VIDEHA — Issue 194 / अंक १९४

Publication: VIDEHA · Issue: 194
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123 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' १९४ म अंक १५ जनवरी २०१६ (वर्ष ९ मास ९७ अंक १९४) १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.राजदेव मण्‍डलक लघु कथा- अवाक २.२.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- ठूठ गाछ (उपन्यास) २.३.जगदीश प्रसाद मण्‍डल-खटहा आम (लघु कथा) ३. पद्य ३.१.१.गंगानंद झा- नोरक उफनैत समुद्र् सँ २.आशीष  अनचिन्हार-गजल ३.जगदानंद झा मनु-गजल ३.२.१.कामिनी कामायनी- अंकोरवट मंदिर २.दिलीप कुमार साह- तीनटा कविता ३.३.नन्‍द विलास राय- दूटा कविता ३.४.१.रमेश-ताजीवन हमर नहि २. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- ४टा गजल ४.बालानां कृते-१.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २.किशन कारीगर- इस्कूल जाइत छी हम ३. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” किछु बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय ई-पत्र प्रणव झा आशीष अनचिन्हारक निबंध जँ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि" निक छल यद्यपि भूमिका के सापेक्ष निबंधक मुख्य अंग कनि छोट कहल जा सके अछि । बड्ड झुकै  ये जंगल लोक गजल गुड़गुड़ाब वाला अछि । धन्यवाद श्रद्धांजलि: मैथिलीक प्रसिद्ध लघुकथाकार श्री राजमोहन झा स्वर्गीय भऽ गेला। विदेह परिवार दिससँ श्रद्धांजलि। प्रबोध साहित्य सम्मान:श्री केदार नाथ चौधरीकेँ प्रबोध साहित्य सम्मान देल गेलन्हि। बधाइ। हुनकर चारू पोथीक लिंक नीचां देल जा रहल अछि। अबारा नहितन https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/ABARA_NAHITAN_KEDARNATHCHAUDHARY.pdf?attredirects=0 करार https://b3abfa1e-a-4ee7bb8f-s-sites.googlegroups.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/Karar_Kedarnath_Chaudhary.pdf?attachauth=ANoY7cqKfXmvdbkWcnhr8uSBMvjy-z2lxTF2tFrOilSNKrLOq0nDEuwht79ayYMW-nCrIrcVhrsOFtK4t9ja6wm6j_GfcaCDld_dUPJr7b8dzSHovG42OkMMiVmxqkgTPcf3knNBGg9TOZsxc45dq8XIVMLx25PQcnmbrmKC3NNMwW4HBzPpF4Eh-3NJ76sxi1QD1TNnzGubzgYBs7BLqMVV_x2z3l2LawBzIpU6ZELI9XEqPXhbBWmBPloLhzdIhCvxlNd4-75A&attredirects=0 माहुर https://b3abfa1e-a-4ee7bb8f-s-sites.googlegroups.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/Mahur_KedarnathChaudhary.pdf?attachauth=ANoY7cpv3TPGJx2xHFn19BXMBsTM8JzNB2qB97l7OTQwcL1Scg4PEw-hwAyEaFOQWsMr4LXxGcTSCZoE7e8UvFX3zm3vQvWsI1VjV9Ij0XAHFiXOl5kyigk37USsvwbdtgaZR_1tE4vcPhk6YsRw-2BnX5-WDARG67EDYGPvTQ-5BzZpXEhlY1WMqejBr3o94Ld2NDboUxRiU6p6kBlpUg8KnMHaJbdGzwG8FHIC7ZzW_ckagdUm2Rh8g5JBr26GqatrdPVQWo5b&attredirects=0 चमेली रानी https://b3abfa1e-a-4ee7bb8f-s-sites.googlegroups.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/CHAMELIRANI_MAITHILI.pdf?attachauth=ANoY7creiJ-LQ41ZdnxpY4ynw2yEvgnhlX5sUKbqB3mFZyf1tv_7TsCJSIasnua8qeAezrLrvj-q_3pyOcpMdC74fHdnwGPyYAOh1mgShob1kkSgWnqIgm-9YLAFKZS54KBHF3F-EuDBBhh2isgoI2PzMA4gorpEAdzGsTqGEQmjBU8b7AQEQi27zkwrx2JqsxHf1mm4hjLI1kIbkCj--E1PiObO2eeiScByGW_DuNLUNCrQKAN3uERuCCRVO4QmngxnL9W3jlx_&attredirects=0 विदेहक २०० म अंक: १५ अप्रैल २०१६ केँ विदेहक २०० म अंक ई-प्रकाशित हएत। ऐ मे विदेह सम्मान/ समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मानसँ सम्मानित लेखक आ हुनकर कृतिपर समीक्षा/ निबन्ध प्रकाशित हएत। अहाँसँ रचना सादर आमंत्रित अछि। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 ११) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. 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सभकेँ झगड़ा-फसाद भऽ जेतै। तइ कारणो बसकेँ दू घण्‍टा बेमतलब ठाढ़केने रहतै। आ जातरी सभकेँ एते समस्‍या हेतइ। तइसँ बसबलाकेँ मतलबे की। सभ तँ अपने सुआरथमे डुबकी मारैत अछि। सुआरथ पूर भेल तँ वाह नइ तँ आह। अनकासँ केकरो की मतलब। ओ सोचलक- मुदा हम तँ स्‍वार्थमे नै छी। बेमार सारि सारि बारम्‍बार फोन कऽ रहल छेली जे- “हम जीअब की मरब तेकर कोनो ठेकान नहि। एक बेर भेँट कऽ जाउ।” ओइठाम केना नै जाएब, जैठाम जेनाइ कर्तव्‍य अछि। ‘केतबो लिखब लेख, परेमक रूप अनेक।’ भेँट होएत। ओइ भेँट करबामे नै जानि केतेक सुख छै। केतेक आनन्‍द छै। सूचना मिललाक उपरान्‍त जितूकेँ कछमछी लगलै से अखनो धरि लगलै छेलै। ओकरा यादि पड़लै। अँगनासँ निकलैत-काल पत्नी टोकने रहइ। “केतए जाइ छिऐ। कोनो ओइठाम लोक नै छै।” पत्नी जेना तमसाएल रहइ। शंकामे औनाइत मन! तामसे फड़फड़ाइत! जितू मिलबैत बाजल- “कोनो आनठाम जाइ छिऐ जे एना तमसाएल छी। अहींक गाम तँ जाइ छी।” हँसैत जितू निकैल गेल छेलै। सड़पर ऐबते दोस टोकि देने रहइ- “हे यौ, सासुर अछि पछिम जाइ छिऐ उत्तर मुहेँ।” “कनी बैंकसँ टको-पैसा लेबाक अछि। अखैन हम नै रूकब।” कहैत आगू बढ़ि गेल रहइ। जितूकेँ मनमे आएल। जतरा पहर टोकि देने रहए तँए शायद बाटमे एना बाधा भऽ रहल अछि। पुन: सारिक संगे बिताएल समए ओकरा स्‍मरण हुअ लगलै। हँसी-खेल, फगुआक रंग-अबीर, आमक मास, मधुमास। ओकर रूप, गुण, बोली आ मुस्‍की मारैत मुख...। किछुकाल-ले जेना ओ स्‍वर्गक सागरमे डुमकी मारए लगल। सुखकेँ यादि केलासँ लोक किछु पलक लेल पुन: सुखी भऽ जाइत अछि। सुनमसान बाट आ बिकट समए। जेना सभ किछु बिला गेल छेलै। एकाएक मेघक गर्जनासँ जितूकेँ धियान भंग भऽ गेलइ। जेना फेर चारू-भरसँ अन्‍हार घेर लेलकै। एहने समैमे घटल घटनाक सबहक चित्र आगूमे आबए लगलै। ओकरा मन पड़लै। एकबेर सासुरेमे सारक दोस कहने रहए- “हे यौ, इलाकामे जँ कुसमए केतौ फँसि जाएब तँ हमर नाम सुमैर लेब।” सारक मुहसँ दोसक बड़ाइ खूबे सुनने रहए। जितूकेँ बुझेलै जेना कातमे किछो छेलै। मुदा ओ अन्‍हारमे किछो नहि देख रहल छल। पएर थरथराए लगलै। कथी छेलै- भूत-प्रेत आकि चोर-डकैत। पता नै ओतए पहुँच सकब आकि बाटेमे प्राण बिला जाएत...। फेर भट्ट दऽ किछो खसल। डेराइते ओम्‍हर तकलक। देखते जेना मनकेँ भरोस भऽ गेलइ। कियो आगूमे बाट धेने धड़फड़ाइत जा रहल छेलै। जहिना लटछुटु माल दोसर माल-जालकेँ देखते स्‍थिर भऽ जाइत अछि तहिना जितूकेँ सन्‍तोख भेलै। शंका सभ मेटाए लगलै। डेग बढ़ौलक जे संगे चलब, लगमे जाइते ओ उनैट कऽ कर्कश अवाजमे पुछलक- “रेऽऽ ठाढ़ रह! केतऽ रहै छी?” तखने बिजली चमकल। ओही इजोतमे जितू ओकर भयंकर रूप देखलक। भागल भय जेना फेरसँ देहम समा गेल। डरे देह थराराए लगल। पेटक हवा निकास लेल गोंगिया उठल मुदा ओहो डरसँअन्‍दरेमे बिला गेल। अनायासे मुहसँ निकलल- “हौ अही अगिला गाम हमर सासुर अछि। हमहूँ तोरा चिन्‍हते छिअ आ तहूँ हमरा चिन्‍हते हेबहक। एना किए करै छहक।” “आ रे तोरी-के, कोनए गेलै रौ, चेला सब, ई तँ सभकेँ चिन्‍हते छौ। जुलुम भेलौ। सभटा भेद खोलि देतौ। सभ किछो छीन-ले आ सारकेँ साफ कऽ दही।” “हौ बाप, हम केकरो नहि चिन्‍हैत छी।” “चुप...।” तड़ाक-तड़ाक मुँहपर चमेटा खसए लगल।लगलै जेना बजर गिरैत अछि। जितू धड़फड़ा कऽ भूमिपर खसि पड़ल। “देखै छी पाछूमे इजोत1 पुलिस आबि रहल छौ। सभ किछो छीन-ले आ गरदैन काटि दही। हम आगू निकलै छियो।” एकटा चेला तरूआरि लेने जितू दिश बढ़ल आर सभ तेजीसँ आगाँ बढ़ि गेल। चेला जितू लग आबि सभ जेबीक तलाशी लेलक आ उठैत बाजल- “यौ गुरू ई तँ थप्‍परेसँ मरि गेलै। मारबै की। आगू जल्‍दी पुलिसक इजोत लगीच आबि गेल।” सभ पड़ा गेल। जितू चिन्‍हल अवाज सुनि  कुहरैत उठल। मन घृणासँ भरि गेलइ। अचरजमे डुमल स्‍वर निकललै- “धनक लेल लाक एतेक नीचाँ गिर सकैत अछि। केकरा कहबै के पतिएतै, जेकरे कहबै सएह लतिएतै।” जेना लगलै केतौ किछु नहि, कोनो सम्‍बन्‍ध नहि। मनुख केहेन आ जानवर केहेन। के नीक? अनायासे ओकर हाथ ओहइ जेबी दिस गेलै जइमे आठ हजार टका रखने रहए। सभ टका-पैसा सुरक्षिते रहइ। ओ अवाक् भऽ गेल। सोचलक- केतौ आ केकरो लग इमान रहि सकैत अछि। बुढ़-पुराणक बात मोन पड़लै- केतबो काटबहक जड़ि इमानक सोर पताल धरि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डल- ठूठ गाछ (उपन्यास) समर्पणभाव जिनगीक तँ दुइयेटा ने धुरी अछि, सुख आ दुख। अही दुनू धुरीपर ने दुनियाँक बीच आनो-आनो चरसँ अचर धरि नचबो करैए, उड़बो करैए, महकबो करैए आ महकेबो करैए। जेना एक दिस- बेली, चमेली आ जूही अछि जे धरतीसँ सटल अपन पातक पवित्रता आ फूलक सादगीक संग अपन जिनगीक आदि-अन्‍त करैत अकासकेँ अपन महकसँ महकबैत जीवन-लीला समाप्‍त करैए तँ दोसर दिस- राड़ी, डबहारी आ पटेर अछि जे अपन फूलकेँ अकासमे पसारि एक दिशासँ दोसर दिशा उड़ि-उड़ि अपन रंग-रूप देखबैए, मुदा महक केहेन रखने अछि से बेली, चमेली आकि जूही पुछौ कि नै पुछौ मुदा देखनिहारक दायित्‍व तँ बनियेँ जाइए। • 1. साँझक बढ़ैत सियाही अन्‍हराए लगल, जेना-जेना सियाही करियाएल जाइत तेना-तेना दिनक इजोत कमए लगल। सड़कसँ बीघा पचासे हटि बाधमे एकटा गाछ। इजोतमे गाछक सभ सिरखार रस्‍तेपर सँ चलनिहार देखैत मुदा साँझक पछाइत, माने जेना-जेना अन्‍हार पसरैत जाए तेना-तेना गाछोक रूप बदलऽ लगइ। पहिल साँझ सौंसे गाछक पात आँगनक बिछान जकाँ बिछाएल बूझि पड़ैत मुदा कनियेँ सियाही बढ़ने पातक पता नइ रहैत संगे गाछक डारियो अन्‍हारमे हेरा ठूठ जकाँ किछु समए देख पड़ैत पछाइत ओहो हेरा जाइत। झंझारपुरसँ धीरेन्‍द्र अबैत रहैथ, रस्‍तासँ कनी हटि प्रोफेसर रामकृष्‍ण बाबूक घर छैन। घरक पछुऐतपर नजैर पड़िते नबे-एकानबे बर्खक रामकृष्‍ण बाबूपर गेलैन जे आइ ठूठ गाछ जकाँ भऽ गेला अछि। 1925 इस्‍वीमे रामकृष्‍ण बाबूक जन्‍म ओहन परिवारमे भेलैन जे परिवार राज-परिवारसँ जुड़ल जमीन्‍दारक रूपमे छल। देशमे अजादीक लड़ाइ[1] पसैर धाराक रूपमे प्रवाहित हुअ लगल, किसानक देश, गामक देश भारत। भारतक मूल पूजी खेत, जैपर देश ठाढ़ अछि। गुलामीक हजारो बर्खक इतिहास ऐठामक गाम आ गामक पूजीकेँ पाछू धकेलैत पछुएने रहल। जइसँ गमैया जिनगी टुटैत-टुटैत एतेक टुटि गेल अछि जइसँ चीन-पहचीन मेटाएल जा रहल अछि। प्रगतिशील विचारक सभ मञ्चपर आबि चुकल छला। ओ सभ जमीनपर एला जे देशक मूल पूजी–माने किसानक देश, गामक देश–गाम छी तँए बिना गामक विकास भेने देशक विकास सम्‍भव नइ। गाम रज-रजबारसँ लऽ कऽ जर-जमीनदारक संग रूढ़िसँ सेहो जकैड़ गेल अछि, ओ सुधरने बिना गामक सुधार सम्‍भव नै। जमीनक प्रश्‍न उठने देशमे पसरल रज-रजबार आ जर-जमीनदारक बीच खलबली उठल। जमीन आ जमीन्‍दारीक खरीद-बिकरी संग उधार भेटने जमीनदारक संख्‍यामे बढ़तियो भेल आ घटबियो भेल। ओना, गाम-गामक लोकक दशा एहेन भऽ गेल जे उपास करैले कोनो पावैनक प्रतीक्षा नै रहल। जँ कोनो गाम हजार घरक अछि तँ नअ सएसँ ऊपरे परिवारकेँ अपन घराड़ियो नै। मनुख तँ केतौ घरेमे रहत। ओना तइसँ किछु दिन पहिने रेण्‍ट-मुक्त बास भूमि भऽ चुकल छल, मुदा हजारो बर्खक गुलामीक शिकार लोककेँ पड़ाइत-पड़ाइत कोनो कर्म बाँकी नै रहि चुकल छल। केकरो कोनो गाममे घराड़ी छल, मुदा पेटक दुआरे पड़ा दोसर गाम बसल तँए ओ फेर बिनु घराड़ियेक होइत रहल। जखन अधिवेशन सभमे आजादीक वृहद आकारक अवाज उठल तखन रजो-रजबार आ जरो-जमीन्‍दारक पेटक पानि डोललैन। जइसँ पसरल खेतक लत्तीकेँ समटऽ लगला। ओना गामो-गामक लोकक आचार-विचारमे किछु-ने-किछु अन्‍तर होइते छै, जे सोभाविको अछि। बौद्धिक स्‍तरक हिसाबसँ विचारो आ काजोक स्‍तर बदलै छै। प्रोफेसर रामकृष्‍ण बाबूक पिता गोरख बाबू चारि भॉंइक बीच जेठ, तँए जहिना माता-पिताक सिनेह तहिना भाए सबहक आदर। जइसँ सुसम्‍पन्न परिवारक जे गुण-धर्म होइ छै तइसँ सम्‍पन्न परिवार। आगत-भागतसँ लऽ कऽ गीत-संगीत, साहित्‍यिक चर्चासँ मञ्च जकाँ सजल परिवार। संस्‍कारी परिवारमे आने काज[2] जकाँ पढ़ाइयो-लिखाइ। जइसँ स्‍कूल जाइ जोकर जखने रामकृष्‍ण भेला कि स्‍कूलक बाट पकैड़ लेलैन। गामक स्‍कूलसँ हाइ स्‍कूल तक रामकृष्‍णक जिनगीमे कोनो हवा-विहाड़ि नइ लगलैन। बच्‍चेसँ जे नीक रिजल्‍ट होइत आबि रहल छेलैन ओ मैट्रिक तक बरकरारे रहलैन। चालीस इस्‍वीक पछाइत अजादीक लहैर जोर पकैड़ नेने छल। तेजीसँ उथल-पुथल हुअ लगल। जेना आसमान फाटि  जाइ छै तहिना रामकृष्‍णोक परिवारमे भेलैन। चारू भॉंइक बीच भिनौज भेने, परिवारक सम्‍पैत चारि भागमे बँटेने अखन धरिक रचल-बसल परिवार एकेबेर ढनमनाएल। खेत-पथारक बिकरी परिवारमे बढ़ल। ओना परिवारक अखन धरिक जे हित-अपेक्षित, कुटुम-परिवार, सर-समाजक जे सम्‍बन्‍ध रहलैन ओ खर्च तँ ओहिना रहलैन मुदा आमदनीमे धक्का लगबे केलैन। किछु दिनक पछाइत, माने जखन रामकृष्‍णकेँ कौलेजमे प्रवेश केला साले भरि भेलैन कि पिता मरि गेलखिन। अपन भाए-बहिनक बीच रामकृष्‍ण सभसँ जेठ रहबे करैथ। पिताकेँ मुइने परिवारक बोझ माथपर आबि गेलैन। अपनासँ छोट पॉंचो भाए-बहिनक पढ़ौनाइ-लिखौनाइसँ लऽ कऽ विधवा माइक भार सेहो पड़लैन। कहुना-कहुना आई. ए. पास कऽ लेलैन। खेत-पथार रहितो रामकृष्‍णकेँ ने खेती करैक लूरि आ ने इच्‍छा। होइतो अहिना छै जे नीक विद्यार्थीक मनमे सदैत यएह रहैए जे केतौ शिक्षक बनि जीवन-जापन करी। मुदा शिक्षकक खगता स्‍कूल-कौलेजमे रहत तखने ने हएत। से तँ गनल कुटिया आ नापल झोर जकाँ स्‍कूल-कौलेज! केतौ खाली नै! मुदा इलाको तँ सभ रंगक अछि। कोनो कोसीक उपद्रवी क्षेत्र अछि तँ कोनो भुतही-कमलाक। ओना जइ इलाकामे रामकृष्‍णक घर छैन ओ धारक उपद्रवसँ सुरक्षित अछि। अपन इलाका छोड़ि रामकृष्‍ण कोसी क्षेत्रक हाइ स्‍कूलमे शिक्षक बनि जिनगीक शुरूआत केलैन। हाइ स्‍कूलक शिक्षक सभकेँ ओहन दरमहो नहियेँ भेटै छेलैन। जे परिवारकेँ हाइ-फाइमे रखितैथ। ओना ई जरूर भेल जे टुटैत-टुटैत परिवार एक सीमापर आबि अँटैक गेलैन। जेकरा रामकृष्‍ण बुझलैन। जइसँ आमदनीक बीच परिवारकेँ चलबैक विचार सोचि लेलैन। बाहर रहने बाहरक खर्च हेबे करत, संगे गामोक परिवारक भार तँ ऐछे। श्रवण कुमार जकाँ रामकृष्‍ण परिवारक बेटा बनि भार अपन कन्‍हापर उठा लेलैन। रेलगाड़ीक सुविधा रहने चारि-पॉंच घण्‍टामे गाम पहुँच जाइ छला,जइसँ अठबारे शनि-रबिकेँ आबा-जाही स्‍कूल आ गामक बीच रखने छला। ओना शिक्षा-बेवस्‍थामे सेहो जुग परिवर्तन होइए मुदा केहेन परिवर्तन होइए ऐपर तँ सभकेँ नजैर रखऽ पड़तैन। नजैरक माने, कोन मुहेँ आकि केकरा दिस ओ लत भेल। मुदा से जइ जुगक उपज रामकृष्‍ण छला ओ समयानुकूल छेलैन। शिक्षा पद्धतिमे अखुनका विद्रूपता नइ आएल छल। ग्रामीण परिवेशमे चाहो-पानक चलैन अखुनका जकाँ नइ छल। ओना पानक प्रशस्‍ति मिथिलांचलमे अदौसँ रहल मुदा आम-जनक बीच समटा ओ विशेष, माने खास-खास उत्‍सवमे अँटैक गेल छल। ओना एकटा प्रश्‍न तँ उठिते अछि जे आधुनिक वैज्ञानिक परिवेशमे पानक महत् की अछि। जेहेन परिवारक रामकृष्‍ण बाबू छला ओइ परिवारमे सभ कथुक चलैन छेलैन। मुदा परिवारसँ हटल रहने अपन जीवनकेँ साँचामे ढालैक तँ अवसर भेटबे केलैन। मौकाकेँ लाभमे बदैल रामकृष्‍ण अपन जिनगीकेँ अपना ढंगे निरमाएब शुरू केलैन। एक तँ ओहिना छोट-भाए बहिनक बीच एहेन विचार अखनो तँ गाम-परिवारमे ऐछे जे मते-पिता नइ अपनो भाए-बहिन आ समाजोक भाए-बहिनक बीच बेवस्‍थित रूपमे सम्‍बन्‍ध ऐछे जे बेसीमे नइ तँ कमोमे जरूर चलि रहल अछि। तैसंग विधवा माइक जिनगी परिवारक जिनगीकेँ सात्‍विकता दिस बढ़बैत रहलैन। भूखे सहब आ कोनो संकल्‍प-व्रते सहब, दुनू सहबे भेल मुदा दुनूमे अन्‍तरो तँ ऐछे। एक सहब भेल भरलपर आ दोसर भेल जरलपर, जइसँ ईहो तँ हेबे करत जे भरलकेँ पाचक हएत आ जरलकेँ घातक! घातक ई हएत जे हाड़-मांसक संग हड्डियो सुखाएत! आने-आन मनुख जकाँ रामकृष्‍णक जिनगीकेँ कहियौन आकि दुनियाँकेँ, बीचमे आबि ठाढ़ भऽ गेल रहैथ। विचारक धारमे अपना बुधिये रामकृष्‍ण अपनाकेँ जुड़शीतलक माल-जाल जकाँ छोर पकैड़ हेलौलेन। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी, बहुरंगी। केतौ बालु भरल अछि तँ केतौ सोना, केतौ पाथर भरल अछि तँ केतौ बोन-झार,केतौ पानि भरल अछि तँ केतौ माटि...। माटियो तँ माइटे छी, कोनो उस्‍सर अछि तँ कोनो केशौर केसैर उपजबैक शक्‍ति रखने अछि। अथाह दुनियाँक थाह पकड़ब असम्‍भव नइ तँ कठिन तँ ऐछे। दसो दिशामे दुनियाँ बँटाइत बँटाएल अछि, तहूमे तेते कोण-काण बनि गेल अछि, जँ किछु डेग केम्‍हरो उठबौ चाहब तँ कोनो कोणेमे कोणिआ जाएब आ कोणियेला पछाइत केमहर मुहेँ चलि जाएब, से ठेकान करब अथाह नइ तँ अगम तँ ऐछे। जहिना अगमो पानिमे हेलिनिहार सभ रंगक होइ छैथ, कियो एहनो होइ छैथ जे अगम बूझि, माने माटिक ऊपर एते पानि अछि जइमे डुबि जाएब। पानिमे डूमने हवाक प्रवेश रूकै छै तँए बिनु हवे अपनो हवे जकाँ उड़ि जाएब! मुदा तँए कि एहेन हेलिनिहार नइ छैथ जे समुद्र सन पानिमे हेलै छैथ जइमे माटिक ठेकाने ने छै। दुनियाँक बीचमे ठाढ़ रामकृष्‍ण अप्‍पन दुनियाँ दिस नजैर देलैन। अपन दुनियाँ तँ वएह ने भेल जइमे रहैक अछि। एकरो ने दसो दिशा छै आ सैयो कोणो-काण छै। अपन जिनगीकेँ थाह पबिते रामकृष्‍णक मनमे तोष-संतोष जगलैन। जगलैन ई जे मनुखो तँ मनुखे छी जे कारखानाक आगिक चिमनियोँ लग जिनगी बितबैए आ साइबेरियाक काइ-लीचेन गाछो तर। तही बीचमे ने हमहूँ केतौ छी...। अपना जिनगीक आड़ि-धुरकेँ रामकृष्‍ण बिटिया लेलैन। बिटियैबते भक खुजलैन- सभ किछु अपने करए पड़त। अहीमे धरम-करम सभ नुकाएल अछि। जँ देह-हाथ नइ चलाएब, उपार्जन नइ करब तँ परिवारक खेबा-खर्चा केतएसँ औत, धिया-पुताकेँ पढ़ाएब-लिखाएब केना...। अपना जिनगी-ले लोककेँ अपने उपैत करए पड़ै छै, हमरो करैक अछि। दोहरी संकल्‍पक संग रामकृष्‍ण शिक्षकक जिनगी शुरू केलैन। पहिल संकल्‍प केलैन जे अपनो प्रोफेसर बनैक अछि आ परिवारमे छोट-भाए-बहिनक निमरजना ओते तँ करबे अछि जेते पिताजीक समैमे भेलैन। तइसँ जेते अगुआ करब वएह ने अपन सृजन हएत। ओना आर्थिक दृष्‍टिये दुनू-बापूतक जिनगीमे अकास-पतालक अन्‍तर आबि गेल छेलैन। पिताक जिनगी मझोलका जमीन्‍दारक रहलैन जखन कि रामकृष्‍णक जिनगी ओइसँ बदैल एक साधारण शिक्षकक भऽ गेलैन। संकल्‍पकेँ खण्‍डित करैत, माने छोट-छोट टुकड़ी बना रामकृष्‍ण अपन मन असथिर केलैन जे पिताजी जेते पढ़ेलैन, तेते छोट-भाइक प्रति अपनो दायित्‍व बनैए, ओना तइसँ कम-बेसीमे पढ़निहारोक विचार तँ ऐबते छै। जँ नइ पढ़ऽ चाहत तँ परिवारक बीच, समाजक बीच,किए ने अपन प्रायश्चित करा लेब। जँ पढ़निहार रहत तँ अपन ओकाति भरि सहयोग करब दायित्‍वक संग कर्तव्‍यो तँ बनिते अछि। ऐठाम आबि रामकृष्‍णक विचार ठमैक गेलैन। किछु समए ठमकला पछाइत रामकृष्‍णक नजैर अपनापर पड़लैन। परिवारक खर्चमे सिर्फ भोजने-वस्‍त्र आ अवासेटा नइ अछि। लिखब-पढ़ब आ बेर-कुबेरमे दवायो-दारूक जरूरत तँ पड़िते अछि। ओना विद्यालयक संग ट्यूशन करब, तइसँ किछु आमदनी बढ़त मुदा घटो तँ लगबे करत ने जे अपन पढ़ैक समए वेरबाद भऽ जाएत। जखन समैए ने बँचत तखन आगू बढ़ि केना सकब। बाल-बोधक खेल पढ़ब-लिखन नइ ने छी, ओ जिनगीक साधना छी जेकरा साधने बिना जिनगीकेँ आगू मुहेँ बढ़ाएब कठिन अछि। ओना साधनो केते रंगक होइए। मुदा से सभ नइ, जेते साधक जरूरत रहए आ साधैक साधन रहए, बस तेतबे। रामकृष्‍णकेँ जेना भक् खुजलैन। भक् खुजिते नजैर मान-इमान आ सम्‍मानपर गेलैन। ओहो तँ बीज-रूपमे अँकुर, गाछ बनि जिनगीकेँ गछाड़ैत फुनगी धरि पहुँच जाइए। ओतै जा कऽ ने गाछोक फूल फुला-फुला अकास दिस तकैत तरेगन, सप्‍तऋृर्षि गनैए आ तहिना ने मानो-इमान इज्‍जत बनि इजोरिया राति जकाँ भगवतीक आराधनाक मुहूर्त बनैए...। रामकृष्‍णक मन अपना दिस घुमलैन। घुमिते उपकलैन जे जैठाम जिनगीमे आबि अँटैक गेल छी तैठाम इज्‍जत-इमान की भेल आ तेकरा केना बँचा कऽ रखि सकै छी..? सौनक मेघ जकाँ मन गुम्‍हरलैन। गुम्‍हरलैन ई जे जइ काजक भार माथपर आएल अछि ओकरो जँ नीक जकाँ, माने इमानदारी पूर्वक निमरजना करब, तखन तँ...। जखन कि तहीसँ ने इमानो-इज्‍जत चलत। जइ बच्‍चाकेँ पढ़बैक भार कन्‍हापर आएल अछि, तहूमे लोअर प्राइमरी स्‍कूल आकि मिडिल स्‍कूलमे नै छी, हाइ स्‍कूलमे छी, ऐठामसँ निकलला पछाइत कियो आगूओ पढ़ैले कौलेज जाएत आ केते पढ़ाइ छोड़ि अपन जिनगी बनबैक किरियामे लागत। एहेन धरतीपर जँ अपना जिनगीमे जीवन्‍तता नइ रहत तखन केतौ-ने-केतौ किछु-ने-किछु कमी औत। मुदा ओ जीवन्‍तता औत केना? रामकृष्‍ण अपन आमदनी आ अपना काजकेँ समैमे बान्‍हि चलब मनमे रोपि लेलैन। समए निसचित अछि, आमदनी निसचित अछि जँ एकरा काजक निसचितता नइ देब तखन पछड़ैक सम्‍भावना बनियेँ जाइए। आमदनीक खर्च अपन जिनगीक संग परिवारक जिनगी चलाएब अछि। अपन जिनगीक खर्च जे अछि ओइमे भोजन प्रमुख अछि। जँ हम बजार दिस जाइ छी तँ निसचित रूपे अधिक खर्च हएत, मुदा जँ ओकरा अपन दिनचर्यामे लऽ आनब तँ अदहोसँ बेसीक बँचत हएत। रामकृष्‍णक मन मानि गेलैन। आगू पढ़ैपर नजैर गेलैन। भाइयो-बहिन परिवारमे रहि मैट्रिक तक तँ घरेपर सँ पढ़ि सकैए। अपन जे हिस्‍साक जमीन अछि, ओकरो उपजबैक परियास करब,नइ जँ तइ सभसँ खर्च नइ पुड़त तँ थोड़-थाड़ बेचियो लेब। मुदा जँ खर्चक दुआरे अपने आकि परिवारेक बाल-बोधकेँ जिनगी बाधिक केने रहब तखन तँ जिनगी कोणाह बनि जाएत। बी.ए.मे रामकृष्‍ण नाओं लिखा, छह मासक पछाइत कौलेज छोड़ने रहैथ, किताब सभ कीनि नेने रहैथ। सोझे बैचमे फारम भरि बी.ए. कऽ लेलैन। बी.ए. केला पछाइत विद्यालयमे स्‍तरो बढ़लैन आ दरमहोक बढ़ोत्तरी भेलैन। तैसंग नीक रिजल्‍ट पढ़ैक मन सेहो जगा देने रहैन। प्राइवेट विद्यार्थीकेँ युनिवर्सिटीसँ परीक्षा-ले परमीशन लिअ पड़ै छै। मनमे अराधि लेलैन जे जखने अवसर भेटत तखने एम.ए. कऽ लेब। मुदा ओइले अखनेसँ कनखड़ऽ पड़त। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1790, तिथि : 25 अक्‍टूबर 2015 2. विचार रूपमे रामकृष्‍णक मनमे रोपा गेल रहैन जे एम.ए. करब। मुदा घड़ी-मिनट दिन-मास गुजैर गेल, अखनो धरि रामकृष्‍णक मनमे काज रूपमे नइ रोपाएल छेलैन। ओना विद्यालयमे सेहो साहित्‍येसँ जुड़ल रहला मुदा ओ पूर्वपीठिका भेल। तेकर कारण रहै जे सभ दिन साहित्‍य विषय दिस रहला। ओना साहित्‍योमे गणित नइ अछि सेहो बात नइ, गणित तँ ओहूमे अछि मुदा ओ नमहर अछि, तँए छोट जिनगीमे ढीलढीला भऽ जाइए। जिनगीक लेल तँ जरूरत अछि अर्थशास्‍त्रक संग ओकर स्‍टैटिक्‍सकेँ बुझब, तइमे हजारो कोस दूर हटल रामकृष्‍ण, तँए समए बीतए लगलैन मुदा निर्णएपर पहुँचिये ने पाबि रहल छला। केतौ बाजब नीक नइ, एकर अनेको कारण अछि मुदा से नइ, रामकृष्‍णक मनमे उठलैन जे असम्‍भव काजकेँ सम्‍भव बनबैक प्रक्रिया छी, तँए काजक बिसवासू दू दिस बढ़त। एक दिस काजक लेल जिनगी भेल आ दोसर जिनगी-ले काज भेल। मुदा पुरुखकेँ तँ अपन पुरुषत्‍वोमे बिसवास करबाके चाही। मुदा नजैरमे जेना नचि गेलैन- ‘कंगनक लेल आरसी की आ पढ़निहार लेल फारसी की।’ रामकृष्‍णक मनमे जेना जेठुआ नमी जगलैन। जेठुआ नमीक माने भेल, जमीनमे ठण्‍ढपन आएब। मुदा से नै नमी तँ जमीनमे सभ दिन रहिते अछि, भलेँ कहियो जल-प्‍लाविते भऽ जाए, कहियो कण्‍ठे सुखए लगए। मुदा सृजन शक्‍तिमे कमी-बेसी रहै छै। जइमे जेठुआ नमी जे समुद्र-धारसँ लऽ कऽ जमीन धरिमे बेसिया जाइए। माने समुद्रोमे माछ अण्‍डा छोड़ैए आ जमीनोमे रौदमे तपि बीआ आरो सक्कत भऽ हाल पबिते धरतीकेँ फाड़ि कलश उठौने दुनियाँक बीच अपन पहचान बनबैत अपना वंशो आ अपनो नामकरण करैए। जँ से नइ करैत तँ सभ धान धाने छी आ सभ मान माने छी, जकाँ ने भऽ जाएत...। जेठुए हाल जकाँ रामकृष्‍णक मनमे अपन जिनगीक गणित जगलैन- साहित्‍यो गणितसँ आ अर्थशास्‍त्रो गणितसँ फड़कैत बूझि पड़लैन। जेना कानमे किछु भेने कुकुऐ लगैए, आँखि मिड़मीड़ए लगैए, पीपनी फड़कए लगैए तहिना रामकृष्‍णोक मन फड़फड़ेलैन। फड़फड़ाइते दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि कागज-कलम उठा जिनगीक केलकुलेशन करए लगला। एक दिस सोझ बाट देखैथ जे आठ सए नम्‍बरक आठ विषय एम.