ आगू देखऽ लगला। मनक संग देहोमे चुलबुली आबि गेलैन। समयानुकूल भोजन बना,भोजन करैत रामकृष्ण निर्णए केलैन जे ओछाइनपर निचेनसँ औरो नीक जकाँ विचारि लेब। ओछाइन सेरिया जखन ओछानिक सिरमापर मुड़ी खसौलैन कि धक्-दे विधवा माइक संग भाए-बहिनपर मन उड़ि गेलैन। दिनो-दिन माइक देहक दशा खसि रहल अछि! देहक दशा खसैक कारण दुइयेटा भऽ सकैए। देह आ दैहिक। ओना उमेरो पचास टपि गेल मुदा सएक नापमे तँ अधडरेर भेल, अखन किए देह खसतैन। साठिक बाद ने खसैक सम्भावना जगैए। ओना खाइ-पीबैमे कोनो तेहेन अभाव तँ नहियेँ हुअ दइ छिऐ, जेहेन हजारो-लाखो परिवारमे छै। नइ! जरूर मानसिक पीड़ासँ पीड़ित अछि। की एहेन उमेरमे जँ पति-विहीन लोक भऽ जाए, बाल-बच्चा छोट रहै ओहन लोकक इज्जत-आवरू एहेन समाजमे बँचि सकैए जेहेन समाज बनि गेल अछि आकि बनि रहल अछि आकि बनौल गेल अछि। की माए-बापक धर्म बाल-बच्चाक सेवा करब नइ छी? बहिन बिआहे जोकर भऽ गेल अछि, ओ तँ माइयेक सोझमे अछि, की ओकरा मनमे सन्ताप नइ जगैत हेतइ? रामकृष्णक हँसी-खुशीक मनक नीन पड़ा कऽ दूर भागि गेलैन। कछ-मछ करैत ओछाइनपर पड़ल माएपरसँ भाए-बहिनपर नजैर उतरलैन। दू-दूटा भाएकेँ कौलेजक खर्चा जुटाएब बाल-बोधक खेल नइ ने छी। मुदा ईहो तँ दायित्व बनियेँ जाइए किने जे जहुना अपने राम कृष्ण कौलेज मधुबनीमे पढ़लौं, तहुना तँ पढ़ा दिऐ। मुदा छोड़लो तँ नहियेँ जा सकैए। तखन तँ भेल अपन जिनगीक संग परिवारक जिनगीकेँ अपन कमाइमे अँटावेश करब। जे अँटावेश करए तँ अपने पड़त। ◌ शब्द संख्या : 1203, तिथि : 29 अक्टूबर 2015 3. अंगरेजी विषयमे रामकृष्ण एम.ए. कऽ लेलैन। जहिना मनमे एम.ए. केला पछाइत जगै छै, तहिना रामकृष्णोकेँ जगलैन। ओना एम.ए. केलासँ पूर्व आ पछातिक बीच स्कूलक अध्यापनमे अन्तर नै एलैन मुदा शिक्षको सबहक आ छात्रो-अभिभावकक बीच बेक्तित्वमे अन्तर आबिये गेलैन। 1940 इस्वीसँ 1960 इस्वीक बीच, आजादीक आन्दोलनसँ लऽ कऽ देशक आजादी तकक परिस्थिति जहिना भुमकमसँ पहिने भुमकमक समए आ पछातिक जे स्थिति होइए तहिना रहल। ओना डोलैत-धरती किछु-किछु असथिरो भऽ गेल मुदा नमहर भुमकमक पछाइत जहिना छोट-छोट भुमकम अबैत रहैए तहिना ऐबते रहइ। आजादीक आन्दोलन 1942 इस्वी अबैत जुआ गेल। माने जन-जनक बीच पहुँच गेल जइसँ घर-घरसँ निकैल लोक सड़कपर आबि गेल। मनमे स्वतंत्र देशक स्वतंत्र नागरिक बनैक फल फड़िये गेल छल। आजादीक लड़ाइ दिस झूकने देशक उत्पादनो वाधित भेल। खेतियो-पथारी आ शिक्षणो-संस्थान सभ प्रभावित भेबे कएल। ओना पुरना दरभंगा जिला जे अखन मधुबनी, दरभंगा आ समस्तीपुरमे बँटल अछि तइमे मात्र दू या तीनटा कौलेज आ तही अनुपातमे हाइयो स्कूल छल आ ओना संस्कृत विश्वविद्यालयक संग ठाम-ठीम संस्कृत महाविद्यालयो आ विद्यालयो सभ छेलैहे। 1942 इस्वीमे जहिना कौलेजक शिक्षको आ विद्यार्थियो तहिना स्कूलोक विद्यार्थियो आ शिक्षको सभ आन्दोलनमे कूदि गेला। कठिन लड़ाइक पछाइत देशक आजादीक नीक फलो तँ भेटबे केलैन। देश स्वतंत्र भेला पछाइत जहिना सभ क्षेत्रमे अपन-अपन समस्या जगल तहिना अपनो इलाकामे स्कूल-कौलेज आ अस्पतालक संग रस्ता-पेरा, खेती-पथारी इत्यादिक समस्या उठबे कएल। अखुनका मधुबनी जिलामे एकटा कौलेज आर.के. कौलेजटा छल। जयनगर, बाबूबरही, पण्डौल, सरिसव पाही, झंझारपुर, निर्मलीमे कौलेज आ तहिना हाइयो स्कूल, मिडिलो स्कूल, बनबैक जिज्ञासा समाजक मनमे उठल। 1960 इस्वीसँ पहिने पान-सातटा कौलेजो खुजल आ लहेरियासराय अस्पतालो बनल। आजादीक पूर्वसँ जे स्कूल आ कौलेज चलैत आबि रहल छल ओ अपन नीक गति पकैड़ संचालित हुअ लगल, जइसँ रामकृष्णकेँ स्कूलक जवाबदेहीक दबाव रहबे करैन। नव-नव कौलेज आ नव-नव स्कूल खुजने शिक्षकोक जरूरत पड़बे करत। रामकृष्णो दू धारक पेटमे पड़ि गेला। एक दिस हाइ स्कूलसँ कौलेजक शिक्षक बनैक इच्छा तँ दोसर दिस नव कौलेजमे वेतन नइ भेटने परिवारक भरण-पोषणक समस्या। जखन कौलेज नीक बनि संचालित हुअ लगत तखन ने वेतन भेटत। तैबीच एकटा लागल जीबिका, माने हाइ स्कूलकेँ छोड़ब रामकृष्ण नीक नहि बुझलैन। परिवार ओहीपर ठाढ़ छैन। संगे ईहो होइन जे सीमित कौलेज खुलने सीमित शिक्षकोक बहाली हएत, ओ जँ भरि जाएत तखन तँ अवसरक चूक हएत। जहिना डारिक चुकल बानरक गति होइ छै तहिना अवसरक चुकल लोकोकेँ होइते छै। जइ उत्साहक संग देशक आजादीक लेल जनमानस जगि कऽ आगू बढ़ल ओ उत्साहकेँ आजादीक पछाइत छीन-भीन कऽ देल गेल। कहैले शासन विदेशी हाथसँ देशी हाथ आएल मुदा बेवहारिक जे जिनगी छल, ओइमे कोनो बदलाव नै आएल। एहनो नै कहल जा सकैए जे केतौ ने आएल, से ठाम-ठीम गामो-समाजमे आएल आ ठाम-ठीम परिवारोमे आएल। खाली सत्तासँ सटलक जिनगीमे उछाल आएल मुदा गाम-समाज ठमकले रहि गेल। रंग-बिरंगक उपद्रव जे पहिनेसँ आबि रहल छल ओ समाजक बीच किछु बढ़िये गेल, कमल नहि। जँ केतौ कोनो रंगक कमबो कएल तँ दोसर रंगक उपकबो कएल। ओना देशक बीच जन-जनक समस्या अछि मुदा ओ केना मेटत एकरा-ले जेहेन शासन-सूत्र चाही से नइ भेल। नव जनमल प्रजातंत्र बेवस्था, हजारो बर्खक लूटल-कूटल देश, केना उठि कऽ ठाढ़ भऽ चलत। धिया-पुताक गेन नइ ने छी जे पकड़नौं गुड़ैकते अछि। गाम-गामक अर्थ-सम्पदाक संग, कौशल सम्पदा, जे पहिनेसँ दबल आबि रहल छल ओकरा उठबैक ओहेन उपाय नइ भेल जेहेनक खगता छल। भुमकमक पछाइत आकि समुद्री जुआरिक पछाइत जहिना धरतियो आकि पानियोँ असथिर होइत-होइत असथिरो आ शान्तो भऽ जाइए तहिना आजादीक पछाइत जनमानसक आजादीक सपना असथिर होइत-होइत शान्त भऽ एते दबि गेल जे ओकर चीन-पहचीन मेटाएल जकाँ बूझिमे आबि रहल अछि। ओना किछु इलाकाक किसान अपन जिनगीकेँ बूझि खेती-वाड़ी करब अपनौलैन जइसँ ओ सभ बेसी गिरहस्तीपर आश्रित छैथ। जे अपना ऐठाम नइ अछि। हजार बीघा जमीनबला सेहो नोकरिये करता तखन बिनु खेतबलाक की उपाए हएत। ओना घर-बाहर दुनू दिससँ ओझरी तँ ऐछे। सालमे एकबेर बाढ़िक उपद्रव, जइमे खेती-पथारीसँ लऽ कऽ घर-दुआर दहौनाइ-भँसौनाइक संग जमीनो कटि-कटि धार बनिते अछि। तहिना बेसी बरखा भेने सेहो आफद ऐबते छै। जाड़ोक मौसम सेहो तेहने मारुख होइते अछि। मास-मास, दू-दू मासक शीतलहरी। मुदा सभ किछुकेँ रहैत फेर केना जीबित रहब, ऐ ले तँ सभ ने अपन-अपन सोचबै। शिक्षाक खगता बूझि इलाकामे स्कूल-कौलेज बनबैक विचार जन-मानसमे जगल। 1960 इस्वीसँ पूर्व जखन दरभंगा जिला छल तखन समस्तीपुरसँ लऽ कऽ निर्मली तक कौलेज खुजैक वातावरण बनल। दर्जनो कौलेज आ दर्जनो हाइ-स्कूल खुजल। मुदा आजादीक पछाइतो पढ़ाइमे, माने शिक्षण बेवस्थामे ओ बदलाव नइ आएल जे गुलामीसँ आजादीक होइ छै। तैसंग किसानक गामेटा नइ, देशो छी, मुदा खेती-वाड़ीक स्कूल-कौलेज खुजबे ने कएल। एक तँ खेत-पथार ओहिना जमीन्दारीक ओझरीमे पड़ि परती भेल पड़ल आबि रहल छल तैपर पढ़ल-लिखल लोक गामक कोन बात जे राज्ये छोड़ऽ लगला तखन बोनिहारे सभ किए पाछू रहता,ओहो सभ किए ने शहर होइत विदेशोमे जा-जा बोइने करता। आब कि कोनो डाक्टर-इंजीनियरक खगता छै, आब तँ करखानामे काज केनिहारक खगता छै...। मुदा देहो छीपलासँ तँ समस्याक समाधान नहियेँ हएत। पण्डौलमे सेहो कौलेज खुजल। परिवारसँ लऽ अपन धरिक जिनगीक हिसाब रामकृष्ण जोड़लैन। भाइयो सभकेँ चेष्टगर भेने उपार्जनक उपाय रामकृष्णक परिवारमे भेलैन। किछु दिन जाबे सुचारू ढंगसँ कौलेज नै चलत ताबे अपनो समैक बचत तँ हेबे करत। ई विचार रामकृष्णक मनमे रहबे करैन जे जेना-जेना कौलेजमे सुधार हएत तेना-तेना दरमहोमे सुधार होइते जाएत। तँए नीक हएत जे कौलेजोमे शिक्षकक लेल अपन उपस्थिति दर्ज करा ली। अखन समए हाथ लागल अछि, फेर कहिया एहेन अवसर भेटत। मनमे विचार उठला पछाइत परिवारोक (माने माइयो आ भाइयो-बहिनक) बीच अपन विचार रामकृष्ण रखलैन। जहिना पाल परहक मालदह आकि कलकतिया आम आगूमे ऐबते मन पाल-पाल हुअ लगैए तहिना परिवारजनकेँ सेहो रामकृष्णक विचारसँ भेलैन। अवसरक अनुकूल विचार रखैत परिवारसँ पुछलखिन- “आवा-जाही बढ़ने खर्च बढ़त, जखने अपन खर्च बढ़त तखने अहाँ सबहक बीच, माने परिवारमे कमी औत। जँ से सहैले अहाँ सभ तैयार होइ तँ हम आगू बढ़ि सकै छी।” एकमुहरी सभ कहलकैन- “नीक हएत।” रामकृष्ण पण्डौल कौलेजमे ज्वाइन कऽ लेलैन। किछु दिन तँ नियारे-बातमे बीतलैन पछाइत, सात दिनमे एक दिन पढ़ाएब शुरू केलैन। धीरे-धीरे विद्यार्थियो बढ़ल जइसँ कौलेजक आमदनियोँ बढ़ल। कौलेजमे आमदनी बढ़ने किछु-किछु वेतनो सुधरैत भेटब शुरू भेलैन। ओना सड़कक माथ तीनू। माने जहिना कौलेज जेबाले सड़कक माथ, तहिना बीचमे अपन घरो आ दोसर भाग हाइयो स्कूल। तीन सालक पछाइत जखन रामकृष्ण कमीशनसँ बहाल भऽ गेला तखन हाइ-स्कूलक नोकरी छोड़ि, कौलेज पहुँच गेला। ◌ शब्द संख्या : 999, तिथि : 04 नवम्बर 2015 4. समैक संग कौलेजोक स्थिति सुधरए लगल। सरकारियो अनुदान आ विद्यार्थियोक फीसमे बढ़ोत्तरी भेने कौलेजक आर्थिक स्थिति सुधरल। जइसँ मकानो बनल,पुस्तकालय सेहो सुधरल आ शिक्षक-कर्मचारीक वेतनमे सेहो सुधार भेल। रामकृष्ण बाबूक जिनगीमे सेहो उछाल एबे केलैन। ओना रामकृष्ण बाबू कौलेजक शिक्षकमे सभसँ उमेगर रहैथ। उमेरक लाभ-गुण दुनू भेटबो केलैन। पहिल, हाइ स्कूलमे पढ़बैक जे दस बर्खसँ ऊपरक अभ्यास रहैन ओ लाभ कौलेजमे प्रवेश पबिते नीक शिक्षकक श्रेणी पड़ले भेटलैन। आ दोसर, होइतो अहिना छै, जे जेहेन बुढ़ाएलमे डिग्री पौता ओ ओहिना ने बुढ़िया बाढ़ि जकाँ गाम-गामकेँ उजाड़ि कऽ बुढ़ाएल काजो करता। सोभाविक अछि जैठाम कियो अठारह-बीस बर्खक शिक्षक कौलेजमे प्रवेश करता आ कियो काञ्चीनाथ झा‘किरण’ जकाँ सतावन-अठावन बर्खक अवस्थामे करता, तैठाम दुनूकेँ एकरंगाह तँ नहियेँ कहल जा सकैए। एकटा भेला नवतुरिया जिनका अखन सीखैक समए छिऐन आ दोसर ओहन बुढ़ाएल भेला जे गामक-गाममे धार फोड़ि देने छथिन...। तीस-पैंतीस बर्खक उमेरक जखन रामकृष्ण बाबू रहैथ तखन कौलेजक शिक्षक बनला। तैबीच बेटो हाइ-स्कूलसँ पढ़ि कऽ कौलेजमे पहुँच गेल रहैन। आन शिक्षकक अपेक्षा रामकृष्ण बाबूकेँ विद्यार्थीक पढ़ाइ दिस किछु बेसी झूकान रहैन। ओना नीक-बेजए तँ सभठाम किछु-ने-किछु होइते छै, मुदा एकर माने ईहो नइ जे नीकसँ बेसी काज बेजाए भऽ जाए। मुदा समैयोक तँ अपन बलउमकी होइते छै। जखन एक रंग वेतन दुनू गोरेकेँ रहत तँ के कम आ के बेसी भेला? कौलेजमे शुरूहेसँ रामकृष्ण बाबूकेँ शिक्षको, कर्मचारियो आ विद्यार्थियो सभ श्रद्धाक नजरिये देखबो करैन आ मानितो रहलैन। जइसँ रामकृष्ण बाबूक मनमे ओहन मलिनता कहियो नै एलैन जे जिनगीमे केतौ कमियोँ अछि। यएह ने भेल जिनगी जे जइ काजक भार उठौने छी ओकर निर्वहन जँ इमनदारीसँ करिते छी तखन मलिनता औत किए...। अंगरेजी साहित्यक विद्यार्थी रामकृष्ण बाबू मुदा अंगरेजी जीवन शैली–माने अपन अधिक-सँ-अधिक काज स्वयं करब–नै बनि पड़ैन। ऐ मानेमे रामकृष्ण बाबूकेँ महसूस होइन जे अपनामे किछु कमी तँ ऐछे। हेबो केना ने करतैन। खबासोकेँ खबासक खगता मने-मन रहिते अछि किने। कौलेज आ रामकृष्ण बाबूक घरक बीच पचास-पचपन किलो मीटर पक्की सड़कक दूरी। नीक सड़क रहने बसक लगातार सर्भिस। गामेसँ कौलेजक आबा-जाही रामकृष्ण बाबू रखने रहला। ओना दुइयो-डेढ़ किलो मीटर दूरीबला शिक्षक अपन डेरा फुटा परिवार आ गाम-समाजसँ हटि दोसर समाजमे बसऽ चाहै छैथ। ओना रामकृष्ण बाबू अपना गामक पहिल एम.ए छैथ तहूमे अंगरेजी साहित्यसँ। अहुना लोक कहै छै जे दूरक ढोलो सुहौन लगै छै। मुदा, ढोल तँ ढोले छी। ढोलक चालि आकि तबलाक चालि थोड़े सभ पकैड़ पबैए। कोनो भाषा भाषा भेल जे क्षेत्र भरिमे बाजल-लिखल जाइए। मुदा साहित्य समाजक ओहन शील अछि जे देहक आत्मा जकाँ सभ समाजक बीच बास करैए। तैठाम गमैया पाहुन जकाँ जँ मोजरे नइ देब तँ ओइ वेचारे पाहुनक कोन दोख? खैर जे से...। दुनू कारणे रामकृष्ण बाबूकेँ परिवारसँ लऽ कऽ समाज तक मान-सम्मान आ पद-प्रतिष्ठाक आदर भेटबे केलैन। परिवारो आ समाजोकेँ तँ ई लाभ भेबे कएल जे जखन परिवारमे एक गोटे एम.ए. पास कऽ लेलैन तँ एम.ए. तकक बाटक बोध तँ हुनका भाइए गेलैन। करै-सँ-धरै जोकर तँ ओ भाइए गेला। माने ई जे कोन एहेन पढ़ुआ हेता जे उच्च शिखर धरि पहुँचैक बीआ अपना मनमे नइ रखने हेता। अगर-मगर एक ढकिया मुदा सबहक मन-मन्दिरमे बास करैबला भगवान कैलाशवासी बनैए चाहै छैथ। देखा-देखी रामकृष्ण बाबूक परिवारोमे शिक्षाक स्तर बढ़लैन। छोट दुनू भाए सेहो एम.ए. पास कऽ लेलखिन, जइसँ नोकरियोमे प्रोन्नति भेलैन। जेकर प्रभाव गामोपर पड़बे कएल। देखा-देखी गाममे पाँचटा एम.