VIDEHA — Issue 210 / अंक २१०

Publication: VIDEHA · Issue: 210
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95 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' २१० म अंक १५ सितम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०५ अंक २१०) ऐ अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- ४ टा लघुकथा १.कन्हा भँट्टा  आ २. भोलानाथ बाबा ३. दुरकाल आ ४.कलंक २.३.ओम प्रकाश- बीहनि कथा- १.सामंत २.जस जस सुरसा बदनु बढ़ाबा २.४.मुन्नाजी- बीहनिकथा- १. कोठा वाली २. बॉस ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.राजेश मोहन- कृष्ण छठिहारक पद ३.३.अब्दुर रज्जाक- गजल ३.४.जगदीश चन्द्र ठाकुर  अनिल- ५ टा गजल ४.बालानां कृते-डॊ. शशिधर कुमर- किछु बाल कविता Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Books/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाउ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव Join official Videha facebook group. Join Videha googlegroups Follow Official VidehaTwitter to view regular Videha  Live Broadcasts through Periscope. विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाउ। संपादकीय विदेह रचनात्मकता बढ़ेबाक हिसाबे किछु ने किछु नव काज करैत आबि रहल अछि। ऐ बेर विदेह एकटा नव प्रोजेक्ट लऽ कऽ आएल अछि, जै अन्तर्गत विदेहक संपादक मंडल एकटा कोनो रचनाकर्मीसँ हुनक किछु रचना आमंत्रित कऽ विदेहक एकटा अंकमे देत आ ओइ रचनाकर्मीक संबंधमे कोनो आन रचनाकर्मी टिप्पणी देता। रचनाकर्मी आ टिप्पणी देनिहारक नामक घोषणा एकै समएमे कएल जाएत। रचना ओ टिप्पणी जहिया आएत तै केर बादे अंक केर निर्णय कएल जाएत मने रचना आ टिप्पणी दूनू ऐ प्रोजेक्ट लेल आवश्यक अछि। 

ओना ई प्रोजेक्ट सबहक सहयोगपर आधारित रहत तँए ई प्रोजेक्ट लगातारो चलि सकैए आ सुविधानुसार सेहो। ऐ प्रोजेक्ट केर पहिल घोषणाक अनुरूपे कामिनी क रचना आमंत्रित कएल गेल आ कामिनीजीक रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल मधुकांत झा जीकेँ आमंत्रित गेल। ऐ अंकमे (२०९ म अंक ०१ सितम्बर २०१६) कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त जीक टिप्पणी प्रस्तुत अछि/ ई-पत्र ई-पत्र कविता जे विदेहा प्रकाशित केलक अछि कामिनी जीक , से सभ रचना उत्तम लागल। सभ कविताक अलग - अलग स्वाद छै । नारी लेखनक एकटा मुखर व्यक्तित्वक रुप मे अपन रचना स' साहित्यक यात्राक यात्री रूप मे चलि रहल छथि । एहिना चलैत रहथि , से शुभकामना । तहिना जे कविता पर समालोचना आयल आदरणीय श्री मधुकांत झाजी द्वारा , सेहो ओतबे नीक लागल । सम्पूर्ण विदेा टीम केँ एहि काज लेल सहृदय धन्यवाद ।  अपनेक -नारायण झा, रहुआ - संग्राम , मधेपुर , मधुबनी । बहुत नीक । धन्यवाद श्रीमान एतेक नीक टिप्पणी लेल ।धन्यवाद आशीष जी अहुँ के एहन सुनहरा अवसर उपलब्ध करेबाक लेल । -कामिनी कुमारी जेना की सभ गोटा जनै छी जे विदेह २०१५ मे तीन टा विशेषांक तीन साहित्यकारपर प्रकाशित केलक जकर मापदंड छल सालमे दूटा विशेषांक जीवित साहित्यकारक उपर रहत जइमे एकटा ६०-७० वा ओइसँ बेसी सालक साहित्यकार रहता तँ दोसर ४०-५० सालक ( मैथिली साहित्यकार मने भारत आ नेपाल दूनूक)। ऐ क्रममे अरविन्द ठाकुर ओ जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल"जीपर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आगूक विशेषांक किनकापर हुअए तइ लेल एक मास पहिनेसँ पाठकक सुझाव माँगल गेल छल।  पाठकक सुझाव आएल आ ओइ सुझाव अंतर्गत विदेहक किछु अगिला विशेषांक परमेश्वर कापड़ि, वीरेन्द्र मल्लिक आ कमला चौधरी पर रहत। हमर सबहक प्रयास रहत जे ई विशेषांक सभ जनवरी ओ फरवरी २०१७ मे प्रकाशित हुअए मुदा ई रचनाक उपलब्धतापर निर्भर करत। मने रचनाक उपलब्धताक हिसाबसँ समए ऊपर-निच्चा भऽ सकैए। सभ गोटासँ आग्रह जे ओ अपन-अपन रचना ३१ दिसम्बर २०१६ धरि ggajendra@videha.com पर पठा दी। विदेह सम्मान विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) 1.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार 2012 2012 श्री राजनन्दन लाल दास (समग्र योगदान लेल) 2.विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१२ बाल साहित्य पुरस्कार - श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ “तरेगन” बाल प्रेरक विहनि कथा संग्रह २०१२ मूल पुरस्कार - श्री राजदेव मण्डलकेँ "अम्बरा" (कविता संग्रह) लेल। 2012 युवा पुरस्कार- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक “अर्चिस” (कविता संग्रह) 2013 अनुवाद पुरस्कार- श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर) विदेह भाषा सम्मान २०१३-१४ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कारक रूपमे प्रसिद्ध) २०१३ बाल साहित्य पुरस्कार – श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल। २०१३ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल। २०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल। २०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल। विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो -  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ अभि‍नय- मुख्य अभिनय , सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो, हास्‍य-अभिनय सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर नृत्‍य सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत चि‍त्रकला श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल संगीत (हारमोनियम) श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक) श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत संगीत (रसनचौकी) श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज मूर्ति-मृत्तिका कला श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त काष्ठ-कला श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान -२०१२ श्री नवेन्दु कुमार झा नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१३ मुख्य अभिनय- (1) सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (3) सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही,जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हास्‍य–अभिनय- (1) श्री ब्रह्मदवे पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) टाॅसि‍फ आलम सुपुत्र मो. मुस्‍ताक आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (मांगनि खबास समग्र योगदान सम्मान) शास्‍त्रीय संगीत सह तानपुरा : श्री रामवृक्ष सि‍ंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सि‍ंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मांगनि‍ खबास सम्‍मान: मिथिला लोक संस्कृति संरक्षण: श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान (समग्र योगदान सम्मान): नृत्‍य - (1) श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला- (1) जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरि‍मुनि‍याँ / हारमोनियम (1) श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक/ ठेकैता/ ढोलकि‍या (1) श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वादक- (1) वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- ि‍नर्मली, वार्ड न. ०७  , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शिल्पी-वस्तुकला- (1) श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला-मृर्तिकार कला- (1) घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व.   , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) काष्ठ-कला- (1) श्री जगदेव साहु सुपुत्र शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ि‍नर्मली-पुरर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी- आत्मनिर्भर संस्कृति- (1) श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ- (1) मो. जीबछ सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा- श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार आ खजरी/ खौजरी वादक- (1) श्री सुकदेव साफी सुपुत्र श्री   , पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) पराती (प्रभाती) गौनि‍हार - (अगहनसँ माघ-फागुन तक गाओल जाइत) (1) सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी- (1) मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) मो. रहमान साहब सुपुत्र...., उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादक- (1) श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझुला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) गीतहारि‍/ लोक गीत- (1) श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) (2) सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादक- (1) श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) काँरनेट- (1) श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जू वादक- (1) श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- ि‍नर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्री घुरन राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) भगैत गवैया- (1)  श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) (2)  श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) खि‍स्‍सकर- (खि‍स्‍सा कहैबला)- (1) श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघरडि‍हा, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ (2) बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- (2)सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मिथिला चित्रकला- (1) सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) (2) श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खजरी/ खौजरी वादक- (2) श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) तबला- श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) सारंगी- (घुना-मुना) (1) श्री पंची ठाकुर, गाम- पि‍पराही। झालि‍- (झलि‍बाह) (1) श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ (2) श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी (बौसरी वादक) श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छथि‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक गाथा गायक श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा वादक (छोकटा झालि‍...) श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, ि‍जला- सुपौल (बि‍हार) मृदंग वादक- (1) श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (2) श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तानपुरा सह भाव संगीत (1) श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगि‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/ तासा- श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र कालेश्वर राम, उमेर- ५८, गाम- मझौरा, पास्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक- श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक,  १९७५ ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि‍। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ/ ग्रुम बाजा श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, १९८० ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि‍। श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ ढोल वादक श्री बदरी राम, उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- ि‍नर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री योगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा (होलीमे बजाओल जाइत...) श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र),जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/ डि‍गरी- श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) विदेहक किछु विशेषांक:- १) हाइकू विशेषांक १२ म अंक, १५ जून २००८ Videha_15_06_2008.pdf          Videha_15_06_2008_Tirhuta.pdf       12.pdf २) गजल विशेषांक २१ म अंक,  १ नवम्बर २००८ Videha_01_11_2008.pdf       Videha_01_11_2008_Tirhuta.pdf         21.pdf ३) विहनि कथा विशेषांक ६७ म अंक, १ अक्टूबर २०१० Videha_01_10_2010        Videha_01_10_2010_Tirhuta             67 ४) बाल साहित्य विशेषांक ७० म अंक, १५ नवम्बर २०१० Videha_15_11_2010        Videha_15_11_2010_Tirhuta             70 ५) नाटक विशेषांक ७२ म अंक १५ दिसम्बर२०१० Videha_15_12_2010        Videha_15_12_2010_Tirhuta           72 ६) नारी विशेषांक ७७म अंक ०१ मार्च २०११ Videha_01_03_2011        Videha_01_03_2011_Tirhuta           77 ७) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक १११ म अंक, १ अगस्त २०१२ Videha_01_08_2012        Videha_01_08_2012_Tirhuta           111 ८) भक्ति गजल विशेषांक १२६ म अंक, १५ मार्च २०१३ Videha_15_03_2013        Videha_15_03_2013_Tirhuta           126 ९) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक १४२ म, अंक १५ नवम्बर २०१३ Videha_15_11_2013        Videha_15_11_2013_Tirhuta           142 १०) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक १६९ म अंक १ जनवरी २०१५ Videha_01_01_2015 ११) अरविन्द ठाकुर विशेषांक १८९ म अंक १ नवम्बर २०१५ Videha_01_11_2015 १२) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक १९१ म अंक १ दिसम्बर २०१५ Videha_01_12_2015 १३) विदेह सम्मान विशेषा‍क- २००म अ‍क १५ अप्रैल २०१६/ २०५ म अ‍क १ जुलाई २०१६ Videha_15_04_2016 Videha_01_07_2016 लेखकसं आमंत्रित रचनापर आम‍ंत्रित रचनाकारक टिप्पणीक शृंखला १. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी VIDEHA 209th issue विदेहक दू सए नौम अंक Videha_01_09_2016 विदेह ई-पत्रिकाक  बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह ५ ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह ६ ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह ७ ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह ८ ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह ९ ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह १० ] Maithili Books can be downloaded from: https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ Maithili Books can be purchased from: http://www.amazon.in/   For the first time Maithili books can be read on kindle e-readers. Buy Maithili Books in Kindle format (courtesy Videha) from amazon kindle stores, these e books are delivered worldwide wirelessly:- http://www.amazon.com/ अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। २. गद्य २.१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास २.२.जगदीश प्रसाद मण्डल- ४ टा लघुकथा १.कन्हा भँट्टा  आ २. भोलानाथ बाबा ३. दुरकाल आ ४.कलंक २.३.ओम प्रकाश- बीहनि कथा- १.सामंत २.जस जस सुरसा बदनु बढ़ाबा २.४.मुन्नाजी- बीहनिकथा- १. कोठा वाली २. बॉस डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास

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घरनी किछु नहि करैत छथि घरमे रहैत छथि, हलांकि ओकर बाद कहबाक तात्पर्यकें पूर्ण करैत जरुर करताह – “हमर आँगनसँ सहीमे मात्र गृहणी/हाउसवाइफ छथि"। औजी, कहियो अपन आँगनबालीक भूमिकामे जीवन जीब कS तS देखियौ तखन पता लागत जे आहाँक घरवाली कतेक पैघ जवाबदेहीकें निमाहि रहल छथि ! हुनका नहितँ कहियो छुट्टी, ने कहियो आराम, आने कहियो केओ मदति केनिहार,आओर ताहि जवाबदेहिक मतलब किछु नहि ? ई एकटा बड्ड पैघ प्रश्न अछि। एहि पर विचार जरुर करक चाही। भोजन आ भोजनक विन्यास सभसँ पैघ, त्वरित आ शाश्वत कला अछि। एकटा कहबी छैक – “जे निक खैएत सैह नीक भोजन बनाएत”। इहो कहल जैत छैक जे जखन कुनो महिला सुचिता आ समर्पणकें भावसँ भाँनस करैत छथि तS भोजन सुअदगर आ रुचिगर हेबेटा करत। यैह कारण छैक जे भगबान राम माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई; सासु सुनयना; गुरुपत्नी अरुंधती, पत्नी सीता सबहक हाथक रान्हल भोजन केलाह, मुदा जे स्वाद हुनका भीलनी सबरी के आंइठ बैरमे लगलनि तेहेन सुआद कत्तहुने लगलनि। ई भेल भोजन बनोनिहारिक  आ परोसनिहारिक अनुराग। आजुक समयमे नाना तरहक सुविधा जेनाँकि रसोई गैस आकि आनो तरहक जारैन उपलब्ध अछि जाहिसँ चट्टहि भाँनस भअ जाइत अछि। कल्पना ओहि समयक करू जखन साओन-भादबक मुसलाधार बरखामे खड़हक छप्पर चुबैत घरमे अपन सभक बहुतो गोटेके माय, पितियाईन, दाई कोन धरानी भाँनस करैत छली! जारैनमे भीजल चेरा, गोइठा, करची, झाँखी चुल्हामे घोंसिया कखनो मूंहसँ तS कखनो बियनि होंकि आंच पजारब, धुआंसँ आँखिमे नोर भरल आ तैयो रंग-बिरंगक पकमान आ भोजनक सचार। ताहूमे अगर घरमे केओ पैघ पाहून जेनांकि जमाय, समधि इत्यादि आबि गेलाह तS घोर बिकट, तथापि बिना मोन मलीन केने हुलसित मोनसँ भोजनक विन्यासमे लागि जैत छली। तरकारीक अभावमे बारीक़ साग, कंद, खम्हारु, ओल, लती-फत्तीक पात जेना कन्ना, तिलकोड़क पात; लटकल चारक सजमनि,कदीमा; झाड़क झीमनी, करैल; घर-पछुआरमे लागल गाछक फल जेनाँकि- केरा, कटहर आदिसँ चीज़ जोरिया कS अनेक तरहक तरकारी, तरुआ-बघरुआ, भुजिया-सन्ना-चटनी बनबैत छली तकरा बादो टारासँ नाना तरहक़ अंचार जाहिमे फारा, कुच्चा, खटमिट्ठीबला आदि ब्यंजन परोसि पाहूनक सत्कारमे २०-२५ तरहक सचार लागि जैत छलै। आब जखन पाहून भोजन पर बैसता आ महिला लोकनि गीत नहि गेती से कोना हेतैक तें बिनु थकने विहुँसैत मोनसँ दाई-माई सभकें संगौर कS गीत-नाद शुरू होइत छल। पाहून खाईतो रहैत छलाह आ गीतक आनंद लैत छलाह। जखन कखनो हम कोनो पांच सितारा होटल में भोजन करैत छी आ कोनो गीतगैन के गबैत देखैत छी तS होइत अछि जे एहिसँ बढ़ियाँ कोरसमे गीत हमरा सभक समाजक महिला गबैत छथि। वैह खानसामा, वैह परोसय बाली, वैह गीत गेनिहारि, वैह वस्तुक व्यवस्था केनिहारि। मल्टीटास्किंग कें अहिसँ पैघ उदाहरण भला आर की भS सकैत अछि? पहिनेकें समयमे लोक सभ बियाहसँ पहिने एहि बातक खाँझ-भाँझ करैत छलाह जे जाहि घरमे कन्यादान करबाक अछि ओहि घरक चीनबार कहेन छैक। मतलब कतेक साफ़-सफाई, कोन तरहक द्रव्य केर बरतन-बासन बड़ पक्षक ओहिठाम उपयोग होइत छैक। हिनका लोकनिक खान-पान कहेन छन्हि, घर-परिवारक भोजनक विन्यास, दु:खक भोजन, सुखक भोजन, पाबनि-तिहारक भोजन, यात्रा पर जएबाक काल बाटमे खेबाक जोग भोजन, खाद्य भोजन, अखाद्य भोजन, पथ्य बला भोजन, कोन समयमे की खाई आओर की नञ खाई, इत्यादि नाना तरहक जानकारीकें अगर ठीकसँ ओहि भावकें विवेचना कयल जाय आओर विभिन्न अवसर पर मैथिलानी सभक द्वारा गाओल गीत सभकें देखलासँ एहसास होयत जे ओ गीत सब विधपुरौआ आकि मनोरंजने वला गीत मात्र नहि अछि अपितु ज्ञानक खान अछि। ओहि गीतमे ज्ञान,विज्ञान, संस्कार, सामग्रीक वर्णन आ विवरण सब किछु समाविष्ट अछि।  मैथिलीमे अगर अंग्रेजीक शब्द culture कें अनुवाद कयल जाय तँ हमरा बुझने ओ शब्द जे culture कें सभसँ लगमे अछि मैथिलीमे ओकरा “मिथिलाम” कहल जायत आओर इयैह मिथिलाम अछि जे मैथिल सभकें भारते टा नहि अपितु समस्त संसारमे अलग पहचान दैत अछि। मिथिलामक चर्चा बिनु भोजन विन्यास, बिनु महिला सभक भूमिका, बिनु गीत-नाद आकि विध-व्यवहारक संभव नहि अछि। वस्तुतः भोजन विन्यास, गीत-नाद, विध-व्यबहार, जीवन जीबाक अंदाज़, वस्त्र विन्यास, धर्मक आचरण, प्रकृति आ संस्कृति मे समन्वयक नाम भेल मिथिलाम। बात भोजन विन्यासक चलि रहल अछि तें कनेक मिथिलाक इतिहास कें सेहो ध्यान देमय पड़त। ज्योतिरीश्वर अपन कृति वर्णरत्नाकर मे ११म् शताब्दीक मिथिलाक भोजन विन्यास पर प्रकाश देलनि अछि। हिनका अनुसारे मिथिलाक प्रमुख भोजन भात, दालि, तरकारी, चूडा, दही, शक्कर, फल तथा दूध छल। ज्योतिरीश्वर अपन दोसर पोथी प्राकृति-पैँगलम् मे कहैत छथि जे “ओ गृहणी धन्य छथि जे अपन पति केँ केराक पात पर भात आ घी परोसि खोअबैत छथि”। एहि पोथी मे रंग-बिरंगक माँछ रान्हव आ तरकारी बनेवाक विधि सेहो लिखल अछि। वर्णरत्नाकर मे जे मिथिलाक प्राचीन परम्परागत भोजन समिग्रिक सूची प्रस्तुत कयल गेल अछि ताहिमे “चाउर, चूडा, मुंगवा, लडुबी, सरुआरि, माँठ, फ़ेना, मधुकूप्पी, तिलबा, सिरोल, खिरसा, सिरनी, झिल्ली, फरही, भूजा, मोतीचूड़, अमृतकुंड आदिक उल्लेख अछि संगहि भोजनमे दहीक प्रधानता सेहो भेंटल अछि। आब लोकगीत पर अबैत छी, लोकगीतमे फकरा, पीहानी, गीत, लोकवृति आदि सब किछु समाहित अछि। एहिठाम दू गोट फकरा मैथिल समुदायक भोजन विन्यास आ भोजनक प्रति आसक्तिकें बुझबाक हेतु पर्याप्त अछि । पहिल : मिथिलाक भोजन तीन/ कदली, कबकब मीन।। दोसर: तीन तीरहुतीया तेरह पाक। ककरो लेल चुडा दही ककरो लेल भात।। अही दू गोट गीतक आधार बना सब विवरणकें देखल जा सकैत अछि। मिथिलाक भोजन तीन। कदली, कबकब मीन।। एकर अर्थ भेल जे मिथिलाकें लोक सभ लगभग नीकसँ लकS अधलाह तकमे जेनाँकि- उत्सव, काज-राज, संस्कार, पाबनि-तिहार धरिमे केरा, ओल बा ओले परिवारक आन कंद जेनाँकि खम्हरुआ; आओर अंततः नाना प्रकारक माछके प्रयोग भोजनमे अवश्य करैत छथि। विवाह -दान, मुड़न, उपनयन, पाबनि तिहार सबमे केराक प्रयोग हेबेटा करैत अछि। ओहुना लोकसब केराकें पाकल, काँच आ केराक फुलक सेहो खेबाक विन्यासमे प्रयोग करैत छथि। केराक तरुआ, तरकारी, सत्यनारायण भगवानक कथामे घोरुआ प्रसाद आ ओहुना पाकल केराक प्रयोग शाश्वत अछि। कबकबकें बात करैत ई कहब जरुरी अछि जे ओल मिथिलामे बहुत प्रिय अछि। एक फकरामे भादबक ओल केर बारेमे कहल जैत छैक: भादवक ओल की खै राजा आकि चोर मिथिला आ माछ एक दोसरक पूरक अछि। पंचदेवताक एकहि संगे उपासना करे बला मैथिल समाज जाहिमे ब्राह्मण सेहो सम्मिलित छथि कुनो दिन आ कुनो मास माछ खेबासँ परहेज नहि करैत छथि। माछकें जल-पड़ोर, जल-फूल आदि नामसँ बजा कतेक गोटे तँ एकरा मांसाहारी भोजनक श्रेणी तकमे नञ राखय चाहैत छथि। कातिक आ साओन मासमे जखन लोक सामान्यतया मांसाहारी भोजनकें त्यागि दैत छथि, अपन मैथिल अहू मासमे खूब चटकारसँ माँछ खाईत छथि, संगहि एहि मासमे माँछ खाय बलाक हेतु बैकुंठमे जगह बना दैत छथि। कातिक मास जे गैंचा खाय। ससरि-फ़सरि बैकुंठे जाय।। एक बारहमासा गीत एहेन भेटल जाहिमे मिथलाक पानिमे उपलब्ध लगभग सब माछक वर्णन तँ अहिए ओकरा कोना बनाबी कोना खाई, कथीक संगे खाई सब वर्णित अछि। एतबे नहि लगभग ७५% माँछ जे मिथिलाक पानिमे भेटैत अछि तकर वर्णन छैक। कने एहि बरह्मासाकें देखू: मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ा संग यो। तरल चेचड़ा माछ कुरमुर लागय मोन भरि संग यो।। पूस हे सखि अन्न नवका संग मांगुर झोर यो। कबइ कुरमुर दाँत दबइत करय जनजन शोर यो।। माघ बदरी जाड़ थरथर काँपय तन बड़ जोर यो। सुख बोआरी खंड लखि कए मन विनोद विभोर यो।। मास फागुन मदक मातल बहय पछबा बसात यो। बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यो।। चैत हे सखि रोग सभदिस रूप नाना देखि यो। तरल भुन्ना पलइ रान्हल खाइत बड़ सुख लेखि यो।। मास हे सखि आबि पहुँचल गरम बड़ बइसाख यो। गेल मन रुचि माछ गामर खंड सभ दिन चाख यो।। जेठ हे सखि हे हेठ बरखा मुंड भाकुर पात यो। पड़तु बिसरतु आबि ससरतु कर नवका भात यो।। मेघ सखि बरसत अखाढ़ जत रसालक डारि यो। तोड़ि काँचे आम आमिल देल सौरा पाल यो।। मास हे सखि आओल साओन भरल अंडा घेंट यो। तरल दही माछ मारा खाथि भरि पेट यो।। माछ इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यो। मास आसिन देवपूजा शंख घंटा नाद यो।। रान्हि रहुआ माछ बइसब पूर्ण भेल परसाद यो। मास कातिक बारि मरूआ बऽड़ तरल-अपूर्व यो।। पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यो... माँछ खेबाक वर्णन तँ अहिए माछक शिरा खेबाक परंपरा प्रबल सेहो अछि, घरक मुखिया, पाहून, बरियाती आदिकें शिरा परोसल गेल आ बुझू हुनकर उचित सत्कार भेल। निम्नलिखित फकरा एहि कथ्य के प्रमाणित करैत अछि: शिरा खाय से मीरा। पूच्छी खाय गुलाम।। जमाय जखन भोजन करक हेतु बैसति छथि तँ नाना तरहक गीत गाबि हुनका मनोरंजन कयल जाइत अछि। एकटा डहकन जाहिमे देखियौ, ओना तँ गारि देबाक परंपरा अछि मुदा गारिक संग-संग भोजन विन्यासक वर्णन सेहो अछि। खाजा मूंगबा आर पिरिकिया ता पर गरम सोहारी जी। माजी के गारी पिताजी के गारी आ बाबाजी के पढथि गारी जी। पढु हे सारि हमरो के गारी हम लेब देह के पसारी जी।। एहि गीतमे गारि तँ छैहे जे डहकनक मूल प्रकृति अछि, मुदा गारिकें संगे-संगे भोजन सामग्री – खाजा, मूंगबा, पुरुकिया, सोहारी आदिक विवरण सेहो छैक। सामा-चकेबाक एक गीतमे बहिन सब भोजनक बात करैत छथि: साम-चको साम-चको अबिह हे अबिह हे। जोतला खेतमे बैसिह हे बैसिह हे। लाले रंग पूरी पकबिह हे पकबिह हे।। मिथिलामे साग खेबाक परंपरा सेहो अदौसँ अछि। अयाची मिश्रक जीवनवृत्त ककरा नहि बुझल छैक। मात्र ११ कट्ठा खेतमे साग-पात कंद-मूल खाकS जीवन यापन करैत छलाह आ अध्ययन-अध्यापन करैत छलाह। कतेक बेर राजा बजौलखिन मुदा अपन गामक गुरुकुलकें छोडि कत्तहु नहि गेला। स्वयात संप्रभुताकें सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत छलाह। माँछक तुलनामे सागक अधिक प्रधानता देबाक प्रथा मिथिलामे सहज अछि। एकटा फकरा एहि बातकें प्रमाणित करैत अछि: माछ-भात पांच हाथ। साग-भात सात हाथ।। विन्यासमे सागक अलावे सागकें आन चीज़ सब जेना अरिकोच, गुजिया, इत्यादि बनबैत छथि, खेसारी, बथुआ, केराव, चना, कर्मी,गेनहारी, पटुआ आदिक साग मिथिला लोक खाईत छथि। अपना ओतय साग तोडल नहि अपितु खोटल जैत अछि। कोनो भोजमे साग एक महत्वपूर्ण तरकारी होइत अछि। मिथिलाक एहि परंपरासँ प्रभावित होइत ठीके कहल गेल अछि: कोकटा धोती पटुआ साग। तीरहुत गीत बड़े अनुराग। भाव भरल तन तरुणी रूप। तैं तँ तिरहुत होइछ अनूप।। अपन माटि सँ गुजरियाकें एतेक सिनेह जे साग-पात खोंटि लेती, साग-भात खा लेती मुदा रहती मिथिलेमे : साग-पात खोंटि- खोंटि दिवसों गेमेबै यौ हम मिथिलेमे रहबै नहि चाही हमरा सुख-आराम यौ हम मिथिलेमे रहबै।। तिलकोर आ कन्ना साग बिना की मिथिलाक पाहुनक सचार लागि सकैत अछि? चाउरक पीठारमे डुबा शुद्ध सरिसबक तेलमे छानल तिलकोर दुरो देसमे रहनिहार मैथिल सबके जीभमे पानि आनि दैत अछि। सजमनि, भाटा इत्यादिमे अदौरी तँ चाहबे करी तखनने भाटा-अदौरिक चहट्गर तरकारी बनत! भाँटाकें तरुआ, भटबर आर की-की नहि बनैत अछि। बारिक भाँटातँ बेर बिपत्तिक समय इज्जत रखैत अछि। भांटाकें भटबर, ठोपेके तेल। खेलक जमैया ठेलम ठेल।। मिथिलाक लोककें खिच्चरिमे सेहो पापर, घी, दही, अचार, चटनी इत्यादि संग खाईत छथि। खिच्चरिमे चारि बस्तु नहितँ केहन खिच्चरि? खिच्चरि के चार यार। घी पापर दही अचार।। ई त भेल पद परन्तु सही अर्थ में खिच्चरि के छौ यार थिक: घी, पापर, दही, अचार, चटनी, तरुआ। एक उचती गीतमे जखन विवाहक बाद वर भोजन करवा लेल बैसैत छथि तS सासु आ आन स्त्रीगन सब अपन गीतमे व्यंजन केर वर्णन करैत छथि: जाहि दिन राम जनकपुर अयला देखहु दुनिया के लोके भाति-भाति के भोज्य लगाओल नयना बिनु परकारे जी केरा नारियल खण्ड सोहारी परबल केर तरकारी जी जीमय बैसला ओ चारू भाई परसथु प्रेम पीयारी जी // दोसर उचती में बर के कृष्ण स्वरुप मानि किछु अहि तरहक विवरण भेटैत अछि: खाजा खुरमा तपत जिलेबी तापर सक्त सुपाड़ी जी। जेमय बैसला कृष्ण-कन्हाई सारि जे पढ़थिन गारि जी।। भगबान कृष्णक बालकालकें एक भक्ति गीतमे भोजनक किछु वर्णन भेटैत अछि: करथि पुकार जशोदा माई मोहन प्रात नाहाई। दही केरा गरम जिलेबी खोआ भोग लगाई।। लोकगीतमे भूख, निर्धनता, कुअन्न आदिक ऐतिहासिक संदर्भक वर्णन लोकगीत लोकविद्या होइत अछि, लोकइतिहास होइत अछि। एहेन इतिहास जे अपन प्रमाणिकता एवं शैली कें कारण जन-जन केर कंठमे लिखा जैत अछि। एहेन लिखान जकरा ने कुनो पानि गला सकैत अछि ने कुनो आगि जरा सकैत अछि आने कुनो कीड़ा खा सकैत अछि। एकबेर जनकंठमे रचि गेल त पीढ़ी-दर-पीढ़ी अबाध गति सँ चलैत रहैत अछि। मधुबनी ज़िलाक शाहपुर गाममे एक जनमान्ध लोक कवि भेला। हुनकर नाम छलनि फतुरी लाल। फतुरी लाल एक बेर मिथिलाक भयानक अकालक सामना केलनि आ अकालक विभीषिकाक ह्रदयविदारक विवरण अपन कवित्तमे केलनि। ओ रचना अकालकवित्त कें नाम सS जानल जैत अछि। अब्राहम ग्रिएर्सन १८८७ ईस्वीमे फतुरी लाल केर अकाल कवित्त हुनके मुहें सुनिकS लिखलनि। एहि कवित्तमे ई विवरण अछि जे भुखमरी केर अवस्थामे लोक प्राणरक्षा हेतु की-की नहि करैत अछि। किछु पंक्ति मात्र देखलासँ दुखक असीम वेदनाक अनुभूति सहजे भS जैत छैक: भेल धनतरि दुई फ़ासिल जग-राहडिऔर मकई। अकाल पडल तिरहुति में भारी-तैं बही गेल हवा। घर-घर मांगन करे नर नारी-फाँकि मकई केर लावा। मालीक आउर महाजन सभ-कै-घर-घर ढेरीक अन्न। लोक बुझओल ओहो तकै छथि मुंह्गा ऋणक शान। सभै देखि बनियान सभ सनकल-डरें लगाओलक टट्टी। सुन्न दोकान शहरमे परि गेल-सुन्न भेल सभ चट्टी। सूखल गात भात भौ लटपट-कतेक बात अब सहना। नर नारी सभ सान तेआगल-बेकारी भेल अब गहना।। बारहमासा एवं अन्य गीतमे गरीबीकें चित्रण करैत कोना कियोक महिला कम भोजन अथवा कुअन्न खा कS दिन खेपैत छथि तकर मर्मस्पर्शी वर्णन कैल गेल अछि। आईसँ करीब ३०-३५ सालक इतिहासमे अगर जा सकी आ अपन मानस पटल पर ओहि स्थिति आ गरीबीकें ऐनाँके रिफ्लेकशन जेकाँ देख पाबी तS सहज रूपमे ई अनुमान लगा सकैत छी। एकटा बारहमासा एहेन भेटल जाहिमे एकटा निर्धन महिला जिनकर पति परदेस गेल छथिन ओ कोन धरानी अपन समय नितांत निर्धनतामे बिता रहल छथि तकर विवरण देल गेल अछि। पूस गोइठा डाहि तापब माघ खेसारिक साग यो फागुन हुनका छिमरि माकरि चैत खेसारीक दालि यो बैशाख टिकुला सोहि राखब जेठ खेरहिक भात यो अखाढ़ गाड़ा गाड़ि खायब साओन कटहर कोब यो भादव हुनको आंठी पखुआ आसिन मडुआक रोटी यो कातिक दुख-सुख संगहि खेपब अगहन दुनू सांझ भात यो उपरोक्त गीतमे कोना एक महिला खेसारीक साग, खेसारीक दालि आमक टिकुला, खेरहिक उसिना, पाकल आमक गाड़ा, कटहरक कोआ,नेढा, आमक पखुआ, मडुआ रोटी, एक मास अनिश्चितता केर स्थिति आ अंततः अगहनमे भात। कहू तS कतेक सत्यकें जे आई लगभग इतिहास भS चुकल अछि तकरा ई अपना मानसमे रखने अछि मिथिलाक गीत-नाद। गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। ओहने विधवाक दुःखसँ द्रवित होइत बाबा “यात्री” लिखैत छथि: बांसक ओधि उपारि करै छी जारनि... हमर दिन की नै घुरतै जगतारिनि // मैथिली लोकगीतमे भोजन विन्यास आ औषधि लोकगीत लोकविद्याकें अंग अछि। लोक विद्याकें अनेक पक्ष वैज्ञानिक होइत अछि। कृषिकार्य एवं अन्य सब कार्यमे डाक बचन कतेक सटीक अछि से हमरा लोकनि बहुत निक जेकाँ बुझैत छी। बहुतो लोकगीत एहेन अछि जे कहेन अन्न अथवा भोज्य सामग्री सेहो कुन दिन, कुन मासमे खेलासँ की भS सकैत अछि तकर बहुत तथ्यपरक जानकारी दैत अछि गीत सुनब अथवा पढ़ब तँ लागत जेना आयुर्वेदक कोनो वैद्यक देल नुस्खा हो। हरेक गाछ आ हरेक भोज्य सामग्रीमे प्राचीन भारतीय परंपराकें अनुसार किछु-ने-किछु औषधिक तत्व छैक। भारतीय परम्परामे औषधि आ भोजन अलग-अलग चीज़ नहि छैक। ताहि अपना सबहक भोजनमे पथ्य आ कुपथ्यकें बात प्रबल मानल जाइत अछि। अपन शोधकार्यकें अवधिमे जखन मिथिलाकें गाम सभसँ गीतक संकलन करैत रही तS एकटा गीत एहेन भेटल जाहिमे ओ ई बतबैत छल जे कोन दिन कथिक प्रयोग भोजनमे करक चाही जाहिसँ तन आ मन दुनु स्वस्थ्य रहत। ई वर्णन ज्योतिष विचार पर सेहो आधारित अछि। रबि के पान सोम के दर्पण मंगल के किछु धनियाँ चर्पण बुध के गुड़ बृहस्पति राई शुक्र कहे मोहे दही सुहाई शनिबार जे अदरख खाई कालौं काल कटति घर जाईं।। ई त भेल कहिया की खेबाक चाही। एक एहेन गीत भेटल जे बारहमासाक रूपमे रचित भेल अछि। ई एकटा वैद्य जेकाँ बहुत वैज्ञानिकताकें आधार पर लिखल अछि। गीत अर्थकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि: सावनक साग ने भादबक दही। आसिनक ओस ने ने क़ातिकक मही। अगहनक जीर ने पूसक धनी। माघक मिसरी ने फ़ागुनक चना। चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल। ज़ेठक चलब ने अषाढ़क बेल। कहे धनवनतरि अहि स बचे। वैद्यराज काहे पुरिया रचे।। मैथिली लोकगीत अनंत महासागर अछि। अहि महासागरमे सँ भोजनक सम्बन्धमे जे किछु जानकारी छल से समयसीमा कें ध्यानमे राखि पाठकक समक्ष राखल। नीक लागल तS मैथिली लोकगीत परम्परा केर महानता अधलाह लागल तखन हमर ज्ञानक विपन्नता। आभार: हमर लोकविद्या पर लिखल सब काज लोकस लेल अछि। लेकिन एहि लेख के भाषा के मर्यादा के संचालक एवं हमर अनुजतुल्य श्री अमरनाथ मिश्र अंखि फोरि-फोरि ठीक केलाह अछि। एहि काज लेल हुनका धन्यवाद द हुनकर योगदान के छोट नहि कर चाहैत छी मुदा ओ खूब आगा बढ़थि से आशीर्वाद दैत छियनि। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश प्रसाद मण्डल ४ टा लघुकथा १.कन्हा भँट्टा  आ २. भोलानाथ बाबा ३. दुरकाल आ ४.कलंक कन्‍हा भँट्टा समए रौदियाह भेने जिनगियो आ जिनगीक किरियो-कलाप रौदियाइते अछि, आ से खाली रौदिए-टा मे नइ बाढ़ियो-दाहीमे होइए। ओना,दुनूक बीच विपरीत सम्‍बन्‍ध अछि, अकास-पतालक अन्‍तर अछि। मुदा जिनगीक बीच आबि दुनू एक भऽ जाइए। माने ई जे जहिना गाछो-बिरीछ आ मालो-जाल, हाल बेहाल भेने दम खींचैयो लगैए आ तोड़बो करैए तहिना बाढ़ियो-दाहीमे होइए। ओना, कहैले तँ कहले जाएत जे एकटा ‘पानिक अभावमे मरल’ आ ‘दोसर पानि पिबैत मरल।’ मुदा से जे हौउ, जिनगी तँ निच्‍चाँ मुहेँ खसबे करैए। जखन समैये रौदियाह भेल तखन जिनगीक किरिया-कलापसँ लऽ कऽ जीवन-यापन धरि रौदिएबे करत, मकमकेबे करत। अनो-पानि आ तीमनो-तरकारीमे मकमकी एबे करत। रौदी भेल खेतक उपज गेल! उपज गेल, वस्‍तुक अभाव भेल! आ वस्‍तुक अभाव भेने जीवन आ जिनगी गेल..! ओना, जइ हिसावे तीमन-तरकारीमे मकमकी आएल तइ हिसावे अन्नमे नइ आएल। मुदा नहियेँ आएल सेहो केना कहल जाएत। हँ, ई जरूर भेल जे जैठाम तीमन-तरकारीक भावमे चारि बर, पाँच बरकेँ के कहए जे अठ-अठ-दस-दस बर बढ़ल, तैठाम अन्नक भावमे डेढ़िया-दोबर बढ़बे कएल अछि। जे भाँटा पाँच रूपैये किलो पनरह दिन पहिने छल, ओ रसे-रसे बढ़ैत तीस रूपैये किलो भऽ गेल आ जे टमाटर दस रूपैये किलो छल ओ साठि रूपैये भऽ गेल। अन-पानिमे से नइ भेल, जे बीस रूपैये किलो छल ओ पचीस रूपैये भेल आ जे साठि रूपैये छल ओ सत्तैर रूपैये भेल। ओना, खाली खाइ-पिबैक नइ आनो-आनो वौसमे चढ़ा-ऊतरी भेबे कएल। रौदी भेने किछु चीज सस्‍तो भेल आ किछु कूदि कऽ अकासो छूलक। तीमनो-तरकारी एके रंग नइ कुदल, जेना हरियर तरकारी कुदल तेना अल्‍लू नइ कुदल। मुदा ऐठाम तँ ईहो बात ऐछे जे अल्‍लूकेँ कोबी-भाँटा, टमाटर-साग जकाँ हरियर मानल जाए की नइ? ओ तँ ने फूल छी, ने पात आ ने ऊपरका फड़े छी। ओ तँ छी कन्‍द-मूल चाहे गॉंठ। कन्‍द-मूल आकि गाँठ रहितो अल्‍लूमे एकटा बात तँ ऐछे जे आनसँ नमहर[1] जिनगियो छै आ आन जकाँ गलनमो-सड़नमो नहियेँ अछि। ओना, सड़नमा ओहो अछि मुदा हरियरसँ कम अछि। आनक अपेक्षा बेसी खगतो पुरबैए। माने ई जे आन तरकारीक अपेक्षा अल्‍लू बेसी बकतियारो होइए। खएर, जे होइए मुदा जखन हरियर गाछ हरियर फड़, पाँतेसँ बिछ-बिछ उखाड़ि तरकारी बनैए तखन तँ ओहो कनी-मनी गलिते अछि आ हरियर गाछक हरियर फड़ो भेबे कएल, तँए अल्‍लूक सौंसे जिनगीकेँ भलेँ हरियर तरकारी नइ मानल जाए, मुदा थोड़बो दिन तँ मानले जा सकैए। ओना, अल्‍लूकेँ कन्‍द-मूल कहल जाए आकि गाँठ, ईहो तँ झमेल ऐछे। अल्‍हुआकेँ शकरकन्‍द कहल जाइए, जे एकटा गाछमे अल्‍लुए जकाँ घोंदा फड़ैए, भलेँ एकटा गोल आ एकटा नाम किए ने हुअए। तैसंग ईहो तँ ऐछे जे जहिना अल्‍लूमे पातर खोंइचा होइए तहिना अल्‍हुओमे अछि। ओना, नामोक दृष्‍टिसँ दुनू भैयारीए बुझि पड़ैए। तेतबे किए, दुनूमे सँ केकरो टमाटर जकाँ आकि भॉंटा जकाँ बीआ सेहो ने होइ छइ। जखन एकटा गुण आकि एकटा काज मिलने दोस्‍तियारे सम्‍भव अछि, तखन तँ अल्‍लू अल्‍हुआक भैयारीमे सेहो ऐछे। मुदा केशौरो तँ मिश्रीए-कन्‍द छी, जेकरा अल्‍लू जकाँ ने कन्‍दे रोपल जाइए आ ने उला-पका खाएले जाइए। ओकर फूलमे छीमीदार फड़ होइ छइ, तइमे बीआ होइ छइ, ओही बीआसँ कन्‍द भेल..। मुदा ऐठाम कन्‍दो-कन्‍दमे फन्‍दे-फन्‍द अछि। रहल जे अल्‍लूकेँ ‘गाँठ’ मानल जाए की नइ? मुदा गाँठोक तँ लीला अपार ऐछे, किछु माटि तरक गाँठ भेल तँ किछु माटिक ऊपरको। जेना, गाँठ-कोबी माटिक ऊपर होइए, किछु गाँठ एहनो तँ ऐछे जे माटिक तरोमे एकेटा होइए जे जड़ि धने रहैए। मुदा गीरह-गाँठ कहैबला हरदी-आदीक तँ से नइ अछि। भलेँ अल्‍हुआ-अल्‍लू जकाँ फुट-फुट घोंदानुमा नहि, हत्‍थे जकाँ किए ने हौउ। मुदा जे हौउ, अल्‍लूक तँ मिठाइयो, तरकारियो, अँचारो बनैए आ अल्‍हुआ जकाँ उसैन सेहो खाएल जाइए। जे अन्नक काजक पुरती सेहो करिते अछि। खएर जे से...। पिताजी दू भाँइ। दुनू भैयारीक बीच अखन एगारह गोरेक परिवार अछि। नीक समए हौउ कि अधला, नमहर परिवारक खगता बेसी होइते अछि। गामक ओहन परिवारमे छी, जइमे नीक जकाँ माने सुपोषित भोजने ने भेटैए मुदा जैठाम भोजनोमे कोताही हएत तैठाम घर-दुआर आकि पढ़ाइ-लिखाइ वा ऐसँ ऊपरक जे खगता अछि ओ तँ कल्‍पनाश्रित छोड़ि पुर्तिये केते कऽ सकै छी। ओना, एगारह गोरेक परिवारमे खाइयो-पिबैक एक विचार नहियेँ अछि, मुदा समैक धक्का तँ विचारकेँ तोड़ि-मरोरि एकबट करिते अछि। ओना, समए बदलने फेर विचार-भिन्नता जनमैक परिस्‍थिति बनियेँ जाइए। बनियेँ ने जाइए बनितो अछि आ नहियोँ बनैए। भोजनकेँ जीवनक मुख्‍य खगता बुझि परिवारक सभ कियो एकठाम बैस विचार केलौं जे जिनगी-ले सुपोषण जरूरी अछि, तँए चारि साए ग्राम हरियर तरकारी जरूरी अछि। माने, जहिना अन्नक उचित मात्रा जरूरी अछि तहिना हरियर साग-सब्‍जी सेहो जरूरी अछि। दस बर्खसँ कम उम्रक परिवारमे कियो ऐछे ने जइसँ घटी-बढ़ी हएत। ओना, एक विचार भेलो पछाइत करिया काका अपना जिद्दपर ठाढ़े रहि गेला। हुनकर जिद्द छैन जे भात हुअ कि रोटी अढ़ाइ साए ग्राम अल्‍लूक चोखा हेबे करए...। करिया काकाकेँ अल्‍लूसँ कोन प्रेमक प्रगाढ़ता छैन से तँ ओ जानैथ, मुदा अन्नक पछाइत अल्‍लू छोड़ि दोसरकेँ ओते मोजर नइ दइ छथिन जेते अल्‍लूकेँ। फलो सोझहेमे छैन जे मोटैनी बेमारी पकैड़ नेने छैन, मुदा तैयो सूर्यवंशी जकाँ प्राण जाए मुदा विचार नइ जाए..। ओना, परिवारमे करिया काकाकेँ छोड़ि दसो गोरे ऐ विचारकेँ राजी-खुशीसँ मानि अमल करै छी जे चारि साए ग्राम हरियर साग-सब्‍जी प्रतिदिन परिवारमे हेबक्के चाही, से ऐछो। जहिना कहल गेल अछि जे ‘कनही गाइक भीने बथान’ सेहो ऐछे। खाइक मामलामे करिया काका दसो गोरेसँ भिन्न छैथ। आ से घरेटा मे नहि, गामोमे निमाहिते छैथ। समाजमे भोज-काज भेने भोजनक खुशी लोककेँ होइते छइ, मुदा से करिया काकाकेँ नइ होइ छैन। किएक तँ भोज-काजमे अल्‍लूक चोखा नइ भेने केतौ खाइयो-ले नहियेँ जाइ छैथ। आ जँ कहियो केतौ जाइतो छैथ तँ अल्‍लूक चोखा दुआरे अजश दाइये दइ छथिन। ओना, समाजक भोज-काजमे जश-अजशक आनो-आन कारण अछि, मुदा करिया कक्काक अजशक कारण अल्‍लूए-चोखा रहैत अछि। ओना, समाजिको भोजमे आ परिवारोमे आन सब्‍जीक अपेक्षा अल्‍लूक महत बेसी ऐछे। तेकर कारणो अछि जे चोखा, तरूआ, भुजुआ,भुजिया, अचार सहित आनो विन्‍यास अल्‍लूक जेते बनैए तेते दोसरकेँ नहियेँ बनैए। भोज तँ ओहन भोजन छी जइमे बेसी-सँ-बेसी विन्‍यास बनैए। बनबो केना ने करत, भोज तँ आवश्‍यक भोजनसँ आगू बढ़ि विशेष भोजन छीहे, तैठाम जँ विशेष विन्‍यास नइ बनइ, तखन ओ विशेषे केना भेल? आ जखन आनसँ बेसी विशेषता नइ रहत तखन ओ विशेषाधिकार प्राप्‍ते केना कऽ सकैए? रौदियाह समए भेने अपन कोन चर्च जे गामेसँ हरियर तरकारी अलोपित भऽ गेल अछि। सबहक बाड़ी-झाड़ी ओहिना बिनु उपजाक मर्र-मर्र करैए। मुदा भोजन-ले तँ तरकारीक जरूरत ऐछे। जखन अपन चास-बासमे हरियर तरकारी नइ अछि तखन तँ हाटे-बजार दिस ने जाए पड़त। ओना, गामक चौबगली आन सभ गाममे हाट अछि जे सपताहमे दू-दू दिन लगैए। बजार जकाँ भरि-दिना नहि, खाली बेरुका उखड़ाहा भरि मात्र लगैए। जे करीब-करीब चारि घन्‍टा रहैए। गमैया हाट छी तँए गामे-घरक हटवारो रहल। ओहीमे किछ किनवारो आ किछु बेचवारो रहल। तैसंग किछु एहनो कीनवार-बेचवार होइए जे बेचबो करैए आ कीनबो करैए, मुदा से कम रहैए। अधिक बेचवार ओहन रहैए जे अपन खेत-पथारसँ उपजल वौस हाटपर आबि बेचैए। गामसँ बेसी दूर तँ नइ मुदा चौवगली गमैया-हाटसँ कनीए आगू झंझारपुर हाट अछि। बगलेमे बजारो छइ। ओना, गामक चौबगली-गमैया हाटसँ झंझारपुर-हाट नव अछि। माने आन हाटक अपेक्षा झंझारपुर हाट पछाइत लागब शुरू भेल, मुदा अनुकूलता पौने सभ हाटसँ बेसी जगजियार तँ ऐछे। अनुकूलतोक अनेक कारण अछि। जइमे प्रमुख अछि- प्रतिक्रिया स्‍वरूप हाट लागब। माने, झंझारपुर-हाट महरैल हाटक प्रतिक्रियामे लागब शुरू भेल। जे एक जातिक अधिकारक हाट छल। समाजमे दबंगता छेलैहे। हाटक वेपारियो आ खरीदवालोक संग ज्‍यादती भरपुर करै छल। संजोग भेल किछु वेपारियो आ खरीदवालोमे आक्रोश बढ़ल, सरकारी कार्यालयसँ हटल रहबे करए। माने, थाना-ब्‍लौक सँ दूर छेलै महरैलक-हाट, तँए जेहेन निगरानी सरकारक हेबा चाही से नहियेँ रहइ। झंझारपुर बजारक लाट सेहो रहबे करइ, जइसँ बजरूआ वेपारी सेहो आक्रोशितक संग भेल। झंझारपुर-हाट लागब शुरू भेल। महरैल-हाट रसे-रसे घटए लगल आ अखन ओ गमैया हाट बनि ठाढ़ अछि, जइमे गामेक बेचवालो आ लेवालोमे समटा गेल अछि। ओना, महरैलक बरदहट्टा सेहो टुटल, मुदा अनुकूलता नइ रहने झंझारपुरोमे नइ लगि सकल। तेकर कारण भेल अछि जे इलाकामे गाए-बरदक उपटान जकाँ सेहो भाइये गेल अछि। झंझारपुर हाटकेँ तेजीसँ उठैक कारण सरकारीकरण सेहो भेल, आ लगमे बजारो आ सरकारियो कार्यालय रहने सभ रंगक लेवालो आ बेचवालोक समावेश भाइये गेल अछि। तैसंग चौबगली दूर-दूर तक सड़क आ सवारीक सुविधा भेने अन्‍तर्राज्‍यीय वेपारी सेहो पहुँचए लगल,जइसँ हाटक चुहचुही दिनानुदिन बढ़िते गेल अछि। दियादीमे तँ नइ मुदा भैयाक संगी भेने लाल भाइक परिवारसँ विशेष सम्‍बन्‍ध ऐछे। लाल भाय नोकरी करै छैथ। ओना, गामेसँ जाइ-अबै छैथ, मुदा कर्तव्‍यनिष्‍ट लोक रहने आठ घन्‍टा ड्यूटी पुरबैमे अपने भरि दिन लगि जाइ छैन। जइसँ हाट-बजारक काज पत्नियेँ, माने लाले भौजी करै छथिन। अपने साइकिल रखने छी, जइसँ झंझारपुर जाइ छी, पाँचे किलोमीटरपर झंझारपुर-हाट अछि, टेम्‍पूक सुविधा गामसँ सेहो छइहे तँए स्‍त्रीगणो सभ हाट-बजार करिते छैथ। मुख्‍य सड़कसँ उतैर जखने हाटक बाट धेलौं कि लाल भौजीकेँ टेम्‍पूपर सँ उतरैत देखलयैन। मनमे भेल जे टोकयैन, परिवारिक सम्‍बन्‍ध ऐछे। मुदा फेर भेल जखन भौजियोक नजैर पड़बे केलैन आ किछ ने बजली तखन जँ अपन-अपन काज अपने सम्‍हारि चली, यएह ने भेल अपना भरोषे चलब। ओना अनभुआर जगहपर आकि गामसँ बाहर जँ गौंआँ-घरूआ भेट जाए तँ मनसूबा बढ़बै करै छइ, हमरो बढ़ल। लाल भौजीकेँ बढ़लैन कि नइ बढ़लैन से तँ ओ जनती, मुदा अपना बुझि पड़ल जे मन चुहचुहा जरूर गेलैन। थोड़ेक आगू बढ़ि परतीपर साइकिल लगबए बढ़लौं। हाटक मुहेँपर लाल भौजी जेना ठमैक गेली। जनु हमर बाट ताकए लगली कि की से तँ ओ जानैथ मुदा जेते कालमे साइकिल लगेलौं तेते काल तक ओ ठाढ़ रहली। ओना, पुराने साइकिल अछि, ताला बिनु लगेनौं काज चलैबला अछि, मुदा से नइ तलो ऐछे। ताला जखन लगबए लगलौं तखन एक नजैर तालापर देलिऐ आ दोसर लाल भौजीपर। तालापर नजैर पड़िते एकटा गौंआँ मन पड़ल। केते लक्कर-झक्करसँ वेचाराकेँ महिना दिन पहिने बिआहमे साइकिल देने रहइ। आठम दिनका हाटमे एतै केदैन चोरा लेलकै! वेचारा घुमि कऽ गाम गेल, तखन आबि कऽ दरबज्‍जापर बैस गेल। कनी कालमे जखन एलौं तँ पुछलिऐ» “किए बैसल छह?” असथिरेसँ पुछने रहिऐ। ले-बलैया! ओ तँ कानए लगल! मने-मन सोची जे की भेलैए! परिवारक तँ ने कियो किछु कहलकैए? हुचकैत बाजल» “झंझारपुर-हाट गेल छेलौं से साइकिले चोरा लेलक!” मन असथिर भेल जे अपन परिवारक नइ अन्‍तुका बात छी। कहलिऐ» “केना चोरेलकह। ताला नै लगेने छेलह?” डाँड़मे बान्‍हल कुन्‍जी खोलि कऽ देखबैत बाजल» “देखै छिऐ, कुन्‍जी संगेमे अछि। खूब कटकटा कऽ लगा देने छेलिऐ।” कहलिऐ» “बुझल नइ छेलह जे सभ हाटमे दस-बीसटा साइकिल झंझारपुरमे चोरि भाइये जाइ छइ, तखन सचेत भऽ कऽ ने कोनो चिन्‍हारक दोकान लग साइकिल लगैबतह। ऐठाम किए छह। गामपर जा।” ओ बाजल» “अहाँ कनी संगे चलू, घरवालीकेँ बुझा-सुझा देबै, नइ तँ ओ घरेसँ भगा देत।” बड़ आश्‍चर्य भेल जे महिने दिन पहिने बिआह भेलै, तखन एहेन शिकाइत पत्नीक किए करैए! जिज्ञासा बढ़ल। पुछलिऐ» “अखन तँ महिनो दिन बिआह केना नइ भेलह हेन तखन एहेन बात किए बजै छह?” जेना मनक हूबा जगलै। बाजल» “रूपैआकेँ लोक उनटा-पुनटा चिन्‍हैए मुदा लोककेँ लोक तँ लोलेक बोलसँ ने चिन्‍हैए।” की करितौं, कोनो कोट-कचहरीक लफड़ा थोड़े छी जे बेसी समए लगैत। भेल तँ घरपर जा सभकेँ कहि देबै जे ‘चोर-ले ताला की आ बेइमान-ले केबाला की।’ सएह केलौं। साइकिल लगा जखने घुमलौं की लाल भौजी सेहो डेग बढ़ेली। आगूए-आगू तरकारी दोकानपर पहुँचली। अपनो तँ वएह काज रहए। जा हम पहुँची ता भौजी दोकानक आगूमे बैस तरकारी सभपर नजैर दौड़बैत रहैथ। पहुँचते दोकानदारकेँ पुछलिऐ» “भँट्टा की दर?” निच्‍चाँ-सँ-ऊपर लाल भौजी नजैर केलैन। दोकानदार बाजल» “तीस रूपैये किलो।” दामक हिसाबे दोकानक वस्‍तुक चुहचुही नइ बुझि पड़ल। ओना हाटेक चुहचुही रौदियाएल बुझाइत रहइ। एकटा नमरी जेबीमे रहए। घरपर तँ बुझि पड़ल रहए जे परिवारक हिसाबे दू दिनक तरकारी हएत, मुदा से भेल नइ। मने-मन हिसाव बैसेलौं तँ नब्‍बे रूपैआमे तीन किलो भँट्टा हएत, दस रूपैआमे चाहो-पान भाइये जाएत। दू-चारि जँ संगमे नइ राखब तँ पुरान साइकिल अछि जँ केतौ पनचर हएत कि भाल्‍टुए फटि जाएत, तखन तँ पएरे ने जाए पड़त..! तीन किलो भँट्टा कीनि झोरामे लऽ लेलौं। नमरी देलिऐ, दस रूपैआ घुमा देलक। जहिना स्‍टेशनमे ऐगला यात्रीकेँ टिकट होइते दोसर यात्री अपन टिकटक आदेश दइए तहिना दोकानपर पाइ सम्‍हारिते रही कि लाल भौजी कनहा भँट्टाक ढेरी देखबैत पुछलखिन» “ओइ ढेरीक की दर रखने छी?” असथिर चिते तरकारी दोकानदार बाजल» “कोनो कि भाव छीपल अछि। नीकक अदहा कनहा होइए।” लाल भौजी मने-मन हिसाव जोड़ली। हुनको नमरीए रहैन। पनरह रूपैयेक हिसावसँ छह किलो, दोकानदाकेँ कहलखिन जोखू। ओना लाल भौजीक नजैर जेतए रहल हौनु मुदा हमरा हँसी लगि गेल। हँसी ई लगल जे जखन भँट्टा सड़ले छै तखन अनेरे किए कीनि रहली अछि? मुदा लाल भौजीक मुँहमे मलिनता नइ रहैन। ओ भँट्टाकेँ देख हिया कऽ हियाइस नेने छेली जे दस प्रतिशतसँ पच्‍चीस प्रतिशत नोकसान अछि, बाँकी पचहत्तैर प्रतिशतसँ ऊपरे नीक अछि। कहुना-कहुना तँ चारि किलोसँ ऊपरे हएत। पाँचो किलो भऽ सकैए। जखन रौदियाह समए अछि, महगी पकड़बे करत। तैठाम जँ जान बँचा नइ चलब तँ दोख केकर हेतइ। नब्‍बे रूपैआमे छह किलो भँट्टा लाल भौजी लेली। दस रूपैआ हुनको दोकानदार घुमा देलकैन। ओहो मने-मन टेम्‍पू-भाड़ा बैसा लेली। दुनू गोरे दोकानपर सँ विदा भेलौं। भाय, हाट-बजार छिऐ, सभसँ सभ पुछ-आछ करिते अछि। मनमे ‘कनहा भँट्टा’ घुरियाइते रहए। कहलयैन» “भौजी, जुआनीक सनकी हाटो-बजारमे चढ़ले रहैए?” ओना हम ‘कनहा भँट्टा-दे’ ठिकिया कऽ बाजल रही मुदा से लाल भौजीक नजैरपर नइ चढ़लैन। हुनका मनमे दोसरे-तेसरे बात नचलैन। बजली» “से की?” कहलयैन» “पाइ कुट-कुट कटै छेलए जे सभटा सड़लाहा भँट्टा कीनि लेलौं?” ओना हम भौजियेक पक्षक बात बाजल रही मुदा भौजीक मनमे से नइ भेलैन। विपक्षेक बात बुझि पड़लैन। जखन कि प्रश्‍न तँ कनहा भँट्टा सम्‍बन्‍धित अछि। नीक-अधलाक बीच पक्ष-विपक्ष हएत। जे बात भौजीक मनमे नचलैन। नचिते मुस्‍कियेली, मुदा मुँह बन्ने रहलैन।मुस्‍की देख अपन मन खसए लगल। खसए ई लगल जे हमर विचारकेँ भौजी कोन रूपे बुझली? लाल भाय पंचायत सेवकक नोकरी करै छैथ। मैट्रिक पास छैथ। लाल भौजी पढ़ल-लिखल नइ छैथ, मुदा गृहिणीक सभ लूरिक बोध रहने परिवारमे कहियो कोनो काजक आकि विचारक टकराहट दुनू परानीक बीच नइ होइ छैन। लालो भाय गाममे रहितो, परिवारसँ मुक्ते छैथ। सोझ-मतिया चाइलिक लोक रहने जहिना मासक दरमाहा उठबै छैथ तहिना सभ रूपैआ नेने आबि दुनू परानी परिवारक महिनो दिनक हिसाव बैसा खले-खल रूपैआकेँ बाँटि काज करै छैथ। खसैत मने बजलौं» “भौजी हमर बात अहाँ कोन रूपे लेलिऐ?” ओना भौजीक मन खुशीमे दहलाइत रहैन। होइतो अहिना छै जे एके प्रश्‍नक उत्तर मन-मनक विचारक अनुकूल शब्‍दमे होइते छइ। शब्‍दो तँ शब्‍द छी, एके शब्‍द केतौ मारक होइए आ केतौ तारक सेहो होइए। ओना बजैक क्रममे भौजी बजली» “कोनो अहाँ अधला बात कहलौं जे अधला लागत?” अपनो गर भेटल। कहलयैन» “तखन चुपे-चाप किए रहि गेलौं, हँ-हूँ किछ किए ने कहलौं?” हमर बात भौजीकेँ अधला नइ लगलैन। मुस्‍कियाइत बजली» “अहाँ कौलेजमे पढ़ै छी की खेल करै छी?” मनमे भेल जे एना किए भौजी बजली! ऐमे कोन पढ़ै आ खेलैक बात अछि? पुछलयैन» “ऐमे की खेल अछि?” मुस्‍की भरैत भौजी बजली» “यएह दुनियाँक खेल छी। दुनियॉंमे ने किछ अधला अछि आ ने नीक। देखै-करैक नजैर आ लूरि चाही।” लाल भौजीक बात नीक जकाँ नइ बुझि पेलौं। मुदा छी तँ झंझारपुर-हाटक रस्‍तापर ठाढ़। तहूमे रौदियाह समैक रौद सेहो अछि। मुँह फोरि बजलौं» “भौजी अहाँक चिक्कारी हम नइ बुझै छी। मुँह खोलि बाजू।” बजली» “कौलेजमे पढ़ै छी आ एतबो ने बुझै छिऐ जे सभ किछुमे परिस्‍थिति-बस पील फड़ैए। चीजक कोन बात जे लोकक देहोमे फड़ै छइ। मुदा जेकरो देहमे फड़ै छै ओहो पीलुआ छाँटि जीबए चाहैए की नइ?” बिच्‍चेमे बजा गेल» “हँ से तँ चाहिते अछि आ जीबो करैए!” भौजी बजली» “जेना वौसमे महगी आबि गेल अछि तेना नोकरीबलाकेँ दरमाहा थोड़े बढ़ि जाएत। मुदा परिवारक खर्च तँ हेबे करत।” कहलयैन» “हँ से तँ हेबे करत।” बजली» “तखन तँ हमरा सन लोककेँ दुइए-टा उपाय ने अछि जे चाहे दू-कौर कम खाउ चाहे दब समानक उपयोग करू।” कहलयैन» “हँ से तँ करै पड़त।” भौजी बजली» “नबे रूपैआमे अहाँकेँ तीन किलो भँट्टा भेल आ हमरा कहुना चारि किलोसँ ऊपरे, सड़लाहा छाँटि कऽ, हएत। अहीं कहू जे की नीक भेल?” भौजीक बात सुनि अवाक् भऽ गेलौं। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2537, तिथि : 30 जून 2016 [1] अधिक दिन रहैबला भोला नाथ बाबा अन्‍तिम जेठ, काल्‍हि सौंझका बरखा तेहेन भेल जे मौसमोमे बदलाहट आएल आ धारो सभ फुलाए लगल। ओना, दूटा बरखा पहिनौं भेल छल, ई तेसर बरखा बरखा जेठक छेलै, जइसँ जे धार आद्राक ओद्रसँ निकैल फुलाइ छल ओ अनुकूल मौसम पाबि अगते फुला गेल। होइते अहिना छै जे जँ समैकेँ अनुकूल बनैसँ पहिने अनुकूल वातावरण बनि गेल तँ ओइमे अनुकूलता स्‍वत: आबए लगै छइ, सएह भेल।..अनुकूलता ई भेल जे पहाड़ी धार हौउ आकि तराइ इलाकाक, बर्खाक पानि पबिते फुला जाइए, सएह भेल। नेपालसँ लऽ कऽ दूर-दूर तक तराइ इलाकामे तेते बर्खा भेल जे धारक संग-संग मौसमोमे बदलाहट आबि गेल। सालोक संजोग नीक रहल, जहिना अगहनमे धनमण्‍डल धान भेल तहिना चैतमे दलिहनो आ गहुमो भेल। तैसंग आमो-जामुन तेते फड़ल जे ऐ बेर कौओ-कुकुरक मन अधेबे करत। जहिना आमक फड़ी तहिना जामुनक फड़ी लगने छोट-छोट गाछक कोन बात जे बड़को-बड़को गाछक डारि सभ धरती दिस झूकि कऽ निच्‍चाँ-मुहेँ भऽ गेल। छोट-छोट आमक गाछमे तँ बाँसक सोंगरो लोक लगौलक मुदा नमहर गाछमे सोंगर केना लगौत, तँए ओ ओहिना रहि गेल। जामुनक गाछकेँ तँ बेसी फड़नौं, फड़ छोट भेने, सोंगरक खगते ने होइ छै जे सोंगर कियो लगौत। ओना, आमक गाछ आ जामुनक गाछक लकड़ियोमे अन्‍तर होइते अछि जइसँ लकड़ीक गुणोमे अन्‍तर होइते अछि। जइसँ जेते भार उठबैक शक्‍तियो मजबुतियो जामुनक गाछकेँ होइ छै तइसँ कम शक्‍ति आमक गाछकेँ होइ छइ। मुदा तैसंग एकटा कुभाँजो तँ ऐछे। कुभाँज ई जे तगतगर जामुनक गाछकेँ होइतो फड़ छोट होइ छै आ आमक गाछमे नमहर फड़ होइए...। बेरुका समए, भोला नाथ बाबा दुपहरिया सूतबसँ उठि मुँह-हाथ धोइ, पानि-चाह पीब दरबज्‍जाक ओसारक कुरसीपर बैस अपन पचासी बर्खक बीचक आजुक दिनपर मने-मन विचार करए लगला। बेर झुकने सुरूजो पच्‍छिम-मुहेँ झूकि पछबरिया रस्‍ता पकैड़ नेने आ पुरबा हवा अपन रस भरल चालि पकैड़ रसे-रसे चलि रहल अछि। पनरह गोरेक परिवार भोला नाथ बाबाक छैन, जइमे सभसँ श्रेष्ठ अपने छैथ, से दुनू मानेमे परिवारमे श्रेष्‍ठ छैथ। पहिल जे बाबाक सीढ़ीपर छैथ आ दोसर पचासी बर्ख बितौल जिनगियो छैन। आइक परिवार मनमे अबिते भोला नाथ बाबाक पहिल नजैर पत्नीपर गेलैन। ओना, साले भरिक छोट पत्नी छथिन, मुदा काजमे केतौ साल भरिक छोट, तँ केतौ पचीस-पचास सालक छोट छथिन। माने ई जे किछु काज भोला नाथ बाबाक बहुत अगुआएल छैन मुदा पत्नी ओइ काजमे बहुत पछुआएल छथिन। ओना, किछु छथिन मुदा पैंसैठ-छियासैठ बर्खसँ संगी बनि संग-संग चलि तँ आबिये रहल छथिन। पत्नीपर नजैर पड़िते भोला नाथ बाबाक मन मधुएलैन। मधुआइते मन मुस्‍कियेलैन। मुस्‍की भरैत बुदबुदेला» “तुलसी ऐ संसारमे भाँति-भाँतिक लोक...।” मुहसँ तँ निकैल गेलैन मुदा मने-मन जखन विचार करए लगला तखन एकटा काज मन पड़लैन। मन पड़िते मुँह फुटलैन» “कहू जे ई केहेन भेल!” ..भेल ई रहैन जे पोता मोटर साइकिल किनलकैन। नव रहने झलकैत रहबे करइ। मधुबनीसँ आनि दरबज्‍जाक आगूमे लगौलक। गाड़ीसँ उतैर दरबज्‍जेपर सँ दादीकेँ ई सोचि शोर पाड़लक जे गाड़ी देख मन खुशी हेतैन, असीरवाद देती। जखने दादीक असीरवाद भेट जाएत तखने बबोक असिरवादक मिनहा भाइये जाएत आ आरो जे सभ परिवारमे छैथ, माने माता-पिता, काका-काकी ओ नीक छोड़ि अधला बात बाजिये ने सकै छैथ। खुशीए-खुशी परिवारमे हएत। यएह ने भेल परिवार आकि समाजक काज जइसँ सभ एकमुहरी अनुकूल वा खुशीक नजैरसँ ओइ काजकेँ देखए। दरबज्‍जाक आगूमे गाड़ी ठाढ़ कऽ ‘दादी-दादी’ बजैत राम किशुन आँगन आबि दादीकेँ गोड़ लागि कहलक» “दादी, गाड़ी कीनि कऽ अनलौं हेन?” गाड़ीक नाओं सुनिते दादीक मन खुशीसँ खुशिया लगलैन। ओसारपर सँ उठि सोझे दरबज्‍जापर आबि गाड़ी देख बजली» “ताबे निच्‍चेमे रहए दहक...।” कहि पार्वती चोट्टे आँगन घुमि सिदहा नापैबला तम्‍मामे धान लेलैन, हाँइ-हाँइ कऽ चारिटा दुभि सेहो नोंचि अनलैन आ पुतोहुकेँ कहलखिन» “कनियाँ कनी पीठार पीसू।” सासुक आदेशे पुतोहु सूखले अरबा चाउरकेँ पानि दए-दए पीठार पिसलैन। सिनूर-पीठार आ दुभि-धान नेने पार्वती लोहाक गाड़ीकेँ बाहर पुइज घर प्रवेशक आदेश देलखिन। ओना, भोला नाथ बाबा सेहो दरबज्‍जापर बैसल दादीक सभ लीला देखलैन मुदा बजला किछु ने। मुदा मनमे एते उठबे करैत रहैन जे एक परिवार रहितो कियो अपना मनक धारमे भँसिया रहल अछि तँ कियो जीवनकेँ धार बुझि पार होइक ओरियान कऽ रहल अछि। ..मुदा लगले दादीक ओ रूप सोझहामे आबि गेलैन जे संग मिलि केहनो रौद रहौ कि बरखा हौउ आकि जाड़े-ठाढ़ रहौ, एते तँ गुण छैन्‍हे जे जाधैर काजमे जुटल रहै छी ताधैर पार्वती सेहो समयकेँ बिनु ठेकनौनौ जुटल रहै छैथ। यएह ने भेल संगीक संगपना, जे गुण पार्वतीकेँ शुरूहेमे धेलकैन से अखनो धेनहि छैन। ओना उमेरोक हिसावे आ समैयोक हिसावे काज बदैल गेल छैन, मुदा काज करैक जे उत्‍साह आ जिज्ञासा शुरूसँ धेलकैन ओ अखनो धेनहि छैन। पत्नीपर सँ नजैर उतैर भोला नाथ बाबाकेँ अपनापर एलैन। अपनापर अबिते मन ठमकलैन। मुदा ठमकला कनीए कालक पछाइत मन घुसैक कऽ शासन आ सत्ता दिस बढ़ि गेलैन। सत्ता दिस नजैर बढ़िते हँसी लगलैन। हँसी ई लगलैन जे जइ सत्ताक पाछू पत्र-पत्रिका, रेड़ियो, टी.भी, इन्‍टरनेट सभ सहयोगी अछि तैठामक आम-अवामक जे समस्‍या अछि आ सरकारक जे समाधान छइ, से लोक बुझिये ने रहल अछि जइसँ ओकर लाभ उठौत। ..मनमे अबिते भोला नाथ बाबा गुनधुन करए लगला जे एना किए भऽ रहल अछि? ..एक दिस देखै छी जे धिया-पुताक कलम-किताब आ स्‍कूलक बैग तकक माध्‍यमसँ प्रचार भऽ रहल अछि आ दोसर दिस सभ शून भेल बैसल अछि। ..मुदा लगले भोला नाथ बाबाक मन उचैट कऽ फेर अपनेपर आबि गेलैन। अपनापर अबिते बुदबुदेला» “जानए जअ आ जानए जत्ता। जखन राज सत्तासँ कोनो मतलब नइ अछि तखन ओइ पाछू माथे धूनब फाजिल हएत। जँ एते माथ अपना-ले धूनब तँ अपनो कल्‍याण हएत, परिवारो-समाजक हेतइ आ देशो-दुनियाँक हेतइ। पाँच बीघा जमीन अछि, जेकर मालगुजारी सरकारकेँ दइते छिऐ, ओही जमीनक ने उपजा-बाड़ीसँ अपनो आ परिवारो ठाढ़ अछि। जँ कनियोँ नजैर सरकार आकि सत्ताक रहैत तँ ओहो ने अपन देशक सम्‍पैत[1] बुझि सहयोग करितए, सेहो तँ नहियेँ अछि। लऽ दऽ पाँच बीघा जमीनक माटि अछि, जेकरा उपजबै-ले पटौनीक संग-संग नीक बीआ, नीक खादक खगता अछि, से पुरौनिहार के अछि। जखन अपने केने होइए तखन अनकर भरोसे केते। सहजे तँ इनारेमे भाँग घोरा गेल अछि तखन तँ जीविते छी सहए बहुत भेल।” सितम्‍बर 1929 ईस्‍वीमे भोला नाथक जन्‍म एकटा साधारण किसान[2] परिवारमे भेलैन। गाममे तँ ओअरे प्राइमरी धरिक स्‍कूल, मुदा कोस भरि हटि दोसर गाममे मिड्ल स्‍कूल रहइ। गौरी नाथक बहुत इच्छा रहैन जे बेटाकेँ पढ़ा-लिखा एक सुशिक्षित नागरिक बनाबी मुदा अंग्रेजी शासन रहने विचारमे बाधा रहबे करैन। पाँच बर्खक पछाइत भोला नाथकेँ पिता स्‍कूलमे नाओं लिखा देलखिन। साले-साल आगू बढ़ैत भोला नाथ सतमामे पहुँचल। 1942 ईस्‍वी। अंग्रेजी शासनक खिलाप गामे-गाम आन्‍दोलन पसैर गेल। जइ स्‍कूलमे भोला नाथ पढ़ै छला, ओइ स्‍कूलमे पाँचटा शिक्षक,जइमे चारि गोरे तँ अपनाकेँ शिक्षक बुझि आन्‍दोलनसँ हटल रहला मुदा पाँचम– देवकान्‍त बाबू आन्‍दोलनमे कुदि पड़ला। जखन सौंसे देशक लोक अपन-अपन स्‍वतंत्रताक भागीदारी दर्ज करा रहला अछि तखन हमहूँ तँ अही गुलाम देशक एक पढ़ल-लिखल नवयुवक छी। कहिया-ले ई जुआनी राखब। ..यएह सोचि देवकान्‍त बाबू अजादीक आन्‍दोलनमे कुदल रहैथ। दस-बारहटा स्‍कूलक विद्यार्थी सेहो संग देलकैन। मुदा जहिना रामकेँ बानर-भालू संग देने रहैन तहिना देवकान्‍तो बाबूकेँ बाल-बोध संग देलकैन। ओना, गामे-गाम आन्‍दोलन पसरल रहबे करइ तँए संगीक अभाव नहियेँ रहैन। ओही समैमे भोला नाथ दसो-बारहो विद्यार्थीक संग अजादीक आन्‍दोलनमे आगू बढ़ला। जहिना कोनो तीर्थ-व्रत करैले लोक संगी भँजियबैए तहिना देवकान्‍त बाबू सेहो नजैर खिड़ा भँजियौलैन। गाममे गाँधीजी आन्‍दोलनक ऐगला बाहन रहैथ। ओना, गॉंधीजीक असल नाओं रघुनन्‍दन रहैन जे 1921 ईस्‍वीमे गाँधीजीक नाओं सुनि आन्‍दोलनमे कुदल रहैथ। 1934 ईस्‍वीमे जबरदस भुमकम भेल छल, जहिना 1988 ईस्‍वीमे भेल तहूसँ नमहर। केतेको लोक मरल, केतेको घर-दुआर खसल, केतेको नीक खेत बाउलसँ बलुआहा खेत बनि गेल। ओही भुमकममे जे सहयोग-ले अन-पानि कपड़ा-लत्ता, गाममे भेटलैन, ओइ सहयोगकेँ तेते इमानदारीसँ रघुनन्‍दन बँटलैन जे गामक लोक ‘गाँधीजी’ कहए लगलैन। ओना, जेते भुमकम पीड़ित गाम छल, अकसरहाँ गामकेँ सहयोग भेटल, मुदा गामक जे अगुआ सभ छला ओ आधा-छिधा बँटबो केलैन आ आधा-छिधा अपनो रखि लेलैन। ओना, जखन देवकान्‍त बाबू आनन्‍दोलनक संकल्‍प मनमे रोपि विद्यालय छोड़ि विदा भेला तखन चारू शिक्षक, जे आन्‍दोलनमे नइ बढ़ला, देवकान्‍त बाबूकेँ मनाही केलकैन जे नइ जाउ। मुदा किनको बात नहि सुनि देवकान्‍त बाबू विद्यालयसँ निकैल गेला, जिनका संग दस-बारहटा विद्यार्थी सेहो देलकैन। जइमे भोला नाथ सेहो छल। विद्यालयसँ निकैल दसो-बारहो विद्यार्थीक संग देवकान्‍त बाबू एकटा आमक गाछक छाहैरमे बैस विचार करए लगला। विचारमे एलैन जे जइ बाल-बोधकेँ संग नेने जा रहल छी, ओ मनसँ जा रहल अछि आकि होहामे जा रहल अछि। तँए सबहक मनक बात बुझैले एका-एकी सभकेँ पुछलखिन। उत्‍साहित बाल-बोध सभ हँ-मे-हँ मिला देलकैन। हँ-मे-हँ मिलिते देवकान्‍त बाबूक मन कशललैन। कलशलैन ई जे ऐ जत्‍थाक नेतृत्‍व करैक भार ऊपर आबि गेल। आब तँ अपने ने विचार करए पड़त जे केतएसँ शुरू करब? ..मन ठमकलैन, ठमैकते आन्‍दोलनक सीमांकन केलैन। एक दिस दिल्‍लीक गद्दी आ दोसर दिस गाम-गामक लोकसँ लऽ कऽ खेत-पथार धरि दाबल अछि। तैठाम जँ गामक लोक गामसँ आन्‍दोलन शुरू नइ करत तखन तँ गामे छुटि जाएत। गामे-सँ-गाम जोड़ि ने जिलो-जबार आ राजो-देश बनल अछि। देवकान्‍त बाबू दसो-बारहो आन्‍दोलनकारी सभकेँ संग नेने गाँधीजी माने रघुनन्‍दन ऐठाम पहुँचला। पनरह-बीस गोरेक संग गाँधीजी आन्‍दोलनेक विचार कऽ रहल छला। कियो रेलवेक पटरी उखाड़ैक विचार दइ छेलैन, तँ कियो पोस्‍ट ऑफिसमे आगि लगबैक, कियो गोरा-सिपाहीक रस्‍ताकेँ अवरूद्ध करैले पुल तोड़ैक विचार दइत रहैन...। मुदा जाबे कोनो एकमुहरी विचार नइ भऽ जाएत ताबे आगू केना बढ़ल जा सकैए। ..अही गुनधुनमे सभ कियो विचार करिते छला कि देवकान्‍त बाबू अपन जत्‍थाक संग पहुँचला। बाल-बोधक जत्‍था देख सभ आन्‍दोलनकारी खुशियो भेला आ छगुन्‍तोमे पड़ला। खुशी ई भेला जे जखन कोनो देशक बच्‍चा-बच्‍चा अपन देशक गरिमा बुझत तखन ओ देश अजादक कोन बात जे एक सुसम्‍पन्न देश सेहो बनबे करत। आ छगुन्‍तामे ई पड़ला जे बाल-बोध केना पैघ-सँ-पैघ यातना सहि सकैए! गाँधीजी देवकान्‍त बाबूकेँ पुछलखिन» “देवकान्‍त बाबू, समाजक पढ़ल-लिखल लोक तँ अहीं सभ छी, केना आगूक कार्यक्रम बनाएब?” गाँधीजीक प्रश्‍न सुनि देवकान्‍त बाबू ठमकला, मुदा ई जगह तँ कोनो प्रश्‍नक निर्णायक उत्तर दइबला नइ छी, अपन विचार रखैक छी, जे निर्णायक दौड़मे अछि। ..देवकान्‍त बाबूक नजैर तखन भोले नाथपर रहैन। हीगर-पुष्‍टगर भोला नाथ रहबे करए। ओना, छल बारहे-तेरह बर्खक मुदा रहए कलशगर। सदिकाल कानो आ कन्‍हो उठौनहि रहै छल। ..देवकान्‍त बाबू बजला» “जखन अंग्रेजी शासन तोड़ए चाहै छी तखन ओकर डारि-पात सभकेँ तोड़ए पड़त। नइ तँ जहिना कोनो बर-पीपरक गाछकेँ जड़ि काटि खसा देबइ आ ओकर डारि-पात, फूल-बीआ रहबे करतै तखन तँ ओ फेर गाछ हेबे करत।” देवकान्‍त बाबूक विचारपर सभ बुजुर्ग आन्‍दोलनकारी विचार करए लगला। अन्‍तो-अन्‍त विचार भेल जे गाँधीजीक मुहेँ बजौल गेल» “पहिने थानाक चौकी जे चौकीदारक जिम्‍मामे छइ, ओकर बरदी-मुरेठा छीनि कऽ आइ जरा देब अछि।” गाँधी जीक संग सभ कियो विदा भेला। ..गाममे दूटा चौकीदार दुनू गामेक। दुनू गोरेकेँ भाँज लगि गेल जे बरदी-मुरेठा जरबैक विचार आन्‍दोनकारी कऽ लेलक अछि। दुनू चौकीदार विचारलक जे अनेरे गौंआँ हाथे मारियो खाएब आ समाजिकता सेहो टुटत, तहूमे अंग्रेजी सरकार कि अपना देशसँ रूपैआ आनि दरमाहा दइए। ओकर कि कोनो नून-हरदी खाइ छिऐ। गौंऍं ने आठअना-एक-रूपैआ चौकीदारी दइए जइसँ पनरह-पनरह रूपैआ दुनू गोरेकेँ दरमाहा भेटैए। खाली बरदी देने अछि आ लऽ दऽ कऽ चारि हाथ मुरेठाक कपड़ा देने अछि। ..किए ने अपन समाजिकता राखब। सएह केलक। ओही मुरेठा जरबैक घटनामे देवकान्‍तो बाबू आ भोलो नाथ जहल गेला। पहिल बेर, देवकान्‍त बाबू सन 1942 ईस्‍वीमे तीन बर्ख धरि जहलमे रहला आ भोला नाथ छबे मासमे नवालिक दुआरे छुटि कऽ एला। भोला नाथक जिनगी सन 1942 ईस्‍वीक आन्‍दोलनसँ शुरू भेल समाजसँ अपन अलग रूपमे अपन जिनगीक क्रिया-कलाप अपनौलैन। आन्‍दोलन बढ़ैत गेल, भोला नाथक जहल यात्रा सेहो बढ़ैत गेलैन। देशक सत्ता विदेशीसँ देशीक हाथमे आएल। आने जकाँ भोलो नाथ स्‍वतंत्र देशक साँस लेलैन। ओना, अजादीसँ पूर्ब आ 1942 ईस्‍वीक बीच भोला नाथ आरो तीन बेर जहल गेल छला। समाजोक बीच विचारमे बदलाव आबि चुकल छल। बदलाव ई जे अखन तक समाजमे एहेन धारणा बनल छल जे जहल जाएब पाप छी आ पापीए-ले जहल अछि, माने जे पाप करैए सएह जहल जाइए। तीन भाए-बहिनक बीच भोला नाथ। दू बहिनक बीच जेठ भोला नाथ। पिता राधा मोहनकेँ पुश्‍तैनी पाँच बीघा जमीन। समयानुसार जिनगी बना परिवारकेँ अखनो ओहिना जीवित रखने छैथ जहिना बाबाक अमलदारीमे रहैन। देशेक बीच अजादीक विर्ड़ो उठल, गाम-गामक नवयुवको आ समझदारो सभ आन्‍दोलन कऽ रहला अछि तँए कहियो भोला नाथकेँ पिता ई नइ कहलखिन जे बौआ आन्‍दोलन अधला छी...। नव उमेरक भोला नाथक मनमे बैस गेल छल जे आन्‍दोलनेसँ अजादियो भेटत आ अजादीक पछातिये अजाद भऽ कियो अपन जिनगीकेँ अजाद बनौत। तैसंग जहलमे ईहो आन्‍दोलनकारी सभसँ सीख नेने छला जे अपन देश आइये नइ बहुत दिनसँ गुलामीक शिकंजामे कसल आबि रहल अछि। गुलाम देशक आम-अवामक जिनगीकेँ तोड़ैत-तोड़ैत एते तोड़ि देल जाइए जे मनुखक जिनगीकेँ पशुवत बना दइए। जइसँ चीन-पहचीन रहिये ने जाइए। भोला नाथ जखन उन्नैसम बर्खमे पहुँचल तखन राधा मोहन कहलखिन» “बौआ, आब तँ हमहूँ चारिमे सीढ़ीमे पहुँचब, दुनू बेटीक बिआह भाइये गेल, माता-पिताक जिनगीक अन्‍तिम क्रियो-कर्मसँ निवृत्त भाइये गेल छी, खाली तोरे बिआह-टा पछुआएल अछि।” पिताक विचारकेँ स्‍वीकार करैत भोला नाथ बाजल» “बाबू, परिवारक जे ढर्रा बनि गेल अछि तइ अनुकूल मानि गेलौं मुदा परिवारक संग समाजोक सेवा करबे करब।” बेटाक विचारसँ सहमत बनबैत राधामोहन बजला» “जाबे जीबै छी ततबे दिन ने, मुदा पछाइत तँ अपने निमाहए पड़तह।” ओना, अखन तक परिवारक कोनो भार भोला नाथक ऊपर नइ पड़ल छल तँए भारक-भारीपन बुझबे ने केलक आ बाजल» “बड़ बढ़ियाँ।” भोला नाथक बिआहो भेल। जहलमे एते भोला नाथ बुझि गेल छल, पैघ-पैघ विचारकक विचार सुनि, जे पहिने परिवारसँ गाम, गामसँ जिला-जबार होइत राज्‍य-देशकेँ जानब अछि, तइले अध्‍ययनो आ देशाटनो जरूरी अछि। तहूमे पिता जीवित छैथ तँए अखन मौका अछि। सएह केलैन। जहिना कोनो तीर्थ स्‍थानक कियो तीन-पेखैन करैत तहिना भोला नाथ सौंसे देशकेँ तीन बेर भ्रमण करैत देशक समाजिक आर्थिक अध्‍ययन देखियो कऽ आ किताबो पढ़ि कऽ बहुत किछु जानि चुकल छला। दस बर्खक पछाइत माता-पिताक अन्‍त भेलैन। परिवारक भार भोला नाथकेँ अपना ऊपर ओइ रूपे आएल जे पिताक अमलदारीमे पाँच गोरेक परिवार छेलैन जे अखन  छअ गोरेक भऽ गेल अछि। देशक संग गामोक दशा पछुआएले छल। ने खेती-बाड़ीक समुचित बेवस्‍था आ ने पढ़ै-लिखैक स्‍कूल-कौलेजक सुविधा आ ने बर-बेमारीक इलाजक समुचित सुविधा। ओना, लहेरियासराय अस्‍पताल आ ठाम-ठाम स्‍कूलो-कौलेज खुजि गेल, मुदा आवश्‍यकतानुकूल नहि। अपन पाँचो बीघा जोतसीम जमीनकेँ भोला नाथ एकठाम केलैन। माने गौंआँ सभसँ अदैल-बदैल, एकटा बोरिंग गड़ा खेतक पानिक सुविधा बनौलैन। एक जोड़ बरद आ एकटा महींस सभ दिने परिवारमे रहलैन जेकरा समुन्नत बनौलैन। समुन्नत ई जे महींसक सेवासँ कम्‍मो सेवामे गाइक सेवा होइ छइ, परिवारमे जेते करताइत अछि तही हिसावसँ ने परिवारक काज ठाढ़ हएत। ..