ए.क कोर्समे अछि जइमे छह सएक परीछा उतीर्ण भाइए गेल छी। मात्र दू सएक नम्‍बर दू विषयक झमेल अछि। मनमे चपचपी एलैन जे बढ़ि-बढ़ि ठमैक जाइन। ठमैक ऐ दुआरे जानि जे अपन बुझल बात माने ‘हाथी पियासल, घोड़ा पियासल, दल-दल पानि, थलथल वाणि पथपल मानि।’ रामकृष्‍णक आगूमे रकशाएल मन ऊकवाती नेने रस्‍तापर ठाढ़ भऽ दीवाली पावैनक ऊक जकाँ परीछा घड़ी..; परीछा घड़ी..; पढ़ैत रहैन। जइसँ रामकृष्‍ण ठमैक गेला। अही झीका-तीड़ीमे रामकृष्‍णक साल भरि समए निर्णए करैसँ पहिने चलि गेलैन। विद्यालयमे हेड मास्‍टर एम.ए. रहथिन, मुदा कुर्सियो तँ कुर्सी छी, ने धाके कहियो विचारैक बात सोचलैन आ ने कहियो उपकैरो कऽ हेडमास्‍टर साहैब जीवनक सम्‍बन्‍धमे पुछलकैन। ओना बेक्‍तिगत गुण आ पद प्रतिष्‍ठाक गुण दुनू दू भेल। नियमानुसार दुनूक पालन हेबा चाही मुदा ओकर तँ समए-स्‍थान निर्धारित अछि। खैर जे से...। सोचे रामकृष्‍ण हेडमास्‍टर साहैबसँ एम.ए. करैक गप नइ चलौलैन। पाछू उनैट तकैथ तँ सभ शिक्षक नव कि पुरान मुदा रहैथ तँ सभ आई.ए.-बी.ए. पासे। जैठाम आई. ए; बी.ए. पास तैठाम एम.ए. तँ भुताहि भेबे कएल। भुतही गाछीसँ आगू बढ़ि रामकृष्‍ण जखन विद्यार्थी दिस बढ़ैथ तँ देखैथ जे ई तँ भेल पूर्वपीठिका,माने बच्‍चाक ज्ञानभूमि! ऐठामसँ आगू बढ़ैत ने कियो एम.ए.क चोटीपर पहुँचैए आकि पहुँचत। मुदा ऐमे तँ चुम्‍बकक सम्‍बन्‍ध छै जे एक सिरा दोसरकेँ नचबैए। तेसर साँझ। कोसीक किनछेर, माने भेल धारक लगक जमीनपर देने जे चलैक रस्‍ता रहैए ओ। ओही रस्‍ता होइत रामकृष्‍ण टहलैत बहुत दूर चलि गेला। अपने पढ़ैक विचार मनकेँ दबने रहैन, इजोरिया पख रहबे करइ, सुर्ज अपन बोरिया-विस्‍तर समैट सुतैले चलि गेला मुदा ठहाका मारि इजोरिया अन्‍हारकेँ घेरैए ने दइ, अही धोपचटमे रामकृष्‍ण तीन कोस आगू धरि टहलैत गेलापर मनमे होश एलैन जे सौंझका समए छी, केते दूर चलि एलौं! घुमि कऽ आबि अपन ओसारक कुरसीपर बैसिते मनमे उठलैन, पहिने हाथ-पएर धोइ चाह बना पीब ली। पछाइत बैस विचारि लेब जे हमरा की करक चाही। विचारक दुइए पक्ष होइए। ‘हँ’ आ ‘नइ’। पछाइत‘हँ’ओमे हजारटा डारि छिटकैए आ ‘नहियोँ’मे। चाह पीला पछाइत मनमे चेनियत ऐबते अपन विचार–संकल्‍पक विचार, जे आइ हँ-निहँस कैये लेब–जेना पूर्वाक लहकीमे भँसिया पछिम दिस डोलि गेने आ धारक पानि जकाँ विचारोक लाट धेने दोसर विचार सेहो बहैत रहैए, तहिना लाटे-लाट साहित्‍यक धारमे रामकृष्‍ण फँसि गेला। आऽ हाऽ हाऽ! केहेन सुन्नर सुन्‍दरी अछि जे एक घड़ी आधो घड़ी, आधोमे पुन आध! मने-मने रामकृष्‍ण विस्‍मृत भऽ गेला। विस्‍मृत एहेन भेला जे जहिना घड़ी-घण्‍ट बजैत देवालयक मुहथैरपर ठाढ़ भऽ पूजाक शंख फूकैत होइत। मनमे हलचल उठलैन। मुदा लगले दोसर धुन ससैर कऽ आबि सवार भऽ गेलैन। ओ धुन  छल- ‘आध जनम हम  नीन  गमाओल!’ दुनियाँ  केतेटा  आ जिनगी केतेटा..? तइले लोक अनेरे हाय-हाय किए करत? ओना हाथोक घड़ी रामकृष्‍ण रखने छैथ मुदा देवालोमे घण्‍टीबला-घड़ी रखनहि छैथ। होइतो अहिना छै जे केकरो घड़ी समए बतबै छै तँ कियो घड़ीकेँ समए बतबैए। यएह तँ भेल दुनियाँक खेल। कियो मिनट-पल समए पकैड़ नचैत तँ कियो कटल-खोंटल चान जकाँ जिनगी देख झुझुआइत! घड़ी बाजल, साढ़े आठ। रामकृष्‍णक भक् टुटलैन। भानसक समए भऽ गेल। हाथक घड़ीपर नजैर रखि पैछला समए (माने बैसैकालक समए) सँ मिलौलैन तँ डेढ़ घण्‍टा घण्‍टीए डोलबैमे चलि गेल। हाइ रे बा! नान्‍हिटा विचार करए बैसलौं, सेहो छुटिये गेल! आइक लेल जे काज अछि, आकि विचार अछि ओ औझुका भेल,काल्हि-ले काल्हि छै। तखन तँ काजे छुटि गेल। अच्‍छा! भानस करै बेर विचारि लेब। मुदा विचार आइये करैक अछि। सम्‍पन्न परिवारमे रामकृष्‍णक जन्‍म भेने गीत-नादक परिवार भेटले रहैन, जइसँ बच्‍चेसँ किछु-किछु साजोपर हाथ देने आ मीठ अवाज रहने अवाजोक साधना रहबे करैन। जे अखनो पछुऐबते छैन, जइसँ असगर रहने तबला-मजीराक हाथ तँ छुटि गेलैन मुदा हारमोनियम रखनहि छैथ। ओहो नियमित समए खाइते छैन। असगरे गौनिहार, असगरे बजौनिहार-सुनिनिहार, आन कियो ने! तखन..? चुल्हि लग बैसिते जेना मन फुड़फुड़ेलैन। फुड़फुड़ाइते पहिने निर्णैये कऽ लेलैन जे एम.ए. करब, प्रोफेसर बनब। काजक इच्‍छा तँ करैक शक्‍ति मंगै छै। से शक्‍ति रामकृष्‍ण संचित करैक दिशामे अखनेसँ भीड़ गेला। तेसर साल एम.ए.क परीछा दइक अछि। काल्हिये युनिवर्सिटीसँ सिलेवश आनि, आठो विषयक खण्‍डवाइज किताब सेहो कीनि लेब। किछु-किछु समैक कटौती सभ काजमे करैत दू घण्‍टा समए निकालि काजमे हाथ लगा देब। जिनगीक टपान टपैक दुर्ग बाटपर ठाढ़ भऽ रामकृष्‍ण चुल्हि लगसँ आगू देखऽ लगला। मनक संग देहोमे चुलबुली आबि गेलैन। समयानुकूल भोजन बना,भोजन करैत रामकृष्‍ण निर्णए केलैन जे ओछाइनपर निचेनसँ औरो नीक जकाँ विचारि लेब। ओछाइन सेरिया जखन ओछानिक सिरमापर मुड़ी खसौलैन कि धक्-दे विधवा माइक संग भाए-बहिनपर मन उड़ि गेलैन। दिनो-दिन माइक देहक दशा खसि रहल अछि! देहक दशा खसैक कारण दुइयेटा भऽ सकैए। देह आ दैहिक। ओना उमेरो पचास टपि गेल मुदा सएक नापमे तँ अधडरेर भेल, अखन किए देह खसतैन। साठिक बाद ने खसैक सम्‍भावना जगैए। ओना खाइ-पीबैमे कोनो तेहेन अभाव तँ नहियेँ हुअ दइ छिऐ, जेहेन हजारो-लाखो परिवारमे छै। नइ! जरूर मानसिक पीड़ासँ पीड़ित अछि। की एहेन उमेरमे जँ पति-विहीन लोक भऽ जाए, बाल-बच्‍चा छोट रहै ओहन लोकक इज्‍जत-आवरू एहेन समाजमे बँचि सकैए जेहेन समाज बनि गेल अछि आकि बनि रहल अछि आकि बनौल गेल अछि। की माए-बापक धर्म बाल-बच्‍चाक सेवा करब नइ छी? बहिन बिआहे जोकर भऽ गेल अछि, ओ तँ माइयेक सोझमे अछि, की ओकरा मनमे सन्‍ताप नइ जगैत हेतइ? रामकृष्‍णक हँसी-खुशीक मनक नीन पड़ा कऽ दूर भागि गेलैन। कछ-मछ करैत ओछाइनपर पड़ल माएपरसँ भाए-बहिनपर नजैर उतरलैन। दू-दूटा भाएकेँ कौलेजक खर्चा जुटाएब बाल-बोधक खेल नइ ने छी। मुदा ईहो तँ दायित्‍व बनियेँ जाइए किने जे जहुना अपने राम कृष्‍ण कौलेज मधुबनीमे पढ़लौं, तहुना तँ पढ़ा दिऐ। मुदा छोड़लो तँ नहियेँ जा सकैए। तखन तँ भेल अपन जिनगीक संग परिवारक जिनगीकेँ अपन कमाइमे अँटावेश करब। जे अँटावेश करए तँ अपने पड़त। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1203, तिथि : 29 अक्‍टूबर 2015 3. अंगरेजी विषयमे रामकृष्‍ण एम.ए. कऽ लेलैन। जहिना मनमे एम.ए. केला पछाइत जगै छै, तहिना रामकृष्‍णोकेँ जगलैन। ओना एम.ए. केलासँ पूर्व आ पछातिक बीच स्‍कूलक अध्‍यापनमे अन्‍तर नै एलैन मुदा शिक्षको सबहक आ छात्रो-अभिभावकक बीच बेक्‍तित्‍वमे अन्‍तर आबिये गेलैन। 1940 इस्‍वीसँ 1960 इस्‍वीक बीच, आजादीक आन्‍दोलनसँ लऽ कऽ देशक आजादी तकक परिस्‍थिति जहिना भुमकमसँ पहिने भुमकमक समए आ पछातिक जे स्‍थिति होइए तहिना रहल। ओना डोलैत-धरती किछु-किछु असथिरो भऽ गेल मुदा नमहर भुमकमक पछाइत जहिना छोट-छोट भुमकम अबैत रहैए तहिना ऐबते रहइ। आजादीक आन्‍दोलन 1942 इस्‍वी अबैत जुआ गेल। माने जन-जनक बीच पहुँच गेल जइसँ घर-घरसँ निकैल लोक सड़कपर आबि गेल। मनमे स्‍वतंत्र देशक स्‍वतंत्र नागरिक बनैक फल फड़िये गेल छल। आजादीक लड़ाइ दिस झूकने देशक उत्‍पादनो वाधित भेल। खेतियो-पथारी आ शिक्षणो-संस्‍थान सभ प्रभावित भेबे कएल। ओना पुरना दरभंगा जिला जे अखन मधुबनी, दरभंगा आ समस्‍तीपुरमे बँटल अछि तइमे मात्र दू या तीनटा कौलेज आ तही अनुपातमे हाइयो स्‍कूल छल आ ओना संस्‍कृत विश्वविद्यालयक संग ठाम-ठीम संस्‍कृत महाविद्यालयो आ विद्यालयो सभ छेलैहे। 1942 इस्‍वीमे जहिना कौलेजक शिक्षको आ विद्यार्थियो तहिना स्‍कूलोक विद्यार्थियो आ शिक्षको सभ आन्‍दोलनमे कूदि गेला। कठिन लड़ाइक पछाइत देशक आजादीक नीक फलो तँ भेटबे केलैन। देश स्‍वतंत्र भेला पछाइत जहिना सभ क्षेत्रमे अपन-अपन समस्‍या जगल तहिना अपनो इलाकामे स्‍कूल-कौलेज आ अस्‍पतालक संग रस्‍ता-पेरा, खेती-पथारी इत्‍यादिक समस्‍या उठबे कएल। अखुनका मधुबनी जिलामे एकटा कौलेज आर.के. कौलेजटा छल। जयनगर, बाबूबरही, पण्‍डौल, सरिसव पाही, झंझारपुर, निर्मलीमे कौलेज आ तहिना हाइयो स्‍कूल, मिडिलो स्‍कूल, बनबैक जिज्ञासा समाजक मनमे उठल। 1960 इस्‍वीसँ पहिने पान-सातटा कौलेजो खुजल आ लहेरियासराय अस्‍पतालो बनल। आजादीक पूर्वसँ जे स्‍कूल आ कौलेज चलैत आबि रहल छल ओ अपन नीक गति पकैड़ संचालित हुअ लगल, जइसँ रामकृष्‍णकेँ स्‍कूलक जवाबदेहीक दबाव रहबे करैन। नव-नव कौलेज आ नव-नव स्‍कूल खुजने शिक्षकोक जरूरत पड़बे करत। रामकृष्‍णो दू धारक पेटमे पड़ि गेला। एक दिस हाइ स्‍कूलसँ कौलेजक शिक्षक बनैक इच्‍छा तँ दोसर दिस नव कौलेजमे वेतन नइ भेटने परिवारक भरण-पोषणक समस्‍या। जखन कौलेज नीक बनि संचालित हुअ लगत तखन ने वेतन भेटत। तैबीच एकटा लागल जीबिका, माने हाइ स्‍कूलकेँ छोड़ब रामकृष्‍ण नीक नहि बुझलैन। परिवार ओहीपर ठाढ़ छैन। संगे ईहो होइन जे सीमित कौलेज खुलने सीमित शिक्षकोक बहाली हएत, ओ जँ भरि जाएत तखन तँ अवसरक चूक हएत। जहिना डारिक चुकल बानरक गति होइ छै तहिना अवसरक चुकल लोकोकेँ होइते छै। जइ उत्‍साहक संग देशक आजादीक लेल जनमानस जगि कऽ आगू बढ़ल ओ उत्‍साहकेँ आजादीक पछाइत छीन-भीन कऽ देल गेल। कहैले शासन विदेशी हाथसँ देशी हाथ आएल मुदा बेवहारिक जे जिनगी छल, ओइमे कोनो बदलाव नै आएल। एहनो नै कहल जा सकैए जे केतौ ने आएल, से ठाम-ठीम गामो-समाजमे आएल आ ठाम-ठीम परिवारोमे आएल। खाली सत्तासँ सटलक जिनगीमे उछाल आएल मुदा गाम-समाज ठमकले रहि गेल। रंग-बिरंगक उपद्रव जे पहिनेसँ आबि रहल छल ओ समाजक बीच किछु बढ़िये गेल, कमल नहि। जँ केतौ कोनो रंगक कमबो कएल तँ दोसर रंगक उपकबो कएल। ओना देशक बीच जन-जनक समस्‍या अछि मुदा ओ केना मेटत एकरा-ले जेहेन शासन-सूत्र चाही से नइ भेल। नव जनमल प्रजातंत्र बेवस्‍था, हजारो बर्खक लूटल-कूटल देश, केना उठि कऽ ठाढ़ भऽ चलत। धिया-पुताक गेन नइ ने छी जे पकड़नौं गुड़ैकते अछि। गाम-गामक अर्थ-सम्‍पदाक संग, कौशल सम्‍पदा, जे पहिनेसँ दबल आबि रहल छल ओकरा उठबैक ओहेन उपाय नइ भेल जेहेनक खगता छल। भुमकमक पछाइत आकि समुद्री जुआरिक पछाइत जहिना धरतियो आकि पानियोँ असथिर होइत-होइत असथिरो आ शान्‍तो भऽ जाइए तहिना आजादीक पछाइत जनमानसक आजादीक सपना असथिर होइत-होइत शान्‍त भऽ एते दबि गेल जे ओकर चीन-पहचीन मेटाएल जकाँ बूझिमे आबि रहल अछि। ओना किछु इलाकाक किसान अपन जिनगीकेँ बूझि खेती-वाड़ी करब अपनौलैन जइसँ ओ सभ बेसी गिरहस्‍तीपर आश्रित छैथ। जे अपना ऐठाम नइ अछि। हजार बीघा जमीनबला सेहो नोकरिये करता तखन बिनु खेतबलाक की उपाए हएत। ओना घर-बाहर दुनू दिससँ ओझरी तँ ऐछे। सालमे एकबेर बाढ़िक उपद्रव, जइमे खेती-पथारीसँ लऽ कऽ घर-दुआर दहौनाइ-भँसौनाइक संग जमीनो कटि-कटि धार बनिते अछि। तहिना बेसी बरखा भेने सेहो आफद ऐबते छै। जाड़ोक मौसम सेहो तेहने मारुख होइते अछि। मास-मास, दू-दू मासक शीतलहरी। मुदा सभ किछुकेँ रहैत फेर केना जीबित रहब, ऐ ले तँ सभ ने अपन-अपन सोचबै। शिक्षाक खगता बूझि इलाकामे स्‍कूल-कौलेज बनबैक विचार जन-मानसमे जगल। 1960 इस्‍वीसँ पूर्व जखन दरभंगा जिला छल तखन समस्‍तीपुरसँ लऽ कऽ निर्मली तक कौलेज खुजैक वातावरण बनल। दर्जनो कौलेज आ दर्जनो हाइ-स्‍कूल खुजल। मुदा आजादीक पछाइतो पढ़ाइमे, माने शिक्षण बेवस्‍थामे ओ बदलाव नइ आएल जे गुलामीसँ आजादीक होइ छै। तैसंग किसानक गामेटा नइ, देशो छी, मुदा खेती-वाड़ीक स्‍कूल-कौलेज खुजबे ने कएल। एक तँ खेत-पथार ओहिना जमीन्‍दारीक ओझरीमे पड़ि परती भेल पड़ल आबि रहल छल तैपर पढ़ल-लिखल लोक गामक कोन बात जे राज्‍ये छोड़ऽ लगला तखन बोनिहारे सभ किए पाछू रहता,ओहो सभ किए ने शहर होइत विदेशोमे जा-जा बोइने करता। आब कि कोनो डाक्‍टर-इंजीनियरक खगता छै, आब तँ करखानामे काज केनिहारक खगता छै...। मुदा देहो छीपलासँ तँ समस्‍याक समाधान नहियेँ हएत। पण्‍डौलमे सेहो कौलेज खुजल। परिवारसँ लऽ अपन धरिक जिनगीक हिसाब रामकृष्‍ण जोड़लैन। भाइयो सभकेँ चेष्‍टगर भेने उपार्जनक उपाय रामकृष्‍णक परिवारमे भेलैन। किछु दिन जाबे सुचारू ढंगसँ कौलेज नै चलत ताबे अपनो समैक बचत तँ हेबे करत। ई विचार रामकृष्‍णक मनमे रहबे करैन जे जेना-जेना कौलेजमे सुधार हएत तेना-तेना दरमहोमे सुधार होइते जाएत। तँए नीक हएत जे कौलेजोमे शिक्षकक लेल अपन उपस्‍थिति दर्ज करा ली। अखन समए हाथ लागल अछि, फेर कहिया एहेन अवसर भेटत। मनमे विचार उठला पछाइत परिवारोक (माने माइयो आ भाइयो-बहिनक) बीच अपन विचार रामकृष्‍ण रखलैन। जहिना पाल परहक मालदह आकि कलकतिया आम आगूमे ऐबते मन पाल-पाल हुअ लगैए तहिना परिवारजनकेँ सेहो रामकृष्‍णक विचारसँ भेलैन। अवसरक अनुकूल विचार रखैत परिवारसँ पुछलखिन- “आवा-जाही बढ़ने खर्च बढ़त, जखने अपन खर्च बढ़त तखने अहाँ सबहक बीच, माने परिवारमे कमी औत। जँ से सहैले अहाँ सभ तैयार होइ तँ हम आगू बढ़ि सकै छी।” एकमुहरी सभ कहलकैन- “नीक हएत।” रामकृष्‍ण पण्‍डौल कौलेजमे ज्‍वाइन कऽ लेलैन। किछु दिन तँ नियारे-बातमे बीतलैन पछाइत, सात दिनमे एक दिन पढ़ाएब शुरू केलैन। धीरे-धीरे विद्यार्थियो बढ़ल जइसँ कौलेजक आमदनियोँ बढ़ल। कौलेजमे आमदनी बढ़ने किछु-किछु वेतनो सुधरैत भेटब शुरू भेलैन। ओना सड़कक माथ तीनू। माने जहिना कौलेज जेबाले सड़कक माथ, तहिना बीचमे अपन घरो आ दोसर भाग हाइयो स्‍कूल। तीन सालक पछाइत जखन रामकृष्‍ण कमीशनसँ बहाल भऽ गेला तखन हाइ-स्‍कूलक नोकरी छोड़ि, कौलेज पहुँच गेला। ◌ शब्‍द संख्‍या : 999, तिथि : 04 नवम्‍बर 2015 4. समैक संग कौलेजोक स्‍थिति सुधरए लगल। सरकारियो अनुदान आ विद्यार्थियोक फीसमे बढ़ोत्तरी भेने कौलेजक आर्थिक स्‍थिति सुधरल। जइसँ मकानो बनल,पुस्‍तकालय सेहो सुधरल आ शिक्षक-कर्मचारीक वेतनमे सेहो सुधार भेल। रामकृष्‍ण बाबूक जिनगीमे सेहो उछाल एबे केलैन। ओना रामकृष्‍ण बाबू कौलेजक शिक्षकमे सभसँ उमेगर रहैथ। उमेरक लाभ-गुण दुनू भेटबो केलैन। पहिल, हाइ स्‍कूलमे पढ़बैक जे दस बर्खसँ ऊपरक अभ्‍यास रहैन ओ लाभ कौलेजमे प्रवेश पबिते नीक शिक्षकक श्रेणी पड़ले भेटलैन। आ दोसर, होइतो अहिना छै, जे जेहेन बुढ़ाएलमे डिग्री पौता ओ ओहिना ने बुढ़िया बाढ़ि जकाँ गाम-गामकेँ उजाड़ि कऽ बुढ़ाएल काजो करता। सोभाविक अछि जैठाम कियो अठारह-बीस बर्खक शिक्षक कौलेजमे प्रवेश करता आ कियो काञ्चीनाथ झा‘किरण’ जकाँ सतावन-अठावन बर्खक अवस्‍थामे करता, तैठाम दुनूकेँ एकरंगाह तँ नहियेँ कहल जा सकैए। एकटा भेला नवतुरिया जिनका अखन सीखैक समए छिऐन आ दोसर ओहन बुढ़ाएल भेला जे गामक-गाममे धार फोड़ि देने छथिन...। तीस-पैंतीस बर्खक उमेरक जखन रामकृष्‍ण बाबू रहैथ तखन कौलेजक शिक्षक बनला। तैबीच बेटो हाइ-स्‍कूलसँ पढ़ि कऽ कौलेजमे पहुँच गेल रहैन। आन शिक्षकक अपेक्षा रामकृष्‍ण बाबूकेँ विद्यार्थीक पढ़ाइ दिस किछु बेसी झूकान रहैन। ओना नीक-बेजए तँ सभठाम किछु-ने-किछु होइते छै, मुदा एकर माने ईहो नइ जे नीकसँ बेसी काज बेजाए भऽ जाए। मुदा समैयोक तँ अपन बलउमकी होइते छै। जखन एक रंग वेतन दुनू गोरेकेँ रहत तँ के कम आ के बेसी भेला? कौलेजमे शुरूहेसँ रामकृष्‍ण बाबूकेँ शिक्षको, कर्मचारियो आ विद्यार्थियो सभ श्रद्धाक नजरिये देखबो करैन आ मानितो रहलैन। जइसँ रामकृष्‍ण बाबूक मनमे ओहन मलिनता कहियो नै एलैन जे जिनगीमे केतौ कमियोँ अछि। यएह ने भेल जिनगी जे जइ काजक भार उठौने छी ओकर निर्वहन जँ इमनदारीसँ करिते छी तखन मलिनता औत किए...। अंगरेजी साहित्‍यक विद्यार्थी रामकृष्‍ण बाबू मुदा अंगरेजी जीवन शैली–माने अपन अधिक-सँ-अधिक काज स्‍वयं करब–नै बनि पड़ैन। ऐ मानेमे रामकृष्‍ण बाबूकेँ महसूस होइन जे अपनामे किछु कमी तँ ऐछे। हेबो केना ने करतैन। खबासोकेँ खबासक खगता मने-मन रहिते अछि किने। कौलेज आ रामकृष्‍ण बाबूक घरक बीच पचास-पचपन किलो मीटर पक्की सड़कक दूरी। नीक सड़क रहने बसक लगातार सर्भिस। गामेसँ कौलेजक आबा-जाही रामकृष्‍ण बाबू रखने रहला। ओना दुइयो-डेढ़ किलो मीटर दूरीबला शिक्षक अपन डेरा फुटा परिवार आ गाम-समाजसँ हटि दोसर समाजमे बसऽ चाहै छैथ। ओना रामकृष्‍ण बाबू अपना गामक पहिल एम.ए छैथ तहूमे अंगरेजी साहित्‍यसँ। अहुना लोक कहै छै जे दूरक ढोलो सुहौन लगै छै। मुदा, ढोल तँ ढोले छी। ढोलक चालि आकि तबलाक चालि थोड़े सभ पकैड़ पबैए। कोनो भाषा भाषा भेल जे क्षेत्र भरिमे बाजल-लिखल जाइए। मुदा साहित्‍य समाजक ओहन शील अछि जे देहक आत्‍मा जकाँ सभ समाजक बीच बास करैए। तैठाम गमैया पाहुन जकाँ जँ मोजरे नइ देब तँ ओइ वेचारे पाहुनक कोन दोख? खैर जे से...। दुनू कारणे रामकृष्‍ण बाबूकेँ परिवारसँ लऽ कऽ समाज तक मान-सम्‍मान आ पद-प्रतिष्‍ठाक आदर भेटबे केलैन। परिवारो आ समाजोकेँ तँ ई लाभ भेबे कएल जे जखन परिवारमे एक गोटे एम.ए. पास कऽ लेलैन तँ एम.ए. तकक बाटक बोध तँ हुनका भाइए गेलैन। करै-सँ-धरै जोकर तँ ओ भाइए गेला। माने ई जे कोन एहेन पढ़ुआ हेता जे उच्‍च शिखर धरि पहुँचैक बीआ अपना मनमे नइ रखने हेता। अगर-मगर एक ढकिया मुदा सबहक मन-मन्‍दिरमे बास करैबला भगवान कैलाशवासी बनैए चाहै छैथ। देखा-देखी रामकृष्‍ण बाबूक परिवारोमे शिक्षाक स्‍तर बढ़लैन। छोट दुनू भाए सेहो एम.ए. पास कऽ लेलखिन, जइसँ नोकरियोमे प्रोन्नति भेलैन। जेकर प्रभाव गामोपर पड़बे कएल। देखा-देखी गाममे पाँचटा एम.ए. पास भऽ गेला। कहैले रामकृष्‍ण बाबू सभ दिन गामसँ जोड़ल रहला मुदा जुड़ि कऽ रहि नै सकला। जुड़ि कऽ रहैक माने भेल जे मनुखेक जिनगी जकाँ मनुखक बनौल समाजोक जिनगी छै किने तँए जहिना परिवारमे बेटाकेँ कोरामे नेने बापोकेँ अपन बालपन मन पड़ै छै, जेकरा ओ पितृ-ऋृण बूझि चुकबैक संकल्प मनमे रोपि निमाहैए तहिना ने समाजियो परिवारमे अछि...। ओना जखन रामकृष्‍ण विद्यार्थी छला तखन बच्‍चे छला, ओहू अवस्‍थामे स्‍कूल-कौलेजक संगी गाममे बनबे केलैन। आ जखन हाइ-स्‍कूलक शिक्षक बनला तखन विद्यार्थी जीवनक सभ किछु बदैल गेलैन, मुदा रहला तँ विद्यार्थीए सबहक बीच। ओना अठबारे गाम अबै छला मुदा रस्‍तेक झमार आ परिवारेक काजमे उलैझ कऽ समए कटि जाइत रहैन, जइसँ गाम दिस तकैक समैये ने भेट पबैन...। ओना समाजोक बीचक जे काज अछि, माने सार्वजनिक काज ओहो केतेक रंगोक अछि आ करैयोक ढंग अलग-अलग छै। मुदा तइ सभसँ कम सरोकार रामकृष्‍ण बाबूकेँ अखन तक रहलैन। कौलेजक  पुस्‍तकालयमे  समृद्धता आएल,  ओना कौलेजमे छात्रो आ शिक्षकोकेँ नव-नव आ नीक-नीक पोथी उपलब्‍ध भेने पुस्‍तकालयक संचालनमे सेहो बढ़ोत्तरी भेल। जहिना पैघ-पैघ प्रकाशनक प्रकाशित पोथीपर नीक प्रकाश पड़ए लगैए, प्रकाशित होइते पोथीक गुण बुझौनिहारक नजैर पड़ए लगै छैन, माने पोथीक गुण-अवगुन बुझौनिहार भेटने सभकेँ लाभे-लाभ होइए तहिना रामकृष्‍ण बाबूसँ,पुस्‍तकालयसँ लऽ कऽ कौलेजक शिक्षकक संग विद्यार्थियोकेँ लाभ भेल...। शुरूहेसँ रामकृष्‍ण बाबूक झुकाउ पढ़ै-लिखै दिस रहलैन, संगे कौलेजक पुस्‍तकालयक भार भेटने पढ़ै-लिखैमे आरो बढ़ौत्तिरियेक अवसर भेटलैन। एक तँ महाविद्यालयक विद्यार्थीकेँ पढ़ौनाइ तैपर पुस्‍तकालयक देख-रेखक भार भेटने रामकृष्‍ण बाबू कौलेज खुजैसँ लऽ कऽ बन्‍द होइ धरिक समैमे बन्‍हा गेला। ओना आन कौलेज जकाँ ऐ कौलेजमे पुस्‍तकालयक रीडिंग रूम नै, नइ तँ रामकृष्‍ण बाबूकेँ आरो बेसी भार पड़ितैन। हलाँकी अलगसँ पुस्‍तकालयक भार भेटने लाभे भेलैन। घरपर सँ सबेरे आठ बजे बस पकड़ऽ निकलै छला, दस-पोने-दस बजे कौलेज पहुँच जाइ छला। जँ क्‍लास रहै छेलैन तँ क्‍लास जाइ छला नइ तँ पुस्‍तकालैयेमे रहै छला। ओना पोथीक लेन-देन पुस्‍तकालयक आन-आन कर्मचारी सबहक जिम्‍मामे छेलैन, मुदा देख-भालक भार तँ रामकृष्‍ण बाबूपर रहबे करैन। दस बजेसँ चारि बजेक बीच पढ़ै-लिखैक भरपूर समए रामकृष्‍ण बाबूकेँ भेटलैन। जेकर उपयोगो नीक जकाँ केलैन। जइसँ अंगरेजी साहित्‍यक संग हिन्‍दी,मैथिली आ संस्‍कृत साहित्‍यकेँ सेहो गहरायसँ अध्‍ययन केला। रामकृष्‍ण बाबूक पढ़ौनीसँ विद्यार्थियोकेँ नीक लाभ भेटैत रहल। तेकर कारण छल जे पुस्‍तकालयमे टटके पढ़ि क्‍लास जाइ छला, नीक जकाँ पढ़बै छला। कौलेजक जिनगीक रूटिंग रामकृष्‍ण बाबूक एहेन बनि गेल रहैन जे भोरे सुति उठि नित्‍यकर्मसँ निवृत होइत, चाह पीबैत-पीबैत नहेबा बेर भऽ जाइन। नहा कऽ खाइ छला आ कपड़ा पहीरि बस पकड़ैले निकैल जाइ छला। तहिना कौलेजसँ घुमती बेर सेहो चारि बजेक बाद हब-गब करैत पाँच बजे तक कौलेजक कम्‍पाउण्‍डसँ निकलै छला, जे सात बजेसँ आठ-साढ़े-आठ बजे तक घरपर पहुँचै छला। घरपर पहुँचला पछाइत रौतुका ओरियानमे लगि जाइ छला। ओना गामोक लोक देखैत रहैन जे रामकृष्‍ण बाबू गामेसँ कौलेज जाइ-अबै छैथ। खाली रबि दिन गाममे रहै छैथ। ओना तेकर अतिरिक्‍त गामक लोकमे ईहो तँ धारणा रहबे करइ जे ‘छबे कौलेज, नबे स्‍कूल।’ माने कौलेजक पढ़ाइ छह मास चलै छै आ हाइ-स्‍कूल तकमे नअ मास। बाँकी दिन छुट्टी रहैए, माने बन्न रहैए। गाममे रहितो रामकृष्‍ण बाबू गामक पैघ समाजसँ हटि कटल-छँटल समाजिक जिनगी जीबए लगला। गामक बीच नव-नव समाजक जन्‍म सभ दिनसँ होइत आबि रहल अछि आ आगूओ होइत रहत। माने ई जे जँ गाममे पाँचटा इंजीनियर भऽ जाथि तँ एक इंजीनियर समाजक जन्‍म भाइए जाइए। समाजमे इंजीनियरक की जरूरत अछि, ई तँ ओ जानैथ, मुदा एक नव समाज तँ उठि कऽ ठाढ़ भेबे कएल। अहिना आनो-आन समाजक ऐछे। डाक्‍टरक समाज, प्रोफेसरक समाज, विस्‍तृत रूपमे पढ़ल-लिखलक समाज इत्‍यादि-इत्‍यादि। दू सए घरक[3] गाममे रामकृष्‍ण बाबूक जन्‍म भेल छेलैन। एक-दियादी परिवार जे एक-जातीय टोल-समाज बनि गाममे ठाढ़ छैन। बाँकी गामक लोक रंग-रंगक अनेको टुकरीमे बँटल अछि। किछु परिवारकेँ, जिनका खेत छैन ओ किसान छैथ आ जिनका अपन खेत नै छैन ओ तँ बोनिहार छैथे जे किछु पूब-पछिम खटि जिनगी बितबै छैथ तँ किछु गोटे छोट-मोट कारोबार करै छैथ। मुदा पढ़ै-लिखैक मामलामे सभ एकरंगाहे। दू-चारि गोरे हाइ-स्‍कूल तक देखने बाँकी सभ निशान दऽ दऽ मटिया तेल-गहुम कोटासँ उठबैबला। गामो तँ आदिम समाजसँ लऽ कऽ एक्कैसम शताब्‍दी तकक इतिहास अपना पेटमे रखने अछि। माने ई जे मनुख निरमित परिवारो छी, समाजो छी आ देश-दुनियाँ सभ कथू छी। आइक सदी एक्कैसम सदी छी, माने एकसँ शुरू भेल सदी ई एक्कैसम छी। आइपर काल्हि ठाढ़ होइत-होइत एक्कैसम सीढ़ीपर पहुँचल बटोही हम सभ छी। तैसंग ईहो एकटा गुण तँ ऐछे जे ने बीसम छेलिऐ आ ने बाइसम हेबै, रहबै एक्कैसमे। तँए हमरा ई भ्रम नइ हेबा चाही जे सभ दिन चानक अशोकक गाछक निच्‍चाँमे टोकरीसँ हमहीं सूत कटैत रहब। मुदा निअसो तँ नहियेँ भऽ सकै छी। हमहूँ ने ऐ धरतीक एक खूटपर नट-नटी जकाँ ठाढ़ छी आ हमरो आगूमे ने विशाल रंग-मञ्च सजल अछि। करोड़ो-अरबो तमसगीर बैसलो-बैसल आ ठाढ़ो भऽ भऽ तमाशा तँ देखैयो-ले चाहि रहला अछि आ देखियो रहला अछि...। रामकृष्‍ण बाबू जेहने चरित्रवान तेहने इमनदारो, मुदा गाममे रहितो समाजसँ दूर जिनगी रहने समाजकेँ जे लाभ हिनकासँ हेबा चाही, से लाभ नइ भेल। उच्‍च श्रेणीक पढ़ल-लिखल लोक, उच्‍च श्रेणीक चिन्‍तको आ उच्‍च श्रेणीक विचारवानो तँ होइते छैथ। मुदा चिन्‍तन केना विचारक रस्‍तासँ चलि विचारवान बनौत, तइ बुझैमे रामकृष्‍णकेँ भौक भेलैन। हलाँकी भौक जानि कऽ नहि, अनजानमे भेलैन। साहित्‍यक विद्यार्थियो आ चिन्‍तको रहने साहित्‍येक दुनियाँमे वौअए लगला। वौआइत-वौआइत आइ चारू जुगक साहित्‍य आ साहित्‍यक भाषा तथा लिपिक बीच तेना ओझरा गेल छैथ जेकरा सोझरबैले जहिना अंगरेजी साहित्‍यक ढेरियाएल पोथी, तहिना संस्‍कृत, मैथिली आ हिन्‍दी साहित्‍यक पोथी पढ़ैले बाँकीए छैन। स्‍कूल-कौलेजक साहित्‍यसँ आगू बढ़ि अठारहो पुराणेमे अखन ओझराएल छैथ। उपनिषद, वेदान्‍त आ एक लाख मंत्रबला ऋृग्‍वेदो तँ बाँकीए छैन...। साहित्‍यक दुनियाँ अलगो अछि आ समाजोक संग अछि। दुनूक दू दिशा, दू पहलू, दू विचार आ दू तरहक संचालनमे दूरी भेने, दूरी तँ बनियेँ जाइए। जइसँ रामकृष्‍ण बाबू गाम-समाजमे रहितो ऐ दूरीक कारणे हटल रहला। ओना, जहिना व्‍यास बाबा अपन अठारहो पुराणक निचोर पाप-पुण्‍यक सीमापर आनि रखि देलखिन तहिना गमैया साहित्‍यकारोक सीमा ने भेल जे गमैया लोकक गमैया भाषामे गमैया बात-विचारकेँ गामक इतिहास-भूगोलकेँ देखैत समाजशास्‍त्रपर नजैर रखैत साहितक रूपमे साहित्‍यकेँ ओढ़ा दिऐ। ◌ शब्‍द संख्‍या : 1494, तिथि : 07 नवम्‍बर 2015 5. जहिना पढ़ैक खुशी पढ़ला पछाइत सभकेँ होइए तहिना रामकृष्‍ण बाबूकेँ सेहो होइन। जिनगीक तँ दुइयेटा ने धुरी अछि, सुख आ दुख। अही दुनू धुरीपर ने दुनियाँक बीच आनो-आनो चरसँ अचर धरि नचबो करैए, उड़बो करैए, महकबो करैए आ महकेबो करैए। जेना एक दिस- बेली, चमेली आ जूही अछि जे धरतीसँ सटल अपन पातक पवित्रता आ फूलक सादगीक संग अपन जिनगीक आदि-अन्‍त करैत अकासकेँ अपन महकसँ महकबैत जीवन-लीला समाप्‍त करैए तँ दोसर दिस- राड़ी, डबहारी आ पटेर अछि जे अपन फूलकेँ अकासमे पसारि एक दिशासँ दोसर दिशा उड़ि-उड़ि अपन रंग-रूप देखबैए, मुदा महक केहेन रखने अछि ओ तँ बेली,जूही आकि चमेली पुछबे करत किने। होइतो अहिना छै जे जखन विद्यार्थी अपन परीछाक तैयारीमे अध्‍ययन केला पछाइत मननक अवस्‍थामे पहुँच उताहुल हुअ लगैए जे हे भगवान इहए प्रश्‍न जँ परीछामे पूछल जाएत तँ हमरासँ नीक उत्तर कियो ने देत। हँ ओहो विद्यार्थी देत जे हमरे जकाँ अध्‍ययन केने मननक मने चलैत हएत। एहेन बात कोनो हाइये स्‍कूलक आकि कौलेजेक विद्यार्थीकेँ नइ, सभकेँ होइए जे रामकृष्‍ण बाबूकेँ सेहो होइन। कोनो पोथी पढ़ला पछाइत जखन मननक  अवस्‍थामे  मन निसाँ जाइ छेलैन  तखन  निसभेर राति जकाँ अपनो सुधि-बुधि बिसैर जाइ छला जे अपना हाथ-पएर अछि की नइ। कानो अछि की नइ। आँखि जँ रहैत तँ दुनियोकेँ देखतौं ने। ओना दुनियाँक दूरी तँ दूर अछि मुदा अपन हाथ-पएर तँ अपना देहेमे सटल अछि तथापि अन्‍हारमे कहाँ एको-डेग आकि एको हाथ उठैए। रामकृष्‍ण बाबूक संग मजबूरी तँ छेलैन्‍हे। मजबूरी ई जे पुस्‍तकालयमे पोथीक लेन-देनमे जे गप-सप्‍प होइन, तइमे कियो बाइबिलक बात पूछि दैन तँ कियो गीताक, कियो पुराणक कथा लाड़ि-चाड़ि दैन तँ कियो वेदान्‍तक। जइसँ मन नंग-चंग रहिते छेलैन। ओना पढ़ैक धारमे उपस्‍थिति होइते छेलैन मुदा तइमे पाराग्राफपर पहुँचैक मोहलत लऽ लइ छला तँए पढ़ैक धारमे बाधा तँ नइ उपस्‍थित होइ छेलैन मुदा लिखैक धारमे तँ सभकेँ होइते छै। जँ से नइ होइ छै तखन चद्दैरक खूटमे बान्‍हि कऽ किए रखऽ पड़ैत- ‘कनक छड़ी सी कामिनी, कहे को रस लीन...।’ जँ वेचाराक धारक धारा गतिशील रहितैन तँ वेचारी धोबिनकेँ किए जोड़ऽ पड़ितैन- ‘कटि के कंचन काटि कऽ छातीपर रख दीन...।’ जहिना सभ दिनसँ आ सभकेँ होइ छै तहिना रामकृष्‍ण बाबूकेँ सेहो होइन...। ज्ञान एलापर जहिना गुनगुनी लगैए, बुधि एलापर बुदबुदी, तहिना ने लूरि एलापर खुइर सेहो अबैए। जइसँ खोदो-वेद होइए आ वेदो-खोद तँ होइते अछि। जे रामकृष्‍णो बाबूक मनमे कुरसीक ओंगठान आबि जाइन। ओंगठलहा मनमे कोनो नव विचार ऐबते देह-हाथमे खुर-खुरी आबऽ लगै छेलैन। खुर-खुरी ऐबते हाँइ-हाँइ शर्टक ऊपरका जेबीमे खोंसल पेन आ राखल डायरी निकालि चारि-पाँति गढ़ि लइ छला। कहियो नीक धुनमे गीत तँ कहियो नीक चालिमे कविता। ई तँ अपनो मने-मन बुझबे करै छला जे गद्य लेखन सक्कत धरतीपर चलब छी, जखन कि पद्य- सल-सल, दल-दल, थल-थल, थल-जल सभतैर चलैए। जे पुरना डायरी सभमे केतेक टुकड़ी-पुरजी गीत-कविताक ओहिना खोंसल छैन्‍हे। जहिया जेहेन छुट्टी कौलेजमे होइन तहिया पुस्‍तकालयसँ तेहेन अधखड़ुआ पढ़ल किताब वा ओतेक किताब लऽ कऽ चलै छला जे गामोमे पढ़ब। पढ़ैक तेहेन लत पकैड़ नेने रहैन जे लिखै दिस हाथे ने बढ़ऽ दैन। हाथो केना बढ़ितैन, दसमीक छुट्टीमे अबै छला तँ भागवत-कथा सभकेँ सुनबऽ लगैथ आ अमैया छुट्टीमे अबै छला तँ सिनुरिया आमक ललियाएल सिनूर-कलियाएल फल, कृष्‍णभोगक थुलियाएल-गुलियाएल गोला, सजमनियाक सजमैन आ फैजली आमक गाछसँ फड़ धरिक फझैत सुनैत-सुनैत चालीस दिनक छुट्टी बीत जाइ छेलैन। मुदा गाछ जेहेन माटिपर रोपल अछि तेहने ने आमोक सुआद हेतै से बुझिये ने पबै छला। रामकृष्‍ण बाबू आमक सुआदेटा-मे नै ओझराइ छला, ओझरा जाइ छला जे हनुमानजी जखन सीताकेँ ताकए लंका गेला आ ओइठाम अमराय बगानमे काँच-पाकल, लाल-डम्‍हाएल सभकेँ खा-खा सुआदो बुझलैन आ वएह जे आमक गुद्दा खा-खा आँठी फेकलखिन, सएह ने बम्‍बैसँ बम्‍बई पलल आ कलकतियासँ कलकत्ता। मुदा सरही भुटभुटिया, खटहा नकुबी आ गोबराहा सापसीन केना आबि गेल? अही ओझरीमे साल-सालक गरमी छुट्टी अमरैयाक बगवैयामे बीतैत रहलैन, मुदा एतबो ने बूझि पेला जे मनुखक भोजनक अनिवार्य वस्‍तुमे फलो अछि। जैठामक बारहो मास तीन सए साइठो दिनक भोज्‍य वस्‍तु फल भेल, तैठाम हजारो बीघा आमक गाछीबला गामकेँ तँ पुछले जाएत किने जे एते खेतक उपजा जँ अहाँ सभ डेढ़े-दुइए मासमे खा जाइ छी, तहूमे अन्न-तीमन लगा कऽ नइ, केवल चारि सए ग्राम फलेटामे, तखन किलो भरि अन्न आ तीमनमे केते खाएब? तैपर सालक दस-साढ़े-दस मासमे जे फलक खगता हएत से केतएसँ आनब? भाय! मुदा किछु छिऐ तँ आमक गाछीक जेठक दुपहरियाक मचकीपर मचकैत चैतावर चौमासासँ बढ़ैत छहमासा, बरहमासा होइत मस्‍तीसँ चलिते अछि। तहूमे रामकृष्‍ण बाबूक सोझराएल मन तँ छेबे करैन जइमे कवित्‍व शक्‍ति छैन्‍हे। कविता लिखैमे स्‍पष्‍ट सोच छैन जे जखन- ‘भुजंग प्रयात्, भुजंग प्रयात् भुजंग प्रयात्, भुजंग प्रयात्।’ छन्‍दबद्ध कविता भऽ सकैए। ‘हरि गरजल हरि सबदल हरिक सबद सुनि हरि चलल।’ कविता भऽ सकैए। तखन ईहो किए ने हएत- ‘नीन तोड़ू जागू उठू उठि कऽ ठाढ़ होउ।’ तँए कवितो लिखैमे केतौ उलझन मनमे नइ होइन। मुदा लिखैकाल मनमे झमेल ठाढ़ भऽ जानि जे शेक्‍सपीयरक शैलीमे गद्य लिखी आकि शेक्‍सपीयर शैलीमे पद्य? खैर किछु हौउ, मुदा ने चाइनसँ तरबा तकक कविता कहियो कहि आकि लिख पबै छला आ ने कथा। ओना अंग-भंग आ भंग-अंग कविता नइ लिखै छला सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। ओना रामकृष्‍ण बाबू साहित्‍यक विद्यार्थी सभ दिन रहला, जइसँ सभ दिन साहित्‍यसँ जुड़ाउ रहलैन। मुदा रूपमे थोड़े बदलाव भेलैन। बदलाव ई भेलैन जे जखन हाइ स्‍कूलक शिक्षक छला तखन परिवारक बोझ तर तेना दबल छला जे लिखै-पढ़ैक वातावरण परिवारमे बनाइए ने पाबि सकला। जइसँ अपन अध्‍ययन-शक्‍तिमे सेहो बाधा उपस्‍थित भेबे केलैन। मुदा साहित्‍यसँ प्रेम रहने परिवारक संस्‍कार-संस्‍कृतिसँ जुड़ल रहला। साज-बाजक संग परिवारो सजले छेलैन। असगरूआ जिनगी रहने हरिमुनियाँ रखै छला। आखिर साजो तँ साज छी। किछु एहनो अछि जे असगरो दुनियाँमे रमैए आ दोसराइतोक संग रमैए। हरिमुनियाँ आकि खौजरी एहने ने साज छी। जँ से नइ रहैत तँ कबीरदास अपना झोरीमे खौजरीए टा किए रखै छला। ओना हाइ-स्‍कूलक जिनगीमे रामकृष्‍ण बाबू अपनो आ परिवारोक समुचित खाँहिंसकेँ नै पुरा पबै छला। मुदा ऐठामक माटियोक तँ अपन गुण-धर्म अछि। नै पान तँ पानक डंटियोसँ पूजाक विहीत होइते अछि। एहेन खानापुरी रामकृष्‍ण बाबूक जिनगीक बीच छेलैन। ओना मनमे सदैत रहैन जे जिनगी खानापुरी नइ,पूरीखाना छी। मुदा..? शिक्षकक जिनगीक बीच रामकृष्‍ण बाबू साँझू पहरमे, एक घण्‍टा नित्‍य हरिमुनियाँपर बैस अपन स्‍वर-साधना करै छला आ अपन इष्‍ट आराध्‍य देवकेँ दुखनमो सुनबै छला। कौलेजक नोकरीक दस सालक पछाइत–प्रोफेसर बनलापर–रामकृष्‍ण बाबूक जिनगीक परिस्‍थितिमे मोड़ एलैन। अनेको परिवारिक उलझन एक्केबेर समटा गेलैन। एक दिस कौलेजकेँ सरकारीकरण भेने वेतनमे भरपुर उछाल एलैन तँ दोसर दिस दूटा बेटा बैंकक नोकरी करए लगलैन। बाल-बच्‍चाक बिआह-दान, पढ़ाइ-लिखाइसँ रामकृष्‍ण बाबू निचेन भेला। निचेन होइते जेना पढ़ै-लिखैक जिज्ञासा तेज भऽ गेलैन। एक संग कथा-कविता लिखब शुरू केला। जहिना सभकेँ एकटा गीत लिखला पछाइत मनमे होइ छै जे एकटा गीतक मलो बना गरदेनमे पहिरी तहिना कथाक एकटा संग्रह, करीब अस्‍सी पृष्‍ठक, छपौलैन। जिनगीक पचासम बरख रामकृष्‍ण बाबू पार कऽ चुकल छला। मुदा जिनगियो तँ जिनगी छी जे एक उमेरक–समैक–हिसाबसँ चलैए आ दोसर, काजकेँ आराध्‍य मानि आराधनाक पाछू जे जिनगी चलै छै ओ। मुदा से नइ, भगवान केकरो बेपाट नै छथिन, ओना एते दूजा-भाव तँ छैन्‍हे जे केकरो सुखदेव जकाँ पेटेमे हूँहकारी सीखा दइ छथिन तँ केकरो अष्‍टावक्र जकाँ शुद्ध-अशुद्ध। तँ केकरो ध्रुव जकाँ बच्‍चेमे एकटंगाक लूरि सीखा दइ छथिन आ तहिना केकरो युवनास्‍त जकाँ जुआनीमे सीखबै छथिन, तँ केकरो बुढ़िया शबरी ऐठामक बैर खेनाइ। रामकृष्‍ण बाबूक पचास बरख परिवारसँ लऽ कऽ अखन धरिक जे समए काटब रहैन से इमनदारीसँ कटलैन। जेकर फलो भेटबे केलैन। तीनू बेटाकेँ नीक जकाँ पढ़ा-लिखा नीक पदपर पहुँचा, बिआह-दान करैत जिनगीक विश्रामक साँस लेलैन। आब, पहिलुका जे धएल-धरल साहित्‍यिक बीज गणित छेलैन ओ जेना चैती हवा पेब एकाएक भकरार गाछ जकाँ मनमे ठाढ़ भेलैन। ठाढ़ भेलैन ई जे साहित्‍य पढ़ि जँ कनियोँ साहित्‍य-साधना नै केलौं तँ ओइ पढ़बक कोनो महत नै भेल। ओना साहित्‍यक क्षेत्र ओहन क्षेत्र छी जे बिनु ओर-छोरक अछि जेकर पार पाएब कठिन तँ ऐछे। जँ से नइ अछि तँ कियो किए अपन राग अलापैत घण्‍टो-घण्‍टो स्‍वर-साधना करै छैथ, तँ कियो पैरक एक आँगुरपर ठाढ़ भऽ नचै छैथ? मुदा से नइ, रामकृष्‍ण बाबूकेँ कथा आ कविता लिखै दिस तेज धार जकाँ मन बढ़लैन। ओना जइ उमेरमे अखन रामकृष्‍ण बाबू आबि गेल छैथ आ साहित्‍यक बीज मनमे जागि गेल छैन, जँ तेकर समुचित पालन पोशन हएत तँ ओ कवितासँ महाकाव्‍य आ कथासँ उपन्‍यास रूपमे फड़बे-फुलेबे करत। मुदा परिवारिक जे जिनगी अछि ओ गजपटहा धार जकाँ बनि गेल अछि जइसँ बरहबट्टु विचारो आ गतियो-विधि बरहबट्टुए भऽ जाइए। तँए नीक बाटो पकड़ब खेल नहियेँ छी। जखन अपन संग्रहक सभ कथा सेरिया, छपैले प्रेस दिस बढ़बैक ओरियान केलैन तइ दिन रामकृष्‍ण बाबूकेँ खुशीसँ अपन बिआहक दिन मन पड़ि गेलैन। केकरो बेटी, केकरो पुतोहु, केकरो पत्नी तँ केकरो जननीक सीमा छी किने? तूँ नीके-ना प्रेससँ आरो फ्रेश भऽ अबिहऽ। जिनगीमे की लेब। यएह ने भेल समाजिक जीव भेने समाजकेँ आत्‍म-शक्‍ति देब। पचास हजार महिना कमाइ छी, किए ने अपन आ अपन परिवारक खर्चकेँ जिनगीक योजनानुसार बनाएब-बढ़ाएब। देश गरीब अछि, गरीब ऐ दुआरे जे हजारो बर्खक गुलामीक पछाइत स्‍वतंत्राक साँस लेलक। जइसँ समाजक संग परिवारोक धुरी तँ ढील भाइए गेल अछि। चारि बापूत तँ उत्‍पादनकर्ता परिवारमे छी, जँ ओ उत्‍पादकेँ परिवारक समुचित विकासमे लगा आगू दिस डेग उठाएब तँ ओ बिसवासू हेबे करत। रामकृष्‍ण बाबूक उत्‍साह जेते लिखै घड़ी रहैन तइसँ बेसी उत्‍साह पोथी छपबैकाल मनमे जगलैन। लोकक बीच जुड़ाएल अपन आत्‍मचित्‍य पठा रहल छी, केतेकेँ आत्‍म जुड़ाएत ई पछाइत बुझब मुदा अनवरत ऐ साहित्‍य साधनासँ जुड़ि आगूक दिवस गूदस करब। पोथी छपल। किछु पोथी हित-अपेछितक संग कुटुमो-परिवारमे बिलहलैन। पोथी छपबैकाल मनमे रहैन जे अही पोथीक मूल्‍यसँ आगूक पोथी छपबैमे सुविधा हएत। मुदा समाजोक तँ अजीव खेल अछि, एक दिस पढ़ैक वातावरण तैयार भेल जा रहल अछि तँ दोसर दिस पढ़निहार पोथीसँ हटि रहल अछि। हजार पोथीमे गोटेक सए बिनु मूल्‍यक बँटलैन, बाँकी ओहिना अलमारीमे रखल रहलैन। लोकक बीच एहेन धारणा ऐछे जे जँ कियो साधक अपन कठिन साधनासँ पोथी प्रकाशित करबै छैथ आ बजारक समुचित बेवस्‍था आ समुचित मांग नै रहने जँ अपन बजार अपने ताकऽ आगू बढ़ै छैथ तँ ओ अपन नैतिकताक मान बढ़बै छैथ। मुदा वाह रे नङ्गरकट समाज! किछु अपने नै करत आ केनिहारकेँ सौंसे माथ टेटरे ताकि बाजत जे जँ नीक रचनाकार रहितैथ तँ अपने गामे-गाम घुरि-घुरि भौरगिरी करितैथ। मुदा हुनका यएह ने बुझऽ अबै छैन जे जखन मनुख अपन जिनगीकेँ अपना हाथमे लऽ पैरक बले चलि बुधिक बाट पकैड़ विवेकक लक्ष्‍य बना ओतए तक पहुँचैक तीर्थ यात्रा करए, वएह ने मनुख भेल। मुदा समाजक लोको तँ लोके छी किने, कियो अनकर नीककेँ भरि दिन अधला बनबैए तँ कियो अपन अधलाकेँ भरि दिन नीक बनबैए। जँ से नइ अछि तँ किए कियो अपनाकेँ उदार कहैए आ अनका कंजूस कहि गरियबैए? भाय! गारि-गरौबलिक तँ ई दुनियेँ छी, पढ़बो करू सुनबो करू, सीखबो  करू आ सीखेबो करू। जँ  से नइ  करब तँ बिजलीक  इजोत जकाँ लगले इजोत लगले अन्‍हारमे पड़ि जाएब। सभ सभकेँ गरियबै पाछू बेहाल अछि, जइसँ दुनियाँक सभ गारि सुननिहारो छी आ पढ़निहारो तँ छीहे। जेना, जे कियो पोथी प्रेमी छैथ ओ अपन सिदहो-समरक पाइ पोथीए पाछू मार्क्‍स जकाँ गमा दइ छैथ, मुदा खाधुर नीक मानि प्रशंसा करत, एहनो तँ मनुखक सोभाव नहियेँ अछि। ताड़ी-दारू पीनिहार अपन सिदहा-समरक पाइ ताड़ी-दारूमे गमा, रोडपर सँ दुनियाँकेँ गरिऐबते अछि। तँए ओ नीक करैए एहनो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। तहिना खेतक प्रेमी लोक, बेटाकेँ कुपोषणक शिकार बना लइ छैथ मुदा कमाएल पाइ नै खर्च कऽ ओही बेटा-ले खेत कीन लइ छैथ। खैर जे से...। दुनियाँमे सभ अपनाकेँ उदार मानि दुनियाँकेँ कंजूस कहि गारि तँ पढ़िते अछि, कर्म चाहे जे हुअए। मुदा ई खेल छी मनक माइनक। मनक माइन जे नीक बुझैए आकि अधला बुझैए ओ भेल मनक खेती-वाड़ीक उपजा। उपजा तँ समैक हिसाबसँ खेतमे उपजबे करैए, तखन तँ जे जेहेन खेतिहर ओ ओहेन हवा-पानि देख फसल लगबै छैथ, जइसँ सुभर अन्नो आ आनो-आन भोज्‍य वस्‍तु तँ उपजैबते छैथ। ओना आइए नै अदौसँ आमोक गाछ आ ताड़ो-खजूरक गाछ आबि रहल अछि, मुदा छी तँ दुनू गाछे। तँए फल कुफल नै फड़त सेहो केकरो रोकने थोड़े रोकाएत। एकटा गाछमे फलसँ रस निकलै छै तँ दोसरकेँ पँजरेसँ निकलै छै। मुदा दुनियाँक खेलो तँ खेले छी, केकरो फूलसँ फड़ होइ छै तँ केकरो फूलकेँ फड़सँ कहियो मकै जकाँ भेँटे ने होइ छै। जइ दिन रामकृष्‍ण बाबू प्रेससँ पोथीक थाक लऽ बससँ गाम अबैत रहैथ, तइ दिन गोसा घाटक मेला दुआरे बसमे खूब भीड़ रहइ। गामक बस रहने पोथीक थाक नेने बसमे चढ़ला। चिन्‍हार बसक कण्‍डक्‍टर आगूएमे गेटे सोझे रामकृष्‍ण बाबूकेँ बैसा देलकैन। पोथीक थाक दुनू जॉंघपर रखि दुनू हाथे पकैड़, भीड़मे हेरा गेला। हेराइते दुनू आँखि बन्न भऽ गेलैन। पर्वतपर टहलैत पार्वतीकेँ देखते जहिना महादेव कल्‍याण, कल्‍याण करए लगै छैथ तहिना हिनको मन उधिया गेलैन। उधियाइते बिसैर गेला जे गाड़ीमे ठस्‍सम-ठस्‍स लोक अछि, जिनगी भरिक कमाइ आगूमे अछि तँए कनी सचेत रही। रामकृष्‍ण बाबूक वौआइत मन शिव-शिव करैत विचड़ए लगलैन। बसो जेना चलैसँ थस्‍स लऽ लेने। कखैन पहुँचाएत, कखैन नइ। पत्नीकेँ अपन जिनगीक कमाइ हाथमे दऽ देबैन। परिवारक एकटा ओहन अमर फलक गाछ रोपि रहल छी जे पुश्‍त-पुश्‍ताइन रचैत-बसैत भोगैत रहत। एक-एक जनकेँ हाथमे अपन कीर्त देब। जँ आइए सभटा बिलहा जाएत तँ काल्‍हिये फेर ने प्रेसक रस्‍ता पकड़ब। जइ दिन रामकृष्‍ण बाबू पोथीक रूपमे कथा संग्रह छपबौलैन तहू दिन तक ई बात नै बूझि पेला जे किए अपनो परिवारजन मैथिली साहित्‍यक पोथी नइ पढ़लैन। की मैथिलीएकेँ दोख लगा जिनगीक बाटकेँ तियागि दिऐ। भाषा नीक-अधला भऽ सकैए मुदा भाषासँ सजल जे साहित्‍य अछि, जे मनुखक आत्‍म स्‍वरूप अछि, ओ केना इमहर-ओमहर भऽ सकैए। ओना जाधैर रामकृष्‍ण बाबूक पोथी प्रेसमे रहलैन ताधैर अपन सृजन-शीलतामे कमी आबि गेल रहैन। प्रेसोमे पोथी छह मास अँटकलैन जे कौलेजसँ समए निकालि-निकालि प्रेसक काज सम्‍हारने रहैथ। जइ समए रामकृष्‍ण बाबूक कथा संग्रह प्रकाशित भेलैन तइ समए जहिना लुबधल फड़ल आमक गाछ आ लुबधल फुलाएल गुलाव-फूलक गाछक शोभा-सुन्‍दरक रंग-रूपमे चारि चान लगि जाइए, तहिना रामकृष्‍णो बाबूक मनमे लगल रहैन। जइसँ दिन-राति कथा-कविताक सृजनक पाछू मन वौअए लगलैन। छिटफुट केतेको कथो लिखलैन आ कवितो। मुदा लिखैक पाछू छपाएबो, माने प्रकाशितो कराएब तँ ओहीसँ जुड़ल अछि, तँए जखन पोथी छपाइपर नजैर उठि कऽ जानि तँ अन्‍हार जकाँ आँखिक सोझमे बूझि पड़ैन। ओना अन्‍हारो बहुत घनगर नहियेँ रहैन, घनगर अन्‍हार तँ ओइ रचनाकारक आगू पसरैत जिनका आर्थिक मजबूरी रहै छैन। घनगर अन्‍हार नइ रहैक कारण रामकृष्‍ण बाबूकेँ अपनो पचास हजार महिनाक कमाइ रहैन, तैसंग दुनू बेटाक कमाइ सेहो तइसँ बेसीए रहैन। ओना जइ मनसूबासँ पोथीक दाम रखने छला, जँ अदहो पोथी–माने पाँचो सए–बीक जइतैन तैयो समस्‍याक समाधान, माने आगूक छपबैक छपाइक बाधा हल भऽ जइतैन। मुदा से भेलैन नै। घरेमे पोथी जक-थक पड़ल रहि गेलैन जइसँ रामकृष्‍ण बाबूक सृजनशीलतामे ह्रास हुअ लगलैन। रचना दिससँ मन टुटए लगलैन, मुदा पढ़ै-लिखैक वातावरणक बीच रहने पढ़ै-लिखैक अनुकूलता तँ रहबे करैन। सृजन दिससँ–माने मौलिक रचना दिससँ–रामकृष्‍ण बाबूक मन उतैर समीक्षा तथा अनुवाद दिस बढ़ऽ लगलैन। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2363, तिथि : 12 नवम्‍बर 2015 6. गाम-घर आ चेहरा-मोहरासँ धीरेन्‍द्र रामकृष्‍ण बाबूकेँ तीस-पैंतीस बर्खसँ चिन्‍हैत आबि रहल छैन, मुदा सोझहा-सोझही कहियो कोनो गप नै, तैठाम आगूक सम्‍बन्‍धक बीच किछु रस्‍ता तँ हेबा चाही, से बन्न रहने मनक बात दुनूकेँ मनेमे रहलैन। मनक बात मनेमे ई जे धीरेन्‍द्र सेहो साहित्‍यक विद्यार्थी, साहित्‍यसँ रूचि रहने,गाममे केतेक पावैन-तिहारक अवसरपर सेहो आ औहुना समाजक संग समाजिक मञ्चपर समाजक जिनगीक बात कहितो छैथ, सुनितो छैत आ संगे हँसी-ठट्ठा सेहो करिते छैथ, मुदा...। कृष्‍णपुरक दछिनवारि टोलमे एक गोरे अगुआ कऽ एकदिना साहित्‍यिक-सांस्‍कृतिक कार्यक्रमक आयोजन केलैन। अगले-बगलक चारि गामक चारि गोरेकेँ कार्यक्रममे आमंत्रित कऽ एकठाम केलैन। गामक कार्यक्रम, साहित्‍यसँ रूचि रखैबला धीरेन्‍द्र सेहो अपन काज बूझि ओइमे जुटला। ओइ चारू पड़ोसी विद्वानमे रामकृष्‍ण बाबू एक। दोसर, गामेक एक बेकती जे रहैथ तँ अर्थशास्‍त्र विषयक प्रोफेसर मुदा गामक जिनगीमे रचल-बसल रहने समाजिक काजमे बेस रूचि छेलैन। तेसर बेकती छला, तेसर गामक आई.पी.एस. अफसर- आई.जी साहैब। आ चारीम बेकती रहैथ- संस्‍कृत साहित्‍यक आचार्यक संग वैदिक। धीरेन्‍द्रकेँ सेहो समए भेटल। मुदा, एक तँ गाममे नव काजक बीजारोपण भऽ रहलए जइ फलक जरूरत समाजकेँ छै। तँए अपनाकेँ वक्ता नै बूझि धीरेन्‍द्र प्रमुख[4] श्रोताक रूपमे मञ्चपर उपस्‍थित भेला। एके दरी-जाजीमक मञ्च बनल। श्रोतासँ वक्ता धरि एक संग सभ बैसला। ओना निर्धारित विषय नइ रहने सभ अपने-अपने सूरे तैयार रहबे करैथ। तैपर मने-मन ईहो तँ रहबे करैन जे समाजक बीच जेहेन पहचान अछि, तइमे विश्व-मोहिनीक मञ्च परहक नारद जकाँ ने कहीं भऽ जाए। ओना निर्धारित समैसँ पहिने जहिना मञ्चक ओरियान मञ्चकर्ता केने छला तहिना आमंत्रित विद्वतजन सेहो आध-पौन घण्‍टा पहिनहि पहुँच गेल रहैथ। खुल्‍ला मञ्च छल तँए चारू गोरेक परिचए-पात करबैत मञ्चवैया चाह-पानक ओरियानमे गेला। एमहर-चारू गोरे नमस्‍कार-पाती करैत, अपन-अपन दर्शक बाँटि लेलैन। नवतुरिया धिया-पुता सेहो अनेरे ढेरिया[5] गेल छल। कियो पुलिस विभागक आई.जी.सँ मुहॉं-मुहींक गपक आनन्‍दमे मस्‍त, तँ कियो कौलेज-युनिवर्सिटीक विषयक चर्चमे व्‍यस्‍त। मुदा आम आदमी ऐ दुआरे व्‍यस्‍त जे साहित्‍यिकी पर्वक नव पवनौट समाजकेँ भेट रहल अछि। वाह रे गामक संस्‍कार! हमरा गामकेँ फल्‍लॉं-फल्‍लाँ आबि धरतीकेँ पवित्र केने छैथ…। सभसँ आश्चर्यजित लोक तखन भेला जखन एक संग एक दरीपर बैस सभ चाह पीलैन। तहूमे जेना आई.जी. साहैब कमाने सम्‍हारि नेने रहैथ तहिना चाह देखते कहि देलखिन- “एक दिससँ शुरू करू।” कार्यक्रम शुरू भेल। ओना अपन-अपन सीमामे सभ उपरा-उपरी, मुदा आई.जी. साहैबक सम्‍बन्‍धमे विशेष चर्च समाजक बीच पसरले छल जे वैष्‍णव छैथ,माछ-मासु किछु ने खाइ छैथ। तेतबे नइ, एको पाइ घूसो-घास नइ लइ छथिन। जइक चलते पितासँ गरमिलान रहै छैन। गरमिलानोक तँ कारण ऐछे, जैठाम थानाक मुंशी, एक बाध खेत, दस कट्ठा घराड़ी कीन, तीन महला पीट लइए, तैठाम आई.पी.एस. बेटा भेनहि की भेल। सभ दिन अपने तवाह जे मासक अन्‍तिम सप्‍ताहमे साबुन लगाएब छोड़ि देने छी...। मञ्चक अध्‍यक्षक नाओंक घोषणा होइते गामक पान-सातटा नव-तूर अपन-अपन कविता नेने एक्केबेर आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेल। जा! ई की भेल? मुदा पहिने सभकेँ कविता पाठक समए भेटल। पहिल कविताक पाठमे जहिना रामकृष्‍ण बाबू मुड़ी डोलबैथ तहिना, शायरी जकाँ शब्‍द-शब्‍दमे आई.जी. साहैब सेहो कहथिन- “बहुत नीक, बड़ बढ़ियाँ।” ओना बैसारक पाछू दिस ईहो कन-फुसकी होइत रहए- “रओ, ई छौड़ा कहिया कवि-काठी भऽ गेल। जेना पेटेसँ सुकदेव जकाँ सीख कऽ आएल हुअए तहिना ढीठगरसँ पढ़ैए!” ओना, पँजराबला तैपर चोहटबो करइ- “तूँ ने अपने सुनै छह आ ने दोसरकेँ सुनऽ दइ छहक।” कविताक पाठ सम्‍पन्न भेल। पहिल वक्ता आई.जी. साहैब भेला। गीतासँ बेसी सिनेह छैन, गीतापर जेते छोटसँ छोट आ पैघसँ पैघ पोथी अछि, सभ रखनौं छैथ आ पढ़ितो छैथ। ओ गीतेपर प्रवचन करए लगला। ओना विषयो-वस्‍तु निर्धारित नइ छल। आई.जी. साहैबकेँ अद्भुत भाषण-शक्‍ति छैन्‍हे, जमीनक रस्‍ते केना गीता चलि रहल अछि...;अपन एक घण्‍टाक भाषणमे आई.जी. साहैब रखि देलखिन। एक सूरे वक्ता आ श्रोता मुँहमे कान सटा तेना मस्‍त भऽ गेला जे सबहक विचारमे जेना नव स्‍फुरण जागि गेल। चाह चलल। हँसी-मजाक सेहो चलल। तइ बिच्‍चेमे रामकृष्‍ण बाबू अपन पोथी–कथा संग्रहक–एक-एकटा दस-गोरेक हाथमे थम्‍हा देलखिन। धीरेन्‍द्रोक हाथमे एकटा पोथी एलैन। जेतेकाल चाह-पान चलल तेतेकालमे सभ कियो पोथीकेँ उनटा-पुनटा देख भाषा-साहित्‍य, साहित्‍यकारक परिचयक संग रामकृष्‍ण बाबूक चेहरा देख-देख अपन-अपन पोथी अपना आगूमे रखि लेलैन । कार्यक्रम फेर शुरू भेल। दोसर वक्ताक रूपमे रामकृष्‍ण बाबूकेँ समए भेटलैन। विषय निर्धारित नइ रहने सभ अपन-अपन विषय-खण्‍ड चुननहि रहैथ। तहूमे साहित्‍यिक-सांस्‍कृतिक कार्यक्रम छी। ने विषयक कमी आ ने भावक। ओना आई.