ए. पास भऽ गेला। कहैले रामकृष्ण बाबू सभ दिन गामसँ जोड़ल रहला मुदा जुड़ि कऽ रहि नै सकला। जुड़ि कऽ रहैक माने भेल जे मनुखेक जिनगी जकाँ मनुखक बनौल समाजोक जिनगी छै किने तँए जहिना परिवारमे बेटाकेँ कोरामे नेने बापोकेँ अपन बालपन मन पड़ै छै, जेकरा ओ पितृ-ऋृण बूझि चुकबैक संकल्प मनमे रोपि निमाहैए तहिना ने समाजियो परिवारमे अछि...। ओना जखन रामकृष्ण विद्यार्थी छला तखन बच्चे छला, ओहू अवस्थामे स्कूल-कौलेजक संगी गाममे बनबे केलैन। आ जखन हाइ-स्कूलक शिक्षक बनला तखन विद्यार्थी जीवनक सभ किछु बदैल गेलैन, मुदा रहला तँ विद्यार्थीए सबहक बीच। ओना अठबारे गाम अबै छला मुदा रस्तेक झमार आ परिवारेक काजमे उलैझ कऽ समए कटि जाइत रहैन, जइसँ गाम दिस तकैक समैये ने भेट पबैन...। ओना समाजोक बीचक जे काज अछि, माने सार्वजनिक काज ओहो केतेक रंगोक अछि आ करैयोक ढंग अलग-अलग छै। मुदा तइ सभसँ कम सरोकार रामकृष्ण बाबूकेँ अखन तक रहलैन। कौलेजक पुस्तकालयमे समृद्धता आएल, ओना कौलेजमे छात्रो आ शिक्षकोकेँ नव-नव आ नीक-नीक पोथी उपलब्ध भेने पुस्तकालयक संचालनमे सेहो बढ़ोत्तरी भेल। जहिना पैघ-पैघ प्रकाशनक प्रकाशित पोथीपर नीक प्रकाश पड़ए लगैए, प्रकाशित होइते पोथीक गुण बुझौनिहारक नजैर पड़ए लगै छैन, माने पोथीक गुण-अवगुन बुझौनिहार भेटने सभकेँ लाभे-लाभ होइए तहिना रामकृष्ण बाबूसँ,पुस्तकालयसँ लऽ कऽ कौलेजक शिक्षकक संग विद्यार्थियोकेँ लाभ भेल...। शुरूहेसँ रामकृष्ण बाबूक झुकाउ पढ़ै-लिखै दिस रहलैन, संगे कौलेजक पुस्तकालयक भार भेटने पढ़ै-लिखैमे आरो बढ़ौत्तिरियेक अवसर भेटलैन। एक तँ महाविद्यालयक विद्यार्थीकेँ पढ़ौनाइ तैपर पुस्तकालयक देख-रेखक भार भेटने रामकृष्ण बाबू कौलेज खुजैसँ लऽ कऽ बन्द होइ धरिक समैमे बन्हा गेला। ओना आन कौलेज जकाँ ऐ कौलेजमे पुस्तकालयक रीडिंग रूम नै, नइ तँ रामकृष्ण बाबूकेँ आरो बेसी भार पड़ितैन। हलाँकी अलगसँ पुस्तकालयक भार भेटने लाभे भेलैन। घरपर सँ सबेरे आठ बजे बस पकड़ऽ निकलै छला, दस-पोने-दस बजे कौलेज पहुँच जाइ छला। जँ क्लास रहै छेलैन तँ क्लास जाइ छला नइ तँ पुस्तकालैयेमे रहै छला। ओना पोथीक लेन-देन पुस्तकालयक आन-आन कर्मचारी सबहक जिम्मामे छेलैन, मुदा देख-भालक भार तँ रामकृष्ण बाबूपर रहबे करैन। दस बजेसँ चारि बजेक बीच पढ़ै-लिखैक भरपूर समए रामकृष्ण बाबूकेँ भेटलैन। जेकर उपयोगो नीक जकाँ केलैन। जइसँ अंगरेजी साहित्यक संग हिन्दी,मैथिली आ संस्कृत साहित्यकेँ सेहो गहरायसँ अध्ययन केला। रामकृष्ण बाबूक पढ़ौनीसँ विद्यार्थियोकेँ नीक लाभ भेटैत रहल। तेकर कारण छल जे पुस्तकालयमे टटके पढ़ि क्लास जाइ छला, नीक जकाँ पढ़बै छला। कौलेजक जिनगीक रूटिंग रामकृष्ण बाबूक एहेन बनि गेल रहैन जे भोरे सुति उठि नित्यकर्मसँ निवृत होइत, चाह पीबैत-पीबैत नहेबा बेर भऽ जाइन। नहा कऽ खाइ छला आ कपड़ा पहीरि बस पकड़ैले निकैल जाइ छला। तहिना कौलेजसँ घुमती बेर सेहो चारि बजेक बाद हब-गब करैत पाँच बजे तक कौलेजक कम्पाउण्डसँ निकलै छला, जे सात बजेसँ आठ-साढ़े-आठ बजे तक घरपर पहुँचै छला। घरपर पहुँचला पछाइत रौतुका ओरियानमे लगि जाइ छला। ओना गामोक लोक देखैत रहैन जे रामकृष्ण बाबू गामेसँ कौलेज जाइ-अबै छैथ। खाली रबि दिन गाममे रहै छैथ। ओना तेकर अतिरिक्त गामक लोकमे ईहो तँ धारणा रहबे करइ जे ‘छबे कौलेज, नबे स्कूल।’ माने कौलेजक पढ़ाइ छह मास चलै छै आ हाइ-स्कूल तकमे नअ मास। बाँकी दिन छुट्टी रहैए, माने बन्न रहैए। गाममे रहितो रामकृष्ण बाबू गामक पैघ समाजसँ हटि कटल-छँटल समाजिक जिनगी जीबए लगला। गामक बीच नव-नव समाजक जन्म सभ दिनसँ होइत आबि रहल अछि आ आगूओ होइत रहत। माने ई जे जँ गाममे पाँचटा इंजीनियर भऽ जाथि तँ एक इंजीनियर समाजक जन्म भाइए जाइए। समाजमे इंजीनियरक की जरूरत अछि, ई तँ ओ जानैथ, मुदा एक नव समाज तँ उठि कऽ ठाढ़ भेबे कएल। अहिना आनो-आन समाजक ऐछे। डाक्टरक समाज, प्रोफेसरक समाज, विस्तृत रूपमे पढ़ल-लिखलक समाज इत्यादि-इत्यादि। दू सए घरक[3] गाममे रामकृष्ण बाबूक जन्म भेल छेलैन। एक-दियादी परिवार जे एक-जातीय टोल-समाज बनि गाममे ठाढ़ छैन। बाँकी गामक लोक रंग-रंगक अनेको टुकरीमे बँटल अछि। किछु परिवारकेँ, जिनका खेत छैन ओ किसान छैथ आ जिनका अपन खेत नै छैन ओ तँ बोनिहार छैथे जे किछु पूब-पछिम खटि जिनगी बितबै छैथ तँ किछु गोटे छोट-मोट कारोबार करै छैथ। मुदा पढ़ै-लिखैक मामलामे सभ एकरंगाहे। दू-चारि गोरे हाइ-स्कूल तक देखने बाँकी सभ निशान दऽ दऽ मटिया तेल-गहुम कोटासँ उठबैबला। गामो तँ आदिम समाजसँ लऽ कऽ एक्कैसम शताब्दी तकक इतिहास अपना पेटमे रखने अछि। माने ई जे मनुख निरमित परिवारो छी, समाजो छी आ देश-दुनियाँ सभ कथू छी। आइक सदी एक्कैसम सदी छी, माने एकसँ शुरू भेल सदी ई एक्कैसम छी। आइपर काल्हि ठाढ़ होइत-होइत एक्कैसम सीढ़ीपर पहुँचल बटोही हम सभ छी। तैसंग ईहो एकटा गुण तँ ऐछे जे ने बीसम छेलिऐ आ ने बाइसम हेबै, रहबै एक्कैसमे। तँए हमरा ई भ्रम नइ हेबा चाही जे सभ दिन चानक अशोकक गाछक निच्चाँमे टोकरीसँ हमहीं सूत कटैत रहब। मुदा निअसो तँ नहियेँ भऽ सकै छी। हमहूँ ने ऐ धरतीक एक खूटपर नट-नटी जकाँ ठाढ़ छी आ हमरो आगूमे ने विशाल रंग-मञ्च सजल अछि। करोड़ो-अरबो तमसगीर बैसलो-बैसल आ ठाढ़ो भऽ भऽ तमाशा तँ देखैयो-ले चाहि रहला अछि आ देखियो रहला अछि...। रामकृष्ण बाबू जेहने चरित्रवान तेहने इमनदारो, मुदा गाममे रहितो समाजसँ दूर जिनगी रहने समाजकेँ जे लाभ हिनकासँ हेबा चाही, से लाभ नइ भेल। उच्च श्रेणीक पढ़ल-लिखल लोक, उच्च श्रेणीक चिन्तको आ उच्च श्रेणीक विचारवानो तँ होइते छैथ। मुदा चिन्तन केना विचारक रस्तासँ चलि विचारवान बनौत, तइ बुझैमे रामकृष्णकेँ भौक भेलैन। हलाँकी भौक जानि कऽ नहि, अनजानमे भेलैन। साहित्यक विद्यार्थियो आ चिन्तको रहने साहित्येक दुनियाँमे वौअए लगला। वौआइत-वौआइत आइ चारू जुगक साहित्य आ साहित्यक भाषा तथा लिपिक बीच तेना ओझरा गेल छैथ जेकरा सोझरबैले जहिना अंगरेजी साहित्यक ढेरियाएल पोथी, तहिना संस्कृत, मैथिली आ हिन्दी साहित्यक पोथी पढ़ैले बाँकीए छैन। स्कूल-कौलेजक साहित्यसँ आगू बढ़ि अठारहो पुराणेमे अखन ओझराएल छैथ। उपनिषद, वेदान्त आ एक लाख मंत्रबला ऋृग्वेदो तँ बाँकीए छैन...। साहित्यक दुनियाँ अलगो अछि आ समाजोक संग अछि। दुनूक दू दिशा, दू पहलू, दू विचार आ दू तरहक संचालनमे दूरी भेने, दूरी तँ बनियेँ जाइए। जइसँ रामकृष्ण बाबू गाम-समाजमे रहितो ऐ दूरीक कारणे हटल रहला। ओना, जहिना व्यास बाबा अपन अठारहो पुराणक निचोर पाप-पुण्यक सीमापर आनि रखि देलखिन तहिना गमैया साहित्यकारोक सीमा ने भेल जे गमैया लोकक गमैया भाषामे गमैया बात-विचारकेँ गामक इतिहास-भूगोलकेँ देखैत समाजशास्त्रपर नजैर रखैत साहितक रूपमे साहित्यकेँ ओढ़ा दिऐ। ◌ शब्द संख्या : 1494, तिथि : 07 नवम्बर 2015 5. जहिना पढ़ैक खुशी पढ़ला पछाइत सभकेँ होइए तहिना रामकृष्ण बाबूकेँ सेहो होइन। जिनगीक तँ दुइयेटा ने धुरी अछि, सुख आ दुख। अही दुनू धुरीपर ने दुनियाँक बीच आनो-आनो चरसँ अचर धरि नचबो करैए, उड़बो करैए, महकबो करैए आ महकेबो करैए। जेना एक दिस- बेली, चमेली आ जूही अछि जे धरतीसँ सटल अपन पातक पवित्रता आ फूलक सादगीक संग अपन जिनगीक आदि-अन्त करैत अकासकेँ अपन महकसँ महकबैत जीवन-लीला समाप्त करैए तँ दोसर दिस- राड़ी, डबहारी आ पटेर अछि जे अपन फूलकेँ अकासमे पसारि एक दिशासँ दोसर दिशा उड़ि-उड़ि अपन रंग-रूप देखबैए, मुदा महक केहेन रखने अछि ओ तँ बेली,जूही आकि चमेली पुछबे करत किने। होइतो अहिना छै जे जखन विद्यार्थी अपन परीछाक तैयारीमे अध्ययन केला पछाइत मननक अवस्थामे पहुँच उताहुल हुअ लगैए जे हे भगवान इहए प्रश्न जँ परीछामे पूछल जाएत तँ हमरासँ नीक उत्तर कियो ने देत। हँ ओहो विद्यार्थी देत जे हमरे जकाँ अध्ययन केने मननक मने चलैत हएत। एहेन बात कोनो हाइये स्कूलक आकि कौलेजेक विद्यार्थीकेँ नइ, सभकेँ होइए जे रामकृष्ण बाबूकेँ सेहो होइन। कोनो पोथी पढ़ला पछाइत जखन मननक अवस्थामे मन निसाँ जाइ छेलैन तखन निसभेर राति जकाँ अपनो सुधि-बुधि बिसैर जाइ छला जे अपना हाथ-पएर अछि की नइ। कानो अछि की नइ। आँखि जँ रहैत तँ दुनियोकेँ देखतौं ने। ओना दुनियाँक दूरी तँ दूर अछि मुदा अपन हाथ-पएर तँ अपना देहेमे सटल अछि तथापि अन्हारमे कहाँ एको-डेग आकि एको हाथ उठैए। रामकृष्ण बाबूक संग मजबूरी तँ छेलैन्हे। मजबूरी ई जे पुस्तकालयमे पोथीक लेन-देनमे जे गप-सप्प होइन, तइमे कियो बाइबिलक बात पूछि दैन तँ कियो गीताक, कियो पुराणक कथा लाड़ि-चाड़ि दैन तँ कियो वेदान्तक। जइसँ मन नंग-चंग रहिते छेलैन। ओना पढ़ैक धारमे उपस्थिति होइते छेलैन मुदा तइमे पाराग्राफपर पहुँचैक मोहलत लऽ लइ छला तँए पढ़ैक धारमे बाधा तँ नइ उपस्थित होइ छेलैन मुदा लिखैक धारमे तँ सभकेँ होइते छै। जँ से नइ होइ छै तखन चद्दैरक खूटमे बान्हि कऽ किए रखऽ पड़ैत- ‘कनक छड़ी सी कामिनी, कहे को रस लीन...।’ जँ वेचाराक धारक धारा गतिशील रहितैन तँ वेचारी धोबिनकेँ किए जोड़ऽ पड़ितैन- ‘कटि के कंचन काटि कऽ छातीपर रख दीन...।’ जहिना सभ दिनसँ आ सभकेँ होइ छै तहिना रामकृष्ण बाबूकेँ सेहो होइन...। ज्ञान एलापर जहिना गुनगुनी लगैए, बुधि एलापर बुदबुदी, तहिना ने लूरि एलापर खुइर सेहो अबैए। जइसँ खोदो-वेद होइए आ वेदो-खोद तँ होइते अछि। जे रामकृष्णो बाबूक मनमे कुरसीक ओंगठान आबि जाइन। ओंगठलहा मनमे कोनो नव विचार ऐबते देह-हाथमे खुर-खुरी आबऽ लगै छेलैन। खुर-खुरी ऐबते हाँइ-हाँइ शर्टक ऊपरका जेबीमे खोंसल पेन आ राखल डायरी निकालि चारि-पाँति गढ़ि लइ छला। कहियो नीक धुनमे गीत तँ कहियो नीक चालिमे कविता। ई तँ अपनो मने-मन बुझबे करै छला जे गद्य लेखन सक्कत धरतीपर चलब छी, जखन कि पद्य- सल-सल, दल-दल, थल-थल, थल-जल सभतैर चलैए। जे पुरना डायरी सभमे केतेक टुकड़ी-पुरजी गीत-कविताक ओहिना खोंसल छैन्हे। जहिया जेहेन छुट्टी कौलेजमे होइन तहिया पुस्तकालयसँ तेहेन अधखड़ुआ पढ़ल किताब वा ओतेक किताब लऽ कऽ चलै छला जे गामोमे पढ़ब। पढ़ैक तेहेन लत पकैड़ नेने रहैन जे लिखै दिस हाथे ने बढ़ऽ दैन। हाथो केना बढ़ितैन, दसमीक छुट्टीमे अबै छला तँ भागवत-कथा सभकेँ सुनबऽ लगैथ आ अमैया छुट्टीमे अबै छला तँ सिनुरिया आमक ललियाएल सिनूर-कलियाएल फल, कृष्णभोगक थुलियाएल-गुलियाएल गोला, सजमनियाक सजमैन आ फैजली आमक गाछसँ फड़ धरिक फझैत सुनैत-सुनैत चालीस दिनक छुट्टी बीत जाइ छेलैन। मुदा गाछ जेहेन माटिपर रोपल अछि तेहने ने आमोक सुआद हेतै से बुझिये ने पबै छला। रामकृष्ण बाबू आमक सुआदेटा-मे नै ओझराइ छला, ओझरा जाइ छला जे हनुमानजी जखन सीताकेँ ताकए लंका गेला आ ओइठाम अमराय बगानमे काँच-पाकल, लाल-डम्हाएल सभकेँ खा-खा सुआदो बुझलैन आ वएह जे आमक गुद्दा खा-खा आँठी फेकलखिन, सएह ने बम्बैसँ बम्बई पलल आ कलकतियासँ कलकत्ता। मुदा सरही भुटभुटिया, खटहा नकुबी आ गोबराहा सापसीन केना आबि गेल? अही ओझरीमे साल-सालक गरमी छुट्टी अमरैयाक बगवैयामे बीतैत रहलैन, मुदा एतबो ने बूझि पेला जे मनुखक भोजनक अनिवार्य वस्तुमे फलो अछि। जैठामक बारहो मास तीन सए साइठो दिनक भोज्य वस्तु फल भेल, तैठाम हजारो बीघा आमक गाछीबला गामकेँ तँ पुछले जाएत किने जे एते खेतक उपजा जँ अहाँ सभ डेढ़े-दुइए मासमे खा जाइ छी, तहूमे अन्न-तीमन लगा कऽ नइ, केवल चारि सए ग्राम फलेटामे, तखन किलो भरि अन्न आ तीमनमे केते खाएब? तैपर सालक दस-साढ़े-दस मासमे जे फलक खगता हएत से केतएसँ आनब? भाय! मुदा किछु छिऐ तँ आमक गाछीक जेठक दुपहरियाक मचकीपर मचकैत चैतावर चौमासासँ बढ़ैत छहमासा, बरहमासा होइत मस्तीसँ चलिते अछि। तहूमे रामकृष्ण बाबूक सोझराएल मन तँ छेबे करैन जइमे कवित्व शक्ति छैन्हे। कविता लिखैमे स्पष्ट सोच छैन जे जखन- ‘भुजंग प्रयात्, भुजंग प्रयात् भुजंग प्रयात्, भुजंग प्रयात्।’ छन्दबद्ध कविता भऽ सकैए। ‘हरि गरजल हरि सबदल हरिक सबद सुनि हरि चलल।’ कविता भऽ सकैए। तखन ईहो किए ने हएत- ‘नीन तोड़ू जागू उठू उठि कऽ ठाढ़ होउ।’ तँए कवितो लिखैमे केतौ उलझन मनमे नइ होइन। मुदा लिखैकाल मनमे झमेल ठाढ़ भऽ जानि जे शेक्सपीयरक शैलीमे गद्य लिखी आकि शेक्सपीयर शैलीमे पद्य? खैर किछु हौउ, मुदा ने चाइनसँ तरबा तकक कविता कहियो कहि आकि लिख पबै छला आ ने कथा। ओना अंग-भंग आ भंग-अंग कविता नइ लिखै छला सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। ओना रामकृष्ण बाबू साहित्यक विद्यार्थी सभ दिन रहला, जइसँ सभ दिन साहित्यसँ जुड़ाउ रहलैन। मुदा रूपमे थोड़े बदलाव भेलैन। बदलाव ई भेलैन जे जखन हाइ स्कूलक शिक्षक छला तखन परिवारक बोझ तर तेना दबल छला जे लिखै-पढ़ैक वातावरण परिवारमे बनाइए ने पाबि सकला। जइसँ अपन अध्ययन-शक्तिमे सेहो बाधा उपस्थित भेबे केलैन। मुदा साहित्यसँ प्रेम रहने परिवारक संस्कार-संस्कृतिसँ जुड़ल रहला। साज-बाजक संग परिवारो सजले छेलैन। असगरूआ जिनगी रहने हरिमुनियाँ रखै छला। आखिर साजो तँ साज छी। किछु एहनो अछि जे असगरो दुनियाँमे रमैए आ दोसराइतोक संग रमैए। हरिमुनियाँ आकि खौजरी एहने ने साज छी। जँ से नइ रहैत तँ कबीरदास अपना झोरीमे खौजरीए टा किए रखै छला। ओना हाइ-स्कूलक जिनगीमे रामकृष्ण बाबू अपनो आ परिवारोक समुचित खाँहिंसकेँ नै पुरा पबै छला। मुदा ऐठामक माटियोक तँ अपन गुण-धर्म अछि। नै पान तँ पानक डंटियोसँ पूजाक विहीत होइते अछि। एहेन खानापुरी रामकृष्ण बाबूक जिनगीक बीच छेलैन। ओना मनमे सदैत रहैन जे जिनगी खानापुरी नइ,पूरीखाना छी। मुदा..? शिक्षकक जिनगीक बीच रामकृष्ण बाबू साँझू पहरमे, एक घण्टा नित्य हरिमुनियाँपर बैस अपन स्वर-साधना करै छला आ अपन इष्ट आराध्य देवकेँ दुखनमो सुनबै छला। कौलेजक नोकरीक दस सालक पछाइत–प्रोफेसर बनलापर–रामकृष्ण बाबूक जिनगीक परिस्थितिमे मोड़ एलैन। अनेको परिवारिक उलझन एक्केबेर समटा गेलैन। एक दिस कौलेजकेँ सरकारीकरण भेने वेतनमे भरपुर उछाल एलैन तँ दोसर दिस दूटा बेटा बैंकक नोकरी करए लगलैन। बाल-बच्चाक बिआह-दान, पढ़ाइ-लिखाइसँ रामकृष्ण बाबू निचेन भेला। निचेन होइते जेना पढ़ै-लिखैक जिज्ञासा तेज भऽ गेलैन। एक संग कथा-कविता लिखब शुरू केला। जहिना सभकेँ एकटा गीत लिखला पछाइत मनमे होइ छै जे एकटा गीतक मलो बना गरदेनमे पहिरी तहिना कथाक एकटा संग्रह, करीब अस्सी पृष्ठक, छपौलैन। जिनगीक पचासम बरख रामकृष्ण बाबू पार कऽ चुकल छला। मुदा जिनगियो तँ जिनगी छी जे एक उमेरक–समैक–हिसाबसँ चलैए आ दोसर, काजकेँ आराध्य मानि आराधनाक पाछू जे जिनगी चलै छै ओ। मुदा से नइ, भगवान केकरो बेपाट नै छथिन, ओना एते दूजा-भाव तँ छैन्हे जे केकरो सुखदेव जकाँ पेटेमे हूँहकारी सीखा दइ छथिन तँ केकरो अष्टावक्र जकाँ शुद्ध-अशुद्ध। तँ केकरो ध्रुव जकाँ बच्चेमे एकटंगाक लूरि सीखा दइ छथिन आ तहिना केकरो युवनास्त जकाँ जुआनीमे सीखबै छथिन, तँ केकरो बुढ़िया शबरी ऐठामक बैर खेनाइ। रामकृष्ण बाबूक पचास बरख परिवारसँ लऽ कऽ अखन धरिक जे समए काटब रहैन से इमनदारीसँ कटलैन। जेकर फलो भेटबे केलैन। तीनू बेटाकेँ नीक जकाँ पढ़ा-लिखा