काज करैबलाक हिसावसँ अपन काजक रूप-रेखा बना भोला नाथ काजकेँ बदलबो केलैन आ निरमेबो केलैन। समैक संग अपन जिनगीकेँ ताल-मेल बैसबैत परिवारक गाड़ीकेँ भोला नाथ खिंचए लगला। खेती-पथारी आकि किनो आमदनीक जड़ि समैक अनुकूल घटौलो-बढ़ौलो जा सकैए। मुदा मनुखक जनमसँ लऽ कऽ धरम-करम धरिक जिनगियो तँ परिवारेमे सृजित होइए। तइमे भोला नाथ बाबा स्‍वतंत्र देशक, स्‍वतंत्र जिनगीक संग जीविये रहला अछि। ◌ शब्‍द संख्‍या : 2357, तिथि : 17 अगस्‍त 2016 दुरकाल ‘दुरकाल’क अर्थ भेल ओहन काल जे जिनगीक अनुकूल नइ भेल। दोसर भेल ‘काल’ जे ने जिनगीक बेसी अनुकूल भेल आ ने बेसी प्रतिकूल भेल आ तेसर भेल ‘सुकाल’ जे जिनगीक अनुकूल भेल। बहुत बर्खक पछाइत एहेन ‘दुरकाल’सँ किसान सभकेँ भेँट भेलैन, किसाने-टा नहि मनुख-मात्रेकेँ भेँट भेलैन। ओना, पनरह बर्ख पहिनौं एहेन समय भेल छल, आ तइसँ पूर्ब 1981 ईस्‍वीमे सेहो भेले छल। मनुखेक इतिहास जकाँ समैयोक इतिहास अछि, जइमे उपजा-बाड़ीसँ लऽ कऽ जिनगीक दशा तकक वृतान्‍त सेहो ऐछे। केते दिनपर केहेन भुमकम भेल, केहेन बरखा कहिया भेल, केहेन रौदी कहिया भेल, केहेन झाँट-बिहाड़ि कहिया आएल इत्‍यादि..। मुदा ई तँ समयक गति-विधि छी, हेबे करत। तहूमे बेठेकान हएत। तैबीच ईहो तँ सच ऐछे जे देशक सवा अरब लोकक पूर्वज सेहो जीवित धारमे बहैत आबिये रहला अछि। जँ से नइ जीवित अबैत रहितैथ तँ आइ हम-अहाँ केना छी? तँए दुनू संगे-संग अबितो रहल अछि आ आगूओ रहबे करब...। दरबज्‍जापर बैसल शिव शंकर काका मने-मन दुनियाँक संग-संग अपन परिवारोकेँ तजबीज काइये रहल छला कि मौलाएल सरूप पहुँचल। ओना, तजबिजोक अपन-अपन ढंग अछि, कियो बैसले-बैसल दुनू आँखि मुइन तजबीज करै छैथ, तँ कियो ओछाइनपर पड़ल-पड़ल, तहिना कियो दुनू आँखि तकैत तजबीज करै छैथ, तँ कियो दुनू हाथे काज करैत आ दुनू आँखि तकैत सेहो तँ करिते छैथ। ..शिव शंकर काका दुनू आँखि तकैत तजबीज करै छला तँए सरूप लालकेँ पहुँचते देख लेलैन। देखते बजला» “सरूप, बहुत दिनक पछाइत नजैरपर चढ़लह अछि?” शिव शंकर कक्काक आगूमे बैसल सरूप लाल बाजल» “काका, की नजैरपर चढ़ब, जीब कठिन अछि! गाम छोड़ि पड़ाए पड़त।” सरूप लालक बात सुनि शिव शंकर काका ठमैक गेला। ठकमुराइत मने-मन विचार करए लगला जे मिसियो भरि सरूप लाल झूठ नइ बाजल अछि। कहलो गेल छै जे ‘कंगनाकेँ देखैले ऐनाक खगता थोड़े पड़ै छइ।’ ओ तँ आँखिक सोझहेमे अछि। अखनो तँ ओही बीच छी। मुदा सरूप लालक बेथित मनकेँ जँ सुथित नइ बना देबै तखन तँ आरो जे छह मासमे मरत आकि गाम छोड़ि पड़ाएत, से लगले पड़ा जाएत।..अपनाकेँ समरस बनबैत शिव शंकर काका बजला» “सरूप, तोहूँ सभ दिन एके रंग रहि गेलह!” ‘सभ दिन एके रंग’ सुनि सरूप लाल चौंकल। चौंकल ई जे काका की कहि देलैन जे ‘सभ दिन एके रंग रहि गेलह!’ लोक केना सभ दिन एके रंग रहत? जखन बच्‍चासँ चफलगर होइत सियान बनैत अधवेसू बनैत बुढ़ भऽ कऽ मरि जाइए। तखन ओ एक रंग केना भेल रहत?..मुदा लगले सरूप लालक मन घुमलै। घुमिते ठमकलै। ..ठमकलै ई जे शिव शंकर कक्काक बात आकि विचार तँ कहियो हूसल नइ भेलैन अछि आ ने कहियो कोनो हूसल विचारे देलैन। तखन एहेन जँ कहलैन तँ हुनको अपन विचार हेतैन। तँए पुछि लेब नीक हएत। सरूप लाल बाजल» “काका, एके रंग की कहलिऐ से नीक जहाँति नइ बुझि पेलौं।” सरूप लालक जिज्ञासा देख शिव शंकर कक्काक मन मणियेलैन। मणियाइते बजला» “सरूप, जहिना तूँ धिया-पुतामे डरबुक छेलह तहिना अखनो छहे।” सरूप लालक मनमे आरो ओझरी लगि गेल। तहूमे पेरासूत जकाँ दोहरी ओझरी भऽ गेलइ। पहिल ‘एकरंग’ दोसर ‘डरबुक’ जहिना धिया-पुतामे डरबुक छेलौं तहिना अखनो छीहे..! अपन विचारो आ काजोक बुझैक लूरि अपने भेने जहिना बुझनिहारक मनमे खुशी उपकै छै तहिना सरूप लालकेँ उपकल। मनमे उपकल यएह भेल जिनगीक रंग। मुदा जखन एके मंत्रकेँ बेर-बेर जपल जाइए, तहू पाछू तँ किछ कारण हेबे करत, तँए किए ने कक्केसँ दुनू शब्‍दक माने पुछि लिऐन। बाजल» “की डरबुक छी काका?” सरूप लालक प्रश्‍न सुनि शिव शंकर काका मुस्‍कियेला। ओना, कक्काक मुस्‍की देख सरूप लालक मनमे शंका उठल। शंका ई उठल जे भरिसक काका कोनो डेराएल काज देखलैन तँए मुस्‍की मारि रहला अछि! मुदा सरूप लाल पाछू दिस नजैर खिड़ौलक तँ केतौ किछु ने देख पड़इ। लगले मनमे होइ जे देखैयोक तँ अपन-अपन नजैर होइए। कोनो चीजपर जँ हमर नजैर नइ जा रहल अछि एकर माने ईहो तँ नहियेँ हएत जे ओ चीज ऐछे नहि। ..सरूप लाल बाजल» “काका, कनी अपन विचारकेँ फरिछा दिअ।” ‘अपन विचार फरिछा दिअ’ सुनि शिव शंकर काका मने-मन तजबीज करए लगला जे कोन रूपे फरिछाएब नीक हएत, जे बात वा विचार करए चाहब ओ नीक जकाँ ओहिना हू-बहू बुझि जाएत। बुझनिहारो तँ रंग-रंगक अछि। कियो हू-बहू ओहिना बुझनिहार अछि तँ कियो बेसियो बुझनिहार अछि आ कियो जेतबो अछि तहूसँ कम बुझैबला अछि। ..मुदा लगले मन हरिया गेलैन। हरिया ई गेलैन जे सरूप लालसँ की कोनो आइए-टा भेँट भेल अछि जे नइ चिन्‍है छिऐ। बेसी काल एकठाम बैस अपनो परिवारक आ गामो-समाजक गप-सप्‍प करिते छी...। शिव शंकर काका बजला» “सरूप, कोनो कि अही बेर एहेन दुरकाल समए भेल हेन जे डरे पड़ा जेबह। जिनगीमे समैसँ कहियो डर नइ करी। केहनो समए किए ने हुअए, ओकर मुकाबला करी।” ‘समैसँ मुकाबला करी’ सुनि नहाएल चिड़ै जकाँ पाँखि झाड़ि सरूप लाल बाजल» “काका, कहलिऐ तँ बेस बात मुदा...।” ‘मुदा’ सुनि शिव शंकर काका बुझि गेला जे जहिना रस्‍ता चलैत बटोहीकेँ आगूमे टुटल रस्‍ता वा खच्‍चा वा काँट-कुशसँ घेरल देख पएर अँटैक जाइ छइ, भरिसक तहिना सरूपो लालकेँ भऽ रहल छइ। मुदा चलैक ने रस्‍ता एकटा होइए, जिनगीक तँ से नइ अछि। अनेको रस्‍ते एक दिन, एक क्षण चलए पड़ै छइ। तँए कोन रस्‍तामे बाधा उपस्‍थित भेलै जे गामे छोड़ि पड़ाए चाहैए वा जिनगीए-सँ हाथ धोइक परिस्‍थिति बनि गेल छइ, ओ तँ जाबे खुलि-खरियारि कऽ नइ पुछि लेब ताबे नीक जकाँ उत्तर केना दऽ पेबइ। उत्तर तँ ओ ने भेल जे समस्‍याकेँ निच्‍चाँ उताइर टपि जाइ। ..शिव शंकर काका बजला» “सरूप, दुनियाँमे एहेन कोन रोग अछि जेकर दवाइ नइ छइ, आ एहेन कोन प्रश्‍न अछि जेकर उत्तर नइ छइ आकि एहेन कोन समस्‍या अछि जेकर समाधान नइ छइ।” ओना, जहिना सरूप लाल लहका बंशी जकाँ अन्‍दाजे खेल रहल अछि तहिना शिवशंकरो काका खेला रहला अछि, तँए प्रश्‍नोत्तरी भेला पछाइतो प्रश्‍न हेराएले छैन, मुदा तैयो दुनू गोरे मने-मन गुड़-चाउर तँ खाइये रहला अछि। तैबीच सरूप लालक मन कलशल। होइतो अहिना छै जे पात झड़ल गाछ हुअए आकि अधसूखू गाछ हुअए–अधसूखू गाछ जीवित-सूखल केर बीच बँटाएल रहैए, तइमे जेमहरसँ जीवित रहल–वसन्‍तक समय पबिते कलैश जाइए तहिना वसन्‍ती विचारसँ सेहो मन कलैशते अछि,सएह सरूप लालकेँ भेल। मन कलैशते सरूप लालक मुँहक टुसी खिलल। खिलते  खिल-खिलाइक खेल खेलए चाहक मुदा विवेकी विचार रोकि देलकै। ओना, शिव शंकर काका सरूप लालक मुँहक टुसीसँ बुझि गेला जे सरूपक मन पाहिपर चढ़ि गेल अछि। मुदा पाहियोपर चढ़ने तँ धड़फड़ीमे पहिया नहियेँ पाबि सकै छी, किएक तँ प्रश्‍नकेँ बिनु पहियेने पाहिपर चढ़ाएब बचपना हएत। तैबीच सरूप लालक मनक टुसी टुसिया कऽ नव पातक रूप पकैड़ लेलक। मुस्‍की दैत बाजल» “काका, ऐ बेर भगवान सोलहन्नी बेपाट भऽ दुरकाल बना देलैन!” ओना, शिव शंकर काकाकेँ सेहो देखलो आ भोगलो समय छैन्‍हे। मुदा कालक सीमा तँ ऐछे। केकरो पेटक समस्‍या अछि, केकरो घरक अछि, केकरो बर-बेमारीक अछि, तँ केरो बाल-बच्‍चकेँ पढ़ै-लिखैक, तैठाम जँ फुटा कऽ नइ बुझि लेब तखन ओकर समाधानक समुचित उपाय केना हएत। ओना, तैयो शिव शंकर काका अनुभवी डाक्‍टर जकाँ चेहरेसँ बेमारीकेँ अँकैत रहैथ, मुदा रोगीक बिनु हाल-चाल बुझबो अधखिजुए भेल। ओना, शिव शंकर कक्काक अपन आत्‍माराम गवाही दइते रहैन जे सरूप लालकेँ परिवार नमहर छइ, खेते-पथार-टा जीविका छइ,असगरूआ समांग अछि, तैपर अभागल एहेन अछि जे अनेने चारि गोरेक परिवार आरो बढ़ि गेलइ। ..फेर लगले मनमे एलैन जे जे कियो बेल खाइए अपना अँतड़ी भरोसे आकि अनका भरोसे, कियो ताड़क गाछ आकि नारिकेलक गाछ रोपैए अपना हाथ-पएरक भरोसे आकि अनाका भरोसे। ..शिव शंकर कक्काक मन ठमैक गेलैन। आगू बजैक हिम्‍मते ने होइन। मुदा जइ समस्‍याक जिज्ञासासँ गप-सप्‍प शुरू भेल ओ तँ आगूमे ऐबे ने करत। तखन मुहोँ चुप राखब नीक थोड़े हएत। ..आगू-पाछूक विचार करैत शिव शंकर काका बजला- “दुनियाँ बड़ भारी अछि। खोजनिहार सभ अपना-अपना ताले खोजि रहला अछि, कियो मेघमे लोहापर उड़ि रहला अछि, तँ कियो धरतीमे सोना उपजा रहला अछि, तँ कियो खानसँ सोना खुनि रहला अछि। मुदा जहिना सभकेँ अपन-अपन जिनगीक बाट बनल छैन जे अपना-अपना बाटे कियो दौगियो कऽ तँ कियो रसो-रसो रमि रहला अछि, तहिना ने अपनो सबहक जिनगीक आगू टपान अछि जेकरा अपने टपब।” शिव शंकर कक्काक विचार सुनि सरूप लालक मन झुझुअए लगल। झुझुअए ई लगल जे भरिसक हमर बात काका कातमे रखए चाहै छैथ, आ दुनियाँक बीच वौआबए चाहै छैथ! ..दुनियाँमे केकरा-ले के अछि, मुदा अपना-ले तँ सभ अपना-अपनी-के ऐछे। अपन समस्‍या जाबे काकाकेँ नहि कहबैन ताबे समधानल जवाब थोड़े भेटत। बाजल» “काका, ई साल जहिना शुरू भेल तहिना अन्‍तो-अन्‍त भऽ रहल अछि। तैबीच केना जीब?” ओना, सरूप लाल अखनो काते-कात प्रश्‍नकेँ घुमा रहल अछि, मुदा शिकारी जहिना बोनक चारू कात रस्‍ते-रस्‍ता देखैए, किसान बाधमे देखैए तहिना शिव शंकर काका सेहो देख तँ रहला अछि, मुदा घिरनीबला बंशी खेलेनिहार जकाँ, तँए मनमे कोनो औगताइ रहबे ने करैन। तहूमे मन गवाही दैन जे एहेन जे बुड़िवाण अछि जे घरमे अखैन सिदहा नइ हेतइ आकि कोनो आने वौस नइ हेतइ, मुदा तेकर ओरियान छोड़ि बात बनबैए! मुदा लगले मन रोकि कहलकैन। सरूप लालेकेँ एहेन किए बुझब। एते तँ देखते छी जे दस-एगारह गोरेक परिवार अपना बाँहु-बले चलाइये रहल अछि। सेहो जे चला रहल अछि ओ ओही बपौती खेत-पथारकेँ जोति-कोरि कऽ किने। अनका जकाँ थोड़े अछि जे मनोरंजनक रूपमे ताश खेलैत जुआक पाशा बना पान-साए-हजार जीत कऽ आनत आकि बुड़ौत। तेतबे किए, शास्‍त्रो-पुराण कि कोनो झूठ कहैए जे जुआ खेलब अधला छी। जँ अधला रहैत तँ कृष्‍णक बीचमे दुनू भैयारी कौरब-पाण्‍डव खेलबे करैत। जइ काजकेँ शास्‍त्रो-पुराण अधला नइ कहि कर्मक्षेत्र कहियौ कि कुरूक्षेत्रक लेल उचित ठहरौने छैथ, ओ अधला केना भेल जे कियो ओकरा अधला बुझि वर्जित करत? ..मनक अपने विचारमे शिव शंकर काका ओहिना ओझरा गेला जहिना केकरो अपने पाइक खगता रहनौं जोगारक पाछू रहैए आ तैबीच जँ कियो जोगारी जानि कऽ पाइक मांग करइ, आ तखन जहिना मन तबैए तहिना तरे-तर शिव शंकर काकाकेँ सेहो हुअ लगलैन, मुदा प्रश्‍न तँ एहेन ऐछे जे अपन जोगार भोजनक लेल पाइयक अछि आ दोसरकेँ बर-बेमारीक इलाजक लेल, ओना बरो-बेमारीक महत केतौ-केतौ भोजनसँ कम्‍मो अछि आ केतौ-केतौ बेसियो, मुदा लतड़ल मनक विचारकेँ समेट शिव शंकर काका सरूप लालक मनक मलिन प्रश्‍नकेँ, कोनो वस्‍तुकेँ जहिना पत्तरक चुट्टासँ पकड़ल जाइत, तहिना चुट्टी जकाँ पाते-पात टहलैबला विचारकेँ बिच्‍चेमे पकड़ैत बजला» “सरूप, मनुखो बड़ अखज होइए!” ‘अखज’ सुनि सरूप लाल चौंकल। चकोना होइत बाजल» “से की कहलिऐ काका?” सरूप लालक पिपाशु मन देख शिव शंकर कक्काक मन गवाही देलकैन जे सरूप लाल पाहिपर चढ़ि गेल। आब पहियबैमे देरी नइ हएत। बातकेँ लतड़बैत बजला» “सरूप, एन-एच. सभपर देखबहक जे गाड़ीमे गाड़ीकेँ जे भिरानी होइ छइ, ओइमे निचेनसँ बैसल यात्री सभकेँ देखबहक जे यात्रामे अछि आ दुनू टाँगे तेना कऽ टुटि गेलै जे अपना बुते उठि कऽ ठाढ़ो ने भेल हेतइ, मुदा ओकरो मन कहै छइ जे यात्रा नइ पूरत आकि नइ पहुँचब?” शिव शंकर कक्काक विचार सरूप लालक मनकेँ जेना बेधलक। होइतो अहिना छै जे अस्‍पतालमे आकि कोनो डाक्‍टरक क्‍लीनिकमे एक रोगी दोसरक दुख देख अपनाकेँ आशान्‍वित होइए जे जखन ईहो जीवित जिनगी पेब सकैए तखन हमहीं किए ने पेब। माने ई जे आँगुर टुटल रोगीकेँ गट्टा टुटल रोगीकेँ देखने सवुर होइ छइ, तँ गट्टा टुटल रोगीकेँ बाँहि टुटल रोगीकेँ देखने सवुर होइ छइ। कष्‍ट-पीड़ा भलेँ तरे-तर जेकरा जेते होइत हौउ, मुदा मुँहक चुहचुही थोड़बे बिलाइए। बिलेबो केना करत, दुनियोँ तँ पागलेक छी। सभ पागले अछि, मुर्ख मुरुखपनामे पागल अछि, ज्ञानी ज्ञानपनामे। तहिना कियो इमनपनामे पागल अछि, तँ कियो बे-इमनपनामे। कियो गुणपनामे पागल अछि तँ कियो अवगुणक बोनमे पगलाएल अछि। केकरो अमृत पीलाक पछाइत अमरताक बोध होइ छइ, तँ केकरो मृत मत्तिकापन पिबैमे होइ छइ। ..नजैत मनमे शिव शंकर कक्काक नव विचार जगलैन। बजला» “सरूप, तेहेन दुरकाल समए आबि गेल जे जएह दिन जीबै छी, सहए दिनकेँ लाख बरिस बुझि मनकेँ बुझबै छी।” गरदैन लग तक भरल पानिक बरतनकेँ चुल्‍हिपर चढ़ा निच्‍चासँ आगिक ताउ देलासँ जहिना खौलैत पानि उधिया-उधिया ऊपर अबैत तहिना सरूप लालक मनक विचार तरसँ ऊपर लगल। बाजल» “ऐ बेरक समए, माने ई साले तेहेन कुसमय भऽ गेल जे ऐगला साल पकैड़ पएब कि नहि, से मन नइ मानि रहल अछि।” समुद्रक गहराएल पानि देख जहिना विचार गहराइ छै तहिना सरूप लालक विचार सुनि शिव शंकर कक्काक मन गहराइते कलपलैन। कलैपते बजला» “लोक बजैए जे एके दहारमे किदैन बहार।” शिव शंकर कक्काक विचार सरूप लालक मनमे जेना गहराइसँ गड़ल। गड़िते बाजल» “से की कक्का?” सरूप लालक जिज्ञासा देख शिव शंकर कक्काक मनमे एलैन जे सरूप लालक अशियाएल मन टुटि रहल अछि, जँ अखैन संजीवनी नइ देब तँ हो-ने-हो एके बेर छाती ने कहीं चहैक कऽ टुटि जाइ। तँए जाबे हर्ट-एटेक नइ भेल अछि तइ बीचक जे समए अछि, यएह ओकरा बँचबैक समए छी। ..जहिना मेघनादक वाणसँ लक्ष्‍मणकेँ भेल रहैन जे सुर्योदयसँ पहिने संजीवनी सेवन जँ नइ करौल जेतैन तँ ऐगला दिन मृत्त घोषित भाइये जइतैथ। मात्र किछु घन्‍टाक समए बीचक अछि...। चितवनमे विचड़ैत शिव शंकर काका बजला» “पहिने ई कहह सरूप, जे केते दिन घरक बुतात से काज चलि सकै छह?” शिव शंकर कक्काक विचार सुनि सरूप लालक मन जगलै। जगिते उठलै जे झूठ-फूस नइ बाजब मुदा सतो बाजब कि असान अछि। ओहो तँ कठिन ऐछे। कठिन ई जे अखन तक अपने खेत-पथारसँ आकि आने कोनो उपायसँ उपारजन कऽ आनि पत्नीकेँ सुमझा दइ छिऐन। तखन घरमे की अछि आ की नइ अछि से अपने थोड़े बुझै छी। बुझियो तखने ने सकै छेलौं जखन पत्नी कहितैथ जे चाउर सठि गेल आकि गहुम सठि गेल, सेहो तँ नहियेँ कहली अछि। बाजल» “काका, घरे छी तँए घरक कोठीमे की अछि आ की नइ अछि से केना कहब।” सरूप लालक बात सुनि शिव शंकर काका अपना विचारकेँ आगू बढ़ैसँ रोकि दोसर दिस मोड़ि लेलैन। मोड़ैत बजला» “सरूप, समैक संग मनुखकेँ लड़ए-झगड़ए पड़ै छइ। केहनो समए आगूमे आबए, लड़िये-भिड़ कऽ ओकरा टपि सकै छी। जँ से नइ करब तँ आजुक बाधा व्‍योधाक शिकारी बना शिकार कए लेत। जखने व्‍योधाक शिकार बनब तखने जिनगी विलोप भऽ जाएत! तँए सदिकाल अपनाकेँ जिनगीक संग लड़ैत-भिड़ैत चलैत रही।” ओना, शिव शंकर काका एके साँसमे आरो बाजए चाहै छला, मुदा मनमे भेलैन जे कनछेदन काल बोल-बोधकेँ ओतबे गुड़ खियौल जाइए जेतेक पीड़ा कानछेदनमे होइ छइ। ई तँ नइ ने जे गुड़क चेकीए आगूमे रखि देब। ..बिसमित होइत सरूप लाल बिच्‍चेमे टोकलकैन» “काका, नीक जकाँ अहाँक बात नइ बुझि पेलौं। कनी फरिछा कऽ बुझा दिअ।” सरूप लालक बात सुनि शिव शंकर कक्काक मन पघिल गेलैन। पघिलते मनमे उठलैन जे सरूप लाल अपन जिनगीक सूत्र नइ पकैड़ पाबि रहल अछि। किसान छी, किसानी जिनगी छइ, मुदा किसानी जिनगी धड़धड़ाइत धार जकाँ केना आगू दिस चलैत रहत, भरिसक सरूप सएह नइ बुझि रहल अछि। मुदा प्रश्‍नो तँ जटिल अछि। ने किसानकेँ एक रंग जमीन अछि आ ने करताइते एक रंग छइ। तैठाम सामूहिक विचार करैमे थोड़े कठिनाह तँ ऐछे। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे परिवारो कि कोनो सबहक एके रंग अछि। खगतो तँ सभ परिवारकेँ सभ रंग छइ। तखन तँ भेल जे जेकरा जेते खेत छै आ जेते लोकक परिवार छइ, ओइ दुनूक बीच सामंजस करए। केना खेतमे सालो भरि उपज लागल रहत, जइसँ एकटा घर औत दोसर घरसँ खेत जाएत। तैसंग जे परिवारक श्रमशक्‍ति अछि ओ सभ दिन श्रमशील केना बनल रहत...। मुदा जहिना रोगसँ दाबल रोगीकेँ तत्‍काल दवाइक जरूरत होइ छै नइ कि रोगक जड़ि कारण बुझैक आकि दवाइयेक जड़ि कारण बुझैक। मुदा बिनु बुझनौं तँ स्‍थायी काज नहियेँ चलत। तखन तँ यएह ने नीक हएत जे दवाइक संग-संग रोगोक कारणक उपाय सुझौल जाए। ..