जी. साहैबक प्रवचन सुनि रामकृष्‍ण बाबू एते अह्लादित भऽ गेला जे गीता दिससँ ससैर रामायण दिस चलि एला। ओना दर्शकक बीच क्रम भंग भेल मुदा ईहो तँ भेबे कएल जे एक विषयमे पच्‍चीस गोरे पच्‍चीस रंगक बात कहि अनेरे श्रोताक कानकेँ झराह नै केलैन। मुदा तैयो चारू वक्ताक बीच अपन-अपन वक्तव्‍यक कान्‍ही-मिलानी रहबे करैन। रामकृष्‍ण बाबू रामायणिक सीता-चरित्र शुरू केलैन जे केना ऋृषि-मुनीक खूनसँ उत्‍पैत कन्‍या पिताक ऐठाम शिव-धनुष सन धनुषकेँ वामा हाथे उठा ठाँउ करै छलि, तिनका केना पति-घरमे राजगद्दीक बदला बोनक बास करए पड़लैन। जेतए मात्र तीनियेँ गोरे–राम, लक्ष्‍मण, सीता–वौआइत रहलैथ। संगे, रावण केना ठकि कऽ हरि लेलकैन। एक तँ शिक्षण वृत्तिसँ जुड़ल रामकृष्‍ण बाबू, दोसर साहित्‍यसँ सेहो जुड़ल, तँए रूचिगर ढंगसँ बजला। जइसँ दर्शकक बीच जहिना दही-चीनीक भोजमे सकरौड़ी पातपर अबैत तहिना गीतासँ रामायण धरिक प्रवचन सुनैत-सुनैत समाज मस्‍त भऽ गेला। तेसर वक्ता अर्थशास्‍त्री रहैथ, ओना विषय बुझबैक अद्भुत क्षमता रहने कौलेजोमे नीक शिक्षकक गिनती छैन्‍हे। हिनको अपन विषय तँए अपन साहित्‍य-संस्‍कृति रहबे करैन। मिथिलाक माटि-पानि आ साइबेरियाक उत्तरी ध्रुवसँ सटल दछिनी तकक माटि-पानि, समए-सालक तुलना केलैन। केना साइबेरियाक माटि, जे सालक तीन मास-चारि मास-पाँच मास बरफसँ उघार होइए आ ओइठामक लोक केना ओइ माटिकेँ उपजा अपन उदर-पोषण करै छैथ। जखन कि अपना ऐठाम देखौआ तीन मौसम–जाड़, गरमी, बरसात–आ तेकर सीमा-सरहद मिला छहटा मौसम होइए। ने बरफसँ कहियो भेँट आ ने वर्फीली रोगसँ रोगाएल मौसमक संग मातृभूमिसँ। अपना ऐठाम बेसीसँ बेसी- कहियोकाल हवोक संग आ कहियोकाल बर्खोक संग पाथर खसैए, वएह भेल बरफ। चारिम वक्ता आचार्यजी भेला जे छठि पावैनपर बजला। पोखैरक घाटपर डुबैत सूर्यक संग उगैत सूर्यक आगू सजल सूप-कोनियाँक अर्घक शास्‍त्रीय विवेचन पहिने आचार्यजी केलैन। जे किछु गोरे बुझबो केलैन आ किछु गोरे नहियोँ बुझलैन। पछाइत अर्घक संगे जेना अचार्यजी सूपक भुसवाक संग डालीमे गुड़ैक गेला। गुड़ैकते बजला- “चाउरक चिक्कसमे कुशियारक रस मिला अन्नकेँ मधुर बनबैक लूरि अपना सबहक पूर्वजेक देन छी। जेकरा अपना सभ आइयो ओहिना जीबित रखने छी। खेती-गिरहस्‍तीसँ उपजल वस्‍तुकेँ डालीमे सजबै छी। जे एक जुगक सीमा रेखा निर्धारित केने अछि। वरसाती फसल जेना हरदी, आदी, सुथनी, अड़ुआ,टौकना, कुशियार इत्‍यादिक समए पुड़ि गेल, आब ओकरा खेतसँ आनि अपन उपयोग करू। तहिना अँकुरीपर संकेत कएल अछि जे ओकर अँकुरैक समए भऽ गेल तँए ओकरा घरसँ निकालि खेतमे दियौ...।” आचार्यजीक वक्तव्‍यसँ दर्शक सभ पावैनक पाबन-पौना पाबि गद्-गद् भऽ गेला। आचार्यजीक वक्तव्‍यसँ कए गोरेक मुहसँ अनायास निकलल- “यएह ने खेतसँ अबैत आ खेत दिस जाइत उदय-अस्‍त छी!” “एक जिनगीक बेथा-कथा, केना एकटा दाना साल भरि चक्कर लगबैत छठिक घाटपर अँकुरि कऽ परसाद बनि अपन पाबन पौना दऽ रहल अछि!” सम्‍पन्नताक संग कार्यक्रमक समापन भेल। खुशीक वातावरणमे गदगदीक लहैर लहरल। बाहरी जे अतिथि-अभ्‍यागत छला हुनका सभकेँ विदा करबाक बेर आएल। मुदा जहिना सीता स्‍वयंवरक पछाइत जखन मिथिलासँ मिथिलांगना विदा भऽ अयोध्‍या जाइ लेल तैयार भेली आ तखन जहिना एक दिस बरियातीक बीच जानकी, तहिना ने दोसर दिस जानकी-राम सेहो छेलैथे। जहिना अतिथिगण समाजक सिनेहसँ सिनेहिल भेला तहिना दोसर दिस समाज सेहो बाहरी समाजसँ सिनेहिल भऽ भऽ सिहैर रहल छला। जहिना कार्यक्रम शुरू होइसँ पहिनहि चारू गोरेकेँ एलापर सबहक परिचए बेवस्‍थापक देने छेलखिन तहिना चारू परिचितिसँ मुँह-मिलानी करैत एक स्‍वरे बजला- “एहेन कार्यक्रम साले-साल समाजमे हेबा चाही।” गौआँ-सँ-अनगौआँ धरि सभ एक स्‍वरे हूँहकारी भरलैन- “एके गाममे नइ सभ गाममे होय, जँ दसटा गाममे सालमे एको बेर भेल तैयो मास-सबा-मासपर भेल, जइसँ मनक ताजगी बनल रहत। जँ से नइ हएत तँ बिना धरिऔल हँसुआ-खुरपी जेना भोथ भऽ बिझा जाइए जइसँ ओ काजे जोकर ने रहैए।” ओना चारू वक्ताक अपन-अपन जिनगी, कियो हजारो कोसपर नोकरियो करैत आ बान्‍हल छुट्टीक बीच रहबो करैत, तँ कियो काजेक बोझ तर दबाएल। कियो परिवारक ओझरीमे तेना ओझराएल जे कोट-कचहरीसँ नोकरी सम्‍हारैत-सम्‍हारैत परेशान। अन्‍तो-अन्‍त यएह विचार भेल जे सालमे एकबेर हम सभ ऐ गाममे कार्यक्रम करब। अन्‍तिम नमस्‍कार भेला पछाइत रामकृष्‍ण बाबूक पोथीक चर्च उठि गेल। अपन साहित्‍य प्रेमक चर्च करैत रामकृष्‍ण बाबू अपन मातृभाषामे कथा-कविता लिखैक संकल्‍पित विचार व्‍यक्‍त केलैन- “अपन ई सदैत इच्‍छा रहैए जे किलास छोड़ि अंगरेजी नइ बाजी, अपन परिवार-समाजक संग विद्यार्थियोसँ अपने भाषामे गप-सप्‍प करी, से करितो छी।” चारू गोरे अपन-अपन रस्‍ते विदा भेला। रामकृष्‍ण बाबूक संग लगि धीरेन्‍द्र आगू बढ़ल। ओना दू-अढ़ाइ किलो मीटरपर रामकृष्‍ण बाबूक गाम, गामक बीचमे घर। पएरे आएलो छला। दस डेग आगू बढ़लापर धीरेन्‍द्र रामकृष्‍ण बाबूकेँ बधाइ दैत कहलकैन- “श्रीमान्, अपनेकेँ तँ चेहरोसँ आ शिक्षण-काजोकेँ बहुत दिनसँ चिन्‍है छेलौं मुदा सोझहा-सोझही चिन्‍हारए आइए भेल। अपनेकेँ पोथी लिखैक बधाइ..!” ओना हजारो चेहरामे रामकृष्‍ण बाबू हेराएल रहै छैथ, मुदा धीरेन्‍द्रपर नजैर नइ पड़ल हेतैन, सेहो बात नहियेँ कहल जा सकैए। मुदा ‘बधाइ’ सुनि धीरेन्‍द्रक परिचए पुछैत रामकृष्‍ण बाबू बजला- “अहाँक की नाओं छी, की करै छी?” “नाओं धीरेन्‍द्र छी, साहित्‍येक विद्यार्थी हमहूँ छी। किछ-किछ लिखबो करै छी।” तैपर रामकृष्‍ण बाबू कहलखिन- “हमहूँ तँ पड़ोसिया छी। ओना नोकरिहारा छी। मुदा रविकेँ गामेपर रहै छी। अपन लिखलो देखौ देब आ अबैत-जाइत रहब। देखियौ! एकरे कहै छै संयोग। एक पड़ोसी छी, एतेटा जिनगी बीत गेल आ परिचए-पात आइ भेल।” दुनू गामक बीचमे, माने अदहा रस्‍तामे जखन गप-सप्‍प करैत दुनू गोरे पहुँचला तँ अखियास भेलैन जे अदहा-अदहीपर आबि गेलौं। मुस्‍कियाइत रामकृष्‍ण बाबू बजला- “बेसी दूर अरियातल अभ्‍यागतक भेँट बेसी दिनपर होइ छै। आब अहूँ जाउ, हमहूँ जाइ छी।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 1539, तिथि : 17 नवम्‍बर 2015 7. नोकरीक अन्‍तिम समए, माने जखन तीन बरख सेवा निवृति होइमे बँचल रहैन, रामकृष्‍ण बाबू प्रोफेसर इण्‍चार्य रूपमे प्रिंसिपल भेला। ओना किछु दिन पूर्व डी.लिट् करैक विचार मनमे सेहो उठल रहैन, मुदा से नइ कऽ पेला। पी-एच.डी. तँ केनहि छला। तहूमे नीक विषयपर, तँए मनमे उर्जवान बल तँ आबिये गेल छेलैन। पचपन बर्खक अवस्‍थामे रीडर भेने दरमहोमे बढ़ोत्तरी भेलैन आ कौलेजमे एक-मात्र रीडर भेने पद-प्रतिष्‍ठामे सेहो बढ़ोत्तरी भेबे केलैन। पहिल पोथी–कथा संग्रह–सँ दोसर पोथीमे, माने कथा-सँ-कविताक बीच भावक संग भाषोमे किछु-ने-किछु तफड़का रहबे करैन मुदा जिनगीक प्रथम पुष्‍प रहने जेहने अपना मनमे तेहने कौलेजक संगियोँ-साथी आ परिवारोजनक बीच खुशीक लहैर उठबे कएल रहैन। मुदा जे कविता संग्रहमे छपल छेलैन ओ टटका नै, दस बरख पूर्वक रहैन। पचास बर्खक पछाइत जहिया पी-एच.डी. करैले रामकृष्‍ण बाबू रजिष्‍ट्रेशन करौलेन तहियासँ अपन सृजनक कलम ठमैक गेलैन। ओना कथो आ कवितो संग्रह, दुनू पोथी- अपन मौलिके रचना छिऐन मुदा एकाएक सृजनशीलतामे ठहराव तँ आबिये गेलैन। तेकर कारण ईहो भेल जे पी-एच.डी.क तैयारीमे समए खिंचा गेलैन। मनो दोसर दिस बहैट गेलैन। तैसंग कौलेजक जिम्‍मा तँ रहबे करैन। रामकृष्‍ण बाबू इण्‍चार्यक रूपमे प्रिंसिपल बनला पछाइत पुस्‍तकालयक भार दोसरकेँ सुमझा देलखिन मुदा तैयो ऑफिसक काजे तेते बढ़ि गेलैन जे मनक थकान बेसिया लगलैन, जइसँ अपन सृजनक कलम साफे बन्न भऽ गेलैन। होइतो अहिना छै जे जँ कोनो शारीरिक काज हुअए आकि मानसिक, औसतसँ बेसी भेने या तँ थकान जल्‍दी आएत वा काजक समए पुड़ौला पछाइत देरी तक थकान रहत। सएह भेलैन रामकृष्‍णो बाबूकेँ। ऑफिसक ओझरौठ सभमे तेना मन थाकि जानि जे घरपर किताब-कागज-कलम दिस नजरिये ने जाइन। माघक आठ बजे भिनसर। काल्‍हि रामकृष्‍ण बाबू सेवा निवृत भेला। काल्‍हि तकक जे आठ बजैत भोर छल ओ स्‍नानक समए रहैन, साढ़े आठ बजैत-बजैत खा-पी कौलेजक रस्‍ता पकैड़ लइ छला। मुदा आइ तँ कोनो काजे ने छैन...। सौनक करियाएल मेघ जहिना उमड़ऽ-घुमड़ऽ लगैए, तहिना रामकृष्‍ण बाबूक मनमे उमड़न-घुमड़न उठलैन। उठिते पत्नीकेँ कहलखिन- “मन कनी खसल बूझि पड़ैए, पीलहा चाहक कोनो असर नै भेल। एकबेर हार्ड लीकरबला चाह पीयाउ।” ओना सुभद्रोक मन खसले रहैन। खसैक कारण पतिक सेवा निवृत छेलैन। काजूलक संगी आब नइ रहलौं। पतिक जिनगी टुटने की पत्नीक जिनगी नइ टुटैए। टुटिते अछि। काल्‍हि धरि जे कमौआ छला ओ आइ थोड़े रहला। काल्‍हि धरि जे काज करैत आबि रहल छला, जँ ओ काज करैक शक्ति छैन्‍हो तैयो आब काजक थोड़े रहला! आगिपर चढ़ल गर्म वर्तनक पानि जकाँ सुभद्राक मनमे रंग-रंगक बुलबुला जगैत रहैन। मुदा बजती की आ कहथिन केकरा..? पतिक वेदनाक संग अपन संवेदना व्‍यक्‍त करैत सुभद्रा बजली- “हमरो मन उखड़ल जकाँ बूझि पड़ैए। कॉफीए बना लइ छी।” ‘कॉफी’ सुनि रामकृष्‍ण बाबूक मनमे कुवाथ भेलैन। कुवाथ ई भेलैन जे भरिसक ताना तँ ने मारि रहली अछि। मुदा लगले मन मनाही करैत विचार देलकैन जे भाइयो सकैए। ओहो कियो आन तँ नहियेँ छैथ, आ ने दूरमे छैथ जे हमर बेथा हुनका प्रभावित नै करतैन। बजला- “जे नीक बूझि पड़ैए सएह बनाउ। मुदा ई नजैर राखब, जे बनाएब ओ कनी कड़गड़ बनाएब।” सामंजस करैत सुभद्रा बजली- “चिन्नी कनी कम कऽ देने चाहो आ कॉफियोक अपन रमकी रहै छै।” सतरंजक गोटी जकाँ सह पाबि रामकृष्‍ण बाबू बजला- “जाबे रमकी नइ पीब ताबे मन थोड़े रमकत।” गैस चुल्‍हिक बेवस्‍था, तँए कॉफी बनबैमे पॉंचो मिनट ने लगलैन। लगले सुभद्रा दुनू गिलासमे कॉफी नेने रामकृष्‍ण बाबूकेँ हाथमे धरबैत अपनो आगूमे बैस पीबए लगली। सुभद्रा कॉफियो पीबैथ आ आँखि उठा-उठा पतियोपर दैथ। आँखि उठा कऽ दइक कारण पतिक बदलैत जिनगीक धारक दुनू कातक महार देखब रहैन। ओना रामकृष्‍ण बाबूक मनमे सेहो उठैत रहैन जे नारी-जगतक पहिल इच्‍छा तँ यएह ने रहैत अछि जे कर्मगर पतिक हाथमे हाथ रखि जीवन-यात्रा करी। से तँ काल्‍हि धरि छल। अपन बाहुँवलसँ अपनो आ परिवारोक जिनगीकेँ गूदस करैत एलौं। आइ काज छीना गेल। छिनाएल केना, ओइ जोकर आब नइ रहलौं। जहिना सभकेँ होइ छै तहिना ने हमरो भेल...। मुदा तैयो, रामकृष्‍ण बाबूक मनमे ठनका जकाँ खसिते रहैन। खसैन ई जे अपना तँ ओते पेंशन मासे-मासे भेटैत रहत जइसँ दू गोरेकेँ खाइ-पीबैमे तिरोट नै हएत। मुदा अपन मन की कहत? यएह ने कहत जे बिनु श्रमिक पेब श्रमिक जिनगीक मान-मरजादा रखै छिऐ! जँ से नइ तखन श्रमक माने-सम्‍मान की रहल। आ जखन श्रमक मरजदे मरि जाएत तखन कियो उन्नतिक शिखरक शिखा जँ माथमे टाँङ्गियेँ लेत तइसँ की हेतै? लगले रामकृष्‍ण बाबूक मन आगू ससरैत पत्नीपर गड़लैन। अपने तँ परश्रमावलंवी बनि भरपाइ कऽ लेब मुदा पत्नीकेँ तँ परिवारिक क्रियामे बढ़ोत्तरीए हेतैन। काल्हि तक आठ बजे भोरसँ आठ बजे साँझ तक बोनाएल रहै छेलौं, भरि दिन जे किछु अपन देहीक जरूरत पड़ै छल अपन सेवा अपने करै छेलौं। मुदा आब तँ हमहूँ ने भार स्‍वरूप चारि बेर चाह बनबैले कहबे करबैन। तहूमे तेहेन शरीर बनि गेल छैन जे अपने उठबो-बैसबमे असोकर्ज होइते छैन...। नंग-चंग होइत मने रामकृष्‍ण बाबू बजला- “अखन गप-सप्‍प करैक मन नइ होइए।” कहि हाथक खाली गिलास हाथमे पकड़ा देलखिन। गिलास पकड़बैक कारण रहैन जे झब-दे लगसँ चलि जाएब। मुदा से भेलैन नइ। पतिकेँ कछमछ करैत देख सुभद्राक मन सेहो कछमछा गेलैन। कछमछा ई गेलैन जे बूढ़ देह भेलैन। जँ ऐठामसँ उठि कऽ चलि जाएब आ कहीं कछमछीए सँ प्राण छुटि जानि; तखन जँ समाजक कियो पुछत जे की भेलैन, केना भेलैन? तखन ई कहब केहेन हएत जे ‘हम किछु बुझबे ने केलौं?’ जँ कोनो बेथा मनमे छैन तँ ओ जाबे मनसँ निकालता नै ताबे ओकर दरद केना कमतैन। कनैत-कनैत तँ लोक कमाइबला जुआन बेटाक मृत्‍युक दरद मेटा लइए आ हिनका कोन एहेन विपैतक पहाड़ टुटि कऽ देहपर खसि पड़लैन, जे दरद नै कमतैन...। दुनू परानीक मन अपन-अपन दुनियाँमे कॉफीक रमकी पकैड़  रमकैत रहैन। मुदा लगले रामकृष्‍ण बाबूक मनमे एकटा युक्ति फुड़लैन। युक्ति ई फुड़लैन जे जँ कनीकाल मन मारि कऽ चुप भऽ जाएब तखन अपने उठि कऽ केनो काजे चलि जेती। सएह केलैन। कुरसीपर बैसल रामकृष्‍ण बाबूक देहमे शिथिलता अबऽ लगलैन, जेना देहक शक्ति निकलऽ लगलैन। जँ कुरसीपर बैसल रहब तँ मुहेँ-भरे निच्‍चाँमे खसि पड़ब। चेतन मन चेतबैत कुरसीपर सँ उठा पलंगपर लऽ गेलैन। सिरमापर नीक जकाँ मुड़ी सोझो ने भेल रहैन कि मन फुड़फुड़ा कऽ उड़लैन। उड़लैन ई जे काल्हि धरि दुनियाँक बीच काजमे रमल रहने अपन देहक संग परिवारो आ समाजोक सभ किछु बिसैर गेल छेलौं। मुदा आइ तँ ओ दुनियाँ नइ रहल। की दुनियाँ हमरा-ले अनर्थ भऽ गेल? रामकृष्‍ण बाबूक मनमे ‘अनर्थ’ ऐबते एक संग केतेको विचार मनमे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलैन। उठि कऽ ठाढ़ ई भेलैन जे जखन दुनियेँ अनर्थ भऽ गेल तखन हमरे अर्थ की रहल। दुनियेँ रहने ने अपनो छी...। मुदा लगले मन फरीच भेलैन। दुनियाँ अनर्थ नइ भेल, दुनियाँ तँ जहिना सभ दिन अर्थ-भरल रहल तहिना अखनो अछि आ आगूओ रहबे करत! लगले मन अपन दुनियाँक बीच एलैन। ऐबते मनमे उठलैन जे अनका-ले दुनियाँ भलेँ अर्थपूर्ण किए ने अछि आ रहह मुदा अपना-ले तँ अनर्थ भाइए गेल। जँ से नइ भेल तँ की जइ दिन कौलेजक प्रोफेसर बनलौं तइ दिन जे योग्‍यता छल, तइमे तँ आइ बढ़ोत्तरीए भेल, मुदा आब हमरा-ले कोन कौलेजक जगह खाली अछि जैठाम जा बास करब... ? रामकृष्‍ण बाबूक मन फेर ठमकलैन। ठमैकते मनमे उठलैन जखन अपन दुनियेँ अनर्थ भऽ गेल तखन तँ दुनियाँ अन्‍हार भाइए जाएत किने। मन कलपऽ लगलैन। कलपऽ लगलैन जे जखन सगतैर अन्‍हारे पसैर जाएत तखन रहब केतए!! जिनगीक बोनमे रामकृष्‍ण बाबू औना गेला। औनाइक कारण भेलैन जे जहिना परती-परात भूमिमे बोन-झाड़क बीच साइयो-हजारो चलैक बाट तँ रहैए, लोक चलितो अछि, मुदा ओकर निसचित दशा-दिशा नइ रहने बोने-बोन, झाड़े-झाड़ चलैत रहैए-चलैत रहैए मुदा कोनो ठौर-ठेकान नै रहने औनाए लगैए, तहिना रामकृष्‍ण बाबूक मन वौआ तँ अबैन मुदा निसचित बाट नइ भेटने औनाए लगैन, दम फूलऽ लगैन। मुदा किछु क्षणक पछाइत जखन मन असथिर भेलैन, सॉंसक गति सम भेलैन तखन अपन जिनगीक दू महारक बीच बहैत धारपर नजैर पड़लैन। काल्‍हि धरि की जिनगी छल। निसचित काजमे जिनगीक सभ क्षण निर्धारित रहै छल। समैपर खेनाइ खाइ छेलौं, काज करै छेलौं, अराम करै छेलौं। अपन जिनगीक संग जे सेवाक भार कान्‍हपर छल से करैत दुनियोँक सेवा करै छेलौं। अहिना ने संयासियो सबहक जिनगी छैन, जे सदिकाल दुनियाँकेँ दुतकारितो दुनियाँक सेवामे सभ किछु त्‍यागि दिन-राति प्रकृतस्‍थ भेल रहै छैथ...। रामकृष्‍ण बाबूक भक् जेना खुजलैन। दरमाहापर सेवा करैक भार छीना गेल, जे आब भरिया बनैक सामर्थसँ बाहर भऽ गेल, मुदा तँए कि अपनामे ओ शक्‍ति नै अछि जे भार विहीन भऽ जाएब। अपना भरे चलब आ अनका भरे चलब, यएह ने हारि-जीत छी...। मन पड़लैन अपन सृजन शक्ति। सृजन शक्‍ति ऐबते मन तरैस गेलैन। जेना किछु नव चीज भेट गेल होइन तहिना मनमे खुशी जगलैन। पत्नीकेँ सोर पारलखिन- “केतए छी?” चारि कोठरीक घर-आँगन, सुभद्रा जेबे केतए करती। बड़ जेती तँ सुतै-घरसँ भनसा-घर। पतिक अवाज सुनि बजली- “एतै छी। अबै छी।” बजैत  सुभद्रा  आबि  आगूमे  ठाढ़  भेलखिन।  रामकृष्‍ण  बाबू  सेहो पलंगेपर पल्‍था मारि बैस, कैरम-बोडक उल्‍टा गोटी जकाँ कहियौ आकि महाभारतक अर्जुनक नैन-भेदी वाण जकाँ, बजला- “एना जे छिलमिलाइत चिड़ै जकाँ देख संगीक संग छोड़ि चलि जाएब, तखन भेल जिनगीक संगबे?” रामकृष्‍ण बाबूक बात सुभद्रा नीक जकाँ नइ बुझली मुदा चिड़ै तँ बूझि गेल छेली। चिड़ैयेक पाँखि पकैड़ बजली- “पुरुखक कोन ठेकान। वेचारी मादा चिड़ैकेँ अण्‍डा सेबए पड़ै छै। अहाँकेँ की अछि भने नोकरियो चलिये गेल, आब पलंगपर बैसल-बैसल हुकुम फरमाबैत रहू।” सुभद्राक बात जेना रामकृष्‍ण बाबूक करेजकेँ छेद देलकैन। तिलमिला गेला। मुदा चुप्‍पो हएब नीक नहि बूझि तीनू बेटा-पुतोहुक चर्च उठबैक विचार मनमे रखि बजला- “अपने तँ आब कोनो काज नइ रहल..?” रामकृष्‍ण बाबूक मनक बात मनेमे घुरियाइत रहैन आकि बिच्‍चेमे सुभद्रा टोकि देलकैन- “एना किए मन तोड़ि कऽ बजै छी। दुनियाँकेँ लोक कर्मभूमियो कहैए, आ अहाँ..?” ओना रामकृष्‍ण बाबूक मनमे घुरियाइत ई रहैन जे जहिना अपने काजसँ निचेन भऽ गेलौं तहिना जँ ओहो[6] काजसँ निचेन भऽ जाथि, तखन ने दुनू गोरेक जिनगी समतूल हएत। से तँ ऐठाम सम्‍भव नइ अछि। अपने तँ कोनो काज नइ रहल मुदा हुनको नइ रहलैन सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। एक तँ जहिना सभ दिन घर-आँगनक काज करैत आबि रहल छैथ तहिना छैन्‍हे आ तैसंग ईहो तँ भाइए गेलैन जे एते दिन भरि दिनक असगरूआ जिनगी छेलैन, जइसँ खगतो कम छेलैन आ आब हमरा रहने तँ परिवार जकाँ परिवारिक खगतो बढ़तैन जइसँ काजो बढ़बे करतैन...। रामकृष्‍ण बाबूक मन नचलैन। नचिते दुनू सिरो आ पुछरियो एकठाम भऽ गेलैन। जहिना घुरीपर नचैत चक्रवत-चक्का चारू दिस एके अवस्‍थामे नाचि जाइए तहिना मनक चक्का नाचऽ लगलैन। कखनो होइन जे जीवन संगिनी पत्नी छैथ, तँए काजोक समरूपता हेबा चाही, मुदा लगले होइन जे जहिना आदिमकालमे मनुख मनुखक हाथ पकैड़ अपन गुलाम बना, मारि-पीटि ओकरासँ सेवा करबै छल तहिना ने पत्नियोँ भेली! किछु कहबैन आ से जँ नै करती, तँ कि कोनो एहेन मरतरिया हमहींटा हएब जे मारि-पीट कऽ हुनकासँ काज लेब आ अपने मलिकाना झाड़ब..! रामकृष्‍ण बाबू गुम्म भऽ गेला। मुदा परिस्‍थितिवस कहियौ आकि देखा-देखी, फुड़लैन- हँ ई कोनो अनुचित थोड़े भेल। समाजमे कि कोनो हमहींटा एहेन हएब आकि एहेन समाजक रेवाजे बनल अछि। रेवाजेसँ ने रीति आ रीतेसँ ने नीति बनैए। समाजोक तँ एहेन नीति ऐछे...। मुदा फेर रामकृष्‍ण बाबूक मन अपन साठि बर्खक देहसँ भारी पत्नीक पसेनापर पड़लैन। जैठाम भरि-भरि दिन आगिक चुल्हि लगक जिनगी जीनिहारि संगी छैथ तैठामक यएह भेल संगपना! कियो आगिमे झड़कै आ कियो फूह खेलए..? ओना रामकृष्‍ण बाबू पत्नीकेँ ऐ दुआरे सोर पाड़ने छेलखिन जे गामसँ हटि जखन कोनो बेटा ऐठाम रहब, तखने दुनू बेकतीक जिनगी समरूपमे चलत मुदा फूहर मन रहने आने-आने विचार तेना मनमे उठए लगलैन जे नियरलाहा बात मनेमे टराइत रहलैन। बजला- “एकटा बात बुझल अछि?” तेहेन पोजमे रामकृष्‍ण बाबू बजला जे सुभद्रा चौंक गेली। अकचकाइत बजली- “की इ इ इ.., नाइ इ इ...।” ओना बजैकाल तँ सुभद्रा बाजि गेली, मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे एतेटा दुनियाँमे एते चीज अछि, एते लोक अछि, तइमे एहेन कोन एकटा बात अछि जे एतेकालसँ गप-सप्‍प केलौं आ ओ रहि गेल पछुआएले? सुभद्रा अपन मनक विचारमे वौआइते छेली कि बिच्‍चेमे रामकृष्‍ण बाबू चहैक उठला- “कनी चाह पीआउ।” ‘चाह पीआउ’ सुनि सुभद्रा मने-मन हँसली। खुनलौं पहाड़, भेटल मुसरी! मुदा मन तँ विहुँसल छेलैन्‍हे, बजली- “माँड़े ते माउग जीविते अछि, अही बहन्ने ने अपनो पीब।” ओना पत्नीक बात रामकृष्‍ण बाबूकेँ नीक नइ लगलैन नीक नइ लगैक कारण भेलैन जे जइ तरहक विचार मनमे उपजए लगलैन, तइ अनुकूल पत्नीक कर्म-कुशल नइ बूझि अपनेमे मनन-चिन्‍तन करब नीक बुझलैन। तँए लगसँ पत्नीकेँ हटबए चाहलैन। सुभद्रा चाह बनबए गेली। सुभद्राकेँ लगसँ हटिते वर्तनक लहरैत पानि जहिना रसे-रसे असथिर होइत जाइए तहिना रामकृष्‍ण बाबूक मन असथिर हुअ लगलैन। मुदा तैयो मन सिहकैते रहैन। सिहकैत मनमे एलैन- हम केतए छी? ‘हम केतए छी’ मनमे उठिते जेना अचेत मनमे होइए तहिना सभ किछु हेरा गेलैन। मुदा कोनो एहेन फल वा फूलक गाछ, जे जड़ियेसँ फड़ऽ–फुलाए लगैए तैठाम जहिना लगौनिहारक तृष्‍णा तृषित होइत तिरपित हुअ लगैए तहिना रामकृष्‍ण बाबूक मनमे जगए लगलैन। एक संग अनेको प्रश्‍न उठि-उठि ठाढ़ हुअ लगलैन। कोनो प्रश्‍न एहेन बूझि पड़ैन जे पेनी नीक छानल अछि, जइसँ मन हरैस कऽ हरखित भऽ जाइन। मुदा लगलै आगू टुटल छाती वा फुटल माथ देख मन तरैस कऽ तलैप जाइन! मुदा सिहरैत मनकेँ असथिर करैत जिनगीक धारकेँ पकड़ैक परियास केलैन। तैबीच पत्नी चाह नेने आबि गेलखिन। होइतो अहिना छै जे जँ अहाँ अपन जिनगीक कोनो गिरह खोलैत होइ आ बीचमे जँ कियो नव आगंतुक आबि जाथि तैठाम अपन विचार रोकि, हुनका तँ कुशल-छेम पुछब अनिवार्य भाइए जाइए तहिना रामकृष्‍णो बाबूकेँ भेलैन। चाहक गिलाससँ निकलैत भाफ देख बजला- “अहाँ तँ ने बेसी भफाएल छी, चाहक रंग नीक लगैए।” तैबीच सुभद्रा दू घोंट चाह पीब चुकल छेली। गरम चाहक भाफ सुभद्राक मुहोँसँ निकैलते रहैन। भफाएले मुहेँ उत्तर देलखिन- “जेते भफाएल पुरुख-पातर होइ छैथ, तेते जँ मौगी-मेहैर रहत तँ दुनियाँ आछन भऽ जाएत।” रामकृष्‍ण बाबू सेहो अदहा गिलास चाह पीब नेने छला। चाहक भाफो जिरा गेल छल मुदा मनमे पत्नीक बात घुरियाइते छेलैन। एहेन भारी बात किए पत्नी बजली जे दुनियोँ आछन भऽ जाएत? जँ दुनू बेकता-बेकतीक बात रहैत तँ काज देख टोक-टाक करितैथ, मुदा ऐठाम तँ दुनियेँक बात बाजि गेली..! बीटियबैत रामकृष्‍ण बाबू पुछलखिन- “नै बुझलौं, की दुनियेँ आछन भऽ जाएत?” विहुँसैत सुभद्रा कहलकैन- “सभटा गप अखने कऽ लेब आकि काल्हियो-ले राखब। एकरा काल्‍हिले रहए दियौ। ” चीतवनमे मन असथिर करैत रामकृष्‍ण बाबू बजला- “अपना  नीक  बूझि  पड़ि  रहल अछि जे जखन सेवा-निवृत भाइए गेलौं तखन किए ने बेटे-ऐठाम चलि दुनू परानी रही।” ‘बेटा-पुतोहु ऐठाम जा रही’ सुनिते सुभद्राक मनमे भन-भनी शुरू भेलैन। एक संग केतेको प्रश्‍न मनमे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलैन। विरहाइत मनमे नाचए लगलैन,अपन-हाथ जुइत आ विचारक परिवार। तहूमे एकटा बेटा नइ, तीन-तीनटा अछि। तीनू तीनठाम अपन-अपन रहैए। अपनो तीनू भैयारीमे तीन रंगक जिनगी छै। तीनू नोकरिया परिवार छी, बेटा सभ भरि दिन काजक पाछू विरहाएल रहैत हएत आ घर-परिवारक सभ जुति-भाँति पुतोहुक हएत...। पुतोहुपर नजैर पड़िते सुभद्राक मन आरो भीनैक गेलैन। भीनैकते पतिपर दाँत पीसैत विचारए लगली। कोन दुरमतिया कपारपर चढ़ि गेलैन जे ओहन मनुखकेँ कपारपर उठा अनलैन। ई तँ गुण अछि जे दुनू गोरे दूठाम छी, नइ ते साँझ-भोर झोंटा-झोंटौवैल होइतए। जेहने गामक रहत तेहने ने माइयो-बाप आ सरो-समाज रहतै। जेहने सर-समाज रहतै तेहने ने लोको हेतइ। मुदा लगले सुभद्राक मन शान्‍त भेलैन। शान्‍त होइते बजली- “अपनेटा नीक बूझि पड़ैए आकि बेटो सभ नीक कहत, समाजो नीक कहत?” सुभद्राक बात रामकृष्‍ण बाबूक चानिक चान तोड़ि देलकैन। झनाक-दे मनमे उठलैन, तीनू बेटाक परिवारक जिनगीक संग अपन जिनगी। तीनू बेटाक परिवारो आ दरमहो तीन रंगक अछि। जेना पैरक ओंगरीक घावमे ठेंसने ठेंसेक अनुकूल दरदो बढ़ै छै तहिना एक साहित्‍य-प्रेमी सेवा निवृत प्रोफेसर- रामकृष्‍ण बाबूक बीच उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलैन। ठाढ़ होइते नजैर तीनू बेटाकेँ बच्‍चासँ सियान धरिक जिनगीपर गेलैन। अपन सेवामे केतौ कोताही कहाँ भेल। कोताही मनमे ऐबते पत्नीपर नजैर गेलैन। नजैर ई गेलैन जे जनमसँ करम धरि सभटा तँ वएह ने केलखिन। तखन अपने मने अपना मनकेँ मना लेब, से नीक नै...। समगम होइत रामकृष्‍ण बाबू पत्नीकेँ पुछलखिन- “पहिने अहाँ कहू जे तीनू बेटाक पालनमे कोनो दूजा भाव केने छी?” सुभद्राकेँ जेना ठोरेपर रहैन तहिना बजली- “नै।” रामकृष्‍ण बाबूकेँ बूझि पड़लैन जे उड़ैत कौआ जकाँ सोझे टाँहि दऽ देली। काग भाषा नै बजली। तँए बिना घमरथने नइ फरियाएत। बजला- “एकटा बात पुछौं?” जहिना जिज्ञासु जकाँ रामकृष्‍ण बाबू बाजल छला तहिना जिज्ञासा करैत सुभद्रा बजली- “एकटा नइ एक हजार पुछू।” मुँह-कान सम्‍हारैत रामकृष्‍ण बाबू पुछलखिन- “कोनो चीजक छाँहक अकार केहेन होइए?” ओना रामकृष्‍ण बाबूक प्रश्‍न ओझराएले रहलैन। जे पछाइत अपनो बुझलैन। पत्नी टाँहि दऽ उत्तर देलकैन- “चीजक रंग चाहे जेहेन हौउ मुदा छाँह तँ कारीए हएत किने।” पति-पत्नीक बीचमे अहिना बात-विचारक झिक्कम-झिक्का होइते छै, तँए रामकृष्‍ण बाबूक मनमे मिसियो भरि कुवाथ ऐ बातक नइ भेलैन जे हमर बात पत्नी काटि देली, नै मानली। थोड़ेक पाछू घुसकैत बजला- “अहूँ बुझैमे लाले-बुझक्कर छी। हम पुछलौं ‘अकार’ आ अहाँ बूझि गेलौं ‘रंग’। ठीके ने लोक कहै छै केदैन बुझलैन दू ढेकरी पियौज।” ‘लाल-बुझक्कर’ सुनि सुभद्राकेँ मिसियो भरि कम्पन्न नै भेलैन। जँ कम्‍पन्न होइतैन तँ लाल बुझक्कर आ कारी बुझक्करक बात उठितैन, मुदा से सभ किछु ने। अगिला बात जे ‘दू ढेकरी पियौज’क छल से मनमे जनु गड़ि गलैन। बजली- “की दू ढेकरी पियौज कहलिऐ?” अपन बात सम्‍हारैत रामकृष्‍ण बाबू बजला- “कोनो चीजक अकारक माने भेल, ओकर मूर्त रूप, जे ओकर अपन लछन-करन छिऐ। आ रंग तँ ऊपरसँ चढ़ैए।” पतिक बातकेँ मने-मन मानि सुभद्रा बजली- “कीदैन कहए लागल छेलिऐ से बिसैर गेलौं?” “नै, बिसरबै किए। सएह ने कहै छी।” पत्नी- “कहू।” “जहिना कोनो चीजक अकारक छाँह अकार नेने रहैए तहिना परिवारमे बेटा-बेटीक सेवा ओही अकारमे माए-बापक प्रति रहैए। ओना हरि अनन्‍त हरि कथा अनन्‍ता अछि। दुनियाँमे जेते मनुख अछि, तेते रंगक जिनगियो छै। जइमे लोक मौज-मस्‍तीसँ जीबतो अछि।” पतिक बात सुनि सुभद्राक मन पानिसँ भरल घैल जकाँ बूझि पड़लैन। अकछाइत बजली- “अनेरे  कोन  दुनियाँक भौरी-बट्टामे  लागल छी। अपन नून-रोटीक बात सोचू।” पत्नीक विचार सुनि रामकृष्‍ण बाबूक मन ठमकलैन। ठमकलैन ई जे एते दिन अपन देह दुनियाँक धुनकीमे धुनै छेलौं जइसँ दुनियाँमे जीबैक हकदारो छेलिऐ मुदा आब तँ से नइ रहल। तीनू बेटा तीनठाम नोकरी करैए, तीनूकेँ तीन रंगक दरमेहेटा नै, परिवारो छै। विचारमे ऐबते रामकृष्‍ण बाबू वौआ गेला। आँखि उठा देखैथ तँ दुनियाँक बोनमे सौंसे बाटे-बाट देखाइन। मुदा जहिना बाट नइ रहने लोक हेरा जाइए तहिना बाटक बोनमे सेहो तँ हेराइते अछि...। पतिकेँ चुप देख सुभद्रा टोकलखिन- “एना जे नून-रोटी बेर चुप्‍पी लाधि देब, तखन तँ...।” पत्नीक तगेदा सुनि रामकृष्‍ण बाबूक मन विचलित नइ भेलैन। नइ होइक कारण मनमे रहैन, दुनू परानीक जिनगी तँ दू जनक प्राणक बीचक आड़िपर ने ठाढ़ अछि, तैठाम एक-दोसरकेँ विचारवान बनौने बिना काजो तँ नहियेँ चलि सकैए...। विचारकेँ बहटारैत रामकृष्‍ण बाबू बजला- “हम अही दुआरे बेटा ऐठाम रहैक विचार करै छी।” बेटाक नाओं सुनिते सुभद्राक मन नचलैन। नचलैन ई जे बेटाकेँ पालने छी, पालनक भार लेब मुदा ओहो तीनू तँ तीनठाम अछि! झँपले-तोपल सुभद्रा बजली- “तीनू तीनठाम जे अछि?” पत्नीक बात जेना रामकृष्‍ण बाबूक छातीकेँ बेध देलकैन। बेध ई देलकैन जे तीनूकेँ अपना जनैत ने कहियो खाइ-पीबैमे कोताही केलिऐ आ ने पढ़ै-लिखैमे। एके रंग तीनू भाँइ डिग्रियो पौने अछि। मुदा तीनूक जिनगीमे अकास-पतालक अन्‍तर भऽ गेल अछि! एना किए भेल? पत्नीकेँ कहलखिन- “माथा काजे ने करैए। कनी एकबेर दू-घोंट चाह पिआउ।” रामकृष्‍ण बाबू तीनू बेटाक जिनगीपर जखन सेरिया कऽ नजैर देलैन तँ बूझि पड़लैन जे जेठ बेटाकेँ उन्नतिक कारण नीक बैंकक नीक दरमाहाक संग नीक सुविधो अछि आ तैपर सँ बालो-बच्‍चाक तेहेन भारी बोझ नइ छै। मुदा मझिलाकेँ तँ दुनू दुर्गति भऽ रहल छै, परिवारो नमहर छै आ नव बैंक रहने दरमहो कम छै। आ तेसरक तँ दिने-दुनियाँ दोसर छै, सरकारी नोकरी छै, सरकारी खजाना हाथमे छै, सदिकाल हवाइये जहाजसँ स्‍वर्ग-नर्क टहलैत रहैए। तैबीच पत्नी चाह नेने पहुँचलैन। भफाइत चाह देखियो कऽ रामकृष्‍ण बाबू गुमे-गुम चाह पीबए लगला। विचार बिन्‍दुमे अँटकल रामकृष्‍ण बाबूक मन। तीनू बेटाक जिनगीमे सामंजस तँ आनल जा सकैए। किए तीनू भाँइ अपने-अपने बाल-बच्‍चा मात्रक परिवार बूझि मनमे रोपि लेलक। बिच्‍चेमे पत्नी पूछि देलकैन- “आब कहू केहेन मन लगैए?” हारल-मारल-थाकल बटोही जकाँ रामकृष्‍ण बाबू बजला- “अपनो हूसलौं। जँ परिवारक स्‍तरक हिसाबसँ तीनू भाँइकेँ सामंजस कएल जाइत तँ जे अखन बनि गेल अछि से नइ रहैत!” सुभद्रा- “तखन आब..?” रामकृष्‍ण बाबू- “तखन यएह जे जँ बेटा बाप-माए बूझि परिवारसँ सम्‍बन्‍ध रखए सेहो बड़बढ़ियाँ आ जँ नइ राखए सेहो बड़बढ़ियाँ। समाज तँ भीखो मांगि कऽ खेबाक अधिकार लोककेँ देनहि अछि। अन्‍तमे बूझल जेतइ। मुदा गाम छोड़ि बाहर नइ जाएब।