नीक पदपर पहुँचा, बिआह-दान करैत जिनगीक विश्रामक साँस लेलैन। आब, पहिलुका जे धएल-धरल साहित्यिक बीज गणित छेलैन ओ जेना चैती हवा पेब एकाएक भकरार गाछ जकाँ मनमे ठाढ़ भेलैन। ठाढ़ भेलैन ई जे साहित्य पढ़ि जँ कनियोँ साहित्य-साधना नै केलौं तँ ओइ पढ़बक कोनो महत नै भेल। ओना साहित्यक क्षेत्र ओहन क्षेत्र छी जे बिनु ओर-छोरक अछि जेकर पार पाएब कठिन तँ ऐछे। जँ से नइ अछि तँ कियो किए अपन राग अलापैत घण्टो-घण्टो स्वर-साधना करै छैथ, तँ कियो पैरक एक आँगुरपर ठाढ़ भऽ नचै छैथ? मुदा से नइ, रामकृष्ण बाबूकेँ कथा आ कविता लिखै दिस तेज धार जकाँ मन बढ़लैन। ओना जइ उमेरमे अखन रामकृष्ण बाबू आबि गेल छैथ आ साहित्यक बीज मनमे जागि गेल छैन, जँ तेकर समुचित पालन पोशन हएत तँ ओ कवितासँ महाकाव्य आ कथासँ उपन्यास रूपमे फड़बे-फुलेबे करत। मुदा परिवारिक जे जिनगी अछि ओ गजपटहा धार जकाँ बनि गेल अछि जइसँ बरहबट्टु विचारो आ गतियो-विधि बरहबट्टुए भऽ जाइए। तँए नीक बाटो पकड़ब खेल नहियेँ छी। जखन अपन संग्रहक सभ कथा सेरिया, छपैले प्रेस दिस बढ़बैक ओरियान केलैन तइ दिन रामकृष्ण बाबूकेँ खुशीसँ अपन बिआहक दिन मन पड़ि गेलैन। केकरो बेटी, केकरो पुतोहु, केकरो पत्नी तँ केकरो जननीक सीमा छी किने? तूँ नीके-ना प्रेससँ आरो फ्रेश भऽ अबिहऽ। जिनगीमे की लेब। यएह ने भेल समाजिक जीव भेने समाजकेँ आत्म-शक्ति देब। पचास हजार महिना कमाइ छी, किए ने अपन आ अपन परिवारक खर्चकेँ जिनगीक योजनानुसार बनाएब-बढ़ाएब। देश गरीब अछि, गरीब ऐ दुआरे जे हजारो बर्खक गुलामीक पछाइत स्वतंत्राक साँस लेलक। जइसँ समाजक संग परिवारोक धुरी तँ ढील भाइए गेल अछि। चारि बापूत तँ उत्पादनकर्ता परिवारमे छी, जँ ओ उत्पादकेँ परिवारक समुचित विकासमे लगा आगू दिस डेग उठाएब तँ ओ बिसवासू हेबे करत। रामकृष्ण बाबूक उत्साह जेते लिखै घड़ी रहैन तइसँ बेसी उत्साह पोथी छपबैकाल मनमे जगलैन। लोकक बीच जुड़ाएल अपन आत्मचित्य पठा रहल छी, केतेकेँ आत्म जुड़ाएत ई पछाइत बुझब मुदा अनवरत ऐ साहित्य साधनासँ जुड़ि आगूक दिवस गूदस करब। पोथी छपल। किछु पोथी हित-अपेछितक संग कुटुमो-परिवारमे बिलहलैन। पोथी छपबैकाल मनमे रहैन जे अही पोथीक मूल्यसँ आगूक पोथी छपबैमे सुविधा हएत। मुदा समाजोक तँ अजीव खेल अछि, एक दिस पढ़ैक वातावरण तैयार भेल जा रहल अछि तँ दोसर दिस पढ़निहार पोथीसँ हटि रहल अछि। हजार पोथीमे गोटेक सए बिनु मूल्यक बँटलैन, बाँकी ओहिना अलमारीमे रखल रहलैन। लोकक बीच एहेन धारणा ऐछे जे जँ कियो साधक अपन कठिन साधनासँ पोथी प्रकाशित करबै छैथ आ बजारक समुचित बेवस्था आ समुचित मांग नै रहने जँ अपन बजार अपने ताकऽ आगू बढ़ै छैथ तँ ओ अपन नैतिकताक मान बढ़बै छैथ। मुदा वाह रे नङ्गरकट समाज! किछु अपने नै करत आ केनिहारकेँ सौंसे माथ टेटरे ताकि बाजत जे जँ नीक रचनाकार रहितैथ तँ अपने गामे-गाम घुरि-घुरि भौरगिरी करितैथ। मुदा हुनका यएह ने बुझऽ अबै छैन जे जखन मनुख अपन जिनगीकेँ अपना हाथमे लऽ पैरक बले चलि बुधिक बाट पकैड़ विवेकक लक्ष्य बना ओतए तक पहुँचैक तीर्थ यात्रा करए, वएह ने मनुख भेल। मुदा समाजक लोको तँ लोके छी किने, कियो अनकर नीककेँ भरि दिन अधला बनबैए तँ कियो अपन अधलाकेँ भरि दिन नीक बनबैए। जँ से नइ अछि तँ किए कियो अपनाकेँ उदार कहैए आ अनका कंजूस कहि गरियबैए? भाय! गारि-गरौबलिक तँ ई दुनियेँ छी, पढ़बो करू सुनबो करू, सीखबो करू आ सीखेबो करू। जँ से नइ करब तँ बिजलीक इजोत जकाँ लगले इजोत लगले अन्हारमे पड़ि जाएब। सभ सभकेँ गरियबै पाछू बेहाल अछि, जइसँ दुनियाँक सभ गारि सुननिहारो छी आ पढ़निहारो तँ छीहे। जेना, जे कियो पोथी प्रेमी छैथ ओ अपन सिदहो-समरक पाइ पोथीए पाछू मार्क्स जकाँ गमा दइ छैथ, मुदा खाधुर नीक मानि प्रशंसा करत, एहनो तँ मनुखक सोभाव नहियेँ अछि। ताड़ी-दारू पीनिहार अपन सिदहा-समरक पाइ ताड़ी-दारूमे गमा, रोडपर सँ दुनियाँकेँ गरिऐबते अछि। तँए ओ नीक करैए एहनो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। तहिना खेतक प्रेमी लोक, बेटाकेँ कुपोषणक शिकार बना लइ छैथ मुदा कमाएल पाइ नै खर्च कऽ ओही बेटा-ले खेत कीन लइ छैथ। खैर जे से...। दुनियाँमे सभ अपनाकेँ उदार मानि दुनियाँकेँ कंजूस कहि गारि तँ पढ़िते अछि, कर्म चाहे जे हुअए। मुदा ई खेल छी मनक माइनक। मनक माइन जे नीक बुझैए आकि अधला बुझैए ओ भेल मनक खेती-वाड़ीक उपजा। उपजा तँ समैक हिसाबसँ खेतमे उपजबे करैए, तखन तँ जे जेहेन खेतिहर ओ ओहेन हवा-पानि देख फसल लगबै छैथ, जइसँ सुभर अन्नो आ आनो-आन भोज्य वस्तु तँ उपजैबते छैथ। ओना आइए नै अदौसँ आमोक गाछ आ ताड़ो-खजूरक गाछ आबि रहल अछि, मुदा छी तँ दुनू गाछे। तँए फल कुफल नै फड़त सेहो केकरो रोकने थोड़े रोकाएत। एकटा गाछमे फलसँ रस निकलै छै तँ दोसरकेँ पँजरेसँ निकलै छै। मुदा दुनियाँक खेलो तँ खेले छी, केकरो फूलसँ फड़ होइ छै तँ केकरो फूलकेँ फड़सँ कहियो मकै जकाँ भेँटे ने होइ छै। जइ दिन रामकृष्ण बाबू प्रेससँ पोथीक थाक लऽ बससँ गाम अबैत रहैथ, तइ दिन गोसा घाटक मेला दुआरे बसमे खूब भीड़ रहइ। गामक बस रहने पोथीक थाक नेने बसमे चढ़ला। चिन्हार बसक कण्डक्टर आगूएमे गेटे सोझे रामकृष्ण बाबूकेँ बैसा देलकैन। पोथीक थाक दुनू जॉंघपर रखि दुनू हाथे पकैड़, भीड़मे हेरा गेला। हेराइते दुनू आँखि बन्न भऽ गेलैन। पर्वतपर टहलैत पार्वतीकेँ देखते जहिना महादेव कल्याण, कल्याण करए लगै छैथ तहिना हिनको मन उधिया गेलैन। उधियाइते बिसैर गेला जे गाड़ीमे ठस्सम-ठस्स लोक अछि, जिनगी भरिक कमाइ आगूमे अछि तँए कनी सचेत रही। रामकृष्ण बाबूक वौआइत मन शिव-शिव करैत विचड़ए लगलैन। बसो जेना चलैसँ थस्स लऽ लेने। कखैन पहुँचाएत, कखैन नइ। पत्नीकेँ अपन जिनगीक कमाइ हाथमे दऽ देबैन। परिवारक एकटा ओहन अमर फलक गाछ रोपि रहल छी जे पुश्त-पुश्ताइन रचैत-बसैत भोगैत रहत। एक-एक जनकेँ हाथमे अपन कीर्त देब। जँ आइए सभटा बिलहा जाएत तँ काल्हिये फेर ने प्रेसक रस्ता पकड़ब। जइ दिन रामकृष्ण बाबू पोथीक रूपमे कथा संग्रह छपबौलैन तहू दिन तक ई बात नै बूझि पेला जे किए अपनो परिवारजन मैथिली साहित्यक पोथी नइ पढ़लैन। की मैथिलीएकेँ दोख लगा जिनगीक बाटकेँ तियागि दिऐ। भाषा नीक-अधला भऽ सकैए मुदा भाषासँ सजल जे साहित्य अछि, जे मनुखक आत्म स्वरूप अछि, ओ केना इमहर-ओमहर भऽ सकैए। ओना जाधैर रामकृष्ण बाबूक पोथी प्रेसमे रहलैन ताधैर अपन सृजन-शीलतामे कमी आबि गेल रहैन। प्रेसोमे पोथी छह मास अँटकलैन जे कौलेजसँ समए निकालि-निकालि प्रेसक काज सम्हारने रहैथ। जइ समए रामकृष्ण बाबूक कथा संग्रह प्रकाशित भेलैन तइ समए जहिना लुबधल फड़ल आमक गाछ आ लुबधल फुलाएल गुलाव-फूलक गाछक शोभा-सुन्दरक रंग-रूपमे चारि चान लगि जाइए, तहिना रामकृष्णो बाबूक मनमे लगल रहैन। जइसँ दिन-राति कथा-कविताक सृजनक पाछू मन वौअए लगलैन। छिटफुट केतेको कथो लिखलैन आ कवितो। मुदा लिखैक पाछू छपाएबो, माने प्रकाशितो कराएब तँ ओहीसँ जुड़ल अछि, तँए जखन पोथी छपाइपर नजैर उठि कऽ जानि तँ अन्हार जकाँ आँखिक सोझमे बूझि पड़ैन। ओना अन्हारो बहुत घनगर नहियेँ रहैन, घनगर अन्हार तँ ओइ रचनाकारक आगू पसरैत जिनका आर्थिक मजबूरी रहै छैन। घनगर अन्हार नइ रहैक कारण रामकृष्ण बाबूकेँ अपनो पचास हजार महिनाक कमाइ रहैन, तैसंग दुनू बेटाक कमाइ सेहो तइसँ बेसीए रहैन। ओना जइ मनसूबासँ पोथीक दाम रखने छला, जँ अदहो पोथी–माने पाँचो सए–बीक जइतैन तैयो समस्याक समाधान, माने आगूक छपबैक छपाइक बाधा हल भऽ जइतैन। मुदा से भेलैन नै। घरेमे पोथी जक-थक पड़ल रहि गेलैन जइसँ रामकृष्ण बाबूक सृजनशीलतामे ह्रास हुअ लगलैन। रचना दिससँ मन टुटए लगलैन, मुदा पढ़ै-लिखैक वातावरणक बीच रहने पढ़ै-लिखैक अनुकूलता तँ रहबे करैन। सृजन दिससँ–माने मौलिक रचना दिससँ–रामकृष्ण बाबूक मन उतैर समीक्षा तथा अनुवाद दिस बढ़ऽ लगलैन। ◌ शब्द संख्या : 2363, तिथि : 12 नवम्बर 2015 6. गाम-घर आ चेहरा-मोहरासँ धीरेन्द्र रामकृष्ण बाबूकेँ तीस-पैंतीस बर्खसँ चिन्हैत आबि रहल छैन, मुदा सोझहा-सोझही कहियो कोनो गप नै, तैठाम आगूक सम्बन्धक बीच किछु रस्ता तँ हेबा चाही, से बन्न रहने मनक बात दुनूकेँ मनेमे रहलैन। मनक बात मनेमे ई जे धीरेन्द्र सेहो साहित्यक विद्यार्थी, साहित्यसँ रूचि रहने,गाममे केतेक पावैन-तिहारक अवसरपर सेहो आ औहुना समाजक संग समाजिक मञ्चपर समाजक जिनगीक बात कहितो छैथ, सुनितो छैत आ संगे हँसी-ठट्ठा सेहो करिते छैथ, मुदा...। कृष्णपुरक दछिनवारि टोलमे एक गोरे अगुआ कऽ एकदिना साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन केलैन। अगले-बगलक चारि गामक चारि गोरेकेँ कार्यक्रममे आमंत्रित कऽ एकठाम केलैन। गामक कार्यक्रम, साहित्यसँ रूचि रखैबला धीरेन्द्र सेहो अपन काज बूझि ओइमे जुटला। ओइ चारू पड़ोसी विद्वानमे रामकृष्ण बाबू एक। दोसर, गामेक एक बेकती जे रहैथ तँ अर्थशास्त्र विषयक प्रोफेसर मुदा गामक जिनगीमे रचल-बसल रहने समाजिक काजमे बेस रूचि छेलैन। तेसर बेकती छला, तेसर गामक आई.पी.एस. अफसर- आई.जी साहैब। आ चारीम बेकती रहैथ- संस्कृत साहित्यक आचार्यक संग वैदिक। धीरेन्द्रकेँ सेहो समए भेटल। मुदा, एक तँ गाममे नव काजक बीजारोपण भऽ रहलए जइ फलक जरूरत समाजकेँ छै। तँए अपनाकेँ वक्ता नै बूझि धीरेन्द्र प्रमुख[4] श्रोताक रूपमे मञ्चपर उपस्थित भेला। एके दरी-जाजीमक मञ्च बनल। श्रोतासँ वक्ता धरि एक संग सभ बैसला। ओना निर्धारित विषय नइ रहने सभ अपने-अपने सूरे तैयार रहबे करैथ। तैपर मने-मन ईहो तँ रहबे करैन जे समाजक बीच जेहेन पहचान अछि, तइमे विश्व-मोहिनीक मञ्च परहक नारद जकाँ ने कहीं भऽ जाए। ओना निर्धारित समैसँ पहिने जहिना मञ्चक ओरियान मञ्चकर्ता केने छला तहिना आमंत्रित विद्वतजन सेहो आध-पौन घण्टा पहिनहि पहुँच गेल रहैथ। खुल्ला मञ्च छल तँए चारू गोरेक परिचए-पात करबैत मञ्चवैया चाह-पानक ओरियानमे गेला। एमहर-चारू गोरे नमस्कार-पाती करैत, अपन-अपन दर्शक बाँटि लेलैन। नवतुरिया धिया-पुता सेहो अनेरे ढेरिया[5] गेल छल। कियो पुलिस विभागक आई.जी.सँ मुहॉं-मुहींक गपक आनन्दमे मस्त, तँ कियो कौलेज-युनिवर्सिटीक विषयक चर्चमे व्यस्त। मुदा आम आदमी ऐ दुआरे व्यस्त जे साहित्यिकी पर्वक नव पवनौट समाजकेँ भेट रहल अछि। वाह रे गामक संस्कार! हमरा गामकेँ फल्लॉं-फल्लाँ आबि धरतीकेँ पवित्र केने छैथ…। सभसँ आश्चर्यजित लोक तखन भेला जखन एक संग एक दरीपर बैस सभ चाह पीलैन। तहूमे जेना आई.जी. साहैब कमाने सम्हारि नेने रहैथ तहिना चाह देखते कहि देलखिन- “एक दिससँ शुरू करू।” कार्यक्रम शुरू भेल। ओना अपन-अपन सीमामे सभ उपरा-उपरी, मुदा आई.जी. साहैबक सम्बन्धमे विशेष चर्च समाजक बीच पसरले छल जे वैष्णव छैथ,माछ-मासु किछु ने खाइ छैथ। तेतबे नइ, एको पाइ घूसो-घास नइ लइ छथिन। जइक चलते पितासँ गरमिलान रहै छैन। गरमिलानोक तँ कारण ऐछे, जैठाम थानाक मुंशी, एक बाध खेत, दस कट्ठा घराड़ी कीन, तीन महला पीट लइए, तैठाम आई.पी.एस. बेटा भेनहि की भेल। सभ दिन अपने तवाह जे मासक अन्तिम सप्ताहमे साबुन लगाएब छोड़ि देने छी...। मञ्चक अध्यक्षक नाओंक घोषणा होइते गामक पान-सातटा नव-तूर अपन-अपन कविता नेने एक्केबेर आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेल। जा! ई की भेल? मुदा पहिने सभकेँ कविता पाठक समए भेटल। पहिल कविताक पाठमे जहिना रामकृष्ण बाबू मुड़ी डोलबैथ तहिना, शायरी जकाँ शब्द-शब्दमे आई.जी. साहैब सेहो कहथिन- “बहुत नीक, बड़ बढ़ियाँ।” ओना बैसारक पाछू दिस ईहो कन-फुसकी होइत रहए- “रओ, ई छौड़ा कहिया कवि-काठी भऽ गेल। जेना पेटेसँ सुकदेव जकाँ सीख कऽ आएल हुअए तहिना ढीठगरसँ पढ़ैए!” ओना, पँजराबला तैपर चोहटबो करइ- “तूँ ने अपने सुनै छह आ ने दोसरकेँ सुनऽ दइ छहक।” कविताक पाठ सम्पन्न भेल। पहिल वक्ता आई.जी. साहैब भेला। गीतासँ बेसी सिनेह छैन, गीतापर जेते छोटसँ छोट आ पैघसँ पैघ पोथी अछि, सभ रखनौं छैथ आ पढ़ितो छैथ। ओ गीतेपर प्रवचन करए लगला। ओना विषयो-वस्तु निर्धारित नइ छल। आई.जी. साहैबकेँ अद्भुत भाषण-शक्ति छैन्हे, जमीनक रस्ते केना गीता चलि रहल अछि...;अपन एक घण्टाक भाषणमे आई.जी. साहैब रखि देलखिन। एक सूरे वक्ता आ श्रोता मुँहमे कान सटा तेना मस्त भऽ गेला जे सबहक विचारमे जेना नव स्फुरण जागि गेल। चाह चलल। हँसी-मजाक सेहो चलल। तइ बिच्चेमे रामकृष्ण बाबू अपन पोथी–कथा संग्रहक–एक-एकटा दस-गोरेक हाथमे थम्हा देलखिन। धीरेन्द्रोक हाथमे एकटा पोथी एलैन। जेतेकाल चाह-पान चलल तेतेकालमे सभ कियो पोथीकेँ उनटा-पुनटा देख भाषा-साहित्य, साहित्यकारक परिचयक संग रामकृष्ण बाबूक चेहरा देख-देख अपन-अपन पोथी अपना आगूमे रखि लेलैन । कार्यक्रम फेर शुरू भेल। दोसर वक्ताक रूपमे रामकृष्ण बाबूकेँ समए भेटलैन। विषय निर्धारित नइ रहने सभ अपन-अपन विषय-खण्ड चुननहि रहैथ। तहूमे साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम छी। ने विषयक कमी आ ने भावक। ओना आई.