मन खनहन भेलैन। खनहन होइते शिव शंकर काका बजला» “सरूप, तोरा ते नइ ठेकान हेतह मुदा हमरा तँ भोगल अछि।” बिच्‍चेमे सरूपलाल टोकि देलकैन» “नइ बुझलौं, काका?” शिव शंकर काका बुझबैत कहलखिन» “1971 ईस्‍वीक बात छी। तइ समए जुआन रही, माने पचीस बर्खक अवस्‍था रहए। अखन तोहर उमेर केतेक छह?” सरूप लाल» “केते भेल हएत! पैंतीस-चालीसक लगधगमे हएब।” शिव शंकर काका» “जहिना ऐ बेर शुरूहे अखाढ़सँ जे सुपाने बरखा हुअ लगल जइसँ धानो दहा गेल आ केते लोकक घरो खसल, तहूसँ बेसी बरखा ओइ साल, 1971 ईस्‍वीमे भेल रहइ। सालो भरि लधनहि रहि गेल छल। ओही बेर बंगला देश पाकिस्‍तानसँ फुटि स्‍वतंत्र बंग-भाषी देश बनल। बड़ भारी लड़ाइ भेल रहइ। देशक ओहन हालत भऽ गेलै जे लोककेँ जीब कठिन भऽ गेलइ। तैठामक लोक तँ एते ठाठसँ जीविते अछि। आ अपना सभकेँ कोन भारी विपैत अछि।” शिव शंकर कक्काक विचार सरूप लालक मनक सोगकेँ जेना थबकल। सोग थबैकते सरूप लाल बाजल» “काका, मनुख ते मनुख छी किने। ओ तँ मनुखे जकाँ ने जीबए चाहत।” सरूप लालक बात सुनि शिव शंकर काका भभा कऽ हँसए लगला। जइसँ जे बात बाजए चाहै छला ओ पेटेमे कुदैत रहि गेलैन। जहिना अबोध बच्‍चा माए-बापक हँसी देख अपन कानब छोड़ि हँसए लगैए तहिना सरूप लालकेँ सेहो भेल। मुदा बाल-बोध बच्‍चासँ भिन्न चेतन बोध होइए। बाजल» “काका, हाथी केतबो नमहर किए ने भऽ जाए मुदा मूसकेँ जे घर बनबैक लूरि छै से ओकरा हेतइ?” सरूप लालक बात शिव शंकर काकाकेँ ओहिना बुझि पड़लैन जहिना एक तीर्थ स्‍थान गेनिहार यात्रीकेँ एके रस्‍ताक ठेकान करब जरूरी होइ छइ। तँए सरूप लालकेँ आगूक बन्‍द बाट देखा अपन जे पएर रोपैक जगह छै तैठामसँ रस्‍ता बनाएब सभसँ बेसी उपयुक्‍तो आ नीको हएत..। बजला» “बौआ सरूप, अपना सभ किसान छी। खेतेक उपजावाड़ी ने जीविका छी। तँए अपन जीविका जहिना फुलाइत-फड़ैत चलत तहिना ने जिनगियो चलत।” जहिना कोनो अनाड़ियो-धुनाड़ीकेँ, माने जे पारखी नइ अछि, जँ रस्‍तापर चमकैत लाल अन्‍हारोमे प्रकाशित मणि देख मनमे नव शक्‍तिक संचार होइ छै तहिना सरूप लालकेँ सेहो भेल। बिच्‍चेमे बाजल» “कक्का, कनी खरियारि कऽ बुझा दिअ।” सरूप लालक बात सुनि शिव शंकर काकाकेँ जेना शिव दर्शनक बोध भेलैन। मुदा लगले मनमे उठलैन जे एहनो-एहनो जगह-स्‍थान तँ ऐछे जेकरा बुझै-बुझबैले शब्‍दे ने अछि। तँए ओहन जगह वा स्‍थानकेँ बुझाएब तँ कनी कठिन ऐछे। मुदा लगले मन खनखना गेलैन। खनखनाइते उठलैन, कोनो भाषा आकि साहित्‍यमे कम शब्‍द अछि, आ कोनोमे बेसी अछि, तँए कि ओइ भाषा आकि साहित्‍यकेँ कमजोरो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। जँ ओ कमजोर भेल तँ ओइ भाषा-भाषी आकि साहित्‍य-साहित्‍यिकीकेँ की कम रस भेटै छैन सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। मुदा लगले फेर भेलैन जे अनेरे मनकेँ वौआबै छी। असल भाषा आ साहित्‍य तँ ओ भेल जेकरा दिअ चाहै छिऐ ओ बुझि कऽ अपनामे ढाइर लिअए...। मन असथिर करैत शिव शंकर काका बजला- “बौआ सरूप, अपना जेते खेत छह, ओकर हिसाव जोड़ि कऽ देखहक जे सालमे ऐसँ केते आमदनी होइए। दाही भेने केतेपर आबि कऽ अँटकै छी वा रौदी भेने केतेपर अँटकै छी। भगवानक भरोस छोड़ि दहक जे नीक समए करबे करता, सालो भरि उपजा-बाड़ी होइते रहत, गुजर-बसर चलिते रहत।” शिव शंकर कक्काक विचार सुनि सरूप लालक मनमे उठल जे शिव शंकर काका ठीके कहि रहला अछि। मुदा हिसाबो जोड़ब तँ कठिन ऐछे...। बाजल» “कक्का, कनी हिसावसँ अपन बात कहियौ।” ‘हिसाव’ सुनिते शिव शंकर कक्काक मनमे खुशी ई उठलैन जे जखने लोक परिवारो आ समाजोक अपन-अपन हिसाव बुझि अपना-अपना हिसावे चलए लगत तखने ने जिनगीक हिसाव हएत। जाबे से नइ हएत ताबे तक तँ ओ बेहिसावेक भेल, जेकर कोनो मोल नइ छइ। ..शिव शंकर काका बजला» “सरूप, सरकारी सेवा बहबाँइर भऽ गेल अछि, मुदा जिनगी तँ क्षण-पलमे चलैए, तँए क्षण-पलक हिसाव जखन भेटत तखने ने ओ हिसावसँ चलि सकैए, जाबे से नइ हएत ताबे तँ जिनगी बेठेकाने बनल रहत किने।” मुड़ी डोलबैत सरूप लाल बाजल» “बेस कहलौं काका।” सालक हिसाव जोड़ैत शिव शंकर काका बजला- “सरूप, चारि मासक बर्खाक समए होइए। माने अखाढ़सँ आसिन तक। ओना बिचला दुनू मास माने सौन-भादो, ढेनुआर भेल, अखाढ़ चढ़ल भेल आ आसिन उतरल भेल। जँ खूब बरखा भेल तँ दाही होइए, बाढ़ि अबैए आ जँ नइ भेल तँ रौदी होइए। यएह भेल रौदी-दाही। मुदा बारह मासक सालमे आठ मास ऐसँ अलग अछि। जेकरा हाथमे आनब अछि। ओना, रौदियो-दाहीक समैकेँ हाथमे आनल जा सकैए, मुदा ओ कनी भरिगर अछि। जैठाम किसानी जिनगीए दबल अछि, तैठाम रंग-रंगक दबौठकेँ एके बेर नहियेँ हटौल जा सकैए मुदा बेरा-बेरी तँ हटौले जा सकैए।” सरूपक मन जेना भरि गेल। बाजल» “काका, अखन जाइ छी, काल्‍हि निचेनसँ आरो बुझब।” ◌ शब्‍द संख्‍या : 3176, तिथि : 22 अगस्‍त 2016 कलंक पैंतीस साल हाइ स्‍कूलमे शिक्षकक नोकरी केला पछाइत सेवा निवृत्त भेला पछाइत जीवन लाल काका अपन गाम जगरनाथपुर आबि गेला। ओना, तीन भाँइक भैयारी छैन मुदा छोट दुनू भाँइकेँ अखन अवस्‍था रहने नोकरी छैन्‍हे। गाममे नइ रहने, परिवार संगे रखने छला,खेतो-पथार, कलमो-गाछी आ घरो-दुआर अनभुआर जकाँ भाइये गेल छेलैन, जे गौंओं बुझै छैन। तँए अपन परिवार आकि अपन सम्‍पैतमे कोनो बाधा बीचमे नहियेँ भेलैन। हजार बीघा रकबाक गाम जगरनाथपुर। जइमे बारहो वर्ण बसल अछि। जइसँ परोपट्टामे जगरनाथपुर सम्‍पन्न गाम मानल जाइते अछि। जे आनो गामबला मानिते अछि आ अपन गाम (माने जगनाथपुर) बला ओइ समृद्धताक (सम्‍पन्नताक) सुखो तँ भोगिते छैथ। सुख ई जे जिनगीक अधिकांश जरूरतक काज गामेमे पुरि जाइ छैन। माने ई जे दैनिक जिनगीक जरूरतक पूर्ति जँ गाममे हुअए तँ यएह ने भेल समृद्धता। ओना लोकोक जिनगी समटल ऐछे, तेकर कारण अछि जे बाहरी वातावरणक प्रवेश आन गाम जकाँ नहियेँ भेल अछि। जहिना पसारी– माने नौआ, धोबि, बड़ही इत्‍यादि अछि जेकर अपन-अपन बेवसाय समाजमे छइ, तहिना गामक किसानो आ बोनिहारो तँ ऐछे। बेवसायिक जाति अपन-अपन बेवसाय करिते छैथ। ओना साएसँ ऊपर किसान परिवार छैथ, मुदा सभकेँ एक-रंग जमीन-जत्‍था नहियेँ छैन। पचासो बीघाबला किसान छैथ आ तीनियोँ बीघाबला छैथ। तहिना बोनिहारोक अछि। किछु एहनो अछि जेकर घरो अनके जमीन वा सरकारी जमीनमे छै आ किछु एहनो अछि जेकरा अपन घर-घराड़ी अछि आ किछु एहनोअछि जेकरा अपन दस-पाँच कट्ठा खेतो छै आ किछु एहनो अछि जेकरा अपन खेत पथार तँ नहि अछि मुदा दस-पाँच कट्ठा बर-बटाँइ सेहो करैए। गामक जमीन सेहो एक रंगाहेअछि। एक रंगाह भेल जे ने बेसी उपरारि जमीन अछि आ ने बेसी चौरी अछि। ओना, चौरीक तँ छुतियो नइ अछि मुदा डेढ़-दू साए बीघा उपरारि अछि जइमे लोक घर-घरारीसँ लऽ कऽ गाछी-कलम लगौने छैथ। ..जहिना सम्‍पन्न गाछी-कलम अछि तहिना बँसवाड़ि सेहो ऐछे। उस्‍सर जमीनक छुटियो गाममे नहियेँ अछि। चालीस-बियालीसटा पोखैर सेहो अछि जे करीब साए बीघा जमीनमे अछि। पोखैरक महारपर बेसी लोकक बास छै। ओना गाम बरह-वर्णा छी, मुदा कोनोजाति एहेन नहि छैथ, जे जमीनेमे आकि जनसंख्‍येमेदोसर-तेसरसँ बेसी अगुआएल छै। चलीस-पचास बीघा जमीनबला पाँच गोरे छैथ जे पाँच जातिक छइ, जहिना साए घरसँ ऊपर जातिबला चारि छैथ, जइमे चारि जातिमे छै। नोकरी-चाकरी चाहे सरकारी हौउ आकि गैरसरकारी, कम लोक करै छैथ। तहूमे ओहन लोक करै छैथ जे समंगर छैथ। सोभाविके छै जे जखन गुजर करै जोकर अपने साधन रहत तखन लोक नोकरीए किए करत। ..ई धारणा पढ़लो-लिखल लोकमे छैन तँए ओहो सभ अपन गिरहस्‍तीकेँ अगुआ कियो माछ उपजबै छैथ, तँ कियो खेतीक संग गाइयो-महींस पोसै छैथ। सबहक (माने पढ़ल-लिखल) मनमे धारणा बनले छैन जे सरकारी नोकरीमे ओतबे दरमाहा भेटैए जइसँ पदक हिसाव, स्‍तरक हिसावसँ जिनगी बना जीब सकै छी। तहिना बोनिहारोक धारणा बनल अछि जे जखन मिहनते केने केतौ गुजर करब तखन जँ गामेमे बारहो मास काज भेटत तखन अनेरे गाम-समाज छोड़ि आन गाम-समाजमे किए जाएब। किए गामक नाक कटेबै जे फल्‍लाँ गामक भिखमंगा भीख मांगए आएल अछि। की ई कहब झूठ अछि जे घरक अदहो पेट भोजन आन घरक भरि पेटसँ नीक होइए। तहूमे समाज अपन खगताक पूर्ति लेल केतेको पावैनक उपास सेहो काइए कऽ अपन साल पुराइये लइ छैथ। ओना अपना ऐठाम किसानी जिनगी अपन समुचित रूप नइ पौने ठूठ भऽ ठूठिया जरूर गेल अछि, मुदा से जगरनाथपुरमे नइ अछि। सबहक मनक विचार एक-रंगाहे छैन जे जहिना तीन साए पैंसैठो दिन (माने सालो भरि) मनुखो आ पशुओकेँ भोजनक संग चैनसँ रहैले घरोक जरूरत होइ छइ, तेतए तँ तीन साए पैंसैठो दिनक प्रबन्‍ध सेहो ने करए पड़त। तहूमे हम सभ ओइ धरतीक वासी छी जैठामक ऋृषि-मुनिक परम्‍परा रहलैन अछि जे आजुक खगताक पूर्तिसँ जँ एको मुट्ठी सिदहाक चाउर काल्‍हि-ले रखै छी तँ अहाँ समाजमे चोर भेलिऐ। ओना ऋृषि-मुनिक जिनगी किसानी जिनगीसँ ऊपर अछि मुदा विचारमे इमाननइ छैन सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। तहूमे जनक सन-सन महापुरुष छैथ जे हरबाहि करैत किसानी जिनगी धड़ैत जोगी-संयासी छला। जगरनाथपुरक बोनिहारोक बीच धारणा बनले अछि ‘लूटि लाउ कुटि खाउ, भिनसर भने फेर जाउ।’ ..जैठाम श्रमक संग जिनगी सटि कऽचलि रहल अछि तैठाम श्रम-साध्‍यमे भेद केना उपस्‍थित हएत। हाथसँ जेते काज भऽ सकैए ओ तँ हाथक काज भेल जेकरा करैले सभकेँ दू-दूटा छइहे। अही दुनू हाथक भरोसे ने बीत भरिक पेट अछि। गाम एला पछाइत जीवन लाल काका एक-पनरहिया अपना रहैजोकर दुआर बनबैमे लगौलैन। पनरह दिनक पछाइत रहैक घर देख नमहर साँस छोड़ि मने-मन विचारलैन जे आइ धरिक जे समाज छल आकि उपैतिक जिनगी छल ओ दुनू हेरा गेल। जखन जिनगीमे दुनू हेरा गेल, तखन आगूक जिनगी-ले रहल की जे अपनाकेँ ओहन बुझब। ..आइ धरि जीवन लाल काकाकेँ एहेन विचार मनमे कहियो ने उठल छेलैन। जहिना तीन भाँइक भैयारीमे दुनू छोट भाए अपन-अपन परिवारक संग बाहरे छैन तहिना दुनू बेटो अपन-अपन परिवारक संग सेहो रहिते छैन। असगरे दुनू परानी गाम आबि शेष जिनगी बितबैक विचार काइये नेने छैथ। ओना जखन मास दिन समए सेवा निवृत्ति होइमे जीवन लाल काकाकेँ रहलैन तखन चाह पिबै काल पत्नीकेँ कहने रहथिन- “ऐ बेरक अद्रा पावैनो आ गुलाब खास आमो निचेनसँ गामेमे खाएब।” ओना अखन धरिक बाहरक अभ्‍यस्‍त जिनगी तँए पत्नीकेँ ओते मनमे नइ गड़लैन जेते गड़क चाहिऐन। मुदा गामक नाओं सुनि बेटा-पुतोहु दिस नजैर तँ गेबे केलैन। बजली- “आब चारिमपनमे दुनू परानी ऐलौं, जाबे हूबा छल ताबे ने कमाइयोक आ भोगैयोक मनसूबा छल, मुदा ऐ अवस्‍थामे बिनु सहाराक जीवियो तँ नहियेँ सकै छी।” पत्नीक थड़थड़ाइत विचार सुनि जीवन लाल काका बजला- “हमरा-ले कोनो हर्ष-विस्‍मय नइ अछि, दूटा बेटा अछि, जखन गरमी मास रहतै तँ रॉंचीबला ऐठाम रहब आ आन छह मास दोसर बेटा लग।” ओना जीवन लाल काका लहका बंशी जकाँ पत्नीक आगू अपन विचारकेँ रखलैन, मुदा अनुराधाकेँ घरिनीबला बंशी जकाँ विचार घुरिया लगलैन। विचार ई घुरिया लगलैन जे ‘साँइक राज अपन राज, बेटाक राज मुँह तक्की।’ तहूमे तेहेन जुग-जमाना आबि गेल अछि जे कोन पुतोहु सासुकेँ सासु बुझैए। जहिना मनमे सोचै छी जे निचेनसँ बेटा-पुतोहु लग रहब तहिना तँ तेकर उल्‍टो भऽ सकैए। उल्‍टा होइक कारण अछि, जे कियो वंशगत परिवारक सम्‍पैतक बीच बेटा-पुतोहुक जिनगी बसर करै छैथ, आ कियो घरसँ बहार बेटाक नोकरी-चाकरी वा कोनो बेवसाइये किए ने होनि, बीच रहब भेल दुनू एक केना भऽ भेल? ..तँए किछु-ने-किछु ओकर असर तँ पड़बे करत। माने ई जे वंशगत परिवारमे वंशगत आचार-विचार-बेवहार वंशक बाट पकैड़ चलैए जइसँ मन-मतान्‍तरक कोनो कारणे ने रहैए मुदा नव जगहपर समाजिक नव परिवेश तँ रहिते अछि जइसँ जिनगीमे किछु ने किछु मन-मनान्‍तरमे भेद आबिये जाइए। मानि लिअ जे कियो अपन साहित्‍यसँ एम.ए. केने छैथ,जिनका ऊपर शारीरिक खुला जिनगी प्रभाव छैन, तैठाम तँ ज्ञान वा डिग्रीक एक सीमा रहितो विचार आ बेवहारमे अन्‍तर हेबे करत। ओना, ई अन्‍तर अपन समाजक बीच, परिवेश पाबि सेहो भाइये रहल अछि। परिवेश ई जे कियो किसानी जिनगी धारण केने छैथ आ कियो नोकरीक,दुनूक बीच काजक (उपार्जनक लेल साध्‍य) अन्‍तर तँ आबिये जाइत अछि जे मनुखक जिनगीक गठनमे किछु-ने-किछु जीवन-गाँठ तँ पड़िये जाइत अछि जइसँ किछु-ने-किछु दूरी बनियेँ जाइत अछि। ओना, अनुराधाक मनमे ई विचार नइ उठल छेलैन, दोसर विचार छेलैन। दोसर विचार अनुराधाक मनमे ई उठल छेलैन जे अखन धरि अपना हाथ-मुट्ठीक बले जीबैत एलौं, जे से अखन धरिक जिनगीक रूप बनल आबि रहल अछि, आ जखने बेटा-पुतोहुक परिवारमे रहब, जे परिवार बेटा-पुतोहुक हाथ-मुट्ठिये चलि रहल अछि, तैठाम अँटावेशमे किछु-ने-किछु विघटन तँ हेबे करत, जखने विघटन भेल तखने ने मनघटन सेहो हेबे करत। जखन मन घटन हएत तखने ने ओइ भेद औत। जखने भेद औत तखने ने मनभेद हएत। जखने मन भेद हएत तखने रक्का-टोकी हएत, जखने रक्का-टोकीक जन्‍म परिवारमे भेल तखने परिवारक रूपमे विश्रृखलता औत आ कहा-सुनी होइत-होइत झगड़ा-झाँटी हएत। जे जीवन भरि लधल रहि जाएत। जखने मनमे झगड़ा-झाँटीक रूप बनल रहत आ देहमे केहनो चिक्कने वस्‍त्र वा पेटमे भोजन रहबे करत तइसँ निचेन मन थोड़े रहत। जखने मनमे चेन नइ रहत तखने ओ निचेनीकेँ बास थोड़े हुअए देत। ..मनमे उठिते अनुराधाक मन औना गेलैन। आगूक कोनो निचेनीजिनगी बाट नहि देख मन घुरिया-फिरिया लगलैन। घुरियाइत-फिरिआइत अनुराधाक मनमे, ठमकल गाछमे जहिना कोनो मुड़ीमे कलशक नव टुसाक आगमन होइते गाछकेँ जिनगीक नव वस्‍त्र भेटैक आशा जगै छै तहिना भेलैन। भेलैन ई जे दुनू परानीक उमेर साइठ-बासैठ बर्खक भेल अछि, अखन तकक जिनगीक जे अभ्‍यास बनल आबि रहल अछि ओकरा उमेर की करतै। शर्कसमे देखै छिऐ जे लोक हाथीकेँ उठा लइए ओहो तँ ओकरा अभ्‍यासेसँ ने भेल रहै छै जे जखन हाथीक बच्‍चा छल ओकरो महींसिक पर्ड़ू जकाँ दुनू हाथे उठौल जाइए, तहिना ने हाथियोकेँ होइए। बच्‍चामे दुनूक अन्‍तरे की रहैए। कनी-मनी रहैए। मुदा उठौनिहार तँ ओइसँ बीस रहबे करैए। तखन जे जिनगी जीबैत आबि रहल छी ओ भारीए केना भेल जे केकरो ऐठामजा कऽ रहब। मनमे अनेरे जिनगीक सोग पकड़ैए। अनेरे बुझै छी जे जिनगी भारी अछि तँए केकरो सहारामे रहब जरूरी अछि। जखन बाप-पुरखाक देल घर-घराड़ीक संग वाड़ी-फुलवाड़ी सेहोअछि–माने गाछी-कलम, तखन जे अनेरे कोनो बेटा लगमे रहि कऽ मरब आ बिजलीसँ जरौल जाएत, तइमे एको मुट्ठी छाउरो हएत जे गयामे पिण्‍ड पड़त आकि हडियो बँचल रहत जे गंगा लाभ हएत..? अनुराधाक घुरियाइत मनमे विचार मन पड़लैन, विचार मन पड़लैन जे भगवान रामक संग सती-सावित्री सीता केना पतिक संग राज-पाट छोड़ि बोने-बोन चौदह बर्ख धरि जिनगी जीलैन। जखन साठि-बासैठ बर्खक उमेर भाइये गेल अछि, सत्तैर-पचहत्तैर बरखमेसभ मरैए, हमहूँ दुनू परानी मरब, तइले मनहानि करब नीक नहि। ..अनुराधा बजली- “जहिना सभ दिन दुनू गोरे स्‍वतंत्र जिनगी जीलौं तहिना आगूओ जीब। बड़ बेसी हएत तँ एतबे ने हएत जे दरमाहा अधिया जाएत,मुदा ईहो तँ हेबे करत जे जिनगी भरि जे कमा-कमा तोरा गाड़लौं, ओहो तोरा तँ भोटबे करत। तैसंग बाप-पुरखाक ओतेक सम्‍पैत भेटल जइसँ केते पुरखाक जिनगी चलल छैन। तँए अनेरे किए केतौ आनठाम जा कऽ रहब, अपने गाममेकिए ने रहब।” पत्नीक विचार सुनि जीवन लाल कक्काक मनमे सेहो अपन पैंतीस सालसँ पूर्वक स्‍मृति मानस पटलपर उतैर धड़-धड़ा कऽ घेर लेलकैन। घेरते मनमे माता-पिताक संग अपन विद्यालय सेहो उतैर गेलैन। वएह गाम कहियौ आकि मातृभूमि जैठामक विद्यालयमे पढ़ि अपना कऽ सक्षम शिक्षक बना पैंतीस बर्ख विद्या दान केलौं। कहब जे दरमाहा तरे ने विद्या बेचलौं। बेचलौं कहाँ जैठाम रहलिऐ तैठामक अन-पानि खेलिऐ-पीलिऐ। ने कहियो केकरो ट्यूशन पढ़ा फीस लेलिऐ आ ने परीक्षामे नम्‍बर घुसका-फुसका एको पाइ लेलिऐ आ ने केकरो ऐठाम रहि खेलिऐ-पीलिऐ। अपन डेरा बना, अपने परिवार जकाँ जीबो केलिऐ आ बाल-बच्‍चाकेँ पढ़ेबो-लिखेबो केलिऐ...। पत्नीक विचारकेँ शिरोधार्य करैत जीवन लाल काका बजला- “मन कि दुनू गोरेक बाँटल अछि। जएह मन अहाँक अछि, सएह ने अपनो अछि।” ऽङञ?“” [1] जमीनो आ श्रमो [2] पाँच बीघाबला ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ओम प्रकाश- बीहनि कथा- १.सामंत २.जस जस सुरसा बदनु बढ़ाबा १ सामंत साहेब आफिससँ निकलि क' कतौ जाइत छलाह। चपरासी हुनकर वातानुकूलित कक्षक दरबज्जा खोलि क' ठाढ़ भ' गेल। दोसर चपरासी हुनकर बैग ल' कए चलल। बाहर बत्ती लागल कार लागल छल। कारक चालक कारक गेट खोलि ठाढ़ छल। अप्पन कक्षसँ कार धरि पच्चीस मीटरक दूरी साहेब पाँच मिनटमे पहुँचि गेलाह।ओतबा दूरमे कतेको मुलाजिम ठाढ़ छल आ सलामी ठोकने जा रहल छल।साहेब मूड़ी हिला क' जबाब दैत कार धरि गेला आ शानसँ गाड़ीमे बैसि गेला। कार ओतयसँ चलि क' शहरक टाउन हाल पहुँचल। साहेब गाड़ीसँ उतरलाह तँ ढ़ेरी लोक सलामी ठोकैत आगाँ पाछाँ करैत हुनका भीतर ल' कए चलि गेल। आइ ओतय "सामंतवादक प्रभाव आ नब सामंतवाद" विषयपर एकटा गोष्ठी छल आ साहेब मुख्य अतिथि छलाह।सामंतवादक दुष्प्रभाव आ ओकर आतंकसँ जकड़ल समाजकेँ नब रस्ता देखेबा लेल साहेबक भाषणक प्रतीक्षामे हुनकर जिंदाबादक नारासँ पूरा हाल गुंजायमान भ' गेल। २ जस जस सुरसा बदनु बढ़ाबा रामलाल आइ बड्ड खुश छल। कंपनी ओकर दरमाहा बीस हजारसँ बढ़ा क' बाईस हजार क' देलकै। ओ कनी मधुर कीनलक आ घर आबि ई सूचना अपन घरनीकेँ देलक। घरनी खुश होइत बाजलीह -"ई तँ बड्ड नीक भेल। दुनू बच्चाक इसकूलक फीस अही माससँ दू दू सय टका बढ़ा देलकैए। हमर होली आ दीवाली दुनूकेँ साड़ी बकियौता अछि। माँजीक दवाय पछिला मास नै कीनाएल छल सेहो कीना जेतैक। बनियाक बकियौता सेहो........." "हे यै चुप रहू।" रामलाल घरनीकेँ बीचहिमे टोकलनि-"एखन धरि अहाँ तीन हजारसँ ऊपरक खरचा जोड़ा देलौं, जखन की दरमाहा दूइये हजार बढ़ल अछि।" घरनी कहलकनि-"एखन तँ आरो खरचा सब छै।" रामलाल चुप भ' मूड़ी पर हाथ ध' बैसि रहलाह। हुनका रामचरितमानसक चौपाई मोन पड़ि गेलनि- जस-जस सुरसा बदनु बढ़ाबा तासु दुगुन कपि रूप देखाबा ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। मुन्नाजी- बीहनिकथा- १. कोठा वाली २. बॉस १ कोठा वाली -- गै विमला,हे ओइ गाछ मे लगा ई नुआ बान्हि दही. -- किए गै ? -- देखै नै छीही, किछु पुरखाह लोकक नजरि एम्हरे छै. -- रौ बाँहि , पोखरीक घाट पर त' इहो सब ओहिना परदा करै छै जेना आन जनि जाति ! -- हे, सब पुरूख छेछराहे होइ छै , नै ? -- यै, अहाँ सब त' उघरल वृत करै छी, तहन लाज ? -- जी, कोठा पर , बन्न घर मे ! " कोठा सँ बहरी ओहिना बुझू जेना आन मए- बहीन " ! २ बॉस