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 3232, तिथि : 23 नवम्‍बर 2015 8. दरबज्जाक चौकीपर बैसल रामकृष्‍ण बाबू अपन अगिला जिनगीकेँ ठेकाइन रहला अछि जे आब केना चलब? मुदा कखनो अनठेकान दिस बहि जाइ छैथ तँ कखनो ठेकान दिस। स्‍पष्‍ट आ सोझ-साझ रस्‍ता देखिये ने पाबि रहल छैथ...। मुदा लगले मनक खिड़कीसँ अपन संकल्‍पित विचार हुलकी देलकैन, हुलकी ई देलकैन जे तीनटा बेटा अछि मुदा तीनू तीनठाम ऐछो आ तीनूक जिनगियो–दरमाहा, आमदनीक–हिसाबे तीन रंगक छै। तैठाम केकरो ऐठाम गेने विसाइन भाइए जाएब। विसाइन ई जे भाए-भाए वा बहिन-बहिन वा भाए-बहिनक बीच जे अनुवांशिक सिनेहक रज-कण अछि ओ दोसर-तेसरसँ किछु-ने-किछु भिन्नता रखिते अछि। भलेँ अपन सहोदर बहिनकेँ देवी-दुर्गा वा भगवतीक रूपमे दर्शन पबैए तैठाम दोसराइत बहिनक संग रूप परिवर्तित हुअ लगै छै, अनेको रंगक रूप बनि-बनि ठाढ़ हुअ लगै छै। खैर जे से...। रामकृष्‍ण बाबूक विचार आगू बढ़लैन। आगू बढ़िते परिवार सभपर–माने अपनो बेटा आ आनोक बेटा–पर नजैर पड़लैन। विचित्र ढंगसँ परिवार-सजल अछि। दू परिवारक दू जनक संयोग विवाहक रूपमे होइ छै। मुदा दुनूक[7] परिवारिक रूप की अछि? किएक तँ परिवारो ने एकटा रूप बना चलैए। दू परिवारसँ आएल दू जन मिलि एक नव परिवारक सृजन करैए। जइसँ दू लूरि, दू बूधि आ दू विचारोक संग भऽ सकैए आ एको-एक लूरि, बूधि आ विचारक संयोग भऽ सकैए। माने ई जे जँ एक भाषा-क्षेत्र, एक लूरि अर्थात् एक काज आ एक विचार–माने जिनगीक दिशाक विचार–क्षेत्रक संयोग सेहो होइए...। मुदा रामकृष्‍ण बाबूक मन लगले आगू बढ़ि अपन तीनू बेटा-पुतोहुपर पड़लैन। तीनू सहोदर भाइयो आ दियादिनियो भेली। मुदा तीनूक जिनगीमे एते अन्‍तर किए भऽ गेल जे भैयारीक बीच एतबो मिलान-भाव नइ अछि जे एक परिवारक छी? एक माए-बापक संतान छी? एके रंग तीनू भाँइकेँ सेवा करैत एक स्‍तर तक पढ़ैलौं-लिखैलौं! आखिर, तीनू भाँइ ऐ बातकेँ किए ने बूझि पेलक? एक तँ समाजिक जिनगी टुटि-टुटि कऽ विकृत रूप बनौने जा रहल अछि..! तैठाम तीनू बेटाकेँ अनेरे पढ़ेबे किए केलौं। हम सक्षम बेल बूझि विचार करैक बाट देलिऐ। अपना-ले कियो अपने ने सोचत-विचारत। भैयारीक सम्‍बन्‍ध भाइए ने निमाहत आ माए-बापक धियान रखि चलत। भलेँ सोचै-विचारैक अनेको दिशो आ रस्‍तो अछि। पत्नीकेँ सोर पाड़ि रामकृष्‍ण बाबू कहलखिन- “अहुँकेँ चाहो-पान धरिक सिनेह हमरासँ नइ..?” सुभद्रा वर्तन-बासन धोइ छेली। आँखियो कारिखेपर आ हाथो कारिखेपर तँए मनो करिखाइये गेल रहैन। उत्तर दैत बजली- “बहत्तैर हाथक अँतरी होइ छैन पुरुखकेँ आ सिनेहीन हेती मौगी।” ओना पतिक इशारा सुभद्रा बूझि गेल छेली। सभ काज छोड़ि केतली अखारि चाह बना कपमे नेने रामकृष्‍ण बाबू लग पहुँचली। हाथक भफाइत चाहसँ जखने रामकृष्‍ण बाबूक नजैर उठि सुभद्राक चेहरापर पड़लैन कि गाछक शील जकॉं परिवारक शीलपर नजैर पहुँच गेलैन। शीलपर पहुँचते अगिला परिवारक[8] शीलपर गेलैन। ओ तँ डारि जकॉं होइए..! जहिना भकमोड़पर भक् लगितो अछि आ छुटितो तँ ऐछे तहिना रामकृष्‍ण बाबूक भक् खुजलैन। भक् खुजिते पत्नीकेँ कहलखिन- “जहियासँ दुनू गोरे संग भेलौं तहियासँ केतेको रौदी-दाही भेल, मुदा जहिना दुनू परानी प्राण-सँ-प्राण सटा संगे जीबैत एलौं तहिना आगूओ ने जीबैक बिसवास बना चलब।” एक तँ भिनसुरका उखड़ाहा तैपर दुनू बेकती संग-संग चाहो पीलैन। चाह-पान केला पछाइत तँ ओहिना सबहक मन जीरा जाइते छै, तहिना सुभद्राकेँ भेलैन। मुदा मनक भीतर खौंझ उठि गेल रहैन जे पुतोहु रहैत अपने हाथ झड़काबऽ पड़ैए। आ दोसर दिस ईहो होइन- ‘साँएक राज अपन राज, बेटा-पुतोहुक राज मुँह-तक्की।’जैठाम अपना मने सभ दिन खेलौं-पीलौं तैठाम आनक मने खाइ-पीबैले भेटत से मन मानत..? द्वन्‍दमे सुभद्राक मन घुरिया गेलैन। रस्‍ता परहक धूरा जेना रस्‍तेकेँ अन्‍हरा देलकैन तहिना आगू-पाछूक विचार दिस नजरिये ने जाइत रहैन। ओना रामकृष्‍ण बाबू अपनो दू जिनगीक मझधारमे लटैक गेल रहैथ। होइतो अहिना छै। जहिना धरती-अकासक बीच जे क्षितिज अछि ओ दुनू दिससँ घीचम-तीर करैत सीमा बनौने अछि, तहिना दू धारक बीचक धारामे सेहो लोक लसैकते अछि। ओना तहूठाम तीन स्‍थिति होइ छै। कोनो पहाड़ी धार रहने सालो भरि गतिशील रहैए तँ कोनो बरसाती धार रहने तीन-मसुआ, छह-मसुआ बनि सुखि जाइए। मुदा से नइ, वर्फीली धारक बहाउ सभ दिशामे जँ समान होइ, तखन जे दू धाराक बीचक शक्‍ति रहत ओ एक नव शक्‍तिक सृजन करैत आरो बेसी गतिशील होइत बहैत रहैए। मुदा ओहो वर्फीलीक बहाउ जे मध्‍यम गतिये हएत, तैठामक धाराक जे गति रहत ओइमे कतर-व्‍योंत हेबे करत किने। माने तेज बहाउक धारा ओकरा रोकबे करत किने। तैठाम जँ ओइसँ क्षीण वर्फीलीए धार किए ने हौउ आकि तीन-मसुआ, छह-मसुआ बरसातीए धार, ओ तँ सहजे अपन घर-अँगना छोड़ि मरि जाइए। विचारक धारमे बहैत रामकृष्‍ण बाबूक मन सेहो डोलि-डोलि जिनगीक धारमे बहऽ लगलैन। जइसँ मन थीरे ने होइन जे आब कोन घाटपर पहुँचब जे ओइ पार जाएब। मुदा मनमे लगले उठि गेलैन जे अखन धरि परिवारे आकि अपनो जिनगी गढ़ैमे तँ पत्नीए संग रहली, तँए किए ने आगूओक जिनगीक विचार हुनकोसँ पूछि लिऐन। अनेरे केतौ जे हेरा-भेथिया जाइ। तखन तँ अपनो जान थालमे फँसल हाथी जकॉं भऽ जाएत, तैपर सँ जे जँ नढ़िया जकॉं माथपर चढ़ि कपार खोधि-खोधि खाए लगती तखन तँ अनेरे ढोंढ़क फेरमे पड़ि जाएब। तइसँ नीक ‘संग मिलि करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज।’ ‘संग मिलि करी काज’ विचारमे ऐबते रामकृष्‍ण बाबूक मन थोड़ेक हरियेलैन। माने, मनक रंग बदललैन। हरियाएले पत्नीकेँ कहलखिन- “अहूँ देखै छी आ अपनो बुझै छी जे महाविद्यालय अकाजू बना जिनगीकेँ अदहेपर सँ तोड़ि पेंशनक जिनगी बना देलक। नीक-नीकुत पौष्‍टिक खेनाइ खाएब तखने किछ दिन औरो देखब, तइमे बेसी खरचो हएत। मुदा से जाबी तँ मुँहमे लगिये गेल। तैपर सँ बूढ़ भेने देहो ने ठेहियाएत, जइसँ रंग-रंगक रोगो-वियाधि पकड़त। तहूमे तेहेन जुग आबि गेल जे ‘संगेमे वैद मियाँ मरता है।’ बला कहबी भऽ गेल अछि। रोगक जेते इलाज अगुआएल तेते महगो भऽ गेल। अहाँ तँ सभ दिन घर चलेलौं मुदा अपने तँ कहियो घर-परिवार बूझि नइ पेलौं, तँए अहींक हाथमे अपन जिनगीक डोरि थम्‍हा रहल छी...।” तीर्थयात्रा,   धर्मयात्रा  आकि   कर्मयात्रासँ  घुमल  थाकल-ठेहियाएल यात्रीकेँ जहिना परिवारक सिनेह भेटै छै, वएह सिनेहिन विचार सुभद्राक मनमे जगि गेलैन। जगि गेलैन अपन माथक लाल सिनुर। जाधैर पति जीबै छैथ ताबैए धरि ने सती-पति कहबै छी मुदा जखने पति छीना जेता तखने ने समाजो विधवा मानि अपन यात्राकेँ अशुभ बुझए लगत। तखन केना..? ...तखन तँ काटल गाछ तरक जिनगी बनिये जाएत। ऐ काटल गाछक निच्‍चाँ ठाढ़ भऽ केना चलब? सुभद्रा असोथकित भऽ गेली। थोड़े कालक पछाइत कूह फेरैत बजली- “अपन मन की कहैए?” ‘अपन मन’ सुनि रामकृष्‍ण बाबूक मन अमैर कऽ उमैर गेलैन। पहाड़सँ उतैर उमरैत धारक हिलकोर जकॉं मन घुमए लगलैन। जहिना धारक बीच धारा केतौ-केतौ गोल-गोल घूमि क्षीण गतिक वेगकेँ चारू कात छिड़ियबैत चलैए तहिना रामकृष्‍ण बाबूक मनक छिड़ियाएल क्षीण धार, जे आगूक गतिसँ फेकाइत फीका हुअ लगलैन। गरमान्‍त मने रामकृष्‍ण बाबू बजला- “अखन धरिक जे जिनगी रहल ओ एकबट कहियौ आकि एकचलिया, तेकर अभ्‍यस्‍त भऽ गेल छी। मुदा जिनगी तँ बहु-चलिया छी, तखने नव सिरासँ कोनो बाटक घाट बना पाएब। से तँ आब कठिन ऐछे। एहेन..?” पतिक बात सुनि सुभद्रा सहजे-सहजे सहमए लगली। सहमए ई लगली जे हिनके कमाइपर तँ अपनो ठाढ़ छी, जइ भरे ठाढ़ छी सएह खुट्टा जँ हिल-डोल करए लगत तखन अपनो तँ ओहिना हिल-डोलमे हिलैत-डोलैत रहब..! मुदा सुभद्राक मन लगले बदैल गेलैन। बदैल ई गेलैन जे किछु छैथ तैयो तँ ओ पुरुखे छैथ, तहूमे ओहन पुरुख जे पति सेहो छैथ। जाबे कोनो गाछमे पतिया नइ औत ताबे बतियाक आशा व्‍यर्थ! कमाइ टुटि गेलैन, माने दरमाहा पेंशन बनि अधिया गेलैन, मुदा अखनो जेते भेटतैन तइसँ बहुत कम-कम कमेनिहारकेँ हमरोसँ नमहर परिवारक गाड़ी घीचऽ पड़ै छैन, तैठाम जँ अपनाकेँ निरवल-दुरवल बुझै छी, तँ ई मनक बेकार विकार भेल। अनेरे जे मनमे अबैए जे ई बीमारी, उ बीमारी हएत, तइमे बेसी खरचा हएत। तेकर कोन गारंटी छै जे हेबे करत। ओह! ई अनेरे मन तोड़ब भेल। बुढ़ाड़ीमे नीक-निकुत[9] भोजन, ओ तँ भोज्‍य वस्‍तुमे पएल जाइ छै, तइले बेसी महग वस्‍तु कीनबक कोन जरूरी अछि। ई तँ पाइबलाक फैशन छी। महग आकि सस्‍ता, ओ तँ बनिया-बेकालक किरदानी छी, जे समाजमे काल बनि ठाढ़ अछि। जइ वस्‍तुक कमी रहल ओकर दाम बढ़ा देत आ जे बेसी रहत ओकर दाम घटा देत। जइसँ लेनिहारक जेबी पकड़ाएत। मुदा तइसँ वस्‍तुक पौष्‍टिक गुणकेँ कोन मतलब छै। तहूमे हम सभ तँ ओइ इलाकामे रहै छी जइ इलाकामे अनरनेबाकेँ कौआ नइ पुछैए। आमे केते खाएत, तहूमे खेरा कौआ उपैटे गेल जे फलखौका छल,आब तँ कार-कौआक बास बनि गेल अछि, ओ तँ सहजे फलक संग ओकर गाछक दिवारकेँ सेहो तेना कऽ नोचि-नोचि खाइए जे ओइ गाछे केँ सिर खुनि सुखा दइए। सोच-विचारमे पड़ल सुभद्राक मनमे जहिना सूर्यक इजोत बढ़ैत अन्‍हारमे प्रवेश करैत शाम कहबए लगैए तहिना पति-पत्नीक बीचक संध्‍यावेला जकाँ भेलैन। भेलैन ई जे अपनोमे एते सामर्थ्‍य तँ ऐछे जे जहिना घरक काज माने भानस-भातसँ लऽ कऽ सभ काज सभ दिनसँ करैत एलौं, अखनो करै छी आ आगूओ करब, सएह ने। तइले पतिक बेथाएल मनकेँ आरो बेथित किए करबैन। बजली- “अहाँ पुरुखक खेल खेलै छी।” पत्नीक बात सुनि रामकृष्‍ण बाबूक मनमे काँटक बोझ भीष्‍म पितामह जकाँ नहि रामक पुष्‍पवाणक तुणीर जकाँ खसलैन। रामकृष्‍ण बाबू खाली शिक्षक पदसँ सेवा निवृत शिक्षकेटा नै, एक साहित्‍य सृजक प्रेमी सेहो छैथ। जे समाजक आत्‍माक निर्माता सेहो होइ छैथ। जखन समाजक आत्‍म-निर्माता स्‍वयं व्‍यक्‍ति-निर्माता नइ बनि सकल तँ ओ सृजनकर्ता केना भेल। व्‍यक्‍तिक समूह समाज आ समाजक आत्‍माकेँ प्राण-प्रतिष्‍ठित करैबला सृजनकर्ता...। रामकृष्‍ण बाबूक मनमे एकाएक जेना साइयो-हजारो पुष्‍प-वाण आगूमे छिड़िया गेलैन। नजैर पड़लैन पत्नीक ओइ शब्‍दपर जे पुरुखक खेल कहने छेली। पुरुखक खेल यएह ने भेल जे पुरुख खेलए। मुदा पत्नीक मुँहक बात छी। आनक रहैत तँ आनो नजैरसँ देखल-मानल जा सकैत मुदा...। फेर होइन जे बजन्‍ता तँ केतौ अपन छाहोँ ने देखए देलैन। अहाँ पुरुखक खेल, अहाँक माने पुरुखक समूह सेहो भेल, तैठाम नारीक नारी केतौ कहाँ देखै छी? फेर मन घुमलैन, पुरुखक खेल! दुनियाँ तँ पुरुख-नारीक झुलैत खेल छी किने। मुदा ई तँ कुम्‍हारक चाक जकाँ एक्केटा खुट्टीमे ठाढ़ अछि..! तरे-तर रामकृष्‍ण बाबूक मन तुरैछ कऽ मुरैछ गेलैन। विचारक बोन अन्‍हरा गेलैन। जइसँ बोलती बन्न रहैन। मुदा पत्नी तँ अगिला उत्तर पबैले आँखि उठा बेर-बेर देखबे करैन। तगेदा होइत देखैथ। कनीए-कालक पछाइत रामकृष्‍ण बाबूक ठमकल मन ठनकलैन। ठनैकते उठलैन, पुरुखक खेल। पुरुख तँ लिंगक हिसाबे बँटाएल अछि, मनुखक हिसाबे तँ नइ बँटाएल अछि। पुरुखपना तँ से नइ छी। ओ तँ मरदो आ मौगियोमे अछि। केतौ कोनो पुरुखमे बेसी अछि तँ केतौ मौगीमे। जइ पुरुखमे कम रहै छै ओ मौगपना रस्‍ता पकैड़ चलैए आ जइ मौगीमे बेसी रहै छै ओ मरदोसँ बेसी मरदगानी गबैए...। रामकृष्‍ण बाबू जेते थाह लिअ चाहैथ तेते अगममे चलि जाइ छला। अपने बेथे बेथित भेल जा रहल छला आकि बिच्‍चेमे सुभद्रा टोकलकैन- “किए मन खसल अछि?” अपनाकेँ सम्‍हारैत रामकृष्‍ण बाबू कहलखिन- “मन खसल कहाँ अछि, विचारमे कनी झुकाउ आबि गेल अछि।” एक्केबेर अगिला-पैछला जिनगीकेँ सानैत-बाटैत सुभद्रा बजली- “अनेरे सोग-पीड़ा मनमे रखने छी। जेते दिन अनकर तील खेलिऐ तेते दिन बोहि देलिऐ। हूबा करू होशमे आउ। बिनु किछु केने अदहा दरमाहा देत। अपन दिन-राति तँ अजाद भऽ जाएत। कनियोँ-कनियोँ लुर-खुड़ाएब तैयो बहुत हएत।” “हँ! जेकर खेलिऐ तेकरा-ले केलिऐ।” जहिना साल भरिक पछाइत गाड़ीक ड्राइवर अपन अगिला जिनगी-ले ड्राइवरी लाइसेंसक नवीकरण करबैए आ करेला पछाइत जहिना मनमे खुशी होइ छै तहिना सुभद्रोकेँ भेलैन। मुख-मण्‍डल चमैक उठलैन। मुदा रामकृष्‍ण बाबूक चेहराक रोहानी जेना उतरए लगलैन। बजैकाल तँ बाजि गेला मुदा पछाइत सुमारक भेलैन। सुमारक ई भेलैन जे जेकर खेलिऐ तेकरा-ले केलिऐ। मुदा आब तँ से नइ हएत। आब तँ अपना भरे चलए पड़त। जाबे कार्यरत छेलौं, काजमे लागल रहै छेलौं,समैक गतिक पहियाक संग घुमैत रहै छेलौं मुदा आब तँ से नइ हएत। एक घरक खसान हएत आ दोसर घरक उठान। तइमे टटघरसँ ईंटाक होइमे जड़ि-मूल घरकेँ तोड़ए पड़ै छै। मुदा किछु पुरान घरक आत्‍मा तँ नवका घर बसिते अछि। आन वस्‍तु रहौ कि नइ मुदा घराड़ी तँ रहिते अछि...। रामकृष्‍ण बाबूक भक् जेना खुजलैन। खुजलैन ई जे अखन धरिक जिनगी पठन-पाठनक रहल, तँए मनमे यहए ने लिलसा रहत जे मरैकाल तक अहिना काज लगल रहए...। मुदा लगले भकमोड़पर आबि रामकृष्‍ण बाबूकेँ फेर भक् लगि गेलैन। लगि ई गेलैन जे सभ दिन पठन-पाठन करैत एलौं, से आब केना हएत! पठनक जोगार तँ कैयो लेब, मुदा पाठन केना करब? अखन धरि मन मारि विद्यालयक पठन-पाठनमे लगल रहलौं जे से ने रेडियो स्‍टेशनसँ जान-पहचान भेल आ ने गामेक समाजक कोनो साहित्‍यिक संस्‍थासँ। तखन पाठन केतए करब? कौलेजक विद्यार्थियो तँ छीनाइए गेल! भकमोड़पर सँ रामकृष्‍ण बाबूक मन फेर घुमि कऽ पहिलुके रस्‍ता धेने पाछूए मुहेँ आगू बढ़लैन। पाठनेटा किए, पठनो तँ बदलबे करत। एते दिन विद्यार्थी-ले बेसी पठन करै छेलौं अपना-ले कम, मुदा आब तँ से नइ हएत। काजो घटल। विद्यार्थीक समए विद्यार्थी बनि अपन अध्‍ययन करब। अपन अध्‍ययन मनमे उठिते पुस्‍तकालय मन पड़लैन। हाइ रे बा, किताबो छीना गेल! गाममे पुस्‍तकालय कहाँ अछि! केतएसँ किताब आनब? जखन किताबे नइ तखन पढ़ब की? अपन किताब दिस नजैर गेलैन। पठन-पाठनक जिनगी रहितो अपन पुस्‍तकालय कहाँ अछि? मन आगू बढ़ि गेलैन। आगू बढ़िते पाछूसँ धकियबैत दोसर मन कहलकैन। अपनो तँ सृजन शक्‍ति ऐछे। जिनगी भरि तँ पढ़बे-पढ़ेबे केलौं आ घरसँ बाहर धरिक दुनियोँ देखते आबि रहल छी आ देखतो छी। तखन किए किताबक अभाव खटकत...। मन मानि गेलैन जे अपन अगिला शेष जिनगी पठन-पाठनमे बिताएब। मन थीर होइत-होइत सृजनशीलतापर आबि अँटकलैन। अँटैकते उठलैन, पोथी छपाएब केना? जँ लिखबे[10] करब आ ओ छपि नहि पएत तखन तँ ओ घरमे सड़िये जाएत। तइसँ लाभ की भेटत। लिखब असान अछि, आइसँ नियमित जिनगी बना लिखै-पढ़ैक निश्चित समए बनेला पछाइत ओ अनेरे जिनगीक नियमित क्रियासँ जुड़ि जाइए। आगूक कोनो स्‍पष्‍ट (सोझ) रस्‍ता नजैरमे एबे ने करैन। कोनो टेँढ़-टुढ़ तँ कोनो झँपाएल-तोपाएल तँ कोनो आगूएसँ कटल-खोंटल...। आइक समैमे पोथी छपाएब असान भऽ गेल, तेकर दुनू कारण भेल तकनीकी विकास सेहो भेल आ आर्थिक विकास सेहो भेल। मुदा से भेल अछि पैछला पाँच बर्खक बीच। तइसँ पहिने पोथी छपाएब भारी भीड़ छल। जेकर चलैत साइए नहि हजारोमे मिथिलांचलक धरोहर हेरा गेल अछि...। रामकृष्‍ण बाबू मने-मन विचारए लगला- अपन दरमाहा टुटि गेल, बेटा सभ कहियो ई नइ पुछलक जे बाबू कोन किताब लेब। धिया-पुता जकाँ बिस्‍कुटक डिब्‍बा हाथमे धड़बैत रहल। बिस्‍कुटक संग धिया-पुतापर नजैर पहुँचते रामकृष्‍ण बाबूकेँ मन पड़लैन जेठ बेटाक कहल बात- “बाबू, हम तँ अंगरेजी माध्‍यमसँ पढ़ने छी, मुदा गीता पढ़ैक मन सदिछन होइए। संस्‍कृतमे लिखल छै, ओ मैथिलीमे रचि दियौ, जे सभकेँ पढ़ैमे असानो हएत आ सभ पढ़बो करत।” मनमे ऐबते रामकृष्‍ण बाबू सोचलैन। अखन ओ बैंकक मैनेजर भऽ गेल छैथ, अपन बेटो-बेटीक भार उतरिये गेल छैन, जँ ओ आर्थिक मदत करता तँ पोथी छपाएब बड़ भारी समस्‍या नहियेँ अछि...। मुदा लगले रामकृष्‍ण बाबूक मनमे भेलैन जे आइसँ दस बरख पहिने गीताक चर्च बेटा केने छला। गीताक मांग केने छला। मुदा ओ हमरा बुते पुड़ौल हएत। ओहिना पाँती पढ़ि भाषा बदैल देबै, मुदा से अपन मन मानत? गीताक नृत्‍य-कृत्‍य मनमे उठिते रामकृष्‍ण बाबू आत्‍म-भोरसँ विभोर हुअ लगला। खापैड़क धानक संग खापैड़क तीसी जकाँ मन चनचना लगलैन। कृष्‍णक गोपीक संगक रासलीला हारल-मारल ब्रजवालाक संग रचब-बसब। मुदा अपन जिनगी की रहल? अपना कलममे तँ केकरो ओतबे ने दम रहै छै जेते ओ दमगर रहल। सभ दिन घरसँ बाहर तक गुरुआइ केलौं, सेवकाय कहियो केलौं नै, तखन बेटाक मनोरथ हमरा बुते केना पुड़ाएल हएत..? रामकृष्‍ण बाबूक मन ठमैक गेलैन। किछु समए धरि ठमकला पछाइत फेर मनमे भेलैन जे किए ने बेटोक परीछा लाइए ली। किए ने हमहीं मन पाड़ैत कहिऐन जे ‘बौआ, आब कौलेजसँ निचेन भेलौं, जँ अहाँ पोथी-छपबैक भार उठा ली तँ दू-तीनटा संग्रह जोकर लिखलो राखल अछि आ अहूँ जे  गीताक चर्च केने रही, तहूमे हाथ लगा देब। अपने तँ किछु-ने-किछु कहबे करता, तइसँ अपन अगिला काजक रूप-रेखा बना लेब...। अगिला काजक रूप-रेखा रामकृष्‍ण बाबूक मनमे ऐबते फेर गीते घूमि एलैन। गीतासँ केकरो डेरेबा नइ चाही। ओ जिनगी दइए। जिनगीकेँ जन्‍म-जन्‍मान्‍तर धरिक रस्‍ता देखबैए। रामकृष्‍ण बाबूक मन अह्लादित भऽ गेलैन। अह्लादित होइते मन उनैट बेटाक पढ़ाइ दिस बढ़लैन। बेटा अंगरेजी-माध्‍यमसँ पढ़लक। मुदा गीता तँ संस्‍कृतमे लिखल गेल अछि। दुनूक दू भाषा छी। दुनूक लिपि, शब्‍द-विन्‍यास, उच्‍चारण सभ किछु अपन-अपन छै। तँए किछु भारी तँ ऐछे। मुदा मैथिली तँ अपन घरैया भाषा छी, जे बिनु सीखनौं-पढ़नौं लोक सीख लइए। तँए जँ मैथिलीमे गीताक अनुवाद करैक मांग बेटा केलक तँ ओ उचित केलक...। ...मुदा काजो तँ काज छी, गीता सन महत-माइन विषयपर रस्‍ते-पेरे शब्‍दक तुकवन्‍दी गढ़लासँ थोड़े हएत। ओ हिसाब जोड़ैले तँ कैलकुलेटर मशीन संगमे राखए पड़त। नइ तँ ई थोड़े बूझि पाएब जे लत्तियो-फत्ती आकि झाड़ो-झुड़मे अमृत-फल फड़ैए। तैठाम सोझे वृक्षक फल कहि देने नइ ने हएत। रामकृष्‍ण बाबूक वौआएल मन थाकल बटोही जकाँ थकथका गेलैन। थकथका ई गेलैन जे अनेरे मनक संग अपनो वौआइ छी। अनेरे पानि महक माछकेँ नअ-नअ कुटिया बँटै छी। जहिया जे हेतै से बुझल जेतइ। पहिने राम-राम करैत राम-धामक काजमे हाथ लगा दिऐ। थकथकाएल मनमे ईहो उठलैन जे सतेकेँ ने सत्-सत् कृष्‍ण गीतामे गीत गौने छथिन- ‘करम करैत चलू, फलक आशमे बैसू नइ।’ ठीके ने कहने छथिन। आब ईहो वएह कहितथिन जे आम रोपब तँ आम भेटत आ बगुर रोपब तँ काँट। एते कहैले हुनका छुट्टी छेलैन। हँसेरा-हँसेरीक बीचमे ने ठाढ़ रहैथ...। रामकृष्‍ण बाबूक मन फेर कनी पाछूए मुहेँ घुसैक गेलैन। जहिना महाभारतक मैदानमे वीरक तीरसँ वीरक रथ कनी पाछू घुसैक जाइए। मनमे खुशी उपकलैन। विहुँसैत पत्नीकेँ कहलखिन- “अगिला जिनगीक बोही-खतियानक नक्शा मनमे बनि गेल...।” आगूक बात रामकृष्‍ण बाबूक पेटेमे रहैन कि बिच्‍चेमे सुभद्रा टोकि देलकैन- “की बोही-खतियान?” “सएह ने कहै छी, सुनू...।” ‘सुनू’ कहि रामकृष्‍ण बाबू सुभद्राक आँखि-मे-आँखि मिला बजला- “जहिना अहाँ गृहिणी बनि गृहपत्नी सभ दिन रहलौं तहिना आगूओक भार भेल।” ‘भार’ सुनि सुभद्रा बजली- “आ अपन भार की भेल?” विहुँसैत रामकृष्‍ण बाबू बजला- “कुशी अमावस्‍या दिनक उखारल कुशक भार। राम-धान केना अपन जिनगीमे जुटि जाइत अछि।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 2780, तिथि : 01 दिसम्‍बर 2015 [1] अंग्रेजक खिलाप [2] घरेलू काज [3] परिवारक [4] प्रमुख श्रोताक माने कान-आँखि आ मनसँ त्रिवेणी धारक घाट जकाँ श्रवण केनिहार। [5] अनेरो ढेरिआइसँ मतलब जे गंभीर कार्यक्रम अछि, तइ अनुपातमे। [6] पत्नी (सुभद्रा) [7] लड़का-लड़कीक [8] बेटा सबहक परिवार [9] पोष्‍टिक [10] साहित्‍य सृजन ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्‍डलक ‘समरथाइक भूत’ संग्रहक तेसर संस्‍करणसँ एकटा लघु कथा- खटहा आम तीन मास पहिने अर्थशास्‍त्र विभागक प्रोफेसर छीतन भाय रिजाइन लगा गाम आबि गेला। गामेमे रहब, रट लगि गेलैन। रट ई लगलैन जे अनेरे नगद-नारायणक फेड़मे पड़ि अपन देव-पितर बिसैर गेल छी, मुदा कौलेजक भाषामे बजै छला, जइसँ गामक लोक बुझिये ने पबै छल जे की बजै छैथ। भाय! गामो-घरक लोकक तँ जिनगी बदललै आब,टी.भी.