141 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २०३ म अंक ०१ जून २०१६ (वर्ष ९ मास १०२ अंक २०३) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.प्रयास प्रेमी मैथिल- जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही (नाटक) २.२.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- दूटा लघुकथा २.राजदेव मण्डल- एकटा लघुकथा आ एकटा विहनि कथा ३. दिनेश रसिया- बिहनि कथा ४. सत्यनारायण झा- बिहनि कथा- सुटिया २.३.१.नवेंदु कुमार झा- गाम मे समटि रहल प्रभाव आ चर्चा भेल वैश्विक प्रभावक- साहित्य अकादमीक भुसकौल मंडलीक कारनामा २. उमेश मण्डल- कौशिकी सम्मान समारोहक आयोजन २.४.रवि भूषण पाठक-दोस्तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य) ३. पद्य ३.१.रामसोगारथ यादव- चारिटा गजल आ एकटा कविता ३.२.1.संतोष चतुर्वेदीजीक दूटा हिंदी कविताक अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा 2. दिनेश रसिया- गजल 3.सुकोसित शिशिर- कविता ३.३.१.सृजन शेखर 'अज्ञेय'- दूटा कविता २.हिंदीक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबरालक सातटा कविता- मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा ३.४.१.राजदेव मण्डल- शिशुक स्वर २. जगदीश प्रसाद मण्डल- पाइक मोल ४.बालानां कृते-डॊ शशिधर कुमर- किछु सचित्र बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय मिथिला स्टुडेण्ट यूनियनक काज स्वतः ध्यान आकृष्ट क’ रहल अछि, एकर गएर स्वर्ण स्वरूप एकर लोकप्रियताक कारण अछि/ मैथिलीक साहित्य अकादेमी पोषित आ मुख्यतः स्वर्ण साहित्यकारक आभाषी साहित्य आ सवर्ण आच्छादित मिथिला राज्यक आभाषी आन्दोलनक विपरीत एकर काज धरातलपर भ’ रहल अछि, विदेह परिवार मिथिला स्टुडेण्ट यूनियनक काजक प्रशंसा करैए आ ओकर संग अछि/ २. गद्य २.१.प्रयास प्रेमी मैथिल- जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही (नाटक) २.२.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- दूटा लघुकथा २.राजदेव मण्डल- एकटा लघुकथा आ एकटा विहनि कथा ३. दिनेश रसिया- बिहनि कथा ४. सत्यनारायण झा- बिहनि कथा- सुटिया २.३.१.नवेंदु कुमार झा- गाम मे समटि रहल प्रभाव आ चर्चा भेल वैश्विक प्रभावक- साहित्य अकादमीक भुसकौल मंडलीक कारनामा २. उमेश मण्डल- कौशिकी सम्मान समारोहक आयोजन २.४.रवि भूषण पाठक-दोस्तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य) प्रयास प्रेमी मैथिल- जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही (नाटक) करम के डोर सँ बान्धल अछि जिनगीकऽ एक कथा जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही जीनगी एक अजीब दास्तान छैक जे जन्म तऽ माँ बाप दैत मुदा करम अपनेही होयत अछि। जे जेहन काज करैत छैकहुनका ओहि अनुसार जिनगी कऽ फल मिलैत अछि। आ संगे विधाता छठी के रातिमें जे विधना लिख दैत छैक ओकरा किओ नै काटि सकैत अछि, आ उ प्रत्येक प्राणी के भोगही टा परैत अछि। इहे विषय पर आधारित रचनाकार प्रयास प्रेमी मैथिलद्वारा लिखित कहानी :करम के डोर सँ बान्धल अछि जिनगीकऽ एक कहानी "जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही" भाग - १ एक राज्यमें एक राजा रहैत छैक। राजा के ४ टा बेटी छथि,दिक्षा, दिव्या, प्रिति आ मेनुका छथि। आ किछ नौकर चाकर सेहो रहैत छैक। राजा कऽ चारु बेटी सब मन जतन सँ अप्पन -अप्पन पढाई लिखाई करैत रहैत अछि। एकदिन चारु बहिन साथमें कॉलेज पढ़ेबाक लेल जाइत छल तऽ बाटमें देखैत अछि के एक लंगड़ा लुल्ला यानी एक अपाहिज़ व्यक्ति भूखसँ तड़पैत बीच बाट पऽ बेहोस नज़र भेटैत छैक। दिक्षा : ए के छे तू रस्ता पर सँ हटबे की नै, तोरा आउर जगह नै भेटलौ जे बीच रस्ता पर आबि के देह ओगड़ने छी ? अपाहिज : हे बहिन हम नै चलि सकैत छी। अहाँ चलि सकैत छी तऽ हमरा कात लगाबि दिय, नै तऽ नाघि कऽ चलि जाऊ ! दिक्षा : तऽ हिनका हम जाइत छी छुएबाक लेल ( चपैट कऽ बजैत अछि आ हुनका दिक्षा नाघिकऽ चलि जाइत अछि )साथे दिव्या आ प्रिति दुनू कोई दिक्षा जका नाघिकऽ चलि जाइत अछि। मेनुका : हे भगवान ! लगैत अछि बिचारा अपाहिज बहुत दिन सँ दाना - पानि सँ व्याकुल छैक। ( मेनुका अप्पन मनमें सोचि रहल छैक )मेनका नै किछ पुछि हुनका अप्पन कोरामें उठाबिकऽ एक बृक्ष के लग लऽ जाइत अछि। अपाहिज : पानि ... पानि .. .(मेनुका सोचैत छैक … दीदी सब कॉलेज पुगि गेल होइथिन। अगर आजु हम कॉलेज नै जाइ छी तऽ पिताजी हमरा बहुत बड़का सजा देताह आ अगर कॉलेज जाइ छी तऽ ई अञ्जान बेसहारा कऽ पानि बिनु मृत्यु भऽ सकैत अछि। नै नै एक वयक्ति के जिनगीसँ बढ़ि हमर पढाई नै छैक बरु हम पिताजीके सजाई भोगि लेबै मुदा हिनका हम एहन हालतमें छोड़ि के नै जेबै पढ़ेबाक लेल। मेनुका पानि लबैत अछि आ अप्पन टिफ़िनकऽ सबटा खाना हुनका अप्पन हाथसँ खुवाबि दैत अछि। तखने मेनुका के दीदी सब कॉलेजसँ छुट्टी भऽ कऽ आबि जाइत अछि। दिक्षा : मेनुका बौवा अहाँ कॉलेज नै गेलौ ? चलू आजु घरे कनीक, हम अहाँक सिकायत पिता जी सँ करैत छी। मेनुका : दीदी देखुने ई बेसहारा पानिसँ तड़पैत छलैथ तबहम हिनका लेल पानि लेब गेलौं ताहिसँ हमरा कॉलेज जाइमें देर भऽ गेल। आब अहिं कहुँ दीदी एक आदमी के जान सँ बढ़िके हमर पढाई तऽ नैने छैक… दीदी ? दिक्षा : आब घरहु चलब की हुनके संगे गठबंधन करेबाक विचार छैक ? आजु घर जाइमें कतेक देरी भऽ गेल से अहाँक पता अछि ? घर जाऽक की जवाब देबै पिताजी के ? भाग ~ २ राजा : बेटी दिक्षा ! अहाँ सबके कॉलेज सँ आबैमें किए देर भऽ गेल बउवा ? दिक्षा : नै पिता जी नै किछ, बाटमें संगी लोकेन सब सँ बतियाई लगलौं ताहि चलते आबैमें देर भ'गेल। ( दिक्षा बात छुपाक कहैत अछि। ) राजा : अच्छा कोई बात नै, बेटी अहाँ सब चारु बहिन आब सियान भ'गेलौं। हम अहाँ सब सँ किछ सवाल कऽ रहल छी। अहाँ चारु बहिन सोचिक जवाब देब। दिक्षा : जी पिता जी हम सब जरूर सही जवाब देबैन। राजा : दिक्षा ! अहाँ कहु तऽ केकरा सिरे पललौं, केकरा सिरे पढ़लौं आ केकरा सिरे कहल मानैत छी ? दिक्षा : पिता जी हम तऽ अहिंक सिरे पललौं, अहिंक सिरे पढ़लौं आ अहिंक सिरे कहल मानैत छी। राजा : अहाँ दिव्या ? दिव्या : पिता जी हम तऽ अहिंक सिरे पललौं, अहिंक सिरे पढ़लौं आ अहिंक सिरे हमहुँ कहल मानैत छी। राजा : अहाँ प्रिति ? प्रिति : पिता जी हम तऽ अहिंक सिरे पललौं, अहिंक सिरे पढ़लौं आ अहिंक सिरे हमहुँ कहल मानैत छी। राजा : अहाँ कहु मेनुका ? मेनुका : पिता जी जन्म तऽ जरूर माँ बाप दैत छथिन मुदा करम अपनेही होइत छैक आ जे जेहन करम करैत छथि ओकरा व्याह अनुसार फल मिलैत अछि। ( राजा क्रोधमें आबि जाइत अछि आ मंत्रीसँ कहैत अछि। ) राजा : मंत्री ! मंत्री .... मंत्री : जी ! जी सरकार .... राजा : मंत्रीजी अपने तुरन्त जाउ तऽ जेहने मिलैय तेहने लड़का खोजि के लाबू चाहे ओ लंगड़ा होय या लुल्हा अपाहिज तुरन्त हिनका बियाह करि ई राजसँ बिदाई करू। ( मंत्री जाइ छैक आ व्हे गाछ तरमें जे अपाहिज छेल्हा, हुनके उठाबि लबैत अछि। ) मंत्री : लिय ! लड़का लाबि देलौं सरकार। राजा : बहुत सुन्दर ! आब देखूँ करम तऽ अपनेही ? जल्दी सँ एकरा बियाह कराबि बिदा करू। ( मेनुका के बियाह व्याह अपाहिज व्यक्ति के संग करि राइतो राति घर सँ निकालि दैत अछि। मेनुका अप्पन पति के जहियो ने सकैय तहियो काँधमें लऽक रोबैत - रोबैत घरसँ निकैल चलि जाइत छथिन। किछ दूर गेलाकऽ बाद एक मसहूर गाछ नज़र अबैत अछि। ) मेनुका : चलैत - चलैत पायर थाकि गेल। जाई छी आ राति भर अहि गाछ के निचा में विश्राम करब आ बिहान होइते रास्ता देख्बैन। ( मेनुका अप्पन पति के गाछ तरमें सुताबिकऽ रोवैत - रोवैत अपनहुँ सुति जाइत छैक व्याह बीचमें आकाशवाणी आवाज़ अबैत अछि। ) आकाशवाणी : बेटी तू नै कान् ! हम तोरा ई दुःखसँ बेरापर होयबाक उपाय बतबै छियौ। ध्यान सँ सुन : एत सँ किछ दूर पूर्व एक माँ दुर्गा के मन्दिर भेटतौ, तू माँ दुर्गा के अप्पन भक्ति पूजापाठ सँ प्रसन्न करि, माँ दुर्गा तोहर भक्तिसँ प्रसन्न भऽक तोहर पति के दुःख हरि लेतौ। नारायण ! नारायण !! नारायण !! भाग - ३ ( बिहान होइबते मेनुका अप्पन पतिके लऽक अप्पन गन्तव्य के तरफ चलि देत छथि। किछ दूर गेलाकऽ बाद आकाशवाणी के अनुसार एक माँ दुर्गा के मन्दिर भेटैत अछि। मेनुका अप्पन पतिके मन्दिर के डेरियाह पर राखि के आकाशवाणीकऽ कहल अनुसार माँ दुर्गा के भक्ति करेमें लागि जाइत छैथि। ) मेनुका : ~~~ गीत ~~~ बिन्ती सुनु हे मईया हमरो पुकार - २ करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार - २ सब के हे मईया अहाँ देखैत छी - २ हमरा किया हे मईया अहाँ तड़पबैत छी - २ आब तऽ हम हे मईया भेलौं लचार , करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार !! सगरोसँ थाकि मईया अहाँकऽ द्वारमें आइल छी - २ ई बिपत के घरीमें हे मईया अहाँ कतऽ गेल छी - २ अहाँ बिनु दोसर हे मईया नै कोनो आधार , करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार !! अहिंकऽ चरणमें हे मईया अछि जिनगी हमर - २ अहिं एक माई हमर नै आउर कोई माई दोसर - २ अहाँ नै करबै हे मईया तऽ के करतै दुलार , करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार !! बिन्ती सुनु हे मईया हमरो पुकार - २ करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार - २ ( मेनुका के पति देवी माँ के कृपा सँ चले - बुले लगैत अछि। मेनुका अप्पन पति के चलैत बुलैत देखिकऽ मनमें बहुत खुशी होइत अछि आ अप्पन पति के माँ दुर्गा के प्रणाम कराब लऽ जाइत अछि। ) मेनुका : चलु माँ के प्रणाम करी। पति : अहाँके छी ? आ हमरा एम्हर के लौलक ? मेनुका : देखू अहाँ हमर पति छी आ हम अहाँके पत्नी, हमर पिता जी अहाँकऽ संग हमर बियाह कऽ देने अछि आ हमरा अहाँक सदा - सदा के लेल हमर पिता जी अप्पन राज्य सँ निकला कऽ देने अछि। आब हमरा लेल जिय के सहारा एकहिटा अहिं छी। एहे सँ जतेक जल्दी होयत अछि ततेक जल्दी ई राज्य सँ दोसर राज्य चलु। केनहायतो के अप्पन जिनगी सुख - दुःख काटैत दिन गुजैर् करब। पति : अच्छा ठीक छैक। हम अहाँके की कैह् कऽ बजाउ ? मेनुका : देखू अहाँ प्रिय कैह् कऽ बजाउ। पति : हेतै ! ( ओइठाँ सँ दुनू व्यक्ति चलि दैत अछि। किछु दूर गेला कऽ बाद रस्तामें एक नदी अबैत अछि। नदी के नजदीक पहुँचैत अछि तऽ देखैत छैक एकदम सँ नदी मे लाल भाँसैत रहैत छैक। मेनुका सोचैत छैक यदि हम ई लाल लैत छी तऽ हौ ने हौ ई काल भऽ सकैत अछि ! ताहि बीचमें हुनकर पति एक हाथमें धरि लैत छैक। आ मेनुका देखि कऽ हुनका कहैत अछि। ) मेनुका : देखू स्वामी अपने ई ल'के की करब ? अहीं सँ नीक अइ के फेक दियौ। ( मेनुका के पति लाल छैक की किछ आउर छैक से नै चिन्हैत छैक। ) पति : लिय प्रिय ! अहाँ कहैत छी तऽ हम फेक दैत छी। ( ओइ जगह सँ दुनू प्राणी बतियाइत आगू बढ़ैत अछि मुदा मेनुका के पति के मनमें ओइ लाल पर सँ मन नहीं हटैत छै। किछ दूर गेला कऽ बाद उ अप्पन पत्नी मेनुका के कहैत अछि ! ) पति : प्रिय देखू नऽ हमरा बड जोर सँ लहुसंका लागि गेल, अहाँ अईठाँ रूकू हम लहुसंका करि कऽ अबैत छी। मेनुका : हेतै जाऊ जल्दी सँ आइब ! ( मेनुकाकऽ पति जाइ छैथ। उ लहुसंका की करत, ओकरा तऽ उ लाल लेबाक छल। जल्दी सँ एक गोट लाल लऽक अप्पन प्यान्टमें लुकाबि लैत अछि आ फिर सँ वापस आबि जाइत अछि। ) पति : लिय प्रिय आबि गेलौं ! चलु आब !! मेनुका : चलि एलौं ? पति : हँ चलि एलौं। मेनुका : लिय तऽ आब चलू ! ( चलैत - चलैत दुनू व्यक्ति दूसरा राज्य के नजदीक पहुँचैत अछि। मेनुका सोचैत छथि आब हम दोसर के राज्यमें पहुँच गेलौं मुदा हम सब रहब कतऽ ?एक गाछ तऽर बैठ के विचार करैत छथि। ) पति : हम सब ई अन्जान गाउँमें जाऽ रहल छी मुदा हम सब रहब कहाँ प्रिय ? हमरा किछ नै फुराइय ! मेनुका : देखू स्वामीनाथ भगवान के घरमें देर होइत अछि मुदा अंधेर नै होइत अछि। किछ नै किछ उपाय जरूर भेट जाइत। ( ताहि क्षणमें एक बुढ़िया माँ अबैत छथि। ) बुढ़िया माँ : बेटी ! अहाँ के छी आ अहाँक घर कहाँ छैक ? मेनुका : देखू माँ ! हम सब के कोई नै छैक, हम सब बेघर बेसहारा छी, माँ जी। बुढ़िया माँ : देखू बेटी ! अहाँ हमरा माँ कहलौँ आ कैह् रहल छी की हमरा सब के कोई नै छैक चलू आई सँ अहाँ सब हमरे लग रहब, हमरा कोई अप्पन सन्तान नै अछि मुदा अहाँक देखिकऽ आई भगवान हमर आस पूरा कऽ देलखिन बेटा बेटी के आस पूरा कऽ देलखिन। " भगवान के माया कतौ धुप तऽ कतौ छायाँ " ( ओइ ठामसँ मेनुका अप्पन पति के संग बुढ़िया माँ के घर जाइत छैक। ) भाग - ४ ( मेनुका अप्पन पति के लऽक बुढ़िया माँ संगमें हुन्का घरमें रहे लगैत अछि। मेनुका के पतिके ओई गावँके लोग नवधिया कहिके बजबे लगैत अछि। २/४ दिन के बाद मेनुका के पति नदीमें सँ जे लाल लौने रहैय ओकरा उ नुका कऽ रख्ने रहै छथि। से लाँल लऽके मेनुका के पति बिहाने बिहान गडकावैय फेर उठावैय फेर गडकावैय उठावैय। जाईत जाईत मेनुका के पति ओई राज के राजा के घर के सामने पहुंचैत छथि आ उ लाल गडैक के राजा के द्वारमें चलि जाईत छथि। राजा के बेटी सुमैना दुवारे पर रहैत छथि। आ उ लाल अप्पन हाथमें धऽ लैत अछि। ) सुमैना : बाप रे बाप कतेक सुन्दर लाल छै । ( सुमैना लाल लऽके आँगनमें चलि जाईत छथि । एम्हर मेनुका के पति घुरि के वापस घर चलि जाईत छथि । दोसर दिन राजा के बेटी सुमैना नहाँ सोनाँह् के उ वाली एकटा कान मे पहिर कऽ मल्हिनियाँ के बोलबैत छथि । ) सुमैना : गे मल्हिनियाँ ..! मल्हिनियाँ : जी राजकुमारी जी ! सुमैना : देख्ही तऽ हम तोरा केहन लगैत छियौ देखमें ? मल्हिनियाँ : बड़ सुन्दर लगैत छी राजकुमारी जी मुदा एकर जोडी दोसरो कानमें रहैत तऽ अहु सँ बेसी सुन्दर लैगतौं अपने राजकुमारी जी। सुमैना : साच्चे कहैत छे नै ? मल्हिनियाँ : हँ राजकुमारी जी हम साच्चे कहैत छी । सुमैना : तऽ जो जल्दी सँ पिता जी के बोलाबि कऽ ला ! मल्हिनियाँ : हेतै हम जाईत छी, राजा साहब के बोलेबाक लेल। ( मल्हिनियाँ तुरन्त जाइत अछि राजा साहब के बोलेबाक लेल। ) मल्हिनियाँ : राजा साहब ! राजा साहब !! अहाँ के राजकुमारी जी तुरन्त बोलाबि रहल छथिन। राजा : कि बात भेलैय से मल्हिनियाँ ? मल्हिनियाँ : से बात तऽ राजकुमारी जी हमरा नै बतौलखिन। राजा : ले चल हम अबैत छी, देखैत छी जा के कि भेलैन। ( मल्हिनियाँ फेर दौड़ल - दौड़ल राजा आबसँ अगाडिये राजकुमारी लऽ पहुँच जाइत अछि आ राजकुमारी मल्हिनियाँ सँ पुछैत अछि। ) सुमैना : मल्हिनियाँ पिता जी आबि रहल छौ। मल्हिनियाँ : हँ राजकुमारी जी आबि रहल छथि, राजा साहब ! ( सुमैना रुसि के चुपचाप घरमें जाऽक सुति रहैत छथि। ) भाग ~ ५ ( राजा महल कऽ भीतर जाइत अछि आ बेटी सँ पुछैत छथि । ) राजा : बेटी सुमैना ! कि भेल किए नै बजैत छी, कोई किछ कहलकऽ की ? सुमैना : पहिने अहाँ हमरा पिता जी वचन दिय जे हम कहब से अहाँ करि देब । राजा : बाप बेटी मे कथी के वचन, बेटी हमरा लेल एकटा अहीं सब किछ छी । अगर नै मानव तँ हम वचन दैत छी जे अहाँ कहबै सेह हम करि देब । ( सुमैना उ लाँल निकाएल के राजा के देखवैत कहैत छैक । ) सुमैना : पिता जी हमरा ई लाँल के जोडी चाही । राजा : ई लाँल आहाँ कतँ से लैलौं ? सुमैना : ई लाँल अपन गावँ के नवधिया काईल खिन गडकावैत - गडकावैत अवैत रहै कि लाँल गडैक के अपन द्वार पर चलि एल आ हम उ लाँल उठा के अपन हाथमें लऽ लेलौं । उ नवधिया हमरा लाँल लैत देख के घुमि के अपन घर चैल गेल । राजा : लिय अहाँ निश्चिन्त भऽ जाउ अहाँ ई लाँलकऽ जोडी लएबाक लेल हम ओई नवधिया के बोलबैत छी । राजा : मंत्री ! मंत्री : जी महाराज ! राजा : जल्दी सँ जाऊ उ गाउँमें जे नवका नवधिया एल छैक हुन्का बोलाबिक लाऊ । मंत्री : हेतै महाराज ! हम जाइत छी अखुन्ते बोलाबिक लबैत छी । ( मंत्री जाइत छथि मेनुका के पति नवधिया के बोलेबाक लेल । जब मंत्री नवधिया के घर पहुँचैत अछि तऽ मेनुका के द्वार पर बैसल देखैत छथि । मंत्री लगे जाइत छथि आ मेनुका सँ कहैत छथि । ) मंत्री : अहाँ के छी ? नवधिया केम्हर छैक ? मेनुका : हम हुन्कर पत्नी छी, कहुँ कि बात छैक हम कैह् देबै हुन्का … मंत्री : राजा साहब के अडर अछि की नवधिया के जेना नै तेना महल में अएबाक लेल ! मेनुका : किए, हुन्का सँ कोनो गल्ती भेल अछि की ? मंत्री : से बात हमरा नै अछि पता, मुदा राजा साहेब हमरा तऽ खाली ई कहलक जे अहाँ जाउ आ नवधिया के बोलाबिक लाउ । मेनुका : अच्छा, ओ एतै तऽ हम राजा साहब के महलमें हुनका पठाँदेब । मंत्री : जल्दी पठाबि देबै नवधिया के … मेनुका : होतै । ( किछ देर के बाद मेनुका के पति घर अबैत अछि, तखने मेनुका हुन्का कहैत छथि । ) मेनुका : अहाँ के राजा साहब के मंत्री बोलेबाक लेल आइल छलाह । जाऊ देख आऊ कि बात छैक । नवधिया : अच्छा ठीक छै हम जाँके देखैत छी की किए हमरा राजा साहब अप्पन महलमें बोलौने अछि । भाग ~ ६ ( नवधिया राजा के घर जाएत छथि। राजा द्वार पर रहै छथि । नवधिया जा के राजा के नमस्कार करैत छथि। ) नवधिया : नमस्कार राजा साहब ! राजा : नमस्कार ! आऊ बैसू ! नवधिया : राजा साहब हमरा किए बोलैलौं ह ? राजा : अहाँ सँ एकटा जरूरी काज पैड गेल तै ताहि सँ आहाँ के बोलेलौं ह । नवधिया : जी राजा साहब कहुँ ने कि काज पडल ? ( राजा ऊ लाँल निकाईल के देखऽ दैत छैक आ कहैत छथि ) राजा : ई अहाँक अछि ? अहाँ आन्ले छलौं ? नवधिया : जी हम आन्ले छलौं ! राजा : अहाँ ई कऽतऽ सँ आन्लौं ? हमरा अइके जोडा चाही ! अहाँ हमरा अइके जोड़ा लाबि दिय । नवधिया : अच्छा ठीक छैक राजा साहब हमरा एक सप्ताह के समय दिय अइके जोड़ा लाबि देब । राजा : अच्छा ठिक छै अहाँ के हम देलौं एक सप्ताह के समय ... नवधिया : लिय तब हम जाएत छी । राजा साहब ! राजा : लिय जाऊ जल्दी आएब । नवधिया : जी हेतै । ( नवधिया घर आवैत अछि तऽ मेनुका हुन्का सँ पुछैत छथि ।) मेनुका : अहाँके राजा साहब अप्पन महलमें किए बजैने छल ? नवधिया : राजा याह् खातीर बोलैने छल की, जे अपना सब अप्पन राज सँ आबैत काल नदीमें ओ चिज नै बहैत छलै से हुनका चाही, व्याह् के लेल हमरा बोलौने छलाह । मेनुका : मुदा राजा साहब के कोनाकऽ पता चलऽल जे अहाँके उ चीज के बारेमें जानैत छी । नवधिया : हम आवैत खिन अहाँ सँ नुकाकऽ पेंन्में धऽ लेने छलौं कि वेहें पर्सुखिन हम गडकावैत छलौं से गरैक के राजा साहब के द्वार पर चलि गेल आ ओ राजा सहाब के बेटी उठा लेलनि ताहिसँ हुनका मालुम भेल हमरा ओ चिज के बारेमें थाह छैक कहिके ! मेनुका : हम अहाँक कहने छलौं नै लिय फेक दियौ कैह के मुदा अहाँ नै मानिकऽ हमरासँ नुका कऽ आनि लेलौं आब भेल ने फसाद ! अच्छा कोई बात नै जाउ हुनका हुनकर जोडी आनि दियौ । नवधिया : अच्छा ठीक छै हमरा बटखर्चा के जोगार कऽ के दिय हम जा रहल छी । मेनुका : कनिक रूकु , लिय ऐमें जलखै अछि , बाटमें भुख लागत तऽ खाऽ लेब । नवधिया : हेतै ! लिय हम जाएत छी । मेनुका : जाऊ जल्दी आबि घुरि कऽ ... नवधिया : अच्छा हेतै ! भाग ~ ७ ( नवधिया चलि दैत छथि ओई लाल के जोडी लएबाक लेल । जाएत - जाएत नवधिया वही नदी लग पहुंचैय । फेर देखैत छैक ऊ लाल एकदम सँ भासैत रहैय । नवधिया चलैत - चलैत भुखा गेल छल । ओ सोचैत छथि जे पहिने जल्खै खाबि लितौं तब ई समान लऽकऽ घर जाएब । जल्खै खेलाक बाद नवधिया के मनमें एक सवाल पैदा होईक छै जे ई लाल - लाल गोल समान कतऽ सँ भासैत आबि रहल अछि । ई पता लगावलेल नवधिया नदीके कातेकात सिरा के ओरी चैल दैत छैक । जाएत - जाएत दश कोस उत्तर चलि जाएत छथि । तेकर बाद एक महा घना जंगल आबैत अछि । ओईठाम नवधिया एक गज़ब दृश्य देखैत छथि । एक गाछी के दुफेरिया ठाँरिमें एक सुन्दर कुमारी कनियाँ के मुडी काटि के टांगल, ओई मुडी से जतेग बुन्द खुन चुबै सब ओई नदी के पानिमें गिरला कऽ बाद लाल बनि जाएत छलैथ । आ ओई कनियाँ के धर गाछ के जैरमें रहैय संगे बगलमें एक लाल एक हरियर रंग के तलवार राखल रहैत अछि । आउर एक नारियल के माहि भयंकर गाछ सेहो रहैत अछि ।एकाएक नवधिया के नजर वोई सुन्दर कनियाँ के नजर सँ टकराइत अछि । उ सुन्दर कनियाँ नवधिया के देख के खलखल हँसे लागैय आ नवधिया सँ पुछैत अछि ... ) सुन्दर कनियाँ : ह..हा..