VIDEHA — Issue 202 / अंक २०२

Publication: VIDEHA · Issue: 202
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118 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २०२ म अंक १५ मई २०१६ (वर्ष ९ मास १०१ अंक २०२) ऐ अंकमे अछि:- १ विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१४ अनुवाद पुरस्कार सं सम्मानित- श्री विनीत उत्पल [“मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल] द्वारा अनूदित: साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत हिन्दी कहानी रेहन पर रग्घू- काशीनाथ सिंह आ २. पल्लवी मण्डल- दृष्टिकोण १ साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत हिन्दी कहानी रेहन पर रग्घू काशीनाथ सिंह हिन्दी सं मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल कोलकातामे तेजस्वी पत्रकार बांग्ला-हिन्दी-सेतु अप्पन छोट भाय कृपाशंकर चौबेक लेल जों ‘काशी का अस्सी’ हमर नगर छल ते ‘रेहन पर रग्घू’ हमर घर अछि-आओर शायद अहों के. काशीनाथ एक 1 जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा रहए दुपहरिया। कनी काल पहिने रौदे छल। ओ खेनाइ खेने छल आ खा कऽ अखन अप्पन कोठलीमे पटायले छल आकि एकबैग बिर्रो ऐल। घरक सभटा खुजल खिड़की-दरबज्जा धाँइ-धाँइ करैत अपनेसँ बन्द हुअए लागल आ खुजए लागल। किल्ली उड़ि कऽ कतौ खसल आ भट-भट की-की केना-केना खसऽ लागल, लागल जेना धरती थरथरा रहल अछि आ भीत हीलि रहल अछि। अकास कारी खटखट भऽ गेल छल आ चारू दिस अन्हार गुज्ज छल। ओ उठि कऽ बैसि रहल। अंगना आ दरबज्जा बड़का-बड़का ओला आ बरफक पाथरसँ छरा गेल, दलानक रेलिंग टूटि कऽ दू लग्गा दूर जा कऽ धड़ामसँ खसल। एकर बाद जे निराउ  बर्खा बरिखब शुरू भेल तँ ओ पाइनक बुन्नी नै छल, लागए जेना पाइनक बड़हा छल, जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहए तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतऽ सँ ओ छोड़ल आकि खसाएल जा रहल छल। मेघ लगातार गरजि रहल छल, दूर नै, लगेमे माथक ऊपर जेना बिजलौका लौकि रहल छल, दूर नै, खिड़कीसँ भीतर आँखिमे।एकहत्तरि बर्खक बूढ़ रघुनाथ अवाक! ई एकाएक की भऽ गेल? की भऽ रहल छै? ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, देहपर पड़ल सीरक हटेलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला अड़काक टेकसँ खुजल छल आ बाहर दिस देखि रहल छल। घरक आगुए कदम्बक बड़का गाछ छल मुदा ओकर पता नै चलि रहल छल, अन्हारक कारण, आ बर्खाक कारण जे धऽ कऽ तोपने छल, पथियाक पथिया उझील रहल छल। छातक डाउन-पाइपसँ पाइनक धार खसि रहल छल आ ओकर हहारो अलगेसँ सुना दऽ रहल छल। एहेन मौसम, एहेन पाइन आ एहेन हवा ओ कहिया देखने छल? दिमागपर जोर देलापर मोन पड़ल- साठि-बासठि बर्ख पहिने! ओ स्कूल जाए लागल छल, गामसँ दू माइल दूर। मौसम खराप देखि कऽ मास्टर समयसँ पहिने छुट्टी दऽ देने छल। ओ सभ नेना-भुटकाक संगे गाछी पहुँचले छल आकि आन्ही-बिर्रो-पाइन आबि गेल आ अन्हार पसरि गेल। सभ कियो आमक गाछक अढ़ लेबऽ चाहलक मुदा बिर्रो ओकरा सभकेँ जेना लऽ कऽ उड़ि गेलै आ गाछीसँ बाहर धानक बाधमे लऽ जा कऽ पटकलकै। ककरो झोराक आ किताब-पत्तरक कोनो पता नै छलै। पाइनक बुन्नी ओकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छलै आ ओ मारे चिचिया रहल छल। बिर्रो थम्हलाक बाद जखन पाइन-बुन्नी कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ डिबिया लऽ कऽ बहार भेल छल ताकै लेल। ई एकटा अनहोनी छल आ अनहोनी जँ नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा अनहोनीये छल जे बाहर एहेम मौसम छै आ ओ कोठलीमे अछि। कत्ते दिन भऽ गेल बर्खामे भिजना? कत्ते दिन भऽ गेल गरमी मासक दुपहरियाक बहैत लूमे घुमना? कत्ते दिन भऽ गेल जेठक गुमारमे झरकनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे बौएनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल ठारमे ठिठुरि दाँत कटकटेनाइ? की ई अही लेल होइत अछि जे हम एकरासँ कोना बचि कऽ रही? बचि-बचि कऽ चली? आ अही लेल की एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्तियारी करी, गप करी, माथपर बैसाबी? हम एकरासँ एना व्यवहार कऽ रहल छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए कऽ रहल छी एहेन? एम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लगैत छलन्हि जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, एकर ऐश्वर्य, एकर सौन्दर्य- ई मेघ, ई रौद, ई गाछ-बृच्छ, ई फसिल, ई धार, कछार, जंगल, पहाड़ आ ई सभ किछु एतऽ घुरि जाएत। ओ ई सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैक चाहैत अछि जेना ओ जँ चलियो जाएत तँ ओकर आँखि अतै रहि जेतै। चमड़ीपर सभ चीजक थाप सोखि लै लऽ चाहैत अछि जेना चमड़ी केंचुल जकाँ एतऽ घुरि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका लग पहुँचैत रहत। हुनका लागैत छल जे बेसी दिन आब हुनका नै अछि जाइमे। भऽ सकैए जे ओ दिन काल्हि हुअए, जहिया हुनका लेल सुरुज नै उगै। उगत तँ अबस्से मुदा से दोसर लोक सभ देखत, ओ नै। की ई सम्भव नै अछि जे ओ सुरुजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए, ने ओ रहत, ने ओ उगत आ नहिये कियो आर ओकरा देखत! मुदा एकटा सुरुजे सौंसे धरती तँ नै, ओ कोन-कोनक बौस्तुकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखबासँ रोकत? हुनकर हाथ एतेक नम्हर किए नै भऽ जाइ छन्हि जे ओइमे सभटा धरतीकेँ समेटि लिऐ आ मरै वा जिअए तँ सभक संग! मुदा एकटा मोन आर छल, रघुनाथक जे हुनका धिक्कारि रहल छल, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम? धरतीसँ प्रेमक ई आतुरताइ? ई अहलदिली? काल्हि सेहो ई धरती छल। यएह मेघ, अकास, तरेगण, सुरुज, चन्द्रमा छल। धार, निर्झर, सागर, जंगल, पहाड़ छल। यएह गली, मकान, चौबटिया छल। कतऽ छल ई अहलदिली? फुरसति छल हुनका ई सभ देखै कऽ? आइ जखन मृत्यु बिलाड़ि जकाँ आस्तेसँ कोठलीमे ढुकि रहल अछि तखन बाहरक जिनगीक अबाज सुनाइ दऽ रहल अछि? सत-सत बाजू रघुनाथ। अहाँकेँ जे भेटल अछि ओकरा लऽ कऽ कहियो सोचने रही? कहियो सोचने रही जे एकटा छोट सन गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब? ओसारपर पिरहीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नून खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैसि कऽ लंच आ डिनर करब? मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अबाज बाहरक गड़गराहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अप्पन सकमे नै छल। ओकर नजरि कोनमे राखल लाठी आ छत्तापर गेल। जाड़क ठंढ़ी ओहिने भयंकर छल आ ऊपरसँ ई ओला आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। किल्ली खोलि कऽ ओ ठाढ़ भेल तँ दरबज्जा अपने खुजि गेल। सिहकैत बसात सनसना कऽ भीतर पैसि गेल आ ओ डरा कऽ पाछाँ हटि गेल। फेरसँ ओ साहस केलक आ बाहर जेबाक तैयारी शुरू कऽ देलक। पूरा बाँहिबला गरम गंजी पहिरलक, ओइपरसँ सूती अंगा, ओइपरसँ स्वीटर आ ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट ओ पहिनहिये पहीर लेने छल। यएह ओकर जाड़क मासमे भोरमे टहलबाक वस्त्र छल। मोफलर सेहो छलै मुदा ओइसँ बेसी जरूरी छलै गमछा। बर्खाकेँ देखैत जेना-जेना कपड़ा भिजैत जेतै ओ एकाएकी उतारैत जाएत आ फेकैत जाएत आ अन्तिममे रहि जेतै मात्र ई टा गमछा। ओ अप्पन पहिराबा-ओढ़ाबासँ आब सभ तरहेँ निश्चिन्त छल मुदा खाली माथकेँ लऽ कऽ ओ ततमतमे छल, कनटोप ठीक रहतै आकि माथमे गमछा बान्हि लए। ओला जतेक खसबाक रहै से खसि गेल छलै। आब ओकरा कोनो अन्दाज नै छलै। ओ गमछाकेँ गरदनिक चारू दिस लपेटि लेलक, खालिये माथ बहरा गेल। आब ने कियो रोकैबला छलै आ ने टोकैबला। ओ कहलक- “रौ मोन! घुरि कऽ आबि जेमेँ तँ वाह-वाह आ नै घुरि कऽ आबि सकमे तँ वाह-वाह।” बर्फ सन पाइनक अन्हार बीहरिमे उतरबासँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भार संग एक्को डेग बढ़ैब ओकरा लेल मोश्किल हेतै। ओ कोठलीसँ तँ बहरा गेल मुदा गेटसँ बाहर नै जा सकल। छत्ता खुजलासँ पहिने जे पहिलुक बुन्न ओकर बिन झाँपल केशहीन चानिपर पड़लै तँ ओ तुरत्ते बूझि नै सकल जे ई बिजलौका खसल छलै आकि लोहाक किल्ली खसल छलै जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतर तरबा धरि पहुँचि गेलै। ओकर सम्पूर्ण शरीर झनझना गेलै। ओ पानिक अछारसँ डरा कऽ बैसि गेल मुदा भिजबासँ नै बचि सकल। जाधरि छत्ता खुजितै ताधरि ओ पूरा भीजि गेल छल। आब ओ ओझरीमे पड़ि गेल छल, बर्फ सन बसात आ अछारक बीच। हबा टूटल दूभि सन हुनका उड़ा रहल छल आ अछार धरतीपर पटकि रहल छल। भीजल कपड़ाक भार हुनका उड़ऽ नै दै छल आ हबा हुनका घिसिया रहल छल। हुनका एतबेटा मोन छन्हि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसला आ ई बेर-बेर तखन धरि भेल जखन छत्ताक कमची टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बहार जा कऽ बिला गेल। आब ओकरा एना लगै छल जेना बसात ठामे-ठाम नोचि रहल होइक आ पाइन धीपल लोहसँ दागि रहल होइक। बेहोश भऽ कऽ खसबासँ पहिने ओकरा लग दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे एलै। ओ दू बेर आत्महत्या करबाक विचार केने छल- पहिल बेर लोहता स्टेशनक रेलक पटरीपर गाम-घरसँ दूर निर्जनमे, जतऽ कियो आबै जाइ नै छल। तइ काल ओ सामान्य पैसेंजर वा मालगाड़ीकेँ नै, एक्सप्रेस वा मेलकेँ चुनने छल, किएक तँ जे हुअए से हुअए खट दऽ, एक्के निशाँसमे, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल आकि मेल अबैत देखा पड़लै। पता नै किए ओकरामे जीवनसँ मोह उत्पन्न भऽ गेलै आ ओ उठि कऽ भगबापर छल आकि ठेहुन लगक एकटा पएर खचाक। ई तँ मरैसँ बेसी खराप भेलै। बैशाखीक आश आ घरक लोकक गाइर आ धुत्कारी। एक बेर फेर आत्महत्या करबाक धुनि सवार भेलै ओकरापर। ऐबेर ओ चुनकक सिमानपरबला इनार। ओ अप्पन बैशाखी फेकि कऽ ओइमे फांगि गेल छपाकसँ आकि एकटा बरहा पकड़िमे आबि गेलै। तीन दिन बिन खेने पीने भूखल सोर पाड़ैत रहल ओ इनारमे आ निकलल तँ दोसर पएर तोड़बा कऽ। आइ वएह ज्ञानदत्त - बिन पएरक ज्ञानदत्त- चौबटियापर भीख मंगैत अछि। मरबाक ओकर इच्छा ओकरा कतौ कऽ नै छोड़लकै। मुदा ई हरमजदा ज्ञानदत्त ओकरा मोनमे एलै किए नै? ओ मरबाक लेल तँ नै निकलल छल? निकलल तँ छल ओ पाइनक ठोपक लेल, ओला सभक लेल, बसात लेल। ओ ऐ बातपर आबि गेल जे जीवनक अनुभवसँ पैघ अछि जीवन। जखन जीवने नै तँ अनुभव केकरा लेल। 2 पहाड़पुरमे रघुनाथ एक्केटा छल। ओना कहैक लेल रामनाथ, शोभानाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ सेहो सभ छल मुदा ओ रघुनाथ नै छल। आ रघुनाथक ई भाग्य छल जे जतऽ कतौ ओ देखा पड़ै छल, गाम घरक लोक बिख-सबिख भऽ जाइ छल आ पैघ साँस लैत कहै छल- बाह! की भाग्य पेलक अछि ई बिरनल! रघुनाथ पहाड़पुर गाममे असगरे पढ़ल लिखल लोक छल। डिग्री कॉलेजक अध्यापक। दुब्बर-पातर नमगर-छरगर देहबला। शुरुहक दस बरख धरि साइकिलसँ अबैत जाइत छल, बादमे स्कूटरसँ। पछिला सीटपर पहिने बेटी बैसै छलै, बादमे बेटा बैसऽ लगलै। कहियो एकटा, कहियो दुनू। मोटा-मोटी पाँच-छह माइलक दूरी रहै। सभ सुखी आ सफल लोक सन रघुनाथ सेहो अपना जीबा लेल, आगाँ बढ़बा लेल आ अकास छूबा लेल किछु ईलम ताकि लेने छल। सत्य पूछू तँ ओ तकने नै छल, ओकरा प्रकृतिमे छलै। ओ खाली बूझि गेल छल आ ओकरा ओ नित्य व्यवहारक संग बनौने छल। ओ पातर आ नमगर छल आ तइसँ कने लीब कऽ चलै छल। कतौ अबैत-जाइत काल, केकरोसँ भेँट-घाँट करैत काल, बाजैत काल ओ कनी लीबल रहै छल। पहिल बेर ओ अप्पन बारेमे केकरो दोसरासँ गप्प करैत प्रिन्सिपल साहेबक मुँहसँ “विनम्रता” शब्द सुनलक। एहेन हुनकर प्रशंसामे कहल गेल छल। जइ लीबल रहैमे ओ लाजक अनुभव करै छल, ओकर वएह खूबी छल, ई नव बोध ओकरा भेलै। ऐमे ओ आगू जा कऽ दूटा खूबी आर जोड़ि देलक, मुस्कियेनाइ, आ सहमति देनाइ। कियो किछु कहितिऐ ओ मुस्कियाइत रहितिऐ आ समर्थनमे मूड़ी हिलाबैत रहितिऐ। ई तखने सम्भव छलै जखन अहाँ अपना दिससँ कम बाजी। ऐ तरहेँ रघुनाथ विनम्रता, कम बाजाभूकी आ मुस्की संगे जीवनक यात्राक प्रारम्भ केने छल। आ एकरा संयोगे कहियौ जे ओ कहियो असफल नै भेल। ऐ संयोगकेँ दोसर लोक सभ “भाग्य” कहैत छल। आ ऐपर रघुनाथ सेहो विश्वास कऽ लेने छल। भेल ई जे एक बेर ओ जखन कॉलेजसँ साइकिलसँ घर घुरि रहल छल तखन ओ देखलक जे ओकर साइकिलक चेन टूटि गेल छै। ओ साइकिलकेँ कॉलेजमे छोड़ि देलक आ बुलि कऽ आबऽ लागल। गर्मी मास, रौद खूब, हवा कतौ नै, देह घामसँ भीजल। बाटमे कतौ गाछो-पात नै। अकासमे मेघ छलै मुदा दुरस्तमे। हुनकर मोन बाजल- “ओह! ई मेघ जँ रहितए माथक ऊपर छत्ता सन।” आ देखू, एक फर्लांग एबे कएल रहए आकि मेघ सत्ते ओकर माथक ऊपर आबि गेलै। आ एतबेटा नै, ओ मेघ हुनका संगे छाह करैत गाम धरि आएल। अगिला दिन ई सिद्ध भऽ गेल जे ई मात्र भ्रम नै छल। ओ वर्गमे पढ़ेबा लेल जहिना बिदा भेल, तहिना ध्यान गेलै जे कलम नै छै। चाहे तँ ओ घरेमे छूटि गेलै आकि बाटमे खसि पड़लै। ओ एखन क्लासमे पहुँचलो नै छल आकि आगू हॉलमे ओकरा एकटा कलम खसल लखा देलकै, रौदमे चमकैत। एहेन गप आन लोकक संग सेहो होइत अछि मुदा नै जानि किए हुनका लगै छल जे दीनदयालु परमपिताक हुनकापर विशेष कृपा छन्हि। ओ हुनकर सभ सुविधा-असुविधाक ध्यान रखैत अछि। ऐसँ जे ओ चाहैत छथि ओ देर सबेर भऽ जाइत अछि।आ देखू जे ओ जखैन-जखैन चाहलक, जे जे चाहलक से भेल गेल। हुनका किछु करऽ नै पड़ल, अपने मोने भऽ गेल। पढ़ाइ खतम केलाक बाद ओ शोध कऽ रहल रहथि आ हुनकर मोन नै लागि रहल छलन्हि। आब कहिया धरि ओ करैत रहितिऐ शोध? कतौ नोकरी भेटि जेतिऐ तँ जान बचितिऐ। आ बेसी दिन नै बितलै आ हुनका नोकरी भेटि गेलन्हि। एकर श्रेय ओ हालेमे जन्मल अपन बेटीकेँ देलक। बेटी लक्ष्मी होइत अछि। वएह अप्पन संगे आ अपना लेल हुनकर नोकरी लऽ कऽ आएल छल। मुदा आब एकर बाद एकटा बेटा चाही। ई ओ नै, हुनकर हृदय बाजल। आ देखू, चारि बर्खक बाद बेटा सेहो आबि गेल। एकर बाद एकटा आर बेटा- बस! ऐ तरहेँ एकटा बेटी, दूटा बेटा, शीला आ रघुनाथ, सभ कियो मिला कऽ पाँच लोकक परिवार। छोट परिवार, सुखी परिवार। परिवार सुखी रहल हुअए वा नै, रघुनाथ सुखी नै छल। जिनगी हुनका लेल पहाड़पुरक धूल-धक्कर आ हँसी खेल नै छल। जन्मले छल तँ स्वयं कीड़ा-मकोड़ाक योनिमे किए नै जन्म लेलक? ओ ओतऽ जनमि सकै छल मुदा नै, भगवान जँ हुनका ऋषि-मुनिक लेल दुर्लभ योनिमे जनम देने अछि तँ एकर पाछाँ हुनकर कोनो उद्देश्य रहल हेतन्हि। जे जाउ, साठि-सत्तरि बरखक मौका दैत छी अहाँकेँ, जाउ धरतीकेँ सुन्नर आ सुखी बनाउ। धरती सुन्नर आ सुखी तखैन हएत जखैन अहाँक बाल-बच्चा सुखी, सुन्नर आ सम्पन्न हएत। अहाँकेँ जे बनबाक अछि ओ तँ अहाँ बनि गेलौं, आब बच्चा अछि जिनकर आगू पूरा जिनगी आ दुनियाँ राखल छै। यएह अहाँक भविष्य अछि। जीबू तँ हुनकर जिनगी, मरू तँ हुनकरे जिनगी। आ रघुनाथ से केलक। हुनकर सभटा शक्ति आ सभटा बुद्धि आ सभटा पूँजी हुनका सभकेँ बनबैमे लागल रहल। ओ चाहलक- सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करितिऐ। सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करऽ लागल। ओ चाहलक- संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियर बनितिऐ। संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियरटा नै बनल, अमेरिका तक पहुँचि गेल। ओ चाहलक- मैनेजर समधी हुअए। संजय ई नै चाहलक। ओ से केलक जे ओ चाहलक। रघुनाथक आस रहि गेल। दयानिधान किछु मदति नै कऽ सकल हुनकर। हुनका दुख ऐ गपक छल जे मैनेजर एकरा बाप-बेटाक मेलपेंच बुझलक। ओ बड़ मानसिक तनावमे चलि रहल छल, मुदा कॉलेजक हुनकर सहयोगी हुनका बधाइ दऽ कऽ भरोस देलक जे एकटा अन्हार खधाइमे खसबासँ ओ बचि गेला। ऐमे प्रिन्सपलक भूमिका आर नीक छल। ओ मोटामोटी तीस साल पहिने रघुनाथक संग कॉलेज पकड़ने छल। दुनुक दोस्तियारी छलै। जखैन भेटितिऐ हँसी मजाक, हाहा हूहू करितिऐ। ओ एक दिन आस्तेसँ कहलक- “यौ रघुनाथ, हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे एतबेटा गप अहाँकेँ बुझैमे किए नै आएल? ओ अहाँक बेटीक बदलामे अहाँक बेटाकेँ खरीद रहल छल।” ऐ तरहेँ रघुनाथ सहज भऽ रहल छल जे एक दिन घरपर हुनका प्रिन्सपलक दसखतबला नोटिस भेटल। आरोप दूटा छल- “नेग्लिजेन्स ऑफ ड्यूटी”(काजमे ढिलाइ) आ “इनसबऑर्डिनेशन”(उच्च अधिकारीक गप नै मानब)। एहेन कोनो संकेत अपन गपमे नै देने छल ओ पहिने कहियो। ई दुनूटा आरोप छल निराधार। एकरा रघुनाथेटा नै, सहयोगी सभ सेहो जानैत छल आ प्रिन्सपल सेहो। सबहक सहानुभूति ओकरा संगे छलै, मुदा संग देबा लेल कियो तैयार नै छल। ओ उत्तर दऽ देलक मुदा ओ ई जानैत छल जे एकरासँ कोनो लाभ नै अछि। ओ फेंफियाइत एतऽ सँ ओतऽ दौगैत गेल। आजिज आबि कऽ प्रिन्सपलसँ भेँट केलक आ हुनकासँ सलाह मांगलक। ओ कहलक- “देखू रघुनाथ, अहाँ जतेको दौड़-धूप करू, निलम्बनक मोन बना लेने अछि मैनेजर। हुनकर शक्ति आ पहुँचकेँ अहाँ जनिते छी। एकर बाद अहाँ कचहरी जाएब, फौदारी लड़ब, ई कहिया धरि चलत, कियो नै जनैत अछि। भऽ सकैत अछि जे फैसला होइसँ पहिने अहाँ मरियो जाइ। हँ, जाधरि मुकदमा चलत, ताधरि पेंशन रुकल रहत। ई सभ देखि कऽ हमर तँ सलाह अछि जे अहाँ वी.आर.एस. (वॉलन्टरी रिटायरमेन्ट स्कीम, स्वेच्छासँ सेवानिवृत्ति सुविधा) लऽ लिअ। रघुनाथ बड़ी काल धरि चुप रहल। हुनकासँ किछु बाजल नै गेल। “ठीक अछि, मुदा एकटा अहाँ मदति करू।” “कहू, की कऽ सकैत छी हम?” “निलम्बनकेँ अहाँ ताधरि लटकेने राखू जाधरि बेटीक बियाह नै भऽ जाए। फेर हम सएह करब जे अहाँ कहने छी।” मनुष्यताक लेल ई करबाके छल। प्रिन्सपल चिन्तित भऽ कऽ बाजल- “जाउ, कोशिश करै छी, मुदा ई गप अहाँ कतौ नै बाजी, से।” आ प्रिन्सपल कहिया धरि बाट तकितिऐ। 3 एहेन मुसीबतमे रघुनाथकेँ किओ आन नै हुनकर अप्पन बेटे धऽ देने छल। बेटोमे संजय! संजय टा! आ ई नम्हर खिस्सा अछि- राँचीसँ कैलिफोर्निया धरि पसरल। संजय प्रेम केने छल सोनलसँ! ई प्रेम कोनो चौौबटियापर घुमैत लफुआ छौड़ाक अनगढ़ प्रेम नै छलै, ऐमे गुणा-भाग सेहो रहै आ जोड़-घटा सेहो! जतेक गहींर छल ततबे व्यापक। संजयक सोनल प्रोफेसर सक्सेनाक बेटी छल। सदिखन प्रथम श्रेणी, व्याख्याताक योग्यता परीक्षा पास आ दर्शनशास्त्रसँ पी.एच.डी.। नौकरी तँ पक्का छल, बनारसक विश्वविद्यालयमे, जतय ओकर माय कुलपति छल, मुदा ओइमे अखन देरी छलै, तखनि धरि बियाहक बाट तकबाक छल! बियाहमे बाधा भऽ रहल छल, ओकर ठोढ़सँ बाहर आएल दाँत आ सटल नाक जकर क्षतिपूर्ति ओ अप्पन सर्टिफिकेटसँ करैत छल। छूटल-बढ़ल कसरि पूरा कऽ रहल छल सक्सेनाक पसारल ई फूस कि हुनका एकटा एहेन कलामी सॉफ्टवेअर अभियन्ताक आवश्यकता छन्हि जे अमेरिकाक एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनीक तीन बर्खक कान्ट्रेक्टपर कैलीफोर्निया जा सकए। ऐ आवश्यकताक अनुभव सम्पूर्ण इन्स्टीट्यूट बुझैत छल। संजय अन्तिम परीक्षा दऽ देने छल, रिजल्टक घोषणा बाकी छल! एम्हर कतेक बेर माँ-बापक संदेश आएल छल जे आबू, लड़कीकेँ देखि लियौ। लड़कीकेँ की देखब, ओ तँ देखले छल! रघुनाथ जइ कॉलेजमे पढ़बैत छल, पूर्व विधायकक बेटी तकर मैनेजर छल। गोर, नमछुरुक, सुन्नर आ आकर्षक। एम.ए.। नीक गृहणी। मैनेजर पुरान जमानाक जमीन्दार, अथाह सम्पत्तिक मालिक। रघुनाथक कोनो हैसियत नै छलै ओकर आगू। नहिये नीक सन घर दुआर, नहिये जमीन-जत्था। आठ बिगहा खेत आ हरक जोत। नेनपन आ युवावस्था बड्ड तंगीमे बितलै। बच्चा सभकेँ पढ़ेलक तँ खेतकेँ बन्हकी लगा कऽ आ कॉलेजसँ ऋण लऽ कऽ। स्पष्ट छल, मैनेजर “सॉफ्टवेअर अभियन्ता” केँ देखने छल, अप्पन कॉलेजक मास्टर रघुनाथकेँ नै। ई सम्बन्ध रघुनाथक लेल सपनासँ आगूक चीज छल । फाएदे-फाएदा छल ऐसँ! जिलामे पहिचान आ प्रतिष्ठा जे भेटतिऐ, से अलग। ओ कीसँ की भेल जा रहल छल। तँ गाम आबैसँ पहिने सक्सेना सर सँ बिदा लै लेल गेल छल संजय। एकरा अहिनो कहि सकैत छी जे ओकरा सक्सेना सर डिनरपर बजेने छल। गर्मीक साँझ। अप्पन लॉनमे सक्सेना बेंतक कुर्सीपर चुपचाप बैसल छल। माली गमलामे पाइन दऽ रहल छल। बंगलाक भीतरक बत्ती जड़ि रहल छल। कोनो कोठलीसँ संगीतक धुन आबि रहल छल। अवकाश प्राप्तिक करीब, हृदयक मरीज प्रो. सक्सेना संजयक एबासँ अनजान चुपचाप बैसल छला आ आगू देखि रहल छला। बड़ी कालक बाद ओ पुछलक, “कोन इन्स्ट्रूमेन्ट अछि”। संजय बिना बुझने माथ हिलेलक। “आ राग? कोन राग अछि?” संजय निरुत्तर, फेर माथ हिलेलक। ओ ससरि गेल आ ऊँच अबाजमे बजेलक- “सोनू”। जीन्सक पेंट आ टी-शर्टमे कूदैत सोनू आएल- “हँ पापा”। संजय ठाढ़ भऽ गेल। सक्सेना मुस्की देलक, पहिने संजयकेँ देखलक, फेर सोनलकेँ। सोनल सेहो मुस्की देलक। संजय सोनलसँ भेँट तँ कते बेर केने छल मुदा देखने पहिलुके बेर छल। ओकरा लगलै जे कोनो छौड़ीकेँ टुकड़ीमे नै “सम्पूर्णता”मे देखबाक चाही। कतेक फर्क पड़ि जाइत छै। संगे संग छौड़ी आ कनियाँकेँ एक तरहेँ नै देखबाक चाही। रूप-रंग, ढीब-ढाब, मान-मनौअलि छौड़ीमे देखल जाइत अछि, कनियाँमे नै! ई सभटा पुरान धारणा अछि, हमर पापा-मम्मीक जमानाक, हमर नै। सक्सेना गुम्मी तोड़लक- “ई अछि सोनम, जइमे हमर प्राण बसैत अछि। सितार, सरोद, संतूर माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस एकरा पसिन्न नै। फिल्मी गीतकेँ ई गीत नै मानैत अछि। किएक तँ ई अपने कथक नृत्यांगना रहल अछि। तँ की खुआ रहल छी हमरा सभकेँ आइ?” “ओ तँ तखने पता लागत जखन खाएब।” सोनल लजा कऽ भागि गेल। “बैसू संजय।” ई कहैत सक्सेना सेहो मूड़ी झुका कऽ बैसि गेल। किछु सोचैत। टूटल स्वरमे बाजल- “कोना रहब एकर बिना, रहब कोना से नै बुझि पड़ैत अछि। ई चौदहे बर्खक छल जखन एकर माय गुजरि गेलै।” तकर बाद ओकर आँखिसँ नोर खसऽ लगलै- “तीन चारि बरखसँ लगातार आबैत रहल अछि लड़का। एकसँ एक। अहाँक सीनियर सेहो, क्लासफेलो सेहो। मुदा बेटा भारी संकटमे छी, अहीं उबारि सकै छी ऐ संकटसँ। पछिला बरख ई बाजल छल जे बियाह करब तँ संजयसँ, नै तँ नै करब बियाह। अपना भीतर नुकेने रहलौं ऐ गपकेँ। आइ बाजि रहल छी, सेहो ऐ दुआरे जे फैसलाक घड़ी आबि गेल अछि। तीन-चारि मास आर अछि कैलिफोर्निया जेबामे। ऐ बीच बियाह अछि, हवाइ टिकट अछि, पासपोर्ट अछि, वीजा अछि, सभटा तैयारी अछि। सोनल अमेरिका आ हनीमूनकेँ लऽ कऽ उत्साहित अछि।” ओ आँखि पोछलक आ संजयकेँ देखलक। “सभ बापक सपना होइ छै आ हमरो अछि। नै हेतिऐ तँ सेंट्रो कार किए लैतिऐ? अपना लेल फिएट तँ छेबे करल। नव घर गृहस्तीक समान किए जुटैबितिऐ? अहाँक नग्रमे एकटा कॉलोनी अछि अशोक विहार। ओइमे एकटा छोट सन बंगला बनबैले छी। सभ किछु कम्प्लीट अछि। बस फिनिशिंग टा बाकी अछि। सोचले रही जे एतऽसँ रिटायर करब तँ काशीवास करब। सभ लोक यएह चाहै छै। अहाँक पापा-मम्मी सेहो चहैत होएत। मुदा सोचैत छी जे काल्हि सोनल विश्वविद्यालयमे ज्वाइन करत तँ कतए रहत? हमर तँ सभटा जीवन राँचीमे बीतल, सभटा दोस्त-मित्र, सर-सम्बन्धी एतए अछि। ओतऽ जा कऽ की करब? तइसँ बंगला ओकरे नाम कऽ रहल छी।” संजय चिन्तित भेल। ओकर आँखिमे पापा-मम्मीक चेहरा घूमि रहल छलै। ओकरा लागि रहल छलै जे ओ हुनका हँ करैमे जल्दी कऽ देने छल। बाजल “बड देर कऽ देलौं सर सोनलक बात बताबैमे।” “देर सबेर किछु नै होइत अछि संजू, सभ चीजक बेर होइ छै। आब यएह देखू, हमर साढ़ू प्रोफेसर अस्थानाकेँ बनारस मे एहने घड़ीपर कुलपति किए हाँकि देने छल जखन सोनल थीसिस जमा कऽ रहल छलि?” ओ सिगरेट जरेलक- “ओना तँ सिगरेट मना अछि मुदा कहियो काल एकाध सोंटा लऽ लैत छी। तँ अहाँक पापा। हुनकर परेशानी बुझि सकैत छी। कहैत रहल छी हुनका लऽ कऽ। छोट भाइ अछि अहींक। पछिला तीन-चारि बर्खसँ कैट-मैट परीक्षा दऽ रहल अछि। लोक सेवा आयोगक परीक्षा दऽ रहल अछि। आ कोनोमे नै आबि रहल अछि- ओकर परेशानी। गप आएल बीचमे तैं, परेशान भऽ कऽ किछु कऽ नै लिअए तेँ ओइसँ पहिने कोनो मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूटमे नामांकन करा दियौ। एना नै तँ डोनेशन दऽ कऽ। ऐं यौ, कत्ते लागत? डेढ़ लाख, दू लाख, आर की? अहाँ बतेने छलौं जे अहाँक पढ़ाइ लेल ऋण लेल गेल छल आ खेत सेहो भरनापर राखल अछि। ऐ सभ परेशानीसँ बहार होइले कतेक जरूरति हएत हुनका? हुनकासँ गप कऽ कए तँ देखू। की चाहैत छथिन ओ। देखू, बरियाती, धूम-धरक्का, गाजा-बाजा ई सभ फुसियाहींक बखेरा छी। कोनो जरूरति नै अछि देखावटी व्यवहार आ तमाशाक। बियाह लेल कोर्ट अछि आ दोस महीम लेल एकटा स्वागत समारोह राखि देबै। ई हम कऽ देब, फेर? ओना एकटा गप बता दै छी, जेहेन कम्पनी आ जेहेन शर्तपर अमेरिका जेबाक अछि ओइसँ तीन बरखमे कियो एते कमा लेत जे जौँ ओकर बाप चाहै तँ गामक गाम कीनि लेत। बुझलौं?” “प्रश्न ई नै अछि सर। पिताजी कने लोक-लाज आ जाति-पातिमे विश्वास करऽबला पुरान ढङक लोक छथिन।” सक्सेना गम्भीर भऽ गेला। कनी काल धरि चुप रहलखिन। ऐ बीच सोनल साड़ीमे आएल। खाइक लेल बजाबैक लेल। “देखू संजू। लॉ ऑफ ग्रेविटेशनक निअम गाछ आ फड़ धरि लेल मात्र लागू नै होइत अछि। मनुक्खक सम्बन्धपर सेहो लागू होइत अछि। सभ बेटा-बेटीक माँ-बाप पृथ्वी अछि। बेटा ऊपर जाइले चाहैत अछि आर ऊपर, कनिक आर ऊपर तँ माँ-बाप अपन आकर्षणसँ ओकरा घिचैत अछि। आकर्षण संस्कार भऽ सकैत अछि आ प्रेम सेहो, माया-मोह सेहो। मंशा गिराबैक नै होइत अछि। मुदा खसा दैत अछि। जँ हम अपन बापक सुनने हेतिऐ तँ हेतमपुरमे पटवारी बनि गेल हेतिऐ। तँ ई अछि। हमरा जे कहबाक रहए, से कहि देलौं। अहाँकेँ जे नीक लगैत अछि से करू। हँ, जाइसँ पहिने सोनलसँ गप कऽ लेब।” 4 जुलाइमे बियाह भऽ गेल चिरंजीवी संजय आ सोनलक कोर्टमे। नहिये बरियाती आ नहिये बाजा-गाजा। प्रीतिभोजक लेल नोत आएल छल, रघुनाथक नामसँ सेहो। मुदा ओ नै गेला। एहेन चोट लागल छल रघुनाथ आ शीलाकेँ जे ओ दोसरकेँ नै देखा सकैत छल आ नहिये ककरोसँ नुका सकै छल। एहेन ठामपर जाएब ओ बन्द कऽ देने छल जतऽ दू-चारि गोटे जुमैत होथि। ओ मानि लेने छल जे दू बेटामे एकटा बेटा मरि गेल। जखन माए-बापक प्रतिष्ठाक ओकरा चिन्ते नै तँ मरले बुझू।सितम्बरमे ओ अमेरिका जाए आकि नर्क, ऐसँ ओकरा कोनो सरोकार नै। ऐ घड़ी लेल ओ ओकरा पालने-पोसने छल, पढ़ेने-लिखेने छल, गाछ कटने छल, कर्ज लेने छल, भरनापर खेत देने छल, आ दुनिया भरिक तगेदा सुनने छल? हुनकर लाख मना केलाक बादो राजू गेल छल, रामू माने संजयक भाए धनंजय, घुरल तँ ओकरा हाथमे एकटा ब्रीफकेश छल जे रघुनाथ लेल सक्सेना पठेने छल। रघुनाथ कॉलेजक तैयारी कऽ रहल छल। कुमोनसँ ब्रीफकेश दिश देखलक आ बाजल- “राखि दियौ।” “ऐं, एना कोना राखि दी। अप्पन संदूकमे राखू।” बाबा जमानाक सन्दूकमे की कहाँ राखै छल रघुनाथ आ ओकर चाभी ओ ककरो नै दै छल। बिना किछु बजने ओ चाभी ओकरा दिश फेकि देलक।राजू ब्रीफकेशकेँ संदूकमे राखि चाभी घुरा देलक आ बाजल, “आर किछु नै पुछब?” शीला उदास मोनसँ दरबज्जापर ठाढ़ि छल, भीतर चलि गेलि। “अहाँ सभ तँ एना गुम्म छी जेना कोनो बिपति आबि गेल”, राजू हँसैत माँक पाछाँ भीतर चलि गेल। “कनियाँ एहेन जे लाखमे एक। माँ अहाँ चिन्ता नै करू। सभ किछु करत ओ जे संजय बाजैत छल। हाथ-पएर जाँतत, मुँह दबाएत, बर्तन माँजत, बाढ़नि लगाएत, खेनाइ बनाएत, जे जे चाहत से सभ किछु करत। कनी अमेरिकासँ घुरिकऽ आबऽ तँ दियौ। अखन हनीमूनपर जा रहल अछि दार्जिलिंग, ओतएसँ दमदम हवाइ अड्डा, फेर ओतएसँ अमेरिका। बचि गेलौं अहाँ, जँ गेल रहितिऐ तँ मुँह देखाइ देबऽ पड़ितिऐ। ई लिअ, अहाँले फोटो पठेलक अछि स्वागत समारोहक…।” राजू नै जानि की-की बजैत रहल, ओ सुनितो रहल, नहियो सुनैत रहल। दुनू गोटेक फोटो ओतए पड़ल रहल जतऽ ओ बैसल छल। एकटा मन कहि रहल छल, “देखी”, दोसर कहि रहल छल, “छोड़ू, जाए दियौ”। सभटा सख धरले रहि गेल। राति भऽ गेल छल। गाममे सनाटा पसरि गेल छल। एक दिन पहिनहिये खूब बरखा बुन्नी भेल छल। हरियरी पसरि गेल छल। झिंगुरक अबाज गामकेँ गनगनेने छल। मेघ घटाटोप केने छल। दूर अकाशमे बिजलौका लौकै छल। ओम्हर कतौ पानि पड़ल हेतै, एम्हर नै भेल। रघुनाथक घर दुआर गामक बाहरी इलाकामे छल। घरक अगुलका हिस्सा दुआर पछुलका घर। दुआरक माने दलान आ बरण्डा। ऐ बरण्डामे सुतै छल रघुनाथ आ राजू। राजूक सुतलाक बाद रघुनाथ आध रातिमे नुका कऽ भीतर गेल, ढिबरी लेसलक आ सन्दूकसँ ब्रीफकेश निकाललक। जखन ओ ढिबरी आ ब्रीफकेश लऽ कऽ शीलाक बगलबला कोठली गेल तँ ओकरा मोन पड़लै जे ब्रीफकेशक चाभी तँ राजू देबे नै केलक। ओ रकमसँ राजूकेँ जगेलक। राजू बतेलक जे ब्रीफकेश चाभीसँ नै नम्बरसँ खुजत, ऐ नम्बरसँ। आ बड़-बड़ करैत ब्रीफकेश खुजि गेल। रघुनाथ ब्रीफकेशकेँ खोललक तँ भाव-विभोर। बेटा संजयकेँ लऽ कऽ जत्ते तामस रहै सभ टा बिला गेलै। टाकाक एतेक गड्डी अपन आँखिक सोझाँ एकटा ब्रीफकेशमे ओ पहिल बेर देखि रहल छल। आ ई कोनो सिनेमा नै वास्तविकता छलै। गामक लोक रघुनाथकेँ झगड़ा-झंझटिसँ दूर रहैबला मुदा कंजूसक श्रेणीमे गनती करै छल जे टाकामे अठन्नी भजबैत अछि। लोक ईहो कहै छल जे बड्ड लोभ नै केने रहितिऐ तँ ई दिन नै देखऽ पड़ितिऐ। रघुनाथ ब्रिन्चकेँ अपना दिस घिचलक। पहिने सए-सएक गड्डी गननाइ शुरू केलक। ओ एक-एक बण्डलक संख्या सेहो लिखि रहल छल। फेर ओ पाँच-पाँच सएक नोटक गड्डी उठा कऽ गनब आ लिखब शुरू केलक। गनैत-गनैत राति बेशी भऽ गेल आ सभटा रुपैयाक जोड़ भेल चारि लाख साठि हजार। हुनकर हअदय काँपल, जँ गनैयोमे गलती भेल हएत तँ एतेक टाका कोना? ओ उठि गेल आ सन्दूकमे झोंकि फेर आनि लेलक। घुरतीमे भंसाघरसँ कटोरामे पानि लऽ रहल छल तँ शीला जागि गेल। अंगुर भिजा-भिजा कऽ फेरसँ टका गनलक मुदा फेर वएह चारि आ साठि। ओ माथ पकड़ि बैसि गेल। “कोन गप अछि?”, शीला पुछलक। “पाँच लाखमे कम अछि चालीस हजार, कियो सन्दूक तँ नै खोलने छल?” “चाभी तँ अहीं लग छल, खोलत के?” “कियो आर तँ नै आएल छल घरमे?” “अहाँ आ राजू आएल छलौं, आर तँ कियो नै।” कनी कालक बाद ओ नै जानि की सोचि कऽ उठल आ राजूकेँ जगा कऽ लऽ अनलक। राजू आँखि मिड़ैत आएल। “ब्रीफकेश के देने छल अहाँकेँ, संजू आकि सक्सेना?” “किए? की गप अछि?” “बताउ, कम अछि पाँच लाखमे?” राजू हँसल, “मंगनीक बाछीक दाँत नै गानल जाइ छै। संतोष करू, जत्ते भेटि गेल से मंगनीमे, सएह बुझू।” ओ एकटक राजूकेँ देखैत रहल, “अहाँ तँ किछु एम्हर-ओम्हर नै केने छी?” “हम जनै छलौं जे यएह शक करब अहाँ, अहाँ स्वभावेसँ शक्की छी।” “चुप्प”, शीला बाजलि, “अहिना बापसँ गप्प कएल जाइ छै?” “बुझि गेलौं, यएह चोरेलक अछि। बतेलक नै।” “पहिने बुझि जेबाक चाही। चोरा कतौ बतबै छै जे चोरि वएह केने अछि”, राजू बाजल। रघुनाथ आश्चर्यसँ देखलक ओकरादिस, “की भऽ गेल छै ऐ छौड़ाकेँ। एकर भाए कम्प्यूटर अभियन्ता। ओ ऐ तरहेँ कहियो गप नै केने अछि बापसँ।” “गप्प नै केलक, तेँ अस्थिरेसँ चुपचाप बियाह कऽ लेलक आ बापकेँ खबरि धरि नै केलक।” झनझना उठल गुस्सा सं रघुनाथ। मन भेल-ओकरा घर सं निकलि जायैक कहियै मुदा नै जानि की सोचहि के ओतय सं उठल आ आंगन मे आबि गेल। कोना मे बंसखट पड़ल छल, ओहि पर बैसि गेल। ओ भगवानक लेल माथ उठैलक आसमान दिस। 