मे नांगट नाच देखैत रहैए आ मने-मन गुनगुनाइत रहैए- ‘नन्‍द भवनसँ निकलल हे गिरिधर गिरधारी...।’ भाय! कोन गिरिधर गिरधारी से तँ ओ जानए। बहुरूपिया कृष्‍ण कखनो महाभारतक शंख फुकै छैथ, तँ कखनो गोपीक संग वृन्‍दावनक रास करै छैथ, कखनो मक्‍खन चोरा कऽ खाइ छैथ, तँ कखनो घाट परहक साड़ी लऽ कऽ भगै छैथ, तँ कखनो गाइयक चरबाहि करैत गोबरक पहाड़ बनबै छैथ...। दरबज्‍जापर बैसल छीतन भायकेँ अपन नोकरी छोड़ब मनमे उठलैन। दस बर्खक अनुभवी शिक्षक जखन अप्‍पन अर्थशास्‍त्र पढ़लैन तखन मन उड़ैज  गेलैन  जइसँ  उर्जावान  भऽ  गेला। अपन शक्‍तिक बोध होइते अपन भवितव्‍य देखलैन। देखते तियाग पत्र दऽ कऽ गाम चलि एला...। छोट भाए बूझि अपन फर्मेल्‍टी निमाहैले छीतन भाय लग पहुँच, चिक्कारीमे कहलयैन- “भाय, असगरे की विचारि रहल छी?” चिक्कारी ई जे बुझल रहबे करए जे प्रोफेसरक जिनगी असगरूआक भऽ जाइ छै। गाम थोड़े छी, जे चाहक चौखरी,पानक चौखरी, ताड़ीक चौखरी, तासक चौखरी हजारो किसिमक चौखरी लगा दस गोरे एकठाम हब-गब करैत रहता। एकांत बूझि पड़लैन तँए, कि की, आकि मन बेथाएल रहैन तँए, हमरो अर्थशास्‍त्रेक बात कहए लगला! आकि बजैक वेगमे जनु अपन कौलेजक किलास धियानमे चलि एलैन तँए, ओही लहजामे बाजब शुरू केलैन- “बौआ, पहिने चाह पीबह। जेते हल्‍लुक माथ रहतह तेते नमहर मोटा उठबैमे हल्‍लुक बूझि पड़तह।” जहिना चिल्‍होरिक टाँहि सुनि लोक बूझि जाइए तहिना भोजियो बूझि गेल रहथिन। भौजीकेँ अपन काजपर बिजलोका जकाँ नजैर रहै छैन। सेरिया कऽ नीक जकाँ बैसबो ने कएल रही, माने सोझहा-सोझही बैसी आकि कनछिया कऽ बैसी, ई सोचिते रही। कहुना भेला तँ जेठ भाय भेला तैपर पढ़ौनीक काज करै छैथ। तहूमे बामा भाग किनछिया कऽ बैसी आकि दहिना भाग। अही तारतम्‍यमे रही। तइ बिच्‍चेमे भौजी चाह नेने आबि बजली- “गामक पुरुखकेँ बैसैयोक लूरि नै!” मुदा धड़फड़ा कऽ किछु बाजबो नीक नहियेँ होइए। एके शब्‍द अगियाएलमे अगिया जाइए आ पानियाएलमे पनिया जाइए। तँए कखन रज तम भऽ जाएत आकि सत भऽ जाएत, तेकर कोन ठेकान। तेतबे किए, तमो रज आ सत बनिते अछि...। मुदा चुटकी तँ चुटकी छी। एक बेरे थोड़े फरिआइए, ओ तँ दोहरा कऽ फरियाएत नै तँ तेहरा कऽ। जँ एक बेरे फरियाइत तँ तुलसी पात तोड़ैकाल तीन बेर चुटकी किए बजबए पड़ै छै..? बजलौं- “भौजी, आब वसन्‍ती रंग चढ़ल हेन। बिआह मन पड़ैए की नै, हमहीं परोफेसर-भैयाक लोकनियाँ रहिऐन।” तइ बिच्‍चेमे छीतन भाय बजला- “तहूँ केते नाङैर भारी केने छह। एते दिन प्रोफेसर छेलौं, आब भैयारी भेलौं।” हमरो सुतरल कहलयैन- “भैया, अहीं सभ गाममे कटा-कटी कऽ गामकेँ दुइर कऽ देलिऐ, सभ दिन भैया कहैत एलौं जँ आब प्रोफेसर भैया नइ कहब तँ अहूँकेँ मनमे की हएत। भैयाक पाछू प्रोफेसरक नाङैर सटि गेल किने।” छीतन भायकेँ बजैक मन रहैन, तँए हँसी-मजाककेँ हटबैत बजला- “बौआ, हम तियाग-पत्र किए देलौं से तँ कहबे ने केने छेलिअ आ तोहूँ ने पुछलह?” कहलयैन- “भैया, अहाँकेँ की कहब, सभ गप लोक सभठाम बजैए मुदा पाइ- पाइ-कौड़ीबला बात थोड़े बजैए। तँए अगुरबार पुछब अहूँकेँ थोड़े नीक लगितए।” एकमुहरी विचार छीतन भाइक मनमे अँटकल रहैन तँए दोसर बातपर मने ने टिकैन। बजला- “बौआ, जड़ियेसँ कहै छिअ। जइ दिन नोकरी छोड़लौं तइसँ आठ-नअ दिन पहिलुका गप छी। मखना तारीकपर लहेरियासराय गेल रहए, घुमतीकाल डेरापर आएल। ऐबते बाजल ‘प्रोफेसर साहैब, अहाँ तँ राजा भऽ गेलौं...। ‘राजा’ सुनि अपन मन तँ कनी आगू-पाछू करए लगल जे राजा तँ भेल भूपति! से कहाँ अछि! मनमे भेल जे भरिसक राति-बीच दुआरे, गाम नै जा हेतै तँए, रहत। अपन डेरा अछि, ओढ़ना-बिछौना सभ ऐछे। किछु ने बजलौं।” बिच्‍चेमे टोकि देलिऐन- “भैया, ई तँ धरमक काज भेल। अनका जकाँ नै ने जे गौआँ-घरूआकेँ देखब तँ मुँह घुमा लेब जे दस टाका खरच ने भऽ जाए।” हमर गप छीतन भायकेँ नीक लगलैन। बाढ़िक पलाड़ी जकाँ मन उमैड़ गेलैन। अपने मने बाजए लगला- “राजा सुनि अपन मन तँ नै तर-ऊपर भेल मुदा पत्नीक मन भऽ गेलैन।” मुस्‍की दैत पुछलयैन- “की भऽ गेलैन, भौजीकेँ?” बजला- “भऽ ई गेलैन जे जहिना बिनु पढ़ल-लिखल गुरुक पत्नी गुरुआइन आ डाक्‍टरक पत्नी डाक्‍टर-साहिबा बनि जाइ छैथ। तहिना हुनको भऽ गेलैन। हमरा लगसँ मखनाकेँ उठा चुल्हिये लग बैसा फदर-फदर गपो करए लगली। बीच-बीचमे हँसबो करैथ आ नेपो झाड़ैथ। तैसंग केता बेर चाह दुनू गोरे पीलैन तेकर ठेकान नै।” बूझि पड़ल जेना छीतन भाइक मन औरो पला गेलैन अछि। टोकलयैन- “मखनासँ कोनो गप भेल की नै?” बजला- “बड़ीकालक पछाइत जखन भानस लगिचा गेल, चुल्हि-चीनमार बहारै बेर भेल तखन ओ लगमे आएल। पुछलिऐ- सोझे भाटक राजा मखन बना देलह आकि भाटिक जैड़ोमे किछु छै?” मखनोक मन फुलाएल रहबे करइ, बाजल- “भाय साहैब, करोड़-पति भेने लोक राजा भऽ जाइए, से ते अहूँ भाइए गेल छी।” मखनाक बात नीक जकाँ नै बूझि पेलौं जे की कहि देलक। मुदा अपनो मन धिक्कारए लगल जे एकटा साधारण आदमीक बात नीक जकाँ नै बूझि पेलौं! मुदा दोहरा कऽ पुछबो नै सोहाएल। नै ऐ दुआरे सोहाएल जे केना कऽ एकटा बुझौनिहार[1] अपने मुहेँ बाजी जे बातक गूढ़केँ नै बुझलौं। मन ठमकल। ठमैकते कनियेँ ठहरलौं आकि मन जिराएल। जिराइते उठल। किए ने मखनाक बाजल बात बुझलौं! मुदा जहिना ‘बाउ’ शब्‍दक अर्थ बुझैले आगू-पाछूक शब्‍दक ताल मिलबए पड़ै छै, नै तँ‘बाउ’क माने बेटा भेल आकि ‘बाप’ से बुझिये ने पेबै तहिना भऽ गेल...। चपाड़ा भरैत मखनाकेँ कहलिऐ- “मखन, तूँ ते बड़का कवि बनि गेल छह। तोहर दोहाइ जरूर पड़बे करत। हमरा सबहक कमाइये की अछि जे तोरा सन-सन लोकक सुआगत करब।” एक दिस जहिना पत्नीक मन रानीक गद्दीपर बैसल तहिना मखनोक। तहूमे केता बेर चाह पीलक तेकरो ठेकान नै,मन गरमाएल रहबे करइ, बाजल- “भाय साहैब, अपने तँ आब राजा भऽ गेलिऐ। कोन चीजक कमी भगवान देने छैथ जे अनेरे बजरूआ लोहा महींसिक दूध खाइ छी, सुच्‍चा दही भोजे-काजमे खाइत हएब? ललमुहाँ रहुओ तँ बिसरिये गेल हएब?” मखनाक एक-एक शब्‍द जेना हमरा छातीकेँ बेधैत रहए। विद्यापतिक उगना जकाँ अनेको विचार मनकेँ अलगा देलक। आगू की बाजी से विचारेमे उपरौंझ हुअ लगल। विचारक क्षेत्र आ सच्‍चाइक क्षेत्रक बीच एते दूरी बनि गेल अछि जे बेसी गोरे अही कटारिमे खसिते अछि। मुदा पत्नीक फुलाएल मन फगुआ-जोगिराक भोलाबाबा जकाँ अन-धन सोनमा लूटबैले तैयार रहैन। तैयारो केना ने हेती वा रहितैथ, राजगद्दीक खुशनामामे जँ पमरियोकेँ साड़ी पहिरा नै नचैबतैथ तँ खुशीए की भेल। केबाड़क अढ़ेसँ बजली- “मखन, भगवान अहाँ मुँह अमरीत बरसाबैथ।” मखना की जानए गेल जे अमृताएले मुँह ने अमृत वरिसौत। अमृत सुनियेँ कऽ मन उधिया गेल छेलइ। कहलकैन- “भौजी, अहूँ ससैर कऽ लगमे आउ। जे बात काना-कानीक छी ओ दोसराइतकेँ सुनब नीक नै हएत।” मखनाक बात सुनि विस्‍मित भेल रही। मुदा पत्नीक जिज्ञासा आगूए-आगू गाइक ओइ बच्‍चा जकाँ रहैन जे दौड़ कऽ गाएसँ दू-लग्‍गा-चारि-लग्‍गा आगू जा ठाढ़ भऽ पाछू माए दिस तकैए आ आँखि मिलिते गाए अपन मातृत्‍व शक्‍तिक बोधक अमृत पीब आगू डेग उठबैत रहैए...। तहिना पत्नीकेँ लगमे ऐबते मखना बाजल- “हम बीचमे बैसब।” ओना मखनाक मनमे उचड़ैत रहै जे हिनके सन-सन लोक ते गामो उजारलक आ भैयारीक सम्‍बन्‍धोकेँ मेटौलक...। मुदा लगले मनमे एलै जे ई कु-नजरिये देखब भेल। सती-सावित्री, सीता, अहिल्‍या, सुनयना इत्‍यादि सन-सन किए बिसरा रहलौं अछि। मुदा लगले मनमे एलै जे शहर-बजारमे के केकरा रहए दइए, तैठाम जँ भाय साहैब एते सुआगत केलैन ई हम हिनका विचारकेँ बधाइ दइ छिऐन। बाजल- “भाय साहैब, अहीं सन-सन धरमतमा लोक सबपर ई दुनियाँ ठाढ़ अछि।” बैशाख-जेठमे जहिना गैवार-महींसवार बाधमे तामल खेतक गोलापर गोला चढ़ा देबाल ठाढ़ करैए, तहिना हमरा मनपर गोला चढ़ल जाइत रहए, तँए गुम्‍मी लधने रहलौं। मुदा पत्नी अपना मनक फुलवाड़ीमे माइलिक बीच अपनाकेँ देख आरो भकराड़ भऽ कऽ फुलाए लगली। तैपर चाहक चुमकी सेहो चढ़िये गेल रहैन। बजली- “मखन बौआ, अहीं सभ ने भाए-बोन भेलौं, हाथ-पएर भेलौं। अहिना जहिया-जहिया दरभंगा आबी तहिया तहिया अबैत रहब।” ओना पत्नीक जेहेन बोल निकललैन तेहेन बेवहार नै छैन। भलेँ वृन्‍दावनेक राधा अपनाकेँ किए ने मानैथ, मुदा अधलो केना कहेती। जे बेवहार मखनाक संग कऽ रहली अछि, ओकरा कम नै आँकल जा सकैए। भलेँ जँ काज आगूओ शेष अछि तँ आगू समैयो तँ शेष ऐछे। की हुनका मनमे आबो नै आबि सकै छैन जे रोगाएल-टटाएल परिवारक मखन छी,किछु भड़ो-किराया-ले आकि किए कचहरीक चक्करमे पड़ल अछि, ओकरो मेटबैक उपाय सोचितैथ। खैर जे से...। हमहूँ गुम्‍मे रहलौं। ओना हमर गुम्‍मी आ हुनकर चढ़ल मन देख मखनोक मनक मृदंग, मृदंगे नै ढोल-मृदंग दुनू चढ़ल जाइत रहइ। कहलकैन- “भौजी, देखले दिनमे जइ जमीनक दाम तीन हजार रूपैए कट्ठा छेलै ओ आइ तीन लाख रूपैए कट्ठा भऽ गेल। तहूमे अहाँकेँ तेहेन ओ चौक परहक बड़का कोला अछि, ओ तँ बूझू जे रजधानी भऽ जाएत। तेहेन जगजियार चौक भऽ गेल जे ओइठाम चाहब तँ बजार लगा देब। कमसँ कम बान्‍हक कात दिससँ दू सए घर बना दिऐ तँ लाखो भाड़ा हएत। अनेरे भाय साहैबकेँ अहाँ अपनो नोकर आ अनको नोकर बनौने छिऐन।” मखनाक बात सुनि अपने उठि कऽ टहलए लगलौं। मने-मन विचारए लगलौं जे हजार-लाखमे फानि गेल! मुदा तखनो जँ अपने नै ताकब तँ केकरा के तकलक जे हमरे ताकत। मुदा अखन दरबज्‍जापर आएल गामक भैयारीकेँ छोड़ि..., विचारो करैक उचित समए नहियेँ अछि। फेर घूमि कऽ आबि बैसलौं। तैबीच मखना बाजि चुकल छल, ‘भौजी,उ बड़का खरहोरि जे अछि, ओइमे एकटा बोरिंग गड़ा देबै आ बीघो भरि हमरा खेती करैले जहिया दऽ देब तहियासँ दुनू साँझक तरकारीक भार अखने गछि लइ छी।’ मने-मन मखनाक बातकेँ हमहूँ नोट कऽ लेलौं।  मुदा लगले मन  उछैट गेल। उछैट ई गेल जे यएह मक्‍खन चोरि तँ वृन्‍दावनक लीला छी! मुदा घड़ीक चालिसँ चालि मिला पत्नीकेँ कहलयैन- “दुनू भैयारी एकेठाम बैस कऽ खेबो करब आ किछु गाम-घरक गपो-सप्‍प करब आ अहाँ रूक्‍मिणी जकाँ बिअनि हौंकब।” ‘बिअनि’क नाओं सुनि पत्नी उठैत बजली- “मखन बौआ, अहूँ की पानिक मक्‍खन थोड़े छी, बकेनमा महींसिक ने दूधक मक्‍खन छी। ऐठामसँ गाम पहुँचते कोला-कोली सेरिया जोत-कोर करए लागब। जहिया हम सभ गाम आएब तहिया देखब।” जेहने भूख जगल हुअए तेहने अनुकूल जगह जँ भोजनो-आरामोक हुअए तँ एहने संयोग संयमक बाटे चलैए। सएह भेल, चौपेतल कम्‍मलक आसनपर बैसते जहिना अपन मन मखनाक मन पढ़ए लगल तहिना पत्नी हाँइ-हाँइ कटोरा-कटोरी साँठए लगली। पानि ऐ दुआरे चढ़ि गेल रहैन जे मखनाक संग जखन भोजनक दौन[2]मे ओझराएल रहब किने तैबीच अपन मैलकियतक गप पत्नी चला लेती। किएक तँ हमरा परोछेमे मखनाकेँ खेतक जुआन दऽ देने छेलखिन। मखनो खेती करैक भार उठा नेने छल...। मनमे बेर-बेर उठए लगल जे अनेरे लोक अपन सम्‍पैतकेँ नै जगा दुनियाँ घूमि रहल अछि। मुदा से अपने बुझने हएत आकि अनको विचारमे विचार साटि विचारैत करैयो पड़त? तहिना मखनोक मन जगलै। जगबो केना ने करितै, जखने दूध तखने मक्‍खन, जखने मक्‍खन तखने घी। मुदा भेड़ी-घी आब केतए भेटत जे माथमे लगा दरद भगाएब। भानसे  बेर मखना माछक कुटियापर हीक गाड़ि अँखिया  नेने छल। भाय, भोजमे तँ  वएह  खेनिहार ने ठकाइए जेकरा पातपर भोजनक विन्‍याश आगू-पाछू परसल जाइए। मुदा मखनाक सोझमे भानस भेल, जीबलाह रहैत तँ लोहियेसँ निकालि-निकालि लोलक पानि मिझा नेने रहितए, मुदा मखनो अपनो अपन अस्‍तित्‍व तँ जनिते अछि। आखिर किछु छी तँ पुरुखक बेटा पुरुख तँ छीहे। एतबोकाल धिरित नै राखल हेतइ। एक तँ ओहिना अनठिया चाह पीनिहार जकाँ लोभे पेट फुला नेने अछि। मुदा भानसक संगी सेहो मखन रहबे करैन। केते खिस्‍सा-पिहानी कहि-सुनि दुनू गोरे एकबट्ट भऽ गेल, तँए अपनाकेँ भनसिया बूझि मखना आदर करैत कहलक- “भाय साहैब, केतए गेल ओ पीड़ी सेरसोक तेल-मसल्‍ला[3] आ केतए गेल ओ ललमुहाँ रहु आ बुआरीक पेटी?” तैबीच पत्नी थारी नेने आबि गेली। जहिना हाट लगौनिहार हटवार अपन-अपन चीज-बौस पसारि हाट सजा तराजू पकैड़ हाथ पसारैए तहिना अपन काज उसारि पत्नी ओइ ताकमे लगि गेली जे पहिने दुनू गोरे मुहमे लऽ मुहकेँ बरदाबौथ ने तखन खुलल मुँहक सोहर केहेन होइ छै से सुना देबैन। जे कोन सोहर छी, जन्‍मौटी छी आकि मूड़नक, बिआहक छी आकि असमसानक। मुदा हमरा ऊपर एकटा आरो बड़का चेका माटिक चढ़ि गेल। चढ़ि ई गेल जे केना अपनो पिताक देल पनरह बीघाक किसान परिवारक छी, हमरा सन लोक[4] अपनो आर्थिक विश्लेषण जँ अपने नै करत तँ जे कहियो स्‍कूल-कौलेजक आँखि नै देखलक ओ केते दूर धरि आगू लऽ जा सकैए? अपना सभ किछु अछि। मुदा मखना कोन नजरिये देख रहल अछि! ई तँ भने दुनू गोरेक[5] बीचक बात छी भने मुहोँक काज नै बरदाएत आ जीहो चलबे करत। तँए सुनबे नीक। अपने चुप भऽ गेलौं...। मुदा पत्नी तँ अपने नियारे तबाह जे धान-दौनक बरद जकाँ जहाँ दाँत, ठोर, जीह चौकल्‍ला चलए लगलैन आकि अपन प्रस्‍ताव पेश कऽ देबैन। प्रस्‍ताव ई जे अखन तक पुरुखक बिनु विचारल बात अछि तँए तीनू गोरेक बीच विचारो पक्का-पक्की भऽ जाएत आ काजोमे हाथ लगत। हेबो तँ अहिना ने करतै जे जे जहिना कले-कले लोक गाम छोड़लक तहिना कले-कले धरबो करत। प्रश्‍न तँ ओतए अँटैक गेल अछि जेतए संकल्‍पक दृढ़ताक बात अछि...। पत्नी मखनाकेँ कहलखिन- “मखन, अहाँ हमरा जे बीघो भरि खरहोरि उपजबैक बात कहलौं, से अखन मालिको छैथे, मुहाँ-मुहीं कऽ लिअ।” पत्नीक बात अपना कोनो उझट नै बूझि पड़लैन, मुदा खरहोरियो तँ खढ़क खेतीए छी, तखन ओकरा उपटौल किए जाएत? प्रश्‍न मनमे उठलैन। मुदा तइमे अपन कोन दोख। जहियासँ हाइ-स्‍कूल धेलौं आ गाम छोड़लौं तहियासँ छोड़नहि छी, जँ कोनो काज उदेममे गाम एबो करै छी तँ काजे भरि अपनाकेँ समेट खँति नेने छी, मुदा परिवारो तँ पाँच सदस्‍यक देशे छी, जखने मातृ-भूमि भेल तखने राष्‍ट्र-भूमि सेहो भेल। जँ से खत्ती दऽ कऽ नै राखल जाएत तँ हूरारेक चालि पकैड़ ने मनुखो चलत जइसँ केमहर हुरैक जाएत तेकर कोनो ठेकान छै। तँए गुमे-गुम सुनैक जिज्ञासासँ कान ठाढ़ केने रहलौं। पत्नीक प्रश्‍न नीक जकाँ धरतीपर खसलो ने छेलैन आकि बानर जकाँ मखना बिच्‍चेमे लोकैत हमरा दिस तकैत बाजल- “भाय साहैब, परिवारक भार जँ अहाँ उठा ली तँ अहूँक परिवारक भार हम उठा लेब।” मखनाकेँ निच्‍चाँ-ऊपर देखए लगलौं। मनमे छगुन्‍ता लगल जे कहू एते पढ़ि-लिखि कऽ एतेटा नोकरीक आमदनी अछि तखन ते सदिकाल भूर फुटले रहैए, जे धिया-पुताक पढ़ौनीक फीस पछुआ गेल अछि तँ भारामे नून सठल अछि...। माल टेनक डिब्‍बा जकाँ ढकर-ढकर करैत परिवार चलैए। छगुन्‍तामे पड़ल रही तैयो मखनाकेँ पुछैक विचार भेल मुदा सोझे नै, कैरम-बोडक उल्‍टा गोटी जकाँ। अपन दुखसँ लोक आनोक दुख बुझैए आ आनेक दुखक उपायसँ अपनो दुख मेटबैए, मेटबैक लूरि सीखैए। पुछलिऐ- “मखन, केते खर्चसँ तोहर घर चलि सकै छह?” प्रश्‍न सुनिते मखन बकरी-घी जकाँ टभैक कऽ फद-फदाएल- “दिन-रातिक समए तँ दिन-रातिक काजसँ चलै छै, भाय साहैब। तखन भेल धिया-पुताकेँ जिनगी चलै जोकर बना दुनियाँकेँ देब। ई कोन बड़का खर्चक काज भेल।” गमैया पनचैतीमे जहिना मुँह-दुबरा पञ्चकेँ रेलबे स्‍टेशनमे टिकट कटौनिहार जकाँ धकियबैत धकिया अपन काज मुँह-गरहा ससारि लइए तहिना पत्नी हमरा धकिया मखनाकेँ अपना दिस करैत बजली- “बौआ, ओइ बीघो भरि खरहोरिमे की सभ उबजेबै?” एक तँ ओहिना मखनाक मन थारीक आगत-भोगसँ गद्-गद् रहैए। तैपर एक विचारवान जकाँ विचारै जोकर काज सेहो आगूमे आबि गेलइ। मुदा कोनो प्रश्‍नक जवाब ओइठाम देब भारी होइ छै जैठाम हजारो प्रश्‍न छै मुदा ओइठाम किए भारी रहत जैठाम एकेटा प्रश्‍न रहत। यएह तँ भेल हल्‍लुक आ भारी मनक ओझरी-सोझरी। एक तँ ओहुना मखनाक छोट जिनगी, तीन गोरेक परिवार। दू गोरे समकस कमौनिहार तेसर दू सालक बच्‍चा तँ अपने देह झाड़ि हँसुआ-खुरपी लऽ कऽ संगे-संग खेलाइत रहै छै, तँए किए मनपर कोनो भर पड़ल रहतै। पत्नीक बात सुनि मखनाकेँ कि कोनो विधाता जकाँ विचारैक जरूरत रहइ, जे देरी लगितै ओ तँ मात्र खरहोरि तोड़ि खेती करैक रहइ। बाजल- “भौजी, बारहो मास तीमन-तरकारीक धनमण्‍डल घरमे लागल रहत। जक्खैन जे मन फुरत तक्खैन से अपना बाड़ीसँ तोड़ि आनब आ टटका-टटकी खाएब।” मखनाक बात सुनि पत्नीक मन लोहियामे पड़ल मक्‍खन जकाँ टभकलैन। विहुँसैत बजली- “से केना बारहो मास तरकारीक धनमण्‍डल लागत। ऐठाम बरसातमे तरकारी खाइले जी-जरैत रहैए आ अहाँ केना धनमण्‍डल लगा देब?” प्रश्‍न सुनि मखनाक मनमे कोनो हिलकोर नै उठलै। एतबे उठलै, उपजाक बात तँ अन्‍तिम भेल, पहिने खरहोरि, जे कहियोक कहियौ आकि अखुनका कहियौ, घर बनबैमे आकि बरैब छाड़क भार उठौने छल आकि अछि, ओ आब कमि रहल अछि। घरोपर सीमटी, गिट्टीसँ लऽ कऽ चदरा-खपड़ा धरि चढ़ि रहल अछि, तैठाम खढ़क उपजाक की उपयोग? मुदा माटि उपयोगी नै अछि एहनो तँ नहियेँ कहल जाएत। तहूमे माटियो अपन-अपन गुण अपन-अपन शक्‍तिक अनुकूल सेहो होइते अछि। खेतक अनेको किसिम अनेको गाममे अछि। केतौ पानिक बाढ़ि तँ केतौ माटिक। मुदा अखन खरहोरिक बात अछि। कोनो गाममे गाछी-कलम आकि खरहोरि ऊँचरस जमीनमे लगौल जाइए, नीचरस जहिना पताल दिस ससरैत अन्नसँ निच्‍चाँ उतैर माछक उपजामे पहुँच जाइए तहिना ऊँचरस जमीन उपजाक अकास लगबैए आ तहिना घर ठाढ़ कऽ घराड़ी सेहो बनबैए। मखनाक मनमे, जेठुआ फुलाएल धारक अवारि जकाँ रंग-रंगक बात उठए लगलै। उठबो केना ने करितै, बारहो मास उपजबैबला खेतमे नजैर वौआइत रहै किने। वौआइत ई रहै जे जगहो तँ जगहे छी। मुहसँ फुटल तँ कहलयैन करोड़ पति राजा छी, मुदा अपनो तँ ओइसँ कम नहियेँ हएब। जे जमीन भौजी देलैन, ओ तँ घराड़ी छी, दस लाख-पनरह लाख रूपैए कट्ठा। जँ दसो लाखे कट्ठा जोड़ै छिऐ तेयो 16x10= 160 लाख भेल। एक करोड़ साठि लाख...। मुदा लगले मखनाक मन घुमलै बाजल- “भौजी, भैयाकेँ तइले तामसो उठतैन। तहूमे खाइकालमे। अनेरे मनमे हेतैन जे केहेन पतित अछि जे खेबो करैए आ घिनेबो करैए। मुदा से बात नै भैया। खटहा आमक गाछीमे पड़ि गेल छी। यएह ने सोचैत हेबै जे विद्या-दान करै छी। मुदा विद्या केतए हेराएल छैथ? जैठाम नै छैथ। कोनो काज बिना बुधिये थोड़े चलैए, जेते अहाँ नोकरीक दरमाहा उठबै छी तइसँ बेसी हएत। ओना अपन सम्‍पैत बैंकोमे जमा रखि सकै छी, मुदा अनका हाथक काजो आ सम्‍पैतोक अशे केते। मुदा दुनूसँ नीक जे अपन सम्‍पैतकेँ सम्‍पैत बना जिनगीमे ठार करी।” कहलिऐ- “बौआ मखन, बिनु विचार केने किछु निर्णए करब उचित नै, मुदा भौजीसँ पुछहुन जे गाममे रहथुन?” ता अपन मनक उष्‍मा उष्‍मित भऽ उर्जवान बनबए लगल। एक-एक वस्‍तुपर नजैर उमड़ए लगल। जँ केकरो किछु बुझबैक अछि आकि कहैक अछि ओकरा बान्‍हि कऽ किए बाजब। किए ने अपन बोधक परीक्षण करैत चलब। पत्नीकेँ अपन गामक आ बजारक बाससँ पहिनेक, एक-एक कौशल जे माए जिनगीक लेल सीखौने रहथिन जे सागो खोंटि कऽ खेनिहारक जिनगी मिथिलाक धरती दैत आबि रहल अछि। चाहे वेपारीक दृष्‍टिए बारहो मास साग देखिऐ आकि भोजनक रूपे, मुदा होश तँ अपने राखए पड़त जे जाड़क मासमे पटुआ-पोरो आ गरमी मासमे सूआ-मेथी खाइ आकि नै खाइ। एक तँ ओहुना घरक बान्‍हल स्‍त्रीगण बाहर घुमबो-ले आ देखबो-ले फड़फड़ाइत रहिते छैथ तैपर अपन नव शक्‍ति जगैत जमीन, तैपर सासुरक गाम, जे अपन गाम भेल, तैपर हमर आग्रह सुनि  दस-अनियाँ मुस्‍की दैत बजली- “ऐमे पुछैक आ विचारैक कोन खगता अछि। जहिना पति घर जेबाले पत्नीकेँ कियो रोकिनिहार थोड़े होइए तहिना ई अप्‍पन घर छी। अइले पुछै आकि विचारैक कोन प्रयोजन अछि।” बिच्‍चेमे ढकार करैत मखना कहलकैन- “भौजी एतेकाल अपना मने कहियौ आकि भूखल पेटे कहियौ मुदा आब अहाँक बलजोरी खेनाइ खाएब। ओना आगूमे आबि गेल अछि, छुताएब अन्नक अपमान भेल, तहूमे जे अन्न सभसँ ऊपरक ईश्वरत्‍वक शक्‍ति पौने अछि,तेकर अपमान करब मनुखता नै ने हएत।” दोसर दिन कौलेज गेलौं, पढ़बैमे मन ओझरा गेल। ओझरा ई गेल जे जे किछु किताबमे पढ़ने छेलौं सएह विद्यार्थीकेँ पढ़बैत रहलौं! मुदा आइ अपना नजरिये दुनियाँ दिस देख पढ़बए चाहलौं। जइमे सामंजस[6] नै भेने ओझरी लगि जाइ छल। मुदा जहिना नव ओझरी मनमे लगैत रहए, तहिना दोसर ओझरी खुजितो छल। खुजैत र्इ छल जे जइ बच्‍चाकेँ मनक विचारसँ मन  भरैत  रहलौं,  कहि  देब जे बौआ मन आइ बेधाएल छह तँए पढ़बै दिस मन नै बढ़ि रहल अछि। अनमनस्‍क भेल डेरा आबि पत्नीकेँ कहलयैन- “कनी नीक जकाँ कॉफीबला चाह बनाउ।” जहिना लाबा भुजनिहारि उड़ैत लाबाकेँ लारैन सँ मारि-मारि दबैत रहैए तहिना लारैन चलबैत कहलैन- “एकर माने आन दिन मनमाफित चाह नै बनबै छेलौं।” पत्नीक लारैनपर धियान नै दैत कहलयैन- “किछु विचार करबाक अछि, तँए अखन दोसर बात नै करू।” अनायास हुनका मनमे सौनक गुम्‍हरैत मेघक शंका भेलैन जे भरिसक ठनका खसत। बजली किछु ने। गैस-चुल्हि,लगले चाह आनि आगूमे ऐ आशासँ कान ठाढ़ केली जे आगूक की आदेश होइए। मुदा जेना-जेना चाह पीबैत गेलौं तेना-तेना विचारक गम्‍भीरता बढ़ैत गेल। चाह पीब गिलास रखैत पान मुँहमे लेलौं। जेना-जेना पान मुँहमे फुलाए लगल तेना-तेना मनो फुलाए लगल...। पुछलयैन- “स्‍वतंत्र जिनगी की?” मुँहक फटाहि तँ छथिये, हमरे प्रश्‍नक पुछरियो पाछूसँ पछुआएले रहैन, बिच्‍चेमे पकैड़ बजली- “हमर की स्‍वतंत्रता। एतबे ने जे अहाँ संग कखनो बाल-बोध लग बैस भाए-बहिन जकाँ रहब, कखनो बाबा-दादी जकाँ घर-परिवारक विचार करब, कखनो संगे-संग आगि-पानिमे मरब, मुदा सभ कथुक बाबजूद एक मनुख बनि केना जीब, यएह ने भेल स्‍वतंत्र जिनगी। जाबे स्‍वतंत्र जिनगी नै ताबे स्‍वतंत्र नन्‍दन वन केना?” पत्नीक  विचार  आरो  ओझरा  देलक। जेना मनक कोनो  ससे-बस ने  चलए दिअए। दौगैत घोड़ा जकाँ पत्नीक विचारक घोड़ाक छोर खिंचैत बजलौं- “गाममे नीक लगत?” अपन सम्‍पैतक आर्थिक विश्लेषण मने-मन कऽ रहल छेलौं जे जहिना भारत सरकारकेँ माटि छै, पानि छै तहिना तँ गाममे पनरह बीघाक चास-बास अपनो अछि। जेकरे अमार लागल अछि तेहीले नोकरी-चाकरी करै छी। मुदा तखन लोक जँ नोकरी नै करता तँ संस्‍था चलत केना? ऐठाम संस्‍था नै चलबक प्रश्‍नक पाछू वेरोजगारी सेहो देखए पड़त। तँए बौद्धिक समुचित बँटवारा। आठ बजैत-बजैत रातिमे निर्णएपर पहुँच गेलौं जे खटहा जिनगीसँ मीठहा किए ने जीब। कोनो कि अपना ओकाइत नै अछि जे स्‍वतंत्र जिनगी बना स्‍वतंत्र देशक नागरिक बनि बिनु मोलक ज्ञान-दान करब! मन दृढ भऽ गेल। काल्हि नोकरी छोड़ि देब। लगले मनमे भेल जे काल्‍हिक बीच राति शेष अछि तँए ओते बिलमब उचित नै। नीक रहत जे अखने फोनसँ कार्यालय सूचित कऽ दिऐ। जँ कनियोँ भनक बहराएत तँ रंग-रंगक दूत-भूत पहुँच मन-मोहैन चलबए लगत। मुदा तइसँ की, कियो अपन काजक मालिक अछि। काजे ने नीक बनैत-बनैत कर्म बनैए आ कर्म बनि धर्मक संगे चलए लगैए। दोसर दिन कौलेजक ठीक समैपर घरसँ निकलैसँ पहिनहि पत्नीकेँ कहलयैन- “अहाँक मनक बात मन मानि लेलौं। आगूक बात घूमि एला पछाइत कहब।”  22 नवम्‍बर 2014, शब्‍द संख्‍या- 3515 [1] विद्यार्थीकेँ पढ़ौनिहार [2] मुँहक दौन [3] तेल- रस, मसल्‍ला- सौंस सेरसोक पीसल [4] अर्थशास्‍त्रक विद्वान [5] पत्नी आ मखन [6] समन-जश ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.गंगानंद झा- नोरक उफनैत समुद्र् सँ २.आशीष  अनचिन्हार-गजल ३.जगदानंद झा मनु-गजल ३.२.१.कामिनी कामायनी- अंकोरवट मंदिर २.दिलीप कुमार साह- तीनटा कविता ३.३.नन्‍द विलास राय- दूटा कविता ३.४.१.रमेश-ताजीवन हमर नहि २. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- ४टा गजल १.गंगानंद झा- नोरक उफनैत समुद्र् सँ २.आशीष  अनचिन्हार-गजल ३.जगदानंद झा मनु-गजल १ गंगानंद झा नोरक उफनैत समुद्र् सँ मुस्की के मोती चुइन आनै छी हम जिनगी के गीत गाबय छी