हा.. सुनु अहाँ के छी ? आउर ऐम्हर कतऽ एलौं ? ( नवधिया डर सँ भागे लगैत अछि । ) सुन्दर कनियाँ : देखु अहाँ नै डराउ, हम अहाँ के किछ नै करब । ( नवधिया रुकि जाएत छथि ) सुन्दर कनियाँ : देखु हम जे - जे कहैत छी से - से अहाँ करु, हमर ई मुडी खोईल के गाछ तरमें धर छैक अहाँ धर आ मुडी बीचमें हरियर रंग के तलवार राखि दियौं आ फेर उ हरियर रंग के तलवार खीँच लियौं । ( नवधिया सुन्दर कनियां केँ कहल अनुसार मूडी खोईल केँ आनै छैथ आ धँर मूडी केँ बीच मेँ हरिहर तलवार राईख केँ खीँच लै छै । सुन्दर कनियां सुगबुगाँ के उठै छैथ । ओकर नाम रहै छैथ लाँल कनियां । ओ नवधिया सेँ कहै छै । ) लाल कनियाँ : अहाँ ऐम्हर कथी खोज एलौं हँ ? नवधिया : हम ऐम्हर अखन जे नदी लाल ढिक्का भासैत नै छेल हम ओकरे खोजी करेबाक लेल एतऽ तक एलौं । लाल कनियाँ : देखु हमर पिता जी के आवै के समय भेल जाएत छैक । हमर पिता राक्षस छथिन ओ अहाँ के देखत तेअँ गिर जेता । से नै हम जेना - जेना कहैत छी ओनहायते करब । नवधिया : अच्छा अहाँ जेनहायते कहवै कर लेल हम ओनहायते करब । ( लाल कनियाँ मनेमन बिचार करै छथिन आब फेर कहिया ई मनुष्य सँ भेट हेत आ नै हेत से नै ऐह मौका छियै हम अपन पिता जी के एकर हाथसँ बध कराबिकऽ एकर संग शादी कऽ लेब । ओकरा सँ ओकर नाम पुछै छथि । ) लाल कनियाँ : अहाँ के नाम कि अछि ? नवधिया : हमरा सब कियो नवधिया कहैत अछि हमर नाम नवधिया अछि । लाल कनियाँ : देखु हम सुतै छी । अहाँ ई लाल तलवार सँ हमर मुडी काटि के पहिने जेना टांगल छल ओनहायते टांगि के अहाँ फूलवारीमें नुका के केनहायतो राति काटि लिय । काईल सवेरे हमर पिता जी फेर शिकार करऽ जेता तेकर बाद हम बोलाईब तब अहाँ आएब। नवधिया : ठीक छैक, हेतै । ( नवधिया, लाल कनियाँ कऽ बात मानि फूलवारी राति गुजारि लैत अछि । ) भाग ~ ८ ( साँझ होइते राक्षस अपन बासस्थान पर वापस आवै छथि आ अपन बेटी के मूडी लाल तलवार सँ जोडैत छथि । लाल कनियाँ उठि के अपन पिता के प्रणाम करैत छैक । ) लाल कनियाँ : प्रणाम पिता जी । राक्षस : खुश रहू ! बेटी आई हमरा एम्हर मनुष्य के गन्ध आबि रहल अछि । लाल कनियाँ : पिता जी ऐठाम तऽ एकटा हम्ही, हम्ही मनुष्य छी हमरे गन्ध अवैत हेत । अहाँक एम्हर तऽ दोसर कियो नै छथि । पिताजी आई हम अहाँ सँ एकटा बात पुछ चाहैत छी यदी अहाँ सँच - सँच बताईब तेँ हम पुछब । राक्षस : हँ पुछु की बात पुछ चाहैत छी । हम सँच - सँच बता देब । लाल कनियाँ : ई नारियल के गाछमें खोता जे छनि ओईमहक पंक्षी मैना कहियो ने कतौं जाई छैक कि बात छै अईमें पिता जी हमरा अपने सँच - सँच बताबु । राक्षस : देखु बेटी हम अहाँ के बतावै छी ध्यान दऽ के सुनु । ई नारियल के गाछ में जे मैना छै उ हमर प्राण छी । हमरा कोई नै मारि सकै छथि । हमरा मार लेल उ खोताकऽ मैना के मार पडतै तहने हम मरब नै तऽ नै ! एकर लेल ई लाल तलवारसँ नारियल कऽ गाछ के एक छह में काटि के गिरावे पडतै बादमें ओई मैना के मारतै तब हम मरब नै तऽ हम नै मरि सकैत छी । लाल कनियाँ : लिय पिता जी बहुत राति भऽ गेल । आब खाना खाऽ के आराम करू । राक्षस : हेतै चलु ! ( खाना खाऽ के दुनु बाप बेटी सुति रहैत छै । बिहान उठि के फेर बेटी के मुडी लट्का दैत अछि आ अपना शिकार मे निकैल जाईत छथि । राक्षस के गेलाकऽ बाद लाल कनियाँ नवधिया के बोलबैत छथिन । ) लाल कनियाँ : कोने छी निकैल के बहार आबू पिता जी चलि गेलैन शिकार पर । ( नवधिया फूलवारी सँ निकैल कऽ आवैत अछि । ) लाल कनियाँ : देखु काईल खिन जै तरिका से हमर मुडी जोड्ने छेलौं तहिना फेर जोडू । ( नवधिया लाल कनियाँ के मुडी आ धर जोडैत छैक आउर लाल कनियाँ फेर उठि के खार भऽ जाइत अछि आ नवधिया सँ कहैत छथि । ) लाल कनियाँ : देखू अहाँ जे चीज लेव लेल एलौं ई सेकरा पाँव लेल अहाँ के ई नारियल के गाछमें खोता छैक ओई में एकटा मैना छैक ओकरा अहाँ के मारे पड़त । नवधिया : देखुँ हम अपन समान पाँव लेल यी काज करेबाक लेल तैयार छी । लाल कनियाँ : तऽ है ई लाल तलवार लिय आएख छहमें नारियल गाछ के काटि खसाबु । ( ओहिनती नवधिया नरियल गाछ के काटै यऽ तेनहायते राक्षस के पायरमें ठेस लागैत छैक आ राक्षस के मालूम भऽ जाईत अछि कि हमर जान खतरामें छैक से... अप्पन बास स्थान के तर्फ राक्षस तेजी सँ चलि दैत छथि । तही बीचमें नवधिया मैंना के पकैड कऽ ओकर टांग तोरि दैत छथि कि तखने राक्षस लंगड़ा भऽ जाईत छैक, तहियो राक्षस लँगड़ाइत - लँगड़ाइत गडकैत फडकैत अवैत रहै अछि, कि अंतमें नवधिया मैंना के मुड़ी मचोरि दैत छैक आ मैंना के प्राण छुटि जाईत छैक आ राक्षस मरि जाईत छथि । ) नवधिया : लिय आब तऽ हम ई मैंना के मारि देलौं ! आब कहुँ कि कऽर पड़तै । लाल कनियाँ : देखु ई लाल तलवार हरियर तलवार संगमें लिय आ चलू अहाँ अपन घर के ओर ! नवधिया : मुदा हम जे समान लेव लेल एल छेलौं से समान ? लाल कनियाँ : अहाँ पहिने अप्पन घर तऽ चलू ओतै भेट जाइत समान । नवधिया : साँचे कहैत छी नै ? लाल कनियाँ : हँ - हँ साँचे कहैत छी हम, अहाँ चलू तऽ सही पहिने ! ( ओईठाम सँ दुनू गोटे चलि दैत अछि । जब नवधिया राज के नजदीक पहुंचैत छथि तऽ लाल कनियाँकऽ एक गाछ के निचामें बैठा दैत छथि आ कहैत छैक । ) नवधिया : देखु अहाँ अईठाम कनिक देर बैठु हम घर जाई छी अप्पन कनियाँ सँ हुकुम लेबाक लेल जे अहाँ के घर लऽ जाई कि नै लऽ जाई । लाल कनियाँ : अच्छा ! हेतै जाऊ । ( भाग - ९ ) ( मेनुका अपन पति नवधिया केँ येल देँख केँ पुछै छैथ । ) मेनुका :- एलौं ? नवधिया :- हँ चैईल ऐलुँ मुदा एकटा समान तँ । हम बाटे मेँ राईख केँ ऐलु येँ अहाँ सँ पूछँ जे हुन्का घर मेँ लावी कि नै ? मेनुका :- जाऊ आनुँ कियो उठाकेँ ल'जेत। ( नवधिया जाई छैथ लाँल कनियां केँ लाव । ) लाँ.कनियां:- कि कहलs अहाँ केँ कनिया ? देलs हुकुम हमरा लँsजाईलेँ ? नवधिया :- हँ हँ कहल्कै जल्दी आँनु । चलूँ जल्दी चलूँ । ( ओईठिन सँ नवधिया लाँल कनियां केँ ल'के घर जाई छैथ । लाँल कनियां मेनुका केँ देखकेँ हुन्का प्रणाम करै छै । ) लाँ.कनियां:- प्रणाम दिदी । मेनुका :- खुश रहु । ( मेनुका लाँल कनियां सेँ पुछै छैथ ।) मेनुका :- अहाँ केँ छी ? हमर पति तँ लाँल लाव गेल छेलाँ मुदा हिन्का संग मेँ अहाँ ? लाँ.कनियां:- देखुँ दिदी हम्ही छी ऊ लाँल समय आवतै सब जाईन जेब दिदी । हमर नाम चियै लाँल कनियां । मेनुका :- चलूँ ठीक छै । साँझ भsगेल खाना बनावै छी । दुर सँ एलौं अहाँ सब थाकल भूखायल हेब। खाना खाँकेँ आराम करब । लाँ.कनियां:- होइतै दिदी । ( खाना खाँकेँ सब कोई सुईत जाई छैथ । राजा के मालुम है ये नवधिया आयल सेँ । राजा बिहान सवेरे मंत्री केँ हुकुम करै येँ । ) राजा :- मंत्री नवधिया केँ जाँके कहुँ जे समान लाव लेँ हम हुन्का पठेनैँ छेलौं सेँ समान लँके तुरन्त आवै लेँ । मंत्री। :- होइतै महाराज । ( मंत्री जाई छैथ आ नवधिया सेँ कहै छैथ ) मंत्री :- ये नवधिया राजा सहाब तुरन्त जे समान लाँव लेल पठेनेँ रहे सेँ समान लँके तुरन्त कहलs आवै लेँ अहाँ केँ । ( मंत्री कैह के चैल जाई छैथ । नवधिया मंत्री केँ बात सुईन केँ कपार पँ हाथ धँके बैठ रहै येँ । तही बीच मेँ लाँल कनियाँ आवै छै । नवधिया केँ कपार पँ हाथ ध'केँ बैसल देख केँ पुछै छैथ । ) लाँ.कनियां:- मर अहाँ केँ की भेल कपार पँ हाथ धँके बैसल छी ? नवधिया :- जे समान लाँव लेँ राजा सहाब पठेनेँ जेल हमरा सेँ समान ल'के जल्दी आवैलेँ खबर पठेल्कै ये । लाँ.कनियां:- धुँ अहाँ अही खातीर चिन्ता करै छी । सुनु अहाँ एकटा कठौत मेँ भैर कठौत पाईन भैर केँ आँनु । ( नवधिया एक कठौत पाईन भोर के आनै छैथ । ) नवधिया :- लियँ आन्लुँ पाईन । लाँ.कनियां:- सुनु हम जेना कहै छी तैहनती करब । यी कठौत के ओल्ती मे राँखु । जैहनती हमर मूडी जंगल मेँ काईट के धर सेँ अलग क'के टांगने रही ओहिनती आईयो हमर मुडी के काईट केँ धर सेँ अलग क'के कठौत सामनेँ चार मेँ टांगु । जब कठौत भैर जेत तँ फेर धर मेँ सटाँ के हरिहर हरिहर तलवार सेँ जोईड देबै । ( नवधिया ओहिनती लाँल तलवार सेँ लाँल कनियां केँ मूडी काईट केँ कठौत सामनेँ चार मेँ टाईगं दैछै ।जतेग खून लाँल कनियां केँ मुडी सेँ कठौत मेँ खसै छै सब लाँल बैइन जाई छै आ कठौत पुरा भैर जाई छै । वाद मेँ फेर नवधिया लाँल कनियां केँ मूडी धर मेँ सँटा केँ हरिहर तलवार सेँ जोईड दै छैथ । लाँल कनियां उठै छै आँ नवधिया केँ कहै छै । ) लाँ.कनियां:- यैँ कठौत मेँ सेँ एकटा ल'के जाऊ राजा केँ दँsआबु । नवधिया :- है तै हम जाई जी पूगा आवै छी । ( नवधिया एकटा ल'के राजा केँ दैलेँ जाई छै ।) नवधिया :- प्रणाम राजा सहाब । राजा :- प्रणाम । आन्लौं समान ? नवधिया :- हँ आनलियै । हेँ लियँ । ( राजा उ लाँल लै छैथ आ बेटी केँ दै छै ।) राजा :- बेटी सुमैना हेँ लियँ लाँल केँ जोडी । सुमैना :- लाबु पिता जी । ( सुमैना उ लाँल धँ राखै छैथ । बिहान सबेरे नहाँसोनाँ केँ ऊ लाँल दोसरो कान मेँ पहिन केँ मलिनियां के बोलावै छैथ । ) सुमैना :- गे मलिनियां ? मलिनियां :- जी राजकुमारी जी ! सुमैना :- हे एत याँ ? मलिनियां :- कहूँ राजकुमारी जी । सुमैना :- कहँ तेँ मलिनीयां आब हम केहेन लागै छियै देखै मेँ ? ( भाग - १० ) ( मलिनियां सुमैना केँ देखैत कहै छथिन । ) मलिनियां :- वाह राज कुमारी जी कि रुप लागै येँ देखै मेँ संगे यी दुनु लाँल पहिन्लौं तेँ आउर सुन्दर देखै छी मुदा ऐ मेँ एकटा चिज आउर जेँ रहतियेँ तेँ आहाँ सुन्द्रता चन्दा केँ ज्योती केँ मलिन करतियेँ । सुमैना :- कुन चिज मलिनियां जल्दी कsह कि चियै उ चिज ? मलिनियां :- उ चीज चियै राज कुमारी जी हाँस बिहुस केँ फूल । आहाँ केँ जुरा मेँ हाँस बिहुस के फूल । आहाँ केँ जुरा मेँ हाँस बिहुस केँ फूल जब रहता तेँ आहाँ केँ सुन्द्रता केँ वर्णन नै पुछु ! सुमैना :- मुदा मलिनियां यी भेटत कतेँ ? ( मलिनियां ६ मास आगा आउर ६ मास पाछाँ केँ बात जानैत रहै छैथ । उ राज कुमारी केँ कहै छैथ । ) मलिनियां :- देखुँ राज कुमारी जी आहाँ केँ बचन देनेँ यैछ आँ येहो समान आहाँ केँ ओहे नवधिया आईन सकत आउर दोसर कियो नै । सुमैना :- साच्चे कहै छी तु ? मलिनियां :- हँ..हँ.. राज कुमारी जी । सुमैना :- ले तब जल्दी सँ पिता जी केँ बोलाँ केँ आँन । मलिनियां :- अच्छा हम जाई छी राज कुमारी जी । ( मलिनियां जाई येछ राजा केँ बोलाव लेल । ) मलिनियां :- राजा सहाब राजा सहाब राज कुमारी जी बोलावै छथिन आहाँ केँ । राजा :- ले..ले.. चल हम आवै छी । ( राजा आवै छैथ आ अपन बेटी सुमैना सूँ पुछै छैथ जे कि भेल । ) राजा :- बेटी सुमैना कहुँ कि बात । किये बोलेलौं हमरा कि भेल ? सुमैना :- पिता जी हमरा हाँस बिहुस केँ फूल चाही । राजा :- मुदा यी कतँ भेटत आँ के आनत यी । आहाँ तेँ हमरा बचन मेँ बाईध केँ बडका मुसिबत मेँ फसाँ देलौं । ( बीच मेँ मलिनियां बजै छैथ । ) मलिनियां :- कोनो मुसीबत नै राजा सहाब येहो काज नवधिया करताँ । आहाँ हुन्का हुकुम तँ करियौं । राजा :- लेँ तँ हम बोलवै छियै नवधिया आउर हुकुम करै छी यी हाँस बिहुस केँ फूल आन लेल । राजा :- मंत्री ..! मंत्री :- जी महाराज । राजा :- जल्दी सेँ जाऊ आ नवधिया केँ बोलाँऊ । मंत्री:- होइतै महाराज हम जाई छी । ( मंत्री जाई छैथ नवधिया केँ बोलाव लेल । ) मंत्री :- यौं नवधिया ..? नवधिया :- हँ मंत्री जी कहुँ कि बात ? मंत्री :- आहाँ केँ राजा सहाब तुरन्त बोलेलऽ । नवधिया :- अच्छा चलूँ । (नवधिया मंत्री केँ संगे राज दरवार जाई छैथ।) नवधिया :- प्रणाम राजा सहाब । राजा :- प्रणाम ! बैसु । नवधिया :- कहुँ कथि लेल हमरा बोलेलौं सरकार ? राजा :- आहाँ हमर कहलाँ करलौं मुदा यैं बेर फेर हमरा आहाँ केँ जरुरी पैड गेल आउर येहो काज अहीं केँ कर पडत । नवधिया :- कहुँ कि काज ? राजा :- आहाँ केँ हमरा हाँस बिहुस केँ फूल आइन केँ दियँ पडत । ( नवधिया किछ नै सोईच केँ राजा के देल आढैत स्वीकाईर लै छैथ । ) नवधिया :- हँ हेतै राजा सहाब हम आईन देब । राजा :- तँ लियँ जाऊ । ( नवधिया राजा केँ बचन दऽ दैयेँ जे हम हाँस बिहुस केँ फूल आईन देब । जे कि हुन्का हाँस बिहुस केँ फूल केँ बारै मेँ किछ मालुम नेँ छैन । नवधीया चुपचाप अन्हार चेहरा बनाँ घर जाई छैथ । घर नै किन्को सेँ बजै छैथ । ततबे मेँ मेनुका आँ वाँल कनियां आईब जाई छै । मेनुका पुछै छैथ । ) मेनुका :- कि भेल कि कहलऽ राजा सहाब ? नवधिया :- ओ कहलs हमरा हाँस बिहुस केँ फूल आईन दियँ । मेनुका :- तँ आहाँ कि कहलियें ? नवधिया :- हम कहलियै हेतै हम आईन देब जे हाँस बिहुस केँ फूल बारै मेँ हमरा किछ मालूम नै छै । ( बीचे मेँ वाँल कनियां बजै छैथ । ) लाँ.कनियां :-चिन्ता जुईन करु आहाँ सब येकर उपाय हमरा लँ छै । मेनुका :- कि उपाय बताऊ नेँ ? लाँ.कनियां :- हम कहै छी ध्यान दँsकेँ सुनु । ( भाग - ११ ) ( लाँल कनियां हाँस बिहुस फूल केँ बारै मेँ बतावै येँ नवधिया केँ ।) लाँ.कनियां :- देखुँ अहाँ ऐठिन सँ सिधा जाउ जतऽ सेँ हमरा लावलौं तऽते ओईठिन से फेर अहाँ १४ कोष उत्तर जायब । जब अहाँ १४ कोष उत्तर जेब तब माहा भयंकर सुनसान पहाड मेँ जंगल केँ बिच एक पोखैर भेटत ।अगर ओईदिन अहाँ सवेर पुगब तेँ ठिक येँ नै तेँ दोसर दिन अहाँ सवेरे पोखैर केँ चारो महाड केँ घुईमफिर केँ उत्तरबैरिया महाड पँ जाँ केँ कोनो ठिन निक जगह मेँ नुकावै केँ लेल सुरक्षित ठाम बनाईब जै सेँ कोई अहाँ केँ देखँ नै पावै ।जब राईत केँ ११ बजत तेँ अहाँ जाँकेँ नुकाँ जेब । जब पोने १२ राईत हायत तँ आकाशसे एक माहा बिशाल हात्ती आयत आ उत्तरबैरिया महाड पऽ जाँकेँ उतरत आउर चारो महाड घुईम केँ फेर उत्तरबैरिये महाड पऽ जाँकेँ पश्चिम मुहे सुईत जायत । तब हात्ती केँ शुर मेँ सँ सुन्दर कनियां निकलत । उ कनियां चारोदिस ताईक केँ पोखैर मेँ स्नान करँ जायत । स्नान कऽके फेर ऊ हात्ती केँ शुर केँ आगु मेँ आईब केँ अपन केश केँ जुराँ खोलत आँ पलथी माईरके झुमर खेल केँ लेल बैठत अही बिच अहाँ चुपचाप पछाडी सेँ जाँके ओकर मांग मेँ सेनुर धऽदेब । नुका केँ जेब जै सँ ऊ अहाँ केँ देखे नै बुझलौं कि नै । नवधिया :- जी बुईझ गेलुँ । मेनुका :- येकर मतलब येकरा हुन्का संग मेँ शादी करऽ परतै । लाँ.कनियां:- हँ दिदी । मेनुका :- नै यी नै हुवत । लाँ.कनियां:- देखुँ दीदी एना नै करु ।यी सब करम केँ फल छैथ । हिन्कर भाग्य मेँ येहे लिखल छै हमर अहाँ केँ रोक्ला सेँ किछ नै हेत । बरु हिन्का जल्दी सँ पठा दियौ येकर सिवा दोसर कोनो उपाय भी नै छैथ । मेनुका :- जब अहाँ कहै छी तँ जेतै मुदा यी उ कनियां केँ संग मेँ शादी केला सेँ हाँस बिहुस फूल मिल जेतै कि? लाँ.कनियांं :- देला केँ बाद सब किछ वेह कनियां करतै । ( तेकर बाद लाँल कनियां आउर मेनुका मिल केँ नवधिया केँ बटखर्चा केँ संग मेँ एक बट्टा सेनुर दऽके हाँस बिहुस फूल केँ खोजी मेँ भेज दे येँ । ) मेनुका :- हे यी लियँ खाई केँ सामान छी जब रस्ता मेँ मुख लागत तेँ खायब आउर यी सेनुर निक सेँ राखब बुझलौं । नवधिया :- हँ हँ लाबुँ । मेनुका :- लियँ । नवधिया :- लियँ हम जाई छी । मेनुका :- लियँ जाउँ । ( नवधिया हाँस बिहुस केँ फूल केँ खोजी मेँ चैईल दै छैथ । जाइत जाईत नवधिया जै ठिन सेँ लाँल कनियां ल'गेल रहै ओई ठाम पहुचै छै आ हुन्का ओइठिन साँझ पेर जाई छै । राईत नवधिया ओहिठिन रैह केँ बितावै येँ । दोसर दिन बिहान सवेरे फेर चैईल दै छै । जब नवधिया पहाड केँ नजदिक पूगै येँ तँ फेर साँझ पैईर जाई छैथ । ओईदिन नवधिया पहाड केँ कात रैह केँ राईत काटै येँ । दोसर दिन फेर बिहाने चैईल दै छै । जब नवधिया १ घण्टा केँ रस्ता काटै येँ तब आवै ये पहाड केँ घंघोर जंगल जेकर बिच मेँ बिशाल पोखैर देखै छैथ । नवधिया पोखैर केँ महाड पँ जाई छैथ तेँ नवधिया केँ लागै येँ जेना चारो दिस सेँ हुन्का किछो झपटै लेँ खोजै येँ ।नवधिया केँ मन मेँ डर समा जाई छैथ । नवधिया जैनंग तेनंग निडर भऽकेँ पोखैर केँ चारो महाड घुईम केँ उत्तरबैरिया महाड पऽ जाई छैथ । चारो दिस खोजै छै जेँ कोईठिन नुकायब । देखै छै कात मेँ माहा झपटगर झार । ओही झार मेँ नवधिया नुकावै केँ जोगार मिलेलक ।जब राईत के ११ बजल तेँ नवधिया जाँ केँ नुका गेल । जब १२ बजै मेँ १५ मिनट बाँकी रहल तेँ आकाश सेँ ऊ तेज हावा मेँ हनहनाईत माहा भयंकर बिशाल हात्ती आवै छै । हात्ती आईब केँ पोखैर केँ चारो महाड घुईम के उत्तरबैरिया महाड पर जाँके पश्चिम मुह भ'के सुतै छैथ । बाद मेँ हात्ती केँ शुर सेँ एक सुन्दर कनियां निक्लै छैथ । जेकर नाम हाँस बिहुस रहै छै । हाँस बिहुस पोखैर मेँ जाँके नहावै छै । नेहाँ केँ आइब केँ हात्ती केँ शुर अगाडी मेँ पलथी माईर केँ बैईठ जाई छै आ झुमर खेल केँ लेल केश केँ जुराँ खोले येँ । जैहनती हाँस बिहुस जुरा खोलै येँ तैहनति नवधिया लाँल कनियां केँ कहल जेहाईत पिछा सेँ आईब केँ हाँस बिहुस केँ मांग मेँ सेनुर ध'दैये । हाँस बिहुस पिछा घुईम केँ देखै छैथ नवधिया केँ । नवधिया डर सँ थरथर काँप लाग्लैन । नवधिया केँ थरथर कापैत देख केँ हाँस बिहुस हँसे लाग्लैन आँ नवधिया सेँ कहै छैथ । ) ( भाग - १२ ) हाँस बिहुस :- हाँ...हाँ...हाँ...! सुनु नैं डराबु । अहाँ हमर मांग भैर कें हमरा लेल बहुत निक काज केलौं । हमरा आईतक मनुष्य कें दर्शन नै भेल रहें मुदा आई अहाँ ओहो में हमरा अपन अर्धाग्नि बनेलौं । अहाँ तँ हमर प्रमेश्वर छी । ( नवधिया किछ नै बजै छैथ चुपचाप हाँस बिहुस कें बात सुइन रहल यें ।) हाँस बिहुस :- अहाँ यी कहुँ अहाँ कें घर कतँ भेल ? आब चलु हमरा लsकें घर । नवधिया :- हम अहाँ कें लsकें घर जेब मुदा हम अहाँ कें कुन हिसाब सें अपन घर लsजेब ? हाँस बिहुस :- देखुं अहाँ हमर सीत में सेनुर भरलौं तैं हिसाब सें हम अहाँ कें पत्नी आउर अहाँ हमर पती । हमर अहाँ कें आब पतीपत्नी कें रिस्ता बैन गेल । नवधिया :- मुदा हम तँ एल छेलु हाँस बिहुस फूल कें लेल । हाँस बिहुस :- देखुं अहाँ कें हाँस बिहुस कें फूल भेटत पहिनें घर तँ चलु । नवधिया :- साच्चें कहैं छी ? हाँस बिहुस :- हँs..हँs..सांचे कहैं छी चलु । ( नवधिया कें थांह नै रहैं यें जे एहे छी हाँस बिहुस एकरे नाम अइछ हाँस बिहुस । ओईठिन सँ दुनोगोटा चैल दै छैथ । अवैत अवैत जब लाँल कनियां कें नहिरा लें आवै यें तँ हाँस बिहुस नवधिया सें कहै छैथ । ) हाँस बिहुस :- सुनु ! नवधिया :- कि ! बाजु ? हाँस बिहुस :- ताबें अहाँ कनिखिन अहिठाम बैसु हम अपन सखीकें भेटकें आवै छी । नवधिया :- कि नाम छी अहाँ कें सखी कें ? हाँस बिहुस :- लाँल कनियां । नवधिया :- चलु चलु अहाँ कें सखी ओतैं घर में भेट भsजेत । ( नवधिया कें यी बात सुइन कें हाँस बिहुस बुईझ गेल की यी सब भेद लाँल कनियां हिन्का बतेलs आ सिखेलs यें । फेर ओई ठिन सें दोनोगोटा चैईल दै छैथ । घर पूगै यें तँ लाँल कनियां आउर मेनुका दोनोगोटे मिल कें स्वागत कें साथ हिन्का सब कें घर में प्रवेश करावैयें । राजा कें मालुम हैं यें जे नवधिया अबिगेल सें । तुरन्त मंत्री द्वारा आढैत पठावै यें जे हाँस बिहुस कें फूल लsकें आवै लें । मंत्री जाई छैथ कहैं लें । ) मंत्री :- यौं नवधिया ? नवधिया :- जी कहुं मंत्री जी । कहूं की ? मंत्री :- जे सामान लाव पठेनें रहें राजा झं सहाब ओं सामान लsकें जल्दी कहलs आवै लें । ( एतेग कही कें मंत्री चैईल जाईछैथ । नवधिया कें तँ किछ नै फुराईयें आं नै खाना खाईयें चुपचाप मन माईर कें सुइत रहैं यें । सें देख कें हाँस बिहुस पुछै यें । ) हाँस बिहुस :- मर स्वामीनाथ की भेल । नै खाई छी नै पियै छी आँ चुपचाप कियें मन माईर कें सुतल छी ? कहूं हमरा की भेल ? नवधिया :- किछ नै भेल । बात कि छै जें जै चिजलें राजा हमरा पठेनें रहें सें तँ हम लावबेनें केलियैं । हाँस बिहुस :- कुन चीज ? नवधिया :- हाँस बिहुस कें फूल । हाँस बिहुस :-तँ अहाँ येतबें खातिर खटपरौन धेनें छी । अहाँ तँ हाँस बिहुस फूलकें गाछी लाबि लेनें छी । नवधिया :-सें कोना कें ? हाँस बिहुस :-हमरा जें आनलौं । नवधिया :-अहाँ तँ मनुष्य छी । फेर फूल केनंग कें......? हाँस बिहुस :-हम जें जें कहैं छी सें सें करू आँ देखुं । ( भाग - १३ ) ( हाँस बिहुस नवधिया सें कहैं छै । ) हाँस बिहुस :- अहाँ सब सें पहनें जाउ एक सेट नवका तास आउर एकटा तन्ना लाऊ । तेकर बाद में देखूं कि सब होई छै । ( नवधिया तेजी सँ जाके एक सेट तास आउर एकटा तन्ना लाइब कें दें छै । ताही बीच में हाँस बिहुस मेनुका आउर लाँल कनियां बोलाs कें लावै छैथ ।) नवधिया :- हें यी लियँ तन्ना आँ तास । ( हाँस बिहुस खटिया पs नवका तन्ना बिछा दैछैथ । लाँल कनियां हाँस बिहुस एक दिस आउर मेनुका नवधिया एक दिस भsकें तास खेलs ले शुरू कsदै छै । जव कि नवधिया कें तास कें बारें में किछ नैं जानैं छैथ । बेर बेर मेनुका नवधिया के कारण सँ हाईर जाई छैथ । नवधिया आउर मेनुका के बताबती हुव लागै यें । नवधिया आउर मेनुका बिच बताबती हैत देख कें लाँल कनियां कें हसीं लाईग जाई छै । लाँल कनियां कें हसैत देख कें हाँस बिहुस कें रहल नैं जाई यें आँ वोहों हंस लागैं यें । जैं हाँस बिहुस हसैं छै तैं भैर खटिया हाँस बिहुस कें फूल भsजाई छै । अही क्रम में दोनो सखी हँस में लाईग कें हाईर जाई छै आँ नवधिया जीत लैं छैथ ।) नवधिया :- देखु त ऐ बेरी जीतलियै कि नैं । हाँस बिहुस :- जी स्वामी जी जीत गेलौं तब तँ भैर तन्ना फूल भेल । नवधिया :- साच्चे कतेग सुन्दर फूल छैं । हाँस बिहुस :- लियँ आब खेल बन्द करू जैं कें खातिर खेल खेल लें शुरू केली रहें सें काज भsगेल । आब जें छै हम अहाँ कें फूल कें माला गुइथ कें दै छी अहाँ राजा कें पुगा आबुं । नवधिया :- अच्छा होईतैं । जल्दी गुइथ दिअँ । ( हाँस बिहुस तुरन्त माला गुइथ कें नवधिया कें दै छै । ) हाँस बिहुस :- हं यी लिअँ । जाऊ राजा सहाब कें पुगा आबु । ( नवधिया हाँस बिहुस कें फूल कें माला पुगाव जाई छैथ । ) नवधिया :- राजा सहाब प्रणाम । राजा :- प्रणाम । आनलियै हाँस बिहुस कें फूल ? नवधिया :- हँ राजा सहाब हम तँ फूल कें माला बना कें लाईब देलौं । राजा :- लाबु तँ देख्बै केहेन छै । नवधिया :- यी लियँ । राजा :- बड सुन्दर छै । ( राजा सोचै छै हिन्का जें जें कहलियै सें सें अपन जान कें परवाह नैं कैर कें लाईब देलs सें नै हिन्का ओकर बदला में किछ देव कें चाही हमरा आउर नवधिया सें पुछै छै । ) राजा :- कहुं नवधिया अहाँ हमर कहल सब चिज लाविदेलौं तेकर लदवा में हम अहाँ कें किछ दिअँ चाहै छी । कहुं कि लेब ? नवधिया :- हम कि मांगब राजा सहाब अहाँ कें इच्छा । राजा :- लिअँ जाउ हमर पुराना राजमहल में अहाँ सब रहूं आई स उ भवन अहाँसब कें भेल । नवधिया :- हे तैं हम जाई छी । राजा :- लिअँ तब जाउ । ( राजा बेटी कें बोलाs कें फूल कें माला दै छै । ) राजा :- बेटी सुमैना .. सुमैना :- जी पिता जी । राजा :-हँ यी लिअँ हाँस बिहुस कें फूल आइन देलक । सुमैना :- बाs कतेग सुन्दर फूल कें माला । ( सुमैना फूल कें माला राइख छोडैं यें आं बिहान सबेरे सब दिन कें नेहाइत नहां सोनां कें दुनु लाँल पहिर कें अपन जुरा में मलिनियां कें कहल अनुसार उ फूल कें माला लगाs लैयें आउर मलिनियां कें सोईर पारै यें ।) सुमैना :- गे मलिनियां हे एनें यां । मलिनियां :- जी राज कुमारी जी एलौं कहुं की कहैं छी ? ( सुमैना मलिनियां दिस घुईम कें कहैं छैथ । ) सुमैना :- लें आब कहs जे हम केहेन लागै छियैं ? मलिनियां :- अहाँ कें सुन्दरता के तँ बयान नैं यें राज कुमारी जी बिलकुल स्वर्ग कें परी लागैं छी अहाँ मुदा....... एक चिज बिन । सुमैना :-मुदा आब कुन चिज जल्दी कहs ? (भाग - १४) मलिनियाँ:- राज कुमारी जी यदि अहाँके मांगमे सेनुर जब रहति तब अहाँ के सुन्दरताके बयान मत पुछु जतेक करी ओतेक कम पडति । सुमैना:- मुदा सेनुर त' शादीसुदा नारीके सृगार अछि । हम तँ अखन कुमारी छी कोनाके पैहिरब सेनुर हम ? मलिनियाँ:- शादी कऽ लियौं ! सुमैना :- केकरा संगे ? मलीनियाँ:- आउर केकरा संगे ओहे नवधिया संगे करू । सुमैना :- मुदा ओ त' बिलकुल अनपढ गवार छथि ।