VIDEHA — Issue 200 / अंक २००

Publication: VIDEHA · Issue: 200
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59 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २०० म अंक १५ अप्रैल २०१६ (वर्ष ९ मास १०० अंक २००) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-रामक ‘अम्बरा’ २.विनीत उत्पल- नव दिशाक कथा (जगदीश प्रसाद मंडलक गामक जिनगी) २.२.आशीष अनचिन्हार- पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण २.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’ २.मुन्नाजी-अधिकार लेल छटपटाइत मोहन दास २.४.मुन्नाजी-धीया-पुता लेल प्रेरक अछि देवीजी ३. ३.१.नबो नारायण मिश्र- युगपुरुष श्री राजनंदन लाल दास ३.२.केदार कानन- हमर सबहक पंडितजी ३.३.योगेन्द्र पाठक “वियोगी”-एकसरुआ सिपाही ३.४.राम लोचन ठाकुर- रमानंद रेणु के मन पाड़ैत ४.केदार कानन-सहज आ मिलनसार छलाह रेणुजी Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय संपादकीय विदेहक २००म अंक मे विदेह सम्मानसं सम्मानित कृति आ कृतिकारक समीक्षाक प्रारम्भ भेल अछि जे आगां किछु अंक धरि चलत/ समानान्तर साहित्यक ई सम्मान सरकारी साहित्य अकादेमीक सम्मानकें जाइ तरहें ध्वस्त केलक अछि, मैथिली साहित्य आ साहित्यकारक संख्या आ गुणमे जेना वृद्धि केलक अछि से पाइबला पुरस्कारक तुलनामे आन्तरिक मोटीवेशनक विजय मात्र देखबैत अछि/ पहिने साहित्यकार मात्र जीबै लेल काज करै छल, फेर पुरस्कार लेल आ आब ओ अपन साहित्य लेल एकटा उद्देश्य संग काज कऽ रहल अछि, जतऽ ओकरा मोटीवेट केनहार ओ स्वयं अछि/ आ ओकर मोटीवेशन छै ओकरा सोझां एकटा उद्देश्य/ ड्राइव- द सरप्राइजिंग ट्रुथ अबाउट ह्वाट मोटीवेट्स अस (लेखक- डेनियल एच. पिंक) कम्प्यूटर जका‍ँ समाज सेहो अपन ‍ऑपरेटिंग सिस्टम (अदृश्य दिशा आ निर्देश) स‍ँ चलैए। पहिल मानव ऑपरेटिंग सिस्टम (मोटीवेशन 1.0) मात्र अस्तित्व रक्षा लेल छलै। तकर बाद आएल मोटीवेशन 2.0 ऑपरेटिंग सिस्टम जे बाहरी पुरस्कार आ प्रतारणापर आधारित छलै। मोटीवेशन 2.0 बीसम शताब्दीक लीखपर चलैत रहैबला काज लेल सफल छलै। मुदा 21म शताब्दीमे ऐ ऑपरेटिंग सिस्टममे बहुत रास बग आब’ लगलै, ई बेर-बेर क्रैश हेब’ लगलै। 21म शताब्दीमे हम जे करै छी तकरा केना सजबै छी, हम जे करै छी तकरा केना सोचै छी आ हम जे करै छी तकरा केना करै छी ऐ सभ लेल 2.0 ऑपरेटिंग सिस्टम ओतेक कारगर नै रहल। आ तै लेल नव ऑपरेटिग सिस्टम आवश्यकताक अनुभव भेल। मोटीवेशन 2.0 ऑपरेटिंग सिस्टमक पुरस्कार आ प्रतारणाक मॉडल आंतरिक मोटीवेशनके‍ँ मिझब’ लागल, परिणाम (मात्रा आ गुण दुनू) के‍ँ घटब’ लागल, रचनाशीलताके‍ँ थकुच’ लागल, आ नीक व्यवहारके‍ँ घटब’ लागल। ई ऑपरेटिंग सिस्टम अनावश्यक बौस्तु, जे हमरा नै चाही,सेहो देब’ लागल, अनैतिक व्यवहारके‍ँ प्रोत्साहित कर’ लागल, लोकके‍ँ एडिक्ट बनब’ लागल आ छोट आ क्षणिक परिणाम बला सोचके‍ँ प्रोत्साहित कर’ लागल। मोटीवेशन 2.0 क ई सभ बग अछि जे ओइ ओपरेटिंग सिस्टमके‍ँ अनुपयोगी बनब’ लागल। ओना ए ऑपरेटिंग सिस्टम आइयो रुटीनबला काज लेल ओप्रभावकारी अछि मुदा रचनात्मक काज लेल ई अनुपयोगी आ विपरीत परिणाम देब’ लागल। 21म शताब्दी लेल मोटीवेशन 3.0 ऑपरेटिंग सिस्टम आइ काल्हि बाहरी पुरस्कार आ प्रतारणाक बदला कोनो काज केलास‍ँ अहा‍ँके‍ँ की आंतरिक संतोष भेटैए, ई मूल बात भ’ गेल अछि। ई व्यवहार ठोस नैतिक परिणाम द’ रहल अछि। 21म शताब्दीक ऐ व्यवहारक तीनटा मूलभूत तत्व अछि:- (1) स्वायत्तता (ई डिफाउल्ट सेटिंग अछि,आ स्वयं निर्देशित अछि) (2) मास्टरी (पलानि क’ पड़ला स‍ँ ओइमे मास्टरी भेटैए) आ (3) उद्देश्य (अपना लेल स‍ँ विपरीत आ वृहद, उद्देश्यक वृहदता पुरस्कारक आ अपना लेल काजक स्थान घटब’ लागल)। माने मोटीवेशन 3.0 ऑपरेटिंग सिस्टम सिखब, नव सृजन करब आ ऐ विश्वके‍ँ आर नीक बनाएब ऐ तीन बिंदुपर बनल। मोटीवेशन 2.0 स‍ँ मोटीवेशन 3.0 क बीच प्रस्थान एना छल- “ज‍ँ एना करब त‍ँ ई हएत” स‍ँ आगा‍ँ “ई काज अहा‍ँ सम्पन्न केलौँ ते‍ँ ई हम मानै छी”। मोटीवेशन 2.0 काज सम्पन्न केलास‍ँ पूर्व पुरस्कारक लोभ बा प्रतारणाक डर देखबै छल, मुदा मोटीवेशन 3.0 मे पुरस्कारक लोभ बा प्रतारणाक डरक स्थान खतम भ’ गेल। कोनो काज लोक करैए बा नै करैए ओइ लेल पुरस्कारक लोभ बा प्रतारणाक डरक स्थान पर आंतरिक मोटीवेशन आ समाज आ विश्वक लेल किछु करबाक उद्देश्य सोझा‍ँ आब’ लागल। एत' एकटा सुखद समाचार ई अछि जे मोटीवेशन 3.0 क व्यवहार जन्मना नै कर्मणा अछि। मैथिली साहित्य आ साहित्यकार आ मोटीवेशन 1.0, मोटीवेशन 2.0 आ मोटीवेशन 3.0 ऑपरेटिंग सिस्टम मैथिली साहित्यमे मोटीवेशन 1.0 ऑपरेटिंग सिस्टम साहित्य अकादेमीमे मैथिलीक प्रवेश स‍ँ पूर्वक स्थितिक समानांतर अछि। किरण, अमर, जीवन झा, हरिमोहन झा, यात्री, रेणु आदि ऐ पहिल ऑपरेटिंग सिस्टमक अंतर्गत कार्य केलनि। ऐमे स‍ँ किछु जेना अमरजी मोटीवेशन 2.0 क चाँगुरमे फ‍ँसि गेला। मोटीवेशन 2.0 क अंतर्गत विभूति आनंद, तारानंद वियोगी, प्रदीप बिहारी आदिके‍ँ राखल जा सकैए जे अपनाके‍ँ आइयो मोटीवेशन 3.0 क साहित्यकारक विरोध करबा लेल अभिशप्त पबै छथि। मोटीवेशन 3.0 क प्रारम्भ 21म शताब्दीक पहिल दशकक समानांतर मैथिली साहित्य आंदोलनक संग प्रारम्भ भेल, ऐ मे जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, संदीप कुमार साफी आदि नाम अबैत अछि। मोटीवेशन 1.0क मशीन त‍ँ आब मृतप्राय अछि मुदा मोटीवेशन 2.0 क किछु मशीन अखनो समानांतर रूपे‍ँ चलि रहल अछि, किछु रुटीन गद्य आ पद्य रचना लेल एकर आवश्यकता अछि। किछु पुरस्कारक लोभ आ किछु प्रतारणाक डर देखा क' रुटीन काज घुसकि-घुसकि क' चलि रहल अछि। मुदा मोटीवेशन 3.0 क उत्पाद चारू दिस छिड़िया गेल अछि। मोटीवेशन 2.0 मे कन्नारोहट बढ़ि गेल अछि जे मशीनमे ढेर रास बग केर सूचक अछि, मोटीवेशन 3.0 वाइरस विहीन अछि। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष,कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ७) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ८) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 ९) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 १०) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 ११) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-रामक ‘अम्बरा’ २.विनीत उत्पल- नव दिशाक कथा (जगदीश प्रसाद मंडलक गामक जिनगी) २.२.आशीष अनचिन्हार- पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण २.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’ २.मुन्नाजी-अधिकार लेल छटपटाइत मोहन दास २.४.मुन्नाजी-धीया-पुता लेल प्रेरक अछि देवीजी ३. ३.१.नबो नारायण मिश्र- युगपुरुष श्री राजनंदन लाल दास ३.२.केदार कानन- हमर सबहक पंडितजी ३.३.योगेन्द्र पाठक “वियोगी”-एकसरुआ सिपाही ३.४.राम लोचन ठाकुर- रमानंद रेणु के मन पाड़ैत ४.केदार कानन-सहज आ मिलनसार छलाह रेणुजी १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-रामक ‘अम्बरा’ २.