अछि सुर सबटा बिखरल  जीवन वीणा के सब तार टूटल  चारू दिस अछि अन्हार भरल  आलोकक सब दीप मिझल  निराशाक अनंत अन्हार में आशाक दीप जराबैत छी  हम जिनगी के गीत गाबय छी 

सिनेहक सब टूटल माला  दगधल करेज भोकल भाला  अप्पन जे सब आन भेला  सब दुआरि एगो ताला  चीन्हए नें यै कियो ककरो मुस्की के हार पहिराबै छी हम जिनगी के गीत गाबय छी 

दू मिल भेल एक कहॉं  अछि प्रीत जग के रीत कहॉं  गीतक अछि मनमीत कहॉं हृदयक अछि संगीत कहाँ  मनुक्ख़ बिकाइय के हाट ई प्रेमक सितार बजाबै छी  हम जिनगी के गीत गाबय छी

सृजन ०४.०१.२०१६ २ आशीष  अनचिन्हार गजल

गेलै दरबार अनचिन्हार भेलै उद्धार अनचिन्हार

सभ बनि गेलै सिनेमा नीक खाली परचार अनचिन्हार

जे खा गेलै हमर सपना से बड़का खुंखार अनचिन्हार

ठीके महमह करैए देह छै सिंगरहार अनचिन्हार

अप्पन की आन की ऐठाम पूरा संसार अनचिन्हार

सभ पाँतिमे मात्राक्रम 22221-2221 अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि। ३ जगदानंद झा मनु गजल रूप मारूक तोहर देखते कनियाँ ख़ून देहक सगर भेलै हमर पनियाँ नै कतौ केर विश्वामित्र छी हमहूँ प्राण लेलक हइर ई तोर चौवनियाँ जरि क' तोहर पजारल आगिमे दुनियाँ माय बापक नजरिमे बनल छै बनियाँ नीक बहुते गजल कहने छलहुँ हमहूँ आइ सभ किछु बिसरि बेचैत छी धनियाँ झाँपि राखू अपन रूपक महलकेँ 'मनु' भेल पागल कतेको देखि यौवनियाँ (बहरे मुशाकिल, मात्रा क्रम; 2122-1222-1222) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.कामिनी कामायनी- अंकोरवट मंदिर २.दिलीप कुमार साह- तीनटा कविता १ कामिनी कामायनी ॥ अंकोरवट मंदिर॥ कत्तेक विशाल / उन्नत प्रकोष्ठ / भीम काय /तना स/ गृह /आवृत । आब छाँह द रहल /वृक्ष /अतेक/ छी खंडहर /कतबो पुरान । दैदीप्यमान /खंडित /तइयो असेवित अछि /मूर्ति /तइयो ई ऊंच ऊंच प्रासाद वृंद / शेर , पद्म  अछि भिंदिपाल / नयनाभिराम ओ अप्सरा नृत्य / ओ शांत ताल मे सुतल काल / आह क्षितिज स झांकि कनैत अछि चारु चन्द्र के रश्मि पुंज देखू जन नायक के प्रताप / की मौन /निर्लिप्त /बस  सहैत ताप नीचा वसुधा /ऊपर आकाश / अखनों गुंजित अछि ओ स्वर महान / ओ महा यान /ओ महा प्राण / भींजैत पाषाण/कजरी बेहाल / बाचि रहल अछि स्वगत ठाढ़/ दिव्य कतेक ई अंकोरवट । कण कण में इतिहास भरल कतेक शासक के राज छुपल/ गौरव ,गरिमा स ओत प्रोत / घड़ीघण्ट, शंख ,नित दिन बाजल कत्तेक  वैष्णव गान भेल / कखनों शंकर आराध्य भेला तांडव रूप अपन धयला । कत्तो विष्णुप्रिया मुस्की मारैत। शिव जटा उमहर  फहराय रहल / बड़का विशाल शिवलिंग कहलैथ/ छल हमरो कहियो राज एतय / अहि आनन /कानन मे कहिओ / डमरू के गुंजित गान छल मुदा काल के भय स महाकाल / गेला ओतयस नहिं,कत्तो पड़ाय/ ओ हेरै छथी मानव नियति । अहि यशोधरा पुर के बासी/ ओहि सेयाम रेप के  घर आँगनि / ई कथा सुना बैत छै सून में / कि कलाकृत्य /कि चित्र विचित्र कारीगर हेता कत्तेक सज्ञान । अमर अजर ओ राति  बनल   / देला इन्द्र  आदेश जेकर / ओ महाशून्य में ठाढ़ एखन / जोहैत अछि जानै बाट केकर । २ दिलीप कुमार साह, गाम : इटहरी वार्ड न. १० , पोस्‍ट : बेलही ,भाया : निर्मली , जिला : सुपौल ,पीन न. ८४७४५२ ,योग्‍यता : नन मैट्रिक , जीविकोपार्जन : खेती-गृहस्‍ती, ड्राइविंग तीनटा कविता १ मिथिला हमर... मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत कहबै छी गमकैत-गमकैत अपने-आपमे देशोक ऑंचर गमकबै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। मिथिलाचलक वादी, रचैताक नक्काशी जे कियो जनमैत, गोट-गोट अभिलाषी संत, अधिकारी, कुशल नेता, कविसँ ऐ नगरक मुकुट सजबै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। मिथिलामे मधुर-मधुर तीन अक्षरक मेल रचैत घड़ी विधाता खेललैन कोनो खेल सौराठक मेला आ सुगना पद्चिन्‍ह हस्‍त–शिल्‍पसँ मान बढ़बै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। गमकैत-गमकैत अपने-आपमे देशोक अँचरा गमकबै छी फल हम अद्भुत कहबै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। २ क्षण भरि... अहाँ छी बाबू अखन छोट सन्‍यासी उमेर भरि पहिने एतए टिक लिअ नइ मचाउ शोर अहाँ ‘कहाँ-कहाँ’ नशवर दुनियाँमे अमर दूध पीब लिअ जँए लक्ष्‍यक खातिर एलौं भुवनमे ठामे-ठाम ओइ बाटकेँ परेख लिअ दौड़ए पड़त खून-पसेना बहा कऽ ओंगरी पकैड़ पहिने चलनाइ सीख लिअ बौआसँ आब बुढ़-बुढ़ानुस भेलिऐ हारल झुटका आबो तँ जीत लिअ रंग-बिरंगक झूठ-साँचक मेलासँ हम तँ कहब चीज कोना नीक लिअ कर्मे गुणे फल भेटै छै यौ बाबा बिछौनापर ओंघरनियाँ, पट चाहे चीत लिअ ताधैर धरि एतुक्का धन जाधैर तन लऽ जइले चारियोटा पुण्‍य बीछ लिअ अहाँ छी बाबा अखन वृद्ध सन्‍यासी क्षण भरि और एतए टिक लिअ छोट मुहसँ हम केते फकरब जाइत-जाइत फकरा लिख लिअ क्षण भरि और एतए टिक लिअ। ३ हमरा याद अबैए... बचपन गेलै एलै जुआनी याद पड़ल बिसरल बात गाए चरेलिऐ, बकरी चरेलिऐ कटल केना नदानी, हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। भोरे सुति कऽ उठै जब छेलौं माए कहै छल जो स्‍कूल चौकपर देखते बानरबला समए खतम खेला देख-देख तीन-तीन दाइल फोड़ै छल बाँसक छौंकीसँ बाबू हमरा देहमे फाटल-फाटल अखनो अछि निशानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। पानि पीबै छेलौं पड़ोसिया कलक कहियो लोटा-कहियो डेकची फेकि दइ छेलए अदहनबला पानिमे आँइठ दऽ दइ छेलए अँइठहा पानिकेँ गंगा समैझ-समैझ पीब-पीब बितेलिऐ जिनगानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। कोयला बीछि-बीछि जरना बीछि-बीछि माए पोसलखिन हमरा मोटियाक काज करि-करि कऽ बाबू पढ़ेलखिन हमरा तीन-तीन साँझ भूखलो छेलौं अन्नक रस्‍ता देख-देख हम काटलक पेट परेसानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। काँचे नदानीमे हम उपारजन लेल परदेशक मुँह देखलौं गामक गमक शहरमे नइ भेटल उल्‍टे पएर आबि गेलौं माइक आशिष लऽ कऽ मनसँ स्‍टेजपर हम चढ़ि गेलौं अपन मिथिलाकेँ मिथिलामे घूमि-घूमि हम गबै छी अपन जिनगानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नन्‍द विलास रायजीक दूटा कविता- १ नेताजी नेताजी चुनाव जीत गेला पौने पाँच बरख धरि चैनक नीन लेला। अगिला चुनावमे फेरो ठाढ़ भेला जनताक बीच गेला। जनता पुछलकैन- “अहाँपर केना करी बिसवास कहाँ भेल क्षेत्रमे कोनो विकास?” नेताजी कहलखिन- “विकासे विकास अछि पहिने हमरा घरमे जरै छल डिबिया आब बिजलीक प्रकाश अछि बुझू एकदम झकास अछि। हमर बेटा जेकर नाओं विकास छी ओ पढ़ैत छल गमैया स्‍कूलमे आब पढ़ैत अछि देहरादूनक कन्‍वेन्‍टमे हम लागल छी ओकर हर तरहेँ इम्‍प्रूभमेन्‍टमे ओ पानिकेँ कहैत अछि वाटर आ खेनाइकेँ लंच हमरा बुझना जाइत अछि ओकर अंग्रेजी भऽ गेल अछि बड्ड टंच। फुसि नै बजैत छी करू हमरापर बिसवास हमरा विकास बेटाक भेल खूब विकास। और सुनू, मुदा नेता हमरे चुनू। पहिने हमरा रहैक-ले बकरियो घर ने छल पीबैले नै छल एकटा चप्‍पोकल अहाँ सबहक कृपासँ आब अछि तीन-तीनठाम आलीशन मकान फ्रिजक मिनरल जल पीबै छी मुदा अपनाकेँ बुझै छी आन चढ़ैले नै छल एकटा कटही साइकिलो आब अछि भी.आइ.पी, ए-सी बला मोटर गाड़ी गाड़ीमे चलै छी तँ लोक हमरो बुझैत अछि नेता बड़का भारी। पहिने अठन्नियो, चौअन्नियो नै रहैत छल जेबीमे आब हजरिया, पचसैयाक रहैत अछि गड्डी दस-टकहिया, पँच-टकहियाकेँ तँ बुझैत छी आब हम, कागज रद्दी पहिने मुरही-कचरीक संग कखनो-काल पीबै छेलौं ताड़ी आब रोज पीबै छी भूजलाहा काजूक संग इंग्‍लिश वाइन जइसँ रहैत अछि हमर मूड एकदम फाइन। पहिने बसैले नै छल घराड़ी खाइ छेलौं,बेसाह-उधारी आब अछि फर्म हाउस आलीशान खाइत छी सभ दिन नव-नव पकवान यौ, हमरा क्षेत्रक जनता महान अहासँ सभ छी हमरा-ले अखन, साक्षात भगवान करू अपन अमूल्‍य वोटक हमरे दान जइसँ हमर हएत भाग्‍यक निर्माण जँ जीत गेलौं हम एमकी तँ बनाएब हम अपन खास पहचान। पटना, दिल्‍ली, कलकतामे तँ घर भाइये गेल अछि मुम्‍बइ, चेन्नइमे कीन लेब आलीशान मकान आब होइ छी विदा किएक तँ जेबाक अछि हमरा केतेको गाम अहाँ सभकेँ बहुत-बहुत प्रणाम।” २ हमर सपनाक बिहार दैहिक, दैविक, भौतिक ताप सपनाक बिहारमे कहियो ने व्‍याप्‍त। राष्‍ट्रपति होइथ वा होइथ भंगीक सन्‍तान सभकेँ शिक्षा भेटए एक समान। उन्नत खेती हुअए हुअए खुशहाल किसान शहरसँ सुन्नर हुअए गाम। सभसँ नीक हुअए खेती बेटासँ बढ़ि कऽ हुअए बेटी। सभकेँ भेटए रोटी कपड़ा और मकान हर खेतकेँ पानि भेटए आ हर हाथकेँ काम। केतौ केकरोपर ने हुअए अत्‍याचार कोनो स्‍तरपर ने हुअए भष्‍टाचार। निष्‍ठापूर्वक सभ करैथ कर्म मानव जातिआ मानव धर्म। आतंकवाद केर नै सुनी नाम। सभ करैथ इमानदारी पूर्वक काम। दुनियाँमे बढ़ए बिहारक मान आर भेटए बिहारीकेँ सम्‍मान। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.रमेश-ताजीवन हमर नहि २. जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- ४टा गजल १ रमेश ताजीवन हमर नहि कुमारिमे व्यभिचारी समाजक नजरि, कहै छल- ई हमर थिक! सारि बनलौं तऽ बहिनोइया नजरि, बाजल- ई हमर थिक! विवाह भेल तं वर कहलनि- ई सभदिना हमरे टा थिक! सरहोजि बनलौं तऽ ननदोसिया-नजरि बाजल- ई हमर थिक! जनमिते अपन बच्चा कहलक- ई हम्मल छी! मुदा जहियासं डाक्टरनी, कहलनि-’स्तन कैंसर!’ तहियासं हमर अपनेटा भऽ कऽ रहि गेल! तहिये टा सं, ’हम्मर अप्पन’ भऽ सकल! २ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ४ टा गजल 1. मात्रा क्रम : २१---१२२२---२२२ काँट हटयबामे लागल छी बाट बनयबामे लागल छी आठ बजै छै सभ सूतल छै साफ़ करयबामे लागल छी काज कनी करियौ यौ बौआ ढोल बजयबामे लागल छी लोक लगा देने छै झगडा आगि मिझयबामे लागल छी भाइ कनी अनको दिस तकियौ पाइ कमयबामे  लागल छी छाँह कमल जाइछ धरतीपर गाछ लगयबामे लागल छी पाप बहुत बढलै दुनियामे प्रेम बढयबामे लागल छी 2. मात्रा क्रम : 22222221 कौआकें कौआ कहि देल बूझू बड़का गलती  भेल एके घरमे सबहक बास नै ककरो ककरोमे मेल मरला बहुतो जन महगीसँ आ हुनकर वेतन बढि गेल जुनि पूछू बौआ हमरासँ दालि कते दिन खेना भेल सोचै  छी जीवन की थीक सीढी आ साँपक बस खेल धीया पूता बिनु ई महल हमराले’ बूझू अछि जेल (चारिम शेरक दोसर पाँतिमे दूटा लघुकें दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) 3. मात्रा क्रम : 21-12-222 नोर   गरम पीबै छी भाग्य अपन लीखै छी टीक अपन  नोचै छी माथ अपन  पीटै छी सोर करू ककरा हम ठोर अपन  सीबै छी गाछ बनत बड़का ई बीज ई जे  छीटै छी जोर घटल जाइत अछि बाँस जकाँ  लीबै छी बाउ अहाँ करबै  की सभक पता  टीपै छी गीत गजल सीखू ने गारि किए सीखै  छी (चारिम शेरक दोसर पांतिमे एक टा दीर्घकें लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि ) 4. मात्रा क्रम : 2121-22-221 बात एक लागू सभ ठाम चोर और साधू सभ ठाम काज काल पाछू रहताह भोज बेर आगू सभ ठाम पाप थीक माँगब ककरोसँ से धियान राखू सभ ठाम बूढ-सूढ भूखल ने रहथि घूरि-फीरि ताकू सभ ठाम बात-बात पर जुनि तमसाउ मीठ-मीठ बाजू सभ ठाम प्रेम थीक बड़का उपहार बेर-बेर बाँटू सभ ठाम ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक १.आशीष अनचिन्हार- बाल गजल २.किशन कारीगर- इस्कूल जाइत छी हम ३. डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” किछु बाल कविता १ आशीष  अनचिन्हार बाल गजल