जी. साहैबक प्रवचन सुनि रामकृष्ण बाबू एते अह्लादित भऽ गेला जे गीता दिससँ ससैर रामायण दिस चलि एला। ओना दर्शकक बीच क्रम भंग भेल मुदा ईहो तँ भेबे कएल जे एक विषयमे पच्चीस गोरे पच्चीस रंगक बात कहि अनेरे श्रोताक कानकेँ झराह नै केलैन। मुदा तैयो चारू वक्ताक बीच अपन-अपन वक्तव्यक कान्ही-मिलानी रहबे करैन। रामकृष्ण बाबू रामायणिक सीता-चरित्र शुरू केलैन जे केना ऋृषि-मुनीक खूनसँ उत्पैत कन्या पिताक ऐठाम शिव-धनुष सन धनुषकेँ वामा हाथे उठा ठाँउ करै छलि, तिनका केना पति-घरमे राजगद्दीक बदला बोनक बास करए पड़लैन। जेतए मात्र तीनियेँ गोरे–राम, लक्ष्मण, सीता–वौआइत रहलैथ। संगे, रावण केना ठकि कऽ हरि लेलकैन। एक तँ शिक्षण वृत्तिसँ जुड़ल रामकृष्ण बाबू, दोसर साहित्यसँ सेहो जुड़ल, तँए रूचिगर ढंगसँ बजला। जइसँ दर्शकक बीच जहिना दही-चीनीक भोजमे सकरौड़ी पातपर अबैत तहिना गीतासँ रामायण धरिक प्रवचन सुनैत-सुनैत समाज मस्त भऽ गेला। तेसर वक्ता अर्थशास्त्री रहैथ, ओना विषय बुझबैक अद्भुत क्षमता रहने कौलेजोमे नीक शिक्षकक गिनती छैन्हे। हिनको अपन विषय तँए अपन साहित्य-संस्कृति रहबे करैन। मिथिलाक माटि-पानि आ साइबेरियाक उत्तरी ध्रुवसँ सटल दछिनी तकक माटि-पानि, समए-सालक तुलना केलैन। केना साइबेरियाक माटि, जे सालक तीन मास-चारि मास-पाँच मास बरफसँ उघार होइए आ ओइठामक लोक केना ओइ माटिकेँ उपजा अपन उदर-पोषण करै छैथ। जखन कि अपना ऐठाम देखौआ तीन मौसम–जाड़, गरमी, बरसात–आ तेकर सीमा-सरहद मिला छहटा मौसम होइए। ने बरफसँ कहियो भेँट आ ने वर्फीली रोगसँ रोगाएल मौसमक संग मातृभूमिसँ। अपना ऐठाम बेसीसँ बेसी- कहियोकाल हवोक संग आ कहियोकाल बर्खोक संग पाथर खसैए, वएह भेल बरफ। चारिम वक्ता आचार्यजी भेला जे छठि पावैनपर बजला। पोखैरक घाटपर डुबैत सूर्यक संग उगैत सूर्यक आगू सजल सूप-कोनियाँक अर्घक शास्त्रीय विवेचन पहिने आचार्यजी केलैन। जे किछु गोरे बुझबो केलैन आ किछु गोरे नहियोँ बुझलैन। पछाइत अर्घक संगे जेना अचार्यजी सूपक भुसवाक संग डालीमे गुड़ैक गेला। गुड़ैकते बजला- “चाउरक चिक्कसमे कुशियारक रस मिला अन्नकेँ मधुर बनबैक लूरि अपना सबहक पूर्वजेक देन छी। जेकरा अपना सभ आइयो ओहिना जीबित रखने छी। खेती-गिरहस्तीसँ उपजल वस्तुकेँ डालीमे सजबै छी। जे एक जुगक सीमा रेखा निर्धारित केने अछि। वरसाती फसल जेना हरदी, आदी, सुथनी, अड़ुआ,टौकना, कुशियार इत्यादिक समए पुड़ि गेल, आब ओकरा खेतसँ आनि अपन उपयोग करू। तहिना अँकुरीपर संकेत कएल अछि जे ओकर अँकुरैक समए भऽ गेल तँए ओकरा घरसँ निकालि खेतमे दियौ...।” आचार्यजीक वक्तव्यसँ दर्शक सभ पावैनक पाबन-पौना पाबि गद्-गद् भऽ गेला। आचार्यजीक वक्तव्यसँ कए गोरेक मुहसँ अनायास निकलल- “यएह ने खेतसँ अबैत आ खेत दिस जाइत उदय-अस्त छी!” “एक जिनगीक बेथा-कथा, केना एकटा दाना साल भरि चक्कर लगबैत छठिक घाटपर अँकुरि कऽ परसाद बनि अपन पाबन पौना दऽ रहल अछि!” सम्पन्नताक संग कार्यक्रमक समापन भेल। खुशीक वातावरणमे गदगदीक लहैर लहरल। बाहरी जे अतिथि-अभ्यागत छला हुनका सभकेँ विदा करबाक बेर आएल। मुदा जहिना सीता स्वयंवरक पछाइत जखन मिथिलासँ मिथिलांगना विदा भऽ अयोध्या जाइ लेल तैयार भेली आ तखन जहिना एक दिस बरियातीक बीच जानकी, तहिना ने दोसर दिस जानकी-राम सेहो छेलैथे। जहिना अतिथिगण समाजक सिनेहसँ सिनेहिल भेला तहिना दोसर दिस समाज सेहो बाहरी समाजसँ सिनेहिल भऽ भऽ सिहैर रहल छला। जहिना कार्यक्रम शुरू होइसँ पहिनहि चारू गोरेकेँ एलापर सबहक परिचए बेवस्थापक देने छेलखिन तहिना चारू परिचितिसँ मुँह-मिलानी करैत एक स्वरे बजला- “एहेन कार्यक्रम साले-साल समाजमे हेबा चाही।” गौआँ-सँ-अनगौआँ धरि सभ एक स्वरे हूँहकारी भरलैन- “एके गाममे नइ सभ गाममे होय, जँ दसटा गाममे सालमे एको बेर भेल तैयो मास-सबा-मासपर भेल, जइसँ मनक ताजगी बनल रहत। जँ से नइ हएत तँ बिना धरिऔल हँसुआ-खुरपी जेना भोथ भऽ बिझा जाइए जइसँ ओ काजे जोकर ने रहैए।” ओना चारू वक्ताक अपन-अपन जिनगी, कियो हजारो कोसपर नोकरियो करैत आ बान्हल छुट्टीक बीच रहबो करैत, तँ कियो काजेक बोझ तर दबाएल। कियो परिवारक ओझरीमे तेना ओझराएल जे कोट-कचहरीसँ नोकरी सम्हारैत-सम्हारैत परेशान। अन्तो-अन्त यएह विचार भेल जे सालमे एकबेर हम सभ ऐ गाममे कार्यक्रम करब। अन्तिम नमस्कार भेला पछाइत रामकृष्ण बाबूक पोथीक चर्च उठि गेल। अपन साहित्य प्रेमक चर्च करैत रामकृष्ण बाबू अपन मातृभाषामे कथा-कविता लिखैक संकल्पित विचार व्यक्त केलैन- “अपन ई सदैत इच्छा रहैए जे किलास छोड़ि अंगरेजी नइ बाजी, अपन परिवार-समाजक संग विद्यार्थियोसँ अपने भाषामे गप-सप्प करी, से करितो छी।” चारू गोरे अपन-अपन रस्ते विदा भेला। रामकृष्ण बाबूक संग लगि धीरेन्द्र आगू बढ़ल। ओना दू-अढ़ाइ किलो मीटरपर रामकृष्ण बाबूक गाम, गामक बीचमे घर। पएरे आएलो छला। दस डेग आगू बढ़लापर धीरेन्द्र रामकृष्ण बाबूकेँ बधाइ दैत कहलकैन- “श्रीमान्, अपनेकेँ तँ चेहरोसँ आ शिक्षण-काजोकेँ बहुत दिनसँ चिन्है छेलौं मुदा सोझहा-सोझही चिन्हारए आइए भेल। अपनेकेँ पोथी लिखैक बधाइ..!” ओना हजारो चेहरामे रामकृष्ण बाबू हेराएल रहै छैथ, मुदा धीरेन्द्रपर नजैर नइ पड़ल हेतैन, सेहो बात नहियेँ कहल जा सकैए। मुदा ‘बधाइ’ सुनि धीरेन्द्रक परिचए पुछैत रामकृष्ण बाबू बजला- “अहाँक की नाओं छी, की करै छी?” “नाओं धीरेन्द्र छी, साहित्येक विद्यार्थी हमहूँ छी। किछ-किछ लिखबो करै छी।” तैपर रामकृष्ण बाबू कहलखिन- “हमहूँ तँ पड़ोसिया छी। ओना नोकरिहारा छी। मुदा रविकेँ गामेपर रहै छी। अपन लिखलो देखौ देब आ अबैत-जाइत रहब। देखियौ! एकरे कहै छै संयोग। एक पड़ोसी छी, एतेटा जिनगी बीत गेल आ परिचए-पात आइ भेल।” दुनू गामक बीचमे, माने अदहा रस्तामे जखन गप-सप्प करैत दुनू गोरे पहुँचला तँ अखियास भेलैन जे अदहा-अदहीपर आबि गेलौं। मुस्कियाइत रामकृष्ण बाबू बजला- “बेसी दूर अरियातल अभ्यागतक भेँट बेसी दिनपर होइ छै। आब अहूँ जाउ, हमहूँ जाइ छी।” ◌ शब्द संख्या : 1539, तिथि : 17 नवम्बर 2015 7. नोकरीक अन्तिम समए, माने जखन तीन बरख सेवा निवृति होइमे बँचल रहैन, रामकृष्ण बाबू प्रोफेसर इण्चार्य रूपमे प्रिंसिपल भेला। ओना किछु दिन पूर्व डी.लिट् करैक विचार मनमे सेहो उठल रहैन, मुदा से नइ कऽ पेला। पी-एच.डी. तँ केनहि छला। तहूमे नीक विषयपर, तँए मनमे उर्जवान बल तँ आबिये गेल छेलैन। पचपन बर्खक अवस्थामे रीडर भेने दरमहोमे बढ़ोत्तरी भेलैन आ कौलेजमे एक-मात्र रीडर भेने पद-प्रतिष्ठामे सेहो बढ़ोत्तरी भेबे केलैन। पहिल पोथी–कथा संग्रह–सँ दोसर पोथीमे, माने कथा-सँ-कविताक बीच भावक संग भाषोमे किछु-ने-किछु तफड़का रहबे करैन मुदा जिनगीक प्रथम पुष्प रहने जेहने अपना मनमे तेहने कौलेजक संगियोँ-साथी आ परिवारोजनक बीच खुशीक लहैर उठबे कएल रहैन। मुदा जे कविता संग्रहमे छपल छेलैन ओ टटका नै, दस बरख पूर्वक रहैन। पचास बर्खक पछाइत जहिया पी-एच.डी. करैले रामकृष्ण बाबू रजिष्ट्रेशन करौलेन तहियासँ अपन सृजनक कलम ठमैक गेलैन। ओना कथो आ कवितो संग्रह, दुनू पोथी- अपन मौलिके रचना छिऐन मुदा एकाएक सृजनशीलतामे ठहराव तँ आबिये गेलैन। तेकर कारण ईहो भेल जे पी-एच.डी.क तैयारीमे समए खिंचा गेलैन। मनो दोसर दिस बहैट गेलैन। तैसंग कौलेजक जिम्मा तँ रहबे करैन। रामकृष्ण बाबू इण्चार्यक रूपमे प्रिंसिपल बनला पछाइत पुस्तकालयक भार दोसरकेँ सुमझा देलखिन मुदा तैयो ऑफिसक काजे तेते बढ़ि गेलैन जे मनक थकान बेसिया लगलैन, जइसँ अपन सृजनक कलम साफे बन्न भऽ गेलैन। होइतो अहिना छै जे जँ कोनो शारीरिक काज हुअए आकि मानसिक, औसतसँ बेसी भेने या तँ थकान जल्दी आएत वा काजक समए पुड़ौला पछाइत देरी तक थकान रहत। सएह भेलैन रामकृष्णो बाबूकेँ। ऑफिसक ओझरौठ सभमे तेना मन थाकि जानि जे घरपर किताब-कागज-कलम दिस नजरिये ने जाइन। माघक आठ बजे भिनसर। काल्हि रामकृष्ण बाबू सेवा निवृत भेला। काल्हि तकक जे आठ बजैत भोर छल ओ स्नानक समए रहैन, साढ़े आठ बजैत-बजैत खा-पी कौलेजक रस्ता पकैड़ लइ छला। मुदा आइ तँ कोनो काजे ने छैन...। सौनक करियाएल मेघ जहिना उमड़ऽ-घुमड़ऽ लगैए, तहिना रामकृष्ण बाबूक मनमे उमड़न-घुमड़न उठलैन। उठिते पत्नीकेँ कहलखिन- “मन कनी खसल बूझि पड़ैए, पीलहा चाहक कोनो असर नै भेल। एकबेर हार्ड लीकरबला चाह पीयाउ।” ओना सुभद्रोक मन खसले रहैन। खसैक कारण पतिक सेवा निवृत छेलैन। काजूलक संगी आब नइ रहलौं। पतिक जिनगी टुटने की पत्नीक जिनगी नइ टुटैए। टुटिते अछि। काल्हि धरि जे कमौआ छला ओ आइ थोड़े रहला। काल्हि धरि जे काज करैत आबि रहल छला, जँ ओ काज करैक शक्ति छैन्हो तैयो आब काजक थोड़े रहला! आगिपर चढ़ल गर्म वर्तनक पानि जकाँ सुभद्राक मनमे रंग-रंगक बुलबुला जगैत रहैन। मुदा बजती की आ कहथिन केकरा..? पतिक वेदनाक संग अपन संवेदना व्यक्त करैत सुभद्रा बजली- “हमरो मन उखड़ल जकाँ बूझि पड़ैए। कॉफीए बना लइ छी।” ‘कॉफी’ सुनि रामकृष्ण बाबूक मनमे कुवाथ भेलैन। कुवाथ ई भेलैन जे भरिसक ताना तँ ने मारि रहली अछि। मुदा लगले मन मनाही करैत विचार देलकैन जे भाइयो सकैए। ओहो कियो आन तँ नहियेँ छैथ, आ ने दूरमे छैथ जे हमर बेथा हुनका प्रभावित नै करतैन। बजला- “जे नीक बूझि पड़ैए सएह बनाउ। मुदा ई नजैर राखब, जे बनाएब ओ कनी कड़गड़ बनाएब।” सामंजस करैत सुभद्रा बजली- “चिन्नी कनी कम कऽ देने चाहो आ कॉफियोक अपन रमकी रहै छै।” सतरंजक गोटी जकाँ सह पाबि रामकृष्ण बाबू बजला- “जाबे रमकी नइ पीब ताबे मन थोड़े रमकत।” गैस चुल्हिक बेवस्था, तँए कॉफी बनबैमे पॉंचो मिनट ने लगलैन। लगले सुभद्रा दुनू गिलासमे कॉफी नेने रामकृष्ण बाबूकेँ हाथमे धरबैत अपनो आगूमे बैस पीबए लगली। सुभद्रा कॉफियो पीबैथ आ आँखि उठा-उठा पतियोपर दैथ। आँखि उठा कऽ दइक कारण पतिक बदलैत जिनगीक धारक दुनू कातक महार देखब रहैन। ओना रामकृष्ण बाबूक मनमे सेहो उठैत रहैन जे नारी-जगतक पहिल इच्छा तँ यएह ने रहैत अछि जे कर्मगर पतिक हाथमे हाथ रखि जीवन-यात्रा करी। से तँ काल्हि धरि छल। अपन बाहुँवलसँ अपनो आ परिवारोक जिनगीकेँ गूदस करैत एलौं। आइ काज छीना गेल। छिनाएल केना, ओइ जोकर आब नइ रहलौं। जहिना सभकेँ होइ छै तहिना ने हमरो भेल...। मुदा तैयो, रामकृष्ण बाबूक मनमे ठनका जकाँ खसिते रहैन। खसैन ई जे अपना तँ ओते पेंशन मासे-मासे भेटैत रहत जइसँ दू गोरेकेँ खाइ-पीबैमे तिरोट नै हएत। मुदा अपन मन की कहत? यएह ने कहत जे बिनु श्रमिक पेब श्रमिक जिनगीक मान-मरजादा रखै छिऐ! जँ से नइ तखन श्रमक माने-सम्मान की रहल। आ जखन श्रमक मरजदे मरि जाएत तखन कियो उन्नतिक शिखरक शिखा जँ माथमे टाँङ्गियेँ लेत तइसँ की हेतै? लगले रामकृष्ण बाबूक मन आगू ससरैत पत्नीपर गड़लैन। अपने तँ परश्रमावलंवी बनि भरपाइ कऽ लेब मुदा पत्नीकेँ तँ परिवारिक क्रियामे बढ़ोत्तरीए हेतैन। काल्हि तक आठ बजे भोरसँ आठ बजे साँझ तक बोनाएल रहै छेलौं, भरि दिन जे किछु अपन देहीक जरूरत पड़ै छल अपन सेवा अपने करै छेलौं। मुदा आब तँ हमहूँ ने भार स्वरूप चारि बेर चाह बनबैले कहबे करबैन। तहूमे तेहेन शरीर बनि गेल छैन जे अपने उठबो-बैसबमे असोकर्ज होइते छैन...। नंग-चंग होइत मने रामकृष्ण बाबू बजला- “अखन गप-सप्प करैक मन नइ होइए।” कहि हाथक खाली गिलास हाथमे पकड़ा देलखिन। गिलास पकड़बैक कारण रहैन जे झब-दे लगसँ चलि जाएब। मुदा से भेलैन नइ। पतिकेँ कछमछ करैत देख सुभद्राक मन सेहो कछमछा गेलैन। कछमछा ई गेलैन जे बूढ़ देह भेलैन। जँ ऐठामसँ उठि कऽ चलि जाएब आ कहीं कछमछीए सँ प्राण छुटि जानि; तखन जँ समाजक कियो पुछत जे की भेलैन, केना भेलैन? तखन ई कहब केहेन हएत जे ‘हम किछु बुझबे ने केलौं?’ जँ कोनो बेथा मनमे छैन तँ ओ जाबे मनसँ निकालता नै ताबे ओकर दरद केना कमतैन। कनैत-कनैत तँ लोक कमाइबला जुआन बेटाक मृत्युक दरद मेटा लइए आ हिनका कोन एहेन विपैतक पहाड़ टुटि कऽ देहपर खसि पड़लैन, जे दरद नै कमतैन...। दुनू परानीक मन अपन-अपन दुनियाँमे कॉफीक रमकी पकैड़ रमकैत रहैन। मुदा लगले रामकृष्ण बाबूक मनमे एकटा युक्ति फुड़लैन। युक्ति ई फुड़लैन जे जँ कनीकाल मन मारि कऽ चुप भऽ जाएब तखन अपने उठि कऽ केनो काजे चलि जेती। सएह केलैन। कुरसीपर बैसल रामकृष्ण बाबूक देहमे शिथिलता अबऽ लगलैन, जेना देहक शक्ति निकलऽ लगलैन। जँ कुरसीपर बैसल रहब तँ मुहेँ-भरे निच्चाँमे खसि पड़ब। चेतन मन चेतबैत कुरसीपर सँ उठा पलंगपर लऽ गेलैन। सिरमापर नीक जकाँ मुड़ी सोझो ने भेल रहैन कि मन फुड़फुड़ा कऽ उड़लैन। उड़लैन ई जे काल्हि धरि दुनियाँक बीच काजमे रमल रहने अपन देहक संग परिवारो आ समाजोक सभ किछु बिसैर गेल छेलौं। मुदा आइ तँ ओ दुनियाँ नइ रहल। की दुनियाँ हमरा-ले अनर्थ भऽ गेल? रामकृष्ण बाबूक मनमे ‘अनर्थ’ ऐबते एक संग केतेको विचार मनमे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलैन। उठि कऽ ठाढ़ ई भेलैन जे जखन दुनियेँ अनर्थ भऽ गेल तखन हमरे अर्थ की रहल। दुनियेँ रहने ने अपनो छी...। मुदा लगले मन फरीच भेलैन। दुनियाँ अनर्थ नइ भेल, दुनियाँ तँ जहिना सभ दिन अर्थ-भरल रहल तहिना अखनो अछि आ आगूओ रहबे करत! लगले मन अपन दुनियाँक बीच एलैन। ऐबते मनमे उठलैन जे अनका-ले दुनियाँ भलेँ अर्थपूर्ण किए ने अछि आ रहह मुदा अपना-ले तँ अनर्थ भाइए गेल। जँ से नइ भेल तँ की जइ दिन कौलेजक प्रोफेसर बनलौं तइ दिन जे योग्यता छल, तइमे तँ आइ बढ़ोत्तरीए भेल, मुदा आब हमरा-ले कोन कौलेजक जगह खाली अछि जैठाम जा बास करब... ? रामकृष्ण बाबूक मन फेर ठमकलैन। ठमैकते मनमे उठलैन जखन अपन दुनियेँ अनर्थ भऽ गेल तखन तँ दुनियाँ अन्हार भाइए जाएत किने। मन कलपऽ लगलैन। कलपऽ लगलैन जे जखन सगतैर अन्हारे पसैर जाएत तखन रहब केतए!! जिनगीक बोनमे रामकृष्ण बाबू औना गेला। औनाइक कारण भेलैन जे जहिना परती-परात भूमिमे बोन-झाड़क बीच साइयो-हजारो चलैक बाट तँ रहैए, लोक चलितो अछि, मुदा ओकर निसचित दशा-दिशा नइ रहने बोने-बोन, झाड़े-झाड़ चलैत रहैए-चलैत रहैए मुदा कोनो ठौर-ठेकान नै रहने औनाए लगैए, तहिना रामकृष्ण बाबूक मन वौआ तँ अबैन मुदा निसचित बाट नइ भेटने औनाए लगैन, दम फूलऽ लगैन। मुदा किछु क्षणक पछाइत जखन मन असथिर भेलैन, सॉंसक गति सम भेलैन तखन अपन जिनगीक दू महारक बीच बहैत धारपर नजैर पड़लैन। काल्हि धरि की जिनगी छल। निसचित काजमे जिनगीक सभ क्षण निर्धारित रहै छल। समैपर खेनाइ खाइ छेलौं, काज करै छेलौं, अराम करै छेलौं। अपन जिनगीक संग जे सेवाक भार कान्हपर छल से करैत दुनियोँक सेवा करै छेलौं। अहिना ने संयासियो