विनीत उत्पल- नव दिशाक कथा (जगदीश प्रसाद मंडलक गामक जिनगी) १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ रामक ‘अम्बरा’ ------- ‘अम्बरा’ श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसं 2010 मे प्रकाशित राजदेव मण्डल जीक पचहत्तरि टा विलक्षण कविता सबहक संग्रहक नाम थिक | एहि पोथीक सन्दर्भमे गजेन्द्र ठाकुरजीक टिप्पणी अछि जे ‘अम्बरा’ एकैसम शताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह बनि आएल अछि | कविता सभमे प्रखर मानवीय संवेदनाक विस्तार अछि |कविता निकलैत अछि घरसँ ,आंगनसँ,समाजसँ, देश-दुनियासँ  |कविता देखैत अछि भाषा आ संस्कृतिक हाल,सभ्यताक बिहाड़िमे लोक कोना बनल अछि कंगाल |कविता भेंट करबैत अछि राक्षस सभसँ | राक्षस अछि अज्ञानक,अशिक्षाक,आर्थिक आ सामाजिक असमानताक,अन्हारक, अंधविश्वासक | कविता कहैत अछि : विज्ञानक शक्ति, विज्ञानपर निर्भरता बढ़ल अछि | आत्माक शक्ति कम भेल अछि |परिणाम अछि जे जन-जीवनमे तनाव बढ़ल अछि | कविता नहि चाहैत अछि ककरो आँखिमे नोर | ककरो आँखिमे नोर नहि रहय, चाहे ओ बच्चा हो, जुआन हो, बूढ़ हो, स्त्री हो, पुरुख हो, चाहे ओ खेतमे पसेना बह्बैत हो आ कि आन ठाम | पुरान बाट सभ पर काँट-कूश बढि गेल अछि | कविता नव बाट दिस तकैत अछि | लोक नहि चाहैत अछि बाढ़ि  आबय आ जीवन नष्ट भ’ जाए, मुदा बाढ़ि  बेर-बेर अबैत अछि | लोक असहाय भ’ जाइत अछि | लोक धूम-धामसँ  बेटीक बियाह करैत अछि |बेटी सासुर जाइत अछि, मुदा सबहक ध्यान बेटीपर टांगल रहैत छैक | सासु चलाबै ठुनका पति भाँजैत अछि डांग केकरा कहबै मोनक बात ससुर पीबैत अछि भांग पहिने बचत जान तखन राखब कुलक मान चाहे किछो बितइ आब नहि जाएब ओहि घर .... (कविता : रूसल धीया) लोक चाहैत अछि हमर देश जोरगर हुअए | एकता रहै |मुदा नहि होइत छैक | घरमे एकता नहि होइत छैक |हमसभ भाए सँ  अलग होइत छी |किछु बरखक बाद हमर सबहक पुत्र भैयारीमे बाँट-बखरा करैत छथि | इएह क्रम चलैत रहै छै | आइ हमरो दुनू बेटा भ’ रहल अछि भिन्न बाँट-बखरा क’ रहल गिन-गिन ... ( कविता : अढाइ हाथक सांगि ) एक भिखमंगा दोसर भिखमंगापर हँसैत अछि | लोक संस्कृति आ सभ्यताक बीच त्रिशंकु बनल अछि : कखनहुँ  कानैत अछि लोक कखनहुँ  गबैत अछि गीत किछु काल करैत झगडा किछु काल करैत अछि प्रीत ... ( कविता : अनमोल जिनगी ) कविता करैत अछि जीवन-मूल्यक बात | बच्चा जनमि गेल, बेटा भेल सुनितहि घर खुशीसँ  भरि गेल सौंसे टोल खबरि  पसरि गेल बढ़ए लागल उछाह कहलक लोक वाह-वाह मुनियाँ अछि लछमिनियाँ तखने एकरा परसँ जनमल छौंडा... ( बाल कविता: मुनियाँक चिन्ता ) कविता मानव-मनमे व्याप्त छुद्रताक सूचना दैत अछि | ई झगड़लगौना पिशाच नै आबए देलक अपनापर आँच रखने सभसँ मेल, खेलैत रहल झाँपल खेल जकरा संग करै ई कनफुसकी तेकरा मुखसँ  उड़ि  जाइछ  मुसकी ... ( कविता : झगड़लगौना पिशाच ) प्रकृति लोकक रक्षा करैत अछि, मुदा लोक ओकर आदर नहि करैत अछि | लोकक अशुभ-चिन्तनक असरि प्रकृतिपर पडैत छैक आ फेर तकर असरि लोकपर | गाछसँ घेरल चारू भर मध्यमे छल दू टा घर चारू भरक गाछ झडकि गेल तैयो आगि नै बहरा भेल ईश्वर केहेन रचना रचि गेल दू टा घर जडल सौंसे गाम बचि गेल ..... ( कविता : गाछक वलिदान ) बिरिछ पर कुडहरि दन-दना रहल अछि दूनू भाँइ भन-भना रहल अछि यएह गाछ छिऐ झगडाक जड़ि एकरा देबै आइए काटि ....... ( कविता: गाछक हिस्सा ) भौतिकवादी प्रवृति लोककें आंतरिक रूपसँ कंगाल बना दैत छैक | सोनाक घर ...... मनोरथ पूरा भेल किन्तु यएह आइ जहल भ’ गेल .... ( कविता : पत्रोत्तर ) अंतिम कविता ‘आँखिक प्रतीक्षा’ ह्रदयक पियासक बात करैत अछि | शरद पूर्णमाक ई राति देखबाक अछि उत्कट इच्छा हम करैत रहब जिनगी भरि प्रतीक्षा | ई प्रतीक्षा कथीक ? कहिया धरि ? ई जनबाक लेल राम ( राजदेव मण्डल )क ‘अम्बरा’ अहाँक प्रतीक्षा करैत अछि | २ विनीत उत्पल नव दिशाक कथा (जगदीश प्रसाद मंडलक गामक जिनगी) मैथिली साहित्यमे पिछला डेढ दशकसं जे कथाकारक कलम ग्रामीण परिवेश कअ लअ पाठकक आगू मुखर अछि, ओहिमे जगदीश प्रसाद मंडलक नाम सबसं आगू अछि। गामक घटना आ परिघटनाके जहि रूपमे ओ अप्पन कथामे प्रतिष्ठित करैत छथिन, ओ आजुक बाजारवादक कालमे विलक्षण अछि आ ओ लीकसं हटि अप्पन नव बाट बनाबैत अछि। हुनकर कथाक नायक आ नायिका गामक ओ लोक अछि जे पारंपरिक समाज सं बारल अप्पन मजूरी आ जीवनयापनमे लागल रहैत अछि। चूंकि मैथिली साहित्य सब दिन सवर्णक थाती रहल अछि ताहिसं नहि ते एहन पात्र पर आय धरि कोनो कथा लिखल गेल, नहि कोनो एहन रचनाकार बहरायल जे समाजक ओहि हिस्साक कथाक दृष्टिसं देखय। यहि कारण अछि जो दू दर्जनसं बेसी पोथी लिखलाक बादो मैथिली साहित्यक समानांतर धरासं फराक गणमान्य विद्वान लोक हुनका एक तरहे बारने अछि। ओना बारने शब्द जगदीश प्रसाद मंडल लेल गलत होयत। सत गप ई अछि जे मैथिली साहित्यक एखुनका तथाकथित सवर्ण मानसिकता बला विद्वान लोक पढ़ब बिसुरि गेल अछि आ ओ भीखमे मांगल पोथी या मुफ्तमे भेटल पोथीक पढ़बाक उचित बुझैत अछि। एहन कालमे जगदीश प्रसाद मंडलक कथा ओहि समाज पर एकटा थापड़ अछि, जे पढ़ब लिखबसं दूर पोथी प्रकाशित करबाक आ ओ ओहि पोथी पर कोनो पुरस्कार भेटबाक तिकड़ममे लागल रहैत अछि। हिंदीमे प्रेमचंद आ फणीश्वरनाथ रेणु ग्रामीण परिवेशक सबसं पैग कथाकार अछि आ ग्रामीण परिवेशक चित्रण करयमे हुनका आगू कियो नहि टिकय अछि, मुदा जौं ओहि बेस पर जगदीश प्रसाद मंडलक कथा देखल जाय ते हुनकर बेसी कथा ओहि जमीन पर ई दूनू गोटा सं बड़ रास आगू अछि। ओ गामक चित्रण संग-संग ओहि परिस्थितिक सेहो चित्रण करैत अछि जहि दशामे गाम-घरक लोक रहैत अछि। मैथिलीक कथाक दृष्टिसं देखल जाय ते राजकमल चौधरी, यात्राीजी, मायानंद मिश्र, ललित, धीरेंद्र, धूमकेतु सं लअ कअ सामानांतर साहित्यक कथाकार सुभाष चंद्र यादव, दुर्गानंद मंडल, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, मानेश्वर मनुज, उमेश मंडल, मुन्नाजी, गजेंद्र ठाकुर, कुमार मनोज कश्यप, मुन्नी कामत जेहन कथाकार सेहो अपन कथामे गामक परिवेश कअ परिलक्षत करैत अछि। जगदीश प्रसाद मंडलक कथा संग्रह गामक जिनगीमे कुल 19 टा कथा अछि जे पूर्णतया गामक कथा अछि आ गामक वातावरणमे उपस्थित सब रास गुण व अवगुण कअ पाठकक आगू राखल गेल अछि। कथा लिखयमे जगदीश जीक कोनो जोड़ नहि अछि, यै कारण अछि जे कोना कोनो कथा यू-टर्न लैत अछि, ओ हिनकर सबटा कथामे देखल जा सकैत अछि। कोनो कथाक पात्रा कखनो लागैत अछि जे ओ निराश भावसं भरल अछि आ हुनकर जिनगीमे कहियो इजोत नहि हेतय। ओ जिनगी भरि संघर्ष करैत रहतय, ताहि ठाम पात्राक जिंदगी टर्न लैत अछि आ ओकर जिनगी मे एकटा किरणक प्रवेश होयत अछि आ जिनगी बदैल जायत अछि। जिनगी उमंग सं भरि जायत अछि। यहि टर्निंग प्वाइंट आनब कथाकारक सफलता अछि आ ओहिमे जगदीश मंडलक आगू कोनो समकालीन कथाकार ठहरय नहि अछि। ई कथासंग्रहमे 'भैंटक लाबा', बाढ़ि कअ लअ कअ, 'बिसांढ़' अकालक या रौदक जमीन पर आ 'पिरारक फड़' आन दिना खानपानक बेगरता कअ लअ कअ लिखल गेल अछि। तीनो परिस्थितिमे पति-पत्नी कोना सामंजस्य बनाकअ चलैत अछि आ जीवन सं आ जीवनमे संघर्ष करैत अछि, एकर प्रामाणिकता कथामे लखाह दैत अछि। अहि बाजारवाद जुगमे जखन संबंधक बिखराव एकटा नव मोड़ पर ठाड़ अछि, तहि कालमे एहेन कथाक लिखब कोनो क्रांतिसं कम नहि अछि। ताहिना 'अनेरुआ बेटा'ई समाजक लेल सीख अछि जे कोनो एकटा दंपत्ति एकटा नेना के पोसैत अछि, जेकरा अप्पन कोनो संतान नहि अछि आ ओकरा पढ़ा-लिखाकअ ओहि ठाम पर पहुंचाबैत अछि, जे कियो सपनोमे सोचि नहि सकैत अछि। 'ठेलाबला' नामक कथा अहि समाजक मुंह पर तमाचा अछि, जे अप्पन कमाई केर दम पर नेना कअ कतय धरि पहुंचैलक। ताहिना 'रिक्शाबला', 'डाॅक्टर हेमंत', 'पंचपरमेश्वर', 'घरदेखिया', 'बहीन', 'बोनिहारिन मरनी', 'चूनवाली', 'डीहक बंटवारा' कथाक पाट कथाक नव इतिहास रचयमे सक्षम भेल अछि। अहि तथ्य सं इंकार नहि करल जा सकैत अछि जे जगदीश प्रसाद मंडल लग जे गामक शबदक संग कहबी अछि, संवादक संग-संग चरित्रा अछि जे कोनो समकालीन कथाकार लग नहि अछि। हुनकर यहि गुण आन कथाकार सं हुनका परछाबय अछि आ यहि हुनका कथाकारक भीड़ सं पफराक करैत अछि। ई गप दृष्टिव्य अछि जे हुनकर बेसी रास कथाक पात्र समाजक ओ लोक अछि जे आय धरि कहियौ कोनो भाषामे मुख्य पात्राक तौर पर कोनो कथामे नहि आयल अछि। हुनकर पात्रा सेहो गामक परिचय कराबैत अछि जेना, दुखनी, लुखिया, पफेकुआ, रघुनी, बुचाई, भुलिया आदि। ताहि सं कथाकार गजेंद्र ठाकुर एकठाम लिखैत छैथ जे जगदीश प्रसाद मंडलक कथा मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि तथा हिनक कथा मैथिली कथाके एक भगाह होएबासं बचा लैत अछि। ई समानांतर मैथिली साहित्यक देन अछि जे जगदीश प्रसाद मंडल जेहन कथाकारके पाठकक आगू आनलक। ओना जगदीश प्रसाद मंडलक कथा विदेह सं पहिने मिथिला दर्शनमे छपल छल। गामक जिनगी कथा संग्रह आजुक दौरक एहन कथा संग्रह अछि, जे पाठक कअ कथ्यक नव धरातल पर लअ जायत अछि आ गाम-घरक शब्दसं सेहो आत्मसात कराबैक अछि। हम सब ओहि कालसं गुजैर रहल छी जतय अंग्रेजीक आगू दुनिया भरिके बड़ रास भाषा खत्म भअ रहल अछि आ अंग्रेजी एकटा वैश्विक भाषा जना उभरि रहल अछि। जना पैग माछ छोट माछ कअ निगैल जायत अछि, तहिना अंग्रेजीक आगू आन भाषके भअ रहल अछि। आहि कालमे जगदीश प्रसाद मंडलक कथा एकटा इजोत देखा दैत अछि, जे भाष की छी आ ओ कोना जीवित रहत। अहि दशामे जगदीश प्रसाद मंडल एकटा नव दिशा दैत अछि जे शहरीकरण