271 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २०४ म अंक १५ जून २०१६ (वर्ष ९ मास १०२ अंक २०४) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.घनश्याम घनेरो - किछु विहनि कथा २.अमरनाथ झा, संस्थापक, ‘वैदेही’, नई दिल्ली द्वारा आयोजित जानकी नवमीक मौका पर गांधी दर्शन एवं स्मृति समितिक तत्वावधानमे आयोजित परिचर्चा आ संगोष्ठीमे वक्ता सबहक वक्तव्य- ट्रांसस्क्रिप्ट आ अनुवाद: विनीत उत्पल २.२.१.विद्याचन्द्र झा “बमबम”, किछु प्रेम विहनि कथा आ किछु विहनि कथा २. लघुकथा आ विहनिकथा- तुलनात्मक विवेचन- मुन्नाजी २.३.१.राजीव कर्ण- किछु विहनि कथा २.राम सोगारथ यादव- सपना सपने अछि-(बिहनि कथा) ३. दिनेश रसिया- बीहनि कथा ४. नारायण मधुशाला- २ टा बिहनि कथा २.४.१.मलय नाथ मिश्र- २ टा बीहनि कथा २.जगदानन्द झा ॒मनु॒- किछु प्रेम बीहनि कथा ३. मुन्नाजी- किछु प्रेम बीहनि कथा ४. अब्दुर रज्जाक- २ टा बिहैन कथा ३. पद्य ३.१.१.प्रयास प्रेमीक किछु कविता २.अब्दुर रज्जाक- कता आ गजल ३.२.राम सोगारथ यादव- किछु कविता, गीत आ गजल ३.३.१.प्रयास प्रेमी- किछु गजल २.दिनेश रसिया- गजल ३. नारायण मधुशाला- गीत ४.अशरफ राईन- गजल ३.४.१.संतोष कुमार झा- सुजनी शिल्प २. आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल ३. जगदानन्द झा "मनु"- भक्ति गजल आ कविता ४. ज्योति चौधरी- हम छी क्षोभित ४.बालानां कृते-डॊ शशिधर कुमर- किछु सचित्र बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.१.घनश्याम घनेरो - किछु विहनि कथा २.अमरनाथ झा, संस्थापक, ‘वैदेही’, नई दिल्ली द्वारा आयोजित जानकी नवमीक मौका पर गांधी दर्शन एवं स्मृति समितिक तत्वावधानमे आयोजित परिचर्चा आ संगोष्ठीमे वक्ता सबहक वक्तव्य- ट्रांसस्क्रिप्ट आ अनुवाद: विनीत उत्पल २.२.१.विद्याचन्द्र झा “बमबम”, किछु प्रेम विहनि कथा आ किछु विहनि कथा २. लघुकथा आ विहनिकथा- तुलनात्मक विवेचन- मुन्नाजी २.३.१.राजीव कर्ण- किछु विहनि कथा २.राम सोगारथ यादव- सपना सपने अछि-(बिहनि कथा) ३. दिनेश रसिया- बीहनि कथा ४. नारायण मधुशाला- २ टा बिहनि कथा २.४.१.मलय नाथ मिश्र- २ टा बीहनि कथा २.जगदानन्द झा ॒मनु॒- किछु प्रेम बीहनि कथा ३. मुन्नाजी- किछु प्रेम बीहनि कथा ४. अब्दुर रज्जाक- २ टा बिहैन कथा १.घनश्याम घनेरो - किछु विहनि कथा २.अमरनाथ झा, संस्थापक, ‘वैदेही’, नई दिल्ली द्वारा आयोजित जानकी नवमीक मौका पर गांधी दर्शन एवं स्मृति समितिक तत्वावधानमे आयोजित परिचर्चा आ संगोष्ठीमे वक्ता सबहक वक्तव्य- ट्रांसस्क्रिप्ट आ अनुवाद: विनीत उत्पल १ घनश्याम घनेरो - किछु विहनि कथा बीहनि कथा ---------------- आवारा के ? --------------- -- रे भठियारा जकाँ किए ठिठिआइत छें ? -- आइ छोड़बौ नइ ! -- आ, आ ने रे ? पकड़ ने रे ! आंगी खोल, रभस कर ! आ ? आ ? देखहक हउ लोक सभ ! उन्टे भागल जाइ छै । आ ने रे ? छेछड़पनक अंत आब भ' रहल छैक । छौंड़ी - मौगी राखब पुरुखक बुत्ता सँ बाहरक बात ! इ बातक ज्ञान स्त्रीमे पोखगर भेलैक अछि ! बीहनि कथा ---------------- पैरबी -------- मिडिया सहित सभ केओ लखना बाबा केँ संत मानै छइ । लाखोमे भक्त छन्हि । लखन बाबा गुरु शिक्षा सेहो दैत छथिन्ह । हाजरी दरवारमे लगाओल । गघमिसन भीड़ । चारि घंटा लगलै भीड़ उसरैमे । लखन बाबा चेला सँ पुछलथि - -- ओ के ? -- गुरु शिक्षा लेल आतुर छथि । -- पठाबह ! प्रणाम कयलाक बाद नब्बे डिग्री कोण पर ठाढ़ रही कि लखना बाबा हुड़कलाह - -- सोझ सँ ठाढ रहू ? -- अहाँ संत नइ छी ! -- तँ की छी ? -- कथा वाचक ! -- से कोना ? -- संत हुड़कै नहि छथि ! -- आइ सँ हमर उत्तराधिकारी अहाँ ! -- इ संभव नहि । -- तखन ? -- मीडिया केँ सोझाँ सकारू जे अहाँ संत नहि छी ! बाबा आसान तर सँ सोनाक मोटका चेन निकालि पहिरबैत बजलाह - बच्चा, ज्ञानी छह! परख छह !! बीहनि कथा ---------------- खल्लास ----------- पिछला मर्डर सफल रहलैक । पछाति बलिप्रदान हो । छागरक स्नान पोखरि सँ करा अनने छल । पंडितजी मंत्रोचारण प्रारम्भ कयलाह । छागरक देह भुलकलैक । कसैया हंसल - खुश । ता मे छागर नागरि झाड़ने छल आ कसैयाक आँखिमे किछु गड़ि गेलै । -- भाई ! खल्लास । जब्बार हंफियाइत बाजल । भीमा ई बात सुनिते ठाढ़ भ' गेल आ पंडितजी केँ आदेश दैत बाजल " छागर केँ स्वतंत्र क' दियौ ! -- किए यौ ? -- मनुख छोड़ि आन जीवक बध बड्ड झंझटियाह अछि । पंडितजी भीतर सं डेरा गेलाह । बीहनि कथा ---------------- पेटक अँटकर ----------------- चूड़ा-दहीक आर्डर केँ बैरा निष्पादित क' चुकल छल । हरी बाबू किए बिलंब करताह - मुदा ढकार नहि भेलनि तँ सशंकित भ' उठलाह । हाक देलथिन -- रमुआ दौगल आयल । -- साफ - साफ बता, डंडी मारने छलैं आ कि नइ ? -- हाकिम ! अइ होटलक दस रुम हमर जिम्मा छै । डंडी मारबै तँ अफरि नइ जेबै ! -- मतलब, हम फूसि बजै छी ? -- से कहाँ कहै छी ! एक बेर फेर सँ अँटकर लगा क' देखतिएक ? -- हमर पेट केँ उकटबें ? -- कस्टमर तँ हमर सभक भगवान् छथि ? भगवानो सँ लोक कहूं उकटा - पैंची कयलक अछि ! -- होशियार छेँ ? -- होसियारी तँ कस्टमर सिखबै छै ! मुदा कस्टमर नइ जनै छै जे दोसरक ईमान ओकर पेटक अनुसारे रंग नहि बदलै छै ! रमुआ केँ गट्टा पकड़ि हरी बाबू बैसोलन्हि - चिल्ड वाटर चाही, अनबें ? किए नइ ! रमुआ केँ आब जा क' दिमाग हल्लुक भेलै । दौगल फ्रीज़ बाला हन्ना डिस । बीहनि कथा ---------------- प्रेम पेसगी ---------------- सैंयां बिना ..., सैंयां ले ...., सैंयां - बाक बन्न । फेर शुरू वैह सैंयां भइल ...। -- हे रौ मचरुआ ! चुप्प भेलैं कि उठियौ ? -- तोरा की भेलौ गे बुढ़िया ? -- सैयां माने बुझै छेँ ? -- हँ गइ ! कनियाँ हेतै तँ हमरा कहतै सैंया ! -- तँ तों किए अनघोल कयने छेँ ? -- तों की बुझबी ? ओकरे सांती कहै छियै, गबै छियै । -- निर्लज्जा ! लोक की कहतौ ? -- लोक एकरा प्रेम पेसगी कहतै ! -- भगलह कि ? जो सूत ग' ! हारि क' बुढ़िया अपन हन्नाक केबाड़ भिड़ा लेलक । बीहनि कथा ----------------- समुदाय ----------- विधायक बाला एलेक्शनमे दुएटा नामक चर्चा रहैक । मिसर आ इदरीस । मनुक्खमे अतेक सोझमतुआ नहि देखल । ओना काल्हि भोंट खसाओत लोकसभ ! साइत थाकि गेल हेतैक । नबो नाथ आ मोह नाथ चललाह भोंट खसाब ' । -- नबो, तों ककरा भोंट देबहक़ ? -- भैया ! मिसर तँ नहि जीत रहल छैथि ! -- हमरो सैह लगैए ! -- तखन ? -- ठिकेदारिओ बैसिए गेल छह । एहि बेर इदरीसबा केँ ट्राई करबहक ? -- इच्छा तँ होइए मुदा मोन छ - पांच ? -- से किए ? -- मिंया छै ने ! -- अपन काज ककरा सँ सुतरतह ? -- से तँ इदरीसबे सँ । छठा धरि संगे पढ़ने अछि ! जीतल तँ बाह - बाह ! -- अहाँक धर्म की कहैए ? -- धर्मक चर्च केलह तखन सुनह : वैतरणीक पार करबा लेल बाट एखनोधरि फोर लेन नहि भेलैक अछि । वैह एकपेड़िया । समुदाय विभिन्न छै मुदा बाट वैह छै आ रहतै ! बीहनि कथा ----------------- धुज्ज़ा --------- अराडि करबामे अब्बल अछि सोनमा । अपन बँसबिट्टी छैक । जखने मोन भेलै दूटा बांस काटि लाओत आ छेकम छेका शुरू ! सोनमाक पित्ती केँ साहस नहि भेलै जे किछु कहितैक । तबो बाजल -- बांस उपटेला सं फायदा हेतौ ? -- तँ दोसरा केँ घुसक' दियै ? -- से तँ ठीके करय छेँ, किछु - किछु दोसरो काज कायल क'र ! -- कोन काज ? -- सिरिफ अराडि सँ डिप्लोमा केने हेतौ ? -- किछु नहि फुराइऐ ! -- अइमे सँ एकटा बांस कात क' दही ? -- किए ? -- काल्हि रामनवमी छै । धुज्ज़ा गडेतै । -- अच्छे ! हनुमानी झंडा अनलहक ? -- हमर हाथ खाली छौ । -- हमरो तँ वैह हाल छह । -- तँ दोसर बांस बेचि दे ? सोनमाक माथा ठनकलै । आब एहि सभ सँ काज नहि चलत । बांस उपटि जायत । -- कक्का आब चललियह बम्बई ! -- किछु देने जैतें ? -- अराडि बाला डिप्लोमा छोड़ने जाइ छियह । बीहनि कथा ----------------- निरमा ---------- पोता तीनटा आम नेने छल । उम्र पाँचम चढ़ल छलै । दुएटा हाथ - उबडुब्ब भेल छल । पुछलिएक - -- एकटा आम देबह ? -- अंहुँ केँ नइ देब आ रागनियों केँ नहि देबै ! -- किए ? -- दुनु गोटे हमर बात नहि मानै छी । ता मे रागनी धमकलि । -- एकटा हमर, एकटा बाबा केँ आ बाँकी तोहर ! -- छु क' देख ? दांते नहि कटलियौ तँ ? -- बाबा ! नइ देतौ । -- जाय दही, खाय दही ! -- थमह ने बाबा ? उपाय करै छी ! रागनी आँगन गेलि आ एक लोटा पानि नेने आयलि । लोटाक पानि घोंकैत छलि । पोता पुछलकै -- लोटामे की छौ ? -- तोहर करेज । -- नइ गे अइ मे फेन छौ ! -- निरमा देने छियै, शुद्ध निरमा ! निर्मल निरमा । -- की करबही ? -- उघारे देह रह ने, मम्मी थूरि देतौ ? -- अत' बाबा छथिन्ह ! -- अच्छा रुक तोहर हिरदे शुद्ध आ निर्मल करै छियौ । -- कोना ? रागनी लोटमे हाथ भिजा भिजा ओकर छाती पोछैत रहलै ताधरि , जाधरि दुनु आम नुका क' बाबा केँ देने रहैक आ लोटा ओंघरा देलकै । -- हमर आम ? -- तोरे पलथी तर छौ ! -- एक्केटा ? -- हिरदे निर्मल नइ भेलै ? -- अच्छे, एकटा आम बाबो केँ दियौंह ? रागनी बाबा दिस तकलक आ आँखि मटका देलकै । बीहनि कथा ----------------- रक्तदान ----------- भैया बोकारोमे नव घर लेलनि आ एहि लाथे भौजी सँ भरि पोख बतियाल रही । -- सुन्नर लगै छी ! -- धन्यवाद ! ओना मुंह कान चिक्कन अछिए । -- नहि औ, धोती - कुर्तामे ! -- ओ ! -- कबूला रहय कि जे पचासक उपर हयब तँ धोती धारण करब ? -- नइ अइ ! सुनबामे आयल अछि मिथिला राज्य बनतै । -- ओइ राज्यमे अहींक धोती उधियाएत की ? -- मिथिलाक पोशाक की हेतै ? गुनघुनमे छी ? -- किए ? -- नवतुरिया केँ पहिराबा देखै नहि छिऐ ! -- आप रूपी भोजन, पर रूपी श्रृंगार ! -- तँ अहाँ जीन्स किए ने पहिरै छी ? -- से आब हेतै ? आब साड़िए मे जिनगी कटि जेतै । -- आब झोरामे एक सेट धोती, कुरता, दोपट्टा आ पाग रखबाक हिस्सक लगबै छी ! -- यैह पोशाकक धोषणा मिथिला राज्य करत ? -- परंपरा देखल जेतै तँ कँहु हमरे बात ने साँच भ' जाय ! -- दुविधामे किए छी ? -- डिपेंड मुख्यमंत्रीपर करै छै ने ? भौजी फेर घुरि फिर धोतीपर टकटकी लगोलनि आ पुछलन्हि : -- पहिने सँ बेसी कम्फर्ट लगैत हयत ? -- हँ अय ! देह से हल्लुक जकाँ । -- वाह ! -- लेकिन एकटा अवगुण छइ, अइ मे फाँक छै । -- से तँ परम्परा निमाहैमे लोक चारि फाँक छै । -- फाँक बाटे मच्छर खूब खून पिबैए । -- परम्पराक नाम पर किछु तँ रक्तदान करू ? -- बेस ! चाह पियाउ । -- किए ने ! -- साँझ पड़लै, आब रक्तदान स्वतः होइत रहतै ! बीहनि कथा ---------------- दियाद - ताप -------------------- घूरन झाक आँगन टोलमे सभ सँ नमगर आ चौड़गर छैक मुदा बीचमे टाट लागल । तीन बरखक बाद आइ टाट भोरे उजारि देने छलैक तँ पूरन केँ करेज सुप सनक भेलैक । संताप रहैक ! घूरन झा लगले तीनटा खाधि खुनि साँस लेलन्हि तँ फेर पूरन झाक मोन कसिया गेलनि - पुछलथिन्ह -- ई की केलह ! आबो दियादी ताप कम नहि भेलह ? -- भेल तखनहि ने टाट उजारि देलिए ! -- तखन ई खाधि ? -- भैया ! दियादी ताप कम आ सूर्यक ताप केँ धुज्ज़ा लहरै छै । -- एहि खाधिमे की करबहक ? -- काल्हिए तीनटा आम गाछक बेना द' आयल छलहुँ, आइ अनबै । पूरन झा अपन टीक सोझरबैत मुस्कैत छलाह - टाट रगड़क प्रतीक छल । (पर्यावरण दिवस) बीहनि कथा ---------------- काँट -------- रमण नहि रमण बाबू कह' पड़त ! भैयाक सार थिकाह । दालि सुड़काहा । हम नहि दीदी नाम रखने छलै । -- पिंटू बाबू अहाँक विवाह मरुकिया ने ? -- हँ ! -- पाहुन सँ यैह चूक भेलन्हि । ई सुनतहि पत्नी घेड़ाक पथिया पटकैत बमकलीह - हे रौ रमना ! ओना डारि पात नहि पकड़ । फरिच्छा क' बाज जे की खेबाक इच्छा छौ । हाट विदा भेलहुँ तँ पाछु लागि गेलाह रमणजी आ पत्नी कहलन्हि - दही लइए लेबै आ कहि दै छी - रमना केँ पाई - ताई खर्चा नहि करबै ? -- दीदी कहिया धरि एतै यौ ? -- से किए ? -- सभटा बात ओकरा कहबै ? -- राम राम ! माँछ भात खुआ, काँट नहि गराबी ! पत्नी अपने हाथ सँ अपने गाल थोपियौलन्हि किए ....... ? बीहनि कथा ---------------- करता हूँ - स्त्रीलिंग -------------------------- आफिस सँ घुमल छलहुँ । घमायल शरीर । लाल काकी केँ हाक देलियनि : -- कत' छी ? -- काम करता हूँ ! खसल अठबज्जर ! पंखा ऑन कयल आ लुद द' बैसा गेल । पंखा जाधरि स्पीड पकड़ैत ता घाम सुखा क' बाउल भ' गेल रहय । -- कने सोझ सँ बाजब तँ नइ हएत ? -- कोना हयत ? पुरुखक कपडा खीचू हम, आयरन करू, हाट - बाजार, डाक्टर - बैद, न्योत - पिहान, इस्कूल पहुंचाबी हम । तै पर सं आयल गेल से ! आब अहीं बाजू ? हमरा बकज'र लागि गेल । नहि तँ भाषा शुद्धिकरण क' सकलहुँ आ ने चाहक फरमाइस करबाक हिम्मति भेल । बीहनि कथा ---------------- वर (?) साइत ------------------- नैंसीक हमर ननदि । तीन मास पूर्व बियाह भेल छल हमर । हुनक अबैया रहनि - नहि जुमलाह । अकथाइन मोन सँ नैंसी केँ हाक देलियन्हि : -- कने एम्हर आएब ? -- सुनै छी - बहीर नइँ छी ! -- दुनु भाय - बहिन एक्के रंग ! -- की भेल भाभी ? -- आइ हमर सैं अहीं ! -- आज्ञा ? -- बाजार जाउ ने, किछु - किछु किनी लाउ ने ? -- जेना ? -- पंखा । -- उषा आ कि तूफान ? -- अइ मे बाँसक होइ छै ? -- कोन बाँसक ? -- हरौथक । -- आगू बाजू ? -- कोनी बेनी, रील नहि तागाक पोला, अगरबत्ती किछु किछु फल फूल आ मिठाई । -- दो हजार निकालो ! -- अनमन भायक आवाज लागल । -- ठीक है एक्के हजार लाओ । -- अच्छे ! जायब कोना अय ? -- हमरा पर छोड़ू ने ! पाइ लाउ पाइ ? अहाँ नहा सोना क' तावत तैयार रहब, हम लगले पयर एलौं आ नैंसी फुद्दी भ' गेलि । जखन पाइए नइ आपस करती तँ उघउथ चंगेरा । ओना नैंसी भौजाई केँ हाथ सं लुझिए लैतैक ! जेहने झमटगर वरक गाछ तेहने स्त्रीगणक झुण्ड । मुदा ओइमे एक भाग करबै तँ कुमारि सभ हेतै । धियान सं गुनैत - बुनैत ! नैन्सीक भौजाई तागा सँ वर गाछक अटूट बान्हक तिरपेक्षण करैत छलीह तँ अन्चोके नैंसीपर नजरि पड़लन्हि - अरे ! ई की ? अनजान छौंड़ा केँ तागा सँ किए बन्है छथिन्ह ! चंगेरा सैंति रोड पर अबिते नैंसी भौजाई सँ कहलकै -- पका दै छै नइ ? -- अहाँ की पकबै छलहुँ ? -- अंहुँ कुमारि मे एहने हयब ? -- बेसी फड़फराउ नहि । ओ के छल ? -- के अय ! -- वर ? साइत ! -- धुत ! चलू ने अय । नैंसीक मूड़ी गोंतब भौजाई केँ नीक लगलै । बीहनि कथा ---------------- जानेमन ---------- वाश रूम वरिष्ठ नागरिक हेतु काल अछि । अपन किरदानी देखाओत अवस्स - जेना रानहल माँछ पर बिलाइ धपायल हो । लालकाकी सिर बिसायल । पिछड़ि गेल रहथि । चकरी घूमि गेलनि । प्लास्टर उपरान्त लालकक्का उठा अनने रहथिन लालकाकी केँ । एक गिलास पानि दैत पूछलखिन्ह - कोना भेल ? लालकाकी किछु बजितैथ मुदा कोना पड़ल रहतीह तकर ग'र बैसा रहल छलीह । ता मे लालकक्का केँ जोर सं भभायल हँसी छुटलन्हि । ले बलैया ! लालकाकी तेना ने हड़बड़ेलीह जे अपने ग'र बैसि गेलनि । निसास छोड़ैत बजलीह - धुत जाउ ! बीहनि कथा --------------- आशीर्वाद ----------- बुढ़बा केँ बुढ़िया हबक्का कटने रहैक । सांझूक समय आ पुतौह तेसर मंजिल सँ सेहो उतरि गेल छलैक । दुनु बेकती गुम्म आ असमंजसमे रहथि । भोरे बुढ़ उठलाह । स्नान उपरान्त लोटामे जल भरि ठाढ़ छलाह । हाक देलथिन्ह : -- कने गंगाजल आनब ? बूढी गंगाजलक बोतल दैत पुछलथिन्ह - की करबै ? बूढ़ा लोटामे गंगाजल फेंट देलथिन्ह आ बूढी केँ स्थिर भ' बैसबाक अनुनय विनय कयलनि आ बूढी संचमंच बैसि गेलीह। बूढ़ा लोटाक सम्पूर्ण जल बुढ़ीक माथपर पातर धार सं खसबैत पुछलथि - जलक चोट लागय तँ कहब ! बूढी मुड़ी ऊपर उठौलन्हि आ किछु गंगाजलक बुन्न घोंटा गेल रहनि आ हुनक हाथ उठि गेलनि - जेना आशीर्वाद दैत होथि ! बीहनि कथा --------------- तेरे सिवा ---------- मॉर्निंग वाक डाक्टर सँ बेसी घरक लोक कहैए तें करैत छी । ककरा ने मोन होइत हेतैक जे भोरका सिहकी ओछाओन पर लागय । एक चक्कर मैदानक लगाओल आ कोन ध' बैसि गेलहुँ । एकटा बुढ़ नेगरियाइत लुद द' बैसलाह । चुनौटी पर नजरि खिरलन्हि आ पुछलन्हि : -- अछियो की ? -- हँ ! -- एम्हरो ? -- किए नहि ! मुदा अहाँ आइ उदास छी । -- एहि उम्रमे हंसी हमरा लेल उपहास ! -- से कोना ? -- लोक कहत - बुढ़बा बताह भ' गेलैए । -- सभ नहि कहत ? -- हँ, पत्नी छोड़ि - सभ ! -- सत्ते ? -- कारण हुनको बाध्यता छन्हि । -- मुदा हँसैत तँ जरूर हएब ? -- हँ ! हम हुनका देखि आ ओ हमरा .... । बीहनि कथा -------------- फिरसान ----------- तीनटा मिस्ड कॉल - भोरे भोर । देखलंहु तँ फिरसान महराज । -- हेल्लो ? -- हँ हँ, हम फिरसान ! -- सुनाबह, टिकट कनफर्म्ड नहि भेलह कि ? -- कतुक्का ? -- बैकुंठधामक ! -- खिल्ली नहि उड़ो ? -- हम खुद फिरसान छी ! -- मजाक नहि करह । छूतहर कहूँ ई सभ सोचए ! -- तोरा सभक अखन चलती छह ! -- तोहर दुबकब लोकक खुसी ! -- सैह तँ ! भेंटघाँट भ' जायत, अबियौ ? -- भगलह की ! थम्ह, हमहीं अबैय छियौ। -- बेस आ ! बाटपर ठाढ़ फिरसान माथ परहक घाम काछैत बाजल -- मीता, लोक होशियार भेल जाइत अछि । वेट वेट एंड वेटक ज्ञान भेलैक आ हमरा घर बैसा देलक । बीहनि कथा --------------- सहरसाबाली --------------- इ तेसर बेर छलै । कारी घटाटोप मेघ । लटकल । गुमकी तेहने । आ कि बिजलोका चमकलै, कड़कलै - ठनका कत्तौ खसल हेतै अवस्से ! कमलाक निन्न टुटलन्हि । हफियलीह आ अंगेठीमोड़ लैत देह तँलैन्हि -- चली आब दीदी सँ भेंट करी ! बड़बडाइत विदा भेलीह । दीदीक चौकठि नाँघिते कोशी अक्चकेलीह : -- गे ! आबो थीर हेबें से नहि ? -- किए ? -- आबो वैह जुआनी छौ ? -- जतबे दिन बाँचल छै, उमक' दे ने गे ! -- जो जे मोन होइ छौ क'र ! -- मुंह नइ घोंकचो ! खेलैत - कूदैत तँ फेर तोरे शरणमे रहै छियौ । -- बेसी हमरा पतियो नहि ? -- अपने जेना बड़ सज्जन ? -- तँ की ! -- पूछा दियौक ? -- ककरा सँ ? -- राजकमल सँ, सहरसाबाली सँ .... कतेक नाम लियौ, बता' ? 'हूँ' ! कोशी स्तब्ध छलीह कमलाक बातपर । बीहनि कथा -------------- भठियारा ---------- स्वीट होम सँ निकलैत सड़कक काते कात राधा विदा भेलि । रघबा अन्चोके स्कूटी सटा देलकै । -- नइ सुधरबें ? -- घूर ! चल, मिठाई खुआ ? -- निर्लज्जा ! कथीक खुसीमे ! -- हमरा जे निरैस देलें । -- तोहर सिद्धान्त हमरा पसिन्न नहि । -- ठीक । तकर माने हम भठियारा छी ? -- नइ रे ! तों प्रिय छेँ ! -- हमरा सँ अखन डेराइत हेबें ? -- किए ? -- तोहर होयबला सिद्धांत तोड़बा सकै छियौ ! -- चल, तँ खा ले मिठाई ! -- डेरा गेलें ? -- नइ रे ! तों भठियारा नइ छें । जानि ने किए रघबा केँ आँखि नोरा गेलैक । राधा अपन छोटकी रुमाल बढ़ा देने छलि । बीहनि कथा -------------- जिज्ञासा ---------- ओ तखन फँसि गेल जखन पत्नीक खाता सँ भैयाक खातामे तीस हजार रुपैया ट्रांसफर क' देने रहैक । ओ होशियार अछि मुदा अनुज अछि । अग्रज किछु देने हेथनि से मोन होइक वा नहि मुदा जनैत अछि हुनके देखायल बाट, जतय ठाढ़ अछि तकर परिणाम छैक । कतेको प्रयास कयलक - फूसि कंहू गलय, ओहिना छिटछिट । पत्नी आगू लिबल नहि । गुम्मा छुआ अनने रहय । अग्रजक दू मास पहिने नोकरी छुटि गेल छलैक । ओ भने कोनो दोसर महानगरमे सपत्नी दूर छल । पत्नीक कलह बेसाहब जायज रहैक । ओकरा पत्नी औना क' राख' चाहै छैक । ओ भातृ भक्त अछि । पत्नी उधबा उठा देलकै । नैहर सँ फोनपर पंचैती करौलक । ओ अग्रज मामिला सं आहत छल । उपर सं पत्नीक तलाक मुद्दा । लतियौलक पंचकेँ - दमिभरि । पुरुख कें चन्ठो हएब जरुरी । सभ सक्कदम ! पत्नीक आस नैहरो सं खत्म । मामिला हारिक' अग्रजक कोर्टमे ओकर पत्नी दाखिल कयलनि । सेहो मोबाइल पर । दस तरहक बात ओकरा सुन' पड़लैक । पत्नी खुश रहैक । पराजित अपने सं कराबी सैह सफल ! ओ बौक भेल पराजित होइत रहल फोनपर । घिघियाइत रहल । बात कयनिहार दोसर आन नहि ओकर अग्रज रहथिन । तीन मास बाद । ओ साँझमे आफिस सं आयल छल कि पत्नी मोबाइलपर आयल मैसेज केँ देखबैत पुछलकै - पैंतीस हजारक कोना आबि गेलै ? -- कप्पारक छोट तँ हम छी ! -- से की ? -- भैया ट्रान्सफर केने हेथन्हि ! -- ओ ... ! तखन ओतेक बात किए अहाँ केँ ओइ दिन सुनौलथि ? -- अहाँ खुश रही ! -- एकटा बात पुछू ? -- की ? -- दीदी (दियादनी) केँ हालचाल पुछिएक । भाईजी पांच मास सं घर बैसल छथिन । -- के कहलक ? -- दिदिए बाजल रहैक ! -- हमरा तँ आइ धरि केओ नहि कहलक ? -- जाय दियौक बीतल बात । ओकर पत्नी फोन लगौलक : -- गोड़ लगै छियौ ! -- सोहागवती ! -- निसबद्दी किए लदने रहैं छेँ ? -- फोने करै लए रहियौ ? -- भैया केँ किए नइ कहै छियौंह जे हुनका सं बात करथिन ? -- किए ? फेर कोनो बात उखड़लैए ! -- नइ गे ! तोरा तँ ओही पर मोन रहै छौ ? -- चल नइ कोनो बात ! जिज्ञासा केलें यैह बड़का बात । जिज्ञासामे बल छैक । -- से की ? -- तों सभ छेँ ने ! आर की चाही ! ओकरा थारीमे पत्नी एकटा आओर रोटी रखैत पुछलकै - -- छुच्छे जिज्ञासामे बल होइ छै से हमरा नहि बुझल छल । -- तँ हम की करू ? -- जखन पाइ कौड़िक बाते नहि तँ हाथ धोउ आ भैयाकेँ हालचाल पुछियौंह ? -- ठीके ? -- हँ अइ !!!! बीहनि कथा ----------------- काम अमर --------------- टोलमे भैयारी लिहाजे सभ सँ पैघ - मुसन छैथि । दलान सड़कक सटले । सन्नुक राखल । दिनभरि पड़ल रहैत छथि - मुसन । पचपन सँ उपरे हेतैन्हि । मुदा बेर खसैत उतरि जाइ छथि आ सड़कक कातमे बैसल करची सँ घरती केँ छौंकियबैत रहैत छथि - नित दिन । धियापुता खेलाइत - खेलाइत मुसन आगू सँ निकलल । एकटा छौंड़ा केँ नहुँए इशारा कयलन्हि आ -- सुन ! हमरा मौसा नहि कह । -- किए ? -- साँझ पड़लै, हमरा नहाय पड़त ! सभ धियापुता मौसा मौसा किल्लोल क'र' लागल । ता एकटा छौंडाक माय ओही रस्ते गुजरलै । -- भैयो जे छथिन ने ! आ घोघ नमरा मुस्कियाइत डेग झटकारि लेलन्हि । बाध सँ घास क' मलाहिनक झुंड जाइत छलि । धियापुता मुंह सँ मौसा मौसा शब्दक सुनि ठामकि गेलि । मुसन ठिठियाइत रहथि । -- देखियौ बढ़बाक सपरतीव ! कहलकै जे ...... । झुण्ड ससरि गेल रहै । हम ससरि क' मुसन लग गेलहुँ । भाइ ! अहाँक काज अमर रहत । फाइनल करची धरती पर पटकैत मुसन ठाढ़ होइत बजलाह - काम अमर छैक ! बीहनि कथा ----------------- डेट - तिथि ---------------- भिनसरक समय । घर निसबद छल । दुनु प्राणी जागल । छौंक एक्के ! -- केहन बनलै ? -- नीक । कड़गर । पत्ती बेसी खसा देने हेबै ? -- जाय दियौक । एकटा काज करब ? -- की ? -- एकटा फूल पैन्ट आ कमीज सिया लेब ? -- किए ? -- 28 तारीख अबै छै । -- मतलब ? -- मैरेज डे, बूझै नइ छियै ऐ ? -- बियाह कहाँ भेलाय, कुमारे छी । -- भगलंहु की ? पाइ नामे पुरुख ओहिना कुमार भ' जाइ छथि ! -- अहाँ सप्पत ! हाथ खाली अछि । अहाँ कही तँ एकटा FD तोड़बा ली । -- छोड़ि दियौ । सिल्वर जुबली लए एकटा SIP अगिला महीना सँ चालु करबा दियौक ? -- नीक आइडिया । दू तारीख । रवि दिन । पाठकजी घर बगलमे । कहा पठौलहुँ । अयलाह - सन 91 सालक पतरा नेने । -- 1991मे 28 मई कए कोन तिथि रहै ? -- से की ? -- आ एहि साल सेम तारीखमे ई तिथि कहिया पड़ै छै ? -- अच्छे । -- ठीक सँ देखबै ? -- तेरह दिन आगू भागल अछि । अर्थात एहि साल जुनक दस तारीख । उत्सुक पत्नी पाठकजी दिस चाह बढ़बैत पुछलथिन्ह - पक्का ने ? -- कहै केँ बात छैक - सद्यः ! पत्नीक आँखि चमकि गेलनि । पूछलिएन्हि - चलु ने, मॉल सँ घूमि आबी ? हमर पयर जूतामे घुसियाइत छल हुनका सँ फेयर एन्ड लवली पिच्चा गेल रहन्हि आ बहुत रास लोसन बुल द' बाहर भ' गेल छलैक । घर सँ बाहर होइत पत्नी हमर कॉलर ठीक करैत कहलैन्हि - डेट सँ तिथिए नीक, नइ ! बीहनि कथा ----------------- आवाज ------------ -- दीदी गइ ? -- की ? -- अखन जे फोन कयने रहै से गुंडा बुझायल । -- भक् ! ओ भूटकुन छलखुन । -- अपने मोने लोक बूझि जेतै जे हम तोरा ओत्त' आयल छियौक ? -- हँ गे ! आवाज सँ । -- नइ गे ? पुछलक जे पाहुन छथि ? -- से की ? हुनका सँ बियाह करबें कि ? -- ओकर आवाजमे एहन मिसरी रहै जे लागल ओ हमरा सँ बियाह करत । -- गे ! हुनकर उमेर बुझल छौक ? -- हम तँ आइ धरि देखनेहो नइ छिऐ । -- पचासकेँ लगभग ! -- आंइ ! स'ख़मे आगि लगौक । दीदीक बहिन डेग झटकारि दोसर हन्ना पैसि गेलि । बीहनि कथा ------------------ कुकूर -------- मोबाइल सँ हुनक फ़ोटो लैत पूछलिएन्हि - हम घनश्याम ! आबो तँ घोघ सरका रोटी उंटाउ ? -- की कहू बौआ ! हिस्सक पड़ि गेल अछि ? -- से कोना ? -- आँगनमे ननदि दियोर सँ बेसी जेठ/ससुर सभ बैसि टाइम पास करै छथि । हम लगले दलानमे हुलकलंहु - ठीके कुकूर चौकी पर बैसल छल । बीहनि कथा ----------------- सुपर बाए ------------- सुन्नरि काकी । झुडकुट बूढ़ । कारी मजिस्ट तेहने । हाथमे अगबे यश । बाए बैसबैमे इल्मी । मुदा सुन्नरि काकीक बाए पुतौह कहियो नहि जगह पर स्थिर र'ह' दैन्हि । कलरा दौगल आयल । मौसी सँ पुछलकै - दादी कत' छै ? की बात छै रौ ? सुन्नरि काकीक पुतौह अपन बहिन पूत सँ पुछलथिन । माय केँ पेटमे दरद करै छै । बाबू कहलखिन्ह जे पकड़ि क' अनियाउन्ह ! -- हे अय माँ ! कने दीदीकेँ देखि अबथुन्ह ने ? -- पहिने हुक्का सुनगा क' लाउ ? -- एती तँ नहि पीतिह ? -- दोसरा बेरमे एहन अनुराग गाम बुल' चलि जाइए ? -- अच्छा तँ हुक्का भरिए दै छियन्हि । -- पीनी नहि हेतै, मंगा लेब ता हम देखने अबै छी । -- अच्छा जाउथ । उखरा बिताइए क' एतीह ! भनभनाइति काते कात, बाड़िए बाड़ी बहिनक अंगना ढुकि गेलीह - सुन्नरि काकीक पुतौह । -- पीनी मंगेलहुँ ? -- हँ अय ! की भेलै दीदी केँ ? -- कलराक बाप केँ पठेलियैक अछि ? -- किए ? हिनका सँ अंटकर नहि लगलन्हि ! -- दुनु बहिनक थाह भगवाने लगौताह । दीदीक नकिया कए बाजब आ लजाइत सँ सुन्नरि काकीक पुतौह खिखियए लगलीह । काकी टीप दैत बजलीह - -- आब नहि अबेर होइए ! बीहनि कथा ------------------ शागिर्द ---------- उर्मिला उमेश सँ अपन कमजोरी एना बखान केलक : -- जनै छें, राति क' सुतै छी तँ कोना ने कोना डेंग चढ़ि जाइए । -- कतेक दिन सँ एना होइ छौ ? -- अक्सर ! -- तखन तँ तोँ फूलकुमारी छें । -- सत्ते रौ ? -- नहि विश्वास होइ छौ तँ मन सँ पुछि ले ! -- झुट्ठा कहीं के ! -- मोहने केँ फोन लगा ले ? -- कोन मोहना ? -- छोड़ ! सिंहजी केँ तँ जनै छें ? -- ओ.......! बीहनि कथा ----------------- भ्रम ------ -- हम सभकेँ छोड़ल आ सभ सँ रिश्ता तोड़ल । -- ठीके ? -- दृढ निश्चय ! -- आब केओ फोनोफान करै छह ? -- नहि तँ ! -- काल्हि ठेकना क' देखियह आ फेर कहियह । -- की ? -- तोरा के के पकड़ने छलह ? बीहनि कथा ----------------- बट सावत्री ---------------- -- आम नब्बे रुपये किलो, लीची अस्सी रूपये किलो । -- से की ? -- चारि तारीख क' बड़साइत छै ! -- ककरा सांती होइ छै ? -- अइमे सांती फांती नइ होइ छै ! -- तँ किए करब ? -- धूत ! बूझै नइ छिऐ - स्त्रीगण बर लेल करै छथि । -- ऐ बेर हमरा लेल नइ करू ! -- तँ ककरा लेल सहबै ? -- महंगाई लेल ! पत्नी बकुआ गेलीह । आग्रिम सूचना व्यर्थ जकाँ । बीहनि कथा ----------------- गुलबदन ------------ -- छोड़ झाड़ हमरा डूब' दे ? -- किए ? से तोरा बीच कमलामे नइ गोइंत एबौ ! -- अतेक मेहनति किए करबें ? -- एकटा कहबी बुझल छौ ? -- की ? -- डूबैत के खढो उबारि दैत छैक । -- की मतलब ? -- तोरा पर कोन विश्वास ! झाड़ फुनुस पकड़ि फेर उपर आबि जेबें । -- यैह पपियाहि मोन तोरा नहि बिसरै छौ । -- तँ एहन कटाओन बात किए बजलें ? -- ऊँ ! -- रे बाज ने ? अय दुनियामे तोरा सिबाय हमर केओ आर छै ! -- चुप्प पगली ! एहन बात जुनि कर । -- किए ? -- तोहर मुंह विचित्रे भ' जाइ छौ ! -- केहन ? -- गुलबदन जकाँ । आ प्रेमिका प्रेमी केँ मुलुढ़ मुलुढ़ देखितो छलि आ घुसकैतो रहय । बीहनि कथा ----------------- गुणवत्ता ------------ -- रश्मि तोँ एतेक ओपन माइंड केँ कोना भ' गेलें ? -- जहिया सँ रमेश सँ प्रेम भ' गेल । -- एना होइ छै ? -- हँ गे ! डिस्कसमे जान छै, सभ तरहक ज्ञान छै ! -- अच्छा ! किछु बता - रमेशक बारेमे ? -- काल्हि रमेश संगे पार्कमे दू घंटा छलहुँ । ओकर नेनमतियाही बातपर खूब हंसलहुँ । अंतमे हमरा सँ ओकर नाक टेढ़ भ' गेल रहैक ! -- कोना गे ! -- ओकर फेसमे जादू छैक । हम प्रेममे बहल जाइत रही आ ओकर नाक पकड़ि डोलबैत गबैत रही - तोँ हमर सोना रे, सोना रे, सोना .... । रागनी रश्मि केँ बिच्चेमे टोकि देलकै - तोहर सोना कतेक कैरेट केँ छौक ? रश्मि सकदम । फक्क आ झमायलि सनक मुँहक आकृति । -- की भेलौ ? -- सैह तँ नहि अखियास कयल ! -- छोड़ ओइ बात केँ ! भोरक भटकल साँझमे घर आबय तँ भटकल नहि कहैछ । रश्मिक सभ आंगुर रागनीक आंगुरमे फँसल रहैक । कड़कड़ा देलकै । रागनीक मुंह सँ खसलै - भक् ! आ दुनु ठिठिया लागलि । बीहनि कथा ----------------- झटहा --------- आमक टिकुला छेटगर भेल आ गाछीमे मचान स्थापित होइत गेल । गुनेसर सभ सँ आगू रहथि । भोगिन्द्र उखपाती अछि । एकटा लुकड़ी सदिखन संगे रखैछ । गुनेसर चेतल छैथि । ओकरा देखतहि मचान पर सँ कुदलाह । -- आबह तँ ? भोगिन्द्र सहटल । धात्रीक सुखल गाछपर फेकलक झटहा । अब्बल डारि सभ झाड़झडा खसलै । फेर फेकलक - लगातार दसो बेर । -- रे भोगिया ? पगला गेलें कि ? -- अहाँ केँ की भेल ? -- सुखल गाछमे झटहा मारने रस चुबतह की ? -- अहाँ सेबू गाछी - तीन मास धरि । खायब - आम आ कटहर । -- आ तोँ ? -- हम तँ यैह बंहलहुँ बोझ आ चलहुँ - खायब गरम गरम टटका रोटी । माय बाट तकिते हयत ! गुनेसर असफल प्रयास करैत रहथि - मचानपर चढ़बा लेल । बीहनि कथा ----------------- होश -------- -- भाग, भाग ? -- की भेलै ? -- आगि लगलै ! -- ठहर ! थम्ह । -- किए ? -- आगि के मिझेतै ? तोहर बाप ! बिहनि कथा ----------------- सुख - दुःख --------------- -- माय ! अय कोबरा घरमे नइ सुतबौ ? -- की भेलौ से ! -- राति पेट फुलि गेल । -- कहू तँ भला ! अय, अहाँ नीचें मे पाटिया ओछा लैतौंह तँ नइ होइत ? -- हम की जान' गेलियै ! -- ओकर ओछावन सभ दिन फराके करै छलहुँ । -- माय ! कहलियौ ने, अलगे ओछाओन किए ने केलें ? -- आइ की भ' गेलौ ? -- बाँहि चढ़ि गेल । हाथे नइ उठैए ! -- कोना रौ ? -- अपढ़ंगाहि पुतौह अनलें, भरि राति बाँहि केँ सिरहन्ना बनोने रहौ । -- ओहोहो ! नस दबा गेल हेतौ, बाँहि झारही ने रे ! हे अय, सुनै छी - कनी मूव हँसौंथ दियौ ने ! -- एना हुनकर सभ बातमे किए दहीमे सही करै छथिन ? -- भक् बकलेलही ! एक्केटा तँ पूत अछि । ओकरे सुख लए नेनमति जगौने रहै छी । -- तै सँ फायदा ? -- पूतमे माय फायदा घाटा नहि हरै छै । -- काल्हि केँ टिकट छैक, चलि जेबन्हि तखन ? -- काल्हि केँ के देखलक अछि ! अहाँ नहि बाजू । हमर करेज केँ जुराय दिअ - जेना तेना ! पुतौह सासु केँ घेंटमे घेंट जोड़ि सुबकैति बजलीह - माँ, असगर दुःख कोना काटतीह ! बिहनि कथा ----------------- भूलचूक - लेनीदेनी ------------------------- पिपरक झमटगर गाछ । ओकरे सीके पांच डेग पर पोखरि । गाछक कातमे भोला बाबाक मंदिर । ओकर दुनूक उमेर पचास के अंदर हेतैक । देखबामे पैंसठक लगभग । नाम छैक - राम पिरीत आ दुखन । दुखन सरकारक भक्त छल आ कि दुष्ट, रमपिरता केँ तखन भान भेलैक जखन बृद्धा पेंसनबला आवेदन केँ सही बता खारिज करबा देने रहैक । दुखन पर राम पिरीत कनखरल आ धपायल सेहो रहैत छल । दुखना केँ एहि बीचमे घर मचमचा गेल छैक । बाबा केँ गोहरियामे लागल रहैत अछि - भोरे भोर । रमपिरता सोचलक - दुखना केँ पाछु पड़क चाही । भोला बाबा केँ कोन ठीक - झूठ बात पर मूड़ी डोलि जएतन्हि तँ हमरा सँ टैपि जायत । रामपिरीत भोरे उठल । लोटा लैत दुखनाक पाछु लागि गेल । पोखरिमे दुनु स्नान केलक । जल उठा मंदिर ढुकल । पहिने दुखना जल ढारैत पढ़लक : -- सांई इतना दीजिए जामे कुटुंम समाय ! -- हय - हय ! लोटा ऊपर कर ? -- किए रौ ? -- अपन बाल गोपाल गाम अबिते नइ छौ, कुटुम केँ के पुछैए ! पाछु हट । आब हमरा जल चढब' दे ! -- तोँ की मंगबही ? -- तोरा रोग लागि जाउ, जल्दिए ! -- किए रौ ? -- पटना सँ बेटा औत्तौ, घिसिया क' ल' जेत्तौ ! -- तोरा कोन फायदा होत्तौ ? -- तोरे पड़ेने बृद्धा पेंसन पास होतै, बाबा पर जल ढाड़ने सम्भब नहि। आ रामपिरता जल मंदिरक सीढ़ी पर हेरबैत उतारि गेल । २ अमरनाथ झा, संस्थापक, ‘वैदेही’, नई दिल्ली
जानकी नवमीक मौका पर गांधी दर्शन एवं स्मृति समितिक तत्वावधानमे आयोजित परिचर्चा आ संगोष्ठीमे वक्ता सबहक वक्तव्य.