-- सप्ताह भरि सँ चलि रहल बॉसक पी.ए लेल साक्षात्कारक आइ खत्मी दिन ऐछ. कॉलबेल बाजल.....! -- किरानी बाबू , साहेबक केबिन मे फाईल खोलैत-- नाम रीतिका, उमेर- १९ बरख..... -- बॉस तमसाइत -- " हमरा साक्षात्कारक रिपोर्ट नै, ओ लड़की चाही !" -- सर ! ओ फ्रेसर ऐछ ! -- बॉस हम छी की अहाँ ? -- सर !बॉस त' अहीं ने . -- प्रशिक्षणक जिम्मा हम्मर ,एक सप्ताह मे एहेन ट्रेण्ड क' देबै जे ओ अपन घर घूरनाइ बिसैर जएत ! -- जी , उपस्थित करै छी ! ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। ३. पद्य ३.१.आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल ३.२.राजेश मोहन- कृष्ण छठिहारक पद ३.३.अब्दुर रज्जाक- गजल ३.४.जगदीश चन्द्र ठाकुर  अनिल- ५ टा गजल आशीष अनचिन्हार- २ टा गजल गजल 1 भीतर भीतर गुमसैए बाहर बाहर धधकैए जीवन फाटल गुड्डी छै तैयो ओ सभ उड़बैए सभहँक चिंता अँगना धरि अपना अपनी बचबैए असगर असगर दुनियाँमे लाशो अपने उठबैए बरखा बुन्नी पाहुन सन कहियो कखनो पहुँचैए सभ पाँतिमे 222 + 222 + 2 मात्राक्रम अछि 2 बात जे कहल गेलै अनचोक्के हाथ सभ जुटल गेलै अनचोक्के केखनो करा दैए दुर्घटना बात जे बुझल गेलै अनचोक्के मोन पड़ि रहल सभ धीरे धीरे संग जे छुटल गेलै अनचोक्के बाजि नै सकल किछु रहलै चुप्पे प्रश्न से पुछल गेलै अनचोक्के धार बूझि रहलै सभ किरदानी पानि जे सुखल गेलै अनचोक्के सभ पाँतिमे 212-1222-222  मात्रा क्रम अछि ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। राजेश मोहन कृष्ण छठिहारक पद नीलनयन मे काजर लागल बिहुंसि रहल चितचोर हे, बाल गोपाल छठिहारक राति सूतल यशोमती कोर हे। पीयर अंगा टोपी पीयर पीतांबर मुकुट भल मोर हे, तीनू देवी सोहर गाबथि बालक मुस्की ठोर हे। पैजनिया झुनझुन रुनझुन बाजै देखू रूप बेजोर हे, बिसरि गेल छथि सभ अपना कें नंदन माखनचोर हे। धन धन मातु यशोदा जे आओल ललना कोर हे, धन भेल गोकुलधाम देखि नटवर नंदकिशोर हे। ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। अब्दुर रज्जाक गजल काँट सs भरल तलाबके बाते नै करू  दिल तोइर गेली जनाब के बाते नै करु  . सियाह भेल बादल बर्षलै नै कोना  धोखा ओ दैत गेली तनाबके बाते नै करू  . आइर बनोने ओ बड डैर बनोने ओ  जं बात करी त सबाबके बाते नै करू  . सीमान पs अपने ओ बदनाम अपने भs ओ  दोष केकर पूछी टकराबके बाते नै करू  . अन्हर उठल कतउ बज्जर गिरल कतउ  लछ्तर संगे ओ पथराबके बाते नै करू  . ओ रोग एहन देली बिरोग एहन देली बस जिबित शरीर खराबके बाते नै करू . अनजान रही ओ बिरान रही हम  लs दs किछ जबाबके बाते नै करु  . नै ओ फासी दs गेल नै प्राण लगेल  तलबार गर्दन पs नबाबके बाते नै करु  . बात ओकर एहन जज्बात ओकर केहन  ओकर स्नेहक धुन गुलाबके बाते नै करू ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। जगदीश चन्द्र ठाकुर  अनिल ५ टा गजल गजल 1 लछुमन रेखा नांघू नै पाइक पाछां भागू नै रस्ता आगू के देखू पाछां घुरि-घुरि ताकू नै एहन नै क्यो दुनियांमे जकराले' क्यो आगू नैत। सोचू दुनियां निरमल हो अपना ले' किछु मांगू नै सुख आयल दुख अछि पाछू कखनो नङटे नाचू नै दुख आयल अछि चलि जायत सुख अछि पाछां कानू नै अपने सुत मानू सदिखन हरियर गछुली काटू नै मात्रा-क्रम : २२२२-२२२ 2 किछुए जन छथि देशमे रखने सभकें    क्लेशमे रावण भेटल अछि  कते रामक सुन्दर     भेषमे जे सुख भेटल  गाममे से दुरलभ    परदेशमे आपसमे पटरी  कहाँ ब्रह्मा  विष्णु महेशमे के छथि माँ आ के पिता सुख सुविधाके  रेसमे मात्रा-क्रम : 2222-212 3 गंजन केलौं थोड़ अहां नै लागू हमरा गोर  अहां नै थापर अछिए मोन  अहांकें देखल आंखिक नोर अहां नै हमहूं कारी मेघ कहां  छी छी जंगलके  मोर  अहां नै जैतहुं एको बेर अयोध्या केलौं कहियो जोर अहां नै नै काटब ई राति जं कहुना देखब कहियो भोर अहां नै साधू नै छी भाइ अहां सन बूझू लेकिन चोर अहां नै मात्रा-क्रम : 2222-21-122 4 खेल-कूदमे बचपन बीतल रंग-भंगमे   यौवन  बीतल भोज-भातमे रहलौं सभदिन बात-बातमे पचपन बीतल जेठ मासके गरमी  भोगल पूस-माघके ठिठुरन बीतल लोभ-मोहमे पागल रहलौं द्वेष-रागमे  छण-छण बीतल भोर, साँझ आ दिन-दुपहरिया दौड़-धूपमे जीवन  बीतल आइ बाढ़िमे डूबल सभ किछु ढ़ोल-झालि अभिनन्दन बीतल मात्रा-क्रम : 21212-2222 5 सभकें सभ सुनतै एकदिन सबहक दिन घुरतै एकदिन सभ सबहक आदर करतै सभले' सभ  मरतै  एकदिन अनके बलपर कूदय  ओ खसतै बस बुझतै एकदिन जे जे रावण बनि चिकरय सबहक घर जरतै एकदिन अपनाकें  जानत-  मानत से विजयी बनतै  एकदिन जय जय भारत जय मिथिला सब गेतै नचतै  एकदिन मात्रा-क्रम : 222-2222 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। बालानां कृते विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम भाषापाक डॊ. शशिधर कुमर- किछु बाल कविता चीता (बाल कविता) चित्रकाय - चीता प्रशिद्ध अछि, भारत  भरिमे  भेल  विलुप्त । संस्कृतक  अछि  देल   नाँओ, पर संस्कृतक  क्षेत्रहिसँ लुप्त ।।*‍‍१ “भारतीय चीता”  बाँचल अछि, अगबहि    आब    ईरानमे । किछु केर  आशा छी  एखनहु, ओ   भेटत  बलुचिस्तानमे ।।*‍२ ईरानक चीता    ओएह   बूझू, जे  छल  भारत केर  चीता । भारत  आ  भारतसँ पच्छिम, एसियामे छल  इएह चीता ।।*‍२ चीता केर  इएह  एक प्रजाति, छल एसियाक सभ टा चीता । बाँकी  चारि  प्रजाति  शेष जे, अफ्रिकाक से  अछि  चीता ।।*‍२ जतबा  धरतीक  जन्तु एखन, स्थलमंडल पर विचरैत अछि । सभसँ   बेसी  त्वरित  वेगसँ, चीतहि टा बस दौड़ैत अछि ।।*‍३ बाघ-सिंह-तेन्दुआ  जे अछि से, प्रायः     रातिचर    प्राणी । जगुआरक दिन - राति समानेँ, चीता     दिनचर    प्राणी ।।*‍४ अल्प  समयमे  त्वरित  वेगसँ, करैछ     खेहारि    शिकार । बारहसिंघा,  हरीन,   नीलगाए, खढ़िआ    आदि    शिकार ।। अल्प  समयमे  त्वरित  वेगसँ, हकमि  जाइत  अछि  चीता । कए शिकार,  नञि खाऽ सकैछ, ओ  आधा - पओने   घण्टा ।।*‍५ निर्बल ओ असहाय  देखि कऽ, आन    उठाबैछ    फायदा । मारल  शिकारकेँ  लए भागैछ, चीता आ सिंह - लकड़बग्घा ।।*‍५ भूखल चीता  उठैछ पुनः आ, फेरहु     करैछ    शिकार । जँ तकदीर नीक एहि बेर तँऽ, बनैछ    शिकार - आहार ।। भारतीय - चीता    भारतमे, करए     फेरसँ     बास । तकर व्योंतमे  अछि लागल, आब भारत  केर  सरकार ।। देशक ई भोतिआएल धरोहरि, प्राप्तिक   होइछ   प्रयास । जतन भऽ रहल भारत-भू पर, चीताक    हो    पुनर्बास ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - संस्कृतक “चित्रक” वा “चित्रकाय” शब्दसँ “चीता” शब्दक उत्पत्ति भेल अछि । मुदा “भारतीय चीता” आब भारतसँ विलुप्त(EXTINCT) भऽ चुकल अछि । *‍२ - “भारतीय चीता” एखन मात्र ईरान देशमे बाँचल अछि आ तेँ ओकरा आब “ईरानी चीता” कहि सम्बोधित कयल जाइत अछि । किछु लोकक कहब अछि जे भारतीय चीता बलुचिस्तानमे सेहो बाँचल भऽ सकैत अछि मुदा तकर पुष्टिक लेल कोनहु वैज्ञानिक अध्ययन नञि कयल गेल अछि । *‍३ - जिबैत चीताक कुल पाँच प्रजाति (SUB SPECIES) अछि । पहिल प्रजाति एसिया महाद्वीपमे भेटए बला “भारतीय या ईरानी चीता”अछि आ शेष चारिटा प्रजाति अफ्रिका महाद्वीपमे पाओल जाइत अछि । *‍४ - बाघ, सिंह आ तेनुआ आदिक विपरीत चीता मुख्यतः दिनचर जन्तु अछि आ दिनहिमे शिकार करैत अछि । चीता अपन घ्राण शक्ति वा सुँघबाक शक्तिक आधार पर नञि अपितु दृष्टि वा देखबाक क्षमताक बलेँ शिकार करैत अछि । *‍५ - चीता बहुत कम समयावधिमे बहुत बेसी गति धरि पहुँचि सकैत अछि । गति पकड़बाक एहि त्वरित प्रक्रियाक कारणेँ चीताक त्वरण(ACCELERATION) धरती पर विचरण कएनिहार जन्तुसभमे सभसँ बेसी अछि । शिकार करबा काल चीताक औसत गति (AVARAGE SPEED) 64 कि॰मि॰ प्रति घण्टा रहैत अछिपर शुरुआति गति 112 कि॰मि॰ प्रति घण्टा धरि भऽ सकैत अछि । गति पकड़बाक एहि त्वरित प्रक्रिया अर्थात अत्यधिक त्वरणक कारणेँ चीताक शरीर बहुत बेसी गर्म भऽ जाइत अछि जाहिसँ चीता बहुत बेसी थाकि जाइत अछि । ओ एतबा थाकि जाइत अछि जे अपन पकड़ल शिकारकेँ अपना सोझाँमे राखि आधा - पओन घण्टा सुस्ताइत अछि आ तकरा बादहि ओ एहि शिकारकेँ खाइत अछि । बहुधा ओकर क्लांति वा हकमीक फायदा आन मांसाहारी जन्तुसभ (यथा - आन चीता, बाघ, सिंह, लकड़बग्घा, हुड़ार आदि) उठबैत अछि आ सुस्ताइत चीताक सोझाँसँ ओकर शिकार लऽ कऽ भागि जाइत अछि आ बेचारा चीता विवश भऽ से देखैत रहि जाइत अछि । *‍६ - भारतीय चीताकेँ ईरानसँ आनि फेरसँ भारत जंगलसभमे पुनर्वासित करबाक प्रयास भारत सरकार द्वारा कएल जा रहल अछि । *अंग्रेजीक पॅन्थर (PANTHER) शब्द चीताक अतिरिक्त तेनुआ ओ जगुआर लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि । जगुआर (बाल कविता) जगुआरक  मतलब  नञि  चीता, ओ तँऽ  आनहि  जीव छी । किछु-किछु तेन्दुआ सनि देखबामे, मुदा ओ आनहि जीव छी ।।*‍१ तेसर   पैघ   बिलाड़ि   अछैतहु, बहुतहि  ओ  शक्तिशाली । छोट  मुदा  सुगठित   काय  छै, फुर्ती छै  सब पर  भारी ।। छोट  मुदा  खूब  मोट  पएर छै, बड़ छै  पएरक  मजगूती । मगर - काछुकेँ  चीड़ि  सकैतछि, दाँतक  ततबा  मजगूती ।।*‍२ हरीन आदि प्राणिक बुझलहि अछि, पैघ बिलाड़ि शिकार करैछ । साँप - मगर - कछुआ सरिसृप जे, तकरहु ने जगुआर छोड़ैछ ।।*‍२ दिनचर छी,  रातिचर  सेहो  ओ, जखन मोन, शिकार करैछ ।*‍३ नबका दुनिञा  केर  बासी  अछि, दच्छिन-माँझ विहार करैछ ।।*‍१ तेन्दुआ आओर बिलाड़ि जेकाँ ओ, आसानीसँ  गाछ   चढ़ैछ । पानि हेलि कऽ  ओ बाघहि सनि, नदी - धारकेँ  पार करैछ ।। “जगुआरेट” आमेजन  घाटीक, भाषा   केर   छी   शब्द । तकरहिसँ जगुआर बनल अछि, अंग्रेजीक   नञि    शब्द ।।*‍४ अहँसभकेँ जँ फुरए नऽव किछु, कही    मैथिली     नाम । ता धरि जगुआरहि मिथिलामे, एहि  जीवक  भेल  नाम ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - आइ - काल्हि जगुआर या जैग्युआर (JAGUAR) शब्द श्रव्य ओ दृश्य माध्यम (AUDEOVISUAL MEDIA) पर बेसी चर्चित भऽ गेल अछि आ कतेकहु बेर ओकर भ्रामक अर्थ “चीता” धिया-पुतसभकेँ बताओल जाइत अछि । मुदा से नञि, चीता ओ जगुआर दूनू दू जन्तु अछि - एकदम भिन्न । चीता पुरना दुनिञाक (एसिया ओ अफ्रिका महादेशक) मूल निवासी अछि जखनि कि जगुआर नबका दुनिञाक (दछिनबारी ओ उतरबारी अमेरिका महादेशक) मूल निवासी । जगुआर सम्पुर्ण दछिनबारी अमेरिका आ उतरबारी अमेरिकाक माँझ ओ दछिनबारी भागक वन्य क्षेत्रमे पाओल जाइत अछि । जगुआर बहुत किछु तेन्दुआ सनि लागैत आछि, मुदा तेन्दुआसँ सेहो भिन्न अछि । जगुआरक चाम पर बनल कारी घेरेबाक बीचमे एकटा कारी बुनका रहैत अछि पर, तेनुआमे से नञि । बाँकी, आन अन्तरसभ तँऽ अछिअहि । *‍२ - जगुआर बिलाड़ि कुलमे (Family - FELIDAE) आकार ओ भारक अनुसारेँ तेसर (क्रमशः बाघ ओ सिंहक बाद) सभसँ पैघ सदस्य अछि मुदा ताहि अनुरूपेँ ओ बहुत शक्तिशाली होइत अछि । बिलाड़ि कुलक आन कोनहु सदस्य मगर ओ काछु केर शिकार नञि करैत अछि मुदा जगुआर अपन शक्तिशाली श्वदन्त दाँत (CANINE TEETH) ओ हन्वास्थिक (MANDIBLE) बलेँ मगरक मजगूत खाल ओ कछुआक मजगूत खोलकेँ चीड़ि दैत अछि । *‍३ - बाघ, सिंह आ तेनुआ मुख्यतः रातिचर होइत अछि जखनि कि चीता दिनचर । मुदा जगुआर दिनचर ओ रातिचर दूनू होइत अछि, मतलब कि ओ दिन ओ राति दूनू समय समान रूपेँ शिकार करबामे सक्षम अछि आ शिकार करैत अछि । *‍४ - अंग्रेजीक “जगुआर” शब्द आमेजन घाटीक क्षेत्रीय भाषाक शब्द “जगुआरेट” सँ लेल गेल अछि आ तेँ एहि ठाम मैथिलीमे सेहो हम ओहि शब्दक यथावत प्रयोग कयल अछि । मैथिलीमे जगुआर विदेशज श्रेणीक शब्द भेल । तेन्दुआ या तेनुआ (बाल कविता) किछु-किछु बाघहि सनि लगैत छै, किछु मिलैत अछि चीतासँ । पानिमे बाघहि सनि  हेलैत अछि, रंग मिलैत अछि  चीतासँ ।। चित्रकाय छै  चीतहि  सनि, मुदा करिया धब्बा  गोल ने छै ।*‍‍१ गाछ  चढ़एमे   बहुतहि  माहिर, पैघ बिलाड़िमे जोड़ ने छै ।।*‍२ गाछ चढ़ैछ  झट  मूँहमे  धएने, मूइल  बहुत भारी शिकार । छीनि सकैछ ने  बाँटि सकैतछि, आन केओ मूहँक आहार ।। गाछक मोटका डाढ़ि पर बैसल, भक्षण करैछ शिकार ओ । दिनभरि सूतल रहइछ ओहि ठाँ, उतरैछ साँझ अन्हार ओ ।। बाघ - सिंह - चीतासँ  छोट छै, लागैत छै  जगुआर जेकाँ । एक जँ रहितए  दुहु टा  दुनिञा, अलग फेर जगुआर कहाँ !! *‍३ तेनुआ भेटैछ एसिया - अफ्रिका, विविध क्षेत्र - जलवायुमे । बारल छै  बस क्षेत्र विषम अति, मरू - हिम जलवायु जे ।। “हिम-तेनुआ” अलगहि छी प्राणी, भेटैछ  ऊँच  पहाड़  पर ।*‍४ ओतबहि अलग ओ छी तेनुआसँ, जतबा चीता - बाघसभ ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - प्राचीन संस्कृतक “चित्रकः” वा “चित्रकायः” शब्दमे आजुक “चीता” सेहो आबैत छल आ “तेन्दुआ या तेनुआ” सेहो । किछु लोक संस्कृतक “तरक्षुः” शब्दसँ तेन्दुआ मानैत छथि पर तरक्षुः चीता आ बाघ आदि लेल सेहो आयल अछि । हिन्दीमे सेहो “तेन्दुआ” शब्दक आगमनक श्रोत स्पष्ट नञि अछि; सम्भवतः कोनहु जनजातीय भाषा वा बोलीसँ आयल छल आ ओतहिसँ मैथिलीमे सेहो आयल । मैथिलीमे“तेन्दुआ” शब्द यथावत प्रयुक्त होइत अछि जकर उच्चार भेद (PHOENETIC VARIANT) “तेनुआ” सेहो अछि । *‍२ - तेन्दुआ गाछ पर चढ़बामे बड्ड माहिर होइत अछि । ओ शिकार कएलाक बाद ओहि शिकारक लहाशकेँ अपन मूँहमे दाबि आसानीसँ गाछ पर चढ़ि जाइत अछि । एहि प्रकारेँ ओ अपन भोजनकेँ आन प्रतिद्वन्दी शिकारीसभसँ (जेना कि - बाघ, सिंह, चीता आदिसँ) सुरक्षित कऽ लैत अछि । *‍३ - पैघ बिलाड़िसभमे तेन्दुआक अतिरिक्त मात्र जगुआर गाछ पर चढ़ि पाबैत अछि । जँ पुरना आ नबका दुनिञा कोनहु स्थल मार्ग द्वारा परस्पर जुड़ल रहैत तँऽ सम्भवतः तेन्दुआ ओ जगुआर अलग - अलग प्राणीक रूपमे नञि विकसित भेल रहैत । *‍४ - “हिम तेन्दुआ” (या हिम तेनुआ) नामक जन्तु “तेन्दुआ” (या तेनुआ) केर कोनहु प्रजाति नञि छी अपितु एक गोट स्वतन्त्र मांसुभक्षी जन्तु छी । ओहि दूनूमे ओतबहि अन्तर अछि जतबा कि तेन्दुआ ओ आन पैघ बिलाड़ि (बाघ, सिंह, जगुआर, चीता) सभमे अछि । “हिम तेन्दुआ” (Eng. - SNOW LEOPARD / OUNCE) (Bio. Name - Panthera uncia syn. Uncia uncia) भारतमे मात्र हिमालय पर्वत श्रेणीक 3000मीटर सँ 4,500 मीटर (9,800 फीट सँ 14,800 फीट) केर ऊँचाई धरि भेटैत अछि । भारतक अतिरिक्त प्राकृतिक रूप सँ ओ नेपाल, भूटान, चीन, मंगोलिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गीस्तान, ताज़िकिस्तान आ उजबेकिस्तान देशमे पाओल जाइत अछि । बनबिलाड़ि आ खटाँसु/खटाँस (बाल कविता) छी “बिलाड़ि” ओ जे मनुक्ख केर, घऽर - आङ्गन खरिहान  भेटैछ । आ  मनुक्ख  केर   परिवेशहिमे, जकर  सभक  सन्तान  पलैछ ।।