काल मे गाम-घर बचबाक चाहि आ ओतौका परिवेश तखने बचल रहत जखन गाम-घरक संस्कार, संस्कृति आ भाषा बचत। अहि मे हुनकर सभ रास कथा सन्देश दै मे सफल अछि, जे कथाकारक सेहो सफलता अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। आशीष अनचिन्हार पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण एगो नदी रहै जकर नाम पद्मा रहै। ओइ नदीक कछेरमे एकटा गरीब ब्राम्हणक निवास रहै। ब्राम्हण गरीब रहथि मुदा विद्यावान सेहो। मुदा विद्यावान रहने की? आ जखनहम ई खिस्सा अहाँकेँ सुनबऽ लेल बैसल छी तखन हमरा अपने एकटा सिनेमाक खिस्सा मोन पड़ि गेल। आमिर खान अभिनीत फिल्म छै "थ्री इडियट" ओना ई मूलतः चेतनभगत केर खिस्सा छै। खएर ओइ फिल्म केर नायक अपन मालिकक बेटाक नामपर पढ़ै छै मने विद्या नायक केर हिस्सामे आ डिग्री मालिकक बेटाक हिस्सामे। हँ, त कहै छलहुँ जे पद्मा नदीक कछेरमे एकटा गरीब ब्राम्हण छलाह जिनका अपने नहि आनो भाषाक रचना अपन भाषामे अनुवाद करबाक सौख-सेहंता रहनि आ समयपाबि करबो करथि। लोक कहै छै बहुभाषी भेनाइ बहुत नीक छै। लोकक मोताबिक जे जते भाषा सीखि सकै तते नीक मुदा हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि (ई अनुभव हमरा मात्र दस सालमे पूरा उत्तर आ उत्तर-पूर्व भारतमे रहबाक दौरान भेल) जे बहुभाषी भेनाइ प्रवासी लोकक लक्षण छै। से चाहे ओ ओ कोनो राज्यक किएक ने हो। मिला लिअ हमर अनुभव गलत नै हएत। फेर हमरा एकटा आर सिनेमा मोन पड़ि गेल जाह सिनेमा नै बल्कि कतेको सुपरहिट सिनेमाक कथा देबए बला आ राजेश खन्नाकेँ सुपर स्टार बनबए बला गुलशन नंदाक एकटा उपन्यास "घाट का पत्थर" मोन पड़ि गेल। ऐ उपन्यासमे नायक-नायिकाक जान बचबै छै। बदलामे नायिकाक बाप ओकरा अपन बिजनेसक साझीदार बनबै छै मुदा नायक केर मोनमे नायिका छै मुदा नायिका ओकरा पसंद नै करै छै। बादमे ई पसंद-नापसंद अपन चरम अवस्थामे पँहुचि जाइ छै। नायक द्वारा जखन बिजनेसक सभ भेद खुजबाक डर होइ छै तखन नायिका नायकसँ बियाह तँ कऽ लै छै मुदा दूनू मतभेद पहिने जकाँ रहै छै। दूनूक मिलनसँ एकटा बेटा जन्मै छै जे बादमे जा कऽ अपन बापकेँ मारि दै छै। आब अहाँ सब अकच्छ भऽ गेल हएब। कहाँ ई साहित्य केर लेख आ कहाँ ई सड़ल फिल्म सभ। ओनाहितो अहाँ सब सोबर लोक छी तँ चलू हम फिल्मक बात बादमे करब। 2009मे ओइ गरीब ब्राम्हणक कोखिसँ एकटा अनुवाद जन्म लेलकै जकर नाम छै " पद्मा नदीक माँझी"। जखन माए-बाप गरीब तखन कोनो बच्चा लेल कियो सोहर की बधैया नै गाबै छै। हँ बेर-बेरपर छठिहारक भोज नै भेटलै से चर्चा जरूर करै छै। ओना कहीं कहींसँ निछाउर रूपी पुरस्कार सेहो छै मुदा जखन बच्चे गरीबक छै तखन खोज कि पुछारी काहँसँ? सरकार बहादुर तीन सालक उमेर धरिक बच्चा सभ लेल प्रयास करै छै मुदा से तँ अहूँ के बूझल हएत ने जे दलालक बच्चा गरीबे केर दाना खा कऽ नमहर होइ छै। तँ देखू तीन सालक आन किछु बच्चाक लिस्ट जिनका सरकार बहादुर पुरस्कार देलखिन-- 2009- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) 2010- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) 2011- श्री खुशीलाल झा (उपरवास कथात्रयी, रघुवीर चौधरीक गुजराती उपन्यास) 2012- श्री महेन्द्र नारायण राम ("कार्मेलीन" कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) जँ 2009 आ 2010 बला बच्चा के देखबै तँ वर्तमान समय लेल भने संतुष्टि लागए मुदा 2011 आ 2012 देखिते अहाँ अपन माथा फोड़ि लेब से हमरा विश्वास अछि। 2009आ 2010 दूनू अनुवाद मूल ग्रंथसँ भेल अछि मुदा 2011 आ 2012 ????? 2011 आ 2012 केर बच्चासँ गरीब "पद्मा नदीक माँझी" केर तुलना करी तँ पद्मा नदीक माँझी बहुत बलिष्ठ अछि मुदा पहिनेहें कहि देने छी जे दलालक बच्चा गरीबकबच्चाक खोराकी खा कऽ जीबै छै से एहू ठाम छै। आब प्रश्न उठै छै जे ऐ पद्मा नदीक माँझी के पुरस्कार किएक ने भेटल तँ तइ लेल अनुवाद पुरस्कारक शुरूसँ 2012 धरिक लिस्ट देबए पड़त आ से हम परिशिष्टमे देब।ओहि ठामसँ देखलापर पता चलत जे लगभग 70 प्रतिशत ओहनकेँ पुरस्कार भेटल छै जकर अनुवाद कर्ता मूल भाषा जनिते नै छथि उपरे देखू ने 2011मे खुशी लाल झाकेँभेटलनि तिनका गुजराती नै आबै छनि तेनाहिते महेन्द्र नारायण रामकेँ कोंकणी भाषा कतेक आबै छनि से तँ भगवाने जानथि कि जूरी जानथि मुदा जनता तँ जानिए रहलछै। हम पहिनेहों कहलहुँ एखनो कहि रहल छी ई खुशी लाल झा कि महेन्द्र नारायण राम सन झुट्ठा अनुवादक आ एकरा चूनए बला दलाल जूरी सभ गरीबक पुरस्कार खा कऽमहान बनल अछि। आबो अहाँ सभकेँ फिल्म "थ्री इडियट" मोन पड़ल कि नै। विद्या तँ पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण लग छनि मुदा ओकर डिग्रीपर दलाल सभ कब्जा केने अछि। भने पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण मूल भाषासँ अनुवाद केने होथि मुदा सरकार बहादुर तँ दलालक फेरामे छथि। तँए "पद्मा नदीक माँझी" आ ओकरा सन-सनकेँ पुरस्कार नै भेटलै आ ने भेटतै। आब कने फेर गुलशन नंदाक उपन्यासकेँ देखी। ओहिमे नायक तखने जबरदस्ती नायिका संग बियाह करै छै जखन कि नायिकाक बापक बिजनेसक सभ खराप भेद बूझल भऽ जाइत छै। कहीं पुरस्कारोमे एहने तँ नै छै। भऽ सकैए पुरस्कारक महंथक सभ खराप भेद ई चमचा-दलाल सभ बूझि जाइत हो आ ओइ भेदकेँ सुरक्षित रखबाक लेल पुरस्कार थमा देल जाइत हो। हमरा तँ पहिल तर्कक अपेक्षा इएह बेसी समीचीन बुझाइत अछि। महंथ सभ अपन बिजनेस एही तरीकासँ सुरक्षित रखने अछि।मुदा जेना उपन्यासमे बेटा अपन जिद्दी बापकेँ मारि दैत छै तेनाहिते ई दलाल सभ पुरस्कारक महंथ सभकेँ मारबे करतै। धेआन देबाक बात छै जे आन कियो नै अपने दलाल सभ मारि देतै महंथ सभकेँ। से महंथ जीबऽ की मरऽ मुदा ऐ बातपर संदेह नै जे अनेको पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण चलि जेता असगरें। परिशिष्ट--- साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार 1992- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) 1993- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) 1994- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) 1995- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) 1996- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) 1997- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) 1998- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) 1999- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) 2000- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) 2001- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) 2002- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) 2003- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) 2004- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) 2005- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) 2006- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) 2007- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) 2008- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) 2009- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) 2010- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) 2011- श्री खुशीलाल झा (उपरवास कथात्रयी, रघुवीर चौधरीक गुजराती उपन्यास) 2012- श्री महेन्द्र नारायण राम ("कार्मेलीन" कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’ २.