ट्रांसस्क्रिप्ट आ अनुवाद: विनीत उत्पल अन्वेषणक विषय छै जानकीक वास्तविक नाम डॉ. पंकज मिश्र, दिल्ली विश्वविद्यालय हमरा बड प्रसन्नता भेल जानकी नवमी राजधानीमे मनाओल जा रहल अछि. चर्चा करैत छलहुं जे क्या ‘वैदेही’- त’ अपना सब जानैत छियै जे मिथिलामे हमर सबहक बुद्धि-शक्ति छै, ओहि प्रति असीम अनुराग छै, अविभक्त स्नेह छै आ वैदेही कहला मात्र सं अपनत्वक प्रतीति होय छै. वैदेही समग्र देहक, समग्र मिथिलाक प्रतीक छै. ओना हमर दिमागमे एकटा प्रश्न आबैत अछि जे सीताके वास्तविक नाम की रहय? ओना जानकी मतलब जनकक पुत्री, मैथिली मतलब मिथिला के, सीता मतलब हर के फार सें उत्पन्न भेल, पुनीता मतलब पुण्य सं तखन हुनकर असली नाम की छल, ई अन्वेषणक विषय अछि. आजुक दौरमें सशक्तिकरण शब्दके बुझबाक आवश्यकता अछि. हम आयके जुगमे एकर मतलब एतबे टा बुझय छियै, जे पतिके जवाब द’ सकय, धमका सकय, ओ नारीके वास्तविक सशक्तिकरण होइत छै. अपना सब नै जानैत छियै जे ओ सीता छलखिन जे जखन राम मना क’ देलखिन जे हम अहाँ के वनवास नै ल’ जायब ते ओ की बाजलखिन. बाल्मीकि रामायणक मुताबिक, सीताजी रामके संबोधित कहैत कहलखिन जे हमर पिता हमर ब्याह कोन निकम्मा सं करा देलक. अयोध्याकांड में सन्दर्भ अछि. सीताजी ओहि समयमे स्टैंड लेने छलखिन जे अहाँ हमरा कोना नै ल’ जायब. त’ सशक्तिकरण नारी के पर्याय होयत अछि. दशहरा में जखन दुर्गा सप्तशतीके हम-अहाँ पाठ करैत छी, तखन एक्के चीज बार-बार कहैत छी, ‘शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः’. स्त्री सशक्तिकरण के पैग उदाहरण वैदेही छथिन अमरनाथ झा, संस्थापक ‘वैदेही’ ‘वैदेही’ कथिक लेल, ई सवाल अहम अछि आजुक जुगमे. विदेहसं आयल ‘वैदेही’. विदेह मतलब जिनका देह नै छै, होयत छै. देह नै छै मतलब सेल्फलेस. कोनो स्वार्थ नै, कत्तो किछु नै. किछु नै कत्तो. हमरा मोताबिक कोना समाजक पिछडल लोक आगां बढय, ओ भेल विदेह. ‘वैदेही’ सेहो शरीरसं नै आयल छथिन. वैदेही धरती सं आयल छथिन. सीता यानी वैदेही, मैथिली छथिन. सरकार के एकटा महत्वकांक्षी आभियान छै, ‘बेटी बचाउ, बेटी पढ़ाउ’, ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’. अहि मामलामे सीतासं बढिके हमरा ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’ कंपेनक सबसं पैग उदहारण कियो नै लखाह दैत छै. ओ पहिल बेटी छलखिन, जे धरतीसं निकालल गेल छल, बचायल गेल छल. अहि तरहे ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’ पहिलुक ते वहि छलखिन रहय. ‘सेव द गर्ल चाइल्डक’ एम्बेसेडर ते वहि छली. दोसर ई जे जखन हम नारी सशक्तिकरण के गप करय छियै, जखन नारी सशक्तिकरणके सबसं पैग उदाहरण हमरा सीताजी बुझाबैत छथिन. आ हमरा सबके मिथिला संस्कृतिमे नारी सशक्तिकरण त्रेता युग से अछि. कहबय कोना? हमरा अहिठाम सीताजीके लेल स्वयंवर छल, अहि सं पैग सशक्तीकरण की देब अहाँ? की कहब अहाँ? हुनका वर चुनय के अधिकार छल. हमर सबहके विदुषी मैत्रेयी, गार्गी जे भेल छथिन, के नै जानैत अछि हुनका? ओ सब कत्तेक विद्वान भेल अछि, ई नुकायल नै अछि. हुनका सभहक पढ़ैक पूर्ण आजादी छल. विद्वान भेलखिन ओ, शास्त्रार्थ केलखिन ओ. मिथिलाके जे संस्कृति रहल अछि, सदिखन दुनियाक नेतृत्व केलक. दू सौ-तीन सौ-पांच सौ सालक बाद दुनिया ओ काज केलक, मुदा शुरुआत कतय सं भेल-मिथिला सं भेल, मैथिली सं भेल. मिथिलासं या जानकीक सहयोगसं जे सीताके जे वर भेलखिन, राम ओ मर्यादा पुरुषोत्तम भेलखिन. एत्बाक कष्ट केलाक बावजूद, बादमे धरतीमे समा गेलखिन. सीता नवमी या सीताके जे जन्म होयत छै, ओहि बारेमे किनको बुझल नै, बहुत कमके बुझल रहय. कहि सकैत छी जे आंगुर पर गिनय बला. ई केकर जिम्मेवारी छै? सीता कतय के छथिन. मिथिला के, मैथिली छथिन ओ, तखन ई ते हमरे-अहाँके जिम्मेवारी बनय छै नै, हमरे-अहाँके ऊपर ई कर्ज छै नै. हमरा सब जखन जन्म लैत छी तखने हमरा सबके दुइटा-तीनटा कर्ज भ’ जायत छै- मातृकर्ज, पितृकर्ज आ दुनिया-दारीक कर्ज. बहुत रास कर्ज सब छै. माँ जखन माटी छै, धरती छै, ओकरो हमरा लेल कर्ज छै. तखन अहाँ जों ओहि माइट-पाइन के छियै, अहाँ कत्तो किछु क’ रहल छियै, किछु लायक बनि गेलयै, ते अहाँके जरूर ओहि माटीके दस-बीस प्रतिशत कर्ज उतारबाक प्रयास करबाक चाहि. जानकी आजुक जरूरत डा. राजेश झा, दिल्ली विश्वविद्यालय एकटा फिल्म आयल छल ‘लगे रहे मुन्नाभाई’. हमर बेटी ओकरा डीवीडी पर बार-बार देखय. महात्मा गांधीके ल’ क’ हम एकेडमिशियन सब सेहो पढैत छियै, पढ़बैत छियै, ढेर रास किताब सेहो आबि गेल छै. मुदा, गांधीजीक मूल भावनाके ई फिल्म नीक जेना राखैत छै. जेना संवाद करलक ताहिसं छोट-छोट बाल-बच्चा ओकरा बार-बार देखैत अछि. तहिना हमरा लागयये जे जानकी जेकरा सिम्बोलायिज करय छथिन, रिप्रेसेन्ट करय छथिन, जानकीके आयके मिथिलामे जरूरत अछि. हम मानिके चलैत छी जे स्त्री सशक्तिकरणके मतलब छै जे डिसीजन मेकिंगक पावर ((निर्णय लेबक क्षमता) होबाक चाहि, ओटोनोमी होबाक चाहि आओर एकटा वर्किंग. जे गांधीक करीब भ’ सकैत छै जे परिभाषा, ओ यहि भ’ सकैत छै, जे महिलाक जे अधिकार छै, ओटोनोमी छै, ऊ ओकरा हैण्ड ओवर कायल जाय. ई होयत स्त्री सशक्तिकरण. बहुत लोक कहैत छै जे अहाँ सभ भारतमे सरस्वतीक पूजा करैत छी मुदा अहाँ पुरुषक तुलनामे स्त्रिगनक लिट्रेसी रेट (शिक्षा दर) देखियो, तहिना लक्ष्मीक देखियो, जे धनक देवी छै, मुदा धनक अधिकार नै छै. ते ई बहुत रास बहस सोशल साइंसमे अछि. जों हम सब देवीक पूजा करैत छी ते ओकर आम महिलाक दैनिक जीवन पर की प्रभाव छै. ओकरा की भ’ रहल अछि या इम्पावरमेंट की भ’ रहल अछि. दुनू तरहक विचार अछि अहिमे. कतेक लोग कहैत अछि जे अहाँक देवीक स्वरूप द’ क’ हुनकर इम्पावरमेंट नै क’ देल जाहि रहल अछि, मुदा हुनका धोखा देल जा रहल अछि. ओतय दोसरो ग्रुप अछि जे मानैत छैथ जे ई मीथोलोजिकल स्टोरी छै या देवीक स्वरूपमे जखन पूजा क’ रहल छियै, जे हिन्दू धर्ममे एकटा ट्रेडिशन छै, देवता आ मनुष्यक बीचक दूरी काफी कम रहय छै, ओहि कंटेस्ट में कत्तो नै कत्तो सकारात्मक असर करैत छै. हाल-फिलहाल कत्ते आन्दोलन भेल अछि जे देवीक ल’ क’ मोवलाइज करैक कोशिश कायल गेल अछि. जेना महाराष्ट्रमे शेतकारी संगठन करलक किसान आन्दोलन में. ओहि ठाम सीताक या लक्ष्मीक इमेजनरीक यूज करैत लोगके मोवलाइज केल गेल आ मांग करल गेल जे ई खेत, ई माइट, महिलाक नाम पर ट्रांसफर भ’ जाय. गांधी के अहाँ अहिमे कतय लोकेट करब. गांधी के देखय लेल अहाँके ई समझय पडत जे ओ सोशल रिफार्मर (सामाजिक सुधारक) रहथिन. हुनका समाजके ल’ क’ की विचार रहैन. सोशल रिफार्मक ल’ क’ की विचार रहैन. इंडीविजुवलक ल’ क’ की विचार रहैन आओर कम्युनिटी क’ ल’ क’ की विचार रहै. गांधी बहुत रचनात्मक सुधारक रहथिन. सुधार दू तरीक सं भ’ सकैत छै. अहाँ अस्तित्व बला परंपराके गारि दियो. ओहिमे अहाँके कतेक क्रेडिबिलिटी बनत, कतेक एक्सेप्टबिलिटी बनत, ई प्रश्नक विषय वस्तु छै. गांधी महसूस केलखिन जे जों अहाँ भारतमे सामाजिक परिवर्तन आनैल चाहैत छी, सामाजिक सुधर आनैल चाहैत छी, ते एकटा विख्यात कोट छैन गांधीजीके ‘इट इस बेटर टू स्वीम थ्रू द ट्रेडिशनल, इफ यू डाउन द ट्रेडिशन, यू विल डाई’. अहाँ परंपराके मार्गदर्शन करब ते अहाँ नीक परिणाम पायब. हुनकर जे पूरा संगठन छै सुधारक उपर, हुनकर जे अप्रोच छै ट्रेडिशन के उपर, केना इस्तेमाल कएल जाय सामाजिक सुधारमे, अहिमे गांधीजी के ओहि परिदृश्यमे हमरा सबके देखय के जरूरत छै. एकटा किताब छै, ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज’. दिल्ली विश्वविद्यालयक इतिहास विषयमे सजेस्टेड रीडिंग में ओ छल. कोनो संगठन ओकरा पर केस करलक जे ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज’ मे सीताजीक ल’ क’ किछु आपतिजनक गप कहल गेल अछि, ते ओकरा ओहि ठामसं हटा देल जाय. आओर सुप्रीम कोर्ट एकेडमिक काउन्सिलमे ओहि गके रिकोमेंड कएलकय जे ओहि बारेमे बताऊ जे हमरा की करबाक अछि. छह-सात घंटा ओहि पर बहस भेलय आओर जे डिसीजन भेल ओहि में ई भेल जे विभिन्न विचार-विमर्श हेबाक चाहि. मिथिलाक रामायणक सेहो दू-तीनटा वर्जन छै. जे सीताक वर्जन हम सब पढैत छी या सुनय छी, ओ एक वर्जन छै, कई आओर सेहो वर्जन छै. हमरा बुझाबय ये जे गांधीजीक लेल सीताके एकटा रोल माडलक तरहे रहय. गांधीजी आओर रामायणक संबंध छै. गांधीजी अप्पन ओटोबायोग्राफीमे लिखने छथिन. ओ बचपनमे बड डरपोक रहथिन, भूत-प्रेत सं डरय रथिन जेना कोनो आम बच्चाके लागैत छै. हुनका कतय एकटा महिला काजवाली रहय, ओ हुनका की कहलक. गांधीजीक जीवनमे, महिलाक ल’ क’ जे हुनकर अप्रोच रहय, हुनकर जिन्दगी अहि सं बड रास प्रभावित छल. गांधी जीक ल’ क’ ई देखय पडत. एकते हुनकर माँ, दोसर हुनकर पत्नी, पत्नीक संग जे हुनकर संबंध रहय, ओ बहुत ट्रांसफॉर्म भेलय, समयक संग. तेसर रामायण या रामनामासं जे हुनकर लिंक रहेन. महिला काजवाली रहय, जिनकासं हुनका बेसी प्रेम रहल. ओ कहलखिन जे अहाँके डर लागय ये ते अहाँ रामनामा का पाठ करू. ओहि सं हुनकर रामायणसं लिंक शुरू होयत छै. ओ मानैत छथिन जे तुलसीदास द्वारा रचित जे रामचरितमानस अछि, भक्ति के जे लिटरेचर छै. ओहि में सर्वोत्तम छै. एकटा खास ट्रेडिशन के प्रति, एक खास इंटरप्रेटेशन के प्रति, गांधीजीक आयडिया रहैथ. सीतजसं हमू सब पर्सनली लिंक छी. सीतक कहानी हम सब नेनासं सुनैत छी, हुनकर अपील जे छै, त्याग जे छै, पवित्रता जे छै तकर बादो अइयो मिथिला मे सेक्स निर्धारण होयत छै, ई बंद हेबाक चाहि. तखने गांधी और सीताजीक ख्याल पारब सत होयत. विद्यापति आ जानकी हमर सबहक साइनेज छथिन डॉ. सविता खान, दिल्ली विश्वविद्यालय कोनो स्त्रीक ख़ासके बड महिमामंडित होबय लागैत छै ते ऊ बड डराय बला चीज होयत छै. जखन अमरनाथ झा जी सीता नवमीक गप कहलखिन ते हमर रोमांस आओर रोमांच दुनू शुरू भेल. जे आय धरि हमसब रामनवमी या मैस्कुलीन (पुरुष) नवमीक गप सुनय रहिये. जे राम प्रतीक छथिन. एवरी टू डू विद मैस्कुलिनीटी (सब किछु पुरुषत्वक संग होयत अछि). तखन हम राष्ट्रीय राजधानीमे फेमिनिज्म (नारीवादी) के एकटा कार्यक्रमक ल’ क’ आओर ओकर नवमीक सेलिब्रेट क’ सकी, ई बिलकुल नव गप छल आ आओर बेसी उत्सुकता सेहो भेल. उत्सुकताक बाद दोसर कड़ी आबय छय, जखन अवलोकन करय लागय छी जे ओकर स्वरूप की हेतय. एकर सबसं महत्वपूर्ण गप ई जे एकर अर्थ की हेतय. जानकी नवमीक अर्थ की छै आ एकरा हम दूटा खंड में देखय लैक चाहैत छी. मिथिलाक सिंबलक तौर पर हरेक समुदायके, हरेक प्रान्तके, हरेक देश के, किछु-किछु प्रतीकक जरूरत होयत छै. ओय प्रतीकक जरूरत ते होयत छै, जे ओ प्रतीक के बल पर ओ समुदाय अपनाक एक गंतव्यक दिस कनि-कनि ल’ जायत छै, ताहिमे विद्यापति आ जानकी जी छै. साइनेज के तौर पर इस्तेमाल कएल जायत छैथ. जना अहाँ के जीएसडीएस (गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति) पहुचैक छल ते बहुत ठाम साइनेज छल जे कार्यक्रम ओतय भ’ रहल छै, तहिना विद्यापति या जानकी हमरा सबहक लेल साइनेज छथिन. ओ साइनेज जेकरामे हम सब बहुत गर्वक संग ई उदगार क’ सकैत छी जे विद्यापति हमर, जानकी हमर. ई ठीक अछि मुदा ओकर बाद की? कतेक लोक अहि सभागारमे बैसल या फेर शहर-दर-शहर विद्यापति पर्व मनाबैत छथिन, ओ विद्यापति के अर्थ कतेक बुझय छथिन-अहि विषय पर हमर खास दिलचस्पी अछि. ओहू पर हमरा दिलचस्पी ये जे जानकी नवमी जे सब गोटे एतय सेलिब्रेट क’ रहल छी, जुटल छी या सन्देश दैक कोशिश क’ रहल छी, एकटा खास समुदाय के या राष्ट्रीय राजधानी में क’ रहल छी ते एक जगह लिमिटेड नै रहतय, ई सन्देश सब जगह जतय. ओय सन्देशमे हम सब स्वयं कतेक विश्वास करैत छी? सैद्धांतिक महिमामंडित दिस हम नीकसं बढ़य लागैत छी, लेकिन जे ग्राउंड रियलिटी छै, वास्तिवकता छै, मिथिला, मैथिली, जानकी, सीता सबके, ओहिमे बहुत गैप छै. हमरा लगय ये जे जानकी नवमीके मनाबैक जे पहिल सफलता या ओकर सबसे पैग अर्थ होयत, ओ गैपके एड्रेस करयमे होयत. जतय सिद्धांतमे हम किछु आओर बाजैत छी सैद्धांतिकमे किछु आओर बाजैत छी. आवरण किछु आओर ओढेत छी, वास्तविकता हमर सबके किछु आओर अछि. बहरहाल, सबसं पैग कनेक्ट मिथिला क’ ल’ क’ दूटा जे साइनेजक ल’ क’ गप केने रहि, पहिल विद्यापति आ दोसर जानकी. हमरा मोताबिक जों कोनो भी संस्कृति के आगू बढ़ाबे चाहैत छी ते एहन-एहन सूत्रके अहाँके खोजय पडत. सूत्र के खोजिके निकालय पडत, जे समाजक तमाम वर्णके, तमाम वर्गके एकसूत्रमे बान्हि सकय. अहि लेल मिथिला में ओ चिन्हे पडत, जे एहन कोन-कोन सूत्र अछि जे अहाँ के कम्युनलिटी दिस ल’ ज’ सकय. हमरा लेल दूटा सूत्र छै विद्यापति आ जानकी. जानकी ते नै, जे ओ महिमामंडित देवी छल, तं जे ओ मिथिलाक बेटी छैथ. बेटी जे होयत अछि तकरा हम बेटीयेटा नै कहैत छिये. राम राजा की पत्नी सीता नै होय छथिन, जनक के बेटी जानकी होयत छथिन. ओ बेटी जेकरा हरेक गाम में कह्य छथिन जे ओ गामक बेटी छथिन, मिथिला के बेटी छथिन, ते ओ हमरा प्रिय छैथ. ते हमरा लेल अद्भुत छ्ल, ते हमरा लेल स्मरणीय छैथ, ते हमरा लेल ओ वन्दनीय छैथ. क्याकि ओ बेटी छथिन. आब प्रश्न उठैत छै जे ओ बेटीसं अपना सबहक एक्सपेक्टेशन की अछि. बेटी के हमसब कतय-कतय ल’ जायत चाहैत छियै. मिथिलाक बेटी संगे कतय-कतय ट्रेवल करैत छियै. जे हमर आय धरि पर्सनल अनुभव रहल अछि, जे हम देखलहुं ये, बेटीक भेला पर मिथिला, जे जानकी के धरती छैन, बेटीक खुशी अनुभव, या चेहरा पर खुशी जे हमरा बेटी भेलय, आय धरि हम नै देखने छी. हमरा नै लगय ये जे वास्तविक तौर पर जानकीके वंदना मिथिला एखन धरि क’ सकलय ये. हमरा नै बुझि पड़य ये. खैर, तखन जानकी आ विद्यापति कोन एहन सूत्रमे सब वर्ग आ वर्णके बान्हैत छथिन, विद्यापति के बारे में किछु ख़ास चर्चा शुरू करब आ ओकरा जानकी के तरफ ल’ जायब. विद्यापति हमरा ख्याल सं प्रथम कवि छथिन, जे ‘देसिल बयना सबजन मिट्ठा’ से शुरू करय छथिन, जतय ऊ बोली के, भाषा के, निज भाषा के आओर निजता के गौरव दिस ध्यान दियाबैत छथिन. हरिश्चंद्रसं बहुत पहिने जखन ओ कहैत छथिन ओ आम लोकक तरफ, गाँवक तरफ, ग्वालिनक तरफ, पनिहारिनक तरफ, जे पुरुषार्थक परिभाषित करैक जे विद्यापति के परिभाषा छल, अहाँ ओहि पुरुषार्थ के रिलाइज करय छिये, जखन अहाँ ओहि प्रेम भक्ति भाव सं गुजरै छी. कोनो प्रेम भक्ति भावनासं गुजरयके जे पद्धति छल, ओ एलिट पद्धति नै छल, ओ बहुत ही बहुत सबअल्टरन, बहुत ही कॉमन, सबजक भाषामे, मैथिली भाषामे, जकरा पटगमनीमे, चैतीमे, परातमे, साँझमे आ हरेक स्त्री स्वावलंबी भ’ क’ गायब सकय, बुझि सकय, ओकरा व्यवहारमे उतरि सकय. क्याकि हम सब गोटे जानैत छी, याज्ञवलक्य जे मिथिलेमे भेला आ हुनका स्पष्ट कहल छैन आ हुनकर स्पष्ट लाइन छैन, ‘धर्मस्य निर्णयो ज्ञयो मिथिला व्यवहारतः’ एकर अर्थ अछि जे जों अहाँक धर्मक निर्णय बुझय के अछि ते अहाँ मिथिलाक व्यवहार के देखू. ओ मिथिलाक व्यवहारक वाहिनीक, मिथिलाक बेटी, मिथिलाक स्त्रीमे भेटत. मिथिलाक एक-एक स्त्री ओ व्यवहारक पालन करैत आ कायम करैत छै जे मिथिला के ओ हायर स्टेज धरि ल’ जायत छथिन, जे हमर सबके एकटा गंतव्य ये. हम सब ओ साइनेज लगा के जे छिये, फाइनली ओ अल्टीमेट रियलिटी तरफ रिलायिज करय चाहैत छी. तें विद्यापति पुरुषार्थ के ओय स्टेज तक ल’ गेलखिन, ओ स्तर तक ल’ गेलखिन, जतय बोली आ भाषा अछि. एक गप दिस ध्यान करायब चाहैत छी जे मैथिली कोनो भाषा नै छै, अहाँ जानकी के सेहो मैथिली कहैत छी. ते देवी जानकी आ भाषा इंटरक्वाइंड भ’ गेल छै, मिल गेल छै. तें ई आइडेंटीफाई करब मुश्किल छै जे हम मैथिलीक प्रैक्टिस क’ रहल छी, देवीक पूजा क’ रहल छी या अहाँ भाषाक प्रक्टिस क’ रहल छी. भाषा आ मैथिलीक एहन सुन्दर समन्वय जे छै ओ मिथिलामे देखय लेल भेटय ये. ताहिमे जानकी जे छै, ओ बहुत पैग माध्यमक तौर पर आबैत ये. दोसर गप जे गांधी, विद्यापति आ जानकीक बीच परस्पर कोन सूत्र भ’ सकैत छैन? ओ परस्पर सूत्र छैन जे आय धरि वेस्टर्न सोचक एकटा समस्या रहलय ये. ओ जखन स्त्रीक देखत त्याग करैत, स्त्रीक देखत बलिदान करैत, स्त्रीक देखत एक ख़ास ढांचामे जेना साड़ी पहिरने छै, मुडी झुकैने छै सदिक्खन, पुरुषक संग जेना सीताक फोटो या वंदना रामक बिना नै देखय छैयेन, ते एकटा लेबल लगा देत छै, जे नै-नै ई स्त्री सशक्तिकरण नै छै. ई ते बहुत कमजोर छै. ई ते अबला नारी छै. एकरा स्त्री सशक्तिकरणक जरुरत छै. गांधी ओहि सशक्तिकरण के पलटि देलखिन. स्त्री के या सीता के जे अबलाकरण भ’ रहल छै, ओकरा ओ सबला बना देलखिन. क्या की ओ त्याग के, बलिदान के, चाहे कोनो बेटी, स्त्री होथिन, ओकरा ओ कहलखिन जे सशक्त टा त्याग क’ सकैत छै. जे कमजोर रहते, अबला रहते, ओ त्याग कखनो नै करतय. तें गांधी के जे बहुत इम्पोर्टेंस छैन, जतय ओ व्यस्कक सोचक कमी छल, त्यागक, बलिदानक जे एकटा नीचां स्तर पर राखि रहल छल, गांधी ओकरा अकस्मात टर्न क’ देलखिन आ बतओल्खिन जे त्याग आ बलिदान की छै? मुदा हमर प्रश्न त्याग, बलिदान, जानकी सं आगू के अछि. मिथिला या दोसरे जगहक बेटी त्याग त’ क’ देलखिन मगर हुनका वापस की भेटल? हमरा नै लागय ये जे किछु भेटल. यू ट्यूब पर जखन अहाँ जानकी वंदनाके टाइप करबै, एक्को टा सिंगल, पोपुलर कल्चरमे जानकी वंदना कत्तो नै देखाह पडत. ई हमर एकटा अनुभव रहल. अतय जानकी वंदना एकटा लोग गाबि रहल छल आ जानकी वंदना सेहो होयत अछि, हमरा लेल ई एकटा खबर छल. पोपुलर कल्चर में जखन अहाँ जानकी वंदना के ट्रेस करय लेल चाहबै ते ओ अहाँ के कत्तो नै भेटत. राम वन्दना अहाके ढेर सारा भेटत. तेखन प्रश्न ई छै जे जानकके स्त्री सशक्तिकरणक रूपमे, उत्सवक रूपमे देखिके संगे बहुत सारा एट्रिब्युट्स के, वेल्युके लगाके आखिरकार हमरा सबके भेट की रहल अछि? हमरा सबके संग जानकी सबके भेंट की रहल अछि? हमरा ख्याल सं बहुत कम, बहुत ही आवरण के तौर पर. जतेक एक्टिविटी छै, जतेक एक तरहेसं टोकेनिज्म जेकरा कहैत छियै हमसब, टोकेनिज्म के तौर पर सारा कार्यक्रम, सारा हाव-भाव, बेसी सं बेसी टोकेनिज्म के तरफ ल’ जा रहल छै. वास्तविक परिवर्तन कतय भ’ रहल ये, कोना भ’ रहल ये, भ’ रहल ये या नै भ’ रहल ये, हमरा बुझने ई बात के सोचनाय, एक-एक आदमी के मानस में बैसेनाय बहुत जरूरी ये. नै ते जानकीक उत्सव मनेनैआय, जानकीक गप केनाय, हुनकर वंदना केनाय, हुनकर फोटो बनेनाय, हमरा लागय ये एकरासं किछु नै भ’ सकय ये. जानकी आ गांधी सं सीखय अप्पन समाज प्रो. अरविंद कुमार झा, डीन (शिक्षा निकाय), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा हम सब सौभाग्यशाली छी जे ओहि पवित्र भाषामे बजि रहल छी, जे कहियो जगतजननी जानकीक सेहो मात्रभाषा छल. रामायणमे एकरा मानुषी कहल गेल अछि. हनुमान जखन लंका पहुन्चाल्खिन, अशोक वाटिकामे ओ सीतासं संस्कृतमे नै बाजैत छैथ. क्या, क्याकि संस्कृत लंकोमे सब जानैत छल, तें सीताजीक विश्वास प्राप्त करय लेल, करबाक लेल अति बुद्धिमान हनुमान मानुषी अर्थात मैथिलीमे बाजय लागैत छैथ. क्या ते मैथिली लंकामे जानतय के? आ दोसर बात जे एतेक दिनक बाद ओहि प्रदेशमे अप्पन मातृभाषा सुनिके आह्लादित भेनाय स्वाभाविक छल. ई कहल जाय छै जे आत्मीयाकताक संबंध मातृभाषा बनबैक छै ओ दुनियाक कोनो भाषा नै बना सकैत छै. आब सवाल उठे छै जे एक तरफ जानकीजी, एक तरफ तरफ गांधीजी आ एक तरफ हमर आजुक समाज. ते हम कहब चाहब कतय मिथिलाक बेटी, मर्यादापुरुषोत्तम रामक जीवन संगिनी जनक दुलारी जानकी, आ कतय गुजरातक साबरमती नदीक तट सं सत्य, अहिंसाक बल पर जग-जीतनहार महात्मा गांधी आ कतय वैश्विकरण आ औद्योगिकीकरणक चौबटिया पर ठकमुडी लगौने ठाड़ अप्पन समाज. तीनों तीन दिशा जाय छय. तखन ओ कोन फार्मूला अछि जे तीनो के एक सूत्रमे बान्हैत अछि. संजोग से ओ महत्वपूर्ण फार्मूला हमरा बाल्मीकि रामायणमे जाके भेटल. दंडकारण्यमे जखन ऋषि-मुनि अप्पन दुर्दाशक वर्णन करैत कहैत अछि, जे हम सब तपस्या क’ के पुण्य कमाबैत छी, तकर छठम भाग राजाक जायत छै, तखन हमरा लोकके राक्षसक उत्पातसं बचायब अहाँक राजधर्म छी. ताहि पर उत्तेजित भ’ के राम प्रतिज्ञा करैत छैथ जे हम अहाँ लोकेन लेल शत्रु राक्षसक वध अवश्य करब. अहि पर जानकी के उक्ति महत्वपूर्ण अछि. ओ राम सं कहैत छथिन, ‘हम सब एतय बनवास करय लेल आयल छी, शस्त्र उठाबय नै, कतय तपोवृत आ कतय क्षत्रिय धर्म. दुनू में कोनो मेल नै. एतय देश धर्म के पालन करब सर्वथा उचित. अहाँ जखन वनवासक अवधि पूरा क’ के, अयोध्या लौटब तखन शस्त्र धारण करब किया ते शस्त्रक सेवन सं बुद्धि मलिन भ’ जायत छै.’ जानकीजीक ओ बात भगवान राम नै मनालखिन, मुदा तकर हजारों साल बाद महात्मा गांधी मायक ई वचनक अनुसरण केलेन आ बिना शस्त्र आ शास्त्रक प्रयोग केने सत्य अहिंसाक बल पर मातृभूमि के परतंत्रता सं मुक्ति दियेलेन. हमर सौभाग्य अछि जे हम जन्मना जानकीजी सें सम्बद्ध छी, आ कर्मना हम गांधीजीसं. अपने सब जानैत छी जे जाहि वर्धा विश्वविद्यालयमे हम रहैत छी, तकरा पासेमे सेवाग्राम आश्रम छै, जतयसं गांधीजी अहिंसक लड़ाई लड़ने छलाह. जानकीजी जन्म लेली सीतामढक पुनौरा गाम में, मुदा हुनकर लालन-पालन भेलैन जनकपुरमे, तें भारत आ नेपालक बीच उनका सं बढ़के कियो सांस्कृतिक सेतु आर की भ’ सकैत छै? ई हमर व्यक्तिगत धारणा सेहो ये, राष्ट्र आओर समाजक बीच जों कोनो संबंध होय छै ते ओ सांस्कृतिक संबंध होय छै. जानकीक एकटा लोकप्रिय नाम सीता सेहो छै. सीता नाम के की अर्थ होय छै. खेतमे हरक फारसं से क्यारी बनैत छै, ओकरा संस्कृतमे सीता कहल जायत छै. सीताक उत्पत्ति राजा जनक द्वारा हर जोतैत काल भेल छलैन. मान्यता अछि जे एकबेर बहुत बड़का अकाल पड़ गेल, वर्षा करबैक लेल राजा जनक स्वयं हरके मूठ पकड़लाह आ हर जोतय लागल. अहि क्रममे एकटा कुम्भ उखड़ल, जाहिसं जगतजननी प्रकट भेली, ओ महाशक्ति छलीह आ हुनका दृष्टिपातक बादे अवधक राजकुमार श्री राम शिव धनुष तोड़ी सकल छलाह. बादमे लंका जाके असुर संहार क’ सकल छलाह. आखिर राम-रावण युद्धक कारण ते भगवती सीते छलीह. संसारमे सीतासं सुन्दर नै कोनो स्त्री भेल, नै कोनो स्त्री हेताह. स्वामी तुलसीदास रामक एहन भक्त छलाह, जे हुनकर सुन्दरताक आगू करोड़ों कामदेव के फेल मानैत छलाह. ‘कोटिक काम लजावन हारी’. तुलसी जखन सीताजीक देखैत छैथ, ते अवाक रहि जायत छैथ आ कहैत छैथ, ‘सब उपमा कवि झुठारी’. मने सीताके कोनो उपमा भैये नै सकैत छै. ओ तुलसी बडबड छंदमे रामसं कहैत छथिन, ‘गर्व करहु रघुनन्दन जानी मन मानी, आपनी सूरत सिया के छांह’. हे रघुनन्दन राम, अहाँ आपन रूप पर घमंड नै करू, अहाँके रूप ते सीताके छाहियो बराबर नै अछि. रूपक ल’ क’ दू शब्द आओर कहेल चाहब. ई रूप जे सामने देखय छियै अहाँ, ई रूप सिर्फ चर्मक या हड्डीक मिश्रण नै होयत छै. हम मानैत छियै आ शेक्सपीयर सेहो कहने अछि अहाँ जे केकरो रूप देखय छियै, ओ अहि मस्तिष्कमे जे विचार, जे आचार, जे सोच होय छै, ओकरे रिफ्लेक्सन देखय छियै. तें तुलसी एकदम सही छैथ. तुलसी जानैत छलाह जे हुनकर उद्धार पुत्रवत्सला माता सीता क’ सकैत छैथ. विनय पत्रिकाक एकटा पदमे तुलसी माँ जानकी सं निहोरा करैत छैथ, ‘कबहुक अंब अवसर पाई, ध्यावी सुधि मेरी किछु करून कथा सुनाई’. की अर्थ भेल एकर? एकर अर्थ भेल, ‘हे माँ कहियो मौका देखके भगवान रामके हमरो सुधि दिये देबैन, सेहो पहिने किछु करून कथा सुना के.’ दुनिया के कोनो रामायमे लंकाकांडमे पूरा युद्धकालमे सीता अशोक वाटिकामे बैसल की क’ रहल छलीह, तकर वर्णन नै आयल अछि. मुदा की ई संभव छै जे आद्यशक्ति सीता मर्यादा पुरुषोत्तम राम के असगरे युद्ध करय देथिन. असली युद्ध ते महादुर्गा सीता अशोक वाटिकामे बैस के क’ रहल छलीह. राम ते माध्यम मात्र छलाह. हम रामके भगवान् नै, पुरुषोत्तम मानैत छी. बहुत सं लोक पुछैत छै जे अहाँ राम के भगवान् किया नै मानैत छियै, किया मर्यादा पुरुषोत्तम. रामक पिता दशरथ के सेहो तीन रानी, मुदा देखियो, सीता के तेज, जानकी माता के तेज, जे पहिल रातमे, पहिल वचन जे ओ अप्पन पत्नीके देत छैथ, ओ यहै कहैत छैथ जे आय के बाद अहीं हमर पत्नी रहब, कियो आओर नै. पहिल व्यक्ति पुरुष हेबाक बावजूद अपनाके मर्यादाके मर्यादित राखैत अछि ते ओ मर्यादा पुरुषोत्तम छैथ. आय मैथिल समाजक आवश्यकता अछि जे हम सब अपनके मर्यादित करि. आब बचल समाज. वस्तुतः आय हमरा लोकेन समाज कहैत छियै, तकरा किछु सदी पहिने ‘ज्यांपद जन’ कहल जायत छल. सम्राट अशोक अपन धर्मयात्राक उद्देश्य घोषित करैत छैथ आ कहैत छैथ, ‘ज्यांपद जन क’ दर्शन’. ज्यांपद जनके धर्मके नीति सिखायब, ज्यांपद जन के संग नीति विमर्श करब. समाजक अर्थ कहियो टोली छल. आय समाज ते अछि, भारतीय संस्कृति सं प्रभावित समस्त समाजमे सीता पवित्रतम नारीक प्रतीक छैथ, सर्वथा पूज्य, लोकमे हुनकर एहन प्रतिष्ठा जे रामसं पहिने हुनकर नाम लेल जायत छै. तहिना अगर भारत के पूरे विश्वमे जानल जायैत छै ते दू व्यक्तिक वजह सं. एक महात्मा बुद्ध आ दोसर महात्मा गांधी. विष्णु, ब्रह्मा आ महेशक द्वारा नै. महात्मा गांधी के जे प्रतिष्ठा लोकमानसमे छै ओ कोनो हुनका समकालीन नायकमे नै भेट सकैत छै. भारत नै सम्पूर्ण विश्वक समाज महात्मा गांधीक आध्यात्मिक नेतृत्वमे अप्पन भविष्य सुरक्षित पाबय अछि. जब लन्दनमे वकीलक रूपमे गांधी आ ई गांधी जखैन चंपारण पहुँचैत छैथ, ते कम्पलीट ट्रांस्फोर्मेशन, जेकरा अहाँ काया रूप कहि सकैत छियै. बहुत लोग अहिमे आओर भी विशेषण देने अछि, लेकिन हम कहैत छी जे ई रूपांतरण अछि. जों हम एकटा चीज गांधीसं सीखैय लेल चाही ते ई जे ‘हाउ टू ट्रांसफॉर्म योरसेल्फ’. मैथिल बहुत बढ़िया क’ रहल अछि अप्पन अप्पन फील्ड में. जे जतय छैथ सिरमौर पर छैथ. मुदा ‘बेटी बचाउ, बेटी पढाउ’, ई सिर्फ हरियाणाक लेल नै छै, देशक लेल नै, ई मिथिलाक लेल बेसी सटीक अछि. बाट देखाबैक अछि मिथिलाक दर्शन प्रोफ़ेसर मनीन्द्र नाथ ठाकुर, जेएनयू हम तीन गप कहेल चाहैत छी. पहिल गप गांधी क’ ल’ क’ जे गांधी के आय कोना देखैक जरूरत अछि, दोसर गप मिथिलाक ल’ क’ आ मिथिलाक संस्कृतिक ल’ क’ आओर तेसर गप वैदेही क’ ल’ क’. गांधीक जे बात महत्वपूर्ण आजुक तारीखमे अछि से ई नै जे गांधी शांतिक पुजारी छल बल्कि ई जे गांधी शांतिपूर्वक युद्धक पुजारी छल. गांधी संघर्षक पुजारी छल आ हुनकर कहब छल जे संघर्ष शांतिपूर्वक करहि के जरूरत अछि. दोसर गप जे ओ आत्मालोचनाके महत्वपूर्ण मानैत छलाह. ओ लगातार समीक्षा करैत छल जे समाजके, अपना आपके. ई दू गप गांधीजी के सभटा नेतृत्वसं फराक करैत अछि. अहाँ सब ‘गांधी’ फिल्म देखने होयब. फिल्ममे गांधी दक्खिन अफ्रीकासं जखैन आबैत छथिन, ते बड रास नेता बैसल छैथ आ हुनकर बाट जोहि रहल अछि. जिन्ना साहेब बैसल छैथ, नेहरूजी बैसल छैथ आ गांधीजीक ल’ क’ गप क’ रहल छैथ जे कियो गांधी आयल अछि आ ओ आबय बला अछि. आ ओ आबि जाय ते हम सब गप शुरू करि. गांधी आबैत अछि आध धोतीमे आ पहिल काज ओ करैत अछि जे, जे वेटर ट्रे मे चाह दैक लेल आबैत अछि ओकरा सं ट्रे अप्पन हाथ के ल’ लय छथिन. संगे कहैत छथिन कि जा धरि अपना आ एकरा सबमे बराबरी नै होयत तक धरि हम अंगरेजी सबहक बराबरी नै क’ सकब. ई हमरा लागैत ये जे गांधीक ये सही स्वरूप अछि. सामाजिक परिवर्तनक लेल मुक्तिके जे बिगुल शांतिपूर्वक संघर्षक लेल ओ बजैने छथिन, यहि गांधीजीक असली रूप अछि. आओर अहि असली रूपक एकटा खास आयाम अछि जे हुनका मिथिलासं जोड़ैत अछि. ओ खास आयाम अछि जे हुनकर आत्मक ल’ क’ जे आयाम अछि. कोनो लोक राजनीति तौर पर कोना भ’ सकैत अछि जे ओ निराधार सेल्फलेस भ’ जाय. जे लोक राजनीति क’ रहल अछि, हुनका मालूम होयत जे अहाँ आन्दोलन क’ रहल छी ते ई नीक गप अछि, पढ़ा रहल छी ते नीक गप अछि मुदा जहिना अहाँ राजनीतिमे आयलहुं, अहांके सभटा बुराई लोकक आगू आबि जायत. एतेक बेसी कम्पीटीशन अछि, एतेक आब्सेसिव सेन्स अछि जे ई सदिक्खन देखैर अछि जे कत्तो हमर अपमान ते नै भ’ रहल अछि, कत्तो हमर सम्मानमे कमी ते नै भ’ रहल अछि. सभटा मौका पर देखय के कोशिश करैत छै जे पावरक सही बैलेंस बनि रहल अछि की नै. गांधीजी कोना अहिसं निकल? गांधी के ई बुझा गेल छल जे यात्रा जतेक बाहर अछि, ओतबे अन्दर सेहो अछि. एकर समझ जों पूरा दुनियाक फिलासफीमे कत्तो सं आबैत अछि ते ई मिथिलासं आबैत अछि. आ एतय सं हम अहाँके मिथिला ल’ जायब. जे नाम वैदेही पडल अछि तकर पाछू विदेहक पूरा खिस्सा अछि. अहाँ जानैत छी जे अष्टावक्र बड कम उम्रक बड पैग फिलासफर छल. हुनकर देह चारि ठामसं मुड़ल छल. ओ विकलांग छल. ओ जनक सं भेंट करय लेल जायत छल ते हुनका गेट पर रोकि देल गेल. ओकरा पाछां नम्हर खिस्सा अछि, जे हम नै कहब. ओ अष्टावक्र क्या भेल छलाह? जखैन ओ अप्पन माँक पेटमे छल तखन हुनकर माँ वेदक आलोचना करैत छल. तब हुनकर पिता बाजलखिन जे अहाँ के भीतर जे अहाँक बेटा अछि, ओ अहाँक संग गड़बड़ क’ रहल अछि. ते ओ हुनका शाप द’ देलखिन आ ओ अष्टावक्र भ’ गेलखिन. एकर मतलब ई जे ओहि कालमे वेदक आलोचना संभव छल. जखन ओ जनकक दरबारमे पहुँचलाह ते पहिने ते बहार सं भीतर नै आबय देलक. सब बाजय लागल जे ई नेना अछि, अन्दर कोना जायत. तखन ओ एकटा श्लोक पढलक ते लोक के लागल जे ई कोन लोक छियै? प्रवेश भेटल. अन्दर गेल ते दरबारी सब हुनकर शरीरके देखिके हँसैत लागल. ओ बाजलखिन जे हम ते सोचने छलहुं जे एतय विद्वान लोक बैसल अछि मुदा एतय ते चर्मकार लोक बैसल अछि आ देखि रहल अछि जे हमर चर्म उपयोगमे आबि सकैत छै या नै. फेर ते हंगामा मचि गेल. ओ ओत्ते क्या गेल छल, ओकरो एकटा खिस्सा अछि. ओ दरबारमे बाजलखिन जे हम ओहि लोकसं भेंट करय लेल आयल छी जे अपना आपके विदेह कहैत अछि. विदेहक मतलब होयत अछि जेकरा अप्पन देहक सुध नै हुए. ओ देखलखिन जे राजा जनक दू स्त्रीगनक अर्धनग्न देह पर हाथ राखने अछि, ते हुनका आओर तामस चढ़ल. मुदा ता धरि ओ देखलखिन जे नीचां आगि जलि रहल अछि आ पइर आगक उपर अछि. तकर बाद राजा जनक आ अष्टावक्रक बीच संवाद होयत अछि, जेकरा अष्टावक्र गीता कहल जायत अछि. अष्टावक्र गीताक ल’ क’ लोक कहैत छथिन जे माइंड आ बॉडी रिलेशनक ल’ क’ ई दुनियाक सबसं पावरफुल टेक्स्ट अछि. माइंड आओर बॉडी रिलेशनक प्रॉब्लम पश्चिमी देशमे भेल, जतय शरीर आ मनके अलग-अलग करल गेल आ कहल गेल जे शरीरक विज्ञान पूरा विकसित भ’ गेल अछि मुदा मन क’ ल’ क’ हुनका सबके किछु बुझयमे नै आयल. ताहि सं सविताजी कहि रहल रहथिन जे एहन फेमिनिज्म विकसित भेल जाहिमे महिलाके सिर्फ देहक रूपमे देखला जा रहा अछि. ई नै बुझल जा रहल अछि जे ओकर पूर्णता की अछि? अष्टावक्रमे ओ डिबेट बड पावरफुल तरीकासं आयल अछि. आ हम ई मानैत छी जे कोनो डिबेट ता धरि नै होयत अछि जा धरि समाजक अन्दर डिबेट नै होयत अछ्ही. निश्चित रूपसं मिथिलाक समाजमे अहि तरहक डिबेट चलि रहल होयत, एकर कतेक रास उदाहरण अछि. याज्ञवल्क्य जखन अप्पन पत्नी सं बाजल जे हम संन्यास पर जा रहल छी आ आब सभटा संपत्ति अहाँके अछि. अहाँ एतय आराम करू ते ओ की बाजल रहथिन. ओ कहलखिन छल जे अहाँ ई कोन गप क’ रहल छी. हम संपत्ति ल’ क’ की करब? की हमरा सन्यास लेबाक अधिकार नै अछि? की हमरा मुक्त हेबाक अधिकार नै अछि? पूरा तरहे माइंड आ बॉडी रिलेशन पर ई डिबेट चलैत अछि जे कोंसेसनेसक कोन लेवल पर मुक्त भ’ सकैत छी. चेतनक स्तर पर हम कोना मुक्त भ’ सकैत छी. गांधी हमर ख्यालसं चेतनाक लेवल पर मुक्त हयके गप करय छथिन, जेकरा बादमे कतेक मार्क्सवादी चिन्तक सेहो कहने अछि. ओ काउंट हेजेमोनीक गप करैत छथिन. ओ कहैत छथिन जे पहिने अहाँ अप्पन अन्दर सोचू जे अहाँ मुक्त भ’ गेल छी. जों अहाँ अपना अन्दर सोचि लेलहुं जे अहाँ मुक्त छी ते बाहरसं अहाँके कियो गुलाम नै बना सकैत अछि. आ ई सोचय बला गप अछि जे ई अप्पन चेतनाक अन्दर पहुंच सकैत अछि की नै? की हम सामाजिक तौर पर गुलाम भेलाहक बादो मानसिक तौर पर मुक्त भ’ जाय. हमरा लागैत अछि जे ई मिथिलाक संस्कृतिक एकटा पार्ट रहल होयत. हम किछु आओर शोध क’ रहल छी आया ओकर बाद हम ठीकसं अहाँ के कहि सकब जे आब ओ चेतना ओतय अछि या नै. मुदा निश्चित रूपसं ई संस्कृतिक पार्ट रहल होयत. अहि तरहक संस्कृतिमे स्त्री विमर्शक गप भ’ सकैत अछि. हमरा लागैत अछि जे गांधी ओहिसं प्रभावित छल. निश्चित रूप सं कहब कठिन अछि मुदा गांधीक जों हम देखी, जे गप राजेशजी सेहो कहने अछि जे गांधी के अहि गपक क्रेडिट देबाक जरूरी अछि जे ओ बड पैमाना पर स्त्री के घरसं निकलि के राजनीतिक बना देने छल. ओहि काल हुनका सभके राजनीतिक बना देलक जखन भारतीय समाज अलग-अलग प्रथासं मुक्त भेल छल. ओहि काल ओ बड पैमाना पर महिला सभके घरसं बाहर निकललक आ ई डिबेट ओहि काल जरूर चलैत होयत जे हुनकर चरित्र की अछि. महिला पहिल बेर घरसं बाहर निकलि रहल छल ते हुनका दोसर पुरुख सं संपर्क होयत ते संबंध केहन बनि रहल अछि. गांधी अहि सब चीजसं वाकिफ होयत ताहि सं गांधी ओहि मूल्य दिस ध्यान द’ रहल होयत, जाहि मूल्यक ल’ क’ रेडिकल फेमिनिस्ट कहैत अछि जे ई गांधी कंजर्वेटिव छथिन आ एंटी-वुमेन छथिन. हमरा ख्यालसं गांधी मिथिला संस्कृतिसं एकटा अल्टरनेटिव फेमिनिज्म ल’ क’ आबै छथिन. जे क्रांतिकारी अछि, मुदा श्रेष्ट अछि. जे तर्कपूर्ण अछि, जे चीजके आसानीसं नै मानैत अछि, मुदा संबंधके सम्मान करैत अछि. ओ फेमिनिज्मके बुझैत अछि जे ओहि में शायद पावर रिलेशनशिप अछि, शायद हमरा इन्फेरियर बुझल जा रहल अछि तकर बादो हम अहि संबंधके माथ पर राखैत छी. मिथिलामे फिलोसिफिकल ट्रेडिशनक पार्ट रहल होयत. गांधी ओकरासं बड रास चीज सीखैत छल. गांधीक सीखैक टेक्सचुअल प्रमाण खोजब ते पोलिटिकल साइंसटिस्टक तरहे ई भेटब बड कठिन होयत. गांधीजी कुरआन सं बड किछु लेने अछि मुदा ई भेटब बड मुश्किल अछि. जों अहाँ गांधी आ कुरआनके पढब ते लागत जे गांधी ते कुरआनक नीक अध्येता अछि. बाइबिलसं सेहो ओ बड किछु लेने अछि. ओना गांधी जे ज्ञान यात्रा भारतमे केने अछि, हमरा सभके समाजके बुझैक लेल ई ज्ञान यात्रा करबाक चाहि. गांधी जे ज्ञान यात्रा केने छल, जाहि संस्कृतिके पकडैक कोशिश केने छल, हमरा लागैत अछि जे ओहिमे मिथिलाक अहि तथ्यके ओ राखने छल. जे वैदेहीक संस्कृति छल, जेना पंकज मिश्रजी कहलक जे ओना देखयमे लागैत अछि जे ई केहन महिला अछि, जे सबटा गप मानि लैत अछि, चलि गेल वनवास, घुरिके आयल, ओकरा निकालि देल गेल, बाहर चलि गेल, धरतीमे समा गेल. ई जे ‘हाईट ऑफ़ सबमिशन’ अछि, ‘हाईट ऑफ़ पेट्ररिकल ओपरेशन’ अछि, हमरा लागैत अछि जे एकर बादो कोनो बेर वैदेही तर्कके नै छोड़लक आया क्षमा के ते आओर नै छोड़लक. रामके सदिक्खन क्षमा करैत रहल. संबंधक मर्यादाके बुझैत रहल मुदा बताबैत रहल जे अहिमे किछु नै किछु गड़बड़ चलि रहल अछि. ई हमरा लागैत अछि जे गांधीक शांतिपूर्ण परिवर्तनक लेल ई जरूरी आयाम छल. ई सरेंडर नै छल. जखन गांधी अहाँकक गपके मानैत छथिन, बहस करैत छथिन, अहाँसं बहसक लेल तैयार छथिन, ते ई सरेंडर नै अछि. ई आमंत्रण अछि डायलागक लेल. आओर जाहि डायलोग क’ ल’ क’ ओ परिवर्तनक गप करैत छथिन, ओ सत्याग्रह. आग्रह अछि. दुराग्रह नै अछि सत्याग्रह. जे सत्याग्रहक पूरा गप अछि ओ वैदेहीक संस्कृतिक पार्ट रहल अछि. एकरा गंभीरतासं बुझैक गप अछि आ बौद्धिक जगतके अहिमे जायके जरुरत अछि जे कोना हम अहि दिस जाय. एकटा आखिरी गप कहै लेल चाहब, जे प्रयोग गांधीजी केलखिन, ओ सेवाक प्रयोग छल. महिलाके आन्दोलनमे ठाड़ केलखिन. जे महिला घरसं बाहर निकलि के आयल, बड परेशान रहैत होयत. कतेक महिलाके पति छोडि देने होयत. कतेक महिलाक पति आंदोलनक काल मारल गेल होयत. तखन गांधीक आगू एकता सवाल छल जे की करब? ताहि सं गांधी एकटा संगठन बनैलखिन. सेल्फ इम्प्लायड बनैलखिन आ ओ संघठन आय धरि सबसें सफल संगठन अछि, एकटा मॉडल अछि इंडस्ट्रीक. ई अहि वैदेही संस्कृतिक पार्ट अछि, जाहि वैदेही संस्कृतिमे लोकगीत, पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट ओकर हिस्सा अछि, जेकर कोनो ट्रेनिग नै अछि, स्कूल नै अछि, कॉलेज नै अछि, मुदा ओकर एकटा हिस्सा अछि, जीवन अछि आ अहि जीवनक हिस्सा ओतय सं बाहर निकलि के आबैत अछि. ओकर प्रतिभा बाहर निकलिके आबैत अछि. हमरा लागैत अछि जे ताहिसं वैदेही संस्कृति क’ ल’ क’ गप महत्वपूर्ण अछि जे हम मिथिलाक संस्कृतिक गप करि. संस्कृतिक ल’ क’ अहाँ जखन ऊंच गप करैत छी ते ओ ई अहि बातक परिचायक अछि जे अहाँ कत्तो नै कत्तो डिप्रेस्ड छी. अहाँ अप्पन संस्कृति क’ ल’ क’ कत्तो नै कत्तो डिप्रेस्ड छी. अहाँ तखने ओकरा ल’ क’ ऊँच गप करब जखन अहाँके लागत जे ओकरा सही मान्यता नै भेटल अछि. ई सत अछि. आजुक तारीखमे मिथिलामे सेक्स अनुपात कम भ’ गेल अछि. कनि दिन पहिने एकटा महिला ओतुका पंचायतसा आयल छल आया बतोलक जे भ्रूण हत्या ओतय हर दिन भ’ रहल अछि. तें ओतय परिवर्तनक आगाज करैक लेल अपना सबके संस्कृतिक रक्षा करबी जरूरी अछि. जों हम अप्पन गुणगान टामे लागल रहब ते शायद परिवर्तन नै भ’ सकैत अछि. ओतय भारी आन्दोलन जरूरत अछि. हमर एकटा फिलोसफी (दर्शन) छल. हम फिलोसफीमे सबसं पैग सेंटर हैत छलहुं. ओतय सं एत्ते अबी गेलहुं ते दर्शन सेहो ख़त्म भ गेल. रिचुवल्स बचि गेल अछि. हम रिचुवल्समे फंसके रहि गेल छी. हमर एकटा मित्रक स्त्री मिथिलाक अछि. ओ सामा-चकेवा पर काज क’ रहल अछि. ओ कहैत छथिन जे मिथिलामे सबसं पैग परेशानी ई अछि जे हम सब जे कमाबैत छी, ओकर सबसं बेसी भाग रिचुवल्स पर ख़त्म भ’ जाइत अछि. हम सब पाय बचा नै सकैत छी. माता-पिताक मरलाह के बाद कतेक बरख धरि हमलोग हुनकर रिचुवलमे लागल रहैत छी. सभटा कमाय ओहिमे जा रहल अछि. ओतय पूंजीक ल’ क’ कोनो काज नै भ’ रहल अछि. ई कोना बदलत? अहि दिस सोचबाक चाहि. ‘वैदेही’ सामाजिक परिवर्तनक दिस जाए तखन ई गांधीक बाट होयत. हमहीं बेटी, हमहीं शक्ति, हमहीं अहाँमे अन्तर्निहित छी शेफालिका वर्मा आय जानकी नवमी छी. आजुका दिन बहुत पवित्र आ पावन अछि जे आय सीताक जन्म भेल अछि. हमरा जहियासं स्मृतिमे आयल अछि, रामनवमी सुनैत आयल छी, जानकी नवमी नै सुनलाहूँ. मुश्किसं हमर ज्ञानमे आठ-दस बरससं जानकी नवमी सुनि रहल छी. एक-दू ठाम हम गेलहु मुदा आयोजन जानकी सब करैत छलाह. आय पहिलुक बेर दिल्लीमे, देशक ह्रदयमे वैदेही नै राम सब एकर आयोजन क’ रहल अछि. ताहि सं एकटा हिलकोर मैच गेल अछि, सीता नवमी, जानकी नवमी. हार्दिक आभार. बेटी के बचाउ नै, बेटीक जन्म छी हमर. एकर उत्सव मना रहल छी. एकरा बचाउ क्या, हमहीं बेटी, हमहीं शक्ति, हमहीं अहाँमे अन्तर्निहित छी. आय जों जानकी नै रहतियेथ, ते कहियो राम नै बनताह. रामक जतेक रूप आयल, ओहिके भीतर सीताक त्याग, समर्पण, संग-संग हुनकर जतेक तागत, शक्ति रहैत, ओ राममे तिरोहित भेल, तखन राम आय मर्यादा पुरुषोत्तम बनलाह. कखनो काल हमरा मन होयत अछि, काश अहि लेखनी तुलसीदासक बदले कोनो नारीक हाथम रहतीये. रत्नावलीक हाथमे रहतीये, तखन जे मानस लिखल जैतीये, ताहिमे मर्यादा पुरुषोत्तम रामक बदलामे सीताशिरोमणी नारीक नाम हेतिये. ओहिमे उर्मिलाक वाक्य वेद वाक्य जेना हेतिये. ऐना किछु नै भेल. क्याकि कलम ते अपने सबके हाथमे छल. हम सभ ते तिरोहित भेल रहैत छी. सरस्वती जेना अपने सभहक भीतरमे, अपने सब्बके सभ किछु नीक करबाक प्रेरणा बनल रहैत छी. तुलसी रामचरितमानस लिखके वास्तवमे कागजक पन्ना-पन्नाके तुलसी, तुलसीदल बना गेल. तुलसी रामचरितमानस लिखके समस्त मध्य युगके भारतके अप्पन दास बना लेलखिन. क्याकि हमर सबहक जीवमे जे परंपरा अछि, जे मूल्य अछि, जे जीवनमूल्य अछि, ओ सभ किछु हमरा सबहक तुलसीदाससं भेटल अछि. जीवन जीवाक जे नियम अछि, इखनो, जा आईयो ओतबे सजीव अछि जे मध्यकाल में छल. अहि द्वारे तुलसीक लिखल अहि मानसमे बैसल अछि. मुदा एकर मतलब ई नै जे आब तुलसी लिख गेलाह, ‘कत विधि श्रीजी नारी जग माही, पराधीन कखनो सुख नाहि’. नै मानब. क्या नारी क्या पराधीन? अहाँ नौकरी करय छी, ते अहों ते पराधीन छी. जय दिन रिटायर करय छी, कहैत छी जे मुक्त भ’ गेलहुं. ते नारी कोना पराधीन. पिताक अधीन नारी नै रहय छै, बेटा-बेटी दुनू पराधीन रहय छै बच्चा में. पतिक अधीनमे पत्नी नै रहय छै, पति-पत्नी एक दोसराक प्रेमक अधीन रहिके परिवार, समाज आ देश के बचा बै छथिन. पुत्रक अधीन ते सवाल नै उठे छैथ. पुत्रक अधीन माता क्या, पिता क्या नै? जे नारी, जे माँ, जे पिता, भरि जिनगी संतान के बनेबाक लेल अपना आपके गला दय छथिन, ओ जों अप्पन पुत्रक पास कनिक चैनक छहारमे सुतैक चाहैत छैन ते कोना भ’ गेलखिन ओ पुत्रक अधीन. नारी सीताक जन्म भेल छै, धरती सं, खेत सं. हरेक स्त्री के आगू बढ़ाबयके वास्ते खेत गम घर जाय पडत. ओते जे नारीक स्थिति अछि, ओतुका सशक्तिकरणक वास्ते, हमरा सभके ओहि सीता लग. नारी पुरुषोत्तम राम, एकटा पत्नीक हैसियत ते दूर प्रजाके नै कहि सकलाह. ई रामक विफलता छी. पाग बचाउ मतलब इज्जत बचाउ. स्त्री अहाँक इज्जत छी, चाहे जे रूपमें ओ हुए. नारीक सुरखा नै स्वरक्षा हुए. ओ निर्णय ल’ सकय, आर्थिक तौर पर सुदृढ़ हुए, यहि कामना अछि. चंपारणमे होयत बड रास कार्यक्रम श्री वेदव्यास कुंडू, निदेशक, गांधी स्मृति और दर्शन समिति, नई दिल्ली एतय आयल लोक गांधी, सीता आ स्त्री सशक्तिकरण पर नीक फ्रेमवर्क देलक. एतय हम फोकस करैत छी गांधी स्मृति और दर्शन समिति दिस. ई जे ‘बेटी बचाउ-बेटी पढाउ’ नारा आ स्त्री सशक्तिकरण अछि, एकरा ल’ क’ समिति समूचा देशमे की काज क’ रहल अछि. अहिमे हम एकरो सं आगू आओर काज क’ सकैत छी. समूचा देशमे कारगिलसं ल’ क’ अगरतला धरि अहि सभ विषयमे गांधी स्मृति और दर्शन समिति कतेक रास प्रोग्राम करैत अछि. एखन पिछला मार्चमे बड पैग प्रोग्राम कारगिलमे केने छलहुं जतय 160 युवामे 90 प्रतिशत लडकी सब छल. ओतय अलग-अलग समुदायमे अलग-अलग चुनौती अछि, ओकरा फोकस केने छलहुं. लडकी सबहक भागीदारी, निर्णय लयक क्षमता आदि पर बेसी ध्यान देलहुं जे गांधीजीक सेहो फोकस छल. शांति आ अहिंसामे महिला सबहक अहम भूमिका अछि, ताहि सं ओकरा फोकस करैत वर्कशॉप करैत छी. अगरतलामे हम बड नीक प्रोग्राम केने छलहुं. ओतय गामक अन्दर, ट्राइबल एरियामे, सभ ठाम काज केलहुं. दक्खिन आ उत्तरमे सेहो काज करैत छी. अहि बरख चंपारण सत्याग्रहक 100 बरख शुरू भेल अछि. अहिक लेल हम व्यापक रूपसं पूरा काजक फ्रेमवर्क बनैने छी. अहिमे हम चंपारणमे की करब, ओकरा बेसी फोकस केने छी, अहिमे ‘बेटी बचाउ, बेटी पढाउ’ आ स्त्री सशक्तिकरण क’ ल’ क’ ध्यान देब. अहिमे दोसर फोकस हम इंटरप्रेन्योर युवती सबके केने छी. किछु दिन पहिने हम सब गुवाहाटीमे एकटा कानक्लेव ‘यंग एन्त्रोपोनस कानक्लेव’ केने छलहुं. ओकरामे जे युवती छल, छोट-छोट काज करैत छल, हुनका सभके हकार देने रहि. अहि बरख वर्तमान वित्तीय वर्षमे केंद्र सरकारक ई फ्लैगशिप प्रोग्राम दिस गांधी स्मृतिक फोकस अछि. ओकरा हमसभके आगू बढेबाक अछि. अहिक लेल अलग-अलग ठाममे, प्रान्तमे वुमेन इम्पावरमेंट कोना हुए, महिला आ युवाक भागीदारी कोना बढ़य, शांति आ अहिंसा समाजमे कोना बढ़य, ओकरा लेल वर्कशॉप आ ट्रेनिंग सेहो देत छी. मिथिलामे कोनो भेदभाव नै छल श्री आर.