'देखू मां, हम डेढ़ बरख सं कहि रहल छलहुं हिनका सं जे मोटरबाइक दऽ दियौ। घरानाक सभ छौड़ा लग अछि, एकटा हमहीं छी जकरा लग नै अछि। हिनकर कहब छल जे हाथ-पाइर तोड़बाक अछि की? माथ फोड़बाक अछि की? चोरी-चकारी आ लफंगई करबाक अछि की? डाका डलबाक अछि की? केकर हाथ-पइर टूटल अछि, कहू ते? ते संजू हमरा सं पुछलक-'अहां के की चाहि? जखैन हम ओतय सं घुरहि लागलहुं। हम कहलहुं-'हां, मोटरबाइक। ओ हमरा टका थमा देलक। ओ ब्राीफकेस मे सं देलक या कतय सं देलक हमरा नै पता।" 'सरासर झूठ। ई जानैत अछि जे संजय आब नै आबय बला अछि। हम नै पूछि सकब ओकरा सं।" रघुनाथ के ई झूठ बर्दाश्त नै भेल। शीला ठाढ़-ठाढ़ डिबरीक मद्धिम रोशनी मे कानि रहल छलि। ओ अप्पन बेटाक अहि रूप सं अनजान छलि। 'आैर कहू। हमर बापजानक दूटा बेटा-संजू आ हम। ई एक्को आंखि सं हमरा देखलक तक नै। सभटा मेहनत आ सभटा पाय ई ओकरे पर खर्च करलखिन। पढ़ैलक, लिखैलक, कंप्यूटर इंजीनियर बनैलक आ हमरा लेल। कामर्स पढ़ू। जकरा पढ़हि मे नै ते मदद कऽ सकैत छल, नै हमरा मन लागैत छल। कोनो तरहे बीकाम करलहुं ते कोचिंग करू, ई टेस्ट दियौ, ओ टेस्ट दियौ। हम थाकि गेल छी टेस्ट दैत-दैत। हिनका सं कहियौ, ई टका कत्तौ इमढ़-उमढ़ खर्च नै करैथ, डोनेशन लेल राख्ौथ। बिना डोनेशन कत्तौ एडमिशन नै हय बला छै। परछा के बता दैत छी।" 'जौं डोनेशनक टका नै देब तऽ?" 'ते कहियौ नै पूछब जे ई की कऽ रहल छी?"'कियअ कऽ रहल छी?" 'की करब? डाका डालब? तस्करी करब? गांजा हेरोइन बेचब? कत्ल करब?" की बक-बक कऽ रहल छी अहां? फालतू? झमाइर के शीला बाजल, 'आओर अहां चुप रहू। अनाप-शनाप कहि रहल छी बाप सें।" राजू कमरा सं बाहर निकलैत पिता सं बाजल, 'बस कहि देलहुं।" 'सुनू-सुनू। भागू नै। अपना लऽ कऽ सोचैत छी आ कहियौ अप्पन बहिन कऽ लऽ कऽ सोचने छी? जखैन होयत अछि तखन जाइत छी हजार पांच सौ मारि के आबि जायत छी ओकरा सं? ओकर ब्याह कऽ लऽ कऽ कखनो सोचैत छी?" 'देखि रहल छी हिनकर?" ओ मां दिस मुड़ल, 'जकरा सं कहबाक छल, ओकरा सं नै कहलल, कहि हमरा सं रहल अछि, जे एखन पढ़ि रहल अछि। डोनेशनक गप आयल ते दीदीक ख्याल आबि रहल अछि। पहिले हिनका सं कहियौक जे कंजूसी आ दरिद्रता छोड़ैक आब। हंसी उड़ाबैत अछि लोक। ई ढिबरी आ लालटेन छोड़य आ आन जना तार खींचवांके-कम से कम आंगन आ दरवाजा पर लट्टू ते लगवाय लियै। इजोत हुयै घर मे। एकर संगे फोन लगा रहल अछि लोक। घर मे फोन होयत ते संजू जखन चाहत, गप कऽ लेत। अहां सरला दीदी सं गप कऽ लेब। दीदी से टा किया भौजी सं सेहो।" माथा फोड़ैत फेर सं बैस गेल रघुनाथ-'यहि छी भाग्य। जकरा लेल कंजूसी करलहुं, ैओकरे मुंह से ई सुनबाक छल।" 'आओर एकटा गप कहि दैत छी अहां से आओर हिनको सं। फेर एहन बेवकूफी नै करैथ जेहन संजूक काल मे कइलय अछि। दीदी से परछा के गप कऽ लहुं चे ओ हिनकर तय करल सं ब्याह करत या नै। ई ते दौड़-भाग कऽ कत्तौ तय कऽ अइथिन आ ओ कहि दियै जे हमरा ब्याह नै करबाक अछि। फेर भद पिटत हिनकर।" 'ई अहां कोनो कहि सकैत छी।" 'कियैकि हम एकटा आदमी के अकसर हुनका संग देखनी छी। के छी ओ, नै जानैत छी।" 'देखलियै नै? एकरा शरम धरि टा नै अछि बहिन कऽ लऽ के अहि तरहे गप करैत?" रघुनाथ दांत पीसैत ओतय सं बाजल। 5 सरला दुविधा मे छल-ब्याह करि आ नै करि? पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नै करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत। कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे! आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नै छूटहि छल। अहिना मे नै जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल। कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नै युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नै छल। नै कोनो खतरा, नै कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नै छल। कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नै सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ। सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नै। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नै छल, जतय हुनका कियो नै जानैत हुयै। निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ। प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नै अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन! सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो। जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नै सकल नीक सं। नींद नै आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नै बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि... एखन नै जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नै, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल? कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नै, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नै, विद्वान अछि। कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नै हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नै बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नै हुयै ओहि दिन! अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नै, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नै! मनु श्रद्धा सं देखलक! श्रद्धा मनु के देखलक! दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नै, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल। ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।" स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी! ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नै!" ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल। अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक। चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!" कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक! 'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे! दुनूक मु‍ँह फक. काटू त' खून नै. कौशिक सर फुर्तीस‍ँ आँचरक नीचास‍ँ हाथ खीचलक आ सरला उठि बैसल. हुनका बुझैमे नै आएल जे ई की भ' गेल, कोना भ' गेल? कनियोटा आवाज भेल रहितिऐ त‍ँ ई स्थिति नै अइतिऐ. हदसल कौशिक सर ओइ पहरेदारके‍ँ ताकैत रहल. ‘देखि की रहल छि, उठ, ई रंडीबाजीक अड्डा नै अछि. जाऊ.’ ओ मुड़िक' चलि गेल. सरला आ‍ँचरस‍ँ मुंह झा‍ँपिक' कानि रहल छल. कौशिक सर कोनो तरहे ओकरा ठाढ़ केलक आ अपन पाछां आबैके इशारा केलक. ‘ऐ‍ँ उम्हर नै, इम्हर. थानापर.’ ‘थानापर किए, एहन की केने छी हम?’ हिम्मत जुटेलक कौशिक सर. ‘ओत' पता लागत काका कि अहा‍ँ की केने छी? कत'स‍ँ फ‍ँसेने छी अइ छौड़ीके‍ँ?’ अखन धरि ‘काका’ आ ‘रंडीबाज’-ई अपमानजनक शब्द सभ कौशिक सरक कानमे गूंजि रहल छल मुदा आब ई ‘थाना’? ‘थाना’ मतलब बड्ड किछु. बेइज्जती, हवालात. अखबारमे खबरि. यूनिवर्सिटीमे चर्चा. समाजक कोढ़. नौकरीस‍ँ सस्पेंशन. कोन मुंहस‍ँ परिवारमे जाएब? आ ई सरला? एकर की हएत? कोन मुसीबतमे ओ फंसल ओकर चक्करमे? सरला सुबकब बन्नाक' एक कात ठाढ़ छल आ पहरेदार गेट लग ठाढ़ छल थाना जाइक मंसूबामे. चौकीदार आ माली सेहो ओकरा लग आबि गेल छल आ रोकि रहल छल -हौ, छोडू भाइ. जाए दियौ. उमर देखू काकाक. कथी लेल पानि उतारि रहल छी एकटा बुढ़बाके‍ँ. कहियो रहल रहए आ मजा सेहो ल' रहल रहए. कौशिक सर हदसल सरला लग आएल- परेशान नै हुअ. अखन देखैत छी. सभ ठीक भ' जाएत. सरला तामसमे छलि. ओकर नजरि पहरेदार आ माली सभपर टिकल छल. कौशिक सर गेटपर ठाढ़ पहरेदारके‍ँ फराक ल' गेल आ फुस—फुस गप कर' लागल. बीच-बीचमे ओ उखड़ि जाइ छल आ हाथ छोड़ाक' भाग' लागैत छल. कौशिक सर ओकरा सौ-सौके दू टा नोट पकड़ेलक जकरा ओ फेक देलक आ माली सबहक दिस इशारा करैत पांचटा आंगुर देखौलक- ‘नै चाचा, नै हएत एकरास‍ँ. थाना चलू.’ ‘बस्स. बड्ड भ' गेल नाटक.’ सरला दौगल। ओइ दुनू लग पहुंचल-‘कोन ई टाका? अहाँ हमरास‍ँ गप करू.’ ओ अकचकाक' कौशिक सर दिस ताकलक-‘एकर सुनु काका.’ ‘काका हेतौ तोहर, हमर दोस्त अछि, प्रेमी अछि. हम प्रेम केने छी, चुम्मा लेलक अपन मोनस‍ँ. कियो केकरो संग बलात्कार नै केने अछि, किए थाना?’ ‘चलू त‍ँ ओत' बताबै छी?’ ओ चलल. आगू ठाढ़ भ' सरला बाट रोकिक' बाजल- ‘कियो नै जाएत थाना-ताना. नै तू‍ँ, नै हम. एस.पी., कलक्टर, आइ.जी.- जकरा बजबैक अछि एत' बजाउ.’ बुझि की रहल छी अहाँ. ओ हड‌बड़ा गेल. ताकैत रहल कखनो कौशिक सरके‍ँ, कखनो सरलाके‍ँ. माली आ चौकीदार सेहो आबि गेल अइ बीचमे. ‘के देखलक प्रेम करैत? ई चौराहा अछि? बाजार अछि एत', जत' रेप भ' रहल अछि? फंसाबैक चाहै छी टाका लेल? तू‍ँ की ल' जेब' हमरा, हम ल' जाएब तोरा?’ मामलाक नव पेंचके देखैत माली बीच-बचावमे आएल आ ओ निष्कर्ष देलक जे गलती इंसानस‍ँ होइत अछि, ताइस‍ँ छोडू, हटाउ आ अप्पन-अप्पन काज देखू. कौशिक सर जाधरि खसल टाका उठौलक ताधरि सरला टैक्सीमे बैस चुकल छल. कौशिक सर ओकरा बगलमे बैसैत बाजल-‘हम नै जानै छलौं जे अहाँ एतेक बहादुर छी?’ ‘हमहूं नै जानै छलौं जे एतेक डरपोक आ कायर छी अहाँ.’ टैक्सी घुरल. दुनू एक-दोसरास‍ँ पूरा बाट नै बाजल. ई एकटा डराएल सपना छल- जे ढेर दिन धरि सरलाक पाछां नै छोड़लक. सपनामे पहरेदारक चेहरेटा नै छल, हाथक छुहन आ थकुचनाइ सेहो छल. 6 सरलाक अइ सपनाके‍ँ आरो भयौन बना देने छल ओकर पड़ोसी. ओ जाइ बहुमंजिल मकानक पहिलुक तलक किरायाक फ़्लैटमे रहैत छल, ओकर अगल-बगलमे दू-दू कमराक फ़्लैट छल. ओइमे ओकरे स्कूलक मास्टरनी सभ रहैत छल- बाम दिस मीनू तिवारी आ दहिना दिस बेला पटेल. मीनू स्कूलक वाइस प्रिंसिपल छल आ ओ ओकर अप्पन फ़्लैट छल-कीनल. वएह सरलाके‍ँ अप्पन बगलमे दियौने छल-किरायापर. मीनू केशकट्टी छल- कन्हा धरि छोट-छोट केस. एकदम लाल मेहदीस‍ँ रंगल. उम्र चालीसस‍ँ बेसी. स्वभावस‍ँ सीरियस आ रिजर्व्ड. एक तरहे समाजस‍ँ बारल. शादी-बियाहमे जाइते नै छल, आयोजन सभमे जाइस‍ँ सेहो बचैत छल. घरस‍ँ स्कूल आ स्कूलस‍ँ घर, बस यएह आएब-जाएब छल. मजबूरीमे ह‍ँसैत छल. सखी-सहेली सेहो नै छलै कियो जकरा संग उठब-बैसब हुअए. उम्रक बादो ओकर गोर सुडौल देह आकर्षक छल. ओ कुमारि छल. असगरे रहैत छल. ओकर दूटा पामेरियन कुक्कर छलै- एकटा कार आ दोसर उज्जर. बेटा बा बेटी कहू- यएह छलै. ओकरा ल' क' ओ दू बेर बाहर निकलैत छल, टहलाबै बा नित्य कर्म कराबै लेल. पिंजरामे एकटा तोता सेहो छलै जे जकरा-तकरा घरमे पैसै छल आ जेबा काल बाजै छल. ओकर ऐ टे-टे के‍ँ ओ ‘सुस्वागतम’ बा ‘टाटा’ बताबै छल. ओकर सभटा चिंता ओकरे ल' क' छलै. ‘की बताबी. आइ पम्मी दिनभरिस‍ँ गुमसुम अछि.’ ’आइ टूटूक नाक बहि रहल अछि.’ ‘पम्मीक पेट ख़राब अछि.’ ‘दुनूमे गप सभ बन्न छै.’ ‘टूटू पम्मीस‍ँ कोन गपपर तमसाएल अछि, बताबै नै अछि.’ ‘दुनू हमरा लग सुतएस‍ँ पहिने झगड़ा करैत अछि, पता नै किए?’ अइ तरहक चिंता. कातिकक पहिनेस‍ँ ओ ओकरा लेल परेशान हएब शुरू होइत छल आ ताधरि रहैत छल जाधरि पिल्ला नै भ' जाइ छलै आ जखन भ' जाइ छलै त‍ँ कतेक रास दिन सोहरक कैसेट बजाबैत छल आ फेर नव परेशानी... मीनूक घरमे बाहरस‍ँ आबैबला खाली दूटा मर्द छल- एकटा ओकर भाय, ओ मीनूस‍ँ पैघ छल आ ओकालति करैत छल, ओकाललि चलैत छलै बा नै- ठीक ठीक नै बुझल. ओ सभ मासक पहिलुक सप्ताहमे अबैत छल आ जखन आबैत छल त‍ँ बड़ी काल धरि भाइ-बहिनमे चिख-चिख होइत छलै. ओकर गेलाक दू-तीन दिन धरि मीनूक मूड खराप रहैत छलै. दोसर छल जानवरक डाक्टर. ओ मीनूक उमेमरक बा ओकरा सं कनी पैघ छल. कहियो टिप-टापस‍ँ रहैत छल, केस डाइ करैत छल आ सफारी सूट पहिरैत छल. ओ गर्मीक छुट्टीमे दुपहरियामे आबैत छल जखन लोक बाहर निकलैस‍ँ बचैत छल. ओ आबतिऐ आ पा‍ँच बाजएस‍ँ पहिने चलि जइतिऐ. जाड़क मासमे कहियो-कहियो मीनूक घरपर रौतुका खेनाइपर आबैत छल. जखन ओ जाए लागैत छल त‍ँ मीनू बालकनीपर ठाढ़ भ' बेर धरि हाथ हिलाबैत रहै छल. अइ बालकनीक बगलमे सरलाक बालकनी छल जत' कहियो-कहियो ठाढ़ भ' क' दुनू पार्कक नजारा लै छल. मीनूक इच्छाक अनुसार सरला ओकरा स्कूलमे मैडम कहैत छल आ घरपर दीदी. दीदी ओकरा सल्लो कहैत छल. ओ बालकनीमे ठाढ़ भ' क' देखि रहल छल, ओ हफ्ता भरिस‍ँ देखि रहल छल. सभ साँझ छह बाजैक करीब सोलह-सत्रह बरखक एकटा छौड़ा पार्कमे आबैत छल- गुलदाउदीक पैघ सन फुलाएल फूल ल' क' आ बैसक' ओकर पखुड़ीपर किछु लिखै छल आ इंतजारीमे रहै रहै छल, बी-ब्लाकक बालकनीमे एकटा छौड़ीक एबाक. ओ जना दखिन भारतीय छौड़ी छल. ओ ब्लाउज आ स्कर्टमे आबिक' ठाढ़ भ' जाइ छल- लहरैत केसमे एकदम फ्रेश जेना नहा क' निकलल हुअए. छौड़ा घुमैत छल, पीठ ओकरा दिस करैत छल आ कुदकि क' पएरस‍ँ एना किक मारै छल कि फूल ओकर बालकनीमे खसैत छल. छौड़ी लाल पोलीथिनमे समेटल फूल उठाबैत छल आ अपन गोलाइक बीच ब्लाउजक भीतर राखि लैत छल. घासपर चित्त खसल छौड़ा उठैत छल आ ओकरा दिस ‘किस’ फेकै छल. जवाबमे छौड़ी मुस्काइत, लजाइत ठोढ़स‍ँ चुम्मा लहरा दैत छल. ‘सल्लो! बड्ड दिन भ' गेल अहाँके‍ँ कॉफी पियाबैत. आउ ने.’ एक दिन मीनू सरलास‍ँ बाजल. ई वएह दिन छल जखन छौड़ी चुम्मास‍ँ संतोष नै करलक, कोनो कालक गीत गुनगुना क' जवाब सेहो देलक- ‘छोटी-सी यह दुनिया, पहचान रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल.’ सरला जखन पहु‍ँचल तखन मीनू किचनमे छल. ओ कनी कालक बाद काफीक दूटा मगक संग ड्राइंग रूममे आएल- चुप आ संच-मंच भ' क' गेल आ ब्रांडीक एक शीशी सेहो ल' अनलक जेकरा डॉक्टर ओकरा लेल छोड़ि देने छल. ओ ओइमे एक चम्मच ब्रांडीक देलक आ ओकर लाभ बतैलक. ओइ काल टूटू आएल आ मीनूक कोरामे बैस गेल. मीनू ओकरा देर धरि सहलाबैत आ प्यार करैत रहल- ‘देखब, एक नै एक दिन मारि देल जाएत ई छौड़ा. एतेक नीक छौड़ा.’ ‘ई कोना कहि सकै छी अहाँ?’ मीनू चुप रहल फेर कान' लागल- ‘नै, सल्लो, यएह होइत अछि- यएह हएत.’ ‘ईहो त' भ' सकैत अछि जे छौड़ी कोनो दोसर घर चलि जाए बा छौड़ा ककरो अनकर घर बसा लिअए. आ ईहो त' भ' सकैए जे दुनू बियाह क' लिअए.’ ‘ई त' आरो खराप हएत.’ ‘किए?’ ‘अप्पन बगलमे बेलाके‍ँ देखि लिअ. ओ प्रेम विवाह केने छल, ओइ पटेलस‍ँ. पी.सी.ओ. चलाबैत छल आ रहैत एहन छल जेना लाट साहेबक नाती. ओइपर पागल भ' गेल छल बेला. अहिनो सुनल अछि जे ब्याहक बाद जहर खेने छल ओ. बियाह भेल आ देखू- सभ दिन किच-किच, गारि-गरौअलि, मारि-पीट, कानब-खीजब. कोनो मुनसास‍ँ कतौ ह‍ँसि- बाजि लिअए त‍ँ जीनाइ मुश्किल. स्कूल सेहो देखए, तीनटा नेनाक जिम्मदारी सेहो उठाबए आ पटेलके‍ँ सेहो खुश राखए. देखने रही पा‍ँच-सात बरख पहिने ओकरा, की फिगर छल आ की निखार छल.’ ‘खाली एकटा बेलाके‍ँ ल' क' त‍ँ ई नतीजा नै निकालल जा सकैत अछि दीदी.’ ‘एक गप गेंठ बान्हि लिअ सल्लो, अहाँ दुनू चीज एक संग नै क' सकै छी. ई समाज एहिने अछि. प्रेम करू बा बियाह करू. आ जकरास‍ँ प्रेम करू ओकरास‍ँ बियाह त‍ँ एकदम्मे नै. बियाहक रातिस‍ँ ओ प्रेमीस‍ँ मर्द हएब शुरू क' दैत अछि. जौं हमरास‍ँ पूछब त‍ँ हम सभ स्त्रीके‍ँ एकटा सलाह द' सकै छी. ओ अप्पन सा‍ँयस‍ँ घरस‍ँ बाहर प्रेम पाबैक इच्छा करैत अछि त‍ँ ओकरा घरस‍ँ बाहर प्रेम करबाक छूट दिअए, प्रेरित करए तइ लेल. किएकि ओ कत्तौ आ ककरो प्यार करत त‍ँ ओकरा भीतरक घृणा आ अनिच्छाक भाव भरैत रहत आ तकर लाभ ओकर स्त्रीके‍ँ भेटतै. स्त्रीये टा नै, नेना सभके‍ँ सेहो भेटतै. बुझलौं.’ ‘आ स्त्री सेहो एना करए तखन?’ ‘त‍ँ जीवन भरि नरक भोगय लेल तैयार रहए. स्त्री त‍ँ स्त्री, नेना धरि माफ नै करत एकरा लेल.’ सरला कत्तो नै कत्तो अइ गपक अएनामे अप्पन भविष्य ताकि रखल छल, मीनूके‍ँ नै बूझल छलै. ‘रुकू कनी एक मिनट.’ मीनू उठल। ‘मिट्ठू बड़ी कालस‍ँ टा‍ँय-टा‍ँय क' रहल अछि. ओकर डिनरक बेर भ' गेल अछि.’ ओ कटोरीस‍ँ भीजल चना, हरियरका मिरचाइ, सोहारिक टुकड़ी लेलक आ पिजड़ामे द' देलक. ऐ बीच सुग्गा खुशीस‍ँ कुदैत आ हल्ला करैत रहल. पम्मी आ टूटू माथ उठाक' एक बेर देखलक आ फेर अप्पन-अप्पन कुर्सीपर सुति गेल. ‘बैसू कत' जा रहल छी?’ सरलाके‍ँ ठाढ़ देखिक' मीनू बाजल. ‘बैस क' की करब, अहाँ बताएब त‍ँ नै.’ ‘की?’ ‘यएह जे अहाँ ब्याह किए नै करलिऐ? अइ उमेरमे जखन एहेन छी त‍ँ पंद्रह बरख पहिने? खाली सुनैत छी लोकस‍ँ- भा‍ँति-भा‍ँतिक गप...’ ‘छोडू, जाए दिअ. किछु नै रहि गेल अछि बताबैक लेल.’ मीनू माथ झुकाक' बड़बड़ाएल. गरस‍ँ एकटा नम्हर साँस निकललै, आ आ‍ँखि द' क' छतक पंखा धरि गेल. ओ आस्तेस‍ँ मुस्कराएल आ सून आ‍ँखिस‍ँ सरलाके‍ँ घुरैत रहल- ‘प्यार कियो किए करत? की करत? जाधरि जाति आ धर्म अछि ताधरि कियो की करत प्रेम? ओइ बुरबकीक नतीजा भोगने छी हम. मुदा अपनाके‍ँ रोकब अपन वशमे छल जे? हम छह टा छौड़ी छलौं आ एक संग किरायाक मकानमे कमरा ल' क' रहैत रही. एक कोठलीमे दू गोटे. ओत'स‍ँ जाइ छलौं कॉलेज पा‍ँव-पैदल. बीचमे पड़ैत छल एकटा मिशनरी हास्पिटल. ओकरे गेटक लग ठाढ़ रहैत छल माइकल कर्मा. नाम आ पातर. ताम्बई रंग. नीग्रो जेहन उभरल कुल्हा आ चीता सन डा‍ँड़. टी शर्ट आ जींसमे. ठोढ़ी पर कनी टा दाढ़ी आ माथपर ठाढ़ केस. नग्रमे सभस‍ँ अलग.’ ओ फेर निसा‍ँस छोड़लक आ अप्पन पएरके‍ँ आ फर्शके‍ँ देखए लागल- चुपचाप. ओकर आ‍ँखि नोरा गेलै- ‘मुनसाक देहक सेहो अप्पन संगीत होइत अछि. राग होइत अछि. ओकर ठाढ़ होइमे, घुमैमे, चलैमे, देखैमे. बाजए या नै बाजए, सुनु त‍ँ सुना पड़ैत अछि. ओइ रागके‍ँ अहा‍ँक मन टा नै सुनैत अछि, अहा‍ँक ठोढ़ सेहो सुनैत अछि, बा‍ँहि सेहो सुनैत अछि, डा‍ँड़ सेहो, जांघ सेहो, नितम्ब सेहो- एतेक धरि कि छाती सेहो. ‘निपुल्स’ कखनो-कखनो एना किए अपने तनि जाइत अछि जेना कान लगाक' सुनि रहल अछि- बिना ओकर देह छुने. ओ तीन मास धरि ओत' ठाढ़ रहल, हमर आबै-जाइ काल. आ जेना भोरमे अचानके पातपर ओसक बुन्न थरथराइत आ चमकैत लखाह दैत अछि, ओहिना हम रही पात सन. कखैन एतेक ओस खसल कि हम भीज गेलौं- हमरा नै पता. खाली अतेक पता अछि जे हम त‍ँ भीज रहल छलौं, माइकल त‍ँ डूमि गेल छल.’ एक दिन अपना के‍ँ ओकर मोटरबाइकपर बैसल देखलौं. पुछलौं- ‘कत' जा रहल छी?’ ओ बाजल- ‘नै पता.’ हमहू‍ँ बैसल नै छलौं, उड़ि रहल छलौं ओकर पा‍ँखिक सहारे. ओइ आदिवासीके‍ँ जंगलक पात-पात जानै छल, सभ आइर ओकरा चिन्हैत छल. ओ एकटा बाजराक खेतमे बाइक ठाढ़ क' देलक- ‘उतरू, हम अहाँके देख' चाहै छी.’ हम किछु कही, रोकी-टोकी ओकरास‍ँ पहिने ओ हमर साड़ीके‍ँ खोलि देलक. बाजल- ‘ब्लाउज खोलि दियौ, नै त‍ँ बट्टम टुइट जाएत.’ ब्रा वएह खोललक- ‘जिद क' कए.’ ‘बस हिलू नै.’ दू कदम पाछा‍ँ हटि गेल उल्टा पएर आ ऊपरस‍ँ नीचा‍ँ धरि ताकलक. हम अप्पन हाथस‍ँ अपनाके‍ँ झांपैक कोशिश क' रहल रही मुदा सभ बेकार. ‘कही त‍ँ एकबेर कनि छू ली.’ हालत एहन छल जे के कहए आ के सुनए? कनी टा झुकि क' ओ अप्पन ठोढ़स‍ँ छातीक ठाढ़ घुंडी सभके‍ँ बेर-बेर दबौलक, चुमलक आ जीहस‍ँ सहलैलक आ बाजल- ‘चलू, पहिरू आब?’ ‘आब कत'?’ ओ जवाब देलक- ‘विंढम फाल. कियो नै हएत अइ काल. ओत' नहाएब.’ ‘कपड़ा कहाँ आनने छी?’ ‘नहाबैक लेल कपड़ाक की जरूरत?’ मीनू बाजैत रहल, लजाबैत सेहो रहल. कखनो चेहरा लाल होइत छल, कखनो स्याह पड़ैत छल. कखनो आ‍ँखि झुकैत छल, कखनो खुलैत छल, कखनो बंद होइत छल. ओ आगू बताबैस‍ँ पहिने कनी हिचकिचाएल- ‘बाइक कत' छोड़लक, झरनाक मु‍ँहपर कोना पहु‍ँचल- एकटा रहस्यलोक छल हमरा लेल आ ओतए एक दिन-राति रूकिक' की-की केलक, की-की भेल नै पुछू. ओ सभ पिछला जन्मक गप अछि. माइकलक संग हम आदिवासी नै, आदिमानव भ' गेल रही. आदम नंग-धड़ंग. जंगलमे, धारक कात. गाछक चारूकात लुक्खी जेना दौड़ैत-भागैत रहलौं. खरहा जेना उछलैत कुदैत रहलौं. झरनामे मा‍ँछ सन हेलैत-नाचैत रहलौं. धारक बीच पाथरपर मगर-घड़ियालक नेना जेना रौद तापैत रहलौं. की-की नै केलौं हम सभ? कहैत लाज लागि रहल अछि हमरा जे दोसर दिन दुपहरियास‍ँ पहिने, ओकर शब्दमे कही त‍ँ, हमर सोता चूब' लागल छल मुदा ओइ हालतमे तइयो नै छोड़लक ओ. एकरा एना बुझु जे जखन हम नै छोड़लौं त‍ँ माइकल किए छोड़ितिऐ?...त‍ँ ऊ एक दिन एक राति. बस वएह हमर जिनगी अछि.’ सरला मूड़ी झुकाक' सुनैत रहल. मीनू के‍ँ चुप भ' गेलाक बाद पुछलक- ‘फेर?’ ‘फेर’ की? गेल रही दू बेर आर, मुदा पिकनिकक सीजनमे- भीड़-भाड़मे आ वएह गलती भेल. नै जानि कोना खबर पिताजी के‍ँ लागि गेल. एक दिन ओ आएल आ बाजल- ‘आब बड़ क' लेलौं बी.एड., घर चलू'. कानि-कानिक' कोनो तरहे‍ँ परीक्षा देलौं आ यएह भाइ छल हमर बॉडीगार्ड, जे सभ मास रंगदारी टैक्स ल' जाइत अछि.’ ‘मुदा बियाह किए नै केलौं ओकरास‍ँ?’ ‘बियाह जखन पिताजी करए लेल चाहलक, त‍ँ हम नै केलौं आ जखन हम करए लेल चाहलौं त‍ँ बड्ड देरी भ' गेल छल. आ ई भाइ. जौं क' लेतिऐ त‍ँ एकर आयक स्रोत की हेतिऐ. नै हुअए देलक ई कोनो नै कोनो बहन्ने.’ ‘नै, हम ई पूछि रहल छी जे माइकेलस‍ँ किए नै केलौं?’ ‘माइकेल.’ ओ उदास भ' गेल, सोचलौं जे अप्पन पएरपर ठाढ़ भेलाक बाद करब. आ ठाढ़ सेहो भ' गेलौं अप्पन पएरपर. ओकर मानसिक हालत आर ख़राब छल आ ओ जल्दी मचा रहल छल. हम सब योजना बना नेने रही, तारीख तय क' लेने रही- पहिने मंदिर, फेर चर्च, आकि सुनलौं- विंढममे ओ खूब ऊ‍ँचस‍ँ कूदि गेल छल. लोक कोदैत अछि स्विमिंग पूलमे, धारमे, पोखैरमे-नोकगर पाथरस‍ँ पाटल झरनामे कुदैत कहियो केकरो नै सुनने रही. ओ एतेक मूर्ख नै छल. ई रहस्य छोड़ि गेल जाइत-जाइत, जे ई कुदनाइ छल बा किछु आर!’ ‘मानि लिअ जौं ओ जिबैत रहितिऐ आ ओकरास‍ँ बियाह क' लेतिऐ तखन?’ ‘त‍ँ?’ ‘त‍ँ संतुष्ट रहितिऐ, सुखी रहितिऐ?’ ‘देखू सल्लो, सवाल बुरबक सन अछि. ई के बता सकैत अछि जे ऐना हेतिऐ त‍ँ केहन हेतिऐ?’ जे भेबे नै कएल त‍ँ ओकरा ल' क' की कहि सकैत छी. ह‍ँ, यएह सवाल पहिने कहियो कएल हेतिऐ त‍ँ शाइत दोसर उत्तर हेतिऐ. समय केर संग सोच सेहो बदलै छै. आइ वएह कहि सकैत छी जे प्रेमके‍ँ प्रेम रहए दी. ओकरा बियाह धरि नै ल' जाउ बा बियाहक विकल्प नै बनाउ. अप्पन बगलमे बेला पटेलस‍ँ पूछू. ओ जेकरास‍ँ प्रेम केलक, ओकरास‍ँ बियाह केलक. आब पा‍ँच बरखक बाद फेर किए प्रेम लेल बेचैन अछि?’ ‘सुनू, प्रेम एकटा खोज अछि सल्लो, जीवन भरिक खोज. कखनो ख़तम, कखनो शुरू. खोज केकरो अनकर नै, अप्पन. हम अपनाके‍ँ दोसरामे खोजैत छी, एकटा बिछड़ि जाइत अछि बा छूटि जाइत अछि त‍ँ लागैत अछि जे जिनगी खतम. जीयैक कोनो अर्थ नै रहि जाइत अछि. आँखिक आगू शून्य आ अन्हार. सभ चीज निरर्थक भ' जाइत अछि. मुदा किछु काल बाद कियो दोसर भेटि जाइत अछि आ नव आंकुर फुटि जायत अछि. फेर लहलह, फेर मलहम. ई दोसर गप अछि जे दोसर सेहो अपनाके‍ँ ताकैत टकराइत अछि. सत्य कही त‍ँ प्रेमक खूबसूरती सभ बेर ओकर अपूर्णतामे अछि. ओकर माने प्रेमक उम्र जतेक छोट हुअए ओतेक चमक आ विद्युत. जौं नम्हर हुअए त‍‍ँ सड़बाक गंध आब' लागैत अछि. ई जरुर अछि जे एकरा छोट आ पैघ करब हमर बसमे नै होइत अछि.’ सरलाक दिमाग चकराए लागल. बड्ड काल धरि बैसल-बैसल बा सुनैत सुनैत, जखन कि शुरू वएह केने छलि. मीनूके‍ँ बुझा गेलै आ पुछलक- ‘की गप अछि? की सोचि रहल छी.’ सरला नोराएल ह‍ँसीस‍ँ बाजल- ‘किछु नै. अहाँ बढ़ा देलौं हमर उलझन.’ 7 जहिया मैनेजर कॉलेज आएल, ओइ दिन रघुनाथ गाजीपुर गेल छल- सरलाक लेल लड़का देखै लेल. बीस दिनुका बाद फेर मैनेजर कॉलेज आएल, अइ बेर फेर रघुनाथ बाहर आजमगढ़ गेल छल लड़का देखै लेल. ई पा‍ँचम बा छअम बरख छल. बियाह हाथमे आबैत हुसि जाइ छल. छह बरख भ' रहल छल लड़का खोजैत-खोजैत. जेना-जेना सरलाक उमेर बढ़ैत जा रहल छल, ओना-ओना ओकर बेचैनी आ दौड़-धूपी सेहो बढैत जा रहल छल. शुरू केने छल आइ.ए.एस. आ पी.सी.एस. स‍‍ँ मुदा ओकर रेट एतेक बेसी छलै जे जल्दिये नरम पड़ि गेल. पच्चीस लाखस‍ँ ल' क' एक करोड़ धरि – ई रकम ओ सपना धरिमे नै देखने छल. भरोसा छलै जे अप्पन बेटीक रूप-गुण आ योग्यतापर जेकरा नै त‍ँ किओ पूछि रहल छलै, नै देखि रहल छलै. अइ दौड़ा-धूपीमे हुनका त‍ँ खाली छह बरख लागल छल मुदा बेटी तीसस‍ँ ऊपर चलि गेल छल. नौबति एतेक धरि आबि गेल छलै जे जे लड़का भेटैत छल, ओकर उमेर बेटी स‍ँ कम. बेटी ओइ इलाकामे पहिलुक एम.ए, बी.एड., सर्विसमे आबि गेल छलि आ जखन स‍ँ आयल छलि आत्मविश्वासस‍ँ भरल छलि. पापा मम्मीक परेशानीक देखि क’ कखनो-कखनो माँ स‍ँ मजाकमे कहैत छलि- ‘पापा हमरा लेल लड़का एहन खोजि रहल अछि जना कियो गाइक लेल सा‍ँढ़ खोजैत अछि.’ एक बेर त‍ँ ओ माँ-बापक मु‍ँह लटकल देखि क’ रघुनाथस‍ँ सोझे बाजल छल- ‘अहाँ त‍ँ बाजारक निअमक विरुद्ध काज क’ रहल छी. जखन कियो जींस बेचैत अछि त‍ँ बदलामे खरीदारस‍ँ ओकर दाम लैत अछि. आ अहाँ छी जे जींस बेचियो रहल छी आ ओकर दाम सेहो द’ रहल छी.’ जखन रघुनाथ ओकरापर तमसाएल त‍ँ ओ बाजल-‘पापा, अहाँ अनेरे परेशान भ’ रहल छी, हमरा बियाह नै करबाक अछि.’ सभ छौड़ी अहिना बाजैत अछि- कखनो माँ-बापक चिंता देख क’, कखनो शालीनता आ संकोचमे, कखनो खौंझा क’, कखनो बियाहमे देरी होइत देख- अइस‍ँ रघुनाथक परेशानी कम होइ के बदला बेसी भ’ जाइ छल. अहिने समयमे मैनजरक प्रस्ताव आएल छल अप्पन बेटीक लेल. जखन ओ निराश भ’ चलल छल आजमगढ़ बला बियाह ल’ क’. लड़का सेल्स टैक्स आफिसर मुदा खर्च लगभग दस-एगारह लाख. हुनकर अप्पन इस्टीमेटस‍ँ दोबर. मुदा मैनेजरक भलमानसता आ बड़प्पन- जे हमरा रहिते चिंता कोन गपक? अप्पन पैघ बेटाक नाम पर हमरास‍ँ दस लाख ल’ क’ पहिने बेटीक बियाह क’ लिअ, फेर बेटाक बादमे क’ लेब. ओहिनो ई नीक नै लागैत अछि जे जवान बेटी घरमे हुअए आ बेटा बियाह क’ लिअए. एकरा कहैत अछि बड़प्पन आ एकरे कहै छी भाग्य. कत’ मैनेजर आ कत’ हुनके कॉलेजक मास्टर रघुनाथ. पूरा जिलामे पसरि गेल छल ई खबरि आ सभ लोक अइ मुहूर्तक इंतजार क’ रहल छल- जे संजय सभ किछु माटिमे मिला देलक. आब रघुनाथ कोन मु‍ँह ल’ क’ जाय मैनेजर लग? वएह बेटा- जाइ बेटापर हुनका भरोस छल आ गुमान छल- वएह बेटा हुनकर जीह काटि क’ ओइ सक्सेनाके‍ँ द’ देलक जकरास‍ँ नै त‍ँ हुनकर जान छल आ नै पहिचान छल. कोनो तरहे साहस क’ रघुनाथ गेल छल मैनेजरक घर. बंगलाक आगू बनल अप्पन नव कोटेजमे बिछौनपर पटायल मैनेजर केकरोस‍ँ फोनपर गप क’ रहल छल. ओ रघुनाथ दिस कोनो ध्यान नै देलक. मैनेजर आध घंटा धरि कखनो एकरास‍ँ कखनो ओकरास‍ँ गप करैत रहल आ फेर नहाबै लेल चलि गेल. नहा-धो आ पूजा पाठ करलाक बाद दू घंटा बाद आएल त‍ँ रघुनाथके‍ँ बैसल देखलक. ‘कोना अएलौं?’ ‘अप्पन स्कूटरस‍ँ.’ ‘किए? कार कत’ गेल?’ ‘कार कहाँ अछि?’ ‘किए? ओकरा अमेरिका ल’ गेल बेटा?’ हँसैत मैनेजर सोफापर बैस गेल आ पएर टेबुलपर पसारि देलक- ‘मास्टर, बियाह अहा‍ँक बेटा केलक, बधाई हमरा भेट रहल अछि. सभ कियो बाजि रहल अछि जे घटिया लोकक समैध बनैस‍ँ अहाँ संयोगेस‍ँ बचि गेलौं.’ रघुनाथ दोषी जना माथ झुका क’ चुपचाप सुनैत रहल. ‘मास्टर, जे किछु होइत अछि, नीक होइत अछि. शुरुहेमे हमर मनमे एकटा शंका छल. जे कियो सुनैत छल, आश्चर्य करैत छल आ अहाँक भाग्य के‍ँ सराहैत छल. कहैत छल जे की देखि क’ बियाह करबाक सोचलौं अहाँ? कोनो त‍ँ मेल हुअए? कत्तौ त‍ँ मेल हुअए? सभ सर-सम्बन्धी, दोस-महीम नाखुश. हम कहलौं- नै, संकटमे अछि रघुनाथ. चाहे जेहन हुअए, अछि त‍ँ हमरे कॉलेजक. एहन काल हम नै मदद करब त‍ँ के करत? त‍ँ हम वएह करए चाहलौं जे हमर आत्मा बाजल. मुदा अहाँक किस्मत ख़राब छल त‍ँ हम की करितौं?’ ओ रुकि क’ बाहर देख’ लागल. बाहर दरबज्जाक आगू बोलेरो ठाढ़ छल आ घुर्र-घुर्र क’ रहल छल. शाइत कत्तौ जेबाक रहै मैनेजरके‍ँ. ओ ड्राइवरके‍ँ डांटिक’ गाड़ी चुप करेलक. बंगला आ कॉटेजक बीच टिनक नम्हर शेड छल जकर नीचा‍ँ कार, ट्रैक्टर, ट्राली आ मोटरबाइक-साइकिल ठाढ़ छल. बोलेरो ओत’ स‍ँ आनल गेल छल. ‘रघुनाथ, गलती अहा‍ँक बेटा केलक मुदा हमर तामस ओकरापर नै अछि, अहाँपर अछि. अइ द्वारे जे अहा‍ँ ई गप हमरास‍ँ नुकेलिऐ. अहाँ जानै छिऐ जे हम केकरो अहित नै करै छी. जत’ धरि बनि सकैत अछि, मदति करै छी. बराबर ध्यान राखै छी जे अप्पन लोक सभके‍ँ कोनो तरहे‍ँ दिक्कत नै होइ. मुदा अहाँ नुकेलिऐ आ ओकरे दुःख अछि आ तामस सेहो. अहा‍ँके‍ँ बता देबाक चाही रहए जे अहाँक बेटा अहा‍ँक कहलमे नै अछि. एतबे टा नै, इहो कहैमे कोनो हर्ज नै जे ओ चरित्रहीन आ भ्रष्ट अछि. ई घरक गप छल, हमरा बताबैमे कोन गपक डर आ संकोच? हम अहाँके‍ँ खा’ त‍ँ नै जैतौं.’ रघुनाथ नीचा‍ँ ताकैत चुप रहल. हुनकामे ई साहस नै छल जे कहि दैतिऐ- ई दुनू इल्जाम गलत अछि. मुदा ई कहएस‍ँ अनर्थ भ’ जैतिऐ. मैनेजरक तामस कोन रूप लैतिऐ, कहब कठिन छल. ओ जलील हुअएमे अप्पन भला बुझलक आ मैनेजरके‍ँ ओहि सोहमे सुनैत रहल. एखन अहाँके‍ँ बुझएमे नै आबि रहल अछि जे अहाँक बेटा अहाँस‍ँ की केने अछि? अप्पन नासमझीमे अहाँके‍ँ कतेक पैघ मुसीबतमे फ‍ँसा देने अछि. अहा‍ँक बेटी एखन कुमारि अछि. भगवन नै करए कुमारि रहि जाए. ई अकारण नै कहि रहल छी. अहाँके‍ँ ई पता तखैन चलत जखन बेटी लेल वर देखै लेल निकलब. जत’ जाएब, आन गपस‍ँ पहिने लोक यएह पूछत जे अहा‍ँक संबंध कत’-कत’ अछि? बताबए त‍ँ पडत जे बेटा कायस्थक छौड़ीस‍ँ ब्याह केने अछि, समैध लाला अछि. बरेबै बा नुकेबै? एहन गप नुकाइतो कहाँ अछि. अहाँ नुकाएब त‍ँ ओ दोसरास‍ँ पता लगा लेत. जानिते छी, जे कियो संबंध बनाबैत अछि, ठोक बजा क’ बनबैत अछि.’ रघुनाथ ठाढ़ भ’ गेल आ हाथ जोड़ि क’ बाजल- ‘ठीक छै, चलैत छी.’ ‘अरे बैसू, एतेक जल्दी किए?’ ‘नै, जरूरी काज अछि, आब देरी भ’ रहल अछि.’ ‘अच्छा, जाउ.’ मनेजर सेहो संग-संग ठाढ़ भ’ गेल- ‘अच्छा, ई बताउ, अहाँक रिटायरमेण्ट कहिया अछि?’ रघुनाथ चौंकल आ हुनका देख’ लागल. ‘ताइस‍ँ पुछलौं किएकि प्रिंसिपल साहेब बतौलखिन जे अहाँक मन नै लागि रहल अछि पढ़ाबैमे. बेसी काल क्लास छोड़ि दै छी बा बाहर रहै छी.’ ‘एना त‍ँ नै अछि. जरूरी पड़लापर एक्स्ट्रा क्लास सेहो लै छी आ कोर्स पूरा करै छी. रिजल्ट कहियो ख़राब नै आबैत अछि हमर छात्रक.’ ‘ठीक अछि. मुदा हम दू बेर गेल रही ऐ बीचमे आ दुनू बेर अहाँके‍ँ नै देखलौं. ई अहाँ आ प्रिंसिपल साहेबक बीचक गप छी, हमरा एकरास‍ँ की मतलब?’ कहैत मैनेजर बोलेरोमे बैस गेल. रघुनाथ किछु कह’ चाहै छल मुदा चुप रहल. गाड़ी स्टार्ट होइस‍ँ पहिने मैनेजर नौकरपर गरजल- ‘भोलू. मास्टर साहब खाय चाहए त‍ँ खुआ देब, हमरा बेर भ’ सकैत अछि.’ रघुनाथ घुरि गेल. हुनका बेर-बेर लागि रहल छल जे आबि क’ ओ गलती केलक- जे हुनका नै एबाक चाही रहए. 8 सरला घर आएल- छुट्टीक दिन. रविके‍ँ. पहिने ओ बेसी काल आबै छलि. शनि साँझ के‍ँ आबै छलि, रविके‍ँ रहै छलि आ सोम दिन भोरे चलि जाइ छलि. मिर्जापुरस‍ँ घरक दूरी अछि कत्ते? बीचमे बनारसमे एकटा बस बदल’ पड़ैत अछि-बस. मुदा दू बरख स‍ँ आएब ओ एकदम्मेस‍ँ कम क’ देने अछि. ताइस‍ँ सरलाके‍ँ लागै छल जे ओकरा आबएस‍ँ माँ-बाप खुश होइ क’ बदला चिंतित आ परेशान भ’ जाइत अछि, जेना बेटी नै, समस्या आबि गेल, जेना कहि रहल हुअए- ले देखि ले. बुढ़िया त‍ँ भ’ गेल, आब नै त‍ँ कहिया करब बियाह? रघुनाथ गाजीपुर आजमगढ़ भ’ क’ घुरल छल. ओ अपना दिसस‍ँ मन बना क’ आएल छल- दुनूमे स‍ँ एक; जेकरामे शीला आ सरला ‘ह‍ँ’ क’ दिअए. ओ दुनूक ल’ क’ शीलास‍ँ गप केने छल. खर्चाक मामिलामे दुनू बीस-उन्नीसक बियाह छल. आठस‍ँ दस लाखक बीचक. ओ बरख भरिस‍ँ लागल छल हुनका पाछा‍ँ आ आब ‘फ़ाइनल’ करबाक बेर आबि गेल छल. आजमगढ़क लड़का ‘सेल्स टैक्स आफिसर’. अखैन इलाहाबादमे काज क’ रहल अछि. खानदानी कुलीन सेनानी वीर कुंवर सिंहक संबंधी. बाप काशी ग्रामीण बैंकमे खजांची. ‘ईमानदार’ आ ‘मददगार’ जेहन छवि बना क’ राखबाक संग पा‍ँच बरखक भीतर आजमगढ़ शहरमे दुमहला कोठी. लड़काक दू टा छोट भाय आ दूटा छोट बहिन. माँ जिबैत. लड़का किछु नै त‍ँ कमस‍ँ कम एडिशनल कमिश्नर भ’ क’ रिटायर हएत. ओ ओना लड़की देख लेने छल आ पसीन केने छल. लड़का दिसस‍ँ मामिला फ‍ँसल छल लड़कीक नोकरी ल’ क’- जे दुनूमे स‍ँ नोकरी कियो एक्के टा करत. लड़की जौं नौकरी करए लेल चाहैए त‍ँ तखन करए जखन नेना सभ स्कूल जाए लागए. ई शर्त एहन छल जकरा सरला मानत-अइमे संदेह छल रघुनाथके‍ँ. किछु गप के‍ँ ल’ क’ शीला सेहो असमंजसमे छल- लड़का सभस‍ँ पैघ बेटा. दू टा दिअर हएत आ दू टा ननदि. दिअरके‍ँ पढ़ेबाक जिम्मदारी सेहो उठाब’ पड़ि सकैत अछि भौजीके‍ँ. ननदिक स्वाभावस‍ँ खौंझी होइत अछि- जरैवाली आ एक नै एकटा बखेड़ा ठाढ़ करएवाली. झंझटिया. पैघ होइ के कारण हुनकरो शादी-बियाहमे किछु नै किछु करए पड़त. सासु सेहो अखैन मरल नै अछि-झगड़ाउ आ सभटा गपपर मीन-मेख निकालएवाली भेल त‍ँ आरो मोश्किल. भ’ सकैत अछि, बुढ़ौती बड़की पुतोहूक संग काटए लेल सोचए. सरला अलग नौकरी करैत रहए तखनो ई झंझटि कम नै होइबला अछि. ओ तय केलक जे बेटीके‍ँ बुझा-सुझा क’ निर्णय करब ठीक हएत. दोसर बियाह प्रस्ताव गाजीपुरक. एकरास‍ँ उलटा. लड़का इलाहाबादमे पा‍ँच बरखस‍ँ कोचिंग करैत लोक सेवा आयोगक परीक्षा द’ रहल छल. आइ.ए.एस. आ पी.सी.एस. क सेहो. पिछला बेर इंटरव्यू धरि जा क’ छ‍ँटा गेल छल. गोर, नम्हर आ सुन्नर. अबेर-सबेर कत्तो नै कत्तो सेलेक्शन निश्चित छल. रघुनाथ दोबारा ओ गलती नै दोहराबैक चाहैत छल जे एक बेर क’ चुकल छल. दू बरख पहिने. जखन लड़का कम्पटीशन द’ रहल छल तखैन बिया मंगनीक छल, बेरोजगार बुझि क’ नै केलखिन ओ मुदा जखन तीन मास बाद ‘सेलेक्ट’ भ’ गेल त‍ँ दाम पचास लाख. हाथस‍ँ निकलि गेल बियाह. ...त‍ँ ओकरा किछु नै किछु बनबाक अछि आइ ने काल्हि. बाप जीवन बीमा निगममे उपप्रबंधक. बेटा असगरे- ने भाय, नै बहिन. बापक एकटा पैघ भाय छल- सेहो नावल्द. हुनकर संपत्ति सेहो भेटबाक छल. शीलाक झुकाव अइ बियाह दिस छल. एकरास‍ँ छोट परिवार की भेट सकैत छल केकरो? नहिये ननदिक झंझटि, नै दिअरक. जत’ चाहू ओत’ रहू. जेना चाहू ओना रहू. जे चाही वएह करू. नै कियो देख’ बला, नै रोकएबला. नर्सिंग होम आ अस्पतालक जरूरी भेल त‍ँ सासु हाजिर. बुढ़बाके‍ँ छोड़ि सासु नै जाएत त‍ँ माँ त‍ँ छेबे करए. जतेक ससुर, ओतेक नहिरा- दुनू अहींक. रघुनाथक नजरिया किछु आर छल. हुनका आजमगढ़बलाक पक्का नोकरी आ भरल-पुरल परिवार बेसी नीक लागि रहल छल. मुदा ओ निर्णय सरलापर छोड़ने छल. सरला अप्पन पिताके‍ँ देखलक- एतेक कम दिनमे कत्ते बदलि गेल अछि पिताजी. खल्वाट भ’ गेल अछि. माथस‍ँ केस उड़ि गेल छै- कनपट्टीके‍ँ छोड़ि क’. आगूक दूटा दा‍ँत जानि कहिया उखड़ि गेल. ठोकर बैस गेल अछि. कनी आर झुकि गेल अछि आ बूढ़ सन बुल’ लागल अछि. पिता सेहो बेटी दिस ताकलक- ओ सेहो बदलल-बदलल सन लागि रहल छल जानि किए? आब ओ हुनका कोनो लड़की नै, स्त्री लखाह द’ रहल छल. ओकरा समीज-सलवारमे देखैक आदति पड़ि गेल छल हुनका- शाइत. मुदा ओकर जे चेहरा एतेक उदास आ सुखाएल रहैत छल, ओ एतेक पनिगर आ प्रसन्न किए? यएह नै, दुबर–पातर देहमे भराव आ आकर्षण सेहो आबि गेल छल. ऊबड़-खाबड़ समतल सीनापर गोलाइ उभारक संग पुष्ट नजरि आबि रहल छल. रघुनाथक अनुभव बता रहल छल जे एना कोनो मर्दक संसर्ग आ हाथक स्पर्शक बिना संभव नै मुदा मन कहि रहल छल जे एहन खान-पानक सुविधा आ निश्चिंतताक कारण अछि. ओ साड़ी-ब्लाउजमे ठाढ़ अप्पन बेटीके‍ँ आजमगढ़ बलाक नजरिस‍ँ देखबाक प्रयास केलक. सरला ओइ दुनू बियाहक ल’ क’ गंभीरतास‍ँ सुनैत रहल. बड़ी काल धरि. ‘ह‍ँ, बाजू, अइ सभमे कोन पसीन छौ तोरा?’ रघुनाथ अंतमे पुछलक. ‘कोनो नै. हुनकास‍ँ कह जे ओ जतए चाहए, ओतए करए, हमरा नै करबाक अछि.’ ‘की?’ रघुनाथ अवाक. हुनकर आ‍ँखि फाटल रहि गेल. ओ एकटक देखैत रहल- ‘सात बरखस‍ँ यएह सुनबा लेल दौगैत रही?.’ रघुनाथ अखड़ा खाटपर बैसल छल, आ शीला सरलाक बगलमे पड़ल प्लास्टिकक कुर्सीपर. साँझक छाह आँगनमे उतरि आएल छल. सरला माँ-बापक सभस‍ँ दुलारू बेटी छल आ मु‍ँह लागल. रघुनाथ अप्पन बेटा सभस‍ँ दूरी बनौने छल, मुदा बेटीस‍ँ नै. जे गप केकरो स‍ँ नै कहि सकैत छल, सेहो बेटीस‍ँ क’ लैत छल. बेटी बापक लिहाज त‍‍ँ करैत छल मुदा किछु कहए-सुनए स‍ँ पहिने संकोच नै करैत छल. ‘हम कहियो नै कहलौं जे अहाँ दौडू. फालतूमे दौड़ैत रही त‍ँ एकरा लेल हम की करब? पूछू माँ स‍ँ, कतेक बेर कहने रही जे हमरा नै करबाक अछि ब्याह.’ ‘नै करबाक अछि त‍ँ की असगरे रहबाक अछि- अइ तरहे?’ ‘हम ई कहिया कहलौं? हम खाली ई कहलौं जे हमरा बियाह नै करबाक अछि जाइमे लेन-देन आ मोल-भाव होइत हुअए?’ ‘कोन बियाह अछि जाइमे ई सभ नै होइत अछि? की संजयमे नै भेल?’ ‘ओकर गप छोडू, ओ बियाह नै, सौदा छल.’ ‘तू‍ँ की कह’ चाहै छह?’ रघुनाथ आँखि तरेर क’ ओकरास‍ँ पुछलक आ चुप देखिक’ खाटपर पसरि गेल. कनी काल धरि शांत रहलाक बाद ओ बाजल- ‘शीला, बुझाउ ऐ लड़कीके‍ँ. शहरमे रहि क’ ओकर दिमाग ख़राब भ’ गेल अछि.’ शीला माथ झुकाक’ शुरूस‍ँ नोर बहा रहल छलि. अप्पन नाम सुनलाक बाद हिचकी लिअए लागल- ‘अहीं माथपर चढेने छी. अहीं भोगियौ. जखैन ई बी.ए. केने छल तखने हम कहने रही जे कराए दियौ बियाह. त‍ँ नै, अखैन पढ़त. एम.ए. केलक त‍ँ फेर कहलौं जे पैघ भ’ गेल अछि, आब करा दियौ. त‍ँ नै, अप्पन पएर पर ठाढ़ हएत हमर बेटी. नोकरी करत. आब देखू एकर रंग-ढंग? हम कहने रही दुनियाक चक्कर लगाबैस‍ँ पहिने जे पहिने एक बेर पूछि लिअ अप्पन दुलारू बेटीस‍ँ एक बेर. नै पुछलौं, त‍ँ भोगू.’ ‘पापा, तामस नै हुअए त‍ँ हम किछु बाजी.’ सरला सहज छल. परेशान माँ-बाप छल। सरला- ‘अहाँ आ माँ हमर आँखि छिऐ जइस‍ँ हम दुनिया देखब शुरू केने छलौं. ओकरेस‍ँ हम देखलौं जे मर्द एकटा बड़द अछि जकरा एकटा खुट्टा चाही-अप्पन आरामक लेल. ओ खुट्टा अहा‍ँ लेल माँ छल आ सत-सत बाजू, की माँ अहा‍ँ लेल विवशता नै छल.’ ‘बन्न करू ई फालतू गप?’ ‘पापा, हम अहाँक ओ जिनगी त‍ँ देखने छी जे सभ कियो देखने अछि मुदा बेस-कम मम्मी नै देखने हएत. हुनका की पता जे ओ कतेक खुशमिजाज आ मजाकिया इंसानक कनिया अछि. हमहू‍ँ कत’ बुझि सकल छलौं, अहा‍ँके‍ँ घरमे? यएह बुझै छलौं जे हमर बाप तमसाइत--डपटैत आ गुम्हराइत आ हा-हा करबाक अलाबे किछु नै जानै छथिन. ई बाहर देखि क’ जानलौं जे ओ लजाइत सेहो अछि, मुस्कराबैत सेहो अछि, हंसी-मजाक सेहो करैत अछि आ आ‍ँखि–आ‍ँखिमे गप सेहो करैत अछि. ... आइ एतेक दिन बाद हम बुझि सकलौं जे जखन हम हाईस्कूलमे छलौं त‍ँ मिसेज रेखा मैडम किए हमरा एतेक प्रेम करैत छल आ अहाँ लेल किए चिंता करै छल.’ ई अंतिम वाक्य अंग्रेजीमे ओ बाजल। सरला जकरा शीला नै त‍‍‍ँ बुझलक बा सुनलक मुदा रघुनाथ तामसमे बैसि गेल- ‘फालतू गप बन्न करू, साफ़-साफ़ कहू अहा‍ँके‍ँ बियाह करबाक अछि बा नै.’ ‘जखन करबाक हएत क’ लेब, अहाँ किए परेशान छी.’ ‘ताइस‍ँ कि हम जिबै छी, मरि नै गेलौं.’ ‘अहाँ नै क’ सकब पापा. हम जानै छी अहा‍ँके‍ँ, ताइस‍ँ छोडू.’ ‘जखन संजयके‍ँ बर्दास्त केलिऐ त‍ँ अहू‍ँके‍ँ क’ लेब, कहू त‍ँ.’ सरला कनी काल धरि चुप रहल आ रघुनाथके‍ँ देखैत रहल- ‘कोनो सुदेश भारतीक ख्याल अछि अहा‍ँके‍ँ?’ ‘एक त‍ँ वएह अछि तोहर मिर्जापुरक एस.डी.एम.’ ‘कोनो दोसरो अछि की?’ रघुनाथ दिमागपर जोर दैत बाजल- ‘एक कोनो भारती भारती क’ कए छल जे तोहर संग एम.ए. मे पढैत छल.’ ‘आ ओकर बड़ाइ करै छलौं अहाँ. वएह अहाँके‍ँ बाजार ल’ क’ जाइ छल.’ ‘ह‍ँ, नीक छौड़ा छल. मुदा चमार छल.’ ‘मिर्जापुरबला वएह भारती अछि, जेकरा अहाँ नीक कहैत रही.’ ‘त‍ँ?’ रघुनाथ विस्मयस‍ँ ओकरा घुरैत रहल. ‘त‍ँ की? ओकरा संग ब्याह करबाएब अहाँ?’ रघुनाथ खाटपर फेर पसरल, ओइस‍ँ पहिने शीला कूही भ’ कान’ लागल. रघुनाथ आकाश दिस दुनू हाथ उठेलक- ‘हे भगवन. ई की क’ रहल छिऐ हमरा संग. लाला त‍ँ तैयो ठीक छल मुदा आब की? हम की करब? केकरा मु‍ँह देखाएब? ...ओ पागल जेना किछो स‍ँ किछो बकझक करए लागल. ‘माँ, ई त‍ँ सात बरखस‍ँ लोकक दरबज्जे-दरबज्जा घिघियाइत फिर रहल छथि आ एतेक बरखस‍ँ ओ हमरास‍ँ खेखनिया क’ रहल अछि- पूरा सम्मान आ इज्जतक संग. कोटास‍ँ सही मुदा पी.सी.एस. अछि. देखै-सुनैमे केकरोस‍ँ कम नै. हमर नौकरीस‍ँ सेहो ओकरा परहेज नै. कखनो कोनो बदमाशी सेहो नै केलक हमरा संग. कोनो एहन ऐब सेहो नै छै ओकरामे. हम एखन धरि ‘ह‍ँ’ नै केने छी मुदा सोचि लेने छी जे करब त‍ँ ओकरे संग.’ ‘ओकर बाद घुरि क’ कहियो पहाड़पुर नै अइहियें. अप्पन मु‍ँह नै देखाएब. ई याद राखिहें.’ रघुनाथ ठाढ़ भ’ गेल- ‘आब जाउ एत’स‍ँ. कोनो जरूरत नै तोहर. मरि गेलौ माँ-बाप.’ ‘राति भ’ रहल अछि. अइ काल कत’ जाएत?’ शीला बाजल. ‘चाहे जत’ जाए, जाए.’ सरला मुस्कराबैत बैसल रहल-‘एखन कहाँ केने छी? अखैन त‍ँ रहि सकै छी.’ 9 सरला चलि गेलि, मुदा रघुनाथक सुख-शान्ति लऽ गेलि। रघुनाथ कतेक राति सुति नै सकल। हुनका नीन नै आबि रहल छल। कोन जन्मक पाप छल जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। बच्चा सभकेँ एहन संस्कार कतऽसँ भेटल छलै जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। संजयकेँ कियो नै भेटलै- नहिये ठाकुर, नहिये बाभन, नहिये भूमिहार; भेटलै तँ लालाक लड़की। तकर बादो ओ ओइ लाएक छल जे मुँह देखा सकए, मुदा ई सरला। ओ ककरा मुँह देखाएत। कतऽ मुँह देखाएत। लड़कीक अप्पन तर्क छलै, जे ओ जाइत-जाइत सुना गेल छल। जे भी गलत काज करैए, ओ ओकर पक्षमे तर्क गढ़ि लैए। उहो ई तर्क गढ़ले छल- अहाँ दोसराक शर्तपर बियाह कऽ रहल छी, एतऽ हम बियाह करब मुदा अप्पन शर्तपर, अहाँ हमर स्वाधीनता दोसराक हाथमे बेचि रहल छी, एतऽ हमर स्वाधीनता सुरक्षित अछि, अहाँ अतीत आ वर्तमानसँ आगू नै देखि रहल छी, हँ, हम भविष्य देखि रहल छी, जतऽ स्पेसे-स्पेस अछि। स्पेसे-स्पेस, ऊहूँ। स्पेस माने की। आरक्षण आ कोटाक अलाबे एकर कोनो मतलब अछि? एतबे नै, आरक्षण नै हेतियै तऽ भारती केकरो ने केकरो दुआरि जाइत हेतियै आ पढ़य-लिखय कऽ बादो नग्रमे रिक्शा खींचैत हेतियै। अहीं कहैत रही जे एकदम गधा अछि, किछु नै बुझैत अछि। आइ पी.सी.एस. भऽ गेल तँ ओकरा जेहन कियो नै। ओ अप्पन मनक बोझ निकाललाक बाद हल्लुक अनुभव कऽ रहल छल कि पाछाँसँ कोनो हल्ला सुनाइ देलकै- यौ मास्टर साहेब। जमायक की हाल अछि? आ कनी-कनी हुनका लागै छल जे ई हल्ला पाछाँ टा सँ नै, आगूसँ सेहो- बाम-दहिनसँ सेहो, ऊपर-नीचाँसँ सेहो आबि रहल छलै। चारू दिससँ। गाम-घर, आस-पड़ोस, जान-पहिचानक सभ कियो हुनकर जमायकेँ लऽ कऽ चिंतित छलनि मुदा हुनकासँ हँसी कऽ रहल छलनि। ऐ बीच नै जानि किम्हरसँ कोनो बच्चाक किलकारी सुना पड़ल आ ओ हुमचैत हुनका दिस अप्पन नान्हि-नान्हि बाँहि पसारि देलक- नाना, ई देखू की अछि। ओ ओकर हाथसँ एकटा कागज लेलथि, जे हुनकर परोक्षमे चमटोलसँ झूरी देने गेल छल। ई निमंत्रण पत्र छल झूरीक पोतीक। तँ आब यएह हुनकर दियाद आ लगीचक अछि। नोत-हकार आ खानपीन आब हुनके संग हेबाक अछि, गेल अप्पन दियादबाद। रघुनाथ निश्चय केलक जे आब ओ वालण्टरी रिटायरमेंट लऽ लेत। ओ शीलासँ अप्पन ई इच्छा बतौलक जे आब ओकरा नोकरीक जरूरत नै छै। ई नै बतौलक जे ओकरा वी.आर.एस. आ सस्पेंशनमे सँ एकटा चुनबाक छै आ ऐमे यएह ठीक छै जे ओ करबाक लेल सोचि रहल अछि। चन्द्रमाक रोशनी पसरल छल, अगहनक। अकास साफ छल। आध आंगैन इजोरिया छल, आधमे छाह। चन्द्रमा सोझे रघुनाथक चेहरा देखि-देखि मुस्करा रहल छल। ओ ओकर जल्दीसँ हटबाक आसमे छल मुदा ओ अप्पन ठामसँ हटबाक नाम नै लऽ रहल छल। ओ हुनका नजरि गारि कऽ देखैत रहल आ हुनका लागऽ लगलनि-जेना चांद ऐना अछि आ ओकरामे लखाह पड़ऽ बला दाग हुनकर मुँहक झाइ। गामक सिमानक पारसँ शुरू भऽ जाइत अछि कुसियार आ राहरिक खेत, जतऽसँ नरहिया एक्के संग हुआँ-हुआँ शुरू केलक। गामसँ कुकुड़ सेहो ओही भावसँ उतारा देलक आ जना देलक जे ओ सभ सेहो सुतल नै अछि। शीलाक खाट रघुनाथक कातेमे छलै आ ओ सुतलि छलि। पछिला कतेक दिनसँ रातिमे यएह भऽ रहल छल। रघुनाथ रतजग्गा कऽ रहल छल आ शीला गप करैत सुति जाइत छलि। रघुनाथ उठि कऽ बैस गेल। इजोरियामे ओकर मुँह देखलक। भरल-भरल गोल गोर चेहरा आ नाकक लोलपर चमकैत चन्द्रमाक किरिण। एकरासँ पहिने ओ हुनका सदिखन पटायल देखने छल, सुतल नै। ओ एकटकसँ निहारैत रहल हुनका। ओ करौट लेने छल आ ओकर चेहरा रघुनाथे दिस छल। ओकरासँ सात बरख छोट, मुदा उमेर ओकरो नै छोड़ने छल। ओकरा भीतर प्रेम घुमरऽ लागल- हँ, आबो सुन्नरि छल हुनकर स्त्री। ओकरा लागल, ओ कहियो ठीकसँ प्रेम नै केलक हुनका। ओ हाथ बढ़ा कऽ हुनकर ब्लाउजक एकटा बटन खोलि देलक, चुप्पे दोसर, फेर तेसर। सुतल छाती जेहन नीनसँ जागि गेल, कुनमुनेलक आ फेर घुरऽ लागल। बिछौनपर झुकल-झुकल। ओइमे जान बाकी छल। ओ उठल आ हुनकर बगलमे पटा रहल। शीला ठाम बनौलक हुनका लेल आ आँखि बन्द केले-केले अपनाकेँ हुनकर आश्रित कऽ देलक। आँखिकेँ खोलबाक प्रयोजन नै छलै, हुनकर ओंगरी देहक सभटा कोन-अंतरासँ परिचित छल। ओ बड़ काल धरि एक-दोसराक देहक भीतर ओइ चीजकेँ ताकैत रहल, जे नै जानि कहिया अप्पन ठाम छोड़ि कऽ चलि गेल छल। रघुनाथकेँ लागि रहल छल- नै, कत्तौ नै अछि, कत्तौ ने कत्तौ ऐ बा ओइ देहमे अछि सत्ते मुदा जौँ सच्चे हेतिऐ तँ कतऽ जैतिऐ। परेशान भऽ थाकि-हारिे ओ अप्पन मुँह शीलाक छातीक बीचमे धँसा देलक आ शांत पड़ि गेल। मन नै कऽ रहल अछि, तँ छोड़ू।- शील आस्तेसँ बाजल। कनी काल धरि रघुनाथ किछु नै बाजल, फेर एक बेर हिचकी लेलक। शीलाकेँ लगलै जे ओकर छातीक बाम दिससँ जे गरम चीज बिछौनपर टघरि रहल अछि, ओ नोर थिक। रघुनाथक नोर। ओ हुनकर उघारल पीठ ससारलक- आस्तेसँ। मन तँ कऽ रहल अछि, देहे संग नै दऽ रहल अछि।- टूटल सांसे रघुनाथ बाजल। -तँ ऐमे दुखी हेबाक की गप अछि? होइत छै एना कखनो-कखनो। -नै, ई आब कखनो कालक गप नै लागि रहल अछि, शीला। -बड़ तनावमे रहि रहल रही ऐ बीच। तइसँ एना अछि। -नै, नै, फुसिये मोन नै बहटारू। हम ओइ लीखकेँ चीन्हि गेलौं, जइ बाटे चलि कऽ ई देहमे पैसैत अछि। -के ऊ। -बुढ़ापा। रघुनाथ बाजल आ कूही भऽ कानऽ लागल। शीला ओकरा पकड़िकेँ बैसौलक आ सांत्वना दैत बाजलि- एहन किछु नै अछि। दिमागी भूत खाली। बिना काजक सोचैत रहै छी, राति-दिन। हम कोनो शिकाइत केने छी कहियो? आर की चाहै छी। सदिखन जवाने रहब की? ओना, ई सभ बेटी-बेटा लेल छोड़ि दियौ। हमर-अहाँक उमेर थोड़े अछि ई सभ करबाक। अगला चारिम आ पाँचम दिन साँझमे जखन रघुनाथ कॉलेजसँ घुरल तँ शीला ओकरा खबरि केलक जे टेस्ट दऽ कऽ धनंजय आबि गेल अछि। ओना जौं ओ खबरि नै करितिऐ तखनो ओसारपर बाइकेँ ठाढ़ देखि कऽ ओ बुझि गेल छल। कपड़ा बदलि कऽ जखन ओ बाहर आएल तँ धनंजयकेँ देखलक। पुछलक- ऐबेर केहन भेल पर्चा। -बड़ नीक। निकालि लेब ऐबेर। -पाँच बरखसँ यएह गप सुनि रहल छी। सभ बेर निकालि लै छी। -एस.सी., एस.टी. कोटा आ घटल सीटपर हमर सक नै अछि। ओकरा लेल हम की करी? रघुनाथ ओकर कोना उतारा नै देलक। ऐ बीच शीला बाप-बेटा लेल चाह लऽ कऽ आएल। चुपचाप चाह पिबैत रहल। चुप्पी राजू तोड़लक- सुनने छी, अहाँ समएसँ पहिने रिटायरमेंट लैबला छी। -लैबला नै, लऽ लेने छी। आइ चिट्ठी देलौं। -एना किए केलौं अहाँ। -ई हमरासँ नै, अप्पन भाइ संजयसँ पुछू। शीला दिस देखैत रघुनाथ बाजल। -संजय तँ अछि नै, हम छी। कोनो निर्णय लेबासँ पहिने अहाँकेँ हमरा बताबैक तँ चाही छल। -बतैतिऐ तँ अहाँ की करतिऐ। हुनकर चेहरा कनी काललेल खिचा गेल, एक केर हँ देखलौं, दोसर केर नै, नै सुनऽ चाहैत रही। आ अखन ओ दिन नै आएल अछि जे हम अहाँ सलाह पर चली। धनंजय हुनका दैखैत रहल। फेर माँ दिस देखलक। शीला माथ झुकेने बैसल रहल, किछु नै बाजल। -अहाँकेँ निर्णय लैत काल हमरा लऽ कऽ सोचबाक चाही। अखन अनिश्चिते अछि हमर भविष्य। -ई सोचैत-सोचैत हम बूढ़ भऽ गेल छी। अहाँ बालिग छी आब। अप्पन अपने देखू।- रघुनाथ खिसियाइत बाजल। ऐ उत्तरसँ धनंजय मसोसि कऽ रहि गेल। ओ आससँ माँ दिस देखलक जे ओ किछु बाजए। -अहाँकेँ ई बुधि दीदी आ संजयक कालमे किए नै आएल छल, हमरे कालमे किए आबि रहल अछि। लाकेँ खराब लगलै। ओ टोकलक- चुप रह राजू, कखैन की बाजबाक चाही, बुझैत नै छिहीं की। -सभ बुझै छी माँ, एत्ते बुरबक नै छी। पता नै किए, हमरोसँ ईर्ष्या करै छथिन ई। अहाँ तँ बुझिते छी जे टेस्टक कोनो भरोस नै अछि, यएह सोचि हम नोएडाक एकटा मैनेजमेंट इंस्टीट्यूटक पता केने छी। इंस्टटीट्यूट तँ आरो छै, मुदा रेट बड्ड छै। यएह छै जे नीक अछि आ अप्पन सीमाक सेहो। दोसरासँ डोनेशन तीन लाख मुदा हमरासँ अढ़ाइ लाख लऽ रहल अछि। सभटा मिला कऽ एक बरखक खर्च छह लाख टका पड़ि रहल अछि। आ आब। जखन हमर बेर आएल तँ ई रिटायर भऽ कऽ घर बैसि गेल छथि। अपनाकेँ हमर ठामपर राखि कऽ सोचियौ ने। रघुनाथ सुनैत चुपचाप बैसल रहल। शीला हुनका देखलक आ ओ शीलाकेँ। कियो ककरोसँ नै बाजल। रघुनाथ उठि कऽ भीतर गेल आ कनी कालक बाद नोटक गड्डी संग आएल। -ई लिअ साढ़े चारि लाख। बाकी बचल छऽ मासमे लऽ जाएब। ओ गड्डी ओकर आगू फेक देलक आ ओतऽसँ हटि गेल। दू 1 बड़ समए लागि गेलै रघुनाथकेँ घरपर रहबाक आदति पकड़ैमे। ओ रहल तँ गाममे मुदा गामक नै रहल। गाममे ओ नै रहल तँ ओ गाममे की करितिऐ। पहाड़पुर जाए लऽ चाहैत छल, अप्पन गाछी, बसबिट्टी आ पाखैरक कारण- जतऽ चिड़ैक बोली आ गाय-महीसक डिरिएनाइ आ बड़दक घंटीक टनटनसँ गाम गनगनाइत छल, मुदा आब गाछ कटि गेल छल। बसबिट्टी साफ भऽ गेल छल आ पोखरि धानक खेत बनि गेल छल। गाछीक बीचसँ एकटा नहरि गेल छल, जकर कातमे प्राइमरी स्कूल खुजि गेल छल। ओकरे बगलमे दवाइक दोकानक लेल जमीन घेर लेल गेल छल। आम्बेडकरक गाम भेलाक बाद पहाड़पुर तेजीसँ बदलि रहल छल। गाममे बिजली आबि गेल। केबलक लाइन बिछा गेल छल। अखबार लऽ कऽ हॉकर आबऽ लागल छल। किछु घरमे टीवी, पंखा आ फोन लागि गेल छल। सड़कपर खडंजा बिछा गेल छल। खपरैलक किछु मकान रहि गेल छल, बाकी सभ पक्का छल। जे पक्का नै छल, तकर आगू ईंटा खसल नजरि आबि रहल छल। रघुनाथ अपनाकेँ टी.वी. आ अखबारमे व्यस्त राखऽ लागल। शौक तँ उपन्यास पढ़ैक छलै मुदा उपन्यास कॉलेजक पुस्तकालयमे छलै जतऽ जाएब ओ बंद कऽ देने छल। हँ, ओ वएह उपन्यास दोबारा पढ़ि रहल छल, जकरा कहियो ओ पढ़ि गेल छल। मासमे एकाध बेर नगरक पेंशन ऑफिसक चक्कर ओ जरूर लगा लै छल। गाममे ओ नहिये ककरो कतय जाइ छल, नहिये हुनका कतय कियो आबै छल। ओ लड़का-बच्चाक लिखाइ-पढ़ाइकेँ काज बुझै छल, बाकी काज तँ फालतुए। सम्मान सभ करै छलै, छोट-पैघ सभ, मुदा अगुआएल वर्गसँ बेसी पिछड़ल आ दलित। तइसँ रघुनाथ हुनकर किताब-कॉपीसँ लऽ कऽ नाम लिखेबाक फीस आ फीसक माफी लेल जे कऽ सकै छल, करै छल। ओ गामक प्रपंच आ राजनीतिसँ निर्लिप्त बड़ सोझ-सरल आ सज्जन लोकक रूपमे सबहक प्रिय छल। मुदा ओ सबहक प्रिय नै छल। ठकुरानक, जकरा ओ अप्पन दियाद-बाद कहै छल, ओकर लड़का ओकरा पसंद नै करै छल आ तकर कारण छलै एक तँ जखन मंडल आयोग लागू कएल गेल तँ तकर स्वागत करैबलामे कॉलेजमे असगरे अगुआएल वर्गक अध्यापक रघुनाथ छल। दोसर जखन-तखन चमटोलक हरवाह हड़तालक धमकी दै छल, ओ मानै छल जे से वाजिब अछि आ हुनकर सभक हक अछि। -उपाए की अछि, से तँ बताउ? -उपाए अछि। चाहे तँ हुनकर मांगपर सहानुभूति संग विचार करू बा फेर एकटा ट्रैक्टर कीनू। आ किएक तँ अपनामे सँ कियो ऐ औकातिक नै छी, जे असगरे कीन सकी, तइ दुआरे हरक पाछाँ दाम बान्हि दियौ, जे सभ लोक मिल कऽ कीनी। ई गप्प भेल छल बब्बन कक्काक दरवाजा पर जखन दियाद-बादक सभ बड़-छोट जुमल छल। चलाएत के? ड्राइवरक संग हेल्पर चाही, खलासी चाही। अप्पन ई छौड़ा सभ जे पछिला सात-आठ बरखसँ कंपीटिशनक नामपर गामसँ नग्र आ नग्रसँ गाम मोटरसाइकिलपर घूम-फीर कऽ रहल अछि, जखन नोकरीक कोनो आस नै तँ यएह करए। रघुनाथ बाजि तँ गेल मुदा ओकरा लगले लगलै जे गलती भऽ गेलै। छौड़ा सभ बिख-सबिख भऽ गेलै, आँखि लाल भऽ गेलै। मुदा आगू बुढ़-पुरान छलै, से मसोसि कऽ रहि जाइ गेल। ओइमे सँ किछु रिसर्च कऽ रहल छल, किछु कोचिंग कऽ रहल छल, किछु केर अंतिम चांस छलै कंपीटिशनक, किछु कंपीटिशनक इंटरव्यूक तैयारी करै जाइ छल आ ओइ बीचमे कोनो तरहक बाधा नै चाहै छल। एहन तरहक प्रस्ताव अपमानजनक छलै ओकरा लेल। ई तँ कियो नै जानै छल जे ककर भाग्यमे की लिखल छै? आ की कहतै लोक, यएह जे ट्रैक्टर चलाबैक लेल केने छल एम.ए., एम.एस.सी. आ पी.एच.डी.।  ओकरा सभकेँ जे कहतै से तँ कहबे करतै- अहाँ की कहबै? अहाँ तँ बाप छी। सभटा लाज-धाख घोरि कऽ पी गेल छी की? मुदा ओकरामेसँ कियो बाजितिऐ, ओकरासँ पहिने आहत स्वरमे बब्बन कक्का बाजल- रग्घू। जाए दियौ। की कहियौ तोरासँ? तोहर बेटा एकर हालत मे हेतिऐ तँ आइ एना नै बाजितिऐ। रघुनाथ उठि कऽ घर घुरि आएल, चुपचाप। ओकरा दुख छलै जे ओ ओतऽ जे गप कहने छल, ओइ छौड़ा सबहक बाप ओकरा सभसँ कहै छल-कोढ़िया, अबारा। ई गप केकरोसँ नुकाएल नै अछि जे कोचिंग, फार्म, टेस्ट ओकरामे सँ कतेक लेल नग्रक दोस्तसँ मिलै-जुलैक बहन्ना छलै। ई रघुनाथे टा नै, ओकर सभक गार्जियन सेहो बुझै छलै जे ओकरा सभ लेल कोटा बा आरक्षण एकटा सहज कवच बनि गेल छै, जकर प्रयोग ओ सभ अप्पन असफलताकेँ नुकेबा लेल करैत अछि। मुदा ऐ समस्याक जे हल सुझौलक तइसँ बेटे सभ टा नै बाप सभ सेहो खराब मानि गेलै। एकर बादसँ नहिये कहियो कियो रघुनाथकेँ बजौलकै, नहिये ओकरासँ पुछलकै आ नहिये ओ कोनो सलाह देलक। हँ, ओकरा कतय एकमात्र आबऽ बला रहि गेल छलै छब्बू पहलवान। ओ किए आबै छलै आ सेहो शुरूहेसँ- तकर उत्तर नहिये छब्बू लग छलै, नहिये रघुनाथ लग। ककरो पुछलापर एतबे टा कहतिऐ- नीक लागैए। शांति भेटैए। ओ जखन आबै छल तँ गाँजा, भीजल साफी, चिलम, डोरक टुकड़ा आ सलाइ-काठी संग आबै छल। असगरे निश्चिंतीसँ दम लगैतिऐ। आ खाटपर पटा रहै छल। एम्हर किछु सधुआ गेल छल। जखन-तखन बाजि उठतिऐ- मास्टर कक्का, पता नै किए आब जीयैक मन नै करैए। एक बेर हुनका चुप आ उदास देखि कऽ रघुनाथ पुछलक- की गप अछि छब्बू। ऐ तरहे किए पटायल छी? छब्बू आँखिकेँ बंद कऽ बाजल- कक्का, आइ भोरमे बजरंग बलीक सपना आएल छल। बाजल, छब्बू। अहाँ जे पाप कऽ रहल छी, ओकर प्रायश्चित सेहो अहींकेँ करऽ पड़त, दोसराकेँ नै। -जखन अहाँ जानै छी जे पाप अछि, तँ किए करै छी? -हम देखिते बेबस भऽ जाइ छी मास्टर कक्का, की बताबी अहाँसँ? रघुनाथ दिसा-फरागत लेल जैबाक तैयारी कऽ रहल छल, बाजल- मुदा छब्बू, हम एकटा गप अहाँसँ कहि रहल छी, ख्याल राखब। जखैन धरि हुनकर हड़ताल चलि रहल अछि, ताधरि बिसैरियो कऽ चमटोल दिस पएर नै राखब। कोनो भरोस नै अछि ककरो। -गप तँ ठीके कहि रहल छी कक्का, मुदा एकटा हमर गप अहूँ सुनि लिअ। जौं ढोल बजाएत, तँ पाथर पड़ै बा बज्जर खसए, हम नै सुनब, नहिये देखब- चलि देब। जखन अहाँकेँ ककरो गप मानबाके नै अछि, तँ जे इच्छा अछि, से करू। रघुनाथ बड़बड़ाइत सिमान दिस चलि गेल, जिम्हर बब्बन सिंहक पंपिंग सेट छल। ई हड़तालक सातम दिन छल। अषाढ़ शुरू भऽ गेल छल आ ऐबेर पानि खूब बरिसल छल। हरवाहा एहन कालमे हड़ताल केने छल- खेतक जोत, बोनि आ केराकेँ लऽ कऽ। हरवाही आ खेतकेँ लऽ कऽ। बाबा आदमक जमानासँ चलि आबैत रेटपर काज करबासँ मना कऽ देने छल हरवाहा सभ। बीच-बीचमे हड़ताल केने छल ओ सभ, मुदा ठाकुर सभ बोनि कनी बेसी बढ़ा देने छलै आ ओकरा सभकेँ बुझा-सुझा कऽ ठीक कऽ देने छलै। मुदा ऐबेर आर-पारक लड़ाइ छल। ऐमे गोबर पाथैबाली ओकर छौंड़ी आ स्त्री  सभ सेहो छलै। परिणाम ई भेलै जे खेतमे लागल पानि सुखाए लागल छल, चरनीपर बान्हल माल-जाल लगही-गोबरमे उठि-बैस रहल छल आ पूरा ठकुरपट्टी गंदगीसँ भरि गेल छल। ऐबेर हड़ताल बुझैमे ठाकुर सभ चूकि गेल छल। हरवाहा थाकि-हार कऽ नै आएल आ नहिये खेखनिया केलक, नहिये ओकर चूल्हि मिझेलै। जरूरी पड़लै तँ अहिरपट्टी गेल, एम्हर नै आएल। पूरा इलाकाक चमटोलीक भविष्य पहाड़पुरक हड़तालपर आश्रित छलै- ओ सभ से बुझि जाइ गेल छल। ठाकुर सभ राति भरि बब्बन सिंहक द्वारपर पंचायत करैत छल आ मुंसफ, जज, मजिस्ट्रेट, कलक्टर, एस.पी., इंजीनियर, डॉक्टर नै भऽ सकैबला हुनकर छौड़ा सभ हुनकर पंपिंग सेटपर बैसकी। ओ सभ दिन साँझ आठ बजे धरि ओतऽ जुमै छल, कहियो गाँजाक दम लगाबैत छल, कहियो दारूक बोतल खोलैत छल आ चमटोलीकेँ सदिखन सैंतबाक योजना बनाबैत छल। कोना सैंतल जाए, कखैन सैंतल जाए, सैंतबाक लेल तरीका की हुअए- ई सभटा समस्या छलै जइ लऽ कऽ ओ सभ गंभीरतासँ विचार करतिऐ आ तेसर गिलास धरि पहुँचैत ओ सभ कोरस गाबऽ लागै छल। गाबैत चलू, गाबैत चलू, एक दिन अहूँक जमाना आएत। जहिना ई खत्म हेतिऐ तहिना इंटरनेशनल लुक भऽ जाइ जाइत छलै- मनमे अछि विश्वास। हो हो मनमे अछि विश्वास हम हएब कामयाब, एक दिन। इ काल रामभरोस दुबे, जे पड़ोसी गामक छल आ भंगेड़ी छल आ ओकरा छोड़ि ऐ मंडलीक निअमित सदस्य बनि गेल छल- पतरा खोलि कऽ दिन देखैत रहतिऐ जे सैंतबाक तिथि कोन हुअए? ओ मुहुर्त तँ बता देने छल- कृष्णपक्षक अमावस्याक राति, मुदा कोन मासक अमावस्या हुअए, ऐ लऽ कऽ आश्वस्त नै भऽ पाबि रहल छल। ओम्हर हड़ताल खिचैत जा रहल छल आ गद्दरि फसिलक आस खतम भऽ रहल छलै। ओइ काल एक दिन नहरक रस्ते एकटा ट्रैक्टर धड़-धड़ करैत आएल छल आ अहिरपट्टीमे दशरथ राउतक दरबज्जापर ठाढ़ भऽ गेल। ओकरा लऽ कऽ आबऽबला आन कियो नै जसवंत छल- दशरथक बेटा। दशरथकेँ चारि टा बेटा छल- दूटा गाममे आ दूटा मध्यप्रदेशक कोरबामे। गामबला दूध आ खोआक व्यवसाय करैत छल आ कोरबाबला बलवंत कोलियरीमे ठेकापर लेबर सप्लाइ करैत छल। आ जसवंत देसी दारूक भट्टी चलाबैत छल। जसवंत जाधरि गामपर छल लुच्चा, लफंगा आ लतखोर मानल जाइ छल। भागलो छल तँ बापसँ मारापीटी केलाक बाद। शुरू-शुरूमे मध्यप्रदेशसँ पुलिस आएल छल, एक-दू बेर तकैत, मुदा बादमे सुधरि गेल कनी-मनी। एम्हर जखैन गाम आबै छल- भैया, बाबू, कक्कासँ नीचाँ ककरो नै कहै छल। कहै छल जे परदेसमे सभ किछु अछि, इज्जत नै अछि। चाही जतेक कमा लिअ, रहब दूइये नंबरक आदमी।  दू नंबर माने दू कौड़ी। आब ओ सभ किछु छोड़ि-छाड़ि कऽ गाम-जबारक सेवा करऽ चाहै छल। संजोगे छलै जे ओ पछिला एक-दू बेर जखन-जखन गाम आएल, गाम हड़तालक चपेटमे छल। ओ नै एम्हर छल, नै ओम्हर। ओकर उठब-बैसब दुनू दिस छल-ठाकुर दिस सेहो, हरवाहा सभ दिस सेहो। ओ अप्पन दिससँ दुनूक बीच सुलह-समझौताक पूरा कोशिश केलक, मुदा नजदीक एबाक बदला दुनू एक-दोसराक आर विरुद्ध होइत गेल। जयवंत ओइ दुनूकेँ जवाब देलक ट्रैक्टर आनि कऽ, जे सभ किचकिचबैत रहैत छलै जे अहीरक बुधि ओकर ठेहुनमे होइत अछि (तइसँ कारण ओ सभ ठेहुनक बीच बाल्टी दबा कऽ गाय आ महीस दुहैत अछि)। ट्रैक्टर खेतमे ठाढ़ छल- ट्रॉली, कल्टिवेटर, हार्वेस्टर आ थ्रेशरक संग, गेंदाक माला पहिरने। ओकर कातमे खाट पर डंटा लऽ कऽ दशरथ बैसल छल। गामक नेना सभ ओकरा घेरने छल- कियो छू कऽ देखऽ चाहै छल, किछु ट्रॉलीपर चढ़ऽ चाहैत छल। दशरथ तमसा रहल छल आ डंटा पटकि कऽ ओकरा सभकेँ भगा रहल छल। जाधरि कथा आ हवन नै भऽ जाइ छल ताधरि लोकक नजरिसँ बचा कऽ राखैक छलै ओकरा। भगवंत उर्फ भग्गूक जिम्मा दोसर काज छलै। ओ कॉपी आ कलमक संग इम्हरसँ उम्हर भाग-दौड़ कऽ रहल छल। किसानक लेल सभसँ मुश्किल आ परेशानीक छल ई मास। अगहनक खेत तैयार छल, खेती पछता भऽ रहल छल, जल्दीसँ जल्दी जोताइ आ रोपनी करबाक छलै, तकर बाद रबीक नंबर छल। बड़ मौकापर आएल छलै ट्रैक्टर। तारीख लेल लूटि मचल छलै, भाड़ा चाहे जे लिअ, बीघाक हिसाबे। आर भाड़ा सेहो की लेबाक छलै-वएह जे रेट बान्हि देने छल, दू कोस दूरक इकबालपुरक काशी सिंह अप्पन ट्रैक्टरक। कथा लेल अखन तीन दिन बाकी छलै आ इम्हर अगिला तीन मासक सभटा तारीख बुक। दशरथ जकरा ककरो पुछै छल, तकर तँ बुझू भाग्ये। हुनका पुछैबला वएह छल जे नव घर-दुआर बनबा रहल छल, माटि आ खपरैलक घर खसा कऽ। जखन बिजली आबि गेल छल तँ ओइ स्टैंडरक घर चाही। दीया बाती आ लालटेन बला नै। एहन लोकसभ पहाड़पुरेटा मे नै, पास-पड़ोसमे सेहो छल। ककरो पजेबा चाही, ककरो सीमेंट, ककरो बालु, ककरो गिट्टी, ककरो लोहा-लक्कड़। केतारी सेहो तैयार भऽ रहल छल, सुगर मिलक लेल। जखन ट्रॉली छल, तखन सौ टा काज। दशरथ सबहक सुनतिऐ आ धैर्य राखैक लेल कहैत छल- सभ भऽ जाएत। कनी-कनी हएत। मुदा सबहक काज हएत। ठाकुर सभ सर्द छल। ओ सभ ओकरा सभकेँ सदिखन अपनासँ नीचाँ बुझैत छल मुदा आब हुनकर सभक चिरौरीक दिन आबि गेल। हुनका सभकेँ आब अफसोच भऽ रहल छलनि जे ई गप जखन रघुनाथ कहले छल तँ हुनकर किऐ नै सुनलौं। 2 राति भऽ गेल छलै। गाममे शान्ति पसरल छलै। कनी-कनी झिस्सी पड़ि रहल छलै। ढाबुस बेंगक टर्र-टर्र आ सनकिरबाक झन्न-झन्नसँ दिगंत गूंजि रहल छल। ट्रैक्टरक काज शुरू कऽ देलाक बादो ठाकुर हारल सन अनुभव कऽ रहल छल किएकि चमटोलमे कोनो तरहक बेचैनी नै छलै। अन्तर एतबे टा आएल छलै जे हरवाहा सभ आब गाममे आ गामक रस्तासँ आबऽ-जाए लागल छल- मूड़ी झुकैले, आरामसँ, बिना बाजले बा दुआ-सलाम केले। ठाकुर सभकेँ लागैत छलै जे ओ छाती उतानि कऽ हुनका सभपर हँसैत आबि रहल अछि- जा रहल अछि। रघुनाथ सुतएसँ पहिने बत्ती मिझाबैले जा रहल छल आकि माथपर बोरा राखने पानिमे भिजैत गनपत बरण्डापर आएल। गनपत हुनकर हरवाहा छल, हरवाहीक अलाबे घर-दुआरक काज सेहो देखैत छल। रघुनाथ ओकर बेटाकेँ अप्पन कॉलेजसँ बी.