हम तँ स्विकिरै छी मुदा पिता जी स्विकारतै कह् मलिनियाँ ? मलिनियाँ:- राज कुमारी अहाँ नवधियाके अनपढ गवार कहै छी ? जे पुरुष अप्पन जाँन पऽ खेल कऽ अहाँके हर ख्वाईसके पुरा केलक । हँ मानैछी हमहुँ जे ओ अनपढ गवार छथि मुदा जे काज किन्को सऽ नही हुववाला काज ओ कऽके देखादेलक आउर संगे ओ नेक पुरा साफ बिचारके ईन्सान अछि । जहातक रहल राजा सहाबके बात , तँ हर बाप अप्पन सन्तानके खुशी चाहै छथि । जही सऽ सन्तान खुश रहें ओहे काज करै छै अप्पन सन्तानक' लेल । एक त' अहाँके पिता जी ओ राजा अछि जे ' जाँन जाए पर बचन नही जाए ' । अहाँ किए बेसी सोचै छी ? जाऊ जाके कहुँ राजा सहाब सऽ अप्पन मोनक' बात । सुमैना:- त' बोलाए के आन नें पिता जीके। मलिनियाँ:- जरुर हम जाए छी बैलाएके लावै छी । ( मलिनियाँ राजाके बोलाएके लावै छथि ।तेकर बाद.......................................) राजा :- की बात बेटी सुमैना आब कुन चिजके जरुरी पडल ? सुमैना :- पिता जी अहाँ आए तक हमरा किछु चिजके कमि मह्सुस नैं हुवें देलौं । हमर मागल हर चिज अहाँ पुर्ति क'देलौं । आए पिता जी हम अहाँ सऽ अन्तिम चिज मांगीरहल छी आ हमरा पुरा बिश्वास अछि जें अहाँ अस्विकार नैं करबै हमर माग पुरा करबैन । ओना त' पिता जी जे चिज हम माग जाँरहल छी से चिज कोनों बेटा आ बेटी अप्पन मातापिता सऽ मुह खोएल नैं मागै छै । अदि यी अहाँके दृष्टीमें गलत देखाएत त' यी अबोध बेटी समैझ माफ करब । राजा :- बाजू त' सही की माग चाहै छी ? सुमैना :- पिता जी हम शादी करऽ चाहै छी । राजा :- अहाँ तऽ जे हम सोचैत रही से खुद बेज देलौं । हम काल्ही खुन मंत्रीके पठावै छी निक लड्का खोजएके लेल । सुमैना :- पिता जी लड्का खोजी करऽके जरुरी नैं अछि। लड्का अही गाँवमे छै । राजा :- लड्का अही गाँवमे अछि, के ? ( बिचेमें मलिनियाँ बजें लिगै छै ।) भाग -१५ मलिनियाँ:- राजा सहाब ओ लड्का आउर दोसर नै किओ नवधिया अछि । राजा :- मुदा मलिनियाँ ओ त' शादीसुदा पुरुष अछि ।आउर हम सबकिछ जानैत कोनाके हुन्का संगमे अप्पन बेटीके विवाह कऽदी यी असम्भव छै मलिनियाँ यी असम्भव छै । मलिनियाँ:- राजा साहब अहाँके मालुम नैं अछि ओ शादासुदा नै की ३/३टा पत्नी छै। जे की हुन्कर २टा पत्नी के जोत सँ अप्पन राज कुमारी एतेक सुन्दर लागिरहल अईछ । राज कुमारीके कान महक कुन्डल नवधियाके दोसर पत्नी लाँल कनियाँके जोत अछि तैहनती जुरामे नवधियाके तेसर पत्नी हाँस बिहुसके हँसीके जोत हाँस बिहुस फूल अछि राजा सहाब। हमरा त' लागै यें अप्पन राज कुमारी नवधियाके संगमे बहुत खुश रहति आ एहो बिश्वास छै हमरा जे ओसब राज कुमारीके अस्वीकार नैं करथि , स्वीकारथि छोट बहिन जकाँ प्रेम आ दुलार देथिन । दोसर बात त' यी राजा सहाब अहाँ राज कुमारीके बचन दऽदेनें छी । एहेन मोका फेर-फेर नही आयत माहाराज ! देखुँ ३टा पत्नी हबितो कतेक निमन सुखी संसार छै नवधियाकें । राजा :- मुदा यी प्रस्ताव नवधियाके पत्नी मेनुका स्वीकारथि तब नें ! मलिनियाँ:- माहाराज अहाँ पहिनें प्रस्ताव त' लऽके जाऊ । अहाँके प्रस्ताव ओ कभियो नें अस्वीकार करथि । हँ देर सही मुदा हैंस हैंसके स्वीकारथि । राजा :- ले त' मलिनियाँ तु कहै छी त' हम जरुर जायब अप्पन बेटीके खुशीके लेल नवधियाके घर ।जही में सन्तानके खुशी ओहीमे पिताके खुशी । ( राज कुमारी राजाके निर्णय सुनीके खुशी सऽ झुईम उठै छैक आ मलिनियाँके धन्यवाद दैत सखी संगीके संग नाचे गावें लागै छै ।) सुमैना :- मलिनियाँ हम बहुत बहुत आभारी छियौ तोहर हमर बहिन तु जे हमर मनके बात पिता जीके कही देलें । मलिनिया:- धन्यवाद राज कुमारी जी । हमहुँ आई बहुत खुश छी राज कुमारी जी जें अहाँ हमरा अप्पन बहिनके दर्जा देलौं । अहाँके जीनगीमे हरपल सदखिन खुशीके वर्षात हुवैत रहें सें हम भगवती सऽ कामना करै छी । ( सुमैना खुशी सऽ कल्पना संसारमे पुगी जाईत छै ।) सुमैना :- गीत ﹏ ﹏ ﹏ ﹏ आब त' बनतै दुल्हिन सखी एहो सुमैना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! माथ हमर मन्टीका सजतैं, हाथ दोनो हमर कंगना ! हिरामोती सऽ चम-चम चमकतैं सखी हमर गेहना !! देरी जुनी करू जल्दी आबू यौं हमर सजना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! घरसब नव रंग सऽ रंगतै, मडुवा सजतैं बिच अंगना ! द्वार पऽ गेट मंगल घट़ सऽ सजतैं, बजतैं ढोल बजना !! हम त' लेबैं पिया सऽ नौ लख्खा हार मुह बजना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! आब त' बनतैं दुल्हिन सखी एहो सुमैना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! राजा :- बेटी सुमैना जाऊ अहाँ लोकिन महलमे आराम करु हम जाई छी मेनुका सऽ बात करऽ ( सुमैना आ मलिनियाँ आराम करऽ महलके भित्तर जाई छथि आउर राजा चैली दैत छैक नवधियाके घर सुमैनाके शादीके बात करऽ ।) ( भाग - १६ ) ( राजा मेनुकाके घर पंहुचैं अछि । तहीं बखत दुवार पऽ नवधिया बैसल रहै छथि । नवधिया राजाके अप्पन घर आयल देखी कऽ ओ अप्पन हैसियतके मुताविक स्वागत करै छथि । लोटामे पानी लाविके राजाके पाएर पखारीके एक चटाई बिछाकें ओहीं पऽ आसन करावै छथि ।) नवधिया :- नमस्कार राजा साहब राजा :- नमस्कार नवधिया :- कहूँ राजा सहाब की जरुरी पडल जे अहाँ अपनें चलीकें हमर दुवार पऽ एलौं । कही की स्वागत करी हुजुरके ? राजा :- देखूँ पहिनें मेनुकाके बजाके लाबूं । नवधिया :- मेनुका कत छी अहाँ ? देखूँ तँ आई दरबाजा पऽ के एल्खिन यें । मेनुका :- जी हम आबिरहल छी । ( मेनुका दुवार आवै छै तँ राजाके देखै अछि आ जाँके ओ राजाकें प्रणाम करै छथि ।) मेनुका :- प्रणाम राजा सहाब राजा :- सदा सुहागिन रहूँ । बेटी मेनुका हम अहाँ सँ किछ बात करऽ लेल आयल छी । अदि अहाँ इन्कार नै करब तऽ हम कहऽ चाहै छी । मेनुका :- देखूँ राजा सहाब अहाँ हमर पिता सामान अछि आउर अहाँ हमरा बेटी कहलौं तँ किओ बेटी अप्पन पिताके बातकें ईन्कार कsसकै छै की । अहाँ कहूँ की बात अछि पिता जी ? हम अहाँके बातके एकोरति नें ईन्कार करब । राजा :- बेटी आई हम अप्पन घरके ईज्जत अहाँके खौछामें देब लेल आयल छी । मेनुका :- देखूँ पिता जी हम नैं बुझ्लूँ खोईल कs कहूँ ? राजा :- बेटी मेनुका हमर बेटी सुमैना कहै छथि हम शादी करब तँ सिर्फ नवधियासें नहीं तँ नैं । तही सऽ हम अहाँ लोकिन लँ एलौं अप्पन बेटीके खुशीके भीख माग लेल । हमर बेटीके छोट बहिनके रुपमें अपना लियँ बेटी । ( मेनुका एकछन गुम भऽजाई छै , तेकरबाद ।) मेनुका :- नैं पिता जी एना नैं कहूँ । यी तऽ हमर सौभाग्य अछि जे हमरा आई छोट बहिन भेटल ।हमअहाँकें यी बात स्वीकार करै छी पिता जी । हमर बिचार सँ जतेक जल्दी हुवें ततेक जल्दी शादी करू । राजा :- देखूँ बेटी अहाँ हमरा पिता कहलौं तही लऽके हम दोनों घरकें जीम्मेबारी खुद लै छी । अहाँ लोकिन शादीके बिषयमें कोनो किसिमकें चिन्ता जुनि लियौ । हम स्वंम सब किछकें बन्दोवस्त करै छी । सुमैना :- जे बिचार अहाँके पिता जी । राजा :- लियँ त' आई शुक्रबार छी मंगलबारके शादीके ठिक पक्का बुझूँ । सुमैना :- बहुत निक पिता जी । राजा :- तब हम जाई छी । सुमैना :- होतैं पिता जी । ( राजा शादीके तयारी करऽ लेल अपन घर चलि जाई छथि । एम्हर मेनुका घरमें कहूँ तऽ सबमें एक किसिमके अनौठा खुशीकें महसुस भ'रहल छै । सब किओ खुश छथि । एक तऽ सुमैनाकें आबैके खुशी तऽ छेवें करथि दोसर मेनुकाकें कोखमें पलीरहल बच्चाके आबवाला दिन भी नजदिक आबिरहल अछि । तहीं सs सब किओमें खुशीके रौनक छाऽगेल अछि। ३ दिन कोना बितगेल किन्को मालुम नैं भेला । अन्तिममें मंगल दिन नवधिया सुमैना बियाहे दुल्हा बनिकें बरयातीके साथ राजाके दुवार जाई छथि । आर्य निति नियम अनुसार सुमैनाके शादी नवधियाके संगमें सम्पन्न होई छथि । अन्तबेर जहीं बेटीके राजा माँ आँ बाप दुनोके प्यार आ दुलार दऽके पोसल ओ जीगरके टुक्रा एकाएक अपना सँ दुर जाई बखत राजा अपना आपके सम्हारें नै सकै छथि । आँखी सँ नोर भह् लागै छै आ बेटी सँ कहै छै ।संगे सब गाम समाजके आँखी नोर आबी जाई छै) समदाउन _______________ हाँ आऽ रे.... बापके दुलारी सुमैना ( पिया घर चललै-२) नहिहर बहैं सब आँखी नोर जाऊ बेटी हँसीखुशी रखियह कुलके मान आब त' पत्तियें छिय तोहर प्रमेश्वर भगवान हाँ आऽ रे... मिलि रे लियो जुली लियौ (सखी रे बहिन्पा-२) सब तकै अछि अहींके ओर जाऊ सखी जाऊ सखी साजन केर हे गाम ! सास-ससुरके मानियेह बेटी तु पैध भगवान हाँ आऽ रे.... बापके दुलारी सुमैना ( पिया घर चललैं-२) नहिहर बहैं सब आँखी नोर ( बरात बिदाई भ'जाई छै । जब नवधिया दुल्हीनके लऽके घरके नजदिक पहुचें पऽ होईत रहै छै आ दुवार पऽ लाँल कनियाँ दुल्हा-दुल्हिनकें आबै के बाट तकैत रहै छै। ताही बिचमे मेनुकाके एका एक ....... ) ( भाग - १७ ) ( बरात बिदाई भ'के चलि जाइ छथि । ओम्हर लाँल कनियाँ नवधिया "भोला" आ सुमैनाके आवैके बाट निहारै छथि । सुमैनाके आविरहल खबर सुनी कँsमेनुकाके गर्भके दरद उठि जायत अछि । ) सोहर :- एक त' पिया मोरा भोला दोसर सुमैना बियाहे गेला ! ललना रे तेसरमे गर्भके दरदिया बड सतावेला रे-२ !! लाँल पियाके बाट तकै दुवार में -२ हाँस बिहुस छै कोहबर सजावै में -२ ललना रे दरदके मारे हमरा किछ नें फुराई अछि रे-२ ! सुमैना बियाह पिया दुवार एल -२ सब सखी सुमैनाके परिछें गेल -२ ललना रे सुमैनाके राखिते पायर बोवा जन्म लेल्कै रे-२ ! लाँल खुशी झुमी कs नाँचs लाग्लै-२ देखिते सचमैना बौवाके गोदी लेल्कै-२ ललना रे हँसितें हाँस बिहुस भरी आंगन फूलेफूल भेलैं रे-२! ( सुमैनाके राखितें अंगनामे पायर मेनुकाके कोगख सँs नव राज कुमारके जन्म होएत छैथ । जेकर नमाकरन करैत अछि "अमर" । अमरकें जन्म सँ पुरा राज खुशी अछि । दिनचरिया कटैके क्रममें एकदिन मेनुकाके मनमें अप्पन मातापिताके देखएकें लेल जेबाके बिचार पैदा होएत छै मुदा यी बात केकरा कहति जें हम माँ बापकें देख जायब आ चुपचाप मन मारिके बैसल रहै अछि । मेनुकाके मन मारिके बैसल देखि कँs सुमैना पुछै छैथ मेनुका सँs ।) सुमैना: दिदी की भेलैन जें एना मन उदास कँsकें बैसल छथि । मेनुका: नै किछ ओहिनती बैसल छी । सुमैना: नै दिदी जरूर किछ बात अछि जे अहाँ हमरा सँ छिपारहल छी । कहूँ की बात अछि दिदी जें अहाँ एना मन मारिके बैसल छी ? मेनुका: बात किछो नै अछि सुमैना बस माँ बाबुके याद आबि गेल । देखके मन करै छै । सुमैना: एतबेंटा बातमें दिदी एतेक उदास चलूं काल्हिखुन सबगोटा जबैं माँ बाबु जीके देखकें लेल । ( दोसर दिन बिहान सवेरें नवधिया संग सब गोटा चलि दैत अछि मेनुकाके नहिहर माँ बापके देखकें लेल । जब मेनुका नहिहर पहुचै छथि तँ ओहि राजके किओ नैं पहिचानै छथि मेनुकाकें ।ओहीठाम देखै छथि कत्तौ नें अप्पन मातापिताके घर नजर आवैत अछि । ततबेंमे एक नवयुवक आवै छथि आ ओकरा सँ सुमैना पुछै छैथ ।) सुमैना: हे हौ भैय्या हेंएनें सुन तँ ! नवयुवक: कहूँ की बात ? सुमैना: अहि राजके राजा जे छलै ओ कतँ रहै छै आजुकल ? नवयुवक: बहिन उ राजा आब अहिठाम नै रहै छथि । ओकर बेटीसबके बियाह भेलाके बाद हुन्कर सब राजपाट बिलैट गेल ।३ टा बेटीसबके बढिया राजघरानामें बियाह केल्खिन मुदा ऊसब तँ घुमि कँs अखनधरि माँ बापकें देखैयो लेल नै आयल । आउर एकटा बटी जे सब सँ छोट बेटी रहै हुन्का लँगडा लुल्हाके संगे बियाह कराके रातोरात अही राज सँ निकाली देल्कै । ओकर अखन धरि कोनो खबर नै जे ओ कतँ गेला , कतँ छथि । हँ एतेक सुनमें आयल अछि जें राजारानी दुनों कहानती दोसर टोलमें भिख मांगीके अप्पन गुजारा कsरहल छथीन । ( एतेक बात सुनीकें मेनुकाकें आँखी सँ नोरक' धार बह् लागै छैथ । मुदा करथि की ? सबकिओ सुमैना , हाँसबिहुस , लाँल कनियाँ सम्झावै छैथ ।दोसर दिन ओसब गरिब आ असहाय लोककें अनाज आ लत्ताकपडा दान करsके ओही गाममें काजकरम राखै छथि । असहायके गाउँमे अनाज आ लत्ताकपडा बांटिरहल छै से सुनिके मेनुकाके मातापिता भी जाइ अछि । मेनुकाके मातापिता पुरा बुढ भ'गेल रहै अछि । किन्को ओसब पहिचानें नै सकैत अइछ । मेनुका अप्पन मातापिताके वस्त्र देवके क्रममे नाम पुछै छथि । मेनुकाके पिता मेनुका दिस घुमि कँs देखै छथि.......... (अन्तिम भाग -१८) मेनुका :- अहाँ दुनू गोटाके नाम की अछि बाबु ? बृद्धबृद्धा :- हमर निम कर्मलाल आ हमर पत्नीके नाम सुस्मा अछि । ( मेनुका जैहनति नाम सुनैत छैथ तहिनति हुन्का आँखि सँ नोरक' समुन्द्र बह लागै छैथ आ अप्पन मातापिताके भरि पाँज पकरिके कान लागै छथि । कर्मलाल अपना दुनूगोटाके भरिपाँज पकरिके कानैत देखिके मेनुका सँ पछै छैथ । ) कर्मलाल :- बौवा अहाँ के छी ? किये हमरा दुनूंगोटाके नाम सुनीके कांन लागलौं ? मेनुका :- पिता जी हमरा नै पहिचानलौं अहाँसब ? कर्मलाल :- नै , नाम कहब तब नें चिन्हब जे अहाँ के छी ? मेनुका :- हम अहाँके छोट्की बेटी मेनुका छी पिता जी मेनुका । ( एतेक बात सुनि कँ कर्मलाल मेनुकाके मूह निहारैत रहिगेल जेनाकी ओकर बोल बन्द भ'गेल । किछ बोल नै सकिरहल आ मेनुका काँनैत पुछैत रहल । ) मेनुका :- यी की हालत बना लेलौं पिता जी ? की चिजके कमी भेल अहाँलोकिनकें जे आइ दोसरकें दुवार दुवार पर जाँके भिख मांगे लागलौं ? कर्मलाल :- बेटी , यी सब हमर कर्मके फल अइछ । अहाँ सही कहनें छेलौं जन्म दैत अछि माँ बाप करम तँ अपनेही" सेहें भेल बेटी । अहाँके अइ राज सँ निकाललाँके वाद अहाँके दाइसबके शादी भेलाके वाद अपना महलमे उडीबिडी लागिगेल बेटी । सब राजपाट बिकागेल किछ नें रहल बाँकी । यी सब हमरा हमर करमके फल मिलिरहल छैक बेटी । हम अहाँके संगमे बहुत बड्का अन्याय केलूं बेटी । तेकरें सजाय आइ हम भोगैत छी बेटी । मेनुका :- नै पिता जी एना नैं बाजूं । यी सब विधिके विधान अछि । जे विधाता छठिके राति लिखि दैत छैक ओ हर प्राणीके भोगहीटा परै छै मुदा मानवके अप्पन करम करसें पाँछा नैं हटबाक चाही। माँबाप अप्पन बेटाबेटीके जन्म दैत छथि संगे पढालिखाँ दैत छैक मुदा ओ बेटाबेटीके करममे शुख चायन लिखल नै अछि तँ ओ बेटाबेटी अनैतिक काजमें संलग्न भ'के नैतिक करम करs सँ चुकी जायत रहै छैथ जेकर नतिजा जिनगीभर भोग पडै छैथ ।चलूं पिता जी आब घर जाएत छी । ( ओहीठाम सँ मेनुका अप्पन मातापिताके ल'के संगे सबगोटा अप्पन राज आवै छथि आ फेर स' खुशीके जीवन बितावें लागैं अछि ।) जन्म दैत अछि माँ बाप करम तँ अपनेही लेखक :- प्रयास प्रेमी मैथिल #समाप्त# पात्र परिचय :- (१) कर्मलाल सिंह ठाकुर:-(राजा'क') (२) सुस्मा:- (रानी 'क') (३) दिक्षा :-(राजाके बेटी जेठ्की) (४) दिभ्या:- (राजाके बेटी मैझली) (५) प्रिति:- (राजाके बेटी सैझली) (६) मेनुका:- (राजाके बेटी छ़ोट्की) (७) बैजु :-(मंत्री 'क') (८) भोला:- (नवधिया 'अपाहिज') (९) बढिया माइ (१०) धर्मपाल सिंह:- (राजा 'ख') (११) सुमैना :-(राजकुमारी) (१२) जीतुराम (मंत्री 'ख') (१३) अन्तरा:- (मलिनियां) (१४) गर्जन :-(राक्षस) (१५) लाँल कनियाँ :-(राक्षसके बेटी) (१६) हात्ती (१७) हाँस बिहुस :-(हात्तीके बेटी) (१८) अमर :-(नव युवराज मेनुकाके बेटा रचनाकार ; प्रयास प्रेमी मैथिल ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.जगदीश प्रसाद मण्डल- दूटा लघुकथा २.राजदेव मण्डल- एकटा लघुकथा आ एकटा विहनि कथा ३. दिनेश रसिया- बिहनि कथा ४. सत्यनारायण झा- बिहनि कथा- सुटिया १ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ मूल पुरस्कारसं "गामक जिनगी", लघु कथा संग्रह लेल आ २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - “तरेगन”बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह लेल आ २०१४ बाल पुरस्कार "नै धारैए" बाल उपन्यास लेल सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा लघुकथा १ गाछपर सँ खसला ओछाइनेपर रही, माने नीनसँ सूतल रही। ओना किरिण नइ फुटल रहै मुदा गामक लोक जगि गेल रहै, पोसर चरौनिहार महींसवार बाधसँ घूमि गेल रहए, गाछीक अखड़ाहापर कुश्ती समाप्त भऽ गेल रहै, मुदा चलती बेरक सवारी कसा-कसी होइते रहइ। पत्नियोँ ऑंगन-घर बहारि चुल्हि नीपैक सुर-सार करिते रहैथ कि पड़ोसिनी आबि कहलकैन» “मनोज बाबा गाछपर सँ खैस पड़ला!” कहि पुछाड़ि-भाड़क बेन जकाँ आगू बिल्हए बढ़ि गेली। ‘गाछपर सँ खसब’ सुनि जे पत्नी अवाक भेली से पड़ोसिनी परोछ भऽ गेलैन मुदा बकार नइ फुटलैन जे कनी आरो सेरिया कऽ बुझितैथ। घर-निप्पा चुल्हि लग रखि पत्नी सोझे लगमे आबि बजली» “मनोज बाबा गाछपर सँ खैस पड़ला!” ओना पहिनहि जगा देने छेली। जगला पछाइत कहलैन। मनोज बाबाकेँ गाछपर सँ खसब सुनि मनमे उड़ी-बीड़ी उठि गेल। मुदा तखन तँ पत्नियेँ सोझमे रहैथ, आन रहितैथ तँ आनो मने बाजल जा सकैए मुदा पत्नी लग से केना हएत। पति जकाँ ने बाजए पड़त। की करितौं सहए केलौं। तमसा कऽ तँ नइ मुदा गरमा कऽ बजलौं» “कुकुर कटने छेलैन जे भोरे-भोर गाछपर चढ़ि गेला।” ओना कहब जे अठबजिया ओछाइन छोड़निहारकेँ अहिना भकइजोते होइत रहै छै से बात नइ, छअ बजेसँ पहिनेक बात छी। उठै बेर हमरो भऽ गेल रहए मुदा उठल नइ रही। मनक खौंझक कारक दोसरो भेल। दोसर भेल जे जखन गाछेपर सँ खसला तखन केते जखम भेल हेतैन तेकर कोन ठेकान। तइमे तेलेक मालिशसँ नीक भऽ जेता आकि डाक्टर ऐठाम जए पड़तैन आकि अक्सीजन-घर पहुँचबए पड़तैन, तेकर कोन ठीक अछि। तइले तँ तैयार भऽ कऽ ने निकलए पड़त, से तँ अखन ओछाइने छोड़लौं अछि। अखन नित्य-कर्मक संग पाइयो-कौड़ीक बेंत-बाँत ने करए पड़त। तहूमे जखन डाक्टरे-इलाजक भाँजमे पड़ब तखन केते दिन लागत आ की सभ करए पड़त तेकरो की थाह अछि। अथाहक भरोसे केते...। मुदा फेर भेल जे सोझे मने-मन नक्शे-खतियान बनबैत रहब तहूसँ तँ नहियेँ हएत। कोसी-नहैर जकाँ मने-मन नक्शा बना लेब आ खुनैकाल ई ठेकाने ने रहत जे पानिक बहान ऊपर-सँ-निच्चाँ दिस दौड़ैए, तैठाम जँ मुहेँपर निच्चाँ उतारि देबै आ आगूमे ऊँचका खेत रहतै तखन ओइ खेतकेँ पटैक केते आशा कएल जाएत, ई तँ इंजीनियरक काज भेल, सबहक तँ छी नइ। तहूमे अपन नक्शा-खतियान तँ अखन यहए ने हएत जे मुहसँ पत्नीकेँ घरक भार सुमझबैत,अपने मुँह-कानमे पानि लऽ ली आ जेते जल्दी बाबा लग पहुँच सकब ओते मुस्तैदी करी। जानक कोनो ठेकान अछि जे परान छूटि जाएत आकि...। चाह पीब विदा भेलौं। थोड़बे हटि कऽ टोलेमे दछिनवारी कात घर छैन। मनोज बाबा दरबज्जेपर भेटला। ओना गामक लोकक देखब पतरा गेल रहै मुदा गोटि-पङरा आबा-जाही रहबे करइ। गामक बातावरणमे पसैर गेल रहै जे फुलेक गाछपर सँ खसला, फुलडाली नेनहि ठाढ़े खसला। पुछलयैन» “बाबा, किछु विशेष समाचार?” अपने तँ लाभर-जीभर बजलौं मुदा सियाखी बाबा नीक जकाँ बूझि गेला। जएह बात गामक वातावरणमे पसरल तही टोनमे मनोज बाबा बजला» “आने दिन जकाँ अपन नियमसँ फूलक बेर फूल तोड़ए गेलौं। कनैल फुलक फड़ी[1]क मास छीहे सएह ठिकिया कऽ चढ़लौं, थोड़बे ऊपर गेलौं कि पएर पीछैड़ गेल, हाथमे फुलडाली लटकौनहि निच्चाँ-मुहेँ ससरैत ठाढ़े खसलौं।” गपक आभाससँ बूझि पड़ल जे बाबा अपन बेथाकेँ छिपा कऽ बाजि रहला अछि जँ से नइ अछि तँ बोलीमे किए अवरोध भऽ रहल छैन। मुदा अपनो तँ हुनके बेथा मेटबैले ने जिज्ञासा करए आएल छी, तखन जँ जोतले-चौकियाएल खेत भेट गेल तँ बीये छिटैमे किए देरी करब। कहलयैन» “फुलडाली मजगूत छल किने?” ओना बाबा बोली परेख लेलैन, मुदा बाउक भाउ जेना दुनू अछि- पितोकेँ आ पुत्रकेँ सेहो ‘बाउ’ कहल जाइ छै, तहिना मुस्की दैत बजला» “एह! फुलडाली तँ फुलडालीए अछि, ओना छी पितरिया मुदा रंग-रूपसँ सोने जकाँ झलकैए।” घन्टा भरि पहिलुका चोटपर मनोज बाबा केतबो झाँपन दैथ तैयो ओछ धोती-साड़ी जकाँ एक-भाग उघारे भऽ जाइन। अपनो मन गवाही दिअए- भाय!