के. सिंह, लोकसभा सदस्य पहिने ते हम अमरनाथजी कें धन्यवाद दिअ चाहब जे ओ अपना सबके अप्पन जड़सं भेंट करैलखिन. हम सहरसाके रहय बला छी, हमर नानी गाम मधुबनीमे अछि, हमर सासुर भोजपुरमे अछि. कियो लोक जखन अप्पन जड़सं फराक भ’ जायत अछि ते ओ सूइखि जाइत अछि. कियो समाजसं कटि जाइत अछि ते ओ सूख जाइत अछि. ओ समाजमे चलि नै सकैत अछि, ओकरामे ओ आत्मविश्वास, आत्मबल नै रहि जाइत अछि. ई अपना सबहक संस्कृति अछि जे अपना सबके आत्मविश्वास दैक अछि, आत्मबल दैक अछि. हम सब आपन प्रान्तके छोडि के आयल छी. हम एतय प्रवासी छी. हम सब आपन प्रांत के छोडिके अहि द्वारे अहिलहूं, क्याकि शनै-शनै ओतय शिक्षा व्यवस्था धराशायी भ’ गेल. स्कूली शिक्षा धराशायी भ’ गेल. आब ते विश्वविद्यालय धरि शिक्षा धराशायी भ’ गेल. अप्पन नेना सबके कतय पढ़ाबी, ई अहम प्रश्न अछि. एकटा हमर जेनरेशन छल जे एतय आयल. हमर पिताजी हमरा कॉलेजमे पढैक लेल एतय भेजने छल. हम लोक जाहि काल एतय आयलहूं, ओहि काल साइंस कॉलेज नीक छल, पटना कॉलेज सेहो नीक छ्हल मुदा कनि गिरावट आयब शुरू भ’ चुकल छ्ल. तइयो नीक छल. आब नै अछि. ताहि सं अपना दिस सं बेसी सं बेसी लोक इम्हर आबि रहल अछि. सम्पूर्ण पूर्वांचलसं लोक इम्हर आबि रहल अछि, बिहारसं ते आबिये रहल अछि. जों अहाँ पढ़-लिख ली ते ओतय नौकरी सेहो नै अछि, ते एत्ते आयब आवश्यक अछि. जों हा एतय आबी आ अप्पन संस्कृतिसं दूर भ’ जाय ते अप्पन सबहक बाल-बच्चा एकटा जड़विहीन अस्तित्वमे चलि जायत, जेकरा संस्कृतिक बंधन नै अछि, ओ दोसर संस्कृतिक दिस चलि जायत अछि. ई दोसर जे संस्कृति अछि, मिलल-जुलल संस्कृति अछि, ओकर स्तर बड नीचा अछि आ अपना सबके अप्पन संस्कृति पर गर्व अछि. ताहि सं अहि तरहक बीच-बीचमे एहन कार्यक्रम हैत रहय जाहिसं हमसभ बीच-बीचमे भेंट क’ सकी आ अप्पन संस्कृतिक एतय जिन्दा राखि सकी. आजुक विषय बड महत्वूर्ण अछि आ अपना सबसं संबंधित अछि. हम सब ओतुका रहय बला छी जतुका सीताजी छलीह. अपना सबहक एतय पहिने कोनो भेद नै छल, नारीक लेल बड इज्जत छल. ताहिसं हम सब दुर्गाजीक पूजा करैत छी. अपना एतय मनमे कोनो भेदभाव नै छ्हल. अपना कतय, अप्पन समाजमे जतेक महिला नेतृत्व भेल, ओतय कोनो आओर देशमे, कोनो समाजमे नै भेल. ऐना अहि द्वारे, अपना सबहक़ पूर्वज अप्पन संस्कृतिमे सबके बराबरीक दर्जा देने छल. हमसब ‘सीताराम’ कहैत छी, ‘रामसीता’ नै. पहिने सीता, तकर बाद राम. बादमे जखन दोसर-दोसर संस्कृति आयल, ओकरा सुसंस्कृत ते नै कहि सकैत छी, अपना कतय इन्वेडर्स (आक्रमणकारी) आयल, तखन पर्दा प्रथा शुरू भेल. ओकर बाद जे अप्पन समाजक महिलाक स्थिति भ’ गेल, ओकरा सुधारब आवश्यक भ’ गेल अछि. ई अहि द्वारे क्याकि 50 प्रतिशतक बल पर कोनो समाज प्रगति नै क’ सकैत अछि. एकटा पुरुष प्रधान समाजक प्रासंगिकता तखैन छल जखैन लड़ाई तीर-तलवारसं लड़ाल जायत छल. लोक खायक लेल शिकारक लेल जायत छल. आब नॉलेज सोसाइटी भ’ गेल अछि. आब कंप्यूटरसं लड़ाई लड़ल जा रहल अछि. आब नौकरीकक लेल नॉलेजक आवश्यकता अछि, बाहुबलक नै. ताहिसं हम चाहि या नै चाहि, समानता ते अइबे करत आ आबइये पडत. जों प्रगति आनैक अछि ते समानता आनय पडत. जों अपना सभ लगातार अहि दिस काज करि ते अपना सभ तेजीसं तरक्की करब. ई अपना सबके मानय पडत. दोसर गप ई सेहो अछि जे कोनो समाजमे जों समानता नै हुए ते ओ समाज बेसी प्रगति नै क’ सकैत अछि. समानताक मतलब अछि विचार राखयके स्वतंत्रता, अप्पन गप कहैक स्वतंत्रता, अप्पन डिग्निटी मेंटेन करैक स्वतंत्रता. ई नै भ’ सकैत अछि ते बुझू ओ समाज बीमार अछि. जाहि समाजमे आध जनताके अप्पन अभिव्यक्तिके खुलिके कहैक अधिकार नै हुए, ओ समाज बीमार अछि. अपना सब्बके अहि बीमारीसं निकलबाक अछि. अहि दिश बहुत दिनसं काज सेहो चलि रहल अछि. हम सब दहेज़ उन्मूलन क’ ल’ क’ कानून आनलहूं. हम सब ई कानून आनलहूँ जे लड़का आ लडकीक समान अधिकार संपत्ति पर भेटत. ओकरा हमसब एखैन धरि वास्तविकतामे ट्रांसलेट नै क’सकलहूँ. हम सब अप्पन परिवारेमे देख लिअ, अप्पन्न समाजमे देखि लिअ. एकटा ट्रांसलेट करहिके जरुरत अछि तकरा बादे सहीमे क्वालिटी आयत. अपना सबके ई मेंटिलिटी छोड़बाक होयत जे हम सबहक देखभाल बेटे टा क’ सकैत अछि. बेटी माय-बापक नीक देखभाल करैत अछि. बेटीके अप्पन माय-बापक बेसी चिंता अछि. ई बुझे पडत अपना सबके. समाजके बुझय पडत. एखन अहिमे अपना सबके आओर सुधार आनय पडत आ आनय के आवश्यकता अछि. मुदा लोक के ठाम-ठाम ई बुझाबय पडत. ओकरासं पहिने एकरा ल’ क’ अपना के अंगीकृत करय पडत. हम सब बाजि दैत छी, भाषण द’ दैत छी मुदा व्यवहार करैक होयत अछि ते अप्पन निजी जिनगीमे ऐना नै करैत छी. ऐना करय पडत. अपना आपमे अपनाक प्रति ईमानदार हुए पडत. अप्पन विचारक प्रति ईमानदारी आनय पडत. केकरोमे ईमानदारी नै अछि. पहिने अप्पन विचारमे ईमानदारी आनि लिए ते समाजक ओहिना कतेक रास कुरीति कनि-कनि दूर भ’ जा लागत. अप्पन सबके जे प्रकृति अछि, संस्कृति अछि, ई सब करब दोसराक बनिस्पत अपना सबहक लेल बेसी आसान अछि. एकरा अंगीकृत करब बेसी आसान अछि. मिथिलामे सम्मान दैक परंपरा अछि श्री प्रभात झा, वरिष्ठ नेता, भाजपा जीवनमे संवाद आ प्रवास दुनू हेबाक चाही. लोकके सम्मान देबय चाही. हम भाषण दी या नै दी, हम बाजी या नै बाजी, सबके सम्मान देब मैथिलक संस्कार छियै. ‘अतिथि देवो भव’. पाहूनक जतेक सत्कार मिथिलामे होयत अछि, ओत्ते कोनो देशमे, कोनो राज्यमे, कोनो जाइमे नै होयत छै. पाहून माने भगवान. पइर धोयल जायत छै. एहन नै होयत छै, जखन जाय छै तखनो विदाईयो सेहो देल जाय छै. ई हम सबहके परंपरा छै. जेकरा जीवनमे दोसरके सम्मान देबक स्थान नै बनय छै, समाज ओकरा नै मान्यता नै दैत छै, समाजमे स्वीकृति ओकरे भेटय छे, जे अपना इगोके शांत राखय छै. गांधीजी क्या बढ़लखिन, हुनका इगो नै रहय. जे आदमी जवाहरलाल नेहरूके झेल लेलखिन, सबसें पैग आदमीक बेटा, ओहि कालक सबसें पैग वकीलक बेटा. जेकर कपड़ा पेरिससं धुलाके आबय छल, ओहि पर कियो नियंत्रण केलक ते ओ गांधीजी छलाह आ हुनकर नैतिक नियंत्रण जवाहरलाल पर छल. आओर समाजमे अहाँ नैतिकवान छी, अहाँके नियंत्रण सदैव रहैत. इन्क्रोच्मेंट नै होयत छै राजनीतिमे आ समाजमे. दिक्कत ई भ’ गेल छै जे गांधीजीके मानय सब छियै मुदा जीवमे उतारयके कोशिश नै करैत छी. गांधीजीक शतांश जों अहाँ किछु जीवनमे ल’ लहूं, सबसं नीक. हम सीतामढीसं आबय छी. एकटा लड़ाई हम एखन धरि लड़ रहल छी. जों अयोध्यामे रामक पैग मंदिर, ते पुनौरामे जानकी माँक किया नै? आओर अहिके लेल भारतक जतेक जनप्रतिनिधि भेला अछि हम हुनका चिठ्ठी लिखने छी. एखनो बहुत लोकके बुझल नै अछि जे जनकपुरमे हुनकर ब्याह भेलैन, लाल-पालन भेलैन, मुदा जन्म ते पुनौरामे भेलैन, जे भारतमे अछि. आओर अयोध्यामे ते डिस्प्यूट छियै, जमीन पर, जन्म स्थान पर, मुदा सीताजीक पुनौरामे कोनो डिस्प्यूट नै छै. ताहिसं सबके कोशिश करैक चाही, अगर माँके बेटाके संस्कार देबाक अछि ते संस्कारके सबसे बड़का धनी कियो छै ते ओ सीता छैथ. तें पुनौरा धाममे सीताजीक नाम पर भारतक संस्कार राजधानी बनाओल जाय. अइयो हम जाय छियै हर साल ओतय, ते देखय छियै जे बच्चा सबके कोरामें ल’ जाय छै माय, आ माय ओतय कनि टा माटी अप्पन बच्चाक माथमे लगा दैत छै. ई ओय पावन धराके छियै आ विश्वके कियो महिला धारासं नै आयलै. अग्नि, रक्त सं दूर कियो महिला रहलय ते ओकर नाम छियै माँ जानकी. कतय समा गेलखिन धरतीमे, इहो केकरो नै बुझल अछि. अहि लेल आन्दोलनमे संग दियो. सीताजी पर बजय छी, गांधीजी पर बजय छी मुदा जों किछु अंश अपनामे नै आनि सकलहूं, ते कष्ट भ’ जायत. आओर अहि लेल धरा जननी के संतति छियै, ओकर वंशज छियै. एकरा सबके लेल अपना सबके प्रार्थना करबाक चाहि. भगवान सब किछु दिये, गरूर नै दिए, घमंड नै दिए. अप्पन समाज आ संस्कृतिके जे जीवन दर्शन अछि आ ओकरा जीबाक राखयके छै ते गाम जरुर जाऊ. ओतय पढ़यके सुविधा नै छै, नौकरीके सेहो सुविधा नै छै मुदा जाऊ. हम सब सीताजीके संतति छी, गांधजी के विचार मानय छियै ते गाम जरूर जाऊ. समाज चलय छै समाजक जीवन-दर्शन सें आओर अहि लेल सभ दल सं उपर उठिके मा जानकी के दलमे आऊ क्याकि माँ जानकीक दल ते एक्के टा अछि. जीवन में सतत सक्रियता, पुरुषार्थके जगेनाय, प्रीतीसं जोड़नाय, ई अपना जीवनके संबंध हेबाक चाहि. नीक बाजय में की लागय छै? आय अहाँ केकरो कना नै सकय छियै ते हंसाऊ. नाभि सं हँसब दूर भ’ गेल. हमरा कतय एकटा ‘खां’ छैथ, एडीजी अनुराधा शंकर खां, रामचंद्र खांक बेटी. हमरा सबके बड मानैत छैथ. कत्तो जाय छथिन ओ मैथिली में बजैत छथिन. एडीजी बहुत स्मार्ट, जेकरा लोग तगड़ा कहैत छैथ. विदिशा के एसपी. शिवराजजी (मध्यप्रदेशक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान) के जिन्दगी बांचल छैन, राखी बान्हे छै. एक बेर एक्सीडेंट भेलय ते ओ अपना कोरामे शिवराजजी के उठाके इलाज करयलखिन.ई छियै सीताजीके दायित्व, मिथिलाके दायित्व. आओर अहि लेल हम कहैत छी, हम काहियो अहाँ सब लेल ठार होयत छी ते हम सब अप्पन जीवनके सफल करैत छी, अहाँ के जीवन के सफल नै बनबैत छी. आओर मनुष्य जीवनके सफल बनाबयक मुख्य कारण छियै जे हमसब धर्मराजक उपासक छी, भगवतीक उपासक छी. उच्चैठ में कालीदासके ज्ञान भ’ गेलय, जन्म उज्जैनमे भेल छल आ हमरा सबके ज्ञान नै भ’ रहल अछि, जतय हम सब पैदा भेल छी. ई ते बड कष्टक गप छियै नै. कालीदास जेकरा घर बाली भगा देलकय, तकरा ज्ञान भ’ गेलय अ चारि टा महाकाव्य भ’ लिख देलक. अहाँ जखैन उच्चैठ जेबय, नदी किनारे छै आ संस्कृत विद्यालय छै अहि ठाम. हम पूरा सांस्कृतिक घुमल छी, विद्यापतिक गाम बिस्फी सेहो गेल छी, हुनकर जे स्थान छै ओतय गेल छी. मंडन मिश्रजी के गाम गेल छी, जाहि गामसं सत्तर-अस्सी टा आईएएस-आईपीएस निकलले, ओहि गामक माटी देखय लेल गेलहुं, जे केहन ओ माटी छै जे खाली आईएएस-आईपीएस निकालैत छै. भारतमे जों सबसे पैग सांस्कृतिक धरोहर छै कत्तो, ते ओकर नाम छै मिथिलांचल. ओहि धरोहरके लेल जे ‘वैदेही’ संस्था बनाके काज क’ रहल छी, बहुत-बहुत बधाई. गांधी जेहन समाज में मैसेज दय बला, भारते टा नै विश्वमे कियो नै भेलाह. हम अहाँ गाय-महीसक दूध पीय छी, गांधीजी बकरक दूध पिबय रहथिन. क्या? गरीबक घरमे बकरी रहैथ छै. प्रचार करयके काज नै रहय हुनका. अहिना प्रचार भ’ गेल. जे बकरी बला रहय, ‘गांधीजी’, ‘गांधीजी’ करय लगलाह. हम अहाँ हाथमे घड़ी पहिरय छी, ओ डारमे घड़ी पहिरय रहथिन. गांधीजी डोराक चश्मा पहिनय रहथिन. गांधी जतय जाथिन ते हरिजन कतय भोजन करथिन. ‘मासेज’ में ‘मैसेज’ देत रहथिन. दांडी यात्रामे सबके हाथमे डंडा छल, ओ आन्दोलनक संकेत देलखिन. नमक आन्दोलन जे हर घरमे खायल जायत अछि, थोक में मैसेज देनायके काज करलखिन शांतिपूर्वक. ओ गोलमेज सम्मलेनमे आधा धोती पहिनके गेलखिन आ लोक देखय लागल, जे गांधी ये छैथ. समाज एखनो ईमानदारीके इज्जत देत छै. अहाँ दूटा आंखि से दुनिया देखय लेल चाहैत छी मुदा दुनिया अहाँके हजारों आंखि से देखय ये. आब अहाँके कोनो चीज नुकायल नै रहत, अपना जीवनके केहन संस्कारमे राखयके ये, ई दायित्व स्वयं अहाँके छी. जेखन अहाँके संस्कारित जीवन रहत ते अगल-बगलके लोगमे सेहो संस्कार रहत. हमरा लागय ये जे हम सब मैथिल छी, मिथिला सं छी, जानकीके छी, अप्पन संस्कारके जीबैत राखैत, जीवन-दर्शनके जीबैत राखैत, गांधीके आदर्श पर चलब, भेदभाव मिटाके. कियो आदमी ऊपर-नीचां नै होय छै, भगवान राखैत छै. लक्ष्मी चंचला होयत छै. मैथिल मतलब जूनून. हम सब बाहर जायत छी. खूब काज करैत छी. गाममे दू-चारि बीघा जमीन भ’ जाइत छै ते कहैत छी, के काज करत? माटीके सेवा केनाय बिसुरी नै. छैठके पूजा बिसुरी नै. गामके पोखैरके आनंद कत्तो नै भेटत. गाम जरूर जाऊ, एहन प्लानिंग करू जे दस आदमीके काज जरूर दियो. बुद्धि बाजारमे नै बिकायत छै, भगवान देत छथिन. संस्कृति गौरव होयत अछि प्रचंड पौटील्य, संचालक, भानु कला केंद्र कोनो राष्ट्रक गौरव, ओकर भू-क्षेत्रफल आ आर्थिक सम्पन्नता नै होयत अछि बल्कि ओहि देशक भाषा, संस्कृतिक अवस्थाक प्रतिबिंबित करैत अछि. नेपाली संस्कृतिक उपर पाश्चात्य संस्कृतिक अतिक्रमण या आक्रमण रोकबाक आ बचाबैक लेल भानु कला केंद्रक स्थापना भेल अछि. संस्कृतिक संरक्षण, संवर्धन आ प्रवर्धन लेल हम सब ई पावन अवसर पर शामिल हेबाक लेल नेपाल सं आयल छी. मैथिलीमे बड सम्मान भेटल माया देवी, भानु कला केंद्र मैथिली भाषाक लेल पचपन साल पहिने हमर घरबला, जेकर फोटो अहाँक आगूमे राखल अछि, मैथिलि भाषाक लेल बहुत संघर्ष क’ करने छल. ओ एक्के टा चीजसं बड प्रभावित भेल छ्ल. हम जनकपुरक लडकी छी आ विराट राजाक कनिया जनक राजाक बेटी छल. हमर घरबाला जनकपुर गेल रहैथ जखन हमर शादी भेलय तखन. मैथिली भाषा बला सब अप्पन कनियाके सम्मान द’ क’ बजय छलाह ते हुनका बड मन लगलाह. मैथिली भाषा में ‘तों’ शब्दक प्रयोग नै होयत छै, सम्मान द’ क’ कहैत अछि, ‘हे आऊ’. ओहि सं ओ बड प्रभावित भेल आ ओ मैथिली भाषाक लेल जान-प्राण देलखिन. आयसं इक्कीस बरख पहिने दिल्लीक तालकटोरा स्टेडियममे एकटा कार्यक्रम भेल छल आ हिनका मैथिली एकेडमी सें सम्मानों भेटल छल. ओहिमे एकटा कार्यक्रम भेल छ्हल ‘अरिपन’ पटना दिस सं, कम्पीटीशन करने रहय. ओहि में 265 संस्था भाग लेने रहय. ओहि में 14टा पुरस्कार रहय आ तेरह टा पुरस्कार हम असगरे लेने रहि. हमर एखैन धरि सबटा कार्यक्रममे वीपी फाउनडेशनसं बड सहायता भेटल छैथ. सीता हमर विभूति छली कृष्णा प्रसाद, कार्यवाहक राजदूत, नेपाल हम भले ही नेपालक पहाडी इलाका सं छी मुदा हमर शिक्षक मैथिली समुदायसं छल. मैथिली सिर्फ एकटा भाषा नै अछि, मुदा सभ्यता आ संस्कृति सेहो अछि. नेपालमे मैथिली दोसर सबसं बेसी बाजय बला भाषा अछि. नेपाल आ भारतक बीच सिर्फ राजनीतिक संबंध नै अछि मुदा संस्कृति, धर्म आ परंपराक संबंध सेहो अछि. दुनू देशक बीच संबंध हम नै जानकी आ महात्मा बुद्ध केने छल. माता सीता हमर देशक विभूति छली. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.विद्याचन्द्र झा “बमबम”, किछु प्रेम विहनि कथा आ किछु विहनि कथा २. लघुकथा आ विहनिकथा- तुलनात्मक विवेचन- मुन्नाजी १ विद्याचन्द्र झा “बमबम”, कैथिनियाँ किछु प्रेम विहनि कथा आ किछु विहनि कथा किछु प्रेम विहनि कथा सिनेह गऽइ तोरा सब कैंऽ एखन धरि तैयार नहि भऽ भेलहु ? सब वरसाइत पूजनिहारि जाइतो गेलय बड़क गाछ तर जगहो नहि भेटतहु सब पहिने जगह छेक लेतहु लालकाकी बाजि उठलि ! रानी तों तखन सऽ घर मऽ कि करैत छहि गऽइ एखन धरि तोहर श्रींगार पूर्ण नहि भलहु अछि ! हँ काकी हइया हमरा भऽ गेल - - आब कने भउजी कऽ सेहो ने - - - - ! तों दुनू ननदि - भाउज भोरहिं संऽ ओरियौन मऽ लागल छंऽ आ पहर दिन बितल जाइत छहि आ तोरा सब केंऽ सजब - संबरब कऽ अंते नहि लइत छउ ? आ हम सब किछु ओरियौन कऽ केंऽ तोरा सब कैऽ कथा सूनबय द्वारे एक पहर संऽ बैसल छी आ तोहर सबहक लिला तऽ कहले ने जाय ? कि घर संऽ भउजी'क मध्यम स्वर बहरेलन्हि आब कि सब दिन हिनके सब कैंऽ समय रहतन्हि कि ? एखनो धरि कक्का'क सिनेह मानल नहि जाइत छैन्हि सब संऽ पहिने बियैनि आ सिंनुरिया आम डाली मऽ ल'क तैयार रहैत छथि ! ( कि अहि बात पर भेलहि ठहक्का ) आ हमरा सब कैंऽ - - - - ! हम सब त एखन नव छी नेह उचिते छैइक ने ? लालकाकी तखन नेहियाति रहु नहु - नहु - - - - प्रेम विहनि कथा उड़ाँत मास्टर सेहाबक बेटा पढऽ - लिखऽ मऽ बेस तेजगर छलैइक ! ईस्कूलक परिक्षा मऽ सदिखन प्रथमे अबैत छल ! ओकरा कोनो दोस्त - महिम सऽ बेसी मतलब नहि रहैत छलैक ! ओना ईस्कूलक सब छौंड़ा - छौंड़ी सब ओकरा संऽ बात करबाक लेल आतुर रहैत छलैक , मूदा ओ ककरहु संऽ बेसी बात - चित नहि करैइत छल ! ओ अप्पन पठन - पाठनक काज सऽ बेसी मतलब रखैत छल यथा ओहि मे लागल रहैत छल ! समय बितैत गेलय आ ईस्कूलक पढा़ई समाप्त कऽ ओ आब कॉलेज जेवाऽ जोग भऽ गेल छल ! आ कॉलेज मऽ नाउ सेहो लिखौलक , ओकरहि संगे सुजित बाबूक बहिन सेहो ओकरहि कॉलेज मऽ नाउ लिखेलकइ ! बता दि जे दूनू इस्कूले सऽ संगे पढ़ैत छलय ! छौड़ी केर कॉलेज मऽ नाउ लिखेवाक घर सऽ मनाहि भेटल छलहि मूदा जिद्द केला उत्तर ओकर नाउ लिखेलहि ! शायद छौड़ी कैंऽ ईस्कूले कऽ समय मास्टरक बेटा सऽ सिनेह भऽ गेल छलहि ! दूनू कॉलेज जाय लागल कने दिनक बाद दूनू के गप - शप सेहो खूब नीक जकाँ होमऽ लगलहि ! दूनूटा बाट - घाट सेहो बात - चित करऽ लगलैक निधोक भय कऽ ! ने जानि दूनू मे एहन बदलाव एका - एक कोना आबि गेलय , भ सकय कॉलेजक प्रभाव हो अथवा स्नेहक प्रभाव हो ! जे होई दूनू टा आब बेस उड़ाँत भ गेल छल ! परंच गंउआ - घरुआ कैंऽ एना भऽ दूनूक मखरनाई अंसोहात जकाँ लगैइत छलैक ! होइत - होइत एक दिन बात सुजित बाबूक कान मे सेहो परलइक जे अहाँक बहिन आ मास्टरक बेटा - - - - - ! फेर कि छलहि सुजित बाबू ओकरा दूनू पर नजरि राखऽ लगलाह संयोग सऽ एक दिन दूनू कऽ कॉलेजक पाछू ठाकूरबारीक मंदिरक आंगन मऽ लगाओल फूलक बगान मऽ दूहु केर बैसल अपना आँखि सऽ देख लईत छथिन ! आ ओतय सऽ अप्पन बहिन कऽ पकरि गाड़ी मऽ बैसाऽ घर आनि लैइत छथिन ! तखर बाद प्रात भेने संउसे गाम मऽ अनघोल मचल छलहि जे सुजित बाबूक बहिन फंसरि लागा मरि गेलय ! आ मास्टरक बेटा सेहो लापता छैइक ! मूदा चरबाह - हरबाहक धिआ पूता हल्ला करैइत एलय जे माहटर सेहैऽबक बेटा कमला कात मऽ मूइल परल छैइक ! लोक सब दउरल नदी कात - - ! देखियो एकर साँस चलिते छहि - - - ! छौड़ जिव तऽ गेलहि मुदा सनकल सन भ गेलय ! आब तऽ ओ छौंड़ा एकदम निच्छट बताह जंका करैत रहैत छैइक ! छिछिआति रहैत छैइक बरबराइत रहैत छैइक ! प्रेम विहनि कथा जूड़ाएब रविश बाबू सूतले रहथि कि श्रीमति जी वासी पानि हाथ मऽ लय रविश बाबूक माँथ पर दइत हाथ फेरैइत ! उठू ने - - ! देखियो सूर्य भगवान कोना सोलहो कला लय उगल छथि ! चिड़ै - चूरमून्नी सब कोना चहकि रहल अछि ? वसात सेहो कतेक सोहनगर बहि रहल छैइक ! उठूऽ उठूऽऽऽऽऽ ! रविश बाबू आँखि खोलइते देरी आय माय मोन पड़ि गेल ! नेना रहि तखन जूड़ि - शितलक दिन बेस अहिना ओहो कहैत उठबैत छल ! ओह ओ दिन सब कतय चलि गेलय आ ओ पावनि तिहार सब से नहि कहि ? परंच आय अहाँक हमरा उठेवाक इ नव ढंग कतय सऽ प्राप्ती भेल ? जे हम निंद्रा संऽ सिधे तंद्रा मे नेनपनक बीच चलि गेलहु ! हमर माय ने तऽ फोन पर कहलक ? हे भगवान आय जूड़ि शितल छियैक से अहाँक नहि बूझल अछि कि ? पत्नि माँथ पर हाथ फेरैइत कहलकनि ! ओह सैह देखियौक एहि शहरक भग - दौड़ मऽ अपन पावनि - तिहार सेहो मोन नहि राखि पावैत छी ! परंच इ कहु जे अहाँक बासी पानि सूतले मंऽ माथ पर देवाक ख्याल कोना आयल ? पत्नि :- आय दिने सैह थिकैक जकरा संऽ लोक कैंऽ आस रहैत छैइक लोक अजूका दिन ओकरा जूरबैइत छैइक ! जेना गाम मंऽ माय, पितियैन, मंइयाँ आरो - आरो लोक सब आजूक दिन धिया - पूता कैंऽ माँथ पर पानि दय जूरायल रहवाक आशिर्वाद दइत रहलैक अछि ! किआक तऽ भविष्य मऽ ओहि धिया - पूता संऽ समाज कैं किछु आस रहैत छैइक तैंय ! गाछ - पात केर लोक पानि दय जूड़बैत छैइक जे लोक कैऽ भारी आस लागल रहैत छैइक गाछ - पात संऽ ! परंच हमर तऽ सगर जिनगी अहिं पर चलैइत अछि ! हम अहाँक जूराअयल रहवाक प्रार्थना नहि करब त ककर करब ? इ कहि दूनू गोटे पूर्ण शांत भय किछु सोचय लगलाह ! प्रेम विहनि कथा पंचैती प्रणव सब दिन ओकर आगू - पाछू करैइत रहैत छल ! यथा ओकरा पर नजरि राखल करैइत छल ! शायद प्रणव कैंऽ ओकरा संऽ स्नेह भ गेल रहैक ! परंच प्रणव कैंऽ ओकरा संऽ इ गप्प कहैत डर लगैत छलैक ! एवं - क्रमे चारि साल बीति गेल मुदा आय धरि प्रणव सऽ ओकरा कहल नहि भेलय ! एक दिन कोना ने कोना प्रणव के हमरा संऽ बात - चित होइत -२ मित्रता भय गेलय आ ओ हमरा ओतय बेसी काल आबय लागल ! ओ छौड़ी सेहो बेसी काल एमहर घूरिया - फिरिया कऽ आबऽ लगलहि ! हमरा एखन धरि एहि बातक भनक तक नहि लागल ! कि संयोग सऽ एक दिन प्रणव हमरा सऽ सब बृतांत कहैत कहै अछि जे हमरा ओकरा सऽ स्नेह भ गेल अछि ! हम पूछलिए जे कि ओहो अहाँ स स्नेह करैत अछि कि ? प्रणव बाजल से हम एखन धरि नहि बुझि सकलहु अछि ! से कने अहिं पूछितियैक किआक त आहाँ संऽ ओकरा गप्प होइत छैक ! हम बेस कहि ! एक दिन छौंड़ी कऽ इ बात पूछैत छियैक तऽ ओ हं मे मूरी हिला चलि दैइत अछि ! हम बुझि गेलिए जे दूनू एक दोसर सऽ सिनेह करैत अछि ! आ इ सिनेह एक भगाह नहि छैइक ! फेेर कि छय दूनू टा बात करय लगैत अछि ! कि एक दिन गाम मे हल्ला हल्ला भेलहि जे फल्लांमा बेटा आ फल्लांमा बेटी भागी गेलय ! आ सगरो इहय प्रचार होमऽ लगलहि जे छौंड़ा "बमबम" केर दोष छलहि ओकरहि लग बेसी काल रहैत छलहि इ ओकरहि कारनामा हेतैक ! फेर कि छलैक दूनू पक्षक गार्जियन हमरहि उपर पंचैती बैसेलक ! आ गामक पंचक निर्णय तऽ अहाँ सब बूझैते हेबैक ! जे मूह देख मूंगवा ! आय हम फसल छी दोसरक सिनेहक जाल मे - - - - - - - - विहनि कथा आबक जमाय बहिन दाय देखथुन आँगनक मोख तक कियो आयल छलखिन ,पूछलिएन जे के छी तऽ चोट्टे आपस भय गेलथि ! ने जानि के छल हेताह ? हम ताबत हल्ला होइत देखलिए :- मार सार केऽ चोर उच्चका लमपट नहि तन रे, आ भीड़ एक गोट व्यक्ति कैंऽ लात - मूक्का सऽ दूरुस्त कऽ रहल छल ! हमहु भीड़ कऽ चिरैत -फारैत ओतय धरि पहुँचलहु , आखिर एतय कि भय रहल छैइक ? किआक एतेक भीड़ लागल छैइक ? किआाक एतेक हो - हल्ला भय रहल छैइक ? मात्र जिज्ञासा बस गेलहु आ आब सब किछु आँखिक सोझां मे छल ! हम जावत हाँ-हाँ करि तावत तऽ हुनका अधमिरुत कऽ देने रहैन ! हम पूछलिए :- ऐंऽ रउ तों सब एना किआक हुनका मारि रहल छहुन ? छौंड़ा सब :- कि कहु भैया ई छौड़ा लाल काकी केर कोञ्टा पर एतेक राति कऽ हुलकी मारैत छलैक तऽ कि करितियैक से अहिं कहु ? हम टॉर्च बारि गौर सऽ हुनक मुह देखय लगलहु हे भगवान ! ई कि केलह तों सब ? ई तऽ लाल काकी कऽ जामाय छथिन ! इ सुनि ठार भीड़ अवाक रहि गेल ! बिहनि कथा अभगलाहा होसीआरपुर बाली कनियाँ छी यईऽऽ - - - -? सुन्दरपुर बाली फटकिए लग संऽ आवाज दइत छथिन ! आबौथ बहिन दाय बैसौथ ,इ तऽ आब एबो नहि करैत छथि ? मार बारहनि कि आयब एकरा सब द्वारे ! ककरा सब द्वारे ? कि भेलनि बहिन हमर छौड़ा सब तऽ नहि किछु कहलकनि अछि ? राम - राम अाहाँ धीया - पूता सन नेना रहय त भागे छैइक ! तखन कि भेलनि बहिन दाय ? ओ हमरे अभगलाहा सदिखन पिव कऽ हल्ला - फसाद करैत रहैत छैइक ! काजो करवाक लेल नहि जाइत रहैत छैइक , ओकरे द्वारे मोन सदिखन बेप्रित लगैत रहैत अछि, कउखन मोन चैन नहि रहैत अछि ! कि कहु ओकर खिस्सा कनियाँ सबदिन लोक सब संऽ गारि - गलौज मारा - पिटी केनहे अबैत अछि ! जतय - ततय सऽ उपराग सब अबैत रहैत अछि ,जेहो सब मूरी नहि उठबैत छल सेहो सब दूटा बात - कथा कहि कऽ चलि जाइत अछि ! कि करि किछु नहि फूराइत अछि ? चिन्ता जूनि करौथ , कहाँ दिन सुनलिए जे सरकार सगरे दारु - तारी बन्न करऽ जा रहल छैइक ! धू कि बन्न करत इ फूसियाहा नेतवा सब , सब फूसिये बजैत रहैत अछि ! आर गामे - गामे एकर दोकान फोलने जा रहल छैइक आ आहां कहैत छियै जे बन्न करत ! नइऽ यईऽ बहिनदाय सत्ते कहै छियैन बन्न कऽ देतैक , किआक तऽ टीवी रेडियो कागत-समाचार सगरे कहैत रहैत छैइक ! तखन तऽ दिने सुदिन भ जेतैक हमरा सबहक ! भगवान भल करौक ओकरा जे इ सब बन्न करवाओत ! ( कि ता फेर हल्ला भेलय ) जाय दिअ कनियाँ फेर लगयैऽ पिव कऽ एलय अछि ! फेर अवियहथि बहिन दाय - - - - - ! बिहनि कथा आदति संयोग संऽ आय लाल कक्का भेंट भऽ गेलाह ! ओ अपन मस्ती मऽ बरबराइत जाइत छलथि ! हम पूछलिएन कि हाल समाचार अछि कक्का ? ओ झूमैत बजलाह बहुत नीक , तूं अप्पन कहऽ ? हमहुं ठीक छी , मूदा अहाँक मूंह संऽ दूर्गंध कथिक निकलैत अछि ? दारु - तारी नहि तऽ- - - - - - ? हमर आदति सऽ तूं तऽ परिचिते छऽ तखन एना अकचाइत किआक छऽ ? बूझले छऽ जे जावत हम एक घोट दऽ नहि दइत छियैक तावत थकान दूर कहाँ होइत अछि ! नहि हमरा तऽ भेल जे सरकार दारु - तारी बन्न कऽ देलकइ तऽ - - - - - ? तऽ कि लोक अप्पन आदति सॅऽ बाज आवि गेल हेतय सैह ने ? हउ एतय टाका छऽ तऽ बुझऽ जे जिन्ह बला आका छऽ तों ! एतय पाय'क बले कि नहि भेटैत छैइक ? मात्र पाय रहल ताकि फेर जे तकबह से तोरा हाथ मऽ ! सरकार डैढै़ - डैढ़ै तऽ भ्रष्टाचारी सब पाते - पाते चलैत छैइक ! हम :- एकर मतलव जे दारु - तारी भेटतहि छैइक ? नहि ओना नहि भेटैत छैइक , जेना पहिने डेग - डेग पर भेटैत छलैक ! परंच जकरा बूझल छैइक तकरा लेल कमी नहि छैक दू पाय सस्त की महग ! जाय दैह दोरा सने बक्क - बक्क के करत कहि बरबड़ाइ बिदा भेलाह ! बिहनि कथा भोंट लाल कक्का केर देखियैन जे ,जेसब भोंट माँगय लेल आबनि सब कैंऽ भोंट देवाक आश्वासन दय विदा करैथ ! जे आवनि सब कैंऽ कहथिन जे चिन्ता जूनि करु हम अहाँक भोंट देबे करब दोसर कैं दियैक वा नहि दियैक? आ अहाँ सब बुझितै छियैक जे हम कहियो फूसि नहि बजलहु ! हुनक इ बात सुनि हमरा नहि रहि भेल हम पूछि बैसलिऐन ऐं यउ कक्का अहाँ फूसि नहि तऽ कि सबटा सत्ते बजैत छी ? त कि हम फूसि बजैत छी से तोंहि कहऽ जे आइ धड़ि कि फूसि बजलहुं ? हम कहलिएन जे जतेक मुखिया - सरपंच भोंट मगवाक हेतु अबैत अछि सबकैंऽ कहि दइत छियैक जे अहाँक भोंट देबे करब तखन फेर - - - - - ? तखन फेर कि - - ? इ नहि ने कहैत छियैक जे अहाँक छोंड़ि दोसर कैं नहि देबैक ! परंच कक्का - - - ? परंच कि ? इहय ने जे तूं सोचैत हेबह जे सब कें कोना भोंट द देबैक सैह ने ? हउ जखन टप्पे मारवाक छैइक तखन जेहने एक ठाम मारने तेहने सब ठाम मारने ! कोनो भीड़क काज त नहि छइक जे दिक्कत होयत ? तखन तऽ सब भोंट बोकसे भऽ जायत ! बोकस भऽ जाउ वा खोखस भय जाउ परंच हमर बात झूठ नहि ने होयत ? आओर एकटा बात जे सब तऽ मूर्खे - गवार ठाढ भेल छैइक जकरा सी आखरक ज्ञाण नहि छैइक से जनताक प्रतिनिधि बनत आ हम ओकरा भोंट दय पापक भागी नहि बनब हउ? तांय सबकैंऽ देबय आ भेटतय ककरहु नहि ! वाह कक्का अहाँ कमाल आ अहाँक सोचो कमाल ! बिहनि कथा इलेक्सन लाल कक्का आओर लाल काकी दूनू गोटेक हल्ला सुनि हमहु हुनक आंगन प्रविष्ट केलहु ! हम कहलिएन कक्का आय धरि काकी कैंऽ तमसायल नहि देखने रहियैन आय कि बात छैक जे काकी अहाँ पर अग्निच - वायुश्च भेल छथि ? तावत लाल काकी बाजि उठलि ऐं यउ बउआ कि कहि जहाँ कि इलेक्सन नजदिक आओत कि हिनका भरिदिन दनान पर चाहे (चाय) चाहि ! चीनी आ चाहक पातक कोनो उद्यमे नहि , तखन अहिं कहु जे कतय संऽ इ सब पार लगत - - - ? कि लाल कक्का बमकि उठला तऽ कि हम दनान पर बैसल लोक सब कैंऽ दनान पर सैंऽ भगा दियौक कि ? दनान छैइक त लोक एबे करत आ बैसबे करत ! भगबैय लेल के कहैत अछि ? बैस ने होय छैइक लोक कैंऽ जत्ते काल धरि बैसत से परंच चायक चाह आवश्यक छैइक कि ? हउ हमहु कि अनका चाह पिआबैत छी ? सब तऽ मुखिये - सरपंच आ आ ओकर लोक सब तकरा ने पिआबैत छी हउ ! हमहुं हुसल काज नहि करैत छी पाँच साल तऽ ओकरे सबहक बदौलत खेपब कि कतहु चाकरी करय लेल जायब से तूंहि कहऽ कने ? कि बाहर संऽ कोन ओमिदवारक आबाज एलय लालबाबू छी यउ ? हं - हं हइआ ! जाउ -जाउ चाह त जढ़ले अछि ने ? भरि दिन इ सब अकच्छ कऽ छोरत ! बिहनि कथा हेल्लो लाल कक्का :- बमबम छऽ हउ बमबम - - - - ? हं कक्का कि भेल ? एम्हर आबह कने तोरे संऽ काज छल ! आय हमरा संऽ अहाँक कोन काज भ गेल यउ ? जे ने कराबय इ वैज्ञाणीक यूग ! से कि भेल यउ कक्का ? हउ कि कहियऽ ? एहि बेर बेटा एगो हेल्लो द गेल अछि तहि द्वारे सदिखन फरिसान भेल रहै छी ! ओ त भने मोबाइल दऽ गेलाह जे जखन मोन होयत तखन बेटा - पुतहु , सर - सबंधी जकरा संऽ मोन होयत तकरा संऽ गप कऽ लेब एहि मे फरिसान होयबाक कोन काज ? हउ कि कहियऽ एहि हेल्लोक कारन संऽ तोरा काकी संग झंझट भऽ गेल ! से कोना झंझट भ गेल अहाँक तऽ नहि कहियो काकी संऽ - - - ! कि कहियऽ तोरा कहय बला गप्प रहय तखन ने कहबऽ ? आ नहि कहबऽ तऽ तों बुझबहक कोना सेहो बात छैइक ! हं बिनु कहने कोना बुझबैक कहबै तखने बुझबय ! हउ तोरा जहाँ कि कतहु हेल्लो लगबैत छी की एकटा जनना बाजऽ लगैत अछि इ सुनि तोहर काकी हमरा पर कुपित भ जाइत छहऽ ! आ एक दिन तऽ कहि बैसल जे बूढ़ारी मऽ घीढ़ारी करबाक मोन होयत अछि ? नवारी मऽ कहियो लांछन लगेबे नहि केलक आ हेल्लो द्वारे बुढ़ारी मऽ - - -? हेल्लो संऽ नीक चिट्ठीए छल ककरहु अबय त तोहर काकी बूझबे नहि करय पढ़ले नहि होयक ! आब तूही कहऽ जे कि करि एहि हेल्लो कऽ ? हमरा त मोन होयत अछि जे चूरि कऽ डबरा मऽ फेक दियै ! हँ - हँ एना जूनि करु ओ त कम्प्यूटर बजैत रहैत छैइक ! ओह से गप्प तोरा काकी कऽ के बुझेतह ? हमर गप्प सुनबाक लेल तैयार नहि छथि कने तोही बुझा दहक नहि त एहि हेल्लो क आय हम - - - - - ! बिहनि कथा नोन चटबा पुर बाली एक्के सुरे गाड़ि कथा पढ़ने जाइत छलैक ! कि भेलय किआक एतेक तमसायल छैइक आइ ई ? कि हेतैक छौंड़ाक हालत देखौक ने तखन फेन फूछियौक जे किआक तमसायल छैइक ? कि भेलय छौंड़ा कऽ? से देख ने होइत छैइक जे कि भेल हन से ! बाप रे बाप एना के मारलकय एकरा ? के मारतैक अपने गिरहत मारलकई कने खेत मे बकड़ी हुलि गेलय तय लेल देखौक ने केना दू-दालि कऽ फोरि देने छैय ! छौड़ा कतय छलय जे बकड़ी खेत मे चलि गेल रहैक ? कतय जेतैक कने छौड़ा सब सने - सने खेलाय लगलहि तय लऽ हमर नेना कऽ एना भऽ कऽ मारलकई नीक नहि हेतय ओकरा ! किआक एना बाजैत छैक इ , कियो दोसर मारलकई अपने गिरहत कने डाँटि देलखिन छौड़ा बदमासो बड्ड छय बदमासी केने हेतय आ जाँउ मारनेहे हेथिन तऽ ओ नीके द्वारे ने मारने हेथिन ! ओ कखनहु बेजाय नहि कऽ सकैत छथि हम हुनका नीक संऽ चिन्हैत छियैन्ह ! इ मनसा कऽ कि भऽ गेलय से नहि कहि ? बेटा कऽ एना भऽ कऽ मारलकई तइयो मालिक'क बड़ाई कम नहि होइत छैइक ! लगय एकरा नोन पढ़ा कऽ खुआ देने छैइक एकरा गिरहतवा ! बिहनि कथा साढ़े बाइस थोथर बाबूक ओतय ब्राह्मण भोजन होइत छलैक आ भोजक पाँती मे लाल कक्का घूमैत छलाह कि एक गोटे पूछलकैन लाल बाबू , खोखाय बाबू केना कि भोज - भात कैलथि अथि ? लाल कक्का बजलथि खोखाय बाबू साढ़ै बाइस केलथि ! ओ व्यक्ति लाल कक्काक मूहे देखैत रहि गेल छल ! ओना हमहु बात नहि बुझि सकल रहि ! कि ओ पूणः बाजि उठल आ थोथर बाबू कते नोतने छथि ? इहो हमरा हिसाबे साढ़े बाइसे केलथि अछि ! बेचारे ओ तऽ चूप्प परंच पाँती मे बैसल लोक सब लाल कक्का'क मूँह बक्कर - बक्कर तकैत रहि गेल छल जे लाल बाबू इ कि बजलाह ? हम सेहो भोज खयला'क उपरांत साढ़े बाइस'क बारे मे सोचैत छलहु जे साढ़े बाइस मे कि होइत छैइक ? ओन साढ़े बाइसक मतलब तऽ नहि मे बुझैत छल ! मूदा थोथर बाबू तऽ भोज केलथि आ सब बैसि खेबो केलहुं तखन तऽ एकर मतलव नहि मे नय लगा सकैत छी ! परंच इ कोन साढ़े बाइस कहलथि से नहि कहि ? प्रात भेने लाल कक्का कैंऽ बाट बहारैत देखलिऐन हमहु अपन मोनक भितर बसिआइत बात हुनका सऽ पूछि बैसलहुं ऐं यउ लाल कक्का साढ़े बाइसक मतलब कि होइत छैइक ? लाल कक्का कोन साढ़े बाइस मतलब कि कहैत छऽ कने फरिछा कऽ कहऽ ने हउ ? हयउ राति मे भोज बला साढ़े बाइसक अहाँ जे कहने रहिए तकरे मतलब नहि बुझि सकलहुं ? ओऽऽऽ हउ अप्पन टोल कैंऽ नाम पैंतालीस घर छियैक कि नहि से कहऽ ? हम हं से तऽ पैंतालीस घर छियैके मूदा इ साढ़ै बाइसक कि भेलय से पूछलहुं अछि ? लाल कक्का हउऽ तुहूं महा बूड़ि लोक छऽ ! पैंतालीक आधा कि होइत छैइक से कहऽ ? पैंतालीसक आधा तऽ साढ़े बाइसे होइत छैइ मूदा - - - - -? मदा कि ? दूहु गोटे आधा - आधा टोल लऽ कऽ भोज केने रहथि ! आबो बुझलहक कि नहि साढ़े बाइस ? आ नय बुझलहक तऽ कहियो नहि हुझबहक ! हम हं - हं कक्का बुझि गेलिए साढ़े बाइस ! धन्य छी अहाँ आ धन्य अहाँक सोंच ! बिहनि कथा मोहन भोग आय चारि - पाँचटा लंगोटिया संगी सब भोरहि - भोर हमरा घर पर पहुंचल ! ओहि मे दू - तीनटा परदेशी दिल्ली - बम्बई मे रहनिहार सब छल जे गर्मी छूट्टी मे गाम आयल छल ! हउ बाबू एबिते देरि तेहन ने अनघोल मचेलक से जूनि पूछु ! हरउ दोष घर संऽ निकल ने रउ , देखि हम सब बाहर संऽ एलहु अछि तऽ एकरा खोज करय लेल आबि गेलहुं आ एकरा घर संऽ निकलल पार नहि लगैत छैइक ? जखन विआह नहि भेलय तय पर , विआह भऽ जेतय तऽ लगय अछि दर्शनो एकर दूर्लव भऽ जायत आरो किदनिकहां दनि सब - - - - - -! हमहु अकच्छ भऽ घर संऽ निकललहु ! कि बात छियै रउ तों सब एना किआ अनेरो गरदमगोल मचेने छंऽ रउ ? हरउ कि कहियउ कहलिए जे गाम एलहुं अछि तऽ गाछी - बिर्छीक मजा सेहो लेवाक चाहि आ जहने गाछी दिस जायब तऽ तोहर ओ मिठका मोहन भोग कोना बिसरि सकैत छी ? जे तोरा बिनु गेनहि भोग नहि होयत ! हम :- अच्छ तांय हमरा संग करय लेल ऐलऽ नय तऽ नहि अबितैंय सैह ने ? नय रउ एहन कोनो बात नहि छहि तोरा हम सब बिसरि सकैत छियउ कि से कह ? से तऽ हम बुझैते छियै जे तों सब कि कऽ सकैत छैंऽ ? हम कटहरक गाछ पर आ तों सब कटहरक आंठी टा निच्चा मे छोड़ने छलैंय , सक्क रहितउ त ओहो तुं सब नहि छोड़ितैंह ! इ बात एखन तक तोरा मोने छउ ? हाऽऽऽऽ हाऽऽऽऽ सब गोटे खूब हँसलक अच्छऽ सून एकटा दू हत्थी झटहा लऽ ले तखन चलिहैं नहि तऽ - - - - - बुझिते छहि कि खेबैंऽ से ! लऽ लेलिए तूं सब तकर चिंता किआक करैत छैं तोरा सब आम खेबा सऽ मतलब छउ कि गाछ - - - - - - ? हरउ बुझलियउ आब चलबो कर ! ( सब गोटे बिदा भेलहुं जकरे गाछ भेटय ओहि पर झटबाहि शुरु ! बानर जकाँ किछु खाइत किछु फेकैत गेलहु ! आ अपना गाछी पहुचि बुझु जे मोहन भोग के झटहाक मारि मारि कऽ सहन भोग बना दइ गेलय ) विहनि कथा जड़ैत चिमनी छाप लाल कक्का दनान पर खैनी चूनबैत बैसल छलथि कि एकटा कुर्ता - पैजामा बला यूवक जकरा पाछू - पाछू करीब दस - पंद्रह टा नव - यूवक छौंड़ा सब सेहो छलैक ओ आबि कऽ लाल कक्का कैंऽ प्रणाम करैत छैन्ह ! पहिने तऽ लाल कक्का कने हरबरा जाइत छथि मूदा मूह संऽ निकलैत छैन्ह नीके रहऽ ! लाल कक्का एखन नीके रहय बला आर्शिवादक कुनो औचित्य नहि अछि कुर्ता - पैजामा बला बाजल ! ताहि पर लाल कक्का हउ बाबू तखन कि कहियऽ हम तऽ सब कैंऽ सैह कहैत छियैक जे नीक ( स्वस्थ ) रहऽ, लोक कऽ आओर कि चाहि परंच तूं तऽ अजबे लोक बुझायत छऽ ? पाछू संऽ एकटा छौड़ा बाजल हिनका विजय श्री कऽ आर्शिवाद दियौन कक्का ! कि लाल कक्का बाजि उठला हमरा पहिनहि बुझाइत छलय जे एहि मूसटंडा छौंड़ा सब संगे कतहु मारि करवाक लेल जाइत छऽ परंच मोन मे भेल जे कहिं से बात पूछबऽ तऽ तोरा खराप ने लागि जाउ ताहि हेतु नहि पूछलिऽ ! कुर्ता - पैजामा बला एहि बेर हाथ जोड़ि विनम्रता पूर्वक बाजल अहाँक बात कियो बेजाय नहि लैइत अछि तऽ हम कोना बेजाय मानब से कहु ? हं सेहो तोंऽ ठीके कहैत छऽ हम कखन कि बजैत छी से अपनहु नहि बू़झैत छियै तखन लोकक कोन कथा ! परंच लाल कक्का अहाँ जे सोचलहु से हम नहि छि ! हम एहि बेरक चूनाव मेऽ सरपंचक पदक ओमिदवार छी ! जेना लाल कक्का कैंऽ अपसोस भेल हो तहिना भऽ कऽ बजला ओह तोरा पहिनहि ने से बात बजवाक चाहि छलहऽ ने हउ ? देखहक हम तऽ तोरा चिन्हवे नहि केलियऽ ! कि ओर पूणः बाजल कक्का हम गूरकुनक बेटा छी आ हमर बाबाक नाम भूटकुन छलैन्ह आऔर हमर नाम छरपन भेल ! छऽ लम्बर पर हमर चूनाव चिन्ह जड़ैत चिमनी छाप अछि ! आब अपन आर्शिवाद दिऔक कक्का ! लाल कक्का अहि बेर बेस सम्हरि कऽ बजलाह हउ हम तऽ पहिनहि कहि देने छियह जे नीके रहऽ ! हउ नीके रहबऽ तखन ने मेहनत करबऽ आ बुझैते छहक जे मेहनतिक फर मिठ होइत छैइक से तऽ तोंहु बुझिए गेल हेबहक बिनु नीक रहने किछु संभव नहि छैय तखन जा खूब मेहनत करऽ ! नीके कऽ इहो मतलब भेल जे ओहो मे नीके रहबऽ कि बूझलक ! जे आज्ञा कक्का कहि फेर एक बेर प्रणाम कऽ ओ बिदा भेल ! ओकरा गेलाक बाद लाल कक्का बाजऽ लगलाह देखियउ गूंडे सब सरपंच बनवाक लेल तैयार अछि ! धन्य हमर प्रजातंत्र !! बिहनि कथा नोटक भोंट सूकन के चारि - पाँच गोटे सँऽ मारि रहल छलैक ! मूक्का - हाथ लात - जूता जेना ओकरा उपर बरसि रहल छलैक ! धिरे - धिरे आरो लोक सबहक जूटान ओहि दिस भऽ रहल छलैक परंच ओतय पहुचलोक बाद कियो किछु बाजैत नहि छलैक ! सब अपन मूकदर्शक बनि ओहि दृश्यक आनंद उठबैत छल ! ता हमहु ओतय पहुंचलहु परंच हमहु ओ दृश्य देखि के किं कर्तव्य विमूढ़ भऽ गेलहुं ! देखत छी सोमन आ सोमनक समर्थक सब इ कहि मारैत छलैक जे - - सार तों जे भोंट देवऽक बदला नोंट लेने छलहि तकर कि भेलहु ? आ सूकन बजैत छल जे हम अहाँक भोंट दिआ देलहु ! परंच सोमनक आदमी सब मानय लेल तैयार नहि जाँ तों सब हमरा भोंट देंलह तऽ हम हारि कोना गेलहु रउ ? सार फूसियों कऽ पाय ठकनाय अइये निकालि दैइत छियहु - - - - - - हम तऽ इहय सोचैत रहि गेलहु जे दोष ककर ? मारि खेनहार केंऽ कि मारनाहर कैंऽ पाय देनहार कैंऽ कि लेनहार कैऽ ? बिहनि कथा हकार रखवारी वाली'क अंगना मे हकार पूरय वाली सबहक धर्रोहि लागल छय टोल - पारक धिया - पूता संऽ ल'क बुढ़िया धरि बेरा -बेरी बरसाइतक बदाम लेबऽ लेल आबय -जाइत छैइक ! रखवारी वाली'क पुतहु सबकें आग्रह संऽ बैसाय कऽ माथ मऽ तेल सिनूर दऽ आदरक संग बदाम दय विदाह करैत छलैक ! मूदा एहन उदार भाव अप्पन पुतहु केऽ देखि रखवाली वाली कैंऽ ग्रह्य नहि भऽ रहल छैइक भितरे - भितर पुतहु पर कन्हुअाय रहल छल परंच करत कि एतेक स्त्रिगण आंगन मे बैसल छय तकरे द्वारे टा चूप्प भेल अछि नहि तऽ - - - - - ! मूदा संयोग देखियो मौका भेटिए गेलहि - - बघांत वाली यऽइ कनियाँ हम तीन गोटे छी तीनू गोटे'क हिस्सा बेन हमरा दऽ दिऽ - - - रखवारी वाली'क पुतहु अपन साउस दिस ताकऽ लगलि जे कि करि कि ताबत पितोझिया वाली बाजि उठलखिन कने लबाइये कऽ दियहु ने अहाँक भगवान कोन बस्तूक कमी देने छथि जे साउक मुह तकैत छी ? साउस तऽ अहाँक आय धरि टोल पार मे ककरो खोंटियो के बेन नहि देने हेती तेहन कृप्पन छथि ! हउ दियउनु देखय छियहि बुच्ची दाय'क वर सेहो सूनय छी कहाँदनि इनजियर छथिन आ भारो - दउर तऽ खूब नीक जकाँ आयल छल तखनो अहाँ से - - - - - ? एतबहि बात सुनैत देरी रखवारी वाली अग्निश्च - वायूश्च भऽ गेली भगवान देने छथिन तऽ कि सबटा लूटा देतहि कि ? इ सब हमरा पुतहु कैंऽ सिखा - पढ़ा कऽ खराब करय जाय - जाइत छथि इ हमरा नीक नहि लगैत अछि से बुझि लय जइयो ! कि पितोझिया बाली सेहो ताउ मे अबैत अंयऽइ अहाँ अंगना कि कियो बिन बजौने आयल कि ? अहाँक अंगना कियो थूको फेकय लऽ नहि आयत लोक ! हऽ य चलय - चल ,आ सब बिदा भऽ गेल ! नहि देवाक छलहि तऽ हकारे नहि दितहि लोक कुकूर छय कि - - - - - ? २ लघुकथा आ विहनिकथा- तुलनात्मक विवेचन .मुन्ना जी --------------------------- पढ़बा लिखबा सँ पहिने सुनबा गुणवाक परिपाटी छल.जे परिपाटी मनुक्खक पशु सँ भिन्नता पविते प्रारम्भ भ' गेल हएत.मुदा से आदि मानव मे नै रहल हएत.ई सौभाग्य त' मनुक्खक विकसीत रूपें के भेटल हेतै . प्रारम्भ मे एक दोसराक बीच कह- सुनी आ ओकरा तेसर - चारिम.....लोक लग कहि के सुनेवाक क्रम बनि गेल.ई क्रम ता धरि चलैत बढ़ैत रहल जा धरि पढवा लिखवाक परिपाटी नै बनल.इएह श्रुति- वाचनक क्रम कोनो घटना विशेष कें एक लोक सँ दोसर लोक तेसर, चारिम......होइत समूह मे पसरल.एक समूहक दोसरा समूहक बीच कथ्ये वा वाक्ये आगाँ बढैत गेल.उएह विभिन्न कथ्य कालान्तरे कथाक रूपें सोझाँ आयल. मैथिली मे भाषाइ विकास त' प्रारम्भिके चरण सँ देखार भेल मुदा कथा लेखन सुषुप्त रहल.सुषुप्ते ना वरन् धुमिल वा पछुआएल रहल.मौखिक कथा त' पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होइत रहल मुदा लिखित कथाक उपस्थिति शुन्य सन रहल.ऐ सँ ई साबित होइछ जे मैथिली मे साहित्यिक लुरिक अभाव वा शुन्यता पसरल छल.तकर एक कारण इहो भ' सकैए जे मैथिलीक प्राम्भिक चरण मे बजबाक भाषा त' मैथिली छल.मुदा पढ़बा - लिखबाक भाषा संस्कृत वा उर्दु छल. सब कागजी काज ओही माध्यमे होइत रहल.समयान्तरे ओकर स्थान अँग्रेजी लेलक.कम पढ़ल- लिखल लोक संस्कृत वा उर्दुक ज्ञान नेने छलाह वेशी पढ़ल - लिखल लोक अँग्रेजी भाषा अंगीकार केने छलाह.जिनका मे साहित्यिक अभिरूचि शुन्य छल. मैथिली मे संस्कृतक प्रभाव रहल आइयो ओही भाषाक मूल मे मैथिली साहित्य टीकल ऐछ. प्राय: इएह कारण रहल हएत जाहि सँ मैथिलीक प्रारम्भिक लेखन अपन भाषिक मूल रचना सँ नै भेल.प्रारम्भिक लेखन विद्यापतिक संस्कृत मे लिखल ' पुरूष परीक्षा'क मैथिली अनुवाद सँ भेल.तकर मुख्य कारण छल- तत्कालीन मिथिला मे जाहि वर्गक प्रभाव छल हुनक शिक्षा आ सनातनी रोजगारक ( यथा- पुजा- पाठ)भाषा संस्कृत छल.