ए. करौने छल, ओकर बाद ओकरासँ एकटा फार्म भरबौने छल, जइ कारणसँ ओ बटिखरा-नाप इंस्पेक्टर बनल छल। ऐ अनुभवकेँ गनपत कहियो नै बिसरल। ऐ काल हुनकर ओ बेटा एम. राम मिर्जापुरमे पोस्टेड छल। -ऐँ गनपत, तूँ? कियो देखलकौ तँ नै? -नै मास्टर साहेब। ओ बोरा खाम लग राखि मचिया खिचलक। -एकटा गप बता दी। हम अहाँकेँ नै छोड़ब, भले अहाँ छोड़ि दियौ। हँ, ई काल कनी खराप अछि। -जानै छी। अइलौं कोना, से कहू। -गेल छलौं मगरूरक हिंया मिर्जापुर। सोमारू सेहो ओत्ते छै ने। मगरू ओकरा आटा-चक्कीपर ओतऽ काज पकड़ा देने छै आ ओ पक्का भऽ गेल अछि ओइ काज मे। -तँ? -तँ मगरू कहलक जे जाँत, ओखली, मूसरा, ढेकी, चक्की तँ कियो चलाबैत नै अछि आइ-काल्हि आ आटा पिसाबै लेल जाइ छै लोक एक-डेढ़ कोस दूर- डेढ़गावां बा कमालपुर। एनामे जौं गामपर आटा-चक्की बैसाइल जाए तँ केहन रहत? सोमारू सम्हारै लेल काफी अछि। -बैसेबै कतऽ? -सरकार, चमटोल आ गामक बीचमे जे ऊपर जमीन छै, ओइपर। आन कोनो काजक तँ ओ छै नै। रघुनाथ किछु काल धरि सोचैत रहल। -पुछबाक ईहो छल जे ठाकुरे लेल धुत्… रोटी आ भात छै, आटा आ चाउर तँ नै छै। रघुनाथ हँसल- ई सभ नै सोचू। शुरूमे भले अनसोहाँत सन करत, देर-सबेर सभ जाएत आ पिसाएत। एतबे टा नै, आस-पड़ोसक गामसँ सेहो आएत। जखन चक्की गाममे रहत तँ ओत्ते दूर के जाएत? बस देर नै करू। आर बताउ, कत्ते दिन रहलौं मिर्जापुरमे। -रहलिऐ दस दिन। एक दिन तँ पुछैत-पाछैत गुड़िया बेटीक इस्कूल चलि गेलिऐ। बड़ खुशी भेल। घर लऽ गेल। अप्पन हाथसँ खाना पकेलक, खुएलक, अहाँक आ मलकाइनक हाल-चाल पुछलक। चलऽ लागलौं तँ बीस टा टका जबर्दस्ती पकड़ा देलक। एक्को रत्ती नै बदलल छै। -ढेर दिन रहि गेलौं मगरू लग। -नै मास्टर साहेब, सभ दिन ओतऽ नै रहलौं। तीन दिन तँ पीसीक हियाँ रहलौं। पीसीक जँ सभसँ छोट बेटा अछि, ओ उहाँक डिप्टी मजिस्टे्रट छै- यसडीयम। बड़ पैघ कोठी छै, ओकर आगू कलम सेहो बड़ पैघ छै। जीप छै, पुलिस छै, ड्राइवर छै, नोकर-चाकर छै। ऊ साधारण लोक थोड़े छै। इजलास लागै छै। सभ कियो भेंट नै कऽ सकै छै। पीसीसँ कतेक-कतेक दिन भेंट नै होइ छै। हम तँ देखबे नै केने छलौं ओत्ते पैघ लोक। ओत्ते रहि गेलौं तीन दिन। पीसी रोकि लेलक। रघुनाथ कनी गंभीर भऽ गेल- नाम की छै ओकर। -हम सभ तँ सिद्धू-सिद्धू बाजै छी मुदा नाम छै सुदेश भारती। राम नै लिखैत अछि। रघुनाथकेँ काटू तँ खून नै। ई वएह सुदेश भारत छल जेकर जिक्र सरला केने छल। ओकरासँ ओ बियाहक गप केने छल। जौं ओ सच्चेमे कअ लेतिऐ तँ गनपत जे हर जोतैत छल आ ओकर आगू ठाढ़ रहैत छल आ मचियापर बैसैत छल, ओकर रिश्तेदार हेतिऐ। खरपत जे गनपतक बाप अछि, हुनकर समधी हेतिऐ आ गर मिलतिऐ। हुनकर संग खाटपर बैसतिऐ आ जमायक बापक हैसियतसँ ऊँच हेतिऐ हुनकासँ। हुनकर मन भेल जे शीलाकेँ अबाज दऽ कऽ बजाबै आ कहै जे सुनू, गनपत की कहि रहल अछि। -बाकी सबहक अप्पन दुख छै मास्टर साहेब। ओकर बियाह नेन्नेमे भऽ गेल छलै। ओ अप्पन मेहरकेँ छोड़ि देने अछि। ओकर झमेला चलि रहल छै आइ-काल्हि एकटा मास्टरनीसँ। ओ ऊँच जाइतक छै। कहियो कहै छै जे बियाह करब अहींसँ, कहियो कहै छै- नै करब। माँ-बाप नै चाहैए। ऐसँ ओकरा लटकेने चलि रहल छै। पीसा बड़ दुखमे रहै छै। -तूँ जो, देर भऽ रहल छौ। ऊ मास्टरनीक संग इहाँ-उहाँ जाइ छै, होटल सेहो जाइ छै, दोसर शहर सेहो घूमै छै, खूब मौज करै छै, मुदा पीसीसँ नै मिलाबै छै। पीसी बाजल जे हमरा देखा दे, एक बेर हम बतेबे ओकरा जे किए नै कऽ रहल छी बियाह। मुदा, भेँट कराएब तखैन ने। -कहलियौ ने, नीन आबि रहल अछि। ओ बत्ती बुझा दहीं। -अच्छा साहेब। गनपत ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा साहेब, एक बेर बुझा देतिऐ जे मेहरकेँ छोड़ि कऽ किए एना कऽ रहल छी। मेहरिया तँ कत्तौ चलि जाएत आ ककरो ने ककरो राखि लेत, मुदा बदनामी ककर हएत। ओकरे ने। -तूँ जेमे कि नै, दिमाग नै चाट। -अहाँ नै जाएले चाहब तँ कहियो कोनो काजक बहाना कऽ हमहीं ओकरा आनि लेब। रघुनाथ तमसा कऽ थरथराए लागल। ओ उठि कऽ झमारि कऽ बत्ती मिझा देलक। ओ ओकरा ठेल कऽ बाहर कऽ देलक। गनपत माथपर बोरा राखि कऽ बाजल- साहेब, जे कहै लेल आएल रहि, से तँ बिसरिए गेलौं। एकबैग ओकर अबाज फुसफुसाहटिमे बदलि गेलै, देखिये रहल छी हवा खराब छै। नै, एकटा गप कहि रहल रही। एहन कोनो गप नै अछि मुदा पहलमानकेँ बुझा देबै जे जखन धरि हवा खराब छै, चमटोल दिस नै देखए। आ देखत की, उम्हर नै जाए। रघुनाथक ध्यान नै छल ओकर फुसफुसाहटि दिस। ओकर चिंता आ बेचैनीक कारण दोसर छल- कि कत्तौ एकरा सरला आ भारतीक संबंधक जानकारी नै हुअए। जखन संबंधी अछि तँ कहियो ने कहियो मगरू जरूर भेंट करैत हएत, भऽ सकैत अछि जे भारती सेहो चर्चा केने हएत। आ नै हुअए तँ मगरू दुनूकेँ कहियो संगमे देखने हएत। जखन एक्के नग्रमे अछि तँ कोना संभव अछि जे ओकरा पता नै चलल हेतै अखन धरि। -शीला। आखिर ओकरा रहल नै गेलै आ ओ दोसर बेर शोर पाड़लक- तामसेमे। 3 पहलमान माने छब्बू पहलमान। पहाड़पुरक दक्खिन हिस्सामे घर छल बजरंगी सिंहक। ओ इलाकामे छब्बू पहलवानक नामे जानल जाइ छल। गामक नाम दूर-दूर धरि पसारने छल। दंगलमे जतऽ–जतऽ गेल, जीत कऽ घुरल इनामक संग। टंगड़ी आ धोबियापाट ओकर प्रिय दांव छल। लंबाइ कम नै, जुलुम तागति आ फुर्ती छलै ओकरामे। ककरो पकड़ि लिअए तँ छोड़ाएब मुश्किल, दाबि दिअए तँ उठब मुश्किल, पट पड़ि कऽ माटि पकड़ि लिअए तँ चित्त करब मुश्किल। भैंसक केहुनीसँ मारि दिअए तँ पसरि जाए आ उठि नै सकए। मुदा हुनकर पैघ भाए- जकर चलिते ओ पहलवानी करै छल, जखन असमय एकाएक गुजरि गेल तँ ओ लंगोट खुट्टापर टांगि देलक आ घरक जिम्मेदारी संभालि लेलक। छब्बूक बियाह नै भेल छलै। जखन उमेर छलै तखन केलक नै अखाड़ाक जोशमे आ जखन करए चाहलक तँ उमेर नै रहलै। कियो अइबो नै केलै। ऐ तरहेँ परिवारक नामपर हुनकर दस बरखक भातिज छल आ मसोमात भौजी। भौजी दिन-राति पूजा-पाठ आ धरम-करममे लागल रहै छलि आ भातिज स्कूल जाइ छल। खेती-बारी छब्बू सम्हारै छल आ सम्हारत की- झूरी हरवाहाक जिम्मा छोड़ि कऽ निश्चिंत रहै छल। मुदा ई निश्चिन्ती ओकर भाग्यमे नै छलै। एक दिन ओकर नजरि पड़ि गेलै झूरीक स्त्री ठोलापर। दू बच्चाक माए मुदा कहैक लेल। ऊ कलवा लऽ कऽ आएल छली, अप्पन मरदक लेल। छब्बू ओकरा पहिनो देखले छल-नै जानि कतेक बेर। मुदा ऐबेर नजरि नै पड़लै, गड़ि गेलै। ओ ओकरा आबैत देखलक, बैसैत देखलक, चलैत देखलक- की छड़ी सन शरीर, की लचक, की गस्सल बाँहि। गड़ि गेल आँखिमे। कतऽ ई अक्खर झूरी आ कतऽ ई गांजाक कली। बस सुट्टा लगि जाए तँ उड़ि जाउ आसमानमे आ फेर उड़ैत रहू। जमीनपर घुरैक नौबति नै आबए। आर फेर तकर बाद शुरू भेल छब्बू पहलमानक सुट्टा मारैक खिस्सा। मुदा खिस्सा रफ्तार पकड़तिऐ एकरासँ पहिने भौजीकेँ अंदाजा भऽ गेलै। भातिज मुन्ना माँकेँ बतेलक जे ओ कक्का आ ठोलाक दलानमे ओकरा नुक्का-छुप्पी खेलैत देखने छल। भौजी कानए लागल। ओ छब्बूसँ बाजल- छब्बू, हमर एकटा विनती अछि। भैया तँ रोकै-टोकैक लेल नै अछि, अहाँ करब अप्पन मनक। मुदा चाहे जे करी, करू घरसँ बाहर। एकरा साफ-सुथरा रहऽ दियौ। इशारा बुझि गेल छब्बू। एकर बादसँ छब्बूक चमटोलीमे आवाजाही बढ़ल। हरवाहा लेल हुअए बा रोपनी-कटिया लेल बजेबाक लेल। चमटोलीमे जाएब ठाकुर अप्पन बेइज्जती बुझै छल। जरूरी काज भेल तँ ओ बच्चा सभकेँ पठबै छल।  मुदा छब्बू एहन मान-सम्मानसँ दूरे छल। जँ ओ गाममे लखाह नै दैतिऐ, कलम बा नहरपर सेहो नै लखाह दैतिऐ, आरि-खेतपर सेहो नै लखाह दैतिऐ तँ लोक ई मानि लै छल जे ओ चमटोल गेल हएत, ठोलाक संग। ई चमटोल सेहो जानैत छल आ गाम सेहो। तमसाह एत्ते जे ओकरासँ सोझाँ-सोंझी कहैक हिम्मत ककरो नै छलै। सभ अगुएलहा बेर-बेर मिल कऽ घरेनक सभसँ प्रतिष्ठित बब्बन कक्कापर दवाब बनेलक जे ओ अप्पन सकसँ जे किछु कऽ सकए, करए। बुझाबियौ बा धमकाबियौ बा जातिसँ बाहर करू। एहन कहएबला अगल-बगलक गामक लोक सेहो छल। शिकाइतसँ तंग आबि कऽ कक्का छब्बूकेँ बजैले छल। छब्बू हुनकर गप बड़ ध्यानसँ सुनलक आ अंतमे बाजल- गप तँ ई ठीक अछि कक्का मुदा ककरा-ककरा जातिसँ बाड़ब। ककरो-ककरो झाँपल अछि आ ककरो-ककरो उघार। मुदा बचल तँ कियो नै अछि हमर नजरिमे। रहल गप हमर तँ अहाँसँ नै नुकाएब। हम सभ किछु करै छी मुदा मुँहसँ मुँह नै सटबै छी। अप्पन धरम आ जातिकेँ नै बिसरै छी। कक्का माथ झुका कऽ बैसल रहल, किछु नै बाजल। छब्बू कनी काल बाद उठि कऽ चलि गेल। लोक मजाकमे कहै छल जे चऽरमे झूरी पहलमानक खेत जोतैत अछि आ पहलमान चमटोलमे ओकर खेत। हिसाब बराबर। आ झूरीकेँ ई छलै जे जखन ओ खेत जोति कऽ घुरै छल तँ छब्बू घरमे रोपनी कऽ कए आबैत छल। जखन छब्बू घरमे बजारसँ घुरतिऐ तखन छब्बू घरमे। ओ ओकर हेबाक आहट भेटिते तुरत्ते आपस भऽ जाइ छल। ओ एक बेर हिम्मत केने छल। हाथ जोड़ि कऽ कहलक- मालिक, हमर नै तँ कमसँ कम अप्पन इज्जतक ख्याल करू। लोक की-की कहैत अछि अहाँकेँ लऽ कऽ। एकर नतीजा ई भेलै जे ओ चौदह दिन भरि देह हरैद-प्याज देहपर पाति कऽ घरमे पड़ल रहल। असहाय ठोला।  जीअब कठिन भऽ गेलै। नरक भऽ गेलै ओकर जिनगी। राति भरि झूरीकेँ छातीसँ लगा कऽ कानैत रहल आ तामससँ फनफनाइत रहल। सभसँ पैघ गप ई छल जे ग्राम सेवक चमटोलक, ओकरे जाइतक, पहलमानक संग गांजाक सुट्टा लगाबैत छल आ जखन कहियो कहतिऐ- कलेजा कड़ा राखू, खाली कनी बाट ताकू। -कहिया धरि बाट ताकू। सावन शुरू भऽ गेलै। ऐ मासमे पचैयां (नागपंचमी) पड़ैत छल। पहाड़पुरमे पचैयां छब्बू पहलमानक पर्व छल। ओइ दिन तीनटा बाल्टीमे भीजल चना आनल जाइ छल, परात भरि मिठाइ आबैत छल, बताशा आबैत छल, बजरंग बलीक पूजा कएल जाइत छल, छब्बू पहलमान लंगोट पहिर कऽ अखाड़ाक मोहारपर बैसैत छल आ अप्पन चेलाक गट्टापर रक्षा बान्हैत छल। ओ सभ उस्तादक आशीर्वाद संगे अखाड़ामे उतरैत छल। ओकर सभक कतेक जोड़ी होइत छल आ दुपहरिया बाद धरि पट्ठा सभ अखाड़ामे जोर-आजमाइश करैत रहतिऐ। सभसँ आखिरीमे छब्बू उतरितिऐ- पैघक पएर छुबि कऽ आ छोट सबहक हाथ जोड़ि कऽ। ई प्रदर्शनी-कुश्ती होइ छल। ओ अप्पन दांव आ करतब देखाबै छल- पहलमानी छोड़ि देलाक बादो। ऐ काल चमटोलसँ डफली आ नगाड़ाबला सेहो आबै छल आ झूमि कऽ बजाबै छल। अहिरटोलीक बनेठीबला सेहो रहैत छल आ एक-दोसरासँ खेलाइत पसीना-पसीना भऽ जाइ छल। दोसर गाममे पचैंया पर्व रहि गेल मुदा पहाड़पुरमे ई अखनो चलि रहल छल- चलनिक रूपमे सएह। मुदा ई गप सभ जानैत छल जे ई तहिये धरि अछि जाधरि छब्बू अछि। कोनो ठाकुरक नव पीढ़ीक लेल देह बनाएब, कशरत आ अभ्यास करब, कुश्ती लड़ब फालतू चीज छल। एकदम मूर्खताइ। बन्दूकक आगू मजगूतसँ मजगूत शरीरक की मतलब? तइसँ ओकर चेलामे बंसी अहीर,कहार, लोहार, गड़ेरिया छल, ठाकुर बाभन नै। मुदा ऐबेर खराप छल पचैयांक। पानि भोरसँ पड़ि रहल छलै- कहियो मद्धिम, कहियो तेज। अखाड़ा एक दिन पहिने तैयार केने छल अपनेसँ छब्बू। ई काज चेलामे सँ ककरो नै करऽ देने छल। मुदा ऊ थालम थाल भऽ गेल छल- धानक खेत सन। मिठाइ आ बताशा आबि गेल छल। बदाम फुलि कऽ अँखुआ गेल छल। इंतजारी छल बरखा थम्हैक। छब्बू कहि गेल छल जे अहाँ सभ तैयारी राखब, जहिना मौसम ठीक हएत, हम आबि जाएब। मुदा नहिये मौसम ठीक भेल, नहिये छब्बू आएल। पानि तखने थमकल जखन साँझ झलफलाएल। अकास साफ भेल आ जतऽ–ततऽ एकाधटा तारा नजरि आबऽ लागल। ओइ काल पुलिसक जीप आएल गाममे आ पता चलल जे छब्बूक हत्या भऽ गेल अछि। जनपदक सभसँ करेजाबला आ दमगर लोकक हत्या। ई खबर नै, बिजली छल, जे बदरी छटलाक बाद तरतड़ा कऽ ठाकुर टोलपर आबि खसल छल। ओ चाहे जे छल, जेहन छल- ठाकुर छल। आ ओकरा रहिते ककरोमे ऐ टोल दिस आँखि उठा कऽ देखबाक तागति नै छलै। आ आब? आब, चमटोलक बाहरी हिस्सामे, एकटा झोपड़ीक आगू थालमे चितंग पड़ल छल। मरल। उघार अकासक नीचाँ। एकटा लालटेन ओकर माथ लग छल, दोसर पएर दिस, दुनू ईंटापर। जेना लाशपर नजरि राखल जा सकए। लाश सेहो थाल आ माटिमे लेभराएल पड़ल छल। पएर ऐ तरहेँ छितराएल पड़़ल छल जेना बीचसँ चीर देल गेल छल। जननांग काटि देल गेल छल आ ओइ ठाम खूनक थक्का छलै, जइपर माछी झबरल छलै, उड़ि आ भिनभिना रहल छल। पुलिस परेशान छल, ओइ जननांगक लेल। कटल तँ गेल कतए? ऐ लाश लग कत्तौ नै छल। ओ लालटेन आ टॉर्चक रोशनीमे ओकरा ताकि रहल छल। जमीन समरस नै छलै- खधाइ बहुते छलै आ सभमे पानि भरल छल। ओकरा जतऽ कत्तौ संदेह होइ छलै, लाठीसँ हूड़ि कऽ देखि लै छल, भले ओ माटिक ढेला हुअए। एक डर सेहो छल कत्तौ भीतर, जे एहन नै हुअए जे कुक्कुर आएल हुअए आ मांसक लोथ बुझि कोनो दोसर ठाम लऽ गेल हुअए बा खा गेल हुअए। ई खोज देर राति धरि चलैत रहल। पुलिस अप्पन दिससँ सभटा तैयारीक संग आएल छल मुदा जइ आशंकाक संग आएल छल, ओहेन किछु नै भेलै- नहिये कोनो दंगा भेलै, नहिये चमटोल फूकल गेल, नहिये बदलाक कार्रवाई भेल। झूरीक झोपड़ीक बाहर ताला लटकि रहल छलै आ चमटोलमे सुन-सन्नाटा छल। एक्कोटा मर्द नै। सभटा मर्द बस्ती छोड़ि कऽ नै जानि कतऽ चलि गेल छल। पुलिस एबासँ पहिलेसँ। मौगी आ नेना छल, ओ सभ अप्पन घरमे बंद छल। हत्या एकटा एहन लोकक भेल छलै जकर घरमे कियो एफ.आई.आर. दर्ज करैबला नै छलै। हत्या के करलक, कखैन करलक, कोना करलक, किऐ करलक- एकर कोनो गवाह नै छलै। अंदाज जरूर लगाएल जा रहल छल मुदा ओ अंदाजे भरि छल जे छब्बू भोरे-भोरे अप्पन देहक आगि मिझाबै लेल झूरीक घर पहुँचल। आहट लागिते झूरी दोसर कोठरीमे नुका गेल। दोसर ढोला चांचर खोलि कऽ ओकरा भीतर लऽ गेल। अनधैर्य छब्बू लुंगी खोलि कऽ जहिना ओकरा संग सुतै लेल भेल आकि ओ ओकर फोता पकड़िये कऽ झुलि गेल। ओ ओकरा मारैत-पीटैत चिचियाबैत बेहोश भऽ कऽ खसि पड़ल। ओइ काल झूरी हसुआ लऽ कऽ आएल आ ओकर जननांग काटि कऽ फेक देलक। दुनू बाहर आबि गेल कोठरी बंद कऽ कए आ ओकरा तड़पैत, छटपटाइत आ मरबाक इंतजार करैत छोड़ि कऽ। बादमे दुनू घिसिया कऽ ओकरा बाहर कऽ देलक। आकि ओ धानक बीआ छीटऽ बीअड़िमे गेल छल ओइ दुनूक संग। मारलक ओतहिये, मुदा बलात्कारक केस बनाबै लेल ओकरा दरबज्जाक आगू आनि कऽ पटकलक। आकि नि:शस्त्र भेलाक बादो पहलमान दू-चारि टा केँ तँ काँचे चबा जाइत। दू-चारि मनक नै छल ओ। चमटोलकेँ पता छलै जे ओ किम्हर दिसा-फरागत हैक लेल जाइत अछि। पूरा चमटोल उम्हरे घेर कऽ राहरिक खेतमे मारलक जेना ओ सुग्गरकेँ चारू दिससँ घेर कऽ मारैत अछि आ झूरीक घरक आगू आनि कऽ फेंकि देलक। चऽरमे कतबो चिचिऐब तइयो केकरा सुना पड़त मेघक गड़गड़ाहटिमे। ऐ तरहक चर्चा छल। अलग-अलग अंदाज, अलग-अलग लोकक। सच गप केकरो नै पता। लाश लग कियो एबे नै कएल तँ कोना पता लागितिऐ? पुलिस ककरो आबैए नै देलक। मुदा एकटा गप कनी-कनी साफ भेल जे, जे किछु भेल, अचानक आ संजोगे नै भेल छल। एकर पाछाँ मास भरिसँ तैयारी छल। ऐ तैयारीमे असगरे पहाड़पुर चमटोल नै, आस-पड़ोसक बीस-पच्चीस गामक चमटोल मिलल छल। पहिने आ बादमे खर्चे-खर्च छल- थानाक सीओकेँ चाही, मुंशीकेँ चाही, पोस्टमार्टम बला डॉक्टरकेँ चाही, पैरवीकारकेँ चाही, वकीलकेँ सभ तारीखपर चाही, गवाहकेँ चाही- ढेर रास खर्च। ई कतऽ सँ करत झूरी? तइसँ सभ चमटोलक हरवाहा चंदा जुटैलक। दोसर, हुनका सभकेँ इंतजार छल अप्पन जाइतक कोनो पुलिस अधिकारीक, जे धानापुर थाना सम्हारए आ से आबि गेल छल, दू मास पहिने। भगेलू माने बी.राम। संगे अक्टूबरमे चुनाव छल विधानसभाक आ कोनो एहन पार्टी नै जकरा अनुसूचित जातिक वोटक दरकार नै हुअए। तेसर, चमटोल जानै छल जे छब्बूक मामिलामे ठाकुर घरेन बँटि जाएत, कहियो एक नै हएत। आ जल्दिये ई साबित भऽ गेल। 4 छब्बूक मारल जेबाक आदंक जकरा सभसँ बेसी छल ओ रघुनाथ छल। नै जानि की छल जे छब्बू जहिया कहियो कलम दिस औतिऐ, नहर आ अखाड़ा दिस औतिऐ आ अप्पन महीसक संग उत्तर दिसक चऽरमे औतिऐ -रघुनाथक दुआरकेँ जरूर देखतिऐ- मास्टर साहेब अछि कि नै। अछि तँ खाली बैसल अछि बा काज कऽ रहल अछि। जौँ रघुनाथ खाली रहै छल तँ छब्बू आबि कऽ बैस जाइ छल। बाजैत किछु नै, बस बैसल रहतिऐ। पुछलेपर बाजै छल जे कोनो काज नै, बस अहाँ लग किछु काल रहब नीक लागैए हमरा। नीक लोकक संगति भेटैत कहाँ अछि। ओ जाइ छल सभ ठाम मुदा बैसै नै छल। ओ रघुनाथक कहले बिना हुनकर हित-अहितक अपने आप ध्यान राखै छल। ई हुनकर भावना छल जकर पाछाँ कोनो कारण नै छल। ई गप रघुनाथ दोसरासँ सुनै छल, छब्बूसँ नै। अखन साल भरि पहिलुक्का गप अछि- रघुनाथक पछुआरमे हुनकर पितयौत भाइक घर-दुआर अछि जकर आगू तीन बिगहाक करीब हुनकर जमीन अछि। हुनकर माने रघुनाथक। भाइ धरि तँ ठीक छल। ओ बाँट-बखराक सम्मान करै छल मुदा भातिज सबहक नेत खराब हुअए लागल। हुनकर घरक आगू दोसराक जमीन। ओ सभ चारि भाँय छल आ सभ समर्थ। पैघकेँ रघुनाथ पढ़ेने छल आ बिजली विभागमे नोकरी दिएने छल। ओ समए-समएपर कब्जा करैक तरकीब आ बहन्ना खोजैत रहै छल। ओ एक बेर राति भरिमे रघुनाथक पछुआरमे एकटा ईंटाक देवाल ठाढ़ कऽ देलक आ हुनकर बाट बंद कऽ देलक। रघुनाथकेँ तखैन पता चललै जखन हो-हल्ला सुना पड़लै। ओ पहुँचल तँ देखलक जे छब्बू लाठी लऽ कऽ देवाल खसा रहल छल आ धुरझाड़ गारि पढ़ैत नरेशकेँ ललकारा दऽ रहल छल- घरघुस्सा, बाहर निकल आ हिम्मत होउ तँ ठाढ़ कर देवाल। हमहूँ देखिऐ। मास्टरकेँ असगर बुझले छीहीं की? खसरा-खतौनी कोनो चीज अछि कि नै? नरेश आ ओकर भाइ घरमे घुसल रहल। ओकरामे सँ ककरो हिम्मत नै भेलै जे बाहर आबए आ छब्बूसँ भिड़ए। सत्य गप तँ ई छलै जे रघुनाथकेँ नोकरी जाइक जते दुख छलै, ओइसँ एक्कोरत्ती कम छब्बूक जाइक नै छलै। किएकि छब्बू छल तँ रघुनाथ सेहो छल आ हुनका लेल पहाड़पुर सेहो। आब ककरा बुत्ते ओ रहत। छब्बूक मारल जेबासँ पहिने गनपत रघुनाथकेँ इशारामे बता देने छल जे पहलमान जँ अहाँ कतऽ आबए तँ बुझा देबै- चमटोलसँ दूर रहए। ई हमरा दुनूक गप तेसराकेँ पता नै चलए। खाली दूर रहए। रघुनाथ एकटा बहन्ना ताकि कहलो छल जे छब्बू, आब बहुत भऽ गेल, जाए दिऔ। छब्बू बाजल छल- मास्टर साहेब। छोड़ि तँ दिऐ, मुदा जाउ कतऽ? गाममे तँ सभ बेटी अछि, पुतोहु अछि। आर कतऽ जाएब। रघुनाथ ओकरा तरह-तरहसँ बुझाबैक प्रयास केलक, मुदा सभ बेकार। ओनाहूँ ओ सोचले छल जे बेसीसँ बेसी की हएत- यएह ने जे छब्बू बेइज्जत कएल जाएत आ झूरी ढोलाक संबंध सभ दिन लेल खत्म भऽ जाएत।  मुदा ई तँ छब्बूक दुश्मन सेहो नै जानै छल जे एहन हएत। ओ ई कहैत घुमैत रहल जे ई एकटा ठाकुरक हत्या नै, पूरा दियादक समर्थाइकेँ चुनौती अछि, ओकरा ललकारा देल गेल अछि- मुदा ऐ घटनाकेँ बिसरब आ एकर चर्चा नै करब नीक बुझलक सभ। कनी काल लागल ठाकुर टोलाकेँ बदलैत समएकेँ बुझबामे आ ओकर हिसाबसँ अपनाकेँ ढालबामे। कतेक दिन धरि दुआर कूड़ा आ कचराक ढेर बनल रहल, कतेक दिन धरि लादिक लग गोबर बजबजाइत रहल, कतेक दिन धरि बड़द खुट्टासँ बान्हल उठैत-बैसैत रहल, गाइ-महीस डिरियाइ छल आ पगुराइत रहल। पटायल-पटायल खटिया तौड़ैबला ठाकुर कखनो कोन भरे पड़ल कोदारि दिस ताकितिऐ, कखनो फरसा दिस, कखनो बाढ़नि दिस आ थाकि कऽ अंतमे ओइ छाउर दिस जिम्हरसँ हरवाह आबैत छल। मुदा हरवाहा जे चमटोलसँ भागल, से नै घुरल। एक हफ्ता बीतल। फेर दोसर हफ्ता बीतल। फेर तेसर हफ्ता बीतल। ओकर जेबाक बाद ठाकुर जतेक परेशान छल, दशरथ यादव ततेक खुश। ओकर बेटा जसवंत ऐ कालमे ठाकुरकेँ सम्हारि लेने छल। ओ हुनका सभकेँ हरवाहाक कमी नै हुअए देलक। ओ सबहक खेत भाड़ापर जोतलक। एक्को दिन ओकर ट्रैक्टर नै बैसल। सभक हर कामै रहि गेल। ओ सभकेँ बुझा देलक जे बड़द मथदुक्खी आ बोझ अछि, फालतू अछि। दुआर गंदा करैत अछि, ओकरा हटाउ। ओकर गोबर कोन काजक? ओकरासँ उपजाउ तँ यूरिया अछि। किछु गप बादमे पता चलल, ओइ काल नै। जेना ओ जइ तरहेँ ठाकुरकेँ सम्हारलक, तहिना ओ चमटोलकेँ सेहो सम्हारलक। किछु हरवाहा तँ शहर चलि गेल- रिक्शा चलेबा लेल सोचिए कऽ बा बोनिपर काज करै लेल मुदा बर रास लोक कोरबा गेल- जसवंतक छोट भाइ बलवंत लग, जे बोनि मजूरक ठिकेदार छल। ओ सभकेँ खदानमे काज दिएलक। आर ईहो जे गामक घर होइसँ ओ दोसरासँ जतेक लै छल, ओइसँ कम लेलक। एतबे टा नै, जसवंत ओकरो मदद केलक जे चमटोलमे रहि गेल छल, खास कऽ मौगी सबहक। राशन-पाइनक गरजसँ अनाजक लेल ओ ठकुरटोलीमे जाएब बंद कऽ देलक आ सूदपर जसवंतसँ या अहिरटोलीसँ टका लिअए लागल। ओ आब सोझे गज्जन साव केर दोकानपर जाइ छल। नगद पाइ दै छल आ किराना समान लै छल। गाम कनी-कनी पहिलुक्के जकाँ घुरए लागल छल- नव बदलाव आ नव व्यवस्थाक संग। अन्तर एतबे टा आएल जे हरवाहा बाहर नोकरी करै छल। आ ओ जखन गाम घुरै छल तँ ठकुरटोलीमे नै जा कऽ अहिरटोलीमे जाएब, उठब-बैसब बेसी पसीन करै छल। शाइत हुनका ओतऽ बराबरीक अनुभव होइ छल। रिटायरमेंटक बाद लोकक देखा-देखी रघुनाथ सेहो अप्पन खेत-बारीक दोसर व्यवस्था केलक। ओ अप्पन खेत सनेहीकेँ अधियापर दऽ देलक। सनेही हुनकर कॉलेजक चपरासी छल आ सात मील दूर अप्पन गामसँ कॉलेज आबै जाइ छल। जाइतक कोइरी। ओकर समस्या ओकर औरत आ बाल-बच्चा छल। रघुनाथ ओकर परिवारक लेल ओसारक एकटा हिस्सा आ बाहरक खोपड़ी दऽ देलक। ऐ तरहेँ ओ खेतीक झंझटसँ निश्चिन्त भऽ कऽ कत्तौ आबै जाइ जोग भऽ गेल। आर कत्तऽ आएत-जाएत, मैनेजर आ प्रिंसिपल पेंशन लटकेने छल आ ओ अहीमे लागल छल। ओ ओइ चक्करमे दू-तीन दिन लेल नग्र गेल छल तखने हुनकर भातिज नरेश घरक पछुआरक जमीन दोबारा घेर लेलक- ऐ बेर काँट बला तारसँ। एतबे टा नै, नरेश पुरना लादि ओइ जमीनपर गाड़लक आ महीस बान्हि देलक। चारू दिस गोबर आ गोइठा फेकबा देलक, जतऽ-ततऽ सण्ठी आ पुआरक बोझ रखबा कऽ ई सिद्ध करैक प्रयास केलक जे पछिला कएक बरखसँ ई ओकरे कब्जामे अछि। गाममे घुसैत रघुनाथ एकरा देखलक आ सोझे ओतऽ पहुँचल जतऽ नरेश महीसकेँ सानी दऽ रहल छल। ओ हाथ पोछि कऽ कक्काक पएर छूलक। ई सभ की छै? नरेश हुनका आश्चर्यसँ देखलक- किछु तँ नै, की अछि? तामस मे थरथरा उठल रघुनाथ- बदमाशी करै छी आ सेहो अप्पन कक्कासँ। -कनियो टा लाज नै एलौ तोरा? हटा ई सभ खुट्टा-तुट्टा, तार-फार। नरेशक तीन भाइ सेहो घरक भीतरसँ बाहर आबि गेल। पड़ोसीमे कियो नै आएल। सभ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल सुनि रहल छल। -ई तँ नै हटत कक्का। हमर घर-दुआरिक आगूक जमीन साबिकक अछि आम जमीन आ फालतूमे अहाँ फँसेने छी। अहाँक ई छेबे नै करी, ई तँ गाम-समाजक अछि। एतबै सुनैक छल आकि रघुनाथक देहमे जना आगि लागि गेल। ओ फनफना उठल आ एक लात मारलक लादिपर। तोहर साती कऽ, आ गाम समाजक। अखन माटि काँच छल लाइदक, ओ एक दिस भसकि गेल। ऐ बीच तामससँ आगि-पानि होइत आ गारि पढ़ैत नरेशक छोट भाइ देवेश दौगल आ धक्का दऽ कऽ रघुनाथकेँ खसा देलक। ओ सम्हरितिऐ, तइसँ पहिले ओ हुनकर छातीपर बैस कऽ गरजल- साढ़ बुढ़बा, गरदनि पकड़ि कऽ अखने दबा दिऐ तँ मरिए जाएत। हम जतेक नीक लोक जकाँ गप कऽ रहल छी, ओतेक शेर बनि रहल अछि। जा, जे करैक अछि, कऽ लिअ। उठैत ओ हुनकर डाँरपर एड़ी मारलक- साढ़ बुढ़बा हरमजदा। रघुनाथ उठबाक प्रयास केलक मुदा उठि नै सकल। लाइदक कातमे पड़ल-पड़ल ओ चारू दिस ताकलक। दियाद-बाद देखि रहल छलै आ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल छलै। कनी कालक बाद नरेश ओकरा ठाढ़ केलक आ घर दिस ठेल देलक। पीस कऽ लगाबै लेल हरदि-पियाज नै हुअए तँ पठबा देब।- देवेश चिकड़ल। -की भऽ गेल अछि गाम केँ? -एतऽ जनम लेलौं, पोसेलौं, बढ़लौं, पढ़ेलौं, सबहक मदति केलौं- कखनो किताब-कॉपीसँ, कखनो फीस माफीसँ, कखनो टका-पैसासँ, कतेक सर-संबंधी अछि आ रहत। आइ-काल्हि की भऽ गेल अछि गामकेँ? की अहीसँ जे ओ दियाद-बादक ऐ बा ओइ पार्टीमे नै अछि? की अहीसँ जे ओ रिटायर भऽ गेल आ कोनो काजक नै रहल? की अहीसँ जे ओ कहियो कोनो झगड़ा बा झमेलामे नै पड़ल? की अहीसँ जे ओ बेटा जातिक बियाह बाहर केलक? की अहीसँ जे ओकर बेटा अमेरिका मे डॉलर कमा रहल अछि? की अहीसँ जे ओकर दोसर बेटा सेहो नोएडामे एम.बी.ए. कऽ रहल अछि? की अहीसँ जे ओ बटाइपर खेती सनेहीकेँ देलक- बाहरी लोककेँ, हिनका सभकेँ नै? की भऽ गेल अप्पन दियाद-बादकेँ? रघुनाथ बुझबामे असमर्थ रहल। 5 रघुनाथ दलानपर करट भऽ कऽ पटायल छल। नै, नै करैक बादो शीला डाँड़पर फुलल हड्डी लग हरैद, पियाउज आ चूनक घोर लगा रहल छलि। आ मुँहक भितरे-भीतर किछु बड़बड़ कऽ रहल छलि, नाककेँ सुड़कैत। दू-दू टा मुस्टंड बेटा मुदा दुनू परदेशमे। एक्को टा एतऽ नै जे बापक बगलमे ठाढ़ हेतिऐ। रघुनाथ जइ अंडाकेँ पैघ केलक, ओ कोइलीक नै कौआक छल। आ ओ अपने कौआ छल, नै तँ ई गप बुझिये गेल हेतिऐ। ओ आइ धरि घरमे रहैत आएल छल, जे खपरैलक छल, माइटक मोट-मोट देवारक। साबिकी घर। पाछाँबला जमीन जानि-बूझि कऽ बँटवारामे लेने छल ओ, कि जखन पाइ आ समए हएत तँ पक्काक घर बनाएब-छोट सन। ई जरूरी छल- हुनका लेल नै, बेटा लेल। घरे नै रहत तँ ओ आएत किए? आएत तँ रहत कतऽ? आ जखन एबे नै करत, रहबे नै करत तँ गाम-घरकेँ बूझत-गमत की? फेर बाप-दादाक जमीन-जत्थाक की हएत? के देखत जा कऽ? खपरैलक घर तँ ढहि रहल अछि। कखन बैसि जाएत, कियो नै जानैत अछि? तेँ किछु दिन पहिने जखन प्राविडेण्ट फंडक पाइ भेटल तखने नव घरमे हाथ लगाबैक फैसला कऽ लेने छल। आब ई नव आफत। हुनका छब्बूक कमीक अनुभव भऽ रहल छल- लगातार। ई नव खाढ़ी पैदा भेल छल गाममे- तहियासँ जखनसँ गाममे बिजलीक खाम, केबुल, ट्यूबवेल, पम्पिंग सेट आ दवाइ दोकान आएल छल। जातिक पार्टी आएल छल, हराहरी तेसर घरसँ फौजमे कियो ने कियो भर्ती भेल छल। सवर्णमे एकटा वर्ग रिसर्च आ कोचिंग करैबला छौड़ा सबहक छल, जे शहरसँ बा कोनो फौजीक घरसँ बोतल लै छल आ राति पम्पिंग सेटपर बिताबैत छल। दोसर वर्ग नरेश आ ओकर भाइक छल। नरेश बिजली मैकेनिक छल। सरकारी कर्मचारी छल। मुदा खुट्टासँ तार खीच कऽ घरमे अवैध कनेक्शन दै छल आ चिक्कन कमाइ छलै। ओकर तीनू भाँइकेँ पॉलिटिक्समे मोन लागै छलै। देवेश सपा केर कार्यकर्ता छल, रमेश बसपा केर आ महेश भाजपा केर। ई पार्टी पछिला बीस बरखसँ सत्तामे आबि-जा रहल छल आ क्षेत्रक विधायक आ सांसद सेहो अही पार्टीक भऽ रहल छल। तीनू बड़ बुधियारीसँ कोनो ने कोनो नेताकेँ पकड़ने छल। ओ अप्पन-अप्पन नेताक संग रहितिऐ, घुमितिऐ, खेतिऐ-पितिऐ आ जनताक सेवा करैतिऐ- माने ट्रांसफर करबाबैक आ रोकबाबैक काज। छोट-मोट नोकरीसँ ई पैघ आ सम्मानजनक धंधा छल। लोकपर रोबदाब सेहो रहै छलै आ रुआब सेहो। हुनकर सभक मंत्री संग उठबाक-बैसबाक आ खाइ-पीयैक खिस्सा रहै छल। ओ जहिया कहियो चारि-पाँच दिनक लेल गामसँ निपत्ता रहतिऐ तँ सोझे लखनऊसँ या कोनो महारैलीसँ या हल्ला-बोलसँ आबैत छल। ई भाइ सबहक पहुँच आ पाइ केर तागतिक बोध रघुनाथकेँ तहिया भेलै जहिया हुनका दस-बारह दिन दौड़ऽ पड़लै- कखनो लेखपाल लग, कखनो थानापर, कखनो एस.डी.एम.क ऑफिसमे। कुर्सी सभ देलक, सम्मान सभ केलक, ध्यानसँ सुनलक हुनकर गप आ अंतमे बाजल- मास्साब। अहाँ विद्वान छी, शरीफ छी, अहाँक सभटा गप सत्य अछि मुदा कोन झमेलामे अपनाकेँ दऽ रहल छी? ओ सभ नीक लोक अछि की? मुँह फोड़ि कऽ किछु नै कहलक, इशारासँ जरूर बुझा देलक जे कऽ सकैत अछि तँ किछु नै, मुदा खाली गपे कऽ सकैत अछि। ओइ काल हुनका ईहो पता चलल जे दियाद-बादक आठो परिवारमे सँ सभ परिवारकेँ चुप रहै लेल नरेश दू-दू हजार टका देने छल। रघुनाथ दौड़ैत-दौड़ैत थाकि गेल। ई उमर सेहो एहन काज लेल नै रहि गेल छल। आब पहिलुक जेहन शक्ति सेहो नै रहि गेल छलै। ठेहुनमे दर्द रहै छलै आ गरदनिमे सेहो। शीला अलगे मरीज छल दमाक आ गैसक। जखैन रघुनाथ लग आबैत छल, डकार लेने आबैत छल। आ पछिला दिनक घटना आ पतिक परेशानी ओकरा आरो नर्वस आ निराश कऽ देने छल। रघुनाथ दुपहरियाक खेनाइक बाद नीमक नीचाँ पटायल छल आ सोचिये रहल छल जे आब की करी। एकमात्र रस्ता हुनका लखाह दऽ रहल छल- कचहरी। मुदा ओ रस्ता बड़ नम्हर छल। ओ जानै छलि जे तारीखपर तारीख पड़ैत जाएत। ऐ तरहेँ एक दिन आइत-जाइत मरि जाएब आ फैसला नै हएत। ऐ बीच शीला आएल। ओ बाजल- अजीब लोक छी अहाँ। असगरे चिंतामे मरल जा रहल छी, जकरा ई सभटा सम्हारैक अछि, ओकरासँ सलाह किए नै लऽ रहल छी? पुछियौ तँ ओकरासँ। -ककरासँ- बेटासँ। -हँ, मानलौं जे एकटा दूर अछि, मुदा दोसर तँ लग अछि। -एकदम सत्य कहि रहल छी अहाँ। ओ निसाँस लेलक- कहू तँ! ऐ दिस तँ हमर ध्यान गेबे नै कएल। ओ उठल आ शीलाक संग फोनमे भिड़ि गेल। शीला हुनका बेर-बेर बुझबैत रहल जे बल-धकेलक, पटकैक, मारि-पीटक गपक चर्च नै करबाक अछि नै तँ ओ परेशान भऽ जाएत आ पढ़ब छोड़ि कऽ बीचेमे चलि देत। लाइन भेटल रातिक दस बजेक बाद। स्वरपर संयम राखैत रघुनाथ विस्तारसँ सभटा गप कहैत हुनकासँ विचार पुछलक। ईहो बाजल जे एतऽसँ कैलिफोर्नियाक लाइन नै लागै छै, संजूसँ सेहो सलाह लऽ कऽ बताएब। राजू बीचमे टोकलक- किए मरल जा रहल छी जमीन लऽ कऽ। छोड़ू ओकरा आ सुनू, भौजी बनारस आबि गेल अछि अशोक विहारमे। ज्वाइन कऽ लेने अछि यूनिवर्सिटीमे। अहाँ माँकेँ लऽ कऽ चलि जाउ आ ओत्ते रहू आ सुनू। सुनैसँ पहिने फोन राखि देलक रघुनाथ। ओ माथ पकड़ि कऽ बैसि गेल। -की-की भेल? -शीला पुछलक। -भेल की? आब सम्हारू ओकरा। उड़ि कऽ आबि रहल अछि हवाइ-जहाजसँ। आबैते गोली मारि देत नरेशकेँ। ओ सभ बर्दाश्त कऽ लेत, बापक बेइज्जती बर्दाश्त नै करत। -अरे रोकू, रोकू ओकरा। -ओकरा तँ रोकि देब, संजयकेँ कोना रोकब? ओ तँ ओतऽसँ मिसाइलसँ सोझे घरमे आएत। शीलाकेँ संदेह भेलै अप्पन बुधिपर आ ओ चुप भऽ कऽ हुनका देखऽ लागल। -साढ़। कहैत-कहैत ओ माथ उठा कऽ शीलाकेँ देखलक। -हमरा डर छल ताइसँ हम गप नै कऽ रहल रही, मुदा अहाँक कहलासँ केलौं। हम एत्ते बुरबक नै छी जे हमर दिमाग मे नै आएल। मुदा अहाँक जिदपर केलौं। नै जानि कतऽसँ एहेन बेकाजक आ कोढ़िया छौड़ा जनम लऽ लेलक- साढ़। पछिला जन्मक पाप। हम तीस-पैंतीस बरख नोकरी केलौं, लाखक लाख कमाइ केलौं आ हाथमे एकटा पाइ नै। ऐ हाथ आएल, ओइ हाथ गेल। पुछू तँ कतऽ गेल, से बता नै सकब। आ ई जमीन। आइयो ओतै कऽ ओतै छी। मिसियो भरि टससँ मस नै भेल अप्पन ठामसँ। ई अहाँक दादा-परदादा-बापकेँ खुएलक, अहाँकेँ खुएलक, एतबे टा नै बेटा आ नाती-पोताकेँ खुआएत। अहाँ करोड़ो कमाएब मुदा टका आ डॉलर नै खाएब। भगवान ने करए जे ओ दिन आबए जखन बैंक चाउर-दालिक दाना बाँटत। ओ जांघपर मुक्का मारलक आ शीला दिस ताकैत बाजल- साढ़, तूँ सभ पैघ भलहि भेल हुँअए अप्पन माँक दूध पी कऽ, मुदा तोहर माँक माए अछि ई जमीन। चाउर, दालि, गहूम, तेल, पानि, नून यएह जमीन देने अछि। आ बाजै छी जे हटाबू ओकरा। -छोड़ू ओकरा। तामसमे रघुनाथ की सभ बाजैत रहल, हुनका अपनो नै पता। कोन तरहे शीला हुनका सम्हारैत पकड़ि कऽ आंगनमे लऽ गेल- जाउ, सूति जाउ। सोचू नै। 6 ऐ काल रघुनाथकेँ एकटा बोध भेलै। ई जे नीक लोकक मतलब अछि निरर्थक लोक, आ भला आदमीक अर्थ अछि डरपोक लोक। जखन कियो अहाँकेँ विद्वान कहए तँ ओकर अर्थ मूर्ख बुझू आ जखन कियो सम्मानित कहए तँ तकर अर्थ दयनीय बुझू। हुनका सभ ठाम यएह कहल गेल आ हुनकर कोनो काज नै कएल गेल। हुनका सभ ठाम हट-हट आ दुर-दुर कएल गेल। ओ ओइ बकरी आ गाए जेना अछि जे में-में आ बाँ-बाँ कऽ सकैत अछि, मारि नै सकैत अछि। यएह ओकर छवि, सबहक आगू मिमियाबै आ घिसियारी काटैबला मास्टरक। ई हुनकर छवि नै अछि, यएह छथिन ओ। ओ ओइ छविकेँ तोड़ै लेल सोचि रहल छल, बब्बन सिंह ओ अवसर दऽ देलक। ओइ काल रघुनाथ अपन खेतमे छल। ओ मचियापर बैसल छल आ आगू सनेही अप्पन आ हुनकर हिस्साक गहूम नपबा रहल छल। बगलसँ जा रहल बब्बन ठाढ़ भऽ गेल। गामक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला। गामे टा नै, पास-पड़ोसमे कत्तौ विवाद होइ छल तँ एक पंचक रूपमे कोनो ने कोनो पार्टी दिससँ ओ सेहो रहै छल। ई अलग गप अछि जे ओ मामला सुलझाबैक बदला आर ओझरा दै छल। ई हुनका नीक नै लागै छल जे रघुनाथ नै जानि कतऽ–कतऽ दौड़ल, हुनका लग नै आएल। रघुनाथ हुनका देखलक मुदा कोनो भाव नै देलक। -मास्टर।