कियो कनबैत-कनबैत हँसबैए, कियो हँसबैत-हँसबैत कनबैए, मुदा जीवन-धार तँ से नइ छी, ई तँ हँसैत-खेलैत बहैत धारा छी। तैठाम मनोज बाबा अपने जे नुका रहला अछि तखन कनी किए ने एकटा ओढ़ना आरो ओढ़ा दिऐन। सहए करैत पुछलयैन» “बाबा, साँप जकाँ जे गाछपर सँ ससैर कऽ निच्चाँमे उतैर ठाढ़े रहलिऐ, एकर तँ कोनो मानैयेँ ने भेल?” पारखी मनोज बाबा धाँइ-दे बात परेख लेलैन। बजला» “बेसी-सँ-बेसी तूँ यएह ने कहबह जे गाछपर सँ साँपे ससैर कऽ निच्चाँ अबैए आकि गनगुआरिये?” बिच्चेमे बजा गेल» “हँ, एकटा टाँगक झोंझबला आ दोसर बिनु टाँगबला।” बातकेँ सम्हारि बाबा बजला» “थोड़बे ऊपर चढ़ल रही, जेते ऊपरसँ धिया-पुतामे कुदनाइ सीखने रही तँए ससरलौं नइ पीछड़ए लगलौं आकि कूदि गेलौं।” ‘कुदब’ सुनि चपाड़ा भरैत कहलयैन» “अपने कहुना भेलिऐ ते पुरान हाड़-काठक ने भेलिऐ, मुदा हड्डीक जोड़क जे पएरमे छिटकिल्ली अछि ओ ने ते ससरल।” एकेबेर नीपैत-पोतैत बाबा बजला» “यएह बुझह जे जहिना पहिने फ्रेश रही तहिना अखनो छी।” कहलयैन» “बाबा, जखन पूजा करै छी, फूलक जरूरत होइए तखन एहेन-एहेन जे बड़का फूलक गाछ लगौने छी, जैपर चढ़ि कऽ तोड़ए पड़ैए तइसँ नीक ने जे फुलवाड़ी लगा छोट-छोट गाछक फूलसँ बेगरता सम्हारि लेब।” ई बात जेना मनोज बाबाकेँ मनमे गड़ि गेलैन तहिना तिलमिलाइत बजला» “बौआ, तोरासँ लाथ की करब। साठि बर्खक उमेर भऽ गेल, चालीस बरख सँ पूजा करै छी, जखन जुआनी छल आ घरसँ खेत धरि कर्मभूमि बनौने छेलौं, सभ किछु सोझेमे नचै छल, आब ओ हूबा अछि जे ओते मनसूबा करब, मुदा...।” हारमोनियमक अन्तिम पटरी जकाँ अवाज बदलैत रहैन मुदा केकरा कहथीन आ कहने हेतैन की तँए ऐठाम आबि बाबाक बोली पलटैत रहैन। मनमे भेल जे ई तँ केकर दिनक परि भऽ गेल, जे गेलौं करहर उखाड़ए आ आगूमे चलि आएल केशोर! माने भेल जे करहरो आ केशौरो पनिगर माटिमे होइए, मुदा होइए दुनू दू परिस्थितिमे। जखन पानि रहै छै तखन करहर होइए आ जखन पानि सूखि माटि सकताइए तखन केशौर होइए जे हाथसँ नइ खुरपीसँ उखाड़ल जाइए, तइले खुरपीक प्रयोजन पड़ै छै। ऐठाम सएह भऽ गेल, मनसूबा बना आएल छेलौं जे बाबाक कुशल-छेमक पछाइत, चाहे साइकिलेसँ आकि टेम्पूएसँ डाक्टर ऐठाम जाएब, दादीकेँ सेहो संग कऽ लेब, बर-बेमारीमे पत्नियेँ ने अर्द्धांगिनी बनि आधा दुख बँटतैन। मुदा से तँ बाबा गाछ परहक खसब बिसैर अपन जिनगीक खसब दिस बढ़ि रहला अछि..! पुछलयैन» “की कर्मभूमि कहलिऐ बाबा?” एक तँ ओहिना बैसारी मनोज बाबा, भरि दिन विचारेक परसादी बँटिते रहै छैथ, तैपर कर्मभूमि सन शब्द भेट गेलैन, भेटते जेना मनसूबा जगलैन। बजला» “बौआ, यएह देह छी जे हट्ठामे बैशाख-जेठ मास सन दिनमे हर-बरदक संग बारह बजे तक कोदरबाहि करै छेलौं मुदा थाकैनसँ मिसियो भरि मुँहो मलिन नइ होइ छल, जइक चलैत घर-अँगनासँ लऽ कऽ खेतो-पथार धरि हँसैत रहै छल मुदा आइ..!” ‘आइ’क पछाइत सभ कानि रहल छी, से मुहेँमे रहि गेलैन। बाबाक बन्न होइत बकार देख अपनो बकार बन्न हुअ लगल। मुदा संजोग नीक रहल। दादी सेहो लगमे आबि गेली। जहिना बाल-बोधकेँ अगुआ पुतोहु वा परपुतोहु अपन जेठजन[2]केँ अपन समाद पठबै छैथ तहिना समदिया भेट गेल। मुदा दादी-आगू बाबाकेँ अपन बेथा व्यक्त कराएब मन नइ मानलक। ओना लग्गासँ मरखाहो मालकेँ घास खुऔल जाइए से तँ मनमे रहबे करए। बजलौं» “बाबा, अखनो अहाँक जे हड़गर-कठगर देह अछि ओ जुआनी-जवानीमे केहेन रहल हएत।” पत्नीकेँ आगूमे देख आकि की से तँ बाबा जानैथ मुदा बूझि पड़ल जे बाँहिक कुरता समेट-समेट गट्टासँ बाँहि दिस लऽ जा रहला अछि। ओना नजैर पत्नीपर नइ हमरेपर रहैन, बजला» “बौआ, कर्मभूमियेँ धर्मभूमियोँ छी जे सातो दुनियाँमे अछि। चाहे ओ भावभूमिक कर्मभूमि हुअए आकि जन्म भेल जगहकेँ जन्मभूमि-मातृभमि कहि कर्मभूमि बुझियौ.., अहिना सभ माने- सातो दुनियाँमे अछि, आ सभ दुनियाँक अपन कर्मभूमियोँ छै आ मर्मभूमियोँ छै।” अपना झोंकमे बाबा बजैत रहला, बजैत रहला जे सून-अनसून दुनू हुअ लगल। तँए नीक जकाँ बाबाक बात नइ बूझि पाबी। मुदा गुरु ने एक भेला,चेलाक कोन ठेकान अछि। एको भऽ सकैए, एकसँ बेसी दोसरो-तेसरो भऽ सकैए आ एकोमे उत्थरसँ गहींरगर भऽ सकैए। बजलौं» “बाबा, एक दिनक बेरा पार करैमे जे एना लाख कोसक रस्ता देखए लगबै तहूसँ तँ काज नहियेँ चलत। जरूरत तँ एतबे ने अछि जे काल्हि जे कौल्हुका सूर्जक उदए हएत ओ सीमा भेल आ अस्त धरिक कर्म आ कर्मक सीमा- जिनगी भेल। तेतबे जँ ठेकानसँ ठेकाइन ठेकनबैत चली सएह ने?” ओना दादी अखैन तक ठाढ़े छेली, मुदा कड़चीक साँगह परक लत्ती जहिना हवामे डोलैत रहैए तहिना दादीक देह अखनो तक डोलिये रहल छेलैन। डोलबो केना ने करितैन, बेटा-पुतोहुक कोनो अशे ने छैन, लऽ दऽ कऽ साठि बर्खक खाली पतिक छैन, सेहो भोरे-भोर तेहेन अन्हरगरेमे गाछपर सँ खसला जे अन्हरगरे केना चलि जइतैथ, तेकर कोनो ठीक छेलैन। जँ बाबाक पेटे-पाँजर टुटि गेल रहितैन तँ दादीक गति की होइतैन…। मनमे भेल जे अछैते बेटा-पुतोहु कष्टमे किए छैथ? दादीकेँ पुछलयैन» “दादी, अछैते बेटा-पुतोहु जे एना कष्टमे छी से नीक लगैए?” हमर बात सुनिते दादी तँ सहैम गेली मुदा मनोज बाबाक मनक फुनफुनी ओहिना जगलैन जहिना रणभूमिमे रणाकेँ जगैए। बजला» “बौआ, जइ पुरुखकेँ आइन-अपगराइन नइ अछि, ओहो कोनो पुरुखे भेल।” बाबाक मजगूत विचार सुनि मनमे भेल जे भरिसक मनमे कोनो दमगर व्रत छैन, जे पुरबै पाछू अपन सभ किछु बलिदान करैले तैयार छैथ। मुदा से तँ सुनला पछाइते ने बुझब। ओना मनोज बाबाक परिवारक सभ भाँजो तँ नइ भाँजल अछि मुदा दुनू बापूतक बीचक बात नइ बुझल अछि सेहो तँ नहियेँ अछि। कहब जे जखन बुझले अछि तखन सएह ने किए कहलयैन। समाजक बीचमे ने बसल छी, समाजक बीच बहुत एहेन बातो आ काजो अछि जे सीमाबद्ध अछि। जे सीमाबद्ध अछि ओकर अतिक्रमणो तँ अतक्रमणे भेल, तँए। बजलौं» “बाबा, अहाँ ते तेहेन उमकीमे उमैक कऽ बाजि देलिऐ जे बुझबे ने केलौं?” बाबाकेँ जेना सह भेटलैन, मुदा दादीकेँ कठाइन लगलैन से ठोरक बिजकीसँ बूझि पड़ल, मुदा बातो-विचारक तँ अपन क्रम होइ छै, ई तँ नइ जे आमक गाछे रोपैकाल चूड़ा कीन कऽ लऽ आनी जे आम सेने खाएब। एक तँ परिवारक विवाद छी तहूमे बाप-बेटाक बीचक जे कखनो नाहपर गाड़ी जकाँ आ कखनो गाड़ीपर नाह जकाँ चलि अपन जिनगीक बाट-घाट पार होइए। तेहेन विवादकेँ तँ, जहिना गोहि अपन मुँह खोलैत-खेलैत शिकार लग पहुँच पकड़ैए, तहिना करब ने जरूरी अछि। मनोज बाबा बजला» “तोहीं कहह जे बेटाक ई उचित भेल जे कोन-कहाँ देशमे जा कऽ बिआह कऽ लेलक।” ओना किछु लोकमे एहेन बजैक आदत होइए जे अपन विचारक बातकेँ टुकड़ी-पुरजी बना, एक-एकटा कहैत बीचमे पुछैत रहत जे की हेबा चाही। मुदा नीक अधला दुनू पक्ष अछि, से सभ बात बुझला पछाइते ने कियो उचित निर्णायक मोड़पर आबि सकैए। तैबीच जे टुकड़ी-टुकड़ीक निर्णय कऽ नेने रहब तखन तँ अपने निर्णये ओझरा जाएत तँए बजलौं» “बाबा, अपने कनीकाल मुँह बन्न रखियौ, दादियो कोनो ऐसँ फराक नहियेँ छैथ तँए हिनको बाजए दियौन।” जेना हमर बात बाबाकेँ काँट जकाँ मनमे गड़लैन तहिना बिसबिसाइत दुनू ठोर बिदकलैन। ओना मुँह बन्न केने रहैथ। भऽ सकैए जे मनमे ईहो आबि गेल होइन जे तीन गोरेमे एक बजनिहार दू सुनिनिहार ने होइए, तैठाम बिनु सुनिनिहारक बाजबे की हएत। ओना, दादीक मनमे अपन बेटा-पुतोहुक सिनेह अखनो मनक धारे-धार चलिये आबि रहल छेलैन, तैठाम समाजक रूपमे हमरा देख आरो गतिमान भऽ गेलैन जे आक्रोशित होइत बजली» “सोल्हैनी दोख हिनके छैन!” दादीक बात सुनिते बाबाक नरसिंह तेज भेलैन, जे मुँहक रूखिसँ बूझि पड़ल। मनमे भेल जे कहीं दादीपर हाथ ने उठि जाइन। मुदा तइसँ पहिने बीचक जे समए अछि जँ ओकरा अनुकूल बना लेब, तखन रूप बदैल सकैए। दादीपर सँ नजैर हटा बाबाक आँखिपर गाड़लौं। जहिना गहुमन साँप आकि बाध-सिंह आँखि-पर-आँखि पड़िते ठकुआ जाइए तहिना भेल। मनोज बाबा ठकुएला। बजलौं» “दादी, जड़िसँ कहियौ।” ‘जड़ि’ सुनिते मनोज बाबाक मन पिनपिनेलैन। मुदा तैपर दादी मिसियो भरि धियान नइ दऽ बाजए लगली» “बौआ, तोरो बुझल हेतह आ गामोक लोककेँ बुझल छैन जे एकटा बेटा अछि। कौलेजसँ पढ़ि नोकरी करए कलकत्ता गेल। ओइठाम बिआह कऽ लेलक।” बिच्चेमे टोनि देलिऐन» “हँ, ओ तँ अहाँ दुनू बेकतीक बड़का भार उतारि देलक किने।” बजैले दादी लुसफुसाइते रहैथ कि बीचेमे मनोज बाबा बजला» “गामसँ जाइकाल बेटाकेँ एना बुझा कऽ कहलिऐ जे बौआ, कामरूप कहाँ-दन ओम्हरे छै, जैठाम पुरुखकेँ जहुरी मौगी सभ गदहा-घोड़ा बना बाधमे चरैले ठोकि दइ छै, तइ सभपर नजैर रखिहह।” बाबा तेना टोनमे बजला जे हँसी लगि गेल, हँसए लगलौं जइमे बाबाक बातो उधिया गेलैन। बिच्चेमे दादी फेर बाजए लगली» “बौआ, जहिना अपना सबहक गाम-घरक लोक अछि तहिना कनियाँक छीछा-बीछा सेहो छैन, तखन बीचमे कोन काँट अछि जे बुड़हाक आाँखिमे गड़ि गेलैन जे कहलखिन- जाबे जीब ताबे तोहर ने कमाइ खेबौ आ ने मुँह देखबौ।” एकाएक मनक विचारमे उलट-फेर हुअ लगल मुदा जइ परिवारक समस्या छी ओ परिवार केना समस्याकेँ बूझि रहला अछि ओ ने...। बजलौं» “बेटा की उत्तर देलकैन?” बेटाक पक्षमे दादी उत्तेजित होइत बजली» “बेटो ते कहिये कऽ गेल छैन जे- भेले जाइ छी।” २ दुधियाएल बरखा बैशाख मासक अन्हरिया-एकादशीक अढ़ाइ बजे राति। मात्र आधा घन्टा बाँकी तीन बजे भोर होइमे। ओछाइनपर पड़ल दुर्वासा काका मौसमक तापसँ तपित होइत कछमछ करैथ। हवा शान्त, ताप तपतपाइत। तपतपेबो केना ने करैत, जहिना रेडियो तहिना अखबारो दिन-राति चिचियाइत जे केता बर्खक पछाइत एहेन टेम्प्रेचर मौसमकेँ चढ़ल अछि! कछमछ करैत ओछाइनपर दुर्वासा कक्काक मन उतप्त भऽ वौआइत-वौआइत ऐठाम आबि अँटैक जाइन जे जीब कठिन अछि। केना नइ बूझि पड़तैन जे जीअब कठिन अछि? जखैन नीने हराम तखैन लोके आकि कोनो आने पालतू-सँ-जंगली जानवर आकि माटि परहक पंछीसँ लऽ कऽ गाछ परहक पंछी धरि जीविये केते दिन सकैए? बुझले तँ बात अछि जे जखने कफ-पीत आ वात संग पकड़लक तखने औरदा खटियए लगल। जखने जिनगीक औरुदा खटियाएत आकि चौकियाएत आकि पलेगाएत तखने ने बूझि लिअ जे आब गाछी लगिचाएल..! बेर-बेर दुर्वासा कक्काक औनाइत मनमे उठैन जे मौसमक बेतुकी गतिसँ पैछला सालक अन्तिम फसिल मारल गेल..! आमक दरसे ने..! पाकलक कोन बात जे टुकलाक चटनियो नदारत..! आन सालक हिसावसँ दोबर पटौला पछातियो गरमा धान पूजियोमे घाटा लगौत..! आ गहुम सहजे मारले गेल..! गहुमक गेने पैछला साले चलि डूमि गेल..! मुदा खेरही तँ ऐगला खेती छी, परिवारकेँ के कहए जे समाजसँ लऽ कऽ जिला, राज्य आ देशक समस्या दालिक छी..! केना नइ दस कट्ठा खेरही दुर्वासा काका करितैथ? ओना धड़फड़ाएल किसान कहियौ कि औगुताएल आकि अगुआएल, सरोसत्तीए पूजाकेँ वसन्तक जन्म-दिन बूझि खेरही-बीआ आधा माघेसँ खेतमे छीटब शुरू करै छैथ, मुदा से नइ बतीस दिन पहिने दुर्वासा काका सलोहाल खेतकेँ पटा, जोति-कोरि बीआ छीटि चौकिया उन्नैत किस्मक अल्पकालिन खेरही दस कट्ठामे ई सोचि केने छला जे समुचित विधि-विधानसँ केने निसचित परिवारक साल भरिक दालिक समस्या मेटा जाएत। हिसावो सोझ बूझि पड़लैन। ओना चालीस किलो कट्ठा तक खेरहीक पैदावार अछि, मुदा अपने तँ ओहन किसान छैथ नइ जे ओइ ऊचाइकेँ पकैड़ पेता। मुदा एहनो तँ झड़खंडी किसान कहियौ कि अधमरू आकि पछुआएल नहियेँ छैथ जे सोलहन्नी बीओ बुड़ेता...। तँए बीच-बँचाउ करैत बीस किलो कट्ठा मानि, दू क्विन्टलक हिसावसँ खेरही-खेती केने छला। हिसाव एना सोझ बूझि पड़लैन जे सालो भरि जँ आधा किलो पाँच गोरेक परिवारमे खर्च हएत तँ सौ-ग्राम मुड़े-मुड़ भेबे कएल। ओना सबठामक अपन-अपन जरूरत छै, मुदा से अलग अछि। तहूमे दालि-दालिक अपन-अपन कद-काठी सेहो होइए। एक दिस खेसारीक कद-काठी अछि, जे दानामे अदहा खोंइचा आ अदहा दालि होइए जखन कि खेरही तइ कद-काठीक नइ छी, ओकर कद-काठी दोसर छै, किलोमे आठो सए ग्रामसँ बेसी दालि होइए। तेतबे किए, कुरथी-तेबखा आ खेरही ओहन दालि छी जेकर खोंइचो खाद्ये छी। जँ से नइ छी तँ भतउसनामे धानक चाउर कुटि कऽ आ खेरहीक दालि सौंसेक दोस्ती केना होइए? दू-तीन दिनसँ मेघ असथिर हवामे रूइयाक फाहा जकाँ उड़ियए लगल, जइसँ झपन-तोपन शुरू भेल। तैसंग हवो उड़ए लगल। हवाक गतियो रसे-रसे तेज होइत गेल। ओना धरती जे तपित भऽ गेल छल आ ओकर जे तपवन उठए लगल, तइसँ वातावरणमे कोनो बेसी सुधार तँ नइ भेल छल मुदा सुधारक किछु झलकी तँ आबिये गेल छेलै। अढ़ाइ बजे रातिमे हवाक गति तेज भेल, वादल सेहो उमड़ए लगल। बुन्दा-बुन्दी पानि शुरू भेल। जे धीरे-धीरे बढ़ए लगल,जइसँ धरतीक तपित तन रसे-रसे तुषित हुअ लगल। अकास-सँ-धरती धरि मौसम समरूप तँ नइ भेल मुदा सिमैस जरूर गेल। धरतीक तपित तापसँ औनाइत दुर्वासा कक्काक मन रसे-रसे चैन हुअ लगलैन। अखन धरि जे औनाइत मनमे वौआइत विचार उठै छेलैन आ खसै छेलैन ओ मौसमकेँ बदलैत रूप देख मौसमे-अनुकूल, अदलए-बदलए लगलैन। जहिना अदलै-बदलैबला मंडीमे शान्ति राखब जरूरी होइ छै, जँ से नइ राखब तँ पाइयेक हिसाव ओझरा जाएत, तहिना। जेना-जेना दुर्वासा कक्काक मन मौसमानुकूल चैन होइत जाइन तहिना-तहिना सौन मासक पूनो-चान जकाँ अपनो चान फरीच हुअ लगलैन। जेना-जेना अपन चान फरीच होइत जाइत रहैन तेना-तेना मन चैन भेल जाइन। तीन बजे राति बीतल आ तीन बजे भोर शुरू भेल। मेघो बुनियाएब बन्न केलक। एका-एक ओते रातिमे कहियौ आकि ओते भोरमे चुट्टी-पीपरीसँ लऽ कऽ मनुख तक चल-मला गेल। मुदा दुनियोँ तँ दुनियाँ छी, जेकरा जे भवै वएह ने ओकर भावना भेल आ जेहने भावना तेहने ने बुधि, आ जेहेन बुधि हएत तेहेन काज करैमे आनन्दो आएत आ वएह आनन्द ब्रह्मानन्दोमे जा कऽ मिलत! अपन रागमे दुर्वासा काका मने-मन डुबकी बजबैत रहैथ कि चिकनी काकी चिचिआइत लगमे आबि कहलकैन» “अखनो तक जे गठूला घर नै बनेलौं से देखियौ-गे सभटा गोरहाक दशा! भीज कऽ सभटा गोबर भऽ गेल! फेरसँ पाथए पड़त!” होइते अहिना छै जे घरमे आगि लगौ आकि नहमर बिहाड़ि अबौ आकि भुमकम हौउ परिवारजन तँ अपने-अपने भवन मनसँ ने अपन-अपन जानक संग ओहू वस्तु आ विचारकेँ जान-बँचबैत घरसँ बहराइए जे ओकर प्रिय रहै छै। जहिना सैयो-हजारो रंगक वस्तु-जातसँ भरल घर-परिवारमे वएह वस्तु वा विचारकेँ बँचबए चाहैए आ आन वस्तु वा विचारक भरमार रहितो छोड़ैले तैयार होइए, तहिना चिकनियो काकीकेँ भेलैन। भेलैन ई जे जहिना गोबरधन-पहाड़ ओढ़ि ब्रजमण्डलवासीक जान बँचबैक पाछू कृष्ण भीर गेला तहिना परिवारक पहियाक चलैत घुरीक एकटा किल्ली जकाँ जारैनपर चिकनी काकी अपन सुरता गड़ौने छेली। वएह सुरता हुनका बुन्दा-बुन्दी छुटिते गोरहाक मचान दिस बाड़ी लऽ गेलैन, जेकर दुर्दशा देख चिकनी काकीक मन कलहैन्त गेल छेलैन। ओहीसँ आक्रमित भऽ दुर्वासा काका लग आबि बाजल छेली। मुदा दुर्वासा कक्काक मन बदलैत मौसम आ बदलैत जिनगीक गति-विधिपर धियान अड़कल छेलैन, जइसँ चिकनी काकीक बातक कोनो उत्तर नइ देलखिन। देबो जरूरी नइ बुझलैन। जरूरी ऐ दुआरे नइ बुझलैन जे चिकनी काकीक आद्योपान्त बात सुनलैन। सुनिते जखन गुनए लगला तँ बैशाखक अधमसिया बूझि पड़लैन, नइ कि मौसमक उतार बूझि पड़लैन। माने ई जे मौसमक उतार भेल गरमी मास,माने जखन बरखा मास बनए लगैए तइ बीचक समए, जे एक उतरैए दोसर चढ़ैए। मुदा बैशाख तँ से मास नइ छी, ओना एक मास जेठुआ रौद सेहो पछुआएल अछि। जइमे सालक सभसँ जुआएल रौद होइए। जुआएल कहियौ आकि जबनाएल, समए तँ सभसँ नीक गोरहा-ले भेबे कएल। तैठाम जे पत्नी माथ पटकै छैथ, यएह भेल अनेरो दुख बेसाहब...। दुर्वासा कक्काक मन आगू घुसैक गेलैन। घुसैक कऽ गोरहा घर कहियौ आकि जारैनक गठूला, तइमे जा कऽ अँटकलैन। अँटैकते मनमे उठलैन- एक तँ आश्रमी घरसँ आकि भण्डार घरसँ गठूला कद-काठीमे छोट होइए, तैसंग नीपै-बहारै आकि लेबै-मुनैक कोनो खगते ने होइए, तइले एते जे माथ-कपार पीटै छैथ से अनेरे ने! हिनके सबहक सपनामे कहियो चारि बीघाक ताज-महल औतैन..? तँए आरो अनठा कऽ दुर्वासा काका कनतोपि लेलैन। ओना दुर्वासा कक्काक मुँह नइ खुजने चिकनी काकीक मन चिक्कन हुअ लगलैन। किएक तँ पति-पत्नीक बीच जँ पत्नीक बातसँ पति मुँहकेँ बन्न कऽ लैथ, सएह ने भेल पत्नी-लेल चिक्कन। आब कि माथपर चढ़ि टीक पकैड़ ठीक करती तखन मन चिक्कन हेतैन? चिक्कन मन बनिते चिकनी काकीक नजैर पतिक बन्न मुँहपर पड़लैन। पहिने शंका भेलैन जे पूर्वाक लहकीमे भरिसक नीन छैथ तँए हमर बात नइ सुनलैन। मुदा गोरहा-घर आ गोरहाक दशा मनकेँ बेथित केनहि रहैन, तँए बेर-बेर मनमे विचारक झोंको उठबे करैन। मुदा असगरमे के केकरासँ पुछत आ के केकरासँ कोनो विचार लेत कि देत। तखन तँ भेल जे जे भऽ रहल अछि ओकरा छातीमे मुक्का मारि देखैत चलू। यएह सोचि अपन पनचैती अपने करैत चिकनी काकी अपन ओछाइन दिस बढ़ि गेली। अन्हरिया-एकादशीक भोरक उदित चान जहिना दुधियाएल लाली नेने फरीच मौसमक बीच चौठक चान जकाँ हँसियाएल अपन रंग-रूप निहारैए तहिना दुर्वासा कक्काक मन अपन जिनगीक रंग-रूप निहारए लगलैन। मरहन्ना गहुमक खेती आ फलाएल आमक बगान बोनिआ गेने दुर्वासा कक्काक जे मनसँ भूख व्याकुल भऽ पड़ा लगल छेलैन ओ पुन: खेरही खेतीपर नजैर पड़िते आबए लगलैन। दालिक अभाव किए भेल? पहिल प्रश्न दुर्वासा कक्काक मनमे उठलैन। खैहन अन्न भेल धान, गहुम, मकइ इत्यादि आ दलहन भेल बदाम, केराउ, मौसुरी, खेसारी इत्यादि। भोजनक पहिल खगता खैहन अन्नसँ पूर्ति होइए नइ कि दलिहनसँ। दलिहन भेल खैहनक सहयोगी। ओना दलिहनोक रोटी, सतुआ आ उसनाक रूपमे खैहनक पूर्ति करैए, मुदा ओ भेल अभावक भाव। ओना दलिहनोक खेती आनो-आनो मौसममे होइए, जेना राहैर, खेरही, कुरथी आ तेबखा। मुदा राहैर, कुरथी आ तेबखा ऊँचरस जमीनक फसिल छी, जे धार-धूरक इलाका रहने मिथिलांचलमे कम अछि, तँए राहैर-कुरथी उपजै जोकर चासे कम अछि। रहल कैतका खेती, माने जाड़-मासक खेती मुदा ओ तँ जहिना खैहनक समए छी तहिना दलिहनक सेहो छी। एक तँ ओहिना धार-धूर, डोह-डाबर चौर-चाँचर, कोचाढ़ि-बीरैक गाम जइमे मध्यम किस्मक जमीन कम अछि,तैपर खैहनक बदला दलिहन अभावी लोक किए उपजेता, तैसंग ईहो भेल जे समुचित ढंगसँ दलिहनक खेतीक चलैन कमि गेल आ दलिहनक छिटुआ खेतीक चलैन जोर पकैड़ लेलक, जे करैमे असानो होइए। मुदा समुचित ढंगसँ नइ भेने तिहाइयो-चौथाइ उपज नइ होइए! अस्सीक दसकमे वैज्ञानिक पद्धतिसँ गहुमक खेती करैक सरकारी योजना बनल, उपजामे बढ़ौतरी भेल, दलिहन खेत गहुमक खेतमे बदैल गेल जइसँ दालिक उपज कमि गेल! दुर्वासा कक्काक मन आगू घुसकलैन। आगू ई घुसकलैन जे जखन एहेन स्थिति बनि गेल अछि तखन कि लोक दालिये खाएब छोड़ि दिअए? कनीकाल-ले महगक दुआरे छोड़ियो देत मुदा अदौरी-बरीक कोन दोख भेल जे गाम छोड़ि पड़ा जाए? जाड़क हिस्साबला समए जे गहुमकेँ छोड़ि दइ छिऐ, तैयो ओइमे गरमा दालि माने खेरही-तेबखा तँ कएल जा सकैए? तइले दुनूक समैक अँटाबेश करब अछि। मुदा अँटाबेशक पाछू पैछला मौसमक प्रभावो-दुष्प्रभाव तँ ऐछे?जँ खेत बिलैम कऽ उखड़त- माने खेतीक अनुकूल बनत- तखन खेतीमे बिलम हएत। जखने खेतीमे बिलम हएत तखने फसिल आगूक समए पकड़त। जखने आगूक समए पकड़त तखने ऐगला फसिल प्रभावित हएत..? दुर्वासा कक्काक मन आगू घुसैक अपन देश-कोस दिस बढ़ि गेलैन। कहू जे दुनियाँ भरिमे अपना सबहक भोजनक जे सचार-विचार अछि, ओ दुनियाँमे केतए अछि? ओना चाउर-दालि सभ देशक भोजन छी, मुदा जइ सचार-विचारसँ हम सभ खाइ छी ओ केतए अछि? भातक पहिल संगी दालि छी, से आन थोड़े बुझैए..? आब दुर्वासा कक्काक नजैर अपन खेरही-खेतीपर एलैन। खेतमे बीआ देना बतीस दिन भऽ गेल। सत्तैर दिनक पछाइत फड़ ललियए लगत। पचहत्तैर-अस्सी दिनमे खेरही खस्सी बनि आगूक भोज्यमे शामिल भऽ जाएत। जहिना नख-सिखक वर्णन तहिना सिख-नखक वर्णन सेहो होइते अछि। एकेबेर दुर्वासा कक्काक मन हहैर कऽ बतीस दिन पाछू घुसैक ओइ दिनपर गेलैन जइ दिन खेतमे खेरही बीआ बौगु केने छला। बौगु करैसँ चारि दिन पहिने पटौने छला,धरती एते तबैध गेल छल जे सलोहाल पटौल खेत चारिये दिनमे उखैड़ गेल, माने खेती करै जोकर भऽ गेल। डकरा हाल खेतमे रहने भुआ जकाँ गाछ जनमल। बीआक उपचारक संग जोतो आ खादो अनुकूल भेल। जइ गतिये फसिलक बढ़बारि हेबा चाही ओइमे मिसियो भरि कोताही नइ भेल। जहिना अपन कर्तव्यमे कमी नइ भेलैन, तहिना खेरही सेहो अपन चालि-ढालि आ रंग-रूप पकड़ने दुधिआइत-दुधियाइत फुलिआइपर पहुँच गेल अछि..! दुर्वासा कक्काक मन हलसैत-कलशैत ओइ अवस्थामे पहुँच गेलैन जेतए जिनगीमे मोड़ अबैए आ दुधिआइत देहमे फुलिआइत मन नचैए। नचैत दुर्वासा कक्काक मनमे जेना घुरमी लगलैन। होइतो अहिना छै जे नचैत-नचैत जखन देहमे घुरमी लगै छै तखन ओ नचैत-नचैत धरतीपर या तँ बैस जाइए वा खसि पड़ैए। घुरमी ई लगलैन जे दालिक उपटान केना किसानक बीच आएल? मुदा से अखन नइ। अखन एतबे जे जहिना चाउरक हिसावे दू सेरक बदला तीन सेर धान भिनसुरका उखड़ाहाक[3] बोइन छल तहिना चाउरेक हिसावसँ दू सेर दालियो बोइन छल। एकर माने ई नइ जे मिथिलांचल दालि-दलिहनक भण्डार छल। हँ, एते जरूर छेलै जे किछु किसान परिवार एहेन छला जिनका अपना परिवारसँ फाजिल दालि होइ छेलैन, जे बोइनोमे दइ छेलखिन। एकर माने ईहो नइ जे दालिक प्रचूरता छल। जे किसान निम्न-मध्य परिवारक छला ओ धानक अभावमे सेहो दालिये बोइन दइ छेलखिन। ई तँ भेल भिनसुरका उखड़ाहाक बोइन। मुदा बेरुका उखड़ाहाक[4] सबा सेर चाउरक हिसावसँ दू सेर धान जहिना बोइन छल, तहिना सवा सेर दलिहन सेहो छल। एकर माने ई नइ बूझब जे बोनिहारकेँ तीन सए पैंसैठो दिन काज लगै छेलैन, भरि साल कमाइ छला, बेरोजगारी नइ छल। नइ छल कि छल से तँ सबहक सोझहेमे अछि। अधरतिया बीतल, बरखा सेहो बन्न भेल। पूर्वा हवाक लहकीमे अकासमे पसरल वादल सेहो छँटि गेल। जहाँ करिया मेघ परीच भेल कि भुक-भुक तरेगनो आ भकजोगनियोँ सभ भुकभुकाए लगल। अन्हारिया-एकादशीक भोरक चान हँसिया-सदृश हँसिआइत पूब दिशामे उगल। बदलैत मौसमक अखड़ेहे ने अखार भेल जँ से नइ भेल तँ किए कालीदासकेँ कहए पड़लैन- “आषाढ़स्य प्रथम दिविशे:..!” जँ पूर्णिमा आ सकराँतिक हिसावसँ मास चलैत तँ किए लिखए पड़ितैन? सोझ-साझ पूर्णिमा आकि सकराँतिक हिसावसँ सीमापर खुट्टी गाड़ि मासकेँ खुटिया दितैथ..! आन दिनक अपेक्षा जेना आइ दुनियाँक सभ किछु भोरे जगि गेल तहिना दुर्वासा काकाकेँ बूझि पड़लैन। आन दिन तीन बजे भोरमे पौड़कियेटा बोली दइ छल, से आइ धरतीक धोंघा-सितुआसँ लऽ कऽ गाछ परहक चिड़ै-चुनमुनी सहित बोली दिअ लगल! गाए-महींस घरसँ बहार होइले डिरिया लगल अछि। दुर्वासा काका ओछाइनसँ उठि ओसारपर आबि चिकनी काकीकेँ कहलखिन» “दुनियाँक सभ किछु जगि गेल आ अहाँ ओछाइने धेने रहब?” ओना चिकनी काकी अपने बेथे बेथाएल अखनो छैथे, जइसँ कखनो बरखाकेँ झड़कौआ कहि गरियबै छथिन तँ कखनो अपन कपारकेँ दोख लगबै छैथ,तँ कखनो पतिकेँ अपन कपार बूझि अपनाकेँ कोसबो करै छैथ जे केहेन कपारमे बेथाएल छला! मुदा सभकेँ समटैत चिकनी काकीक मन गवाही देलकैन,भोरका समए छी, सभ अपन-अपन भरि दिनक सगुन बनबैले हँसैत उठैए, तैठाम जँ मरियाएल-कड़ुआएल उठब से नीक नहि। मनकेँ बदलैत ओछाइनसँ उठि चिकनी काकी ओसारपर आबि बजली» “आइ भोरे नीन बिला गेल।” मुस्की दैत दुर्वासा काका बजला» “बिलाएल कहाँ बिलाइ जकाँ दूध-फूल तकैए..!” [1] फड़ी-क माने भेल जहिना पानक पात पानक फड़ी कहबैए तहिना फूलक सघन पैदावार फूलक सघन फड़ी भेल। [2] ससुर, ददिया-ससुरकेँ [3] माने बारह बजे तकक [4] माने बेरसँ साँझ धरि- २ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१२ मूल पुरस्कारसं "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल सम्मानित श्री राजदेव मण्डलक एकटा लघुकथा आ एकटा विहनि कथा १ एडजस्टमेन्ट (लघुकथा) मनक बाटिकामे कामनाक पुष्प फुलाइते रहैत अछि। कालक कारणे किछ मौला जाइ छै मुदा किछ विकसितो होइते रहै छै। भुलोटन खेतसँ आपस अबैत-काल सोचि रहल छल- जाड़ भेल अछि। आगि लग बैसबो करब आ पत्नीसँ प्रेमपूर्वक गप्पो करब। जहियासँ बेटा-पुतौहुक पुतौहक अँगना भेल पत्नियोँसँ गप्प करैमे संकोचे रहैत अछि। मुदा अखनी अँगना सुनहट होएत। लोक सोचैत रहैत अछि किछ आ भऽ जाइ छै किछु आर। विचारले गप्प जँ भऽ जाइ तँ सभ स्वर्गेमे डुमकी मारत...। भुलोटन अँगना ऐबते देखलक जे पत्नी कोनटामे मुँह नमरौने बैसल अछि। सहैट कऽ लग गेल आ सिनेहसँ पीठपर हाथ दैत पुछलकै- “की भेल?” पत्नी फनैक उठलै- “हटू, ऐठामसँ..!” “एना किए कनै छी?” “कानबै नै तँ हँसबै। ऐसँ नीक तँ मरि जइतौं।” “फरिया कऽ बजबै तब ने बुझबै।” “कहै छै जे मने-मन गजै छी आ गज लऽ कऽ नपै छी! ओइ दिन नै कहलौं जे हमरा अलगे रस्ता लगा दिअ। एकर ओल सनक बोल सहल नै जाइए। मुदा अहाँक मन तँ अछि दोसरे। आइ सभ करम करा देलिऐ।” “कानू नै चुप रहू। कोनो गप्प तँ रस्तेसँ कएल जेतै किने।” “अहाँ रस्ता आ बाट तकैत रहू। अँगनामे रहबै तब ने देखबै रँगताल। अहाँक बेटा पुतौह मीठ अछि तँ संगे रहू। हम अलगे रहब। नहि हेतै तँ केकरो बरतन-बासन माँजबै। एकटा पेट तँ कुतो पालि लइ छै। हम तँ मनुख छी।” “धुर, तेतेक लगौड़ी लगबै छी ने। अहूँ की कम छी। कोय ईर घाट तँ कोय वीर घाट। हम पुछै छी- अखनी की भेलै से बजू ने?” भुलोटनक बात सुनिते जेना ओकरा पत्नीक अन्तरमे उधका मारलकै। बुझेलै कोनो सहाराकेँ कियो जोरसँ डोला देलकै। ओकरा आँखिसँ भर-भरा नोर खसए लगलै। ओ बझल गलासँ बजली- “एतेक दुख काटि अहीले बेटाकेँ पोसलिऐ। केतेक आसा लगौने छेलिऐ। सभटा आस-मनोरथ आब संगे चलि जाएत। यादि अछि- अहूँ कहै छेलिऐ- कमजोर छी तैयो अँगना-घरक सभटा काज करए पड़ैत अछि। पुतौह आएत तँ किछो ने करए पड़त। गिरथाइन बनल रहब। बैसलेमे तीमन-भात भेटत। देखियो आब- आगूमे भात पाछूसँ लात। से अहाँक सोझहामे। जखैनकि अहाँ खुट्टा जेकाँ ठाढ़ छी। तब हमर ई गति?” पत्नीक अन्तिम वाक्य जेना भुलोटनक सूतल पुरुषार्थकेँ जगा देलकै। बुझेलै देहक कोनो भागसँ गर्मीक उत्पति भऽ रहल होइ...। बुढ़ाएल नस-नस तना गेलइ...। “ओ कुपूत केनए गेल अछि। दूटा पाइ कमए लगल तँ अपनाकेँ की बुझैत अछि। दुनू परानी निपत्ता किए भेल अछि। अखनी सोझहामे रहैत तब ने देखा दैतिऐ।” “की भेल यौ भुलोटन काका? किए गरमा रहल छिऐ?” कहैत पड़ोसिया निरसू लगमे आबि गेल छल। पत्नी कनैत बजली- “हँ, निरसूओ बौआ तँ ओहीठाम रहइ। हमरापर तँ बिसवासो नै हएत। एकरेसँ पूछि लियौ। केना हमर कण्ठ पकड़ने रहए।” “कनी फरिया कऽ हमरा बुझबए पड़तह निरसू। की सभ भेल रहै?” निरसू कातमे बैसैत बाजल- “यौ भुलेटन काका, किछ दोख लोहोक आ किछु लोहोरोक। केकरा की कहबै। एहो औंगरीमे काटबै चाहे ओहू औंगरीमे कटबै, जखम तँ अहींक हएत।” पत्नी बिच्चेमे काटैत बजली- “अहूँ झूठ नइ बाजू। हमरा कण्ठ पकैड़ नै मारै छेलै?” हाथसँ इशारा करैत निरसू बाजल- “अहाँ थिर रहू हम तँ कहिते छिऐ। दूधक लेल लड़ाइ भेल रहइ। तखैन कनियाँक नैहरसँ चारि गोरे आबि गेल रहइ।