गैर पुरोहित वर्गक भाषा मैथिली मात्र छल. मैथिली विद्वानक वा आलोचकक मतानुसार इअह मुख्य वा विशेष कारण रहल जे मैथिलीक पहिल साहित्यिक मूल रचना गैर पौरोहित वर्गक रचनाकार रासबिहारी लाल दासक उपन्यास " सुमति " (1918) सँ प्रारम्भ भेल. समयान्तरे मैथिली साहित्यक विकास भेलोपरान्त ऐ भाषाक साहित्य पर ओही पौरोहित्य वर्गक आधिपत्य भ' गेल. ओही ठाम सँ एकर विकासक बजाय क्षीणता प्रारम्भ भेल. [4/26, 8:02 PM] manojkumarkarn71: विद्यापति संस्कृत मे अनेक ग्रन्थक रचना कएलनि, मुदा चन्दा झा ताहि मे सँ अनुवाद करबाक लेल चुनलनि- " पुरूष परीक्षा " के.अहि प्रकारें मैथिलीक पहिल कथापोथी पुरूष परीक्षा मानल जा सकैए.--- मोहन भारद्वाज, मैथिली कथाक विकास, सा. अकादमी- २००३ सं. वासुकीनाथ झा. पहिने पौराणिक खिस्सा लिखाइत छल. साहित्य विधा मे ओतर नाम छल- नाटक.पद्य मे भेलत' काव्य.कहल गेल त' खिस्सा, कहबाक शैली मे लिखल गेल त' उपाख्यान भ' गेल.श्रुतकथा वा गढ़ल कथा के लेखक जँ अपन शब्द मे लिखलनि त' ओ कहएल मौलिक रचना.एहि तरहें मौलिक कथाक पहिल रचना- काली कुमार दासक " भीषण अन्याय "(१९२३) के मानल गेल. उपरोक्त स्थिति मैथिली कथासाहित्यक प्रारम्भिक चरण के परिलक्षित करैए.कथाक विकास यात्रा के एक टा नव मोड़ देलक- रमानाथ झा द्वारा एकरा अंग्रेजीक SHORT STORY कहि फरिछेवाक पछाति. कथा वा गल्पक आब विकसीत रूप सोझाँ आबय लागल.आ उएह कहएल मैथिली लघुकथा ( Maithili Short Story)ऐ सँ पहिने रचनाकार लोकनि एकरा अंग्रेजी मे Story कहि संबोधित करैत छलाह.जनतब करबैत चली जे- Story यानी ' कथा ' वा कहानी त' साहित्यिक दुहू विधाक सभ प्रकार माने की उपन्यास, कविता , नाटक.....आदि मे उपस्थित रहैछ.बिना कथांशक त' कोनो रचनाक अस्तित्वे नै मानल जा सकैए. वस्तुत: आधुनिक मैथिली लघुकथाक विकास स्थुलता सँ सुक्षमताक विकास छी,भावुकता सँ तटस्थताक विकास छी, आदर्श सँ यथार्थक विकास छी. परञ्च आधुनिक मैथिली लघुकथाक प्रेरणा भूमि युरोप, विशेषत: अंग्रेजीक लघुकथा साहित्य रहल ऐछ, सेहो निर्विवाद ऐछ.कथा साहित्य कहला सँ कहानी / कथा/ गल्प ओ उपन्यास दुनूक बोध होइछ.किन्तु मात्र कथा सँ कहानी अथवा गल्प केर बोध होइछ. अंग्रेजी मे ऐ लेल मानक शब्द ऐछ-Short Story.मायानन्द मिश्र- मैथिली कथाक विकास सं. वासुकीनाथ झा.सा.अकादमी- २००३. रमानाथ झाक Short Storyके लघुकथा कहि विवेचनक पछाति मैथिलीक कथा/ गल्प लधुकथाक रूपें प्रकाशित होइत रहल.सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Maithili Short Story लिखल भेटत.एखन धरि मैथिली मे हजारो लघुकथा आ सैकड़ो लघुकथा संग्रह(Collection Of Maithili Short Story)मैथिली मे विद्ययमान ऐछ. एखन धरि विभिन्न विश्वविद्यालय सँ अाठ गोटे मैथिली लघुकथा (Maithili Short Story). पर शोध क' चुकलाह ऐछ.लघुकथाक नवम शोधार्थी छथि- अनमोल झा, जे सम्प्रति तिलका माँझी विश्वविद्यालय सँ लघुकथा( Short Story)मेशोधरत छथि.ओना हुनक लघुकथा कथ्य, शैली एवं लेखकीय तकनीकी वी सुक्ष्म दर्शीयें विहनिकथा (Seed Story)क समकक्ष बुझाइए.ओ एकर शोध श्री केष्कर ठाकुर जीक निर्देशन मे क' रहलाह ऐछ ! त' जहिना आन सब प्रोफेसर/आलोचक/ संपादक मैथिली लघुकथाक आधिकारिक आ ऐतिहासिक मानदण्द के बिसरि वा अज्ञानता रहि हिन्दीक लघुकथा के मैथिली मे लघुकथा बुझैत रहलाह तही मे सँ श्री केष्कर ठाकुर जी के सेहो देखल जा सकैए. भारत सरकारक साहित्य अकादमी सबतरि मैथिली कथा/ गल्प के लिखित आ मौखिक (मंचीय उदघोषणा)रूपें मैथिली लघुकथा कहि संबोधित करैत आबि रहल ऐछ.मुदा साहित्य अकादमी सँ मैथिली लघुकथा संग्रह छपेनिहार / पुरस्कार पेनिहार कहियो विरोध नै केलनि आ लाभान्वित होइत रहलाह.तहू सँ हास्यास्पद बात जे मैथिली लघुकथा संग्रह पर देवनागरी मे- कथा संग्रह आ English मे Collection of Maithili Short Story छपबैत रहलाह .आ स्वघोषित विद्वानक दर्जा पबैत रहला.भारत सरकारक साहित्य अकादमी सँ मैथिली लघुकथा संग्रह के पहिल बेर १९८७ मे पुरस्कृत हेबाक सौभाग्य प्राप्त भेल छल. ई लघुकथा संग्रह छल- ' अतीत' लघुकथाकार छलाह- उमानाथ झा लघुकथा लेखनक प्रारम्भ सँ ९८ वर्षक पछातियो स्वघोषित /पेटपोषित सब अपन इरखे नाङरि कटबैत दोसरो कथ लेखक के दिशारहित.....करैत रहलाह. मैथिली मे लघुकथाक स्पष्टीकरणक पछाति आब विचार करी ऐ सँ विलग ' बिहनिकथा ' पर ' बिहनि' माने बीया. जेना एक टा बिहनि अपन कतेको प्रक्रिया सँ गुजरि एक टा संपुर्ण गाछक सामर्थ्य रखैए. तहिना बिहनिकथा (माने- बीजकथा- हिन्दी,Seed Story in English)अपन सब रूपें यथा- कथ्य, शिल्प एवं सिरखारी सँ एक टा संपुर्ण कथाक प्रतीक ऐछ. ने ओ लघुकथाक छोट रूप छी, ने छेँट ने अखरकट्टु. अपन सब कशीदाकारीक संग पुर्णत: भरल- पुरल कथाक सामर्थ्यवान रूप ऐछ विहनिकथा(Seed Story) एत' जाहि बिहनिकथाक विवेचन क' रहल छी ओहि नामक पदार्पण भेल ऐछ- बीसम सदीक अन्तिम दशक मे. एकर खगता हमरा ऐ दुआरे भेल जे पहिने सँ मैथिली मे कथा/ गल्प लघुकथा लिखाइते छल आ किछु मैथिलीक अज्ञानी विद्वान हिन्दीक लघुकथा के सेहो मैथिली मे लघुकथा लिखै छलाह जाहि सँ दुनूक पहिचान संकट मे बुझएल.अही खगता के पुर करब लेल वा दुनू के विलगा दुनूक अस्तित्व बचा के रखबा लेल.भिन्न नाम द' आगाँ बढ़ाओल गेल. ऐ सँ पहिने मैथिली मे बिहनिकथाक लेखन ' हिन्दीक देखाउँसे लघुकथा नामे होइत आबि रहल छल.तकर मुख्य कारण छल- तत्कालीन बिहनिकथाकारक.दुरदृष्टिहीनता वा अज्ञानता.ओ सब लौल क' वा नकलची बनि एकरा लिख' चाहलाह.पाठक के सेहो नव चीज भेटलै त' एकर स्वागत हएब स्वाभाविक छल.ओ सब अंधानुकरण क' लिखब शुरू केलनि छोट आकारक कथा.आ पहिने सँ मैथिली मे लघुकथा विद्यमान रहितो ऐछोट अकारक कथा के सेहो नाम देलनि लघुकथा.(Short Story)सत्यत: ई हिन्दी सँ उधार लेल गेल शब्द छल.हिन्दी साहित्य जेना अँग्रेजी साहित्य सँ आच्छादित ऐछ तहिना मैथिलीक किछु रचनाकार हिन्दीक अन्धानुकरण क' अपन जग्गह बनेबा लेल संघर्षरत देखल जाइ छथि. असल मे हिन्दी कथाकार हिन्दी मे Story के कहानी नामे लिखैत रहलाह...! जहन खलील जिब्रान वा अन्यान्य अंग्रेजी रचनाकारक देखा देखी छोट अकारक कथा हिन्दी मे लिखए लागल तहन हिन्दी बला सब अंग्रेजीक Story क स्थान पर Short Story लघुकथाक नामकरण केलनि. मैथिली रचनाकार लेखन शैलीक संग एकर नामो के अंधानुकरण क' एक टा हास्यास्पद काज केलनि.तकर मपख्य कारण छल- तत्कलीन रचनाकारक दृष्टि फरीछ नै हएब. ओ सब हिलसि क' अंधानुकरण क' आत्मिक प्रसन्न भेलाह जे एक टा आओर सफलता .....लीक सँ हँटि क' भेट गेल. जनतब दी जे जहिया हिन्दी मे लघुकथा लिखब शुरू भेल( उन्नैसम सदीक मध्य) तहिया मैथिली लघुकथा( कथा/ गल्प,Short Story) जे हिन्दीक कहानीक समकक्ष छल, लेखनीक प्रारम्भिक अवस्था मे छल. माने जे मैथिली साहित्य आओर सब दोसर भाषाक समर्थ्य साहित्य मध्य पछुएल रहैए.तकर मूल कारण ऐछ जे मैथिलीक रचनाकार मे वेशी( सब नै) साहित्य/ इतिहास / व्याकरण सँ अज्ञात रहि अपन साहित्यिक दृष्टि कें वा अस्तित्व के मिथिला मैथिली सँ बहरेवाक चेष्टा वा सोच नै रखै छथि .एहि मूल कारणे मैथिली साहित्य आओर साहित्यकार आन भाषा साहित्यक रचनाकारक तुलने सब सँ नीचला पौदान पर देखाइ छथि.उदाहरण स्वरूप पंजाबीक ' मिन्नीकथा' हिन्दीक लघुकथाक संग फरिछा गेल.से ओइ भाषाक रचनाकारक दूर दृष्टिक प्रभाव छल. पंजाबी लघुकथा कहियो ' लघुकथा' नामे नै लिखा ' मिन्नीकथा नामे शुरू भेल.(किएक त' पंजाबी कहानी आधिकारिक रूपे लघुकथा कहाइए. ) आइयो ओही नामे अपन स्वतंत्र अस्तित्व पावि चुकल ऐछ.तहिना हिन्दीक लघुकथा वांग्ला मे ' ए मिनिटेर कथा ' संस्कृत मे लघ्वी आदि संपुर्ण अस्तित्व मे ऐछ.मैथिली सँ दबल/ पछुएल भाषा ओड़िया मे सेहो हिन्दीक लघुकथा क्षुद्रकथा( खुद्रकथा) नामे लिखाइछ. तहन की मैथिली मेअपन शब्द भंडार नै की मैथिलीक रचनाकारक ओतेक अवगति नै जे हिन्दीक लघुकथा मैथिली मे अपन स्वतंत्र नामे किए नै? हमहू अपन लेखनीक प्रारम्भिक चरण मे लघुकथा शब्दें विहनिकथा लिखब शुरू केने रही. कहबी छै' जे देखतै कुलपरिवार से सीखतै रीति व्यवहार ' साहित्यकुलक अग्रज सब सएह करैत अबै छलाह.किछुए दिनक पछाति मोन मे हिन्दीक अंधानुकरणे लिखल जाइत लघुकथाक जग्गह पर शुद्ध मैथिली शब्द हेबाक जिज्ञासा जागल.ऐ नाम के जनौलनि मैथिलीक स्थापित कवि, चर्चित लघुकथाकार एवं विहनिकथाकार श्री राज.फरवरी 1995 मे 'सहयात्री मंच' लोहना( मधुबनी) क साहित्यिक विमर्श लेल भेल बैसार मे हम ( मुन्ना जी) ' बिहनिकथा ' शब्दक स्वतंत्र नामक प्रस्ताव रखलौं. जकरा सहृदये श्री राज द्वारा समर्थनक संग उपस्थित सब रचनाकारक समर्थने/ सहयोग ऐ नाम के सर्वमान्य घोषित कएल गेल.आ तहिया सँ हिन्दीक लघुकथाक कथ्य/ शिल्प मे म लिखल जाय बला मैथिली लघुकथा ' बिहनिकथा नामे लिखाइत आबि रहल ऐछ आ लघुकथा(Short Story) ओहिना मैथिलीक गल्पकथा बनल रहल जे अपन स्वतंत्र अस्तित्व मे सामाजिक और सरकारी संस्थागत मान्य ऐछ. बिहनिकथा(Seed story)स्वयं मे कथाक पुर्ण रूप ऐछ. सामान्यतया लघुकथा(Short story) कतेको विन्दु के छुबैत/ समेटैत पाठक के अपन उद्देश्य बतेबा मे सक्षम भ' पबैए.ओकर विपरीत ' बिहनिकथा ' (Seed Story)पाठक के एक खुट्टा पर खुटेसल सन राखि अपन सार्थकता के एके क्रम मे बेकछा लेखकीय मन: स्थिति के फरिछा दैछ.आ पाठकक मगज मे ऐनमैन स्थिर भ' समा जाइछ . मैथिली लघुकथा आ मैथिली बिहनिकथा के मुख्य रूपें जे विलगबैए ताहि मे महत्पुर्ण तथ्य ऐछ- जे मैथिली लघुकथा (Maithili Short Story)क शुरूआत संस्कृतक मूल रचनाक उल्था(अनुवाद) सँ प्रारम्भ भेल. जहन की बिहनिकथा मैथिलीक मूल रचना सँ प्रारम्भ भेल. मैथिली लघुकथाक विकास कतेको चरण पार क' भेल.जहन की बिहनिकथा जनमहि सँ स्वतंत्र अस्तित्व मे आयल.आ अल्प समय मे बिहनिकथाक कतेको प्रारूप यथा- प्रेम बिहनिकथा, भुतहा बिहनिकथा, बाल बिहनिकथा सहित कुल१२ गोट पोथी आवि चुकल ऐछ. बिहनिकथा आलोचनाक पहिल पोथी ' अर्द्धविराम ' शीघ्र प्रकाश्य ऐछ.एकरा फरिछाबे मे सब सँ महत्वपुर्ण योगदान ' मैथिली पाक्षिक विदेहक बिहनिकथा विशेषांक ,अंक - ६७ रहल. बिहनिकथाक एकल एवं सामुहिक पोस्टर प्रदर्शनी लगाओल गेल .जे मैथिली कथा साहित्यक इतिहासक पहिल सफल प्रयोग ऐछ.बिहनिकथाक एक टा मजगुत कड़ी रहल फरिछएल मानसिकता बला रचनाकारक आगू आयब.जहन की हिन्दी लघुकथाक घेर मे फँसल किछु रचनाकार बेर - बेर बिहनिकथा पर अपन अज्ञानता थोपबाक असफल प्रयास करैत रहलाह. आब प्रारम्भ सँ तेसर दशक मे आबि कतेको उतार- चढ़ावक संग आगाँ बढ़ैत अपन स्वतंत्र नामे स्थान पौलक. ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.राजीव कर्ण- किछु विहनि कथा २.राम सोगारथ यादव- सपना सपने अछि-(बिहनि कथा) ३. दिनेश रसिया- बीहनि कथा ४. नारायण मधुशाला- २ टा बिहनि कथा १ राजीव कर्ण किछु विहनि कथा *********** पौस ------ साँझक समय रहय पान खाय के मोन भेल तैं दोकान पर गेलौंह। ओमहर सँ हमर एकटा मित्र एलाह "नमस्कार यौ" आऊ आऊ दोस पान खाऊ गप्पे गप्प में किछु देर पहिने के बात मोन पड़ल। दोस? कहु.... यौ अहाँक बाबु जी कुत्ता..... दोस-हे सुनु! अहाँक बाबु जी कुत्ता..... आहा! गरम किये होय छी दोस? हम कहलौ जे अहाँक बाबु जी कुत्ता खरीदलाहा? घर परिवारक लेल लोक पर विश्वास नै रहलैंह की? बीहनि कथा --------- सिनेह *********** -- बौआ , कने एम्हर सुनू ने ! -- की कहै छी भइया.....कहू ने ? -- आँय यौ , अहाँ के अप्पन राज काज नै ऐछ की ? -- से की ? -- दोसरा के काजक पाछाँ अहाँ अपना के हेरा लै छी. -- आ अप्पन काज ...? -- की करबै भइया , दोसराक हीया मे पैसि के त' देखियौ. -- सिनेह मे मातल सब गछारने बुझएत ! बीहनि कथा ************* नेत --------- देखियौंन कोना काते काते मुह घुमा क जा रहल छैथ। --से किये यौ कक्का ? --ओहो ! की कहै छह बौआ छः माह भ गेल एक्को टा पाय नै देलक अखन धरि उधारी जे खेलक से। --त कहै नै छियै अहाँ ? --होउ कहलियै दू चारि बेर लेकिन...........हमरा त बुझाइए जे हिनकर नेते ख़राब छैन्ह। --(एक दिन भोरे भोरे) -- लक्ष्मी बाबू छी यौ ? --की बात छै यौ ? आय भोरे भोरे दर्शन देलियै। --यौ हमरा बड्ड लाज लगै छल अहाँ सँ तैं हम काते काते चैल जायत रही अहाँक उधारी जे रखने रही। लेकिन लिय अपन पाय अहाँ हमरा फेरो सँ नौकरी लागि गेल। मज़बूरी अछि मुदा नेतगर छी। बीहनि कथा ------------ देखौवल न्याय --------------- -- आंय यै भौजी एतेक भीड़ अहि अंगना में किये छै। --देखियौ न बोआ उ है ने मंगनुआ के पुतौह से अपन साउस आ ससुर के बड़ दुःख दै है तैं लोक आउर ओकरा मारै ले गेल है। --आ मंगनुआ अपने क त छै से ? -- उ दिल्ली गेल है कमाय लय। --ओहो ! आंय यै भौजी तखन त जुल्मे ने हेतै। ई कोन न्याय भेलै ? मंगनुआ के आबह दैतथिन तखैन फैसला करबाक चाही ने। --आ तखन की होतई जखन बुढ़बा बुढिया के मारि देतै उ मौगी। --अच्छे देखियौ दूये मिनट में फैसला केना होय छै। --(सब सँ आगू आबि) अपने सब सँ आग्रह जे जिनका जिनका अहि कनियाँ सँ कष्ट अछि आ बूढ़ा बूढ़ी सँ स्नेह से अपना अपना ओहिठाम ई दुनु प्राणी के ल जा क सेवा कैरतियैन्ह त उचित होइत। (सबहक बाक बंद सब अपन मुड़ी झुका अपन घरक रास्ता देखलाह) बीहनि कथा ********** पैघ लोक ****************************************** --बोउआ कनि टोल में आ दियाद सबके निमंत्रण द अबियौ न। --ठीक छै कक्का, हम आधा घंटा बाद द एबैन्ह। --(सब गोटे दलान पर जुटला खाय लेल) --यौ बोउआ मोहन बाबू त नजैरे नै अबै छैथ हुनका नत नै देलियैन की? --जा यौ कक्का हम त बिसैरिये गेलियै हुनका। --आहा। जाऊ जाऊ दौड़ क ओना आब त बड्ड लेट भ गेलै । मानता की नै लेकिन खोज पूछारी जरूरी ऐछ। --मोहन कक्का छी यौ ? --हाँ बोउआ आबह। की कहै छ ? --यौ हमरा सँ त बड़का गलती भ गेल। --से की हौ। --सब जगह हम नत देलियै आ अहाँ के ओहिठाम छुटी गेल। --ओहो ! रामू छ हौ ? --हाँ कक्का। --की सब बनि गे$ल ? --दाइल भात भ गेलै आ खाली तरकारी बांकी छै। --छो$ड़ ओकरा , च$ल भोज खाय।सब इंतज़ार में हेताह। बीहनि कथा --------- ख़ुशी ----------- --बधाई हो मुखिया जी ! अहाँ त आय सबके पछाड़ी देलियैन। होउ आब भोज भात आ लडडू मिठाई के व्यवस्था करियौ। --हाँ हाँ किये नै जरूर हेतै। --मुखिया जी एकटा बात पूछू ? --हाँ पूछु। --यौ हम बेर बेर देख रहल छी जे अहाँ खुशियो होय छी आ चेहरा उतैरियो जाइये। किछु बात छै की ? --नै कोनो खास नै ,हम सोचै छी जे ई जीत हमर सबस पैघ ख़ुशी नै ऐछ । हमरा त वोहि दिन सबस बेसी ख़ुशी होयत जै दिन हमरा मुखिया चुननाहर लोक सब सुखी रहता । बीहनि कथा उल्टा पुल्टा ---------- --हे हे । मर तोड़ी भला के। ई छौड़ा त सबटा काम उलटे पुल्टे करै छै। --की भेल कक्का यौ ? --ओह! की कहै छ ई हमर जे पोता छै ने ओकरा कहबै पूब जाय ले त चैल जाइये पछिम। पता नै की पढई लिखै ये। --ओहो । नै बुझलियई कक्का आब त पढाईये उल्टा भ गेलै ने। पहिले पढलकै उ, ए बी सी डी, आ आब पढई छै आई. ए .,बी. ए. ,सी.ए.,बी.सी.ए.। ----------------------------------- बीहनि कथा ----------- फोटो कॉपी ----------- --भैया ! --हँ , की कहै छह बोउआ। --मनुखक फोटो कॉपी देखने छी अहाँ ? --है। मनुखक केहन फोटो कॉपी होय छै हौ ? --हे , ई देखियौ । --आरौ तोरी भला के ! ई त फेकना बुझाई छै हौ ? --हँ भैया वेह छै। --त एकरे तू फोटो कॉपी कहै छहक ? --हँ भैया। --हौ से किये? --हम चाहै छी जे नवतुरिया सब ओरिजिनल बनय ताकि लोक एकरे सभक नक़ल करय लेकिन ई छौड़ा सब त अपना के बिसैर कखनो सलमान खान आ कखनो शाहरुख़ के इस्टाइल मारैये फेस बुक पर तैं। २ राम सोगारथ यादव सपना सपने अछि---(बिहनि कथा) हे सुनै है .... ऐकरे कहै छि ऐ.... बहिर जेना भगेलै ......यै बुधनाके बाबू नहि सुनै छि यै ? .....एऽह कथी कहै छि कहुन ? कि भेलै कैला ओते फटियाई छि...... ......बौवा साथीके फोन आयल छलैय कथी सब कहलकैय निकसँ नहिं बुईझ पैलियै कनि बौवाके मिस्कल मारियो तँ गप करबा लेल मन ब्याकुल भरहल अछि । ............ई गप सुनिक हम मने मन मुस्कुराईत रहि गेलौं ओतेबे मे काका हमरा सँ कहलखिन .........रे .... रबिन्द्र ,कनिक बुधना लँ फोन लगात ? .......काका बुधना के फोन स्विचओफ बताबै छो । काकी जहि नम्बरसँ फोन आईल छ्ल ओहि पर फोन करबै तँ नहिं हे तै ...कि?... ............होतै बौवा बात भजैतै कि मारहोन ...............हमरा एना महसुस होईत छ्ल जे जब प्रदेश मे अपन संतान होईत अछि तखन बोली सुनेला माय बाबू कतेक आतुर होईत छै । .........ए .... रुक काका कनिक देख हो मनिष भैया के फोन चैल अलै कत्तारसँ हेलो भैया प्रणाम.... .........आँईरौ बुधनाके घरे फोन कैला नहि लगै है । ..........भैया ओकर माई बाबू हमरे लँ छै बात कैर सकै छा । ........नै नै सुन हम जे कहै छियो ई बात ओकरा माई बाबूके नहि कैहियही ओना बाध मे तँ पता चलिये जैतै ..........आब हम अकबक भगेलौ हमरा मुहँमे जेना बकार लाईग गेल । ............रे ....रबिन्द्रा कि भेलो तो कैला नहि बजै छे । मनिष तँ बुधनेके बारेमे पुछै छलौ ग नै कि भेलै कहन काका बहुत उत्साह भँ हमरा सँ पुछ केकोसिस करैत छलखिन मुदा हमरा आँखिस्ँ जब नोर टप टप बहलागल तब काका ,काकी चिन्तित भँ पुछ लगलै ।आ आरो लोक सबके जमघट लागलगलैकाका , काकी संतान के खबर सुनला आतुर भगेल खिन हमरा ई बात छुपनाई बहुत कठिन भगेल अन्तमे मुहँ खोल्ही टा परल काका बुधना भैया के एक्सिडेन्ट भँ क मृत्युु भँ गेलो आब काका , काकी सेहो माथ पकडैत काँन लगलखिन ............ओह बेचरा बहुतो सपना बोईक कऽ बिदेश गेल छलै । आ बजैत रहै छलै जे बिदेशसँ आईब तब छोटकी बहनके शादी करब धुमधामसँ । ई कि भँगेलै सब दैब के लिखल बिधना अछि जेना जेना घुमाउत तेना तेना घुम्ही पडत । ३ दिनेश रसिया बिहनि कथा ......... मनसुखाः बाबा कत स अबै छह ? बाबाः चौरी गेल रहियै । मनसुखाः अतेक रौदमे कि करै छेलहा ? बाबाः कि करियै आमक गाछी के रखबारी , मनसुखाः एह तहन त खुब आम खाइत हेबा तों नै ? बाबाः बौवा कने जा क देखी जे बापक कन्हाके हर कतेक हल्लुक होइ छै । मनसुखा चुप्पी लधने ........ ४ नारायण मधुशाला- २ टा बीहनि कथा बीहनिकथा-१ एकटा लड़का पैँजाब खटै छल । बैशाख महिनाके ओकर बाप ओकरा फोन करैय । बेटा आप तोँ घर चलि आ । ओ लड़का सोचैय जे ठीकेमे बेसी दिन भऽ गेल एतऽ रहला । आब घर जेना चाही । मुदा ओईसँ पहिने सबक्यो लेल लत्ताकपड़ा किनि लई छी । ओ गेल एकटा निक Malla मे कपड़ा किनबाक लेल । आ माई बाप बहिन क्यो लेल कपड़ा किनिलक । अन्तमे ऊ सोचैय सब लेल कपड़ा तँ लेलौँ मुदा अपना लेल कुछ तँ लेबे नै केलौँ । तब ओकर नजैर एकटा काफी महग Jacket पर पड़ैय आ महगे सही ऊ किनि लैय । घर आबैय । घरमे ओकर वियाह लेल करबाक लेल बोलेने छल । बिहाने भने वरतुहार एल । छँडा खुब सजिधजि लेलक । आ ऊ सम्झैय जे अते महगमे अते निक Jacket अखन नै पहिरै छी तँ ओकर अपमान भऽ जाएत । से नै तँ पहीर लई छी । छँडा पहीर लेल । आ तब गेल वरतुहार लग । लड़का देखलक । लड़काके देख कऽ ऊ सब जे जा लगल तब लड़काक बाप वरतुहारसँ पुछैय । हमर बेटा पसन्द पड़ल ने । वरतुहार जबाफ दैय । यौ अहाँक बेटा तँ हजारमे एक अछि । लड़का तँ एक्को रती नै काटै बला अछि । लेकीन वैह कने लड़का हिरोसँ हुराठ भऽ गेल अछि । हिरो धरि रहैत तब तँ ठिके छल मुदा अहाँक बेटा हुराठ भऽ गेल अछि । बीहनिकथा-२ -- अते दिनसँ अहाँ कत गेल रही ? -- अपन संस्थाक दिसिसँ गिरगिट सभक आयोजन कएल गेल प्रोग्राममे । -- गिरगिट सभक प्रोग्राममेँ, माने ? -- अनु ई कवियो गिरगिटेसन होईछै नै ? -- की भेल ? -- यार अनु, कवि लिखैत अछि कुछ आ प्रयोगमे स्वम आनैत अछि कुछ । लोक झुठेके कहै छै जे सब काज बराबर होइछै । आ एहो देखाबटी बात जे नारी पुरुष एक सम्मान अछि । ई सब बात बेकार जेना लगैए । -- से किए ? -- आब देखुन ! हम जे गेल रही जै प्रोग्राममे । ओतऽ पैघ पैघ कवि, कलाकारके सम्मान मिलल । मुदा ओतऽ जे बहिन सब सभके भानस करि खुवेलक तेकरा पर क्यो विचारे नै केलक । एकटा बात कहुँ केकरो जन्म के दैय ? -- माए ! -- मुदा कहुँ तऽ महिलाक नाम कतौ आबैए ?...देखु तऽ सभतरि...विज्ञानक पिताके...राष्ट्रक पिताके...एहने प्रश्न अबैए । सगतर पुरुषक नाम मात्र। माएक नामक कियाने ? राष्ट्रपति होईत अछि मुदा राष्ट्रपत्नी किए ने ? -- अहाँक प्रश्न गम्भीर अछि । -- अनु जँ पियौनोके कतौ सम्मान मिलैत तऽ की ओ सभ अपना पर गौरभानवीत नै होएत ? ऊ मेहनतसँ काज करैए तँए स्कूल ठीकसँ चलैए मुदा ओकरे नाम कतौ ने । तब किए ने कोई काजके छोट वा पैघ मानत ? किया कोई पियौन, भानस करऽबला आदि बनबाक लेल चाहत ? -- पिलीज, अहाँ शान्त भऽ जाऊ । किछ बात किताबी बात बनिक मात्र रहि जाईए । की करबै ? माथा पर प्रेसर नै लिए । -- अनु की करु कतबो करै छी ई मतभेद देखले नै जाईए। -- असली चिन्तन करबाला व्यक्तिके एहिना होई छै। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.मलय नाथ मिश्र- २ टा बीहनि कथा २.जगदानन्द झा ॒मनु॒- किछु प्रेम बीहनि कथा ३. मुन्नाजी- किछु प्रेम बीहनि कथा ४. अब्दुर रज्जाक- २ टा बिहैन कथा १ मलय नाथ मिश्र- २ टा बीहनि कथा १ समीकरण =========================== ::-एहू बेरदा छोटका-बडकाक रंग देबाक चेष्टा केने रहै ओ! मुदा नञि सुतरलै,खूमे प्रयास केने रहै। ::-किये नञि होम'देलहक।हमरा सब त' एहि बेर अनठा देलियै।जेकरा हेबाक हेतै से अपन हेतै। ::-नञि बुझलियै मालिक! पछिला चुनावक भोग त' भोगिते छलू।एबरीदा हम पहिले से साबधान छलू। ::-ऐ बेर की भेल' ।पछिला बेर त' तहूँ खूब नाच केने छल',छोटका -बडका नाम पर। ::-मालिक! आब कान पकरै छी।बलू हैर जेब से कबूल,मुदा आब फेनो::::::उँउउउउहूँ। ::-किये की भेल',भने निके त'छह। ::-नञि यौ मालिक!!तीन-तीन टा' केस कपार पर अछि।घूस-पैंच दैत दैत साकिन भ'गेलौं।लूटि लेलक नेतबा सब। ::-एहि बेर कोन राजनीति छ'तोहर सबहक। ::-एहि बेरदा किछु नञि छै।कान मे तूर तेल ल' सूतल छियै।सूतलो रहबै त' अहाँ सबहक माँ बाबूक चरणक किरपा से जितबे करबै। ::-कोना के जितब'से ने कह'।सूतले जिततै जँ लोक त'हमहूँ सब वेह फरमूला लगा देबै किने। ::-जा'से नञि बुझलियै! मुखिया बनतै सोमन मिसर के कनियाँ आ पंचायत समिति हेतै अतिपिछडा मे से, तैले हम छियै।सरपंच द' देलियै अंजुमन मियां के।आ जिला परिषद बनेबै हम सब बुधना पासमान नञि छलै तेकर बेटा,भने निके त'नाम छै ओकर,हँ हँ संजितबा।बड सुन्दर छौंरा छै।पढलो लिखल छै आ बोलियो बानी नीके छै। ::-ओहो इ त'सब समीकरण बैसा लेलह तों सब किने।ठिके कहै छ'एहि समीकरण पर त'सब निश्चिते सुतलो मे जितबे करब'।अच्छा थमह' हमहूँ सब लगबै छी माथा।एही सोशल इंजीनियरिंग पर। २ बेकाजक का'ज ===-=-==-================= :-कि कहियौ! बिद्यार्थी त' दूर बुरियार्थीयो सब जे रहिते त' कम से कम तासो त' फेंटतौ। ::-किये ओत' मन नञि लगैये। ::-मन कोना लागत, गपो करय बला के अभावे रहय छै। ::-तखन लफरेंटिशे करय परैत हेत। ::-कि करब किछु त' करब।उपजल गप ऐ कोठी सँ ऐ कोठी करैत रहै छी।ताही मे किछु नीक -खराब सब भ'जाइछै। इ मोबाइल अछि जे कोनहुना दिन काटि लै छी। ::-नीके करै छी।घर चलबै ले सरकार ढेर रास दैते अछि। बेरोजगारक कुटि-चालि मे लागल रहू,जे जेहो रोजगार मे लागल छै ओ अहींके लगौल खुरापात मे ओझरेल रहे।जे करी सरकार!!दोहाइ ओहिपार के छी। ::- बड बड देखलौं लेकिन तोरा जेकाँ कागचेष्टी नञि देखलौं।एक्कहि साँस मे सबटा सुरैड ने देलही।तोरो जोडा नञि भेटल हमरा। सबटा ठांहि पठाहिं मुँहे पर। ::-आहि रे बा! आबो त'सुधरू।धीया पूता पैघ भेल।नामी-गिरामी कहबै छी।लेक्चर-फरफेसर सबटा नाङरि लागल अछि।आब त' इज्जैत बचबै के समय आबि गेले।बरू कहब त' तास फेंटनिहार के हम तैक दै छी। लबडा बला काज सँ बढिया तासे फेंटब। ::-ठीक छ' ताक'।तखनि तासो फेंट के दिन काटब। ::-त'बाद मे इ नञि कह' लागब जे जुआ बला तसक्कर चाही। २ जगदानन्द झा ॒मनु॒ किछु प्रेम बीहनि कथा 1. एसगर बासोपत्ती बस अड्डा । 'म'केँ दिल्ली जेए बला ट्रेन दरभंगासँ पकरैक छलै । बासोपत्तीसँ दरभंगाक धरिक यात्रा बससँ । बसक इन्तजारमे 'म' एकटा लगेज हाथमे नेने ठाड़ । ततबामे 'स' अफसीयाँत भागि कय आबि 'म' लग ठाड़ होति, टूकुर टूकुर ओकर मुँह तकैत । दुनू आँखिसँ नोर निकलि 'स'केँ गाल होति गरदनि धरि टघरि गेल । म, "तु एतेक कनै किएक छेँ?" स म केर दुनू हाथ खीच, ओकर हाथपर अपन मुँह रखैत, "हम कहाँ कनि रहल छी ।" ओकरा उदास आ कनैत देखि म दूटा बस छोरि देलकै । "हमरो ल' चलू, अहाँ बिनु हम एहिठाम नहि जी सकब । ओहीठाम हम सबकेँ कहबै जे हम अहाँक नोकरानी छी । अहाँक नेनाकेँ खेलाएब, घरमे पोछा लगाएब, बर्तन धोब ।" ई कथन छल एकटा बिधबा माएक जेकर बेटा दिल्ली बाली संगे ब्याह कय दिल्लीए बसि गेल छल आ माए एसगर गाममे । ********************************* 2. प्रेम गुदड़ी बाजारक भीड़ भाड़सँ निकलैत, एकटा दुकानक आँगा टीवीक आबाज सुनि डेग रूकि गेल । टीवीसँ अबैत ओकर अबाजे टा सुनाइ द' रहल छल । ओकर देह नहि देखा रहल छल मुदा अबाजेसँ ओकरा चिन्हनाइ कतेक आसान छै । आइसँ तीस वर्ष पहिने, हमरे संगे संग नमी वर्ग धरि पढ़ै बाली, सुन्दर, चंचल मात्र मूठ्ठी भरि डाँड़ बाली सु..... "कि प्रेम इहे छैक की मात्र देहक प्रजनन अंगपर एकाधिकार बना कय राखैमे सफल भेनाइ?" ************************************ 3. सोहागिन हल्द्वानी, हम आ सा । क़ब्रिस्तान पार कय क' हम दुनू पहाड़क उपर चढ़ैत, समतल जगह ताकि पार्ककेँ एकटा वेंचपर बैसि, देहक गर्मीकेँ कम करैक हेतु बर्फमलाइ (आइस्क्रीम) कीन खेनाइ शुरू केलौंहँ । दुनू गोटा अप्पन अप्पन आधा बर्फमलाइ खेने होएब कि, सा "जँ हम अहाँक सामने मरि गेलौं तँ हमर सारापर चबूतरा बना देब ।" मेघ धरि उँच उँच पहाड़, चारू कात प्राकृतिक सौंदर्य, मखमल सन घास, स्वर्गसन वातावरण, बर्फमलाइ केर आनन्दक बिच अचानक एहेन गप्प सुनि, बर्फमलाइ हमर मुँहसँ छूटि हाथमे ठिठैक गेल । कनिक काल सा केर मुँह पढ़ैक असफल प्रयास केलाक बाद; "अवस्य एकटा नीक चबूतरा । जँ हम पहिने मरि गेलौं तँ एतेक व्यवस्था ज़रूर कय जाएब जे एकटा नीक चबू.... " बिच्चेमे सा हमर मुँहकेँ अप्पन हाथसँ दाबैत, "नीक नहि साधारणे चबूतरा मुदा अहाँक हाथे आ ओहिपर लिखल हुए "सोहागिन सा" । ********************************** 4. बेगरता दोसर मँुहेँ करोटिया दय सुतल मकेँ अपना दिस घुमाबैत - "धूर जाउ ! कोना मुँह घूमेने सुतल छी, दस मिनट पहिने अप्पन बेगरता काल बिसरि गेलियै कोना जोँक जकाँ सटल छलौं ।" 5. अगिला जनम “डाँड़ टूटल जाइए भरि रा ति सूतलहुँ नहि बड़ तंग करै छ ी, अगिला जन्ममे अहाँ हिजड़ा होएब जे कोनो आओर मौगीकेँ एना तंग नहि कए सकब।” “ठ ीक छै ! अगिला जन्म अगिला जन्ममे देखल जेतै, एहि जन्मक आनन्द तँ लए लिअ । आ अगिला जन्ममे ओहि हिजड़ाक ब्याह जँ अहिँक संगे भए गेलहि तँ ।" ************************************ 6. मँुह झौँसा “गै दैया ! एतेक आँखि किएक फूलल छौ ? लगैए रा त भरि पहुना सुतए नहि देलकौ।” “छोर, मँुह झौँसा िकएक नहि सुतए देत, अपने तँ ओ बिछानपर परैत मातर कुम्भकरन जकाँ स ुति रहल आ हम भरि रा ति कोरो गनैत बितेलहुँ।” ३ मुन्नाजी किछु प्रेम विहनि कथा 1 असरा बेरहट लए किछु देलकै ? हँ ,बान्हि देलियै . हम जाइ हियै....., नै सुनलकै की ? सुनि गेली ,मुदा हमर मोन करै है जे आइ नै जेतै से नै हेतै ? आइ मासक अन्तिम तारीख हइ, जएह एक दिनक खोराकी के पाइ त' बढ़ि जेतै. ओना मोन त' हमरो आगू - पाछू करैहए. ई कहतै बलू त' रहि जेबै! सब दिन त' एकरा थाका हारी रहिते हइ, आ घर अबै हइ त' बाले बच्चे सोहरल. हमरा लेल एकरा पलखति कहाँ रहै हइ. ईह.....! हम की भरि दिन खटै हियै अपने पेट खातिर! हे , पेट त' सबहक कोनहुना भरिए जाइ है. ई खाली, पेटे के सोचैत दिन, मास, बरख बितबैत रहओ. हम एकर पलखतिक असरे तकैत रहि जाइ हियै. आ एकरा लेल धानि सन! एह.....! हमहू त' कहिया स' उहे बाट तकैत रहियै. हे , एने आउ ने...... केवाड़क विलइया ठक सँ उठल ! 2 संगबे अगिनवाणक फोँका जकाँ बड़बड़ा उठल रहै नेहक लावा. कुलीन रहबाक कारणे नै कोइ बजै, आ नहिये कोइ रोकि पौलकै. दिन...... दुपहरिया सौंसे गाम सोरहा भ' गेलै.....! सुरूजक ताप सन उठल ज्वारि चान उगवा धरि चाने सन सेरा गेल रहै. मुदा ता धरि छओंड़ाक शोणितक टघार....मुँह मलिन क' देने रहै.छओंड़ी अपन ओढ़नी सँ ओकर फुटल कपार के झँपने....! गामक चारू भ'र सँ सगरोक लोक जुमि गेल रहै. सब कियो बिन माँगल सलाह देब' लगलै-....! दुन्नू के गोली मारि दे....! नै, छओंड़ी के भगा के छओंड़ा अनलकौ, एकरे गाछ मे टांगि दे, गरदनि मे गमछा लगा के. पंचायतक बैठार भेलै ,फरमान सुनएल गेल.... " छओंड़ा के काटि के गाड़ि दे !" छओंड़ी विहुँसैत पुछलक - 'आ छओंड़ी के ?' माय - बाप केधमका के सुनझा दही. नै, किन्नहुँ नै. छओंड़ी तमकि उठल- " जेबै त' दुन्नू, जीबै त' दुन्नू ." 3 छुच्छ दुलार समस्त युवा युवती सँ अपील-" जाति- पाति, रंग- भेद, धर्म - कर्म सँ उपर उठि देशक सर्वांगिन विकासक लेल सोचै जाउ." की यौ......, आइ त' बुझाइ छल जे कोनो बड़का पाटीक बड़का नेता भ' गेलौं अहाँ . यै , हम समाजक सब रूढ़िक रीढ़ के तोड़ि नव समाज बनेबाक संकल्पित छी. आ ताहि मे अहाँ सनक उच्चकोटिक विचारवान महिला चाही, संग पुरवा लेल. सेआइये मात्र नै, जन्म जन्मांतर धरि. 'खाउ सप्पत....अहाँ संग देव, जीवन संगिनी बनि. ' ' हे भाषण छोरू, पुइछ आउ अपन पुरखा के, हमर जातिक लोक अहाँक जाति मे मिझ्झर हएत. ? ' वाह! ओइ छओंड़ाक नमहर- नमहर लच्छेदार शब्द आ वाक्य माइक आ मंचे पर तक रहि गेलै. केना नयना मे घुइस हृदय मे उतरै लए उताहुल छल! हमर जाति सुनि ओकर आँखिक पानि उतरि गेलै. 'नीक भेल जे हमर हीयाक हीत हिया मे बाँचल रहि गेल, अप्पन लोक लए.' " नै त' प्रेमक फाँस मे फँसा हमरो घीना छोड़ैत आ अपन बाप पुरखा के सेहो " 4 दिहलगड़ि टेंगरा, पोठी, ईचना लै जाऊ...! कोना दै छीही गै ? लू ने मालिक , जे टका दै के मोन होत से द' देबै.साँझ झलफलाइ है.फेनो घरो घुरै के है. एँ गै, तों जे दिन राति खटै छें से तोहर मरद'बा की करै छौ, कहाँ छौ ओ ? ओ घरे मे रहै है मालिक. किए गै ओ मरद छौ की तों ? मालिक ओकरा घुमै फिरै मे असोकर्ज होइ है, तें भानस भात आ बाल बच्चा उएह देखै है " मुनहारि साँझ हो गेलै हम कखनी से एकर असरा मे ओसारा पर बैसल हीयै.ई मौगी भ' दुरे दुरे जा खटै है आ हम,बाल बच्चा आ भनसाघर मे लागल रहि जाइ हियै की विधनाक लिखल है से नै जानि" ई हदियाइ किए है, मनसा आ मौगी असगर मे त' अधुरे रहै है पूर त' तहन होइ है जहन दुनू एक भ' काज पुरवै है. हम करियौ की ई करौ, बात त' बरोबरिये ने बुझौ. "आ हे , दुनू गोटे बलू सब खन घर मे रहौ की नै रहौ,एक दोसरा के हिया मे त: बसले रहै है न'. ! 5 उफाँटि ओह...! केहेन निर्मम हत्या भेलै ओकर. के केने हेतै एहेन काज ? छओंड़ी जतबे सुन्नर ततबे सुशील सेहो छलै.तहन ककरो सँ दुश्मनीयो त' नै हेतै! यै, सुन्नर आ सुशीलक संग भरल पुरल जुआन सेहो छलै. हँ से त' छलैहे. त' ककरो सँ ....रंगरभस के फेर मे भेल हेतै ! यै जहन सभ चीज सँ भरल पुरल छलैहे तहन ककरो हिया मे त' बैसिये गेल हेतै ने. नै यौ,एकक हिया मे पैसल रहितै तहन ने अ'ढ़घात सँ दोसरो जँ नजरि गड़ेने होइ ? सब टा दोष छओंड़े के किएक ? जँ छओंड़ीयो सिनेह के पीयो फेको वासन जकाँ बुझैत होइ ! पकड़ा गेलै......पुलिस पकैड़ लेलकै. ककरा यौ ? हत्यारा के! के छै ? ओकरे प्रेमी ! 6 जुड़बन्हन गेंठजोड़बा क' दियौ ....! देखब यै कनिया , एम्हर ओम्हर नै भागथि. ककरा भगै के गप्प करै छी यै, कनिया के की वर के ? मनगर त' दुनू ने. मुदा मौगी त' जाँतल मोने रहि जाइए पर मनसा....हुलकाह बुझू. किए यै, मौगी के मोन कोनो मनसा पर नै जाइ छै की, सत्ते कहू त ' ? यौ, ज' से नै होइतै त' मनसा मौगीक प्रयोजने कोन ? मनसा मनसाक संग आ मौगी मौगीक संग रहि लैतै. तहन अहीं कहू बन्हन सँ की हएत ? हँ यौ इहो बात त' सत्ते ! " नुआ , धोतीक बन्हन सँ मोन नै बन्हाइए. मोनक बन्हन लए हिया सँ हियाक मिलान चाही " 7 निंघेस
गै दइया गै दइया, कहू त' एकर सपरतिब. ई रहत केठरीक भीतर विलइया ठोकि के , आ हम रहू टुग्गर- टापर जकाँ ढेंगराइत. मनसा त' पहिने हमर , तहन ने ओकर. पहिने प्रेमालाप! तहन देहक भूख.....निवारण.कहियो ऐ सब मे असोकर्ज नै हुअ' पबै ताहि लेल दिन राति अपना के समर्पित क' रखने रही यौ, अहाँक प्रेम फाँस मे फँसि दुनू गोटेक जुड़बंधन भेल छल. .आ हम तकर निवहता आइ धरि करैत रहलौं. मुदा अहाँ....अहाँ त' स्वर्गक सुख देखा नरक मे धकेल देलहुँ. "गै, ओ हमरासँ प्रेम केलकै आ हमहु ओकरा सँ......!" तखने दुनू एक भेलियै.आ तों त' आब देह सँ पुरान भ' गेलेँ. गै दइया गै दइया, हम पुरान भ' गेलियै आ एकर देह त' नवे धएल छै. हँ गै. त' ई कहौ जे आइ दोसराक प्रेम मे अपन अछिंजल सँ ओकरा सिक्त क' रखतै.आ काल्हि फेर तेसर.फेर....कतेक दिन धरि अपन अछिंजल सँ नवकी - नवकी छओँड़ी के घोंकि- घोंकि के छोड़ैत रहतै. ' जाधरि देह मे हुव्वा रहत!' आ ओउ निँघुछल.मौगी सबहक की हेतै ? ओहो सब हमरे जकाँ नवका प्रेम जाल बुनतै.....! बाढ़ैन नै मारतै ओहोन सिनेही के.....? " बाढ़ैन मारौ की खापड़ि, डेग त' चुकि गेलै." 8 बखरा मुन्ना जी उँह........! की भेल. ? अहाँक दाढ़ी गड़ैए . हा....हा....हा !नीक चौल केलौं. पहिने त' बिन काटलो दाढ़ी नै गड़ल कहियो. आ आब.....! आब बौआ भेलै ने . " त' की, बौआ भेने हमर गाल मे काट उगि गेल की ." से नै यौ......! आ की हमरा लेल अहाँक हृदय मे पाथर समा गेल ? नै यौ, सिनेह त' आब बौओ के चाहियै ने . हँ, समय अलग - अलग हेतै . नै , हमरा अहाँक बीचक सिनेह मे सँ आब ओकरो बखरा लगतै. " हे देखियौ, अहाँक किरदानी पर ओहो मुस्कियाइए ." 9 अन्हरिया मे
हम ओकर दुनू पाँजर मे गुदगुदी लगाबी आ ओ खिलखिला उठए.....! बड़ मजगर लागए ओ क्षण, ओकरा लेल धानि सन. फुलवारीक बीच दुनू गोटे एके पाथर पर बैसी, सोझाँ सोझे नजरि मिलौने. दुनूक गप्पक पहाड़ नै ढ़हि पावए कखनो, कतौ , कहियो. मुदा ओकर ठोरक विहुँसव, आ हमर ओकर नयनक किरणक मिझ्झर हएब, नै जानि कत' हेरा दै छल दुनू के.सोच जतेक दुर धरि जए, सिनेहक ओतेक लगीचक एहसास होइत रहै छल. ई क्रम जारी रहल......! फेर आजुक गप्पक क्रम मे पुछि बैसल.....एँ यौ, हमरा सेझाँ पबिते अहाँ एना बेसुधि किए भ' जाइत छी ? अहाँक नयनक किरिण हमरा अहाँक हिरदय मे समेबाक लेल उताहुल क' दैए! अच्छा छोड़ू , कहू जे हम अपन विआह मे बजएब त' एबै ने ? " यै, आब ई त' पक्का ऐछ जे जहन दुनू गोटे एक मड़बा पर बैसब, तखने विआहल जएब." नै यौ, हमर अहाँक प्रेम लचार भ' गेल हमर मए बापक हमरा प्रति प्रेमक आगाँ.....! हमर विआह दोसरा सँ हएब निश्चित भेल ऐछ. सिनुर दानक बेर बिजली गुल भ' गेल. अन्हारे अन्हार.......की भेलै.....ठीक करू जनरेटर....! " ईजोत भेल.....वर सिनुरक तामा हाथ मे लेने ठाढ. कनिया......फरार ! 10 सेल्फी
यौ, अपन मोनक एक टा बात कह' चाहै छी , कहू ? कहू ने एत' कियो दोसर त' छै नै. हमर मोन कहैए- जेनाहमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेल ऐछ. यै हमहू फरिछाइए दी, सत्ते अहाँ हमरा हृदय मे समा गेलौं ऐछ मुदा हम अहाँ सँ प्रेम नै करै छी. बुध्दु कहीं के ! प्रेम कएल नै जाइ छै, ओ त' अपने भ' जाइ छै. यै ,जे अपने भ' जाइ छै से अनेरूआ कहाइ छै. ओकर कोनो ठौर- ठेकाना नै होइ छै. तहन दुनू गोटे एहिना रह' दियौ. " एक दोसरा क् करेज मे समएल ." 11 खोंइछक धान
गै विमला, ओम्हर के पतियानी मे हाँसू किए लगेलें. एम्हरे आ ने हमर वाम - दहिन. एके संग दुनू गोरा कटनी करब, काजो उसरत आ तोहर मुँह निहारव सेहो संगे चलत. उँह....! एत' एलैए बोइन कर' की परेम कर' ? गै, जाबे आओर बोनिहार सब एतै ता धरि ई छओंड़ा- छओंड़ी पेटक संग- संग करेजक आगि सेहो सेरा लेतै. हरज कोन ! "ई कह जे तोरा मोन मे ओ नै होइ छौ जे हमरा होइत हएत ? यौ, छओंड़ा जते उधवा उठवैए तै सँ की कम आगि छओंड़ी के लेसै छै. मुदा हम सब निमुधन ! जबले मुँह रही त' परिवार आ समाज दुनूक प्रतिष्ठा रखनिहार बुझू. हे यौ, ओ सब अवै बला है.हम अपन आँटी ल' के जाइ छी. गै, तों ज' चलि जेम' त' हमरो बोझ कहाँ पुरत. आँटिये भरि रहि जएत. हे ले........! राजू हाँय -हाँय धान मीर के ओकरा खोंइछ मे द' देलक. विमला- ऐँ ई की करै छी, हमर विआह त' भेवे नै कएल.तहन खोंइछ ? " गै , ई खोंइछक धान नै , प्रेम दै छियौ धराउख रखिहें." आ ज' हम दोसरा के भ' जेबै ? तें ने धराउख.....! " आ जे से हेतै त' हम अहिना रहि जेबै तोहर खोँइछक याद मे ! 12 दासीन
नहुएँ, नहुएँ पछिया सिहक' लागल रहै. मोन त' चान सन शीतल मुदा हृदय मे सिनेह लहक' लगलै. यै, अहाँ ठोर पर लिपिस्टिक किए लगा लै छी ? "ठोर मे नवका रंग देवा लेल ." मुदा अहाँक ठोरक वास्तविक रंग कहाँ धोखरल ऐछ एखन धरि.अहाँक ठोरक मुस्की त' कतेको ठोर त'र क' दैए. यौ वास्तविक ठोर त' एके टाक मुस्की मे मिझ्झर होइ छै. मुदा रांगल ठोर नै जानि कतेको हृदय पर पाथर जकाँ बजरैए. आ हमर हृदय त' ओहिना रहि जाइए मोम जकाँ नहुएँ नहुएँ पसिझैत अहाँक सिनेहक दासिन बनि. " दोसरा सँ की स'ख मनोरथ." 13 प्रतिक
गै , तोहर घर त' बालू के छौ, अपने भहरि के खसि पड़तौ! चुप्प, तोरो घर त' संठी के छौ, एके बिहाड़ि मे उधिया जेतौ! रंजन, बाध मे महीस आ नमिता बकरी ल' चरब' जाइ छल.कतेको चरवाहा चरवहिनीक संग इहो दुनू गोटे घोलका -माली खेलाइत रहै छल. सामा -चकेवा आ कनिया - पुतरा खेलाइत कतेको बरख धरि दुनू एक दोसराक संग झगड़ा झाँटी केलक आ फेर सहटल रहल. वयसक चढानक संग आव मिलनक चढान सेहो उपर जए लगलै.पहिने त' सबहक सोझाँ मिलान होइआ आव चोरा नुका के. " रौ रंजन आब. तोँ ककरा सँ चोरा नुकी मिलबेँ रौ !" किए गै, तोरे सँ .....! हमर त' काल्हि विआह भ' जएत. हम सासुर चलि जेबौ. आ तोँ.....? रंजन अवाक.....! की भेलौ रौ ? ' ऐँ गै, हमर सबहक मोनक महल ठीके के भहरि गेल! एतेक दिनक याद क्षणे मे विला जएत गै ?' नै रौ, चल ऐ च'र मे एक टा गाछ रोपि दै छियै.जहिया धरि लोक रहतै तहिया धरि हमर तोहर सिनेह जियैत रहतौ. ' कथी के गाछ रोपमे ? पीपर के, सब के छहरियेतै सब मोन पाड़ैत रहतौ. नै रौ चल आमक गाछ रोपि दै छियै किए गै , आमेक गाछ . किएक? रौ, जहिया फड़तै तहिया हमर तोहर रसिकताक प्रतीक दोसरो के हिया रसौतै " 14 सिनेहक धार
ऐं गै छओंड़ी, तोरा सब दिन नवका - नवका छओंड़ा संग देखै छियौ....? आंटी ओ सब हमर ब्वायफ्रेण्ड छै ! त' तोहर कोनो संगबहिना नै छौ, सब टा संग भइये छौ की ? अहाँ एना शक्क किए करै छी आंटी ! चुप्प गै लुच्ची ! " सिनेह ककरो सँ लागए त' धराउख बुझी.ई नै जे जकरे सँ नैन मिल जए, मोन बाँटि लियय. यै आंटी ,अहाँ सब बला जमाना धएल नै रहलै आब.सुनै छी जे पहिलुका लोक सबहक ( कनियो - वरक)चोरा क'मिलान होइ छलै.संतान ......दर्जन भरि ! लबरी कहीं के.....! गै, हम सब दर्जन भरि जनमाइयो के शरीर मे हुव्वा रखै छलौं.आ सब टा चिलकाक निमेरा सेहो अपने सँ करै छलौं. मुदा आवक छओंड़ा -छओंड़ीक जुआनीयो नितुआन ! शक्तिवर्द्धक दवाई, जीम आ योगा पर टिक के जीवैए. धीया - पुता भेल त' वेशी सँ वेशी दू टा ओहो पलाइए दोसरे भरोसे. यै आंटी ,लोक जनम लेलक ऐछ कमाऊ , खाऊ मौज उड़ा ऊ फेर चलि जाउ ! ' तें रंग रभस त' जरूरी छै' त' एकर मतलब भेल जे क्षणे- क्षणे किरायाक घर जकाँ घरवला सेहो बदलैत रहू.एहेन कोन प्रेम जे कतौ ककरो पर जा टिक नै पावए. यैआंटी, .....जकरा सँ मोन मिलए उएह मीत बुझू. ई काज त' उएह क' सकैए जे सिनेही ऐछ ! " तेँ मोन राखू, दुखक नोर सुखि जए त' सुख' दियौ, हृदय सँ सिनेह नै सुखल ताकए कहियो" ' 15 ऐब की बेरिया
रौ सौरभ, तोरा बड़िखन सँ देखै हियौ एने- ओने मुड़ियारी देने फिरै ही रे. किछो हेरा गेल हौ की ? दोग दोसाइने वोन झाँखुड़ मे तकने फीरै ही रे....! सौरभ अवाक्......! फेर - हँ रौ, ताकै हियै से देखाइ कहाँ कतौ हइ. की हेरा गेल हौ, कह ने त' हमहू ताकिदै हियौ. रौ सुरजा ,तोरा नै भेटतौ. तूँ हियाँ से जो. ऐँ , एहेन कोन चीज हेरएल है रौ, जे तोरा भेटतौ हमरा नै.सेहो भेटेतौ तखनी जहन हम हियाँ नै रहबै. सेआब जे होइ हमहू तोरा संग ताकिये के रहबै.दुनू गोटे मिलि तकमे त' जल्दी भेटेतौ रौ. हौअए रौ....जकरे नाम गुलाब छड़ी सएह चलि आबए. निक्की सौरभ दिस बढ़ले रहए ....सौरभ सेहो सहटल निक्की दिस दुनूक नजरि मिललै की निक्की के सोझाँ मे परि गेलै सुरजा.निक्की दुनू के मुँह लुलूअबैत पड़एल उनटे पएरे.कोनटा फड़की, दोग दोसाइने लंक ल' पड़ाइत........! सौरभ ओकरा पछुएने.....अपस्याँत! " रूक....रूक गै,आइ नहिये छोड़बौ जाबे तोरा पटा नै देबौ.तोहर ठोरक मुस्की मे अपन ठोरक मुस्की मिझ्झर क' " 16 परदा पर
हम सबहक सोझाँ सप्पत खा कहै छी.पृथ्वी अकाशक बीच अगिनक सोझाँ. आई सँ अहाँ हम्मर आ हम अहाँक भेलौं अहा.,प्रिये....! जेहने रसिकगर गप्प तेहने बनल सेट. जेना स्वर्गक आनन्द करवैए. से त' सत्ते. हमहू नै जानि कोना अहाँक करेज मे सटि सब किछु बिसैर गेलौं.ई संकोचे हेरा गेल जे हम अहाँ मंच पर छी.घर मे नै.हम अहाँ एक टा कलाकार मात्र छी सच्चौ के पति-पत्नी नै. यौ से त' ठीके. ठीके नै यै ! माने, मंचक प्रदर्शन करैत- करैत मोन नुकएल की खुजल सत्तौ के प्रदर्शन ताकय लागल ऐछ. मुदा से त' मोने भरि रहि सकैए.कल्पना करैत रहू यथार्थक खोज मे विलमल रहू. त' की हमर अहाँक प्रेम प्रदर्शन कहियो बन्न घर मे आकार नै लेत ? किन्नौ नै. "प्रेम आ कला कहियो बन्हन मे नै बन्हाइछ.लोक के देखाउ, मुदा मोन नै भरमाउ." 17 पसार....!