मोइन पोखरि नालामे हेली हम गाछीमे नाची गाबी खेली हम

चोरा जामुन तोड़ी आमो तोड़ी ई बड़का काज कऽ नमहर भेली हम

हेतौ तोरा अँगनामे पिल्ला तै आसामे तोहर आँगन एली हम

तागत छै ज्ञानक हमरो हिस्सामे नहुँ नहुँ धीरे दुनियाँकेँ ठेली हम

बच्चा छी बच्चामे भगवाने छै ने बाभन ने डोमा ने तेली हम

सभ पाँतिमे दस टा दीर्घ अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि २ किशन कारीगर इस्कूल जाइत छी हम झोड़ा में कॉपी किताब नेने  स्कूल बैग में टिफिन रखने  कूदैत फंगैत हँसैत गबैत  स्कूल जाइत छी हम. टेम टेम पर पढ़ब-लिखब  अ आ आई हम सीखब  पैरे पैरे, स्कूल गाड़ी मे बैसि  हमहूँ आई स्कूल जाएब. अपने मने कहियो भिंसरे उठब  सभ सं पहिने मुहँ हाथ धोअब  भूख लागत ता जलखै करब  फेर कनि कल पढ़ै लेल बैसब. इस्कूल के घंटी हमरा शोर पारै मास्टरजी कतेक नीक खिस्सा सुनाबैथ  नहा सोना के छी हम तैयार  मम्मी डैडी हमरा स्कूल द आबै. किताब मे कतेक नीक डाँरी पारल सीलेट भट्ठा पर लिखब नीक लागल  देखि देखि हम डाँरी परलौहं रंग भरल स्केच केहेन हँसी लागल. मास्टरजी हमरा कान मे कहलैन पढ़ बौआ अ आ, सी डी ई  आई हहूँ अक्षर सिखलौहं  हँसी लागल केहेन खी खी खी आई कतेक लोक इस्कूल एलै  धिया-पूता सभ हँसले-कनलै सभ मिली फेर पढ़ै लगलै  मास्टरजी के कतेक नीक लगलै. इस्कूल मे नबका ज्ञान सीखब  पढहब-लिखब आ खेलब-धूपब  दोस महिम संग सलाह आ झगड़ा  कतेक नीक किताबी ककहरा. जखैन जेहेन नीक लागल  फेर खेलेबो धूपबो करैत छी हम  अपने मने आ की होमवर्क बनने  इस्कूल जाइत छी हम. ३ डो. शशिधर कुमर भेम्ह या भम्हरा (बाल कविता) कारी भेम्ह,  कारी भेम्ह,  भम्हरा  हमरे  नाम  छी । हम तँऽ होइ छी आनो रंगक, चर्चित बहुते श्याम छी ।।*‍१ हमहूँ मधुमाक्षी - बिढ़नी सनि, सामाजिक छी  प्राणी । हम ने काटी  अनेरो ककरो,  करी ने हम  मनमानी ।। हमरो समाजमे  श्रमिक रहैछ,  नेतृत्व करैतछि रानी । हमर आकार पैघ बहुते छी,  नञि बिढ़नी केर सानी ।।*‍२ भम्-भम् केर सुन्नर आबाज छी हम्मर नामक कारण । हमर पंख केर गतिसँ निकसए, ई आबाज मनभाओन ।।*‍३ कारी पर  पीयर,  नारंगी,  लाल  या  उज्जर  धारी । कखनो  फेंट - फाँट  रंगक  आ  कखनो अगबे कारी ।।*‍१ मधुमाक्षी सनि  हमहूँ फूलक,  रसहिं  बस  पीबै छी । पी - पराग मदमस्त रही, आ अपनहि धुनिमे रहै छी ।। पर जँ केओ  हमरा खोंतामे,  करइछ  जाए  उकाठी । नानी याद  अवश्ये आओतीह,  तकरा जँ हम काटी ।। मधुमाक्षी आ आन बन्धु सनि,  हमहूँ  करी परागण ।*‍४ फूले-फूले विचरए सटि कऽ, कतेक परागक  मधुकण ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - अपना दिशि आ अपना दिशि केर वाङ्गमयमे अगबे कारी रंगक भेम्ह बड़ प्रशिद्ध थिक । पर संसारमे भेम्हक बहुत रास प्रजाति भेटैत अछि जकर रंग निम्न प्रकारेँ भऽ सकैछ - ·        एकवर्णी कारी, ·        कारी रंगक देह पर पीयर नारंगी या उज्जर रंगक धारी या धब्बा बला, ·        पीयर या उज्जर रंगक देह पर कारी धारी या धब्बा बला *‍२ - मधुमाक्षी (-छी) आ बिढ़नी जेकाँ भेम्हक हरेक झुण्ड या छत्तामे एक टा रानी भेम्ह (QUEEN BUMBLE BEE), किछु पुरुष या नर भेम्ह (DRONE/S BUMBLE BEE) आ बहुत रास श्रमिक या मजूर भेम्ह (LABOUR BUMBLE BEE) रहैत अछि । *‍३ - इएह अबाज केर कारण प्रायः हरेक भाषामे एकर नामकरण भेल अछि । *‍४ - भेम्ह सेहो फूलक रस चूसैत अछि । फूलक रस चूसबा काल फूलक पराग कण (POLLEN GRAINS) ओकरा शरीरक विभिन्न भागसँ सटि कऽ एक फूलसँ दोसर फूल पर पहुँचि जाइत अछि । एहि तरहक परागणक (POLLINATION) प्रक्रियाकेँ कीट-परागण(ENTOMOPHILY)  कहल जाइत अछि । कीट-परागण वस्तुतः पर-परागणक (CROSS POLLINATION) एक प्रकार छी । हँसुआ दाबी (बाल कविता) बड़की टा  केर  चिड़ै  उड़ै  छै, नाम तँऽ  “हँसुआ दाबी”  छै । लोलक  किछु छी  बात विशेषें, नाम  तेँ  “हँसुआ दाबी”  छै ।। जञो  राखी  सोझाँमे  परस्पर, दू   टा   कचिया  - हाँसूकेँ । बिनु   दाँतक  लागत   जेहेन, बूझू  लोल  छै  ‘दाबी’  केर ।।*‍१ नाँओ  पहिल बेर  सुनल, भेल एहनो  होइतछि  की   नाम ? गौरसँ  देखल,  तखन  बुझल, वाह !  केहेन  सुन्नर  नाम ।। पर  हँसुआ-दाबी  किछु एहनो, लोल जकर  दुहु  सटल रहैछ । किछु तँऽ एक्कहि रंग देखबामे, किछु विशेष ओ  अलग रहैछ।।*‍२ पड़ती - जमकल पानि,  नहरि, वा  पोखरि - डबरा   कातमे । पैघ  गाछ  पर  झुण्डे - झुण्डे, रहैछ    बाद     बरसातमे ।।*‍३ ठण्ढी - शीतलहरी  पछाति ओ, धीरे - धीरे  कम भऽ जाइछ । कादो - पानि सुखाए जाइत छै, तेँ कत्तहु अन्तऽ चलि जाइछ ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - हँसुआ दाबीक दुनु लोल बाहर सँ भीतर दिशि हल्का मुड़ल रहैत अछि, तेँ बन्न भेलाक बादहुँ बीचमे कने रिक्त वा खाली स्थान रहि जाइत अछि । देखला पर एहेन सनि लगैत अछि जे दू गोट कचिया हाँसू (जकर भीतरी भागमे दाँत नञि हो) परस्पर सोझाँ राखल हो । लोलक इएह गुण एहि चिड़ै केर मैथिली नामकरणक कारण बनल होयत । लोलक इएह गुणक कारण अंग्रेजीमे ओ ऑपेन बिल्ल्ड स्टॉर्क(OPEN BILLED STORK) कहबैत अछि । *‍२ - हँसुआ दाबीक लोलक ई विशिष्ट स्वरूप बाल्यावस्थासँ नञि रहैत अछि । बाल्यावस्थामे बन्न भेला पर ओकर दुहु लोल परस्पर सटि जाइत अछि । लोलमे एहि तरहक वक्रता (अन्तर्वक्रता) किशोरावस्थामे विकसित होइत अछि आ जीवनपर्यन्त रहैत अछि । अंग्रेजीक स्टॉर्क कहाबए बला किछु आओर जाति-प्रजाति जे देखबामे हँसुआ-दाबी सनि लगैत अछि पर जकर लोलकेँ बन्न भेला पर बीचमे रिक्त स्थान नञि रहैछ, सेहो मैथिलीक हँसुआ-दाबीक अन्तर्गत आबैत अछि । यथा - व्हाईट स्टॉर्क (WHITE STORK) आदि । *‍३ - ई बरसातक अन्तिम समयमे बहुत संख्यामे अपना दिशि देशक आन भाग ओ विदेशसँ अबैत अछि । ऊँच-ऊँच गाछ सभ पर खोंता बनबैत अछि आ पोखरि, डबरा, खत्ता, नहरि, नदीक कछेड़ अथवा कोनहु चऽर-चाँचरि जतऽ पानि जमकल हो आदि ठाम पर झुण्डक-झुण्ड देखाई देत । ओ कीड़ा-मकोड़ा, बेङ्ग आदि खाइत अछि परञ्च डोका (PILA) ओकरा बड़ पसिन्न छै । डोकाकेँ खएबाक लेल प्रायः ओ डोकाक खोलकेँ (कवचकेँ) तोड़ैत नञि अछि । ओ अपन लोलक विशिष्ट आकार आ संरचनाक मदतिसँ खोलकेँ (CONK SHELL / EXOSKELETON) बिना तोड़नहि डोकाक मूँह लऽग पकड़ि भितरुका कोमल भागकेँ बाहर झीकि लैत अछि । *‍४ - बेशी ठण्ढी वा शीतलहरी केर बाद अपना दिशि क्रमशः जलाशयक पानि कम होमए लगैत अछि, कादो बला स्थान केर कम भेलासँ हँसुआ-दाबी आ एहि तरहक आन चिड़ै लेल भोजनक प्रतिद्वन्द्विता बढ़ि जाइत अछि । तेँ ओ सभ आन जगह पर पलायन कऽ जाइत अछि । पर तइयो पुर्ण अलोपित नञि होइत अछि, थोड़-बहुत सलो भरि देखल जा सकैत अछि । यद्यपि अपना ओहि ठाँ मात्र एशियाई ऑपॅन बिल्ल स्टार्क (ASIAN OPENBILL STORK) पाओल जाइत अछि पर अफ्रिकी ऑपॅन बिल्ल स्टार्क (AFRICAN OPENBILL STORK) सेहो मैथिलीक “हँसुआ दाबी” नामक चिड़ै केर अन्तर्गत आओत । नीलकण्ठ या असली नीलकण्ठ (बाल कविता) “रॉबिन”  छी  नीलकण्ठ, “आर”सँ  होइए “रॉबिन” ।*‍१ नञि योरोप केर आ ने अमेरिकी, “इण्डियन रॉबिन” ।।*‍२ हे  असली नीलकण्ठ !  अहाँ  जा  कतऽ  छी बैसल । लोक  कहैतछि  जतरा   शुभ,  जँ  अहाँकेँ   देखल ।। बहुतहु  लोक  बिसरि   बैसल अछि,  अहँक  रूपकेँ । भ्रममे  बूझए  नीलकण्ठ,  कोनहु    आन   भूपकेँ ।।*‍३ “नीलकण्ठ”  जे शब्द,  स्वयं  ओ  परिचय  दैतछि । शेष  काय  छै  आन  रंग,  ग्रीव   नील  कहैतछि ।। एक तरफ  सब  कहथि,  अलोपित  “नीलकण्ठ” छै । सुलभ “सिरौली”  देखि कहए,  इएह  नीलकण्ठ छै ।।*‍४ केहेन  विरोधाभास  छै  पसरल,  एहि   दुनिञामे । जएह  बजैछ,  उनटे करैछ,  सब  एहि  दुनिञामे ।। नीलकण्ठमे  कण्ठ - नील,  बस नर केर  होइतछि । तेँ शायद  हिन्दू - समाज,  “शिव-रूप”  बुझैतछि ।।*‍५ साँझक   गोधूलि - बेलामे,   अक्सर  भेटैत  छल । जतरा  प्रात, तेँ  जतरा - दर्शन,  शुभ बुझैत छल ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - आर”सँ होइए “रॉबिन = “R” for “ROBIN” *‍२ - अंग्रेजीक रॉबिन (ROBIN) शब्द बहुत व्यापक अछि जाहिमे योरोपीय रॉबिन (EUROPEAN ROBIN), अमेरिकी रॉबिन(AMERICAN ROBIN), इण्डियन रॉबिन (INDIAN ROBIN) आ इण्डियन ब्ल्यू रॉबिन (INDIAN BLUE ROBIN) समाविष्ट अछि ।मात्र इण्डियन रॉबिन (INDIAN ROBIN)  केर किछु जाति वा प्रजाति (SPECIES / SUB-SPECIES) नीलकण्ठक श्रेणीमे अबैत अछि कारण कि ओकर कण्ठ “नील” रंगक (INDIGO / INDIGO BLUE / ROBIN-BLUE)  होइछ आ शेष शरीर कारी, गाढ़ भूरा वा आन रंगक रहैछ । इण्डियन ब्ल्यू रॉबिन (INDIAN BLUE ROBIN) सेहो नीलकण्ठ नञि अछि किएक तँऽ ओकर पूरा शरीर नीला होइत अछि, नञि कि कण्ठमात्र । एहि सन्दर्भमे भारतीय “नील वा लील” शब्द आ अंग्रेजीक “ब्ल्यु” शब्द पर विचार सेहो परमावश्यक अछि - ·        BLUE (in British Eng.) - प्राचीन भारतमे वा सही रूपेँ कही तँऽ आइसँ ३०-४० वर्ष पहिने इएह अंग्रेजी सम्पुर्ण भारत मे बाजल आ बूझल जाइत छल । एहि अंग्रेजीमे - §  INDIGO = नील (तत्सम) वा लील (तद्भव) रंग §  BLUE = आसमानी रंग या स्वच्छ आकाशक रंग §  यथा इन्द्रधनुषक वर्णपट्टमे (SPECTRUM  OF  VISIBLE  LIGHT) देखू VIBGYOR = बैनीआहपीनाला अर्थात INDIGO = नीला आ  BLUE = आसमानी ·        BLUE (in American Eng.) = पछिला करीब ५० साल सँ धीरे-धीरे अमेरिकी अंग्रेजीक प्रचार-प्रसार बढ़ल अछि । इण्टरनेटक प्रसारक संग-संग अमेरिकी अंग्रेजी सम्पुर्ण भारतमे पसरि गेल अछि आ ओ ब्रिटिश अंग्रेजीकेँ धकिआए बैसल अछि । अमेरिकी अंग्रेजीमे - §  BLUE = नील ओ नीलाभ समस्त रंगक परिचायक §  ब्रिटिश अंग्रेजीक INDIGO = अमेरिकी अंग्रेजीक INDIGO-BLUE / ROBIN-BLUE §  ब्रिटिश अंग्रेजीक BLUE = अमेरिकी अंग्रेजीक SKY-BLUE / LIGHT-BLUE = आसमानी §  अमेरिकी अंग्रेजीमे MARINE-BLUE / OCEAN-BLUE = समुद्री नील या हरिताभ नील §  अमेरिकी अंग्रेजीमे AQUA-BLUE / MARINE = नीलाभ हरियर, आदि । इएह कारण शब्दार्थमे बहुत बेर भ्रम केर स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत अछि । तहिना नीलकण्ठ संगे सेहो भेल अछि । नीलकण्ठक “नील”रंगकेँ ब्रिटिश अंग्रेजीक अनुसार INDIGO बुझबाक चाही आ अमेरिकी अंग्रेजीक अनुसार INDIGO-BLUE / ROBIN-BLUE, तखन कोनहु भ्रम नञि होयत । दोसराक वा दोसर भाषामे कयल गेल अनुवादकेँ सीधे मैथिलीमे नञि उतारि देबाक चाही । *‍३ - लोक सभ (आ किछु अनुवादक लोकनि सेहो) नील माने आसमानी या चटक नील (फिरोजी) मानि एकटा दोसर चिड़ैकेँ - जकरा मैथिलीमे सिरौली (सिरोली नञि) कहल जाइत अछि - प्रबल रूपसँ नीलकण्ठ वा लीलकण्ठ मानए लगलाह अछि । ई भ्रम इण्टरनेट पर पसरल भ्रमक कारण बहुत तेजीसँ अपन जड़ि जमा चुकल अछि । *‍४ - अलोपित = एहि ठाम “दुर्लभ” अर्थमे, नञि कि “विलुप्त” अर्थमे प्रयुक्त ।  एक दिशि कहल जाइत अछि कि “नीलकण्ठ” केर दर्शन आब दुर्लभ अछि (खास कऽ मिथिलामे) आ  दोसर दिशि सर्वसुलभ दर्शन देनिहार “सिरौली” केर पहिचान नीलकण्ठक रूपमे करबैत छी - से कोना ? रॉबिनक ओ प्रकारसब जे नीलकण्ठक श्रेणीमे अबैत अछि से पहिने पूरा भारतमे भेटैत छल आब उत्तर भारत दिशि बहुत कम भऽ गेल अछि । *‍५ - मात्र पुरुष वा नर नीलकण्ठक कण्ठ केर रंग नील होइत अछि । स्त्री वा मादा नीलकण्ठ गौर वर्णक (रंगक) होइत अछि । *‍६ -  नीलकण्ठ प्रायः साँझखन (सूर्यास्तक समयसँ किछु पहिने; गोधूलि बेलामे) उड़ैत कीड़ासभकेँ खएबाक लेल बिजलीक ताड़ पर या कोनहु गाछक पछबरिया ठाढ़िसभ पर बैसल देखल जाइत छल । सिरौली या नकली नीलकण्ठ (बाल कविता) हे नकली नीलकण्ठ !  तोहर छह  गजब पिहानी । असली  भेल   अलोपित,  तोँही   राजा - रानी ।।*‍१ नील-हरित तोर पाँखि,  तोँहूँ बैसए छऽ ताड़ पर ।*‍२ गर्दनि  छह ने नील  तोहर,  मटियाही - पीयर ।।*‍३ नकली अशोक जे, दुनिञा  तकरा असली बूझए । सीता-अशोक जे छी असली, से केओ ने चीन्हए ।।*‍४ तहिना तोहर साम्राज्य बहुत,  पसरल छह सौंसे । असली  दुर्लभ,  नकली  सर्वसुलभ,  सब लोके ।। नाम “सिरौली” तोहर छियऽह,  बूझल से हमरा । अलग “सिरोली मएना” से जानए भरि मिथिला ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - असली नीलकण्ठ नञि देखाइ देबाक कारण लोक एकरे नीलकण्ठ मानि बैसल अछि । भ्रमक आओरो बहुत रास कारण अछि । *‍२ - एकर पाँखि नील रंगक होइत अछि जे उड़बा काल चमकैत हरिताभ-नील रंगक बुझि पड़ैछ । मिथिलामे पहिने असली नीलकण्ठ सेहो बिजलीक ताड़ पर बैसल भेटैत छल तहिना ईहो चिड़ै भेटैत अछि । *‍३ - एकर गर्दनि नील नञि भऽ कऽ पीयर सनि होइत अछि । एहि चिड़ैकेर बिदेशी किछु प्रजातिसभमे (SUB-SPECIES) पीयर गर्दनि पर नील आभा रहैत अछि पर ओ सभ उत्तर भारतमे नञि पाओल जाइछ आ नहिञे कहियो पहिने पाओल जाइत छल । तेँ ओ नीलकण्ठ नञि भऽ सकैछ । तेलुगू भाषामे एकर नाम “पलपित्त” अछि जखनि कि कन्नर भाषामे “नीलकण्ठी” कहबैछ । सम्भवतः कन्नर भाषाक नीलकण्ठीसँ ई भ्रम उपजल कि इएह संस्कृतक नीलकण्ठ अछि । पर जे हो, मैथिलीक नीलकण्ठ ई नञि अछि । *‍४ - आइ - काल्हि जाहि शोभा वृक्षकेँ अशोक नामसँ जानल जाइत अछि से वस्तुतः नकली अशोक छी । रावणक अशोक वाटिकाक अशोक जकर कि चिकित्सकीय प्रयोग आयुर्वेदमे बताओल गेल अछि, से अलग अछि । ओकरा आइ - काल्हि “सीता अशोक” कहल जाइत अछि आ इएह असली अशोक अछि जकर प्रयोग अशोकारिष्ट आदि बनएबामे होइत अछि । *‍५ - मिथिलामे एकरा “सिरौली” नामसँ जानल जाइत अछि (सिरोली नञि) । सिरोली एकटा अलग चिड़ै अछि, ओ एक तरहक मएना अछि । मोहखा या मोखा (बाल कविता) खेतमे  आ  बाड़ी - झाड़ीमे । पड़ती - गाछी - बँसबिट्टीमे । कूदए - फानए एक चिड़ै ।। बेशी ओकरा उड़ल ने होइछ । कूदए - फानए - कने उड़ैछ । लाल आँखिबाला  ओ  चिड़ै ।। देह आ नाङ्गरि कारी - कारी । कौआ सनि  केर  बूझू  कारी । लाल पाँखिबाला  ई  चिड़ै ।। कीड़ा - मकोड़ा डोका गिरगिट । बेङ्ग साँप भूआ आ की - की ! खा कऽ  पेट भरैछ ओ चिड़ै ।। एतबहिसँ  ने  पेट  भरैत  छै । अण्डा - चुज्जा फऽड़ ठुसैत छै । ताड़ - खजूरक   शत्रु   चिड़ै ।। सौंसे भारतमे  भेटैत  अछि । पर्वत पठार मैदान फिरैतछि । “मोहखा या मोखा” जे चिड़ै ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - कुक्कू (CUCKOO) गण आ परिवार (Order - Cuculiformes & Family - Cuculidae) केर सदस्य होइतहुँ मोहखा एहि परिवारक आन सदस्यसभ सनि शिशुभरण-परजीवी (BROOD PARASITE) नञि अछि । ओ अपन खोंता बनबैत अछि, अपन अण्डाकेँ अपने सेअइत अछि आ बच्चाक देखभाल सेहो अपनहि करैत अछि । एहि परिवारक आन बहुत रास सदस्य जेना कि कोइली, पपीहा, चातक आदिशिशुभरण-परजीवी (BROOD PARASITE) होइत अछि । पोरकी या पौड़की (बाल कविता) कहियो ने कहियो तोँ सुनने तँऽ हेबही । मारए गेलै परबा, मारि लेलकै पोरकी ।। इएह छियै  पोरकी,  चिन्हीन्ह  बौआ । दूरसँ कखनो कऽ, लागै  जेना  परबा ।।*‍१ शान्त स्वभाव  छै  जेना  लजबिज्जी । घोल - अनघोलसँ  होइ   कछमच्छी ।। ऊँचका  गाछ  पर,  खोंता ओ लगबए । दुहु - प्राणी शान्तसँ,  खोंतामे विचरए ।।*‍२ खेत - खरिहानमे   दाना  लेल उतरए । मनुक्खक आहटि  पबितहिं  उड़ि जाए ।। परबाक  स्त्रीलिङ्ग  बूझू जुनि  पोरकी । परबा  फराक  आ  फराके छै  पोरकी ।। परबा आ पोरकी − दुहुमे  दू लिङ्ग छै । भ्रम दूर भेल, दुहु शब्द उभयलिङ्ग छै ।।*‍३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - दूरसँ देखला पर परबा (परेबा) आ पोरकी (पौड़की) एकरंगाह लगैत अछि पर दुनु अलग - अलग चिड़ै अछि । *‍२ - ई चिड़ै प्रायः जोड़ामे अपन खोंतामे या कोनहु गाछक डाढ़ि पर बैसल भेटैछ । *‍३ - पोरकी शब्द परबाक स्त्रीलिङ्ग नञि अछि । एहिसँ नर पोरकी आ मादा पोरकी दुनुक बोध होइत अछि । बगरा/बगड़ा (बाल कविता) बगरा, बगरी आओर बगेड़ी, तीनू अलग  चिड़ै छी । बगरी-बगेड़ी  बादमे कहियो, बगरा एखन कहै छी ।। घऽर आङ्गन खरिहानमे पहिने, बगरा खूब  भेटै छल । बाँसक कोरो - धरणि - बरेड़ी, खोंता ओ लगबै छल ।। धिय-पुता  के  छल एहेन जे, देखने नञि हो बगरा । नञि देखने बगरा केर खोंता, आ बगरा केर बच्चा ।। एक समय छल जहिया बगरा, चहचहाइत छल सौंसे । घऽर आङ्गनमे जँ कोनो खोंता, बगरा होयत अवश्ये ।। आब तँऽ शहरक क्षेत्रसँ बूझू, बगरा  भेल  निपत्ता । जञो पथार तखनहि गामहुमे, छोट झुण्डमे बगरा ।।*‍१ एना किए भेल पता ने ककरहु, पर जँ रहलै एहिना । संग्रहालयमे काल्हि  देखत यौ, बगरा सगरो दुनिञा !! *‍२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - अनाजक पथार सुखएबा काल जे बगरा अबैत अछि से प्रायः “घरैया बगरा” (HOUSE SPARROW) रहैत अछि जखनि कि खेत सभक आढ़ि पर या बाधसँ जाए बला कच्चा सड़क वा बान्ह पर जे बगरा भेटैत अछि से “बनैया बगरा” (TREE SPARROW) रहैत अछि । *‍२ -  बगराक संख्या ताहूमे खास कऽ घरैया बगराक संख्यामे पछिला ‍१० - २० सालमे बहुत कमी भेल अछि जकर कारण पुर्ण रूपसँ नञि ज्ञात अछि । पर ओकर आवास क्षेत्र (HABITAT) केर समाप्त होयब या कम होयब एकर कारण बताओल जा रहल अछि । उड़ीस (बाल कविता) कमला  माएकेँ  कहियो  ठकलन्हि   गोनू  बाबू । एक सए एक  उड़ीसक,  बलि  देल  गोनू  बाबू ।।*‍१ बास ओकर पुरना पलंग, कुर्सी, चौकी आ खाटमे । रातिमे ओ चुटचुट काटए, दिन नुका रहैए फाटमे ।। ओ मनुक्ख केर खून चूसि कऽ, अप्पन पेट भरैए । बदलामे कत’ रोगक संगहि, निन्नमे विघ्न करैए ।।*‍२ तेँ जल्दीसँ करी  उपाए  आ  ओकरा झट उपटाबी । एहेन चौकी आ खाट पलंगकेँ, चट दऽ रौद लगाबी ।।*‍३ तोसक, कम्मल, सीरक, सुजनी सभकेँ रौद देखाबी । चद्दरि तकिया-खोल आदिकेँ, पानिमे दऽ खौलाबी ।। गऽह - फाट चौकी - पलंग केर, छीटी उचित दबाई । बौआ - बुच्ची  दूर  रही,  जँ छीटथि केओ दबाई ।। तइयो जँ नञि बात बनए तँऽ अन्तिम करी प्रबन्ध । कमसँ कम छओ मास-बरष धरि, छोड़ू एहेन पलंग ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मिथिलाक प्रशिद्ध गोनू झाक खिस्सासँ उद्धृत । *‍२ - उड़ीस केर कटलासँ मनुक्खक रतुका निन्न तँऽ खड़ाब होइते अछि संग - संग त्वचा पर कटबाक निशान बनि जाइत अछि जे नोचए लगैत (ITCHING TENDENCY) अछि । नोचला पर (AFTER SCRATCHING) नऽह लगलासँ ओहि स्थानसभ पर घाओ आ द्वितीयक संक्रमणक (SECONDARY INFECTIONS) संभावना भऽ जाइत अछि । उड़ीसमे मनुक्खकेँ संक्रमित कए रोगग्रस्त करबाक क्षमता रखनिहार कम सँ कम २८ गोट परजीवी (PATHOGENS) पाओल जाइत अछि, जखनि कि एहि क्षेत्रमे एखन बहुत कम्मे काज भेल अछि । *‍३ - लकड़ीसँ बनल उपस्कर (फर्निचर) ओ बिछाओन आदिकेँ गर्म करब (तेज रौदमे आ जकरा सम्भव हो तकरा खौलैत पानिमे) आ सुखाएब सबसँ नीक घरेलू उपचार थिक । 45°C (‍113°F) पर एक घण्टा राखब वा -17°C (01°F) पर दू घण्टा राखब उड़ीसकेँ पुर्णतः समाप्त कऽ दैत अछि । पहिल तरीका अपनासभ दिशि गर्मीमे आ दोसर तरीका पहाड़क क्षेत्रमे सर्दीमे बेस प्रभावकारी अछि । जँ 50°°C (122°F) केर तापमान प्राप्त कएल जा सकए फर्निचर ओकरा सहन कऽ सकए तऽ मात्र दू मिनटमे पूरा उड़ीस उपटि जाइछ । चद्दरि आ वस्त्र आदिसँ उड़ीस उपटएबाक लेल आयरनक उपयोग कएल जा सकैछ । चुँकी रौदमे देला पर लकड़ीसँ बनल उपस्करक गऽह आ फाटमे उड़ीस नुका कऽ बचि जाइत अछि, तेँ ओहि ठामसँ ओकरा निकालबाक लेल उचित दबाई केँ गऽह आ फाटसभमे छीटलासँ  ई विधि बेशी प्रभावकारी सिद्ध होइछ । दबाई छिटबाक काज घरक कोनो पैघ आ बुझनुक सदस्य सावधानीपुर्वक करैत छथि कारण ई दबाई मनुक्खक साँस द्वारा या मूँह आ आँखिमे पड़लासँ मनुष्यक स्वास्थ्यकेँ सेहो गम्भीर हानि पहुँचा सकैत अछि । धियापुताकेँ एहि काजसँ दूर रहबाक चाही आ अनेरो हुलुक-बुलुक नञि करबाक चाही । कोनहु दुर्घटना भेला पर सीधे यथासिघ्र चिकित्सककेँ देखएबाक चाही । *‍४ - उड़ीस बिना किछु खएने - पिउने ‍100 सँ 300 दिन धरि रहि सकैत अछि । ई अवधि वातावरणक तापमान पर निर्भर करैछ । तेँ कोनहु खुला जगह पर बिना उपयोगक छओ महीना वा एक वर्ष धरि उड़ीस लागल लकड़ीक उपस्करकेँ छोड़ि देलासँ सेहो उड़ीसकेँ उपटाओल जा सकैछ । डोकहर (बाल कविता) डोकहर ओ - जे डोका हेरए, या  ताकए  जे डोका । डोकहर जाहिठाँ देखल जाइए, पसरल  सौंसे  डोका ।। इएह डोका देखि लोक बुझइए, डोकहरकेँ  प्रिय  डोका । नाम देलक डोकहर,  पर बूझू छी किछु हद से धोखा ।।*‍१ डोकहर  केर  आवास - क्षेत्रमे, हँसुआ - दाबी    संगे । हँसुआ - दाबीकेँ   प्रिय  डोका, डोकहर  माथ  कलंके ।।*‍१,२ डोकहर पैघ चिड़ै - तइयो  ओ, उड़ए    अकाशेँ   ऊँच । ऊँच  गाछ पर  खोंता  बनबए, उतरए  झुण्डक - झुण्ड ।। डोकहर केर  मजगूत टाँग  आ, लोल   सेहो   मजगूत । बेङ्ग साँप काँकोड़  डोका  सभ, चिबा  जाइछ   साबूत ।।*‍२ एकर शिकार  वर्ज्य  भारत भरि, छी   संरक्षित    प्राणी । तइयो लोक  कहाँ  मानैत  अछि, करैछ  अपन  मनमानी ।।*‍३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - डोकहर आ हँसुआ-दाबीक आवास क्षेत्र (HABITAT) एक्कहि होइत अछि । ओहि ठाम जे मुइल डोकाक खोल (EXOSKELETON OF PILA) पसरल रहैत अछि जे वास्तवमे हँसुआ-दाबी द्वारा भक्षण कएल गेल डोकाक अवशेष थिक, नञि कि डोकहर द्वारा खाएल गेल डोकाक । *‍२ - डोकहर आ हँसुआ-दाबी दुनु डोका (PILA) खाइत अछि पर हँसुआ-दाबीकेँ डोका विशेष पसिन्न छैक । ओकर लोल केर अगिला भाग एना बनल छैक जे ओ डोकाक खोलकेँ बिना तोड़नहि डोकाक अगिला भागकेँ पकड़ि डोकाक भीतरुका कोमल भागकेँ बाहर झीकि लैत अछि आ खा जाइत अछि । डोकहर सेहो डोका खाइत अछि पर हँसुआ-दाबी जेकाँ ओकरा डोकासँ विशेष प्रीति नञि छै । दोसर बात जे डोकहर अपन मजगूत लोलसँ डोकाक उपरुका कवचकेँ तोड़ि कऽ डोका खाइत अछि, तेँ ओकरा द्वारा भक्षण कएल गेल डोकाक कवच टूटल रहैत अछि - साबुत नञि । *‍३ - एहि चिड़ै केर शिकार करब प्रतिबन्धित थिक पर गामक लोककेँ नियम-कानून कहाँ पता आ जँ बताओल जाइतो अछि तँऽ ओ से कहाँ मानैत छथि । ग्रामीण भागमे - विशेष कऽ जन-जातीय आ अशिक्षित वर्गमे - डोकहरक मांसु विशेष प्रचलित अछि । अंग्रेजीक GREATER ADJUTANT आ LESSER ADJUTANT दुनु मैथिलीक डोकहर शब्दक अन्तर्गत अबैत अछि । आइ काल्हिLESSER ADJUTANT बेशी देखबामे अबैत अछि कारण जे GREATER ADJUTANT केर संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम भऽ गेल अछि । डोकहरक दुनु प्रजाति संकटग्रस्त अछि । LESSER ADJUTANT असुरक्षित (VULNERABLE) श्रेणीमे अबैत अछि जखनि किGREATER ADJUTANT विलुप्तप्राय (ENDANGERED) श्रेणीमे । ढील आ लीख (बाल कविता) ढीलो रानी, ढीलो रानी, कतऽ जाइ छी । सभ केओ मारलक तेँ रूसल जाइ छी ।। आब  एहेन  फकड़ा  पुरान  भऽ गेलै । ढील ताकब  बात अनजान  भऽ गेलै ।।*‍१ साबुन एलै  शैम्पू  आ  दबाई  बहुते । ढीलक  करै  छै  ओ  बिदाई  तुरुते ।।*‍१ ढील  परजीवी छी  आ खून चूसए छै ।*‍२ माथक जे केश, तकर जड़ि धऽ रहै छै ।। धियापुता  केश जे  साफ ने करए छै । ओकरहि  केशमे  ढील   सोहड़ै   छै ।। ढील केर अण्डा  ओ  ढील केर बच्चा । मैथिलीमे लीख छै आ संस्कृतमे लिक्षा ।।*‍३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - पहिने धियापुता जखन स्थिर भऽ माथमे ढील ताकए नञि दैत छलै तँऽ तकनिहारि दाइ-माए लोकनि एहने फकड़ा सभ सुनाए परतारि कऽ ढील ताकै जाइ छलखिन्ह (-थिन्ह) । आब बहुविध मेडिकेटेड साबुन, शैम्पू आ किछु गोटी ढील मारबाक लेल सद्यः रामबाण जेकाँ काज करैछ तेँ ढील तकबाक प्रथा आ ओहि संगहि एहेन फकड़ा सभ बहुत कम भऽ गेल अछि । पर गाम-घरमे एखनहु से भेंटि जाएत । *‍२ - परजीवी = PARASITE; रक्तचूसक परजीवी = SANGUIVOROUS PARASITE *‍३ -  ढील (मैथिली) = (संस्कृत) = जूँ (हिन्दी) = HEAD LICE / HEAD LOUSE (अंग्रेजी), तथा लीख (मैथिली) = लिक्षा (संस्कृत) = OVUM (Sing.) / OVA (Pl.)  &  LARVA (Sing.) / LARVAE (Pl.) /  NYMPH  OF  HEAD LICE / HEAD LOUSE (अंग्रेजी) ढील एकटा परजीवी (PARASITE)  थिक । ओ मनुक्खक माथमे रहैत अछि आ मनुक्खक खून चूसि मात्र ओएह पर जीवैत अछि, तेँ ओरक्तचूसक परजीवी (SANGUIVOROUS PARASITE)  भेल । ढील केर मात्र एक्कहिटा ज्ञात पोषक अछि तेँ ओ मनुक्खक लेलअधिबद्ध या अविकल्पी पजीवी (OBLIGATE PARASITE)  आ मनुक्ख ढीलक लेल अधिबद्ध या अविकल्पी पोषक (OBLIGATE HOST)  भेल । आन परजीवी कीड़ासभ जेकाँ ढीलकेँ बहुत मजगूत टांग या पाँखि नञि होइत अछि तेँ ओ एकसँ दोसर मनुक्खमे मात्र माथक सीधा सम्पर्कसँ (DIRECT HEAD TO HEAD CONTACT) - जेना कि सूतए काल, एक्के कंघीक प्रयोग कएलासँ - पसरैत अछि । कोइली (बाल कविता) कोइली कोइली सभ बजैत छी, पर के - के छी देखने ? *‍१ एक्कहि संगे बाजि उठल सभ, कोइली हम छी देखने ।। जोतला खेतमे  वा  पड़तीमे,  पानि जतए छै लागल । कारी - कारी  बहुते कोइली,  नाङ्गरि बीचसँ काटल ।।*‍२ नञि बौआसभ आ बुच्चीसभ,  ओ तँऽ छी  धनछुआ । कारी - कोइली, कारी - कौआ आ करिया - धनछुआ ।। कोइली  चिड़ै  प्रवासी  छै  ओ  दूर  देशसँ  आबए । भरि बसंत रहि, बरखा बादहिं, पुरना देश ओ भागए ।।*‍३ अबितहिं एहिठाँ गाछीमे  ओ  कू - कू राग अलापए । मज्जर, टिकला, आमक संग-संग ई आबाज हर्षाबए ।। ऊँच गाछ पर  घनगर पातक  बीच नुका कऽ बैसए । तेँ मनुक्ख आबाज सुनए बस, कोकिल-छवि ने देखए।। कोइली  खोंता नञि बनबए,  कौआ बनबैतछि खोंता । कोइली  ताहिमे अण्डा पाड़ए,  कौआ संग छै धोखा ।।*‍४ कौआ फरक ने बूझि पाबए, अपना - आनक अण्डामे । अण्डे नञि,  ओ पोषए - पालए कोइलीयोक बच्चाकेँ ।। पाँखि उगल बच्चा उड़ि भागल,  अपना झुण्डक संगे । कौआ मूर्ख बनल कानैत अछि, दुनिञा रंग - बिरंगे ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ मैथिलीमे, ·        कोइली - कारी रंगक चिड़ैविशेष जे कि भारतीय ओ आन वाङ्गमयसभमे अपन मधुर आबाजक लेल प्रशिद्ध अछि । हिन्दीमे एकरा कोयल आ अंग्रजीमे कुक्कू (CUCKOO) कहल जाइत अछि । ·        कोयली - आमक आँठीक भीतरमे उज्जर रंगक कोमल संरचनाविशेष । ·        मैथिलीमे “कोइली” आ “कोयली” श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द भेल । मतलब कि एहेन शब्दसभ जे सुनबामे एकरँगाह लगैत अछि पर ओकर अर्थ अलग−अलग होइत अछि । *‍२ - धियपुता सभ (आ किछु पैघ लोक सभ सेहो) कारी रंगक कारण भ्रमवश “करिया धनछुआ”केँ (BLACK DRONGO) कोइली कहि दैत छथि । *‍३ - देश = राजनैतिक सीमासँ अलग देश होयब जरूरी नञि = दूरस्थ स्थान वा भिन्न जलवायुबला क्षेत्रक द्योतक *‍४ - सभ प्रकारक कोइली आ पपीहा शिशु-भरण परजीवी (BROODING PARASITE) होइत अछि । ओ अपन अण्डा कौआ, करिया धनछुआ, धनछुआ या एहि तरहक आन चिड़ैसभक खोंतामे दैत अछि जे कि शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि । शिशु-भरण परजीवी अपन अण्डा चोड़ा-नुका कऽ शिशु-भरण पोषकक खोंतामे दऽ दैत अछि आ शिशु-भरण पोषक अपन अण्डाक संग-संग परजीवीक अण्डाकेँ सेहो सऐत अछि, अण्डासँ बच्चाकेँ निखालेत अछि आ खोअबैत-पिउपैत अछि । उड़बा जोकर भेलापर परजीवी कोइली या पपीहाहक बच्चा अपना-अपना झुण्डमे भागि जाति अछि आ ताहि बच्चाकेँ भागि गेला पर स्त्री/मादा कौआकेँ उदास होइत सेहो देखल गेल अछि । अंग्रेजीक CUCKOO शब्द बहुत व्यापक अछि । एहि अन्तर्गत कोइली, पपीहा आदि बहुत रास गाबय बला चिड़ै सभ अबैत अछि । एकरा अन्तर्गत अंग्रेजीक KOEL / TRUE CUCKOO आ INDIAN CUCKOO शब्दसभसँ बोध होइबला चिड़ैसभकेँ राखब बेशी उचित होयत जे जीव-विज्ञानमे क्रमशः Eudynamys आ Cuculus वंशसभक (GENERA) सदस्य पक्षी अछि । ई दुनु तरहक चिड़ै भारतमे सेहो प्रायः हर भागमे पाओल जाइत अछि । ऊपरुका चित्रमे देखाओल कोइली Eudynamys वंशक अछि । सभ प्रकारक कोइली मे मात्र नर कोइलीये टा गबैत अछि संगहि पुरुष/नर-कोइलीक रंग कारी या अपेक्षाकृत गाढ़ रंगक होइत अछि तथा मादा/स्त्री-कोइली अपेक्षाकृत हल्लुक या कम गाढ़ रंगक होइत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमे टाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/ संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका www.videha.com Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका''विदेह' १९४ म अंक १५ जनवरी २०१६ (वर्ष ९ मास ९७ अंक १९४) मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA

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का. की fa PHOS eis Tn teat ee ek नर, के aie 4 मैथिली - सिरैली cif कि सिरोली) / नकली नीलकण्ठ हिन्दी - नकली नीलकण्ठ संस्कृत - नीलाड्ग, चलपुच्छ अंग्रेजी - INDIAN ROLLER (इण्डियन रॉलिर) / BLUE JAY (ब्ल्यू / ब्लू जे) जैववैज्ञा० नाम - Coracias indica syn. Corvus bengalensis syn. Coracias bengalensis etre - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

oe | y / he tf fy ma 4 ( हे ae ae : i es लिन a ROLLER | INDIANROLLER | INDIANROLLER aréfor - आसमाली ‘oréfor - मटियाही पीयर गर्दनि - मटियाही पीयर (ननि कि often (नील रेग लेशो of (संगहि लीलाभ) = = स्थान - यूजेप (योजेप) | प्राप्ति स्थान - पच्छिमी एशिया, |... प्राप्ति स्थान - दच्छिल-पूब समस्त भारत (पच्छिम-उत्तर- एशिया यथा - थाइलैण्ड, 'पूब-दच्छिल आ संगडहि पुर्वोत्तर | म्यांमार, कम्बोडिया, भारतमें BE, लाओस, वियतनाम, सिंगा- प्रजातिः- प्रजातिः- पुर आदि; संगहि सटल i Coracia bengalensis होयबाक कारण पुर्वोत्तिर Coracia garrulus garrulus bengalensis |___भारतक किछु भागमें | & & प्रजातिः- | Coracia garrulus seminowi Coracia bengalensis indicus | | Coracia bengalensis affinis|

> ey 2 ग््णया —-«@ _— d ‘ ~ io q © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. orf fe ora tage Ga आ लीख उपटएबाक Yio ओ पारम्परिक तरीका "sla ताकब" | ढील तकाबए काल 'जस्वन RIGA Neto करैत छल वा see चाहित छल तस्वन ढील तकनिडारि लोकनि ओकरा पड़तारि ws, पोल्हा5 ws, स्विस्सा-पिद्ानी सुना ws ढील ताकित Geils | ताहि क्रममे विभिल्‍्न प्रकारक स्वसचित वा स्वसंशोधित गीतसभ Ral ZA छल, यथा - "lei Boil, ढीलो राली, DAS TIS छी .................."। Te ai a

stare टिकला केर भाग Hare मैथिली लॉओो है. ह.-कोयली (COTYLEDON/ EMBRYO) _, ia — 3 2.- Reprarefler कोशा (DEVOLOPING SEED COAT) maf ge “fetes ड 3, - गुद्दा या फलमज्जा (MESOCARP / PULP / FLESH) Rou gesaitiere ४.-स्वॉइवा / छिलका (PERICARP /SKIN) कोयली + कोशा - आँठी / अस्थि/ फलास्थि ENDOCARP/ SEED /STONE)

तप we rate ae =, ‘eal 7 सपस ~ Pass =i Ww न efi ey हि, ‘s feaepUlis AP Ufecta? डॉ मेठ i . | Ie vy |) मैथिली - कोइली Cader) हिन्दी - कोयल संस्कृत - कोकिल, पिक आदि अंग्रेजी - cucKOO (INDIAN, ASIAN, AUSTRALIAN, PACIFIC) & KOEL / TRUE CUCKOO, Gaasilo नाम - Eudynamys spp., Cuculus spp. (मुख्यतः) the - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)

| | 5 eS han <4 i Xi: a a pea . की * © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शशिष्र कुमर eager MPaageaa ‘face? f war किए भरेत्र पता ने ककरहु, पर जैँ we एहिना। ६. संग्रहालयमे काल्हि देखत याँ, बगरा सगरों दुनिजा !! \. "बिहार संग्रहालय” पटनामे "aR केर प्रतिमा

के | fy Wiz तय or! Aa re >a <= ’ B \\ y a ‘St बा 22 हक नि Ds Ge — oo ih acon ero "| मैथिली - बगरा या बगड़ा FRA बगरा या बगड़ा) Rosin again संस्कृत - चटक (गृढचटक), कलविड्क अंग्रेजी - स्पैंसे (हाउस AAA - SPARROW (HOUSE SPARROW) जैववैज्ञा० नाम - Passer spp. (Passer domesticus) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामे eats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

Se one NY SS SS: et हू २-३५ WS “ DS . Sry ONS ? ६४. em BENS ES oe - “Sess! दे £ न कक. © Dr. Shashidh@t Kumar “Videlat “Sen, SN be -—e- “ax y YS NY GS. आदिम “Rar ow va aaa mae SS Se A x ९५३ mA NS 2 wes aS कि के के LAS मैथिली - मोहखा / ear हिन्दी - महोस्त संस्कृत - महोक / काकोल / वनकाक अंग्रेजी - CROW PHEASANT / GREATER COUCAL जैंववैज्ञा८ नाम - Centropus sinensis (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

हा री माटालीतकण्ठ (लेकली) का अर कक cd Fy — i See aan 4 C5 a “2 = = tn ae ee कप ~ oo Ga मैंथिली - जीलकएण्ठ (असली) हिन्दी - जीलकण्ठ (असली) संस्कृत - नीलकण्ठ अंग्रेजी - INDIAN ROBIN (इण्डियन रॉबिन) जैववैज्ञा०८ नाम - Saxicoloides spp. (5, fulicatus, 5. intermedius etc.) tte संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

दुडु लोलक बीचमे खाली स्थान एना बुझि || Ss x * ] A + 7 = _ ©] thar Kui gga = 4 ate हु क्र x, fA, s » : \ है... अल भ जज a कै 2 Rex we के मैथिली - हँसुआ दाबी हिल्‍्दी - बक की एक प्रजाति संस्कृत - dw, सारस अंग्रेजी - oPENBILLS / OPENBILLED STORKS (ASIAN & AFRICAN) जैंववैज्ञा० जाम - Anastomus oscitans (ASIAN) & Anastomus lamellegerus (AFRICAN) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

कि जी जे ~~ wi 7 हर a @ | ay ‘se we re mat. gf 0 mn ~ जे Sz ey, y na q e by पे ५ . मैथिली - Nase / भग्हरा / शैंवरा / भौंरा हिन्दी - start / भौंरा संस्कृत - श्रमर / अलि / मधुप xfer / मिलिन्द / मधुकर आदि अंग्रेजी - HUMBLE BEE (Old Eng.), BUMBLE BEE, BLACK BEE / BEETEL (New Eng.) जैववैज्ञा० नाम - Bombus spp. are संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वसपमे)

BES “| ८ = ZZ ‘ a S LP AG A ~N “ee Zs मैथिली - ढील, ढीलक अण्डा आ लीस्व हिल्‍दी - जूँ संस्कृत - यूका (ढील), पिपिलिका / लिक्षा fa) अंग्रेजी - HEAD LICE / HEAD LOUSE (Ie), NYMPH (€f&a) जैंववैज्ञा० जाम - Pediculus humanus capitis ate - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी ना ओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ ats जाइत अछि - तत्सम सवरूपमे)

\ 4 fe ही ot रे की कप ५ - मैथिली - उड़ीस हिन्दी - खटमल संस्कृत - मत्कुण अंग्रेजी - BED BUGIS (बेड बैग) जैववैज्ञा० नाम - Cimex lectularis (मुख्यतः) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल Rw लॉंओ या पर्यायी लॉओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी जाओ भर जाइत अछि - तत्सम सवरूपमे)