सबहक जिनगी छैन, जे सदिकाल दुनियाँकेँ दुतकारितो दुनियाँक सेवामे सभ किछु त्यागि दिन-राति प्रकृतस्थ भेल रहै छैथ...। रामकृष्ण बाबूक भक् जेना खुजलैन। दरमाहापर सेवा करैक भार छीना गेल, जे आब भरिया बनैक सामर्थसँ बाहर भऽ गेल, मुदा तँए कि अपनामे ओ शक्ति नै अछि जे भार विहीन भऽ जाएब। अपना भरे चलब आ अनका भरे चलब, यएह ने हारि-जीत छी...। मन पड़लैन अपन सृजन शक्ति। सृजन शक्ति ऐबते मन तरैस गेलैन। जेना किछु नव चीज भेट गेल होइन तहिना मनमे खुशी जगलैन। पत्नीकेँ सोर पारलखिन- “केतए छी?” चारि कोठरीक घर-आँगन, सुभद्रा जेबे केतए करती। बड़ जेती तँ सुतै-घरसँ भनसा-घर। पतिक अवाज सुनि बजली- “एतै छी। अबै छी।” बजैत सुभद्रा आबि आगूमे ठाढ़ भेलखिन। रामकृष्ण बाबू सेहो पलंगेपर पल्था मारि बैस, कैरम-बोडक उल्टा गोटी जकाँ कहियौ आकि महाभारतक अर्जुनक नैन-भेदी वाण जकाँ, बजला- “एना जे छिलमिलाइत चिड़ै जकाँ देख संगीक संग छोड़ि चलि जाएब, तखन भेल जिनगीक संगबे?” रामकृष्ण बाबूक बात सुभद्रा नीक जकाँ नइ बुझली मुदा चिड़ै तँ बूझि गेल छेली। चिड़ैयेक पाँखि पकैड़ बजली- “पुरुखक कोन ठेकान। वेचारी मादा चिड़ैकेँ अण्डा सेबए पड़ै छै। अहाँकेँ की अछि भने नोकरियो चलिये गेल, आब पलंगपर बैसल-बैसल हुकुम फरमाबैत रहू।” सुभद्राक बात जेना रामकृष्ण बाबूक करेजकेँ छेद देलकैन। तिलमिला गेला। मुदा चुप्पो हएब नीक नहि बूझि तीनू बेटा-पुतोहुक चर्च उठबैक विचार मनमे रखि बजला- “अपने तँ आब कोनो काज नइ रहल..?” रामकृष्ण बाबूक मनक बात मनेमे घुरियाइत रहैन आकि बिच्चेमे सुभद्रा टोकि देलकैन- “एना किए मन तोड़ि कऽ बजै छी। दुनियाँकेँ लोक कर्मभूमियो कहैए, आ अहाँ..?” ओना रामकृष्ण बाबूक मनमे घुरियाइत ई रहैन जे जहिना अपने काजसँ निचेन भऽ गेलौं तहिना जँ ओहो[6] काजसँ निचेन भऽ जाथि, तखन ने दुनू गोरेक जिनगी समतूल हएत। से तँ ऐठाम सम्भव नइ अछि। अपने तँ कोनो काज नइ रहल मुदा हुनको नइ रहलैन सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। एक तँ जहिना सभ दिन घर-आँगनक काज करैत आबि रहल छैथ तहिना छैन्हे आ तैसंग ईहो तँ भाइए गेलैन जे एते दिन भरि दिनक असगरूआ जिनगी छेलैन, जइसँ खगतो कम छेलैन आ आब हमरा रहने तँ परिवार जकाँ परिवारिक खगतो बढ़तैन जइसँ काजो बढ़बे करतैन...। रामकृष्ण बाबूक मन नचलैन। नचिते दुनू सिरो आ पुछरियो एकठाम भऽ गेलैन। जहिना घुरीपर नचैत चक्रवत-चक्का चारू दिस एके अवस्थामे नाचि जाइए तहिना मनक चक्का नाचऽ लगलैन। कखनो होइन जे जीवन संगिनी पत्नी छैथ, तँए काजोक समरूपता हेबा चाही, मुदा लगले होइन जे जहिना आदिमकालमे मनुख मनुखक हाथ पकैड़ अपन गुलाम बना, मारि-पीटि ओकरासँ सेवा करबै छल तहिना ने पत्नियोँ भेली! किछु कहबैन आ से जँ नै करती, तँ कि कोनो एहेन मरतरिया हमहींटा हएब जे मारि-पीट कऽ हुनकासँ काज लेब आ अपने मलिकाना झाड़ब..! रामकृष्ण बाबू गुम्म भऽ गेला। मुदा परिस्थितिवस कहियौ आकि देखा-देखी, फुड़लैन- हँ ई कोनो अनुचित थोड़े भेल। समाजमे कि कोनो हमहींटा एहेन हएब आकि एहेन समाजक रेवाजे बनल अछि। रेवाजेसँ ने रीति आ रीतेसँ ने नीति बनैए। समाजोक तँ एहेन नीति ऐछे...। मुदा फेर रामकृष्ण बाबूक मन अपन साठि बर्खक देहसँ भारी पत्नीक पसेनापर पड़लैन। जैठाम भरि-भरि दिन आगिक चुल्हि लगक जिनगी जीनिहारि संगी छैथ तैठामक यएह भेल संगपना! कियो आगिमे झड़कै आ कियो फूह खेलए..? ओना रामकृष्ण बाबू पत्नीकेँ ऐ दुआरे सोर पाड़ने छेलखिन जे गामसँ हटि जखन कोनो बेटा ऐठाम रहब, तखने दुनू बेकतीक जिनगी समरूपमे चलत मुदा फूहर मन रहने आने-आने विचार तेना मनमे उठए लगलैन जे नियरलाहा बात मनेमे टराइत रहलैन। बजला- “एकटा बात बुझल अछि?” तेहेन पोजमे रामकृष्ण बाबू बजला जे सुभद्रा चौंक गेली। अकचकाइत बजली- “की इ इ इ.., नाइ इ इ...।” ओना बजैकाल तँ सुभद्रा बाजि गेली, मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे एतेटा दुनियाँमे एते चीज अछि, एते लोक अछि, तइमे एहेन कोन एकटा बात अछि जे एतेकालसँ गप-सप्प केलौं आ ओ रहि गेल पछुआएले? सुभद्रा अपन मनक विचारमे वौआइते छेली कि बिच्चेमे रामकृष्ण बाबू चहैक उठला- “कनी चाह पीआउ।” ‘चाह पीआउ’ सुनि सुभद्रा मने-मन हँसली। खुनलौं पहाड़, भेटल मुसरी! मुदा मन तँ विहुँसल छेलैन्हे, बजली- “माँड़े ते माउग जीविते अछि, अही बहन्ने ने अपनो पीब।” ओना पत्नीक बात रामकृष्ण बाबूकेँ नीक नइ लगलैन नीक नइ लगैक कारण भेलैन जे जइ तरहक विचार मनमे उपजए लगलैन, तइ अनुकूल पत्नीक कर्म-कुशल नइ बूझि अपनेमे मनन-चिन्तन करब नीक बुझलैन। तँए लगसँ पत्नीकेँ हटबए चाहलैन। सुभद्रा चाह बनबए गेली। सुभद्राकेँ लगसँ हटिते वर्तनक लहरैत पानि जहिना रसे-रसे असथिर होइत जाइए तहिना रामकृष्ण बाबूक मन असथिर हुअ लगलैन। मुदा तैयो मन सिहकैते रहैन। सिहकैत मनमे एलैन- हम केतए छी? ‘हम केतए छी’ मनमे उठिते जेना अचेत मनमे होइए तहिना सभ किछु हेरा गेलैन। मुदा कोनो एहेन फल वा फूलक गाछ, जे जड़ियेसँ फड़ऽ–फुलाए लगैए तैठाम जहिना लगौनिहारक तृष्णा तृषित होइत तिरपित हुअ लगैए तहिना रामकृष्ण बाबूक मनमे जगए लगलैन। एक संग अनेको प्रश्न उठि-उठि ठाढ़ हुअ लगलैन। कोनो प्रश्न एहेन बूझि पड़ैन जे पेनी नीक छानल अछि, जइसँ मन हरैस कऽ हरखित भऽ जाइन। मुदा लगलै आगू टुटल छाती वा फुटल माथ देख मन तरैस कऽ तलैप जाइन! मुदा सिहरैत मनकेँ असथिर करैत जिनगीक धारकेँ पकड़ैक परियास केलैन। तैबीच पत्नी चाह नेने आबि गेलखिन। होइतो अहिना छै जे जँ अहाँ अपन जिनगीक कोनो गिरह खोलैत होइ आ बीचमे जँ कियो नव आगंतुक आबि जाथि तैठाम अपन विचार रोकि, हुनका तँ कुशल-छेम पुछब अनिवार्य भाइए जाइए तहिना रामकृष्णो बाबूकेँ भेलैन। चाहक गिलाससँ निकलैत भाफ देख बजला- “अहाँ तँ ने बेसी भफाएल छी, चाहक रंग नीक लगैए।” तैबीच सुभद्रा दू घोंट चाह पीब चुकल छेली। गरम चाहक भाफ सुभद्राक मुहोँसँ निकैलते रहैन। भफाएले मुहेँ उत्तर देलखिन- “जेते भफाएल पुरुख-पातर होइ छैथ, तेते जँ मौगी-मेहैर रहत तँ दुनियाँ आछन भऽ जाएत।” रामकृष्ण बाबू सेहो अदहा गिलास चाह पीब नेने छला। चाहक भाफो जिरा गेल छल मुदा मनमे पत्नीक बात घुरियाइते छेलैन। एहेन भारी बात किए पत्नी बजली जे दुनियोँ आछन भऽ जाएत? जँ दुनू बेकता-बेकतीक बात रहैत तँ काज देख टोक-टाक करितैथ, मुदा ऐठाम तँ दुनियेँक बात बाजि गेली..! बीटियबैत रामकृष्ण बाबू पुछलखिन- “नै बुझलौं, की दुनियेँ आछन भऽ जाएत?” विहुँसैत सुभद्रा कहलकैन- “सभटा गप अखने कऽ लेब आकि काल्हियो-ले राखब। एकरा काल्हिले रहए दियौ। ” चीतवनमे मन असथिर करैत रामकृष्ण बाबू बजला- “अपना नीक बूझि पड़ि रहल अछि जे जखन सेवा-निवृत भाइए गेलौं तखन किए ने बेटे-ऐठाम चलि दुनू परानी रही।” ‘बेटा-पुतोहु ऐठाम जा रही’ सुनिते सुभद्राक मनमे भन-भनी शुरू भेलैन। एक संग केतेको प्रश्न मनमे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलैन। विरहाइत मनमे नाचए लगलैन,अपन-हाथ जुइत आ विचारक परिवार। तहूमे एकटा बेटा नइ, तीन-तीनटा अछि। तीनू तीनठाम अपन-अपन रहैए। अपनो तीनू भैयारीमे तीन रंगक जिनगी छै। तीनू नोकरिया परिवार छी, बेटा सभ भरि दिन काजक पाछू विरहाएल रहैत हएत आ घर-परिवारक सभ जुति-भाँति पुतोहुक हएत...। पुतोहुपर नजैर पड़िते सुभद्राक मन आरो भीनैक गेलैन। भीनैकते पतिपर दाँत पीसैत विचारए लगली। कोन दुरमतिया कपारपर चढ़ि गेलैन जे ओहन मनुखकेँ कपारपर उठा अनलैन। ई तँ गुण अछि जे दुनू गोरे दूठाम छी, नइ ते साँझ-भोर झोंटा-झोंटौवैल होइतए। जेहने गामक रहत तेहने ने माइयो-बाप आ सरो-समाज रहतै। जेहने सर-समाज रहतै तेहने ने लोको हेतइ। मुदा लगले सुभद्राक मन शान्त भेलैन। शान्त होइते बजली- “अपनेटा नीक बूझि पड़ैए आकि बेटो सभ नीक कहत, समाजो नीक कहत?” सुभद्राक बात रामकृष्ण बाबूक चानिक चान तोड़ि देलकैन। झनाक-दे मनमे उठलैन, तीनू बेटाक परिवारक जिनगीक संग अपन जिनगी। तीनू बेटाक परिवारो आ दरमहो तीन रंगक अछि। जेना पैरक ओंगरीक घावमे ठेंसने ठेंसेक अनुकूल दरदो बढ़ै छै तहिना एक साहित्य-प्रेमी सेवा निवृत प्रोफेसर- रामकृष्ण बाबूक बीच उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलैन। ठाढ़ होइते नजैर तीनू बेटाकेँ बच्चासँ सियान धरिक जिनगीपर गेलैन। अपन सेवामे केतौ कोताही कहाँ भेल। कोताही मनमे ऐबते पत्नीपर नजैर गेलैन। नजैर ई गेलैन जे जनमसँ करम धरि सभटा तँ वएह ने केलखिन। तखन अपने मने अपना मनकेँ मना लेब, से नीक नै...। समगम होइत रामकृष्ण बाबू पत्नीकेँ पुछलखिन- “पहिने अहाँ कहू जे तीनू बेटाक पालनमे कोनो दूजा भाव केने छी?” सुभद्राकेँ जेना ठोरेपर रहैन तहिना बजली- “नै।” रामकृष्ण बाबूकेँ बूझि पड़लैन जे उड़ैत कौआ जकाँ सोझे टाँहि दऽ देली। काग भाषा नै बजली। तँए बिना घमरथने नइ फरियाएत। बजला- “एकटा बात पुछौं?” जहिना जिज्ञासु जकाँ रामकृष्ण बाबू बाजल छला तहिना जिज्ञासा करैत सुभद्रा बजली- “एकटा नइ एक हजार पुछू।” मुँह-कान सम्हारैत रामकृष्ण बाबू पुछलखिन- “कोनो चीजक छाँहक अकार केहेन होइए?” ओना रामकृष्ण बाबूक प्रश्न ओझराएले रहलैन। जे पछाइत अपनो बुझलैन। पत्नी टाँहि दऽ उत्तर देलकैन- “चीजक रंग चाहे जेहेन हौउ मुदा छाँह तँ कारीए हएत किने।” पति-पत्नीक बीचमे अहिना बात-विचारक झिक्कम-झिक्का होइते छै, तँए रामकृष्ण बाबूक मनमे मिसियो भरि कुवाथ ऐ बातक नइ भेलैन जे हमर बात पत्नी काटि देली, नै मानली। थोड़ेक पाछू घुसकैत बजला- “अहूँ बुझैमे लाले-बुझक्कर छी। हम पुछलौं ‘अकार’ आ अहाँ बूझि गेलौं ‘रंग’। ठीके ने लोक कहै छै केदैन बुझलैन दू ढेकरी पियौज।” ‘लाल-बुझक्कर’ सुनि सुभद्राकेँ मिसियो भरि कम्पन्न नै भेलैन। जँ कम्पन्न होइतैन तँ लाल बुझक्कर आ कारी बुझक्करक बात उठितैन, मुदा से सभ किछु ने। अगिला बात जे ‘दू ढेकरी पियौज’क छल से मनमे जनु गड़ि गलैन। बजली- “की दू ढेकरी पियौज कहलिऐ?” अपन बात सम्हारैत रामकृष्ण बाबू बजला- “कोनो चीजक अकारक माने भेल, ओकर मूर्त रूप, जे ओकर अपन लछन-करन छिऐ। आ रंग तँ ऊपरसँ चढ़ैए।” पतिक बातकेँ मने-मन मानि सुभद्रा बजली- “कीदैन कहए लागल छेलिऐ से बिसैर गेलौं?” “नै, बिसरबै किए। सएह ने कहै छी।” पत्नी- “कहू।” “जहिना कोनो चीजक अकारक छाँह अकार नेने रहैए तहिना परिवारमे बेटा-बेटीक सेवा ओही अकारमे माए-बापक प्रति रहैए। ओना हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता अछि। दुनियाँमे जेते मनुख अछि, तेते रंगक जिनगियो छै। जइमे लोक मौज-मस्तीसँ जीबतो अछि।” पतिक बात सुनि सुभद्राक मन पानिसँ भरल घैल जकाँ बूझि पड़लैन। अकछाइत बजली- “अनेरे कोन दुनियाँक भौरी-बट्टामे लागल छी। अपन नून-रोटीक बात सोचू।” पत्नीक विचार सुनि रामकृष्ण बाबूक मन ठमकलैन। ठमकलैन ई जे एते दिन अपन देह दुनियाँक धुनकीमे धुनै छेलौं जइसँ दुनियाँमे जीबैक हकदारो छेलिऐ मुदा आब तँ से नइ रहल। तीनू बेटा तीनठाम नोकरी करैए, तीनूकेँ तीन रंगक दरमेहेटा नै, परिवारो छै। विचारमे ऐबते रामकृष्ण बाबू वौआ गेला। आँखि उठा देखैथ तँ दुनियाँक बोनमे सौंसे बाटे-बाट देखाइन। मुदा जहिना बाट नइ रहने लोक हेरा जाइए तहिना बाटक बोनमे सेहो तँ हेराइते अछि...। पतिकेँ चुप देख सुभद्रा टोकलखिन- “एना जे नून-रोटी बेर चुप्पी लाधि देब, तखन तँ...।” पत्नीक तगेदा सुनि रामकृष्ण बाबूक मन विचलित नइ भेलैन। नइ होइक कारण मनमे रहैन, दुनू परानीक जिनगी तँ दू जनक प्राणक बीचक आड़िपर ने ठाढ़ अछि, तैठाम एक-दोसरकेँ विचारवान बनौने बिना काजो तँ नहियेँ चलि सकैए...। विचारकेँ बहटारैत रामकृष्ण बाबू बजला- “हम अही दुआरे बेटा ऐठाम रहैक विचार करै छी।” बेटाक नाओं सुनिते सुभद्राक मन नचलैन। नचलैन ई जे बेटाकेँ पालने छी, पालनक भार लेब मुदा ओहो तीनू तँ तीनठाम अछि! झँपले-तोपल सुभद्रा बजली- “तीनू तीनठाम जे अछि?” पत्नीक बात जेना रामकृष्ण बाबूक छातीकेँ बेध देलकैन। बेध ई देलकैन जे तीनूकेँ अपना जनैत ने कहियो खाइ-पीबैमे कोताही केलिऐ आ ने पढ़ै-लिखैमे। एके रंग तीनू भाँइ डिग्रियो पौने अछि। मुदा तीनूक जिनगीमे अकास-पतालक अन्तर भऽ गेल अछि! एना किए भेल? पत्नीकेँ कहलखिन- “माथा काजे ने करैए। कनी एकबेर दू-घोंट चाह पिआउ।” रामकृष्ण बाबू तीनू बेटाक जिनगीपर जखन सेरिया कऽ नजैर देलैन तँ बूझि पड़लैन जे जेठ बेटाकेँ उन्नतिक कारण नीक बैंकक नीक दरमाहाक संग नीक सुविधो अछि आ तैपर सँ बालो-बच्चाक तेहेन भारी बोझ नइ छै। मुदा मझिलाकेँ तँ दुनू दुर्गति भऽ रहल छै, परिवारो नमहर छै आ नव बैंक रहने दरमहो कम छै। आ तेसरक तँ दिने-दुनियाँ दोसर छै, सरकारी नोकरी छै, सरकारी खजाना हाथमे छै, सदिकाल हवाइये जहाजसँ स्वर्ग-नर्क टहलैत रहैए। तैबीच पत्नी चाह नेने पहुँचलैन। भफाइत चाह देखियो कऽ रामकृष्ण बाबू गुमे-गुम चाह पीबए लगला। विचार बिन्दुमे अँटकल रामकृष्ण बाबूक मन। तीनू बेटाक जिनगीमे सामंजस तँ आनल जा सकैए। किए तीनू भाँइ अपने-अपने बाल-बच्चा मात्रक परिवार बूझि मनमे रोपि लेलक। बिच्चेमे पत्नी पूछि देलकैन- “आब कहू केहेन मन लगैए?” हारल-मारल-थाकल बटोही जकाँ रामकृष्ण बाबू बजला- “अपनो हूसलौं। जँ परिवारक स्तरक हिसाबसँ तीनू भाँइकेँ सामंजस कएल जाइत तँ जे अखन बनि गेल अछि से नइ रहैत!” सुभद्रा- “तखन आब..?” रामकृष्ण बाबू- “तखन यएह जे जँ बेटा बाप-माए बूझि परिवारसँ सम्बन्ध रखए सेहो बड़बढ़ियाँ आ जँ नइ राखए सेहो बड़बढ़ियाँ। समाज तँ भीखो मांगि कऽ खेबाक अधिकार लोककेँ देनहि अछि। अन्तमे बूझल जेतइ। मुदा गाम छोड़ि बाहर नइ जाएब।” ◌ शब्द संख्या : 3232, तिथि : 23 नवम्बर 2015 क्रमश: जारी........... [1] अंग्रेजक खिलाप [2] घरेलू काज [3] परिवारक [4] प्रमुख श्रोताक