मुन्नाजी-अधिकार लेल छटपटाइत मोहन दास १ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’ मैथिली गजल आ शेरो-शाइरीक लेल ‘अनचिन्हार आखर’ बहुत महत्वपूर्ण नाम अछि | 2008 मे इन्टरनेट पर मैथिली गजल आ शेरो-शाइरीक स्वतंत्र अभियान ल’क’ ‘अनचिन्हार आखर’ नामक ब्लागक संग उपस्थित भेलाह युवा रचनाकार आशीष अनचिन्हार | पहिल बेर गजेन्द्र ठाकुर द्वारा तेरह खंडमे गजल शास्त्र प्रस्तुत कएल गेल आ एतहिसं शुरू भेल मैथिलीमे सरल वार्णिक बहर | स्वयं आशीष अनचिन्हार सेहो एहि ब्लॉगपर मैथिलीमे गजल लिखबाक लेल व्याकरण प्रस्तुत करैत कतेक गजल लिखलनि आ आनो रचनाकार सभसं संपर्क कए हुनका सभकें प्रेरित केलनि गजल लिखबाक लेल |बहुत रचनाकार एहि अभियानमे सम्मिलित  भेलाह | इन्टरनेट पत्रिका ‘विदेह’क एक अंकमे सरल वार्णिक बहरमे आशीष अनचिन्हारक बहुत रास गजल प्रकाशित भेल |आशीषजीक एहेन 78  टा गजल 32  टा कता आ किछु रुबाइक संग वर्ष2011  मे एक पोथीमे आएल जकर नाम अछि ‘अनचिन्हार आखर’जे हमरा जनैत मैथिलीमे पहिल एहेन पोथी अछि जाहिमे सरल वार्णिक बहरमे 78   टा गजल अछि | एहि पोथीकें दू बेर पढलाक बाद हमर जे मंतव्य अछि से निम्नलिखित शब्दमे व्यक्त कएल जा रहल अछि : 1)      एहि पोथीक आरम्भमे गजलक इतिहास  आ  मैथिली गजलक व्याकरण प्रस्तुत भेल अछि | शेर, मतला, रदीफ़, काफिया, मकता आ बहरसं नीक जकां परिचय कराओल गेल अछि | 2)      पोथीमे 78  टा गजलक अतिरिक्त 32  टा कता आ 2  टा रुबाइ अछि | 3)      76 टा गजलमे रदीफ़ आ काफिया दूनू अछि | 2 टामे काफिया मात्र अछि | 4)       2  टा गजलमे 6 टा शेर अछि | शेषमे पांच-पांचटा शेर अछि | 5)       वर्णक संख्याक अनुसार गजलक संख्या एहि तरहें अछि : 8 वर्णक 1 टा गजल अछि 9 वर्णक 1 टा गजल अछि 10 वर्णक 2 टा गजल अछि 11 वर्णक 4 टा गजल अछि 12 वर्णक 8 टा गजल अछि 13 वर्णक 3 टा गजल अछि 14 वर्णक 11 टा गजल अछि 15 वर्णक 12 टा गजल अछि 16 वर्णक 13 टा गजल अछि 17 वर्णक 7 टा गजल अछि                                                           18 वर्णक 6 टा गजल अछि 19 वर्णक 4 टा गजल अछि 20 वर्णक 6 टा गजल अछि                                                           21 वर्णक 1 टा गजल अछि (6 ) मतला : मतला सभमे रदीफ़/ काफियाक पालन नीक भेल अछि | अपवादमे निम्नलिखित गजल सभ अछि : गजल क्रमांक--56 बुझाइत / मिझाइत                                                         गजल क्रमांक--71 तबीयत / रैयत गजल क्रमांक--77 ओन्नी / मुन्नी (7 ) काफिया : मतलाक काफिया आ आन शेर सभक काफियामे मिलान अछि | अपवादमे निम्नलिखित गजल सभकें देखल जाए : गजल क्रमांक    मतलाक काफिया            आन शेर सबहक काफिया 10            दुराचार /  भ्रष्टाचार              बेकार, सरकार,अन्हार, अनचिन्हार 20           भड़ुएक / पहरुएक                मालिएक, निशबदीएक 29           अदना/ पदना                    विपदा,तगमा,भगवा,सुगवा 35           रोकब/ ठोकब                      फ़ोड़ब,तोडब 36           बहन्ना / सन्ना                       जुन्ना 43                     राति / पांति                       आँखि, माटि, हडाहि 55             टूटैत / छूटैत                     लुटैत, कटैत,खसैत 65            जरैत / डरैत                  भरतैक, बजैत, रहैत 67            खसा/ बसा                    बना,सजा,नचा 71      तबीयत / रैयत                   किस्मत 73             मानू / जानू                        बेकाबू (8) मकता   :  बत्तीस टा गजलमे मकताक प्रयोग भेल अछि, से नीक भेल अछि | (9) भाषा आ भाव पक्ष  : गजलकारक अनुसार गजलकें प्रेमी-प्रेमिका ( आत्मा-परमात्मा )क गप्प-सप्प सेहो मानल जाइत छैक आ गप्प-सप्प सदिखन गद्यमे होइत छैक, तें गजल लेल गद्यात्मक भाषा हेबाक चाही | से गद्यात्मक भाषाक नीक स्तरक आकर्षण सभ रचनामे अछि | गजलकार कहैत छथि : “हम अपन गजलमे (किछु शब्दक ) अपूर्ण रूपकें प्रधानता देने छी | पूर्ण रूपक प्रयोग हम खाली वर्ण आ मात्रा मिलेबाक लेल करैत छी |अपूर्ण भाषा गजलक लेल बेसी नीक |” ‘नहि’ के स्थानपर ‘नै’, ‘जाहिठाम’क बदला ‘जै ठाम’, ‘कतेक’ के बदला ‘कते’, हेतैक के बदला ‘हेतै’क प्रयोग शेर सभमे नीक लगैत्त छैक | गजलमे मुख्य तत्व प्रेम होइत अछि |प्रेम कोनो मनुक्ख, प्रकृति,माटि-पानि, संस्कृति, भाषा, देश-दुनियासं भ’ सकैत अछि | प्रेमक अभिव्यक्ति कतेक रूपमे भेल अछि : नोंक-झोंक, उलहन, उपराग,आक्रोश,आवेश आदि तत्व जहां-तहां विभिन्न गजलक शेर सभमे सुच्चा मैथिल दृष्टि  नेने भेटल अछि | बानगीक रूपमे देखल जाए निम्नलिखित शेर सभ : ‘भूखक दर्द होइत छैक प्रकाशोसँ तेज देखू पेटक खातिर दलाल बनल लोक’ ‘चुप्प रहत मनुख गिदर भुकबे करतै निर्जीव तुलसी चौरा कुकुर मुतबे  करतै’ ‘हरेक समय बितैए दुःख आ दर्दमे गरीब लेल नव-पुरान की साल हेतै’ ‘देहे जिन्दा भावना मरि गेलै जग लगैए समसान सन’ ‘नहि बनत केओ राम मुदा सेवक चाही हनुमान सन ’ ‘रामक आदर्श तँ मरि गेल हुनके संगे बुझू आब तँ खाली हुनक नाम चलैए’ ‘ जे नै कमा सकए टका बेसीसं बेसी लोक तँ ओकरे बुझैछै   बेकार सन ‘ ‘घोघक रहस्य त एना बुझियौ झरकल मूंह झपनहि  नीक.’ ‘लोक जहर दैए मुस्किया कए आब त हँसीसँ  डरनहि नीक’ ‘हाथ सटेलासँ मोन केना भरतै अहाँ करेजसं सटा लिअ हमरा’’ ‘जाइ छी मुदा जेबाक मोन  नै अछि कोनो सप्पतसं घुरा लिअ हमरा’ ‘नून नै चटबए पड़तै बेटीकें आब तँ  गर्भपात लेल युद्ध’ ‘बुड़िबक देवी कुरथी अक्षत हम एहने विकास करैत छी’ ‘अहाँक दरस-परस बड्ड महग अछि सटि जैतहुँ अहाँक देहमे बसात भेने’ ‘सबहक घरमे एकटा अगत्ती जन्मए सरकारक निन्न टुटै छै खुरफात भेने ‘ ‘हमरा अहाँ नीक लगै छी सभ दिनसं मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी’ अहाँकें प्रभावित करबाक लेल, चुप्प करबाक लेल, सोचबाक लेल, विचार करबाक लेल आ बेरपर मोन रखबाक लेल सैकडो  शेरसं भरल अछि एहि पोथीक गजल सभ  | पोथीक सम्बन्धमे अपन टिप्पणी प्रस्तुत करैत गजेन्द्र ठाकुरजी कहैत  छथि : “मैथिलीक पुनर्जागरणक ऐ समएमे ऐ पोथीक आगमन मैथिली आ मात्र मैथिलीक पक्षमे एकटा सार्थक हस्तक्षेप सिद्ध हएत | स्वतः स्फूर्त गजलमे जे गेयता आ प्रवाह होइ छै से ऐ संग्रहक सभ गजल, रुबाइ आ कतामे अहाँकें भेटत |” हम एहि टिप्पणीक  समर्थन करैत छी | २ मुन्नाजी अधिकार लेल छटपटाइत मोहन दास लोकतांत्रिक इकाइक रूपमे गिनल जाए बला जन वा जनमानस ओकर शिकार भऽ जाइए आ शिकारी सभ ओकरा बलें सत्ता सुखासीन भ अपन आधारकेँ बेर-बेर थकुचैत कि चेथड़ी करैत अट्टहास करैए। कियो दुब्बर जन जँ कहियो कत्तौ केखनो माथ उठा अपन अधिकार तकैए तहन ओकरेसँ जाबी बना मुँह जाबि देल जाइए आ कि ओकरे बीनल सीकसँ ओकरे फसँरी दऽ देल जाइए। अभिजात्यवर्गक बीच सर्वहारा वर्ग अपनाकेँ उपर करितों नीचा देखा नीचमे रहबाक लेल बेबस होइए। कत्तौ केखनो पाइसँ नीच तँ कत्तौ, केखनो जातिसँ नीच राखि धोधिगरहा सभ ओकर शक्तिक दोहन करैए। आ निचला पौदानक लोक सदिखन उपरका लोकक कत्तौ जातिसँ तँ कत्तौ पाइसँ ओकरा नीचा दबाइत रहि जाइ लेल बाध्य होइए। एहने उपरोक्तो परिस्थिति मध्य एकटा सर्वहारा वर्गक लोक अछि मोहनदास। जे अपन परिस्थितिक संग-संग समाजिक विषम परिस्थितिसँ लड़बाक असफल प्रयास करैत जिनगी काटि रहल अछि। सभ डेग दूरा-दुरखापर अपन डेग अटकि जाइत देखैए मुदा तइयो हारि नै मानैए। थकैए, खसैए आ फेरो हुब्बा कऽ अपन बाट परहँक एक-एक डेग आगू बढ़बैत जाइए।मोहन दासक कथाककार उदयप्रकाशजी एकर घर-परिवार, समाज आ परिस्थिति मध्य घुसि एकल-एक भोगल यथार्थकेँ जीवंत कऽ चित्रण करबामे सफल देखाइत छथि। एक-एक सोच आ घटनाकेँ एतेक महीन आ निस्सन बोध आ चित्रण कथाकेँ महान बनबैत अछि। मोहन दास ऐ स्वतंत्रताक लड़ाइ एकसर वाहक भऽ चलैत बाटपर पौलक हर्षवर्धन ओकीलकेँ। जिनगीसँ झमारल दोसराइतपर विस्वासे कठिन भऽ गेल छै। बिसनाथ ओकील द्वारा सहयोगक आस संशयग्रस्त बुझैए मुदा एकसँ भल दुइमे विश्वास करैत ओकरा संग देबाक आश्वासनपर विश्वास कऽ जा टिकैए। समय बितैत गेल। मोहनदास कस्तूरी अपन मेहनति-मजूरी आ मलहइया मायक कृपासँ कोनो तरहें दिन गुजारि रहल छल। मोहन दास ओइ दफत्रक आगू ठाढ़ छल जतऽ चारि बरस पहिने ओ अपन सभटा सर्टिफिकेट जमा केने छलाह। ओतऽ काज करऽ बला बाबू भरोसा देने छल- अहाँक नाओं तँ कहियो ने कटि सकैत अछि किएक तँ लिकित आ शारीरिक परीक्षामे अहाँ सूचीमे सभसँ उपर छी। मुदा कतेको बरख धरि परिणाम शून्य।ई वएह काल छल जखन लगातार पंद्रह बरससँ हिंदी भाषाक संबंधित पदक चयन समीतिक सभ सदस्य खाली पदपर अपन जमाए-बेटी, बेटा आ समधिकेँ निर्लज्जतासँ नियुक्त कऽ दैत छल। ओइपर ने कोनो सी.बी.आइ इन्क्वाइरी छल ने राज्य सभा वा लोक सभामे कोनो सवाल उठैत छल। मोहन दास सभ ठाम हारैत रहल.. तहन ओ खाडा गाम जा कऽ सिंहनारायण गोंसाइकेँ बजौलक ओकरा बीस टाका आ दालि चाउर, नून-हरदि सीधा देलक। ओकरासँ मलहइया मायक पूजा करौलक आ शुद्ध बकरीक दूधसँ निकालल गेल पाव भरि मालाइक भोज चढ़ौलक। आइ निभरोस भऽ मोहन दास अट्टहास कऽ रहल अछि " जकरा बनबाक छै मोहनदास, हम नै छी मोहन दास। हम बी.