इह .....! चोर नहितन. कखनो एम्हर कखनो ओम्हर, हुलूक बुलूक़ करैत रहै छथि.उचक्का नहितन. की बरबराइ छी यै ? किछु नै, अहाँक उचकपनी के फरियबै छलहुँ.आब ई सब बहुत भेल छोड़ि दियय हुलूक बुलूक. जँ सत्ते सिनेही छी त'आइ एकर स्थायी निदान भ' जए. स्थायी निदान ? से कोना विआहि क'. तखन जतेक सिनेह हृदय मे उसारि राखल ऐछ, सबटा खुल्लम खुल्ला उझिल सकैछी. यै विआहो क' के लोकक प्रेमालाप लए बन्ने घर चाही. तहन विआहे किए ? प्रेमक वंशमनि पसार लए......! 18 आशीर्वाद -------------- कला आ प्रेम कहियो कखनो कोनो सीमा मे नै बन्हएल .दुनू असीम ऐछ.तहन प्रेम पर पहरा किएक ? खास क' ओहोन प्रेम जे वएसक परिपक्वताक संग सीढी चढए आ बढए.. नै किन्नौ नै, ई सर्वथा असंभव ऐछ. प्रेमक धार मे तुँ वहि गेलेँ.मुदा हम भसिए नै देबौ. ई कह जे तोरा सब सुविधा द'पढ़बा लेल छोड़लियौ की प्रेमक धार वहेवा लेल! डैडी, प्रेमक लेल कोनो सरंजामक बेगरता नै हृदयक उदारता चाही.जाहि सँ विआहक बन्हन मे बन्हा एक दोसराक नीजता के उघि सकी. अहाँ दुनू माय बेटी बताह भ' गेलौं की ? ओ जे कहत सएह हेतै.मानलौ जेओ छओंड़ा सेहो अपने जातिक छै.पढ़ल गुनल इंजिनियर छै.मुदा एकर जन्मदाता की आश्रयदाता त' हमही छी.हम जे चाहब से हेतै ! ऐं...., निम्मी भागि गेल ! अहाँ मए भ' के की करै छलौं? हम त' अहूँ के बुझौलौं आ बेटियो के.मुदा की करू मौगी त' शुरूहे सँ वेवश ऐछ पुरूखक सोझाँ. हँ, आ बेटी वेवश छल प्रेमक आगाँ ! तहन पढल आ मुर्ख मे की अन्तर . प्रेमक बेर त' दुनू बरोबरि ! ओकरा कहि देबै जे घूरि के ऐ घर मे पएर नै दिए.आशीर्वाद त' दुरक गप्प जे ओकरा लेल ई दुआरि सदा के लेल बन्न भ'गेल. "डैडी,अहाँ हमरा लेल नव दुआरि त' ओही दिन खोलि देलौं जहिया हमरा इंजिनियरी करेलौं.उएह आशीर्वाद हमर निवहताक सारथी सेहो हएत ." 19 आँचर....! ---------------- मए बापक इच्छाक विरूद्ध प्रेम मे बताह भ' घर सँ भागल बेटीक लेल - " बेटी, तों हमर धाख नै मानलेँ.मए सँ त' सीखतेँ जे ओआइयो हमर निर्णयक विरूद्ध डेग नै उठबै छथि." तों भगलें त' सदाक लेल ऐ घरक दरवज्जा बन्न बुझ, अपना लेल.बना ले नव दुनिया बसा ले नव परिवार.बिसरि जो जन्मदाता आ आश्रयदाता के. नै , हम अहाँक भोगक वौस्त नै छलहुँ, अर्द्धांगिनी छी.आ अपन पेट मे पालल धिया लेल- " बेटी तों गलत डेग त' निश्चिते उठेलेँ मुदा प्रसन्न रह जकरा जिनगीक संगी बनेले तकरा संग.मुदा कहियो जँ सब देहरि बन्न बुझाउ तइयो एक टा दुरखा अवश्य खुजल भेटतौ- मएक आँचर ." 20 उठल्लू
देखू त' केहेन उजड़ी उपटी सन भ' गेल ऐछ! प्रेम विआह सँ भेल छुट्टा छुट्टी ओकरा मौगति धरि पहुँचा देलक ऐछ. कहू त' की उमेर छै ओकर.ह मरा आगाँ त' जनमल ऐछ.देखिते देखिते जुआन भेल, प्रेम भेलै , विआह भेलै. आ, फेर छुट्टम छुट्टा! हे, देह आ मोन दुनू सँ टुटि गेल ऐछ.ओकरा परिवार समाज द्वारा सम्हारवाक प्रयास कएल जए तोड़वाक नै.आखिर नेनमति सँ जे केलक तकर सजए जिनगी भरिक लेल हम सब त' नै दियै. बड्ड खटरास करै छी अहूँ.एहेन जे कुल शील बुझिते त' अनेरूआ लोकक प्रेम जाल मे फँसिबे नै करितए.तहिया मए बाप, गौंआ समाज ज' बुझबै त' सब बुझाय ओकर दुश्मन ! त' भोग' बुझतै कोना ? हे यौ अनिल जी,हम अहाँक हृदय सँ आभारी छी.जे अहाँ टुटल समय मे जिनगी के जीवाक आ कि भोगवाक सामर्थ्य देलौं.अहाँक प्रेम हमरा आइ धरि जियौने रहल.ज' एहिना हमरा आगुओ जियाव' चाहै छी त' अंगिया क' नव जिनगी दियय.धर्म रक्षक आ जीवन रक्षक दुनू मे नाम हएत अहाँक. हे , हम परिवार आ बाल बच्चे भरल पुरल छी.तोरा जकाँ उठल्लू नै छी हम. " ध्यान रखिहें ,सेवा आ प्रेम बँटै छी हम, सोहाग नै." 21 बाट- घाट
अहा ! केहेन मनोरम दृश्य. प्रकृतिक कोरा मे हम सब, कृत्रिम कोरा मे दुनू गोटे.कहू केहेन आनन्दक क्षण ! हँ यौ, पहाड़, जंगल ताहु मे दुइ टा जुआन छओंड़ा छओंड़ीक जोड़ी.अहाँक मोन जेना उच्छश्रृंखल हेबाक प्रयास क' रहल ऐछ ! आओर अहाँक यै ? स्थिर चित, शान्त मोन प्रेरणाक मध्य टिकल. हँ यै, जिनगीक किछु क्षण ऐ तरहें बितैत....लगैए जेना जिनगीक मठोमाठ सन. हे यौ, मुदा छओंड़ी, जँ एहेन जिनगी मे देखार भ' जए त' बुझू जेना- मसोमात सन ! तहन आब अहीं कहू आगूक की विचार ? हे यौ , हमर विचार मानव ? किएक ने .कहि के त' सुनाउ. आब दुनू गोटे अपन जिनगीक यथार्थ तकबा लेल विलगि जाउ एक दोसरा सँ. आँय यै, त' अहाँ एहिना अधखर जिनगी जियव ? नै यौ, जहिया जकर गात लगबै तहिया ने.ता धरि त' सब टा अपने छी संपुर्ण.आ ओही संपुर्णताक खातिर त' अहूँ सहटलौं! त' हम ई मानि ली जे ओ सहटब क्षणिक छल. किएक ने. " अपन बाट अपने बना, मोकाम ताकू !" 22 द्वन्द -------- हे , फोन क' वेशी तंग केलौं त' आवि के गरदनि मोइक देव, बुझलियै.घरवाली छी, घरे भरिक सोचू....! हम कत' जाइ छी, की करै छी ओइ मे टांग अड़वै के कोशिश नै करू. फोन राखू. यौ सुनीत हमआब जाइ छी , बड्ड बेर भेल. एन केना जए देब. त' की करव आओर ? गप्प सरक्का ! डेढ़ बरख सँ सएह करैत एलौं.मुदा आइ पता चलल जे अहाँ सिनेही नै निर्मोही छी. से की ? एक त' अहाँ विअाहल छी , परिवारिक लोक.जे हमरा सँ नुकौलौं.दोसर जे मौगीक उपभोग मात्रक वौस्त बुझि पहिने रंग रभस फेर गरदनि मोकवाक लेल तैयार..! आ आव हमरा संग....! हे रुकू.... रुकू ने,नै रूकब त' गोली मारि देब. यै, ओइ दिन त' भागि गेलौं. तकर पछाति फोन बन्द....! की भ' गेल अहाँ के ? "हे , सुनू राति मम्मी- डैडीक चिन्हल जानल लड़िका सँ हमर विआह भ' गेल.अखन हम सब हनीमून पर निकलल छी.अखनुक पछाति फेर हमरा फोन नै करी अहाँ , से मोन राखब. " विआह अहाँक,पसिन्न मम्मी- डैडीक !" हँ यौ, कुल- परिवार त' चिन्हल जानल छै. " बाट-घाटक सिनेही त' अनेरूआ होइ छै, अनेरूआक धरम- करम के कोनो किच्छो ठौर ठेकान नै ! " 23 देह, मोन आ प्रेम सबीना आ मोहसिनक जोड़ी सौंसे जोलह टोलीमे प्रसिद्ध छल। किएक तँ मोहसिन सभ साँझ पोलिथिन पीबि कए आबए आ सबिनाकेँ खूब मारै गरियाबै। मुदा सबिना चुपचाप पाथर बनि जाए। लोककेँ आशचर्य लागै। जखन की ओकर टोलक आर मर्द-जनानी मीलि हपनामे खूब उठा-पटक, भागादौड़ी करए, हरबिर्रो मचि जाए टोल भरिमे। कहियो काल सबिना सेहो मोहसिनसँ मुँह लगा लिए आ मोहसिन भरि इच्छा कूटि दै ओकरा। बाजा-भुक्की बन्न भए जाइ दूनूमे। तखन सबिनाक बाप अबै। सबिनाक बाप बड़का मौलबी छल। सबिनाकेँ सिखाबए पढ़ाबए जे अपन अल्ला मियाँ नराज भए जाइ छथिन्ह जँ केओ मौगी अपन पतिपर हाथ छोड़ैए तँ। अब्बाक कहल बात सुनि अपन नोरकेँ नूआक खूँटमे सुखा लिए। सम्मान करए अल्ला आ कुरानकेँ। मोहसिनकेँ मुइना आइ तेसर दिन भए गेल रहै। ओ सभ दिन भोर-साँझ ओकर कब्र लग जा भेसै छल। कब्रक उपर बेना डोलबैत छल। देखहो बला लोककेँ आशचर्य लगै।एकरासँ बेसी प्रेम तँ कोनो मौगी अपन पतिकेँ नै केने हेतै। मुदा..........मुदा सत्य छल जे ओकरा मोहसिनसँ प्रेम नै रहै। ओकरा मगजमे खाली कुरान शरीफक ओ बात घुसल रहै जाहिमे कहल गेल रहै जे" साँच मुसलमान वएह अछि जे कुरानक तहरीरकेँ मानैए" आ सबिना कहियो सुनने रहए जे " जाबत धरि पतिक साराक माटि नै सुखाइत छै तावत दोसर बिआह वा परपुरुख संपर्क कुरानक नजरिये अवैध मानल जाइत अछि" आ....आब आस्ते, आस्ते मोहसिनक कब्र केर गिल्ल सारा सुखा सक्कत भेल जा रहल छलै। 24 परमेश्वर करमान लागल लोकक बीच पंचैती शुरू भेल। पहिल पुरुष पंच----- अइ छौंड़ा-छौंड़ीकेँ तँ भकसी झोंका कए मारि दिअ। छोड़ू नै। इ प्रेमक नामपर सगरो समाजकेँ कलंकित केलक अछि। दोसर पुरुष पंच----- नै एकरा ऐ पड़ौआ छौंड़ासँ मुक्ति दिआ बिआहि दिऔ कोनो लुल्ह,नाङर,घेघाह वा कनाहसँ अपन कुकर्मक सजाए एतै भोगि लेत इ। मौगी पंच----ऐ उढ़री-ढ़ररीसँ कोन गामक लोक बिआह करत? एकरा तँ तरहड़ा खूनि गाड़ि दिऔ। एहि घोंघाउजक बीच छौंडीक कुहरल आवाज आएल----- हम अहाँ सभहँक पएर पकड़ै छी। हम उढ़री नै छी। हम एकरासँ प्रेम करै छी। हमरा जे चाही से सजाए दिअ। मुदा हमरा सभकेँ जिनगी दिअ। आ चोट्टे मुखिया जी छौड़ी माएकेँ बजा कहलखिन्ह------ लिअ एकरा झोंट पकड़ि लए जाउ आ बान्हि राखू। तखने सभ पंच समवेत स्वरे बाजल---- मुखिया जी अपने तँ परमेश्वर छिऐ तखन फेर एकर सजाए-----बास एतबे। मुखिया जी बजलाह--- नेतृत्वक काज छै जे जँ कतौ पसाही लागल देखए तँ ओहिमे पानि ढ़ारि दै नै की घी। 25 जिया जरए सगर राति अहा.....मूहँ तँ लगै जेना चाने हो आ आँखि तँ बुझू जे मृगनयनी सन। कने मूड़ी तँ उठाउ। एक बेर नजरि मिला कए तँ देखिऔ। आँ...... एहन झटका तँ बिजुरियोसँ नै लागल छल। कोनो बात नै बिआहक पछाति पहिल राति एहने संवेदनशील होइत छै। हे यै....की भेल। एना आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार किएक ? हमरासँ कोनो गलती भेल की। नै गलती तँ हमरासँ भेल जे अपन गलतीक सजा अहाँकेँ दए देलहुँ। केहन गलती आ केहन सजाए ? किशोरी होइतहिं हम यौवनक मधुमासमे डुब्बी लगेबाक सोचि उतरए लगलहुँ। अमीरीमे पोसाइत, जुआनीकेँ पबिते मोन बान्ह-सिकड़ीकेँ तोड़ि बहार हेबाक लेल औनाए लागल छल। हम कइए की सकैत छलहुँ। किशोर वयमे भटकबाक एकमात्र कारण छल- ई भरल-पुरल देह जे जौबनकेँ चरम पर जा टिकल छल। जकरा अमीरी आ जुआनीकेँ बीचसँ निकलल संक्रमण घेर लेलक। बिआहो तँ अहाँ संग वएह सभ करेलक जे हमर बाँचल संपतिक पहिल उपभोग केने छल। हमर माए-बाप अपन बेटे जकाँ बुझि सभ सुख-सुविधासँ पूर्णछुट्टा छोडि देलनि। कारण जे माए-बापक एक मात्र संतान रही हम। यै, हम बड्ड उम्मेदसँ आजुक रातिक प्रतीक्षा करैत रही। हमरा सोंझा उपस्थित कएल गेल बहुत रास कथा स्थगित भए गेल छल। कारण छल हमर सोच-- जे हम शहरुआ छोंड़ीक लिव-इन-रिलेशनशिपकेँ फैसन वालीकेँ अपनासँ दूर राखए चाहैत छी। यौ, हमर बिआह भए गेल। हमर कुमारिक पद छुटि गेल। मुदा हम अहाँक जिनगी खराप नै करए चाहैत छी। हमर मौगी जाति असवी होइत अछि। मुदा किछु वर्ख पहिने लागल एड्सक बेमारी हमर जिनगीक सीमा देखा देलक अछि। सत्ये बेमारीक कोनो विश्वास नै, मुदा अहाँ एकटा रोगी मात्र नै अहाँ तँ चरित्रहीनसँ बेसी किछु नै देखाइ छी हमरा। जँ एतेक निष्ठावान छी जे अपन रोग हमरामे नै देखए चाहैत छी तँ अपन मूँह पर पोतल करिखासँ हमर मोन जिनगी स्याह किएक केलहुँ ? यौ, ऐ समाजक परंपरा निमाहैत लोक-लाज आ अपन रक्षार्थ पुरुषक गात लागब आवश्यक बुझलहुँ। बस। बाहर रौदक धाह देखाएल। मुदा मोनमे अन्हारे-अन्हार पसरि गेल छल। उजासक बाट सेहो अन्हराएल। 26 साढ़े एकैसम सदी हेलो..... हाय। की हाल छै ? फाइन। ई कोनो एबाक समय छै। डेढ़ घंटा लेटसँ । खिसिया किए गेलहुँ। रस्तामे सौरभ भेटि गेल। सटि गेल हमरासँ । कहू हब भागि जैतहुँ । केहन एक्सपिरिएन्स गेन करैत ओ। मुदा अहूँ तँ समय पर नहिए आएल हएब। हँ रियाकेँ गोल्डेन पार्कमे तते ने मोन लगै छै जे घेंटा-जोड़ी कए लेने छल। छोड़िते नै छल। जखन रियासँ एते घेंटा-जोड़ी अछि तखन हमर कोन काज ? अहाँसँ नीक सौरभे जे हमर बाट जोहैए। ओ नामरद अछि की जे अहीं टाक बाट जोहैए। हम जाइ छी। कत' सौरभ लग। कथी लेल। इन्ज्याय करबा लेल।३ हेलो जुगनू कत' छी। बुढ़बा गाइड लग। की करै छी। हर्षक संग छलौहें की। आब फ्री छी। आबि जाउ हमरा लग। कतए छी अहाँ ? डीयर पार्कमे। आबै छी। तँ करू प्रतीक्षा जुगनू केर हम चलै छी। खिसिआइ छि किए। आब की केकरो पर आश्रित छै। एक जँ केलक मना तँ दोसर तैयार छै। आब बिआह तँ केकरोसँ कतौ क' लैए। मुदा भोगैए केओ, कतौ केकरो दोसराकेँ। पहिने प्रथा चल घर बदलबाकेँ मुदा आब तँ घरवला बदलबाक परंपरा छै। विदेह अंक-७८मे प्रकाशित 27 भूख सतबरतीक मोहर अपना उपर लगेबाक लेल नै जानि कतेको सासु आ माएकेँ आरोपित केलक। एतेक धरि जे कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरा पर शंका तँ भरि गौंआ करै मुदा ओहि मौगीक छुटल मूँहक सोंझा सभ अपन-अपन मूँह बन्द राखए। असलमे ओकर घरबला सेनाक नौकरीमे छल। छुट्टीक कमी। ताहि पर ओ मौगी गजबकेँ सुन्दर रहै। तँए ओ गामे नै अनगौंआक नजरिमे आबि गेल रहै। एक दिन गाम भरिक मौगी सभ ओकरा बैसार क' क' कूब ज्ञान देलक। ओ मौगी खूब आक्रोशित स्वरें बाजल---ऐ गामक कोन घरक बेटी-पुतोहु हाट-बजार आ मेला ज क' नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ कहियो अपन घरसँ बहरा क' दूरो पर नै जाइ छी। आब केओ पाहुन-परक एतै तँ हम ओकरा कोना क' भगा देबै। यै कनियाँ, नै बरदास भेल तँए मूहँ खोलै छी। पाहुन-परककेँ नै भगा देबै मुदा ओकरा संग करै बला रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकै छी ने। देखिऔ सभहँक बेटी-पुतोहु अपन सासु-माए केर संग जा कतौ घुमैए आ फेर चलि अबैए। केकरो किछु भेलैए आइ धरि। अहाँ तँ घरेमे रहि पेट क' लेलहुँ अछि। घरबला जे अगिला मासमे आएत तकरे लेल ई रखने छिऐ ई अनजनुआ चिलका। बुझा ने देथुन्ह ईएह सभ। हम तँ फोन पर फोन कए हारि गेलहुँ। नौकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जबानी की धराउ राखल छैओ तँ आबि घुरि जेतै फेर दिया-बातीमे एबाक बचन द' क'। ऐ बीचमे हमरा जखन मोन हएत संग रहबाक तकर कोन बाट हेतै। अहिना कुहरि क' मरबै की आ कि एकरा शांतिक लेल दोसर बाट तकबै हम। भूख लगला पर भोजन चाही खाली बचन नै। आ सभा खत्म भ' गेल छल। ४ अब्दुर रज्जाक २ टा बिहैन कथा १ समीम संग सगीराके निकाहके भs गेल अछि ४ बर्ष। "अल्लाहक भेद अपरम्पार अछि -कहैत सगीरा बाजल, "सुनली कहाँदन मोहम्मदपुरबाली दीदीके फेर सs महिनबारी रूइक गेल है " समीमक नयन सगिराक नयनमें अपनाके देखैत बाजल/ " ह, त निक नहीं हेतैय की पांचम बेर कही बेटिए भेलै त खाली बेटिए बेटिए रहतै" " ह ,त निक नहींए हेतै की सहीमें ? हे, ओकर बेटियों अल्लाह हमरे कोखमें किया नहीं धदैय। हमरो कहित अम्मी गे अम्मी अब्बू कहिया अरबसs औतई हमरा लेल खजूर आ बुर्का लक " " है ,बताही जा जा कथीसब बकs लगली पहिने बेटीयो भेल त् नहिए ताले बेटीएके मोनक बिचार बकs लगली ,बेटियों होब त दियौ " "सब बात सुईंन लेली हमरा त बुझाइलसे अहा अखन फेसबुकिया बनल छि आ हमरा बातके ओतेह ध्यान नहीं दsक सुईंन रहल छि खाली फेसबुक पs छौरी सबहक आ पार्टी सबहक़ फोटो सोटो प ध्यान रखने रहैछि" "हम दुनु तिनु काज एकैबेरमें करैछि से अहाके नहीं जानल हबसे अहा जोरे बत्कहो आ निसंतानक लेल कोनो चमत्कारी बला दबाईके प्रचारों हेरैत रहैछि" "धर मरदबो सबके बात नहीं बूइझ पाबैछि , लोक अखन रंग रंग के दबाई कराब डाक्टर ल जाइए झुठे फुसेके फेसबुक प कहादन दबाई मिलतै" २ हनीफ आ खदिजाक निकाह के एक दसक पूरा भगेल अछि । दिन राईत पसिना आ इमन्दारी सदुपयोग सs रुखी -सुखी भs नित्य क दिनचर्या अल्लाह क मर्जी सँ बीत रहल अछि। गरीबी संग जिनगी कs भाग दौड़ बड्ड कठिन होइतो, संग रहला सँ हर्षित अछि दुनु प्राणी । साँझक पहर घरमे हनीफ किछ एम्हर ओम्हर टर्च बाइरक' देख रहल अछि। हनीफ किछ हेरैत मुडमें कहलेंन -" कहलिय, सुनै छी अपन टचबला मोबाइल खम्हाबला खोधलीएमें धैल छल से नहीं देखरहल छी ?" खदिज़ा माथ पs ओढ़नीके मिलाबैत -" हँ , मोबाइलके कोन काज अछि सब लग त' मोबाइल अछिए। ताहूमें ओकर बैट्री त साफ़ साफ़ नहीं काज करहल अछि ?" -"ओहे त साफ़ साफ़ बैट्री नहीं काज करहल छलै ओहि स' ओई में बट्री लगाब लेल हेर रहल छि " -" मर कोन जरुरी भsगेल छेलै से ओकरा बट्री फेरबाक लेल ?" -" जरुरी अछि भs गेल कहूँन' कहाँ अछि से ?" -" ओकरा त बट्री ओ फेराक ठीक करालेने अछि हमरा नहिरामें । भाई जी आइल रहथिनसे उनके दs देलिएन ,कहादंन कनियाँ के मोबाइल पानिमें गिर कs बिगैर गेल गेलै ओहीले उनका दिक्कत छलहा। -" ओना हमहू अपने बहिनके देबलेल सोचने छ्लौ मुदा बिग्रल देबै लेल कनि संकोच छल निके कैलौ से भने नैहर भेज देलीए अहि बहने ओकरा लेल नयाँ किन क भेज देबै। " -"नयाँ ल'क ओ की करता खाली उनका बाते करबाक लेल चाही त भाई जी एकटा पुरान मोबाइल देने अछि हमरा से भेज देबैय त नहीं हेतै से ?" -" जा ,म हमरा बहिन लेल पुरान अछि घरमें नैहर लेल टच बला भेजा गेल त कम स कम पूछोआछी नहीं " लोहछैथ खदीज़ा कहलीं -" हमरा नैहर लेल त पुछबाक छल मुदा अहाँक बहिन लेल किछो कोनो पुछबाक केकरो बेगरता नहीं अछि ,कहाँदन महिलो अधिकार अछि अखन मधेशी महीलाक लेल नयाँ अधूरा संबिधानमें।" -" कानून में भs गेल अछि मुदा जखन बड़ा बड़ा पार्टीमें महिला नेत्रि सब तैतीसो प्रतिशत अधिकार युक्त नहीं अछि त सामाजिक व्य्ह्बारक में कहाँदन पचास प्रतिशत कतs सँ ? " ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.१.प्रयास प्रेमीक किछु कविता २.अब्दुर रज्जाक- कता आ गजल ३.२.राम सोगारथ यादव- किछु कविता, गीत आ गजल ३.३.१.प्रयास प्रेमी- किछु गजल २.दिनेश रसिया- गजल ३. नारायण मधुशाला- गीत ४.अशरफ राईन- गजल ३.४.१.संतोष कुमार झा- सुजनी शिल्प २. आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल ३. जगदानन्द झा "मनु"- भक्ति गजल आ कविता ४. ज्योति चौधरी- हम छी क्षोभित १.प्रयास प्रेमीक किछु कविता २.अब्दुर रज्जाक- कता आ गजल १ प्रयास प्रेमीक किछु कविता १.हमर गुडिया रानी ------------------------ अंगनाके हमर गुडिया रानी आइ भ'रहल विदाई छै ! माएके करेजा फाटल नयना नीर बहाई छै !! रहैत ओकरा हमर अंगनामे हरदम चाँन चकोर रहैय ! साँझ बिहान हरदम ओ बाबु माएके कहल करैय !! बेटा बेटीमे नै कोनो अन्तर त' किए बेटिये होएत पराई छै ! बेटी माए बापके आशिर्वाद मांगैय बेटा धन लेल करैत लडाई छै !! सुनैत समाद बेटी दौरैत चलि आवैय छै ! माए बापके दु:ख नै बुझै बेटा डिस्कोमे धन बहावैय छै !! आँखीके सामनें मे बेटी भ'जाएत छै सियानी ! थारीमे भात दैय छै लोटामे भरिके पानि !! देख कऽ बेटीके चाँनसन चेहरा माए बापके रहल नहीं जाइ छै ! अंगनाके हमर गुडिया रानी आइ भ'रहल विदाई छै !! २.शादी भ'गेल -------------------- नयनक' चौपारि पऽ प्रेमक' बैसार भेल किछु बजबो नें केलु हम तै सँ पहिनें दिलक' फैसला भ'गेल नै किनको सम्बोधन नहिं कोनो वादप्रतिवाद स्नेहक' कलम सँ उपस्थिति लिखा गेल प्रस्तावक' कार्यनयन उ तेजी सँ शुरु भेल अन्त्यमे काजक' स्वरुप ओकरा किओ दोसरके संगमे, हमर रेखाके संगमे शादी भ'गेल ! ३.भाइ बहिनके खुन चुइस चुइस ----------------------------------------- वसन्तक' बहार एलै रंगक' त्योहार फगुवा गेलै ! मनमे अनेको सवाल उब्जैय छै आँइखक' आगा उदासी किए ? कोनाके कही हम जे होली नै मनेलौं मातृभुमि पऽ रंग अबिरके वर्षा भेवें केलै ! कोना कही हम होली मनेंलौं अपनें माँ बहिनके उजर नुवां पहिरें पडलैय !! कोना करि देशक' हृदयके अवलोकन आँइख सँ अपनेमनेए नोर खसऽ लागैय छै ! पडोसियाके दोष लगेनाइ अनुचित छै जखन अपनें भाइ गद्दार बनल छै !! कहैय छलैं अहीबेर नै त' कहियो नहिं देखूँ सब भेलैय बुढिया फुइस ! अखन ढिढ़ फुलाके वैसल छै भाइ बहिनके खुन चुइस चुइस !! ४.असगर भेलियै --------------------- दोस्त सब दोस्तीयारी करैय छै ! प्रकृती आ जीनगी गद्दारी करैय छै !! बाधा आ अडचन संग लडि रहल छी ! समयके पाँछा दोडि रहल छी !! भुख पियास सब किछके तियागी ! बनलौं हम जीनगीके अनुरागी !! जीनगीके बाट कटैत नहिं कटैय छै ! हर डेग पs दु:ख आ दर्द भेटैय छै !! दु:ख, दर्दके संग दोस्ती केलियै ! सब संग बिछैडके असगर भेलियै !! ५.प्रेम बिमारी ----------------- अइछ गोर वदन अहाँके संगे आउर केश कारी ! देखि कऽ पुनम चेहरा हम भ'गेल छी बिमारी !! अहाँ मन मोहिनी, मृग नयनी किए करै छी एना ! अहीं लऽ प्रेम पिज़डामे बन्द भेल यौ देखूँ यी मेना !! मधुरस अइछ भरल अहाँके गुलाबी ठोरमे ! होएत रहैय ये अहाँके चर्चा नगर चारू ओरमे !! मिठ-मिठ बोली बाजिके अहाँ हमरा फसा लेलियै ! दिल लऽके हमरा किए पिज़डामे बन्द केलियै !! उडऽ चाहैय छी हम खुला गग़नमे प्रिय खोलूँ केबार ! घुमिके आयब फेर हम करऽ लेल अहाँ संग प्यार !! कतेक दिन बन्द कऽके राखब हे प्रिय दुलारी ! अहाँ संगमे नेह लगाके हम भ'गेल छी बिमारी !! ६.हमर जान अहाँ के जान मे ----------------------------------- नयन अछि बेचैन मोन पियासल ! जेहो लगमे छेल ओहो दूर भागल !! खोजैय छी त' भेटैय ये सुखल नदी नाला ! अहिंके याद करिके हम जपैय छी प्रेमक' माला !! दिन अनहार लागैय यें कहूँ आब हम की करि ! अहाँ बिनू हम आब अही कहूँ जीबि की मरि !! अहाँ रहीं त' इजोत रहैय सगरो घर अंगना मे ! अहाँ के सुन्दर रुप अगाडी दाग बुझाई छेल चाँन मे !! कतs चलि गेलौं प्रिय ? हम खोजैय छी खेत खरिहान मे ! घुइम के चलि आउ प्रिय अइछ हमर जान अहाँ के जान मे !! ७.तडपब हमर प्रेम ल' ----------------------------- प्रित लगेलौं अहाँ सँ हम सब संग नाता तोइर के ! अहाँ किए भेलौं दोसर के हमरा सँ मूह् मोइर के !! अहाँके हम पुजैत रहिं दिलके फूल लोहिर के ! हमरा भिखारी बना देलौं नसिब हमर फोइर के !! कुन जन्म के बदला लेलौं हमर दिल तोइर के ! दिल मे बनेलौं घाँह अहाँ ऊ नैं छुटै छै किछो कईर के !! यौ पछिता रहल छी हम अहाँ संग पाछा पइर के ! दुनियाँ अनहार भ'गेल हम जीबि कोना की कईर के !! यौ कहियो खुश नहिं रहब हमरा सँ अहाँ बिछैर के ! तडपब हमर प्रेम ल' अहाँ हम कहैय छी हल्ला कईर के !! ८.कोरियाहा बरद ---------------------- हाथमे छै ज्ञेनिहाँ लाठी दुवार पऽ गाडल हरोठा बाँसके मेह ! दूइटा पाख घुमल से दुखावे लागल कोरियाहा बरदके देह !! झारन दैय बखत सब स पहिनें खोह बनाके खाए आहार ! दाउनी केनिहारके परेशान कऽदेल फेकैत फेकैत साहार !! खोह तोडैत देखि कऽ गिरहतबा जूनाँ स' देलक मुहँ बान्ही ! हाँकैत दाउनी एके डेगमे गिरावे लागल मुहँसे लेर, पोटा, पानी !! यी दाउनी खोलैत सबसे पाँछा आहार खाए खातिर रहैय ये ! एकरा पिठ पऽ पडैत ज्ञेनिहाँ लाठीके चोट यी लंक ल'के भागैय ये !! ९.नहिहरके मान, सासुरके सम्मान आ साजनके प्राण ---------------------------------------------------------------- यी रिस्ता केहेन अछि जे छोडऽ परैय ये नहिहरके संसार ! चुटकी भर सेनुर सँ अपन होएत अछि दोसरके संसार !! भाइ बाप विदाई करैत कुलके मान रखियह बेटी कहैय ये ! जाएत ससुराल सास ससुर पुत्रबधुके आशिर्वाद दैय ये !! संग लाविते हमरा हमर साजनसे जे रहल नहिं जाइ ये ! सुहाग राति कोहबर घरमे हमरा सँ की बात करैय ये !! अहाँके मधुर मुस्कान देखिते हमर मन डोलि गेल ! अहाँके आविते प्रिय अंगना दुवार सिगरो इजोत भ'गेल !! की जाँदु अइछ अहाँमे जे सगरो समाज करैय ये गुणगान ! आब त अही अछि हमर सुखचाइन प्रिय अही अछि प्राण !! कृष्ण पक्षके पुनम राति अहाँ आविते संग ल'के एलौं ! जन्म देनिहार माँ बापके छोडिके अहाँ हमर भ'गेलौं !! १०. फुलवारीमे एक फूल रहैय ------------------------------------- फुलवारीमे एक फूल रहैय खलखल हँसैत दुतियाँके चाँन जकाँ जीनगीमे इजोत हेत से सपना देखलूँ पुनमके राइत जकाँ ! ओ फूल इशारा केलक हम ससैरके लगमे गेलूँ फेर ऊ हमरा सँ कहलक हमरा तोइरके ल'चलूँ हम पुछलियै किए ? ओ मुश्कुरा कऽ बोलऽल अहाँके पिड हमरा पसंद अछि हम कहलियै होतै ! किछ दिनके वाद फूलक' लेल बात करऽ हम माली लऽ जाइत रहिं किछु दूरें स' नजर पडल फुलवारी उजरल जकाँ दोसर फूल सँ पुछली ओ कहलक हमरा सँ ऊ फूल दोसरके पिड पऽ चढिगेल १० दिन अगाडी किओ दोसर तोइर ल'गेल ! सुनिते हमर सुरुज पऽ करिया बादल लाइग गेल मुसलधार बर्षा बर्सल नयनके धारमे बाइढ चलि एल बचल-खुचल सब भाइंस गेल रुकल बर्षा त' सबके नजरमें यी "प्रयास" असगर रहि गेल ! ११.धोती ------------ धोती भगवानके पहिरन अछि मिथिलाके शान ! नित दिन पुजा कर जाइ पहिर धोती जज़मान !! धोतीके महत्व अछि बड्ड मिथिलामे चारु ओर ! दुल्हा, दुल्हिन माथ पऽ ल'के करऽ जाइ छै मटकोर !! सबकिओ मिल करियौं धोतीके सम्मान ! बियाहमें धोती पहिरके होएत अछि सेनुर दान !! मिथिलाके सदियो सँ धोती अछि आन ! सब किओ पहिर धोती बढाऊ मिथिलाके शान !! अपन मिथिला पऽ अछि हमरा गुमान ! दुई हाथ जोडि सबकें "प्रयास" करैय ये प्रणाम !! १२.हुनकें ---------- भुख पियास सब हेराए गेल हुनकें के खोजी करैत ! पायर पिरा गेल जीनगीके डगहर चलैत चलैत !! हुनकर डेरा अछि कतऽ से जाइ छी सबकिओ के पुछैत ! नितदिन ओकरें पुजै छी भोरेंभोर सुरूज उगैत !! यौं बतीस बसन्त बीत गेल हुनकें बाट तकैत ! मठ-मन्दिर घुमैय छी हम हुनकर नाम जपैत !! अछि सबहक मालिक ओ , छै तीनों आँइख सँ देखैत ! सब काल कष्ट दूर भागैय छै हुनकर नाम लैत !! आब साँझ बिहान कटैय हमर हुनकें नाम लैत ! यौं अहूँ हुनका मनमें बैसाबूँ सब दु:ख हरिलेत !! १३.हमर दिल अहींके याद करैय ये -------------------------------------------- नीत दिन अहाँके यादमे नयन हमर मोती बर्षावैय यें ! यौं अहाँ परदेसीके एकोरति नैं हमर याद आवैय ये !! ननद हरदम झघरा करऽ लेल दाउपेच खोजैय ये ! सासु हरदम गारि पढैय छै आ कूलक्षिणी कहैय ये !! यौं बौवाके अनमनामें जलखैयमे बेर भ'जाए छै कि ! ससुर दिअर दुनूँ मिलिके हमरा पऽ जुवाली सुर्रैय ये !! आब जि पिता गेल यी जीनगीसे, मन होइ छै डुबि मरी ! की करि बौवाके रुप, अहाँके स्नेह संग नहिं छोडैय ये !! जुनि रहूँ विदेश प्रिय अहाँ छोडि आबूँ अपन गाम यौं ! यौ घरबामें सजनी अहाँके अहाँ बेगर दु:ख काटैय ये !! करियौ नहिं देरी साजन कहीं भ'जेत अबेर यौं ! हरदम हरक्षण हमर दिल अहींके याद करैय ये !! १४.जीनगीके मेला ------------------------- यी जीनगीके मेला सँ की ल'के जेवैय छोडि दियौं किछ अहिठाम अमर अजर भ'जेवैय ! बड्ड नमहर यी मेला फेर नहिं आब पेब दोसरके पाछा नैं लागू कहिं कतौं हराजेब ! देखूँ मेलामें छै कतेग रंग बिरंगके मिठाई किओ अपनें ढिर भरैय छै किओ दोसरके खिलाई ! कहिं मेलाके रम-झममे अहाँ अपनो नें बिसैएर जायब दुनियाँके पाछा पडिके अहाँ जितें मुर्दा भऽजायब ! अहिठाम सब अवसरवादी छै दोसरके पसिनाके कमाई खाए छै अपन पेट भरैयके लेल दोसरके आहार छिनैय छै ! अहिठाम दारु पिबिके सब किओ सिसि फोडिके फेक्नें ये अहाँके दोषी बनावके लेल कुकर्मके जाल बिछौनें ये ! यी मनुखक' जीनगी अछि उजरा सफेद रंगके चादर दाग लाग से बचाबूँ एकरा सदैव करू एकर आदर ! नहिं एलौं किछु ल'के नहिं जायब किछु ल'के रोपू शान्ति, सतविचारके बिहैन रहब सदा अमर अजर भऽके ! १५.चेतनाके दिप जलाबूँ ------------------------------ मिथिला गगन खाली छै आहाँ तारा बनिके आबूँ ! चमचम चमकैत आहाँ हमरा दिल सँ सजाबूँ !! सब मेघ, कुभेसके आहाँ कात लगाके आबूँ ! भोरक' सुरूजक' लाली सँ अहाँ हमरा सजाबूँ !! मुर्झाएल यी गाछमें अहाँ खाँध पाइन लगाबूँ ! फेर स' रंग बिरंके फूल अहाँ फुलाबूँ !! यी रेगिस्तान सनके भुमी पऽ अहाँ प्रेम रस बर्षाबूँ ! मिथिलामेमें लागल मैलकें अहाँ दिल सँ पखारू !! ईर्श्या विभेदके तियागी सदभावके गीत गाबूँ ! घर-घर में जाइके अहाँ चेतनाके दिप जलाबूँ !! १६.जीवन हमर उद्धार करू ---------------------------------- हमर नयनमे अपन नयन मिलाके देखूँ अपन मनके दिया जला के देखूँ हम अहींके लेल बनल छी हम अहींके राहमे बैसल छी ! पल अनमोल सब बितल जाइ अहाँ बेगर हमर मन घबराइ हम त' ओकरा अपन देवता बुझै छी तहियो हमरासे किए ऊ रुसल आइ ! मांग हमर पुरा खाली छै ओठके सुखिगेल लाली छै आबू सजना आसन करू हमर दिलके आसन अहीं लेल खाली छै ! समय देखूँ बितल जाइ छै हमर मोनक' आशा पुरा करू लाल सेनुर सँ' हमर मांग रंगिके जीवन हमर उद्धार करू ! १७.हमर जीनगी लुटि ल'गेल ---------------------------------- आशक' डोर टुटि गेल , मनके मित छुटि गेल , सीनेहक' नोरके वर्षा शुरू भेल , लागल मेघ भादो आविगेल ! तन भिजल पुरा मन भिजल , डबरा सबरा सब भरिगेल , हमरे आँखिके सामनहिंमे , हमर अपनें जीनगी भसिया गेल ! घट-घट बाईढक' पाइन पिलूँ , जाँनमे साँस रहिते लास भेलूँ , नै लोक जुटल नै शंख घरिघण्ट बजल , हमर आँखिके सामनें हमर जीनगीके लहास उठिगेल ! हमरा आपन प्रेमक' जालमे फसा कें , खेललक' हमरा संग धोखेवाजीके खेल , जब हमर हाथ खली भेल देखलक' तऽ ओ , दोसरके हाथ पकडी हमरा छोडी गेल ! जे सोचनों नें रहि कहियो हमें , कोना सब बर्वाद भ'गेल , हमरे आँखिके सामनें मे , हमर जीनगी लुटी लगेल! १८.मिथिलाके लेल लडिते रहवैय --------------------------------------- ससरैत चलूँ गजरैत चलूँ अत्याचारी सबके संग लडैत चलूँ ! जकरल कूभेसके फायर देवैय सान सँ मिथिलाके झण्डा गायड देवैय !! सुतलके निन्द स' जगावें चलूँ भटकलके रसता पऽ लावेय चलूँ ! जब सबकिओ एक साथ हेवैय तखनें स्वतन्त्र मिथिला राज पेवैय !! मन भीतरके अज्ञानके बहारैत चलूँ अधिकारके डिबिया बारैत चलूँ ! देखूँ सबकिओके एकरंग पायर बढाबूँ सबकिओ एकसंग !! झाँएट बिहायर स' जुद्धि जेवैय दुश्मनके उपर टुइट पडवैय ! हत्या , हिंसाके दूर राखैत अपन अधिकारके लडाई लडवैय !! चोख शब्दके बाण छोडवैय निरंकुश सत्ताके भ्रम तोडवैय ! जबतक देहमे प्राण रहतैय मिथिलाके लेल लडिते रहवैय !! १९.उल्हा चुकाके खेल ---------------------------------- केहेन नेता चुन्लियै जें मधेशी जनता भुखें मरैय ये । मधेशी नेता ढिर फुलाकें सिंघेसरा जकाँ गर्जैय ये ।। मधेशी जनता भुखल काँनिरहल छै नेतासब दहमे हर्दा खेल खेलैय ये । जब मधेशी जनता सडक पऽ उतरल त' नेतासब हर्दा खेलमें सरेल बोलैय ये ।। जौं पहिनें जनताके कहल मानितौं तें आइ मधेशी जनता सडक पऽ नैं एतियै । मान सम्मानके साथ जीवन जीतियै आइ मधेशके नहिं एहेन स्थिति हेतीयै ।। सुन्दर सनकें अपन मिथिला मधेश आइ लडाईके करूक्षेत्र बनिगेल । केहेन नेता चुन्लियै जें खेलरहल ये उल्हा चुकाके खेल ।। २०.संगे रहब सेहें सही ---------------------------------- सब किछ सम्भव अइछ देर सही , खोजु भेटत मोतीके दाना कहिं न' कहिं । अपन माटी पानीके बिसैर अहाँ , ब्यर्थमे बौवाबी रहल छी जहिंतही । की भेटल ? वर्षो दिन रहिके विदेशमे , बिसैर गेलौं ऊ गोदी जहि पऽ खेलैत रहीं । मोन पारैय याद करैय ये हर बखत , रनें-बनें भटकैत यें अहाँके सीनेही । अहाँ चलि आबु अपन जन्मभुमि पऽ , दू पाय कम बेस मुदा संगे रहब सेहे सही । २१.संकल्प ---------------------------- मन बचन सँ संकल्प करू आब करबैय एहेटा काज । खुन पसिना चुवा देवैय लऽके रहवैय मिथिला राज ।। दुश्मनके उपर टुइट पडू हमसब वीर मैथिल सन्तान । अपन भुमिके रक्षा करू बचाबू अपन पहिचान ।। मिथिला अपन जन्मभुमि हमसब मैथिल छी हुनकर सन्तान । माँके चीर हरण नहि हुवेय दियौं चाहेय गमाव पडैय अपन जाँन ।। अटल रहब डटल रहब लै ल' अपन अधिकार । शस्त्र सँ सु-सज्जित भ'के चाहेय ओ कलम हो या तलवार ।। २२. ल'के रहत मधेश ------------------------------ चुपचाप छी त' यी नैं बुझू जे हम हाएर गेलूँ । मधेश पुत्रके आँखिमे देखूँ जागरुकताके दिया बाइर देलूँ ।। बड्ड दूरित केलौं सबटा सनेस असगरें ठुसलौं । जब झड़ लागल पेट त' पडोसी स' भेटैयके बहानें Metron खाएले गेलौं ।। छुटत नहिं यी पेटझरी आब Metron खाऊ आ आउर किछ । जे आगी लगेलौं मधेशमें ऊ धधकैत जायत अइछ अहीं दिस ।। आब केतबो नौटंकी कऽलियौं चाहें धरू बहुरूपीके भेष । मिथिला आब जागिगेल अइछ आब त' लऽके रहत मधेश ।। २३ . हे मां हंस वाहिनी ---------------------------------- हे मां हंस वाहिनी सरस्वती बारि दिअ सगरो अहाँ चेतनाके ज्योती ! अहाँके महिमा अछि अपरम्पार अहाँ लग अइछ ज्ञानक' भण्डार !! चार भुजा धारिनी हे मां शारदे शिक्षाके नैय्या हमर पार करि दे ! दू हाथमे अहाँ कमल आ पुस्तक लेनेय छी अहाँ दू हाथ से विणा बजावैय छी !! ताकू हे मां एकबेर नयन अपन खोली पानफूल प्रसादके संगमे हम द्वारमे एली ! अपन शिष अहाँके चरणमे नवावैय छी तनमन समर्पन क'के हम श्रीपञ्चमीके गाथा गावैय छी !! शिक्षा दान क'के हे मां शारदे करु भक्तके उद्धार हे माते ! हे हंस वाहिनी , विणा धारिनी भुजा अईछ चार शिक्षारुपी प्रसाद द'के हे मां करु प्रणाम हमर स्वीकार ! २४ बखान सजनीकें -------------------------------- रुप अहाँके पुनम चाँन नयन अहाँके मृगक' समान ! मुस्कान अहाँके दुतियाँके चाँन नाँच नाचै छी मौरणी सामान !! चाल चलैय छी नागिनके चाल उमेर अछि अहाँके सोलह् साल ! चौराह् पऽ बिछौनें छी प्रेमक' जाल जालमे फसाँके करैय छी बवाल !! पायरके पायल बजैय ये छन-छन बढें लागल हमर दिलके धड़कन ! हाथमे अहाँके हरिहर चुरि लगावैय ये हमर गर्दन छुरी !! गाल अहाँके टमाटर सन लाल ठोर अहाँके गुलावी लाल ! दाँत चम्कैय ये मोती सन केश अइछ अहाँके वृन्दावन !! जखिनें केलौं अहाँ आँखि स' इशारा फँसि गेल यी "प्रयास" विचारा ! सुनु यौं संगी साथी सारा कहिनतियो लगाबू हमरा अररा !! २५ . राइतक' सपना --------------------------- पायलक' धुन बाजैय रुनझुन ! नाकके नथुनियां घुमावैय पुरा दुनियां !! कसल-कसल गोर वदन महकेलक' हमर मन ! नैनक' पिरछी नजर पढलक' मोहनी मन्तर !! मन नहिं आब हमर काबू ससैरके कनि लग आबु ! मन जतन स' रैचके नव कनियाँ जकाँ सैजके !! बाजिके मिठ मधुर बोली दिल पऽ चलावैय छी प्रेमक' गोली ! ठोरक' लाली चम्कैय चम-चम बजावेत छी चुरी खन-खन !! कुन जादु, गुण छै यी नारीमे लागैय छै सुन्दर सोलह् सिंगारसंग सारीमे ! रुप छै एकर बड्ड अनमोल पहिरनें छै कानमें कानवाली गोल !! बाजब नहिं किछ हम मजबुर छी मस्त निन्दमे हम चुर छी ! यी हम लिखलूँ डेरा जाइत खिन देखलूँ यी सपना हम राइत खिन !! २६. तब बनत पहिचान ---------------------------------- पाइनक' बीना फुलवारी जैएर रहल छै ! फूलक' लेल सखी सहेली झगैर रहल छै !! मालीसब पोखैरमें हर्दा खेलरहल छै ! किओ धत्ता पऽ त' किओ पानीमें उछैलरहल छै !! कतेक सखी सहेली चौकीदारक' सिकार भेल ! कतेक त' फुललारीमे फूलक' लेल विलिन भ'गेल !! जेहो माली पऽ विश्वास केलूँ वोहो स्वार्थी भ'गेल ! वर्षो बितल फूल बेगर फुलवारी बाँझ रहिगेल !! छोडब नहिं फुलवारीमें सँ अपन बखरा लेब आब ! मल-जल द'के फुलायब फूल चम्पा,चमेली,गुलाब !! नहिं जायब दोसरके फुलवारीमें अपनें फुलवारी सजायब ! अपन पसंदके फूलक' गाछ अपन फुलवारीमे लगायब !! तब देखव अपन फुलवारीमे हायत नवका भोर ! कोइली मधुर गीत गुनगुनायत हायत चाहूँओर शोर !! तब फुलवारीके पडोसियों करत गुणगान ! जब बनायब अलग फुलवारी तब बनत पहिचान !! २७ .कुन गल्ती भेल हमरा स' ---------------------------------- यौ कुन गल्ती भेल हमरा स' जे एहेन साजा देलौं । हमर दिलक' खुनसे अहाँ अप्पन हाथ रंगेलौं ।। मठ मंदिरके वादा कसम अहाँ सब तोडि देलौं । दिल पऽ पाथर राखिके हमर प्रेमके लतिएलौं ।। यौ कतेक सपनासब हम अहाँ पऽ सजेनें छेलौं । अहाँ दोसरके भऽ हमर सब सपना चुर केलौं ।। केहेन कठोर भेलौ अहाँ एना हमरा भुला देलौं । अहाँके देल चोट स' हम जीविते लहास भ'गेलौं ।। हमर जीनगी स' अहाँ किए दुर भागि चलि गेलौं । किए दोसरके सेनुर सँ अप्पन सितके सजेलौं ।। २८. लाल सलाम ---------------------------------- अपन बीरता देखाके गेल मधेशीके निन्द सँ जगाके गेल ! हे शहिद मधेशक' बीर सन्तान करैय छी अहाँके हम लाल सलाम !! अहाँके सपना साकार करऽ सीनामे क्रान्तिके ज्वाला धधैक गेल ! दुश्मनके आब नहिंए छोडब लडैत रहब अपन मातृभुमिके लेल !! रे खस बाहुनवादी शाषक पहाडी एक मधेशी पडतौ सय पऽ भारी ! देख नजर सँ मधेश दिस देख खुलि गेलौ मधेशक' क्रान्तिके केवाडी !! बेर-बेर धोखा देल्ही मधेशके तूसब लुटैत एल्ही मधेशक' खेत खरिहान ! आब मेची सँ माहाकाली तक क्रान्ति करऽ निकली गेल छौ मधेशक' तीर कमान !! जबतक अपन भुमि नै भेटतैय तावेतक नै हेतैय मधेशीके पुरा अरमान ! हे शहिद मधेशक' बीर सन्तान करैय छी अहाँके हम लाल सलाम !! २९. नटखट कृष्ण कनहैया ---------------------------------- मथुरा कारागारमे जन्म लैत सब द्वारपाल सुतिगेल ! पिताके हाथ पायरके जंजीर खुलऽल सब गेटक' केवाड खुलीगेल ! राखिते पायर यमुनामे बसुदेव मुसलधार बारिस शुरू भेल ! भाई लक्ष्मण शेषनाग बनि रक्षा केलक यमुना प्रभुके चरण स्पर्स कऽके गेल ! भेल जन्म पुत्रीके नन्द घरमे माई यसोधा मुर्क्षित भ'गेल ! अपन पुत्र नन्दके दऽके बासुदेव अपन संग हुनकर पुत्रीके लऽके गेल ! भेल जन्म बच्चाके सुनिते कंस दौरिते कारागारमे गेल ! बद्ध करैयके बेरमे बच्चा हाथ सँ छुटिके आकाशमे उडिगेल ! देलक आकाशवाणी कंसके आब अहाँके अत्याचार बहुत भ'गेल ! तोरा मारैयवाला बीर पुरुषके पृथ्वी पऽ जन्म भ'गेल ! नन्द घरमे पुत्रके जन्म भेल सुनिके गौकुलमे खुशीके वर्षात भ'गेल ! बालकके देख आयल ग्वालिनसब हुन्का देखिके देखिते रहिगेल ! कान्हाके मारैय लेल कंसद्वारा कतेक दानव गौकुल पठायल गेल ! कतबो झाँट बिहाएर हावा चलऽल मुदा कनँहैया हँसैतके हँसिते रहिगेल ! अन्तमे कंसके बहिन पुतना रुप बदलिके स्वंम ऐल ! बालक कान्हाके छाती सऽ लगाके आकाश मार्गमे लऽके चलिगेल ! प्रभु हुन्का देखिते चिन्हिगेल पिवैत पुतनाके छाती सँ दुदक' संग पुतनाके प्राण सहित पिगेल ! ग्लालबाल संग गेन्द खेलऽ कान्हा यमुनाके तटपर गेल ! तेहेन जोर सँ गेन्द फेकलक कान्हा गेन्द जाएके यमुनामे गिरिगेल ! मित्रके वचनपर कान्हा यमुनामे कुदिगेल ! गौकुलमे सुनिते खबर यी माँ यसोधा बेहोस भ'गेल ! किछिये देरमे नाग नाथिके कान्हा नागके फेंपपर नाँचैत उपर एल ! देखिके कान्हाके नाँच देव लोक सँ फूलक' वर्षा भेल ! अन्त घरि जब आयल कंसके कृष्ण बलरामके बोलाके मथुरा ल'गेल ! मथुरामे मामा आ भान्जाके संगमे माहायुद्ध शुरू भेल ! कतेक दानवसब मरल बलरामके हाथ सँ हाथी मरिगेल ! अन्त्यमे कंसके मृत्युके समय एल कान्हा फाँनिके कंसके छातीपर चढिगेल ! तेहेन मुक्का मारलक छातीपर प्रभु छणमे कंसके प्राण छुटिगेल ! ३०. एलैय मिथिलामे पावैन चौठीचाँन ----------------------------------------------- एलैय मिथिलामे पावैन चौठीचाँन घर-घरमे पकतैं खिरपुरी पकवान ! भरि डाली चढेतैय फल-फूल धूपदानीमे जरेतैय सरऽर गूल ! छाँछीसंग कौरनामें दही चढेतैय लावनक' उपर दिप जरेतैय ! माए चौठीके हात उठेतैय बड्का भैया पैनढार करतैय ! मांगै माए चौठी सँ वरदान सदा सुखी रहें हमर जहान ! मिथिलामे एहो पावैन अछि माहान बैएठ चौका पऽ भोग लगावैय मरऽर जज़मान ! एलैय मिथिलामे पावैन चौठीचाँन घर-घरमे पकतैं खिरपुरी पकवान ! ३१. मधेशी जनता ---------------------------------- दु:खित यी मन हमर खोजीरहल चाँनचकोर छै ! ज्ञानक' दिपके ज्योति बेगर मधेशमे अन्हार चारूओर छै !! रसता चौबटिया पऽ भटैकरहल छी लsके हाथमे बिन फूलके डाला ! नजरमे नै किओ आबिरहल छै सत्तबाटके मार्गदर्शन कराबवाला !! बिना उदेश्य बयर्थे बौवाबीरहल छी जहि तहि सगरो चाहूँओर ! साँझ परल ईजोतक' दिया बुतायल फेर किल्ही हेत की नहिं हेत सरूजक' लिलीसंग भोर !! मध्य रातीमें चारूओर बिहाएर एलै अब त' हमरा निन्द नै भ'रहल छै एको छन ! घरक' खुट्टा हिललै छपर परके खर उडिगेलै देखिके यी, बिभोर भ'के कानिरहल छै हमर नयन !! कानैत-कानैत नोर सुखिगेल, कण्ठ बैएठ गेल तहियो झुठक' आशके जोरिमे लटकल छी ! मिलत की नै मिलत भिखमंगा गद्दार सबहक पाछाँ हमहूँसब टिन्हा बिटी लऽके हो हो क'रहल छी !! कतेक भाइबन्धु एकरें पिछाँ मिटगेल तहियो नें बन्द भेल अछि धोखाबाजिके खेल ! गद्दार सबके अही सऽ नै किछ फरक पडल बौवा-बुच्ची टुगर बनल, बहिनसबके सेनुर पुछागेल !! ३२. निहोरा अछि मैथिल जन सँ ---------------------------------------- निहोरा अछि मैथिल जन सँ करियौ संकल्प स्वच्छ मन सँ ! आब नै ल'के दहेज शादी करबैय , घरक' लक्ष्मी बेटीके बचेबैय !! बेटा खाट पऽ सुतल रहैय यें , बेटी घरकें सब काज बजबैय यें ! बेटी बापके माथक' पाग छी , कुलके फुलवारीके फूलक' बाग छी !! बेटी उपर नै करू अत्याचार , बेटियोके दियौ बेटाकें दुलार ! तब देखब अहाँके केहेन मान बढैय यें , बेटीये सें सबहक कुलके दिप जरैय यें !! बेटा-बेटी बिच नै करू दू-रित , बेटियोके जीवनमें बारु शिक्षाके दिप ! बेटियो बेटा नेहायत अभिमान जगायत , उच्च गग़नमे विमान चलायत !! बेटी घरके ईज्जत छी , बेटी अदभुत दौलत छी ! सबकिओ बेटीके सम्मान करू , दहेज नै लऽ, दऽके कन्यादान करू !! ३३.