माने कान-आँखि आ मनसँ त्रिवेणी धारक घाट जकाँ श्रवण केनिहार। [5] अनेरो ढेरिआइसँ मतलब जे गंभीर कार्यक्रम अछि, तइ अनुपातमे। [6] पत्नी (सुभद्रा) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार जँ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि (व्यंग्य निबंध) हमरा भोर कऽ बहुत किछु फुराइत अछि। ताहूमे जखन की हम जागि जाइ। मने कहबी छै ने " जखने जागी तखने भोर" ताही तर्जपर। ताहूमे दिसा-मैदान कालमे हमरा बहुत किछु सोचाइत-फुराइत अछि। अपना देशक बोली-बानीमे ओनाहुतो शौचालय आ सोचालयमे कनिकबे अंतर छै। ओना समानता तँ कने ईहो छै जे कब्ज पेटक हो की दिमागक खतरनाक होइ छै। असलमे जे शुद्ध मैथिल ब्राम्हण हेता तिनका दिसा-मैदान कालमे बहुत किछु फुरेबे करतनि। जँ ओइ कालमे नै फुराइ छनि तँ ओ शुद्ध मैथिल ब्राम्हण नै हेता। कतेको मैथिल ब्राम्हण ऐ कालमे सोचि कऽ दियाद आ दालिकेँ गला देला आ ओहो बिना सबूत छोड़ने। हँ तँ फेर आबी कहबीपर। मने जखने जागी तखने भोर। ऐ कहबीकेँ मैथिल ब्राम्हण सभ कसिया कऽ पकड़ने छथि। तँइ देखैत हेबै जे भरि जीवन ईंटा-पाथर जोड़ए बला रिटायरमेंट भेटिते मोबाइलपर कवि बनि जाइ छथि, मिथिला राज्य अभियानी बनि कऽ नेताक दर्जा पाबि लै छथि। रिटायरमेंटक बाद हुनका मिथिला-मैथिल-मैथिलीक ततेक ने चिंता भऽ जाइत छनि जे ओ दिन-दिन दुबराएल जाइ छथि, एतेक दुबरा जाइ छथि जे हुनका धोतियो नै सम्हारल होइ छनि। आ दुबराइते-दुबराइत काजक बलें भेल अपन सीनियर सभकेँ शिक्षा देबऽ लागै छथि। आ शिक्षाक स्तर की तँ हम उम्रमे नमहर छियौ तँ तों हमर सभ बात मानै, हमरा बुधियार मानि आदर-सत्कार दे आदि-आदि। आब जँ कियौ हुनकासँ पूछै छनि जे सरकार एतेक चिंता पहिने कियैक नै छल एहि काज सभ लेल तँ हुनकर एकैटा उत्तर भेटत- जखने जागी तखने भोर। हुनका ई नै कहल होइ छनि जे ओते दिन परिवारमे फँसल छलहुँ आब समय अछि तँइ करै छी। ओ घुमा-फिरा कऽ कहता जे जखने जागी तखने भोर। दरअसल ई हुनकर या मैथिल ब्राम्हणक एकटा रक्त विकारे बूझू। हुनका बुझाइ छनि जे घुमा-फिरा कऽ कहलासँ लोक महान मानि लेत। संगे-संग ईहो डर होइत छनि जे असल बात कहबै तँ कियो सीनियर नै मानत। आ हमहूँ तँ मैथिल ब्राम्हणे छी ने। एक दिन एनाहिते हम दू बजे दिनमे सूति कऽ जागल रही आ दिसा-मैदान दिस गेल रही। तखने हमरा फुराएल जे जँ कदाचित् भगत सिंह आ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि आ समाजिक आंदोलन केने रहितथि तँ हुनका सभकेँ की-की सुनबा लेल भेटल रहितनि। मैथिल ब्राम्हण पढ़ल-लिखल होथि की नै होथि, गुणवान, रूपवान, धनवान, बलवान होथि की नै होथि मुदा ओ सभ्य जरूर होइ छथि। सभ्यतामे मैथिल ब्राम्हणक जोड़ा नै। जनमघुट्टी जकाँ सभ्यता पियाएल जाइत छनि मैथिल ब्राम्हण सभकेँ। आन जातिमे सभ्य भेनाइ कोनो जरूरी नै छै मुदा हिनका सभकेँ सभ्यता चाहबे करी। आ सभ्यतो केहन तँ बस बाहरी दिखावा बला। भीतर किछु कऽ लिअ। भाए-भाएमे गारि-मारि भऽ जाए। एक भाए जमीन बँटवारा लेल दोसर भाए के किछु कहबा-करबा लेल तैयार भऽ जाथि लेकिन बाहर धोती-तिलक लगा नमस्कार-प्रणाम जरूर करथि। बाह-बाह जरूर करथि। इएह भेल हिनकर सभहँक सभ्यता। ओनाहुतो मैथिल ब्राम्हण बाह-बाह छोड़ि किछु कइयो ने सकैत छथि। कारण गुणवान, रूपवान, धनवान, बलवान हेबाक लेल जे असल तत्व चाही जे हिनका सभमे होइते नै छनि तँइ ई सभ बाह-बाह छोड़ि किछु कइयो नै सकै छथि। आइ-काल्हि सोशल मीडियाक दौरमे हिनकर सभहँक परिभाषामे विस्तार सेहो भेल अछि। धोती-तिलक लगा बंडी पहीरि कऽ फोटो घिचा लिअ आ ओकरा फेसबुक आदिपर धऽ दिऔ। बस अहाँ परमामेंट सभ्य बनि गेलहुँ। कंप्यूटरक ओहि पार अहाँ अपना घरमे केहन छी से के देखए गेल। हँ तँ पहिने सुनू जे जँ कदाचित् महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि आ समाजिक आंदोलन केने रहितथि तँ हुनका ई सभ्य मैथिल ब्राम्हण सभ शुरूआतमे की कहितनि--- "एना नै लोकक नजरिमे अपन छवि बनाउ। देखार नै होउ। मीठ बात बाजू। सरकारक विरोध केनाइ अपने विरोध केनाइ छै। एना नै। घर-परिवार बला छी। ऐ कूद-फानमे रहब तँ किछु नै हएत। कोनो बात नै ई सभ करबाके अछि तँ पहिने जीवन बना लिअ। केहन नीक ओकालति तँ चलिते अछि। देखियौ फल्लाँ बेटाकेँ टाल लगा देलकै।" आब जखन गाँधी उपरका बात नै मानि अपन काज कऽ कऽ किछु प्रतिष्ठित भऽ जाइ छथि तखन देखू जे ई सभ्य लोक सभ की कहैत छथिन--- " बड्ड भेल। इह इएह करता देशक उद्धार। बाप मरल अन्हारमे पूतक नाम पावर हाउस। आब जखन अहाँकेँ हम सभ महात्मा मानि लेलहुँ तखन फेरसँ ई उपास-अनशन करबाक की जरूरति अछि। केहन बढ़ियाँ स्थापित भइये गेल छी। आब हाथ सेकैत रहू। आब गाँधी ईहो बात नै मानै छथि आ जेल जाइ छथि तखन ई सभ्य लोक सभ कहै छथि--" कहने रहिऐन्ह जे नै करू कूद-फान। एक बेर महात्मा बनिए गेलहुँ तखन बेर-बेर महात्मा बनबाक कोन काज? नै कान देलनि हमर बातकेँ। आब गेलहुँ ने जेल। बनैत रहू सिद्ध-महात्मा-जोगी जेलेमे। हम नै आएब बचबए लेल। दरभंगिया ब्राम्हण की कहै छथि-- " इएह बकरी पोस्सा चलल महात्मा बनऽ। बाप छै बनियाँ आ ई बनत सिद्ध-महत्मा। आन चीजकेँ सौख रहितै तँ कोनो बात नै सौखो केहन तँ महत्मे बनत। एकरा बूझल नै छै जे हमर पिता, हमर बाबा, हमर नाना आ हमर सभ संबंधी दस-दस हाथ चाकर ढ़ेका बान्है छथि। ऐ दुनियाँमे हमर पिता, हमर बाबा, हमर नाना आ हमर सभ संबंधी छोड़ि कियो आन महात्मा बनिए नै सकैए। आ जँ कियो आन बनत तँ ओ ढ़ोंगी हएत। आब देखू जे सहरसा-सुपौलक ब्राम्हण की कहै छथि--" ठीक छै जे अहाँ महात्मा बनि गेलहुँ लेकिन बनेलक के हमहीं ने। आब महात्मा बला जते लाभ अछि से हमरा दऽ दिअ। जँ नै देब तँ सड़ैत रहू जेलमे। पुरैनियाँ, मुंगेरिया, चंपरनियाँ ब्राम्हण-- हम सभ तँ मैथिल छीहे नै तखन अहाँकेँ महात्मा बनाइये कऽ हमरा की हएत। ओना चलू नै मामासँ कनहा मामा नीक। नै ओकालति सम्हरल तँ महात्मागिरीसँ खर्चा चला लेलहुँ। चलू कोनो विधिये परिवार खेपि लेलहुँ ने। आ तीस सालक बाद ब्राम्हण सभ मीलि कऽ गाँधी स्मारकपर बैसि कऽ ताश खेला रहल छल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल-एगच्छा आमक गाछ (लघु कथा) सुन्दरपुर गाममे सोनमा बाध अछि। ओना चारू बाधक बीचमे गाम अछि मुदा दछिन-वरिया बाध माने गामक दछिन जे बाध अछि जइ बाधमे प्रवेश करिते दछिन मुँह डेग उठत, ओइ बाधमे एकटा आमक गाछ अछि जेकरा लोक एगच्छा सेहो कहैए। ओना सोनमा बाध नमगर-चौड़गर अछि, नमगरे-चौड़गर नइ, ऊँचगर-नीचगर सहो अछि। तेतबे किए, जहिना खेत-खेतक माटि एकरंगाहो अछि तहिना भटरंगाहो तँ ऐछे, तँए ने दसो-पनरह रंगक माटियो अछि आ नीचाँ-ऊपर रहने आड़ियो-सीढ़ियो तँ बनले अछि किने। खैर जे अछि मुदा एते तँ ऐछे जे गाछक कमी नइ रहितो वृक्षक कमी तँ बाधमे ऐछे, माने खेती-पथारीक तँए ऊँचगर खेत रहितो अन्नेक खेती होइए जइमे गाछियो-बिरछी तँ भाइए जाइए। से गाछी-बिरछी नहि। डेढ़ कट्ठा परतीपर मात्र एकटा आमक गाछ अछि। एकर माने ईहो नइ जे गाछ-पात नइ अछि। अन्नोक गाछो होइते छै, पातो होइते छै। तहूमे माटिक जे भटरंगीपन छै ओ तँ आरो बेसी रंगक गाछ-पात उगबैए। जँ एकरंगाह रहैत तँ किछु समटल कारोबार, माने माटिक अनुकूल उपजा रहितै, से नइ बेसी रंगक रहने बेसी रंगक होइते छै। खैर जे छै, मुदा बाधमे एकटा आमक गाछ तँ ऐछे। एकरा नकारलो नहियेँ जा सकैए। बाधमे असगर एगच्छा आमक गाछ, खूब चतरलो अछि आ नम्हरो अछि। ओना ओ गाछ कियो रोपलक आकि अपने जनमल, से अखैन तक गौआँ नइ फरिछा सकल अछि। कियो कहै छै बाधक जे रखबार छल ओ रोपलक,मुदा ओ बुढ़बा तँ मरि गेल। रोपलाहा गाछे ने रहि गेल, मुदा से माननिहारो हुअए तब ने...। किछु गोटे ईहो तँ कहिते अछि जे कौआ पाकल आम आनि गुद्दा खा लेलक आ आँठी-खोंइचा छोड़ि देलक,ओही आँठीक गाछ छी...। मुदा लोकक मनमे जे होइत हौउ, ओ परतीपर जनमल तँ ऐछे, केकरो खास जमीनमे छै नै, तँए सबहक छी,सबहक छीहे नइ सभ छाहैरमे छहरेबो करैए आ आमोकेँ चटनीसँ पाकल धरि खेबो करिते अछि। गाछो तँ सभ रंगक होइए मुदा से नइ, ओ आमक गाछ मनुखक केतेको पीढ़ी देखलक आ केते आगूओ देखत। ओना आगूक निसचित बिसवास नइ कएल जा सकैए, जेना पैछला अछि, मुदा बिसवास नहियोँ कएल जाए सेहो तँ उचित नहियेँ हएत। ओना, जहिना सौंसे बाधमे एकटा गाछ रहने एगच्छा भेल, तहिना हजार बीघाक आमक गाछीमे एकटा बेलक गाछ सेहो तँ एगच्छा भेबे कएल। आमेक गाछी किए, तहिना फुलवाड़ियो सभमे होइते अछि...। एगच्छा रहितो ओ आमक गाछ बुर्ड़ाक तँ ऐछे। अपन चालि-बाइन धेनहि अछि। बुर्ड़ाक ई जे अनरनेबा आ धात्री जकाँ बिनु जोड़े[1] जीबैक आशो नहियेँ रखने अछि, सेहो बात नहियेँ अछि। असगरे बाधमे अछि, फड़बो करैए, मोजरबो करैए, हरियेबो करैए, फतझड़ो होइए, मुदा जीबठ बान्हि जीबो तँ करिते अछि। नइ-ते असगरे जेना बाधमे अछि तेना अनरनेबा आबि धात्री जकाँ वंशो उपैट गेल रहितै। सभ बबाजीए बनि गेल रहितै। होइतो अहिना छै जे जे समैक मुकावला नइ करैए ओ मेटा जाइए। ओकर वंशक बाढ़ि रूकि जाइ छै, मटियामेट भऽ जाइ छै। पंचतत्वमे विलीन भऽ जाइए। द्वापर युगीन एकलव्य जकाँ ओ एगच्छा आमक गाछ अपनाकेँ बुझैत। जहिना शक्त-शील एकलव्य अपनाकेँ शक्तिवान बनबैले शक्तिशालिनीक आराधना केलैन तहिना ओहो आमक गाछ असगरे बाधक नीचला डेढ़-कट्ठबा परतीपर ठाढ़ भेल अपनाकेँ बुझैत। गाछो-बिरीछक दुनियाँ तँ ऐछे। हजारो-लाखो रंगक गाछ-बिरीछक बोनाएल दुनियाँमे की सबहक वंशो आ वंशवृद्धियो एके रंगक थोड़े अछि। कोनो बीआसँ जनमैए तँ कोनो फूलसँ, कोनो पत्तासँ जनमैए तँ कोनो गाछक सीरसँ...। केकरो सिर माटिक तरमे रहै छै तँ केकरो पानिक तरमे। केकरो डारियेमे सिर होइ छै तँ केकरो फुनगीपर...। वेचारा आमक गाछकेँ मन ठहिअए लगलै। ठहियाइते मनमे उठलै अनेरे दुनियाँक बोनमे मनकेँ वौआबै छी। तइसँ नीक जे अपन दिन-दुनियाँक बात बजबो करब, करबो करब आ जीबो करब। मन फेर ठमैक गेलइ। मुदा ठमैकते जेना तीन-बट्टीपर दिशांश लगितो छै, जइसँ पूब-पछिम भऽ जाइए आ पछिम पूब, तहिना दिशांश, छुटबो करै छै, जइसँ उत्तर-दछिनक बौध हुअ लगै छै। जे केमहरसँ एलौं आ केमहर जाएब। तहिना आमोक भक्क कनी खुजल। खुजल ई जे अपनामे अनरनेबो आ धात्रियोसँ बेसी शक्ति ऐछे। ओकरा दुनूकेँ जे जोड़ नइ भेटतै तँ छेहा नंगा बबाजी जकाँ भऽ जाएत, वंशो रूकि जेतै आ दुनियोँ ओकरा बिसैर जेतइ। मुदा अपना तँ से नइ अछि, सभ किछु अछि...। सभ किछु मनमे ऐबते एनामे जेना अपन मुँह अपने देखाइत तहिना अपन शक्ति अपना शकलमे देखलक। अपना धुनिमे गाछ धुनियाँक धुनकी जकाँ जिनगीक रूइयाकेँ धुनए लगल। हजारो-लाखो रंगो, भटरंगो आ चितकाबरो वंशक गाछ सभ तँ ऐछे, तहीमे ने हमहूँ एकटा भेलिऐ। जखन एकटा भेलिऐ, तखन एकेटा ने भेलिऐ। तखन दोसराइत जे ताकब से अपने दोसराइतमे किए ने इजोते-इजोत जाएब...। जिनगीक ओ बटोही जे नमहर जिनगीक बाट टपि आबि असोथकित भऽ जाइत तहिना वेचारा आमक गाछक मन असोथकित होइत ठमकल। देहमे शके ने बूझि पड़ै जे ठाढ़ रहत। हब टुटु साइकिल जकाँ मनक चक्का ने आगूए घुसकै आ ने पाछूए ससरै। जेना आइ ओ जिनगीक हारि कबूल कऽ लेत। मुदा से भेल नइ, भेल ई जे हुब टुटू मन बाजल- “आब, ई दुनियाँ देखब कठिन भऽ गेल।” पजरेमे हूब घटू बाजल- “बुड़ि कहीं के रे! ब्रह्मा सन-सन केते ब्रह्माकेँ देखनिहार लोमस बाबा लोहिया ओढ़ि कऽ देखलैन आ तूँ एतबेमे धौना फेड़ै छेँ। एकटा पएरबला कनी नेंगरा कऽ चलत, मुदा चलत किए ने। कोनो कि लोथ छी।” हूब घटूक हब टुटु विचारकेँ वेचारा आमक गाछ विचारणीय बूझि विचारए लगल। मनमे एलै- गाछ-बिरीछक बोनाएले दुनियाँमे एकटा हमहूँ छी। रंग-रंगक रूप, रंग-रंगक चालि-ढालिक जिनगी सभकेँ अपन-अपन छै। कियो बीआसँ गाछ होइए, तँ कियो फूलसँ...। ‘फूलोसँ गाछ’ मनमे ऐबते एगच्छा आमक गाछ ठमैक गेल। ठमकल ई जे अपन वंशक रस्ता की अछि। एकटा भेल पाकल आमक सक्कत आँठीसँ, दोसर भेटबे ने करइ। मनमे उठै जे हमर वंश कि एक भग्गुए रहि गेल...। आगू-पाछू किछु भेटबे ने करइ। भेटबो केना करितै, अखन तकक नजैर बीये-बाइलिक देखल-सुनल छेलै। मुदा नजैर जखन आगू बढ़लै तखन बूझि पड़लै जे नै हमरो उपैतक दोसरो रस्ता अछि। ओ अछि बच्चा गाछक छातीसँ कलशल डारि सटा देने नव गाछ बनि नव जीवन सेहो तँ ऐछे। तखन जिनगीसँ निराश किए हएब। मुदा जिनगी लेल जे समए-शक्तिसँ मुकावला करए पड़ै छै ओकर अनेको रूपमे दूटा कारण प्रमुख अछि। एक अछि समए-शक्ति जइमे जिनगी निहीत अछि आ दोसर अछि दानब-मानब वृति...। एका-एक ओइ एगच्छा आमक गाछक मन फुला गेल। फुलाइते अठ्लाइत बाजल- “हम लाल छी।” जुहियाइत जूही बाजल- “जेहने सतरंगी रंग तेहने सतरंगी चालियो ने छौ। मरदक लाल जहिया बनमेँ, तहिया बुझबौ।” मनमे उठैत खौंझकेँ रोकैत गाछ विचारए लगल। भाय सात अरब लोकमे केकरो एते फुरसैत छै, जे दोसरो दिस ताकत आकि देखत। बाप भरि दिन बेटा-ले पसेना छोड़बैए ओकरा तँ एते फुरसैते ने छै जे अपना बेटाकेँ कम-सँ-कम अपनो वंशक इतिहास आ समाजिक सरोकार बुझा सकत आ अनका कोन मतलब छै। जहिना कोनो हरेलहा बात, सोचै-विचारै काल जखन मन पड़ै छै, तखन अनेरे अपनो मनमे फुलाइत हँसी उठै छै तहिना ओइ एगच्छा आमक गाछकेँ सेहो भेल। मन पड़लै अपन लगौनिहार रखबार, केना असकरे बाधमे ठाढ़ छी,जहिना सभ-ले अन्हर-विहाड़ि, झाँट-पाथर छै तहिना ने हमरो-ले अछि...। एगच्छा आमक गाछक आगू घुसलक मन बुदबुदाएल- “अपन सर्वांग जिनगीक रक्छा अपने अपने-अपने करैक लूरि-बूधि हएत तखन ने रकछित रहि सकै छी।” लगले दोसर मन टोकलक- “मातृभूमि केकरा कहै छै, ओकर रकछक के छी?” अउत्तरित प्रश्न आमक गाछक मनमे उठए लगल। मुदा कलशक डारिक नव गाछक रोहानी देख मन रहैम गेलइ। रहैमते फुला गेलइ। फुलाइते उठलै- “अदौसँ जीव-जन्तुक संग रमैत एलौं अछि आ आगूओ अहिना रहता जोगी बनि रमैत एगच्छा नइ सत्-गच्छा बनि इन्द्रधनुष जकाँ अकासमे फुलाएब।” ◌ शब्द संख्या : 1167, तिथि : 31 दिसम्बर 2015 [1] प्राग क्रिया ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-६ टा कविता ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- वञ्चित धार ३.