ए नै केलहुँ। हम कहियो कोनो नौकरी काबिल नै रही। हमरा चैनसँ जीबऽ दिअ" ई हिंदीक मोहनदास थिक की मैथिली अंग्रेजी की आन भाषाक से लोककेँ पढ़लेपर पता लगतै कारण हरेक समाज नै हमरा हिसाबें तँ हरेक आदमीमे एक टा ने एकटा मोहनदास रहिते छै। विनीत उत्पलजीकेँ बधाइ ऐ अनुवाद लेल। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नाजी धीया-पुता लेल प्रेरक अछि देवीजी धिया-पुताक मोन कचाह होइत छै। जेना बाँसक हरियर करची। ओकरा जिम्हर लिबेबै तिम्हरे लीबि जाएत। ताहि समय बगरता होइ छै ओइ खिज्जा मगज के सजग कऽ ठोस बाट धरेबाक। से जँ सजग रूपे भेल तँ ओ बाट मोकाम धरि स्वतः पहुँचा देबाक कुब्बति रखैए। "देवीजी"केँ समाजिक बदलावक सूत्रधार बना ज्योति चौधरीजी खंडित गिनगीकेँ जोड़बाक सफल प्रयास करबाक चेष्टा कएलनि अछि। ऐ पोतीमे छोट-छोट आलेखक माध्यमें धीया-पुताकेँ प्रेरणा दऽ नव बाटपर चलबाक लेल प्रेरित कएल गेल अछि। धीया-पुता सभ सुग्गाकेँ पकड़ि पिंजड़ामे बंद कऽ रखेए। ओकरा सभ "देवीजी" सिखा देने छै। ओ जखने "देवीजी" बाजए की सभ थपड़ी पाड़ए। देवीजी ओकरा बदला छात्र-छात्रासँ किछु दाना-पानी राखि सुग्गाकेँ पिंजड़ा खोलि उड़ा देलनि। आब सभ चिड़ै ओतऽ दाना-पानी खा-पी कऽ उड़ि जाइत छल। देवीजी ऐसँ धीया-पुताकेँ स्वतंत्र जीवन जीबाक सीख देलनि। परीक्षाक परिणाममे असफल भेल बच्चा सभपर माए-बापक तामस करबापर मना करैत सभ असफल बच्चा सभकेँ दुखी नै भऽ आगू मेहनति आ सफल हेबाक लेल प्रेरित केलनि। आब कोनो बच्चा असफल नै होइए। मैथिलीमे ऐ तरहँक प्रेरक निबंधक पहिल संगोर अछि जे मात्र निबंध नै प्रेरणा आ जे नव बाट सृजनक रूपमे सोंझा आएल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। नबो नारायण मिश्र युगपुरुष श्री राजनंदन लाल दास लगभग तीन दशक पूर्व कलकत्ताक महाजाति सदन प्रेक्षागृहमे मैथिली कार्यक्रमकेँ आयोजन छलै। हम दर्शकदीर्घामे उपस्थित मैथिलीप्रेमी लोकनिक उत्साह देखि रोमांचितभेल छलहुँ। ताहि मध्य एकटा सज्जनकेँ हाथमे मैथिली पत्रिकाक किछु प्रति देखलहुँ। मैथिली पत्र-पत्रिकासँ लगाव हेबाक कारणे हम अपनाकेँ रोकि ने सकलहुँ आ हुनकासँएक प्रति लेलहुँ। विशिष्ट व्यक्ति सभसँ हुनक घनिष्ठ संबंध देखि हम हुनक परिचय पुछने छलहुँ, आ तकर बादसँ आइ धरि निरंतर हुनका संपर्कमे छी। ओ व्यक्ति छथिमैथिलीक त्रैमासिक पत्रिका "कर्णामृत" केर यशस्वी संपादक, मिथिला-मैथिलीक उन्नायक स्वनामधन्य बाबू श्री राजनंदन लाल दास। हिनक जन्म 5 जनवरी 1934 मे अपन मातृक सहरसा जिलाक पटोरी गाममे भेलनि। दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर अंचलक गोनौन गाम हिनक पैतृक गाम छनि। ।स्व. विद्या देवी एवं स्व. मनीलाल दासक ई सुपुत्र वर्तमानमे तीन भाइ, एक बहीनिक अतिरिक्त चारि गोट संतान मध्य मिथिला-मैथिलीक हेतु सतत तत्पर रहैत छथि।अत्यंत खेदक विषय जे हिनक पत्नी राजेश्वरी देवीक निधन हालहिमे 74 वर्षक अवस्थामे कोलकाताक गरफाकेँ आवासपर 24 दिसम्बर 2015केँ भऽ भेलनि। राजनंदन जीक प्रारंभिक शिक्षा बिहारसँ प्राप्त केलाक बाद 1949मे कलकत्ता एलाह। राजेन्द्र छात्र निवासमे रहि राजनीति शास्त्रमे एम.ए केलनि। मिथिला-मैथिलीक प्रतिसाकांक्ष रहबाक कारणे हिनक प्रवेश तात्कालीन "मिथिला लोक संघ "मे 1958मे स्वयंसेवक केर रूपमे भेलनि। आगू जा मैथिलीक आन सभ संस्था जकाँ ईहो संस्था दू भागमेबँटि गेल एक "अखिल भारतीय मिथिला संघ" दू मिथिला सांस्कृतिक परिषद् । दासजी "अखिल भारतीय मिथिला संघ" केर सदस्य बनलाह। दासजी भू-भाषाक प्रति सततसजग रहलाह अछि। ओना तँ मिथिला-मैथिलीक प्रति हिनका छात्रे जीवनसँ सिनेह छलनि मुदा कलकत्ता एलापर तात्कालीन मिथिला-मैथिलीक परिवेश आ युग-प्रवर्तक स्व.बाबू साबेह चौधरी, स्व. देवनारायण झा एवं स्व. प्रबोध नारायण सिंह प्रभृति महानायक लोकनिक सानिध्यमे एलापर हिनक रुचिमे विस्तार भेनाइ स्वाभाविके छल। अपन कर्मठताक बलपर श्री दासजी अखिल भारतीय मिथिला संघक सचिव निर्वाचित भेलाह। ई हिनक लोकप्रियताक प्रमाण छल। ई तँ भेल हिनक संगठनकेँ सुचारू रूपें आगू धरि बढ़ेबाक कला। दोसर पक्ष हिनक साहित्यिक-सांस्कृतिक अछि। पत्रकारितासँ आंतरिक लगाव हेबाक कारणे जे अवसर भेटब निश्चिते छलनि आ से भेटलनि जखन किछु साहित्यिक प्रेमी लोकनि "आखर" नामक पत्रिकाक प्रकाशन केलक जकर संपादक छलाह कीर्ति नारायण मिश्र एवं बीरेन्द्र मल्लिक आ स्वयं छलाह संग छलखिन स्व. पीताम्बर पाठक ओ अन्य। अप्प समयमे ई पत्रिका बहुत लोकप्रिय भेल मुदा एकरो ग्रहण लागि गेलै। किछु अपवाद के छोड़ि मैथिलीक सभ पत्रिका अल्पायु होइत रहल अछि आ तकरे शिकार भेल "आखर"। मैथिल बुद्धिजीवी होइत छथि मुदा ई लोकोक्ति "तीन तिरहुतिया तेरह पाक" सदिखन पछोड़ धेने रहैत छनि। किछु घटनासँ दासजी मर्माहत भेला। ताहि समय ओ एहनसंगठनक प्रयासमे छलाह जे कोनो पत्रिका बिना कोनो दिक्कत चलैत रहए ताहिमे अपन योगदान देबाक निश्चय केलनि आ तकरे फलस्वरूप "कर्णामृत"मे हिनक योगदानकआइ छत्तीसम वर्ष चलि रहल अछि। कर्णामृतक संस्थापक संपादक स्व. अर्जुम लाल करणजी जाहि आत्मविश्वासक संग हिनका ई भार देने छलखिन तकरा सफलतापूर्वकनिर्वाह करैत रहलाह अछि। हिनक लग्नशीलता कारणे भारतक प्रत्येक राज्य एवं नेपालक किछु अंचलमे एकर पाठक ओ ग्राहक अछि। धातव्य जे एहि पत्रिका संचालन ओसंपादन पूर्णतः अवैतेनिक अछि। आइ 82 वर्षक अवस्थामे एखनहुँ  संपादकीय कार्यसँ जुड़ल छथि। प्रारंभेसँ आइ धरि साहित्य सृजनमे नव लेखककेँ प्रोत्साहन दैत रहलाह अछि। मिथिला चित्रकलाक हेतु सतत नव लोककेँ प्रोत्साहित केनाइ अपन धर्म मानैत छथि। पत्रिकाक आवरण चित्रमे मिथिला चित्रकलाक हएब तकरे परिचायक थिक। हरेक साल अक्टूबर-दिसम्बर अंक जे शारदीय विशेषांक रूपें ख्याति प्राप्त केने अछि से संपूर्ण रूपे साहित्य ओ मिथिला चित्रकलापर केंद्रित रहैत अछि। ई शारदीय विशेषांक संग्रहणीय मानल जाइत अछि। एकर अतिरिक्त कथा अंक, मिथिला लोककला-लोकसंस्कृति आदि प्रकाशित भेल अछि। हमरा नजरिमे सभसँ विशेष महत्वपूर्ण वस्तु ई जे अपना समाजक 18  गोट विभूतिक समृतिकमे मरणोपरान्त विशेषांक निकालबाक श्रेय हिनके छनि। इएह हिनक संपादकीय कुशलताक प्रतिमान अछि। आ हिनक इएह कुशलता मैथिलीक संपादकक भीड़सँ अलग करैत अछि। हालहिमे अथिति संपादक श्री चंद्रेशजीक सहयोगसँ कर्णामृतक नेपाल अंक आएल अछि जे बहु-प्रशंसित भेल अछि। कर्णामृतक संपादकीय "हमर कहब"मे हिनक बहुआयामीक्रियाकलाप आ मैथिलीक प्रति सुच्चा सिनेह देखल जा सकैत अछि। साम्यवादी विचारधारासँ ओतप्रोत रहबाक कारणे मैथिलीमे मौलिक नाटक "सन्तो" लिखलनि जकर सफल मंचन सेहो भेल अछि। नाटकसँ लगावक कारणे कर्णगोष्ठीक तत्वावधानमे कतिपय मैथिली नाटकक मंचन करौने छथि। हिनक लिखल किछु पोथी एना अछि-- १)     सन्तो ( नाटक), 2) चित्रा-विचित्रा (कर्णामृतमे प्रकाशित हिनक संपादकीयक संकलन), 3) मिथिला-मैथिलीक विकासमे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान-1974सँ 2011 तक 4) प्रबोध नारायण सिंह ( बिनिबंध-साहित्य अकादेमी) एकर अतिरिक्त अनेको निबंध पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल छनि। वर्तमानमे आत्मकथा, बिनिबंध एवं अन्यान्य महत्वपूर्ण लेखकीय प्रयासमे संलग्न छथि। कतिपय संस्थाद्वारा सम्मानित भऽ चुकलाह अछि। हमरा नजरिमे जतेक सम्मानक ई अधिकारी छथि से एखनहुँ हिनका प्राप्त भेनाइ बाँकी छनि। विडंबना अछि जे हम सभ मरणोपरान्तजेहि व्यक्ति केर गुणगान करैत नहि अघाइत छी तिनके जीवनकालमे उचित सम्मान देबासँ परहेज करैत छी जे घातक अछि। एहन महान विभूतिक विषयमे कतबो लिखबथोड़ हएत। हम अपनाकेँ भाग्यशाली बुझैत छी जे एहन विभूतिक सिनेह सदिखन भेटैत रहल अछि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। केदार कानन हमर सबहक पंडितजी पंडित गोविन्द झाजीक रचनात्मकता एखनो बनल छनि से मामूली बात नहि थिक। मोन पड़ैत छथि जीवकान्त जे कहैत छलाह जे लेखककेँ नित्तह किछु ने किछु लिखैत रहबाक चाही खाहे ओ रचनाकारक नामे पत्रे किएक ने हो, एहिसँ लेखनक क्रमबद्धता बनल रहैत