बड्ड अनमोल छेल ओ क्षण -------------------------------------- मिलन बिछोडक' बिचके क्षण , बहुत सुन्दर स्वर्गके सन ! जतवेए शुख ततवेए दु:ख , देखैय लेल हरदम चौकैय नयन !! मिठ-मिठ बात क्षणेंमे रुसनाई , एको क्षण नै नजर सऽ दुर जायले दैय ! जन्म-जन्म हम साथ निभायब , हँसि-हँसिके ओ वादा करैय !! मिलनके क्षण आमावसोके राति पुनम लागैय , जखनेंए तखनेंए चाँन चम-चम चम्कैय ! ओकर हँसिके देख सारा जग हँसैय , दाँत लागैय ओकर जेना मोती चम्कैय !! बड्ड अनमोल छेल ओ क्षण , कतबो करि कम अछि ओकर वर्णन ! दृढ विश्वासक' संग स्वच्छ छलै मन , हमारा पऽ समर्पण क'देलक ओ अपन जीवन !! ३४. सुत्तल निन्दमे सपना सपनाएत रहि ------------------------------------------------- सुत्तल निन्दमे सपना सपनाएत रहि ! प्रेमक' गीत हम गुनगुनाएत रहि !! अडहुल फूल सन लाल अहाँके ठोर ! नैनाके खिड्की सऽ मारै छी हुल्की भोरे भोर !! बोल बाजै छी मिठगर कोईलीके बोली ! दिलपर चलावै छी अहाँ प्रेमक' गोली !! नैन मट्का-मट्की आब कतेक दिन ! रहेय नै सकैय छी हम अहाँ सऽ एको छन भिन !! जखनें अहाँ केलियै सोलह् शृगार ! देखिते लागल हमरा प्रेमक' बोखार !! आब कोना हम काटब दिन ! अहाँ लेलौं हमर आँखिके निन्द छिन !! धड़कन बढलैय, करेजामे मारैय हिलोर ! टुटल निन्द खुलल आँखी भ'गेलैय भोर !! ३५. मायाजाल --------------------------------- पुनम चाँनकें चेहरा सुरूजक' लाली गाल । मजुरनी नाँच नचै छी उमर यें सोलह् साल ॥ नयनमें कारी कजरा ठोर अछि गुलाबी लाल । अहाँ पाजल बजबैत चलै छी नागिनकें चाल ॥ टनटन बजै छी अहाँ जेना बाजै ढोलक नाल । प्रेमक' छुरी चलाकें अहाँ हियाकें करै छी हलाल ॥ प्रेमक' दर्दसें तडैपकें सबकें भेल बुराहाल । सुन्दर रूप देखाकें अहाँ बुनै छी मायाजाल ॥ ३६. जीनगीके डगर ---------------------------------- जीनगीके डगर बड छोट बड नम्हर ! डेग डेग पऽ खुशी भेटै डेग डेग पऽ दु:खक' कहर ! मनमे खुशीके सपना सजाँके एलु अनकर देश प्रदेश ! सबटा सपना सपनें रहीगेल बनी बाईढ आयल दु:खक' क्लेस ! राईतमे आँखीमे निन्द नै हैयें दिनमे नैं छै कखिनो चैन ! शोक चिन्ताके भारी सऽ पुरा जीनगी बनल बेचैन ! सोचै छी कोनाके पार हेबै यी दु:ख सऽ भरल धार ! बिच रेतपऽ चैढ गेल छी नै जासकै छी ओही पार नैं अही पार ! ३७. अपन भुमिके लेल लडिते रहवैय --------------------------------------------- जनताके धकैएल देल्कैय धोखामें अपना बैसल छै सोफामें बाप बिन बेटा-बेटी भेलैय टुगर तेकर नुन खाएके नेता बनल छै सुगर ! कतेक धियाके सुहाग लुटा गेल कतेक माँके कोएख खाली भेल खुनेंखुन सँ मातृभुमि लतपत बनल मुदा गद्दार सबहक पेट खालिए रहिगेल ! चुप नै रहूँ चलू आब लड्वैय गद्दार सबहक पेट फोड्बैय बहुत वर्दास्त कsलेलौं आब कतेक दिन जरैत रहवै आब चलू सबकिओ सिना तानिकें हाथ हाथमें नुन बुकनी सानिके शासकके आँखीमे जाँके थोपी देवैय गर्दन भिराके मुडी छोपि लेवैय ! आब खुनक' हिसाब खुन सँ लेवैय दमन अत्याचार आब नै सहवैय जबतक देहमे प्राण रहतैय अपन भुमिके लेल लडिते रहवैय ! ३८. जीनगीके कथा ---------------------------------- अहाँ दिया हम बात्ती छी ! गाबिरहल जीनगीके प्राति छी !! जीनगीके इनार बड्ड अनमोल ! बिना उघैनके राखल छै दोल !! कोनाके भरि ज्ञानक' पानी ! व्यर्थे वितिरहल छै जीन्दगानी !! कथी कऽ उघैन लगाबी दोलमें ! दम फर- फरारहल छै कलियुगक' खोलमे !! थुना गेल छी मनुखक' जेलमें ! सफर कऽरहल छी बिना पटरी पऽके रेलमे !! हम कत' जारहल छी हमरा किछ नै पता ! एहे अछि हमर जीनगीके कथा !! ३९. मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? ---------------------------------------------------- बिहारी कहबे केलक अड्डागोडा छिनमें कोशिस सेहो केलक अखन घरमें घुइसकें बेटा पुतौहकें पिटलक मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? हस्पतालमें बेटा भर्ना यें खेतमें बिहैन बनल जर्ना यें अहाँ छी भुखल ठोर सुखल कि आई अहाँकें बर्ना यें ? मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? अखन मधेशी नेता ब्यस्त छै सोफा पऽ फेबिकल लगावमें बिना बिहैनकें खेत रोपऽमें मधेशी जनताकें भट्ठीमें झोकऽमें मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? निकलू सब मधेशी साथमें लsकें कचियां कुढारी हाथमें नै कैरकें भेदभाव जाईतमें नै सोचु आयल यी साईतमें दुश्मनकें गर्दन छोपे चलु दिन हुवें चाहे राईतमें मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? क्रान्ति आब करबे करबै दुश्मनकें आब नै छोड्बै आब नै चुपचाप रहबै अपन हिसाँ लऽकें छोड्बै मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? ४०. जरल कपार ---------------------------------- दु:ख दर्द सब छुपा कें हैंस कें बजबाक हमर अछि बानी । बतीस बसन्त बित गेल किओ नैं बुझलक हमर जीनगानी ॥ नोरें नोर कें धार में हेल रहल छी बैंइन कें नवका हेलवार । हेलैत हेलैत थाकी गेलौं पुगs नैं सकली नदी ओई पार ॥ कूल कें मर्यादा , परिवार कें परवरिस में बतीस बीत गेल । दोसर कें लेल सोचैय में यी जीनगी जहिनें कें तहिनें रहि गेल ॥ मानव योनिकें जीनगी यौं संगी हमर भऽगेल अछि बेकार । मिलल नै किछ दुनीयांदारी में भेलु सुनसान आ जरल कपार ॥ ४१. धोकेवाज प्रेम ---------------------------------- खेल खेलै छी अहाँ नुकाचोरी । दिल पऽ चलेलौं प्रेमक छुरी ॥ बोलु नेँ कि मन मेँ यें आहाँ केँ । करै छी कियेँ एना दिल लँsकेँ ॥ सामने मेँ मिठमिठ बोलै छी । पछाँ हमर खिधास करै छी ॥ कुन जन्म केँ बदला लैँ छी । जें हम दर्द सेँ तड्पैत छी ॥ प्रेमक दर्द बडजोर हैयेँ । हमरा देख केँ हँसी लागै येँ ॥ छोडीके जाएत छी हम अहाँ केँ । साक्छी राईख सारा जाहाँ केँ ॥ ४२. कंकल , पत्थर , शीसा , काँट ----------------------------------------- सपारऽ नै सकैय छी , तs बिगार्बो नै करू । जित नै सकैय छी , तs हार्बो नै करू ॥ जीनगी एकटा रंगमंच छियै , जै पऽके हम आहा कालाकार । गामघर मे चेतना के सनेस बाँटु , भगाऊ जातीपातीके छुवाछुत ब्यवहार ॥ मिठगर मिठगर बोल बजैय छै , मुख मे राम राम बगल मे छुरा । गामघर के घुन बनेल्कैय , बैइन आबी के सुडा ॥ कतेग सुन्दर लागैय छेल , रंगबिरंग के फूलबारी । खाधपानि बेगर मरिरहल छै , गेल फूलबारीमे लगा के केबाडी ॥ नहीं लऽके एल छेलौं किछु , नहीं लऽके जायब किछु साथ । निक कर्मके संग हँसु खेलुँ , नै धऽके बैसु कपारमे हाथ ॥ समय गतिशिल छै , हिन्का सदैव सदुपयोग करू । सत्य कर्म मे सहजोग दियौ , दुराचारी दुष्टब्यवहारी के पिछा नै परू ॥ जीनगी के डगर चलबैय , बहुतो भेटत दूपेडिया । कुमार्गमे ईजोत देखब , सत्यमार्गमे अन्हरिया ॥ कर्म सँ पिछा नै भागै जाउ , यी अछि बिधाताके लिखल लेख । जीवनक रस्ता ठमैक ठमैक चलुँ , ककंल , पत्थर , शिषा , काँट के देख ॥ ४३. अहाँ हमर प्रेम कहानी छी ---------------------------------------, अहाँ बोली बचन केँ रानी छी । अहाँ हमर प्रेम कहानी छी ॥ गोरी कारी कारी केश अहाँ केँ । दिवाना बने लऽ सारा जाहाँ केँ ॥ अहाँ हमर मन केँ देवी छी । कैरकी गोरकी अहाँ जे भी छी ॥ नैन सँ बजै छी प्रेमक भाषा । अहीं पऽ लगेनेँ छी हम आशा ॥ खोलु प्रिये दिल केँ दरबाजा । बजवै छी हम प्रेमक बाजा ॥ सुनी केँ अहाँ खुश भऽजेबै । जौं प्रेमिका अहाँ हमर हेबै ॥ बड बेर भेल हम जाएत छी । अहाँ तेँ हमरा सेँ लजाएत छी ॥ ४४. प्रेमक दुकान ---------------------------------- चमचम चम्कैय येँ ठोरक लाली । यौं मारैय अइछ पेङ्गा कान केँ बाली ॥ नयन सँ करैय छी अहाँ नुकाचोरी । प्रेमक भाषा अहाँ बजैय छी गोरी ॥ नाक केँ नथुनियां देखैय मेँ बिजोर । सब केँ ल'गेलौं अहाँ अपन ओर ॥ दऽकेँ अहाँ चौबन्नी मुश्कान । लेनें जाई छी अहाँ सबहक प्राण ॥ प्रिय किए अहाँ एनंग करैय छी । अहीं पँ सजनी हमहूँ मरैत छी ॥ नुका केँ राखूँ अहाँ अपन समान । बन्द करु प्रिय प्रेमक दुकान ॥ ४५ . करै छी प्रणाम ---------------------------------- खुश छी अहाँ हमर दिल दुखाँ केँ । जे लऽगेलौं हमर निन्द उडा के ॥ यौं खुश नै रहब अहाँ एकोदिन । जब याद आयत बितलाह दिन ॥ यौं कि करै छेलियै कि से कि भऽगेल । बनल बात सबटा बिगैर गेल ॥ मन तेँ करै अछि फाँसी लाईग जाइ। वेदर्द समाज सेँ दुर भाईग जाइ ॥ छी प्रदेशी केँ प्रयास उपनाम यौं । नै करु अहाँ हमरा बदनाम यौं ॥ जौं करब अहाँ हमरा बदनाम । साच्चे कहै छी तियागी देब प्राण ॥ करै जाऊ संगी हमरो सम्मान । दुई हाथ जोईर करै छी प्रणाम ॥ ४६. लजेब जीत केँ ---------------------------------- अहाँ गुलभन्टा केँ बारी छी । पाकल पुरल महकारी छी ॥ अहाँ समतोला सन लाल छी । अहाँ हमसब केँ मिशाल छी ॥ जी करै येँ हमर किछ करी । अहाँ केँ संग मेँ कुस्ती लडी ॥ अपन मन केँ सक पुराली । अहाँ केँ नैना सेँ नैना लडाली ॥ रोकु नेँ पैहनेँ दिलक रेल । तब खेल्बै कुस्ती केँ खेल ॥ खेल मेँ अहाँ केँ चित करब । यौं प्रेमक टाँका फिट करब ॥ बात करी हम प्रेम प्रीत केँ । लऽजेब अहाँ केँ खेल जीत केँ ॥ ४७. आई के युग मेँ ---------------------------------- आई के युग मेँ प्रेम सेँ पाप होई छै , पाप सेँ फलिफाप । निर्दोषी केँ लात दै छै , दोषी केँ साथ ॥ सत्य बोलै छै , परिवार सेँ टूटै येँ । पाप के बिरोध करेँ , उ समाज सेँ फूटै येँ ॥ सत्य बचन तीत होई छै , असत्य मिठ रस । निक काज मेँ उल्हन मिलै छै , गलत मेँ मिलेँ जस ॥ ४८. रुसल दुल्हिन ---------------------------------- प्रिय प्रेम हम अहीं केँ करै छी । अहाँ हमरा सँ कियँ रुसल छी ॥ अहाँ के राह मेँ नैन बिछौने छी । घरक' केबार खुलेँ छोडनेँ छी ॥ प्रिया अहाँ आबु हमरा लग मेँ ! बड राईत भेल भित्तर चलुँ । भुल , गल्ती हमर माफ करू ॥ एनंग अहाँ रूसब हमरा सेँ । कहुँ हम प्रेम करी केकरा सेँ ॥ प्रिय एक बेर तँ हैँस कऽ बजु ! देखूँ तीनतरिया डुबी गेल । राइत कट्ल , बिन्सर भेल ॥ सुनु तँ कोइली केँ मिठ अवाज । बतेबैय नै केकरो अपन राज ॥ राइतभर जागलौं अखन झूकैत छी ! ४९. सुनु साजन ---------------------------------- यौं अहाँ संग केँ सुन्दर पल हमरा याद आवै येँ । अहाँ केँ गुथल प्रेमक माला हमरा बड सतावै येँ ॥ पढलौं एहेन कुन जादु आँ मन्तर आहाँ साजन । हर बखत अहींकेँ याद करै येँ हमर तनमन ॥ राईत राइत केँ सपना मेँ अहीं केँ चेहरा देखै छी । राईत केँ निन्द मेँ आईब अहाँ कियेँ लल्चावै छी ॥ फगुवा , सिरूवा बित गेल पाईक गेल जेठवा आम । सजनी मन पारै येँ छोईर बिदेश चलि आबु गाम ॥ ५०. डाक्टर कवि बिमारी कलम ------------------------------------------ अहाँ अछि कवि हम कलम यौं । दिल केँ घाँ पँ लगाऊ मलम यौं ॥ मिठ शब्द केँ पट्टी लगाऊ । घाँ केँ सब आहाँ दर्द भगाऊ ॥ मन सेँ चलाब नैना केँ सिजर । निक सँ देख्बै घाँ केँ चारू भर ॥ कंचन कोमल बिमारी केँ मन । दर्द सेँ धडकै यैछ धडकन ॥ अहाँ अछि कवि हम कलम यौं । जल्दी सेँ लगाऊ मलम यौं ॥ ५१. मोनक फुलबारी ---------------------------------- हमर मोनक फुलबारी मे अहाँ खोपरी बनाँ के बास बैस गेलौं । सोच्लौं फुलबारी के पहरदारी हेतै मुदा आहाँ हमरा पागल बनाँ देलौं ॥ फुलबारी के माली कही के फूलक सब रस आहाँ चुसी लेलौं । रस चुसल फूल मलिन भेल देख के खोपरी तोडीके बास छोरी गेलौं ॥ सोचने छेली अहाँ खाधपाईन लगाँ के फुलबारी मे हँरिहँरी लाएब देबै । कि थाह अहाँ निर्मोही हमर फूलक पैड के ठठरी बनाँ के भागी जेबै ॥ केतबो फूलक फुलबारी मे अहाँ कलियौं माली के शासन । सगरो के फूलक रस से बैढ के उपर रहत हमर फूलक रस के आसन ॥ ५२. विश्वासक बोतल ---------------------------------- विश्वासक बोतल पिवैत पिवैत पेट हमर भैर गेल । विश्वासक तिजौरी जेकरा मान्लौं उ तिजौरी मे आगी लगाँ गेल ॥ पजरल विश्वासक पजाही मे विश्वासक मसिन जैर गेल । देख के एक छन मुर्छित कि भेलौं सब कहलँ यी पागल भगेल ॥ विश्वासक सोक मे नैन सँ चुवे लागल विश्वासक मोती के दाना । सेह देखी के वेदर्दी जवाना हैंस हैंस मारे लागल ताना ॥ विश्वासक पैर संगी आहाँसब नै रोपव यौं । कतौं सँ निकलत हुनकर बिंज तँ अपने आप मे सोपव यौं ॥ ५३. प्रेमक दर्द ---------------------------------- अहाँ नैना के धनुष सेँ चलेलौं प्रितक बाण यै । दिल भगेल घाँयल हमर निक्लै छै प्राण यै ॥ कुन गल्ती भेल हमरा सेँ जे देलौं येहेन सजा । दर्द सेँ तडपै छी हम तँ आहाँ केँ आवै ये मजा ॥ कुन मिट्टी सँ बनल छी आहाँ तनी हमरा बताबु । धर्ती के मनुष्य छी याँ अश्मानक परी सामने त' आबु॥ यी प्रेमक घाँ पँ अहाँ बेवफा केँ नुन बुकनी छिटी गेलौं । दर्द तँ देलौं देलौं मुदा संगे हमर सारा संसार लुटी लेलौं ॥ प्रेमक दर्द कि होएत छै कि मालुम अहाँ केँ । प्रेम नै करू कहै छी हम सब साथी सारा जाहाँ केँ ॥ ५४. सपना के परी ---------------------------------- नैन अहाँ के लजौनी झार । देखै ची हैँस के हमरा बार बार ॥ लाल गाल , गुलाबी होट । दिलपर मारलक प्यारक चोट ॥ मस्त मौसम आँ छै मस्त जवानी । करँ खोजै हमरा संग मनमानी ॥ मोनक मनोरथ मोनक आशा । बजै लँ चाहै छै प्रेमक भाषा ॥ परी के समान रुप , रेशम जकाँ केश। टुटल निन्द तँ देख्लौं हम छी बिदेश ॥ सुन्दर गगन के आहाँ छी एक सुन्दर तारा । कहुँ अहाँ फेर हमरा कहियाँ भेटब दोबारा ॥ ५५. बितलाह प्रेम ---------------------------------- दिल मे दर्द ठोर पँ प्यार । सुखल खरेरी हमर संसार ॥ नै छै संगी साथी नै कोई अपना । दिल पँ लागल चोट टुटल सब सपना ॥ फूल मे रस छेल सब चुईस गेल । मुर्झायल फूल तँ हमरा भुली गेल ॥ कि करै छेली कि भगेल । भरल जवानी मे आगी लागी गेल ॥ रैह रैह के तडपावै । बितलाह दिन याद आवै ॥ चढल जवानी हमर लुईट के । भेल दोसर के हमरा सँ फुईट के ॥ ५६. मिथिला हमर माहान ---------------------------------- मिथिला केँ मैथिल सँ आशा । सदखिन बजियौ मैथिलि भाषा ॥ धोती, पाग, माछ, पान, मखान । येह सब अछि मिथिला केँ पहिचान ।। नितदिन सदखिन मैथिली गाबू । अपन बौवा बुच्ची केँ मैथिली पढाबु ॥ मिथिला माईटक अछि गुण अपरम्पार । स्वंम माँ लक्ष्मी सिता बैन लेलक अवतार ॥ स्वर्ग सँ सुन्दर अपन मिथिला माहान । अहिठाम बैन पाहुन येल स्वंम भगवान ॥ ५७. हमर करेजा के टुक्रा ---------------------------------- हमर करेजा के टुक्रा हम जाइ छी बिदेश । कमा कऽ ढौवा लावब अहाँ ले झुनझुना सनेस ॥ मन परैय छी अहाँ, हम सपना सपनाएत छी । आँइख मे अहाँ के हम चेहरा ल'के जाएत छी ॥ जुनि बौवा अहाँ माए के उल्हन सुनावैय । माए के कहल करब , बुधियार बेटा कहावैय ॥ जाइ छी अहीं के लेल हम दुरदेश बाहार । जुनि बिसरब बेटा अहाँ हमर दुलार ॥ अहाँ के देख के हम केनें छी कतेग कल्पना । पुरा करब बौवा अहाँ हमर सब सपना ॥ जब होइबैय अहाँ सियान तँ कुल के राखब मान । समाज मे नमुनारूपी बनायब अपन पहिचान ॥ युगयुग जीवैत रहब हम आशिष दै छी । अहाँ लेल हम देश छोइर बिदेश जाई छी ॥ ५८. हे त्रिभुवनपति ---------------------------------- हे त्रिभुवनपति जग के रचैया छीअहाँ केहेन रचना केलौं । कतेग के दिया बुतेलौं तँ कतेग के दीयाबाती छिन लेलौं ॥ हे त्रिभुवनपति छीअहाँ ऐहेन निहृदय कियँ भगेलौं । दिन मे रंग देखेलौं मुदा राईतो मे एतै सगरो से हल्ला भेल । ऐना किए देह डोलेलौं सबहक सपना सँ सजल महल टुईट गेल ॥ कतेग के हाथपैर गेल, कतेग बेसहारा बनल आँईखक नोर सुईख गेल । सब पुकारलक अही के हे त्रिभुवनपति पृथिवी के रचैया आहाँ कतँ गेलौं । भेलौं बहीर छीअहाँ कतेग गाछक मजर झाईर देलौं तँ कतेग गाछ उखाईर लगेलौं ॥ हे त्रिभुवनपति आहाँ ऐहेन निहृदय कियँ भगेलौं । ५९. बटोही के संग मे परी, मोनक बनल रसभरी " ------------------------------------------------------------- मनमोहक बचन संगे मधुर मुश्कान । औशी के राईत लागै पुर्णिमा सामान ॥ शुभ दिन अइछ संगे शुभ घरी । रुप के रानी छी अहाँ स्वर्ग के परी ॥ नयन सँ अहाँ चलाँ के जादू । सब किओ के केलौं अहाँ अपन काबु ॥ जखन बजेलौं अहाँ चुरी खनखन । बढेय लागल हमर दिलक धडकन ॥ एलौं कतऽ सँ अहाँ आ जेबैय कुन गाम ? करैय छी कुन काम अहाँ आ अइछ कि नाम ? ६०. सुईया बैन के आयल कैची बैन के गेल ----------------------------------------------------- ऊ सुईया बनि के आयल जीनगी मे आँ कैची बनि के गेल । मोती दाना लुटी हमर, हमरा खन्ता मे धकलीके गेल ॥ जीवनभर अहाँ के साथ नै छोडब से कसम खेने छेल । नवका डेरा पावलँ कि ऊ सब कसम वादा भुईल गेल ॥ जारक मास मे हमर जीनगी के सिरक भरिके ओढी लेलऽ। गेल जाड तँ हावा मे सिमरक रूईया समैझ उडा देलऽ ॥ प्रेमक बेवफाई के झेल रहल अछि हम बडका झेल । ऊ सुईया बनि के आयल जीनगी मे आँ कैची बनि के गेल ॥ ६१. दागक दर्द ---------------------------------- छेल लगवार दोसर तें हमरा कियें फसेलियै । आगा साही हमरा पाछासें किएक धकैल देलियै ॥ कपडामें लागल थाल देखकें सब कियो हंसै यें । यी दाग जीनगीकें पिरेलऽ हमरा किछ नें फुरै यें ॥ लगाकें कपडामें दाग अहाँ खुब हैंस रहल छी । देल दागक दर्दसें हम जीवैतें मैररहल छी ॥ खुशीसें रहुं आहाँ हमर जीनगीमें दाग लगाकें । फेर नें करब एना दोसरकें संग नेह लगाकें ॥ ६२. शिव त्रिपुरारी ---------------------------------- तिनो पुर कें पति शिव त्रिपुरारी ! संग में सांप लऽकें बसाहा पऽकेलन सवारी !! भांग धतुर कें भोजन करैं पहिरैं यें बाघक छाला ! जटा में चांन चमचम चम्कैं गाला में उजंरात कें माला !! हाथ में त्रिशुल आँ डमरू लेनें जटा सँ बहैं गंगाधार ! सब देवो कें देव कहावै हिनकर लिला अपरम्पार !! ६३. कण कण में आहाँ ---------------------------------- कण कण में आहाँ हर पल में आहाँ आहाँ अविनासी छी आहाँ अदृष्यकारी छी ! अहीं कें चरण में संसार अहीं लs दुलार मलार अहीं सबहक मैया छी अहीं जग कें खेवैया छी ! आहाँ अरूपा छी आहाँ शक्तिस्वरूपा छी आहाँ काली छी आहाँ कल्याणी छी ! शंख , चक्र , गदा लेनें छी आहाँ शेर पs सवार केनें छी अइछ भैरव भैया साथ में लक्ष्मी , सरस्वती दुनू कात में ! ६४. असगर भेलियै ---------------------------------- दोस्त सब दोस्तयारी करै छै । प्रकृति आँ जीनगी गद्दारी करै छै ॥ बाधा आँ अडचन सँ लैड़रहल छी । समय के पांँछा दोईड रहल छी ॥ भुख पियास सब किछकें त्यागी । बनलौं जीनगीकें हम अनुरागी ॥ जीनगीकें बाट कटल नैं कटै छै । हर डेग पऽ द:ख आँ दर्द भेटै छै ॥ दु:ख दर्दकें संग दोस्ती केलियै । सब सँ बिछैड असगर भेलियै ॥ ६५.यौ मधेशी ---------------------------------- मन होई छै आँखी मुईन ली यी वेदर्द दुनियांकें छोएरकें । माया ममता तियागीकें सबटा आँ सबसंग रिस्ता तोएरकें ॥ बनल छै सब अवसरवादी अपने आपमें सब झगैरकें । यौं लै छै परोसिया मोकामें चौका भाई भाई बिच चुगली कैरिकें ॥ पढलो लिखलो बनल छै मुर्ख सम्झायब हिन्का कि करिकें । देखकें माईकें करेजा कानल भाई भाईमें दरारकें ॥ भुमीकें चिर हरै यें दुश्मन के छै जे चिरत छाती पकैरकें । जेकरो पठेलौं रक्षा कर लेल ओ चुप भगेल बैरीसंग मिलकें ॥ जे चाहै छै भुमीके चिर बचाबें ओकरा गारी दै फटकाईरकें । आबो त आईख खोलु यौं मधेशी अपन सुतल निन तोईरकें ॥ सब मधेशी एकजुट हबियो किछ त चलु अगाडी ससैरकें । बनायब भुमीकें स्वतन्त्र यौं येहटा संकल्प कैरकें ॥ ६६. प्रेम --------------------- दिलकें आँखी खोलीकें देखुं हम अहाँकें सामनें छी ! दिलोजानसें अहींकें चाहलौं अहींकें अपना मान्ने छी !! प्रेम रस बड मिठ है छै एकबेर पि कऽते देखुं ! भवसागर पार भजेब जौं प्रेम अहाँ कैरलेबैं !! प्रेम सुर बड मधुर पैरक पायलकें झन्कार ! साजा लियौं अपन भवनमें आबि जेत खुशीकें बाहार !! स्वच्छ मनसें हृदयमें दियौं हमरा बास ! संग नै छोडब कहियो जबतक रहत जानमें सांस !! ६७. क्रान्ति करबें करब ---------------------------------- आई मिथिला माईकें चिर हरऽ देखुं दुश्मन भेल अईछ तैयार घर घर स' निकलू यौं मैथिल दुश्मनकें करियौं खबरदार कि केल्कै आई नेतासब मिथिला-मधेशमें नै छै शान्ति उतरें लागल मैथिल जुवकसब मिथिला भुमीकें लेल करऽ क्रान्ति मिथिला आँ मधेशकें लेल सब मैथिल-मधेशी हबियौं तैयार सहजें दै अइछ त' बड निक नै त' छिनकें लियौं अपन अधिकार बाट रोकनिहारकें मुंहसें सम्झाउ नैं मानैंयें त' लातसें लत्याऊ हमसब मिथिला-मधेशी एतबें कहब अपन मिथिला-मधेश लऽकें रहब आब जान चाहें लियँ पडैं आँ दियँ पडैं मिथिला-मधेशक लेल क्रान्ति करबें करब ६८.हमर जीनगीके परिचय ---------------------------------- मन करैय बसन्त ऋतुमे फुलल फूल जकाँ फुलि । मुदा करि की शिशिर मासमे पोउनकल काँट जकाँ भ'गेल छी । हँसी खुशी सऽ मौरणी जकाँ नाँची मोन होइय । मुदा यी नीहृदय दुनियाँमे जिन्दा लहास बनिके जीरहल छी । मानव जोनि एक रंगमंचके साधन अछि । जहिठाँ बाध्यता आ बिडम्बनाके गिठहसे पैघ किछो नैं । हर मोड, चौक , चौपारी, चौराहपर ठोकरें ठोकर । किओ हाथके सहारा दै तऽ किओ टांग पकरिके खिचै छै । साहस बटोएरके दौडैयले चाहैय छी । रसता भेटैय देखाय दैछै सुखल बाउलक फाँक । पिछा घुमिके देखैय छी हम निकली गेल छी बहुत दुर । नजर पडैय छै अप्पन पायरके छाप पऽ । माटिपर बनल छाप जहिनाके तहिना छै । बाउलपरके छाप हावा उडाके लऽगेलैय । आब डेग कोना उठाबी आ कतऽ राखि । दानापानी बेगर पेटमे बिलाई नाँच नाँचै छै । आँखी मुनैं छी तऽ रसता साफा नजर आवैय यें । खोलितें आँखी फेर यी दुनियाँ अन्हार देखाए यें । अहि मंचपर "प्रयास" कऽरहल अछि अभिनय । एहे अछि संगी वास्तवीक हमर जीनगीके परिचय । ६९.सायद सबदिनके लेल नामोनिसान मिटि जेत ----------------------------------------------------------- मनमे एकताके दिप जरीरहल छै, देहक' सब अंग-अंगके नससब जागल छै! नेपालके मधेशीयो नेपाली से स्वीकारें नें, तहियो मधेशीके आँखीमे नेपाली चश्मा लागल छै!! फूल सँ सजायल डाली राखल छै, तकरा उठाबत बभनाके डर लागैय! नेता वर्तामे स्वार्थक' वेद पढैय, मधेशी आमक, साकल जकाँ जरैय!! नैं सठल यें साकलसब अखन , स्वार्थक' घी ढारैत रहूँ.! साकलक' आहुतीके अन्जाम मिलें नैं मिलें, अहाँ स्वार्थक, घी सँ अप्पन फाइदा लुटैत रहूँ !! अप्पन पुर्खौती बचावैयके लेल , पढैत रहूँ झुठेंके वेद ! धोखेवाजीके यज्ञमे देखब कहीं, सायद सबदिनके लेल नमोनिसान मिटि जेत !! ७०.पुश मास पानी ठार लगैय ---------------------------------- पुश मास पानी ठार लगैय, अस्नान करैतखुन बड्ड जार लगैय! भरिदिन कुभेस फसरल छै, गोहाली घरमें घूर धधरल छै! बुढवा दादा अलुवाह पकाय, बौवा बुच्चि मागि-मागि खाय! लोटामे पानी, थारीमे भात काढल छै, बुढवा दादा गप्पमें लागल छै! थारीकें भात देखूं ठैर गेलैय, घूर महक अलुवाह सेहो जैर गेलैय! देहमे मैलक' चिप्परी सट्ल छै, टांगक' तरबा सेहो फाटल छै! पानी छुवैत बड्ड कोढि लगैय, खाएत खुन फुररसिन उठैय! ७१. अहाँ ओतऽ बिन संगीतके गीत गबू ------------------------------------------------- बिहुसल कारी केस अहाँके, रहि-रहि हमरा इशारा करैय ! मनमें हमरो प्रेमक' टुसी पनुकलैय सामुन्ने जेबाक लेल डर लगैय !! अहाँके चन्द्रमुखी चेहरा पऽ हम, बजारहल छी प्रेमक' धुन ! आँखि लागिते सपना देखैत छी हम, अहाँके संगमें मनारहल छी हनिमुन !! अहाँके मन्द-मन्द मुस्कीके जादु, हमरा कऽ लेलक अप्पन काबू ! हम एतऽ गीतारके तार कसैत छी, अहाँ ओतऽ बिन संगीतके गीत गाबू !! ७२. आब उठाबिरहल छियौ बन्दुक ! --------------------------------------------- कतेक मधेशीके खुन पिलही, तैयो नैं मेटलौं तोहर भुख! तोहर भुख मिटाबऽ लेल, आब उठाबिरहल छियौ बन्दुक !! अप्पन भूमिके लेल हम, सहि लेबै सबटा गम! खुनक' होली खेलऽ तोरासंग, आबि रहल छी लऽके गोली, बारुद, बम !! मानवताके सीमा नांघि देलें तु, सब नियम कानुन तोडिके! बहुत शासन कएलें तुसब, आब भागै पडतौ मधेश छोडिक !!थ शहिद भाइ सबहक कसम, आबि रहल अछि कफ्फन बान्हिके! आर पारके लडाई लैड़ तोरासंग, बचेबै अप्पन माटी पानिके !! मधेशक' गांव गांव सऽ, फुका गेल एकताके शंख! अप्पन अधिकार लेबऽ लेल, निकली गेल मधेशी लड़ऽ मधेशक' जंग !! ७३. हंसा जारहल अछि ससुराल" ---------------------------------------- जाई छी अहाँ सँ दुर हम यी बेदर्द दुनियाके छोडीके ! नाम अहाँ के जपैत हम यौं उजरा चादर ओढीके !! नसीबमें नैं छेल हमर जीनगी जिब अहाँ संगमें ! दुवा करब भगवान सँ मिलब दोसर जनममें !! हँसी खुशीके साथ रहब यौं हमर दुवा यें अहाँ पऽ ! अइछ हमरा लेल किछ त' यौं चलुँ कटिहारी लाश पऽ !! सब मिल समदाउन गाबु बजाबु शंख घण्टकें ताल ! हमर हंसा हमरा छोडी जाँरहल अछि ससुराल !! ७४. अपनें घरमे नोकरी करतै ------------------------------------ मन अपनेमें हलचल छै सबहक मन भट़कल छै ! सगरो सऽ थाकि बौवाबीकें रस्ता दोपेडिया पऽ अटकल छै !! भयंकर आगी लागल छै धन्धोर बढैत जारहल छै ! धियापुताकें टांगहात झर्कलै गार्जन कानमें तेल लऽकें सुतल छै !! घरक' कोरो फट फट फुटै छै पडोसिया हँसि हँसिकें मजा लुटै छै ! घरमें नोकरबा फोक़डा पढैय तेकरा मालिकवा बेसर्मी सँ सुनैं छै !! लागैय छै आब घर सुडाह भ'जेतै नोकरबा अपनें संसारमें रमेतैंय ! पडोसीया सब चिज पऽ कब्जा करता तब मालिकवा अपनें घरमें नोकरी करतैंय !! ७५. बिदेशीके रक्षा बन्धन -------------------------------- भाई बहिनक' माहान पावैन आयल रक्षा बन्धन ! बहिनक यादमे बिदेशक भाईसबहक धड्कीरहल अछि धड्कन !! माहाजनक कर्जा स' भऽके तंग एलु मलेशिया साउदी कतार ! बिदेशोमे रहैत बहिन हम याद करै छी राखी त्योहार !! रेशमके काँच धागा जेका अछि भाई बहिनके बन्धन ! सदियोसे मानी आयल आई अछि पावैन रक्षा बन्धन !! भाईके लेल बहिन लऽके एल मिठाई संग राखी थारीमे ! प्रेम स' भाईके मिठाई खुवाबैत बान्है छैथ राखी दहिना हाथके नाडीमे !! ७६. माइके ममता ----------------------- माई कें ममता अथाह् सब सँ पैग जथाह् ! पी माईकें दुध दशधार देखै अछि दुनियाँ संसार !! माईकें गोदीसन नैं कोनो आसन बैस गोदीमें केलौं शासन ! लथार-पथार सब सहैं मिठ बचन सऽ बौवा कहैं !! करि काज साँझ घर आवै बौवा बौवा कैहीकें बोलावै ! नेह सँ उठाके गोदीमें सुतावै दुधके संग लोरी सुनावै !! नितदिन भोर अंगनामें लावै अंगुरी पकैर कऽ लरऽ सिखावै ! माई अछि ममताकें माहारानी माई सऽ जुटल सब सन्तानकें जीनगानी !! ७७. गन्तब्य ---------------- बिधाताकें बिधि काटऽ नै सकै छी, जीनगी सँ दुर भाग नै सकै छी ! दु:ख दर्द सब संगमें ल'के , संघर्षके रथ पऽ यात्रा करे छी !! नै जानि कतऽ भेटतै गनतब्य , खोजैत जारहल छी चाँहूदिस ! मनमें बहुतो सवाल जवाफ उब्जै छै, कहीं हरेबैए की जनमासक' बिच !! कखनो खसैत छी त' कखनो समहरैत छी, जीनगी संघर्षके बाट पऽ ! बड पैघ जिम्मेवारी सोपल अछि, यी मानव चोलाके काँध पऽ !! ससरि-ससरिके आगू बढिरहल छी, अप्पन गनतब्य लग पुगिजेबै ! जगमे निक कोनो काज कऽके , यी मानव जोनिके सफल बनेवै !! ७८. हमसब मैथिल कहावै छी –----------------------------------- जन्म लेलौं हम मिथिला भुमि पऽ मैथिल पुत्र कहावै छी ! भोरें प्रातें जखनें तखनें मैथिली भाषा बाजै छी !! माँ जानकीके जन्मभुमि मिथिला हमर महान छै ! तहीं भुमिके बनल जमाई स्वंम राम भगवान छै !! धोती, कुर्ता, गम्छा, पाग अछि मिथिलाके भेष ! अहीं मिथिलाके पुत्र छेल राजा सत्तवर्ता स्लहेस !! इतिहासके स्वच्छ पाना पऽ लिखल बिदेह जनकके कहानी छै ! अहीं मिथिलाके भुमि पऽ बहिरहल कमला कोशीके पानी छै !! मिथिलें भुमिके जंगलमे भगवान राम धुनि लगेनें छेल ! तहीं दिन सऽ ओ जंगलके नाम रामधुनि वन राखल गेल !! स्वर्गसन अहीं मिथिलाके सब मैथिल गाथा गावै छै ! सत्ययुग बितल कलियुग आयल तहियो नें रामधुनिके आगी निभावै छै !! मिथिलाके कोकिल कवि छेल विधापति महान ! तेकरें शिष्य बनल रहैं! स्वंम महेश्वर भगवान !! हमसब मैथिल मिथिलावासी जन्मभुमिके चरणमें शिष नवावै छी ! गर्व अछि हमरा अपन मिथिला पऽ जे हमसब मैथिल कहावै छी !! ७९.हम परदेसिया पागल बनि गेलौं ! -------------------------------------------- जखनें तखनें अहीं याद आवै छी , अहाँ वेदर्दी कोना हमरा छोडी गेलौं ! संग संग जीयै मरैके कसम अहाँ, कोनाके एतेक जल्दी सँऽ बिर्सि गेलौं ! लोकक' आगा सरम सऽ शीर झुकैत छै, यी केहेन जीनगीमे दाग लगा देलौं ! बहुत पछितारहल छी अखन हम , जे अहाँ सनके घाति सँऽ दिल लगेलौं ! अहाँ वेदर्दीके याद भुलावके लेल , हम परदेसिया पागल बनि गेलौं ! ८०.कोना मनायब दिपावली ? ------------------------------------ केहेन आगी लागल छै मधेशमें, कतौं नै देखै छी खुशहाली ! सगरो छै बन्द,हडताल,आन्दोलनके र्याली, त' कहूँ एनामे कोना मनायब दिपावली ? तन छै बिदेशमें, मन अछि गाममें , मातृभुमिके खबर सुनि-सुनिके हमरा , एकोरति मन नै लागिरहल छै काममें ! खेतखरिहान सबटा लुटिरहल छै, घरक' बोखारी भ'गेलै खाली , त' कहूँ एनामे कोना मनायब दिपावली ? केकरो घरमे जगमग दिप जरतै , केकरो घरमे घट़ा घनघोर काली ! जब दियाबातीके उक्की फेरैवाला छिन लेलकै , त' कहूँ एनामे कोना मनायब दिपावली ? ८१. सत्तापरके सरकार ---------------------------- जनताके छातीपर गोली चलावैके हुकुम दै छै सत्ता पऽके सरकार । से देखि कँ' आँखी मुनि लेनें छै राष्ट्रिय स्तरके मिडिया आ संचार ।। हक मंगनिहार भाइ मारिके बीरता देख्वै छै जंगी प्रशासन । चरनसिमाके पार क'चुकल छै खसवादी सबहक शासन ।। अप्पन अधिकार लेल जे अवाज उठावै ओकरा कहै छै आतंकवादी । जे माइके आंचल भाइके खुन सँ रंगवै से कहावैत छै राष्ट्रवादी ।। शोषन दमनके घैला भरिगेल , गुन्जे लागल मधेशमे अजादीके अवाज । द'के अपँपन कुर्बानी मधेशी आब बनायत स्वच्छ , स्वतन्त्र स्वराज ।। गामगाम आ बथानबथानमे बज लाग्लै स्वराजक' गीत । हबियो एकजुट मधेशी आब भ'के रहतै मधेशक' जीत ।। :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: नाम :- प्रयास प्रेमी मैथिल (साहित्यिक) राम नारायण मेहता (वास्तविक) पता :- डुम्राहा- ९ , सुनसरी , नेपाल अखन :- मलेशिया २ अब्दुर रज्जाक किछु कता आ गजल कता-१ कतेक रहब परदेसमे लौट आबु आबो घर प्रीतक' चार चुबिरहल अछि आबु आबो घर कते रुकु देख-देख कs कोरोसब गनैत ढहल जाइय टाटोसब सम्हारू आबो घर कता-२ देखू केहन मोडर्न ज़माना अछि बोतलक पाइन और पाकेटमें खाना अछि केहनकs बदलल जीबन शैली लोकक भोजन आधुनिक मुदा सोंच पुराना अछि। गजल-१ समाद अछि ओकरा, कुशल छि अहि ठाम चिंता जुनी किया एकरा, कुशल छि अहि ठाम . की भेलैन जखन कांट लगौलेन हमरा बाटमें सोनित सsपैर रंगल तकरा,कुशल छिअहि ठाम . बेचैनीके यादमें ओ आबे संगे जखने शांझ साथसंग बस होबैत जेकरा ,कुशल छि अहि ठाम . बहिगेल कोसी बलान जखने ह्र्दयके नयन सं कानियोक के सुनत केकरा ,कुशल छि अहि ठाम . देख लेब जखन धोखा सs अगर हमरा लाशके नोर बहा नही करब नखरा ,कुशल छि अहि ठाम गजल-२ अहाँसंग स्नेह जोडs लेल बड्ड कठिन अछि अहाँसंग चित मोडs लेल बड्ड कठिन अछि . ओ जोडल, पैघ नाता नहीं सोनित के ओ किरिया तोड़s लेल बड्ड कठिन अछि . आबो ह्र्दयके फूल फूलबाक छल मुदा ? पथ्थर दिल फोडs लेल बड्ड कठिन अछि . बान्हैत जकडलौं अनेक भिन्न -भिन्न फंदामें रहल किछ याद छोड़s लेल बड्ड कठिन अछि . महँग जिनगीमें सेनुरक ओते मोल किया ? साँच प्रीत बिच भोड़s लेल बड्ड कठिनअछि गजल-३ अहाँ जाई छि त जाऊ अपन याद लेने जाऊ एक बेरक भेटमें हमर नहीं करेज लेने जाऊ नहीं तरेगन अहाँ सन नहीं चांन अहा सन मधुर इजोत संग हमर दुनु नयन लेने जाऊ अहाँक पैरक आहाट संग मुस्कान आबैय ओ आहटसंग नहीं हमर मुस्कान लेने जाऊ कहबाक रहल मोनमे कोना कहूकी भsगेल ओ शब्द हमर मुदा ,अपन साथ लेने जाऊ अब्दुरक किछ अहाक उपराग नहीं कहत अहाँ अपने अपन सबटा उपराग लेने जाऊ गजल-४ बनल एक सवालक जवाफ छि अहाँ बसन्तमें फुलल एक गुलाब छि अहाँ उठल तूफान भs मोंनक हियासंग साजल हमरा लेल उ सबाब छिअहाँ देखैत हम जागलमें जेना देखलेलौ नहीं सुतल बेरक सुंदर खाब छि अहाँ हमर प्रीत मिलल जंs अहाक नैनासंग देखैत रहलौ एक खाश जनाब छि अहाँ 'अब्दुल'क ह्र्दयमें फुलल फुलबारीस किए तोइरक फूल बनलौ बेताब अहाँ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राम सोगारथ यादव- किछु कविता, गीत आ गजल "हमर बिनती"-(कविता) ऐह पावैन धर्ती देख , देव ललायल । तैंय , महादेव बैन उगना, बिधयापती घर आयल ।। अन्न्त बर्ष पवित्र रहे एह धर्ती, बनि बहन सीता ,पाहुन राम यैहा । हे प्रभु ! मिथिलेमे अंत होइ, मिथिले जन्म दिहा २ ।। ऐहि राज्यमे , ज्ञान सुन्दरता, एकता , गोरबकऽ छै भन्डार । नदि नाल , ताल तलैया , कुन्ड, स्वरोवर छै प्राकृतिकऽ श्रीङ्गार ।। स्वर्ग नहिं भायत देख मिथिला, तैँय ऐहि धर्तीपर लादिहा । हे "प्रभु" ! मिथिलेमे अंत होई मिथिले जन्म दिहा २।। जहिठाम कमला , कोशी बहै, खल-खल हसैँ बलान । खिस्सा पेहानी, गीत सुनी, सत्तसंगमे बैठी अपने दलान ।। परशुराम अवतारी, सप्त ॠषीकेँ तपसँ पवित्र भेल , भुमीपऽ लादिहा हे "प्रभु" , मिथिलेमे अंत होई मिथिले जन्म दिहा २।। रामसोगारथ यादव " हे युवा उठु "---(कविता) हे युवा उठु, अहाँ कौलका भोर छि । प्रचंड गर्मिकेँ सहासी, अहाँ पथके डोर छि ।। सब गुणसऽ भरल , अहाँ सतरंगी छि । बदलैत रिति प्रथाके, अहाँ नयाँ सुरुवात छि ।। हे युवा उठु, अहाँ वसंतकऽ हवा सितल छि । किचरसँऽ भरल समाजमे, अहाँ फुलल कमल छि ।। चिन्हुँ अपन नम्रता, आ कठोर जैरके । कतेक मजबुत अछि, देखु अहाँ बाँझल पैरके ।। हे युवा उठु, अहाँ नयाँ प्रबेश छि । चिंन्हुँ देर नहिं करु, अहाँ नयाँ संदेश छि ।। बिन गर्जल बर्षात, अहाँ होन्हाँरी नंक्षत्र छि । भबिस्यकेँ कर्ण धार, अहाँ मुख्य पात्र छि ।। हे युवा उठु, अहाँ कौलका भोर छि । प्रचंड गर्मिकें सहाशी, अहाँ पथकेर डोर छि ।। "रोकु दहेजकेँ" (कविता) बहुतो बेटि आगिमे जैर गेलै , बहुतो बेटि फाँसि चैरह गेलै !! बहुतो घर लुटागेलै, बहुतो भाइ मैर गेलै, मुदा , जुटाब नहिं सकलकै रुपैया, दहेजके । बड-बड ज्ञानी भेलै, बड-बड अगुवा भेलै, देशके शासक बदल्लै, आदमिमे चेतना जगलै, मुदा, लगाम लगाब नै सकलकै, दहेज के ।। बहुतो जोरि घुटना टेक, दहेजके आगु मजबुर भजाइय। बहुतो बाप एकरा अगाडि, पागकेँ लाज गिरबैय ।। मुदा, तैयो रोईक नहिं सकलकै, यै रितके !! जै बेटि छैत तैंय हम छि, सब किय नहिं सोचलकै । जै बेटि छैत तैँय संसार अछि, इ रित किय नहिं बुझलकै ।। अन्त करु खरिद बिकरी, जिन्ददी बेटिकेँ । आ तब सम्भव अछि, मधुर रिस्ता रोटिकें ।। "लोभ किय ?" (कविता) नहिं किन्को इ धर्ती अछि, नहिं किन्को प्राकृतिक हावा । हम सभ छि मानव जाती, करै छि ऐहि गपकऽ दवा ।। बेकारकें लडै छि जातिक लडाई, चार पलकें नेहमानिमे । कोई नहिं छथिं फरक, लागि जाउ मानव सामनमे ।। छै इ हमर छै इ अहाँकें, मनमे रखनाईयो अछि भुल । संसार ऐकेटा अछि, जे अछि प्रमात्मा पाउकऽ धुल ।। चार दिनके हमर अहाँक जिन्दगिमे, कोई नहिं अछि, अपन नहिं कोई आन । अन्तिम छनमे पुगिते धन,सम्पत्ति, संतान,सब भजाईत अछि बिरान ।। पृथ्वी एकटा मन्दिर अछि, मानव जेकर पुजारी । इ हमर इ अहाँकें जाईके बेरा, जाई परैत छैक सबके बैन भिखारी ।। कमाईल सम्पती छनिक खुसी, सामानकऽ खुसी अमर अछि तैयौं बेद भाव किय ? सब नंगे आयल छि नंगे जायब, नहिं कोई बड नहिं कोई छोट, बुझितो सम्पतिकें लोभ किय ? महानुभाव ज्यू ! (कविता) महानुभाव ज्यू ! प्रवासिके तर्फसँ जय नेपाल ।। एकटा छोट कविता लिखिरहल छि । अशा अछि जे पैढ देब ! हमरा कवितामे नहिं कोनो ऐजेन्डा अछि नहिं कोनो क्रन्तिकारी शब्द, नहिं राजनितिक गंध, हमरा कवितामे बिगरल रेमिट्यान्स मसिनकेर दु:खद खबर अछि ।। जे २४० फिट उच रुपैयाकें गाछसँ गिर बिगैर गेल अछि अँ.. ह..... फेकु ...नहिं पूरा पढी दिय..... हमरा कबितामे कोनो समुदायकेर गप नहिं अछि । नहिं कोनो गाम ,नामके वर्णन अछि हमरा कबितामे मारुभुमीमे बैहैत पसिनाके नदि नदिसँ निकलैत समुन्द्र जेहन लहर अछि हा.... हा..... हा.... अहाँ कि बुझब इ मर्म अपन्हिके गाडिमे,बंगलामे toilet मे A.C.हबे नहिं बुझबै अहाँ माय रहिते टुहरा बनल बेटा मर्म नहिं.....