- ओ शोर पाड़लक। रघुनाथ लग गेल आ गोर लागलक। -जमीन अहाँक अछि, गाम-समाज या नरेशकेँ ओकरासँ की लेब-देब? दोसर कियो कोना कब्जा कऽ लेत? -एतबे टा हमहूँ जानै छी। -जानै छी तँ विधायकजी सँ किए ने भेँट करै छी? -कोन विधायकसँ? -अरे वएह, अप्पन कॉलेजक मैनेजर। माथ ठनकलै रघुनाथक। एकर मतलब जे ऐ पूरा मामिलाक तार ओत्तेसँ जुड़ल अछि। संजयक बियाहसँ। ओकरा हुनका रिटायर करबेलेसँ आ पेंशन रोकबेलेटा सँ संतोष नै भेलै- आ ई अछि दियाद-बादक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला लोक, जे नरेशकेँ नै बुझा कऽ हमरा बुझा रहल छल। आ बुझा की रहल छल, ओइमे रस लऽ रहल छल। ओइ काल रघुनाथक दिमागमे एकटा खुराफाती विचार आएल। -कक्का।- ओ बब्बनक हाथ पकड़ि कऽ कनी फराक लऽ गेल। अहाँसँ एकटा विचार लैक चाहैत रही, कतेक दिनसँ। जखन अहाँ भेटिये गेलिऐ तँ कहू तँ एत्ते पूछि लै छी। -बाजू, बाजू। मन तँ नै बनेने छी मुदा कखनो-कखनो सोचै छी जे ओइ जमीनकेँ बेच दी। बब्बन हुनका आश्चर्यसँ देखैत रहल। -अहाँकेँ पता अछि, कतेक महंग अछि ओ जमीन। आबादीक भीतर। कतेक काजक अछि। ओकरा बेचब सोना बेचै सन अछि। आ बेचब किए? -मथदुक्खी राखैसँ की फाएदा? -यएह तँ चाहै अछि नरेश। मुदा ओकरा नै बेचबाक अछि। ओ जे केलक, तकरा कोना बिसरि सकै छी? -तँ फेर? -फेर की? अखन तँ यएह सोचने छी जे ओकरा नै देबाक अछि, बाकी तँ घर अछि, गाम अछि, अहाँ चाहब तँ अहीं छी। देखल जाएत, कोनो जल्दी थोड़े अछि। बब्बन कनी गंभीर भेल- आ ओकर कब्जाक की करब? -कब्जाक की, खुट्टा अछि। आर किछु नै तँ जे उखाड़ि कऽ फेक देत ओकरो दऽ सकै छी। मैनेजर साहब सेहो खोलऽ चाहैए बच्चा सबहक अंग्रेजी स्कूल ऐ इलाकामे कत्तौ। एतऽ खोलि लिअए। -अरे गामक लोक मरि गेल अछि जे बाहरी लोककेँ देब? -नै, एकटा गप कहि रहल छी। अखन किछु तय-तफसिला थोड़े अछि। रघुनाथ धीरेसँ बाजल- हम दान तँ नै दऽ रहल छी ककरो। जखन वाजिब आ सही भेटत तखने ने। -अहाँ तँ गाममे फौजदारी करा देब मास्टर।- चिंतित भेल बब्बन बाजल। -हम की करब? जखन ओ अपने करैपर बिर्त अछि तँ कियो की कऽ सकैत अछि। रघुनाथ हुनकर कान लग मुँह लऽ जा कऽ बाजल- मुदा ई गप अपने धरि राखब। दुनिया भरिक लोक आबैत रहैत अछि अहाँ लग। की फाएदा कहएसँ? छै कि नै? तँ चली। रघुनाथ खेत दिस घुरि गेल। सनेही दोसर बेर पुछने छल जे गहूमकेँ बखारीमे आइये राखि दिऐ या काल्हि लेल छोड़ि दिऐ। शीलाक कहब छल जे राहैर आ तोड़ी सेहो बँटि जाए तँ सभकेँ बेरा-बेरी राखि देल जाए। रघुनाथ ई निर्णय शीलापर छोड़लक आ ओसारपर आबि कऽ बैसि गेल। शीला सेहो पाछाँ-पाछाँ आएल। -किए भरि-ठेहुन भरि-छाबा कऽ रहल रही हुनकासँ? सभटा खुराफातक जड़ि तँ वएह छथि। -अहाँ चुप रहि कऽ तमाशा देखू। हम बड़ रास मसाला दಽ देलौं हुनका। आब काल्हिसँ एतऽ बैसकी लगाएब शुरू कऽ देत लोक। रघुनाथक चेहरापर राहत आ संतोषक चमक छल। शीला उखड़ल मनसँ पुछलक- अहाँ जमीन बेचैक गप कऽ रहल रही हुनकासँ? रघुनाथ हँसल- गपे तँ कऽ रहल रही, बेच नै रहल रही। बेचबाक नै अछि हमरा। हमर अप्पन कमाएल चीज छेबो नै करए जे हम बेची। बाप-दादा लग हुनकर पुरखासँ कोना आएल हएत, वएह जानैत हएत। मुदा ई लोक नहिये अपने चैनसँ रहत, नहिये रहऽ चाहैए, नहिये रहैले देत। आब यएह देखू, हमर दोष कतऽ अछि? संजय बियाह केलक। ओतऽ केलक जतऽ चाहलक, जतऽ ओकरा अप्पन हित देखा पड़लै। भविष्य देखलक। हमरो नीक नै लागल मुदा ओकर अप्पन पसीन आ जिनगी रहै। हम की कऽ सकैत रही? मुदा तकर सजा मैनेजर हमरा देलक। फालतूमे। हमहूँ कहलौं- ठीक अछि। गामपर रहब- सुख आ शांतिसँ। नहिये ऊधोक लेब, नहिये माधोकेँ देब। एक समए छल जखन खेत-पथारक अतिरिक्त किछु नै छल एतऽ- नहिये अखबार छल, नहिये बिजली छल, नहिये फोन, नहिये टीवी छल। आइ सभटा अछि आ फसिल एतेक जे हम दूटा लोक लेल ककरो आगू हाथ नै पसारै जरूरति। रहल गप्प दोसर जरूरतक लेल तँ आइ ने काल्हि पेंशन भेटबे करत। फेर कोन गप्पक चिन्ता। की। रघुनाथ मुसकुराबैत शीला दिस देखलक। आ सभ सुख-दुखमे सदिखन संग दैबाली स्त्री अखन जीवित छलि। ओ हुनका खिचलक आ अपना लग बैसा लेलक। ओ लजाइत हुनका लग बैसल रहलि आ ओ हुनका एकटकसँ देखैत रहल। -शील, ऐ सभ चीजक सहारे जिनगी तँ काटल जा सकैत अछि, जिअल नै जा सकैत अछि। एकाएक हुनकर आवाज भारी आ उदास भऽ गेल। -शीला। अप्पन तीनटा बच्चा अछि, मुदा पता नै किए, कखनो-कखनो हमर भीतर एहन हूक उठैत अछि जेना लागैत अछि- हमर स्त्री बाँझ अछि आ हम निपुत्तर छी। माँ आ बाप होइक सुख नै जानलौं हम। हम सभ नहिये बेटाक बियाह देखलौं, नहिये बेटीक। नहिये पुतोहु देखलौं, नहिये होएबला जमाएकेँ। हम एहन अभागल माँ-बाप छी जकरा ओकर बेटा अप्पन बियाहक सूचना दैत अछि आ बेटी कहैत अछि जे जँ अनुमति नै देब तँ नोत नै देब। आ आब अहाँक नजरि अछि राजूपर जे ओ सभ साध पूर कऽ देत। -नेहाल कऽ देत अहाँकेँ, एहन भ्रम हुअए तँ निकालि दियौ अप्पन दिमागसँ। हमरा पता अछि जे ओ एकरोसँ आगू जा रहल छै। ओ एकटा एहन विधवा लड़कीकेँ ताकि लेने अछि जकरा दू बरखाक बच्चा छै। एतबे नै, ओ कोनो नीक सर्विस सेहो करै छै। ओकर पाइसँ ओ दिल्लीमे मौज कऽ रहल अछि। मोटरबाइक लऽ गेल अछि मस्ती करबाक लेल। बच्चा पोसब आ मौज करब दू टा काज अछि ओकर। गेल छल डोनेशनक पाइ लऽ कऽ, आइ धरि पता नै चलल जे एडमिशन लेलक आकि नै। -अहाँ एतेक गप जानैत रही तँ कहियो बतौलिऐ किए नै। -की कऽ लेती अहाँ? की करितिऐ बता कऽ। शीला, हम जानै छी ओकरा। पढ़ैमे कहियो रुचि नै रहलै ओकरा। अप्पन बापसँ कोन स्वरमे गप करैत अछि। एकरा अहाँ देखने छी। ओ शॉर्टकर्टसँ पैघ लोक बनैले चाहैत अछि। ओकरा लेल पैघ लोकक मतलब अछि धनी लोक। आ सेहो खून-पसीन बहा, बिन मेहनतिक। ओ महत्वाकांक्षी लड़का अछि मुदा लालच आ महत्वाकांक्षा बुझैत अछि। ओ बड़ रास चीज हासिल करए चाहैत अछि- अनचोक्के बिना पढ़ले-लिखले, बिना नीक नंबर आनले डिवीजन आनलक, बिन प्रतियोगिता देले, बिना खटले आ नौकरी करले। हमरा नै पता जे ओ लड़की ओकरा कोना भेटल। कतऽसँ भेटल। भऽ सकैत अछि जे ओकरा कोनो मर्दक खोज हुअए। एतबै जरूर अछि जे डेढ़ बरख पहिने कोनो सड़क दुर्घटनामे ओकर पति मरि गेल। ओइ लड़कीक अप्पन फ्लैट अछि, कार अछि, ऑफिसक काजसँ सिंगापुर, बैंकाक आबैत-जाइत रहैत अछि आ ई ओकर बच्चा सम्हारैत अछि आ घर जोगैत अछि। जेना हम नै जानै छी, तहिना ओ नै जानै छै जे ओकर मनमे की छै, की विचार छै। -अहाँ ई सभ कोना जानलिऐ। -ई नै पुछू। नोएडामे हमरो लोक अछि, जे आबैत-जाइत रहैत अछि। शीला चिंतित भऽ उठल- सभटा दुख अही बुढ़ापामे देखब लिखल छल की? एकटा बेटा परदेसमे, पता नै कहिया आएत। दोसर एतऽ मुदा ओकरो वएह हाल। मुदा ओकरोसँ खराप। आ इम्हर बापक दोसर मुसीबत। गाम छोड़ब तँ जानि जाएत, नै तँ मारल जाएब। नहिये कियो देखएबला अछि, नहिये सुनएबला, नै जानि ककर नजरि लागि गेल अछि घरकेँ। रघुनाथकेँ ओतಽ असगरे छोड़ि कऽ चुपचाप ओ अंदर गेल आ पटा रहल। 7 घरमे फोन आब जीक जंजाल भऽ गेल छल। जखन रघुनाथ कनेक्शन लेने छल तँ राजूक जिदपर जे संजू अमेरिकासँ जखन गप करऽ चाहत तँ केना करत। कोनो संदेश देबाक हुअए तँ। भौजीकेँ जौं मम्मीसँ किछु बाजबाक बा पुछबाक हुअए तखन। हमरे कोनो सलाह लेबाक हुअए तखन। चिट्ठी-पत्री आब के लिखैत अछि, ककरा लग एत्ते समए अछि। आ सरला दीदी सेहो तँ अछि शहरमे, हुनकासँ गप नै करबाक अछि की अहाँकेँ आ मम्मीकेँ। तँ कोनो हालमे जरूरी अछि ई। गाममे सेहो बेमतलब थोड़ लेने अछि लोक। फोन लागल तँ राजूक लेल। जखन कखनो घरमे रहैत छल, लागल रहैत छल ओइपर, कखनो ऐ दोस्तक, कखनो ओइ दोस्तक। संजूकेँ तँ लाइने नै भेटै छलै। हँ, कखनो-कखनो सरला जरूर भेट जाइ छल। आब जखन राजू बाहर अछि तँ फोन ओहिना बेकार पड़ल रहै छै जना नादि आ खुट्टा बा हर आ ठेंगा। तइसँ रातिमे जखन फोनक घंटी बाजल तँ रघुनाथ आ शीला डरि कऽ एक-दोसराकेँ ताकलक। घंटी बजब तँ बन्न भऽ गेल, ओइमे सँ कियो उत्साह नै देखेलक। जखन दोसर बेर बाजल तँ रघुनाथ उठल आ रिसीवर उठेलक। -हैलो। दोसर दिससँ आवाज आएल। चिन्हलक ओकरा। देर धरि सुनैत रहल, फेर शीलाकेँ रिसीवर पकड़ा देलक। आ माथपर हाथ राखि चुपचाप बैस गेल। कनी काल बाद दोसरದೊ दिससँ कानैक आवाज सुना पड़ल। ओ उठल आ अप्पन बिछौनपर आबि गेल। रिसीवर राखि कऽ शीला सेहो आएल आ अप्पन बिछौनपर बैसि गेल। ओ काल्हि आबि रहल छथि अपना सभकेँ लऽ जाइ लेल। -अहाँकेँ जेबाक अछि तँ जाउ, हमरा नै जेबाक अछि। बड़ कानि रहल छल। पुछि रहल छल जे हमर कोन एहन गलती अछि जे देखै लेल तँ दूर, अहाँ सभ फोन धरि नै केलौं। ओ केलक कहियो फोन। हम सपना देखि रहल रही जे महारानी घुरि आएल अछि अप्पन देश। आकाशवाणी भेल छल हुनकर आगमनक लेल। -ई तँ नै बाजू। राजू बतौले छल। -हम कोनो राजू-ताजूकेँ नै जानै छी। ओ किए नै कहलक। बापकेँ कऽ सकैत छल ससुरक संगे। ओकरा बजौलक, ज्वाइन करौलक, अशोक विहार आएल। एत्ते दिनसँ रहि रहल छथि, बीचमे पापा-मम्मी मोन नै पड़लै, आइ मोन पड़लै। ओहिना तँ मोन नै पड़ल हेतै, आएल हएत, कोनो गप हएत जरूर। कानि-कानि कऽ कहि रहल छल जे हम मम्मी-पापाक बिना नै रहि सकैत छी। -झूठ बाजैए। बहटरा रहल छल अहाँकेँ। जानैए कत्ते अपना सभकेँ। नहिये कहियो देखने अछि, नहिये भेंट अछि तँ ओ किजाने गेलए पापा-मम्मीकेँ। हम तँ जानै नै छी जे हमरो कोनो पुतोहु अछि। -पूतोहु नै सही, बेटा तँ अछि। नै जानि की सोचत। -कोन मतलब अछि बेटा-बेटी बहु दुनिया। सबहक चिंता करै लेल हमहीं छी। रघुनाथ तमसा गेल। ओकरा तँ चिंता छै जे लोक की कहतै। सासु-ससुर गाममे पड़ल अछि आ पुतोहु नग्रमे मजा कऽ रहल छै। -ई अहाँ कहि रहल छी, अप्पन मोनसँ। बुझलिऐ। किछु बजाउ नै हमरासँ। रघुनाथ उठल आ आंगनमे टहलऽ लागल। नीन भागि गेल छल हुनकर। ओ कोनो निर्णय नै कऽ पाबि रहल छल। ओ गामसँ सेहो तंग भऽ गेल छल मुदा ओकरा छोड़ऽ नै चाहै छल। मन नग्र आ कॉलोनी दिस लागल छलै- जीवनक नव दिस, नव जिनगी दिस, साफ-सुन्दर पक्का मकान आ अलकतरा छारल सड़क दिस, गंगाक घाट दिस, अनचिन्हार नव संबंध दिस। ई आकर्षण छल मनक मुदा उम्हर जाइमे भऽ रहल छलै जे कत्तौ एना नै हुअए जे पछुआरक जमीन हाथसँ निकलि जाए, बिन देख-रेखक मकान ढहि जाए, सनेही चोरी आ बेइमानी शुरू नै कऽ दिऐ, कत्तौ लोक सदा लेल गामसँ गेल नै मानि लिअए। आ एहन कहएबला तँ कम नै हएत जे गाम छोड़ि कऽ भागि गेल। एकरासँ पैघ जगहंसाइ आर की भऽ सकैत अछि। ओ आंगनक चक्कर काटैत ओतऽसँ ठाढ़ भऽ गेल जतऽसँ खपरैलसँ ऊपर उठैत चन्द्रमा लखाह दऽ रहल छल। ओ ओकरा देखऽ लागल जेना गाम छोड़लापर फेर नै लखाह देत- बा ओकरेसँ पुछि रहल अछि- आ तखन की करबाक चाही। ई चैत मासक राति छल। दशरथ यादव अप्पन दरवाजाक आगू नव शिव मंदिर बनौने छल। पछिला दस घंटासँ ओतऽ अखंड हरिकीर्तन चलि रहल छल। कीर्तनिया मंदिरक बगलमे ठाढ़ नीमक गाछपर लाउडस्पीकर बान्हि देने छल आ समूचा गाम हरे राम, हरे राम सँ दलमलित छल। ई एकरस गूंज ओकर मनकेँ भारी कऽ रहल छलै। -अहाँ जाउ, हम एतऽ रहब, अप्पन घरमे। सुनलिऐ। ओ ऊँच आवाजमे शीलासँ बाजल। -अहाँकेँ असगरे छोड़ि कऽ। नै बाबा नै, पता नै की भऽ जइतए। शीला ओतऽसँ बाजल- आ ऊ घर तँ सेहो अहाँक छी। संजू की कहैत छल। हम चाहैत छी जे मम्मी-पापाक अंतिम दिन काशीमे बितए। चैनसँ बितए। जखन समए आएल अछि तँ ना-नुकुर कऽ रहल छी। सोनल दोसर नै अछि, पुतोहु अछि अपन। -अहाँ, बुझै किए नै छी। सोनल पुतोहु अछि, घर पुतोहुक अछि, अपन नै। कोन औकातिसँ जाएब हम। पाहुन बनि कऽ। किराएदार बनि कऽ। कोन औकातिसँ। ओइ दिस ध्यान नै गेलै शीलाक। ओ कनी काल अचकचाएल, फेर बाजल- ठीक अछि, हुनकर घर तँ अछि मुदा संजू तँ अछि नै। ओ हम्मर बेटा अछि। देर-सबेर तँ आबए पड़त ओकरा। राजूकेँ वएह नै कहै छल जे पापा-मम्मीकेँ पठा दियौ। आ सोचू जे पुतोहुक घर की हमर नै अछि? रघुनाथ चुप रहल। किछु नै बाजल। -देखू, अपना सभ चलू। एहन नै जे घरकेँ छोड़ि कऽ जा रहल छी। कहियो घुरि आएब ऐमे। जखन परेशानी हएत तँ आबि जाएब। खेतीक जिम्मा तँ स्नेहीकेँ देने छी। रहि गेल घर तँ दस बिस्सा खेत आर दऽ दै छी गनपतकेँ। कमरा बंद कऽ दरवाजाक ताला ओकरा दऽ दियौ। साफ-सफैयत आ देखभाल करैत रहत। शीलाक गपमे दम लखाह देलक रघुनाथकेँ। हुनका चारि दिन बाद जेबाक छल पेंशनक काजसँ। दिक्कत केवल ई छल जे गनपत मिर्जापुर गेल छल अपन बेटा लग। तँ एहन करू शीला, अहाँ तँ सोनल लग काल्हि चलि जाउ। हम एतुक्का व्यवस्था कऽ पाँचम दिन पहुँचब। पेंशन ऑफिसमे अप्पन काज निंघटा कऽ सोझे अशोक नगर आबि जाएत। कोनो जरूरी गप हुअए तँ फोनपर खबर कऽ देब। अरे हँ, फोनक कनेक्शन सेहो तँ कटाबए पड़त। छोड़ू, अहाँ अपन तैयार करू, गहूम, चाउर, दालि, घी, अचार। कनी-बेसी जे लऽ जा सकब, लऽ लेब। 8 रघुनाथ बाजल पाँच दिन मुदा लागि गेल पचास दिन। ओइमे ओकर कोनो दोष नै छल। सोचने छल जे जखैन जेबाके अछि तँ एतुक्का सभटा समस्या सुनझा कऽ गेल जाए, ई नै हुअए जे रही ओतऽ आ मन लागल रहए एतए। बड़ रास सोचि-विचार कऽ ओ फैसला लेलक जे रूकल पेंशन हुअए बा आबादीक जमीन, जखन अही दुनूक जड़िमे मैनेजर अछि तँ हुनकासँ एक बेर भेँट कऽ लैमे की हर्ज अछि। जौँ एतबे टा सँ हुनकर ईगो तुष्ट हएत तँ कहएमे की खरापी अछि। आइ जे किछु छी, अहींक कारण छी, नोकरी नै देने हेतिऐ तँ जानि कतऽ हेतिऐ। जखन बनैले छिऐ तँ बिगाड़ि नै करियौ। आब स्थिति सेहो बदलि गेल छल। मैनेजरक बेटाक बियाह भऽ गेल छल वनमंत्रीक ठिकेदारक बेटासँ। ओ पड़़ोसी जिलाक छल। मैनेजरसँ ऊँच स्टेटसबला। आब रघुनाथसँ शिकाइतक कोनो कारण सेहो नै रहि गेल छल। ओ मिठाइक पैकेट आ सेब, संतोला आ अंगूरक संग पहुँचल तँ मैनेजर, जकरा लोक सरकार बाजैत छल, नीक मूडमे छल। रघुनाथकेँ देखैत ओ चुहुल करैत बाजल- मास्टर। अहाँक स्वास्थ्य देखि कऽ लागैत अछि, जे शुरूसँ दरमाहा नै लऽ कऽ पेंशन लेबाक चाही छल। जवानी तँ आब आएल अछि अहाँपर। -सरकार।- रघुनाथक मुँहसँ निकलल आ ओ कानऽ लागलखिन। -की। की भेल? आइ धरि नो-ड्यूज क्लियर तक नै भेल की? मैनेजर चौंकि कऽ पुछलक आ प्रिंसिपलकेँ फोन केलक। फेर बाजल- जाउ, चिंता नै करू। भऽ जाएत। आर किछु? रघुनाथ नरेश आ बब्बन सिंहक सभटा किस्सा बतौलक। ओ चुपचाप सुनैत रहल। कनी काल बाद ओ बाजल- जखन ई अहाँक घरक छल तँ बटाइ किए देलिऐ। गलती तँ अहूँक अछि। रघुनाथ किछु नै बाजल। हुनका ई बताएब ठीक नै लागल जे बाहरक लोककेँ तँ कखनो हटाएल बा भगाएल जा सकैत अछि मुदा हुनका मुश्किल हएत। ओ एतबे टा बाजल- हँ, गलती तँ भऽ गेल। आब किछु केलो नै जा सकैत अछि। -अहाँ समस्या ठाढ़ करैत रहू आ हम निपटारा करैत रही, यएह ने। मैनेजर एस.डी.एम.केँ फोन केलक आ इशारासँ किछु बुझेलक। रघुनाथ ओइ काल माथ झुकेने बैसल रहल। -आब कोन सोचमे छी। जाउ आ बब्बन सिंहकेँ पठा देब। ओ उठल आ बाथरूममे चलि गेल। जाइत-जाइत कहलक- भऽ सकैत अछि एस.डी.एम. ऑफिस दौड़ए पड़ए एकाध बेर। दौड़ाएब आ अहाँसँ किछु बाजए तँ हुनका आगू बड़ सिद्धांतवादी बनैक जरूरत नै अछि। सबहक किछु ने किछु मजबूरी होइत अछि। ठीक। बीस-पच्चीस दिनक दौड़-धूपक बाद एक दिन एस.डी.एम. दूटा सिपाही आ लेखपालक संग आएल- जरीब आ गामक नक्शा लऽ कऽ आ सबहक आगू जमीनक पैमाइश केलक। ऐबेर जमीनक ओ हिस्सा सेहो रघुनाथक हकमे निकलल जे नरेशक घर-दुआर छल। एकर मतलब ई भेल जे रघुनाथ चाहए तँ नरेशक घर-दुआर गिरा दिअए बा रहए दिअए आ ओत्ते जमीनक दाम वसूलि लिअ। ओकरा रघुनाथक भलमनसाहत पर छोड़ि देल गेल। ई हुनकर बड़ पैघ सफलता छल- निश्चिंती सेहो। पापड़ तँ बड़ बेलने छल मुदा सम्मान घुरि एलै। आब ओ बनारस जा सकैत छल मास- दू मासक लेल। मुदा जौँ मन लागि गेलै तँ संदेश आ फोना-फोनीसँ काज चलि जेतै। ओ जाइक तैयारी शुरू कऽ देलक आ तैयारी की करबाक छल। राशन लेलक। दू टा छोट-छोट बोरामे अलग-अलग अल्लू आ पियाजु छलै। चारि बजेक बस लेल तैयारी कऽ रहल छल जखन बाहरमे डाँट डपटिक आवाज सुनाइ देलकै। निकलल तँ देखलक- जयनारायण माने जग्गन। बड़ उखड़ल छल आ रूसल। हुनकर एक हाथमे कल्लूक कान छल आ दोसरमे दू टा अधपक्कू आम। डरल कल्लूकेँ पकड़ि कऽ सनेहीक झोपड़ाक आगू ठाढ़ छल- सनेही, सनेहिया रे। भीतरसँ सनेहीक स्त्री निकलल- की अछि मालिक? ओ झपटि कऽ कल्लूकेँ खिंचलक, दू थापड़ फेर मुक्का मारैत आ धकियाबैत भीतर ठेल देलक। ओ कानैत भीतर चलि गेल। मामला बुझैत देर नै लगलै रघुनाथकेँ। घरेनमे सबहक दरवाजाक आगू नीमक गाछ अछि, असगरे वएह टा अछि जकर दरवाजाक आगू आमक गाछ अछि। टिकुला लागैसँ लऽ कऽ ओकरा पाकै धरि, जकर नौबति शाइते कहियो आबैत छल। घरानाक छौड़ा सभ हाथमे ढेला नुका ओकर चरू दिस घुमैत रहै छल आ जग्गन ताधरि ओकर नीचाँ खाट राखि कऽ पड़ल रहैत छल जाधरि गर्मी बर्दाश्त होइ जोग रहैत छल। दर-दियाद भरि केँ कऽ चटनी, अचारक काज हुनकर लाख प्रयासक बादो ओकरेसँ चलैत छल। इन्हरसँ ढेला चलैत छल, उम्हर जग्गन पकड़ैक घातमे रहैत छल। एक कऽ पकड़ैत अछि, तीन टाक मौका भेट जाइत अछि। हुनकर आ छौड़ा सबहक व्यस्तता कहियो-कहियो डेढ़-दू मास धरि चलि जाइ छल। -आउ, आउ जगन। हमरासँ कहू की गप अछि। -काकी अछि आकि नै, आबए तँ आबी अहाँ कतए। -आउ, बैसू तँ सही। ओ जग्गनक आगू खटियापर बैसै लेल इशारा केलक आ शोर पाड़लक झोपड़ीक आगू ठाढ़ सनेहीक स्त्रीकेँ। -जग्गनकेँ सतुए घोरि कऽ पियाबियौ। सुराहीक पानिमे बनाएब। जग्गन कनी स्थिर भेल आ बैसि गेल। फेर अप्पन लुंगीक फाँड़सँ तमाकुलक डिब्बा बहार केलक आ मिड़ए लागल। बाजल- मास्टर कक्का, अहाँ ई बड़ पैघ गलती कऽ देलौं। कोइरी-कहारकेँ अप्पन बीचमे बसा कऽ अहाँ बड़ पैघ गलती केलौं। -ऐमे गलती की अछि? -अरे, अहाँकेँ लखाह नै दैत अछि। अही बाट देने हम दिन-राति आबै-जाइ छी। ई बैसल तँ बैसल अछि, पटायल अछि तँ पटायल अछि। पैघ लोगक बीच रहैक सउर नै छै। आ हिनकर बेटा। बीचे मे रघुनाथ टोकि देलक- देखू जग्गन, फालतूक गप अछि ई। समै-काल बड़ बदलि गेल अछि। आइ मानसिक रूपसँ विकलांगे एहन गप करैत अछि। कोन गपक पैघ छी अहाँ। पुरखा, जमीन आ जातिक भरोस। छब्बूक हत्याक बादो ई भ्रम अछि तँ राखने रहू। पछिला दिन अहूँ अप्पन खेत बेचलिऐ। ठाकुरमे सँ कियो किए नै किनलक। किनलक तँ आखिर जसवंते। आइयो हम्मर अहाँक खेती ओकरे भरोसे होइत अछि, ट्रैक्टर ओकरे लग अछि, टका ओकरे लग अछि। विधायक ओकरे अछि, सांसद ओकरे अछि, सरकार ओकरे अछि, ओकाइतो ओकरे लग अछि, कोनो काजक लेल पैरवी करबाक होइत अछि तँ अहाँ ओकरे लग जाइ छी, तकर बादो पैघ लोक छी अहाँ। एहन गलतफहमी पोसबाक अछि तँ पोसने रहू। हँ, ई जरूर अछि जे ओ दोसर गामक अछि, पराया अछि, अधिया देबाके अछि तँ ओकर बदला कोनो अप्पनकेँ देबाक चाही छल। आब अहीं बताबियौ, के अप्पन अछि जकरा दैतिऐ। जग्गन गुम्म रहि गेल। रघुनाथ सभसँ लगक पड़ोसी छल। नरेश ओकरे भाइक बेटा, जकर नजरि बराबर पछुआरबला जमीनपर छलै। कनी काल इंतजारीक बाद रघुनाथ बाजल- देखू जगन, परायामे अप्पन भेट जाइत अछि मुदा अप्पनमे अप्पन नै भेटैए। एहन नै छल जे अप्पन नै छल। छल मुदा तखैन जखैन समाज छल, परिवार छल, सर-समाज छल, जखन भावना छल। भावना यएह छल जे ई भाइ छी, ई भातिज छी, भतीजी छी, ई कक्का छी, ई काकी छी, ई पीसी छी, भौजी छी। भावनामे कमी होइ छल तँ ओकरा पूरा कऽ दैत छल लोक लाजक कारणे। नै तँ एनामे लोक की कहत। मात्र भावना छल, गणित नै, लेन-देन नै। ऐबीच सत्तूक घोर दऽ कऽ गेल सनेहीक स्त्री, रघुनाथ चुप भऽ गेल। ओकर गेलाक बाद फेर शुरू केलक- आब अहीं कहू, नरेशसँ बेसी के अप्पन छल। सोचने छल, ओकरा दऽ कऽ निश्चिंत भऽ जाएब। मुदा ओकर नेतपर शक छल, बड़ी काल पहिनेसँ। आ ओकरा नै दऽ कऽ नीक करलिऐ। नै तँ से दिन सेहो अइतिऐ जखन अप्पन खेत की, गाममे ओ घुसै नै दैतिऐ। आ कहैक जरूरत नै जे ओइ काल अहूँ हमर नै, ओकर संग दैतिऐ। हँ, सनेहीकेँ हम जानै छी। ओ अप्पन काजसँ काज राखएबला लोक अछि। अहाँ आर ककरो शिकाइत हुअए तँ बताएब। मौके नै देत, बताएब की? तीन 1 ओ घर, जकरा राँचीक प्रोफेसर राजीव सक्सेना रिटायर भेलाक बाद अपना रहै लेल बनारसमे बनबैने छल आ जकरा अप्पन बेटी सोनलक नाम कऽ देने छल, ओ अशोक विहारमे छल। बनारसमे मोहल्ला छल, विहार आ कॉलोनी नै। एकर निर्माण शुरू भेल १९८०-९० क आसपास जखैन पूर्वांचल आ बिहारक भू-माफिया आ बाहुबलीक उदय भेल। ओ नग्रक दक्खिन, पच्छिम आ उत्तर दिस बसल गामकेँ किनलक आ ओकर प्लाटिंग कऽ बेचब शुरू कऽ देलक। देखैत-देखैत १५-२० बरखक भीतर गामक अस्तित्व खतम भऽ गेल आ ओइ ठाम नव-नव नामक संग नगर, कॉलोनी आ विहार बसि गेल। ई नव बनारस छल- महानगर सन। मोहल्लामे रहएबला मोहल्लेमे रहल। अप्पन पुरखाक काज-धंधा, दोकान, रोजगार आ घाटक संग। मुदा ऐ कॉलोनीमे बसऽबला बेसी लोक नव नागरिक छल। ओ बाहरसँ आएल छल। अगल-बगलक जिलासँ। सौ-पचास कि.मी. दूरसँ। हुनकर लगेमे गाम छल, थोड़-बेस जमीन छल, खेती-बारी छल। हुनका समए-समएपर बनारस आबऽ पड़ैत छल-कहियो कोर्ट कचहरीक काजसँ, कहियो अस्पतालक काजसँ, कहियो तीर्थ-बर्त लेल, कहियो शादी-बियाहक खरीदारी लेल, कहियो नेना सबहक एडमिशन आ पढ़ाइ करैक लेल। बेर-बेर आबि कऽ घुरएसँ नीक छल जे एतऽ ठहरैक आ रुकैक एकटा स्थाई ठाम हुअए, एकटा डेरा हुअए। मुदा ई ओकरा सभ लेल संभव छल जकरा लग अप्पन कोनो छोट-मोट नोकरी अछि, आ ओकरा लेल जकर बेटा सभमे सँ कमसँ कम एकटा बाहर कमा रहल हुअए। जकर नेना सभ गाममे बोर होइत हुअए आ ओतऽ नै रहए चाहैत हुअए, नग्रक आदति लागि गेल होइ आ अप्पन हित उम्हरे देखऽ चाहैत हुअए। मुदा गाममे ओइमे सँ किछु पहुँचि रहल छल कनी-कनी, जे नग्रमे छल- बिजली सेहो, नल सेहो, फ्रिज सेहो, फोन सेहो, टीवी सेहो, अखबार सेहो। मुदा ओ मजा नै छल जे नग्रमे छल। मजा छल तँ ओकरा लेल जकरा लग ट्रैक्टर छल, थ्रेशर छल, पंपिंग सेट छल, बोलेरो आ सफारी छल, जे खेतीक पेटक लेल नै, व्यवसाय लेल कऽ रहल छल, जे एक नै, एक्के संग सभ राजनीतिक पार्टीक हितैशी आ मदति केनहार छल। एहन लोकक कॉलोनी सेहो दोसर छल- नम्हर-चौड़गर प्लाटबला। मुदा अशोक विहार हुनकर कॉलोनी छल जे अध्यापक छल, बाबू छल, दोसर श्रेणीक सरकारी, गैर-सरकारी कर्मचारी छल आ एकरोसँ खास गप ई छलै जे या तँ रिटायर भऽ चुकल छल या निकट भविष्यमे रिटायर होइबला छल। नै तँ अखबारमे कोनो विज्ञापन, नै कोनो चौकपर ऐ लऽ कऽ कोनो होर्डिंग जे ऐ कॉलोनीक प्लाट हुनके बेचल जाएत जे पचास-पचपनक ऊपर हएत आ जल्दिये रिटायर हएत। मुदा जानि ने कोना भेल जे जखन कॉलोनी तैयार भेल तँ भेल जे ई बूढ़क कॉलोनी छी। एहन बूढ़-बूढ़ीक जिनकर बेटा-बेटी अप्पन स्त्री आ नेना सबहक संग परदेसमे नोकरी कऽ रहल अछि-कियो कोलकातामे अछि, तँ कियो दिल्ली, कियो मुंबई तँ कियो बेंगलौर तँ कतेक रास तँ विदेशमे। हुनकर दुख अपरम्पार छल। ओ बेटा-बेटी लेल अप्पन गाम छोड़ि देने छल, अप्पन जन्मभूमिकेँ। ई अपना लेल तँ ठीक, चाहे जना रहि लिअए, मुदा हुनका लेल नै। नहिये बिजली, नहिये पानि, नहिये लिखाइ-पढ़ाइ, नहिये आबै-जाइक सुविधा। घर हुअए तँ एहन ठाम जतऽसँ खेती-बारीपर सेहो नजरि राखल जा सकए आ बेटा-बेटीकेँ सेहो असुविधा नै हुअए। ओ अप्पन ठाम जमीन, संबंध, संगी-साथी, बाग-बगेचा, ड्बरा-पोखरि छोड़ि कऽ जइ संतान लेल आएल, वएह बाहर अछि। एतऽ धरि तँ ठीक छल, मुदा आब हलात ई अछि जे जतऽ सर्विस कऽ रहल अछि, ओ ओइ नग्रमे रमि गेल अछि आ ओतऽसँ घुरि कऽ एतऽ नै आबऽ चाहैत अछि। जौं ओ आबए चाहैत छल तँ हुनकर बच्चा सभ नै आबए चाहैत अछि। लिअ, ई नव आफत। जकरा लेल घर छोड़लौं ओकरे अप्पन अलग घर। ई नव आफत हुनका जिअ नै दऽ रहल अछि, नहिये मरैये दऽ रहल अछि। गामपर दादा-पुरखाक जमीन-जेदाद। बाप-दादाक धरोहर नै देखू तँ कखैन दोसर कब्जा कऽ लेत कहब मुश्किल। पुरखा सभ तँ एक-एक कौड़ी बचा कऽ, पेट काटि कऽ, जोड़ि-जोड़ि कऽ जेना-तेना जमीन बढ़ेने छल। चारि कऽ पाँच केने छल, तीन नै हुअए देलक आ तँए ई हाल अछि। कनीटा इम्हर-उम्हर भेल तँ आड़ि गाएब। महीना-दू महीनामे कमसँ कम एक बेर गामक चक्कर लगाबैत छल। देख लिअ लोक, जे नै अछि। ध्यान राखए। हाल चाल लैत छेम-कुशल-मंगल पुछैत। दुख-सुखमे जाइत, सभसँ बना कऽ राखू। अधिया या बँटाइपर खेती तखने करू। दियाबाती बा घर दुआरक देख-रेख लेल कोनो नौकर-चाकर राखू तखनो। हुनकर बेटाक नेनपन गाममे बीतल छल। नग्रमे पढ़ैत काल सेहो ओ आइत-जाइत रहल छल गाममे। ओ खेती भले नै केले हुअए मुदा हुनका ई पता छल जे हुनकर खेत-पथार कोन छै, धानक, गहूमक, दलिहनक। हुनका थोड़-बहुत जानकारी छल। खेला-धूपी बा कौतुहुलमे बाप-कक्का संग रहि कऽ ओ अगोर केने छल, रोपनी-कटौनी सेहो देखने छल। लोक सेहो जानैत छल जे ई फलानाक बेटा या भातिज अछि। गाम घरसँ माया-मोह लेल एतबे कम नै छल मुदा हुनकर बच्चा। ओ तँ दादा-दादीकेँ छोड़ि कऽ चिन्है ककरा छल? आ दादा-दादीकेँ सेहो चिन्है कतऽ छल। चिंता ओकरा होइ छै जकरासँ मोह होइ छै, प्रेम होइ छै। परिचए आ संबंध नै तकर की चिंता। खेत सेहो ओकरे चिन्हैत अछि जे ओकरा संग जियैत-मरैत अछि। ओ खेतकेँ की चिन्हत, खेते हुनका चिन्हएसँ मना कऽ दैत अछि। ई सभटा गप बेटा सबहक नजरिमे बूढ़क भाँसब छल। अहाँ माटिमे पैदा भेलौं आ एक दिन ओइ माटिमे मिलि जाएब। कहियो ओइसँ छूटैक बा ऊपर उठैक बा आगू बढ़ैक गप अहाँक दिमागमे नै आएल, किएकि ओइमे गोबर नै माटि छल। की कऽ लेलौं खेती कऽ कए अहाँ। कोन युद्ध जीत लेलौं। खाद महग, बीज महग, नहरमे पानि नै, मौसमक भरोस नै, बड़द नै रहल, भाड़ापर ट्रैक्टर समएपर भेटए नै। हरवाह आ मजूर रहल नै। ककर भरोसे खेती करू आ खेती सेहो तखन करू जखन हाथमे बाहरसँ चारि पइसा आबए। की फाएदा एहन खेतीसँ। असल चीज पइसा अछि। जौँ हाथमे पइसा हुअए तँ ओ सभटा जिन्स बिना किछु केने बजारमे भेट जाइत अछि, जकरा लेल अहाँ राति-दिन खून-पसीना एक करैत छी। बिना किछु केले, बिना किछु करेले। सभटा गप आ सभटा झगड़ा बेटासँ चलि रहल छल, गामकेँ लऽ कऽ। मुदा आब नव आफत। अशोक विहारक मकानक की हएत। ओ जतऽ अछि, ओतऽसँ आबऽ नै चाहैत अछि। अछि तँ ई जे हुनकासँ गाम तँ छूटिये रहल अछि, अशोक विहार सेहो ने छूटि जाए। 2 अशोक विहारक लेन नंबर ४ क डी.१ मे अमेरिकासँ आएल सोनल सक्सेना रघुवंशी, तीन बरख बाद। हुनकर डैडी आएल छल सोनलकेँ सैंट्रोसँ पहुँचाबै आ विश्वविद्यालय ज्वाइन कराबै लेल। एतबे टा नै, हफ्ता भरि रहि कऽ सभ चीज ठीक-ठाक केलक, ओकरा सजेलक-धजेलक, भोर-साँझ बेटीकेँ चाह पिएलक, ओकर दिनचर्या निर्धारित केलक आ विदा होइसँ पहिने ओकरा सलाह देलक। संजूक मम्मी-पापाकेँ बजा लिअ, ओ काज आएत। घर सेहो देखत आ अहाँकेँ मदति सेहो करत। यएह बाजल छल संजय सेहो अमेरिकासँ विदा करैत काल। -हम दुनू भाँय बाहरे छी, मम्मी-पापा गाममे असगरे अछि। ऐ उमेरमे हुनका सहाराक जरूरत अछि, हुनका संगे राखब। ई पहिलुक राति छल जखन ओ घरमे असगरे छल। देर राति धरि घर आ अप्पन बेडरूममे संगीत सुनैत रहल। एक कैसेटक बाद दोसर कैसेट। शास्त्रीयसँ मोन भरितिऐ तँ अर्धशास्त्रीय, ओइसँ मोन भरितिऐ तँ फिल्मी गाना। पढ़ैत रहितिऐ, सुनैत रहतिऐ। बत्ती मिझा कऽ सुतबाक आदति छलै। बेडरूमकेँ छोड़ि कऽ आन कोठलीक बत्ती बरैत छोड़ि देलक आ पटा गेल। सुन-सन्नाटाक सेहो आवाज होइत अछि आ से नीक कम, भयौन बेसी होइत अछि। एतबे टा नै। ई आवाज सुनाइये टा नै, लखाह सेहो दऽ रहल छल। हुनकर घरक आगू पार्क छल- बड़ पैघ। पूरा मोहल्ला या कहियौ कॉलोनीक। जखनसँ आएल छल, तखनेसँ भोर-साँझ देखि रहल छल। ओ तीन बरखसँ एहन दुनियामे रहि कऽ आएल छल जतऽ अन्हार नै होइ छल। जतऽ बूढ़ नै रहै छल। जतऽ सभटा चीज दौड़ैत-भागैत उछलैत-कूदैत नजरि आबैत छल। जइमे पानि छलै, तेजी छलै। जतऽ जवान आ जवानी आ तरह-तरहक रंग छलै। जतऽ कोनो चीज अप्पन ठाम ठाढ़ आ स्थिर नै लखाह दै छल- आ आब ई पार्क आ ई कॉलोनी। बूढ़, अपंग आ विकलांग ई विहार। फरवरीक ऐ मासमे खिड़की आ दरवाजापर थाप दैत बसंती हवा आ पार्कमे घिसियाइत, उड़ैत सूखल, झड़ल मृत सन पातक चरमर शब्द। मानि लियौ ककरो घरमे कोनो चोर पैसि जाए। ककरो की, हमरे घरमे चोर पैसि आबए आ सेहो असगरे। बिना कोनो संगीक, औजारक, डाकू पैसि आबए बिना राइफल-बंदूकक असगरे। राति-बिराति तँ छोड़ू, बीच दुपहरियामे। कोनो बलात्कारी पैसि आबए दिनेमे आ हमरा उठा कऽ चलि जाए पार्कमे, आ हम चिकड़ी जे बचाउ-बचाउ तँ के सुनत (बेसी बूढ़ या तँ बहीर अछि या ऊँच सुनैत अछि)। के दौड़त (बेसी बूढ़ ठेहुन या जोड़क दर्दसँ परेशान अछि)। के देखत (बेसी बूढ़ तँ मोतियाबंदक आपरेशन करा कऽ आँखिपर हरियर पट्टी बान्हले छल), ई सभ नै कऽ सकए तँ ठाढ़ भऽ कऽ चिकरए तँ सही (बेसी कऽ डाँड़ झुकल अछि आ मुँहमे दाँत नै, ओ घिघिआ तँ सकैत अछि, मुदा चिकड़ि नै सकैत अछि)। ऐ सोचसँ सोनलक भोँआ ठाढ़ भऽ गेलै। ओ कोनो अनजान डरसँ सिहरि उठल। फेर एकाएक ध्यान गेलै कुक्कुर दिस। कुक्कुर बड़ रास छल कॉलोनीमे- सभ सड़कपर, सभ गेटक बाहर बैसल या घुमैत लखाह दैत छल मुदा एतऽ एक्के टा ‘मुदा’ छल। एत्ते दिनसँ ओ ककरो भूकैत नै सुनले छल। ओकरे मकान डी-१ क गेटपर एकटा भूरा बैसल रहैत छल मुदा जखन जाउ, कत्तौसँ जाउ- गेटसँ चुपचाप हटि जाइ छल आ दोसर ठाम कनी हटि कऽ बैसि जाइ छल। कॉलोनीक बशिंदाक अलाबे किराएदार सेहो अछि- सभ घरमे। नीचाँ मालिक, ऊपर किराएदार। किछुमे देसी, किछुमे विदेशी- ओइमे बेसी जापानी, कोरियाई बा थाई। विद्यार्थी बा टूरिस्ट अप्पन काजसँ काज राखैत छल। ओकर अलाबे ओ कर्मचारी अछि जकर कोनो समए बदली भऽ सकैत अछि। यानी ओ जिनकर दिमागमे मकान कब्जा करबाक गप नै आबए। एहन लोकक मोहल्ला, लोकसँ की लेब-देब, हुनका सभकेँ अपनेसँ फुर्सत नै छनि। एहन तरहक जे ओकरे घर की, कॉलोनीक कोनो घर- एतए धरि जे कॉलोनीक कॉलोनी दिनमे लूटि कऽ लऽ जाए, रोकै-टोकैबला कियो नै भेटत। सोचैत-सोचैत लागल जे ई खाली एकटा सोच नै अछि- एकटा हॉरर फिल्म अछि, जे ओकर आँखि देखि रहल अछि। ओ पार्कमे फाटैत, चिर्री-चोथ होइत जा रहल साड़ी-ब्लाउजमे इम्हर-उम्हर भागि रहल रहए- जोरसँ गरजि रहल रहए, मुदा कियो अप्पन घरसँ निकलिये नै रहल अछि। ककरो सुनाइ नै दऽ रहल अछि तँ निकलत कतऽसँ। उठि कऽ झटकि कऽ ओ बत्ती जरेलक आ फिल्म खत्म। साँसमे साँस एलै। कैसेट लगेलक। दुर्भाग्यसँ कैसेट तेहेन निकललै जकरा ओ नै सुनऽ चाहैत छल, नै सुनने रहऽ चाहैत छल- वक्त ने किया, क्या हँसी सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम। ई कैसेट सोनलकेँ समीर देने छल- तीन बरख पहिने, बियाहक रिसेप्शनक दिन। तखैन ओकरा नै तँ एकरा देखैक खगता भेलै आ नहिये सुनैक। ओकरा सदिखन अपना लग राखलक मुदा कहियो नै सुनलक। आइ ई सुनैत ओकरा लागि रहल छलै जे कत्ते बदलि गेल ओइ गीतक अर्थ आइ। ओ संजयक कोनो चर्चा नै केलक अप्पन डैडीसँ, जानि-बूझि कऽ। ओ हृदएक मरीज अछि, हुनका ठेस लागितिऐ। जौँ विश्वविद्यालयक सर्विस नै भेटल हेतिऐ आ ओ अमेरिकामे रहि गेल हेतिऐ तँ की हेतिऐ। गलती कतऽ भेल आ ककरासँ भेल- ओ बुझि नै सकल। आरती गुर्जर ओकर लैंडलार्डक बेटी। ओइ कॉल सेंटरमे काज करैत छल जइमे संजय करैत छल। संग आएब-जाएब ओकरे कारसँ होइ छलै। दिन-रातिक संग। आश्चर्य ई छल जे आरतीक माए-बाप हुनका एक-दोसराक करीब आबैत देखि रहल छल, तकर बादो चुपचाप छल। आश्चर्य ई छल जे ओकर सभक आँखिक आगू ओ हँसी करैत छल- निर्लज्जताक सीमा धरि आ टोकलापर हँसऽ लागैत छल। आ एकरोसँ पैघ आश्चर्य ई छल जे आरतीक पति जखन कहियो न्यूयार्कसँ आबै छल तँ ओ अप्पन पतिसँ ओकर ब्वायफ्रेंडकेँ लऽ कऽ गप करैत छल आ ओकरा डिनरपर लऽ जाइ छल। जाए तँ संगमे ओ सेहो, मुदा ओकरा सदिखन लागैत छलै जे नै जइतिऐ तँ बेसी नीक रहतिऐ। ओ एकटा एहन समाजमे आबि गेल छल जइमे डॉलरकेँ छोड़ि कऽ कोनो आन चीज जना प्रेमक लेल ईर्ष्या करब पछुएबाक निशानी छल। ओ जखन संजयसँ ओकर किरदानीक शिकाइत करै छल, ओ तमसा जाइ छल। -अहाँ देश आ कालक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैलऽ सीखू, चलैलऽ सीखू। नै चलि सकी तँ चुपचाप बैसल रहू बा घुरि जाउ। -घुरब तँ असगरे किए? अहाँकेँ संग लऽ कऽ। -हम तँ डिअर परदेसकेँ अप्पन देस बनाबैक सोचि रहल छी। मुस्कुराइत ओ आँखि मारि कऽ बाजल- अहाँ किए नै खोजि लै छी एकटा ब्वायफ्रेंड। -नीक लागैत अहाँकेँ? ओ सीधा संजयक आँखिमे देखलक। -नीक, की कहै छी। निश्चित भऽ जाएब सर्वदा लेल। हा, हा, हा। सोनल संजयक आँखिमे गौरसँ देखलक। ओ आँखि छल या दिल। ई गप ओ जबानसँ बाजल छल या दिलसँ। ओ कत्तौ सच्चेमे सोनलसँ मुक्ति तँ नै चाहैत छल। ओ देखि रहल छल जे अमेरिका एलाक बाद हुनकामे तेजीसँ अन्तर आएल छल। एक-दू बरखक भीतर। ई ओकर तेसर नौकरी छल। ओ एकटा शुरू करैत अछि, दोसराक खोजमे लागि जाइत अछि। पहिनेसँ नीक, पाइकेँ लऽ कऽ। हुनकामे इन्तजारी नामक चीज नै अछि। ओ जल्दीसँ जल्दी ऊँचसँ ऊँच स्थान छुअ‍ चाहैत छल। जहिना एकटा ऊँच स्थानपर पहुँचै छल, कनी दिनमे से नीचाँ लागऽ लागै छल। एकरा ओ महत्वाकांक्षा कहै छल। जँ ई महत्वाकांक्षा अछि तँ फेर लालच की अछि। लालच। आरती गुर्जरक संग संजयक दोस्तीक पाछाँ खाली आरती गुर्जर अछि बा ओकर एन.