४.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- - २ टा गजल २.विजयनाथ झा- तीन टा कविता आशीष अनचिन्हार २ टा गजल गजल 1 बड़ झूकैए जागल लोक बड़ सूतैए जागल लोक छै खन अनुखन सदिखन दर्द बड़ कूथैए जागल लोक हम्मर तोहर ओक्कर नाम बड़ बूझैए जागल लोक अप्पन टेटर आनक घेघ बड़ दूसैए जागल लोक इम्हर खधिया उम्हर भूर बड़ मूनैए जागल लोक हीरा मोती माणिक संग जश लूटैए जागल लोक सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम अछि 2 हम झुट्ठेमे अपसियाँत तों सत्तेमे अपसियाँत नहियें पी सकलै शराब जे चिखनेमे अपसियाँत सभ खा गेलै खेनहार किछु पत्तेमे अपसियाँत जकरा लग सालक हिसाब से महिनेमे अपसियाँत के छै अनचिन्हार लेल सभ अपनेमे अपसियाँत सभ पाँतिमे 222-22-121 मात्राक्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ६ टा कविता १ सोझ बाट सोचलहुँ बाट ई सोझ, एकर अनुसरण करी । कुटिल वक्र तजि, सरल सोझ केर वरण करी ।। पर दुनिञामे सोझ कहाँ, कत्तहु धरती छै । बिनु किछु उगने साफ कहाँ, रहइछ पड़ती छै । पड़ती जञो छोड़ल, तँऽ उपजै, काँटे अगबे । सरल सोझ आ स्वच्छ सुगम अछि बाटे कतबे । जतेक दूर दुर्गम अगम्य, अछि से अतिपावन । जतेक विलक्षण विश्मयकारी, ततेक सोहाओन । अखड़ल जकरा, कहलक, बाटेँ हवन करी । अति विशिष्ट लए, ओहि कातेँ अहँ गमण करी ।। एहि सृष्टिक तँऽ इएह एक छै, नियम सनातन । सरल सोझ केर एहिठाँ नञि छै, जीवन-यापन । जञो रहितए तँऽ, पृथिवी गोल किए कऽ रहितै ? एकर सतह, पर्बत – पहाड़ - घाटी नञि रहितै । नदी असंख्य, धरती पर सदिखन सोझेँ बहितै । चक्रबात - बिर्रो आ बबण्डर सेहो ने अबितै । आब सोचै छी, हमहूँ वक्रेँ भ्रमण करी । जएह रूचए दुनिञाकेँ, तहिना रमण करी ।। दुर्लभ चीजक दुनिञामे छै - मोल बहूते । सर्वसुलभ धूरा फाँकए, नञि पूछए लोके । सर्वसुलभ छी हवा - पानि, सोचल की अपने ? हीरक मोल - अमोल भेल, नञि भेटए जखने । हीरा सेहो जञो सपाट, होइए कम दामक । गेल तरासल, कुटिल भेल, बूझू बड़ काजक । दुनिञामे जिउबा केर इच्छा वरण करी । दुनिञादारी सीखी, तकरेँ नमण करी ।। वक्र सुलभ, पर सोझ बाट भेटए ने तकने । सोझेँ भेल विशेष, जखन दुर्लभ छी तखने । मुदा सोझ केर जिनगी संकटसँ छी भरले । सोझ बाँस कटि गेल, टेढ़ एखनो छै लगले । दुनिञा सोझक लेल कहाँ कहियो रहलैए । सोझ सरल अनुशासित से गदहा कहबैए । सोझ जौड़केँ गीरह दऽ लगबै सभ ओझड़ी । तहिना सोझ मोनमे सेहो लागल घुरछी । असमञ्जसमे मोन, सोचए की एखन करी । सोझ चली कि वक्र, ककर अनुसरण करी ।। २ मंगलमय हो नव वर्ष मोन पड़ैतछि, आइ नगद आ काल्हि उधारी । हमरा सभकेँ, लागल किछु एहने बेमारी ।। हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी । विगत् वर्षकेँ, अपना – अपनी, खूब लतारी ।। पिछला साल, सेहो स्वागत छल, एहि नववर्षक । आइ पुनः, स्वागत करैत छी, अगिला वर्षक ।। गओले गीत ओ, पुनि गबैत छी, अछि लाचारी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। विगत् वर्ष, जे छल आगत, से नञि तत् नीके । नव आगत, करी पुनि स्वागत, होयत सब ठीके।। जे ने कटल, से कटि जायत, सब संकट भारी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। आबि रहल अछि, एक जनबरी, नऽव साल छी । पुनि होली, नव वर्षक स्वागत, तेँ बेहाल छी ।। कहिया–कहिया, कतेक–कतेक, नव वर्ष मनाबी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। विगत् वर्ष, कंगाल – दिगम्बर, बुझले अछि से । नवल वर्ष, होयत विश्वम्भर, होइछ भरम से ।। कर्म करू, तजि सभ आडम्बर, औना - पथारी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। ३ तमघैला भरि – भरि अनलहुँ (कविता) मिथिला देखए गेल छलहुँ, हम बहुते मिथिला देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। ब्राम्हण केर मिथिला हम देखल, आ हरिजन केर मिथिला । सिक्ख ईसाई मुसलमान केर, बौद्ध – जैन केर मिथिला । पढ़ुआ केर मिथिला हम देखल, मुरूखक देखल मिथिला । गामक मिथिला अलगे भाखल, शहरक अलगे मिथिला । भारत केर मिथिला सेहो देखल, आ नेपालक सेहो देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। बेतिया, मोतीहारी, वैशाली, सीतामढ़ी आ शिवहर । दरिभंगा, मधुबनी, समस्ती – पुर दुहु संग मुजफ्फर । किशनगंज, पुर्णिञा, अररिया, बेगूसराय खगड़िया । बीच कौशिकी अछि सुपौल, मधेपुराक संग सहरसा । कटिहारक मिथिला देखल, हर घाटक पानिकेँ चिखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। दानवीर कर्णक धरती जे, अंगक क्षेत्र रमणगर । ततहु देखल मिथिला माएक, आँचर केर छाँह मनोहर । बाबाधाम ओ आस-पास केर, देखल अलगे मिथिला । मिथिलापुत्रक संग बसल, अगनित प्रवासमे मिथिला । भारत ओ विश्वक हर कोणा, अलगे मिथिला देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। मिथिला केर हर रूप मनोहर, सुन्नर छवि अभिराम । कहाँ केओ छल श्रेष्ठ आ दोसर, दीन – हीन सन्तान । जतऽ कतहु जे छथि मैथिल, से राखथु अप्पन मान । आ प्रवास केर क्षेत्रक सेहो, देथु उचित सम्मान । भारत ओ नेपालमे अलगे, मिथिला केर माँगकेँ देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। ४ ।। नववर्ष मंगलमय हो ।। नववर्ष मंगलमय हो । नववर्ष मंगलमय हो । शुभ भावनाक उदय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। नव प्रेरणाक लय हो । नव सर्जनाक उदय हो । ई विश्व ऊर्जामय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। दुःख - क्लेश केर क्षय हो । नञि वेदना आ भय हो । सभ स्वस्थ ओ निर्भय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। सुख - शान्ति केर जय हो । बस सत्य टा अजेय हो । नव चेतनाक उदय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। ५ परिवर्तन परिवर्तन जिनगीक नियम छी, परिवर्तन होएबे करतै । वर्तमान जे घटित भऽ रहल, से अतीत होएबे करतै ।। परिवर्तन नहि रोकि सकै छी, परिवर्तन तँऽ शाश्वत छै । एकर सिवा सबकिछु धरतीपर, अजर-अमर नञि, नश्वर छै ।। परिवर्तन केर नियम सृष्टि केर, एकमात्र उत्प्रेरक छी । आदि – अन्त, निर्माण – ध्वंश केर, इएहमात्र सम्प्रेरक छी ।। काल बुझू वा समय कहू, एकरहि रूपेँ परिलक्षित अछि । जगत नचाबए इएह नियम, अपने तँऽ अतिसंरक्षित अछि ।। अनुकूलेँ हो वा प्रतिकूलेँ, परिवर्तन नहिञे रुकतै । परमेश्वर केर परमशक्ति ई, अपन राह चलबे करतै ।। मानव जे प्रतिकूलहुमे, अनुकूल बाट एक बना सकए । सएह जीवनक चित्रपटक, सर्वोत्तम अभिनेता कहबए ।। ६ सहनशीलता (कविता) सहबाक गुण छी पुज्य, जा धरि पार ने सीमा करए । तकर बादो जे सहए से, कायरक उपमा पाबए ।। सहनशील मनुक्ख बढ़िञा, जा उचित कारण रहए । जँऽ अकारण आ हो अनुचित, सहल तँऽ पामर बनए ।। ओ युधिष्ठिर आ कि रघुवर, शास्त्रमे सुन्नर लागथि । हर धिया केर माए चाहथि, जमाए शिवशंकर बनथि ।। मिथिलाक बेटी छथि सिया, तेँ पुज्य भरि मिथिलामे ओ । भाग सीता सनि कहए सब, ने हमर ललनाक हो ।। देखि रहलहुँ मूक - चुप, मिथिलाक वैभव लुटि रहल । सहन करबा केर हद, कखन धरि सभ चुप रहब ?? ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल वञ्चित धार बढ़त दिन पेब दीन बढ़ि-बढ़ि घटती पेब घट घटऽ लगै छै। घटत-बढ़त बेर बिनु बुझने दोसर-तेसर सिरचढ़ बनै छै। दोसर-तेसर चिरचढ़ बनै छै। सचिया साँच सोच सचिया बीच विचार बिचड़ए लगै छै। बीच बिचबल धड़ धार धैड़ चीत चीतवन चिनतए लगै छै। चीत चीतवन चिनतए लगै छै। चित्र-पट चीत चिन्त्य चेत उत्तरे-दछिने धरियए लगै छै। पेब पनवट उत्तर उतैर वञ्चित धार धड़-धड़ बहै छै। वञ्चित धार धड़-धड़ बहै छै। वञ्चित धार धरधरा बहै छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- २ टा गजल २.विजयनाथ झा- तीन टा कविता १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल 1. मात्रा क्रम : 2 2 2 2—1 2 ---122 किछु कहबाले’ गजल कहै छी किछु जनबाले’ गजल कहै छी अनको सूनब बहुत जरूरी चुप रहबाले’ गजल कहै छी पेटक पीड़ा कते कनाबय से बुझबाले’ गजल कहै छी किछु करबाले’ करू तपस्या तप करबाले’ गजल कहै छी सबहक नीचाँ बहुत-बहुत जन दुःख सहबाले’ गजल कहै छी पड़ले रहबै अहाँ कखन धरि हम चलबाले’ गजल कहै छी रोकत ककरो कियो कतौ नै तँइ बढबाले’ गजल कहै छी देशक बाहर रहब कते दिन घर घुरबाले’ गजल कहै छी 2. मात्रा क्रम :222-221-122 हम काव्यक रसपान करै छी गंगामे असनान करै छी कत्तहु नहि भगवान धरापर हमहूँ ई अनुमान करै छी जिनका बलपर धरणि ई हरियर हम हुनकर सम्मान करै छी जे हमरा बुधियार बुझै छथि हम हुनके गुणगान करै छी खेलौं हम गुटका कि सुपारी हम अपने अपमान करै छी अनकाले’ हम खाधि खुनै छी अपनाकें धनवान करै छी सुन्दर हो सभ लेल ई धरती नव-नव अनुसन्धान करै छी (तेसर आ सातम शेरमे पहिल पांतिमे एक-एक टा दीर्घकें लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि ) २ विजयनाथ झा तीन टा कविता 1 . नव वर्षक एहि मधुर पहरमे नव वर्षक एहि मधुर पहरमे समुपस्थित सब बंधु-प्रवरमे अभिनंदन वंदन प्रतिवेदित हास होइ उल्लास नवोदित। भाव-स्वभाव भरल हो समता सुरभि-स्नेह पसरय घर-घरमे। बाटि रहल छी हर्ष समुज्वल- सभक लेल हम गाम-शहरमे। --------------- 2. हमर नाम परिचय सादर सुरत हम हमर नाम परिचय सादर सुरत हम नमन कोटिश: देश भारत भरत हम। ललित रूप वैविध्य अछि गाम घर-घर नगर सब समुन्नत क्रिया, कर्म, व्रत हम। हमर सभ्यता अछि पुरातन, सनातन प्रगतिशील तैयो विनयशील नत हम। समर मे शौर्य सिद्धांत संबल तिरंगा हमर प्राण प्रिय प्राणवत हम। सदाचार, सुविचार, संयम, सुरक्षा बहुरूपता लौह, पारद, रजत हम। वैविध्य व्यंजक विविध रूप आखर लालित्य- लावण्य उल्लासरत हम। हमर स्वाभिमानक कथा लोमहर्षक कएल त्याग उत्सर्ग वाणीवरद हम। विविधता हमर धर्म परिचय सुरुचिगर हमर लोक परिवार संयुक्त शत हम। हमर आंकलन क' रहल आय दुनिया समादृत सभक बीच संसारवत हम। ------------------------- 3. चेतना केर नव सृजनमे चेतना केर नव सृजनमे भाव नूतन खास भरिऔ, व्यंजना चमकम मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ। संग पुरबामे अहां केर अछि युवा पीढ़ी सबल, मार्गदर्शन हो सुपथगर मिथक नव इतिहास भरिऔ। शब्द श्रद्धांजलि समर्पण ओ करू जे प्रेरणा प्रद, गूढ़ नहि गुण ग्राह्य सब लए भ्रम रहित विश्वास भरिऔ। ज्ञानकेर देखल अनादर वेदना ई कष्ट भारी, नहि उचित अवहेलना ई द्वेष नहि आवेश भरिऔ। शक्तिपीठक मूल थाती ऋषि मुनिक ई यज्ञशाला, शैव विद्यापति प्रकाशक चहुमुखी विन्यास भरिऔ। शब्द बीथी मे नुकाएल कांट-कुश सब कात केने, शरद सायं भोर फागुन लोक मे उल्लास भरिऔ। पर्व ई गणतंत्र सम्मुख सांस्कृतिक अवदान धएने पुरिऔ संबंध-दृढ़ता लोक हिट सायास भरिऔ। चेतना केर नव सृजन में भाव नूतन खास भरिऔ। व्यंजना चकमक मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ। पर्व ई गणतंत्र सम्मुख सांस्कृतिक अवदान धएने, पूरिऔ संबंध-दृढ़ता लोक हित सायास भरिऔ. चेतना केर नन सृजनमे भाव नूतन खास भरिऔ, व्यंजना चकमक मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक १.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ६ टा बाल कविता १ आशीष अनचिन्हार बाल गजल बड़ सुंदर गलफुल्लू बौआ घोड़ा गदहा उल्लू बौआ अंगो भीजल पेन्टो भीजल बड़ मूतै छुलछुल्लू बौआ इम्हर कानै उम्हर बाजै बड़ खच्चर गँड़िखुल्लू बौआ हरियर पीयर उज्जर कारी लाल गुलाबी बुल्लू बौआ आमुन जामुन इमली सिमली गाछे गाछे झुल्लू बौआ सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि चारिम शेरक दोसर पाँतिमे अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि २ डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”-- ६ टा बाल कविता १ बेङ्ग (बाल कविता) देखू ! देखू ! ई छै बेङ्ग । टर्र-टेँ, टर्र-टेँ करइछ बेङ्ग ।। हरियर - पीयर ढाबुस बेङ्ग । गाल फुला कोना बाजए बेङ्ग ।। खत्ता - डबरा - पोखरि बेङ्ग । मेघक लगितहि कुदकए बेङ्ग ।। बेङ्गहि सनि देखू ई भेंक । पर ने टर्र - टर्र करइछ भेंक ।। बौआ फेंकलक जुमा कऽ ढेप । डुम्मी काटि कऽ भागल बेङ्ग ।। बेशी सर्दी, बेशी घाम । सहि ने पाबए ओक्कर चाम ।। तेँ बरिसातक पहिने - बाद । माटिक तऽर रहए निर्बाध ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - देखबामे एकरंगाह होएबाक कारण भेंक आ दादुर मैथिली साहित्यमे − विशेषतः काव्य साहित्यमे − बहुधा बेङ्ग केर पर्यायवाचीक रूपमे प्रयुक्त होइत अछि परञ्च ई दुहु वास्तवमे अलग - अलग जीव थिक । बेङ्ग केर त्वचा स्निग्ध आ चिक्कन होइत अछि, ओकर जबड़ामे दाँत होइत अछि, नर बेङ्ग टर्र -टेँ केर अबाज निकालि सकैत अछि जखनि कि भेंक केर त्वचा सुखाएल आ खरखर होइत अछि, ओकरा दाँत नञि होइत अछि तथा ओ बेङ्ग जेकाँ अबाज नञि निकालि सकैत अछि । बेङ्गक बच्चाकेँ “बेङ्गची” आ भेंकक बच्चाकेँ“भेंकशिशु” कहल जाइत अछि जकर प्रारम्भिक अकार माछक बच्चा सनि होइत अछि आ विभिन्न स्तरक कायान्तरण प्रक्रिया(METAMORPHOSIS) केर बाद चिरपरिचित वयस्क स्वरूपकेँ प्राप्त करैत अछि । · बेङ्ग / बेंग (मैथिली) = मेंढक (हिन्दी) = FROG (ENGLISH) = Rana spp. & Others (जैववैज्ञानिक नाम) · भेंक / दादुर (मैथिली) = भेंक / दादुर (हिन्दी) = TOAD (ENGLISH) = Bufo spp. & Others (जैववैज्ञानिक