छैक। ठीक इएह बात पंडितजीमे लागू होइत छनि। हुनक जे वयस छनि ताहि वयसमे गाम-घरक बूढ़ लोकनि खटा धयने रहैत छथि मुदा पंडितजीक भीतर जे रचनात्मकता बनल छनि से हुनका बूढ़ नहि होबऽ दैत छनि। ई बात जहिना हमरा सभकेँ चमत्कृत करैत अछि तहिना ईर्ष्यासँ सेहो भरैत अछि। ओ ने तँ रूकल छथि ने ठमकल। ओ एखनो मैथिली भाषा आ साहित्यकेँ समृद्ध कऽ रहल छथि। मोन पड़ैत अछि 2014क कोनो मासमे एक संध्या हुनका संग बितौने रही। संगमे रघुनाथ मुखिया रहथि, अवकाशक दिन छल आ अक्कू भाइ घरहिमे छलाह। बहुत रास गप-सप भेल छल। ओ बहुत आत्मीयता आ आपकताक संग हमरा कहलनि जे "केदार एकटा बात कहैत छी, अहाँ हमर बातकेँ ध्यानसँ सुनू। हम कहऽ चाहैत छी जे मैथिली बला किसुनजीक संग न्याय नहि कऽ सकलाह अछि आ ओ न्याय अहाँ कऽ सकैत छी।" माने, हुनक कहबाक अर्थ रहनि जे हम अपन पितापर एकाग्र एकटा पोथी लिखी। बात हमरा जँचल छल आ ओही दिन हुनका ओतए, हुनका समक्ष हम संकल्प लेलहुँ जे किसुनजीपर हम एकटा पोथी अवश्ये लिखब। ओ अपन पोथी सभ देखौलनि। एक ठाम सजा कऽ राखल। व्यवस्थित। हुनक ई पोथी सभमेसँ अधिकांश हुनक मौलिक लेखन छल, किछु संपादित आ किछु आन-आन भाषाक सर्वोत्तम कृतिक अनुवाद। सभ किछु व्यवस्थित आ एक ठाम। ई एक लेखकक संसार छल जे कतहुँ छिड़िआएल नहि छल। एकटा पूरा कोठलीमे समाएल छल हुनक लेखकीय दुनियाँ। गोविन्द बाबूक संग लागल छनि पंडितजी। मुदा कतहुँसँ हुनक बगए-बानि देखि ओ पंडित माने मिथिलाक पारंपरिक पंडित सन नहि लगताह। वेश-भूामे ओ सभ दिन पैजामा पहिरलनि। देखबा-सुनबासँ पंडितक विपरीत। मुदा जखन हुनकासँ गप होयत, कोनो विषयपर विमर्श होयत, कोनो सिद्धांतक खंडन-मंडन होयत तखन लागत अरे ई तँ संपूर्ण शात्रक गंभीर अवगाहन केने छथि। तखन लागत जे ई मिथिलाक आत्मा बाजि रहल अछि। साहित्यक लगभग सभ विधामे ओ लिखलनि। आ जे लिखलनि से एकदम ठोकल-पीटल। आ से खूब लिखलनि। जीवंत लिखलनि. जागंत लिखलनि। ओ कोनो युवा रचनाकारसँ बेसी युवा छथि। बेसी सक्रिय छथि। बेसी जागल आ जीवंत छथि। कथा गोष्ठी ( सगर राति दीप जरए) सभमे ओ सभ ठाम जाइत-अबैत रहलाह। कथा पाठ करैत रहलाह। राति भरि जागि कऽ आन कथाकारक कथा सभपर अपन महत्वपूर्ण आ विचारोत्तेजक टिप्पणी करैत रहलाह। हुनक सक्रियता रेखांकित करबा योग्य अछि। भारती मंडनक प्रकाशन क्रममे हमरा मोन अछि जे तीन-चारि टा वरिष्ठ लेखक मात्र ओहन विषयपर लिखलनि जाहिपर एक संपादकक हैसियतसँ रचनाक अनुरोध कएल ताहिमेसँ एक पंडित गोविन्द झा छथि। माने ओ विषय मैथिली लेल एकदम नव आ बेछप छल। गोविन्द बाबू ताहिपर अपन कलम चलौलनि। हमहूँ चमत्कृत आ चमत्कृतसँ बेसी आह्लादित। ओ सदैव व्यस्त रहै छथि। किछु ने किछु करैत रहैत छथि। आ जे करैत रहैत छथि से हमरा सभहँक थाती थिक, गौरव आ विरासत थिक। हुनक सक्रियता, हुनक रचनात्मकता हुनक जीवनक संबल थिक। ओ एक योग्य पिताक योग्य संतान सिद्ध भेलाह अछि। संगहि ओ मिथिला आ मैथिलीक योग्य-सुयोग्य पंडित, महत्वपूर्ण लेखक आ विचारक छथि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। योगेन्द्र पाठक “वियोगी” एकसरुआ सिपाही प्रायः बीस बर्ष पूर्वक घटना छी। मइ जून के मास रहल हेतैक। हम कलकत्ता मे एकसरे रही। भोजनक समय रहै। हम भोजन केलाक बाद बरतन बासन धोइ लेल तैयार भेलेरही कि घंटी बाजल। एहन कुसमय मे के आएल होएत ? हम उघारे देह रही, लुंगी आधा समेटने। गर्मीक समय हमर बगे बानि एहिना रहैत अछि। ओही बगे मे हम केवाड़ खोलल। सामने मे ठाढ़ छलाह दुब्बर पातर नमगर पिंडश्याम व्यक्ति। पुछलनि – “वियोगीजी छथि ?” हम की उत्तर दियनु ? एतबे कहलिएनि –“भीतर आउ”। हुनका भीतर बैसाए हम हाथ धो लेलहुँ, लुंगी ठीक केलहुँ, हाफ शर्ट पहिरि लेलहुँ आ हुनका सामने उपस्थित भेलहुँ “जी कहल जाए, अपनेक परिचय ?”हमर जिज्ञासा पर हुनकर उनटे जिज्ञासा छल –“अपनहि वियोगीजी छी ?” हम स्वीकारोक्ति मे मूरी हिला देलिएनि। तकर बाद परिचय भेल आ आगन्तुक महाशय कर्णामृत पत्रिकाक बारे मे बतौलनि। एकटा पत्रिका लेने आएल छलाह से देखौलनि आ हमरा एकर आजीवन सदस्य बनबाकआग्रह केलनि। हम तुरत्ते हुनका पाँच सौ टाकाक चेक काटि देलिएनि। हुनका पत्रिकाक पुरान प्रति सब सेहो देबाक अनुरोध केलिएनि। एतहि सॅं शुरू भेल श्री राजनन्दन लाल दासजी सॅं सम्पर्क। तकर किछुए दिनक बाद ओ स्वo अर्जुन लाल करणजीक संग डेरा एलाह। हमरा गाम मे कर्ण कायस्थक बाहुल्य तेंकायस्थ समाज मे प्रायः सब लोक एहि गाम सॅं परिचित। आ करणजीक तs समधियारु सेहो छलनि हमरे गाम। एवम प्रकारें घनिष्टता बढ़ैत गेल, हम चित्रगुप्त पूजा मे सेहोजाए लगलहुँ आ कने मने कलकत्ताक मिथिला मे घोंसिआए लगलहुँ। आ कर्णामृतक नियमित पाठक तs भैए गेलहुँ। ताहि समय राजनन्दन बाबू काकुरगाछीए मे रहैत छलाह। लग रहने एकाध बेर हुनका डेरो गेल रही। बिमारीक बाद ओ बेटी लग चल गेलाह गरफा-संतोषपुर। कने दूर जरूरभs गेलैक तथापि एहू डेरा मे हम कएक बेर गेलहुँ। मैथिली साहित्य मे हुनक साहित्यिक अवदानक मूल्यांकन करबा मे हम अपना कें सक्षम नहि बुझैत छी। ओ मूल्यांकन तs विद्वान लोकनि कैए चुकल छथि तें ने हिनका‘विदेह समानान्तर पुरस्कार’ देल गेलनि। हम मात्र एकटा जन साधारण रूपें, जकरा साहित्य सॅं कने सिनेह छैक, अपन बात कहब। कर्णामृत सम्भवतः मिथिला मिहिरक बादप्रथम पत्रिका होएत जे पैंतीसम वर्ष मे चलि रहल अछि आ नियमित रूपें लोक कें सब अंक भेटि रहलैक अछि। आ एकर श्रेय एकमात्र हुनके। मात्र किछुए दिन एहन भेलछलैक, जखन राजनन्दन बाबू बहुत अस्वस्थ छलाह जे दू अंक कें जोड़ि एक अंक बहराएल छलैक। तें हमर कहब जे ओ एकसरुआ सिपाही छथि। हमरा बुझने एखनहु हुनककोनो स्थायी आ ओहन ऊर्जावान सहयोगी नहि नजरि आबि रहल छथि जिनका साहित्य जगत सॅं परिचय होनि तें कखनहु कए ई डरो होइत रहैत अछि जे राजनन्दन बाबूकबाद कर्णामृतक भविष्य की हेतैक। कर्णामृतक पोषक संस्था छैक कलकत्ताक कर्णगोष्ठी। ई मानल जाए जे एहि भविष्यक चिन्ता एही संस्थाक कर्णधार लोकनि कें हेतनि तेंभविष्यक चर्चा उचित नहि। मैथिली मे पत्र पत्रिका सॅं बेसी अभाव छैक लेखक के। बहुत कम व्यक्ति छथि जे एकटा स्तरीय रचना लीख सकैत छथि। तेहन स्थिति मे कोनो सम्पादक लेल पत्रिकाकन्यूनतम आकार रखैत समय पर लेख जमा कs कए छपबैत रहब बेस कठिनाह काज छैक। मुदा राजनन्दन बाबूक परिचय क्षेत्र एतेक पैघ छनि आ हिनका प्रति लोक मे तेहनेश्रद्धाभाव छनि जे हिनक आग्रह कें कियो टारि नहि सकल अछि। इएह कारण जे पत्रिका मे नीक रचना सब भरल रहैत छैक। हम जतेक कर्णामृत देखल अछि ताहि अनुभव पर कहि सकैत छी जे ई पत्रिका विशेषांक लेल बेसी प्रसिद्ध अछि। बहुतो विषय पर राजनन्दन बाबू पत्रिकाक विशेषांकप्रकाशित करैत रहलाह अछि। विशेषांक साहित्यिक व्यक्ति केन्द्रित सेहो रहलैक आ ज्वलन्त सामाजिक समस्या केन्द्रित सेहो। शारदीय विशेषांकक अतिरिक्त सोलह टा विशेषांकअछि मिथिला विभूति लोकनिक स्मृति मे। एहि मे अछि बाबूसाहेब चौधरी सॅं लs कए श्रीकान्त मंडल आ सुमन जी सॅं लs कए आरसी प्रसाद सिंह आ प्रबोध नारायण सिंहप्रभृति प्रसिद्ध नाम सब। मिथिला मैथिली सॅं सम्बद्ध कोनो आन संस्था एतेक विस्तृत पटल पर विशेषांक बहार केलक से हमरा सन्देह अछि। मौलिक कृतिक रूप मे हिनक मात्र एकटा नाटक ‘सन्तो’ उपलब्ध अछि। मुदा हिनक प्रत्येक सम्पादकीय सेहो मौलिके रहैछ ने। यदि सबटा एहन लेख कें जमा कs कए कियोरिसर्च करए तs हमरा बुझने किछु नव विचार जरूर उजागर हेतैक जे कोन तरहें राजनन्दन बाबू अपना बहीर समाजक कान पर चिचिया चिचिया कए समस्या सब सुनबैतरहलखिन अछि। सन्तो द्वारा सेहो ई मैथिली आन्दोलनक आगि कें बिएनि होंकैत धधरा उठेबाक प्रयास केलनि अछि। हिनक दोसर प्रकाशित पुस्तक अछि‘चित्रा विचित्रा।’