आर.आइ. माए-बाप, जकर गुजराती हस्तशिल्पक चमकैत व्यवसाय अछि। जकर ओ एकमात्र संतान अछि। आरतीसँ संजयक सम्बन्ध ओकरा बुधिसँ बाहर छल। एतऽ रहि कऽ सोनल सेहो कमा सकैत छल। कोना विश्वविद्यालयमे, कॉलेजमे, लाइब्रेरीमे, कत्तौ सेहो। कंप्यूटरमे सेहो नीक गति छल। मुदा संजय जखैन सोचलक, अपना लऽ कऽ सोचलक। सोनलकेँ लऽ कऽ सोचैक फुरसति नै छलै। ओ सोनलकेँ हाउस वाइफसँ बेसी हइले नै देलक आ ओ सेहो बनारसक इंतजारीमे आइ-काल्हि-परसू करैत रहि गेल। सोनलक आँखि भरि गेलै। ओइ काल ओ निर्णय लेलक जे ओ आब एतऽ नै रूकत। ओ बहन्ना ताकि रहल छल जे राँचीसँ पापाक ई-मेल आएल जे तुरंत आबि जाउ। १५ केँ अहाँक इंटरव्यू अछि। ओकर खुशीक सीमा नै रहलै। ई ओकर आत्माक पुकार छल जे विश्वविद्यालय धरि पहुंचल छल। आइ भोरक प्रकाशमे खिड़कीसँ फेर गरजि रहल छल सोनलक आत्मा। -संजयकेँ नै, समीरकेँ सुनू आ चलि आउ। 3 बेसी नै, हफ्ता-दस दिन लगलै सोनलकेँ ऐ घरक एकांत आ सुन-सन्नाटक हिसाबसँ अपनाकेँ उतारऽ मे। आ जखन उतरि गेल तखन मजा आबऽ लगलै। अप्पन ‘असगरे’ केँ इंज्वाय करऽ लागल। ओ डेढ़-दू बिसवाक रियासतक रानी छल- मालकिन। जखन चाहे सुतु, जखन चाहे उठू, जतऽ चाहे बैसू, जना चाहे ओहिना घरमे रहू। ब्रा बा गंजीमे, लुंगीमे, गाउनमे। नंगटे नहाबी, कूदी-फांगी। नै कियो देखैबला नै कियो सुनएबला। जखन चाही, जेहन चाही खेनाइ रान्ही। नै रान्ही, उपास करी, ओकर मोन। जौं संगमे ई सासु-ससुर हुअए तँ ई करू, ऊ करू, एना करू, ओना नै करू। दुनिया भरिक झमेला, टोका-टाकी। टेपरेकॉर्डर छै, टी.वी. छै, कंप्यूटर छै, मोबाइल छै, फोन छै जइसँ अपनाकेँ व्यस्त रखबाक चाही। एकर अलाबे किताब छै, क्लासक तैयारी छै, कार छै। बेसी नै, साँझकेँ फ्रेश भेलाक बाद आध घंटाक ड्राइवपर बहरा जाउ आ घुरि कऽ बीअरक एकटा पैग आ सिगरेट (ई कैलिफोर्नियाक आदति छल जकरा देर-सबेर छोड़ैये पड़तै, ऐ सड़ल-गलल नग्रमे से ओ जानैत छल)। -मुदा समीर कतऽ अछि। ओ पापाकेँ फोन केलक। कोनो खास गप लेल नै, बस ओहिने। जखन ओ रिसर्च कऽ रहल छल इतिहासमे, तखने समीरसँ परिचए भेल छलै। एकटा तेज आकर्षक युवक छल। नीक खाइत-पिबैत घरक। ओकरासँ दू बरख सीनियर आ राजनीतिमे पी.एच.डी.। नौकरी भेटि रहल छल मुदा ओ अप्पन हितकेँ नै देखि कऽ किसान-मजदूरक हितकेँ देखलक। ओकरामे देश आ दुनिया आ समाजक सभटा मुद्दापर नम्हर बहस करबाक आ विश्लेषण करबाक दक्षता छलै। ओकरा राजनीतिक ऐक्टिविस्ट हएब पसीन छल। ओइ समएमे बिहारमे एहन कतेक ग्रुप छल आ ओ ओइमे सँ एकटा ग्रुपसँ जुड़ि गेल आ सक्रिय भऽ गेल। ओ हफ्तामे एक बेर पटना आबैत छल आ पूरा दिन सोनल संग बिताबै छल। ओकर सपना छल जे बियाह करब आ अप्पन जीवन किसानक खुशहालीक लेल समर्पित कऽ देब संगे-संग। सोनल जखन डैडीकेँ बतौलक तँ ओ बुझाबैत बाजल जे ई आतुर दिमागक सोच अछि। कनियाँक कमाइ आ नोकरिहाराक चंदापर क्रांति करऽबला एहन युवकक कमी नै अछि बिहारमे। ओ जल्दीसँ जलखै आ चाह-पानिक लेल दोसराकेँ ताकैत सड़कपर लखाह पड़ैत रहैत अछि। एहन सनकीमे नै आबू। आ हुनके समझेला-बुझेलापर ओ संजयसँ बियाह तँ कऽ लेलक मुदा समीरकेँ हृदएसँ नै निकालि सकल। एतऽ धरि जे अमेरिकामे जखन संजय ओकरासँ ब्वायफ्रेंडक गप केलक तँ ओ डरि गेल जे कत्तौ ओकरा समीरक दोस्तीक खबरि तँ नै अछि। हुनका समीरक बड़ सोच लागल छन्हि, ओकरा एतऽ एलाक बादसँ। ओ भोर कऽ छतपर टहलि रहल छल जे डी-४ क आगू सड़कपर पुलिस वैन लखाह देलकै। ओकर नजरि जाइसँ पहिनेसँ ठाढ़ छलै ओ वैन। किछु लोक छल जे भीतर-बाहर आबि जा रहल छल। लेनक एकटा कोनपर ओकर डी-१ आ दोसर कोनपर डी-४। ओकर दुइये मकानक बाद। बरतन माँजै आ झाडू पोछा करैबाली दाइ ओइ कॉलोनीक छल। जहिना ओ आएल, ओ पुछलक। दाइ गीता जे किछु बतौलक से भयौन छल। ई ओइ कॉलोनीक तेसर घटना छल। ऐ बरखक तेसर। डी-४ राय साहबक बंगला छल। राय साहब बागवानीक खूब शौकीन। हुनकर लॉनमे मखमल सन घास छल, जेना हरियर रंगक गद्दा। ओइमे जुत्ता-चप्पल पहीर कऽ ने ओ अपने जाइ छल, नहिये दोसराकेँ जाए दै छल। घासक गद्दाक चारू दिस फूल आ रंग-बिरंगक पातबला गमला छल। ओ दिन भरि कैंची संग लॉनमे नजरि आबैत छल- काटैत-छाँटैत। हरियर रंगक पाछाँ एहन बताह जे बंगलापर सेहो हरके डिस्टेंपर। एतऽ हरियरी हुनकर झुर्रीबला मुँहपर रहै छलै सदिखन। एक दिन एकटा फोन एलै राय साहेबक नामे। -एत्ते जल्दी की अछि मकान बेचबाक। कनी रुकि जैतिऐ। राय साहेब हेलो, हेलो करैत रहि गेल, मुदा फोन कटि गेल छलै। ओइ दिन हुनका आश्चर्य भेलै, हँसी सेहो एलै। फेर सभ तेसर-चारिम दिन रोज या तँ कोनो ने कोन फोन आबै छलै या कियो ने कियो मकानकेँ लऽ कऽ जानकारी करैक लेल आबै छलै। फोन करऽबला की अछि, कतऽसँ कऽ रहल अछि, मकान बिकेबाक गप के बतौलक, राय साहेबकेँ किछु पता नै चलि सकलै। आबऽबला केँ ओ बिगड़ि कऽ भगा दै छला, फाटकक भीतर पैसऽ लेल नै दै छला। ओ कहैत-कहैत थाकि गेला जे ई खबर गलत अछि, हुनका बेचबाक नै अछि। तकर बादो ई खेरहा खतम नै भेल। ओ परेशान भऽ गेल। लागैत रहए जे ओ पागल भऽ जाएत। ओ सुतै लेल छटपटा कऽ रहि जाइ छल आ नीन नै आबैत छलै। दोस्त मित्रक सलाहपर ओ पुलिसकेँ रिपोर्ट केलक जे हुनका लग केहन-केहन फोन आबैत अछि, केहन-केहन लफंगा आबैत अछि, आ केहन-केहन गप करैत अछि। चारिम दिन जे लोक मकानकेँ लऽ कऽ पुछैले एलै, तकर गपसँ राय साहेबकेँ लागि गेलै जे पुलिस रिपोर्टक जानकारी हुनका अछि मुदा एकर नहिये डर छै, नहिये आदंक। जइ मानसिक तनाव आ बेचैनीसँ ओ जीबि रहल छल, ओइसँ हुनका ओइ दिन मुक्ति भेटल जइ दिन एकाएक हुनकर नेनाक मित्र राजराम पांडे उर्फ भुटले गुरु आएल। भुटले गुरु आब तँ नगरक प्रसिद्ध रईस छल मुदा छल हुनकर पड़ोसी गामक। हाईस्कूल धरि हुनकर संग गाममे पढ़ि चुकल छल। कतेक मोहल्लामे कतेक रास मकान छलै। ओ इम्हरसँ जा रहल छल तँ हुनका राय साहेब मोन पड़ल आ पुछैत-पाछैत डी-४ मे चलि आएल। -भजार। बड़ नीक घर अछि सुरेश। ओ गेटमे पैसैत बाजल। राय साहब बड़ उत्साहसँ हुनका घर देखेलक। ओ पहिल बेर आएल छल। ओ घर-आंगनक प्रशंसा करैत बतेलक जे ओइ समएमे भले ने भेंट भेल हुअए, दुनू बेटीक बियाह आ भाभीक स्वर्गवासक खबरि हुनका भेटल छल। ड्राइंग रूममे पैसैत हुनका पुछलक। -सुरेश। अहाँक बेटा कतऽ अछि आइ-काल्हि जकर इलाज करा रहल छलौं। भुटले गुरु सोफापर बैसल, राय साहेब हुनका आगू बैसि कऽ कूही भऽ कानऽ लागल। भुटले गुरु सेहो सोफासँ नीचाँ आबि गेल आ सुरेश रायकेँ बाँहिमे भरि आगू दीवान दिस ताकैत रहल। दीवानपर मोटरी जकाँ एकटा छौड़ा पटायल छल। ओ टुकुर-टुकुर उत्सुक भऽ हुनका ताकि रहल छल। दाढ़ी-मोंछ बेहिसाब बढ़ल छलै। खाली मुँह खुजल छलै। देह झाँपल छलै। एकटा सुखाएल लकड़ी सन बिछौनपर पड़ल छल। लागै नै छलै जे डाँड़क नीचाँ किछु छै। ई बाजैत तँ तहियो नै छल। मुदा ई ख्याल नै जे किछु बुझैत अछि बा नै। भुटले गुरु पुछलक। राय साहेब बिना किछु बाजले हिचकी लिअए लागल। भुटले गुरु सांत्वना दैत हुनका उठैलक आ सोफापर अप्पन बगलमे बैसेलक। कनी काल बाद राय साहेब आएल आ अंदर चलि गेल। जखन ओ चाहक संग घुरल तँ सामान्य छल। चाह पीयैत ओ बतौलखिन जे कोना पेट काटि कऽ, गामक जमीन बेचि कऽ, बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ कोन तरहेँ ई घर ठाढ़ केलक, दू बरख पहिने रिटायर भेलाक बाद ओइमे आएल। हम कहियो नै सोचलौं जे केकरा लेल घर। बस ई छल जे अपना लेल एकटा घर हुअए। एकरा ठाढ़ हेते-हेते स्त्री सेहो चलि गेल। मुदा लागल रहलौं बिना सोचले-बुझले जे घर हुअए तँ केकरा लेल। देखि रहल छी ऐ बेटाकेँ। नै चलि सकैत अछि, नहिये सुनि सकैत अछि, नहिये बाजि सकैत अछि। की हएत एकर जखन हम नै रहब। नै जानि कोन जन्मक पापक सजा दऽ रहल अछि भगवान। -हम छी ने, चिंता किए करै छी? -भुटले गुरु हुनकर कान्हपर हाथ राखलक। -चिंता तँ ई अछि भुटले गुरु जे छऽ-सात माससँ सुतल नै छी। नै जानि कतऽसँ केहन-केहन लोकक राति-बिराति फोन आबैत रहैत अछि, धमकी दैत। पता नै के उड़ा देलक जे सुरेश राय अप्पन घर बेचि रहल अछि। परिणाम र्ई अछि जे गुंडा-बदमाश धरि घरक भीतर घुसल चलि आबैत अछि आ सलाह दऽ रहल अछि, जे जतेकमे बेचब ओतबेमे दू टा कमराक फ्लैट आबि सकैत अछि आ बाकी सूदसँ बीस-पच्चीस बरख निश्चिन्तीसँ काटि लेब। पुछलौं जे अहाँ के? तँ बाजैत अछि- प्रापर्टी डीलर, प्रापर्टी डील अहाँ कऽ रहल छी, बिना पुछले जे अहाँ बेच रहल छी आकि नै? दलाल साढ़। हिम्मत तँ देखू ओकर। जौँ आइ नरेश नीक रहितिऐ तँ ई नौबति नै ऐतिऐ। भुटले गुरु गंभीरतासँ ई सभ किछु सुनैत रहल आ सोचै-विचारैक बाद बाजल। -एना अछि सुरेश। हम दू-तीन दिनमे एकटा दरबान बा लोककेँ भेज देब। बड़ भरोसक लोक। ओ अहाँक सभटा समस्या दूर कऽ देत। ठीक। तेसर दिन सत्तेमे एक लोक आएल आ राय साहेबक फिकिर खतम भऽ गेल। नहिये कहियो फोन आएल, नहिये गुंडा-बदमाश सभकेँ साहस भेलै जे लगमे कत्तौ लखाह दैतिऐ। मुदा जे हेबाक छल, भऽ कऽ रहल। तीन मास बाद। राति दिन पूरा घरक देखभाल करैबला दरबान राति भरक छुट्टी लऽ कऽ भतीजीक बियाहमे अप्पन गाम गेल छल आ इम्हर ओइ राति ई दुर्घटना भऽ गेल। ओइ पलंगपर पटायल राय साहेबक बेटा टुकुर-टुकुर ताकैत रहल आ ओकर हत्या भऽ गेलै। भुटले गुरु ऐ दुर्घटनाक दू दिन पहिनेसँ अस्पतालमे छल। रूटीन चेकअप लेल। दरबान हुनका ई खबरि देलक। ओ अस्पतालसँ सोझे अप्पन गाड़ीमे आएल। दरबज्जापर ठाढ़ भीड़केँ ओतऽसँ हटैलक, बढ़ैलक, डाँटलक, डपटलक आ भीतर जा कऽ पुलिससँ जनतब लेलक। फेर ओइ कमरामे गेल जतऽ बिछौनपर राय साहेब पटायल छल। ओतऽ बगलमे एकटा तख्तापर हुनकर बेटा सेहो छल, जे निश्चल पड़ल छल। मूकदर्शक। दुर्घटनाकेँ आँखिसँ देखैबला गवाह। ओ पुलिसक संग भीतर गेल, ओकरे संग घुरि आएल। बाहर अंदाजी गप आ कनफुसकी चलि रहल छल- या तँ मुँह या नाकपर गेरुआ दबा कऽ मारल गेल या गला दबा कऽ। देहपर कत्तौ चोटक चिन्हासी नै छल। हाथ उठेबाक कोनो चिन्हासी नै। बिछौन मोचड़ाएल नै। गेरुआपर शोनितक छोट-मोट चिन्हासी छल जेना ओ मुँहसँ निकलल हुअए। लहाश जखन पोस्टमार्टम लेल आनल जा रहल छल, सोनल अप्पन गेटपर ठाढ छल। सोनल अप्पन गेठपर ठाढ़ ओकरा जाइत देखि रहल छल। कॉलोनीमे मकान कब्जा करैक तेसर घटना छल। घरमे ओ सेहो असगरे छल। विश्वविद्यालय आबै-जाइक समए अनिश्चित। कोनो दिन दुपहरियासँ पहिने क्लास, कोनो दिन दुपहरियाक बाद। घरमे कियो नै। दिनमे तँ चोरी भऽ सकैत अछि मुदा रातिमे तँ हत्या धरि संभव अछि। ऐ कल्पनासँ ओकरा थरथरी छूटि गेलै। आँखिमे उतरैबला सिहरी सगरे देहमे पसरि गेलै। ओ ऐ गुनधुनीमे पूरा दिन पड़ल रहल। नोकर नै भेटि रहल छलै, नहिये नोकर राखब मुनासिब छल। नोकरनी झाड़ू-पोछासँ आगू लेल तैयार नै छल। बेर-बेर ओकर ध्यान जा रहल छल सासुरपर। रातिमे ओ पहाड़पुरक कोड खोजलक आ फोन केलक- पापा, हम सोनल। आबि रहल छी काल्हि, अहाँ दुनूकेँ लैक लेल। तैयार रहऽ। नै, किछु नै सुनब। मम्मीकेँ फोन दियौ..। 4 शीलाकेँ सोनल ओ मान-सम्मान देलक जे कोनो पुतोहु की देत अप्पन सासुकेँ। भोर-साँझ मम्मी, बीच राति मम्मी, घरमे मम्मी, बाहर मम्मी- बस सभ दिस मम्मीये मम्मी। जखन कि शीला सोनलक संग आएल लोक लाजक कारण, तइसँ जे नै जाएब तँ बेटा की सोचत हुनका लऽ कऽ। की जे बेटाक सहारा बुढ़ापा काटै लेल अछि तँ ओकर स्त्रीक कोना नै सुनी? ओ नै सुनत तँ ओ हुनकर किए सुनत? लोक अप्पन बच्चाक भविष्य किए सिटैत अछि। तइसँ किएकि हुनकर भविष्यमे हुनका अप्पन भविष्य लखाह दैत अछि। काएदासँ देखल जाए तँ ओ हुनकर नै, अप्पन भविष्य सिटैत अछि। ऐ सीटल भविष्यमे डेग राखने छल शीला आ प्रसन्न छल। जइ लड़कीसँ कोनो पूर्व परिचय नै, कोनो सम्बन्ध नै, एतऽ धरि जे नहिये अप्पन जातिक, नहिये अप्पन कुलक। नहिये संस्कार। ओ शीलाक पाछाँ मरल जा रहल छल- मम्मी, चाह पीब। मम्मी जलखै करब, मम्मी नहा लेलखिन। मम्मी खाना खा लेलखिन, मम्मी कोनो जरूरति। एत्ते खयाल तँ हुनकर बेटी सरला सेहो नै राखैत छल। सोनल पहिने हुनका घर देखैलक- ड्राइंग रूम, ओइसँ सटल कोठली, आंगन, फेर ओ कोठली जइमे मम्मी-पापा रहत, फेर किचेन आ स्टोर, फेर पछुआरक हीस जइमे नोकर-चाकर लेल टीनक खुजल शेडबला कोठली। फेर ओ ऊपर लऽ गेल, छतपर आ देर धरि मम्मीकेँ टहलाबैत रहल जे लोक देखए आ जानए जे ओ घरमे असगरे नै रहैत अछि। ऐ घरमे ओ सभ किछु छल जकरा लऽ कऽ शीला सोचलो नै छल। हुनका राति भरि नीन नै आएल- कारण जे हुअए। कारण नव ठाम सेहो भऽ सकैत अछि, चौड़गर डबल बेड सेहो, गदगर बिछौन सेहो। आ सुख छल जे अनचोक्के हुनकर जीवनमे आबि गेल छल। ओ घरमे आएल नै छल, गृह प्रवेश केने छल। यएह कहने छल सोनल आ नीकसँ नीक डिश बना कऽ खुएले छल। शीलाक खुशी बेर-बेर ओकर आँखिमे नोरा रहल छल। आ ई नोर आर किछु नै, पहाड़पुरक खपरैलबला घर छल, हुनकर बेटा-बेटी छल आ दुख छल जे ओ अप्पन जीवनक भरि सहल छल। एकाएक हुनका मोन पड़ल संजयकेँ लऽ कऽ, नहिये ओ किछु पुछलक, नहिये सोनल अपनासँ किछु बतौलक। दोसर-दोसर गप होइत रहल आइ धरि। अगला दू-तीन दिनसँ शीला अप्पन दिनचर्या निश्चित कऽ देने छल। खाना बनाबैवाली महाराजिन आइ धरि नै भेटल छल आ ओ बैसल-बैसल की करितिऐ दिन भरि। भोर कऽ चाह, आ बीच रातिक खेनाइ ओ अप्पन जिम्मा लऽ लेलक। कष्ट मात्र एतबे छलै जे गप करैबला अखन धरि कियो नै भेटल छलै। डी-पॉकेटक घटनासँ सभ कॉलोनीबला अपनाकेँ घरमे रोकि राखने छल। ओ सभ डरल छल जे कत्तौ एहन नै हुअए जे ओ मकान छोड़ए आ घरमे घुसब मुश्किल भऽ जाए। ऐसँ पार्क सेहो खाली पड़ल छल- नहिये कोनो औरत, नहिये कोनो मर्द। तीन-चारि दिन धरि कियो अप्पन घरसँ बाहर नै निकलल- सर्विस करैबलाकेँ छोड़ि कऽ। शीला झाड़ू-पोछा करैवालीक पाछाँ-पाछाँ घुमैत रहैत छल आ गप करैत रहैत छल जे कएटा छौड़ा छै, कएटा छौड़ी छै। कतऽ बियाह भेलै। जमाए की करैत अछि। कएटा पुतोहु अछि। ककरा संग रहै छी। स्वभाव केहन अछि। सेवा करैत अछि आकि नै। बेटा ध्यान दैत अछि कि नै। अखन कोनो पोता-पोती अछि कि नै। किछु सुनैत, किछु अप्पन सुनाबैत छलि। ओइ काल सोनल अप्पन काज करितिऐ, पढ़ितिऐ, लिखितिऐ आ नै तँ कंप्यूटर माउससँ खेलैतिऐ या टाइप करितिऐ। ऐ बीच शीला दू बेर पुतोहुसँ दुखी भेल छल। ओ भोरमे चारि बजे जागि जाइ छल आ सोनल सुतल रहै छल आठ बजे भोर धरि। ओ ओकरा जगबैक एकटा तरीका निकालक। ओ भोर चारि बजे चाह तैयार करलक आ हुनका जगेलक। सोनल सुतल रहल आ उठलापर चाह सिंकमे फेंक देलक। फेर अप्पन अलगसँ नेबोक चाह बनेलक। शीला देखैत रहल। दोसर दिन ओ नेबोक चाह बनेलक कनी देरीसँ। माने सात बजे। ओइ दिन सेहो यएह भेल। सोनल बाजल- मम्मी, हमर चाह रहऽ देल करथिन अहाँ। जखन उठब, तखन बना लेब। हुनका नीक नै लागल। अप्पन आदतिक अलग ओ कोनो तरहे चुप रहि गेल। एतऽ धरि तँ चलि जैतिऐ मुदा एक दोसर प्रसंगमे तँ जेना हुनकर मन उचटि गेल। होइत ई छल जे शीला भोरमे रातिक बचल रोटी बा परोठा आ सब्जी जलखै कऽ लैत रहथिन। सोनल देखलक तँ बिगड़ल- नै मम्मी, ई नै चलत। अहाँ ऊ खायब जे हम खाएब। टोस्ट बटर, दलिया, दूध, फल। ऊ सभ नै। ठीक। शीलाक दिमागमे सवाल उठल जे रोज-रोज जे बैसका रोटी या परोठा बचि जाइत अछि, ओकर की हएत। ओकरा दाइ गीताक ख्याल आएल। ओ सेहो आबैत शीलाकेँ माताजी-माताजी कहैत छलि। काज-धंधा खतम कऽ जखन गीता जाइ छल तँ ओकरा रोकि कऽ खुआ दैत छल। तरकारी नै रहलै मुदा नै रहलापर कखनो चाह दैत छल, कखनो अचार। सोनलकेँ पता चलल। पता की चलल ओ गीताकेँ एक कोनमे बैसल खाइत देखि लेलक। -मम्मी। -गीताकेँ जाइक बाद सोनल बाजल। -अहाँ किए ओकर आदति बिगाड़ि रहल छी मम्मी। शीला बुझैक ख्यालसँ पुतोहु दिस ताकलक। -ओकर नोकरीक शर्तमे चाह-नाश्ता नै छल। पाँच सौ महीना आ सालमे दू बेर साड़ी, बस। -मुदा, हम चाह-नाश्ता कतऽ दै छी। जे किछु बचल-खुचल रहै छै, सधा दै छी। -फेकैसँ बा कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआबैसँ नीक अछि जे ककरो स्वार्थ सिद्ध होइ। -यएह तँ। कुक्कुर-बिलाइकेँ भले खुआ देथिन, ओकरा नै देथिन- यएह कहब अछि हमर। -आँए। ई केहन गप कऽ रहल छी अहाँ। फाटल आँखिसँ पुतोहु दिस ताकलक शीला। -नै, खराप नै मानब। एकरा एना बुझथिन। मानि लिअ काल्हि अहाँ कत्तौ चलि जाइ छी बा एतऽ नै रहब। ओ हमरोसँ आशा करत आ हम नै दऽ सकब तँ खराप लागत, ठीकसँ काज नै करत। छै कि नै। -सभ ठीक। मुदा ई गप हमर गरामे नै उतरि रहल अछि जे कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआ देब, मुदा ओकरा नै खुआएब। -मम्मी, ओ अहाँक परजा नै अछि, नोकरनी अछि- प्रोफेशनल। ओकर पेट रोटी-परोठासँ नै, पैसासँ भरत। एतबेटा नै, अहाँ ओकरासँ गप करब आ ओ अहाँक माथ चढ़ि जाएत। -काल्हि जखन कोनो गपपर ओकरा टोकब तँ ओ लड़ऽ लागत। ओकरा अहाँ वएह रहए दियौ जे ओ छी। आबए, अपन काज करए आ बाट नापए। शीला माथ झुका कऽ चुपचाप सुनैत रहल आ ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा हम अन्नक अपमान नै हुअए देब। ओकरा नै खुआएब तँ अपने खाएब। -अहाँ अधला मानि गेलौं। नै बुझलौं हमर गप। -बुझि गेलौं, कोनो अनपढ़ नै छी। हमहूँ बी.ए. छी अप्पन कालक। -ठीक अछि। मुदा हम तँ हिनका बैस कऽ खाए लेल नै देब। काल्हि ई कहथिन जे हमरा बैसा कऽ खुआबए छल। -तँ हमरो सुनि लिअ, हम अन्नकेँ एना फेकै लेल नै देब। ई बहस तखने खतम भऽ सकैत छल जखन ओइ दुनूमे सँ कियो चुप भऽ जाए आ ओतऽ सँ हटि जाए। आखिरीमे सोनल कोनो काजक बहन्ने ओतऽसँ चलि गेल। शीला किछु काल धरि बैसल रहल। ओकरा लागल जे बहू नकचढ़ीये टा नै, मथचढ़ी सेहो अछि। पैदा करितिऐ तखन ने अनाजक मोल पता चलितिऐ। माँ-बापक एकेटा औलादि, जातिक लाला- खेत-पथारसँ मतलब नै, ओकरा की बुझल छै अप्पन फसलक सुख-दुख। ओ घरक पछुआरमे गेल जतऽ रघुनाथ बाहरसँ घुमि कऽ आएल छल आ नहाइ लेल जा रहल छल। ओ जहिना शुरू केलक तहिना रघुनाथ टोकलक- सही बाजलक ओ। पुतोहुकेँ सुनै आ हुनका संग रहैक आदत डालू। -की? अहाँक ई सभ कहब अछि। -नै। हमर ई कहब नै अछि। हमरा ई कहब अछि जे जकर घरमे रहै छी, खाइ छी, पहिरै छी, ओकर गपपर कान-बात दियौ। वएह करू, जे ओ चाहैत अछि। -राशन हम आनलौं, चाह-नाश्ता हम बनबै छी, खाना हम पकाबै छी। जे कियो आबैत अछि, हुनका उठाबैत-बैसाबैत छी- आ हमर कोनो पूछि नै। -अच्छा जाउ अहाँ एतऽसँ। जे करबाक अछि करू। खिसिया कऽ रघुनाथ बाजल आ बाथरूममे चलि गेल। -हम नै रहब एतऽ। हमरा गाम पहुँचा दिअ आ नै पहुँचाएब तँ अपने चलि जाएब। बाथरूमक भीतर रघुनाथ हँसैत बाजल- अरे। पुतोहुसँ तँ पुछि लियौ। अपने सँ नै एलौं अछि अहाँ, वएह आनले अछि। कोना अछि ओ गीत। ओ नल खोलि देलक आ गाएब शुरू केलक- अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं। अभी अभी तो आई हो, बहार बन के छाई हो अभी जरा नहा तो लूँ, अभी जरा ... न... नम... न... नू... साँझक चारि बजेक आसपास सरलाक फोन आएल- बड़ दिन बाद। बड़ दुखी आ शिकाइतक स्वरमे। उठैलक शीला। सोनल कॉलेज गेल छल, घरपर वएह छल। एकरासँ पहिने दू-तीन बेर ओ गामपर फोन केने छल। ओकर खराप भाग्य जे रिसीवर उठैने छल रघुनाथ आ ओकर नाम बिन सुनले, बिन पुछले आ बिन बाजले फोन राखि देने छल। एकर चर्चा सेहो शीलासँ नै केले छल। -माँ आब तँ आबि सकैत छी हमरा कतए। -एना किए बाजि रहल छी सरला। शीला कननमुँह भऽ उठल। -हम बियाह नै केने छी माँ, पापाकेँ कहि देब। चाहे तँ उहो आबि सकैत अछि। -हुनकर हम नै जानैत छी मुदा हम तँ तैयारे छी। जखन कही तखन आबि जाएब। -ठीक अछि, अगला पंद्रह दिनक भीतर कोनो व्यवस्था करैत छी। -मुदा अहाँ बियाह किए नै करलौं। हम तँ मानि लेने छलौं जे भऽ गेल हएत। -माँ, हम सोचि लेने छी। भगवान आ बियाहक बिना जिअल जा सकैत अछि, रहल जा सकैत अछि। कोनो गपक फिकिर नै करब। ठीक। सरला रिसीवर राखि देने छल। शीला जतऽ छल तत्तै ठाढ़ रहल। ओकरा बुझैमे नै एलै जे ई नीक भेल कि अधला। ओ रघुनाथकेँ बतौलक। रघुनाथ मात्र एतबे टा कहलक जे ऐसँ नीक हेतिऐ जे ओ बियाह कऽ लेतिऐ। 5 शीला सोनलक आग्रहपर ताधरि रुकल रहल जाधरि खेनाइ बनाबैवाली दाइक व्यवस्था नै भऽ गेलै। जइ दिन शीला गेल, ओइ दिन सोनल गेट आ घरक चाबीक डुप्लिेकेट बनबैलक आ ओकरा रघुनाथकेँ दऽ देलक। दुपहरियाक एक-डेढ़ घंटा छोड़ि कऽ ओ जखैन चाहे तखन, जतऽ चाहे ओतऽ आ-जा सकैत छल, घूमि सकैत छल, भेँट-घाँट कऽ सकैत छल, कियो पूछै-ताकैबला नै छलै। ओहिनो रघुनाथ घरमे रहैत एक तरहेँ घरक बाहर छल। पछुआरक बाउंडरीवालसँ लागल एक ईंटाक दूटा देवाल छल, जइपर अस्बस्टर पड़ल छल। सोचल गेल छल जे जौँ नोकर-चाकर बा ड्राइवर भेल तँ ओइमे रहत। रघुनाथक व्यवस्था शीलाक संग ओइ कोठलीमे छलै। ऐसँ बेसी ओ अपन कनियाँ संग सुतलो नै छल। आबै कऽ दिनसँ हुनका ई ठाम जँचि गेल छल। ओकर बगलमे नल सेहो छल आ शौचालय सेहो। आर की चाही। नाश्ता-खाना घरमे, बाकी सभ बाहर। शीला संग रघुनाथक संबंध दाम्पत्यक रहलै मुदा प्रेमक नै भऽ सकलै। ईहो कहि सकै छी जे ओ शीला संग सुति जाइ छल  मुदा प्रेम नै करै छल। आ मानै छल जे ऐलेल शीला जिम्मेदार छथि। ओ एहन स्त्री छल जकरा सभ दिन प्रेमक प्रमाण चाही। एतबे टा नै, एक बेर या दू बेर या तीन बेर अहाँ हुनका आश्वस्त कऽ देलौं जे अहूँ ककरो आनसँ नै हुनकेसँ प्रेम करै छी तँ ओ मानि जाएत। फेर ओ अगिला दिन परीक्षा लैले चाहत जे ओ कोनो ओहिना तँ नै छल। एतबे टा नै, ओ अप्पन प्रेमकेँ लऽ कऽ मात्र शिकाइत कऽ सकै छल। एकर अतिरिक्त ओकरा लग कोनो आन भाषा नै छलै। ई सभ स्थिति रघुनाथमे मात्र खिसियैनी टा नै आनलक, ओकरा दिससँ अवहेलना सेहो आनलक। शीला कहियो हुनकर रुचि आ पसीनक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैक प्रयत्न नै केलक। जेना शीला चाहै छलि जे घरमे कोनो गप हुअए जइसँ ओ खुश हुअए, उल्लसित हुअए, ओकरामे उत्साह आ जोश लखाह दिअए, हँसए, गाबए, आर किछु करए। मुदा तैयो हुनकर चेहरापर कोनो तरहक कोमल भाव नै आबै छल। एतऽ धरि जे रघुनाथ जखन खुशीसँ मारे कूद-फान करए आ बेचैन हुअए लागैत छल तखनो ओ हुनकर उपहास करैत निर्विकार ठाढ़ रहैत छलि। खुशी हुनकर चेहरापर अबैत छल तँ जबरदस्तीक दाग सन फेर गाएब भऽ जाइ छल। एकर अलाबे हुनकामे खूबीये खूबी छल। ओ अपन पति आ बेटाक पद आ प्रतिष्ठाकेँ हरदम फराक राखै छलि। दोसरा लग बड़ रास एहन बौस्तु होइ छल जे हुनका लग नै छल मुदा हुनकामे कखनो ईर्ष्या नै होइ छल। समभाव हुनकर स्वभाव छल। ओ तखने विचलित होइ छल जखन ओ कोनो गरीब गुरबाकेँ लल्ल आ विवश देखै छलि। ओ सभ किछु सहि सकैत छलि मुदा ककरो जबर्दस्ती नै। शीलाक गेलाक बाद रघुनाथ निसाँस लेलक। ओ हुनकासँ पुतोहु लऽ कऽ किछु नै बाजै छलि, मुदा एकर बादो ओ तनावमे रहैत छल। ऐ तनावसँ ओ आब मुक्त भऽ गेल छलि। शुरू-शुरूमे रघुनाथकेँ अशोक विहार पसीन नै एलै। ओ ततबे उजाड़ आ उदास इलाका देखने नै छल। देखब तँ दूर, सोचलो नै छल। हुनका कियो बतौने छल जे ई पूरा इलाका कहियो पूरा श्मशान होइ छल। यएह ओजह भऽ सकैए जे हुनका सभ गली आ सभ मकानक सभटा खिड़कीसँ आबैबला हवा मृत्युगंध फेंटल लागै छल। मने इम्हरसँ जाउ या उम्हरसँ जाउ नाक दबा कऽ या फेर ओइपर रुमाल राखि कऽ। आँखि बन्द कऽ देखू तँ पूरा बस्ती ओइ बंदरगाहक सन छल जतऽ सभटा यात्री महाप्रयाण पर निकलै या ओइ पार जाइक तैयारीमे लागल छल। मुदा एक भोर- एहन भोर रोज आबै छल- आ ऐ आँखिसँ रघुनाथ देखै छल। ओइ भोर ध्यान गेलै पार्क दिसनसँ आबैत एकटा बुढ़ दिस- लकवा मारल, मुँह टेढ़, गरदनि झुलैत, वाम हाथ झुलैत, घिसिआइत असक्क पएर, दोसर गलीसँ निकलल एकटा दोसर बूढ जकर एकटा आँखि खुजल छलै आ दोसरपर हरियरका पट्टी छलै, आ तकर पाछाँ एकटा दोसर बूढ़ जकर गरमे कालर माने स्पांडिलाइटिसक पट्टा छलै। तेसर गलीसँ सेहो एकटा बूढ़ आबि रहल छल, पार्कक गेटक दिस आस्ते-आस्ते। हुनकर एकटा हाथमे बोतल छल आ ट्यूब लुंगीक भीतर। सूर्य जना-जना ऊपर उठल जाइ छल, ओना-ओना सभटा कोनासँ खराम खटखटबैत आबैबला एहन बूढ़क संख्या बढ़ैत जाइत छल। रघुनाथकेँ लागल जे ई बूढ़ नै अछि- जिनगीक भूख अछि, जीवनक प्यास अछि, स्वयं जीवन अछि- जे ठोपे-ठोपे एकटा खधाइमे जमा भऽ रहल अछि ओहिना जेना कोनो पहाड़ीक कतेक रास दरारिसँ पानिक एकटा डरीड़ चलैत अछि आ कोनो आन स्रोतसँ मिलिकऽ कहियो नै सूखैबला, मील धरि फूही उड़ाबै बला, शोर मचाबै बला अजस्र धार बनि जाइत अछि। जीवनक झरना सभ भोर रघुनाथकेँ अपना दिस खीचैत अछि- रग्घू, आबू, सुनू, भीजू। मुदा रघुनाथ फुहीमे भीजैसँ बराबर बचैत अछि। किए बचैत अछि रघुनाथ- ओकरा ओ बुझि नै सकल छल। जखन सभ बूढ़ अप्पन मुत्युक विरोधमे बड़ मन आ जतनसँ बाबा रामदेव बनैत अछि, रघुनाथ मूड़ी निहुरेने चुपचाप पार्कसँ बहरा जाइत अछि। हुनकर पसीनक ठाम ई नै, नहरि छल। अशोक विहारसँ डेढ़ किलोमीटर दूर। नहरक पार ओकरासँ सटल बगेचा छल आ तकर आगू संजय कॉलोनी। ई कहियो घनगर छल, जइमे छल-धातरीम, बेल आ लतामक गाछ। रघुनाथ नहरक पुलपर ताधरि बैसल रहैत छल जाधरि रौद सहि सकै जोग रहै छल ओकर गाछीमे। ऐ पुलपर हुनकर भेँट भेल छल एल. एन. बापटसँ। बापट बनारसक महाराष्ट्रीयन छल। एतऽ पढ़लक लिखलक, एतैसँ नोकरी शुरू केलक आ जौनपुरसँ डिप्टी जेलर भऽ रिटायर भेल। बड़ मस्तमौला आदमी छल- पुरना फिल्मी गानाक शौकीन। हुनकर दूटा शौक छल- पीअब आ गीत गायब। गाबै तखने टा छल जखन पीबै लेल बैसै छल। हुनका कोनो संतान नै छलन्हि- नहिये बेटा, नहिये बेटी। स्त्री छल जकरा सभ बुढ़िया कहै जाइ छल। ओ संजयनगरमे एकटा छोट सन फ्लैट लेने छल आ जइमे कहियो-कहियो जबर्दस्ती रघुनाथकेँ लऽ जाइ छल। आ जखैन लऽ जाइ छल, किताबी कीड़ा ऐ मास्टरकेँ गरियाबैत कनी टा चिखा दै छल। सूर्य हुनकर शत्रु छल। ओ निअमसँ पाँच बजे साँझ कऽ पुलापर आबि जाइ छल आ हुनका गारि देब शुरू करैत छल- रघुनाथ, कनी देखू साढ़केँ। जानि-बूझि कऽ अबेर कऽ रहल अछि। ओ साँझ हैक संग बेचैन हुअए लागैत छल आ घर दिस एना भागैत छल जेना पुलिसक चांगुरसँ छुटैत चोर। हफ्तासँ ऊपर भऽ गेल छल जखन बापट रघुनाथसँ भेंट नै केने छल- नहिये पुलपर, नहिये ओइ गाछीमे। ओ सभ दिन जाइ छल आ घुरि आबै छल। ओ ओइ दिन जल्दी घुरि आएल छल किएकि गुमार बड़ छल आ पानि बरसैक आस छल। कालोनीक मुहथरिपर मकान छल मन्ना सरदारक। बिन पलस्तरक, ईंटाक। पैघ दरबज्जा, जइमे एक दिस नम्हर सन खटाल, ओतऽ बान्हल चारिटा महीस, तीनटा गाए। एतऽ भोर आ साँझ दूधक बर्तनक क्यू लगाबै छल बूढ़। ई कारोबार मन्ना सरदारक नैत देखै छल, हुनकासँ एकर कोनो मतलब नै छल। कहैत अछि जे ई कालोनी हुनकर जमीनपर बसल अछि। पचहत्तर-अस्सी बरखक मन्ना सरदार अप्पन जमानाक पहलमान। कारि, मोट, गस्सल शरीर। पेट कनी निकलल। आइयो लाल लंगोट आ छीटबला गमछामे उघार देह रहैत अछि आ निअमसँ पच्छिम मुँह कऽ कए पचास डंड-बैसकी करैत अछि। हुनका बस एक्केटा शौक अछि आ एक्के टा रोग। शौक अपन हाथसँ भांग घोटब, गोला जमाएब, ऊपरसँ मलाइ-रबड़ी खाएब आ रोग- गठिया। हुनकासँ डॉक्टर बाजल छल जे जौं चाहै छी गठिया ठीक हुअए तँ भांग छोड़ि दिअ। ओ जवाब देने छल- औ डॉक्टर साहेब, अहाँ कहब तँ दुनिया छोड़ि देब, बाकी भांग नै। ओ जवानी धरि शहर जाइ छल आ जे कियो पकड़िमे आबि जाइ छल ओकरा ओइ दिनक खिस्सा सुनाबै छल। रघुनाथ हुनकर पहुँचिमे आबि गेल छल ओइ दिन। ओ जहिना मुड़ल, तहिना सरदार पुछलक- जै रामजी मास्टर साहेब। कुम्हर कऽ रहै बला छी अहाँ। की बतौने छलौं ओइ दिन। -धानापुर साइडक। -अरे, अहाँ बतैलिऐ किए नै, ओइ साइडक तँ गुरु छल। -गुरु के? -छक्कन गुरु। अहाँ केना नै हुनका चिन्है छी? ई तँ आश्चर्यक गप अछि। आबू, बैसू तँ। पानि नै बरसत, चिन्ता नै करू। देखू पुरबा शुरू भऽ गेल अछि। पीताम्बरी आ खड़ाम- बस यएह धुआ-धजा छल हुनकर, चाहे जतऽ रहए। की नम्हर छलथि, की छुरी सन देह। परबा पोसने छल ओ। बस एकटा परबा- सेहो सोन सन। ओ अप्पन हाथसँ किसमिस, बदाम, छोहाड़ा खुआबै छल। एक बेर ओ गाएब भेल छल, हफ्ता भरि लेल। गुरु चिंतित। साढ़ बिना बतेले कतऽ चलि गेल। आठम दिन घुरल तँ लोल एकदम लाल। हाँफि रहल छल। गुरु बाजल- सूर्य देवताकेँ ठोर मारि कऽ आएल अछि, जीह आ लोल जरि रहल अछि ओकर, लखाह नै दैत अछि। पहिने पानि पिआ। तँ एहन छल गुरु। एक बेर साँझ कऽ भांग घोटि कऽ ओइ पार गेल, साफा पानि देलक, चंदनक तिलकपर ठोप लगैलक, गट्टापर गजरा लपेटलक आ दालिक मंडी दालमंडीमे पैसल। मुन्नी बाइ अप्पन घरसँ देखि रहल छल जे गुरु आबि रहल अछि। जहिना गुरु ओकर कोठा लग पहुँचल ओ अपनाकेँ सम्हारि नै सकल। वाह रे गुरु। गुरु ओकरा अपन कन्हा आ कोहनीक बीचक ठामपर रोकि लेलक। गुरु बाजल- मुन्नी, आइ ऐपर मुजरा होइतए मुदा ऐ गलीमे नै, चौकपर। असगरे हम टा नै, सगर नग्र देखत। आ गुरु ओकरा ठीके चौकपर आनि लेलक। आ फेर जे मुजरा भेल से नै पूछू तँ सएह नीक। आ अहाँकेँ पते नै जे गुरु के छल? जखन ओ उठल तँ अकास साफ भऽ गेल छल आ जतऽ–ततऽ छिरिआएल तारा लखाह पड़ि रहल छल। 