नाम) बेङ्ग आ भेंक - ई दुहु उभयचर वर्गक जन्तु अछि अर्थात पानि आ माटि दुनु स्थानमे विचरण करैछ ( उभय = दुहु / दुनु तथा चर = विचरण कएनिहार / रहनिहार) । उभयचर वर्गकेँ अंग्रेजीमे क्लास एम्फिबिया (Class AMPHIBIA) (Amphi = Both & Bion/Bios = Life) कहल जाइत अछि । उभयचर वर्गक जन्तुसभ शीतरक्तीय / अनियततापी / बाह्यतापी (COLD BLOODED / POIKILOTHERMIC / ECTOTHERMIC) जीव होइत अछि यानि कि ओकरसभक शरीरक तापमान वातावरणक तापक्रमक अनुसार घटैत बढ़ैत अछि । तेँ वातावरणक तापमानक बहुत बेशी कम होएब आ बहुत बेशी बढ़ब एहि तरहक जीव सभक लेल जानमारुक होइत अछि । एहना अवस्थामे ओ सभ जमीनक भीतर नुका जाइत अछि । चुँकि जमीनक भीतरक तापमान जमीनक ऊपर जेकाँ घटैत - बढ़ैत नञि अछि तेँ ओ एतए सुरक्षित रहैत अछि । एहि समय ओ जीवसभ बेशी हलचल नञि करैत अछि आ जिउबाक लेल पुर्व सञ्चित भोजन (चर्बी) पर निर्भर करैछ । गर्मीक समयमे एहेन प्रक्रियाकेँ गृष्मनिद्रा (AESTIVATION / ESTIVATION) आ ठण्ढीक समयमे शीतनिष्क्रियता(HIBERNATION) कहल जाइत अछि । शरीरक तापसन्तुलनक (THERMOREGULATION) एहि तरहक प्रक्रिया सरिसृप वर्ग(Class REPTILIA) केर प्राणीसभमे (यथा - साँप आदिमे) सेहो देखल जाइत अछि । पक्षी आ स्तनपायी वर्ग (Class AVES & MAMMALIA) केर जीव (मनुक्ख सेहो) ऊष्णरक्तीय / नियततापी / स्थिरतापी / अन्तःतापी / अन्तर्तापी (WARM BLOODED / HOMEOTHERMIC / ENDOTHERMIC) होइत अछि अर्थात ओकर सभक शरीरमे एहेन व्यवस्था रहैत छै कि वातावरणक तापक विरुद्ध ओ सभ अपन शरीरक तापमानकेँ एकटा निश्चित सीमामे बनओने रहैछ । २ धनछुआ (बाल कविता) अपनहि खेत खरिहान रहैए, ई तँऽ छी धानछुआ । उच्चारण करबामे बाजी, एकरे तँऽ धनछुआ ।। तार पर बैसए, मेह पर बैसए, बैसए ओ खुट्टा पर । धानक ढेरी चट छू आबए, बैसए जा ठुट्ठा पर ।। शायद इएह गुणक कारण, ओ धानछुआ कहबैए । गौरसँ देखबै, तखने बुझबै, एना किएक करैए ।। छोट छोट कीड़ा आ फतिङ्गा, धानक ढेरीमे बहुते । खा कऽ तकरा पेट भरैए, छोड़ि धानकेँ अगबे ।। एकरे देखि कऽ कहबी बनलै, अगराहीक धनछुआ । लोक बजैए अर्थ ने बूझए, चीन्हए ने धनछुआ ।। एकरहि एगो छै भैय्यारी, ओ करिया धनछुआ । लोक बुझैए ओकरा कोइली, पर छी ओ धनछुआ ।। भेटत जोतला खेतमे या फेर, जाहिठाँ जमकल पानि । खा कऽ जीबए कीड़ा−मकोड़ा, करए जे उपजा हानि ।। बड़ हल्लुक, खऽढ़क ऊपरमे, देखबै एकरा बैसल । बस कारी भेने की कोइली, गाबैत कहिया देखल ?? संकेत आ किछु रोचक तथ्य - Ø धानछुआ या धनछुआ - धूसर-मटियारी या किछु−किछु छाउरक रंगक चिड़ैविशेष जकरा अंग्रेजीमे ऐशी ड्रोङ्गो (ASHY DRONGO) कहल जाइत अछि । Ø करिया धनछुआ - कारी रंगक चिड़ैविशेष जकरा अंग्रेजीमे ब्लॅक ड्रोङ्गो (BLACK DRONGO) कहल जाइत अछि । सामान्य लोक आ धियापुता कारी रंगक कारण एकरहि कोइली बुझि लैत अछि । संस्कृतमे एहि चिड़ैकेँ धुत्त कारी होएबाक कारण “भृंगराज” नामक पक्षी कहल गेल अछि । Ø कोइली - कारी रंगक चिड़ैविशेष जे कि भारतीय ओ आन वाङ्गमयसभमे अपन मधुर आबाजक लेल प्रशिद्ध अछि । हिन्दीमे एकरा कोयल आ अंग्रजीमे कुक्कू (CUCKOO) कहल जाइत अछि । Ø कोयली - आमक आँठीक भीतरमे उज्जर रंगक कोमल संरचनाविशेष । Ø मैथिलीमे “कोइली” आ “कोयली” श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द भेल । मतलब कि एहेन शब्दसभ जे सुनबामे एकरँगाह लगैत अछि पर ओकर अर्थ अलग−अलग होइत अछि । ३ उल्लू (बाल कविता) रातिमे कचबच कचबच करइछ, नाम ओकर कचबचिया छै ।१,२ ई नञि दूर देश केर प्राणी, अपनहुँ ठाँ बारहमसिया छै ।। आँखि ओकर दुहु गोल - गोल, गोलका भाँटा केर तरुआ सनि । नाक सपाट आ लोल सुकुच्ची, आँखिक सोझाँ मड़ुआ सनि ।। दुनिञा अचरजसँ देखै छै, ओ दुनिञाकेँ अचरजसँ । राति इजोरिया खौंझाएल मन, निन्न जँ टूटल कचबचसँ ।। आँखि एकर किछु खास बनल छै, रातिमे सभ किछु देखबा लए ।३ दिनुका इजोत चोन्हराए आँखि, छै बनल ने दिनमे देखबा लए ।। गर्दनि छै सेहो किछु विशेष, ओ घूमि जाइत छै चारू कात ।४ इएह सब देखि कऽ लोक कहैए, एक्कर भूत - परेतक साथ ।। राति इजोरिया साँझक झलफल, मूँह लागए जेना हो लुच्चा । मूँहक भाव - भंगिमा गजबे, कहबै तेँ ओ मूँहदुस्सा ।।१ अपना सभक समाजमे मूर्खक, उल्लू बनि गेल छै पर्याय । दिन सूतए छै, राति जागए छै, तेँ एहेन कहबी छै भाय ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - १ - मूँहदुस्सा, कचबचिया आदि मैथिलीमे उल्लू (OWL) केर पर्यायी नाम अछि । २ - “कचबचिया” नाम मैथिलीमे उल्लूक अतिरिक्त एकटा आन चिड़ै लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि । एहेन शब्द जकर अलग−अलग स्थान पर अलग−अलग अर्थ हो वा अलग−अलग चीजक बोध करबैत हो मैथिलीमे अनेकार्थक शब्द कहबैत अछि । दू अलग−अलग तरहक चिड़ै केर बोध करएबाक कारण “कचबचिया” शब्द अनेकार्थक भेल । ३ - उल्लूक आँखि बहुत कम प्रकाशमे देखबाक हेतु समायोजित रहैत अछि । तेँ ओकर बनावट किछु विशिष्ट होइत अछि । उल्लूक आँखि कम प्रकाशमे दूरक वस्तुकेँ देखबा लेल बनल अछि आ ताहि कारणेँ ओ अपना लऽगक (आँखिसँ किछु सेन्टीमीटरक परिधिमे) वस्तुसभकेँ एकदम्मे नञि देखि सकैत अछि । ४ - उल्लूक गर्दनि मे १४ टा ग्रीव कशेरुक हड्डी (CERVICAL VERTIBRAE) होइत अछि जखनि कि मनुक्खमे मात्र ७ टा । मनुक्खक गर्दनि मात्र करीब १७० सँ १८० डिग्री धरि घुमि सकैत अछि जखनि कि उल्लूक करीब ३४० सँ ३५० डिग्री धरि । तेँ उल्लू एक ठाम बैसल - बैसल अपना शरीरकेँ बिना हिलएने - डोलओने, बस अपन गर्दनि घुमा कऽ अपन आगाँ आ पाछाँ सेहो देखि सकैत अछि । रातिमे विचरण करबाक कारण रात्रिचर अछिए । इएह अद्भुत गुणसभक कारण मनुक्ख ओकरा भूत-परेतक पर्याय मानैत अछि । ४ सुग्गा (बाल कविता) पोखरिक भीड़, लतामक गाछ । ताहि पर सुग्गा करैए नाच ।। जहिना पात लतामक हरियर । तहिना सुग्गाक रंगो हरियर ।। बैसि नुकाएल खाए लताम । मनुजक आहटि, चौंकल कान ।। हेंजक - हेंज अबैए बेस । खाए लताम ओ खेपक - खेप ।। ककरहु गर्दनि लाल लकीर । केओ बिना लालहि अछि कीर ।। लाल लोल सुन्नर लागैए । खोधि-खाधि सब फऽड़ चीखैए ।। ऊँचगर गाछक बेस क्षुपुङ्ग । धोधरिमे सब रहए उत्तुङ्ग ।। छै स्वतन्त्र उड़बाक सिहन्ता । मनुक्खक हाथ अभागक चिन्ता ।। पकड़ाएल, की करत उपाए ? पिञ्जरा नञि छै रहल सोहाए ।। सुग्गाक विश्वमे बहुत रास जाति ओ प्रजाति पाओल जाइत अछि । एकर रंग हरियर, लाल, पीयर, नील, धूसर-मटियारी आ एहि रंगक विभिन्न प्रकारक फेंट-फाँट भऽ सकैत अछि । एहि कवितामे सामान्य रूपसँ भारत ओ खास कऽ मिथिला क्षेत्रमे पाओल जाएबला सुग्गाक वर्णन कएल गेल अछि । ५ बिढ़नी आ पचहिया (बाल कविता) ई बिढ़नी, ओ बिढ़नीक खोंता, बुझलह की ने बौआ । दूरे रहिहह, काटि लेतह, कटिते बनि जएबह कौआ ।। बिढ़नी कटतह, थुम्हा फुलओतह, करए ने जाह उकाठी । सम्हरि कऽ खहिहह आमक गाड़ा, देखलक बिढ़नी बाटी ।। आमक महिना अबितहि बिढ़नी, जानि कतऽसँ आबए । आमक चोभा लगबए बुच्ची, काटि कऽ तखने भागए ।। मधुमाछी सनि देखबामे अछि, पर नञि मऽध बनाबए । पर खोँतामे एक्कहि रंगक, कोठरी कोना बनाबए !! कम बिषाह पीयर बिढ़नी, कहबए “साधारण बिढ़नी”। लाल आ कारी देहमे धारी, इएह “पचहिया बिढ़नी”।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - · बिढ़नी आ पचहिया दुहु एकरँगाह होइतहुँ एक-दोसरासँ किछु विशिष्ट अन्तर रखैछ । · अंग्रेजीमे वास्प (WASP) शब्दसँ उड़एबला कीड़ाक एकटा बहुत पैघ समुदायक बोध होइत अछि जाहिमे बिढ़नी ओ पचहियाक अतिरिक्त आन बहुत तरहक सम्बन्धित कीड़ासभ अबैत अछि । · बिढ़नी गाछ-पातमे उपस्थित सेल्युलोज (CELLULOSE) नामक पदार्थकेँ अपना थूक या लेरमे (SALIVA) सानि अपन खोंताक (NEST)निर्माण करैछ । सेल्युलोज ओएह पदार्थ अछि जाहिसँ कागत (PAPER) बनैत अछि । तेँ एकरा अंग्रेजीमे पेपर वास्प (PAPER WASP)कहल जाइत अछि । एकर खोंतामे २०० सँ ५०० धरि कोठरी भऽ सकैत अछि आ हरेक कोठरी आकारमे एक समान रूपसँ षटकोणीय(HEXAGONAL) होइत अछि । एकर खोंताकेँ एकटा विशिष्ट छत्ता सनि आकार होइत अछि तेँ एकर खोंताकेँ छत्ता (COMB) आ बिढ़नीकेँ अंग्रेजीमे अम्ब्रेल्ला वास्प (UMBRELLA WASP) सेहो कहल जाइत अछि । · समान्य रूपसँ भेटए बला पीयरका बिढ़नीकेँ अंग्रेजीमे यॅलो पेपर वास्प (YELLOW PAPER WASP) कहल जाइत अछि । एकरअतिरिक्त आन कतेको तरहक बिढ़नी होइत अछि किछु एक रंगक तँऽ किछु पर दोसर रंगक धारी (BANDS) रहैत अछि । · मुख्य रंग (पीयर या नारंगी या आन) पर दोसर रंगक (कारी या भूरा) धारी (BANDS) पचहियामे सेहो भेटैत अछि पर पचहिया सामान्य बिढ़नीसँ आकारमे किछु पैघ होइत अछि । पचहियाकेँ अंग्रेजीमे हॉर्नेट (HORNET) कहल जाइत अछि । ई बिढ़नीएक किछु पैघ आ विशिष्ट रूप मानल जाइत अछि तेँ कतेक ठाम एकरा वास्प (WASP) या हॉर्नेट वास्प (HORNET WASP) कहि सेहो संबोधित कएल जाइत अछि । · सामान्यतः पचहियाक दंश बिढ़नीक दंशसँ बेशी खतरनाक होइत अछि । पचहियाक दँशसँ मनुक्खक मृत्युक घटना बेशी सोझाँ आयल अछि । ६ पहाड़ी मएना (बाल कविता) सोन चिड़ैञा, सोन चिड़ैञा, कोन देशसँ आबैत छी । पीयर देह आ कारी पाँखिमे, बहुतहि सुन्नर लागैत छी ।। आँखि छी कारी, मूरी कारी, लोल गुलाबी सुन्नर छी । ककरो-ककरो पर देखैत छी, मूरी सेहो पीयर छी ।। हमरा दिशि आबी बसन्तमे, ठण्ढी अबितहि भागैत छी । प्रायद्वीप*१ भारत कि अफ्रिका, ठण्ढी जाए बिताबैत छी ।। मएना सनक आकार अहँक, तेँ नाम “पहाड़ी मएना” छी । सोन चिड़ैञा नाम आन केर, अहँ केर तँऽ बस उपमा छी ।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ द्वीप (ISLAND / ISLET) ओ स्थलखण्ड थिक जे चारू कात सँ पानिसँ घेरल होअए आ प्रायद्वीप (PENINSULA) ओ स्थल खण्ड थिक जे तीन कातसँ पानिसँ घेरल हो पर एक कातसँ कोनो आन स्थलखण्डसँ जुड़ल हो; जेना कि भारतक दक्षिणी भू भाग । (प्रायद्वीप = प्रायः + द्वीप = जे द्वीप तँऽ नञि अछि पर लगभग द्वीप सदृश अछि = चारि नञि पर तीन भाग पानि हो जाहि स्थलखण्डक) । *२ एहि चिड़ैकेँ मैथिलीमे “पहाड़ी मएना” कहल जाइत अछि, जकर कारण सम्भवतः मएनासँ मिलैत - जुलैत एकर अकार - सुकार छी ।पीयर रंग हएबाक कारण एकरा सोन - चिड़ैञा केर उपमा देल गेल अछि जे कि एकर नाम नञि अछि । “सोन-चिड़ैञा” नामसँ मैथिलीमे एकटा दोसर चिड़ै केर बोध होइत अछि । ई हिन्दीक “पहाड़ी मैना”सँ बिल्कुल भिन्न अछि तेँ दुहु भाषामे एक्कहि नामक कारण भ्रमित नञि होउ । कारी माथबला पीयर रंगक चिड़ै जे ऊपरुका चित्रमे देखाओल गेल अछि तकर अंग्रेजी नाँओ BLACK HEADED GOLDEN ORIOLE थिक आ प्राणिशास्त्रीय या जैववैज्ञानिक (BIOLOGICAL / SCIENTIFIC) नाँओ Oriolus larvatus अछि । एहने चिड़ै जकर माथ सेहो पीयर रंगक होइत अछि से INDIAN GOLDEN ORIOLE कहबैत अछि आ एकर प्राणिशास्त्रीय नाँओ Oriolus kundoo अछि । मैथिलीमे ई दुहु प्रजाति “पहाड़ी मएना” कहल जाइत अछि आ दुहुक लोलक रंग मांसक सदृश गुलाबी होइत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १९३ म अंक ०१ जनवरी २०१६ (वर्ष ९ मास ९७ अंक १९३) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
मैथिली - skews / दादुर मैथिली - बेइग or हिल्दी tes args हिन्दी - मेढक अंग्रेजी -टोड (TOAD) हा जैववै० नाम - बुफो आदि (Bufo spp. & Others) eae नाम - सना आदि (Rana spp. & Others)
कह | “ © Oi Sastidhr Kumar “VWieha” Clee Eager © wr? oat aaa मैथिली - धनछुआ (धानछुआ) अंग्रेजी - एशी ड्रॉन्गो (ASHY DRONGO) * रे. . जैववैज्ञा० नाम - Dicrurus leucophaeus \ \ (डाइक्रुरस ल्युकोफ़ेकस)
बी & * है; ; \ © De. Shashidhar Kumar “Vid PN ST. atte व कर कि aha aa Faery’ मैथिली - सुग्गा हिन्दी - तोता संस्कृत - शुक, कीर अंग्रेजी - पैंट / पैराकीट PARROT / PARACHAET/ PARAKEET) * Gado नाम - सिट्टाकुला आदि (Psittacula spp. & Others) 2 कि... व SS de
ee Pack Gh iy, eae ee करनी H कर te see Re | Og es a ce f नि ,... हक 4 eS me 2७५ २११३ ना SN Ee Sd RO IFS ih ¥ Yeon ay Ros: ८. lg > . fa के paSfishidhar (जि फीक my oe Ages gy, oe | Paes oy ee जी... Oe a Bs Way's, are || मैथिली - करिया धनछुआ (करिया धानछुआ) व नि हिन्दी - भ्रुजंगा _ संस्कृत - भ्रृंगराज ——— al | ह_जैववैज्ञा० नाम - Dicrurus macrocercus (डाइक्रुरस मैक्रोसरकस) डंडा a a a ma
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है, Ke ; a i a ow 2. st BS a "= tg केन रन a "aig कर fie oo. ae “teas - a> के थे बिढ़नीक स्वॉता an sift खॉताक कोठरीक षटकोणीय संरचना मधुमाक्षी (-छी) सँ मिलैत - जुलैत अछि पर ओहिमे ase नजि रहैछ कारण कि fast ase afr बनवबैत अछि |
Ed r 4 . a ie ra? te i I uw" - ia ‘ a ae .. ies rs ' हू ने री | i #4 nell मे स i ©. | \.\ } nd | at il 9 कि दर ढ़ Dia? ana ऋ '. मैंथिली - विढ़ली (साधारण / पीयरकता आ आन रूंग-रूपक बिढ़ली) ar uaféar (फचडहिया बिढ़ली) हिल्दी - ततैंया, ay, ESI संस्कृत - Ne, Ne, aa, तृषसूक्किनु, विषशूक्त, विषशृड्गिनु, दंशिनु, कोष्ठागारिनू अंग्रेजी - PAPER WASP/S (विढ़ली) & HORNET/S or HORNET WASPS (पचहिया) जैतवैज्ञा० जाम - Polistes spp. , Ropalidia spp. etc. (बिढ़ली) & Vespa spp. (पचहिया)
मैथिली - sec, मुँढदुस्सा, कचबचिया हिन्दी - उल्लू... संस्कृत - उलूक अंग्रेजी - आउल (OWL) Piggy ab ’ ny iL be v/ जैतवैज्ञालिक लाम - Tyto, Strix, Otus, Megascopes, Bubo, Ninox, Asio, Glaucidium, आदि 26 वंशसभक (Genus / Genera) करीब 230 जाति (Species) DI सामुहिक जाम |