हुनकर भाइक संगे। सभटा दूधक चाह बना देल गेलइ। तहीपर काकीकेँ नै रहल गेलइ।” “रहल केना जाइत। मालिक-मलिकाइन सुतले रहै छै। हम जाड़-ठारमे अनरोखे थरथराइत ओइ टोलसँ दूध लाबि दइ छिऐ। टाँग-हाथ कठुआ जाइए। देहमे जड़ैया बोखार रहए तैयो दूध लाबलौं। से एको घोंट कथीले रहए देत। सभ दिन इहए टेबा। कहलिऐ तँ कण्ठ मोकै छलए। अहिना कहियो मारि देत हमरा।” “ई गप्प बरदाइश करैबला छै निरसू? दुनू परानी हमरा सभकेँ जिअ नै देत।” निरसू भरोस दैत बाजल- “तेहेन बात नै छेलै। एकेबरे आमील नै पीबू। कनियोँ कनी बेसी तमसा गेल छेली। तेकर कारण छेलै जे भाइक संगे नैहरक नीक लोक सभ छेलै। काकी ओकरा सबहक सोझेमे गारि-बात दिअ लगली। बता-बातीमे सौस-पुतौह ठेलम-ठेल कऽ लेलकै। कमजोरीक कारणे काकी गिर पड़ली। आब एकरा तिलकेँ तार नहि हुए दियौ। काका एडजस्ट करू। यौ अहाँ सबहक समए गेल बीत, आब भऽ गेलै दुनियॉंक इएह रीत।” मुदा भुलोटनकेँ मनमे दोसरे बात उपकलै- कहियो-काल जे पत्नीक हाथसँ तेल लगै छल सेहो दुरलभ हएत, तँए बाजल- “नहि हौ, सभ गप्पमे ई सभ अहिना करै छै। हम नै मानबै। पाँचटा पंचकेँ बैसेबै करबै।” एक दिस बेटाक सिनेह आ दोसर दिस पत्नीक प्रेम बीचमे पिसाइत भुलोटन सोचैत-विचारैत बढ़ि रहल छल। सुनै छिऐ किछे दिनक बाद एलेक्सन होइबला छै। ऐबेर अछेवटकेँ भोँट दऽ मुखिया बनेबाक छै। देखै छी ओ निडर छैथ। बजै-भुकैक छमता छै। पर पंचायतमे दूधक दूध आ पानिक पानि बेरा दइ छथिन। एहने लोक मुखिया हेबाक चाही। कतेक दिनसँ सोचै छेलौं जे आन गोरेतँ झगड़ोकेँ बढ़ा देत। अछेवटकेँ एक दिन घरपर लऽ जाएब। एकरे बुत्ते झगड़ा सुलझत मुदा समएपर भेँट हुअए तब ने...। भुलेटन विचारक बोनमे वौआइत अछेवटक दुआरिपर पहुँच गेल छल। दुआरिक एक कातमे अछेवटक पिता बैसल छला। भुलोटन कनी दूरेसँ पुछलक- “यौ, अछेवटजी छैथ आकि नै?” “ओकरा कथीले ताकै छहक हौ?” “एगो पंचैती करेबाक छै।” “आँइ, ओ बेमनमाँ पंचैती करत?” भुलोटनकेँ शंका भेलै। एना किए बजै छै। सहैट कऽ लग चलि गेल छल। अछेवटक पिता हाथ देखबैत कहलकै- “देखै छहक चण्डलबाक किरदानी। सटकासँ हाथ तोड़ि देलक। जे बापक हाड़ तोड़ै छै से तोहर निसाफ करैले जेतै।” भुलोटनक टाँग तरक धरती हिलए लगलै। चारू भर धुइयाँ-धुंध। किछ फुरेबे ने करइ। मोन पड़लै पड़ोसियाक गप्प। निरसू ठीके कहै छल- “एडजस्टमेन्ट..!” २ गंगजलिया पोखैर (विहनि कथा) कोनो वस्तु वा स्थानक नव नामकरणक एकटा इतिहास होइ छै, से कनी साँचो रहै छै, कनी झूठो रहै छै आ कनी बदललो रहै छै। ऐ पोखैरकेँ गंगजलिया पोखैर किए कहै छै? गामक लोक जे गंगा असलान करए जाइ छै, ओतएसँ आपसी हैतकाल गंगाजल नेने अबै छै आ ओ पोखैरक पानिमे मिला दइ छै। ई परम्परा बहुत पहिनेसँ चलि रहल छै। तँए ऐ पोखैरकेँ गंगजलिया पोखैर कहै छै। गामक पैघ लोक कहै- “ऐ पोखैरमे नहेलासँ लोक पवितर भऽ जाइत अछि।” ओही गंगजलिया पोखैरमे नहाइत रही। चारि-पाँचटा धिया-पुता संगी सभ सेहो छेलै। एक-दोसरपर पानि झोंकैत। सुड़कुरिया मारैत सोना डुम्मी खेलैत रही। कोय माछ जकाँ उछलैत आ कोय साँप जकाँ हेलैत। खुशीक कोनो सीमा नहि छल। तखैने गामक बड़का लोक असलान करए पहुँचला। संगी छौड़ा सभ संच-मंच भऽ गेल। थिर भऽ कऽ नहए लगल। हमरा ओइ गामक सभ गप्प नहि बुझल छल। किएक तँ हम बेसी मामा गाममे रहै छेलौं। तँए हम ओहिना उछलैत-कुदैत रहलौं। ओइ बड़का लोककेँ देहपर पानि पड़ि गेलैन। ओ तमसा गेला। आँखि गुड़ैर कऽ तकलैथ। मुदा हम नै बूझि सकलौं। ओहिना उछलैत-कुदैत नहाइत रहलौं। ओ बड़का लोक अन्तिम डूम दैत गंगा-गंगा करैत विदा भेला। फेर हमरा बुते पानि पड़ि गेलैन। ओ फनकैत कसि कऽ दू चमेटा घींच देलक। नोराएल आँखिए पुछलयैन- “हमरा अहाँ मारलौं किए?” ओ फोंफियाइत बजला- “एना बानर जकाँ किए कुदै छेँ। पानि पड़ा देलेँ। अपवित्र भऽ गेलौं!” हम कनैत कहलयैन- “ई तँ गंगाजीक पानि छिऐ। ई पड़लासँ अपवितर केना हेतै?” ओ बजला- “रौ पानि तँ ठीके पवित्र अछि मुदा तूँ तँ अपवित्र छेँ।” “केना कऽ यौ, हमहूँ तँ गंगेमे असलान केने छी।” चटाक फेर चमेटा लगल। “बकटेंटी करै छेँ। गंगाजी मे नहेलासँ जाति थोड़े बदैल जाइ छै।” जेना लागल अन्तरमे किछु दरैक गेल। आँखि ललिया गेल छल। तामसा कऽ तकलौं। ओ किछु दूर जा रहल छला। हमरा लगल जे हुनका आ हमरा बीचक दूरी बढ़ि रहल अछि। कतेक तेकर थाह नहि। ३ दिनेश रसिया बिहनि कथा ......... मनसुखाः बाबा कत स अबै छह ? बाबाः चौरी गेल रहियै । मनसुखाः अतेक रौदमे कि करै छेलहा ? बाबाः कि करियै आमक गाछी के रखबारी , मनसुखाः एह तहन त खुब आम खाइत हेबा तों नै ? बाबाः बौवा कने जा क देखी जे बापक कन्हाके हर कतेक हल्लुक होइ छै । मनसुखा चुप्पी लधने ........ ४ सत्यनारायण झा- बिहनि कथा- सुटिया अन्हार गुफ्फ |हाथ हाथ नहि सुझैत | आकाश साफ़ रहैक |पूरा आकाश तारा सं आच्छादित |निरवता त’ तेहन रहैक जे हृदय मे अनेरे सनसनाहट बुझाय |भगजोगनिक यत्र तत्र प्रकाश रात्रिक निरवता क’ आओर प्रखर केने रहैक |पक्षी सभ अपना खोता मे तेना ने सुतल रहैक जे कतौ सं कोनो आवाज नहि अबैत रहैक |एकदम शांत |वायुक वेग मे केखनो क’ बाँसक झुरमुट ऊपर नीचा भ’ जायक लगैक जेना कोनो अदृश्य शक्ति ओकरा हिला रहल छैक | एहन अन्हरिया राति नहि देखने छलियेक |हम ओही दिन कतेको अंतराल क’ बाद इलाहाबाद सं गाम आयल रही |हम ओहि समय इलाहाबाद मे पढ़ैत रही |भोजनोपरांत हम अपन दलान पर सुतल रही |नींद नहि होयत रहय |दोसर पहर राति बित गेल रहैक |कनेके काल पहिने बाँध बोन में गिदरक हुआ हुआ सुनने रहियैक |कतबो प्रयास करी नींद हेबे नहि करय |छटपट करैत परल रही |तखने दलानक कात कनैलक गाछ लग कुकुर कानय लगलैक |कुकुरक रुदन हमरा देह मे कपकपी भरि देलक |कनेक मोन क’ स्थिर केलौ |आब बुझायल निद्रा देवीक आगमन भ’ रहल छनि | अर्द्धावस्था मे रही |तखने बुझायल पुबारी कात सं दुर दुर सं केकरो विलाप करबाक आवाज आबि रहल अछि |निद्रा देबी पुनः लंक लेलनि |एतेक राति मे के कानि सकैत छैक ?अनुमान सं बुझायल जे मलहटोली सं कनबाक अवाज आबि रहल छैक |विलाप त’ एहन करैक जेना अंतरात्मा सं चित्कार करैत होयक |ओह ,कियो भारी बिपति मे कानि रहल छैक ?ओहिना ओछेन पर परल रही ,ताबे आँगन दिस सं माय अयलीह आ उठा, कहय लगलीह जे लगैत अछि जेना सुटिया कनैत छैक |ओकर बेटा बच्चेलाल बर जोर दुखित छैक |मियादी ज्वर लगैत छैक |सुटियाक नाम सुनिते मोन दुःख सं भरि गेल |ओ हमरा घरक खबासनी छल |एकेटा बच्चा भेल रहैक त’ ओकर पति भोकरहा मरि गेलैक |बेटाक कारण सगाइ नहि केलक |ओकर निर्बाह हमरे घर सं होयत छलैक |हमरा सात्विक सिनेह सुटिया सं छल |हम ओकरा बेटा सं चारि पाँच सालक पैघ रहियैक |बच्चे रही त’ सुटिया हमरा मायसन सिनेह देने छल |बर माने |हम बच्चे सं ओकर पाछू पछु दौड़ैत रहैत छलौ |आत्मीय सिनेह छल |गाम आबी त’ सुनिते ओ दौड़ जायत छल |अपना हाथे पानि पियाबति छल |हमरा माय क’ पूरा सम्हारैत छलैक |आइ नहि आयल त’ मोन में एकबेर ठह्कल मुदा भेल नहि बुझल हेतैक ?आब त’ ओकरो बच्चेलाल सोलह –सत्रह बरखक भ’ गेलैक |मुदा ----|मायक मुँह सं जहिना सु निलियैक ,तुरत ओकरा घर दिस भागलौ |वास्तव मे बच्चेलाल क’ तुलसी पीड़ा लग सुता देने रहैक आ ओकरा देह पर सुटिया अपन देह बजारि चिचिया रहल छलैक |हमरा देखिते सुटिया हमरा पैर पर अपन कपार पीटय लागल |ओ बेहोश भ’ गेलैक |ओकर दांती छोरेलियैक मुदा होश मे अबिते ओ ओहिना कपार पिटय लगैक |बच्चेलाल निष्प्राण भ’ गेल रहैक |ओ एहि दुनिया क’ छोरि चुकल छल | कनेकालक बाद लोक सभ एकटा ठठरी बना क’ अनलकै \ ओहिपर बच्चेलाल क’ धय देलकै आ राम नाम सत्य छै ,कहैत ,सभ श्मशान दिस बिदा भ’गेलैक | ओकरा अंगना सं सभ चलि गेल रहैक |सुटिया असगरे कनैत रहैक |बगल मे हमहू ठाढ़ रहियैक |एक बेर ओकर आँखि हमरा आँखि सं मिललय |ओकर दर्द जेना हमरा पूरा शरीर मे समा गेल |नहि रोकि सकलौ अपना क’ आ ओकरा भरि पाँज पकरि अपना करेज मे सटा लेलौ आ जोर जोर सं कानय लगलौ जेना माय क’ पकरि बेटा कनैत छैक | ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.नवेंदु कुमार झा- गाम मे समटि रहल प्रभाव आ चर्चा भेल वैश्विक प्रभावक- साहित्य अकादमीक भुसकौल मंडलीक कारनामा २. उमेश मण्डल- कौशिकी सम्मान समारोहक आयोजन १ नवेंदु कुमार झा, (मैथिली पत्रकारिता लेल विदेह सम्मान प्राप्त) गाम मे समटि रहल प्रभाव आ चर्चा भेल वैश्विक प्रभावक साहित्य अकादमीक भुसकौल मंडलीक कारनामा देशक प्रतिष्ठित सरकारी साहित्यक संस्था साहित्य अकादमी पटना मे अपन साहित्यिक उपस्थिति दर्ज करा अपन उपलब्धि मे एकटा आओर कड़ी जोड़ि लेलक। बिहारक तथाकथित प्रतिनिधि सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक संस्था चेतना समितिक सहयोग सॅ सम्पन्न कार्यक्रमक बाद आयोजक गदगद बुझि पड़ैत छलाह। मुदा सम्पूर्ण आयोजन इ स्पष्ट कऽ देलक जे साहित्यक अकादमीक मैथिली परामर्षदात्री समिति (मैथिली भाषा परामर्ष मंडल) प्रचण्ड बुड़िक मंडली अछि। पैघ संस्था छल, पैघ आयोजन छल तऽ पैघ आ प्रचण्ड विद्वानक उपस्थिति मैथिली साहित्यक लेल गौरवक विषय स्वाभाविके अछि। विषय चाहे जे हो विद्वानक संगति मे भरि दिन बितल तऽ नीक-नीक जनतब भेटबे कएल। मुदा जाहि उद्देष्य आ विषय पर ई कार्यक्रम केन्द्रित छल ओहि पर मैथिलीक प्रचण्ड साहित्यानुरागी सभक ध्यान नहि छल। उद्घाटन सत्र से लऽकऽ कथा संधि धरिक सत्र ज्ञान अर्जन करऽवला अवष्य रहल। विद्वान सभ विद्वतापूर्ण गप उपस्थित श्रोताक ज्ञानक भंडार के अवष्य बढ़ौलक आ जिनका अपन ज्ञान पर विषेष भरोसा छल ओ अपन स्मार्ट फोन पर ‘‘फेसबुक’’ क पेज खोलि अपन ज्ञानक उत्सर्जन करैत रहलाह। हमर तऽ दाबा अछि जे इ सम्पूर्ण कार्यक्रम विषय सॅ विषयांतर रहल। एहि आयोजन मे सभ सहभागी विद्वानक विचार ज्ञानाअर्जन मे सहायक रहल। इ कहबा मे कोनो संकोच नहि जे इ सरकारी आयोजन कोनो विषय पर केन्द्रित कऽ सरकारक खजाना के चूना लगैबाक सफल प्रयास रहल। भने मैथिली भाषा के संविधानक अष्टम् अनुसूची मे स्थान भेटि गेल हो। विद्वान एहि आयोजन मे सम्मिलित विद्वान आ परामर्ष मंडली नह कटा शहीद हेबा लेल तैयार होथि मुदा हुनक योगदान नाम मात्र अछि। खैर आब हमहूॅ विषयांतर भऽ रहल छी। अष्टम् अनुसूची मे सम्मिलित मैथिली भाषाक आब गमैया प्रभाव समाप्त हेबा स्थिति मे अछि। गाम घर सॅ आब जगत जननी माता सीताक भाषा मैथिली विदा भऽ रहल अछि। मैथिली भाषी क्षेत्र मे हिन्दी जड़ि गहिर भेल जा रहल अछि। मैथिली भाषाक क्षेत्र आ आबादी बढ़ि रहल अछि। जखनकि सरकारक आंकड़ा मे मैथिली बजनहारक संख्या घटि रहल अछि। एहि स्थिति में मैथिली साहित्य, आ पत्रकारिता पर वैष्विक प्रभावक चर्चा करब मात्र गप्पबाजी अछि। आब जखन सरकारी संस्था अछि तऽ ओकर बजटक उपयोग करब हमरा सभक नैतिक दायित्व अछि पूरा देषक शासन व्यवस्था लोक कल्याणकारी व्यवस्थाक अन्तर्गत चलि रहल अछि। सरकारक सेहो दायित्व अछि जे ओ लोक सभक (विषिष्ट) कल्याण करए। सम्पूर्ण समाजक कल्याण करब कोनो सरकारक लेल संभव नहि अछि मुदा किछु विषिष्ट लोकक तऽ कल्याण भइए सकैत अछि। से अहू आयोजन मे भेल आ पूरा सफाइक संग भेल। एहि कार्यक्रमक विषय तऽ बड़ व्यापक छल। एहि मे सहभागी विद्वान सभक विदूता पर सेहो कोनो आषंका नहि। कार्यक्रमक आयोजन आ कर्ताधर्ताक प्रतिभा तऽ मानहे पड़त। तखन नहि जे अपन सेवाकाल मे मैथिली के अपन साध्यं बुझलनि तिनका एहू बेर साधबाक अवसर भेटि गेल। मैथिलीक वैष्विक प्रभाव पर चारि दृष्टिए अपन विचार रख निहार चारू प्रतिभाषाली विद्वानक अद्भूत योग्यताक धनी छलाह। एहि मे तीन गोटे तऽ अवष्य एहन छलाह जिनकर रोजी-रोटीक आधार मैथिली नहि छल तइयो मैथिली लेल काज कएलनि आ काज कऽ रहल छथि। हुनका सभ के अवसर भेटल तऽ एकर उपयोग नहि कऽ सकलाह। चारू विद्वानक जे आलेख प्रस्तुत भेल ओ विद्वतापूर्ण छल मुदा ओकरा विषय सॅ दूर राखल गेल छल। जखन परामर्ष मंडलक नेतृत्व दिषाहीन छल तऽ भला वक्ताक दिषा पर चलबाक कोन प्रयोजन? इ तऽ मैथिलीक दुर्भाग्य अछि जे सरकारी सेवा आ हिन्दी पत्रकारिता मे खुटा गाड़वला मैथिली साहित्य आ पत्रकारिता मे सेहो खुटा गाड़बा मे सफल रहल। विषय सॅ विषयांतर भेल प्रषासनिक साहित्यकारक आलेख मे साहित्यक प्रषासनिक दंभ स्पष्ट गेल तऽ हिन्दी पत्रकारिताक स्तम्भ जे अपन पत्रकारिताक जीवन मे बिना अर्थ मैथिली पत्रकारिताक सेवा नहि देलनि ओ मैथिली पत्रकारिता पर वैष्विक प्रभावक चर्चा तऽ नहि कऽ बाकी सभ गप्प कहलनि। अर्थक मोह पाष मे फसल इ नव मैथिली पत्रकार अपन मनक व्यथा कहबा मे से हो संकोच नहि कएलनि जे ओ एक बोनि पर दू टा काज कऽ रहल छथि। (आलेख पढ़लनि आ अध्यक्ष्ता कएलनि) हुनका पत्रकारिता पर वैष्विक प्रभाव सॅ बेसी चिन्ता एहि लेल छल जे कोलकाताक कोनो मैथिली दैनिक सरकारक विज्ञापन लऽ रहल अछि। जेना हुनक जमीन केबाला कऽ सरकार ओहि मैथिली दैनिक के विज्ञापन दऽ रहल हो। हिन्दी पत्रकार मैथिली पत्रकारिताक आनक बानगी इ छल जे ओ मिथिला मिहिर सन यषस्वी मैथिली पत्रिका संपादक सुधांषु शेखर चौधरीक नाम धरि नहि लेलनि। एतबा नहि विकट परिस्थिति के बादो समय साल चलैत रहल आ एहि पर हुनक नाजरि नहि गेल। मुदा अपन मित्र हुनक पत्रिका पर विषेष ध्यान रहल। मैथिली साहित्यक इ सौभाग्य बुझि आ कि दुर्भाग्य, एकटा नाव फैषन बनि गेल अछि, जे अपन सामर्थ्य मे मैथिली के बिसरि जाइन अछि, अपन सरकारी सेवा आ आन सेवा सॅ मुक्त भऽ जाइत अछि ओ अपन वैष्विक प्रभाव देखबऽ लेल पैघ मैथिली साहित्यकार आ पत्रकार बनि जाइत छथि आ एहन अवसरक खोज मे लागि जाइत छथि। एहि आयोजनक प्रति मैथिली परामर्ष मंडलक कतेक सजग छल एकर बानगी आछि आमंत्रण पत्र आ कनि सॅ भेट कार्यक्रमक बुकलेट। आमंत्रण पत्रक भाषाक त्रुटि तऽ इ साबितक देलक जे परामर्ष मंडल मैथिली भाषाक पैघ भुसकौल साहित्यकारक मंडल अछि। एतबा नहि कनि सॅ भेट कार्यक्रमक कीति नारायण मिश्र पर केन्द्रित हिन्दी मे छपल बुकलेट मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभाव के रेखांकित करैत अछि। या तऽ मैथिली परामर्ष मंडल मात्र अर्थ उपार्जनक लेल बनक अछि अथवा सŸो भुसकौल अछि। जखन आमंत्रण पत्र हिन्दी आ मैथिली दूनू भाषा मे छपि सकैत अछि तऽ बुकलेट के मैथिली मे छलपऽ मे कोन परेषानी छल। एहि संदर्भ मे जनतब पर इ स्पष्टीकरण देल गेल जे साहित्य अकादमी क इ कार्यालयी भाषा अछि। प्रधानमंत्री कार्यालयक भाषा सेहो हिन्दी आ अंग्रेजी अछि। मा० प्रधानमंत्रीक कार्यक्रमक मैथिली अनुवाद प्रसारित होइत अछि तऽ साहित्य अकादमी के अपन कार्यालय भाषा बदलऽ मे कोन परेषानी छल। इ सभ अव्यवस्था परामर्ष मंडलक भुसकौल हेबाक परिणाम अछि। असल मे परामर्ष मंडलक नेतृत्वकर्ता के साहित्य अकादमी मे मैथिली साहित्यक खराम पुजबाक लेल देल गेल छल। मॉ सरस्वतीक वाद्ययंत्र नामी परामर्ष मंडलक नेतृत्वकर्ता एहि खराम के पहिर कऽ चलबाक प्रयास कऽ रहल छथि। मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभावक असरि कवि सॅ भेट कार्यक्रमक दरमियान स्पष्ट रूपें देखल गेल। एहि सत्रक विद्वान साहित्यकार कीर्ति नारायण मिश्रक साहित्यिक योग्यता पर कोनो तरहें टिप्पणी करब उचित नहि अछि मुदा एहि सत्र मे जाहि तरहे बेका सॅ हिन्दी मे अपन विचार रखलनि ओहि सॅ तऽ स्पष्ट भेल जे हुनक साहित्यिक आत्मा अवष्ये वैष्विक भऽ गेल अछि। कीर्ति बाबू हिन्दी आ मैथिली साहित्यक भूर्धन्य साहित्यकार छथि। हमरा नहि लगैत अछि जे हिन्दी साहित्यिक आयोजन मे एहि तरहें ओ मैथिली मे अपन विचार रखैत हेताह। हिन्दी हमरा सभक राष्ट्रभाषा अछि। एकर सम्मान करब हमरा सभक दायित्व अछि राष्ट्रभाषाक प्रतिनिधित्व करबाक लेल साहित्य अकादमीक प्रतिनिधि पूरा आयोजन मे सदेह उपस्थित छलाह तखन मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभावक चर्चा छोड़ि अपना पर वैष्विक प्रभाव देखैबाक कोन प्रयोजन। एहि आयोजनक एकटा आन सत्र छल ‘‘कथा संधि ओहि मे हिन्दीयाइन साहित्यकार के अवसर देब परामर्ष मंडलक मैथिलीक प्रति अनुराग के स्पष्ट करैत अछि। हुनक कथाक पृष्ठभूमि हिन्दीए सन जागल जे ओ स्वयं सेहो स्पष्ट कएलनि ओ कथा सुनौलनि। हमरा कथा नहि बुझि पड़ल तऽ एहि मे हुनकर कोन दोष। दोष तऽ सूनऽ वलाक। जे कथा दिस ध्यान नहि तऽ एहि आयोजनक गुण-दोषक ब्लू प्रिन्ट बनबऽ मे अपन ध्यान लगौने छलाह। मैथिली साहित्य मे भने मैथिलीक षिक्षक आ प्राध्यापक अपना के पैघ विद्वान बुझैत होथि। मुदा वास्तविकता इ अछि जे डा0 हरिमोहन झा सॅ मनमोहन झा धरि आ राज कमल चौधरी सॅ कमल मोहन चुन्नू धरि मैथिली साहित्यकारक जे पैघ सूची सोझा अछि ओहि मे निःसंदेह नब्बे प्रतिषत मैथिली साहित्यिक प्रतिभा ओ छथि जिनकर रोजगारक माध्यम मैथिली नहि अछि। नवका पीढ़ीक सेहो बेसी सक्रिय मैथिली साहित्यकार सेहो मैथिली पढ़निहार नहि छथि तथापि ओ मैथिली साहित्य मे अपन झण्डा गा़ड़ऽ लेल सतत् सक्रिय छथि। साहित्य अकादमीक मैथिली परामर्ष मंडल मे बेसी सदस्यक पेटक आगि मैथिली साहित्यक माध्यम सॅ मिझा रहल अछि मुदा ओ गाम घर पर मैथिली साहित्यक कोनो प्रभाव नहि छोड़ि रहलाह अछि। ओ तऽ मात्र सरकारी गैर सरकारी आयोजन माध्यमे अपन वैष्विक प्रभाव देखैबाक अवसर तकैत रहैत छथि। साहित्यक अकादमीक इ आयोजन जेना अज्ञानताक प्रतियोगिता बुझि पड़ल। एहि आयोजनक प्रति साहित्य अकादमी आ आयोजक संस्था चेतना समितिकक गंभरीता ओकर कार्यषैली सॅ स्पष्ट भऽ गेल। जखन साहित्य अकादमी जे एहि आयोजनक वित पोषक छल एहि आयोजनक प्रति गंभीर नहि छल तऽ सदा सॅ अगंभीर रहल चेतना समिति कि एक एहि कार्यक्रम के गंभीरता सॅ लैत। साहित्य अकादमी आमंत्रण पत्रक बंडल पठा देलक आ चेतना समितिक सोइत वला व्यवस्था एहि आमंत्रण के नजर अंदाजक अपना तरहे आयोजनक व्यवस्था मे लागि गेल। अकादमी के जेना चेतना समितिक कार्य प्रणालीक अंदाज छल। ओ साहित्यकार सभ के सेहो फराक सॅ पांच पांच टा आमंत्रण पत्र पठौने छल। लगैत अछि जे इ कोनो रैली छल जे सभ साहित्यकार के पांच पांच मुड़ि क संग उपस्थित हेबाक छल। राजधानी पटना मे मैथिली साहित्य प्रेमीक कोनो कमी नहि अछि मुदा एहि आयोजन मे भांज पुराओल उपस्थिति चेतना परिवारक सोइताना व्यवस्थाक एकटा बानगी छल। आतिथ्य सत्कारक लेल चर्चित मिथिलाक संस्कृति पर एहि आयोजन मे वैष्विक प्रभाव देखल गेल। महाकवि विद्यापतिक नाम पर बनल विद्यापतिक भवनक बिम्ब पर मिथिलाक आतिथ्य परम्परा के टांगि सरदारी व्यवस्था मे अतिथि सत्कार भेल ओ आष्चर्यजनक छल। चेतना समितिक महादेवक सोइत बसहा कार्यक्रमक सफलता पर गद्गद् छलाह। मैथिली लेखाक संघक मैथिली लिटरेचर फेस्टिवेल मे जखन चेतना समिति पर प्रतिकूल टिप्पणी भेल छल तऽ ओहि ठाम उपस्थित चेतना समितिक महादेवक बसह। सभ तांडव देखबा योग छल मुदा महादेवक एहि मंदिर मे क एहि अव्यवस्था पर ओ बसहा सभ महादेवक आगा मुड़ि हिलबैत रहलाह। असल मे विद्यापति भवनक संदर्भ मे इ उक्ति सटीक बैसैत अछि जे माल महाराज के आ मिर्जा खेले होली विद्यापति भवन मैथिल समाजक सम्पति अछि आ महादेव एकरा सरदार के होली खेलबा लेल गिरवी राखि देलनि अछि। साहित्य, संस्था आ समिति अछि तऽ आयोजन होएब आवष्यक अछि। पैघ संस्था रहत तऽ पैघ आयोजन ज्यो पैघ आयोजन तऽ विद्वान सेहो पैघ-पैघ रहताह। पैघ विद्वानक उपस्थिति मे नीक ज्ञानार्जनक अवसर भेटत। इ नीक गप। मुदा विषय सॅ विषयांतर भऽ श्रोता सभ के दिग्भ्रमित करब उचित नहि। मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभावक बहन्ने ज्ञानार्जन तऽ अवष्य भेल। एहि बहन्ने अनियमित अवकाश प्राप्त साहित्यकार, विद्वान आ पत्रकार मैथिली साहित्य पर अपन प्रभाव छोड़ऽ मे सफल रहलाह। २ उमेश मण्डल कौशिकी सम्मान समारोहक आयोजन निर्मली (सुपौल) : १८ अप्रैल, संध्या ६:३० बजेसँ स्थानीय विद्यालय- एस.एन.एस. ग्लोवल सेमिनरीक पाँचम स्थापना दिवसपर विविध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कएल गेल। संगे विद्यालय परिसरमे नव-निर्मित नाट्य मंच- ‘बेनीपरी रंगशाला’क उद्घाटन सेहो भेल। उद्घाटनक पछाइत कौशिकी सम्मान समारोहक सत्र आरम्भ भेल। जेकर मुख्य अतिथि अयकर अधिकारी सह गजलकार ओम प्रकाश झा, विशिष्ठ अतिथि- साहित्यकार राजदेव मण्डल, कमलेश झा, कपिलेश्वर राउत, नन्द विलास राय, राम विलास साहु एवं उमेश पासवान तथा सम्मानित अतिथि- टैगोर साहित्य पुरस्कार एवं विदेह साहित्य सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार जगदीश प्रसाद मण्डल एवं प्रो. धीरेन्द्र कुमार छला। सर्वप्रथम मंचासिन सभ अतिथिगणकेँ अंग-वस्त्र एवं पुष्प-मालसँ सम्मानित कएल गेलैन, पछाइत श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ हुनक समग्र साहित्यिक योगदानक लेल आ नाट्य-निर्देशनक योगदान लेल प्रो. धीरेन्द्र कुमार रायकेँ ‘कौशिकी सम्मान-२०१५सँ सम्मानित कएल गेलैन। प्रशस्ति-पत्र, पुष्प-गुच्छ एवं अंग-वस्त्र प्रदान कएल गेलैन। सम्मान समारोहकेँ सम्बोधित करैत मुख्य अतिथि- ओ.