नहिं..... महानुभाव ज्यु..... कनिके रहिगेल पैढ दिय..... हमरा कवितामे अहाँके विरुद्ध कोनो शब्द नहिं अछी ।। नहि एकल पीडा हमरा कवितामे बिदेशे भुमिपर निकल्ल बेटिके अवाज अछि । अहाँ कि बुझब मनक पीडा, अखन देश बनाब मे लागल छि नै ? ।। बनाउ सुन्दर शान्त बिशल बनाउ एकटा अलग मिशाल ।। हम रौंदामे जैरक रिमिटान्स पठादेब मोह , मया तेज नोर पिलेब शान्तिके प्रतीक बुद्धसंन रहे । बनाउ त्रीमुखी दिया बराबरी प्रकाश तीनु ओर रहै ।। "घुसकें जुस बंद करु"-( कविता) खुर्सी तऽर सँ देबकेँ उपहार पाँचे टकातऽ छै, बन्द करु ऐहन उपकार । सबकेर जैरिया ऐतै छै, कुछ कैर नहिं सकत सरकार, जाँ धैर पोसाईत रहत भ्रष्टाचार ।। खुर्सीकें मन्याता दिउ पुजा नहिं । उन्कर ऐह काज अछि अँहा पछुवा नहिं।। निसपक्क्ष अगुवाकें समान करु । कि त बोतलपर नहिं बिकायल करु ।। घुस पैठीमे नसायल दुनिया तहे तह पर एकर दलान छै । भ्रष्टा आ दलालिकें भिता भितामे दोकान छै ।। नयाँ सुरुवात हेतु ऐहि पोटरिकेर जतनल करु । भ्रष्टाकेर अन्त करु घुसकेर जुस पिनाई बन्द करु ।।"गामकऽ याद"--(कविता) टिफिनमे बसिया भात भैर, नित दिन दौरी काम लाँ। हक हक करैत, आइख मिजैत, जब महिना पुगै, सयोके पछाडि रहि दाम लाँ।। दौडैत-दौडैत तङ्ग भगेली, मनकरैय कनि कैरतो अराम । आँखिमे नोर लैऐक आबै, जखन याद आबे अपन गाम ।। मरभुमी देख कोशीके पानी, मनमे हिलोर मरैय । बड-बड बिलडिङ्ग देख, गामक झोपरी याद अबैय ।। कैहिया देखब कमलके फुल, कमलाके पुल, आँखिके सोझा अबै धनुषा धाम । आँखिमे नोर लैऐक अबै, जखन याद अबै अपन गाम ।। नित दिन छटप्टाइत सुति, सुतलमे देखि सपना मायके । लोट जाउतँ कोना लौटु, अपने तँ छि अन्पढ, सोचैत छि पढाली भाइके ।। कहाँ बिसर्ल छि बगरियाके, कोनाकँ बिसैर जाउ ? मजाकी बाबाके । कोना कऽ बिसैर सकै छि होलि, दिवाली, छठ, गर्म-गर्म रोटि माय हाथकँ तवाके ।। तनतँ कतो यै मन हमर, ओहि सुन्दर बगमे, जैठाम सब मिठ-मिठ बजै, फुल भंभरा लाँ सजै, अपनेपऽ हसिं अबैय, जब होठपर अबै प्रीतक नाम । आँखिमे नोर लैऐक आबै, जखान याद अबै अपन गाम "भुत लागल कतकेँ ?"-(कविता) जहिया अस्थिर छलै मधेश । अपनेपर समपन्न छलै देश ।। सब वर्ण छलै, एके नेपाली, संगे खेलैत छला होलि । कन्फुसकिए मे बिका गेलै, मारै आब छातिमे गोलि ।। पहाड झरैत छल, मधेश जाक रोकैत छला । मधेश दहाईत छल, पहाड आईब कऽ छ्नैत छला ।। हिमालपऽ सबके शान छलै, उच छला सबहक शिर । कोन डकहाके डाह लगलै, केकरा चढलै माथक पिर ।। छिट्का रहल यै गाथल मोति, पकरु उरल कबुत्तरके । हे यो ओझा जि ? अगुवाके भुत लगलै कहाँ के? दक्षिणके कि उत्तर के ।। " नोर बिरान भेल"--(कविता) बर्षोसऽ सजायल सपना, आई टुटिए गेल । बचपनसऽ जतनल नोर, आई बहिये गेल ।। बिधाताके बिधना अछि कि ? चलैत बाट ठेंश लागिये गेल । हजारो सपनाके एकेटा लक्ष्य, प्रप्ति बिफल भेल ।। सपनाके वाटमे अपनाके भुलागेली हम । असली खुसी कहाँ मिलैय, खुसिके डगर भुलाइए गेलि हम ।। गोंदि खेलायल खुसीके बिदाईमे पछुवाईए गेलि हम । सपनाके कहरिया जे ठहरली ! बहल नोर पियेलेली हम ।। अपने देहके अंग आई आन भगेल । आँखीक नोर आई बिरान भगेल ।। प्रवासी जे ठहरलो हम, भरल दुनियाँ सुन सान भगेल । आँखिक नोर आई बिरान भगेल ।। प्रलय अहिं छि (कविता) खटगर छै कि मिठगर?, स्वाद बुझैछी अहाँ दुनुटा । धर्तीपर प्रलय किय कारण, बुझैछी अहाँ तिनुटा ।। भगवान बास करैय हृदयमे, हम नहिं अहिं बजैत छि । हम तँ सेवक छि मुदा, अहाँतँ अंतोके घडी बुझैत छि ।। चाँन्दपर जमिन बिकाईय, जमिन बंझर भगेलै । कारणपर कारण अहि देखाबैत छि, तब कहुँ , अंतक घडी अहाँ बुझै छि कि नहिं ? ।। बिन ब्रेकके देह रातिकऽ जेनै रुकैत छै । सबटा, सबटा जैरिया ओतै अछि होबे करतै, जौं रौतका लिला कम नै हेतै ।। कोना नहिं कहुँ एना ! धर्तिपर बाहरके , बोझ साले साल जे थपैछि । घरसँ वारि तक पुगने बिन छोडी नहिं धर्ती हिल्लापर माला जपै छि ।। अगाडियोके ध्यान दैत गाडी बरहाउ । बंशो कायमे राखु सौख नहि जराउ ।। अगैरा बगैरा सब समापती हेतै चाँन्दोके जमिन बिहानेला रहिजैतै ।। "नव मिथिलाक निर्माण करैत चलु"--(कविता) नेहसँ स्नेह जोरैत चलु धोती कुर्ता पाग लगबैत चलु प्रेम भावकऽ गीत गबैत चलु दुनु हाथे ताली बजबैत चलु नव मिथिलाक निर्माण करैत चलु डेगसँ डेग मिलाबैत रहु अपन भाषा सैदखन बोलैत रहु भिन्सरे भिन्सरे प्राती गबैत रहु अपन हरायल कालाके खोजैत चलु नव मिथिलाक निर्माण करैत चलु अपन सँस्कृतीपर सदैब बिसवाश करु आन-आने रहत अपनापर गुमान करु मरबे करब तऽ अपना माटिला मरु आउ प्यारक हाथ अगाडि करु नव मिथिलाक निर्माण करैत चलु निक बोली सदैब बजैत रहु सुन्दर व्यवहार सगरुप करैत चलु मीत सऽ मित्रता बडबै चलु मानसमान सबके सैदखन करैत रहु नव मिथिलाक निर्माण करैत चलु " करुवाइल स्वाद "(कविता) जगंसऽ तंग भगेली, बेरोजगारीसऽ भंग मोछक यैठन नहिं छुटल, पछोर धैने छी बर्का बर्काके संग ।। नसामे नसायल संसद भवन, गाम गाममे छिटायल बिसकी रम लगैय । प्रजातन्त्रके सवाद आब अलुके चटनीयोसँ कम लगैय ।। घुस पैठी आ दलालिके, तहे तह पर दलान बनोने छै । कन्फुसकीपर चल बला इ निकमा स्वर्ग उताइर देब सब के सपना देखोने छै ।। हम भोट कटा केकरोसँ कम नहिँ छि, एक औंठापर आब लाख टका दाम लगैय । प्रजातन्त्रके सवाद आब, अलुके चटनीसँ कम लगैय ।। दल दल मे फस्ल गाडी , जुवनका रेमिटायन्ससँ खिच रहल अछि आस्नसँ भाषन दैइत प्रजातन्त्रके मिच रहल अछि जाईत पाईतके मुदापऽ उपरेस आब दम लगैय । प्रजातन्त्रके स्वाद , आब अलु के चटनीसँ कम लगैय ।। अखनो बिसरल नहिं छि, जै ठाम खुने खुन सऽ बिहान भेल छलै । अपने घरमे लोक आमने सामुने बिरान भेल छलै ।। प्रप्तीसँ बेसि उदासी आब देख देख पडोसिया हसैंय । प्रजातन्त्रके स्वाद आब अलुके चटनीसँ कम लगैय ।। मानैत छलो जेकरा बृछक जैर ओहो आई अपन कर्म खोजैय । प्रजातन्त्रके स्वाद आब अलुके चटनीसँ कम लगैय ।। "भरिया"--(कविता) मुँह डुबल अछि सनेहमे, तन ढाकल चिथरा कपडासऽ । समयक मारल भरिया, दुःख सुनाबे ककरासऽ ।। चलैत बाट भेटलै पिपलक गाछ, सुस्ताले रे मन !,बृक्षक छाँयामे, देह परल यै झकारी । थुलुर-थुलुर बोईक यैलै भरिया, नेहक सन्देश भारी ।।"सहिद"-(कविता) सहिद हमर अगुवा, उपधिक घरोहर । बिसैर रहल छि उ दिन, नैया डुइब रहल सरोवर ।। सन्कोच नै उन्का मनमे, लुटा देलक घरपरिवार । खस्वादी उ शास्कसँ मङ्ग्ने छला हक बराबर ।। अहुछी ओहि माटिके , जैठाम भेल्छ्ला सपुतक अन्त,। चिता बोइक शहिद्क बेटा, किरिया खैने छल राकके ।। ल छोरब अपन हिसा, बनायब एकटा न्या हिसा । चारु तरफ धुवा देखाय, आदत परल सहक हिन्सा ।। बनाउ इन्कर उपदेशक, एकताक सङ्गहोर । सहिद हमर अगुवा, उपधिक धरोहर ।। प्रवास--(कविता) सजलै छै मार्बल आ पथरसँ चुह-चुह घर करै छै । बिसतर तकियासँ घर सेन्टसँ साजल छै ।। सुतके कोसिस करि रहलछि मुदा निन्द कहाँ अबै । कखनो मायके याद, कखनो प्रीतके याद अबै ।। छ्टपटयतँ छि, कर फेरैत छि, लाख कोसिस करि रहल छि । निन्दिया उडिगेल, मोन बिचलितमे परल अछि मुदा मनकें बुझाबेमे अकाम छि बहुत कोसिस करै छि बिसरके कुछ कमाइ के, कामक चिन्ता सेहो सतबै कुछ न्या करके, परदेशमे छि जे मन ऐहसांस दियबैय ।। उइठक पानी पियै छि कुछ मनके शान्त करै छि । फनु बिसतरप लेटै छि, मन कहाँ मनैय फनु ओहि धुन मे बोवाई छि ।। घर जे रहती संगि संगे घुम जैती पवैन तिहारमे मिठ मिठ प्रसाद खैती । मामा ऐतै हमरा गाम , हम बहन के गाम जैती ।। ओतनेमे अलार्म बजैय, भोरक चार बजल छै, ओहो.... कामप जैबाक समय भगेलै आहिने गुनधुन- गुनधुनमे दिन कटैय । गामक पोखरी तलाव नदि नाल, साथी संगि के याद सेहो नै छोरैय प्रदेश मे छि जे मन ऐहसाँस दियबैय ।। "दहेजक चपेटा"-(कविता) ओकरा फुलमे नहिं काँट छलै , हमरा आगु जायतके फाँट छलै " दुनिया प्रेम दिवस मन्बै मुदा हमर मन कनै ! हम प्रेम दिवसके बिरोधी नहि छि ! हमतँ दहेजके मारल , जायत पायतके सतावल छी एहि तरह , मारल गेल छलै ओहो तंन , मुदा उ मैर गेलै ! हमरतँ नहिं अन्ते भसल नहिं साथ निभयबे सकलि कियकतँ ऽ हम दहेजके रितिमे बाँध्ल छली जायत पायतके रिस्तामे छुटयावल छली कठिनाय उन्को आगु आयल छलै ! मुदा उ निभालेलकै ! हमरा फुलोमे नहिं काँट छलै जेइ प ऽ हम चैल लिति हमरा अगाडित दहेजके जेल छल जैमे हम कैदी कैद भगेली हमरा माथपऽ जाईतके नाम लिखायल छ्ल जैमे हम लेपटा गेलि हम दहेजके चपेटामे प्रेमोके भुला गेलि ।। हेरा गेलै (कविता) हेरा गेलै यौ हेरा गेलै जहिंऐसँ पश्चिमा हावा लगलै तहिएसँ धोती हेरा गेलै । बिसरा गेलै यौ बिसरा गेलै जहिएसँ जेबमे रुपैया भरलै तहिऐसँ अपन रितियो भुलागेलै ।। कहाँ सुन्बै है आब खिसा बाबा दलानमे ब्यस्ताके कारण नहिं अछि समयके बदलैत भुलायल नहिं अछि ई तँ मानवताके असमान्तामे दरार भगेलै । कहाँ बजै है यो बिहनका भोरमे कोयली जहियासँ पंछिके रुप धैलकै मानव तैहिएसँ पंछी बाजके बिसरागेलै ।। कहाँ है यौ मैथिलके धरोहर जहिएसँ अपनैलकै तहिए बिका गेलै । हेरा गेलै यौ हेरा गेलै पुर्खाके सम्पती हेरा गेलै ।। बंदिमे --(कविता) घोडा मुहसऽ घाँस छिनाईत गदहा के थाली लडु सजाईत कन्फुसकिमे बकरी बिकाईत हकके दबबैत देखलौ, हकदारके गोलि मारैत देखलौ ६ महिनाके बन्दिमे । बजारमे जुलुस निकलैत बेसिया के पाउडर लगबैतै बँन्दरके हसैत देखलौ, शेरके कनैत देखलौ, जनता पिटाईत देखलौ, नेता बिदेश भ्रमनमे निकलैत देखलौ, ६ महिनाके बन्दी मे ।। कोयलिके कुहकैत मैनाके गित गबैत खुनक नदि के धरा देखलौ कोमरो तिहार मनबैत देखलौ, नकाबन्दिके सेहो देखलौ ६ महिनाके बन्दिमे । राजधानिमे पार्टीप पार्टि देखलौ, समुचा देशमे महगाई बडैत देखलौ ६ महिना के बन्दिमे ।। "नकामी जिनगी"---(कविता) गामकऽ खुसि छोडिकँ जाय छि यो बिदेश, अहिठाम कुछ कैर नहिं सकैत छियौ माय । दहेजकऽ रुपैयाँ महाजनकें ॠण तिरिते, जल्दिऐ चलि आयब स्वदेश माय ।। सभ दिनकेँ लागि कहाँ, दु सालतँ अछिऐ माय, मायकऽ आँखी नोरसँ भरीकऽ डबडबा गेलै । हम पथर दिलकेँ, कहाँ कानी सकलियै भैया, नोर छुईयोनै सकलकै,हमरा मनमेतँ उमंग छलै ।। धरफर- धरफरमे अपना रुपैयाँसँ अपनाके बेचीलेलियै !! कहियो बेल्चा नहिं चलाइल इ हाथ, कहियो कोदारी नहिं चलाईल इ हाथ, करिरहल छि आई दामके लागि । कहियो बसिया भात नहिं देखने आँईख, सभ दिन ठंडा-ठंडेमे घुमल इ देह, आई करिरहल छि एक साँझ खैबाक लागि ।। सायत... हमर संघर्ष देख दैबोकें जलन भगेलै ! ९ हेक्टरकें भुकम्पसँ घर तोडिदेलकै । दहेजकें चपेटामे बहनोके जरा देलकै ।। आब... मोबाईलो हमरा लेल बैमान भगेलै मात्रे महाजनके बोली सुनाबैत अछि । कहिया तिरबे हमर ॠण .....!! सपने सपना बोकि आयल हम , आब जिनगिसँ दुर होईबकेँ चाहैत छि । दु सालमे नकामिकें बाट देखौने सपना, खाली हाथ घर जैबालेल बाध्य भेल छि ।। सायत ऐहे नकामिके लक्ष्य छलै हमर !! मारुभुमिकें बृक्षसँ , रुपैयाँ नहिं तोडिसकलियौ माय । माफ करिहे , हमर हजारो सपना सपने रहिगेलौ माय ।। आब हम थाकिगेलि यौ, आब हम माईत गेलि यौ जल्दिऐ घुमी ऐबो तोरा शरणमे । मेहनत करब अपने देशमे श्रमे कर पडतै, करबै अपना देशमे ।। " नोर बिरान भेल"--(कविता) बर्षोसऽ सजायल सपना, आई टुटिए गेल । बचपनसऽ जतनल नोर, आई बहिये गेल ।। बिधाताके बिधना अछि कि ? चलैत बाट ठेंश लागिये गेल । हजारो सपनाके एकेटा लक्ष्य, प्रप्ति बिफल भेल ।। सपनाके वाटमे अपनाके भुलागेली हम । असली खुसी कहाँ मिलैय, खुसिके डगर भुलाइए गेलि हम ।। गोंदि खेलायल खुसीके बिदाईमे पछुवाईए गेलि हम । सपनाके कहरिया जे ठहरली ! बहल नोर पियेलेली हम ।। अपने देहके अंग आई आन भगेल । आँखीक नोर आई बिरान भगेल ।। प्रवासी जे ठहरलो हम, भरल दुनियाँ सुन सान भगेल । आँखिक नोर आई बिरान भगेल ।। प्रवासीके होलि सपनामे --(कविता) आई राईत एगो सपना देखलौं, होलिके रंगमे रंगायल छलौं । ढम्फाके धुनमे रमायल छलौं।। खुब जोगिरा गबैत छलौं, गामके चोबटियापर । संगि हाथमे फिंचकारी छलै । हमर जेब भरल गुलालसँऽ छलै भाँगके नसा ओतबे चढैत छलै।। जतेक जोगिरा गबैत छलियै गबैत काल नहिं जानी किय मन हिचैक गेल कर फेरिते निन्द खुलिगेल आँखी खुलिते अपनाके पैलौं बिदेशी खाटपर अहि ठाम तँ हम प्यासे हिचकैत छलौ सायत मन चलिगेल छल,आई मिथिला नगरियामे , ई फगुवा अछी ? सपनामे कोना नहिं आउत ! पुवा पुरिके दिन हम रोटि जे खैने छलौ । रंगमे रंगायबला दिन हम बालुमे जे लेहराईल छलौ ।। सायत अहिबेर के फगुवामे रंगके हकदार हमरो याद कैने छला । हमरो मन बरा पछतायल सायत तैँय सपना ऐहन आईल छला ।। अन्त्त: तँ मनके मनालेलौ मुदा आईखक नोर नहिं समहाईर सकलौ । महसुस भेल , अहि बेरक होलि,हम प्रवासी सपनेमे मनैलौ ।। कलंकी प्रथा---(कविता) यै प्रथाके कोनो लाज नहिं जतेक परहेज ओतेक बडले जाईय तिने अक्षर दहेजकें, सरुवा रिति बेटि फाँसी लटकल जाईय देखु पलैटक यौं कुमरका बापे हाथ देह अहाँके बिकाईय रितिके नामपर दहेज कलंक मैथिल बेटिके नाम घिनाईय भिख मङ्गै छि फटफटिया जब अपने करै छि अहाँ कमाई न्या युगमे ढाठी पुरनके लगैय दहेजमे दगायल बेटि नोर पोछैय बिचलित मन--(कविता) आई काईल नै जानी किय, डेग पछा हटिरहल अछि। देखैत सुन्दर संसारके हमर मन, नहिं जानी किय डैर रहल अछि ।। न्याँ सुरुवातकेँ आशतँ जगैत अछि, जखन पुर्बमे लाल सुर्य देखैत छि। नहिं जानी किय अस्त होईते सब निराश भजायत अछि जखन कुछ न्याँ सोच बनाबै छि ।। असफल सँ बिचलित मन नहिं जानी किय हरपल सफलताके डोर खोजैय । डरतँ ओत लगैय कैला पर लोक जब पानी फेट दैय ।। सायत कहि खोजलासँ भेट जैतै सब प्यार । खोजिक आईन लितियै बसा लितियै संसार ।। एहन भग्य होबाक चाहिँ तेहन नहि अछि लगै दिनोमे अंहार । असफल ई जिन्दगीसँ दुर भँजैतो तेज दितौ संसार ।। बेदना (कविता) नोर कतेक दिन पोछु, खुईलक जियके मन करैय । बिधाताके जे बिधना अछि, घरी-घरी कनादैय ।। एक तर्फ मायाके जाल अछि, दोसर तर्फ , असल पुत्रके कर्तब्य निर्वाह करचाहै छि । छातिके टुक्डा जवानिके मित्र छातिएमे साईटक राखचाहै छि ।। दुख लिखलकै बिधाता, सुख लिख काल, सायत मसि निहैट गेल हेतै । कर्म सँ कखनो पछाडी नहिं छि । जाँ धैर हाथ नहि थर्थरा जाई, ताँ धैर कोशिस करै छि । सायत हमरा कर्ममे कतो खोंट हेतै । तैंय तोरै छि फुल भजाइय काँट चलै छि बाट चलाजाईय माँथ जियके आश आगु जिन्दगी बिफल अछि, नोरे झोरे हृदय कनैय । कतेक सहुँ पर्तर आ बेदना दुनिया तयागके मन करैय ।। पुज्य आत्मा-(कविता) पुजनियँ आत्मा,कहाँ छि अहाँ, हम देह दगारहल छि । पुनः देह प्रबेश क कऽ आउ, हमरा मन्दिरमे , हम गुदा छलाके देह, राक्षस सँ तंग भरहल छि ।। देहक हडि साथ नहिं दरहल अछि । अंग अंगमे छिरियायल नासा, बात-बातमे रुकिरहल अछि ।। असम्भव अछि अहाँ बिन गाडी, हम सिधा देहसँ चलारहल छि । स्विकार करब हे आत्मा पुनःह , आगमनके पत्र पठारहल छि ।। आउ हे पुजनियँ आत्मा आउ, ई शान्तिके देह बारुद सँ छिरिया रहल अछि। बहुत डर भरहल अछि, कहिँ हृदय नहि फुटिजाई । कोनो अंगमे साहस नहि, जे समहाईर सकत आब देहके ।। हे पुजनियँ आत्मा आउ, हमरा मन्दिरमे प्रवेश करु, पुनः हमरा निरोगी बना दिय, अहिँके मोह सँ बाँचल वृक्ष , अखनो हरियालीके सहास कैने छै । कोनो परिवर्तन बदलावनै भेल, ई लम्बा कलहल, अपने अंग सँ बिस्वस्त भरहल छि ।। हे पुजनियँ आत्मा आउ । अपना मन्दिरमे स्थान लिय यै देह के मृत लोक जाई सँ बचाउ ।। "फागुन महिना"--(कविता) बसंतक फागुन ,रंग अबिरा । पुवा पुरी भाङ्ग खाँ ,गैबै कबिरा ।। कोयलीक कुहुकुहु ,मधुर स्वर । लगन उताहुल देखबै ,स्वैम्बर।। प्रेमक जोरि वाट तकै, साल सलिना। हाइ रे ! हाइ,फागुन महिना ...२।। बदाम,राहरकऽ बिज भरल,मन ललयल । आम,बर्हर फुल्लै,देख पंछी कलायल ।। फुर्सतकऽ घुर तापी,ओयर उनक चादर । जङग्ल छोइर,गाछे गाछ घुमै बान्दर ।। नहिं ठंडे नहिं गर्म, नहिं छुटै पसिना । हाई रे ! हाई फागुन महिना २ ।। अपनेमे बेहाल रहै बदाम,ओरहक घुर । चिरी-चिरी भङगेरा बजै,लगन उताहुर ।। ऐह छै ! सालक अन्त,होलि के महिना हाई रे ! हाई फालगुन महिना २।। आत्मक अवाज--(कविता) हम मुर्कटा मुडि खोजिरहल छि । फिर सँ आत्मा प्रवेश लेल देह खोजिरहल छि ।। कायर्ता के घुनमे पिसारहल आत्मा, हमरा देह दे ।। हम मुर्कटा आत्मा देह खोजिरहल छि । जहिना बंन्दुकिया, देहसँ दुर कैलकै आत्मा, हम फिर , अपना माँथ पर लागल कलँक हटाब चाहै छि । गे माय हमरा गर्भमे स्थान दे, हम फिरसँ जन्मलँ पुर्वमे , शान्तिकेँ रंग उराबचाहै छि । स्वार्थी जिन्दा सपूत तोहर, बँन्दरके चंगुरमे फसल छौ । किय, किय हमरा सुतादेले अंचलमे हमरा पुनः आगमन करा, हम मुर्कटा एक बेर आरो, सहिदमे पंत्तिमे नाम लिखाब चाहै छि । गे माय अपना गर्भमे , हमरा पुनः स्थान दे । हम फिरसँ लाल नदिमे नहाई चाहै छि । हमरा शान्ति नहिं मिलरहल अछि, हम बन-बन भटैक रहल छि । स्थान दे , हम एक बेर आरो सहिदकें पंत्तिमे नाम लिखाब चाहै छि ।। "समय संग हम"--(कविता) वाह रे समय वाह ! गजबकेँ तोहर फेर बदल छौ, आखिर आँखिकऽ नोर , हाथसँऽ पोछाइऐ देले । गजबकें तोहर गति छौ, आखिर सबटा खुसी, हाथसँऽ छोडाइऐ देले ।। दुरतँ अपनासऽ कैले- कैले, साथ जे लजैते ओहि ठाम । एक तर्फ खुसिकेँ लडु बटैतै, हम पिति गमकऽ जाम ।। वाह रे समय वाह ! गजबकेँ तोहर कोलहु छौ । जै मे तोरि जिका , सबके भाग्य पेरैत छे ।। एहन मोर पऽ लाक खारा कैले, अपनाके खुसी नहिं साथ बाँट सकली । नहिं मुहसऽ हसिऐ सकली, नहिं हाथसँ ताली बजाइबे सकली ।। दिन राइत मेहन्त करैत छि, मुदा सबटा फल तो छिनाइए देले । वाह रे समय वाह ! कि हम करैत छि? कि हमर लक्ष्य ? कुछो नहिं बुझ सकली । तोरे दोसर नाम भाग्य छौ कि ? तोहर नीति नहिं हम बुझ सकली ।। तो चलबैत गेले, हम चलैत गेलि,साथे साथ मुदा, तैयो तोरा नहिं पहिचान सकली । अन्त्य तँ जवानीसऽ , बुढापामे धकेलिए देले ।। वाह रे समय वाह ! गजबके तोहर नीति छौ आखिर लहरैत चितामे धकेल, हमर आन्त कैए देले ।। वाह रे समय वह ! "भाग्य बिदेशमे"--(कविता) बहरिये खुर्सि बहरिये कलम, लिखदेलकै सब आबेशमे । लगैय जनताकँ भाग्य, लिखदेलकै बिदेश मे ।। कोइ मरै पानी ला तँ, कोमहरो दाहर अबै । केकरो घर अपना बिन सुन सान लगै तँ, कोमरो खुसिके गित गबै ।। बुद्धके देश फसल छै क्रन्तिमे, बन्दुकलँ सबके उताइर देलकै रेश मे । लगैय जनताक भाग्य, लिखदेलकै बिदेशमे ।। समुन्द्रके चिर कोइ,बन्बै डगर, कोइ बसबै रेतमे बस्ति । कोइ उडै हवामे दुनिया राज करै, कोइ करै चाँन्द तारामे गस्ती ।। हमरा पानी के कोनो सिमा नहिं, सबटा गंगा बैह जाइ । पडोसी लोक पथर चिर पानी लबै, अपना रेतपऽ स्वर्ग उताइर जाइ ।। हमर अगुवा कम नहिं बरा जोगरु, जोगालै अपना खुर्सिके जोगालै अपना सत्ताके, आ डुइब जाइ मधु रसमे । लगैय जनताक भाग्य , लिखदेलकै बिदेशमे ।। पहाडक सुन माटि मिलै, तराईयक धानके कोनो मोल नहिं। हिमाल कऽ हिरामोती सागर बहै, अस्तित्वकें, कोनो मोल नहिं।। महानुभाव ज्यु ! काला कोट लगाक , चैल रहल अछि राजनितिके भेषमे । लगैय जनताक भाग्य , लिखदेलकै बिदेश मे ।। "यात्रामे जिनगी"--(कविता) कहियो बिदामे, तँऽ कहियो पढाईमे । कहियो काजमे, तँऽ कहियो घुमनाईमे ।। कहियो मन बहैक जाई कोनो जत्रामे । जिन्दगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ कहियो शादिमे, तँऽ कहियो ससुरालिमे । कहियो पतझरमे, तँऽ कहियो हरयालिमे ।। कहियो मन बहैक जाइ पत्रामे । जिन्दगी बित रहल अछी यात्रामे ।।२ कहियो नोरमे डुईब जाई, तँऽ कहियो हँसि सऽ मन फुईल जाई । कहियो प्रीतके याद अबै, तँऽ कहियो बिछोड्मे मन मुरछा जाई ।। कहियो बहैक जाई मौतक खत्रामे । जिन्दगी बित रहल अछी यात्रामे ।।२ कहियो हवामे उरि , तँऽ कहियो धर्तीपर चली । कहियो खुला मैदामे दोडि, तँऽ कहियो भट्की गलि ।। कहियो ध्यान लगाबी अंकऽक मात्रामे । जिन्दगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ कहियो माईके आंचलमे रहि, तँऽ कहियो बिदेशमे । कहियो पत्नीके बाहमे रहि, तँऽ कहियो स्वदेशमे ।। कहियो सुन्दरतामे रहि, तँऽ कहियो कचरामे । जिनगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ बटोहिया (कविता) आईल छला बिपतमे बटोही बैन कऽ । जियैत छलै सबके आत्मामे बैठ क ।। बडकाके दुलारा छलै,छोटकाके खिलोना । मालिकके नोकर छलै , मित्रके दिवाना ।। हुनरके जोर छलै,पूरा टोलके प्यारा । अन्नाथ छलै मुदा ,गामके छला सहारा ।। गलत के बिरोधी छलै ,सचाइके मित्र । सैदखन करैत जनता,हक हितके जिक्र ।। अनहरमे नहिँ उरियलै , आईगमे नहिं जरलै , ओकरातँ बफादार जिन्दे गाईर देलकै । आईल छलै कहाँस बटोहिया, गाम छोईर कहाँ चैल गेलै बटोहिया, बैमानके जातीतँ ओकरा गोलि मारि देलकै ।। मुदा बटोहिया मरलै कहाँ ।। देशकेहर स्तम्भपर ओकर नाम लिखागेलै । ओकर खुन बयर्थ भेलै कहाँ नेपाल मायकेआंचल लाल रंग सऽ सजागेलै ।। आईल छला बटोही बैनकऽ मुदा अमर भगेलै । बटोहिया अपन बन्श हितके लागि, सबके पयारा सहिद भगेलै ।।२ " सरकार जि"-(कविता) हे यो सरकार ? कँहा गेल हमर अधिकर । हमहुँ छि अहिं देशक बासी, नाम यै हमर मधेशी ।। माटिपर आँच आब नहिं देव, हमरो बाहमे छैक ओते दम ।। जैंय हम छि,तै भोगै छि ? प्रजातान्त्रिक दरबर । हे यो सरकार ? कहाँ गेल हमर ,अधिकार ।।२ किय नहि, बुझै छि अहाँ? छै हकदर । हे यो सरकर ? कहाँ गेल हमर अधिकर ।।कसैया मोथा---(कविता) आई गामसँ बिदा भेला दु साल भगेल परिवर्तन के गति बहुत तेज देखलौं अहिठाम । पतथर तोईरकऽ सुन्दर बस्ती बनबैत देखलौं अहिठाम ।। अहिठामकें रेतमे, इमन्दारिके बिज भरल अछि । मारुभुमिमे हावा संग उडियायत बालुमे, एकता समान्ताक गुण भरल अछि ।। ईमन्दारिके बाट तैय करैत बालु अपन स्थान बनाबैत अछि । हेरायल बिज खोजी-खोजी सुन्दर गाछ बनाबैत अछि ।। फलके आन्नद सब मिल बाँटैत छैक । अप्सोच ! हमर माटी, सुन्दर माटी, उर्वर माटी, ईमन्दारिके बिजसँ झारतँ बनाबैत अछि झार सँ गाछ बनाबक संकल्पतँ करैत अछि मुदा मोथा (घाँस)कसैया ईमन्दारी बिजके जन्मैते झाँपके प्रयासमे रहैत छैक ।। मोथा ईमन्दारी बिज के झाँपमे सफल होईत अछि । जाँ धैर पोसाईत रहतै मोथा ताँ धैर ईमन्दारीक गाछ होनाई अस्मभव अछि ।। अस्मभव अछि बिकास ।। प्रीतक ईन्तजार (कविता) ओहे कमला नदिके बाँध, ओहे गामक पिपलके छैयाँ । मन त हमर अँहिमे डुबल, अहाँ भेलौ केहन कसैया ?।। हमतँ अखनो अहाँकें, ओहि ठाम इन्तजार करै छि । लोट चैल आउ प्रीय,हमतँ अखनो अहाँसँ प्यार करै छि ।। बिस्की, महुवा, रम सब छोरैली, हमरा जिन्दगिमे आबिक । जिन्दगी जियकेंतँ,सिखा देलो, मुदा कहाँ चैल गेलि मन तोडिक।। हमरा मनके बाग सुना-सुना लगैय, सुखल बागमे,अहाँक इन्तजार करै छि । लोट चैल आउ प्रीय,हमतँ अखनो अहिसँ प्यार करै छि ।। "इ किन्कर"( कविता) ई किन्का बारिके फुल हबे । पोखरिमे मुर्छा रहल अछी । रोपबाक सोख छ्ल, निक कैलौं, रोप्लौं बारिमे फुलाक फुल, फेकदेलौं किय ? गामके कुवाँमे, चौबटिया पर । नदि मे, सडक पर ।। जतबे सोखिन छि , वास्ना लेबमे । ओतबे समर्थ राखु, फुलके समहार मे ।। ऐना गंन्ध बिहिन नहिं करियौ एना पोखरी मे छताई नहिं दियौ इ किन्कर सुखकऽ खुसि हबे, इ केकर पापके पोटरी अछि। जुवनका के, किशोरके, जेकर होई, उठा लजाउ बिना झारके फुल ।। छता रहल हबे, लोकके जना रहल हबे बिस्तरके गंध, खायल पियल रोटि नहिं, राईतक गंध, चौबटिया पर गन्हा रहल हबे ।। इ केकर जवानिके पाप हबे लजाउ छता रहल अछि पोखरिमे ।। "अछोप किय कहै छि"----कविता मनमे छुपल अछि बात, हमरा आई कह दिय । खुनकऽ रंग सबके लाल अछि, संगे हमरो पानी पिय दिय ।। हमरा पसिनामे गन्ध नहिं मेहन्तमे खोट नहिं, पैसा सऽ हम मजदुरी बदलै छि । तैयो हमरा अछोप किय कहै छि ? जै घरमे चैन क सांस लैछी, जै रोटिसँ पेट भरै छि, बिचाईर कऽ देखु सबमे , हमरे पसिना अछि । सजावल महलकें प्रतेक कुनामे, हमरे हाथक छाप अछि।। छोट निच तऽ अहाँ छुटियो ने छि हमहुँ तँ मानव जाति अँहु जनैत छि तै यो हमरा अछोप किय कहै छि ? हमरो देह सजायल अछि, लाले लाल खुनमे । दुनिया अकाश छुबै अहाँ, नाची रहल छि जायतक धुनमे ।। रोजो हमरे खिचल ईनारक पानी सऽ, कया जुरबै छि । तैयो हमरा अछोप किय कहै छि ? जैय देव अहाँ पुजि, ओहि देवकें हम पुजारी छि । फरक तऽ अतबे अछि । मन्दिर मे हम पाँउ रखिते,अहाँ अपबित्रताकें संकेत देखबै छि ।। मनावता नहिं सम्पतिके घमण्ड, उठैय अहाँक मनमे,भिन करैत छि।। फनु गामसँऽ बाहर किय सँगे , जल ढरी करैत छि । गाम अबिते हमर अछोप किय कहै छि ? "मिथिला अटल अछि "(कविता) लंका आगु झुकलै नहिं मिथिलानि, रावणो राज्यमे अटल रहै मिथिला । धर्तिके अन्तिम छन तक, ऐहिना फहराईत रहतै मिथिला ।। कियक तँऽ मिथिला एकटा अस्तित्व अछी । मिथिला सबके मनमे बसल भाव अछी ।। रौंदियो सँऽ अकाल परल छलै, तहियो भुखल छलै नहिं मिथिला । कमला कोशी बहिते छलै, सुखल छलै नहिं मिथिला ।। कियक तँऽ मिथिला दैव के राज्य अछी । मिथिला के अपने प्रकृतिक श्रीङ्गार अछी ।। बड-बड संकट ऐलै,ऐह धर्ती पर, सब समा गेलै मिथिला । ऐतै भबिस्यमे जौँ एहन समय, सब घोईट जैतै मिथिला ।। कियक तँऽ मिथिला ज्ञानक भंडार अछी । मिथिला तिनु दैव के मन भायल स्वर्ग अछी ।। राम सोगारथ यादव "भावना"-- (कविता) हे स्वार्थ हमरा छोडि दिय, हम नि:स्वार्थ बन चाहैत छि ।। हमरा मनसँ हटि जाउ अहाँ हम संसारिक प्रेममे, अथावत रह चाहैत छि ।। हे घमण्ड अहाँ हमरा माथसँ हटि जाउ, अहाँ बहुत भारी पैर रहल छि ।। नम्र हृदयके कठोर बनाक अहाँ, अपना अहंकारमे जारि रहल छि ।। हे पाप अपनासँ दुरकँ दिय, अहाँक भागी नहिँ बनचाहैत छि ।। संग रहिक, अपनासँ दुरके अनुभव करि रहल छि ।। हे स्वार्थ , हे घमण्ड , हे पाप, सदाके लागि बिदा भजाउ, हमरा जिनगिसँ ।। नित दिन प्रेमक बारिष हेतै, हटि जाउ हमरा जिनगिसँ ।। "महराज ! ऐना किय ?" (कविता) महराज ! हम अहिठाम खेलैत छलौं, हम अहिठाम, शान्तिक गुण गबैत छलौं । क्रन्ति कि होईत अछी ? अर्थो नै बुझैत छलौं ।। महराज ! पगलैत बर्फ किय, कठोर भगेल अछि ? बहैत पानी किय , रुकि गेल अछि ? किय- किय अपना दरवजो पर, शान्ति महशुश नहिं भरहल अछि ? महराज ! आखिंके रोशनी कम भगेल कि ? हाथ काम करनाई छोईर देलक कि ? हमरा उपलब्धिके फल कत बेच देलियै ? प्रजातान्त्रिक के अर्थ कोन बैग मे नुका लेलिऐ ? महराज ! ऐहे दिन देखला हम अन्चिन्हार भेल छलौं ? याद अछि अपने के ? अहाँके बारिमे निमके पता खाक हम हर जोतैत छलौं । दिय - दिय हमर कमाई जोईख क नै हाथ उठाक दिय मुदा हमर हक बमोजी । महराज ! छनिके सहि स्वतन्त्रता के अनुभव करैत छलौं पुनः किय टायर जराब पर मजबुर कदेलौं ==== गजल==== जराउ नै बिधाके मन्दिर महा पाप भ सकैय काईल अंहुँक संतान अंगुठा छाप भ सकैय सकैछि तँ मनकऽ अहिंसा जराउ देहक मैल छिनु नै किन्को जीवन श्राप महा श्राप भ सकैय सडक हडतालके नामपर बस्ती जरनाई काईल अपनो घर जरिक सखाप भ सकैय भेदभावसँ भरल बस्तिमे गन्तबय खोजै छि? काईल अपने लोक अपने खिलाप भ सकैय अहिंसा भेदभाव जौं मनसँ हटादेबै तखन सुन्दर संसारसँ निक मेलमिलाप भसकैय - --- गजल---- प्रतिगिया कैने छलौ हम, भेटव जरुर माफ करब ! जवना आगु भेलौ मजबुर समयक खेल छै सब,धैर्यता राखु अहाँ एक दिन घुईम आयब, हम छि नै दुर अहाँ ऐनामे देखु,आखिंमे बसल छि हम अहाँके सोझे छि,मन करु नै सकनाचुर प्रेम झुकल नै अछि, भल्हे मैइर गेल है संकोच नै करु, प्रेम अछि नै कोनो कसुर बुझैत दुनियाके संग आयब हम ,अहाँ माङ्ग सजौने रहब, भर आयब सिन्दुर रामसोगारथ यादव ---गजल--- रुप एहने सजायब अहाँ ऐना फहरायब जेना हवा सँग गुडिया मुस्कान ठोरेँ उडायब इसो नै कहब कखनो अहाँ मेकप करायब कैन्को नै दोष देव हम अहाँ माथ नै देखायब कनिक मन शर्मो करु तैँ निक नारि कहायब -----गजल----- जिबैत छि अँहीक, लेल मरैत छि अँहीक , लेल आगि सन जरल ,रौदा सहैत छि अँहिक लेल प्रेमक भुखल, पथर महैत छि अँहिक लेल मनेमे बिछोडक, गित गबैत छि अँहिक लेल वचन ई यैगला , साल अबैत छि अँहिक लेल रामसोगारथ यादव ====गजल==== वाह रे उपर वाला, अहाँ आगु चल्लै नै किन्को जोर तैँ चलिते बाट नै जानी किय आई कानै मन मोर टुटल बिन्दु, समयक परिधिमे घुमिरहल छि हँसिते - हँसिते नहिँ जानी किय बहिजाई दु नोर अहाँक बाट कठिन अछि , तैयो चलिरहल छि शितल ई मन आई अशान्त किय,करै दु:ख शोर लक्ष्य पछाडि दौडैत दौडैत, कुछ नहिं बुझिपैलौ दु:ख भुँजैत नित दिन , कहियो भेल नै नव भोर उटाले दैब आब, जिनगिके जुवा हम हारी गेलौं सहन शक्ति सब हेरागेल, मन परल बिभोर ====गजल==== आहाँ नै पुछु कोना बितैय राईत किन्कालाँ उदास छि पुछैय राईत कतेक सुनसान लगै आहाँ बिनु हम नै आहाँ बुझी बुझैय राईत आहाँ कहैछी बिसैर गेलौं हमरा कते नाम जपै छि सुनैय राईत कोना बिसैर जायब बितल बात याद अबिते आहाँ झुमैय राईत जहि दिन कनि याद आबि नै आहाँ ओहि दिन ई ताना मारैय राईत ====गजल==== पुछु नै अहाँ बिन हम कोना जिवै छि कहियो पौवा कहियो बोतल पिवै छि जहिऐ छोडी गेलियै अहाँ बिचे वाट तखनेसँ खाली पेट नसेमे हिलै छि घायल करेज पुछु कोना तडपैय टुक्रा मिलाकँ दिलकँ पोटरी सिबै छि जगलोमे याद किय ? सुतलो सताबै अँही सपनाके हम दिनोमे चिबै छि हमर जेना तेना अहाँ खुस रहब आई अहिंक यादमे दु शब्द लिखै छि रामसोगारथ यादव ====गजल=== चाँन्द उतरल छलै, आई मटैक-मटैक कऽ रुप हमहुँ देखलौं, आई लटैक-लटैक कऽ केशक चोटि बाँन्हल , नयन कजधार छलै हाथक चुरि बजै ,ओकर खनैक खनैक कऽ नजैर मिलते बुझि , जेना चमत्कार भगेलै चाँन्द खुदे जे आयल, छलै महैक महैक कऽ लग हमहुँ गेलियै, रुप निकसँ देखलियै हाथ उठैबते उ,भागल झनैक झनैक कऽ आँखिक निन्दो हरान भेल,मनो उदास भेल कुछो नै पैलौं राती ,बितल भटैक-भटैक कऽ ------ गजल----- राजनिती आ घुस पैठिके बनल दलान छै लुटतैकि बचतै देश ? अगुवाकेकि प्लान छै दुनियामे अलगे इ अपन चिन्हारी रखने प्रकृतिकसँ भरल देश अपन महान छै कात करोट खुब सुझाई बिचक घाव नहि आँखिऐ सोझा सम्पत्ति बहैत नदि बलान छै स्वार्थी भेल नेता जेब भरमे लागल अछी पाछ लागल आजुक युवा कथिके जवान छै देश जडिरहल जनता मरिरहल अछि गम नहि निपनियाके खुर्सीके ताना तान छै ---गजल --- छिटकु नै भटकु नै बिछे बाट लटकु नै मोका यैलै सटकु नै गर्मे गर्म चपकु नै संग मे सँ मटकु नै -----गजल----- गोर नै कारी छै, जान हमर चित्तकबरि छै , प्रण हमर दन्त खिस्टी ,खिसिऐल रहै छै आबिते करै , सम्मान हमर बिन दहेजेके सैट गेलै उ कारी अछि मुदा शान हमर देह रंग तँ छै , चितकबरि ऐँठे हाथे नोचै कान हमर कोना कपार सटलै हमरा के कैलकै कन्यादान हमर ----- गजल----- मानवके बस्तिमे मानवताके ब्यपार लगैय गुण,दोष बिसैर बनाउल व्यवहार लगैय जोरगरहाके उच्च अवाज निर्धनके लगाम बदलाब कहाँ अछी ?पुरनके बिचार लगैय बाँन्दरसँ मानव जंगलसँ उठिऐलौं बस्तिमे पुनः पंछी जेना नंगा होईत ई संसार लगैय कतनो तरकि करै लोक दु भाग नै बिसरलै पशुके गुण देखबैत मानव उघार लगैय दोष हिंसा ई जलनके हवो सँ तेज गति अछी मानव मानवता बिन तरकी बेकार लगैय ----गजल---- जिवै छि पिबै छि नसामे हिलै छि यादके चिबै छि फाटल सिवै छि नोरसँ लिखै छि राम सोगारथ यादव भाव (रचना) आई ई मन फरु आईखमे पानी भैर देलक बुझैलियै जौं मनके कहैछै आई मदरडे है तैं याद दिला देलौं जो रे जो पापी मन रे माई जे रहितै जिन्दा तँ जरुर मिल यैतियै हम त टुहर छि नै बुझल हौ मन आरो बिचलित होईत हृदयके सेहो कना देलक आईख मे कनिके पानी आईल छल आब तँ आरो नोर बहादेलक साँचे , आईखमे जखन नोर आबैय रुमाल ,तोलिया सँ पोईछ लैछी मुदा जखन मन कनैय तखन वस कान्हिटा परैय ।। राम सोगारथ यादव बधाई अछि प्रीय--(भाव रचना) मारुभुमी सऽ प्रेम दिवसके बधाई प्रीय हर साँसमे समायल रहि एहे दुवाइ प्रीय लिखरहल छी रेतपर बैठक सुहकार करब समय बदलतै अपनो बजतै सहनाई प्रीय मनमे बैठाकँ नोरकेँ सियाही बनाकँ अहिके यादमे कुछ लिख रहल छी आई प्रीय जब याद आबै सुन्दर नगरी सहजे मन मुर्छाई प्रीय ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.प्रयास प्रेमी- किछु गजल २.दिनेश रसिया- गजल ३. नारायण मधुशाला- गीत ४.अशरफ राईन- गजल १ प्रयास प्रेमी- किछु गजल गजल - १ मोनक सब सपना आँइख सँ नोर बनि बैह गेलै ! बितल प्रेमक पल दिलमे छाप बनिके रैह गेलै !! सबदिन हम ओकरासंग सुच्चा प्रेम करैत एलूँ , मुदा आइ ओ निर्मोही हमरा बेवफा नाम कैह गेलै ! देल बेवफाके नामसंग प्रेम बिछोडक' दर्दसब , घायल दिल हमर हँसिके सबटा दर्द सैह गेलै ! अपन दिल पऽ पत्थर राखि ओकरा बिर्सै लऽ खोजलूँ , मुदा फेर सऽ सामनें आबि ओ छुटल घाँ उरैह गेलै ! दिन बितलै माह बितलै संगे सब किछु बिसरैत , यी "प्रयास"के पुरा जीनगी ओकरा बिनु निमैह गेलै ! गजल - २ मिठ बोल बाजिके गर्दन पऽ चलवै छी आरी किए ? दिल सँ खेलके अहाँ बनै छी दिलक' ब्यपारी किए ? जब अहाँके अंग्रेज शहरमे रहैयके छेल तऽ, कहूँ पसंद केलौं मिथिलाके पहिरन सारि किए ? अपना बेरमे हमर करुवो बोली मिठ लागैय , हमरा बेरमे लगावैय छी दिलक' केवारि किए ? बहार सँ सुरत देखैयमे ये चाँनसन चकोर , मुदा भित्री दिलके अहाँ बनौनें छी कारि कारि किए ? जब हमर देलाह सुझावसब खराब नै छै तऽ , कहूँ हमरा हरदम दैत रहैय छी गारी किए ? गजल - ३ जनता के बिसैर संसदमे नेता करै मोज छै ! जहि खातिर जितेल्कै ओहीपर नै कोनो खोज छै !! अधिकार छिनेंलै सबमे हहाकार मचलैय , देशभर हडताल , चक्काजाम भ'रहल रोज छै ! जनताके घरमे नहीं कतौं चुल्ही पजरलैय , संसदके घरमे भ'रहल सबदिन भोज छै ! जनताके खुन सँ मातृभुमी लतपत भेलैय , तहियो नहीं नेतासबके बदलsल सोच छै ! ब्यक्तिगत स्वार्थ खातिर जनताके उस्का उस्काके , वर्तामे जाइके करिरहल कुर्सीके प्रपोज छै ! गजल - ४ हमरा डायर अपनाके फूल सम्झैय ! अपन पायरक' हमरा धुल सम्झैय !! अपनाके जटावाला माहान माहाराजी , हमराके चिलम परके गुल सम्झैय ! अपनाके त्रीपुरेश्वर बंमभोला भगवान , हमराके ओ डमरू आ त्रीशुल सम्झैय ! अपनाके आनन्द सँ रहैवाला मालिक , हमराके अपन मच्छर झुल सम्झैय ! हमराके वेली ,चमेली , गेन्दा आ क्रोटन , अपना सब सँ पैघ अरहुल सम्झैय ! हमरा हरदम आएर गैर बिरान , अपना आपके सबहक मुल सम्झैय ! गजल - ५ देखिते हमरा ओ भ'गेलै दिवानी हमर ! एतऽ कन्ट्रोलमे नै रहलै जवानी हमर !! ओ कहियो नहीं हमर अनादर करैय , ओकरा उपर चलैय मनमानी हमर ! देखनिहार सब देखिते रहिजाएत छै , सब गुण सँ सु-सज्जित छै जनानी हमर ! ओ त' ईशारा सँ सबटा बात बुझि जाइ छै , यौ सबसे बेसी अछि कनियाँ ज्ञानी हमर ! आब त' ओकरा बिनु हम जिअ नै सकै छी , ओ त' बनिगेल छै जीवन कहानी हमर ! गजल - ६ एना किए रुसै छी हमर प्राण अहाँ ! किए ल'रहल छी हमर जान अहाँ !! बचपना अखिन्तो नहीं गेल अहाँ कऽ , मुदा अखन भ'गेल छी सियान अहाँ ! हरदम हमरा नंगोचंगो करिकें , किए उडवै छी हमर धियान अहाँ ! अहिनतिमे यी जवानी बिति जायत , त' कहूँ कहिया करबै लवान अहाँ ! बात मानूँ पकडि लियँ हात हमर हमर अछी अनमोल समान अहाँ ! गजल-७ झुठें कऽ सिनेहक' जालमे हमरा अहाँ फसेलियै किए ? वचन हमरा , तन दोसर पऽ समर्पण केलियै किए ? यै कोमल हमर दिल सँ खुन निकाली निकालीके अहाँ , एना दोसरके जीवनक' महल अहाँ रंगेलियै किए ? हमरा सँ किछु सिकायत रहें तँ दिल खोलीक' कहतौं , मुदा एकाएक बिसैर दोसरके संगी बनेलियै किए ? अदि जीवनभर संग संग चलै के मोन नहीं छेल तऽ , हमरा रंगी विरंगी झुठा सपनासब देखेलियै किए ? आइ अपन जीनगी सँ हमरा दुसमनी भ'रहल छै , यी कहियो नै छुटैवाला वेवफाके दाग लगेलियै किए ? गजल-८ बड सुनर अछि रुप आ रंग अहाँ कऽ ! पावितौं हमहूँ जीवनक' संग अहाँ कऽ !! भोर सँ साँझ चेहरा पऽ मुस्कान रहै ये , केहेन अछि जवानीके उमंग अहाँ कऽ ! गजबे सुरक' संगम अछि जवानीमे , के बजावें पावता यी मिरदंग अहाँ कऽ ! चौक चौराह पर गुलछर्रा छोडैय यें , मारैत कन्खी सबटा अंग अंग अहाँ.