6 रघुनाथ जखैन साँझमे घूमै, टहलै लऽ या मिलै-जुलैलऽ बाहर जाइ छल, तँ कोशिश करै छल जे नौ बजे धरि घुरि आबए। रातिक खाना ओ सदिखन सोनल संग खाइ छल। ई सोनलक जिद छल। दुपहरियाकऽ एना तखने संभव भऽ सकै छल जहिया ओकर छुट्टी रहए। नै तँ दाइ खाना पका कऽ चलि जाइ छलि आ ओ अपनेसँ खाना निकालि कऽ खा लै छल। नाश्ता हिनकर अलग छल आ सोनलक अलग। हिनका अँखुआएल बदाम आ दूधसँ खाली मतलब छल। शीलाक गलतीसँ ओ बड़ रास गप सिखने छल। ओ अप्पन हिसाबसँ हुनका नै चलबै छल, हुनकर हिसाबसँ ओ अपने चलैत छल। हुनका ससुर बनैक बदला बाप बनि कऽ चलब बेसी सुविधाजनक लागै छल। आ तामसक कोनो गप नै हुऐलऽ दियौ आ हेबो करए तँ बर्दास्त कऽ लिअ आ टारि दियौ। दुनू साँझक खेनाइ आ सुतबासँ मतलब छल- बाकी अहाँ जानू, अहाँक काज जानए। खर्ची गामसँ, तर-तरकारी पेंशनसँ। आ पेंशन एतबे भेट जाइ छल जे अपनेटा नै, दोसरोक छोट-मोट जरूरत पूरा भऽ जाए। बेटा पुतोहुक संग जीयैक यएह तरीका हेबाक चाही जे सभकेँ एक-दोसराक दोस्त बना देले छल। भऽ सकैए जे एकर पाछाँ कत्तौ ने कत्तौ हुनकर अप्पन असगरुआ प्रवृत्ति हुअए बा हुनकर अकछाएब। जखन सोनलक आग्रहपर पहिल बेर सरला आएल छल अशोक विहार तँ ओ सोनलक दीदीक संग ननदि सेहो छल। विदा करै काल ओ सोनाक चेन आ अउँठी संग दूटा साड़ी हुनका लेल आ दूटा मम्मी लेल देने छल। तकरा बादो सरला कतेक बेर आएल आ सभ घड़ी सोनल जे कऽ सकै छल, करैत रहल- माने घरक जे चीज सरलाकेँ पसिन्न आबै ओ सरलाक। ई कहियो नै सोचने छल जे सरला पैघ अछि- दैक कर्तव्य ओकर छै। शीलाकेँ सेहो अप्पन गलतीक अनुभव भऽ गेल छलै जे ओ अप्पन पुतोहुकेँ बुझैयेमे गलती केने छल। एतबे टा नै, सोनल अपना दिससँ बाप आ बेटा- रघुनाथ आ धनंजय- क बीचक दूरी सेहो कम करैक कोशिश केलक। ई अलग गप अछि जे दूरी घटैक बदला बढ़ैत गेल- मुदा ऐमे ओकर दोष कतऽ छल। ओ धनंजयकेँ फोन कऽ कहलक जे भैया, अहाँ तँ जुलुम करै छी। अमेरिकासँ पैसा मंगाबैक होइ छल तँ की-की नै बाजै छलौं। कतेक रास गप करै छलौं जे ई जरूरत अछि, ऊ जरूरत अछि। आ एतऽ एतेक दिनसँ हम आएल छी आ एक बेर देखैले नै एलौं जे भौजी कोना अछि। पापाकेँ सेहो ठीकसँ नै मालूम अछि जे अहाँ एम.बी.ए. केलौं कि नै आ कऽ लेलौं तँ आब की कऽ रहल छी। अहाँक बियाह लेल लोक आबि रहल अछि। पापा मम्मी परेशान अछि। की चाहै छी, बताउ तँ? एक दू दिनक लेले सही, आबि तँ जाउ। ऐ फोनक नतीजा छल जे ओ आएल मुदा रूकल घरमे नै, डायमंड होटलमे। तइसँ जे ओ असगरे नै छल, संगमे एकटा महिला छल अप्पन टिटहरबीक संग। सोनल हुनका सभकेँ रातिमे खेनाइक नोत देने छल। जखन रघुनाथकेँ ई खबर भेटल छल तँ ओ उठल आ चुप्पे पहाड़पुर चलि गेल। धनंजयकेँ आबैमे कनी देर भऽ गेल छल। ओ टैक्सीसँ आएल छल। संगमे आबैवाली स्त्री नै, लड़की छल- के. विजया। सोनलक उमेर की छल। नाकमे हीराक चमकैत कील, कानमे झूलैत रिंग, जूड़ामे बेलक फूल। एकदम दक्षिण भारतीय मुदा गोर आ सुन्नर। गपसँ पता चलल जे ओ दक्खिन दिल्लीमे कोनो कारपोरेट कंपनीमे नोकरी करैत अछि। ओइ कंपनीमे ओकर पति सेहो काज करैत छल, पहिनेसँ। ओकरासँ नीक पद आ वेतन छल। ओ बिन-बियाहल छल। दुनू बियाह केलक आ नोएडामे डूप्लेक्स फ्लैट लेने छल। बच्चीक पैदा हैक किछु दिन बाद एकटा सड़क दुर्घटनामे हुनकर मृत्यु भऽ गेल छल। घर, गाड़ी, नोकरी, बचिया, सभ किछु मुदा छल बेसहारा। भावनात्मक रूपसँ टूटि चुकल छल ओ। एनामे धनंजयसँ भेंट भेल छलै। बच्चीक नाम रत्ना डी. छल। ओ धनंजयकेँ पापा कहैत छल। सोनल सुनि कऽ असमंजसमे पड़ल रहल, किछु काल धरि। फेर एतबे बाजल- अहाँ सभकेँ सोझे घर एबाक चाही। धनंजय बहन्ना केलक जे विजयकेँ समए नै छलै। ओकरा बाबा विश्वनाथक दर्शन करैक छल, गंगा नहाबैक छलै, घाट देखबाक छलै, सारनाथ जेबाक छलै- समए कतऽ अछि। जइ काल अमेरिकाक अलबम देखै-देखाबैक कार्यक्रम चलि रहल छल, ओइ काल डिनरक तैयारीक बहन्ने सोनल किचेनमे आएल आ सहायता लेल धनंजयकेँ बजेलक। -राजू, एतेक पैघ गप। ने अहाँ पापाकेँ बतेलिऐ, ने मम्मीकेँ आ नहिये हमरा। ई की देखि रहल छी? -कोन गप? -ऐँ, यएह जे अहाँ बियाह कऽ लेलौं आ ककरो खबरि धरि नै देलौं। -के बाजल जे हम बियाह कऽ लेलौं। सोनल आश्चर्यसँ धनंजय दिस ताकलक- अहाँ दुनू एक्के छतक नीचाँ रहि रहल छी नै जानि कहियासँ, आ बच्ची पापा कहि रहल छी अहाँकेँ आ बियाह सेहो नै? मामिला की अछि? धनंजय मुस्किएलक- भौजी, मामिला किछु नै अछि। गप एतबे टा अछि जे ओकरा हमर जरूरत अछि आ हमरा ओकर- जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -की ओकरा ऐ गपक आभास अछि जे ओ ओकरा संग ताधरि अछि जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -ई हम नै जानैत छी। -अहाँ ओकरा संग रहि रहल छी, ओकर खा रहल छी, पी रहल छी, पहीर रहल छी, ओकर गाड़़ी आ पेट्रोलसँ घूमि रहल छी, ओकर बचिया अहाँकेँ पापा मानैत अछि, अहाँक भरोसे घर आ बच्चीकेँ छोड़ि़ नोकरी करैत अछि। अहाँ ओकर संबंधी बा नोकर सेहो नै छी- फेर कोन संबंध अछि अहाँ आ ओकर बीच। अपरतीब भऽ धनंजय बाजल- भौजी, छोड़ियौ ई सभ। चलू खाइ छी। -ऐँ, एना कोना छोड़ि देब। अहाँ ओकरा धोखा दऽ रहल छी आ बेवकूफ बना रहल छी। आकि फेर हमरासँ झूठि बाजि रहल छी बा नुका रहल छी। -दिल्लीक लड़कीकेँ नै जानै छी अहाँ। भऽ सकैत अछि, काल्हि बच्ची स्कूल जाए लागए तँ कान पकड़ि कऽ बाहर कऽ दिअए। -एकदम कऽ देबाक चाही, अहाँक चालि देखि कऽ। सोनल ओकर टोह लैत पुछलक- एकटा गप कहू, अहाँक नजरि ओकर घर-घरारी आ सुख-सुविधा पर तँ नै अछि? -अच्छा, रहऽ दियौ। अहूँ हद करै छी। -हम ऐ द्वारे कहि रहल छी, जौं हुअए, अहाँकेँ कऽ लेबाक चाही। सुन्दर अछि, बुझनुक अछि, जॉबमे अछि, अहाँकेँ जॉब नै भेटए तखनो कोनो हर्ज नै। हम संग छी अहाँक। बुझलौं। चलू आब। सोनल विजयकेँ आवाज देलक। सभटा किचेनसँ कटोरी, प्लेट आ थाड़ी डाइनिंग रूममे लऽ गेल, एक-एक कऽ कए। सोनल रत्ना डी. केँ कोरामे बैसेलक, खैलक आ खुअएलक आ साढ़े एगारह बजे विदा केलक। विदा होइसँ पहिने धनंजय भौजीकेँ असगरे लऽ गेल। -भौजी, की ई सत्य अछि जे भैया ओतऽ बियाह केले अछि? सोनल ओकर मुँह देखऽ लागल। -आरती कऽ कए कोनो छौड़ी अछि की ओतऽ? सोनल बिना हुनका सभकेँ विदा केने घर भागि गेल। 7 रघुनाथ गामसँ घुरल मुदा स्वार्थी आ कृतघ्न बेटाक जाइक बाद। ई हुनकर विचार छल, अप्पन छोट बेटा धनंजयकेँ लऽ कऽ। ओकरा पता छलै जे ऐ नगरक अशोक विहारमे ओकर भौजीक संग बाप सेहो रहैत अछि, मुदा ठहरल होटलमे। मानलिऐ जे औरत संग छलै- काशी दर्शन लेल आएल छल जे ई लड़काक घर अछि, आसान हएत। करबाक ई चाही जे हुनका होटलमे ठहरा कऽ अहाँ अप्पन घर आबि जैतिऐ, एतऽ रुकतिऐ मुदा नै। रघुनाथ नाराज हुअए, हुनका दुख सेहो भेल। ई गप ओ पुतोहुसँ नै कहि सकैत छल। दोसर गप छल बापक ईगो। देखऽ चाहै छल जे जे बेटा दिल्लीसँ बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेँट करै लेल बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेंट करै लेल बनारससँ डेढ़ दू घंटा दूर पहाड़पुर आबि सकैत अछि बा नै। शिकाइत तँ हुनका अप्पन बड़ बेटा संजयसँ सेहो छल मुदा परदेसक दूरी आ ओकर असगरे पड़ि जाइक कल्पना हुनकर कड़ापनकेँ कम कऽ कए राखने छल। ओ एहन देशमे छल जतऽ माँ नै, बाप नै, स्त्री नै। ओकर ओतऽ की हालत होइत हेतै, एनामे जखन ओकरा लेल हुक उठैत छल। ओ बिसुरल नै छल जे अप्पन बियाह करबाक बादो ओ अप्पन पिताक जरूरतक ध्यान राखलक। एतबे टा नै, ओ जे डी-१ अशोक विहारमे एत्ते दिनसँ निस्फिकिर अछि आ खाट तोड़ि रहल अछि- ओकरे चलते। हुनका ओकर एक आ एकमात्र इच्छाक जानकारी अछि- एक तरहे पिताक अंतिम इच्छा जे ओ अप्पन अन्तिम साँस पहाड़पुरमे बनल नव घरमे छोड़ए। ओ गामक पी.सी.ओ. सँ शुरूमे दू-चारि फोन कऽ मोन सेहो पाड़ने छल जे किछु भेजू, जतबे बनि सकए ओतबिये टा, कमसँ कम ढाँचा तँ अपना रहिते ठाढ़ कऽ दैतिऐ। ओ शुरूमे उत्साह देखेबो केलक मुदा आखिरीमे ओ खौंझा कऽ कहलक जे टका किए बरबाद करैपर लागल छी, ओकर सदुपयोग करबा लेल सोचू। एकर बादसँ रघुनाथ रूसि गेल छल। नहिये ओ फेर फोन केलक, नहिये ओ गप्पे केलक। सोनल जरूर गप करैत छल-कंप्यूटरक आगू बैसि कऽ, कानमे ईयर फोन लगा कऽ। मासमे कहियो एक बेर, कहियो दू बेर। रघुनाथसँ कहैत छल जे पापा, आबि जैतिऐ। अहाँ गप कऽ लियौ। मुदा संजय नै कहैत छल तेँ सोनलकेँ कहै आ चाहैसँ की। ऐ तरहेँ हुनकर रूसब चलैत रहल- वएह बापक ईगो। एतबै जरूर छल जे जखन कखनो फोन आबैत छल, ओ अपनाकेँ बजाबैक इंतजार करैत छल, जे कहियो नै भेल। संजय एक बेर बाजि गेल- अनचोक्के। तखन ओकर भाइ ओकरा संग छल। ओ राँचीमे पढ़ि रहल छल ओइ काल। रघुनाथ मास्टर- आदमी कोनो प्रसंगमे कृतज्ञताक मतलब बुझि रहल छल जे कियो अहाँ लेल कनियो टा किछु करैत अछि तँ ओकरा बिसुरी नै, मोन राखू आ मौका भेटए तँ जे किछु कऽ सकैत छी, करू। ऐ जन्ममे उऋण भऽ जाउ। एकरासँ पैघ सुख दोसर नै। जखन रघुनाथ चुप भऽ गेल तँ संजय बाजल- पापा, एकर मतलब तँ अहाँ जतऽ रहू, ओतै ठाढ़ रहू। बेर-बेर घुरि कऽ देखब तँ आगू कहिया बढ़ब। अहाँ कृतज्ञ हइ लेल कहि रहल छी आकि पएरमे बेड़ी पहिरै लेल। ई गप ऐल-गेल मुदा रघुनाथक दिमागसँ गेल नै छल। रघुनाथ सेहो चाहै छल जे बेटा आगू बढ़ए। ओ खेत आ मकान नै अछि जे अप्पन ठाम नै छोड़ए। मुदा ईहो चाहै छल जे एहनो मौका आबए जखन सभ कियो एक संग हुअए, एक ठाम हुअए। अपनामे हँसैए, गाबैए, लड़ैए, झगड़ा करैए, हा-हा खी-खी करैए, खाइए पिबैए, घरक सुन-सन्नाटा टूटैए। मुदा कतेक बरख भऽ रहल अछि- कियो कत्तौ अछि, कियो कत्तौ। आ बेटा आगू बढ़ैत एत्ते आगू बढ़ि गेल छल जे ओतऽ सँ पाछाँ देखए तँ नहिये बाप नजरि आबै नहिये माँ। कखनो कखनो हुनका लागै छल जे ओ बापट जना बिनु सन्तान हेतिऐ तँ बेसी नीक होइतए। ओ सेहो हुनके सन दारू छानि कऽ गओतिऐ आ मस्त  रहतिऐ। गामसँ घुरलाक बाद ओ अप्पन पुतोहुसँ घनंजयकेँ लऽ कऽ किछु नै पुछलक। पुतोहु अपने उदास आ बेमार लागि रहल छल। ई सोचि कऽ जे औरतकेँ बहुत रास एहन बीमारी होइत अछि जइ लऽ कऽ पूछब ठीक नै। ओ चुप्पा लगा गेल। हुनकर बीच गप होइत छल रातिमे, खेनाइक टेबलपर। रघुनाथ गामक सोचमे जीयैत रहैत छल, ओ वएह गप करैत छल, पुतोहुक विश्वविद्यालयक, अप्पन विभागक, लड़का-लड़कीक, प्रशासनक। हुनका अनमुनाह सन देखि कऽ रघुनाथ शुरू केलक, पहाड़पुरमे हइबला ग्रामसभा चुनाव कऽ लऽ कऽ- बुझू, एहन कालपर गेल छी जखन चुनावक माहौल छै। पहाड़पुरक ग्रामसभा अछि आरक्षित कोटाक। लड़ैत अछि दलित आ निर्णायक होइत अछि ठाकुर वोट, जकर संख्या अछि साठि। ई साठि वोट जकरा चाहे सभापति बना दिअए आ जकरा चाहे प्रधान बना दिअए। ठाढ़ अछि सोमारू राम आ मगरू राम- हम जइ दिन पहुँचलौं, ओइ दिन साँझकेँ ठाकुरक सभक बैठकी छल बब्बन काका कतय। तय भेल जे यएह मौका अछि जखन ओ पकड़िमे आएल आ यएह मौका अछि बदला लेबाक। जेतबा ऐंठैक अछि, ऐंठ लिअ, नै तँ फेर हाथ नै आबएबला। विचार भेल जे दुनिया आ देश एक्कैसम शताब्दीमे चलि गेल अछि आ पहाड़पुरमे मंदिर नै, जल चढ़ाबै लेल खाली महादेव स्थान अछि। कहल जाए तँ जे एक लाख देत, वोट ओकरे देल जाएत। जौं एकरा लेल दुनू तैयार भऽ जाए, तखन? कियो बीचेमे टोकलक। ऐपर दू टा विचार आगू आएल। एक ग्रुपक कहब छल जे एहन हालतमे बोली बढ़ाबैत रहू। एक कऽ डेढ़, डेढ़ कऽ दू- एना। जे बेसी दिअए, वोट ओकरे देल जाए। दोसर ग्रुपक कहब छल जे नै, ई मोल भाव अछि, नीलामी सन चीज अछि, अप्पन जबानसँ पलटब अप्पन प्रतिष्ठाक आ मर्यादाक अनुकूल नै अछि। दुनूसँ एक-एक लाख लऽ लेल जाए आ वोट आध-आध बाँटि लेल जाए। तीस एक कऽ, तीस दोसर कऽ। बताएल दुनूकेँ नै जाए। ओ मानि कऽ चलए जे साठियो हमरे जा रहल अछि। नव पीढ़ी ऐ दुनूसँ असहमत छल। हुनकर कहब छल जे अहाँ सभ अप्पन मंदिर आ महादेवकेँ लऽ कऽ चाटू, हमरा हमर दारू आ मुर्गा चाही। रघुनाथकेँ ई सभ सुनाबैत मजा आबि रहल छलै मुदा ओ देखि रहल छल जे सोनल नहिये सुनि रहल छल आ नहिये रस लऽ रहल छल। हुनकर मन कत्तौ आन ठाम छल। खाना खाइ लेलाक बाद जखन ओ हाथ धोइले आएल तँ देखलक जे सोनल अप्पन बिछौनपर चितांग पड़ल छल आ कानि रहल छल। रघुनाथ हुनकर कोठलीमे ठाढ़ भऽ कऽ किछु काल धरि बुझाबैक कोशिश करैत रहल- बेटा सोनल, की गप अछि? सोनल आर कानऽ लागल। -बेटा, बाज तँ की गप अछि। रघुनाथ अपनाकेँ सम्हारैत पुछलक। -संजय दोसर बियाह कऽ लेलक। सोनल हिचकीक संग बाजल- हम काल्हि फोनपर गप केलौं। तखन बाजल- कमसँ कम हमरासँ पूछि तँ लैतिऐ। 8 भ्रम आ भरोस- यएह अछि जिनगीक स्रोत। ऐ स्रोतसँ फूटैत अछि जिनगी आ फेर बहैत निकलैत अछि- निर्मल-कलकल। कखनो-कखनो लागैत छल जे ई अलग-अलग चीज होइत अछि। स्रोत एक्के होइत अछि-ओकरा भ्रम कहू आकि भरोस। ई नै हुअए तँ जीअब सेहो नै हुअए। यएह स्रोत रघुनाथक जिनगी छल। जखन अमेरिकासँ घुरलाक बाद सोनल बाजल छल जे पापा, हमरा लागि रहल अछि जे संजय ओतऽ बसि जाए चाहैत अछि। इंडिया आएत जरूर मुदा रहै लेल नै, विजिट करै लेल। तँ रघुनाथ हुनकापर व्यंग्यसँ मुस्की देने छल- कतेक जानै छी संजयकेँ। बाप एतऽ, माँ एतऽ, भाए एतऽ, बहिन एतऽ। आर तँ आर स्त्री सेहो एतऽ। ओ कहलक किछु नै, खाली मुस्की देने छल जे ओ अप्पन बापक दीनता आ दरिद्रता देखने अछि। ओ दुखी आ परेशान भऽ कऽ कहियो-कहियो बाजै छल जे चिंता नै करू, एतबे कमाएब-एतबे कमाएब जे घरमे राखैक जगह नै हएत। मुदा कमाबैक ई रहस्य नहिये ओ बुझि सकल आ नहिये सक्सेना। आइ हुनका लागै छल जे ओ सोनलसँ बियाह सोनल लेल नै, अमेरिका जाइ लेल केने छल। रघुनाथ, तँ जिनगी अहाँकेँ जे जियैक छल, ओ जी चुकलौं। आब अहाँ अप्पन बेइज्जती लेल जीबि रहल छी। ई कियो नै कहि रहल छल मुदा हुनकर कान सुनि रहल छल आ ई मूक स्वर हुनकर हृदए धरि पहुँचि रहल छल। ओइ साँझ ओ भोजन केलाक बाद घरक पछुआरमे अप्पन डेरा नै गेल। ड्राइंग रूममे बैसल रहि गेल। ओ पूरा राति ओहिना काटि देलक- बैसल-बैसल। नीन नै एलै। तरह-तरहक आशंका आबि-जा रहल छलै जइमे सभसँ प्रबल छल जे कत्तौ ई लड़की आवेशमे आबि कऽ किछु कऽ नै लिअए। ई कहैक जरूरत नै आ एकरामे दू राय नै जे ऐ समाचारसँ हुनका एक तरहे खाली सुख भेटल छल जे ओकरासँ बियाह करैक पहिने की ओ हमरासँ पुछने छल। अहाँक बाप तँ गप करबाक जरूरतो नै बुझलक। एतऽ धरि जे नोत सेहो ऊपर मोने देने छल। आब बुझू। जे केलौं तकर दंड भेटल। आब कानि किए रहल छी। हम आकि कियो आन की करत। मुदा ई सुख कनी काल धरिक छल। एना सोचब ओकर निष्ठुरता आ अमानवीयता हेतिऐ। ओइ हालतमे तँ आरो जखन ओ अप्पन व्यवहारसँ हुनकर हृदए जीत लेने छल। एहन विचार अपनामे निचताइ अछि। एहन कालमे सहृदएता आ प्रेम चाही। बिजली ड्राइंग रूम सेहो जरि रहल छल आ सोनलक कमरा सेहो। रघुनाथकेँ कनियो टा आहटि भेटै तँ आस्तेसँ जाइ छल आ ओकर कोठलीमे हुलकी दै छल जे सभ किछु ठीक-ठाक तँ अछि। रातिक डेढ़-दू बजेक आसपास सोनल हँसैत ड्राइंग रूममे आएल- पापा, आत्महत्या नै करब, निश्चिंत रहू। जाउ, सुति जाउ। मम्मीक कोठलीमे बा डेरामे। रघुनाथ लजा गेलथि। हम ऐ डरसँ थोड़े बैसल छी भाइ। हमरा नीन नै आबि रहल अछि। सोनलक ध्यान ड्राइंग रूमक ओइ पैघ फोटोपर गेल जे ओकर बियाहक छल। शाइत रिसेप्शनक छल। संजय-सोनल दूटा ऊँच मखमलक फूलसँ सजल कुर्सीपर बैसल छल आ दुनूक माथपर हाथ राखने सक्सेना साहेब पाछाँ ठाढ़ छल। -पापा एकटा प्रार्थना अहाँसँ। -कहू। -ई गप घरमे रहए। अहाँ, मम्मी आ सरला दीदीक बीच। हमर पापाकेँ नै पता चलए। -किए? -ओ बर्दाश्त नै कऽ सकथिन। दू बेर अटैक भऽ चुकल छन्हि। रघुनाथ किछु कहऽ चाहैत छल मुदा चुप भऽ गेल। ओ सोनलकेँ बाजऽ दै चाहै छल जइसँ जे ओकर मनमे अछि, निकालि कऽ हल्लुक भऽ जाए। ई नीक अछि जे ओ खाली सुनए। -पापा हम चाही तँ हुनका कोर्टमे नमाड़ि सकै छी, पेमाल होइत रहता। हम भागि कऽ नै आएल छी, हुनक छोड़ि कऽ नै आएल छी। आएल छी लियौन भऽ कऽ। हमही टा नै, ओ सेहो चाहैत रहथिन जे हम हाउस वाइफ बनि कऽ नै रही। नोकरी करी आ सेहो अप्पन देशमे। आर एतऽ एलाक बादो अहाँ मीठ-मीठ गप करैत रही। एक बेर नै बतौलखिन जे हुनकर मनमे की अछि? एहनो नै जे हमरा बजौलखिन नै आ हम आबऽ सँ मना कऽ देने होइ। -जुलुम अछि। सोनल बिख-सबिख होइत बाजल। -अहां की बुझै छी हमरा। ऐँ, अहाँ डायवोर्सक लेल पुछले तँ रहितिऐ हमरा, हँ कऽ दैतिऐ। अहाँ नै दैतिऐ, कहतिऐ तँ हम दऽ दैतिऐ। पुछबो टा नै केलक, इशारा सेहो नै केलक। बिना डाइवोर्स बियाह कऽ रहल छी। अपमानित कऽ कए। बिना कोनो गलतीक, कसूरक। आ निर्लज्जता ई अछि जे पुछलापर मुस्कुराबैत कहै छी जे हँ भाइ, कऽ लेलौं। करऽ पड़ल। मूर्ख बुझै छी हमरा। जेना हम अहाँकेँ जानिते नै छी। जेना हमरा अहाँक किरदानी नै बुझल अछि। हम तँ बाबू अहाँक खाट ठाढ़ कऽ दैतौं, मुदा की बताबी। लोक यएह बुझत जे हम ई सभ गुजार लेल कऽ रहल छी, जखैन कि हम थूक फेकै छी अहाँक कमाइपर। की समय भऽ रहल अछि पापा। चारि, साढ़े चारि। रूकू, अहाँकेँ चाह पियाबै छी। ओ उठल आ किचेनमे चलि गेल। ठंडी बेसी छल। रघुनाथ पएरकेँ सीरकमे लपेट कऽ सोफापर पड़ल छल। हुनका नीक लागि रहल छलनि जे सोनलक मूड बदलि गेल छै। मुदा ई नीक नै लागि रहल छलनि जे ओ हुनकासँ ओना गप करए जेना ओ संजय अछि। गलती हुनकर बेटा केने छल मुदा अपराधबोधसँ ग्रस्त ओ छल। ओ भीतरसँ डरल आ घबराएल छल। ओ कहै तँ ककरोसँ नै छल मुदा गाम हुनका लेल सुरक्षित नै रहि गेल छलनि। बेटा सभकेँ गाम गेना कतेक बरख भऽ गेल छल। हुनका कोनो सरोकार नै रहि गेल छलनि गामसँ। घरेनक लोक सनेहीकेँ ठीकसँ काज नै करऽ दै छल। तारीक पहिने बुक करलाक बादो जसवंत हुनकर खेत तखैन जोतै छल जखन सबहक जोताइ भऽ जाइ छल आ रोकलाक बादो हुनकर नाली बंद कऽ पानि पहिने अप्पन खेतमे लऽ जाइ छल लोक सभ। बाहरी लोक सभसँ झगड़ा मोल लऽ कऽ एक दिन टिकब मुश्किल छल। रघुनाथ अपने कहै छल- सभ बेर चुप भऽ जाउ, सहि लिअ, मुदा झंझटि नै करू। दियादक नजरि हुनकर खेतपर लागल रहैत छल- ई गप ककरोसँ नुकाएल नै अछि। गाम गेलापर हुनकर सम्मान सभ कियो करै छल मुदा ई सम्मान हुनका रहस्यपूर्ण लागैत छल। नरेश अप्पन घरक आगू हुनकर जमीनपर खुट्टा गाड़ि कऽ महींस बान्हब फेर शुरू कऽ देने छल। रघुनाथ देखियो कऽ अनठा कऽ चलि दै छल। के रोज-रोज किचकिच करए। ऐ बेर तँ सनेही जे सूचना देने छल, ओइसँ ओ आरो हदैस गेल रहथिन। एक दिन हुनकर गाम जाइसँ तीन दिन पहिलुका गप अछि जे मोटरसाइकिलसँ दूटा छौड़ा आएल छल हुनकर दरबज्जापर। पैंट-शर्टमे। ओ उतरल आ बरण्डापर पड़ल खाटपर पटा रहल। सनेहीकेँ बजौलक, पुछलक जे मास्टर साहबक यएह घर छिऐ? फेर पुछलक जे ओ कहिया-कहिया आबै छथिन। कतेक दिन रहै छथिन। कहिया जाइ छथिन। शहरमे कतऽ बसोबास छनि- तरह तरहक प्रश्न। जाइत-जाइत ईहो बाजल जे हुनकर दिमाग ठेकानमे तँ अछि आकि नै। सनेही बाजल जे ओ नीक छौड़ा सभ नै अछि। कोनो भरोस नै अछि एहन छौड़ा सबहक। जखन दिनोमे एतऽ आबि सकैत अछि तँ नग्र बनारस कते दूरे अछि। एकरासँ पहिने कहियो देखने नै छल ओकरा। जे चुपचाप पटायल छल ओकर शर्टक नीचाँ पेस्तौल बा रिवाल्वर जेहन चीज छल। सनेहीक रिपोर्टक असर ई भेल जे ओ झलफल होइते घरसँ बाहर निकलब बन्न कऽ देने छल। ओ कारण बुझैक कोशिश करै छल मुदा किछु बुझि नै सकल। शीले सन रघुनाथक सेहो अजीब स्थिति छल। ओ एतऽ रहितिऐ तँ गामक लेल चिंतित रहै छल, ओतुक्का गप करै छल आ घुरैक बहन्ना खोजैत रहै छल मुदा ऐबेर जेहन संकेत भेट रहल छलै से ओतऽ घुरैक सोचेमे डर लागै छलै। ऐबेर ओ तय कऽ लेने छल जे बेसी जरूरी हुअए तँ दोसर गप अछि, मुदा अशोक विहारक डेरा अछिये। ओ बनल रहए, हुनका आर किछु नै चाही। मुदा एतऽ? एतऽ संजय हुनका आगू दोसर समस्या ठाढ़ कऽ देने छल। आब ओ पूर्ण रूपसँ सोनलक मर्जीपर छल। ओ चाहे तँ रहऽ दिअए, चाहे तँ निकालि कऽ बाहर कऽ दिअए। भाइ, अहाँ ताधरि हमर ससुर छी जाधरि अहाँक बेटा हमर साँए छल। जखन ओ पति नै, तँ अहाँ ससुर केहन, कोन गपक? ई कोनो सराय आ धर्मशाला अछि नै जे पड़ल-पड़ल रोटी तोड़ि रहल छी, मुफ्तियाक। चलू एतऽसँ, अप्पन बाट नापू। हुनका नीक गप यएह लागि रहल छलनि जे ओ किछु कहए, ओइसँ पहिने ओ कहि दिअए, बेटी, बड्ड भऽ गेल, आब आज्ञा दिअ। (ई ओ बुझै छल जे ई कहैसँ लाभ हुनका भेटत। भऽ सकैए ओ पघिल जाए आ मना कऽ दिअए।) सोनल चाह लऽ कऽ आबि गेल- दूटा पैघ मगमे। एकटा मग हुनकर आगू राखैत बाजल-पापा, अहाँ एहन बेटा किए जनमेलौं। जे ओ नै देखै छल जे ओकरा लग छै, सदिखन उम्हरे देखैए, जे दोसराक लग छै- लेर चुअबैत। पता अछि, ओ आरती गुर्जरसँ बियाह केने अछि। रघुनाथ चाह सुड़कलक। ओ कोनो सोचमे डूमल छल। -ऐ दुआरे जे ओ असगर संतान अछि- करोड़पति एन.आर.आइ. व्यवसायीक। एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी आरती इंटरप्राइजेजक मालिकक। -बेटा, हम सभ ई नै सुनऽ चाहै छी। हम खाली एतबे चाहै छी जे अप्पन पापाकेँ जा कहियौ आ आब हमर छुट्टी करू। -की। की कहलौं अहाँ? कनी फेर तँ सुनी। सोनलक अबाज अनचोक्के ऊँच भऽ गेलै। रघुनाथ बिना ओकरा दिस ताकने चाह सुड़कैत रहल। सोनल हुनकर हाथसँ मग छीन लेलक। -एकदम्म नै। कान पकड़ू आ कहू जे एहन गप फेर नै करब। रघुनाथ असहाय आ निराश आँखिसँ हुनका ताकलक। ओ कानैत रघुनाथक कोरामे गुरकि गेल- पापा, संजय छोड़ि देलक, कोनो गप नै, अहाँ तँ हमरा नै छोड़ू। 9 रघुनाथ अप्पन जिनगीक समए नापैत छल, अप्पन पएरसँ, ओकर चालि आ तागतिसँ, फेफड़ासँ आबैत जाइत साँससँ। एक समए छल जखन ओ पंद्रह सोलह मील जाइ छल मामागाम। रौदमे। बिन थाकल, बिन कत्तौ बैसल- आ प्रसन्न रहै छल। फेर ई समए घटब शुरू भेल- आठ मील, फेर छऽ मील, फेर चारि मील, फेर एक मील। आ ओ आब डेरामे आबि कऽ घोकचि गेल छल। जौँ कत्तौ निकलबाक होइत अछि तँ आब दूटा पएर बेसी नै होइ छै, एकटा तेसर पएर सेहो लगाबऽ पड़ैत अछि आ ओ तेसर पएर छल- छड़ी। आब ओ तिपहिया मनुख छल। संतोष ई छलै जे हुनकर सन चौपाया मनुखसँ कॉलोनी भरल छल। जीयैक आस यएह छलै जे ओ असगरे नै अछि। हुनकर सन बड़ रास लोक अछि। कतेक लोक तँ हुनकोसँ खराप स्थितिमे अछि। जे हिस्सा ओ किरायापर देने अछि आ अपना रहै लेल एकमहला चुनने अछि, ओ ओतै अटकल रहैत अछि। कोनो तरहे बालकनीमे आबैत अछि आ ओतऽ बैसल-बैसल पूरा दिन लोककेँ आबैत-जाइत देखि कऽ अप्पन जीवित होइक अहसास करैत अछि। रघुनाथ कोनो तरहेँ पार्क आ नहर तक आबि जाइ छल, गाम नै जा सकै छल। एतऽसँ थ्री-व्हीलर बा टेम्पो लेब, बस अड्डा जाएब, बसमे धक्का-मुक्कीक बीच चारि घंटा बैसल रहब, नहरपर उतरब, फेर ओतऽसँ पाँव-पैदल डेढ़-दू किलोमीटर गाम जाएब मुश्किल भऽ जाइ छल। जोड़मे दर्द सेहो रहऽ लागल छल। मुदा जेना-जेना गाम जाएब कम होइत गेल, तेना-तेना ओतुक्का जमीन-जालक चिंता बढ़ल गेल। सोनल हुनका डेरासँ हटा कऽ घरक गेस्ट-रूममे राखि देने छल। ओ ठंडीसँ बचि गेल छल मुदा खिड़की लग बैस कऽ राति भरि अप्पन गाम आ खेतमे घुमैत रहैत छल आ सलाह दैत रहै छल। थाकि जाइ छल तँ बाकी समए ऐ सोचमे लगाबै छल जे सोनल हुनकर के अछि। ने पुतोहु, ने बेटी- की ओ ओकर घरमे बैसल अछि? जे हुनकर अछि, ओ नै जानि कतऽ–कतऽ अछि। हुनका तँ फिकिरे नै छनि। पूरा दियाद-बाद- जकर एक-एकटा पजेबा ओ जोड़ने छल- छिड़िया गेल छल। एतऽ धरि जे शीलाकेँ सेहो अप्पन बेटीक घर बैस कऽ बाढ़नि लगाएब आ खेनाइ बनाएब स्वीकार छल, मुदा पुतोहु कतऽ रहब स्वीकार नै। आ आब तँ पुतोहु सेहो कहाँ रहि गेल अछि। शीला या जकरा ककरो पता चलत, दस बात हुनके सुनाएत, उन्टे जे कोन सरोकारसँ ओतऽ छी अहाँ। ई हलदली एक भोर हुनका कॉलोनीक शर्मा पी.सी.ओ. धरि लऽ गेल। हुनका सर्दी-बोखार छलनि। कतेक दिनसँ बाहर नै निकलि रहल छल। सोनल नै निकलऽ दै छल। मुदा अप्पन दुनू बेटासँ फाइनल गप करैक उद्देश्यसँ ससरि आएल- चुपचाप। सभसँ पहिने संजयकेँ फोन केलक- यएह साढ़े आठ बजेक समए होइत अछि, जखन सोनल कंप्यूटरपर बैसै छल। -हलो, हम बनारससँ रघुनाथ। -संजय। अपना लग राखू ई चरण-स्पर्श। लाज आबैए अपनाकेँ अहाँक बाप कहैत हमरा। जे नीचता अहाँ देखेने छी अहाँ, ओइसँ हमरा गप नै करबाक चाही, मुदा... -अनर्गल गप बंद करू। -सुनू, हम अशक्त भऽ गेल छी। जिनगीक कोनो ठेकान नै, कखैन की हुअए। आब खेती नै हएत हमरासँ। या तँ आबि कऽ सम्हारू या बताउ की करी। गामक जमीन-जालक। संजय। धनंजयसँ तँ पुछबे करब, मुदा अहाँ पैघ छी। मालिक छी। अहाँ की कहै छी? संजय-०००० -नै, नै, हम वएह सभ करब जे अहाँ कहब। कहियौ तँ। विचार दिअ अपन। -संजय-०००० -हँ। तँ सभ बेचि दिऐ। ओइ पाइसँ एक-डेढ़ कोठलीक बनारसमे फ्लैट लऽ लिऐ। बाकी जमा कऽ दिऐ आ ओकर सूदसँ दुनू परानी जीबी-खाइ। -संजय-०००० -हँ, हँ। पेंशन तँ रहबे करत। मुदा सुनू, ई काज अप्पन माँ-बापक लेल अहीं करू। ई हमरासँ नै हएत। -संजय-०००० -ऐ दुआरे जे ई पाप अपना हाथसँ नै करब। ऐ दुआरे जे ओ पुरखा सबहक चीज छी, हुनकर धरोहर छी। दोसराक चीज बेचबाक अधिकार हमरा नै अछि। -संजय-०००० -नै, हम एकदम्मे भावुक नै छी। मुदा हमर खेत नै छी। एकरा हम जिन्स आकि माल मानै लेल तैयार नै छी। आ सुनू, अप्पन सलाह अपना लग राखू। साढ़। नमकहराम। ओ फोन राखि देलक। किछु काल धरि सोचैत रहल जे फोन करी आकि नै करी। आखिरमे लगा देलक नंबर। -हलो, धनंजय अछि की? -महिला स्वर-०००० -हम रघुनाथ। हुनकर पिता। -धनंजय-०००० -हलो राजू। अहाँ बनारस एलौं मुदा गाम नै एलौं। हम इंतजार करैत रहि गेलौं। -धनंजय-०००० मौका नै भेटल तँ नै भेटल। जाए दियौ। एहन अछि बेटा जे हम आब कोनो काजक लेल नै रहलौं। काज-धाज नै होइए। समस्या अछि खेतक। ओकर की करी? -धनंजय-०००० -नै, ओ तँ ठीक अछि मुदा सनेही कहिया धरि देखत। ओकरा लोक करैएले नै दैत अछि। ओकर सबहक आँखि लागल अछि अप्पन खेतपर। -धनंजय-०००० -तँ अखैन रूकि जाइ छी। मानि लिअ रूकि जाइ। मुदा ओकरासँ पहिने हम चलि जाइ तँ। संजय सेहो बाहर, अहूँ बाहर। फेर के? -धनंजय-०००० -ठीक अछि, बेच दै छी मुदा ओतबे पाइक किछु करए पड़त ने। की करी ओकर? -धनंजय-०००० -आध-आध बाँटि देब अहाँ दुनू भाइमे। फेर हमर आ अहाँक माँक की हएत? हम की खाएब? अच्छा सुनू, ई बताउ जे अहाँ की कऽ रहल छी आइ-काल्हि। -धनंजय-०००० -आइ धरि नै भेटल अछि नोकरी। कतेक दिन लागत अखन। अहीं किए नै आबि जाइ छी। मैनेजमेंटक ज्ञानक उपयोग खेतीक बिजनेसमे नै भऽ सकैत अछि? धनंजय फोन काटि देलक। -हरामखोर। रघुनाथ पी.सी.ओ.सँ बाहर आबि गेल। साढ़, डोनेशनसँ पढ़ब तँ पूछत के? ने काबिलती अछि नहिये पैरवी- चलल अछि मैनेजर बनै लऽ। ओ घर नै जा कऽ सोझे पार्क गेल आ लकड़ीक बैंचपर बैसि गेल। पार्कक बगलबला लेनमे घर छल पारसनाथ शर्माक आ तीन-चारिटा दाइ हुनकासँ झगड़ा कऽ रहल छल। हफ्तामे एक-दू बेर कालोनीक कोनो ने कोनो घरक आगू एहन सीन भऽ जाइ छल। किए होइ छल एहन सीन, एकरा सभ कियो जानै छल तइसँ महत्व नै दै छल। -छल ई जे सभ घरमे बांग्लादेशी दाइ छल। सोलह-सत्रहक उमेरसँ पैंतीस-चालीस सालक। बूढ़मे सँ ककरो ने ककरो बुढ़िया अप्पन बेटा-पुतोहु लग बाहर चलि जाइ छल किछु मासक लेल। रहै छल तँ राग-द्वेषसँ मुक्त भऽ आ बुढ़बाकेँ एतबे छूट देने। बूढ़मे शाइते कोनो बूढ़ छल जकरा अप्पन जवान हेबाक भ्रम नै हएत आ ओ समए-समएपर परीक्षण नै करऽ चाहैत जे हुनकामे किछु बचल अछि आकि नै। तृष्णाक मारल सभ बूढ़ प्रेम, दुलारक नामपर एहन छूट लऽ लै छल आ दाइ सभ सेहो साबुन, तेल, नेलपॉलिश, लिपिस्टिक बा पंद्रह-बीस टका बख्शीस पाबि संतोष कऽ लै छल। ओ हुनका कतऽ काज करैत सुरक्षित अनुभव करैत छल। समस्या ओतऽ ठाढ़ होइ छल जतऽ बूढ़ अप्पन दाइकेँ सेवाक मुताबिक बख्शीस दैमे ना-नुकुड़ करै छल। ई प्रणय कलह जेहन मामला होइत छल जइमे तेसराक दखल दैक जरूरत नै पड़ैत छल। (बेसी जानकारी लेल पत्रकार सुशील त्रिपाठीक स्टोरी पढ़ू- आखिर अशोक विहारक प्रवेश-द्वारपर मर्दाना कमजोरी आ सिसनोत्थानक समस्याक निवारणक जड़ी-बूटी वनौषधिसँ शर्तिया इलाजक पीअर तम्बू साल भरि किए तनल रहैत अछि।) ऐ कलह-कोलाहलसँ निरपेक्ष रघुनाथ बेंचपर धूप सेवन कऽ रहल छल तखने हुनका ताकैत पुरना मित्र जीवनाथ वर्मा पहुँचल। ओ हुनके संग रिटायर भेल छल आ रसायन शास्त्रक अध्यापक छल। नग्रमे बेटा-पुतोहुक संग साकेत विहारमे रहैत छल। कार्यकालक दिनमे किछु लोक हुनका पागल बुझै छल आ किछु जीनियस। चना-चबेनापर जीवित रहैवाली भारतक अस्सी प्रतिशत जनता हुनकर चिंताक विषय छल। ओ सेहो शौकीन छल भूजाक (भुजनाठीसँ भुजल चना, मटर, लाइ, चूड़ा, बालि) क। भारी मोश्किल छल सामान्य लोकक। कड़ाही जुटाउ, बालु आ नीमकक बंदोबस्त करू, चुल्हा जराउ, ओकर गरम होइक आ धधकैक इंतजार करू, तखन जा कऽ भुज्जा तैयार होइत अछि। एहन नै भऽ सकैत अछि जे ई सभ झंझटि नै पोसऽ पड़ए। कतेक रास बरखक चिंतन मननक बाद ओ एकटा प्रयोग केने छल। किएक तँ ई राष्ट्रीय स्तरक समस्या छल जकर समाधान खोजि कऽ निकालने छल तइसँ हुनकर हार्दिक इच्छा छल जे एकर उद्घाटन वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम करथि। मुदा झिटुकी लगेने छल रघुनाथे। ओ कहने छल जे प्रयोग अखन प्रक्रियामे अछि तइसँ आयोजन स्थानीय स्तरपर हुअए। बड़ खर्च केने छल वर्मा। घरक आगू तम्बू लगेलक, तीस अध्यापक लेल कुर्सी मंगबैले छल, कैटररसँ चालीसटा थारी मंगबैलक, माइक लगबैलक। सभ अध्यापकक थारीमे चारिटा चना राखलक आ प्रिंसिपल, जकरा उद्घाटन करबाक छलै, हुनकर थारीमे पाँचटा। थपड़ीक गड़गड़ाहटिक बीच प्रिंसिपल मुँहमे पाँचो दाना खसेलक आ दकड़ैत थुकड़ि देलक। माइकपर एक वाक्य बाजल- ई चना लोहाक अछि आ जहर अछि। सभ अध्यापक चिखने बिना प्लेट फेक देलक आ चलि गेल। हुनका मोताबिक वर्मा हुनकर अपमान केलक आ वर्माक मोताबिक ओ वर्माक। प्रयोग ओना तँ गोपनीय छल, ओकरा लऽ कऽ बताओल सेहो नै जा सकै छल मुदा रघुनाथकेँ जे जानकारी छलै से ई जे वर्मा झाड़ि पोछि कऽ जमीनपर एक किलो चना पसारलक, ओइपर स्पिरिट छिड़कलक,काठी जरैलक, धधरा उठल आ चना भुजा गेल। (खोंइचा जड़ि गेल, गुद्दा ओहिना काँचे रहि गेल।) यएह भुज्जा फेमबला वर्मा किछु काल हुनका देखैत रहल आ आस्तेसँ कहलक- रघुनाथ। रघुनाथ जखन माथ उठेलक तँ ओ लपकल-ऐँ। ई सत्ये अहीं छिऐ। भजार, की भऽ गेल अहाँकेँ। कल्ला बैसि गेल छै, गाल धँसि गेल छै, दाँत झड़ि गेल छै, आँखि भीतर चलि गेल छै- एना केना भऽ गेल। चिन्हैमे नै आबि रहल छी अहाँ। रघुनाथ हँसल, ठाढ़ भेल, हुनका बाँहिमे लेलक आ अपना संग बैसाबैत बाजल- कनी इम्हर। किछु नै भजार, गेल छलौं काल्हि पेंशन ऑफिस। जखन घुरऽ लगलौं तँ बड़ा बाबू पुछलक- रघुनाथ जिबिते अछि आकि गुजरि गेल। हम पुछलौं- एना केना बाजि रहल छी। ओ कहलक- फाइल बंद पड़ल अछि हुनकर। मइसँ पेंशन नै चढ़ल अछि। किए? ओ बाजल जे लाइव सर्टिफिकेट नै देने अछि। तँ हम यदि देखैये लेल एलौं जे मामिला की अछि? -बड़ नीक केलौं, ऐ बहन्ने अहाँसँ भेंट भऽ गेल। ओकरामे किछु करबाक तँ अछि नै। फारम भरि कऽ रजिस्ट्रारकेँ देबाक अछि। ओ दस टका लेत आ प्रमाणित कऽ देत। फेर बरख भरिक चिन्ता खत्म। रघुनाथ बड़ मिझाएल मोनसँ बाजल- जीवनाथ। हमरा चौअनिया जीवनमे कोनो रुचि नै अछि। वर्मा बड़ दुखी भऽ कऽ रघुनाथकेँ देखलक- भजार, की बात अछि। अहाँ एहन तँ नै रहिऐ। चलू घर। जाइक हुअए तँ साँझकेँ जाएब। रघुनाथ एकटा हाथमे लाठी आ दोसरमे वर्माक कन्हा धेने घुरल। 