पी. झा कहलैन- “सेमिनरीक निदेशक डॉ. सुरेन्द्र कुमार सिंहजी अपन विद्यालयक स्थापना दिवसक समारोहक संग ‘कौशिकी सम्मान’ शुरूआत कऽ ने मात्र निर्मली अपितु मैथिली साहित्य-जगतमे एक कीर्तिमान स्थापित केलैन अछि, ई एक ऐतिहासिक कार्य छी। कौशिकी सम्मान लेल दुनू गोरेकेँ बधाइ। संगे सेमिनरी परिवारकेँ धन्यवाद..!” क्रमकेँ जारी रखैत विशिष्ठ अतिथि राजदेव मण्डलजी अपन उद्बोधनमे कहलैन- “बहुमुखी प्रतिभाक धनी जगदीश बाबू कमे दिनमे विपुल संख्यामे साहित्य-सृजन कऽ एवं अपन विचारधाराक बलपर मैथिली साहित्य-जगतमे अपन पहिचान बनेलैन। ई हुनक सच्चा कर्मक द्योतक अछि। जे किछु लिखै छैथ, जिनका लेल लिखै छैथ, जिनकर गप लिखै छैथ, तिनका सबहक संग डेग-डेग मिला चलबो करै छैथ! सभसँ पैघ गुण हिनक ई छैन जे विरोधक मात्र स्वरेटा नै ओहन बेवहारो आ जिनगियो बनेने छैथ जगदीश बाबू। जे मिथिलामे बेछप अछि! थोड़ अछि! यएह हिनक एक-एक रचनाकेँ सेहो अनुपम अनबैत अछि, बेछप बनबैत अछि। सेमिनरी परिवार जगदीश बाबू एवं प्रो. धीरेन्द्र बाबूकेँ कौशिकी सम्मानसँ सम्मानित कऽ निर्मलीक नाम रौशन केलैन अछि। ” उद्बोधन क्रमकेँ जारी रखैत संघर्षशील मैथिली सैनानी श्री कमलेश झा बजला- “नाट्य-निर्देशनक क्षेत्रमे प्रो. धीरेन्द्र कुमारकेँ एवं साहित्य-जगतमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ कौशिकी सम्मान जे सेमिनरी परिवार, एक विद्यलय परिवार प्रदान कएल ओ अबस्स अनुपम कार्यक शुरूआत छी। ऐ हेतु ने मात्र सुरेन्द्र कुमार सिंहजी धन्यवादक पात्र छैथ बल्कि समस्त निर्मलीवासी धन्यवादक पात्र छैथ। ई क्रम अनवरत जारी रहए ई हमर शुभकामना..!” ऐ तरहेँ अन्य विशिष्ठ अतिथिगण सेहो अपन उद्गार व्यक्त केलैन। अन्तमे मंच संचालक उमेश मण्डल आयोजककेँ धन्यवाद ज्ञापनक लेल आमंत्रित केलैन। डॉ. सुरेन्द्र कुमार सिंहजी धन्यवाद ज्ञापन करैत बजला- “मंचासिन मुख्य अतिथि, विशिष्ठ अतिथि एवं सम्मानित अतिथिक संग सभागारमे उपस्थित सबहक प्रति हम आभार प्रकट करै छी। १८ अप्रैल विद्यालयक स्थापना दिवस छी, जे ई पाँचम छी। ऐ अवसरपर हम सभ साल किछु-ने-किछु कार्यक्रम आयोजन करैत रहलौं। मुदा ऐ सालसँ जे ‘कौशिकी सम्मान’क आरम्भ कएल ओ आगूओ जारी रहत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल एवं प्रो. धीरेन्द्र कुमारजी केँ सम्मानित कऽ हम- सेमिनरी परिवार- बहुत खुश छी, अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस कऽ रहल छी! अहिना अपने सबहक सहयोग बनल रहए...। धन्यवाद नमन..! ” तेसर सत्रमे विद्यालयक छात्र-छात्राक द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कएल गेल। जइमे शिक्षाक महत, स्वच्छताक महत, साम्प्रायिक सौहार्द, राष्ट्र प्रेम, लघु नाटिका, गीत, गजल संगे विभिन्न तरहक नृत्य इत्यादिक सुन्दर प्रदर्शनसँ भेल। जे दर्शक-दीर्घामे उपस्थिति श्रोता सभकेँ मंत्र-मुग्ध केलकैन। अनेको पारितोषिक एकर प्रमाण बनल। स्कूलक शिक्षकगण सेहो ऐ सुन्दर कला प्रदर्शन लेल धन्यवादक पात्र रहला। श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित पोथी ‘विदेह नाट्य उत्सव’ एवं ‘विदेह लघु कथा संग्रह’ तथा ‘तरेगन’ नामक पोथी पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर सेमिनरीक सभ शिक्षककेँ तथा छात्र-छात्राकेँ श्रीमती प्रीति ठाकुर रचित बाल साहित्य- ‘मैथिली चित्रकथा’ एवं ‘गोनू झा आ आन मैथिली चित्र कथा’ पारितोषिक रूपमे प्रदान केलक। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। रवि भूषण पाठक दोस्तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य) आ झड़बैर कालक दोस्ती बहुत किछ महुआक रंग नेने रहै ,रंगो सँ बेशी गंध ।खूब मादक गंध ,पूरा क' पूरा गाछी-बिरछी ओइ गंध सँ पुलकित ,मुदा ऐ गंधक आयु कत्ते दिन ,ऐ फलक आयु कत्ते दिन ,ऐ वसंतक आयु कत्ते दिन ,तहिना ऐ कालक दोस्ती सब रहै ।किछु दिनक लेल पूरा जगजगाड़ ,आ फेर जल्दिए बाइस भेनै आ किछुए घंटाक बाद मौलेनए ,मौलाईत-मौलाईत लाल भेनै आ फेर करियेनए ।मुदा चलाक लोक शरबत बना पी लैत रहथिन,बेशी चलाक लोग लट्टा बना के राखि दैत रहथिन आ जे जन्मी चलाक रहथिन से महुआ कें सड़बाक प्रतीक्षा करैत रहथिन ,महुआ सड़ै आ मधु मे बदलि जाए ।काबिल लोक सब ऐ दोस्ती कें सीसी मे राखि के अमर बना देलखिन ।तें ऐ काल मे जल्दी-जल्दी दोस्ती बनै आ टूटै ।बहुत किछु ‘ट्रायल एंड एरर’ तकनीक पर ।दोस्ती बहुत किछ तात्कालिक स्वार्थक आधार पर बनैत रहै ,आ ईहो पता नइ रहै कि ऐ दोस्ती सँ किछु भ' पेतए वा नइ आ किछु समै बितैत जखन पता चलै कि हे दोस्ती तोहर कोन दिशा ,तोहर कोन रंग ,तखन तुरत दोस्त सब बदलि जाए आ जे विशेषण ,समास आ मुसकियान अहांक लेल प्रयुक्त भेल रहै ,से दोसराक लेल खर्च भेनै शुरू भ' जाए ।कखनो काल दोस्त लोकनिक' स्वार्थ आमने-सामने आबि जाइ तखन दूनू एक-दोसर पर आरोप लगबैत अलग भ' जाइत रहथिन ।जे जत्ते बुधियार ,से तत्ते कम आरोप लगबै ।आ एहने समै मे एलखिन साव जी आ साव जी दूए दिन मे विदा भ' गेलखिन ,एहने समै मे एलखिन कमती जी ,ऊहो दुए दिन मे विदा भ' गेलखिन ........मुदा सभ एहने नइ रहै क्।किछु आयल छथिन कि पुरनका सब कें उखाडि़ के फेक देबै कत्त’ बागमती मे ,गंगा मे ,करेह मे..... ईहो एगो समै रहै ,मधुबनी जिला मे एक सँ एक इंस्पेक्टर भूमि विभाग मे । एगो सिंह जी रहथिन ,जिनकर पहुंच पटना तक ,मिश्रा जी रहथिन हरदम पटना-रांची बौआइत रहथिन आ झाजी दिल्ली -कोलकाता सँ कम कखनो नइ बतियाथिन ,एगो ईहो समै छैक सब झड़बैर सब पहुंच गेल छैक ।एगो छथिन विनय भूषण से हरदम सिंहजीक पाछू लागल रहै छथिन ,आ ऐ अागू-पाछू मे भोजन-जलपानक चिंता सँ मुक्त छथिन ,एतबे नइ सिंहजी कनेक पहुंच वला छथिन से एही बहाने कनेक बात-सात ,निंदा-प्रशंंसा ,पाद-फूस करैत नजदीकी बढि़ रहल छैक आ कनेक काजो ससरि रहल छैक ।विनय भूषण जी आ सिंह जी सहरसाक महिषी प्रखण्डक छथिन ।दूनूक दोस्ती एही ठामक अछि,मुदा दूनू आदमी एके साथ कहै छथिन भगवती तारादेवीक जय ।ऐ दोस्ती के झाजी कनेक वक्र आंखि सँ देखै छथिन ,किएक त' विनय भूषण छोट जाति सब मे सँ छथिन आ झाजी कें लागैत छैन जे विनय भूषण सिंहजी कें साथ मिलि एकटा नया समीकरण बना सकैत अछि ,मुदा सिंहजी एकरा एकटा संभावना कें रूप मे देखैत छथिन,मतलब एहन आदमी जे ब्राह्मण सबकें गरिया सकैत अछि ,बस एकटा चाय ,कनेक जलपान ,बासि-कुसि मिठाई आ ई सब नइ होए तैयो एकटा भविष्य आ एकटा संभावनाक मद्देनजर....
आ झड़बैरक दोसर फुल्ली जीवछ ठाकुर ।देह पिलपिल्ली मुदा अवाज भरिगर ।की चाही आ की बाजै छी ,ऐं यौ ठाकुर जी ,एना मे केना मिलत ओ सभ ,जे अहां चाहै छी आ जे कंठ पर आबैत आबैत रहि जाइत अछि ।मुदा कतबो कहियौ करता ओतबे ।आ एकटा चीजक गैरेंटी कि ओ सही चीज नइ बता सकैत छी ,पता नइ पर्सनेलेटी डिजोर्डर ,जेनेटिक समस्या वा कोनो खास मानसिकता ।अहां पूछबै नाम आ ओ पूर्ण शिष्टताक संग अपन शैक्षिक योग्यता बतेता ।नइ -नइ हुनकर कान ठीक छइ ,ओ बताहो नइ छथिन ,ओ अहां संग मजाको नइ करैत छथि,मुदा ई अल्लक बल्ल जे छैक ,सएह हुनकर शक्ति ।एही शक्तिएंक भरोसे ओ अपन रस्ता चलैत छथिन आ अहां अनुमान नइ लगा सकैत छियै कि ओ किमहर जेता ।आ ठाकुर जी सब दिस छथिन कनेक सिंह जी दिस ,कनेक झा दिस ,कनेक मिश्रा जी दिस ,कनेक रंजन दिस ,कनेक विनय भूषण दिस ,मुदा ओ गोजर नइ छथिन कि शतपादी होथि ,तें ओ किमहरो नइ घुसुकि पाबै छथिन ,ओ चालियो नइ छथिन कि ससरैत-ससरैत नमहर रस्ता पार क' सकैथ ,से ऊ भ' गेलखिन वृद्ध ऊंट जे अपन नमहर गरदनि उचका-उचका पात तोड़ैत हो आ ठाकुरो जी बस पाते तोड़ैत छथिन ,फल ,डांट छूबाक सामर्थ्य हुनका मे नइ ।जे ऊर्जा बचैत छैन से रेलवेक टाईम-टेबुल देखबा मे लगा दैत छथिन ,डेली सकरी जाइत छथिन ने ,तें आबि जेता दस मिनट पहिले आ आफिस सँ भागि जेता दू घंटा पहिले ।पीठ पर बैग टांगने ठाकुर जी एकटा निश्चित समै मे दरभंगा आ संकरी स्टेशन पर देखा सकैत छथिन आ ई मासिंक सीजनल टिकट हुनका कत्तौ के नइ छोड़लक । ने ओइ ग्रूपक भेलखिन ,ने अइ पटटी दिस ससरलखिन ।ओ अखंड यात्री रहलखिन आ पूरा मंडली जिला चरैत रहलै ......अधिकारी परेशान कि किछु कमा के नइ दैत अछि ,आ अधीनस्थ परेशान कि साहेब कमबा नइ रहल छथि ।मुदा एहने मे कतेको एहनो सूरमा सब छैक ,जे चाहैत छैक कि ठाकुर जी नइ आबैथ मधुबनी ,ओ बैग ल’ के ,टिकट ल’ के ,मोटर साईकिल सँ ठाकुर जी कें विदा करैत छैक ,आ ठाकुर जी गाम जाइत छथिन ,मुदा गाम मे रहैत छथिन त’ धियान रहैत छैन मोबाईल पर ,हरदम चौंकैत रहता कि केकर फोन एलै ,केखनो कंपनी वला फोन केलकै ,त’ ऊचकि के देखता ,केखनो वौआ –बुच्ची सब सेहो गलती सँ रिंगटोन बजा देलकै त’ परेशान ठाकुर जी बच्चा सब कें डेंगा दैत छथिन ।केखनो डेरा के फोन बंद क’ दैत छथिन ,केखनो बैटरी निकालि दैत छथिन आ केखनो काल ओछैने पर मुसकियाइत बहन्ना सोचैत छथिन ।ई मुसकिएनै कतेको बेर कनियां के खराब लागलेन ,पहिले टोकैत रहथिन ,आब टोकनै छोडि़ देलखिन ,मुदा एखनो कहियो काल कनियां ताक’ लागैत छथिन ।हाय रे ठाकुर जी ,ठाकुर जी केकरो नइ भेलखिन ,ने कनियां आ बाल बच्चा के ,ने आफिस मे रहि के दू पैसा कमा पेलखिन ,ने अधिकारी वर्ग पर दू पइसा लुटा सकलखिन ,ने रोड पर शुद्ध मोन सँ खखसि कें भरि गाल पीक फेंकलखिन ।ठाकुर जत्त’ रहलखिन परेशान रहलखिन आ सब हुनका सँ परेशाने रहलै ।
झड़बैर कालक तेसर सम्माननीय इंस्पेक्टर साहेब आत्मानंद छी छथिन ।अपने सिंहजीक बाल सखा छी आ अपनेक घर जिला सहरसा मे अछि ।अपने सिंह जीक साथे साथ पटना मे जवानी नष्ट कएल आ चापलूसी ,चमचै आ जासूसी मे निष्णात भेलौं ।पता नइ कोन सुखे मधुबनी मे च्वाइस देलौं आ ऐ ठाम सिंहजीक जूनियर इंस्पेक्टर के रूप मे ख्यात छी ।ई जूनियरिटी पदरूप मे नइ विशेषण आ क्रिया रूप मे छैक ।जइ समै आत्मानंद जी जिला ज्वाइन केलखिन ,जिला दू भाग मे बँटल रहै सिंह जी ,सहरसा आ सिंह जी समस्तीपुर मे ।आ आत्मानंद जी आबिते दूनू पाटी ओत' धुरझार घूम' लागलखिन ।लोक अनुमान लगबै ,कथी लेल आबै छौ आत्मानंद ,लोग शक करै ,विश्वास करै ,आरोप लगबै ,अपना आप के बचाबै ,मुदा आत्मानंद एबा-जेबा मे कोनो कमी नै केलखिन ,जेकरा जे बूझबा के होए से बूझहै ।आ आत्मानंद जी अपन काज अत्यंत मौन आ समर्पण के साथ क' रहल छथिन ।केओ कहै छै जे आत्मानंद दूनू गुट के एक करबा मे लागल छथिन ,दोसर तर्क ई छैक जे आत्मानंद भेला ब्राह्मण,ओ किएक एक करथिन ,ओ त' इएह चाहता कि सिंह जी कमजोर होए आ ओ एकर स्थान ,झोड़ा-झपटा आ कमंडल सहित सिंहासन ल' लैथ ।तेसर तर्क ई छैक जे ई आतमबा जासूसी क' रहल छौ ।सब ठाम अपन कैमरा आ टेप सेट केने रहै छौ आ जा के सिंह जी ओइ ठाम बोकरि दैत छैक आ ऐ बोकराए क' पइसा सिंहबा एकरा दैत छैक ।मुदा आत्मानंद जी की क' रहलखिन से मात्र आत्मानंदे टा जानैत छथिन ।आत्मानंद जी क’ अस्त्र छैक मौन ।जे जेकरा बाजै के छौ ,से बाजि ले ,ओइ पर कोनो प्रतिक्रिया नइ देता ,बस मुसकिएता ,आ मुसकीओ छोट-छीन ,अहां मुसकी बुझियौ या नया छी तखन ई अनुमान लगाबियौ कि आत्मानंद जी क’ मुह कहिया सँ टेढ़ छेन । आ बस नइ बजबा कें कारणे ई अनुमान लगेनए कठिन कि आत्मानंद किमहर छथिन आ बस एही कारणें ओ सब गुट ,टोल आ पट्टी मे स्वीकार्य छथिन ,बस स्वीकार्ये छथिन ,लोकप्रिय नइ ,िकएक त’ गुप्त योजना मे या त’ सिंह जी संग शामिल रहैत छथिन या फेर अधिकारी वर्ग सब संगे ।मुदा अहां ईहो नइ कहि सकैत छियै कि आत्मानंद जी कें बाज’ नइ आबैत छनि या हुनका संग मे विषयक अभाव छैक ,यदि मौका मिलैत छैन त’ बीटल्स ,लांग मार्च ,ब्रह्मांड आ बिगबैंग पर अबाध रूप सँ घंटा-दू घंटा बाजि सकैत छथिन ।तें एक टा चीज नोट करू कि मितभाषित ,चुप्पी आ मौन हुनकर अस्त्रे टा अछि ,आउर किछु नइ । आत्मानंदजी मे एकटा आर गुण छैक –भक्ति ।अधिकारी वर्ग मे ई भक्तक रूप मे ख्यात छथिन ।डेली जेनए ,बिना बजाओल जेनए आ बिना आज्ञा के नइ एनए ।फ्रिज साफ केनए ,तरकारी आननै ,‘तबियत ठीक अछि ने ‘ ई पूछनै ।दोहा क’ दोसर लाईन बाजनै ।हँसी-खुशी क’ मौका होए त’ हँसनै आ कोनो दुख-विषादक बात होए त’ मुंह लटकेनए ।साहेब जेकरा पर प्रसन्न छथिन त’ प्रसन्न भेनए आ साहेब जेकरा पर नराज छथिन त’ आत्मानंद सेहो नराज भ’ जाइत छथिन ।आत्मानंद जी सूचनाक वाईर छथिन । के कत्त’ छैक ,के केकरा सँ भेंट केलकै ,केकरा केकरा सँ नइ पटैत छैक आ के केकरा मे सटेने छैक ई सब सूचना आत्मानंदजी यथा स्थान राखि दैत छथिन ।आ केखनो काल त’ शक होइत अछि कि आत्मानंद जी आदमी छथिन कि पेन ड्राईव ।आ एक दिन विनय भूषण सपना देखलकै कि आत्मानंद पर सिंहजी एकटा दवाई फेंक देलखिन आ आत्मानंद ओछैन बनि गेलै ,आ विनय भूषण दोसर दिन सपना देखलकै कि सिंह जी एकटाा मंत्र बाजलखिन आ आत्मानंद नटुआ जँका नाच’ लागलै ।तेसर दिन फेर विनय भूषण सपना देखलकै सिंह जी आंखि मूनि के किछु मंत्रे जँका परहलखिन ,आत्मानंद कंडोम बनि के साहेबक जेबी मे चलि गेलै ।विनय भूषण कहैत छैक कि ई सपना नइ सत्त छैक ,हमर आंखिक देखल ,मुदा सिंह जी कहैत छथिन कि विनयबाक दिमाग बेशी भ’ गेल छैक ,एकरा ईलाज चाही । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.रामसोगारथ यादव- चारिटा गजल आ एकटा कविता ३.२.1.संतोष चतुर्वेदीजीक दूटा हिंदी कविताक अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा 2. दिनेश रसिया- गजल 3.सुकोसित शिशिर- कविता ३.३.१.सृजन शेखर 'अज्ञेय'- दूटा कविता २.हिंदीक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबरालक सातटा कविता- मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा ३.४.१.राजदेव मण्डल- शिशुक स्वर २. जगदीश प्रसाद मण्डल- पाइक मोल रामसोगारथ यादव- चारिटा गजल आ एकटा कविता गजल १ पुछु नै अहाँ बिन हम कोना जिवै छि कहियो पौवा कहियो बोतल पिवै छि जहिऐ छोडी गेलियै अहाँ बिचे वाट तखनेसँ खाली पेट नसेमे हिलै छि घायल करेज पुछु कोना तडपैय टुक्रा मिलाकँ दिलकँ पोटरी सिबै छि जगलोमे याद किय ? सुतलो सताबै अँही सपनाके हम दिनोमे चिबै छि हमर जेना तेना अहाँ खुस रहब आई अहिंक यादमे दु शब्द लिखै छि सरल वार्णिक- १४ २ जराउ नै बिधाके मन्दिर महा पाप भसकैय काईल अंहुँक संतान अंगुठा छाप भसकैय सकैछि तँ मन कऽ अहिंसा जराउ देहक मैल छिनु नै किन्को जीवन श्राप महा श्राप भसकैय सडक हडतालके नामपर बस्ती जरनाई काईल अपनो घर जरिक सखाप भसकैय भेदभावसँ भरल बस्तिमे गन्तबय खोजै छि काईल अपने लोक अपने खिलाप भसकैय अहिंसा भेदभाव जौं मनसँ हटादेबै तखन सुन्दर संसारसँ निक मेलमिलाप भसकैय सरल वार्णिक --१८ ३ जिवै छि पिबै छि नसामे हिलै छि यादके चिबै छि फाटल सिवै छि नोरसँ लिखै छि सरल वार्णिक--३ ४ छिटकु नै भटकु नै बिचे वाट लटकु नै मोका ऐलै सटकु नै गर्मे गर्म चपकु नै संग मे सँ मटकु नै सरल वार्णिक ---४ कविता ई किनकर ई किन्का बारिके फुल हबे । पोखरिमे मुर्छा रहल अछी । रोपबाक सोख छ्ल, निक कैलौं, रोप्लौं बारिमे फुलाक फुल, फेकदेलौं किय । गामके कुवाँमे, चौबटिया पर । नदि मे, सडक पर ।। जतबे सोखिन छि , सौगंध लेबमे । ओतबे समर्थ राखु, फुलके समहार मे ।। एना गंन्ध बिहिन नै करियौ एना पोखरी मे छताई नै दियौ इ किन्कर अँचलके खुसि हबे, ई केकर पापके पोटरी अछी । जुवनका के किशोरके जेकर होई उठा लजाउ बिना झारके फुल छता रहल हबे लोक के जना रहल हबे बिस्तर के गंध खायल पियल रोटि पानीके गंध चौबटिया पर गन्हा रहल हबे ई केकर जवानिके पाप हबे लजाउ छता रहल हबे पोखरिमे ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। 1.संतोष चतुर्वेदीजीक दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा 2. दिनेश रसिया- गजल 3.सुकोसित शिशिर- कविता 1 संतोष चतुर्वेदीजीक दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा १ गाँठ बेर-बेर एहन होइत छै की कोनो गाछक गाँठसँ फुटि जाइ छै नवका पल्लव आ तकरा संग शुरू होइ छै नव बाट अपन संघर्षसँ ओतहिंसँ रचा जाइ छै नव कविता अपन रससँ नदी-समुद्र केर सृजन करैत आ एक पल्लव कि बाट कि कविता केर बदला ठीक ओत्तहिं जनमि जाइ छै हजारक हजार जैठाम सोझ ठाढ़ि रहै छै तैठाम सृजनक कोनो उम्मीद नै ( मूल हिंदी कविता "वहीं से फूटती हैं राहें" केर भावानुवाद) २ मेघक दूभि अकासक अगम-अथाह संसारमे अवारा जकाँ घुमनिहार हम मेघ, आ तों जमीनपर एकैठाम हिलैत-डोलैत रहए बाली हरियर-हरियर छोटकी दूभि बरखा बनि एबौ तोरा लग आ बना लेबौ हीत-मीत अपन इच्छामे भिजा कऽ रचि-बसि जेबौ तोहर हरियरीमे चुप-चाप हम रहबौ तोरा लग अनचिन्हार बनि कऽ जे कियो अलग नै कऽ सकए हमरा तोहर हरियरीसँ ( मूल हिंदी कविता "बादल और दूब" केर भावानुवाद) अनहद आ पहली बार क संपादक संपर्क-- मोबाइल: 09450614857, ई मेल- santoshpoet@gmail.com 2 दिनेश रसिया गजल कनकनीमे ठरल पाइन इन्हेर नै भ जाइ । गरिबक घरमे कही कतौ भोर नै भ जाइ ।। मुह त सिबक रखनैये छै सोसकसब, सियल मुह फेरसं कही जोर नै भ जाइ । एक साँझ भुखले रहै छि मिता अखनो हम, धियापुताक दशा देख मनकही अघोर नै भ जाइ । अपन बात राखैयोके स्वतन्त्रता नै देखै छी, स्वतन्त्रताले माहुुरसन कही तिलकोर नै भ जाइ । ध्यान देबै यौ गौँवासब रसियाके बात पर, मेहनतके फल फेरो कही घरक चोर नै ल जाइ । 3 सुकोसुत शिशिर बाउर, दड़िभंगा. फूइस बाजी त' वज्र खसन्ता बन्हन तऽर रहल ने गुजर-बसर लेब सप्पत की ? भेल छगुन्ता. जाने जगरनाथ, देह छुबै छी, फूइस बाजी तऽ वज्र खसन्ता ! ......१ सिरागु छल चिनबारक आगू, रोज निपैत छल घर भगवन्ता पनही उतारि,ओलतीए राखि, बैसी ओसार टाट लगन्ता ! .............२ सग्गा पियाउज , लसूनक पत्ता बाड़ी केर लंका तैयार तुरन्ता. सद्य: कूटल , तखनहि फटकल सुआदी चूरा होइछ सेहन्ता ! ...........३ बेरहट आँगन , जलखइ दलान कलौ कतए नहिं तकर ठेकान फुल्ही थार, संगे सभक बैसार बरसे सिनेह , पसरे परसन्नता ! .......४ ठेलि-ठेलि झुटकी कित कित खेली करिया - झुम्मरि मोन घुमन्ता . दिने कोटपीस, राति पचीसी जीतब सिखेलक गोधि भगवन्ता ! .....५ गप्पक खेती , अल्हुआक लत्ती बेस अगत्ती लुत्ती लगन्ता, आगू बढ़ैत देखि देह जरैत मारैत छिटकी नहिं देर लगन्ता ! ........६ उकसाएल बाती ढुनमुन काकी उकटि के पुरखा गारि पढ़न्ता, नुनू कहथि पुनि माथ हँसोथि सिनेह केहन भगवाने जनता ! ...........७ डायनक शूल, देवी केर फूल भगत भगाबे कलेश अनन्ता, बट्टा चलै, चौरठ लठियाय पंचैती झट न्याय करन्ता ! ................८ खढ़-पुआर, गोरहा-गोइठा चेरा-सुण्ठी जखन सठन्ता कोड़ो-काठी , हरौतक लाठी होम जराठी चुल्हि जरन्ता ! ...............९ मूजक मौनी,पौती सींकिक कोहबर,कोठी, सामा, चकेवा ताड़क बियैन. खजूड़क पटिया सुजनी,कथरी कला अनन्ता ! ............१० साउस-ससुर सुन्नर सार पँजियार सारि-सरहोजिक देखि लवणता बिसरे सुध-बुध,संसारक सभ दु:ख सासुरक सुख भोगल जे कन्ता ! .........११ बन्हन तऽर रहल ने गुजर-बसर लेब सप्पत की ? भेल छगुन्ता. जाने जगरनाथ, देह छुबै छी, फूइस बाजी तऽ वज्र खसन्ता ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.सृजन शेखर 'अज्ञेय'- दूटा कविता २.हिंदीक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबरालक सातटा कविता- मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा १ सृजन शेखर 'अज्ञेय'- दूटा कविता १ गीत सँ पहिने शब्द छऽल चुप प्रकाश सँ पहिने अन्हार छऽल ..... समय भागि गेल समय भागि रहल समय आगू एत्तै समय सँ पहिने समय छऽल ..... कि कि ने केलौं कि कि ने भेलौं समटि नहिं सकलौं एक मुट्ठी जिनगी जिनगी सँ पहिने साँस छऽल .... अन्हार भेल मंच पर चलि रहल तमाशा नाचि रहल नटुआ टूटल ताल ताशा मेला सऽ पहिने बजार छऽल ...... रूकतैऽ तऽ मरतैऽ मरतैऽ तऽ रूकतैऽ तकतैऽ तऽ भेटतैऽ देखतैऽ तऽ बुझतैऽ चलय सऽ पहिने रूकल छऽल ...... आगू सऽ बढि गेल आगू सऽ बिका गेल रहि गेल से रहि गेल गाड़ी जकर छूटि गेल सपना सऽ पहिने अइंख छऽल ...... बात कि हेतै मुँह जे नय खुजतै ठाढ़ कोना रहतै डोरी जे टूटतै अंत सऽ पहिने आदि छऽल ..... माटिक मुरूत पानि बिनु फाटैत माटिक मुरूत पानि छू भखरैत माटि सऽ पहिने माटि छऽल..... भेंट नय भेलै भीड़ छलै बहुत रूकि नय पेलै जल्दी छलै बहुत प्रेमी सऽ पहिने प्रेम छऽल ..... २ हऽम कनी तमसएऽल छी निन्न टूटल अखने तैं ओंघाएऽल छी केलौं बहुत स्वाँग भऽ गेलौं निर्लज्ज देखलौं मुँह एना में तें कनी लजायल छी छोड़ू ओहि बात के दोसर कोनो बात करू टारि-टारि एहिना सच बिसराएऽल छी चलब ने अनचिन्हार बाट अन्हार राइत डरि-डरि एहिना डरे नुकाएऽल छी बचि-बचि के चलैत रहलौं जिनगी भरि सहेजलौं ने एक्कहु साँस तें खलियाएऽल छी लिखैत रहलौं जाहि हाथ सऽ जाली ख़त उसरै ने पुण्य काज तैं कँपकपाएऽल छी माँगैय के अछि आदत खोललौं ने बंद मुट्ठी दै के बेर तें कनी हिचकिचाएल छी हँसि ने पेलौं कानि ने पेलौं बनलौं बुधियार विदा के बेर तें आय नोरे नहाएल छी जिनगी के दस्तावेज़ २ हिंदीक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबरालक सातटा कविता मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा 1. कमरा अहि कमरामे सपना आबैत छै लोक पहुंच जाइत छै दस या बारह बरखक उम्रमे एतय फर्श पर बारिश गिरैत छै सुतल मेघ मंडराबैत छै रोज एकटा पहाड़ कनि-कनि अहि पर टुटैत छै एकटा जंगल एतय अप्पन पात खासबैत छै एकटा धार एतौका किछु सामान अपना संग बहा के लअ जाइत छै एतय देवता आ मनुख लखाह देत छै नांगर पइर फाटल कपड़ामे घुमैत संग-संग घर छोडैक सोचैत. (1989 मे रचित) 2. बाहर हम दरवज्जा बन के देलहुं आ कविता लिखैक लेल बैसलहूं बाहर हवा बहि रहल छल हल्का इजोत छल बारिश मे एकटा साइकिल ठाड़ छल एकटा बच्चा घर घुरि रहल छल हम कविता लिखलहूं जाहि मे हवा नै छल इजोत नै छल साइकिल नै छल बच्चा नै छल. (1990 मे रचित) 3. लिखल चलल जाइत छलहुं आखिर हम देखलहुं जे स्त्री कतेक यातना सहित अछि. नेना सब अनेरवा जेना घुमैत अछि. सखा-संबंधी सब हमरा सं गप करब बेकार बुझैत अछि. बाप बुझलक जे आब हम शायद कहियो हुनका चिट्टी नै लिखब. हमरा की छल एकर सबहक पता हम लिखल चलल जाइत छलहुं कविता. (1988) 4. उम्मीद आंखिक इलाज करबैक लेल जायत बाप सं दस डेग आगू चलैत छी हम आंखिक इजोत घुरय के उम्मीदमे बापक आंखि चमकैत छै उम्मीदसं ओहि चमकमे हम हुनका लखाह दैत छी दस डेग आगू चलैत. (1989) 5. अप्पन अधिकार जखन इजोत भेल छांह लखाह देलक अपनासं पैग लखाह देलक अप्पन अन्हार. (1991 मे रचित) 6. पहाड़ छथिन ओ नीक पहाड़ छथिन पसरल निमग्न पहाड़ पर आबैत छै नीन. (1988 मे रचित) 7. एहन काल जेकरा लखाह दैत नै ओकरा कोनो बाट नै लखाह दैत अछि जे नांगर अछि ओ कत्तो नै पहुंच सकैत अछि जे बहीर अछि ओ जीवनक धम्म नै सुनि सकैत अछि बेघर कोनो घर नै बनाबय अछि जे बताह अछि ओ नै जाइन सकैत अछि जे ओकरा की चाहि ई एहन काल अछि जे कियो भी भअ सकैत अछि आन्हर, नांगर बहीर बेघर बताह. (1992) ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजदेव मण्डल- शिशुक स्वर २. जगदीश प्रसाद मण्डल- पाइक मोल १ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१२ मूल पुरस्कारसं "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल सम्मानित श्री राजदेव मण्डलक कविता शिशुक स्वर बन्न परसौति घर चिचिआइत शिशुक स्वर निकलैत सुगन्ध मन्द–मन्द शान्तिमे स्पन्द मधुर आवाज सजौने साज कनैत बारम्बार खोलत अनन्त संभावनाक दुआर बनत नित-नूतन सिरजनहार ऐ हेतु होए एहेन आधार बढ़ै बुधि, विवेक, विचार तत्काल चाही सुरक्षाक ढाल देखू पाछू नचै छै काल लेने छै वएह पुरना जाल क्रन्दन स्वर पुछै सवाल “की हरण कऽ सकब अहाँ हमर दुख देख रहल छी घातीक रूख ताकि सकब अहाँ चिन्हल मुख हएत कोनो मनुक्खे सन मनुक्ख?” २. विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ मूल पुरस्कारसं "गामक जिनगी", लघु कथा संग्रह लेल आ २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - “तरेगन”बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह लेल आ २०१४ बाल पुरस्कार "नै धारैए" बाल उपन्यास लेल सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता पाइक मोल पाइ-पाइक दुनियाँमे पाइ-पाइक मेला लगल छै। भाय साहैब अपनो कहियौ कोन पाइक संग जिनगी छै। पाइ-पाइक...। एक पाइ खगता मेटबै दोसर खगता बढ़बै छै। रस-कस करैत दुनू संगे-संग चलैत रहै छै। पाइ-पाइक...। जहिना पाइ उधार जिनगीक तहिना पार उधार लगबै छै नजैर-नजैरक खेल खेलि पाइ दोस्ती करैत चलै छै। पाइ-पाइक...। पाइ ने कहियो जिनगी हेतै मुदा जिनगीक करमी बनबै छै। कर्मक करमी करनी जहिया फल जिनगी पबैत चलै छै। पाइ-पाइक...। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॊ शशिधर कुमर- किछु सचित्र बाल कविता गरूड़ (बाल कविता) पैघ चिड़ै - चिल्होरिसँ नम्हर, या बड़का चिल्होरि बुझू । छी “गरूड़” - जँ नाम रूचए नहि, तँऽ “बड़का चिल्होरि” कहू ।।*१ चाङ्गुर*२ छै मजगूत ततेक, खरहहुकेँ धएने उड़ि भागैछ ।*३ किछु प्रजाति तँऽ चाङ्गुरमे, साँपहुकेँ धएने उड़ि भागैछ ।।*४ ओ चिल्होरि जेकाँ नञि कहियो, भागैछ लोलमे दाबि शिकार । एक्कहि कुल, अन्तर तइयो छै, भिन्न दुहुक किछु छै बेबहार ।।*५ बहुविध गरूड़, शिकारहु बहुविध, अपन - अपन छी जीहक चाट । चिड़ै - छोट, खरहा तँऽ छैहे, ककरो प्रियगर साँप कि माछ ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - गरूड़ (EAGLE), चिल्होरि (KITE) आ किछु बाज (ACCIPITRINE HAWKS / TRUE HAWKS) - तीनू एक्कहि कुलक (FAMILY - ACCIPITRIDAE)सदस्य थिक तेँ तीनूमे बहुत किछु समानता अछि । समानता रहितहुँ तीनूमे बहुत किछु विभिन्नता अछि आ तीनू तरहक चिड़ै केर अपन किछु वैशिष्ट्य अछि जकरा आधार पर मैथिलीमे, संस्कृतमे आ हिन्दी - अंग्रेजी आदि भाषासभमे तीनूक अलग - अलग नाम देल गेल अछि । एहि ठाम जाहि शिकारी चिड़ैसमूहकेँ गरूड़ मानल गेल अछि तकरा भारतक आनो बहुत रास पक्षी वैज्ञानिकसभ गरूड़हि मानैत छथि । गरूड़क वर्णन हिन्दू धर्म ग्रण्थसभमे किछि मिथकीय काल्पनिक स्वरूपक होयबाक कारणेँ किछु लोक एकरा गरूड़ नञि मानैत छथि आ ताहि तरहक लोक एकरा “बड़का चिल्होरि” कहि सकैत छथि । *२ - चाङ्गुर = पञ्जा = CLAW (यद्यपि “चाङ्गुर” शब्द केर शाब्दिक अर्थ चारि आङ्गुरसँ बनल मुट्ठी स्वरूप भेल आ “पञ्जा” माने पाँच आङ्गुरसँ बनल, तथापि दुनु केर सामान्य रूढ़ि स्वरूपक अर्थ एक्कहि अछि − अंग्रेजीक CLAW केर अर्थमे ।) *३ - गरूड़क चाङ्गुर बड़ मजगूत होइत अछि । तेँ ओ अपन शिकारकेँ अपन चाङ्गुरमे दाबि उड़ि जाइत अछि − नञि कि चिल्होरि जेकाँ लोलमे दाबि कऽ । ओकर चाङ्गुरक पकड़ि एतेक शक्तिशाली होइत अछि कि ओ कएक बेर खरहाकेँ सेहो अपन चाङ्गुरमे पकड़ि कऽ बहुत फुर्तीसँ उड़ि जाइत अछि । *४ - गरूड़क किछु जातिसभ (Circaetus spp., Terathopius spp. & Spilornis spp. ) तँऽ साँपक शिकार करबामे माहिर होइत अछि तेँ अंग्रजीमे एकरासभकेँ सर्पेण्ट ईगल (SERPENT EAGLES) कहल जाइत अछि । विश्वमे गरूड़क करीब साठि टा जाति (60 SPECIES) पाओल जाइत अछि जाहिमेसँ अधिकांश यूरेसिया (यूरोप व एसिया) तथा अफ्रिका महादेशमे पाओल जाइत अछि । *५ - गरूड़क चाङ्गुरक पकड़ि चिल्होरिक चाङ्गुरक (CLAW) पकड़ि केर अपेक्षा बहुत मजगूत होइत अछि जखनि कि गरूड़क लोलक (BEAK)पकड़ि चिल्होरिक लोलक पकड़ि केर अपेक्षा बहुत कमजोर होइत अछि । तेँ गरूड़ अपन शिकारकेँ चाङ्गुरमे पकड़ि कऽ उड़ भागैत अछि जखनि कि चिल्होरि लोलमे । *६ - सामन्यतः सभ प्रकारक गरूड़ अपनासँ छोट चिड़ै, छोट रीढ़धारी प्राणी (जेना कि - मूस, खरहा, खरगोश, लुक्खी आदि), छोट सरिसृप (जेना कि - गिरगिट, छोट साँप आदि) केर शिकार करितहि अछि । गरूड़क किछु जातिसभ (Circaetus spp., Terathopius spp. &Spilornis spp. ) साँपक शिकार करबामे विशेष माहिर होइत अछि तेँ अंग्रजीमे एकरासभकेँ सर्पेण्ट ईगल (SERPENT EAGLES) कहल जाइत अछि । तहिना गरूड़क किछु जातिसभक (Haliaeetus spp., & Icthyophaga spp. ) विशेष अभिरुचि माछ आ जलीय - पक्षीसभक शिकार करबामे रहैत अछि । कल्याणी कोशक अनुसार - गरूड़ = एक पक्षी = a kind of EAGLE = Homraius bicornis गरूड़ = एक पक्षी = a kind of EAGLE एहि ठाम धरि तँऽ ठीक अछि परञ्च गरूड़ = Homraius bicornis बात मान्य नञि बुझना जाइत अछि । Homraius bicornis (syn. Buceros bicornis syn. Buceros homrai syn. Buceros cavatus syn. Dichoceros bicornis) वास्तवमे बड़का धनेश थिक जकरा अंग्रेजीमे GREAT HORNBILL / GREAT INDIAN HORNBILL / GREAT PIED HORNBILL कहल जाइत अछि । [syn. = synonymous to = पर्याय / पर्यायवाची अछि ] गिद्ध (बाल कविता) बड़की टा केर चिड़ै छिऐ, आ पंखक पैघ पसार छै ।*१ हेय दृष्टिसँ लोक देखै पर, ओक्कर बड़ उपकार छै ।। मुर्दाखौक अशुभ परिचायक, पैघ लहाश आहार छै । छोट जीव खरहा आ मूसक, सेहो करैछ शिकार छै ।।*२ मृत प्राणीकेँ खा धरती केर, करइत ओ सिंगार छै । ओकरा बिनु धरती पर सौंसे, मृत जीवक अम्बार छै ।।*३ पछिला तीस बरखसँ एहिठाँ, गिद्धक पड़ल अकाल छै । छी अकाल केर मूल मनुक्खे, ओकरे करनी काल छै ।।*४ मृत गो महींष बड़द तँऽ बूझू, भऽ गेल आब जंजाल छै । धार नदी ओ नहरि बाढ़िमे, सड़ैत लहाशक टाल छै ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - शिकारी पक्षीमे प्रायः गिद्ध सभसँ पैघ होइत अछि । भारतमे मुख्यतः एकर पाँच टा प्रजाति पाओल जाइत अछि - · WHITE RUMPED VULTURE = Gyps bengalensis · INDIAN VULTURE = Gyps indicus · SLENDER BILLED VULTURE = Gyps tenuirostris · HIMALAYAN VULTURE = Gyps himalayensis · GRIFFON VULTURE / EURASIAN GRIFFON = Gyps fulvus *२ - ई चिड़ै प्राथमिक रूपेँ मुर्दाखौक (SCAVANGER) अछि पर आवश्यकता पड़ला पर मूस, खरहा, खरगोश आदि प्राणिक शिकार सेहो करैत अछि । तेँ एकरा मुर्दाखौक शिकारी पक्षी (SCAVANGING BIRD OF PREY) कहल जाइत अछि । *३ - गिद्ध अपन समाजमे प्रायः अशुभक परिचायक मानल जाइत अछि पर वास्तवमे ओकर एहि धरती पर बड़ पैघ उपकार छै । ओ मृत प्राणीकेँ खा कऽ एहि धरतीकेँ स्वच्छ रखेत अछि, एहि धरतीक सिंगार करैत अछि, धरती पर महामारीकेँ पसरबासँ रोकैत अछि । *४ - पछिला तीस बरखसँ (सन् 1990सँ) भारत ओ नेपालमे गिद्धक संख्या बहुत तेजीसँ घटल अछि आ एहि ठाम भेटए बला गिद्धक जातिसभ विलुप्त होएबाक कगार पर पहुँचि चुकल अछि । एकर मुख्य कारण अछि पोशुआ पशु (माल - जाल) केर बेमार अवस्थामे सुई(INJECTION) केर रूपमे उपयोग होमए बला एकटा दबाई जकर नाम अछि DICLOFENAC SODIUM । ई दबाई मवेशीसभकेँ बोखारमे, चोट लगला पर, घाव-घोषसँ दर्द भेला पर देल जाइत छल । एहि दबाईक किछु अंश मवेशीसभक शरीरक चर्बी ओ मांसुमे सञ्चित भऽ जाइत अछि आ मुइलाक बाद आहार श्रृंखला (FOOD CHAIN) द्वारा गिद्धक पेटमे चलि जाइत छल । एहि दबाईकेँ गिद्ध नञि पचा पाबैत छल आ ओकर तत्काल प्रभावसँ गिद्धक आँत आ आन अंगसभमेसँ रक्तस्राव (INTERNAL BLEEDING / HAEMORRHAGE) होमए लागैत छल जाहि कारणेँ गिद्धक मृत्यु भऽ जाइत छल । एहि तरहेँ मनुक्ख ओ माल - जालक लेल प्राणरक्षक दबाई गिद्धक लेल सद्यः प्राणघातक भऽ जाइत छल । आब भारत, नेपाल ओ पाकिस्तान सरकार माल - जालमे एहि दबाई केर प्रयोग पर रोक लगा चुकल अछि आ ओकरा बदला MELOXICAM दबाई प्रयोग करबा लेल कहल गेल अछि । MELOXICAM गिद्धक लेल घातक नञि अछि । एहि प्रतिबन्धक बावजूदहु आँकड़ा कहैत अछि जे चोरा-नुका कऽ गाम-घऽरमे DICLOFENAC SODIUM केर प्रयोग मवेशीपर एखनहु भऽ रहल अछि । *५ - पहिने मृत मवेशीसभकेँ (खास कऽ हिन्दूलोकनि द्वारा मृत गाएकेँ) गामसँ बाहर चऽरमे छोड़ि देल जाइत छल जकरा गिद्धक झुण्ड किछुए कालमे खा जाइत छल पर आब से नञि भेलासँ बहुत समस्या भऽ गेल अछि । विशेष - हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध ऊँच पर्वतीय क्षेत्रमे होयबाक कारण आ संगहि अपन किछु विशिष्ट शारीरिक क्षमताक कारणेँDICLOFENAC SODIUM केर दुष्प्रभावसँ सबसँ कम प्रभावित भेल । भारतमे पाओल जाए बला शेष सभ गिद्धक प्रायः निनानबे प्रतिशतसँ बेशी (>99%) संख्या समाप्त भऽ चुकल अछि आ आब ओ सिर्फ संरक्षित स्थानहि पर बाँचल अछि । चिल्होरि या चील्ह (बाल कविता) पएर छोट मजगूत पंख छै, मुर्दाखौक शिकारी । पर सामान्य ई एकर रूप छै, ई तँऽ सर्वाहारी ।।*१ लाल पीठ चिल्होरि ब्राह्मिणी, आन छै भूरा-कारी ।*२ आँखि एकर बड़ तेज होइछ तेँ, ई छै कुशल शिकारी ।। सधल उड़ान भरैछ चिड़ै ई, मारैछ दक्ष झपट्टा । भरल हाटमे बिनु टकरएने, मांसु लऽ भागै पक्का ।।*३ भागैत काल मांसुकेँ ओ तँऽ, लोलहिमे पकड़ै छै । पएर ओकर कमजोर होइछ तेँ, लोलहिसँ झपटै छै ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ *४ - गरूड़क अपेक्षा चिल्होरिक चाङ्गुर बहुत कमजोर होइत अछि जखनि अपन वजनक अनुसारेँ ओकर लोल बहुत मजगूत होइत अछि । तेँ ओ अपन शिकारकेँ अपन लोलमे दाबि उड़ि जाइत अछि − नञि कि गरूड़ जेकाँ चाङ्गुरमे दाबि कऽ । ई ओना तँऽ सर्वाहारी पक्षी(OMNIVOROUS BIRD) अछि आ समय पड़ला पर किछुओ खा लैत अछि परञ्च मुख्य रूपेण ई मुर्दाखौक शिकारी चिड़ै (SCAVANGER RAPTOR / SCAVANGINGER RAPTOR BIRD) अछि । *२ - गिद्ध, गरूड़, चिल्होरि आ बाज − ई सभ शब्द स्वयंमे वैविध्यपुर्ण अछि तथा कोनहु एक जातिक चिड़ै केर बोध नञि करबैछ अपितु कतेकहु जैववैज्ञानिक वंश ओ जातिसभक (BIOLOGICAL GENERA & SPECIES) समूह केर परिचायक थिक । चिल्होरि शब्दसँ माइल्विनी (MILVINAE),एलानिनी (ELANINAE) आ परनिनी (PENINAE) नामक तीन टा उपकुल (3 SUBFAMILIES) केर सदस्य जाति-प्रजातिसभक बोध होइत अछि । · माइल्विनी (MILVINAE) उपकुल (SUB FAMILY) केर सदस्य मँझलुका आकारक शिकारी चिड़ै अछि पर चिल्होरि समूहमे सभसँ पैघ होइत अछि । ई बेशी समय आकाशमे मँड़राइत रहैत (HOVERING) अछि − एक ऊँचाई तक उड़लाक बाद गुड्डी (Eng. - KITE,हिन्दी - पतंग) जेना हवामे उधियाइत रहैत अछि − तेँ अंग्रेजीमे एकरा मँड़राईबला या उधियाईबला चिल्होरि (HOVERING KITES)कहल जाइत अछि । एहि तरहक परिभ्रमण ओ सम्भवतः मृत-प्राणीक खोज लेल करैत अछि । ललका चिल्होरि (RED KITE;Milvus milvus), कारी-भूरा रंगक करिया चिल्होरि (BLACK KITE; Milvus migrans), कत्थी-लाल रंगक ब्राह्मिणी चिल्होरि(BRAHMINY KITE / RED BACKED SEA EAGLE; Haliastur indus) आदि इएह उपकुलक सदस्य अछि । मिथिलामे बेशीतर लोक इएह कुलक सदस्यकेँ चिल्होरि बुझैत अछि वा कहैत अछि । · एलानिनी (ELANINAE) उपकुल (SUB FAMILY) केर सदस्य किछु छोट आकारक होइत अछि । ई आकाशमे मँड़राइत नञि रहैत अछि पर प्रायः ऊँच गाछ पर बैसि शिकारकेँ ताकैत रहैत अछि आ देखाई देला पर तेजीसँ उड़ि झपट्टा मारि शिकारकेँ लोलमे पकड़ि उड़ि भागैत अछि तेँ अंग्रेजीमे एकरा उड़एबला चिल्होरि (SOARING KITES) कहल जाइत अछि । एहि चिल्होरिसभक आँखिक रंग लाल (RED IRISH) होइत अछि आ देह केर वक्षोदर भाग (VENTRAL PART) प्रायः उज्जर रंगक होइत अछि । छोट आकार, उज्जर रंग, मँड़रएबाक गुणक आभाव आदिक कारणेँ मिथिलामे प्रायः एकरा बाज कहि देल जाइत अछि । · परनिनी (PENINAE) नामक उपकुलमे (SUB FAMILY) शेष बचल चिल्होरिसभ आबैत अछि । *३ - चाहे ओ कोनहु प्रकारक चिल्होरि हो (नञि कि गरूड़), पर ओकर उड़ान एतेक सधल ओ दक्ष होइत अछि कि बहुत भीड़-भाड़बला हाट-बजारमे सेहो बिना कोनहु मनुक्खसँ टकरएने कसाईक दोकानपरसँ मांसुक टुकड़ी या माछ वा माछक कुटिया लोलमे दाबि कऽ उड़ि भागैत अछि । मैथिलीमे - चील्हो = Abbreviated form of चिल्होरि कल्याणी कोशक अनुसार - चिलहोरि (चिल्होरि) = चील्ह, एक पक्षी = KITE = Falco chila चील्ह = चिलहोरि (चिल्होरि) = KITE चिलहोरि / चील्ह = एक पक्षी = KITE एहि ठाम धरि तँऽ ठीक अछि परञ्च चिलहोरि / चील्ह = Falco chila बात मान्य नञि बुझना जाइत अछि । Falco chila बहुत पुरान शब्द थिक जे सर्वमान्य कहियो नञि रहल आ आब एहि शब्दक प्रयोग भ्रमित करैछ, तेँ सर्वथा त्याज्य थिक । परबा या परेबा (बाल कविता) केहेन ई चिड़ै छै ! दिनहिमे उड़ै छै । साँझ होइतहि देरी ओकरा बाट ने सुझै छै ।।*१ पोशुआ सेहो छै । बनैया सेहो छै । बैसितहि सभ ठाँ ओ, गुटर - गूँ करै छै ।।*२ धूसरि कारी उज्जर । गर्दनि नील हरियर । भाँति - भाँति रंग, मुदा एक्कहि चिड़ै छै ।।*३ प्रशिक्षण पाबै छल । चिट्ठी पहुँचबै छल । उजराकेँ शान्तिदूत, जग भरि मानै छै ।। पौड़की सनि लागै छै । पौड़की ओ नञि छै । पौड़की - विपरीत ओ तँऽ, झुण्डेमे रहै छै ।।*४ पौड़की कुलक ओ । हरियल कुलक ओ । माँसु लेल लोक खूब, ओकरा पोषै छै ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - हमसभ देखैत छी जे साँझ होइतहि देरी पोशुआ परबा उड़ैत नञि अछि जाहिसँ अनुमान होइत अछि जे साँझ भेला पर परबाकेँ देखाइ नञि दैत अछि । वास्तवमे से बात नञि । परबा विशुद्ध दिनचर (STRICTLY DIURNAL) चिड़ै अछि । ओकरा रातिमे देखाइ तँऽ दैत छै पर ओ राति कऽ उड़ैत नञि अछि । ओ रातिमे तखने उड़ैत अछि जखनि कि ओकरा उछन्नर देल जाय अथवा विशेष प्रकारसँ प्रशिक्षित कएल गेल हो । परबामे रंग चिन्हबाक शक्ति होइत अछि । ओ पराबैगनी किरणकेँ (ULTRAVIOLET RAYS) सेहो आँखिसँ देखि सकैत अछि । तहिना परबा अपश्रव्य तरंगकेँ (INFRASONIC WAVES) सेहो सुनि सकैत अछि । मनुक्खक आँखि नहि तँऽ पराबैगनी किरणकेँ देखि सकैत अछि आ नहिञे ओकर कान अपश्रव्य तरंगकेँ सुनि सकैत अछि । अन्हारमे वा कम प्रकाशमे परबाक रंग पहिचानबाक शक्ति अवश्य बाधित होइत अछि । *२ - गुटर-गूँ = COOS / COOING SOUND *३ - बनैया परबाक रंगमे प्रायः बेसी अन्तर नञि होइत अछि जखनि कि पोशुआ परबाक रंग भाँति-भाँति केर होइत अछि । *४ - परबा झुण्ड या समूहमे रहएबला (GREGARIOUS) चिड़ै अछि जखनि कि पौज़की आ हरियल एकाकी (SOLITARY) चिड़ै अछि । पुरना अंग्रेजीमे परबा लेल DOVE आ PIGEON दुहु शब्द प्रयुक्त होइत छल । DOVE अंग्रेजीमे जर्मन मूलक शब्द अछि जखनि कि PIGEON फ्रेञ्च मूलक । आइ काल्हि प्रायः छोट आकारक परबा लेल आ पौड़की लेल DOVE शब्दक प्रयोग होइत अछि आओर पैघ कारक परबा लेलPIGEON शब्दक । परबा लेल किछु आओरहु शब्द सभक प्रयोग होइत अछि जाहिसँ धियापुता की, पैघहु लोकनि भ्रममे पड़ि जाइत छथि । एहेन शब्दसभ नीचाँ अर्थ सहित देल जा रहल अछि - · ROCK DOVE / PIGEON = WILD DOVE / PIGEON = Columba livia = बनैया परबा − ई प्राकृतिक रूपसँ समुद्री तटीय भृगु (सीधा ठाढ़ चट्टानसभक दड़ारि; उच्चारण - दड़ाइर) (SEA CLIFF), चट्टनी बहिर्निक्षेप (बहिर्गत या आगाँ निकलल भाग) (ROCK LEDGES) आ ताहि तरहक आन स्थानसभमे रहैत अछि । · DOMESTIC PIGEON = Columba livia domestica = पोशुआ परबा − बनैया परबाक ओ समूह जकरा मनुक्ख पोशुआ बना लेलक । · FERAL PIGEON = ESCAPED DOMESTIC PIGEON = Columba livia domestica = निस्तार पाओल (भागल) पोशुआ परबा − पोशुआ परबा जे कि निस्तार पाबि (भागि कऽ या फेर मुक्त भऽ कऽ) पुनः बनैया भऽ गेल हो । एहि तरहक परबा प्रायः पुर्ण रूपसँ बनैया नञि बनि पाबैत अछि । गेटवे ऑफ इण्डिया, लाल किला परिसर, कोनहु मन्दिर वा महजिदक परिसर आदि स्थानमे भेटएबला परबा एहने परबाक समूह थिक । · FANCY PIGEON = Columba livia domestica = कल्पित परबा − ई वास्तवमे पोशुआ परबा थिक जकरा किछु लोक अपना अनुसारेँ प्रजनन करा कऽ () अपन इच्छानुरूप रंग-रूप, कद-काठी ओ स्वभाव बला परबाकेँ उत्पन्न करैत छथि · WAR PIGEON = CARRIER PIGEON = MESSENGER PIGEON = Columba livia domestica = सनेशवाहक परबा − किछु विशेष प्रकारक प्रशिक्षित परबा पहिने सनेशवाहक केर काज करैत छल तेँ CARRIER / MESSENGER PIGEON कहाओल । प्रथम ओ द्वितीय विश्वयुद्धमे ओ अपन सनेशवाहकक भूमिकाक कारण WAR PIGEON कहाओल । बगेरी या बगेड़ी (बाल कविता) बगरा सनि ओ छै देखबामे, पर ओ बगरा नञि छै । नहिञे बगरी पिउरा माथक, ओ “बगेरी” कहबै छै ।।*१ बाधमे बिजुरीक ताड़क ऊपर, बैसल प्रायः देखबै । खेतक आढ़ि-बान्ह पर सेहो, बैसल कखनो देखबै ।।*२ नर - बगरी उड़बाक कालमे, गाबैत छै अपना स्वरमे ।*३ धरती पर खोंता ओ बनबय, खरही खऽढ़ भीतरमे ।।*४ बंगाली चातक कहैत छथि, अहँ चातक नञि बुझियौ । ई “बगरी” छी मैथिलीक, एकरा जुनि चातक कहियौ ।।*५ कोइली शिशु-भरण परजीवी, एकरहु खूब छकाबैछ । कौआ सनि एकरहु खोंतामे, नुका कऽ अण्डा पाड़ैछ ।।*६ गौरसँ देखबै, एकर माथ पर, कलगी सनि किछु लागैछ । बगरा आओर बगेरीमे नञि, बगरी तेँ अलगहि भाखैछ ।।*७ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - बगरा (बगड़ा), बगरी (बगड़ी) आ बगेरी (बगेड़ी) तीनू अलग चिड़ै केर नाम अछि- मैथिली नाँओ हिन्दी नाँओ संस्कृत नाँओ अंग्रेजी नाँओ जैववैज्ञानिक नाँओ बगरा या बगड़ा गौरैया कलविङ्क, चटक SPARROW Passer spp. बगेरी या बगेड़ी चकता या लावा पक्षी भारद्वाज पक्षी LARK, SKYLARK, esp. EURASIAN SKYLARK Alauda arvensis बगरी या बगड़ी बया पीतमुण्ड कलविङ्क BAYA WEAVER, WEAVER BIRD Baya philipinnus ई तीनू चिड़ै बगड़ा गण (Order - PASSERIFORMES) केर सदस्य अछि आ तेँ एकरंगाह सनि लगैत अछि । एकरा सामान्य अंग्रेजीमे पॅसेराइन बर्ड्स (PASSERINE BIRDS) सेहो कहल जाइत अछि । एहि गण (ORDER) केर चिड़ै सभक चाङ्गुर (CLAW) केर बनावटमे विशेष प्रकारक रहैछ जाहिमे तीन टा औंठा (TOE/S) आगाँ दिशि आ एक टा पाछाँ दिशि रहैत अछि । वास्तवमे ई चिड़ैसभक सभसँ पैघ गण थिक जाहिमे चिड़ै सभक ज्ञात जातिक (SPECIES) करीब आधासँ बेशी जाति समाविष्ट अछि । ई समस्त रीढ़धारी जीव (VERTEBRATES) केर सभसँ वैविध्यपुर्ण गण (MOST DIVERSE ORDER) सेहो अछि जाहिमे चिड़ैसभक पाँच हजारसँ बेशी जातिक (>5000 SPECIES) समावेश अछि । *२ *७ - ई चिड़ै प्रायः बाधमे बिजलीक ताड़ पर (एकसरि वा सुगवा सीकी, मएना, सिरौली आदि चिड़ै केर संगमे) या फेर बान्ह, आढ़ि, धूर आदि पर बैसल भेटत । प्रारम्भिक नजरिमे ई चिड़ै बगराक कोनहु प्रभेद बुझि पड़ैछ । परञ्च ध्यानसँ देखला पर एकर माथ, गर्दनि ओ चाङ्गुरमे औंठाक संरचना किछु अलग आ विशिष्ट बुझि पड़त । · माथ पर एक टा छोट-क्षीण कलगीनुमा (SHORT BLUNT CREST) संरचना होइत अछि जे चिड़ै केर अपना इच्छाक मोताबिक उठाओल या खसाओल जा सकैछ । · गर्दनि घुमओला पर ओकर गर्दनिक पाँखि शेष धऽड़ केर ऊपर एकटा टोपी सनि राखल बुझि पड़ैछ (देखू उपरुका चित्रमे) । · चाङ्गुरक पछिल औंठाक नऽह बहुत बेशी पैघ (नमगर) रहैछ (देखू उपरुका चित्रमे) । एकर टाङ्ग बहुत मजगूत होइत अछि आ तेँ ओ बेशी काल जमीनहि पर चलैत-दौड़ैत भेटत । ओकर मटियाही रंग जमीन पर ओकरा लेलछद्मावरण या छलावरण (CAMOUFLAGE) केर काज करैछ । *३ - पुरुष/नर बगेरी/बगेड़ी अपना स्वरमे गाबैत अछि आ से गायन प्रायः आकाशमे उड़ैत काल होइत अछि । *४ - बगेरी अपन खोंता गाछक डाढ़ि पर नञि बनबैत अछि । ओ खढ़-खरही आदिक अऽढ़मे जमीनहि पर घाससँ खोंता बनबैत अछि । *५ - बंगालीमे चातक शब्द अंग्रेजीक स्काइलार्क (SKYLARK) (Alauda spp.) चिड़ै लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि पर मैथिलीमे कदापि नञि । बंगालीमे एहि तरहक प्रयोगक (वा भ्रमित प्रयोगक) निम्न कारण अछि - · चातक ओ बगेरी दुहुक माथ पर कलगी वा कलगीनुमा संरचनाक होयब · दुहु चिड़ैमे गायनक प्रवृत्ति होयब · चातक केर उपस्थिति अपेक्षाकृत बहुत कम होयब आ ताहूमे दिनमे प्रायः नञि देखाई देब · बहुधा साहित्यमे गायनक प्रयोजनसँ चातक ओ पपीहाकेँ एक मानि लेब, आदि । *६ - कौअहि जेकाँ बगेरीक खोंतामे सेहो कोइली, पपीहा, चातक आदि चिड़ै (शिशुभरण परजीवी चिड़ै) नुका - चोड़ा कऽ अपन अण्डा दैत अछि । (विशेष देखू - कोइलीक पाद टिप्पणीमे) । गायक पक्षी (SONG BIRDS / SINGING BIRDS) केर रूपमे अंग्रजी साहित्यमे लार्क (LARK) या स्काइलार्क (SKYLARK) केर ओहने महत्त्व अछि जेहेन मैथिली सहित आन भारतीय वाङ्गमयमे चातकक अछि । प्राचीन अंग्रेजीक लार्क (LARK) शब्द जँ कोनहु आन शब्दक वा विशेषणक बिना आयल अछि तँऽ ओ वस्तुतः स्काइलार्क (SKYLARK) या यूरेसीय स्काईलार्क (EURASIAN SKYLARK) शब्दक परिचायक थिक । स्काइलार्क (SKYLARK) शब्दक प्रवेश अंग्रजीमे बादमे भेल अछि आ यूरेसीय स्काईलार्क (EURASIAN SKYLARK) शब्दक तँऽ बहुत बादमे । एखनहु सामान्य अंग्रेजी साहित्य मुख्यतः लार्क (LARK) या स्काइलार्क (SKYLARK) शब्दक प्रयोग पर्यायी स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि यूरेसीय स्काईलार्क (EURASIAN SKYLARK) शब्दक प्रयोग मात्र जैववैज्ञानिक अंग्रेजी साहित्यसभमे होइत अछि । पाठकलोकनिसँ - पहिल बात - हम गलतीसँ पहिने हिन्दीक “बया” नामक चिड़ै केर मैथिली नाम “बगेरी” लीखि चुकल छी । कृपया ओहि गलतीकेँ क्षमा करी ताहि चिड़ै केर मैथिली नाम “बगरी” या “बगड़ी” पढ़ी । दोसर बात - चातक चिड़ै केर पाद टिप्पणीमे (FOOT NOTE) हम लिखने रही जे, “अंग्रेजीक स्काइलार्क (SKYLARK) (Alauda spp.) चिड़ै केर मैथिली नाँओ एखनि धरि हमरा नञि बूझल अछि ।” ई लेखन भ्रमवश भेल छल । वास्तवमे आढ़ि-धूर-बान्ह आ बिजलीक ताड़ पर बैसल-दौगैत-कूदैत-उड़ैत बगरी नामक जाहि चिड़ैकेँ हम देखने रही आ अपना छविकर्षण यंत्रसँ (CAMERA) छवि (PHOTO / SNAP) निकालने रही (ऊपर देल गेल पहिल चित्र) से आन संदर्भमे देल गेल स्काइलार्क (SKYLARK) केर छविसँ नञि मिलैत छल । बादमे अधिक आवर्धन (HIGHER ZOOM) बला छविकर्षण यंत्रसँ (NIKON COOLPIX - S700 CAMERA, 20X- ZOOM, 16.00 MEGAPIXELS) लेल गेल छविसभसँ (ऊपर देल गेल दोसर आ तेसर चित्र) ज्ञात भेल जे दुहु चिड़ै एक्कहि अछि आ अंग्रेजीक लार्क (LARK) या स्काइलार्क (SKYLARK) वास्तवमे मैथिलीक “बगरी” या “बगड़ी” थिक । कल्याणी कोशक अनुसार - बगेड़ी = बगड़ा-सन एक खाद्य पक्षी = A TABLE BIRD = ORTOLAN, LARK (SHORT TOED) कल्याणी कोश सेहो बगेड़ी (बगेरी) केर लेल अंग्रेजीमे LARK शब्दक प्रयोग कएल अछि हलाँकि ओ एहि शब्दसँ मात्र SHORT TOED LARK केर समावेश कएल अछि । पुनः SHORT TOED LARK दू तरहक होइत अछि - · GREATER SHORT TOED LARK (Calandrella brachydactyla) · LESSER SHORT TOED LARK (Calandrella rufescens) संगहि-संग एहिमे ORTOLAN = ORTOLON BUNTING (Emberiza hortulana) नामक चिड़ै केर समावेश सेहो कएल गेल अछि । ई चिड़ै सेहो LARK या SKYLARK जेकाँ जमीनहि पर खोंता लगाबैत अछि । जे हो, पर LARK नामक चिड़ै केर कोनहु प्रकार हो, ओकर मांसु केर खाद्यप्रयोग मिथिलहिमे नहि अपितु विश्वभरिमे प्रशिद्ध अछि । जखनि कि ORTOLON BUNTING नामक चिड़ै पिञ्जरामे पोषल जाइत अछि तथा ओकर मांसु खाद्यक रूपमे प्रायः नहिञे प्रयुक्त होइत अछि । बाज (बाल कविता) मैथिलीमे छी “बाज” विदेशज । नञि छी - तत्सम, तद्भव, देशज ।।