*‍१ आन बिलाड़ि  जतेक जे  बाँचल, “बनबिलाड़ि” केर  नाम  पाबैछ । बाध - बोन  जंगल  आ  झाड़मे, बनबिलाड़ि  केर   बास  रहैछ ।।*‍२ साँझ - परातहि  घुमैत - घामैत, बाट - घाट   खरिहान   भेटैछ । छै   बिलाड़िसँ  पैघ - पुष्ट  ओ, मोटका भोकना बिलाड़ि लागैछ ।। एकरहि  तँऽ यौ  गाम - घऽरमे, दोसर  नाम  “खटाँसु”  कहैछ । पर “खटाँसु”  शब्दक  परीधिमे, आनहु  जन्तुक  नाँओ आबैछ ।।*‍३ तेँ अर्थक  फरिछौठ  लेल  किछु, होअए  उपाए  से  माँग करैछ । जोड़ि  विशेषण, भिन्न कएल तेँ, अपन - अपन दूनू नाम पबैछ ।।*‍४ जे   खटाँसु   मार्यार   समूहक, “बनबिलाड़ि खटाँसु”     भेलैक । अथवा  मांसुक  भक्षण  कारण, “मांसुभक्षी खटाँसु”     हेतैक ।।*‍५ आन  समूहक  जे  खटाँसु  से, मांसु  खाइछ, फलाहार  करैछ । तेँ  अप्पन गुण केर  अनुसारहि, “सर्वभक्षी खटाँसु”     भेलैक ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मैथिलीमे जाहि जन्तुक नाम “बिलाड़ि” अछि से अंग्रेजी ढर्रा पर “घरैया बिलाड़ि” (DOMESTIC CAT / FERAL CAT) भेल किएक तँऽ ई मनुक्खक घऽर-आङ्गन खरिहान-दलान आदि स्थानहि पर रहैत अछि । वस्तुतः बिलाड़िक बेसीतर समय मनुक्खहि केर परिवेशमे बितैत अछि, ओकर बच्चासभ मनुक्खहि केर परिवेशमे जन्म लैत अछि आ पैघहु होइत अछि । *‍२ - आन बिलाड़िसभ जे मनुक्खक परिवेशसँ दूर बाध-बोन, जंगल-झाड़ आदिमे रहैत अछि आ जकर बच्चासभ ओही परिवेशमे जन्मैछ आ पलैछ-बढ़ैछ, तकरासभकेँ मैथिलीमे “बनबिलाड़ि” कहल जाइत अछि । ओ सभ साँझ-परात कहुखन-कहुखन मनुक्खक परिवेशमे या बाट-घाट पर घुमैत-फिरैत भेटि सकैत अछि पर बेसी काल मनुक्खक परिवेशसँ दूरहि रहैत अछि । बनबिलाड़ि बिलाड़िक अपेक्षा आकारमे थोड़ेक पैघ होइत अछि । *‍३ - बनबिलाड़िकेँ खटाँसु (उच्चारण - खटाँउस या खटौंस) अथवा खटाँस (कल्याणी कोशमे देल वर्तनीक अनुसार) सेहो कहल जाइत अछि ।मुदा एहि शब्दक एकटा समस्या छैक । खटाँसु या खटाँस शब्द बनबिलाड़ि समूहक जन्तुक अतिरिक्त एकटा आनहु जन्तुक लेल प्रयुक्त होइत अछि जकरा अंग्रेजीमे सीवेट (CIVET) कहल जाइत अछि । *‍४ *‍५ - आजुक परिस्थितिमे एहि तरहक ओझराएल शब्दकेँ फरिछाएब आ फरिछाए कऽ परिभाषित करब आवश्यक । तेँ हम समानता ओ विषमताकेँ देखैत खटाँसु या खटाँसकेँ दू टा व्यापक समूहमे बाँटल अछि । *‍५ - खटाँसु (खटाँस) केर पहिल समूह भेल “बनबिलाड़ि खटाँसु (खटाँस)” जे कि ऊपर “बनबिलाड़ि” नामसँ परिभाषित कएल गेल अछि । ई जन्तुसभ बिलाड़ि कुल या मार्यार कुल (Family - FELIDAE) केर सदस्य अछि । ई सभ प्राकृतिक रूपसँ मुख्यतः मांसु केर भक्षण करैछ अर्थात मांसुभक्षी (CARNIVOROUS) होइत अछि । तेँ एकरासभकेँ “मांसुभक्षी खटाँसु (खटाँस)” सेहो कहि सकैत छी । *‍६ - खटाँसु (खटाँस) केर दोसर समूहकेँ हिन्दीमे “गन्धबिलाव” कहल जाइत अछि कारण जे एकर एकरासभमे कस्तुरी सनि सुगन्ह (सुगन्धि) होइत अछि । तेँ मैथिलीमे  “गन्हबिलाड़ि (या सुगन्हबिलाड़ि) खटाँसु (खटाँस)” कहि सकैत छी । मुदा ध्यातव्य जे “गन्हबिलाड़ि”कोनहु बिलाड़ि नञि छी आ नहिञे बिलाड़ि कुल या मार्यार कुल (Family - FELIDAE) सँ एकर कोनहु सम्बन्ध अछि । ई जन्तुसभविवेराइडी कुल या गन्हबिलाड़ि कुल (Family - VIVERRIDAE) केर सदस्य अछि आ रातिचर होइत अछि । ई सभ प्राकृतिक रूपसँ मांसु आ संगहि संग फऽल (यथा - आम, चीकू, ताड़कून आदि) ओ घास-पातक भक्षण सेहो करैछ, मतलब कि ई सब नैसर्गिक रूपेँ सर्वभक्षी(OMNIVOROUS) होइत अछि । तेँ एकरासभकेँ “सर्वभक्षी खटाँसु (खटाँस)” सेहो कहि सकैत छी । बंगालीभाषामे एकरा “गन्धगोकूल” या“खाटोश” कहल जाइत अछि । बाघ (बाल कविता) राजा मरि गेल,  राज तँऽ अछिए । सिंह मूइल सनि, बाघ तँऽ अछिए । जाहि जंगलमे सिंह अलोपित,  ताहि ठाँ राजा  बाघ तँऽ अछिए ।।*‍‍१ सिंहक छल साम्राज्य विश्व भरि । कहियो ओतबा नञि छल बाघक । सत्ता पलटल, सिंह बिलटि गेल, बिलटल तइयो बाघ तँऽ अछिए ।।*‍२ सभसँ  पैघ  बिलाड़ि  बाघ छी । तदनन्तर  सिंहक  अछि पदवी । पर जे हो,  सौंसे  जंगलमे,  मार्यारक  साम्राज्य  तँऽ  अछिए ।। भारत,   दच्छिन−पूब  एसिया । हिन्द-पड़ोसी   आ  साइबेरिया । एसियाक ओ मात्र धरोहरि,  दुनिञा भरिमे  धाख तँऽ  अछिए ।।*‍३ चामक रंग छै  लाल - नारंगी । ताहि पर  कारी - कारी पट्टी । पेट, गाल, नाङ्गरि छी उज्जर; कारी धारीक छाप तँऽ अछिए ।। जे  कहबैछ   बंगालक  बाघ । छी  पूरा  भारत  केर  बाघ । अंग्रेजक देल नाम ई भ्रामक,  ऊघैत एखनहु  बाघ तँऽ अछिए ।।*‍४ नगर वाल्मीकि भारत केर छी । चितवन - परसा नेपालक छी । पछबारी मिथिला गण्डक तट, एखनहु शोभित बाघ तँऽ अछिए ।।*‍५ सभ  बिलाड़िकेँ  पानिक डऽर । एकरा  तक्कर  डऽर ने भऽर । सुन्दरवन गंगा - तिमुहानी,  दलदल तइयो  बाघ तँऽ अछिए ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - पहिने समस्त भारतवर्षमे सिंहक साम्राज्य छल । एक्कहि जंगलमे सिंह (LION, Panthera leo) आ बाघ (TIGER/TIGRE, Panthera tigris) दूनू रहैत छल आ ताहि समएमे सिंहकेँ जंगलक राजा कहल जाइत छल । धीरे - धीरे शिकारक कारण सिंहक संख्या बहुत तेजीसँ घटल । घटल तँऽ बाघक संख्या सेहो, मुदा सिंह अपेक्षा कम तेजीसँ । आ जाहि ठाम सिंह अलोपित भऽ गेल ताहि जंगलक राजा बाघकेँ कहल जाए लागल । अछिअहि = (अछिअ + इ + ह) = (अछिए + ह) = (अछिए + ……… ह केर लोप) = अछिए *‍२ - बहुत पहिने सिंहक साम्राज्य बाघक तुलनामे बहुत विस्तृत छल । सिंह पहिने सम्पुर्ण भारतवर्षक जंगलमे पर्याप्त मात्रामे (सम्भवतः बाघसँ बेसी मात्रामे) छल ।  समय बदलल, परिस्थिति उनटि गेल आ आब गुजरातक गिरिवनकेँ छाड़ि सिंह समूचा भारतक जंगलसँ अलोपित भऽ गेल । सिंहक तुलनामे बाघक स्थिति भारतमे बहुत बेसी नीक अछि । आ सिंहक अनुपस्थितिमे बाघहि जंगलक राजा भेल । *‍३ - बाघ प्राकृतिक रूपसँ मात्र एसिया महादेशमे भेटैत अछि । भारतक संगहि भारतक पड़ोसी देशसभ, आन दच्छिन-पूब एसियाक देशसभ आ रूसक साइबेरिया प्रदेशक दच्छिन-पूब भागमे भेटैत अछि । तेँ ओ खास तँऽ अछिए । *‍४ - ईस्ट इण्डिया कम्पनीक बंगाल स्टेटमे ताहि समय आजुक पच्छिम बंगालक अतिरिक्त बिहार (मिथिला सहित), उड़ीसा आ बाङ्ग्ला देश अबैत छल । ओ लोकनि सुन्दरवनमे बाघकेँ देखि कऽ ओकर नाम “रॉयल बंगाल टाइगर (ROYAL BENGAL TIGRE)” राखि देलन्हि जखनि कि ताहि समयमे बाघ समस्त अविभाजित भारतक जंगलसभमे सामान्य रूपसँ भेटैत छल । ताहि समय अपना दिशि भेटए बला बहुत रास जीव-जन्तु ओ गाछ-बिरिछक नाम बंगालक नामसँ राखि देल गेल जे भ्रामक छल आ अछि । तहिना ई बाघ सेहो । कोनहु जैववैज्ञानिक नाँओमे जञो “बेंगालेन्सिस (bengalensis / benghalensis)” प्रत्यय जुड़ल होअए तँऽ बेसी सम्भावना जे ओ जैव-जाति वा प्रजाति अपना दिशि सेहो सामान्य रूपसँ भेटैत होयत । *‍५ - मिथिलाक पछबारी सीमा पर गण्डकक तट पर अवस्थित जंगलसभमे एखनहु बाघकेँ देखल जा सकैत अछि । पच्छिम चम्पारणक“वाल्मीकि राष्ट्रिय उद्यान” (VALMIKI NATIONAL PARK & WILDLIFE SANCTUARY) केर “वाल्मीकि बाघ रिजर्व” (VALMIKI TIGER RESERVE / VTR) भारतमे बाघक प्रमुख प्राकृतिक आवास क्षेत्रमेसँ एक अछि । एकरहि ठीक उत्तर भऽर नेपालक सीमामे अवस्थित “चितवन राष्ट्रिय निकुञ्ज” (CHITWAN NATIONAL PARK) आओर “पर्सा वन्यजन्तु आरक्ष” (PARSA WILDLIFE RESERVE) सेहो बाघक प्राकृतिक आवास क्षेत्र अछि । एहिमेसँ चितवन राष्ट्रिय निकुञ्जकेँ युनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व सम्पदा क्षेत्र (WORLD HERITAGE SITE) केर श्रेणीमे सम्मिलित कएल गेल अछि । वास्तवमे ई तीनू वन्य क्षेत्र मीलि कऽ एक गोट बाघ आरक्ष एकाई केर रचना करैछ जकरा “चितवन-पर्सा-वाल्मीकि बाघ आरक्ष एकाई” (CHITWAN-PARSA-VALMIKI TIGER CONSERVATION UNIT or CPV-TCU) कहल जाइत अछि । *‍६ - बिलाड़ि कुलक आन सदस्य सभकेँ पानिसँ बड़ डऽर होइत अछि । “तीतल बिलाड़ि” - एक गोट प्रशिद्ध कहबी छै । मुदा “बाघ” आ“जगुआर” एहेन सदस्य अछि जकरा पानिसँ डऽर - भऽर नञि होइत छै । ई दूनू पानिमे बहुत दूर धरि आ बहुत काल धरि हेलि सकैत अछि। तेँ बाघकेँ सुन्दरवन सनि तिमुहानीक (DELTA) दलदली क्षेत्रमे सेहो कोनहु असौकर्य नञि होइत छै । बिलाड़ि (बाल कविता) बाघक मौसी  कहै छी  जकरा,  तकरहि नाम “बिलाड़ि” छै । एक्कहि कुल केर  जीव दुनु छै,  बहुतहि छोट  बिलाड़ि छै ।। छोट  ओकर  कद-काठी छै तेँ,  विचरि  रहल  निर्बाध छै । पैघ बिलाड़ि जेकाँ ओक्कर नञि, सिकुड़ि रहल साम्राज्य छै ।। कखनहुँ म्याँउ-म्याँउ बाजैत अछि, खन गुम्हरैत आबाज छै । घऽर-आङ्गन  कि  बाध-बोन,  सभठाँ  मार्यारक  राज छै ।। अपना  मिथिलामे  प्रशिद्ध  बड़,  “गोनू झाक बिलाड़ि” छै ।*‍१ एतबा कीर्त्ति  जे  कहबी बनि गेल,  “गोनू झाक बिलाड़ि छै” ।। मांसुभक्षी  आ  चतुर  शिकारी,  मूसक  करैछ  शिकार  छै । माछक  चाट  बहुत छै  ओकरा,  दूधक  सद्यः काल  छै ।। जतए बिलाड़िक पहुँच असम्भव,  “सीक” एहेन निर्माण छै ।*‍२ सीक टुटल  तँऽ  भाग बिलाड़िक,  तेँ ई कहबी विधान छै ।। घर-आङ्गन जे भेटैछ हरदम, सएह कहबैछ “बिलाड़ि” छै । जंगल-झाड़  बिलाड़ि  रहैछ जे,  से तँऽ “बन-बिलाड़ि” छै ।।*‍३ तेनुआ ओ जगुआर जेकाँ ओ,  गाछ चढ़एमे  माहिर  छै । ऊँच भवन ओ गाछ-बिरिछसँ, कूदि जाइछ जग-जाहिर छै ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - गोनू झाक खिस्साक बिलाड़ि ततेक ने प्रशिद्ध भेल कि ओकरा नाम पर कहबीअहि बनि गेल । *‍२ - “सीक” वस्तुतः दूध, दऽही आ माखन आदिकेँ बिलाड़िसँ सुरक्षित रखबाक एकटा सस्ता लेकिन बहुत नीक उपाए छल । *‍३ - “बिलाड़ि” वस्तुतः मनुक्खहि केर परिवेशमे रहैत अछि आ जे जंगली परिवेशमे रहैत अछि से “बनबिलाड़ि” कहबैत अछि । बनबिलाड़िकेँ “खटाँसु” (उच्चारण - खटाँउस या खटौंस) अथवा “खटाँस” सेहो कहल जाइत अछि । मुदा “खटाँसु” या “खटाँस” शब्दक अन्तर्गत “बनबिलाड़िक” अतिरिक्त एकटा आन जन्तु सेहो अबैत अछि जकरा अंग्रेजीमे “सीवेट” (CEVET) कहल जाइत अछि । एकर गुणक आधार पर एकरा मैथिलीमे “गन्हबिलाड़ि” कहि सकैत छी (हलाँकि मैथिलीमे एकर ई नाँओ प्रचलित नञि अछि) । *‍४ - बिलाड़ि कुल (Family - FELIDAE) केर मात्र ४ टा सदस्य गाछ पर चढ़बामे माहिर होइत अछि । ओ चारू सदस्य अछि - तेन्दुआ (तेनुआ), जगुआर, बनबिलाड़ि आ स्वयं बिलाड़ि । सिंह या सिंघ (बाल कविता) सिंह  कहू  या  सिंघ कहू  अहँ, छी  ओ  तँऽ जंगल  केर राजा । पहिने छल विचरैत  विश्व  भरि, मुदा आब बाजल अछि  बाजा ।।*‍‍१ राज  ओकर  भारत भरिमे  छल, आ   सौंसे  पच्छिमक  एसिया । छाड़ि     सहारा     मरूभूमिकेँ, भेटैत छल  हर ठाम  अफ्रिका ।।*‍२ दू  शताब्दी   पहिने  धरि  तँऽ, यूरोपहुमे   बड़   रहैत   छल । प्रागैतिहासिक   कालक   युगमे, भरि अमेरिका ओ फिरैत छल ।।*‍२ आब तँऽ बाँचल ठाम-ठीम किछु, जतए  सुरक्षित  जंगल  अछि । भारत केर गुजरातक “गिरिवन”, ओत्तहि सिंहक  मंगल  अछि ।।*‍३ अछि प्रयास चलि रहल  बसाबी, सिंहकेँ     आनहु    जंगलमे । पहिल  खेप  छी  मध्य-प्रदेशक, “कुनो”  नाम  केर  जंगलमे ।।*‍४ तहिना  अफ्रिकाक  स्थिति  छै, ओत्तहु  कम्महि  सिंह  बचल । नवका    गिनतीमे    पहिनेसँ, सिंहक  संख्या  बहुत  घटल ।। पुरुष-सिंह  केर  गर्दनि पर  छै, केसरिया    केसक   “केसर” ।*‍५ सिंहनी केर  नञि रहैछ घेंट पर, लटकैत सुन्नर सनि “केसर” ।। इएह केसर केर कारण  सिंहक, नाम  “केसरी”    सेहो   पड़ल । इएह  “केसरी”  जतए - ततए, अछि  शूरत्वक पर्याय बनल ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१*‍२*‍३ - बहुत पहिने सिंहक साम्राज्य बाघक तुलनामे बहुत विस्तृत छल । सिंह पहिने एसिया, अफ्रिकाक अतिरिक्त यूरोप आ दूनू अमेरिका महादेशमे पाओल जाइत छल । करीब ‍दस हजार वर्ष पहिने अमेरिका महादेश आ प्रागैतिहासिक कालमे (PREHISTORIC ERA)यूरोपसँ विलुप्त भेल । भारतमे सेहो मात्र गुजरातक गिरवनमे किछु सिंह बाँचल अछि । हाँ, अफ्रिकाक सिंहसभक स्थिति भारतीय सिंहसभसँ किछु नीक अवश्य अछि । क्र॰सं॰ मैथिली नाँओ अंग्रेजी नाँओ जैववैज्ञानिक नाँओ सिंहक स्थिति १ भारतीय या एसियाक सिंह Asiatic Lion / Indian Lion / Persian Lion Panthera leo persica जिबैत (जिउत)  अछि २ अफ्रिकाक सिंह African Lions - collectively (Each subspecies with a different name individually) Panthera leo leo & other approx. 17-18 subspecies जिबैत (जिउत)  अछि ३ यूरोपक सिंह European Lion Panthera leo spelaea करीब २,५०० वर्ष पहिने विलुप्त ४ अमेरिकाक सिंह Americon Lion Panthera leo atrox करीब १०,००० वर्ष पहिने विलुप्त *‍४ - भारतमे एखन मात्र गुजरात राज्यक गिरिवनमे (GIR FOREST NATIONAL PARK & WILDLIFE SANCTUARY) सिंह बाँचल अछि जे कोनहु प्राकृतिक आफद या महामारीक कारण एक संगहि सुड्डाह भऽ सकैत अछि । एहि बातकेँ ध्यानमे रखैत भारत सरकार सिंहकेँ किछु आनहु जंगलसभमे पुनर्स्थापित करबाक प्रयास कऽ रहल अछि । एहेन पहिल प्रयास मध्य प्रदेशक “कुनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य”(KUNO - PALPUR WILDLIFE SANCTUARY) करबाक तैयारी भऽ रहल अछि । *‍५ - पुरुष सिंहक गर्दनिसँ चहु दिशि स्वर्णाभ पीयर (वा किछु प्रजातिमे पीयर-भूरा-कारी) रंगक केस लटकैत रहैत अछि जकरा संस्कृत आ मैथिलीमे “केसर” कहल जाइत अछि । इएह कारणेँ सिंहक एकटा पर्यायी नाँओ “केसरी” सेहो अछि । हिन्दीमे एकरा “आयाल” आ अंग्रेजीमे“मॅन” (MANE) कहल जाइत अछि । सिंहनीमे एहि तरहक संरचना नञि रहैत अछि । ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)2004-16. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽलेखकक नाम नैअछि ततऽसंपादकाधीन।विदेह- प्रथममैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHAसम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। कला-सम्पादन: ज्योति झा चौधरी। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि)ggajendra@videha.comकेँमेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि।रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचयआ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेता, से आशा करै छी। रचनाक अंतमेटाइप रहए, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहलअछि।एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै। ऐ ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मीठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-16सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटारचनाआ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाकअनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतुggajendra@videha.co.inपर संपर्क करू। ऐ साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरीआ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।५ जुलाई २००४ केँhttp://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html “भालसरिक गाछ”- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ”जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सिद्धिरस्तु विदे हwww.videha.co.inविदेहप्रथम मैथिलीपाक्षिक ई पत्रिकाwww.videha.comVideha Ist Maithili Fortnightly ejournal  'विदेह' २१० म अंक १५ सितम्बर २०१६ (वर्ष ९ मास १०५ अंक २१०)मानुषीमिह संस्कृताम्ISSN 2229-547X VIDEHA

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ही मत लक, । कक से भी | bas : Pe age जे GF = VER ATI S XN ay etna Ae ee a हा son किक soe Ney mA ra Noe ‘ cola — a Mote लय मैथिली - जगुआर हिल्‍दी - जगुआर संस्कृत... अंग्रेजी - JAGUAR जैववैज्ञा० नाम - Panthera onca नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

३७ न eS Seq साभार aon pisabay-com (freedownload) मैथिली - चीता (चित्रमें - अफ्िकाक चीता) हिल्‍दी - चीता संस्कृत - चित्रकः, चित्रकायः, तरक्षुः, चित्रव्याघ:,वेगवत्‌, द्वीपिनू अंग्रेजी - CHEETA (NORTH & EAST INDIAN ACCENT), CHEETAH (SOUTH & WEST INDIAN ACCENT), PANTHER, HUNTING LEOPARD जैंववैज्ञा८ नाम - Acinonyx jubatus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भर जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

Pee ae वि कु > Oo pe EPR ett ELE eae gt साभार सौंजन्य - pixabay.com (free download) अफ़िकाक चीता AFRICAN CHEETA Acinonyx jubatus

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