कऽ ! नयनक' जाँदूके नै अछि जवाफ कोनो , कमाल करैय ये प्रेमक' जंग अहाँ कऽ ! गजल -९ सामने आबिके अहाँ किए नजर चोरावैय छी ? लगमें बोलाके किए फेर हमरा भगावैय छी ? नजरके सामनेमें दोसरके हाथ पकडिके , किए अहाँ हमरा प्रेमक जहर पियावैय छी ? प्रेमक झुठा सपना देखा देखाके आइ हमरा , हमर दिलके किए एना अहाँ धडकावैय छी ? आइ देखूँ अहाँके प्रेममे पागल बनिके प्रिय , घायल दिलके हाथमे ल'के हम बौवाबैय छी ! प्रेमक दियामे धोखेवाजके हावा लगाके अहाँ , हे यै "प्रयास प्रेमी" के किए एना तडपावैय छी ? गजल - १० नै करै नै किछु करऽ दै झुठें कऽ अटकल छै ! बाँकी जे छै सेहो अपन रसता भटकल छै !! मूह सँ फोडैय लब्बा करनीधरनी किछु नै , बेसरमी जकाँ बिच रसता पऽ थभरल छै ! पायरके निंचाके जमिन खुसकल जाइ छै , बेसरमीके गुमान तहियो नें सटकल छै ! आधा दर्जन निर्लज सबहक टिम बनाके , यौ टिमक कप्तान खेलरहल भलिवल छै ! यौ खेलाडी सबहक खेल देख देख कऽ आइ , दर्शकके हृदय नोर सँ भेल जलथल छै ! गजल - ११ हमर आँखिके सामने हमर दिलके तार टुटि गेलै ! हम देखिते रहि गेलूँ किओ हमर जीनगी लुटी गेलै !! अपन मनमे बहुतोरास सपनासब सजौउने रही हम , सबटा सपना चुर भेलै आ नसिब हमर फुटी गेलै ! दरबदर पागल नेहाएत बौवाबीरहल छियै हम , हमर भाग्य विधाता आइ हमरा संग किए रुठी गेलै ! हरदम सबदिन हम समयके संगमे चलैत एलुँ , मुदा तबो किए आइ हमरा हात सँ समय छुटी गेलै ! प्रयासक' सबटा प्रयास निरासाके बाईढमे भसिएलै , मोनक' सब आशा अभिलाषाके आइ लहास उठी गेलै ! गजल - १२ खजानाके ढेरी सठऽ लाग्लैय मुदा अघावैय नै किओ ! अपन मर्यादा बिर्सि वेसर्मी जेकाँ लजावैय नै किओ !! नव संगीतक' सुर आ धुन सुनैय लेल ब्याकुल छै , रंगमंच पऽ सजाएल साजवाज बजावैय नै किओ ! देखूँ मंडपके सबटा खुटाखभनी सब गाडल छै , यौ राखल छै रंगबिरंगके फूल सजावैय नै किओ ! दक्षिना मागैय छै बभना मात्र सावा टका चारिआना , यौ जज़मान लsछै सौसें हजरिया भजावैय नै किओ ! देखूँ सब आनहर सबके आँखिमे छै धुल झोकल , सामनेंमे छै सु-मार्गके रसता से देखावैय नै किओ ! गजल - १३ अपन वसमे नै ओ अंग केहेन ? जहीमे चमक नै ओ रंग केहेन ? समस्यामे नै कोनो मद्दत करैय , ओहेन साथीसबके संग केहेन ? जे अपने आपमे कटैय मरैय , यी बिना उदेश्यवाला जङ्ग केहेन ? नै कतौं खुशु देखी नै कतौं चमक , छायल उदासीके उमंग केहेन ? नै धुनमे मधुरता नै कोनो सुर , बौका गीतारक' तरंग केहेन ? गजल - १४ मोहक' पिज़डामे फैइस गेल छी भागब कोना ? यौ लोकक' कू-दृष्टिके रेत सँ कात लागब कोना ? सपना देखैत छी सबदिन सत्तकर्मके हम , गहिर निन्द सुतल छी निन्द तोडि जागब कोना ? यौ पुर्खाके अर्जल सम्पति लोक लुटिरहल छै , तकरा बैरीसब सँ बचाके हम राखब कोना ? हम लागल छी मुदा भाइ पडोसीके बात सुनैं , आब अपन भाइके की कैरके सम्झायब कोना ? मन भितरमे यी बातसब गुचौर मारै। छै , से हम शिक्षित मुरुख लोकके देखायब कोना ? गजल - १५ समाजक' सबटा कूरिती अहाँ संग लेनें चलूँ ! संस्कृति संरक्षणके पाठ सबके सिखेनें चलूँ !! जेमहर जेमहर शिक्षामे अन्हार देखैय छी , ओमहर ओमहर शिक्षाके ज्योति जलेनें चलूँ ! यौ समाजक' मस्तिष्कमे जक्रल मैएलके अहाँ , अपन दिमागी ब्रस सँ माझीके चमकेनें चलूँ ! माझल मोएलसबके अहाँ धोवैत धोखारैत , अपन मातृ संस्कृति सँ समाजके सजेनें चलूँ ! रस्ता भटकल बिसरल बाटबटोही सबके , सत्तमार्गक' रस्ताके दर्शन अहाँ करेनें चलूँ ! छोट-बर सबके बराबर नजर सँ देखैत , समाजके संग इन्सानके कर्तब निभेनें चलूँ ! गजल - १६ सोनाचाँनी सँ भरल पुरल जीनगी सुनसान किए ? फूलेफूल सँ सजायल यी महल लागैय स्मसान किए ? यौ हम त' सबकिओके नीक सँ पैहचानी रहल छी , यौ मुदा हमरा सँ सब बनिरहल छै अन्जान किए ? नै किओ गुदानैं यें नै किओ हमर कहल मानैत छै , लोग सम्झीरहल छै हमरा खेलौनाके समान किए ? आब नहिं जियल जाएत छै नहिं मरल जाएत छै , यी मानव जोनि हमरा लऽ भेलैय अनसोहान किए ? यी जीनगी आब हमरा बड्का पहाड बुझाएत छै , हमरा सँ रुसिगेल छै आइ हमर भगवान किए ? गजल - १७ अते पैघ धोका किए अहाँ हमरे साथ केलौ झुठा सपना देखाके अहाँ हमरा संग किए घात केलौं ? बौवाबैत रही हम अपने संसारमे दु:ख दर्द सहैत अपन जीनगी स' अहाँ हमरा किए आजाद केलौं ? अखन हमरा देखिके सारा दुनियाँ हँसिरहल छै, हमरा जीनगीके अहाँ एना किए बर्वाद केलौं ? लोक' क सामने माथ उठाके चल' नै सकै छी हम, हमर खुन सँ अहाँ दोसरक लाल किए हाथ केलौं ? आब त' जीन्दा लास बनिके जीरहल छी हम, कहूँ हमर सपना सबके अहाँ किए श्राद्ध केलौैं ? गजल - १८ देखिते ओकरा हमर नैनाचार भ'गेलै, नै जानी कतऽ कोनाके हमरा प्यार भ'गेलै ! की कहब, कोनाके कहब किछ नै फुरैय, यी चंचल मनमे प्रेमक' बैसार भ'गेलै ! ओकरा देखै बिना रहल नै जाइ हमरा, आब दिनों औशी राति जकाँ अन्हार भ'गेलै ! ओकरा लेल दानापानी सब तियागवैय, आब ऊ हमर जीनगीके आधार भ'गेलै ! कतऽ जा'के खोजी नाम, पत्ता किछो नै मालुम, ओकरा पाछाँ "प्रयास" गजलकार भ'गेलै ! गजल - १९ अहाँ हमर ठोरक' अछि गीत प्रिय , सेनुर स' सजेलौं अहाँके शीत प्रिय ! अहाँ दुल्हिन बनिके एलियै अंगना , नै सर्माबु यी छी दुनियाँके रित प्रिय ! खेलैत बतिसी खेल अहाँ हारि गेलौं , लेलौं अहाँके खेलमे हम जीत प्रिय ! बड्ड अनमोल पुरस्कार अछि अहाँ , बनेलौं अहाँके जीनगीके मित प्रिय ! मिलि जुलि सबटा दु:ख सहवैय , बनेवैय सफल अपन प्रित प्रिय ! गजल - २० हम बाट जोहैत अछि ओ एतै कहिया ? देल वचन हमरा ओ निभेतै कहिया ? कुमारी बैसल अछि हम ओकरे लेल , नै जानि हमरा दुल्हन बनेतै कहिया ? एतऽ मनमे हमर खरेरी लागल छै , मनमे प्रेमक' बारिस बर्सेतै कहिया ? सपना सब कतेक सजेनें अछि हम , यी सपना सकार हमर हेतै कहिया ? जीवनके रंग सबटा बेरंग भ'गेलै , ओ नव रंगसे हमरा रंगेतै कहिया ? गजल - २१ फसि गेलूँ हम समाजक' भिडमे आयब कोना ? कहूँ अहाँ लेल प्रेमक' फूल हम लायब कोना ? बड्ड भारि समस्यामे फसिगेल छी हम सजनी , अहाँ संगमे केल वादा कसम निभायब कोना ? पियास से हमर कण्ठ सुखिरहल छै अहि ठाँ , कहूँ आब प्रितक गीत हम प्रिय गायब कोना ? डेग-डेग पऽ आँगा पाछा पहरेदारी लागल छै , अपन संदेश हम अहाँतक पठायब कोना ? अहाँ संगके ओ प्रेमक' पल बड्ड याद आवे छै , दिल पऽ पाथर राखिके अहाँके भुलायब कोना ? गजल - २२ अहाँके देखिते हमर नयन खुशी सँ बिभोर भऽगेलै ! अहाँके आविते प्रिय हमर जीनगीमे भोर भऽगेलै !! हमर जीनगी औशीके अन्हरिया राइत बनल रहै , अहाँके मुश्कान से यी जीनगी चाँन जकाँ चकोर भऽगेलै ! बुतायल जाएत छलै मन महके आशाके किरण सब , अहाँके स्वच्छ स्नेहके ताप सँ पजैरके धंधोर भऽगेलै ! सुनसान लगैत रहैय हमर यी समुच्चा घर अंगना , अहाँ एलौं लक्ष्मी एलै से सगरो जहाँमे शोर भऽगेलै ! लोकके लेल कारी रहैय सबदिन यी प्रयासके मन , अहाँके मोहिनी रूपके जाँदू सँ यी मन गोर भऽगेलै ! गजल - २३ अहाँ किए हमरा सँ दूर भऽके लैछी प्राण साजन ! अहाँ बेगर निकली रहल छै एतऽ हमर जान साजन !! बिछोडके दर्द हम आब त' सहेय नै सकैय छी, आब त' यी जीनगी सँ भऽगेल छी हम हैरान साजन ! पंक्षी , पवन , झर्ना, खोला हमरा संग मजाक करैय, अहाँ सब जानितो किए बनै छी अन्जान साजन ! ननदी सौतिनीञा हरदम हमरा सँ झगरैत रहैय छै, सास-ससुर सम्झैय लागल छै हमरा बिरान साजन ! आँइखमे एको रति निन्द नहिं होएत छै हमरा पिया, सजाएल सेज अहाँ बिनु लागैय छै सुनसान साजन ! गजल - २४ यै बात मानू हमर हम करैय छी अहाँके प्यार सजनी ! यी जीवन अर्पण करै छी अहाँ पर नै करू इन्कार सजनी !! निन्द हमर हरेलै आँखी स' चैइन नै होएत छै एको छन, एक बेर अहूँ करिके देखूँ त हमरा संग दुलार सजनी ! यै हमर करेजा दिलोजान स' हम अहींके चाहैत छी, सबके सामनें कऽरहल छी अपन प्रेमके इजहार सजनी ! अहाँ जौं एना मूह् मोडवैय हमरा सँ' यै हमर जान, देखूँ यी जीनगी हमर भऽजेतैय बिलकुल बेकार सजनी ! यी नयन हमर आइतक अहींके बाट निहारी रहल ये प्रिय, अह़ीके लेल अखन धरि अइछ यी "प्रयास" कुमार सजनी ! गजल - २५ लागल करेजामे प्रेम बिछोडके बाण यी जीनगी जियल नै जाइ छै ! जेकरा मनके महलमे सजेनें छेलुँ ओ आइ भऽरहल पराई छै !! दुनियाँके केहेन रित बनल सब ताकैय अपना खातिर फाईदा, प्रेमक' सब वादा कसम तोडिके ओ हमरा सँ' भऽरहल विदाई छै ! एतऽ सब किओ हमर अर्थी उठावैयके लेल तैयारीमे लागलैय, ओतऽ ओ हाथमे मेहंदी सजेलकै घर अंगनामे बजैत सेहनाई छै ! सब सखीसब नाँचैत गावैत ओकरा दुल्हिन बनाके डोली चढेल्कै, एतऽ हमरा अछियामे चढाएत सब संगतुरिया नोर बहाई छै ! ओ हरदम सबदिन खुश रहऊ अपन नव सजनाके संगमे, एतऽ अछियामे डहैत "प्रयास"के घायल आत्मा दऽरहल बधाई छै ! गजल - २६ ब्यर्थे हमर जीनगीके इजोरिया डुबें लागल छै ! पियाके बाट तकैत यी नयन हमर जागल छै !! ओकरा बीनू एकोछन मन नहिं लागैय हमरा , नै जानि किए पिया हमर हमरा छोडी भागल छै ! पिया बिछोडके गीत गवैत देखिके लोग हमरा, सबकिओ पाथर मारैय कहै यी छौरी पागल छै ! पीया मिलनके खातिर हमर सुहाग रातिके सेज, यौ बर्षो सँ प्रेमक' फूल संग सजायल राखल छै ! यौ आशे आशमे पुरा जवानी ढलि गेलैय हमर, पिया बीनू हमर जीनगीमे जकरल बादल छै ! गजल - २७ हम त' छी अहाँके साजन अहींके भऽके रहब यौं ! जतेक कलेश देवै अहाँ सबटा हम सहब यौं !! दूर नै करू अपनासे हमरा यौ हमर साजन, अहाँ नै सुनवैय त' कहूँ ककरा हम कहब यौं ! यौ अहीं त' छी हमर भगवान पति परमेश्वर, देहमे प्राण रहैयतक अहींके नाम जपव यौं ! बस अहीं छी एकटा हमर यी जीनगीके सहारा, अहाँ बिनूँ एकपल भी हम जि नहिं सकब यौं ! अदि अहाँ आबो नहिं मानब त हमर प्राणनाथ, अपन खुन सँ यी जीनगी अहाँके नाम लिखब यौं ! गजल - २८ बसिगेलौं अहाँ हमर मनमें प्रिय प्राण बनिंके , सोभा बढा दिअँ हमर दुवारके दलान बनिंके !! देखूँ अपन मनमें प्रेमक' मण्डप बनेलौं हम, अहाँ आबिके आसन करु प्रिय जजमान बनिंके ! हमर मनके मन्दिरमे प्रेम यज्ञ सजायल। छै, अहाँ यज्ञमें समा जाऊ साकलके समान बनिंके ! बड्ड उदास लागैय हमर यी सुनसान जीनगी, यौ अहाँ मुश्कान लाबि दिअँ दुतियाके चाँन बनिंके ! यौ सखाप क'देवैय दुनियाँसे प्रेमक' बिरोधीके, हम प्रेमक' तीर तऽ प्रितम अहाँ कमान बनिंके ! गजल - २९ प्रिय प्रेम हमर हमरा गुलावके फूल तोइर दिअँ ! टुटल कोमल मनकें हमर अहाँ प्रिय जोइर दिअँ !! मन करैय भगवानके हम प्रेमक' फूल चढावितौं , हमरा प्रेमक' बगियासे प्रेमक' फूल लोहैएर दिअँ ! बिगरल रस्तापर चढि गेलैय यी जीनगीके पहिया , सुमार्ग दिस हमर जीनगीके मुह् अहाँ मोइर दिअँ ! किछु नहिं फुरैय हमरा आब हम की करि अहिं कहूँ , चलूँ मिलके संग संग ऊ बितलाह बात बिसैर दिअँ ! मुडि हिलावैके इशारा हमरा समझमे नहिं आवै ये , यौ अपन मुखारविन्द से प्रेमक' आवाज चिकैर दिअँ ! गजल - ३० याद करै छी ओकरा जे ओ एतै कहिया ? मनके ललुसा हमर पुरेतै कहिया ? अपन मांग स'जौउनें बैसल छी हम , ओ सेनुर सँ हमर मांग सजेतै कहिया ? जोवनक' रंग सब धोख्रल जाएत छै , ओ नव रंग जोवनमे लगेतै कहिया ? ध्रुव दर्शन लेल मन छै ब्याकुल हमर , ओ हमरा ध्रुव दर्शन करेतै कहिया ? घर अंगना सुनसान लागैय हमर , नै जानी ओ प्रेमक' बाजा बजेतै कहिया ? हमरा संग केलाह वादा कसमके ओ , हमरा दुल्हिन बनाके निभेतै कहिया ? गजल - ३१ सुरुजक' छेहाएरमे सबदिन पसिना चुबावैय छी ! जीवनक' सब दु:ख दर्दके अपन मीत बनावैय छी !! रस्ता पेरामे भेटल सब अनचिन्हारके संगमे लऽके , सब किछु जानितो हम दुश्मन संगे गाला मिलावैय छी ! सुखमे सबकिओ हमरा संगे हँसैत खेलैत रहैय , पडल दु:ख तऽ हम अखन अस्गर नोर बहावैय छी ! सुरुजक' छेहाएर सँ झर्कल हम अपन देहमे , जीनगी जीवैय लेल गरिबीके मलहम लगावैय छी ! बगिचामे मजरल मजरमे महुवा लागल देखि कऽ , भोर साँझ जखनें तखनें हम बिरह गीत गावैय छी ! गजल - ३२ बर्षो स' सजाएल सपना हमर आइ किओ लुटि गेल ! सब किछु बाइढमे भाँसल नसिब हमर फुटि गेल !! मनमे बनाएल प्रेमके सुन्दर महल हमर आइ , हमरे आँखिके सामनेंमे झहैर झहैरके टुटि गेल ! नै जानी कुन गल्ती भेल हमरासे ओकरा संगमे , मूह घुमा लेल्कै, हमरासे हमर विधाता रुठि गेल ! कुन कर्मके सजा तु देलह हो भगवान आइ हमरा , हमर सामनेंमे आइ हमर जाँनके डोली उठि गेल ! प्रेम बिछोडके दर्द नै सैह् पेलूँ आँखिसे नोर गिरल , पता नै पेलूँ हम हमर जिन्दा लाससे प्राण छुटी गेल ! गजल - ३३ लाल लाली लगाएल अइछ ठोर अहाँके ! चमचम चमकैय चेहरा गोर अहाँके !! कतs हेरा गेलौं किए नहि बाजिरहल छी , चिकैर चिकैर कऽरहल छी शोर अहाँके ! हर बखत बौवा बुच्चीके फटकारैय छी , कोनाके बनिगेल हृदय कठोर अहाँके ! केकरो जि मे नइ लगवैय छी आइकल , देखरहल छी भ'गेल मूह जोर अहाँके ! नीक बात कहला स' कुरकुटाके लागै ये , झुठेके आँखिसे बहीरहल नोर अहाँके ! गजल - ३४ नोरक' मईस स' हम जीनगानी लिखै छी ! अपन दु:ख सुखके हम कहानी लिखै छी !! स्मरण भ'रहल छै ओ प्रिया संगके पल , याद कऽके अपन हम ओ जवानी लिखै छी ! समाजके विपरित प्रियाके अपनेंलाह , आइ ओहें हम अपन मरदानी लिखै छी ! प्रियाके खातिर सबके संग झगरलाह , अखन ओहे अपन पहलवानी लिखै छी ! सम्झैत ओ दिनसब आँइख रसा गेलैय , सोचैत जीनगीके बाइढक' पानी लिखै छी ! गजल - ३५ यौ जखनें जखनें नेतासब गद्दार भेलैय ! यौ तखनें तखनें जनता बलत्कार भेलैय !! जखन सत्ता हथियावै के समय आएल त' , झुठेके अस्वासनके जनमे प्रचार भेलैय ! जब अपन अधिकार मागलक जनता त' , तब जनता पर सत्ताबल प्रहार भेलैय ! आइ मधेश भुमि पऽ खुनक' दाग लागलैय , मधेशीके उपर कतेग आत्याचार भेलैय ! नेतासब कुर्सि खातिर भागदौड करैय छै , निमुखा जनता आन्दोलनमे आचार भेलैय ! गजल - ३६ दिलमे लागल आँइग हम देखायब कोना ? मरल मनके आत्माके हम .जिआयब कोना ? देखूँँ हम अभागलके जरल कपार छै , महलके सुख भाग्यमे लिखायब कोना ? यी जीनगी हमर जनमासक जालमे छै , डेग-डेग पऽ छै बाधा आब बचायब कोना ? चलैत चलैत हृदयके कण्ठ सुखि गेलै , आब कतऽ सँ की लाएबके पिआयब कोना ? बड्ड जिम्मेवारी यी मानव तनके रिस्तामे , यौ बड्ड भारी यी रिस्ता हम निभायब कोना ? गजल - ३७ हमर मनके सपना कहिया साकार हेतै ! मन भितरके भावना कहिया बहार हेतै !! मनक' चौपारि पर बनाएल योजनासब , यी जनमासक' बिचमे कहिया प्रचार हेतै ! दर-दर भटैक रहल छी लोकsक देशमे , अपनें भुमि पऽ कहिया नीक रोजगार हेतै !! लडैत लडैत शहीद भ'गेलैय भाइसब , अहिंपर संविधानमे कहिया विचार हेतै ! छुपाएल प्रयासक' यी संघर्षके डेगसब , लोकसबके नजरमे कहिया देखार हेतै ! गजल - ३८ फसि गेलूँ प्रेमक झोलमे मन कानि रहल छै ! देख हमर तडप निर्मोहीया फानि रहल छै !! हम कोनो गल्ती नइ कलौं ओकरा संग प्रेममे , यी सबटा बातसब धोखेवाज जानि रहल छै ! हम त' ओकरा सबदिन सँ प्रेम करैत एलौं , मुदा ओ हमरा बेवफा नाममे सानि रहल छै ! अतेक बडका इल्जाम लागाएत हमरा पऽ , यौ एकोरति नइ हमर यी दिल मानि रहल छै ! मन करै बिर्सि जेतौं सबदिनके लेल ओकरा , ओ त' अखिन्तो हमर हृदयके रानी रहल छै ! गजल - ३९ फाटिगेल करेजा दुई टुक्रा आब हम सियब कोना ? दर्द त' बड्डजोर होएत छै आब हम जीयब कोना ? यौ मन होएत अछि जहर पीबि कऽ मरि जेतौं हम , मुदा हाथ थरथराएत छै से जहर पियब कोना ? अपनें मनक' बात मनके रसेरस खारहल छै , यौ यी मनके भीतरके बात केकरो हम कहब कोना ? पिया बिनू एकोरति निक नै लागैय छै घर अंगना , यौ आब हम यी चढल जवानीके दर्द सहब कोना ? पिया बेगर हमरा यी दिनो औशीके राति सामान छै , ओकरा बिनू तीन तीन साल असगर रहब कोना ? नाम :- प्रयास प्रेमी मैथिल ( साहित्यिक ), राम नारायण मेहता (वास्तवीक ) पता :- डुम्राहा - ९ , सुनसरी , नेपाल । अखन :- मलेशिया २ दिनेश रसिया गजल कनकनीमे ठरल पाइन इन्हेर नै भ जाइ । गरिबक घरमे कही कतौ भोर नै भ जाइ ।। मुह त सिबक रखनैये छै सोसकसब, सियल मुह फेरसं कही जोर नै भ जाइ । एक साँझ भुखले रहै छि मिता अखनो हम, धियापुताक दशा देख मनकही अघोर नै भ जाइ । अपन बात राखैयोके स्वतन्त्रता नै देखै छी, स्वतन्त्रताले माहुुरसन कही तिलकोर नै भ जाइ । ध्यान देबै यौ गौँवासब रसियाके बात पर, मेहनतके फल फेरो कही घरक चोर नै ल जाइ । ३ नारायण मधुशाला गीत अपन कारी नैनासँ चलेलक' हमरा प' चपेट जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट गाछीमे मचान पर हम ओँघरल रही सहेलीसँगमे टुकला खालि ओ आयल छली कमल नयन देखैत भेल हिआ मोर अचेत जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट वसन्तेसन मन ओकर छल, रौदमे तपिकऽ माथा प' पसिना, नयाँ पल्लवीसन लाली ठोरपऽ खुलल कारी केशीयामे लेलक' मनके लपेट जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट ऋतुए सँग गेल ओहो, आबि गेल विरहक' ग्रीष्मऽ आब तँ ओकरा देखैल, बेकल रहैछी हरक्षणऽ के सुनत हिआक दु:ख, के बुझत कलेश ? जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट अपन कारी नैनासँ चलेलक' हमरा प' चपेट ४ अशरफ राईन गजल सब लुटैत रहल बस हम लुटाइत रहलौ करति नीक काज तबो पिटाएत रहलौ मन तऽ साफ छलै झलकैत ऐना जकाँ तैयो नैऽ किया किनको सोहाएत रहलौ उठाबैत सब फायदा सोझापन के हमर झूठे हम सब केऽ नेह में बन्हाएत रहलौ लगाक छाती सँ दिल निकालि लै छै तबो जालिम केर सहर में हम रमाएत रहलौ सुख बटैत दुःख नुकाबैत अशरफ़ तैऽ सफल बाट पऽ सदति मुसकाएत रहलौ अशरफ़ राईन हॉल :दोहा ,क़तार ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.संतोष कुमार झा- सुजनी शिल्प २. आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल ३. जगदानन्द झा "मनु"- भक्ति गजल आ कविता ४. ज्योति चौधरी- हम छी क्षोभित १ संतोष कुमार झा वरिष्ठ संकाय एवं पाठ्यक्रम निदेशक (फाउंडेशन),चर्म वस्तु एवं उपवस्तु डिज़ाइन विभाग, फुटवेयर डिज़ाइन एवं डेव्लपमेंट इंस्टीट्यूट, ए-10/ए, सैक्टर-24,नोएडा. सुजनी शिल्प मिथिला मे, आबाय मौसम चारि, बरखा, जार, वसंत, ओ गर्मी! चाहे मौसम, जेहो होमय, नरम बिछौन, ताकय नीन! नीन मीठ, सुजनी देबय, मौसम संग, अपन गुण बदलय, चाहे मौसम, कोनो आबाय, एकर महत्ता, कम नै करि पावय! सुजनी मिथिला कें, कला-विरासत, घर-घर मे, आबय जे काज! पुरान-धुरान, फाटल, नूआ, सुजनी कला में, काज आबय! बैस आँगन, सीबय सुजनी, मैइयाँ, काकी, मौसी सब घेर! गाबि-गाबि, संगीत मधुर, हास्य-व्यंग के मिसरी घोरि! सुइया, खरी, इंची, कैंची, तागा, रंग-बिरंगक चाही! लत्ता-नूआ बईसा, नाप संग, मजबूत सिलाई, सुजनी कें चाही! कैथी, करी, कट-कटुवा आदि, रचलक कढ़ाई, लय रूप अनेक! कढ़ाई कला मे, माहिर महिला, कथा-चित्र, फूल-पत्र आदि, बनबई छथि! कन्यादान, द्विरांगमन, छठिहार, सुभ काज नहिं, सुजनी बिन पूर्ण! घर-घर मिथिला मे, भेटत सुजनी, मैथिल संस्कृति कें, ई श्रेष्ठ पहचान! 2 आशीष अनचिन्हार २ टा गजल 1 काज गुलाब बराबर घाम शराब बराबर सुख छै पन्ना पन्ना दुख तँ किताब बराबर छै धर्मक आँगनमे घोघ नकाब बराबर क्रेडिट जय डेबिट जय फंड हिसाब बराबर ठोरो चुप मोनो चुप प्रश्न जबाब बराबर सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। 2 कियो अपनेसँ क्लीन बोल्ड कियो अनकेसँ क्लीन बोल्ड कियो खेपैए कानि कानि कियो हँसियेसँ क्लीन बोल्ड कियो हाँ जी हाँ जीसँ जिंदा कियो नहियेसँ क्लीन बोल्ड कियो पसरल छथि झूठ मूठ कियो सहियेसँ क्लीन बोल्ड कियो छै पासी केर संग कियो कटियेसँ क्लीन बोल्ड सभ पाँतिमे 122+2221+21 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। ३ जगदानन्द झा 'मनु' भक्ति गजल आ कविता भक्ति गजल आइ मैया बजेलनि हमरा अपन दर्शन दिएलनि हमरा मनक शक्ती सगरो छनमे आइ मैया दखेलनि हमरा हुनक महिमा कते छनि भाड़ी ज्ञानकेँ दिप जरेलनि हमरा पाप सगरो हमर बिसरा कय छोट बेटा बनेलनि हमरा दय क' ममता अपन आँचरकेँ मनु करेजसँ लगेलनि हमरा (मात्रा क्रम; 2122-122-22) कविता भीख नहि अधिकार चाही, हमरा मिथिला राज चाही जे हमर अछि खूनमे ओ खूनक अधिकार चाही जनक वाचस्पतिकेँ पुत्र हम, हमर चुप्पीकेँ नै किछु आओर बुझू शांतचित्त हम समुद्र सन, हमर क्रोधकेँ सोनित चाही सिंह सन हम बलवान रहितो, मेघ सन हम शांत छी ई जुनि बिसरी ऊधियाइत मेघकेँ, मुठ्ठीमे संसार चाही जाहि कोखिसँ सीता छथि जनमल, ओहि कोखिक संतान छी बाँहिमे प्रज्वलित अछि अग्णि, बस एकटा संकेत चाही भूखसँ व्याकुल छी, मुदा उठाएब नहि फेकल टुकड़ी कर्ण बनि जे नहि भेटल, ओ ममता केर अधिकार चाही माए मैथिली रहती किएक, निसहाय एना एतेक दिन होम करे जे तन मन अप्पन, एहेन लव कुश सन संतान चाही ४ ज्योति चौधरी हम छी क्षोभित भारतीय न्याय पद्धति चलैत काछुक गति अर्जिक मंजूरी चाहैत छी त बेच बिकिन लिया सब संपत्ति जे भ्रष्ट अछि अत्याचारी अछि घूमि रहल अछि झुण्ड बना क बिन डिग्री आ बिन किताब के परिचित अछि सब दाँव पेंच स आत्मसम्मान के लड़ाई में क्षण - क्षण बिलखि रहल पीड़ित जन डेग - डेग पर नब परीक्षा असगर अपने छोडने सब अपन सत्यक गरिमा पर अखनो भरोस अछि वकील समुदाय कनि हमर विनती सुनु न्यायक अधिकार हमर अपन अछि कर्त्तव्य आ लोभ में एक के चुनु ज्ञान बिना नहि वकालत झाड़ू जिरह के बहाने करै की शोषित न्यायक दर्श भेल दुर्लभ अछि अहि अन्याय पर हम छी क्षोभित ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॊ शशिधर कुमर- किछु सचित्र बाल कविता पाकल आम (छवि वा सन्दर्भ आधारित ६ गोट कविता) कहियो - कहियो सभ किछु ठीक रहितहुँ, पर्याप्त समय रहितहुँ, लाख प्रयासक बावजूदहु किछु नञि लिखाइत अछि । कहियो तकर ठीक विपरीत, मोन चहुचङ्ग रहितहँ, बिना कोनो खास प्रयत्नक, बहुत कम समयमे अनायसहि बहुत किछु लिखा जाइत अछि । सएह भेल १० जून २०१६ ई॰क भोरमे । फेसबुक फोलल, श्री बिभूति आनन्दजीक (मैथिली वरिष्ठ लेखक) प्रोफाइल फोटोक रूपमे आमक झब्बाक छवि लागल छल । झब्बामे चारिटा आम छल आ ताहिमे एकटा पाकल (पीयर ढाबुस), एकटा अधपक्कू आ शेष दू टा काँच (किंवा डम्हाएल) छल । झब्बा नीक लागल - ताहि सन्दर्भ पर एक टा कविता लीखल । तकरा बाद पाँचटा आओरहु कविता धरा-धर अपनहि-आप लिखा गेल । ०१ एक अधवयसू − दू टा जुआन । संगहि एक गोट “पाकल आम” । सुन्नर समय − विहंगम दृश्य, तीन पीढ़ी केर भेल मिलान ।। जिनगीक गति छी एहने भैय्या, सब अबटीमे “पाकल आम” । समयक चालि ने बदलल कहियो, तूबत बनि सब पाकल आम ।। समय हाथ - जीबू मस्तीमे, जिनगी केर नञि कोनहु ठेकान । कनितहि रहब, हँसब कहिया फेर, उलहन − देव भेलाह बेइमान ।। ०२ एक परम पाकल प्रबुद्ध, दोसर पकबा लए प्रेरित अछि । तेसर - चारिम से देखि रहल, खेला देखि अचम्भित अछि ।। पहिलुक अछि सत्ता हथिअओने, आनक सत्ता लए काल बनल । दोसर सोचए, तूबए पाकल, तखनहि तँऽ गुरूघण्टाल बनब ।। तेसर - चारिम छी मूक प्रजा, सब देखि रहल आ सोचि रहल । सत्ताक समर नञि प्रतिभागी, परिणाम मुदा सब भोगि रहल ।। ०३ एक गुरू छथि दीप्त ज्ञानसँ, दोसर किछु अवभासित छथि । तेसर - चारिम नव शिष्य हुनक, संगति बैसल आह्लादित छथि ।। कहथि गुरू - ई ज्ञान थिकहि, बँटलासँ कहियो नञि घटैछ । अज्ञानक अम्मत टिकुला, ज्ञानहि बल मधुर रसाल बनैछ ।। सद्-ज्ञान गुरूक छी झलकि रहल, पीताभ मधुर आमक फल सनि । संगतिमे अम्मत काँच आम सेहो, बदलि रहल पाकल फल सनि ।। ०४ एक दूइर दोसरहुँकेँ करैछ, से संगति केर प्रभाव छै । पाकल देखि कऽ काँच पकैए, फऽड़क सहज स्वभाव छै ।। एक जँ उजिआएल, दोसरहुमे उजिअएबा केर भाव भरैछ । जँ केओ बुड़िआएल समूहमे, सभक भविष्यक काल बनैछ ।। एक शराबी इएह चाहैत अछि, मित्रहु बैसि शराब पिउबए । मुदा तपस्वी सदिखन चाहैछ, संगीक तप - जंजाल तजए ।। संगति केर महिमा छी भारी, एहि झब्बामे से बुझा रहल । पाकल देखि पकैए दोसर, तेसर-चारिम छी डम्हा रहल ।। ०५ देखि सुपुक - पाकल - गोपीकेँ, मोन करय खएतहुँ ओकरा । बहुत ऊँच छी, चढ़ि नञि तोड़ब, फेंकि रहल छी तेँ झटहा ।। गछपक्कू तँऽ गछपक्कू छी, दोसर पालहु पर पका लेबै । संगमे कँचका सेहो खसल तँऽ, गोड़ि अनाजमे पका देबै ।। ई की भेलै ! गछपक्कू तँऽ, अपनहि तूबल आओर खसल । हमर मोन भगवानहु बुझलन्हि, हापुस आम ओ बिहुँसि रहल ।। सुपुक = सुपक = सुपक्व गोपी = सुपक्व निदग्ग पीयर वा लाल-पीयर गछपक्कू आम हापुस = रत - रत करैत सुपक्व गछपक्कू आम (मराठी आदि भाषामे "हापुस" आमक एक गोट प्रकारक नाम थिक, मुदा मैथिलीमे ताहि अर्थमे नञि प्रयुक्त भऽ कऽ निर्दिष्ट अर्थमे प्रयोग होइछ) आमक बिहुँसब = गछपक्कू आम जखन बेसी ऊँचाईसँ तूबि कऽ माटि पर खसैछ तँऽ ओ एक वा एकाधिक स्थान पर (प्रायः ऊपरमे या बगलमे/पार्श्वमे) फाटि जाइछ । एहि घटनाकेँ आमक बिहुँसब ओ एहेन आमकेँ बिहुँसल आम कहल जाइत अछि । ०६ पाँचहु आङ्गुर नञि छी समान, नहिञे दू गोटे संसारमे । भाँति - भाँति केर लोक भेटैए, अप्पन सभक समाजमे ।। एक्कहि आमक झब्बामे छै, काँच, डम्हाएल आ पाकल । तहिना समाजमे लोक थिकै, अपना - अपनी काजेँ पागल ।। किछु प्रबुद्ध, किछु अतिप्रबुद्ध, सामान्य तथा किछु निर्बुद्धी । सुजन - सुबुद्धि सेहो बहुतहि, किछु रहैछ अनेरहु दुर्बुद्धी ।। ओहुना ई सभ किछु बदलैत छै, समय - वयस - अनुभव संगे । सबहक अप्पन अलगहि महत्त्व, आ काज आबैछ अपना ढंगे ।। पाकत जञो सभटा आम संग, एक्कहि बेर भऽ जायत ढेरी । तेँ तकर व्यवस्था प्रकृति करैछ, पकबैछ ओ आम बेरा - बेरी ।। कबार (बाल कविता) छी कंकूर - सहोदर, पर हम ओकरासँ किछु छोट छी । नाङ्गरि पातर छोट-क्षीण मोर, ओक्कर तँऽ चौकोर छी ।।*१ कंकूरहि सनि लोल हमर, आ देहक कारी रंग छी । माथ सेहो एकवर्णी कारी, लाल ने ओक्कर रंग छी ।।*२ सालक किछु एहनहु महीना, लोहाक बीझ सनि रंग हमर । देहक चमक बढ़ल - बदलल, हरियर-कारी छी पंख हमर ।।*३ कंकूरक सनि भलहि लोल छी, अलगहि पर सब ढंग हमर । हम नञि भेटब दूर चऽड़मे, पानिक श्रोतक संग हमर ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - करांकुलक अंग्रेजी नाम BLACK NAPED IBIS अछि आ कबारक GLOSSY IBIS, तेँ दुहुमे बहुत नजदीकक सम्बन्ध अछि । तथापि, दुहुमे बहुत किछु भिन्नता सेहो अछि आ तेँ प्राणीशास्त्रक वर्गीकरणमे सेहो दुहु अलग - अलग वंशक चिड़ै अछि । करांकुलसँ कबारक आकार छोट होइत अछि । करांकुलक नाङ्गरि चौकोर होइत अछि जखनि कि कबारक अपेक्षाकृत कम चौकोर ओ छोट । *२ - कबारक आकार-सुकार देखबामे करांकुलहि सनि लागैत अछि । लोलक आकृति सेहो कंकूरहि सनि रहैछ । पर, कबारक माथक ऊपरमे कंकूर जेकाँ लाल रंग नञि रहैत अछि । *३ - सालक किछु महीना एहन होइत अछि जाहिमे कबारक देहक रंग भूरा-कारीसँ बदलि बीझायल लोहाक रंगक (RUSTY COLOUR) आ चमकयुक्त (GLOSSY) भऽ जाइत अछि । दुहु पंखक रंग बदलि कऽ कजरी सनि गाढ़ चमकैत हरियर भऽ जाइत अछि । *४ - करांकुलक विपरीत कबार जलाशयक आस-पासक क्षेत्रमे भेटैत अछि । पानिक श्रोतसँ बेसी दूर ई चिड़ै नञि देखाइ दैछ । करांकुल (बाल कविता) एत्तेक मेहनति किएक करै छेँ ? अपन स्वास्थ्य पर ध्यान ने दै छेँ । कारी - झामरि देह भेल छौ, अनमन्न तोँ कंकूर लागै छेँ ।। जे “कंकूर” छै सएह “करांकुर” । इएह “कालकण्टक” आ “करांकुल” । एकरहि उपमा रोजहि बाजथि, तइयो तोँ एकरा ने चिन्है छेँ ।।*१ चिड़ै ई कारी, धुत्थुर - कारी । लेशहि उज्जर, आँखियहु कारी । माथक लाल रंग केर कारण, भ्रमसँ तोँ “लालसर” बुझै छेँ ।।*२ प्रायः छोट झुण्डमे भेटैछ । बाध - बोन आ चऽड़मे भेटैछ । पानिक श्रोतसँ दूरहि देखही, धारक कातमे किएक ताकै छेँ ।।*३ लोल एकर किछु खास लागैत छै । बिनु बेँतक गैंतीसँ मिलैत छै । या फेर तकरहि सनि आकृति छै, जकरा तोँ तरुआरि कहै छेँ ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “कंकूर” केर उपमा अपना दिशि बहुत प्रचलित अछि, पर बहुत कम्महि लोककेँ बूझल अछि जे “कंकूड़ या कंकूर” एक टा चिड़ै केर नाम थिक । किछु लोक “कंकूर” शब्दक उत्पत्ति “कंकाल” शब्दसँ मानैत छथि − शायद ओहो लोकनि सही छथि । सूखि कऽ कंकूर भऽ गेलेँ - कंकालसँ कंकूरक उद्गम दिशि ईशारा करैछ । चिड़ै दिशि ईशारा करैत बाँकी उद्धरण उपरुका कवितामे देल गेल अछि । *२ - बहुत लोक एकर माथ परक लाल रंग देखि “एकरा” भ्रमवश “लालसर” चिड़ै कहैत छथि − से गलत थिक । चिड़ै केर सम्यक जानकारी रखनिहार/-रि लोकनि जनैत छथि कि लालसर आन चिड़ै थिक । *३ - उड़ए बला अधिकांश पैघ चिड़ै कोनहु-ने-कोनहु प्रकारक जलाशयक नजदीकमे भेटैछ । मुदा, करांकुल प्रायः जलाशयसँ बहुत दूरक घासयुक्त मैदानी क्षेत्रमे भेटैत अछि । कखनहु - कखनहु जलाशयक आस - पास सेहो भेटि सकैत अछि । *४ - एकर लोल केर आकृति विशिष्ट प्रकारक होइत अछि जे कि देखबामे बिना बेंतक गैती (PICK AXE) या फेर भीतर दिशि वक्रित तरूआरि (INWARD CURVED SWORD) सनि लागैत अछि । राजहंस या हंसावर (बाल कविता) हउए देखियौ “अरुण - क्रुञ्च”, वाह ! केहेन रमणगर लागैत छै ! *१ सागर तट पर झुण्डक - झुण्ड ओ, केहेन सोहनगर लागैत छै !! *२ खन सारस सनि ठाढ़ भेल छै, खन हंसहि सनि हेलैत छै ।*३ हंसहि सनि देखियौ गर्दनि, ओ पानिसँ अनुखन खेलैत छै ।। केओ कहैछ - छै “राजहंस” इएह, केओ कहैछ - “हंसावर” छै ।*४ अपना दिशि नञि छै भेटैत, ओकरा बड़ रुचिगर सागर छै ।।*२ हंसहि सनि एकरहु तँऽ मूँहमे, छन्नी सनि किछु लागल छै । कादो सानल पानिसँ सेहो, स्वच्छ आहार ओ छानैत छै ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - प्राचीन हिन्दू धर्मग्रण्थसभमे जाहि “अरुण क्रुञ्च” नामक चिड़ैकेँ अग्निदेवताक वाहन बताओल गेल अछि से इएह चिड़ै थिक । *२ - ई चिड़ै समुद्र तट पर रहब पसिन्न करैत अछि आ तेँ अपना दिशि नञि भेटैत अछि । भारतमे विशेष कऽ पछबारी समुद्रतटीय घाट पर ई चिड़ै आबैत अछि आ किछु संख्यामे पुबारी समुद्रतटीय घाट केर क्षेत्रमे (यथा - उड़ीसाक चिल्का झीलमे) सेहो । ई प्रबासी चिड़ै(MIGRATORY BIRD) थिक । गर्मीमे अफ्रिकाक समुद्री तटसँ भागि प्रायः दच्छिन-पच्छिम एसियाक आ यूरोपक समुद्र तट पर आबैत अछि आ ठण्ढीमे पुनः ओतहि चलि जाइत अछि । *३ - ठाढ़ भेल ई चिड़ै लाल रंगक सारस (क्रुञ्च या क्रौञ्च) जेकाँ लागैत अछि आ तेँ संस्कृतमे एकर एकटा नाम “अरुण क्रुञ्च” अछि । पानिमे हेलबा काल ई अनमन्न हंस सदृश लागैत अछि, हंसहि सनि एकर गर्दनि अंग्रेजीक “S” वर्ण जेकाँ देखाइ दैत अछि । एकर आबाज सेहो हंसहिसं मिलैत अछि । इएह कारणेँ “राजहंस” सेहो कहबैत अछि । *४ - किछु लोक “अरुण क्रुञ्च” नामक चिड़ै केर पर्यायी नाँओ “राजहंस” सेहो मानैत छथि तँऽ किछु लोक एकरा “हंसावर” कहि सम्बोधित करैत छथि । *५ - एहि चिड़ै केर लोलक भीतर एकटा छन्नी सनि संरचना (SIEVE LIKE STRUCTURE) होइत अछि जकर मदतिसँ कादो भरल पानिमेसँ सेहो अपन खएबा जोग बस्तुकेँ स्वच्छ स्वरुपमे प्राप्त कऽ लैत अछि आ बाँकी अनावश्यक पदार्थकेँ बाहरहि छोड़ि (छाड़ि) दैत अछि । एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे प्राचीन शास्त्रसभमे वर्णित “नीर - क्षीर विवेक” (नीर = कादो वा निर्माल्ययुक्त पानि; क्षीर = पोषक तत्त्वसभ) केर गुण राजहंसमे पाओल जाइछ । किछु विशेष बात - · ई चिड़ै अपना दिशि (सम्पुर्ण मिथिलामे) नञि भेटैत अछि । तेँ एकर कोनहु आन मैथिली नाम नञि अछि । एहना स्थितिमे हम एहि ठाँ ओकर संस्कृतहि नामकेँ तत्सम स्वरूपमे मैथिली नामक रूपमे प्रयोग कयल अछि । · मैथिली तँऽ मैथिली, संस्कृतहुमे “राजहंस” नाम केर सन्दर्भमे बहुत मत - मतान्तर अछि । परञ्च, संस्कृतक प्रशिद्ध ग्रण्थ “अमरकोश”मे देल गेल राजहंसक विवरण एहि चिड़ैसँ बेसी मेल खाइत अछि । संगहि आनहु बहुत रास गुण-धर्म केर मिलानक आधार पर आइ-काल्हि बेसीतर विद्वान एकरहि “राजहंस” मानैत छथि । अमरकोशक अनुसार राजहंसक विवरण निम्न प्रकारेँ अछि - Ø ……… राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैर्लोहितैः सितः ……….।। Ø अर्थात्, राजहंस ओ थिक जे सित वर्ण (किछु धूसर उज्जर; नञि कि स्वच्छ उज्जर) केर अछि आ जकर चक्षु (आँखि) ओ चरण (पएर) लोहित (लाल वा ललौन) वर्णक अछि । · जाहि ठाम ई चिड़ै नञि पाओल जाइत अछि (मिथिलामे सेहो) ओहि ठामक सहित्यकारलोकनि आ लोकसभ राजहंस चिड़ै केर रूपमे अपना मन केर कल्पनाक अनुसार गढ़ि लैत छथि । अथवा, राजहंस शब्दक प्रयोग तँऽ करैत छथि पर राजहंसकेँ प्रत्यक्षतः चिन्हबाक झंझटिसँ दूरहि रहैत छथि । · हिन्दीमे देल गेल एकटा आओर नाम अछि - “हंसावर” । ई नाम फादर कामिल बुल्के (अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश) द्वारा देल गेल छल । पर, हिन्दीअहुमे आब एहि शब्दक प्रयोग कम भऽ गेल आ एहि चिड़ै लेल “राजहंस” शब्दक प्रयोग होइत अछि । · लॅमिङ्गो (राजहंस) केर विश्वमे कुल छओ (बेसीतर प्रणीशास्त्री द्वारा मान्य) जाति अछि- Ø GREATER FLAMINGO - Phoenicopterus roseus - बड़का राजहंस / गुलाबी राजहंस Ø LESSER FLAMINGO - Phoenicopterus minor - छोटका राजहंस Ø CHILEAN FLAMINGO - Phoenicopterus chilensis - चीलीक राजहंस Ø JAMES’ (or JAMES’S) FLAMINGO - Phoenicopterus jamesi - जेम्सक राजहंस Ø ANDEAN FLAMINGO - Phoenicopterus andinus - एण्डीज पहाड़क राजहंस Ø AMERICAN FLAMINGO - Phoenicopterus ruber - अमेरिकाक राजहंस उपरोक्त जातिसभमेसँ (BIOLOGICAL SPECIES) पहिल दू गोट भारतमे भेटैत अछि । राजहंसक छओ जातिसभमेसँ पहिल केर संख्या विश्वभरिमे सभसँ बेसी अछि । सिरोली या सिरोली मएना (बाल कविता) छी मएने सनि, वा मएने छी, पर चितकाबर रंग हमर । बोली मीठ छी, सएह कारणेँ, एहेन सनि छी नाम हमर ।।*१ केओ कहथि स्थान “सिरोई”, ताहिसँ बनल “सिरोली” छै ।*१ पर मीठगर बोलहि कारण, हम्मर तँऽ नाम “सिरोली” छै ।।*१ साधारण मएना सनि ने हम, भेटब घर - आङ्गन बेसी । ढीठ ओतेक नञि तेँ हमरा, देखब ओत्तहि, नञि जन बेसी ।।*२ हल्लुक - पीयर लोल हमर छी, नेने जड़िमे किछु लाली । सुग्गा सनि अनुकरण करी, हमहूँ तँऽ मनुक्खक बोली ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पुर्वोत्तर भारतक मणीपुर राज्यमे एकटा स्थान अछि “सिरोई / सिरोही” जाहि ठाम सिरोई राष्ट्रिय उद्यान (SIROHI / SHIRUI NATIONAL PARK) या यैंगैंगपोक्पी लोकचाओ वन्यजीव अभयारण्य थिक जकर स्थापना सन् 1982 ई॰मे कयल गेल छल । अन्तर्जाल पर उपलब्ध जानकारी इएह कहैत अछि कि “सिरोई” नामक स्थानक आधार पर एहि मएनाक नाम “सिरोई मएना” पड़ल जे कि बादमे“सिरोली मएना” भऽ गेल । परञ्च हमरा ई बात पचि नञि रहल अछि कारण कि - · “सिरोली मएना” पूरा दछिनबारी एसियामे मैदानी (PLAINS) आ निचला तराई (LOWER FOOTHILLS) क्षेत्रमे पाओल जाइत अछि, तखन फेर मात्र मणीपुरहि के “सिरोई” केर विशेषण किएक ? · सिरोई राष्ट्रिय उद्यान केर स्थापना सन् 1982 मे भेल पर मिथिलामे एहि चिड़ै केर नाम “सिरोली” बहुत पहिनहिसँ अछि (मिथिलाक किछु अतिवृद्ध महिला लोकनि बतओलन्हि) । · अपना दिशि लोक सभक (विशेष कऽ किछु अतिवृद्ध जानकार महिला लोकनि) अनुसारेँ “सिरोली” (सिरोली मएना) केर बोली “मएना” (साधारण घरैया मएना) केर बोलीक अपेक्षा मधुर होइत अछि तेँ एकर एहेन नाम अछि । · ई चिड़ै गाबएबला पक्षीक (SINGING BIRDS) श्रेणीमे आबैत अछि जे कि किछु सीमा धरि नामकरणक पाछाँ ओकर आबाजकेँ कारण होयबाक पुष्टि करैछ । *२ - “सिरोली” “साधारण मएना” जेकाँ ढीठ नञि होइत अछि आ तेँ घर आङ्गनमे जाहि ठाम मनुक्खक आबर-जात बेसी हो ताहि ठाम नञि देखाइ देत । गाम-घऽरमे कने कात -करौटमे आ प्रायः छोट-छोट झुण्डमे सिरोली देखबामे आओत । *३ - पिञ्जरामे पोषला पर सिरोली सेहो सुग्गा जेकाँ मनुक्खक बोलीक नकल करैत देखल गेल अछि । साही (बाल कविता) साहीक काँट तँऽ सुनने हएबहक । सुनने की - देखने सेहो हएबहक । साहीक काँटमे “साही” की ?? “साही” मूस - गणक छी प्राणी ।*१ मूससँ बहुते पैघ - से जानी । सौंसे देहे “काँट” बुझी ।। दिन भरि बियरिमे रहैत अछि । बाहर रातिएमे निकसैत अछि ।*२ रक्षा-कवच ई “काँट” कही ।। कारी - उज्जर काँट छियै ।*३ उपनयनहुमे काज छियै ।*४ पहिलुक लेखनी इहो बुझी ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मूस आ साही − दुहु एक्कहि कुलक सदस्य अछि । ओहि कुलक नाम अछि रॉडेण्शिया (RODENTIA) । *२ - ई बिलेशय प्राणी अछि आ माटिक नीचाँमे बिलमे रहैत अछि । संगहि रातिचर (NOCTURNAL) प्राणी सेहो अछि । *३ - साहीक काँट (QUILS / SPINES) परिवर्तित रोइयाँ (MODIFIED HAIR) थिक जकर रूप-रंग ओ आकार साहीक प्रकार तथा सहीक वयस पर निर्भर करैछ । *४ - उपनयनमे शिखा-विभाजनक विधमे (बरुआक टीककेँ ३ भागमे बँटबाक बिधमे) साहीक काँटक काज पड़ैछ । *५ - पहिने अपना दिशि भीत (माटिक देबाल) पर चित्र बनएबा काल चित्रक खाका (OUTLINE / ROUGH DIAGRAMME) बनएबा हेतु सेहो प्रयुक्त होइत छल । यूरेसिया (यूरोप आ एसिया) तथा अफ्रिका महादेशकेँ पुरना दुनिञा (OLD WORLD) आ उतरबारी तथा दछिनबारी अमेरिका महादेशकेँ नवका दुनिञा (NEW WORLD) कहल जाइत अछि । साहीक जे जाति (SPECIES) जाहि ठामक मूल निवासी अछि ताहि अनुसारेँ ओकरा सभकेँ पुरान दुनिञाक साही (OLD WORLD PORCUPINES - ORDER HYSTRICIDAE) आ नऽव दुनिञाक साही (NEW WORLD PORCUPINES - ORDER ERETHIZONTIDAE) कहल जाइत अछि । साही रहितहुँ दुनु समूहमे बहुत बेसी अन्तर अछि । डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”, ग्राम – रुचौल, पो॰ – मकरमपुर, जिला – दरभंगा, पिन – ८४७२३४, ई मेल - videha19@yahoo.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु विदे हwww.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.comVideha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २०४ म अंक १५ जून २०१६ (वर्ष ९ मास १०२ अंक २०४)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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ra a न k japan | गैंतीक बेंत “रू दे a \ f
ra Orta : जला सर ete से Pein की न =< i : uf : Suan - HII सौजन्य - plvabay.com (free dowiilowdy मैथिली - par हिन्दी - छोटा बुज्जा, Dray संस्कृत - कवार अंग्रेजी - GLOSSY IBIS जैववैज्ञा० नाम - Plegadis falcinellus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
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th: “” as BE IRE, aah . AL e papi = We है भी me sy we ae eon कड़ाडइकुल / कराड़कुल / कयंकुल / ps / कंकूर fers hz झुण्ड FLOCK OF RED NAPED IBIS / INDIAN BLACK IBIS / BLACK IBIS Pseudibis papillosa
Ee ee Raid us a Es ae es 33 mC RAN “5 = F East Rn @ ehh Fad oe a Ce Ca है | an ईद Oa | | pene : eae | 2 = मैथिली - याजहंस dep - बड़का गुलाबी राजहंस) हिन्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण Pra अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेस्स) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) हनोट -संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉजो या प्यौयी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे wah नाँजों Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे,
है a te 7. oe teas’ 5 मैथिली - राजहंस dep - बड़का गुलाबी राजहंस) हिन्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण Hoa अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] Gado नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटिस्स) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) हनोट -संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉजो या प्यौयी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे wah नाँओों Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे,
कि... = — ee — <q —— — a = कक... या साहीक विभिन्न तरहक wic (साभार साँजन्य - विकिपीडिया पब्लिक sida)
~ a दर ~ a. ‘ 2 bs सम, Re ee? ; ya $n at ee” ae 2S A ee a a % es | Fi \I जाझार सौजल्य - gofreeddWvnioad.net_ - gofreedoWnload.net बड़की (गुलाबी) राजहंसक AVS GREATER PINK FLAMINGO Phoenicopterus roseus
A cae Pl Va TR पर VEN. ही ch, A i} | i 0 a थे ARS Aes fe eae "4 is i . oat i i} bog Cin) ली ¥ 2 es ae ond i eae ar Pa खाए: मैथिली -wsigod / कड़ांकुल / Pipa (तत्सम), 'कथयंकुर (अर्ध तत्सम), कंकूर / PPS ga) हिन्दी - काला बुज्जा संस्कृत - कयंकुल , कालकण्टक , कृष्ण आदि, रक्तशिर्ष आटि अंग्रेजी - RED NAPED IBIS / INDIAN BLACK IBIS / BLACK IBIS जैंववैज्ञा० नाम - Pseudibis papillosa syn. Pseudibis davisoni syn. Inocotis papillosus atte - सैस्कृत भाषामे आयल हरेक ना ओ या पर्यायी AED स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ Sts जाइत INT - तत्सम स्वरूपमे