*१ जाहि भाषासँ “बाज” छै आयल । ओहि भाषामे अर्थ छै व्यापक ।।*२ “बाज - बहादुर” पोषथि बाज । पैघ, छोट आ माँझिल बाज ।।*३ मैथिलीमे भेल “अर्थ - संकोच” । छोटकी शिकारी पक्षीक बोध ।।*४ छोट - मँझलुका विविध चिड़ैसभ । गरूड़ - चिल्होरिक बाद जे बाँचल ।।*५ बहुविध देश आ बहुविध बाज । सौंसे दुनिञा पसरल राज ।।*६ चिल्होरिक गण साझी बाज । तेँ किछु गुण सझियो छै व्याप्त ।।*७ छोट चिड़ै केर करैछ शिकार । बेङ्ग आ गिरगिट सेहो आहार ।। दिनचर - चिड़ै - शिकारी ढीठ । सुरुजक दिशि कऽ बैसए पीठ ।।*८ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “बाज” - शिकारी चिड़ै केर अर्थमे प्रयुक्त होमए बला ई शब्द मैथिलीमे “विदेशज शब्द” थिक अर्थात आन भाषासँ (संस्कृतक अतिरिक्त आन भाषा) मैथिलीमे आयल अछि । *२ - शिकारी चिड़ै केर अर्थमे प्रयुक्त होमए बला “बाज” शब्द मैथिली आ आन भारतीय भाषासभमे “अरबी भाषा” सँ आयल अछि । प्राचीन अरबीमे बाजक अर्थ बेस व्यापक छल जाहिमे प्रायः गरूड़, चिल्होरि, गिद्ध आदि समस्त शिकारी चिड़ै आबैत छल । *३ - नेनपनमे गाम-घऽरमे सुनल बहुतहु खिस्सा-पिहानीमे “बाज बहादुर” नामक पात्र रहैत छल जे भाँति - भाँति केर बाज पोषैत छल - छोटका बाज, मँझलुका बाज आ बड़का बाज । ई “बाज” शब्दसँ बोध होइ बला शिकारी चिड़ैसभक व्यापकताक परिचायक छल । (ध्यातव्य जे अरबी भाषामे गरूड़, चिल्होरि, गिद्ध आदि नञि होइत अछि − मैथिलीमे शिकारी पक्षी सभक ई सब समूह “संस्कृत” भाषाक देन छी − तत्सम वा तद्भव रूपमे) । *४ *५ *६ - मैथिली भाषामे “बाज” शब्द तँऽ प्रयोग होइत अछि, पर ओकर अर्थ मूल अर्थसँ कम व्यापक अछि । व्याकरणमे एहि तरहक घटनाकेँ “अर्थ सङ्कोच/संकोच” कहल जाइत अछि । जखन कोनहु शब्दक पहिलुक अर्थसँ एखनुक अर्थ संकुचित (कम) भऽ गेल हो तँऽ “अर्थ संकोच” तथा जँ पहिलुक अर्थसँ एखनुक अर्थ व्यापक (विस्तृत) भऽ गेल हो तँऽ “अर्थ प्रसार” कहबैत अछि । गिद्ध, गरूड़ आ चिल्होरि केर अतिरिक्त जे शिकारी पक्षी बाँचल से वस्तुतः मैथिलीक “बाज” शब्दमे समाहित भेल । तेँ अंग्रेजीक FALCON, HAWK, BUZZARD, OSPREY, HARRIER, KESTREL आदि शब्दसँ बोध होइ बला शिकारी पक्षीसभ प्रायः मैथिलीक “बाज” शब्दमे निहित अछि । अनुवाद साहित्यमे प्रायः अंग्रेजीक HAWK शब्दकेँ बाज शब्दक समकक्ष मानल जाइत अछि । अंग्रेजीक HAWK शब्दसँ निम्न चिड़ैसभक बोद होइत अछि - · ACCIPITRINE HAWK = TRUE HAWK = GOSHAWKS + SPARROW HAWKS + OTHERS = members of Sub Family ACCIPITRINAE · BUTEONINE HAWK = BUZZARDS = members of Sub Family BUTEONINAE मोटा-मोटी मैथिलीक “बाज” शब्द अंग्रेजीक शब्दसँ वृहत् अछि आ अरबी भाषाक “बाज” शब्दसँ न्यून अछि । मैथिलीक भाषाक “बाज” शब्द निम्न चिड़ैसभकेँ समाहित करैछ - · ACCIPITRINE HAWK = TRUE HAWK = GOSHAWKS + SPARROW HAWKS + OTHERS = members of Sub Family ACCIPITRINAE · BUTEONINE HAWK = BUZZARDS = members of Sub Family BUTEONINAE · HARRIERS = members of Sub Family CIRCINAE · OSPREY = Pandion haliaetus (Family - PANDIONIDAE) · FALCONS, KESTRELS & CARACARAS = members of Family FALCONIDAE *७ *८ - दिनचर = DIURNAL = दिनमे शिकार कएनिहार चिड़ै = तेँ सुरूज दिशि पीठ कऽ कऽ बैसैत अछि ताकि शिकार पर पड़ि रहल सुरूजक किरिण परावर्तित भऽ कऽ सोझेँ ओकर (गरूड़, चिल्होरि वा बाज केर) आँखि पर पड़ओ । लुक्खी (बाल कविता) छोट जीव, बड़ मोट छै नाङ्गरि, पर ओ खिखीर नञि छै । अपना दिशि सौंसे भेटैत छै, बाड़ल कत्तहु नञि छै ।। पैघ छै पछिला टाङ्ग दुहु, अगिला बड़ छोट रहै छै । छोटकी कंगारू सनि लागए, पर कंगारू नञि छै ।।*१ फऽल - फूल - दाना खाइए, ने घास - पात रूचै छै । अगिला पएरकेँ हाथ बना ओ, फऽल - फूल पकड़ै छै ।।*२ भूरा रंगक देह ओकर, वा रंग जेना मटियाही । पाँच या तीन टा भेटत पीठेँ, उज्जर - उज्जर धारी ।।*३ टी - टी, टी - टी ध्वनि तीव्र, ओ बेर - बेर करै छै । संगहि नाङ्गरि उठा कऽ ऊपर, हावामे ओ डोलबै छै ।।*४ आबहु ने चिन्हलहुँ तँऽ कहै छी, “लुक्खी” ओ कहबै छै । धारीबाला भारतमे आ, आस - पड़ोस भेटै छै ।। विश्वमे सौंसे पसरल लुक्खी, बहुत प्रकारक होइ छै । रंग जे हो, पर पीठ पर धारी, अन्तऽ नञि भेटै छै ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - कंगारू ऑस्ट्रेलियामे पाओल जाय बला एकटा जीव अछि । विदेशी जीव रहितहुँ आइ - काल्हिक बच्चासभ ओकरासँ खूब परिचित रहैत अछि - कारण थिक, आजुक पोथीसभ (“K” for KANGAROO), क्रिकेट नामक खेलक प्रचलन आ श्रव्य ओ दृश्य मिडिया पर कंगारूक विशेष चर्च । “कंगारू”, “जिराफ” आदि शब्द मैथिलीमे विदेशज शब्द भेल । मैथिली सेहो ओहि तरहक शब्दसभकेँ ठीक ओहिना आत्मसात कएने अछि जेना कि हिन्दी ओ आन भारतीय तथा विदेशी भाषासभ । *२ - एहि जीवक अगिला दुहु पएर छोट - छोट होइत छै जकर उपयोग ओ खएबा काल कोनहु बस्तुकेँ पकड़बाक लेल करैत अछि । *३ - प्रायः उतरबारी भारतमे भेटए बला लुक्खीक (NORTH INDIAN PALM SQUIRREL; Funambulus pennantii) पीठ पर पाँच टा उज्जर रेखा (धारी) होइत अछि जखनि कि दक्षिनबारी भारतक लुक्खीक (SOUTH INDIAN PALM SQUIRREL; Funambulus palmarum) पीठ पर तीन टा । *४ - ई जीव (लुक्खी) बैसल - बैसल “टि - टि” केर एक टा विशिष्ट ध्वनि निकालैत अछि आ संगहि अपन नाङ्गरिकेँ ऊपर उठाए हवामे झुलबैत रहैत अछि । *५ - मात्र भारतीय लुक्खीक पीठ उज्जर धारीसँ युक्त होइत अछि । विश्वमे भेटए बला आन लुक्खीक पीठ पर धारी नञि रहैत अछि । शिकरा या सिकरा (बाल कविता) शिकरा छी एक बाजक रूप ।*१ सिकरा लीखथि बहुतो भूप ।।*२ पाँखि छोट ओ गोलाकार । छोट चिड़ै आ आन शिकार ।। बगरा ओक्कर प्रिय शिकार । बेङ्ग आदि छै सेहो आहार ।।*३ उज्जर रंगक पेट आ छाती । ताहि पर कत्थी रंगक धारी ।।*४ नर-शिकरा केर लाले आँखि । स्त्री-शिकराक पिउरा आँखि ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “शिकरा” एक प्रकारक बाज अछि । *२ - “शिकरा” शब्दक निस्पत्ति “शिकार” शब्दसँ भेल अछि । मैथिलीमे किछु लोक “शिकरा”केँ “सिकरा” लिखैत छथि पर “शिकार”केँ“सिकार” एखन धरि नञि लिखल जाइत अछि । *३ - छोट चिड़ै − विशेष कऽ बगरा (SPARROW) − शिकराक सभसँ प्रिय शिकार थिक । ओना आनहु छोट चिड़ैसभ, छोट सरिसृप (REPTILES,जेना कि - गिरगिट आदि) आ छोट उभयचर (AMPHIBIANS, जेना कि - बेङ्ग, भेंक आदि) वर्गक प्राणी आदि शिकराक शिकार बनैत अछि । *४ - दुहु लिङ्गक शिकराक वक्षोदर भाग (VENTRAL / ANTERIOR PART) उज्जर रंगक होइछ आ ओहि पर भूरा-कत्थी रंगक अड़ीय पट्टी(TRANSVERSE BANDS) रहैछ । *५ - नर शिकरा आँखिक रंग नारंगी वा लाल होइत अछि जखनि कि स्त्री-शिकराक आँखिक रंग पिउरा । सुगवा सीकी या सीकी सुगना या सुगवा कीड़ीखौक (बाल कविता) देखियौ बाबू ! सुग्गा हउए, सुग्गा नञि छी - बौआ रे ! सुग्गे सनि केर रंग लागै छै, पर नञि सुग्गा - दैय्या गे !! *१ हरियर सुग्गा पाँखिक सनि आ, फेंटल किछु आनहु हरियर । आन रंग ककरहु छै फेंटल, आन छटा केर छै हरियर ।।*२ एक्कर नाङ्गरि गौरसँ देखियौ, सीकी सनि किछु बहकल छै ।*३ सुग्गा पाँखिक रंगक बेशी, “सुगवा सीकी” कहबै छै ।। बाधमे, चऽड़मे, ठूँठ गाछ पर, बिजलीक ताड़ पर छै बैसल । खन उड़ि-उड़ि धरती पर आबै, खनहि ओतहि देखब बैसल ।। कीड़ा आओर मकोड़ा खाइतछि, तेँ कूदि धरती पर आबैछ । मधुमाछी, बिढ़नी आ फतिंगी, सभकेँ लोलसँ धऽ दाबैछ ।।*४ पर सभसँ बेशी रुचैत अछि, खाएमे एकरा “मधुमाछी” । अंग्रेजीमे नामे एक्कर, पड़लै “भक्षक मधुमाछी” ।।*५ लोल लाल सुग्गा केर सुन्नर, फलाहार केर लेल बनल । एकर लोल छै कारी - कारी, एकर आहारक योग्य बनल ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - सुगवा सीकी (BEE EATER) नामक चिड़ै केर जे जाति (SPECIES) अपना दिशि पाओल जाइत अछि तकर पाँखिक रंग अपना दिशि पाओल जाय बला सुग्गाक पाँखिक रंग सनि होइत अछि । एकर इएह रंगक कारण एकर मैथिली नाममे “सुगवा / सुगना / सुग्गा” उपसर्ग वा प्रत्यय (PREFIX / SUFFIX) केर रूपमे लागल अछि । मैथिलीअहि नञि, आनहु भाषा - जेना कि मराठी भाषामे एकर एकटा पर्यायी नाम“पाणपोपट” अछि, जकर अर्थ भेल “पात केर बनल सुग्गा” या “पात सनि हरियर सुग्गा” । संस्कृतक “पत्रिंगा” (पत्र = पत्ता या पात) केर सेहो एहने सनि अर्थ अछि जखनि कि मैथिली आ हिन्दीमे प्रयुक्त पतरेंगा आ पतरिंगा एकरहि तद्भव रूप अछि । *२ - अपना दिशि बहुतायतमे जे सुगवा-सीकी चिड़ै (BEE EATERS / BEE EATER BIRDS) भेटैत अछि तकर गर्दनि आ धऽरक रंग सुगापंखी हरियर होइत अछि जखनि कि माथक रंग नारंगी-हरियर जखनि कि मूँहक निचलुका रंग हरिताभ नील (हल्का फिरोजी सनि) होइत अछि । एकर नाम तेँ हरियर सुगवा सीकी वा सुगापंखी सुगवा सीकी (GREEN BEE EATER / LITTLE GREEN B. E. / ORIENTAL G.B.E.) कहि सकैत छी । सुगवा सीकीक आन जाति सभमे सेहो हरियर रंग अवश्ये रहैत अछि पर हरियरक आभा बदलैत जाइत अछि ओ नीलाभ-हरियर भऽ जाइत अछि । हरियरमे नील रंगक मात्राक अनुसारें ओकर रंग गाढ़ हरियर वा नील हरियर भऽ जाइत अछि । यूरोप ओ अफ्रिकामे पाओल जाए बला जातिमे नारंगी ओ पीयर रंगक प्रमाण सेहो बढ़ि जाइत अछि । *३ - एहि चिड़ै केर नाङ्गरिसँ दू टा सीकी सनि पातर संरचना निकलल रहैत अछि । एहि चिड़ै केर जे प्रजाति अपना दिशि बेशी भेटैत अछि से सुगापंखी रंगक होइत अछि । तेँ सम्भवतः एकर नाम “सुगवा सीकी” या “सीकी सुगना” अछि । *४ - ई चिड़ै हवामे उड़ैत कीड़ा - मकोड़ा, चुट्टी, बिढ़नी, पचहिया आ मधुमाक्षी(-छी) सभकेँ पकड़ि लोलमे दाबि गीरि (खाए) जाइत अछि । तेँ एकर नाम “सुगवा कीड़ीखौक” सेहो पड़ल होयत । *५ - एकर प्रतिदिनक आहारक बीस प्रतिशतसँ (20%) छियानबे प्रतिशत (96%) धरि चुट्टी, बिढ़नी, पचहिया आ मधुमाक्षी(HYMENOPTERANS) भऽ सकैत अछि । ताहूमे मधुमाक्षी(-छी) (Apis dorsata) एकरा विशेष प्रिय अछि । तेँ अंग्रेजीमे एकर नाम “बी ईटर”(BEE EATER) छैक जकर शाब्दिक अर्थ “मधुमाक्षी(-छी) भक्षक” होइत छैक । *६ - सुग्गा आ एहि चिड़ै केर लोलमे बहुत पैघ अन्तर होइत छै । सुग्गा पुर्णतः फलाहारी (FRUGIVOROUS) चिड़ै अछि आ तेँ ओकर लोल ओहि तरहेँ बनल अछि । सुगवा-सीकी चिड़ै केर आहार ऊपर वर्णित अछि आ तेँ ओकर लोल ओही तरहक बनल छै । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु विदे हwww.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.comVideha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २०३ म अंक ०१ जून २०१६ (वर्ष ९ मास १०२ अंक २०३)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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4 Rae? VS pes ONG Ti | i" Na Ne 2, Le, 4) is पका moe हे f 2.5 oe 3 कर if ? 4 . ३८१ एज her Kumar "dehy ©, St x “Reet © झा PA ada SWAP , | x ahs w —L—- —— | म्याल, भुनये 2 मी fen rar, जया ~— — = मैथिली - गिद्ध / गीद्ध / efter हिन्दी - गिद्ध संस्कृत - ye, सुदर्शन, Yelle, snot, भास, वज़चज्चु, वज़तुण्ड, खनगेन्द्र, Wear, दीर्घदर्शिन, कामायुसू, सघन् आदि। अंग्रेजी - VULTURE (चित्रमे - HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE) जैंववैज्ञा० नाम - OLD WORLD VULTURES - 6 SPECIES & NEW WORLD VULTURES - 7 SPECIES (चित्रमें - Gyps himalayensis - an OLD WORLD VULTURE) he seep set आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी a मड़ जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)
नल 3 श = ¥ wy) } j wai चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans
Pe q Be Ost. शशिधर कुमर “विदेह” 6 र द्ध } का स्थान - पाहीघाट-समौर are, मधुबनी बगेरी / EURASIAN SKYLARK / Alauda arvensis
’ R कुमर “विदेह” ww «i ‘ - —_— री 4 हे _—_—> 3 4 = स्थान - पाहीघाट-समौर ane, मधुबनी बगेरी / EURASIAN SKYLARK / Alauda arvensis
कं की व. मे किक ‘a b= re ape ey Y गा as a हि x “i ¢ x ete ./ x Who iy Ii we “पक, बट ८: fl o e 4 x 9 Pee sg By bya 2, Dey OK ES we I Ey Og Ske 9d पातक छन्मावरण / छलावरणमे (CAMOUFLAGE) नुकायल "सुगवा सीकी" या "पतरेंगा खुग्गा" (GREEN BEE EATER) (Merops orientalis) DI जोड़ी | प्रायः ई जोड़ीअहिमे बैंसल Wa अछि आ gg fergor एकरंगाहि होइत अछि |
re Bs — रुभी / मादा शिकरा / Ripa (शिकरा / Rip बाज) Se = TN 4 es a TT कर कि " \)
G 4 ( (ee कु = x Sie alt - मर —e v-Shashidhar = र i तर गौ = अपना अगिला GE UGG हाथ जेकॉ प्रयोग Ia aA देखबामे छोटकी कंगारू (ऑस्ट्रेलियाक जीव) afer लागैत लुवस्वी
ee as haa He aed (अगिला दुह UL) दाना उठा Ws खाइत Gait
करिए - _ TE yi * ७ Dr Shashidhar Kumar “deh” © डॉ. अधिकार “विदेह © जान नियन = acre हि ng a thing tal 38 . मैंथिली - लुक्खी हिल्दी - गिलहरी संस्कृत - वृक्षशायिका, रोमशी, कलन्दक, वृक्षमर्कटिका, शाखामूग ("शाखामृग" शब्दक अर्थ "बानर" Wel - अनेकार्थक शब्द) अंग्रेजी - SQUIRREL (चित्रमे - NORTH INDIAN PALM SQUIRREL - 5 STRIPED) जैववैज्ञा०८ नाम -Family - SCIURIDAE (लुकखी कुल) केर समस्त जाति ओ प्रजातिस्रभ्न (SPECIES & SUB SPECIES) (चित्रमे - Funambulus pennanitii) नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
: ya o™ » = ¥ . Sar RY i 4 = (4 7} ~< ३ ७ पे... ; का Vy ¥ > र 9 ae “A 4 Wi Reset me (Saat १: ही मैथिली - बगेरी / बगेड़ी हिन्दी - चकता / लावा पक्नी _... संस्कृत - भारद्ाज पक्षी अंग्रेजी - LARK (चित्र - EURASIAN SKYLARK / SKY LARK) जैंव० नाम - Alauda spp., Mirafra spp. 3i आन Agra (Genera) जातिसभ्र (Species) (चित्र - Alauda arvensis) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
न मकर है उत्तर रन ९८०८०, जज Ne के wes a aN a er ier ~ a a , के ae सन उजरा परबा / Ua (विश्वभरिमें शान्तिक प्रतीक मानल जाइत अछि)
कर eg UN दर 28 का डक ARE कर कर ‘ 5 र q IRR NT ४० Se PG eS ere © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शशिधर gat “विदेह” © छा “Pa ब्लबव “facHR? ' Je विभिन्न रूप - रंगक UAT / परेबासभ
Ss A YQ g Fe 4 कर } VF - Ys ie bs भर SS NO y fh gos > »~\ = A oe oa 8 “ डक 3 UX i & $2 स्थाल -रुचौल-दुलास्पुरूगल्डबारि (गल्धबारि) arr दरिंगा-धुवली x lh, के & करिया पीठबला soni चिल्होरि (प्राय: बाज कहि देल जाइछ) BLACK WINGED KITE / BLACK SHOULDERED EURASIAN KITE Elanus caeruleus
मा ie VS eS NG “\ ‘ x -. ae ey, , po ही aA \ NWS S we SN CSS ee NO nor संजय गा जितना करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans
Ti Ae Pa) lanl = ve Fas कक “4 mes <r eS न: 2 ६ स्थाल - संजय गाँधी जैविक उद्याल, पटना केर प्राइगणमे एकटा गाछक & डाढ़ि पर बैंसल स्वच्छल्द South, esl oy "करिया चिल्होरि" 2 i DE th LA FU: नर: 2: Tate क करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans
शनि ion (ees ¥ my (Axl IBY Mester Kumar “idea, व डॉ. शशिथर presen वा Wg अपर iene | दि... ९ OO ९३% Ra 5 स्थान - संजय गाँधी जैविक उद्यान, करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans
g डर ‘es न Bo. > मैथिली - चिल्होरि (उच्चा० - चिल्होइर) या चील्ह (चित्रमे - करिया पीठबला sont चिल्होरि) हिन्दी - चील संस्कृत - चिल्ल, वाताट, आतायिनू्, प्रतिबिम्ब, कणठनीडक आदि अंग्रेजी - KITE (चित्रमे - BLACK WINGED KITE) जेववैज्ञा० नाम - Milvus spp., Elanus spp. & members of 0 other genera (चित्रमे - Elanus caeruleus) (Excluding genera covered under EAGLE) इनौट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
अर aN = © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शर v4 ag” © जा नलिवत = cy 4S , oe DN pa रद my RLS : 5 Ap we Pei a pnt aie at कि "रन Oe मैथिली - चिल्होरि (उच्चा० - चिल्होइर) या चील्ह (चित्रमे - करिया facet हिन्दी - चील संस्कृत - चिल्ल, वाताट, आतायिनु, प्रतिबिम्ब, कएठनीडक आदि अंग्रेजी - KITE (चित्रमे - BLACK / PARRIAH KITE) जैववैज्ञा० नाम - Milvus spp., Elanus spp. & members of 0 other genera (चित्रमे - Milvus migrans) (Excluding genera covered under EAGLE) he - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ Ts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
y Py 5 Se y 4 7% Z od wt J ASS 4 Tt ye SoM Fin al \ AN can So allo a दठ \ a \ \\ रे \ 2 हिमालयी गिद्ध / हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE Gyps himalayensis
कि जि Sade न तट ०. ae ‘2 a) ¢ ‘ ss es ae — =} Nea x & वे wre | Fs SN Jar Kia ee ad i ae NY 9 Sa कि उन हाल -संजय आधी जैविक se, CoE हिमालयी गिद्ध / हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE Gyps himalayensis
ze a - Ee ——” SI = yp N RN Ne = J न 4 90) टन ee ff ही y) कसर नर लि = ७९ woe Ly 7 ant +.. स्थाल अर पटला (चित्रमे - हिमालयी ग्रिफॉल गिद्ध / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE / Gyps himalayensis)
fs BTS FF fy रा pore Sk 4 i f ip . ba oY i iF ies “| ral / हू om शशिधर कमरे. डर. ?' a =i ee | i: an i PSL) QPS « | it ~ 4 «४ 44 कि. धर AN ही RS er eee PLew लोल आ गर्दनिक बनावट (नजदीकर्से देखला पर) (चित्रमे - हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE / Gyps himalayensis)
ना लि स्वर्णिम गरूड़क चाड़गुर i TE जा | (चित्रीय निरूपण) | |) | — ft Wii ha! j j }/ ty CLAW OF A GOLDEN EAGLE] 0 7] भी ही j i) है | mtaGRaMMATIC ILLUSTRATION) \\ a RN NY Cae \ 4 PAN Wt? wy ’ yi) डर , नि ee ee साभार सौंजल्य - तिकिणीडिया पब्लिक डेमिल
लय eae? | + at २ के... 3 > 7 i} 4: कर aS | Ry ae Whe aaa न लहर Z io tie {A hes है | BL. ni = स्वर्णिम गरूड़ / GOLDEN EAGLE / Aquila chrysaetos साभार सौंजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमिन)
) © Dr, Shashidhar Kumar “Videha” ORME ee ey © afte चूधव face” मैंथिली - गरूड़, Asal चिल्होरि (उच्चा« - चिल्होइर) हिन्दी - गरूड, महाश्येन संस्कृत - गरूड, उत्क्रोश, श्येन / श्येनिका (पु०/स्त्री०) आदि अंग्रेजी - EAGLE (BALD, GOLDEN, , CROWNED, BOOTED HARPY, MARTIAL, STEPPE, SERPENT etc. EAGLES) (चित्रमे - STEPPE EAGLE / मैंदानी aos) जैववैज्ञा० नाम - कुल 60 वा Asa बेसी जाति (SPECIES) (चित्रमे - Aquilla nipalensis) हनौट- संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली srt पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
oa दिन... ‘Ne iia ShashitharKinar“Videka® © डॉ. शशि ae 2 rg aii. pe galore gersaz बाथ, गा बाधमें जिलेबी गाछक डाढ़ि पर बैंसल एकटा गरूड़क जोड़ा विश्वमें गरूड़क समस्त जातिसभमें परुष-गरूड़क आकार BIC आ Sil-oResew आकार Ua होइत अछि चित्रमे - मैदानी oes = STEPPE EAGLE = Aquila nipalensis
Qa Shae a ag ar ‘Videha” © डॉ. शशिधर कुमर tdag XN पद be NAG 73 , Va, . NN ¥ है, x Ze x i pete m\ मे iN AS ahs 9 q vy नस १0 स्थान -संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना | करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans