101 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २०९ म अंक ०१ सितम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०५ अंक २०९) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त जीक टिप्पणी २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- २ टा लघु कथा- १. गुलेती दास आ २. जिगेसा २.३.राजदेव मण्डल- जल भंवर (उपन्यास) २.४.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना २.जगदानन्द झा ’मनु’- दूटा बीहनि कथा ३. पद्य ३.१.जगदानन्द झा ’मनु’ २टा गजल आ आशीष अनचिन्हार- एकटा गजल ३.२.बाबा बैद्यनाथ- आजाद गजल ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु कविता ३.४.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- ३ टा गजल ४.बालानां कृते-बाबा बैद्यनाथ- बाबा-पोताक सिनेह Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह रचनात्मकता बढ़ेबाक हिसाबे किछु ने किछु नव काज करैत आबि रहल अछि। ऐ बेर विदेह एकटा नव प्रोजेक्ट लऽ कऽ आएल अछि, जै अन्तर्गत विदेहक संपादक मंडल एकटा कोनो रचनाकर्मीसँ हुनक किछु रचना आमंत्रित कऽ विदेहक एकटा अंकमे देत आ ओइ रचनाकर्मीक संबंधमे कोनो आन रचनाकर्मी टिप्पणी देता। रचनाकर्मी आ टिप्पणी देनिहारक नामक घोषणा एकै समएमे कएल जाएत। रचना ओ टिप्पणी जहिया आएत तै केर बादे अंक केर निर्णय कएल जाएत मने रचना आ टिप्पणी दूनू ऐ प्रोजेक्ट लेल आवश्यक अछि।
ओना ई प्रोजेक्ट सबहक सहयोगपर आधारित रहत तँए ई प्रोजेक्ट लगातारो चलि सकैए आ सुविधानुसार सेहो। ऐ प्रोजेक्ट केर पहिल घोषणाक अनुरूपे कामिनी क रचना आमंत्रित कएल गेल आ कामिनीजीक रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल मधुकांत झा जीकेँ आमंत्रित गेल। ऐ अंकमे (२०९ म अंक ०१ सितम्बर २०१६) कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त जीक टिप्पणी प्रस्तुत अछि/ ई-पत्र विदेह 208 अंक में डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ में समानता पढ़ल । नीक लागल । मुदा सौराठक विभूतिक नाम सब पढ़ला पर लागल जे सूचि में एकटा महत्वपूर्ण नाम छुटि गेल छनि जेना महात्मा पुरुषोत्तम ठाकुरक नाम नहि देखल । महात्माजी एक पैर पर ठाढ़ भ भोर स साँझ धरि सहस्त्र गायत्रीक जाप करैत साधना करैत छलाह । जीवनभरि एक संध्या फलाहार पर रहैत आध्यात्मिक मार्ग में लीन छलाह । हुनक आश्रम में गायत्री मंदिर स्थापित अछि । सोमनाथ बाबाक मंदिर सँ ई स्थान लगभग 200 मीटरक दुरी पर ओही टोल में अवस्थित अछि । सभागाछी सँ सटले । नहि जानि एहेन महत्वपूर्ण नाम कोना छुटि गेल । कैलाश बाबू अपन रिसर्च में इहो जोड़ि लेथि से आग्रह । विशेष जानकारी पंडित देवोत्तम ठाकुर गायत्री स्थान ,सौराठ सँ भेटि सकैत छनि । भवदीय कुमार गगन आशीष जी केर गजल कम शब्द में सुंदर अभिव्यक्ति अछि। हुनका आ अहूं के बधाई। रमण कुमार सिंह जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल। पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो - तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभिनय- मुख्य अभिनय , सुश्री शिल्पी कुमारी, उम्र- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उम्र- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय सुश्री प्रियंका कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्द ठाकुर, उम्र- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडित, उम्र- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्म तिथि- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही,जिला- मधुबनी (बिहार) हास्य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्व. लक्ष्मी पासवान, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) टाॅसिफ आलम सुपुत्र मो. मुस्ताक आलम, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनिरूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरिया, पोस्ट- बाबूबरही, जिला- मधुबनी (बिहार) मांगनि खबास सम्मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़िया, पोस्ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्य - (1) श्री हरि नारायण मण्डल सुपुत्र- स्व. नन्दी मण्डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) चित्रकला- (1) जय प्रकाश मण्डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री चन्दन कुमार मण्डल सुपुत्र श्री भोला मण्डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्ट- बेलही, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) संप्रति, छात्र स्नातक अंतिम वर्ष, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना। हरिमुनियाँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्व. रामस्वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकिया (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्व. , पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री कल्लर राम सुपुत्र स्व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्व. अनुप राम, गाम+पोस्ट- िनर्मली, वार्ड न. ०७ , जिला- सुपौल (बिहार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्लिक सुपुत्र दरबारी मल्लिक, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री राम विलास धरिकार सुपुत्र स्व. ठोढ़ाइ धरिकार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडित सुपुत्र- श्री मोलहू पंडित, पता- गाम+पोस्ट– बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री प्रभु पंडित सुपुत्र स्व. , पता- गाम+पोस्ट- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- िनर्मली-पुरर्वास, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री योगेन्द्र ठाकुर सुपुत्र स्व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्व. कपिलेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्ट– बनगामा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बिलट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्ट- बड़हारा, भाया- अन्धराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०१ जोगिरा- श्री बच्चन मण्डल सुपुत्र स्व. सीताराम मण्डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री , पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) पराती (प्रभाती) गौनिहार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्व. सनक मण्डल पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहिया, भाया- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्डल सुपुत्र स्व. खुशीलाल मण्डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्ट- ककरडोभ, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जिला- मधुबनी (बिहार) गीतहारि/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्डल, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) (2) सुश्री सुविता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्ट- बलियारि, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी (बिहार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री लक्ष्मी राम सुपुत्र स्व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) काँरनेट- (1) श्री चन्दर राम सुपुत्र- स्व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) बेन्जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्व. लक्ष्मी महतो, उमेर- ४५, गाम- िनर्मली वार्ड नं. ०४, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) भगैत गवैया- (1) श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) (2) श्री शम्भु मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल, पता- गाम- बढियाघाट-रसुआर, पोस्ट– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) खिस्सकर- (खिस्सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडिहा, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल, पिन- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखिया उर्फ टहल मुखिया- (2)सुपुत्र स्व. ढोंगाइ मुखिया, पता- गाम+पोस्ट- औरहा, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मिथिलेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दिलिप झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री किशोरी दास सुपुत्र स्व. नेबैत मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट-– मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) तबला- श्री उपेन्द्र चौधरी सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्ट- पीपराही, भाया- लदनियाँ, जिला- मधुबनी (बिहार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पिपराही। झालि- (झलिबाह) (1) श्री कुन्दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जिला- मधुबनी, पिन- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र श्री झोटन मण्डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) श्री विभूति झा सुपुत्र स्व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- कछुबी, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) लोक गाथा गायक श्री रविन्द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसियाही, पोस्ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री पिचकुन सदाय सुपुत्र स्व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) मजिरा वादक (छोकटा झालि...) श्री रामपति मण्डल सुपुत्र स्व. अर्जुन मण्डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, िजला- सुपौल (बिहार) मृदंग वादक- (1) श्री कपिलेश्वर दास सुपुत्र स्व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामविलास यादव सुपुत्र स्व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सिमरा, पोस्ट- सांगि, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जिला- मधुबनी (बिहार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री राजेन्द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्ट- छजना, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी (बिहार) रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्व. ललित राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल, उमेर- ६०, रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक, १९७५ ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल (बिहार) गुमगुमियाँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्व. श्री श्रीचन्द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्ट- बेलही, भाया- िनर्मली, थाना- मरौना, जिला- सुपौल (बिहार) श्री योगेन्द्र राम सुपुत्र स्व. बिल्टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धियानी दास सुपुत्र स्व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर),जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) श्री महेन्द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्ट- चनौरागंज, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी (बिहार) नङेरा/ डिगरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शिविर), जिला- मधुबनी पिन- ८४७४१० (बिहार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf 12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक, १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf 21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010 Videha_01_10_2010_Tirhuta 67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010 Videha_15_11_2010_Tirhuta 70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010 Videha_15_12_2010_Tirhuta 72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011 Videha_01_03_2011_Tirhuta 77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012 Videha_01_08_2012_Tirhuta 111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013 Videha_15_03_2013_Tirhuta 126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013 Videha_15_11_2013_Tirhuta 142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषाक- २००म अक १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अक १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/ For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त जीक टिप्पणी २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- २ टा लघु कथा- १. गुलेती दास आ २. जिगेसा २.३.राजदेव मण्डल- जल भंवर (उपन्यास) २.४.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना २.जगदानन्द झा ’मनु’- दूटा बीहनि कथा कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त जीक टिप्पणी जेना की बूझल हएत जे विदेह एकटा नव प्रोजेक्ट केर घोषणा केने छल, जै अन्तर्गत विदेहक संपादक मंडल एकटा कोनो रचनाकर्मीसँ हुनक किछु रचना आमंत्रित कऽ विदेहक एकटा अंकमे देत आ ओइ रचनाकर्मीक संबंधमे कोनो आन रचनाकर्मी टिप्पणी देता। आ ऐ प्रोजेक्ट केर पहिल घोषणामे कामिनी जीक रचना आमंत्रित कएल गेल छल आ कामिनीजीक रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल मधुकांत झा जीकेँ आमंत्रित कएल गेल छल। ऐ अंकसँ ई प्रोजेक्टक शुरूआत भऽ रहल अछि तँ पहिने पढ़ू कामिनीजीक पाँच गोट कविता आ तकर बाद मधुकांतजीक विचार (संपादक) 1 छौड़ीक आँखि मे एकटा छोट छीन छौड़ीक आँखिमे समायल छै दुनिया एकटा भरल-पूरल दुनियाँ जाहिमे कतौ नदी बहैत छै कतौ उतरैत छै झरना पहाड़परसँ हनहनाइत छै कतौ बाँसक पैघ पैघ बोन पुरबा पछबाक बसातमे कतौ उड़ान भरै छै प्लेन दूर धरिक यात्रा तय करबाक लेल लगाओल जाइत छै कतौ प्रदर्शनी किछु बेचबाक लेल किछु खरीदबाक लेल छौड़ीक आँखिमे हँसी छै दू बुन्द नोर छै पूरा दुनियाँ छै मुदा छौड़ीक आँखिमे छौड़ी नहि छै कतौ नहि छै ओकर अस्तित्व ओकर इच्छा/ ओकर आकांक्षा ओकरा तँ दौड़ायल जा रहल छै बेटीसँ कनियाँ आ कनियाँसँ माय बनबाक लेल । 2 आशाक बान्ह सब बेर ओकर घरबला ओकरा आँखिमे बान्हि जाइत छै आशाक बान्ह की एहि बेर पठेतै ओकरा लेल धराउ रखै लेल नीक नूआ गुदड़ी गुदड़ी भेल आँगीकेँ फेरबाक लेल रेशमी कपड़ा पहिरबाक लेल एक जोड़ा चप्पल कि एहि बेर जाइत देरी पठेतै ओकरा नामसँ मनिआडर आ बच्चन महाजनक पाई गढेतै ओ अपना लेल नाक महक छक कि एहि बेर दूर्गा पूजामे देखा देतै लोककेँ कि ओ परदेशियाक बहु अछि मुदा सब बेर जाइत मातर बिसरि जाइत छै ओकरा आ ओकर सपनाक कतार नोरक धार मे बहि जाइत छै एक-एक कऽ सबटा एकटा तेसरे चिंता घेरि लैत छै नहि जानि की भेलै परदेशमे ओकरा । 3 मीत ! अहाँ एना कहिया धरि बैसल रहब आशामे की अहाँक थारीमे खसायत कियो रोटी आ अहाँक हाथमे सौपि देत कियो अधिकार कहिया धरि ठाढ रहब मुँहथरिपर की अहाँक घरमे टाँग पसारि कऽ सूतल लोक निकलि जायत सहजहि कहिया धरि बैसाखीक सहारे बजबैत रहबै बाहरक घंटी की कियो जागत जकरा अहाँ सुनेबै अपन संपूर्ण व्यथा कथा मीत! कहिया धरि मुनने रहबै कान अभद्र गारि सुनि कऽ की ओ चुप्प भऽ जायत सहजहि आखिर कहिया धरि बनल रहबै अहाँ मीलक पाथर जकरापर जेठक दुपहरिया आ साओनक बरखाक असर नहि परैत छै मीत । 4 पिता एक बेर फेर पिताक सोझाँमे वर्तमान अर्थहीन आ भविष्य अनिश्चित छनि पैरक फाटल बेमाय जकाँ खेतो फाटि गेल एक बेर फेर प्रकृति मुँह मोड़लक आ वर्षा नहि भेल ओ परिवार क पैघ बेगरताक सोझाँमे बड़ छोट महसूस करैत छथि अपनाकेँ घरक खर्चा/ स्कूल कऽ फीस लगानक बोझ बेटीक भावहीन आँखि सबहक सोझाँमे लगैत छथि एहि बेर परास्त भऽ जेता शून्य आकाश दिस तकैत-तकैत हुनकर आँखियो शून्य बुझना जाइत अछि ओ सब दिन जाइत छैथ खेतक आरिपर आ टाँट परल धरती देखि कऽ घुरि अबैत छथि ओ सब दिन इन्द्रसँ करैत छथि प्रार्थना किएक पिताक आँखिमे एखनो पानिक देवता इन्द्रे छथि वर्षा दिय / वर्षा दिय दरारग फाटल खेतकेँ पानि सँ पोहपीत कऽ दिय जे हमर जीवनक आधार अछि सुखक संसार अछि मुदा कोनो प्रतिक्रिया नहि देखा परैत अछि केम्हरो कोनो परिवर्तन नहि बुझना जाइत अछि कतौ निराशा आगु आ आशा पाछू छुटल जाइत अछि खुट्टा पर बान्हल बड़द जकाँ पिता बेबस भेल जाइत छथि समय अछि की तैयो दरकल अयना जकाँ दू भागमे पिताकेँ बाँटि रहल अछि बिना कोनो दोष के । 5 मोन आइ मायासँ मुक्त अछि मोन आइ हँसि रहल अछि मोन आइ नाचि रहल अछि मोन आइ गाबि रहल अछि मोन पाँखि लगा आसमानमे उड़ियो रहल अछि मोन आइ मायासँ मुक्त अछि मोन आइ दर्दसँ वेलग अछि मोन आइ सब बन्धन सब द्वेषकेँ पार कऽ लेलक मोन आइ खुशीकेँ अपना जीवनक आधार बना लेलक मोनक आँगनमे आइ फुलायल अछि भालसरिक फूल मोनक आँगनमे आइ पसरि रहल अछि पारिजातक सुगंध मोनक आँगनमे आइ उतरि रहल अछि चान मोनक आँगन मे आइ गाबि रहल अछि कोइली गुनगुना रहल अछि भौंरा मोनक आँगनमे सजि रहल अछि फूल भरल सेज मोनक आँगनमे उतरि रहल अछि मान सम्मान धीरे धीरे आँखिमे प्रेम भरने हर डेगमे विश्वास लेने अधिकारसँ अपना दिस खिचैत अपनामे समटैत । कामिनीजीक किछु कविता.... एक विमर्श। (मधुकांत झा) मैथिली साहित्यक काव्य विधामे महिलाक संख्या पर्याप्त नहि। बधाइक पात्र छथि कामिनी जी जे ओ अपन सृजनशीलताक माध्यम कविताकें चुनलनि। हिनकर कविता संग्रह प्रकाशित अछि तथा पत्र पत्रिकामे सेहो प्रकाशित अछि। ई बेस चर्चित तथा अर्चित कवियत्रीमे एक छथि। हमरा समक्ष संयोगवश हिनक किछु कविता भेटल अछि। पढल, गुणल आ तकर परिणामस्वरूप एहि कवितापर दू शब्द लिखबाक लोभ संवरण नहि कs पाबि रहल छी। कामिनी जी शहरमे.रहैत छथि लेकिन मिथिलाक माटि पानि लोकक दशा दुर्दशासँ परिचित छथि आ तकरा आधार बना अपन सरल सहज सुंदर शब्दसँ संवेदनाक एहेन तरंग उत्पति करै छथि जे झकझोरि दैछ। हिनकर पहिल कविता छौंड़ीक आँखि मे, एक बेटी के एहन तस्वीर प्रस्तुत करैछ जकरा आँखिमे प्राकृतिक, कृत्रिम बजार सजल छैक, हँसी नोर छैक परन्तु नहि भेटैछ ओकर अपन अस्तित्वक रेह। ओकर इच्छा आकांक्षाक नहि छैक कोनो जगह। एकर कारण कवियत्री मानैत छथि नारीक ओ यंत्रवत जीवन जे बेटीसँ कनिया, कनियासँ माय बनाबक लेल सदियोंसँ ओकरा दौड़ा रहल छैक। नारीकक एहि दुर्दशासँ सभ भिज्ञ छी तथापि हिनकर कलात्मक प्रस्तुति एहि संवेदनाकें मोतीक चमक प्रदान करैत अछि। हिनकर दोसर कविता, आशाक बान्ह, एक एहेन पत्नीक चित्रांकण अछि जे परदेशी पतिक बातक भरोसपर नव नव साड़ी आँगी, गहना पहीरबाक सपना देखैत अछि, महाजनसँ फराकति भेटबाक आश करैत अछि। अपन शान शौकत के बलपर सबकेँ चकित करबाक लिलसा पालैत अछि। आनन्दमे मगन अछि। लेकिन सभ झूठ । एकदिन हहा कऽ टुटल सपना संग खसैत अछि आ परदेशिया पतिक कुशल क्षेम जनबाक लेल औहरि कटैत अछि। मिथिलाक परदेशी जीवन आ अनाथ प्रेयसीक दुर्दशाक सजीव चित्रण मार्मिक बनि पड़ल अछि। तेसर कविता, मीत,अछि जे मिथिलामे संक्रामक रोग सदृश आलसीपनक रूपमे घरे-घर पसरल अछि। ककरो बैसल ठाम कोना पेट भरत तकरा यादि करबैत कवियत्री एहि बेरोजगार लोकक तुलना ओहि मीलक पाथरसँ करैत छथि जकरा रौद बसात आ बर्षाक नहि होइत छैक कोनों असरि। ओ कहैत छथि जे आबो बहराउ, कहिया धरि रहब बनल मीलक पाथर। ई मैथिल समाज लेल बेस प्रेरणादायक अछि जकरा शारीरिक परिश्रम अपमान सन लगैछ। पाथरक उपमा सटीक लगैछ। चारिम कविता, पिता, जे किसान छथि आ मानसून पर निर्भर किसानी केहेन खुनीमा होइछ तकर हृदयविदारक वर्णन कोनों पाठककें द्रवित कऽ सकैछ। खेतमे फाटल दरारि हुनका अपन जीवन कें दरकल आयना सन दू फाँक करैत छनि। जिम्मेदारीक बोझ आ बेटीक उदास आँखि पिताक आत्माकें छहोछित कऽ दैत अछि। किसान पिताक बहन्ने कामिनी जी भारतीय किसानक आत्महत्याक कारणकें दृढतापूर्वक रेखांकित कयलनि अछि। पाँचम कविता, पहिल कविता छौंड़ीक आँखिमे, के विपरीत एक एहन महिलाक चित्रांकण कयलनि अछि जे अपन बल पर सम्मान पाबि अति हर्षित छथि। हुनका आँगनमे बसंतक सुगंधि, पुनमक चान, साउनक बहार आ कोयलीक गूँजन एक संग उतरि आएल छनि। खुशीमे पाँखि लागि हुनका आसमानमे उड़बाक आनंद प्रदान कs रहल छनि। विश्वासक डेग, अधिकारक सुगंध हुनका जँ अपना दिस आइ घीच रहल छनि तँ संसार अपन आँचरमे समेटि रहल छनि। आनंदक ई पल पाठको केँ आत्मनिर्भर होयबाक लेल प्रेरित करैछ। कामिनी जीक कविता सँ प्रतीत होइछ जे ई कोनो वाद विवादसँ प्रभावित भऽ तरल प्रतिक्रियाक रूपमे ई कोनों रचना नहि करैत छथि। जे देखैत छथि तकरा भावनात्मक पाँखि लगा तेना प्रस्तुत करै छथि जे पाठककें अपन सुख-दुख बुझा जाइछ। हँ, ई तँ जरूर जे ओ समस्या क दुआरि जाइत छथि परन्तु घरक केवाड़ खिड़की नहि खोलैत छथि जे हिनक कविता कें कनी छुछुआन करैत छनि। लेकिन हिनकर कोमल शब्दमे गंभीर भाव आ सहानुभूति हिनकर कविताकेँ मार्मिकता प्रदान करैछ जे हिनकर सफलता थिक। बधाइ। खूब लिखथि,यशक सम्राज्ञी बनथि से कामना रहत। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल २ टा लघुकथा १.गुलेती दास आ २. जिगेसा गुलेती दास अन्तिम जेठक दस बजेक समए। चारि दिन पहिने गुलेती दासकेँ दूटा छिट्टा दइले कहने रहिऐ। आइ भोरे समाद पठौलक, ‘छिट्टा तैयार भऽ गेल से लऽ जाह।’ ..समैमे तीखपन, ओना पूर्बा हवा सिहकैत रहइ मुदा तैयो जेना बुझि पड़ैत जे धरतीसँ आगि उठि रहल अछि, खास कऽ दस बजेक पछाइत आ चारि बजेक बीचक समैमे। रोहनियाँ बर्खा नइ भेल, ओना पनरह दिन पहिने बिहड़िया पानि भेल छेलै, मुदा ओहो छीच्चे जकाँ भेल जइसँ समैक तापकेँ दाबि नइ सकल। छिछियाएले जकाँ रहि गेल। गोटि-पँगरा रोहनियाँ आम पकए लगल मुदा समए नइ पेने ओकरो सुआद पकाइने जकाँ, माने रौद-पक्कुए सन बुझि पड़ैत। गुलेती दास ऐठाम छिट्टा आनए विदा भेलौं। गुलेतीक पुश्तैनी जातीय टाइटिल ‘मुखिया’ छिऐन। माने मल्लाह परिवारमे गुलेती दासक जन्म भेलैन। पचीस बर्ख पूर्ब गुलेती मुखिया कबीर पंथी वैष्णव भेला, जइसँ ‘मुखिया’ टाइटिल बदैल ‘दास’ भऽ गेलैन। पचास बर्खक गुलेती दासक जिनगीक अपन रूटिंग बनल छैन। दस बजे ओ भानसक पाछू लगि जाइ छैथ, जे एगारह-सबा-एगारह बजे भोजन तैयार कऽ लइ छैथ। भानसक पछाइत नहा कऽ, मंत्र-जाप तँ किछु अबै नइ छैन, मुदा तैयो ‘जय सत्नाम, जय-जय सत्नाम’ करैत चानन सेहो करै छैथ। चानन केला पछाइत भोजन करै छैथ। बारह-सबा-बारह बजे थारी-बरतन धो-धा चीनमारपर रखि अराम करए चलि जाइ छैथ। तीन बजे ओछाइन छोड़ि मुँह-हाथ धोइ, पानि पीब, तमाकुल चुना कऽ खा, अपन काजमे लगि जाइ छैथ...। भिनसुरका उखड़ाहाक काज सम्प़न्न करैत गुलेती भानस करए विदा होइक ओरियान करिते छल कि पहुँचलौं। हमरा देखते गुलेती दास बाजल- “भैया, तोहर काज काल्हिये बेरू-पहर सम्पन्न भऽ गेल, भने आबिये गेलह।” कहि दुनू छिट्टा आनि आगूमे रखि देलक। दुनू छिट्टाकेँ निहारि-निहारि देखलौं तँ बुझि पड़ल जे जहिना कहने छल, तहिना छिट्टा बनौनौं अछि। पुछलिऐ- “गुलेती, दुनूक केते दाम भेलह?” ओना शुरूहेमे, माने जखन छिट्टा दइले कहने रहिऐ तखने डेढ़-डेढ़ साए रूपैयेक हिसावसँ कहने रहए। मुदा ईहो कहने रहए जे जखन छिट्टा बनि जाएत तखन दस-बीस कमे करि कऽ दिहह। ..छिट्टा देख मनमे भेल जे जेहेन वौस देलक अछि तइमे दामक अतिरिक्त किछु उपड़ा सेहो दिऐ, मुदा लेबाल-देबालक विचार मनमे जोर मारि देलक तँए दोहरा कऽ कहा गेल ‘केते दाम भेलह।’ गुलेती दास बाजल- “भैया, कहनहि रहिहह जे तीन साएमे दस-बीस कमे दिहह।” साए-साए रूपैआक तीनटा नमरी जेबीसँ निकालि गुलेती दासक हाथमे दैत कहलिऐ- “गुलेती, तूँ जेते दस-बीस कम करहब, ओते दाम कम भेल, मुदा तोहर कारीगरी देख मन खुशी भऽ गेल तँए तोरा ओते इनाममे दइ छिअ, ओहो रखि लएह।” ‘इनाम’ सुनि गुलेती मुस्कराइत कहलक- “भैया, पाइ-कौड़ी कोनो वौस छी, असल छी जे मनसँ असीरवाद दएह जे अहिना काज लगल रहए जइसँ समाजक उपकार करैत रहिऐ। भानस करैक बेर भऽ गेल तँए अखैन बेसी गप नइ करबह।” अपनो गुलेती दासक रूटिंग बुझले अछि तँए बेसी गप-सप्पकेँ आगू नहि बढ़ा, दुनू छिट्टा हाथमे लऽ विदा भेलौं। जहिना कोनो गाममे जे जेते पहिने आएल रहल ओ ओते नीक बासभूमि अपनबैत बसैए, आ जे जेते पछाइत आएल ओ ओते आगू बढ़ैत बास बनबैत जाइए, तहिना गुलेती मुखियाक पिता-दोरिक मुखिया सेहो हरिपुरमे आबि बसला। से खाली दोरिके मुखिया नहि, आठ-दसटा मलाह परिवार कोशिकन्हासँ उपैट आबि बसल छला। करीब साठि बर्ख पहिने...। जइ समए दोरिक मुखिया हरिपुरमे आबि बसला, तइ समए मात्र तीनियेँ गोरे परिवारमे छला। दोरिकक माए- रूपनी, पत्नी- तेतरी आ अपने दोरिक। गरमजरूआ आम जमीन, करीब पाँच कट्ठाक परती रहै तेहीपर आठो-दसो परिवार बसला। हरिपुरक अवादी पतराएले छल, खेती-पथारी करैबलाक खगता छेलैहे। ..जहिया आठो-दसो परिवार आबि बसला, तहिया हरिपुरमे जे सुभ्यस्त, किसान सभ छला ओ भरपुर सहयोग केलखिन। चारि-पाँच परिवार दू-दू-तीन-तीन परिवारकेँ अपना बीटक बाँस, खढ़ आ साबे दऽ दऽ घर बनबा देलखिन। ओहू दसो-बारहो परिवारकेँ बोनि-बुत्ता करैक गर सेहो भेटलैन। ओना, रूपनी उमेरदार मुदा तैयो बेटा-पुतोहुक संग अखाढ़मे धनरोपनी आ अगहनमे धनकटनीक संग रब्बियो-राइ उखाड़ए-काटए जाइते छेली। जे किसान दोरिककेँ घर बनबैमे बाँस, खढ़ आ साबेक मदैत केने रहथिन, हुनके हरवाहि दोरिक करए लगला। सालक बारह मासमे दू मास हरवाहि चलै छल, जइमे एक मास सूख-जोत आ एक मास कदबा चलइ, बाँकी दस मास हरवाहिक काज बन्ने रहइ। खेतियो असान छेलइ। अखाढ़मे धनरोपनी, भादो-आसीनमे खरहाएल धानक खेतमे कमठौन आ अगहनमे धनकटनी चलइ। दौन-दोगौन किसान अपने कऽ लइ छला। समए आगू बढ़ल। दोरिक मुखियाक माए मरि गेली। दोरिककेँ सेहो पहिल बेटा आ दूटा बेटी भेल। सात सालक जेठ बेटा- फुदी मुखिया। फुदियाक बिआह सेहो भऽ गेल। दुनू बेटी, जे एकटा पाँच बर्खक छल आ दोसर अढ़ाइ बर्खक छल, ओ आ फुदिया लगा पाँच गोरेक परिवार दोरिक मुखियाक छेलैन। ओना, बेटाक बिआह भऽ गेल मुदा ओइसँ परिवारक जनसंख्यायमे कोनो बिरधी नइ भेल। होइतो अहिना छेलै आ अखनो केतौ-केतौ होइते अछि जे बच्चेामे बेटा-बेटीक बिआह भेल आ दस-बारह बरिसक पछाइत दुरागमन। बाल-विवाहक कारण छल, बेटा-बेटीक बिआह माए-बापक अनिवार्य कार्य मानल जाइत रहल अछि जेकर पुरती करब सेहो अनिवार्य बुझल जाइत रहल अछि। एक तँ ओहुना मनुखो आ आनो-आन जीव-जन्तुअक जिनगीक कोनो निसचित गारंटी नइ अछि। मत्र्त लोक छी, जे जन्म लेलक ओ मरबे करत। मुदा तोहूमे जैठाम जिनगी-ले अनुकूल परिस्थिति नइ रहल तैठाम तँ आरो जिनगी बेठेकान भऽ जाइए। ओना, जँ मनुखो आ आनो-आन जीव-जन्तुक अनुकूल परिस्थिति रहल तँ जिनगीकेँ ठेकनौले जा सकैए। बच्चाकसँ वृद्धि होइत वृद्ध बनैत-बनैत साए बर्ख भाये जाइए। चारि साए बीघाबला गाम हरिपुर। चारियो साए बीघा जमीन चारि किस्म मे बँटल अछि। ओना माइटिक अनेको किस्मू अछि मुदा से नहि, साइजिक हिसावसँ हरिपुरमे चारि किस्माक जमीन अछि। पहिल अछि- ‘उपराइर’, जइमे बासो-अगवास अछि, बाड़ियो-चैमास अछि आ गाछियो-बिरछी अछि। दोसर अछि- ‘मध्यम जमीन’। मध्यमोमे दू रंगक किस्म अछि। पहिल ‘ऊँच मध्यम’ आ दोसर अछि ‘नीच मध्यम’। आ चारिम अछि ‘चैरी’, ‘चैर’। चारि साए बीघा जमीनमे दू साए बीघा चैरी अछि, बाँकी दू साए बीघा मध्यमसँ बास धरिक अछि। ओना, चैरियोमे धानक खेती होइए, मुदा अबिसवासू। जइ साल अगते नमहर बर्खा भेल आकि बाढ़ि आएल पानिसँ चैरी भरि गेल, तहन तँ दहार भेल तँए एको कनमा धान नइ उपजत। हरिपुरक उत्तर-पच्छिम कोण होइत सुपर्णा धार प्रवेश केने अछि। जे उत्तर-पच्छिमसँ शुरू होइत गामक उत्तरबरिया बाध देने उत्तर-पूब कोण पकैड़ दच्छिन-मुहेँ होइत गामसँ बहराएल अछि। गामक चारू-कात माने चारू बाधमे चैरियो अछि आ आनो-आनो किस्मचक जमीन। ओना, जँ समए नीक रहल, माने दाही-रौदी नइ भेल, तखन तँ एते उपजा भाइये जाइए जइसँ सालो भरिक बुतातमे कटमटी नइ अबैए मुदा दाही-रौदी भेने तँ आबिये जाइए। दोरिक मुखिया, जिनका अपन घर छोड़ि किछु ने छैन, सेहो अपन काजकेँ बढ़ौलैन। बारह मासक सालमे तीन मास काज रहने, तीन मास तँ परिवारक गुजर चलि जाइ छेलैन, मुदा बाँकी मासमे भुखमरी आबि जाइ छेलैन। ओना, परिवारमे गुलेतीक जन्मक सेहो भऽ गेल। गुलेती माने दोरिक मुखियाक चारिम सन्तामन। गामक दछिनबरिया चैरीक बगलेमे पूबसँ पच्छिम-मुहेँ बान्हा अछि। जे बीचमे टुटल अछि। सुखार मासमे तँ सूखले-सूखल लोक टपैए मुदा जखने बर्खा भेल आकि बाढ़ि आएल तहन रस्ता बन्न भऽ जाइए। ओना सोलहन्नी तँ नइ होइए, मुदा भरि-जाँघ-भरि-डाँड़ पानिमे टपए पड़ै छइ। करीब एक कट्ठामे बान्हन टुटल अछि। जइ देने चैरियोक पानि आ बाढ़िक पानि सेहो बरसातमे बहैत रहैए। जेकरा लोक खोरबन्हाक सेहो कहै छइ। ओही टुटलाहा बान्हौमे दोरिक टौहकी पहटासँ घेर मछबारि सेहो करै छैथ। जइसँ साओन-भादोसँ लऽ कऽ कातिक तक मछबारिक रोजगार चलिते छैन। ओना, पोखैरक पोसा माछ जकाँ तँ नहि मुदा अनेरूओ आ पोखैर-झाँखैरक जे पुरना माछ बाढ़िमे भँसि-भँसि पड़ाइए ओहो तँ होइते छइ। बाँसक छिट्टा-पथिया आ टौहकी-पहटा सेहो बनबैक लूरि दोरिक मुखियाकेँ छैन्हे। टौहकी-पहटाक बिकरी तँ बेसी नहियेँ होइ छेलैन मुदा छिट्टा-पथियाक बिकरी तँ होइते छेलैन। ओहीठाम माने खोरिबन्होक पुबरिया भित्तामे, खोपड़ियो आ मचानो बना दोरिक मुखिया सौनसँ जे रहए लगै छला ओ कातिक तक बाधेमे दिन-राति बितबै छला। एक-बेर-दू-बेर टौहकी चाहि माछो ऊपर करै छला आ भरि दिन छिट्टा-पथिया सेहो बनबै छला, जेकर बिकरी गामोमे होइ छेलैन आ आनो-आनो गामक लोक आबि-आबि किनै छल। जहिना दुरागमनक पछाइत दुनू बेटी सासुर चलि गेल तहिना जेठका बेटा-फुदिया सेहो दुरागमनक पछाइत घर-जमाए बनि सासुरेमे रहए लगल। कारण भेल, ससुरकेँ मात्र एकेटा बेटी दोसर कोनो सन्तादन नहि। सासुरमे घराड़ीक संग दू कट्ठा बाड़ियो...। ओना, गुलेती सेहो पनरह बर्खक भऽ गेल, मुदा अलबटाह जकाँ रहने बिआह नइ भेलइ। अलबटाह ई जे देहक हिसावे माथो नमहर रहै आ बोलियो साफ नइ निकलै। ओना बाजै सभ किछु मुदा स्पलष्ट बोल नइ रहने सुननिहार साफ-साफ नइ बुझैत। तैसंग दुनू पएरो झखाइ। भादो मास, सूर्यास्तक समए। टौहकी चाहैत दोरिक मुखिया भरि डाँर पानिमे रहैथ। बड़का टौहकी रहइ। ओइमे एकटा साँप फँसि गेल। मेघौन समए, दोरिककेँ बुझि पड़लैन जे अन्हैभ छी। टौहकीक मुँह खोलि साँपकेँ अन्है बुझि पकड़ए चाहलैन। टौहकीमे फँसल साँप छटपटाइते रहए। जहाँ दहिना हाथे साँपकेँ पकड़ए लगला कि हाथेमे साँप काटि लेलकैन। जखन हाथमे साँप काटि लेलकैन तखन दोरिककेँ बुझि पड़लैन जे भरिसक ढोढ़ साँप छी, वएह काटि लेलक। ढोढ़क बिख माल-जालकेँ तँ लगै छै मुदा मनुखकेँ नइ लगै छइ। ओना, हाथसँ छर-छर खून बहए लगलैन मुदा तेकरो चिन्ताब मिसियो भरि दोरिकक मनमे नइ भेलैन। टौहकीक मुँह बान्हि दोरिक ऊपर एला आ जैठाम खून बहैत रहैन, तैठाम चुनौटीसँ चून निकालि लगा लेलैन। ओना, बिख तरेतर देहमे पसरए लगलैन मुदा तेकरा अनठा देलखिन। चून लगा फेर पानिमे पसि टौहकी उठौलैन। टौहकीक मुँह खोलि साँपकेँ निकालए लगला कि फेर दोहरा कऽ साँप काटि लेलकैन। टौहकी चाहिते-चाहिते दोरिक पानिमे खसि पड़ला। दोसर कियो ओइठाम नहि। पानियेँमे दोरिक मरि गेला। एक घन्टानक पछाइत जखन गुलेतियो आ ओकर माइयो पहुँचल तँ दोरिककेँ खोपड़ीमे नइ देखलक। चारू-कात तकलक तँ केतौ ने नजैरपर पड़लन। अन्हाइर सेहो भऽ गेलइ। गुलेती कपड़ा बदैल पानिमे पैसल तँ पिताकेँ मुइल पड़ल देखलक। देखते जोरसँ माएकेँ शोर पाड़लक- “माए! बाबू मरि गेल!” ‘मरब’ सुनि तेतरियो पानिमे पैस कऽ देखलैन जे पतिक साँस बन्न भऽ गेल। पानिपर ताबे अलगल नइ रहइ। गुलेतीकेँ कहलखिन- “बौआ, पहिने दुनू गोरे पकैड़ कऽ ऊपर लऽ चलह।” भरि राति दुनू माय-पुत माने गुलेतियो आ तेतरियो दोरिककेँ खोपड़ीमे रखि ओगैड़ कऽ बैसल। भोर होइते दुनू माय-पुत खोपड़ीएमे कानए लगल। ओना गामसँ हटल खोपड़ी, मुदा रहै तँ गामेक दछिनबरिया बाधमे। ..दुनू माए-बेटाक कानब सुनि एके-दुइये गामक लोक पहुँचए लगल। अन्त मे मचानेक फट्ठो आ बल्लोक चचरी बना दोरिकक लाशकेँ उठा धारक कात लऽ जा गाड़ि देलक। अखन धरि तेतरीक मनमे मिसियो भरि ई चिन्ता, नइ पैसल छलैन जे निसहाय छी। बुझियो केना पड़ितैन, सोझमे पति, बेटा, बेटी सभकेँ देखैत। तैसंग जे जिनगी बनल आबि रहल छेलैन सेहो तँ रहबे करैन। माने ई जे जइ सुख-दुखक बीच जिनगी बनल छैन सेहो तँ छैन्हे , जइसँ अपन ऐगला शेष जिनगीपर नजैर किए जइतैन। मुदा पतिक परोछ भेने तेतेरीक मनो आ शरीरो हरहरा कऽ जेना बैसए लगलैन। ओना तेतरी सत्तैर बर्ख टपि चुकल छैथ मुदा अखन तक मनसँ मृत्युुओ आ दुखो हेराएल छैन। पतिक परोछ भेने जेना एकाएक तेतरीक मनकेँ चिन्तात दाबए लगल। दाबबो केना ने करितैन। एक दिस गुलेती सन अलबटाह बेटा सोझहामे देखैत तँ दोसर दिस जेठ बेटा-पुतोहु आ पोता-पोतीकेँ अपनासँ दूर हटल दोसर गाममे देखैत। जे कहियो एको कौर खाइक आकि एको बीत वस्त्रसक जोगार नइ करैत। बेटी तँ सहजे जन्मोदाता माए-बापसँ हटि दोसर घर बसिते अछि, तँए ओकर आशे कोन...। साल बितैत-बितैत तेतरीक शरीर जड़ि कटल लत्ती जकाँ अलिसा-अलिसा सुखैत-सुखैत सुखि गेलैन। माने तेतरी मरि गेली। पिताक मृत्यु क पछाइत गुलेती मुखियाक ऊपर परिवारक भार आबि गेल। ओना, गुलेतीक बुधि ओते परिपक्व। नहि जे अपन पूर्ण दायित्व बुझैत मुदा तैयो तँ एते बुझबे करै छल जे जहिना पिताक अमलदारीमे माछक कारोबार करै छेलौं तहिना आबो करब। जइसँ तीन-चारि मास गुजर चलिये जाइए। तैसंग पिताक संग बाँसक बीटसँ बाँस काटि अनै छल आ ओकरा पाँगि-पुईंग कऽ टुकड़ी बना-बना, माने ओकरा टोनि-टोनि, चीर-फारि छिट्टा-पथियाक काड़ो बनबै छल आ बीनैबला कैमचियो बनबै छल, तैसंग छोट-छोट पथियो-टौहकी आ पहटो गुलेती बना लइ छल। ओना पहटा बनाएब सभसँ सोझगर अछि मुदा आब ने ओकर खगता गाममे अछि आ ने बिकरीक वस्तु बनल अछि। जहिया दोरिक कोशिकन्हासँ पड़ा कऽ हरिपुर आबि बसल तहिया तीन गोरेक परिवार रहैन-अपने, माए आ पत्नी, जे समए पेब कलशल। बेटा-बेटी भेने पाँच गोरेक परिवार भेलैन। मुदा बेटा-बेटीकेँ सासुर बास भेने फेर तीनियेँ गोरे-तेतरी आ गुलेतीपर आबि अँटैक गेलैन। ओना, बेटो-बेटी जे सासुर बसैए, जीवित छैन आ तैसंग पोतो-पोती आ नातियो-नातीनसँ परिवार झमटगर भाइये गेल छैन, जइसँ दुनू परानी दोरिकक मनमे खुशी रहबे करैन। मने-मन बजबो करिते छला जे जहिना कोशिकन्हासँ पड़ा आबि हरिपुरमे बसलौं तहिना भगवान एकसँ एक्कैस परिवार बना देलैन। आगू की हएत से लोक थोड़े देखैए। बड़ देखैए तँ वर्तमान देखैए आ अतीत देखैए। अतीतो तँ अतीते छी जे अपन चुगली अपने करैए। चुगली ई जे जहियासँ मनुख ऐ धरतीपर जन्मा लेलक आ लतड़ैत-चतड़ैत आगू बढ़ल तहियासँ हमरो वंश जीबैत आबि रहल अछि, जँ से नइ जीबैत रहल अछि तँ आइ हम केना छी। समैक चपेटमे, माने समैक उतार-चढ़ावमे परिवारक डारि-पात जे टुटल हुअए आकि झड़ल हुअए मुदा शील रूपमे वंशो तँ जीवित ऐछे। ओना, गुलेतीक परिवार असगरक भऽ गेल। माने परिवारमे गुलेती असगरे रहि गेल। मुदा असगरो रहल तैयो तँ परिवार रहबे कएल, भलेँ अलबटाह रहने गुलेतीक बिआह नइ भेल, तइसँ परिवार आगू नइ बढ़त, मुदा असगरोक परिवार तँ ऐछे। जखने परिवार रहल तखने ओकरा जीवित रखैले परिवारक सभ विहीत करए पड़ै छइ। परिवारो तँ परिवार छी। एको गोरेक होइए आ पचासो गोरेक होइते अछि। एक गोरेक परिवार ओ भेल जे गुलेतीक छइ, आ गोटे-गोटे ऋृषि-ऋृषिकाक सेहो होइए, जइमे असगरेक जिनगियो आ परिवारो होइए आ दुइयो-तीनियोँ आ चारियो-पाँचोक होइए। तैसंग जँ दू भैयारी आकि तीन भैयारी आकि चारि भैयारीक रहल, तँ पाँच-दस-पनरह-बीसक सेहो होइए। तहूसँ बेसी जँ पिताक परिवारसँ आगू बढ़ि बाबा तकक रहल तँ तीसो-चालीस गोरेक भेल आ जँ तहूसँ पाछू परबाबा तकक संयुक्त रूपमे रहल तँ पचासो-साठि गोरेक परिवार होइते अछि जेकरा ‘संयुक्त परिवार’ सेहो कहै छी। ओना, संयुक्तो परिवार केते रंगक होइए। जँ दू-तीन भैयारीक रहल तँ ओहो संयुक्त परिवार भेल आ जँ तइसँ पाछू बाबा तकक भेल तँ ओहो भेल आ जँ परबाबा तकक भेल तँ ओहो संयुक्त परिवार भेल। मुदा तँए कि एक गोरेक आकि दू गोरेक परिवार नइ अछि, एहनो तँ नहियेँ कहल जा सकैए किएक तँ सेहो ऐछे। ओना, एक-पुरखिया परिवारकेँ संयुक्त परिवार बनैक अनुकूल परिस्थिति बनितो नहियेँ अछि तँए ओ नमहर जड़ि रहितो ताड़-खजूर जकाँ एक-पुरखियाहे रहैए। माने ई जे जँ परबाबा धरिक परिवार अछि। ओइ परिवारमे परबबो असगरे भैयारी छला आ बेटो एकेटा भेलैन, बेटी भलेँ बेसीए रहल होनि जे सासुर चलि गेलैन ओ परिवार तँ एक-पुरखियाहे आगू बढ़ि बाबापर पहुँचैए। आ जँ बबोक वएह गति भेलैन जे एकेटा बेटा भेलैन जइसँ फेर एक-पुरखियाहे परिवार आगू बढ़ल...। तँए ओहन परिवार तँ कहियो संयुक्त नहियेँ बनि पाऔत, बेसीसँ बेसी एतबे ने हएत जे बबो-दादी आकि माइयो-बाप आकि बेटो-पुतोहु एकठाम रहि गुजर-बसर करैथ। ओना, अकसरहाँ लोकक मुहेँ यएह निकलैत जे ‘संयुक्त परिवार नष्ट भऽ गेल वा जेहो अछि से नष्टो होइक बाट पकैड़ नेने अछि।’ मुदा ऐठाम हमरा भ्रम भऽ गेल अछि। भ्रम ई भऽ गेल अछि जे हम समयक गतिकेँ नीक जकाँ नहि बुझि पेब रहल छी। जहिना समैक गति अछि जे भिनसरसँ दुपहर, दुपहरसँ साँझ पड़ैए तहिना सभ कथुक अछि, जइमे परिवारो आ समाजो अछि। समाज परिवर्तनशील अछि। कोनो क्षण एहेन नइ होइ छै जइमे परिवर्तन नइ होइए। मुदा प्रति क्षण होइबला परिवर्तन जाबे तक पुरान स्थितिमे रहल माने पुरान सीमाक बीच रहल-ताबे तक मात्रात्मक परिवर्तनक बीच रहल मुदा जखन ओ धीरे-धीरे बदलैत ओइ सीमापर पहुँच लांघए चाहैए वा लांघैए तखन स्थिीति बदलौ चाहै छै आ बदलियो जाइ छै जइसँ बदलावक एक नव रूप धारण करैए जेकरा गुणात्मक परिवर्तन कहै छिऐ, अहीठामसँ परिवारो आ समाजोमे एक नव रूपक उदय होइ छै जे विकास कहबैए। उदाहरणक रूपमे हम देखै छी जे जहिना केटलीमे पानि भरि चुल्हिपर चढ़बै छी, ओइमे निच्चा सँ आँच दइ छिऐ, जइसँ पानि गर्म होइत खौलए लगैए। जाधैर पानि खौलैत रहैए ताबे धरि ओ मात्रात्मक परिवर्तनक रूपमे रहल मुदा जखने खौलैत पानि वाष्प बनि उड़ए लगैए तखन ओ गुणात्मकमे बदैल जाइए, जइसँ पानिक रूप वाष्पक रूपमे बदैल जाइए। अहिना परिवारोक संग अछि। जेकरा हम ‘संयुक्त परिवार’ कहै छिऐ ओ अखनो अपन बदलैत रूपमे जीवित अछि आ आगूओ रहत। अखनो एहेन परिवार तँ ऐछे जे पचीस-पचास जनक अछि। परिवारक जे श्रमशील लोक छैथ ओ अपन-अपन जीविका-ले अपन-अपन उत्पादनमे दसठाम छिड़ियाएल रहै छैथ, आ जखन परिवारमे कोनो पैघ काज- विवाह, श्राद्ध इत्यादि भेल तखन सभ एकठाम भऽ दस-दिन-बीस-दिनमे काज निवटा अपन-अपन जगह पुनः पकैड़ लइ छैथ। ..जाबे धरि परिवारक सभ जनकेँ जीबै जोग उपार्जन नइ रहतैन ताबे ओ परिवार ठाढ़ो केना रहि सकैए तँए जेकरा नष्ट होइत संयुक्त परिवार बुझै छी ओ पाछूक विचार आ ढॉंचा छी। मुदा नव ढाँचाक रूपमे ‘संयुक्त परिवार’ अखन नइ अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। हँ, एते जरूर भेल अछि जे ओ नव रूप पकैड़ ठाढ़ अछि। गुलेती मुखियाक परिवारक जे पैछला रूप छल ओ बदैल गेल मुदा जीवित भाए-बहिनक बीचक सम्बन्ध अखनो जीवित अछि। माने ई जे गुलेतीक जेठ भाइयो आ बहिनो, जे सासुर बास करैए, अपन के कहए जे दुनू बहिनो आ भागिनो-भगिनीक आवा-जाही छइ। तैसंग ईहो छैहे जे गुलेतियो कहियो काल अनदिनो माने बिना कोनो काज-उदेमक सेहो जाइते अछि आ तैसंग जँ कहियो कोनो विशेश काज बिआह-दुरागमन आदि- भेल तँ तहूमे जाइते अछि। ओना, माता-पिताक मुइने गुलेतीक परिवार असगरेक रहि गेल, मुदा परिवार तँ ठाढ़ रहबे कएल। नमहर परिवार रहने परिवारक जे जरूरतक वस्तु अछि ओकर जरूरत बेसी होइ छइ, आ जेते छोट रहल तेते कम होइ छइ। माने ई जे रहैक घर हुअए आकि भोजनक सिदहा-समर, आकि देहक वस्त्रव आकि रोग-वियाधिक दवाइ-दारू ऐ सभ चीजक खगता कम आ बेसी रहने बेसी होइ छइ। जाबे तक दोरिक मुखिया जीबै छला ताबे तक शकलदेवकेँ गिरहत मानि हुनके काज-उदेम करैत रहलैन। शकलदेवे दोरिककेँ घर बनबैक बाँसो-खढ़ देने रहथिन आ अपन गिरहस्तीमे काजो देने रहथिन, तैसंग मौका-कुमौकामे दू सेर आकि दू टाका दऽ मदैतो करै छेलखिन। ओना, शकलदेवो मरि गेला। बेटा सुरतलाल छथिन जे पितेक सीख-लिखे अखनो धरि परिवार चलबै छैथ। हाथ-पएर टेँढ़ रहने गुलेतीकेँ ने हर जोतल होइ आ ने धनरोपनी कएल होइ, जइसँ सुरतलालक संग सम्बन्धमे कमी आबि गेल। ओना, सुरतलाल हर जोतैले दोसर गोरेसँ सम्बन्ध बना लेलैन मुदा गुलेतीकेँ सेहो सोलहन्नी नहियेँ छोड़लखिन। अखनो जइ दिन सुरतलाल खेती शुरू करै छैथ, माने पहिल दिन, जइ दिन जन-हरबाहकेँ नति कऽ खुअबै छथिन- तइ दिन गुलेतीकेँ सेहो नौत दऽ खुऐबते छथिन। दोरिकक अमलदारीमे परिवारमे तीन दिसक आमदनी छल, पहिल छल हरबाहिक संग रवियो-राइ उखाड़ै-काटैसँ लऽ कऽ धनकटनीक बोइन सेहो, तैसंग सौनसँ लऽ कऽ कातिक तक माछोक छल आ टौहकी-पहटा-छिट्टा-पथिया जे बनबै छला सेहो छेलैन। से गुलेतीक परिवारमे नइ रहल। मुदा तैयो मछबारिक आमदनी आ छिट्टा-पथियाक रहबे कएल। टौहकी-पहटा बनाएब छोड़ि सोलहन्नी छिट्टा-पथिया बनबैए। सुरतलाल गामक सुभ्यस्त किसान छैथ, जिनका दस बीघा जोतो, खढ़ो-खरहोरि आ वेखो-बुनियादि छैन। पाँच कट्ठाक जे बँसवाड़ि छैन ओ ओहन जइमे दस-बीसटा बाँस सभ दिन सूखले रहैए। गदिआह माटिपर बँसबाड़ि छैन जइसँ एक-एकटा बाँस पचास-पचास हाथक होइ छैन। तहूमे जीवनी किसान शकलदेव, रंग-रंगक बाँसो लगौने छला आ ओकर तरद्दुत सेहो साले-साल करिते छला। तरद्दुत ई जे बाँसक बीटमे साले-साल बैशाख-जेठमे माटियो दइ छेलखिन आ खाली जमीनक तमनी सेहो करिते छला, जइसँ पुरान बीट रहितो बुझिये ने पड़ैत जे ई एते पुरान अछि। ओना, नवो बीट पुरान बीट जकाँ बिना तरद्दुतक भाइये जाइए। हेबो केना ने करत जहिना गरीब परिवारमे समुचित भोजन आ बर-बेमारीमे समुचित दवाइ नइ भेटने जुआनो-जहान झखड़ल बुझि पड़ैए तहिना नवको बाँसक बीटमे भाइये जाइ छइ। गुलेतीक परिवारक सम्बन्धक जे शकलदेव परिवारक संग अखन धरिक छल ओइमे काजक कमी भेनौं कमी नइ आएल अछि। जइ समए दोरिक जीबै छला तहू दिनमे छिट्टा-पथिया बनबैले शकलदेवक बाँस कीनि बनबै छला आ गुलेती जखन करए लगल तखनो सुरतलालेसँ बाँस कीनि-कीनि बनबैए। ओना, गुलेतीक परिवार आ सुरतलालक परिवारक सम्बन्धमे मिसियो भरि विघटन नहि भेल मुदा सम्बन्धक रूपमे परिवर्तन तँ भेबे कएल। होइते अहिना छै जे समैक संग बेकतियो, परिवारो आ समाजोक सम्बन्धमे परिवर्तन भऽ जाइए। जहिना दोरिककेँ हरिपुर एलापर शकलदेव बिसवासक संग बाँस, खढ़, खरही दऽ घर बनबा बसौलखिन आ अपन मदैतिक लेल हरबाहिक संग गिरहस्तीसँ जोड़ि जिनगीकेँ बिसवासक संग आगू बढ़बैत रहलखिन तहिना सुरतलालो गुलेतीक संग अपन बिसवासकेँ जीवित रखनहि छैथ। माने ई जे गुलेतीकेँ जे छिट्टा-पथिया बनबैले बाँसक खगता होइ छै तइले कहि देने छथिन- “गुलेती, बाँसक बीट अपने बुझिहह, तँए जखन तोरा खगता हुअ तखन परोछोमे काटि सकै छह। दामक कोनो बात नहि, तोरो बुझले छह जे बीस रूपैआ एगो-बाँसक दाम होइए, जे तूँ पहिनौं दऽ सकै छह आ पछातियो दऽ सकै छह।” ओना, गुलेतियो इमानदारीसँ ई बुझिते अछि जे बिसवासो तँ पुरनाइये गेल अछि जइसँ कमी आबिये जाइ छइ। तँए जखन बाँसक खगता होइ छै तखन ओ अपन जीवनक जीविकाक काज बुझि पहिने सुरतलालकेँ जानकारी दैत काज करैए। अन्तिम जेठ, टहटहौआ रौद। गुलेती मुखिया तीन बजे अपन छिट्टा बीनैक सभ समचाक संग एकटा डाबामे पानि नेने घरसँ थोड़े हटि रस्ता परक पाखैर गाछ लग पहुँचल। ओना, ओ आइए-टा नहि, सभ दिन ओही गाछक निच्चाँथक छाहैरमे बैस अपन काज करैए। गाछक निच्चाँ मे काड़ा, कैमची, पगहरिया आ पानिक डाबा रखि बौगुलीसँ तमाकुल निकालि चुनबए लगल। तही काल लोहिया पट्टीबला श्याम सुन्दर दास अपन दूटा चेलाक संग पहुँचला। तीनू बबाजी भनडारा पुरए दीप जाइ छला। ओना, तीनू गोरे छत्ता सेहो ओढ़ने रहैथ मुदा तैयो रौदा गेले छला। रौदेबो केना ने करितैथ, एगारहे बजे खा-पी कऽ गामसँ विदा भेला। लोहिया पट्टी आ दीपक बीच पाँच-छह कोस जमीन अछि। चारि बजेसँ भनडाराक कार्यक्रम पहुँचनहि शुरू हएत। भनडरो नमहर छइ। एगारह साए टूक बँटने छैथ। सात साए महात्मोक जुटानी अछि। तैसंग परोपट्टाक जे कण्ठीमधारी कबीर पंथी छैथ, तिनको सभकेँ दल पड़ले छैन। एक-सँ-एक गबैया सभ सेहो एबे करता। ओना, कम कि बेसी जे साधु-महात्माच छैथ, सभकेँ किछु-ने-किछु भजन कीर्तन अबिते छैन, जे कियो खौजरीपर गबै छैथ तँ कियो ढोलक-हरमुनियाँपर तँ कियो ओहिना थोपड़ी बजा-बजा सेहो गेबे करै छैथ। जहिना छोट-पैघ कबीर पंथी महंथक जुटानी अछि माने दल पड़ल छैन, तहिना छोट-पैघ गबैयोक जुटानी ऐछे। रहबो केना ने करत, अखुनका जकाँ कि अपन-अपन फीस बना चलै छैथ, एक टूक सुपारी अपना पंथक भेट जाइ छैन कि अपन सेवा दइले तैयार भऽ जाइ छैथ, जइसँ नीकसँ नीक भजन-कीर्तनक कार्यक्रम, कम-सँ-कम खर्चमे चलिते अछि। ..इलाकाक पैघ गबैया सरिया दासीन जे डोम परिवारक छैथ, जिनकर कहब छैन जे सात-दिन-सात-राति एक-सुरे जँ गबैत रहब तैयो दोहरा कऽ एक भजन नइ गाएब। गबैया नमहरक दोसर कारण ईहो अछि जे अपने-आपमे ओ पूर्ण छैथ। माने ई जे ने हुनका दोसर संग पुरनिहार दोसर गबैयाक खगता होइ छैन आ ने कोनो बजन्त्रि येक। माने ई जे एहनो गबैया तँ छैथे जिनका नीक माईक आ आधुनिक बाजाक संग नीक बजौनिहारोक खगता होइ छैन, तैठाम सरिया दासीन अपने मुहेँ गेबो करै छैथ आ अपने हाथे खौजरियो बजबै छैथ। चेहरा-मोहरा भलेँ देखनुक नइ होनि मुदा ज्ञान ज्योातिक प्रखर गबैया तँ छैथे जे पारखी लेल आकर्षणक कारण ऐछे। तँए खाली पंथाइयेक सुननिहारटा नहि आनो-आन कला-पारखीक जुटान तँ भाइये जाइए। तहूमे सरिया दासीनक संग छट्ठू दास, हिताइ दास, राम अशीष दास, रामजी दास इत्यादि अनेको गबैयाकेँ टूक भेटले छैन। सभ कियो जुटबे करता। एक तँ ओहिना गोसाँइ साहैबक सेवकान तहूमे नमहर कार्यक्रम ऐछे तैठाम जँ कार्यक्रम शुरू होइसँ एको घन्टाक पहिने नइ पहुँचता सेहो केहेन हएत। ..यएह सोचि लोहिया पट्टीबला महात्माक श्याम सुन्दर दास एगारह बजे खा-पी कऽ गामसँ विदा भेला जे तीन बजे तक दीप पहुँच जाएब। मुदा से भेलैन नइ शुरूमे तँ एक झोंक खूब चलला जइसँ घन्टे भरिमे दू कोस टपि परसा लगिचा देलखिन। मुदा एक तँ खेलहा-पिलहा परहक चालि, दोसर जेठुआ रौद, परसा अबैत अबैत बेदम भऽ गेला। कटोरिया धोधि थुलथुल देह, थकानसँ ई बुझि पड़लैन जे जँ एको डेग आगू बढ़ब तँ खसि पड़ब। ओना, अपनोसँ तबाह दुनू चेला भऽ गेलैन। चेलाक तबाहीक कारण भेल जे दुनू गोरेक काँखमे नमहर-नमहर झोरो, जइमे कपड़ा-लत्ताक संग झालि-खौजरी इत्यादि छेलैन, तैपरसँ एक हाथे छत्ता सेहो पकड़ए पड़ल रहैन। मुदा मुँह फोरि अपन बेथा गोसाँइ साहैबकेँ कहबो केना करतैन। कहैक माने भेल अपना संग गोसाँइयो साहैबक समए लेब। एक तँ ओहिना समैपर पहुँच पएब कि नहि, तैपर सँ आरो समए खटियाएब उचित नहि। ..संजोग नीक बनल। परसा धामक आगू पहुँच गेला। केना गोसाँइ साहैब श्याम सुन्दर दास कहितथिन जे ‘थाकि गेलौं, कनी अराम करब।’ तँए बोल बदलैत बजला- “छीतन दास, भने नीक जगहपर पहुँच गेलौं। सूर्य मन्दिर छी। चलू कनी दर्शन कऽ लेब।” एक तँ ओहिना सबहक मनकेँ रौदक थकान दबने, तैपर गोसाँइ साहैबक विचार कटलो तँ नहियेँ जा सकैए। छीतन दास बजला- “हँ-हँ साहैब, फेर कहिया ऐ रस्ते आएब कहिया नहि, तँए जिनगीक जे काज अगुआइत भऽ जाए ओ ओते बढ़ियाँ किने।” ओना, दोसर चेला-दुखी दास बुझि गेला जे दुनू बहन्ना कऽ रहला अछि, भरि दिन निरगुने-सगुनक विचार करैत रहै छैथ आ अखन दर्शन करैक मन भऽ रहल छैन! तँए दुखी दासक मुँह बिजकैत रहैन। जे बात श्याम सुन्दर दास बुझि गेला। दुखी दासकेँ पछुअबैत पुछलखिन- “की दुखी दास अहाँक की विचार अछि?” गोसाँइ साहैबक विचार कटलो तँ नहियेँ जा सकैए तखन तँ भेल गुरुकेँ अनुकूल बना चली जइसँ अनुकूलता औत। ..मुस्की दैत दुखी दास कहलकैन- “साहैब, अहाँक ने पहिल दिन छी। मुदा हमर तँ सासुरे परसा छी। जखन सासुरमे रहै छी तँ भोरे सुति उठि नहा कऽ पहिने एक लोटा जल सूर्ज भगवानकेँ चढ़बै छिऐन, तेकर पछाइते चाहो-पान करै छी आ दुनियोँ-दारीक गप-सप्पल।” सभ गप करिते तीनू गोरे मन्दिरक आगूक आँगनमे पहुँच अपन-अपन झोरा-झपटा रखि अराम करए लगला। ओना, तीनू मुरतेकेँ निन सेहो दाबए लगलैन मुदा चारि बजेसँ पहिने दीप पहुँचैले कछमछी सेहो मनकेँ रेबारिते रहैन। पनरह-बीस मिनट अराम केला पछाइत श्याम सुन्दर दास बजला- “छीतन दास! अराम केने समैपर नइ पहुँचब, आगू बढ़ू।” छीतन दास बिना किछु बजने उठि कऽ झोरा काँखमे लटकौलक। तीनू गोरे परसा धामसँ टहटहौआ रौदमे छाता तानि विदा भेला। परसा धामसँ दू कोस आगू हरिपुर। हरिपुर अबैत-अबैत तीनू मुरते फेर बेदम भऽ गेला। तीनूक मन लुस-फूसाए लगलैन जे केतौ बैस कनी काल अराम करी। मुदा श्याम सुन्दर दासक नजैर जखन घड़ीपर पहुँचैन तँ मन कड़ुआ जाइन। एके घन्टाक समए बँचल अछि आ कोस भरिसँ बेसी जमीन चलबो अछि। मुदा आगू बढ़ैक डेगे ने ससरैन। तैपर पियाससँ मन छटपटाइत रहैन। तहूमे गामो तेहेन अछि जे अँगने-अँगने सभ चापाकल गरौने, रस्ता कातमे एकोगो कल नहि, पानियोँ केतेए पीब। केकरो ऐठाम जँ पानि पिबए पहुँचबो करब तँ तेते ने आगत-भागत करए लगता जे आरो बेसी समए लगत। अपन सेवकानमे भनडारा छी, गेला पछातिये कार्यक्रमक श्री गणेश हएत। ..श्याम सुन्दर दासकेँ कोनो रस्ते ने सुझैत रहैन जे की केने की नीक हएत। ततमत करैत तीनू गोरे पाखैर गाछ लग पहुँचला। गाछक जड़िमे गुलेती डाबाक मुँहपर लोटा औन्ह कऽ रखने रहए। जहिना प्रियतमक प्रेममे प्रेमीक नजैर चकोनो होइत रहैए तहिना श्याम सुन्दर दासक नजैर पाखैर गाछक जड़िमे राखल माटिक कलशपर अँटकल रहैन। मुदा ताकमे रहैथ जे चीजबला किछु बाजत तखन ने बातक सोरि पकैड़ अपन बात राखब। से गुलेती दास किछु बजबे ने करैत। मतलबे वेचाराकेँ की रहइ। तहूमे रस्ता-पेरा चलनिहारकेँ उपकैर कऽ टोकबो नीक नहि। जँ कहीं टोकाइन लगि जानि तँ अनेरे गुम्हरता। तँए, तइसँ नीक ने जे ‘ने मारी माछ आ ने उपछी खत्ता।’ ओना, श्याम सुन्दर दासकेँ नमगर चानन देख गुलेती बुझि गेल जे ई सभ बबाजी छिआ। किएक तँ श्याम सुन्दर दासकेँ मोछ-दाढ़ी ने झमटगर नइ छैन मुदा चानन तँ नमगर-चैड़गर छैन्हेे। छीतन दास आ दुखी दास ने झोंटो बढ़ौने छैथ आ मोछो-दाढ़ी बढ़ौने छैथ, भलेँ कण्ठी गमछे तरमे किए ने झँपाएल होनि मुदा छैथ सभ बबाजीए। समयक गतिकेँ अँकैत श्याम सुन्दर दास गुलेती दिस तकैत बजला- “बाउ, दीप केते दूर हएत?” ओना, श्याम सुन्दर दासकेँ बुझल रहबे करैन, किए तँ केतेको दिन अही रस्ते दीप होइत दीघिया गेल छैथ। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे लग-पासक गामक दूरी बेसी आबा-जाही भेने छोट भऽ जाइए आ बाहर-बलाक लेल माने दस-कोस-बीस-कोस चाइलिक थाकल लोक-ले बढ़ि जाइए। गुलेती मुखिया बाजल- “बाबा महराज, किरिण डुमैत दीपक हाट तीमन-तरकारी-ले जाइ छी आ दोसर साँझ होइत-होइत घुमि कऽ आबि जाइ छी, तेतबे दूर अछि।” गुलेतीकेँ कोस आकि किलोमीटर बुझब कोन जरूरी छइ, अपन काजसँ मतलब छइ, तँए अपन काजक नापसँ दीपकेँ नापि बाजल। ओना, गुलेतीक इमान श्याम सुन्दर दासक मनकेँ मोहि लेलकैन। मोहि ई लेलकैन जे अखनो जँ केतौ इमान बँचल अछि तँ एहने-एहने लोकक बीच अछि। ऐठाम जँ सम्बन्ध नइ बनाएब तँ नीक सम्बन्धी सँ भेँट हएब कठिन अछि। विचारकेँ आगू बढ़बैत श्याम सुन्दर दास बजला- “बाउ, डाबामे जल छी?” ‘जल’ सुनिते गुलेतीक अपनो मन जलजला गेलइ। जलजला ई गेलै जे भूखलकेँ एक कौर अन्न आ पियासलकेँ एक लोटा जलदान करब धरम छी। मुदा अपनो तँ धर्म अछि, जँ धर्म-धर्म अपनेमे लड़त तँ अधर्मक राज हेबे करतै। अपन धर्म बँचबैत गुलेती मुखिया बाजल- “बाबा महराज! हम साँकठ छी। मलाह सेहो छी, सालमे चारि मास मछबाइरे करै छी। हमर घैलक जल केना पान करब?” गुलेतीक बात सुनि श्याम सुन्दर दासक मनमे एकाएक अनेको प्रश्नम उठि गेलैन। मुदा समैकेँ देखैत अपन विचारकेँ दाबए चाहैथ। मुदा जे रणक्षेत्रमे प्रश्नी उठि गेल अछि ओकरा छोड़बो तँ नीक नहियेँ हएत। मुदा प्रश्नो। तँ एहेन जटिल अछि माने पेरासूत जकाँ तेहेन घुरछी लागल छै जे धड़फड़मे सोझराएबो कठिन ऐछे। जँ कहबै जे ‘बौआ माछ खाएब छोड़ि दहक सेहो नइ हएत। किए तँ कैतकी गैंचीक सुआद मनमे हेबे करतै। हमर बात किन्नौं सुनत। ..जाबे केकरो अनुकूल नइ बना पएब ताबे ओ संग थोड़े आबि सकैए। मुदा ‘पियास ने मानए धोबी घाट...।’ ..पियाससँ तीनू मुरतेक मन माटिपर पड़ल माछ जकाँ छटपटाइत रहैन। श्याम सुन्दर दासक मनमे ईहो उठैन जे हमर जे पूर्व महापुरुष सभ भेल छैथ ओ भूखलमे कुत्तोक मौसुकेँ अमृत मानि भक्ष वस्तु कहने छैथ...। श्याम सुन्दर दास मने-मन विचारए लगला जे की कहलासँ गुलेती अनुकूल हएत। जाबे अनुकूल नइ हएत ताबे जे जल पियौत तँ मन अपन गवाही देबे करतै जे पाप केलौं! एक दिस ‘साधु-महात्माए’क सेवा, दोसर दिस ‘पाप’, दुनू सिरापर ऐछे! तैबीच ईहो तँ ऐछे जे दुनियाँमे सभकेँ अपन इष्ट-देव छै आ ओही इष्टहदेवक आदेशानुसार अपन-अपन बुधि-विवेकसँ काज करैए। तत्काँल जँ किछु आदेशो देबै आ परिस्थितिवस जँ मानियोँ लेत तँ पछाइत अपन मन कहबे करतै जे ई अनुचित भेल। माने ई जे बटोही-अभ्यादगत बुझि कहबै आ तेकरा जँ ओ सेवा बुझि काइयो लेत तैयो मने-मन गुनधुन करबे करत। मुदा जाबे ओकर मनकेँ मोड़ि अपना मनोनुकूल नइ बना लेब ताबे आगूओ केना बढ़ब। ..एकाएक श्याम सुन्दर दासक मनमे भेलैन कहाँ एक लोटा ‘जल’ आ कहाँ जलसँ भरल अथाह समुद्र.., तैठाम जँ पछैड़ जाइ सेहो नीक नहि, तँए नीक ई हएत जे अनकर मनकेँ मोड़ैले कनी अपनो मनकेँ लियौन करी। अपन मनकेँ लियौन करैत श्याम सुन्दर दास गुलेतीकेँ कहलखिन- “बौआ, परिवारमे के सभ अछि?” ‘परिवार’ सुनि गुलेती मुखियाक मन चैंकल। चैंकल ई जे आइ तक कियो एहेन शुभचिन्तपक नइ भेला जे हमरा सन गरीब लोकक परिवारक खोज-खबैर लथि। ओना गुलेती काज करैक सुर-सार करिते रहए, हाथ नइ लगौने रहए, तइ बिच्चेमे परिवारक बात उठि गेल। ..गुलेती बाजल- “बाबा महराज, असगरे छी माइयो आ बाउओ मरि गेल।” ‘असगर’ सुनिते श्याम सुन्दर दासक मनमे उठि गेलैन जे एक दिस लसगरक बीच जा रहल छी आ दोसर दिस बाटेमे असगरसँ भेँट भऽ गेल। किए ने एकरो ओही लसगरमे लसका दिऐ जे समूहमे समाज बनि समाजिक जीवन धारण करत। तैबीच मनमे ईहो उठलैन जे लसगर जँ बोनो-झाड़ आकि धारो-समुद्रमे रहैए तँ ओकर जिनगीक अपन आनन्द छइ, मुदा असगर जँ से रहत तँ बोन-झाड़मे बाघ-सुगरक डर हेतै जे कहीं किम्हैरोसँ आबि चाभि ने दिअए। तहिना धारो-समुद्रमे हेबे करतै जे कोनो मोइनमे ने डुमि जाइ...। विचारकेँ आगू बढ़बैत श्याम सुन्दर दास बजला- “असगरे परिवारक सभ काज सम्हाइरि केना लइ छी। परिवारमे काज तँ बहुत होइ छइ, उपैतसँ विपैत धरि?” ओना, श्याम सुन्दर दासक विचार गुलेती नीक जकाँ नइ बुझलक। माने उपैत-विपैतक अर्थ नइ बुझलक। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे दू गोरेक गप-सप्पदमे बिनु बुझलो प्रश्नक उत्तर लोक दइते अछि। ..गुलेतियो मुखिया सहए केलक- “बाबा महराज, गरीब लोकक परिवारे की! ‘आगू नाथ ने पाछू पगहा।’ तखन तँ पेट अछि ते भूख लगबे करत, तइले कमा कऽ खाइ आकि भीख माँगि कऽ आकि ठकि-फुसिया कऽ, लोक कहुना तँ जीबे करत।” ओना, गुलेती अपना धुनिमे बाजल। मुदा श्याम सुन्दर दासकेँ जिनगीक एकटा पन्ना भेटलैन, जेकरे पकैड़ पुछि देलखिन- “कमाइ की सभ अछि?” ‘कमाइ’ सुनि गुलेती मुखियाक मनमे ठहकल। पहिने काज तखने कमाइ। काज करब तखन ने कमाइ हएत..। बाजल- “बाबा महराज, सालो भरि बाँसक छिट्टा-पथिया बनबै छी, ओकरे बेच कऽ खाइ-पिबै छी।” श्याम सुन्दर दास- “एकेटा काज करै छी आकि दोसरो?” गुलेती- “ई भेल सालतनी काज आ बीचमे एकटा दोसरो काज अछि। सालक चारि मास मछबारि सेहो करै छी।” श्याम सुन्दर दास- “जखन मछबारिक काज करैत हएब तखन तँ छिट्टा-पथियाक काज छुटि जाइत हएत?” ओना, गुलेती मुखियाक मोट बुधिक मन तँए मेही बात सभ बिसैर-बिसैर जाइते अछि। मुदा अखियास करैत बाजल- “बाबा महराज, आसिन-कातिकमे जहिना पावैनक धुमसाही रहैए तहिना काजोक भऽ जाइए। एक तँ जनमारा मास दुनू छी, केकरो मलेरिया बोखार धरैए तँ केकरो साँप-बिच्छूसँ छुबबैए, तैपर दिनो कनी छोट भाइये जाइए। मुदा..?” ‘मुदा’ सुनिते श्याम सुन्दर दासक मनमे ठहकलैन। ठहैकते मुहसँ मुस्की छुटलैन। मुस्कियाइत बजला- “तखन पार केना लगैए?” जहिना कोनो भारी माने चैड़गरो आ गहींरगरो धार टपै काल मनमे समोह उठैए तहिना गुलेतीक मनमे समोह उठल, जइसँ बोली लटपटाए लगल। बाजल- “गरीब लोकक जिनगीक कोनो लज्जैगत रहैए। ने खाइ-पिबैक ठेकान आ ने रहै-सहैक, तखन तँ कहुना मनकेँ मारि नहि रहत तँ..।” ठमकैत गुलेतीकेँ देख श्याम सुन्दर दास बिच्चेमे पुछि देलखिन- “जखन असगरे छी तखन एते लन्दज-फन्दद काज किए करै छी? काजकेँ समैट जतबे खगता अछि तही हिसावसँ करू।” श्याम सुन्दर दासक विचार जेना गुलेती मुखियाक मनमे भरि गेल तहिना तीर लगल चिड़ै जकाँ छटपटाए लगल, बाजल- “से केना हएत?” श्याम सुन्दर दास बजला- “जँ साल भरिक रस्ता” भेट जाए तँ चारि-छह मासक रस्ता छोड़ि दी।” हँसैत गुलेती बाजल- “से तँ नानियोँ-मुहेँ सुनने छी जे बेसी काल बजै छेली जे छह मासक रस्ता नइ चलि साल भरिक चली।” सुढ़ियाइत गुलेतीक मनकेँ देख मोहैन चलबैत श्याम सुन्दर दास बजला- “जखन घर-अँगनामे बैस छिट्टा-पथियाक काज कऽ लइ छी तखन जँ पानि-झाड़क काज करै छी से नीक लगैए?” ‘पानि-झाड़’ सुनिते गुलेतीक मन पनियाइत झहरल- “बाबा महराज, हमर बाउओ पानियेँमे मरल।” ‘पानिमे मरल’ सुनिते श्याम सुन्दर दासक मनमे उपकलैन- मुर्दघट्टीए ओहन जगह छी जैठाम लोक अन्तिम साँस लइए। जखन जिनगीक अन्तिम साँसक समए अबैए तखने नव साँस पौने मनमे परवेशो करैए...। जहिना मरैत रोगीकेँ कोराइमिन दऽ किछु समए प्राणकेँ ठहरौल जाइए तहिना जिनगीक कोराइमिन दैत श्याम सुन्दर दास बजला- “बाउ, जखन साल भरिक उपैतिक काज लगले अछि तखन दू-मसुआ आकि चरि-मसुआ काज छोड़ि देब नीक। ओना, टुकड़ी-पुरजा काज जे होइए ओ थोड़े लभगर होइते अछि मुदा ओइ लभगरक लोभमे नइ पड़ी।” जहिना धुर-झार श्याम सुन्दर दास अपन विचारकेँ व्यक्त करैत गेला तहिना गुलेतीक जिज्ञासा सेहो बढ़ैत गेल, जेकरा ओ ठाढ़ कानक कोन बात जे मुँह-बाबि सुनबो करए आ अखियासो करए, मुदा जड़िक मूल लग नजैर जेबे ने करइ जे श्याम सुन्द़र दास की कहि रहला अछि। खएर.., एते तँ जिज्ञासा जगिये गेलै जे बाजल- “बाबा महराज, अहीं सेने हमहूँ जाएब। केतए जाइ छिऐ आ कहिया घुमबै?” अपन मेहनतक फल देख श्याम सुन्दर दासक मन ठाढ़ भेलैन। ठाढ़ होइते हियाबए लगला जे ‘की केने की नीक हएत’ तँए किछु बजैमे बिलम होइत रहैन। बिच्चेमे छीतन दास टीपलक- “गुलेती भाय, करीब बीस बर्ख पहिनहि हमरो घरवाली मरि गेल, आ जेठका बेटा जे पनरह सालक रहए ओ गौंआँ सबहक संगे बिराटनगर पड़ा कऽ चलि गेल।” बिच्चेमे गुलेती बाजल- “दोसर-तेसर धिया-पुता बीचक नइ अछि?” गुलेती मुखियाकेँ धड़फड़ाइत देख छीतन दास बाजल- “छह मास अल्हु आ माटि तर रहैए से धड़फड़ेबे ने करैए आ अहाँ लगले धड़फड़ा गेलौं। पहिने भेख लिअ तखन आरो भीख भेटत।” लगले सूरमे गुलेती बाजल- “अहाँक विचार मानि गेलौं। पहिने एक लोटा जल पीब लिअ जे थाकल-ठेहियाएल छी, बजैमे कण्ठो सर्रास हएत।” कहि गुलेती पाखैर गाछक जड़िमे माटिक डाबा लग आबि लोटा अखारि कऽ पानि भरि श्याम सुन्दर दासक हाथमे दैत बाजल- “गरीब लोक छी, ऐसँ बेसी ऐठाम उपाइये की अछि। जँ आइ ठहैर जैतिऐ तँ सौंझका भनडारा चलितै।” लोटो भरि जल पीब श्याम सुन्दर दास बजला- “अखनसँ अहाँ ‘गुलेती मुखिया’ नइ ‘गुलेती दास’ भऽ गेलौं।” अपन बदलैत नाउक-नाङैर सुनिते गुलेतीक मन भगवान रामक धनुषपर पहुँचल। ..पियाससँ छीतनो-दास आ दुखियो दासक कण्ठ सुखिते रहैन। तैबीच गुलेती दासकेँ देखलैन जे हाथ बागि माने पानि पियाएब छोड़ि विचार सुनैमे वौआ रहल अछि। अपनो-ले अपने मुँह नइ उठाएब तखन तँ अन-पानि बेतरे मरिये जाएब आ कियो पुछनिहारो ने हएत। बजला- “गुलेती भाय, पहिने जल पिआउ तखन गुलेतीक फट्ठाकेँ धनुषक फट्ठा बनाएब।” छीतन दासक व्यंग्य-वाण सुनि श्याम सुन्दर दासक मसुएलहा मन मकइ जकाँ जे खापैड़ पड़िते भरभरा जाइए तहिना बत्तिसो दाँतकेँ छिटकबैत भरभरा गेलैन। बजला- “छीतन दास, बहुत दिनक पछाइत एहेन संगी भेटल।” गोसाँइ साहैबक वाणीक वाण जेना छीतन दासक छातीकेँ पघिला देलकैन। मनमे एलैन- जहिना असगरूआ अपने छी, तहिना गुलेतियो दास अछि मुदा जाबे अपन बात गुलेतीकेँ कहि नइ देबै ताबे ओ ओते लग केना औत। माने ई जे जाबे अपन हिरदयक दर्द कहबै नइ ताबे अनका दर्दक संग अपन छातीक दर्द घुलत-मिलत केना। ..छीतन दास बाजल- “गुलेती भाय, पहिलुका जे पनरह बर्खक बेटा रहए जे पड़ा कऽ बिराटनगर चलि गेल ओ जीबैए कि मरैए से अखनो ने बुझै छी। तैबीच डेढ़-साल-दू-सालपर पान-सातटा धिया-पुता भेल, नीक जकाँ मनो ने अछि।” बिच्चेमे गुलेती टोकलकैन- “अपनो धिया-पुता मन नइ अछि?” मुस्कियाइत छीतन दास बाजल- “एकोटा जीवैत रहितए तखन ने। कोनो तीनियेँ मासमे, तँ कोनो साल भरिपर, तँ कोनो तीन सालक भऽ भऽ कऽ मरि गेल।” मुस्कीे दैत गुलेती बाजल- “घरवाली अछि किने?” छीतन- “सएह ने कहै छी, अन्तिम बेर जौंआँ बेटा भेल, मुदा बेटाक संग घरोवाली सोइरियेमे मरि गेल। तेकर पछाइत हमहूँ गोसाँइये साहैबसँ भेख लऽ बेरागी बनि साधु-सेवामे लगल छी।” धड़फड़ाइत गुलेती बाजल- “बाबा महराज, अपन सभ अरजाल-खरजाल समैट कऽ अखने आँगन-के रखि अबै छी। अही पाखैरक गाछक निच्चाँ मे अपनेसँ भेख लेब आ अपने संग सेहो जाएब।” ◌ शब्द संख्याँ- 5996, तिथि- 12 अगस्त 2016 २ जिगेसा गोटे साल जहिना धनक धनमण्डल होइए, माने धानो-गहुमक उपज नीक भेल, तीमनो-तरकारीक नीक आ आमो-जामुन खूब फड़ल जइसँ सालो भरि अगहने-अगहनक लरती-चरती बुझि पड़ैए, तहिना ऐ बेर बिआह-दानक सेहो भेल। माघेमे जे सरस्वती पूजाक परातसँ लगनक दिन शुरू भेल ओ फागुन पकड़ैत चैत छोड़ैत बैशाख पकड़ैत जेठ होइत अखाढ़ोमे धुमसाही दिन-राति चलिते रहल, जेना बरहमसिया लगनक दिन भऽ गेल। माने ई जे मौसमक हिसावसँ जाड़ो-गरमियो आ बरसातो पकैड़ लेलक। बरहमसिया लगन भेने बिआहो-दान तेना जोर पकड़लक जे सबहक मनकेँ बेटे-बेटीक बिआह घेर लेलक। जेहने मन रहत तेहने ने काजो पकैड़ करब..? सएह भेल। लगनक जोर एहेन भेल जे गामे-गाम बिआहे-बिआह पसैर गेल। पसरल ई जे जँ कोनो समाजमे दसटा बिआह होइए तँ ओइमे परिवारक समांगसँ लऽ कऽ दियाद-वाद, टोल-पड़ोस, हित-अपेछित आ कुटुम-परिवारक लेनी-देनीसँ लऽ कऽ करनी-धरनी धरि लगिये जाइए। ओना, किछु गोरेक मनमे ईहो शंका उठैत जे भरिसक आब बिआह-दान हेबे ने करत तँए जे जेतए अछि ओकरा अही लगनमे सम्हारि लिअ चाहैए। केकरो-केकरो मनमे ईहो शंका होइत जे भरिसक कनीए ओरा जाएत..! तहिना, कनियाँ पक्षकेँ होइत जे भरिसक बरे सठि जाएत, से नइ तँ अही साल सम्हारि ली जइसँ आगू बिआहक झमेले समाप्त भऽ जाएत। माघक शुरूएसँ जे बजारक आ बाजा-गाजाक संग बरियाती-पुरनिहारक चलती आएल से सालो भरि लधले रहि गेल। जहिना बजार खूब चढ़ल तहिना बजो-गाजाबला आ बरियातियो पुरनिहारक चढ़बे कएल। चढबो केना ने करत, नव जुग एने देश-दुनियाँक लोक गामे-गाम पसरल ऐछे। सभ रंगक- बोली, सभ रंगक भोजन आ सभ रंगक वस्त्रो पकड़िये लेलक। परसू जीतू काका बेटी बिआहक बरियाती विदा कऽ निचेन भेला। ओना हमहूँ ओही बिआहक प्रक्रियामे पनरह दिनसँ व्यस्त रहलौं। चारिम दिनक भरि रौतुका आ परसू-दिनका दौड़-बरहा तेते देहकेँ थका कऽ दुखा देलक जे परसू साँझमे जे ओछाइन धेलौं से खाइये-पीबैटा-ले उठलौं, बाँकी ओछाइने धेने रहलौं...। मुदा एकाएक अखने मनमे भेल, जखन हम जीतू कक्काक सहयोगी छेलिऐन तखन जब एते थकान भेल तँ जीतू काका आ फुलटुसी काकीकेँ केते भेल हेतैन!तँए भेल जिगेसा करब उचित अछि। एहेन तँ नइ जे परिवारमे केकरो डाँड़ टुटल रहै आ केकरो फोंसरियो घाउए होइ, आ ओ डाँड़ टुटलाहाक आगू ई बहाना बनाएत जे हमरो तँ रोगे धेने अछि, तखन तँ जेहने डॉंड़टुटु भेल तेहने फोंसरिहा? तब तँ अपन-अपन ताक-हेर अपने-अपने करू..! मुदा, एकरा कहाँ धरि उचित ठहरौल जा सकैए? उठि कऽ विदा भेलौं जीतू कक्काक जिगेसा करए...। जहिना नहेला पछाइत शिव-भक्त ‘जय शिव जय शिव’ करैत पोखैरक घाटसँ शिव मन्दिर तक पहुँच अपन नचारी-विचारी करैए तहिना दरबज्जासँ निकैलते मनमे उठल» “हाय रे दुनियाँ आ हाय रे समाज! सात कट्ठा जमीन छअ लाखमे बेचि जीतू काका कन्यादान केलैन अछि!” लगले मन घुसैक कऽ आगू बढ़ि गेल। आगू ई बढ़ल जे एक तँ शरीरक व्याधिसँ बेथित हेता जीतू काका, तैपर धनक बेथा सेहो हेबे करतैन! दरबज्जेपर जीतूओ काका आ फुलटुसियो काकी चाह पीबैत गप-सप्प करैत रहैथ। लगमे पहुँचलौं। देखते फुलटुसी काकी बजली» “केटलीमे अहाँ-जोकर चाह ऐछे, छानि कऽ नेने अबै छी।” कहि हाँइ-हाँइ फुलटुसी काकी अपन गिलासक चाह पीलैन। चाह पीब उठि चाह आनए आँगन गेली। जीतू कक्काक लगमे बैस हियासए लगलौं जे कक्काक मन केहेन छैन? मुदा चेहराक चुहचुहीसँ मिसियो भरि रोगक रेख नइ बुझि पड़ि रहल अछि! बजलौं» “काका, कन्या-दानसँ ते निचेन भऽ गेलौं?” ओना, कन्या-दानसँ निचेन लोक साल भरिक पछाइत होइए, किएक तँ सालो भरि पावैनियेँ-पावैन सेहो आ बिआहक प्रक्रियाक संग समैया भाड़ो-दौड़ दौड़ैबते रहैए, मुदा एहनो तँ ऐछे जे बर-कन्याक बीच सिनूरदान भेला पछाइत जँ कोनो विशेष घटना घटि गेल, तखन सालो भरिक भाड़क दौड़ सेहो अँटैक कऽ मरि जाइए। मुदा वैवाहिक बन्धन बरकरार रहैए। ओना, जीतू काकाकेँ काल्हि भतखइ-भाड़ सेहो पठबैक छैन, जइमे चाउर-दालिक संग आरो-आरो भोजन-विन्यासक वस्तु पठबैक तँ छैन्हे। चुल्हि लग पहुँचैसँ पहिनहि फुलटुसी काकीक मनमे उठि गेलैन जे चाहक कोन धड़फड़ी अछि, फेर कनी चुल्हिपर चढ़ा गरमा लेब। एतबे ने जे चाह-पत्तीक संग रहने चाहमे टेनीन पनपए लगैए, ओकरा छानि कऽ कात कऽ देबै आ केटली अखाइर कऽ ठण्ढे चाह रखि देब, पछाइत आगिपर चढ़ा धीपा लेब। चोट्टे अदहे रस्तासँ घुमि फुलटुसी काकी आबि बजली» “बौआ, बहुतरबा मिठाइ सभ उगैड़ गेल अछि। चाह पछाइत पीब, पहिने चारिटा मिठाइ खा लेब?” जइ मने घरपर सँ विदा भेल रही जे जे काज पछुआएल हेतैन, ओइ पुरबैमे दुनू परानी काका चिन्तित हेता, से ऐठाम तँ खुशीसँ मिठाइ खुअबैक विचार काकी कऽ रहली अछि! केना शुभ समए अशुभ बात बजितौं, तँए मनकेँ सुभाषित करैत बजलौं» “काकी, चाहे कि मिठाइये केतौ पड़ाएल जाइए जे एना अहाँ अपसियाँत छी!” मुदा काकियोक मन जेना फरहरे रहैन तहिना बजली» “बौआ, काजक बढ़ोतरी भेने जे काजक उमकी चढ़ल से चढ़ले अछि। तँए अपसियाँत कहाँ छी, अपसियाँत नै छी।” हमरा दुनू गोरेक कठ विवाद जीतू काकाकेँ नीक नइ लगलैन। जनु मनमे कोनो एहेन नव जिज्ञासा, नव विचार रूपमे अंकुर रहल छेलैन। खिसिया कऽ तँ नहि,मुदा जोरसँ काकीकेँ कहलखिन» “जे मन फुरैए से करू। एना घूर-बहूर किए करै छी!” ओना, तामस उठला पछाइत सेहो लोक जोर-जोरसँ बजैए आ बिनु तामसक तमस उठने सेहो जोरसँ बजाइते छइ। जेकरा खिसिया कऽ तमसाएब बुझै छी,ओहो अधला नइ भेल, खिस्सा पिहानी बना मनक कलिमाकेँ सेहो घुअल जाइए मुदा बोलीक उग्रता ओकर रूपकेँ प्रभावित करै छइ। फुलटुसी काकीक मनमे जे खुशीक हिलकोर उठैत रहैन तेकर कारण रहैन जे बिआहक पछाइत खेबा-पीबाक वस्तु-जात तेते उगैड़ गेल छैन जे मास दिन सिलौटो-लोढ़ी नइ पकड़ए पड़तैन, तैपर काजक रमकी सेहो चढ़ले छैन। जीतू कक्काक बात सुनि काकी ने चाह आनए आगू बढ़ली आ ने मिठाइ आनए, जेना मने शान्त भऽ गेलैन। ओहो तीन-कोनियाँ जकाँ जगह पकैड़ बैस गेली। चाह पीब पान खा जीतू काका बजला» “बौआ, तोरा ते ने शरीरमे कोनो गड़बड़ भेलह, खटनीसँ?” बिनु मुँह खोलने मुड़ी डोलबैत इशारा केलिऐन» “नइ।” शान्त वातावरणमे इशारोसँ बहुत बात होइ छै, जइसँ बोल प्रदूषनक सम्भावना सेहो नहियेँ रहै छइ। बोल प्रदूषन भेल- ‘रक्का-टोकी।’ मनमे उठैत रहए जे काका अपने पारखी लोक छथिये, की नीक आ की अधला काजक[1] बीच भेल, ओ तँ अपनेमे ने विचारि लेब। ओना तीनियेँ गोरे- माने जीतू काका, फुलटुसी काकी आ हम रही मुदा तीन गोरे रही कि तेरह गोरे, गप-सप्प करै काल धारक प्रवाह जकाँ विचारोक प्रवाह तँ होइते अछि, तैठाम जँ विचारक प्रवाह बाम-बूच हएत तखन तँ बात-चीतमे रक्का-टोकी बढ़त! तँए तीनू गोरेक विचारक प्रवाह एक सिरा वा एक भट्ठा हएब जरूरी अछि। तहूमे काकीकेँ काका तेना चोहैट लेलखिन जे मन चोटाइये गेल हेतैन। तँए एक रस बना गप-सप्प करब जरूरी बुझि दुनू गोरेक बीच-बँचावक सीमा दैत बजलौं» “काकी, चाह-ताह अखन छोड़ू, खाली एक गिलास पानि पीया दिअ आ पान खुआ दिअ।” मुहसँ निकैलते जेना काकोक मनमे आ काकियोक मनमे हरिअरी उठलैन। मुदा काकीक मनमे अखनो काजक रमकी रमिते रहैन। बजली» “बौआ, चारि-पाँचटा बोतल ठंढाक उगरल अछि। वएह नेने अबै छी।” जहिना ओंघीक आगमन होइते आँखियो झल-फलाए लगैए आ हाफियो हुअ लगैए तहिना कक्काक मनमे सेहो विचारक उठैत रहैन। तैयो मुहकेँ तँ दबने रहला मुदा नजैर चढ़ने आँखिक रूप बदलए लगलैन। गुण रहल जे किछु बजैसँ पहिनहि काकी लोटामे पानियोँ, गिलासो आ ठंढाक एकटा बोतलो नेने आबि बजली» “जे मन हुअए से करू।” एक गिलास पानि पीब बजलौं» “काका, पान अपने लगा लेब।” अपन बनौल भोजनो-चाहो आ पानो नीक लगैक कारण होइए जे जइ वस्तुसँ जेते सिनेह रहल ओइ वस्तुकेँ ओइ रूपमे प्रयोग करब। भाय, मिरचाइ नइ खाइ छी तँ तीमनमे नइ देबइ। कड़क-चाह पीबै छी तँ चाहपत्ती बेसी देबइ। जँ तीतगर पान नीक लगैए तँ खएर बेसी देबइ आ जँ मिठगर खाइक इच्छा रहल तँ खएर-चुनक मिलानीमे चुन कनी बेसिया देबइ। ओना जीतू काका सेहो गप-सप्प करैक क्रममे रहैथ आ अपनो तँ ओही जिज्ञासामे आएले छी, कहलयैन» “काका, अपना सभ सन परिवारमे बेटीक बिआह भारी पड़ि रहल अछि!” ओना, काका मुड़ी डोला स्वीकारि लेलैन मुदा मुहसँ किछु ने बजला। नइ बजैक अनेको कारण मनमे नचैत हेतैन। मुदा, जहिना छालही आकि गाव-मक्खनकेँ माटिक वरतनमे रेहीसँ रहि वा मोहला पछाइत जखन ओ पानिपर अलगए लगैए, जइसँ साफ देखैमे आबए लगै छै जे घी[2] बनैजोकर भऽ गेल, तहिना जीतू कक्काक मन जखन फरिछाइत साफ भेलैन, तखन मुस्कियाए लगला। मुस्कियाइत नजैर-मे-नजैर मिला बजला» “बौआ, बजलह तँ बड़बेस बात, मुदा ऐ पाछू बहुत रास नीक-बेजाए कारणो अछि, तँए धाँइ-दे हँ-नै बाजि देब औगताएल विचार भऽ जाएत।” ओना, सभ दिनसँ जीतू काकाकेँ सभ तरहेँ श्रेष्ठ बुझैत आबि रहल छी मुदा अखन तँ सद्य: कन्यादान सन यज्ञ निर्विघ्न निवारण केलैन अछि। तँए किछु विशेष अनुभव तँ हेबे करतैन। होइते अहिना छै जे जखन कोनो रोगी डाक्टर ऐठाम पहुँचल आ क्षणे-क्षण पानि मांगए लगल तखने डाक्टर परेख लइ छैथ जे तृषित पानिक रोग अछि नइ कि तिरपित पानिक रोग। जीतू काकाकेँ सभ तरहेँ श्रेष्ठ बुझैक सेहो कारण अछि। ओना, एको काज आकि विचारमे लोक श्रेष्ठ होइ छैथ, जे भेल कोनो काजमे श्रेष्ठता प्राप्त करब। मुदा ऐसँ आगू अछि एक-सँ-अधिक काजमे श्रेष्ठता प्राप्त करब, आ ओहूसँ आगू अछि जिनगीक श्रेष्ठता प्राप्त करब। तइमे जीतू काका श्रेष्ठ जिनगी बना जीब रहला अछि। बजलौं» “काका, ओना जेते ऐ बिआहमे बरदेलौं तेते अपन काज पछुआइये गेल, मुदा अपनासँ आगू समाजक काज बुझै छी, तँए ओइले कोनो मलिनता नइ अछि। पनरह दिनक कएल काज अछि तँए ओ तँ आब समापने दिस ने उतरत।” जेना हमर बात जीतू काकाकेँ नीक लगलैन। बजला» “तत्काल कौल्हुका भाड़ पठाएब अछि। ओना बिआहेक भाँजक काजमे एकरो भाँजपर चढ़ा नेने छी, तँए कोनो चिन्ता मनमे नहियेँ अछि। ओना, ऐ भाड़क आब कोनो महत थोड़े रहल।” कहि मुँह बिजका लेलैन। जँ कक्काक विचार अपनो बुझैत रहितौं तखन तँ कोनो प्रश्ने ने मनमे जगैत, मुदा से तँ भेल नइ। कक्काक मुँह किए बिजकलैन से मनकेँ खोलि देलक। बजलौं» “से की, काका?” जीतू कक्काक मनमे रहैन जे कन्यादानक शुरूसँ अन्त धरिक विचार करी, मुदा बिच्चेमे दोसर प्रश्न उठि गेल। कक्काक मनमे ईहो उठलैन जे जखन कन्यादानक बीच कोनो विघ्न-बाधा उपस्थित नइ भेल, तखन तँ स्पष्ट अछि जे समीक्षा-जोकर कोनो जगहे ने रहि गेल, मुदा तैयो एते तँ ऐछे जे एक-कड़ीमे ओकरा जोड़ि माला-रूपमे एक झलक देख ली...। विचारकेँ असथिर करैत जीतू काका बजला» “बौआ, ओना पहिने बिआह-दुरागमन दू बेर होइ छल, माने दू लगनमे होइ छल। आ ई भाड़ छी दुरागमनक पछातिक, मुदा आब तँ दुनू एके बेर हुअ लगल अछि, तँए..?” बिच्चेमे बजा गेल» “से की?” काका बजला» “ई भाड़ जे छी, दुरागमनक पछातिक पहिल भाड़, ओ छी कन्याक भोज्य-विन्यासक लूरिक परीछा। मुदा से आब थोड़े होइए। अनेको एहेन-एहेन कारण सभ बीचमे उपस्थित भऽ गेल अछि जे परीछाक परिस्थिये बिगाड़ि देलक अछि।” पुछलयैन» “से की?” काका बजला» “ई परीछा परिवारक बीचक छी। माने ई जे सासुरमे पहिल दिन कनियाँ भोजन बनौती से परीछा परिवार-जन खा कऽ बुझता। मुदा आब तँ जहिना बिआहक बरियातीक ठेकान नइ अछि, तहिना ईहो बेठेकान भऽ गेल अछि। मानि लाए जे पचास गोरेकेँ भोज खाइक न्योँत दऽ देलिऐ, ओतेक भोजन बनाएब कनियासँ सम्भव नइ अछि। मुदा वएह कनियाँ जइ परिवार भरिक भोजन बनौती, ओही काजे ने एबो केली अछि। कहब जे समाजिक भोजमे सभ तरहक लोकक समावेश भेने बेसी नीक हएत, मुदा काजोक तँ सीमा अछि। एक आदमी केते कए सकैए...।” धुर-झार काकाकेँ बजैत देख अपनो मन बजैले लुसफुसाइत रहए मुदा जँ दुनू गोरे बजबे करब तँ सुनिनिहार के हएत। तँए मुँह दाबि कऽ रखने रही। ओना जहिना कोनो धारमे बाढ़िक पानिक बेसी आगमन होइते धार फुलाइयो लगैए आ प्रवाहो तेज भऽ जाइ छै, तहिना कक्काक रूप देख बुझि पड़ैत रहए। मुदा जहिना कोनो टटका घटना बिनु टाट लगने छिड़िया कऽ नाचि जाइए जइसँ सभ बात सबहक बीच आबि गेने बेसी शुद्ध रहैए, मुदा बसिएला पछाइत ओहूमे केते टाट-फड़क लगि जाइए, तहिना अखन कन्यादान सन यज्ञ सम्पन्न भेल अछि, जेकरा बुझब-जानब जरूरी अछि जँ आने-आन गप-सप्पमे समए ससैर जाए आ मुख्य बात छुटि जाए, सेहो तँ नीक नहियेँ भेल। तँए विचारकेँ मोड़ैत, बिच्चेमे बजलौं» “काका, बड़ीटा दुनियाँ अछि आ बहुत लोको अछि, ओकरे दिस जँ देख-देख मुँह तकैत रहब तखन अपना सिरक जे काज अछि से केना हएत?” हमर बात सुनि काका गम्भीर भेला। गम्भीर होइत मुड़ी डोलबैत स्वीकारि लेलैन मुदा मुँह बने रहलैन। तैबीच काकी टपैक गेली» “बिआहक पछाइत पहिल सालक सौनमे भरि अन्हरिया पख फूल लोढ़ै छेलौं, से वीध आब थोड़े हएत। नैहरक वीध छी से सासुरमे केना हएत?” ओना, जीतू काकाकेँ काकीक विचार सोहनगर लगलैन मुदा मुस्की भरैत मुँह बने रखला। बजलौं» “काका, तेहेन दुरकाल समए आबि गेल अछि जे अपना सभ सन लोककेँ जीब कठिन भऽ गेल अछि!” हमर बात सुनि जीतू कक्काक नजैरक पानि जेना जगलैन। जगिते नजैर चढ़ए लगलैन। आँखि उठा हमरा दिस तकलैन तँ बुझि पड़ल जे जे नचारीक बात कक्काक सोझ रखलौं ओ जेना हुनका धड़ि लेलकैन! किएक तँ जहिना साँप धेला पछाइत बिखक असैरसँ नजैरक रूप बदलए लगै छै तहिना जीतू कक्काक नजैर बदलए लगलैन। बजला» “बौआ, जे दुनियाँ अछि आ ओकर जेहेन परिवेश छै ओहीमे ने अपनो सबहक परवरिस हएत, तेकरा जँ दुतकारि दुरकाल कहि हारि मानि लेब तँ यएह ने भेल कायरता?” कक्काक बात सुनि अपनो मनमे विचार-मल्ल जगल। जगिते भेल जे औझुका मनुख ने हम भेलौं। जँ अपनाकेँ हजार बर्ख पैछला आकि हजार बर्ख ऐगला बुझब तँ वएह ने भेल बचपना। जनम-सँ-मरण धरिक जे जिनगीक यात्रा अछि ओ तँ आइयेक समैमे ने चलैत बितबैक अछि। मुदा जीतू कक्काक संग रहने एते तँ भाइये ने गेल अछि जे ओहो हमर जीवन-मरण देख रहला अछि। मुदा, प्रश्न तँ ईहो ने अछि जे जीतू काका अपना संग रहितो कायर जकाँ बुझि रहला अछि..! अपनाकेँ सम्हारैत बजलौं» “जीता-जिनगीकेँ जँ चीता-जिनगी बना जीबे करब तँ ओ थोड़े जिनगी भेल?” हमर बात सुनिते जीतू कक्काक मन जेना खनखनेलैन! बजला» “बौआ, ने परिवार छोड़ि पड़ाइक अछि आ ने दुनियाँ छोड़ि आ ने जिनगी छोड़ि केतौ पड़ाइक अछि। असल अछि जिनगीकेँ पकैड़ चलब।” जीतू कक्कक बात नीक नहाँति नइ बुझि पेलौं। मनमे बुझि पड़ल जे जेना अधखिज्जूए बुझलौं। मुदा अधखिज्जू धानक चाउरकेँ दोहरा कऽ ढेकीमे कुटि-छाँटि जहिना छाँटल चाउर बनौल जाइ छै तहिना बिनु बुझल बातकेँ छँटियबैत बजलौं» “काका, हमरा अहॉंक परिवारमे अन्तरे की अछि। जेहने मझोलका परिवारमे गिनती अहाँ-परिवारक होइए तेहने हमरो-परिवारक अछि। तँए एहेन-एहेन यज्ञ काजक भार तँ पड़बे करत किने।” जीतू काकाकेँ हमर बात नीक लगलैन। जहिना केकरो चाहो, पानो, सिगरेटो आ नोइसो लैक अभ्यास रहल, आ कखन कोन अम्मलक प्रयोगक प्रयोजन मनकेँ अछि ओ तँ अपने-अपने मनमे होइए, मुदा एहनो तँ होइते अछि जे अन्ना-गाहिंस झटहा जकाँ फेकलासँ आनो काज सुतैर जाइए, तहिना भेल। भेल ई जे जीतू कक्काक मनमे रहैन जे कन्यादान परिवारक काज छी, ओ तँ परिवारे-जनकेँ करैक भार अछि, ओना कहनिहार, सुननिहार आ केनिहारो तँ समाजमे ऐछे, मुदा ओ तँ केना सुति रहल अछि, आकि सुता गेल छै, आकि सुता देल गेल छै ओ तँ सभ समाजक मुहेँ-कानसँ बुझल-जानल जा सकैए। अपन शुभ काजक अनुकरण जँ दोसरो-तेसरो परिवार करत तँ ओकरो शुभे-शुभ हेबाक सम्भावना रहै छै मुदा बदलैत समाजिक परिवेशमे एकरो निश्चितता नइ रहि गेल अछि। तँए अपन कएल शुभ कर्मक महत घटि गेल सेहो तँ नहियेँ अछि...। जीतू काका बजला» “बौआ, परिवारक काज समयानुसार समैपर सम्पन्न होइत चलए, वएह भेल परिवारक शुभ गति-विधि।” जीतू काकाकेँ आगूक बोल मुहेँमे रहैन कि बिच्चेमे बजा गेल» “एकरा के काटत?” ओना बजलौं अनठेकानियेँ मुदा जीतू काकाकेँ अपन विचार अकाट बुझि पड़लैन, जइसँ मनक मणि मुनि रूपमे फुटलैन» “बौआ, बेटीक बिआह भेल, जइमे बहुत एहेन विधि-बेवहार भेल जेकर या तँ प्रयोजने ने छल, वा नव सिरासँ चढ़ि गेल। मुदा कन्यादानो करब तँ अनिवार्य,जे काजक मूल बिन्दु भेल। हँ! तखन, औझुका परिवेशमे अपन-काजक अँटावेश केना हएत, ई तँ अपने ने बुझए पड़त?” कहलयैन» “हँ।” काका बजला» “छह लाख रूपैआ कन्यादानमे खर्च भेल, खेत बेचि कऽ केलौं। अदहासँ बेसी रूपैआ धुर-खेल भऽ गेल। मुदा उपायो तँ दोसर नहियेँ छल। नीक-अधला बजनिहार समाजमे ढेरियाएल अछि, मुदा नीक-अधलाक विचार करैत समाजकेँ आगू दिस लऽ चलब, एहेन विचारक लोक केते अछि?” मनमे बेर-बेर उठए जे जे विचार करए चाहै छी ओ विचार भाइये ने रहल अछि आ अनेरे समाजक बात दौड़-दौड़ कऽ बीचमे आबि खसि पड़ैए..! सम्हारि कऽ बजलौं» “काका, ऐ बेरक समए तँ लगनक हिसावे कहियौ आकि बिआह-दानक हिसावे, सोल्हन्नी धुर-खेले भऽ गेल! जेते नेंगरा-लुल्हा, कन्हा-बौका छल सभ उठि गेल!” हमर बात जेना जीतू काकाकेँ नीक लगलैन। गाम दिस हिया कऽ ताकए लगला, चारिटा बिआह नजैरपर पड़लैन। ओना गामे छी, जे गाम जेते नमहर तइ गाममे तेते काज होइते अछि। मुदा हमर गाम से नहि, अखुनका जे सरकारक पंचायतिक नाप अछि, तइ हिसावक गाम अछि। ओना जीतू काका चौअन्नी मुस्की भरि चुपे रहला, मुदा फुलटुसी काकीकेँ जेना छुबि देलकैन! बजली» “बौआ, बजैमे केकरो किछ लगै छै! बेटी बिआह केहेन होइ छै से जेकरा करए पड़ै छै ओ बुझैए। कोढ़ तोड़ि देलक!” ओना काकीक विचारकेँ जीतू काका सेहो मने-मन मानि रहल छला मुदा बजला किछु ने। कनी काल तीनू गोरेक बीच गुमा-गुमी बनल रहल। सभ सबहक मुँह देख-देख नजैर उतारि धरतीपर लऽ आनी...। कनी कालक पछाइत मौन-भंग करैत जीतू काका काकीकेँ कहलखिन» “एते काल चाह-चाह, मिठाइ-मिठाइ घोल करै छेलौं, आ जखन बेर आएल तखन मुँह दाबि नेने छी!” ‘खग जानए खगक भाषा’, जीतू कक्काक बात फुलटुसी काकी बुझि गेली। बीचसँ उठैत बजली» “बहुतरबा कौफी सेहो उगरल अछि।” तनैत वाणमे जीतू काका बजला» “चाह-कौफी पछाइत पीआएब, पहिने कनी नोनगर-मिठगर लाउ।” जहिना अफरजात वौस रहने बारीककेँ परसैमे नीक लगै छै तहिना फुलटुसी काकीकेँ सेहो भेलैन। घरमे सभटा वौस देखले रहैन, उठि कऽ गेली आ थारी भरि साँठि आगू बढ़ली। बीचमे बजलौं» “काका, समाजो आ गामो एक रहितो टुकड़ी-टुकड़ी बनल अछि। जइसँ एके गामक वा एके समाजक काज रंग-विरंगक भऽ जाइए। जइसँ समाजिक सरोकारपर..!” बिच्चेमे जीतू काका लोकि लेलैन। बजला» “हँ से तँ अछिये।” तैबीच भरल थारी नेने फुलटुसी काकी सेहो पहुँच आगूमे रखि देलैन। मधुर भोज्य-वस्तुसँ थारी भरल रहबे करइ। देखते जेना मनो मिठाएल। बजलौं» “काका, अनेरे लोककेँ दुरमतिया चढ़ल छइ। कहू जे वैवाहिक सम्बन्ध दूभि-धानसँ सेहो भऽ सकैए, तइमे लाखक-लाख, करोड़क-करोड़ रूपैआ धुर-खेल भऽ रहल अछि! लूटा रहल अछि! मुदा की गाम-समाजमे ओते सम्पन्नता आबि गेल अछि जे जेकर कुप्रभाव समाजपर नइ पड़त?” मुड़ी डोलबैत जीतू काका सूहकारि तँ लेलैन, मुदा बजला किछु ने। तैबीच दुनू गोरे एक-एकटा रसगुल्ला थारीसँ उठेलौं। जीतू काका हाँइ-हाँइ मुँहक रसगुल्ला चिबबैत बजला» “बौआ, दहेज आइ कोढ़ बेमारी जकाँ समाजक कोढ़केँ खखोरि-खखोरि खा रहल अछि, से केकरा?” ओना मुँहमे अपनो लालमोहन लऽ नेने रही मुदा जेना रस तर चलि गेल आ गिट्सबला छेना मुहेँमे लठिया गेल रहए, तैयो बजलौं» “नइ बुझि पेलौं, कका?” नइ बुझि पबैक कारण अछि जे समाजक सभ बजैए जे दहेज अधला छी। तैठाम काका की बाजि रहला अछि? जीतू काका बजला» “बौआ, गाम-समाजमे जे जाइतिक जल्ला पसरल अछि ओइ जल्लाकेँ सोझरबैमे दहेज आएल। जे नीक भेल।” एक तँ कक्काक पहिलुके बातक ओझरी मनमे नइ छुटल छल, तैपर फेर दोसर ओझरी लगा देलैन! ओझरी ई जे ‘दहेज नीको छी।’ ..छँटियबैत बजलौं» “काका, दूटा प्रश्न एक संग आगूमे आबि गेल अछि। पहिल, दहेज नीक केना? आ दोसर, ओझराएल समाजक जालकेँ दहेज केना सोझरा रहल अछि?” तैबीच दुनू गोरे दू-दूटा मिठाइ आ चरि-चरिटा नमकीन-कटलेट खा पानि पीब नेने रही। चाहक बारी आबि गेल छल। मुदा फुलटुसी काकी सेहो दुनू बात सुनने छेली तँए उत्तर पबैले मुँह बाइब निचेनीमे बैसल छेली। चाहक छौंकमे जीतू काका बजला» “बौआ, अखन कोनो काजक औगताइ नइ ने छह?” कहलयैन» “नइ।” ओहुना तँ बाते-विचारक काजे एतए आएल छी, तखन आन काजक अगुताइयोक बात केना कहि दैतिऐन। असथिर होइत जीतू काका बजला» “बौआ, काजक खुशी आकि गम किछु ने अछि। ई तँ परिवार चलैक प्रक्रिया छी जे सभकेँ करै पड़तै।” ओना, मुड़ी डोलबैत बजलौं» “हँ, से तँ करै पड़तै।” मुदा मनमे ईहो होइत रहए जे फेर ने कहीं काका परिवारक दोसर विचारमे ओझरा जाथि। मुदा से जेना जीतू कक्काक अन्तरात्मा बुझि गेलैन। बजला» “बौआ, अपना सबहक गाम-समाजमे जाइतिक भीतर जाइतिक जल्लाक सीढ़ीनुमा खाड़ही बनल अछि, किछु काजोक हिसावसँ आ किछु वृत्तियोक हिसावसँ आ किछु माननौं।” जीतू कक्काक सोझराएल बात सुनि मुड़ी डोलबैत बजलौं» “ऐमे के ‘नइ’ कहत!” जेना हमर बातसँ जीतू काकाकेँ सह भेटलैन, तहिना सहियारैत बजला» “एतबे जँ रहैत तँ सोझ-साझ डाँरि खींचि डँरियाएब हल्लुको होइत, मुदा..!” जीतू काका ‘डाँरि खींचि डँरियाएब’ की बजला सँ नीक जकाँ बुझबे ने केलौं! बुझबो केना करितौं, कागजपर कलमसँ डाँरि खींचलकेँ सभ देखैए। खेतमे आड़ि बना सेहो लोक अड़िया-अड़िया डँरियबैत अछि। मुदा मनुख तँ बिनु सींग-नाङैरक छी। मनुखकेँ डँरियाएब! ई की..? मुँह खोलि बजलौं» “काका, कनी आरो सोझरा कऽ कहियौं। मन पूरा फरीच नइ भेल।” हमर बात सुनि जेना जीतू काका विह्वल भऽ गेला, मनमे विचारक लहैर उठि गेलैन, कोन ढंगे बुझौल जाए जे मनक बात ओहो बुझि जाए..? संयमित होइत बजला» “बौआ, समाजमे पहिल भेल समाजिक जाति आ समाजिक जाइतिक बीच जाति-जातिक बीच सेहो अहिना बनल अछि, जहिना समाजमे अछि। जाइतिक बीच अगुआएल-पछुआएल इत्यादि, सेहो अनेको जातिक बीचक दूरी ओतबे अछि जेते समाजक बीचक जाइतिक दूरी अछि।” भकइजोतमे जहिना कखनो साफो देख पड़ैत आ कखनो अन्हराइयो जाइत, तहिना जीतू कक्कक विचारमे हुअए। जे बात जीतूओ काका बुझि गेला। बजला» “मन अकछाइ-तकछाइ ते ने छह?” मुदा हमरो सुतरल। बजलौं» “मन अकछाएत तँ एक बेर फेरो चाह पीब लेब।” चाहक चर्च सुनि फुलटुसियो काकीक मन फुरफुरेलैन, जेना अपनो चाह पीबैक विचार पहिनेसँ जगल होनि। फुलटुसी काकी उठैत बजली» “हमरो आबह देब, तखन फरिछौट करब।” फुलटुसी काकीक बात सुनि मनमे भेल जे भरिसक जे बात काकी बुझि रहली अछि, से अपने नइ बुझि पेब रहल छी! तैबीच जीतू काका बजला» “कोनो बाते-विचार आकि काजे-उदेमकेँ फरिछबैक जे रस्ता अछि ओ एक बेर कि हजारो बेर फरिछौल जा सकैए। भेल तँ एतबे ने जे घोर-मट्ठा पोखैरक पानि केना घाटपर फरिच हएत जे साफ पानि लेब?” ओना, अपना मनमे बेर-बेर उठैत रहए जे जाबे काकी अबै छैथ ताबे विचारकेँ चरियबैत रही, मुदा कक्कोक बातक उलंघन करब नीक नइ बुझि पड़ैत रहए। अपनो हिस्सा चाह नेने फुलटुसी काकी पहुँचली। बीचमे तस्तरी रखि गिलास उठा जाबे जीतू कक्काक हाथमे पकड़ौलखिन, तइ बिच्चेमे अपनेसँ गिलास उठा मुहमे लगेलौं। ताबे काकी सेहो गिलास उठौली। विचारकेँ खरियबैत बजलौं» “काका, ऐ बेर तँ बुझि पड़ैए जे बिआहेक साल छी!” जीतू काका बजला» “अपना गाममे केते लड़का-लड़कीक बिआह भेल?” ओना, नजैर उठा-तकलौं तँ बुझि पड़ल जे बिआहो की एके रंगक भेल। केकरो बिआह-दुरागमन संगे भेल, तँ केकरो दुरागमनेटा। तेतबे नहि, चुमौनो तँ कम नहियेँ भेल। भेल तँ तीनू। मुदा अपना तँ यएह ने अछि जे नव परिवारक ओझराएल बात बुझि, माथक बात पटकैत बजलौं» “काका, ओते छुट्टी रहैए जे भरि गामक बिआहक हिसाव जोड़ब। तखन ते जइ बिआहमे सागिर्द भेलौं तेतेक ठेकान अछि।” हमर बात जेना जीतू काका बुझि गेला। बुझबैत बजला» “बौआ, रंग-रंगक जाइतिक बीच बिआह-दान भऽ रहल अछि, मुदा सभमे किछ-ने-किछ सम्बन्धो अछि आ नहियोँ अछि।” कक्काक सहगर बात सुनि आरो सह दैत बजलौं» “हँ, से तँ अछिये।” जीतू काकाकेँ जेना सह भेटलैन तहिना सहटैत आगू बढ़ि बजला» “बौआ, समाजमे एहेन कोनो जाति नइ अछि जेकर काजमे एक-दोसरसँ कनी हटलो आ कनी सटलो नइ होइ। मुदा ओते मगजमारी कथीले करब, अपन बात कहै छिअ।” कक्काक सुढ़ियाएल विचार सुनि मनमे कनी सवुर भेल जे जइ काजे आएल छेलौं, से पटरीपर आबि रहल अछि! तँए, कनी पाछूसँ काकाकेँ धकियबैत बजलौं» “काका, अपना ऐठाम जे काज[3] भेल ओ बढ़ियॉं ढंगसँ भेल।” ओना मनमे ई रहए जे सहगर बात सुनेने कक्कक मन सोहनगर हेतैन जइसँ नीक जकाँ सभ बात कहता। मुदा से भेल नइ। बजला» “बौआ, आब तँ काज सम्पादन भऽ गेल। तँए अनेरे छोट-छोट खोंच-खाँचकेँ खोंचाह बनाएब नीक नहि।” गर भेटल, बजलौं» “हँ-हँ! अनेरो चिक्कन बाँस वा लकड़ीकेँ टेंगारीसँ काटि-काटि खोंचाह बनाएब नीक नइ।” बजला» “गाममे ते सभ जाइतिक बीच मिला कऽ साइयोसँ बेसी बिआह भेल, सभटाकेँ समेट एकठाम करब कठिन अछि। मुदा अपन आ गामक तीनटा बिआह मिला चारूक बात कहै छिअ।” बजलौं» “चारियोटा कम नइ भेल, चारि रंगक भेल। एको रंगमे केतेको रंगो अछि आ बेदरंगो अछि। बेदरंग भेल बाल-बोधक काजक रंग।” जीतू काका बजला» “अपन ऐठाम जे काज भेल तइमे तोंहू जड़ि-सँ-छीप धरि छेबे कएल छेलह, सभ किछु देखबे केलह। ओना, किछु काज एहनो भेबे कएल जे विचारक विपरीत छल मुदा समाजक जे रूप-रेखा बनि गेल अछि, तइमे दोसर उपैयो तँ नहियेँ छल।” बजलौं» “हँ, से तँ बनियेँ गेल अछि।” आगू बढ़ैत काका बजला» “श्याम बाबू सेहो बेटीक बिआह केलैन, खर्चक हिसावे हुनकर काज हमरा काजसँ नमहर भेलैन। मुदा ओ तँ हाइ स्कूलमे शिक्षक छैथ, नीक दरमहो पबै छैथ। पाँच बर्ख पहिनहिसँ, बेटीक नामे रूपैआ बैंकमे जमा करैत आबि रहल छला, सेहो जोर देलकैन आ हितो-अपेछित मदैत केलकैन तँए हुनका कोनो अखर नइ भेलैन।” बजलौं» “हँ से तँ भेबे केलैन।” आगू बढ़ैत जीतू काका बजला» “तेसर बिआह सोहन लालक बेटीक भेलैन। ओहो ब्लौकमे सप्लाइ इन्सपेक्टरक नोकरी करै छैथ। ब्लौक भरिक डीलर सभ तेते मदैत केलकैन जे उगड़िये गेल हेतैन। अपना घरसँ एको पाइ खर्चो ने भेल हेतैन।” बजलौं» “हँ, सेहो तँ देखबे केलौं।” जीतू काका बजला» “चारिम, मुनेसर भाइक बेटीक बिआह भेलैन। हुनको हमरे जकाँ खेत बेचि कऽ करए पड़लैन।” बजलौं» “काका, बहुत समए भऽ गेल। जाइ छी।” ◌ शब्द संख्या : 3977, तिथि : 8 जुलाई 2016 [1] बिआह-कार्य [2] शुद्ध विचार [3] कन्यादान ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जल भँवर (उपन्यास) राजदेव मण्डल 1. पंचमीक राति अन्तिम पहरपर लटकल छल। केतौ एकटा चिड़ै चुनचुनाएल। राजेसरक देह चौकीपर पड़ल छेलै मुदा मन सपनामे दौगैत-पड़ाइत। निन्नमे डुमल साँसक तीव्रस्वर। ओइ गतिसँ दौगैत सपनामे केतएसँ केतए पहुँच गेलछेलइ। ओ देख रहल छल, सपनाक रंग भरल चित्र...। गाछक निचला भाग अन्हारमे डुमल छल। ओइ अन्हारमे ओ ठाढ़ भेल छल। धरती आ अकासक बीच विचारकेँ पकड़ने। अकस्मात भयंकर अट्टहास सुनलक। राजेसर चौंक उठल। आकि पाछूसँ केकरो कनबाक स्वर ओकरा हिला देलक। चारूभर तकलक। वायुक गति बिहाड़ि सन। आगूमे जेना किछो गरजल। देखलक जे राक्षस सन आकृतिबला एक हाँज जीव ठाढ़ भेल छेलइ। ओ सभटा एकेबेर आक्रमण करैले दौगल। जान बँचेबाक कोनो उपाय नै सुझलै। लपैक कऽ ओ डारि पकैड़ गाछपर चढ़ि गेल। आक्रमणक मुद्रा बनौने जीव सभ लपकैले चेष्टा करए लगलै। डरे थरथराइत राजेसर ऊपरका डारि पकड़बाक यत्न करऽ लगल। किन्तु डारिकेँ पकड़िते मोचरा जाइ छेलइ। मोचराएल डारिपर लटकल राजेसर चिचिया लगल। डारिकेँ कड़कड़ाइते राजेसरक धुकधुकी तीव्र भऽ गेल। भंयकर जीव सभ फानि-फानि कऽ ओकरा पकड़बाक कोशिश करऽ लगलै। बँचबाक लेल ओ एमहरसँ ओमहर डारिपर झूलए लगल। ओकर देह कखनो अन्हारमे तँ कखनो इजोतमे चलि जाइ छल। तखने सौंसे गाछ कड़कड़ा उठल। राजेसर जोरसँ हल्ला केलक- “हौ भागै जा... जल्दी। गाछ खसि रहल छइ। तऽरमे पिचा जेबहक।” भयानक जीव सभ उनटि कऽ तकैत भागऽ लगलै। ओकरा सबहक आँखिमे परेम आ घृणा दुनू भरल छेलइ। तखैने राजेसरक जेठ भाय- जागेसर जोरसँ हल्ला केलक- “रौ... राजेसर। उठ जल्दी। भिनसरबा भऽ गेलइ। चल हमरा धार तक पहुँचा। नाह सबेरे खुगै छइ।” राजेसरक सपना भंग भऽ गेल छेलइ। डरसँ घमाएल देहकेँ पोछलक। साँसकेँ सहज करैत बाहर दिस देखलक। घरसँ बाहर इजोत हुलकी मारै छेलइ। ◌ 2. सुर्जक स्वर्णिम किरिण पृथ्वीपर पसैर गेल छल। दूर-दूर धरि छुछे बाउल पसरल। हरियरीक नाओंपर केतौ-केतौ खढ़क झाँकुड़। बगलसँ बहैत धार। आ पानिपर दौगैत रंग-बिरंगक किरिण। चमकैत पसरल बाउलपर दूटा मनुखक छाँह ठाढ़ भेल छल। उड़ैत बाउलपर दौगैत आँखि जेना किछो ताकि रहल छेलइ। अगिला पुरुखक देह दुबर-पातर। रौद-पानिमे रेताएल श्याम-शरीर। हाथमे लाठी आ छाता लेने जागेसर ठाढ़ छल। पाछूमे ओकर छोट भाए राजेसर। पुष्ट शरीर। वर्ण कनी साफ। जुआनीक रंगसँ चमकैत। मुख उत्साहसँ दमकैत। दुनू भाँइ भिनसरबे गामसँ चलल रहै। धारक किनारपर अबैत-अबैत भोरका किरिण देहपर पड़ए लगलै। जागेसर बेचैन दृष्टिसँ धारक फनकैत पानि दिस तकलक आ बजल- “रौ राजेसर, नाह कहाँ छै?” “नाहबला केानो साधारण लोक छइ। ऊ अपना बखतसँ एतइ। लोकक बेगरतासँ ओकरा कोन मतलब।” “हँ कहै छी ठीके। बड़ टेँटियाह होइ छइ। एके मिनटमे अपन रूप बदलि लइ छइ।” कहैत जागेसर अपना नजैरकेँ धार दिस दौड़ौलक मुदा मन बहिनक संकटमे घुरिया रहल छेलइ। राजेसरक पएर स्वत: पानि लग पहुँच गेलइ। सोचलक, केतेक पानि हेतइ। हेलि कऽ टपल नै जा सकैत अछि। एकटा पएर पानिमे देलक। हड़बड़ा कऽ कछेरक माटि नेने पानिमे खसल। “आहि रौ तोरी के।” डाँड़ धरि पानिमे चलि गेल। जागेसर ‘हाँ हाँ’ करैत दौगल। आ ओकर हाथ पकैड़ घींच लेलक। जागेसर डपटैत बाजल- “एना जँ लुच्चा जकाँ करबहक तँ डुमि जेबहक। आब तूँ जवान भेलहक। देखै छहक, लोक प्रकृतिकेँ परनाम करै छइ। मनकेँ एकाग्र करै छै तब सोचि-विचारि कऽ कोनो काज करै छइ।” मुड़ी झुकौने राजेसर भीजल नुआँकेँ झाड़ए लगल। तखने एकटा पुरुख ओनएसँ आएल। सौंसे देह गरदा आ बाउल पड़ल। जागेसर ओकरा दिस तकैत बाजल- “हौ भाय। नाह कहाँ छै?” “हमहीं नाहक ठीकेदारी नेने छी। हम खढ़ बेचै छी। लेबहक?” जागेसर पुछलकै- “खढ़ बेचै छहक?” “उपजै छै खढ़ आ बेचबै चाउर।” पुरुख तमसाइत चलि देलक। राजेसर पुछलकै- “एना तमसाइ किए छै?” जागेसर बाजल- “एकर कोनो दोख नै छै बौआ।” धार दिस तकैत गम्भीर सुरमे बजल- “दुख आ अभावसँ बेथित लोक अमरीत-वाणी केतएसँ अनतै। अमरीतक अभावमे बीख तँ राज करबे करतै। ई लड़ाइ होइते रहतै।” नाहकेँ अबैत देख दुनूक मनमे आसक संचार हुअ लगलै। ◌ 3. सघन मेघक खण्ड सुरुजकेँ झँपने छल। दौगैत-पड़ाइत खोजैत मेघ। मेघक दोगसँ हुलकी मारैत तीखर किरिण। बाध-बोनमे काज करैत लोककेँ दुपहरियाक भूख बेसी तंग-तवाह करै छइ। नचैत दुपहरियामे बाध-बोन सुन-मसान। सुनहट बाट जेना निसाँस छोड़ैत रहै। बाटक दुनूकात पसरल खेत। केतौ-केतौ गाछी-बिरछी ठाढ़ भेल। सुनहट बाटपर राजेसर बढ़ल जा रहल छल। रस्ता-पेराक नापैत पएर। मुदा मनमे सनसना रहल छेलै, साँझक गप्प। साँझेमे तँ सुनने रहै जे ओकर बहिन बेसी बेमार पड़ि गेल छइ। तँए आइ भिनसरे ओकर जेठ भाय- जागेसर- बहिनक हाल-चाल बुझैले विदा भऽ गेल छेलइ। जागेसरकेँ कोसीक कछेर तक पहुँचबैले राजेसर संगे गेल छल। जागेसरकेँ नाहपर चढ़ेला बाद राजेसर आपस गाम दिस आबि रहल छेलइ। ओकर बढ़ैत पैरक संगे विचारक क्रम सेहो बढ़ऽ लगलै। सोचए लगल, जिनगीमे केहेन-केहेन वियोगक छन अबै छै आ ओइ छनकेँ कल्पना मात्रसँ लोक केतेक दुखित रहैत अछि। मुदा जखैन ओ दुखक छन आबि जाइ छै तँ केहेन सहजतासँ सभ सहि लैत अछि। एके अँगनामे भाए-बहिन खेलैत-कुदैत, पलैत-बढ़ैत रहैए। माए-बाप, भाए-बहिनक बीच सिनेहक जाल केतेक सघन भऽ गेल रहैत अछि। किन्तु बिआह भेला बाद बहिनकेँ ऐ घरसँ विदा हुअ पड़ै छइ। दिन-दिनसँ जुआन भेल सिनेहकेँ छोड़ैत आ तोड़ै काल केहेन पीड़ासँ गुजरए पड़ैत हेतै? भाए-बहिनक बीच निरन्तर बढ़ैत दूरी। गाम-घर, माए-बाप, अड़ोसी-पड़ोसी सभकेँ बिसैर बहिन सासुर दिस विदा भऽ जाइत अछि। ओइ बिछुड़ैत घड़ीमे बहिनक हृदए केना फटैत हेतै...? ओह...! बिआह लगीचेमे हेबाक चाही। जइसँ भेँट करैमे समस्या नै होइ। जागेसर भैया ई नीक नै केलक, जे बहिनक बिआह एतेक दूर कोसी धारक ओइ पार कऽ देलकै। फेर ओकरा मनमे बहिनक संग खेलल गेल खेल सबहक स्मरण हुअ लगल। तखने टिपिड़-टिपिड़ पानि पड़ऽ लगल। राजेसरक सोचक क्रम टुटल। ओ मुड़ी उठा अकास दिस तकलक। मेघ धरती दिस नमरल जा रहल छल। सौनक मेघ होइते छै अहिना। केनौउसँ एगो टुकड़ी नमरल आ झर-झरा कऽ बरैस गेल। राजेसर अंग-पोछासँ मुँहपर पड़ल पानिकेँ पोछलक। आ आगू मुहेँ नजैर दौगेलक। बलान धारमे बाढ़ि आबि गेल छेलइ। कछेरक खेत सभ पानिसँ डुमल जा रहल छेलइ। बाउलक ऊँचका भिण्डा सभ सूखल छेलइ। रोपल धानकेँ बाउलसँ भरैत बलान माय। केतेको बरिससँ ई बलान नदी ऐठाम घुरिया रहल छइ। आस-पासक गाम सबहक माटकेँ प्राण विहीन कऽ देने छइ। कोनो ठाम बाउलक भिण्डा तँ कोनो ठाम खत्ता। केतौ समतल नहि। केकरो खेतमे नीक माटि तँ केकरो खेते मरा गेल। कोइ मनक मन धान उपजबैत तँ कोइ हक्कन कनैत। तब ने कोइ ईहो कहै छै, आएल बलान तँ बान्हू दलान आ गेल बलान तँ टुटल दलान। स्वतंत्रताक लेल ई नदी किछो कऽ सकैत अछि। केतबो ऊँचगर बान्हसँ घेर दियौ बाउलसँ भरना करैत फानि कऽ ओइपार टपि जाएत। जइ बाटे मन होइ, जइ गाम जेबाक होइ, ओतए चलि जाएत। ऐबेर ई नदी राजेसरक गामकेँ चारूभरसँ घेरने छइ। उत्तरसँ अबैत धारा दू भागमे विभक्त। गामक पुबरिया धारा मोट-गहींर मुदा पछबरिया धारा पातर। जेना बड़का साँप गामकेँ घेरने होइ। गामक उतरबरिया कात ऊँचका भिण्डापर स्कूल। धारक घेरासँ बँचल छइ। स्कूलक भिण्डापर ठाढ़ भऽ कऽ सौंसे गामक छप्पर देखल जा सकै अछि। दूर-दूर धरि पसरल खेत...। राजेसरक गाम। कोनो बेसी नमहरो नै आ ने कोनो बेसी छोट। सभ तरहक लोक आ जाति। जातिक भेद नहि, एकेठाम बसल। दूटा टोल मुदा एकेमे मिलल। किन्तु अन्तर अछि-एकटा। गरीब, मजदूरक विचार सभ रंगक। मुदा जमीनबला धनिक सबहक विचार एके रंग। राजेसर सोचलक, की होइ छै जे हमरा सभकेँ आपसी झगड़ासँ फुरसति नहि भेटैए आ ओकरा सभकेँ एके इशारा...। मेघक गर्जनासँ ओकर धियान दोसर दिस भऽ गेल। पानिक झीसी बन्न भऽ गेल छेलइ। हवामे ठण्ढी आबि गेल छेलइ। मनकेँ प्रसन्न करैबला समए...। राजेसर अपना गामक बाधमे पहुँच गेल छल। कनी आगूसँ हड़हड़ाइत, फनकैत भूतही बलानक धारा...। राजेसरक पएर गाम दिसक बाटपर बढ़ऽ लगल। बर्खामे भीजला कारणे देहक ठेही निकैल गेल छेलइ। ठण्ढाएल हवासँ मन आन्नदित हुअ लगलै। ओ गुनगुनाए लगल। शनै: शनै: अवाज तीव्र हुअ लगलै- “कहमाँ बहै छै मैया कमलेसरी कहमाँ बहै छै बलान। माँझ तिरहुत बहै छै मैया कमलेसरी अलापुरमे बहै छै बलान। केते जल बहै छै मैया कमलेसरी केते जल बहै छै बलान। अगम जल बहै मैया कमलेसर रिमझिम बहै छै बलान। कथी दऽ बोधबै मैया कमलेसरी कथी दऽ बोधबै बलान। पान-फूल दऽ बोधबै मैया कमलेसरी पाठी दऽ बोधबै बलान।” ‘छपाक’ दऽ पानिमे किछु खसल। ओही शब्दसँ गीतक क्रम टुटि गेल। राजेसर अकचका कऽ चारूभर तकलक। आँखि खोललक मुदा किछो नै भेटल। मन घुरिया लगलै आ देह आगू बढ़ल। ओ बाउलक ऊँचगर ढूहपर चढ़ि चारूभर नजैरकेँ दौगेलक। आँखि ठाढ़ भऽ गेल। धुरक कातसँ एकटा नारीक आकृति ओकरे दिस टक-टक तकैत। ठोरपर मन्द मुस्कान। राजेसर छड़ैप कऽ ढूहपर सँ उतरल। ओ गमछासँ मुँह पोछैत ओम्हरे टाँग बढ़ेलक। लग गेलापर देखैत अछि जे नीता धूरक कातमे बैसल अछि। मुड़ी नमरौने खुरपीसँ माटि कैच रहल अछि। कातमे घाससँ भरल छीटा छइ। राजेसर अनुमान लगेलक जे यएह माटिक ढेपा पानिमे फेकने हएत। मुदा तेना अनठौने अछि जे के कहत एकर किरदानी छी। राजेसर किछु काल धरि ओकरे दिस तकैत रहि गेल। हरिअर रंगक साड़ीकेँ ठेहुन धरि समेटने। बाँहिपर कसल ब्लाउज। सिनुरिया भेल मुँहपर लटकल एकटा लट। बरखामे भीजल केशसँ चुबैत पानिक बून ललियाएल कपोलपर ससैर रहल छल। लगै छेलै जेना करियाएल मेघसँ टपकैत मोती चानपर गिर रहल होइ। पिआसल नजैर पिबैत रहल रूपक पानि, किन्तु केते काल? किछु एहनो समए होइ छै जइमे अभिनय चलैत-चलैत यर्थाथ बनि जाइ छइ। आ ओइ यर्थाथकेँ सहजताक संग अंगीकार करऽ पड़ै छइ। राजेसर खखसल। नीता अकचकाइत मुड़ी घुमौलक। पातर ललियाएल ठोरपर मन्द मुस्कान। आँखिक भवमे सहज आकर्षण। राजेसर तकिते रहि गेल। नीता बजली- “की यौ गबैया, बड़ी टहकारसँ गाबै छेलौं। जेहने गीत तेहने मधुर गला।” राजेसर ठाढ़भेल ओहिना तकैत रहल, जेना पहिने तकै छल। नीता नजैर घुमबैत पुन: बजली- “हे यौ, एना किए टकटकी लगौने छी, हम की कोनो चुड़ीन छी।” राजेसर हँसैत बाजल- “हमरा तँ बुझि पड़ैत अछि जे अहाँ जलपरी छी। तुरन्ते पानिसँ निकैल कऽ बैसल छी। तँए मन होइए जे अहाँकेँ देखते रही।” “अहाँकेँ तँ हरदम मजाके सुझैए।” “ई मजाक नै अछि नीतू। लोक जँ नीक कहैत तँ अहाँकेँ आँखिक सोझहासँ परोछ नइ हुअ दइतौं। मुदा करब की...।” “रोकैत के अछि, अहाँकेँ?” “रोकत के हमरा। मुदा बिआहसँ पहिने ई गप्प ठीक नै अछि। समाजक लाज-धाक तँ राखए पड़ै छइ। जनिते छिऐ, अपना गाममे केहेन-केहेन अगिलगौना सभ अछि। छनेमे तिलकेँ ताड़ बना देत।” “तँए ऐ डरे चारि दिनसँ नुकाएल छेलौं।” “से बात नै छइ। माइक बेमारीक कारणे ओझरा गेल छेलौं। पथ-पानि,दवाइ करैमे अपसियाँत छेलौं।” “सएह यौ, हमरा तँ कखनो काल डर भऽ जाइत अछि। कहींहम बिच्चे धारमे ने डूमि जाइ।” “अहाँ घबराउ नै। हमरा शपथपर बिसवास राखू। अहाँकेँ छोड़ि दोसरसँ हमर बिआह नै हएत। किछु दिन परतीछा करए पड़त।” नीताक मुँहपर खुशीक रेखा आएल आ सिनुरिया रंग छोड़ैत चलि गेल। गप्प दुनूकेँ आर निकट लाबि लेलक। नीता मुड़ी नुहरौने बजली- “परतीछा तँ हम जिनगी भरि कऽ सकै छी। मुदा एकटा गप्प बुझि लिअ। जहिया ई बात होएत तहिया गाममे हड़कम्प मचि जाएत।” “से किए? बिआह तँ होइते रहै छइ।” “होइ छइ। अपना जातिमे। आन जातिमे नहि। गरीब-धनिक सेहो देखल जाइ छइ। हम तँ जातियो आ धनोमे अहाँसँ हीन छी। ओनऽ परिवार आ समाज ओहो सभ रोकत।” “अहाँ बेकारे चिन्ता करै छी। हमरापर बिसवास राखू। हम केकरोसँ डरेबला नै छी।” कहैत राजेसर आरो लग सहटि गेल। नीताक बाँहि दिस तकैत बाजल- “अहाँक बाँहिपर ई कथीक चेन्ह छी? कोइ मारलक की?” “हँ, बाबू खिसया कऽ एक छौंकी मारलक।” “की भेल रहै से?” “धरमलालक काज गछने रहै। हमरा कहने रहै जे ओकरा अँगना जा कऽ काज कऽ दिहैन। हम नइ गेलिऐ।” “किए नै गेलिऐ?” “हे यौ, ओकरा ऐठाम जँ काज करैले जाइ छी तँ लगैत रहैए जे धरमलाल आँखिमे गिर लेत। हरदम टकटकी लगौने रहै छइ। हमरा डर होइए। बाबू ई बात बुझबे ने करै छइ। कहबै केना।” “अहाँ चिन्ता नै करू। हमर मोटका डेरहत्थी लाठी राखल छइ। जँ अहाँक किछ कहत तँ कपारे फोड़ि देबै।” “हे यौ, बापक संगे ओकर बेटो ओहने छइ।” गप-सप्पक क्रममे राजेसरक अंग नीतासँ स्पर्श भऽ गेलइ। स्पर्शक सुखद आकर्षण...। राजेसर चाहलक जे नीताकेँ पाँजिया ली। नीता बँचबाक लेल चेष्टा केलक आ धड़फड़ाइत धारमे खसि पड़ल।जलक तीव्र वेगक कारणे भँसिया लगल। मुदा राजेसर चट-दे धारमे धसि गेल आ नीताक बाँहि पकैड़ कछेर दिस घिंच लेलक। दुनू हतप्रभ। एक दोसर दिस तकैत। डर आ सिनेह एके संग बरखैत...। नीताक सभटा वस्त्र भीज कऽ देहमे सटि गेल छेलइ। राजेसरोक वस्त्र डाँड़ धरि भीजल। अपना दिस धियान जाइते नीताक नजैर नीचा झूकि गेल। पानिक शोर सुनहटकेँ भंग कऽ रहल छेलइ। दूरसँ कोइ खखसल। दुनुगोरे मुड़ी उठा कऽ देखलक। कालीकान्त कोदारि कान्हपर नेने आबि रहल छेलइ। किछु एहनो लोक होइ छै जेकर डर सभकेँ होइत रहै छइ। आ ओकरा तापसँ लोक हटले रहैए। नीक आ अधलाहक मध्य डरक सत्ता, आ सत्ताक निच्चाँ सुख-दुखमे डुमल लोक। राजेसर आ नीताकेँ जेना डर चारूकातसँ घेरि लेलक। दुनू आँखिएसँ किछु गप्प केलक आ अपन-अपन बाट धऽ लेलक। आ धारक पानि जेना हँसए लगल। ◌ 4. राजेसरक देह थाकल-ठेहियाएल आ निन्नमे मातल छेलइ। मुनल ऑंखिमे नचैत रहै- सपनाक सतरंगी संसार। ओ स्वच्छ झीलमे हेल रहल छल। गहींर झील। अगम-अथाह, झलमलाइत पानि। कनी अन्हार कनी इजोत। मुदा ओइ पानिमे राजेसरकेँ डर नइ होइ छेलइ।शरीरमे स्पर्श करैत जलसँ ओकरा सुखद अनुभूति भऽ रहल छेलइ। ओ हेलैत आगू बढ़ले जा रहल छल। आकि कियो गट्टा पकैड़ झमारऽ लगलै। कानकेँ कोनो शबद हिलौलकै। भुक्क दऽ ओकर निन्न टुटि गेलइ। धड़फड़ा कऽ उठि गेलइ। छनेमे सुन्दर सपना आगूसँ अलोपित भऽ गेल छेलइ। ओ अँङ्गैठी करैत उठि कऽ बैसल। आगूमे भौजाइकेँ ठाढ़ भेल देखलकै। ओसारसँ नीचॉं उतैर अकास दिस तकलक तँ देखलक जे ललियाएल सुरुज धरती दिस हुलकी मारि रहल छेलइ। खोंतासँ बाहर चिड़ै-चुनमुनी चुन-चुना रहल छल। मेघ अपन मोहक चित्र बना रहल छेलइ। भौजाइक शबदसँ राजेसर पाछू घुमि तकलक। “गिरहत तकैले आएल छेलइ। काज गछने छल। जाइयौ ने। आइ भाइक बदलामे काज कऽ देबै।” गप्प सुनि जेना तुरतेमे राजेसरक मन तितौंस भऽ गेलइ। मुँह घोंकचबैत ओ दुआरिसँ बाहर विदा भऽ गेलइ। अदहा सौन सनसना कऽ बीति गेल छेलइ। रेड़-बरहा करितो धन-रोपनी तेजीसँ भऽ रहल छल। एहेन समैमे जनो-मजदूर खुशामदोपर नइ भेटत। रोपनी-कटनीक लेल लोक बाहर चलि जाइत अछि। काज केनिहारक अभाव सोभाविक छइ। काज करेबाक अछि तँ खुशामद करए पड़त। अहिना होइ छै- कखनो नाहपर गाड़ी तँ कखनो गाड़ीपर नाह। जन-मजदूर, काज केनिहार, श्रमशक्तिकेँ ने मान-सम्मान आ ने उचित श्रमक मूल्य भेटै छइ। सोभाविक छै जे ओ सभ पलायन करतै। राजेसरक सोच फेर दोसर दिस घुमलै। गछल छै तँ काज करैले जाए पड़त। ओकर पएर पोखरिक महार दिस बढ़ल। दरबज्जापर सबहक बरद सानी-कुटी खा रहल छेलइ। किछु गिरहत टेक्टरक जोगाड़मे लगल। गप हँकैत। धनक ठेसी सभसँ बेसी। “धुर हम तँ दू दिनमेखेती कऽ लेबै।” अधिक खेतबला सभ जनकेँ होहकारने खेत दिस जा रहल छल। “रौ जल्दी चल। खेत चटपटाएल छइ। पानि सुइख जेतौ तँ मुँह तकैत रहि जेमेँ।” चौबटियापर मलकेसर जोर-जोरसँ सोर पाड़ि रहल छेलै- “रौ ढोकबाऽ ऽ ऽ। दुपहरिया भेल जाइ छइ। तूँ सभ पड़ले रहमेँ।” ओइ टोलक लोककेँ बुझले छै जे गिरहतकेँ चिचियाइक आदत छइ। तँए अनठौने अछि। मलकेसर फेर हल्ला केलक- “रौ सुनै छीही आकि नइ। रौ ढोकबाऽ ऽ ऽ। मरि गेल छी की...?” मखना ओही टोलपर सँ आबि रहल छल। एक नम्बरक बकटेँट अछि। ओकरा बुझल छेलै जे मलकेसरक बाप कारी बाबू एकबेर घरढुक्का काण्डमे पकड़ा गेल रहइ। ओही दिनसँ परोछमे लेाक ओकरा करिया बोता कहए लगलै। मलकेसर जँ अनछपोमे सुनि जाइ तँ झगड़ा शुरू...। मलकेसर हल्ला करिते छल। मखनो जोरसँ सोर पाड़लक- “बक् छू...। बक् छू...। करिया बोता बक् छू...।” मलकेसरक ऑंखि ललिया गेलइ। तामसे हाथ थरथराए लगलै। हाथमे लाठी रहबेकरै। लाठीक हूर उठा कऽ ओकरा लगीच गेलइ। “रौ सार, तूँ एहेन बात बजमेँ। देखै छी लाठीक हूराठ। एके हूराठमे...।” “हे, हम तोहर करजा धारने छियह आकि कमाएल खाइ छियह। ईह, टेरही देखबैत अछि!” “तूँ एहेन अधला गप बजलेँ किएक? तूँ हमरा...।” “हम तोरा नहि कहलियऽ हम तँ अखनियोँ बोताकेँ सोर पाड़बै- बक् छू...। बक् छू...।” मलकेसर तामसे थरथराए लगल। करोध बरदाससँ बाहर। ओ मखनाक मुँहकेँ लाठीक हूराठसँ हूराठि देलकै। अचक्केमे चोट लगलासँ मखना चितंगे खसि पड़ल। लाठीकेँ सोझ करैत मलकेसर बाजल- “की बुझि पड़ै छौ तोरा, कमजोर। रौ बाप तँ हमरा सोझहामे बजबे नइ करतौ आ तूँ फटर-फटर...।” कहैत घुमि कऽ विदा हुअ लगल आकि मखना सुतले-सुतल ओकर टॉंग पकैड़ सट दऽ घींच लेलक। मलकेसर मुहेँ भरे गिरल। ओइठाम राखल पथ्थलपर गिरलाक कारणे डॉंड़मे बेसी चोट लगि गेलइ। बात आगू बढितै ताबे ‘हॉं हॉं’ करैत राजेसर बीचमे पहूँच गेलइ। खेत-पथार दिस जाइत गौऑं-घरूआ ठमैक गेल। दुनुगोरेकेँ पकैड़ अलग केलक। फोंफियाइत मलकेसर बाजल- “देखलिऐ ने यौ अपने लोकैन, ई छौड़ा हमरा डॉंड़ सरका देलक। रौ रजेसरा गवाही रहिहेँ।” भीड़सँ अवाज निकलल- “यौ मलकेसर बाबू, अहॉं शान्त रहू। साँझहेमे पञ्चैती करब। एतेक ठेसी।” “हँ यौ, एकरा सबहक मन बढ़ि गेलइ। जेतए देखियौ, जबरदस्तीए बात करत। बुढ़बाकेँ डॉंड़ सरका देलकै।” “मखनोक मुँह फुला देलकै। कोनो की एके दिस गलती भेलइ। फटाक दऽ पहिने लाठी नै चला देबाक चाही।” “साँझेमे फरिया जेतै जे केकर गलती छइ।” “हँ हँ, बुझले तँ छै जे गाममे केहेन पञ्चैती होइ छइ। मुँह देख मुंगबा...।” राजेसर चुपचाप ओही भीड़मे ठाढ़ छल। कालीकान्त कार कौआ जकॉं टॉंहि दऽ बाजल- “रौ रजेसरा हम तोरा तकने फिरै छियौ। तूँ पञ्चैती करै छेँ। हर-जन खेत पहुँच गेलइ। जल्दी चल।” लबरा ऐबते बाजल- “रौ चल करैले खेती-पथारी, नइ तँ बिका जेतौ बाड़ी-झाड़ी।” “देखही लबरा ऐबते अपन लबरपन शुरू करि देलकै।” “तँ हम कहॉं कहै छिऐ- बक् छू...। बक् छू...।” सभ हँसैत-मुस्कियाइत चलि देलक। ◌ 5. दिन भरिक काज कऽ जखैन लोक आपस अबैत रहै छै तखैन सफलता-विफलता, जश-अपजश, नीक-अधला सभ घेरने रहै छइ। रोपनी-कमैनी करैबलाकेँ तँ बाते किछु आर रहै छइ। रौदाएल देह, घामसँ भीजल कपड़ा-लत्ता। भुखाएल पेट, पियासल मन, मुरझाएल मुँह, टॉंग-हाथमे सटल थाल-कादो। गाम दिस बढ़ैत पएर बाधक चिन्ता छोड़ि दइ छइ। किन्तु गाम परहक चिन्ता कपारपर चढ़ि जाइ छइ। एहेन बखतमे ऑंखिमे तामस नचिते रहै छइ। सुरूज डुमैमे अखैन किछु बिलम्मे छेलइ। राजेसर बँसबिट्टी लग आबि ठाढ़ भऽ गेलइ। ऑंखि चारूभर घुमि-घुमि ताकए लगलै। अहीठाम तँ नीता भेँट करैले कहने छल? कहॉं देखै छिऐ। ठकि लेलक की? फेर ओकर पूर्व मिलनक घटना सभ मन पड़ए लगलै। आ जेना शीतल बसातक एकटा झोंक आबि देहकेँ सिहरा देलकै। आहट सुनलक तँ मुड़ी उठा कऽ आगू तकलक। धरमलाल बाबूक बेटा कुलानन्द लगमे आबि गेल छेलइ। चारूभर नजैर घुमबैत कुलानन्द ऍंठि कऽ बाजल- “रौ रजेसरा, एना चोर जकॉं की तकै छी?” राजेसरो केना चुप रहितए, बाजल- “जेकरा काज-धंधा नै रहै छै से अहिना बताह जकॉं वौआइत रहै छै आ लबर-लबर केने घुमै छइ।” दुनूमे बकटेँटी शुरू भऽ गेलइ। “हे रौ, हम सबटा गप बुझै छियौ। बाधे-बोनमे जे रसलीला केने घुमै छीही से के नइ जनै छौ। जहिया चोटपर चढ़बीही तहिया बुइझ पड़तौ।” “यौ कुलानन्द, हमहूँ सभ बात जनै छी जे घरेमे अहॉं की सभ करै छिऐ। डुमि कऽ एना पानि किए पीबै छी। हमरा डेराउ नइ। जहिया हमर मन गरमा जाएत तँ डेरहथ्थी हमरा काँखे तर रहै छइ।” “ओऽ ऽ, ई गप तँ बिसैर गेल रहियौ जे तूँ गरीबक नेता छेँ। सुनै छियौ जे मुखियासँ ठाढ़ हेमेँ। एहने चोरा-छीनरा मुखिया होइ छै रौ।” “गौआँ-घरूआ चाहतै तँ हम मुखिया पदसँ लड़बै। आ अहॉंकेँ कहने थोड़े किछो हएत। अखैन केहेन मुखिया अछि से तँ जनिते छिऐ।” “रौ, शिवकान्त बाबू तँ दू पीढ़ीसँ मुखिया बनल छथिन। हुनकर मोकाबला तूँ करबीही। पसङ्गो बरबैर छीही, हुनका सोझहामे तूँ। फूकतौ तँ उड़ि जेबही। रे बुड़ी, देहपर न लत्ता, चौधरी बोलत्ता। बापसँ भेँट भऽ जेतौ।” राजेसर डेरहथ्थी कॉंख तरसँ निकालैत बाजल- “हे, मुँह सम्हारि कऽ बात करू आ नइ जँ अखने फरियेबाक अछि तँ फरिया लिअ।” “रौ, हम तोरासँ लड़ि कऽ अपन मान घटाएब। लोक कहत जे लड़बो केलकै तँ कीड़ी-मकौड़ीसँ।” “से तँ हमहूँ घरढुक्कासँ नहि लड़ऽ चाहै छी।” “समए आबऽ दही डॉंड़ सरका देबौ जे उठले ने हेतौ।” “लोक हमरा संगे अछि। हमरा गीदर-भौकी नइ देखाउ। नहि तँ डेन-बॉंहि टुटि जाएत।” “ठीक छइ।” तामसे डेन फरकबैत दुनू दू दिसामे चलि देलक। बँसबिट्टीसँ एक हेँज कौआ-मेना फड़फड़ाइत उड़लै आ अपन-अपन संगीक संगे अकासमे निर्विघ्न विचरण करए लगल। ◌ 6. गामक चौबटियापर ठाढ़ ई पीपरक गाछ आब केतेक चतैर गेल छइ। कोनो आइसँ ई गाछ छइ। बुढ़े-पुरान कहत जे कहिया रोपल गेल। आब तँ माटि भरि कऽ चबुतरो बना देल गेलइ। पहिने तँ लोक भुँइएपर बैसै छेलइ। पञ्चैती की कोनो आइसँ होइ छइ। हँ, जमानामे तँ कोटो-कचहरी नहियेँ रहइ। पञ्चैतीएमे न्याय होइ छेलइ। जेतए न्याय ओतै अन्याय। लगबैत रहू उपाय। मनुख छै तँ झगड़ा हेबे करतै। तामसो तँ लोककेँ संगे छन्हि। तामसपर लोक की नियंत्रण करत। लोकेपर तामस नियंत्रण करैत अछि। तामसपर नियंत्रण केलासँ की हेतै? दोसर बाटे आर दूना बैगसँ बहतै। कोनो तरहेँ जँ तामस एबाक दुआरि सभ बन्न भऽ जेतइ। पहिने तँ ओकरा संगी सभपर रोक लगबए पड़तै। गामक चौबटियापर लोक सभ एका-एका जमा भऽ रहल छेलइ। आइ कोजो करैत काल सभकेँ पञ्चैतीएपर धियान रहइ।मनमे रहै छै- अपना लड़ाइ-झगड़ा नै करब तँ दोसरोकेँ लड़ाइ करैत देखबै। अन्तरक सभ बातसँ परिचित भऽ जेनाइ की सहज छइ। भीतरिया कंकालकेँ देखनाइ बड़ डेरौन...। पञ्चैती तँ जमानामे होइछेलइ। दूधक दूध आ पानिक पानि बेरा दइ छेलइ। अखैन तँ पञ्चैतियोमे घूसखोरी, जातिवाद, पाटीवाद, अपन-आन...। सभ अपना-अपना सुआरथमे डुमल। न्यायक कण्ठ मोका जाइत अछि। केतेको समस्या फन-फना कऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि।अन्यायक बदला आइ नहि काल्हि अन्याय भेटते अछि। गाछ रहतै तब ने झटहो मारलापर फले भेटतै। सॉंझक अन्हार गाछ-पत्ता सभपर पसरए लगल छल। पछुआएल कौआ-मेना कॉंइ-काँइ करैत खोंता दिस पड़ाएल जा रहल छेलइ। गोसॉंइ घरमे दियावाती भुकभुकाए लगल छेलइ। चबूतरा लग तीन-चारिटा पटिया बिछा देल गेल छेलइ। लालटेनक मधिम इजोतमे सबहक मुँह ठीकसँ नहि देखाइत रहइ। गाम-घरमे बिजलीक कोन काज। चौबीस घण्टामे कखनो काल एक आध घण्टाक लेल आबि गेल तँ लोक तिरपित भऽ जाइत अछि। किछु लोक पटियापर बैसल छेलै तँ किछु कातेमे फुसराहटि कऽ रहल छेलइ। मधुमाछी जकॉं घनघनाइत स्वर। स्पष्ट रूपें नहि सुनाइ छेलइ। किछु लोक निरंतर उपेक्षित आ दबावमे रहलाक कारणे सबहक सोझहामे बजबाक साहस नै कऽ पबैत अछि। ओहन बेकती सभ काते-करोटमे बाजि-भुकि कऽ संतोख कऽ लैत अछि। सभ ढंगक बेकतीकेँ समाजमे जरूरतो तँ रहबे करै छइ। किछु जन-मजदूर सभ राजेसरकेँ कातेमे घेरि लेने छेलइ। अपन-अपन उपदेश झाड़ि रहल छल। स्वार्थक तँ रूपे तेतेक होइ छै जे के चीन्ह सकत। कखैन केना कऽ परगट हएत आ कखैन लुप्त भऽ जाएत, कहनाइ कठिन। ओ अपना अनुरूपें नाच नचबैत रहैत अछि। आ बेकती अपनाकेँ बिसैर नचैत रहैत अछि। सबहिं नचावत सुआरथ गोसॉंइ। “सुनि ले राजेसर! अपन गप्प कहैमे डेरा जेबही तँ जुलुम भऽ जेतौ।” “हँ, उनटे मखनाकेँ जरिमाना लगि जेतइ।” “डेरेतै किएक? कोनो की कोइ बाघ छिऐ।” “हँ, अखनीसँ धाक टुटल रहतौ तब ने मुखिया पदसँ लड़बीहीं।” “हे रौ, ओहो सभ कोनो काला पहाड़ नै छिऐ। छूच्छे हवा-पानि देने रहै छइ।” “रौ, अपना सभ गरीब छिऐ तँ की कण्ठ मोंकि देतइ।” “हौ, राजेसरकेँ बजैक छमता छइ। के एकरा गप्पकेँ काटि सकतै?” “चलू बहादूर डर नै राखू। पाँछा छी हम सभ तैयार।” “रौ, एना राजेसराकेँ गरपर नै चढ़ाबीही,चारि दिनक बादक तँ सभ कमाइले बाहर चलि जेबही आ बेचारा असगरे सबहक चोटपर चढ़ि जेतइ।” “अखनी की नजैरपर नै चढ़ल छै, केतेक बेर मुँहपुरखा सभकेँ मुहेँपर गारि-बात देने छइ। लाठी चमकौने छइ। ओ सभ छोड़ि देतै?” “सएह हौ, गरीबक एकता आ बालुक बान्ह। हौ काका, एके धक्कामे चारि फक्का। केतेकोकेँ तँ चढ़ौआ छागर बना कऽ परान लेलहक आ ऐबेर...।” “चुप रह, मौगा-मरद अहिना बजै छइ।” “ठीके, ओकरा सबहक काजमे जे बारम्बार अड़चन करतै तेकरा...।” “तरेतर राजेसरापर सभ गुम्हैड़ रहल छइ।” “चुप, चूड़ी पीन्ह कऽ घरमे बैस रह। की करतै? गिर लेतै?” आपसी घेंघौज शुरू भऽ गेल छेलइ। सभकेँ शान्त करबाक लेल राजेसरकेँ बाजए पड़ल- “अहॉं सभ चिन्ता नइ करू। अन्याय नै हेतइ। हम जवाब देबै। चलू लगमे बैसै छी।” गाछ तर पंच सभ बैस गेल छल। चारूभर तकैत प्रमुख पंच बजला- “यौ, मलकेसर बाबू एला?” “आबि रहल अछि।” नेंगराइत मलकेसर पहुँचल। ओ कुहरैत पटियापर बैस गेल। “मखना कहॉं अछि यौ?” “आबि गेलौं पंच साहैब। हम कोनो पछुआइबला मरद नै छी।” मखना गमछासँ मुँह बन्हने छल। “सभ गोटे तँ आबिए गेल आब शुरू कएल जाए।” “रौ मखना, तूँ मुँह किए झँपने छेँ। उघारि कऽ देखा।” मखनाक मुँह फुलि कऽ कुप्पा भेल छेलइ। “पहिने तँ मलकेसरसँ पूछल जाए- जे की भेल छेलइ।” “हँ-हँ, पहिने मलकेसरजी सँ पूछल जाए।” धरमलाल ऑंखि नचबैत बाजल। मलकेसर देह-हाथ सोझ करैत बाजल- “यौ सरपंच साहैब, जन-मजदूरकेँ मने बढ़ि गेल छइ। तइमे लबका छौड़ा सभ तँ पानियोँ मे आगि लगबै छइ। देखियो ने, भोरमे हम जनकेँ हाक दइ छेलिऐ। मखना ओनएसँ आबि कऽ हमरा अधला बात सभ कहऽ लगल। हम ओकरा डॉंट-डपट देलिऐ तँ ओ हमरा पथ्थलपर पटैक देलक। डॉंड़ सरैक गेल अछि।” “ई तँ जुलुम भेलइ। एहेन-एहेन डकलीलामी।” -कुलानन्द ऑंखि उनटबैत बजल। “चुप रहबै तँ अहिना कपारपर चढ़ि कऽ लगही करत।” “नहि यौ, कसि कऽ डण्ड-जुरिमाना कएल जाए।” “एहेन अगिमुत्ता सभकेँ तँ मुइलाह बापसँ भेँट करबा दइके चाही।” “धड़फड़ नइ करियौ, कनी मखनोसँ बात बुझियौ। ‘कुछ बुझा न समझा आ फरमा दिया फॉंसी।’ एना नइ करियौ।” मलकेसरसँ राजेसर करजा नेने रहइ। सोचलक,राजेसर हमरे दिस बजत किने। तँए मलकेसर कुहरैत बाजल- “मखनासँ पुछबै। ओ तँ अपने दिस बजत। राजेसरो ओहीठाम रहै, ओकरासँ पुछियौ।” कुलानन्द फरकैत बाजल- “रजेसरा किए बजतै? ऐ बीचमे ओकर बात किए मानल जेतइ?” “किए नइ बजतै? ओ हमरा सबहक मुँहपुरुख छिया।” “एकेबेर एना नै बजियौ। मलकेसरजी जँ अपने कहै छैथ जे राजेसर ओइठाम रहै तँ ओकर गप सुनए पड़त। कहि कऽ सुनाबह हौ राजेसर केकर गलती रहइ।” राजेसर ठाढ़ भऽ कऽ बाजल- “यौ पंच लोकैन! हम जे देखलौं से कहि दइ छी। ठीके मलकेसर बाबू जनकेँ जोर-जोरसँ हाक दैत रहथिन। तखैने मखना जोर-जोरसँ बोकराकेँ हाक दैत ओमहरसँ एलइ। मलकेसर बाबू खिसिया कऽ लाठीक हूराठसँ मखनाक मुँह फोड़ि देलखिन। पहिलुक गलती तँ मलकेसरे बाबूसँ भेलैन। बाता-बातीमे लाठी नै चलेबाक चाही। तैपर मखना बँचैले पाछूसँ टॉंग पकैड़ घींच लेलकैन। चुट्टीओकेँ चीपबै तँ काटबे करत।” मलकेसर खिसियाइत बाजल- “मखना हमरा देख कऽ बक छू-बक छू करै छल हमरा गारि पढ़ै छल। ओकरा लग बकरी कहॉं रहइ।” मखना फानि कऽ बाजल- “बकरी हमरा हाथसँ छूटि कऽ भागि गेलइ। तँ हाथमे केना रहितै?” “तूँ हमरासँ बोता बारेमे पुछलेँ किएक नहि? तब ने हाक दैतही।” “आब लिअ। मूतबै आकि घरमे सुतबै। बजबै-भुकबै आकि नहि। पहिने मलकेसर बाबूसँ औडर लिअ पड़त। हे, आब ई जेठरैती नै चलत।” “दाबी देखबैत अछि। जेना कोय गुलाम रहइ।” कुलानन्द बाजल- “हम तँ पहिने बुझैत रहिऐ जे रजेसरा सबहक मगज उनटा देतइ।” “काज करै छी तँ मजदूरी भेटैत अछि। कियो मँगनी नै दइ छइ। राजेसरक सभ गप्प सॉंच छइ।” “तँ की मलकेसरजी झूठ बजै छै? सभ तँ पंचे छिऐ। केकरा के रोकत। दुनू दिससँ भारी घेंघौज शुरू भऽ गेल छेलइ।” “कोय धनीक अछि तँ अपना-ले अछि। कमाइ छी तँ ठाठसँ खाइ छी। केकरोसँ माङऽ नै जाइ छिऐ। दाबी कथीक देखा रहल अछि।” “तँ तोरा सभ गामसँ उजारि देबहक। बुढ़-पुरानकेँ परतिष्ठा घिना देबहक।” गमछा कपारमे बान्हैत एक-गोरे फनकल- “झगड़े-लड़ाइ करैक विचार छौ तँ फरिया ले।” “हे मुँह सम्हारि कऽ बात कर। एनए कोइ कमजोर नइ छइ।” परभुदास गामक संत छैथ। हॉं..हॉं... करैत ओ आगू एला। “कहू जे ई पञ्चैती छिऐ आकि युद्ध। पञ्चैतीमे जँ अन्याय हेतै तँ हजारो समस्याक जनम भऽ जेतइ। देखलिऐ कहियो लड़ाइ-मारिसँ विकासक काज होइत?गामक संस्कारकेँ एना नै बिसरू। बात आगू बढ़त तँ सभटा राखल-उसारल धन पानि जकॉं बोहि जाएत।” लबराकेँ नहि रहल गेलइ। बिच्चेमे टपैक उठल- “रौ भाय बगरा नहि कर झगड़ा। खोंताक बच्चा सेहो छौ कच्चा सेवलहा अण्डा सेहो हेतौ गण्डा। मन थिर कर नहि तँ हेतौ वितण्डा।” ताल ठोकैत फेर बाजल- “आबि जो फरिया ले नहि तँ गरिया ले। तूँ उनचास तँ हमहूँ पचास। रौ भाय बगरा हम छी लबरा।” केते गोटेकेँ हँसी लगि गेलइ। लोक सभ किछु शान्त जकॉं भऽ गेल छल। “यौ सरपंच साहैब। बात बिगड़ल जाइत अछि। एना नहि हएत।” “ऐठामसँ पॉंच पंच उठि कऽ बाहर जाउ। एकान्तमे विचार करू। आ फैसला सुना दियौ।” “ठीक छै सएह कएल जाए।” “देखलीही बँचा लेलियौ।” “हमरा की बँचाएब ओकरा बँचा लेलिऐ।” पञ्चैतीसँ पॉंच पंच बाहर निकैल गेल छल। निर्णए की होइत की नहि। सबहक धियान ओम्हरे चलि गेल छेलइ। आपसी कनफुसकी शुरू भऽ गेल छेलइ। लालकान्त पाछूमे बैसल छल। उचित अवसर देख आगू आएल आ ठाढ़ भऽ बाजए लगल- “यौ पंच भगवान! हमरा एकटा पञ्चैती कऽ दिअ।” झपसूलालक देह सिहैर गेल छेलइ। कातेसँ टपैक उठल- “अखनी दोसर गोटेक पञ्चैती नइ हेतौ।” लालकान्तक ऑंखि ललिया गेल छेलइ। “किए ने हेतै? पञ्चैतीए करैले ने पंच सभ बैसल छैथ। तूँ रोकनिहार के?” बात आगू बढ़ितै तइसँ पहिने एकटा पंच बाजल- “अच्छा झगड़ा नै करू। बाजह हौ लालकान्त,की बात छै?” “की बजबै यौ पंच साहैब। बजितो लाज होइए।” “बजबहक नै तँ बुझबै केना?” लालकान्त नजैर उठा कऽ झपसूलाल दिस देखलक आ बाजल- “पुछियौ झपसूकेँ जे अधरतियामे हमरा अँगना कथीले गेल रहए?” झपसू बातकेँ काटैत बाजल- “देखियौ, केकरा ऐठाम के नहि जाइ छइ।” लालकान्त ऑंखि गुड़रैत बाजल- “झपसू, तूँ हमरा बातमे टोक नै दऽ सकै छेँ। हम पुछै छी- अधरतियामे हमरा अँगना की करैले गेल रहए?” “कोनो चीज चोरा लेलियो? हम कोनो चोर छी?” “की करैले गेल रही?” पंच टोकलक- “जवाब दहक झपसू। कथीले गेल छेलहक?” झपसू छीना काटैत बाजल- “हमर अँड़िया बछा रातिमे खुलि गेल रहए। तेकरे ताकैले गेल रहिऐ।” लालकान्त तामसे ठाढ़ भऽ कऽ बाजल- “रौ झपसू, झूठ किए बजै छेँ। पंचक सोझहामे..। बजर खसतौ।” “तँ तोहीं कहऽ जे सॉंच की छै?” “तूँ हमरा स्त्रीकेँ किए सोर पाड़ैत रही?” “झूठ गप्प। तोहर पत्नी स्वीकार करतौ ई बात। ओ तँ साँझोमे हमरे अँगनामे बैसल रहौ। कहै छेलौ हमरा खेतमे हर जोति दिअ।” “हमरा इज्जतकेँ उघार करबेँ। देखबीही?” “देखबै की? तोरासँ हम कमजोर थोड़े छी।” पंच रपटैत बाजल- “अहॉं सभ मुँहकेँ बन्न करू।” मनधत्ता धड़फड़ाइत पहुँचल आ जोरसँ हल्ला करैत बाजल- “हौ जुलुम भऽ गेलै हौ।” “की भेलै हौ?” मनधत्ता राजेसर दिस ताकैत बाजल- “रौ रजेसरा तोहर भाए जागेसर दुनियॉंसँ चलि गेलौ रौ।” “केना भेलै हौ।” मनधत्ता कानैत बाजल- “हौ, हम आ जागेसर एके नाहपर चढ़ि धार पार करैत रहिऐ। धारमे बाढ़ि आएले रहै। नाह डुमि गेलइ। केतेक-गोरे डुमि कऽ मरि गेलइ।” “तूँ केना बचलीही?” “हमरा एकटा नहवरिया छानिकेँ ऊपर केलक। केतबो तकलिऐ जागेसरक लहाशकेँ, केतौ ने भेटल।” मनधत्ता फेर कानए लगल। किछु कालक लेल सभकेँ जेना बघजर लगि गेल होइ। नि:शब्द...। सभकेँ ऑंखिक सोझहामे जेना जागेसरक मुखाकृति नाचि उठल...। जेना एक-एकटा ओकर गुण मन पड़ि आएल होइ। मुइलासँ पूर्व लोकमे दोष-गुण केतबो होइ मुदा मुइला उपरान्त लोककेँ ओकर गुणे बेसी स्मरण होइ छइ। जेना सभटा अवगुण मृत्यु अपना संगे नेने चलि जाइ छइ। तइमे गौऑं-घरूआकेँ जागेसरसँ बेसी फैदे भेटल छेलइ। हरक्षण दसगरदा काजले तैयारे। केकरो ऐठाम कोनो कठिन समस्या आबि जाइ छेलै तँ राति-बिराति हौउ चाहे पानि-पाथल झहरैत हौउ, जागेसर ओइठाम तत्काल पहुँच जाइ छेलइ। कहियो समाजकेँओकरासँ हानि नइ भेल छेलइ। एहेन लेाकक मृत्युसँ सबहक ऑंखि नोरा जाएब सोभाविके...। किछु-गोरे एक-दोसरक मुँह ताकि रहल छल आ किछु-गोरेक ऑंखिसँ दहो-बहो नोर बहि रहल छेलइ। मुदा किछु एहनो बेकती होइ छै जेकरा अनकर उन्नतिसँ दुख होइ छइ। अपना दिस धियाने नहि रहै छइ। ओइठाम किछु एहनो लोक छल जे मुँह नेरौने दुखितक नाटक कऽ रहल छल। राजेसर सभसँ कातमे बैस गेल छल। ओ निरंतर उत्तरेमुहेँ ताकि रहल छल। जेना आँखिमे असीम पीड़ा भरि गेल होइ। भीतरे-भीतर औनाइत दुखक धुइऑं। मुहसँ बोल नै फुटै छेलै मुदा कुहैर रहल छल। ‘मिले न जगत सहोदर भ्राता।’ राजेसरपर लोकक धीरजभरल शब्दसँ कोनो परभाव नहि पड़ि रहल छेलइ। ओ असथिरेसँ उठल। बुझेलै टॉंगमे कोनो शक्ति नइ अछि। तैयो धीरे-धीरे घर दिस टॉंग बढ़ि रहल छेलइ। मलकेसर ठाढ़ होइत बाजल- “रौ तँ हमर पञ्चैती केना हेतै?” कालीकान्त रपैट कऽ कहलक- “ईह, ओनेए वेचारापर दुखक पहाड़ खसि पड़लै आ एकर पञ्चैती हुसल जाइ छइ।” सरपंच ठाढ़ होइत बजला- “अखनी पञ्चैती नै हएत। वेचाराकेँ जुआनी मौत भऽ गेलइ। पहिने पॉंच गोटेजाउ आ धारक कातसँ जागेसरक लहाश ताकि-हेरि कऽ लाउ। अन्तिम संस्कार कएल जेतइ।” एकाएकी सभ विदा भऽ गेल छल। राजेसरक अँगनासँ कनबाक स्वर आबि रहल छेलइ। रातिक अन्हार जेना आरो सघन भऽ गेल छल। ◌ 7. धारक कछेर। पसरल बाउल। केतौ-केतौ कास-पटेरक झाड़-झॉंखुड़। ओहीठाम राजेसर ठाढ़ भेल छल। बताह सन दशा। सोचि रहल छल। ‘सभ किछो अछि ओहिना, जहिना छल तहिना। मुदा ई की भेल, हमरा लेल, सभ किछु बदैल गेल...? संगे आएल गौऑं सभ जागेसरक लहाश ताकि-हेरि रहल छल। चारूभर अगाध बालुका-राशि। केतौ हरियरीक लेश नहि। जेना नदी उजरका साड़ी पहिरने होइ। कात-करोटमे केतौ किछु नै। जेना नदीक नोरसँ सभ किछु दहि-भँसि गेल होइ। चहुँओर पसरल सुन-मसान, ने कोनो बोली ने कोनो गान। राजेसर सोचलक- एहने दशा आब हमरा भौजियोकेँ होएत। अहिना विधबा स्त्री जकॉं उजरा साड़ी पहिर, ऑंखिसँ नोर बहबैत, पहाड़ सन जिनगीकेँ नपैत-जोखैत...। अकुलाएल मनकेँ बहटारैले कनी आगू बढ़ल मुदा फेर ठमैक गेल। यएह तँ ओ जगह छी। अहीठाम जागेसर भैया कहने रहैथ- “हौ बौआ, जागि-बेरागि कऽ सुतिहऽ। घरो काते-करोटमे आ रातियो अन्हरिये। बुझिते छहक गामक गेल आ निन्नक सूतल। हमरा बेसियो समए लगि सकैत अछि।” बेसी समए की लगतै ओ तँ सदा-सदाक लेल छोड़ि कऽ चलि गेला। जेना बोली, बानि, क्रियाकलाप द्वारा मृत्यु समैसँ पूर्वे सूचना दैत रहै छइ। राजेसर डबडबाएल ऑंखिकेँ पोछि लेलक। छीटपर मुँह उठौने- नाहक भग्न अवशेष। लगै छेलै जेना गोहि शिकारकेँ पकड़ैले लक लगेने होइ। भविसक बोझ जेना राजेसरकेँ दबने जा रहल छेलइ। मन तरे-तर काछुर काटि रहल छेलइ। माथासँ घामक टघार चूबि रहल छेलइ। ओ धड़फड़ाइत धारक पानि दिस बढ़ि गेल। “एना धड़फड़ीमे कोनो काज नै करी। आब तूँ जुआन भेलह।” जेना केतौसँ भाइक स्वर ओकरा कानसँ टकरेलै। आशासँ भरल ओ चारूभर चकोना भेल। मुदा केतौ किछु नै देखा रहल छेलइ। जेना अन्तरमे किछु उधुक्का मारलकै। ओ हिया फाड़ि कऽ कानए लगल। भाइक संग बितौल एक-एक क्षण मन पड़ि रहल छेलइ। जेकरा परतापे ओ ने डेराइत छल आ ने कखनो चिन्तित होइ छल। मुदा आइ ओकरा बुझाइ छेलै जे ओ असगर भऽ गेल अछि। विल्कुल बेसहारा। सभ किछु बदलल। मन खाली खाली सन। माथपर हाथ लेने ओहीठाम बैस गेल। भविसक भूत सभ आगूमे नाचए लगलै। केतबो ताक हेरि केलक मुदा लहासक केतौ अता-पता नै चललै। गौआँ सभ असोथकित भऽ कऽ राजेसर लग बैस रहल छेलइ। भूख-पियाससँ सबहक मन ऑंटो-ऑंट भऽ गेल छल। कछमछी लगल छेलै मुदा जाएत केना। समाजिक भारसँ घेराएल छल। कालीकान्त कातेमे बैसल छल, एकगोरे पुछलकै- “यौ कालीकान्त बाबू, आब कोन उपाए लगतै? दाह संस्कार केना हेतै?” गमछासँ मुँह पोछैत कालीकान्त बजला- “आब मरलाहा संगे मरि जाएब से हएत। एते तका-हेरी केलौं मुदा लहाशक केतौ पता नै लगल। साइत धारक पेटमे चलि गेल।” “उपाए की हेतौ यौ?” “एहेन स्थितिमे तँ कुशपुतर बना कऽ दाह संस्कारक बेवस्था होइ छेलइ। गामपर चलह। जाति-समाजसँ पुछि लिहक। जेना कहतह तेना करिहऽ।” “तँ आब चलबाक चाही।” “हँ, दुपहरिया बीतल जा रहल छइ। आ बाट केहेन अछि से बुझिते छहक।” मुदा राजेसर किछो नै सुनलक। जेना ओ गप-सप्पसँ बहुत दूर छल। सोचक सागरमे निमग्न। मुँहपर पीड़ा नाचि रहल छेलइ। चुपे-चाप अपनहि नोरकेँ पी रहल छल। कनी काल तक कालीकान्त ओकरा मुँह दिस तकैत रहला। जेना अपना ऑंखिसँ राजेसरक हृदैक पीड़ाकेँ नापैत होइ। मुदा आनक पीड़ा आन नहि जान। दुखक पसरैत छॉंहकेँ कालीकान्त देख रहल छला। ओ राजेसरक बॉंहि पकैड़ हिलबैत बजला- “रौ राजेसर, एना वौराएल किए छीही। तोरेपर तँ आब पलिवारक सभटा भार छौ। एना जँ करबीही तँ पलिवारक आन लोकक की दशा हेतौ। मनकेँ थीर कर। ऐठामसँ उठ। चल गामपर।” राजेसर उठैक कोशिक केलक। मुदा टॉंग थरथराए लगलै। सौंसे शरीर केराक भालैड़ जकॉं डोलैत रहइ। ऑंखिक आगू अन्हार। ओइ अन्हारमे लाल-पीअर रेखा...। ओ लुद दऽ बैस रहल। कालीकान्त समझबऽ-बुझबऽ लगला- “रौ, संसारक चक्र अहिना चलै छइ। जे ऐ मृत्युभुवनमे आएल अछि ओकरा एक दिन ऐठामसँ जाए पड़तै। जन्म आ मृत्यु होएब तँ लीला अछि। ऐ लीलामे मनुखकेँ अपन-अपन काज करए पड़ै छइ। भागि कऽ केतए जेबही? लीला केकरा बुत्ते रूकत। राजा, रंक, फकीर कोय मृत्युसँ नहि बँचि सकैत अछि।” संत परभुदास लगमे आबि कऽ बाजल- “यौ सदा न फूलै तोड़ी, सदा न सावन होय। सदा न जौवन थिर रहे, सदा न जीबे कोय। जे ऐ संसारसँ चलि गेल से आपस नै आबि सकैत अछि। सभगोटे मिलि कऽ कानब तैयो घूरि कऽ नै आउत।” राजेसर नोर पोछैत बाजल- “हे यौ, अहूँ सभ ठीके कहै छिऐ। मुदा सभ किछुकेँ एकटा समए होइ छइ। समैसँ पहिने एहेन बेथा भऽ जाएत से कहियो मनमे नै आएल रहए। अहीं सभ सोचियौ, पलिवारक भार, धिया-पुताक भार आ भौजीक दशा देखै छिऐ तँ मोन होइए जे हमहीं मरि जैतौं से नीक होइत।” परभुदासकेँ बजए पड़लै- “जिय बिनु देह नदी बिनु वारि, वैसहिं नाथ पुरुष बिनु नारी। ओकरा तँ ठीके भारी विपैत पड़ि गेलइ।” कालीकान्त सम्हारैत बजला- “से तँ हमहूँ सभ बुझै छिऐ जे जुआनीक मौत बड़ अधला। मुदा की करबहक। ऊपरबलाक जे इच्छा छेलै से भेलइ। ओइ सर्वशक्तिमानक सोझा केकर वश चलतै। संतोष तँ करइ पड़त।” किछु काल सभ कियो गुम पड़ि गेला। जेना एक-दोसरक पीड़ाकेँ नापि-जोखि रहल होथि। कालीकान्त ऊपर मुहेँ तकैत बजला- “चलह, बड़ बेर भऽ गेलइ। आगूक गप्प गामपर सोचल जेतइ।” परभुदास पॉंजमे पकैड़ राजेसरकेँ ठाढ़ केलक आ बाजल- “मनकेँ थिर करह आ डेग उठाबह।” “होहिं वही जो राम रचि राखा।” आगू राजेसर आ पाछूसँ गौआँ सभ मुँह लटकौने विदा भऽ गेल छल। मनुखक हृदैमे दुख सहबाक असीम क्षमता रहिते अछि। केहनो भारी दुखकेँ रसे-रसे सहि लैत अछि। राजेसर सोचि रहल छल आ उड़ैत धूराकेँ देख रहल छल। पता नै लगि रहल छेलै जे हवा संगे धूरा अछि आकि धूरा संगे हवा। मुदा धूराक मध्य बनैत आकृति तुरन्तेमे बिगैड़ जाइ छेलइ। ओइ बनैत आकृतिक मध्य राजेसर अपनाकेँ तकैत-तकैत हेरा गेल छल। ◌ 8. भोरेसँ चारूभर अनघोल भऽ रहल छल। पुरुखमे आपसी चरचा आ स्त्रीमे फुसराहैट। पूरे गाम दलमलित। लोक सभ गामपर सँ ससरल जा रहल छल। चुपेचाप, अनठौने। गाम-घरक कोनो घटना बड़्ड तेजीसँ पसरैत अछि। जेना आगिक कुकुआहा एक घरसँ दोसर घरकेँ अपना लपेटमे लैत बढ़ैत अछि। तहिना एक कानसँ बियाबान, सबहक पेटमे बात थोड़े पाचै छइ। केते-गोरेकेँ तँ पेटमे बात बसात जकाँ औनाए लगै छइ। जँ जल्दी नहि निकलौ तँ...। कालीकान्त अपने दलानपर ओंगठल छला। धिया-पुता ओकरा देहपर लटकल छल। किन्तु ओकर धियान ओइ औरतियाक गपपर छेलै जे लगेमे बैसल छेलइ। केतेको गप पंचकेँ एकान्तीमे कहल जाइ छइ। खुशामद आ पैरवी केलापर पंचो न्याय-अन्याय करैले तैयार भऽ जाइ छइ। जखैन पैरवी केनिहार पंचक मनोनुकूल हुअए तखैन तँ...। कालीकान्तकेँ किछु एहने सरस गप औरतिया सुना रहल छेली। तखैने सरपंच साहैब आबि गेला। कालीकान्तक आँखिक इशाराकेँ औरतिया बुझि गेल। ओ चट-दे नुका कऽ कोनटामे ठाढ़ भऽ गेल। कालीकान्त खखसैत कनी जोरसँ बजला- “यौ सरपंच साहैब, भोज-काजक इन्तिजामे राजेसरकेँ दिक्कत भऽ रहल छइ। कनी ओम्हरो धियान दियौ।” सरपंच साहैब ठमकैत बजला- “यौ, ओनए गाम दलमलित भेल छइ। अहाँकेँ भोज छूटि रहल अछि। अहाँकेँ तँ धियाने दोसर दिस अछि।” चकित होइत कालीकान्त बजला- “हमरा किछो पता नै अछि। की भेलै से?” “लरेनाक स्त्री बीख खा लेलकै, रातियेमे मरि गेलइ। थाना खबैर पहुँच गेल छइ। थोड़े काल मे दरोगा गामपर पहुँचत।” “नेता लरेना ऐठाम यौ?” “हँ यौ, अहीबेर तँ सभ नेतपनी घोंसड़तै।” “यौ नेता फनकबाज छइ। केहेन-केहेन अफसरकेँ मुट्ठीमे रखने छइ। देखै दिऐ जे बड़का लोकक गाड़ीकेँ हाथक इशारासँ रोकि दइ छइ।” “धूर ई कोन बड़का बात छइ। घूसखोरसँ काज करबौनाइ तँ सबसँ असान...।” “नइ यौ सरपंच साहैब। ओना जे कहियौ मुदा नेतबा छै बड़ा सोरसियल।” “जँ सोरसियल अछि तँ मुखिया जीक कथी लऽ पमोजी करैत अछि।” “की करतै अपना बुते नै सम्हरल हेतइ।” “तब कोन सोरसियल भेलै?” “अखनी केतए अछि नेता?” “साइत डागदर संगे फदर-फदर कऽ रहल अछि।” “डागदरकेँ देखै छी पछिम मुहेँ जा रहल अछि।” “पूछताछसँ बचबाक लेल केतौ चलि देने हएत।” “यौ सरपंच साहैब, अहूँ तँ साइत ओही डरे ससरल जा रहल छी।” “नै यौ, हम तँ पूबरिया बाधक खेत देखैले जा रहल छी।” तीन-चारिटा जुबककेँ जाइत देख दुनुगोरेक धियान ओनए चलि गेल। पढ़ल-लिखल बेरोजगार युवक सभ छुट्टीमे गाम आएल छल। आपसमे गप लड़बैत चौक दिस जा रहल छल। “एकटा गप नै बुझलिऐ यौ। लरेनाक स्त्री बीख खा लेलकै आकि अन्न-पानिक संगे खुआ देलकै?” “खेलकै आकि खुआ देलकै, जे भेल होइ। मुदा मरि गेल से तँ साँच छइ। एकर दोखी तँ लरेना आ ओकर पलिवारे भेलइ।” “जँ अपने खेने होइ तब केना कऽ दोखी हेतै?” “परिवारमे तँ परोछ रूपसँ तेतेक दुख आ कष्ट दइ छइ। बारम्बार प्रताड़ित करै छै जे महिलाकेँ बेवस भऽ कऽ आत्महत्या करए पड़ै छइ। जँ एहेन परिस्थिति पैदा केने होइ तँ दोख केकर भेलै?” “ठीके, पुरान विचारक लोक सबहक नजैरमे महिलाक कोनो मोल नहि छइ। ओहन लोक हरदम महिलापर दाब-चाप देखबैते रहै छइ।” “ऐ शोषण आ अत्याचारक कारणे केतेक उपद्रव होइ छै आ समाजो पछुआ जाइ छइ।” युवक सबहक गप सुनि कालीकान्त तमसाइत बजला- “अपना सभकेँ देख कऽ केहेन अँतड़ीमे लगैबला बात बजै छइ। सुनै छिऐ आकि नहि?” सरपंचो साहैब तमसाइत बजला- “सुनबै की, ई सभ गाममे केकरो मनुख बुझै छइ। ई छौड़ा सभ अपनाकेँ सभसँ बड़का काबिल बुझै छइ। आ जाने छै ढोंढ़क मनतरो नहि।” मखना कम पढ़ल-लिखल रहितो देश-विदेशक बात बुझै छल। ओ बाटक कातमे ठाढ़ भेल सभ गप सुनि रहल छेलइ। नै रहल गेलै तँ बाजल- “ई सभ किछो नहि बुझै छै तँ आइ.ए; बी.ए. पास केना केलकै यौ?” कालीकान्त नै बजला मुदा सरपंच चट-दे लोकैत बजला- “रौ, परीक्षा पास केनेसँ कियो काबिल नइ भऽ जाइ छइ।” “तब कथी केलासँ होइ छै?” कालीकान्तकेँ बजऽ पड़लै- “बड़ काबिल छै तँ एना बौआएल किए घुरै छौ। कोनो नीक नोकरी करितौ ने।” “अहाँ नोकरी केनिहारकेँ काबिल बुझै छिऐ। ईह! ई कहियौ जे हमर बेटा नै पढ़लक तँए मने-मन जरै छी।” “हमरा सभ किए जरबै। कोय अपना बरदकेँ नाङैरेमे नाथत ओइसँ लोककेँ की बिगड़तै।” सरपंच साहैब बातकेँ आगू बढ़बैत बजला- “हे यौ, दू साल जँ उपजा नै होइ तँ सभ नवावी घोंसैर जेतइ। उपजा जँ होइत रहै तँ पढ़ौनाइ कोन बड़का बात छइ।” मखना पट-दे बजल- “जँ एतेक सस्ता गप छै तँ अहूँ अपना बेटाकेँ पढ़ा लैतौं किने।” सरपंच साहैबकेँ जेना भीतर तक छूबि देलकैन तँए ओ गुम्हड़ैत बजला- “ई छौड़ा सभ अकासेपर चलता। हे रौ, तोरा कोइ बजेने छेलौ जे लबर-लबर करै छेँ?” कालीकान्त फटकारैत बजला- “हे रौ, तूँ ऐठामसँ जेबेँ की नहि।” “जाएब किए नै। साँच बात अहिना लगै छइ।” “ई किएक जाएत हमहीं चलि जाइ छी।” कहैत सरपंच साहैब तेजीसँ बाध दिस विदा भऽ गेला। पदचापसँ निकलैत क्रोध! जोड़ लगैत परबा डेरा गेल आ फड़फड़ाइत उन्मुक्त अकास दिस उड़ि गेल। मुदा सरपंच साहैबक धियान ओमहर नै छेलैन। ओ अपना मनसँ लड़ैत बढ़ल जाइ छला। ◌ 9. गाम कनी शान्त जकाँ भऽ गेल छल। तैयो लोक मने-मन डेराएले छल। भितरिया डर निकैल जेना असान थोड़े छइ। ओ तँ भीतरे-भीतर कुही करैत रहै छै आ थकुचल जिनगी चलैत रहै छइ। संगे हहास मारैत सभ किछकेँ झँपने बढ़ैत रहै छै, बहादूर सभ। ओना अही बीचमे तीन-चारि बेर थानेदार आएल छल। मुदा केकरोपकैड़ नै पौलक। घटनोक दिन सिपाहीक एलासँ पहिनहि लहास जरि गेल छेलइ। मुदा जरलोहो हड्डी सिपाही सभ बीछि कऽ नेने गेल छल। डर तँ सभकेँ बनले छेलै जे केकर नाम दारोगाक डायरीमे नोट छै आ केकर नहि। एहने समैमे लोक सभ मनमे सैंतल दुसमनी सधबैत अछि। ऐ कारणे सभ मने-मन आतंकित। साँझ पड़ैमे किछु पल शेष छेलइ। गोसाँइ डुमानी-बेर। राजेसरक दुआरिपर लोक सभ जमा भऽ गेल छल। आइए जागेसरक सराधी भोज छेलइ। ओना राजेसरक स्थिति भोज करबाक जोग नै छल परन्तु सर-समाजक उड़न्ता गप सुनलकै। कोइ सोझहामे तँ कोइ परोछमे। वेवश भऽ कऽ भोज करए पड़लै। जाति-समाजसँ भागियो तँ नै सकै छल। लोक सभ लोटा लटकौने पैछला भोजक चरचा करैत आबि रहल छल। राजेसरक दुआरिकेँ खरड़ासँ साफ कएल गेल छेलइ। एक-गोरे कुकुर आ कौआकेँ लाठीसँ भगा रहल छल। किछु भोजक पंच सभ कोणटामे ठाढ़ भऽ कऽ गप लड़ा रहल छल। “दुआरि नीकसँ साफ नै केलकै। हौ, सकरता नहि छेलै तँ कथीले भोज केलकै।” “हे यौ, की कहब कण्ठ मोकि कऽ भोज लेलकै। किछ मुँहपुरुखा सबहक विचार भेलै जे ऐ भोजमे एकरा डाँड़ तोड़ि दहक। सभ नेतागीरी अपने छुइट जेतइ। जन-मजदूर पाटी लऽ कऽ बड़ी जोरसँ गरजैत रहै छइ। भोजमे करजकेँ बोझ पड़तै आ ओकरे सधबैत जिनगी बीत जेतइ। मुखिया बनबाक सपना कहियो पुरा नहि हेतइ।” दोसर-गोरे बाजल- “हौ, जे भोज नै करए से दालि खौब सुड़कए। लोगक ऐठाम जे भोज खेने छै से करजा कहिया सधौते। भोज नहि करतै तँ उद्धार केना हेतै?” “हँ, हँ…। भोज तँ सभकेँ करबाके चाही। आखिर मुक्ति केना मिलतै।” “हँ यौ, समाजोक तँ एकटा निअम-काइदा छै तेकरा तोड़बाक नहि चाही।” “एना पुरान लकीरक फकीर बनल रहब तँ मरैत रहू ओही तरमे आ लदने रहू। बचबाक अछि तँ परिवर्तन करू।” “झगड़ा नै करू। बैसैले चले-चलू।” जातिक मानिजन हाथमे लोटा नेने पंच सबहक बीचमे आबि कऽ बाजल- “की यौ, सभ-गोरे आबि गेलौं?” मलकेसर टाँहि दऽ बाजल- “हमरा सभ ठीकेदारी नेने छिऐ- सबहक। जे नहि आएल से पाछू खाएत।” “हँ, ठीके छइ। सभ किछो तैयारे छइ। बैसू पाँतिसँ।” सुनिते, सभ-गोरे चटाचैट बैस गेला। लरेना नेता कातेमे ठाढ़ भऽ कऽ सरपंच साहैबसँ कनफुसकी कऽ रहल छल। गप सुनैले डाक्टर लगमे सहैट कऽ गेल।साधारण दुख-बेमारीक इलाज अंगरेजी जानै छल तँए गामक लोक ओकरा डाक्टरे साहैब कहै छेलइ। लरेनाक स्त्री जखैन मरैत रहै तखैन डाक्टरोकेँ बजौल गेल रहइ। मनमे डर पैसल रहै जे कहीं मोकदमा मे नाम ने पड़ि गेल हुअए। शंका समाधान करैले लरेनासँ पुछलकै- “की यौ नेताजी, केशक की हाल छै?” डेराएल रहलाक कारणे नेता मिरमिराइत बाजल- “अखैन तँ ठीके छइ। दरोगाजी किछ डिमण्ड केने छइ।” “यौ, सौस-ससुरसँ मिलानक गप करू। ठीक रहत।” “देखियौ तँ आगू की होइ छइ।” सरपंच साहैब बैसल लोक दिस नजैर उठबैत बजला- “यौ भात परसल जा रहल छइ। कोनो नीकठाम अपनो सभ बैसू।” पंच सभ पाँतिमे बैस गेल छल। बारीक सभ भोज्य पदार्थ परसैत अपसियाँत। भात-दालि, तीमन-तरकारी, पापर-अँचार आ चटनी। लोक सभ भोजनक सुआद लऽ रहल छल। लरेना नेता किछ बाजए चाहलक तखैने मनधत्ता दौगैत आगूमे पहुँच गेल। मनधत्ता चौकपर साग-सब्जीक छोट-छीन दोकान करैए। ओ अपसियाँत होइत लरेनाकेँ कहलक- “यौ नेता, जल्दी भागू नहि तँ पकड़ा जाएब। दरोगाजी एक दरजन फौरसक संग आबि रहल अछि।” लरेना फानि कऽ ठाढ़ होइत पुछलक- “कोनेसँ रौ?” “पछिमसँ गाम लग आबि गेल अछि।” लरेना अँइठे हाथे नुआँ समटैत पूबमुहेँ भागल। कोइ कातसँ टाँहि दऽ बजल- “चाहे छुटए संग साथ, नहि छोड़ी आगूक भात।” लरेनाकेँ भागैत देख ओकर दियाद भेलवा आ पीअर बाबाक कान ठाढ़ भऽ गेलइ। भेलवा अपना बगलमे बैसल पीअर बाबाकेँ पुछलकै- “हौ बाबा, नेतबा किए भागलै?” पीअर बाबा मुँहक भात घोंटैत बजल- “आबैत काल टीटही लगल रहइ। हमरा शंका होइ छौ। साइत पुलिस-दरोगा आबि रहल छइ।” “साँचे हौ? अपनो सभकेँ पकड़तै?” “हँ रौ, लहास जरबैमे तँ अपनो सभकेँ संग केने रहइ। केशमे नाम हेबे करतौ। सुनै छिऐ- थानापर बड़ पिटान करै छइ। जान नै बँचतौं। कोनो तरहेँ भाग ऐठामसँ।” भेलवा हरमुठाह लोक। आगू-पाछू सोचैबला कोनो बुधि नै। डरसँ आँखि नोरा गेलइ। फनफनाइत ताकत घटि गेलइ। किछु दिन पहिने ओही गामक सुपड़िया चोरकेँ पकैड़ थानापर लऽ गेल रहै। राति भरि नंगी मरचायक मसालासँ ओकरा सेवा कएल गेल रहइ। ई गप भेलवाकेँ बुझले छेलइ। ओ मनेमे सोचलक- चण्डलबा जँ आइ हमरा पकड़त तँ नै जानि जे कोन दशा करत। डरसँ ओकरा ऑंखिक आगू अन्हार भऽ गेल छेलइ। कोने भागत बाट सुझबे ने करइ। ओ सोझे पाँते दिस पड़ाएल। केतेक-गोरेक पातपर लात दैत,भातकेँ खिचाड़ैत मलकेसरक लग जा कऽ धाँइ-दे खसल। ओकर ठेहुन मलकेसरक मुहेँमे लगल। मलकेसर चितंगे खसल, मुँह पकैड़ बपराहैड़ काटए लगल। लोक सभ हो-हल्ला करए लगला। भेलवाकेँ बुझेलै- साइत दरोगाजीआबि गेल।ओ फुड़-फुड़ा कऽ उठल आ लरेनाक पछोड़ धेने भागल। मलकेसर कुहरैत उठल आ गरियबैत बाजल- “के छेलै रौ सार, हौ बाप, जान नहि बॉंचऽ दैत। किछ दिन पहिने तँ एकटा अगत्ती मखना डाँर सरकौने छल। आइ मुहोँ भंगठा देलक सार भेलवा।” गरदा झारैत फेर बजल- “हे रौ फतरिंगा सभ, सामरथी नै रहै छौ तँ बौहकेँ बीख खिया कऽ किए मारै छीही। हे रौ सार, रही घुरघुरा आ उखाड़ी बिचलाघर खाम्ह।” भारी घोल-फचक्का होए लगल। ओही हल्ला-फसादक मध्य केतेक-गोरे ससरए लगल। जेकर केशमे नाम हेबाक शंका रहै ओ दोगे-दोग बिला गेल। पीअर बाबा पोखैर दिसक लाथ लगा विदा भऽ गेल। ओकरा पाछू डाक्टर साहैब गप लड़बैत चलि देलक। पाँतमे जगह-जगह स्थान रिक्त भऽ भऽ गेल छल। बँचल लोक सभ भोज खा रहल छल। मुदा बीच-बीचमे ओइ खाली जगहकेँ देखैत कुता सभ आपसमे गुम्हरए लगल। जाबे लोक ‘हॉं-हॉं’करै ताबे कुकुर सभ पाँतमे ढुकि गेल। नष्ट-नष्ट कहि सभ-गोरे फानि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। धिया-पुता पातमे लात दैत भागि गेल। गधकिचन मचि गेल। किछसँ किछ बजैत लोक सभ घर दिस विदा भऽ गेल छल। राजेसर दुआरिक कातमे ठाढ़ भेल छल। वेचारा केतेक करजा-बरजा करैत भोजक ओरियान केने छल। सेहो समाजकँ पाइठ नहि भऽ सकलै। ओकरा आँखिसँ दहो-बहो नोर खसि रहल छल। मुदा ओइ नोरकेँ देखैबला कियो नहि छल। एक-गोरे बाजल- “भोज की करत। जश नहि भेटलै।” दोसर-गोरे टोनलक- “ऐमे केकर दोख?” रोजेसरक देह जेना काठ भऽ गेल छल। ओ शून्यमे निहारि रहल छल। ◌ 10. लोक सभ जा रहल छल- गहवर घर दिस। असनान केने हाथक डालीमे फूल-अछत,लड़ू-पान भरल। आइ भगतपर गोरैयाक सवारी हेतइ। ई बात सुनिते लोककेँ छुटलो दुख-बेमारी फेरसँ जेना उपैक गेलै, भीड़सँ तहिना लगै छल। परिवारक पढ़ल-लिखल, नव लोक सभ रोकि रहल छल। ‘ई पुरनका विचारकेँ छोड़ू। ओझहा-धाईममे फँसि कऽ रोगीक जान मारि देबइ।’ मुदा कोइ नहि सुनै छेलइ। ओकरो सबहक अपन तर्क रहइ। ‘ईह, कहै छै जे- लव लव जोगीकेँ...। हौ, केतेक बेर तँ जे बेमारी डागदरसँ नै ठीक भेलै तेकरा ओझहा-धाईम ठीक केलकै। ओते टको-पैसा रहै तब ने ओते महग दवाइ कीन सकब। एने घरमे घिंचै छै मुसरी डन आ ओनए...।’ राजेसरो अपना भतिजाकेँ कान्हपरलाधने जा रहल छल- गहवरदिस। केतेक दिनसँ ओकर बेमार भातिज कौहैर काटि रहल छेलइ। आब तँ आँखियोक रंग बदलल सन बुझाइ छेलइ। साधारण दवाइ-विरोसँ कोनो असैर नै होइ छेलइ। ठीक ढंगसँ इलाज केना करत। टका-पैसाक बिल्कुल अभावे। टका तँ टटके भोजमे उड़ि गेल रहइ।ओ बुझै छल- जे ओझहा-धाइमसँ किछो नइ हेतइ। मुदा दोसर उपाए की करत। अभावक कारणे नीक डागदरसँ इलाज केना होएत? वेवश भऽ गेल छल। ऊपरसँ माए आ भौजाइक अनुरोधकेँ केना टारैत। बरिसोसँ बीनल जालकेँ तोड़नाइकी असान छइ। ओ तँ तेतेक मजगूत भऽ गेल रहै छै जे ओकरा तोड़ैत तोड़ैत बेकती स्वयं टुटि जाइत अछि। गहवरक अँगनीमे सभ गोटे जमा भऽ गेल छल। एक कातमे भगैतिया सभ मिरदंग आ झालि लेने तैयार। भीड़मे स्त्रीगणक संख्या पुरुषसँ बेसी। बगलमे किछ गोटे हाथ जेाड़ने थरथरा रहल छल। जेना तरे-तर कियो ओकरा सबहक देहेकेँ हिला रहल छेलइ। बरिसोंसँ ठमकैत आ दौगैत बिसवासक आवरणकेँ विच्छिन्न करब की असान छै? ओकरा तँ मात्र हिलबै आ डोलबैले ज्ञानक जोरगर बसात चाही। नहि तँ चलैत रहत तरे-तर जेना मन्द पवनसँ डोलैत पात। आइ गहवर घर चिकनि माटिसँ निपल-पोतल छल। एकटा कोनमे फूल-अछत आ दीपकक ढेरी। दूधक ढारसँ भीजल-चिपचिपाइत निचला भूमि। धियान लगौने बैसल भगत। देवताक आवाहन कऽ रहल छल। भगतकेँ आँखि खुललै। एक चुरु गंगाजल देहपर छिट लेलक। आँजुर भरि फूल गहवर दिस चढ़ौलक आ फेर ध्यानस्त भऽ गेल। मिरदंग आ झालि बजए लगल। ‘तृंग धिग ध तृंग धी...।’ भगैतिया सभ भगैत शुरू कऽ देलक।स्त्रीगणक गीत वायुपर चढ़ि आसमान दिस चलि देने छल। “कोन दिन हे काली, तोरो जनम भेल कोन दिन भेल छठिहार। शनि दिन हे काली, तोरो जनम भेल ओकरे छबे भेल छठिहार। करिया कुकुरिया हे काली बाटे सुतै छै डेढ़िया चली गेल बिजुवन शिकार। एक बने झोरलह हे काली दोसर वने झोरलह तेसर वने उठल शिकार। हरिनो नै मारै काली तितिरो नै मारै बीछि-बीछि मारै छै मयूर। हकन्न कानै हे काली वनकेँ मयूरनी बारि वयस हरै छेँ सिनूर। जानो नहि मारबौ मयूरनी परानो नहि हतबौ पंखा लेबौ गोरैयाक सनेश से हरने जेबौ सबटा कलेश...।” भगतपर देवताक सवारी भऽ गेलइ। ओ देह-हाथकेँ ऐंठी-मोचार केलक आ मिरदंगक तालपर कुदए लागल। कुदैत-कुदैत ठाढ़ भऽ गेल आ हाथ उठा कऽ भारी अवाजमे बजल- “हैत बाबू, सत्त जवाब पड़ै छह।” लोक सभ चुप भऽ गेल छल। भीड़मे ठाढ़ भेल मुँहपुरुख सभ चटदनी आगू आएल। किछ-गोरे हाथ जोड़ैत बाजल- “हौ महराज, कनी हमरो सभपर धियान राखहक। वाड़ी-फूलवारीकेँ असिरवाद देने जाहक।” भगतकेँ मुहसँ कठोर शब्द निकलल- “विनाश कऽ देबौ। अगराही लगा देबौ।” मनधत्ता मुड़ी डोलबैत बाजल- “बड़ खिसियाह छइ। कोन देवता छिऐ यौ?” दोसर-गोरे बाजल- “केतेक गनबहक। बेरा-बेरी सभ देवता औते।” “हँ यौ, लोगे जकाँ देवतोक जनसंख्या तँ बढ़ले हेतइ।” एक-गोरे कल जोड़ने थरथराइत आगूमे आएल- “यौ महराज, एतेक किए खिसियाएल छिऐ?” हाथ फड़कबैत भगत बाजल- “तूँ सभ कोठा-सोफामे रहै छेँ आ हमरा-ले टुटली-मरैया। हमर ताल देखबीही?” एके स्वरमे केतेको-गोरे बाजल- “नहि यौ महराज, एना नै करियौ। गलती-कुगलती माफ करियौ। अहूँक घर बनि जेतइ।” भरल बाटी दूध। भगत गट-गट पीबए लगल। मखना कातमे चुक्की माली बैसल छल। आँखि निरारि कऽ तकैत बाजल- “रौ तोरी-के, भगता सौंसे बाटी दूध पी लेलकै।” मोचन लाठीक हुराठ ओकरा पीढ़ीपर लगबैत बाजल- “बजैक होश नै छौ। कही ने जे बाबा छाँकी लेलकै।” मखनाकेँ रीश उठि गेल छेलइ। ओ फोंफियाइत बाजल- “बड्ड पकिया भगता छौ तँ हमरा मुठ्ठीमे की छै- कहि देतौ।” “हे बेसी फट-फट नहि करी। जँ कहि देतौ जे तोरा मुठ्ठीमे गहुमन साँपक पोआ छौ। तब की हेतौ?” “तइसँ की भऽ जेतै?” “मुठ्ठीमे राखल चीज बदैल कऽ गहुमन साँप बनि जेतौ आ डँसि लेतौ। तब बुझबीही जे अरारि केलासँ की होइ छइ।” “की हेतै? तू मरबहक?” “हँ हौ, कहे भगता पुराबै देवता।” किछ-गोरेक देह सिहैर गेल छल। केते-गोरे बिच्चेमे ठाढ़ भऽ गेल छल मुदा आँखि चारूभर घुमि रहल छेलइ। भलचनकेँ दूटा स्त्री छेलै तँए केते-गोरे दू बहुआ कहइ। ई गप्प सुनिते भलचनक देहमे जेना आगि लगि जाइ। तँए वेचारा कातेमे ठाढ़ भऽ सोचि रहल छल। ‘पहिल स्त्रीमे धिया-पुता नहि भेल तँए ने दोसर स्त्रीसँ चुमौन करए पड़ल। ओकर जवानीक सुन्दरता देख लोक जरैए किए? मुदा भलचनक मन आ देह बुढ़ा गेल रहइ। जवान स्त्रीक चलब-लड़ब देख मनमे हरदम शंका बनले रहइ। होइत रहै छै मनमे बेवधान, शक्ति, शंका आर समाधान। आइ भलचनक लवकी स्त्री डाली लगौने छेली। हल्ला–गुल्लाक कारणे लोक सभ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल छेलइ। भलचनक लवकी स्त्री गमकौआ तेल लगौने बिच्चेमे ठाढ़ भेल छल। कुलानन्द सहटैत-सहटैत लग चलि गेल। ओभलचनक स्त्रीकेँ पाछूसँ सटि ठाढ़ भऽ गेल छल। अनठौने, अनबुझु जकाँ दोसर दिस तकैत। बुझै जे भीड़मे के देखत। ओनए दुनूकेँ सटिया कऽ ठाढ़ भेल देख भलचनक पारा गरम हुअ लगलै। ओकरा बुझेलै- जे औरतियोकेँ यएह मन छै तब ने देहमे एतेक सटल छै आ किछो नहि बजै छइ। गमकौआ तेल लगबैक मतलब की? भलचन तामसे थरथराइत लोककेँ ठेलैत-ठालैत अपना स्त्रीक लग चलि गेल आ लपैक कऽ ओकर झोंटा पकड़लक आ मुक्का दैत बाजल- “गे बेहया, तोरा कोन बियाधि छुबने छौ। निकल ऐठामसँ नइ तँ गत्तर तोड़ि देबौ। तोरा की बुझि पड़ै छौ जे हम किछो नइ बुझै छिऐ।” कहैत तरातैर चमेटा मारि रहल छल। कुलानन्दकेँ नहि रहल गेलै ओ भलचनकेँ कण्ठ पकैड़ पटैक देलकै। भलचन केंकिया उठलै। राजेसर सभ खेला देख रहलछेलइ। ओकरा बरदाससँ बाहर भऽ गेलइ। पाछूसँ गेल आ कुलानन्दकेँ उठा कऽ पटैक देलकै। जाबे लोक हाँ-हाँ करै ताबे चारि चमेटा लगा देलकै। दुनुगोरेकेँ पकैड़ लोक सभ हाटोलक। समाजक बीचमे कुलानन्दकेँ मारि लगि गेल छेलइ। ओकरा बुझाइ छेलै जे इज्जत उतैर गेल। बाघ जकाँ गुम्हड़ैत बाजल- “रजेसरा,गौआँक सोझहामे जे हमर बेइज्जती केलही। एकर बदला हम लेबे करबौ। एहेन दशा करा देबौ जे इएह गौआँ-समाज तोरापर थूक फेकतौ।” राजेसर बाजल- “सुनै छिऐ यौ एकर गप्प। समाजक बीचमे एकटा बुढ़-पुरान बेकती मारै छेलइ। कुकरमी किरदानी केहेन करै छेलै, कहै छी- एकरा कहियौ, ऐठामसँ चलि जाएत नै तँ बात बढ़ि जाएत।” “ऐबेर तोरा मुइलहा सभसँ भेँट करा देबौ। चिन्हले हमरा।” कुलानन्द ओइठामसँ चलि देलक। किछु लोक भलचन आ ओकरा स्त्रीकेँ शान्त केलक। लोक रंग-बिरंगक विचारमे डुबि गेल छल। अपन-अपन तर्क-विचार। भगतजीक अवाज सुनिते लोक सभ शान्त भऽ गेल छल। एकाएकी गोहारि हुअ लागल। गीतहारि सबहक गीत फेर शुरू भऽ गेल छेलइ। “आजुक दिनमाँ सुदिन या गे माय मधुपुर भऽ गेल उछाही कि गोरैया जसो मंत्र हे कोन काते कात रहे बाँसक बिटिया गे माय कोन काते चिरब कामी कि गोरैया जसो मंत्र हे...।” जेकरा सबहक गोहारि भऽ गेल छेलै ओ सभ एका-एकी विदा हुअ लागल। गामक शिक्षित बेरोजगार संतू आ फुलेसर ओही बाटे चौक दिस जाइ छल। लोकक भीड़ देखते दुनुगोरे ठमैक गेल। तखैने राजेसरो अपना भातिजकेँ लेने भीड़क मध्यसँ निकलल। ओकरा देखते फुलेसर सहैट कऽ लग गेल आ हँसैत बाजल- “ही... ही... ही... की हौ राजेसर, तहूँ ऐ पुरना बातपर बिसवास रखने छहक। लोक केतए-सँ –केतए पहुँच गेलइ।” राजेसर वेदना भरल आँखिसँ ओकरा दिस तकैत बाजल- “की करबै यौ? केना हेतइ?” फुलेसर बिच्चेमे बाजल- “पता नै ई अंध-बिसवास गाम-घरकेँ कहिया तक घेरने रहतै आ अपटी खेतमे लोक परान दैत रहतै। हौ अनका की कहबे हमरा तँ अपने काकी ईहे कारणे आन्हर भेल छइ। एनए मेडिलक विज्ञान केते ऊपर पहुँच गेल छै से तँ बुझिते छहक।” “सभटा बात बुझै छिऐ यौ फुलेसरजी, मुदा की करबै। टका-पैसाक अभाव छइ। डागदर लग छुछे मुहेँ काज चलतै।” “लोक तँ जन्म लैत अछि- संघर्ष करैले। कोनो रोजगर ठाढ़ करए पड़तह। ओना काज थोड़ेचलै छइ।” “खेती-पथारीक हाल देखते छिऐ। दोसर बिन पाइकेँ कोन रोजगार करबै ऐठाम?” “सुनै छिऐ- बाहरोसँ लोक बहुत टका-पैसा कमा कऽ अनैतअछि।” -कहैत फुलेसर चौक दिस चलि देलक। राजेसर गुनधुन करैत अँगना दिस विदा भऽ गेल। मुदा मनमे शंका, समस्या आ समाधान लाधल छल। ◌ 11. कृष्ण पक्ष। चारूभर अन्हरिया पसरल छल। किन्तु किछ एहनो घर छेलै जेकर इजोत देख अन्हार दूरेमे ठमकल छल। चाहे रूप परिवर्तन जेतेक भऽ जाए मुदा अन्हार आ इजोतक संघर्ष चलिते रहै छइ। अन्हार अपना जीतपर अट्टाहास करै छै आ मदमे डुमि जाइ छै किन्तु इजोतक धियान जीत आ हारिपर नहि रहै छइ। ओ तँ अनवरत संघर्ष करैत रहै छइ। उजियारीक लेल जरैत रहै छइ। आ कहैत रहै छै- “हम जरैत रहब, हम मरैत रहब मुदा अहाँक लेल, इजोत करैत रहब।” सरपंचक दुआरिपर कृष्ण अष्टमीक मेला लगल छेलइ। ओकरे दरबज्जापर नाचो हेतइ। अन्हार रहितो लोक ओनैभर ससरल जा रहल छेलइ। धान रोपल भऽ गेल छेलइ। धनरोपनीक बाद लोक अपनाकेँ निचेन जकाँ बुझै छल। नाच देखैले सभ जा रहल छल। मरद-पुरुख गप छाँटैत आ औरतिया सभ संगोर करैत। मपैतलालक स्त्रीकेँ सभ डाइन कहै छेलइ। ओकरा कोय नै संग करै छेलइ। दोसर कारण बजैमे सेहो ओ चरफड़ आ झनकाहि। संगे मपैतलाल पूजिगर लोक। दस-गोरेमे उठै-बैसेबला मुँहपुरुख। अही सभ कारणे अरिपुरवालीकेँ मुँहपर कोय डाइन कहैक साहस नहि करै छेलइ। परोछमे तँ रजो-महराजाकेँ लोक गारि पढ़ै छइ। कलेजाबला तँ ओ अछि जे सोझहामे साँच गप कहै छइ। चाहे कानमे लगौ वा कपारमे। ओना एकर फल नीक-अधला दुनू होइ छै मुदा पहिने तँ कर्म हेबाक चाही। सुच्चा कर्म! अरिपुरवाली असगरे चलि देने छल। मने-मन गारि पढ़ैत, भिनभिनाइत। जाबे पहुँचल ताबे लोक सभ बैस गेल छल। नाचक वन्दना शुरू भऽ गेल छेलइ।ढोलक-हरमुनिया माहटरक हाथसँ बेसी मुड़ी तालपर गतिशील। अभाव आ दुखमे कटैत जिनगीक मध्य जँ कोनो नाच-तमाशा वा उत्सव होइ छै तँ किछ क्षणक लेल जिनगी ओइ प्रसन्नतामे डुमकी मारि लैत अछि। पुन: नव शक्तिक संग समस्यासँ लड़ए लगैत अछि। अरिपुरवाली लोककक पाछूमे ठाढ़ भऽ कऽ चारूभर तकलक आ फलिगर जगह देखते बैस गेल। ओकरा पते नइ छेलै जे आगूमे नरहेलपुरवाली अपना दलक औरतिया सबहक संगे बैसल अछि। अरिपुरवालीसँ नरहेलपुरवालीकेँ पुरान झगड़ा छेलइ। दुनूटा एक दोसरक छाँहमे नहि चलै छल। नरहेलेपुरवाली ई हवा उड़ौने छेले जे अरिपुरवाली हक्कल डाइन अछि। तइ कारणे अरिपुरवाली पुरे टोलमे बदनाम भेल छल। केते-गोरे एकरा दोखियो बनौने छल। नरहेलपुरवालीपर नजैर पड़लासँ पहिने अरिपुरवाली ओकरा पाछूमे बैस गेल छल। आब तुरन्ते बिना बहाना केने ओइठामसँ उठियो केना जाएत। कुसंजोगसँ छनहि बाद नरहेलपुरवाली उनैट कऽ तकलक। अरिपुरवालीकेँ देखते ओकरा सौंसे देहक रूइयॉं कटो-काँट भऽ गेलइ। बगलमे बैसल अपना दलक औरतिया सभकेँ कानमे फुसुर-फुसुर करए लगली- “गइ भइखौकी! की तकै छीही, उठ ऐठामसँ। जान नहि बँचतौ। देखै छीही, डनियाही सहैट कऽ लगमे बैसल छौ!” सुनैत सभ-गोरे फनफना कऽ ठाढ़ भऽ गेली। जेना लगमे साँप चलि आएल होइ। नरहेलपुरवाली-संगे सभटा औरतिया दोसर कोणपर जा बैस गेली। ओइठाम असगरे अरिपुरवाली बैसल रहि गेली। भिनभनाइत, गारि पढ़ैत, एकरबा बानर जकाँ। नाच देखैले कालीकान्तो आएल छल। मुदा ओ कातेमे ठाढ़ भऽ कऽ भुटन रायसँ गप करै छल। तेकर कारण रहै, ओकरा संगेआएल झबरा कुत्ता। बड्ड प्रेमसँ वेचारा ओकरा पोसने अछि। ओ केतौ जाए तँ कुकुर ओकरा संग लगि जाए। ओ सोचने छल- कातेसँ कनी काल देखबआ आपस भऽ जाएब। बीचमे गेलासँ कुताक कारणे कोनो विवादो ठाढ़ भऽ सकैत अछि। थोड़े पता छेलै जे केतबो सम्हरल रहब तैयो विवाद कखनो केतौ भऽ सकैए। ओ तँ बिनु बजौल अतिथि सदृश सेहो होइत अछि। अरिपुरवाली अपना लग चारूभर खलिया गेल जगहोकेँ देखए आ नाचो देखैत रहए। कालीकान्तक कुत्ता ससैर कऽ अरिपुरवालीक लग चलि गेल। पाछूसँ जा कऽ ओकरा सूँघि लेलक। अरिपुरवाली पूजा-पाठ केनिहार। कुकुरकेँ सुंघैत देख फानि कऽ ठाढ़ भऽ गेली। चारूभर तकलक। भुटन राय पाछूसँ लाठीकेँ ठेकना लगौने कालीकान्तसँ गप करिते छल। अरिपुरवाली शीघ्रतासँ भुटन राय लग गेली। पाछूसँ सट्ट-दे लाठी खींच लेलक। लाठी खैंचते भुटन राय गदाक-दे खसल। मुदा अरिपुरवाली ओम्हर तकबो नहि केलक। ओ लाठी लऽ कऽ कुकुरकेँ तड़तड़बए लगली। कुकुर नेंगराइत केंकियाइत। भुटन राय फुड़फुरा कऽ उठल आ फनकैत बजल- “देखलिऐ यौ कालीकान्तजी। डनियाहीक किरदानी? जँ हमरा किछो हेतै तँ अहाँ गवाही रहब।” कालीकान्त ओकर बातपर धियान नहि देलकै। ओकरा पोसा कुत्ताकेँ मारि लगल छेलइ। ओ तरेतर फोंफिया रहल छल। हल्ल-गुल्ला भेलासँ लोक सभ जमा भऽ गेल छल। जइमे सरपंचो साहैब छला। देखतै कालीकान्त फनकए लगल- “यौ सरपंच साहैब, अहाँ सभकेँ केते बेर कहलौं जे ओझहाकेँ मंगाऊ आऐ समस्याकेँ जड़ि-मूलसँ हटाऊ। मुदा अहाँ सभ धियाने ने दइ छिऐ। देखियो जे अखनी नाँहकमे हमरा पोसा कुकुरक जान लइ छल!” सरपंच साहैब गम्भीर होइत बजला- “शांत रहू कालीकान्तजी। कोनो रस्ता तँ लगबै पड़तै।” “केना शान्त रही! अहाँ सभ नहि बुझै छिऐ जे ओ डाइन अछि?” “हँ से तँ बुझै छिऐ। मुदा कोनो काज तँ तरीकेसँ हेतै किने।” मखना लोक सभकेँ ठेलैत आगू आएल आ चद-दे बाजल- “की बुझै छिऐ? केकरोपर झूठ-मूठ दोख नइ लगाबियौ। डाइन तँ होइते ने छइ। मुरुख जकाँ आइयो पुरना बातकेँ धेने छी!” बात आर बढ़ैत तइसँ पहिने नाच पाटीक मेम्बर सभ सभकेँ बैसबए लगल। तखैने नीता ओमहरसँ आएल। लुच्चा छौड़ा सभ कातेमे ठाढ़ छल। ओकरा देखते छौड़ा सभ आपसमे आँखि मटकबए लगल। एकटा मुँह दाबि बाजल- “मुखड़ा चान का टुकड़ा।” दोसर फेर बाजल- “चाँद सार लऽ मुख घटना करू, लोचन चकित चकोरे।” मुदा नीता केकरो गपपर धियान नहि देलक। ओ आगू बढ़ि गेलि। ओकर आँखि तँ राजेसरक खोजमे लगल छल। पएर बढ़ैत, चकौना होइत, मन उड़ैत-फिड़ैत। किन्तु मनमे होइ जे कहुना लुच्चा छौड़ा सबहक नजैरसँ परोछमे चलि जाइ जइसँ एकरा सबहक धियान हटि कऽ दोसर दिस चलि जाएत। शौभाग्यसँ ओ जे सोचै छेली तहिना भेलइ। तखैने नाचक मंच लग हल्ला भेलै- “हौ दौड़ह हौ! डकैत घेरलक!” सभ ओम्हर ताकए लगल। फुचकुनमा ओमहरसँ अपसियाँत होइत आएल आ बजल- “यौ सरपंच साहैब! देखियौ, मंचक पाछूमे दूटा डकैत हथियार लेने ठाढ़ छइ। ओ हमर सभटा टका छीन लेतइ। हमरे दिस बधुआ कऽ तकै छेलइ।” भुटन राय पुछलकै- “हौ, टका लऽ कऽ टहलल घुरै छहक। तेकर मतलब बेसी टका रखने छहक। कोनो दाउ सुतार लहक की?” “नै यौ भाय, हमर बेटा अपन बौह-बेटी छोड़ि कऽ दू सालसँ बाहर खटि रहल छइ। ओकरा माएकेँ मरैत काल मुँह नहि देखल भेलइ। देह टूटि गेलइ। मुदा कोनो तरहेँ एक लाख कमा कऽ लौलक। जमीन खरीदक गप कने भेल रहइ। जमीनबला जुवान बदैल लेलक। दर-बरमे झगड़ा भऽ गेलइ। आब टका केकरा लग राखब। सभ तँ बेइमाने। इमानदार अनकर काल अपना कपारपर किए लेत। तँए रातिकेँ डाँरेमे खोंसने रहै छी।” “बैंकमे किए ने रखि देलहक?” “धुर बैंकोमे खाता खोलेनाइ कोनो असान गप छइ। देखै नै छिऐ, केतेक कागत-पत्तर माँग करै छइ। हम मुरुख छी तैयो एते तँ बुझै छी- जे जमा करै काल एतेक परेशानी तँ निकालै बेरमे कोन ठेकान।” फुचकुनमा सरपंच साहैबदिस घुरैत आगू बजल- “ई टका अहाँ राखू सरपंच साहैब।” “हमरोसँ डकैत छीन लेत तब हम केतएसँ देब।” “केना करबै यौ। ईहो एकटा काल भऽ गेल अछि। नीनो जेना भागि गेल अछि।” एकटा लुचबा छौड़ा लग आबि बाजल- “यौ फुचकुन काका, ऊ डकैत नै छेलइ। नाचक एक्टर छेलइ। डकैतक पाट खेलैले मेकप केने छइ। डेराउ नइ, बैस कऽ नाच देखू।” “आब लिअ, जोड़ी देख कऽ साँपक डर।” छौड़ा सबहक नजैर नीतापर सँ हटि गेल छल। नाच जमि गेल छेलइ। देखनिहार सभ नाचक रसमे डुमि गेल छल। आ ओइ रससँ धुआँइत अन्तरक मैल आँखिक बाटसँ जलकण बनि बहि रहल छेलै...। सभ अपनाकेँ बिसैर जेना दोसर लोकमे भ्रमण कऽ रहल छल। संगीतक ध्वनि सूतल रातिकेँ सिहरा रहल छल। नीता चकोना होइत ओइठामसँ निकैल गेल छलि मुदा मनक चोर पछोड़ धेनहि छेलइ। ◌ 12. नीतक पएर जइ गतिसँ चलि रहल छेलै ओही गतिसँ ओकर विचारोक क्रम बढ़ि रहल छल। राजेसरसँ मिलैक पियासकेँ ओ केतेको दिनसँ ठकैत आ दबैत आबि रहल छल। मुदा आइ ओ इच्छा तीव्र भऽ गेल छेलइ। ओ साँझेमे विचार केने छल जे नाचक मंच लग जरूर भेँट होएत, मुदा असफल भऽ गेल। असफल भेलासँ केते-गोरे थिरे रहि जाइत अछि किन्तु केते-गोरे क मनमे सफलता प्राप्त करबाक तेतेक जोर मारि दइ छै जे ओ ओइ दिशामे आरो तीव्रताक संग काज करए लगैए। तहिना नीताक मिलनक इच्छा आरो तीव्र भऽ गेल छल। रहि-रहि कऽ मनमे जेना किछ उधक्का मारए लगलै। नीता अधीर भऽ गेल। मनक चैन जेना हेरा गेल छेलै, तहिना लोक लाजक डर आ घर-परिवारक प्रतिष्ठा आदि सभ किछ बिसरए लगल। पएर राजेसरक घर दिस स्वत: बढ़ैत गेलइ, बढ़ैत गलइ। भावनामे डुमल नीता राजेसरक दुआरिपर कखन पहुँच गेल तेकर पतो ने लगल। डेढ़िया लग ठाढ़ भऽ कऽ ओ कनी काल तक अकानैत रहल। कोनो प्रकारक शब्द नहि सुनि अँगना दिस हुलकी मारलक। सभटा टटगघर बन्न। साइत सभ सुति रहल छल। ओना, राजेसर अँगनामे राखल चौकीपर ओंगठल छल। घरक गरमी आ मच्छरक डरे ओ बारहरेमे सुतै छल। ओसारक कोणपर एकटा डिबिया भुकभुकाइत रहइ। जेकर इजोत अन्हारसँ लड़ैमे असमर्थ छल। तैयो अस्पष्ट, मद्धिम इजोत चारू-भर पसरल छेलइ। नीता निशबद मारने, पएर दाबने रसे-रसे लगमे चलि आएल। मुदा राजेसरकेँ तेकर अभासो ने भेल। जे कियो ओकरा लगमे आबि ठाढ़ अछि। हेबो केना करितै, राजेसर तँ अपनहि धुइनमे अन्हार दिस देखैत किछ सोचि रहल छल। पिताक जीवन कालमे तँ ओकरा कोनो तरहक सोचे-फिकिर ने भेल छेलइ। कहुना किछ पढ़ियो-लिखियो नेने छल। मुदा पिताक मृत्यु होइते पढ़ाइयो छूटि गेलइ। भाइक काजमे संग दिअ लगल।