एकरा किछु लोक हिनक मौलिक कृति नहि कहैत छनि। हमरा विचारें ई ठीक नहि। एहि मे एक भाग अछि यात्रा कथा जेबहुत रोचक ढंगें लिखल अछि। यदि वित्तक समस्या नहि रहितैक तs हम बुझैत छी राजनन्दन बाबू एहि कथा सबकें अलग सॅं पुस्तकाकार अनितथि आ तखन कोना हम सबओकरा मौलिक नहि कहितियैक ? मौलिक खाली कथे कविता टा तs नहि होइत छैक। निबन्धो मौलिक भs सकैत छैक ने। सम्पादकीय सॅं हटि कए जे लेख, निबन्ध आदिछैक सेहो मौलिक भेबे केलै ने। हिनक अनेक लेख अन्य पत्र पत्रिका मे सेहो छपल अछि। हिनक एकटा आर पुस्तक प्रकाशित अछि – “मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान”। ओना तs एहू मे पुरने बात सब संकलित छैक मुदा ई एकटानीक ‘संदर्भ ग्रन्थ (reference book)’ बनि गेल अछि। मैथिली आन्दोलन, कलकतिया मैथिलक योगदान आ पत्रकारिताक इतिहास सब बुझबा लेल एकटा संग्रहणीय पोथीअछि ई। नवतुरिया लेल कलकत्ताक स्वर्णिम युगक परिचय प्राप्त करबाक नीक स्रोत। नोकरी चाकरी करैत मार्केटिंग सन काज मे व्यस्त रहैत, जाहि मे सदिखन यात्रा करबा लेल झोड़ा टँगनहिं रहैत छलाह, एकसरे राजनन्दन बाबू जतेक करैत गेलाह से कोनोदृष्टिएँ थोड़ नहि कहल जेतैक, ई हमर मान्यता अछि। तखन लोक कें तs हमेशा अपेक्षा रहैत छैक “आर बेसी आर बेसी” के। आशा करैत छी एखनहु कतोक वर्ष धरि ओसक्रिय रहताह आ एहि अपेक्षा कें पूरा करथिन। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम लोचन ठाकुर रमानंद रेणु के मन पाड़ैत मैथिलीमे बड़ प्रचलित कहबी छै- सीता जन्म वियोगे गेल।, दुख छोड़ि सुख कहियो ने भेल। एहि कहबीक सत्यता सिद्ध करबाक प्रयोजन भरिसके केकरो हेतनि। हमरा लोकनि जनैत छी जे 1931 ई. जनगणनामे मैथिली भाषीक संख्या छल 14275000 जकरा 1951मे मात्र 97685 देखाओल गेल। ई काज केलनि मैथिली विरोधी हिंदीक पक्षधर लोकनि। एकर पृष्ठभूमिमे अबस्से दरभंगा महराज लक्ष्मीश्वर सिंहक जुलाइ 1880 ई.क ओ आदेश छल जे अमला लोकनिकेँ तीन मासक भीतर हिन्दी भाषा एवं नागरी लिपि सीखि ताहीमे समस्त काज करबाक लेल  कहल गेल छलैक। हिन्दीमे साहित्य सिरजनक लेल कएकटा पुरस्कारक घोषणा कएल गेलै आ ताही संग हिन्दी नहि सिखनिहार लेल नौकरीसँ हटा देबाक धमकी। 1910मे बनल " मैथिल महासभा" जकर सदस्यता मात्र ब्राम्हण आ कायस्थ धरि सीमित राखल गेलैक, बाँकी नब्बे प्रतिशत धरतीपुत्रकेँ बारि देलक। एकर तीव्र प्रतिक्रिया भेलैक फलतः ओ लोकनि घर-आँगनमे मैथिली बजितो तकरा स्वीकार नहि करथि आ तकरे फल छै जे मैथिलि साहित्यकारमे एहि वर्गक उपस्थिति नहिये सन अछि। 1930सँ 1940 धरि जे तीस गोट यशस्वी साहित्यकारक जन्म भेल अछि, जिनका लोकनिक प्रतिभाक प्रभासँ मैथिली साहित्य भास्वर अछि। ताहिमे सभ महराजी मैथिल छथि। ललित, धूमकेतु, लिली रे, डा. धीरेन्द्र, मायानंद मिश्र,राजमोहन झा, सोमदेव. रमानंद रेणु, बलराम, जीवकांत, डा. रामदेव झा, कीर्ति नारायण मिश्र, हंसराज, कुलानंद मिश्र, रामानुग्रह झा, आदिक परिचय देब आवश्यक नहि आ हिनका लोकनिमे अपवाद छोड़ि सभ प्रायः प्रगतिशील विचारक पोषक छथि। स्वाभाविक छै जे कोनो रचनाकारक प्रतिभा-प्रतिबद्धताक, हुनक रचनाधर्मिताक विवेचन-विश्लेषण, आलोचना-समालोचना एहि पृष्ठभूमिकेँ ध्यानमे राखिए कऽ कएलो जा सकैछ। रमानंद रेणुक जन्म 1934मे भेलनि। ई बहुविधावादी रचनाकार चलाह। कथा, कविता, उपन्यास, नबंध सभ विधामे ई लिखैत छलाह। खूबे लिखैत छलाह। हिनक पहिल रचना 1950मे प्रकाशित भेल अछि। उत्तर जनपदक अनुसार हिनक दू गोट उपन्यास, तीन कथा संग्रह, तीन कविता संग्रह एवं दू गोट संपादित पोथी अछि। जँ थोड़ अछि तँ तकर कारण प्रकाशन आ वितरण व्यवस्थाक नहि होयब थिक। ई समस्या प्रायः सकल साहित्यकारक संग रहल अछि आ तँइ मैथिली पोथीक संख्या अपेक्षाकृत थोड़ अछि। स्वाभाविक कारणे एहि दयनीय अवस्थाक लेल किछु लोहक दोष तँ किछु लोहारोक मुदा सर्वाधिक दोषी जँ केयो छल तँ से लक्ष्मीश्वर सिंह जकर दुरभिसंधिक कारणे मिथिलाक्षर तँ उठिए गेल, मैथिली भाषाक अस्तित्व सेहो संकटापन्न भ गेलैक।  बिसरबाक नहि थिक जे मैथिल महासभाक कार्यक्रम सेहो हिंदीमे होइत छल। अस्तु। जेना कि कहि चुकल छी जे एहि अवधिक अधिकांश साहित्यकार प्रगतिशील विचारक पोषक छलाह यद्यपि प्रत्यक्षतः तँ ई लोकनि महराजी दुरभिसंधि वा अवधारणाक विरोध नहि कएलनि मुदा प्रकरांतरसँ अपन रचनाक माध्यमें तकर विरोधमे बेस मुखर रहलाह आ तकर प्रमाणमे हिनक लोकनिक रचना उपल्बध अछि।किरणजीक मधुरमनि, यात्रीक बलचनमा किंवा जोड़ा मंदिर, ललितक रमजानी एवं रमानंद रेणुक दूध-फूल एकर प्रमाण थिक। वस्तुतः किरण-यात्राीसँ जाहि प्रगतिशील परंपराक प्रारंभ भेल से हिनका लोकनिक प्रसादात आर बेसी प्रखर, आर बेसी मुखर भेल। मैथिलीमे आद्यावधि जतबा शोध भेल अछि ताहिमे हिनका लोकनिक कृतित्वक कतेक सहभागिता अछि सेहो एकर दृष्टांत स्वरूप उपस्थित कएल जा सकैछ। आ मैथिलि भाषा साहित्यिक भविष्य लेल इएह चिन्ताक कारण अछि। आइयो विद्यालय, विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे मात्र प्राध्यापके लोकनिक रचना पढ़ाओल जाइछ, वएह लोकनि प्रश्नपत्र बनबै छथि, खाता देखै छथि, पुरस्कार देनिहार संस्था सभमे भाइ-भतीजावादक वर्चस्व छैक। आ एहि सभमे जे लोकनि छथि से सभ परंपरावादी महराजी मैथिल। जनकवि यात्रीक नवतुरिया वैश्वीकरणक झंझावातमे उड़िया रहल अछि, लाभ-लोभक लालसामे भसिया रहल अछि। रमानंद रेणुक प्रथम उपन्यास "दूध-फूल" 1967मे प्रकाशित भेल। ई सकलीक व्यथा कथा ओकर संघर्ष आ उपल्बधिक कथा थिक। एकर समापनक एना होइछ " सकलीक अङना मे आइ बड़ चहल-पहल छलैक। भरि गामक छोटका-बड़का सभक नवतुरिया छौंड़ा इम्हर-ओम्हर दौड़ि रहल छलैक। सभकेँ रमदेबा काज हढ़ौती अढ़ा रहल छलैक। आइ ई क्यो नहि कहि सकैत छलैक जे के छोटका आ के बड़का? भोजक पूरा तैयारी छलैक। भरि गामक भोज। सभ क्यो हँसी खुसी सँ खाइत-पिबैत गेल। आ ओहिना हवसैत-खेलाइत ढ़ोल-पिहहीक सङ विदा असली रामसरनक बियाहक लेल। सभ बूढ़-पुरान अपन दरबज्जापर बैसल देखैत रहल। अपन धीया-पूता केँ बरजि सकबाक सामर्थ्य जेना केकरो मे नहि छलैक। मानिजन-सरदारक कान जेना बहीर भऽ गेल छलैक। सभ चप रहल। बरियाती गाम सँ बिदा भऽ गेलैक" एहिमे रेणुजीक प्रगतिशील चिंतन-चेतना, अपन भू-भाषाक उन्नति-विकासक लेल व्याकुलता, हुनक कल्पनामे नवतुरिया लोकनिक स्नेह-सामंजस्य, उत्साह-उद्दीपना आ बूढ़-पूरान अर्थात परंपरावादी लोकनिक बौक-बहीर भेनाइकेँ देखबैत अछि। सत्य कही तँ ई उपन्यास बहुत किछु कहैत अछि मुदा जेना तुलसी दास कहै छथि-- "मूरख हृद्य न चेत जौं गुरू मिलहि विरंचि सम" आ तँइ आइयो मिथिला-मैथिली अवहेलितावस्थाने पड़ल अछि। अपन माटिक गंध, पानिक कान्ति, हवा-बसातक निर्मलता, भाषाक सहजता आ भावक गंभीरताक संग ई एक अद्भुत उपन्यास थिक। 1972मे प्रकाशित भेल हिनक शोककाव्य "ओकरे नाम"। कुल चालिस पृष्ठक ई एक दीर्घ काव्य थिकजे ई अपन दिवंगत पुत्र श्री कृष्ण कुमारक स्मृतिमे, ओकर वियोगमे रचने छथि। स्वीकार करबामे आपत्ति नहि जे एहिसँ पूर्व एहन काव्य हमरा देखबाक अवसर नहि भेटल छल। एक पिताक अपन पुत्रक वियोगमे एहन व्याकुलताकेँ काव्यक रूपमे चित्रित केनाइ अभिनवे कहल जा सकैछ। सत्य कही तँ तँ अपन संतितक शोक ककरा नहि सीदित करैत छैक। मनुख तँ मनुक्खे थिक पशु-पक्षियो अपन संततिक शोकमे विकल भेल विलाप करैछ आ से देखि कोनो भावुक लोक द्रवित भऽ जाइछ। यद्पि पशु-पक्षीकेँ अपन व्यथा व्यक्त करबाक ओ भाषा नहि होइत छैक जे मनुखकेँ उपल्बध छै। रेणु अपन कविताक आरंभ एहि तरहें करैत छथि-- "प्रतिदिन भिनसरे एक टा प्रतिमा बनाउ आ साँझ मे तोड़ि दियौ। ककरो अत्याधिक स्नेह पाप थिक "आत्मज" आत्मज नहि तें दुलार करब दोष थिक समस्त स्त्रीगण आइ बंध्या अछि समस्त माइक कोखि सँ बहराइत छै आगि संपूर्ण धरती पर खेलाइत अछि चित्कार हमरा नहि कहू क्यो "बाप" हम नहि छी केकरो "अपन बाबू जी" आ हम नहि छी अहाँक लग-पास कृष्ण, आइ कोना अङेजि रहल छी अहाँ अपन निस्तेज शरीर जड़ भेल प्रकृति अनुरागहीन वात्सल्य लटपटाइत बोल अपन चुलबुल अस्तित्व खोखसाह व्यक्तित्व आ सयो मोन माटिक चखान? ई कविता एना समाप्त होइछ-- " बन्धु हमरा एकटा विश्वासक डेग उठाबऽ दियऽ हमर अन्वेषी दृष्टि यथार्थक पलड़ा पर आइ बिका गेल। हमरा अनास्थाक भीड़ मे जयबासँ रोकि लियऽ हम मात्र व्यक्ति छी आ व्यथितक संपर्क कैक बरख सँ पीड़ित अछि प्रत्येक पद्धति उपर अछि। हमरा आश्वस्तिक स्वर चीन्हऽ दियऽ। हमरा अपन निजी परिस्थितिमे जीबऽ दियाऽ, बन्धु कतेक विलक्षण अछि ई कविता। आरंभमे व्यक्तिगत विकलताक आभास दैतो शेषमे संपूर्ण मानवताक व्यथा-कथा कहैत "सत्य थिक संसार"केँ चरितार्थ करैत अछि। व्यक्तिक संपर्क जे पीड़ित अछि ताहिसँ उपर उठि मानवीय संपर्क साधनक अप्रितम प्रयास अछि। तँइ कवि विश्वासक डेग उठेबाक आकांक्षी छथि। सत्य थिक मनुखकेँ सार्थक करै चाहै छथि आ इएह महत्वपूर्ण बात थिक।कोनो रचनाकारक व्यक्तित्वक छाप ओकर रचनापर पड़ैत छैक आ एहि व्यक्तित्वक निर्माणमे परिवेशकप्रधानता रहैत छैक।  एहि संग निर्विवाद ओकर चिंतन-चेतना संपृक्त रहैछ जे रचनाक दिशा निर्धारणमे अहम भूमिका निर्वाह करैछ। एहि ठाम हम वाल्मीकिक- मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् । केर उदाहरण देबऽ चाहैत छी। ओ मात्र क्रौंच वधक बात लीखि नहि थम्हला अपित व्याधकेँ शापितो केलनि। आ इएह साहित्यकारक दायित्वो होइत छै। मधुपजी अपन "घसलअट्ठनी" कवितामे भाग्याश्रित भऽ दोषमुक्त नहि भऽ सकै छथि। रेणुजी अपन रचनामे बेस इमानदार छलाह ताहिमे केकरो संदेह नहि हेबाक चाही।एहिठाम हम हिनक कथाक चर्च करऽ चाहब। मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्तासँ 1982मे प्रकाशित भेल हिनक "अन्तहीन आकाश"। एकर पहिल कथा थिक "अग्निजीवी"। अग्निजीवी अर्थात श्रमजीवी, बोनिहार। मैथिलत्वक सीमासँ बाहर। मुदा रेणुजी एहि सीमाकेँ नहि मानैत छलाह। कथाक नायक झरोखी सितलीकेँ लऽ अनैछ। ओकरासँ बियाह करत। मुदा सितली ओकरासँ निम्न जातिक छै आ से सितलीक जातिक माइनजन-देबानकेँ मंजूर नै। "तों हमरा आउरक समाजक मूड़ी छोपि लेलऽ हन। तोरा जरिमाना भरऽ पड़तऽ---- आइ धरि अइ परोपट्टा मे एहन कतहु कुच्छो नहि भेल छलै हन।--- बहार करऽ लड़िकी के। हम आउर अपन समाजक लड़िकी के लऽ जेबै। कि हमरा आउरक समाजक मे लड़िका नहि हइ कऽ जे परजाति मे लड़िकी उठतै गऽ। झरोखी कने सहमि अबस्से जाइत अछि किन्तु सितलीक साहस कनियों झूस नहि होइत छै। ओ निधोख पुछैत छइ-- की मौगी मनुख नइ होइ हइ कऽ? सभ दिना, सभ हालति मे मरद के मालिस करिते रहइ कऽ? आ कुच्छो बोलू तँ गत्तर गत्तर फोड़ि दै ? हमरा लेखे आब माय-बाए, भाय-समाज जे कुच्छो हइ कऽ, एतही हइ। हम आन ठीञा कतहु नइ जेबै। अपना मोन सँ, राजी-खुशी सँ ई घर डेमलिए हन। एक मुट्ठी अन्न आ एक रत्ती सिनेह हमरा ईहे मिलैत हइ कऽ। आब हमरा दोसर कुनो फिकिर नय हइ।" मनुवादी परंपरापर एहन प्रखर प्रहार, नारी विमर्शक एहन ज्वलंत दृष्टांत, प्रगतिशीलताक एहन विलक्षण उदाहरण मैथिलीक साहित्यालोचक लोकनिक दृष्टिपर नहि पड़नि से स्वाभाविके। जाति-गोत्र-संबंधक चकभाउर दैत आलोचनाक लेल ई सभ सोचलो नै जा सकैछ। मुदा प्रगतिशील विचारक सर्जनात्मक साहित्यकार रेणु जीक लेल ई कतेक सहज अछि से सहजहि बूझल जा सकैछ आ इएह थिक रेणु जीक विशेषता। रमानंद रेणु मैथिलीक एक विरल-विलक्षण विभूति छलाह जनिकापर कोनो मैथिलीभाषीकेँ गर्व हेबाक चाही। हिनक कविता संकलन "कतेक रास बात" जे 1197 ई. मे प्रकाशित भेल ताहीपर साहित्य अकादेमी पुरस्कारो प्रदान कएलक। परंच आवश्यक नहि जे हिनक एक-एक रचनापर पृथक-पृथक मंतव्य देल जाए। कोनो पत्रिकाओ लेल सभंव नहि जे ओतेक पैघ निबंध छापत। तँइ हिनक स्मृतिकेँ शत-शत नमन करैत हम एतै विराम लैत छी। सुविधा भेने बेसी दोसर बेर। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। केदार कानन सहज आ मिलनसार छलाह रेणुजी ओ रमानंद लाल दास छलाह जे लेखनमे रमानंद रेणु भेलाह। सुपौल जिलासँ सटल उसमामठक निवासी। आरंभिक रचना सभ हुनक गीत विधामे हमरा सभकेँ प्राप्त होइत अछि। बादमे ओ नवकवितासँ जुड़लाह आ एहि विधाकेँ श्रीसंपन्न कएलनि। गद्य लेखनमे जखन उतरलाह तँ कथा आ उपन्यास विधामे प्रचुर लेखन कएलनि। हुनक लेखनक समालोचना तँ समालोचक आ आलोचक करताह मुदा हम मानैत छी जे ओ वास्तविक अर्थमे एक श्रेष्ठ मनुख छलाह। सहज-सरल आ मिलनसार। हुनक व्यक्तित्व आकर्षक छल। रेणुजी मैथिलीमे पहिल एहन लेखक भेलाह जे राजकमल चौधरीक बंगलाक चर्चा कएलनि। 1967 मे, फरवरी मासमे  सुपौलमे आयोजित नवकविता सेमिनारमे ओ भाग लेने छलाह। प्रायः हमरा सभकेँ बूझल अछि जे इएह सेमिनार राजकमल चौधरीक अंतिम सेमिनार साबित भेल। फरवरी मासमे सुपौलमे  संपन्न भेल ई ऐतिहासिक द्विदिवसीय समारोह अनेक अर्थमे महत्वपूर्ण छल। एहि समारोहक (कविगोष्ठीक) अध्यक्षता राजकमले केने रहथि। एहि वर्षक जूनमे राजकमल हमरा सभकेँ छोड़ि अनंत अकाशमे नुका गेलाह। सुपौलक समारोह समाप्त भेलाक बाद राजकमल अपन कुछु लेखक मित्रकेँ अनुरोधपूर्वक अपन गाम महिसी लऽ गेल छलाह। ओहिमे रमानंद रेणु सेहो रहथि। राजकमलक अपन प्रभामंडल छल। अपन चमक, अपन व्यक्तित्व आ अपन बहुआयामी प्रतिभाक कारणे सभ हुनकासँ जुड़ऽ चाहैत छल। जखन ई लोकनि महिसी पहुँचलाह तँ हिनका सभक भव्य स्वागत कएल गेलनि। रमानंद रेणु, जीवकांत, कीर्तिनारायण मिश्र आदिक संग राजकमल तृप्त रहथि। पहिल बेर ओहि बंगलाक चर्चा रमानंद रेणु कएलनि जे महिसीमे "फूल बाबनूक बंगला' नामे ख्यात छल। ओहि फैघि सन गाममे अपना तरहक ई विशिष्ट आ मनोहारी बंगला राजकमल बहुत मनोयोगसँ बनबौने छलाह। सुनैत छी जे अज्ञेय ओहि भंगलाक गृहप्रवेशक अवसरपर उपस्थित रहथि से राजकमलक इच्छा रहनि। अनेक इच्छा जकाँ राजकमलक ईहो इच्छा हुनका संग चलि गेलनि। तँ कहैत रही जे राजकमलक ओहि बंगलाक चर्चा पहिल बेर रमानंद रेणुजी केने रहथि जखन राजकमलक आतिथत्यक बाद ई लोकनि अपन-अपन गाम घुरल रहथि। ई लेख संस्मरणक रूपमे राजकमलक मृत्यु 19 जून 1967 बाद "आखर" (कलकत्तासँ प्रकाशित)मे प्रकाशित भेल छल। "आखर" प्रकाशनक जड़ि सुपौले छल। एहिठामक सेमिनारमे आखरक प्रकाशनक योजना बनल छल। तकर एक सहभागी रेणुजी सेहो छलाह। महिसीमे, साँझमे तारास्थान दिस टहलैत अपन अतिथि लोकनिकेँ राजकमल बंगट मिसरक गायन सुनाबए चाहैत रहथि। एकरो चर्चा रेणु केने छथि बंगट झाक रूपमे। मुदा ओ बंगट मिसर छथि झा नहि। संयोग जे तारानंद वियोगी एखने दू-तीन सप्ताह पहिने सुपौल आएल रहथि तँ हमरा आ सुभाषचंद्र यादवकेँ बंगट मिसरक गायन ( जकरा ओ अपन मोबाइलमे टेपित केने रहथि) सुनौलनि। बंगट जी जिबैत छथि आ हुनक कार्यस्थल एखन सिंहेश्वर थिकनि जतऽ ओ प्रवचन आदि दैत छथि आ अपन गायन कलाक प्रयोग सेहो करैत छथि। हुनक मूल नाम थिकनि पंडित ताराकांत मिश्र। गामक नाम बंगट  मिश्र। मोन पड़ैत अछि जे रेणुजीसँ भेंट करए जाइत रही तँ ओ अपन एक्सचेंज आफिसमे भेटैत छलाह। मोबाइल आ लैपटापक जमाना नहि छल। एक्का-दुक्का लोक लग चोंगा बला फोन रहैत छलनि। ओही एक्सचेंज आफिससँ फोन अथवा तार (टेलीग्राम) कएल जाइत रहै। ओ आफिसमे बहुत लोकप्रिय छलाह आ आनो स्टाफ सभ सम्मानक दृष्टियें हुनका देखैत रहनि। ओ कतबो व्यस्त रहथि, मोन अछि जे आफिससँ निकलि बिनु जलखै आ चाहक घुरए नहि दैत छलाह। कुशल-क्षेम आ हालचाल, गाम-घरक हाल-सूरति पुछैत रचनादिक विषयमे अवश्ये चर्चा करथि। राय साहेबक पोखरि लहेरियासराय, बला घरोपर अनेक बेर हुनका ओतए जयबाक अवसरि हमरा भेटल रहए। ओ जतेक सिनेह आ आतुरताक संगे भेंट आ गप्प करैत छलाह से दुर्लभ छल। अत्यंत स्नेहिल आ मिलनसार। संवेदनशील तेहन जे जखन हुनक हेठ पुत्रक असामयिक निधन भऽ गेल रहनि तँ ओ अत्यंत मर्माहत स्थितिमे दीर्घ कविता ( जे "ओकरे नाम"सँ प्रकाशित भेल) लिखलनि, प्रायः एक्कै रातिमे वा एकै सप्ताहमे। बहुत दिन धरि ओ अवसादमे रहला। स्वाभाविक छल। मुदा साहित्य प्रतिकूलो स्थितिमे मनुखकेँ उबारैत अछि रेणुजी सेहो उबरलाह आ फेर साहित्य सृजनक अनंत श्रृखंलामे जुड़ि गेलाह। मैथिलीमे अथवा कोनो साहित्यमे एकै टा दुख नहि छै। एकैटा समस्या नहि छै। अनेक दुख आ समस्यासँ रचनाकार संघर्षरत रहैत छथि। रेणुजी जतेक लिखलनि, नीक वा बेजाए एहिपर चर्चा के करत? ई एक पैघ प्रश्नचिन्ह थिक। जीवनक सभ किछुकेँ दोसर प्राथमिकता बूझि पहिल प्राथमिकता लेखनकेँ देबए बला लेखककेँ अन्ततः (अन्ततः नामसँ रेणुजीक एक कविता संग्रह सेहो छनि) की भेटैत छनि। आवश्यक अछि जे रमानंद रेणुक साहित्यिक अवगाहन हो, ओकर मूल्याकंन हो, ओहिपर चर्चा ओ विमर्श हो, सेमिनार हो.... तखन पाठक हुनक हुनक रचना संसारक मर्म बूझि सकताह आ रेणुजीकेँ तखने वास्तविक रूपमे चीन्हि सकब। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु विदे हwww.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.comVideha Ist Maithili Fortnightly ejournal  'विदेह' २०० म अंक १५ अप्रैल २०१६ (वर्ष ९ मास १०० अंक २००)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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