10 जीवनाथ वर्मा जाइत-जाइत एकटा नव आफत ठाढ़ कऽ कए गेल छल, ई कहैत जे अपना सबहक लेल बडु जीलौं रग्घू मुदा अपना लेल जीबू। यएह ओ गप छल जे कहियो हुनका अप्पन दिमागमे नै आएल। अपनासँ अलग सेहो किछु होइत अछि की? की बेटा अप्पन नै छल? बेटी अप्पन नै छल। स्त्री अप्पन नै छल। खेत-खलिहान अप्पन नै छल। ई जरूर अछि जे सभ कियो अपना लेल जीवन चाहै छल। ककरो ऐ गपक चिन्ता नै छलै जे ओ जी रहल अछि आकि मरि रहल अछि। ओकर अप्पन खगता सभसँ बेसी रहै छलै आ ओ नै चाहै छल जे कियो ओकरापर कोनो सवाल उठाबै। अहाँ ओकरा अप्पन बाट जाए दियौ आ जाए दइमे मदति करू तँ अहाँसँ नीक कियो नै। मुदा की हुनकर जिनगी रघुनाथक जिनगी छल। नै, हेबाक चाही छलै अप्पन अलगसँ। जे भेलै नै। आ जीवनाथ वर्मा ई सभ तखैन कहि रहल छल जखन कान सुनि नै सकैत छल, आँखि देखि नै सकैत छल। कल्ला चबा नै सकै छलै, डाँड़ सोझ नै भऽ सकै छलै। आ ई सभ किछो अपन प्रति आ पतिक कर्तव्यक भेँट चढ़ि गेलै। ओ ई मानै लेल एकदम्मे तैयार नै छल जे अप्पनक भेषमे ओ दोसर छल। ओ कत्तौसँ खसल नै छल, अनेरुआ नै छल। रघुनाथ स्वयं कृतज्ञ भावसँ शीलाकेँ दोसराक घरसँ आनले छल, यएह हुनकर हुनका सभपर उपकार छल जे हुनका नै जानैत-पहचानैत हुनका संग आएल छल आ एक नव दुनिया रचएमे हुनकर संग देने छल। आखिर कोन उम्मेदसँ रघुनाथ शीलासँ मिलि कऽ रचने छल ई दुनियाँ। ओ एतबे नि:स्पृह आ निस्वार्थ तँ नै छल आ हुनकर आशा सेहो हुनकासँ अलग नै छल, जे गाम-घरक छल। की जे ओ अशक्त भऽ जाए तँ बच्चे हुनकर आँखि बनत, हुनकर हाथ-पएर बनत। ओ दुखित हएत तँ यएह बच्चा हुनकर सेवा करत, दवा-दारू करत, अस्पतालमे भर्ती कराएत। मरऽ लागत तँ मुँहमे गंगाजल-तुलसी देत, अर्थी सजाएत, श्मशान लऽ जाएत, क्रिया-कर्म करत। मुदा देखू तँ एकरासँ बेसी मूर्खता की भऽ सकैत अछि। अरे, मरलाक बाद सड़य-गलय, कौआ-चील खाए बा कुकुर- की फर्क पड़ै छै। मुदा यदि दुनियाक आ दुनियाक चलैत रहैक कायदा ई रहैत अछि कि की पैदा हुअए बा जिअए। जीअब अहाँक कर्तव्य अछि। कर्तव्य माने की? अशक्क। कियो ई नै पुछलक अपनासँ- ककरा लेल जी रहल छी? ओ जन्मैक बाद जाधरि जी रहल अछि, जी रहल अछि। मरय कऽ दिन धरि। मरय कऽ दिन बाप-बेटाक हाथ ओ सभ किछु सौंपि कऽ जाइत अछि जे ओकरा संग रहैत अछि। लिअ, सम्हारू आब। हम चललौं। रघुनाथ लग गामक जमीनक अलाबे किछु नै छल आ ओइ जमीनकेँ ओ अनमोल बुझैत छल। बेटा हुनका कैशमे भजोखा देखैत छल आ कहि रहल छल जे एकरासँ बेसी तँ हमर एक मासक इनकम अछि। संजयक टिप्पणी रघुनाथक भीतरक सभटा जीवनक रस चूसि लेने छल। ओ अप्पन कोठलीक खिड़की लग बैसल कदम्बक पातक पार आसमान देखि रहल छल जे सूर्यास्तक बाद मलिछौंह छल। ओतऽ हुनकर आँखिक आगू एकटा मद्धिम तारा छल जे हिलैत पातक अढ़मे कखनो नुका जाइ छल, कखनो हुलकऽ लागै छल। ई तारा नै छल। हुनकर पिता छल जे हुनकापर हँसैत छल आ नुका जाइ छल। -हौ जीवनाथ सुनह। अप्पन दिन तँ बचल नै जीबाक लेल मुदा जीअल छी अपना लेल। ओ अचानके चिकड़ि उठल जेना जीवनाथ सद्यः गेटक बाहर ठाढ़ अछि। ताराक तुकमिलानी लारा। तारा हुनका लाराक मोन पाड़ि देने छल, ओइ लाराक जे हुनकर नितांत अप्पन जिनगीक गुप्त हीस छल। जइ दिन रघुनाथ अप्पन किशोरावस्था पार कऽ रहल छल ओइ काल हुनकासँ टक्कर लेने छल लारा चड्ढा। एकटा अल्हड़ आ सोझ सन लड़की। अंडाकार मुँहवाली सुन्दर लड़की। सपनाएल आँखि। नाकक नोकपर बदमासी। ठोढ़क कोनपर हँसी। छड़ीसन देह जना हवामे थरथराइत बुलबुल्ला। कमी छल तँ बस दूटा पाँखिक, जकर सहायतासँ ओ जखैन चाहए तखन उड़ि सकए। रघुनाथ मामक घर रहि कऽ पढ़ाइ केने छल आ ओ आगू रहै छल बंगलामे। पैघ बहिन हॉस्टलमे छल आ ओ माँ-बापक संग। रघुनाथसँ एक क्लास ऊपर छल। ओ जखैन-तखैन साँझक बल्बक रोशनीमे पापाक संग बैडमिंटन खेलाइ छल तँ रघुनाथ अप्पन दरवाजापर ठाढ़ भऽ कऽ देखैत छल। एक दिन जखन लाराक माए-बाप कोनो समारोहमे बाहर गेल छल, ओ इशारासँ रघुनाथकेँ बजैले छल। ओ घरक ड्रेसमे छल- स्कर्ट आ ब्लाउजमे। ओ रघुनाथक संग कैरम खेलाइ लेल बैस गेल आ किछु काल धरि खेलाइत रहल। फेर अचानके उठल, दौड़ कऽ लॉनमे गेल, पीअर गुलाबक फूल संग घुरल आ केसमे लगा कऽ ठाढ़ भऽ गेल- आब कहू, केहन लागै छी। अपरतीब भऽ रघुनाथ देखैत रहल आ आस्तेसँ बाजल- नीक। -ऐँ, खाली नीके? लाराक आँखि फाटल रहि गेलै। रघुनाथकेँ बुझैमे नै एलै जे आगू की बाजी। लारा पएरसँ ठेल कऽ बोर्डकेँ एक दिस केलक आ हाथ पकड़ि कऽ ठाढ़ कऽ देलक रघुनाथकेँ। ओकर आँखि नोरा गेलै, बाजल- गोबर। मोनेमोन चाहै छी जे नीके-नीक बाजी, अहाँक आँखि ठोढ़, आंगुर, बाँहि, आ पूरा देह नीक बाजी। आ... ओ एक-एक कऽ ओकर अंगा आ पैंट खोलैत गेल। -अप्पन सेहो हम खोली आकि अहूँ किछु करब। ओ लजाइत कनफुसकी केलक। जना-जना वस्त्र ओकर देहसँ अलग होइत गेल, ओना-ओना एकटा अज्ञात, अनदेखल, अकल्पित दुनियाँ खुजैत गेलै ओकर आगाँ कनी-कनी। मुदा ई कनी-कनी असह्य भऽ गेलै रघुनाथ लेल। ओ बेसब्र आ जंगली भऽ उठल। ओ लाराक संयमपर चकित सेहो छल आ मुग्ध सेहो। ओ हुनका आस्तेसँ बैसैलक आ हुनकेपर नमड़ि गेल- फूलसँ बनल गाछ सन। हुनका भीतर लैसँ पहिने हुनकर कानमे फुसफुसैलक- बुद्धूराम। कहियो मेटाएब नै। आ हुनकर झाँपल जीहक नोकसँ दहिना दिस लिखलक- एल.ए.। जखन बाम छातीपर आर. लिख रहल छल ओइ काल कॉलबेल बाजल। ओ तरपि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। बाजल- पहिरू आ भागू पाछाँसँ। फेर तँ मास भरिक बादे चड्ढा साहेबक बदली भऽ गेल आ ओ चलि गेल। ऐ गपकेँ या तँ रघुनाथ जानैत छल या लारा- तेसर कियो नै। एहन बहुत रास गप अछि हुनकर जिनगीमे जे वएह टा जानैत अछि। की ई नै छल अपना लेल जिअब। ककरो नै पता जे शुरूसँ रघुनाथ एकटा चोरक जिनगी जिअल अछि जे हुनका नजरि आबैबला जिनगीसँ बेसी असली आ अप्पन रहल अछि। नहिये माँ-बापकेँ पता, नहिये स्त्रीकेँ, नहिये बेटा-बेटीकेँ। ऐ जिनगीक भीतर एकटा दोसर जिनगी। जकरा लोक देखैत छल आ बुझैत छल ओ दोसराक लेल आ दोसराक काजक लेल भले रहल हुअए- हुनकर अप्पन जिनगी नै छल। मजा आ झमेला ऐ जिनगीमे छलै जे हुनकर निजी छल आ जे प्रेमक खोजमे गुजरि गेल। जमानासँ बचा कऽ, लोकक आँखिसँ चोरा कऽ, अपना आँखिमे गर्दा झोंकि कऽ, हुनका धोखा दऽ कऽ। जे हुनकर अलाबे, ओकरा पता छलै, ऐ गपक भनक भले भेटल होइ ककरो, पूर्ण जानकारी ककरो नै। पूरा जानकारी तँ अहाँक बदमाशीक सेहो नै अछि ककरो रघुनाथ। ओहो चोरीक जीवन छल अहाँक। अहाँ हॉस्टलमे छलौं ओइ काल। अहाँक भजार श्रीराम तिवारी, भेँट करए लेल आएल छल अहाँसँ। आएल छल तँ अस्पताल अप्पन माँकेँ लऽ कऽ, हुनकर हालत सीरियस छल। माँकेँ अप्पन भाइक जिम्मा छोड़ि कऽ अहाँसँ भेँट करऽ लेल आएल छल। जखन ओ जाए लागल तँ ओकर जेबीसँ खसल तागसँ बान्हल नोट अहाँ देखने छलौं आ चुप रहलौं। बादमे गानलौं तँ एक सए तीन टका छल। माँकेँ देखा कऽ घंटा भरि बाद फेर आएल- चिन्तित, परेशान आ घबड़ाएल। अइते ओ जतऽ बैसल छल ओतऽ फेर चौकीक नीचाँ टेबुलपर आ ओकर नीचाँ कोठलीमे चारू दिस देखैत रहल। बुझलाक बादो अहाँ ओकरा पुछले छलौं- की गप अछि? किछु टका छलै दवाइ लेल, भेट नै रहल अछि। आन ठाम कत्तौ तँ गेलौं नै। अहाँ देखलौं तँ नै। आ अहाँ उत्तर की देलौं- अस्पतालक भीड़-भाड़मे कनी सम्हरि कऽ रहबाक छल। ओतऽ जतेक पेशेण्ट आबैत अछि ओत्ते चोर आ पाकिटमार सेहो। ई सभक शिकाइत अछि। नै भजार। आर कत्तौ गेले नै छी। खसल हएत तँ एत्ते कत्तौ, जेबी कटबाक तँ सवाले नै अछि। -तँ देखू ने, कतऽ अछि एतऽ। अछि कत्तौ? -तँ रघुनाथ ईहो अहीं छलौं। वएह अहाँक निजी जिनगी। जौं ई जिनगी लोककेँ पता चलल हेतिऐ तँ अहाँ की एतेक आदरणीय आ गण्यमान रहि गेल हेतिऐ या नै, अपने सोचू। रघुनाथ सोचलक आ वर्माकेँ अपना लेल जिबूबला सलाहपर अविचलित रहल। ऐ दगाबाज आदर आ प्रतिष्ठाक बदला आत्माक ई नंगटपनी बेसी नीक छल। अपना लेल सेहो आ समाज लेल सेहो। ई आदमी टाक नै समाजक विसंगतिक सेहो चेहरा अछि, जे झाँपल-मुनाएल अछि। समाज जानए जे जँ हम बदमाश छी तँ ऐ बदमाशीक कारण असगरे हम नै छी, ओ सेहो अछि। आ सही कहियौ तँ ओकरे कारण हम एहन छी। -पापा। सोनल दरवाजासँ आवाज देलक। -अहाँ अखैन धरि अन्हारमे पटायल छी। ओ स्विच ऑन केलक आ कमरामे रोशनी भऽ गेल। रघुनाथक आँखि चोन्हैल, फेर पसरि गेल। पहिल बेर सोनलक संग एकटा युवा। नम्हर, सुन्दर, आँखिपर नै माथपर चश्मा, कन्हापर झोरा, खादीक कुर्ता आ जीन्सक पैंट। एक हाथमे लपेटल अखबार। रघुनाथ उठि कऽ बिछौनपर आएल। -पापा। यएह अछि समीर। दैनिक भारतक उप-संपादक। रघुनाथक पएर छुलक समीर। -हमर कजिन अछि। हम बतौले रही। ई बिसरि गेल हेथिन। जइ काल हम पटनामे रिसर्च कऽ रहल रही, ओइ काल ई सेहो ओत्तै छल। आइ अचानक सेमिनारमे भेट गेल। लऽ कऽ आबि गेलौं अपना संग। -कतऽ रहै छी बेटा। -एत्तै, लगेमे। संजय नगरमे। -ऐँ। ओतऽ तँ हम गेल छी। अप्पन दोस्त बापट कतय। -हम हुनके फ्लैटक नीचाँ रहै छी। आब तँ हुनकर फ्लैटमे हुनकर बेटा आबि गेल अछि, स्त्री बच्चाक संग। चौंकल रघुनाथ- हुनकर बेटा? बेटा कहाँ छल हुनका। समीर सोनलकेँ ताकलक। सोनल बतैलक जे ओइ काल अहाँ गाम गेल छलौं। हुनका किछु नै पता। समीर बाजल- पापा। की अहाँकेँ खबर अछि जे बापटक मर्डर भऽ गेल अछि पछिला दिन। नहरमे हुनकर लाश भेटल छल। आ अहाँ आश्चर्य करब जे एफ.आइ.आर. अही बेटाक नामे अछि। पेपरमे आएल छल ई समाचार। अही बेटाकेँ ओ अनाथालयसँ अडाप्ट केने छल, जखन ओ बच्चा छल। पढ़ैलक, लिखैलक, कोनो नोकरी सेहो दिआ देने छल ओकरा। चालि-चलन नीक नै छलै तइसँ निकालि देने छल ओकरा घरसँ। ई चाहै छल जे अपना रहिते फ्लैट ओकर नाम लिखि दिअए। शायद लिखबाइओ लेने छल ओ, ऐ शर्तपर जे ओ ऐमे तहिये आएत जखन ओ नै रहत। कहब मुश्किल अछि जे की कोना भेल। रघुनाथ काठ सन बैसल रहल- बिना हिल-डुल। कनी कालमे चश्मा उतारलक, गरमे लपेटल मफलरसँ पोछलक, फेर लगा लेलक। जना ओ बापटकेँ देखऽ चाहै छल। ऐ नगरमे एलाक बाद जे लोक असगरे हुनकर दोस्त हैत छल हुनकर ओ बापट छल। हुनकर मुँहसँ आश्चर्य सन नै, एकटा आह सन निकलल ई वाक्य- ई की हैत जा रहल अछि लोककेँ। ई केहन हैत जा रहल अछि दुनियाँ। हम बड़ नीक नै रही मुदा एत्ते खराब सेहो नै छलौं। -पापा, समीरसँ कहि रहल छी जे ऐ नगरमे जखन अप्पन घर अछि तँ ओत्तऽ किए। उपरो तँ एकटा कमरा खाली पड़ल अछि। रघुनाथ कातर भऽ कऽ हाथ जोड़लक- जे करबाक अछि करू, हमरा असगरे छोड़ि दिअ। प्लीज। रघुनाथ बिना खेले-पिले राति गुजारि देलक। नीन नै एलै। ओ कोठलीमे बत्ती मिझा कऽ सुतैत छल मुदा आइ जड़ैत छोड़ि देलक। एक बजे राति हुनकर आँखिक आगू बापटक चेहरा घुमैत रहल आ कानमे ओकर गीत- हाए हाए ये जालिम जमाना। मुदा एकर बाद हुनकर हृदएक अबाज कानमे धक-धकक बदला मारलक-मारलक कहि धड़कब शुरू कऽ देलक। रोशनीक रंग पीअरसँ लाल हुअए लागल। फेर तँ ओ जिम्हर नजरि घुमाबै छल, उम्हरसँ कोदारि, कुड़हरि, हाँसू, चक्कू, पघरिया, ईंटा, पाथर, पेस्तौल कूदैत-फांगैत ललकारा दैत लखाह दै छल। कनी कालमे रोशनी नै, जना शोनितक फूही उड़ए लागल आ चारू दिस दीवार लाल भऽ गेल। ओ उठि कऽ बैस गेल आ अपनासँ बाजल- ऐ दुनियाँमे कहियो हरियरका रंग होइत छलै भाइ, ओ कतऽ गेलै? 11 जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा छल दुपहरिया। कनी काल पहिने रौद छल। ओ खाना खैले छल आ खा कऽ अखन अपना कोठलीमे पटायल छल, आकि अन्हर-बिहाड़ि। घरक सभटा खिड़की दरबज्जा भड़-भड़ करैत अपने-आप बन्द-खुलय लागल। छिटकिन्ने छिड़िया कऽ कत्तौ खसल, सभ बौस्त उघड़ा-भाँड़ हुअए लागल, जेना धरती हिलि गेल हुअए। देवार थरथराए लागल। अकास कारी भऽ गेल आ चारू दिस घोर अन्हार। ओ उठि कऽ बैसि गेल। आंगन आ लॉन पैघ-पैघ बर्फक पाथरक पथार लागि गेल आ रेलिंग टूटि कऽ खसल-धड़ाम। ओकर बाद जे मूसलाधार बर्खा शुरू भेल तँ ओ पानिक ठोप नै छल, लागल जेना ओ पानिक रस्सी हुअए जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहे तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतएसँ ई छोड़ल बा खसाएल जा रहल अछि। मेघ लगातार गड़गड़ा रहल छल- दूर नै, माथपर बिजली कड़कि रहल छल, दूर नै खिड़कीसँ भीतर आँखिमे। एकहत्तरि बरखक बूढ़ रघुनाथ आश्चर्यचकित। ई अचानके की भऽ गेल। किए भऽ रहल अछि। ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, शरीरसँ सीरक अलग केलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला गिट्टीक मदतिसँ खुजल छल आ ओ बाहर देखि रहल छल। घरक बाहर कदम्बक बड़ पैघ गाछ छल मुदा ओकरा पता नै चलि रहल छलै ऐ अन्हारक कारण, घनघोर बर्खाक कारण। छतक डाउन पाइपसँ जलधारा खसि रहल छल आ ओकर अबाज अलगसँ सुनाइ पड़ि रहल छल। एहन मौसम, एहन बर्खा आ एहन हवा ओ देखने नै छल। दिमागपर जोर देलाक बाद मोन पड़लै-साठि-बासठि बरख पहिने। ओ स्कूल जाए लागल छल- गामसँ दू मील दूर। मौसम खराब देखि कऽ मास्टर साहेब समएसँ पहिने छुट्टी देने छल। ओ सभटा बच्चा संग गाछीमे पहुँचले छल आकि बिहारि, बर्खा आ अन्हार। सभ आमक गाछक अढ़ लैले चाहलक मुदा बिर्रो हुनका घास सन उड़ेलक आ गाछीसँ बाहर धानक खेतमे जा कऽ पटकि देलक। ककरो झोरा-झपटा आ किताब-कापीक पता नै। बर्खाक बुन्नी हुनकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छल, ओ कानऽ बाजऽ लागल। बिर्रो थमलाक बाद जखन बर्खा कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ टॉर्च लऽ कऽ निकलल छल खोज लेल। ई एकटा दुर्घटना छल आ दुर्घटना नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा दुर्घटने छल जे बाहर एहन मौसम अछि आ ओ कोठलीमे अछि। कतेक दिन भऽ गेलै बर्खामे भिजला। कतेक दिन भऽ गेलै लू केर झोकसी झोकेला। कतेक दिन भऽ गेलै जेठक घाममे डुमना। कतेक दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे घुमना। कतेक दिन भऽ गेलै जाड़मे ठिठुरना, दाँत कटकटेना। की ई तइसँ होइए जे हम एकरासँ बचल रही। बचि कऽ चली। या तइसँ जे एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्ती करी, गप करी, माथपर बैसाबी। हम एकरासँ ओना व्यवहार करै छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए करै छी एना। इम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लागै छल जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य- ई मेघ, रौद, गाछ-बृच्छ, फसिल, धार-नाला, कछार, जंगल-पहाड़ आ ई सभ किछु एत्तै छूटि जाएत। ओ  सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैलऽ चाहै छल जेना ओ भले चलि जाएत, आँखि रहि जेतै, चामपर सभ चीजक थाप सोखऽ चाहैए जेना चाम केचुली सन एतऽ छूटि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका धरि पहुँचैत रहत। हुनका लागै छल जे बेसी दिन नै बचल अछि हुनका जाइमे। सम्भव अछि जे ओ दिन काल्हि हुअए जखन हुनका लेल सूर्य नै उगए। उगत जरूर, मुदा ओकरा दोसर देखत- ओ नै। की ई संभव अछि जे ओ सूरजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए- नहिये ओ रहए, नहिये उगए आ नहिये देखए। मुदा एकटा सूरज पूरा धरती तँ नै, ओ कोन-कोन चीजकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखैसँ रोकत। हुनकर बाँहि एतेक नम्हर भऽ जाइए जे ओ ओइमे पूरा धरती समेट लिअए आ मरए बा जिअए तँ सभक संग। मुदा एकटा कचोट आर छलै रघुनाथकेँ जे ओकरा कचोटि रहल छलै, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम। धरतीसँ प्रेमक। ई व्यग्रता। काल्हि सेहो ई धरती छल। ई मेघ, अकास, तारा, सूर्य आ चन्द्रमा। धार, झरना, सागर, जंगल, पहाड़। ई गली, मकान, चौबटिया। कतऽ छल ई उद्वेग। फुर्सति नै छलै एकरा सभकेँ देखबाक। आइ जखन मृत्यु बिलाइ जना आस्तेसँ कोठलीमे आबि रहल अछि तँ बाहरक जिनगी सुनाइ दऽ रहल अछि। -सत सत बताउ रघुनाथ, अहाँकेँ भेटल जकरा लऽ कऽ कहियो सोचने छलौं। कहियो सोचने छलौं जे एकटा छोट गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब। पीढ्चीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नीमक खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैस कऽ लंच आ डिनर करब। मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अवाज बाहरक गड़गड़ाहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अपना वशमे नै छल। हुनकर नजरि गेल कोनमे ठाढ़ लाठी आ छत्ता दिस। जाड़क ठंढी ओहिनो भयानक छल ऊपरसँ पाथर आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। खोललक की, ओ ओत्तै ठाढ़ छल आ अपने-आप खुजि गेलै। भीजल हवा सनसनाइत अंदर आएल आ ओ डरि कऽ पाछाँ हटि गेल। फेर साहस केलक आ बाहर निकलैक तैयारी शुरू केलक। पूरा बाँहिमे थर्मोकोट पहिरलक, ओइपर सूती अंगा, फेर ओइपर स्वेटर, ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट पहिने पहीर लेने छल। ई जाड़क भोरमे पहिर कऽ टहलैक कपड़ा छलै। छलै तँ मफलर सेहो मुदा ओकरासँ बेसी जरूरी छलै- गमछा। बर्खाकेँ देखैत। जना-जना कपड़ा भिजतै, ओ एक-एक कऽ उतारैत आ फेकैत जाएत आ अंतमे रहि जेतै ई गमछा। ओ अप्पन साज-बाजक संग अखनो पूरा आश्वस्त नै छल। उघार, बिना केसक माथकेँ लऽ कऽ ओ दुविधामे छल- कनटोप ठीक रहत बा गमछा बान्हि लिअए। पाथर जे खसबाक छल, शुरूहेमे खसि गेल छल आ आब ओकरा कोनो अंदेशा सेहो नै छलै। ओ गमछाकेँ गरमे चारू दिससँ लपेटलक आ उघारे माथे बाहर आबि गेल। आब नहिये कियो रोकैबला आ नहिये टोकैबला। ओ बाजल- हे मन। चलू। घुरि कऽ एलौं तँ वाह-वाह। नै एलौं तँ वाह-वाह। पाथरबला बर्खाक अन्हार सुरंगमे उतरैसँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भारक संग एक ठेग बढ़ब हुनका लेल मुश्किल हएत। ओ अप्पन कमरासँ निकलि आएल मुदा गेटक बाहर नै जा सकल। छत्त खुजैसँ पहिने जे पहिलुक ठोप ओकर उघार, खल्वाट माथपर खसल, ओ एतेक पलखति नै देलक जे ओ बुझि सकए जे ई बिजली कड़कल अछि आकि लोहाक किल्ली अछि जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतरे तड़बा धरि पैसि गेल अछि। ओकर पूरा शरीर झनझना उठल। ओ निराउ बर्खामे बैस गेल मुदा भीजैसँ नै बचि सकल। जखन धरि छत्ता खुजल, ताधरि ओ पूरा भीज गेल छल। आब ओ फँसि गेल छल- बर्फबला हवा आ बर्खाक बीच। हवा घास सन ओकरा ऊपर उड़ा रहल छलै आ बर्खा जमीनपर पटकि रहल छलै। भीजल कपड़ाक भार उड़ऽ नै दऽ रहल छलै आ हवा घिसियेने जा रहल छलै। हुनका एतबे टा मोन छलनि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसल आ ई तखन धरि चलल जखन छत्ताक कमानी टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बाहर गाएब भऽ गेल। आब हुनका एहन लागि रहल छल जे हवा ठाम-ठामसँ नोचि रहल अछि आ पानि दागि रहल अछि- जरैत छोलनीसँ। अचेत हैकऽ खसैसँ पहिने हुनकर दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे आएल- हुनकर मित्र। ओ दू बेर आत्महत्या करैक प्रयास केने छल- पहिलुक बेर लोहता स्टेशनक लग रेल पटरीपर नग्रसँ दूर निर्जन स्थलपर, जतऽ ककरो आएब-जाएब नै छल। समय ओ पैसेंजर बा मालगाड़ीक नै, एक्सप्रेस आकि मेलक चुनने छल। जे हैक अछि खटसँ हुअए, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल जे मेल आबैत देखलक। जाने की, ओहि सं जीवनक मोह पैदा भेल आ उठि केर भागहि मे भेल जे घुटनाक लग पइर खचाक। ई मरहि से बेसी खराब भेल। बैसाखीक सहारा आ घर बला केर गाइर अ दुत्कार। एक बेर फेर आत्महत्याक जुनून सवार भेल ओहि पर। अहि बेर सिवानक इनार। ओ बैसाखी फेंक छलांग लगैलक आ पइन मे छपाक कि बरोह पकड़ि मे आबि गेल। तीन दिन बिना खायल पियल भूखल चिल्लाबैत रहल इनार मे-आओर निकलल ते दोसर टूटल पइरक संग। आइ वएह ज्ञानदत्त बिना पएरक ज्ञानदत्त चौराहापर भीख मांगैए। मरैक आस ओकरा कतौकऽ नै छोड़लकै। मुदा ई साढ़ ज्ञानदत्त ओकर दिमागमे किए नै आएल। ओ मरै लेल निकलल नै छल। निकलल छल बुन्नी लेल, पाथर लेल, हवा लेल। ओ परिणाम निकाललक जे जीवनक अनुभवसँ जीवन पैघ अछि। जखन जीवने नै, तँ अनुभव ककरा लेल। 12 रघुनाथकेँ किछु पता नै जे ओ अप्पन कोठलीमे केना पहुँचल। के लऽ गेल। कखैन लऽ गेल। केना लऽ गेल। कपड़ा के उतारलक? देह के पोछलक आ तीस बरखक पुरना खादी आश्रमबला ओ गाउन आ ओवरकोट के पहिरलक जकर रोइयाँ झड़ि गेल छल आ जे जलफाँफीटा रहि गेल छल। ओ नीचाँसँ उघार छल आ गर्भमे पड़ल नेना सन बुक्की मारने बिछौनपर पड़ल छल। हुनका ऊपर कंबलक संग सीरक पड़ल छल जकर नीचाँ ओ दबल छल। हीटरसँ कमराकेँ गर्म कऽ देल गेल छल। हुनकर पएरक तरबामे समीर तेल रगड़ि रहल छल आ दोसर तरबामे सोनल। गरम तेलसँ अजमाइनक गंध आबि रहल छल। रघुनाथक गरसँ निकलैबला फोंफ बता रहल छल जे चिंताक कोनो गप नै अछि। ओ बेहोशीमे लागि रहल छल- नीनमे बेसी, जागलमे कम। परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल सोनल हुनका दू-तीन बेर अवाज देलक। देहमे कनी हिलडोल भेल मुदा आँखि नै खोललक। राति आधसँ बेसी बीत गेल छल। बत्ती मिझा दिअ?- समीर पुछलक। सोनल बाजल- मिझा दियौ। रघुनाथक मनमे भेल जे मना कऽ दिऐ। तरबा लग बैसैत समीर पुछलक- काल्हि कए बजे अछि अहाँक क्लास। -काल्हि नै, आइ कहू। नऽ बजेसँ। मुदा छुट्टी लिअ पड़ि सकैत अछि। -अरे नै, नीक भऽ जाएत भोर धरि। टनाटन। ठार लागि गेल अछि। ओ तँ कहू जे हम समएसँ पहुँचि गेलौं। जेना गेट लग किछु खसैक आवाज भेल, हम दौड़लौं आ देखलौं तँ पापा। (देखू ई झुट्ठाकेँ। कत्तौ नै दौड़ल। पोर्टिकोसँ डंटा कोंचि-कोंचि कऽ देखलक। अपने डरल छल जे नै जानि की भेल। कुकुड़, बिलाइ जानि कऽ।) ओइ दुनूक अवाज रतजग्गी सन छल- खस-खस आ फुस-फुस। ओ आस्तेसँ फुसफुसा रहल छल, तइसँ रघुनाथक नीन उचटै नै। ओ अपन नीचाँ कंबल ओछा कऽ राखने छल आ शाल ओढ़ने छल। -एक गप कहू जे पापा शुरूसँ एहन लोक छल? झक्की आ जिद्दी। अपना मोनक।- समीर बाजल। -पहने ई हाथ हटाउ। -केहन हाथ। -यार, सेंसेशन भऽ रहल अछि। गुदगुदी। बुझै नै छी की? -बगलमे बैसै छी तँ कखनो सुनै छी हमर। (रघुनाथकेँ बत्ती मिझाबैक रहस्य आब बुझैमे आएल। ओ सीरकक भीतर घोकचि बंद आँखिये सभ किछु देखि-सुनि रहल छल आ मारे लाजक नहिये करौट लिअ सकैत छल, नहिये हिलि रहल छल।) -सोचै छी मम्मी आ दीदीकेँ खबर दऽ दी। -जेहन अहाँ चाही, ओना जरूरत नै अछि एकर। -सोचू जौँ अहाँ नै हेतिऐ तँ की हेतिऐ? असगरे की करतिऐ हम? एइयू! अनचोक्के चिहुँकि उठल ओ। की करै छी ई? धैर्य नै अछि? -केना हएत? ठंढी तँ देखू। समीर ओकरा आर लग-आरो लग आबैत कानमे बाजल-रोकबाक अछि तँ मौसमकेँ रोकू। सुनि रहल छी- फेर टिप टिप। ई बुन्नी किछु कहि रहल छल। की कहि रहल छल? आवाज समीरक गरमे कत्तौ फँसि गेल छल आ टूटि रहल छल। -सम्मी। प्लीज।- सोनल बेचैनीमे अप्पन माथ रघुनाथक ओइ पएरपर राखलक जकर तरबा ओकर तरहत्थीपर छलै। ओकर गर्म साँस हुनकर आंगुरपर हवा कऽ रहल छल। -दोस। उठू तँ। पापा सुति गेल अछि, हुनका सुतऽ दियौ। समीर जना गिड़गिड़ाइत बाजल। सोनल ठेहुन भरे बैसल रहल आ रघुनाथक तरबापर माथ रखने सोनल बीच-बीचमे सिहरि उठए। ओ भारी टूटैत अबाजमे कहलक- बुझै किए नै छी? ऐ हालमे कोना छोड़ि दिअ हिनका? कखैन केकर जरूरत पड़ि जाए। मुदा ओकर एक नै सुनलक समीर। ओ बैसल सोनलकेँ लगभग अप्पन कोरामे उठैलक आ लेने-देने कोठलीसँ बाहर भऽ गेल। रघुनाथकेँ खराप नै लगलै। ओकर तरबामे पड़ल ओकर माथ जेना पहिने क्षमा मांगि लेने छल। अखन उमेर छेबे की करए। रघुनाथ मन बनैलक जे जौं ओ समीरकेँ प्रेम करैए आ ओकरा संग घर बसाबऽ चाहैए तँ ओ पापाक हैसियतसँ कन्यादान करबामे पाछू नै हटत। रघुनाथकेँ पूरा तरहे स्वस्थ हेबामे एक सप्ताह लागि गेलै। ओ सीरक ओछा कऽ लॉनमे पटा कऽ रौद सेकि रहल छल- दुपहरियामे। सोनल आ समीर अप्पन काजपर चलि गेल छल। सभ दिन सन अपनामे हँसी मजाक करैत। गाड़ीमे सोनलक बगलमे बैसैत समीर हाथ हिलेलक-बाइ-बाइ पापा, हैव अ गुड डे। जवाबमे रघुनाथ सेहो हाथ हिलैलक- पटायल-पटायल। के जानए, हाथ हिलल बा नै। घंटा भरि बाद हुनकर आँखि मिचमिचाएल, आकास दिस देखलक आ उठि बैसल। बैसल एहन लागि रहल छल जना लॉनमे कोनो सुखाएल बोन्साइ हुअए। आब खाली देवार छल आ ओ छल आ रौद छल।  कनी काल लागल हुनका सामान्य होइमे। -गुड डे।- ओ आस्तेसँ बाजल। -गुड डे।- ओ मुस्की देलक। -गुड्डे।- हुनकर आँखि नोरा गेल। ओ चौंकि कऽ झटपट आँखि पोछलक आ खुशीसँ हँसल। आब ओ पूर्ण रूपेँ सुस्थिर चित्त छल। मुदा के कहए पूरा तरहेँ। किएकि मास भऽ गेल छल आ कत्तौसँ कोनो खबरि नै छल- नहिये मिर्जापुरसँ, नहिये नोएडासँ, नहिये अमेरिकासँ, नहिये पहाड़पुरसँ। शाइत सभकेँ बूझल भऽ गेल छलै जे रघुनाथ हुनका सदा लेल बिसुरि गेल अछि, बिसुरि नै गेल, मरल मानि लेने अछि। माया-मोह त्यागि कऽ। कॉलोनी ओहिना निर्जन आ उदास अप्पन घरमे पैसल छल। अहिनामे हुनकर दरवाजापर एकटा बोलेरो जीप ठाढ़ भऽ गेल आ ओइसँ दूटा युवा बहार भेल। ओ वएह छल जकर चर्चा केने छल गामक सनेही। अखने किछु दिन पहिने। ओ पएर छूबि कऽ हुनकर अगल-बगलमे बैस गेल। रघुनाथ ध्यानसँ देखलक- ओ विश्वविद्यालयक लड़का सन जीन्स आ स्वेटर पहिरने छल। एकदम टीप-टॉप। भला आ सभ्य घरक। पुछलापर नाम नै बतौलक ओ। ओ सभ चौकन्ना छल आ हड़बड़ीमे लागि रहल छल। रघुनाथ चाह पानि लेल पुछलक मुदा ओकरा सभकेँ एत्ते फुर्सति नै छलै। -सर, ऐपर सिग्नेचर कऽ दियौ। एक गोटे एकटा कागज बढ़ौलक जइपर पहिनेसँ किछु लिखल छल। रघुनाथ चश्मा लगा कऽ पढ़ब शुरू केने छल जे दोसर छीन लेलक- हमरासँ पूछू ने। हम बता दै छी। पहिने सिग्नेचर करू। रघुनाथ ओकरा नीक जकाँ देखलक। ओ रिवाल्वर निकालि कऽ दरीपर हुनकर आगू राखि देलक। -कतेक देने अछि नरेश। अस्सी हजार। एक लाख। ऐसँ बेसी दाम तँ नै अछि जमीनक।- पुछलक रघुनाथ। -सिग्नेचर करै छी आकि नै। -ओ तँ कऽ देब मुदा हम दू लाख दिआए दी तँ? -दू लाख? कतऽसँ दिआएब? -एकरासँ अहाँकेँ मतलब। दिआए दी तँ? दुनू एक-दोसरा दिस ताकलक- तँ जे कही से कऽ देब। -मारि देब नरेशकेँ? -सेहो कऽ देब। -मुदा हम ओकरा मारै लेल नै कहब। काज वएह करी जइमे खतरा कम हुअए, पाइ भेटए। जतेक मामूली रकम लेल अहाँ दौड़ल आएल छी ओतेपर तँ लगही करैत अछि हमर एकटा बेटा। -तइसँ एतेक गन्ध मारि रहल छी, ओइमे नहाबै छी की। नम्हरबला लड़का हँसी केलक। -की कहलौं? रघुनाथ अप्पन हाथ कानपर लऽ गेल-कनी ऊँच बाजू। -किछु नै, बताउ तँ की करबाक अछि? पहिने पेस्तौल जेबीमे राखू आ ओ कागज हमरा दिअ बा फाड़ि दिअ। -हँ, कहू।- रिवाल्वर जेबीमे राखैत दोसर बाजल। -हमरा लेने चलू। अपहरण करू हमर आ मांगू दू लाख। -के देत अहाँ सन सड़ल-गलल बुढ़बाकेँ दू लाख। -खाली दू लाख, तइसँ जे ई पाइ दैमे कनियो नै अखरतै। भेट जाएत आ हत्यासँ सेहो बचि जाएब। -अरे के देत ऐ सड़ल-गलल केर। -सड़ल गलल छी अहाँ लेल, बेटा लेल तँ नै, बेटी लेल तँ नै। -मानि लिअ एकरामे सँ किओ पाइ दै लेल नै आएत, तखन? -से देखबाक अछि जे कियो आबैए की नै? -हमहूँ तँ सैह कहि रहल छी जे कियो नै आबए तखन? रघुनाथ क्षण भरि सोचलक- तैयो चिंता नै। एतेक गेल-गुजरल हम नै छी। एतेक तँ हमरा लग अछि जे अपनाकेँ छोड़ा लेब। -बैसल रहू हिलब नै। दुनू उठल, कनी दूर जा कऽ आपसमे खुसुर-फुसुर केलक, फेर ओत्तैसँ आवाज देलक- ठीक अछि चलू। -तँ आउ, समेटू सीरक। रघुनाथ ठेहुनपर हाथ राखि कऽ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। दुनू चकित भऽ देखलक- सीरकक की करब? -ओढ़ब, ओछाएब, सिरमा बनाएब- जरूरत पड़त तँ लुंगी बना लेब आर की? रिवाल्वरबला लड़का सीरक समेटैत पुछलक- किछु खास अछि ऐ सीरकमे? -अछि ने। बेटा पठेने अछि कैलिफोर्नियासँ। मुदा ई सीरक सन तँ नै लागैए।- दोसर संदेह केलक। -लागए नै लागए, हम तँ से कहै छी।- कहैत रघुनाथ बिदा भेल। -रौ बूढ़, जाए कतऽ छी? कमसँ कम पैसा तँ राखि लिअ। दस दिनक फोन-फान, राशन-पानी, पेट्रोल सभक। खाएब की? -सभ हमहीं करब तँ अहाँ सभ की करब? बैस कऽ नोट गानब की? रघुनाथक भौंह तनि गेलै। हुनकर भीतरक मास्टर फनफना उठल- आ सुनू, अहाँ सन लौंडाकेँ पढ़ाबैत उमर गुजरल अछि हमर, तइसँ आदरसँ गप करू। हमर जरूरत अहाँकेँ अछि, हमरा कोनो जरूरत नै अछि अहाँक। बुझलौं। रिवाल्वरबला लड़का आस्तेसँ बाजल- आस्तेसँ-चलू तँ पहिने। ओत्तै बतबै छी जे ककरा ककर जरूरत छै। -किछु कहलौं?- रघुनाथ थकमका गेल। -किछु नै, चलू। रघुनाथ जखन डंटाक सहारे बाहर आएल तखन ओकर मुँह बानरटोपीक भीतर छल आ सीरक लड़काक कन्हापर। ओ आगू जा रहल छल, दूनू अपहर्ता लड़का पाछाँ-पाछाँ- जेना ओ बेटाक संग मगन तीर्थपर जा रहल छल। “रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) श्री काशीनाथ सिंह जन्म: 1 जनवरी, 1937, बनारसक जीयनपुर गाममे. काशी विश्वविद्यालय सं हिन्दी मे एम.ए. आओर पी-एच.डी. ओतय अध्यापन आ प्रोफ़ेसर आ अध्यक्ष पदसं सेवामुक्त. कृति: लोग बिस्तर पर, सुबह का डर, आदमीनामा, नई तारीख, सदी का सबसे बड़ा आदमी, कल की फटेहाल कहानियां, कहनी उपखान (कहानी संग्रह), घोआस (नाटक), हिन्दी में संयुक्त क्रियाएँ (शोध), आलोचना भी रचना है (समीक्षा), अपना मोर्चा, काशी का अस्सी (उपन्यास), याद हो कि न याद हो, आछे दिन पाछे गए (संस्मरण). सम्मान: कथा सम्मान, समुच्चय सम्मान, शरद जोशी सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, साहित्य अकादेमी सम्मान. विनीत उत्पल जन्म : 7 अप्रैल, 1978. मधेपुरा, बिहार. एक दशकसें बेसी अवधि धरि राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान जेहन अखबारमे पत्रकारिताक बाद आय काल्हि अध्यापन. सम्प्रति जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक मे शोधरत. अहाँक प्रकाशित कृति सभमे हम पुछैत छी (मैथिली काव्य-संग्रह), नए समय में मीडिया (संपादन), साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदय प्रकाशक कथा ‘मोहनदास’क मैथिली अनुवाद. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। पल्लवी मण्डल दृष्टिकोण ऐ दुनियाँमे प्राकृत द्वारा निर्मित सभ चीज़ सुन्दर छै ओ चाहे मनुक्ख हो वा अन्य जीव-जन्तु पर्यावरण आकि आभामण्डल धरती आकि आसमान सभ सुन्दर छइ! सुन्दरता निर्भर करैए अपन-अपन दृष्टिकोणपर माने देखैक अपन नजैरपर ऐमे आशा-निराशा सेहो अछि मुदा दृष्टिकोण तँ दृष्टिएक समावेश छी जे अप्पन-अप्पन रहने सभकेँ अद्वितीय बनबैए सभ अछि सुन्दर ऐ गप्पक पुष्टि करबैए अही दुआरे दृष्टि बदलू अपनहि सृष्टि बदैल जाएत आ लाख कमी रहितो अहाँकेँ सभ किछु सुन्दर बुझाएत!!  ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु विदे हwww.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.comVideha Ist Maithili Fortnightly ejournal  'विदेह'२०२ म अंक १५ मई २०१६ (वर्ष ९ मास १०१ अंक २०२)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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