ओहो निष्ठुर भऽ संग छोड़ि परलोकवासी भऽ गेला। आब तँ सभटा भार अपनहि कपार, भेल सवार। काजक पाछू दौगैत-दौगैत कमजोर तन ऊपरसँ बेथित मन। आइ ओ बेसी डेरा गेल छल्। कारण छेलै, चारि बर्खक भातिज। जे आइ बेसी बेमार भऽ गेल छेलइ। छौड़ा दरदसँ केतेक छटपटाइत रहइ! कनैत-कनैत बेहवाल। कनी काल पहिने कहुना कऽ निन्न पड़ल। आइ जँ छौड़ाकेँ किछ भऽ जइतै तखन भौजी केना कऽ धीरज बान्हैत। कोनो उपाय नहि भेट रहल छल! ने घरमे एकोटा पाइ छल आ ने कियो देबा लेल तैयार रहए। घरमे जे अन्न-पानि बँचलौ छेलए सेहो सभटा श्राद्ध-कर्ममे बिकाइये गेल। कोनो सहारा नजैरक सोझमे नहि आबि रहल छल...। नचार स्थितिक विषयमे सोचैत-सोचैत राजेसरक आँखिमे हाहा कऽ नोर आबि दुनू आँखिकेँ सिमसा देने रहइ। लगेमे ठाढ़ नीताक एक मन कहै, राजेसर सूतल अछि। किएक तँ मुड़ी ने डोलबैए। लगले दोसर मन कहलकै, नै-नै जगले अछि। मुदा प्रतीक्षोक तँ एकटा सीमा होइते छै किने। ओना, ओहो काल आ परिस्थितिक अनुसार बदलैतो रहैए। नीताकेँ नइ रहल गेलै तँ टोकलक- “एना किए अनठौने छिऐ, यौ?” जेना राजेसरक कानमे प्रेम-रस पड़ि गेलइ, तहिना मुड़ी उठौलक आ नीता दिस ताकिते रहि गेल। टुटैत मनकेँ सुखद सहारा। छातीक भीतरजेना किछ फुड़फुड़ा उठलै। दुखद स्थितिमे अपना प्रेम-पात्रकेँ निकट देख राजेसरक आँखिसँ फेर नोर ढबढ़बाएल। ढबढ़बाइत नोर देख नीताक सिनेह बदरिया अन्दरेमे उमड़ए-घुमड़ए लगलै। धुक-धुकी तेज भऽ गेलइ। ओ लगमे सटि कऽ बैस गेल आ रसे-रसे राजेसरक माथ हौंसतैत बाजल- “की भेल! एना किए कनै छी?” राजेसर गमछासँ नोर पोछैत बाजल- “कानब नहि तँ दोसर उपाय की। कानबो तँ सन्तोखक उपाय छिऐ। अहाँ तँ सभ किछ जनिते छी।” “की करबै। देवी माय फेर सभकिछ नीक कऽ देती। धीरज धरू।” “लगै छै जेना हमरा भागमे मात्र दुखेटा अछि। आइ फेर हमरा भातिजक हालत बेसी खराप भऽ गेल अछि। घरमे एकोटा पाइ नहि अछि। कानब नहि तँ की करब।” “कोनो उपाय तँ हेबे करतै। अहीं जँ एना कानब तँ माए आ भौजीक की हालत हेतैन। अहींपर ने सभ आस छैन।” “कोन उपाय हेतै? गिरहत किछ देबा-ले तैयार नै अछि। समए तेहेन भऽ गेल जे आने कियो मुँहपर माछी बैसए देत। सभ धनिकाहा एके जूति बनौने अछि। हमरा तँ मन होइत अछि जे फँसरी लगा कऽ मरि जाइ। मुदा माए आ भौजीक मुँह देखते मन मारि कऽ रहि जाइ छी।” “आ हम तँ एकोबेर याइदो ने अबैत हएब। हँ-हँ, हम मने किए पड़ब।” “अहींक याद करैत तँ हम कहुना जीब रहल छी।” “हमरा नहि बिसरीहक। जँ बिसरबाक मन हेतह तँ ओइसँ पहिने मारि दिह हमरा।” कहैत-कहैत नीताक आँखिसँ नोर बहए लगल। ओकरा आँखिक नोरकेँ देखते जेना राजेसर अपना दुखकेँ बिसैर गेल। सिनेह दूना वेगसँ बहए लगल। ओ भरि पाँच-के पकैड़ नीताकेँचुप करए लगल। नीता राजेसरक छातीमे मुँह सटा कऽ हुचैक-हुचैक कानए लगल। दुनू एक दोसराक धीरज बन्हबैत। सिनेह स्पर्श करैत। प्रेमक सागरमे डुमकी मारए लगल। केतेक काल बीतल तेकर पता दुनूमे सँ केकरो नहि छल। तेकर कारण छेलै दुनू ऐठामसँ दूर बहुत दूर सुखक संसारमे विचरण कऽ रहल छल। सबहक परियास रहै छै जे दुखक लगसँ पलायन करी आ सुखसँ आलिंगन करी। मुदा मनक बात पूर्ण थोड़े होइ छइ। दू जोड़ी आँखिक सोझा सपनाक सतरंगी संसार नृत्य कऽ रहल छल। बच्चाक कानबसँ दुनूक निन्न टुटल। नीता फुरफुरा कऽ ठाढ़ भऽ गेल। पछुआरक बँसबिट्टीमे बौगुला सभ ‘कँए’ ‘कँए’ करै छेलइ। सुरमे-सुर मिलबैत कोयली ‘कुहू’ ‘कुहू’ करए लगल। नीता बाजल- “हे यौ, साइत राति बीत गेल। देखै छिऐ भोरूकबा तारा।” “हँ, तहिना बुझाइत अछि।” “हँ, लोकक उठबाक बखत भेल जाइ छइ। किनसाइत कियो देख लेत।” “किए, लोकक डर होइत अछि?” “डर तँ नहि होइए। मुदा समाज...।” “डर नइ होइए तैयो छोड़ने छी। आसपर लोक केतेक दिन जिअत?” “बिसवास राखू।” “बिसवास नहि रहैत तँ जीबतौं केना।” नीता जोरसँ निसाँस खींचैत फेर बाजल- “हे यौ, कुलानन्दक चालि-चलन बड़ खराप छइ। आ हमरा तँ नचार भऽ कऽ ओकरे ओइठाम काज करैले जाए पड़ैए।” “चिन्ता नइ करू। किछ दिन औरो धीरज राखू। आखिर समाजमे विरोध करैले किछ सामरथियो चाही। फेर देखै छी जे हमरा के रोकैत अछि, ऐ बिआहसँ।” बिआहक नाओं सुनिते नीता लजा गेल। मुँह सिनुरिया आम सन भऽ गेलइ। ओ मुड़ी निच्चाँ केने रसे-रसे आँगनसँ विदा भऽ गेल। तखैने दुआरिपर कियो खोंखी केलक। दुआरिपर जाइते नीता मुड़ी उठा देखलक। सात-आठ-गोरे नाँच देख आपस जा रहल छेलइ। नीताक आनक अँगनासँ निकलैत देख सभ ठमैक गेल। आपसी इशारा आ कनफुसकी करए लगल। “चढ़ि गेल छौ चोटपर।” “पकैड़ ले अहीठाम।” “नइ रौ। विचार कऽ ले पहिने। तब खेला करिहेँ।” “कुलानन्द कोनए गेलौं रे?” “ओनए कुलानन्द सोर पाड़ै छौ। पहिने बुझि ले।” नीताक पएरमे जेना पाँखि लगि गेल छल। द्रुत गतिसँ अपना घर दिस जा रहल छल। ◌ 13. आइ सुरुज अन्तिमो पहरमे कड़कड़ौआ रौद उगलैते छेलइ। खुरपेरिया बाट सुन-मसान छल। मेघक एगो टुकड़ी दौगैत आबि रहल छेलै मुदा केतेक काल रोकि सकत ओ एहेन अगिलगौना रौदकेँ। राजेसर एकपेरिया धेने टीसनदिस बढ़ल जा रहल छल। संगी-साथी सभ आगू चलि गेल छेलइ। तँए हड़बड़ाएल सन, नमहर डेग। घुमि-घुमि गामो दिस तकै छल। जेना किछ बिसैर गेल होइ वा किछ छूटल जा रहल होइ। आइ भोरेमे ओ सोचि नेने छल जे गामपर रहने आब गुजर नहि चलत। करजाक भार बेमार भातिज, पलिवारक खरच, सभ चीजकेँ देखैत जेना ओ डरे भीतरसँ थरथरा गेल छल। मखना सभ किछ बुझने छेलै तँए बोल-भरोस दैत कहने छल- “भाय एनामे काज नहि चलत। अपना पएरपर ठाढ़ हुअ पड़त।” मुदा ठाढ़ होइले किछु टका-पैसा तँ चाही। अही सबहक विषयमे सोचैत ओ दिल्ली, पंजाब जाइबला जन-मजदूरक पछोर धऽ नेने छल। किछ पूजी जँ हाथमे रहत तँ खेतियो नीकसँ कऽ सकब। मन-मन सोचैत आ डेग बढ़बैत। मुदा घरक मोह जेना आगूमे रहि-रहि कऽ ठाढ़ भऽ जाइ छेलइ। बचपनसँ लऽ कऽ आइ धरि ओ कहियो एतेक दूर नहि निकलल छल। दिल्ली-पंजाबक नामेटा सुनने छल तँए मनमे डेराओन सन बुझाइ छेलइ। केतेको प्रकारक शंका सभ मनमे उठि रहल छेलइ। बचपनसँ जइ गाम-घरमे कुदैत-फानैत जवान भेल छल तेकरा छोड़ैत मोह उठि रहल छेलइ। संगी-तुरियाक संग बाजब-भुकब, हँसब-खेलब सभटा यादि आबि रहल छेलइ। मुदा परिस्थितिक आगू नचार। निरूपाय! सभटा बन्हनकेँ तोड़ैत ओ दौगैत स्टेशनपर पहुँच गेल छल। ◌ ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। १.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना २.जगदानन्द झा ’मनु’- दूटा बीहनि कथा १ फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना डॉ. कैलाश कुमार मिश्र राम बियाहने कुन फल भेल। सीता जन्म अकारथ गेल। कखनो काल जखन माय तंग भ जैत छलीह त अनायास दोदिल होइएत कहैत छलीह: “फाटू हे धरती” एकर बाद सब बुइझ जैएत छल जे माय आब तामसे घोर छथि। फेर हुनका कियोक किछु नहि कहैत छलनि। मुदा हमर नेनमति देखू हमरा होइएत छल माय फाटू हे धरती कथी लेल कहैत छथि। एक दिन जखन माय केर मोन शांत रहनि त बाल सुलभ जिज्ञासा कैल: “माय, अहाँ फाटू हे धरती कियैक कहैत छियैक?” माय कहली: “की कहु बाऊ, नारीक स्थिति एखनो सीता दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अच्छिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय में राम के अगुआ देत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि: बंदौं राम लखन वैदेही, जो तुलसी के परम सनेही। तुलसीदास अपन रचना रामचरितमानस में १४४३ बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ, दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। लेकिन वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र १४७ पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि ३२५ – १४७ बेर सीता, ६९ बेर जानकी, ५८ बेर बड़भागी आ ५१ बेर बैदेही। अहू में एक राजनीति ऐछ. सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ. ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब वैह सीताक दुःख देखू: लंका में राम रहला १११ दिन आ सीता रहली ४३५ दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन. डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वी क जीवन।” कहि ने की भेल! माय जेना अपन भावना के फोरि-फोरि हमरा कह्य लगली। हम छोट जरुर रही मुदा अतबो छोट ने जे माय के कहक भाव नहि बुइझ पाबी। कनिक क्षण लेल लागल जेना माय केर शरीर में सीताक आत्मा बैस गेल हो! माय कहैत रहली: “देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप में आबथि: माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।। आ राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम में बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि। आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम. जखन समस्त मिथिला में अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ में एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहि माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप में आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल। सबहक मोन में उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने!” सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि में डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स? सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन. यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै” राम चिंता में आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।” सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब” राम बजलाह : हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब। फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि। विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली. रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली। “जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन. कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक? अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ में खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?” खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत,के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।” जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल। मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह. राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।” सीता: “से कोना?” राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।” सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?” राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी।” सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक?” ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ी करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय! धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती में बिलुप्त भ गेलीह।” ई बात कहि माए कनि जोर स सास लेलीह आ कहलनि “ बाऊ ताहि जखन हमरा सबके कोनो कष्ट होइएत अछि त अपना के सीता बुझैत छी आ अनायास मुह स निकलि जैत अछि : “फाटू हे धरती”। ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि। अपमानित होइएत छथि। बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....” ई बात कहैत माय केर नयन नोर स भरि गेलनि. ओहि क्षण त नेना रही आब बुझै छी जे माय के नोर कोना खसलनि!!! २ जगदानन्द झा ’मनु’ २ टा बीहनि कथा १ - बेटाक बाप "ई जे भरि दिन नेतागिरीमे लागल रहै छी कि एहिसँ पेट भरत? चलू अप्पन पेटक आगि तँ जेना तेना मिझा लेब कनिक बेटीक ब्याहो केर चिंतासँ तँ डरू । भेल तँ ३-४ वर्खमे ओकरो ब्याह करए परत, ओहु लेल १०-१५ लाख रूपैया चाही ।" "केहेन गप्प करै छी ? आब ओ ज़माना नहि रहलै । बेटा आ बेटीमे फराके की? जेना बेटाक पढ़ाइ-लिखाइ लालन पालनमे ख़र्चा तेँनाहिते बेटीमे । बेटी बेटासँ कतौ कम नहि । आ हम्मर बेटी तँ लाखोमे एक अछि ।" "ई अहाँ बुझै छीयै मुदा समाजमे दहेज लोभी बेटाक बाप नहि ।" २- रभसल "धूर भौजी ! अहुँ बड़ रभसल जकाँ किनादन करैत रहै छी ।" "यौ लाल बाबु रहै दियौ, जँ हम एना रभसल जकाँ नहि करितौँ तँ, ई जे कोरामे भतिजाकेँ लदने रहै छी से मनोरथ अहाँक भैया बुते तँ रहिए गेल रहिते ।" ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.जगदानन्द झा ’मनु’ २टा गजल आ आशीष अनचिन्हार- एकटा गजल ३.२.बाबा बैद्यनाथ- आजाद गजल ३.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु कविता ३.४.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- ३ टा गजल जगदानन्द झा ’मनु’ २टा गजल आ आशीष अनचिन्हार- एकटा गजल १ जगदानन्द झा ’मनु’ २ टा गजल गजल- १ बनेलहुँ अपन हम जान अहाँकेँ जँ कहि लाबि देबै चान अहाँकेँ हँसीमे सभक माहुर झलकैए सिनेहसँ भरल मुस्कान अहाँकेँ कमल फूल सन गमकैत अहाँ छी जहर भरल आँखिक बाण अहाँकेँ पियासल अहाँ बिनु रहल सगर मन सिनेहक तँ चाही दान अहाँकेँ करेजक भितर 'मनु' अछि कि बसेने रहल नै कनीको भान अहाँकेँ (मात्रा क्रम ; १२२-१२२-२१ १२२) गजल - २ साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै गाम नोतब सराधे सबहक कहल छी आँखिकेँ पानि आइ तँ सगरो मरल अछि राति दिन हम मुदा ताड़ीमे बहल छी कहब ककरा करेजा हम खोलि अप्पन नै कियो बूझलक हम धेने जहल छी सुनि क' हम्मर गजल जग पागल बुझैए दर्द मुस्कीसँ झपने 'मनु' सब सहल छी (बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२) २ आशीष अनचिन्हार गजल पहिने भक्तक तगमा भेटल तइ बादे किछु सुविधा भेटल हँसि उठलै रस्ता कारक संग गुमसुम बैसल रिक्सा भेटल नवका ताला नवका चाभी बिन कब्जा के बक्सा भेटल हुनकर ता थैया थैया केर डेगा डेगी चरचा भेटल अटकल बंसी बड़ जीवन भरि कनियें बोरक हिस्सा भेटल सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि दोसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतिम लघुकेँ छूटक तौरपर लेल गेल अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बाबा बैद्यनाथ आजाद गजल जखनहि जगलहुँ तखनहि भोर । चिड़ै करए बरू कतबहु सोर । प्यासक मारल सूखल ठोर । देह बुझाइछ बहुत कमजोर । घरक लोकसभ पड़ल बेडपर, कोना पीबि हम पानि इन्होर । जदि जगेबैक सभ तमसायत, बूढ़क घरमे चलय ने जोर । बिना सुसुम हम पानि पीब तँ, तखनहि उखड़त खोंखी जोर । गिद्धक औरदा हमरा देलनि, कियै विधाता एहन कठोर । मुइले गुण की पड़ेले गुण ई. कहबीक कतेक अर्थ बेजोड़ । आब बुझाइछ प्राण बचत नहि, तखनहि ससरल परदाक छोर । खोंखि सुनि पोता उठि आयल, चूमि गाल ओ बैसल कोर । पुछलक कियै ने अहाँ बजै छी, आंखिमे भरल कियै अछि नोर? हिम्मतिकऽ कने चुल्हि पजारू, "बाबा " कनेक लगबियौ जोर । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल किछु कविता १ घोड़ मन घोड़ मन घोड़छान तोडि चैदहो लोक भरमए लगल। सातो-सोपान पताल टपि सातो अकास उड़ए लगल।
समए संग जहिना बिलगैए मिसरी-मक्खन ओ निर्मल जल हंसा उड़ि परमहंसा बनि-बनि तहिना उड़ैत मन देह.स्थल।
स्थूल-सूक्ष्म बँटि.बँटि जहिना दृश्य-भाव कहबैए। एक्के आँखिए दुनू देखै छी। अचेत मन भरमैए।
निकैल देह धारण करैए आत्म-परमात्म दर्शन पबैए। पबिते दर्शन मगन भऽ भऽ सूर-तान, वीणा धड़ैए। मथिते मथानी जहिना घी-पानि बिलगए लगैए। जले बीच दुनू समाएल उठि एक सिर चढ़ए लगैए। लोहिया चढ़ल आगि बीच जहिना मक्खन नाचए लगैए। काह-कूह फेक-फेक पेनी बीच बैस जमैए। ◌ 2 गोबर घोड़ाइते पानि जहिना गोबराह रूप धारण करैए गोबरेक गन्ध पसारि-पसारि गोबरछत्ता बनि-बनि छितिराइए। सुविचार कुविचारो तहिना छने-छन छीन होइत चलैए। गिरगिट रंग पकैड़-पकैड़ गिरगिटिया चालि चलए लगैए। गिरगिटिया मनुक्खो तहिना दिन-राति बदलैत चलैए गिरगिटेक जहर सिरैज-सिरैज बिख उगलैत चलैए। भेद-कुभेद मर्म बिनु बुझने देखा-देखी ओढ़ैत चलैए ओढ़ि-ओढ़ि ओझरा-पोझरा डुबकुनियाँ काटि मरैए। गाछक ऊपर डारि बीच जहिना बाँझी अपन बास करैए झड़मनुखो मनुख बीच तहिना ऊपरे-ऊपर चालि मारैए। सात समुद्र बीच मनुख दसो दिशाक दर्शन पबैए चीन-पहचीन केने बिना जिनगीक बाट पकड़ैए। ◌ 3 प्रकृतोक तँ प्रकृत गजब छै सुगन्धो-कुगन्ध फूल खिलबैए। सु-पारखी सुरैख-परैख कु-पारखी दिन-राति मरैए। परेखनिहारो परैख कहाँ परैख-परैख बिलगा चलैत धार-मझधार बीच पिछैड़-पिछैड़ नहियेँ खसैत। बेबस मन बहैट-बहैट सीरा-भट्ठा बिसरए लगैत जान बँचबैक धरानी कोनो लपैक-लपैक पकड़ए चाहैत। सत्ताक भत्ता छिड़ियाएल छै फानी, फनकी बनि लागल छै। चिड़चिड़ीक फड़ जकाँ चुभि पएर टीको नोछड़ै छै। बिनु पाँखिक हंसा जहिना तीनू लोक विचरण करैए। दिन-रातिक भेद बुझि-बुझि अज्ञान-ज्ञान-सज्ञान बनैए। ◌ 4 आँखि मिचैनी पाश बैस ब्रह्म-जीव माया खेलैए। समए पाबि तहिना ने अज्ञानो-सज्ञानक चालि चलैए। होइत आएल आदियेसँ अज्ञान-ज्ञान बीच संघर्ष ताधैर चलिते रहत जाधैर अन्हार इजोत बनत। पछुआ छोड़ सम्हारि-सम्हारि ऐगला पकड़ैत चलू। अतीत केर स्मृति बना समद्रष्टा बनैत चलू। एक छोड़क बाट देखि भूत-वर्तमान देखैत चलू। भविस तँ भविसे छी भविस-वर्तमान बनबैत चलू। डेंगी नाह जहिना यात्री धार पार करैए। डगमगाइत देह मड़मड़ाइत मन जीवन धाम पहुँचैए। ◌◌◌
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल ३ टा गजल १ किछु नरमे नारायण देखल बाकीमे बस रावण देखल सभठाँ सभ घटनामे भैया शकुनी आ दुरयोधन देखल झगड़ा-झाँटी भितरे भीतर बाहरमे अपनापन देखल सबहक छल अनुमोदन पहिने पाछाँ सय संशोधन देखल पेटो ओकर नमहर सन के भोजन अति साधारण देखल लाठी भाला तीरक बदला फूलक हम आयोजन देखल मात्रा-क्रम : 2 2 2 - 2 2 2 - 2 2 २ झूठक कारोबार बड़ीटा चोरक अछि संसार बड़ीटा जे नै कहियो गेल पढ़ैले से रखने अछि कार बड़ीटा देखैमे ओ छोट लगै छथि छनि गरदनिमे हार बड़ीटा हुनका लग नै गेल रही हम छल रस्तामे धार बड़ीटा हुनकर सेवा भेल कहाँ किछु छनि हुनकर उपकार बड़ीटा सगरो दुनियां गाम हमर अछि अछि हम्मर परिवार बड़ीटा मात्रा-क्रम : 22-2221-122 ३ पढिते -पढिते लीख' लगलौं की थिक दुनिया सोच' लगलौं नै गेलौं इसकूल जहिया भेटल छौंकी कान' लगलौं गेलौं हम कौलेज जहिया कूदय लगलौं फान' लगलौं देखा-देखी लोक स'भकें हमहूं कूकुर पोस' लगलौं छाहरि दै छल गाछ हमरा हम गाछेकें काट' लगलौं दुनियामे सभ दोख 'अनिल'क लिखिते-पढिते जान' लगलौं मात्राक्रम- 2222-2122 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक बाबा बैद्यनाथ बाल कविता बाबा-पोताक सिनेह अपन पौत्र छथि बड़ बुधियार हिनक हँसी छनि सिंगरहार ठुमुकि-ठुमुकिकऽ ई नाचै छथि सद्यः जेना कृष्ण अवतार जखनहिसँ अवतीर्ण भेल छथि भेल हमर जिनगी साकार हिनकर हँसी-ठहक्का सुनितहि लगैछ जेना हम नहि बेमार एखन जदि क्यो पाहुन आबथि कऽ ने सकी किनको सत्कार बुझा रहल हम हेरा गेल छी पाबि एहन अनमोल दुलार गीत कवित्त सकल बिसरल हम लीखि सकी नहि ई उद्गार पाबि रहल नैसर्गिक सुख हम प्रभुकेर महिमा अगम अपार बाबा-पोताकेर एहि सुख लग दुनियाँकेर सभ सुख बेकार हमर उदासल एहि जिनगीमे विधि देलनि अद्भुत उपहार चुका सकब नहि ऋण हुनकर हम ओ जे केलनि परम उपकार आब बुझाइछ हमर जीवन ई सरिपहुँ भेल सफल साकार ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम विलास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु विदे हwww.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.comVideha Ist Maithili Fortnightly ejournal 'विदेह' २०९ म अंक ०१ सितम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०५ अंक २०९)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA
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